1. Bhrigu Sutra - Siddha Nath Sharma_text
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ப்ருகுஸூத்ர
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श्रीविश्वनाथोविजयति
श्रीमन्महर्षिभृगुप्रणीतम्
भृगुसूत्रम्
रतलाम मण्डलान्तर्गत सुखेड़ा ग्रामनिवासी, काशीस्थ गवर्नमेण्ट संस्कृत महाविद्यालय परीक्षोत्तीर्ण, स्व० पं० श्रीरेवाशंकरात्मज राज्योतिपी, रमल शास्त्री, अग्निहोत्री “नागदा”
पण्डित श्री सिद्धनाथशर्मकृत-
सरलहिन्दीटीकासहितम्
जन्मपत्रफलोपयोगी
खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन
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संस्करण : फरवरी २०१८, संवत् २०७४
मूल्य : ६० रुपये मात्र।
मुद्रक एवं प्रकाशक:
खेमराज श्रीकृष्णदास™
अध्यक्ष : श्रीवेंकटेश्वर प्रेस,
खेमराज श्रीकृष्णदास मार्ग,
मुंबई - ४०० ००४.
सर्वाधिकार : प्रकाशक द्वारा सुरक्षित
Printers & Publishers :
Khemraj Shrikrishnadas,
Prop: Shri Venkateshwar Press,
Khemraj Shnkrishnadass Marg, 7th Khetwadi,
Mumbai - 400 004.
Web Site : http://www.Khe-shri.com
Email : [email protected]
Printed by Sanjay Bajaj For M/s. Khemraj Shrikrishnadass
Proprietors Shri Venkateshwar Press, Mumbai - 400 004,
at their Shri Venkateshwar Press, 66 Hadapsar Industrial
Estate, Pune 411 013.
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"धर्माधिकारपत्रमिदम्"
॥ श्रीमच्छंकरोविजयतेराम् ॥
स्टेट ग्वालियर
मुकाम सुबेड़ा
तारीख ८/३/३६
जि० नं० ११७
श्रीमत्परमहंस परिव्राजकाचार्य पदवाक्य प्रमाण पारावारीण यम नियमासन प्राणायाम प्रत्याहारध्यानधारणा समाध्यष्टय़ोगाचरण निरुपित चक्रवर्तित्यादि-
नाद्यन्वच्छ्रुतगुरुपरम्पराप्राप्त सकलवैभव निगमागमाबिल वेदान्तानुभावाविध-
गताद्वैतभाव संजातशुद्धान्तःकरण युक्त वैदिकमार्गप्रवर्तक श्रीकेलासक्षेत्रस्थित सुवर्ण
हीरामणि माणिक्य मौक्तिक विलसन्मण्डप सिंहासनारुढ श्रीविष्णुप्रयागतीरनिवास
सर्वतन्त्र स्वतन्त्र श्रीगुरुचरण कमलोपासनसल्लव्ध श्रीमत्सुधन्वनः सात्राज्य
प्रतिष्ठापनाचार्य श्रीमत् त्रोटकाचार्य परम्पराप्राप्त श्रीमत्महाराजाधिराजत्व
विशिष्टज्योतिष्मठाधिपत्य घटदर्शनस्थापनाचार्यड अण्णडसंमण्डलाचार्य जगद्गुरु
श्रीनगर महास्थान राजधानी युक्त श्रीमन्महाराजाधिराज श्रीशडूराचार्य
श्रीविश्वेश्वरानन्द करकमल संजाताभिषेक्यजोतिर्मठाधीश्वर श्री १०८ श्री
श्रीमन्महाराजाधिराज श्रीसदानन्दगिरिस्वामिभिः प्रणीताः॥
मूलस्थान-बद्रिकाश्रम अवांतरस्थान भानपुरा, स्टेट इन्दौर
स्वस्ति श्रीमत् परम शिष्योत्तम दयादान दाक्षिण्यादिगनेक सद्गुण गणालंकृत वेद
विहित नित्य नैमित्तिक कर्मानुष्ठान तत्पर सकल निगमागम पारावारप्रवीण
श्रीमच्छंकर चरण कमलार्चन तत्पर धर्मधुरन्धर राजज्योतिषी रमलशास्त्री पं०
सिद्धनाथ अग्निहोत्री सुबेड़ा निवासी को ॐ नमो नारायण स्मरण पूर्वक "पुत्र-
पौत्रादिखिलशिरजर्जीविताशीरवादाः प्रतिदिनस्मुल्लसतुवराम्"।
विशेष श्रीशडूरस्वामी सच्चिदानन्दगिरि महाराज का शुभागमन मुकाम सुबेड़ा
में मिति फाल्गुन शुक्लात्रयोदशी गुरूवार सं० १९९२ को हुआ और समस्त ब्रह्म
समाज ने आचार्य श्री का स्वागत पूर्णरूप से किया परन्तु इस प्रान्त के विप्रवर्ग
विद्या व बहु कर्म से हीन दृष्टिगोचर हुए यद्यपि आप धार्मिक शिक्षा तन मन से दे
रहे हैं तथापि द्रव्याभाव के कारण विद्यालय गिरो स्थिति में है। यह पूर्ति भगवान्
कैलासवासी शडूर अवश्य शीघ्र पूर्ण करेगा।
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हम आपके अतुल-परिश्रम को देखकर धन्यवाद देते हुए साथ में सहर्ष यह भी आज्ञा प्रदान करते हैं कि आप अपने सत्कार्य पर अटल बने रहें तथा ब्राह्मणों के षट् कर्म व कर्मकाण्ड की शिक्षा सम्पूर्ण विप्र कुमारों को देकर सनातन धर्म का प्रचार करें व यथा शास्त्र धर्माधर्म विवेचनपूर्वक प्रायश्चित्त का भी आप निर्णय कर सन्मार्ग बताते रहें।
समस्त प्रिय विप्रमण्डल शुभाशीर्वाद के साथ प्रेमपूर्वक सूचित किये जाते हैं कि आप लोग स्वधर्म (संघयोपासनादिक नित्यकर्म व) धर्म सम्बन्धी निर्णय गायत्री उपदेश व धर्म मर्यादा कायम रहे ऐसे समग्र शास्त्रोक्त वचन उक्त पण्डितजी से सहर्ष ग्रहण किया करें।
इस गुरु आज्ञा का पालन प्रत्येक शिक्षा सूत्रधारी सानन्द पूर्वक स्वीकृत कर ब्रह्मकर्म और स्वधर्म की रक्षा करेंगे।इतिशम् ।
महाराजा श्रीजी की आज्ञा से-अनेक आशीर्वादा: । Secretary
H. H. Jyotirmathadipati Shreemat Jaganguru Shree Shankaracharya
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उपाधिपत्रमिदम्
ॐ
श्रीचन्द्र संस्कृत महाविद्यालयस्य -
प्रमाणपत्रमिदम्
आसभैरवम्, काशी
मन्दसोर मण्डलान्तर्गत सुहेड़ा ग्राम निवासिनो माननीय पण्डित रेवाशङ्कर भट्टतस्यात्मजः श्रीपण्डित सदानाथ शर्म्मा।
अयमेक विंशति वर्षेऽस्मद्विद्यालये व्याकरण,, काव्य, कोश, ज्योतिषे, रमलशास्त्रादीन्यध्येत्य समीचीने नैपुण्यं गतः ।
अतोऽस्मैशीलवते “ज्योतिषरत्न” रमल शास्त्री चेत्युपाधिनाडलंकृतवेदं प्रमाणपत्रं प्रदीयते ।
विक्रमाब्दीये-
१९८८ श्रावण मासे शुक्लपक्षे-एकादश्याम् चन्द्रवासरे, तदनुसार ता॰ २४/८३१ ईशवीये
हः स्वामि दर्शनानन्दस्य श्रीचन्द्र-संस्कृत महाविद्यालयाध्यक्षस्य, आस भैरवं, काशी
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मानपत्रमिदम्
ॐ
श्रीगायत्री-रुद्र-दुर्गा-महायज्ञसमितिपेटलावद,
जिला झाबुआ, मध्यप्रदेश द्वारा समर्पित
"सन्मान-पत्र"
यह सन्मान-पत्र समर्पण करते हुए समिति को महान् हर्ष है कि रतलाम मण्डलान्तर्गत सुभेड़ानिवासी श्रीमान् माननीय पूज्य पंडित श्रीसिद्धनाथजी शास्त्री राज-ज्योतिषी ने यहां के श्रीगायत्री-रुद्र-दुर्गा महायज्ञ को २५ विद्वानों के साथ बड़े समारोह पूर्वक, आचार्य पद को सुशोभित कर वेद ध्वनि एवं शास्त्रोक्त विधि विधान से पारश्रम पूर्वक निर्विघ्न सम्पादन किया।
जिससे चारों ओर से दूर दूर से आई असंख्य जनता श्रीजगन्नारायण भगवान् के अपूर्व दर्शन कर परममुग्ध होकर कृतार्थ हुई।
अतः आपकी इस सराहनीय पुनीत सेवासे समिति परम प्रसन्न होकर यह "सन्मानपत्र" सादर समर्पित करती है।
इति।
यज्ञ-स्थल:
श्री नीलकण्ठेश्वर महादेव-मंदिर, पेटलावद
वै०शु० १०शु० विंश० २०१४
ह: फतेराम गंगाराम सोना,
यज्ञाध्यक्ष:
महायज्ञ-समिति, पेटलावद
सोमेश्वर चतुर्वेदी, वी० टी० सी० विशारद
मन्त्री:
महायज्ञ-समिति, पेटलावद, मण्डल झाबुआ, (म० प्र०)
दिनांक ९-५-१९५७ ई०
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श्रीहरि:
विनम्र-निवेदन
अप्रत्यक्षाणिशास्त्राणि विवादस्तेषु केवलम् ।
प्रत्यक्षं ज्योतिषं शास्त्रं चन्द्राकौ यत्र साक्षिणौ ॥१॥
माननीय पाठकमहोदय,
प्राय: यह तो सबको ही विदित है कि वेद के छः अंगों में से “ज्योतिषं नयनं स्मृतम्” इस प्रमाण से ज्योतिपशास्त्र वेद का छठवां अङ्गनेत्र माना गया। नेत्र का धर्म संसार की सम्पूर्ण वस्तुएं देखने का है। ज्योतिप के तीन स्कन्ध है सिद्धान्त, संहिता और जातक। सिद्धान्त वह है जो सूक्ष्मगणित द्वारा आकाश में ग्रह, नक्षत्र, तारा एवं राशि इनके उदय, अस्त, योग, ग्रह, युद्ध तथा चन्द्र सूर्य ग्रहणादि का स्पष्ट ज्ञान देकर उनसे विविध् भ्र के अनेक शुभाशुभ फल जाने जाते हैं।
संहिता वह है जो ग्रह विम्वों के संयोगवश, दिन, रात्रि, समय, अयन, ऋतु एवं देश विदेशों में नाना प्रकार के शुभाशुभ उत्पादादि योग जाने जाते हैं। जातक वह है जो प्रत्येक जीवात्मा अपने अपने कर्मानुसार ८४ लाख योनियों में भ्रमण करता हुआ पुनः वह यहां जब जन्म लेता है तो ठीक उसी ही समय के इष्ट, लग्न, ग्रह, नक्षत्रादिवश उसके मुख दु:ख, लाभ हानि, भाग्य, आयु आदि जीवनभर के सम्पूर्ण शुभाशुभ फल पूर्णतया जाने जाते हैं।
हमारे प्रात:स्मरणीय ऋषिमहर्षियों ने अपने तपोबल के प्रभाव से उपरोक्त यह सब ही भूत, भविष्य, वर्तमान तीनों काल प्रत्यक्ष जानकर तथा पूर्ण अनुभव करके इस महान् ज्योतिप शास्त्र की रचना की। जिसकी सत्यता की साक्षी आज तक सारे संसार को स्वयं चन्द्र और सूर्य देते हुए अपनी जगमगाती हुई दिव्य ज्योति से प्रकाश का विकास प्रतिक्षण करते जा रहे हैं।
उसी ज्योतिष शास्त्र का छोटा सा यह महामुनि भृगु रचित ‘भृगुसूत्र’ नामक जातक ग्रन्थ जन्मपत्री का फल बताने में अद्वितीय है। इसमें तन्वादि द्वादशभाव स्थित सूर्यादि नवग्रहों के द्वारा शरीर का सुख, धन, भाई, माता-पिता का सुख, तथा अरिष्ट, विद्या, रोग, शत्रु, स्त्री, भाग्योदय,
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विषयानुक्रमणिका
विषय
पृष्ठ
विषय
पृष्ठ
सप्तमे भौमफलम्
२२
पंचमे गुरुफलम्
३५
अष्टमे भौमफलम्
२३
षष्ठे गुरुफलम्
३६
नवमे भौमफलम्
२३
सप्तमे गुरुफलम्
३६
दशमे भौमफलम्
२४
अष्टमे गुरुफलम्
३७
एकादशे भौमफलम्
२४
नवमे गुरुफलम्
३८
द्वादशे भौमफलम्
२५
दशमे गुरुफलम्
३८
चतुर्थोध्यायः
एकादशे गुरुफलम्
३८
लगे बुधफलम्
२५
द्वादशे गुरुफलम्
३९
द्वितीये बुधफलम्
२७
षष्टोध्यायः
तृतीये बुधफलम्
२७
लगे भृगुफलम्
३९
चतुर्थे बुधफलम्
२८
द्वितीये भृगुफलम्
४०
पंचमे बुधफलम्
२९
तृतीये भृगुफलम्
४१
षष्ठे बुधफलम्
२९
चतुर्थे भृगुफलम्
४१
सप्तमे बुधफलम्
३०
पंचमे भृगुफलम्
४२
अष्टमे बुधफलम्
३०
षष्ठे भृगुफलम्
४३
नवमे बुधफलम्
३१
सप्तमे भृगुफलम्
४३
दशमे बुधफलम्
३१
अष्टमे भृगुफलम्
४४
एकादशे बुधफलम्
३२
नवमे भृगुफलम्
४५
द्वादशे बुधफलम्
३२
दशमे भृगुफलम्
४५
पंचमोऽध्यायः
एकादशे भृगुफलम्
४५
लगे गुरुफलम्
३३
द्वादशे भृगुफलम्
४६
द्वितीये गुरुफलम्
३३
सप्तमोऽध्यायः
तृतीये गुरुफलम्
३४
लगे शनिफलम्
४६
चतुर्थे गुरुफलम्
३५
द्वितीये शनिफलम्
४७
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विषय
पृष्ठ
विषय
पृष्ठ
तृतीये शनिफलम्
४७
द्वितीये राहुकेत्वो: फलम्
५२
चतुर्थे शनिफलम्
४७
तृतीये राहुकेत्वो: फलम्
५२
पञ्चमे शनिफलम्
४८
चतुर्थे राहुकेत्वो: फलम्
५२
पष्टे शनिफलम्
४८
पञ्चमे राहुकेत्वो: फलम्
५३
सप्तमे शनिफलम्
४९
पष्टे राहुकेत्वो: फलम्
५३
अष्टमे शनिफलम्
४९
सप्तमे राहुकेत्वो: फलम्
५३
नवमे शनिफलम्
५०
अष्टमे राहुकेत्वो: फलम्
५३
दशमे शनिफलम्
५०
नवमे राहुकेत्वो: फलम्
५४
एकादशे शनिफलम्
५०
दशमे राहुकेत्वो: फलम्
५४
द्वादशे शनिफलम्
५१
एकादशे राहुकेत्वो: फलम्
५४
अष्टाध्याय:
लग्ने राहुकेत्वो: फलम्
५१
द्वादशे राहुकेत्वो: फलम्
५४
टीकाकारपरिचय:
५५
टीकासमाप्तिसमय:
५५
इति भृगुसूत्र की विपयानुक्रमणिका समाप्ता
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तीर्थयात्रा, राजभोग और किस वर्ष में धन प्राप्ति व किस वर्ष में शरीर में अरिष्टता एवं आयु आदि अनेकफल से पूर्णतया ठीक ठीक ही फलप्रद है। प्रस्तुत ग्रन्थ 'ज्योतिषंगारूढीविद्यापितापुत्रैनर्दीयते' इस लोकोक्यानुसार अभी तक अलम्य एवं अप्रकाशित रहने से सर्वजन तथा छात्रवृन्द इससे प्रायः सर्वदा वश्चित ही रहते थे। मेरे विद्याध्ययन काल में भगवान् श्रीशंकरजी के प्रसाद से मुझे काशी के एक वृद्ध प्रसिद्ध एवं प्रकाण्ड विद्वान् ज्योतिपी द्वारा २०० वर्ष का प्राचीन हस्तलिखित केवल मूलमात्र ही प्राप्त हुआ था। अतः मैंने सर्वोपकारार्थ इसको सरल हिन्दी भाषाटीका सहित परिश्रम से बनाकर इस द्वितीय संस्करण में और भी उचित संशोधन कर ग्रन्थ के अन्त में ग्रहों का उच्च नीच शत्रु मित्रादि का आवश्यक उपयोगी चक्र और विविध प्रश्नों के सरलता पूर्वक निर्णय करने की चमत्कारिक केरल सिद्ध प्रश्नावली का संग्रह करके विश्वविख्यात "श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम्-प्रेस" बम्बई के अध्यक्ष महोदय, श्रेष्ठिवर्य श्रीमान् धर्म मूर्ति खेमराज श्रीकृष्णदासजी को यह पुनः पुनः प्रकाशनार्थ राजनियमानुसार सर्वाधिकार पूर्वक सादर समर्पित किया है। अतेव आशा है कि ज्योतिप शास्त्र के प्रेमी महानुभावों को इससे कुछ भी उपकार होगा तो निज परिश्रम को सफल समझूँगा और अन्त में श्रीविद्वज्जनों से करबद्ध प्राथना है कि धर्मवश यदि इसमें कोई तरह का त्रुटि रह गयी हो तो कृपया क्षमा प्रदान करेंगे। इति।
विनीत- पं० सिद्धनाथ शास्त्री, 'ज्योतिषरत्न रमल शास्त्री' पो० मु० मुखेड़ा, मण्डल रतलाम (म० प्र०)
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श्री:
बृहज्जातक की विषयानुक्रमणिका
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पृष्ठ
विम्ब
पृष्ठ
प्रथमोऽध्याय:
लग्ने रविफलम्
१
तृतीये चन्द्रफलम्
१२
द्वितीय रविफलम्
३
चतुर्थे चन्द्रफलम्
१३
तृतीये रविफलम्
४
पंचमे चन्द्रफलम्
१४
चतुर्थे रविफलम्
५
षष्ठे चन्द्रफलम्
१४
पंचमे रविफलम्
६
सप्तमे चन्द्रफलम्
१५
षष्ठे रविफलम्
६
अष्टमे चन्द्रफलम्
१५
सप्तमे रविफलम्
७
नवमे चन्द्रफलम्
१६
अष्टमे रविफलम्
७
एकादशे चन्द्रफलम्
१६
नवमे रविफलम्
८
द्वादशे चन्द्रफलम्
१७
दशमे रविफलम्
९
लग्ने भौमफलम्
१७
एकादशे रविफलम्
९
द्वितीये भौमफलम्
१८
द्वादशे रविफलम्
१०
तृतीये भौमफलम्
१९
द्वितीयोऽध्याय:
चतुर्थे भौमफलम्
२०
लग्ने चन्द्रफलम्
११
पंचमे भौमफलम्
२०
द्वितीये चन्द्रफलम्
११
षष्ठे भौमफलम्
२१
तृतीयोऽध्याय:
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विषयानुक्रमणिका
विषय पृष्ठ विषय पृष्ठ
सप्तमे भौमफलम् २२ पंचमे गुरुफलम् ३५
अष्टमे भौमफलम् २३ षष्ठे गुरुफलम् ३६
नवमे भौमफलम् २३ सप्तमे गुरुफलम् ३६
दशमे भौमफलम् २४ अष्टमे गुरुफलम् ३७
एकादशे भौमफलम् २४ नवमे गुरुफलम् ३८
द्वादशे भौमफलम् २५ दशमे गुरुफलम् ३८
चतुर्योऽध्यायः एकादशे गुरुफलम् ३८
लग्ने बुधफलम् २५ द्वादशे गुरुफलम् ३९
द्वितीये बुधफलम् २७ षष्ठोऽध्यायः
तृतीये बुधफलम् २७ लग्ने भृगुफलम् ३९
चतुर्थे बुधफलम् २८ द्वितीये भृगुफलम् ४०
पंचमे बुधफलम् २९ तृतीये भृगुफलम् ४१
षष्ठे बुधफलम् २९ चतुर्थे भृगुफलम् ४१
सप्तमे बुधफलम् ३० पंचमे भृगुफलम् ४२
अष्टमे बुधफलम् ३० षष्ठे भृगुफलम् ४३
नवमे बुधफलम् ३१ सप्तमे भृगुफलम् ४३
दशमे बुधफलम् ३१ अष्टमे भृगुफलम् ४४
एकादशे बुधफलम् ३२ नवमे भृगुफलम् ४४
द्वादशे बुधफलम् ३२ दशमे भृगुफलम् ४५
पंचमोऽध्यायः एकादशे भृगुफलम् ४५
लग्ने गुरुफलम् ३३ द्वादशे भृगुफलम् ४६
द्वितीये गुरुफलम् ३३ सप्तमोऽध्यायः
तृतीये गुरुफलम् ३४ लग्ने शनिफलम् ४६
चतुर्थे गुरुफलम् ३५ द्वितीये शनिफलम् ४७
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विषयानुक्रमणिका
विषय पृष्ठ विषय पृष्ठ
तृतीये शनिफलम् ४७ द्वितीये राहुकेत्वो: फलम् ५२
चतुर्थे शनिफलम् ४७ तृतीये राहुकेत्वो: फलम् ५२
पञ्चमे शनिफलम् ४८ चतुर्थे राहुकेत्वो: फलम् ५२
पष्ठे शनिफलम् ४८ पञ्चमे राहुकेत्वो: फलम् ५२
सप्तमे शनिफलम् ४९ पष्ठे राहुकेत्वो: फलम् ५३
अष्टमे शनिफलम् ४९ सप्तमे राहुकेत्वो: फलम् ५३
नवमे शनिफलम् ५० अष्टमे राहुकेत्वो: फलम् ५३
दशमे शनिफलम् ५० नवमे राहुकेत्वो: फलम् ५४
एकादशे शनिफलम् ५० दशमे राहुकेत्वो: फलम् ५४
द्वादशे शनिफलम् ५१ एकादशे राहुकेत्वो: फलम् ५४
अष्टमाध्याय: द्वादशे राहुकेत्वो: फलम् ५४
लग्ने राहुकेत्वो: फलम् ५१ टीकाकारपरिचय: ५५
टीकासमाप्तिसमय: ५५
इति भृगुसूत्र की विषयानुक्रमणिका समाप्ता
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अथ तत्त्वदृष्टादिवामाश्रितस्वतरविचारमाह- तत्रादौ लग्ने रविफलम्--
आरोग्यं भवति ।।१।। पित्तप्रकृति: नेत्ररोगी ।।२।। मेधावी सदाचारो वा ।।३।। उष्णोदरवान् ।।४।। मूर्ख: पुत्रहीन: ।।५।। तीव्रबुद्धि: ।।६।। अल्पभाषी प्रवासशील: सुखी ।।७।। स्वोच्चे कीर्तिमान् ।।८।। बलिनिरीक्षिते विद्वान् ।।९।। नीचे प्रतापवान् ।।१०।। ज्ञानद्वेषी दरिद्र: अन्धक: ।।११।। शुभदृष्टे न दोष: ।।१२।। सिहे स्वाश्र नाथ: ।।१३।। कुलारे ज्ञानवान् ।।१४।। रोगी बुद्धुदाक्ष: ।।१५।। मकरे हृदोगी ।।१६।। मीने स्त्रीजनसेवी ।।१७।। कन्यायां रवौ कन्या प्रज: दारहीन: कृतघ्नश्च ।।१८।। क्षेत्री शुभयुक्त: आरोग्यवान् ।।१९।। पापयुते शत्रुनீचक्षेत्रे तृतीये वर्शे ज्वरपीडां।।२०।। शुभदृष्टे न दोष: ।।२१।।
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अथटीकाकारः स्वेष्टदेव नमस्कारमाचष्टे- श्रीपार्वतीपतिं नत्वा गुरुं चैव सरस्वतीम् । सिद्धप्रभकारिनाथ्री टीकेयं रच्यते मया ॥
जगतां रक्षणार्थाय दैवज्ञानां हिताय च । यस्यां विज्ञानमात्रेण दैवज्ञो जायते ध्रुवम् ॥
सूर्य जन्म लग्न में हो तो निरोग्य होता है। पित्तप्रकृति और नेत्र में रोगवाला हो। बुद्धिमान् और अच्छा आचरण करनेवाला हो। जठराग्नि तेज हो ज्ञान से हीन और पुत्र से हीन हो। तीक्ष्णबुद्धिवाला हो। थोड़ा बोलनेवाला, परदेश में घूमनेवाला और मुखी हो। यदि सूर्य अपनी उच्च राशि (मेषराशि) में हो तो वह कीर्तिवाला होता है। बलवान् ग्रह देखते हों तो पण्डित होता है। यदि सूर्य नीच (तुलाराशि) में हो तो तेजस्वी होता है। और ज्ञान से वैर करनेवाला, दरिद्र और काणा होता है। शुभ ग्रह की दृष्टि होने पर उक्त, अनिष्ट फल दूर हो जाते हैं। सूर्य सिंह राशि में अथवा सिंह के नवांश में हो तो किसी स्थान का अधिपति होता है। कर्क राशि में हो तो जानी हो। और शरीर में रोग तथा फोड़े फूँसीवाला हो। मकर सूर्य राशि में हो तो हृदय में रोग हो। मीन राशि मे हो तो स्त्रियों की सेवा करनेवाला हो। कन्या राशि में सूर्य हो तो कन्या उत्पन्न करनेवाला हो, और स्त्री से हीन तथा किये हुए उपकार को नाश करनेवाला हो। सूर्य अपनी राशि (सिंहराशि) का हो तो अथवा शुभग्रहयुक्त हो तो आरोग्य होता है। सूर्य के साथ पाप ग्रह बैठे हों और शत्रु तथा नीच ग्रह के घर में हो तो ३ वर्ष में ज्वर से कष्ट हो। शुभ ग्रहों के देखने पर ये दुष्टफल नहीं होता है।१-२१॥
"अत्रोदाहरणम्-
॥ श्रीगणेशायनमः ॥ श्रीशुभ संवत् १९९९ शके १८६४ प्रवर्तमाने
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रविरुत्तरायणगते, ग्रीष्मर्तौ, मासोत्तमे-आषाढ मासे कृष्णपक्षे, चतुर्थ्याम् सह पञ्चम्यां तिथौ गुरुवासरे ५।७ धनिष्ठोपरिशतभिषा-नक्षत्रे, १७-५१ प्रीत्युपरि आयुष्यमान् योगे ४१-३१ तत्रश्रीसूर्योदयदिष्ट घटचादि ३७१५ सूर्य: २-१६ लग्नस्पष्ट: १-८-५२-० दिनमानम् ३३-२३ रात्रिमानम् २६-३७ अहोरात्रम् ६०-० भयातम् १७-४६ भभोग: ५८-३२ मकरलग्नोदये श्रीसकल कल्याणवती शुभ वेलायास् सुखेड़ाग्रामवास्तव्य: पण्डितश्रीसिद्धनाथशास्त्रिण: गृहे चि० पुत्र रत्न जन्म: चरणभेदेन जन्मनाम "शिवकुमार:" इति प्रतिष्ठिततराशि कुम्भ: स्वामी मन्दश्र । आङ्गलमतेन जन्मतिथ्यादिकं च (दिनांक २,७,१९४२ ईशवीयै) श्री: जन्मकुण्डलीचक्रमिदम्
लङ् ११ के १२ शु १ बु २ श ७ मं १० ५ ८ कल्याणंभवतु ४ मं ६ रा शु ३ बु २ श ५ लश्नाद्द्वितीये रविफलम्
मुखरोगी ॥२२॥। पञ्चविंशतिवर्षे राजदण्डेन द्रव्यच्छेद: ॥२३॥ उच्चे स्वक्षेत्रे वा न दोष: ॥२४॥ पापयुते नेत्ररोगी ॥२५॥ स्वल्पविद्वान् रोगी ॥२६॥ शुभवीक्षिते धनवान् दोषादीन्
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व्यपहरति ॥२७॥ नेत्रसौख्यम् ॥२८॥ स्वोच्चे स्वक्षेत्रे वा बहुधनवान् ॥२९॥ बुधयुते पवनवाक् ॥३०॥ धनाधिप: स्वोच्चे वाग्मी ॥३१॥ शास्त्रज्ञ: ज्ञानवान् नेत्रसौख्यम् राजयोगश्च ॥३२॥
लग्न से द्वितीय स्थान में सूर्य हो तो मुख में रोग हो। २५वें वर्ष में राजा के दण्ड से धन का नाश हो। यदि सूर्य उच्च (मेष) में हो अथवा अपने स्थान (सिंहराशि) में हो तो यह उक्तदोष नहीं होता है अर्थात् राजदण्ड से धन का नाश नहीं होता है। सूर्य के साथ पाप ग्रह बैठे हों तो नेत्र में रोग हो, और थोड़ा शास्त्र जाननेवाला तथा रोगी होता है। सूर्य को यदि शुभ ग्रह देखते हों तो धनी हो और इन अनिष्ट फलों का नाश होता है। और नेत्र का पूर्ण सुख हो। सूर्य अपने उच्च (मेष) में तथा अपने स्थान (सिंह) में हो तो बड़ा धनी हो। सूर्य के साथ बुध हो तो रूक्ष कर बोलनेवाला हो। द्वितीय स्थान का स्वामी उच्च (मेष) में हो तो चञ्चल वाणी बोलनेवाला हो। शास्त्र जाननेवाला, ज्ञानी, नेत्र का सुखी, और राजयोगवाला होता है॥३२-३२॥
बुद्धिमान् अनुजरहित: ज्येष्टनाश: ॥३३॥ पञ्चमे वर्षे चतुरष्टद्वादशवर्षे वा किश्चित्पीडा ॥३४॥ पापयुते कूरकर्ता ॥३५॥ द्विष्ट्रातृमान् पराक्रमी ॥३६॥ युद्धे शूरश्र ॥३७॥ कीर्तिमान् निजधनभोगी ॥३८॥ शुभयुते सोदरवृद्धि: ॥३९॥ भावाधिपे बलयुते श्रातृदीर्घायु: ॥४०॥ पापयुते पापेक्षणवश-नाश:॥४१॥
शुभवीक्षणवशाद्धनवान् भाग्यसुखी च॥४२॥ लग्न से तीसरे घर में सूर्य हो तो बुद्धिमान्, छोटे भाई से हीन, और बड़े भाई मर जाते हैं। ५ वर्षमें अथवा ४।८।१२ वर्षमें कुछ शरीर पीड़ा हो। सूर्य
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पाप-ग्रह से युक्त हो तो नीच कर्म करनेवाला हो। और दो भ्राता-वाला हो एव तेजस्वी होता है। सग्राम में शूरवीर हो कीर्तिवाला और अपने धन को भोगनेवाला होता है। सूर्य शुभ ग्रह से युक्त हो तो अपने सगे भ्राता की वृद्धि होती है। तृतीय स्थान का स्वामी बलवान् ग्रहों से युक्त हो तो भाइयों की दीर्घायु होती है। पापग्रह से युक्त हों व देखते हो तो भाई का नाश होता है। और शुभ ग्रहों के देखने से धनी सब आनन्द भोगनेवाला और सुखी होता है॥३३-४२॥
हीनाझः अहंकारी जनविरोधी उष्णदेही मनः पीडावान् ॥४३॥द्वात्रिंशद्र्शे सर्वकर्मानुकूलवान् ॥४४॥बहुप्रतिष्ठासिद्धि: सत्त्वापदविज्ञान शौर्यसम्पन्न: ॥४५॥ धनधान्यहीन: ॥४६॥ भावाधिपे बलयुते स्वक्षेत्रत्रिकोणे केन्द्रे लक्षणापेक्षया आन्दोलिकाप्राप्ति: ॥४७॥पापयुते पाप वीक्षणवशाद्दुष्टस्थाने दुर्वाहनसिद्धि॥४८॥ क्षेत्रहीन: ॥४९॥ परगृह एव वास: ॥५०॥
लग्न से चौथे भवन में सूर्य हो तो अझ से हीन, घमंडी, मनुष्यों से कपट करनेवाला, गरम शरीरवाला और चित्त हमेशा कष्ट में हो। ३२ वर्ष में सब कार्यों के अनुकूल हो। बहुत प्रतिष्ठा सिद्धिवाला, विख्यात पदवीवाला ज्ञान और वल से युक्त हो। और धनधान्य से रहित हो।
चतुर्थ स्थान का स्वामी बलवान् ग्रहों से युक्त हो व राशि (सिंह) का हो अथवा ५-९ में व केन्द्र (१-४-७-१०) इन स्थानों में बैठा हो तो चिह्नानुसार पालकी तथा अच्छी २ सवारी प्राप्त हो। यदि पाप ग्रहों से युक्त हो व पाप ग्रह की दृष्टि होने पर खराब स्थान में नीच वाहन की सवारी प्राप्त होवे। मकान से रहित हो। और सर्वदा दूसरों के घर में वास करनेवाला होता है॥४३-५०॥
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निर्धनः स्थूलदेही सप्तमे वर्षे पितृरिष्टवान् ॥५१॥ मेधावी अल्पपुत्रः बुद्धिमान् ॥५२॥ भावादिषे बलयुते पुत्रसिद्धिः ॥५३॥ राहुकेतुयुते सर्पशापात् सुतक्षयः ॥५४॥ कुजयुते शत्रुयते मूलात् ॥५५॥ शुभदृष्टियुते शुभवृद्धियुते न दोषः ॥५६॥ सूर्यशत्रुभावदिषु भक्तः ॥५७॥ बलयुते पुत्रसमृद्धिः ॥५८॥
लग्र से पांचवें भाव में सूर्य हो तो कगाल मोटा शरीरवाला और ७ वर्ष में पिता को अरिष्ट हो। बुद्धिमान् और अल्प पुत्रवाला हो । पांचम स्थान का स्वामी ग्रहों के साथ युक्त हो तो पुत्र का पूर्ण सुख होता है। सूर्य के साथ राहु केतु युक्त हों तो नागदेव के शाप से पुत्र का नाश हों। मङ्गल युक्त होने पर शत्रु के कारण से पुत्र का नाश हो। सूर्य को शुभ ग्रह देखते अथवा युक्त होने पर ये कफन न होता अर्थात् पुत्र का सुख होता है। और सूर्य मृग आदि जीवों में सेवा करनेवाला हो। सूर्य के साथ वली ग्रह युक्त होने पर पुत्र की वृद्धि होती है॥५१-५८॥
अल्पज्ञातिः ॥५९॥ शत्रुवृद्धिः धनधान्यसमृद्धिः ॥६०॥ विंशतिवर्षे नेत्र वैपरीत्यं भवति ॥६१॥ शुभदृष्टियुते न दोषः ॥६२॥ अहिकाननपारकुन्त्रसेवी ॥६३॥ कीर्तिमान् शोक-रोगी महोष्णदेही॥६४॥ शुभदृष्टे भावादिषे देहारोग्यम् ॥६५॥ ज्ञातिशत्रुबहुल्यस् ॥६६॥ भावादिषे दुर्बले शत्रुनाशः ॥६७॥ पितृदुर्बलः ॥६८॥
लग्र से छठवें स्थान में सूर्य हो तो छोटी जातिका हो। शत्रु की वृद्धि और धनधान्य की वृद्धि हो। २० वर्ष में नेत्र में फूला आदि रोग उत्पन्न हो। सूर्य को शुभग्रह देखते हों अथवा युक्त हों तो यह फल नहीं होता है
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अर्थात् नेत्र का अच्छा सुख होता है। सर्प जंगल को पार करनेवाला व मन्त्र को जाननेवाला हो। यशवाला, चिन्ताकरनेवाला, रोगी और गरमशरीरवाला होता है। छठे स्थान का स्वामी शुभग्रह के साथ बैठा हो तो शरीर आरोग्य होता है। जाति में बहुत शत्रु हों। छठें स्थान का मालिक बलहीन हो तो शत्रु का नाश हो। और पिता कमजोर होता है॥५९-६८॥
लग्नात्सप्तमे रविफलम्
विवाहविलम्बनं स्त्रीद्वेषी परदाररतः दारद्रयवान् ॥६९॥ पञ्चविंशतिवर्षे देशान्तर प्रवेशः ॥७०॥ अभक्ष्यभक्षणः विनोदशीलः दारद्रेषी ॥७१॥ नाशान्तबुद्धिः ॥७२॥ स्वक्षे बलवति एकदारवान् ॥७३॥ शत्रुनोचचक्षिते पापयुते वीक्षणैर्बहुदारवान् ॥७४॥
लग्न से सातवें घर में सूर्य हो तो विवाह विलम्ब से हो, स्त्री से विरोध करनेवाला, दूसरे की स्त्री से प्रेम करनेवाला और दो स्त्री होती हैं। २५ वर्ष में अन्य देश में गमन हो, और नहीं खाने योग्य पदार्थ का भक्षण हो। नम्रस्वभाववाला हो तथा स्त्री से कपट करनेवाला होता है। प्रत्येक कार्य को नष्ट करनेवाली बुद्धि हो। सूर्य अपनी राशि (सिंह) का हो और बलवान् होने पर एक स्त्री हो। यदि सूर्य को शत्रु तथा नीच ग्रह की दृष्टि होने पर अथवा पाप ग्रह सूर्य के साथ बैठे हों व देखते हों तो बहुत स्त्रियोंवाला होता है॥६९-७४॥
लग्नादष्टमे रविफलम्
अल्पपुत्रः नेत्ररोगी ॥७५॥ दशमे वर्षे शिरोव्रणि ॥७६॥ शुभयुतदृष्टे तत्परिहारः ॥७७॥ अल्पधनवान् गौमहिष्या-दिनाशः ॥७८॥ देहे रोगः ॥७९॥ ख्यातिमान् ॥८०॥
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भावाधिपे बलयुते इष्टक्षेत्रवान् ॥८१॥ स्वोच्चे स्वक्षेत्रे दीर्घायु: ॥८२॥
लग्न से आठवें भाव में सूर्य हो तो थोड़े पुत्र और नेत्र में रोग हो। १० वर्ष शिर में घाव हो। सूर्य के साथ शुभ ग्रह युक्त हो अथवा देखते हों तो मस्तक में घाव नहीं होता है। धोड़ा धनवाला, और गौ भैंस आदि पशु नाश हो जाते हैं। शरीर में सर्वदा रोगवाला हो, और प्रसिद्ध होता है। अष्टम स्थान का स्वामी बलवान् ग्रहों से युक्त हो तो इच्छानुसार खेतवाला हो। यदि सूर्य उच्च (मेष) का हो व अपने स्थान (सिंह) राशि में हो तो दीर्घायु होती है॥७५-८२॥
सूर्योविदेवता भक्त: ॥८३॥ धार्मिक: अल्पभाग्य: पितृद्देषी मितद्रव्यवान् स्वोच्चे स्वक्षेत्रे तस्य पिता दीर्घायु: ॥८४॥ बहुधनवान् तपोध्यानशील: गुरुदेवताभक्त: ॥८५॥ नीचारिपापक्षेत्रे पापैर्युतेऽ दृष्टे वा पितृनाशः॥८६॥ शुभयुते वीक्षणवशाद्वा पित्ता दीर्घायु: ॥८७॥
लग्न से नौवें भवन में सूर्य हो तो सूर्य, शिव आदि देवताओं की सेवा करनेवाला हो। पुण्य करनेवाला, थोड़ा भाग्यवाला, और पिता से विरोध करनेवाला, तथा पुत्र स्त्री से युक्त हो, यदि सूर्य उच्च का (मेष) अथवा अपने स्थान (सिंहराशि) में हो तो उसका पिता दीर्घायु होता है। बड़ा धनाढ्य हो, परमात्मा का भजन करने का स्वभाव हो, और गुरु तथा देवताभक्त होता है। सूर्य नीच (तुला) का हो शत्रु तथा पापग्रह के घर में व पाप ग्रह देखते हों व युक्त हों तो पिता का नाश होता है। सूर्य शुभग्रह से युक्त हो अथवा देखते हों तो पिता दीर्घायु होता है॥८३-८७॥
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अष्टादशवर्पे विद्याधिकारेण प्रसिद्धो भवति द्रव्यार्जनसमर्थश्च ॥८८॥ दृष्टित्रितः राजप्रियः सत्कर्मरतः राजशूरः ख्यातिमान् ॥८९॥ स्वोच्चे स्वक्षेत्रे बलपरः ॥९०॥ कीर्तिम्रसिद्धिः ॥९१॥ तटाकक्षेत्रगोपुरादिब्राह्मणप्रतिष्ठासिद्धिः ॥९२॥ पापक्षेत्रे पापयुक्ते पादृष्टिवशात् कर्मविघ्नकरः ॥९३॥ दुष्टकृतिः अनाचारः दुष्कर्मकृतापी ॥९५॥
लग्न से दशम स्थान में सूर्य हो तो १८ वर्ष में विद्या के प्रताप से प्रसिद्ध होता है और धन प्राप्त करने में भी समर्थ होता है। सूर्य को तीन ग्रह देखते हों तो राजा का प्रिय हो अच्छा कर्म करनेवाला, व राज्य में शूर वीर, और प्रसिद्ध होता है। सूर्य उच्च (मेष) का अथवा अपने स्थान (सिंह) का हो तो वली होता है। यश से प्रसिद्ध हो। बावड़ी स्थान, गौ, ग्राम ब्राह्मण, देवप्रतिष्ठा आदि कराने से प्रसिद्ध होता है। सूर्य पाप ग्रह के घर में हो अथवा पाप ग्रह से युक्त हो व देखते हों तो कोई कार्य करने में विघ्न हो। दुष्टकार्य करनेवाला हो। नीच आचरणवाला, भ्रष्टकर्मवाला और पापी होता है॥८८-९५॥
बहधान्यवान् पञ्चविंशतिवर्षे वाहनसिद्धिः ॥९६॥ धनवाग्जाल-द्रव्यार्जनसमर्थः प्रभुज्वरितभृत्यजनलेखः ॥९७॥ पापयुते बहुधान्यव्ययः ॥९८॥ वाहनहीन ॥९९॥ स्वक्षेत्रे स्वोच्चे अधिकप्राबल्यम् ॥१००॥ वाहनेशयुते बहुक्षेत्रे वित्ताधिकारः ॥१०१॥ वाहनयोगेन न बहुभाग्यवान् ॥१०२॥
लग्न से ग्यारहवें घर में सूर्य हो तो अत्यन्त धन धान्यवाला हो, २५ वर्ष में सवारी प्राप्त हो। धन, वाणी, और कपट से धन को उपार्जन
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करने में समर्थ होता है, भयङ्कर ज्वर से कष्ट हो, और सेवकजनों पर प्रेम करनेवाला हो। सूर्य के साथ पापग्रह युक्त हो तो अधिक धन खर्च करनेवाला हो। सवारो से हो हान हो। सूर्य अपने स्थान (सिंह) का अथवा उच्च (मेष) का हो तो अत्यन्त बलवाला हो, सूर्य के साथ चतुर्थ स्थान का स्वामी युक्त हो तो वहुत स्थानों में धन का अधिकार हो। चतुर्थस्थान के स्वामी के साथ हो तो रवि अल्पभाग्यवाला होता है॥९६-१०२॥
लग्नाद्द्वादशे रविफलम्
षट्त्रिंशददर्शे गुल्मरोगी ॥१०३॥ अपात्रव्ययकारी पतितः धनहानि: ॥१०४॥ गोहत्यादोषकृत् परदेशवासी ॥१०५॥ भावाधिपे बलयुते वा देवतासिद्धि: ॥१०६॥ शय्याखट्वाज्ञादि सौख्यम् ॥१०७॥ पापयुते अपात्रव्ययकारी सुखशय्याहीन: ॥१०८॥ षष्ठेशयुते कुष्ठरोगयुतः शुभदृष्टियुते निवृत्ति: ॥१०९॥ पापी रोगवृद्धिमान् ॥११०॥
लग्न से बारहवें भवन में सूर्य हो तो ३६ वर्ष में गुल्म रोग हो। नीच स्थान में खर्च करनेवाला, भ्रष्ट, और धन की हानि करनेवाला होता है। गोहत्या आदि दोष को करनेवाला, और परदेश में रहनेवाला होता है। यदि द्वादश स्थान का स्वामी बलवान् ग्रह से युक्त हो तो देवता को सिद्धकरनेवाला होता है। पलङ्ग आदि से सुख हो, सूर्य के साथ पाप ग्रह बैठे हों तो दुष्टस्थान में खर्च करनेवाला सुख और शय्या से हीन होता है। सूर्य के साथ षष्ठम स्थान का स्वामी युक्त हो तो कुष्ठरोगवाला हो, सूर्य को शुभग्रह देखते हों व युक्त हो तो यह दोष निवृत्त होता है अर्थात् कुष्ठ रोग नहीं होता हैं। पाप करनेवाला और रोग की वृद्धि होती है।
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इति श्रीभृगुसूत्रे सिन्धुप्रभाकरी टीकाभियुक्ते सूर्यभावाध्यायनाम प्रथमोऽध्याय: ॥१॥
अथ तन्वादिद्वादशभावस्थितचन्द्रफलमाह
तत्रादौ लग्ने चन्द्रफलम्
रूपलावण्ययुक्तश्वपल: व्याधिना जलाच्चासौख्य: ॥१॥
पञ्चदशवर्षे बहुयात्रावान् ॥२॥
मेषवृषभ कर्कलश्रे चन्द्रे शास्त्रपर: ॥३॥
धनी सुखी नृपाल: मृदुवाक् बुद्धिरहित: मृदुगात्र: बलो ॥४॥
शुभदृष्टे बलवान् ॥५॥
बुद्धिमान् आरोग्यवान् बाग्जालक: धनी ॥६॥
लग्नेशे बलरहते व्याधिमान् ॥७॥
शुभदृष्टे आरोग्यवान् ॥८॥
जव लग्न में चन्दमा हो तो सुन्दर स्वरूपवाला, चंचलरोग से युक्त और जल से भय प्राप्त होता है। १५ वर्ष में बहुत यात्रा करनेवाला हो। चन्द्रमा लग्न में मेष, वृष, कर्क इन राशियों में हो तो शास्त्र को जाननेवाला हो। और धनी, सुखी एवं मनुष्यों की रक्षा करनेवाला, मधुरवाणी बोलनेवाला बुद्धि से हीन, व कोमल शरीरवाला, और तेजस्वी होता है। चन्द्रमा को शुभ ग्रह देखते हों तो बली होता है। और बुद्धिमान् निरोग्य शरीरवाला, कपटी वाणी बोलनेवाला तथा धनवान् होता है। यदि लग्न का स्वामी बल से हीन हो तो रोगी होता है। लग्नेश को शुभ ग्रह देखते हों तो आरोग्य होता है॥१-८॥
लग्नाद्द्वितीये चन्द्रफलम्
शोभनवान् बहुप्रतापी धनवान् अल्पसन्तोषी ॥९॥
अष्टादशवर्षे राजद्वारे ण सेनाधिपत्ययोग: ॥१०॥
पापयुते विद्याहीन:
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।।११।। शुभयुते बहुविद्याधनवान् ।।१२।। एकैनैव पूर्णचन्द्रेण सम्पूर्ण धनवान् ।।१३।। अनेकविद्यावान् ।।१४।। लग्न से द्वितीय स्थान में चन्द्रमा हो तो सुन्दर अत्यन्त तेजस्वी, धनी, और थोड़ा सन्तोष करनेवाला हो। १८ वर्ष में राजद्वार में सेना का मालिक हो। चन्द्रमा के साथ पाप ग्रह बैठे हों तो विद्या से रहित हो। शुभ ग्रह बैठे हों तो बहुत प्रकार की विद्यावाला और धनाढ्य होता है। यदि केवल एक ही पूर्ण चन्द्रमा हो तो दूसरे घर में पूर्ण धनवाला हो और अनेक प्रकार की विद्या जाननेवाला होता है।।९-१४।।
लग्नात् द्वितीये चन्द्रफलम् भगिनीसमान्य: वातशरीर अल्पभाग्य: ।।१५।। चतुर्विंशतिवर्षे भाविरूपेन राजदण्डयेन द्रव्यच्छेद: ।।१६।। गोमहिष्यादिहीन: ।।१७।। पिशुन: मेधावी सहोदरद्वृत्ति: ।।१८।। लग्न से तीसरे भाव में चन्द्रमा हो तो मध्यम बहिन वाला और वातशरीरवाला होता है, तथा अन्न से हीन एवं मन्दभाग्य का होता है। २४ वर्ष में किसी कार्य के अपराध में राजा के दण्ड से धननाश हो, गौ भैंसे आदि पशुओं से हीन हो चुगली करनेवाला बुद्धिवाला और सग भाइयों की वृद्धिवाला होता है।।१५-१८।।
लग्नाच्चतुर्थे चन्द्रफलम् राज्याभिषिक्त: आशुवान् क्षीरसमृद्ध: धनधान्यसमृद्ध: मातृरोगी ।।१९।। परस्त्रीसङ्गनपानकारी ।।२०।। मिष्टान्नसम्पन्न: परस्त्रीलोल: सौख्यवान् ।।२१।। पूर्णचन्द्रे स्वक्षेत्रे बलवान् मातृदीर्घायु: क्षीणचन्द्रे पापयुक्ते मातृनाश: ।।२२।। वाह्महीन: बलयुते वाहनसिद्धि: ।।२३।। भावाधिक्ये स्वोच्चे अनेकाश्वादि-वाहनसिद्धि: ।।२४।।
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लग्न से चौथेभाव में चन्द्रमा हो तो राजयोगी, घोड़ावाला और दूध की वृद्धिवाला होता है, तथा धन धान्य से युक्त और माता रोगवाली हो। पराई स्त्री के स्तन को पीनेवाला हो। मीठा अन्न से युक्त दूसरे की स्त्री में आसक्त और सुखी होता है। यदि पूर्ण चन्द्रमा अपने स्थान (कर्क) राशि में हो तो बलवान् या माता दीर्घायु होती है यदि पाप ग्रह से युक्त क्षीण चन्द्रमा हो तो माता का नाश होता है। और वाहन से रहित हो चन्द्रमा बलवान् ग्रहों से युक्त हो तो सवारी प्राप्त होवे। चतुर्थ स्थान का स्वामी उच्च में हो तो अनेक घोड़े की सवारी प्राप्त होती है॥१९-२४॥
लग्नातपञ्चमे चन्द्रफलम्
स्त्रीदेवतासिद्धिः भार्या रूपवती ॥२५॥ क्वचित् कोपवती
स्तनमध्ये लाञ्छनं भवति ॥२७॥ चतुष्पादलाभः
स्त्रीद्रव्य बहुलार्जनः सत्स्वप्नः बहुश्रुतोपदेशः चिन्तावान्
स्त्रीप्रजावान् एकपुत्रवान् ॥२८॥ स्त्रीदेवतोपासनावान्
शुभयुक्ते वीक्षणवशादनुग्रहसमर्थः॥३०॥ पापयुक्तेक्षण-
वशान्निग्रहसमर्थः ॥३१॥ पूर्णचन्द्रे बलवान् अन्नदानप्रीतिः
अनेकबुधप्रसादैश्वर्यसम्पन्नः सत्कर्मकृत् भाग्यसमृद्धः राजयोगी
ज्ञानवान् ॥३२॥
लग्न से पांचवें घर में चन्द्रमा हो तो स्त्री और देवता को वश में करनेवाला तथा सुन्दर स्त्रीवाला होता है। कभी स्त्री क्रोधवाली हो और कुच के बीच में चिह्न होता है। चतुष्पद जीवों का लाभ हो व दो स्त्रीवाला तथा अत्यन्त दूध से युक्त, सत्य बोलनेवाला अधिक परिश्रम करनेवाला रंजस्त्री तथा एक पुत्रवाला हो। स्त्री तथा देवता की सेवा करनेवाला होता है। यदि चन्द्रमा के साथ शुभ ग्रह बैठे हों वह देखते हों तो दया करने में समर्थ होता है। यदि पाप ग्रह बैठे हों व देखते हों तो
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दुष्टस्वभाव में समर्थ हो। पूर्णचन्द्रमा पञ्चम स्थान में हो तो बली और अन्न का दान करनेवाला अनेक विद्वानों के आशीर्वाद से ऐश्वर्ययुक्त अच्छे कर्म करनेवाला भाग्यवान् राज्ययोगवाला और ज्ञानी होता है॥२५-३२॥
लग्नात्षष्ठे चन्द्रफलम्
अधिकदारिद्रयदेही ॥३३॥ षट्त्रिंशद्दर्शे विधवासुतौ तत्र पापयुते होनपापकरः ॥३४॥ राहुकेतुयुते अर्थहीनः ॥३५॥ घोरः शत्रुकलहान् सहोदरहीनअग्रिमादिरोगी॥३६॥ तटाककूपादिषु जलादि गण्डः ॥३७॥ पापयुते रोगवान् ॥३८॥ क्षीणचन्द्रे पूर्णफलानि ॥३९॥ शुभयुते बलवान् अरोगी ॥४०॥
लग्न से छठे स्थान में चन्द्रमा हो तो अत्यन्त दरिद्र शरीरवाला हो। २६ वर्ष में विधवा स्त्री के साथ भोग करनेवाला हो। चन्द्रमा के साथ पापग्रह बैठे हो तो नीच पाप करनेवाला होता है। चन्द्रमा के साथ राहु केतु बैठे हों तो धन से रहित हो। भयङ्कर शत्रु से झगड़ा करनेवाला भाई से हीन और मन्दाग्रिरोगवाला होता है। वा बड़ী कुँवा व जलादि से भयभीत हो। यदि चन्द्रमा क्षीण हो तो पूर्णफल प्राप्त होते हैं। चन्द्रमा के साथ पापग्रह युक्त हो तो रोगी हो। शुभग्रह युक्त हो तो बली और रोगरहितं होता है॥३३-४०॥
लग्नात्सप्तम चन्द्रफलम्
मृदुभाषी पार्थनेत्रः द्वात्रिंशद्दर्शे स्त्रीयुक्तः ॥४१॥ स्त्रीलोलः स्त्रीमूलेन ग्रन्थिशस्त्रादिपीडा ॥४२॥ राजप्रसादलाभः ॥४३॥ भावाधिपे बलयुते स्त्रीद्वयम् ॥४४॥ क्षीणचन्द्रे कलत्रनाशः ॥ पूर्णचन्द्रे बलयुते स्वोच्चे एकदारवान् ॥४५॥ भोगलुब्धः ॥४६॥
लग्न से सातवें भाव में चन्द्रमा हो तो कोमल वाणी बोलनेवाला, पार्थिव नेत्रवाला अर्थात् अरजुन के समान नेत्रवाला हो। बत्तीसवें वर्ष में स्त्री से युक्त होता है। स्त्रीलोलुप हो। स्त्रीमूलेन शस्त्रादि से पीड़ा हो। राजा की कृपा से लाभ हो। भावाधिपे बलवान् हो तो दो स्त्री होवें। क्षीण चन्द्रमा हो तो कलत्र का नाश हो। पूर्ण चन्द्रमा बलवान् हो स्वोच्च में हो तो एक पत्नीव्रत होवें। भोगलोलुप होवें॥४१-४६॥
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समीप नेत्रवाला। और ३२ वर्ष में स्त्री से युक्त होता है। चञ्चल स्त्रीवाला तथा स्त्री के कारण से गांठ और शस्त्रादि से पीड़ा हो। राजा की प्रसन्नता से लाभ होता है। सप्तम स्थान का स्वामी बलवान् ग्रहों से युक्त हो तो दो स्त्रीवाला हो। यदि चन्द्रमा क्षीण हो तो स्त्री का नाश हो। पृथ्विन्द्रमा हो और वली ग्रह युक्त हो, व उच્ચ (वृष) का हो तो एक ही स्त्री वाला होता है। एवं भोगविलास में लुब्ध रहता रहे॥४५-४६॥
लग्रादष्टमे चन्द्रफलम् अल्पवाहनवान् ॥ तडाकादिषु गण्ड: ॥ स्त्रीमूलेन बन्धुजनपरित्यागी ॥ स्वक्षे स्वोच्चे दीर्घायु: क्षीणे वा मध्यमायुः ॥ (क-ग)
लग्न से आठवें भाव में चन्द्रमा हो तो थोड़ा वाहनवाला। तड़ाग, कूआ आदि में डूबकर मरनेवाला, स्त्री के कारण अपने बन्धुजनों को त्यागनेवाला हो। यदि चन्द्रमा अपनी राशि (कर्क) में उच्चवस्थान (वृषभ) में हो तो दीर्घायु वाला हो, चन्द्रमा क्षीण हो तो मध्यम आयुवाला होता है (क-ग)
लग्रात्नवमे चन्द्रफलम् बहुश्रुतवान् पुण्यवान् ॥४७॥ तटाकगोपुरादिनिर्माणपुण्यकर्ता ॥४८॥ पुत्रभाग्यवान् ॥४९॥ पूर्णचन्द्रे बलयुते बहुभाग्यवान् ॥५०॥ पितृदीर्घायु: ॥५१॥ पापयुते पापक्षेत्रे भाग्यहीन: ॥५२॥ नष्टपितृमातृक: ॥५३॥
लग्न से नवम स्थान में चन्द्रमा हो तो अनेक शास्त्र सुननेवाला और धर्मात्मा होता है। घाट, ग्राम आदि बनानेवाला तथा धर्म करनेवाला हो। पुत्र भाग्यवान् हो। पूर्ण चन्द्रमा हो और वली ग्रहों से युक्त हो तो
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बड़ा भाग्यशील होता है, पिता दीर्घायु वाला होता है। यदि चन्द्रमा पाप ग्रह से युक्त हो वह पापग्रह के घर में हो तो भाग्य से हीन हो। और माता-पिता नष्ट हो जाते हैं॥४७-५३॥
लश्नादशमे चन्द्रफलम्
विद्यावान् ॥५४॥ पापयुते साप्ताविंशतिवर्षे विधवासङ्गे ननु जनविरोधी ॥५५॥ अतिमेधावी ॥५६॥ सत्कर्मनिरतः कीर्तिमान् दयावान् ॥५७॥ भावाधिपे बलयुतेविशेषत्कसिद्धि: ॥५८॥ पापनिरीक्षते पापयुते वा दुष्कृतिः ॥५९॥ कर्मविच्रकरः ॥६०॥
लग्न से दसवें घर में चन्द्रमा हो तो विद्यावाला हो, चन्द्रमा के साथ पापग्रह हो तो २७वे वर्ष में विधवा स्त्री के व्यभिच्चार करने से मनुष्यों का वैरी होता है। और अत्यंत बुद्धिमान् होता है। श्रेष्ठ कर्म करने में आसक्त, यशवाला और दयालु होता है। दशम स्थान का स्वामी बलिग्रहों से युक्त हो। तो अधिक पवित्र कर्म करनेवाला हो। यदि पाप ग्रह देखते हों व पापग्रह युक्त हो तो पाप कर्म करनेवाला हो। और हर कार्य में विघ्न करनेवाला होता है॥५४-६०॥
लग्नादेकादशे चन्द्रफलम्
बहुश्रुतवान् पुत्रवान् उपकारी ॥६१॥ पश्चाद्दर्शनेपुत्रर्णबहु-प्राबल्ययोगः ॥६२॥ गुणाढचः: ॥६३॥ भावाधिपे बलहोनें बहुधन व्ययः ॥६४।। बलयुते लाभवान् ॥६५॥ लाभे चन्द्रे निक्षेपलाभः ॥६६॥ शुक्रयुतेन नरवाहन-योगः: ॥६७॥ बहुविद्यावान् ॥६८॥ क्षेत्रवान् अनेकजनरक्षणभाग्यवान्
लग्न से ग्यारहवें भवन में चन्द्रमा हो तो बहुत शास्त्रों को सुननेवाला, पुत्रवाला और परोपकारी होता है। ५० वर्ष में पुत्र के ऋण
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दुर्भोजन: दुष्पात्रवयय: कोपोद्रवव्यसनसृद्धिमान् स्त्रीयोगयुक्त: अन्नहीन: ॥७०॥ शुभयुते विद्वान् दयावान् पापशत्रुयुते पापलोक: शुभमित्रयुते श्रेष्ठलोकवान् ॥७१॥
लग्राद्द्वादशे चन्द्रफलगम्
इति श्रीभृगुसूत्रे सिद्धप्रभाकरटीकाध्याययुक्ते चन्द्र भावाध्यायनामद्वितीयोऽध्याय: ॥२॥
अथ तन्वादिद्वादशभावस्थितभौमफलम् तत्सादौ लग्ने भौमफलम्
देह वणं भवति ॥१॥ हृढगात्र: चौरभूषक: बृहत्साभि:
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रक्तपाणि: शूरो बलवान् मूर्ख: कोपवान् सभानशौर्य: धनवान् चापलवान् चित्ररोगी क्रोधी दुर्जन: ॥२॥ स्वोच्चे स्वक्षेत्रे आरोग्यम् हृदगात्रवान् राजसन्मानकीर्ति: ॥३॥ दीर्घायु: ॥४॥ पापशत्रुयुते: अल्पायु: ॥५॥ स्वल्पपुत्रवान् वातशूलादिरोग: दुर्मुख: ॥६॥ स्वोच्चे लशक्ष धनवान् ॥७॥ विद्यावान् नेत्रविलासवान्॥८॥ तत्र पापयुते पापक्षेत्रे पापदृष्टियुते नेत्ररोग: ॥९॥
जन्मलग्न में मंगल हो तो शरीर में घाववाला होता है। मजबूत शरीरवाला चोर अच्छे होने की इच्छावाला बडी नाभि (डूठ) वाला लाल हाथ तेजस्वी वली, मूर्ख, क्रोधवाला सभा में निर्वली हो धनवान् तथा चञ्चलतावाला नानाप्रकार के चित्रविचित्र रोगवाला क्रोधी और दुष्ट होता है। मङ्गल उच्च (मकर) का हो व अपने स्थान (मेप वृश्चिक) में हो तो शरीर आरोग्य हो, पुष्ट शरीरवाला, राज्य में सत्कार पानेवाला और यश प्राप्त करनेवाला होता है। एवं दीर्घायु हो। मङ्गल के साथ पाप तथा शत्रु ग्रह बैठे हो तो अल्पायु होती है। थोड़े पुत्रवाला व वातशूलादि रोगवाला तथा खराब मुखवाला होता है। यदि मङ्गल उच्च (मकर) का हो तो धनाढ्य हो, विद्यावाला और नेत्र का पूर्ण सुखवाला होता है। मङ्गल के साथ यदि पापग्रह बैठे हो, पापग्रह के घर में हो अथवा पापग्रह देखते हों तो नेत्र में रोगवाला होता है॥९-१॥
लग्रादिद्वितीये भौमफलम्
विद्याहीन: लाभवान् ॥१०॥ षष्ठाधिनपेयुत: तिष्ठति चेश्रेत्रवैपरित्यं भवति ॥११॥ शुभदृष्टे परिहार: ॥१२॥ स्वोच्चे स्वक्षेत्रे विद्यावान् ॥१३॥ नेत्र विलास: ॥१४॥ तत्र पापयुतक्षेत्रे पापदृष्टे नेत्ररोग: ॥१५॥
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स्वस्त्री व्यभिचारिणी ॥१६॥ शुभहृ्टे न दोष अनुजहीनः ॥१७॥ द्रव्यलाभः ॥१८॥ राहुकेतुयुते वैर्यासङ्गमः ॥१९॥ शत्रुद्रेषी क्लेशयुतः शुभगे अल्पसहोदरः ॥२०॥ पापयुते पापवीक्षणेन भातृनाशः ॥२२॥ उच्चस्वक्षेत्रे शुभयुते भ्राता दीर्घायु: धैर्यविक्रमवान् ॥२३॥ युद्धे शूर: ॥२४॥ पापयुते मित्रक्षेत्रे धृतिमान् ॥२५॥
लग्न से द्वितीय स्थान में मङ्गल हो तो विद्या से हीन, और धन का लाभवाला होता है। यदि मंगल छठे स्थान के स्वामी के साथ बैठा हो तो नेत्र में फूला आदि रोग होता है। यदि मंगल को शुभग्रह देखते हों तो यह उक्त दोष नहीं होता अर्थात् नेत्र का पूर्ण सुख प्राप्त होता है। मंगल उच्च (मकर) में हो व अपने स्थान (मेष वृश्चिक) में हो तो विद्यावाला होता है। और नेत्र का सुखवाला हो। मंगल के साथ पापग्रह बैठे हों, व पापग्रह के घरमें हो अथवा पापग्रह देखते हो तो नेत्रमें रोगवाला होता है॥१०-१५॥
लग्न से तीसरे घर में मंगल हो तो उसकी स्त्री व्यभिचार करनेवाली होती है। मंगल को शुभग्रह देखते हों तो उक्त अनिष्टफल नहीं होता है और छोटे भाई रहित हो। तथा धन से हीन होता है। मंगल के साथ राहु केतु बैठे हों तो वेश्या (रंडी) से भोग करनेवाला हो और भाई से कपट करनेवाला, दुःख से युक्त, सुन्दर भगवाली स्त्रीवाला होता है। एवं थोड़े भाईवाला होता है। यदि मंगल पापग्रह से युक्त हो व देखते हों तो भाई का नाश हो। अथवा मंगल उच्च (मकर) राशि में हो व अपने स्थान (मेष वृश्चिक) में हो तथा शुभग्रह से युक्त हो तो भाई दीर्घायुवाला व गम्भीर और प्रतापवाला होता है। संग्राम में शूरवीरं
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हो, मंगल के साथ पापग्रह बैठे हों व मित्र के घर में हो तो धैर्यवाला होता है॥१६-२५॥
ग्रहच्छिद्रम् ॥२६॥ लग्नाच्चतुर्थे भौमफलम् अष्टमेवार्षे पितृरिष्टं मातृरोगी ॥२७॥ सौम्ययुते परगृहवास: ॥२८॥ निरोगशरीरी क्षेत्रहीन: धनधान्यहीन: जीर्णगृहवास: ॥२९॥ उच्चे स्वक्षेत्रे शुभयुते मित्रक्षेत्रे वाहनवान् क्षेत्रवान् मातृदीर्घायु: ॥३०॥ नीचर्क्षे पापमृत्युयुते मातृनाश: ॥३१॥ सौम्ययुते वाहन निष्ठावान् ॥३२॥ बन्धुजनद्रैषी स्वदेश परित्यागी वस्त्रहीन: ॥३३॥
लग्न से चौथे भवन में मङ्गल हो तो घर में कलहवाला हो। ८ वर्ष में पिता को अरिष्ट हो, और माता को रोग होता है। मङ्गल के साथ शुभग्रह बैठे हों तो दूसरे के घर में रहनेवाला हो। आरोग्य शरीरवाला, घर से हीन और धनधान्य से भी रहित तथा पुराने घर में रहनेवाला होता है। मङ्गल उच्च (मकर) में हो व अपने स्थान (मेष वृश्चिक) में हो अथवा शुभ ग्रह से युक्त हो, व मित्र के घर में हो तो सवारीवाला, घरवाला और माता दीर्घायुवाला होता है। यदि मङ्गल नीच (कर्क) में हो व पापग्रह से युक्त हो, अथवा अष्टम स्थान के स्वामी के साथ युक्त हो तो माता का नाश होता है। यदि शुभग्रह युक्त हो तो सवारी की इच्छा करनेवाला होता है। और भाई तथा कुटुम्बियों से वैर करनेवाला, व अपने देश को छोड़नेवाला और वस्त्र से रहित होता है॥२६-३३॥
लग्रात्पञ्चमे भौमफलम् निर्धन: पुत्राभाव: दुर्गी राजकोप: ॥३४॥ षष्टवर्षे आयुधेन किज्चिद्गण्डकाल: ॥३५॥ दुर्वासन ज्ञानशीलवान् ॥३६॥
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मायावादी ॥३७॥ तीक्ष्णधी: ॥३८॥ उच्चे स्वक्षेत्रे पुत्रसमृद्धिः: अन्न दानप्रिय: ॥३९॥ राजाधिकारयोग: शत्रुपीडा ॥४०॥ पापयुक्ते पापक्षेत्रे पुत्रनाश: ॥४१॥ बुद्धिभ्रंशादिरोग: ॥४२॥ रन्ध्रेशे पापयुक्ते पापी ॥४३॥ वीर: ॥४४॥ दत्तपुत्रयोग: ॥४५॥
लग्न से पञ्चम स्थान में मङ्गल हो तो कङ्गाल, पुत्र से हीन, दुष्टमार्ग को जाननेवाला, और राजा से क्रोध करनेवाला होता है। ६ वर्ष में शस्त्र से कुछ दण्ड प्राप्त होता है। दुष्ट जगह रहनेवाला और ज्ञान से युक्त होता है। और कपट करके बोलनेवाला हो, एवं तीक्ष्ण बुद्धिवाला होता है। मङ्गल उच्च राशि (मकर) व अपने स्थान में (मेप वृश्चिक) राशि में हो तो पुत्र की वृद्धि वाला हो और अन्न का दान करने में वड़ा चतुर होता है। व राज्य का अधिकार प्राप्त हो, तथा शत्रु से पीड़ावाला होता है। यदि मङ्गल के साथ पाप ग्रह बैठे हो व पापग्रह के घर में हो तो पुत्र का नाश होता है। और बुद्धि के भ्रष्ट होने से रोगवाला हो। अष्टम स्थान का स्वामी पापग्रह से युक्त हो तो पापी होता है। और तेजस्वी तथा दूसरे का पुत्र दत्तक (गोदी) रखनेवाला होता है॥३४-४५॥
लग्नात्पष्टhe भौमफलम् प्रसिद्ध: ॥४६॥ कार्यसमर्थ: ॥४७॥ शत्रुहन्ता पुत्रवान् सप्तविंशतिवर्षे कन्यकाभ्वादि युत ऊढवान् ॥४८॥ शत्रुक्षय: पापपक्षे पापयुक्ते पापहष्टे पूर्णफलानि ॥५०॥ वातशूलादिरोग: ॥५१॥ बुधक्षेत्रयुक्ते कुष्ठरोग: ॥५२॥ शुभ दृष्टेपरिहार: ॥५३॥
लग्न से छठवें भाव में मङ्गल हो तो प्रसिद्ध होता है और प्रत्येक कार्य करने में समर्थ हो, शत्रु को नष्ट करनेवाला, एवं पुत्रवाला हो, २७ वर्ष में कन्या वा घोड़ा आदि से युक्त हो, अथवा सवारी पर चढ़नेवाला हो
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स्वदारपीडा ॥५४॥ पापार्ते पापयुतेन च स्वर्क्षे स्वदार हानि: ॥५५॥ शुभयुते जीवति पत्यौस्त्रीनाश: ॥५६॥ विदेशस्थर: उच्चमित्रस्वक्षेत्रशुभयुते पापक्षेत्रे ईक्षणवशात्कलत्र नाश: ॥५८॥ अथवा चोरव्यभिचारमूलेन कलत्रान्तरं दुष्टस्त्रीसङ्ग ॥५९॥ भगचुम्बनवान् ॥६०॥ चतुष्पादमैथुनवान् मद्यपानप्रिय: ॥६१॥ मन्दयुते षष्ठे शनिचुम्बन पर: ॥६२॥ केतुयुते रजस्वलास्त्रीसम्भोगी ॥६३॥ तत्स्थत्रुयुते बहुकलत्र नाश: ॥६४॥ अथवा: अहंकारी वा शुभदृष्टे न दोष: ॥६५॥
लग्न से सातवें भावन में मंगल हो तो अपनी स्त्री रोगवाली हो। यदि मंगल पाप ग्रह के घर में हो व अपने स्थान (मेष वृश्चिक) में हो तो अपनी स्त्री का नाश हो। शुभग्रह युक्त हो तो जीते हुए पति के स्त्री का नाश हो और परदेश में घूमनेवाला होता है। मंगल उच्च (मकर) का हो, व मित्र व अपने स्थान में (मेष वृश्चिक) राशि में हो व शुभग्रह से युक्त हो अथवा पाप ग्रह के घर में हो व देखते हों तो स्त्री का नाश हो। और चोरी तथा व्यभिचार के कारण से अन्य दुष्ट स्त्री से भोग करनेवाला होता है। भग को चुम्बन करनेवाला हो, एवं चतुष्पद (चार पैर) वाले जीवों से मैथुन करनेवाला तथा मद्यपान करने में आसक्त होता है। मंगल के साथ शनि युता हो व देखता हो तो लिंग को चुम्बन
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करनेवाला यदि केतु युक्त हो तो रजस्वला स्त्री से भोग करनेवाला होता है। मंगल के साथ शत्रु ग्रह युक्त हो तो बहुत स्त्री नाश होती हैं और निर्बली घमण्डी हो अथवा शुभग्रह देख्ते हो तो उक्त अशुभ फल नहीं होता है॥५४-६५॥
लग्रादष्टमे भौमफलम्
नेत्ररोगी: अर्धायु: पित्तरिष्टं मूत्रकृच्छ्रारोग: ॥६६॥ अल्पपुत्रवान् वातशूलादिरोग: दारसुखयुक्त: ॥६७॥ शुभयुते देहारोग्यसू दीर्घायु मनुष्यादिवृद्धिः ॥६८॥ पापक्षेत्रे पापयुक्ते ईक्षणवशाद्वातक्षयादिरोग: सूत्रकृच्छ्राधिक्यं वा ॥६९॥ मध्यमायु: ॥७०॥ भावाधिपबलयुते पूर्णायु: ॥७१॥
लग्न से आठवें भाव में मंगल हो तो नेत्र में रोगवाला, आधी उम्रवाला, व पिता को अरिष्ट हो तथा मूत्र मल आदि रोगवाला होता है। और थोड़े पुत्रवाला होता है, वात शूलादि रोगवाला और स्त्री के सुख से युक्त होता है। मंगल के साथ शुभग्रह बैठे हों तो शरीर निरोग्य हो, दीर्घायुवाला हो और मनुष्यों की वृद्धिवाला हो। यदि मंगल पाप ग्रह के घर में हो व पापग्रह से युक्त हो व देखता हो तो वात क्षय आदि रोग होते हैं और मूत्र मल से रोग अधिक होते हैं। मध्यायुवाला हो। अष्टम स्थान का स्वामी बलवान् ग्रहों से युक्त हो तो पूर्णायुवाला होता है॥६६-७१॥
लग्रान्नवमे भौमफलम्
पित्तरिष्टम् ॥७२॥ भाग्यहीन: ॥७३॥ उच्चस्वक्षेत्रे गुरुदारगः ॥७४॥
लग्न से नवम स्थान में मंगल हो तो पिता को अरिष्ट हो। व भाग्य से हित हो। यदि मंगल उच्च (मकर) का हो तथा अपने स्थान (मेष
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वृश्रिक) का हो तो गुरु की स्त्री से व्यभिचार करनेवाला होता है।।७२-७४।।
लग्नाद्दशमे भौमफलम्
जनवल्लभ: ।।७५।। भावाधिपे बलयुते जाता दीर्घायु: ।।७६।। विशेषभाग्यवान् ध्यानशीलवान् गुरुभक्तियुतः ।।७७।। पापयुते कर्मविघ्नवान् ।।७८।। शुभयुतेशुभक्षेत्रे कर्मसिद्धि: ।।७९।। कीर्तिप्रतिष्ठावान् अष्टादशवर्षे द्रव्याजनसमर्थ: ।।८०।। सर्वसमर्थ: दृढगात्र: चोरबुद्धि: पापयुते पापक्षेत्रे कर्मविघ्नकर: ।।८१।। दुष्कृति: ।।८२।। भाग्येशकर्मेशयुते महाराजयौवराज्येष्ट-टाभिषेकवान् ।।८३।। गुरुयुतेगजान्तैश्वर्यवान् ।।८४।। सूसमृद्धिमान् ।।८५।।
लग्न से दशवें घर में मङ्गल हो तो मनुष्य का प्रेमी हो। दशम स्थान का स्वामी बलि ग्रहों से युक्त हो तो भाई दीर्घायु हो और बड़ा भाग्यवान्, परमात्मा में ध्यान करनेवाला तथा गुरु की सेवा करनेवाला होता है। यदि पाप ग्रह युक्त हो तो कार्य में विघ्न करनेवाला हो। यदि मङ्गल शुभग्रह से युक्त हो वा शुभग्रह के घर में हो तो कार्य को सिद्ध करनेवाला होता है। कीर्ति वा प्रतिष्ठावाला, १८ वर्ष में धन संग्रह करने में समर्थ हो। सर्वकार्यों में समर्थ, पुष्टशरीरवाला, चोरबुद्धिवाला हो, यदि पापग्रह युक्त हो व पापग्रह के घर में हो तो कार्य में विघ्न करनेवाला होता है। दुष्कर्म करनेवाला हो। मङ्गल नवम दशम स्थान के स्वामी से युक्त हो तो राजा और युवराजपदवी में अभिषिक्त होता है। मङ्गल के साथ गुरु बैठा हो तो हाथी की सवारी वाला। और भूमि से समृद्ध होकर बड़ा भाग्यशाली होता है।।७५-८५।।
लग्नादेकादशे भौमफलम्
बहुकृत्यवान् धनी स्वगुणैराशुलाभवान् ।।८६।। क्षेत्रेशयुते
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राजाधिपत्यवान् ॥८७॥ शुद्धद्रयुते महाराजाधिपत्ययोग: ॥८८॥ ज्ञातृवित्तवान् ॥८९॥
लग्न से ग्यारहवें भाव में मंगल हो तो बहुत कार्यों को करनेवाला, धनाढ्य और अपने गुणों से शीघ्र लाभवाला होता है। मंगल, एकादशस्थान के स्वामी से युक्त हो तो राज्य का मालिक हो। दो शुभग्रह बैठे हों तो महाराज्य का स्वामी हो। और भाई धनवाला होता है॥८६-८९॥
लग्नाद्द्वादशे भौमफलम् द्रव्याभाव: वातपित्तदेह: ॥९०॥ पापयुक्ते दासभक: ॥९१॥
लग्न से बारहवें भाव में मङ्गल हो तो धन से हीन हो और वातपित्त रोगवाला शरीर होता है। यदि मङ्गल के साथ पाप ग्रह बैठे हों तो पाखण्ड करनेवाला होता है॥९०-९१॥
इति श्रीभृगुसूत्रे सिद्धप्रभाकरटीकाभियुक्ते भौमभावाध्यायोनाम तृतीयोऽध्याय: ॥३॥
अथ तन्वाद्द्वादशभावस्थितबुधफलमाह
तन्वादौ लग्ने बुधफलम् विद्यावान् विवाहादिबहुश्रुतवान् ॥९१॥ अनेकदेशे सार्वभौम: मन्त्रवादी पिशाचादिवशीकरणसमर्थ: मृदुभाषी विद्वान् क्षमो दयावान् ॥९२॥
सप्तविंशतिवर्षे तीर्थयात्रायोग: बहुलाभवान् बहुविद्यावान् ॥९३॥ पापयुते पापक्षेत्रे देहे रोग: पित्तपांडुरोग: ॥९४॥ शुभयुते शुभक्षेत्रे देहारोग्यम् ॥९५॥ स्वर्णकान्तिदेह: ज्योतिषशास्त्र पठित: अज्ञहीन: सज्जनद्देशी नेत्ररोगी ॥९६॥
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सप्तदशवर्षे भ्रातृणामन्योन्यकलहः ।१८। वंचकः ।८। उच्चस्वक्षेत्रे भातृसौख्यम् ।९। श्रेष्ठे लोकं गमिष्यति ।१०। पापयुते पापहष्टयुते नीचर्क्षे पापलोकं गमिष्यति ।११। शव्यासुख वर्जितः शुद्रदेवतोपासकः ।१२। पापमन्दादि युते वामनेत्रे हानिः षष्ठेशयुते नीचेशयुते वा न दोषः ।१३। अपात्रव्रयवान् ।१४। पापहा ।१५। शुभयुते निःश्रयेन धनधान्यादिमान् धार्मिकबुद्धिः।१६।अस्त्रवित् गणितशास्त्रज्ञः सौख्यवान् तर्कशास्त्रवित् हढगात्रः ।१७।
जन्म लग्न में बुध हो तो विद्यावाला, विवाह करनेवाला हो और बहुत शास्त्रों को सुननेवाला हो। बहुत देशों में घूमनेवाला वा यन्त्र मन्त्र को जाननेवाला, भूत प्रेत को दूर करने में समर्थ मनोहर वाणी बोलनेवाला, पण्डित, क्षमा करनेवाला और दयालु होता है। १७ वर्ष में तीर्थयात्रा हो और अत्यन्त लाभ हो तथा नानाप्रकार की विद्या जाननेवाला होता है। बुध के साथ पापग्रह बैठे हों व पाप ग्रह के घर में हो तो शरीर में रोगवाला तथा पित्त पाण्डु, रोगवाला होता है। यदि शुभग्रह युक्त हो व शुभग्रह के घर में हो तो शरीर निरोग्य होता है। और सुवर्ण की कान्ति के समान सुन्दर शरीरवाला ज्योतिष शास्त्र को पढ़नेवाला, अंग से हीन, श्रेष्ठ मनुष्यों से कपट करनेवाला और नेत्र में रोगवाला होता है। १७ वर्ष में भाइयों का आपस में लड़ाई झगड़ा हो। और ठगी होता है। बुधयादि उच्च (कन्या) का हो व अपने स्थान (मिथुन कन्या) में हो तो भाइयों का सुख हो। और स्वर्गलोक जानेवाला होता है। यदि बुध के साथ पापग्रह बैठे हों व देखते हो तो अथवा नीच राशि (मीन) में हो तो नरकलोक जानेवाला होता है। और पल झादि सुख से रहित शुद्रदेवता की पूजा करनेवाला होता है। बुध के साथ (शनि आदि पाप ग्रह बैठे हों तो वायें नेत्र में हानि हो, और षष्टम स्थान का स्वामी युक्त हो व बृहस्पति युक्त हो तो यह उत्तम
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फल नहीं होता है। दुष्ट जगह खर्च करनेवाला और पाप को नाश करनेवाला हो यदि बुध शुभ ग्रह से युक्त हो तो निश्चय ही धन धान्यवाला हो तथा धर्म करनेवाली बुद्धि हो। शस्त्रविद्या व गणित शास्त्र को जाननेवाला, सुख एवं तर्कशास्त्रों को भी जाननेवाला और मजबूत शरीरवाला होता है॥१—१७॥
पुत्रसमृद्धिः वाचालकः वेदशास्त्रविचक्षणः संकल्पसिद्धचा संयुक्तः धनी गुणाढचः सद्गुणी पश्चदशवर्षे बहुविद्यावान् ॥१८॥ बहुलाभप्रदः ॥१९॥ पापयुक्ते पापक्षेत्रे अरिनीन्चागे विद्याविहीनः ॥२०॥ कूरतत्ववान् पवनव्याधिः ॥२१॥ शुभयुक्तिवीक्षणाद्धनी ॥२२॥ विद्यावान् ॥२३॥ गुरुणा युते वीक्षिते वा गणितशास्त्राधिकारेण सम्पन्नः ॥२४॥
लग्न से द्वितीय स्थान में बुध हो तो पुत्र की वृद्धिवाला बहुत बोलनेवाला वेदशास्त्र को जाननेवाला संकल्प कर कार्य को सिद्ध करनेवाला एवं धनी अच्छे अच्छे गुणों वाला और १५ वर्ष में नानाप्रकार की विद्या प्राप्त करनेवाला होता है। और विद्या के प्रताप से अत्यन्त लाभ हो। बुध के साथ पापग्रह युक्त हो व पापग्रह के घर में हो अथवा शत्रु तथा नीच (मीन) में हो तो विद्या से रहित होता है। और दुष्ट स्वभाववाला वायु के द्वारा रोगवाला होता है। यदि बुध के साथ शुभग्रह बैठे हों व देखते हों तो धनाढच हो व विद्यावाला हो। बुध के साथ बृहस्पति बैठा हो व देखता हो तो गणितशास्त्र के अधिकार में निपुण होता है॥१८—२४॥
लग्नतृतीये बुधफलम् आतृमान् बहुसौख्यवान् ॥२५॥ पश्चदशवर्षे क्षेत्रपुत्रयुतः
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।।२६।। धनलाभवान् ।।२७।। सद्गुणशाली ।।२८।। भावाधिपे बलयुते दीर्घायु: धैर्यवान् ।।२९।। भवाधिपे आत्मपीडा भोतिमान् ।।३०।। बलयुते आत्मा दीर्घायु: ।।३१।।
लग्न से तीसरे घर में बुध हो तो भाईवाला और अत्यन्त सुखवाला होता है। १५ वर्ष में स्थान व पुत्र से युक्त हो। धन का लाभवाला होता है। और अच्छे अच्छे गुणोंवाला होता है। यदि तृतीय स्थान का स्वामी बलवान् ग्रहों से युक्त हों तो गम्भीर और दीर्घायुवाला होता है। तृतीयस्थान का स्वामी निर्बल हो तो भाइयों को पीड़ा हो और डरपोक होता है, बलोग्रहों से युक्त हो तो भाई दीर्घायु होता है।।२५-३१।।
लग्नाच्चतुर्थे बुधफलम् हस्तचापल्यवान् धैर्यवान् विशालाक्ष: पितृमातृसौख्ययुत: ।।३२।। ज्ञानवान् सुखी ।।३३।। षोडशवर्षे द्रव्यापहाररुपेण अनेकवाहनवान् ।।३४।। भावाधिपे बलयुते आन्दोलिकाप्राप्ति: ।।३५।।राहुकेतुशनियुते वाहनारिष्टवान् ।।३६।।क्षेत्रसुखवर्जित: बन्धुकुलद्वेषी कपटी ।।३७।।
लग्न से चौथे भवन में बुध हो तो हाथ वड़े चञ्चल हो, गम्भीर विशाल नेत्रवाला और माता पिता का सुख से युक्त होता है। ज्ञानी और सुखी हो। १६ वर्ष में धन को चुराने रूप से बहुत से वाहनवाला होता है। यदि बुध के साथ बृहस्पति शुक्र शनि ये बैठे हों तो अनेक वाहनवाला हो, चतुर्थ स्थान का स्वामी बली ग्रहों से युक्त हो तो पालकी प्राप्त होती है। बुध के साथ राहु केतु शनि बैठे हों तो वाहनों का अरिष्टवाला अर्थात् नहीं प्राप्त होते हैं और स्थान तथा सुख से हीन भाई व कुल से द्वेष करनेवाला और कपटी होता है।।३२-३७।।
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लग्रात्पश्चमे बुधफलम्
मातुलागण्ड: मात्रासौख्यं पुत्रवित्तंसेधावी मधुरभाषी बुद्धिमान् ॥३८॥
भावाधिपे पापयुते बलहीने पुत्रनाश: ॥३९॥
अपुत्रदत्तपुत्रप्राप्ति: पापकर्मी मन्त्रवादी ॥४०॥
लग्र से पश्चम स्थान में बुध हो तो मामा को गण्डवाला रोग हो, माता का सुखवाला, पुत्र सुख में विघ्नवाला, बुद्धिमानू मनोहर वाणी बोलनेवाला होता है। पश्चम स्थान का स्वामी पाप ग्रहों से युक्त हो व निर्वली हो तो पुत्र का नाश हो। पुत्र से रहित होकर दत्तकपुत्र प्राप्त हो, पाप कर्म करनेवाला एवं मन्त्रों को जाननेवाला होता है॥३८-४०॥
लग्रात्पश्चे बुधफलम्
राजपूज्य: विद्याविदग्ध: दानश्लक: विवादशूर: ॥४१॥
त्रिंशद्दर्शे बहुराजलोहो भवति ॥४२॥
पत्रादिलेखक: ॥४३॥
कुजर्के नीलकुष्ठादिरोगी ॥४४॥
शनि राहुयुते केतुयुते वातशूलादिरोगो जातिशत्रुकलह: ॥४५॥
भावाधिपे बलयुते ज्ञातिप्रबल: ॥४६॥
अरिनोचरे ज्ञातिक्षय: ॥४७॥
लग्र से छठवें घर में बुध हो तो राजा का पूज्य हो, विद्या पढ़ने में विद्ध, दूत और कलह करने में शूरवीर होता है। ३० वर्ष में अत्यन्त राजा से प्रेम होता है। और पत्रादि लिखने में चतुर होता है। बुध यदि मंग्ल की राशि में (मेष वृश्चिक) में हो तो नीलकुष्ठ रोगवाला हो। बुध के साथ शनि राहु केतु युक्त हों तो वातशूलादि रोगवाला और जाती के शत्रु से झगड़नेवाला होता है। यदि षष्ठमस्थान का स्वामी बली ग्रहों से युक्त हो तो जाती में बली होता है। बुध शत्रु के घर में हो व नीच (मीन) राशि में हो तो जातिनाश होती है॥४१-४७॥
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लग्रात्सप्तमे बुधफलम् मातृसौख्यम् अभ्याद्यारुढो धर्मज्ञ: उदारमतिः ॥४८॥ दिगन्तविश्रुतकीर्तिः राजपूज्यः ॥४९॥तत्र शुभयुते चतुर्विंशतिवर्षे आनन्दैकप्राप्तिः: ॥५०॥ कलत्रसम्बन्धे: ॥५१॥ अभक्ष्यभक्षण:॥५२॥ भावेशे बलयुते एकदारवान् ॥५३॥ दारेशे दुर्बले पापे पापर्क्षे कुजादियुते कलत्र नाश: ॥५४॥ स्त्रीजातके पतिनाश: कलत्रं कुष्ठ-रोगी ॥५५॥ अरुपवत् लग्न से सातवें भवन में बुध हो तो माता का सुखवाला, घोड़ा पर चढ़नेवाला व धर्म को जाननेवाला और निर्मल एवं उदार बुद्धिवाला होता है। प्रत्येक दिशा में श्रवण कीर्तिवाला तथा राजा का पूज्य होता है। बुध के साथ शुभ ग्रह बैठे हो तो २४ वर्ष में पालकी प्राप्त हो। और स्त्री के अनुकूल बुद्धिवाला होता है व नहीं भक्षण करने योग्य वस्तु को खानेवाला होता है। सप्तमस्थान का स्वामी बल्लीग्रहों से युक्त हो तो एक ही स्त्रीवाला हो। यदि सप्तम स्थान का मालिक निर्बल हो व पाप ग्रह से युक्त हो अथवा पाप ग्रह की राशि में मंगल से युक्त होकर बैठा हो तो स्त्री का नाश होता है। यदि स्त्री की कुण्डली में ऐसा योग हो तो पति का नाश हो और स्त्री कुष्ठरोगवाली तथा कुरुपवती होती है॥५५-५६॥
लग्रादष्टमे बुधफलम् आयु: कारक बहुक्षेत्रवान् ॥५७॥ सप्तपुत्रवान् ॥५८॥ पञ्चविंशतिवर्षे अनेकप्रतिष्ठासिद्धि: ॥५९॥ कीर्तिम्प्रसिद्ध: ॥६०॥ भावाधिपे बलयुते पूर्णायु: ॥६१॥ अरिनीतपापयुते अल्पायु: ॥६२॥ अथवा उच्चस्वक्षेत्रे वा शुभयुते पूर्णायु: ॥६३॥ लग्न से आठवें भवन में बुध हो तो आयु को प्राप्त करनेवाला और
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बहुत स्थानोंवाला होता है। सात पुत्रवाला तथा २५ वर्ष में नाना प्रकार की प्रतिष्ठा से प्रसिद्ध हो। और यश से भी विख्यात होता है। अष्टमस्थान का स्वामी बलीग्रहों से युक्त हो तो पूर्णायु हो। यदि अष्टम स्थान का स्वामी शत्रु के घर में व नीच (मीन) में हो अथवा पापग्रह युक्त हो तो अल्पायु हो। व उच्च राशि (कन्या) में हो एवं अपने स्थान (कन्या मिथुन) में हो अथवा शुभ ग्रहों से युक्त हो तो पूर्णायु वाला होता है॥५७-६३॥
लग्रातनवमे बुधफलम् बहुप्रजासिद्धि: ॥६४॥ वेदशास्त्रविशारद: संगीत पाठक: दक्षिण्यवान् धार्मिक: प्रतापवान् बहुलाभवान् पितृदीर्घायु: ॥६५॥ तपोध्यान-शीलवान ।।६६।। लग्न से नवम् स्थान में बुध हो तो बहुत सन्तानवाला हो और वेद शास्त्र के जानने में निपुण व गायन विद्या को पढ़नेवाला, बड़ा चतुर धर्म करनवाला, तेजस्वी अत्यन्त लाभवाला और पिता दीर्घायु वाला होता है। श्रीपरमात्मा के चरणों में भक्ति ध्यान तथा भजन करने की प्रकृतिवाला होता है॥६४-६६॥
लग्रादशमे बुधफलम् सत्कर्मसिद्धि: धैर्यवान् बहुलकोर्तिमान् बहुचित्तवान् ॥६७॥ अष्टादशवर्षे नेत्ररोगवान् उच्चस्वदेशे गुरुकुलेज्ज- ष्टोमादिबहुकर्मवान् ॥६९॥ अरिपापयुते मूढकर्मविश्वान् दुष्कृति: अनाचार: ॥७०॥ लग्न से दशवें घर में बुध हो तो तो पवित्र कार्य को सिद्ध करनेवाला, गम्भीर, अतुल कीर्तिवाला और बहुत प्रकार के चितवाला होता है। २८ वर्ष में नेत्र में रोगवाला होता है। बुध उच्च (कन्या) में हो वा
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अपने स्थान (मिथुन कन्या) में हो अथवा बृहस्पति से युक्त हो तो अग्निष्टोम यज्ञादि पवित्र कर्म करनेवाला होता है। यदि बुध शत्रु के घर में पाप ग्रह के साथ युक्त हो तो मूर्ख कर्म को नाश करनेवाला व नीच पाप कर्म करनेवाला और भ्रष्ट आचरणवाला होता है॥६७-७०॥
लग्नादेकादशे बुधफलम्
बहुमङ्गलप्रदः ॥७१॥ अनेककारेण धनवान् ॥७२॥ एकोनविंशतिवर्षादुपरि क्षेत्रपुत्रधनवान् दयावान् ॥७३॥ पापर्क्षे पापयुते होनमूलेन धनलोपः ॥७४॥ शुभमूलेन धनवान् ॥७५॥
लग्न से ग्यारहवें भवन में बुध हो तो बहुत से मंगल कार्य प्राप्त होते हैं। और नाना प्रकार से धनवाला होता है। १९ वर्ष के बाद स्थान पुत्र व धन से युक्त हो और बड़ा दयालु होता है। बुध पाप ग्रह के घर में हो व पाप ग्रह से युक्त हो तो नीचकर्म के द्वारा धन का नाश हो। यदि बुध उच्च राशि (कन्या) में हो अपने स्थान (मिथुन कन्या) में हो तो शुभकार्य से धन का लाभ होता है॥७१-७५॥
लग्नाद्द्वादशे बुधफलम्
ज्ञानवान् ॥७६॥ वितरणशाली ॥७७॥ पापयुते चञ्चलचित्तः ॥७८॥ नृपजनहृषी ॥७९॥ शुभयुते धर्ममूलेन धनव्ययः ॥८०॥ विद्याहीनः ॥८१॥
लग्न से बारहवें भाव में बुध हो तो ज्ञानी हो। और कोई वस्तु देने में चतुर हो। बुध के साथ पापग्रह युक्त हो तो चञ्चल चित्तवाला होता है। और राजा तथा मनुष्यों से वैर करने वाला हो। शुभग्रह बैठे हों तो धर्म के कारण से धन का खर्च होता है। और विद्या से रहित होता है॥७६-८१॥
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अथ तन्वादिद्वादशभावस्थितगुरुफलमाह
तत्रादौ लग्ने गुरुफलम्
स्वक्षेत्रे शब्दशास्त्राधिकारी ॥१॥
त्रिवेदी बहुपुत्रवान् सुखी चिरायु: ज्ञानीवान् ॥२॥
उच्चे पूर्णफलानि ॥३॥
षोडशवर्षे महाराजयोग: ॥४॥
अरिनोचपापानां क्षेत्रे पापयुते वा नीचकर्मवान् ॥५॥
मनश्शीलत्ववान् मध्यायु: पुत्रहीन: स्वजनपरित्यागी कृतघ्न: गर्विष्ठ: बहुजनद्वेषी साक्षरवान् पापक्लेशभोगी ॥६॥
जन्मलग्न में गुरु हो और अपने स्थान (धन मीन) में हों तो व्याकरण शास्त्र को जाननेवाला हो और तीन वेदों का ज्ञाता बहुत पुत्रोंवाला, सुखी वड़ी आयुवाला और ज्ञानी होता है। बृहस्पति यदि उच्च (कर्क) का हो तो ये पूर्ण फल प्राप्त होते हैं। १६ वर्ष में महा राजयोगवाला हो। गुरु शत्रु के व नीच राशि (मकर) में हो तथा पापग्रह के घर में व पाप ग्रह से युक्त हो तो नीच कर्म करनेवाला होता है। और चञ्चल चित्तवाला हो, मध्यायुवाला पुत्र से रहित अपने कुटुम्बियों को छोड़नेवाला, किये हुए उपकार को नहीं माननेवाला, कृतघ्न, घमण्डी, बहुत मनुष्यों से वैर रखनेवाला, पापी और दुःख भोगनेवाला होता है॥१-६॥
लग्नाद्द्वितीये गुरुफलम्
धनवान् बुद्धिमान् इष्टभाषी षोडशवर्षे धनधान्यसमृद्धि:
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बहुप्राबल्यवान उच्चस्वक्षेत्रे धनुषि द्रव्यवान् ॥७॥ पापयुक्ते विद्याविद्वः ॥८॥ चोरवश्चनवान् दुर्वचनः अनृतप्रियः ॥९॥ नीचक्षेत्रे पापयुते मद्यपानी श्रष्टः ॥१०॥ कुलनाशकः ॥११॥ कलत्रान्तरयुक्तः पुत्रहीनः ॥१२॥
लग्न से दूसरे स्थान में गुरु हो तो धनी, बुद्धिमान्, मनोहर वाणी बोलनेवाला हो। १६ वर्ष में धन धान्य की बहुत वृद्धि हो और अधिक प्रतापवाला होता है यदि गुरु उच्च (कर्क) का व अपने स्थान (धन मीन) राशि का हो तो महाधनी हो, यदि पापग्रह युक्त हो तो विद्या पढ़ने में विघ्न हो और चोरी करनेवाला व ठगनेवाला, खराब वचन बोलनेवाला होता है तथा झूठ बोलनेवाला हो, यदि बृहस्पति नीच (मकर) राशि से हो और पापग्रह युक्त हो तो मद्यपान करनेवाला तथा भ्रष्ट होता है। कुलुम्ब का नाश करनेवाला दूसरे की स्त्री से युक्त हो तथा पुत्र से रहित होता है॥७–१२॥
लग्नातृतिये गुरुफलम्
अतिलुब्धः भ्रातृवृद्धि: दाक्षिण्यवान् संकल्प सिद्धिकर: ॥१३॥ बन्धुदोषकर: ॥१४॥ अष्टत्रिंसद्दर्शे यात्रासिद्धि: ॥१५॥ भावाधिपे बलयुते भ्रातृदीर्घायु: ॥१६॥ भावाधिपे पापयुते भ्रातृनाश: ॥१७॥ धैर्यहीन: जडबुद्धि: दरिद्र ॥१८॥
लग्न से तीसरे भवन में गुरु हो तो अत्यन्त लोभी भाइयों की वृद्धि वाला, वड़ा चतुर, कोई कार्य संकल्प कर सिद्ध करने वाला होता है। तृतीय स्थान का स्वामी बलवान् ग्रहों से युक्त हो तो भाइयों की दीर्घायु हो, यदि पापग्रह के साथ युक्त होवे तो भाइयों का नाश होता है एवं सन्तोष से रहित, जड़ बुद्धि वाला और दरिद्री होता है॥२४–३१॥
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लग्नाच्चतुर्थे गुरुफलम्
सुखी क्षेत्रवान् बुद्धिमान् क्षीरसमृद्ध: सन्मना: विधावी ॥१९॥
भावाधिपे बलयुते भृगुचन्द्रयुक्ते शुभवर्गेण नरवाहनयोग: ॥२०॥
बहुक्षेत्र: अश्ववाहनयोग: गृहविस्तरवान् ॥२१॥
पापयुक्त: पापिन: दृष्टेक्षत्रवाहनहीन: ॥२२॥
परगृहवास: क्षेत्रहीन: मातृनाश: बन्धुद्देशी ॥२३॥
लग्न से चौथे घर में गुरु हो तो सुखी, स्थानवान् बुद्धिमान् हमेशा दूध की वृद्धि वाला और शुद्ध चित्त वाला तथा पवित्र बुद्धि वाला होता है। चतुर्थ स्थान का स्वामी बलवान् ग्रहों से युक्त हो वह शुक्र चन्द्रमा युक्त हो अथवा शुभग्रह के वर्ग में हो तो मनुष्य की सवारी करने वाला होता है। और बहुत स्थान वाला, घोड़ा की सवारी वाला तथा बड़ा घर वाला होता है। चतुर्थ स्थान के स्वामी के साथ पापग्रह बैठ हो तो पापी हो अथवा देखते हों तो घर तथा वाहन से रहित हो। और दूसरे के घर में रहने वाला माता का नाश करने वाला और भाइयों से कपट करने वाला होता है॥१९-२३॥
लग्नात्पञ्चमे गुरुफलम्
बुद्धिचातुर्यवान् विशालेक्षण: वाग्मी प्रतापी अन्नदान प्रिय: कुलप्रिय: अष्टादशवर्षे राजद्वारेण सेनाधिपत्य योग: ॥२४॥
पुत्रसमृद्ध: ॥२५॥
भावाधिपे बलयुते पापक्षेत्रे अथवा नीचगे पुत्रनाश: ॥२६॥
एकपुत्रवान् ॥२७॥
धनवान् ॥२८॥
राजद्वारे राजमूलने धनव्यय: ॥२९॥
राहुकेतुयुते सर्पशापात् सुतक्षय: ॥३०॥
शुभदृष्टे परिहार: ॥३१॥
लग्न से पांचवें भाव में गुरु हो तो चतुर बुद्धि वाला तथा दीर्घनेत्र वाला, वाणी बोलने वाला, तेजस्वी व (वाचाल) अन्न का दान
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लग्रात्पञ्चे गुरुफलम्
शत्रुक्षय: ज्ञातिवृद्धि: पौत्रादिदर्शनं ऋणशरीर: शुभयुते रोगाभाव: ॥३२॥
पापयुते पापक्षेत्रे वातशैत्यादिरोग: ॥३३॥
मन्दक्षेत्रे राहुयुते महारोग: ॥३४॥
लग्न से छठवें स्थान में बृहस्पति हो तो शत्रु का नाश हो और जाति की वृद्धिवाला पुत्र का पुत्र (पोता) को देखनेवाला तथा शरीर में चित्तवाला होता है। गुरु के साथ शुभ ग्रह बैठे हों तो रोग से हीन हो। पापग्रह युक्त हो व पापग्रह के घर में हो तो वात व शीतरोगवाला हो, वृहस्पति शनि के स्थान (मकर कुम्भ) में राहु के साथ बैठा हो तो भयंकर रोगवाला होता है॥३२-३४॥
लग्रात्सप्तमे गुरुफलम्
विद्याधनेश: बहुलाभप्रद: चिन्ताधिक: विद्यावान् पातिव्रत्य- भक्तियुतकलत्र:॥३५॥
भावाधिपे बलहीने राहुकेतुशनिकुजयुते पापवीक्षणाद्वा कलत्रान्तरम् ॥३६॥
शुभयुते उच्चस्वक्षेत्रे एकदारवान् कलत्रद्वारा बहुवित्तवान् सुखी चतुस्त्रंशदर्शे
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प्रतिष्ठासिद्धि: ॥३७॥
लग्न से सातवें भाव में बृहस्पति हो तो विद्या और धन का मालिक हो और ये अत्यन्त लाभ को देनेवाले होते हैं, बहुत चिन्तावाला विद्यावाला हो और स्त्री पतिव्रता भक्ति से युक्त हो। सप्तम स्थान का स्वामी निर्बल हो अथवा राहु, केतु, शनि, मंगल, ये ग्रह बैठे हों व पाप ग्रह देखते हों तो अन्य स्त्री के भोग करने वाला हो। यदि सप्तम स्थान के स्वामी के साथ शुभग्रह युक्त हो व उच्च में (कर्क) राशि में अथवा अपने स्थान (धन-मीन) में हो तो एक ही स्त्रीवाला हो और स्त्री के द्वारा बहुत धनी हो, तथा सुखी हो, और ३४ वर्ष में प्रतिष्ठावाला होता है॥३५—३७॥
अल्पायु: नीचकृत्यकारो ॥३८॥ पापयुते पतित: ॥३९॥ भावाधिपे शुभयुते रन्ध्रे दीर्घायु: ॥४०॥ बलहीने अल्प्यायु: ॥४१॥ पापयुते सप्तदशवर्षादुपरि विधवासङ्गमो भवति ॥४२॥ उच्चस्वक्षेत्रगे दीर्घायु: बलहीन: अरोगी योगपौरुष: विद्धान् वेदशास्त्रविचक्षण: ॥४३॥
लग्न से आठवें भावन में गुरु हो तो अल्पायुवाला और नीच कर्म करनेवाला होता है। बृहस्पति के साथ पापग्रह युक्त हो तो भ्रष्ट होता है। अष्टम स्थान का स्वामी शुभग्रह से युक्त होकर अष्टम स्थान में हो तो दीर्घायुवाला हो। अष्टमस्थान का स्वामी बलहीन हो तो अल्पायु हो। पापग्रह बैठे हों तो १७ वर्ष के बाद विधवा स्त्री से संगम होता है। यदि गुरु उच्च (कर्क) का हो अथवा अपने स्थान (धन मीन) में हो तो दीर्घायु हो, निर्बल हो तो निरोग्य हो और उद्योग करनेवाला, पण्डित तथा वेदशास्त्र को जाननेवाला होता है॥३८-४३॥
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लग्रात्नवमे गुरुफलम् धार्मिक: ॥४५॥ तपस्वी साधुतारुढ: धनिक पश्चत्रिंशद्यज्ञकर्ता पितृदीर्घायु: सत्कर्मसिद्धि: अनेक प्रतिष्ठावान् बहुजनपालक: लग्र से नौवें स्थान में गुरु हो तो धर्मकर्म करनेवाला हो। तप करनेवाला, पवित्रता से युक्त और धनवान् होता है। ३५ वर्ष में यज्ञ करनेवाला हो, दीर्घायु पिता हो, शुभ पवित्र कर्म करने से नाना प्रकार की प्रतिष्ठावाला और बहुत मनुष्यों की रक्षा करनेवाला होता है॥४५॥४५॥
लग्रादशमे गुरुफलम् धार्मिक: शुभकर्मकारी गीतापाठक: योग्यतावान् प्रौढकीर्त्ति: बहुजनपूज्य: ॥४६॥ भावाधिपे बलयुते विशेषकर्तुसिद्धि: ॥४८॥ पापयुते पापक्षेत्रे कर्मविघ्न: दुष्कृतियात्रालाभहीन: ॥४९॥ लग्र से दशवें घर में गुरु हो तो धर्मात्मा शुभ कर्म करनेवाला, गीता का पाठ करनेवाला, चतुर उज्जवल यशवाला और बहुत मनुष्यों का पूजनीय होता है। दशम स्थान का स्वामी बलवान् ग्रहों से युक्त हो तो कार्य में विघ्न करनेवाला हो, दुष्टकर्म करनेवाला हो और यात्रा में लाभ से हीन होता है॥४६—४९॥
लग्रादेकादशे गुरुफलम् विद्वान् धनवान् बहुलाभवान् द्वात्रिंशद्दर्शेऽश्वारुढ: ॥५०॥ अनेकप्रतिष्ठासिद्धि: ॥५१॥ शुभपापयुक्ते गजलाभ: ॥५२॥ भाग्यवृद्धि: चन्द्रयुते निक्षेपलाभ: ॥५३॥ लग्र से एकादशभाव में वृहस्पति हो तो पण्डित धनाढ्य तथा अत्यन्त लाभवाला हो, ३२ वर्ष में घोड़ा पर चढ़नेवाला होता है और
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बड़ा प्रतिष्ठावाला हो, गुरु के साथ शुभ तथा पापग्रह बैठे हों तो हाथी पर चढ़नेवाला हो। भारय की वृद्धिवाला हो, बृहस्पति के साथ चन्द्रमा बैठा हो तो धरी हुई वस्तु का लाभ होता है॥५०॥५३॥
लशाद्दादशे गुरफलम्
निर्धनः पाठकः अल्पपुत्रः गणितशास्त्रज्ञः सम्भोगी ॥५६॥ ग्रन्थवर्णी अयोग्यः ॥५५॥ शुभयुते उच्चस्वक्षेत्रे स्वर्गलोकप्राप्तिः ॥५७॥ पापयुते पापलोकप्राप्तिः ॥५७॥ धर्ममूलेन धनव्ययः ब्राह्मणस्त्रीसम्भोगी गर्भिणीसङ्गभी ॥५८॥
लग्न से वारहवें स्थान में गुरु हो तो धन से हीन, विद्या पढ़नेवाला, थोड़े पुत्रवाला व गणितशास्त्र को जाननेवाला, और नाना प्रकार के भोग को भोगनेवाला होता है। गांठवाला एवं घाववाला और योग्यता से रहित होता है। गुरु के साथ शुभग्रह युक्त हो वह उच्च (मीन) में हो अथवा अपने स्थान (धन मीन) में हो तो स्वर्गलोक प्राप्त हो। पापग्रह बैठें हों तो नरक प्राप्त हो और धर्म के कारण से धन को खर्च करनेवाला, ब्राह्मण की स्त्री से भोग करनेवाला और गर्भवती स्त्री से व्यभिचार करनेवाला होता है॥५४-५८॥
इति श्रीभृगूसूत्रे सिद्धप्रभाकरटीकाभियुते गुरुभावाध्यायनामपञ्चमोऽध्यायः ॥५॥
अथ तन्वादिद्वादशभावस्थितभृगुफलमाह
तत्रादौ लग्ने भृगुफलम्
गणितशास्त्रज्ञः ॥१॥ दीर्घायु: दारप्रियः वस्रालङ्कारप्रियः रूपलावण्यप्रियः गुणवान् ॥२॥ स्त्रीप्रियः धनी विद्वान् ॥३॥
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शुभयुते अनेकसूषणवान् ॥४॥
स्वर्णिकान्तदेह: ॥५॥
पापवोक्षितयते नीचास्तगते चोरवश्चनवान् ॥६॥
वातश्लेष्मदिरोगवान् ॥७॥
भावाधिपे राहुयुते बृहद्रिजो भवति ॥८॥
वाहने शुभयुते गजान्तैश्वर्यवान् ॥९॥
स्वक्षेत्रे महाराजयोग: ॥१०॥
रन्ध्रे ऽष्टव्याधिपे शुक्रे दुर्बले स्त्रीद्रव्यम् ॥११॥
चञ्चल भाग्य: ॥१२॥
कुरबुद्धि: ॥१३॥
लग्नादिद्वितीये भृगुफलम् धनवान् कुटुम्बी सुभोजन: विनयवान् ॥१४॥
नेत्रे विलासधनवान् सुमुख: ॥१५॥
दयावान् परोपकारी ॥१६॥
द्वात्रिंशद्दर्शे उत्तमस्त्रीलाभ: ॥१७॥
भावाधिपे दुर्बले दुःस्थाने नेत्रवैपरोत्यं भवति ॥१८॥
शशियुते निशान्ध: कुटुम्बहीनो
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नेत्ररोगी धननाशकर: ॥१९॥
लग्न से दूसरे स्थान में शुक्र हो तो धनी, कुटुम्बी, अच्छा भोजन करनेवाला और नम्रतावाला होता है। सुन्दर नेत्रवाला, धनी एवं अच्छा मुखवाला, दयालु, दूसरों की भलाई करनेवाला होता है। ३२ वें वर्ष में सुन्दर स्त्री प्राप्त हो। द्वितीयस्थान का स्वामी वलहीन और दुष्ट स्थान में स्थित हो तो नेत्र में फूला अथवा रोग होता है। शुक्र के साथ चन्द्रमा बैठा हो तो रात्रि में अन्धा, कुटुम्ब से रहित, नेत्र में रोगवाला और धन को नाश करनेवाला होता है॥१४-१९॥
लग्नातृतिये भृगुफलम्
अतिलुब्ध: दाक्षिण्यवान् भ्रातृवृद्धि: संकल्पसिद्धि: पश्चात्सहोदरभाव: ॥२०॥ क्रमेण भ्रातृतत्पर: वित्तभोगपर: ॥२१॥
भावाधिपे बलयुते उच्चस्वक्षेत्रे भ्रातृवृद्धि: दुःस्थाने पापयुक्ते भ्रातृनाशं: ॥२२॥
लग्न से तीसरे भवन में शुक्र हो तो अत्यन्त लोभी बड़ा सुन्दर भाइयों की बुद्धिवाला, मन में कार्य को विचार कर सिद्ध करनेवाला और पीछे से भाइयों से हीन होता है। यथाक्रम से जन्म हुए भ्राताओं से तत्पर एवं धन को भोगनेवाला हो। यदि तृतीय स्थान का स्वामी बलवान् ग्रहों से युक्त हो व उच्च (मीन) का अथवा अपने स्थान (वृष तुला) का हो तो भाइयों की वृद्धिवाला हो और शुक्र दुष्ट स्थान में व पापग्रह से युक्त हो तो भाइयों का नाश होता है॥२०-२२॥
लग्नाच्चतुर्थे भृगुफलम्
शोभनवान् बुद्धिमान् भ्रातृसौख्यं सुखी क्षमावान् ॥२३॥ क्षीरसिद्धि: भावाधिपे बलयुते अश्ववाहनप्राप्ति: ॥२४॥
बलयुते अश्वान्दोलिकानकचतुर् जगद्विद्धि: ॥२५॥
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पापयुते पापक्षेत्रे अरिनீचगे बलहीने क्षेत्रवाहनहीन: ॥२६॥ मातृक्लै शवान् ॥१२७॥ कलत्रान्तरभोगी ॥२८॥
लग्न से चौथे घर में शुक्र हो तो सुंदर रुपवाला, बुद्धिमान् भाइयों का सुखवाला, आज्ञा करनेवाला, और शांतिवाला होता है। ३० वर्ष में घोड़े की सवारी प्राप्त हो। हमेशा दूध की वृद्धिवाला हो यदि चतुर्थ स्थान का स्वामी वली ग्रहों से युक्त हो तो घोड़ों की पालकी (वग्धी) पर सवारी करनेवाला हो और सुवर्ण चतुरंगादि बल की वृद्धिवाला हो। शुक्र के साथ पाप ग्रह बैठे हों व पाप ग्रह के घर में हो अथवा शत्रु के घर में व नीच (कन्या) में हो तथा बलहीन होने पर स्थान और सवारी से रहित होता है। माता के दुःख से युक्त हो। अन्य स्त्रियों से भोग करनेवाला होता है॥२७-२८॥
लग्रात्पश्चमे भृगुफलम् बुद्धिमान् मन्त्री सेनापति: ॥२९॥ माता मट्टी दृश्या यौवनदारपुत्रवान् ॥३०॥ राजसन्मानी मन्त्री सुजः स्त्रीप्रसत्ततावृद्धि: ॥३१॥ तत्र पापयुते पापक्षेत्रे अरिनீचगे बुद्धिजाडचयुत: पुत्राश: ॥३२॥ तत्र शुभयुते नीतिमत्पुत्रसिद्धि: वाहनयोग: ॥३३॥
लग्न से पांचवें भाव में शुक्र हो तो बुद्धिमान्, मन्त्री और सेना का मालिक होता है। दादी को देखनेवाला, युवा स्त्री और पुत्रवाला होता है। शुक्र के साथ पापग्रह बैठे हों व पापग्रह के घर में हो शत्रु तथा नीच (कन्या) में हो तो जड़वुद्धिवाला, और पुत्र की इच्छा करनेवाला हो। यदि शुभग्रह युक्त हो तो नीति को जाननेवाला, पुत्रवाला, और वाहन प्राप्त होता है॥२९॥३३॥
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ज्ञातिप्रजासिद्धि: शत्रुक्षय: पुत्रपौत्रवान् ॥३४॥ अपात्रव्ययकारी मायावादी रोगवान् आर्यपुत्रवान् ॥३५॥ भावाधिपे बलयुते शत्रुज्ञातिर्द्धि: शत्रुपापयुते नाचस्ये भावेशेन्दुस्ये शत्रुज्ञातिनाश: ॥३६॥
लग्न से छठवें स्थान में शुक्र हो तो जाति व सन्तानवाला शत्रु को नाश करनेवाला, पुत्र और पौत्र (पोता) वाला होता है। दुष्ट स्थान में खर्च करनेवाला, कपट से बोलनेवाला, तथा रोगवाला व श्रेष्ठ पुत्रवाला होता है। यदि षष्ठमस्थान का स्वामी बलवान् ग्रहों में युक्त हो तो शत्रु तथा जाति की वृद्धिवाला हो और शत्रु तथा पाप ग्रह से युक्त हो, व नीच (कन्या) में हो अथवा षष्ठमस्थान के स्वामी के साथ चन्द्रमा बैठा हो तो शत्रु तथा जाति का नाश होता है॥३४॥३६॥
अतिकामुक: मुखचुम्बक: ॥३७॥ अर्थवान् परदाररत: वाहनवान् सकलकार्यनिपुण: स्त्रीद्वेषी सत्सप्रधान जनबन्धुकलत्र: ॥३८॥ पापयुते शत्रुक्षेत्रे अरिनीनचगे कलत्रनाश: ॥३९॥
विवाहद्रयम् ॥४०॥ बहुपापयुते अनेककलत्रान्तरप्राप्ति: ॥४१॥ पुत्रहीन: ॥४२॥ शुभयुते उच्चे स्वक्षेत्रे तुले कलत्रदेशे विवाहद्रयम् ॥४३॥ कलत्रमूले बहुप्राबल्ययोग: स्त्रीगोष्ठी: बहुधनवान् ॥४३॥
लग्न से सातवें भाव में शुक्र हो तो बड़ा कामी हो, और मुख को चुम्बन करनेवाला होता है। धनवान् दूसरे की स्त्री से भोग करनेवाला, सवारीवाला, तथा सम्पूर्ण कार्यों में कुशल स्त्री से कपट करनेवाला और भाई, स्त्री आदि कुटुम्बी मनुष्यवाला होता है। शुक्र के साथ पाप ग्रह बैठे हों व शत्रु के घर में अथवा शत्रु नीच (कन्या) में हो तो स्त्री का नाश होता है।
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नाश हो। और दो विवाह करनेवाला होता है। यदि शुक्र के साथ बहुत से पाप ग्रह युक्त हों तो अनेक स्त्री प्राप्त होती हैं और पुत्र से हीन होता है। शुक्र शुभ ग्रह से युक्त हो व उच्च (मीन) में हो अथवा अपने स्थान, (वृष तुला) में हो तो स्त्री के देश में बहुत धन प्राप्त हो। और स्त्री के प्रताप से अत्यन्त तेजस्वी हो तथा स्त्रियों के समूह में रहनेवाला होता है॥३७॥४८॥
लग्रादष्टमे भृगुफलम्
सुखी चतुर्थे वर्षे मात्रगण्ड: ॥४५॥ अर्धायु: रोगी हितदारवान् असन्तुष्ट: ॥४६॥ शुभक्षेत्रे पूर्णायु: ॥४७॥ तत्र पापयुते अल्पायु: ॥४८॥
लग्न से आठवें घर में शुक्र हो तो सुखवाला और ४ वर्ष में माता को गण्डमाला हो। आधी आयुवाला तथा रोगी होता है। हितैषी स्त्रीवाला, और सन्तोप से रहित होता है। शुभाशुभ ग्रहों के घर में हो तो पूर्णायु होता है। साथ पाप ग्रह बैठें हो तो अल्पायु वाला होता है॥४५-४८॥
लग्रानवमे भृगुफलम्
धार्मिक: तपस्वी अनुष्ठानपर: ॥४९॥ पादेबहुतमलक्षण: धर्मी भोगवृद्ध: सतदारवान् ५०॥ पितृदृढोय: ॥५१॥ तत्र पापयुते पितृरिष्टवान् ॥५२॥ पापयुते पापक्षेत्रे अरिनोचगे धनहानि: ॥५३॥ गुरुदारग: ॥५४॥ शुभयुते भाग्यवृद्ध: ॥५५॥ महाराजयोग: ॥५६॥ वाहनकामेशयुते महाभाग्यवान् अभ्यान्दोल्यादिवाहनवान् ॥५७॥ वास्त्रालङ्कारप्रिय: ॥५८॥
लग्न से नवम् स्थान में शुक्र हो तो पुण्य करनेवाला, तप करनेवाला और अनुष्ठान करनेवाला होता है। चरणों में वड़ा उत्तम चित्तवाला,
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धर्मवाला, भोग की वृद्धि करनेवाला और पुत्र तथा स्त्रीवाला होता है। पिता दीर्घायु हो। शुक्र के सात पापग्रह बैठे हों तो पिता को अरिष्ट हो। यदि शुक्र पापग्रह से युक्त हो व पाप ग्रह के घर में अथवा शत्रु तथा नीचराशि (कन्या) में हो तो धन का नुकसान होता है। और गुरु की स्त्री से व्याभिचार करनेवाला हो, शुभे ग्रहयुक्त हो तो भाग्य का वृद्धिवाला हो, एवं राजयोग भी होता है। शुक्र चतुर्थ और सप्तम स्थान के स्वामी के साथ बैठा हो तो बड़ा भाग्यशाली हो और घोड़ों की सवारीवाला तथा पालकी पर चढ़नेवाला हो। वस्त्र तथा आभूपण से युक्त होता है॥५९-५८॥
लग्नादशमे भृगुफलम् बहुप्रतापवान् पापयुते कर्मविघ्नकर: गुरबुधचन्द्रयुते अनेक-वाहनारोहणवान् ॥५९॥ अनेककतूसोद्भ दिगन्त-विश्रुतकीर्ति: अनेक राजयोग: बहुभाग्यवान् वाचाल: लग्न से दसवें भवन में शुक्र हो तो बड़ा तेजस्वी हो, शुक्र के साथ पापग्रह युक्त हो तो कार्य में विघ्न करनेवाला हो, यदि बृहस्पति बुध चन्द्रमा युक्त हो तो बहुत सी सवारियों पर चढ़नेवाला होता है। और नाना प्रकार के यज्ञ करनेवाला हो। तथा सब दिशाओं में यश सुननेवाला, अनेक राजयोगवाला एवं बड़ा भाग्यवान और बहुत बोलनेवाला होता है॥५९-६१॥
लग्नादेकादशे भृगुफलम् विद्धान् बहुधनवान् सुन्दरिलाभवान् दयावान् शुभयुते अनेक-वाहनयोग: ॥६२॥ पापयुते पापमूलात् धनलाभ: ॥६३॥ शुभयुते शुभमूलात् नीचर्के पाप रन्ध्रेशादियोगे लाभहीन: लग्न से ग्यारहवें घर में शुक्र हो तो पण्डित, बहुत धनवाला, पृथ्वी
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प्राप्त करनेवाला और दयालु होता है, शुक्र के साथ शुभग्रह युक्त हो तो अनेक वाहन प्राप्त होते हैं। यदि पापग्रह युक्त हो तो पाप करने से धन मिलता है। और शुभग्रह बैठे हों तो शुभ कार्य करने से धन प्राप्त हो, यदि शुक्र नीच राशि (कन्या) में अथवा पापग्रह और अष्टम स्थान के स्वामी से युक्त हो तो धन का लाभ नहीं होता॥६२-६४॥
लग्नाद्द्वादशे भृगुफलम्
बहुदारिद्रचवान् ॥६५॥ पापयुते विषयलुब्धपर: ॥६६॥ शुभयुक्तश्श्रेष्ठ बहुधनवान् ॥६७॥ शय्याखट्वाज्ञादिसौख्यवान् शुभलोकप्राप्ति: पापयुते नरकप्राप्ति: ॥६८॥
लग्न से वारहवें भाव में शुक्र हो तो अत्यन्त दरिद्री होता है। शुक्र के साथ पाप ग्रह बैठें हो तो भोगादि विषय में लोभवाला हो। यदि शुभग्रह युक्त हो तो बहुत धनवाला हो और पलंग आदि का पूर्ण सुखवाला हो एवं स्वर्गलोक प्राप्त करनेवाला हो, यदि पाप ग्रह बैठे हों तो नरक प्राप्त होता है॥६५-६८॥
इति श्रीभृगुसूत्रे सिद्धप्रभाकरटीकाभियुक्ते शुक्रभावाध्यायनामषष्ठोऽध्यायः ॥६॥
अथ तन्वादिद्वादशभाववस्थितशनिफलमाह
तत्रादौ लग्ने शनिफलम्
वातपित्तदेह: ॥११॥ उच्चे पुरग्रामाधिप: धन धान्य समृद्धिद: ॥२॥ स्वक्षे पितृधनवान् ॥३॥ वाहनेशकर्मेशक्षेत्रे बहुभाग्यम् ॥४॥ महाराजयोग: ॥५॥ चन्द्रमसा हस्ते भिक्षुकी वृत्ति: ॥६॥ शुभहष्टे निवृत्तिः ॥७॥
शनि लग्न में हो तो वात पित्त. प्रकृतिवाला हो, शनि उच्च (तुला) में
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राशि का हो तो नगर और धनधान्य से भी समृद्धिशाली होता है। अथवा ग्राम का मालिक हो, शनि अपनी राशि (मकर कुम्भ) का हो तो पिता धनवान् हो। चतुर्थ दशम के स्वामी की राशि का शनि जन्म लग्न में हो तो बड़ा भाग्यवान् हो। और प्रवल राजयोगवाला हो, शनि को चन्द्रमा की दृष्टि होने पर भीख मांगने की वृत्तिवाला हो, शुभग्रह की दृष्टि से भिक्षुक न हो॥१-७॥
लग्नाद्दितीये शनिफलम्
द्रव्याभाव: दारद्रयम् ॥८॥ पापयुते दारवश्चनाशठाधिप: अल्पक्षेत्रवान् नेत्ररोगी ॥९॥
लग्न से दूसरे स्थान में शनि हो तो धन से रहित हो तथा दो स्त्री वाला होता है। शनि के साथ पापग्रह बैठें हों तो स्त्रियों को ठगनेवाला एवं मठाधीश अल्पस्थानवाला और नेत्र में रोगवाला होता है॥८॥९॥
लग्नातृतिये शनिफलम्
आतृहानिकर: ॥१०॥ अष्ट: दुर्वृत्त: ॥११॥ उच्चस्वक्षेत्रे भ्रातृवृद्धि: ॥१२॥ तत्र पापयुते भ्रातृद्वेषी ॥१३॥
लग्न से तीसरे भाव में शनि हो तो भाइयों की हानि करनेवाला हो। दुःखचित्तवाला और नीचकर्म करनेवाला होता है। यदि शनि उच्च (तुला) का हो अथवा अपने स्थान (मकर कुम्भ) का हो तो भाइयों की वृद्धि हो, शनि के साथ पाप ग्रह युक्त हो तो भाइयों से द्वेष करनेवाला शत्रु होता है॥१०॥१३॥
लग्नाच्चतुर्थे शनिफलम्
मातृहानि: द्विमातृवान् ॥१४॥ सौख्यहानि: निर्धन: ॥१५॥ उच्चस्वक्षेत्रे न दोष: ॥१६॥ अश्वान्दीपाद्यवरोही ॥१७॥
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लग्रेशे मन्दे मातृदीर्घायु: ॥१८॥ सौख्यवान् ॥१९॥ रन्ध्रेशयुक्ते मातृरिष्टम् ॥२०॥ सुखहानि: ॥२१॥
लग्र से चतुर्थ स्थान में शनि हो तो माता की हानि करनेवाला और दो मातावाला होता है। सुखसौख्य से हीन होकर शरीर में कष्ट हो और धन से हीन हो। शनि उच्च (तुला) का व अपने स्थान (मकर कुम्भ) में हो तो यह दोष नहीं होता अर्थात् सुखी तथा धनी होता है और घोड़ा पालकी आदि की सवारी प्राप्त हो। लग्नका स्वामी शनि हो तो माता दीर्घायु होती है। और सुखी होता है। शनि के साथ अष्टमस्थान का स्वामी बैठा हो तो माता को अरिष्टवाला होता है एवं शरीर में कष्ट होता है॥१४॥२१॥
लग्रात्पञ्चमे शनिफलम् पुत्रहोन: अतिदारिद्र:ो दुर्वृत्त: दत्तपुत्रो ॥२२॥ स्वक्षेत्रे स्त्रीप्रजासिद्धि: ॥२३॥ गुरुदृष्टे स्त्रीद्वयम् ॥२४॥ तत्र प्रथमापुत्रा द्वितीया पुत्रवती ॥२५॥ बलयुते मन्दे स्त्रीभिर्युक्त: लग्न से पांचवें घर में शनि हो तो पुत्र से रहित हो, स्लेच्छता से रहनेवाला, नीचवृत्तिवाला और दूसरे की दी हुई पुत्रीवाला होता है। शनि अपने स्थान (मकर कुंभ) में हो तो कन्या सन्तानवाला होता है। शनि को वृहस्पति देखता हो तो दो स्त्रीवाला हों। उनमें प्रथम स्त्री सन्तान से हीन हो, द्वितीय पुत्रवती होती है। शनि बलवान् ग्रहों से युक्त हो तो स्त्रियों से युक्त होता है॥२२-२६॥
लग्रात्पञ्चे शनिफलम् अल्पज्ञाति: शत्रुक्षय: ॥२७॥ धनधान्यसमृद्ध: कुजयुते देशान्तरसंवारी ॥२८॥ अल्पराजयोग: ॥२९॥ भद्रयोगात्क्वचित्सौख्यंकरचिद्योगभङ्ग ॥३०॥ रन्ध्रेशे मन्दे अरिष्टं वातरोगी
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शूलवणदेही ॥३१॥
जन्मलग्न से छठवें स्थान में शनि हो तो छोटी जाति का हो और शत्रु नष्ट हो जाते हैं। धन धान्य से युक्त हो, शनि के साथ मङ्गल युक्त हों तो देशान्तर में घूमनेवाला हो और किञ्चित् राज योग हो, कभी राजयोग के भङ्ग से सुख हो। शनि अष्टम स्थान का स्वामी हो तो वात तथा शूलरोग से शरीर में अरिष्ट होता है और घाव भी होते हैं॥२७—३१॥
शरीरदोषकर: कुशवकलत्र: वेश्यासम्भोगवानू अति दु:खी उच्चस्वक्षेत्रगते अनेकस्त्रीसम्भोगी॥३२॥ केतुयुते स्त्रीसम्भोगी ॥३३॥कुजयुते शिश्नचुम्बनपर:॥३४॥ शुक्रयुते भगचुम्बनपर: ॥३५॥ परस्त्रीसम्भोगी ॥३६॥
लग्न से सातवें भाव में शनि हो तो शरीर दोष युक्त हो, दुर्बल स्त्रीवाला, वेश्या से भोग करनेवाला और अत्यन्त दु:खी हो, शनि उच्च (तुला में) अथवा अपने स्थान (मकर कुम्भ) में हो तो अनेक स्त्रियों से भोग करनेवाला होता है। शनि के साथ केतु स्त्री युक्त हो तो स्त्री से भोग करनेवाला हो। मङ्गल युक्त हो तो लिङ्ग को चुम्बन करनेवाला हो, शुक्र युक्त हो तो भग को चुम्बन करनेवाला हो। और पराई स्त्री से भोग करनेवाला होता है॥२—३६॥
त्रिपादायु: दरिद्री शूद्रस्त्रीरत: सेवक: ॥३७॥ उच्चस्वक्षेत्रगे दीर्घायु: ॥३८॥ अरिनीतगे भावाधिपे अल्पायु: ॥३९॥ कष्टान्नभोगी ॥४०॥
लग्न से आठवें भवन मे शनि हो तो ७५ वर्ष की आयुवाला, दरिद्री,
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शूद्र की स्त्री से भोग करनेवाला और नौकर होता है। शनि उच्च (तुला) का अथवा अपने स्थान (मकर कुम्भ) में हो तो दीर्घायुवाला हो। अष्टमस्थान का स्वामी शत्रु तथा नीच (मेष) हों तो अल्पायु हो। और दुःख से अन्न को खानेवाला होता है॥३७-४०॥
लशान्त्रवमे शनिफलम्
पतितः जीर्णोद्वारकरः एकोनचत्वारिंशद्दशे तटाकगोपुरनिर्माण कर्ता ॥४१॥ उच्चस्वक्षेत्रे पितृदीर्घायु: ॥४२॥ पापयुते दुर्बले पितृरिष्टवान् ॥४३॥
लग्न से नवें भाव में शनि हो तो भ्रष्ट हो और प्राचीन वस्तु का उद्धार करनेवाला तथा ३९ वर्ष में घाट, गौग्राम आदि वनानेवाला होता है। शनि उच्च (तुला) का व अपने स्थान (मकर कुम्भ) में हो तो पिता की दीर्घाय हो। शनि पापग्रह से युक्त हो तथा वलहीन हो तो पिता को अरिष्ट होता है॥४१-४३॥
लग्राद्दशमे शनिफलम्
पञ्चविंशतिवर्षे गङ्गानायी अतिलुन्धः पित्त शरीरौ ॥४४॥ पापयुते कर्मविघ्नकरः शुभयुते कर्मसिद्धिः ॥४५॥
लग्न से दसवें भावन में शनि हो तो २५ वर्ष में श्रीगङ्गाजी का ज्ञान करनेवाला, अत्यन्त लोभी और चित्त शरीरवाला होता है। शनि के साथ पापग्रह बैठे हों तो कार्य में विघ्न करनेवाला हो। यदि शुभ ग्रहयुक्त हो तो कार्य सिद्ध करनेवाला होता है॥४४-४५॥
लग्रादेकादशे शनिफलम्
बहुधनी विघ्नकरः भूमिलाभः राजपूजकः ॥४६॥ उत्तचे स्वक्षेत्रे वा विद्वान् ॥४७॥ महाभाग्ययोगः बहुधनी वाइनयोगः ॥४८॥
लग्न से ग्यारहवें घर में शनि हो तो बड़ा धनी, कार्य में विघ्न करनेवाला, भूमिलाभ करनेवाला और राजपूजित होता है। उच्चे स्वक्षेत्रे वा विद्वान् होता है। महाभाग्ययोगः बहुधनी वाइनयोगः होता है॥४६-४८॥
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करनेवाला और पृथ्वी का लाभ वाला तथा राजा की सेवा करनेवाला होता है। शनि उच्च (तुला) का अथवा अपने स्थान (मकर कुष्भ) का हो तो पण्डित होता है। और बड़ा भाग्यवाला अत्यन्त धनवाला और सवारी प्राप्त होती है॥४६-४८॥
लग्नद्वादशे शनिफलम् पतितः विकलाङ्गः ॥४९॥ पापयुते नेत्रच्छेदः ॥५०॥ शुभयुते सुखी सुनेत्रः पुण्यलोकप्राप्तिः ॥५१॥ पापयुते नरकप्राप्तिः ॥५२॥ अपात्रव्ययकारी निर्धनः ॥५३॥
लग्न से बारहवें घर में शनि हो तो भ्रष्ट हो और अङ्ग से हीन होता है। शनि के साथ पाप ग्रह बैठे हों तो नेत्र में छिद्र हो। शुभ ग्रह हों तो सुखी सुन्दर नेत्रवाला और स्वर्गलोक प्राप्त होता है। शनि के साथ पाप ग्रह युक्त हो तो नरक प्राप्त होता है और दुष्टजनों से अर्थ करनेवाला तथा द्रव्य से हीन (कंगाल) होता है॥४९-५३॥
इति श्रीभृगुसूत्रे सिद्धप्रभाकरटीकाभियुक्तेशनि-भावाध्यायनामसप्तमोऽध्यायः ॥७॥
अथ तन्वादिद्वादश भाव स्थितराहुकेत्वोः फलमाह तत्रादौ लग्ने राहुकेत्वोः फलम् मृतप्रसूतिः ॥१॥ मेषवृषभकर्ककर्कराशिस्थो दयावान् ॥२॥ बहुभोगी ॥३॥ अशुभे शुभहृष्टे मुखलाञ्छनो ॥४॥
जन्मलग्न में राहु केतु हो तो मरी हुई सन्तान हो। यदि राहु केतु मेष वृष कर्क इन राशियों में बैठे हों तो दयालु होता है। और अत्यन्त भोगी होता है। राहु केतु को शुभ अथवा पाप ग्रह देखते हों तो मुख में चिह्नवाला होता है॥१-४॥
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लप्राद्द्वितीये राहुकेत्वोः फलम् निर्धनः देहव्याधि: पुत्रशोकः श्यामवर्णः ॥५॥ पापयुते चुभुके लाज्छनम् ॥६॥
लप्रात्तृतीये राहुकेत्वोः फलम् तिलनिष्पावमुद्गकोद्रवसमृद्धिवान् ॥७॥ शुभयुते कण्ठलाज्छनम् ॥८॥
लप्राचतुर्थे राहुकेतुफलम् बहुभूषणसमृद्धः जायाद्दयम् सेवकः मातृक्लेशः पापयुते निःश्रयेन ॥९॥ शुभयुतदृष्टे न दोषः ॥१०॥
लप्रातपञ्चमे राहुकेत्वोः फलम् पुत्रभावः सर्पशापात् सुतक्षयः ॥११॥ नायगप्रतिष्ठया पुत्रप्राप्तिः ॥१२॥ पवनव्याधि: दुरर्गी राजकोपः दुष्टग्रामवासी ॥१३॥
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लग्न से पांचवे घर में राहु केतु हों तो पुत्र से हीन हो, सर्प के शाप से पुत्र का नाश हो। नारदेव की प्रतिष्ठा करने से पुत्र सुख प्राप्त हो। वायु से रोग उत्पन्न हो, खराब मार्ग में जानेवाला, राजा से क्रोध करनेवाला और नीच ग्राम में निवास करनेवाला होता है॥११-१३॥
लग्रपञ्चमे राहुकेत्वोः फलम् धोरवान अतिसुखी ॥१४॥ इन्दुयुते राजस्त्रीभोगी ॥१५॥ निर्धनः चोरः ॥१६॥
लग्न से छठें स्थान में राहु केतु हो तो गम्भीर और अत्यन्त सुखी होता है। राहु केतु के साथ चन्द्रमा युत हो तो राजा की स्त्री से भोग करनेवाला हो। धन से हीन और चोर होता है॥१४-१६॥
लग्रात्सप्तमे राहुकेत्वोः फलम् द्वारद्वयं तन्मध्ये प्रथमस्त्रीनाशः द्वितीयं कलत्रे गुल्मव्र्याधिः ॥१७॥ पापयुते गण्डोत्पत्तिः ॥१८॥ शुभयुते गण्डनिवृत्तिः ॥१९॥ नियमेन द्वारद्वयम् ॥२०॥ शुभयुते एकमेव ॥२१॥
लग्न से सातवें स्थान में राहु केतु हो तो दो स्त्रीवाला हो जिसमें पहिली स्त्री का नाश हो, दूसरी स्त्री को गुल्म रोग हो। राहु केतु के साथ पापग्रहयुक्त हो तो गण्डमाला रोग हो। शुभग्रहयुक्त होने पर यह दोष दूर हो जाता है। और हमेशा दो स्त्रीवाला होता है। राहु केतु के साथ शुभग्रह युक्त हो तो एक ही स्त्रीवाला होता है॥१७-२१॥
लग्रादष्टमे राहुकेत्वोः फलम् अतिरोगी द्वात्रिंशद्ब्रषायु॥्मान् ॥२२॥ शुभयुते पञ्चचत्वारिंशद्वर्षे भावाधिपे बलयुते स्वोच्चेष्वस्थितवर्षाणि वा जीवितम् ॥२३॥
लग्न से आठवें भाव में राहु केतु हों तो अत्यन्त रोगी हो और ३२ वर्ष की आयुवाला हो। राहुकेतु के साथ शुभ ग्रह युक्त हों तो ४५ वर्ष की
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आयुवाला हो। अष्टम स्थान का स्वामी बलवान् ग्रहों से युक्त हो अथवा अपनी उच्चराशि में हो तो ६० वर्ष की आयुवाला होता है।॥२२॥२३॥
लग्नात्नवमे राहुकेत्वो: फलम् पुत्रहीन: शूद्रस्त्रीसङ्भोगी सेवक: धर्महीन: ॥२४॥ लग्न से नवम स्थान में केतु हों तो पुत्र से हीन शूद्र की स्त्री से भोग करनेवाला व सेवा करनेवाला और धर्म से रहित होता है।॥२४॥
लग्नादशमे राहुकेत्वो: फलम् वितन्तुसज्जम: ॥२५॥ दुग्रामवास: ॥२६॥ शुभयुते न दोष: ॥२७॥ काव्यव्यसन: ॥२८॥ लग्न से दशवें घर में राहु केतु हों तो* विधवा से संगम करनेवाला हो। नीच ग्राम में रहनेवाला हो। राहुकेतु के साथ शुभ ग्रह बैठे हों तो सुन्दर ग्राम में निवास करनेवाला होता है और काव्यशास्त्र को पढ़नेवाला होता है।॥२५-२८॥
लग्नादेकादशे राहुकेत्वो: फलम् पुत्रै: समृद्ध: ॥२९॥ धनधान्यसमृद्ध: ॥३०॥ लग्न से ग्यारहवें भाव में राहु केतु हों तो पुत्रों से युक्त हो और धन धान्य से भी युक्त होता है।॥२९॥३०॥
लग्नाद्द्वादशे राहुकेत्वो: फलम् अल्पपुत्र: ॥३१॥ नेत्ररोगी पापगति: ॥३२॥ लग्न से बारहवें स्थान में राहु केतु हो तो थोड़े पुत्रवाला हो। और नेत्र में रोगवाला एवं नीच गतिवाला होता है।॥३१॥३२॥
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अथ विनयपूर्वकटीकाकारपरिचयःः श्रीसिद्धनाथेन सुदेवविज्ञेनाख्यातरत्नलासकमण्डले वा । वास्तः सुखेडास्त्त च तत् जातेनानिर्मिता वै भृगुसूत्रटीका ॥१॥
अत्र भ्रमाद्या त्रुटिरागता सा संशोध्य विझ्झैः परिपूरणीया। श्रीनारदादैरपि दुःशकं यत् तत्राल्पविन्मादशवित्कथाका ॥२॥
माघे सितेऽर्के ऽहितिथौ सुपुष्पच्यां त्र्यष्टगोभूमितवैक्रमाब्दे । जिज्ञासुमुद्दं भृगुसूत्रकथ्यत् सिद्धप्रभाकर्यभियुक्तजातस् ॥३॥
इति श्रीभार्गवीये-सुखेडाग्राम वास्तव्यकाशीस्थगवर्नमेन्ट संस्कृत महाविद्यालयपरीक्षोत्तीर्ण स्वर्गीय पं० श्रीरेवाशंकरात्मज, राज्ययोतिषी रमलशास्त्री “अग्रिहोत्री नागदा” पण्डितश्रीसिद्धनाथ शमकर्त्तासिद्धप्रभाकर टीकाभियुक्ते राहुकेतु भावाघ्याय नामाष्टमोऽध्यायः ॥८॥
समाप्तोऽयंप्रन्थः
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मासांशः : कुम्भः कुम्भः कुम्भः मकर मीन कुम्भः ॰ रा॰ कु॰ मेष ॰ तु॰ धन ॰ मीं २७ कन्या २७ ॰ रा॰ श॰ कर्क ५ मकर ५ ॰ रा॰ कु॰ वृश्चिक वृक मिथुन ॰ रा॰ कु॰ मकर १५ मीन १५ ॰ रा॰ कु॰ कर्क कुम्भ मिथुन ॰ रा॰ कु॰ मीन २ कर्क २ ॰ रा॰ कु॰ कन्या मकर मिथुन ३ मीन ३ वृ॰ रा॰ कु॰ सिंह मेष ॰ मं॰ कु॰ तुला १० वृ॰ १०
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महणाय् एकपदीशः निशेषतत्वप्रदर्शकः
तिथिपत्रः निशेषतत्वप्रदर्शकः
वारपत्नः निशेषतत्वप्रदर्शकः
नक्षत्रपतिः निशेषतत्वप्रदर्शकः
योगीनेता वरीण
प्र० नष्टजाति०प्र०
प्रहणा वारिण
प्रहणा वारीण
दिशा दान
पातव्य पा०
काषदान
पाके दो
पापनाशक प्रक
कार्तिक
हरिणाख्य शासन
कृत्तिका स्त्री
पुष्य अनुः आर्त्त०
फु० पू० भा०
फु० पू० भा०
फाल्गुनी स्त्री
रोहिणी उपा
पुनर्वसु स्त्री
उल्का
भरा
श्रावरी
मंगला
पिंगला
क उफा उपा
फुष अनुः भा०
फर० पू० भा०
धान्या
पू० फफा०
पू० अनुः भा०
पुष्य
पुष्य
पुष्य
पुष्य
पुष्य चि०
फुन पू० भा०
फुन अनुः भा०
पू० फा०
आ० स्वा० या०
पू० मृग० शिरः
मृग० शिरः
मृग० सि०
मृग० सि०
सिंह
आ० आ० या०
चित्रा
चित्रा
चित्रा
चित्रा
स्वाती
वि० आ० या०
विशाखा
विशाखा
अनुराधा
ज्येष्ठा
मूलं
पू० आ० या०
पूर्वाषाढा
उ० आ० या०
उत्तराषाढा
श्रवण
धनिष्ठा
शतभिषा
पू० भा०
उ० भा०
रेवती
अश्विनी
भरणी
कृत्तिका
रोहिणी
मृगशिरा
आर्द्रा
पुनर्वसु
पुष्य
आश्लेषा
मघा
पू० फाल्गुनी
उ० फाल्गुनी
हस्त
चित्रा
स्वाती
विशाखा
अनुराधा
ज्येष्ठा
मूल
पू० आषाढा
उ० आषाढा
श्रवण
धनिष्ठा
शतभिषक
पू० भाद्रपदा
उ० भाद्रपदा
रेवती
अश्विनी
भरणी
७२
४२
४३
९
२१
७
३८
२०
६
४९
१९
७
३२
९
३
२८
१०
२
२४
६
२२
३१८०
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प्रातःकाले वदेत्पुत्रं मध्याह्ने तु फलं वदेत्। मध्यान्हकाले वदेष्ट्रांस्त्रीन्तु देवतां वदेत् ॥१॥
वर्ग: ध्वज भूत सिंह भान वृद सत गज ध्वांक्ष
प्रश्नाहाराणि स्वर इडुएओ कषगहड चहचजसत्र ठडडण तयदधन पफवभम यरलव शपसहू
प्रश्ननिर्णय: अस्ति नास्ति अस्ति नास्ति अस्ति नास्ति अस्ति नास्ति
मूलप्रश्न: धातु धातु मूल जीव जीव जीव मूल जीव
आयुप्रश्न १००वर्ष १ वर्ष १०० वर्ष २० वर्ष ६० वर्ष ४५ वर्ष ७७ वर्ष १६ वर्ष
मृतु:प्रश्न मुख दुःख मुल दुःख मुख मुख दुःख मुल मुख
स्त्रीलाभप्रश्न लाभ हानि लाभ हानि लाभ हानि लाभ हानि
पुत्रकन्याप्रश्न पुत्र कन्या पुत्र कन्या पुत्र कन्या पुत्र कन्या
वित्तप्राप्ति प्राप्त न प्राप्त प्राप्त न प्राप्त प्राप्त न प्राप्त
कार्यसिद्धिप्रश्न स्थिर न सिद्धि शोभ्र सिद्धि अतिविलंब शोभ्र अतिविलंब स्थिर न सिद्धि
व्यवहार प्रदन शुभ फलह शुभ कलह शुभ शुभ कलह शुभ फलह
व्या० लाभहानि लाभ हानि लाभ हानि लाभ हानि लाभ हानि
रोगो प्रश्न आरोग्य संकट मुख कष्ट आरोग्य कष्ट मुख दुःख
कष्ट दिन ७ दिन २ मास १५ दिन १ मास १५ दिन १ मास ७ दिन २ मास
प्रवासी प्रश्न कुशल रोगी मुख कष्ट मुख कष्ट कुशल रोगी
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प्रवासी स्थिर समीप समीप दूर पुनर्गत मार्गस्थ मार्गस्थ पूरस्थ पुनर्गत
प्रवासी गमागम समीप समीप दूर पुनर्गत मार्गस्थ मार्गस्थ पूरस्थ पुनर्गत
रथयुगमागमो आगम न आगम आगम न आगम आगम न आगम आगम न आगम
जयपराजय प्रण जय पराजय जय पराजय जय पराजय अजय पराजय
वृष्टि प्रण विलम्ब उत्तम विलम्ब उत्तम उत्तम न चर्या उत्तम न चर्या
वृष्टिविन्दान २७ ७ ३० २० १० ६० ३० ६०
धनलाभप्रण प्राप्ति व्यय प्राप्ति हानि लाभ व्यय प्राप्ति हानि
मुष्टिप्रण पत्र अर्थ फल काठ धान्य तृण जीव पुष्प
मुष्टिवर्ण कीसुनम् भेत् लोहितांग पांडुनील पोत आकार इया मिश्र
धान्यज्ञान गोधूम तित्त पीताम्र दाल तण्डुल बने गुड यव
नष्टवस्तुला०प्र० लाभ हानि लाभ हानि लाभ हानि लाभ हानि
नष्टदिशा प्रण पूर्व आग्नेयकोण दक्षिण नैऋृत्य पश्चिम वायव्य उत्तर ईशान
चीर जाति ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य शूद्र धनिक नोकर भोळ नाई
नष्टवस्तु स्थान उक्त में भोजनालयमें बन में अन्तरिक्ष में बरतन में काठपात्र में घर में पृष्ठोदेशीतर
परोष्णतीर्ष प्रण उत्तमश् अनुतमोर्ष उत्तमश् अनुतमोर्ष अतुन्तमोर्ष उत्तमश अनुतमोर्ष
भागोदरविंचार उत्तम नेष्ट उत्तम नेष्ट उत्तम नेष्ट उत्तम नेष्ट
उच्चपदप्राप्तिप्रण प्राप्ति न प्राप्ति प्राप्ति न प्राप्ति प्राप्ति न प्राप्ति प्राप्ति न प्राप्ति
बन्धनिमोक्ष प्रण न मोक्ष मोक्ष न मोक्ष न मोक्ष मोक्ष न मोक्ष मोक्ष
पूर्वकार्यविंधि प्रण ७ दिन १ वर्ष १५ दिन ६ मास १ मास ६ मास ३ मास १ वर्ष
देवपूजा फुलवेच दुर्गा सूर्य हनुमत शिव सरस्वती गणपति पितृवेच
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उपरोक्त प्रश्नावली देखने की सरल विधि:-
यदि प्रश्नकर्ता प्रातःकाल सूर्योदय से ११ बजे तक प्रश्न करे तो पूर्वोत्तर दिशा में प्रश्नकर्ता का मुख रखा कर उनके इष्टदेव तथा प्रश्न का ध्यान करते हुए किसी भी पुष्प का नाम मुख से बुलवाना, मध्याह्न में (११ बजे से ३ बजे तक) फल का नाम, सायंकाल (३ बजे से सूर्यास्त) नदी का नाम एवं रात्रि में किसी देवता का नाम उच्चारण करवाना चाहियें। पुष्प, फल, नदी, देवता इन का पहिला अक्षर ग्रहण करके वो वर्ण अष्टवर्गों में जहां हो उस वर्ग से नीचे एवं प्रश्नकोष्ठक के वायें ओर जहां पर दोनों का सम्मेलन हुआ है वही प्रश्न का फल जानना।
उदाहरण-जैसे किसी ने दिन के ५ बजे आकर प्रश्न पूछा कि मुकदमें में मेरी जीत होगी? तब सायंकाल होने से प्रश्नकर्ता के मुख से नदी का नाम उच्चारण करवाया तो उसने 'नर्मदा' नदी का नाम कहा--इसका पहला अक्षर 'न्' है। यह वृष वर्ग के तवरग में है, अतः इसके नीचे और जय पराजय प्रश्न कोष्ठक के वाई ओर दोनों के सम्मिलन में 'जय' फल मिलता है। अतएव प्रश्नकर्ता की इस मुकदमें में निश्चित रूप से विजय होगी। इसी तरह सम्पूर्ण प्रश्नों का फल समझना।
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