1. Bhrigu Sutra - Siddha Nath Sharma_text
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श्रीविश्वनाथोविजयति श्रीमन्महर्षिभृगुप्रणीतम्
भृगुसत्रम
रतलाम मण्डलान्तर्गत सुखेड़ा ग्रामनिवासी, काशीस्थ गवर्नमेण्ट संस्कृत महाविद्यालय परीक्षोत्तीर्ण, स्व० पं० श्रीरेवाशंकरात्मज राजज्योतिषी, रमल शास्त्री, अग्निहोत्री "नागदा"
पण्डित श्री सिद्धनाथशर्मकृत- सरलहिन्दीटीकासहितम् जन्मपत्रफलोपयोगी
खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन
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संस्करण : फरवरी २०१८, संवत् २०७४
मूल्य : ६० रुपये मात्र।
मुद्रक एवं प्रकाशक: खेमराज श्रीकृष्णदास, अध्यक्ष : श्रीवेंकटेश्वर प्रेस, खेमराज श्रीकृष्णदास मार्ग, मुंबई - ४०० ००४.
Cसर्वाधिकार : प्रकाशक द्वारा सुरक्षित
Printers & Publishers : Khemraj Shrikrishnadass, Prop: Shri Venkateshwar Press, Khemraj Shrikrishnadass Marg, 7th Khetwadi, Mumbai - 400 004.
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Printed by Sanjay Bajaj For M/s. Khemraj Shrikrishnadass Proprietors Shri Venkateshwar Press, Mumbai - 400 004, at their Shri Venkateshwar Press, 66 Hadapsar Industrial Estate, Pune 411 013.
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"धर्माधिकारपत्रमिदम्" । श्रीमच्छंकरोविजयतेराम्॥ स्टेट ग्वालियर तारील ८/३/३६ मुकाम सुखेड़ा जा० नं० ११७ श्रीमत्परमहंस परिव्राजकाचार्य पदवाक्य प्रमाण पारावारीण यम नियमासन प्राणायाम प्रत्याहारध्यानधारणा समाध्यष्टङ्गयोगाचरण निरूपित चक्रवर्तित्याद्य- नाद्यन्वच्छिन्नगुरुपरम्परा प्राप्त सकलवैभव निगमागमाखिल वेदान्तानुभवाब्धि- गताद्वैतभाव संजातशुद्धान्त:करण युक्त वैदिकमार्गप्रवर्तक श्रीकैलासक्षेत्रस्थित सुवर्ण हीरामणि माणिक्य मौक्तिक विलसन्मण्डप सिंहासनारूढ श्रीविष्णुप्रयागतीरनिवास सर्वतन्त्र स्वतन्त्र श्रीगुरुचरण कमलोपासनसंलब्ध श्रीमत्सुधन्वनः साम्राज्य प्रतिष्ठापनाचार्य श्रीमत् त्रोटकाचार्य परम्पराप्राप्त श्रीमन्महाराजाधिराजत्व विशिष्टज्योतिर्मठाधिपत्य षट्दर्शनस्थापनाचार्यऽ अखण्डभूमण्डलाचार्य जगद्गुरु श्रीनगर महास्थान राजधानी युक्त श्रीमन्महाराजाधिराज श्रीशङ्गराचार्य श्रीविश्वेश्वरानन्द करकमल संजाताभिषेकज्योतिर्मठाधीश्वर श्री १०८ श्री श्रीमन्महाराजाधिराज श्रीसदानंदगिरिस्वामिभि: प्रणीताः । मूलस्थान-बद्रिकाश्रम अवांतरसंस्थान भानपुरा, स्टेट इन्दौर स्वस्ति श्रीमत् परम शिष्योत्तम दयादान दाक्षिण्याद्यनेक सद्गुण गणालंकृत वेद विहित नित्य नैमित्तिक कर्मानुष्ठान तत्पर सकल निगमागम पारावारप्रवीण श्रीमच्छंकर चरण कमलार्चन तत्पर धर्मधुरन्धर राजज्योतिषी रमलशास्त्री पं० सिद्धनाथ अग्निहोत्री सुखेड़ा निवासी कोऊनमो नारायण स्मरण पूर्वक "पुत्र- पौत्राद्यखिलश्रिरञ्जीवेत्याशीर्वादाः प्रतिदिनंसमुल्लसतुतराम्"। विशेष श्रीशङ्गरस्वामी सच्चिदानन्दगिरि महाराज का शुभागमन मुकाम सुखेड़ा में मिति फाल्गुन शुक्लात्रयोदशी गुरुवार सं० १९९२ को हुआ और समस्त ब्रह्म समाज ने आचार्य श्री का स्वागत पूर्णरूप से किया परन्तु इस प्रान्त के विप्रवर्ग विद्या व ब्रह्म कर्म से हीन दृष्टिगोचर हुए यद्यपि आप धार्मिक शिक्षा तन मन से दे रहे हैं तथापि द्रव्याभाव के कारण विद्यालय गिरी स्थिति में है। यह पूर्ति भगवान् कैलासवासी शङ्कर अवश्य शीघ्र पूर्ण करेगा।
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हम आपके अतुल परिश्रम को देखकर धन्यवाद देते हुए साथ में सहर्ष यह भी आज्ञा प्रदान करते हैं कि आप अपने सत्कार्य पर अटल बने रहें तथा ब्राह्मणों के षट् कर्म व कर्मकाण्ड की शिक्षा सम्पूर्ण विप्र कुमारों को देकर सनातन धर्म का प्रचार करें व यथा शास्त्र धर्माधर्म विवेचनपूर्वक प्रायश्वित का भी आप निर्णय कर सन्मार्ग बताते रहें। समस्त प्रिय विप्रमण्डल शुभाशीर्वाद के साथ प्रेमपूर्वक सूचित किये जाते हैं कि आप लोग स्वधर्म (संध्योपासनादिक नित्यकर्म व) धर्म सम्बन्धी निर्णय गायत्री उपदेश व धर्म मर्यादा कायम रहे ऐसे समग्र शास्त्रोक्त वचन उक्त पण्डितजी से सहर्ष ग्रहण किया करें। इस गुरु आज्ञा का पालन प्रत्येक शिखा सूत्रधारी सानन्द पूर्वक स्वीकृत कर ब्रह्मकर्म और स्वधर्म की रक्षा करेंगे। इतिशम्।
महाराजा श्रीजी की आज्ञा से-अनेक आशीर्वादाः । Secretary H. H. Jyotirmathadipati Shreemat Jaganguru Shree Shankaracharya
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उपाधिपत्रमिदम् ॐ
श्रीचन्द्र संस्कृत महाविद्यालयस्य-
प्रमाणपत्रमिदम् आसभैरवम्, काशी मन्दसोर मण्डलान्तर्गत सुखेड़ा ग्राम निवासिनो माननीय पण्डित रेवाशड्कर भट्टस्यात्मजः श्रीपण्डित सिद्धनाथ शर्मा।
अयमेक विंशति वर्षेऽस्मद्विद्यालये व्याकरण, काव्य, कोश, ज्योतिषे, रमलशास्त्रादीन्यध्यीत्य समीचीनं नैपुण्यं गतः ।
अतोऽस्मैशीलवते "ज्योतिषरत्न" रमल शास्त्री चेत्युपाधिनाऽलंकृत्वेदं प्रमाणपत्रं प्रदीयते।
विक्रमाब्दीये- वेदान्तकेसरी १९८८ श्रावण मासे हः स्वामि दर्शनानन्दस्य श्रीचन्द्र- शुक्लपक्षे-एकादश्याम् चन्द्रवासरे, तदुनुसारे संस्कृत महाविद्यालयाध्यक्षस्य,
ता० २४/८।३१ ईशवीये आस भैरवं, काशी
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मानपत्रमिदम् ॐ
श्रीगायत्री-रुद्र-दुर्गा-महायज्ञसमितिपेटलावद, जिला झाबुआ, मध्यप्रदेश द्वारा समर्पित
"सन्मान-पत्र"
यह सन्मान-पत्र समर्पण करते हुए समिति को महान् हर्ष है कि रतलाम मण्डलान्तर्गत सुखेड़ानिवासी श्रीमान् माननीय पूज्य पंडित श्रीसिद्धनाथजी शास्त्री राज-ज्योतिषी ने यहां के श्रीगायत्री-रुद्र-दुर्गा महायज्ञ को २५ विद्वानों के साथ बड़े समारोह पूर्वक, आचार्य पद को सुशोभित कर वेद ध्वनि एवं शास्त्रोक्त विधि विधान से परिश्रम पूर्वक निर्विघ्र सम्पादन किया। जिससे चारों ओर से दूर दूर से आई असंख्य जनता श्रीयज्ञनारायण भगवान् के अपूर्व दर्शन कर परममुग्ध होकर कृतार्थ हुई। अतः आपकी इस सराहनीय पुनीत सेवासे समिति परम प्रसन्न होकर यह "सन्मानपत्र" सादर समर्पित करती है। इति।
यज्ञ-स्यल: श्री नीलकण्ठेश्वर महादेव- हः फतेराम गंगाराम सोना,
मंदिर, पेटलावद यज्ञाध्यक्ष: वै०शु०१०गु० वि०सं० २०१४ महायज्ञ-समिति, पेटलावद
सोमेश्वर चतुर्वेदी, बी० टी० सी० विशारद मन्त्री: - महायज्ञ-समिति, पेटलावद, मण्डल झाबुआ, (म० प्र०) दिनांक ९-५-१९५७ ई०
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श्रीहरि:
विनम्र-निवेदन
अप्रत्यक्षाणिशास्त्राणि विवादस्तेषु केवलस्।। प्रत्यक्षं ज्योतिषं शास्त्रं चन्द्रार्कौं यत्र साक्षिणौ ।।१।।
माननीय पाठकमहोदय, प्रायः यह तो सबको ही विदित है कि वेद के छः अंगों में से "ज्योतिषं नयनं स्मृतम्" इस प्रमाण से ज्योतिषशास्त्र वेद का छठवां अंगनेत्र माना गया। नेत्र का धर्म संसार की सम्पूर्ण वस्तुएं देखने का है। ज्योतिष के तीन स्कन्ध है सिद्धान्त, संहिता और जातक। सिद्धान्त वह है जो सूक्ष्मगणित द्वारा आकाश में ग्रह, नक्षत्र, तारा एवं राशि इनके उदय अस्त, योग, ग्रह, युद्ध तथा चन्द्र सूर्य ग्रहणादि का सुस्पष्ट ज्ञान होकर उनसे विश्व भर के अनेक शुभाशुभ फल जाने जाते हैं। संहिता वह है जो ग्रह बिम्बों के संयोगवश, दिन, रात्रि, समय, अयन, ऋतु एवं देश विदेशों में नाना प्रकार के शुभाशुभ उत्पातादि योग जाने जाते हैं। जातक वह है जो प्रत्येक जीवात्मा अपने अपने कर्मानुसार ८४ लाख योनियों में भ्रमण करता हुआ पुनः वह यहां जब जन्म लेता है तो ठीक उसी ही समय के इष्ट, लग्न, ग्रह, नक्षत्रादिवश उसके सुख दुःख, लाभ हानि, भाग्य, आयु आदि जीवनभर के सम्पूर्ण शुभाशुभ फल पूर्णतया जाने जाते हैं। हमारे प्रातःस्मरणीय त्रिकालज्ञ ऋषिमहर्षियों ने अपने तपोबल के प्रभाव से उपरोक्त यह सब ही भूत, भविष्य, वर्तमान तीनों काल प्रत्यक्ष जानकर तथा पूर्ण अनुभव करके इस महान् ज्योतिष शास्त्र की रचना की है। जिसकी सत्यता की साक्षी आज तक सारे संसार को स्वयं चन्द्र और सूर्य देते हुए अपनी जगमगाती हुई दिव्य ज्योति से प्रकाश का विकास प्रतिक्षण करते जा रहे हैं। उसी ज्योतिष शास्त्र का छोटा सा यह महामुनि भृगु रचित 'भृगुसूत्र' नामक जातक ग्रन्थ जन्मपत्री का फल बताने में अद्वितीय है। इसमें तन्वादि द्वादशभाव स्थित सूर्यादि नवग्रहों के द्वारा शरीर का सुख, धन, भाई, माता-पिता का सुख, तथा अरिष्ट, विद्या, रोग, शत्रु, स्त्री, भाग्योदय, ५
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विषयानुक्रमणिका
विषय पृष्ठ' विषय पृष्ठ
सप्तमे भौमफलम् २२ पंचमे गुरुफलम् ३५ अष्टमे भौमफलम् २३ षष्ठे गुरुफलम् ३६
नवमे भौमफलम् २३ सप्तमे गुरुफलम् ३६
दशमे भौमफलम् २४ अष्टमे गुरुफलम् ३७ एकादशे भौमफलम् २४ नवमे गुरुफलम् ३८
द्वादशे भौमफलम् २५ दशमे गुरुफलम् ३८ चतुर्थोऽध्याय: एकादशे गुरुफलम् ३८
लग्ने बुधफलम् २५ द्वादशे गुरुफलम् ३९ द्वितीये बुधफलम् २७ षष्ठोध्याय: तृतीये बुधफलम् २७ लग्ने भृगुफलम् ३९ चतुर्थे बुधफलम् २८ द्वितीये भृगुफलम् ४०
पंचमे बुधफलम् २९ पष्ठे बुधफलम् तृतीये भृगुफलम् ४१
२९ सप्तमे बुधफलम् चतुर्थे भृगुफलम् ४१
३० पंचमे भृगुफलम् ४२
अष्टमे बुधफलम् ३० पष्ठे भृगुफलम् ४३
नवमे बुधफलम् ३१ सप्तमे भृगुफलम्. ४३
दशमे बुधफलम् ३१ अष्टमे भृगुफलम् ४४ एकादशे बुधफलम् ३२ नवमे भृगुफलम् ४४
द्वादशे बुधफलम् ३२ दशमे भृगुफलम् ४५
पंचमोऽध्याय: एकादशे भृगुफलम् ४५
लग्ने गुरुफलम् ३३ द्वादशे भृगुफलम् ४६
द्वितीये गुरुफलम् ३३ सप्तमोऽध्याय: तृतीये गुरुफलम् ३४ लग्ने शनिफलम् ४६
चतुर्थे गुरुफलम् ३५ द्वितीये शनिफलम् ४७
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विषयानुक्रमणिका
विषय पृष्ठ विषय पृष्ठ
तृतीये शनिफलम् ४७ द्वितीये राहकेत्वोः फलम् ५२ चतुर्थे शनिफलम् ४७ तृतीये राहुकेत्वो: फलम् ५२ पश्चमे शनिफलम् ८८ चतुर्थे राहुकेत्वोः फलम् ५२ पष्ठे शनिफलम् ४८ पश्चमे राहुकेत्वोः फलम् ५२ सप्तमे शनिफलम् ४९ पष्ठे राहुकेत्वो: फलम् ५३ अष्टमे शनिफलम् ४९ सप्तमे राहुकेत्वोः फलम् ५३ नवमे शनिफलम् ५० अष्टमे राहुकेत्वोः फलम् ५३ दशमे शनिफलम् ५० एकादशे शनिफलम् नवमे राहुकेत्वोः फलम् ५४ ५० दशमे राहुकेत्वो: फलम् ५४ द्वादशे शनिफलम् ५१ एकादशे राहुकेत्वो: फलम् ५४ अष्टमोऽध्याय: द्वादशे राहुकेत्वोः फलम् ५४
लग्ने राहुकेत्वो: फलम् टीकांकारपरिचय: ५१ ५५ टीकासमाप्तिसमय: ५५
इति भृगुसूत्र की विषयानुक्रमणिका समाप्ता
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तीर्थयात्रा, राजभोग और किस वर्ष में धन प्राप्ति व किस वर्ष में शरीर में अरिष्टता एवं आयु आदि अनेकफल से पूर्णतया ठीक ठीक ही फलप्रद है। प्रस्तुत ग्रन्थ 'ज्योतिषंगारुढ़ीविद्यापितापुत्रैर्नदीयते' इस लोकोक्त्यानुसार अभी तक अलभ्य एवं अप्रकाशित रहने से सर्वजन तथा छात्रवृन्द इससे प्रायः सर्वदा वच्चित ही रहते थे। मेरे विद्याध्ययन काल में भगवान् श्रीशंकरजी के प्रसाद से मुझे काशी के एक वृद्ध प्रसिद्ध एवं प्रकाण्ड विद्वान् ज्योतिषी द्वारा २०० वर्ष का प्राचीन हस्तलिखित केवल मूलमात्र ही प्राप्त हुआ था। अतः मैंने सर्वोपकारार्थ इसकी सरल हिन्दी भाषाटीका महत्परिश्रम से बनाकर इस द्वितीय संस्करण में और भी उचित संशोधन कर ग्रन्थ के अन्त में ग्रहों का उच्च नीच शत्रु मित्रादि का आवश्यक उपयोगी चक्र और विविध प्रश्नों के सरलता पूर्वक निर्णय करने की चमत्कारिक केरल सिद्ध प्रश्नावली का संग्रह करके विश्ववित्यात "श्रीवेङ्गटेश्वर स्टीम्-प्रेस" बम्बई के अध्यक्ष महोदय, श्रेष्ठिवर्य्य श्रीमान् धर्म मूर्ति खेमराज श्रीकृष्णदासजी को यह पुंनः पुनः प्रकाशनार्थ राजनियमानुसार सर्वाधिकार पूर्वक सहर्ष सादर समर्पित किया है। अतएव आशा है कि ज्योतिष शास्त्र के प्रेमी महानुभावों को इससे कुछ भी उपकार होगा तो निज परिश्रम को सफल समझूँगा और अन्त में श्रीविद्वज्जनों से करबद्ध प्रार्थना है कि भ्रमवश यदि इसमें कोई तरह की त्रुटि रह गयी हो तो कृपया क्षमा प्रदान करेंगे। इति।
विनीत- पं० सिद्धनाथ शास्त्री, 'ज्योतिषरत्न रमल शास्त्री' पो० मु० सुखेड़ा, मण्डल रतलाम (म० प्र०)
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श्री:
भृगुसूत्र की विषयानुक्मणिका ***
विषय पृष्ठ विषय पृष्ठ
प्रथमोऽध्याय: तृतीये चन्द्रफलम् १२
लग्ने रविफलम् १ चतुर्थे चन्द्रफलम् १२
द्वितीय रविफलम् ३ पंचमे चन्द्रफलम् १३
तृतीये रविफलम् ४ षष्ठे चन्द्रफलम् १४
चतुर्थे रविफलम् ५ सप्तमे चन्द्रफलम् १४
पंचमे रविफलम् ६ अष्टमे चन्द्रफलम् १५
षष्ठे रविफलम् ६ नवमे चन्द्रफलम् १५
सप्तमे रविफलम् ७ एकादशे चन्द्रफलम् १६
अष्टमे रविफलम् ७ द्वादशे चन्द्रफलम् १६
नवमे रविफलम् ८ तृतोयोध्याय: दशमे रविफलम् ९ लग्ने भौमफलम् १७
एकादशे रविफलम् द्वितीये भौमफलम् १८
द्वादशे रविफलम् १० तृतीये भौमफलम् १९
द्वितीयोध्याय: चतुर्थे भौमफलम् २०
लग्ने चन्द्रफलम् ११ पंचमे भौमफलम् २०
द्वितीये चन्द्रफलम् ११ षष्ठे भौमफलम् २१
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विषयानुक्रमणिका
विषय पृष्ठ विषय पृष्ठ
सप्तमे भौमफलम् २२ पंचमे गुरुफलम् ३५ अष्टमे भौमफलम् २३ पष्ठे गुरुफलम् ३६ नवमे भौमफलम् २३ सप्तमे गुरुफलम् ३६ दशमे भौमफलम् २४ अष्टमे गुरुफलम् ३७ एकादशे भौमफलम् २४ नवमे गुरुफलम् ३८ द्वादशे भौमफलम्ं २५ दशमे गुरुफलम् ३८ चतुर्थोऽध्याय: एकादशे गुरुफलम् ३८ लग्ने बुधफलम् २५ द्वादशे गुरुफलम् ३९ द्वितीये बुधफलम् २७ षष्ठोध्याय: तृतीये बुधफलम् २७ चतुर्थे बुधफलम् लग्ने भृगुफलम् ३९ २८ द्वितीये भृगुफलम् ४०
पंचमे बुधफलम् २९ तृतीये भृगुफलम् ४१ षष्ठे बुधफलम् २९ चतुर्थे भृगुफलम् ४१ सप्तमे बुधफलम् ३० पंचमे भृगुफलम् ४२ अष्टमे बुधफलम् ३० पष्ठे भृगुफलम् ४३
नवमे बुधफलम् ३१ सप्तमे भृगुफलम् ४३ दशमे बुधफलम् ३१ अष्टमे भृगुफलम् ४४ एकादशे बुधफलम् ३२ नवमे भृगुफलम् ४४
द्वादशे बुधफलम् ३२ दशमे भृगुफलम् ४५
पंचमोऽध्याय: एकादशे भृगुफलम् ४५
लग्ने गुरुफलम् ३३ द्वादशे भृगुफलम् ४६
द्वितीये गुरुफलम् ३३ सप्तमोऽध्याय: तृतीये गुरुफलम् ३४ लग्ने शनिफलम् ४६
चतुर्थे गुरुफलम् ३५ द्वितीये शनिफलम् ४७
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विषयानुक्मणिका
विषय पृष्ठ विषय पृष्ठ
तृतीये शनिफलम् ४७ द्वितीये राहुकेत्वो: फलम् ५२ चतुर्थे शनिफलम् ४७ तृतीये राहुकेत्वो: फलम् ५२ पश्चमे शनिफलम् ४८ चतुर्थे राहुकेत्वो: फलम् ५२ पष्ठे शनिफलम् ४८ पश्चमे राहुकेत्वो: फलम् ५२ सप्तमे शनिफलम् ४९ पष्ठे राहुकेत्वोः फलम् ५३ अष्टमे शनिफलम् ४९ सप्तमे राहुकेत्वोः फलम् ५३ नवमे शनिफलम् ५० अष्टमे राहुकेत्वोः फलम् ५३ दशमे शनिफलम् ५० नवमे राहुकेत्वोः फलम् ५४ एकादशे शनिफलम् ५० दशमे राहुकेत्वोः फलम् ५४ द्वादशे शनिफलम् ५१ एकादशे राहुकेत्वो: फलम् ५४
अष्टमोऽध्याय: द्वादशे राहुकेत्वोः फलम् ५४
लग्ने राहुकेत्वोः फलम् ५१ टीकांकारपरिचय: ५५ टीकासमाप्तिसमय: ५५
इति भृगुसूत्र की विषयानुक्रमणिका समाप्ता
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श्री: श्रीमहर्षिभृगुविरचितम्
भृगुसूत्रम् ***
हिन्दीटीकासहितम्
अथ तन्वादिद्वादशभावस्थितरविफलमाह तत्रादौ लग्ने रविफलम्- आरोग्यं भवति ॥१। पित्तप्रकृतिः नेत्ररोगी ॥२। मेधावी सदाचारो वा ॥३। उष्णोदरवान् ॥४॥ मूर्खः पुत्रहीनः ॥५॥ तीक्ष्णबुद्धिः ।।६।। अल्पभाषी प्रवासशील: सुखी ॥७॥ स्वोच्चे कीत्तिमान् ।।८।। बलिनिरीक्षिते विद्वान् ।।९।। नीचे प्रतापवान् ॥१०॥ ज्ञानद्वेषी दरिद्रः अन्धकः ॥११॥ शुभदृष्टे न दोषः ॥१२।। सिंहे स्वांशे नाथः ॥१३॥ कुलीरे ज्ञानवान् ॥१४। रोगी बुद्बुदाक्षः ॥१५॥ मकरे हृद्रोगी ॥१६॥ मीने स्त्रीजनसेवी॥१७॥ कन्यायां रवौ कन्याप्रजः दारहीनः कृतघ्नश् ॥१८। क्षेत्री शुभयुक्त: आरोग्यवान् ॥१९॥पापयुते शत्रुनीचक्षेत्रे तृतीये वर्षे ज्वरपीड़ा॥।२०॥ शुभदृष्टे न दोषः ॥२१।।
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२ भृगुसूत्रम् अथटीकाकार: स्वेष्टदेवनमस्कारमाचष्टे- श्रीपार्वतीपतिं नत्वा गुरुं चैव सरस्वतीम् । सिद्धप्रभकारीनाम्नी टीकेयं रच्यते मया।। जनानां रञ्जनार्थार्य दैवज्ञानां हिताय च । यस्या विज्ञानमात्रेण दैवज्ञो जायते ध्रुवम्।। सूर्य जन्म लग्न में हो तो निरोग्य होता है। पित्तप्रकृति और नेत्र में रोगवाला हो। बुद्धिमान् और अच्छा आचरण करनेवाला हो। जठराग्रि तेज हो ज्ञान से हीन और पुत्र से हीन हो। तीक्ष्णबुद्धिवाला हो। थोड़ा वोलनेवाला, परदेश में घूमनेवाला और सुखी हो। यदि सूर्य अपनी उच्च राशि (मेषराशि) में हो तो वह कीर्त्तिवाला होता है। बलवान् ग्रह देखते हों तो पण्डित होता है। यदि सूर्य नीच (तुलाराशि) में हो तो तेजस्वी होता है। और ज्ञान से वैर करनेवाला, दरिद्र और काणा होता है। शुभ ग्रह की दृष्टि होने पर उक्त, अनिष्ट फल दूर हो जाते हैं। सूर्य सिंह राशि में अथवा सिंह के नवांश में हो तो किसी स्थान का अधिपति होता है। कर्क राशि में हो तो ज्ञानी हो। और शरीर में रोग तथा फोड़े फून्सीवाला हो। मकर सूर्य राशि में हो तो हृदय में रोग हो। मीन राशि मे हो तो स्त्रियों की सेवा करनेवाला हो। कन्या राशि में सूर्य हो तो कन्या उत्पन्न करनेवाला हो, और स्त्री से हीन तथा किये हुए उपकार को नाश करनेवाला हो। सूर्य अपनी राशि (सिंहराशि) का हो तो अथवा शुभग्रहयुक्त हो तो आरोग्य होता है। सूर्य के साथ पाप ग्रह बैठे हों और शत्रु तथा नीच ग्रह के घर में हो तो ३ वर्ष में ज्वर से कष्ट हो। शुभ ग्रहों के देखने पर ये दुष्टफल नहीं होता है।१-२१।। "अत्रोदाहरणम्"- ॥ श्रीगणेशायनमः ॥ श्रीशुभ सम्वत् १९९९ शके १८६४ प्रवर्त्तमाने
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हिन्दीटीकासहितम् ३
रविरुत्तरायणगते, ग्रीष्मऋतौ, मासोत्तमे-आवाढ़ मासे कृष्णपक्षे, चतुर्थ्याम् सह पश्चम्यां तिथौ गुर्वासरे ५।५७ धनिष्ठोपरिशतभिषा- नक्षत्रे, १७-५१ प्रीत्युपरि आयुष्यमान योगे ४६-३१ तत्रश्रीसूर्योदया- दिष्ट घटयादि ३७।५ सूर्य: २-१६ लग्नस्पष्ट: ९-८-५२-० दिनमानम् ३३-२३ रात्रिमानम् २६-३७ अहोरात्रम् ६०-० भयातम् १७-४६ भभोग: ५८-३२ मकरलग्नोदये श्रीसकल कल्याणवती शुभ वेलायाम् सुखेड़ाग्रामवास्तव्य: पण्डितश्रीसिद्धनाथशास्त्रिणः गृहे चि० पुत्र रत्न जन्मः चरणभेदेन जन्मनाम "शिवकुमारः" इतिप्रतिष्ठितंराशि कुम्भः स्वामी मन्दश्र । आङ्लमतेन जन्मतिथ्यादिकं च (दिनांक २,७,१९४२ ईशवीयै) श्रीः जन्मकुण्डलीचक्रमिदम्
चं ११ के ९
१२ लं ८ १०
श्रीशुभम् १ ७ कल्याणंभवतु
बु २ श ४ मं ६ रा शु / सू ३ वृ ५
लग्नाद्द्वितीये रविफलम्
मुखरोगी ॥२२॥ पञ्चविंशतिवर्षे राजदण्डेन द्रव्यच्छेदः ॥२३। उच्चे स्वक्षेत्रे वा न दोषः ।२४।। पापयुते नेत्ररोगी ॥२५॥ स्वल्पविद्वान् रोगी ॥२६॥ शुभवीक्षिते धनवान् दोषादीन्
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४ भृगुसूत्रम् व्यपहरति ॥२७। नेत्रसौख्यम् ।२८।। स्वोच्चे स्वक्षेत्रे वा बहुधनवान् ॥२९॥ बुधयुते पवनवाक् ॥३०॥ धनाधिपः स्वोच्चे वाग्मी ॥३१। शास्त्रज्ञः ज्ञानवान् नेत्रसौख्यम् राजयोगश्च ।।३२।। लग्न से द्वितीय स्थान में सूर्य हो तो मुख में रोग हो। २५वें वर्ष में राजा के दण्ड से धन का नाश हो। यदि सूर्य उच्च (मेष) में हो अथवा अपने स्थान (सिंहराशि) में हो तो यह उक्तदोष नहीं होता है अर्थात् राजदण्ड से धन का नाश नहीं होता है। सूर्य के साथ पाप ग्रह बैठे हों तो नेत्र में रोग हो, और थोड़ा शास्त्र जाननेवाला तथा रोगी होता है। सूर्य को यदि शुभ ग्रह देखते हों तो धनी हो और इन अनिष्ट फलों का नाश होता है। और नेत्र का पूर्ण सुख हो। सूर्य अपने उच्च (मेष) में तथा अपने स्थान (सिंह) में हो तो बड़ा धनी हो। सूर्य के साथ बुध हो तो रुक २ कर बोलनेवाला हो। द्वितीय स्थान का स्वामी उच्च (मेष) में हो तो चश्चल वाणी बोलनेवाला हो। शास्त्र जाननेवाला, ज्ञानवान् नेत्र का सुखी, और राजयोगवाला होता है।२२-३२॥ लग्नात्तृतीये रविफलम् बुद्धिमान् अनुजरहितः ज्येषनाशः ॥३३॥ पञ्चमें वर्षे चतुरष्टद्वादशवर्षे वा किश्चित्पीडा ॥३४। पापयुते क्रूरकर्ता ।३५॥ द्विभ्रातृमान् पराक्रमी ॥३६।। युद्धे शूरश्र ।।३७।। कीर्त्तिमान् निजधनभोगी ॥३८॥ शुभयुते सोदरवृद्धिः ॥३९॥ भावाधिपे बलयुते भ्रातृदीर्घायुः ॥४०॥ पापयुते पापेक्षणवशा- न्नाशः॥४१॥ शुभवीक्षणवशाद्धनवान् भागीसुखी च।।४२।। लग्न से तीसरे घर में सूर्य हो तो बुद्धिमान्, छोटे भाई से हीन, और बड़े भाई मर जाते हैं। ५ वर्ष में अथवा ४।८।१२ वर्ष में कुछ शरीर पीड़ा हो। सूर्य
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हिन्दीटीकासहितम् ५
पाप-ग्रह से युक्त हो तो नीच कर्म करनेवाला हो। और दो भ्राता-वाला हो एव तेजस्वी होता है। संग्राम में शूरवीर हो कीर्तिवाला और अपने धन को भोगनेवाला होता है। सूर्य शुभ ग्रह से युक्त हो तो अपने सगे भ्राता की वृद्धि होती है। तृतीय स्थान का स्वामी बलवान् ग्रहों से युक्त हो तो भाइयों की दीर्घायु होती है। पापग्रह से युक्त हों व देखते हो तो भाई का नाश होता है। और शुभ ग्रहों के देखने से धनी सब आनन्द भोगनेवाला और सुखी होता है।३३-४२॥ लग्नाच्चतुर्थे रविफलम् होनाङ्ग: अहंकारी जनविरोधी उष्णदेही मनः पीडावान् ॥४३।द्वात्रिंशद्वर्षे सर्वकर्मानुकूलवान् ।४४।।बहुप्रतिष्ठिासिद्धि: सत्तापदवीज्ञान शौर्यसम्पन्नः ॥४५॥ धनधान्यहीनः ॥४६।। भावाधिपे बलयुते स्वक्षेत्रत्रिकोणे केन्द्रे लक्षणापेक्षया आन्दोलिकाप्राप्तिः ॥४७।पापयुते पाप वीक्षणवशाद्दुष्टस्थाने दुर्वाहनसिद्धि॥४८॥ क्षेत्रहीनः ॥४९॥ परगृह एव वास: ॥५०॥ लग्न से चौथे भवन में सूर्य हो तो अङ्ग से हीन, घमण्डी, मनुष्यों से कपट कपट करनेवाला, गरम शरीरवाला और चित्त हमेशा कष्ट में हो। ३२ वर्ष में सब कार्यों के अनुकूल हो। बहुत प्रतिष्ठा सिद्धिवाला, विख्यात पदवीवाला ज्ञान और बल से युक्त हो। और धनधान्य से रहित हो। चतुर्थ स्थान का स्वामी बलवान् ग्रहों से युक्त हो व राशि (सिंह) का हो अथवा ५-९ में व केन्द्र (१-४-७-१०) इन स्थानों में बैठा हो तो चिह्नानुसार पालकी तथा अच्छी २ सवारी प्राप्त हो। यदि पाप ग्रहों से युक्त हो व पाप ग्रह की दृष्टि होने पर खराब स्थान में नीच वाहन की सवारी प्राप्त होवे। मकान से रहित हो। और सर्वदा दूसरों के घर में वास करनेवाला होता है।४३-५०॥
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६ भृगुसूत्रम्
लग्नात्पश्चमे रविफलम् निर्धन: स्थूलदेही सप्तमे वर्षे पित्ररिष्टवान् ॥५१।। मेधावी अल्पपुत्र: बुद्धिमान् ॥५२। भावाधिपे बलयुते पुत्रसिद्धि: ॥५३॥ राहुकेतुयुते सर्पशापात् सुतक्षयः ॥५४॥। कुजयुते शत्रुयुते मूलात् ॥५५॥। शुभदृष्टयुते न दोषः ।५६।। सूर्यशरभादिषु भक्तः ॥५७॥ बलयुते पुत्रसमृद्धिः ।।५८।। लग्न से पांचवें भाव में सूर्य हो तो कगाल मोटा शरीरवाला और ७ वर्ष में पिता को अरिष्ट हो। बुद्धिमान् और अल्प पुत्रवाला हो। पश्चम स्थान का स्वामी ग्रहों के साथ युक्त हो तो पुत्र का पूर्ण सुख होता है। सूर्य के साथ राहु केतु युक्त हों तो नागदेव के शाप से पुत्र का नाश हों। मङ्गल युक्त होने पर शत्रु के कारण से पुत्र का नाश हो। सूर्य को शुभ ग्रह देखते अथवा युक्त होने पर ये कुफल न होता अर्थात् पुत्र का सुख होता है। और सूर्य मृग आदि जीवों में सेवा करनेवाला हो। सूर्य के साथ बली ग्रह युक्त होने पर पुत्र की वृद्धि होती है।।५१-५८।। लग्नात्षष्ठे रविफलम् अल्पज्ञातिः ॥५९। शत्रुवृद्धिः धनधान्यसमृद्धि ।६०।। विंशतिवर्षे नेत्र वैपरीत्यं भवति ॥६१॥ शुभदृष्टयुते न दोष: ॥६२।। अहिकाननपारकृन्मन्त्रसेवी ।६३।। कीर्तिमान् शोक- रोगी महोष्णदेही॥६४॥ शुभयुते भावाधिपे देहारोग्यम् ।६५।। ज्ञातिशत्रुबाहुल्यम् ॥६६। भावाधिपे दुर्बले शत्रुनाशः ॥६७। पितृदुर्बलः ॥६८।। लग्न से छठवें स्थान में सूर्य हो तो छोटी जातिका हो। शत्रु की वृद्धि और धनधान्य की वृद्धि हो। २० वर्ष में नेत्र में फूला आदि रोग उत्पन्न हो। सूर्य को शुभग्रह देखते हों अथवा युक्त हों तो यह फल नहीं होता है
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अर्थात् नेत्र का अच्छा सुख होता है। सर्प जंगल को पार करनेवाला व मन्त्र को जाननेवाला हो। यशवाला, चिन्ताकरनेवाला, रोगी और गरमशरीरवाला होता है। छठे स्थान का स्वामी शुभग्रह के साथ बैठा हो तो शरीर आरोग्य होता है। जाति में बहुत शत्रु हों। छठें स्थान का मालिक बलहीन हो तो शत्रु का नाश हो। और पिता कमजोर होता है।५९-६८।। लग्नात्सप्तमे रविफलम् विवाहविलम्बनं स्त्रीद्वेषी परदाररतः दारद्वयवान् ।६९।। पञ्चविंशतिवर्षे देशान्तर प्रवेशः ॥७०॥ अभक्ष्यभक्षणः विनोदशील: दारद्वेषी ॥७१।। नाशान्तबुद्धि। ॥७२।। स्वर्क्षे बलवति एकदारवान् ॥।७३। शत्रुनीचवीक्षिते पापयुते वीक्षणैर्बहुदारवान् ॥७४।। लग्नसे सातवें घरमें सूर्य होतो विवाह विलम्ब से हो स्त्रीसे विरोध करनेवाला, दूसरे की स्त्री से प्रेम करनेवाला और दो स्त्री होती हैं। २५ वर्ष में अन्य देश में गमन हो, और नहीं खाने योग्य पदार्थ का भक्षण हो। नम्रस्वभाववाला हो तथा स्त्री से कपट करनेवाला होता है। प्रत्येक कार्य को नष्ट करनेवाली बुद्धि हो सूर्य अपनी राशि (सिंह) का हो और बलवान् होने पर एक स्त्री हो यदि सूर्य को शत्रु तथा नीच ग्रह की दृष्टि होने पर अथवा पाप ग्रह सूर्य के साथ बैठे हों व देखते हों तो बहुत स्त्रियोंवाला होता है।६९-७४।। लग्नादष्टमे रविफलम् अल्पपुत्र: नेत्ररोगी ॥७५।। दशमे वर्षे शिरोव्रणी ।७६।। शुभयुतदृष्टे तत्परिहारः ॥७७॥ अल्पधनवान् गोमहिष्या- दिनाशः ॥७८। देहे रोगः ॥७९॥ ख्यातिमान् ॥८०।।
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८ भृगुसूत्रम् भावाधिपे बलयुते इष्टक्षेत्रवान् ।।८१।। स्वोच्चे स्वक्षेत्रे दीर्घायु: ॥८२। लग्न से आठवें भाव में सूर्य हो तो थोड़े पुत्र और नेत्र में रोग हो। १० वर्ष शिर में घाव हो। सूर्य के साथ शुभ ग्रह युक्त हो अथवा देखते हों तो मस्तक में घाव नहीं होता है। थोड़ा धनवाला, और गौ भैंस आदि पशु नाश हो जाते हैं। शरीर में सर्वदा रोगवाला हो, और प्रसिद्ध होता है। अष्टम स्थान का स्वामी बलवान् ग्रहों से युक्त हो तो इच्छानुसार खेतवाला हो। यदि सूर्य उच्च (मेष) का हो व अपने स्थान (सिंह) राशि में हो तो दीर्घायु होती है।७५-८२॥ लग्नान्नवमे रविफलम् सूर्यादिदेवता भक्तः ॥८३। धार्मिकः अल्पभाग्यः पितृद्वेषी सुतदारवान् स्वोच्चे स्वक्षेत्रे तस्य पिता दीर्घायुः ॥८४॥ बहुधनवान् तपोध्यानशील: गुरुदेवताभक्तः ॥८५॥। नीचारि- पापक्षेत्रे पापैर्युते दृष्टे वा पितृनाशः।।८६।। शुभयुते वीक्षणवशाद्वा पिता दीर्घायुः।८७॥ लग्न से नौवें भवन में सूर्य हो तो सूर्य, शिव आदि देवताओं की सेवा करनेवाला हो। पुण्य करनेवाला, थोड़ा भाग्यवाला, और पिता से विरोध करनेवाला, तथा पुत्र स्त्री से युक्त हो, यदि सूर्य उच्च का (मेंघ) अथवा अपने स्थान (सिंहराशि) में हो तो उसका पिता दीर्घायु होता है। बड़ा धनाढय हो, परमात्मा का भजन करने का स्वभाव हो, और गुरु तथा देवताभक्त होता है। सूर्य नीच (तुला) का हो शत्रु तथा पापग्रह के घर में व पाप ग्रह देखते हों व युक्त हों तो पिता का नाश होता है। सूर्य शुभग्रह से युक्त हो अथवा देखते हों तो पिता दीर्घायु होता है।।८३-८७॥
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हिन्दीटीकासहितम्
लग्नाद्दशमे रविफलम् अष्टादशवर्पे विद्याधिकारेण प्रसिद्धो भवति द्रव्यार्जनसमर्थश्र ॥८८। दृष्टित्रितः राजप्रियः सत्कर्मरतः राजशूर: ख्यातिमान् ॥।८९। स्वोच्चे स्वक्षेत्रे बलपरः ॥९०॥ कीर्तिप्रसिद्धिः ॥९१॥ तटाकक्षेत्रगोपुरादिब्राह्मणप्रतिष्ठासिद्धिः ॥९२। पापक्षेत्रे पापयुते पादृष्टिवशात् कर्मविन्नकरः ॥९३॥ दुष्टकृतिः ।।९४।। अनाचार: दुष्कर्मकृत्पापी ॥९५॥ लग्न से दशम स्थान में सूर्य हो तो १८ वर्ष में विद्या के प्रताप से प्रसिद्ध होता है और धन प्राप्त करने में भी समर्थ होता है। सूर्य को तीन ग्रह देखते हों तो राजा का प्रिय हो अच्छा कर्म करनेवाला, व राज्य में शूर वीर, और प्रसिद्ध होता है। सूर्य उच्च (मेष) का अथवा अपने स्थान (सिंह) का हो तो बली होता है। यश से प्रसिद्ध हो। बावड़ी स्थान, गौ, ग्राम ब्राह्मण, देवप्रतिष्ठा आदि कराने से प्रसिद्ध होता है। सूर्य पाप ग्रह के घर में हो अथवा पाप ग्रह से युक्त हो व देखते हों तो कोई कार्य करने में विघ्र हो। दुष्टकार्य करनेवाला हो। नीच आचरणवाला, भ्रष्टकर्मवाला और पापी होता है।।८८-९५॥ लग्नादेकादशे रविफलम् बहुधान्यवान् पश्चविंशतिवर्षे वाहनसिद्धि: ।९६।।धनवाग्जाल- द्रव्यार्जनसमर्थ: प्रभुज्वरितभृत्यजनस्नेहः ॥९७॥ पापयुते बहुधान्यव्ययः ॥९८।। वाहनहीन ॥९९॥ स्वक्षेत्रे स्वोच्चे अधिकप्राबल्यम् ॥१००॥ वाहनेशयुते बहुक्षेत्रे वित्ताधिकार: ॥१०१। वाहनयोगेन न बहुभाग्यवान् ॥१०२॥ लग्न से ग्यारहवें घर में सूर्य हो तो अत्यन्त धन धान्यवाला हो, २५ वर्ष में सवारी प्राप्त हो। धन, वाणी, और कपट से धन को उपार्जन ३
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१० भृगुसूत्रम् करने में समर्थ होता है, भयङ्कर ज्वर से कष्ट हो, और सेवकजनों पर प्रेम करनेवाला हो। सूर्य के साथ पापग्रह युक्त हो तो अधिक धन खर्च करनेवाला हो। सवारी से ही हीन हो। सूर्य अपने स्थान (सिंह) का अथवा उच्च (मेष) का हो तो अत्यन्त बलवाला हो, सूर्य के साथ चतुर्थ स्थान का स्वामी युक्त हो तो बहुत स्थानों में धन का अधिकार हो। चतुर्थस्थान के स्वामी के साथ हो तो रवि अल्पभाग्यवाला होता है।। ९६-१०२।। लग्नाद्द्वादशे रविफलम् षट्त्रिंशद्वर्षे गुल्मरोगी ॥१०३। अपात्रव्ययकारी पतितः धनहानिः ॥१०४।। गोहत्यादोषकृत् परदेशवासी ।।१०५।। भावाधिपे बलयुते वा देवतासिद्धि: ॥१०६।। शय्याखट्वाङ्गा- दि सौख्यम् ॥१०७॥ पापयुते अपात्रव्ययकारी सुखशय्याहीन: ।१०८।। षष्ठेशयुते कुष्ठरोगयुतः शुभदृष्टियुते निवृत्ति: ॥१०९॥ पापी रोगवृद्धिमान् ॥११०॥ लग्न से बारहवें भवन में सूर्य हो तो ३६ वर्ष में गुल्म रोग हो। नीच स्थान में खर्च करनेवाला, भ्रष्ट, और धन की हानि करनेवाला होता है। गोहत्या आदि दोष को करनेवाला, और परदेश में रहनेवाला होता है। यदि द्वादश स्थान का स्वामी बलवान् ग्रह से युक्त हो तो देवता को सिद्धकरनेवाला होता है। पलङ्ग आदि से सुख हो, सूर्य के साथ पाप ग्रह बैठे हों तो दुष्टस्थान में खर्च करनेवाला सुख और शय्या से हीन होता है। सूर्य के साथ षष्ठम स्थान का स्वामी युक्त हो तो कुष्ठरोगवाला हो, सूर्य को शुभग्रह देखते हों व युक्त हो तो यह दोष निवृत्त होता है अर्थात् कुष्ठ रोग नहीं होता हैं। पाप करनेवाला और रोग की वृद्धि होती
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हिन्दीटीकासहितम् ११ है॥१०३-११०॥
इति श्रीभृगुसूत्रे सिद्धप्रभाकरी टीकाभियुक्ते सूर्यभावाध्यायनाम प्रथमोऽध्यायः ॥१।
अथ तन्वादिद्वादशभावस्थितचन्द्रफलमाह तत्रादौ लग्ने चन्द्रफलम् रूपलावण्ययुत्तश्वपलः व्याधिना जलाच्चासौख्यः ॥१।। पश्चदशवर्षे बहुयात्रावान् ॥२। मेषवृषभ कर्कलग्ने चन्द्रे शास्त्रपरः ॥३। धनी सुखी नृपालः मृदुवाक् बुद्धिरहितः मृदुगात्र: बली ॥४॥ शुभदृष्टे बलवान् ॥५॥ बुद्धिमान् आरोग्यवान् बागजालकः धनी ।६।। लग्नेशे बलरहिते व्याधिमान् ॥७।। शुभदृष्टे आरोग्यवान् ।८। जब लग्न में चन्द्रमा हो तो सुन्दर स्वरूपवाला, चंचलरोग से युक्त और जल से भय प्राप्त होता है। १५ वर्ष में बहुत यात्रा करनेवाला हो। चन्द्रमा लग्न में मेष, वृष, कर्क इन राशियों में हो तो शास्त्र को जाननेवाला हो। और धनी, सुखी एव मनुष्यों की रक्षा करनेवाला, मधुरवाणी बोलनेवाला बुद्धि से हीन, व कोमल शरीरवाला, और तेजस्वी होता है। चन्द्रमा को शुभ ग्रह देखते हों तो बली होता है। और बुद्धिमान् निरोग्य शरीरवाला, कपटी वाणी बोलनेवाला तथा धनवान् होता है। यदि लग्न का स्वामी बल से हीन हो तो रोगी होता है। लग्नेश को शुभ ग्रह देखते हों तो आरोग्य होता है।१-८॥। लग्नाद्द्वितीये चन्द्रफलम् शोभनवान् बहुप्रतापी धनवान् अल्पसन्तोषी ।।९।।अष्टादश- वर्षे राजद्वारेण सेनाधिपत्ययोगः ॥१०॥ पापयुते विद्याहीनः
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१२ भृगुसूत्रम् ॥११। शुभयुते बहुविद्याधनवान् ॥१२॥ एकेनैव पूर्णचन्द्रेण संपूर्ण धनवान् ॥१३। अनेकविद्यावान् ॥१४।। लग्न से द्वितीय स्थान में चन्द्रमा हो तो सुन्दर अत्यन्त तेजस्वी, धनी, और थोड़ा सन्तोष करनेवाला हो। १८ वर्ष में राजद्वार में सेना का मालिक हो। चन्द्रमा के साथ पाप ग्रह बैठे हो तो विद्या से रहित हो। शुभ ग्रह बैठे हों तो बहुत प्रकार की विद्यावाला और धनाढय होता है। यदि केवल एक ही पूर्ण चन्द्रमा हो तो दूसरे घर में पूर्ण धनवाला हो और अनेक प्रकार की विद्या जाननेवाला होता है॥९-१४॥ लग्नात्तृतीये चन्द्रफलम् भगिनीसामान्यः वातशरीरी अन्नहीन: अल्पभाग्य: ।।१५।। चतुर्विशतिवर्षे भाविरूपेन राजदण्डयेन द्रव्यच्छेद: ॥१६॥। गोमहिष्यादिहीनः॥१७॥पिशुनःमेधावी सहोदरवृद्धिः।।१८।। लग्न से तीसरे भवन में चन्द्रमा हो तो मध्यम बहिन बाला और वातशरीरवाला होता है, तथा अन्न से हीन एवं मन्दभाग्य का होता है। २४ वर्ष में किसी कार्य के अपराध में राजा के दण्ड से धननाश हो, गौ भैंसे आदि पशुओं से हीन हो चुगली करनेवाला बुद्धिवाला और संग भाइयों की वृद्धिवाला होता है॥१५-१८॥ लग्नाच्चतुर्थे चन्द्रफलम् राज्याभिषिक्त: अश्ववान् क्षीरसमृद्धि: धनधान्यसमृद्धः मातृरोगी ॥१९॥ परस्त्रीस्तनपानकारी ॥२०॥ मिष्टान्नसम्पन्नः परस्त्रीलोल: सौख्यवान् ॥२१॥ पूर्णचन्द्रे स्वक्षेत्रे बलवान् मातृदीर्घायुः क्षीणचन्द्रे पापयुते मातृनाश: ।।२२।। वाहमहीनः बलयुते वाहनसिद्धिः ।२३।। भावाधिपे स्वोच्चे अनेकाश्वादि- वाहनसिद्धिः ।।२४।।
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हिन्दीटीकासहितम् १३
लग्न से चौथेभाव में चन्द्रमा हो तो राजयोगी, घोड़ावाला और दूध की वृद्धिवाला होता है, तथा धन धान्य से युक्त और माता रोगवाली हो। पराई स्त्री के स्तन को पीनेवाला हो। मीठा अन्न से युक्त दूसरे की स्त्री में आसक्त और सुखी होता है। यदि पूर्ण चन्द्रमा अपने स्थान (कर्क) राशिमें हो तो बली व माता दीर्घायु हो यदि पाप ग्रह से युक्त क्षीण चन्द्रमा हो तो माता का नाश होता है। और वाहन से रहित हो चन्द्रमा बलवान् ग्रहों से युक्त हो तो सवारी प्राप्त होवे। चतुर्थ स्थान का स्वामी उच्च में हो तो अनेक घोड़े की सवारी प्राप्त होती है॥१९-२४॥ लग्नात्पश्चमे चन्द्रफलम् स्त्रीदेवतासिद्धिः भार्या रूपवती ।।२५।। क्वचित् कोपवती ॥२६।। स्तनमध्ये लाञ्छनं भवति ॥२७॥ चतुष्पादलाभः स्त्रीद्वयं बहुक्षीरलाभः सत्त्वयुतः बहुश्रमोत्पन्नः चिन्तावान् स्त्रीप्रजावान् एकपुत्रवान् ।।२८।। स्त्रीदेवतोपासनावान् ।२९।। शुभयुते वीक्षणवशादनुग्रहसमर्थः।।३०॥ पापयुतेक्षण- वशान्निग्रहसमर्थः ॥३१॥ पूर्णचन्द्रे बलवान् अन्नदानप्रीतिः अनेकबुधप्रसादैश्वर्यसम्पन्नः सत्कर्मकृत् भाग्यसमृद्धः राजयोगी ज्ञानवान् ॥३२।। लग्न से पांचवें घर में चन्द्रमा हो तो स्त्री और देवता को वश में करनेवाला तथा सुन्दर स्त्रीवाला होता है। कभी स्त्री क्रोधवाली हो और कुच के बीच में चिह्न होता है। चतुष्पद जीवों का लाभ हो व दो स्त्रीवाला तथा अत्यन्त दूध से युक्त, सत्य बोलनेवाला अधिक परिश्रम करनेवाला रंजस्त्री तथा एक पुत्रवाला हो। स्त्री तथा देवता की सेवा करनेवाला होता है। यदि चन्द्रमा के साथ शुभ ग्रह बैठे हों वह देखते हों तो दया करने में समर्थ होता है। यदि पाप ग्रह बैठे हों व देखते हों तो
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१४ भृगुसूत्रम् दुष्टस्वभाव में समर्थ हो। पूर्णचन्द्रमा पश्चम स्थान में हो तो बली और अन्न का दान करनेवाला अनेक विद्वानों के आशीर्वाद से ऐश्वर्ययुक्त अच्छे कर्म करनेवाला भाग्यवान् राजयोगवाला और ज्ञानी होता है।२५-३२॥। लग्नात्पष्ठे चन्द्रफलम् अधिकदारिद्रयदेही ॥३३। षट्त्रिंशद्वर्षे विधवासङ्गभी तत्र पापयुते हीनपापकरः ॥३४॥ राहुकेतुयुते अर्थहीनः ॥३५॥ घोरः शत्रुकलहवान् सहोदरहीनअग्निमांद्यादिरोगी॥३६॥ तटाककूपादिषु जलादि गण्डः ॥३७। पापयुते रोगवान् ॥३८॥ क्षीणचन्द्रेपूर्णफलानि ॥३९॥ शुभयुते बलवान् अरोगी ॥४०॥ लग्न से छठे स्थान में चन्द्रमा हो तो अत्यन्त दरिद्र शरीरवाला हो। ३६ वर्ष में विधवा स्त्री के साथ भोग करनेवाला हो चन्द्रमा के साथ पापग्रह बैठे हो तो नीच पाप करनेवाला होता है। चन्द्रमा के साथ राहु केतु बैठे हों तो धन से रहित हो। भयङ्कर शत्रु से झगड़ा करनेवाला भाई से हीन और मन्दाग्निरोगवाला होता है। वा बड़ी कुँवा व जलादि से भयभीत हो। यदि चन्द्रमा क्षीण हो तो पूर्णफल प्राप्त होते हैं। चन्द्रमा के साथ पापग्रह युक्त हो तो रोगी हो। शुभग्रह युक्त हो तो बली और रोग रहित होता है॥३३-४०॥ लग्नात्सप्तमे चन्द्रफलम् मृदुभाषी पार्श्वनेत्र: द्वात्रिंशद्वर्षे स्त्रीयुक्तः ॥४१।। स्त्रीलोल: स्त्रीमूलेन ग्रन्थिशस्त्रादिपीडा ॥४२।। राजप्रसादलाभः।।४३।। भावाधिपे बलयुते स्त्रीद्वयम् ॥४४।। क्षीणचन्द्रे कलत्रनाशः ।। पूर्णचन्द्रे बलयुते स्वोच्चे एकदारवान् ॥४५॥भोगलुब्धः ॥४६॥ लग्न से सातवें भाव में चन्द्रमा हो तो कोमल वाणी बोलनेवाला,
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हिन्दीटीकासहितम् १५ समीप नेत्रवाला। और ३२ वर्ष में स्त्री से युक्त होता है। चश्चल स्त्रीवाला तथा स्त्री के कारण से गांठ और शस्त्रादि से पीड़ा हो। राजा की प्रसन्नता से लाभ होता है। सप्तम स्थान का स्वामी बलवान् ग्रहों से युक्त हो तो दो स्त्रीवाला हो। यदि चन्द्रमा क्षीण हो तो स्त्री का नाश हो। पूर्णचन्द्रमा हो और बली ग्रह युक्त हो, व उच्च (वृष) का हो तो एक ही स्त्री वाला होता है। एवं भोगविलास में लुब्ध रहता रहे॥ ४५-४६॥ लग्नादष्टमे चन्द्रफलम् अल्पवाहनवान् ।। तडाकादिषु गण्डः । स्त्रीमूलेन बन्धुजनपरित्यागी ॥ स्वर्क्षे स्वोच्चे दीर्घायुः क्षीणे वा मध्यमायुः ॥(क-ग) लग्न से आठवें भवन में चन्द्रमा हो तो थोड़े वाहनवाला। तालाब कूँवा आदि में डूबकर मरनेवाला, स्त्री के कारण अपने बंधुजनों को त्यागनेवाला हो। यदि चन्द्रमा अपनी राशि (कर्क) में उच्चस्थान (वृषभ) में हो तो दीर्घायु वाला हो, चन्द्रमा क्षीण हो तो मध्यम आयुवाला होता है (क-ग) लग्नान्नवमे चन्द्रफलम् बहुश्रुतवान् पुण्यवान् ॥४७।। तटाकगोपुरादिनिर्माणपुण्यकर्ता ।४८।। पुत्रभाग्यवान् ॥४९।। पूर्णचन्द्रे बलयुते बहुभाग्यवान् ॥५०॥ पितृदीर्घायुः ॥५१॥ पापयुते पापक्षेत्रे भाग्यहीनः ॥।५२॥ नष्टपितृमातृकः ॥५३। लग्न से नवम स्थान में चन्द्रमा हो तो अनेक शास्त्र सुननेवाला और धर्मात्मा होता है। घाट, ग्राम आदि बनानेवाला तथा धर्म करनेवाला हो। पुत्र भाग्यवान् हो। पूर्ण चन्द्रमा हो और बली ग्रहों से युक्त हो तो
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१६ भृगुसूत्रम् बड़ा भाग्यशील होता है, पिता दीर्घायुवाला होता है। यदि चन्द्रमा पाप ग्रह से युक्त हो वह पापग्रह के घर में हो तो भाग्य से हीन हो। और माता-पिता नष्ट हो जाते हैं।।४७-५३। लग्नाद्दशमे चन्द्रफलम् विद्यावान् ॥५४।। पापयुते सप्तविंशतिवर्ष विधवासङ्गमेन जनविरोधी ॥।५५।। अतिमेधावी ॥५६।। सत्कर्मनिरतः कीर्तिमान् दयावान ॥५७॥ भावाधिपे बलयुतेविशेसर्त्कसिद्धिः ।।५८। पापनिरीक्षिते पापयुते वा डुष्कृतिः ।।५९।। कर्मविघ्नकरः ॥६०॥ लग्न से दसवें घर में चन्द्रमा हो तो विद्यावाला हो, चन्द्रमा के साथ पापग्रह हो तो २७वे वर्ष में विधवा स्त्री के व्यभिचार करने से मनुष्यों का वैरी होता है। और अत्यंत बुद्धिमान् हो। श्रेष्ठ कर्म करने में आसक्त, यशवाला और दयालु होता है। दशम स्थान का स्वामी बलिग्रहों से युक्त हो तो अधिक पवित्र कर्म करनेवाला हो। यदि पाप ग्रह देखते हों व पापग्रह युक्त हो तो पाप कर्म करनेवाला हो। और हर कार्य में विघ्र करनेवाला होता है॥५४-६०॥ लग्नादेकादशे चन्द्रफलम् बहुश्रुतवान् पुत्रवान् उपकारी ।।६१।। पश्चाशद्वर्षेपुत्नर्णबहु- प्राबल्ययोगः ॥६२।। गुणाढयः ॥६३।। भावाधिपे बलहीने बहुधन व्ययः ।६४।। बलयुते लाभवान् ॥६५॥ लाभे चन्द्रे निक्षेपलाभः ॥६६। शुक्रयुतेन नरवाहन-योगः ॥६७॥। बहुविद्यावान् ।।६८।। क्षेत्रवान् अनेकजनरक्षणभाग्यवान् लग्न से ग्यारहवें भवन में चन्द्रमा हो तो बहुत शास्त्रों को सुननेवाला, पुत्रवाला और परोपकारी होता है। ५० वर्ष में पुत्र के ऋण
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हिन्दीटीकासहितम् १७
से छूटनेवाला हो अर्थात् पुत्र प्राप्ति हो। गुणों से युक्त हो, एकादश स्थान का स्वामी निर्बल हो तो अत्यन्त धन को खर्च करनेवाला होता है। बली ग्रहों से युक्त हो तो बहुत धन का लाभ हो। एकादश स्थान में चन्द्रमा होने पर पृथ्वी में धरी हुई वस्तु का लाभ हों, चन्द्रमा के साथ शुक्र बैठा हो तो मनुष्य की सवारी करनेवाला हो और नानाप्रकार की विद्या पढ़नेवाला हो। एवं घरवाला तथा बहुत मनुष्यों की रक्षा करनेवाला और बड़ा भाग्यशाली होता है।६१-६९।। लग्नाद्द्वादशे चन्द्रफलम् दुर्भोजन: दुष्पात्रव्ययः कोपोन्भवव्यसनसमृद्धिमान् स्त्रीयोग- युक्त: अन्नहीनः ॥७०॥ शुभयुते विद्वान् दयावान् पापशत्रुयुते पापलोक: शुभमित्रयुते श्रेष्ठलोकवान् ॥७१॥ लग्न से बारहवें भाव में चन्द्रमा हो तो खराब भोजन करनेवाला दुष्ट स्थान में खर्च करनेवाला क्रोध से कलह करनेवाला व उद्योग धनवाला स्त्रीरोग से युक्त हो और अन्न से रहित होता है। चन्द्रमा के साथ शुभग्रह बैठे हों तो पण्डित और दयालु हो, पापग्रह व शत्रुयुक्त हो तो नरक जानेवाला हो, यदि शुभ तथा मित्रग्रह बैठे हों तो स्वर्गलोक जानेवाला होता है।।७०-७१।।
इति श्रीभृगुसूत्रे सिद्धप्रभाकरीटीकाभियुक्ते चन्द्र भावाध्यायनामद्वितीयोऽध्याय: ॥२॥
अथ तन्वादिद्वादशभावस्थितभौमफलम् तत्रादौ लग्ने भौमफलम् देह व्रणं भवत ॥।१।। दृढगात्रः चौरबुभूषकः बृहन्नाभिः
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१८ भृगुसूत्रम् रत्तपाणिः शूरो बलवान् मूर्ख: कोपवान् सभानशौर्यः धनवान् चापलवान् चित्ररोगी क्रोधी दुर्जनः ॥२॥ स्वोच्चे स्वक्षेत्रे आरोग्यम् दृढगात्रवान् राजसन्मानकीर्तिः ॥३। दीर्घायुः ॥४॥ पापशत्रुयुते: अल्पायुः ॥५॥ स्वल्पपुत्रवान् वातशूलादिरोगः दुर्मुखः ॥६॥ स्वोच्चे लग्नक्ष धनवान् ।।७।। विद्यावान् नेत्रविलासवान्।।८।। तत्र पापयुते पापक्षेत्रे पापदृष्टियुते नेत्र: रोग: ।।९।। जन्मलग्न में मंगल हो तो शरीर में घाववाला होता है। मजबूत शरीरवाला चोर अच्छे होने की इच्छावाला बड़ी नाभि (डूठा) वाला लाल हाथ तेजस्वी बली, मूर्ख, क्रोधवाला सभा में निर्बली हो धनवान् तथा चश्चलतावाला नानाप्रकार के चित्रविचित्र रोगवाला क्रोधी और दुष्ट होता है। मङ्गल उच्च (मकर) का हो व अपने स्थान (मेष वृश्चिक्) में हो तो शरीर आरोग्य हो, पुष्ट शरीरवाला, राज्य में सत्कार पानेवाला और यश प्राप्त करनेवाला होता है। एवं दीर्घाय हो। मङ्गल के साथ पाप तथा शत्रु ग्रह बैठे हो तो अल्पायु होती है। थोड़े पुत्रवाला व वातशूलादि रोगवाला तथा खराब मुखवाला होता है। यदि मङ्गल उच्च (मकर) का हो तो धनाढय हो, विद्यावाला और नेत्र का पूर्ण सुखवाला होता है। मङ्गल के साथ यदि पापग्रह बैठे हो, पापग्रह के घर में हो अथवा पापग्रह देखते हो तो नेत्र में रोगवाला होता है।१-९।
लग्नादि्द्वितीये भौमफलम् विद्याहीन: लाभवान् ॥१०। षष्ठाधिनपेयुतः तिष्ठति चेन्नेत्रवैपरीत्यं भवति ॥११।। शुभदृष्टे परिहारः ॥१२।। स्वोच्चे स्वक्षेत्रे विद्यावान् ॥१३।। नेत्र विलासः ।१४।। तत्र पापयुतेक्षेत्रे पापदृष्टे नेत्ररोग: ।।१५।।
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हिन्दीटीकासहितम् १९
लग्न से द्वितीय स्थान में मंङ्गल हो तो विद्या से हीन, और धन का लाभवाला होता है। यदि मंगल छठे स्थान के स्वामी के साथ बैठा हो तो नेत्र में फूला आदि रोग होता है। यदि मंगल को शुभग्रह देखते हों तो यह उक्त दोष नहीं होता अर्थात् नेत्र का पूर्ण सुख प्राप्त होता है। मंगल उच्च (मकर) में हो व अपने स्थान (मेष वृश्चिक्) में हो तो विद्यावाला होता है। और नेत्र का सुखवाला हो। मंगल के साथ पापग्रह बैठे हों, व पापग्रह के घरमें हो अथवा पम्पग्रह देखते हो तो नेत्रमें रोगवाला होता है॥१०-१५॥ लग्नाततृतीये भौमफलम् स्वस्त्री व्यभिचारिणी ॥१६।। शुभदृष्टे न दोष अनुजहीनः ॥१७। द्रव्यालाभः ॥१८। राहुकेतुयुते वेश्यासङ्गमः ॥१९॥ भ्रातृद्वेषी क्लेशयुतः सुभगः ॥२०॥ अल्पसहोदरः ॥२१। पापयुते पापवीक्षणेन भ्रातृनाशः ॥।२२।। उच्चस्वक्षेत्रे शुभयुते भ्राता दीर्घायु: धैर्यविक्रमवान् ॥२३। युद्धे शूरः ॥२४॥ पापयुते मित्रक्षेत्रे धृतिमान् ।२५॥ लग्न से तीसरे घर में मंगल हो तो उसकी स्त्री व्यभिचार करनेवाली होती है। मंगल को शुभग्रह देखते हों तो उक्त अनिष्टफल नहीं होता है और छोटे भाई रहित हो। तथा धन से हीन होता है। मंगल के साथ राहु केतु बैठे हों तो वेश्या (रण्डी) से भोग करनेवाला हो और भाई से कपट करनेवाला, दुःख से युक्त, सुन्दर भगवाली स्त्रीवाला होता है। एवं थोड़े भाईवाला होता है। यदि मंगल पापग्रह से युक्त हो व देखते हों तो भाई का नाश हो। अथवा मंगल उच्च (मकर) राशि में हो व अपने स्थान (मेष वृश्चिक्) में हो तथा शुभग्रह से युक्त हो तो भाई दीर्घायुवाला व गम्भीर और प्रतापवाला होता है। संग्राम में शूरवीर
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हो, मंगल के साथ पापग्रह बैठे हों व मित्र के घर में हो तो धैर्यवाला होता है।१६-२५॥ लग्नाच्चतुर्थे भौमफलम् गृहच्छिद्रम् ॥२६।। अष्टमेवर्षे पित्ररिष्टं मातृरोगी ।।२७।। सौम्ययुते परगृहवासः ॥२८। निरोगशरीरी क्षेत्रहीनः धनधान्यहीन: जीर्णगृहवासः ॥२९॥ उच्चे स्वक्षेत्रे शुभयुते मित्रक्षेत्रे वाहनवान क्षेत्रवान् मातृदीर्घायुः ॥३०॥ नीचर्क्षे पापमृत्युयुते मातृनाशः ॥।३१।। सौम्ययुते वाहन निष्ठावान् ।।३२। बन्धुजनद्वैषी स्वदेश परित्यागी वस्त्रहीन: ।।३३।। लग्न से चौथे भवन में मङ्गल हो तो घर में कलहवाला हो। ८ वर्ष में पिता को अरिष्ट हो, और माता को रोग होता है। मङ्गल के साथ शुभग्रह बैठे हों तो दूसरे के घर में रहनेवाला हो। आरोग्य शरीरवाला, घर से हीन और धनधान्य से भी रहित तथा पुराने घर में रहनेवाला होता है। मङ्गल उच्च (मकर) में हो व अपने स्थान (मेष वृश्चिक्) में हो अथवा शुभ ग्रह से युक्त हो, व मित्र के घर में हो तो सवारीवाला, घरवाला और माता दीर्घायुवाला होता है। यदि मंगल नीच (कर्क) में हो व पापग्रह से युक्त हो, अथवा अष्टम स्थान के स्वामी के साथ युक्त हो तो माता का नाश होता है। यदि शुभग्रह युक्त हो तो सवारी की इच्छा करनेवाला होता है। और भाई तथा कुटुम्बियों से वैर करनेवाला, व अपने देश को छोड़नेवाला और वस्त्र से रहित होता है।।२६-३३।। लग्नात्पश्चमे भौमफलम् निर्धन: पुत्राभाव: दुर्मार्गी राजकोप: ।३४।। षष्ठवर्षे आयुधेन - किजिचद् गण्डकालः ॥३५॥ दुर्वासन ज्ञानशीलवान् ॥३६॥
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हिन्दीटीकासहितम् २१ मायावादी॥३७। तीक्ष्णधीः ॥३८।। उच्चे स्वक्षेत्रे पुत्रसमृद्धि: अन्न दानप्रियः ॥३९॥ राजाधिकारयोगः शत्रुपीड़ा ।।४०।। पापयुते पापक्षेत्रे पुत्रनाशः ॥४१।। बुद्धिभ्रंशादिरोगः ।।४२।। रन्ध्रेशे पापयुते पापी ॥४३॥ वीरः॥४४॥दत्तपुत्रयोगः ॥४५॥ लग्न से पश्चम स्थान में मङ्गल हो तो कंगाल, पुत्र से हीन, दुष्टमार्ग को जानेवाला, और राजा से क्रोध करनेवाला होता है। ६ वर्ष में शस्त्र से कुछ दण्ड प्राप्त होता है। दुष्ट जगह रहनेवाला और ज्ञान से युक्त होता है। और कपट करके बोलनेवाला हो, एवं तीक्ष्ण बुद्धिवाला होता है। मंगल उच्च राशि (मकर) व अपने स्थान में (मेष वृश्चिक्) राशि में हो तो पुत्र की वृद्धिवाला हो और अन्न का दान करने में बड़ा चतुर होता है। व राज्य का अधिकार प्राप्त हो, तथा शत्रु से पीड़ावाला होता है। यदि मंगल के साथ पाप ग्रह बैठे हों व पापग्रह के घर में हो तो पुत्र का नाश होता है। और बुद्धि के भ्रष्ट होने से रोगवाला हो। अष्टम स्थान का स्वामी पापग्रह से युक्त हो तो पापी होता है। और तेजस्वी तथा दूसरे का पुत्र दत्तक (गोदी) रखनेवाला होता है।३४-४५॥ लग्नात्षष्ठे भौमफलम् प्रसिद्धः ॥४६।। कार्यसमर्थः ॥४७॥ शत्रुहन्ता पुत्रवान् सप्तविंशतिवर्षे कन्यकाश्वादि युत ऊढवान् ॥४८॥ शत्रुक्षयः ।४९। पापर्क्षे पापयुते पापदृष्टे पूर्णफलानि ।।५०।। वातशूलादिरोगः ॥५१। बुधक्षेत्रयुते कुष्ठरोगः ॥५२। शुभ दृष्टेपरिहारः ।५३।। लग्न से छठवें भाव में मंगल हो तो प्रसिद्ध होता है और प्रत्येक कार्य करने में समर्थ हो, शत्रु को नष्ट करनेवाला, एवं पुत्रवाला हो, २७ वर्ष में कन्या वा घोड़ा आदि से युक्त हो, अथवा सवारी पर चढ़नेवाला हो
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२२ भृगुसूत्रम् तथा शत्रु का नाश करनेवाला होता है। मंगल यदि पापग्रह के घर में हो व पापग्रह युक्त हो व देखते हों तो यह पूर्ण फल प्राप्त होते हैं। और वातशूल आदि रोगवाला हो। मंगल बुध के स्थान (मिथुन कन्या) में हो तो कुष्ठ रोगवाला होता है। मंगल को शुभग्रह देखते हों तो उक्त अनिष्ट फल नहीं होता है।४६-५३॥। लग्नात्सप्तमे भौमफलम् स्वदारपीडा ॥५४। पापार्ते पापयुतेन च स्वर्क्षे स्वदार हानि: ॥५५॥ शुभयुते जीवति पत्यौस्त्रीनाशः ।५६।। विदेशपरः ।५७॥ उच्चमित्रस्वक्षेत्रशुभयुते पापक्षेत्रे ईक्षणवशात्कलत्र नाशः ॥।५८।। अथवा चोरव्यभिचारमूलेन कलत्रान्तरं दुष्टस्त्रीसङ्ग ॥५९॥ भगचुम्बनवान् ॥६०। चतुष्पादमैथुनवान् मद्यपानप्रियः ॥६१।। मन्दयुते दृष्ठे शिश्नचुंबन परः ॥६२॥ केतुयुते रजस्वलास्त्रीसम्भोगी ॥६३।। तत्रशत्रुयुते बहुकलत्न नाशः ॥६४।। अवीर: अहंकारी वा शुभदृष्टे न दोषः ।।६५।। लग्न से सातवें भवन में मंगल हो तो अपनी स्त्री रोगवाली हो। यदि मंगल पाप ग्रह के घर में हो व अपने स्थान (मेष वृश्चिक्) में हो तो अपनी स्त्री का नाश हो। शुभग्रह युक्त हो तो जीते हुए पति के स्त्री का नाश हो और परदेश में घूमनेवाला होता है। मंगल उच्च (मकर) का हो, व मित्र व अपने स्थान में (मेष वृश्चिक्) राशि में हो व शुभग्रह से युक्त हो अथवा पाप ग्रह के घर में हो व देखते हों तो स्त्री का नाश हो। और चोरी तथा व्यभिचार के कारण से अन्य दुष्ट स्त्री से भोग करनेवाला होता है। भग को चुम्बन करनेवाला हो, एवं चतुष्पद (चार पैर) वाले जीवों से मैथुन करनेवाला तथा मद्यपान करने में आसक्त होता है। मंगल के साथ शनि घैठा हो व देखता हो तो लिंग को चुम्बन
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करनेवाला यदि केतु युक्त हो तो रजस्वला स्त्री से भोग करनेवाला होता है। मंगल के साथ शत्रु ग्रह युक्त हो तो बहुत स्त्री नाश होती हैं। और निर्बली घमण्डी हो अथवा शुभग्रह देखते हो तो उक्त अशुभ फल नहीं होता है।५४-६५॥। लग्नादष्टमे भौमफलम् नेत्ररोगी: अर्धायु: पित्ररिष्टं सूत्रकृच्छरोग: ।६६।। अल्पपुत्न- वान् वातशूलादिरोग: दारसुखयुतः ॥६७। शुभयुते देहारोग्यम् दीर्घायु मनुष्यादिवृद्धिः ।६८।। पापक्षेत्रे पापयुते ईक्षणवशाद्वा- तक्षयादिरोग: सूत्रकृच्छ्राधिक्यं वा ॥६९॥ मध्यमायु: ॥७०॥ भावाधिपबलयुते पूर्णायु:।७१।। लग्न से आठवें भाव में मंगल हो तो नेत्र में रोगवाला, आधी उमरवाला, व पिता को अरिष्ट हो तथा मूत्र मल आदि रोगवाला होता है। और थोड़े पुत्रवाला होता है, वात शूलादि रोगवाला और स्त्री के सुख से युक्त होता है। मंगल के साथ शुभग्रह बैठे हों तो शरीर निरोग्य हो, दीर्घायुवाला हो और मनुष्यों की वृद्धिवाला हो। यदि मंगल पाप ग्रह के घर में हो व पापग्रह से युक्त हो व देखता हो तो बात क्षय आदि रोग होते हैं और मूत्र मल से रोग अधिक होते हैं। मध्यायुवाला हो। अष्टम स्थान का स्वामी बलवान् ग्रहों से युक्त हो तो पूर्णायुवाला होता है।। ६६-७१।। लग्नान्नवमे भौमफलम् पित्ररिष्टम् ।।७२।। भाग्यहीनः ।७३।। उच्चस्वक्षेत्रे गुरुदारग: ।।७४।। लग्न से नवम स्थान में मंगल हो तो पिता को अरिष्ट हो। व भाग्य से हित हो। यदि मंगल उच्च (मकर) का हो तथा अपने स्थान (मेष
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२४ भृगुसूत्रम् वृश्च्िक्) का हो तो गुरु की स्त्री से व्यभिचार करनेवाला होता है।।७२-७४॥। लग्नाद्दशमे भौमफलम् जनवल्लभः ॥७५॥ भावाधिपे बलयुते भ्राता दीर्घायुः ॥७६॥ विशेषभाग्यवान् ध्यानशीलवान् गुरुभक्ति युतः ।७७। पापयुते कर्मविघ्नवान् ॥७८।। शुभयुतेशुभक्षेत्रे कर्मसिद्धिः ।।७९।। कीर्तिप्रतिष्ठावान् अष्टादशवर्षे द्वव्यार्जनसमर्थः ॥८०॥ सर्वसमर्थ: दृढगात्र: चोरबुद्धिः पापयुते पापक्षेत्रे कर्मविघ्नकर: ।।८१। दुष्कृतिः।८२।। भाग्येशकर्मेशयुते महाराजयौवराज्येप- ट्टाभिषेकवान् ।।८३।। गुरुयुतेगजान्तैश्वर्यवान् ।।८४।। भूसमृद्धिमान् ।।८५।। लग्न से दशवें घर में मङ्गल हो तो मनुष्य का प्रेमी हो। दशम स्थान का स्वामी बली ग्रहों से युक्त हो तो भाई दीर्घायु हो और बड़ा भाग्यवाला, परमात्मा में ध्यान करनेवाला तथा गुरु की सेवा करनेवाला होता है। यदि पाप ग्रह युक्त हो तो कार्य में विघ्र करनेवाला हो। यदि मङ्गल शुभग्रह से युक्त हो वा शुभग्रह के घर में हो तो कार्य को सिद्ध करनेवाला होता है। कीर्ति वा प्रतिष्ठावाला, १८ वर्ष में धन संग्रह करने में समर्थ हो। सर्वकार्यों में समर्थ, पुष्टशरीरवाला, चोरबुद्धिवाला हो, यदि पापग्रह युक्त हो व पापग्रह के घर में हो तो कार्य में विघ्न करनेवाला होता है। दुष्टकर्म करनेवाला हो। मङ्गल नवम दशम स्थान के स्वामी से युक्त हो तो राजा और युवराजपदवी में अभिषिक्त होता है। मङ्गल के साथ गुरु बैठा हो तो हाथी की सवारी वाला। और भूमि से समृद्ध होकर बड़ा भाग्यशाली होता है॥७५-८५॥ लग्नादेकादशे भौमफलम् बहुकृत्यवान् धनी स्वगुणैराशुलाभवान् ।८६।। क्षेत्रेशयुते
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हिन्दीटीकासहितमू २५ राजाधिपत्यवान् ।८७।। शुभद्वययुते महाराजाधिपत्ययोग: ।८.८।। भ्रातृवित्तवान् ॥८९॥ लग्न से ग्यारहवें भवन में मंगल हो तो बहुत कार्यों को करनेवाला, धनाढय और अपने गुणों से शीघ्र लाभवाला होता है। मंगल, एकादशस्थान के स्वामी से युक्त हो तो राज्य का मालिक हो। दो शुभग्रह बैठे हों तो महाराज्य का स्वामी हो। और भाई धनवाला होता है।। ८६-८९॥ लग्नाद्द्वादशे भौमफलम् द्रव्याभावः वातपित्तदेहः ॥९०॥ पापयुते दाम्भिकः लग्न से बारहवें भाव में मङ्गल हो तो धन से हीन हो और वातपित्त रोगवाला शरीर होता है। यदि मङ्गल के साथ पाप ग्रह बैठे हों तो पाखण्ड करनेवाला होता है।।९०-९१।
इति श्रीभृगुसूत्रे सिद्धप्रभाकरीटीकाभियुक्ते भौमभावा- ध्यायोनाम तृतीयोऽध्यायः ॥३॥
अथ तन्वादिद्वादशभावस्थितबुधफलमाह तत्रादौ लग्ने बुधफलम् विद्यावान् विवाहादिबहुश्रुतवान् ॥१। अनेकदेशे सार्वभौमः मन्त्रवादी पिशाचोच्चाटन समर्थ: मृदुभाषी विद्वान् क्षमी दयावान् ॥२। सप्तविंशतिवर्षे तीर्थयात्रायोगः बहुलाभवान् बहुविद्यावान् ॥३। पापयुते पापक्षेत्रे देहे रोगः पित्तपांडुरोगः ॥४। शुभयुते शुभक्षेत्रे देहारोग्यम् ।।५।। स्वर्णकान्तिदेहः ज्योतिषशास्त्र पठितः अङ्गहीनः सज्जनद्वेषी नेत्ररोगी ।६।।
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२६ भृगुसूत्रम् सप्तदशवर्षे भ्रातृणामन्योन्यकलहः ।।७।। वंचकः ॥८।। उच्चस्वक्षेत्रे भ्रातृसौख्यम ।।९।। श्रेष्ठे लोकं गमिष्यति॥१०॥ पापयुते पापदृष्टयुते नीचर्क्षे पापलोकं गमिष्यति ॥११।। शय्यासुख वर्जितः क्षुद्रदेवतोपासकः ॥१२॥ पापमन्दादि युते वामनेत्रे हानि: षष्ठेशयुते नीचेशयुते वा न दोषः ।।१३।। अपात्रव्ययवान् ॥१४।। पापहा ॥१५। शुभयुते निश्चयेन धनधान्यादिमान् धार्मिकबुद्धिः॥१६।।अस्त्रवित् गणितशास्त्रज्ञः सौख्यवान् तर्कशास्त्रवित् दृढगात्र: ।।१७।। जन्म लग्न में बुध हो तो विद्यावाला, विवाह करनेवाला हो और बहुत शास्त्रों को सुननेवाला हो। बहुत देशों में घूमनेवाला वा यंत्र मन्त्र को जाननेवाला, भूत प्रेत को दूर करने में समर्थ मनोहर वाणी बोलनेवाला, पण्डित, क्षमा करनेवाला और दयालु होता है। २७ वर्ष में तीर्थयात्रा हो और अत्यन्त लाभ हो तथा नानाप्रकार की विद्या जाननेवाला होता है। बुध के साथ पापग्रह बैठे हों व पाप ग्रह के घर में हो तो शरीर में रोगवाला तथा पित्त पाण्डु, रोगवाला होता है। यदि शुभग्रह युक्त हो व शुभग्रह के घर में हो तो शरीर निरोग्य होता है। और सुवर्ण की कान्ति के समान सुन्दर शरीरवाला ज्योतिष शास्त्र को पढ़नेवाला, अंग से हीन, श्रेष्ठ मनुष्यों से कपट करनेवाला और नेत्र में रोगवाला होता है। १७ वर्ष में भाइयों का आपस में लड़ाई झगड़ा हो। और ठगी होता है। बुधयदि उच्च (कन्या) का हो व अपने स्थान (मिथुन कन्या) में हो तो भाइयों का सुख हो। और स्वर्गलोक जानेवाला होता है। यदि बुध के साथ पापग्रह बैठे हों व देखते हो तो अथवा नीच राशि (मीन) में हो तो नरकलोक जानेवाला होता है। और पलङ्गादि सुख से रहित क्षुद्रदेवता की पूजा करनेवाला होता है। बुध के साथ (शनि आदि पाप ग्रह बैठे हों तो बायें नेत्र में हानि हो, और षष्ठम स्थान का स्वामी युक्त हो व बृहस्पति युक्त हो तो यह उक्त
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हिन्दीटीकासहितम् २७
फल नहीं होता है। दुष्ट जगह खर्च करनेवाला और पाप को नाश करनेवाला हो यदि बुध शुभ ग्रह से युक्त हो तो निश्चय ही धन धान्यवाला हो तथा धर्म करनेवाली बुद्धि हो। शस्त्रविद्या व गणित शास्त्र को जाननेवाला, सुख एवं तर्कशास्त्रों को भी जाननेवाला और मजबूत शरीरवाला होता है।१-१७॥ लग्नाद्द्वितीये बुधफलम् पुत्रसमृद्धि: वाचालकः वेदशास्त्रविचक्षण: संकल्पसिद्धया संयुतः धनी गुणाढयः सद्गुणी पश्चदशवर्षे बहुविद्यावान् ॥१८।। बहुलाभप्रदः॥१९। पापयुते पापक्षेत्रे अरिनीचगे विद्याविहीनः ॥२०। क्रूरत्ववान् पवनव्याधि: ।२१।। शुभयुतिवीक्षणाद्धनी ।२२॥ विद्यावान् ॥२३। गुरुणा युते वीक्षिते वा गणितशास्त्राधिकारेण सम्पन्नः ।।२४।। लग्न से द्वितीय स्थान में बुध हो तो पुत्र की वृद्धिवाला बहुत बोलनेवाला वेदशास्त्र को जाननेवाला संकल्प कर कार्य को सिद्ध करनेवाला एवं धनी अच्छे अच्छे गुणों वाला और १५ वर्ष में नानाप्रकार की विद्या प्राप्त करनेवाला होता है। और विद्या के प्रताप से अत्यन्त लाभ हो। बुध के साथ पापग्रह युक्त हो व पापग्रह के घर में हो अथवा शत्रु तथा नीच (मीन) में हो तो विद्या से रहित होता है। और दुष्ट स्वभाववाला वायु के द्वारा रोगवाला होता है। यदि बुध के साथ शुभग्रह बैठे हों व देखते हों तो धनाढय हो व विद्यावाला हो। बुध के साथ बृहस्पति बैठा हो व देखता हो तो गणितशास्त्र के अधिकार में निपुण होता है॥१८-२४॥ लग्नतृतीये बुधफलम् भ्रातृमान् बहुसौख्यवान ।।२५।। पश्चदशवर्षे क्षेत्रपुत्रयुतः
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२८ भृगुसूत्रम् ॥२६॥ धनलाभवान् ॥२७॥ सद्गुणशाली ॥२८। भावाधिपे बलयुते दीर्घायुः धैर्यवान् ॥२९॥ भवाधिपे भ्रातृपीडा भीतिमान् ॥३०॥ बलयुते भ्राता दीर्घायु:॥३१॥ लग्न से तीसरे घर में बुध हो तो भाईवाला और अत्यन्त सुखवाला होता है। १५ वर्ष में स्थान व पुत्र से युक्त हो। धन का लाभवाला होता है। और अच्छे अच्छे गुणोंवाला होता है। यदि तृतीय स्थान का स्वामी बलवान् ग्रहों से युक्त हों तो गम्भीर और दीर्घायुवाला होता है। तृतीयस्थान का स्वामी निर्बल हो तो भाइयों को पीड़ा हो और डरपोक होता है, बलीग्रहों से युक्त हो तो भाई दीर्घायु होता है।।२५-३१।। लग्नाच्चतुर्थे बुधफलम् हस्तचापल्यवान धैर्यवान् विशालाक्षः पितृमातृसौख्ययुतः ।।३२। ज्ञानवान् सुखी ॥३३॥ षोडशवर्षे द्रव्यापहाररूपेण अनेकवाहनवान् ॥३४॥ भावाधिपे बलयुते आन्दोलिकाप्राप्ति: ॥३५॥राहुकेतुशनियुते वाहनारिष्टवान्॥३६॥।क्षेत्रसुखवर्जितः बन्धुकुलद्वेषी कपटी ॥३७॥ लग्न से चौथे भवन में बुध हो तो हाथ बड़े चच्चल हो, गम्भीर विशाल नेत्रवाला और माता पिता का सुख से युक्त होता है। ज्ञानी और सुखी हो। १६ वर्ष में धन को चुराने रूप से बहुत से वाहनवाला होता है। यदि बुध के साथ बृहस्पति शुक्र शनि ये बैठे हों तो अनेक वाहनवाला हो, चतुर्थ स्थान का स्वामी बली ग्रहों से युक्त हो तो पालकी प्राप्त होती है। बुध के साथ राहु केतु शनि बैठे हों तो वाहनों का अरिष्टवाला अर्थात् नहीं प्राप्त होते हैं और स्थान तथा सुख से हीन भाई व कुल से द्वेष करनेवाला और कपटी होता है।।३२-३७॥
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लग्नात्पश्चमे बुधफलम् मातुलागण्ड: मात्रादिसौख्यं पुत्रविध्नंमेधावी मधुरभाषी बुद्धिमान् ॥३८।। भावाधिपे पापयुते बलहीने पुत्रनाश: ॥३९।। अपुन्नदत्तपुत्रप्राप्तिः पापकर्मी मन्त्रवादी ।।४०।। लग्न से पश्चम स्थान में बुध हो तो मामा को गण्डवाला रोग हो, माता का सुखवाला, पुत्र सुख में विघ्नवाला, बुद्धिमान् मनोहर वाणी बोलनेवाला होता है। पश्चम स्थान का स्वामी पाप ग्रहों से युक्त हो व निर्बली हो तो पुत्र का नाश हो। पुत्र से रहित होकर दत्तकपुत्र प्राप्त हो, पाप कर्म करनेवाला एवं मन्त्रों को जाननेवाला होता है।३८-४०॥ लग्नात्षष्ठे बुधफलम् राजपूज्य: विद्याविघ्यः दाम्भिकः विवादशूरः ॥४१॥ त्रिंशद्वर्षे बहुराजस्नेहो भवति ॥४२।। पत्रादिलेखकः ॥४३॥ कुजर्क्षे नीलकुष्ठादिरोगी ॥४४॥ शनि राहुयुते केतुयुते वातशूलादि- रोगी ज्ञातिशत्रुकलहः ॥४५॥ भावाधिपे बलयुते ज्ञातिप्रबलः ॥४६। अरिनीचर्क्षे ज्ञातिक्षय: ।।४७।। लग्न से छठवें घर में बुध हो तो राजा का पूज्य हो, विद्या पढ़ने में विघ्न, धूर्त और कलह करने में शूरवीर होता है। ३० वर्ष में अत्यन्त राजा से प्रेम होता है। और पत्रादि लिखने में चतुर होता है। बुध यदि मंगल की राशि में (मेष वृश्चिक्) में हो तो नीलकुष्ठ रोगवाला हो। बुध के साथ शनि राहु केतु युक्त हों तो बातशूलादि रोगवाला और जाति के शत्रु से झगड़नेवाला होता है। यदि षष्ठमस्थान का स्वामी बली ग्रहों से युक्त हो तो जाति में बली होता है। बुध शत्रु के घर में हो व नीच (मीन) राशि में हो तो जातिनाश होती है।४१-४७॥
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३० भृगुसूत्रम्
लग्नात्सप्तमे बुधफलम् मातृसौख्यम् अश्वाद्यारूढो धर्मज्ञः उदारमतिः ।।४८।। दिगन्तविश्रुतकीर्ति: राजपूज्यः ॥४९॥तत्र शुभयुते चतुर्विशति- वर्षे आन्दोलिकाप्राप्तिः ।५०॥ कलन्रमतिः ।।५१।। अभक्ष्यभक्षण:॥।५२।। भावेशे बलयुते एकदारवान् ।५३।। दारेशे दुर्बले पापे पापर्कषे कुजादियुते कलन्न नाशः ।।५४।। स्त्रीजातके पतिनाश: कलत्रं कुष्ठ-रोगी ।५५॥ अरूपवत् लग्न से सातवें भवन में बुध हो तो माता का सुखवाला, घोड़ा पर चढ़नेवाला व धर्म को जाननेवाला और निर्मल एवं उदार बुद्धिवाला होता है। प्रत्येक दिशा में श्रवण कीर्तिवाला तथा राजा का पूज्य होता है। बुध के साथ शुभ ग्रह बैठे हों तो २४ वर्ष में पालकी प्राप्त हो। और स्त्री के अनुकूल बुद्धिवाला होता है व नहीं भक्षण करने योग्य वस्तु को खानेवाला होता है। सप्तमस्थान का स्वामी बलीग्रहों से युक्त हो तो एक ही स्त्रीवाला हो। यदि सप्तम स्थान का मालिक निर्बल हो व पाप ग्रह से युक्त हो अथवा पाप ग्रह की राशि में मंगल से युक्त होकर बैठा हो तो स्त्री का नाश होता है। यदि स्त्री की कुण्डली में ऐसा योग हो तो पति का नाश हो और स्त्री कुष्ठरोगवाली तथा कुरूपवती होती है।४५-५६॥ लग्नादष्टमे बुधफलम् आयु: कारक बहुक्षेत्रवान् ॥५७। सप्तपुत्रवान् ।।५८।। पश्चविंशतिवर्षे अनेकप्रतिष्ठासिद्धिः ।।५९।। कीर्तिप्रसिद्धः ॥६०॥ भावाधिपे बलयुते पूर्णायुः ॥६१॥ अरिनीचपापयुते अल्पायुः ॥६२॥ अथवा उच्चस्वक्षेत्रे वा शुभयुते पूर्णायुः ॥६३॥ लग्न से आठवें भवन में बुध हो तो आयु को प्राप्त करनेवाला और
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बहुत स्थानोंवाला होता है। सात पुत्रवाला तथा २५ वर्ष में नाना प्रकार की प्रतिष्ठा से प्रसिद्ध हो। और यश से भी विख्यात होता है। अष्टमस्थान का स्वामी बलीग्रहों से युक्त हो तो पूर्णायु हो। यदि अष्टम स्थान का स्वामी शत्रु के घर में व नीच (मीन) में हो अथवा पापग्रह युक्त हो तो अल्पायु हो। व उच्च राशि (कन्या) में हो एवं अपने स्थान (कन्या मिथुन) में हो अथवा शुभ ग्रहों से युक्त हो तो पूर्णायुवाला होता है।५७-६३।। लग्नान्नवमे बुधफलम् बहुप्रजासिद्धिः ।।६४।। वेदशास्त्रविशारदः संगीत पाठक: दाक्षिण्यवान् धार्मिक: प्रतापवान् बहुलाभवान् पितृदीर्घायु: ॥६५॥ तपोध्यान-शीलवान ।६६।। लग्न से नवम् स्थान में बुध हो तो बहुत सन्तानवाला हो और वेद शास्त्र के जानने में निपुण व गायन विद्या को पढ़नेवाला, बड़ा चतुर धर्म करनेवाला, तेजस्वी अत्यन्त लाभवाला और पिता दीर्घायुवाला होता है। श्रीपरमात्मा के चरणों में भक्ति ध्यान तथा भजन करने की प्रकृतिवाला होता है।६४-६६।। लग्नाद्दशमे बुधफलम् सत्कर्मसिद्धिः धैर्यवान् बहुलकीर्तिमान् बहुचित्तवान् ।६७।। अष्टाविंशतिवर्षे नेत्ररोगवान् ॥६८। उच्चस्वक्षेत्रे गुरुयुतेऽग्नि- ष्टोमादिबहुकर्मवान् ॥६९।। अरिपापयुते मूढकर्मविघ्नवान् दुष्कृतिः अनाचारः ।७०। लग्न से दशवें घर में बुध हो तो तो पवित्र कार्य को सिद्ध करनेवाला, गम्भीर, अतुल कीर्तिवाला और बहुत प्रकार के चित्तवाला होता है। २८ वर्ष में नेत्र में रोगवाला होता है। बुध उच्च (कन्या) में हो वा
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३२ भृगुसूत्रम् अपने स्थान (मिथुन कन्या) में हो अथवा बृहस्पति से युक्त हो तो अग्निष्टोम यज्ञादि पवित्र कर्म करनेवाला होता है। यदि बुध शत्रु के घर में पाप ग्रह के साथ युक्त हो तो मूर्ख कर्म को नाश करनेवाला व नीच पाप कर्म करनेवाला और भ्रष्ट आचरणवाला होता है।६७-७०॥ लग्नादेकादशे बुधफलम् बहुमङ्गलप्रदः ॥७१। अनेकप्रकारेण धनवान् ॥७२।। एकोनविंशतिवर्षादुपरि क्षेत्रपुत्रधनवान् दयावान् ।।७३।। पापर्क्षे पापयुते हीनमूलेन धनलोपः ।।७४।। उच्चस्वक्षेत्रे शूभमूलेन धनवान् ।७५॥ लग्न से ग्यारहवें भवन में बुध हो तो बहुत से मंगल कार्य प्राप्त होते हैं। और नाना प्रकार से धनवाला होता है। १९ वर्ष के बाद स्थान पुत्र व धन से युक्त हो और बड़ा दयालु होता है। बुध पाप ग्रह के घर में हो व पाप ग्रह से युक्त हो तो नीचकर्म के द्वारा धन का नाश हो। यदि बुध उच्च राशि (कन्या) में हो अपने स्थान (मिथुन कन्या) में हो तो शुभकार्य से धन का लाभ होता है।७१-७५॥ लग्नाद्द्वादशे बुधफलम् ज्ञानवान् ॥७६। वितरणशाली ॥७७॥ पापयुते चञ्चलचित्तः ।।७८।। नृपजनद्वेषी ॥७९।। शुभयुतेन धर्ममूलेन धनव्ययः ॥८०।। विद्याहीनः ।।८१।। लग्न से बारहवें भाव में बुध हो तो ज्ञानी हो। और कोई वस्तु देने में चतुर हो। बुध के साथ पापग्रह युक्त हो तो चश्चल चित्तवाला होता है। और राजा तथा मनुष्यों से वैर करने वाला हो। शुभग्रह बैठे हो तो धर्म के कारण से धन का खर्च होता है। और विद्या से रहित होता
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है।७६-८१॥ इति श्रीभृगुसूत्रे सिद्धप्रभाकरीटीकाभियुक्ते बुधभावा- ध्यायनामचतुर्थोऽध्यायः ॥४॥
अथ तन्वादिद्वादशभावस्थितगुरुफलमाह तत्रादौ लग्ने गुरुफलम् स्वक्षेत्रे शब्दशास्त्राधिकारी ॥१।। त्रिवेदी बहुपुत्रवान् सुखी चिरायुः ज्ञानवान् ॥२।। उच्चे पूर्णफलानि ॥३॥ षोडशवर्षे महाराजयोग: ॥४।। अरिनीचपापानां क्षेत्रे पापयुते वा नीचकर्मवान् ।।५।। मनश्चलत्ववान् मध्यायुः पुत्रहीनः स्वजनपरित्यागी कृतघ्नः गर्विष्ठः बहुजनद्वेषी साश्चरवान् पापक्लेशभोगी ।६।। जन्मलग्न में गुरु हो और अपने स्थान (धन मीन) में हों तो व्याकरण शास्त्र को जाननेवाला हो और तीन वेदों का ज्ञाता बहुत पुत्रोंवाला, सुखी बड़ी आयुवाला और ज्ञानी होता है। बृहस्पति यदि उच्च (कर्क) का हो तो ये पूर्ण फल प्राप्त होते हैं। १६ वर्ष में महा राजयोगवाला हो। गुरु शत्रु के व नीच राशि (मकर) में हो तथा पापग्रह के घर में व पाप ग्रह से युक्त हो तो नीच कर्म करनेवाला होता है। और चञ्चल चित्तवाला हो, मध्यायुवाला पुत्र से रहित अपने कुटुम्बियों को छोड़नेवाला, किये हुए उपकार को नहीं माननेवाला, कृतघ्न, घमण्डी, बहुत मनुष्यों से वैर रखनेवाला, पापी और दुःख भोगनेवाला होता है।१-६। लग्नाद्द्वितीये गुरुफलम् धनवान् बुद्धिमान् इष्टभाषी षोडशवर्षे धनधान्यसमृद्धि:
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३४ भृगुसूत्रम् बहुप्राबल्यवान उच्चस्वक्षेत्रे धनुषि द्रव्यवान् ।७॥ पापयुते विद्याविघ्रः ।।८।। चोरवश्चनवान् दुर्वचनः अनृतप्रियः ॥९॥ नीचक्षेत्रे पापयुते मद्यपानी भ्रष्टः ॥१०।। कुलनाशकः ॥११॥ कलत्रान्तरयुक्त: पुत्रहीन: ॥१२॥ लग्न से दूसरे स्थान में गुरु हो तो धनी, बुद्धिमान्, मनोहर वाणी बोलनेवाला हो। १६ वर्ष में धन धान्य की बहुत वृद्धि हो और अधिक प्रतापवाला होता है यदि गुरु उच्च (कर्क) का व अपने स्थान (धन मीन) राशि का हो तो महाधनी हो, यदि पापग्रह युक्त हो तो विद्या पढ़ने में विन्न हो और चोरी करनेवाला व ठगनेवाला, खराब वचन बोलनेवाला होता है तथा झूठ बोलनेवाला हो, यदि बृहस्पति नीच (मकर) राशि से हो और पापग्रह युक्त हो तो मद्यपान करनेवाला तथा भ्रष्ट होता है। कुटुम्ब का नाश करनेवाला दूसरे की स्त्री से युक्त हो तथा पुत्र से रहित होता है।७-१२॥ लग्नात्तृतीये गुरुफलम् अतिलुब्धः भ्रातृवृद्धिः दाक्षिण्यवान् संकल्प सिद्धिकरः ॥१३॥ बन्धुदोषकरः ॥१४॥ अष्टत्रिंसद्वर्षे यात्रासिद्धिः ।।१५।। भावाधिपे बलयुते भ्रातृदीर्घायुः ॥१६॥ भावाधिपे पापयुते भ्रातृनाशः ॥१७। धैर्यहीनः जडबुद्धिः दरिद्र ॥१८॥ लग्न से तीसरे भवन में गुरु हो तो अत्यन्त लोभी भाइयों की वृद्धिवाला, बड़ा चतुर, कोई कार्य संकल्पकर सिद्ध करनेवाला होता है। तृतीय स्थान का स्वामी वलवान् ग्रहों से युक्त हो तो भाइयों की दीर्घायु हो, यदि पापग्रह के साथ युक्त होवे तो भाइयों का नाश होता है एवं सन्तोष से रहित, जड़ बुद्धिवाला और दरिद्री होता है।।२४-३१।।
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लग्नाच्चतुर्थे गुरुफलम् सुखी क्षेत्रवान् बुद्धिमान् क्षीरसमृद्धः सन्मना: मेधावी ॥१९॥ भावाधिपे बलयुते भृगुचन्द्रयुक्ते शुभवर्गेण नरवाहनयोग: ॥२०। बहुक्षेत्रः अश्ववाहनयोग: गृहविस्तरवान् ॥२१। पापयुः पापिन: दृष्टिवशात् क्षेत्रवाहनहीनः ॥२२॥। परगृहवासः क्षेत्रहीन: मातृनाश: बन्धुद्वेषी ।२३।। लग्न से चौथे घर में गुरु हो तो सुखी, स्थानवाला बुद्धिमान् हमेशा दूध की वृद्धिवाला और शुद्ध चित्तवाला तथा पवित्र बुद्धिवाला होता है। चतुर्थ स्थान का स्वामी बलवान् ग्रहों से युक्त हो वह शुक्र चन्द्रमा युक्त हो अथवा शुभग्रह के वर्ग में हो तो मनुष्य की सवारी करनेवाला होता है। और बहुत स्थानवाला, घोड़ा की सवारी वाला तथा बड़ा घरवाला होता है। चतुर्थ स्थान के स्वामी के साथ पापग्रह बैठे हों तो पापी हो अथवा देखते हों तो घर तथा वाहन से रहित हो। और दूसरे के घर में रहनेवाला माता का नाश करनेवाला और भाइयों से कपट करनेवाला होता है॥१९-२३। लग्नात्पश्चम गुरुफलम् बुद्धिचातुर्यवान् विशालेक्षणः वाग्मी प्रतापी अन्नदान प्रियः कुलप्रियः अष्टादशवर्षे राजद्वारेण सेनाधिपत्य योगः ॥२४॥ पुत्रसमृद्धिः ।।२५।। भावाधिपे बलयुते पापक्षेत्रे अरिनीचगे पुत्रनाश: ।२६।। एकपुत्रवान् ।२७॥ धनवान् ।।२८।। राजद्वारे राजमूलने धनव्ययः ॥२९॥ राहुकेतुयुते सर्पशापात् सुतक्षयः ॥३०॥ शुभदृष्टे परिहारः ॥३१॥ लग्न से पांचवें भाव में गुरु हो तो चतुर बुद्धिवाला तथा दीर्घनेत्रवाला, वाणी बोलनेवाला, तेजस्वी व (वांचाल) अन्न का दान
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३६ भृगुसूत्रम् देने में प्रेमी और कुटुम्ब का प्रिय होता है। १८ वर्ष में राजा के द्वार से सेना का स्वामी हो। और पुत्र की समृद्धिवाला होता है। यदि पश्चम स्थान का स्वामी बलवान् ग्रहों से युक्त हो वा पापग्रह के घर में हो अथवा शत्रु तथा नीच (मकर) राशि में हो तो पुत्र का नाश हो अथवा सिर्फ एक ही पुत्रवाला, और धनाढय होता है। राज्यसम्बन्धिकारण से कचहरी में धन का खर्च हो। पश्चमस्थान के स्वामी के साथ या गुरु के साथ राहु केतु बैठे हों तो सर्प के शाप से पुत्र का नाश हो। शुभ ग्रह की दृष्टि हो तो यह दोष दूर हो जाता है अर्थात् पुत्र का सुख होता है।।२४-३१।। लग्नात्पष्ठे गुरुफलम् शत्रुक्षयः ज्ञातिवृद्धिः पौत्रादिदर्शनं व्रणशरीरः शुभयुते रोगाभावः ॥३२। पापयुते पापक्षेत्रे वातशैत्यादिरोगः ॥३३। मन्दक्षेत्रे राहुयुते महारोगः ॥३४।। लग से छठवें स्थान में बृहस्पति हो तो शत्रु का नाश हो और जाति की वृद्धिवाला पुत्र का पुत्र (पोता) को देखनेवाला तथा शरीर में चिह्नवाला होता है। गुरु के साथ शुभ ग्रह बैठे हों तो रोग से हीन हो। पापग्रह युक्त हो व पापग्रह के घर में हो तो वात व शीतरोगवाला हो, बृहस्पति शनि के स्थान (मकर कुंभ) में राहु के साथ बैठा हो तो भयंकर रोगवाला होता है॥३२-३४॥ लग्नात्सप्तमे गुरुफलम् विद्याधनेशः बहुलाभप्रदः चिन्ताधिक: विद्यावान् पातिव्रत्य- भक्तियुतकलत्रः।।३५॥भावाधिपे बलहीने राहुकेतुशनिकुजयुते पापवीक्षणाद्वा कलत्रान्तरम् ॥३६। शुभयुते उच्चस्वक्षेत्रे एकदारवान् कलत्रद्वारा बहुवित्तवान् सुखी चतुस्त्रिंशद्वर्षे
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प्रतिष्ठासिद्धिः ।।३७।। लग्न से सातवें भाव में बृहस्पति हो तो विद्या और धन का मालिक हो और ये अत्यन्त लाभ को देनेवाले होते हैं, बहुत चिन्तावाला विद्यावाला हो और स्त्री पतिव्रता भक्ति से युक्त हो। सप्तम स्थान का स्वामी निर्बल हो अथवा राहु, केतु, शनि, मंगल, ये ग्रह बैठे हों व पाप ग्रह देखते हों तो अन्य स्त्री के भोग करने वाला हो। यदि सप्तम स्थान के स्वामी के साथ शुभग्रह युक्त हो व उच्च में (कर्क) राशि में अथवा अपने स्थान (धन-मीन) में हो तो एक ही स्त्रीवाला हो और स्त्री के द्वारा बहुत धनी हो, तथा सुखी हो, और ३४ वर्ष में प्रतिष्ठावाला होता है।३५-३७॥ लग्नादष्टमे गुरुफलम् अल्पायुः नीचकृत्यकारी ॥३८।। पापयुते पतितः ॥३९॥ भावाधिपे शुभयुते रन्धे दीर्घायुः ॥४०॥ बलहीने अल्यायु: ॥४१। पापयुते सप्तदशवर्षादुपररि विधवासङ्गमो भवत ॥४२॥ उच्चस्वक्षेत्रगे दीर्घायुः बलहीन: अरोगी योगपौरुषः विद्वान् वेदशास्त्रविचक्षण:।।४३।। लग्न से आठवें भवन में गुरु हो तो अल्पायुवाला और नीच कर्म करनेवाला होता है। बृहस्पति के साथ पापग्रह युक्त हो तो भ्रष्ट होता है। अष्टम स्थान का स्वामी शुभग्रह से युक्त होकर अष्टम स्थान में हो तो दीर्घायुवाला हो। अष्टमस्थान का स्वामी बलहीन हो तो अल्पायु हो। पापग्रह बैठे हों तो १७ वर्ष के बाद विधवा स्त्री से संगम होता है। यदि गुरु उच्च (कर्क) का हो अथवा अपने स्थान (धन मीन) में हो तो दीर्घायु हो, निर्बल हो तो निरोग्य हो और उद्योग करनेवाला, पण्डित तथा वेदशास्त्र को जाननेवाला होता है।३८-४३॥
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३८ भृगुसूत्रम् लग्नान्नवमे गुरुफलम् धार्मिकः ॥४४॥ तपस्वी साधुतारूढः धनिक पञ्चत्रिंशद्यज्ञकर्ता पितृदीर्घायुः सत्कर्मसिद्धिः अनेक प्रतिष्ठावान् बहुजनपालकः लग्न से नौवें स्थान में गुरु हो तो धर्मकर्म करनेवाला हो। तप करनेवाला, पवित्रता से युक्त और धनवान् होता है, ३५ वर्ष में यज्ञ करनेवाला हो, दीर्घायु पिता हो, शुभ पवित्र कर्म करने से नाना प्रकार की प्रतिष्ठावाला और बहुत मनुष्यों की रक्षा करनेवाला होता है। ४४।। ४५ ॥ लग्नाद्दशमे गुरुफलम् धार्मिक: शुभकर्मकारी गीतापाठक: योग्यतावान् प्रौढकीर्ति: बहुजनपूज्यः ॥४६॥ भावाधिपे बलयुते विशेषक्रतुसिद्धि: ॥४७।। पापयुते पापक्षेत्रे कर्मविघ्नः ।४८।। दुष्कृतियात्रा- लाभहीन: ।।४९।। लग्न से दशवें घर में गुरु हो तो धर्मात्मा शुभ कर्म करनेवाला, गीता का पाठ करनेवाला, चतुर उज्ज्वल यशवाला और बहुत मनुष्यों का पूजनीय होता है। दशम स्थान का स्वामी बलवान् ग्रहों से युक्त हो तो कार्य में विघ्र करनेवाला हो, दुष्टकर्म करनेवाला हो और यात्रा में लाभ से हीन होता है।४६-४९॥ लग्नादेकादशे गुरुफलम् विद्वान् धनवान् बहुलाभवान् द्वात्रिंशद्वर्षे अश्वारूढः ॥५०॥ अनेकप्रतिष्ठासिद्धिः ।।५१।। शुभपापयुते गजलाभः ।।५२।। भाग्यवृद्धिः चन्द्रयुते निक्षेपलाभः ॥५३। लग्न से एकादशभाव में बृहस्पति हो तो पण्डित धनाढय तथा अत्यन्त लाभवाला हो, ३२ वर्ष में घोड़ा पर चढ़नेवाला होता है और
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बड़ा प्रतिष्ठावाला हो, गुरु के साथ शुभ तथा पापग्रह बैठे हों तो हाथी पर चढ़नेवाला हो। भाग्य की वृद्धिवाला हो, बृहस्पति के साथ चन्द्रमा बैठा हो तो धरी हुई वस्तु का लाभ होता है।५०।५३।। लग्नाद्द्वादशे गुरफलम् निर्धन: पठितः अल्पपुत्र: गणितशास्त्रज्ञः सम्भोगी ।५४॥ ग्रन्थिव्रणी अयोग्यः ।५५।। शुभयुते उच्चस्वक्षेत्रे स्वर्गलोक- प्राप्तिः ॥५६।। पापयुते पापलोकप्राप्तिः ।।५७।। धर्ममूलेन धनव्यय: ब्राह्मणस्त्रीसम्भोगी गर्भिणीसङ्गमी ॥५८॥ लग्न से बारहवें स्थान में गुरु हो तो धन से हीन, विद्या पढ़नेवाला, थोड़े पुत्रवाला व गणितशास्त्र को जाननेवाला, और नाना प्रकार के भोग को भोगनेवाला होता है। गांठवाला एवं घाववाला और योग्यता से रहित हो। गुरु के साथ शुभग्रह युक्त हो वह उच्च (मीन) में हो अथवा अपने स्थान (धन मीन) में हो तो स्वर्गलोक प्राप्त हो। पापग्रह बैठें हों तो नरक प्राप्त हो और धर्म के कारण से धन को खर्च करनेवाला, ब्राह्मण की स्त्री से भोग करनेवाला और गर्भवती स्त्री से व्यभिचार करनेवाला होता है।५४-५८॥
इति श्रीभृगुसूत्रे सिद्धप्रभाकरीटीकाभियुते गुरुभावाध्यायनामपश्चमोऽध्याय: ॥५॥
अथ तन्वादिद्वादशभावस्थितभृगुफलमाह तत्रादौ लग्ने भृगुफलम् गणितशास्त्रज्ञः ॥१।। दीर्घायुः दारप्रियः वस्त्रालंकारप्रियः रूपलावण्यप्रियः गुणवान् ॥२॥ स्त्रीप्रियः धनी विद्वान् ॥३।
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४० भृगुसूत्रम् शुभयुते अनेकभूषणवान् ॥४।। स्वर्णकान्तिदेहः ॥५॥ पापवीक्षितयते नीचास्तगते चोरवश्चनवान् ।६। बातश्लेष्मा- दिरोगवान् ॥७।। भावाधिपे राहुयुते बृहद्विजो भवति ॥।८।। वाहने शुभयुते गजान्तैश्वर्यवान् ।९।। स्वक्षेत्रे महाराजयोग: ॥१०॥ रन्धरे अष्टव्याधिपे शुक्के दुर्बले स्त्रीट्वयम् ॥११॥ चञ्चल भाग्य: ॥१२।। क्रूरबुद्धिः ॥१३॥ जन्म लग्न में शुक्र स्थित हो तो गणितशास्त्र को जाननेवाला, दीर्घायुवाला स्त्री से प्रेम करनेवाला व वस्त्र आभूषण से युक्त, सुन्दर स्वरूपवाला और अच्छे अच्छे गुणोंवाला होता है। और स्त्रियों का प्रिय धनवान् और पंडित होता है। शुक्र के साथ शुभ ग्रह युक्त हो तो अनेकों आभूषणवाला हो। सुवर्ण के तुल्य सुन्दर शरीरवाला होता है। यदि शुक्र को पापग्रह देखते हों व युक्त हों तथा नीचराशि (कन्या) में हो और अस्त हो गया हो तो चोर और ठगी होता है। और वात श्लेष्म आदि रोगवाला हो। लग्न के स्वामी के साथ राहु बैठा हो तो बड़ा अण्डकोशवाला होता है। चतुर्थ स्थान में शुभ ग्रहयुक्त हो तो हाथी और उत्कृष्ट प्रतापवाला हो। शुक्र अपने स्थान में (वृष तुला) राशि में हो तो बड़ा राजयोगवाला हो। शुक्र अष्टम द्वादश स्थान का स्वामी हो तथा बलहीन हो तो दो स्त्रीवाला होता है। अञ्वल भाग्यवाला और नीचबुद्धि वाला होता है।१-१३। लग्नादि्द्वितीये भृगुफलम् धनवान् कुटुम्बी सुभोजनः विनयवान् ॥१४। नेत्रे विलासधनवान् सुमुखः ॥१५॥ दयावान् परोपकारी ॥१६॥ द्वात्रिंशद्वर्षे उत्तमस्त्रीलाभः ॥१७॥ भावाधिपे दुर्बले दुःस्थाने नेत्रवैपरीत्यं भवति ॥१८।। शशियुते निशान्धः कुटुम्बहीनो
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हिन्दीटीकासहितम् ४१ नेत्ररोगी धननाशकरः ॥१९॥ लग्न से दूसरे स्थान में शुक्र हो तो धनी, कुटुम्बी, अच्छा भोजन करनेवाला और नम्रतावाला होता है। सुन्दर नेत्रवाला, धनी एवं अच्छा मुखवाला, दयालु, दूसरों की भलाई करनेवाला होता है। ३२ वें वर्ष में सुन्दर स्त्री प्राप्त हो। द्वितीयस्थान का स्वामी बलहीन और दुष्ट स्थान में स्थित हो तो नेत्र में फूला अथवा रोग होता है। शुक्र के साथ चन्द्रमा बैठा हो तो रात्रि में अन्धा, कुटुम्ब से रहित, नेत्र में रोगवाला और धन को नाश करनेवाला होता है।१४-१९॥ लग्नात्तृतीये भृगुफलम् अतिलुब्ध: दाक्षिण्यवान् भ्रातृवृद्धिः संकल्पसिद्धिः पश्चात्सहो- दराभावः ॥२०॥ क्रमेण भ्रातृतत्परः वित्तभोगपरः ॥२१॥ भावाधिपे बलयुते उच्चस्वक्षेत्रे भ्रातृवृद्धिः दुःस्थाने पापयुते भ्रातृनाश: ।।२२।। लग्न से तीसरे भवन में शुक्र हो तो अत्यन्त लोभी बड़ा सुन्दर भाइयों की बुद्धिवाला, मन में कार्य को विचार कर सिद्ध करनेवाला और पीछे से भाइयों से हीन होता है। यथाक्रम से जन्म हुए भ्राताओं से तत्पर एवं धन को भोगनेवाला हो। यदि तृतीय स्थान का स्वामी बलवान् ग्रहों से युक्त हो व उच्च (मीन) का अथवा अपने स्थान (वृष तुला) का हो तो भाइयों की वृद्धिवाला हो और शुक्र दुष्ट स्थान में व पापग्रह से युक्त हो तो भाइयों का नाश होता है॥२०-२२। लग्नाच्चतुर्थे भृगुफलम् शोभनवान् बुद्धिमान् भ्रातृसौख्यं सुखी क्षमावान् ॥२३।। त्रिंशद्वर्षे अश्ववाहनप्राप्तिः ॥२४॥ क्षीरसमृद्धिः भावाधिपे बलयुते अश्वान्दोलिकाकनकचतुरङ्गादिवृद्धिः ।२५। तत्र
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४२ भृगुसूत्रम् पापयुते पापक्षेत्रे अरिनीचगे बलहीने क्षेत्रवाहनहीनः ॥२६॥ मातृक्ले शवान् ॥२७। कलत्रान्तरभोगी ॥२८॥ लग्न से चोथे घर में शुक्र हो तो सुन्दर रूपवाला, बुद्धिमान् भाइयों का सुखवाला, आनन्द करनेवाला, और शान्तिवाला होता है। ३० वर्ष में घोड़े की सवारी प्राप्त हो। हमेशा दूध की वृद्धिवाला हो यदि चतुर्थ स्थान का स्वामी बली ग्रहों से युक्त हो तो घोड़ों की पालकी (बग्घी) पर सवारी करनेवाला हो और सुवर्ण चतुरंगादि बल की वृद्धिवाला हो। शुक्र के साथ पाप ग्रह बैठे हों व पाप ग्रह के घर में हो अथवा शत्रु के घर में व नीच (कन्या) में हो तथा बलहीन होने पर स्थान और सवारी से रहित होता है। माता के दुःख से युक्त हो। अन्य स्त्रियों से भोग करनेवाला होता है।२३-२८। लग्नात्पश्चमे भृगुफलम् बुद्धिमान् मन्त्री सेनापतिः ।।२९।। माता मट्टी दृश्वा यौवनदारपुत्रवान् ।।३०।। राजसन्मानी मन्त्री सुज्ञः स्त्री- प्रसन्नतावृद्धिः ॥३१।। तत्र पापयुते पापक्षेत्रे अरिनीचगे बुद्धिजाडययुतः पुत्राशः ॥३२॥ तत्र शुभयुते बुद्धिमान् नीतिमत्पुत्रसिद्धि: वाहनयोग: ।।३३।। लग्न से पांचवें भाव में शुक्रं हो तो बुद्धिमान्, मन्त्री और सेना का मालिक होता है। दादी को देखनेवाला, युवा स्त्री और पुत्रवाला होता है। शुक्र के साथ पापग्रह बैठे हों व पापग्रह के घर में हो शत्रु तथा नीच (कन्या) में हो तो जड़बुद्धिवाला, और पुत्र की इच्छा करनेवाला हो। यदि शुभग्रह युक्त हो तो नीति को जाननेवाला, पुत्रवाला, और वाहन प्राप्त होता है।।२९।३३।।
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लग्नात्पष्ठ भृगुफलम् ज्ञातिप्रजासिद्धिः शत्रुक्षयः पुत्रपौत्रवान् ॥३४। अपात्रव्यय- कारी प्रायावादी रोगवान् आर्यपुत्रवान् ॥।३५।। भावाधिपे बलयुते शत्रुज्ञातिर्द्धिः शत्रुपापयुते नाचस्थे भावेशेन्दुस्थे शत्रुज्ञातिनाश: ॥३६।। लग्न से छठवें स्थान में शुक्र हो तो जाति व सन्तानवाला शत्रु को नाश करनेवाला, पुत्र और पौत्र (पोता) वाला होता है। दुष्ट स्थान में खर्च करनेवाला, कपट से बोलनेवाला, तथा रोगवाला व श्रेष्ठ पुत्रवाला होता है। यदि षष्ठमस्थान का स्वामी बलवान् ग्रहों में युक्त हो तो शत्रु तथा जाति की वृद्धिवाला हो और शत्रु तथा पाप ग्रह से युक्त हो, व नीच (कन्या) में हो अथवा षष्ठमस्थान के स्वामी के साथ चन्द्रमा बैठा हो तो शत्रु तथा जाति का नाश होता है।।३४॥३६॥ लग्नात्सप्तमे भृगुफलम् अतिकामुकः मुखचुम्बकः ॥३७॥ अर्थवान् परदाररतः वाहनवान् सकलकार्यनिपुणः स्त्रीद्वेषी सत्प्रधान जनबन्धुकलत्न: ॥३८।। पापयुते शत्रुक्षेत्रे अरिनीचगे कलत्रनाशः ॥३९॥ विवाहद्वयम् ॥४०।। बहुपापयुते अनेककलत्रान्तरप्राप्तिः ॥४१। पुत्रहीनः ॥४२॥ शुभयुते उच्चे स्वक्षेत्रे तुले कलत्रदेशे बहुवित्तवान् ॥४३। कलत्रमूलेन बहुप्राबल्ययोग: स्त्रीगोष्टिः लग्न से सातवें भवन में शुक्र हो तो बड़ा कामी हो, और मुख को चुम्बन करनेवाला होता है। धनवान् दूसरे की स्त्री से भोग करनेवाला, सवारीवाला, तथा सम्पूर्ण कार्यों में कुशल स्त्री से कपट करनेवाला और भाई, स्त्री आदि कुटुम्बी मनुष्यवाला होता है। शुक्र के साथ पाप ग्रह बैठे हों व शत्रु के घर में अथवा शत्रु नीच (कन्या) में हो तो स्त्री का
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४४ भृगुसूत्रम्
नाश हो। और दो विवाह करनेवाला होता है। यदि शुक्र के साथ बहुत से पाप ग्रह युक्त हों तो अनेक स्त्री प्राप्त होती हैं और पुत्र से हीन होता है। शुक्र शुभ ग्रह से युक्त हो व उच्च (मीन) में हो अथवा अपने स्थान, (वृष तुला) में हो तो स्त्री के देश में बहुत धन प्राप्त हो। और स्त्री के प्रताप से अत्यन्त तेजस्वी हो तथा स्त्रियों के समूह में रहनेवाला होता है।।३७॥४४॥ लग्नादष्टमे भृगुफलम् सुखी चतुर्थे वर्षे मातृगण्डः ।४५।। अर्धायु: रोगी हितदारवान् असन्तुष्टः ॥४६॥ शुभक्षेत्रे पूर्णायुः ॥४७॥ तत्र पापयुते अल्पायुः॥४८॥। लग्न से आठवें घर में शुक्र हो तो सुखवाला और ४ वर्ष में माता को गण्डमाला हो। आधी आयुवाला तथा रोगी होता है। हितैषी स्त्रीवाला, और सन्तोष से रहित होता है। शुभाशुभ ग्रहों के घर में हो तो पूर्णायु होती है। साथ पाप ग्रह बैठें हो तो अल्पायुवाला होता है।४५-४८॥। लग्नानवमे भृगुफलम् धार्मिकः तपस्वी अनुष्ठानपरः ॥४९॥ पादेबहूत्तमलक्षणः धर्मी भोगवृद्धिः सुतदारवान् ।५0॥ पितृदीर्घायुः ॥५१॥ तत्र पापयुते पित्ररिष्टवान् ॥५२। पापयुते पापक्षेत्रे अरिनीचगे धनहानिः ।।५३।। गुरुदारगः ।।५४।। शुभयुते भाग्यवृद्धि: ॥५५॥ महाराजयोगः ॥५६।। वाहनकामेशयुते महाभाग्यवान् अश्वान्दोल्यादिवाहनवान् ॥५७॥ वस्त्रालंकारप्रियः ।५८। लग्न से नवम् स्थान में शुक्र हो तो पुण्य करनेवाला, तप करनेवाला और अनुष्ठान करनेवाला होता है। चरणों में बड़ा उत्तम चिह्नवाला,
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हिन्दीटीकासहितम् ४५ धर्मवाला, भोग की वृद्धि करनेवाला और पुत्र तथा स्त्रीवाला होता है। पिता दीर्घायु हो। शुक्र के सात पापग्रह बैठे हों तो पिता को अरिष्ट हो। यदि शुक्र पापग्रह से युक्त हो व पाप ग्रह के घर में अथवा शत्रु तथा नीचराशि (कन्या) में हो तो धन का नुकसान होता है। और गुरु की स्त्री से व्यभिचार करनेवाला हो। शुभ ग्रहयुक्त हो तो भाग्य की वृद्धिवाला हो, एवं राजयोग भी होता है। शुक्र चतुर्थ और सप्तम स्थान के स्वामी के साथ बैठा हो तो बड़ा भाग्यशाली हो और घोड़ों की सवारीवाला तथा पालकी पर चढ़नेवाला हो। वस्त्र तथा आभूषण से युक्त होता है।४९-५८॥ लग्नाद्दशमे भृगुफलम् बहुप्रतापवान् पापयुते कर्मविघ्नकर: गुरुबुधचन्द्रयुते अनेक- वाहनारोहणवान् ॥५९।। अनेकक्रतुसिद्धि ॥६०॥ दिगन्त- विश्रुतकीर्तिः अनेक राजयोग: बहुभाग्यवान् वाचाल: लग्न से दसवें भवन में शुक्र हो तो बड़ा तेजस्वी हो, शुक्र के साथ पापग्रह युक्त हो तो कार्य में विघ्न करनेवाला हो, यदि बृहस्पति बुध चन्द्रमा युक्त हो तो बहुत सी सवारियों पर चढ़नेवाला होता है। और नाना प्रकार के यज्ञ करनेवाला हो। तथा सब दिशाओं में यश सुननेवाला, अनेक राजयोगवाला एवं बड़ा भाग्यवान और बहुत बोलनेवाला होता है॥५९-६१।। लग्नादेकादशे भृगुफलम् विद्वान् बहुधनवान् भूमिलाभवान् दयावान् शुभयुते अनेक- वाहनयोगः ॥६२। पापयुते पापमूलात् धनलाभः ॥६३।। शुभयुते शुभमूलात् नीचर्क्षे पाप रन्धुरेशादियोगे लाभहीनः लग्न से ग्यारहवें घर में शुक्र हो तो पण्डित, बहुत धनवाला, पृथ्वी
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४६ भृगुसूत्रम् प्राप्त करनेवाला और दयालु होता है, शुक्र के साथ शुभग्रह युक्त हो तो अनेक वाहन प्राप्त होते हैं। यदि पापग्रह युक्त हो तो पाप करने से धन मिलता है। और शुभग्रह बैठे हों तों शुभ कार्य करने से धन प्राप्त हो, यदि शुक्र नीच राशि (कन्या) में अथवा पापग्रह और अष्टम स्थान के - स्वामी से युक्त हो तो धन का लाभ नहीं होता।।६२-६४।। लग्नाद्द्वादशे भृगुफलम् बहुलदारिद्रयवान ॥६५।। पापयुते विषयलुब्धपरः ॥६६।। शुभयुत्तश्रेत् बहुधनवान् ॥६७।। शय्याखट्वाङ्गादिसौख्यवान् शुभलोकप्राप्तिः पापयुते नरकप्राप्ति: ।।६८।। लग्न से बारहवें भाव में शुक्र हो तो अत्यन्त दरिद्री होता है। शुक्र के साथ पाप ग्रह बैठें हो तो भोगादि विषय में लोभवाला हो। यदि शुभग्रह युक्त हो तो बहुत धनवाला हो और पलंग आदि का पूर्ण सुखवाला हो एवं स्वर्गलोक प्राप्त करनेवाला हो, यदि पाप ग्रह बैठे हों तो नरक प्राप्त होता है।६५-६८।। इति श्रीभृगुसूत्रे सिद्धप्रभाकरीटीकाभियुक्ते शुक्रभावाध्यायनामषष्ठोऽध्यायः ॥६॥
अथ तन्वादिद्वादशभावस्थितशनिफलमाह तत्रादौ लग्ने शनिफलम् वातपित्तदेहः ॥१॥ उच्चे पुरग्रामाधिपः धन धान्य समृद्धि: ।।२। स्वर्क्षे पितृधनवान् ॥३। वाहनेशकर्मेशक्षेत्रे बहुभाग्यम् ॥४।। महाराजयोगः ॥५॥ चन्द्रमसा दृष्टे भिक्षुकी वृत्तिः ।६।। शुभदृष्टे निवृत्ति: ।।७।। शनि लग्न में हो तो बात पित्त प्रकृतिवाला हो, शनि उच्च (तुला)
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राशि का हो तो नगर और धनधान्य से भी समृद्धिशाली होता है। अथवा ग्राम का मालिक हो, शनि अपनी राशि (मकर कुम्भ) का हो तो पिता धनवान् हो। चतुर्थ दशम के स्वामी की राशि का शनि जन्म लग्न में हो तो बड़ा भाग्यवान् हो। और प्रबल राजयोगवाला हो, शनि को चन्द्रमा की दृष्टि होने पर भीख मांगने की वृत्तिवाला हो, शुभग्रह की दृष्टि से भिक्षुक न हो॥१-७॥ लग्नादि्द्वितीये शनिफलम् द्रव्याभाव: दारद्वयम् ।।८।। पापयुते दारवञ्चनामठाधिप: अल्पक्षेत्रवान् नेत्ररोगी ॥९॥ लग्न से दूसरे स्थान में शनि हो तो धन से रहित हो तथा दो स्त्री वाला होता है। शनि के साथ पापग्रह बैठें हों तो स्त्रियों को ठगनेवाला एवं मठाधीश अल्पस्थानवाला और नेत्र में रोगवाला होता है।८।।९।। लग्नात्तृतीये शनिफलम् भ्रातृहानिकारकः ॥१०॥ अदृष्टः दुर्वृत्तः ॥११। उच्चस्वक्षेत्रे भ्रातृवृद्धिः ॥१२। तत्र पापयुते भ्रातृद्वेषी ॥१३। लग्न से तीसरे भाव में शनि हो तो भाइयों की हानि करनेवाला हो। दुःखचित्तवाला और नीचकर्म करनेवाला होता है। यदि शनि उच्च (तुला) का हो अथवा अपने स्थान (मकर कुम्भ) का हो तो भाइयों की वृद्धि हो, शनि के साथ पाप ग्रह युक्त हो तो भाइयों से द्वेष करनेवाला शत्रु होता है।१०॥१३। लग्नाच्चतुर्थे शनिफलम् मातृहानि: द्विमातृवान् ॥१४।। सौख्यहानिः निर्धनः ॥१५॥ उच्चस्वक्षेत्रे न दोषः ।।१६।। अश्वान्दीलाद्यवरोही ।१७।
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४८ भृगुसूत्रम् लग्नेशे मन्दे मातृदीर्घायुः ॥१८। सौख्यवान् ॥१९॥ रन्ध्रेशयुक्ते मात्ररिष्टम् ॥२०॥ सुखहानि: ।।२१।। लग्न से चतुर्थ स्थान में शनि हो तो माता की हानि करनेवाला और दो मातावाला होता है। सुखसौख्य से हीन होकर शरीर में कष्ट हो और धन से हीन हो। शनि उच्च (तुला) का व अपने स्थान (मकर कुम्भ) में हो तो यह दोष नहीं होता अर्थात् सुखी तथा धनी होता है और घोड़ा पालकी आदि की सवारी प्राप्त हो। लग्नका स्वामी शनि हो तो माता दीर्घायु होती है। और सुखी होता है। शनि के साथ अष्टमस्थान का स्वामी बैठा हो तो माता को अरिष्टवाला होता है एवं शरीर में कष्ट होता है॥१४॥२१॥ लग्नात्पश्चमे शनिफलम् पुत्रहीन: अतिदरिद्री दुर्वृत्तः दत्तपुत्री ॥२२।। स्वक्षेत्रे स्त्रीप्रजासिद्धिः ।।२३।। गुरुदृष्टे स्त्रीद्वयम् ।।२४।। तत्र प्रथमाडपुत्रा द्वितीया पुत्रवती॥।२५।। बलयुते मन्दे स्त्रीभिर्युक्तः लग्न से पांचवें घर में शनि हो तो पुत्र से रहित हो, म्लेच्छता से रहनेवाला, नीचवृत्तिवाला और दूसरे की दी हुई पुत्रीवाला होता है। शनि अपने स्थान (मकर कुंभ) में हो तो कन्या सन्तानवाला होता है। शनि को बृहस्पति देखता हो तो दो स्त्रीवाला हों। उनमें प्रथम स्त्री सन्तान से हीन हो, द्वितीय पुत्रवती होती है। शनि बलवान् ग्रहों से युक्त हो तो स्त्रियों से युक्त होता है।२२-२६॥ लग्नात्षष्ठे शनिफलम् अल्पज्ञातिः शत्रुक्षयः ॥२७॥ धनधान्यसमृद्धः कुजयुते देशान्तरसश्चारी ॥२८।। अल्पराजयोगः ॥२९॥ भङ्गयोगात्कव- चित्सौख्यंक्वचिद्योगभङ्ग॥३०॥रन्धेशे मंदे अरिष्टं वातरोगी
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शूलव्रणदेही ॥३१॥ जन्मलग्न से छठवें स्थान में शनि हो तो छोटी जाति का हो और शत्रु नष्ट हो जाते हैं। धन धान्य से युक्त हो, शनि के साथ मङ्गल युक्त हों तो देशान्तर में घूमनेवाला हो और किश्चित् राज योग हो, कभी राजयोग के भङ्ग से सुख हो। शनि अष्टम स्थान का स्वामी हो तो वात तथा शूलरोग से शरीर में अरिष्ट होता है और घाव भी होते हैं।२७-३१। लग्नासप्तमे शनिफलम् शरीरदोषकर: कृशकलन्नः वेश्यासम्भोगवान् अति दुःखी उच्चस्वक्षेत्रगते अनेकस्त्रीसम्भोगी॥३२।। केतुयुते स्त्रीसम्भोगी ॥३३।कुजयुते शिश्नचुम्बनपरः॥३४॥ शुक्रयुते भगचुम्बनपर: ॥३५।। परस्त्रीसम्भोगी ॥३६॥ लग्न से सातवें भाव में शनि हो तो शरीर दोष युक्त हो, दुर्बल स्त्रीवाला, वेश्या से भोग करनेवाला और अत्यन्त दुःखी हो, शनि उच्च (तुला में) अथवा अपने स्थान (मकर कुम्भ) में हो तो अनेक स्त्रियों से भोग करनेवाला होता है। शनि के साथ केतु स्त्री युक्त हो तो स्त्री से भोग करनेवाला हो। मङ्गल युक्त हो तो लिङ्ग को चुम्बन करनेवाला हो, शुक्र युक्त हो तो भग को चुम्बन करनेवाला हो। और पराई स्त्री से भोग करनेवाला होता है।३२-३६॥ लग्नादष्टमे शनिफलम् त्रिपादायुः दरिद्री शूद्रस्त्रीरतः सेवकः ॥३७॥ उच्चस्वक्षेत्रगे दीर्घायुः ॥३८। अरिनीचगे भावाधिपे अल्पायुः ॥३९॥ कष्टान्नभोगी ।४० ।। लग्न से आठवें भवन मे शनि हो तो ७५ वर्ष की आयुवाला, दरिद्री.
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५० भृगुसूत्रम् शूद्र की स्त्री से भोग करनेवाला और नौकर होता है। शनि उच्च (तुला) का अथवा अपने स्थान (मकर कुम्भ) में हो तो दीर्घायुवाला हो। अष्टमस्थान का स्वामी शत्रु तथा नीच (मेष) हों तो अल्पायु हो। और दुःख से अन्न को खानेवाला होता है॥३७-४०॥ लग्नान्नवमे शनिफलम् पतितः जीर्णोद्धारकर: एकोनचत्वारिंशद्वर्षे तटाकगोपुरनिर्माण कर्ता ॥४१॥ उच्चस्वक्षेत्रे पितृदीर्घायुः ॥४२॥ पापयुते दुर्बले पित्ररिष्टवान् ।४३।। लग्न से नौवें भाव में शनि हो तो भ्रष्ट हो और प्राचीन वस्तु का उद्धार करनेवाला तथा ३९ वर्ष में घाट, गौग्राम आदि बनानेवाला होता है। शनि उच्च (तुला) का व अपने स्थान (मकर कुम्भ) में हो तो पिता की दीर्घायु हो। शनि पापग्रह से युक्त हो तथा बलहीन हो तो पिता को अरिष्ट होता है॥४१-४३॥ लग्नाद्दशमे शनिफलम् पश्चविंशतिवर्षे गङ्गात्न्नायी अतिलुब्धः पित्त शरीरी ॥४४।। पापयुते कर्मविघ्नकर: शुभयुते कर्मसिद्धिः।४५॥ लग्न से दशवें भवन में शनि हो तो २५ वर्ष में श्रीगङ्गाजी का स्नान करनेवाला, अत्यन्त लोभी और चित्त शरीरवाला होता है। शनि के साथ पापग्रह बैठे हों तो कार्य में विघ्न करनेवाला हो, यदि शुभ ग्रहयुक्त हो तो कार्य सिद्ध करनेवाला होता है॥४४॥४५॥ लग्नादेकादशे शनिफलम् बहुधनी विघ्नकर: भूमिलाभ: राजपूजकः ॥४६॥ उच्चे स्वक्षेत्रे वा विद्वान् ॥४७।।महाभाग्ययोग: बहुधनी वाहनयोगः ।।४८।। लग्न से ग्यारहवें घर में शनि हो तो बड़ा धनी, कार्य में विघ्न
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हिन्दीटीकासहितम् ५१ करनेवाला और पृथ्वी का लाभ वाला तथा राजा की सेवा करनेवाला होता है। शनि उच्च (तुला) का अथवा अपने स्थान (मकर कुम्भ) का हो तो पण्डित होता है। और बड़ा भाग्यवाला अत्यन्त धनवाला और सवारी प्राप्त होती है।४६-४८।। लग्नाद्द्वादशे शनिफलम् पतितः विकलाङ्ग ॥४९॥ पापयुते नेत्रच्छेदः ॥५०॥ शुभयुते सुखी सुनेत्र: पुण्यलोकप्राप्तिः ॥५१।। पापयुते नरकप्राप्तिः ॥५२। अपात्रव्ययकारी निर्धनः ।५३।। लग्न से बारहवें घर में शनि हो तो भ्रष्ट हो और अङ्ग से हीन होता है। शनि के साथ पाप ग्रह बैठे हों तो नेत्र में छिद्र हो। शुभ ग्रह हों तो सुखी सुन्दर नेत्रवाला और स्वर्गलोक प्राप्त होता है। शनि के साथ पाप ग्रह युक्त हो तो नरक प्राप्त होता है और दुष्टजगह खर्च करनेवाला तथा द्रव्य से हीन (कंगाल) होता है॥४९-५३॥ इति श्रीभृगुसूत्रे सिद्धप्रभाकरीटीकाभियुक्तेशनि- भावाध्यायनामसप्तमोऽध्यायः ।७॥
अथ तन्वादिद्वादश भाव स्थितराहुकेत्वोः फलमाह तत्रादौ लग्ने राहुकेत्वो: फलम् मृतप्रसूतिः ॥।१।। मेषवृषभकर्कराशिस्थे दयावान् ॥२।। बहुभोगी ॥३। अशुभे शुभदृष्टे मुखलाञ्छनी ॥४॥ जन्मलग्न में राहु केतु हो तो मरी हुई सन्तान हो। यदि राहु केतु मेष वृष कर्क इन राशियों में बैठे हों तो दयालु होता है। और अत्यन्त भोगी होता है। राहु केतु को शुभ अथवा पाप ग्रह देखते हों तो मुख में चिह्नवाला होता है॥१-४॥
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५२ भृगुसूत्रम् लग्नाद्द्वितीये राहुकेत्वोः फलम् निर्धन: देहव्याधि: पुत्रशोक: श्यामवर्णः ॥५। पापयुते चुबुके लाञ्छनम् ॥६।। लग्न से दूसरे स्थान में राहु केतु हों तो धन से हीन हो, शरीर में रोगवाला पुत्र की चिन्ता करनेवाला और काला रंगवाला होता है। राहु केतु के साथ पापग्रह बैठे हों तो ओष्ठ पर चिह्न होता है।।५॥६।। लग्नात्तृतीये राहुकेत्वो: फलम् तिलनिष्पावमुद्गकोद्रवसमृद्धिवान् ।।७।। शुभयुते कण्ठ- लाञ्छनम् ।।८।। लग्न से तीसरे भवन में राहु केतु हों तो तिल निष्पाव मूंग कोद्रव इन धान्योंवाला हो। राहु केतु के साथ शुभ ग्रह बैठे हों तो कण्ठ में कोई चिह्न होता है॥७।।८।। लग्नाचतुर्थे राहुकेतुफलम् बहुभूषणसमृद्धः जायाद्वयं सेवक: मातृक्लेशः पापयुते निश्र्येन ॥९॥ शुभयुतदृष्टे न दोषः ।।१०।। लग्न से चौथेभाव में राहु केतु हों तो बहुत आभूषणोंवाला दो स्त्रीवाला और नौकर होता है। यदि राहुकेतु के साथ पाप ग्रह युक्त हो तो निश्चय करके माता को दुःख हो। शुभ ग्रह युक्त हों व देखते हों तो उक्त फल नहीं होता है अर्थात् माता का अच्छा सुख होता है।।९॥। १० ।। लग्नात्पश्चमे राहुकेत्वोः फलम् पुत्रभावः सर्पशापात् सुतक्षयः ॥११। नागप्रतिष्ठया पुत्रप्राप्तिः ॥१२। पवनव्याधि: दुर्मार्गी राजकोप: दुष्टग्रामवासी ॥१३।।
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हिन्दीटीकासहितम् ५३
लग्न से पांचवे घर में राहु केतु हों तो पुत्र से हीन हो, सर्प के शाप से पुत्र का नाश हो। नागदेव की प्रतिष्ठा करने से पुत्र सुख प्राप्त हो। वायु से रोग उत्पन्न हो, खराब मार्ग में जानेवाला, राजा से क्रोध करनेवाला और नीच ग्राम में निवास करनेवाला होता है।११-१३। लग्नात्षष्ठे राहुकेत्वो: फलम् धीरवान अतिसुखी ॥१४॥ इन्दुयुते राजस्त्रीभोगी ॥१५॥ निर्धन: चोरः ॥१६॥ लग्न से छठें स्थान में राहु केतु हो तो गम्भीर और अत्यन्त सुखी होता है। राहु केतु के साथ चन्द्रमा युत हो तो राजा की स्त्री से भोग करनेवाला हो। धन से हीन और चोर होता है।१४-१६॥ लग्नात्सप्तमे राहुकेत्वोः फलम् दारद्वयं तन्मध्ये प्रथमस्त्रीनाशः द्वितीये कलत्रे गुल्मव्याधि: ॥१७॥ पापयुते गण्डोत्पत्तिः ॥१८।। शुभयुते गण्डनिवृत्तिः ॥१९। नियमेन द्वारद्वयम् ॥२०॥ शुभयुते एकमेव ॥२१॥ लग्न से सातवें स्थान में राहु केतु हो तो दो स्त्रीवाला हो जिसमें पहिली स्त्री का नाश हो, दूसरी स्त्री को गुल्म रोग हो। राहु केतु के साथ पापग्रहयुक्त हो तो गण्डमाला रोग हो। शुभग्रहयुक्त होने पर यह दोष दूर हो जाता है। और हमेशा दो स्त्रीवाला होता है। राहु केतु के साथ शुभग्रह युक्त हो तो एक ही स्त्रीवाला होता है।१७-२१। लग्नादष्टमे राहुकेत्वोः फलम् अतिरोगी द्वात्रिंशद्वर्षायुष्मान् ॥२२॥ शुभयुते पश्चचत्वारिंशद्वर्पे भावाधिपे बलयुते स्वोच्चेषष्टिवर्षाणि वा जीवितम् ॥२३।। लग्न से आठवें भाव में राहु केतु हों तो अत्यन्त रोगी हो और ३२ वर्ष की आयुवाला हो। राहुकेतु के साथ शुभ ग्रह युक्त हों तो ४५ वर्ष की
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५४ भृगुसूत्रम् आयुवाला हो। अष्टम स्थान का स्वामी बलवान् ग्रहों से युक्त हो अथवा अपनी उच्चराशि में हो तो ६० वर्ष की आयुवाला होता है।।२२।।२ ३ ।। लग्नान्नवमे राहुकेत्वो: फलम् पुत्रहीन: शूद्रस्त्रीसम्भोगी सेवक: धर्महीनः ॥२४॥ लग्न से नवम स्थान में केतु हों तो पुत्र से हीन शूद्र की स्त्री से भोग करनेवाला व सेवा करनेवाला और धर्म से रहित होता है।२४॥ लग्नाद्दशमे राहुकेत्वोः फलम् वितन्तुसङ्गमः ॥२५॥ दुग्मवासः ॥२६॥ शुभयुते न दोषः ॥।२७। काव्यव्यसनः ॥२८।। लग्न से दशवें घर में राहु केतु हों तो* विधवा से संगम करनेवाला हो। नीच ग्राम में रहनेवाला हो। राहुकेतु के साथ शुभ ग्रह बैठे हों तो सुन्दर ग्राम में निवास करनेवाला होता है और काव्यशास्त्र को पढ़नेवाला होता है॥२५-२८॥ लग्नादेकादशे राहुकेत्वोः फलम् पुत्रैः समृद्धः ॥२९।। धनधान्यसमृद्धः ।।३०।। लग्न से ग्यारहवें भवन में राहु केतु हों तो पुत्रों से युक्त हो और धन धान्य से भी युक्त होता है।२९।३०। लग्नाद्द्वादशे राहुकेत्वोः फलम् अल्पपुत्रः ॥३१। नेत्ररोगी पापगतिः ॥३२।। लग्न से बारहवें स्थान में राहु केतु हो तो थोड़े पुत्रवाला हो। और नेत्र में रोगवाला एवं नीच गतिवाला होता है।।३१॥३२।।
- कपड़ा बनानेवाला-ऐसा भी कोई कोई अर्थ करते हैं।
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हिन्दीटीकासहितम् ५५
अथ विनयपूर्वकटीकाकारपरिचय: श्रीसिद्धनाथेन सुदेवविज्ञेनाख्यातरत्नलामकमण्डले वा। वस्तिः सुखेडास्ति च तत्र जातेनानिर्मिता वै भृगुसूत्रटीका॥१॥ अत्र भ्रमाद्या त्रुटिरागता सा संशोध्य विज्ञैः परिपूरणीया। श्रीनारदाद्यैरपि दुःशकं यत् तत्राल्पविन्मादृशवित्कथाका॥२॥। टीकासमाप्तिसमयः माधे सितेऽर्केऽ्रहितिथौ सुपश्चम्यां त्र्यष्टगोभूमितवैक्रमाब्दे। जिज्ञासुमुद्दं भृगुसूत्रकंयत् सिद्धप्रभाकर्यभियुक्तजातम् ॥३।
इति श्रीभार्गवीये-सुखेड़ाग्राम वास्तव्यकाशीस्थगवर्नमेन्ट संस्कृत महाविद्यालयपरीक्षोत्तीर्ण स्वर्गीय पं० श्रीरेवाशंकरात्मज, राजज्योतिषी रमलशास्त्री "अग्निहोत्री नागदा" पण्डितश्रीसिद्धनाथ शर्मकृतसिद्धिप्रभाकरी टीकाभियुक्ते राहुकेतु भावाध्याय नामाष्टमोऽध्यायः ।।८।।
समाप्तोऽ्यंग्रन्थ:
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५६
अथ ग्रहाणां स्वक्षेत्र मित्रशत्रूच्चराश्यादि बोधक चक्रमिदम् ग्रहाणांनाम सूर्य चन्द्र मंगल बुध गुरु शुक्ॢ शनि राहू केतु
शुभपापग्रहा: पाप शुभ पाप शुभ शुभ शुभ पाप पाप पाप
राशिनाम मेष मियुन कर्क सिंह तुला वृश्चिफ मफर मीन
वृषन कन्या धन कुम्म
प्र०स्वक्षेत्राणि सिंह कर्फ मेष मिथुन धन वृपन मफर फन्या मीन भृगुसूत्रम्
वृश्चिक् कन्या मीन तुला कुम्स
मित्रग्रहा: चं० मं० सू० वु० सू० गु० चं० सू० रा० सू० चं० मं० वु० रा० नु० रा० वु० शु० श० बु०
गु० शु० श० शु०
समग्रहा: बु० मं० शु० शु० श० मं० श० गु० श० रा० मं० गु० गु० गु०
गु० श०
शत्रुग्रहा: श० रा० राहु बु० रा० चं० व० श० सू० चं० सू० चं० मं० सू० चं० मं०
शु०
उच्चराशय: मेष वृषन मफर कन्या कर्क ५ भीन तुला मिथुन 0
परमोच्चाशा: १० ३ २८ १५ २७ २०
नीचराशय: तुला वृश्चिक कर्क
नीचांशा: मीन मकर कन्या मेव 0
१० ३ २८ १५ धन
५ २७ २०
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ग्रहाणाम् ३।१० ३।१० ३।१० ३।१० ३।१० ३।१०
एकपाददृष्टिः ३।१० ३।१०
द्विपाददृष्टिः ५1९ ५१९ ५1९ ५1९ oo ५/९ ५1९ ५१९ ५/९
त्रिपाददृष्टिः ४1८ ४1८ ४1८ ४1८ ४1८ ४।८
सम्पूर्णदृष्टिः ७ ७ ४1८७ ७ ५१९१७ ७ ३।१०१७ ७ ७
विंशोत्तरीदशा कू उफा. रो० ह० श्र० मृ० चि० आश्रलेषा पुन वि० भ० पूफा० पुष्य अनु० आर्द्रा म० मू० हिन्दीटीकासहितम्
प्रदनक्षत्राणि उपा ज्ये० रे० पू० भा० पूषा० उ० भा० स्वा० श० अश्ि०
विंशोत्तरीदशा ६ १० ७ १७ १६ २० १९ १८ ७
वर्षाणि योगिनीदशा मंगला पिंगला धान्या भ्रामरी भद्रा उल्का सिद्धा सकठा
वर्षाणि १ २ ३ ४ ५ ६ ७ ८ 0
यो० द० प्र० श्र० आर्द्रा ध० पुन- श० पुष्य पृ० भा० अ० भ०म० ज्ये० फृ० पूफा रो० उफा
नक्षत्राणि मृ० ह०
चि० स्वा० वि० आश्ले० अनु० उ० भा० मृ० रे० पृ० पा० उ० पा०
ग्र०पु०स्त्री०न० पुरुष स्त्री पुरुष नपुं सक पुरुष स्त्री. स्त्री पुरुव पुरुष
ग्रहाणां २२ २४ २५
वर्षाणि २८ ३२ १६ ३६ ४२ ४२
नेष्ट प्रहवर्षे- हरिवंश रुद्रार्चन व्द्रीजप गौ सेवा
दानादि कांस्यदान अमावस्या
अभिषेक मृत्युञ्जय ध्वजादान
घ्रवण धवजा ५७
व्रत जप दान
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५८ भृगुसूत्रम्
अथ चमत्कारिक केरल सिद्ध प्रश्नावली
प्रातःकाले वदेत्पुष्यं मध्याल्ले तु फलं वदेत्।। सायंकाले वदेश्नद्यःरात्रीतु देवतां वदेत् ।।१।।
घष्टवर्ग: ध्वज धम्र सिंह शान वष सर गज ध्वांद
प्रश्नावराणि स्वर कवर्ग चवर्ग टवर्ग तवर्ग पवर्ग यवर्ग शवर्ग अइउएओ कलगघड़ चछजसज टठडढण तबदधन पफवभम यरलव रापसह
प्रश्ननिर्णय: अस्ति नास्ति अस्ति नास्ति अस्ति नास्ति अस्ति नास्ति
मूकप्रश्न: धातु धातु मूल जीव जीव जोव मूल जीव
आयुप्रश्न १००वर्ष १ वर्ष १०० वर्ष २० वर्ध ६० वर्ष ४५ वर्ष ७७ वर्ष १६ वर्ष
मुरुदुःसप्रदन मुख दूःस मुल दुःस सुख दुःस मुख दुःख
स्त्रोलामप्रश्न लान हानि लाभ हानि लान हानि लान हानि
पुथकन्याप्रश्न पुत्र कन्या पुत्र कन्या पुत्र कन्या पुत्र कन्या
विद्याप्राप्ति प्राप्ति न प्राप्ति प्राप्ति न प्राप्ति प्राप्ति न प्राप्ति प्राप्ति न प्राप्ति
कार्यतिद्धि प्रश्न स्थिर न सिद्धि शीत्र सिद्धि अतिविलंव शोघ्र अतिविलंब स्थिर न सिद्धि
व्यवहार प्रश्न शुभ फलह शुभ कलह शुभ कलह शुन कलह
व्या० लानहानि लाभ हानि लाभ हानि लाभ हर्गनि लाभ हानि
रोगी प्रश्न आरोग्य संकट मुग कण्ट आरोग्य मुस दुःल
कष्ट दिन ७ दिन २ मास १५ दिन १ मास १५ दिन १ मास ७ दिन २ मास
प्रवासी प्रश्न कुशल रोगी सुल कप्ट मुन कुशल रोगो
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हिन्दीटीकासहितम् ५९
प्रवासी स्थिर समीप समीप दवूर पुनर्गत मार्गस्य मार्गस्थ दूरस्थ पुनर्गत
प्रवासी गमागम समीप समीप दूर पुनर्गत मार्गस्य मार्गस्य दूरस्थ पुनर्गत
शशुगमागमो आगम न आगम आगम न आगम आगम न आगम आगम न आगम
जयपराजय प्रश्न जय पराजय जय पराजय जय पराजय अजय पराजय
वृष्टि प्रश्न विलम्ब उत्तम विलम्ब उत्तम उत्तम न वर्या उतम न वर्षा
वृष्टिदिनानि २७ ७ ३० २० १० ६०
धनलानप्रश्न प्राप्ति . व्यय प्राप्ति हानि लाभ व्यप प्राप्ति हानि
मुष्टिप्रश्न पत्र अरिब फल काप् धान्य तृण जीव पुष्प
मुष्टिवर्ण कौसुम्न श्रचेत लोहितांग पांडुनील पोत आकाश मिश्र
धान्यज्ञान गोधम तिल पीतान्न दाल तण्डुल चणे गुड़ यव
नष्टवस्तुला०प्र० लाभ हानि लाभ हानि लाभ हानि लाभ हानि
नष्टदिशा प्रश्न पूर्व आग्रेयकोण दक्षिण नंऋृत्य पश्चिम् वायव्य उत्तर ईशान
चौर जाति ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य · शूद्र धनिक नौकर भील नाई
नष्टवस्तु स्थान उतल में भोजनालयमें वन में अन्तरिक्ष में बरतन में काष्ठपात्र में घर में पृथ्वोकेमीतर
परोक्षोतोर्ष प्रश्न उत्तोण अनुतीर्ण उत्तोर्ण अनुतोर्ण उतोप अनुतीर्ष उत्तीर्ण अनुतोर्ण
माध्योदयविधार उतम नेषट उनम नेष्ट उत्तम ने दर उत्तम नेष्ट
उच्चपटप्राप्तिप्रश्न प्राप्ति न प्राप्ति प्राप्ति न प्राप्ति प्राप्ति न प्राप्ति प्राप्ति न प्राप्ति
बन्दीमोक्ष प्रश्न न मोक्ष मोक्ष न मोक्ष मोक्ष न मोक्ष मोक्ष न मोक्ष मोलष
सर्यकार्यविधि प्रश्न ७ दिन १ वर्ष १५ दिन ६ मास १ मास ६ मास ३ मास १ वर्ष
देवपूजा कुलदेव दुर्गा सूर्य हनुमत शिव सरस्यती गणपति पितृदेव
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६० भृगुसूत्रम्
उपरोक्त प्रश्नावली देखने की सरल विधि :- यदि प्रश्नकर्ता प्रातःकाल सूर्योदय से ११ बजे तक प्रश्न करे तो पूर्वोत्तर दिशा में प्रश्नकर्ता का मुख रखा कर उनके इष्टदेव तथा प्रश्न का ध्यान करते हुए किसी भी पुष्प का नाम मुख से बुलवाना, मध्याह्न में (११ बजे से ३ बजे तक) फल का नाम, सायंकाल (३ बजे से सूर्यास्त) नदी का नाम एवं रात्रि में किसी देवता का नाम उच्चारण करवाना चाहिये। पुष्प, फल, नदी, देवता इन का पहिला अक्षर ग्रहण करके वो वर्ण अष्टवर्गों में जहां हो उस वर्ग से नीचे एवं प्रश्नकोष्ठक के बायें ओर जहां पर दोनों का सम्मेलन हुआ है वही प्रश्न का फल जानना। उदाहरण-जैसे किसी ने दिन के ५ बजे आकर प्रश्न पूछा कि मुकदमे में मेरी जीत होगी? तब सायंकाल होने से प्रश्नकर्ता के मुख से नदी का नाम उच्चारण करवाया तो उसने 'नर्मदा' नदी का नाम कहा-इसका पहिला अक्षर 'न' है। यह वृष वर्ग के तवर्ग में है, अतः इसके नीचे और जय पराजय प्रश्न कोष्ठक के बाई ओर दोनों के सम्मिलन में 'जय' फल मिलता है। अतएव प्रश्नकर्ता की इस मुकदमें में निश्चय रूप से विजय होगी। इसी तरह सम्पूर्ण प्रश्नों का फल समझना।
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