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1. BkHin-BrhaspatiKCD-bharat-kA-sangIta-siddhAnta-1959-0016

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Barcode : 99999990076534 Title - Bharat Ka Sangeet Siddhant Granthmala-28 Author - Brihaspati, Shri Kailashchandradev Language - hindi Pages - 383 Publication Year - 1959 Barcode EAN.UCC-13

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हिन्दी-समिति-ग्रन्थमाला-२८

भरत का संगीत-सिद्धान्त

लेखक श्री कैलासचन्द्रदेव बृहस्पति एम. ए., शास्त्री

प्रकाशन शाखा, सूचना विभाग उत्तर प्रदेश

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प्रथम संस्करण

१९५९

मूल्य साढ़े छः रुपये.

मुद्रक पं० पृथ्वीनाथ भार्गव, भार्गव भूपण प्रेस, गायघाट, वाराणस

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प्रकाशकीय

राष्ट्रभाषा हिन्दी के साहित्य की समुन्नति एवं संवृद्धि के लिए उत्तर प्रदेश प्रशासन ने हिन्दीसमिति के तत्त्वावधान मे विविध विपयो के ग्रन्थ प्रकाशित करने की जो योजना बनायी थी, उसी के अन्तर्गत यह पुस्तक प्रकाशित की जा रही है। इसमे महर्षि भरत के सगीत-सिद्धान्त का सम्यक् विवेचन किया गया है। इसके लेखक है सनातनधर्म कालेज, कानपुर के यशस्त्री प्राध्यापक श्री कैलासचन्द्र देव बृहस्पति। यह हिन्दी समिति ग्रन्थमाला का २८वा पुष्प है।

लेखक के पूर्वज, कम से कम चार पीढ़ियो से, रामपुर राज्य के दरबार में रहे हैं, अतः संगीतसम्बन्धी सस्कार उन्हे प्रायः आनुषंगिक रूप से ही प्राप्त हुए है। उन्हें ऐसे "सद्गुरुओ" के चरणो मे बैठकर स्वर-साधना करने का अवसर प्राप्त हुआ है जिन पर आज के अनेक सुप्रसिद्ध एवं सुसम्मानित संगीत-शास्त्रियों की भी अपार श्रद्धा है। अनेक विद्वानों की सत्सगति और अभ्रान्त पथ-प्रदर्शन का भी सौभाग्य उन्हे प्राप्त हुआ है। इसके सिवा उन्होंने भरत के मूल नाटयशास्त्र, शार्गदेव के सगीतरत्नाकर आदि अनेक ग्रन्थो का वर्पो से अनुशीलन और मनन किया है, जिसकी स्पष्ट छाप हमें इस पुस्तक के प्रत्येक अध्याय में देखने को मिलती है।

प्रस्तुत ग्रन्थ महर्पपि भरत के "नाटय-शास्त्र" का अनुवाद नही है। यह उनके सगीतसम्बन्धी सिद्धान्तो का व्याख्यात्मक विवेचन एवं मण्डनात्मक विग्लेषण है। भरत मुनि ने संगीत के सम्वन्ध में जो कुछ लिखा, कालगति के प्रभाव से वह दुर्वोध होने लगा था, अतः उनके विचारो को स्पष्ट करने के लिए मतंग, नान्यदेव, कुभ, शार्ङ्गदेव आदि ने अपनी-अपनी रचनाओ मे उनका पर्याप्त विवेचन किया। हिन्दी में

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इस विषय पर कोई ग्रन्थ अभी तक नही लिखा गया था। वृहस्पतिजी ने प्रस्तुत पुस्तक की रचना कर इस अभाव की पूर्ति कर दी है। मूल विपय का वर्णन और स्पष्टीकरण समाप्त कर चुकने के बाद आपने अन्त के चार अनुबन्धो मे जो सामग्री प्रस्तुत की है, वह भी अत्यन्त महत्त्वपूर्ण और परमोपयोगी है। ग्रन्थ अत्यन्त परिश्रमपूर्वक और बड़ी खोज के साथ लिखा गया है। हम पूरी आशा है कि सगीत के प्रेमियो और उसका विशिष्ट अध्ययन करनेवालो के लिए यह पुस्तक परम लाभदायक प्रमाणित होगी।

भगवतीशरण सिंह सचिव, हिन्दी समिति

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भूमिका

जर्मनी के महाकवि गेटे ने कहा है कि एक महान् चिन्तक जो सबसे बड़ा सम्मान आगामी पीढ़ियो को अपने प्रति अर्पण करने के लिए बाध्य करता है, वह है उसके विचारो को समझने का सतत प्रयत्न। महर्षि भरत ऐसे ही महान् चिन्तक थे, जिन्हें समझने की चेष्टा मनीषियो ने शतान्दियो से की है, परन्तु जिनके विषय में कदाचित् कोई भी यह न कहेगा कि अब कुछ कहने को शेप नही है। उनके रस-सिद्धान्त पर बडे- बड़े कवियों और समालोचको ने बहुत कुछ लिखा है और अभी न जाने कितने ग्रन्थ लिखे जायँगे। उन्होने सङ्गीत पर कोई स्वतन्त्र ग्रन्थ नही लिखा, उनका ग्रन्थ है नाटय- शास्त्र। अपने यहॉ सङ्गीत नाटय का प्रधान अङ्ग माना गया है। भरत ने नाटय मे सङ्गीत का महत्त्व इन शब्दो मे स्वीकार किया है- "गीते प्रयत्नः प्रथम तु कार्य: शय्यां हि नाटयस्य वदन्ति गीतम् । गीते च वाद्ये च हि सुप्रयुक्ते नाटय-प्रयोगो न विपत्तिमेति।।" अर्थात् नाटय-प्रयोक्ता को पहले गीत का ही अभ्यास करना चाहिए, क्योकि गीत नाटय की शय्या है। यदि गीत और वाद्य का अच्छे प्रकार से प्रयोग हो, तो फिर नाटय- प्रयोग मे कोई कठिनाई नहीं उपस्थित होती। अत' भरत ने अपने नाट्यशास्त्र में सङ्गीत पर भी कुछ अध्याय लिखे है, किन्तु इन थोडे से ही अध्यायों मे उन्होने सङ्गीत के सब मूलभूत सिद्धान्ती का प्रतिपादन कर दिया है और उनके साथ ही अपने समय के 'जातिगान' का भी वर्णन किया है। काल- गति से भरतकालीन सङ्गीत में कुछ अन्तर आ गया और उन्होंने इस सम्बन्ध मे जो कुछ लिखा है, वह दुर्वोध होने लगा। मतङ्ग के समय मे भी-जिनका काल प्रो० रामकृष्ण कवि के अनुसार नवी शती ई० है-भरत के सिद्धान्तों का समकना कठिन हो गया था। फिर भी भरत-सम्प्रदाय के समझनेवाले शारङ्गदेव के काल (१३वी गती ई०) तक वर्तमान थे। उसके अनन्तर भरत-सम्प्रदाय का लोप-सा ही हो गया। भरत ने सङ्गीत

१. भरत ना. शा. सा., नि. सा. सं, मध्याय ३५श्लोक ४४१, बृ. ६०३

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पर जो कुछ लिखा है, वह बहुत ही संक्षिप्त रूप में है। साथ ही उनके समय के सङ्जगीत की सज्ञाएँ भी धीरे-धीरे बदलती गयी, इसलिए उनके सिद्धान्त को समझना कठिन हो गया। अतीत मे उनके विचारो को स्पष्ट करने के लिए मतङ्ग, नान्यदेव, अभिनव- गुप्त, कुम्भ, शार्ङ्गदेव इत्यादि विद्वानों ने अपने-अपने ग्रन्थो मे पर्याप्त रूप से लिखा। इधर वीसवी शती मे भरत पर फिर चर्चा प्रारम्भ हुई। श्री क्लेमेण्ट्स्, श्रो देवल, प्रो० पराञ्जपे, पं० विष्णुनारायण भातखण्डे, श्री कृष्णराव गणेश मुले और पं० ओकारनाथ ठाकुर इत्यादि विद्वानो ने भरत के सिद्धान्तो का प्रतिपादन किया है। श्री कृष्णराव गणेश मुले ने अपने मराठी ग्रन्थ 'भारतीय सङ्गीत' मे भरत-सिद्धान्त का विस्तृत रूप से वर्णन किया है। मैने कुछ मराठी मित्रो की सहायता से यह ग्रन्थ पढ़ा। इससे मुझे भरत-सिद्धान्त को समझने मे वड़ी सहायता मिली। मै यह सोचता था कि यदि इसका अनुवाद हिन्दी मे हो जाता तो बहुत अच्छा होता। हिन्दी मे इस प्रकार के ग्रन्थ का अभाव मुझे खटकता रहा। यह बड़े हर्ष का विषय है कि पं० कैलासचन्द्र देव वृहस्पति ने इस अभाव की पूर्ति कर दी है। आपका 'भरत का सगीत-सिद्धान्त' किसी ग्रन्थ का अनु- वाद नही है। आपने भरत के मूल नाटयशास्त्र, मतङ्ग की वृहद्देशी, शाङ्गंदेव के सङ्गीत- रत्नाकर इत्यादि ग्रन्थो का बीस वर्ष से अध्ययन और मंथन किया है। आप संस्कृत के प्रकाण्ड पण्डित है और साथ ही आपको सङ्गीत का क्रियात्मक ज्ञान भी है। अतः आप भरत पर लिखने के लिए बहुत ही उपयुक्त अधिकारी है। आपने छ अध्यायो मे भरत के मुख्य सिद्धान्तो का बहुत ही सुन्दर विश्लेषण किया है और कुछ ज्ञातव्य विषयो पर चार अनुबन्ध भी जोड दिये है। आपने मूल ग्रन्थो का परिशीलन तो किया ही है, प्रो० रामकृष्ण कवि के 'भरत-कोश' का भी पूरा उपयोग किया है। ग्रन्थ भर मे आपने किसी अन्य ग्रन्थकार का कही व्यक्तिगत खण्डन नही किया है। आपका ग्रन्थ केवल मण्डनात्मक है, इसे पढ़कर विज्ञ पाठक स्वयं नीर-क्षीर-विभेद कर सकेगे। - भूमिका-लेखक के लिए एक बडी कठिनाई यह होती है कि यदि वह ग्रन्थ के विपयों पर अपनी भूमिका मे ही बहुत कुछ कह देता है तो वह ग्रन्थकार के साथ अन्याय करता है, क्योकि प्रतिपाद्य विषयो पर ग्रन्थकार का विचार पाठक को ग्रन्थ से ही मिलना चाहिए। यदि वह प्रतिपाद्य विपयो पर कुछ नही कहता, तो भी वह ग्रन्थकार के साथ अन्याय करता है, क्योकि फिर वह ग्रन्थ के प्रति पाठको का ध्यान ही नही आकृष्ट कर सकता। मैने इस उभयापत्ति के मध्य का मार्ग ग्रहण किया है। अतः इस भूमिका मे कुछ संकेत मात्र कर रहा हूँ जिससे पाठक यह जान जायँ कि प्रतिपाद्य विषय क्या है, परन्तु उनको विस्तृत रूप से जानने की उत्सुकता बनी रहे।

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पहले अध्याय मे लेखक ने ग्राम, श्रुति और स्वर पर विचार किया है। स्वरो के समूह को ग्राम कहते है। स्वरो से ग्राम और श्रुतियो से स्वर बने है। परस्पर-सम्बद्ध होने के कारण इन सबका एक साथ विचार इस अध्याय मे किया गया है। महाराज कुम्भ ने ग्राम की बहुत सुन्दर परिभापा की है :- "व्यवस्थितश्रुतियुता यत्र संवादिन स्वराः। मूरच्छनाद्याश्रयो नाम स ग्राम इति सज्ञितः ॥।"१ अर्थत् ग्राम 'संवादी स्वरों' का वह समूह है जिसमे श्रुतियाँ व्यवस्थित रूप में विद्यमान हो और जो मूर्च्छना इत्यादि का आश्रय हो। भरत ने केवल षड्ज और मध्यम ग्राम का वर्णन किया है। उन्होने गान्धार ग्राम की चर्चा नहीं की है। लेखक ने यह स्पष्ट रूप से वतलाया है कि भरत ने श्रुतियो की व्यवस्था संवादित्व के आधार पर की है। पहले क्रियात्मक रूप से देख लिया कि कौन-कौन स्वर परस्पर संवादी है, फिर उन्होने यह जानने की चेष्टा की कि सवादी स्वर कितनी श्रुतियो के अन्तर पर स्थित है, फिर क्रमश उन्होने प्रत्येक स्वर की श्रुतिसंख्या प्राप्त की। लेखक ने पहले यह दिखलाया है कि किस प्रकार नवतन्त्री विपञ्ची वीणा पर षड्ज, ऋषभ, भरतोक्त शुद्ध गान्धार, अन्तरगान्धार, मध्यम, पञ्चम, धैवत, निषाद और काकलीनिपाद प्राप्त होते है। इस अध्याय का 'श्रुति-दर्शन-विधान' बहुत ही पाण्डित्य-पूर्ण है। इसमे लेखक ने पहले भरत की चतु सारणाएँ विस्तारपूर्वक समझायी है और यह दिखलाया है कि उनसे किस प्रकार श्रुतियों की संख्याएँ प्राप्त होती हैं। इसके अनन्तर लेखक ने यह दिखलाया है कि उनके द्वारा निर्मित 'श्रुतिदर्पण' बाद्य पर किस प्रकार समस्त सारणाएँ सम्पन्न हो जाती है और श्रुतियो की सख्याएँ सरलतापूर्वक प्राप्त हो सकती है। यदि यह 'श्रुति-दर्पण' बनवाकर सगीत-विद्यालयो को दे दिया जाय, तो श्रुतियो के समझने मे छात्रो का बहुत उपकार होगा। भरत का श्रुति-सम्बन्धी मत नाट्यशास्त्र के एक पृप्ठ में दिया हुआ है, किन्तु वह इतना संक्षिप्त है कि विद्वानो के लिए विवाद का विपय बन गया है। लेखक का स्पष्टीकरण प्रो० मुले के स्पष्टीकरण से बहुत मिलता है। यदि किसी प्रयोगशाला मे विज्ञान और गणित के आधार पर इन श्रुतियों का विश्लेषण किया जाय, तो मै समझता हूँ कि यह विवाद सदा के लिए समाप्त हो जायगा। इसके अनन्तर लेखक ने श्रुतियों के परिमाण पर विचार किया है और यह सिद्ध

१. भरतकोश पृ० १८९

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किया है कि श्रुतियो का परस्पर अन्तर वरावर नही है। प्रो० मुले ने भी अपने ग्रन्थ में 'श्रुतीचें गणितमूल्य' शीर्षक के अन्तर्गत प्रो० वी० जी० परांजपे के एक लेख के आधार पर गणित द्वारा यह सिद्ध किया है कि श्रुतियों के अन्तर सम नही, विपम है। दूसरे अध्याय मे लेखक ने मूर्च्छना पर विचार किया है। भरत का मूर्च्छना से क्या तात्पर्य है इसका स्पष्टीकरण लेखक ने शास्त्र के प्रचुर प्रमाणो से किया है। मूर्च्छन का अर्थ उभरना या चमकना है। भरत के मत में सप्त स्वरों का क्रमपूर्वक प्रयोग ही मूर्च्छना है- "क्मयुक्ताः स्वराः सप्त मूर्च्छनास्त्वभिसज्ञिताः।" लेखक ने यह सिद्ध किया है कि सप्तस्वरता मू्च्छना का मुख्य लक्षण है। अतः भरत-मत से सम्पूर्ण अवस्था को ही मूर्च्छना कह सकते है। 'औडुवित' और 'षाडवित' अवस्थाएँ मूर्च्छना नही, तान है। इसके अनन्तर लेखक ने पड्ज और मध्यम ग्राम की मूर्च्छनाओं के नाम और स्वर दिये है और दोनों ग्रामों की मूर्च्छनाओ का मण्डल-प्रस्तार द्वारा स्पष्टीकरण किया है। इसके बाद मूर्च्छनाओं पर आश्रित तानो के नाम और 'सरगम' दिये गये है। मूर्च्छनाओं के प्रयोजन को लेखक ने बहुत सुन्दर रीति से समझाया है। इसका इतना विशद और पाण्डित्यपूर्ण वर्णन अन्यत्र नही मिलता। आपने यह दिखलाया है कि भरतोक्त जाति के वादन के लिए मन्द्र स्थान और तार स्थान मे जाने के लिए परावधि निश्चित थी। ये दोनो पराकाष्ठाएँ मत्तकोकिला वीणा पर उस समय सरलतापूर्वक संभव होती थी जब कि तीनो सप्तको में एक विशिष्ट मूर्च्छना उस पर मिली हो। मूच्छनाओ का आश्रय लेने से मन्द्र और तार की अवधियो की प्राप्ति हो जाती थी। भरत के अनन्तर मन्द्रावधि और तारावधि के नियम मे शिथिलता आ गयी और वादक को यह स्वतन्त्रता मिल गयी कि वह इन दोनों स्थानो मे इच्छापूर्वक घूम सके। अत. अब अशवाहुल्य को देखकर विद्वान् मूर्च्छना का निश्चय करने लगे। इस सम्वन्ध मे लेखक ने मतङ्ग के द्वादश-स्वर-मूर्च्छना-वाद का आलो- चनात्मक विवेचन किया है और अन्त मे वादन में मूर्च्छना द्वारा किस प्रकार सौकर्य होता था इसे विस्तारपूर्वक समझाया है। तृतीय अध्याय में जाति-लक्षण पर विचार किया गय। है। जाति-गान वस्तुत. गान्धर्व-गान था जो बहुत ही प्राचीन समय से चला आ रहा था। भरत ने जाति-गान का आविप्कार नही किया, उसके लक्षण बतलाये है। जाति-गान बहुत ही पावन समझा जाता था और उसके नियमों मे कोई हेर-फेर नही किया जा सकता था। जातियाँ

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वेदमन्त्रो के समान पवित्र समझी जाती थी। यह बात रघुनाथ की सङ्गीत-सुधा के निम्नलिखित उद्धरण से स्पष्ट हो जाती है- "यर्थव सामानि ऋचो यजूषि नैवान्यथा कैश्चिदिह क्रियन्ते। सामप्रभूता अति जातयोऽमूरिहान्यथाष्टादश नैव कार्याः ॥"१ मतङ्ग के समय तक जाति-प्रयोग का इस प्रकार लोप हो गया कि उनके लिए उसकी निश्चित रूप से परिभाषा देना भी कठिन हो गया। आजकल विद्वानो में जातिस्वरूप के सम्बन्ध में पर्याप्त मतभेद है। मेरी समझ से इसकी अभिनवगुप्त-कृत परिभाषा सर्वोत्तम और ग्राह्य है। उन्होने कहा है- "तन्र केय जातिर्नाम। उच्यते-स्वरा एव विशिष्टा सन्निवेशभाजो रक्तिम- दृष्टाभ्युदय च जनयन्तो जातिरित्युक्ता.। कोऽसौ सन्निवेश इति चेज्जातिलक्षणेन दशकेन भर्वात सन्निवेशः२।" अर्थात् रज्जन और अदृष्ट अभ्युदय को निष्पन्न करनेवाले विशिष्ट स्वर विशेष प्रकार के सन्निवेश मे जाति कहलाते है। इस परिभाषा मे दो बाते ऐसी है जो बिलकुल स्पष्ट हैं- (१) स्वरो का विशेष सन्निवेश या विन्यास। (२) इस सन्निवेश मे रञ्जकता का होना। स्वरो के विशेष सन्निवेश से क्या तात्पर्य है, इसको अभिनवगुप्त ने स्वय स्पष्ट कर दिया है। उन्होने कहा है-"जातिलक्षणेन दशकेन भवति सन्निवेशः" अर्थात् सन्निवेश से तात्पर्य है जाति के दस लक्षण। वे दस लक्षण निम्नलिखित है- "ग्रहाँशी तारमन्द्री च न्यासापन्यास एव च। अल्पत्व च बहुत्वं च षाडवौडुविते तथा ॥" जिसमे ग्रह, अंश, तार, मन्द्र, न्यास, अपन्यास, अल्पत्व, बहुत्व, पाडवत्व और औडूबत्व के नियमो द्वारा स्वर-सन्निवेश किया गया हो वह 'जाति' है। जाति-गान सङ्गीत की एक बहुत विकसित अवस्था मे प्रादुरभूत हुआ था। तभी वह इतने लक्षणो द्वारा व्यक्त होता था। विद्वान् लेखक ने इन दस लक्षणो को इस ग्रन्थ में भली-भाँति समझाया है। इनमे सवसे महत्त्वपूर्ण लक्षण अंशस्वर है। अश-स्वर के ही महत्त्व को समझने से 'जाति' का रहस्य समझ मे आ सकता है। लेखक ने इन सब लक्षणों को समझाते

१ भ० को. पृ. २२८ २. भ० को० २२७ ३. ना० शा० मध्याय २८, श्लोक ७४

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हुए जाति-गान और वादन पर सुन्दर प्रकाश डाला है। उन्होने १८ जातियों का विस्तृत वर्णन किया है। इनमे से सात जातियो के नाम सात स्वरों पर है। जातियाँ दो प्रकार की हैं-शुद्ध और विकृत। शुद्ध जातियाँ वे है जिनमे कोई स्वर कम नही होता और नामस्वर ही जिनमे अश, ग्रह और न्यास होता है। न्यासस्वर के अतिरिक्त एक, दो या अनेक लक्षणो मे विकार होने से ये जातियाँ विकृत कहलाने लगती है। - अशस्वर के संवादी स्वर का कभी लोप नही होता-इस आधार पर ग्रन्थकर्त्ता ने बहुत सुन्दर रूप से जातियो के प्रकार को समझाया है और विभिन्न आचार्यो के जाति- लक्षण दिखलाकर उन्होने यह दर्शाया है कि उनमे भरत-परम्परा अक्षुण्ण रही है। अन्त मे उन्होने जातियो के ध्यान भी दिये है। चतुर्थ अध्याय मे लेखक ने सङ्गीत-रत्नाकर मे दिये हुए जाति-प्रस्तारो को विशद रूप से समझाकर लिखा है और उनके अनुसार स्वर-लिपि से जातियो का प्रत्यक्षीकरण किया है। लेखक का यह प्रयत्न स्तुत्य है। इसके द्वारा विद्यार्थी समझ सकता है कि जातियाँ किस प्रकार गायी जाती थी और इन्हे वह गा भी सकता है। पञ्चम अध्याय मे स्वर-साधारण और जाति-साधारण का विस्तृत रूप से स्पष्टी- करण किया गया है। शार्ङ्गदेव ने स्वर-साधारण के विषय में बहुत ही ठीक कहा है- "साधारण्यमतस्तस्य यत्तत्साधारण विदुः ।" (अडयार सस्करण, अ० १, पृ० १४७) अर्थात् जो स्वर न तो पूर्व स्थिति को पूर्णतया छोड चुका हो और न पर-स्थिति को पूर्णतया ग्रहण किये हो, जो दोनो का आधार लिये हो, वह है साधारण 'स्वर'। "सह आधारणेन वर्तते इति साधारणः।" (अमरकोश, भानुजी दीक्षित की व्याख्या) लेखक ने एक मण्डल-प्रस्तार मे साधारण स्वरो का श्रृति-स्थान भली-भॉति समझाया है। छठे अध्याय मे लेखक ने राग का विशद वर्णन किया है। इन्होंने पहले राग की परिभापा समझायी है और फिर यह बतलाया है कि भरतोक्त ग्रामराग जाति से उत्पन्न हुए हैं। कल्लिनाथ ने मतङ्ग का उद्धरण देते हुए स्पष्ट कहा है- "तथा चाह भरतमुनि-जातिसभूतत्वाद् ग्रामरागाणाम्।" (सं० र०, अडयार संस्करण, अध्याय, २, पृ० ८) जिस रूढ अर्थ मे आजकल हम 'राग' शब्द का प्रयोग करते है, उसका वस्तुतः 'जाति' पूर्वरूप है। लेखक ने ग्रामरागो का उदाहरण-सहित वर्णन किया है।

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लेखक ने कहा है-"जातियों के दस लक्षणों में प्रमुखतया लक्षण 'अंश' का वर्णन करते हुए उसके लक्षण मे महर्षि ने कहा है कि 'राग का जिसमें निवास होता है और राग जिससे प्रवृत्त होता है ...... वह अशस्वर है।' इससे यह सिद्ध है कि महर्पि जातियो को भी राग ही मानते है।" मेरी समझ में महर्षि ने जहॉ यह कहा है कि "रागश्च यस्मिन् वसति, यस्माच्चैव प्रवर्तते" वहॉ महर्षि ने राग को रूढ अर्थ मे नही लिया है, किन्तु यौगिक अर्थ में लिया है। अर्थात् उनका तात्पर्य यह है कि 'अंशस्वर' वह है जिसमें जाति की रञ्जकता निवास करती है और जिससे रञ्जकता प्रवृत्त होती है। अत इससे यह सिद्ध करना कठिन होगा कि वह जातियो को भी रूढ अर्थ मे राग ही मानते है। यह कहना अधिक समीचीन होगा कि रूढार्थ मे प्रयुक्त 'राग' की 'जाति' पूर्वरूप या आधार थी। इन छः अध्यायो मे भरत-सिद्धान्त का पूर्णरूप से प्रतिपादन हुआ है। इनके अनन्तर जो चार अनुबन्ध दिये गये है, वे भी पठनीय और मननीय है। पहले अनुवन्ध मे भरत-सिद्धान्त मे आये हुए पारिभाषिक शब्दो की व्याख्या है। दूसरे में रस-सिद्धान्त को सक्षेप मे समझाया गया है और भिन्न-भिन्न रसो का विशिष्ट स्वर-सन्निवेशो से सम्बन्ध बतलाया गया है। तीसरे में श्रुतियो की अनन्तता और देशी रागो मे प्रयोज्य ध्वनियॉ वतलायी गयी है और मूर्च्छना तथा आधुनिक ठाठो की स्वर-विश्लेषण द्वारा तुलना की गयी है। चौथे में भारतीय सङ्गीत के १५वी शती ई० तक के शास्त्रकारों का सक्षिप्त परिचय दिया गया है। समग्र ग्रन्थ बहुत खोज के साथ लिखा गया है। भरत-सिद्धान्त को समझने के लिए यह अत्युत्तम कृति है। लेखक ने इसकी रचना करके सङ्गीत के विद्यार्थियो का बहुत उपकार किया है। वे हमारे साधुवाद के पात्र है। आशा है, संगीतानुरागियों द्वारा इसका यथोचित आदर होगा। जयदेव सिंह

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उद्धरण-संकेत

१. अ०, अध्या० अध्याय २. अ० भा० ... अभिनवभारती ३. अभिनव० ... ४. अ० सं० .. अडयार-सस्करण

५. आ० ... आचार्य्य ६. क० टी० सगीतरत्नाकर की कल्लिनाथ-कृत टीका

७. कल्लि० ... 11 ८ का० प्र० ... काव्यप्रकाश ९ का० प्र० टी० .. काव्यप्रकाश की वामनकृत टीका १० कारि० कारिका ११. का० स० . काशी-सस्करण १२. गा० स० गायकवाड सीरीज-सस्करण १३ ताला० .. तालाव्याय १४. तैत्ति० प्राति० तैत्तिरीय प्रातिशाख्य १५ द्वि० .. द्वितीय

१६. ध्व० . ध्वन्यालोक

१७. नान्य० नान्यदेव

१८. ना० शा० .. भरतनाट्यशास्त्र १९. पण्डित० .. पण्डितमण्डली २०. परि० ... परिच्छेद २१. प्रकी०, प्रकीर्णका० ... प्रकीर्णकाष्याय

२२. प्रव० ... प्रबन्धाध्याय २३. ब० सं० ... वम्बई-संस्करण

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२४. भ० को० . . भरत-कोश २५ भ० ना० शा०, भरत० भरत-नाट्य-शास्त्र २६. म०यु० सं० . मद्रास-युनिवर्सिटी-संस्करण २७. मोक्ष० ... मोक्षदेव २८. रत्नाकर .. सज्जगीत-रत्नाकर २९. राग०, रागा० . . रागविवेकाध्याय ३०. वाद्या० . . वाद्याध्याय ३१. वृ० . वृत्ति ३२. शारङ्गं0 .. शाङ्गदेव ३३. श्लो० .. श्लोक ३४. सं० ... संस्करण ३५. सं० र० .. सङ्गीत-रत्नाकर ३६. सं० र० टी० सङ्गीत-रत्नाकर-टीका ३७. सा० द० .. साहित्य-दर्पण ३८. सिह० ... सिंहभूपाल ३९. स्व०, स्वरा० ... स्वराव्याय

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विस्तृत विषय-सूची भूमिका प्राक्कथन अनुसन्धान की प्रेरणा-अनुसन्धान-सम्बन्धी समस्याएँ और निप्कर्प -- प्राचीन सङ्गीतशास्त्र की दुर्बोधता और उसके कारण-प्रचलित सङ्जीत-पद्धतियो मे रस-भाव के प्रति उदासीनता -- अनुसन्धान के आधार-प्राचीन सम्प्रदाय-भरत-सम्प्रदाय की नाट्य-शास्त्रगत विशे- षताएं-उपलब्ध नाट्यशास्त्र-भरत एवं आदि भरत-आदि नाट्य- शास्त्र-भरत-सिद्धान्तो पर विदेशी प्रभाव !- महर्षि भरत के स्वर और आधुनिक भौतिक विज्ञान-ग्रन्थ की शैली-कृतज्ञता-ज्ञापन। -२१-४८- प्रथम अध्याय आप्त वाक्यो को हृदयङ्गम करने के लिए विशेष दृष्टि-विद्या का अधिकारी-ग्राम, स्वर, श्रुति-मण्डल-प्रस्तारो मे पड्जग्राम एवं मध्यमग्राम-नवतन्त्री पर षाड्जग्रामिक स्वरो की सिद्धि, नवतन्त्री पर भरतोक्त स्वर-व्यवस्था-मध्यमग्राम-सितार पर षाड्जग्रामिक सप्तक की सिद्धि-श्रुतिनिदर्शन या श्रुतिदर्शन-विधान-भरतोवत चतुः सार- णाएँ-लेखकनिर्मित यन्त्र 'श्रुतिदर्पण' पर चतु सारणाओ की सरलतम विधि-श्रुतियो के परिमाण-सप्तक मे श्रुतियो का क्रम एव उसकी महत्त्वपूर्ण विशेपताएँ-श्रुतियो के विभिन्न परिमाणो के भेद मे अन्तर जानने की भारतीय विधि। ー 8 ー ミ ャ ー द्वितीय अध्याय मूर्च्छना की व्युत्पत्ति एवं लक्षण-मूर्च्छना की चतुर्विधता के सम्बन्ध मे दो दृष्टिकोण-ग्रामद्वय की मूर्च्छनाओ का रूप-ग्रामद्वय-मूर्च्छना- वोवक श्रुतिपरिमाणयुवत मण्डल-प्रस्तार-ग्रामद्वय-बोधक सारणी- तान-दोनो ग्रामो में अविलोपी स्वर-मूर्च्छनाओ का प्रयोजन, पूर्वा-

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वधि एवं परावधि की प्राप्ति-मत्तकोकिला एवं एकतन्त्री पर मूर्च्छना -जातिविशेष के लिए मूर्च्छना-विशेष का पश्चात्कालीन नियम और उसका प्रयोजन-द्वादशस्वर-मूर्च्छनावाद और उसकी पश्चात्कालीन आलोचना-वादन मे मू्च्छनाजन्य सौकर्य-मतङ्ग-किन्नरी-जाति- विशेष के लिए मूर्च्छनाविशेष का मतङ्गकृत निर्देश-तन्त्रीवाद्यो पर मूर्च्छनाओं की स्थापना का प्रकार-मतङ्ग-किन्नरी पर कुम्भ-मूर्च्छना- सिद्धि पर शार्गदेव और कल्लिनाथ के कथन का रहस्य-मूर्च्छनाओ की सिद्धि एवं उनकी सज्ञाओ की अन्वर्थता। ३४-७३

तृतीय अध्याय जाति-लक्षण-जातियो के भेद-जाति के दस लक्षण, अंशस्वर, ग्रहस्वर, तारगति, मन्द्रगति, न्यास स्वर, अपन्यास स्वर, अल्पत्व, बहुत्व, पाडवित, औड्वित-अन्तरमार्ग, संन्यास, विन्यास-स्थायी स्वर- जातियो के लक्षण, विभिन्न आचार्यो के मत, जातिविशेष से सम्बद्ध मूर्च्छना- विशेप में विभिन्न अश-स्वरो का प्रदर्शन। ७४-१३४ चतुर्थ अध्याय आरम्भ, आलाप, करण, पद-पाड्जी-प्रस्तार-आर्षभी-प्रस्तार-

-नैपादी प्रस्तार-षड्जकैशिकी-प्रस्तार-पड्जोदीच्यवा-प्रस्तार-

१३५-१९०

पञ्चम अध्याय साधारण और उसका लक्षण-स्वरसाधारण-कैशिक स्वर और उनके उपयोग के अवसरो पर कुम्भ का दृष्टिकोण-जातिसाधारण। १९१-१९८

षष्ठ अध्याय राग और उसका लक्षण-सात ग्राम राग-मध्यमग्राम राग, कश्यप एवं शार्ङ्गदेव का विधान, आलाप, पद, आक्षिप्तिका-षड्जग्राम राग, कश्यप एवं शाङ्गदेव का विधान, आलाप, करण, पद, आक्षिप्तिका-

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साधारित अथवा शुद्ध साधारित, शाङ्गदेव एवं मोक्षदेव के विधान, आलाप, करण, पद, आक्षिप्तिका-पञ्चम अथवा शुद्ध पञ्चम राग, कश्यप एवं शार्गदेव के विधान, आलाप, करण, पद, आक्षिप्तिका-कैशिक अथवा शुद्ध कैशिक, शार्ङ्गदेव एवं मोक्षदेव के विधान, आलाप, वर्तनी, पद, आक्षिप्तिका-पाडव अथवा शुद्ध पाडव, शार्गदेव, मतङ्ग एव मोक्षदेव के विधान, आलाप, करण, वर्तनिका, पद, आक्षिप्तिका-कैशिकमध्यम अथवा शुद्ध कैशिक मध्यम, शार्ङ्गदेव एवं मोक्षदेव के विधान, आलाप, करण, पद, आक्षिप्तिका-ग्रामरागो के प्रकार-उपराग, राग, भापाजनक ग्रामराग-भाषाएँ, विभापाएँ, अन्तर भाषाएँ। १९९-२३३

अनुबन्ध (१) ताल-लघु, गुरु, प्लुत-क्रिया और उसके भेद-ताल के दो मुख्य भेद-यथाक्षर चञ्चत्पुट की ताल-क्रिया, द्विकल चञ्चत्पुट की ताल- क्रिया, चतुष्कल चञन्चत्पुट की तालक्रिया-यथाक्षर, द्विकल एवं चतुष्कल चाचपुट की तालक्रिया-यथाक्षर, द्विकल एवं चतुष्कल चञ्चत्पुट की बालक्रिया-तालों मे अङ्गुलिनियम-मार्ग-परिवर्तन या आवृत्ति- मान-लय-यति ;-- समा, स्रोतोगता, गोपुच्छा-ग्रह-सम, अतीत एवं अनागत-प्रकरण-गीतक और ब्रह्मगीत-पदाश्रित गीतियाँ, मागधी, अर्द्धमागधी, सम्भाविता, पृथुला-स्वराश्रित गीतियॉ, शुद्धा, भिन्ना, गौडी, वेसरा, साधारणी-पद, चूर्णपद या अनिबद्ध पद, निवद्ध पद-गीत, वहिर्गीत या निर्गीत-स्तोभाक्षर या शुप्काक्षर-ध्रुवागीत, प्रावेशिकी, नैष्क्रामिकी, आक्षेपिकी, प्रासादिकी, अन्तरा-ध्रुवापद-पूर्वरज्ज- सन्धियाँ-आलाप-रूपक-आक्षिप्तिका-वर्तनी-करण। २३४-२५५

अनुबन्ध (२) पाठ-पाठप्रयोज्य अनुरणनहीन ध्वनि-नाट्य मे रस-प्रक्रिया- स्थायी भाव, विभाव, अनुभाव, सञ्चारी या व्यभिचारी भाव-रसो की संख्या-रसाभिव्यदित-मीमासक भट्टलोल्लट का दृष्टिकोण-नैया- यिक आचार्य शकुक का दृष्टिकोण-सांख्यवादी भट्टनायक का दृष्टि- कोण-आलकारिक आचार्य अभिनवगुप्त का दृष्टिकोण-गीत और रस-आनन्दवर्धन की मान्यता-श्रीकण्ठ का कथन-नाद की अभि-

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व्यजनाशक्ति पर आचार्य अभिनवगुप्त का मत-रस का स्वरूप- गीत की प्रक्रिया के प्रयोजन पर आचार्य अभिनवगुप्त का दृप्टिकोण - स्वरसन्निवेश से रस-परिपाक की प्रक्रिया पर लेखक का दृष्टिकोण- पाड्जी की विभिन्नांश अवस्थाओ में विभिन्न रसों का परिपाक। २५६-२७५ अनुबन्ध (३) श्रुतियो की अनन्तता-श्रुतियो की मृदु, मध्यम एवं आयत अवस्थाएँ -- देशी प्रयोग-वृद्ध काश्यप के स्वर-याष्टिक, आञ्जनेय, अभिनवगुप्त के रससम्बन्धी दृष्टिकोण-ग्रामसश्लेप-संश्लिष्ट स्वर-समुच्चय मे उत्तर भारतीय (प्रचलित) भैरव एवं टोड़ी ठाठ-शार्ङ्गदेव द्वारा निर्दिष्ट कुछ रागो का द्विग्रामत्व-बारहवी शती ई० के अन्त मे उत्तर भारत मे मूर्च्छना-पद्धति का प्रचलन-चौदहवी शती ई० मे ईरानी मुकाम- पद्धति का मेल-पद्धति के रूप मे ग्रहण-पन्द्रहवी शती ई० के मूर्च्छनामर्मज्ञ कल्लिनाथ के समय की स्थिति-आधुनिक ठाठों में प्रयुक्त ध्वनियो की भावानुसारिणी सज्ञाएँ। २७६-२८९ अनुबन्ध (४) ब्रह्मा-शिव, शकर-पार्वती, शिवा-नन्दिकेश्वर-नारद- स्वाति-तुम्बुरु-भरत-दत्तिल-कोहल-स्कन्द-शुक-विश्वा- वसु-अगस्त्य - विशाखिल - कम्बल, अश्वतर - कश्यप- याष्टिक-आञ्जनेय-शार्दूल-राहल (राहुल)-मतङ्ग-कीति- धर-सुधाकलश-लोल्लट-घण्टक-रुद्रट-देवराज-सागरनन्दी -- अभिनवगुप्त-भोज-नान्यदेव-त्रिभुवनमल्ल-सोमेश्वर-जग- देक मल्ल-शारदातनय-हरिपाल-सोमराजदेव-शार्ङ्गदेव-ज्याय- सेनापति-पाल्कुरिकि सोमनाथ-हम्मीर-अल्लराज-पार्श्वदेव- गोपाल नायक-अमीर खुसरो-शृगारशेखर-शम्भुराज-मदनपाल --- विद्यारण्य-भुवनानन्द-देवेन्द्र भट्ट-भट्ट माधव-विप्रदास-वेम -सिंगणार्य-सिगभूपाल (सिंहभूपाल)-पण्डित-मण्डली-कुम्भ- देवण भट्ट-कल्लिनाथ। २९०-३१४ उपजीव्य सामग्री ३१५-३१६ अनुकमणिका ३१७

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प्रानकथन

प्रस्तुत ग्रन्थ नाटयशास्त्र के उपलब्ध सस्करणो के अनुसार महर्षि भरत की आतोद्य-विधि के अन्तर्गत स्वरविधि को स्पष्ट करने की चेष्टा है। नाटयशास्त्र मे कहा गया है कि भावी युग मे मनुष्य प्रायः अबुध होगे, जो होगे भी वे अल्पश्रुत-बुद्धि होगे।* अल्पश्रुत-बुद्धि होते हुए भी आप्त वाक्यो के प्रति अविचल निष्ठा, उनके मनन के लिए सतत वैर्य, भगवान् शकर की कृपा एवं सद्गुरुओ के वरद हस्त की छत्रच्छाया के प्रताप से नाटयशास्त्र की स्वरविधि का मन्थन करके यह नवनीत सहृदयों की सेवा मे प्रस्तुत किया जा रहा है।

१. अनुसन्धान की प्रेरणा लेखक के वंश की चार पीढ़ियॉ रामपुर (भूतपूर्व राज्य) मे बीती है, उसके विद्वान् पूर्वजो ने वहॉ की राजसभा को सम्मानपूर्वक सुशोभित किया, फलत. उसमे शास्त्रानु- शीलन के सस्कार आनुवशिक रहे है। देशी राज्यो के राजपडित गुणी एवं गुणग्राही होते थे और उन्हे बहुश्रुत होना पड़ता था, फलतः सङ्गीतसम्बन्धी सस्कारो के लिए लेखक को इधर-उधर नही भटकना पडा। ऐसे सद्गुरुओ के चरणो मे बैठकर स्वरसाधना करने का अवसर इस अकिञ्चन को प्राप्त हुआ है, जिनके प्रति उन चुने हुए सङ्गीतनो की अपार श्रद्धा आज तक है, जिन्हे गायक या वादक होने के कारण स्वतन्त्र भारत के शासन ने वडे से वड़ा सम्मान दिया है। रामपुर-दरबार मे गायक स्वर्गीय मिरजा नवाबहुसेन सैयद थे। सङ्गीतजीवी जाति मे उत्पन्न होने के कारण उनका दृष्टिकोण अत्यन्त उदार था। जीवन के अन्तिम क्षणो मे उन्होने अपने प्रिय शिष्य, इस ग्रन्थ के लेखक से कहा था-"सङ्गीत का अभ्यास करो, शास्त्रो को समझो, उन पर श्रद्धा करो और उन ऋपि-मुनियो के अभिप्राय को

भविष्यति युगे प्रायो भत्रिष्यन्त्यदुधा नराः । ये चापि हि भविष्यन्ति तेऽप्यल्पश्रुतबुद्यः॥ नाय्यशाञ्त

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समझो, जो निःस्पृह, नि.स्वार्थ और सत्यभापी रहे है। हम शास्त्र नहीं जानते, परन्तु हमारा दृढ़ विश्वास है कि ऋषियों के ग्रन्थों को समझने के लिए जितनी तपस्या की आवश्यकता है, वह बहुत दिनों से नही की गयी है। इसी रामपुर-दरवार मे 'पण्डित' कहलानेवाले ऐसे लोग भी कभी-कभी आये हैं, जिन्होंने भरत और शार्ङ्जदेव-जैसी महाविभूतियो को श्रद्धा की दृष्टि से देखने की आवश्यकता नही समझी, उनके ग्रन्थो को अस्पष्ट कहा है, उनको उपहासपूर्ण दृष्टि से देखा है। इतना ही नही, उनके प्रति उन्होने ऐसे शब्दो का प्रयोग किया है, जिन्हे सुनकर हमें कष्ट होता रहा है। तुम्हारे पूर्वज विद्वान् एव सङ्गीतमर्मज्ञ रहे है, तुम उनके वंशधर हो, यदि तुम प्राचीन ग्रन्थों को समझने के लिए तपस्या नही करोगे, तो और कौन लोग करेगे। विश्वास रखो, परिश्रम व्यर्थ नही जाता। हम न होगे, परन्तु तुम्हारी सफलता पर हमारी आत्मा को शान्ति मिलेगी और वही हमारी गुरुदक्षिणा होगी। यदि नही करोगे, तो हमारे ऋणी रहोगे और हमारी आत्मा अशान्त रहेगी।" स्वर एवं सज्जनता की मूर्ति वे गुरुवर आज इस लोक मे नही हैं, परन्तु उनकी सरल, सुन्दर, सौजन्यमय एव प्रेरक आकृति सदा लेखक के मानसपट पर अंकित रही है। दूसरा प्रेरक व्यक्तित्व रामपुर राज्य के अनुपम ग्रन्थागार के विद्वान् एवं यशस्वी प्रबन्धक मौलाना इम्तियाज अली खाँ अर्शी का रहा है, जिन्होने अपने इस अकिञ्चन मित्र से सदा कहा-"भाईजान, आप बिरहमन (ब्राह्मण) है, आप लोगो को न जाने क्या-क्या विरसे (दाय) में मिला है, आपने संस्कृत पढ़ी है, जो देवताओ की जुबान (भाषा) कही जाती है। देवताओं की जुबान गैरमुकम्मल (अपूर्ण) या गैरवाजअ (अस्पष्ट) नही हो सकती। हम तो यह मान नही सकते कि ऋषि-मुनियो को अपनी बात कहना नही आता था, या उनको जुवान (भाषा) पर उबूर (अधिकार) नही था। हुजूर, जरा जहमत (कष्ट) कीजिए, बड़े कामों के लिए बड़ी रियाजत (तपस्या) चाहिए, तब कही वुजुर्गों (पूर्वपुरुषो) की दौलत मिलेगी। राह मुश्किल है, दिक्कतें भी है, लेकिन यह भी तो देखिए कि मगरिवी (पाश्चात्य) दिमाग आपके बुजुर्गो को क्या कह रहे है। आप उन बुजुर्गो के मफहूम (तात्पर्य) को जब तक समझाने मे कामयाब (कृतकार्य) नही होते, तब तक आपके कुसूर की सजा उन बुजुर्गो को मिलती रहेगी, जो वेकुसूर है। उनकी रूहो (आत्माओ) को चैन तो तब मिलेगा, जव आप खुद को उनका सही जानशीन ( स्थानापन्न या उत्तराधिकारी) साबित करेगे। आज लोग आपके बुजुर्गो के क़ौलो (उक्तियों) को ढोग कह रहे है। अपने वारे मे तो आप जाने, शर्म मुझे आ रही है।"

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बन्धुवर अर्शी महोदय की मर्मबेधी, परन्तु स्नेहपूर्ण ऐसी उक्तियाँ सचमुच इस ब्राह्मण-सन्तान को सदा प्रेरणा देती रही है। २. अनुसन्धान-सम्बन्धी मूल समस्याएँ और निष्कर्ष आज का अनुसन्धानकर्ता जब तेरहवी शती या उससे पूर्व के ग्रन्थो पर दृष्टिपात करता है, तब उसके समक्ष कुछ विशेष प्रश्न आते है, जिनमे से कुछ निम्नलिखित है- (क) आज पड्ज एवं पञ्च्चम अचल स्वर माने जाते है, जब कि प्राचीन ग्रन्थो मे ऋषभ और धवत अपने स्थान से च्युत नही होते। (ख) आज स्थूल रूप मे ऋपभ और धैवत के दो-दो प्रकार है, जिनका कारण स्थान-विच्युति है, इस प्रकार का कोई भेद इन नामो से सम्बद्ध प्राचीन ध्वनियों का नही। (ग) आज मध्यम के दो स्थूल रूप है, जिनमे तीव्रमध्यम मध्यम के उत्कर्ष का परिणाम है, परन्तु प्राचीन ग्रन्थो मे मध्यम के उत्कर्ष की बात कही नही बतायी गयी है। (घ) आज उत्तर भारत के शुद्ध ऋषभ और पञ्चम मे षड्ज-मध्यम-सवाद है, परन्तु प्राचीन षाड्जग्रामिक ऋषभ-पञ्चम में सवाद नही। (ङ) आज दक्षिण भारत के मध्यम और शुद्धनिपाद (उत्तर भारतीय तीव्र धैवत) मेषड्ज-मध्यम-भाव नही, जब कि प्राचीन ग्रन्थो का निषाद मध्यम से नौ श्रुतियो के अन्तर पर होने के कारण उसका संवादी था। कल्लिनाथ जैसे पन्द्रहवी शती ई० के ग्रन्थकार भी मध्यम-निषाद के पारस्परिक संवाद को प्रत्यक्ष मानते है।' (च) उत्तर भारतीय सरस्वती वीणा पर स्थित कोमल 'ग-नि' तथा तीव्र 'रे-ध' मे परस्पर संवाद नही है, जब कि इन संज्ञाओ से सम्बद्ध प्राचीन ध्वनियो में परस्पर सवाद अवश्यम्भावी था। (छ) उत्तर भारतीय सरस्वती वीणा पर स्थित 'ग-प' मे आज पड्जान्तर-भाव (पड्ज एव तीव्र गान्धार का अन्तर) विद्यमान है, जव प्राचीन 'ग-प' मे आठ श्रुतियो का अन्तर होने के कारण पड्जान्तर-भाव सम्भव नही। (ज) मध्यम के साथ पड्जमध्यम-भाव से संवाद करनेवाले निपाद की स्थिति उत्तर भारतीय वीणा मे है, परन्तु उसके साथ मेल-पद्धति के शुद्ध (अर्थात् उत्तर भारतीय कोमल ऋपभ) का पड्जान्तर-भाव नही है, जब कि प्राचीनों के 'नि-रे' में सात श्रुतियो का अन्तर होने के कारण षड्जान्तर-भाव अनिवार्य है।

१-शुद्धयो्मध्यमनिषादयो: परसपरं संवादित्वदर्शनाद। -- आचार्य कल्लिनाथ, सं० र० भ०, स्वरा०, पृ० ९२

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(झ) मध्यम एवं उत्तर भारतीय आधुनिक ठाठ-पद्धति के तीव्र धैवत में षड्- जान्तर-भाव नही है, जब कि प्राचीनो के मध्यम-वैवत मे सात श्रुतियों का अन्तर होने के कारण पड्जान्तर-भाव अनिवार्य है। (ञ) मव्यम एव मेल-पद्धति के शुद्ध (उत्तर भारतीय कोमल) धवत में भी पड्जान्तर-भाव नही है, जब कि मध्यम एव उत्तर भारतीय सरस्वती वीणा के धैवत में पड्जान्तर-भाव है, जो कि प्राचीनो के अनुसार होना चाहिए। फलत. विचारशील मस्तिष्क इस निष्कर्प पर पहुँचता है कि 'म-ध' मे षड्जान्तर भाव न होने के कारण 'घ' प्राचीन धैवत नही, फलत. 'ध' का सवादी 'रे' प्राचीन ऋषभ नही और 'रे' का सवादी 'म' मव्यमग्रामीय त्रिश्रुतिक पञ्चम नही। मध्यम का संवादी न होने के कारण मेल-पद्धति का शुद्ध निपाद (उत्तर भारतीय तीव्र धैवत) प्राचीन निषाद नही और उसका सवादी मेल-पद्धति का शुद्ध गान्धार (अर्थात् उत्तर भारतीय ठाठ-पद्धति का तीव्र ऋषभ) प्राचीन गान्धार नही। अतः यह अखण्डनीय रूप में प्रमाणित होता है कि दाक्षिणात्यो के शुद्ध (!) रे, ग, ध, नि प्राचीन रे, ग, ध, नि नही है, फलत. "स, रे, रे, म, प, ध, ध" प्राचीन षाड्जग्रामिक सप्तक नही। उत्तर भारतीय सरस्वती वीणा के तीव्र ऋपभ के साथ पञ्चम का संवाद है, फलतः तीव्र ऋपभ प्राचीन ऋपभ नही और इस वीणा के कोमल गान्धार-पञ्चम मे पड्जान्तर-भाव है, अतः यह कोमल गान्धार प्राचीन गान्वार नही। इस दृष्टि से विचार करने पर उत्तर भारतीय सरस्वती वीणा पर प्राप्त होनेवाले काफी ठाठ के ऋपभ और गान्धार प्राचीन षाड्जग्रामिक सप्तक के 'ऋपभ-गान्धार' से भिन्न है। फलतः सिद्ध है कि आधुनिक काफी ठाठ भी प्राचीन षाड्जग्रामिक सप्तक नही। विलावल ठाठ में मध्यम-निषाद का सवाद नही, ऋपभ-पञ्चम मे सवाद है, अत. वह भी प्राचीन पाड्जग्रामिक सप्तक नही। ऐसी दगा मे उत्तर एवं दक्षिण की प्रचलित मान्यताओ से सर्वथा मुक्त होकर विचार करना ही अनुसन्धानकर्ता के लिए एकमात्र मार्ग रह जाता है। ३. प्राचीन सङ्गीतशास्त्र की दुर्बोधता एवं उसके कारण शास्त्र मे जो बात न कही गयी हो, परन्तु शास्त्र से जिसका अविरोध हो, शास्त्र जिसकी अभ्यनुज्ञा देता हो अर्थात् जो दूसरे शब्दो मे शास्त्र का निष्कर्प हो, गुरु-शिष्य- परम्परा से उसका उपदेश दिया जाना 'सम्प्रदाय' कहलाता है। जो जिस वात को

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भली-भाँति जानता है, वह उसे तत्त्वपूर्वक कहता है, मर्मज्ञ व्यक्ति की वह तत्त्वपूर्ण उक्ति लोकजयी विष्णु के द्वारा सम्प्रदाय कही गयी है।' रहस्यगर्भ 'सूत्र' अधिकारी व्यक्तियो के लिए ही बोधगम्य होते है। तत्त्वज्ञ व्यक्ति उस रहस्य को ऐसे शब्दो मे स्पष्ट करते है, जिनके द्वारा अल्पज्ञ व्यक्ति भी शास्त्र के तत्त्व से अवगत हो जाते है। आचार्य की आवश्यकता इसी लिए होती है। जब किसी क्षेत्र में सम्प्रदाय अथवा गुरु-शिष्य-परम्परा पर आश्रित शिक्षा-पद्धति का लोप हो जाता है, तब शास्त्रो के रहस्य दुर्ग्ह हो जाते है। दशम शती ई० के अन्तिम दशक में महमूद गजनवी के आक्रमणो का आरम्भ हो गया था। मन्दिरो का विध्वस तथा बलात् धर्म-परिवर्तन भी उसकी योजना के अनिवार्य अङ्भ थे, फलत जहॉ-जहॉ उसके चरण पडे, वहॉ विद्वानों का अभाव होता

पहुँच नही थी।' गया। अलवरूनी ने यह स्वय कहा है कि 'हिन्दू विद्याएँ वहा चली गयी जहा हमारी

१०१३ ई० मे कश्मीर की ओर भी महमूद का ध्यान गया और १०१५ ई० मे उसने कश्मीर का विनाश पूर्णतया कर डाला। पण्डित हो या मूर्ख, गुणी हो या गँवार, सबको अपने लिए इस्लाम एव मृत्यु मे से एक को चुनना था। फलतः कश्मीर-जैसा विद्या-केन्द्र भी हिन्दू विद्याओ से शून्य हो गया। इस दयनीय स्थिति से परिचित होने के लिए फिरिश्ता और बदायूनी के इतिहास पढ़ने चाहिए। यह तथ्य विशेषतया ध्यान देने योग्य है कि अलबरूनी ने हिन्दुओ के तत्कालीन धर्म, दर्शन, साहित्य, इतिहास, भूगोल, खगोल, फलित-ज्योतिष, रीति-नीति इत्यादि का वर्णन तो अपने ज्ञान के अनुसार किया है, परन्तु सङ्गीत के विषय मे वह मौन का आश्रय लिये हुए है। इस्लाम की दृष्टि में त्याज्य ज्योतिप विद्या अलवरूनी की आजीविका का साधन थी, फलत. सङ्गीत को त्याज्य समझकर उसने छोडा नही। सत्य यह है कि अलबरूनी जहॉ-जहॉ पहुँचा, वहाँ-वहॉ उसे सङ्गीत के विद्वानों का दर्शन न हुआ। १०१८ ई० मे महमूद ने कन्नौज एव मथुरा का विनाश किया तथा १०२४ ई० मे सोमनाथ का मन्दिर लूटा। फलत विद्याओ को दक्षिण मे आश्रय ढूंढ़ना पड़ा।

१. शास्त्ानुक्तस्यापि शास्र्रेणाभ्यनुज्ञातस्य शास्त्राविरोधिनोऽर्थविशेषरय आचार्यशिष्यपरंपरया यदुपदेशप्रदानं स संप्रदाय इत्येतल्लक्षणलक्षितत्वात्। तथा चोक्तम् -- यो यत्सम्यग्विजानीते स तद्वदति तत्त्वतः । स सप्रदाय: कथितो विष्णुना लोकजिष्णुना॥ -कस्लिनाथ, सङ्गीतरत्नाकर, (अडयार संस्करण) भाग ४, पृ० २९ ।

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ग्यारहवी शती ई० में धारानरेश भोज (९९७-१०१२ ई०) तथा मिथिलानरेश नान्यदेव (१०८० ई०) ने सङ्गीत-ग्रन्थों की रचना की, परन्तु उस समय की राज- नीतिक स्थिति इन ग्रन्थों के सार्वदेशिक प्रचार के अनुकूल न थी। वारहवी शती ई० मे त्रिभुवनमल्ल (१०७६-११२६ ई०), सोमेश्वर (११२७- ११३४ ई०), जगदेकमल्ल (११३४-११४५), शारदातनय, हरिपाल (११७५ ई०) और सोमराजदेव (११८० ई०) ने सङ्गीत-ग्रन्थ लिखे, परन्तु उत्तर भारत मे मुहम्मद गोरी के द्वारा पृथ्वीराज की पराजय वारहवी शती के अन्त की ऐसी घटना थी, जिसके परिणामस्वरूप एक बार भारत फिर हिल गया। 'सङ्गीत-रत्नाकर' की रचना जिस समय (प्राय. १२३० ई०) हुई, उस समय दक्षिण मे कुछ शान्ति थी, फलतः कश्मीरी परम्परा के एक विद्वान् शार्ङ्गदेव ने अपने आनुवशिक ज्ञान के आधार पर इस अमर ग्रन्थ की रचना की। रत्नाकर के टीकाकार महाराज सिंहभूपाल ने लिखा है कि 'शार्ङ्गदेव के उदय से पूर्व समस्त सङ्गीत-पद्धति विखर चुकी थी, शार्ज्गदेव ने उसे स्पष्ट रूप मे एकत्र सँजोकर रख दिया।' दैवदुर्विपाक से १२९४ ई० में अलाउद्दीन की शनि-दृष्टि दक्षिण पर पडी और देवगिरि के उस राज-वंश पर भी विपत्ति आयी, जो शार्ङ्गदेव जैसे विद्वानो का आश्रयदाता रहा था। मलिक काफूर ने अलाउद्दीन के पास भेजने के लिए अनेक विद्वानो को धर्मभ्रष्ट किया। अनेक सङ्गीतन इस समय दक्षिण से वलात् उत्तर भेजे गये। अलाउद्दीन के दरबार में उस समय 'अमीर खुसरो' जैसे प्रतिभाशाली एवं कूट- नीतिज्ञ व्यक्ति थे। दिल्ली की ओर उस समय जो भी सङ्गीतजीवी कलाकार प्राप्त थे, वे आनुवंशिक रूढियों का पालन मात्र कर रहे थे, अपनी कला के सैद्धान्तिक विवेचन की शक्ति सम्प्रदाय-लोप के कारण उनमें न थी। अमीर खुसरो को ईरानी सङ्गीत का अच्छा ज्ञान था और वह दिल्ली के आसपास उपलब्ध सङ्गीतजों से ईरानी सङ्गीत- शास्त्रियों का विवाद कराता था। भारतीय सङ्गीतशास्त्र के सैद्धान्तिक पक्ष को समझने के लिए ही सम्भवत. अमीर खुसरो की प्रेरणा से अलाउद्दीन ने दाक्षिणात्य सङ्गीतशास्त्रियो को पकड़वा मँगाया था। वलात् पकडे हुए व्यक्ति भला क्या शास्त्रो का रहस्य बतलाते। प्रसिद्ध दाक्षिणात्य सज्जीतशास्त्री श्री वासुदेव शास्त्री का कथन है कि अनेक विद्वानों ने अपने ग्रन्थ स्वयं नष्ट कर दिये और अनेक व्यक्ति अपना धर्म बचाने के लिए 'बौरे' बन गये। अमीर खुसरो के समय तक भारतीय सङ्गीत पर ईरानी दृष्टिकोण से विचार

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किया जाने लगा था। दिल्ली एवं आस-पास प्रचलित भारतीय रागो का वर्गीकरण सम्भवतः ईरानी दृष्टि से होने लग गया था। ईरानी सङ्गीत में मुख्य स्वर बारह थे, तत-वाद्यो पर इन्हें अभिव्यक्त करनेवाली वारह सारिकाएँ मुसलमानी भाषा में 'पर्दा' कहलाती थीं। सितार की सारिकाओं को 'पर्दा' कहा जाना मुस्लिम परम्परा है, हारमोनियम की पटरियों को भी इसी प्रभाव के कारण 'पर्दा' कहा जाता है। ये परदें ईरानी वाद्यों में अचल होते थे और इनसे उद्भूत स्वरों की स्वतन्त्र संज्ञाएँ थीं, फलतः ईरानी प्रभाव से भारतीय वीणाओं में सारिकाएँ अचल हुई। ईरानी पर्दो के आधार पर 'बारह मुकाम' सिद्ध होते थे। भारतीय भाषाओ में ये 'मुकाम' लोचन- जैसे पण्डितों के द्वारा 'सस्थान' कहलाये और उत्तर भारतीय तन्त्रीवादकों ने इन्हें 'ठाठ' कहा। 'ठाठो' ने एक सुविधा यह दी थी कि पर्दे सरकाये बिना प्रायः सभी रागो का वादन हो जाता था। सूक्ष्मतम ध्वनियो को 'मीड' से प्राप्त कर लिया जाता था। उस युग के गायको के मस्तिष्क मे रागो का स्वरूप था, संस्कारो के कारण वे उन रागो का प्रयोग करते थे, परन्तु यह निश्चयपूर्वक कहा जा सकता है कि उन्हे मूर्च्छना- पद्धति तथा उसके साथ अनिवार्यरूपेण सम्पृक्त सङ्गीतसम्बन्वी रस-सिद्धान्त का या तो परिचय न था, या फिर वे उसे गुप्त रखना चाहते थे। अस्तु, इन बारह पर्दो के परिणामस्वरूप 'कोमल ऋपभ' एवं 'कोमल धैवत' जैसी स्वरसज्ञाओ की सृष्टि हुई और उस मूर्च्छना-पद्धति पर 'पर्दा' पड़ गया, जो भारतीय सङ्गीत-ग्रन्थो की कुञ्जी थी। भारतीय सङ्गीत की कुञ्जी 'स्थायी स्वर' से लोगो का अपरिचय हो गया और वह कुछ मर्मज्ञो के हृदयो मे सुरक्षित एक 'रहस्य' हो गयी। ईरानी सङ्गीत में एक सप्तक के अन्तर्गत सूक्ष्मतम ध्वनियाँ चौवीस थीं, जो 'हङ्गाम' कहलाती थी, इन्हे ईरानी सङ्गीत की चौबीस श्रुतियॉ कहा जा सकता है, परन्तु एक सप्तक मे इन चौबीस ध्वनियो की स्थापना चौवीस पर्दो पर किया जाना सुविधापूर्ण नही था, फलत बारह पदो का ईरानी अचल ठाठ उत्तर भारतीय सरस्वती वीणा पर स्थापित हो गया। ईरानी दृष्टिकोण के अनुसार इन वारह पर्दो से उद्भूत होनेवाली ध्वनियाँ अपने आपमे स्वतन्त्र ध्वनियाँ थी, उनकी अलग-अलग संज्ञाएँ थी, परन्तु भारतीय कलाकार तो अपनी सात स्वरसंज्ञाओं से परिचित थे, फलतः अवशिष्ट पॉच ध्वनियों को उन्होने

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विकृत ध्वनि मानकर एक स्थान के अन्तर्गत वारह ध्वनियों के लिए कमशः 'स, रे, रे, ग, ग, म, म, प, ध, ध, नि नि' नाम स्वीकृत किये। गोपाल नायक ने लिखा है कि यवनों ने- (१) वीणाओ की सारिकाएँ अचल की। (२) पड्जमध्यम-भाव की प्रधानता नष्ट हुई, पड्ज-पञ्चम-भाव स्थापित हुआ। (३) ऋपि-प्रणीत सरल मूर्च्छना-पद्धति लुप्त हुई। (४) शुद्ध-अशुद्ध का झगडा चला। एक राग की दो 'सरगम' हो गयी, एक 'प्रकट' और एक 'गुप्त'। (५) 'स रेग म प ध नि' 'पध निस रेग म' हो गये। वैजू ने गोपाल से कहा- "तूने विद्या दी नहीं, छिना दी। शत्रुओ पर नागपाठ डाल। इन्हे श्रुति, स्वर, मूच्छना, गमक इत्यादि का रहस्य न बतला। कोई गुणी इस जाति में जन्म लेगा, तो यह भेद खुलेगा।" ठाठ के प्रताप से प्रत्येक मूरच्छना के सात स्वरो को 'स, रे, ग, म, प, ध, नि' कहा जाने लगा। अर्थात् किसी भी स्वर को प्राप्त होनेवाली अवस्था 'अंशत्व' एव 'स्थायित्व' 'षड्जत्व' में परिवर्तित हो गयी। इस एक भयानक परिवर्तन से तेरहवी शती ई० तथा उससे पूर्व लिखे हुए ग्रन्थ दुर्वोव हो गये। भरत के काल से शार्गदेव के काल तक चले आये षाड्जग्रामिक एवं माध्यमग्रामिक शुद्ध सप्तकों की पहचान लुप्त हो गयी। सन् १३३६ ई० में विजय- नगर राज्य की आधार-शिला रखी गयी। उस राज्य के सस्थापक एवं महामन्त्री श्री माधवाचार्य (विद्यारण्य) ने अनेक शास्त्रो के साथ ही साथ सङ्गीत के पुनरुद्धार का भी कार्य करना चाहा। उस समय विजयनगर मे समस्त देश के पण्डित, कलाकार एव गुणी आने लगे। श्री विद्यारण्य ने उस समय की 'अचल ठाठ' वाली वीणा के आधार पर पचास प्राप्त रागो को पन्द्रह ठाठो मे वर्गीकृत किया और 'ठाठ' के लिए मेल शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग माधवाचार्य के द्वारा हुआ। श्री माधवाचार्य के द्वारा स्थापित मेलो मे 'हेजुज्जी' नामक एक मेल भी है, जो ईरानियो के मुकाम 'हिजाज' से अप्रभावित नही कहा जा सकता। दाक्षिणात्य ग्रन्थो मे 'गजल' 'गज़लु.' और 'कौल' 'कौलु.' हो गया है, इसी प्रकार 'हिजाज' भी 'हेजुज्जी' हुआ है।

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श्री माधवाचार्य के अनुयायी रघुनाथ को इसी मेलचक्र मे पडने के कारण शारङ्गंदेव की सप्ताध्यायी (रत्नाकर) अस्पष्ट एवं अबोध्य दिखाई दी है। रघुनाथ को पाड्जी की वह धवतादि मूर्च्छना 'उत्तरायता मेल' दिखाई दी है, जो वस्तुतः मतङ्ग की 'द्वादश- स्वर उत्तरमन्द्रा' है। श्री वासुदेब शास्त्री ने स्पप्टरूपेण माना है कि तेरहवी शती तथा उससे पूर्व के सङ्गीत-ग्रन्थ पन्द्रहवी शती तथा उससे पश्चात् के दाक्षिणात्य ग्रन्थकारो के लिए सर्वथा दुर्बोध रहे और वे उन्हे नही समझे। परन्तु वासुदेव शास्त्री 'मेलवाद' को दक्षिण की • मौलिकता मानते है, जव कि सचमुच वह ईरानी प्रभाव है। सग्रहचूडामणिकर्ता गोविन्द ने दाक्षिणात्य सरस्वती वीणा को वर्तमान रूप दिया है, जिसमे ध्वनित होनेवाली चौबीस श्रुतियाँ ईरानियो के 'चौबीस' हङ्गाम ही है। जिन बारह स्वरो के आधार पर वेङ्कटमखी ने अपने बहत्तर मेलकर्ताओं की योजना की है, उनका आधार पूर्वोक्त पर्दे ही है। प्रो० रामकृष्ण कवि-जैसे दाक्षिणात्य विद्वान् भी मानते है-"आजकल के गायको ने .... विदेशी गान-शैली की छाया का भी अवलम्बन करके अनेक रागो का प्रवर्तन सम्प्रदाय मे किया। उनका कारण यह है कि नारद, भरत, मतङ्ग इत्यादि की परम्परा मे तीनो स्थानो की समस्त श्रुतियो का वादन करने योग्य वीणा को लेकर प्रत्येक राग के अनुसार (पृथक-पृथक) सारिकाओ से प्रत्येक श्रुति-स्थान की स्थापना करके कोण या नख के द्वारा विविध ठाठो से युक्त राग बरते जाते थे। कहा जाता है कि भरत 'मत्तकोकिला', स्वाति 'विपञ्ची', नारद 'महती' और मतङ्ग 'चित्रा' का वादन करते थे। मतङ्ग इत्यादि ने सम्प्रदाय मे किन्नरी नामक वीणा का वादन प्रचलित किग्रा। तदनन्तर चिरकाल तक किन्नरीवादन ही मुख्यतया होता रहा। शार्गदेव की अपेक्षा अर्वाचीन लोगो ने 'शुद्धमेला' एव 'मध्यममेला' नामक उन वीणाओ का निर्माण करके सम्प्रदाय मे प्रयोग किया, जिनमे सारिकाएँ नियत स्थान में स्थित थी। सोलहवी शती ई० के मव्यकाल मे हनुमन्मत पर आश्रित सम्प्रदाय-प्रवर्तित रागो के वादन-सौकर्य के लिए उन-उन रागो मे प्रयोज्य श्रुतियो के स्थान मे अचल सारि- काओं का निर्माण करके स्वरो के अनुमन्द्र, मन्द्र, मध्य, तार एव तारोत्तर स्थानो का निश्चय करने के पश्चात् बुधो ने अनेक प्रकार की वीणाओ का प्रचलन किया। उसी समय अनुभवसिद्ध रागो के श्रुतिभेद का आश्रय लेकर समानस्वरश्रुतिक राग एक मेल मे रखकर सब प्रवर्तक रागो को नियत मेलो मे विभाजित कर दिया गया। ....

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वेंकटमखी से प्रायः सौ वर्प पश्चात् इस समय प्रयोज्य (दक्षिण भारतीय सरस्वती) वीणा का निर्माण हुआ। मेल-ज्ञान होने पर प्रत्येक राग के श्रुति स्वर स्थान का नियम साधारण वादकों के लिए स्पष्टतर हो जाता है। भरत इत्यादि महर्षियो के सम्प्रदाय में सिद्ध अष्टादश जाति नामक प्राचीन विभाग में तारमन्द्रव्यवस्था, पाडवौडवभेद, स्वर का बहुत्व एवं अल्पत्व, ग्रह, अश, न्यास, का विभाग; गायक के लिए सभी स्पष्ट हो जाते है। मेल-ज्ञान में वे अन्वेषणीय एवं विचारणीय ही होते है। जाति-विभाग में वीणा के चल-सारिकायुक्त होने के कारण वादकों के लिए श्रुतिस्वरज्ञान का निष्कर्ष आवश्यक होता है।"

४. प्रचलित संगीत-पद्धतियों में रस एवं भाव के प्रति उदासीनता

उत्तर भारतीय एवं दाक्षिणात्य दोनो ही पद्धतियों में स्वरविधि की जो शिक्षा प्रचलित है, उसमें रस और भाव के प्रति स्वथा उदासीनता है। यह नही बताया जाता कि किस-किस स्वर के प्रयोग से किस-किस भाव की अभिव्यक्ति होती है, न इस सम्बन्ध में कुछ निर्देश है कि किस-किस रस मे किस-किस राग का विनियोग है। राग का मेल या ठाठ, स्वरों का रागव्यञ्जक सन्निवेश और प्रयोग का समय ही राग-शिक्षा को पूर्ण कर देता है। गायक किस राग के द्वारा किस भाव की अभिव्यक्ति और श्रोताओ के हृदय में किस भाव का उद्रेक कर सकता है, इस सम्वन्ध में आधुनिक ठाठवादी एवं उनके उपजीव्य मेलाचार्य सर्वथा मौन का अवलम्बन किये हुए है। प्राचीनो के अनुसार गान्धार एवं निषाद करुणा के अभिव्यञ्जक है, परन्तु आज 'रे' और 'ध्' से करुणा की प्रत्यक्ष अनुभूति होती है। प्राचीन सङ्गीत में 'रे' एवं 'ध' का नाम तक नही मिलता, अतः इसी निष्कर्ष पर पहुँचा जा सकता है कि सङ्गीतप्रयोज्य प्रचलित ध्वनियों की स्वरसंज्ञाएँ किसी कारण से परिवर्तित हो गयी है। उस परिवर्तन के कारणो की खोज करके प्राचीन एवं प्रचलित पद्धतियों में रस- सम्बन्धी सिद्धान्तों के सामञ्जस्य का दर्शन करना भी अनुसन्धानकर्ता का आवश्यक कर्तव्य हो जाता है।

अनुसन्धान के आधार-प्राचीन सम्प्रदाय आचार्य अभिनवगुप्त (दशम शती ई०) के समय में यह समझा जाता था कि नाटय-सम्बन्धी प्रमुख सम्प्रदाय तीन है, ब्रह्ममत, सदाशिव-मत एवं भरत-मत। इन्हें

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क्रमशः वैदिक परम्परा, आगम-पुराण-परम्परा एवं आर्ष-परम्परा कहा जा सकता है। अभिनवगुप्तकालीन एक उपाध्याय का मत था कि भरत-नाट्यशास्त्र भरत मुनि की कृति नही है, अपितु पूर्वोक्त तीनो सम्प्रदायो की विशेपता पर विचार करके 'ब्रह्ममत' की ससारता का प्रतिपादन करने के लिए किसी ने नाट्यशास्त्र का संग्रह किया है और उसमे तीनो सम्प्रदायो के ग्रन्थों के खण्ड या अश विद्यमान है। अभिनवगुप्त ने इन उपाध्याय को 'नास्तिकधुर्य' (नास्तिकों में अग्रणी) कहा है। इन तीनों सम्प्रदायो के ऐसे स्वतन्त्र ग्रन्थ आज अनुपलब्ध है, जिनमे लौकिक सङ्गीत पर विस्तारपूर्वक विचार किया गया हो। उपलब्ध नाट्यशास्त्र मे सामवेद से 'गीत' का ग्रहण करनेवाले भगवान् ब्रह्मा हैं। 'भरत' ब्रह्मा के शिष्य है। गानयोग मे 'नारद' तथा भाण्डवाद्यो मे 'स्वाति' का नियोजन करनेवाले भी व्रह्मा ही है। अप्सराओ की सृष्टि भी उन्होने ही की है और उन्ही को सन्तुष्ट करने के लिए भरत 'अमृत-मन्थन' नामक समवकार का प्रयोग करते है। ब्रह्मा एक दिन देवताओ के सहित जाते है और भगवान् शकर की अभ्यर्थना करके उनके सम्मुख 'त्रिपुरदाह' का अभिनय हिमालय मे 'भरत' एव उनके शिष्यो द्वारा कराते है। शंकर प्रसन्न होते है और स्वरचित नृत्य का उपदेश 'तण्डु' के द्वारा भरत को दिलाते है। आचार्य अभिनवगुप्त ने 'तण्डु' और 'नन्दी' को एक ही व्यक्ति माना है। इस प्रकार नाटयशास्त्र मे ब्रह्मा को प्रधानता प्राप्त है। नाटयशास्त्र के प्रारम्भिक श्लोक मे ब्रह्मा और शंकर को क्रमश. प्रणाम किया गया है। भावप्रकाशनकार शारदातनय ने नाट्यवेद का आदि कर्ता भगवान् शकर को कहा है। स्थावर-जङ्गम सृष्टि की रचना करने से थके हुए ब्रह्मा भगवान् विष्णु के पास विश्रान्ति का उपाय खोजने जाते है। भगवान् विष्णु उन्हे भगवान् शंकर के पास भेजते है। व्रह्मा की थकान दूर करने के लिए भगवान् शकर स्वरचित नाटयवेद की शिक्षा नन्दिकेश्वर के द्वारा ब्रह्मा को दिलाते है। नन्दिकेश्वर से नाटयवेद पढकर ब्रह्मा लौटते और नाटयवेद के प्रयोक्ता का स्मरण करते हैं। स्मरण करते ही पाँच शिष्यो से युक्त एक मुनि उपस्थित होते है। उन्हे देखकर व्रह्मा कहते है-'नाट्यवेदं भरत' अर्थात् तुम लोग नाटयवेद धारण करो। वे नाटयवेद पढते है और उन सबका नाम 'भरत' पड़ जाता है। शारदातनय की इस कथा का आधार सदाशिव-सम्प्रदाय का कोई ग्रन्थ रहा होगा, जिसमें ब्रह्मा की स्थिति नाट्य के आविष्कर्ता की न होकर, भगवान् शकर के शिष्या- नुशिष्य की है।

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नाट्यशास्त्र (काशी-सस्करण) ध्रुवाध्याय के अन्त में कहा गया है कि मैने वह 'गान्वर्वर' कहा है, जिसका कथन पहले नारद ने किया है,* परन्तु निर्णयसागर-संस्क- रण मे यह श्लोक ध्रुवाध्याय के अन्त में न होकर गुणाव्याय (तैतीसवे) अव्याय के अन्त मे है, वहाँ 'नारदेन' के स्थान पर 'प्रपितामहेन' पाठ है, जिसके अनुसार 'गान्धव' के आदिम वक्ता नारद न होकर 'प्रपितामह' (ब्रह्मा) है।+ अस्तु, नाट्यशास्त्र मे स्वरविधि की यह विशेषताएँ है- (क) उदात्त, अनुदात्त, स्वरित-जैसी वैदिक स्वर-संज्ञाओ की चर्चा तक नही है। (ख) स्वरो के कुल, वर्ण, द्वीप, ऋपि इत्यादि की कोई चर्चा नही है। (ग) श्रुतियों के नाम तथा उनकी जातियॉँ नही है। (घ) 'स्थायी' स्वर एवं 'सचारी' स्वर की चर्चा है। (ड) स्वरों की भावव्यञ्जकता का निर्देश है। (च) श्रुतियो के मध्यमत्व, आयतत्व, दीप्तत्व की चर्चा अलंकारविधि में है, परन्तु सख्या या क्रम के अनुसार विगिष्ट-विशिष्ट श्रुतियों को मध्यम, आयत, दीप्त नही बताया गया। वही आयतत्व विशेष स्वर का 'उत्कर्प', मृदुत्व स्वरविशेप का 'अपकर्ष' और मध्यमत्व स्वरविशेष की 'स्वस्थान- स्थता' या 'विशुद्धता' है। (छ) सात शुद्ध ग्रामरागों की चर्चा है और नाट्य में उनके प्रयोग के अवसर निर्दिष्ट है। अतः इस निष्कर्प पर पहुँचा जा सकता है कि नाट्यशास्त्र के अन्तर्गत जो आतोद्य- विधि व्णित है, उसका मूल भले ही वैदिक-परम्परा रही हो, परन्तु वह वैदिक एव पौराणिक मार्ग से पर्याप्त सीमा तक स्वतन्त्र 'सम्प्रदाय' है। इस आतोदय-विधि मे पौराणिकता का सर्वथा अभाव है, इसी लिए उसमे आतोद्यविधि के अन्तर्गत कोई शब्द भी गान्वर्व के 'अदृष्ट' फल की ओर सङ्केत नही करता और उसका प्रधान प्रयोजन लोकरञ्जन है। फलत. यह स्पष्ट है कि नाट्यशास्त्र की आतोद्यविधि, जिसके लिए 'गान्वर्व' और 'सङ्गीत' दोनो शब्दी का प्रयोग नाट्यशास्त्र मे है, लौकिक सङ्गीत पर विचार करती है। उसमे सङ्गीत के पश्चात्कालीन दो भेदो-मार्ग और देशी-की चर्चा तक नही है।

  • गान्धर्वमेतन् कथित मया हि पूर्वं यदुक्त त्विह नारदेन। + गान्धर्वमेत:कर्थित मया च पूर्वं यदुक्त प्रपितामहेन।

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नाट्यशास्त्र के आधार पर प्राचीन सङ्गीत को स्पप्ट करने का प्रयत्न करनेवाले अनुसन्धानकर्ता का क्षेत्र इसी लिए निश्चित हो जाता है। ५. भरत-सम्प्रदाय की नाट्यशास्त्रगत विशेषताएँ (१) नाट्यशास्त्र के अनुसार एक स्थान में मूल ध्वनियाँ दस हैं। स्थूल दृष्टि को वे नौ प्रतीत होगी, परन्तु विचार करने पर उनकी संख्या दस सिद्ध होती है, हाँ, उनकी संज्ञाएँ नौ है। षाड्जग्रामिक स्वर ही माध्यमग्रामिक संज्ञाएँ ले लेते हैं, परन्तु उस अवस्था में पाड्जग्रामिक गान्धार मध्यमग्राम में उपयोगी नही होता और माध्यमग्रामिक काकली निषाद षड्जग्राम में अनुपयोगी होता है। यदि किसी सारिका-वाद्य मे हम सारिकाएँ सरकाये विना षड्जग्राम एवं मध्यमग्राम की आदिम मूर्च्छनाओ के शुद्ध, अन्तर-गान्धार-सहित, काकली-सहित एवं साधारण, चारो रूप देखना चाहे, तो हमे उस पर दस पर्दे वाँधने पडेगे। निम्नस्थ सारणी मे यह स्थिति स्पष्ट है-

पाड्जग्रामिक स्वरसंज्ञाएँ सारिकाएँ माध्यमग्रामिक स्वरसंज्ञाएँ

पड्ज -- (मेरु) मुक्त तन्नी मुक्ततन्त्री (मेरु)- मध्यम ऋपभ - १ -त्रिश्रुतिक पञ्चम गान्वार- २ -0 अन्तर गात्वार ३ -चतुःश्रुतिक धंवत मध्यम - ४ -निषाद 0 -- ५ -काकली निषाद 1 1

पञ्चम ६ -षड्ज 1 1

धैवत -ऋषभ 1 1

निषाद ८ गगाववार 1

काकली निषाद- ९ -अन्तर गान्वार

षड्ज - १० -पञ्चम माध्यमग्रामिक काकली निपाद की सिद्धि के लिए पाँचवी सारिका है, जिसकी ध्वनि षाड्जग्रामिक पड्ज की अपेक्षा आधुनिक 'तीव्र मध्यम' होगी। दूसरी सारिका पर कोई माध्यमग्रामिक स्वर नहीं और पाँचवी सारिका पर कोई पाड्जग्रामिक स्वर नही है।

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नाट्यशास्त्र (बम्वई-संस्करण) के तीसवें अध्याय मे कहा गया है कि-"पड्ज एवं मध्यम (ग्राम) के गान्धार (अन्तर गान्वार) और निपाद (काकली निपाद) की कृति (स्थापना) मे तीन अन्तर स्वरो की सस्था (स्थिति) से स्वरसाधारण होता है।"* इस प्रकार अन्तर स्वर तीन है-१. पाड्जग्रामिक अन्तर गान्धार, (२) माध्यमग्रामिक काकली निषाद, (३) पाड्जग्रामिक काकली निपाद या माध्यमग्नामिक अन्तर गान्वार। (२) नाट्यशास्त्र के अनुसार स्वरसाधारण के दो प्रकार है। पहला स्वर- साधारण दो श्रुतियों के उत्कर्प से होता है, जिसके परिणामस्वरूप अन्तरगान्वार एवं काकलीनिपाद की सिद्धि होती है। दूसरा स्वरसाधारण प्रयोग की सूक्ष्मता का परि- णाम होता है, जिसे 'कैशिक' कहा गया है, जिसमे स्वर अपने स्थान से केशाग्र अन्तर उतरता या चढ़ता है, यह केशाग्र अन्तर ही 'प्रमाणश्रुति' है। इस स्वरसाधारण से उत्पन्न स्वरों की स्थिति निरपेक्ष नही होती, अपितु उनका उत्कृष्ट एव अपकृष्ट रूप विशिष्ट स्वरसन्निवेश अर्थात् स्वरप्रयोग के विशिष्ट क्म का परिणाम होता है, इसलिए वे मूच्छनाआ के निमाण मे कारण नही होते। (३) पड्जग्राम मे धैवत, मध्यम ग्राम मे पञ्चम एव मध्यम सर्वत्र अविलोपी रहता हं। (४) मूच्छनाओं से उत्पन्न ताने पटस्वर एवं पञ्चस्वर होती है। सम्पूर्ण मू्च्छनाएँ जातयों के सम्पूर्ण, पट्स्वर ताने पाडव और पञ्चस्वर ताने ओडुव रूपा का निर्माण करती है। दश-विशेप मे चतु.स्वर प्रयोग की ओर भी नाट्यशास्त्र मे सकेत है। (५) औडवरूप मे जिन दो स्वरो क। लोप होता है, वे परस्पर सवादी होते है।

(६) जातियॉ और उनमे विकार- जातियो मे विकार के कई कारण होते है, (१) अशस्वर मे परिवर्तन, (२) दो या अधिक जातियो का मिश्रण, (३) अन्य लक्षणो मे परिवर्तन। 'अश' स्वर मूर्च्छना का प्रारम्भिक स्वर है। वाद्यविधि मे इसी को 'स्थायी' स्वर कहा गया है, मृदङ्ग इत्यादि वाद्य इसी मे मिलाये जाते थे। आज यदि जाति-प्रयोग

  • स्वरसाधारणं चापि त्र्यन्तरस्वरसस्थया । निषादगान्धारकृतौ पड्जमध्यमयोरपि॥

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किया जाय, तो सितार और वीणा की चिकारियॉ इसी मे मिलायी जायँगी। निरन्तर गूंजते रहने के कारण भी इसका नाम 'स्थायी' है। स्थायी भाव का प्रकाशन भी यही करता है। पाश्चात्यो के 'टोनिक' या 'की-नोट' शब्द इसी के पर्याय है। एक जाति का एक विशिप्ट 'वर्ण' (स्वरसन्निवेश, स्वरक्रम) जाति का रूप निश्चित करनेवाला स्वर-समुदाय होता है। अंश स्वर का परिवर्तन होने पर भी 'वर्ण' वही रहता है, केवल परिवर्तित 'अंश' या 'स्थायी' स्वर का प्रयोग बहुल हो जाता है। आज मेल-पद्धति एवं ठाठ-पद्धति मे प्रत्येक स्थायी स्वर को 'सा' कहा जाने लगा है। दो या अधिक जातियो के सकर से संकीर्ण या मिश्र जातियों की उत्पत्ति होती है। ऐसी अवस्था मे भी वे षाड्जग्रामिक या माध्यमग्रामिक मानी जाती है। यदि ऐसी जातियों मे 'पञ्चम' लोप्य स्वर रहे तो वह पाड्जग्रामिक मानी जायॅगी, क्योकि मध्यम ग्राम मे 'पञ्चम' अविलोपी होता है, यदि 'धैवत' लोप्य स्वर हो, तो वे माध्यमग्नामिक मानी जायँगी, क्योकि षड्ज ग्राम मे धैवत का लोप विहित नही। प्रयोज्य पञ्चम एव धैवत की त्रिश्रुतिकता एव चतु श्रुतिकता से भी ग्रामविशेप का बोध होता है। (७) राग- शुद्धसाधारित, पड्जग्राम, मध्यमग्राम, पाडव, शुद्धकैशिक, शुद्धकैशिकमध्यम एव पञ्चम, ये सातो शुद्ध राग जातियों के विकार या संकर का परिणाम है। केवल 'षाडव' राग विकृत मध्यमा से उत्पन्न है, अवशिष्ट छहो राग संकीर्ण जातियो से उत्पन्न हुए है। इस प्रकार हम देखते है कि नाट्यशास्त्र मे सकीर्ण जातियॉ एव उनसे उत्पन्न राग है, परन्तु उन जातियो या रागो को किसी एक ग्राम से ही सम्बद्ध माना गया है। किसी जाति या राग को 'द्वैग्रामिक' नही कहा गया। (८) अन्तर स्वरो का प्रयोग जातियों मे केवल आरोह में विहित है। (९) एक ही जाति या राग में गान्धार या निपाद के दोनो रूपो का प्रयोग सम्भव नही।

६: उपलब्ध नाटयशास्त्र तत्त्वदर्शी महर्षि अपने चिन्तन के परिणामो को सूत्ररूप में कहते रहे है। 'सूत्र'

होते है। अल्पाक्षरयुक्त, सन्देहरहित, सारगर्भ, व्यर्थशब्दहीन, व्यापक एवं अनिन्द्यार्थबोधक

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सूत्र के समस्त सार भाग का विवरण करनेवाली व्याख्या 'वृत्ति', दृत्ति की विवेचना 'पद्धति', शंकाएँ उठाकर उनका समाधान किया जाना 'भाष्य', भाष्य के अवान्तर अर्थो का स्पष्टीकरण 'समीक्षा', यथासम्भव सरल अर्थों का सकेत 'टीका', कठिन भाग का सरल शव्दो में स्पष्टीकरण 'पञ्जिका', सूत्र के अर्थ का प्रदर्शन मात्र 'कारिका' तथा उक्त, दुरुक्त एवं अनुक्त अर्थो का विवेचन 'वार्तिक' कहलाता है। भारतीय सिद्धान्त इसी प्रकार प्रौढ़ शास्त्रो के रूप में विकसित होते रहे है। नाटयशास्त्र एवं सङ्गीतशास्त्र के विकास का भी यही क्रम रहा है। आज इन दोनो विपयो के मूलसूत्र अप्राप्य है। यदि आज कोई व्यक्ति 'शाङ्करदर्शन' पर एक ग्रन्थ लिखे, तो उसमे प्रतिपादित सिद्धान्त तो शकराचार्य के होगे, परन्तु उस कृति को विशिष्ट रूप स्वय लेखक द्वारा प्राप्त होगा। भारत के गौरवपूर्ण अतीत मे अनेक प्रसिद्धिपराडमुख आचार्य ऐसे हुए है, जिन्होने प्राचीन मनीपियो के सिद्धान्तो की व्याख्या अत्यन्त सुन्दर रूप में की और अपने यश की चिन्ता न की। अनेक व्याख्याएँ उपलब्ध है, परन्तु उनके कर्ताओ का पता नही। कारिकाओ, वृत्तियो, व्याख्याओ एव भाष्यो के कारण जब किसी शास्त्र का विस्तार अधिक हो जाता है, तव तत्त्वदर्शी मनीषी लोक पर अनुग्रह करके उस शास्त्र का संक्षेप कर देते हैं। इस प्रक्रिया के परिणामस्वरूप ऐसे अनेक ग्रन्थ विद्यमान है, जिनमें प्रतिपादित सिद्धान्तों के मूलतः उद्भावक महापुरुष उन ग्रन्थों की रचना से कही पूर्व सुदूर अतीत में हुए है। ऐसी स्थिति में 'सक्षेप-ग्रन्थों' की भाषा इत्यादि के आधार पर उन महाविभूतियो के अस्तित्व-काल का निश्चय किया जाना उचित नही, जिनके सिद्धान्तो का प्रतिपादन इन ग्रन्थो मे है। लौकिक सङ्गीत पर विचार करनेवाला उपलब्ध प्राचीनतम ग्रन्थ 'नाट्यशास्त्र'- है। भावप्रकाशनकार शारदातनय ने लिखा है कि नाट्य-सम्बन्धी विस्तृत सिद्धान्तो के दो संग्रह, 'द्वादशसाहस्त्री' एव 'पट्साहस्री', किये गये। द्वादशसाहस्त्री आज अनुपलब्ध है और पट्साहस्री का ही एक रूप उपलब्ध 'नाटयशास्त्र' है। षट्साहस्त्री के वर्तमान रूपो मे पाठ-भेद, विषय-प्रतिपादन में क्रमभेद तथा अध्यायो के क्रम मे भी भेद पाया जाता है। कुछ प्रतियो में किसी विषय का विवेचन पद्य मे है, तो अन्य प्रति मे उसी नियम का विवेचन गद्य मे है।

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इस प्रकार पट्साहस्री के प्रमुख रूप दो है, एक प्राचीन और दूसरा नवीन। उद्भट और लोल्लट इत्यादि व्याख्याकारो का आधार प्राचीन रूप एवं शंकुक, कीतिधर एवं अभिनवगुप्त की व्याख्या का आधार नवीन रूप है। आचार्य अभिनवगुप्त ने अभिनवभारती मे कहा है कि 'नास्तिकधुर्य उपाध्याय' ने (उपलब्ध) नाटयशास्त्र को एक संग्रहग्रन्थ माना है, भरत मुनि की कृति नहीं माना। सदाशिव-मत, भरतमत एव ब्रह्ममत के विवेचन द्वारा ब्रह्ममत की ससारता प्रतिपादित करने के लिए उन-उन मतों के प्रतिपादक ग्रन्थो के खण्डों का प्रक्षेप (संग्रह) करके इस शास्त्र का निर्माण किया गया है। आचार्य अभिनवगुप्त यर्द्याप इस धारणा से सहमत नही, तथापि यह सिद्ध है कि आचार्य अभिनवगुप्त के काल, ईसा की दशम शती में भी नाटयशास्त्र को पश्चात्कालीन संग्रह माननेवाले विचारक विद्यमान थे। नाटयशास्त्र के उपलब्ध रूप मे अनेक स्थानों पर आनुवंश्य संग्रह-श्लोकों का अस्तित्व प्रमाणित करता है कि यह एक संग्रह-ग्रन्थ है, जिसका आधार काई प्राचीन ग्रन्थ और वंश-परम्परागत सामग्री है। नाटयशास्त्र मे 'नाटयवेद' की चर्चा है। प्रथम अध्याय के चतुर्थ श्लोक में श्रोता मुनिवृन्द-ग्रथित 'नाटयवेद' की चर्चा करते है। आतोद्यविधि में 'गान्धर्व-कल्प' नामक एक ग्रन्थ की चर्चा है,* जो सामगान करनेवालो से सम्बद्ध प्रतीत होता है और जिसमे 'मध्यम' को अविनाशी माने जाने की बात कही गयी है। शारदातनय के अनुसार 'पञ्चभारतीयम्' नामक एक ग्रन्थ का अस्तित्व भी था, जो सम्भवतः पाँच भरतो के सिद्धान्तों का संग्रह-ग्रन्थ रहा होगा। शारदातनय ने भरत के पुत्र पाँच बताये हैं। नाटयशास्त्र में भरतपुत्रों की संख्या सौ है। नाटयशास्त्र की जातियों मे मतभेद का सकेत भी मिलता है। कैशिकी जाति मे कभी ऋषभ को भी अपन्यास स्वर मानने की बात इस मतवैविध्य की ओर इद्धित करती है। नाटयशास्त्र के काशी-सस्करण एव बम्बई-संस्करण के अट्ठाईसवें अध्याय मे जातियो का वर्णन पद्य मे है, परन्तु नाटयशास्त्र के जिस रूप पर आचार्य अभिनवगुप्त ने टीका की है, उसमें जातियो का वर्णन गद्य मे है। नाटयशास्त्र की भाषा मे 'अपाणिनीय' प्रयोग प्राय. नही है। इस दृष्टि से नाटय-

  • गान्धर्बकक्पे विहितः सामगरपि मध्यमः। नाय्यशास्त्र

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शास्त्र का वर्तमान रूप बहुत अधिक प्राचीन नही प्रतीत होता, तथापि उसमें व्णित सिद्धान्त अत्यन्त प्राचीन हैं।

७. भरत और आदिभरत

अभिज्ञानशाकुन्तल की टीका में राघवभट्ट ने 'भरत' एव 'आदिभरत' दोनो के ही उद्धरण दिये है। भाण्डारकर-प्राच्य-संस्थान में सुरक्षित 'नाट्य-सर्वस्व-दीपिका' नामक हस्तलिखित ग्रन्थ को 'आदिभरत' की टीका समझा जाता है। इसके अनुसार आदिभरत मे पाँच स्कन्ध, वत्तीस अव्याय और दो सी इक्कीस प्रकरण थे एवं श्लोक- संख्या छः सहस्र थी। 'रत्नाकर' के टीकाकार कल्लिनाथ ने 'भरत' के कुछ ऐसे उद्धरण दिये है, जो वर्तमान संस्करणो मे नही मिलते। सात ग्रामरागो की चर्चावाला जो पाठ कल्लिनाथ को प्राप्त था, उसमें शुद्ध, भिन्न, वेसर, गौड एवं साधारण रागों का भी विनियोग नाटय मेंf दिष्ट था। शुद्धा, भिन्ना, गौडी, वेसरा एव साधारणी गीतियाँ दुर्गामत से सम्बद्ध है जो रागों के पाँच प्रकार वना देती है।* अतः यह सिद्ध है कि नाटयशास्त्र के अनेक संस्करण थे, जो परम्परागत सिद्धान्तो के संग्रहमात्र थे। उनमे पौर्वापर्य का निश्चय किया जाना कठिन है। नाट्यशास्त्र के वर्तमान रूप को अभिनवगुप्त ने भरतसूत्र कहा है, नान्यदेव भी नाटयशास्त्र के जातिलक्षणो को सूत्र ही कहते है।

आदिनाटयशास्त्र

मत्स्यपुराण मे नाट्यशास्त्र के प्रवर्तक भरत मुनि की चर्चा है। देवलोक मे भरत मुनि ने 'लक्ष्मी-स्वयंवर' नाटक की योजना की। उर्वशी लक्ष्मी का अभिनय कर रही थी, परन्तु देवसभा मे स्थित पुरूरवा के रूप पर मुग्ध होकर वह अपना अभिनय भूल गयी। अत भरत मुनि ने कुद्ध होकर उर्वशी और पुरूरवा दोनो को ही शाप दे दिया। इस प्रकरण मे भरत मुनि का नाम पॉच वार आया है। कालिदास ने इस कथा की ओर सकेत किया है और भरत मुनि के नाम एव कृति

  • तथा चाह भरत :- पूर्वरङ्ग तु शुद्धा रयाद भिन्ना प्ररतावनाश्रया। वेसरा मुखयो: कार्या गर्भे गौडी विधीयते॥ साधारिताऽवमशे रयात् सन्धी निर्वहणे तथा। -कतिल०, सं० र०टी०, राग०, अ० सं०, पृ० ३२

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का उल्लेख किया है। नयी खोजो के अनुसार कालिदास का काल ई० पू० प्रथम शती निश्चित हो चुका है। वाल्मीकिरामायण के बालकाण्ड एवं उत्तरकाण्ड को आधुनिक विचारक वाल्मीकि की कृति न मानकर प्रक्षिप्त भाग मानते हैं, परन्तु यदि इन काण्डों को प्रक्षिप्त माना जाय, तो भी इनकी भापा इन दोनों काण्डो को पाणिनि की अपेक्षा पुरातन सिद्ध करती है। आज के विद्वान् पाणिनि को ईसा से ७०० पूर्व किसी समय का व्यक्ति मानते है। अयोध्याकाण्ड से युद्धकाण्ड तक भी वाल्मीकि-रामायण मे सङ्गीत की जो चर्चा है, वह वाल्मीकि का भरत-सिद्धान्तो से परिचित होना भली भाँति सिद्ध करती है। रामायण के वर्तमान रूप मे 'प्रक्षेप' है, परन्तु सङ्गीत-विषयक चर्चा रामायण मे अत्यन्त स्वाभाविक ढंग से आयी है, उन सभी स्थलो को अकारण प्रक्षिप्त नही माना जा सकता। वाल्मीकिरामायण मे 'मत्तकोकिला' एवं 'विपञ्ची' जैसी प्राचीनतम वीणाओ की चर्चा है, परन्तु 'किन्नरी' जैसी सारिकायुक्त वीणा की चर्चा नहीं है। शुद्ध सात जातियो की चर्चा है, जिससे सिद्ध है कि चार पाड्जग्रामिक एवं तीन माध्यमग्नामिक जातियों से बाल्मीकि परिचित थे। विकृत अथवा ससर्गज जातियो की कोई चर्चा वाल्मीकि-रामायण मे नही। इस दृष्टि से भी यह सिद्ध है कि रामायण की रचना उस काल मे हुई जब कि शुद्ध जातियो का प्रचलन था और किन्नरी-जैसे सारिकायुक्त वाद्यो का जन्म नही हुआ था। रामायण मे सङ्गीत-शास्त्र की जिन परिभाषाओ का उल्लेख हुआ है, वे निम्न- लिखित है - काण्ड सर्ग इलोक १ गान्धर्व .. अयो० ३५ २ सङ्गीत .. किष्कि० २८ ३६-३७ ३ आतोद्य .. सुन्दर० १० ४९

४ समाज .. अयोघ्या० ५१ २३.

५ गीत .. १२ ७७

६ गीत .. वाल० - २७

स्वरविधि- ७ स्थान .. वाल० ४ १०८ .. सुन्दर० ४ १० S

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८ स्वर . सुन्दर० ४ १० ९ श्रुति . अयोध्या० १० मूच्छना ६५ २

११ स्थानमूर्च्छन · उत्तर० १३ १३ . वाल० ४ १० १२ जाति .. 31 ४ ४८ १३ करण उत्तर० ७१ १५ तत वादय-

१४ वीणा • अयोध्या ३९ २९ १५ मत्तकोकिला किष्कि० १ १५ १६ विपञ्ची · सुन्दर० १० ४१ सुषिर वाद्य- १७ वेणु . किप्कि० ३० ५० १८ शंख .• युद्ध० ४२ ३९ अनवद्ध वाद्य-

१९ दुन्दुभि .. युद्ध० ४२ ३९ २० भेरी 11 ४४ १२ २१ पटह सुन्दर० १० ३९ २२ मृदङ्ग 11 १० ४२ २३ डिण्डिम ४४ २४ पणव 11 ४३ २५ मुरज ११ ६ २६ मड्डक 11 १० ३८ २७ आडम्बर 11 ४५ २८ चेलिका ११ ६ वादनोपकरण-

२९ कोण .• युद्ध० ४२ ३४ तालविधि-

३० मात्रा • उत्तर० २४ ७

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३१ कला · उत्तर० २४ ३२ लय ७ .. वाल० ३३ प्रमाण २ १८

  • ३४ ताल उत्तर० ९४ २

३५ समताल 11 .. उत्तर० ३६ अक्षरसम ७१ १५ 9 मार्ग .. बाल० २ १८ ४ ३८ शम्या ३६ .. अयोव्या० ३९ गीति ९१ ४९ .. उत्तर० ७१ १८ नृत्यविधि- ४० नृत्य ४१ अङ्गहार .. सुन्दर० ११ ५ . . 11 १० ३६ नाटरयविधि -- ४२ रङ्ग युद्ध० ४३ नाटक .. २४ ४३ .. बाल० .. अयो० १२१ ६९ शास्त्रज्ञ-

४४ पूर्वाचार्य .. उत्तर० ४५ लक्षणज्ञ ९४ २

11 ४६ कलामात्राविशेपज्ञ ९४ ५-६

11 सङ्गोतज्ञ पात्र-

१ राम अयोध्या० २ सीता २ १५ 11 ३ रावण ३९ २९ युद्ध० २४ ४२-४३ गंघर्द-

१ नारद .. अयोव्या० २ तुम्बुरु ९१ ४६

३ गोप 11 .. 11

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अप्सराऐं- १ अलम्बुपा .. अयोव्या० ११ ४७ २ मिश्रकेशी 11 ३ पुण्डरीका 11 ४ वामना इस स्थिति से यह निश्चित हो जाता है कि महर्पि वाल्मीकि आदिम नाटयशास्त्र के विपय से भली भांति परिचित थे, फलत. हमारी दृष्टि मे नाट्यवेद के आदिप्रवक्ता भरत वाल्मीकि से पूर्ववर्ती थे। निम्नलिखित कारण हमें इस निष्कर्ष पर पहुँचाते है- (क) नाट्यशास्त्र मे उपलब्ध अनुश्रुति महर्पि भरत को महाराज नहुप का समकालीन वताती है, जो भगवान् राम से पीढियो पूर्व हुए है और आधुनिक अनुसन्धानों के परिणामस्वरूप एक वैदिककालीन नरेश सिद्ध हो चुके है। (ख) नाटयशास्त्र के काशी-संस्करण में भगवान् वाल्मीकि को नाटयवेद के श्रोता ऋपियो मे गिनाया गया है। इससे सिद्ध है कि नाटयशास्त्र का सग्रहकार भी महर्षि वाल्मीकि का उपजीव्य (श्रद्धेय) किसी 'भरत' को मानता था। (ग) वाल्मीकि के टीकाकार राम ने उत्तरकाण्ड मे प्रयुक्त 'पूर्वाचार्य' शब्द का अर्थ 'भरत' किया है। अत. इस टीकाकार को उपलब्ध अनुश्रुति भी भरत को वाल्मीकि की अपेक्षा पूर्वाचार्य सिद्ध करती है। (घ) कालिदास एवं मत्स्यपुराण के अनुसार भी नाट्य के आदिम प्रयोक्ता 'भरत' ही है। (ड) वाल्मीकिरामायण का अन्तःसाक्ष्य भरत के सिद्धान्तों से वाल्मीकि का पूर्णतया परिचित होना सिद्ध करता है। हमारी दृष्टि मे वाल्मीकि, पाणिनि से कही पूर्ववर्ती है और भरत वाल्मीकि से भी पूर्व हुए है। ईसा से पूर्व किसी न किसी शतान्दी मे वाल्मीकि या भरत-जैसी महाविभूतियो को कहीं न कही 'फिट' कर देना हमारे वंश की बात नही।

८. भरत-सिद्धान्तों पर विदेशी प्रभाव ?

भारतीय वाडमय जव ऐतिहासिक दृष्टि से पाश्चात्य विद्वानो के विचार का विषय बना, तब उन्होने भारतीय संस्कृति के उस मूल को खोजना चाहा, जिसकी जडें सुदूर अतीत मे न जाने कहाँ तक चली गयी हैं। उनकी अपनी विशिष्ट मान्यताएँ उन्हें

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अतीत में एक विशिष्ट सीमा तक ले गयी, जिसके अन्तर्गत उन्होने भारतीय वाङमय की अमर कृतियो को काल की दृष्टि से किसी न किसी शताब्दी मे कही न कही ठीक इसी भाँति पटक दिया, जिस भॉति कोई भारवाहक थककर चूर हो जाता है और गन्तव्य स्थान तक पहुँचने से पूर्व ही मार्ग में कही भी सिर पर लदे भार को पटककर हाँफने लगता है। यह ठीक है कि किसी सीमा तक पर्याप्त सामग्री के अभाव के कारण उन विचारको के मार्ग मे कठिनाइयॉ थी, परन्तु साथ ही साथ यह भी नही भूला जाना चाहिए कि वे अनेक विशेषताओ का श्रेय पराधीन भारत की शासित जाति को न देकर अपने पूर्वजो के गुरु 'यूनान' जैसे देशो को देना चाहते थे। शासक जाति शासित जाति का स्वाभिमान एवं आत्म-विश्वास नष्ट करने के लिए सब कुछ करती है। भारतीय नाटको पर यूनान का प्रभाव सिद्ध करने मे कुछ सज्जनो ने एडी-चोटी का जोर लगा दिया, जब कि यूनान मे 'प्रेक्षागृह' जैसी कोई वस्तु नही थी, सात्त्विक अभिनय के लिए कोई स्थान नही था और यवनिका होती ही नही थी। सन्तोप का विपय है कि पिछली पीढ़ी के जर्मन विद्वान् वेवर ने अपने जीवन मे ही यह मान लिया था कि भारतीय नाटक की उत्पत्ति स्वतन्त्र रूप मे हुई है, भले ही उस पर ग्रीक प्रभाव हो। मनुस्मृति के अनुसार तो संस्कारो के लोप एव ब्राह्मणो के अदर्शन के परिणाम- स्वरूप 'यवन' एव 'शक' जातियो का क्षत्रियत्व नप्ट हो गया। 'मानव' धर्म का प्रभाव हटने के कारण 'यवन' 'शक' इत्यादि जातियो को वृषलत्व की प्राप्ति हुई। इसका अर्थ तो यह है कि यवनो (यूनानियो) पर ही आरम्भ मे मनु के आचार का प्रभाव पड़ा, जो सम्भवतः राजनीतिक कारणो से शनै-शनैः कम होता गया। जिन्हे पाश्चात्यो का नाम सुने विना सन्तोष न होता हो, उनको सन्तुष्ट करने के लिए इतना पर्याप्त है कि प्रो० वेर्नर या एगर ने अपनी अरिस्तौतिली के विकास की पुस्तक मे भारतीय विद्वानो का यूनान में पहुँचना भारत पर सिकन्दर के आक्रमण से कही पूर्व सिद्ध किया है। प्रो० उर्विक ने प्लातौन की रिपब्लिक नामक पुस्तक पर भारतीय सिद्धान्तो का प्रभाव सिद्ध किया है। यूनान और भारत के सम्बन्धो पर जिन पाश्चात्य विद्वानो ने विचार किया है, वे संस्कृत एवं ग्रीक दोनो भापाओ से परिचित थे। आवश्यकता है कि हम भारतीय इन दोनो भाषाओ का अध्ययन करके इस विषय पर स्वतन्त्र दृष्टि से विचार करे। भरत के संगीत-सिद्धान्ती को अस्पष्ट एवं श्रुति-विभाग-सिद्धान्त को आडम्वर मात्र घोषित करके कुछ पाश्चात्य सज्जनो ने सन्तोष-लाभ किया, तो कुछ मूर्तियाँ

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भरत की 'प्रमाणश्रति' को पायथोगोरस का प्रसाद सिद्ध करने में जुट गयी। ग्रीक एवं संस्कृत दोनों भापाओ से अपरिचित कुछ 'म्यूजिक-टीचर' आज भी कुछ ऐसी ही अनर्गल वाते यदा-कदा लिख डालते है। उन्नीसवी शती के अन्त एवं वीसवी शती के आरम्भ मे भारत के शिक्षित कहे जाने- वाले समुदाय का पर्याप्त भाग अपने आपको पाश्चात्यों की दृष्टि में 'प्रगतिवादी' एवं 'भारतीयों का आधुनिकतम संस्करण' सिद्ध करने में लगा था। वह स्वयं को उस वर्ग से पृथक करके दिखाना चाहता था, जो पाश्चात्यो की दृष्टि में रूढिवादी था। इस 'आधुनिकतम' भारतीय ने प्रत्येक उस 'नारे' को दुहराने मे अपनी विशालहृदयता एवं निपुणता-इतिकर्त्तव्यता समझी, जो पर्चिम से उठा हो। भारतीय मूलग्रन्थों से अपरिचय, संस्कृत भापा के पठन-पाठन की परम्परा के ह्रास, प्राचीन सम्प्रदायों के लोप एवं मैकाले-महोदय की गिक्षा-योजना के परिणाम- स्वरूप वडी-बडी मनोरञ्जक बातें कहनेवाले व्यक्ति भारत में ही उत्पन्न हुए। इस स्थिति से सङ्गीतक्षेत्र भी अछूता न रहा। नाट्यशास्त्र को अपने दर्शन से कृतकृत्य करने के पूर्वं ही पडितम्मन्य मनीपियो (!) ने उसे अस्पष्ट घोषित कर डाला। कुछ सज्जनो ने यह व्यवस्था दे दी कि संस्कृत भापा के शब्द अनेकार्थवाची होते है, फलत. ग्रन्थो के वास्तविक तात्पर्य का समझा जाना सम्भव नही। किन्ही महानुभाव ने यह लिख दिया कि नाट्यशास्त्र मे 'सङ्गीत' शब्द नही, तो किसी ने यह स्थापना कर डाली कि नाट्यशास्त्र में 'राग' शब्द नही, हो भी तो प्रच- लित अर्थ में नही। इतना अवकाश किसे था कि नाट्यशास्त्र को स्वयं पढ़कर 'सङ्गीत' और 'राग' शब्दो को उसमे देखे। जिस नाट्यशास्त्र मे एक नही सात 'राग' विद्यमान है, 'राग' एवं 'सङ्गीत' शब्दों का प्रयोग एक से अधिक स्थानों पर है, उस नाट्यशास्त्र के सम्वन्ध मे ऐसे सज्जन भी विचार करते, भाषण देते पाये जाते है, जिनका सम्बन्ध कम से कम इस जीवन में तो नाट्यशास्त्र के साथ सम्भव नही। यदि कोई सज्जन ग्रेजुएट भी है, सङ्गीत की भी कोई परीक्षा उन्होंने पास कर ली है, सङ्जीत के दुर्भाग्य एवं अपने सौभाग्य से किसी प्रतिप्ठित कही जानेवाली संस्था में सङ्गीत के अध्यापक भी नियुक्त हो गये है, तो उन वेचारो को भाषण भी देने पडते हैं। भापण मे कुछ न कुछ तो कहा ही जाना चाहिए। कही जाय, तो कोई विचित्र एवं मौलिक वात कही जाय। फलत पड्जग्राम, गान्धारग्राम पर सङ्कट आता है, इनके विलक्षणतम भापण स्वयं इनके लिए भी अस्पष्ट स्पष्टीकरण (1) होते हैं। ऐसा भी होता है कि दवदुर्विपाक से महर्पि भरत पर पायथोगोरस की छाया पड़ने लगती है।

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हिन्दी, संस्कृत, इंगलिश एवं ग्रीक भाषा के मर्मज्ञ विद्वान् पण्डित भोलानाथ शर्मा एम० ए० (वरेली-कालेज, संस्कृत-विभाग) का कथन है कि पायथोगोरस के किसी भी ग्रन्थ का आज अस्तित्व नही, प्राचीन ग्रीक ग्रन्थो के उद्धरणो एवं अनुश्रुतियों के आधार पर ही उसकी चर्चा होती है। ऐसी स्थिति मे पायथोगोरस का प्रभाव भरत पर ढूंढ़नेवाले व्यक्तियो की गणना संसार के प्रमुखतम आश्चर्यो मे होनी चाहिए। वाल्मीकि एव आदिभरत से पूर्व 'पायथोगोरस' का अस्तित्व सिद्ध होना अभी शेष है। ६. महर्षि भरत के स्वर और आधुनिक भौतिक विज्ञान सङ्गीतप्रयोज्य ध्वनियो के सम्बन्ध में आधुनिक भौतिक विज्ञान ने कुछ सिद्धान्त निश्चित किये है। हमे उन सिद्धान्तो के प्रति कोई विरोध या अनुरोध नही है। महर्षि भरत के सङ्गीत पर विचार करनेवाले अनुसन्धानकर्ता के सम्मुख मूल प्रश्न यह आता है कि आधुनिक सूक्ष्मतम वैज्ञानिक उपकरणो के अभाव मे प्राचीन महर्षि स्वरसम्बन्धी सनातन सिद्धान्तो तक किस विधि से पहुचे, उस आर्पविवि की खोज ही अनुसन्धानकर्ता का लक्ष्य होना चाहिए। महर्षि भरत की सारणाविधि के परिणामस्वरूप हमे श्रुतियो के तीन परिमाण प्राप्त हुए है। व्यावहारिक सुविधा के लिए हमने इनका नाम 'क', 'ख', 'ग' किया है, ये परिमाण क्रमशः छोटे होते गये है। 'ख' और 'ग' मिलकर प्राय 'क' के समान हो जाते है। चतुःश्रुतिक स्वरो मे इनका क्र्म 'ग, क, ख, ग', त्रिश्रुतिक स्वरो मे 'क, ख, ग' और द्विश्रुतिक स्वरो मे 'ख, ग' होता है। काकलीनिपाद एव अन्तरगान्धार निषाद एवं गान्वार की शुद्ध अवस्था से 'ग, क' अन्तर पर रहते है। सारणाविधि के परिणामस्वरूप ज्ञात श्रुतियों में एक सप्तक के अन्तर्गत पाँच 'क', सात 'ख' एवं दस 'ग' श्रृतियाँ होती है। 'ग' श्रुति 'प्रमाणश्रुति' है, जो प्रत्येक चतुःश्रुतिक स्वर के आदि एवं अन्त मे त्रिश्रुतिक धैवत और ऋषभ तथा द्विश्रुतिक गान्धार एव निषाद के अन्त भे रहती है। इस प्रमाणश्रुति का ज्ञान ही स्वरो के भरतोक्त आयतत्व एव मृदुत्व का ज्ञान कराता है और सङ्गीतप्रयोज्य ध्वनियों की अनन्तता का साधक है। १०. मौलिकता का दावा नही पूर्व पुरुषो के सिद्धान्तो की व्याख्या करनेवाला व्यक्ति मौलिकता का दावा नहीं किया करता, वह तो पूर्वोक्त तथ्यो को केवल स्पप्ट करने के लिए सचेष्ट मात्र होता है। लेख़ क को ग्रन्थ-सामग्री की मौलिकता का गर्व इसी लिए नही है। ग्रन्थ मे जो कुछ कहा गया है, उसके आधारो को उद्धृत करने का यथासम्भव प्रयत्न किया गया है।

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ग्रन्थ लिखने का मुख्य प्रयोजन हिन्दी-पाठकों के समक्ष कुछ तथ्यो को उद्घाटित करना है, किसी व्यक्ति-विशेष या वर्गविशेप का खण्डन नही। सस्कृत-ग्रन्थो के यथास्थान उद्धरण उन अनुसन्धानकर्त्ताओं के लिए उपयोगी सिद्ध होगे, जो इस दिशा मे सचमुच कुछ कार्य करना चाहते है। खण्डनात्मक पद्धति उस वर्ग के पाठको के मन में ग्रन्थ के प्रति एक आक्रोश उत्पन्न करती है, जो किसी व्यक्ति या वर्गविशेष के प्रति जन्मना अथवा चिरकाल से श्रद्धा रखते है, फलतः इस ग्रन्थ को आधुनिक विचारको के खण्डन से दूर रखा गया है। यदि जिज्ञासु पाठको एव अधिकारी विद्वानो ने सरल भाव एव मर्मस्पशिनी दृष्टि से प्रस्तुत कृति का मूल्याङ्कन किया, तो इसके अकिञ्चन कर्ता को प्रसन्नता होगी। जातियों एव ग्रामरागो को गेय एवं वादनीय रूप से प्रस्तुत करने का सफल प्रयत्न इस ग्रन्थ के लेखक द्वारा किया जा चुका है। वाग्गेयकार की सीमाओ एव कर्तव्यो का ध्यान रखते हुए इनके उदाहरणों की रचना एव शिक्षा का कार्य यथासम्भव हो रहा है। तथापि व्यक्ति की सीमाएँ होती है, इन कार्यो के लिए राजकीय सहायता अनिवार्य- अपेक्षित हांती है। भगवान् आशुतोप को यदि इस शरीर से कुछ कार्य लेना है, तो साधन स्वय जुट जायँगे- गुणहीन व्यक्ति, गुण को परख नही सकता और एक गुणी दूसरे गुणी के प्रति मत्सरी होता है। एसा सरल व्यक्ति विरल होता है, जो गुणो भा हा और गुणरागी भी। श्री ठा० जयदेवसिहजी के रूप मे मुझे ऐसे ही सरल एव विरल व्यक्तित्व का स्नेहमय सम्पर्क प्राप्त हुआ है। वे सगीतममज्ञ तो है ही, ऐसे कई शास्त्रो के साथ भी उनका प्रगाढ परिचय है, जिनके अच्छे ज्ञान के अभाव मे किसी को प्राचीन सङ्गीतशास्त्र के स्पर्श का भी अधिकार नही है। उन्होने इस ग्रन्थ के भूमिका-लेखन के लिए अपनी कठिन परिस्थितियों पर विजय प्राप्त करके कुछ समय निकाल ही लिया, यह उनके विद्याव्यसन एव गुणरागित्व का प्रमाण है। सूचना-विभाग,उत्तर प्रदेश के सञ्चालक एवं हिन्दी-समिति के सचिव श्री भगवती- शरणसिंहजी के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने के लिए मेरे पास उपयुक्त शब्द नही; प्रस्तुत ग्रन्थ का प्रकाशन जिनकी सङ्गीताभिरुचि एव गुणग्राहिता का परिणाम है। अन्तत :- आपरितोपाद् विदुपा साधु न मन्ये प्रयोगविज्ञानम् । वलवदर्पि शिक्षितानामात्मन्यप्रत्यय चेतः ॥l कैलासचन्द्र देव बृहस्पति

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मडलाचर समू

गिरिजापाङ्गविलासवशीकृतहृदयमधीनमधीरम्, विरहितछद्मवेषमचिरम्प्रकटीकृतगौरशरीरम् । छलनगतञ्छलितन्नगतनयावचनचातुरीक्रीतम्, नौमि शङ्करं प्रियासखीजनललितं कविकुलगीतम् ॥ १॥ चञ्चलयुवतिदृगञ्चलसञ्चितमदिरमधुरस क्कताम्, प्रियतमपदपल्लवनतनयनामालिविनोदमुपेताम्। चन्द्रमौलिसितहास कण्टकितरोमामरुणकपोलाम्, नौमि पार्वतीमीशविलोकनविरहितसंशयदोलाम् ।। २ ।। जलनिधिमन्थनमधुरपरिणतिं हरिपरिणयमुपनीताम्,

मुकुलितनलिनविलोचनरुचिरामतिपुलकितगतिधीराम्, नौमि सिन्धुजामिन्दीवरतनुसौरभरुचिरसमीराम् ॥ ३॥ अलिकुलकोकिललालनललिते यमुनातीरनिकुञ्जे, मधुगुञ्जनजितगीतगुन्जिते मञ्जुलसुपमापुञ्जे। राधारूपधरामतिमधुरां मुरलीध्वनिसंवीताम्, नौमि माधवं मोदयन्तमनिशं प्रियतमां पुनीताम् ॥ ४ ॥ गङ्गातुङ्गतरङगकेलिललितं गजवदनमुदारम् लम्वकरग्रहपत्तितकसुमकुलविरचितसुन्दरहारम्। जननीकन्ठसमर्पणमनसं वालसुलभकृतिलोभम्, नौमि गणेशं मुदितमहेशं विमलवुद्धिवलशोभम्॥५ ॥

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प्रथम अध्याय

ग्राम

जिन महर्षियों को सत्य का साक्षात्कार हो चुका हो, उन्हें 'आप्त" कहा जाता है। 'आप्त' महापुरुषो के वाक्य 'शब्द" कहलाते है। नैयायिको ने 'प्रत्यक्ष' इत्यादि प्रमाणों मे 'शव्दप्रमाण' की भी गणना की है।१ भारतीय विचारक श्रुतिवचनों एवं आप्तवाक्यों को 'शब्दप्रमाण' के रूप में ग्रहण करते आये है। नाटय के क्षेत्र में महर्षि भरत 'आप्त' हैं। महर्पि भरत का प्रधानतया प्रतिपाद्य विषय नाटय है। कोई ज्ञान, शिल्प, विद्या, कला, योग या कर्म ऐसा नही, जो नाटय मे न आता हो, अतः उसके अन्तर्गत महर्पि ने गीत, वाद्य और नृत्य का भी वर्णन किया है। महर्षि के अनुसार नाटय के प्रयोक्ता को पहले गीत में परिश्रम करना चाहिए, क्योकि 'गीत' नाटय की शय्या है, गीत और वाद्य भली-भाँति प्रयुक्त होने पर नाटच- प्रयोग मे कोई विपत्ति नही आती।"

१-आप्तस्तु यथार्थवक्ता। -अननंभट्ट, शब्दपरिच्छेद, तर्कसंग्रह २-आप्तवाक्यं शब्दः । -- अन्नंभट्ट, शब्दपरिच्छेद, तर्कसंग्रह ३- यथार्थानुभवश्चतुविधः। प्रत्यक्षानुमित्युपमितिशाव्दभेदात्। तत्करणमपि चतुर्विधम्। प्रत्यक्षानुमानोपमानश्दभेदात्। -अन्नंभट्ट, प्रत्यक्षपरिच्छेद, तर्कसंग्रह ४-न तच्छ तं न सा विद्या न स न्यायो न सा कला। न स योगो न तत्कर्म यन्नाटयेऽस्मिन्न दृश्यते॥ -भरत०, व० सं०, प्रथम अध्याय, पृ० १२ ५गीते प्रयत्त. प्रथमं तु कार्य्य. शय्यां हि नाट्यस्य वदन्ति गीतम्। गीते च वाद्ये च सुप्रयुक्ते नाटयप्रयोगो न विपत्तिमेति॥ -भरत०, व० सं०, अध्याय ३२, पृ० ६०३

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२ भरत का संगीत-सिद्धान्त

'पूर्वरङ्गविधि" एवं 'ध्रुवागान" मे 'गीत', 'वाद्य' और 'नृत्य' का प्रयोग विहित् है, फलतः महर्षि भरत ने गीत, वाद्य और नृत्य का वर्णन सूत्ररूप मे किया है, परन्तु उनके द्वारा किया हुआ विपय-प्रतिपादन संक्षिप्त होते हुए भी इतना पूर्ण है कि 'गीत', 'वाद्' एवं 'नृत्य' इत्यादि के सम्वन्ध में विचार करनेवाले पश्चाद्वर्ती प्रत्येक आचार्य ने महर्षि भरत के वचनो को प्रमाणरूप में उद्धृत किया है। 'गीत', 'वाद्य' एवं 'नृत्य' ही क्यो, नाटयविद्या से सम्बद्ध किसी भी विषय में महर्रि भरत की सम्मति प्रमाण मानी जाती है। व्याकरण के क्षेत्र मे जिस प्रकार पाणिनि, कात्यायन या पतञ्जलि 'मुनि' कहलाते है," उसी प्रकार भरत भी नाट्य एवं तत्सम्बन्धी क्षेत्रो मे 'मुनि' कहे जाते है। यही नही, इन क्षेत्रो मे 'मुनि' शब्द भरत का पर्यायवाची माना जाता है।१ जिस प्रकार श्री शङ्गर एवं श्री रामानुज-जैसे आचार्यो ने प्रस्थानत्रयी (उपनिषद्, व्रह्मसूत्र और गीता) को प्रमाण मानकर अपने-अपने दार्शनिक विचारो का प्रतिपादन किया है, उसी प्रकार नाटय एवं तत्सम्बद्ध विषयों पर विचार करते समय विभिन्नमार्गीय आचार्यो ने अपने पक्ष की पुष्टि के लिए महर्पि भरत के वचनो का आश्रय लिया है। 'भरतनाटयशास्त्र' पर अनेक व्याख्याएँ लिखी गयी है", परन्तु वे मिलती नही।

६-यस्माद्रङ्गप्रयोगोऽयं पूर्वमेव प्रयुज्यते। तस्मादय पूर्वरङ्गो विज्ञेयो द्विजसत्तमा. ॥ -- भरत०, व०स०, अध्याय ५, पृ० ६८ ७-ध्रुवासंज्ञानि तानि स्युर्नारदप्रमुखैद्विजैः। गीताङ्गानीह सर्वाणि विनियुक्तान्यनेकश ।। या ऋच: पाणिका गाथा स्सप्तरूपाङ्गमेव च। सप्तरूपप्रमाणं च तद् ध्रुवेत्यभिसज्ञितम्॥ -- भरत०, व० सं०, अध्याय ३२, पृ० ५३₹ ८-मुनित्रयं नमस्कृत्य तदुक्ती परिभाव्य च। वैयाकरणसिद्धान्तकौमुदीयं विरच्यते ॥ -सिद्धान्तकौमुदी मङ्गलाचरण ९-तण्डुमुनिशब्दौ नन्दिभरतयोरपरनामनी। -भरतनाटयशास्त्र, व० सं० की भूमिका मे सम्पादक द्वारा उद्धृत 'अभिनवभारती' का वाक्य १०-व्याख्यातारो भारतीये लोल्लटोद्भटशडकुका.। भट्टाभिनवगुप्तश्च श्रीमत्कीर्ति- धरः पर:॥ -- आचार्य्य शार्ङ्गदेव, स० र०, अ० स०, स्वरा०, पृ० १३

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ग्राम ३

श्री अभिनवगुप्ताचार्य के द्वारा की हुई व्याख्या उपलब्ध तो है, परन्तु उसका कुछ अंश अमुद्रित होने के कारण सर्वजनसुलभ नही। तथापि भरत के रससम्बन्धी सूत्र 'विभावा- नुभावव्यभिचारिसंयोगाद् रसनिष्पत्ति.' पर मीमांसक आचार्य्य भट्ट लोल्लट, नैयायिक आचार्य्य शडकुक, सांख्यवादी आचार्य्य भट्ट नायक एव आलङ्कारिक आचार्य्य श्री अभिनवगुप्ताचार्य्य की व्याख्याओ से, 'रस' का विचार करनेवाले सज्जन सर्वथा परिचित है।१ शताब्दियो की पराधीनता एव तज्जन्य दुष्प्रभावो के कारण हमारी अनेक विद्याओं एवं कलाओं का पतन हुआ और वे परम्पराएँ नष्ट हो गयी, जो श्री अभिनवगुप्ताचार्य्य- जैसी महाविभूतियो को जन्म देती थी, फलत. अनेक प्राचीन ग्रन्थ हमारे लिए दुर्बोध हो गये। ज्ञान प्राप्त करने के लिए दृष्टि मे निर्मलता, हृदय में सौम्यता तथा प्रत्येक प्रकार के सयम की आवश्यकता होती है।१ शुद्ध, अप्रमत्त, मेधावी, ब्रह्मचारी एवं निर्द्वेष व्यक्ति विद्या का पात्र होता है।१ विज्ञान के प्रति अविज्ञाता की असूया होती है,१४ वह स्वय समझ तो सकता नही और अपना दोष आचार्य्य पर डालता है और कहता है

११-इदं हि भरतसूत्र तट्टीकाकृद्दि भट्टलोल्लट-श्रीशङकुक-भट्टनायकाभिनवगुप्त- पादैश्चतुर्भि. क्रमेण मीमासान्यायसांख्यालङ्कारमतरीत्या चतुर्धा व्याख्यातम्। -आचार्य्य वामन, 'काव्यप्रकाश'-टीका १२-विद्या ह वै ब्राह्मणमाजगाम। गोपाय मा शेवधिष्टेऽहमस्मि। असूयकायानृजवे- ज्यताय न मा ब्रूया वीर्य्यवती तथा स्याम्। ....... अर्थात्-विद्या ने ब्राह्मण से आकर कहा-तू मेरी रक्षा कर, मै तेरी निधि हूँ। ईर्ष्यालु, कुटिल, असंयत व्यक्ति को मेरा उपदेश न कर, (तब) मै बलशालिनी होऊँगी।" -यास्ककृत निरुक्त, द्वितीय अध्याय, चतुर्थ प्रकरण। १३-यमेव विद्याः शुचिमप्रमत मेधाविनं ब्रह्मचर्य्योपपन्नम्। यस्ते न द्रुह्ेत् कतमच्च नाह तस्मै मा वूया निधिपाय ब्रह्मन्। अर्थात्-जिसे तू शुद्ध, अप्रमत्त, मेघावी, ब्रह्मचर्य्ययुक्त देखे, जो तुझसे द्रोह न करे, हर किसी (अपात्र) के हाथ मे मुझे देता न फिरे, ऐसे निधिरक्षक को मेरा उपदेश कर। -यास्ककृत निरुक्त, द्वितीय अध्याय, चतुर्थ प्रकरण २४-नित्यं ह्यविज्ञातुर्विज्ञानेऽसूया। -यास्ककृत निरुक्त, द्वितीय अध्याय, चतुर्थ प्रकरण

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४ भरत का संगीत-सिद्धान्त

कि आचार्य्य स्वयं तो समझता नही, मुझे क्या समझायेगा।" इसी लिए शास्त्र में उस व्यक्ति को विद्यादान के लिए सुपात्र नही माना गया, जो श्रद्धापूर्वक आचार्य्य के चरणों में बैठकर विद्याग्रहण के लिए सचेप्ट न हो।१ अस्तु, आज महर्पि भरत-जैसे 'आप्त' महात्मा के सङ्गीतसम्वन्धी वाक्यो को समझने के लिए श्रद्धा' की और भी आवश्यकता है। हमारे विचार का विषय वह सङ्गीत है, जिसकी उत्पत्ति का आधार तो अवश्य 'वेद' है, परन्तु जो लौकिक विनोद का साधन भी है। अतएव यज्ञ-यागादिक में प्रयोज्य स्वरों और उनके प्रयोगो पर विचार न करके हम अपने आपको भरत मुनि के उस 'तीर्यत्रिक' तक सीमित रखेगे, जिसका प्रयोजन जनमनोरञ्जन है। इस तौर्यंत्रिक का फल 'अदृष्ट' भी है, यह पारलौकिक कल्याण का भी साधन है, परन्तु यह उस 'नाट्य' का अङ्ग है, जिसकी उत्पत्ति ही 'कीडनीयक' के रूप में हुई है,१७ भले ही उसे पञ्चम वेद की संज्ञा दी गयी हो।१ भगवान् व्रह्मा ने नाटय के लिए 'पाठय' ऋग्वेद से, 'गीत' सामवेद से, 'अभिनय' (नृत्यसहित) यजुर्वेद से तथा 'रस' अथर्ववेद से लिये।११ भगवान् ब्रह्मा के अनुसार नाट्य में कही 'धर्म' तो कही 'कीडा', कहीं 'अर्थ' (धन) तो कही 'शान्ति', कहीं 'हास्य' तो कही 'युद्ध' और कही 'काम' तो कही 'वध' है।१० इसमे धर्मात्माओं के लिए धर्म्म, कामरूपी लक्ष्य की सिद्धि करनेवालो के लिए काम, दुर्विनीतो के लिए निग्रह, प्रमत्तों का दमन, नपुसकों की धृष्टता को बढावा, अपने आपको शूर समझनेवालों के लिए उत्साह, अबोध व्यक्तियों के लिए ज्ञान, विद्वानो के

१५-स हयनववुध्यमान आत्मीयं दोषमाचार्य्य एवावसृजति-स्वयमेव तावदयं न वुध्यते, किमस्मान् वोधयिष्यति। -दुर्गाचार्य्य, निरुक्त के पूर्वोक्त वाक्य पर टीका १६-नानुपसन्नाय। -- यास्ककृत निरुक्त, द्वितीय अध्याय, चतुर्थ प्रकरण १७-महेन्द्रप्रमुखैदेवैरुक्त. किल पितामहः। क्रीडनीयकमिच्छामो दृश्यं श्रव्यं च यद् भवेत् ।। -- भरत०, व० सं०, अ० १, पृ० २ १८-नाट्याख्य पञ्चमं वेदं सेतिहासं करोम्यहम्।-भरत०, व०सं०, अ० १, पृ०२ १९-जग्राह पाठयमृग्वेदात्सामभ्यो गीतमेव च। यजुर्वेदादभिनयान् रसानाथर्वणादपि।। -भरत०, व०सं०, अ० १, पृ० २ २०-क्वचिद् धर्म. क्वचित् क्रीडा क्वचिदर्थ. क्वचिच्छमः। क्वचिद्धास्यं क्वचिद्युद्ध क्वचित्काम: क्वचिद्वधः ॥ -- भरत०, व० सं०, अ० १, पृ० ११

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ग्राम ५

लिए विदग्धता, ऐश्वर्य्यशाली व्यक्तियो के लिए विलास, दु.खी के लिए धैर्य्य, धन कमानेवालो के लिए धन और उद्विग्नचित्त व्यक्तियों के लिए सान्त्वना है।२१ दु.खी, शोकार्त, श्रान्त एवं तपस्वी (बेचारे) व्यक्तियों को विश्रान्ति देने के लिए भगवान् ब्रह्मा ने नाट्य की सृष्टि की ।२१ सुख-दु.ख से युक्त लोक का स्वभाव ही आद्भिक, वाचिक इत्यादि अभिनयों से युक्त होने पर नाटय कहलाता है।२२ 'गीत' नाटय का अङ्ग ही नही, प्राण है, अतः उसका प्रयोजन नाटय से भिन्न नही, 'वाद्य' एवं 'नृत्य' गीत के उपरञ्जक एवं उत्कर्षविधायकमात्र है,२अतः तौर्य्यत्रिक (गीत, वाद्य और नृत्य) के अदृष्ट फल में पूर्णतया विश्वास करते हुए भी हमारा दृष्टि- कोण प्रधानतया लौकिक रहेगा।

ग्राम, स्वर, श्रुति 'ग्राम' शब्द समूहवाची है, जिस प्रकार कुटुम्ब मे लोग मिल जुलकर मर्यादा की रक्षा करते हुए इकट्ठ रहते है, उसी प्रकारसव दी स्वरी का वह समूह ग्राम है, जिसमें श्रुतियॉ व्यवस्थित रूप मे विद्यमान हो और जो मूर्च्छना, तान, वर्ण, कम, अलकार इत्यादि का आश्रय हो।१ ग्राम तीन हैं, षड्ज-ग्राम, मध्यम-ग्राम और गान्धार-ग्राम।

२१-धर्मो धर्मप्रवृत्तानां काम. कामार्थसेविनाम्। निग्रहो दुर्विनीतानां मत्ताना दमन- क्रिया॥ क्लीबानां धार्ष्टयजननमुत्साह शूरमानिनाम्। अवोधानां निबोधरच वैदग्ध्यं विदुषामपि॥ ईश्वराणां विलासश्च स्थैर्य्य दु.खादितस्य च। अर्थोप- जीविनामर्थो धृतिरुद्विग्नचेतसाम्॥ -भरत०, व० सं०, अ० १, पृ० ११ २२-दु.खार्तानां श्रमार्ताना शोकार्तानां तपस्विनाम्। विश्रान्तिजननं काले नाटय- मेतद् भविष्यति॥ -भरत०, व० सं०, अ० १, पृ० १२ २३-योऽयं स्वभावो लोकस्य सुखदु.खसमन्वितः । सोऽङ्गाद्यभिनयोपेतोनाटय मित्यभि- धीयते।। -- भरत०, व० सं०, अ० १, पृ० १२ २४-प्राणभूतं तावद् ध्रुवागानं प्रयोगस्य। ---- आचार्य्य अभिनव०, अभिनवभारती, बडोदा-संस्करण, तृतीय खण्ड, पृ० ३८६ २५-नृत्तं वाद्यानुग प्रोक्तं वाद्यं गीतानु्वत च। --- आचार्य्य शार्गदेव, सं० र०, अ० सं०, स्वरा०, पृ० १५ २६-समूहवाचिनौ ग्रामौ स्वरश्रुत्यादिसंयुतौ। यथा कुटुम्बिन. सर्वे एकीभूय वसन्ति हि। सर्वलोकेषु स ग्रामो यत्र नित्य व्यवस्थितः । पड्जमध्यमसंज्ञौ तु द्वौ ग्रामौ विश्रुतौ किल।। -- मतङ्ग, भ० को०, पृ० १८९

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६ भरत का संगीत-सिद्धान्त

महर्पि भरत ने 'पड्ज-ग्राम' और 'मध्यम-ग्राम' का वर्णन किया है।२ वैस्वर्य, अतितारत्व एवं अतिमन्द्रत्व के कारण 'गान्धारग्राम' महर्पि भरत के द्वारा चर्चा का विपय नही वना है।" कुछ आचार्य्यो ने गान्वारग्राम और तज्जन्य रागों का वर्णन करके लौकिक विनोद के लिए भी उनके प्रयोग का विधान किया है," परन्तु अन्य आचार्यों ने लौकिक विनोद के लिए ग्रामजन्य रागो का प्रयोग निपिद्ध बताया है।२० नारद की सम्मति मे गान्वारग्राम का प्रयोग स्वर्ग में ही होता है।११ महर्पि भरत के अनुसार पड्ज, ऋपभ, गान्वार, मध्यम, पञ्चम, धवत और निपादवान् सात स्वर है।१२ श्रुतियाँ वाईस है।" (पड्ज के पश्चात् से तार पड्ज तक) सप्तक मे श्रुतियो का क्रम तीन, दो, चार, चार, तीन, दो, चार है।6 पड्जग्राम मे पड्ज चतु श्रुति, ऋपभ

व्यवस्थितश्रुतियुता यत्र सवादिन. स्वराः । मूर्च्छनाद्याश्रयो नाम स ग्राम इति सज्ञितः॥ -महाराज कुम्भ, भ० को०, पृ० १८९ २७-स्वरा ग्रामौ मूर्च्छनाश्च ... -भरत०, व०सं०, अ० २८, पृ० ४३१ २८-द्वौ ग्रामौ भरतेनोक्तौ ग्रामो गान्धारपूर्वक.। अतितारातिमन्द्रत्वाद् वैस्वर्य्यान्नो- पर्दशित.॥। --- आचार्य्य अभिनवगुप्त, भ० को०, पृ० १८९ २९-नारदेन तदनुसारिणा नान्यदेवेन (च) गान्वारग्रामजातरागा उपदिष्टा., नारदेन यज्ञोपयोगिन.। नान्यदेवेन लौकिकविनोदे च ते प्रयोज्यन्ते। -प्रो० रामकृष्ण कवि, भ० को०, पृ० ५४२ लक्ष्मीनारायणाख्योऽयं सङ्गीताम्भोधिपारगः। गान्धारमूर्च्छनाग्रामं व्यवहारक्षमं यथा। करोति लक्ष्ययोगेन पूर्वलक्षणयोगत ॥ -- लक्ष्मीनारायण, भ० को०, भूमिका, पृ० ११ ३०-ते लौकिकविनोदेष्वप्रशस्ता इति सोमेश्वरेणोक्तम्। -प्रो० रामकृष्ण कवि, भ० को०, पृ० ५४२ ३१-गान्धारग्रामस्य केवलं स्वर्गे प्रयुक्तत्वं नारदेनाभिहितम् । -प्रो० रामकृष्ण कवि, भ० को०, पृ० ५४२ ३२-पड्जश्च ऋपभश्चैव गान्धारो मध्यमस्तथा। पञ्चमो धैवतश्चव सप्तमश्च निपादवान्॥ --- भरत०, व० स०, अ० २८, पृ० ४३२ ३३-तत्र वा द्वाविशतिश्रुतयः । -भरत०, व०स०, अ० २८, पृ० ४३३ ३४-तिस्रो द्वे च चतस्रश्च चतस्त्रस्तिस्र एव च। द्वे चतस्रश्च षड्जाख्ये ग्रामे श्रुति- निदर्शनम् । -भरत०, व० स०, अ० २८, पृ० ४३३

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ग्राम ७

त्रिश्रुति, गान्धार द्विश्रुति, मध्यम चतु श्रुति, पञ्चम चतुश्रुति, धैवत त्रिश्रुति, निषाद द्विश्रुति होता है।१५ मध्यम-ग्राम मे पञ्म तीन श्रुति का रह जाता है और उसकी षड्जग्रामीय अन्तिम श्रुति को ग्रहण कर लेने के कारण धैवत चतु.श्रुतिक हो जाता है, अर्थात् मध्यमग्राम मे मध्यम चतु श्रुति, पञ्चम त्रिश्रुति, धैवत चतु श्रुति, निपाद द्विश्रुति, पड्ज चतु श्रुति, ऋपभ त्रिश्रुति एव गान्धार द्विश्रुति रहता है।३६ निपाद जव दो श्रुतियॉ चढ जाता है, तब 'काकली' निपाद और गान्धार जब दो श्रुति चढ जाता है, तव 'अन्तर गान्धार' कहलाता है। पड्ज की दो श्रुतियाँ ग्रहण कर लेने पर भी निपाद 'षड्ज' नही कहलाता, इसी प्रकार मध्यम की दो श्रुतियॉ ले लेने पर भी गान्धार की सज्ञा 'मध्यम' नही होती।२७ जिन दो स्वरो मे नौ अथवा तेरह श्रुतियो का अन्तर हो, वे परस्पर संवादी है। जैसे, पड्जग्राम मे 'पड्ज-पञ्चम', 'ऋपभ-धैवत', 'गान्धार-निपाद' और 'पड्ज-मध्यम' परस्पर सवादी है। मध्यम-ग्राम मे 'पड्ज-पञ्चम' का परस्पर सवाद नही रहता, अपितु 'ऋपभ-पञ्चम' परस्पर सवादी हो जाते है। वहा अन्य सवाद पड्ज-ग्राम-जैसे ही रहते है।१८ मंडल-प्रस्तारों में षड्जग्राम एवं मध्यमग्राम निम्ननिर्दिष्ट मण्डल-प्रस्तारो मे दोनो ग्रामो और उनमे स्थित स्वरों की स्थिति स्पष्ट ह्-

३५-पड्जरचतु श्रुतिर्नेय ऋपभस्त्रिश्रुतिस्तथा। द्विश्रुतिश्चैव गान्धारो मध्यमश्च चतु श्रुति ।। चतु श्रुति पञ्चम. स्याद् धैवतस्त्रिश्रुतिस्तथा। निपादो द्विश्रुति- र्चैव पड्जग्रामे भवन्ति हि॥ -- भरत०, व०स०, अ० २८, पृ० ४३४ ३६-चतु श्रुतिस्तु विज्ञेयो मध्यम पञ्चम. पुन। त्रिश्रुतिर्धेवतस्तु स्याच्चतु श्रुतिक एव हि। निपादषड्जौ विज्ञेयौ द्विचतुश्रुतिसम्भवौ। ऋपभस्त्रिश्रुतिश्च स्याद् गान्वारो द्विश्रुतिस्तथा॥ -भरत०, व० सं०, अ० २८, पृ० ४३४ ३७-तत्र द्विश्रुतिप्रकर्पणान्निपादवान् काकलीसंज्ञो निपाद, न षड्ज। द्वाभ्यामन्तर- स्वरत्वात्। साधारण प्रतिपद्यते । एवं गान्धारोऽप्यन्तरस्वरसंज्ञो न मध्यमः । तयोरन्तरस्वरत्वात्। -- भरत०, व० स०, अध्याय २८, पृ० ४३७। ३८-ययोश्च नवत्रयोदशकं परस्परत श्रुत्यन्तरे (रं?) तावन्योन्यसवादिनौ। यथा षड्ज-पञ्चमौ, ऋषभ-धैवतौ, गान्वार-निपादौ, पड्ज-मव्यमाविति पड्जग्रामे।

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८ भरत का संगीत-सिद्धान्त

मण्डल-प्रस्तार (१) पड्ज-ग्राम

का० नि० स

१ २ ३ ४ ५ ६

नि २२ ७ रे २१ ८ घ २० ९ ग

१९ १० १८ ११ (अ०ग )

१७ १६१५ १४ १३ १२ ط म

मण्डल-प्रस्तार (२) मध्यम-ग्राम (का नि.) स १२३ ४५६

नि २२ ७ रे

२१ ८

ध २० ९ ग

१९ १०

१८ (अ० ग.) -

१७ १६ १५ १४ १३ १२ प म प्रस्तारों में एक से वाईस तक अंक श्रुतियो के बोधक है। दोनों में केवल एक अन्तर

मध्यमग्रामेऽप्येवमेव पड्जपञ्चमवर्ज पञ्चमर्पभयोश्चार्त्रं संवाद इति। अत्र श्लोक .- संवादो मध्यमग्रामे पञ्चमस्यर्षभस्य च। षड्जग्रामे च पड्जस्य सवादः पञ्चमस्य च। -भरत०, व०सं०, अ० २८, पृ० ४३२

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ग्राम ९

है। षड्जग्राम में 'पञ्चम' सन्हवीं श्रुति पर और मध्यमग्नाम में सोलहवीं श्रुति पर स्थित है। इस स्थितिभेद से दो परिणाम हुए है- (अ) पड्ज-ग्राम में पड्ज-पञ्चम का पारस्परिक त्रयोदश श्रुत्यन्तर (४+१३= १७, तेरह श्रुतियों का अन्तर), जो षड्ज-ग्राम में षड्ज-पञ्चम के पारस्परिक संवाद का कारण था, मध्यमग्राम मे द्वादश श्रुत्यन्तर (४+१२-१६) रह गया है, क्योकि मध्यमग्नाम में पञ्चम सोलहवी श्रुति पर स्थित है। फलतः मध्यम-ग्राम मे पड्ज- पञ्चम मे संवाद नही रहा है। (आ) ऋषभ-पचम परस्पर दस श्रुतियो के अन्तर (७t१०=१७) के कारण षड्ज-ग्राम मे एक दूसरे से संवाद नही करते थे, परन्तु मध्यमग्राम मे पञ्चम के सोलहवीं श्रुति पर उतर आने से ऋपभ-पञ्चम में नौ श्रुतियों का अन्तर (७+९-१६) रह जाने के कारण परस्पर सवाद हो गया है। जो संवादी स्वर महर्ष भरत ने गिनाये हैं, उनके अतिरिक्त भी कुछ संवाद स्वरो मे विद्यमान है। जैसे, 'म-नि', 'अन्तर-गान्वार-धवत', 'प-स' और 'काकली-निपाद- अन्तर-गान्धार' मे भी नव श्रुत्यन्तर होने के कारण परस्पर संवाद है। इसी प्रकार 'म-स' एवं 'अन्तर-गान्धार-काकली-निषाद' में भी तेरह श्रुतियो का अन्तर होने के कारण संवाद है।"१ आधुनिक तीव्र गान्धार ही प्राचीन 'अन्तर-गान्वार' है, जो पड्ज से सात श्रुति दूर है।

३९-यद्यपि जिन दो स्वरो मे महर्पि भरत ने उदाहरणस्वरूप संवाद वताया है, उनकी श्रुतिसंख्या समान है, तथापि परस्पर संवादी स्वरों मे समानश्रुतिकता का अनि- वार्य वन्धन महर्षि भरत ने संवादसम्बन्धी नियम मे नही लगाया है। मतङ्ग का कथन है-सवादिनस्तु पुनः समश्रुतिकत्वे सति त्रयोदशनवान्तरे वा अन्योन्यं वोद्धव्या। (सं० र०, अ० स०, स्वरा०पृ० ९४ पर सिहभूपाल द्वारा उद्धृत) अर्थात्-समश्रुतिक होने पर जिन दो स्वरों में नौ अथवा तेरह श्रुतियो का अन्तर हो, उन्हे परस्पर संवादी जानना चाहिए। मतङ्ग का यह मत प्रत्यक्षविरोवी होने के कारण पश्चाद्वर्ती आचार्य्यो को मान्य नहीं हुआ, क्योकि चतु श्रुतिक मध्यम और द्विश्रुतिक निपाद में संवाद प्रत्यक्ष है। इसी प्रकार चतु श्रुतिक अन्तरगान्धार और त्रिश्रुतिक धैवत मे भी परस्पर प्रत्यक्ष सवाद है। आचार्य्य शार्ङ्गदेव ने भी इस सम्बन्ध मे दो मतों का उल्लेख किया है। उनका कथन है-

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१० भरत का संगीत-सिद्धान्त

एक वात और दर्गनीय है। पड्ज-अन्तर गान्वार, मव्यम-वैवत, गान्वार-मध्यम- ग्रामीय पञ्चम एव पञ्चम-काकली-निपाद में सात श्रुतियों का अन्तर है। इसी प्रकार 'नि-स', 'ग-म', 'म-प', 'त्रिश्रुतिक प-घ' में चार श्रुतियों का अन्तर है। पड्जग्राम की सिद्धि यदि हम एक ऐसा तानपूरा ले, जिसकी डाँड बीच से उठी न होकर सपाट हो, अटक भी सपाट हो और इस तानपूरे में नौ खूंटियाँ लगाकर नी तार चढ़ा ले, तो इन नौ तारो के कारण इसे 'नवतन्त्री वीणा' कहा जा सकता है। भले ही इसकी सम्पूर्ण आकृति पुरातन नवतन्त्री वीणा-जैसी नही है। इस वीणा पर एक-जैसी मोटाई और लम्वाई के नौ तार चढाकर सुगमतापूर्वक महर्पि भरत का 'पड्ज ग्राम' प्राप्त किया जा सकता है। विधि निम्नोक्त है- (क) प्रथम तार को उसकी मन्द्रतम रज्जक ध्वनि मे मिला लिया जाय। यह 'पड्ज' है। (ख) पाँचवाँ तार 'मध्यम' और छठा तार 'पञ्चम' मे मिला लिया जाय।

मिथः संवादिनी तौ स्तो निगावन्यविवादिनौ। रिधयोरेव वा स्याता तौ तयोवा रिधावपि॥ -सं० र०, अ० सं०, स्वरा०, पृ० ९२ अर्थात्(१) निपाद-गान्धार परस्पर सवादी परतु और स्वरों के विवादी होते हैं। (२) अथवा केवल ऋपभ और वैवत के विवादी होते है और ऋपभ-वैवत इन निपाद-गान्धार के विवादी होते है। यहाँ आचार्य्य कल्लिनाथ का कथन है- ननु निगयोरितरान्पञ्चापि स्वरान्प्रति विवादित्वमुक्तम्, तदनुपपत्नम्, शुद्धयोर्मध्यम-निषादयो., परस्परं संवादित्वदर्शनादित्यपरितोपेण पक्षान्तरमाह- रिधयोरेव वेति। प्रथममन्यविवादिनावित्यविशेषेण कथन तु समश्रुतिकयोरेव संवाद इति मतानुसारेण। -सं० र०, अ० स०, स्वरा०, पृ० ९२ अर्थात्-'निपाद-गान्धार' को अन्य पाँचो स्वरों का विवादी बताया जाना अनुचित है, क्योकि शुद्ध मध्यम और निषाद मे परस्पर सवादित्व दिखाई देता है, इसी अपरितोप को समाप्त करने के लिए आचार्य्य शार्ङ्गदेव ने इस दूसरे मत का उल्लेख किया है, जिसमें 'गान्धार-निपाद' को केवल ऋपभ-धैवत का विवादी बताया गया है। प्रथम मत का उल्लेख उन्होने समश्रुति स्वरो को ही परस्पर संवादी माननेवालो की दृष्टि से किया है।

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ग्राम ११

(ग) पाचवें तार को थोडी देर के लिए 'पड्ज' मानकर आठवॉ तार इस नवीन षड्ज के मध्यम मे मिला लिया जाय। यह प्रथम तार पर स्थापित पड्ज की अपेक्षा भरतोक्त निषाद है। (घ) आठवे तार को थोडी देर के लिए 'पड्ज' मानकर तीसरे तार पर इस नवीन पड्ज का 'मन्द्र मध्यम' मिला लिया जाय। यह प्रथम तार पर बोलनेवाले पड्ज की अपेक्षा महर्षि भरत का गान्वार है। (ड) चौथा तार वहॉ मिला लिया जाय, जहॉ प्रथम तार पर वोलनेवाले 'पड्ज' का तीव्र गान्धार वोलता हो। यह महर्पि भरत का अन्तर गान्धार है। (च) चौथे तार को 'षड्ज' मानकर सातवॉ तार उसके 'मध्यम' और नवॉ तार 'पञ्चम' मे मिला लिया जाय। ये दोनो स्वर प्रथम तार पर बोलनेवाले 'षड्ज' की अपेक्षा भरतोक्त 'धैवत' और 'काकली-निषाद' हैं। (छ) सातवे तार को षड्ज मानकर दूसरा तार उसके 'मन्द्र मध्यम' मे मिला लिया जाय। यह प्रथम तार पर बोलनेवाले षड्ज की अपेक्षा भरतोक्त ऋषभ है। इन तारों को क्रमशः छेडने पर आपको षड्ज, ऋषभ, भरतोक्त शुद्धगान्धार, अन्तर- गान्धार, मध्यम, पञ्चम, धैवत, निषाद और काकली निपाद सुनाई देगे। नवतन्त्री वीणा पर स्वरो के ये स्थान प्राचीन है," जिनकी उपलब्धि का प्रकार तर्कसङ्गत एवं वैज्ञानिक रूप में ऊपर दिखाया गया है। यह सब क्रिया वीणा- प्रस्तार मे निर्दिष्ट है-(दे० ब्लाक, पृष्ठ १२ के ऊपर)

मध्यमग्राम

यदि आप नवतन्त्री पर मध्यमग्राम सुनना चाहते है, तो इसी अवस्था मे आप नव- तन्त्री का पहला, दूसरा, चौथा, पाँचवॉ, छठा, सातवॉ और आठवॉ तार छेडिए, आपको कमश मध्यम, त्रिश्रुतिक पञ्चम, धैवत, निषाद, पड्ज, ऋपभ और गान्धार मिल जायँगे। नवतन्त्री वीणा को षड्जग्राम में मिला लेने पर पड्जग्राम के पड्ज, ऋपभ, अन्तर- गांधार, मध्यम, पञ्चम, धैवत और निषाद ही क्रमशः मध्यमग्राम के मध्यम, पञ्चम,

४०-विपञ्च्या नवतन्त्रीपु स्वरास्सप्त तथापरौ। काकल्यन्तरसंज्ञौ च द्वौ स्वराित्य- मानि च।। -महाराज नान्यदेव, भ० को०, पृ० ६२८

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१२

४१-द्विश्रुतिप्रकर्षाद् धैवतीकृते गान्धारे मूर्च्छनाग्रामयोरन्यतरत्वम्। तद्वशान्मव्यमा- धैवत, निपाद, षड्ज, ऋषभ और गान्वार वन जाते है।" 'स-म', 'रे-त्रिश्रुतिक प', 'अन्तरगान्धार-ध', 'म-नि', 'पन्स', 'ध-रे', 'नि-ग' का वह पारस्परिक संवाद, जो नौ नवतन्त्री पर भरतोक्त स्वर- व्यवस्या

दयो यथासंख्येन निपादादिमत्त्वं प्रतिपद्यन्ते। बडज-ग्राम

2 ३ ७ E

(क)स (ख) स 1 स - प भरत का संगीत-सिद्धान्त

-- भरत०, व० सं०, (का० सं०) अ० २८,पृ० ४३५ (ग) स म

म -< स (घ)

(ड) स- -- >तीव्रग (च) स म

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ग्राम १३

श्रुतियों के अन्तर पर आधारित है, सिद्ध हो जाता है। एक जोड़े में दिये हुए स्वर एक दूसरे का प्रतिनिधित्व कर सकने के कारण भी परस्पर संवादी है।४२ दो स्वरों मे सवाद का कारण होने पर नौ श्रुतियो का अन्तर 'पड्ज-मध्यम-भाव' एवं तेरह श्रुतियो का अन्तर 'षड्ज-पञ्वम-भाव' कहलाता है। पड्ज और अन्तर- गान्वार मे पाये जानेवाले सात श्रुतियो के अन्तर को हम 'षड्जान्तर-भाव' कहेगे। नवतन्त्री वीणा पर स्वरो की सारणा में हमने 'अन्तर-गान्धार' की सिद्धि पड्जान्तर- भाव, पञ्चम और काकली-निपाद की सिद्धि पड्ज-पञ्चम-भाव एव अन्य सभी स्वरो की सिद्धि पड्ज-मध्यम-भाव के आधार पर की है। हमने महर्पि भरत के द्वारा बतायी हुई स्वरो की श्रुतिसंख्या के आधार पर स्वरो के रूप प्राप्त किये है। ग्रामस्थित स्वरों की प्राप्ति के लिए प्रत्येक स्वर की श्रुतियो की सख्या जानना ही पर्याप्त है, श्रुतियों के परिमाण और उनके क्रम का ज्ञान 'ग्राम-ज्ञान' का 'परिणाम' होता है 'कारण' नही। महर्षि भरत ने श्रुतियो की सारणा का अधिकारी वह व्यक्ति माना है, जो दोनों ग्रामों के स्वरूप से परिचित हो। यदि आप नवतन्त्री पर दो सप्तक सुनना चाहते है, तो मेरु (अटक) और घुडच (घोड़ी) के बीच मे डाँड पर एक विलकुल सपाट पर्दा इस प्रकार बाँघिए कि तार उससे निकटतम स्थिति में रहे, परन्तु स्वय पर्दे से छू न जायं। इस पर्दे पर दवाकर तारों को जब छेड़ा जायगा, मध्य सप्तक सुनाई देगा। यदि तार-सप्तक सुनने की भी इच्छा हो, तो मध्य-सप्तकवाले पर्दे और घुड़च के ठीक मध्य में एक पर्दा और बाँध दीजिए और इस पर तार-सप्तक सुन लीजिए।

सान्धारं धवतीकुर्याद् द्विश्रुत्युत्कर्पणाद् यदि। तद्वशाद् मव्यमादींरच निपादादीन् यथास्थितान् ।। ततो 5 भूद्यावतिथ्येपा पड्जग्रामस्य सूच्छेना। जायते तावतिथ्येषा मध्यमग्राममूर्च्छना ।। -दत्तिल, सं० र०, अ० सं०, स्वरा०, सिह० पृ० १०९ ४२-यथा हि मध्यमग्नामे मन्योश्चरिधयोस्तथा। विषमश्रुतिकत्वेऽपि मिथः संवादन मतम् ॥ -महाराज कुम्भ, भ० को०, पृ० ७६५ ४३-व्वे वीणे तुल्यप्रमाणतन्त्र्युपवादनदण्डमूर्च्छने पड्जगामाश्रिते कार्य्ये। -भरत०, व० सं०, अ०२८, पृ० ४३३

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१४ भरत का संगीत-सिद्धान्त

सितार पर षाड्जग्रामिक सप्तक सितार या वीणा पर आजकल जिस क्रम के अनुसार पर्दे बँधे हुए है, वह कम कुछ बहुत अधिक प्राचीन नहीं, तथापि सुविधा के लिए हम इस क्रम के अनुसार ही यहाँ पड्जग्राम की सिद्धि देखेगे। पर्दो के प्राचीन क्रम के सम्वन्ध मे अन्यत्र विचार किया जायगा। (अ) किसी सितार पर केवल वाज का तार रहने दें, पर्दे सब हटा दे। बाज के तार को इतना खीचे कि वह कर्णमधुर ध्वनि मे कही भी वोलने लगे। यह ध्वनि मन्द्र मध्यम है। (आ) अटक और घुडच के ठीक वीचोबीच एक पर्दा इस प्रकार वाँधे कि उस पर मध्य मध्यम वोलने लगे। (इ) मुक्त तार अर्थात् केवल मेरु के सहारे बोलनेवाले तार की ध्वनि को 'षड्ज' मानकर एक पर्दा वहाँ वाँधे, जहॉ इस नवीन पड्ज का 'पञ्चम' बोलता हो। यह ध्वनि मध्य सप्तक का 'पड्ज' है। (ई) एक पर्दा वहाँ वाँधे, जहॉ मथ्य सप्तक के षड्ज का पञ्चम बोलता हो। (उ) एक पर्दा वहॉ बॉधे, जहाँ मध्य सप्तक के मध्यम को 'पड्ज' मानने से उसका 'मध्यम' बोलता हो। यह मध्य सप्तक का निषाद है। (ऊ) मध्य सप्तक के निषाद को 'पड्ज' मानकर एक पर्दा अटक की ओर वहाँ वाँधें, जहॉ इस नवीन 'पड्ज' का अवरोहगतिक मध्यम बोलता हो। यह मध्यम मध्य सप्तक का 'गान्धार' है। (ए) एक पर्दा वहाँ वाँधे, जहॉ मध्य सप्तक के पड्ज की अपेक्षा तीव्र गान्धार बोले। यह मध्य सप्तक का भरतोक्त अन्तर गान्धार है। (ऐ) एक पर्दा वहॉ बाँधे, जहॉ 'अन्तर गान्धार' को षड्ज मानने पर इस नवीन पड्ज का 'मव्यम' वोलता हो। यह मध्य सप्तक का धैवत है। मध्य सप्तक के मध्यम को पड्ज मानने पर यह धैवत उसका अन्तर गान्धार होगा। (ओ) एक पर्दा वहाँ वाधे, जहा 'अन्तर गान्धार' को षड्ज मानने पर इस नवीन पड्ज का पञ्चम बोलता है। यह मध्य सप्तक का तीव्र या काकली निषाद है। (औ) धैवत के पर्दे को 'पड्ज' मानकर एक पर्दा अटक की ओर वहाँ वाँधिए, जहाँ इस नवीन षड्ज का अवरोहगतिक मध्यम बोलता हो। यह मध्य सप्तक का भरतोक्त ऋषभ है। निम्नलिखित प्रस्तार में पूर्वोक्त किया स्पष्ट है-

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ग्राम १५

सितार पर पड्ंज-ग्राम

(स) मेरु (अ)

Y

स -(प)-(स)-(स)- (इ)

रे -(म) (औ)

ग (म ( 五 )

न.ग (अ.ग.) -(स)-(स) (स)

म -- (स) (आ)

Y प -(प) (ई)· ने

ध -(म)- -(म (से)

नि -(म)-(स)- (3) Y -का.नि -(प) (ओ)

तार

मन्द्र एवं तार स्थानो के पर्दे इन्ही स्वरों के सहारे वाँधे जा सकते है। नवतन्त्री के तारो की भाति सितार के इन पर्दो पर 'मध्यम-ग्राम' प्राप्त किया जा सकता है। अर्थात् 'स, रे, अन्तर ग, म, प, ध, नि' के पर्दो पर ही मध्यमग्रामीय 'म, प, ध, नि, स, रे, ग' की उपलब्धि हो सकती है।

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१६ भरत का संगीत-सिद्धान्त

'श्रुति-निदर्शन' या 'श्रुतिदर्शन-विधान' पड्ज-ग्राम से मध्यम-ग्राम प्राप्त करने की एक और विधि भी है। यदि षड्ज- ग्रामीय 'ऋपभ' को थोड़ी देर के लिए 'पड्ज' मानकर पड्जग्रामीय पञ्चम को इतना उतारा जाय कि वहं इस नवीन पड्ज का मध्यम हो जाय, तो पाड्जग्रामिक सप्तक मध्यम-ग्रामीय स, रे, ग, म, प, ध, नि मे परिवर्तित हो जायगा। हम आगे चलकर देखेगे कि यह मध्यम-ग्राम की चतुर्थ मूर्च्छना का आरोह है। इसी लिए महर्पि भरत ने कहा है- "मध्यमग्राम मे पञ्चम को एक श्रुति उतार देना चाहिए। (इस उतरे माध्यम- ग्रामिक) पञ्चम की एक श्रुति को चढ़ाने और उतारने से अथवा (माध्यमग्रामिक पञ्चम को चढ़ाकर पाड्जग्रामिक बनाये हुए पञ्चम के) 'मार्दव' (उतारने) और 'आयतत्व' (चढ़ाने) से जो 'अन्तर' होता है, वह 'प्रमाणश्रुति' (पड्जग्राम एवं मध्यमग्राम के अन्तर में) प्रमाणभूत श्रुति है।४४

४४-पड्जग्रामे तु श्रुत्यपकृष्ट: पञ्चमः कार्य्यः। पञ्चमश्रुत्युत्करपदपकर्पा्ा यदन्तरं मार्दवायतत्वाद् वा तत्प्रमाणश्रुतिः । -भरत०, व० सं०, अ० २८, पृ० ४३२ 'आयतत्व' का परिणाम स्वर का चढना होता है। प्रातिशास्य का कथन है- 'आयामो दारुण्यमणुता खस्येत्युच्चैकराणि शब्दस्य।' -तत्ति० प्राति०, म०यु० सं०, अध्या० २२, पृ० १७८ माहिषेय भाष्य मे इसकी व्याख्या है- "आयाम: प्रसारित्वं दारुण्यं दृढत्वं तस्माच्छरीरस्य आयाम कार्य्यः अङ्गाना दृढत्वम् । खमिति कण्ठ. स चोक्त. पुरस्तादिति। तस्य च कार्श्यम्। एवंयुक्तस्य उच्चशन्दो भवति ... ।" अर्थात्-'आयाम' का अर्थ 'प्रसारित्व' (विस्तारयुक्तता) और 'दारुण्य' का अर्थ 'दृढत्व' हँ, अतएव शरीर का 'आयाम' और अङ्गो का दृढत्व करना चाहिए। 'ख' का अर्थ 'कण्ठ' पहले बताया जा चुका है। उस कण्ठ की 'कृशता' करनी चाहिए। इस अवस्था से युक्त व्यक्ति का शब्द ऊँचा होता है। महाभाष्यकार महर्पि पतञ्जलि ने भी तैत्तिरीय प्रातिशास्य का पूर्वोक्त सूत्र उद्धृत करके उसका अर्थ किया है- "'आयामो' गात्राणां निग्रहः, 'दारुण्यं' स्वरस्य दारुणता रूक्षता, 'अणुता खस्य' कण्ठस्य संवृतता। उच्चै.कराणि शन्दस्य।" -महाभाष्य, नि० सा० सं० १९३५ ई०, द्वितीय खण्ड, पृ० २६

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ग्राम १७

चतुःसारणाएँ सारणाएँ करने के लिए हम दो वीणाएँ लें, जो सर्वथा एक-जैसी हों, अर्थात् उनके तार एक-जैसे हों, षाड्जग्रामिक सप्तक उनमे समानध्वनिक रूप मे मिला हो, दोनों को

अर्थात्-आयाम=गात्रो का निग्रह, दारुण्य=स्वर की दारुणता, अर्थात् रूक्षता, 'ख' की अणुता=कण्ठ की सवृतता (सिकुड़ना) स्वर को ऊँचा करनेवाले है। 'मार्दव' का परिणाम स्वर का उतरना है। प्रातिशाख्य का कथन है- "अन्ववसर्गो मार्दवमुरुता खस्येति नीचैःकराणि शब्दस्य।" -तैत्ति० प्राति०, म०यु० सं०, अध्याय २२, पृ० १७८ माहिषेय भाष्य में इसकी व्याख्या है- "अन्दवसर्गः संहार: मार्दवं प्रस्रंसनम् उरता तस्मात् शरीरस्य संहार: कार्य्यः। अङ्गानां प्रस्नंसनं कण्ठस्य स्थूलता एवंयुक्तस्य नीचशब्द उत्प्यते।" अर्थात्-अन्ववसर्ग-संहार (शिथिलता), मार्दव=प्रस्रंसन (ढीला छोड़ना) । अतः शरीर (अङ्गो) का संहार (संहरण, शिथिलता) करना चाहिए। अङ्गो को ढीला छोड़ने एवं कण्ठ की स्थूलता (विवृतता, विस्तार) से युक्त (व्यक्ति) का नीचा शब्द उत्पन्न होता है। महर्षि पतञ्जलि ने इस सूत्र की व्याख्या निम्नलिखित की है- "अन्ववसर्गो गात्राणा शिथिलता। मार्दव स्वरस्य मृदुता स्निग्धता। उरुता खस्य महत्ता कण्ठस्येति नीचै कराणि शब्दस्य।" --- महाभाष्य, पूर्वोक्त सं०, द्वितीय खण्ड, पृ० २६ अर्थात्-अन्ववसर्ग=गात्रों की शिथिलता, मार्दव=स्वर की मृदुता या स्निग्धता, 'ख' की उर्ता=कण्ठ की महत्ता (विस्तार, विवृतता) शब्द को नीचा करनेवाले है। शरीर या गात्रवीणा मे हृदय, कण्ठ एवं मूर्धा में उत्पन्न होनेवाले स्वर क्रमशः उच्चतर होते है। मन्द्र, मध्य, तार स्थानो के उत्पादक हृदय, कण्ठ एवं मूर्धा भी शरीर में करमश ऊँचे है, परन्तु दारवी वीणा में स्थिति विपरीत है। मेरु से नीचे की ओर जितना जायंगे, स्वरो मे उतनी ही उच्चता आती जायगी। दारवी वीणा की इसी स्थिति को समक्ष रखते हुए नाट्यशास्त्र मे कहा गया है- आयतत्वं तु चेन्नीचे मृदुत्वं तु विपय्यये। स्वस्वरे मध्यमत्वं च श्रुतीनामेष निर्णय.॥ -- भरत०, व० सं०, अ० २९, पृ० ४५८ अर्थात्-(अपने वास्तविक स्थान की अपेक्षा) नीचे की स्थिति मे श्रुति का आय- २

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१८ भरत का संगीत-सिद्धान्त

छेड़ने का 'कोण' भी एक-जैसा हो। मूर्च्छना भी एक-जैसी हो।"4 वादन के समय तारों पर आघात भी एक-जैसा हो। सारणा एक ही व्यक्ति करे, तो अच्छा है, क्योकि

तत्व, विपरीत (अपने वास्तविक स्थान की अपेक्षा ऊँची) स्थिति में मृदुत्व तथा अपने स्वर पर श्रुतियों का मध्यमत्व होता है, यह निर्णय है। यह श्लोक सप्त रूपो मे प्रयोज्य अलंकारों के प्रसङ्ग मे है और इसका अभिप्राय दारवी वीणा पर श्रुतियो के 'आयतत्व' एवं 'मृदुत्व' का बोध करानेवाली उच्च (मेरु की ओर) एव नीच (घुडच की ओर) स्थिति को बताना है। निष्कर्प यह है कि भाष्य-वाक्य कण्ठ में 'आयतत्व' एव 'मृदुत्व' का वोध करा रहे है और नाटयशास्त्र दारवी वीणा मे। ४५-द्वे वीणे तुल्यप्रमाणतन्त्र्युपवादनदण्ड*मूर्च्छने पड्जग्रामाश्रिते कार्य्ये। -भरत०, व०सं०, पृ० ४३३ *उपवादनदण्ड का दूसरा नाम 'कोण' या 'कुणप' भी है। महाराज कुम्भ का कथन है- .. कोणः कुणप इत्यपि । वीणादिवादनादण्डः प्रवीणैरुपवर्ण्यते । -भ० को०, पृ० १५१ दुन्दुभि या नगाडे को बजाने के साधन 'चोव' को भी कोण कहा जाता है। इसी लिए महाराज कुम्भ ने उपर्युक्त श्लोक मे 'वीणा' के साथ आदि शब्द का प्रयोग किया है। निम्न श्लोक उदाहरणार्थ द्रष्टव्य- मन्यायस्तार्णवाम्भ: प्लुतिकुहरचलन्मन्थरध्वानधीर. कोणाघातेपु गर्जत्प्रलयघनघटान्योन्यसघट्टचण्डः। कृष्णाकोधाग्रदूत. कुरुकुलनिधनोत्पातनिर्घातवात. केनास्मत्सिहनादप्रतिरसितसखो दुन्दुभिस्ताडितोऽसौ ॥ -- वेणीसंहार, प्रथम अङ्क कोणो वीणादिवादनम् । -अमरकोश, प्रथमकाण्ड, श्लोक ६ कोणो वाद्यप्रभेदे स्याद् वीणादीना च बादने। -- मेदिनी वीणादि वाद्यते येन तद्धनुराकृति काप्ठं कोण उच्यते। --- महेश्वर कृत 'अमरविवेक' नामक (अमरकोश की) टीका पूर्वोक्त स्थल मे महर्षि भरत ने जिन दो वीणाओ की ओर निर्देश किया है वे 'उपवादनदण्ड' अर्थात् 'कोण' के द्वारा बजायी जानेवाली है।

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ग्राम १९

तार, कोण (वादनदण्ड) और इन्द्रिय की विगुणता से स्वरो में अवाञ्छनीय न्यूनता या अधिकता हो जाती है।"६

प्रो० रामकृष्ण कवि का कथन है कि महर्षि भरत की वीणा 'मत्त-कोकिला' कही गयी है- भरतो .. मत्तकोकिलाम् ... अवादयदिति प्राहु.। -भ० को०, पृ० ५१९ एतत्करण मत्तकोकिलाख्यवीणाया भरतेन निर्दाशितम्। अत्र मुख्यवीणायां यत्र गुरुः त भङवत्वा लघुद्वयरूपेण विपञ्च्यादिपु युगपद्वादन रूपमिति भावः । -भ० को०, पृ० ५५६ मत्तकोकिला नामक वीणा मे इक्कीस तार होते है। मन्द्र, मध्य और तार सप्तक में सातो स्वर प्राप्त होने के कारण यह सव वीणाओ में मुख्य कही गयी है। अन्य वीणाएँ इसी का अङ्ग है और उनका 'करण' इत्यादि 'धातुओ' के द्वारा मत्तकोकिला का उपरब्जन है। इस सबध मे आचार्य शार्ङ्गदेव का कथन है- तन्त्रीणामेकविशत्या: कीतिता मत्तकोकिला। मुख्येय सर्ववीणाना त्रिस्थानै. सप्तभि: स्वरैः ॥ सम्पन्नत्वात्तदन्यास्तु तस्या: प्रत्यङ्गमीरिताः । करणैश्चित्रयन्त्यास्तास्तस्या. स्युरुपरञ्जिका ॥ -- स० र०, अ० सं०, वाद्या०, पृ० २४८ महर्षि भरत ने 'नवतन्त्री' विपञ्ची के वादक को 'वैपञ्चिक' कहकर 'वैणिक' को उससे भिन्न कहा है। उनके शब्द है- तते कुतपविन्यासो गायनः सपरिग्रहः । वैपञ्चिको वैणिकश्च वंशवादस्तथैव च।। -- भरत०, व० सं०, अ० २८, पृ० ४२० इसका तात्पर्य है कि जिस प्रकार अपने परिग्रह मे गायन (गायक) प्रधान है, उसी प्रकार तन्त्रीवादकों मे वैणिक है। वैप्चिक (विप्चीवादक) और 'चैत्रिक' (चित्रावादक) का कार्य्य 'वैणिक' के वादन का उपरञ्जनमात्र है। वैणिक का अर्थ 'मुख्य वीणा का वादक' है। शाङ्गदेव के अनुसार मुख्य वीणा और मत्तकोकिला समा- नार्थवाची शब्द है और 'मत्तकोकिला-वादक' की सज्ञा प्रधानतया 'वैणिक' है। ४६-एतेपां च स्वराणां न्यूनाधिकत्व तन्त्रीवादनदण्डेन्द्रियवैगुण्यादुपजायते। यहाँ 'इन्द्रियवगुण्य' शब्द ध्यान देने योग्य है। 'वधिर' या अन्य विकलेन्द्रिय व्यक्ति (जिसके हाथ इत्यादि मे विकार हो) महर्षि भरत के अनुसार सारणा का पात्र नही।

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२० भरत का संगीत-सिद्धान्त

जिस वीणा पर सारणा-किया की जायगी, उसे हम सुविधा के लिए 'चल वीणा आर दूसरी को अचल वीणा कहेगे।

प्रथम सारणा चल वीणा के 'पञ्चम' को इतना उतारा जाय कि वह अचल वीणा के 'ऋषभ' के साथ पड्ज-मध्यम-भाव से सम्वद्ध हो जाय।" इस प्रक्रिया से चल वीणा का पञ्चम अपनी मूल स्थिति से अर्थात् अचल वीणा के पञ्चम की अपेक्षा जितना उतरेगा, उतना अन्तर 'प्रमाणश्रुति' है। चल वीणा के पञ्चम को आपने जितना उतारा है, उतना ही चल वीणा के प्रत्येक स्वर को उतार दीजिए।"ऐसी स्थिति मे चल वीणा का प्रत्येक स्वर अचल वीणा के स्वरों की अपेक्षा एक प्रमाणश्रुति उतर जायगा। यह 'प्रथम सारणा' है।" द्वितीय सारणा अव चल वीणा के 'गान्वार' और 'निपाद' को इतना उतारिए कि वे क्रमशः अचल चीणा के 'ऋषभ' और 'धैवत' मे मिल जायँ।4 अवशिष्ट स्वरो को भी चल वीणा पर

४७-तयोरेकतरस्यां माध्यमग्रामिकीं कृत्वा पञ्चमस्यापकर्षे श्रुतिम् ... । -- भरत, व०सं०, अ० २८,पृ० ४३३ ४८-तामेव पञ्चमवशात् पाड्जग्रामिकी कुर्य्यात्। -भरत०, व०, सं०, अ० २८,पृ० ४३३ यह क्रिया कुछ कठिन नही। चल वीणा के पड्ज को इतना उतारिए कि उसका संवाद उतरे हुए पञ्चम से होने लगे। तत्पश्चात् संवाद के आधार पर षड्ज से मध्यम, मध्यम से निषाद, निपाद से गान्धार, पड्ज से अन्तर गान्धार, अन्तर गान्धार से घैवत और धवत से ऋपभ की स्थापना करना हम जान ही चुके है। इतना कर लेने पर 'चल- चीणा' पर षाड्जग्रामिक सप्तक फिर प्राप्त हो जायगा। चलवीणा का पञ्चम चल- वीणा के पड्ज की दृष्टि से पाड्जग्रामिक एवं अचलवीणा के पड्ज की दृष्टि से माध्यम- ग्रामिक होगा। ४९-एवं श्रुत्यपककृष्टा भवति। -- भरत० व० सं०, अ० २८, पृ० ४३३ ५०-पुनरपि तद्वदेवापकर्षाद् गान्वारनिषादवन्तावितरस्या धैवतर्पभौ (ऋपभ- धैवतौ?) प्रविशतः (द्वि)श्रुत्यधिकत्वात्। -भरत० व० सं०, अ० २८,पृ० ४३३

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ग्राम २१

उसके नवीन 'गान्धार' और 'निषाद' को ध्यान मे रखते हुए पाड्जग्रामिक अनुपात से यथास्थान मिला लीजिए। इस द्वितीय सारणा के सम्पन्न होने पर आप देखेगे कि चल चीणा के स्वर अचल वीणा के स्वरों की अपेक्षा दो श्रुति उतरे हुए है। तृतीय सारणा चल वीणा के 'ऋपभ' और 'धैवत' को इतना उतारिए कि वे क्रमश. अचल वीणा के 'पड्ज' और 'पञ्चम' के साथ एक-रूप हो जायँ।" अन्य स्वरों को भी पाड्ज- ग्रामिक अनुपात से यथास्थान मिला लीजिए। अव आपकी चल वीणा का सप्तक अचल चीणा के सप्तक की अपेक्षा तीन श्रुति उतरा हुआ होगा। चतुर्थ सारणा चल वीणा के 'मध्यम', पञ्चम' और 'पड्ज' को इतना उतारिए कि वे करमश. अचल वीणा के 'गान्धार', 'मध्यम' और 'निषाद' मे मिल जायँ।५२ अवशिष्ट स्वरो को भी पाड्जग्रामिक अनुपात मे यथास्थान मिला लीजिए, अब चल वीणा का सप्तक अचल वीणा के सप्तक की अपेक्षा चार श्रुति उतरा हुआ होगा। पूर्वोक्त विधि से सारणाएँ करने पर चल वीणा हमे एक समय एक ही सारणा प्रदर्शित करती है, क्योकि हम उस पर प्रथम सारणा को मिटाकर दूसरी, दूसरी को मिटाकर तीसरी और तीसरी को मिटाकर चौथी सारणाएँ करते है। फलतः वाईसो श्रुतियाँ एक समय हमारे समक्ष नही आ पातीं। परवर्ती आचार्यो ने वाईस श्रृतियाँ सिद्ध करने के लिए 'श्रुतिवीणा' का आश्रय लिया था", परन्तु एक ऐसा उपाय भी है, जिससे चारों सारणाएँ एव उनके परिणाम-

यहाँ कुछ लोग 'तद्वत्' शब्द से भ्रम मे पड जाते है। 'तद्वत्' क्रियाविशेषण है। महर्षि पाणिनि के सूत्र "तेन तुल्यं क्रिया चेद् वति." की वृत्ति देखिए। ५१-पुनस्तद्वदेवापकर्षाद् धैवतर्षभावितरस्या पञ्चमपड्जौ प्रविशतः (त्रि) श्रुत्य- धिकत्वात्। -- भरत, व० सं०, पृ० ४३३ ५२-तद्वत्पुनरपक्कष्टायां च तस्यां पञ्चममध्यमषड्जा इतरस्यां मध्यनगान्धार- निपादवन्तः प्रवेक्ष्यन्ति चतु श्रुत्यधिकत्वात्।

५३-द्वे वीणे सदृशी कार्य्ये यथा नाद: समो भवेत्। -भरत, व० सं०, पृ० ४३३-४३४

  • -आचार्य शार्ङ्ग०, सं० र०, अ० सं०, स्वरा०, पृ० ६९

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२२ भरत का संगीत-सिद्धान्त

स्वरूप वाईसो श्रुतियाँ भी हमारे समक्ष रहती है और एक ही वाद्य पर सारणाएँ सम्पन्न हो जाती है।

श्रुतिदर्पण पर चतुःसारणाविधि एक ऐसा तानपूरा लीजिए, जिसकी डाँड सपाट हो, अर्थात् बीच से उठी हुई न हो। इस तानपूरे पर पर्दे भी सपाट हो, अर्थात् वे पर्दे सितार के पर्दो की भॉति वीच से उठे हुए न हो। तानपूरे मे पाँच खूंटियाँ हों, पाँच तार एक-जैसे चढ़ा लीजिए। पर्दे सीधे रहें, अर्थात् पर्दे के प्रत्येक भाग से 'अटक' और 'घुड़च' समान दूरी पर हो। घुडच सीधी हो, तनिक भी आडी-तिरछी न हो। इस तानपूरे को हम अव 'श्रुतिदर्पण' कहेगे। इस पर नियमपूर्वक पड्जग्राम के अनुसार पर्दे मिला लीजिए। 'श्रुतिदर्पण' पर चढे हुए पॉचो तारो को समान ध्वनि मे मिला लीजिए। 'श्रुतिदर्पण' के वायी ओरवाले तार को हम पहला तार कहेगे, अन्य तार क्रमशः दूसरा, तीसरा, चौथा और पॉचवाँ तार कहलायेंगे।

मूल सप्तक पहले तार को पड्ज इत्यादि के पर्दो पर दबाकर छेडने से जो सप्तक वोलेगा, उसे हम मूल सप्तक कहेगे, जो पूर्वोक्त पद्धति के अचल सप्तक का काम देगा।

प्रथम सारणा

दूसरे तार को इतना उतारिए कि मूल सप्तक के ऋषभ के साथ दूसरे तार के पंचम का सवाद षड्ज-मध्यम-भाव से होने लगे। इतना करने पर आप देखेगे कि दूसरा तार मूल सप्तक के तार की अपेक्षा 'कुछ' उतरा हुआ है, यह 'कुछ' अन्तर ही महर्षि भरत की भाषा मे प्रमाणश्रुति का अन्तर है। किसी भी पर्दे पर पहले और दूसरे तार को दबाकर छेडा जाय, प्रमाणश्रुति का यह अन्तर दोनो तारो की ध्वनि मे स्पष्ट सुनाई देगा। अर्थात् दूसरे तार पर ध्वनित होनेवाला सप्तक मूल सप्तक की अपेक्षा एक प्रमाणश्रुति उतरा हुआ होगा। द्वितीय सारणा तीसरे तार को इतना उतारिए कि उसके गान्वार की ध्वनि मूल सप्तक के 'ऋपभ' की ध्वनि में मिल जाय। इतना करने पर आप देखेगे कि तीसरे तार का 'निपाद' मूल

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ग्राम २३

सप्तक के 'पञ्चम' में स्वतः मिल गया है। तीसरे तार पर वोलनेवाला पाड्जग्रामिक सप्तक अब मल सप्तक की अपेक्षा दो श्रुति उतरा हुआ है।

सारणायुक्त अुतिदर्पण श्रुति-प्रस्तार पाँचवॉँ तार चौथा तार तीसरा तार (चौथी साखा) (तीसरी साखा) (दूसरी साखा) दूसरा तार महला तार (पहली साखा) मू० सप्तक मेरु (अरक),

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नि 8 -9-41 2 ३ - ७रे 1 - दग

ग -१० ११ १२ १३ म

म १४ १५ १६ 1 प १८ १६ = 20 ध 1 1 २१ >२२ नी

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चौथे तार को इतना उतारिए कि उसका 'ऋषभ' मूल सप्तक के पड्ज में मिल जाय, तृतीय सारणा

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२४ भरत का संगीत-सिद्धान्त

ऐसा करने से चौथे तार का 'धैवत' प्रथम तार के 'पञ्चम' में स्वतः मिल जायगा। चीथे तार पर मिला हुआ पाड्जग्रामिक सप्तक अव मूल सप्तक की अपेक्षा तीन श्रुति उतरा हुआ है। चौथी सारणा पाँचवें तार को इतना उतारिए कि उसका 'मध्यम' मूल सप्तक के 'गान्वार' मे मिल जाय। यह हो जाने पर पाँचवें तार के 'पञ्चम' और 'पड्ज' कमश. सूल सप्तक के 'मध्यम' और 'निपाद' मे स्वत. मिल जायंगे। इस स्थिति में पाँचवे तार पर ध्वनित होनेवाला सप्तक मूल सप्तक की अपेक्षा चार श्रुति उतरा हुआ है। (गत पृष्ठ (व्लाक) में निर्दिष्ट श्रुति-दर्पण-प्रस्तार पर सारणाओ के परिणाम- स्वरूप बाईसो श्रुतियाँ प्रत्यक्ष है।) 'श्रुति-दर्पण' पर प्रदशित श्रुति-प्रस्तार में आपको 'ऋषभ' की तीन, 'गान्धार' की दो, 'मध्यम' की चार, 'पञ्चम' की चार, 'धैवत' की तीन, 'निषाद' की दो और 'पड्ज' की चार श्रुतियाँ स्पप्ट दृष्टि-गोचर होगी। ऋपभ सातवी, गान्वार नवी, मध्यम तेरहवी, पञ्चम सत्रहवी, धैवत वीसवी, निषाद वाईसवी और षड्ज चौथी श्रुति पर स्थित है। मूल सप्तक के ऋपभ के साथ प्रथम सारणा के अर्थात् दूसरे तार के पञ्चम का पड्ज-मध्यम-भाव से सवाद है। द्वितीय सारणा के गान्वार और निषाद मूल सप्तक के ऋपभ एवं धैवत से मिल गये है, अतः द्वितीय सारणा अर्थात् तीसरे तार के गान्धार और निपाद के पदो पर क्रमशः ऋषभ और धैवत लिखे गये है। मूल सप्तक के ऋषभ और धैवत के साथ समध्वनि- कता का सङ्गेत तीरों के द्वारा किया गया है। तृतीय सारणा के ऋषभ और धैवत के पर्दो पर 'स' और 'प' लिखे गये है, जो क्रमश. मूल सप्तक के पड्ज और पञ्चम के साथ उनकी समध्वनिकता के परिचायक है। चौथी सारणा के मध्यम, पञ्चम और षड्ज के पर्दो पर क्रमशः 'ग', 'म', 'नि' अंकित है, जो कमशः मूल सप्तक के गान्वार, मध्यम और निषाद के साथ इन पर्दो पर निकलनेवाली ध्वनियो के सादृश्य का परिचय देते है।

श्रुतियों के परिमाण हम यह जान चुके है कि श्रुति-दर्पण के पहले-दूसरे तार की ध्वनि का अन्तर 'प्रमाण-श्रुति' है, भविष्य मे हम इसे 'ग' अन्तर कहेगे।

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ग्राम २५

श्रुति-दर्पण के दूसरे और तीसरे तार को क्रमशः घीरे से छेड़ने पर हमें 'ग' अन्तर से बड़ा अन्तर सुनाई देगा, इसे हम 'ख' अन्तर कहेगे।

सारणायुक्त सुति - दर्पण ्रुति-परिमाण-प्रस्तार मेरु (जटक)

पं

नि

(ग) (क) (व) (ग) सा 3 8

सा (क) + (ख) (ग)रे ६ ७

रे >ग)ग

ग (ग) (ख)- (ग) म १२

म (क) १४ १५ s. (र) १६ (ग) प १७

प (क) > (सव) श (ग) घ १८ १८ 20 रव ऋ्ग)नि

नि) (ग) (क) (ग) सा 2 3

तारों का क्रम ५ ४ ३ २ 1 सरणा क्रम ४ 3 2 १ मूलसप्तक

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२६ भरत का संगीत-सिद्धान्त

तीसरे और चीथे तार को छेड़ने पर उन दोनो की ध्वनियों में 'ख' अन्तर से भी वडा अन्तर सुनाई देगा, इसे हम 'क' अन्तर कहेगे। चीथे और पाँचवें तार की ध्वनि मे फिर 'ग' अन्तर सुनाई देगा, क्योकि चौथे तार के ऋपभ के साथ पाँचवे तार के पञ्चम का पड्ज-मध्यम भाव से उसी प्रकार सवाद है, जिस प्रकार पहले तार के ऋपभ का संवाद दूसरे तार के पञ्चम के साथ है। इस वात को यो कहा जा सकता है कि पहला तार दूसरे तार की अपेक्षा 'ग' अन्तर, दूसरा तार तीसरे तार की अपेक्षा 'ख' अन्तर, तीसरा तार चौथे तार की अपेक्षा 'क' अन्तर और चौथा तार पाँचवें तार की अपेक्षा 'ग' अन्तर चढा हुआ है। अथवा यों भी कहा जा सकता है कि पाँचवाँ तार चौथे तार की अपेक्षा 'ग' अन्तर, चीथा तार तीसरे तार की अपेक्षा 'क' अन्तर, तीसरा तार दूसरे तार की अपेक्षा 'ख' अन्तर और दूसरा तार पहले तार की अपेक्षा 'ग' अन्तर उतरा हुआ है। (श्रुति-दर्पण पर वाईसो श्रुतियो और उनके परिमाणो को गत पृष्ठ पर देखिए।) पूर्वोक्त प्रस्तार श्रुतियों मे पाये जानेवाले अन्तरो का क्रम दिग्दर्शित करता है। पाँचवे तार के पड्ज के पर्दे पर मूल सप्तक का मन्द्र 'निषाद' है, प्रथम श्रुति इससे 'न' अन्तर पर है, उसके पश्चात् दूसरी, तीसरी और चौथी श्रुतियाँ क्रमश. 'क,ख, ग' अन्तर पर स्थित है। ये पड्ज की चार श्रुतियाँ है। महर्षि भरत ने श्रुतिसंख्या पड्ज से न गिनाकर ऋपभ से गिनायी है, क्योकि 'पड्ज' के 'आधार-ध्वनि' होने के कारण एक सप्तक मे उसकी श्रुतियो की गणना निपाद के पश्चात् ही सम्भव है। ऋषभ की तीन श्रुतियाँ चौथे तार के ऋपभ के पर्दे पर मूल सप्तक का षड्ज बोल रहा है, उसके पश्चात् ऋपभ की तीन श्रुतियाँ (पॉचवी, छठी, सातवी) क्रमश. 'क, ख, ग' अन्तर पर स्थित है। सातवी श्रुति पर ऋषभ है। गान्धार की दो श्रुतियाँ तीसरे तार के गान्धारवाले प्दे पर मूल सप्तक का ऋषभ बोल रहा है, इसके पश्चात् गान्वार की दो श्रुतियाँ (आठवी और नवी) कमशः 'ख, ग' अन्तरो पर स्थित है। नवी श्रुति पर मूल सप्तक का गान्वार विद्यमान है। मध्यम को चार श्रुतियाँ पॉचवे तार के मध्यमवाले पर्दे पर मूल सप्तक का गान्धार है। इसके पश्चात्

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ग्राम २७

मध्यम की चार श्रुतियाँ (दसवी, ग्यारहवी, बारहवी, तेरहवी) क्रमशः 'ग, क, ख, ग' अन्तरो पर स्थित है। तेरहवी श्रुति पर मव्यम विद्यमान है। पञ्चम की चार श्रुतियाँ पॉचवें तार के पञ्चमवाले पर्दे पर मूल सप्तक का मध्यम वोल रहा है। उसके पश्चात् पञ्चम की चारो श्रुतियाँ (चौदहवी, पन्द्रहवी, सोलहवी और सत्रहवी) क्रमशः 'ग, क, ख, ग' अन्तरो पर स्थित है। सत्रहवी श्रुति पर पञ्चम है। धवत की तीन श्रुतियाँ चौथे तार के धँवतवाले पर्दे पर मूल सप्तक का पञ्चम विद्यमान है, धैवत की तीन श्रुतियाँ (अठारहवी, उन्नीसवी और वीसवी) उससे क्रमशः 'क, ख, ग' अन्तर पर स्थित है। वीसवी श्रुति पर धैवत है। निवाद की दो श्रुतियॉ तीसरे तार के निपादवाले पर्दे पर मूल सप्तक का धैवत है, उसके पश्चात् निपाद की दो श्रुतियाँ (इक्कीसवी और वाईसवी) कमश. 'ख, ग' अन्तर पर स्थित है, वाईसवी श्रुति पर निपाद है। षड्ज की चार श्रुतियाँ पॉचवे तार के 'तार षड्ज' वाले पर्दे पर मूल सप्तक का निपाद वोल रहा है, पड्ज की चार श्रुतियाँ (पहली, दूसरी, तीसरी, चौथी) उसके पञ्चात् करमशः 'ग, क, ख, ग' अन्तरो पर स्थित है। चौथी श्रुति पर पड्ज विद्यमान है। सारणा-पद्धति में 'अन्तर गान्धार' और 'काकली निपाद' की सिद्धि भी महर्षि भरत की उक्ति के अनुसार हो जाती है।" तीव्र मध्यम यद्यपि महर्पि भरत के द्वारा नही गिनाया गया है, परन्तु मध्यम और पञ्चम का अन्तर स्वर होने के कारण इसकी उपलब्धि भी यथास्थान होती है। अन्तर गान्धार की दो श्रुतियाँ पाँचवे तार के मध्यमवाले पर्दे पर मूल सप्तक का गान्धार विद्यमान है, उसके पश्चात् अन्तर गान्धार की दो श्रुतियाँ (दसवी और ग्यारहवी) कमश 'ग-क' अन्तरो पर विद्यमान है। ग्यारहवी श्रुति पर 'अन्तर गान्धार' बोल रहा है, जिसकी ध्वनि

५४-अन्तरनिदर्शनमपि श्रुतिनिदर्शने प्रोक्तम्। -भरत०, ब० सं०, अ० २८,पृ० ४३५

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२८ भरत का संगीत-सिद्धान्त

मूल सप्तक के तीव्र गान्वारवाले पर्दे पर निकलनेवाली ध्वनि से अभिन्न नही। फलतः 'अन्तर गान्वार' और 'तीव्र गान्वार' एक ही ध्वनि का बोध कराते है। काकली निषाद की दो श्रुतियाँ पाँचवें तार के तार पड्जवाले पर्दे पर मूल सप्तक का निपाद ध्वनित हो रहा है, इसके पश्चात् काकली निपाद की दो श्रुतियाँ (पहली, दूसरी) क्रमश. 'ग, क' अन्तर पर स्थित है। दूसरी श्रुति पर काकली निपाद ध्वनित हो रहा है। इसकी घ्वनि मूल सप्तक के तीव्र निपाद से भिन्न नहीं, अतः 'काकली निपाद' और तीव्र निपाद एक है। पत-पञचम" (तीन मध्यम) की दो श्रुतियाँ पाँचवें तार के पञ्चमवाले पर्दे पर मूल सप्तक का मध्यम स्थित है, 'पत-पञ्चम' (तीव्र मध्यम) की दो श्रुतियाँ (चौदहवीं, पन्द्रहवी) उससे करमशः 'ग, क' अन्तर पर है, पन्द्रहवी श्रुति पर 'पत-पञ्चम' बोल रहा है, जिसकी ध्वनि मे मूल सप्तक के तीव्र मध्यमवाले पर्दे पर बोलनेवाली ध्वनि से कोई अन्तर नही है। पूर्वोक्त प्रस्तार पर ध्यान देने से कुछ अन्य विशेपताएँ भी दृष्टिगोचर होगी- (अ) प्रत्येक स्वर की उपान्त्य (अन्तिम से पहली) एवं अन्त्य श्रुति क्रमशः 'ख-ग' है। (आ) ऋपभ और धैवत की प्रथम श्रुति का परिमाण भी एक-जैसा है। (इ) पड्ज, मध्यम और पञ्चम की श्रुतियो का क्रम एक-जैसा है, अर्थात् इन स्वरों की श्रुतियो के परिमाणो का क्रम 'ग, क, ख, ग है।

५५-आजकल जिस स्वर की संज्ञा तीव्र मध्यम है, उसे महाराज कुम्भ ने 'पतपञ्चम' की संज्ञा दी है। श्रीकण्ठ ने इस सज्ञा को ज्यो का त्यो ग्रहण किया है। आचार्य कल्लिनाथ का कथन है कि 'रामक्रिया' नामक क्रियाङ़ग राग मे मव्यम 'पञन्चम' की दो श्रुतियॉँ ले लेता है। इस दृष्टि से तीव्र मध्यम महाराज कुम्भ की दृष्टि मे 'पञ्चम' का और आचार्य्य कल्लिनाथ की दृष्टि मे मध्यम का विकार है। इसी ध्वनि को सोमनाथ ने 'मृदु पञ्चम' और वेकट मखी ने 'वराली मध्यम' कहा है। इस सम्बन्ध मे विस्तृत विचार यथास्थान किया जायगा। यहाँ ध्यान देने योग्य वात यह है कि महर्पि भरत की जिस दूसरी सारणा में अन्तर गान्धार और काकली निपाद की प्राप्ति होती है, उसी मे तीव्र मध्यम की भी उपलब्धि होती है।

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ग्राम २९

*निम्नलिखित मण्डल-प्रस्तार में स्वरों की श्रुतियों के परिमाणो का क्रम दिग्दर्शित है - मण्डल-प्रस्तार श्रुतिपरिमाणों का त्रम (का०) नि० स

१२३४५६ ग क ख ग क ख

नि २२ ग ग ७ रे

२१ ख ख ८

घ २० ग ग ९ ग १९ ख ग १० १८ क क ११ (अन्तर गान्धार)

ग ख क ग ग ख १७ १६ १५ १४ १३ १२ म

श्रुतियों के परिमाणो को जॉचने की एक विधि और है- 'ग' अन्तर- प्रथम सारणा का पञ्चम, मूल सप्तक के ऋपभ को 'पड्ज' मानने पर उसका मध्यम होता है, जो मूल सप्तक के पञ्चम की अपेक्षा एक प्रमाणश्रुति उतरा हुआ होता है। परिणामस्वरूप मूल सप्तक के मुक्त तार की ध्वनि की अपेक्षा प्रथम सारणा के मुक्त तार की ध्वनि भी एक प्रमाणश्रुति उतरी होती है। 'स' अन्तर- प्रथम सारणा के ऋपभ को पडज मानने पर द्वितीय सारणा का पञ्चम इस नवीन पड्ज का मध्यम न होकर तीव गान्धार से कुछ चढ़ा हुआ रहता है। इससे सिद्ध है कि मूल सप्तक के तार की अपेक्षा प्रथम सारणा का तार जितना उतरा हुआ है, दूसरी सारणा का तार प्रथम सारणा के तार से 'ग' अन्तर की अपेक्षा अधिक उतरा हुआ है। फलतः प्रथम सारणा एव द्वितीय सारणा के तारों की ध्वनियों का अन्तर मूल सप्तक एव प्रथम सारणा के तारो की ध्वनियो मे पाये जानेवाले अन्तर की अपेक्षा अधिक है।

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३० भरत का संगीत-सिद्धान्त

इस मण्डलप्रस्तार पर विचार करने से कुछ चमत्कारपूर्ण तथ्यों का दर्शन होगा- (अ) जिन दो स्वरों में 'पड्ज-मध्यम भाव' बताया गया है, या हो सकता है, उनके नव श्रुत्यन्तर मे सदा टो 'क' अन्तर, तीन 'ख' अन्तर और चार 'ग' अन्तर होगे। परीक्षा कीजिए - (१) 'स - म' : दो 'क' अन्तर : पाँचवी और ग्यारहवीं श्रुति। तीन 'ख' अन्तर : छठी, आठवी और वारहवी श्रुति। चार 'ग' अन्तर : सातवी, नवी, दसवी और तेरहवी श्रुति। (२) 'म - नि': दो 'क' अन्तर : पन्द्रहवी और अठारहवी श्रुति। तीन 'ख' अन्तर : सोलहवी, उन्नीसवी और इक्कीसवी श्रुति। चार 'ग' अन्तर : चौदहवी, सत्रहवी, वीसवी और वाईसवी श्रुति। (३) 'प - तार - स' : दो 'क' अन्तर : अठारहवी और दूसरी श्रुति। तीन 'ख' अन्तर : उन्नीसवी, इक्कीसवी और तीसरी श्रुति। चार 'ग' अन्तर : वीसवी, वाईसवी, पहली और चौथी श्रुति। (४) 'अन्तर गान्धार - घ' : दो 'क' अन्तर : पन्द्रहवी और अठारहवी श्रुति। तीन 'ख' अन्तर : वारहवी, सोलहवी और उन्नीसवी श्रुति। चार 'ग' अन्तर : तेरहवी, चौदहवी, सत्नहवी और वीसवी श्रुति। (५) 'नि - तार ग' : दो 'क' अन्तर : दूसरी और पॉचवी श्रुति। तीन 'ख' अन्तर : तीसरी, छठी और आठवी श्रुति। चार 'ग' अन्तर : पहली, चौथी, सातवी और नवी श्रुति।

'क' अन्तर- द्वितीय सारणा के ऋषभ को पड्ज मानने पर तृतीय सारणा का पञ्चम इस नवीन पपड्ज के तीव्र गान्वार से भी कुछ उतरा हुआ रहता है। फलत. यह सिद्ध है कि द्वितीय एवं तृतीय सारणाओ के मुक्त तारो की ध्वनि मे पाया जानेवाला 'क' अन्तर सर्वाधिक है।

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ग्राम ३१

(६) 'रे - माध्यमग्रामिक पञ्चम' : दो 'क' अन्तर : ग्यारहवी और पन्द्रहदी श्रुति। तीन 'ख' अन्तर : आठवी, बारहवी और सोलहवी श्रुति। चार 'ग' अन्तर : नवी, दसवी, तेरहवी और चौदहवी श्रुति। (७) '- तार ऋषभ' : दो 'क' अन्तर : दूसरी और पॉचवी श्रुति। तीन 'ख' अन्तर : इक्कीसवी, तीसरी और छठी श्रुति। चार 'ग' अन्तर : बाईसवी, पहली, चौथी और सातवी श्रुति। महर्पि भरत ने अपने द्वारा निश्चित नौ स्वरो मे यथास्थान आनेवाले नव श्रुत्यन्तर को ही सवाद का कारण बताया है, परन्तु यह नही कहा है कि प्रत्येक श्रुति नव श्रुत्यन्तर पर स्थित श्रुति की सवादिनी होती है। वाईस श्रुतियो मे तो ऐसे नव श्रुत्यन्तरो के भी उदाहरण है, जिनमे पूर्वोक्त अन्तर सख्या न होने के कारण संवाद का अभाव है। परीक्षा कीजिए - पॉचवीं और चौदहवी श्रुति में नौ श्रुतियो का अन्तर तो है, परन्तु परस्पर संवाद नहीं है, क्योंकि पॉचवी श्रुति के पश्चात् से चौदहवी श्रुति तक गिनने पर एक 'क' अन्तर (ग्यारहवी श्रुति पर), 'ख' अन्तर तीन बार (छठी, आठवीं और बारहवी श्रुति पर) तथा 'ग' अन्तर पाँच वार (सातवी, नवी, दसवी, तेरहवी और चौदहवीं श्रुति पर) आता है। इस प्रकार श्रुतियों की सख्या तो नौ हो जाती है, परन्तु उनके परिमाणों की संख्या वह नहीं रहती, जो 'पड्ज-मध्यम भाव' के लिए अभीष्ट है। फलत पॉचवीं और चौद- हवी श्रुति मे 'पड्जमध्यम भाव' से सवाद नही, 'श्रुतिदर्पण' पर इन दोनो श्रुतियो को छेडकर भी आप इस तथ्य को प्रमाणित कर सकते है। मण्डल-प्रस्तार मे कई श्रुतियॉ ऐसी दिखाई देगी, जिनका सवाद उनसे नव श्रुत्यन्तर पर स्थित श्रुति के साथ नही है। (आ) 'मण्डल-प्रस्तार' मे पड्ज-पञ्चम भाव पर विचार कीजिए, जिन दो स्वरो के त्रयोदश श्रुत्यन्तर मे 'क' अन्तर तीन, 'ख' अन्तर चार और 'ग' अन्तर छ. होते है, उन्ही दोनों स्वरो मे पड्ज-पञ्चम भाव से सवाद होता है। (१) 'स - प': तीन 'क' अन्तर : पॉचवी, ग्यारहवी और पन्द्रहवी श्रति।

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३२ भरत का संगीत-सिद्धान्त

चार 'ख' अन्तर : छठी, आठवी, वारहवी और सोलहवी श्रुति। छः 'ग' अन्तर : सातवी, नवीं, दसवी, तेरहवी, चौदहवी और सत्रहवी श्रुति। (२) 'रे - ध' : तीन 'क' अन्तर : ग्यारहवीं, पन्द्रहवी और अठारहवी श्रुति। चार 'ख' अन्तर : आठवी, वारहवी, सोलहवी और उन्नीसवी श्रुति। छः 'ग' अन्तर : नवी, दसवी, तेरहवी, चौदहवी, सत्रहवी और वीसवी श्रुति (३) 'ग - नि': तीन 'क' अन्तर : ग्यारहवीं, पन्द्रहवी और अठारहवी श्रुति। चार 'ख' अन्तर : वारहवी, सोलहवी, उन्नीसवीं, इक्कीसवी श्रुति। छः 'ग' अन्तर : दसवी, तेरहवी, चौदहवी, सत्रहवी, वीसवी और बाईसवी श्रुति। (४) 'अन्तर - गान्वार - काकली निषाद': तीन 'क' अन्तर : पन्द्रहवी, अठारहवी और दूसरी श्रुति। चार 'ख' अन्तर : सोलहवी, उन्नीसवी, इक्कीसवी और तीसरी श्रुति। छः 'ग' अन्तर : तेरहवी, चौदहवी, सत्रहवी, बीसवी, बाईसवी और पहली श्रुति। (५) 'म-तार षड्ज': तीन 'क' अन्तर : पन्द्रहवी, अठारहवी और दूसरी श्रुति। चार 'ख' अन्तर : सोलहवी, उन्नीसवी, इक्कीसवी और तीसरी श्रुति। छः 'ग' अन्तर : चौदहवीं, सत्रहवी, बीसवी, बाईसवीं, पहली और चौथी श्रुति। (६) 'ध - अन्तर गान्वार': तीन 'क' अन्तर : दूसरी पाँचवी और ग्यारहवी श्रुति। चार 'ख' अन्तर : इक्कीसवी, तीसरी, छठी और आठवी श्रुति। छ. 'ग' अन्तर : बाईसवी, पहली, चौथी, सातवी, नवी और दसवी श्रुति। (७) 'निषाद - तार मध्यम' : तीन 'क' अन्तर : दूसरी, पाँचवी और ग्यारहवी श्रुति। चार 'ख' अन्तर : तीसरी, छठी, आठवी और वारहवी श्रुति। छः 'ग' अन्तर : पहली, चौथी, सातवीं, नवी, दसवी और तेरहवी श्रुति।

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ग्राम ३३

वाईस श्रुतियों मे नव श्रुत्यन्तर होने पर भी अनेक स्थानो पर षड्ज-मध्यम भाव का अभाव मिलता है। उसी प्रकार अनेक स्थलो मे त्रयोदश श्रुत्यन्तर होने पर भी पड्ज-पञ्चम भाव का अभाव मिलेगा। इस वात को एक और दृष्टि से देखा जाय। पड्ज से जिन तीन श्रुतियो के अन्तर पर 'ऋपभ' स्थित है, उनके अन्तर क्रमशः 'क' 'ख' 'ग' है। यदि सातवी श्रुति पर स्थित 'ऋषभ' को थोडी देर के लिए 'पड्ज' मान लिया जाय, तो दसवी श्रुति पर इस नवीन 'पड्ज' के ऋपभ की प्राप्ति नही होगी, क्योकि आठवी, नवी और दसवी श्रुति के परि- माण क्रमश. 'ख' 'ग' 'ग' है। सातवी श्रुति पर स्थित 'ऋपभ' से नवी श्रुति पर स्थित गान्धार का अन्तर 'ख-ग' है, परन्तु यदि हम नवी श्रुति को ऋपभ मानकर ग्यारहवी पर उसका 'गान्धार' ढूँढे, तो मिलना असम्भव है, क्योकि दसवीं और ग्यारहवीं श्रुति के परिमाण क्रमशः 'ग-क' है। यदि हम पाँचवी श्रुति को गान्धार मानकर नवी श्रुति पर उसका 'मध्यम' ढूँढें, तो उसकी प्राप्ति असम्भव है, क्योंकि छठी, सातवी, आठवी और नवी श्रुति के परिमाण कमश' 'ख-ग-ख-ग' है, जब कि 'गान्धार' के पश्चात् से 'मध्यम' तक प्राप्त होनेवाली दसवी, ग्यारहवी, बारहवी और तेरहवी श्रुतियो के वास्तविक परिमाण 'ग-क-ख-ग' है। इसी प्रकार अन्य उदाहरण भी ढूँढे जा सकते है; जिनसे सिद्ध हो जायगा कि पड्जग्राम की किसी भी श्रुति को पड्ज मान लेने से अगले समस्त स्वर केवल श्रुतिसंख्या के आधार पर नही मिलेगे। अर्थात् यदि हम पाँचवी श्रुति को पड्ज मान ले, तो आठवीं पर उसका 'ऋपभ', दसवी पर 'गान्धार' और चौदहवी पर 'मध्यम' नही मिलेगा। अठारहवी पर पञ्चम मिल जायगा। क्योकि पॉचवी और अठारहवीं श्रुति में तीन 'क', चार 'ख' और छ 'ग' अन्तर होने के कारण पड्ज-पञ्चम भाव है, परन्तु इक्कीसवी पर धैवत और पहली श्रुति पर निषाद की प्राप्ति नही होगी। कारण यह है कि वर्तमान सारणाएँ उस सप्तक को आधार मानकर की गयी है, जो पाड्जग्रामिक है और जिसका 'पड्ज' 'निपाद' से 'ग-क-ख-ग' अन्तर पर स्थित है। प्रथम श्रुति के पश्चात् से पॉचवी श्रुति तक प्राप्त होनेवाला अन्तर 'क, ख, ग, क' है, जो प्रथम श्रुति को 'निषाद' मानने पर पॉचवी श्रुति को उसकी अपेक्षा पड्ज बनाने में असमर्थ है, अत. पॉचवी श्रुति को बलात् कोई षड्ज मान भी ले, तो वर्तमान सारणा के परिणामस्वरूप प्राप्त इस श्रुति-मण्डल मे उसे अन्य अभीष्ट स्वरों की प्राप्ति नही होगी। ३

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द्वितीय अध्याय

मूर्च्छना

मूर्च्छना की व्युत्पत्ति एवं प्रयोजन क्रमयुक्त होने पर सात स्वर मूर्च्छना कहे जाते है।' 'मूच्छना' शन्द 'मूच्छ' धातु से वना है, जिसका अर्थ 'मोह' और 'समुच्छाय' (उत्सेध, उभार, चमकना, व्यक्त होना) है। मूर्च्छना शब्द में 'मूर्च्छ' धातु का अर्थ 'चमकना या उभ- रना' है।

१- कमयुक्ताः स्वराः सप्त मूर्च्छनास्त्वभिसंज्ञिताः । -- भरत०, व०सं०, अ० २८, पृ० ४३५ २- मोहोच्छायाभिधायी यो मूर्च्छधातुस्ततो ल्युटि। करणार्थे मूच्छनेति पदमत्र समुच्छये।। -पण्डितमण्डली, भ० को०, पृ० ५०१ कुछ लोगों का कथन है कि महर्पि भरत ने सग्रहश्लोको में 'मूर्च्छना' और 'तान' का भेद बताया है। सिंहभूपाल के अनुसार मतङ्ग का कथन है- मूर्च्छनातानयोर्च भेदः प्रतिपादितो मतङ्गेन। यदाह - ननु मूर्च्छनातानयोः को भेद .? उच्यते। मूर्च्छनातानयोर्नार्थान्तरत्वमिति विशाखिलः । एतन्न सङ्गतम्, संग्रहशलोके मूर्च्छनातानयोर्भेदस्य प्रतिपादितत्वात्। ननु कथ मूर्च्छनातानयोर्भेद. ? आरोहावरोहक्मयुक्तः स्वरसमुदायो मूर्च्छनेत्युच्चते, तानस्त्वारोहक्मेण भवतीति भेद: । -सिहभूपाल, स०र०, अ० सं०, स्वरा०, पृ०११४ अर्थात्-मूर्च्छना और तान का भेद मतङ्ग ने प्रतिपादित किया है, जैसा कि कहा है-मूच्छना और तान में क्या भेद है ? (यदि यह प्रश्न है तो) उत्तर है कि विगाखिल ने जो कहा है कि मूच्छना और तान के अर्थ मे अन्तर नही, तो यह असङ्गत है, क्योकि सग्रह ब्लोको में मूरच्छना और तान का भेद प्रतिपादित किया गया है। यदि यह प्रश्न

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मूर्च्छना ३५

श्रुति की 'मृदु" (उतरी हुई अवस्था) को कुछ लोगो ने मूर्च्छना कहा है, कुछ लोगों का कथन है कि रागरूपी अमृत के ह्रद (सरोवर) मे गायको और श्रोताओ के हृदय का

हो कि मूर्च्छना और तान मे भेद कैसे है ? तो उत्तर है कि आरोह एवं अवरोह के क्रम से 'मर्च्छना' होती है और आरोह क्रम से 'तान'। प्रो० रामकृष्ण कवि ने इस सम्बन्ध मे मतङ्ग का जो पाठ उद्धृत किया है, वह सिह भूपाल के द्वारा उद्धृत पाठ से भिन्न है और निम्नलिखित है- ननु मूर्च्छनातानयो. को भेद: ? उच्यते, मूर्च्छनातानयोरणुत्वान्तरमिति विशा- खिलः। एतच्चासङ्गतम्। भरतस्य संग्रहश्लोके मूर्च्छनातानयोरभेदस्य प्रतिपादित- त्वात्। कथम् ? मूर्च्छनारोहक्मेण तानोऽवरोहक्रमेण भवतीति भेद। -मतङ्ज, भ० को०, पृ० ५०२ अर्थात्-मूच्छना और तान में क्या भेद है? उत्तर है कि मूर्च्छना और तान में अणुत्व का अन्तर जो विशाखिल ने बताया है, वह ठीक नही, क्योकि महर्षि भरत ने संग्रह श्लोक मे मूर्च्छना और तान का भेद प्रतिपादित किया है। 'किस प्रकार से ?' मूर्च्छना आरोह-कम से और तान अवरोह-क्रम से होती है। पूर्वोक्त दोनो पाठो मे पर्याप्त अन्तर है। 'भरतनाटयशास्त्र' के प्रकाशित संस्क रणों मे उस संग्रह श्लोक की प्राप्ति नही होती, जिसमें मूर्च्छना और तान का उपर्युक्त भेद प्रतिपादित किया गया हो। महर्षि भरत ने तानो को मूर्च्छनाश्रित कहकर मूर्च्छना मे से एक या दो स्वरो के लोप के पश्चात् बचे हुए रूप को औडव या पाडव 'तान' कहा है। ३-तत्र येनैव स्वरेणोच्छाय. प्रवर्तते, तेनैव स्वरेण यदा समाप्तिरपि भवति तदा मूर्च्छना जायते। यथा षड्जग्रामे प्रथमाया मूर्च्छनाया 'सरिगमपधनिसे'ति स्वर- सन्निवेशे सति पड्जो मूच्छति। -नान्यदेव, भ० को०, पृ० ५०२ अर्थात्-जिस स्वर से उच्छाय (आरोह) होता है, उसी स्वर से जव समाप्ति भी हो, तब मूर्च्छना होती है, जैसे, षड्जग्राम मे प्रथम मूर्च्छना का स्वर सन्निवेश'सरि- गमनधनिस' होने पर पड्ज मूर्च्छित (उभरा हुआ) होता है। आचार्य शार्गदेव सात स्वरो के क्रमपूर्वक आरोह और अवरोह को मूर्च्छना मानते है, उस दशा मे 'सरिगमपधनिधपमगरेस' अवस्था मे 'पड्ज' मूर्च्छना का आरम्भक एवं समापक होने के कारण उभरता है। कमात्स्वराणां सप्तानामारोहर्चावरोहणम्। मूच्छनेत्युच्यते. -स० र०, अ० सं०, स्वरा०, पृ० १०३-१०४ ४-श्रुतेर्मदिवमेव स्यान्मूर्च्छनेत्याह तुम्बुरुः। -हरिपाल, भ०को०, पृ० ५००

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३६ भरत का संगीत-सिद्धान्त

निमग्न होना ही मूर्च्छना' है, परन्तु भरत-सङ्गीत में 'मूर्च्छना' का अर्थ सात स्वरों का कमपूर्वक प्रयोग ही है। मू्च्छनाएँ चार प्रकार की होती है, परन्तु इन चतुर्विध मूर्च्छनाओं के रूपो के विषय मे दो मत हो गये है। एक पक्ष का कथन है-'मूर्च्छनाओ के चार प्रकार है, पूर्णा, पाडवा, औडुविता, साधारणा।१

५-गायतां श्रृण्वताञ्चापि भवेद्रागामृते हरदे। मनसो मज्जनं यत्स्यान्मूर्च्छनेत्याह कोहलः॥ -हरिपाल, भ० को०, पृ० ५०० ६-यह पक्ष दत्तिल एवं मतङ्ग का है। सिंह भूपाल का कथन है- मतङ्गदत्तिली तु मूर्च्छनानामन्यथा चातुर्विध्यमवादिष्टाम्। यदाह मतङ्ग - 'तत्र सप्तस्वरा मूर्च्छना चतुविधा पूर्णा पाडवौडुविता साधारणी चेति। तत्र सप्तभिः स्वरैः या गीयते सा पूर्णा, पड्भि: स्वरः या गीयते सा पाडवा, पञ्चमिः स्वरै या गीयते सौडुविता, काकल्यन्तरै:स्वरैः या गीयते सा साधारणी' इति। दत्तिलोऽप्याह-

सर्वास्ता: पञ्चपट्पूर्णसाधारणकृताः स्मृता । -सिह भूपाल, स० र०, अ० स०, स्वरा०, पृ० ११४ अर्थात्-मतङ्ग और दत्तिल ने मूर्च्छनाओ की चतुर्विधता और ही प्रकार से बतायी है। मतङ्ग का कथन है-सप्तस्वरा मूर्च्छना के पूर्णा, पाडवा, औडुविता और साधारणी (अन्तरकाकलीयुक्त) ये चार प्रकार है। सात स्वरो से गायी जानेवाली पूर्णा, छः स्वरोंवाली पाडवा, पॉच स्वरोवाली औडुविता तथा काकलीनिपाद एवं अन्तरगान्धार से युक्त साधारणी है। दत्तिल ने भी कहा है कि वे (मूर्च्छनाएँ) पञ्चस्वरा, पटस्वरा, पूर्णा और साधा- रणकृता होती है। इस मत का आधार महर्पि भरत के नाटयशास्त्र मे पाया जानेवाला यह पाठ कहा जा सकता है- एवमेता. प्रक्रमयुताः पूर्णा. षाडवितौडवितीकृता: साधारणकृतारचेति चतुविधा- श्चतुर्दश मूर्च्छना: । -- भरत०, वस०, अ० २८,पृ० ४३५ अर्थात्-कमयुक्त ये मूर्च्छनाएँ पूर्ण, पाडवित, औडुवित एवं साधारणकृत चार प्रकार की है।

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मूर्च्छना ३७

दूसरे पक्ष का कथन है-मूर्च्छनाएँ चार प्रकार की होती है, गुद्धा, अन्तरसहिता, काकलीसहिता, अन्तरकाकली सहिता।

आचार्य शार्गदेव, सिह भूपाल या कुम्भ के समक्ष महर्षि भरत का यह पाठ नही था। सिंह भूाल ने इस मत को मतङ्ग और दत्तिल का बताया है, महर्पि भरत का नही। कुम्भ ने तो इस मत को भरतविरोधी एवं असङ्भत बताते हुए इसका खण्डन किया है। हमारी दृष्टि से नाट्यशास्त्र मे पाया जानेवाला पूर्वोक्त पाठ प्रक्षिप्त है। ७- यह मत आचार्य शार्ङ्गदेव, पण्डितमण्डली एव कुम्भ इत्यादि का है 'और महर्षि भरत के अनुसार प्रतीत होता है। महर्षि का कथन है- कमयुक्ताः स्वरास्सप्त मूर्च्छनास्त्वभिसज्ञिताः । षट्पञ्चकस्वरास्तासां पाडवौडुविताः स्मृताः॥ साधारणकृताश्चव काकलीसमलंकृताः। अन्तरस्वरसयुक्ता मूर्च्छना ग्रामयोई्वयोः॥ -भरत०, व० सं०, अ० २८, पृ० ४३५ अर्थात्-क्रमयुक्त सात स्वर मूच्छंना कहलाते है। उन मूर्च्छनाओ के पट्स्वर षाडव और पञ्चस्वर औडुवित की उत्पत्ति होती है। साधारणकृत, काकलीयुक्त, एवं अन्तरसयुक्त मूर्च्छनाएँ भी दोनो ग्रामो मे होती है। यहॉ पाडवित और औडुवित शुद्ध (अविकृत स्वर) मूर्च्छनाओ से उत्पन्न होनेवाले रूप है, जिनकी सख्या चौरासी और नाम 'तान' है। ये मूर्च्छनाओ के भेद नही। पाडवित एव औडुवित रूप शुद्ध मूर्च्छनाओ से ही बनते है, विकृत स्वरोवाली मूर्च्छनाओं से नही, इसी लिए मूर्च्छना के शुद्ध रूप के साथ पाडवित और औड्वित की चर्चा की गयी है। महर्षि भरत के द्वारा उपदिष्ट चौरासी ताने शुद्ध मूर्च्छनाओ से ही बनती है। यही बात आचार्य शार्ङ्गदेव ने कही है- ताना: स्युर्मूर्च्छना: शुद्धाः पाडवौडुवितीकृताः। -सं० र०, अ० स०, स्वरा०, पृ० ११५ अर्थात्-शुद्ध मूर्च्छनाएँ पाडव या औडुवित किये जाने पर 'तान' कहलाती है। कुछ और आचार्य भी यही कहते है- एकद्विस्वरलोपेन पाडवौडुवितीकृता.। ताना. स्युमूच्छना शुद्धाः ग्रामद्वयमुपाश्रिताः ॥ -पण्डितमण्डली, म० को०, पृ० ५०१ न चैतेपां मूच्छनात्वमेपु यत्स्वरलोपनम् ।

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३८ भरत का संगीत-सिद्धान्त

हमें दूसरा पक्ष मान्य है, क्योकि 'औडुवित' और 'पाडवित' अवस्था को महर्पि भरत ने 'तान' और सम्पूर्ण अवस्था को मूच्छना कहा है। सप्तस्वरता मूर्च्छना का प्रधान लक्षण है। पड्ज-ग्राम मे सात मूर्च्छनाएँ होती है। उत्तरमन्द्रा, रजनी, उत्तरायता, शुद्ध- पड्जा, मत्सरीकृता, अश्वक्रान्ता और अभिरुद्गता।' इनके आरम्भिक स्वर क्रमश. पड्ज, निपाद, धैवत, पञ्चम, मव्यम, गान्वार और ऋषभ है। अर्थात्-10 १. उत्तरमन्द्रा स ग म प घ नि २. रजनी नि स रे ग म प ध ३. उत्तरायता घ नि स ग म प ४. शुद्धपड्जा नि रे ग म ५. मत्सरीकृता ध् स रे ग ६. अश्वकान्ता नी स रे ७. अभिरुद्गता रे ग म ध् नि स MA.A.S.D A A

तस्मात्सप्तस्वरैयुक्ता मूर्च्छनोक्ता मनीपिमि:। पट्पञ्चस्वरकास्ताना: भिद्यन्तेऽतः पृथक् ततः । पाडवौडुवितीकृता.। पृथक् चतुरशीतिः स्युरेवं पटत्रिशता युतम्। शतत्रयं भवेयुस्ते न चैवं तानाश्चतुरशीतिः स्युरिति मुनिसम्मतम् । तद्वचनं यतः। विकृतस्वरलोपोऽतो नात्र विद्भिश्चिकीपितः । प्रामाण्यान्मुनिवाक्यस्य शुद्धा एवात्र सम्मताः ॥ -- कुम्भ, भ० को०, पृ० २४४ ८-आदावुत्तरमन्द्रा स्याद्रजनी चोत्तरायता। चतुर्थी शुद्धपड्जा च पञ्चमी मत्सरीकृता॥ अश्वक्रान्ता तथा षष्ठी सप्तमी चाभिरुद्गता। पड्जग्रामाश्रिता ह्येता विज्ञेया. सप्त मूच्छना: ।। -- भरत० व० स०, पृ० ४३४ ९-आसा पड्जनिपादधैवतपञ्चममध्यमगान्वार्षंभाद्या. स्वराः। -भरत०, व० स०. पृ० ४३४ १०-तत्र पड्जग्रामे पड्जेनोत्तरमन्द्रा, निषादेन रजनी, धैवतेनोत्तरायता, पञ्चमेन शुद्धपड्जा, मध्यमेन मत्सरीकृता, गान्धारेणारवक्रान्ता, ऋषभेणाभिरुद्गता इति। -भरत, व० सं०, पृ० ४३४

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मूर्च्छना ३९

मध्यमग्राम मे भी सात मूर्च्छनाएँ है, सौवीरी, हारिणाश्वा, कलोपनता, शुद्ध- मध्या, मार्गी, पौरवी और हृष्यका।११ इनके आरम्भक स्वर क्रमशः मध्यम, गान्धार, ऋषभ, षड्ज, निषाद, धैवत, पञ्चम है।" अर्थात् -११ १. सौवीरी म प ध नि रे ग २. हारिणाश्वा ग म प ध नि स रे ३. कलोपनता रे ग म प ध नि स ४. शुद्धमध्या स रे ग म प ध नि ५. मार्गी नि स रे ग म ध ६. पौरवी ध् नी स रे ग म प ७. हृष्यका प् ध् नि स रे ग म

एक मूर्च्छना की सिद्धि दो प्रकार से होती है। षड्ज-ग्राम में यदि गान्धार की दो श्रुतियॉ चढ़ाकर उसे 'धवत' मान लिया जाय, तो उसमें मध्यम-ग्राम की सभी शुद्ध मूर्च्छनाएँ मिल जायंगी।१ नवतन्त्री पर ग्रामसिद्धि के समय भी यह सत्य स्पष्ट किया जा चुका है। मण्डल- प्रस्तार मे इसका स्पष्टीकरण इस प्रकार है-

११-सौवीरी हारिणाश्वाथ स्यात्कलोपनता तथा। शुद्धमव्या तथा चैव मार्गी स्यात् पौरवी तथा॥ हृष्यका चेति विज्ञेया सप्तमी द्विजसत्तमाः । मध्यमग्रामजा ह्येता विज्ञेयाः सप्त मूर्च्छना ॥ -भरत, व० सं०, पृ० ४३४-४३५ १२-आसां मध्यमगान्धारपंभपड्जनिपादधैवतपञ्चमा आनुपूर्वाद्याः स्वरा.। -भरत०, व० सं०, पृ० ४३५ १३-अथ मध्यमग्रामे-मध्यमेन सौवीरी, गान्धारेण हारिणाश्वा, ऋपभेण कलोपनता, पड्जेन शुद्धमध्यमा, निपादेन मार्गी, धैवतेन पौरवी, पञ्चमेन हृष्यका इति। -भरत०, व० सं०, पृ० ४३५ १४-द्विविवैकमूर्च्छनासिद्धि । तथा द्विश्रुतिप्रकर्पाद् धैवतीकृते गान्धारे मूर्च्छना- ग्रामयोरन्यतरत्वं पड्जग्रामे। -- भरत०, व०सं०, (का० सं०), अ० २८,पृ० ४३५

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४० भरत का संगीत-सिद्धान्त

ग्रामद्वयमूर्च्छना-बोधक मण्डल-प्रस्तार

स १ 2 ३ ४ ग ६ क क

नि २२ ग -ग ७ रे

२१ ख - ख ८

घ 20 ग - ग र्६ग

१६ ख -ग १०

१८ क -क ११

ग ग १४

इस मण्डल-प्रस्तार मे आपको दोनों ग्राम दृष्टिगोचर होगे। मध्यम-ग्रामीय स्वर त्रिकोणों मे दिखाये गये है। ग्यारहवी श्रुति भरतोक्त अन्तरगान्धार का स्थान है, जहॉ मध्यमग्राम का 'धैवत' है। इस प्रकार हम देखते है कि पड्ज़ग्राम के अन्तरगान्धार को धैवत मान लेने पर पड्जग्राम की प्रथम मूर्च्छना ही मध्यमग्राम की प्रथम मूर्च्छना वन जाती है। इस वात को यो भी कहा जा सकता है कि मध्यमग्राम के धैवत को दो श्रुति उतार कर उसे 'गान्वार' की संज्ञा दे देने पर मध्यमग्रामीय प्रथम मूच्छना ही पड्जग्रामीय प्रथम मूर्च्छना वन जायगी।" इस किया मे मध्यमग्रामीय निपाद, धैवत द्वारा परि- त्यक्त दो श्रुतियाँ ले लेने के कारण उत्कपयुक्त होकर पड्जग्रामीय मध्यम बन जाता है।

१५-मध्यमग्रामेऽपि धैवतमार्दवात् निपादोत्कर्पाद् द्वैविध्यं भवति। -- भरत०, व० स०, अ० २८, पृ० ४३५

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मूर्च्छना ४१

द्विग्रामीय मण्डल-प्रस्तार भी हमें बताता है कि एक ग्राम का जो स्वर इस क्रिया के परिणामस्वरूप दूसरे ग्राम के जिस स्वर का स्थान ग्रहण करता है, उसके साथ उस स्वर का संवाद होता है। बदली हुई संज्ञावाले स्वर मे भी श्रुतियॉ प्राय. उतनी ही होती है, जितनी श्रुतियॉ कि पूर्वसज्ञावाले स्वर मे होती है।1 मध्यम-ग्राम के पञ्चम और धैवत में चार श्रुतियों का अन्तर होता है," जव पड्जग्रामीय ऋषभ की सज्ञा मध्यमग्रामीय पञ्चम हो जाती है, तव पड्जग्रामीय गान्धार की दो श्रुतियाँ चढा देने से अन्तर-गान्धारवाली श्रुति पर मध्यमग्रामीय चतु श्रुतिक धैवत प्राप्त हो जाता है।" पड्जग्रामीय मध्यम, पञ्चम, धैवत, निषाद, पड्ज भी मध्यमग्रामीय निषाद, षड्ज, ऋषभ, गान्धार एवं पड्ज वन जाते है।१ निम्नलिखित सारणी मे परस्पर प्रतिनिधित्व-जन्य सवाद स्पष्ट है। षड्जग्राम के स्वर का स्थान ग्रहण करनेवाले मध्यमग्रामीय स्वरो के साथ पड्ज-ग्रामीय स्वरो का षड्ज-मध्यम भाव से संवाद है।

ग्रामद्वय-बोधक सारणी

पड्जग्राम से मध्यमग्राम

पड्ज-मध्यमभाव षड्ज-ग्रामीय मध्यमग्रामीय श्रुतिसंख्या (नवश्रुत्यन्तरसंवाद) सज्ञाएँ संज्ञाएँ (मध्यम- मध्यमग्राम मे

ग्रामीय) प्राप्त श्रुतिक्रम

षड्ज-मध्यम स म ४ 'ग, क, ख, ग' ऋपभ-पञ्चम रि प ३ 'क, ख, ग' अन्तरगान्धार-धवत अ० गा० ध ४ 'ख, ग, ग, क' मध्यम-निषाद म नि २ 'ख, ग' पञ्चम-पड्ज प स ४ ग, क, ख, ग' धवत-ऋपभ घ रे ३ 'क, ख, ग' निषाद-गान्वार नि ग २ 'ख,ग'

१६-तुल्यश्रुत्यन्तरत्वात् संज्ञान्यत्वम्। -भरत०, व० सं० अ० २८, पृ० ४३५ १७-चतुःश्रुतिकमन्तरं पञ्चम-धैवतयोः। 11 १८-तद्वद्गान्धारोत्कर्षाच्चतुःश्रुतिकमेव भवति। 11 १९-शेषारचापि मध्यमपञ्चमघवतनिषादपड्जर्पभा मध्यमादित्वं (निषादादित्वं?) प्राप्नुवन्ति। -भरत०, व० सं०, अ० २८, पृ० ४३५

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४२ भरत का संगीत-सिद्धान्त

जिन दो स्वरो में बीस श्रुतियों का अन्तर हो, वे परस्पर विवादी होते है और कदापि परस्पर प्रतिनिधित्व नही करते। ग्रामद्वयवोधक श्रुतिमण्डलप्रस्तार से यह स्पष्ट है कि ऋषभ 'गात्वार' से और वैवत 'नियाद' से वीसवीं श्रुति पर स्थित है, इसी लिए 'गान्वार-ऋपभ' परस्पर विवादी हैं और 'निपाद-वैवत' भी। शुद्ध गान्वार और वैवत परस्पर ग्यारह श्रुतियों के अन्तर पर स्थित होने के कारण संवादी नही है, फलत. पड्जग्राम से मध्यमग्राम बनाने में गान्वार को दो श्रुति चढाकर धैवत के साथ उसका नव श्रुत्यन्तर सवाद वनाना पड़ता है, तब वह 'अन्तरगान्वार' संज्ञा-परिवर्तन होने पर मध्यमग्रामीय धैवत वनता है। अन्तरगान्वार का एक महत्त्व और भी है, अन्तर स्वर होने के कारण वह हमे 'श्रुति' की प्राप्ति कराता है। ग्रामसिद्धि मे हम देख चुके है कि हमे पड्ज से मध्यम, मध्यम से निषाद और निपाद से गान्वार की प्राप्ति हो जाती है। धवत की प्राप्ति हमे तब होती है, जब हम पड्ज का आश्रय पुनः लेकर अन्तर गान्धार की सिद्धि स्वतन्त्र रूप से करते है। फलत. गान्धार से घैवत और धैवत से ऋपभ की प्राप्ति होती है। ऋपभ की प्राप्ति होने पर ही प्रथम सारणा सम्भव होती है, क्योकि मध्यमग्रामीय पञ्चम का निर्माण ऋपभ के साथ उसका संवाद करने पर ही सम्भव होता है और 'प्रमाणश्रुति' की प्राप्ति होती है। इसी लिए अन्तर स्वर 'श्रुति' तक पहुँचानेवाले कहे गये है।२१ 'श्रुति' की प्राप्ति का एक उपाय और भी है, परन्तु पड्जान्तर-भाव का आश्रय हमे उस अवस्था मे भी लेना पडता है। पञ्चम से पड्जान्तर-भाव के आधार पर काकली- निपाद की सिद्धि, उससे पड्ज-मध्यम-भाव के आधार पर अन्तरगान्वार की सिद्धि और तत्पश्चात् धैवत और ऋषभ की सिद्धि करने पर प्रमाणश्रुति की प्राप्ति सम्भव है, परन्तु यह द्रविड-प्रागायाम है। पड्जान्तर भाव के आधार पर मव्यम से वैवत और निषाद से ऋपभ की सीधी सिद्धि भी सम्भव है। तात्पर्य यह है कि 'प्रमाणश्रुति' की प्राप्ति के लिए पड्जान्तर भाव का आश्रय हमे लेना ही पडता है।

२०-विवादिनस्तु ये तेपा स्याद् विशतिकमन्तरम्। -भरत०, व० सं०, अ० २८, पृ० ४३२ २१-जातिरागं श्रुतिञ्चैव नयन्ते चान्तरस्वराः। -भरत, व० सं०, अ० २८, पृ० ४३७

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सूरच्छना ४३

गान्धार से-षड्जान्तर-भाव के आधार पर भी हमें त्रिश्रुतिक पञ्चम प्राप्त हो सकता है, क्योकि त्रिश्रुतिक पञ्चम गान्वार के पश्चात् सात श्रुतियो के अन्तर पर है।

तान -

मूर्च्छनाओं पर आश्रित ताने चौरासी है, उनमे उनचास ाडव और पैतीस औड्व है। (शुद्ध मूर्च्छनाओ की संख्या सात होने के कारण) षड्जग्राम मे पाडव मूर्च्छनाओ का लक्षण सात प्रकार का है। जैसे, पड्जग्राम मे पड्ज, ऋपभ, पञ्चम और निषाद से रहित चार ताने है।१२ मध्यमग्राम में पड्ज, ऋषभ और गान्धार से हीन तीन ताने है। इस प्रकार सब मूर्च्छनाओं मे की जानेवाली ये (षाडव) ताने उनचास होती है,२ जो निम्न- लिखित है-

उत्तरमन्द्रा - १. x रे ग म प ध नि

२. स x ग म प ध नि

३. स रे ग म X ध नि ४. स रे ग म प ध X

रजनी - NXNN ५. नी X ग म प ध ६. नी सा X ग म प ध ७. नी सा ग म X घ

८. x सा रे ग म प ध

उत्तरायता - N X ९. ध नी X ग म प

१०. ध नी स X ग म प

२२-मूर्च्छनासंश्रितास्तानाश्चतुरशीतिः । तत्र एकोनपञ्चाशत् पटस्वरा, पञ्च- त्रिशत् पञ्चस्वराः। लक्षणं तु पटस्वराणां सप्तविधम्। यथा पड्जर्पभगान्वार- हीनाश्चत्वारस्ताना पड्जग्रामे। -भरत०, व० सं०, अ० २८, पृ० ४३७ २३-मध्यमग्रामे तु षड्जर्पभगान्वारहीनास्त्रयस्ताना.। एवमेते सर्वासु मूर्च्छनासु क्रियमाणा भवन्त्येकोनपञ्चाशत्तानाः । -भरत०, व० सं०, अ० २९, पृ० ४२६

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४४ भरत का संगीत-सिद्धान्त

११. ध नी स रेग म X १२. ध x स रे ग म प शुद्ध पड्जा - १३. प ध नी X रेग म १४ प ध नी सा X ग म

१५. x ध नी सा रे म

१६. प ध x सा रे ग म 속 쇄 속 ×

मत्सरीकृता- १७. म प ध नी X रे ग

१८. म प ध नी सा X ग

१९. म X ध नी सा रे ग

२०. म प घ X सा रे ग

अश्वक्रान्ता -

२१. ग म प ध नी X रे

२२. ग म प ध नी स X

२३. ग म X ध नी स रे

२४. ग म प ध X स रे अभिरुद्गता- २५. रे ग म प ध नी x

२६. x ग म प ध स

२७. रे ग म X ध नी स

२८. रे ग म प ध X स

सौवीरी (मव्यमग्राम) - २९ म प ध नी X रे ग

३०. म प घ नी स x ग

३१. म प ध नी स रे X

हारिणाइवा- ३२. ग म प ध नी X रे

३३. ग म प ध स X

३४. x म प ध नी स AV X A

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मूर्च्छना ४५

कलोपनता- ३५. रे ग म प ध नी X

३६. x ग म ध नी स ३७. रे x म प ध नी स A 4 4

शुद्धमध्या - ३८. x रे ग म प ध नि

३९. स X ग म ध नि

४०. स रे X म प ध नि A 4 4

मार्गो --

४१. नी X रे ग म प ध

४२. नी सा X ग म प ध

४३. नी सा रे X म प ध मौरवी-

४४. घ नी X रे ग म प

४५. ध नी स X ग म प

४६. ध नी स रे X म प

हव्यका- ४७. प ध नी X रे ग म

४८. प ध नी स x ग म ४९. प ध नी स रे x म X A A पाँच स्वरवाली तानो का लक्षण पॉच ही प्रकार का है। जैसे, पड्जग्राम में "पड्ज-पञ्चम-हीन', 'ऋषभ-पञ्चम-हीन' और 'गान्वार-निपाद-हीन' तीन तानें (एक मूर्च्छना में ) होती है। मध्यमग्राम (की एक मूर्च्छना ) मे 'गान्धार-निपाद- हीन' और 'ऋपभ-धैवत-हीन' दो तानें होती है। इस प्रकार सब मूर्च्छनाओ मे चनायी जानेवाली औडुव ताने पैतीस होती है, पड्जग्राम मे इक्कीस और मध्यमग्राम मे चौदह।२ इनके रूप निम्नलिखित है-

२४-पञ्चस्वराणां तु पञ्चविधमेव लक्षणम्। यथा षड्जपञ्चमहीना ऋपभ- पञ्चमहीना गान्वारनिपादहीना इति त्रयस्ताना: पड्जग्रामे। मव्यमग्नामे तु गान्वारनिपादवद्धीनावृषभवैवतहीनाविति द्वौ तानौ। एवं पञन्चस्वराः

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४६ भरत का संगीत-सिद्धान्त

उत्तरमन्द्रा -

१. x रे ग म x ध नि

२. स x ग म X ध नि

३. स रे x म प ध X रजनी -

४. नी x रे ग म X

५. नी स X ग म X ध

६. x स रे X म प ध

उत्तरायता - -

७. घ नी X रे ग म X

८. ध नी स X ग म X

९. ध x स रे X म प

शुद्धपड्जा - १०. x घ नी रे ग म

११. x ध नी स X ग

१२. प ध X स x म मत्सरीककृता - १३. म X ध नी रे ग

१४. म x ध नी स X ग

१५. म प ध x स रे X

अश्वकरान्ता -

१६. ग म X ध नी X रे

१७. ग म X ध नी स X

१८. x म प ध X स रे

अभिरद्गता- १९. रे ग म X घ नी X

२०. x ग X ध नी स

२१. रे x म प घ x स

सर्वासु मूर्च्छनासु क्रियमाणास्ताना. पञ्चत्रिशद् भवन्ति। पड्जग्राम एकविशति- मंध्यमग्रामे चतुर्दश। -भरत, व० सं०, अ० २८

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मूच्छना ४७

सौवीरी (मध्यमग्राम) - २२. म प ध x स रे X

२३. म प x नी स x ग हारिणाश्वा- २४. x म प ध x स रे २५. ग म प x नि स X

कलोपनता - २६. रे x म प ध xस २७. x ग म प x नि स

शुद्धमध्या - २८. स रे x म प ध x २९. स x ग म प X नि मार्गो - ३०. x स रे x म प घ ३१. नि स x ग म प X यौरवी- ३२. ध x स रे X म प

३३. x नि स x ग म प

हृष्यका - ३४. प ध X स X म ३५. प X नि स X ग म इस प्रकार उनचास पाडव तानो और पैतीस औडुव तानो को जोड़ने से तानो की सख्या चौरासी होती है।२५ पड्जग्राम मे धैवत, मध्यमग्राम में पञ्चम एवं दोनो ग्रामों में मध्यम का लोप नही होता। मध्यम का लोप कदापि न होने के कारण उसे 'अविलोपी' या 'अविनाशी' कहा गया है।२६

२५-एवमेत एकत्र गम्यमानाश्चतुरशीतिर्भवन्ति। -भरत, व० सं०, पृ० ४३६ २६-न मध्यमस्य नाशस्तु कर्तव्यो हि कदाचन। सप्तस्वराणां प्रवरो ह्यनाशी चैव मध्यमः॥ -- भरत०, व० सं०, अ० २८, पृ० ४४२ पञ्चमं मध्यमग्रामे पड्जग्रामे तु धैवतम्। अलोपिनं विजानीयात्सर्वत्रैव तु मध्य- मम् ।। -दत्तिल मुनि, सं० र०, अ० सं०, स्वरा०, सिह० पृ० १०३

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४८ भरत का संगीत-सिद्धान्त

मूर्च्छनाओं का प्रयोजन

हम यह देख चुके है कि 'मूच्छनाएँ' तानो को जन्म देती है, परन्तु मूर्च्छनाओ और तदाश्रित तानों का प्रयोजन कुछ और भी है। इसे भली भाँति जानने के लिए प्राचीन वीणाओं के विषय में कुछ जान लेना आवश्यक है। प्राचीन काल मे दो प्रकार की वीणाएँ होती थी - (१) वे, जिनमे एक तार पर तीनों सप्तकों के इक्कीसो स्वर प्रत्यक्ष किये जाते थे। (२) वे, जिनमे प्रत्येक स्वर के प्रत्यक्षीकरण के लिए अलग-अलग तार होते थे। प्रथम प्रकार की वीणाओ में आदिम वीणा1 'एकतन्त्री' में एक तार होता था, जैसा कि उसके नाम से प्रकट है। एकतन्त्री वीणा के दूसरे नाम 'ब्रह्मवीणा'," 'घोषक', 'घोषा" भी है। एकतन्त्री वीणा मे पदे नही होते थे, जिस प्रकार आज 'सारङ्गी' या 'सरोद' मे पर्दे नही होते। जिस प्रकार आज 'विचित्र वीणा' में स्वरो की सारणा वट्ट से की जाती है, उसी प्रकार एकतन्त्री में स्वरो की सारणा वॉस की बनी हुई एक वारह अंगुल की सलाई से की जाती थी, जिसे 'कम्रिका' कहा जाता था।३१ एकतन्त्री में पर्दे न होने के कारण सूक्ष्म से सूक्ष्म ध्वनियाँ सरलतापूर्वक निकाली जा सकती थी,१२ यह सुविधा उन वीणाओं में न थी, जिनमे प्रत्येक स्वर के लिए अलग- अलग तार थे। एकतन्त्री पर तीनों सप्तको का प्रत्यक्षीकरण पूर्णतया सम्भव था।

२७-प्रकृतिस्सर्ववीणानामेषा श्रीशाद्गिणोदिता। -आचार्य शार्ङ्ग०, सं० र०, अ० सं०, वाद्या०, पृ० २३७ २८-इयं ब्रह्मवीणेत्यपि कथ्यते। -नान्यदेव, भ० को०, पृ० ८९ २९-घोषकश्चकतन्त्रिका। -आ० शारङ्ग०, सं० र०, अ०सं०, वाद्या०, पृ० २४८ ३०-इदमेकतन्त्र्या वीणाया नामान्तरम्। -श्रीकण्ठ, भ० को०, पृ० १९४ ३१-शलाका वेणुनिर्वृत्तां द्वादशाङ्गुलमात्रिकाम्। वामहस्तकनिष्ठाया पृष्ठे विन्यस्य तत्परम्॥ संवेष्टयानामिकाड्गुल्या तर्जन्यङ्गुष्ठकस्ततः । सम्पीडय गाढमनया वादर्यदखिलान् स्वरान् । -- हरिपाल, भ० को०, पृ० ४२७ ३२-श्रुतयोऽथ स्वरा मूर्च्छास्ताना नानाविघास्तया। एकतन्त्रीकवीणाया सर्वमेतत्प्रतिष्ठितम् ॥ समुदायोऽस्ति नान्यत्र मतङ्गोऽप्याह तत्तथा। . एकतन्त्र्यां स्वयमेवास्ति सरस्वतीति ॥ -नान्यदेव, भ० को०, पृ० ८९

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मूच्छंना ४९

'मत्त-कोकिला' वीणा तीनो सप्तको अर्थात् स्थानों की दृप्टि से पूर्ण थी। इसमे इक्कीस तार होते थे। सात-सात तारो पर क्रमशः एक-एक सप्तक मिला रहता था। 'जाति' या 'राग' के वादन मे मन्द्रस्थान मे जाने की परावधि और तारस्थान में जाने की परावधि 'मत्तकोकिला' और 'एकतन्त्री' मे प्राप्त हो सकती थी। कल्पना कीजिए कि किसी 'जाति' या 'राग' मे 'पड्ज' अंशस्वर है तो मन्द्र षड्ज१२ उस 'जाति' मे मन्द्रस्थान मे जाने की अन्तिम अवधि तथा पड्ज से सप्तम अर्थात् निपाद तारस्थान मे जाने की अन्तिम अवधि था। मन्द्र और तार स्थान की ये दोनो पराकाष्ठाएँ 'मत्तकोकिला' पर उस समय सरलतापूर्वक सम्भव है, जब कि तीनो सप्तको मे 'पड्जादि' मूर्च्छना उस पर मिली हुई हो। इसी प्रकार 'ऋपभ' अशवाली 'जाति' के वादन मे मन्द्र और तार स्थान मे भर- तोक्त पराकाष्ठा की प्राप्ति तभी सम्भव थी, जव मत्तकोकिला के इक्कीस तार ऋष- भादि (रे, ग, म, प, ध, नि, स-रे,ग, म, प, ध, नि, स-रे, ग, म, प, ध, नि, स) मूर्च्छना मे मिले हो। एक 'जाति' के 'अश' स्वर कई हो सकते थे और उनके अनुसार मूच्छना परिवर्तित होती थी। मत्तकोकिला वीणा मे मन्द्र एवं तार स्थान की पराकाष्ठाओं का मिलना सम्भव था। मन्द्र-तार-नियमों मे विकल्प भी किया गया था। इस सम्बन्ध में 'मन्द्र' स्थान की अवधि 'न्यास' और 'अपन्यास'५ स्वर को भी मान लिया गया और तारस्थान मे अश स्वर से चौथे या पॉचवें स्वर को भी तारावधि मान लिया गया। फलतः मन्द्र और तारावधियो मे सकोच हो गया। अस्तु, इस प्रकार हम देखते है कि 'जाति' या 'राग' के प्रयोग मे मन्द्र और तार सप्तक में प्रयोज्य अवधियो का निर्णायक 'अंश' स्वर है। मूर्च्छनाओं का आश्रय लेने से

३३-मन्द्रस्त्वशपरो नास्ति। -- भरत०, व०स०, अ० २८, पृ० ४४३ ३४-सप्तमाद वा नात. परमिहेष्यते। -भरत०, सं० र०, अ० स०, स्वरा०, कल्लि० पृ० १८५ ३५-त्रिविधा मन्द्रगतिः, अंशपरा न्यासपरा अपन्यासपरा च। -भरत०, ब० सं०, अ० २८,पृ० ४४३ ३६-अंशात्तारगति विद्यादाचतुर्थस्वरादिह। आपञ्चमात्सप्तमाद् वा नात. परमिहेष्यते॥ -भरत०, सं० र०, अ० सं०, स्वरा०, कल्लि०, पृ० १८५ ३७-रागश्च यस्मिन् वसति यस्माच्चव प्रवर्तते। नेता च तारमन्द्राणां योऽत्यर्थमुपलभ्यते। ४

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५० भरत का संगीत-सिद्धान्त

मन्द्र और तार अवधियो की प्राप्ति हो जाती है औीर 'वादक' एवं श्रोता को सुविधा या सुख की प्राप्ति होती है।" किसी विशेष जाति के लिए विशेष मूर्च्छना की वात महर्पि भरत के विधान के अनुसार नही उठती। जातिविशेष में प्रयोज्य मन्द्र और तार अवधियो के विकल्प के अनुसार स्थापनीय मूर्च्छनाओ मे 'विकल्प' बादक कर सकता था। पश्चाद्वर्ती आचार्यो ने एक जाति के लिए एक 'मूर्च्छनाविशेष' का निर्देश किया, क्योकि महर्षि भरत के परचात् मन्द्रावधि" और तारावधि" वाले नियमो मे शिथिलता आ गयी थी और वादक को यह स्वतन्त्रता मिल गयी थी कि वह इन दोनों स्थानोमें इच्छापूर्वक (जहाँ तक चाहे) जाय।"१ फलत. एक नियम निश्चित किया गया कि 'जाति' में अशवाहुल्य (अशों की बहु- लता) को देखकर मूर्च्छना का निश्चय वुद्धिमानो को स्वयं कर लेना चाहिए,अर्थात् जाति में निर्दिष्ट अनेक अंशस्वरों को देखते हुए ऐसी मूच्छना मिलानी चाहिए कि किसी भी स्वर को अंग मानकर जाति का वादन किया जाय, तो यथासम्भव मन्द्र एव तार स्वर मिल सकें। इस वात का परिणाम यह हुआ कि विशेष जाति के लिए आचार्यो ने विशेष मच्छना निर्दिष्ट की, परन्तु इसका परिणाम वैसा सन्तोपप्रद नही हुआ, जैसा कि होना चाहिए था, तथा पश्चाद्वर्ती अन्य आचार्यों ने जातिवादन के समय मूर्च्छना निश्चित करने का कार्य वादको पर छोड़ दिया। इस विपय पर कुछ विस्तृत विचार की आवश्यकता को देखते हुए हम मतङ्ग के मूर्च्छनासम्बन्धी मत एवं उस पर अन्य आचार्यो की प्रतिक्रिया देखेगे।

1 अनुवृत्तश्च यश्चेह सोंडश: स्याद् दशलक्षण. ।। -- भरत०,सं० र०,अ०स०, स्वरा०, कल्लि०,पृ० १८२ ३८-इत्थं प्रयोक्तु: श्रोतु. सुखार्थ तानमूर्च्छनातत्त्वम्। मूर्च्छनाप्रयोजनमपि स्थान- प्राप्ति. । -भरत०, व० सं०, अ० २८, पृ० ४३६ ३९-ततोऽवकि कामचारिता। -शार्देव, स० र०, स्वरा०, अ० सं०, पृ० १८६ ४०-अर्वाक् तु कामचार: स्यात्। -शार्ङ्गदेव, स० र०, स्वरा०, अ० स०, पृ० १८४ ४१-उक्तावधेरर्वाङ् न्यूनताया कामचारिता गातुरिच्छयाऽवत्या वाऽपवर्तमानत्वम्। -- कल्लिनाथ, अ० सं०, स्वरा०, पृ० १८६-१८७ ४२-ज्ञात्वा जात्यशवाहुल्यं निर्देग्या मूर्च्छना बुधै.। -कश्यप, स०र०, अ०सं०, रागा०, कल्लि०, पृ० ३२

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मूच्छना ५१

द्वादशस्वर-मूर्च्छनावाद

प्राचीन आचार्य, अर्थात् महर्षि भरत और उनके अनुयायी, मूर्च्छनाओ का प्रयो- जन कण्ठ तथा तन्त्रीवाद्यो पर जातिविशेष या रागविशेष मे प्रयोज्य मन्द्र, मध्य एवं तारस्थानों की प्राप्ति मानते थे, परन्तु मतङ्ग ने मूर्च्छना मे राग की सिद्धि भी ढूँढ़नी चाही।"२ उनका तात्पर्य था कि मूर्च्छना मे मन्द्र तथा तारस्थान के भी कुछ स्वर सम्मिलित होने चाहिए। मन्द्र और तार स्वरो के दर्शन से ही राग की सिद्धि हो सकती है, फलतः मूर्च्छना मे वारह स्वर होने चाहिए।२ इस दृष्टिकोण से आचार्य मतङ्ग ने महर्ष भरत की मूर्च्छनाओं मे पहले या पीछे कुछ अन्य स्वर जोड़े। परिणामत मतङ्ग की मू्च्छनाओ का स्वरूप निम्नलिखितह6 हो गया-

  • १. उत्तरमन्द्रा ध नी स रे ग म प ध नि स रे ग २. रजनी नो स रे ग म प घ नी स रे ग भ ३. उत्तरायता स रे ग म प घ तो स रे ग स प ४. शुद्धषड्जा रे ग म प ध नी स र ग म प ध ५. मत्सरीकृता ग म प घ नी स ग म प ध नि ६. अश्वकान्ता म प ध नि रे ग म प ध नि स ७. अभिरुद्गता प ध नि स ग म प घ नि स रे

मव्यमग्राम"। १. सौवीरी नि स रे ग म प घ नि स रे ग म २. हारिणाश्वा स रे ग म प घ नितरेग म प

४३-मूच्छते येन रागो हि मूर्च्छनेत्यभिसज्ञिता। -मतङ्ग, भ०को०, पृ० ५०१ यद्यप्याचाय्य: सप्तस्वरमूर्च्छना. प्रतिपादिताः । स्थानत्रितयप्राप्त्यर्थ द्वादशा- स्वररेव मूर्च्छना. प्रयुक्ता । .... एव च सति रागसिद्धिः स्यात्। -मतङ्ग, भ० को०, पृ० २८९ ४४-तेन 'धनिसरेगमपधनिसरेग' इत्युत्तरमन्द्रा। 'निसरिगमपधनिसरेगम' इति रजनी। 'सरिगमपधनिसरिगमप' इत्युत्तरमन्द्रा। एवं कमात् शुद्धपड्जा, मत्सरी- कृता, अश्वकान्ता, अभिरुद्गता च जायन्ते। -मतङ्ग, भ० को०,पृ० २८९ ४५-नध्यमग्रामे तु एवमेव 'निसरेगमपवनिसारेगम' सौवीरी। 'सरिगमपधनि-

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५२ भरत का संगीत-सिद्धान्त

३. कलोपनता रे ग म प घ नि स रे ग म प घ ४. शुद्धमध्या ग म प ध नी स रे ग म प ध नो ५. मार्गी प नी रे ग म नि स ६. पौरवी प घ नि स रे ७. हृप्यका ध नो स रे ग म प घ नि स रे ग यहाँ व्यान देने योग्य वात यह है कि महर्पि भरत की मूर्च्छनाओं का क्रम अवरोहो- न्मुख है, अर्थात् उनकी पाड्जग्रामिक मूर्च्छनाएँ करमश. 'स, नि, ध, प, म, ग, रे,' तथा माध्यमग्रामिक मूर्च्छनाएँ कमशः 'म, ग, रे, स, नि, ध, प' से आरम्भ होती है। परन्तु मतङ्ग की मूर्च्छनाओं का क्रम आरोहोन्मुख है, अर्थात् उनकी द्वादशस्वर-मूर्च्छनाएँ पड्जग्राम में क्मशः 'ध, नि,स, रे, ग, म, प' और मव्यमग्राम में 'नी, स, रे, ग, म, प, ध' से आरम्भ होती है। इस कग-विरोध के परिणामस्वरूप महर्पि भरत की अश्वक्रान्ता और हृप्यका मूर्च्छनाओं के पूर्ण रूप मतङ्ग की मूर्च्छनाओ मे नही मिलते। द्वादशस्वर-मूर्च्छनाओ मे स्थूलाक्षरों में मुद्रित स्वर महर्षि भरत की मूर्च्छनाओं का मूल रूप प्रकट करते है। पश्चाद्वर्ती आचार्यों ने 'द्वादश-स्वर-मूर्च्छनावाद' का खण्डन करते हुए उस पर निम्नलिखित आक्षेप किये-४६ (क) मूच्छना का लक्षण क्रमशः आरोह-अवरोह है, द्वादशस्वर 'उत्तरमन्द्रा' का आरम्भिक स्वर धैवत है, जो किसी ग्राम के मूल सप्तक का आदिम स्वर नही। फलतः उत्तरमन्द्रा का धैवतादित्व किसी करमसम्वन्धी सिद्धान्त पर आश्रित नही। मध्यम- ग्रामीय द्वादशस्वर 'सौवीरी' का निपादादित्व भी इसी प्रकार अकारण है। सप्तस्वर मूच्छनाओ मे आरोह की समाप्ति के पश्चात् हमे अग्रिम स्वर अगले सप्तक में वही मिलता है, जो मूर्च्छना का आरम्भिक स्वर है, इस प्रकार कम वना रहता

सरेगमप' हारिणाश्वा। 'रिगमपधनिसरेगमपध' कलोपनता। एवं शुद्धमध्या मार्गी, पौरवी, हृप्यका ऊह्याः । -- मतङ्क० भ० को०, पृ० २८९ ४६-अत्र या मूर्च्छना: प्राह द्वादशस्वरसम्भवा. । मतङ्गोऽस्य मत नैव सुन्दरं प्रतिभाति मे॥ अत्रैव कोहलाचार्य्यो नन्दिकेश्वर एव च। मतङ्गमनुसृत्यवोचतुस्तदिह वर्ण्यते॥ द्वादशस्वरसम्पन्ना ज्ञातव्या मूच्छना बुधैः। अत्र प्रतिसमाधत्ते खुम्भाणकुलनन्दन.। -कुम्भ०, भ० को०, पृ० २८९

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मूर्च्छना ५३

है। परन्तु द्वादशस्वर मूच्छनाओं में आरोह की समाप्ति पर अगला स्वर मूर्च्छना के भारम्भिक स्वर के अतिरिक्त ही मिलता है, फलतः क्रमभङ्ग होता है।" (ख) द्वादशस्वरमूर्च्छनावाद की स्थापना का आधार यह है कि वारह स्वरों मे जाति या राग का स्वरूप स्पप्ट हो जाता है। यह आवार ठीक नही, क्योकि 'नन्दयन्ती' जाति का रूप तब तक स्पष्ट नही होता, जब तक उसमें मन्द्र, मध्य एवं तार 'ऋपभ' का प्रयोग न हो। मन्द्र ऋपभ से तार ऋषभ तक स्वरों की सख्या पन्द्रह होने के कारण किसी भी द्वादशास्वर मूर्च्छना की सीमा में 'नन्दयन्ती' की सिद्धि नही हो सकती।८ फलत. द्वादशस्वर-मूर्च्छनावाद व्यर्थ है। (ग) षाडवित जाति मे बारह स्वरो का अर्थ दो सप्तक और औडुवित जातियो मे प्रायः ढाई सप्तक होता है। अतः द्वादशस्वरमूर्च्छना का लक्षण स्वरसंख्या के आधार पर उन स्थितियो मे भी घटित होने के कारण द्वादशस्वरमूर्च्छना तीनों सप्तको को घेरने लगेगी। यदि इस अतिव्याप्ति-दोष से बचने के लिए पाडवित और औडवित जातियों में लुप्तस्वरों की भी गणना की जाय, तो लोप्य स्वरो को धारण करने के कारण मूर्च्छना कुछ 'जातियो' या 'रागो' की जननी नही रहती।४१ (घ) महर्षि भरत की उत्तरमन्द्रा में 'स-प', 'रे-ध', 'ग-नि' मे पड्ज-पञ्चम-भाव और 'स-म' मे पड्ज-मध्यम-भाव है। इसी प्रकार उनकी माध्यमग्रामिक सौवीरी मे 'म-नि', 'ध-रे', 'नि-ग' और 'स-म' मे षड्ज-मध्यम-भाव है तथा 'प-रे' मे पड्ज-पञ्चम- भाव। अर्थात् पड्जग्राम की आधारभूत प्रथम मूच्छना मे पड्ज-पञ्चम-भाव एवं म्यमग्राम की मूलभूत प्रथम मूर्च्छना मे पड्ज-मध्यम-भाव का प्राधान्य है। द्वादश- स्वर पाड्जग्रामिक प्रथम मूर्च्छना वैवतादि 'उत्तरमन्द्रा' मे आदिम स्वर धैवत के साथ मूर्च्छना का पॉचवॉ स्वर 'गान्वार' संवाद नही करता, इसी प्रकार ऋपभ, जो 'पञ्चम' से पॉचवॉ स्वर है, पञ्चम से सवाद नही करता। यदि यह कहा जाय कि द्वादश-स्वर- मूर्च्छना 'उत्तरमन्द्रा' मे 'ध-रे', 'प-स', 'नि-ग' मे पड्ज-मध्यम-भाव-संवाद मिल जाता

४७-कमात्स्वराणामारोहावरोहौ मूर्च्छनेति यत्। लक्षण तद् विहन्येत करमादारोहणाद् ऋते ॥ ४८-यदुक्त जातिभापादितारमन्द्रादिसिद्धये। -कुम्भ, भ० को०, पृ० २८९

द्वादशस्वरगुम्फेन मूर्च्छना स्यात्प्रयोजिका। नन्दयन्त्यां तदव्याप्ते. तत्पञ्चदशसम्भवात्॥। ४९-पाडवौडवितस्यातिव्याप्तिलाप्यादिसम्भवात्। -कुम्भ०, भ० को०, पृ० २८९ -कुम्भ०, भ०को०, पृ० २८९

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५४ भरत का संगीत-सिद्धान्त

है, तो यह युक्ति बलिष्ठ नहीं, क्योकि इस दशा में भी द्वादशस्वर 'उत्तरमन्द्रा' में पड्ज-पञन्चम-भाव का वह प्राधान्य नही रहता, जो पड्जग्राम की मूल मूर्च्छना के लिए अनिवार्य है। इसी प्रकार द्वादशस्वर निषादादि 'सौवीरी' मूर्च्छना मे गान्वार को कोई परवर्ती और धैवत को कोई पूर्ववर्ती स्वर ऐसा न मिलेगा, जो पड्ज-मध्यम-भाव से सवाद करता हो, फलतः मध्यमग्राम के लिए आवश्यक पड्ज-मध्यम-भाव मध्यम-ग्रामीय द्वादशस्वर प्रथम मूर्च्छना मे न मिलेगा।1 (ड) सप्तस्वर 'उत्तरमन्द्रा' तथा 'सौवीरी' मे संवाद का क्रम उनके उच्चारण मे एक विशिष्ट रज्जन उत्पन्न करता है। संवादक्म का विघात होने से द्वादशस्वर उत्तरमन्द्रा एवं सौवीरी के उच्चारण मे वैसा रज्जन नहीं रहता।५१ (च) 'जाति' या 'राग' के निर्माण में कुछ स्वरो का लङ्डन, ईपत्स्पर्श करना पडता है, यह क्रिया मूच्छना में क्रमभङ्ग करती है, अत. मूर्च्छनाओ का प्रयोजन कूट तानो का निर्माण इत्यादि है, वे रागो की जननी नही। फलतः उनका सप्तस्वर होना ही उचित है।५२ इन्ही सव कारणो से मतङ्ग के पश्चाद्वर्ती अनेक आचार्यो ने द्वादशस्वर-मूर्च्छ- नावाद का खण्डन किया।५१

५०-विसवादिसमावेशाद् रक्तिभङ्गो यत. स्मृत.। -कुम्भ०, भ०, को०, पृ० २८९ ५१-न तावत्कमतोच्चारे रक्ति कुत्रापि जायते। -- कुम्भ०, भ० को०, पृ० २८९ ५२-ईपत्स्पर्शाल्लडघनादै.क्रमभङ्गस्य शासनात्। कूटतानोपयोगित्वं मुख्यमासा प्रयोजनम्॥ न रागजनिरेपातश्चार्वी सप्तस्वरेरिता।। -- कुम्भ०, भ० को०, पृ० २८९ ५३-आचार्य अभिनवगुप्त ने द्वादशस्वर-मूच्छनावाद का खण्डन किया है। प्रो० रामकृष्ण कवि का कथन है- अत्र (यन्मतङ्गेन विवृता) द्वादशस्वरमूच्छना सा अभिनवादिभिरनादृता। -भ० को०, पृ० ४२४ पुन. एक अन्य स्थल पर उनका कहना है- He (Kumbha) entered into Sastric discussions so well mastered by Abhinava. -भूमिका, भ० को०, पृ० १९ फलत हमने यहाँ कुम्भ के मत का उल्लेख किया है। नान्यदेव ने जातिलक्षणो मे उनकी मूर्च्छनाओ का निर्देश नही किया।

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मूरच्छना ५५

वादन में मूर्च्छनाजन्य सौकर्य-

मतङ्ग मुनि के 'द्वादशस्वरमूर्च्छनावाद' का खण्डन अनेक आचार्यो ने भले ही किया हो, परन्तु वादन-सौकर्य के लिए मूच्छना का उपयोग सभी को मान्य रहा है। इस वादन-सौकर्य को भली भॉति देख लिया जाय। चाहे प्राचीन एकतन्त्री हो या आज का सितार, उस पर मेरु और घुडच के ठीक मध्य भाग मे मुक्त तार से उत्पन्न होनेवाली ध्वनि से द्विगुण ध्वनि निकलेगी। तार के मध्य भाग मे निकलने के कारण ही इसे 'मध्यम' कहा जाता है, इसका अर्थ सप्तक का मध्यम स्वर नही। इस 'मध्यम' स्वर को मूर्च्छनाओ का आरम्भक स्वर कहा गया है," मध्य सप्तक" का आरम्भक स्थान यही है, इससे पूर्व मुक्त तार तक सम्पूर्ण मन्द्र सप्तक की प्राप्ति होती है। प्राचीन काल मे इसी स्थान को पड्ज मानकर पाड्जग्रामिक उत्तरमन्द्रा एवं मध्यम मानकर माध्यमग्रामिक सौवीरी का आरम्भ होता था। कुम्भ ने कहा है कि यदि 'मूलभूत ऊर्ध्वतन्त्री' (बाज का तार) तथा पार्श्वतन्त्री (बडी चिकारी ?) पड्ज मे और 'ह्रस्वा तन्त्री' (छोटी चिकारी) पञ्चम मे मिली हों, तो पड्जग्राम होता है।५

नान्यदेव एवं प्रस्तुत प्रकरण पर आचार्य अभिनवगुप्त की टीकाएँ अमुद्रित होने के कारण यहाँ 'भरतकोश' के आधार पर कुम्भ का मत उद्धृत किया गया है। आचार्य शार्ङ्गदेव ने मतङ्ग के मत के अनुसार जातियो की मूर्च्छना का निर्देश किया है, परन्तु मूर्च्छना की द्वादशस्वरता उन्हे भी मान्य नही हुई, उन्होने सगीतरत्ना- कर मे मूर्च्छनाएँ सप्तस्वर मानी है, द्वादशस्वर-मूर्च्छनाओ की चर्चा तक उन्होने नही की। ५४-मध्यमस्वरेण वैणेन मूर्च्छनानिर्देशो भवति .. -भरत०, न० स०, अ० २८, पृ० ४३६ '५-मतङ्गोऽपि-'मध्यसप्तकेन मूर्च्छनानिर्देश. कार्य्यों मन्द्रतारसिद्व्यर्थम्' इति। -सं० र०, अ० स०, स्वरा०, कल्लि०, पृ० १०४ मध्यस्थानस्थषड्जेन मूर्च्छनारभ्यतेऽ्रग्रिमा। -आ० शाई्ज०, सं० र०, अ० स०, स्वरा०, पृ० १०५ ५६-मौलोरध्वतन्त्रिका पार्श्वतन्त्र्यौ द्वे षड्जगे यदि। हस्वा पञ्चमगा चेत्स्यात् पड्जग्रामो भवेदयम्॥ -- मतङ्ग किन्नरी लक्षण, भ० को०, पृ० ४५५

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५६ भरत का संगीत-सिद्धान्त

ऊर्ध्वतन्त्री (वाज का तार) यदि मध्यम मे मिली हो और पार्श्वतन्त्रियां (चिका- रियाँ) क्रमशः पड्ज एव मध्यम मे मिली हों, तो मध्यमग्राम होता है।५ अतः यह स्पष्ट है कि पड्जग्राम की प्रथम मूर्च्छना मे तार के मध्य मे निकलने- वाली ध्वनि 'मध्य पड्ज' और मध्यमग्राम की प्रथम मूर्च्छना में 'मध्य मध्यम' कहलाती थी तथा पड्जग्रामीय सप्तक का आरम्भ 'पड्ज' तथा मध्यमग्नामीण सप्तक का आरम्भ मध्यम से होता था।

मतङ्ग-किन्नरी

पड्ज-ग्राम मध्यम-ग्राम मेरु स मेरु म पर्द-१ पर्दे-१ २ ग २ ३ ३ नि मन्द्र स्थान ४ ४ ५ ध ५ ६ नि ६

७ ७ ८ ८

९ ९ १० १० नि मध्य स्थान ११ ११ १२ घ १२ १३ नि १२ ग

१४ १४ म १५ १५ १६ १६ ध तार स्थान १७ म १७ नि

१८ १८ स

मतङ्ग की जिस वीणा में तारो के मिलाने का क्रम पूर्वनिर्दिष्ट है, वह उनकी

५७-ऊर्ध्वंतन्त्री यदि भवेन्मध्यमस्वरयोगिनी। तत्पारश्वे तन्त्रिकाद्वन्द्वं षड्जमध्यमगं यदि ।। मध्यमग्रामगा जञोया तदेयं किन्नरी वुध.॥। -वही, भ० को०, पृ० ४५५

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मूर्च्छना ५७

'किन्नरो' है। इस 'किन्नरी' में अठारह सारिकाएँ (पदे) हैं। एक बाज का तार और दो चिकारियाँ है। मतङ्ग की इस वीणा में उन्नीस स्वरो की प्राप्ति सम्भव है, एक स्वर मुक्त अर्थात् मेरुसस्थ तार पर तथा अठारह स्वर अठारह पदों पर उपलब्ब होते हैं।" (उपर्युक्त सारणी में यह स्थिति दिखलायी गयी है।) मतङ्ग-किन्नरी मे पड्जग्राम से मध्यमग्राम वनाने के लिए दूसरे, नवें और सोलहवें पर्दो पर स्थित तीनो सप्तको के गान्धारो को जव अन्तरगान्वार बना दिया जायगा, तब वे मेरु पर निकलनेवाली ध्वनि को 'मध्यम' मानने पर मव्यमग्रामीय धैवत वन जायँगे। इस समय जो स्थिति है, उसमे पड्जग्रामीय 'पड्जादि' अयवा मव्यमग्रामीय 'मव्यमादि' मूच्छना मे किन्नरी की सारणा की गयी है। मेरु से छठे पर्दे तक मन्द्रस्यान (सप्तक), सातवें से तेरहवें तक मध्यस्थान तथा चौदहवें से अठारहवे तक तारस्थान ( के पाँच स्वर) है। सातवॉ पर्दा मेरु और घुड़च के ठीक मव्य भाग में होने के कारण "वीणा का 'मव्यम' स्वर" (सप्तक का मध्यम स्वर नही) है और मध्यसप्तक का आरम्भिक स्थान भी है। किन्नरी पर कोई भी मूर्च्छना मिलायी जाय, सातवें पदे पर उस मूर्च्छना का आरम्भिक स्वर स्थापित करना होगा, फलतः उस स्वर का मन्द्र रूप हमें मुक्त तार की व्वनि पर प्राप्त हो जायगा। मतङ्ग की किन्नरी मे इस समय जो 'मूर्च्छना' मिली हुई है, उस पर पाड्जग्रामिक तार धैवत या निपाद अथवा माध्यमग्नामिक तार ऋषभ या गान्वार की प्राप्ति अन्तिम पर्दे पर मीड से होती है। यदि मूर्च्छना का आरम्भ 'गान्वार' से हो, अर्थात् सातवे पर्दे पर निकलनेवाली ध्वनि को 'गान्वार' मानकर अन्य प्दो को अग्रिम स्वरो की श्रुतिसंख्या के अनुसार उतार-चडाकर ययास्थान स्थापित कर लिया जाय. तो किननरी के सत्रहवें पर्दे पर तार धैवत और अठारहवें पर्दे पर निषाद की प्राप्ति हो जायगी, तार पड्ज और ऋपभ अन्तिम पर्दे पर मीड द्वारा मिलेगे। इसी लिए मूर्च्छना का प्रयोजन स्थान-प्राप्ति कहा गया है।५९

५८-अष्टादशाथवा दण्डपृष्ठे न्यस्य यथायथम् ॥ -मतङ्ग, भ० को०, पृ० ४५५ ५९-मूर्च्छनाप्रयोजनमपि स्थानप्राप्तिः। -- भरत०, व० सं०, (का०सं०) अ० २८, पृ० ४३६

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५८ भरत का संगीत-सिद्धान्त

निष्कर्ष यह है कि बादक को पहले यह सोच लेना चाहिए कि उसे मन्द्र एवं तार- स्थानों में किस मन्द्रतम और तारतम स्वर का उपयोग करना है। यह निश्चय हो जाने पर सातवे तार के पर्दे से निकलनेवाली ध्वनि को मध्यसप्तक का वही स्वर मानना चाहिए, जिस स्वर तक मन्द्रस्थान मे जाना है, फलतः मुक्त तार पर उस स्वर की मन्द्र अवस्था मिल जायगी। कल्पना कीजिए कि हमें किसी राग मे मन्द्र ऋषभ से तार धवत तक उन्नीस स्वरों का प्रयोग करना है, तो हमे सातवे पर्दे की ध्वनि को मध्य सप्तक का ऋपभ मानकर अन्य पर्दो की (इस प्रकार आवश्यकतानुसार उतार-चढ़ाव कर) स्थापना कर लेनी चाहिए कि आठवें इत्यादि पर्दो पर गान्धार इत्यादि परवर्ती स्वर एवं छठे इत्यादि पूर्ववर्ती पर्दो पर यथाक्रम षड्ज इत्यादि पूर्ववर्ती स्वर वोलने लगे। इस क्रिया के परिणामस्वरूप मुक्त तार पर 'मन्द्र ऋपभ' और अठारहवे पर्दे पर 'तार धैवत' की प्राप्ति होने लगेगी। यदि आपको किसी राग मे मन्द्र मध्यम से तार मध्यम या पञ्चम तक पन्द्रह या सोलह स्वरो का ही उपयोग करना है, तो आपका काम ऋपभादि मूर्च्छना से भी चल सकता है और षड्जादि से भी, क्योंकि आपके अभीष्ट स्वर इन्ही दो मूर्च्छनाओ में ही नही; पड्जादि, ऋपभादि, गान्धारादि और मध्यमादि मूर्च्छनाओ मे भी मिल जायँगे। एक मूर्च्छना की स्थापना का परिणाम किन्नरी पर उन्नीस स्वरों की प्राप्ति होता है, आपको जब केवल पन्द्रह या सोलह स्वर चाहिए, तो वे स्वभावत. कई मूच्छनाओं में मिल सकेंगे।

जाति के साथ विशेष मूर्च्छना का निर्देश विशे जाति की विशेष मूर्च्छना का निर्देश मतङ्ग ने किया है। उनका यह निर्देश इसी सिद्धान्त के आधार पर है। एक जाति मे 'अंश' स्वर कई हो सकते है। मन्द्र और तार अवधि का नियामक 'अंश' स्वर होता है। 'न्यास' और 'अपन्यास' स्वर भी मन्द्र अवधि के नियामक होते है, फलत. मतङ्ग ने विचारपूर्वक जाति के विभिन्न अंश स्वरो को देखते हुए जातिविशेप के लिए ऐसी मूर्च्छना निश्चित की, कि उसके अनुसार सारणा करके वजाने पर जाति के शुद्ध एव विकृत रूपो का वादन उस एक ही मूर्च्छना मे सम्भव हो सके। ऐसी स्थिति मे हमे जाति के विभिन्न रूपों मे मन्द्रस्थानीय अंश, न्यास या अप- न्यान स्वर की प्राप्ति हो जाती है और तारस्थान में अश स्वर के पश्चात् कभी एक या

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मूच्छना ५९

अनेक स्वर प्राप्त हो जाते है। किसी विकृत रूप के वादन में मन्द्रस्थानीय स्वर भी एक-दो ही मिलते है। जातिविशेष के लिए मूच्छनाविशेप के निश्चय का परिणाम ही यह हुआ कि मन्द्र एव तार स्थान में अवविसम्बन्धी नियमो का पालन पूर्णतया सम्भव न हुआ और यह मान लिया गया कि मन्द्रस्थान एवं तारस्थान में जाना, न जाना या किसी विशेप स्वर तंक जाना प्रयोक्ता की इच्छा पर है। जहॉ तक महर्पि भरत का सम्बन्ध है, उनके अनुसार जाति के प्रत्येक रूप के लिए ऐसी मूर्च्छना निश्चित की जानी चाहिए, जिपका आरम्भक अभीष्ट अन स्वर हो, फलतः मन्द्र, मध्य एव तार स्थान के सम्पूर्ण स्वर मिलेंगे। मत्तकोकिला-जैसे वाद्य मे प्रथम, अष्टम एवं पन्द्रहवे तार को अभीष्ट अश स्वर की संज्ञा देकर अन्य तारो को श्रुतिसंख्या के अनुसार उतार-चढ़ाकर स्थापित कर लेना चाहिए। इस करिया के परिणामस्वरूप मन्द्रावस्था मे अश स्वर मिलेगा, जो मन्द्रस्थान की अन्तिम अवधि है और तारस्थान मे तार अंश से सप्तम स्वर इक्कीसवे तार पर मिलेगा, जो तारस्थान की अन्तिम अवधि है। महर्पि भरत ने वीणा के 'मध्यम' (वीणा के मध्य में स्थित, एकतत्त्री वीणा में मेरुएव घुडच के मध्य भाग में तार पर निकलनेवाली ध्वनि) से मूर्च्छना स्थापित करने का निर्देश एकतन्त्री के सम्बन्ध में किया है, जिसमे वादन-क्रिया एक तार पर होती है, अतः मध्य सप्तक वही से आरम्भ होता है। मत्तकोकिला इत्यादि वीणाओं मे मूल मध्यम सप्तक का आरम्भ आठवें तार से होने के कारण सारणा क्रिया का आवार आठवाँ तार ही होगा। यदि कोई व्यक्ति मत्तकोकिला के मध्यम (बीचवाले अर्थात् ग्यारहवें) तार से मध्य सप्तक का आरम्भ करने की चेष्टा करे, तो मध्य सप्तक की समाप्ति सत्रहवें तार पर होगी, शेष चार तारों पर तार-सप्तक के केवल चार स्वर मिलेगे, मन्द्र सप्तक का आरम्भक स्वर चौथे तार पर वोलेगा और आरम्भिक तीन तार व्यर्थ होगे। फलतः मत्तकोकिला का यह लक्षण भी व्यर्थ होगा कि उस पर तीनो स्थानो की प्राप्ति होती है। अतः मत्तकोकिला मे मूर्च्छना के आरम्भक तार पहला, आठवाँ और पन्द्रहवाँ तार है। 'उत्तरमन्द्रा' मे आठवे तार पर 'मध्य पड्ज" और 'सौवीरी' मे 'मध्य मध्यम' रहता है।

६०-मत्तकोकिलवीणायां तत्न्र्यो यास्तास्वनुक्रमात्। स्वराः पड्जादय: सप्त सप्त भूत्वा तथा स्थिताः ॥

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६० भरत का संगीत-सिद्धान्त

तन्त्रीवाद्यों पर मूर्च्छनाओं की स्थापना का प्रकार

मूर्च्छनाओ की स्थापना के विपय मे महर्पि भरत का मत है-"मूर्च्छनाओं की (केवल प्रथम मूर्च्छना की नहीं ) स्थापना 'वीणा के मध्यम स्वर (सप्तक के मध्यम स्वर से नही) से होनी चाहिए, क्योकि 'मध्यम' अविनाशी स्वर है।"६ उत्तरमन्द्रा या सौवीरी आदि मूर्च्छनाओ मे तो 'मध्यम' अविनाशी या अवि- लोपी है ही, 'वीणा का मध्यम स्वर' (मेरु और घुड़च के ठीक मध्य मे तार पर निकलने वाला स्वर) भी अविनाशी है, क्योकि कोई भी मूर्च्छना मिलायी जाय, तन्त्री के ठीक मध्य भाग मे स्थित सातवॉ पर्दा अपना स्थान कभी नही छोड़ता। मेरुसस्थ अर्थात् मुक्त तार पर निकलनेवाली ध्वनि को 'स,रि, ग, म, प, ध, नि' कोई भी सज्ञा दी जाय सातवे पर्दे पर ठीक उसकी द्विगण ध्वनि बोलेगी, फलत मूर्च्छनाओं की सारणा क्रिया मे किन्नरी के अन्य सभी परदे कभी न कभी नीचे ऊपर सरकाने पड़ते है, परन्तु सातवाँ और चौदहवॉ पर्दा क्रमशः मुक्त तार पर उत्पन्न होनेवाली ध्वनि के द्विगुण एव चतुर्गुण रूप के जनक होने के कारण कभी नहीं सरकाने पड़ते। 'मतङ्गकिन्नरी' के वर्णन मे कुम्भ का कथन है- "सारणा-भेद का आश्रय लेने से वादनक्रिया के तार का योग जिस स्वर से होता है, उसी स्वर के अनुसार मुक्त तार का नामकरण होता है, फलतः मूच्छना-रहस्य से अवगत व्यक्ति (वाज के तार के विभिन्न नामकरणो के परिणामस्वरूप उत्पन्न होनेवाली)

मध्यसप्तकपड्जेन मूर्च्छनारभ्यते Sग्रिमा।

मध्यस्थमध्यमेनाद्या मध्यमग्राममूर्च्छना।। -पण्डितमण्डली, भ० को०, पृ० ५०१ ६१-मध्यमस्वरेण वैणेन मूर्च्छनानिर्देशो भवत्यनाशित्वात्। -भरत०, व०स०, अ० २८,पृ० ४३६ आचार्य कल्लिनाथ ने 'रत्नाकर' मे इस प्रकरण पर की हुई टीका मे 'वैणेन' के स्थान पर भरत-नाट्यशास्त्र का पाठ 'वैणवेन' बताया है, जो वेणु की दृष्टि से ठीक है- 'यः सामगानां प्रथम स वेणोर्मध्यमस्वर.' में भी यही बात वतायी गयी है, जिसका परिणाम 'वेणु' पर तीनो स्थानों की अभीष्ट स्वरसख्या की प्राप्ति है। प्राचीन वेणु- वाद्यो मे छिद्रो को आवश्यकतानुसार अर्धमुद्रित इत्यादि अवस्थाओ मे लाकर सारणा- क्रिया होती थी।

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सूर्च्छना ६१

उस-उस मूर्च्छना का अभ्यास करे। (मुक्त तार से निकलनेवाली ध्वनि का नाम- करण जिस स्वर के आधार पर हो उसका ध्यान रखते हुए उपयुक्त अन्तर पर) पड्ज की स्थापना उसकी श्रुतिसंख्या की दृष्टि से करनी चाहिए। इसके पश्चात् वीणा की डाँड पर (अभीष्ट =ग्राम के अनुसार) स्वरप्रबन्ध को जन्म देनेवाली सारिकाओ की स्थापना यथास्थान करनी चाहिए। स्वच्छमानस व्यक्ति उन सारिकाओ पर इप्ट राग (जिसके लिए सारणा-क्रिया की गयी है) का आलाप निपुणतापूर्वक करे।"२ अन्य लोग भी पड्ज के स्थान पर स्थित निपाद आदि स्वरों से अन्य अन्य रजनी इत्यादि षाड्जग्रामिक मूर्च्छनाएँ तथा मध्यम के स्थान पर स्थित गान्धार इत्यादि से मध्यमग्नाम की हारिणाशवा इत्यादि अन्य मूर्च्छनाएँ मानते है।५

६२-येन येन स्वरेणैवं योगस्तन्त्र्याः प्रतन्यते। सारणाभेदमाश्रित्य सा स्यात्तत्तत्स्वराहया॥ ता ता च मूर्च्छनामस्यामभ्यसेत् तद्विदग्रणीः। स्वस्थाने प्रकृतीकृत्य पड्जं स्वश्रुतिपेशलम्।। स्वरप्रबन्धना: स्थाप्या दण्डपृष्ठेऽथ सारिका.। तास्विष्टराग निपुणमालपेत् स्वच्छमानसः ॥-मतङ्ग, भ० को०, पृ० ४५५ ६३-षड्जस्थानस्थित्न्यायैः रजन्याद्याः परे विदुः। हारिणाश्वादिका गाद्यः मध्यमस्थानसस्थितै.।। षड्जादीन्मध्यमादीश्च तदूर्ध्व सारयेत् क्रमात्। -आचार्य्य शार्देव, स० र०, अ०स०, स्वरा०, पृ०१०७ आचार्य शार्ङ्गदेव की उपर्युक्त पक्तियो पर आचार्य कल्लिनाथ का कथन है- "ननु पड्जमध्यमस्थानयोरेव निपादगान्वारादिप्रयोगे सति पड्जग्राम उत्तर- मन्द्रारजन्यादीनां करथं परस्पर भेदो मध्यमग्रामे च सौवीरीहारिणारवादीना च कथ- मन्योन्यंभेद इत्याशक्य परिहरिष्यन्नाह-षड्जादीन्मध्यमादींशचेति। तदूध्वमिति। रजन्यादिकायां पड्जस्थानस्थापितनिपादादेर्हारिणाश्वादिकाया मध्यमस्थानस्थापित- गान्धारादेश् पर पड्जादीन्मव्यमादीश्च स्वरान् सारयेत्, स्वस्वश्रुतिसंख्यापर्य्या- लोचनया श्रुत्यन्तराणि प्रापयेदित्यर्थः।" --- स० र०, अ० सं०, स्वरा०, पृ० १०७ अर्थात्-पड्ज एवं मव्यम के स्थान पर निपाद, गान्वार इत्यादि का प्रयोग करने से पड्जग्रामीय उत्तरमन्द्रा और रजनी इत्यादि मे तथा मव्यमग्रामीय सौवीरी-

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६२ भरत का संगीत-सिद्धान्त

पड्ज के स्थान पर स्थापित निपाद आदि से ऊपर पड्ज इत्यादि तथा मध्यम के स्थान पर स्थित गान्वार आदि के पश्चात् मध्यम आदि स्वरो की सारणा (स्वरो की श्रुतिसख्या के अनुसार) क्रमपूर्वक करनी चाहिए। 'पण्डितमण्डली' के भी शब्द है- "पड्ज और मव्यम के स्थान पर निषाद आदि एवं गान्धार आदि स्वरों की स्थापना करनी चाहिए, उनके वाद पड्ज और मध्यम इत्यादि स्वरो की सारणा 'बुद्धिमान' व्यक्ति को करनी चाहिए।"१४ सितार पर आज जितने पर्दे बँधे हुए है, उनमे से विकृत स्वरो के पर्दो को यदि निकाल दिया जाय तो सप्तकबोधक पर्दे केवल तेरह रह जायँगे। तेरह स्वर इन पर्दो

हारिणारवा इत्यादि में परस्पर भेद कैसे रहेगा ? इस आशंका को दूर करने की इच्छा से आचार्य्य शार्ङ्गदेव ने 'पड्जादीन्मध्यमादीश्च' इत्यादि पंक्ति लिखी है। इस पक्ति में 'तदूर्ध्व' इत्यादि का तात्पर्य्य यह है कि रजनी इत्यादि मे पड्ज के स्थान पर स्थापित निपाद इत्यादि स्वरो एवं हारिणाश्वा इत्यादि मे पड्ज के स्थान पर स्थापित गान्धार इत्यादि स्वरों के पश्चात् पड्ज इत्यादि और मध्यम इत्यादि स्वरो की 'सारणा' करनी चाहिए, अर्थात् उन-उन स्वरो को उन-उनकी संख्या के अनुसार श्रुत्यन्तरों तक पहुँचाकर स्थापित करना चाहिए।" ६४-पड्जमध्यमयो. स्थाने न्याद्या गाद्या यथाक्रमात्। तदूर्ध्व सारयेत् पड्जमध्यमादीन् स्वरान् सुधीः॥ इस स्पष्टीकरण के पश्चात् निम्नलिखित भ्रम दूर हो जाने चाहिए- (क) आधुनिक 'सितार' या 'वीणा' पर पर्दो के जो अन्तर एवं नाम है, तथा इन पर्दो का जो क्म है, वे अनादि काल से चले आ रहे है। (ख) सितार पर जो पर्दा आज मध्यस्थानीय षड्ज का बोधक है, वही महर्षि भरत का 'वैण मध्यम स्वर' या मतङ्ग के 'मध्यसप्तक का पड्ज' है। (ग) सितार पर 'मन्द्र पञ्चम' का पर्दा प्राचीनो का पड्ज है और वहॉ से शुद्ध पड्जा मूर्च्छना सदा से आरम्भ होती रही है। (घ) शाङ्गदेव या अन्य आचार्य्य उत्तरमन्द्रा के सात स्वरों को जैसे का तैसा रखकर उन्ही स्वरो पर रजनी इत्यादि तथा सौवीरी के सातो स्वरो को बिना इधर- उधर सरकाये उसी अवस्था मे हारिणाशवा इत्यादि की सिद्धि करते थे, फलत. विभिन्न मूर्च्छंनाओ मे स्वरो की श्रुतिसंख्या मे परिवर्तन होता था।

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मूर्च्छंना ६३

पर और चौदहवाँ स्वर मुक्त तार पर वोलेगा। इस प्रकार आज सितार पर मध्यम से आरम्भ होनेवाले केवल दो सप्तको (चौदह स्वरो) की प्राप्ति होती है। वादको ने अपनी सुविधा के लिए मध्यमादि मन्द्रसप्तक के अन्तिम तीन स्वर स, रे, ग तथा मध्यमादि मध्यसप्तक के आरम्भिक चार स्वर म, प, ध, निको लेकर 'स, रे, ग, म, प, ध, नि' पड़्जादि मध्यसप्तक मान लिया है, परिणामतः बाज के तार पर उन्हे मन्द्रस्थान मे इस नवीन पड्जादि मध्यसप्तक के म, प, ध, नि और तारसप्तक के 'स, रे, ग' मिल जाते है।" आधुनिक वादक जब मन्द्र मध्यम से मन्द्रस्थान मे जाना चाहते है, तव उन्हे अन्य तारो का आश्रय लेना पडता है, जो मन्द्र पञ्चम या षड्ज इत्यादि मे मिले होते हैं, जब 'तार गान्वार' से ऊपर जाना होता है तब तार गान्वार के पर्दे पर तार को दवाकर खीचना पडता है। सितार पर जो पर्दे होते है, वे वीणा के तारो की भाति सपाट न होकर वक्र (बीच मे ऊपर को उठे हुए) होते है, फलतः मन्द्र पञ्चम या मन्द्र पड्ज के तारो से बाज का काम लेने पर उन तारो को पर्दो पर दवाकर मीडना पडता है, क्योकि बाज के तार का अन्तर पर्दो से जितना होता है, उतना अन्य तारो का नही। अत. विलम्बित लय की तानें तो मन्द्र पड्ज या मन्द्र पञ्चम के तारो पर जा सकती है, परन्तु द्रुत लय की तानो के लिए ये तार अनुपयोगी होते है। सितार पर यदि किन्नरी की भाँति अठारह पर्दे बाँधने हो, तो सितार के तूंबे की बनावट मे इस प्रकार अन्तर करना होगा कि डॉड पर आज की तार गान्वार के पश्चात् पॉच और ऐसे पर्दे वाँधे जा सकें, जिन पर अग्रिम 'म, प, ध, नि, स' निकल सके। यह सम्भव है। आधुनिक सितार पर तार गान्वार के पश्चात् मध्यम और 'पञ्चम' के दो पर्दे वाधे जा सकते है। पञ्चम के पर्दे पर तार को मीडकर अग्रिम पड्ज की प्राप्ति होती है। 'एकतन्त्री' वीणा में पदे न होने के कारण यह किया अत्यन्त सरल थी।

६५-'आधुनिक वीणा' और 'सितार' पर पदों के वर्तमान क्रम और नामकरण कुछ बहुत अधिक प्राचीन नही, इस संबंध मे विस्तृत विचार अन्यत्र किया जायगा।

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६४ भरत का संगीत-सिद्धान्त

यहाँ हम यह मानकर सितार पर मूर्च्छनाओं की स्थापनाओ का प्रकार दे रहे है कि उस पर किन्नरी की भाँति अठारह पर्दे बँधे हुए है-

उत्तरमन्द्रा-

मेरु ० स (स) पर्द- १ रे - (स) (म) २ ग मन्द्रस्थान ३ म (म ४ प (स) 1 1 ५ ध (स) ६ नि - (अ.गा.) (स) I ' 1 (स -(स) 1 1 ७ स - ८ रे (म) (स) (स) - -(स) - (म)

९ ग (स) (म) मध्यस्थान १० म स) (म) ११ प (प) १२ ध . (प) 1 (प) (स) .१३ नि - (स) 1 १४ स (स) - (स) १५ रे (म) तारस्थान १६ ग (म) १७ म - (१८ प - - (प)

मन्द्रस्थान मे 'धैवत' की सिद्धि षड्जान्तर-भाव के आधार पर 'मध्यम' को पड्ज मानकर की गयी है, 'म-ध', 'नि-रे' मे पड्जान्तरभाव यथास्थान वताया जा चुका है। अन्य सभी स्वरो की सिद्धि का आधार पड्ज-मध्यम-भाव है।

मूर्च्छना (आरोहावरोहयुक्त क्रम) के उत्तर (अन्तिम) भाग मे पड्जग्राम का मन्द्रतम स्वर होने के कारण इस मूर्च्छना का नाम 'उत्तरमन्द्रा' है।*

  • पड्जे तूत्तरमन्द्रा स्यान्मन्द्रश्चात्रोत्तरस्व:। तस्मादुत्तरमन्द्रेयम् ...... ।। -- नान्य०, भ० को०, पृ० ७१

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मूर्च्छना ६५

रजनी-

मेरु- ० नि (स) (स) (स) पर्दे- १ सा - - -(प)1 २ रे - 1 1 - अगा (स) - (स)

३ ग - (म) ४ म (प) (स) ५ प - (स) - (प) ६ घ - - (स) (प) ७ नि - 1 (स) ८ स (म) (स) (स) ९ रे म (स) १० ग म ११ म - (स) १२ प प -- । - (स) १३ ध (प) -३- -(स) १४ नि (म)- -(स) १५ स -(स) १६ रे म १७ ग (म) १८ म म

मन्द्र सप्तक मे निषाद को पड्ज मानकर पड्जान्तर-भाव के आधार पर ऋषभ की सिद्धि की गयी है। अन्य स्वरो की स्थापना मे षड्ज-मध्यम-भाव या षड्ज-पञ्चम- भाव का आश्रय लिया गया है। उत्तरमन्द्रा मे पहला पर्दा ऋपभ का उत्पादक होने के कारण मेरु से 'क, ख, ग' अन्तर पर मिला होता है। रजनी मे मेरु पर निषाद स्थित होने के कारण उससे 'ग, क, ख, ग' अन्तर पर स्थित चतु श्रुति षड्ज प्राप्त करने के लिए मूल मूर्च्छना उत्तरमन्द्रा के पहले पर्दे को घुडच की ओर 'ग' अन्तर सरकाना पडेगा। दूसरा पर्दा जो उत्तरमन्द्रा मे गान्धार का जनक होने के कारण मेरु से 'क, ख, ग, ख, ग' अन्तर पर स्थित था, रजनी मे ऋषभ का जनक होने के कारण मेरु से 'ग, क, ख, ग, क, ख, ग,'अन्तर (सात श्रुतियो का अन्तर) प्राप्त करने के लिए घुड़च की ओर 'ग-क' अन्तर सरकाना पड़ेगा। तीसरा पर्दा वही रखना होगा, क्योकि यह मेरु से नौ श्रुतियों के अन्तर पर स्थित ५

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६६ भरत का संगीत-सिद्धान्त

है। उत्तरमन्द्रा में यह मेरु पर बोलनेवाले षड्ज की अपेक्षा मध्यम का जनक था और रजनी में यही पर्दा मेरु पर वोलनेवाले निषाद से नव श्रुत्यन्तर पर स्थित गान्धार का जनक है। चौथा पर्दा उत्तरमन्द्रा में मेरु पर बोलनेवाले षड्ज का पञ्चम था, रजनी मे भी वह अपने स्थान पर स्थित रहकर मध्यम का जनक होगा, क्योकि 'निषाद-मध्यम' में पड्ज-पञ्चम-भाव है। पाँचवाँ पर्दा उत्तरमन्द्रा में धवत का जनक होने के कारण चौथे पर्दे से 'क, ख, ग, अन्तर पर स्थित था, रजनी में इस पर्दे पर 'पञ्चम' उत्पन्न करने के लिए इसे एक 'ग' अन्तर चढाना होगा। छठा पर्दा उत्तरमन्द्रा मे मेरु से अठारह श्रुतियो (क, ख, ग, ख, ग, ग, क, ख, ग, ग, क, ख, ग, क, ख, ग, ख, ग) के अन्तर पर स्थित था और उस पर निषाद की उत्पत्ति होती थी। रजनी मे उस पर धवत उत्पन्न करने के लिए मेरु से उसे बीस श्रुतियो के अन्तर पर रखना होगा। फलतः उसे दो श्रुति चढ़ाना होगा। सातवे पर्दे पर निषाद स्वतः मिल जायगा, क्योंकि मुक्त तार पर स्थित मन्द्र निपाद का द्विगुण मध्य निषाद इस पर स्वतः बोलेगा। रजनी की स्थापना का जो प्रकार षड्जान्तर-भाव, षड्ज-मध्यम-भाव एवं षड्ज-

आा जायँगे। पञ्चम-भाव के आधार पर प्रद्शित किया गया है, उस प्रकार से सभी पर्दे यथास्थान

मेरु से क्रमशः नौ एवं तेरह श्रुतियों के अन्तर पर स्थित तीसरे और चौथे पर्दे के अतिरिक्त सभी पर्दे इस मूर्च्छना की सारणा करने में उत्तरमन्द्रा वाले स्थानों से हट जाते है, फलतः उत्तरमन्द्रा और इस मूर्च्छना मे दिन-रात जैसा अन्तर हो जाने के कारण ही सम्भवतः इसे 'रजनी' कहा गया है। मध्य और तार स्थान के पर्दे भी मन्द्र स्थान के पर्दों मे विकार के परिणामस्वरूप यथोचित रूप में सरकेगे।

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मच्छना ६७

उत्तरायता-

मेरु- ० व स पर्द- १ नि - । (स) - (स) (स) २ स - ! - (प)- (स) ३ रे - म ४ ग (स) (अ.गा.) -(स)

५ म - (स (प) - (स) 1 ६ प (प) - ७ ध - (प) ८ नि (प) (स) ९ स - (प) (स) (स) १० रे (म) (स) ११ ग (म १२ म १३ प (स १४ घ. (स) १५ नि (स) १६ स १७ रे १८ ग - (म) इस मूर्च्छना की स्थापना मे तीसरा पर्दा अपने स्थान पर ही रहेगा। उत्तरमन्द्रा मे स्थापित पर्दो की स्थिति की अपेक्षा अन्य प्दो की स्थिति मे परिवर्तन होगा। पहला, चौथा और पॉचवॉ पर्दा (कमशः एक श्रुति, दो श्रुति और एक श्रुति) मेरु की ओर सरक जायँगे, तथा दूसरा और छठा पर्दा घुड़च की ओर एक-एक श्रुति सरकेगे। मूर्च्छना का उत्तर (अवरोह का अन्तिम) भाग (मेरु और प्रथम पर्दे का अन्तर) इस मूच्छना मे 'आयत' (अतिशयपूर्वक यमनयुक्त, दृढ़ अथवा पहले पर्दे से घुड़च का अन्तर कम) हो जाने के कारण ही इसका नाम सम्भवत. 'उत्तरायता'* है। मध्य और तार स्थान के पर्दे भी यथास्थान हटेगे।

  • उत्तरोत्तरतश्चास्यामायतो हि स्वरो यतः । तेनेयं मूच्छंना प्रोक्ता भवते चोत्तरायता॥ -नान्य०, भ० को०, ७१

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६८ भरत का संगीत-सिद्धान्त

शुद्धषड्जा- मेरु- ० प (स) पर्दे- १ घ (प) 1 २ नि- (स) - (स) - 1 (स) ३ स - म ४ रे - - (अ.गा.) स - (स) ५ ग - ६ म - -(म) (स) (म)

७ प (स ८ घ स) -- (प) ९ नि म) (स) १० स 'म) - स) ११ रे -( E-→E (स) १२ ग E-A'' १३ म १४ प (प) (स) १५ ध (प) (स) १६ नि म) १७ स (म) १८ रे म

इस मूर्च्छना की स्थापना में उत्तरमन्द्रा की स्थिति की अपेक्षा चौथा पर्दा मेरु की ओर एक श्रुति सरकेगा तथा पॉचवाँ पर्दा दो श्रुति। रजनी और उत्तरायता में पड्ज प्राप्त करने के लिए क्रमशः पहले और दूसरे पर्दे को उत्तरमन्द्रा के स्थान से सरकाना पडता है, परन्तु इस मूर्च्छना की सारणाक्रिया में तीसरे पर्दे की मूल शुद्ध अवस्था पर ही 'पड्ज' प्राप्त हो जाता है, फलतः इस मूर्च्छना का नाम 'शुद्धषड्जा'* है। मध्य और तार स्थान के पर्दे भी मन्द्र स्थान के अनुसार हटेगे।

  • शुद्ध. स्यात्तत्र पड्जस्तु शुद्धपड्जा ततः स्मृता। पञ्चमेन स्वरेणेयं देवता स्यात्पितामहः॥ -नान्यदेव, भ० को०, पृ० ६७१

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मूर्च्छना ६९

मत्सरोकता-

मेरु - 0 म स पर्दे - १ प - -(प)

३ नि म (स -(स) ४ स -(प) (स) (स) ५ रे (अ.ग (स) ६ ग (म) ७ म -(प)-(स) ८ प (स) - -(प) ९ ध स)- (प) १० नि (म) (स) ११ स -(स) (स) १२ रे म - -(स) १३ ग - म १४ म म - -(स) १५ प प -(स) १६ ध प १७ नि (म) १८ स -(म) 1

इस मूर्च्छना में केवल पहले और दूसरे पर्दे को, उत्तरमन्द्रा की स्थिति की अपेक्षा, कमश. एक और दो श्रुति (घुडच की ओर) सरकाना पड़ता है, अन्य सभी पर्दे जैसे के तैसे रहते है। केवल पहले और दूसरे पदे के विकार से उत्तरमन्द्रा के प्रति इस मूर्च्छना का हलका- सा मात्सर्य प्रकट होने के कारण सम्भवत. इसका नाम मत्सरीकृता है।* अन्य स्थानो (सप्तको) मे पर्दे यथोचित रूप मे सारणाक्रिया के परिणामस्वरूप हट जायँगे।

  • मध्यमालापसरणे सा भवेन्मत्सरीकृता। -नान्य०, भ० को०, पृ०४५८

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७० भरत का संगीत-सिद्धान्त

अश्वकान्ता-

मरू - ० ग (स) पर्दे- १ म -(प)-(स) २ प (प) ३ ध -(प) ४ नि (प) (स) (स) 1 i ५ स (प) (स) - ६ रे (अ गा.) -(स) i - (स) (स) ७ ग -(म) ८ म म) (स) ९ प (9) -(स) १० ध (प) ।- (स) ११ नि (स १२ स -म - -(स)(स) १३ रे -(म)- । (स) १४ ग -म १५ म ] (स) १६ प १७ ध प १८ नि -(म)। इस मूच्छना मे चौथे पर्दे के अतिरिक्त सभी प्दे उत्तरमन्द्रा की स्थिति की अपेक्षा (अश्व की गति (क्रमण) के समान) घुडच की ओर बढ़ते है, सम्भवत.इसी लिए इस मूर्च्छना का नाम 'अश्वक्ान्ता' है। अन्य सप्तको के पर्दे भी मन्द्र स्थान की स्थिति के अनुसार अपने स्थान से हटेंगे।

  • भरतकालीन वीणाएँ सारिकाहीन होती थी। इसलिए एकतंत्री वीणा पर मूच्छनाओं की अन्वर्थता समझने के लिए 'पर्दे' के स्थान पर तन्त्री का वह 'स्थान' समझना चाहिए, जिस स्थान पर अभीष्ट स्वर की अभिव्यक्ति होती हो।

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मूच्छंना ७१

अभिरुद्गता-

मेरु- रे (स) पर्दे- ग -(म) म -(स) स) 1 (स ३ प ४ ध - (प) (प, 1 (अ.गा.) ५ नि (स ६ स (प) (स)- ७ रे स) ८ ग ९ म -(स) (स) १० प प ११ ध - (प) 1 १२ नि -(म) -( -(स) १३ स - 1 - (स) (स ) १४ रे (स) १५ ग १६ म १७ प (9) १८ ध -(प)

इस मूच्छना मे उत्तरमन्द्रा की स्थिति की अपेक्षा पहला और पाँचवा पर्दा मेरु की ओर तथा दूसरा, तीसरा और छठा पर्दा घुड़च की ओर बढते है। इस मूच्छना में पर्दे परस्पर 'अभिरोध' करते दिखाई देते है, फलतः इसका नाम अभिरुद्गता (अभि+ रुध्+गता) है। मध्य और तार स्थान के पर्दे भी यथोचित रूप मे सरकेगे।

माध्यमग्रामिक मूर्च्छनाएँ सौवीरी

उत्तरमन्द्रा के गान्धार को दो श्रुति चढ़ाने के पश्चात् उसे 'घैवत' की संज्ञा देने अर्थात् अन्तरगान्धार-युक्त उत्तरमन्द्रा के 'सरिगमपधनि' को 'म, प, ध, नि, स, रे, ग' की सज्ञा देने से 'सौवीरी' की सिद्धि हो जाती है। उत्तरमन्द्रा से 'सावीरी' के निर्माण की प्रस्तुत योजना सम्भवत. सौवीर देश के निवासियो ने की, फलत. इसका नाम 'सौवीरी' है।

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७२ भरत का संगीत-सिद्धान्त

हारिणाश्वा अन्तरगान्धार-युक्त रजनी के 'नि, स, रे, ग, म, प, ध' को क्रमशः 'ग, म, प, ध, नि, स, रे' की सज्ञा दे देने से 'हारिणारवा' की सिद्धि होती है। इस मूर्च्छना में सौवीरी की स्थिति की अपेक्षा पहला, तीसरा और पाँचवॉ पर्दा घुडच की ओर बढ़ते है। पॉचवे का पश्चाद्वर्ती छठा पर्दा भी घुडच की ओर बढ़ता है। यह गति पहले पर्दे से उछलकर तीसरे, और तीसरे से उछलकर पाँचवे पर जाती दिखाई देती है, बीच मे दूसरे और चौथे पर्दे का स्पर्श तक इस गति मे नही होता। जिस प्रकार हिरन चौकड़ी भरते समय उछलता हुआ दौडता है और अगले-पिछले पैरो के मव्य स्थान का परित्याग-सा करता चलता है, वैसा ही प्रकार पहले, तीसरे और पॉचवे पर्दे की 'गति' मे दृष्टिगोचर होता है। पॉचवे पर्दे के पश्चात् यह उल्लंघन नही रहता और वह गति अगले पर्दे (छठे) पर भी दिखाई देकर 'अश्वगति' जैसी हो जाती है। फलतः इस मूर्च्छना का नाम 'हारिणारवा' है। मध्य और तार स्थान के पर्दे भी इसी प्रकार यथास्थान सरकेगे।

कलोपनता

अन्तरगान्धार-युक्त 'उत्तरायता' के 'ध, नि, स, रे, ग, म, प' को 'रे, ग, म, प, ध, नि' की संज्ञा दे देने से 'कलोपनता' मूर्च्छना की सिद्धि होती है। सौवीरी की स्थिति की अपेक्षा इस मूर्च्छना मे पहला, दूसरा और पाँचवाँ पर्दा मेरु की ओर सरकाने पडते है। घुड़च की ओर केवल छठा पर्दा चतु.श्रुति पड्ज की सिद्धि के लिए एक श्रुति सरकाना पड़ता है, अत इसका नाम 'कलोपनता' है। अन्य स्थानो के पर्दे भी यथास्थान सरकेगे।

शुद्ध मध्या अन्तरगान्धार-युक्त 'शुद्धपड्जा' मूर्च्छना 'प, ध, नि, स, रे, ग, म' को क्रमश. 'स, रे, ग, म, प, ध, नि' की सज्ञा दे देने से 'शुद्धमध्या' की सिद्धि होती है। हारिणाश्वा और कलोपनता मे मध्यम की सिद्धि के लिए सम्बद्ध पर्दो को सरकाना पडता है, परन्तु इस मूर्च्छना मे 'मध्यम' तीसरे पर्दे की अविकृत अवस्था मे ही मिल जाता है, फलत. इसका नाम 'शुद्धमध्या' है। शुद्धमध्या मे दूसरा और चौथा पर्दा सौवीरी की स्थिति की अपेक्षा मेरु की ओर सरकेगे। अन्य सप्तको में भी अभीष्ट पर्दे यथास्थान सरकेंगे।

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मूर्च्छना ७३

मार्गो अन्तरगान्वार-युक्त मत्सरीकृता मूर्च्छना के 'म, प, ध, नि, स, रे, ग' को क्रमशः 'नि, स, रे, ग, म, प, ध' की संज्ञा दे देने से 'मार्गी' मूच्छना की सिद्धि होती है। इस मूर्च्छना मे 'सौवीरी' की स्थिति की अपेक्षा पहले पर्दे तथा छठे पर्दे को धुउच की ओोर क्रमश एक और दो श्रुति चढ़ाना पडता है। सौवीरी की स्थिति से इसकी स्थापना का 'मार्ग' सरलतापूर्वक मिल जाने के कारण अभवा सारणा मे मृग-जैसी गति होने के कारण यह मूर्च्छना 'मार्गी' कहलाती है। मौरवी अन्तरगान्वार-युक्त 'अश्वकान्ता' मूर्च्छना के 'ग, म, प, ध, नि, स, रे' को क्रमशः 'घ, नि, स, रे, ग, म, प' की सज्ञा दे देने से पौरवी की सिद्धि होती है। किसी पौरव व्यक्ति अथवा 'जन' से किसी प्रकार सम्बद्ध होने के कारण इसकी संज्ञा 'पौरवी' है।

हृष्यका अन्तरगान्धार-युक्त 'अभिरुद्गता' के 'रे, ग, म, प, ध, नि, स' को क्रमश. 'प,ध, नि, स, रे, ग, म' की संज्ञा दे देने से 'हृष्यका' की सिद्धि होती है। यह मूर्च्छना 'पञ्चम' से आरम्भ होकर 'पञ्चम' पर ही समाप्त होती है, जिसकी प्रधानता 'हास्य' एवं शृंगार में विनियोज्य है। 'नन्दयन्ती' (प्रसन्न करती हुई) नामक जाति में मतङ्ग ने इसी मूर्च्छना का प्रयोग किया है, इस प्रकार हर्पविधायिका होने के कारण सम्भवतः इसका नाम 'हृष्यका' है।

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तृतीय अध्याय

जाति-लक्षण

रज्जन और अदृष्ट अभ्युदय को जन्म देते हुए विशिष्ट स्वर ही विशेष प्रकार के सन्निवेश से युक्त होने पर 'जाति' कहे जाते है। दस लक्षणों से युक्त विशिष्ट स्वर- सन्निवेश 'जाति' कहलाता है।' जातियाँ श्रुति, ग्रह, स्वर इत्यादि के समूह से जन्म लेती है, इसलिए 'जातियॉ' कह- लाती है, जातियो से 'रस' की प्रतीति उत्पन्न या आरम्भ होती है। अथवा 'राग' इत्यादि के जन्म का कारण होने से विशिष्ट-स्वरसन्निवेश 'जाति' की संज्ञा ले लेता है अथवा ये जातियाँ मनुष्यों की 'ब्राह्मणत्व' इत्यादि जातियों के समान है।२ जातियों के भेद षाड्जी, आर्पभी, धैवती, नैषादी, पड्जोदीच्यवती, पड्जकैशिकी और षड्जमध्या षड्जग्रामाश्रित सात जातियाँ है। गान्वारी, मध्यमा, गान्वारोदीच्यवा, पञ्चमी, रक्त- गान्वारी, गात्वारपञ्वमी, मध्यमोदीच्यवा, नन्दयन्ती, कार्मारवी, आन्ध्री तथा कैशिकी मध्यम-ग्रामाश्रित ग्यारह जातियाँ है। इस प्रकार जातियो की संख्या अठारह है।२

१-तत्र केयं जातिर्नाम ? उच्यते-स्वरा एवं विशिष्टसन्निवेशभाजो रक्तिमदृष्टा- भ्युदयं च जनयन्तो जातिरित्युक्ताः। कोऽसौ सन्निवेश इति चेत्, जातिलक्षणेन दशकेन भवति सन्निवेशः । -आचार्य अभिनवगुप्त, भ० को०, पृ० २२७ २-श्रुतिग्रहस्वरादिसमूहाज्जायन्त इति जातयः । अतो जातय इत्युच्यन्ते। यस्मा- ज्जायते रसप्रतीतिरारभ्यत इति जातय. । अथवा सकलस्य रागादेः जन्महेतुत्वा- ज्जातय इति। यद्वा जातय इव जातय, यथा नराणां ब्राह्मणत्वादयो जातयः ।

३-पाड्जी चैवार्षभी चैव वैवती सनिषादिनी। -मतङ्ग, भ०को०, पृ०२२७

षड्जोदीच्यवती चैव तथा वै पड्जकैशिकी।

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जाति-लक्षण ७५

इन अठारह में सात जातियो के नाम सात स्वरों पर है। वे दो प्रकार की है, गुद्ध और विकृत। पड्जग्राम मे पाड्जी, आर्पभी, धैवती और निपादवती (नैषादी) शुद्ध है। शुद्ध जातियाँ वे है, जिनमे कोई स्वर कम नही होता और नामस्वर ही जिनमे अश, ग्रह और न्यास होता है। न्यासस्वर के अतिरिक्त एक, दो या अनेक लक्षणो मे विकार होने पर ये जातिया विकृत कहलाने लगती है। फलत. जो शुद्ध है, वही विकृत भी हो जाती है।' शुद्ध जातियो मे मन्द्रस्वर नियमपूर्वक न्यास होता है, परन्तु विकृत जातियो में यह नियम शिथिल भी हो जाता है। अठारह जातियो में ग्यारह जातियाँ दो या कई जातियो के ससर्ग के कारण विकृत हो जाती है। परस्पर संयोग से इन जातियो का निर्माण होता है।५ षाड्जी और मध्यमा के सयोग से 'षड्जमध्यमा'; गान्वारी और पाड्जी के योग से षड्जकैशिकी; पाड्जी, गान्वारी और धैवती के योग से षड्जोदीच्यवा; पाड्जी, गान्वारी, मध्यमा और धैवती के योग से गान्वारोदीच्यवती; गान्वारी, पञ्चमी, मध्यमा और धैवती से मध्यमोदीच्यवती; गान्घारी, पञ्चमी और सप्तमी (नैपादी) के योग से रक्तगान्धारी; गान्वारी और आर्षभी से आन्ध्री; आर्षभी, पञ्चमी और

पड्जमध्या तथा चैव पड्जग्रामसमाश्रया! गान्धारी मध्यमा चैव गान्धारोदीच्यवा तथा।। पञ्चमी रक्तगान्धारी तथा गान्धारपञ्चमी। मध्यमोदीच्यवा चैव नन्दयन्ती तथैव च। कर्मारवी च विज्ञेया तथान्घ्री कैशिकी तथा॥ -भरत०, व० सं०, पृ० ४३९ ४-एतासामष्टादशानां सप्त स्वराख्याः। ताशच द्विविधाः शुद्धा विकृताश्च। तत्र शुद्धा. षड्जग्रामे पाड्जी आर्षभी धैवती निपादवती च। गान्वारी, मध्यमा, पञ्चमी चेति मध्यमग्रामे। शुद्धा अन्यूनस्वरा. स्वरांशग्रहन्यासाः। एपामन्य- तमेन द्वाम्यां बहुभिर्वापि लक्षणैविक्रियामुपगता न्यासवरज विकृतसंज्ञा भवन्ति। तेन ता एव शुद्धास्ता एव च विकृता.। -भरत, व० सं०, पृ० ४३९ ५-न्यासविधावप्यासां मन्द्रो नियमाद् भवति शुद्धासु विक्वतास्वनियमात्। तत्रका- दश संसर्गजा विकृता. । परस्पर संयोगादेकादश निर्वर्तयन्ति। यथा- शुद्धा विकृताश्चव हि समवायाज्जातयस्तु जायन्ते । ता एव शुद्धविकृता भवन्ति चैकादशान्यासु॥

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७६ भरत का संगीत-सिद्धान्त

गान्धारी से नन्दयन्ती; नैपादी, आर्पभी और पञ्चमी के संसर्ग से कार्मारवी; गान्धारी और पञ्चमी के मिश्रण से गान्वारपञ्चमी; तथा पाड्जी, गान्वारी, मध्यमा, पञ्चमी एवं नैषादी के मिश्रण से कैशिकी जाति का निर्माण होता है।f इन जातियों मे से चार जातियॉ सदा सप्तस्वरा, दस पञ्चस्वरा और चार षट्स्वरा होती है।" मध्यमोदीच्यवा, पड्जकैगिकी, कार्मारवी तथा गान्वारपञ्चमी सदा सप्तस्वरा होती है; षाड्जी, आन्ध्री, गान्धारोदीच्यवा और नन्दयन्ती पट्स्वरा और अवशिष्ट दस जातियाँ पञ्चस्वरा भी होती है। जिन्हें पञ्चस्वरा कहा गया है, वे कभी पट्स्वरा और जिन्हे पटस्वरा कहा गया है, वे कभी पञ्चस्वरा भी होती है।"

६-स्यात् षड्जमध्यमायां निर्वृत्ता पड्जमध्यमा जाति.। गान्वारीपाड्जीभ्यां संयोगात् पड्जकैशिकी वापि॥ पाड्जीगान्धारीम्या धैवत्याश्चापि या विनिष्पन्रा। संसर्गाद् विज्ञेया सा पड्जोदीच्यवा जाति.। -भरत०, व० स०, पृ० ४४१ षाड्जीगान्धारीभ्या धैवत्याश्चापि मध्यमायाश्च। गान्वारोदीच्यवा स्यान्निर्वृत्ता नामतो जाति. । -भरत०, का० स०, पृ० ३२३ गान्धारपञ्चमाभ्यां मध्यमया विरचिता च वैवत्या। जातिस्तु मध्यमोदीच्यवेति सद्भि: सदा जेया।। गान्वारीपंचम्यो सप्तम्याश्चैव रक्तगान्धारी। सञ्जायते जाति:॥ योनिस्तु नन्दयन्त्यास्त्वार्षभी पञ्चमी सगान्धारी। कार्म्मारवी निपादी सार्वभी पञ्चमी कुय्युः॥ गान्वारीपञ्चम्योर्योगादु गान्धारपञ्चमी जाति.। धैवत्यार्पभीम्यां हीना खलु कैशिकी कुर्य्युः ॥ -भरत०, व०स०, पृ०४४१ ७-आभ्यां चतस्रो नियमाज्जयाः सप्तस्वरा नुघ.। दश पञ्चस्वरा ज्ञेयाश्चतस्रश्चव पटस्वराः ॥ -भरत०, ब०स०,पृ०४४१ ८-मध्यमोदीच्यवा चैव तथा वै पड्जकैशिकी। कार्म्मारवी च सम्पूर्णा तथा गान्वारपञ्चमी।। पड्जान्ध्री नन्दयन्ती च गान्वारोदीच्यवा तया। चतस्रः षट्स्वरा ज्ञेयाः पञ्चवस्तुस्वरा दश ॥ यास्ता: पञ्चस्वराः प्रोक्ता याश्चैव षट्स्वरा. स्मृता. । कदाचिदौड़्वीभूता. कदाचित् षाडवीकृताः ॥ -भरत०, ब० सं०, पृ० ४४१

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जाति-लक्षण ७७

भरत-सम्प्रदाय मे यह नियम है कि 'अश' स्वर के सवादी स्वर का लोप कभी नही होता, फलत कुछ जातियो में स्वरविशेष का अशत्व उनकी पाडव या औडुव अवस्था का वाधक हो जाता है। पाडव या औडव अवस्था के वाधक अशस्वर षाडवद्वेषी या औडुवद्देपी कहलाते है। पड्जमध्यमा जाति का षाडव प्रकार निपाद के लोप से बनता है। यदि निपाद ही उस जाति में अशस्वर हो, तो उसकी पाडवावस्था असम्भव है। इस जाति की औडवावस्था 'निपाद-गान्धार' के लोप से होती है। निपादाश अवस्था में षाडव बनाने के लिए निषाद के सवादी गान्वार का लोप असम्भव है।' मव्यमग्रामीय गान्वारी, रक्तगान्धारी और कैशिकी जातियो का षाडव रूप ऋपभ के लोप से होता है। मध्यमग्राम मे ऋषभ-पञ्चम सवाद है, फलतः इन तीन जातियों की पाडवावस्था मे पचम अंशस्वर कभी नही होता, पञ्चम के 'अंश' होने पर ऋपभ का लोप असम्भव है।१ षाड्जी में 'निषाद' का लोप इस जाति को पाडव बनाता है, फलतः इस जाति में गान्वार के अशस्वर होने पर उसके संवादी निषाद का लोप असम्भव है।" षड्जोदीच्यवती मे ऋपभ का लोप उसे षाडव बनाता है, फलतः धैवत के अंश- स्वर होने पर ऋषंभ का लोप असम्भव है।१२ अत पड्जमध्यमा मे निपाद, गान्धारी, रक्तगान्धारी और कैशिकी मे पञ्चम (तीन जातियो में), षाड्जी मे गान्वार और पड्जोदीच्यवती मे धैवत अश होने पर षाडवद्वेषी हो जाते है।१९ गान्वारी मे पड्ज-मध्यम-पञ्चम-निषाद, रक्त-गान्वारी में षड्ज-मध्यम-

९-पट्स्वरी सप्तमे त्वंशे नेष्यते षड्जमव्यमा। सवादिलोपाद् गान्वारस्तत्रैव न भविष्यति ॥ १०-गन्वारी-रक्तगान्धारी-कैशिकीना तु पञ्चमम्। -भरत०, व० सं०, पृ० ४४१

-भरत, व० सं०, पृ० ४४१ ११-पाड्जायाञ्चैव गान्वारमनंशं विद्धि पाडवे।

१२-पड्जोदीच्यवत्याश्चैव धैवतांशे न षाडवम्। -भरत०, व० सं०, पृ० ४४१

-भरत०, व० सं०, पृ० ४४२ १३-संवादिलोपात्सप्तैते षाट्स्वर्य्य तु विवर्जिताः। -भरत०, का० सं०, पृ० ३२४ पादस्वर्य-वर्जित इन स्वरों की संख्या छः होती है, मव्यम सदा पाडवद्वेषी होता है, सम्भवतः महर्षि ने उसे जोड़कर समस्त षाडवद्वेपी स्वर सात माने हैं।

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७८ भरत का संगीत-सिद्धान्त

पञ्चम-निषाद, षड्जमध्यमा मे गान्वार-निषाद, पञ्चमी में ऋपभ और कैशिकी मे धवत स्वर औड्वावस्था में लुप्त नही होते।" जातियों में सभी स्वरो का लोप विहित है, परन्तु मध्यम का लोप कभी नही करना चाहिए। सातों स्वरो मे मव्यम अविनाशी स्वर है। साम गान करनेवालो ने भी गान्धर्व कल्प में मध्यम का विधान अनाशी रूप मे किया है।१ जाति के दस लक्षण जाति के दस लक्षण अंश, ग्रह, तार, मन्द्र, न्यास, अपन्यास, अल्पत्व, बहुत्व, पाडव और औड्वित है।"६ (१) अंशस्वर जिस स्वर में राग रहता है, जिस स्वर से प्रवर्तित होता है, जो तार और मन्द्र अवधि का नेता, नियामक या प्रदर्शक है, जिसका प्रयोग अधिक पाया जाता है, ग्रह, अपन्यास, विन्यास, संन्यास एवं न्यास आदि के योग से जिसका पुनः-पुन. अनुवर्तन होता है, वह इन दस (स्थूलाक्षरों में निर्दिष्ट) लक्षणों से युक्त स्वर 'अंश' कहलाता है।"

षड्जमव्यमपञ्चमाः । सप्तमश्चव विज्ञेयः येषु* चौ(नौ)डुवितं भवेत्॥ द्वी षड्जम्यमांशौ तु गान्धारोऽथ निपादवान्। ऋपभर्चैव पञ्चम्यां कैशिक्याञ्चैव धैवतः॥ एवं हि द्वादशैते स्युः वर्ज्याः पञ्चस्वरे सदा। तास्वनौडुविता नित्यं कर्तव्या जातयो बुधै.॥

१५-सर्वस्वराणां नाशस्तु विहितस्त्वथ जातिपु। -भरत०, व० सं०, पृ० ४४२

न मव्यमस्य नाशस्तु कर्तव्यो हि कदाचन । सप्तस्वराणां प्रवरो ह्यनाशी चव मध्यमः । गान्घर्वकल्पेऽरभिमतः सामगैश्च महर्षिभिः ॥

१६-ग्रहांशौ तारमन्द्रौ च न्यासापन्यास एव च। -भरत०, का०, सं०, पृ० ३२४

अल्पत्वञ्च बहुत्वञ्व पाडवौडुविते तथा॥

१७-रागश्च यस्मिन् वसति यस्माच्चव प्रवर्तते। -भरत०, व० सं०, पृ० ४४३

नेता च तारमन्द्राणां योऽत्यर्थमुपलभ्यते। - * (सप्तमी चैव विशेया यासु ?)

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जाति-लक्षण ७१

पाड्जी मे पड्ज, गान्वार, मव्यम, पञ्चम, धैवत; आर्षभी में ऋपभ, निपाद, घवत; गान्धारी में पड्ज, गान्धार, मध्यम, पञ्चम, निपाद; मध्यमा में पड्ज, ऋपभ, मध्यम, पञ्चम, धवत; पञ्चमी मे ऋपभ, पञ्चम; धैवती मे ऋषभ, धवत; नैषादी मे निपाद, ऋषभ, गान्वार; षड्जकैशिकी में षड्ज, गान्धार, पञ्चम; पड्जोबीच्यवती में षड्ज, मध्यम, धैवत, निषाद; षड्जमध्यमा में षड्ज, ऋषभ, गान्धार, मध्यम, पञ्चम, धैवत, निषाद; गान्धारोदीच्यवा मे षड्ज, मध्यम; रक्तगान्वारी में षड्ज, गान्वार, मध्यम, पञ्चम, निषाद; कैशिकी मे षडज, गाधार, मध्यम, पञ्चम, धैवत, निषाद; मध्यमोदीच्यवा मे पञ्चम; कार्मारवी मे ऋषभ, पञ्चम, धवत, निषाद; गान्धारपञ्चमी मे पञ्चम; आन्ध्री मे ऋपभ, गान्धार, पञ्चम, निपाद और नन्दयन्ती में पञ्चम स्वर को अशावस्थाएँ प्राप्त होती है।१

ग्रहापन्यास-विन्यास-सन्यास-न्यासयोगतः। अनुवृत्तरच यश्चेह सोऽशः स्याद् दशलक्षणः ॥ -- भरत०, रत्नाकर की टीका मे कल्लिनाथ द्वारा उद्धत १८-मध्यमोदीच्यवायास्तु नन्दयन्त्यास्तथैव च। तथा गान्वारपञ्चम्या: धैवत्याश्च तर्थवाशौ विज्ञेयी पञ्चमोऽशो ग्रहस्तथा। धैवतर्षभौ। पञ्चम्यास्तु ग्रहावंशौ भवत पञ्चमर्षभौ। गान्धारोदीच्यवायास्तु ग्रहाशौ षड्जमध्यमौ। आर्षभ्या तु निपादस्तु तथा चर्षभघैवतौ। निषाद्या च निषादस्तु गन्धारश्चर्षंभस्तथा। तथा च षड्जकैशिक्यां षड्जगान्धारपञ्चमा.। तिसृणामपि जातीना ग्रहास्त्वशास्तु कीतिता.। षड्जश्च मध्यमर्चैव निषादो वैवतस्तथा। पड्जोदीच्यवतीजातेर्ग्रहास्त्वंशाश्च कीतिता:। पञ्चमरचर्पभरचैव निषादो धैवतस्तथा। कर्मारव्या वुधरशा ग्रहाश्च परिकीर्तिताः गान्वारश्चर्षभरचैव पञ्चमोऽय निषादवान्। चत्वारोऽशा भवन्त्यान्प्रया ग्रहाश्चैते तथैव हि। ऋषभरचैव षड्जरच मव्यम. पञ्चमस्तथा। मध्यमाया ग्रहा ज्ञेया अंशार्चैव सघैवता.। निषादपड्जगान्वारा मघ्यमः पञन्नमस्तथा।

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८० भरत का संगीत-सिद्धान्त

इस प्रकार कुल अंशस्वर तिरसठ"हो जाते है, जो निम्नस्थ सारणी में स्पष्ट है- जाति अंशस्वर संख्या १. पाड्जी स, ग, म, प, ध ५ २. आर्षभी रे, नि, ध ३

३. गान्वारी स, ग, म, प, नि ५

४. मध्यमा स, रे, म, प, ध ५. पञ्चमी रे, प २ ६. धवती रे, घ २ ७. नैपादी नि, रे, ग. ३ ८. पड्जकैशिकी स, ग, प ३ 5. पड्जोदीच्यवती स, म, घ, नि १०. पड्जमध्यमा स, रे, ग, म, प, घ, नि ७

११. गान्वारोदीच्यवा स, म १२. रक्तगान्वारी स, ग, म, प,नि ५ १३. कैशिकी स, ग, म, प, घ, नि ६

१४. मव्यमोदीच्यवा प १ १५. कार्मारवी रे, प, घ, नि १६. गान्वारपञ्चमी प १

१७. आन्ध्री रे, ग, प, नि ४

१८. नन्दयन्ती प १

योग ६३

गान्वारीरक्तगान्धार्योरग्रहाशा. परिकीतिताः । पड्जाया षड्जगान्वारौ मध्यम.पञ्चमस्तथा। धैवतस्यापि विज्ञेया ग्रहाश्चांशाः प्रकीर्तिताः । कैशिक्या्च ऋषभहीना ग्रहांशा. षट्स्वरा: स्मृताः। सर्वस्वरग्रहांशाश्च विज्ञेयाः षड्जमव्यमा। एवं त्रिषष्टिर्विज्ञेया ग्रहाश्चांशाशच जातिषु। भरत०, व० सं०, पृ० ४४४.४४५ १९-द्वैग्रामिकीणां जातीनां सर्वासामपि नित्यश. । त्रिषष्टिरंशा विज्ञेयास्तासाञ्चव तथा ग्रहाः ॥ -भरत०, व० सं०, पृ० ४४४

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जाति-लक्षण ८१

(२) ग्रहस्वर अंशस्वर ही समस्त जातियो के 'यह' स्वर होते है। प्रवृत्ति अर्थात् प्रयोग या गान-वादन मे जो स्वर अश होता है, वही 'ग्रह' माना जाता है।" जातियो के गान- वादन का आरम्भ अशस्वर से ही होता है, उस अवस्था मे 'अंश' स्वर ही 'ग्रह' कहलाता है। गान-वादन का 'ग्रहण' (आरम्भ) अंशस्वर से होने के कारण ही उसे 'ग्रह' कहते हैं। (३) तारगति जाति-प्रयोगो मे अशस्वर से चौथे, पाँचवे या सातवें स्वर तक तारस्थान मे जाना चाहिए, इससे ऊँचा जाना जाति-प्रयोग मे अभीप्ट नही।२२ जाति-विशेष मे अंश-विशेप से मूर्च्छना का आरम्भ होने के कारण मूर्च्छना के तार-स्थान मे अंशस्वर से सातवे स्वर की ही सत्ता सम्भव है, क्योकि इससे आगे अति तार स्वर आयेगा, जिसका प्रयोग भरत- सम्प्रदाय में नही। (४) मन्द्रगति मन्द्रगति तीन प्रकार की है, 'अग' तक, 'न्यास' तक या 'अपन्यास' तकर। भवरोहोन्मुख अवस्था मे अशस्वर से पश्चात् मन्द्र नही होता, क्योकि तीनो स्थानो मे आरम्भ-स्वर 'अश' ही होता है। मन्द्रगति की अवधि 'न्यास' और 'अपन्यास', ये दो

२०-ग्रहास्तु सर्वजातीनामशवत् परिकीतिता.। यः प्रवृत्तौ भवेदरा. सोऽसौ ग्रहविकल्पित.॥ -भरत०, व० सं०, पृ० ४४२ २१-ग्रहस्तु सर्वजातीनामंश एव हि कीतित. । यत्प्रवृत्तौ भवेद् गानं सीऽशो ग्रहविकल्पितः ॥ -भरत०, का० सं०, पृ० ३२४ २२-अशात्तारगति विद्यादाचतुर्थस्वरादिह। आ पञ्चमात्सप्तमाद् वा नात. परमिहेप्यते। -भरत०, रत्नाकर की कल्लिनाथ टीका मे उद्धृत (अडयार-संस्करण) अशाक्षरैर्गति विद्यादाचतुर्थस्वरादिह। मा पञ्चमात्सप्तमाद् वा नात. परमिहेष्यते। -भरत०, रत्नाकर की कल्लिनाथ टीका (आनन्दाश्रम संस्क०) २३-त्रिविधा मन्द्रगति .- अशपरा, न्यासपरा, अपन्यासपरा च। -भरत०, व० सं०, पृ० ४४३ ६

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८२ भरत का संगीत-सिद्धान्त

स्वर भी, विहित है। हाँ, गान्धार के न्यास स्वर होने पर अवरोहात्मक गति में उसके पश्चाद्वर्ती ऋपभ का प्रयोग भी देखा जाता है। उदाहरणतया 'नन्दयन्ती' जाति में गान्वार न्यास स्वर है, परन्तु उसमे मन्द्रगान्वार से, अवरोहात्मक रूप मे पश्चाद्वर्ती ऋपभ का प्रयोग भी देखा जाता है।१४

(५) न्यास-स्वर जिस स्वर पर 'अङ्ग' (गीत या वाद्य-प्रवन्ध) की समाप्ति होती हो, वह 'न्यास' कहलाता है। 'न्यास' स्वर इक्कीस है।२१ एक स्वर कई जातियो मे न्यासस्वर हो सकता है और अवस्था-भेद से एक जाति मे कई 'न्यास' स्वर भी हो सकते है। फलतः न्यासस्वरों की संख्या इक्कीस हो जाती है। निम्नस्थ सारणी मे यह स्थिति स्पष्ट है- न्यासस्वर जाति संख्या षड्ज षाड्जी, पड्जमघ्यमा २ ऋपभ आर्षभी १ गान्धार गान्वारी, रक्तगान्वारी, षड्जकैशिकी, आन्ध्री, कैशिकी, नन्दयन्ती ६ मव्यम मव्यमा, पड्जमध्यमा, षड्जोदीच्यवा, गान्धारोदीच्यवा, मध्यमोदीच्यवा ५ पञ्चम पञ्चमी, गान्वारपञ्चमी, कैशिकी, कार्मारवी ४

धवत धैवती १ निषाद कैशिकी, नैषादी २

योग २१

२४-मन्द्रस्त्वशपरो नास्ति न्यासे तु द्वी व्यवस्थितौ। दृष्टमृषभसेवनम् ॥ -भरत०, रत्नाकर टीका मे कल्लिनाथ द्वारा उद्धृत २५-'एकविगतिविधो न्यासो ह्यङ्गसमाप्तौ ...... न्यासो ह्यज्गसमाप्ती स चैकविशतिविधो विधातव्यः। -- भरत०, व० सं०, पृ० ४४३

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जाति-लक्षण

(६) अपन्यास स्वर जिस स्वर पर 'अङ्ग' (गीत या वाद्य-प्रबन्ध) के मध्य की समाप्ति होती हो, वह 'अपन्यास' कहलाता है। २ एक जाति के अपन्यास स्वर कई हो सकते है तथा एक स्वर कई जातियो मे अपन्यास स्वर हो सकता है। फलतः अपन्यास स्वर के छप्पन प्रकार हो जाते है।29 कभी-कभी ऋपभ को भी 'कैशिकी' जाति का अपन्यास स्वर माना जाता है, उस दशा मे अपन्यास स्वरों की संख्या सत्तावन हो जायगी।२६ निम्नलिखित सारणी मे अपन्यास स्वर के समस्त प्रकार स्पष्ट है- अपन्यास स्वर जातियाँ संख्या

पडज षड्जकैशिकी, पड्जोदीच्यवा, पड्जमध्यमा, गान्धारी, गान्धारोदीच्यवा, मध्यमा, मध्यमोदीच्यवा, कैशिकी ८

ऋृ पभ षड्जमध्यमा, आर्षभी, गान्धारपञ्चमी, पञ्चमी, धैवती, नैपादी, कार्मारवी, मध्यमा, आन्ध्री ९ गान्वार पाड्जी, पड्जमध्यमा, कैशिकी, आन्ध्री, नैषादी ५

मध्यम गान्धारी, मध्यमा, षड्जमध्यमा, धँवती, नैपादी, कैशिकी ६

पञ्चम पाड्जी, गान्धारी, मध्यमा, पड्जमध्यमा, गान्वारपञ्चमी, पञ्चमी, कैशिकी, आन्ध्री, नन्दयन्ती, कार्मारवी, पड्ज- कैशिकी ११ धैवत पड्जोदीच्यवा, आर्पभी, गान्धारोदीच्यवा, मध्यमोदी- च्यवा, षड्जमध्यमा, मध्यमा, धैवती, कैशिकी, कार्मारवी निषाद पड्जकैशिकी, आर्पभी, पड्जमध्यमा, पञ्चमी, नैषादी, कैशिकी, आन्ध्री, कार्मारवी ८

योग ५६

-- भरत०, व० सं०, पृ० ४४३ २७-'पट्पचाशत्संस्योऽङ्गमध्येऽपन्यास एव स्यात्। -- भरत०, व० सं०, पृ० ४४३ २८-अपन्यासः कदाचिच्च ऋपभोऽपि भवेदिह। -भरत०, व० सं०, पृ० ४५२

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८४ भरत का संगीत-सिद्धान्त

(७) अत्पत्व स्वरो का अल्पत्व दो प्रकार से होता है, 'लड्डन' से या 'अनभ्यास' से।२१ स्वर का ईषत् स्पर्श भी 'लड्टन' है और उसका परित्याग भी। स्वर-विशेप की अनावृत्ति (एक से अधिक वार न लगाना) 'अनभ्यास' कहलाती है। जिन स्वरो के लोप से जाति- विशेय के पाडव वा औडव प्रकार बनते हों, वे उस जाति मे 'लोप्य' स्वर कहलाते है। उस जाति की सम्पूर्णावस्था में भी लोप्य स्वरो का प्रयोग अल्प होता है। जिस जाति मे जो स्वर 'अंश' नही होते, वे उस जाति के 'अनंश' स्वर कहलाते है। लोप्य स्वरों का ईषत्स्पर्श भी होता है और अनभ्यास, अनंश या लोप्य स्वरो का।११ (८) बहुत्व स्वर-विशेष का पूर्ण रूप से स्पर्श करते हुए उसकी पुनः पुन. आवृत्ति बहुत्व का एक प्रकार है और स्वर-विशेष का अपरित्याग बहुत्व का दूसरा प्रकार है। अल्पत्व का उलटा होने के कारण ही बहुत्व भी दो प्रकार का है। बहुत्व मे जातिविशेष के अन्य बली (अंशो तथा उनके सवादी एवं अनुवादी) स्वरों का भी सञ्वार (आरोहावरोह मे पुन. पुनः प्रयोग) होता है।११ (१) षाडवित 'अन्तरमार्ग' को प्राप्त, गाये हुए अनश स्वरो में लंघन एवं अनभ्यास से एक बार थथा-जाति उच्चारण षाडवित (और औडुवित) है।२२ 'षट्' का अर्थ छ और 'अव्' का अर्थ रक्षण है। जाति, राग इत्यादि के 'अव'

-भरत०, व० सं०, पृ० ४४३ ३०-ईषत्स्पर्शो लड्डन स्यात्। -सं० रत्ना०, अ० सं०, स्वरा०, पृ० १९० ३१-ईपत्स्पर्शो लङ्डनं स्यात्प्रायस्तल्लोप्यगोचरम्। अनभ्यासस्त्वनशेषु प्रायो लोप्येष्वपीष्यते॥ * ३२-तद्वद् बहुत्वमल्पत्वविपर्ययाद् द्विविधमेवान्येषां बलिनां सञ्वारः। -भरत०, व० सं०, पृ० ४४३ ३३-तत्र पाडवौडुवितत्वकरणमं (मनं?) शानां गीतानामन्तरमार्गमुपगताना स्वराणा लड्डनादन भ्यासाच्च सकृदुच्चारणं यथाजाति। -भरत०, व० सं०, पृ० ४४३

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जाति-लक्षण ८५

'रक्षक' 'पट्' स्वर 'पडव' (पट्+अव) कहलाते है। पडव स्वरो मे व्यक्त होने के कारण ही पट्स्वर गीत पाडव कहलाते है।१ चार नित्य सम्पूर्ण जातियो के अतिरिक्त चौदह जातियो का पाडवीकरण होता है। इन चौदह जातियो के समस्त अशस्वरो का योग चौवन है। सात पाडवद्वेपी स्वरों को इस सख्या मे से घटा देने पर षाडवित प्रकार सैतालीस रह जाते है। इसी लिए कहा गया है, पट्स्वर षाडवित चतुर्दशविध है, जिनके (उप) प्रकार सैतालीस होते है।१4

(१०) औडुवित उडु का अर्थ (नक्षत्र) और 'वा' का अर्थ 'गमन करना' है। 'उडु' जिसमे 'वान' करे, वह 'उड्व' कहलाता है। पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश मे आकाश (उड्ब) का स्थान पॉचवॉ है, अत पॉचवी सख्या 'औड्वी' कहलाती है। सात स्वरो मे नियमा- नुसार दो स्वरो का लोप होने पर अवशिष्ट पॉच स्वर 'औडुव' कहलाते है। सम्पूर्ण अवस्था को औडुव अवस्था मे परिणत करना ही औडुवित या औड्वीकरण है।१६ आर्षभी, गान्वारी, मव्यमा, पञ्चमी, धैवती, नैपादी, पड्जोदीच्यवा, षड्ज- मध्यमा, रक्तगान्धारी और कैशिकी, इन दस जातियो मे औडुवित प्रयोग होता है। दस औडुवित जातियो के अशस्वरो का योग बयालीस है, इनमे से वारह औडुव- द्वेपी स्वरों की सख्या घटा देने पर वे अशस्वर तीस बचते है, जो औडुवित प्रकारो की सख्या

३४-पडवन्ति प्रयोग ये स्वरास्ते पाडवा मता'। पट्स्वर तेपु जातत्वाद् गीतं पाडवमुच्यते॥ -- रत्नाकर, स्वरा०, अ० सं०, पृ० १९१ ३५-पट्स्वरं षाडवितं चतुर्दशविघं सप्तचत्वारिगत्प्रकारम्। पूर्वोक्तविधान यथाजात्यंशप्रकारैरिति ॥ -भरत०, ब० सं०, पृ० ४४४ ३६-वान्ति यान्त्युडवोऽत्रेति व्योमोक्तमुडुवं दुधः। पञ्चमं तच्च भूतेपु पञ्चसंख्या तदुद्भवा।। डवी सास्ति येपा च स्वरास्ते त्वौडवा मता.। ते सञ्जाता यत्र गीते तदौडुवितमुच्यते। तत्सम्वन्वादौडवं च पञ्चस्वरमिदं विदुः॥ -रत्नाकर, स्वरा०, पृ० १९२

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८६ भरत का संगीत-सिद्धान्त

भी 'तीस' कर देते है। इसी लिए कहा गया है कि प्रयोगज्ञो को औडुवित दशविध समझना चाहिए, जिसके प्रकार तीस है।१७ महर्पि भरत के दस जातिलक्षणो की व्याख्या उपर्युक्त है। अन्तरमार्ग, सन्यास और विन्यास को महर्षि ने पृथक् लक्षण न मानकर इनका अन्तर्भाव दस लक्षणो मे किया है। शा्ङ्गदेव ने इन तीनो को पृथक् गिनकर 'जाति-लक्षण' तेरह बताये है।१८ (१) अन्तरमार्ग न्यास, अपन्यास, विन्यास, ग्रह और अंश के स्थान के अतिरिक्त, वीच-बीच मे अश, ग्रह, अपन्यास, विन्यास एवं सन्यास स्वरों के साथ अल्प स्वरो की विचित्रता उत्पन्न करनेवाली सङ्गति, जो कही अनभ्यास और कही लंघन द्वारा हो, 'अन्तरमार्ग' कहलाती है, जो प्रायः विकृत जातियों में होती है।१

(२) संन्यास गीत की प्रथम 'विदारी' को समाप्त करनेवाला अंश का संवादी या अनुवादी स्वर सन्यास कहलाता है। 'विदारी' का अर्थ 'गीतखण्ड' है।४0

३७-पञ्चस्वरमौडुवितं विज्ञेय दशविधं प्रयोगज्ञै.। त्रिशत्प्रकारविहितं पूर्वोक्तं लक्षणं त्वस्य।। -- भरत०, व० सं०, पृ० ४४४ ३८-यद्यपि भरतमतङ्गादिभिः संन्यासविन्यासयोविदार्याश्रितत्वादपन्यासेऽन्तर्भा-

पृथगुद्देशो नापेक्षित इति दशकं जातिलक्षणमित्युक्तम्, तथापि संन्यासविन्यासयो. पृथगवयवत्वेनान्तरमार्गस्य तु सत्स्वशादिष्ववयवेषु तेन विना प्रयोगासिद्धेस्तस्या- वश्यकत्वाल् लक्षणेषु पृथगुद्दिश्य त्रयोदशेत्युक्तं ग्रन्थकारेण। -आचार्य कल्लिनाथ, सं० र०, अ० स०, स्वरा०, पृ० १८१ ३९-न्यासादिस्थानमुज्झित्वा मध्ये मध्येऽल्पतायुजाम्। स्वराणां या विचित्रत्वकारिण्यंशादिस्भतिः । अनभ्यासै. क्वचित् क्वापि लडघनैरेव केवलै.। कृता सान्तरमार्ग: स्यात् प्रायो विकृतजातिपु॥ -- आचार्य शार्ङ्गदेव, सं० र०, अ० सं०, स्वरा०, पृ० १९१ ४०~ अंशाविवादी गीतस्याद्यविदारीसमाप्तिकृत्। -आचार्य शार्ङ्गदेव, सं० र०, अ० सं०, स्वरा०, पृ० १८९

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जाति-लक्षण ८७

(३) विन्यास जो स्वर विदारी के खण्डरूप पदों अर्थात् श्दो के अन्त में रहता है, वह 'विन्यास' कहलाता है।"

स्थायी स्वर।

महर्षि भरत ने इस परिभापा की चर्चा की है, परन्तु नाट्यशास्त्र के अट्ठाईसवे अध्याय मे यह शब्द नही आया है। गान-क्रिया मे 'इकतारे' या तानपूरे पर 'अश' स्वर निरन्तर गूंजता रहता था। तन्त्रीवाद्यो मे चिकारियॉ 'अंश' स्वर मे मिलायी जाती थी।४२ निरन्तर गूंजते रहने के कारण ही 'अश' स्वर 'स्थायी स्वर' कहलाता था। प्राचीन सम्प्रदाय का लोप हो जाने के कारण हम आज प्रत्येक 'स्थायी स्वर' को पड्ज कहने लगे है, फलत. स्थायी स्वर से अगले स्वरों को हम आज 'ऋषभ' इत्यादि की सज्ञा दे डालते है।

'उपोहन' क्रिया मे 'स्थायी' स्वर को ही आधार स्वर मानकर अग्रिम स्वरों की यथास्थान स्थापना की जाती थी। " 'ध्रुवा" इत्यादि के गान मे राग के प्रकाशन के लिए 'झण्टुम्'५ इत्यादि वर्णो (अक्षरो) का स्थायिस्वराश्रित परिग्रह तथा 'लघु'

४१ -. अशाविवाद्येव विन्यास. स तु कथ्यते। यो विदारीभागरूपपदप्रान्तेऽ्वतिप्ठते ।। -आचार्य शार्ङ्गदेव, सं० र०, अ० सं०, स्वरा०, पृ० १८९ ४२-गान्धाराद्यंशत्वमपि स्वस्थानस्थितानामेव। तेपां स्थायित्वकरणमपि वीणाया- मुपतन्त्रीणां स्वनादसाम्यापादनमिति रहस्यम् । -आचार्य कल्लिनाथ, स० र०, स्वरा०, अ० सं०, पृ०२०३ ४३-उपोह्यन्ते समासव्यासतः पदकालतालमभिहिता. स्वरा यस्मिन् अङ्गे तत् तथो- क्तम्। -- आचार्य अभिनवगुप्त, ना० शा०, वडोदा, द्वि० संस्क०, चतुर्थ अ०, पृ० १८५ ४४-गेय पदविशेष 'ध्रुवा' कहलाते है, जिनका विस्तृत परिचय यथास्थान दिया जायेगा। ४५-कुछ निरर्थक अक्षर या अक्षरसमूह ब्रह्मप्रोक्त शुष्काक्षर कहलाते है, वहिर्गीत या निर्गीत प्रयोग मे इनका प्रयोग सार्थक शब्दो के स्थान पर होता है। उपोहन क्रिया मे गेय छन्द की गति, यति, लघु आदि अक्षरो का अनुकरण करनेवाला निर- र्थंक छन्द भी इनसे वन जाता है।

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भरत का संगीत-सिद्धान्त

इत्यादि काल के परिज्ञान के लिए ताल का परिग्रह 'उपोहन' कहलाता है। 'उपो- हन' से गीत की प्रवृत्ति (आरम्भ) होती है और वह स्थायिस्वराश्रित होता है।" फलतः महर्षि भरत के अनुसार भी गीत का प्रवर्तक स्थायी स्वर 'अंश स्वर' ही है। आचार्य शाङ्गंदेव ने स्थायी स्वर की परिभाषा करते हुए कहा है कि जिस पर राग का उपवेशन (अधिष्ठान) किया जाय, वह स्थायी स्वर कहलाता है।"फलतः स्थायी स्वर राग का 'स्थान' है,"वही राग में प्रयोज्य सप्तक का आरम्भक स्वर होता है।4

जातियों के लक्षण

जातियाँ व्रह्महत्या के पातक से भी मुक्ति दिलानेवाली मानी गयी है, इसी लिए उनमे मनमाना परिवर्तन नही किया जा सकता। जिस प्रकार ऋक्, यजु और साम मे परिवर्तन नही किया जा सकता, उसी प्रकार वेदसम्मित जातियों मे परिवर्तन असम्भव

४६-उपोहन नाम-ध्रुवादिगानेषु रागप्रकाशनार्थ स्थायिस्वराश्रयणेन झण्टुमादिवर्ण- परिग्रहो लघ्वादिकालपरिज्ञानाय तालपरिग्रहश्च। -आचार्य कल्लिनाथ, स० र०, अ० सं०, ताला०, पृ० ३१ ४७-उपोह्यन्ते स्वरा यस्मात् तस्माद् गीतं प्रवर्तते । तस्मादुपोहनं ज्ञेयं स्थायिस्वरसमाश्रयम् ॥ -नाट्यशास्त्र, का० सं०, ३१ अ०, पृ० ३६० ४८-(अ) यत्रोपवेश्यते रागः स्थायी स्वर स कथ्यते। -आचार्य शार्ङ्ग०, सं० र०, अ० सं०, प्रकीर्णका०, पृ० १७६ (आ) यत्र यस्मिस्तत्तद्रागांशभूते षड्जादिष्वन्यतमे स्वरे राग उपवेश्यते स्थाप्यते स स्वरो रागस्थितिहेतुत्वात् स्थायीति कथ्यते। -आचार्य कल्लिनाथ, स० र०, अ० सं०, प्रकी०, पृ० १७६ ४९-स्थायिन रागस्थितं स्थानमित्यर्थः । -- आचार्य कल्लिनाथ, सं० र०, अ० स०, वाद्या०, पृ० २९६ ५०-अस्यां स्थायिनमारभ्य गणयेत् सप्तकद्वयम् । -आचार्य शार्ङ्गदेव, सं० र०, अ० सं०, वाद्या०, पृ० २८३ अस्यां किन्न्य्यां स्थायिनमशस्वरमारभ्य सप्तकद्वय गणयेत्। -- आचार्य कल्लिनाथ, सं० र०, अ० सं०, वाद्या०, पृ० २८३

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जाति-लक्षण ८९

एवं अवाञ्छनीय है।५ पवित्रता-प्रिय हिन्दू जाति ने इसी लिए जातियों के रूप को अक्षुण्ण रखा है। पहले कहा जा चुका है कि मतङ्ग ने जातियो की सीमा में सकोच करके बारह स्वरों को जातिरूप की अभिव्यक्ति के लिए पर्याप्त मान लिया था, पर जातियो के अन्य लक्षणो मे कोई परिवर्तन न तो उनके काल में हुआ था न शार्गदेव के काल मे। भरत की जाति-परम्परा अक्षुण्ण रही, केवल मन्द्रसीमा और तारसीमा मे सकोच हुआ। उसका कारण ऐसे वाद्यो का निर्माण था, जिनमे चौदह सारे होने के कारण एक तार पर तीन सप्तको का वजना सम्भव नही था। कुछ लोगो का विचार है कि मतङ्ग किन्नरी वीणा के आविष्कारक है,५२ यदि यह सत्य है, तो उन्हे बार-बार तारों को सरकाने के झंझट से वचने के लिए जातियो की मन्द्रावधि एवं तारावधि मे संकोच करना पडा होगा। कहा जाता है कि तन्त्रीवाद्यो पर 'सारे' भी पहले पहल मतङ्ग ने ही रखी। अस्तु, हम विभिन्न आचार्यो के द्वारा किये हुए जातिलक्षण देगे, जिनसे यह सिद्ध हो जायगा कि उनमे भरत-परम्परा अक्षुण्ण है। (१) षाड्जी महर्पि भरत का कथन है- "पाड्जी' के अंशस्वर निपाद और ऋषभ के अतिरिक्त पॉच स्वर (स,ग, म, प, ध) होते है। वहाँ गान्धार और पञ्चम अपन्यास होते है। इसमे न्यासस्वर षड्ज होता

५१-अपि व्रह्महण पापाज्जातयः प्रपुनन्त्यमू । ऋचो यजूपि सामानि क्रियन्ते नान्यथा यथा। तथा सामसमुद्भूता जातयो वेदसमिता.।। -आचार्य शार्ङ्ग०, स० र०, अ० स०, स्वरा०, पृ० २७३ ५२-मतङ्गप्रभृतिभि किन्नरीनामवीणावादनमेव सम्प्रदाये प्रावर्तत (वर्त्यत ?) । -प्रो० रामकृष्ण कवि, भ० को०, पृ० ५१९ आचार्य शार्ङ्गदेव ने देशी किन्नरी को प्राचीन किन्नरी से भिन्न बताकर दोनों के तीन-तीन पृथक भेद किये है। महाराणा कुम्भ ने 'मतङ्गकिन्नरी' के नाम से एक किन्नरी विशेष का लक्षण दिया है, जिसमे चौदह या अठारह सारे वतायी है। संभवतः मतङ्ग ने किन्नरी में कोई सशोधन किया, 'मतङ्गकिन्नरी' शन्द इसी का द्योतक है। वाद्य पर मतङ्ज का कोई स्वतत्र ग्रन्थ प्राप्त नही।

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९० भरत का संगीत-सिद्धान्त

है औौर सप्तम अर्थात् निषाद लोप्य होता है। निषाद के लोप से षाड्जी का पाडव 'रूप वनता है एवं ऋपभ तथा निषाद का प्रयोग अल्प होता है (क्योकि ये दोनो स्वर इस जाति में अनंश हैं)। पड्ज-गान्धार तथा धैवत-पड्ज की सङ्गति होती है। प्रयो- कताओं को इस जाति में गान्धार का वाहुल्य करना चाहिए।"३ मतङ्ग का कथन है- "षड्ज ग्राम से सम्वद्ध षाड्जी जाति के पाँच अश और ग्रह होते है। तो जैसे- षड्ज, गान्धार, मध्यम, पञ्चम, धवत ग्रह और अश है। गान्वार और पञ्चम अप- न्यास है। निषादहीन होने पर यह षाडव होती है। न्यास स्वर षड्ज है। पड्ज- गान्वार और षड्ज-धवत की सङ्गति है। तारगति पञ्चस्वरपर है, मन्द्रगति षड्ज तक है। पड्ज और धैवत के लोप से डुवित कभी नही बनता। जव सम्पूर्ण गायी जाती है तब ऋषभ-पञ्वम और निषाद-पञ्चम का अल्पत्व करना चाहिए। अन्य स्वरो का वाहुल्य है। इसकी मूर्च्छना धैवतादि है, ताल 'पञ्चपाणि' है। चित्र मार्ग मे मागधी गीति और द्विकल '(एककल?) पञ्चपाणि ताल, वार्तिक मार्ग मे (द्विकल पञ्चपाणि ताल) सम्भाविता गीति, दक्षिण मार्ग में चतुष्कल पञ्चपाणि ताल और पृथुला गीति है। वीर, रौद्र एवं अद्भुत रस है, (नाटक के) प्रथम प्रेक्षण के ध्रुवागान में इस जाति का विनियोग है।"५

५३-अंशा. स्यु. पञ्च षाड्जाया निषादर्षभवजिता.। अपन्यासो भवत्यत् गान्वार: पञ्चमस्तथा॥ न्यासरचात्र भवेत् षड्जो लोप्य: सप्तम एव तु। पाडव सप्तमोपेतमल्पौ वै धैवतर्षभौ।। धैवतषड्जयोः। गान्वारस्य च वाहुल्यं त्वत्र कार्य प्रयोक्तृभि ।। -भरत०, व० सं०, पृ० ४४७ ५४-षड्जग्रामसंवद्धाया अंशा ग्रहाः पञन्च भवन्ति। तद्यथा-षड्जगान्धारमध्यम- पञ्चमघवता ग्रहा अशाश्च। गान्धारपञ्चमावपन्यासौ। निषादहीना पाडवी। षड्जो न्यासः। पड्जगान्धारयो: षड्जधैवतयोश्च सङ्गतिः। पञ्चस्वरपरा तारगतिः। पड्जस्वरपरा मन्द्रगतिः। पड्जधैवतयोश्चौडुवितत्व सर्वथैव नास्ति। सम्पूर्णा पाडवा। यदा सम्पूर्णा गीयते तदा ऋपभपञ्चमयो निषाद- पञ्चमयोश्चात्पत्वं कार्यम्। यदा षाडवा गीयते तदा ऋषभस्याल्पत्वं कार्यम्। शेपाणा स्वराणां बहुत्वम्। अस्य धैवतादिम ्च्छना। (ताल.)पञ्चपाणि.। चित्रे

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जाति-लक्षण ९१

जाति के रूप के सम्बन्ध में मतङ्ग ने जो कुछ कहा है, वह महर्षि के अनुसार अथवा उनके वचनों का पूरक मात्र है। गीति, मार्ग और ताल इत्यादि का विनियोग भी महर्षि के अनुसार है, इन विषयों पर हम यथास्थान विचार करेंगे।

वीर, रौद्र एवं अद्भुत रसो मे इसका विनियोग बतलाता है कि मतङ्ग पाड्जी की पड्जांश अवस्था का लक्षण प्रधानतया कर रहे है। महर्षि भरत के अनुसार यदि मन्द्र और तारावधि की पराकाष्ठाओं का प्रयोग करना हो, तो मतङ्ग की अठारह सारोवाली किन्नरी में मूर्च्छना का आरम्भ अभीष्ट अशस्वर से करना होगा और इस प्रकार अशस्वर के परिवर्तन के परिणामस्वरूप मूच्छना मे परिवर्तन करना होगा। अठारह सारोवाली किन्नरी में सातवॉ पर्दा मध्य स्थान का आरम्भक और चौदहवाँ पर्दा तार स्थान का आरम्भक है। अठारहवे पर्दे पर तारसप्तक पाँचवॉ स्वर प्राप्त होता है, तथा इसी पर्दे पर तार को मीडकर छठा एव सातवॉ स्वर भी प्राप्त किया जा सकता है। इसी लिए मतङ्ग ने मध्यसप्तक (सातवे पर्दे) से मूर्च्छनाओ के निर्देश की बात कही है, जिसके परिणामस्वरूप किन्नरी पर तीनों सम्पूर्ण स्थान प्राप्त हो जाते है, क्योकि मुक्त तार से छठे पदे तक मन्द्रस्थान की प्राप्ति हो जाती है। मतङ्ग ने 'पाड्जी' मे 'धैवतादि' मूर्च्छना का निर्देश किया है, फलत. इसी एक मूर्च्छना के स्थापित करने से पाड्जी के पड्जाश, गान्वाराश, मध्यमाश और पञ्चमाश रूप की प्राप्ति हो जायगी, क्योकि वे वारह स्वरो के अन्दर जाति के रूप की अभिव्यक्ति मान लेते हैँ एव मन्द्र तथा तार अवधियो के नियमो का कठोर रूप से पालन आवश्यक नही समझते। यहॉ यह नही भूलना चाहिए कि मतङ्ग की 'वैवतादि' मूर्च्छना 'ध नि स रेग म प ध नि स रेग' है, क्योकि उनकी मूर्च्छनाएँ बारह स्वरों की है। यह भी ध्यान देने योग्य बात है कि उनकी किन्नरी पर सातवे से अठारहवे तक पर्दो की सख्या 'वारह' ही होती है।

मार्गे मागधी गीति. पञ्चपाणिद्विकल. (एककल: ?)। वार्तिकमार्गे सम्भा- विता गीतिः (द्विकल: पञ्चपाणिः ताल), चतुष्कल. पञ्चपाणिः दक्षिणे मार्गे पृथुला गीति. । बीररौद्राद्भुता रसा.। प्रथमप्रेक्षणिके ध्रुवागाने विनियोगः । -मतङ्ग, भ० को०, पृ० ६९०

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९२ भरत का संगीत-सिद्धान्त

मतङ्ग-किन्नरी पर वैवतादि मूर्च्छना स्थापित करके उनकी मान्यताओ की परीक्षा की जा सकती है। मतङ्ग-किन्नरी, धैवतादि सूरच्छना पर्द स्वर जिस स्वर को 'अंश' मानकर वादन करना मेरु o-घ हो, वही स्थायी स्वर होगा, फलत. 'चिकारी' १-नि अभीष्ट अंश मे मिलाकर वादन करना चाहिए। २-स अंग-स्वर से ही सप्तक का आरम्भ मानना होगा, ३-रे भले ही वह अश-स्वर किसी पर्दे पर हो। ४-ग षड्जांश पाड्जी ५-म पड्ज अंश मानकर वादन करने पर नवे पर्दे ६-प पर स्थित 'स' मध्यसप्तक का आरम्भक स्वर ७-घ होगा। दूसरे पर्दे पर स्थित मन्द्रषड्ज तक मतङ्ग- ८-नि निर्दिष्ट मन्द्रावधि मिल जायगी। सोलहवाँ पर्दा ९-स तारसप्तक का आरम्भक होगा, तारसप्तक के १०-रे पाँच स्वर मिल जायेगे, जिनमें मध्यम और पञ्चम ११-ग की प्राप्ति अठारहवे पर्दे पर मीड द्वारा होगी। १२-म गान्धारांश षाड्जी १३-प यह षाड्जी की अशविकृत अवस्था है, फलतः १४-ध इसमे मन्द्र अंग तक जाना अनिवार्य नही। १५-नि चौथे पर्दे पर स्थित गान्धार से पन्द्रहवे पर्दे १६-स पर स्थित निषाद तक वारह पर्दे होते है। चिकारी १७-रे को गान्वार मे मिला लेने पर गान्वारांश पाड्जी १८-ग (मीड से म, प) का रूप व्यक्त करने के लिए मतङ्ग के मत में ये बारह स्वर पर्याप्त है। जो मन्द्रावधि से तारावधि में यथेच्छ सीमा तक भ्रमण मानते है, वे मन्द्र और तार स्थान में और भी स्वर प्राप्त कर सकते है। मध्यमांश पाड्जी चिकारियाँ मध्यम मे मिलायी जानी चाहिए। पाँचवे से सोलहवे पर्दे तक बारह स्वरो में जाति का स्वरूप व्यक्त होगा। अन्य मन्द्र एवं तार स्वरो का प्रयोग भी काम- चारवादी कर सकते है।

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जाति-लक्षण १३

पञ्चमांश षाड्जी चिकारियाँ पञ्चम मे मिलाने पर छठे पर्दे से सत्रहवें पर्दें तक बारह स्वर मिलेगे। कामचारवादियो को अन्य मन्द्र-तार स्वर मिल जायँगे। जाति का रूप मतग के अनुसार पूर्वोक्त बारह पर्दो पर अभिव्यक्त हो जायगा।

धैचतांश पाड्जी

धैवत मे चिकारियाँ मिलाने पर मेरु से छठे पर्दे तक मन्द्र स्थान, सातवें से तेरहवें तक मध्य स्थान और चौदहवे से अठारहवे तक (मीड द्वारा प्राप्त मध्यम, पञ्चम को मिलाकर) सम्पूर्ण तारसप्तक की प्राप्ति हो जायगी। सितारवादक भी सितार पर अभीप्ट स्वरो मे चिकारियॉ मिलाकर जातिवादन कर सकते है, मूर्च्छनाओ की स्थापना भी की जा सकती है। तरबहीन सितार मे यह प्रक्रिया सुविधाजनक रहेगी। एक जाति के लिए तन्त्रीवाद्यो पर ऐसी मूर्च्छना की स्थापना करने की पद्धति मतङ्ग से पूर्वकालीन है, जिसकी स्थापना के परिणामस्वरूप उस जाति के अंश-विकृत रूपो के वादन के लिए मूर्च्छना न बदलनी पड़े। कश्यप का कथन है कि जाति मे अशों की बहुलता को देख कर बुध व्यक्तियो को मूर्च्छना का निर्देश करना चाहिए।" मतङ्ग

दिया है। ने प्रत्येक जाति की मूर्च्छना निर्दिप्ट करके काश्यप के विधान को स्पष्ट कर

आचार्य शार्ङ्गदेव का कथन है- "पाड्जी मे निषाद और ऋपभ के अतिरिक्त पाँच स्वर अश होते है, निषाद के लोप से पाडव रूप बनता है। पूर्णावस्था मे कही-कही काकली का प्रयोग होता है। इस जाति मे पड्जगात्धार एव पड्ज-धैवत की सङ्गति है और गान्धार स्वर बहुल है। गान्धार के अश स्वर होने पर निषाद का लोप नही होता। इसकी मूर्च्छना 'धैवतादि' है। इस जाति मे तीन प्रकार का एककल, द्विकल और चतुष्कल ताल (पञ्चपाणि) हैँ, कमश. चित्र, वृत्ति (वार्तिक) एवं दक्षिण मार्ग हैं, क्रमशः मागधी, सम्भाविता

५५-जात्वा जात्यंशवाहुल्यं निर्देत्या मूर्च्छना वुधैः। -कल्लिनाथ द्वारा उद्धृत-सं० र०, रागा०, अ० सं०, पृ० ३२

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९४ भरत का संगीत-सिद्धान्त

और पृथुला गीतियाँ है। प्रथम अंक की नैष्कामिकी ध्रुवा में इसका विनियोग है।५६ इस पाड्जी मे पड्ज न्यास है, गान्धार और पञ्चम अपन्यास है।" ५७ नाटक के अतिरिक्त शंकरस्तुति मे भी इसका विनियोग है। ५ षड्ज के अंश होने पर इसमे कभी-कभी काकली का प्रयोग भरत के प्रतिकूल नहीं, आरोह में अन्तर स्वरो के प्रयोग की ओर नाटयशास्त्र में स्पष्ट संकेत है।५१

५६-पाड्ज्यामशस्वरा. पञ्च निपादर्पभवजिता.। निलोपात् पाडव सोऽत्र पूर्णत्वे काकली क्वचित ॥ सगयोः सवयोश्चात्र सङ्गतिर्वहुलस्तु ग। गान्धारेऽशे न नेर्लोपो मूर्च्छना धैवतादिका ।। त्रिधा ताल. पञ्चपाणिरत्र चैककलादिकः । कमान्मार्गाश्चित्रवृत्तिदक्षिणा गीतयः पुनः ॥ मागधी सम्भाविता च पृथुलेति क्रमादिमाः । नैष्कामिकध्रुवायां च प्रथमे प्रेक्षणे स्मृत. ॥। विनियोगो ... .. -सं० र०, स्वरा०, अ० सं०, पृ० १९६-१९७ ५७-अस्यां पाड्ज्यां पड्जो न्यासः। गान्धारपञ्चमावपन्यासौ। -स० र०, स्वरा०, अ० स०, पृ० १९७ ५८-चकारात्स्वातन्त्र्येणापि ब्रह्मप्रोक्तपदैरन्यैर्वा शकरस्तुतावेव विनियोग. समुच्चीयते। -आचार्य कल्लिनाथ, स० र०, अं०सं०, स्वरा०, पृ०१९८ ५९-अन्तरस्वरसयोगो नित्यमारोहिसंश्रय.। -भरत०, ब०स०, पृ० ४३७ षाड्जी जाति का ध्यान जातियो या रागो के ध्यान का सम्बन्ध यथासम्भव सङ्गीत की आगम-पुराण- परम्परा से है। जगदेकमल्ल ने जातियों के ध्यान भी दिये है। षाड्जी का ध्यान निम्नलिखित है- वीणाक्वणश्रवणजातकुतूहलेन देवेन कामरिपुणा परिरभ्यमाणाम् । पाशांकुशाकितकरामरुणावभासां पाड्जी समस्तजननीमनिशं नमामि ।। -जगदेक, भ० को०, पृ० ६९० अर्थात्-'मै सबकी जननी पाड्जी को निरन्तर प्रणाम करता हूँ, वीणाध्वनि के श्रवण से सकुतूहल, कामरिपु (होने पर भी) भगवान् शकर के द्वारा जिनका आलिङ्गन किया जा रहा है, जिनका करतल पाश और अंकुश के चिह्नो से युक्त है और जिनकी कान्ति अरुण है।

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जाति-लक्षण ९५

(२) आर्षभी महर्षि भरत का कथन है- "आर्षभी में धैवत, ऋषभ और निषाद अश तथा अपन्यास स्वर है। न्यासस्वर ऋषभ है। षाडवकारी (पड्ज) का अल्पत्व है, आरोह में पञ्चम का लघन है। षड्ज के लोप से षाडव और पञ्चम के लोप से औडव प्रकार बनता है, (अन्य अवशिष्ट स्वरो के साथ) निषाद और गान्धार की सङ्गति होती है।"५ भतङ्ग का कथन है- "शुद्ध आर्षभी का गान होता है, (नियम इस प्रकार है-) पड्ज-पञ्चम का अल्पत्व है। ऋषभ, धैवत एवं निषाद ग्रह है, यही स्वर अंश है, यही अपन्यास है। तार निषाद (अंश स्वर से पाँच स्वर पश्चात् विद्यमान) प्रयुक्त होता है। ऋषभ न्यासस्वर है, मन्द्रावस्था न्यासस्वर पर्यन्त अथवा (अवरोहस्थिति मे) उससे पश्चाद्वर्ती स्वर तक मन्द्रावधि है। (ऋषभाश, निषादांश एव धैवतांश अवस्थाओं में क्रमश अशस्वरो से पूर्ववर्ती षड्ज, धँवत और पञ्चम तक मन्द्रावधि है।) निषाद-गान्धार की सङ्गति है। षड्जहीन रूप पाडव एव पड्ज-पञ्चमहीन रूप औड्व होता है। पूर्णावस्था में पड्ज, गान्वार, पञन्चम का अल्पत्व है और औडुवित अवस्था मे गान्धार और मध्यम का। अवशिष्ट स्वर बहुल है। तीन सम्पूर्ण, तीन षाडव और तीन औडव रूप होने के कारण इसके कुल अशस्वर नौ (तीन ऋपभ+तीन निपाद+तीन धैवत=नौ) शुद्ध एव अंश विकृत अवस्थाओ मे हो जाते है। मूर्च्छना पञ्चमादि है। ताल चञ्चत्पुट है।

६०-आर्षभ्या तु भवन्त्यशा धैवतर्षभसप्तमा. । एत एवं अपन्यासा न्यासश्च ऋषभ स्मृत. ॥ अल्पत्वञ्च विशेषेण भवेत्षाडवकारिण.। लंघन पञ्चमस्यैव स्यादारोहणसंश्रयात्।। पट्स्वर सप्तमहीन*(पड्जहीनत्वे) पञ्चस्वर्ये च पञ्चम । विवादिनां स्वराणां च सञ्वारोऽत्र विधीयते॥ -भरत, व० सं०, पृ० ४४८ *नाट्यशास्त्र के मुद्रित संस्करणों का यह पाठ लिपिको के प्रमाद का परिणाम है। परस्पर संवादी स्वर औडवावस्था के निर्माता होते है। इस पाठ में औडुव- कारी स्वर पञ्चम कहा गया है और आरोह में उसका लंघन बताया है, फलतः पाडवावस्था के जनक पड्ज का लोप ही सम्भव है। मतङ्ग एवं शार्ङ्गदेव ने भी पड्ज का लोप आर्पभी मे पाडवकारी माना है।

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९६. भरत का संगीत-सिद्धान्त

एककल ताल चित्रमार्ग से मागधी, द्विकलताल वार्तिक मार्ग से सभाविता और चतुष्कल ताल, दक्षिण मार्ग से पृथुला गीति होती है। वीर, रौद्र एवं अद्भुत रस हैं। प्रथम अङ्ग मे नैष्कामिकी ध्रुवा का गान इसमें होता है।"६ मतङ्ग-लक्षण मे गान्वार का अल्पत्व भरत-विधान के अनुकूल नही, इसी लिए सम्भवत. शार्ङ्गदेव को यह मान्य नही हुआ। मतङ्ग-किन्नरी पर पञ्चमादि मुर्च्छना मे आर्पभी की विभिन्न अवस्थाएँ देखें- पर्दे स्वर ऋषभांश शुद्ध आर्षभी-चिकारियाँ ऋपभ मे मिलाने के ०मर प पश्चात् चौथे पर्दे से मन्द्र, ग्यारहवे से मध्य एव अठारहवे से तार १-ध स्थान का आरम्भ मानिए। 2-नि मन्द्र न्यासस्वर ऋपभ की प्राप्ति मन्द्रावस्था में चौथे पर्दे. ३-स मे होगी, अवरोहगति मे इससे पर अर्थात् तीसरे पर्दे पर स्थित ४-रे पड्ज भी मिल जायगा। अठारहवें पर्दे पर तार को पाँच स्वर तक मींड़ द्वारा निषाद ६-म की प्राप्ति कुशल वैणिकों के लिए असम्भव नहीं। पर्दे में गुजाइश होने पर वैणिक सात-सात स्वर तक खीचते है। धवतांश विकृत आर्वभी-चिकारियॉ धैवत में मिलाने के ९-नि पश्चात् मन्द्रस्थान का आरम्भ पहले, मध्यस्थान का आठवे तथा १०-स तारस्थान का पन्द्रहवे से मानिए। ११-रे सम्पूर्ण मन्द्रस्थान, सम्पूर्ण मध्यस्थान और अठारहवें पर्दे पर १२-ग मीड द्वारा ग म, प की सिद्धि करने पर सम्पूर्ण तारस्थान भी प्राप्त १३-म हो जायगा। १४-प मतङ्ग के विधान के अनुसार पहले पर्दे से बारहवें तक भी १५-घ बारह स्वर मिलते है और आठवे पर्दे से, अठारहवे पर्दे पर मीड १६-नि द्वारा प्राप्त गान्धार तक भी, जो धैवतांश पाड्जी के रूप को १७-स अभिव्यक्त करने मे समर्थ है। धैवत अश से, (अवरोहगति में) १८-रे परवर्ती पञ्चम दोनों स्थितियों मे सुलभ है।

६१-आर्षभी शुद्धा गीयते। निषाद (पड्ज?) पञ्चमाल्पत्वम्। ऋषभधैवतनिषादा ग्रहा:। स्वयमेवांशाः । त एवापन्यासा.। पञ्चस्वरपरस्तारो निषाद। ऋषभो न्यास. । न्यासपरस्तत्परो वा मन्द्र । (मन्द्रा .? ) पड्जवैवतपञ्चमाः। ऋषभ-

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जाति-लक्षण ९७

निषादांश विकृत आर्षभी-चिकारियॉ ऋपभ मे मिलाने के पश्चात् दूसरे पर्दे से मन्द्र, नवे से मध्य और सोलहवे से तार-स्थान की प्राप्ति हो जायगी। अठारहवें पर्दे पर मीड द्वारा धैवत प्राप्त करने पर तीनो सम्पूर्ण स्थान प्राप्त होगे। बारह स्वरो मे जाति के रूप की अभिव्यवित माननेवालो को यथेच्छ वारह स्वर मिलेगे। आचार्य शार्ङ्गदेव का कथन है- "आर्पभी मे तीन स्वर अश होते है; निषाद, ऋषभ और धैवत। द्विश्रुति स्वरों की सङ्गति अन्य स्वरो के साथ होती है। पञ्चम का लघन है। पड्ज के लोप से पाडव और पड्ज-पञ्चम के लोप से इस जाति में औड्व रूप होता है। मूर्च्छना.पञ्चमादि है, और ताल चञ्चत्पुट। .. विनियोग पाड्जी जाति के समान है।'२ इस आर्पभी में ऋपभ न्यास है और अश स्वर ही अपन्यास स्वर है।"६

(निपाद? ) गान्धारयोस्तु सगति.। पड्जहीने (न ?) पाडव (म् ) पड्जपञ्चम- हीनमौडुवितम्। पूर्णावस्थायां पड्जगान्धारपञ्चमानामत्पत्वम्। औडुविते गान्धारमध्यमयोरल्पत्वम्। शेपाणा बहुत्वम्। दश (नव ?) विधत्व चास्या दशां (नवां) शा. शुद्धविकृता: पूर्णास्त्रयः । पञ्चम्या (मा ?) दि-मूर्च्छना। चञ्चत्पुटस्ताल। एककलेन चित्रेण मागधी। द्विकलेन वार्तिकेन सम्भाविता। चतुष्कलेन दक्षिणेन पृथुला। वीररौद्राद्भुता रसा.। प्रथमप्रेक्षणके नैष्क्रामिकी- ध्रुवागाने विनियोग.।

६२-आर्पभ्या तु त्रयोऽशा. स्युर्निपादर्पभधैवता.। -- मतङ्ग, भ० को०, पृ० ५७

द्रिश्रुत्यो सङ्गति शेपैर्लंडघन पञ्चमस्य च।। पाडव पड्जलोपेन सपलोपादिहौड्वम्। मूच्छना पञ्चमादिश्च तालश्चञ्चत्पुटो मतः। अष्टौ कला भवन्तीह विनियोगश्च पूर्ववत्॥। -- स० र०, स्वरा०, अ० सं०, पृ० २०३ ६३-अस्यामार्षभ्यामृपभो न्यास। अंशा एवापन्यासाः।

आर्षभी का ध्यान -सं० र०, स्वरा०, अ० सं०, पृ० २०४

निस्सीमवाङमनसयो (?) रतिदूरव्ति यस्या महत्त्वमवधीरयितुं प्रवृत्तः । पद्मासनो ऽपि परिहास्यदशां प्रयाति तामार्पभी शुकनिभामनिश नमामि ।। -जगदेक, भ० को०, पृ० ५७ ७

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१८ भरत का संगीत-सिद्धान्त

ध्यान देने की बात यह है कि जातियो की मूर्च्छनाएँ आचार्य शाङ्गंदेव ने मतङ्भोक्त ली है, परन्तु इस जाति में मतंगविहित गान्धार के अल्पत्व को भरतविरोधी होने के कारण अमान्य कर दिया है। (३) गान्धारी महर्पि भरत का कथन है- "गान्धारी मे धैवत और ऋपभ के अतिरिक्त पाँच स्वर अश होते है। षड्ज एवं पञ्चम अपन्यास होते है। गान्धार न्यासस्वर है। ऋपभ के लोप से षाडव और ऋपभ-ैवत के लोप से औडुवित रूप होता है। ऋषभ और धैवत का लडघन है, अर्थात् पूर्णादस्था मे इनका प्रयोग अत्यल्प है। ऋपभ से धैवत पर जाना चाहिए।"६ मतङ्ग मुनि का कथन है- "गान्धारी जाति में गान्धार, पड्ज, मध्यम, पञ्चम, निपाद ग्रह और अश है। तारस्थान मे पाँच स्वरो तक गति है। न्यास तक अथवा अवरोहगति मे उससे पर (ऋषभ) तक मन्द्रगति है। ऋपभ के लोप से पाडव और ऋपभ-धैवत के लोप से औडव रूप बनता है। पूर्णावस्था मे ऋषभ-घैवत का अल्पत्व होता है, अवशिष्ट स्वरो का बाहुल्य होता है। स्वरनामयुक्त जाति होने के कारण गान्वार न्यास है। पड्ज- मध्यम (पञ्चम) अपन्यास है। धैवत-ऋपभ की संगति है। यह दस प्रकार की होती है (पञ्चम अंश होने पर केवल सम्पूर्ण अवस्था, निपाद, पेंड्ज और मध्यम के अश होने पर सम्पूर्ण और षाडव अवस्थाएँ तथा गान्धार के अश होने पर पूर्ण, पाडव और औड्व अवस्थाएँ होती है) । मूर्च्छना धैवतादि है। ताल चञ्च- तपुट है। एककल, द्विकल, चतुप्कल ताल से चित्र, वार्तिक, दक्षिण मार्ग मे मागधी,

अर्थात्-जिसके निस्सीम, वाणी और मन के अत्यन्त दूरवर्ती महत्त्व का तिर- स्कार करने मे प्रवृत्त पद्मासन ब्रह्मा भी उपहास के पात्र बनते है, मै उस शुककान्ति आर्पभी को प्रणाम करता हूँ। ६४-गान्वार्या: पञ्च स्युरंशा धैवतर्पभवरजिता । अपन्यासो भवेच्चात्र षड्ज पञ्चम एव च।। गान्धारोऽत्र भवेन्न्यास. षाडवं चर्षभं विना। ऋपभधैवतोपेतं तथा चौडुवितं भवेत्। लंघनीयौ च तौ नित्यमृपभो धैवतं व्रजेत्॥ -भरत०, व० स०, पृ० ४४९

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जाति-लक्षण ९९

संभाविता और पृथुला गीतियॉ होती है। करुण रस है। तृतीय अंक के ध्रुवा-गान मे इस जाति का प्रयोग करना चाहिए।"६५ मतङ्ग के वर्तमान लक्षण मे पड्ज-मध्यम का अपन्यास लिपिक के प्रमाद का परि- णाम है। भरत, दत्तिल६, नान्यदेव इत्यादि सभी ने इस जाति के अपन्यास स्वर पड्ज-पञ्चम बताये है। मतङ्ग-किन्नरी पर धैवतादि (मध्यमग्राम की) मूर्च्छना स्थापित करके गान्धारी के विभिन्न रूपो को देखना चाहिए- पर्दे स्वर गान्वारांश शुद्ध गान्वारी-चिकारियॉ गान्वार में मिलाने मेरु 0-ध पर मन्द्रस्थान चौथे पर्दे, मध्यस्थान ग्यारहवे पर्दे और तारस्थान १-नि अठारहवे पर्दे से आरम्भ होगा। अठारहवे पर्दे पर मीड के द्वारा 2-स तार मध्यम, पञ्चम, धैवत निषाद भी प्राप्त किये जा सकते है। ३-रे मन्द्रस्थान मे न्यासस्वर गान्वार और अवरोह गति मे उस पर अर्थात् तीसरे पर्दे पर ऋपभ की प्राप्ति भी हो जायगी। ५-म मध्यमांश विकृत गान्धारी-चिकारियॉ मध्यम मे मिलाने पर ६-प मन्द्रस्थान पॉचवे पर्दे और मध्यस्थान वारहवे पर्दे से मिलेगा। ७-व तारस्थानीय म, प, ध, निअठारहवे पर्दे पर मीड द्वारा प्राप्त किये ८-नि ज़ा सकते है। वारह स्वरो मे जाति के रूप को देखनेवाले वारह ९ -स स्वर प्राप्त कर सकते है। मन्द्रस्थान मे न्यासस्वर भी उन्हे मिल १०-रे सकता है।

६५-गान्वारपड्जमध्यमपञ्चमनिषादा ग्रहा अंशाश्च। पञ्चस्वरपरस्तार। न्यासपरस्तत्परो वा मन्द्र। ऋषभहीनं पाडवम्। रिधहीनमौडुवितम्। पूर्णा- वस्थायाम् ऋपभवैवतयोरत्पत्वम्। शेपाणा बहुत्वम्। स्वरजातित्वाद् गान्धारो न्यास.। पड्जमध्यमावपन्यासौ। धैवतर्पभयो: सङ्गतिः। अस्या दशविधलक्षणम्। मूर्च्छना धैवतादिः। चञ्चत्पुटस्ताल.। एकद्वित्रिचतुष्कलै.। चित्रवार्तिकदक्षिणेपु मागधीसम्भाविता पृथुला गीतयः। करुणो रस.। तृतीयप्रेक्षणि (ण१) के ध्रुवा- गाने विनियोग.। ६६-गान्वार्या द्वावनशौ तु ज्ञेयावृपभवैवतौ। -मतङ्ग, भ० को०, पृ० १७३

क्रमान्वि(त्नि?) त्यमपन्यासौ विज्ञेयौ पड्जपञ्चमौ॥।-दत्तिल,भ० को०, पृ०१७४ ६७-सगमपनि स्वरा अंशाश्च। सपावपन्यासौ। गान्धारो न्यास। रिलोपे पाडवम्। रिधलोपे औड्वितम्। रिधौ लंघनीयौ। -नान्य ०, भ० को०, पृ० १७३

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१०० भरत का संगीत-सिद्धान्त

पर्दे स्वर पञ्चमांश विकृत गान्धारी-द्वादशस्वरवादियो को यथेच्छ ११-ग वारह स्वर मिलेगे। चिकारियॉ पञ्चम मे मिलाने पर छठे पर्दे से १२-म मध्यस्थान और तेरहवे से तारस्थान मिलेगा। मन्द्र मे न्यासस्वर १३-प गान्धार और अपन्यास स्वर पड्ज की प्राप्ति भी हो जायगी। १४-व निषादांश विकृत गान्धारी-चिकारियॉ निपाद मे मिलाने १५ -- नि पर पहले पदे से मन्द्रस्थान, आठवे से मध्यस्थान और पन्द्रहवे १६-स से तारस्थान मिलेगा। तारस्थानीय म, प, घ अठारहवे पर्दे पर १७-रे मीड के द्वारा मिल जायँगे। द्वादशस्वरवादियो को भी यथेप्ट १८-ग मन्द्र-तार सीमाएँ मिल जायँगी। षड्जांश विकृत गान्वारी-चिकारियाँ पड्ज मे मिलाने पर मन्द्रस्थान दूसरे पर्दे, मध्यस्थान नवे पर्दे तथा तारस्थान पन्द्रहवे पर्दे से मिलेगा। कुशल वैणिक अठारहवें पर्दे पर मीड के द्वारा तारस्थानीय म, प, ध, निभी प्राप्त कर सकते है। द्वादशस्वरवादी भी अपनी अभीष्ट सीमाएँ प्राप्त कर सकते है। आचार्य शार्ङ्गदेव का कथन है- "गान्धारी मे ऋषभ-धैवत के अतिरिक्त पॉच स्वर अंश होते है, न्यास और अश- स्वरो की परस्पर एवं अन्य स्वरो के साथ सगति होती है। क्रमश. ऋपभ के लोप से पाडव और ऋपभ-धैवत के लोप से औडव रूप बनता है। धैवत से ऋपभ पर जाना चाहिए। पञ्चम (अंश होने पर) पाडव अवस्था का द्वेषी (वावक) होता है। निषाद, पड्ज, मध्यम एव पञन्चम के अंश होने पर औडुवित रूप नही होता। मूर्च्छना धैवतादि है, ताल चञ्चत्पुट है। तृतीय अक के ध्रुवागान में प्रयोज्य है। इस गान्धारी मे गान्वार स्वर न्यास है और पड्ज-पञ्चम अपन्यास है।"६९

६८-पञ्चाशा रिधवर्ज्या. स्युर्गान्धार्या.सङ्गति.पुन.। न्यासाशाभ्यां तदन्येषां वैवताद् ऋषभं व्रजेत्॥ रिलोपरिधलोपाभ्यां षाडवौडविते कमात्। पञ्चम. पाडवद्वेपी निसमध्यमपञ्चमा.॥ अशा द्विपन्त्यौड्वित कला. पोडश कीतिता.। मूर्च्छना धैवतादि. स्यात्तालशचञ्चत्पुटो मत.। विनियोगो ध्रुवागाने तृतीये प्रेक्षणे भवेत्॥ -सं० र०, अ० स०, स्वरा०, पृ० २०६ ६९-अस्यां गान्धार्या गान्धारो न्यासः। पेड्जपञ्चमावपन्यासौ। -- स० र०, अ० स०, स्वरा०, पृ० २०७

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जाति-लक्षण १०१

(४) मध्यमा महर्पि भरत का कथन है- "मध्यमा जाति मे गान्धार और निपाद के अतिरिक्त अन्य स्वर अश होते है, वही स्वर अपन्यास भी होते है। मध्यम न्यास होता है। गान्धार और निपाद के लुप्त होने पर औडव एव गान्धार का लोप होने पर पाडव रूप होता है। इस जाति के प्रयोग मे पड्ज-मध्यम का बाहुल्य तथा गान्धार का लंघन प्रयोक्ताओ के द्वारा किया जाना चाहिए।130 आचार्य शार्ङ्गदेव कहते है- "मध्यमा मे गान्धार और निपाद के अतिरिक्त पॉच स्वर अश होते है। पड्ज- मध्यम का बाहुल्य और गान्धार का अल्पत्व होता है। गान्धार के लोप से पाडव और गान्धार-निपाद के लोप से औड्द रूप होता है। मूर्च्छना ऋपभादि है, ताल चञ्चत्पुट माना गया है। द्वितीय अङ्क के ध्रुवागान मे विनियोग है।"१ इस जाति मे मध्यम न्यास है तथा अशस्वर अपन्यास है।"७२

गान्धारी का ध्यान स्वर्णाभिरामरुचिमुज्ज्वलरूपवेपा वीणाविनोदकुतुकां मृदुमीलिताक्षीम्। देवी दयार्द्रहृदया प्रणतिगतेपु गान्वारमाश्रितवतीमनिगं नमामि ।। -जगदेक, भ० को०, पृ० १७४ अर्थात्-मै निरन्तर उन गान्धारी देवी को प्रणाम करता हूँ, जिनकी कान्ति स्वर्णा- भिराम है, जिनका रूप और वेप उज्जवल है, वीणा-विनोद जिनका कौतुक है, जिन्होने (वीणाविनोद के परिणामस्वरूप) मृदुतापूर्वक नेत्र निमीलित कर लिये है और जो प्रणाम करनेवालो के प्रति दयाद्रहृदया है। ७०-मध्यमाया भवन्त्यशा विना गान्धारसप्तमौ। एत एव ह्यपन्यासा न्यास एव हि मध्यम ।। गान्वारसप्तमोपेत पञ्चस्वर्य विधीयते। पाट्स्वर्य्य चाप्यगान्धार कर्तव्यं तु प्रयोगत. ॥ पड्जमव्यमयोरचात्र कार्य वाहुल्यमेव च। गान्धारलडघनं चात्र नित्य कार्य प्रयोक्तृभि. ॥-भरत०, व० स०, पृ० ४५० ७१-पञ्चाशा मध्यमायां स्युरगान्धारनिषादका। पड्जमध्यमबाहुल्य गान्धारोडल्पोऽतर पाडवम् ॥ गलोपान्निगलोपेन त्वौड्वं स्यात्कलाप्टकम्।

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१०२ भरत का संगीत-सिद्धान्त

मतङ्ग-किन्नरी पर ऋपभादि मूर्च्छना की स्थापना करके मध्यमा के शुद्ध एवं विकृत रूपो की स्थिति देखे- पर्दे स्वर 0 -रे मध्यमांश शुद्ध मध्यमा-चिकारियाँ मध्यम मे मिलाने पर दूसरें पर्दे से मन्द्र, नवे से मध्य एव सोलहवे से तार स्थान का 2-म आरम्भ होगा। अठारहवें पर्दे पर मीड के द्वारा निपाद, पड्ज, ३-प ऋपभ, गान्वार की प्राप्ति करने पर तारस्थानीय समस्त स्वर ४-ध मिल जायँगे। ५-नि पञ्चमांश विक्कृत मध्यमा-चिकारियाँ पञ्चम मे मिलाने पर ६-स तीसरे पर्दे से मन्द्र, दसवें से मध्य एवं सत्रहवे से तारस्थान का ७-रे आरम्भ मिलेगा। अठारहवे पर्दे पर मींड के द्वारा नि, स, ग, म प तक तारस्थानीय स्वर प्राप्त किये जा सकते है। ९ -- म १०-प घंवतांश विकृत मध्यमा-चिकारियॉ धैवत मे मिलाने पर ११-घ मन्द्रस्थान चौथे पर्दे से, मध्यस्थान ग्यारहवे से और तारस्थान १२-नि अठारहवे से प्रारम्भ होगा। अठारहवे पर्दे पर मीड द्वारा नि, १३-स स, रे, ग, म तक तारस्थानीय स्वर मिल जायँगे। १४-रे षड्जांश विकृत मध्यना-चिकारियॉ पड्ज मे मिलाने पर १५-ग मध्यसप्तक का आरम्भ छठे और तारसप्तक का तेरहवे से होगा, १६-म तारस्थानीय निपाद अठारहवें पर्दे पर मींड द्वारा प्राप्त हो जायगा। १७-प मन्द्र स्थान मे पड्ज के अतिरिक्त अन्य छहों स्वरो की प्राप्ति हो १८-ध जायगी। मन्द्रावधि मे न्यासस्वर मध्यम दूसरे पर्दे पर मिलेगा। ऋषभांश विकृत मध्यमा -- चिकारियाँ ऋषभ मे मिलाने पर मेरु से मन्द्र, सातवें पर्दे से मध्य एव चौदहवे पर्दे से तार-स्थान का आरम्भ होगा, तारस्थानीय निपाद और पड्ज अठारहवे पर्दे पर मीड द्वारा प्राप्त होगे।

ऋपभादिमूर्च्छना स्यात्तालश्चञ्चत्पुटो मतः। विनियोगो ध्रुवागाने द्वितीयप्रेक्षणे भवेत्।। -सं० र०, अ० सं०, स्वरा०, पृ० २११ ७२-अस्या मध्यमाया मध्यमो न्यासः। अंशा एवापन्यासा.।

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जाति-लक्षण १०३

महर्षि भरत का कथन है- (५) पञ्चमी

"पञ्चमी जाति मे दो स्वर, पञ्चम और ऋषभ, अश होते है। निपाद, पञ्चम और ऋषभ अपन्यास है। मध्यमा के समान पाडव-औडव (अर्थात् गान्धार लोप से षाडव और गान्धार-निपाद के लोप से औड्व) करना चाहिए। इस जाति मे पड्ज- गान्धार-पञ्चम दुर्वल है। इस जाति मे मध्यम-ऋषभ की सङ्गति है। गान्वार से निपाद पर जाना चाहिए।"७३ आचार्य शार्ङ्गदेव कहते है- "पञ्चमी मे ऋपभ-पञ्चम अश है, स-ग-म स्वल्प है। ऋपभ-मध्यम की सगति है। पूर्णावस्था मे गान्वार से निपाद पर जाना चाहिए। गान्धार एव गान्वार-निपाद के

टिप्पणी-मतङ्गकृत जाति-लक्षण हम भरत-कोप के आधार पर दे रहे है, जिन जातियो के मतङ्गकृत लक्षण उसमे नही, वे नही दिये जा रहे है। मध्यमा का ध्यान मन्दारकुन्दकुमुदप्रतिरूपरूपाम् इन्दीवरायतविशालविलोलनेत्राम्। चन्द्रावतंसपरिचुम्बितपादपद्मां तां मध्यमस्वरमयीमनिशं नमामि॥ -जगदेक, भ० को०, पृ० ४६७ अर्थात्-मै उस मध्यमा जाति को निरन्तर प्रणाम करता हूँ, जिसका रूप मन्दार, कुन्द एव कुमुद का प्रतिरूप है, जिसके नेत्र इन्दीवर के समान विस्तृत, दिशाल एवं चञ्चल है और चन्द्रावतस (भगवान् शकर ?) ने जिसके चरणकमलो का चुम्बन किया है। ७३-द्वावशावपि पञ्चम्या भवत. पञ्चमर्पभौ। अपन्यासो निपादश्च पञ्चमर्षभसयुत।। न्यास पञ्चम एव स्यात् मध्यमर्पभहीनता। दुर्वलाश्चात्र कर्तव्या पड्जगान्धारमध्यमा.॥। कुर्य्याच्चाप्यत्र सञ्चार मध्यमस्यर्पभस्य च। गान्धारगमन चाल्प सप्तमात् सम्प्रयोजयेत् ।। -भरत०, का० स०, पृ० ३२९ टिप्पणी-नाट्यगास्त्र के बम्वई-सस्करण मे 'कुर्यादस्याञ्च सचार पञ्चमस्यर्पभस्य च' पाठ है, जो लिपिकर्ता के प्रमाद का परिणाम है। माध्यमग्रामिक होने के कारण यह जाति ऋपभ-पञ्चम-परस्परसवादी है, परस्पर सवादी स्वरो की सङ़गति स्वत. सिद्ध होती है, उसके लिए विशिष्ट विधान की आवश्यकता नही होती।

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१०४ भरत का संगीत-सिद्धान्त

लोप से क्रमशः पाडव एवं औडव अवस्था जानना चाहिए। ऋषभ अंश होने पर औड्वा- वस्था का विरोधी है। कलाएँ आठ है। मूच्छना ताल इत्यादि मध्यमा के समान है। तृतीय अक मे विनियोग है। पञ्चम न्यास है, ऋपभ-पञ्चम-निपाद अपन्यास है।"७ अब मतङ्ग-किन्नरी पर 'ऋपभादि' मूर्च्छना स्थापित करने से पञ्चमी की शुद्ध एवं विकृत अवस्थाओ की यह स्थिति होगी- पर्दे स्वर पञ्चमांश शुद्ध पञ्चमी-चिकारियाँ पञ्चम मे मिलाने पर मेरु 0-रे मन्द्रसप्तक का आरम्भ तीसरे, मध्यसप्तक का दसवे और तार- १-ग सप्तक का आरम्भ सत्रहवे पर्दे से होगा। अठारहवे पर्दे पर मीड 2-म द्वारा तारसप्तक के निपाद, पड्ज, ऋपभ, गान्धार, मध्यम की ३-प प्राप्ति हो जायगी। ४ -- ध ऋषभांश विकृत पञचमी-चिकारियाँ ऋपभ मे मिलाने पर ५-नि मेरु से मन्द्र, सातवे पर्दे से मध्य एवं चौदहवें पद से तारस्थान की ६ -- स प्राप्ति होगी। अठारहवे पर्दे पर तारस्थानीय निपाद और पड्ज ७-रे की प्राप्ति भी मीड से हो जायगी। साधारणतया षाडवकारी स्वर जातियो मे अल्प (अनभ्यास- ९-म युक्त)और उसका संवादी औडवकारी स्वर अल्पतर (लघनयुक्त) १०-प होता है। परन्तु इस जाति मे औड्वकारी निपाद 'अपन्यास'

७४-रिपावंशौ तु पञ्चम्या सगमा: स्वल्पका मताः। रिमयो. संगतिर्गच्छेत्पूर्णत्वे गान्निषादकम्॥ कमाद् गेन निगाभ्यां च पाडवौड्वता मता। ऋपभोऽशस्त्वौडुवितं द्वेष्टयष्टौ च कला मताः। मूर्च्छनादि तु पूर्वावस्प्रेक्षणं तु तृतीयकम् ॥ अस्या पञ्चम्यां पञ्चमोन्यासः ? ऋपभपञ्चमनिपादा अपन्यासाः । -स० र०, स्वरा०, अ०सं०, पृ० २१४ टिप्पणी-यद्यपि पाडवौडवकारी स्वरो से ऋषभ का संवादित्व नही, तथापि ऋषभ को अंशावस्था मे औडुवद्वेपी कहना भरत के विधान- 'ऋपभर्चैव पञ्चम्यां कैशिक्याञ्चैव धैवत.। एव हि द्वादशैते स्यु. वर्ज्या. पञ्च स्वरेसदा ॥' के अनुसार है। -ना० शा०, व० स०, पृ० ४४२

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पर्दे स्वर ११-ध स्वर भी है, फलतः उसका प्रयोग अल्पतर नही। इसी लिए १२-नि भरत और उनके अन्यायी आचार्य शार्ङ्गदेव ने इस जाति मे १३-स अल्प स्वरो का विधान करते समय उनमे निषाद की गणना १४ -- रे नही की। १५-ग गान्वार षाडवकारी होने के कारण अल्प है। पड्ज और १६-म मध्यम इस जाति मे लोप्य स्वर नही, तथापि इस जाति मे उनका १७ -- प अल्प प्रयोग अल्पत्व-सम्वन्धी सामान्य नियम का अपवाद है। १८-ध

(६) धंवती महर्षि भरत का कथन है- "धवती जाति मे धैवत न्यास तथा ऋपभ-धवत अशस्वर है। इस जाति मे धैवत- ऋषभ-मध्यम अपन्यास होते है। षड्ज-पञ्चमहीन अवस्था औडुव होती है, पाडव अवस्था पञ्चमहीन होती है। आरोह में पड्ज-पञ्चम का लघन करना चाहिए। निषाद, ऋपभ एवं गान्वार इस जाति मे बलवान् होते है।"७५

पञ्चमी का ध्यान वाणी न केवलमहारि यथा (या?) विजित्य प्रीतिप्रदा पिककुलात्स च वर्णभेद । देवेन्द्रशेखरितपादसरोजरेणु ता पञ्चमश्रुतिमयीमनिश नमामि । --- जगदेक, भ० को०, पृप्ठ ३४६ अर्थात्-जिसने कोकिल-समूह को जीतकर प्रीतिमयी वाणी ही नही (अपितु) विशेष वर्णभेद (असित) का भी हरण कर लिया, मै उस पञ्चमी जाति को निरन्तर प्रणाम करता हूँ, जिसके चरणकमलो का पराग देवेन्द्र ने भी सिर पर धारण किया है। ७५-धैवत्या धैवतो न्यास स्यादशौ धैवतर्पभौ। अपन्यासा भवन्त्यत्र धैवतर्षभमध्यमा.॥ षड्जपञ्चमहीनं च पञ्चस्वर्य्य विधीयते। पञ्चमेन विना चैव पाडवं परिकीरतितम् ॥ आरोहिणौ च तौ कायौं लंघनीयौ तथैव हि। निपादरचर्पभर्चैव गान्वारो बलवांस्तथा ॥ -भरत०, व० स०, ५ृ० ४४८

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मतङ्ग का कथन है- "धैवती के ग्रह और अंश धैवत और ऋपभ है। शुद्ध अवस्था में धैवत ही अपन्यास है, विकृत अवस्था मे धैवत, ऋपभ और मव्यम अपन्यास है। धैवत न्यासस्वर है। पाडव अवस्था पञ्चमहीन है। औडुवित रूप पड्ज-पञ्चम-हीन है। पड्ज-पञ्चम दुर्वल रखने चाहिए, कही लघनीय भी है। तार गति पाँच स्वरो की है। न्यास अथवा अवरोह गति मे उससे पर तक मन्द्रगति है। पूर्णावस्था में गान्वार, मध्यम, पञ्चम और निवाद अल्प है, औडुवितावस्था में इनका अल्पत्व है, शेप स्वरों का बाहुल्य है। इसकी मूर्च्छना ऋषभादि है। ताल पञ्चपाणि है। चित्र मार्ग मे एककल, ताल मागधी गीति, वार्तिक मार्ग मे ट्विकल ताल, सभाविता गीति तथा दक्षिण मार्ग मे चतुष्कल ताल और पृथुला गीति है। चित्र मार्ग मे चार, दक्षिण मे बारह और वार्तिक मे अडतालीस कलाएँ है। वीर, वीभत्स और भयानक रस है। प्रथम अङ्क के ध्रुवागान में विनियोग है।"७ शार्ङ्गदेव कहते है- "धैवती मे ऋपभ-वैवत अश है। आरोह मे पड्ज-पञ्चम लंघनीय है। पञ्चम के लोप से षाडव और पड्ज-पञ्चम के लोप से औडुव रूप वनता है। मूर्च्छना ऋपभादि है। ताल, मार्ग और गीतियाँ पाड्जी के समान है तथा विनियोग भी वैसा ही है। कलाएँ वारह है। इस जाति मे धैवत न्यास है। ऋपभ, मध्यम एवं धैवत अपन्यास है।"5 ७६-धैवत्या धैवतर्षभौ अशौ ग्रहौ च। शुद्धावस्थाया धैवत एव न्यासः (अपन्यास?)। विकृतावस्थायां धैवतर्पभमध्यमा अपन्यासा.। धैवतो न्यास। पञ्चमहीनं पाडवम्। पञ्चमपड्जहीनमौडवितम्। षड्जपञ्चमस्वरौ बलौ (दुर्बलौ?) कर्तव्यौ। क्वचिल्लघनीयौ। पञ्चस्वरपरस्तार। न्यासपरस्तत्परो वा मन्द्र। पूर्णावस्थाया गान्धारमव्यमपञ्चमनिपादानामल्पत्वम्। शेपाणां च बहुत्वम्। .... ऋषभादि- मूच्छना। ताल: पञ्चपाणि। एककलश्चित्रमार्गे मागधी गीति। द्विकलो वार्तिके सम्भाविता गीति.। चतुष्कलो दक्षिणे पृथुला गीतिः। चित्रे कलाश्चतस्त्र. । दक्षिणे कला द्वादश। वार्तिकेऽष्टचत्वारिशत्कला। रसा वीरवीभत्सभयानकाः । ध्रुवागाने प्रथमप्रेक्षणके विनियोगः। -- मतङ्ग, भ० को०, पृ० २९९ ७७-स्तो धैवत्यां रिधावशौ लडध्यावारोहिणौ सपौ। पलोपात् पाडवं प्रोक्तमौडुव सपलोपत ।। ऋ पभादिर्मूर्च्छना स्यात्तालो मार्गश्च गीतय. । विनियोगश्च पाड्जीवत् कला द्वादश कीर्तिताः ॥ अस्या वैवत्यां धैवतो न्यास, ऋपभमव्यमवैवता अपन्यासा.। --- स० र०, अ० सं०, स्वरा०, पृ० २१७

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जाति-लक्षण १०७

मतङ्ग ने धैवत का अपन्यासत्व केवल शुद्ध अवस्था मे कहा है, फलत सम्पूर्णावस्था मे वे मध्यम को भी अल्प मानते है, पञ्चम पाडवकारी होने के कारण अल्प है। गान्धार और निपाद अंशस्वरो के विवादी होने के कारण अल्म है। मतङ्ग-किन्नरी पर ऋषभादि मूर्च्छना स्थापित करने से हमे शुद्ध एव विकृत घैवती की प्राप्ति इस प्रकार होगी- पर्दे स्वर 0-रे धैवतांश शुद्ध घैवती-चिकारियाँ वँवत मे मिलाने पर मन्द्र- १-ग स्थान चौथे, मध्यस्थान दसवे और तारस्थान अठारहवे से प्राप्त २-म होगा। अठारहवें पर्दे पर तारस्थानीय ध, नि, स, रे भी मीड ३-प द्वारा सरलतापूर्वक मिल जायँगे। ४-ध ऋषभांश विकृत धैवती-चिकारियॉ ऋषभ मे मिलाने पर ५-नि मेरु से मन्द्र, सातवे पर्दे से मध्य और चौदहवे पर्दे से तार-स्थान ६-स की प्राप्ति होगी। तारस्थानीय निपाद और पड्ज भी अठारहवे ७-रे पर्दे पर मीड द्वारा मिल जायँगे। 6-ा (७) नैषादी ९-म महर्षि भरत का कथन है- १०-प "निषादिनी मे निषाद, गान्धार और ऋषभ अशस्वर होते है। ११-ध यही अपन्यास स्वर है, न्यासस्वर निषाद है। पाडव एवं औडुद १२-नि अवस्थाएँ धँवती के समान होती है, उसी जाति के समान लघनीय १३-स एवं बलवान् स्वर है।"८

घैवती का ध्यान यस्या वपुर्नवसुधारसनिर्विशेष पीतं तदप्पतितरा नयनैमहेगे- नापीयमानमभितो विदधाति देहं ता धवतीमनुगुणामनिग नमामि। -जगदेक, भरतकोश, पृ० २९९ अर्थात्-अपने नेत्रो द्वारा भगवान् शंकर जिसके पीत शरीर के शोभामृत का पान अत्यन्त मात्रा मे निरन्तर कर रहे है, (तब भी, जो शरीर धारण कर रही है,) मै उस गुणानुरूप धैवती को निरन्तर प्रणाम करता हूँ। ७८-निषादिन्या निशादोऽ्यो गान्वारस्त्वृपभ. स्मृत । एत एव अ (ह्य) पन्यासा न्यासश्चैवात्र सप्तमः ॥

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१०८ भरत का संगीत-सिद्धान्त

पर्दे स्वर मतङ्ग मुनि कहते है- १४-रे "निपादवती मे निपाद-ऋपभ-गान्धार अंश एवं ग्रह-स्वर होते १५-ग है। यही स्वर अपन्यास है। केवल निपाद न्यास है। षाडवावस्था १६-म पञ्चमहीन और औडवावस्था पञ्चम-पड्जहीन होती है। पूर्णा- १७-प दस्था मे पड्ज, मध्यम, गान्वार और पञ्चम अल्प होते है। औडु- १८-ध वित अवस्था मे मध्यम एव धैवत अल्प होते है। तारस्थान मे पॉच स्वरो का प्रयोग है। न्यासस्वर (निपाद) अथवा (अवरोह गति मे) उससे पर (धवत) तक मन्द्रगति है। मू्च्छना गान्धारादि है। ताल चञ्चत्पुट है। दक्षिण मार्ग मे चौसठ* कलाएँ, चित्र मार्ग मे आठ है, करुण रस है और प्रथम अक के ध्रुवा- गान मे प्रयोज्य है।"" आचार्य शार्ङ्गदेव का कथन है- "नैपादी मे नि, रे, ग अश है, अनश स्वर अवहुल (अल्प) है। पाडव और औडुव रूप तथा लडघ्य स्वर पूर्व जाति (धैवती) के समान है, विनियोग भी उसके सदृश

धैवत्या इव कर्तव्यौ (व्ये?) षाडवौडुविते तथा। तद्वच्च लघनीयी तु वलवन्तौ तर्थैव च।। -भरत०, व० सं०, पृ० ४४८

७९-निपादवत्या निषादर्पभगान्धारा ग्रहा अंशाश्च। निपादगान्वारर्षभा अपन्यासाः। निपाद एको न्यासः । पञ्चमहीनं पाडवम्। पञ्चमपड्जहीनमौडुवितम्। पूर्णावस्थाया पड्जगान्वारमध्यमपञ्चमानामल्पत्वम्। औडविते मध्यमवैवतयो- रल्पत्वम्। पञ्चस्वरपरा तारगति । न्यासपर' तत्परो वा मन्द्र.। गान्धारा- दिर्मूर्च्छना। तालरचञ्चत्पुट.। दक्षिणे कलाश्चतुष्पष्टि । चित्रेऽष्टौ। रसश्च करुण.। ध्रुवागाने प्रथमप्रेक्षणि(ण?) के विनियोगः । *टिप्पगी-'कला' शब्द का अर्थ ताल-भाग भी होता है और एक गुरु (दो लघु) भी। मतङ्ग ने यहॉ दक्षिण मार्ग मे चौसठ कला बताते हुए कला शब्द का प्रयोग 'गुरु' के अर्थ मे किया है। शार्ङ्गदेव का प्रयोग ताल भाग के अर्थ मे है। चञ्चतपुट की चार आवृत्तियॉ दोनो का ही तात्पर्य है। दक्षिण मार्ग मे प्रयोज्य चतुष्कल चञ्चत्पुट की चार आवृत्तियो मे सोलह कलाएँ (तालभाग) होती है। प्रत्येक कला (ताल भाग) मे चार कलाएँ (गुरु) होती है। फलतः १६x४=६४ कलाएँ मतङ्ग ने वतायी है।

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है। ताल चञ्चत्पुट है, कलाएँ सोलह है। मूर्च्छना गान्धारादि है। इस जाति में निपाद न्यासस्वर है और अंशस्वर ही अपन्यास स्वर है।"0 मतङ्ग-किन्नरी पर गान्वारी मूर्च्छना की स्थापना करने से निम्नस्थ स्थिति होगी- पर्दे स्वर निषादांश शुद्ध नैवादी-चिकारियॉ निषाद मे मिलाने पर मन्द्रस्थान का आरम्भ चौथे, मध्यस्थान का ग्यारहवे और तार- १-म स्थान का आरम्भ अठारहवें से होगा। २-प मन्द्रावस्था मे मन्द्र निपाद से अवरोह गति में पर (धैवत) ३-ध तीसरे पर्दे पर मिलेगा और अठारहवें पर मीड द्वारा स, रे, ग, म ४-नि प्राप्त करने पर तारस्थानीय पॉच स्वर मिल जायेंगे। मतङ्ग का ५-स विधान इस प्रकार पूर्ण हो जायगा। ६-रे ऋषभांश विकृत नैषादी-चिकारियॉ ऋपभ मे मिलाने ७-ग पर मध्यस्थान छठे और तारस्थान तेरहवे पर्दे से मिलेगा। मेरु ८-म से छठे पर्दे तक मन्द्रस्थानीय छःस्वर मिलेंगे, जिनमे न्यास स्वर ९-प निपाद भी है। अठारहवें पर्दे पर मीड द्वारा तारस्थानीय पड्ज १०-घ भी मिल जायगा। ११-नि गान्धारांश विकृत नैषादी-चिकारियॉ गान्वार मे मिलाने १२-स १३- पर मेरु से छठे पर्दे तक मन्द्र, सातवे से तेरहवे तक मध्य और चौदहवे से अठारहवे पर्दे पर मौड द्वारा प्राप्त ऋपभ तारस्थान १४-ग की प्राप्ति होगी। १५-म शुद्ध जातियो में अशस्वर ही न्यासस्वर होता है। महर्पि १६ -- प भरत के विधान मे अशस्वर से अवरोहगति मे मन्द्रगति नही १७-ध होती, क्योकि महर्पि के मत मे, यदि मन्द्र और तार अवधियों १८-नि की पराकाष्ठा तीनो स्थानो (सप्तको) मे प्राप्त करना है, तो

८०-नैपादा निरिगा अशा अनशा बहुला स्मृता.। पाडवौड्वलघ्या. स्यु पूर्वावद् विनियोजनम्। चञ्चत्पुट पोडशात्र कला गादिश्च मूर्च्छना।। अस्या नैपाद्या निपादो न्यास। अंशा एवापन्यासाः । -सं० र०, अ० सं०, स्वरा०, पृ० २२०

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११० भरत का संगीत-सिद्धान्त

मूच्छना का आरम्भ (एकतन्त्री या मत्तकोकिला जैसी वीणाओ मे) अंश स्वर से करना चाहिए। तीन से अधिक अति मन्द्र अथवा अति तार स्थान महर्पि के यहाँ नही है। मतङ्ग ने एक जाति के सभी रूपो के लिए एक मूर्च्छना निश्चित की है, फलत अनेक अवस्थाओ मे, जहाँ उनके विधान के अनुसार निश्चित मूर्च्छनाओ मे सम्पूर्ण तीनो स्थान प्राप्त नही होते, वहॉ अनेक स्थितियो मे अति मन्द्र या अति तार स्वर भी प्राप्त हो जाते है। इसी लिए मतङ्ग ने अपने जाति-लक्षणो मे विभिन्न मन्द्र-तारावधियो का विशेपरूपेण वर्णन किया है। शाङ्गंदेव के काल तक मन्द्र-तारावधि के नियम सर्वथा शिथिल हो गये थे, इस शिथिलता का वीज मतङ्ग के द्वादशस्वर-मूर्च्छनावाद मे निहित है।* ससर्गंज विकृत जातियाँ (८) षड्जकेशिकी महर्षि भरत का विधान है- "पड्जकैशिकी मे पड्ज-गान्वार-पञ्चम अश होते है। पड्ज-पञ्चम-सप्तम अप- न्यास होते है। गान्धार न्यासस्वर है। इस जाति की पाडव या औडुव अवस्था नही होती। इस जाति मे धैवत (मध्यम?) और ऋषभ को दुर्वल रखना चाहिए।"८ मतङ्ग का कथन है- "पड्जकैशिकी के ग्रह और अश ड्ज-गान्धार-पञ्चम होते है। तारावधि पञ्चस्वर तथा मन्द्रावधि न्यास स्वर तक अथवा (अवरोह गति में) उससे पर तक है। यह जाति नित्य सम्पूर्ण है। धैवत-निषाद-मध्यम का अल्पत्व है और ऋषभ का अल्पतरत्व। शेष स्वरो का बाहुल्य है। गान्धार न्यास स्वर है। चित्र मार्ग मे एककल चञ्चतपुट ताल, मागधी गीति है। वार्तिक मार्ग मे द्विकल (चञ्चत्पुट) ताल और

  • नैषादी का ध्यान भरत-कोश मे न होने के कारण नही दिया जा सका। ८१-अंशास्तु षड्जकेशिक्या पड्जगान्धारपञ्चमा. । अपन्यासा भवन्त्यत्र पड्जसप्तमपञ्चमा. । गान्धारश्च भवेन्न्यासो हीनस्वर्य न चात्र तु। दौर्वल्यञ्चात्र कर्तव्यं धैवतस्य (मध्यमस्य) पंभस्य च ॥ -भरत०, व० सं०, पृ० ४४८

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जाति-लक्षण १११

सम्भाविता गीति है। दक्षिण मार्ग मे चतुष्कल (चञ्चत्पुट) ताल और पृथुला गीति है। करुण रस है। द्वितीय अंक के प्रथम प्रवेश-गीत मे विनियोग है।"८२ आचार्य शाङ्गदेव कहते है- "पड्जकैशिकी मे षड्ज-गान्धार-पञ्चम अंश होते है। मध्यम और ऋगभ मे अल्पत्व रहता है। धैवत और निषाद (मध्यम और ऋषभ की अपेक्षा) कुछ बहुल होते है। चञ्चत्पुट ताल है, सोलह कलाएँ है। द्वितीय अङ्क की प्रावेशिकी ध्रुवा मे विनियोग है। इस जाति में गान्धार न्यास है और पड्ज-निषाद-पञ्चम अपन्यास है।"८१ मतङ्ग और शार्गदेव दोनो ने ही इस जाति की मूच्छना निर्दिष्ट नही की है, कल्लिनाथ ने भी इस सबंध मे मौन का अवलम्बन किया है। मतङ्ग-किन्नरी में पड्जादि मूर्च्छना स्थापित करने पर मतङ्ग-विहित सीमाएँ मिल जायँगी। मतङ्ग-किन्नरी पर 'षड्जादि' मूच्छना स्थापित करने से निम्नस्थ स्थिति स्पष्ट होती है- पर्दे स्वर 0 - स षड्जांश षड्जकैशिकी-पड्ज मे चिकारियॉ मिलाने पर १-रे मेरु से छठे पर्दे तक मन्द्र, सातवे से तेरहवे तक मध्य एवं चौदहवें 7-ग से अठारहवे ( मीड द्वारा प्राप्त धैवत, निपाद सहित) तक तार- ३-म स्थान की प्राप्ति होगी।

८२-पड्जकैशिक्या पड्जगान्वारपञ्चमा ग्रहा अंशाश्च। पञ्चस्वरपरस्तार.। न्यासपरस्तत्परो वा मन्द्र। नित्यसम्पूर्णा धैवतनिपादमध्यमानामल्पत्वम् ऋपभ- स्याल्पतरत्वम् । शेपाणा बहुलत्वम् । न्यासस्तु गान्वारः। चञ्चत्पुटस्तालः । एककलश्चित्रे मागधी गीति.। वार्तिकमार्गे द्विकल: सम्भाविता गीति.। चतु- ष्कले (लो) दक्षिणमार्गे पृथुला गीतिः। रसश्च करुणः। प्रथमप्रवेशगीते द्वितीयप्रेक्षणके विनियोगः ।

८३-अशा स्यु. पड्जकैशिक्यां पड्जगान्वारपञ्चमाः । -- मतङ्ग, भ० को०, पृ० ६८७

ऋपभे मध्यमेऽल्पत्वं धनिपादौ मनाग्वह॥ चञ्चत्पुट पोडशास्या कला. स्युर्विनियोजनम्। प्रावेशिक्या ध्रुवायां स्यात्प्रेक्षणे तु द्वितीयके ॥ अस्या पड्जकैशिक्या गान्वारो न्यास। पड्ज-निषाद-पञ्चमा अपन्यासा। -स० र०, अ० स०, स्वरा०, पृ० २२४

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११२ भरत का संगीत-सिद्धान्त

पर्दे स्वर गान्धारांश पड्जकैशिकी-गान्धार में चिकारियाँ मिलाने ४-प पर तीसरे पर्दे से मन्द्र, नवें से मध्य और सोलहवे में तार स्थान ५-ध का आरम्भ होगा। मतङ्ग के विधान के अनुसार मन्द्र गान्धार ६-नि (न्यास स्वर) से अवरोह गति मे ऋपभ पहले पर्दे पर मिलेगा। ७-स अठारहवे पर्दे पर धैवत और निपाद की प्राप्ति करने पर तार- ८-रे स्थानीय पाँच स्वर ग, म, प, ध, नि मिल जायेंगे। ९-ग पञ्चमांश पड्जकैशिकी-पञ्चम मे चिकारियाँ मिलाने १०-म पर चौथे पर्दे से मन्द्र, ग्यारहवे से मध्य एव अठारहवे से तार ११-प स्थान की प्राप्ति हो जायगी। अठारहवे पर्दे पर भी ध, नि, स १२-ध प्राप्त किये जा सकते है। १३-नि (९) बड्जोदीच्यवा १४-स महर्पि भरत का कथन है- १५-रे "पड्जोदीच्यवती के अंशस्वर पड्ज, मध्यम, धैवत और १६-ग निषाद है। न्यासस्वर मध्यम है। इसके अपन्यास स्वर धैवत १७-म और षड्ज है। इस जाति मे अंशस्वरों का परस्पर सञ्चार है। १८-प पाडवावस्था मे ऋपभ और औडवावस्था मे ऋपभ-पञ्चम का लोप होता है।" इसमे गान्धार बली है।" सामान्यतः औडवकारी स्वर परस्पर संवादी होते है, परन्तु यह जाति इस सबन्ध मे अपवाद है। इस जाति के पड्जग्रामीय होने के कारण यद्यपि इसमें ऋषभ-पञ्चम परस्पर सवादी नही, तथापि महर्पि ने ऋषभ-पञ्चम को इस जाति मे औड्वकारी कहा है। मतङ्ग और शार्ङ्गदेव ने भी आप्त वाक्य का अनुसरण किया है। इस जाति मे औडुवकारी दोनो स्वरो मे कोई भी पाडवद्वेषी नही, अपितु अशावस्था को प्राप्त धैवत

८४-षड्जश्च मध्यमरचैव निपादो धैवतस्तथा। स्युः षड्जोदीच्यवत्यंश न्यासश्चव तु मध्यम ॥ अपन्यासो भवत्यस्या. धैवत. पड्ज एव च। परस्परमिहांशाना सञ्चारश्च विधीयते।। पञ्चमर्पभहीनं तु पञ्चस्वर्य तु तत्र वै। ऋनभ. पाडवे हीनो गान्वारश्च बली भवेत्॥ -भरत०, व० सं०, प० ४४९

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जाति-लक्षण ११३

है। सामान्यत. षाडवद्वेषी स्वर औडवकारी स्वरो मे से एक होता है, अतः धैवत का पाडवद्वेषित्व भी सामान्य नियम का अपवाद समझना चाहिए। मतङ्ग का कथन है- "पड्जोदीच्यवती मे ग्रह एवं अंश स, म, ध, नि होते है। तार गति मॉच स्वरो तक है। न्यास स्वर तक या उससे अवरोहगतति में पर गान्धार तक मन्द्रावधि है। षाडवा- वस्था ऋपभहीन और औडुवित अवस्था ऋषभ-पञ्चमहीन है। पूर्णावस्था मे गान्धार- पञ्चम का अत्पत्व है। अश होने पर गान्धार बहुल है (?)। पाडवावस्था मे पञ्चम अल्प है। औडवावस्था मे कोई अल्प नहो, सभी बहुल है। मध्यम न्यास है, ऋपभ-धैवत अपन्यास है। ... गान्धारादि मूर्च्छना है। पञ्चपाणि ताल है। एककल, चित्रमार्ग से मागधी गीति, द्विकल वार्तिक मार्ग से सम्भाविता और चतुष्कल दक्षिण मार्ग से पृथुला गीति होती है। रस शृद्गार और हास्य है। द्वितीय अङ्क के ध्रुवागान मे विनियोग है।"८५ आचार्य शाङ्देव का कथन है- "पड्जोदीच्यवा मे स, म, नि, ध अश है, उनकी परस्पर सङ्गति है। मन्द्र गान्धार का बाहुल्य है। तारस्थान मे षड्ज और ऋषभ भी बहुल है। ऋपभ के लोप से पाडव और ऋपभ-पञ्चम के लोप से औडव रूप बनता है। धैवत के अश होने पर पाडव रूप नही होता। गीत, ताल इत्यादि पाड्जी के समान है। मूर्च्छना गान्धा- रादि है, द्वितीय अङ्क के ध्रुवागान मे विनियोग है। इस जाति मे न्यास स्वर मध्यम है। पड्ज और धैवत अपन्यास स्वर है।"८६

८५-पड्जोदीच्यवत्या षड्जमध्यमधैवतनिषादा ग्रहा अंशाश्च। पञ्चस्वरपरस्तार.। न्यासपरस्तत्परो वा मन्द्र । ऋषभहीन पाडवम्। ऋपभपञ्चमहीनमौडुवितम्। पूर्णावस्थायां गान्धारपञ्चमयोरल्पत्वम्। गान्वारस्यांशत्वप्राप्तौ बाहुल्यम्। पाडवे पञ्चमस्याल्पत्वम्। औडुविते न कस्याप्यल्पत्वम्। अशेपाणा बहुत्व- मेव। मध्यमो न्यास: । ऋपभधैवतावपन्यासौ।.गान्वारमूर्च्छना। ताल. पञ्चपाणि.। एककलेन चित्रेण मागधी। द्विकलेन वार्तिकेन सम्भाविता। चतुष्कलेन दक्षिणेन पृथुला। रसौ शृङ्गारहास्यौ। ध्रुवागाने द्वितीयप्रेक्षणके विनियोग. । -- मतङ्ग०, भ० को०, पृ० ६८८ ८६-अशाः समनिधाः पड्जोदीच्यवाया प्रकीतिता । मिथरच सगतास्ते स्युर्मन्द्रगान्वारभूरिताः ॥ पड्जर्पभौ भूरितारौ रिलोपात्वाडवं मतम् । ८

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११४ भरत का संगीत-सिद्धान्त

शार्ङ्गदेव के समक्ष नाट्यशास्त्र का पाठ अधुना-मुद्रित पाठों से कही-कही भिन्न था। कल्लिनाथ के समक्ष भी सम्भवतः यह पाठ था, जिसके अनुसार इस जाति में पड्ज, ऋपभ और गान्वार को बली बताया गया है।"5 कल्लिनाथ का कथन है कि इस जाति मे ऋपभ की भरतोक्त बलवत्ता तारस्थान मे माननी चाहिए।"८ मतङ्ग-किन्नरी पर गान्वारादि मूच्छना स्थापित करने पर इस जाति के विभिन्न प्रकारों की स्थिति निम्नस्थ होगी- पर्दे स्वर 0 - मव्यमांश षड्जोदीच्यवा-मध्यम मे चिकारियॉ मिलाने १-म पर पहले पर्दे से मन्द्र, आठवे से मध्य और पन्द्रहवे से तार स्थान 2-प की प्राप्ति होगी। अठारहवे पर्दे पर पड्ज प्राप्त कर लेने से मत- ३-ध ड्वोक्त तारावधि मिलेगी और पहले पर्दे पर स्थापित मन्द्र मध्यम: ४ -- नि (न्यास) से अवरोह गति मे पर गान्वार भी मेरु पर मिल जायगा। ५-स धैवतांश षड्जोदीच्यवा-धैवत मे चिकारियॉ मिलाने ६-रे पर तीसरे पर्दे से मन्द्र, दसवे से मध्य और सत्रहवे से तार स्थान की ७-ग प्राप्ति होगी। अठारहवे पर्दे पर गान्वार तक प्राप्त करने पर ८-म तारस्थानीय पाँच स्वर ध, नि, स, रे, ग मिल जायँगे। मन्द्र- ९-प स्थानीय स्वर यथेष्ट मिलेगे। १०-ध निषादांश षड्जोदीच्यवा-निपाद मे चिकारियॉ मिलाने ११-नि पर मन्द्रस्थान चौथे पर्दे, मध्यस्थान ग्यारहवे पर्दे और तार- १२ -- स स्थान अठारहवे पर्दे से मिलेगा। अठारहवे पर्दे पर तारस्थानीय स, १३-रे रे, ग, म भी प्राप्त किये जा सकते है।

औडुवं रिपलोपेन घैवतेंऽरे न पाडवम्॥ पाड्जीवद् गीततालादि गान्धारादिश्च मूर्च्छना। द्वितीये प्रेक्षणे गाने ध्रुवायां विनियोजनम्। अस्या पड्जोदीच्यवत्यां मध्यमो न्यास। पड्जधैवतावपन्यासौ। -- स० र०, अ० सं०, स्वरा०, पृ० २२८ ८७-पड्जश्च ऋपभरचैव गान्वारश्च बली भवेत्। -- भरत०, कल्लिनाथ द्वारा उद्धृत " " ८८-'ऋपभरच वली भवेत्' इति मुनिवचनं तु तारस्थर्पभविपयमिति व्यवस्थापनीयम्। -- कल्लिनाथ । पृ० २२८

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जाति-लक्षण ११५ १४-ग षड़्जांश षड्जोदीच्यवा-पड्ज मे चिकारियॉ मिलाने १५-म पर मध्यस्थान पाँचवें पर्दे और तारस्थान बारहवे पर्दे से मिलेगा। १६-प मेरु से चौथे पर्दे तक मन्द्रस्थानीय ग, म, प, ध, नि मिलेगे। १७-ध १८-नि

(१०) षड्जमव्यमा महर्षि भरत का कथन है- "पड्जमध्यमा मे सभी स्वर अश और अपन्यास होते है, प्रयोक्ताओ को इस जाति मे पड्ज या मध्यम स्वर न्यास रखना चाहिए। गान्धार और निपाद के लोप से औडुब एवं निषाद के लोप से षाडव रूप बनाना चाहिए। प्रयोक्ताओ के द्वारा इसमे सभी स्वरों की परस्पर सगति इष्ट है।"८१ इस जाति में सभी स्वर अंश है। सामान्यत. अशस्वर लोप्य नही होते, परन्तु इसमे अनंशावस्था मे निपाद और गान्धार का लोप महर्षि द्वारा विहित है, जो सामान्य नियम का अपवाद है। मतङ्ग कहते हैं- "वड्जमध्यमा के ग्रह और अंश सातों स्वर है। तार गति पॉच स्वरो तक है। मन्द्र गति न्यासस्वर तक अथवा (अवरोह गति मे) उससे पर तक है। पाडवावस्था निपाद- हीन और औड्वावस्था निपादगान्धार-हीन है। ग्राम के अविरोध के कारण सङ्गति यथेष्ट है। पूर्णावस्था मे निषाद और गान्धार का अल्पत्व है। षड्ज-मध्यम न्यास स्वर है। सातो स्वर अपन्यास है। मूर्च्छना मघ्यमादि है। ताल पञ्चपाणि है। एककल, द्विकल, चतुष्कल, चित्र, वार्तिक, दक्षिण मार्गो के द्वारा कमशः मागधी, सम्भा- विता और पृथुला गीतियाँ है। सव रसों मे इस जाति का प्रयोग होता है। द्वितीय अंक के ध्रुवागान मे विनियोग है।"4

८९-सर्वेडशा. षड्जमध्याया अपन्यासास्त एव च। पड्जो वा मध्यमो वापि न्यास: कार्य. प्रयोक्तृभिः। गान्धारसप्तमोपेतं पञ्चस्वर्य तु तत्र वै। पाडव सप्तमोपेत चात्र कार्य प्रयोगतः। सर्वस्वराणां सञ्चार इष्टस्तस्यां प्रयोक्तृभि ॥ -- भरत०, व० सं०, पृ० ४४९ ९०-पड्जमव्यमाया ग्रहा अशाश्च सप्तैव स्वरा। पञ्चस्वरपरस्तार। न्यासपरस्तत्परो वा मन्द्रः। निपादहीना. पाडवा.। निपादगान्धारहीना भडुविता.। ग्रामाविरोघेन

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११६ भरत का संगीत-सिद्धान्त

शार्गदेव का कथन है- "पड्जमव्यमा मे सातो स्वर अश है, उनमे परस्पर सञ्चार होता है। निपाद अनश अवस्था मे अल्प होता है। निपाद एव निवाद-गान्वार के लोप से पाडव एव औडुव प्रकार वनते हैं। (अंश होने पर) निपाद-गान्वार पाडव एवं औडुव अवस्थाओ के विरोधी होते है। गीति, ताल, कला इत्यादि पाड्जी के समान है। मूर्च्छना मध्यमादि तथा विनियोग पड्जोदीच्यवती के समान है। इस पड्जमव्यमा मे पड्ज और मध्यम न्यास तथा सातो स्वर अपन्यास है।"४ मतङ्गकिन्नरी पर मध्यमादि मूर्च्छना स्थापित करने से पड्जमध्यमा के विभिन्न रूपो की स्थिति इस प्रकार होगी- पर्दे स्वर 0 -म षड्जांश पड्जमव्यमा-चिकारियॉ पड्ज मे मिलाने पर १-प चौथे पर्दे से मन्द्र, ग्यारहवे से मध्य और अठारहवे से तार स्थान की प्राप्ति होगी। अठारहवें पर्दे पर ऋपभ, गान्धार, मध्यम, ३-नि पञ्चम मीड द्वारा प्राप्त करने पर मतङ्ग-विधान के अनुसार ४-स तारस्थानीय पॉच स्वर मिल जायँगे। अवरोह गति में न्यासस्वर ५-रे अतिमन्द्र मध्यम मेरु पर मिलेगा और पड्ज स्वरन्यास मानने पर ६-ग उससे पर मन्द्र निपाद चौथे पर्दे पर मिलेगा।

यथेष्टं सञ्चार। पूर्णावस्थाया निगयोरल्पत्वम्। समौ न्यासौ। सप्तस्वरा अपन्यासा. । मध्यमादिमूर्च्छना। ताल. पञ्चपाणिः । एककलद्विकलचतुष्कलैः चित्रवार्तिकदक्षिणमा्ग : क्रमान्मागधी सम्भाविता पृथुलागीतय। सर्वरसात्मिका। ध्रुवागाने द्वितीयप्रेक्षणके विनियोग.।"

९१-अंशा. सप्तस्वरा षड्जमध्यमाया मिथश्च ते। -मतङ्ग, भ० को०, पृ० ६८८

सगच्छन्ते निरल्ोऽशाद् गाद् ऋते वादिता विना। निलोपनिगलोपाभ्या षाडवौडुविते मते। पाडवौडवयो. स्याता द्विश्रुती तु विरोधिनौ।। गीतितालकलादीनि षाड्जीवन्मूच्छना पुन.। मध्यमादिरिह ज्ञेया पूर्वावद् विनियोजनम् ॥ अस्यां पड्जमव्यमाया पड्जमव्यमौ न्यासौ। सप्तस्वरा अपन्यासाः । -- स० र०, स्वरा०, अ० सं०, पृ० २३२

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जाति-लक्षण ११७

७-म ऋवभांश षड्जमध्यमा-चिकारियॉ ऋपभ मे मिलाने पर मध्य स्थान पॉचवे और तारस्थान बारहवे पर्दे से मिलेगा। मेरु से ९-घ चौथे पर्दे तक मन्द्रस्थानीय पॉच स्वर मिलेगे, जिनमे न्यासस्वर १०-नि मध्यम और पड्ज तथा न्यास पड्ज से पर मन्द्र निपाद भी है। ११-स गान्धारांश षड्जमव्यमा-चिकारियाँ गान्वार मे मिलाने १२-रे पर मध्यस्थान छठे और तारस्थान तेरहवे पर्दे से मिलेगा। मेरु १३-ग से पॉचवे पर्दे तक मन्द्रस्थानीय छ स्वर मिलेगे, जिनमे न्यास- १४-म स्वर मध्यम और षड्ज भी है। १५-प मध्यमांश षड्जमध्यमा-चिकारियॉ मध्यम मे मिलाने पर १६-ध मेरु से मन्द्र, सातवे पर्दे से मध्य और चौदहवे पर्दे से तार स्थान की १७-नि प्राप्ति होगी। तारस्थानीय ऋपभ-गान्वार अठारहवे पर्दे पर १८-स मीड द्वारा मिल जायँगे।

पञ्चमांश षड्जमध्यमा-चिकारियॉ पञ्चम मे मिलाने पर पहले पर्दे से नन्द्र, आठवे से मध्य और पन्द्रहवे से तार स्थान की प्राप्ति होगी। अठारहवे पर्दे पर रे, ग, म प्राप्त होने पर तारस्थान सम्पूर्ण मिलेगा। धैवतांश षड्जमध्यमा-चिकारियॉ धैवत मे मिलाने पर दूसरे से मन्द्र, नवे से मध्य एव सोलहवे से तार स्थान की प्राप्ति होगी। अठारहवे पर्दे पर मीड द्वारा रे, ग, म, प्राप्त करने पर सम्पूर्ण तारस्थान मिल जायगा। निषादांश षड्जमध्यमा -- चिकारियॉ निपाद मे मिलाने पर तीसरे पर्दे से मन्द्र, दसवे से मध्य और सत्रहवे से तार स्थान की प्राप्ति होगी। अठारहवे पर रे, ग, म प्राप्त करने से तारस्थानीय पॉच स्वर मिल जायॅगे।

(११) गान्धारोदीच्यवती महर्पि भरत का विधान है- "गान्वारोदीच्यवा मे पड्ज और मध्यम अशस्वर होते है। इस जाति मे औड्वितत्व नही है और पाडव रूप ऋपभ के लोप से बनता है। इसमे अल्पत्व, वहुत्व, न्यास और अपन्यास की विधि षड्जोदीच्यवा-जैसी है।"१२

९२-गान्धारोदीच्यवाशौ च विज्ञेयौ पड्ज-मध्यमौ। पञ्चस्वर्य्य न चास्त्यत्र पाठ्स्वर्य्यम् ऋपभ विना॥

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११८ भरत का सगीत-सिद्धान्त

नान्यदेव* का कथन है- "जिसमे पड्ज और मध्यम अग हो, मध्यम न्यास हो, ऋपभ के लोप से पाडव प्रकार वनता हो, जिसमे औडवावस्था न हो, जिस जाति में पूर्णता विकल्प से हो और मन्द्रस्थान मे गान्वार का वाहुल्य हो, वह गान्धारोदीच्यवती जाति है।"९ आचार्य शार्ङ्गदेव कहते है- "गान्धारोदीच्यवा में पड्ज एवं मध्यम स्वर अंश होते है। ऋषभ के लोप से पाडव रूप होता है। पूर्णावस्था मे अनंश स्वर अल्प रहते है, पाडवावस्था में नि, ध, प, ग अल्प होते है। ऋपभ-धैवत की सगति है। मूर्च्छना धैवतादि है। ताल चञ्चत्पुट और कलाएँ सोलह है। चतुर्थ अंक के ध्रुवागान मे विनियोग है। गान्धारोदीच्यवा में मध्यम न्यास और पड्ज-धैवत अपन्यास है।"१४ मतङ्गकिन्नरी पर धैवतादि मूच्छना की स्थापना से निम्नस्थ स्थिति होगी-

अस्यास्त्वल्पवहुत्वस्य न्यासापन्यासयोस्तथा । यः पड्जोदीच्यवायास्तु सर्वोऽत्र स विधि: स्मृतः ॥ -- भरत०, व०स०, पृ० ४५० *मतङ्गलक्षण भरतकोग मे न होने के कारण नही दिया जा रहा है। ९३-स्वरौ मध्यमपड्जाख्यौ अशौ यत्र प्रकीर्तितौ। न्यास. स्यान्मध्यमो यस्या पाडवं चर्षभ दिना॥ नास्त्येवौडुवित यस्यां विकल्पाद् यत्र पूर्णता। मन्द्रस्थाने च गात्वारवाहुल्यं दृश्यते तथा॥ -नान्यदेव, भ० को०, पृ० १७४ ९४-गान्वारोदीच्यवाया तु द्वावंशौ पड्जमध्यमौ। रिलोपात् पाडव ज्ञेयं पूर्णत्वेंशेतराल्पता।। अल्पा निधपगान्वारा. पाडवत्वे प्रकीतिता.। रिधयो. सङ्गतिर्ज्ञया धैवतादिश्च मूर्च्छना ॥ तालश्चञ्चत्पुटो ज्ञेय. कला पोडश कीतिता.। विनियोगो ध्रुवागाने चतुर्थप्रेक्षणे मतः॥ अस्यां गान्धारोदीच्यवाया मध्यमो न्यास.। षड्जधैवतावपन्यासौ। -सं० र०, अ० सं०, स्वरा०, पृ० २३६

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जाति-लक्षण ११९

पर्दे स्वर 0 - ध षड्जांश गान्धारोदीच्यवती-चिकारियॉ पड्ज मे मिलाने १-नि पर दूसरे पर्दे से मन्द्र, नवे से मध्य और सोलहवे से तार स्थान की २-स प्राप्ति होगी। अठारहवे पर्दे पर म, प, ध, नि भी प्राप्त कर लेने से ३-रे सम्पूर्ण तार स्थान मिल जायगा। ऋषभ की संगति के लिए अति- ४-ग मन्द्र धैवत मेरु पर मिलेगा। ५-म मध्यमांश गान्धारोदीच्यवती-चिकारियॉ मव्यम मे मिलाने ६-प पर पॉचवे पर्दे से मध्य और वारहवे से तार स्थान की प्राप्ति होगी। ७-ध मेरु से चौथे पर्दे तक मन्द्रस्थानीय पॉच स्वर मिलेगे। विकृत ८-नि जातियो मे न्यास की मन्द्रावस्था मे जाना आवश्यक नही होता। ९-स (१२) रक्तगान्धारी १०-रे महर्षि भरत का कथन है- ११-ग "इस जाति का लक्षण, पाडव और औडव इत्यादि अवस्थाएँ १२-म गान्धारी के समान जाननी चाहिए। इस जाति मे धैवत और १३-प निपाद वलवान् होते है। गान्धार और पड्ज की सङ्गति ऋपभ के १४-ध अतिरिक्त अन्य स्वरो के साथ है। इस जाति मे केवल मध्यम १५-नि अपन्यास है।"९५ १६-स १७-रे १८-ग मतङ्ग का कथन है- "रक्तगान्धारी के अश और ग्रह पड्ज-मध्यम-पञ्चम-गात्वार-निपाद होते है। तारस्थान मे पाँच स्वरी का प्रयोग है। मन्द्रस्थान मे न्यास अथवा उससे अवरोह

९५-गान्धारी (रो?) विहितो न्यास हीनस्वर्य्यंञ्च लक्षणम्। सर्वञ्च रक्तपूर्वाया गान्धार्या्च विनिर्दिशेत् । वलिनौ भवतश्चात्र धवतः सप्तमस्तथा। गान्वारपड्जयोर्चात्र सञ्चार. ऋपभं बिना। अपन्यासस्तथा चात्र एको वै मव्यम: स्मृत ॥ -भरत०, व० सं०, पृ० ४४९-५०

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१२० भरत का संगीत-सिद्धान्त

गति में पर स्वर तक जाते है। पाडव अवस्था ऋपभहीन और औडवावस्था ऋपभ- धंवत-हीन होती है। पूर्णावस्था मे ऋषभ-धैवत का अल्पत्व तथा अवशिष्ट स्वरों का बाहुल्य होता है। निषाद अंश होने के कारण बहुल होना चाहिए, परन्तु (महषषि भरत के ?) वचन के परिणामस्वरूप वह अवहुल (अल्प) होता है। पाडव दशा मे वैवत का अल्पत्व होता है। ऋपभ का कभी नही होता। औडवावस्था मे सभी अश- स्वरो के रहने के कारण किसी का अल्पत्व नही होता। पूर्वोक्त विवान के परिणाम- स्वरूप अवशिष्ट स्वर बहुल होते है। न्यास गान्धार ही है। अपन्यास मध्यम है। पड्ज-गान्वार की सङ्गति है। ... मूर्च्छना ऋपभादि है। करुण रस है। ताल पञ्चपाणि है। एककल-द्विकल-चतुष्कल, चित्र-वार्तिक-दक्षिण मार्ग मे क्रमश मागधी, सम्भाविता, पृथुला गीतियाँ है।"१६ मतङ्ग के उपर्युक्त लक्षण मे स्थूलाक्षर भाग नाट्यशास्त्र के मुद्रित संस्करणो तथा शार्ङ्गदेव इत्यादि के लक्षणों से मेल नही खाता। सम्भव है कि भरतकोश में दिया हुआ मतङ्गवाला यह पाठ अशुद्ध हो। निपाद का अल्पत्व इस जाति से होना कुछ समझ मे नही आता। हो सकता है कि मतङ्ग के समक्ष नाट्यशास्त्र का कोई और पाठ रहा हो या उनको गुरुपरम्परा से इस जाति मे निपाद का अल्पत्व प्राप्त हुआ हो। मतङ्ग ने किसी भरत को अपना गुरु कहा है। मतङ्ग इस जाति में निपाद का अल्पत्व 'वचन' के परिणामस्वरूप अपवाद रूप मे मानते है। आचार्य शार्ङ्गदेव का कथन है- "रक्तगान्वारी मे धैवत और ऋपभ के अतिरिक्त अन्य स्वर अंश होते है। पड्ज- गान्धार की सगति ऋपभ के अतिरिक्त अन्य स्वरो के साथ करनी चाहिए। रिलोप

९६-रक्तगान्धार्या षड्जमध्यमपञ्चमगान्धारनिपादा ग्रहा अशाश्च। पञ्चस्वर- परस्तारः। न्यासपरस्तत्परो वा मन्द्र । ऋषभहीन पाडवम्। रिधहीनमौडु- वितम्। पूर्णावस्थायाम् ऋषभ-वैवतयोरल्पत्वम्। शेपाणा वाहुल्यम्। निषाद- स्यांशरवाद् बहुत्वे प्राप्ते वचनादबहुत्वम्। षाडवे धैवतस्याल्पत्वम्। ऋषभस्य न कदाचिदपि। औडुविते सर्वेपामशत्वान्न कस्याप्यल्पत्वम्। उक्तभङग्या शेपाणां बाहुल्यम्। न्यासो गान्धार एव। अपन्यासस्तु मध्यमः । पड्जगान्वा- रयोस्तु सञ्चार । ... ऋपभादिमूर्च्छना। करुणो रसः। ताल. पञ्वपाणिः । एकद्विचतुष्कलेपु चित्रवार्तिकदक्षिणेपु मागधीसम्भावितपृथुला गीतय।

९७-भरत गुरुमाह मतङ्ग. । -मतङ्ग, भ० को०, पृ० ५१६ -- भ० को०, पृ० ४२४

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जाति-लक्षण १२१

और रिधलोप से पाडव और औडव रूप होता है। निषाद और धैवत का बाहुल्य है। पञ्चम अश होने पर पाडवद्वेपी होता है। पड्ज, निपाद, मध्यम और पञ्चम अश होने पर औडुवद्वेपी होते है। पड्ज-गान्वार की भी परस्पर सङ्गति करनी चाहिए। पाड्जी के समान पञन्चपाणि इत्यादि ताल है। मूर्च्छना ऋषभादि है। तृतीय अंक की ध्रुवा में विनियोग है। इस रक्तगान्धारी मे गान्धार न्यास और मध्यम अपन्यास है।" मतङ्गकिन्नरी पर ऋषभादि मूर्च्छना स्थापित करने पर रक्तगान्वारी के विभिन्न रूपो की स्थिति इस प्रकार होगी- पर्दे स्वर गान्धारांश रवतगान्धारी-चिकारिया गान्वार मे मिलाने 0-रे पर पहले पर्दे से मन्द्र, आठवे पर्दे से मध्य एव पन्द्रहवे पर्दे से तार १-ग स्थान की प्राप्ति होगी। अठारहवे पर्दे पर निपाद और प्राप्त कर 2-म लेने तथा मतङ्गोक्त तार-स्थानीय पांच स्वर तथा पड्ज-ऋपभ भी प्राप्त कर लेने से तारावधि की पराकाष्ठा प्राप्त हो जायगी। ४-घ न्यासस्वर से अवरोह गति मे पर अतिमन्द्र ऋपभ मेरु पर ५-नि मिल जायगा। ६-स मध्यमांश रक्तगान्धारी-चिकारियॉ मध्यम मे मिलाने पर ७-रे दूसरे पर्दे से मन्द्र, नवे से मध्य और सोलहवे से तार स्थान की ८-ग प्राप्ति होगी। अठारहवे पर्दे पर नि, स भी प्राप्त करने पर ९-म तारस्थानीय पॉच स्वर मिल जायँगे। १० :- प ११-ध पञ्चमांश रक्तगान्धारी-चिकारियॉ पञ्चम में मिलाने १२-नि पर तीसरे पर्दे से मन्द्र, दसवे से मध्य और सत्रहवे से तार स्थान

१३-स की प्राप्ति होगी। अठारहवे पर्दे पर नि, स, रे प्राप्त करने पर १४-रे तारस्थानीय पॉच स्वर प्राप्त हो जायँगे।

१५-ग निषादांश रक्तगान्धारी-चिकारियॉ निपाद मे मिलाने १६-म पर पॉचवे पर्दे से मध्य और वारहवें पर्दे से तारस्थान की प्राप्ति १७-प हो जायगी। मेरु से चौथे पर्दे तक मन्द्रस्थानीय पाँच स्वर १८-ध मिलेगे जिनमे न्यास स्वर गान्धार भी है।

९८-अंशाः स्यू रक्तगान्धार्य्या पञ्च धर्पभवजिता। रिमतिक्रम्य सगयो. कार्य्ये सन्निधिमेलने॥

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१२२ भरत का संगीत-सिद्धान्त

षड्जांश रक्तगानधारी चिकारियॉ पड्ज में मिलाने पर छठे पर्दे से मध्य और तेरहवे से तार स्थान की प्राप्ति होगी, तारस्थानीय निपाद भी अठारहवें पर्दे पर प्राप्त किया जा सकता है। मेरु से पॉचवे पर्दे तक मन्द्रस्थानीय छःस्वर मिलेगे। (१३ ) कैशिकी महर्पि भरत का कथन है- "ऋपभ के अतिरिक्त अन्य सभी स्वर कैशिकी के अंश होते है। यही स्वर अप- न्यास होते हैं। गान्वार और निपाद न्यास होते है। धैवत और निपाद अंश होने पर 'पञ्चम' न्यास होता है, कभी इस जाति मे ऋपभ भी अपन्यास होता है। ऋपभ के लोप से इस जाति में पाडव और धैवत-ऋपभ के लोप से औडुव रूप बनता है। इस जाति मे पड्ज (निपाद ?) पञ्चम बली होते है। इस जाति मे विशेषतया ऋपभ का दौर्वल्य और लंघन है। स्वर-सञ्चार पड़जमध्या के समान है।" दत्तिल* का कथन है- "कैगिकी मे ऋपभ अनंशस्वर है, द्विश्रुति दोनो स्वर न्यास है। इसमें क्रमशः ऋपभ

रिलोपरिधलोपाभ्यां पाडवौड्वमिप्यते। बहुत्व निधयोरंश. पञ्चमो द्वेष्टि षाडवम्॥ द्विषन्त्यौडुवित पड्जनिमपा' सगतौ सगौ। पञ्चपाण्यादि पाड्जीवद् ऋषभादिस्तु मूर्च्छना। तृतीयप्रेक्षणगत-ध्रुवायां विनियोजनम् ॥ अस्यां रक्तगान्धार्य्या गान्धारो न्यास.। मध्यमोऽपन्यासः । -- सं० र०, अ० स०, स्वरा०, पृ० २४०-४२ ९९-कशिक्यशास्तु विज्ञेया. स्वरा. सर्वेपभ विना। एत एव ह्यपन्यासा न्यासौ गान्धारसप्तमौ ।। धवतेऽ्रश निषादे चन्यास: पञ्चम इप्यते। अपन्यास: कदाचिच्च ऋपभोऽपि भवेदिह॥ आर्पभ्य पाडव चात्र वैवतर्पभवर्जितम्। तथा चौडुवित कार्य्य बलिनौ ड्ज (चान्त्य) पञ्चमौ।। दौर्वल्य ऋपभस्यात्र लघनं च विशेपत. । षड्जमध्यावदत्रापि सचारस्तु विधीयते ॥। -भरत०, व० स०, पृ० ४५२-४५३ *अप्राप्त होने के कारण मतङ्ग-लक्षण नही दिया जा रहा है।

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जाति-लक्षण १२३

और धैवत का लोप करना चाहिए। निपाद और धैवत के अंश होने पर पञ्चम भी न्यास होता है। कुछ लोग अंशस्वरो के समान ही निपाद को भी अपन्यास स्वर कहते है। इस जाति मे पञ्चम और निपाद बलवान् है।"१०० आचार्य शार्ङ्गदेव कहते है- "कैशिकी जाति मे ऋपभ के अतिरिक्त स्वर अश होते है। जब नि, ध अश हो, तो न्यासस्वर पञ्चम तथा अन्य अवस्थाओ मे द्विश्रुतिस्वर (ग, नि) न्यास होते है। अन्य (मतङ्ग आदि) नि, ध की अशावस्था मे नि, ग, प तीनो स्वरो को न्यास मानते है। रिलोप और रिधलोप से पाडव-औडुव प्रकार बनते है। ऋपभ अल्प, नि, प बहुल तथा अशस्वरो मे परस्पर सगति है। क्रमश. पञ्चम और धैवत षाडव और औडुव अवस्थाओ के विरोधी है। पञ्चपाणि इत्यादि पाड्जी के समान है। मूर्च्छना गान्धारादि है। पञ्चम अंक की ध्रुवा में विनियोग है। इस जाति मे गान्वार-पञ्चम-निपाद न्यास है। ऋंपभ के अतिरिक्त छहो स्वर अथवा (कुछ लोगों की दृष्टि मे) सातो स्वर अपन्यास है।"१०१ भरतनाट्यशास्त्र के वम्बई-सस्करण का 'बलिनौ षड्ज-पञ्चमौ' पाठ लेखन- प्रमाद का परिणाम है। काशी-संस्करण मे 'वलिनौ चान्यपञ्चमौ' पाठ है, जो कल्लि- नाथ द्वारा दिये हुए शुद्ध पाठ 'बलिनौ चान्त्यपञ्चमौ' का अशुद्ध रूप है। दत्तिल और शार्ङ्गदेव ने भी इस जाति मे अन्त्य (अन्तिम स्वर निपाद) और पञ्चम को ही वली माना है।

१००-कैशिक्यामृषभोऽनंशो वि (वै?) न्यासौ द्विश्रुती मतौ। ऋपभो धैवतश्चैव हेयावस्यां यथाक्रमम्॥ पञ्चमोऽपि भवेन्न्यासो निपादेऽशे सैवते। ऋपभः स्यादपन्यास. कैश्चिदुक्तोऽशवत्तथा। पञ्चमो वलवानस्यां स्यान्निपादस्तथैव च ।-दत्तिल, भ० को०, पृ० १५१ १०१-कैशिक्यामृपभान्येऽशा निधावशौ यदा तदा। न्यास. पञ्चम एव स्यादन्यदा द्विश्रुती मतौ॥ अन्ये तु निगपान् न्यासान् निधयोरशयोविदु । रिलोपरिघलोपेन पाडवौडुवित मतम् ॥ रिरल्पो निपवाहुल्यमंशाना संगतिमिंय। पाडवौडुविते द्विष्ट. क्रमात् पञ्चमधैवतौ।। पाड्जीवत्पञ्चपाण्यादि गान्धारादिस्तु मूर्च्छना।

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१२४ भरत का संगीत-सिद्धान्त

मतङ्गकिन्नरी पर गान्धारादि मूर्च्छना स्थापित करने से कैशिकी की विभिन्न अवस्थाएँ यो होगी- पर्दे स्वर। 0 -ग गान्यारांश केशिकी-चिकारियॉ गान्धार में मिलाने पर १-म मेरु से मन्द्र, सातवे पर्दे से मध्य और चौदहवे पर्दे से तार स्थान २-प की प्राप्ति होगी। अठारहवे पर्दे पर षड्ज और ऋपभ भी प्राप्त ३-घ किये जा सकते है। मन्द्रस्थान मे गान्वार और निपाद दोनो ४ -- नि न्यासस्वर मिल जायँगे। ५-स नव्यमांश कैशिकी-चिकारियाँ मध्यम मे मिलाने पर ६-रे पहले पर्दे से मन्द्र, आठवे से मध्य और पन्द्रहवे से तार स्थान की प्राप्ति होगी। तारस्थानीय स, रे, ग अठारहवे पर्दे पर प्राप्त किये ८-म जा सकते हैं। ९-प पञ्चमांश कैशिकी-चिकारियॉ पञ्चम मे मिलाने पर दूसरे १०-घ पर्दे से मन्द्र, नवे से मध्य और सोलहवे से तार स्थान की प्राप्ति ११-नि होगी। तारस्थानीय स, रे, ग, म भी अन्तिम पर्दे पर प्राप्त किये जा १२-स सकते है। १३-रे धंवतांश कैशिकी-चिकारियॉ धैवत मे मिलाने पर तीसरे १४-ग पर्दे से मन्द्र, दसवे से मध्य और सत्रहवे से तार स्थान की १५-म प्राप्ति होगी। तारस्थानीय स, रे, ग भी अन्तिम पर्दे पर प्राप्त १६-प किये जा सकते है। इस अवस्था मे न्यासस्वर 'पञ्चम' मन्द्र एव १७-ध अतिमन्द्र स्थान मे भी मिलेगा। १८-नि निषादांश कैशिकी-चिकारियॉ निषाद मे मिलाने पर चौथे पर्दे से मन्द्र, ग्यारहव से मध्य और अठारहवे पर्दे से तारस्थान की प्राप्ति होगी, जिस पर तार स, रे, ग, म भी प्राप्त किये जा सकते है। इस अवस्था मे न्यास पञ्चम की मन्द्र, एव मन्द्रतम अवस्थाएँ भी प्राप्त होगी।

पञ्चमप्रेक्षणगत ध्रुवाया अस्यां कैशिक्यां गान्धारपञ्चमनिपादा न्यासाः। रिवर्ज्याः पट् सप्त वा स्वरा अपन्यासा। विनियोजनम् ॥

-सं० र०, अ० स०, स्वरा०, पृ० २४४-२४५

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जाति-लक्षग १२५

षड्जांश कैशिकी-चिकारियाँ पड्ज मे मिलाने पर पॉचवें पर्दे से मध्य और बार- • हवे पदे से तार स्थान की प्राप्ति होगी। मेरु से चौथे पर्दे तक मन्द्रस्थानीय पॉच स्वर मिलेगे, जिनमे गान्धार और निषाद न्यासस्वर भी है। (१४) मध्यमोदीच्यवा महर्षि भरत का कथन है- "मध्यमोदीच्यवा का अशस्वर पञ्चम है। अन्य सव विशेपताएँ गान्धारोदी च्यवा- जैसी है।"१०२ महाराज हरिपाल का कथन है- "इस जाति मे पञ्चम अश है और यह नित्य सम्पूर्ण है। इसका अवशिष्ट लक्षण गान्धारोदीच्यवा जैसा है।"१०३ आचार्य शार्गदेव का कथन है- "मध्यमोदीच्यवा मे पञ्चम अश होता है, नित्य सम्पूर्ण जाति है। अन्य लक्षण गान्धारोदीच्यवा-जैसे जानने चाहिए। मूर्च्छना मध्यमादि है और ताल चञ्चत्पुट है। चतुर्थ अक के ध्रुवा-गान मे इसका विनियोग है। इस जाति मे न्यासस्वर मध्यम

मतङ्गकिन्नरी पर मध्यमादि मूर्च्छना स्थापित करने से इसकी स्थिति इस प्रकार होगी-

१०२-मध्यमोदीच्यवायास्तु पञ्चमोऽश प्रकीर्तित । शेपो विधिस्तु कर्तव्यो गान्धारोदीच्यवागत । --- भरत०, व० सं०, पृ० ४५० १०३-तत्राश. पञ्चमो नित्यं साप्तस्वर्य्यञ्च दृश्यते। गान्धारोदीच्यवावत् स्यात् गिप्टमस्यास्तु लक्षणम् ॥। -हरिपाल, व० स०, पृ० ४५० १०४-पञ्चमांशा सदा पूर्णा मध्यमोदीच्यवा मता। लक्ष्म शेष विजानीयाद् गान्वारोदीच्यवागतम् ॥ मूर्च्छना मध्यमादि स्यात्तालश्चञ्चत्पुटो मत। चतुर्थस्य प्रेक्षणस्य ध्रुवायां विनियोजनम् ॥ अस्या मध्यमोदीच्यवाया मध्यमो न्यास. । -- स० र०, स्वरा०,अ०स०, प०२४८-४९

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१२६ भरत का संगीत-सिद्धान्त

पर्दे स्वर 0 -म पञ्चमांश मध्यमोदीच्यवा-चिकारियॉ पञ्चम में मिलाने १-प पर पहले पर्दे से मन्द्र, आठवे से मध्य और पन्द्रहवें से तारस्थान की २-ध प्राप्ति होगी। तारस्थानीय रे, ग, म भी अन्तिम पर्दे पर प्राप्त ३-नि हो जायँगे। ४-स यद्यपि मतङ्ज् का लक्षण हमें प्राप्त नही है, परन्तु जिन-जिन 4-रे जातियों के मतङ्गलक्षण प्राप्त है, वे सिद्ध करते है कि शाङ्गदेव ने जातियों की मूर्च्छनाओ का निर्देश मतङ्ग के अनुसार किया है। ७-म इस जाति मे केवल पञ्चम स्वर अश होता है, फलतः यदि ८-प भरत का यह विधान माना जाय कि मन्द्र अंश से अवरोहगति मे ९-ध नही जाना चाहिए, तो इस जाति की मूर्च्छना पञ्चमादि रखने से १०-नि अन्तिम पर्दे पर गान्धार-मव्यम की प्राप्ति करने के परिणामस्वरूप ११-स सम्पूर्ण तीनो स्थान मिल सकते है। परन्तु मतङ्ग ने मन्द्रावस्था मे १२-रे न्यासस्वर या मन्द्रगति मे उससे पर स्वर पर अधिक बल दिया है, १३-ग यहाँ तक कि ने अतिमन्द्र स्थान मे जाने से भी नही हिचकते। प्रस्तुत १४-म जाति की मूर्च्छना मध्यमादि निश्चित करने मे अतिमन्द्र न्यास १५-प मध्यम प्राप्त करने की चेष्टा कारण है। १६-ध मतङ्ग के विधान मे तारस्थान के अधिक-से-अधिक पॉच १७-नि स्वरो का प्रयोग पाया जाता है और मन्द्रगति में न्यास अथवा १८-स मन्द्रगति मे उससे पर मन्द्र की ओर अधिक ध्यान रहता है। (१५) कार्मारवी महर्षि भरत का कथन है- "कार्मारवी के अश एव अपन्यास स्वर ऋपभ, पञ्चम, धैवत, निषाद है। न्यास स्वर पञ्चम है, सदा सम्पूर्ण जाति है, गान्धार की सङ्गति सभी स्वरो के साथ है।"१04 प्रयोग मे अनंश स्वर सदा वली है।१६

१०५-कार्मारव्या स्मृता ह्यंशा ऋषभः पञ्चमस्तथा। धैवतश्च निपादश्चाप्यपन्यासस्त एव तु॥ पञ्चमश्च भवेन्न्यासो हीनस्वर्य न चात्र तु। गान्वारस्य विशेषेण सर्वतो गमनं भवेत् ॥' -- भरत०, व० सं०, पृ० ४५२

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जाति-लक्षण १२७

महाराज नान्यदेव कहते है- "जिसमे निपाद, धैवत, पञ्चम, ऋपभ अश होते ह, यही अपन्यास होते है और न्यास स्वर पञ्चम होता है, वह कार्म्मारवी जाति है।"१८७ आचार्य शार्ङ्गदेव का कथन है- "कार्म्मारवी मे निपाद, धैवत, ऋपभ और पञ्चम अश होते है। अन्तर मार्ग का आश्रय लेने से अनश स्वर भी बहुल होते है। गान्वार अत्यन्त बहुल है, क्योकि उसकी सगति सब अशस्वरो के साथ भी है (और अनश स्वरों के साथ भी)। चञ्चत्पुट ताल, सोलह कलाएँ और पड्जादि मूच्छना है। पञ्चम अङ्द की ध्रुवा मे विनियोग है। इस जाति मे पञ्चम न्यास तथा अंशस्वर अपन्यास है।"१८ मतङ्गकिन्नरी पर पड़्जादि मूर्च्छना स्थापित करने से निम्नस्थ स्थिति होगी- पर्दे स्वर 0 -- स पञ्चमांश कार्मारवी-चिकारियाँ पञ्चम मे मिलाने पर १-रे चौथे पर्दे से मन्द्र, ग्यारहवे से मध्य और अन्तिम पर्दे पर ध, नि, स, 2-ग रे भी प्राप्त करने पर तारस्थानीय पॉच स्वरो की प्राप्ति होगी। ३-म घेवतांश कार्मारवी-चिकारियॉ धैवत मे मिलाने पर पॉचवे ४-प पर्दे से मध्य और वारहवें पर्दे से तार स्थान की प्राप्ति होगी। मेरु से ५-ध चौथे पर्दे तक मन्द्रस्थानीय पॉच स्वरो की प्राप्ति होगी।

१०६-अनशा वलवन्तस्तु नित्यमेव प्रयोगत । -भरत०, कल्लिनाथ द्वारा उद्धृत, स० र०, स्व०, पृ० २५२ हीनस्वर्य न चात्र स्यादनंशा वलिनस्तथा। -भरत०, का० स०, पृ० ३२९ १०७-अशा निषादवैवतपञ्चमरिपभा भवन्ति यत्रामी। अपि चैतेऽपन्यासा न्यासस्थाने च पञ्चमो यस्याम्॥ -नान्य ०, भ० को०, पृ० १३१ १०८-कार्मारव्या भवन्त्यशा निषादरिपधैवता। वहवोऽन्तरमार्गत्वादनशा. परिकीतिता॥। गान्धारोऽत्यन्तवहुल: सर्वाशस्वरसगति.। चञ्चत्पुट पोडगात्र कला. पड्जादि- मूर्च्छना। पञ्चमस्य प्रेक्षणस्य ध्रुवायां विनियोजनम्॥ अस्यां कार्मारव्यां पञन्चमो न्यास.। अशा एवापन्यासा:। -सं० र०, स्वरा० अ० सं०, पृ० २५३

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१२८ भरत का संगीत-सिद्धान्त

६-नि निषादांश कार्मारवी-चिकारियाँ निपाद में मिलाने पर ७-स छठे पर्दे से मध्य और तेरहवे पर्दे से, अन्तिम पर्दे पर धैवत भी ८-रे प्राप्त कर लेने पर, तार स्थान की प्राप्ति होगी। मन्द्रस्थानीय छः ९-ग स्वर मेरु से पाँचवे पर्दे तक मिल जायँगे। १०-म ऋपभांश कार्मारवी-चिकारियाँ ऋपभ मे मिलाने पर ११-प पहले पर्दे से मन्द्र, आठवे से मध्य और पन्द्रहवे से तार स्थान की १२-व प्राप्ति होगी। तारस्थानीय ध, नि, स भी अन्तिम पर्दे पर प्राप्त १३-नि हो जायँगे। १४-स १५-रे १६-ग १७-म १८-प

(१६) गान्धारपञ्वमी महर्पि भरत का विधान है- "गान्वार-पञ्चमी मे अशस्वर पञ्चम होता है, पञन्चम और ऋपभ अपन्यास कहे गये है। गान्वार न्यासस्वर है। इस जाति में पाडव और औडव रूप नही होता। इसमे 'गान्धारी' और 'पञ्चमी' के समान स्वर-सगति होती है।"१९ दत्तिल का कथन है- "गान्धारपञ्चमी मे प्रयोक्ताओ को अंशस्वर पञ्चम जानना चाहिए, वह पञ्चम (और) ऋपभ अपन्यास होते है। गान्वार न्यास होता है। गान्वारी और पञ्चमी मे जो सङ्गति इत्यादि वतायी गयी है, वह इसमे भी जाननी चाहिए। किन्तु यह जाति नित्य सम्पूर्ण होती है।"११०

१०९-अथ गान्धारपञ्चम्या. पञ्चमा (मो)ऽश प्रकीर्तितः। पञ्चमञ्च (रच) पंभश्चैव अपन्यासौ प्रकीतितौ॥ गान्वारोऽन भवेन्न्यासो हीनस्वर्य न चेष्यते। पञ्चम्यास्त्वथ गान्धार्य्याः सज्वारश्च विधीयते ॥-भरत०,का० सं०, पृ० ३२९ ११०-जेयो गान्धारपञ्चम्यां पञ्चमोंऽशः प्रयोक्तृभिः । सर्पभः स्यादपन्यासो न्यासो गान्वार इष्यते।।

1

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जाति-लक्षण १२९

आचार्य शार्ङ्गदेव कहते है- "गान्धारपञ्चमी मे अंशस्वर पञ्चम है, इस जाति में भी गान्धारी और पञ्चमी के समान बहुल स्वरो से (न्यास और अशस्वरो से अन्य स्वरो की तथा ऋपभ-मध्यम की) सगति करनी चाहिए। इस जाति मे चञ्चत्पुट ताल, सोलह कलाएँ और गान्धारादि मूर्च्छना है। चतुर्थ अंक से सम्वद्ध ध्रुवागान में विनियोग है। इस जाति मे गान्धार न्यास है। ऋषभ-पञ्चम अपन्यास है।"१११ मतङ्गकिन्नरी पर गान्धारादि मूच्छना स्थापित करने से स्थिति यो होगी- पर्दे स्वर 0 -ा चिकारियॉ गान्वार मे मिलाने पर मेरु से मन्द्र, सातवे पर्दे १-म से मध्य और चौदहवे से तार स्थान की प्राप्ति होगी। तारस्थानीय २-प षड्ज और ऋषभ की प्राप्ति भी अन्तिम पर्दे पर की जा सकती है। ३-ध ४ -- नि ५-स ६-रे

८-म ९-प १०-ध ११-नि १२-स

गान्धार्य्यामथ पञ्चम्यां यत्सञ्चारादि कीर्तितम्। तदस्यामपि विज्ञेय किन्तु पूर्णस्वरा सदा ।।

१११-अशो गान्धारपञ्चम्या पञ्चम सङ्गति. पुन। -दत्तिल, भ० को०, पृ० १७३

कर्तव्यात्रापि गान्वारीपञ्चम्योरिव सूरिभिः ।। चञ्चत्पुट पोडशात्र कला गादिश्च मूर्च्छना। तुर्य्यप्रेक्षणसम्वन्धिध्रुवागाने नियोजनम् ॥ अस्या गान्वारपञ्चम्यां गान्वारो न्यास. 1 ऋपभपञ्चमावपन्यासी। -सं० र०, अ० सं०, स्वरा०, पृ० २५६ ९

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भरत का संगीत-सिद्धान्त

१३-रे १४-ग १५-म १६-प १७-घ १८-नि

महर्ष भरत का कथन है- (१७) आन्ध्री

"आन्ध्री मे ऋषभ, पञ्चम, गान्धार, निपाद अंश होते है, वही अपन्यास होते है। न्यासस्वर गान्वार है, पड्ज के लोप से षाडवावस्था वनती है, गान्वार और ऋषभ की परस्पर सङ्गति है और धैवत एव निषाद की। अंशस्वर के पश्चात् पर्यायांशों का प्रयोग करते हुए न्यासस्वर तक सचार है।"१२ महाराज हरिपाल कहते है- "इस जाति में षड्ज, मध्यम और धैवत के अतिरिक्त अन्य स्वर अश होते है। षड्ज के लोप से पाडव रूप बनता है। न्यासस्वर गान्धार है।"१२ आचार्य शाङ्गदेव का कथन है- "आन्ध्री में नि, रे, ग, प अंश है, रि-ग और नि-ध की परस्पर सगति है। अंशा- नुक्नम से न्यासस्वर तक जाना चाहिए। मूर्च्छना मध्यमादि है, कला, काल, विनियोग इत्यादि गान्धारपञ्चमी के समान है। इस आन्ध्री जाति में गान्धार न्यासस्वर है और अंशस्वर ही अपन्यास है।"११४

११२-चत्वारोऽशा भवन्त्यान्ध्रयामपन्यासास्त एव तु। गान्वारश्च भवेन्न्यास: पड्जोपेतं च षाडवम्॥ गान्धारर्षभयोश्चापि सञ्चारस्तु परस्परम्। सप्तमस्य च षड्जस्य (पष्ठस्य, का० स०) न्यासो गत्यनुपूर्वशः॥ -- भरत०, व० स०, पृ० ४५१ ११३-आन्ध्री निरूप्यतेऽ्थास्यां पड्जमध्यमघैवतैः। होना: स्वरा इहाशा. स्यु: पाडव षड्जवरजित । न्यासो गान्धार एव स्यादान्ध्जातिरुदाहृता॥

११४-आन्ध्यामंशा निरिगपा रिगयोनिधयोस्तथा। -हरिपाल, भ० को०, पृ० ५२

सगतिर्न्यासपर्यन्तमंशानुक्रमतो -- व्रजेत्।

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जाति-लक्षण १३१

मतङ्गकिन्नरी पर मध्यमादि मूर्च्छना स्थापित करने से स्थिति निम्नोक्त होगी- पर्दे स्वर निषादांश आन्ध्री-चिकारियाँ निषाद मे मिलाने पर 0 - म तीसरे पर्दे से मन्द्र, दसवें से मध्य और सत्रहवे से तार स्थान की १-प प्राप्ति होगी। तारस्थानीय रे, ग, म, प भी अन्तिम पर्दे पर मिल 2-ध जायॅगे। ३-नि ऋषभांश आन्ध्री-चिकारियॉ ऋपभ मे मिलाने पर पाँचवे ४-स पर्दे से मध्य और बारहवे से तार स्थान की प्राप्ति होगी। मेर 4-र से चौथे पर्दे तक मन्द्रस्थानीय पॉच स्वर मिलेगे। गान्वारांश आन्ध्री-चिकारियॉ गान्धार में मिलाने पर छठे ७ -- म पर्दे से मध्य और तेरहवे पर्दे से तार स्थान की प्राप्ति होगी। अन्तिम ८-प पर्दे पर तारस्थानीय ऋषभ भी मिल सकता है। मेरु से पॉचवे ९-ध १०-नि पर्दे तक मन्द्र-स्थानीय छ. स्वर भी मिलेगे।

११-स पञ्चमांश आन्ध्री-चिकारियॉ पञ्चम मे मिलाने पर पहले

१२-रे पर्दे से मन्द्र, आठवे से मध्य और पन्द्रहवें से तार स्थान की प्राप्ति

१३-ना होगी। तार-स्थानीय रे, ग, म भी अन्तिम पर्दे पर मिल जायँगे।

१४-म १५-प १६-ध १७-नि १८-स

(१८) नन्दयन्ती

महर्षि भरत का विधान है- "नन्दयन्ती मे पञ्चम ही सदा अश होता है। मध्यम एव पञ्चम अपन्यास होते है। पड्जहीन अवस्था पाडव होती है, वही पड्ज लघनीय है। इस जाति में स्वर-

षाडव पड्जलोपेन मध्यमादिस्तु मूच्छना। पूर्वावत्तु कलाकालविनियोगा: प्रकीर्तिता. ॥ अस्यामान्क्रया गान्धारो न्यासः। अंशा एवापन्यासाः । -- स० र०, अ० सं०, स्वरा० २६०-२६१

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१३२ भरत का संगीत-सिद्धान्त

सञ्चार आन्ध्री के समान है, ऋषभ का सदा लंघन (बाहुल्य ?) है। प्रयोक्ताओ ने उस ऋषभ तक मन्द्रगति बतायी है।"१५ तारगति षड्ज का अतिक्रमण कभी नही करती। गान्धार स्वर इस जाति में ग्रह और न्यास रखना चाहिए।"६ टिप्पणी-नाट्यशास्त्र के मुद्रित संस्करणो के पाठानुसार इसमें ऋपभ का लंधन होना चाहिए, परन्तु ये पाठ निश्चितरूपेण लिपिको के प्रमाद का परिणाम है। इस जाति मे ऋपभ का बाहुल्य ही सर्वसम्मत है। कल्लिनाथ के समक्ष नाट्यशास्त्र का जो पाठ था उसमे भी ऋपभ का बाहुल्य ही भरतोक्त वताया गया है।१७ दत्तिल का कथन है- "नन्दयन्ती मे मध्यम और पञ्चम अपन्यास है, ग्रह और न्यासस्वर गान्धार है, अंशस्वर पञ्चम है। पाडवावस्था आन्ध्री के समान जाननी चाहिए। इस जाति में औडव अवस्था नही होती। इसमे मन्द्र ऋपभ तक सज्चार होता है, वह कही लंघनीय भी है।"११८ दत्तिल के मत मे ऋपभ कही लंघनीय भी है। आचार्य शार्गदेव कहते है- "नन्दयन्ती मे पञ्चम अशस्वर और गान्धार ग्रहस्वर है। कुछ गीतमर्मज्ञ' इसमे पञ्चम को भी ग्रहस्वर कहते है। इसमे मन्द्र ऋषभ का बाहुल्य है और पड्ज

११५-नन्दयन्त्या भवन्त्यं (त्य?) श पञ्चमो नित्यमेव तु। स्यातामस्यामपन्यासौ मध्यम. पञ्चमस्तथा ॥ पाडव पड्जहीन तु लंघनीय. स एव तु। आन्ध्रीवत् सचरो नित्यमृपभस्य च लंघनम्। तन्न मन्द्रगति प्रोक्ता नित्यं गानप्रयोक्तृभि. ॥-भरत०, का० सं०, पृ० ३२९ ११६-तारगत्या तु पड्ज स्यात्कदाचिन्नातिवर्तते। गान्वारश्च ग्रह कार्यस्तथा न्यासश्च नित्यश ॥-भरत०, व० स०, पृ० ४५२ ११७-बाहुल्यमृषभस्यात्र तच्च मन्द्रगतं स्मृतम्। -- भरत०, कल्लिनाथोद्धृत, स० र०, स्वरा०, पृ० २६७ ११८-नन्दयन्त्यामपन्यासौ ज्ञेयौ मध्यमपञ्चमौ। ग्रहो न्यासश्च गान्वार पञ्चमोंऽश. प्रकीर्तित ॥ आन्ध्रीवत् षाडव ज्ञेयमनौडुवितमेव च। स्यान्मन्द्रर्षंभसञ्चारो लङ्नीयश्च स क्वचित् ॥ -दत्तिल, भ० को०, पृ० ३०३

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जाति-लक्षण १३३

के लोप से पाडव प्रकार बनता है। मूर्च्छना 'हृष्यका' है। ताल आन्ध्री के समान और कलाएँ उस जाति से द्विगुण अर्थात् बत्तीस है। प्रथम अक के ध्रुवागान मे विनियोग है। इस नन्दयन्ती मे न्यासस्वर गान्धार है तथा मध्यम-पञ्चम अपन्यास है।"११ मतङ्ग के प्राप्त जातिलक्षणो मे हम यह देख चुके है कि वे जातियो की मूर्च्छनाएँ बतलाते समय उनके लिए 'उत्तरमन्द्रा', 'सौवीरी' जैसी पारिभाषिक संज्ञाओ का प्रयोग न करके 'पड्जादि' और 'मध्यमादि' जैसी स्वरारम्भ सज्ञाओ का प्रयोग करते है। आचार्य शार्ङ्गदेव ने भी इसी पद्धति का अवलम्बन किया है, केवल नन्दयन्ती के लक्षण मे वे 'हृष्यका' शब्द का प्रयोग करते है। महर्षि भरत की मध्यमग्रामीय पञ्चमादि मूर्च्छना 'हृष्यका' है और मतङ्ग की मध्यमग्रामीय निपादादि 'द्वादशस्वर' मूर्च्छना हृष्यका है। इस जातिविशेष मे आचार्य शार्ङ्गदेव के द्वारा 'हृष्यका' श्द का प्रयोग वतलाता है कि वे इस जाति की मूर्च्छना पञ्चमादि ही मानते है, क्योकि मूर्च्छना-लक्षण मे वे द्वादशस्वर-मूर्च्छनावाद की चर्चा नही करते और उनकी अपनी 'हृष्यका' पञ्चमादि है।

महर्पि भरत के अनुसार इस जाति के तारस्थान मे प, ध, नि, स ये चार स्वर ही प्रयोज्य है, क्योकि वे तारस्थान मे पड्ज से आगे जाने का निपेध करते है, परन्तु 'रुद्रट' इस जाति मे भी प, ध, नि,स, रे, ग, म सातो स्वरो का प्रयोग विहित मानते है। आचार्य अभिनवगुप्त तथा कुम्भ ने मतङ्ग के द्वादशस्वर-मूर्च्छनावाद का खण्डन करते हुए, इस जाति मे कम से कम पन्द्रह स्वरो (मन्द्र ऋपभ, गान्धार, मध्यम, मध्यस्थानीय पञ्चम, धैवत, निपाद, पड्ज, ऋषभ, गान्धार, मध्यम और तारस्थानीय प, ध, नि, स, रे) का प्रयोग आवश्यक कहा है। आचार्य शार्ङ्गदेव ने भी इस जाति मे तार ऋपभ का प्रयोग किया है।

११९-नन्दयन्त्या पञ्चमोऽशो गान्धारस्तु ग्रह स्मृत । कैश्चितु पञ्चमः प्रोक्तो ग्रहोऽस्यां गीतवेदिभि.॥ मन्द्रपंभस्य वाहुल्य पाडव पड्जलोपत.। हृष्यका मूर्च्छना ताल. पूर्वावद् द्विगुणा कलाः ॥ विनियोगो ध्रुवागाने प्रथमप्रेक्षणे भवेत्। अस्यां नन्दयन्त्यां गान्धारो न्यास। मध्यमपञ्चमावपन्यासौ। -स० र०, अ० स०, स्वरा०, पृ० २६४

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१३४ भरत का संगीत-सिद्धान्त

मतङ्गकिन्नरी पर पञ्चमादि 'हृप्यका' की स्थापना करने पर स्थिति यों होगी- पर्दे स्वर पंचमांश नन्दयन्ती-चिकारियॉ पञ्चम में मिलाने पर मेरु से ० -- प छठे पर्दे तक भरतोक्त पूर्ण मन्द्र स्थान मिल जायगा। जो लोग १-ध न्यासस्वर गान्धार या मन्द्रगति मे उससे पर ऋपभ तक ही 2-नि जाना चाहते है, उन्हे भी अभीष्ट स्वर मिल जायँगे। ३-स ४-रे सातवे पर्दे से मध्यस्थान की प्राप्ति होगी। ५-ग तारस्थान मे चतु स्वरावधि-वादियो को तारस्थानीय चार ६-म प, ध, नि, स चौदहवे, पन्द्रहवे, सोलहवें, सत्रहवे पर्दे पर मिल ७-प जायँगे। रुद्रट के अनुसार सम्पूर्ण तार स्थान प्राप्त करने के इच्छुक ८-घ अन्तिम पर्दे पर गान्धार और मध्यम भी प्राप्त कर सकते है। ९-नि अभिनवगुप्त, शार्गदेव और कुम्भ को अनिवार्य रूप मे १०-स अभिमत तार ऋषभ अन्तिम पर्दे पर स्वत. मिलेगा। ११-रे सामान्यत. जातियो मे अशस्वर ही ग्रहस्वर होता है, परन्तु १२- इस जाति मे अशस्वर के अतिरिक्त गान्धार को ग्रह मानना १३-म सामान्य नियम का अपवाद है। १४-प आचार्य शाङ्गदेव ने यद्यपि ऐसे मत का उल्लेख किया है, १५-ध जिसमे पञ्चम को भी इस जाति में ग्रह माना जाता है, परन्तु १६-नि इस जाति के प्रस्तार मे उन्हे भी गान्धार का ग्रहत्व अभिमत है। १७-स कुम्भ ने मतङ्गकिन्नरी का जो लक्षण कहा है, उसमे चौदह १८-रे या अठारह सारिकाएँ आती है। चौदह सारिकाओवाली किन्नरी मे तीनो सम्पूर्ण स्थान प्राप्त होने कठिन है। मेरु से चौदहवे पर्दे तक पन्द्रह ध्वनियॉ तथा चौदहवे पर मीड द्वारा और चार तारस्थानीय ध्वनियॉ सरलतापूर्वक मिल सकती है। इस प्रकार चौदह सारिकाओवाली वीणा पर उन्नीस स्वरो की प्राप्ति होती है। मतङ्ग एव शार्ङ्गदेव तीनो सम्पूर्ण स्थानो के प्रयोग पर बल नही देते। मतङ्ग तो बारह स्वरो को जाति के रूप की अभिव्यक्ति के लिए पर्याप्त मानते है और शाङ्गंदेव को मन्द्र एव तार स्थानो मे कामचार (यथारुचि सचार) पर आपत्ति नही। कुछ जातियो के प्रस्तारो मे शार्ङ्गदेव ने तार स्थान का प्रयोग किया ही नही है।

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चतुर्थ अध्याय

जातियों के प्रस्तार

भरत इत्यादि के जाति-लक्षणो का ज्ञान हमें हो चुका है। उन लक्षणो के उदाहरण जातियो के वे प्रस्तार है, जो उन्होने सङ्गीतरत्नाकर मे दिये है। ये प्रस्तार हमे जातियो के 'वर्णो,' (स्वरसन्निवेश, गान-वादनक्रिया) का ज्ञान कराते है। इन प्रस्तारो के आधार पर हम जातियो के आलाप और विभिन्न अशस्वरो को 'स्थायी' मानने के पश्चात् प्रापणीय रूपो का ज्ञान प्राप्त कर सकते है। नाट्यशास्त्र मे 'आरम्भ' शब्द का प्रयोग है, आचार्य अभिनवगुप्त ने 'आरम्भ' शब्द को 'आलाप' का पर्यायवाची कहा है।' जातियो मे 'करणो' का प्रयोग महर्षि भरत को अभिमत है।२ 'करण' के विपय मे यथास्थान लिखा जायगा। साधारण- तया इन्हे मध्यलय इत्यादि में आलाप का प्रकार समझा जाना चाहिए। जाति-लक्षणो मे नाटक के विभिन्न अको की ध्रुवाओ मे जातियो का विनियोग नाटकाश्रित है। नाटक के अतिरिक्त भी जातियों का गान 'समाजो' या 'सभाओ' मे प्रयोज्य है। जातियो का प्रयोग शकरस्तुति मे भी विहित है।१

१-पूर्व रञ्जकवर्गढौकन तत एव तद्गीतस्योपरञ्जकस्य प्राधान्यम्। तस्य च विम्ब- भूत शारीर शारीरस्वराणा मूलत्वात्। तदनुसन्धानायालापास्य आरम्भ. । -आचार्य अभिनवगुप्त, अभिनवभारती, प्र० ख०, द्वि० गा० स०, पृ० २१३ परिगीतक्रियारम्भ आरम्भ इति कीर्तित.। -भरत०, द्वि० गा० सं०, प्र० ख०, पृ० २१३ २-एवमेता बुधैरजञैया जातयो दशलक्षणा। स्वै. स्वैश्च करणैर्योज्या पदेष्वभिनयैरपि ।। -- भरत०, व० स०, पृ० ४५३ ३-व्रह्मप्रोक्तपदै. सम्यक् प्रयुक्ता. शंकरस्तुतौ। -आचार्य शार्ङ्गदेव, स० र०, अ० स०, स्वरा०, पृ०२७३

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१३६ भरत का संगीत-सिद्धान्त

जातियो के प्रस्तार में जो गेय 'पद' निर्दिष्ट है, उन्हे 'ब्रह्म-प्रोक्त पद' कहा गया है। उन सभी मे शंकर की स्तुति है, फलतः वे किसी नाटकविशेप का अग नही और शंकर- स्तुति मे जाति-समाश्रित पदो के उदाहरण है। इन ब्रह्मप्रोक्त पदो के अतिरिक्त अन्य 'पद' भी गाये जा सकते है।" ब्रह्मप्रोक्त पदो की भाषा लौकिक सस्कृत है, उसमे अपाणिनीय प्रयोग नही है, उनका विषय शकरस्तुति है। वे नाटको मे प्रयोज्य ध्रुवाओ के उदाहरण न होकर स्वतन्त्र प्रयोग के उदाहरण है। आगम-पुराण-पद्धति मे सगीत का आदिम स्रोत भगवान् शकर है, ब्रह्मा ने उन्ही से इस विद्या का ज्ञान प्राप्त किया। ये ब्रह्मप्रोक्त पद सम्भवतः शैव-परम्परा में प्रच- लित पद है, जो भगवान् महादेव की महत्ता के प्रतिष्ठापक है।

(१) षाड्जी-प्रस्तार षाड्जी के प्रस्तुत प्रस्तार मे अंश एवं ग्रहस्वर पड्ज है। इसी स्वर से प्रस्तार का आरम्भ हुआ है। न्यासस्वर पड्ज होने के कारण प्रस्तार की समाप्ति भी पड्ज पर हुई है। यद्यपि इस जाति की विकृत अवस्थाओ मे गान्धार एव पञ्चम स्वर भी अपन्यास हो सकते है, तथापि निम्न प्रस्तार पाड्जी के शुद्ध रूप का उदाहरण है। फलत. इसमें पड्ज अर्थात् अंशस्वर ही अपन्यास स्वर है, इसी लिए पद के मध्य की समाप्ति (छठी पक्ति के अन्त मे) पड्ज पर हुई है। निम्नलिखित प्रस्तारो मे एक-एक पक्ति एक-एक तालभाग का निदर्शन करती है। एक से बत्तीस तक या एक से अड़तालीस सख्याएँ ताल एव गीत मे प्रयुक्त तालशास्त्रीय 'लघु' (पॉच लघु अक्षरो के उच्चारण-काल) परिभापा को प्रकट करती है। संख्याओ के ऊपर लिखे हुए संकेत तालक्रिया के द्योतक है। सभी प्रस्तारो मे 'लघु' का परिमाण यही है और वे दक्षिण मार्ग मे निबद्ध है। इन सव परिभापाओ का स्पष्टीकरण यथा- स्थान किया जायगा।

४-'व्रह्मणा चतुर्मुखेन प्रोक्तैग्रंथितैः पदैः 'तं भवललाट-' इत्यादिभि.' -आचार्य कल्लिनाथ टीका, स० र०, अ० स०, स्वरा०,पृ० २७४ ५-स्वातन्त्र्येणापि व्रह्मप्रोक्तपदैरन्यैर्वा शकरस्तुतावेव विनियोगः समुन्चीयते। -आचार्य कल्लिनाथ टीका, सं० र०, अ० स०, स्वरा०, पृ० १९८

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जातियों के प्रस्तार १३७

पाड्जी के निम्नलिखित प्रस्तार मे अल्पत्व-बहुत्व का परिज्ञान प्रयुक्त स्वरो की संख्या से होगा। षड्ज (ग्रह, अश, न्यास) ३६ ऋपभ (अनश, अल्प) १२ गान्धार (अश से सगत, बहुल) २०

मध्यम ८

पञ्चम ८ धैवत (अश से सङ्गत) १६ निषाद (अनश, अल्प) १२ इस जाति मे धैवत और गान्धार की सङ्गति पड्ज के साथ विशेष रूप से विहित है, फलतः मध्यम एव पञ्चम पर्यायांश होने पर भी अधिक प्रयुक्त नही हुए है। प्रस्तुत प्रस्तार 'पञ्चपाणि' ताल की दो आवृत्तियो में पूर्ण हुआ है।

पद त भवललाटनयनाम्बुजाधिकं नगसूनुप्रणयकेलिसमुद्भवम्। सरसकृततिलकपङ्गानुलेपन प्रणमामि कामदेहेन्धनानलम्॥

१ तालक्रिया आ० नि० वि० प्र०

लघु १ २ ३ ४ ५ ६ ७

स्वर सा सा सा सा पा निध पा धनि

पद त - भ व ल ला - ट

२ तालक्रिया आ० ता० वि० श०

लघु ९ १० ११ १२ १३ १४ १५ १६

स्वर रे गम गा गा सा रिग घस घा

पद न य ना वु जा - घि 1

३ तालक्रिया आ० नि० वि० ता०

लघु १७ १८ १९ २० २१ २२ २३ २४

स्वर रिग सा रे गा सा सा सा सा

पद कं - - -

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१३८ भरत का संगीत-सिद्धान्त

४ तालक्रिया आ० नि० वि० श०

लघु २५ २७ २८ २९ ३० ३१ ३२

स्वर घा धा नी निस निध पा सा सा

पद न ग सू - नु प्र ण य

५ तालक्रिया आ० ता० वि० प्र०

लघु ३३ ३४ ३५ ३६ ३७ ३८ ३९ ४०

स्वर नी घा पा धनि रे गा सा गा

पद के - लि स मु - दुभ 1

६ तालक्रिया आ० नि० वि० स०

लघु ४१ ४२ ४३ ४४ ४५ ४६ ४७ ४८

स्वर सा धां धंनिं पां सा सा सा सा

पद वं - - - - - -

७ तालक्रिया आ० नि० दि० प्र०

लघु १ २ ३ ४ ५ ६ ७ ८

स्वर सा सा गा सा म प मा मा

पद स र स कृ त ति ल क

८ तालक्रिया आ० ता० वि० श ०

१२ १४ १५ १६ . लघु ९ १० ११ १३

स्वर सा गा मा धनि निध पा गा रेग

पद पं का नु ले प 1

९ तालक्रिया आ० नि० वि० ता०

लघु १७ १८ १९ २० २१ २२ २३ २४

स्वर गा गा गा गा सा सा सा सा

-पद न - - 1 1 1

१० तालक्रिया आ० नि० वि० श०

'लघु २५ २६ २७ २८ २९ ३० ३१ ३२

स्वर' धा सा रे गरे सा मा मा मा

पद प्र ण मा मि का - म

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जातियों के प्रस्तार १३९

११ तालक्रिया आ० ता० दि० प्र० लघु ३३ ३४ ३५ ३६ ३७ ३८ ३९ ४०

स्वर धा नी पा धनि रे गा रे स पद दे - हे - घ ना न

१२ तालक्रिया आ० नि० वि० स०

लघु ४१ ४२ ४३ ४४ ४५ ४६ ४७ ४८

स्वर रिग सा रे गा सा सा सा सा पद ल - 1 - 1

प्रस्तुत प्रस्तारो मे मन्द्र स्वरो के ऊपर बिन्दु तथा तार स्वरो के ऊपर खडी रेखा है। मध्यस्थानीय स्वर चिह्नहीन है।*

षाड्जी के इस प्रस्तार मे 'पां, धां, नि, सा, रे, ग, म, प, ध, नि, सा' इन ग्यारह स्वरो का उपयोग है। इस जाति मे प्रयुक्त भन्द्र पञ्चम षाड्जी जाति की शुद्धावस्था मे न्यास या अपन्यास स्वर नही। पञ्चम विक्कतावस्था (पञ्चमांश अवस्था) मे अपन्यास हो सकता है, फलत प्रस्तुत प्रस्तार की मन्द्रगति 'कामचार' का उदाहरण है। इसी प्रकार तारस्थान मे केवल अशस्वर पड्ज का प्रयोग भी कामचार का उदाहरण है, क्योकि महर्षि भरत ने तारस्थान में अंशस्वर से चतुर्थ, पञ्चम अथवा सप्तम स्वर को तार गति की सीमा माना है। मतङ्ग ने पाड्जी जाति की तारस्थानीय गति पञ्चस्वर पर मानी है। अठारह सारिकाओवाली किन्नरी पर धैवतादि मूर्च्छना स्थापित करने के पश्चात् उपर्युक्त ग्यारह स्वर छठे पर्दे से सोलहवें पर्दे तक मिल जायँगे। चौदह पर्दोवाली किन्नरी पर अन्तिम दो स्वर चौदहवें पर्दे पर मीड द्वारा मिलेंगे। (२) आर्पभी -प्रस्तार

प्रस्तुत प्रस्तार ऋपभाश शुद्ध आर्षभी का उदाहरण है। ऋपभ स्वर ग्रह, न्यास एवं अपन्यास होने के कारण उसकी स्थिति प्रस्तार के आरम्भ, अन्त तथा मध्य (चतुर्थ

.. मन्द्रो विन्दुशिरा भवेत्। ऊर्ध्वरेखाशिरास्तारो लिपी ... 11 -सं० र०, अ० स०, स्वरा०, पृ० १५३

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१४० भरत का संगीत-सिद्धान्त

तालभाग के अन्त) में है। प्रस्तुत प्रस्तार, वत्तीस लघुवाले चञ्चत्पुट ताल की दो आवृत्तियो में पूर्ण हुआ है। इसमें आठ कलाएँ अर्थात् तालभाग है। स्वर-संख्या निम्नस्थ है- पड्ज (लोप्य, पाडवकारी, अनंश) १२ ऋपभ (अश,ग्रह, न्यास) ३० गान्वार (संगतिकारक) १६ मध्यम (अनश) १२ पञ्चम (लोप्य, अनश, औडुवकारी) ६ धैवत (अश-संवादी) १० निपाद (धैवत-संगतिकारक) ६

पद गुणलोचनाधिकमनन्तममरमजरमजेयम्। प्रणमामि दिव्यमणिदर्पणामलनिकेतं भवममेयम्॥ प्रस्तार

१ ताल आ० नि० वि० श

लघु १ २ ३ ४ ५ ६ ७ ८

स्वर रे गा सा रिग मा रिम गा रिरि

पद गु ण लो च ना - धि 1

२ ताल आ० नि० वि० ता०

लघु ९ १० ११ १२ १३ १४ १५ १६

स्वर रे रे निध निध गा रिम मा पनि

पद क म न त म म र

३ ताल आ० श० वि० प्र०

लघु १७ १८ १९ २० २१ २२ २३ २४

नी धा पा सा गा स्वर मा धा पा

म ज र म क्ष य पद 1

ताल आ० नि० वि० स०

लघु २६ २७ २८ २९ ३० ३१ ३२

स्वर नी धनि रे गरि सध गरि रे रे

जे य 1 पद म 1

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जातियों के प्रस्तार १४१

५ ताल आ० नि० वि० श०

लघु १ २ ४ ५ ६ ७ ८

स्वर रे मा गरि सधं सस रिस रिग मम

पद प्र ण मा - मि दिव्य 1

६ ताल आ० ताo वि० ता०

लघु ९ १० ११ १२ १३ १४ १५ १६ स्वर निध पा रे रे रिप गरि सध सा

पद म णि द रपं णा - म 1

७ ताल आ० श० वि० प्र०

लघु १७ १८ १९ २० २१ २२ २३ २४

स्वर रिस रिस रिग रिग मा मा मा गररि

पद ल नि के - त 1 1

८ ताल आ० नि० वि० सं०

लघु २५ २६ २७ २८ २९ ३० ३१ ३२

स्वर पा नी रे म गरि सधं गरि गरि

पद भ व म मे - यम् 1 1

प्रस्तुत प्रस्तार मे 'धं, नि, स, रे, ग, म, प, ध, नि' नौ स्वरो का उपयोग है। मन्द्रतम प्रयुक्त स्वर मन्द्र धैवत धैवतांश अवस्था मे अपन्यास होता है। वह प्रस्तुत प्रस्तार मे अशस्वर का संवादी है। तारस्थान का सर्वथा परित्याग कामचार का परि- णाम है। किन्नरी पर पञ्चमादि मूर्च्छना स्थापित करने से ये नौ स्वर दूसरे पर्दे से नवे तक मिल जायँगे। अठारह पर्दोवाली किन्नरी पर आठवे पर्दे से सोलहवे पर्दे तक भी ये मिलेगे।

(३) गान्धारी-प्रस्तार

प्रस्तुत प्रस्तार गान्धारांश शुद्ध गान्वारी का उदाहरण है। ग्रह, न्यास एवं अप- न्यास स्वर गान्वार प्रस्तार के आदि, अन्त एव मध्य (आठवे तालभाग के अन्त) में है। चञ्चत्पुट ताल की चार आवृत्तियों अर्थात् सोलह कलाओं मे इसकी पूर्ति हुई है।

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१४२ भरत का संगीत-सिद्धान्त

स्वरसंख्या निम्नस्थ है- षड्ज (पर्यायांश) १३ ऋषभ (लोप्य, षाडवकारी) गान्वार (अंश, ग्रह, न्यास, अपन्यास) ५३ मध्यम (पर्यायांश) २४ पञ्चम (पर्यायांश) २५ धैवत (लोप्य, औडवकारी) १५ निषाद (पर्यायांश, अंशसंवादी) ३२

पद

एतं रजनिवधूमुखविभ्रमदं निशामय वरोरु तव मुखविलासवपुरचारुममलमृदुकिरण ममृतभवम्। रजतगिरिशिखरमणिशकलशंखवरयुवतिदन्त पंक्तिनिभं प्रणमामि प्रणयरतिकलहरवनुद शशिनम् ॥

प्रस्तार

१ ताल आ० नि० वि० श०

लघु ३ ४ ८ ur २ ५ ७

स्वर गा गा सा नी सा गा गा गा

1 पद ए 1 - तं 1

ताल आ० नि० वि० ता०

लघु ९ १० - १२ १३ १४ १५ १६ 1

स्वर गा गम पा पा धप मा निध निस

पद र ज नि व - मु ख

३ ताल आ० श० वि० प्र०

लघु १७ १८ १९ २० २१ २२ २३ २४

स्वर निध पनि मा मपरर गा गा गा गा

पद वि. भ्र म - दं - 1

ताल आ० नि० दि० सं०

लघु २५ २६ २७ २८ २९ ३० ३१ ३२

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जातियों के प्रस्तार १४३

स्वर गा गम पा पा धप मा निध निस

पद नि शा म य च रो 1

५ ताल आ० नि० वि० श०

लघु १ २ ३ ४ ५ ६ ७ ८

स्वर निध पनि मा मपरि गा गा मा सा

पद त व मु ख वि ला स

६ ताल आ० नि० वि० ता०

लघु ९ १० ११ १२ १३ १४ १५ १६

स्वर गा सा गा गा गा गम गा गा

पद व पुश् चा रु - म म ल

ताल आ० श० वि० प्र०

लघु १७ १८ १९ २० २१ २२ २३ २४

स्वर गा गम पा पा धप मा निध निस

पद मृ दु कि र ण - -

८ ताल आ० नि० 'वि० सं०

लघु २५ २६ २७ २८ २९ ३० ३१ ३२

स्वर निध पनि मा मपरि गा गा गा गा

पद म मृ त भ व -

९ ताल आ० नि० वि० ५ श० लघु १ २ ३ ४ ६ ७ ८

स्वर रे गा मा पध रे गा सा सा

र ज गि रि Iv पद त शि ख

१० ताल आ० नि० वि० ता०

लघु ९ १० ११ १२ १३ १४ १५ १६

स्वर नी नी नी नी नी नी नी नी

पद म णि - श क ल शं -

११ ताल आ० श० वि० प्र०-

लघु १७ १८ १९ २० २१ .२२, २३ २४

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१४४ भरत का संगीत-सिद्धान्त

स्वर गा गम पा पा धप मा निध निस · पद व र यु व ति द त

१२ ताल आ० नि० वि० स०

लघु २५ २६ २७ २८ २९ ३० ३१ ३२ स्वर निध पनि मा मपरि गा गा गा गा पद पं नि 1 - क्ति भं - -

१३ ताल आ० नि० वि० प्र०

लघु १ २ ३ ४ ५ ६ ७ ८

स्वर नी नी पा नी गा मा गा सा

पद प्र ण मा - मि प्र ण य

१४ ताल आ० नि० वि० ता० लघु ९ १० ११ १२ १३ १४ १५ १६ स्वर गा सा गा गा गा गम गा गा tc/ पद र ति क ल ह र व नु

१५ ताल आ० वि० प्र०

लघु १७ १८ १९ २० २१ २२ २३ २४

स्वर गा पा मा मा निध निस निध पनि पद दं 1 - - 1

१६ ताल आ० नि० वि० स०

लघु २५ २६ २७ २८ २९ ३० ३१ ३२

स्वर मा परिग गा गा गा गा गा गा पद शि - - नं -

इस प्रस्तार में 'निं, सा, रे, ग, म, प, घ, नि, सा' इन नौ स्वरो का उपयोग है। भन्द्रतम प्रयुक्त स्वर अंशस्वर गान्धार का संवादी है, परन्तु न्यास या अपन्यास स्वर नही। तारस्थान में भी कामचार है। चौदह पदोवाली किन्नरी पर धैवतादि मूर्च्छना स्थापित करने से उपर्युक्त नी स्वर पहले पर्दे से नवे पर्दे तक मिलेंगे, अठारह पर्दोवाली किन्नरी पर आठवे से सोलहवें पर्दे तक भी मिलेंगे।

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जातियों के प्रस्तार १४५

(४) मध्यमा-प्रस्तार प्रस्तुत प्रस्तार मध्यमांश शुद्ध मध्यमा जाति का उदाहरण है। ग्रह, न्यास और अपन्यास स्वर मध्यम होने के कारण प्रस्तार के आदि, अन्त, मध्य (चौथे तालभाग के अन्त) मे मध्यम का प्रयोग है। प्रस्तुत प्रस्तार चञ्चत्पुट ताल की दो आवृत्तियो अर्थात् वत्तीस लघुओ मे सम्पन्न हुआ है। स्वर-सख्या निम्नस्थ है-

पड्ज (पर्यायाश) ९

ऋषभ (पर्यायाश) ७

गान्धार (लोप्य, षाडवकारी) ४

मध्यम (अश, ग्रह, न्यास) २७

पञ्चम (पर्यायाश) १२ वैवत (पर्यायाश) ८

निपाद (पाडवकारी) १२ टिप्पणी-इस प्रस्तार मे बहुल प्रयोज्य पड्ज नौ बार और अल्प निपाद वारह बार प्रयुक्त हुआ है। परन्तु आलाप में ऐसा नही होगा।

पद

पातु भवमूर्धजाननकिरीटमणिदर्पणम् । गौरीकरपल्लवाडगुलिसुतेजितं सुकिरणम्।।

प्रस्तार

१ ताल आ० नि० वि० शु०

लघु २ ३ ४ ५ ६ ७ ८

स्वर मा मा मा मा पा धनि नी धप

तु भ व मू 1 पद पा -

२ ताल आ० नि० वि० ता०

लघु ९ १० ११ १२ १३ १४ १५ १६

स्वर मा पम मा सा मा गा रे रे

पद र्घ जा न न

३ ताल श० वि० प्रo

लघु १७ १८ १९ २० २१ २२ २३ २४

१०

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१४६ भरत का संगीत-सिद्धान्त

स्वर पा मा रिम गम मा मा मा मा पद कि री ट - - -

४ ताल आ० नि० दि० स०

लघु २५ २६ २७ २८ २९ ३० ३१ ३२

स्वर मा निध 1 निस निध पम पध मा मा

पद म णि द र्पं 1 णं

५ ताल आ० नि० वि० श०

लघु १ २ ३ ४ ५ ६ ७ ८

स्वर नी . नी रे रे नी रे रे पा

पद गौ - री क र प - 1

६ ताल आ० नि० वि० ता०

लघु ९ १० ११ १२ १३ १४ १५ १६ स्वर नी मप मा मा सा सा सा सा

पद ल्ल वा - गु लि सु 1 1

७ ताल आ० श० वि० प्र०

लघु १७ १८ १९ २० २१ २२ २३ २४

1 स्वर गा नि सा गा धप मा धनि सा

पद ते - जि त -

८ ताल आ० नि० वि० स

लघु २५ २६ २७ -२८,२९ ३० ३१ ३२

स्वर पा सा पा निधप मा मा मा मा

पद सु कि -- र ण -

इस प्रस्तार मे 'नि, स, रे, ग, म, प, ध, नि, स, रे, ग, म' बारह स्वरो का उपयोग है। मन्द्रावधि एव तारावधि मे कामचार है। 'मन्द्रतम प्रयुक्त निषाद से अश स्वर मध्यम का पड्ज-मध्यम-भाव है, परन्तु निपांद इस जाति में 'अनश' स्वर है। ऋपभादि मूर्च्छना स्थापित करने पर अठारह पर्दोवाली किन्नरी पॉचवे पर्दे से सोलहवे पदे तक हमें ये स्वर देगी। चौदह पर्दोवाली किन्नरी पर अन्तिम दो स्वर हमे चौदहवे पर्दे पर मीड द्वारा मिलेगे। : "

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जातियों के प्रस्तार १४७

(५) पञ्चमी-प्रस्तार

प्रस्तुत प्रस्तार पञ्चमाश शुद्ध पञ्चमी का उदाहरण है। ग्रह, अपन्यास और न्यास होने के कारण पञ्चम प्रस्तुत प्रस्तार के आदि, मध्य और अन्त मे है। यह प्रस्तार चंचत्पुट ताल की दो आवृत्तियो में निबद्ध है। स्वर-सख्या इस प्रकार है- षड्ज (अल्प) ८

ऋषभ (पर्यायाश) ६

गान्वार (षाडवकारी स्वर) ४

मध्यम (अल्प) ८

पञ्चम (अश, ग्रह, न्यास) २० घैवत (अनंश) ७

निषाद (औडुवकारी) १५

पद

हरमूर्धंजानन महेशममरपतिवाहुस्तम्भनमनन्तम्,। त प्रणमामि पुस्पमुखपद्मलक्ष्मीहरमम्बिकापतिमजेयम् ॥ प्रस्तार

१ ताल आ० नि० वि० ग०

लघु १ २ ३ ४ ५ ६ ७ ८

स्वर पा घनि नी नी मा नी मा पा

पद ह र - ध जा - न

ताल नि० 2 上

२ वि० ताo

लघु ९ १० ११ १२ १२ १४ १५ १६

स्वर गा गा सा सा मां मा पा पां

पद नं म हे श म म र

ताल आ० श० वि० प्र०

लघु १७ १८ १९ २० २१ २२ २३ २४

स्वर पा पां घां नी नी नी गा सा

पद प ति वा 1 हु स्त भ

Page 195

१४८ भरत का संगीत-सिद्धान्त

४ ताल आ० नि० वि० स०

लघ् २५ २६ २७ २८ २९ ३० ३१ ३२ स्वर पा मा धा नी निध पा पा पा

पद न म नं तं 1

५ ताल आ० नि० वि० श०

लघु १ २ ३ ४ ५ ६ ७ ८

.. Av स्वर पा पा रे रे रे रे रे

पद प्र ण मा - मि पु प

६ ताल आ० नि० वि० ता०

लघु ९ १० ११ १२ १३ १४ १५ १६

स्वर मां निंग सा सध नी नी नी नी

पद मु ख प - ल - क्ष्मी

७ ताल आ० श० वि० प्र

लघु १७ १८ १९ २० २१ २२ २३ २४

1 स्वर सा सा सा मा पा पा पा पा

पद ह र म वि का - प

८ ताल आ० नि० वि० सं०

लघु २५ २६ २७ २८ २९ ३० ३१ ३२

स्वर धा मा धा नी पा पा पा पा

पद ति म जे य - 1 -

इस प्रस्तार मे 'म, प, ध, निं, स, रे, ग, म, प, ध, नि, स, रे इन तेरह स्वरों का उपयोग है। मन्द्रतम प्रयुक्त स्वर मध्यम 'अल्प' स्वर है, परन्तु उसकी सङ्गति ऋषभ के साथ है, मध्यम इस जाति मे 'न्यास' या 'अपन्यास' स्वर नही, न्यास से परे है। फलतः इस प्रस्तार की मन्द्रगति कामचार का परिणाम है। तारस्थान में प्रयुक्त अन्तिम स्वर ऋपभ इस जाति मे पञ्चम का संवादी अवश्य है और अंशस्वर से पञ्चम है। ऋषभादि मूर्च्छना स्थापित करने पर किन्नरी दूसरे पर्दे से चौदहवे पर्दे तक हमें उपर्युक्त तेरह स्वर प्राप्त करा देगी।

Page 196

जातियों के प्रस्तार १४२

(६) धैवती-प्रस्तार

प्रस्तुत प्रस्तार धैवताश शुद्ध धैवती का उदाहरण है। ग्रह, अपन्यास एव न्यास स्वर धैवत प्रस्तार के आदि, मध्य एव अन्त मे विद्यमान है। पञ्चपाणि ताल की दो आवृत्तियो अर्थात् बारह तालभागो मे प्रस्तार सम्पन्न हुआ है। स्वर-सख्या इस प्रकार है- पड्ज (पाडवकारी) २१ ऋपभ (पर्यायाश, बली) १० गान्धार (बली) १० मध्यम (अनश) १५ पञ्चम (औडुवकारी) १० धैवत (अश, ग्रह, न्यास) ३५ निषाद (बली) १९ प्रस्तुत प्रस्तार मे अनश एव षाडवकारी पड्ज का प्रयोग बली स्वरो की अपेक्षा अधिक हुआ है। अनश मध्यम भी बली स्वरो की अपेक्षा अधिक प्रयुक्त है।

पद तरुणामलेन्दुमणिभूषितामलशिरोज भुजगाविपैककुण्डलविलासकृतशोभम् । नगसूनुलक्ष्मीदेहार्घमिश्रितशरीर प्रणमामि भूतगीतोपहारपरितुष्टम् ।।

प्रस्तार

१ ताल आ० नि० वि० प्र०

लघु १ २ ३ ४ ५ ६ ७ ८

स्वर धा धा निध पव मा मा मा मा

पद त रु णा म ले - दु 1

२ ताल आ० ताo वि० श०

लघु ९ १० ११ १२ १३ १४ १५ १६ I स्वर धा धा निघ 1 निस सा सा सा सा

पद म णि भू - षि ता - म

Page 197

१५० भरत का संगीत-सिद्धान्त

३ ताल आ० नि० दि० ता०

लघु १७ १८ १९ २० २१ २२ २३ २४ स्वर सध धा पा मध धा निध धनि वा

पद ल शि रो - ज -

४ ताल आ० नि० वि०

लघु २५ २६ २७ २८ २९ ३० ३१ ३२

स्वर सा सा रिग रिग सा रेग सा सा

पद भु ज गा धि पै क

५ ताल आ० ता० वि० प्र०

लघु ३३ ३४ ३५ ३६ ३७ ३८ ३९ ४०

स्वर धा घा नी पां धा पां मां मा

पद कुं - ड ल वि ला - स

६ ताल आ० नि० वि० स०

लघु ४१ ४२ ४३ ४४ ४५ ४६ ४७ ४८

स्वर धां धां पा मधं धां निंध धनि धा

पद कृ त शो - - - भ -

७ ताल आ० नि० वि० प्र०

लघु १ २ ३ . ४ ५ ६ ७ ८

1 स्वर • घा धा निस निस निध पा पा पा

पद न ग सू नु क्ष्मी - ल 1

८ ताल आ० ता० - वि० श०

लघु ९ १० ११ १२ १३ १४ १५ १६

स्वर रिग सा सा सा नी नी नी नी

दे र्ध मि - श्रि 1 पद 'हा -

९ ताल आ० नि० वि० ता०

लघु १७ १८ १९ २० २१ २२ २३ २४

स्वर सा रिग रिग सा नी सा घा घा

त· श री रं 1 1 1 पद

Page 198

जातियों के प्रस्तार १५१

१० ताल आ० नि० वि० श०

लघु २५ २६ २७ २८ २९ ३० ३१ ३२ स्वर रें गंरि मग मा मा मां मां मा

पद प्र ण मा मि भू - त

११ ताल आ० ता० वि० प्र०

लघु ३३ ३४ ३५ ३६ ३७ ३८ ३९ ४०

स्वर नी नी धा घा पा रिग सा रिग

पद गी - तो प हा - र

१२ ताल आ० नि० वि० सं०

लघु ४१ ४२ ४३ ४४ ४५ ४६ ४७ ४८

स्वर पा धा सा मा घा नी धा घा

पद प रि तु ष्ट - 1

इस प्रस्तार मे 'रे,ग, मं, प, धं, निं, स, रे, ग, म, प, ध, नि,स' चौदह स्वरो का प्रयोग हुआ है। मन्द्रतम प्रयुक्त स्वर ऋषभ, अंशस्वर धैवत का सवादी है। तारस्थानीय स्वर अनश है। प्रयुक्त मन्द्रतार सीमाएँ कामचार का परिणाम है। ऋषभादि मूच्छना स्थापित करने पर मेरु से तेरहवे पर्दे तक किन्नरी हमे उपर्युक्त चौदह स्वर दे देगी।

(७) नैषादी-प्रस्तार प्रस्तुत प्रस्तार निषादाश शुद्ध नैपादी का उदाहरण है। अंश, अपन्यास एव न्यास होने के कारण निषाद का प्रयोग प्रस्तार के आदि, मध्य एवं अन्त मे है। चञ्चत्पुट ताल की चार आवृत्तियों अर्थात् सोलह ताल-भागो मे यह प्रस्तार सम्पन्न हुआ है। . स्वर-सख्या इस प्रकार है-

पड्ज (पाडवकारी) १५ ऋृपभ (पर्यायाश, बली) ११ गान्वार (पर्यायांश, बली) ११ मध्यम (अनश) २८

पञ्चम (औडुचकारी) ८ घैवत (अनंश) १२ निपाद (अंश, ग्रह, न्यास) ४३ 1

Page 199

१५२ भरत का संगीत-सिद्धान्त

पद

तं सुरवन्दितमहिषमहासुरमथनमुमापत भोगयुतम्, नगसुतकामिनीदिव्यविशेषकसूचकशुभनखदर्पणकम् । अहिमु खमणिखचितोज्ज्वलनूपुरवालभुजङ्गमरवकलितम्, द्रुतमभिव्नजामि शरणमनिन्दितपादयुग्मपङ्कजविलासम्॥

प्रस्तार

१ ताल आ० नि० वि०

लघु १ २ ३ ४ ५ ७ ८

I स्वर नी नी नी नी सा धा नी नी

पद तं सु र वं - दि त

२ ताल आ० नि० वि० ताo

लघु ९ १० ११ १२ १३ १४ १५ १६

स्वर पा मा सा धा नी नी नी नी

पद म हि ष म हा 1 सु र

३ ताल आ० श० वि० प्र०

लघु १७ १८ १९ २० २१ २२ २३ २४

स्वर सा सा गा गा नी नी घा नी

पद म थ न मु मा प ति 1

४ ताल आ० नि० वि० स०

लघु २५ २६ २७ २८ २९ ३० ३१ ३२

1 स्वर सा सा धा नी नी नी नी नी

पद भो ग यु त 1 1 I

५ ताल आ० नि० दि०

लघु १ २ ३ ४ ५ ७ ८

स्वर सा सा गा गा मा मा मा मा

सु का - मि पद न ग त नी

Page 200

जातियों के प्रस्तार १५३

६ ताल आ० नि० दि० ता०

लघु ९ १० ११ १२ १३ १४ १५ १६

स्वर नी पा धा पा मा मा मा मा

पद दि - व्य वि शे प क I

७ ताल आ० श० वि० प्र०

लघु १७ १८ १९ २० २१ २२ २३ २४

रे 1 1 स्वर गा सा सा गा नी नी

पद सू च क शु भ न ख 1

८ ताल आ० नि० वि० स०

लघु २५ २६ २७ २८ २९ ३० ३१ ३२

स्वर नी नी पा धनि नी नी नी नी

पद द 1 र्पं ण क - 1 1

९ ताल आ० नि० वि०

लघ् १ २ ३ ४ ५ ६ ७ ८

स्वर सा सा गा सा मा मा मा मा

पद अ हि मु म णि ख चि

१० ताल आ० नि० वि० ता०

लघु ९ १० ११ १२ १३ १४ १५ १६

स्वर मा मा मा मा नी घा मा मा

पद तो ज्ज्व ल नू पु र 1 1

११ ताल आ० श० वि० प्र०

लघु १७ १८ १९ २० २१ २२ २३ २४

स्वर वा धा नी नी रे गा मा मां

पद वा ल - भु ज ग - म

१२ ताल आ० नि० वि० स०

लघु २५ २६ २७ २८ २९ ३० ३१

स्वर मा मां पा धा नी नी नी नी

पद र व लि तं 1 म

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१५४ भरत का संगीत-सिद्धान्त

१३ ताल आ० नि० वि०

लघु १ २ ३ ४ ५ ६ ७ ८ स्वर पा पा नी नी रे रे रे रे पद द्वु त म भि जा - मि

१४ ताल आ० नि० वि० ता० लघु ९ १० ११ १२ १३ १४ १५ १६ स्वर मा मा मा रे गा सा सा पद श र ण म निं - दि त

१५ ताल आ० श० वि० प्र०

लघु १७ १८ १९ २० २१. २२ २३ २४ स्वर धा मा रे गा सा धा नी नी पद पा - द यु ग पं - क

१६ ताल आ० नि० वि० स०

लघु २५ २६ २७ २८ २९ ३० ३१ ३२

स्वर पा मा रे 1 गा नी नी नी नी

पद ज वि ला - स

इस प्रस्तार मे 'म, पं, धं, नि, स, रे, ग, म, प, ध, नि, स, रे, ग, म, प' सोलह स्वरो का उपयोग है। प्रयुक्त मन्द्रतम स्वर मध्यम स्वर के साथ अशस्वर निषाद का संवाद- सम्वन्ध है। परन्तु मध्यम इस जाति मे अनश है, तारतम प्रयुक्त स्वर पञ्चम भी 'अनंश' स्वर है। मन्द्र एवं तार सीमाओ मे कामचार है। गान्धारादि मूर्च्छना स्थापित करने पर अठारह सारोवाली किन्नरी पहले पर्दे से सोलहवे पर्दे तक हमें उपर्युक्त सोलह स्वर प्राप्त करा देगी। चौदह सारोवाली किन्नरी पर अन्तिम दो स्वर हमे चौदहवे पर्दे पर मीड द्वारा प्राप्त होगे। (८) षड्जकैशिकी-प्रस्तार प्रस्तुत प्रस्तार पड्जांश षड्जकैशिकी का उदाहरण है। ससर्गज विकृत जाति होने के कारण इसका न्यासस्वर गान्धार अंशस्वर से भिन्न है। प्रस्तार का आरम्भ अशस्वर षड्ज से, उत्तरार्ध का आरम्भ अपन्यासस्वर षड्ज से तथा अन्त न्यासस्वर गान्धार पर हुआ है। चञ्चत्पुट ताल की चार आवृत्तियो मे प्रस्तार की पूर्ति हुई है।

Page 202

जातियों के प्रस्तार १५५

स्वर-सख्या इस प्रकार है- पड्ज (अश, गह, अपन्यास) ३३ ऋपभ दुर्बल) १८

गात्वार (पर्यायाश) १५ मध्यम (दुर्बल) २०

पञ्चम (पर्यायॉश) १८ घैवत (अनश) २८ निपाद (अनश) १४ धैवत और निपाद अनश होने पर भी मध्यम और ऋपभ स्वरो की अपेक्षा, रत्नाकर में बहुल विहित है।

पद

देवमसकलशशितिलक द्विरदर्गत निपुणमति मुग्धमुखाम्वुरुहदिव्यकान्तिम् । हरमम्बुदोदधिनिनादमचलवरसूनु- देहार्धमिश्रितगरीर प्रणमामि तमहमनुपममुखकमलम् ।।

प्रस्तार

१ ताल आ० नि० वि० श०

लघु १ २ ३ ४ ५ ६ ७ ८

स्वर सा सा मा पा गरि मग मा मा

पद दे - - - -

२ ताल आ० नि० वि० ता०

लघु ९ १० ११ १२ १३ १४ १५ १६

स्वर मा मा मा मा सा सा सा सा

पद व - -

३ ताल आ० श० वि० प्र०

लघु १७ १८ १९ २० २१ २२ २३ २४

स्वर धा धा पा पा धा धा रे रिम

पद अ स क ल श शि ति ल

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१५६ भरत का संगीत-सिद्धान्त

४ ताल आ० नि० वि० स०

लघु २५ २६ २७ २८ २९ ३० ३१ ३२

स्वर रे रे नी नी नी नी नी नी

पद 1 1 - - 1

५ ताल आ० नि० वि० श०

V लघु १ २ ३ ४ ५ ६ ७

स्वर धा धा पा धनि मा मा पा पा

पद द्वि 1 र द ग ति - -

६ ताल आ० नि० वि० ता०

लघु ९ १० ११ १२ १३ १४ १५ १६

स्वर धा धा पा धनि धा धा पा' पा

पद नि पु ण म ति 1 -

७ ताल आ० श० वि० प्र०

लघु १७ १८ १९ २० २१ २२ २३ २४

स्वर सा सा सा सा सा सा सा सा

पद मु - गध - मु खां वु 1

८ ताल आ० नि० वि० सं०

लघु २५ २६ २७ २८ २९ ३० ३१ ३२

स्वर धा धा पा धा धनि धा धा धा

पद रु ह दि व्य का - तिम् -

९ ताल आ० नि० वि० श़०

लवु १ २ ३ ४ ५ ६ ७ ८

स्वर सा सा सा रिग सा रिग घा धा

पद ह र म - वु दो - द

१० ताल आ० नि० वि० ता०

लघु ९ १० ११ १२ १३ १४ १५ १६

स्वर मा धा पा पा धा धा नी नी

पद धि नि ना दं 1 - -

Page 204

जातियों के प्रस्तार १५७

११ ताल आ० श० वि० प्र०

लघु १७ १८ १९ २० २१ २२ २३ २४

स्वर रे रे गा सा सां सां सा गां

पद अ च ल व र सू - नु

१२ ताल आ० नि० वि० सं०

लघु २५ २६ २७ २८ २९ ३० ३१ ३२

स्वर धा रिस रे सरि रें सरि सां सा

पद दे हा - र्ध मि - श्रि 1

१३ ताल आ० नि० वि० श०

लघु १ २ ३ ४ ५ ६ ७ ८

स्वर सा सरि रे सरि रे सा सा सा

पद त श री र - -

१४ ताल आ० नि० वि० ता०

लघु ९ १० ११ १२ १३ १४ १५ १६

स्वर मा मा मा मा निध पध मा .मा

पद प्र ण मा मि तम ह 1

१५ ताल आ० ग० वि० प्र०

लघु १७ १८ १९ २० २१ २२ २३ २४

स्वर नी नी पा पम पा पम पध रिग

पद अ नु प म मु ख म भ

१६ ताल आ० नि० वि० स०

लघु २५ २६ २७ २९ ३० ३१ ३२ स्वर गा गा गा गा गा गा गा गा

पद ल - - - - 1 इस प्रस्तार मे 'स, रे, ग, म, पं, ध, नि, स, रे, ग, म, प, ध, नि' चौदह स्वरो का उपयोग है। यहाँ मन्द्रस्थान मे महर्पि भरत के अनुसार मन्द्रावधि की अन्तिम सीमा अशस्वर (पड्ज) का प्रयोग है, परन्तु तारस्थान का प्रयोग सर्वथा लुप्त है। पड्जादि मूर्च्छना स्थापित करने पर किन्नरी मेरु से तेरहवे पर्दे तक हमें उपर्युक्त चौदह स्वरो की प्राप्ति करा देगी।

Page 205

१५८ भरत का संगीत-सिद्धान्त

(९) षड्जोदीच्यवा-प्रस्तार

प्रस्तुत प्रस्तार पड्जांश पड्जोदीच्यवा का उदाहरण है। आरम्भ, मध्य और अन्त मे क्रमशः अश, ग्रह पड्ज, अपन्यास पड्ज और न्यास स्वर मध्यम है। पञ्चपाणि ताल की दो आवृत्तियो मे प्रस्तार पूर्ण हुआ है। स्वर-सख्या इस प्रकार है- पड्ज (अश, ग्रह, अपन्यास) ऋपभ ( षाडवकारी) नटे

गान्धार ( अनश, वली) १५

मध्यम (पर्य्यायांश) १४

पञ्चम (औडुवकारी ) १२ वैवत (पर्य्यायांश) २० निपाद (पर्य्यायांश) ८

पद

शैलेशसूनुप्रणयप्रसङ्गसविलासखेलनविनोदम्। अधिकमुखेन्दुनयनं नमामि देवासुरेश तव रुचिरम् ॥

प्रस्तार

१ ताल आ० नि० वि० प्र०

लघु १ २ ३ ४ ५ ६ ८

स्वर सा सा सा सा मा मा गा गा

शै ले - - 1 पद -

२ ताल आ० ताo वि० श०

लघु ९ १० ११ १२ १३ १४ १५ १६

स्वर गा मा पा मा गा मा मा घा

1 पद श सू - - नु

ताल आ० नि० वि० ता०

लघु १७ १८ १८ २० २१ २२ २३ २४

स्वर सा सा मा गा पा पा नी धा

पद शै ले श सू - नु

Page 206

जातियों के प्रस्तार १५९

४ ताल आ० नि० वि० श०

लघ् २५ २६ २७ २८ २९ ३० ३१ ३२ स्वर घा नी सा सा धा नी पा मा

पद प्र ण य प्र स - ग 1

५ ताल आ० ता० वि० प्र०

लघु ३३ ३४ ३५ ३६ ३७ ३८ ३९ ४०

स्वर गां सा सा सा सा सा सा गां

पद स वि ला - स ख ल 1

६ ताल आ० नि० वि० स०

लघु ४१ ४२ ४३ ४४ ४५ ४६ ४७ ४८

स्वर घा घा पा धा पा नी घा घा

पद न वि नो - द - 1

७ ताल आ० नि० वि० प्र०

लघु १ २ ४ ५ ६ ७ ८

स्वर सा गां गा गां गां गा सा सा

पद अ घि क -

ताल आ० ता० वि० श० ٢٠

लघु ९ १० ११ १२ १३ १४ १५ १६ स्वर नी धा पा धा पा धा धा घा

पद मु - खे न्दु

ताल आ० नि० वि० ता० ,0

लघु १७ १८ १९ २० २१ २२ २३ २४ 1 1 स्वर सा सा मा गा पा पा नी धा

पद अ धि क मु खे न्दु 1 1

१० ताल आ० नि० दि० श०

लघु २५ २६ २७ २८ २९ ३० ३१ ३२ 1 स्वर धा नी सा सा घा नी पा मा

पद न य न - न मा - मि

Page 207

१६० भरत का संगीत-सिद्धान्त

११ ताल आ० ता० वि० प्र०

लघु ३३ ३४ ३५ ३७ ३८ ३ ९ ४०

स्वर गा सा सा सा सा सा सा गा

पद दे वा सु रे श 1

१२ ताल आ० नि० वि० स०

लघु ४१ ४२ ४३ ४४ ४५ ४६ ४७ ४८

1 1 स्वर धा धा पा धा गा मा मा मा

पद त व रु चि र - इस प्रस्तार मे अर्धमागधी गीति का भी आश्रय लिया गया है। अर्धमागधी इत्यादि गीतियो की चर्चा यथास्थान की जायगी।

'ग, म, पं, ध, नि, स, रे, ग, म, प, ध, नि, स, रे, ग, म' सोलहो स्वर प्रयुक्त हुए है। मन्द्रतम स्वर न्यास से पर है। तार स्थान मे प्रयुक्त तारतम स्वर मध्यम अश- स्वर पड्ज से चतुर्थ है। तारावधि भरत-सम्मत है। गान्धारादि मूर्च्छना स्थापित करने पर अठारह सारोवाली किन्नरी मेरु से पन्द्र- हवें पदे तक हमे उपर्युक्त सोलह स्वर प्राप्त करा देगी। चौदह सारोवाली किन्नरी पर अन्तिम स्वर मीड द्वारा मिलेगा।

(१०) षड्जमध्यमा-प्रस्तार प्रस्तुत प्रस्तार मध्यमांश पड्जमध्यमा का उदाहरण है। ग्रह, अपन्यास और न्यासस्वर मध्यम का प्रयोग जाति के आदि, मध्य एव अन्त मे हुआ है। प्रस्तुत प्रस्तार पञ्चपाणि ताल की दो आवृत्तियो मे पूर्ण हुआ है। स्वरसख्या इस प्रकार है- पड्ज (पर्य्यायाश) १६

ऋपभ (पर्य्यायांश) १३

गान्धार (औडुवकारी) २५

मध्यम (अंश, न्यास, अपन्यास) ४८

पञ्चम (पर्य्यायाश) २१

धवत (पर्य्यायाश) २५

निपाद (षाडवकारी) ८

Page 208

जातियों के त्स्तार १६१

पद

रजनिवधूमुखविलासलोचन प्रविकसितकुमुददलफेनसन्निभम् । कामिजननयनहृदयाभिनन्दिन प्रणमामि देव कुमुदाधिवासिनम् ।।

प्रस्तार

१ ताल आ० नि० वि० प्र०

लघु १ २ ३ ४ ५ ६ ७ ८

स्वर मा गा सग पा धप मा निध निम

पद र ज नि व ध् - सु २ ताल आ० ता० वि० श०

लघु ९ १० ११ १२ १३ १४ १५ १६ 1 1 1 1 1 11 स्वर मा मा सा रि ग मग निध पव पा

पद वि ला - स लो - - च

३ ताल आ० नि० वि० ता०

लघु १७ १८ १९ २० २१ २२ २३ २४

स्वर मा गा रे गा मा मा सा सा

पद न - - - - 1 1

४ ताल आ० नि० वि० श०

लघु २५ २६ २७ २८ २९ ३० ३१

स्वर मा मगम मा मा निध पध पम गमम

पद प्र वि क सि त कु मु द

५ ताल आ० ता० वि० प्र०

लघु ३३ ३४ ३५ ३६ ३७ ३८ ३९ ४०

स्वर धा पध परि रिग ] मग रिग सवस सा

पद द ल फे न सं - नि

ताल आ० नि० वि० सं.

लघु ४१ ४२ ४३ ४४ ४५ ४६ ४८

११

Page 209

१६२ भरत का संगीत-सिद्धान्त

स्वर निध सा रे मगम मा मा मा मा पद भ - -

७ ताल आ० नि० वि० प्र०

लघु १ २ ४ ५ ६ ७ ८ स्वर मा मा मगम मंधं धपं पंधं पम गंमंग

पद का मि ज न न य न

८ ताल आ० ता० वि० श०

लघु ९ १० ११ १२ १३ १४ १५ १६ स्वर घा पध परि रिग मग रिग सधस सा पद ह द या भि नं - दि

९ ताल आ० नि० वि० ताo

लघु १७ १८ १९ २० २१ २२ २३ २४ स्वर मा मा धनि घस घप मप पा पा

पद नं 1 1 - I -

१० ताल आ० नि० वि० श०

लघु २५ २६ २७ २८ २९ ३० ३१ ३२

स्वर मा मगम मा निध पध पमग गा मा

पद प्र ण मा मि दे वं - 1

११ ताल आ० ता० नि० प्र०

लघु ३३ ३४ ३५ ३६ ३७ ३८ ३९ ४०

स्वर धा पध परि रिग मग रिग सधस सा

पद कु मु दा धि वा - सि

१२ ताल आ० नि० - वि० सं० -

लघु ४१ ४२ ४३ ४४ ४५ ४६ ४७ ४८

स्वर निध सा रे मगम मा मा मा मा

पद न - - 1

प्रस्तुत प्रस्तार मे 'गं, मं, पं, धं, नि, स, रे, ग, म, प, ध, नि, स, रे, ग, म' सोलह स्वरो का उपयोग है। प्रयुक्त मन्द्रतम स्वर गान्धार पर्य्यायाश है, मतङ्ग की भापा मे 'तत्पर' (न्यास से पर) भी है। तारतम प्रयुक्त स्वर मध्यम अंश है।

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जातियों के प्रस्तार १६३

मव्यमादि मूच्छना स्थापित करने पर अठारह सारोंवाली किन्नरी हमें छठे पर्दे से अठारहवे पर्दे तक तेरह स्वर तथा अन्तिम पर्दे पर मीड द्वारा अवशिष्ट तीन स्वर देगी। चौदह पर्दोवाली किन्नरी पर अन्तिम तीन स्वर नही मिलेगे और उनसे पूर्ववर्ती

प, ध, नि, स, चौदहवे पर्दे पर मीड द्वारा मिलेगे। (११) गान्धारोदीच्यवती-प्रस्तार प्रस्तुत प्रस्तार षड्जाश गान्धारोदीच्यवा का उदाहरण है। ग्रह स्वर पड्ज, अपन्यास पड्ज और न्यासस्वर मध्यम क्रमश. इस प्रस्तार के आदि, मध्य और अन्त में है। चञ्चत्पुट ताल की चार आवृत्तियों में प्रस्तार पूर्ण हुआ है। स्वर-संख्या इस प्रकार है :-

षडज (अश, ग्रह, अपन्यास) २८

ऋषभ (षाडवकारी) गान्वार (वली) २४

मध्यम (पर्य्यायाश, न्यास) २४

पञ्चम (अनंश) २२ धँवत (अनंश ) १४

निषाद (अनंश) २७ पञ्चम, धवत और निपाद अनंश होते हुए भी इस प्रस्तार मे अल्पप्रयुक्त नहीं है। 1 जिन जातियो के योग से यह जाति बनी है, उनमें 'गान्धारी' भी है, इन स्वरों की अनल्पता गान्धारी के मिश्रण का परिणाम है।

पद सौम्यगौरीमुखाम्बुरुहदिव्यतिलक- परिचुम्विताचितसुपादं प्रविकसितहेमकमलनिभम् । अतिरुचिरकान्तिनखदर्पणामलनिकेतं मनसिजशरीर- ताडनं प्रणमामि गौरीचरणयुगमनुपमम् ।। प्रस्तार

१ ताल आ० नि० वि० शo

लघु १ २ ३ ४ ५ ६ ७ ८

स्वर सा सा पा मा पा घप पा मा

पद सौ 1 1 - 1

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१६४ भरत का संगीत-सिद्धान्त

२ ताल आ० नि० वि० ता०

लघु ९ १० ११ १२ १३ १४ १५ १६

स्वर घा पा मा मा सा सा सा सा

पद म्य - - - 1

३ ताल आ० श० वि० प्र०

लघु १७ १८ १९ २० २१ २२ २३ २४

स्वर घा नी सा सा मा मा पा पा

पद गो री - मु खा - वु 1

४ ताल आ० नि० वि० स०

लघु २५ २६ २७ २८ २९ ३० ३१ ३२

स्वर नी नी नी नी नी नी नी नी

पद रु ह दि व्य ति ल क 1

५ ताल आ० नि० वि० श०

लघु १ २ ३ ४ ५ ६ ७ ८

स्वर मा मा वा निस नी नी नी नी

पद चि प रि चु - वि ता -

ताल आ० नि० वि० ता०

लघु ९ १० ११ १२ १३ १४ १५ १६

स्वर मा पा मा परिग गा गा सा सा

पद त सु पा - दं - -

दि० प्र० ७ ताल आ० श०

लघु १७ १८ १९ २० २१ २२ २३ २४

स्वर गा मग पा पध मा धनि पा पा

प्र वि म पद क सि त हे -

आ० नि० वि० स० ८ ताल

लघु २५ २६ २७ २८ २९ ३० ३१ ३२

स्वर रे गा सा सध नी नी धा धा

पद क म ल नि भ - - 1

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जातियो के प्रस्तार १६५

९ ताल आ० नि० वि० श०

लघु १ २ ३ ४ ५ ७ ८

स्वर गा रिग सा सनि गा रिग सा सा

पद अ ति रु चि र का - ति

१० ताल आ० नि० वि० ता०

लघु ९ १० ११ १२ १३ १४ १५ १६

स्वर सा सा सा मा मनि धनि नी नी

पद न ख द पं णा - म

११ ताल आ० श० वि० प्र०

लघु १७ १८ १९ २० २१ २२ २३ २४ 1 111 1 1 स्वर मा पा मा परिग गा गा सा सा

पद ल नि के - त

१२ ताल आ० नि० वि० स०

लघु २५ २६ २७ २८ २९ ३० ३१ ३२

1 1 1 1 1 1 .1 स्वर गा सा गा सा मा पा मा परिग

. पद म न सि ज री र -

१३ ताल आ० नि० वि०

लघु १ २ ३ ४ ५ ७ ८

1 I 1 1 1 1 1 स्वर गा मा गा सा गा गा गा सा

पद ता - - ड न - - 1

१४ ताल आ० नि० वि० ताo

लघु ९ १० ११ १२ १३ १४ १५ १६ i 1 1 ! स्वर नो नौ पा धा नी गा गा गा

पद प्र ण मा - मि गौ री I

१५ ताल आ० वि० प्र०

लघु १७ १८ १९ २० २१ २२ २३ २४

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१६६ भरत का संगीत-सिद्धान्त

नो नी I 1 1 1 स्वर घा पा घा पा मा पा

पद च र ण यु ग म नु प

१६ ताल आ० नि० वि० स०

लघु २५ २६ २७ २८ २९ ३० ३१ ३२ 1 1 1 1 स्वर धा पा सा सा मा मा मा मा

पद म - 1 -

  • इस प्रस्तार मे 'स, रे, ग, म, प, ध, नि, स, रे, ग, म, प, ध, नि' चौदह स्वरो का 1

प्रयोग हुआ है। मन्द्र स्थान का प्रयोग सर्वथा नही है। तार स्थान मे अश स्वर से सप्तम निषाद भरत-विधान के अनुकूल है। धैवतादि मूर्च्छना स्थापित करने पर अठारह सारोवाली किन्नरी दूसरे से पन्द्रहवे पर्दे तक हमे उपर्युक्त चौदह स्वर दे देगी। चौदह सारोवाली किन्नरी पर अन्तिम स्वर अन्तिम पर्दे पर मीड द्वारा मिलेगा।

(१२) रक्तगान्धारी- प्रस्तार

प्रस्तुत प्रस्तार पञ्चमांश रक्तगान्धारी का उदाहरण है। प्रस्तार का आरम्भ ग्रहस्वर पञ्चम से और अन्त न्यासस्वर गान्वार पर हुआ है। गेय पद का पूर्वराव अपन्यास स्वर मध्यम पर समाप्त हुआ है। पञ्चपाणि ताल की दो आवृत्तियो मे यह प्रस्तार सम्पन्न हुआ है। स्वर-संख्या इस प्रकार है-

पडज ७

ऋ पभ (षाडवकारी) ४

गान्धार (पर्य्यायांश, न्यास) १७

मध्यम (पर्य्यायांश) २३

पञ्चम (अंश, ग्रह) ३८

धेवत (औड्वकारी, बहुल) ८

निषाद (पर्य्यायांश, बहुल ) ६

लक्षण में धैवत एवं निषाद का बाहुल्य है, परन्तु प्रस्तार में नही है।

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जातियों के प्रस्तार १६७

पद

तं बालरजनिकरतिलकविभूषणविभूतिम् । प्रणमामि गौरीवदनारविन्दप्रीतिकरम् ॥

प्रस्तार

१ ताल आ० नि० वि० प्र०

लघु १ २ ३ ४ ५ ६ ७ ८

स्वर पा नी सा सा गा सा पा नी

पद तं - वा - ल र ज नि

२ ताल आ० ता० दि० श०

लघु ९ १० ११ १२ १३ १४ १५ १६ 1 स्वर सो सो पा पा मा मा गा गा

पद क र ति ल क भू प

ताल आ० नि० वि० ता०

लघु १७ १८ १९ २० २१ २२ २३ २४

स्वर मा पा धा पा मा पा धप मग

पद ण वि भू - - - -

४ ताल आ० नि० वि० श०

लघु २५ २६ २७ २८ २९ ३० ३१ ३२

स्वर मा मा मा मा मा मा मा मा

पद ति - - - - -

५ ताल आ० ता० वि० प्र०

लघु ३३ ३४ ३५ ३६ ३७ ३८ ३९ ४०

स्वर घां नी पां मं पं धा नी पा पा

पद - - - - - 1

६ ताल आ० नि० वि० सं०

लघु ४१ ४२ ४३ ४४ ४५ ४६ ४७ ४८

स्वर मा पा मा धंनिं पां पां पां पां

1 ! 1 पद - -

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१६८ भरत का संगीत-सिद्धान्त

७ ताल आ० नि० वि० प्र० लघु १ २ ३ ५ ७ ८ स्वर रे गा मा पा पा पा मा पा

पद प्र ण मा मि गौ री 1

८ ताल आ० ता० वि० श०

लघु ९ १० ११ १२ १३ १४ १५ १६ 1 स्वर र 1 गा मा पा पा पा मा पा

1 पद व वि 1 द ना र

ताल आ० नि० वि० ता०

लघु १७ १८ १९ २० २१ २२ २३ २४

स्वर पा पा पा पा पा पा पा पा

पद द - - 1

१० ताल आ० नि० चि०

लघु २५ २६ २७ २८ २९ ३० ३१ ३२

स्वर रे गा सा सा रे गा गा गा पद त्री - ति क र -

११ ताल आ० ता० वि० प्र०

लघु ३३ ३४ ३५ ३६ ३७ ३८ ३९ ४० - 1 1 स्वर गा गा पा धम घा निधे पा पा

1 पद - - -

१२ ताल आ० नि० वि० स०

लघु ४१ ४२ ४३ ४४ ४५ ४६ ४७ ४८

1 111 1 स्वर मा पा मा परिंग गा गा गा

पद 1 - - - -

1 1 1111 प्रस्तुत प्रस्तार मे 'मं, प, धं, नि, स, रे, ग, म, प, ध, नि, स, रे, ग, म, प, ध, नि' अठारह स्वरो का प्रयोग हुआ है। प्रयुक्त मन्द्रतम स्वर मध्यम 'अश' से पर है, मध्यमांश अवस्था में अपन्यास भी है। तार स्थान मे निषाद तक प्रयोग में कामचार है।

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जातियों के प्रस्तार १६९

ऋषभादि मूर्च्छना स्थापित करने पर अठारह सारोवाली किन्नरी दूसरे पर्दे से अठारहवें पर्दे तक हमे सत्रह स्वर देगी, अन्तिम स्वर अठारहवे पर्दे पर मीड द्वारा मिलेगा। चौदह पर्दोवाली किन्नरी पर चौदहवे पर्दे पर तार ऋषभ मिलेगा, मीड द्वारा अवशिष्ट स्वर प्राप्त करना वादक की कुशलता पर निर्भर है।

(१३) कैशिकी-प्रस्तार

प्रस्तुत प्रस्तार पञ्चमाश कैशिकी का उदाहरण है। ग्रह पञ्चम, अपन्यास पञ्चम और न्यास गान्वार क्मश इस प्रस्तार के आदि, मध्य एव अन्त मे प्रयुक्त हुए है। पञ्चपाणि की दो आवृत्तियो मे प्रस्तुत प्रस्तार की पूर्ति हुई है। स्वर-संख्या इस प्रकार है- षड्ज (पर्य्यायाश) ऋृषभ (अनंश पाडव०) ११ गान्धार न्यास) २० मध्यम (पर्य्यायांश) १७ पञ्चम (ग्रह, अश) १५ धवत (औडुवकारी) १४ निपाद (वली) २० प्रस्तुत प्रस्तार मे अत्यन्त वली होने के कारण गान्वार एवं निपाद का प्रयोग सर्वा- धिक हुआ है। सभी स्वरो का सञ्चार होने के कारण सभी स्वरो का प्रयोग सञ्चारी रूप मे है। दुर्वल ऋपभ का भी ग्यारह बार प्रयोग इसी सञ्चार का परिणाम है। साधारणतया किसी जाति का न्यासस्वर एक होता है, परन्तु इस जाति मे गान्धार, पञ्चम एवं निपाद तीन न्यासस्वर सम्भव है। प्रस्तुत प्रस्तार में ग्रहस्वर पञ्चम है, इसी लिए हमने इस प्रस्तार में पञ्चम को अंश माना है। अंश से भिन्न ग्रह केवल नन्दयन्ती जाति मे होता है।

पद केलीहतकामतनुविभ्रमविलास तिलकयुत मूर्धोर्ध्ववालसोमनिभम् । मुखकमलमसमहाटकसरोजं हृदि सुखरद प्रणमामि लोचनविशेषम् ।।

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१७० भरत का संगीत-सिद्धान्त

प्रस्तार

१ ताल आ० नि० वि० प्र०

लघु १ २ ३ ४ ५ ६ ८

स्वर पा धनि पा धनि गा गा गा गा

पद के - ली - ह - त -

२ ताल आ० नि० वि० श०

लघु ९ १० ११ १२ १३ १४ १५ १६ स्वर पा पा मा निध निध पा पा पा

पद का - म त नु - -

३ ताल आ० नि० वि० ता०

लघु १७ १८ १९ २० २१ २२ २३ २४

स्वर धा नी सा सा रे रे रे रे

पद वि - म वि ला - स

४ ताल आ० नि० वि० श०

लघु २५ २६ २७ २८ २९ ३० ३१ ३२

स्वर सा सा सा रे गा मा मा मा

पद ति ल क यु तं -

५ ताल आ० ता० वि० प्र०

लघु ३३ ३४ ३५ ३६ ३७ ३८ ३९ ४०

स्वर मा धां नी वा मा धा मा पा

पद मू - र्धो धर्व वा - ल 1

६ ताल आ० नि० वि० सं०

लघु ४१ ४२ ४३ ४४ ४५ ४६ ४७ ४८

स्वर गा रे सा धनि रे रे रे रे

पद - ダ नि भं 1 1 सो -

७ ताल आ० नि० वि० प्र०

लघु १ २ ३ ४ ५ ६ ७ ८

स्वर गा रे सा सा धा घा मा मा

पद मु ख क म लं. 1 -

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जातियों के प्रस्तार १७१

८ ताल आ० नि० वि० श०

लघु ९ १० ११ १२ १३ १४ १५ १६

स्वर गा गा गा मा मा निधनि नी नी

अ 1 पद स म हा ट -

९ ताल आ० नि० वि० ता०

लघु १७ १८ १९ २० २१ २२ २३ २४

स्वर गा गा नी नी गा गा गा गा

पद क स रो - ज - - -

१० ताल आ० नि० वि० श०

लघु २५ २६ २७ २८ २९ ३० ३१ ३२ 1 11 I स्वर गा गा नो नी निध पा पा

1 ह दि द 1 पद सु ख

११ ताल आ० ताo वि० प्र०

लघु ३३ ३४ ३५ ३६ ३७ ३८ ३९ ४०

1 स्वर मा पा मा पा पा पा मा मा

पद प्र ण मा - मि लो च

१२ ताल आ० नि० वि० स०

लघु ४१ ४२ ४३ ४४ ४५ ४६ ४७ ४८ 1 1 - स्वर सा मा गा निधनि नी नो मा गा

वि शे 1 पद न प -

प्रस्तुत प्रस्तार मे 'म, प, धं, नि, स, रे, ग, म, प, ध, नि, स, रे, ग, म, प, घ, नि' 11

अठारह स्वरो का उपयोग हुआ है। मन्द्रतम प्रयुक्त स्वर न्यास से पर है, तारतम प्रयुक्त निषाद का प्रयोग कामचार से है। गान्धारादि मूर्च्छना स्थापित करने पर अठारह पर्दोवाली किन्नरी पहले पर्दे से अन्तिम पर्दे तक हमे उपय्युक्त अठारह स्वर दे देगी। चौदह पर्दोवाली किन्नरी पर अन्तिम चार स्वर अन्तिम पर्दे पर मीड द्वारा मिलेंगे।

Page 219

१७२ भरत का संगीत-सिद्धान्त

(१४) मध्यमोदीच्यवा-प्रस्तार

प्रस्तुत प्रस्तार पञ्चमाश मध्यमोदीच्यवा का उदाहरण है। ग्रह स्वर पञ्चम, अपन्यास स्वर पञ्चम तथा न्यास स्वर मध्यम क्रमशः प्रस्तार के आदि, मध्य और अन्त मे है। चञ्चत्पुट ताल की चार आवत्तियो मे यह प्रस्तार पूर्ण हुआ है। स्वर-सख्या इस प्रकार है- पड्ज (अनश) ८

ऋपभं (पाडवकारी) १४

गान्धार (अनग) २४

मध्यम (न्यास) १६ पञ्चम (अश, ग्रह) २८ धैवत (अनश) १४ निषाद (अनश) ४२ इस प्रस्तार मे निपाद का प्रयोग बहुल है। यह सामान्य नियम का अपवाद है।

पद

देहार्धरूपमतिकान्तिममलममलेन्दुकुन्दकुमुदनिभं चामीकराम्बुरुहदिव्यकान्तिप्रवरगणपूजितमजेयम्। सुराभिष्टुतमनिलमनोजवमम्बुदोदधिनिनादमतिहास शिवं शान्तमसुरचमूमथन वन्दे त्रैलोक्यनतचरणम् ॥

प्रस्तार

१ ताल आ० नि० वि० ग०

V लघु १ २ ३ ४ ५ ६ ७

स्वर पा धनि नी नी मा पा नी पा

पद दे हा र्धं रू - प 1 1.

२ ताल आ० नि० वि० ता०

लघु ९ १० ११ १२ १३ १४ १५ १६

स्वर रे रे रे गा सा रिग गा गा

पद म ति कां ति म म ल 1

Page 220

जातियों के प्रस्तार १७३

३ ताल आ० श० वि० प्र०

लघु १७ १८ १९ २० २१ २२ २३ २४ स्वर नी नी नी नी नी नी नी नी

पद म म ले दु कु - द 1

४ ताल आ० नि० वि० सं०

लघु २५ २६ २७ २८ २९ ३० ३१ ३२

स्वर नी नी धप मा निध निध पा पा

पद कु मु द नि भ 1 1

५ ताल आ० नि० वि० श०

लघु १ २ ३ ४ ५ ६ ७ ८

स्वर पा पा रे रे रे रे रे रे

पद चा मी क रा वु 1 I

६ ताल आ० नि० वि० ता०

लघु ९ १० ११ १२ १३ १४ १५ १६

स्वर मा रिग सा सध नी नो नी नीं

पद रु ह दि व्य का ति - -

७ ताल आ० श० वि० प्र०

लघु १७ १८ १९ २० २१ २२ २३ २४

स्वर मा पा नी सा पा पा गा गा

पद प्र व र ग ण पू - जि

ताल आ० नि० वि० सं०

लघु २५ २६ २७ २८ २९ ३० ३१ ३२

स्वर गा पां मा निंधं नीं नी सा सा

पद त म जे - यं - 1

९ ताल आ० नि० वि० श०

लघु १ २ ३ ४ ५ ६ ८

स्वर पा पां मां धंनि पां पां पां पां

पद सु रा भि ष्टु त म नि ल

Page 221

१७४ भरत का संगीत-सिद्धान्त

१० ताल आ० नि० वि० ता० लघु ९ १० ११ १२ १३ १४ १५ १६ स्वर मां पां मां रिग गा गा .गा गा

पद म नो ज - व - मं व ११ ताल आ० ग ० वि० प्र०

लघु १७ १८ १९ २० २१ २२ २३ २४ स्वर गा पा मा पा नी नी नी नी पद दो द धि ना द 1 - नि १२ ताल आ० नि० वि० स०

लघु २५ २६ २७ २८ २९ ३० ३१ ३२ स्वर मा पा मा परिग गा गा गा मा

पद म ति हा - स. - -

१३ ताल आ० नि० वि०

लघु १ २ ३ ४ ५ ६ ७ ८

1 1 1 1 i स्वर गा गा गा गा मा निध नी नो

पद शि वं शां - त म सु र

१४ ताल आ० नि० वि० ता०

लघु ९ १० ११ १२ १३ १४ १५ १६

स्वर नी नी धप मा निध निध पा पा

पद च मू म थ न - -

१५ ताल आ० श० वि० प्र०

लघु १७ १८ १९ २० २१ २२ २३ २४

1 1 1 स्वर रे गा सा सा मा निधनि नी

पद व दे - त्रै लो क्य - 1

१६ ताल आ० नि० वि० सं०

लघु २५ २६ २७ २८ ३० ३१ ३२ 1 ! स्वर 1 नो नो घां 1 पा घा पा मा मा

पद न त न् र - 1 9.

Page 222

जातियों के प्रस्तार १७५

प्रस्तुत प्रस्तार मे 'मं, पं, धं, निं, स, रे, ग, म, प, ध, नि, स, रे, ग, म, प, ध, नि' अठारह स्वरो का प्रयोग है। मन्द्रतम प्रयुक्त स्वर मध्यम 'न्यास' है, तार स्थान में कामचार है। मध्यमादि मूर्च्छना स्थापित करने पर अठारह सारिकाओंवाली किन्नरी पहले पदे से अन्तिम पर्दे तक उपर्युक्त अठारह स्वर प्राप्त करा देगी। चौदह पर्दोवाली किन्नरी पर अन्तिम चार स्वर मीड द्वारा मिलेगे।

(१५) कार्मारवी-प्रस्तार प्रस्तुत प्रस्तार ऋपभाश कार्मारवी का उदाहरण है। इसका आरम्भ ग्रहस्वर ऋपभ और अन्त न्यासस्वर पञ्चम पर हुआ है। अपन्यास स्वर पञ्चम प्रस्तार के मध्यम मे है। चञ्चत्पुट ताल की चार आवृत्तियो में यह प्रस्तार सम्पन्न हुआ है। स्वर-सख्या इस प्रकार है- पड़ज (अनश) १०

ऋ पभ (अश, ग्रह) १९

गान्धार (अनश) २९

मध्यम (अनश) १७

पञ्चम (पर्य्यायाश, न्यास) २२ धैवत (पर्य्यायांश) ८

निषाद (अनश) ३४ अनश स्वरो का बहुल प्रयोग इस जाति की विशेपता है। भरत-विधान इस बहुलता का आधार है। पद त स्थाणुललितवामाङ्गसक्तमतितेज.प्रसरसौवाशुकान्ति- फणिपतिमुखमुरोविपुलसागरनिकेतं सितपन्नगेन्द्र- मतिकान्त पण्मुखविनोदकरपल्लवांगुलिविलासकीलन- विनोद प्रणमामि देवयज्ञोपवीतकम् ।। प्रस्तार

१ ताल आ० नि० वि० श०

लघु १ २ ३ ४ ५ ६ ७ ८

स्वर रे रे रे रे रे रे रे रे

पद तं - स्था - णु ल लि त

Page 223

१७६ भरत का संगीत-सिद्धान्त

बाल आ० नि० वि• ताo

लघु ९ १० १२ १३ १४ १५ १६ स्वर मा गा सा गा सा नी नी नी

पद वा - मां ग स क्त

३ ताल आ० श० वि० प्र०

लघु १७ १८ १९ २० २१ २२ २३ २४ स्वर नी मा नी मां पां पां ₹ गा गा

पद म ति ते - ज: प्र स र

ताल आ० नि० वि० सं०

लघु २५ २६ २७ २८ २९ ३० ३१ ३२

स्वर गा पा मा पा नी नी नी नी

पद सौ - ति - धां शु का 1

५ = ताल आ० नि० वि० श०

लघु १ २ ३ ४ ५ ६ ७ ८

रे 1 स्वर गा सा नी 1 रे 1 गा रे मा

पद फ णि प ति मु खं - I

६ ताल आ० नि० दि० ता०

लघु ९ १० ११ १२ १३ १४ १५ १६

स्वर रे गा रे सा नी धनि पा पा

पद उ रो वि पु ल सा - ग

७ ताल आ० वि० प्र०

लघु १७ १८ १९ २० २१ २२ २३ २४

f 111 स्वर मा पा मा पेरिग गा गा गा गा

पद र नि के - तं - - 1

८ ताल आ० नि० वि० सं०

लघु २५ २६ २७ २८ २९ ३० ३१ ३२

स्वर रे रे गा सम मा मा पा पा

पद सि त प न्न गे - न्द्र 1

Page 224

जातियों के प्रस्तार १७७

९ ताल मा० नि० वि० ग०

लघु १ २ ३ ४ ७ ८

स्वर मा पा मा परिग गा गा गा गा

पद ति का - तं - 1

१० ताल आ० नि० वि० ता०

लघु १० ११ १२ १३ १४ १५ १६ स्वर धा नी पा मा धा नी सा सा

पद प - म् ख वि नो द

११ ताल आ० श० वि० प्र०

लघु १७ १८ १९ २० २१ २२ २३ २४

स्वर नी नी नी नी नी नी नी नी

पद र प - ल्ल वा - डगु

१२ ताल आ० नि० वि० सं०

लघु २५ २६ २७ २८ २९ ३० ३१ ३२ स्वर मा मा घा नीं सनिनि धा पा पा

पद लि वि ला - स की ल 1

१३ ताल नि० वि०

लबु १ २ ३ ४ ५ ६ ७ ८

स्वर मा पा मा परिग गा गा गा गा

पद न वि नो - दं -

१४ ताल आ० नि० दि० ता०

लघु १० ११ १२ १३ १४ १५ १६

स्वर नी नी पा धनि गा गा गा गा

मि दे व 1 पद प्र ण मा -

१५ ताल आ० ग० वि० प्र०

लघु १७ १८ १९ २० २१ २२ २३ २४

नो नी स्वर सा गा सा नो नी

पद य ज्ञो प वी - त 1

१२

Page 225

१७८ भरत का संगीत-सिद्धान्त

१६ ताल आ० नि० वि०

लघु २५ २६ २७ २८ २९ ३० ३२

स्वर नी नो घा घा 1 पा पा पा पा पद कं - 1 1 1

प्रस्तुत प्रस्तार में 'मं, प, ध, नि, स, रे, ग, म, प, ध, नि, स, रे, ग, म, प, ध, नि' अठारह स्वरो का उपयोग है। प्रयुक्त मन्द्रतम स्वर मध्यम 'न्यास से पर' है! तारस्थान मे निपाद तक प्रयोग कामचार से है। पड्जादि मूच्छना स्थापित करने पर अठारह सारोंवाली किन्नरी तीसरे पर्दे से अठारहवें पर्दे तक सोलह स्वर तथा अन्तिम पर्दे पर मीड द्वारा अवगिष्ट दो स्वर प्राप्त करायेगी। चौदह पर्दोवाली किन्नरी पर अन्तिम छः स्वर प्राप्त करना वादक की कुशलता पर निर्भर है।

(१६) गान्धारपञ्चमी - प्रस्तार

प्रस्तुत प्रस्तार पञ्चमांश गान्धारपञ्चमी का उदाहरण है। प्रस्तार के आरम्भ एवं अन्त मे क्रमशः ग्रहस्वर पञ्चम एवं न्यास स्वर गान्धार है। अपन्यास स्वर ऋपभ प्रस्तार के मध्य में है। चञ्वत्पुट ताल की चार आवृत्तियों मे प्रस्तुत प्रस्तार सम्पन्न हुआ है। स्वरसंख्या इस प्रकार है-

पड्ज (अनंश) १०

ऋृषभ (अनंश, अपन्यास) (अनंश, न्यास) १४ गान्धार १९

मध्यम (अनंश) १६ पञ्चम (अश, ग्रह) २७ धैवत (अनंश) निषाद (अनश) गान्वार न्यास एव पंचम अंश से अन्य स्वरों की सङ्गति, ऋषभ और मध्यम से अन्य स्वरो की सङ्गति तथा ऋषभ-मध्यम की पारस्परिक सङ्गति के परिणामस्वरूप निषाद का प्रयोग इस प्रस्तार में सर्वाधिक है।

Page 226

जातियों के प्रस्तार १७९

पद

कान्त वार्मकदेशप्रेडखोलमान- कमलनिभं बरसुरभिकुसुमगन्वाधिवासितमनोज्ञ- नगराजसूनुरतिरागरभसकेलीकुचग्रहलीलं तं प्रणमामि देवं चन्द्रार्घमण्डितविलासकीलनविनोदम्।।

प्रस्तार

१ ताल आ० नि० वि० श०

लघु १ २ ३ ४ ७ ८

स्वर पा मप मध नो घप मा घा नी

पद का - - - 1 1 1

२ ताल आ० नि० वि० ता०

लघु ९ १० ११ १२ १३ १४ १५ १६

स्वर सनिनि घा पा पा पा पा पा पा

पद - तं - 1 1 1

३ ताल आ० श० वि० प्र०

लघु १७ १८ १९ २० २१ २२ २३ २४

स्वर घा नी सा सा मा मा पा पा

पद वा मे - क दे - श

४ ताल आ० नि० वि० स०

लघु २५ २६ २७ २८ २९ ३० ३१ ३२

स्वर नी नी नी नी नी नी नी नी

पद प्रे - ऊखो ल मा - न 1

५ ताल आ० नि० वि० ग०

लघु १ २ ३ ४ ५ ६ ७ ८

स्वर नी नी घप मा निव निध पा पा

पद क म ल नि भं

६ ताल आ० नि० वि० ता०

लघु ९ १० ११ १२ १३ १४ १५ १६

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१८० भरल का संगीत-सिद्धान्त 1

स्वर पा पा रे रे रे रे रे

पद व र सु र भि कु सु म

७ ताल आ० वि० प्र०

लघु १७ १८ १९ २० २१ २३ २४

स्वर मा रिग सा सध नी नी नी नी

पद ग वा - धि वा - सि

८ ताल आ० नि० वि०

लघु २५ २६ २७ २८ २९ ३० ३१ ३२

नी 1 11 रिस 1 1 स्वर नी सा रे 1 रे रे

पद त म नो - ज्ञ 1 1

ताल आ० नि० वि० श०

लघु १ २ ३ ४ ५ ६ ७ ८

स्वर नी गा सा निग सा नी नी नी

पद न ग रा - ज सू - नु

१० ताल आ० नि० वि० ता०

लघु ९ १० ११ १२ १३ १४ १५ १६

स्वर नी मां नी मा पा पां गा गा

पद र ति रा ग र भ स I

११ ताल आ० श० वि० प्र०

लघु १७ १८ १९ २० २१ २२ २३ २४

स्वर गा पां मा पा नी नी नी नी

पद के ली - कु च - ग्र 1

१२ ताल आ० नि० वि० सं०

लघु २५ २६ २७ २८ २९ ३० ३१ ३२ स्वर मा पा मा परिग गा गा गा गा

पद ह ली लं - तं -

१३ ताल आ० नि० वि० श०

लघु १ २ ३ ४ ५ ७ ८

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जातियों के प्रस्तार १८१

स्वर नी नी पा धा नी गा गा गा पद प्र ர मा मि दे वं

१४ ताल आ० नि० वि० ता०

लवु ९ १० ११ १२ १३ १४ १५ १६

स्वर नी नी नी नी नी नी नी नी

पद च द्रा - र्ध मं डि !

१५ ताल आ० श० वि० प्र०

लघु १७ १८ १९ २० २१ २२ २३ २४

स्वर मा मा धा नी सनिनि घा पा पा

पद त वि ला सकी ल -

१६ ताल आ० नि० वि० स०

लघु २५ २६ २७ २८ २९ ३० ३१ ३२

स्वर मा पा मा परिग गा गा गा गा

पद न वि नो - दं . -

इस प्रस्तार मे 'मं, प, वं, नि, स, रे, ग, म, प, ध, नि, स, रे' तेरह स्वरो का उपयोग है। प्रयुक्त मन्द्रतम स्वर मध्यम अपन्यास से पर है। तारतम प्रयुक्त स्वर ऋपभ अशस्वर पञ्चम से पॉचवा है। गान्वारादि मूर्च्छना स्थापित करने पर उपर्युक्त तेरह स्वर किन्नरी पर पहले पर्दे से तेरहवे तक मिल जायँगे।

(१७) आन्ध्री-प्रस्तार प्रस्तुत प्रस्तार गान्धाराश आन्ध्री का उदाहरण है। ग्रह, अपन्यास एवं न्यास स्वर गान्धार प्रस्तार के आदि, मध्य और अन्त में है। चञ्चत्पुट ताल की चार आवृत्तियो मे प्रस्तुत प्रस्तार सम्पन्न हुआ है। स्वर-संख्या इस प्रकार है- षड्ज (अनश) ७

ऋषभ (पर्यायांश) गान्वार (अश, ग्रह, न्यास) ४४

मध्यम (अनश) १५

Page 229

१८२ भरत का संगीत-सिद्धान्त

पञ्चम (पर्यायाश) १३ धैवत (अनश) ४

निषाद (पर्य्यायाश) १९ ऋषभ-गान्धार एव निषाद-धैवत की सङ्गति के कारण तथा निषाद के अश संवादी होने के कारण ऋषभ और निपाद का प्रयोग अंश की अपेक्षा अल्प तथा इतर स्वरों की अपेक्षा बहुल है।

पद

तरुणेन्दुकुसुमखचितजटं त्रिदिवनदीसलिलधीतमुखं नगसूनुप्रणयं वेदनिधिं परिणाहितुहिनशैलगृहम् । अमृतभवं गुणरहितं तमवनिरविशशिज्वलनजलपवन- गगनतनु शरणं व्रजामि शुभमतिकृतनिलयम् ।।

प्रस्तार

१ ताल आ० नि० वि० ग०

लघु १ २ ३ ४ ५ ६ ७ ८

स्वर, गा रे रे रे रे रे रे रे

पद त रु णे न्दु कु सु म 1

२ ताल आ० नि० वि० ता०

लघु ९ १० ११ १२ १३ १४ १५ १६

स्वर रे गा रे गा रे रे रे रे

1 1 पद ख चि त ज ट

ताल आ० वि० प्र० ३ १७ १८ १९ २० २२ २३ २४ लघु २१

स्वर रे रे गा गा रे रे मा मा

लि पद दि व न दी स ल

आ० वि० स० ४ ताल नि०

२५ २६ २७ २८ २९ ३० ३१ ३२ लघु धनि नी नी नी नी स्वर रे गा सा 1 1 पद घो - त मु ख

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जातियों के प्रस्तार १८३

५ ताल आ० नि० वि० श०

लघु १ २ ३ ४ ५ ६ ७ ८

स्वर नी रे नी रे धंनि धनि पा पा

पद न ग सू - नु प्र ण य

६ ताल आ० नि० वि० ताo

लघु ९ १० ११ १२ १३ १४ १५ १६

स्वर मा पा मा रिग गा गा गा गा

पद वे - द नि धिं - - -

७ ताल आ० श० वि० प्र०

लघु १७ १८ १९ २० २१ २२ २३ २४

स्वर रे रे गा सस मा मा पा पा

पद प रि णा हि तु हि न

८ ताल आ० नि० वि० स ०

लघु २५ २६ २७ २८ २९ ३० ३१ ३२

स्वर मा पा मा रिग गा गा गा गा

पद शै ल ग ह - - -

९ ताल आ० नि० वि० श०

लघु १ २ ३ ४ ५ ६ ७ ८

स्वर धा नी गा गा गा गा गा गा

पद अ मृ त भ व - -

१० ताल आ० नि० वि० ता०

लघु ९ १० ११ १२ १३ १४ १५ १६ स्वर पा पा मा रिग गा गा गा गा

1 पद गु ण र हि तं -

११ ताल आ० वि० प्र०

लघु १७ १८ १९ २० २१ २२ २३ २४

स्वर नी नी नी नी रे रे रे रे

पद त म व नि र वि श सि

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१८४ भरत का संगीत-सिद्धान्त

१२ ताल आ० नि० वि० स०

लघू २५ २६ २७ २८ २९ ३० ३१ ३२

स्वर रे रे गा नी सा सा नी नी

पद ज्व ल न ज ल प व न

१३ ताल मा० नि० वि० श० %

लघु १ २ ३ ४ ५ ७ ८

1 स्वर पा पा मा रिग गा गा गा गो

1 1 पद ग ग न त नु

१४ ताल नि० वि० ताo

लघु ९ १० ११ १२ १३ १४ १५ १६

रे 1 11 1 स्वर गा सम मा मा पा पा

पद श र णं - न्र जा मि

१५ ताल आ० श० दि० प्र०

लघु १७ १८ १९. २० २१ २२ २३ २४

I 1 स्वर मा मा नो 1 1 सा गा पा

पद शु भ म ति कृ त नि ल

१६ ताल आ० नि० वि० सं०

लघु २५ २६ २७ २८ २९ ३० ३१ ३२

1 1 1 स्वर रिग गा गा गा गा गा गा गा

1 पद यं - - 1

प्रस्तुत प्रस्तार में 'म, प, वं, निं, स, रे, ग, म, प, व, नि, स, रे, गं, म, प, घ, नि' अठारह स्वरो का उपयोग है। प्रयुक्त मन्द्रतम स्वर मध्यम इस जाति के अपन्यास स्वरो मे है। तारस्थान मे प्रयुक्त अन्तिम स्वर अंशस्वर गान्धार से पाँचवाँ है। मध्यमादि मूच्छना स्थापित करने पर अठारह पर्दोवाली किन्नरी मेरु से सन्रहवे पर्दे तक हमे उपर्युक्त अठारह स्वरो की प्राप्ति करा देगी। चौदह पर्दोवाली किन्नरी पर अन्तिम तीन स्वर मीड द्वारा मिलेगे।

Page 232

जातियों के प्रस्तार १८५

(१८) नन्दयन्ती-प्रस्तार

प्रस्तुत प्रस्तार पञ्चमाश नन्दयन्ती का उदाहरण है। केवल इसी जाति मे ग्रह- स्वर गान्धार अनंश होने पर भी है, जिससे प्रस्तार का आरम्भ हुआ है। प्रस्तार के मध्य मे अपन्यास पञ्चम तथा अन्त मे न्यासस्वर गान्धार है। चञ्चत्पुट ताल की आठ आवृत्तियो में यह प्रस्तार सम्पन्न हुआ है। स्वरसख्या इस प्रकार है- पड्ज (षाडवकारी) ५१ ऋपभ (अनश) २५ गान्धार (न्यास) ५९

मध्यम (अनश) ५१ पञ्चम (अंश) ७० धैवत (अनश) ३२ निपाद (अनश) ३०

पद

सौम्यं वेदाङ्गवेदकरकमलयोनि तमोरजोविवर्जितं हरं भवहरकमलगृह शिव शान्त सन्निवेशनमपूर्व भूपणलीलमुरगेशभोगभासुरशुभपृथुलम्। अचलपतिसूनुकरपंकजामलविलासकीलनविनोदं स्फटिकमणिरजतसितनवदुकूलक्षीरोदसागरनिकाशम्। अजशिर कपालपृथुभाजनं वन्दे सुखदं हरदेहम मलमधु सूदनसुतेजोऽधिकसुगतियोनिम्॥

प्रस्तार

१ ताल आ० नि० वि० श०

लघु १ २ ३ ४ ५ ७ ८

स्वर गा गा गा गा पा पा धप मा

पद सौ

२ ताल आ० नि० वि० ता०

लघु ९ १० ११ १२ १३ १४ १५ १६

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१८६ भरत का संगीत-सिद्धान्त

स्वर धा धा घा धा घा नी सनिनि धा पद

ताल आ० श० वि० पु०

लधु १७ १८ १९ २० २१ २२ २३ २४

स्वर पां पा पां पा पां पां पा पा

पद म्यं 1

४ ताल आ नि० वि० सं०

लघु २५ २६ २७ २८ २९ ३० ३१ ३२

स्वर धां नी मां पां गा गां गा गा

पद वे - दा वे द

५ ताल आ० नि० वि० श० लघु १ २ ३ ४ ५ ६ ७ ८

स्वर मा रे गा गा गा गा गा गा

पद क र क म ल यो नि

ताल आ० नि० वि० ता०

लघु ९ १० ११ १२ १३ १४ १५ १६

स्वर मा मा पा पा धा निध पा पा

पद त मो र जो वि व - -

७ ताल आ० श० वि० प्र०

लघु १७ १८ १९ २० २१ २२ २३ २४

स्वर घा नी मा पा गा गा गा गा

पद जि त

८ ताल आ० नि० वि० स०

लघु ₹4 २६ २७ २८ २९ ३० ३१ ३२

स्वर गम पा पा पा मा मा गा गा

पद हर

९ ताल आ० नि० चि० श०

लघु १ २ ३ ४ ५ ६ ७ ८

Page 234

जातियों के प्रस्तार १८७

स्वर धा नी मा पा मा गा मा गा

पद भ व ह र क म ल ग

१० ताल आ० नि० वि० ता०

लघु १० ११ १२ १३ १४ १५ १६

स्वर मा मा मा मा मा मा मा मा

पद ह

११ ताल आ० श० वि० प्र०

लघु १७ १८ १९ २० २१ २२ २३ २४

स्वर रे गा मा पा पम पा पा नी

पद शि वं शा तं सं - नि

१२ ताल आ० नि० वि० स०

लघु २५ २६ २७ २८ २९ ३० ३१ ३२

स्वर रे रे रे रे पां पां मा मा

पद वे श न म पू - वं

१३ ताल आ० नि० वि० शo

लघु १ २ ३ ४ ५ ६ ७ ८ स्वर धा नी सनिनि धा पा पा पां पा

पद भू ष ण ली - ल

१४ ताल आ० नि० वि० ता०

लघु ९ १० ११ १२ १३ १४ १५ १६ स्वर धा नी मा पा गां गां गां गा

पद उ र ग - श भो - ग

१५ ताल आ० श० वि० प्र०

लघु १७ १८ १९ २० २१ २२ २३ २४

स्वर गा पा पा पा घा मा गा मा

पद भा - सु र शु भ पृ थु

१६ ताल आ० नि० वि० स०

लघु २५ २६ २७ २८ २९ ३० ३२

Page 235

१८८ भरत का संगीत-सिद्धान्त

स्वर धा धा नी धा पा पा पा पा पद लं

१७ ताल आ० नि० वि० शo

लघु १ २ ३ ४ ५ ६ ७ ८

स्वर रे गा मा पा पम पा पा नो

पद अ चव ल प ति सू नु

१८ ताल आ० नि० वि० ता०

लघु ९ १० ११ १२ १३ १४ १५ १६

स्वर रे रे रे रे पा पां पां पा

पद क र प क जा म

१९ ताल आ० ग० चि० प्र०

लघु १७ १८ २० २१ २२ २२ २४

स्वर पा पा पा पा धा मा मा मा

पद ल वि ला स की ल

२० ताल आ० नि० वि० स०

लघ् २५ २६ २७ २८ २९ ३० ३१ ३२

स्वर नी पां गा गम गा गा गां गा

पद न वि नो दं

२१ ताल आ० नि० दि० श०

लघु १ २ ३ ४ ५ ६ ७

स्वर र रें गा गा मा मां मा मा

पद स्फ टि क म णि र ज त

२२ ताल आ० नि० वि० ता०

लघु ९ १० ११ १२ १३ १४ १५ :१६

स्वर नी पा नी मा नी धा पा पा

पद सि त न व दु कू - ल

२२ ताल आ० श ० वि० प्र०

लघ् १७ १८ १९ २० २१ २२ २२

Page 236

जातियो के प्रस्तार १८९

1 स्वर सा सा 1 धनि घा पा पा पा पा

पद क्षी रोद सा - ग

२४ ताल आ० नि० वि० स०

लघु २५ २६ २७ २८ २९ ३० ३१ ३२ 1 स्वर मा पा मा परिग गा गा सा सा

पद र नि का - श -

२५ ताल आ० नि० वि० श०

लघु १ २ ३ ४ ५ ६ ७ ८

स्वर रे गा गा मा मा पा पा

पद अ ज शि र: क पा ल

२६ ताल आ० नि० वि० ता०

लघु ९ १० ११ १२ १३ १४ १५ १६

स्वर रे रे रे गा मा रिग मा मा

पद पृ थु भा - ज न

२७ ताल आ० वि० प्र०

लघु १७ १८ १९ २० २१ २२ २३ २४

स्वर मा नी पा नी गा गा गा गा

पद वं - दे सु ख द

२८ ताल आ० नि० वि० स०

लघु २५ २७ २८ २९ ३० ३१ ३२

स्वर मा मा पा पा घा धनि निध मा

पद ह र दे - ह म म ल

२९ ताल आ० नि० दि० श०

लघु १ २ ३ ४ ५ ६ ७ ८

स्वर घा घा सा नी घा नी पा पा

पद म घु सू द न

३० ताल आ० नि० वि० ता०

लघु ९ १० ११ १२ १३ १४ १५ १६

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१६० भरत का संगीत-सिद्धान्त

रे स्वर मा पा धा मा

पद ते - जो धि क - सु

३१ ताल आ० श० वि० प्र०

लघु १७ १८ १९ २० २१ २२ २३ २४

स्वर नी नी नी नी धा पा मा मा

पद ग ति यो

३२ ताल आ० नि० दि० सं०

लघु २५ २६ २७ २८ २९ ३० ३१ ३२

स्वर मा परिग गा गा गा गा गा गा

पद - - निं

प्रस्तुत प्रस्तार में 'र, गं, मं, पं, धं, निं, स, रे, ग,म, प, ध, नि, स, रे पन्द्रह स्वरों का प्रयोग है। प्रयुक्त मन्द्रतम स्वर 'न्यास' से पर तथा अंश-संवादी है। तारस्थानीय ऋपभ अशस्वर पञ्चम से पाँचवाँ है। पञ्चमादि मूर्च्छना स्थापित करने पर उपर्युक्त पन्द्रह स्वर, अठारह सारोवाली किन्नरी, चौथे पदे से अठारहवे पर्दे तक प्राप्त करायेगी। चौदह पर्दोवाली किन्नरी पर अन्तिम चार स्वर मीड द्वारा मिलेंगे।

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पंचम अध्याय

साधारण

स्वर-साधारण पूर्व स्थिति का जहाँ पूर्णतया अन्त न हो और पर स्थिति को भी जहाँ अनागत न कहा जा सके, वह स्थिति 'साधारण' स्थिति होती है। मान लीजिए, छाया मे जाने पर शीत का अनुभव होता है और धूप में जाने पर पसीना आने लगता है, तो न तो यही कहा जा सकता है कि शिशिर का अन्त हो गया है (क्योकि छाया मे शीत का अनुभव होता है) और न यही कहा जा सकता है कि वसन्त नही आया है, (क्योकि धूप मे पसीना आ रहा है)। फलतः शिशिर और वसन्त दोनों की विशेप- ताओं से युक्त इस काल मे 'काल-साधारणता' है। इसी प्रकार यदि कोई स्वर अपनी शुद्ध स्थिति की अपेक्षा चढ गया हो और अगले स्वर तक भी न पहुँचा हो, तो उसकी 'साधारण' अवस्था होगी, क्योकि न तो वह अपने मूल स्थान पर रहा है और न उसने अग्रिम स्वर की स्थिति प्राप्त की है। गान्वार जव अपने स्थान से दो श्रुति चढ़ जाता है, अर्थात् मध्यम की दो श्रुतियों का ग्रहण कर लेता है, तब 'अन्तरगान्धार' कहलाता है।२ निपाद जव अपने स्थान से दो श्रुति चढ़ जाता है, अर्थात् पड्ज की दो श्रुतियो का ग्रहण कर लेता है, तब 'काकलीनिषाद' कहलाता है।१

१-छायासु भर्वत शीतं प्रस्वेदो भवति चातपस्थस्य। न च नागतो वसन्तो न च निःशेष: शिशिरकालः ॥ इति कालसाधारणता। -भरत०, व० स०, पृ० ४३६ २-एव गान्धारोऽप्यन्तरस्वरसंज्ञो गान्वारो न मध्यमः । -भरत०, व० स०, पृ० ४३७ ३-द्विश्रुतिप्रकर्षणान्निपादवान् काकलीसज्ञो निपाद., न पड्ज.। द्वाभ्याम् अन्तर- स्वरत्वात्। -- भरत०, वं० सं०, पृ० ४३७

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१९२ भरत का संगीत-सिद्धान्त

निषाद जव अपने स्थान से एक प्रमाणश्रुति चढ़ता है तब 'कैशिकनिपाद' कहलाता है और पड्ज जब अपने स्थान से एक प्रमाणश्रुति उतर जाता है, तव 'च्युतषड्ज' कहलाता है। ये दोनो क्रियाएँ होने पर कैगिकनिपाद और च्युतषड्ज में दो श्रुतियों का अन्तर रह जाता है। गान्वार जद अपने स्थान से एक प्रमाणश्रुति चढ़ता है, तब 'साधारण गान्धार' कहलाता है और और जब मध्यम अपने स्थान से एक प्रमाणश्रुति उतर जाता है, तब 'च्युतमध्यम' कहलाता है। ये दोनो अवस्थाएँ सम्पन्न होने पर साधारण गान्धार और च्युतमघ्यम मे दो श्रुतियों का अन्तर रह जाता है।4 शार्ङ्गदेव ने इन चारो स्वर-साधारणो को क्रमशः अन्तर-साधारण, काकली- साधारण, पड्ज-साधारण एवं मध्यम-साधारण कहा है।१ प्रथम दो अवस्थाएँ, अन्तर-साधारण और काकली-साधारण एक स्वर में उत्पन्न विकार का परिणाम होती हैं, परन्तु 'पड्ज-साधारण' एवं 'मध्यम-साधारण' अवस्थाएँ दो-दो स्वरो की स्थान-विकृति का परिणाम है। यह कहा जा चुका है कि प्रत्येक चतुःश्रुतिक स्वर की आदिम एवं अन्तिम श्रुतियो का परिमाण 'ग' है*, अर्थात् वे प्रमाणश्रुतियाँ हैं। षड्ज-साधारण मे कैशिक-निषाद अपने शुद्ध स्थान से 'ग' अन्तर चढ़ा हुआ है और षड्ज अपने स्थान से 'ग' अन्तर उतरा हुआ है। इसी प्रकार मध्यम-साधारण मे साधारण गान्धार अपनी शुद्ध स्थिति से एक 'ग' अन्तर चढा हुआ है और मध्यम अपनी मूल स्थिति से एक 'ग' अन्तर उतरा हुआ है। 'ग' अन्तर ही 'केशाग्र' अन्तर है। पड्ज-साधारण एवं मध्यम-सावारण अवस्थाओ में स्वरो का अपने स्थान से एक 'ग' अन्तर हटना प्रयोग (गान-वादन किया) की सूक्ष्मता का परिणाम है, इसी प्रयोगसूक्ष्मता के कारण इसे 'कैगिक' नाम दिया गया

४-निषादो यदि षड्जस्य श्रुतिमाद्या समाश्रयेत्। ऋषभस्त्वन्तिमां प्रोक्तं षड्जसाधारणं तदा। -सं० र०, अ० सं०, स्वरा०,पृ० १४९ ५- मध्यमस्यापि गपयोरेवं साधारणं मतम् । 11 13 11

६-स्वरसाधारण तत्र चतुर्धा परिकीर्तितम् ॥ काकल्यन्तरषड्जैश्च मध्यमेन विशेषणात्। 11 । १४७ *देखिए, प्रथम अध्याय में श्रुतियो के परिमाण।

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साधारण १९३

है।" पड्ज-साधारण का प्रयोग पडजग्राम मे और मध्यम-साधारण का प्रयोग मध्यम- न्राम मे होता है। निम्नस्थ मण्डल-प्रस्तार मे यह स्थिति स्पष्ट है। कै.नि च्यु ष स ग क ख ग क ख १ २ ३ ४ ५

निः ग २२ -७ग !

ख २१ -८ख

ध ग२० -९ग ग

ख १ ९ -१०ग साधा०ग

क१८- -११क

१७ १६ १५ १४ १३ १२ ग ख क ग ग ख

प त्रिश्रु.प म च्यु म पहली श्रुति पर स्थित कैशिकनिषाद अपने मूलस्थान बाईसवीं श्रुति से एक 'ग' अन्तर चढ गया है और तीसरी श्रुति पर स्थित च्युत पड्ज अपने मूलस्थान चौथी श्रुति से एक 'ग' अन्तर उतर गया है। दसवी श्रृति पर स्थित साधारण गान्वार अपने मूल स्थान नवी श्रुति से एक 'ग' अन्तर चढ़ गया है और बारहवी श्रुति पर स्थित च्युतमध्यम अपने मूलस्थान तेरहवीं श्रुति से एक 'ग' अन्तर उतर गया है। *

७-साधारणोऽत्र स्वरविशेष इति षड्जसावारणम् । अस्य तु प्रयोगसौक्ष्म्यात् कैशिकमिति नाम निष्पद्यते। -भरत०, व० सं०, पृ० ४३७ * यह केशाग्र अन्तर प्रयोग में व्यवहार्य स्वर-संगति का परिणाम है। मध्ययुग में उत्पन्न कुछ राग दोनों ग्रामो की थोड़ी-थोडी विशेपताओ को धारण करने के कारण 'द्विग्राम' १३

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१९४ भरत का संगीत-सिद्धान्त

कैशिक निषाद और च्युत षड्ज में तथा साधारण गान्वार और च्युत-मध्यम में प्राप्त होनेवाला द्विश्रुतिक अन्तर 'क, ख'; ऋषभ-गान्धार, धैवत-निषाद, काकली- निषाद-षड्ज और अन्तर गान्धार-मध्यम में प्राप्त होनेवाले द्विश्रुतिक अन्तर-ख, ग' से और निषाद, काकलीनिषाद एवं गान्वार अन्तरगान्धार में प्राप्त होनेवाले द्विश्रुतिक अन्तर 'ग, क' से विलक्षण है। फलतः यह द्विश्रुतिक अन्तर अनिष्ट न होकर इष्ट है। महर्षि भरत ने स्वरसाधारण के दो प्रकारो, अर्थात् अन्तरगान्धार एवं काकली- निषाद का प्रयोग भी मध्यमाश मध्यमा, पञ्चमाश पञ्चमी एव पड्जांश पड्जमध्यमा जाति में बताया है।' 'कम्बल' और 'अश्वतर' इनका प्रयोग उन जातियों मे सामान्य रूप से बताते है, जिनमें निषाद या गान्वार अल्प हों,फलतः आचार्य शार्ङ्गदेव ने षाड्जी जाति मे काकलीनिषाद के क्वचित् प्रयोग का जो विधान किया है, वह इन्हीं दोनो शास्त्रकारो के मत के अनुसार है। पाड्जी जाति मे निषाद लोप्य स्वर है।

कहलाते थे। वर्तमान 'भीमपलासी' मे 'म, प, नि, स, नि, ध, प' स्वर-समुच्चय हमें कैशिक निपाद और च्युत पड्ज का दर्शन कराता है, क्योकि इसमे कैशिक निषाद के बाद हम पड्ज का स्पर्श करके लौट आते है, परन्तु यदि पड्ज पर ठहर जायँ, तो वह अपने शुद्ध स्थान पर जाकर ठहरता है। इसी प्रकार 'नि, स, गै,म, ग, रे, स' स्वर- समुच्चय हमें साधारण गान्धार और च्युत मध्यम का साक्षात् कराता है, परन्तु जब हम मध्यम पर ठहरते है, तब वह मध्यम अपने ठीक स्थान पर लगता है। यह प्रयोग तन्त्रीबोध्य है। ८-स्वरसाधारणगतास्तिस्रो ज्ञेयास्तु जातयः । मध्यमा पञ्चमी चैव षड्जमध्या तथैव च।। आसामंगा (शा) स्तु विज्ञेया षड्जमध्यमपञ्चमाः । यथास्वं ..... -- भरत०, व० सं०, पृ० ४३८ ९-एतदल्पनिगास्वाहु: कम्बलाश्वतरादयः । -स० र०, अ. स०, स्वरा०, पृ० १७७ नाटयशास्त्र के मुद्रित सस्करणो मे' अस्याल्पनिषादगान्धारासु जातिषु प्रयोग:' पाठ प्रक्षिप्त है। शार्गदेव का उपर्युक्त कथन इस सम्बन्ध मे प्रमाण है।

'१०-पूर्णत्वे काकली क्वचित्। -- सं० रं०, अ०सं०, स्वरा०, पृ० १९६

Page 242

साधारण १९५

जातियो में अन्तर स्वरों का प्रयोग आरोही में तथा अल्प करना चाहिए, अवरोही मे अन्तर स्वरो (अन्तर गान्धार और काकली निषाद) का प्रयोग जातियों मे सर्वथा निषिद्ध है।" अन्तैर स्वरो के प्रयोग की विधि इस प्रकार है- षड्ज का उच्चारण करके क्रमशः काकली निपाद और धैवत का उच्चारण करना चाहिए अथवा 'पड्ज' एव 'काकली' का उच्चारण करके पुनः पड्ज एवं उससे परवर्ती स्वरो का उच्चारण करना चाहिए।१२ इसी प्रकार मध्यम, अन्तर गान्धार, ऋपभ का उच्चारण या मध्यम, अन्तर गान्धार, मध्यम एव उससे परवर्ती स्वरो का उच्चारण करना चाहिए।१ कैशिक स्वरो (पड्ज-साधारण, मध्यम-सांधारण) का उपयोग पड्जकैशिकी एवं कैशिकी जाति मे क्मश होता है। पड्जकैशिकी षड्जग्रामीय जाति है, अत. उसमे पड्जसाधारण का प्रयोग होता है और कैशिकी मध्यमग्रामीय जाति है, फलत. उसमें मध्यमसाधारण का प्रयोग होता है।"

११-अन्तरस्वरसयोगो नित्यमारोहिसंश्रयः। कार्य: स्वल्पविशेषेण नावरोही कदाचन ॥ -भरत०, व० सं०, पृ० ४३७ १२-प्रयोज्यौ पड्जमुच्चार्य्य काकलीघैवतौ कमात्। ...... पड्जकाकलिनौ: यद्वोच्यार्य पड्ज पुनर्व्जेत्। तत्परान्यतमं चैव- -स० र०, अ० स०, स्वरा०, पृ० १४८ १३-एवं मध्यममुच्चार्य्य प्रयुञ्जीतान्तरर्पभौ। .... मध्यमं चान्तरस्वरम्। प्रयुज्य मध्यमो ग्राह्यस्तत्परान्यतमोऽथवा॥ -स० र०, अ० सं०, स्वरा०, पृ० १४८ १४-यत्कैश्चिदेते सम्प्रोक्ते कैशिके सूक्ष्मदृष्टिभिः । साधारणेन तद्राजराजसम्मतिमरहति॥ यतोऽभिनवगुप्तोक्तिरहस्यज्ञो क्षमाधिपः । अन्यथैतद्वचोगुम्फयुक्तिव्याकरण व्यधात् ॥ कैशिकीषड्जकैशिक्यौ यतस्तत्वज्ञसम्मते। एते कैशिकमाश्रित्य प्रवृत्ते .... । क्षेत्रराजमतादेतत्स्वरसाधारणं स्फुटम् ॥ -कुम्भ, भ० को०, पृ० ९६५

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१९६ भरत का संगीत-सिद्धान्त

पड्ज-साधारण अवस्था मे पड्ज की अन्तिम श्रुति ऋपभ के अधिकार-क्षेत्र में चली जाती है, फलतः ऋषभ चतुःश्रुतिक हो जाता है। मध्यम-साधारण अवस्था मे मध्यम की अन्तिम श्रुति माघ्यमग्रामिक पञ्चम ले लेता है, फलतः वह चतु.श्रुतिक हो जाता है। कैशिक स्वरों की प्रयोगजन्य अवस्था को देखते हुए ही मूच्छना-विधान में कैशिक- स्वरयुक्त मूर्च्छनाएँ नही मानी गयी है,"अपितु अन्तर एवं काकली मे ही उनका अन्त- र्भाव मान लिया गया है।" इसके अतिरिक्त पड्ज-साधारण एव मध्यम-साधारण का प्रयोग ग्रामविशेष में नियत होने के कारण मूर्च्छनाओ के साधारण (अन्तर-काकलीयुक्त) प्रकार-निरूपण के प्रसंग मे पड्ज-साधारण एव मध्यम-साधारण की चर्चा अनुपयोगी है, क्योकि भरत ने स्पष्ट कहा है कि पड्ज-साधारण पड्जग्राम मे और मध्यम-साधारण मध्यमग्राम मे होता है। यह आचार्य-रहस्य असम्प्रदायज्ञ व्यक्तियो के लिए दुर्गह है।१५ साधारण स्वरो का ग्रामविशेष मे प्रयोग जाति-प्रकरण मे है। रागो मे अन्तर गान्वार एव काकली-निषाद का प्रयोग किसी ग्रामविशेष तक सीमित नही रहता।

१५-षड्जमध्यमयोः साधारणीकृतयोः स्वरूपेण भेदकत्वे सम्भवत्यपि काकल्यन्तरयोः साधारणयोरन्तर्भूतत्वेन तयो: पृथग्भेदकत्वम्। -आचार्य्य कल्लिनांर्थ, सं० र० टी०, अ०सं०, स्वरा०,पृ० १०८ १६-साधारणस्वरौ निषादगान्धारवन्तौ तदादिविकृतास्तत्रैवान्तर्भूताः । -- मतङ्ग, कल्लिनाथोद्धृत, सं० र० टी०, अ०सं०, स्वरा०,पृ० १०८ १७-किञ्च ग्रामद्वये मूर्च्छनासाधारणप्रकारभेदनिरूपणावसरे प्रतिनियतग्राम- वर्तिनोः पड्जमध्यमसाधारणयोरनुपयोगाच्च । यथोक्त भरतेन-'पड्जग्रामे षड्जसाधारणं मध्यमग्नामे मध्यमसाधारणम्' इति । इत्याचार्य- रहस्यमसंप्रदायविदुषां कृते दुर्ग्रहम् । -- आचार्य कल्लिनाथ, सं० र० टी०, अ० सं०, स्वरा०, पृ० १०८ यहाँ यह स्पष्टतया समझ लेना चाहिए कि अल्पनिपाद-गान्वार जातियो में अन्तरगान्धार एवं काकलीनिपाद का ही प्रयोग अभीष्ट है। पड्जसाधारण एवं मध्यमसाधारण के प्रयोग मे निषाद और गान्धार की अल्पता वाञ्छनीय नही। षड्जसाधारण के प्रयोगस्थल पड्जकैशिकी जाति एवं मध्यमसाधारण के प्रयोग- स्थल कैशिकी जाति मे निषाद-गान्धार की अल्पता नही है। नाटयशास्त्र के मुद्रित संस्करणो मे 'अस्याल्पनिपादगान्धारासु जातिषु प्रयोग.' पाठ प्रक्षिप्त है; शार्ङ्गदेव ने यह मत कम्बल और अश्वतर का वतलाया है और फलतः

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साधारण १९७

स्वर-साधारण के विषय मे कुछ परवर्ती विद्वानों ने कहा है कि जव श्रुति के उत्कर्प से किसी स्वर का स्वरूप अस्फुट और लुप्त-सा हो जाता है, तब गीतज्ञ व्यक्ति उस स्थिति को स्वर-साधारण कहते है। पड्ज-पञ्चम एव ऋषभ-धैवत की श्रुतियो का अत्युत्कर्ष (दो श्रुतियो का उत्कर्प) नही होता। (पड्ज-पञ्चम के परवर्ती स्वर ऋषभ-धैवत त्रिश्रुतिक और ऋपभ-धैवत के परवर्ती स्वर गान्धार-निषाद द्विश्रुतिक है, अत) अत्युकर्प से पड्ज और पञ्चम मे बेसुरापन उत्पन्न हो जाता है और अवधान- हीनता आ जाती है। ऋपभ और धैवत को दो श्रुति चढाने पर क्रमश. गान्धार एवं निषाद मे उनका सकर हो जायगा और पश्चाद्वर्ती स्वरो की अभिव्यक्ति नही होगी, फलतः अपनी शुद्ध अवस्था से दो श्रृति चढे हुए अन्तर-गान्वार एव काकली-निपाद मे दो श्रुतियो का स्फुट उत्कर्प होता है।१८

अल्पनिषाद जाति 'पाड्जी' मे काकली का भी विधान किया है। यह सत्य है कि मध्यमा, पञ्चमी तथा पड्जमध्यमा जातियॉ भी 'अल्पनिपाद-गान्धार' है, परन्तु भरत के द्वारा इन विशिष्ट जातियो के नामो का निर्देश इस बात का सूचक है कि पाड्जी जैसी अल्पनिपाद जाति में काकली-प्रयोग भरत को वाञ्छनीय नही। भरतोक्त तीनों जातियो की अल्पनिपाद-गान्धारता देखकर ही कम्बल और अश्वतर ने इस नियम की सीमा बढ़ाकर अन्य जातियो को भी इस नियम के क्षेत्र मे सम्भवत. ले लिया है। फलतः पाड्जी मे भरत के द्वारा अनुक्त काकलीविधान कम्वल और अखवतर को सम्मत होने के कारण ही शार्ङ्गदेव को माननीय हुआ है। "स्वरसाधारण प्रोक्त मुनिभिर्भरतादिभि.। अशेषु समपेष्वेतद् यथास्व नियमाद् भवेत्। एतदल्पनिगास्वाहु. कम्वलाश्वतरादय.।।" - स० र०, अ० सं०, स्वरा०, पृ० १७७ कहकर आचार्य शार्ङ्गदेव ने दोनो मतो का स्पप्टतया पृथक्-पृथक उल्लेख किया है। फलत' यह सिद्ध है कि शार्ङ्गदेव को उपलब्ध नाटयगास्त्र में 'अस्याल्प- निपादगान्वारादिपु जातिपु प्रयोग.।' पाठ नही था। नाटयगास्त्र के मुद्रित संस्करणो मे उपलभ्यमान यह पाठ प्रक्षिप्त है और अवसरानुकूल ने होने के कारण असंगत है। इस पाठ ने अनेक विचारकों के समक्ष उलझन उपस्थित की है। १८-यदा श्रृतिसमुत्कर्पात् स्वनो लुप्त इवास्फुट.। गीतज्ञरगीयते ज्ञेय स्वरसाधारणं तदा॥ अत्युत्कर्पस्तु सपयोर्न भवेद् रिधयोरपि।

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१९८ भरत का संगीत-सिद्धान्त

उपर्युक्त विधान वाईसो श्रुतियो का प्रत्यक्षीकरण होने पर अक्षरशः सत्य सिद्ध होता है। जाति-साधारण-

एक ग्राम मे उत्पन्न समानांश जातियों में होनेवाला समान गान जाति-साधारण है।११ दत्तिल इत्यादि मनीषियो ने शुद्ध-कैशिक-मध्यम इत्यादि रागो को ही जाति- साधारण कहा है।२०

वैस्वर्याद् (र्य)व्यवधानाच्च (धान च) श्रृतीना तेन जायते॥ गन्योस्तु ताभ्या साङ्कर्य्ये स्वरव्यंक्तिर्न लभ्यते। पारिशेष्यादतो गन्योः श्रृत्युत्कर्ष. स्फुटो, भवेत्॥ -पण्डितमण्डली, भ० को०, पृ० ७१३ आधुनिक स्वरो पर पृथक् विचार किया गया है। यहाँ केवल इतना समझ लेना चाहिए कि कोमल धैवत और कोमल ऋपभ पञ्चम एवं पड्ज से 'क' 'ख' अन्तर पर स्थित, घैवत और ऋषभ की, दूसरी श्रुति पर नही उत्पन्न होते, न हो सकते है। १९-(अ) 'जातिसाधारणमेकांशाना विशेषाज्जातीनां तु समवायात्।' -भरत०, ब० सं०, पृ० ४३७ (आ) एकग्रामोद्भवास्वेकांशासुं जातिपु यद् भवेत्। समानं गानमार्य्यास्तं जातिसाधारणं जगुः ॥ -- सं० र०, अ० स०, स्वरा०, पृ० १५० (इ) एकग्रामसमुत्पन्नास्वेकांशास्वपि जातिषु। यत्सम गानमार्य्यास्तज्जातिसाधारणं जगु. । -पण्डित ०, भ० को०, पृ० ७१७ (ई) एकाशोपचितास्वेकग्रामजेषु (जासु) च जातिषु। यद् गानं समतां प्राप्तं जातिसाधारण तुतत्॥ -कुम्भ०, भ० को०, पृ० ९६६ २०-(अ) जातिसाधारणं केचिद् रागानेव प्रचक्षते। -- सं० र०, अ० सं०, स्वरा०, पृ० १५० (आ) केचिद् रागा एव शुद्धकैशिकमध्यमादयो जातिसाधारणमित्याहुः। -- सिंह०, सं० र०, अ० सं, स्वरा०, पृ० १५१ (इ) दत्तिलाद्याः पुनरिदं रागानेव प्रचक्षते।

(ई) रागानेवोचुरपरे जातिसाधारणं बुधा: । -- कुम्भ०, भ० को०, पृ० ९६६

-पण्डित०, भ० को०, पृ० ९२१

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षष्ठ अध्याय

राग A7

महर्षि भरत ने सात ग्रामराग गिनाये है, उनके प्रयोग के अवसर भी निर्दिष्ट किये है,अन्तर स्वरो के प्रयोग से जातिरागो का जन्म भी बताया है, परन्तु 'राग' का लक्षण नही किया है। महर्पि ने ग्रामरागो को जाति से उत्पन्न वताया है। उन्होने यह भी कहा है कि लोक में जो कुछ गाया जाता है, वह सब कुछ जातियो मे स्थित है।* वस्तुतः जातियों के विशद परिसख्यान ने, जहॉ तिरसठ अंश है, तथा लक्षणविकृति से जहाँ जातियो के अनेक अवान्तर भेद सम्भव है, जातियो के क्षेत्र को इतना विस्तृत वना दिया है कि उसमे किसी भी 'राग' का अन्तर्भाव हो सकता है।

१-मुखे तु मध्यमग्राम. षड्जः प्रतिमुखे भवेत्। गर्भे साधारितश्चैव अवमर्शे तु पञ्चम.॥ संहारे कैशिकः प्रोक्त. पूर्वरङ्गे तु पाडव.। चित्रस्याष्टादशागस्य त्वन्ते कैशिकमध्यमः। शुद्धाना विनियोगोऽय ब्रह्मणा समुदाहृतः॥ -भरत०, भ० को०, पृ० ५४२ २-जातिरागं श्रुतिञ्चैव नयन्ते चान्तरस्वरा.। -भरत०, व० स०, पृ० ४३७ ३-नन्वेते रागा ग्रामविशेपसबद्धा इति कुतोऽयं विशेषलाभः ? उच्यते, भरतवचनादेवासौ विशेपो लभ्यते। तथा चाह भरतमुनि .- 'जातिसम्भूतत्वाद् ग्रामरागाणाम्' इति। -कल्लि०, सं० टी०, अ० स०, राग०, १०८ ४-यत्किन्चिद् गीयते लोके तत्सर्व जातिषु स्थितम्। --- भरत०,

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२०० भरत का संगीत-सिद्धान्त

पड्ज इत्यादि स्वरो और स्थायी इत्यादि वर्णो से विभूषित वह ध्वनिविशेप राग है, जिससे मनुष्यो के मन का रज्जन होता हो'। विशिष्ट स्वर, वर्ण (गानक्िया) से अथवा ध्वनिभेद के द्वारा जो जन-रञ्जन मे समर्थ है, वह राग है।६ जो राग स्थायी, आरोही, अवरोही, सञ्चारी वर्गों से शोभन हो, वह सब कुछ (वर्णचतुष्टय) जहाँ दिखाई देता हो, वे राग कहे गये है।" जिनके द्वारा तीनो लोको मे विद्यमान प्राणियों के हृदय का रज्जन होता है, भरत इत्यादि मुनियो ने उन्हे राग कहा है।" रञ्जन के कारण ही राग की संज्ञा 'राग' है, यही राग की व्युत्पत्ति है। राग शब्द 'अश्वकर्ण' जैसे शब्दो के समान रूढे, 'मन्थ' इत्यादि शब्दो के समान यौगिक अथवा 'पंकज' शब्द के समान योगरूढ है।" यदि किसी व्यक्ति को कोई राग नही भाता, तो वह राग उसके लिए रञ्जक नही, परंतु उस अरञ्जक राग को भी रूढि के कारण राग ही कहा जाता है।१

५-योऽसौ ध्वनिविशेषस्तु स्वरवर्णविशेपित. । रञ्जको जनचित्ताना स च राग उदाहृतः ॥ -मतङ्क, भ० को०, पृ० ९२१ ६-स्वरवर्णविशेपेण ध्वनिभेदेन वा पुनः । रज्यते येन यः कश्चित् स रागः सम्मतः सताम् ॥ -- मतङ्ग, भ० को०, पृ० ९२१ ७-चतुर्णामपि वर्णानां यो रागः शोभनो भवेत्। स सर्वो दृश्यते येषु तेन रागा इति स्मृता.।। -- काश्यप, कल्लि०, स० टी०, अ. सं०, राग०, पृ० ६-७ ८-यैस्तु चेतांसि रज्यन्ते जगत्त्रितयवर्तिनाम् । ते रागा इति कथ्यन्ते मुनिभिर्भरतादिभिः॥ -शुभड़कर, भ० को०, पृ० ९२२ ९ -- इत्येवं रागशव्दस्य व्युत्पत्तिरभिधीयते। रञ्जनाज्जायते रागो व्युत्पत्तिः समुदाहृता ॥ -मतङ्ग, भ० को०, पृ० ९२३ १०-अश्वकर्णादिवद् रूढो यौगिको वापि मन्थवत्। योगरूढोऽथवा रागो ज्ेय: पकजशव्दवत्॥। -मतङ्ग, कल्लि०, स० र०, अ० स०, राग०, पृ० २ ११-रागशब्दस्य केवलरूउत्वं तु येन केनचिद् रागेण यः कश्चन न रज्यते, तं प्रति तस्यारञ्जकत्वात् 'अयं रागो मह्यं न रोचते' इति तद्वाक्यप्रयोगे द्रष्टव्यम्।

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राग २०१

जातियाँ वास्तव मे 'मूल राग' है जिनमे विकार होने से अनेक रागो का 'जन्म होता है। जातियो के दस लक्षणो में प्रमुख लक्षण 'अश' का वर्णन करते हुए उसके लक्षण मे महर्षि ने कहा है कि राग का जिसमें निवास होता है और राग जिस स्वर से प्रवृत्त होता है ... वह अशस्वर है।१२ इससे यह सिद्ध है कि महर्षि जातियो को भी 'राग' ही मानते है। ग्रामराग जातियो या मूल रागो से उत्पन्न अथवा उनके विकृत रूप है। महर्पि के कथन के अनुसार यदि अन्तर स्वरों का प्रयोग अवरोह मे भी हो, तो जातियाँ 'जातिराग' हो जाती है।१ यहाँ हमारे विचार का प्रधान विषय महर्पि के द्वारा निर्दिप्ट निम्नलिखित सात शुद्ध राग है" १ -- मव्यमग्राम (मध्यमग्रामीय) २ -- पड्जग्राम (षड्जग्रामीय) ३-साधारित (षड्जग्रामीय) ४-पञ्चम (मध्यमग्रामीय) ५- कैशिक (मध्यमग्रामीय) ६-षाडव (मध्यमग्नामीय) ७-कैशिक मध्यम (१) मध्यमग्राम (पड्जग्रामीय)

कश्यप का कथन है- गान्धारी, मध्यमा और पञ्चमी जाति से मध्यमग्राम नामक राग का जन्म हुआ है। इसमे षड्ज अंशस्वर और मध्यम न्यासस्वर होता है।" शार्ङ्गदेव का विधान है-

१२-रागस्तु यस्मिन् वसति यस्माच्चैव प्रवतते। -भरत०, ब० सं०, पृ० ४३३ १३-अन्तरस्वरसयोगो नित्यमारोहिसंश्रयः । कार्य: स्वल्पविशेषेण नावरोही कदाचन ॥ क्रियमाणोऽवरोही स्यादल्पो वा यदि वा बहुः। जातिराग श्रुतिञन्चव नयन्ते चान्तरस्वराः ॥ -भरत०, व० सं०., ४३७ १४-देखिए, सकेत १ १५-गान्धारीमध्यमाजात्यो. सपञ्चम्योःसमुत्यितः। पड्जांशो मध्यमग्रामो मध्यमो न्यास एव च।। -कश्यप, भ० को० ४६५

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२०२ भरत का संगीत-सिद्धान्त

"मध्यमग्राम राग का विनियोग हास्य एवं शृङ्गार मे है। यह राग गान्धारी, मध्यमा और पञ्चमी जातियो से मिलकर उत्पन्न हुआ है। काकली-निषाद का प्रयोग इसमे विहित है। इस राग का अश-ग्रह स्वर मन्द्र पड्ज, न्यास स्वर ममध्यम और मूर्च्छना (मध्यमग्रामीय मध्यमादि) 'सौवीरी' है। 'प्रसन्नादि' और 7अवरोही' के द्वारा मुखसन्धि मे इसका विनियोग है। यह राग ग्रीष्मऋतु के प्रथम प्रहर में सदा रज्जक है।"१६

लाप

सां नीधापांधां धांधरि। गांसा। रिगानीसां। सगपांपपप निनिपनि सां सां गपसानिधनिनि निरिगासा। पां मं पं निधामा।

करण -1 निनिपपगंगंसंसंरिगं। नि सं सासा। ससंगगंपंपधंधं मधनिसनिध पापापापा पनी पनी सांसांसां गागासागासनी धनीनीनिनिरिगांसांसांपांपाभापानिध पामामा।

पद

अमरगुरुममरपतिमजयं जितमदनं सकलशशितिलकम्। गणशतपरिवृतमशुभहरं प्रणमत सितवृषरथगमनम् ।। आक्षिप्तिका-चञ्चत्पुट ताल

१ ताल आ० नि० वि० · शo

लघु १ २ ३ ४ ५ ६ ७ ८

स्वर सां सां गां गां पां पां मा मा

  • पद अ म र गु रु म म र

१६-गान्धारोमध्यमापञ्चम्युद्भवः काकलीयुतः। मन्यासो मन्द्रषड्जांशग्रहः सौवीरमूर्च्छनः॥ प्रसन्नाद्यवरोहिभ्या मुखसंधौ नियुज्यते। मध्यमग्रामरागोऽयं हास्यशृंगारकारक. ॥ ग्रीष्मेऽह्रः प्रथमे यामे ध्रुवप्रीत्यै ...... । -सं० र०, अ० सं०, राग०, पृ० ५९

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राग २०३

२ ताल 1 आ० नि० वि० ता०

7 लघु, ९ १० ११ १२ १३ १४ १५ १६ * स्वर गां मा मां मा घा नी सां सा पद प ति म ज यं 1

३ ताल आ० श० वि० प्र०

लघु १७ १८ १९ २० २१ २२ २३ २४

स्वर सां सां मां मां पां पां सां सा

पद जि त म द नं स क ल

४ ताल आ० नि० वि० सं०

लघु २५ २६ २७ २८ २९ ३० ३१ ३२

स्वर रे नी सा सा सा सां सा

पद श शि ति ल कं - 1

५ ताल आ० नि० वि० श०

लघु १ २ ३ ४ ५ ६ ७ ८

स्वर नी नी नी नीं धा पा मा मा

पद ग ण श त प रि वृ त

ताल आ० नि० वि० ता०

लघु ९ १० ११ १२ १३ १४ १५ १६

स्वर गां मां गां मां घा नी सा सा

पद म श भ ह र - - 1

७ ताल आ० श० वि० प्र०

लघु १७ १८ २० २१ २२ २३ २४

स्वर नी गां नी सां सा पा पा

पद प्र ण म त सि त व ष

ताल आ० नि० वि० सं०

लघु २५ २६ २७ २८ २९ ३० ३१ ३२ स्वर सा सा निघ पा मा मा मा मा

पद र थ ग म नं 1 1

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२०४ भरत का संगीत-सिद्धान्त

उपर्युक्त आक्षिप्तिका मे 'सं, रे, गं, मं, प, धं, नि, स, रे, ग, म, प; ध, नि' इन चौदह स्वरो का उपयोग हुआ है। मध्यमादि मूर्च्छनायुक्त अठारह सारोवाली किन्नरी के चौथे परदे से सन्रहवे पर्दे तक ये चौदहो स्वर मिल जायँगे। इस राग मे 'ग, रि, स, नि, ध, प, म' अवरोही वर्ण प्रयुक्त हो सकता है, तदनन्तर 'मां मां मा' के रूप मे प्रसन्नादि अलंकार सम्मिलित किया ज़ा सकता है। आक्षिप्तिका मे प्रयुक्त स्वरो की सख्या इस प्रकार है- पड्ज (अंश) १९ ऋृपभ २ गान्धार ७ मध्यम (अंश, संवादी, न्यास) १५ पञ्चम ८ धैवत ४

निपाद १०

(२) षड्जग्राम कश्यप का कथन है- "पड्जग्राम पाड्जी और षड्जमध्यमा जाति से उत्पन्न सम्पूर्ण राग है। इसमे अशस्वर प्ड्ज और न्यासस्वर मध्यम है।"१७ शार्ङ्गदेव कहते है- "पड्जग्राम नामक राग षड्जमध्यमा जाति से उत्पन्न हुआ है, सम्पूर्ण राग है। इसका ग्रह एवं अंशस्वर तार पड्ज है, न्यासस्वर मध्यम है, अपन्यास स्वर पड्ज है, अवरोही और प्रसन्नान्त अलंकार इसमे प्रयोज्य है। इसकी मूर्च्छना पड्जादि (उत्तर- मन्द्रा) है, इसमें काकली-निषाद एव अन्तर-गान्धार का प्रयोग होता है, वीर, रौद्र, अद्भुत रसो में, (नाटक की) प्रतिमुख (सन्धि) मे.इसका विनियोग है। इस राग का देवता वृहस्पति है और वर्षाऋतु, दिन के प्रथम प्रहर मे यह गेय है।"१८.

१७-षड्जांशो मध्यमन्यास स्यात् षाड्जीषड्जमध्ययोः ।' पड्जग्राम इति प्रोक्तः सम्पूर्णंस्वरकस्तथा ॥ -कश्यप० भ० को० पृ० ६८८ -

१८-पड्जमध्यमया सृष्टस्तारपड्जग्रहांशक. । -सम्पूर्णो मध्यमन्यास .: षड्जापन्यासभूपितः ॥

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राग २०५

आलाप

  • संसं (स स)* री गधगरिस सनिधापाधाधारीगासां। री गा सा सग पनि चनिस सा सा। गसरिग पधनिप मामा।

करण

रीरी गाधा गरि सासा नीधपापा। रीरी गध परिसा सा सासा। सा सा गानिधा 1 1

रीरीगा। धा गारी सा सा निधपापा। री री पापा निधन सा सा सा। सरि सरि 1 J

सधनिध पमामामामा।

पद

स जयतु भूताधिपतिः परिकरभोगीन्द्रकुण्डलाभरणः । गजचर्मंपटनिवसन: शशाङ्कचूडामणिः शम्भुः ॥

आक्षिप्तिका-ताल चञ्चत्पुट

१ ताल आ० नि० वि० श०

लघु १ २ ३ ४ : ५' ६ ७ ८

स्वर रें रे गा सा गा रे गा सा

पद स ज य तु भू - ता

अवरोहिप्रसन्नान्तर्भूष. पड्ज़ादिमूर्च्छन.। काकल्यन्तरसयुक्तो वीरे रौद्रेऽद्भुते रसे ॥ विंनियुक्त प्रतिमुखे वर्पासु गुरुदैवतः। गेयोऽह्नः प्रथमे यामे पड्जग्रामाभिधोवुदैः ॥ -स० र०, अ. सं०, राग०, पृ० २६-२७ * लक्षण मे तार पड्ज को इस राग का अंश एवं ग्रहस्वर माना गया है। रत्नाकर . के मुद्रित सस्करणो मे इसके आलाप का आरम्भ'मन्द्र पड्ज से हुआ है, जो हमारी · दृष्टिमे लिपिक के प्रमाद का-परिणाम-है। ··

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२०६ भरत का संगीत-सिद्धान्त

२ ताल आ० नि० वि० ता०

लघु ९ १० ११ १२ १३ १४ १५ १६ स्वर नी धा पा पा गा घा

पद धि प तिः प रि क र A M

३ ताल आ० श० वि० प्र०

लघु १७ १८ १९ २० २१ २२ २३ २४

स्वर गा रे सा सा सा सा सा सा

पद भो गी द्र 1 कुं - ड 1

४ ताल आ० नि०- वि० सं०

लघु २५ २६२७ २८ २९ ३० ३१ ३२ स्वर सा सा गा घनि नी नी नी नी

पद ला र ण: 1 1 1

५ ताल आ० नि० वि० श०

लघु १ २ ३ ४ ५ ६ ७ ८

स्वर गा रिग घा घा गा* गरि सा सा

पद ग ज च ट नि 1

६ ताल आ० नि० वि० ता०

लघु ९ १० ११ १२ १३ १४ १५ १६

स्वर नी घा पा पा रे रे पा पा

पद व स न: श शां - क 1

७ ताल आ० श० वि० प्र०

लघु १७ १८ १९ २० २१ २२ २३ २४

स्वर नी धा नी सा सा सा सा रिसरि पद चू 1 डा म णिः -

ताल आ० नि० वि० सं०

लघु २५ २६ २७ २८ २९ ३० ३१ ३२

स्वर पा घा निध पा मां मां मां मा

पद शं - 1 भु: - 1 1 1

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राग २०७

प्रस्तुत आक्षिप्तिका में स्वरसख्या इस प्रकार है- पड्ज (अंश, ग्रह, अप०) १७ ऋृषभ १२ गान्धार १० मध्यम (न्यास) ४

पञ्चम ८ धैवत ९ निषाद १० प्रस्तुत राग का आलाप ग्रहस्वर षड्ज से आरम्भ हुआ है और न्यासस्वर मध्यम पर उसकी समाप्ति हुई है, जो न्यासस्वर है। करण और आक्षिप्तिका का आरम्भ अशस्वर से न होकर ऋषभ से हुआ है, जो करण एवं आक्षिप्तिका को प्रयोग का अनि- वार्यं अङ्ग सिद्ध करता है। जातियो के प्रस्तार सदा ग्रहस्वर से आरम्भ हुए है, परन्तु रागो की आक्षिप्तिकाओ मे ग्रहस्वर से आरम्भ करने का अनिवार्य बन्धन नही। करण और आक्षिप्तिका की समाप्ति न्यासस्वर पर ही हुई है। (३) साधारित (शुद्ध साधारित) शार्ङ्गदेव का कथन है- "शुद्ध साधारित राग पड्ज-मध्यमा जाति से उत्पन्न हुआ है, तार पड्ज इसका ग्रह एव अंशस्वर है, निपाद और गान्धार का प्रयोग इस राग में अल्प है, इस राग का न्यासस्वर मध्यम है। यह राग सम्पूर्ण है और इसकी मूरच्छना पड्जादि (उत्तरमन्द्रा) है। अवरोही प्रसन्नान्त से अलकृत है, इसका देवता सूर्य है, दिन के प्रथम प्रहर मे वीर, रौद्र रस में गेय है। गर्भसन्धि में इसका विनियोग है।"११

१९-पड्जमध्यमया जातस्तारषड्जग्रहाशक। निगाल्पो मध्यमन्यासः पूर्णः पड्जादिमूर्च्छन.॥ अवरोहिप्रसन्नान्तालकृतो रविदैवतः । वीरे रौद्रे रसे ज्ञेय. प्रहरे वासरादिमे। विनियुक्तो गर्भसन्धौ शुद्धसाधारितो वुधैः ॥ -- सं० र०, अ० सं०, राग०, पृ० १९-२०

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२०८ भरत का संगीत-सिद्धान्त

मोक्षदेव कहते है- "शुद्ध साधारित सम्पूर्ण राग है, पड्ज इसमें अंश एवं ग्रहस्वर है, निपाद-गान्धार अल्प है, न्यासस्वर मध्यम है, यह राग षड्ज-मध्यमा जाति से उत्पन्न हुआ है।"२

आलाप*

सापाधां रीपापाधारी पाधा सासापाधानीधा पामामा रीपा धारी पाधारी पाधा

पाधापापा सासा मा। सा गा री भा। मगरि सासा सरिग पाधारीपाधारीपाधापाधा- सासा सारीगामाधापानीधापानीधापा सां सा।

करण

सस+ पप धध रिरि पप धस साम्+ २ (सस पध धध रिरि पप घस साम्)। रिरि पप धनि पप रिप धस सा सा २ (रिरि पप धनि पप रिप धस सा सा)। सस धघ मंमं गारी गंमं रिग मम मगरिग सासा २ सस घस रिगं सासा पाधा निधप मंमं।

पद

उदयगिरिशिखरशेखरतुरगखुरक्षत विभिन्न धनतिमिरः। गगनतलसकलविलुलितसहस्त्रकिरणो जयतु भानु:॥

आक्षिप्तिका-ताल चञ्चत्पुट

१ ताल आ० नि० वि० श०

लघु १ २ ३ ४ ५ ६ ७ ८

स्वर. सा सा :घा नी पा पा पा पा

पद उ द य गि रि शि ख र

२०-सांशग्रहो निगाल्पः स्यात् षड्जमध्यमया कृतः । संपूर्णो मध्यमन्यास: शुद्धसाधारितो मत.॥ -मोक्ष० भ० को०, पृ० ६७१ * प्रस्तुत आलाप और करण कल्लिनाथ की टीका के अनुसार शुद्धीकृत रूप में है। + यह 'सा' के सानुस्वार उच्चारण का रूप है। 'दो' का चिह्न जिस स्वरसमूह के पुनरुच्चारण का सूचक है, वह कोष्ठक मे पुनः लिख दिया गया है। 1 यहाँ ग्रह तारषड्ज से होना चाहिए।

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राग २०९

२ ताल आ० नि० वि० ता०

लघु ९ १० ११ १२ १३ १४ १५ १६

स्वर धा धा नी नी री री पा पा

पद शे ख र तु र ग खु 1

३ ताल आ० श० वि० प्र०

लघु १७ १८ १९ २० २१ २२ २३ २४

स्वर रे पा पा पा धा नी पा मा

पद र 1 क्ष त वि भि 1

४ ताल आ० नि० वि० स०

लघु २५ २६ २७ २८ -२९ ३१ ३२ स्वर धा मा घा सा सा सा सा सा

पद ध न ति मि र: 1

५ ताल आ० नि० वि.० श०

लघु १ २ ३ ४ ५ ६ ७ ८

स्वर घा धा सा धा सा रे गा सा

पद ग ग न त ल स क ल

६ ताल आ० नि० वि० ताo

लघु ९ १० ११ १२ १३ १४ १५ १६ स्वर रे गा पा पा पा पा पा पा

पद वि लु लि त स ह - स्त्न

७ ताल आ० श० वि० प्र०

लघु. १७ १८ १९ २० २१ २२ २३ २४ स्वर धा मा घा मा सा सा सा सा पद कि र - णो ज य - तु

८ ताल आ० नि० वि० सं०

लघु २५ २६ २७ २८ २९ ३० ३१ ३२ स्वर पा घा निध पा मा पा मा मा

पद भा - - - नु: - - I

१४

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२१० भरत का संगीत-सिद्धान्त

आक्षिप्तिका मे प्रयुक्त स्वरो की संख्या इस प्रकार है- षड्ज (अंश) १४ ऋषभ ५ गान्वार (अल्प) २ मध्यम (न्यास) ७

पञ्चम (अश-सवादी) १९ धैवत १३ निषाद (अल्प) ५

(४) पञ्चम (शुद्ध पञ्चम) कश्यप का कथन है -- "शुद्ध पञ्चम, राग मध्यमा और पञ्चमी जातियों से मिलकर उत्पन्न हुआ है, इसमे अंश एव न्यासस्वर पञ्चम है। गान्धार और निपाद इसमें स्वल्प है।"२१ शार्ङ्गदेव कहते है -- "यह राग मध्यमा और पञ्चमी जातियो से उत्पन्न हुआ है, इसमें काकलीनिषाद एवं अन्तरगान्धार का प्रयोग है, इसका अंश, ग्रह एवं न्यास स्वर मध्य सप्तक का पञ्चम है, इसकी मूर्च्छना हृष्यका है, देवता कामदेव है, संचारी वर्ण इसमें शोभा देता है। ग्रीष्म ऋतु, दिन के प्रथम प्रहर मे गेय है, अवमर्श सन्धि में इसका विनियोग है।"२२ आलाप पाधा मांधा नीधापापा। पधनीरिमपधामा धनि ध पापारीगा सासां। मांपमागा रीरी। रीमांपधा मा पनिधपापा। सांगा नीधा पप निरी मां पाधामाध निध पापा।

२१-मध्यमापञ्चमीजात्योःसम्भूतः शुद्धपञ्चम.। अशोऽस्य पञ्चमो न्यासस्स्वल्पद्विश्रुतिकस्वरः ॥ -- कश्यप, भ० को०, पृ० ६६६ २२-मध्यमापञ्चमीजातः काकल्यन्तरसंयुतः । पञ्चमाशग्रहन्यासो मध्यसप्तकपञ्चमः । हृष्यकामूच्छनोपेतो गेयः कामादिदैवतः । चारुसञ्चारिवर्णशच ग्रीष्मेऽह्नः प्रहरेऽग्रिमे। शृङ्गारहास्ययोः संधाववमर्शे प्रयुज्यते ।। -- -- सं० र०, अ० सं०, राग०, पृ० ९५

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राग २११

करण

पापधपधमधघनिध पापा। पापाधनि रिगपापा मधनिध पापा पपधनि। रीरी गंगं संसं गग रीरी रीरी मम पप धम धध निध पा।

पद

जय विषमनयन मदनतनुदहन वरवृषभगमन पुरदहन। नतसकलभुवन सितकमलवदन भव मम भयहर भव शरणम् ॥

आक्षिप्तिका-चञ्चत्पुट ताल

१ ताल .₹ आ० नि० वि० श०

लघु १ २ ३ ४ ५ ६ ७ ८

स्वर सां सां सा सां री रीं गां सां

पद ज य वि ष न य न

२ ताल आ० नि० वि० ता०

लघु ९ १० ११ १२ १३ १४ १५ १६

स्वर मा गा पम गा री री री री

पद म द न त नु द ह न

३ ताल आ० श० वि० प्र०

लघु १७ १८ १९ २० २१ २२ २२ २४

स्वर मां सां सां सां री री गां सां

पद व र वृ प भ ग म न

४ ताल आ० नि० वि० सं०

लघु २५ २६ २७ २८ २९ ३० ३१ ३२

स्वर मा गा पम गा री री रीं री

पद पु र द ह न -

५ ताल आ० नि० दि० श०

लघु १ २ ३ ४ ५ ८

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२१२ भरत का संगीत-सिद्धान्त

स्वर री री 'मां मा पा मा धा' मा ~ पद न त स क ल भु व न

६ ताल आ० नि० वि० ता० लघु ९ १० ११ १२ १३ १४ १५ १६ स्वर मा धा सां सा नी धा पा मा

पद सि त क म ल द न

७ ताल आ० श० वि० प्र०

लघु १७ १८ १९ २० २१ २२ २३ २४

स्वर 'धा नी री मां री मां पा पा

पद भ व म म भ य ह र

८ ; ताल आ० नि० वि० सं० 47 लघु २५ २६ २७ २८ २९ ३० ३१ ३२

स्वर धा मां धा नी पा पा पा पा

पद भ व श र णं 1

प्रस्तुत आक्षिप्तिका में प्रयुक्त स्वरो की सख्या निम्नलिखित है- पड्ंज .११

ऋषभ १६ गान्धार ६

मध्यम : १४ पञ्चम (अंश). -१० धवत ६ निषाद ३ (५) कैशिक (शुद्ध कैशिक)

शार्ङ्गदेव का कथन है- "शुद्ध कैशिक राग कार्म्मारवी एवं कैशिकी जाति से उत्पन्न हुआ है, इसमे अश एवं ग्रहंस्वर तार पड्ज है, न्यासस्वर' पञ्चम है, काकलीनिषाद का प्रयोग होता है। अवरोही वर्ण एव प्रसन्नान्त अलकार से विभूपित है और सम्पूर्ण राग है। इसकी मूर्च्छना पड्जादि (शुद्धमध्या) है। वीर, रौद्र एवं अद्भुत. रस मे प्रयोज्य है, शिशिर

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राग २१३

ऋतु मे गेय है, इसका देवता मङ्गल है। दिन-के प्रथम प्रहर मे व्यवहार्य है और निर्वहण सन्धि मे इसका विनियोग है।"२२ मोक्षदेव कहते है -- "शुद्ध कैशिक कार्म्मरिवी एवं कैशिकी जाति से उत्पन्न हुआ है, इसका न्यास पञ्चम है, इसमे-काकलीनिपाद का प्रयोग है, सम्पूर्ण राग है और वीर, रौद्र एव अद्भुत रस मे इसका विनियोग है।"२४ आलाप

सा*सा गामा गारी गामां सानी सारी साधा माधा माधा नीधा पामा गामा पापा। वर्तनी

सासासासां रीरीसासारीरी गागा सांसांसासा मामा गारी गारी सासारीरी

पनि सासासासा रीरी मामा पापाधामा मामाधानी सासासासा रीरोगामा सासापापा धामागामा पामा पापापापा।

पद अग्निज्वालाशिखाकेशि माशशोणितभोजिनि । • सर्वाहारिणि निर्मासे चर्म्ममुण्डे नमोऽस्तु ते।।

२३-कामरिव्याश्च' कैशिक्याः सञ्जातः शुद्धकैशिक. । तारपड्जग्रहाशश्च पञ्चमान्त: सकाकॅली ॥। सावरोहिप्रसन्नान्तः' पूर्ण: षड्जादिमूर्च्छनः । वीररौद्राद्भुतरसः शिशिरे भोमवल्लभः । गेयो निर्वहणे यामे मनीपिभि.।। -स० र०, अ० स०, राग०, पृ० ८२ २४-कार्मारव्याश्च कैशिक्यास्तारपड्जग्रहाशक.। . पन्यास. काकलीयुक्तो विज्ञेयशशुद्धकैशिक.। वीररौद्राद्भुतरस. संपूर्णस्वरको मतः ॥ -- भ० को०, पृ० ६६४ *- यहाँ सा (तारपड्ज) से ग्रह होना चाहिए। .-

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२१४ भरत का संगीत-सिद्धान्त

आक्षिप्तिका-चञ्चत्पुट ताल १ ताल आ० नि० वि० श०

लघु १ २ ३ ४ ५ ६ ७ ८

स्वर सा सा सा सा सा सा नी धा

पद अ ग्नि - ज्वा ला शि 1

२ ताल आ० नि० वि० ता०

लघु ९ १० ११ १२ १३ १४ १५ १६

स्वर सा सा री मा सा री गा मा

पद खा के शि - - 1

३ ताल आ० श० वि० प्र०

लघु १७ १८ १९ २० २१ २२ २३ २४

स्वर सा गा री सा सा सा सा सा

पद मां स शो णि - 1

नि० वि० - ४ ताल आ० सं०

लघु २५ २६ २७ २८ २९ ३० ३१ ३२ स्वर सा सा सा सा नी सा नी नी

पद त भो जि नि -

५ ताल आ० नि०. वि० श०

लघु १ २ ३ ४ ५ ६ ७ ८

स्वर मा मा गा री मा मा पा पा

पद स र्वा हा - रि णि 1 I

६ ताल आ० नि० वि० ता०

लघु ९ १० ११ १२ १३ १४ १५ १६

स्वर धा नी पा मा धा मा घा सा

पद नि - र्मा से 1 1 1 1

७ ताल आ० श० वि० प्र०

लघु १७ १८ १९ २० २१ २२ २३ २४

स्वर सा सा सा सा नी घा पा पा

पद च 1 मं मुं डे न 1

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राग २१५

आ० नि० वि० सं० V ताल लघु ₹4 २६ २७ २८ २९ ३० ३१ ३२ स्वर धा नी गा मा ЧT पा पा पा पद मो स्तु ते 1 - 'प्रस्तुत आक्षिप्तिका मे स्वरसंख्या इस प्रकार है- पड्ज (अश) २५ ऋषभ गान्वार ४

f1 मध्यम ९ पञ्चम धैवत (न्यास)

निषाद (६) षाडव (शुद्ध षाडव) आचार्य शार्ङ्गदेव का कथन है- "पाडव राग मध्यमा जाति के विकृत रूप से उत्पन्न हुआ है, इसमें गान्वार एवं पञ्चम दुर्बल हैं, मध्यम न्यास एवं अशस्वर है, तार मध्यम इसका ग्रहस्वर है, इसमे काकलीनिषाद एवं अन्तरगान्धार का प्रयोग होता है, इसकी मूर्च्छना मध्यमादि है, अवरोही इत्यादि (सञ्चारी) वर्ण एवं प्रसन्नान्त अलकार इसके विभूषक है, पूर्वरङ्ग मे इसका विनियोग है, यह हास्य और शृंगार रस का दीपक है, पूर्व प्रहर मे गया है और शुक इसका देवता है।"२५ मध्यमा के विकृत रूप की व्याख्या करते हुए मोक्षदेव ने कहा है कि जातियो में मध्यस्थानीय अशस्वर ही ग्रहस्वर होता है, तार अंशस्वर से ग्रहण ही मव्यमा जाति का (इस प्रसग मे) विकार है।"

२५-विकारिमव्यमोद्भूत. पाडवो गपदुर्वलः। न्यासाशमध्यमस्तारमव्यमग्रहसंयुतः॥ काकल्यन्तरयुक्तश्च मध्यमादिकमूर्च्छन.। अवरोह्यादिवर्णेन प्रसन्नान्तेन भूपित.॥ पूर्वरङ्ग प्रयोक्तव्यो हास्यशृङ्गारदीपक। शुकप्रियः पूर्वयामे ......... ॥। -- सं० र०, अ० स०, राग०, पृ ६३-६४ २६-लक्षणेनेह केनेयं विकृता मध्यमा भवेत्। तारमन्द्रावधिर्यस्मात्तदंशाभ्यामुदाहृतः॥ तस्मान्मध्यग्रहेणैव गातव्यं (व्या) जातयो यतः। तारमघ्यग्रहेणेय विकृता मव्यमा मतः (ता) ॥। -भ० को०, पृ० ६७१

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२१६ भरत का संगीत-सिद्धान्त

मतङ्ग का कथन है कि अन्य छः रागों की अपेक्षा मुख्य होने के कारण इसका विनियोग पूर्वरङ्ग मे है, इस मुख्यता के कारण ही इसे 'पाडव' कहा गया है। इस पाडव का अर्थ 'पट्स्वर' नही, क्योकि यह राग सप्तस्वर होता है और इसका पटस्वर होना सम्भव नही।२७

आलाप मां* सारी नीधा साधानी माधा सारीगां धा सां धांमांरिगामां माधामारी गारी- नीधा सांधानीमांमां।

करण ममरिग मम सस धनि सस धनि मा मां पपपपनि धममध धससरि गांगामा- रिगामामा।

वर्तनिका साधनि पध मारि मानि धधाधधससरि मासासाधनी धपमां मां गारी गारी गासामाधामां गांरीगा गमारिगा सांसाधनी मां धनि धगसाधनि मां मां मां।

पद पृथुगंडगलितमदजल- मतिसौरभलग्नषट्पदसमूहम्। मुखमिन्द्रनीलश़कलै- रभूषितमिव गणपतेजयतु ।।

आक्षिप्तिका-चञ्चत्पुट ताल

१ ताल आ० नि० वि० श०

लघु १ २ ३ ४ ५ ६ ७ ८

स्वर मां मा धां धां सा धा नी पा

पद पृ गं - ड ग लि त

२७-अस्य च व्युत्पत्ति: कथिता मतङ्गेन-'पट्सु रागेषु मुख्यत्वात् षाडवः, सप्तस्वरत्वेन षट्स्वरत्वासम्भवात्। ननु कथं षट्सु रागेषु मुख्योऽयम् ? उच्यते-'पूर्वरज्गे तु शुद्धपाडव: प्रयोक्तव्य.'इति वचनादिति। -सिंह०, सं० र०, अ०सं०, राग०, पृ० ६४ * यहाँ तारमध्यम से ग्रह होना चाहिए।

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राग २१७

२ ताल आ० नि० वि० ता०

लघु ९ १० ११ १२ १३ १४ १५ १६

स्वर धा नी मा मा री मा री 4.

पद म द: ज. म ति सौ - अ

३ ताल आ० श० वि० प्र०

लघु १७ १८ १९ २० २१ २२ २३ २४

स्वर धां नी सा गा रिग धा घा

पद र भ ग्न पट् प 1 अ प

४ ताल आ० नि० वि० सं०

लघु २५ २६ २७ २८ २९ ३० ३१ ३२

स्वर सा धा सा मग #. 4. 4. पद द स मू - I 1 1 न. 4.

५ ताल आ० नि० वि० श०

लघु १ २ ३ ४ ५ ६ ८ 6

स्वर मग री गा मा मा मा पम गा

पद मु ख मिं द्र नी ल 1 1

ताल आ० नि० वि० ता०

लघु ९ १० ११ १२ १२ १४ १५ १६

स्वर री गा सां सां मा मां मां मां

पद श क लै भू पि त 1 1

७ ताल आ० श० वि० प्र०

लघु १७ १८ १९ २० २१ २२ २३ २४

स्वर नी धां नी धा सां सां सां सा

पद मि व ग ण प ते 1 1

८ ताल आ० नि० वि० स०

लघु २५ २६ २७ २८ २९ ३१ ३२

स्वर गा री री गा मां मां मां

पद ज य तु 1 1 A

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२१८ भरत का संगीत-सिद्धान्त

प्रस्तुत आक्षिप्तिका मे प्रयुक्त स्वरों की संख्या इस प्रकार है- षड्ज ११ ऋषभ गान्धार (दुर्वल) ९ मध्यम (अश, न्यास) २४ पञ्चम (दुर्बल) २ घवत १० निपाद ५

(७) कैशिकमध्यम (शुद्ध कैशिकमध्यम) शार्ङ्गदेव का कथन है- 'यह राग पड्जमव्यमा और कैशिकी जाति से उत्पन्न है। ऋपभ-पञ्चम इस राग में वर्जित है। इसका अंश एवं ग्रहस्वर षड्ज एवं न्यासस्वर मध्यम है। प्रसन्नान्त अलंकार, अवरोही वर्ण एव आद्य (उत्तरमन्द्रा) मूरच्छना से युक्त है। इसमें गान्धार अल्प है और निषाद काकली है। वीर, अद्भुत एवं रौद्र रस मे इसका प्रयोग करना चाहिए। यह चन्द्रप्रिय राग है, इसका गान (दिन के) पूर्व प्रहर में होना चाहिए और निर्वहण सन्धि मे इसका विनियोग है।"२८ मोक्षदेव का कथन है- 'शुद्ध कैगिकमध्यम कैशिकी और षड्जमध्यमा से उत्पन्न हुआ है। तार षड्ज इसका ग्रह एवं अंशस्वर है, न्यासस्वर मध्यम है, ऋषभ-पञ्चम इसमें वर्जित है, गान्धार अल्प है, निषाद काकली है, वीर, अद्भुत और रौद्र रस में इसका विनियोग है।"२९

२८-पड्जमध्यमया सृष्ट कैशिक्या च रिपोज्झित। तारसांशग्रहो मान्त शुद्धकैशिकमध्यमः । प्रसन्नान्तावरोहिभ्यामाद्यमूर्च्छनया युतः ॥ गान्धाराल्प: काकलीयुग्वीरे रौद्रेऽद्भुते रसे । चन्द्रप्रिय. पूर्वयामे सधी निर्वहणे भवेत् 11 -- सं० र०, अ० सं०, राग०, पृ० ७६ २९-कैशिकीषड्जमध्याभ्यां तारषड्जग्रहांशकः । मन्यास: स्यात् रिपत्यक्तो गान्धाराल्पः सकाकलिः । रसे वीरेऽद्भुते रौद्रे शुद्धकैशिकमध्यमः ॥ भ० को०, पृ० ६६५

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राग २१९

आलाप

सां*धांमां धां सनि धसनी सां सां। सा धानी मां मां सा गां सां गा माधा माघा सां निध सनि सा सा धामां मधमगागमा सासाधामासगासागामाधास निध सानी सां सासाधानी मा मां।

करण

ससममधधममधसनिधसासांसांसा। संसंगम गमं मधमसानिघसां सां सां सां धंधं ममं धम सगसगमस गग धध सस गंस मम धमध सधनि मामा मामा।

पद

ओङ्कारमूर्तिसंस्थं मात्रात्रयभूषितं कलातीतम् । वरदं वरं वरेण्यं गोविन्दकसस्तुतं वन्दे।।

आक्षिप्तिका-चञ्चत्पुट ताल

१ ताल आ० नि० वि० श०

लघु १ २ ३ ४ ५ ६ ७

स्वर सां सा धा पा (मा?) मा धा पां (मा?) मां

पद ओ का र मू - ति i 1

२ ताल आ० नि० वि० ता०

लघु ९ १० ११ १२ १३ १४ १५ १६

स्वर धा पा (मा?) मा पा (मा?) री (नी?) मा मा

पद सं स्थ - मा त्रा 1

३ ताल आ० श० वि० प्र०

लघु १७ १८ १९ २० २१ २२ २३ २४

स्वर नी धा मा नी धा नी सां सां

पद न्र य भू - पि तं - क

  • यहाँ ग्रहस्वर तारपड्ज होना चाहिए।

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२२०: भरत का संगीत-सिद्धान्त

४ ताल आ० नि० वि० सं०

लघु २५ २६ २७ २८ २९ ३० ३१ ३२

स्वर नी धा नी सां सां सां सां सा

पद ला ती तं 1 -

५ ताल आ० नि० वि० श०

लघु १ २ ३ ४ ५ ७ स्वर धा घा मां मा री (नी?) री (नी?) सा सा पद व र दं व रं व 1 T

६ ताल आ० नि० वि० ता० लघु ९ १० ११ १२ १३ १४ १५ १६ स्वर घा घा मा मा गां गां मां गा

पद रे ण्यं - गो - - वि

७ ताल आ० श० वि० प्र०

लघु १७ १८ १९ २० २१ २२ २३ २४

स्वर नी धा मा नी घा नी सा सा.

पद द क सं - स्तु - तं -

८ ताल आ० नि० वि० स०

लघु २५ २६ २७ २८ २९ ३० ३१ ३२

स्वर धां सा धां नी मां, मां मा मा

पद वं - - दे - -

'?' चिह्नित स्थलों पर 'पा' के स्थान 'मा' तथा 'री' के स्थान पर 'नी' होना चाहिए। प्रस्तुत मूल पाठ लिपिकदोप का परिणाम प्रतीत होता है। इस राग मे 'ऋृषभ-पञ्चम' का परिहार लक्षणसिद्ध है। आलाप और करण मे भी इन दोनो स्वरो का प्रयोग नही। हमारी दृष्टि से आक्षिप्तिका मे प्रयुक्त स्वरो की संख्या निम्नस्थ है- पड़्ज १४ ऋृषभ 0

गान्वार ३

मध्यम २०

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राग २२१:

पञ्चम O धेवत १४ निपाद १३ ग्रामरागों के प्रकार

ग्रामरागो के पाँच प्रकार हैँ, शुद्ध, भिन्न, गौड, वेसर और साधारण। भिन्न रागो के भी श्रुतिभिन्न, जातिभिन्न, शुद्धभिन्न और स्वरभिन्न ये चार भेद होते है। (१) शुद्ध- जो राग अन्य जातियो की अपेक्षा न करके अपनी जाति का अनुवर्तन करते है और उसी के उद्द्योतक होते है, वे शुद्ध कहलाते है।१० (२) भिन्न -* (अ) स्वरभिन्न-किसी राग के वादी, विवादी और अनुवादी ले लिये जायँ, परन्तु संवादी स्वर का परित्याग कर दिया जाय, तो स्वरभिन्न राग उत्पन्न होता है।११ स्वरप्रयोग मे भेद होने के कारण ही भिन्नपड्ज और भिन्नपञ्चम राग शुद्ध पाडव से भिन्न हो गये हैं।१ (आ) जातिभिन्न-जनक जाति के अश, ग्रह इत्यादि का ग्रहण कर लेने पर भी प्रयोज्य स्वरों का क्रम, जनक जाति के क्रम से भिन्न होने एव वक तथा सूक्ष्मातिसूक्ष्म

३०-अनपेक्ष्यान्यजातीर्ये स्वजातिमनुवर्तका.। स्वजात्युद्योतकाश्चैव ते शुद्धा: परिकीरतिताः ॥ -मतङ्ग, कल्लि०, सं० र० टी०, अ० सं०, राग०, पृ० २५ * श्रुतिभिन्नो जातिभिन्न शुद्धभिन्नः स्वरस्तथा। चतुरभिभिद्यते यस्मात्तस्माद् भिन्नक उच्यते॥ -मतङ्ग, कल्लि०, स० र० टी०, अ० सं०, राग०, पृ० २५ ३१-यदा वादी गृहीतः स्यात्सवादी च विमोक्ष्यते। विवादी चानुवादी च स्वरभिन्नः स उच्यते॥ -मतङ्ग, कल्लि० सं० र० टी०, अ० स०, राग०, पृ० २५ ३२-विवादी चानुवादी च गृहीत स्यादित्यनुपङ्गः। शुद्धपाडवापेक्षया भिन्नपड्ज- भिन्नपञ्चमयोः स्वरप्रयोगभेदात् स्वरभिन्नत्वम्। -कल्लि०, सं० टी०, अ० सं०, राग०, पृ० २५

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२२२ भरत का संगीत-सिद्धान्त

स्वरों के प्रयोग के कारण जातिभिन्न रागों की उत्पत्ति होती है।१ शुद्ध कैशिकमध्यम राग से ग्रह अश इत्यादि का साम्य होने पर भी जनक जाति के वर्ण भेद तथा सूक्ष्माति- सूक्ष्म स्वरों के प्रयोग में भेद होने के कारण भिन्न कैशिकमध्यम की जातिभिन्नता है।१४ (इ) शुद्धभिन्न-दूसरी जाति का परित्याग करके अपनी जाति और कुल (जाति से उत्पन्न शुद्ध राग) का विभूषण करने एव अपने कुल को ग्रहण करनेवाले राग शुद्ध- भिन्न कहलाते है।१५ शुद्धकैशिक एवं भिन्नकैशिक के स्वरसंस्थान समान है, परन्तु शुद्ध- कैशिक तारस्थानव्यापी है और भिन्नकैशिक मन्द्रस्थानव्यापी। इसी अन्तर के कारण भिन्नकैशिक शुद्धकैशिक से भिन्न है।२६ (ई) श्रुतिभिन्न-जहॉ चतुःश्रुतिक स्वर भिन्न होकर द्विश्रुतिक हो जाता हो, परन्तु गान्वार द्विश्रुति ही रहता हो, वह राग श्रुति-भिन्न होता है।4 'भिन्नतान' राग में निषाद पड्ज की दो श्रुतियाँ ग्रहण कर लेता है, गान्धार द्विश्रुति ही रहता है। अत भिन्नतान राग श्रुतिभिन्न है।१८

३३-जातीनामशकः स्थाया अल्पकस्तु बहुस्तथा। अल्पत्वं च बहुत्वं चं प्रयोगाल्पवहुत्वत.। सूक्ष्मातिसूक्ष्मैर्वक्रैश्च जातिभिन्न. स उच्यते॥ -- मतङ्ग, कल्लि०, सं० टी०, अ० सं०, राग०, पृ० २५ ३४-शुद्धकैशिकमध्यमापेक्षया भिन्नकैशिकमध्यमस्य ग्रहांशादिसाम्येऽपि स्वस्वजनक- जातिगतवर्णभेदात् सूक्ष्मातिसूक्ष्मस्वरप्रयोगभेदाच्च भिन्नकैशिकमध्यमस्य जाति- भिन्नत्वम्। --- कल्लि०, स० टी०, अ० सं०, राग०, पृ० २५ ३५-परित्यजन्नन्यजाति स्वजातिकुलभूपणः । स्वकं कुलं तु संगृह्धन् शुद्धभिन्नः प्रकीतितः ॥ -- मतङ्ग, कल्लि०, सं० टी०, अ० सं०, राग०, पृ० २६ तारस्वरव्याप्तिमत: शुद्धकेशिकान्मन्द्रस्वरव्याप्तिमतो भिन्नकैशिकस्य शुद्धभिन्नत्वम्। -- कल्लि०, सं० टी०, अ० सं०, राग०, पृ० २६ ३७-चतुःश्रुतिः स्वरो यत्र भिन्नो द्विश्रुतिको भवेत्। गान्धारो द्विश्रुतिश्चैव श्रुतिभिन्नः स उच्यते ॥. -'मतङ्ग, कल्लि०, सं० टी०, अ० सं०, राग०, पृ० २६ ३८-भिन्नतानरागे हि पड्जस्य श्रुतिद्वयं गृह्ाति निषाद.।.गान्वारस्तु द्विश्रुतिरेव। अतोऽस्य श्रुतिभिन्नत्वम्। -कल्लि०, स० टी०, अ० स०, राग०, पृ० २६

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राग २२३

(३) गौड- जिन रागों मे गाढ गमको और ओहाटीललित स्वरों के कारण गीति अखण्डित रूप से त्रिस्थानव्यापिनी रहती है, वे 'गौड' कहलाते है।१९ (४) वेसर- -!: जिन रागो में स्वरों का वेगपूर्वक सञ्चार होता है, वे 'वेसर' कहलाते है।४० 1 (५) साधारण- जिन रागो में शुद्ध, भिन्न, गौड और वेसर; चारो प्रकार के रागों की विशेपताएँ समन्वित हो, वे 'साधारण' कहलाते है।" पञ्चविध ग्रामरागों के अवान्तर भेद४२

शुद्ध-सात शुद्ध रागो की विस्तृत चर्चा की जा चुकी है। भिन्न-भिन्न राग पॉच है। षड्जग्रामीय-(१) भिन्नकैशिकमध्यम, (२) भिन्नपड्ज। मध्यमग्रामीय-(३) भिन्नतान, (४) भिन्नकैशिक, (५) भिन्नपञ्चम।

३९-पूर्वोक्ताया गौडगीतेः संबन्धाद् गौडका. स्मृता.। -- मतङ्ग, कल्लि०, स० टी०, अ० सं०, राग०, पृ० २६ ४०-स्वराः सरन्ति यद्वगात्तस्माद् वेसरकाः स्मृताः। -मतङ्ग, कल्लि०, स० टी०, अ० स०, राग०, पृ० २६ ४१-शुद्धा भिन्नाश्च गौडाश्च तथा वेगस्वरा. परे। कलिता यत्र तान् वक्ष्ये सप्त साधारणास्तत.॥। -- मतङ्ग, कल्लि०, स० टी०, अ० स०, राग०, पृ० २६ ४२-पड्जग्रामसमुत्पन्नः शुद्धकैशिकमध्यम.। शुद्धसाधारितः पड्जग्रामो ग्रामे तु मध्यमे।। पञ्चमो मध्यमग्राम. पाडवः शुद्धकैशिक: । शुद्धा. सप्तेति भिन्ना. स्युः पञ्च कैशिकमव्यमः ॥ भिन्नषड्जश्च षड्जाख्ये मध्यमे तानकैशिक। भिन्नपञ्चम इत्येते गौडकैशिकमध्यम.॥ गोडपञ्चमक: पड्जे मध्यमे गौडकैशिकः । इति गौडास्त्रयः पड्जे टक्कवेसरषाडवौ।। ससौवीरौ मध्यमे तु वोट्टमालवकैशिकौ। मालव: पञ्चमान्तोऽय द्विग्रामष्टक्ककैशिकः॥

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२२४ भरत का संगीत-सिद्धान्त

गौड-गौड राग तीन है- षडजग्रामीय- (१) गौडकैशिकमध्यम, (२) गौडपञ्चम, मध्यमग्रामीय-(३) गौडकैशिक। वेसर-वेसर राग आठ है- षड्जग्रामीय-(१) टक्क, (२) वेसरपाडव, (३) सौवीर, मध्यमग्रामीय-(४) वोट्ट, (५) मालवकैशिक, (६) मालवपञ्चम, द्विग्रामसम्बद्ध-(७) टक्ककैशिक, (८) हिन्दोल। साधारण-साधारण राग सात है- षड्जग्रामीय-(१) रूपसाधार, (२) शक, (३) भम्माणपञ्चम, मध्यमग्रामीय-(४) नर्त, (५) गान्धारपञ्चम, (६) पड्जकैशिक, द्विग्रामसम्बद्ध-(७) ककुभ। इस प्रकार- शुद्ध ७ भिन्न ५ गौड ३ वेसर ८

साधारण ७ योग ३० ग्रामरागो की संख्या तीस है।

उपराग- उपरागो की उत्पत्ति भी जातियो से हुई है। ग्रामरागो के समीपस्थ होने के कारण इन्हे उपराग कहा गया है।४२ उपरागो की सख्या आठ है। वे है-(१) शकतिलक,

हिन्दोलोऽष्टौ वेसरास्ते सप्तसाधारणास्ततः । षड्जे स्याद् रूपसाधारः शको भम्माणपञ्चमः ॥ मध्यमे नर्तगान्धारपञ्चमौ पड्जकैशिकः। द्विग्राम: ककुभस्त्रिशद् ग्रामरागा अमी मताः॥ -- सं० र०, अ० सं०, राग०, पृ० ७-८ ४३-जातिभ्यो जातानामपि ग्रामरागसमीपभावित्वादष्टानामुपरागत्वम्। -कल्लि०, स० टी०, अ० सं०, राग़०, पृ० ९

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राग २२५

(२) टक्कसैन्धव, (३) कोकिलापञ्चम, (४) रेवगुप्त, (५) पञ्चमपाडव, (६) भावनापञ्चम, (७) नागगान्धार, (८) नागपञ्चम।४४ राग

उपरागो के अनन्तर जातियों से ही उत्पन्न राग 'राग' है।"4 उनकी सख्या बीस है। वे है-(१) श्रीराग, (२) नट्ट, (३) बङ्गाल प्रथम, (४) बङ्गाल द्वितीय, (५) भास, (६) मध्यमपाडव, (७) रक्तहस, (८) कोह्नहास, (९) प्रसव, (१०) भैरव, (११) ध्वनि, (१२) मेघराग, (१३) सोमराग, (१४) कामोद प्रथम, (१५) कामोद द्वितीय, (१६) आम्रपञ्चम, (१७) कन्दर्प, (१८) देशाख्य, (१९) कैशिकककुभ, (२०) नट्टनारायण ।४६

भाषाजनक ग्रामराग

ग्रामरागो के आलापप्रकार भापा कहलाते है, भाषा शब्द का अर्थ यहाँ प्रकार है।6 इसी प्रकार विभापा और अन्तरभाषा शब्द भी क्रमशः (भाषा से विभाषा, विभापा से अन्तरभाषा) उत्पन्न आलापप्रकारो के वाचक है, रञ्जक होने के कारण इन सबको भी राग समझा जाना चाहिए। याष्टिक मुनि ने भाषाजनक राग पन्द्रह, मतङ्ग ने छः

४४-अष्टोपरागास्तिलकः शकादिष्टक्कसैन्धवः। कोकिलापञ्चमो रेवगुप्त पञ्चमपाडवः। भावनापञ्चमो नागगान्धारो नागपञ्चमः ॥ -सं० र०, अ० सं०, राग०, पृ० ९ ४५-उपरागेभ्योऽनन्तर जातिभ्य एव जाता: श्रीरागादयो विशतिः । -- कल्लि०, सं० टी०, सं० र०, अ० स०, राग०, पृ० ९ ४६-श्रीरागनट्टौ बङ्गालौ भासमध्यमषाडवौ। रक्तहसः कोह लहास. प्रसवो भैरवो ध्वनिः॥ मेघराग. सोमराग: कामोदो चाभ्रपञ्चम.। स्यातां कन्दर्पदेशाख्यौ ककुभान्तश्च कैशिक:। नट्टनारायणश्चेति रागा विशतिरीरिता. ।। -सं० र०, अ० सं०, राग०, पृ० ९ ४७-ग्रामरागाणामेवालापप्रकारा भाषावाच्याः । भाषाशन्दोऽन् प्रकारवाची। -मतङ्ग, कल्लि० स० टी०, अ० सं०, राग०, पृ० १० १५

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२२६ भरत का संगीत-सिद्धान्त

काश्यप ने बारह और शार्दूल ने चार ही बताये है।"याष्टिकोक्त पन्द्रह (भापाजनक) राग ये हैं- (१) सौवीर, (२) ककुभ, (३) टक्क, (४) पञ्चम, (५) भिन्नपञ्चम, (६) टक्ककैशिक, (७) हिन्दोल, (८) वोट्ट, (९) मालवकैशिक, (१०) गान्धार- पञ्चम, (११) भिन्नषड्ज, (१२) वेसरपाडव, (१३) मालवपञ्चम, (१४) तान, (१५) पञ्चमषाडव ।" १-सौवीर की भाषाएँ सौवीर की चार भाषाएँ-(१) सौवीरी, (२)वेगमध्यमा, (३) साधारिता, (४) गान्धारी है।५० २-ककुभ की भाषाएँ ककुभ की छः भाषाएँ-(१) भिन्नपञ्चमी, (२) काम्भोजी, (३) मध्यमग्रामा, (४) रगन्ती, (५) मधुरी, (६) शकमिश्रा है।५१

४८-एवं विभाषाऽन्तरभाषाशब्दावपि तत्तदनन्तरोत्पन्नालापप्रकारवाचकावित्यवगन्त- व्यम्। तासामपि रञ्जनाद् रागत्वं तथा च वक्ष्यति-'रञ्जनाद्रागता भापारागा- ड्वादेरपीष्यते' इति। तासां जनका याष्टिकोदिता भाषाजनकतया याष्टिकमुनि- नोक्ताः। मतान्तराणामप्यत्रैवान्तर्भावाद्याष्टिकमतानुसारेणोद्दिश्यन्त इत्यर्थ.। कथम् ? मतंगः षडेव ग्रामरागान् भाषाजनकत्वेनाभाषत। काश्यपस्तु द्वादशीवा- वोचत्। शार्दूल: पुनश्चतुर एवाभ्यधादिति। -कल्लि० सं० टी०, अ० सं०, राग०, पृ० ११ ४९-सौवीरः ककुभष्टक्कः पञ्चमो भिन्नपञ्चमः। टक्ककैशिकहिन्दोल-वोट्टमालवकैशिकाः । गान्धारपञ्वमो भिन्नषड्जो वेसरपाडवः । मालव: पञ्चमान्तरच तानः पञ्चमषाडवः । भाषाणां जनका: पञ्चदशैते याष्टिकोदिताः ॥ -सं० र०, अ० स०, राग०, पृ० १० ५०-भाषाश्चतस्रः सौवीरे सौवीरी वेगमध्यमा। साधारिता च गान्धारी ...... -सं०र०, अ० सं०, राग०, पृ० १० ५१ -.... ककुभे भिन्नपञ्चमी । काम्भोजी मध्यमग्रामा रगन्ती मधुरी तथा। शकमिश्रेति पट् ...... । -- सं० र०, अ० सं०, राग०, पृ० १०

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राग २२७

तीन विभाषाएँ (१) भोगवर्धनी, (२) आभीरिका, (३) मधुकरी५। अन्तरभाषा (१) शालवाहनिका है।५१ ३-टदक को भाषाएँ टक्क की इक्कीस भाषाएँ-(१)त्रवणा, (२) त्रवणोद्भवा, (३) वैरञ्जी, (४) मव्यमग्रामदेहा, (५) मालववेसरी, (६) छेवाटी, (७) सैन्धवी, (८) कोला- हला, (९) पञ्चमलक्षिता, (१०) सराष्ट्री, (११) पञ्चमी, (१२ ) वेगरञ्जी, ( १३ ) गान्वारपञ्चमी, (१४) मालवी, (१५) तानवलिता, (१६ ) ललिता, (१७ ) रवि- चन्द्रिका, (१८) ताना, (१९) अम्बाहेरिका, (२०) दोह्या, (२१) वेसरी है।५४ विभाषाएँ (१) देवारवर्धनी, (२) आन्ध्री, (३) गुर्जरी, (४) भावनी हैं।५५ ४ -- पञ्चम की भाषाएँ पञ्चम की दस भाषाएँ-(१) कैशिकी, (२) त्रावणी, (३) तानोद्भवा, (४): आभीरी, (५) गुर्जरी, (६) सैन्धवी, (७) दाक्षिणात्या, (८) आन्ध्री, (९) माङ्गली, (१०) भावनी है ।4६

५२ -........ तिस्रो विभाषा भोगवर्धनी । आभीरिका मधुकरी ... ।।

५३ -... तथैकान्तरभाषिका। शालवाहनिका ...... । -स० र०, अ० सं०, राग०, पृ० १०

-सं० र०, अ० सं०, राग०, पृ०. १० ५४ -..... टक्के त्रवणा त्रवणोद्भवा। वैरञ्जी मध्यमग्रामदेहा मालववेसरी। छेवाटी सैन्धवी कोलाहला पञ्चमलक्षिता। सौराष्ट्री पञ्चमी वेगरञ्जी गान्वार- पञ्चमी। मालवी तानवलिता ललिता रविचन्द्रिका। तानाऽम्वाहेरिका दोहया वेसरीत्येकविशतिः। भापा. स्युः ..... । -सं० र०, अ० सं०, राग०, पृ० १० ५५ -.... रथ देवारवर्धन्यान्धरी च गुर्जरी। भावनीति विभाषा: स्युश्चतस्र :... । -सं० र०, अ० सं०, राग०, पृ० ११ ५६-पञ्वमे पुनः। कैशिकी त्रावणी तानोद्भवाऽडभीरी च गुर्जरी। सन्घवी दाक्षिणात्याऽ्डन्ध्री माङ्गली भावनी दश। इति भाषा .... ।। -सं० र०, अ० सं०, राग०, पृ० ११

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२२८ भरत का संगीत-सिद्धान्त

विभाषाएँ] दो विभाषाएँ-(१) भम्माणी, (२) आन्धालिका है।५७ ५-भिन्नपञ्चम की भाषाएँ भिन्नपञ्चम की चार भाषाएँ-(१) धैवतभूपिता, (२) शुद्धभिन्ना, (३) वाराही, (४) विशाला हैं।५८ विभाषा (१) कौशली है।५१ ६-टक्ककशिक की भाषाएँ टक्ककैशिक की दो भाषाएँ-(१) मालवा, (२) भिन्नवलिता है।६ विभाषा (१) द्राविडी है।११ ७-हिन्दोल की भाषाएँ हिन्दोल की नौ भाषाएँ-(१) वेसरी, (२) चूतमञ्जरी, (३) षड्जमध्यमा, (४) मधुरी, (५) भिन्नपौराली, (६) गौडी, (७) मालववेसरी, (८) छेवाटी, (९) पिञ्जरी है।६२ हिन्दोल और प्रेडखक पर्य्यायवाची शब्द है।६३

५७ -..... विभाषे द्वे भम्माण्यान्ालिके। -सं० र०, अ० स०, राग०, पृ० ११ ५८-चतस्रः पञ्चमे भिन्ने भाषा धैवतभूषिता। शुद्धभिन्ना च वाराही विशालेति .... -सं० र०, अ० सं०, राग०, पृ० ११ ५९-अथ कौशली। विभाषा -सं० र०, अ० सं०, राग०, पृ० ११ ६० -... मालवाभिन्नवलिते टक्ककैशिके। भापे द्वे. -सं० र०, अ० सं०, राग०, पृ० ११ ६१ -..... द्राविडीत्येका विभाषा .... -सं० र०, अ० सं०, राग०, पृ० ११ ६२- प्रेडखके नव। भाषा: स्युर्वेसरी चूतमञ्जरी पड्जमध्यमा। मधुरी भिन्नपौराली गौडी मालववेसरी। छेवाटी पिञ्जरीत्येका ... । -सं० र०, अ० सं०, राग०, पृ० ११ ६३-प्रेड्खक इति हिन्दोलपर्य्यायः। -कल्लि०, सं० र०, अ० सं०, राग०, पृ० ११

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राग २२९

८ -- वोट्ट की भाषा वोट्ट की एक भाषा 'मांगली' है।६४ १ -- मालवकैशिक की भाषाएँ मालवकैशिक की तेरह भापाएँ-(१)वाङ्गाली, (२) माङ्गली, (३) हर्षपुरी, (४) मालववेसरी, (५) खञ्जनी, (६) गुर्जरी, (७) गौडी, (८) पौराली, (९) अर्घवेसरी, (१०) शुद्धा, (११) मालवरूपा, (१२) सैन्धवी, (१३) आभीरिका है।६५ विभाषाएँ (१) काम्भोजी, (२) देवारवर्धनी है।६६ १० -- गान्धारपञ्चम की भाषा गान्वारपञ्चम की एक भापा गान्धारी है।१७ ११ -- भिन्नषड्ज की भाषाएँ भिन्नषड्ज की सत्रह भाषाएँ-(१) गान्धारवल्ली, (२) कच्छेल्ली, (३) स्वरवल्ली, (४) निषादिनी, (५) त्रवणा, (६) मध्यमा, (७) शुद्धा, (८) दाक्षि- णात्या, (९) पुलिन्दका, (१०) तुम्बुरा, (११) पड्जभाषा, (१२) कालिन्दी, (१३) ललिता, (१४) श्रीकण्ठिका, (१५) बा्गाली, (१६) गान्धारी, (१७) सैन्धवी है।६

६४-वोट्टे भापा तु माड्गली। -कल्लि०, सं० र०, अ० स०, राग०, पृ० ११ ६५-वाङ्गाली माङ्गली हर्षपुरी मालववेसरी। खञ्जनी गुर्जरी गौडी पौराली चार्धवेसरी। शुद्धा मालवरूपा च सैन्धव्याभीरिकेत्यम्. । भापास्त्रयोदश ज्ञेया विज्ञैर्मावकैशिके॥ -- सं० र०, अ० स०, राग०, पृ० ११-१२ ६६-विभाषे द्वे तु काम्भोजी तद्वद् देवारवर्द्धिनी। -- सं० र०, अ० स०, राग०, पृ० १२ ६७-गान्धारपञ्चमे भाषा गान्धारी -सं० र०, अ० स०, राग, पृ० १२ ६८- भिन्नषड्जके। गान्धारवल्ली कच्छेल्ली स्वरवल्ली निषादिनी। त्रवणा मध्यमा शुद्धा दाक्षिणात्या पुलिन्दका।

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२३० भरत का संगीत-सिद्धान्त

विभाषाएँ (१) पौराली, (२) मालवा, (३) कालिन्दी, (४) देवारवर्धनी हैं।१! १२-वेसरषाडव की भाषाएँ वेसरपाडव की दो भाषाएँ-(१) नाद्या, (२) वाह्यषाडवा है।७0 विभाषाएँ (१) पार्वती, (२) श्रीकण्ठी है।"१ १३-मालवपञ्चम की भाषाएँ मालवपञ्चम की तीन भाषाएँ-(१) वेदवती, (२) भावनी, (३) विभावनी है।७१ १४-तान की भाषा तान की एक भाषा 'तानोद्भवा' है।७१ १५ -- पञ्चमषाडव की भाषा पञ्चमपाडव की एक भाषा 'पोता' है।७४

तुम्बुरा षड्जभाषा च कालिन्दी ललिता ततः। श्रीकण्ठिका च वाङ्गाली गान्धारी सैन्धवीत्यमू:। भाषाः संप्तदश ज्ञेयाः । -सं० र०, अं० सं०, राग०, पृ०१२ ६९ -.. चतस्रस्तु विभाषिकाः । पौराली मालवा कालिन्दयपि देवारवर्धनी। -सं० र०, अ० सं०, राग०, पृ० १२ ७०-वेसरे षाडवे भाषे द्वे नाद्या वाह्यषाडवा। -- सं०, र० अ० सं०, राग०, पृ० १२ ७१-विभाषे पार्वती श्रीकण्ठयथ -- सं० र०, अ० सं०, राग०, पृ० १२ ७२ -.... मालवपञ्चमे । भाषास्तिस्त्रो वेदवती भावनी च विभावनी। -- सं० र०, अ० स०, राग०, पृ० १२ ७३-ताने तानोद्भवा भाषा .. -सं० र०, अ० सं०, राग०, पृ० १२ ७४-भाषा पञ्चमपाडवे। पोता ... -सं० र०, अ० सं०, राग०, पृ० १२

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राग २३१

कुछ लोग रेवगुप्त नामक राग की एक भाषा 'शका' मानते है। मतङ्गकृत वृहद्देशी मे पल्लवी नामक एक ऐसी विभाषा तथा भासवलिता, किरणावली और शकवलिता नामक तीन अन्तरभापाओ की चर्चा है, जिनके जनक राग नही बताये गये है।"4 इस प्रकार समस्त भाषाओं का संकलन निम्न लिखित है-

१. सौवीर ४

२. ककुभ ६

३. टक्क २१ ४. पञ्चम १०

५. भिन्नपञ्चम ४

६. टक्ककैशिक २ ७. हिन्दोल ९

८. वोट्ट १ ९. मालवकैशिक १३

१०. गान्धारपञ्चम १ ११. भिन्नषड्ज १७ -- १२. वेसरषाडव २ -१३. मालवपञ्चम ३

-१४. तान १

१५. पञ्चमपाडव १ मतान्तर-रेवगुप्त १

योग ९६

७५ -....... शकामेके रेवगुप्ते विदुविदः। विभापा पल्लवी भासवलिका किरणावली॥ शकाद्या वलितेत्येतास्तिस्रस्त्वन्तरभाषिकाः। चतस्रोऽनुक्तजनका वृहद्देश्यामिमा: स्मृताः॥ -सं० र०, अ० सं०, राग०, पृ० १२

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२३२ भरत का संगीत-सिद्धान्त

समस्त विभाषाएँ- ककुभ ३

टक्क

पञ्चम २ भिन्न पञ्चम 9 टक्क कैशिक १ मालव कै० २ भिन्नपड्ज ४ वेसर पाडव २ अनुक्त जनक १

सब अंतरभाषाओ का संकलन यह है योग २०

ककुभ १ अनुक्तजनक ३ योग ४ मतङ्ग ने मुख्या, स्वराख्या, देशजा एवं अन्योपरागजा नामक चार भाषाएं बतायी है। जो अन्य किसी भाषा से प्रभावित न हो वह मुख्या, जो किसी स्वर के नाम पर हो वह स्वराख्या, जो किसी देश के नाम पर हो वह देशाख्या या देशजा एवं इन तीनो से उत्पन्न अन्योपरागजा कहलाती है। याष्टिक ने इन्ही चारो अर्थात मूला को मुख्या, स्वराख्या को सकीर्णा, देशाख्या को देशजा और अन्योपरागजा को सङ्कीर्णा कहा है। शुद्धा, आभीरी, रगन्ती तथा (टक्क, हिन्दोल एवं मालवकैशिकी से उत्पन्न) तीन प्रकार की मालववेसरी ये छः भाषाएँ मुख्या कही गयी है। शेष भाषाओ का लक्षण स्पष्ट है। जिन भाषाओ के लक्षण भिन्न है, उनमे भी कभी नाम का सादृश्य हो जाता है। उपराग, भापाजनक राग, भापाराग, विभापाराग एव अन्तरभापाराग भरतोक्त ग्रामरागो से सम्बद्ध होने के कारण हमारी चर्चा का विपय वने है। विस्तारभय से उनके लक्षण नही दिये जा रहे है।

७६-एव पण्णवतिर्भापा विभाषा विशतिस्तथा। चतस्रोऽन्तरभापा' स्यु. शार्गदेवस्य समताः ॥ -स० र०, अ० सं०, राग०, पृ० १३

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राग २३३

जिनमें ग्रामोक्त रागो की छायामात्र हो, वे 'रागाङ्ग', जिनमें अङ्ग की छाया हो वे 'उपाङ्ग', जिनमे भाषाओ की छाया हो, वे 'भाषाङ्ग', करुणा, उत्साह, शोक इत्यादि व्यक्त करनेवाली प्रयोगक्रिया (गान-वादन-क्रिया) से जिनकी उत्पत्ति हो, वे 'उपाङ्ग' कह- लाते है। 'रागाङ्ग', 'उपाङ्ग', 'भाषाङ्ग' एव 'क्रियाङ्ग' की गणना देशी रागों मे है, भरत- सम्प्रदाय से साक्षात् रूप मे सम्बद्ध न होने के कारण उनकी चर्चा नही की जा रही है।

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अनुबन्ध (१)

कुछ परिभाषाओं का स्पष्टीकरण

प्रधानतया हमारा प्रतिपाद्य विपय वही है जो नाट्यशास्त्र की स्वरविधि में प्रतिपादित है, परन्तु मतङ्ग, शार्ङ्गदेव इत्यादि के जातिलक्षणों मे कुछ ऐसे पारिभाषिक शब्द आये है, जिनका स्पष्टीकरण इस पुस्तक के पाठको के लिए परमावश्यक है, फलतः ऐसे शब्दो का सक्षिप्त स्पष्टीकरण प्रस्तुत किया जाता है- ताल प्रतिष्ठार्थक 'तल्' घातु के पश्चात् अधिकरणार्थक 'घन्' प्रत्यय लगने से 'ताल' शब्द वनता है, क्योकि गीत-वाद्य-नृत्य ताल मे ही प्रतिष्ठित होते है। लघु, गुरु, प्लुत से युक्त सशब्द एवं निःशब्द क्रिया द्वारा गीत, वाद्य, नृत्य को परिमित करनेवाला काल ताल कहलाता है।१ लघु, गुरु, प्लुत पॉच निमेप या पाँच हस्व अक्षरों का उच्चारणकाल भरतवणित तालो में लघु या मात्रा कहलाता है।* दो लघु एक गुरु का निर्माण करते है और तीन लघुओ से एक प्लुत बनता है। ये लघु, गुरु, प्लुत छन्द शास्त्र या व्याकरणशास्त्र के ह्रस्व, दीर्घ, प्लुत से भिन्न है।

१-तालस्तल प्रतिष्ठायामिति धातोर्घनि स्मृतः । गीतं वाद्यं तथा नृतं यतस्ताले प्रतिष्ठितम् ॥ कालो लघ्वादिमितया क्रियया सम्मितो मितिम्। गीतादेविदधत्ताल :...

  • निमेपा. पञन्च मात्रा स्यात्। -- स० र०, अ० सं०, ताला० पृ० ३-४

-- भरत०, व० सं०, पृ० ४७५ पर पादटिप्पणी में पाठभेद

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कुछ परिभाषाओं का स्पष्टीकरण २३५

गुरु का एक पर्याय 'कला' भी है, ताल-भाग को भी 'कला' कहते है तथा नि.शब्द एवं सशब्द क्रियाएँ भी 'कला' कहलाती है। तालशास्त्र मे लघु का चिह्न '।', गुरु का चिह्न 's' और भरतवर्णित तालो मे 'प्लुत' का चिह्न भी 's' है। क्रिया

क्रिया के दो भेद है, नि.शब्दा और सशब्दा। नि.शब्दा क्रिया के चार भेद है, आवाप, निष्क्राम, विक्षेप और प्रवेश। सशन्दा के भी चार भेद है-ध्रुव, शम्या, ताल और सन्निपात। सशब्दा क्रियाएँ 'पात' भी कहलाती है। आवाप-उत्तान (चित, हथेली आकाश की ओर होने की स्थिति से युकत) हाथ की अँगुलियो का सिकोड़ना या बन्द करना आवाप कहलाता है। संकेत 'आ०' है। निष्काम-अधस्तल हाथ की अँगुलियो का फैलाना 'निष्काम' है। सङ्ेत 'नि०' है। विक्षप-अँगुलियाँ फैलाये हुए उत्तान हाथ को दाहिने पार्श्व मे फेकना 'विक्षेप' है। संकेत 'वि०' है। प्रवेश-अधस्तल हाथ की अँगुलियों का सिकोड़ना 'प्रवेश' है। सकेत 'प्र०' है। ध्रुव-चुटकी वजाते हुए, हाथ को नीचे ले जाना 'ध्रुव' है। सकेत 'ध्रु०' है। शम्या-दाहिने हाथ से ताली बजाना 'शम्या' है। सकेत 'श०' है। ताल-वाये हाथ से ताली बजाना 'ताल' है। सकेत 'ता०' है। सन्निपात-दोनो हाथो से ताली वजाना 'संनिपात' है। सकेत 'स०' है।

२ -.... किया द्विधा। निःशब्दा शब्दयुक्ता च नि शब्दा तु कलोच्यते। स्यादावापोऽय निष्क्रामो विक्षेपश्च प्रवेशकः । नि श्देति चतुर्धोक्ता सशब्दापि चतुविधा। ध्रुव. शम्या ततस्ताल सनिपात इतीरिता। पातः कला तु सा ज्ञेया तासां लक्ष्माभिदध्महे। आवापस्तत्र हस्तस्योत्तानस्याडगुलिकुञ्चनम्। निष्क्रामोऽधस्तलस्य स्यादडगुलीनां प्रसारणम्। क्षेपो दक्षिणपार्श्वस्योत्तानस्य प्रसृताडगुले:। विक्षेपोऽघस्तलस्यास्य प्रदेशोडगुलिकुञ्चनम्। ध्रुवो हस्तस्य पात. स्याच्छोटिकाशन्दपूर्वक. । शम्या दक्षिणहस्तस्य तालो बामकरस्य तु। उभयो सनिपात स्यात् ..... । -सं० र०, अ० सं०, ताला०, पृ० ४-५

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२३६ भरत का संगीत-सिद्धान्त

ताल के मुख्य भेद

भरतोक्त तालों में चतुरस्र अर्थात् चञ्चत्पुट (चच्चतपुट, चञ्चूपुट) और त्र्यस्त्र अर्थात् चाचपुट (चापपुट) मुख्य है। इन दोनो के तीन भेद; यथाक्षर (एककल), द्विकल और चतुष्कल होते है। यथाक्षर से द्विगुण मात्राएँ होने के कारण द्विगुण और चतुर्गुण मात्राएँ होने पर चतुष्कल रूपो का निर्माण होता है।" तालो का रूप जब ताल के नाम में प्रयुक्त अक्षरो की स्थिति के अनुसार होता है, तब वे 'यथाक्षर' कहलाते है। यथाक्षर चञ्चत्पुट मे अन्तिम अक्षर 'ट' प्लुत होता है और चाचपुट मे नही। सयुक्त वर्ण से पूर्व वर्ण ह्रस्व होने पर भी दीर्घ यागुरु माना जाता है, फलतः 'चञ्चत्पुट' शब्द मे अक्षर क्रमश गुरु, गुरु, लघु, प्लुत है। इसलिए यथाक्षर चञ्चतपुट का रूप 'SS।ड' और यथाक्षर चाचपुट का रूप '5।IS' है। यथाक्षर चञ्चत्पुट में आठ और यथाक्षर चाचपुट में छ मात्राएँ होती है। पञ्चपाणि चाचपुट ताल का एक भेद 'षट्पितापुत्रक' ताल है, जिसे 'पञ्चपाणि' और 'उत्तर' भी कहते है। षट्पितापुत्रक ताल के आदिम एवं अन्तिम अक्षर यथाक्षर अवस्था में

३-त्र्यस्त्रश्च चतुरस्श्च स तालो द्विविधः स्मृतः । -- भरत०, व० सं०, पृ० ४७६ चतुरस्रस्तु विज्ञेय: तालश्चञ्चू (ञ्च) त्पुटो वुधै.। 1r -भरत०, का० सं०, पृ० ३४३ त्र्यस्त्न: स खलु विज्ञेयस्तालश्चापपुटो भवेत्। -भरत०, का० स०, पृ० ३४३ ४-यथाक्षरश्च द्विकलश्चतुष्कल इति त्रिधा। -स० र०, अ० स०, त्यला०, पृ० ९ ५-तौ चञ्चत्पुटचाचपुटौ (द्विगुणौ) द्विकलापेक्षया द्विगुणीकृतौ सन्तौ चतुष्कला- वित्युच्येते। अष्टगुरुसंमितो द्विकलचञ्चत्पुटो द्विगुणीकृत्य षोडशगुरुसमितः संश्चतुष्कलो भवति। षड्गुरुसम्मितो द्विकलचाचपुटो द्विगुणीकृत्य द्वादशगुरु- सम्मित. सश्चतुष्कलो भवति। -कल्लि०, स० टी०, अ० स०, ताला०, पृ० ११ ६-पट्पितापुत्रकस्त्र्यस्रभेदः सोऽपि तथा त्रिधा। -सं० र०, अ० स०, ताला०, पृ० ११ तस्य पट्पितापुत्रकस्य उत्तर: पञ्चपाणिश्चेत्येतन्नामद्वयम् । -- सिंह०, स० टी०, अ० सं०, ताला०, पृ० ११

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कुछ परिभाषाओं का स्पष्टीकरण २३७

प्लुत होते है। फलत. इसमें अक्षरों की स्थिति प्लुत, लघु, गुरु, गुरु, लघु, प्लुत अर्थात् *515S15' है। (३+१+२+२+१+३=) १२ मात्राओ से यथाक्षर पट्पिता- पुत्रक ताल बनता है।

न्यथाक्षर चञ्चतपुट की तालक्रिया"

तालक्रिया स० ता० श०

तालरूप S S ! S

तालाक्षर च चतु पु ट

मात्राएँ १ २ ३ ४ ५ ६ ७ ८

द्विकल चञ्चत्पुट मे आठ गुरु अर्थात् सोलह लघु होते है- द्विकल चञ्चत्पुट की तालक्रिया तालक्रिया नि० श० वि० ता०

तालरूप S S S S

मात्राएँ १ २ ३ ४ ५ ६ ७

तालक्रिया श० प्र० वि० श०

तालरूप S S S S

मात्राएँ ९ १० ११ १२ १३ १४ १५ १६ चतुष्कल चञन्चत्पुट ताल मे सोलह गुरु अर्थात् ३२ मात्राएँ होती है- चतुष्कल चञन्चतुट की तालक्रिया® १ तालक्रिया आ नि० वि० श०

तालरूप S 5 5 S

मात्राएँ १ २ ३ ४ ५ ७ ८

२ तालक्रिया आ नि० वि० ता०

तालरूप S S S s

मात्राएँ ९ १० ११ १२ १३ १४ १५ १६

७-चञ्चत्पुटे त्वेककले सशताश यथाक्रमम्। -सं० र०, अ० स०, पृ० १४ ८-निशौ निताश प्रविश द्विकले युग्मके मता.। -सं० र०, अ०स०, ताला०, पृ०१५ 8- SSS S SSSSSSS S SSS S आ नि वि श आ नि वि ता आ श वि प्र आ नि वि सं इतिचतुष्कल-चच्चत्पुट-कलाविधि.। -सं० र०, अ० स०, ताला०, पृ० १७

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२३८ भरत का संगीत-सिद्धान्त

तालक्रिया आ० श० वि० प्र०,

तालरूप S S S s मात्राएँ १७ १८ १९ २० २१ २२ २३ : २४

४ तालक्रिया आ नि० वि० स०

तालरूप S S S S

मात्राएँ २५ २६ २७ २८ २९ ३० ३१ ३२

यथाक्षर चाचपुट की तालक्रिया

तालक्रिया श० ताo श० ता०

तालरूप S 1 1 S

तालाक्षर चा च पु मात्राएँ १ २ ३ ४ ५ ६

द्विकल चाचपुट की तालक्रिया" द्विकल चाचपुट मे छःगुरु अर्थात् बारह मात्राएँ होती है-

१ तालत्रिया नि०

तालरूप S 5 मात्राएँ १ २ ३ ४

२ तालक्रिया ता० श०

तालरूप S S

मात्राएँ ५ ६ ७ ८

३ तालक्रिया नि० सं०

तालरूप S S

मात्राएँ ९ १० ११ १२ चतुष्कल चाचपुट में बारह गुरु अर्थात् २४ मात्राएँ होती हैं-

१०-शता शता (ताश ताश) इत्येककल-चाचपुट-कलाविधिः। -सं० र०, अ० सं०, ताला०, पृ० १५ ११-निशौ ताशौ निसमिति ज्ञेयाश्चाचपुटे क्रमात्। -सं० र०, अ० सं०, ताला०, पृ० १५

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कुछ परिभाषाओं का स्पष्टीकरण २३९

चतुष्कल चाचपुट को तालक्रिया

१ तालक्रिया आ० नि० वि० श०

तालरूप S S S

मात्राएँ १ २ ३ ४ ५ ७

२ तालक्रिया आ० ता० वि० श०

तालरूप S S S

मात्राऍ ९ ११ १२ १३ १४ १५ १६

३ तालक्रिया आ० नि० वि० सं०

तालरूप S S 5 5 मात्राएँ १७ १८ १९ २० २१ २२ २३ २४

न्यथाक्षर षट्पितापुत्रक की तालक्रिया१२

तालक्रिया स० ता० श० ता० श० ता०

तालरूप s ~ S S 1

तालाक्षर पट् पि ता पु न्र क

मात्राएँ १ २ ३ ४ ५ ६ ७ ८ ९ १० ११ १२ द्विकल पट्पितापुत्रक ताल मे वारह गुरु या चौवीस मात्राएँ होती है, परन्तु एक पाद-भाग चार-चार मात्राओ का होता है। द्विकल षट्पितापुत्रक की तालक्रिया१४

१ तालक्रिया नि० प्र०

मात्रा १ २ ३ ४

₹ ?- s S S S 5 S 5 S S 5 5 5 आ नि वि श आ ता वि श आ नि वि सं इति चतु- ष्कल-चानपुटकलाविघि। -सं० र०, अ० सं०, ताला०, पृ० १७ 5 1 S 5

सं ता श ता श ता -- सं० र०, अ० सं०, ताला०, पृ० १५ १४- निप्रताशनितानिशताप्रनिसं तथोत्तरे। इति द्विकल-षट्पितापुत्रककलाविधि:। -- सं० र०, अ० सं०, ताला०, पृ० १५

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२४० भरत का संगीत-सिद्धान्त

२ तालक्रिया ता० श०

मात्रा ५ ७ ८

तालक्रिया नि० ताo

मात्रा ९ १० ११ १२

४ तालक्रिया नि० श०

मात्रा १३ १४ १५ १६

५ तालक्रिया ता० प्र०

मात्रा १७ १८ १९ २०

६ तालक्रिया नि० स०

मात्रा २१ २२ २३ २४ चतुष्कल षट्पितापुत्रक की तालक्रिया" चतुष्कल षट्पितापुत्रक मे चौबीस गुरु अर्थात् ४८ मात्राएँ होती है। तालक्रिया आ नि० वि० प्र०

मात्रा १ २ ३ ४ ५ ७

तालक्रिया आ० ता० वि० श०

मात्रा ९ १० ११ १२ १३ १४ १५ १६ तालक्रिया आ० नि० वि० ता०

मात्रा १७ १८ १९ २० २१ २२ २३ २४

तालक्रिया आ० नि० वि० श०

मात्रा २५ २६:२७ २८ २९ ३० ३१ ३२

तालक्रिया आ० ता० वि० प्र०

मात्रा ३३ ३४ ३५ ३६ ३७ ३८ ३९ ४०

१५-5 5 5 S S 5 5 S S S S आ नि वि प्र आ ता वि श आ नि वि ता SS S 5 S 5 5 S 5 5 5

आ नि वि श आ ता वि प्र आ नि वि सं

इति चतुष्कल-पट्पितापुन्नककलाविधि.।-सं० र०, अ० स०, ताला०, पृ० १७

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कुछ परिभाधाओं का स्पष्टीकरण २४१

तालक्रिया आ० नि० वि० सं० मात्रा ४१ ४२ ४३ ४४ ४५ ४६ ४७ ४८ पूर्वोक्तं तीन तालो केअतिरिक्त उद्घट्ट एवं संपक्वेष्टाक नामक दो और ताल सी भरतोक्त है, परन्तु जातियो और रागो के प्रस्तारो मे चतुष्कल चञ्चत्पुट और चतुष्कल पञ्चपाणि ताल का ही प्रयोग हुआ है, अत. इन्ही का विशिष्ट वर्णन किया गया है। पञ्चपाणि ताल त्र्यस्र चाचपुट का एक भेद है, इसी लिए चाचपुट का वर्णन किया गया है। चञ्चत्पुट ताल के प्रथम पादभागं मे कनिष्ठा, द्वितीय पादभाग मे सम्मिलित कनिष्ठा-अनामिका, तृतीय पादभाग में सम्मिलित कनिष्ठा-अनामिका-मध्यमा एवं

चाहिए।१६ चतुर्थ पादभाग मे सम्मिलित कनिष्ठा-अनामिका-मध्यमा-तर्जनी से तालक्रिया करनी

चाचपुट के तीन पादभागो मे क्रमश कनिष्ठा, कनिष्ठा-अनामिका एव कनिष्ठा- अनामिका-तर्जनी से तालक्रिया करनी चाहिए। मध्यमा का प्रयोग इस ताल की तालक्रिया मे वर्जित है।१5 पञ्चपाणि ताल के छः पादभागो मे क्रमश. कनिष्ठा, कनिष्ठा-अनामिका, कनिष्ठा-अनामिका-मध्यमा, कनिष्ठा-अनामिका-तर्जनी-मध्यमा, कनिष्ठा-तर्जनी से तालक्रिया करनी चाहिए।१८ मार्ग

महर्षि भरत ने चित्र, वार्तिक, दक्षिण ये तीन 'मार्ग' बताये है। शाङ्गदेव ने 'ध्रुव' नामक एक और मार्ग भी कहा है। ध्रुवमार्ग मे एक, चित्र मे दो, वार्तिक में चार और दक्षिण मार्ग मे आठ मात्राओ से एक पाद-भाग (कला) का निर्माण होता

१६-प्रथमे पादभागे स्यात् कलाडगुल्या कनिष्ठया। तया चानामयान्यत्र ताभ्या मध्यमया तथा। तृतीये स्याच्चतसृभिस्तुर्य्य चच्चत्पुटस्य तु।। -सं० र०, अ० स०, ताला०, पृ० १४ १७-ओजस्य पादभागे तु कला मघ्याड्गुली विना। -- स० र०, अ० सं०, ताला०, पृ० १४ १८-पञ्चपाणे. कनिष्ठादिचतुष्केण कनिष्ठया। तर्जन्या च पृथक् पादभागषट्के क्रमात्कला.। १६

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२४२ भरत का संगीत-सिद्धान्त

है।१९ इसी लिए चित्रमार्ग में यथाक्षर या एककल, वार्तिक मार्ग में द्विकल और दक्षिण मार्ग मे चतुष्कल ताल का प्रयोग होता है। परिवर्तन या आवृत्ति पादभागादि से युक्त ताल का दुहराना परिवर्त (न) या आवृत्ति कहलाता है।२० मान (परिमिति, परिमाण, प्रमाण, नाप) विश्रान्तियुक्त तालक्रिया से तालो का 'मान' किया जाता है।२१ लय

तालक्रिया के अनन्तर (अगली तालक्रिया से पूर्व तक) किया जानेवाला विश्राम 'लय' कहलाता है। शीघ्रतम लय 'द्रुत,' उससे द्विगुण 'मध्य' तथा उससे द्विगुण 'विल- म्वित' कहलाती है। चित्र, वार्तिक एवं दक्षिण मार्ग में विश्रान्तिकाल के परिमाण में भेद होने के कारण, क्मशः लय मे क्षिप्रभाव, मध्यभाव एवं चिरभाव के कारण लय के अनेक भेद हो जाते है। फलतः क्षिप्रभाव में द्रुत, मध्य, विलम्वित; मध्यभाव में द्रुत,

रूप होता है।२२ मध्य, विलम्वित तथा चिरभाव मे द्रुत, मध्य एवं विलम्बित भेदों का पृथक्-पृथक्

तीनों मार्गो मे एक मात्रा का काल पॉच लघु अक्षरो के उच्चारणकाल के समान होता है, तथापि चित्र मार्ग में दस लघु अक्षरो के उच्चारणकाल से परिमित काल के पश्चात् होनेवाली लय 'द्रुत' कहलाती है, वार्तिक मार्ग मे बीस लघु अक्षरो के उच्चारण काल के पश्चात् उत्पन्न होनेवाली लय 'मव्य' कहलाती है, दक्षिण मार्ग में चालीस लघु अक्षरों के उच्चारणकाल के पश्चात् उत्पन्न होनेवाली लय 'विलम्बित' कहलाती है।

१९-मार्गा. स्युस्तत्र चत्वारो ध्रुवश्चित्रश्च वार्तिक.। दक्षिणश्चेति तन्न स्याद् ध्रुवके मात्रिका कला। शेषेपु द्वे चतस्रोऽष्टौ क्रमान्मात्रा: कला भवेत् ॥ -सं० र०, अ० सं०, ताला०, पृ० ५ २०-आवृत्तिः पादभागादेः परिवर्तनमिष्यते। -स० र०, अ० सं०, ताला०, पृ० २४ २१-विश्रान्तियुक्तया काले क्रियया मानमिष्यते। -सं० र०, अ० सं०, ताला०, पृ० २४ २२-क्रियानन्तरविश्रान्तिर्लय. स त्रिविधो मत.। द्रुतो मध्यो विलम्बश्च द्रुतः शीघ्रतमो मतः । द्विगुणद्विगुणौ ज्ञेयौ तस्मान्मध्यविलम्वितौ। मार्गभेदा्चिरक्षिप्रमध्य- भावैरनेकधा॥

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कुछ परिभाषाओं का स्पष्टीकरण २४३

किसी स्थान को जाने के तीन मार्ग है, दूसरा मार्ग पहले मार्ग की अपेक्षा दुगुना लम्वा है, तीसरे मार्ग की लम्वाई दूसरे मार्ग की अपेक्षा भी द्विगुण है। एक ही गति से चलनेवाले तीन व्यक्तियो मे प्रथम व्यक्ति प्रथम मार्ग से लक्ष्यस्थल पर जितने समय मे पहुँचेगा, दूसरे मार्ग से चलनेवाला उससे द्विगुण और तीसरे मार्ग से चलनेवाला उससे भी द्विगुण समय मे लक्ष्य स्थल तक पहुँचेगा। अपेक्षया पहले व्यक्ति के पहुँचने का काल द्रुत, दूसरे व्यक्ति के पहुँचने का काल मध्य एवं तीसरे व्यक्ति के पहुँचने का काल विलम्वित होगा। मार्ग-भेद से लय-भेद की स्थिति भी ऐसी ही है। इस लय का उपयोग अक्षर, शब्द या वाक्य मे नही होता। क्योकि बोलचाल के समय इनकी जो लय होती है, उसका सज्जगीत से कोई सम्बन्ध नही है। २१ यति

लय की प्रवृत्ति (प्रयोग) का नियम 'यति' कहलाता है। उसके तीन भेद 'समा', 'स्रोतोगता' और 'गोपुच्छा' है। समा आदि, मध्य एवं अन्त में समान लय से युक्त यति 'समा' है। द्रुत, मध्य एवं विल- म्वित लय के भेद से इसके तीन भेद हो जाते है। स्रोतोगता स्रोत जलवृद्धि से पूर्व विलम्बित गति से चलता है, परन्तु जल-वृद्धि होने पर उसका वेग बढ़ जाता है। इसी प्रकार आदि मे विलम्वित लय, मध्य मे मध्य लय एवं अन्त में द्रुत लयवाली यति स्रोतोगता कहलाती है। विलम्बित और मघ्य लयवाली दूसरी 'स्रोतोगता' तथा मध्य एव द्रुत लयवाली तीसरे प्रकार की 'स्रोतोगता' यति होती है। गोपुच्छा गौ की पूंछ अन्त मे विस्तृत होती है, फलतः आदि में द्रुत, मध्य मे मध्य एवं अन्त मे विलम्बित लयवाली यति 'गोपुच्छा' होती है। द्रुत एवं मध्य लयवाली द्वितीय 'गोपुच्छा' और मध्य-विलम्वित लयवाली तृतीय 'गोपुच्छा' कहलाती है।१४

२३-लयोऽक्षरे पदे वाक्ये योऽसी नात्रोपयुज्यते। -सं० र०, अ० सं०, ताला०, पृ० २५ २४-लयप्रवृत्तिनियमो यतिरित्यभिधीयते। समा स्रोतोगता चान्या गोपुच्छा त्रिविधेति सा।

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२४४ भरत का संगीत-सिद्धान्त

ग्रह ताल मे 'सम', 'अतीत' और 'अनागत' तीन 'ग्रह' है। गीत, वाद्य, नृत्य के साथ होनेवाला ताल का आरम्भ 'समपाणि' या 'समग्रह', गीत, वाद्य, नृत्य के पश्चात् होनेवाला ताल का आरम्भ 'अवपाणि' या 'अतीतग्रह' तथा गीत, वाद्य, नृत्य से पूर्व होनेवाला ताल का आरम्भ 'उपरिपाणि' या 'अनागतग्रह' कहलाता है। सम, अतीत और अनागत ग्रहो मे लय क्रमशः मध्य, द्रुत और विलम्वित होती है।२५ प्रकरण-गीतक और ब्रह्म-गीत इन तालो का आश्रय लेकर (१) मद्रक, (२) अपरान्तक, (३) उल्लोप्य, (४) प्रकरी, (५) ओवेणक, (६) रोविन्दक, (७) उत्तर नामक सात गीतो का वादन किया गया है। सात गीत (१) छन्दक, (२) आसारित, (३) वर्धमान, (४) पाणिक, (५) ऋक्, (६) गाथा, (७) साम भी है। ब्रह्मा ने मोक्ष के लिए शिवस्तुति मे इनका प्रयोग किया है।२६

आदिमध्यावसानेषु लयैकत्वे समा त्रिधा। लयत्रैधादादिमध्यावसानेपु यथाक्मात्॥ चिरमध्यद्रुतलया तदा स्रोतोगता मता। अन्या विलम्वमध्याभ्या मध्यद्रुतवती परा॥ द्रुतमध्यविलम्वै स्याद् गोपुच्छा द्रुतमध्यभाक्। द्वितीयान्या भवेन्मध्यविलम्वितलयान्विता ॥ -- स० र०, अ० सं०, ताला०, पृ० २६ २५-समोऽतीतोऽनागतश्च ग्रहस्ताले त्रिधा मत.। गीतादिसमकालस्तु समपाणिः समग्रह। सोऽवपाणिरतीत. स्याद्यो गीतादौ प्रवर्तते। अनागतः प्राक् प्रवृत्तग्रहस्तूपरिपाणिकः। लयाः कमात्समादौ स्युर्मव्यद्रुतविलम्बिता.॥ -- स०, र०, अ० स०, ताला०, पृ० २७-२८ २६-एतैः प्रकरणाख्यानि तालैर्यानि जगुर्वुधा। तानि गीतानि वक्ष्यामस्तेषामाद्य तु मद्रकम्। अपरान्तकमुल्लोप्य प्रकर्योवेणक तत.। रोविन्दकोत्तरे सप्त गीत- कानीत्यवादिषु.। छन्दकासारिते वर्धमानक पाणिक तथा। ऋचो गाया च सामानि गीतानीति चतुर्दश। शिवस्तुतौ प्रयोज्यानि मोक्षाय विदधे विधि:॥ -- सं० र०, अ० सं०, ताला०, पृ० २९

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कुछ परिभाषाओं का स्पष्टीकरण २४५

इन गीतो मे भेद उपभेद भी है, हमने इनकी चर्चा 'ध्रुवा' से सम्बद्ध होने के कारण की है।

पंदाश्रित गीति

स्थायी, आरोही, अवरोही वर्णों से अलंकृत पद एव लय से युक्त गानक्रिया 'गीति' कहलाती है। गीति के चार प्रकार-मागवी, अर्धमागधी, सम्भाविता और पृथुला है।२5 मागधी

प्रथम पादभाग (कला) मे विलम्बित लय से युक्त पद को गाकर, दूसरे पादभाग में कुछ और शब्दो को सम्मिलित करने के पश्चात् मध्यलय मे गाने के अनन्तर तीसरे पादभाग मे कुछ और शब्दो को सम्मिलित करके द्रुतलय मे गाना 'मागधी' गीति है।२८ इस गीति का जन्म मगध देश मे हुआ है। यदि चार मात्राओ का एक पादभाग मान लिया जाय, तो मागधी गीति का उदाहरण यह होगा-

पहली कला १ २ ३ ४ (पादभाग) मा गा मा धा दे व 1

दूसरी कला ५ ६ ७ ८

धनि धनि सनि घा

दे व रु द्रं

तीसरी कला ९ १० ११ १२ रिग रिग मग रिस देव रुद्र व दे

२७-वर्णाद्यलङकृता गानक्रिया पदलयान्विता।गीतिरित्यु च्यते सा च वुधैरुक्ता चतुर्विधा।। मागधी प्रथमा ज्ञेया द्वितीया चार्धमागधी। सम्भाविता च पृथुला .।। --- स० र०, अ० स०, स्वरा०, पृ० २८० २८-गीत्वा कलायामाद्यायां विलवितलय पदम्। द्वितीयाया मध्यलय तत्पदान्तर- सयुतम्। सतृतीयपदे ते च तृतीयस्या द्रुते लये। इति त्रिरावृत्तपदां मागधी जग- दुर्बुधा:॥ -सं० र०, अ० सं०, स्वरा०, पृ० २८०

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२४६ भरत का संगीत-सिद्धान्त

अर्धमागघी

प्रथम कला मे 'देवं' पद का मागधी के समान उच्चारण, दूसरी कला में 'देवं' के पश्चात् 'वं' के साथ 'रुद्रं' का उच्चारण और तीसरी कला मे 'रुद्र' के पश्चार्द्ध 'द्रं' के साथ 'वदे' का उच्चारण 'अर्धमागधी' है।२१ उदाहरण-

१ -- १ २ ३ ४

मा री गा सा

दे वं

५ ६ ७ ८

सा सा धा नी

व रु द्रं

३- १० ११ १२

पा धा पा मा

द्रं वं दे

कुछ लोगो के अनुसार अर्धमागधी मे अवशिष्ट दो पदों की दो बार आवृत्ति होनी चाहिए।२ जैसे-

१- २ ३ ४

मा मा मा मा

दे वं

2- ५ ६ ७ ८

धा सा धा नी

दे वं द्र

३- ९ १० ११ १२

पा निध मा मा

रु द्रं वं दे

२९-पूर्वयोः पदयोरर्धें चरमे द्विर्पदोदिते। तदाऽर्धमागधी प्राहुः। -सं० र०, अ० सं०, स्वर०, पृ० २८२ ३०-द्विरावृत्तपदान्तरे ... । -सं० र०, अ० सं०, स्वर, पृ० २८३ पर पाठभेद

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कुछ परिभाषाओं का स्पष्टीकरण २४७

सम्भाविता

दीर्घ अक्षरो का आधिक्य एवं पदो का सङ्कोच होने पर सम्भाविता गीति होती है।२१ जसे -

१- १ २ ३ ४

धा मा मा रिग

भ क्त्या

५ ६ ७ ८

री गा सा सा

दे - वं -

९ १० ११ १२ mY' नी धा सा नी

रु - द्र -

४- १३ १४ १५ १६

धा नी मा मा वं दे 1 I

पृथुला जिसमे अधिकांश पद ह्रस्व अक्षरो से निर्मित हो, वह 'पृथुला' गीति होती है।१२ जैसे-

१- १ २ ३ ४

मा गा री गा

सु र न त

2- ५ ६ ८

सा धनि घा घा

ह र प द

३१-सक्षेपितपदा भूरिगुरु: सम्भाविता मता। -सं० र०, अ० सं०, स्वर०, पृ० २८४ ३२-भूरिलव्वक्षरपदा पृथुला सम्मता सताम्। -सं० र०, अ०, सं०, स्वर०, पृ० २८५

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२४८ भरत का संगीत-सिद्धान्त

३- ९ १० ११ १२ धा सा धा नी

यु ग लं

४- १३ १४ १५ १६

पा निधप मा मा

प्र ण म त

स्वराश्रित गीति

स्वराश्रित गीतियॉ पॉच है-शुद्ध, भिन्न, गौडी, वेसरा और साधारणी। यही पाँच गीतियाँ शुद्ध, भिन्न, गौड, वेसर एव साधारण नामक पॉच ग्रामराग-भेदो का निर्माण करती है।१ मतङ्ग, कल्लिनाथ एवं सिहभूपाल के मत मे ये पाँचो गीतियाँ 'दुर्गामत' के अनुसार है।" कल्लिनाथ के समक्ष प्रस्तुत भरत-नाट्यशास्त्र मे भी इन पॉचो गीतियों का उल्लेख था।२५

शुद्धा अवकर एवं ललित स्वर शुद्धा गीति का निर्माण करते है।१६

३३-पञ्चधा ग्रामरागाः स्युः पञ्चगीतिसमाश्रयात्। गीतयः पञ्च शुद्धा च भिन्ना गौडी च वेसरा। साधारणीति .. । -सं० र०, अ० सं०, रागा०, पृ० ३ ३४-गीतय. पञ्च विज्ञेयाः शुद्धा भिन्ना च वेसरा। गौडी साधारणी चैव इति दुर्गामते मतम् ॥ -- मतङ्ग, सिह०, सं० टी०, राग०, पृ० ५ शुद्धादयस्तु प्राधान्यन स्वराश्रिता इतीह ग्रन्थकार एताः पञ्च गीतीर्दुर्गामता- नुसारेणालक्षयत्। -कल्लि०, सं० टी०, अ० सं०, राग०, पृ० ६ तत्र दुर्गामतमाश्रित्य पञ्च गीतय इत्युक्तम्। -- सिंह०, सं० टी०, अ० सं०, राग०, पृ ५ ३५-तथा चाह भरत :- 'पूर्वरङ्गे तु शुद्धा स्याद् भिन्ना प्रस्तावनाश्रया। वेसरा मुखयोः कार्य्या गर्भे गौडी विधीयते। साधारितावमर्शे स्यात् सन्धौ निर्वहणे तथा। ... -भरत०, कल्लि०, सं० टी०, अ० सं०, राग०, पृ० ३२ ३६ -.... शुद्धा स्यादवक्रर्ललितः स्वरैः। -सं० र०, अ०, सं०, राग०, पृ० ३

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कुछ परिभाषाओं का स्पष्टीकरण २४९

भिन्ना वक्र स्वरो एवं सूक्ष्म तथा मधुर गमको से युक्त गीति भिन्ना कहलाती है।१७

गौडी त्रिस्थानव्यापी प्रगाढ़ गमको और 'ओहाटी' के कारण ललित स्वरो के द्वारा तीनो स्थानो मे अखण्ड रूप से स्थिति गौडी कहलाती है।१८ ठोडी को हृदय पर रखकर मन्द्र स्वरो को कोमलतापूर्वक कम्पित गमक करके इस प्रकार निकालने से 'ओहाटी' की व्यक्ति होती है, जिसमे श्रोताओ को 'ह' और 'ओ' के सम्मिलित उच्चारण जैसी ध्वनि सुनाई दे। 'ओकार' और 'हकार' पर 'अटन' (गमन) करने के कारण ही इस क्रिया को 'ओहाटी' कहा जाता है।१९

वेसरा आरोही, अवरोही, स्थायी एव सञ्चारी वर्गो मे अत्यन्त रक्तिपूर्वक वेगवान स्वरो से रागो को गाना 'वेसरा' (वेगस्वरा) गीति है।४

साधारणी पूर्वोक्त चारो गीतियो की विशेपताओ को सम्मिलित करके गाना 'साधारणी' गीति है।"१

पद

विभक्तियुक्त शब्द 'पद' है।२ अक्षरसम्बद्ध प्रत्येक वस्तु 'पद' है। स्वर-

३७-भिन्ना वकै. स्वर सूक्ष्मैमधुरैगमकैर्युता। -स०, र०, अ० स०, राग०, पृ ३ ३८-गाढैस्त्रिस्थानगमकैरोहाटीललितै. स्वरै। अखण्डितस्थिति स्थानत्रये गौडी मता सताम्॥ -स० र०, अ० स०, राग०, पृ० ३ ३९-ओहाटी कम्पितैर्मन्द्रैमृ दुद्रुततरःस्वरै.। हकारौकारयोगेण हृन््यस्ते चित्रुके भवेत्॥ -- स० र०, अ० स०, राग०, पृ० ३ ४०-वेगवद्भिः स्वरर्वर्णचतुष्केऽप्यतिरक्तित । वेगस्वरा रागगीतिर्वेसरा चोच्यते वुवै ॥ -स० र०, अ० स०, राग०, पृ० ६ ४१-चतुर्गीतिश्रित लक्ष्म श्रिता साधारणी मता।-सं० र०, अ० सं०, राग०, पृ० ६ ४२-विभक्त्यन्त पद ज्ञेयम् ... -- भरत०, गा० स०, अध्याय १४, पृ० २१४ ४३-यत्स्यादक्षरसंबद्ध तत्सर्व पदसंज्ञितम्। -- भरत०, ब०सं०, पृ० ५३५

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२५० भरत का संगीत-सिद्धान्त

तालानुभावित गान्धर्व मे प्रयोज्य वस्तु को 'पद' कहा जाता है।" पद के दो भेद 'चूर्ण पद' और 'निवद्ध पद' है।४५ चूर्ण पद या अनिवद्ध पद छन्दोविधि के अनुसार जो निबद्ध न हो, जिसमें अक्षरों की संख्या नियत न हो, जिसमें गब्दों की संख्या अर्थ के अनुसार हो, ऐसा सार्थक शब्दसमूह 'चूर्ण पद' कहलाता है।४६ निवद्ध पद छन्दोविधि के अनुसार जो निवद्ध अक्षरों से युक्त हो, जिसमे अक्षरों की संख्या नियत हो, जो यतिच्छेद से युक्त हो, वह सार्थक शब्दसमूह 'निवद्ध पद' कहलाता है। (वह अनेक छन्दों से उत्पन्न होता है।"७) गीत दशांश-लक्षणलक्षित स्वरसंनिवेश (राग या जाति), पद, ताल एवं मार्ग इन चार अंगो से युक्त गान गीत कहलाता है।४८ बहिर्गीत या निर्गोत जिनमे सार्थक शब्दो के स्थान पर निरर्थक 'शुष्काक्षरो' या 'स्तोभाक्षरो' का प्रयोग हो, वे 'निर्गीत' या 'बहिर्गीत' कहलाते है।"१ निर्गीत का अर्थ निरर्थक गीत

४४-गान्वर्व यन्मया प्रोक्तं स्वरतालपदात्मकम्। पदे तस्य भवेद् वस्तु स्वरतालानुभावितम्।। -भरत०, व० सं०, पृ० ५३५ पाठ-भेद ४५-विभक्त्यन्तं पदं ज्ञेयं निबद्धं चूर्णमेव वा। -भरत०, गा० सं०, अ० १४, पृ० २३४ ४६-अनिबद्धं पदवृन्द तथा चानियताक्षरम्। अर्थापेक्षाक्षरयुतं ज्ञेयं चूर्णपदं बुध.। -भरत०, व० सं०, पृ० २२४ ४७-निवद्धाक्षरसंयुक्तं यतिच्छेदसमन्वितम्। निबद्धं तु पदं ज्ञेयं प्रमाणनियताक्षरम्॥ -- भरत०, गा० सं०, अ० १४, पृ० २३४ ४८-ग्रहाशादिदशलक्षणलक्षितस्वरमात्रसनिवेशविशेषो रागः। तैः स्वरैः पदैस्तालै- र्मागै रेवं चतुभिरङ्गरुपेतं ध्रुवादिसंज्ञकं गीतम्। -कल्लि०, सं०, र०, अ० सं०, राग०, पृ० ३३ ४९-निर्गीतं गीयते यस्मादपदं वर्णयोजनात।-भरत०,गा० २सं०, अ० ५, पृ० २२३

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कुछ परिभाषाओं का स्पष्टीकरण २५१

है।५० इस निर्गीत के आविष्कारक नारद है।५इसको विशेपतया असुरों ने अपनाया, इसलिए देवताओं ने इसे वहिर्गीत कहना आरम्भ कर दिया।५२ स्तोभाक्षर या शुषकाक्षर स्तोभाक्षरों या 'शुष्काक्षरो' का उपदेश ब्रह्मा ने किया है। वे है- झण्टु, जगतिप, वलितक, कुचझल, गितिकल, पशुपति, दिगिनिगि, दिग्रे, गणपति, +

तिचा।५ आचार्य शार्गदेव के अनुसार- 'झण्टु जगतिप बलिकित कुचझल तितिझल पशुपति दिगिदिगि वादिगोंग गणपति तितिधा' है। झण्टुं के स्थान पर 'ऋंटुं', 'दिगिदिगि' के स्थान पर 'दिग्ले', 'तितिधा' के स्थान 'तेचाम्' या 'तेन्नाम्' पाठ भी मिलते है। ओंकार और स्वर-व्यञ्जनयुक्त 'हकार' की गणना भी स्तोभाक्षरों मे है।५४ ये स्तोभाक्षर पादपूर्ति के लिए भी उपयोगी है और ये सार्थक शब्दो की भॉति छन्दोवद्ध भी हो सकते है। शुष्काक्षरयुक्त एक विशिष्ट छन्द का रूप नौ गुरु, छः लघु और तीन गुरु है। उदाहरण इस प्रकार है-५५ S S S 5 S S S 1 1 1 1 1 1SS s - nY १ २ ३ ५ ७ ८ ९, १ २ ४ ५ ६, १ २ ३ दि ग्ले दि ग्ले झं झ टु जं बु क व लि त क ते ते न्नाम्

वर्णा झण्टुमादय: स्थाय्यादयरच। -अभि०, भरत०, गा० २ सं०, अ० ५,पृ० २२३ ५०-निर्गीतमिति तावदादय नाम। निरर्थकं गीतमिति। -अभि०, भरत०, गा० २ स०, अ० ५,पृ० २२३ ५१-नारदाद्यस्तु गन्धर्वेस्सभायां देवदानवाः । निर्गीतं श्राविताः सम्यग्लयताल- समन्वितम् ॥ भरत०, गा० २ सं०, अ० ५, पृ० २२१ ५२-एवं निर्गीतमेतत्तु दैत्यानां स्पर्धया द्विजाः। देवानां बहुमानेन वहिर्गीतमिति स्मृतम्॥ -- भरत०, गा० २ सं०, अ० ५,पृ० २२२ ५३-नान्य०, भ० को०, पृ० ७४७ ५४-सं० र०, अ० सं०, ताल०, पृ० १२९ ५५-भरत०, व० सं०, पृ० ७९

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२५२ भरत का संगीत-सिद्धान्त

इस छन्द में सार्थक पदों की योजना भी सम्भव है और प्रत्येक छन्द में शुष्काक्षरों की भी योजना सम्भव है। इसी प्रकार अवनद्ध वाद्यो के पाटाक्षरो (वोलो) से भी छन्द का निर्माण सम्भव है। पूर्वोक्त मद्रक इत्यादि सप्त गीतों का लम्बा विधान है, वह विधान सप्तरूप विधान कहलाता है। वहिर्गीत उस सप्तरूप विधान से युक्त होते है। शुष्काक्षरो का गान 'स्तोभक्रिया' भी कहलाता है। ध्रुवा-गीत गीति का आधारभूत नियत पदसमूह 'ध्रुवा' कहलाता है।" नारद इत्यादि द्विजो ने अनेक प्रकार से जिन गीताङ्गो का विनियोग किया है, उन सबकी सज्ञा 'ध्रुवा' है।4 जो ऋचाएँ, पाणिका एव गाथाएँ है, जो सप्तरूप के अङ्ग और प्रमाण है उन सबकी सज्ञा 'ध्रुवा' है।" इनमे वाक्य, वर्ण, यति, पाणि और लय के अविचल रूप से संबद्ध रहने के कारण इन्हें 'ध्रवा' कहा गया है।५१ 'जाति' (वृत्ताक्षरप्रमाण), 'प्रकार' (सम, अर्धसम, विपम इत्यादि), 'प्रमाण' (पट्कल, अप्टकल), 'स्थान' तथा नाम इन पॉच कारणो से ध्रुवाओ के अनेक भेद हो जाते है।६० प्रयोग के अवसरों मे भेद होने से ध्रुवा के पॉच प्रकार-प्रावेशिकी, नैष्का- मिकी, आक्षेपिकी, प्रासादिकी और अन्तरा हो जाते है।६१

५६-ध्रुवा-गीत्याधारो नियत. पदसमूहः । -- अभि० गा० सं० २, अध्या० ६,पृ० २७० ५७-ध्रवासज्ञानि तानि स्युर्नारदप्रमुखेद्विजैः। गीताङ्गानीह सर्वाणि विनियुक्तान्यनेकशः।। -भरत०, ब०स०, पृ० ५३२ ५८-या ऋच पाणिका गाथास्सप्तरूपाङ्गमेव च। सप्तरूपप्रमाणं च तद् ध्रुवेत्यभिसज्ञितम्॥ -भरत०, व०स०, पृ० ५३२ ५९-वाक्यवर्णा ह्यलङ्कारा यतयः पाणयो लयाः । ध्रुवमन्योन्यसंवद्धा यस्मात्तस्माद् घ्रुवा. स्मृता ।। -भरत०, व० सं०, पृ० ५३३ ६०-जाति (:) स्थानं प्रकारश्च प्रमाणं नाम चैव हि। ज्ञेया घ्रुवाणां नाटयज्ञैविकल्पाः पञ्चहेतुकाः ॥ -भरत०, का० सं०, पृ० ४१७ ६१-प्रवेशाक्षेपनिष्कामप्रासादिकमथान्तरम् । गान पञ्चविधं ज्ञेय =

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कुछ परिभाषाओं का स्पष्टीकरण २५३

प्रावेशिकी नाटक मे अंकारम्भ के समय पात्र रङ्गमञ्च पर आकर विभिन्न रसों और अर्थों से युक्त जिस ध्रुवा का गान करे, वह 'प्रावेशिकी' ध्रुवा कहलाती है।६२ नैपक्रामिकी अङ्क के अन्त मे पात्रो के निष्क्मण के समय निष्काम के गुणो से युक्त जो ध्रुवा गायी जाती है, उसे 'नैष्क्रामिकी' कहते है।१ आक्षेपिको विधि के जाननेवाले गुणी नाट्य मे क्रम का उल्लड्घन करके जिस ध्रुवा का प्रयोग करते है, वह 'आक्षेपिकी' है।१४ प्रासादिकी जो ध्रुवा अन्य रस को प्राप्त अवस्था का, अपने आक्षेप से, परिवर्तन करके रङ्ग- स्थल मे प्रसन्नता का सञ्चार कर देती है, वह 'प्रासादिकी' कहलाती है।६५

अन्तरा पात्र के विपादयुक्त, विस्मृत, क्रुद्ध, सुप्त, मत्त, विश्रान्त, मूर्च्छित या पतित होने पर दोपो को ढकने के लिए प्रयुक्त होनेवाली ध्रुवा 'अन्तरा' कहलाती है। ६६ अन्य दृष्टियो से होनेवाले ध्रुवा-भेदो पर विचार इस अवसर पर अनावश्यक होने के कारण नही किया जा रहा है।

६२-नाना रसार्थयुक्ता नृणां या गीयते प्रवेशेपु । प्रादेशिकी तु नाम्ना विज्ञेया सा ध्रुवा तज्जै। -भरत०, व० सं०, पृ० ५८९. ६३-अङ्कान्ते निष्कमणे पात्राणा गीयते प्रयोगेपु। निष्कामोपगतगुणा विद्यान्नैष्कामिकी ता तु॥ -भरत०, व० स०, पृ० ५८९ ६४-कममुल्लद्ध्य विधिज्ञ. क्रियते या द्रुतलयेन नाट्यविधौ। आक्षेपिकी ध्रुवासौ ... .. -- भरत ०, व० स०, पृ० ५८९ ६५-या च रसान्तरमुपगतमाक्षपवशात् प्रसादयति। राग (रङ्ड) प्रसादजननी विद्यात्प्ासादिकी ता तु ।।

६६-विषण्णे विस्मृते क्रुद्धे सुप्ते मत्तेऽथ सङ्गते । -भरत०, व० सं०, पृ० ५८९

गुरुभारावसन्ने च मूच्छिते पतिते तथा। -भरत०, का० सं० दोपप्रच्छादने या च गीयते सान्तरा ध्रुवा।। -भरत०, व० सं० पृ० ५८९

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२५४ भरत का संगीत-सिद्धान्त

ध्रुदापद ध्रुवा-गान के लिए महर्षि ने अनेक वृत्तो एवं छन्दों का विधान किया है, जो गेय है। वे ध्रुवापद या ध्रुवावृत्त कहलाते है। वे अनेक है। पूर्वरङ्ग

रङ्स्थल मे सब से पूर्व किया जानेवाला प्रयोग पूर्वरङ्ग कहलाता है। गीत, ताल, वाद्य, नृत्त, पाठ्य इत्यादि समस्त या व्यस्त रूप में नाटक से पूर्व प्रयुक्त किये जाने पर भी नाट्याङ्ग रहते है और उनकी संज्ञा 'पूर्वरङ्ग' होती है।"इसके अनेक अङ्ग है।

सन्धियाँ

नाटक में वर्ण्य वस्तु के विकास की विभिन्न अवस्थाओ को व्यक्त करनेवाले स्थल सन्धि कहलाते है। वे पॉच है,-मुख, प्रतिमुख, गर्भ, विमर्श और निर्वहण।६५ आलाप ग्रह, अंश, मन्द्र, तार, न्यास, अपन्यास, अल्पत्व, बहुत्व, पाडव और औडुव की स्थिति जहाँ दिखाई दे, उसे रागालाप कहा जाता है।" आलाप में अपन्यास स्वरों पर रुका नहीं जाता इसलिए वह एकाकार होता है।७१

६७-यस्माद्रङ्गे प्रयोगोऽयं पूर्वमेव प्रयुज्यते। तस्मादयं पूर्वरङ्गो विज्ञेयो द्विजसत्तमाः ॥ ६८-गीततालवाद्यनृत्तपाठ्यं व्यस्तसमस्ततया प्रयुज्यमानं यन्नाटयाङ्गभूतं स पूर्वरङ्ग इत्युक्तं भवति। -अभि०, गा० सं० र०, अध्या० ५, पृ० २०९ ६९-मुखं प्रतिमुखञ्चैव गर्भो विमर्श एव च । तथा निर्वहणञ्चेति नाटके पञ्च सन्धयः ॥ -भरत०, गा० सं०, अध्याय० १९, पृ० २३ ७०-ग्रहांशतारमन्द्राणां न्यासापन्यासयोस्तथा। अल्पत्वस्य बहुत्वस्य पाडवौडुवयोरपि । अभिव्यक्तियंत्र दृष्टा स रागालाप उच्यते ।। -सं० र०, अ० सं०, राग०, पृ० २०-२१ ७१-अपन्यासेष्वविरम्यकाकारेण प्रवृत्त आलाप: । -कल्लि० सं० र०, अ० सं०, राग०, पृ० २१

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कुछ परिभाषाओं का स्पष्टीकरण २५५

रूपक

अपन्यास स्वरों पर रुक रुककर किया जानेवाला 'आलाप' रूपक कहलाता है, उसमे गीतखण्ड पृथक्-पृथक् दिखाई देते है।२ रज्जक स्वर-सन्दर्भ गीत कहलाता है।७ आक्षिप्तिका चञ्चत्ुट इत्यादि तालो और तीनो मार्गो (मे से एक) से विभूषित स्वर तथा -पदो से गूंथी हुई रचना 'आक्षिप्तिका' कहलाती है।७४ वर्तनी प्रबन्ध के अन्तर्गत लयबद्ध परन्तु तालहीन विलम्ब आलाप 'वर्तनी' है।"4 इसके पूर्व आलाप होता है। करण वर्तनी ही द्रुत लय मे प्रयुक्त होने पर 'करण' कहलाती है।७६

७२-रूपकं तद्वदेव स्यात् पृथग्भूतविदारिकम् । -स० र०, अ० सं०, राग०, पृ० २१ स (आलाप) एवापन्यासेषु विरम्य विरम्य प्रवृत्तो रूपकमिति। -कल्लि०, स० टी०, अ० स०, राग०, पृ० २१ ७३-रञ्जकः स्वरसन्दर्भो गीतमित्यभिधीयते । -स० र०, अ० सं०, प्रव०, पृ० १८७ ७४-चञ्चत्पुटादितालेन मार्गत्रयविभूषिता। आक्षिप्तिका स्वरपदग्रथिता कथिता बुघैः ॥ -सं० र०, अ० सं०, राग०, पृ० २१ ७५-वर्तिन्यां वा विवर्तिन्यामालग्पस्तालवर्जितः । आदावारोप्यते यस्याः सा स्यादालापपूर्विका ॥ -सोमराज, भ० को०, पृ० ५८७ ७६-मन्तव्योऽत्र सदा भेदैः (दो) वर्तिन्या: करणस्य च। सविलम्वस्वरैरेव वर्तिनी कथिता वुघैः ॥ -सोमराज, भ० को० पृ० ५८७

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अनुबन्ध (२)

रस एवं स्वर-सन्निवेश

भावो को अभिव्यक्त करने की चेष्टा प्राणिमात्र का स्वभाव है। भावाभिव्यक्ति के साधनों मे नाद के उस रूप का भी एक विशिष्ट स्थान है, जो व्याकरण की दृष्टि से 'निरर्थक' होता है और जिसमे अभिधा वृत्ति नही होती।१ ये निरर्थक कहे जानेवाले नाद स्वतन्त्र रूप से भी भाव-व्यञ्जन मे समर्थ होते है और भाषा की भी सहायता करते है। भाषा के जिस वाचन को 'पाठ' की सज्ञा दी जाती है, वह स्वरसवलित होने पर ही पाठ कहलाता और वक्ता के वास्तविक रआभप्राय का वोध कराता है। उस अवस्था मे स्वर अपने स्थानो का स्पर्शमात्र करते हुए ऊँचे-नीचे होते है, उनके अवधानपूर्ण अनुरणनात्मक स्वरूप का स्पष्टीकरण उस समय नही होता। यदि ऐसा हो, तो पाठ एव गान मे कुछ भेद ही न रह जाय।१ अस्तु, भावव्यञ्जन की दृष्टि से हमारे मनीषी पूर्वजों ने पाठ-प्रयोज्य अनुरणन- हीन ध्वनियो का भी सप्रयोग वर्गीकरण किया है एवं जिन निष्कर्षो पर वे पहुँचे है, वे चिरकाल की सतत साधना के परिणाम है। उन्होने कहा है कि शब्दों को सस्वर एवं

१-इह येयं प्रथमेन सवित्स्पन्देन प्राणोल्लासनया वर्णादिरूपविशेषहीना वाग् जन्यते, सा नादरूपा सती हर्षशोकादिचित्तवृत्ति विधिनिपेधाद्यभिप्रायं वा तत्कार्य्यलिङ्ग- तया वा तादात्म्येन वा श्रुत्यन्तादि गमयतीति तावत् स्थितम्। -अ० भा०, गा० सं०, अ० १७, पृ० ३८७ २-उदात्तानुदात्तस्वरितकम्पितरूपतया स्वराणा यद्रक्तिप्रधानत्वमनुरणनमयं तत्त्यागेनोच्चनीचमध्यमस्थानसंस्पशित्वमात्रं पाठ्योपयोगीति। यदि स्वरगता रक्तिः पाठये प्राधान्येनावलम्ब्येत तदा गानक्रियासौ स्यात्, न पाठ.। .... तस्माद् गानवैलक्षण्याय रक्तिलक्षणं धर्म्ममनादृत्योच्चादिस्थानसंस्पर्श एवात्र प्रधानमिति ... । -- अ० भा०, गा० सं०, अ० १७, पृ० ३८५-३८६

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रस एवं स्वर-सन्निवेश २५७-

उचित स्वर रूप मे दोला जाय, तभी वे प्रयोक्ता के अर्थ का साधन करते है, अन्यथा वे हानिकारक भी हो सकते हैं।१ 'पाठ्य' वस्तु मे स्वर-प्रयोग हमारे विचार का विपय यहाँ नही। गेय स्वरसमुच्चय मे भाव-व्यञ्जन की शक्ति ही हमारा प्रस्तुत विषय है। गीत या रञ्जक स्वर-सन्दर्भ से रस-परिपाक की प्रक्रिया को समझने के लिए नाटयरस की प्रक्रिया को समझना परमावश्यक है। नाटय मे रसप्रक्रिया

स्थायी भाव हम जो कुछ देखते, सुनते या अनुभव करते है, उसका सस्कार हमारे मन पर पड़ता है। अनुभव क्षणिक होने के कारण नष्ट हो जाता है, परन्तु वह एक स्थायी संस्कार छोड़ जाता है, जिसे 'वासना' भी कहा जाता है। अनुकूल या उद्वोधक सामग्री पाकर हमारे मन मे सुप्तप्राय ये सस्कार जाग जाते है। वे सस्कार इस जन्म के तथा पूर्व जन्मो के भी हो सकते है। इन सस्कारो की गणना असम्भव है, तथापि प्राचीन आचार्य्यों ने उनको निश्चित करने की सीमित चेप्टा की है। ये स्थायी भाव कह- लाते है। रति, हास, शोक, क्रोध, उत्साह, भय, जुगुप्सा और भय आठ स्थायी भाव है, परवर्ती आचार्यों ने एक नवाँ स्थायीभाव निर्वेद भी माना है। इन नवो स्थायी भावो मे भी कुछ प्रधान है। विभाव विभाव दो है-'आलम्वन' और 'उद्दीपन।' नायिका एव नायक इत्यादि स्थायी भावो को उद्बुद्ध करने के कारण 'आलम्बन' कहलाते है। वाह्य परिस्थितियाँ, प्राकृतिक सौन्दर्य इत्यादि वस्तुएँ आलम्वन विभावो के द्वारा उद्बुद्ध स्थायी भावो को उद्दीप्त करने के कारण 'उद्दीपन विभाव' कहलाती है।

३-दुष्टः शब्द स्वरतो वर्णतो वा मिथ्या प्रयुक्तो न तमर्थमाह। स वाग्वज्रो यजमान हिनस्ति यथेन्द्रशत्रु स्वरतोऽपराधात्॥ -- महाभाष्य मे उद्धृत अथ यदब्रवीद् इन्द्रगनुर्वर्धस्वेति तस्मादु हैनमिन्द्र एव जधान। अथ यद् ह शश्वद- वक्ष्यद् इन्द्रस्य शत्रुर्वर्धस्वेति शश्वदु ह स इन्द्रमेवाहनिप्यत् । -शतपथ व्राह्मण, का० १, प्र० ५, व्रा० २ १७

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२५८ भरत का संगीत-सिद्धान्त

अनुभाव उद्बुद्ध एवं उद्दीप्त वासनाओ या स्थायी भावो के प्रभाव से मनुष्य की चेष्टाए विभिन्न हो जाती है। इन चेष्टाओं या भाव-भगिमाओ को 'अनुभाव' कहा जाता है। सञ्चारी या व्यभिचारी भाव मनुप्य के मन मे स्थायी रूप से न रहनेवाले अर्थात् अस्थायी रूप से व्यक्त होने- वाले भाव सञ्चारी या व्यभिचारी कहलाते है। ये अनेको स्थायी भावो के उद्बोध के समय प्रकट होते है, इसी 'व्यभिचार' के कारण इन्हें व्यभिचारी कहा जाता है। ये निम्नलिखित तेतीस है- (१) निर्वेद, (२) ग्लानि, (३) शंका, (४) असूया, (५) मद, (६) श्रम, (७) आलस्य, (८) दैन्य, (९) चिन्ता, (१०) मोह, (११) स्मृति, (१२) वृति, (१३) पीडा, (१४) चपलता, (१५) हर्प, (१६) आवेग, (१७) जड़ता, (१८) गर्व, (१९) विपाद, (२०) औत्सुक्य, (२१ ) निद्रा, (२२) अपस्मार, (२३) सुप्त, (२४) विवोध, (२५) अमर्प, (२६) अवहित्य, (२७) उग्रता, (२८) मति, (२९) व्याघि, (३०) उन्माद, (३१) मरण, (३२) त्रास, (३३) वितर्क । रसों की संख्या प्रधान रस चार है-शृंगार, रौद्र, वीर एवं बीभत्स।-इन्ही से क्रमशः हास्य, करुण, अद्भुत एव भयानक रसो की उत्पत्ति होती है। शृंगार की अनुकृति हास्य, रौद्र का कर्म्म करुण, वीर का कर्म्म अद्भुत एवं बीभत्स का दर्शन भयानक रस है।* रसाभिव्यक्ति "विभावो, अनुभावो और व्यभिचारी भावो के संयोग से रस की निष्पत्ति होती है।"4 यह महर्षि भरत का रससम्बन्धी विख्यात सूत्र है। इस सूत्र के 'संयोग'

४-शृङ्गाराद्धि भवेद्धास्यो रौद्राच्च करुणो रसः। वीराच्चवाद्भुतोत्पत्तिर्वीभत्साच्च भयानकः ॥ शृङ्गारानुकृतिर्या तु स हास्यस्तु प्रकीर्तित । रौद्रस्यैव च यत्क्म्म स ज्ञेयः करुणो रस.।। वीरस्यापि च यत्कम्म सोऽद्भुतः परिकीतितः । वीभत्सदर्शनं यच्च ज्ञेय. स तु भयानक. ।। -भरत०, गा० स० २, अ० ६, पृ० २९७-२९८ ५-विभावानुभावव्यभिचारिसंयोगाद् रसनिष्पत्तिः । -- भरत०, गा० सं० २, अ० ६, पृ० २७२

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रस एवं स्वर-सन्निवेश २५९

और 'निष्पत्ति' शब्द की व्याख्याएँ विभिन्न आचार्यो ने विभिन्न प्रकार से की हैं। उनमे निम्नोक्त चार दृष्टिकोण अत्यन्त प्रसिद्ध है। मीमांसक भट्ट लोल्लट का दृष्टिकोण आचार्य भट्ट लोल्लट का मत है कि सीता आदि आलम्वन विभावों और उद्यान इत्यादि उद्दीपन विभावो से राम आदि आश्रयो मे रति इत्यादि भावो का जन्म होता है। कटाक्ष, भुजाक्षेप इत्यादि अनुभावो (कार्यो) से वे प्रतीतियोग्य होते है, निर्वेद आदि व्यभिचारी भावों से परिपुष्ट होते है। साक्षात् सम्बन्ध से वह रस (स्थायीभाव) अनुकरणीय (राम इत्यादि) मे जन्म लेता है और उनका अनुकरण करनेवाले नटो (अभिनेताओ) मे प्रतीयमान (सहृदयो द्वारा आरोप्यमाण) होता है। इस मत का निष्कर्ष यह है कि सर्प के न होने पर भी सर्प के रूप मे देखी हुई रस्सी से भय का उदय जिस प्रकार होता है, उसी प्रकार राम की, सीताविषयक, रति (अभिनय के समय) विद्यमान न होने पर भी नट की नाटयनिपुणता के कारण नट मे प्रतीत होती हुई सहृदयो के हृदय मे चमत्कार अपित करती एव रसपदवी को प्राप्त होती है।" आचार्य भट्ट लोल्लट का यह दृष्टिकोण 'उत्पत्तिवाद' कहलाता है। इसमे रस की उत्पत्ति ऐतिहासिक राम इत्यादि व्यक्तियों में और गौणरूपेण उसकी प्रतोति सामाजिको में मानी है, फलत. सामाजिको (दर्शको या श्रोताओ) का कोई सम्बन्ध 'रस' के साथ नहीं रह जाता। अत. भट्ट लोल्लट से असहमति प्रकट करके आचार्य शकुक ने अपने 'अनुमितिवाद' की स्थापना की।८

६-विभावैर्ललनोद्यानादिभिरालम्बनोद्दीपनकारण रत्यादिको भावो जनितः, अनुभावैः कटाक्षभुजाक्षेपप्रभृतिभि: कार्य्ये: प्रतीतियोग्य: कृत, व्यभिचारिभि- निर्वेदादिभि. सहकारिभिरुपचितो मुख्यया वृत्त्या रामादावनुकार्य्य तद्रूपतानु- सन्धानान्नर्तकेऽपि प्रतीयमानो रसः। इति भट्टलोल्लटप्रभृतयः । -का० प्र०, पृ० ८७ ७ -- तदयं निर्गलितोऽर्य :- यथा असत्यपि सरपे सपतयाऽवलोकिताद् दाम्नोऽपि भीति- रुदेति, तथा सीताविपयिणी अनुरागरूपा रामरतिरविद्यमानाऽपि नर्तके नाट्यनैपुण्येन तस्मिन् स्थितेव प्रतीयमाना सहृदयहृदये चमत्कारमर्पयन्त्येव रसपदवीमधिरोहति। -चामन, का० प्र०, पृ० ८८ ८-उक्ते प्रथमव्यास्याने अनुकार्य्य रामादावेव रसनिष्पत्त्या सामाजिके रस-

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२६० भरत का संगीत-सिद्धान्त

नैयायिक आचार्य शंकुक का दृप्टिकोण शंकुक का कथन है कि रस नट मे नही होता, परन्तु सामाजिको की वासना उस नट में स्थायी भाव का अनुमान करके रस का आस्वाद करती है। कुशल नट (अंभिनेता) काव्यार्थ के साक्षात् और शिक्षा के अनुसार किये हुए अभ्यास से नाटय-कर्म्म द्वारा अपने आप मे उन कृत्रिम कार्य्य, कारण एवं सहकारियों का प्रकाश करता है, जो विभाव इत्यादि कहलाते है और सामाजिको के द्वारा कृत्रिम नही माने जाते। नट मे रस की प्रतीति उसी प्रकार होती है, जिस प्रकार चित्रनिमित अश्व मे अश्व की प्रतीति होती है। यह प्रतीति 'सम्यक् प्रतीति' (राम ही यह है, यही राम है), 'मिथ्या प्रतीति' ('यह राम नही है'-इस पञ्चात्कालीन ज्ञान से पूर्व होनेवाले भ्रम 'यह राम है'), 'सशय प्रतीति' (यह राम है या नही है) और 'सादृश्य प्रतीति' (यह राम के सदृग है) की अपेक्षा विलक्षण होती है। सौन्दर्य (चमत्कार) के कारण रसनीय (आस्वाद्यमान) होने से वस्तु (रति) अन्य अनुमीयमान (अनुमान-ज्ञेय) पदार्थो से भिन्न होती है।१ निप्कर्ष यह है कि जिस प्रकार कुहरे से आवृत स्थान में कुहरे को धुआँ समझने के कारण धुए के साथ रहनेवाली अग्नि का अनुमान होता है, उसी प्रकार नट के द्वारा निपुणतापूर्वक विभाव आदि को 'ये मेरे ही है' इस रूप मे प्रकाशित किये जाने

निप्पत्त्यभावात् सामाजिकानां चमत्कारानापत्तिरित्यर्रुच मनसि निधाय ... श्रीशंकुकमत द्वितीयम्। -वामन, वही, पृ० ८८ ९-राम एवायम् अयमेव राम इति, 'न रामोजयम्' इत्यौत्तरकालिके बाधे रामो- ्यमिति, राम: स्याद् वा न वाऽ्यमिति, रामसदृशोऽ्यमिति च सम्यड-मिथ्या- संशय-सादृश्यप्रतीतिभ्यो विलक्षणया चित्रतुरगादिन्यायेन रामोऽ्यमिति प्रतिपत्त्या ग्राह्ये नटे ...... काव्यानुसन्धानवलाच्छिक्षाभ्यासनिर्वतितस्वकार्य- प्रकटनेन च नटेनैव प्रकाशितै. कारणकार्यसहकारिभिः कृत्निमैरपि तथाऽनभिमन्यमानैविभावादिशव्दव्यपदेश्यैः 'सयोगात्' गम्यगमकभावरूपाद् अनुमीयमानोऽपि वस्तुसीन्दर्यवलाद्रसनीयत्वेनान्यानुमीयमानविलक्षणः स्था- यित्वेन सभाव्यमानो रत्यादिर्भावस्तत्रासन्नपि सामाजिकानां वासनया चंर्व्यमाणो रस इति श्रीशकुक:। -का० प्र०, वही सं०, पृ० ८८-९०

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रस एवं स्वर-सन्निवेश २६१

के कारण, वस्तुत अविद्यमान विभाव इत्यादि के द्वारा उनमे नियत रति अनुमीयमान होने पर भी अपने सौन्दर्य के कारण सामाजिको द्वारा आस्वाद का विपय बनती और चमत्कार का आधान करती हुई 'रसत्व' को प्राप्त होती है।१ इस मत मे कई असङ्गतियाँ है। नट-रूप राम का रामत्व निश्चित नही, परन्तु उसे अनुमान का आधार बनाया जा रहा है। अनुभाव इत्यादि हेतु भी कल्पित या कृत्रिम है, परन्तु उन्हे अकृत्रिम माना जा रहा है। कृत्रिम हेतु के द्वारा साध्य स्थायी भाव भी सम्भावित मात्र (अयथार्य) है। अनुमिति भी कल्पित है। सांख्यवादी भट्ट नायक के द्वारा अन्य मतों की आलोचना भट्ट नायक का कथन है कि राम इत्यादि अनुकार्य और नट इत्यादि अनुकर्ता मे रस की स्थिति मानने से सामाजिको के हृदय के साथ उस पर-गत रस का कोई सम्बन्ध नही बन सकेगा और वह तटस्थ सामाजिक के लिए निप्प्रयोजन होगा। यदि रस की स्थिति स्वगत (सामाजिको के हृदय मे) माने, तो भी सङ्गति नही वैठती, क्योकि सीता इत्यादि विभावो के द्वारा रस की उत्पत्ति होती है, जो सामाजिको के प्रति विभाव नही होते, अपितु राम इत्यादि के प्रति होते है। यदि यह कहा जाय कि साधारणीकरण व्यापार के द्वारा सीता इत्यादि से सीतात्व इत्यादि निकल जाते है, उनमे सामान्य कान्तात्व इत्यादि रह जाता है, फलत. वे सामाजिको के प्रति भी विभाव आदि हो सकते है, तो यह कथन भी युक्तियुक्त नही। क्योकि जब देवता इत्यादि का वर्णन होता है, तो उनके प्रति सामाजिको के हृदय मे पूज्य वुद्धि हो जाती है जो सावारणीकरण मे बाधक है। यदि यह कहा जाय कि अपनी कान्ता का स्मरण होने से सामाजिको को रसा- स्वाद होता है, तो यह भी ठीक नही। क्योकि रसास्वाद के क्षणो मे न तो अपनी कान्ता याद आती है और रसास्वाद उन्हे भी होता है, जिनकी कान्ता न तो थी और न है।

१० -- एतन्मतस्यायं निष्कर्प-यथा कुज्झटिकाकुलिते देशेऽसतोऽपि धूमस्याभिमानाद् धूमनियतस्य वह्नरनुमानन्, तथा नटेनैव सुनिपुण 'ममबैते विभावादय"'- इति प्रकाशितैस्तनासद्भिरपि विभावादिभिस्तन्नियता रतिरनुमीयमानापि निजसौन्दर्यवलात् सामाजिकानामास्वाद्यमानतया चमत्कारमादवती रसता- मेतीति रतेरनुमितिरेव रसनिष्पत्ति। -- वामन, का० प्र० टी०, वही सं०, पृ० ९०

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२६२ भरत का संगीत-सिद्धान्त

रस की अभिव्यक्ति मानने पर भी सङ्गति नही बैठती, क्योकि अभिव्यक्ति तो उस वस्तु की होती है, जो पहले से सिद्ध हो, अन्धकार मे पहले से विद्यमान वस्तुओं का प्रकाशन दीपक करता है, परन्तु रस की सत्ता उसके अनुभव से पूर्व या पश्चात् नही रहती। फलत :-

भट्ट नायक का दृष्टिकोण परगत या स्वगत भाव से रस प्रतीत, उत्पन्न या अभिव्यक्त नही होता, अपितु काव्य एवं नाटय मे, अभिधा वृत्ति से अतिरिक्त, भावकत्व व्यापार से विभाव आदि का साधारणीकरण (व्यक्तिविशेष अंश के परित्याग से उपस्थापन) हो जाता है। अत. भावकत्व व्यापार से भाव्यमान (साधारणीकृत होते हुए) स्थायी भाव की भुक्ति होती है। इस भुक्ति का कारण अन्य ज्ञेय वस्तुओ के सम्पर्क से शून्य स्थिति या सत्वोद्रेक से प्रकाशरूप आनन्दमय साक्षात्कारंरूप भोग होता है।" इस मत का निष्कर्ष यह है कि जिस प्रकार शब्द का व्यापार अभिधावृत्ति (शब्द का सीधा सादा अर्थ वतानेवाली वृत्ति) है, उसी प्रकार काव्य एव नाट्य मे अभिधा से विलक्षण 'भावकत्व' एवं 'भोजकत्व' दो व्यापार है। काव्यार्थ के बोध के पश्चात्, भावकत्व व्यापार से विभावादि रूप सीता आदि, सीतात्व को और राम- सम्बन्धिनी रति रामत्व से सम्बद्ध अंश को छोडकर, सामान्यतया कामिनीत्व रतित्व आदि के रूप मे उपस्थापित होते है। उक्त रीति से साधारणीकृत विभाव आदि का

११-न ताटस्थ्येन नात्मगतत्वेन रसः प्रतीयते, नोत्पद्यते, नाभिव्यज्यते, अपि तु काव्ये नाटये चाभिधातो द्वितीयेन विभावादिसाधारणीकरणात्मना भावकत्व- व्यापारेण भाव्यमान: स्थायी तत्त्वोद्रेकप्रकाशानन्दमयसविद्विश्रान्तिसतत्तवेन भोगेन भुज्यते इति भट्टनायक: । --- का० प्र०, वही सं०, पृ० ९० काव्ये दोषाभावगुणालकारमयत्वलक्षणेन नाटये चतुर्विधाभिनयरूपेण निविडनिजमोहसंकटकारिणा विभावादिसाधारणीकरणात्मनाऽभिधातो द्वितीये- नांशेन भावकत्वव्यापारेण भाव्यमानो रसोऽनुभवस्मृत्यादिविलक्षणेन रज- स्तमोऽनुवेधवैचित्र्यवलाद् द्रुतिविस्तारविकासलक्षणेन सत्त्वोद्रेक-प्रकाशानन्दमय- निजसंविद्विश्रान्तिलक्षणेन परव्रह्मास्वादसविधेन भोगेन परं भुज्यते (इति भट्टनायक:) 1 -अभिनव०, गा० सं० २, अ० ६, पृ० २७७

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रस एवं स्वर-सत्निवेश २६३ योग भोजकत्व व्यापार से होता है, तत्पश्चात् सहृदय सामाजिक उस भोजकत्व व्यापार के द्वारा रति का आस्वाद करते है।'२ भट्ट नार्यक के इस मत से श्रीमान् अभिनवगुप्तपादाचार्य को सन्तोष न हुआ और उन्होंने भावकत्व एव भोजकत्व व्यापारो की कल्पना को प्रमाणहीन और उस प्रकार के साक्षात्कार की कल्पना को भी प्रमाणहीन माना है। वे भावकत्व एव भोजकत्व दोनो को व्यञ्जना का ही रूप मानते है।* इनके मत मे साधक काव्य है, साधन व्यञ्जना है और साध्य रस है। इनका दृष्टिकोण निम्नोक्त है- आलंकारिक आचार्य अभिनवगुप्त का दृष्टिकोण अभिनवगुप्तपादाचार्य्य का कथन है कि लोक मे प्रमदा के कटाक्ष इत्यादि से जो सहृदय व्यक्ति यह निश्चित अनुमान कर लेते है कि उसके हृदय मे व्यक्तिविशेप के प्रति रति है, उन्ही को काव्य मे रस का आस्वाद होता है। लोक मे जो प्रमदा इत्यादि लौकिक कारण होते है, वे काव्य और नाटय मे विभावन इत्यादि अलौकिक (काव्यगत, नाटयगत) व्यापारो से युक्त हो जाने के कारण विभाव इत्यादि कहलाने लगते और लौकिक कारणत्व का परित्याग कर देते हैं। 'ये विभाव मेरे है-न मेरे है, न शत्रु के है-न तटस्थ व्यक्ति के है' इन लौकिक सम्वन्ध-विशेषो के स्वीकार या परिहार के अनिर्णय के कारण वे विभाव सामान्यतया कामिनी इत्यादि रूपो मे रह जाते है।

१२-शब्दस्याभिधारूपवत् काव्यनाट्ययोस्तद्विलक्षणं भावकत्वभोजकत्वनामक व्यापारद्वयमतिरिक्तमस्ति, काव्यार्थबोधोत्तरमेव तत्राद्येन भावकत्वव्यापारेण विभावादिरूपसीतादयो रामसंवन्धिनी रतिश्च सीतात्वरामत्वसम्बन्वाशमपहाय सामान्यत. कामिनीत्वरतित्वादिनैवोपस्थाप्यते, अन्त्येन भोजकत्वव्यापारेण तु उक्तरीत्या सावारणीकृतविभावादिसहकृतेन सा रतिः सहृदयैरास्वाद्यते (अत एव असत्या अपि रतेरास्वादः अलौकिकत्वादुपपन्नः) इति रतेरास्वाद एव रसनिष्पत्तिरिति। -- वामन, का० प्र०, वही सं०, पृ० ९१ *वाचक, लाक्षणिक और व्यञ्जक शन्दो मे कमश अभिधा, लक्षणा, व्यञ्जना वृत्तियाँ रहती है। ये वृत्तियाँ क्रमशः वाच्यार्थ (शब्दो के सीधे सादे अर्थ), लक्ष्यार्थ (वाच्यार्थ के असघटित होने पर उससे सम्वन्ध रखनेवाले अर्थ) एव व्यंग्यार्थ (वाच्यार्थ एव लक्ष्यार्थ से भिन्न एवं विलक्षण अर्थ) का बोध कराती है। व्यञ्जना वृत्ति आलकारिको द्वारा मानी गयी है। 'रस' व्यग्य होता है।

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२६४ भरत का संगीत-सिद्धान्त

इन साधारणीकृत विभावो के द्वारा, सामाजिको मे वासनात्मक रूप से स्थित रत्यादि स्थायी भावो की अभिव्यक्ति होती है। साधारण (व्यक्तिविशेप के सम्वन्ध से हीन) उपाय के बल से वे विभाव उस समय सामाजिको की परिमित, (सीमित) स्थिति को 'विगलित' कर देते है और उन सामाजिको मे एक ऐसी अपरिमित चित्त- वृत्ति का उदय हो जाता है, जिसमे अन्य वेद्य विपयो के साथ उन सामाजिको का कोई सम्पर्क नही रहता। फलत' समस्त सहृदयों के सवाद (एक स्थान पर देखी हुई वस्तु के, अन्य स्थान मे, वैसे ही दर्शन) के पात्र साधारण्य के द्वारा सहृदयों को रस का आस्वाद होता है। · वह रस सामाजिको से, उनके अपने आकार के समान, अभिन्न होता है, आस्वाद्य- मानता ही उसका प्राण है। सहृदयों को रसास्वाद उसी प्रकार होता है जिस प्रकार पानक-रस (इलायची, मिर्च, शर्करा, कर्पूर, खटाई इत्यादि को मिलाकर बनाये हुए पेय पदार्थ के स्वाद) का होता है। वह रस सर्वत्र परिस्फुरित होता हुआ-सा, हृदय मे प्रविप्ट होता हुआ-सा, प्रत्यङ्ग को (अमृत के समान) स्पर्श करता हुआ-सा, अन्य समस्त ज्ञेय पदार्थो का तिरोधान करता हुआ सा, ब्रह्मास्वाद का अनुभव कराता हुआ- सा और लौकिक सामग्रीजन्य आस्वाद की अपेक्षा विलक्षण एव चमत्कारपूर्ण होता है। वह रस उत्पाद्य (कार्य) नही होता, क्योकि कारण के विनाश से तो कार्य का विनाश हो जाता है, परन्तु सीता आदि विभावो के वस्तुत. न होने पर भी सहृदय सामाजिको को रसास्वाद होता है। वह रस 'ज्ञाप्य' भी नही होता, क्योकि ज्ञापन तो पहले से सिद्ध वस्तु का होता है, रस पहले से सिद्ध नही होता, अपितु विभाव आदि के द्वारा व्यञ्जित होकर आस्वाद्य होता है। यदि यह कहा जाय कि 'कारक' और 'ज्ञापक' के अतिरिक्त यह तृतीय विलक्षण दस्तु कहाँ से निकल आयी ? तो यह तीसरी विलक्षण या अलौकिक वस्तु यही विद्यमान है, क्योकि अलौकिक कार्य के लिए अलौकिक कारण भी होना चाहिए, अत विभावादि व्यञ्जको की अलौकिकता उनका दूषण न होकर भूपण ही है। चर्वणा की उत्पत्ति को ही व्यवहार मे रसोत्पत्ति कह दिया जाता है, फलत. रत को कार्य भी कह दिया जाय। वह प्रत्यक्ष इत्यादि लौकिक ज्ञान, अपवव योगियो के प्रमाणनिरपेक्ष व्यानजन्य ज्ञान, और पक्व योगियो के लौकिक सस्पर्श से शून्य स्वस्वरूप- विषयक एव आत्ममात्र-विपयक ज्ञान से भी ग्राह्य नही होता। क्योकि उसमे विभाव आदि अलौकिक पदार्थ भी रहते है, इसी लिए वह रस लोकातीत स्व-सवेदन (ज्ञान) का विषय होता है, अत उसे ज्ञेय भी कह दिया जाय।

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रस एवं स्वर-सन्निवेश २६५

रसग्राहक ज्ञान निर्विकल्पक नही होता, क्योंकि उसमे विभावादि-सम्वन्व प्रधान होता है और निर्विकल्पक ज्ञान तो नाम, रूप, जाति-विशेपो से रहित होता है। वह स्वसंवेदन सविकल्पक ज्ञान भी नही, क्योकि अलौकिकानन्दमय रस के आस्वाद की अवस्था में अन्य पदार्थों का ज्ञान नही होता। फलत. इन दोनो जानो की अपेक्षा वह विलक्षण भी है और उभयात्मक भी, अत उसकी अलौकिकता सिद्ध होती है।'१ गीत और रस रज्जक स्वर-सन्दर्भ गीत कहलाता है। गीत कण्ठ, तन्त्री या सुपिर से अभि- व्यक्त हो सकता है। ये तीनो जव मिल जाते है, तब स्वर्ण, गन्ध और कोमलता का

१३-लोके प्रमदादिभि स्थाय्यनुमानेऽन्यासपाटववता काव्ये नाटये च तैरेव कारण- त्वादिपरिहारेण विभावनादिव्यापारवत्वादलौकिकविभावादि-शन्दव्यवहार्ये- ममवैते शत्रोरेवैते तटस्थस्यैवैते, न ममैवैते न शत्रोरेवँते न तटस्थस्यवैते- इति सम्वन्धविशेयस्वीकारपरिहारनियमानव्यवसायात् साधारण्येन प्रतीतै- रभिव्यक्तः सामाजिकाना वासनात्मतया स्थित स्थायी रत्यादिको नियत- प्रमातृगतत्वेन स्थितोऽपि साधारणोपायवलात् तत्कालविगलितपरिमित- प्रमातृभाववशोन्मिपितवेद्यान्तरसम्पर्कशून्यापरिमितभावेन प्रमात्रा सकल- हृदयसंवादभाजा साधारण्येन स्वाकार इवाभिन्नोऽपि गोचरीकृतरचर्व्यमाणतैक- प्राणो विभावादिजीवितावधि पानकरसन्यायेन चर्व्यमाण: पुर इव परिस्फुरन् हृदयमिव प्रविशन् सर्वाङ्गीणमिवालिङ्न् अन्यत् सर्वमिव तिरोदधत् व्रह्मा- स्वादमिवानुभावयन् अलौकिकचमत्कारकारी शृङ्गारादिको रसः। स च न कार्य्य:, विभावादिविनाशेऽपि तस्य सम्भवप्रसङ्गात्, नापि न्ञाप्यः सिद्धस्य तस्यासम्भवात्, अपि तु विभावादिभिर्व्यन्जितरचर्वणीयः । कारक- ज्ञापकाभ्यामन्यत् क्व दृष्टमिति चेत्, न क्वचिद् दृप्टमित्यलौकिकसिद्धे- भूंषणमेतन्नं दूपणम्। चर्वणानिप्पत्त्या तस्य निप्पत्तिरुपचरितेति कार्य्योऽप्युच्य- ताम्,

स्वसवेदनगोचर इति प्रत्येयोऽप्यभिवीयताम्। तद्ग्राहकं च न निर्विकत्पकं विभावादिपरामर्शप्रधानत्वात्। नापि सविकल्पक चर्व्यमाणस्यालौकिकानन्द- मयस्य स्वसवेदनसिद्धत्वात्। उभयाभावस्वरूपस्य चोभयात्मकत्वमपि पूर्व- वल्लोकोत्तरतामेव गमयति न तु विरोधमिति श्रीमदभिनवगुप्ताचार्यपादाः। -- का० प्र०, वही स०, पृ० ९५

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२६६ भरत का संगीत-सिद्धान्त

मिश्रण-सा हो जाता है, परन्तु निरपेक्ष रहकर भी ये तीनों साधन पृथक-पृथक रूप मे भी 'गीत' की ही अवतारणा करते है। भगवान् वेदव्यास ने भगवान् कृष्ण के वेणु- वादन को 'वेणु-गीत' कहा है। प्राचीन आचार्यो ने गीत में व्यञ्जना शक्ति मानी है, इसी लिए वे गीत से रस-व्यञ्जना के सिद्धान्त का समर्थन करते है।" आनन्दवर्धन तथा उनके विरोधी भी गीत-शब्दो मे रस-व्यञ्जना की शक्ति मानते है और कहते है कि गीत के शब्द अवाचक होने पर भी रस-व्यञ्जक होते है।१६ जिस प्रकार सार्थक शब्दो का एक वाचक रूप होता है, उसी प्रकार गेय स्वरो का एक विशिष्ट रूप होता है। 'स्थायी' (आधारभूत) स्वर की अपेक्षा स्वरविशेप का अन्तर उसके स्वरूप को स्पष्ट करता है। जिस प्रकार वाक्य के अङ्भभूत शब्द वाच्यार्थ के पश्चात् व्यंग्यार्थ का बोध कराते है, उसी प्रकार गेय स्वरसन्दर्भ के अङ्गभूत स्वर अपने स्वरूप के पश्चात् भाव या रस का बोध कराते है। अर्थात् गेय स्वर का 'स्वरूप' व्यंग्यार्थ के बोधन में वही कार्य करता है, जो व्यञ्जक शब्दो का वाचक रूप करता है। गीत मे स्वरो का अपना स्वरूप ही व्यञ्जना का माध्यम है, उन्हे व्यंग्यार्थ वोधन के लिए सार्थक शब्दो के समान वाचकता पर निर्भर नही रहना होता। आचार्य आनन्दवर्धन का कथन है कि जिन नील, मधुरद्वत्यादि वस्तुओ का इन्द्रियजन्य ज्ञान सभी को होता है, भिन्न-मति व्यक्ति भी उन वस्तुओ के विषय मे

१४-न हि यैवाभिधानशक्ति. सैवावगमनशक्तिः । अवाचकस्यापि गीतशब्दादेः रसादिलक्षणार्थावगमात्। -घ्व०, कारि० ३३, वृ, पृ० ३४६ १५-ननु शब्द एव प्रकरणाद्यवच्छिन्नो वाच्यव्यङग्ययोः सममेव प्रतीतिमुपजनयतीति कि तत्र क्रमकल्पनया। न हि शब्दस्य वाच्यप्रतीतिपरामर्श एव व्यञ्जकत्वे निवन्धनम्। तथा हि गीतादिशब्देभ्योऽपि रसाभिव्यक्तिरस्ति। न च तेषामन्तरा वाच्यपरामर्श.। -- घ्व०, कारि० ३३, वृ०, पृ० ३३४ १६-तथा हि गीतघ्वनीनामपि व्यञ्जकत्वमस्तीति रसादिविषयम्। न च तेपा वाचकत्वं लक्षणा वा कर्था्चल्लक्ष्यते। शब्दादन्यत्रापि विपये व्यञन्जकत्वस्य दर्शनाद् वाचकत्वादिशब्दधर्मप्रकारत्वमयुक्तं वक्तुम्। -घ्व०, कारि० ३३, वृ०, पृ० ३५८

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रस एवं स्वर-सन्निवेश २६७

मतभेद के शिकार नही होते। जिस वस्तु के नील रूप का निर्वाध ज्ञान हो रहा हो, उसके विषय में कोई भी नही कहेगा कि वह वस्तु पीली है, नीली नही। उसी प्रकार वाचक शब्दो, अवाचक गीतध्वनियो एवं अशब्द चेष्टाओ (मुद्राओ) की सर्वानुभवसिद्ध व्यञ्जकता को भला कौन अस्वीकृत कर सकता है?" रसकौमुदीकार श्रीकण्ठ भी काव्य, गीत एवं नाटय को निरपेक्ष रूप मे अर्थात् पृथक्-पृथक् रस का उद्गम स्थान मानते है।१ भाषा की अपेक्षा नाद के प्रभाव का क्षेत्र अधिक व्यापक है। भाषाविशेष का मर्मज्ञ सहृदय व्यक्ति ही काव्य के द्वारा रसास्वाद करता है, परन्तु गीत का प्रभाव वच्चो पर भी पडता है।" गीत से तो तिर्यक् योनियो मे उत्पन्न प्राणी भी आनन्द- मग्न होते और प्राण तक दे देते है।२० नाद के इस प्रभाव के कारण ही महर्पि भरत ने गीत को नाटय की शय्या कहा है। गीत के द्वारा 'असहृदय' व्यक्तियों के हृदय मे पडी हुई राग-द्वेष की ग्रन्थियॉ भी धुल जाती है, उनका हृदय भी तरल हो जाता है और वे भी सहृदयो के समान ही रसास्वाद करने लगते है। तिर्यक् योनि मे उत्पन्न होनेवाले प्राणी अपने भावो की अभिव्यक्ति भी नाद के द्वारा ही करते है, हमारे पास उनके मनोभावो को जानने का यही साधन है। भापा भले ही कभी-कभी ठीक-ठीक मनोभावो को अभिव्यक्त करने मे समर्थ न हो, परन्तु नाद कभी असफल नही होता। हर्प, शोक इत्यादि चित्तवृत्तियो को व्यक्त करनेवाले नाद-रूप सार्वभौम है, वे भाषा की भाति एकदेशीय नहीं। कालिदास के मूल काव्य

१७-न हि नीलमधुरादिष्वशेपलोकेन्द्रियगोचरे बावारहिते तत्त्वे परस्परं विप्रतिपन्ना दृश्यन्ते। न हि वाधारहित नीलं नीलमिति द्रुवन्नपरेण प्रतिपिध्यते नैतन्नील पीतमेतदिति। तथैव व्यञ्जकत्व वाचकानां शव्दानामवाचकाना च गीत- ध्वनीनामशन्दरूपाणा च चेप्टादीना यत्सवेंपामनुभवसिद्धमेव तत्केनापहनूयते। -घ्व०, कारिका ३३, वृ०, पृ० ३७६ १८-नाटये गीते च काव्ये त्रिपु वसति रसश्शुद्धबुद्धस्वभाव.। -भ० को०, पृ० ५२९ १९-अज्ञातविषयास्वादो वाल पर्य्यड्किकागत.। रुदन् गीतामृत पीत्वा हर्षोत्कर्ष प्रपद्यते॥ २० -- दने चरन् तृणाहारश्चिन्रं मृगशिशु. पशुः। लुच्धो लुब्धकसङ्गीते गीते यच्छति जीवितम्॥

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२६८ भरत का संगीत-तिद्धान्त

का आनन्द असस्कृतज्ञ व्यक्ति नही ले सकता, परन्तु नाद-सौन्दर्य-जनित आनन्द का अनुभव प्रत्येक को होता है।२१

रस का स्वरूप

रस के स्वरूप को हम एक बार पुन ध्यान मे रख ले- "रजोगुण एव तमोगुण से अस्पृष्ट अन्त.करण सत्त्व कहलाता है२ या वाह्य विषयो से चित्तवृत्तियो को हटानेवाला अन्तकरण का धर्मविशेप 'सत्त्व' है। रजोगुण एव तमोगुण को दबाकर 'सत्त्व' का प्रकाशित होना उसका 'उद्रेक' कहलाता है।२सत्त्व के उद्रेक के कारण अखण्ड, स्वयप्रकाश, आनन्दस्वरूप चेतना 'रस' है। अन्य पदार्थो का ज्ञान उस चेतना के समय नही होता। वह चेतना या अनुभूति ब्रह्मा- स्वाद-सहोदर है। अलौकिक चमत्कार, अथात् रजोगुण एव तमोगुण के दब जाने के परिणामस्वरूप हो जानेवाला चित्त का विस्तार, इसका प्राण है। कुछ प्राक्तन पुण्यशाली सहृदय सामाजिक उसी प्रकार उस रस का अनुभव करते है, जिस प्रकार वे अपने आपसे अभिन्न अपने आकार का अनुभव करते है।"२५

२१-तथा न प्राण्यन्तरस्य मृगसारमेयादेरपि नादमाकर्ण्य भयरोपशोकादि प्रतिपद्यते, तदय नादाच्चित्तवृत्त्याद्यवगमोऽनुमान तावत्। ये त्वेते वर्णविशेपास्ते तन्नाद- रूपसामान्यात्मकपदतन्नु (न्तु) ग्रन्थिमया इव प्राच्यप्रयत्नातिरिक्तनिमित्ता- न्तरापेक्षा,तत एवानभिप्रेतेऽन्यथापि प्रयोक्तु शक्या, अत एव दृप्टव्यभिचारा। नादस्तु झटित्युद्भिन्नमुखरागपुलकस्थानीयो नान्यथासिद्धोऽन्यथासिद्ध शब्दार्थ वावते। -- अभि०, गा० स०, अध्या० १७, पृ० ३८७ २२-रजस्तमोभ्यामस्पृष्ट मन. सत्वमिहोच्यते। -सा० दर्पण, परि० ३, कारिका ३ के पश्चात् उद्धृत २३-इत्युवतप्रकारो वाह्यमेयविमुखतापादक. कश्चनान्तरो धर्म्म. सत्त्वम्। -सा० दर्पण, परि० ३, कारिका ३ के पश्चात् वृत्ति २४-तस्योद्रेको रजस्तमसी अभिभूय आविर्भाव.। -- सा० दर्पण, परि० ३, कारिका ३ के पश्चात् वृत्ति २५ -- सत्त्वोद्रेकादखण्डस्वप्रकाशानन्दचिन्मय.। वेद्यान्तरस्पर्शशून्यो ब्रह्मास्वादसहोदर॥ लोकोत्तरचमत्कारप्राण. कैश्चित् प्रमातृभि। स्वाकारवदभिन्नत्वेनायमास्वाद्यते रसः।।

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जो लोग स्वभाव से ही स्वच्छ दर्पण के समान हृदय से युक्त है, वे अपने मन को ससारोचित क्रोध, लोभ, इच्छा आदि के वशीभूत नही होने देते, उनके लिए 'दश रूपको' (रूपक के दस भेदो) के श्रवण मात्र से वह 'रस' स्पष्ट होता है, जो साधारण रसनात्मक चर्वणा के द्वारा ग्राह्य है। जो लोग वैसे विशुद्धान्तकरण नही उन्हे भी वैसी चर्वणा कराने के लिए नट आदि की प्रक्रिया है। ऐसे लोगो के क्रोव, शोक आदि से ग्रस्त हृदय की ग्रन्थियों का भञ्जन करने के लिए महर्पि भरत ने 'गीत' आदि (वाद्य, नृत्य) की प्रक्रिया विरचित की है।१६ उपर्युक्त पक्तियो से हम इन निष्कर्षो पर-पहुँचते हैं- (अ) रस एक विशेष चेतना है, जो रजोगुण एव तमोगुण के दव जाने पर होती है। (आ) मनुष्य उस चेतना के क्षणो मे रज एवं तम से उत्पन्न व्यक्तिगत चिन्ता, करोध, शोक इत्यादि से मुक्ति पा लेता है। (इ) गीत अर्थात् स्वरसन्निवेश भी रजीगुण एव तमोगुण से उत्पन्न व्यक्तिगत हर्ष, शोक इत्यादि हृदयग्रन्थियो का भञ्जन करने अर्थात् रजोगुण एवं तमोगुण को दवाकर सत्त्व का उद्रेक करने मे समर्थ है। स्वरसन्निवेश से रसपरिपाक की प्रक्रिया दूसरो को सुनाने एव आनन्दित करने की दृष्टि से गीत की सृष्टि करते समय गायक या वादक जिन भावो की अभिव्यक्ति करता है, वे वास्तविक भावों का अभिनय ही होते है। करुण भावो की अभिव्यक्ति के समय कलाकार लौकिक रूप में पीडित नही होता। फलत. स्वरों द्वारा भावो का अभिनय करते समय कलाकार की स्थिति अभिनेता से भिन्न नही होती। हाँ, अभिनेता की अपेक्षा उसके पास साधन सीमित होते है। गायक सार्थक शब्दो का आश्रय लिये बिना ही स्वरसंवलित, शुष्काक्षरो से अथवा आलाप द्वारा भावाभिव्यक्ति करता है, उसकी कण्ठव्वनि अनुकूल 'काकु' से

२६-तत्र ये स्वभावतो निर्मलमुकुरहृदयास्त एन संसारोचितकोवमोहाभिलाष- परवशमनसो न भवन्ति। तेपां तथाविवददरूपकाकर्णनसमये साधारण- रसनात्मकचर्वणाग्राह्यो रससञ्चयो नाट्यलक्षण स्फुट एव। ये त्वतथाभूता- स्तेपा प्रत्यक्षोचिततथाविध चर्वणालाभाय नटादिप्रककिया। स्वगतकोधगोकादि- सकटहृदयग्रन्थिभञ्जनाय गीतादिप्रक्रिया च मुनिना विरचिता। -- अभिनव०, गा० स० २, अ० ६, षृ० २९१

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युक्त होती है और उसकी मुद्राएँ भावानुकूल होती जाती है, परन्तु वह अभिनेता के समान पात्रविशेष के वेप इत्यादि से युक्त नही होता। गायक स्वरसन्निवेश के द्वारा जिन भावो की अभिव्यक्ति करता है, वे 'साधारण्य' एवं 'प्राणिमात्र-हृदयसवाद' के कारण 'सावधान' श्रोताओ की, रजस्तमोनिमित रागद्वेषरप ग्रन्थियों को विगलित करके उनके हृदय मे उस चेतना का अनुभव करा देते हैं, जिसे 'रस' कहा जाता है। स्वरसन्निवेश की इसी शक्ति के कारण हरिण-जैसे प्राणी मे भी उस लौकिक भय का विगलन हो जाता है, जो लौकिक स्थिति मे उसे लुब्धक से चौकन्ना रखता है। फलतः स्वरसन्निवेश के प्रभाव से सहृदय हरिण सहृदयता का अभिनय मात्र करनेवाले कलाकार लुब्धक की हृदयहीनता का ग्रास बन जाता है। महाकवि कालिदास ने कहा है कि रम्य दृश्यो को देखकर और मधुर शब्दो को सुनकर प्राणी के मन में जन्मान्तर से स्थित भावनाएँ जाग जाती है। जहाँ तक नाद-माधुरी का सम्बन्ध है, वह तिर्यक् योनि के प्राणियो तक को तो प्रभावित करती ही है, श्रीमद्भागवत के अनुसार जड़ प्रकृति भी उससे प्रभावित होती है।२८ गान-क्रिया मे स्थायी, उसके संवादी एवं सञ्चारी स्वरों का कार्य नाटय की रस-प्रक्रिया में सीता आदि आलम्बन विभाव, पुष्पवाटिका इत्यादि उद्दीपन विभाव, आश्रय की चेप्टा आदि अनुभाव और निर्वेद, उत्सुकता इत्यादि संचारी भावों के संयोग से रस-निष्पत्ति होती है। स्वर-सन्निवेश के द्वारा रस-प्रक्रिया में स्थायी भाव का आलम्वन 'अंश स्वर' होता है, जिसकी संज्ञा 'स्थायी स्वर' होती है। 'स्थायी स्वर' का संवादी स्वर 'उद्दीपन विभाव' का कार्य करता है, प्रयुज्यमान 'अनुवादी स्वर' अनुभाव का कार्य करते है और 'स्थायी स्वर' को उभारते रहते है एवं 'सञ्चारी स्वर' सज्चारी भावों के प्रकाशक होते है।

२७-रम्याणि वीक्ष्य मधुरांश्च निशम्य शब्दान् पर्य्युत्सुकीभवति यत्सुखितोऽपि जन्तु.। तच्चेतसा स्मरति नूनमबोधपूर्व भावस्थिराणि जननान्तरसौहृदानि॥ -अभिज्ञानशाकुन्तल २८-नद्यस्तदा तदुपधार्य्यं मुकुन्दगीतमावर्तलक्षितमनोभवभग्नवेगा.। आलिङ्गनस्थगितमूर्तिभुजर्मुरारेगृ हू णन्ति पादयुगलं कमलोपहाराः। -- श्रीमद्भागवत, स्कन्घ१०, अ० २१, श्लो० १५

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अत. यह- कहा जा सकता है- स्थायी स्वर पर आलम्बित, उसके सवादी स्वर द्वारा उद्दीप्त, अनुवादी स्वरों द्वारा अनुभावित और सञ्चारी स्वरो द्वारा परिपोपित, सहृदयो की वह चेतनाविशेप 'रस' है, जिसकी अनुभूति के समय रजस्तमोगुण-जनित उनकी रागद्वेषादि ग्रन्थियाँ विगलित हो जाती है। स्थायी स्वर, सवादी स्वर, अनुवादी स्वर एव सञ्चारी स्वर ये चारो ही परि- भापाएँ नाट्यशास्त्र मे आयी है। नाटयशास्त्र मे स्वर-सन्निवेश के द्वारा स्वतन्त्र- रूपेण रस-परिपाक पर पृथक विचार उसी प्रकार नही किया गया है, जिस प्रकार श्रव्य काव्य अथवा मुक्तक काव्य मे रस-परिपाक पर विचार नही। जिस प्रकार वाह्य प्रकृति के साहचर्य मे आकर सहृदय की हृदय-ग्रन्थियॉ विगलित हो जाती है, उसी प्रकार नाद-सौन्दर्य उसके हृदय को विगलित कर देता है। ऐसी स्थिति मे रस-परिपाक के लिए किसी कथा या घटना की आवश्यकता नही होती। स्थायी स्वरों का रसो मे विनियोग स्थायी स्वर रस * स्थायी भाव षड्ज वीर, अद्भुत, रौद्र उत्साह, विस्मय, क्रोध ऋृपभ वीर, अद्भुत, रौद्र उत्साह, विस्मय, क्रोध गान्धार करुण शोक मध्यम शृद्गार, हास्य रति, हास पञ्चम शृङ्गार, हास्य रति, हास धेवत वीभत्स, भयानक भय, जुगुप्सा निपाद करुण शोक जन तक स्वर 'स्थायी' नही होता, तब तक वह 'भाव' का प्रकाशक होता है, 'रस' का नही। उस अवस्था मे उसके द्वारा अभिव्यक्त भाव 'सञ्चारी' होता है, स्थायी भाव नही। उस समय वह स्वरविशेष 'स्थायी स्वर' पर आलम्बित स्थायी भाव का परिपोपण करता है। अनुभव यह सिद्ध करता है कि जिन रागो मे मध्यम स्थायी स्वर होता है, वे सयोग शृगार और जिनमे पञन्चम अशस्वर होता है, वे विप्रलम्भ (वियोग) शृङ्गार के व्यञ्जक होते है। अन्तरगान्धार एव काकली निषाद भी शोकव्यञ्जक होते हैं, ये भरतसंप्रदाय में स्थायी नही होते।

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जातिप्रयोग एवं रागप्रयोग में रसाभिव्यञ्जक स्वर प्रयोज्य स्थायी स्वर हाता है। अतएव 'स्थायी स्वर' परिवर्तित होने पर एक ही 'जाति' पृथक्-पृथक रसों मे विनियुक्त होती है। उदाहरणतया पाड्जी जाति के पाँच रूप होते है, क्योकि इसके अंशस्वर या स्थायी स्वर पड्ज, गान्वार, मध्यम, पञ्चम एवं धैवत होते है। पड्ज स्थायी स्वर होने पर वीर, अद्भुत, रौद्र, गान्धार या निपाद अश होने पर करुण, मध्यम या पंचम के स्थायी होने पर शृङ्गार एवं वैवत के अंश होने पर बीभत्स या भयानक रस की अभिव्यक्ति होती है। स्थायी स्वर मे भेद होने पर प्रयोज्य सप्तक का रूप वदल जायगा, क्योकि स्थायी या अंश स्वर ही सप्तक या स्थान का आरम्भक स्वर होता है। इस प्रकार पाड्जी के एक शुद्ध भेद एवं चार अंश विकृत भेदो के लिए स्थायीभेद से हमे पॉच सप्तक मिलेगे, जिनके रूप निम्नलिखित है- १-षड्जांश पाड्जी के लिए -- स, ३रे, २ग, ४म, ४प, ३ध, शनि, ४स इन आठ स्वरों मे प्रथम सात स्वर पाड्जग्रामिक उत्तरमन्द्रा का आरोह है, अन्तिम स्वर 'अंश' स्वर पड्ज का मध्य सप्तकीय रूप है। ये स्वर हमे पाड्जी का शुद्ध रूप देंगे और पाड्जी जाति का विशिष्ट वर्ण अर्थात् स्वरसन्निवेश हमे पड्ज अंश होने के कारण वीर, अद्भुत या रौद्र रस की अनुभूति करायेगा। २-गान्धारांश पाड्जी के लिए-ग, ४म, ४प, ३ध, २नि, ४स, ३रे, रग*

*आधुनिक ठाठवादी शीघ्रतापूर्वक इस सप्तक को सरलता के साथ 'स, रे, ग, मं, प, ध, नि' कह देगे। उससे केवल एक लाभ यह होगा कि उन्हे भरत-सम्प्रदाय में 'तीव्न मध्यम' का दर्शन हो जायगा, जो कि वास्तव मे भरत का धैवत है और 'स्थायी' गान्वार से ग्यारह श्रुतियो के अन्तर पर स्थित है। परन्तु इस सप्तक के द्वारा अभिव्यक्त होनेवाले रस का सिद्धान्त उनकी पहुच से बाहर रहेगा। एक विचित्र परिणाम यह होगा कि 'ग, ४म, ४प, ३व, २नि, ४स, ३रे, रग' को- 'स, ४रे, ४ग, ३म, २प, ४ध, ३नि, रस' कहने से चतु श्रुतिक ऋपभ और धैवत की सृष्टि होगी, त्रिश्रुतिक मध्यम बनेगा, जो षड्ज से ग्यारह श्रुति दूर होगा और एक ऐसा गान्धार उत्पन्न होगा, जो पड्ज से आठ श्रुतियो की दूरी पर होगा, षड्ज से सत्ह श्रुतियो के अन्तर पर रिथत एक नवीन धैवत का जन्म होगा। इस सज्ञावाले इन स्वरो

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इस अवस्था मे स्थायी स्वर गान्वार है, जिसका स्थायित्व करुण रस का अभि- व्यञ्जक है। शुद्ध पाड्जी मे निपाद का प्रयोग अल्प होता है, परन्तु गान्वाराश अवस्था मे अश-सवादी होने के कारण उसका प्रयोग अनल्प होगा। पड्जाश अवस्था मे जो बहुलता पड्ज एव उसके सवादी पञ्चम को प्राप्त थी, वही स्थिति इस अवस्था मे गान्धार एव निषाद की होगी। हाँ, न्यास स्वर पड्ज ही होगा। ३-मध्यमाग पाड्जी के लिए-म, ४प, ३ध, शनि, ४स, ३े, २ग ४म स्वरो की यह स्थिति 'मध्यम' के स्थायी होने का परिणाम है। इस अवस्था मे पाड्जी का स्वर-सन्निवेश शृगार की अभिव्यक्ति करेगा। मध्यम एव उसके सवादी पड्ज का वहुत्व रहेगा। ४ -- पञ्चमाश पाडजी के लिए-प, ३, ध, २ नि, ४स, ३ रे, २ ग, ४ म, ४प।

की कोई स्थिति भरत-सम्प्रदाय मे नही, फलतः पूर्वोक्त स्वरो की भरतोक्त संज्ञाएँ ही वैज्ञानिक है। *उत्तर-भारतीय सरस्वती वीणा मे ठीक यही- 'म, ४प, ३ध, २नि, ४स, ३रे, २ग, ४म' 'स, ४रे, ३ग, २म, ४प, ३ध, शनि, ४स' कहलाते है, जिनके ऋपभ-धैवत मे सवाद नही, क्योकि वस्तुतः ये दोनो क्रमशः प्राचीन पञ्चम और ऋपभ है, जिनमे बारह श्रुतियो का अन्तर है। पाश्चात्य डायटॉनिक स्केल इस मूर्च्छना मे अन्तर गाधार करने से बनता है, जो उत्तर भारतीय बीणा का विलावल है। यह ध्यान रखना चाहिए कि जिस चतु श्रुतिक धैवत की वात आधुनिक ठाठवादी करते है, उसका अस्तित्व उत्तर-भारतीय सरस्वती वीणा में नही। इस सरस्वती वीणा के शुद्ध धैवत का मध्यम के साथ पड्जान्तरभाव है और वह मध्यम से आठ नही, सात श्रुतियो के अन्तर पर स्थित है। उत्तर-भारतीय सरस्वती वीणा के मध्यम और धैवत प्राचीन मध्यमादि मूर्च्छना के निपाद और ऋपभ है, जिनमे सात श्रुतियों का अन्तर है। मध्यमादि सान्तरा मूर्च्छना के स्वरो को पड्ज इत्यादि करने से चतु श्रुतिक ऋपभ की सृप्टि होती है, जो धैवत के साथ संवाद नही करता, अतः भरतोक्त सज्ञाएँ ही वैजानिक है। + आधुनिक ठाठवादी इन- 'प, '३ध, रनि, ४स, ३रे, २ग, ४म, ४प' को 'स, ३रे, २ग, ४म,,३प, २व, ४नि, ४स'- -. १८

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२७४ भरत का संगीत-सिद्धान्त

यह पञ्चमांश स्थिति वियोग-शृंगार को अभिव्यक्त करेगी। इस अवस्था में पञ्चम एवं उसके सवादी 'पड्ज' का बहुत्व होगा। ५-धवताग पाड्जी के लिए-'व, २नि, ४स, ३ रे, २ ग, ४ म, ४प, ३६' *

कह देगे, परन्तु त्रिश्रुतिक ऋषभ का अस्तित्व उनके यहाँ नही। इन 'स' और 'प' मे वारह श्रुतियो का अन्तर होने के कारण इनमे परस्पर सवाद नही होगा, क्योकि वस्तुतः ये 'पञ्चम' और 'ऋपभ' है। पञ्चम को 'अङ्गद का चरण' माननेवाले सज्जनो को पञ्चम का यह 'च्युतत्व' भला कैसे स्वीकार्य होगा। 'धैवत' जो कि मूर्च्छना का 'गान्धार' है, वह स्थायी स्वर पञ्चम से चौदह श्रुतियो के अन्तर पर स्थित है। पड्ज से चौदह श्रुतियो के अन्तर पर स्थित किसी 'ध' की स्थिति की सङ्गति भी ठाठवाद मे कैसे होगी? अतएव इन स्वरी के प्राचीन नाम ही वैज्ञानिक है। आधुनिक मालकोस, दरवारी और आसावरी रागो का 'धैवत' भैरव के 'धैवत' से उतरा हुआ कहा जाता है। वास्तविक स्थिति यह है 'धैवत' कही जानेवाली यह ध्वनि पञ्चमादि षाड्जग्रामिक मूर्च्छना का गान्धार है, जो अंश स्वर 'पञ्चम' से चौदह श्रुतियों के अन्तर पर स्थित है। इन रागो मे तानपूरे का पञ्चमवाला तार मध्यम मे मिलाया जाना चाहिए। आसावरी और दरवारी में जब 'म प ग' तान मे पञ्चम का स्पर्शमात्र होता है, तब 'पञ्चम' उतरा हुआ लगता है। कुशल तन्त्रीवादक इसी लिए इस स्वर-समुदाय में पञ्चम को 'मीड' द्वारा व्यक्त करते है, स्थिर सारिका के पञ्चम का प्रयोग नही करते, वैवत भी मीड द्वारा ही व्यक्त किया जाता है। वस्तुतः यह 'मपग्र' पञ्चमादि मूर्च्छना का 'स, रे, नि' है, जिसके 'रे-नि' मे ऋषभ निषाद से सात श्रुतियो के अन्तर पर स्थित है। जो सज्जन इन रागों में षड्ज के साथ पञ्चम का सवाद देखना 'रागरूप' देखने की अपेक्षा अधिक अच्छा समझते है, उन्हे वैसा मानने का अधिकार है। हमारी दृष्टि में इन रागो मे पञ्चम का संवाद षड्ज के साथ नही, क्योकि वह 'पञ्चम' प्राचीन ऋषभ है। इस सम्बन्ध मे सहृदयो के कान प्रमाण है। * ठाठवादी इन- 'ध, रनि ४स, ३रे, २ग, ४म, ४प, ३ध' को 'स, २रे, ४ग, ३म, २म, ४ध, ४नि, इस'

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रस एवं स्वर-सन्निवेश २७५

कह देगे, परन्तु यह मूर्च्छना ठाठ-सिद्धान्त के लिए 'ठाठ-विध्वंस' और 'मेल-सिद्धान्त' के लिए 'मेल-मर्दन' सिद्ध होगी। क्योकि- इस अवस्था मे यह स्वरसमूह धैवत के स्थायित्व के कारण बीभत्स एवं भयानक रसों का अभिव्यञ्जक होगा। स्थायी स्वर धवत एव उसके सवादी ऋषभ का बहुत्व इस अवस्था मे होगा।

(अ) ठाठवादियो को पञ्चम नही मिलेगा, जब कि 'मेल' या 'ठाठ' मे पञ्चम का होना अनिवार्य है। (आ) मध्यम के दोनो रूप षाड्जी मे आगे-पीछे प्रयुक्त होते हुए मिलेगे, जब कि एक मेल मे दोनो मध्यमो का होना असम्भव है। (इ) त्रिश्रुतिक षड्ज एव मध्यम का दर्शन होगा। अत इन स्वरो की भरतोक्त सज्ञाएँ ही वैज्ञानिक है। इस मूर्च्छना से उत्पन्न होनेवाले रागो का व्यवहार वारहवी शताब्दी मे उठ चुका- सा था। हमने उन रागो को पुष्ट एव अखण्डनीय प्रमाणो के आधार पर स्पप्ट करके उनमे गेय वस्तुओ की रचना करके शिप्यो को उनकी शिक्षा दी है। जातियो के शुद्ध, विकृत एवं सकीर्ण रूप को स्पप्ट करके उनमे 'वाक' और 'गेय' की रचना करने की दिशा मे हमने कुछ कार्य आरम्भ कर दिया है। कार्य लम्वा है। भगवान् की इच्छा यदि इस शरीर से कार्य लेने की हुई, तो इस सम्बन्ध मे एक विशाल ग्रन्थ यथासमय पृथक् प्रस्तुत किया जायगा।

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अनुबन्ध (३)

श्रुतियों की अनन्तता और देशी रागों में प्रयोज्य ध्वनियाँ

श्रुतियों की अनन्तता नाट्यशास्त्र के वम्बई-संस्करण मे सप्तरूप-प्रयोज्य अल्कारो का वर्णन करते समय श्रुतियों की तीन अवस्थाएँ आयत, मृदु एव मध्यम बतायी गयी है।१ एकतन्त्री- जैसी वीणा मे जब ये श्रुतियॉ अपने वास्तविक स्थान की अपेक्षा घुडच की ओर अर्थात् नीचे निकलती है तो 'आयत', मेरु की ओर अर्थात् ऊँचाई की ओर निकलती है तो 'मृटु' और अपने वास्तविक स्वरस्थान पर निकलती है तो 'मध्यम' या 'मध्य' कहलाती है। स्वरों की शुद्ध अवस्था को अभिव्यक्त करनेवाली श्रुति-विशेष का भी यह 'आय- तत्व' अर्थात् उत्कर्ष एव 'मृदुत्व' अर्थात् अपकर्प, प्रयोग अर्थात् गान-क्रिया अथवा वाद्य- क्रिया के परिणाम-स्वरूप होता है, फलत. श्रुतियॉ समुद्र मे उठनेवाली तरङ्गों के समान अनन्त हो जाती है। कोहल ने इसीलिए श्रुतियो को अनन्त कहा है।" विभिन्न अवसरो पर गानक्रिया के परिणामस्वरूप स्वर अपने स्थान से प्रमाण- श्रुति या केशाग्र अन्तर उतरते या चढ़ते है, उस समय उनका शुद्ध रूप वैस्वर्ययुक्त प्रतीत होता है। इसी लिए विश्वावसु ने कहा है कि 'क्रिया' (गान, वादन) एव ग्राम-विभाग के परिणामस्वरूप स्वरों की स्वस्थानस्थ अवस्था का बोध करानेवाली श्रृतियो मे भी वैस्वर्य प्रतीत होता है।१

१-आयतत्वं तु चेन्नीचं (चे) मृदुत्वं तु विपर्यय. (ये) । स्वस्थाने मध्यमत्वं च श्रुतीनामेप निर्गय ॥-नाट्यशास्त्र, व०सं०, अध्याय २९ २-आनन्त्य हिश्रुतीनां च सूचयन्ति विपश्चितः । यथा ध्वनिविशेषाणामानन्त्यं गगनोदरे॥ उत्तालपवनोद्वेलजलराशिसमुद्भवाः। इयत्तां प्रतिपद्यन्ते न तरङ्गपरम्पराः ॥ -- कोहल ३-एतासामपि वैस्वर्य क्रियाग्रामविभागत.। -विश्वावसु

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श्रुतियों की अनन्तता और देशी रागों में प्रयोज्य ध्वनियां २७७

पाड्जग्रामिक उत्तरमन्द्रा मे श्रुतियों का क्रम एक बार हमे फिर ध्यान मे रख लेना चाहिए- स रे ग अ० म प ध नि का० स 1 ० कखग खग गक खग गकखग कखग खग गक खग यह स्थिति स्पप्ट करती है कि इस श्रुतिक्रम मे- (अ) प्रत्येक शुद्ध स्वर को अपनी अपकृप्ट या मृदु अवस्था मिल सकती है, क्योकि प्रत्येक स्वर की अन्तिम श्रुति 'ग' अन्तर या प्रमाणश्रुति है, परन्तु अन्तर- गान्धार एवं काकलीनिपाद की अन्तिम श्रुति 'क' है, 'ग' नही। अत इन्हे प्रमाणश्रुति उतारने पर जो दो ध्वनिया प्राप्त होगी, वह इस श्रुति-क्रम मे नही है। (आ) गान्वार, मध्यम एव निपाद की उत्कृष्ट या आयत अवस्था इस श्रुतिक्म मे प्राप्त होगी, क्योकि इन स्वरो की पश्चाद्वर्तिनी श्रुतियाँ 'ग' अन्तर है, परन्तु ऋपभ, धैवत, अन्तरगान्धार एव काकलीनिपाद को एक प्रमाणश्रुति चढाने पर जो चार नवीन ध्वनियॉ जन्म लेगी, उनका अस्तित्व इस श्रुतिक्रम मे नही, क्योकि इन चारो स्वरों की पश्चाद्वर्ततनी श्रुति 'ग' न होकर 'स' अन्तर है। (इ) यदि अपकृप्ट ध्वनियों का और भी अपकर्प किया जाय और उत्कृप्ट ध्वनियो का और भी उत्कर्प किया जाय, तो और भी विलक्षण ध्वनियॉ मिलेगी। 'ग' परिमाण से श्रुतियो का निरन्तर अपकर्ष या उत्कर्प हमे श्रुतियों की अनन्तता का दिग्दर्शन करा देगा। इस अनन्तता के ज्ञान की प्रक्रिया हमे भरत-बोधित वाईस श्रुतियो के क्म से ही ज्ञात होती है, अत. मूल श्रुतियॉ वाईस मानी गयी है। शार्ङ्गदेव ने अपकृष्ट पड्ज एव मध्यम की च्युत पडज एव च्युत मध्यम कहा है, अपकृष्ट पञ्चम माध्यम ग्रामिक या त्रिश्रुतिक पञ्चम कहा गया है और उत्कृष्ट गान्वार एव निपाद को साधारण गान्धार एवं कैशिक निपाद की संज्ञा दी गयी है। देशी प्रयोग नाट्यशास्त्र मे सङ्गीत के दो विभाग 'मार्ग' और 'देशी' नही किये गये है। नाट्य- शास्त्र मे वर्णित आतोद्य-विधि का प्रयोजन लोकरं्जन है। मनीपियों को सदा 'वेद' के साथ 'लोक' का भी प्रामाण्य मान्य रहा है। वाल्मीकि ने केवल सात जातियों का उल्लेख किया है। नाट्शास्त्र पश्चात्कालीन सग्रह-ग्रथ है। सम्भव है, उसमे वणित सङ्कीरण जातियॉ पश्चात्कालीन विकास हो। सङ्कीर्ण जातियो मे 'पड्जोदीच्यवती', 'मध्यमोदीच्यवती' सज्ञाओ का 'उदी-

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२७८ भरत का संगीत-सिद्धान्त

च्यवती' शब्द उन उन जातियो के रूपों का उत्तरदिशा सम्बद्ध से क्षेत्रों मे प्रचलित होने का प्रमाण हो सकता है। सम्भव है, ये जातियाँ उत्तरीय क्षेत्रो की सृष्टि हो। यद्यपि नाट्यशास्त्र को सप्तस्वर, पट्स्वर एव पञ्चस्वर प्रयोग ही स्वीकृत है, तथापि चतु स्वर प्रयोग भी नाट्यशास्त्र में देशापेक्ष (देशविशेष में प्रचलित) कहा गया है, अतः आज 'देशी' कहे जानेवाले सङ्गीत का वीज नाट्यशास्त्र मे विद्यमान है। नाट्यशास्त्र मे वर्णित 'आतोद विधि' एक विशिष्ट विधि है, उसके अपने कुछ नियम है। परन्तु इसका यह अर्थ नही कि अनन्त आनन्द की अभिव्यक्ति में समर्थ अनन्त प्रक्रियाएँ नाट्यशास्त्र मे गिना दी गयी है। हाँ, यह सत्य है कि नाट्यशास्त्र के कुछ व्यापक एवं त्रिकालावाधित नियम विश्वभर के सङ्गीत को अपने विस्तृत अङ्ग में ले लेते है। अन्य आचार्य

वृद्ध काश्यप, याष्टिक, आञ्जनेय एवं मतङ्ग-जैसी विभूतियो ने देशी सङ्गीत पर विचार किया है, परन्तु इनमें से केवल मतङ्ग का ग्रन्थ प्राप्त है। मतङ्ग ने देशी रागो को भी ग्राम-विभाग मे वर्गीकृत किया है। प्रो० रामकृष्ण कवि ने वृद्ध काश्यप के जो उद्धरण दिये हैं, उनसे सिद्ध होता है कि वृद्ध काश्यप सात शुद्ध स्वर, उत्कृष्ट पञ्चम, एक अन्य धैवत, काकली निपाद, अन्तर गान्वार, षड्ज, मध्यम, गान्धार के साधारित रूप, (तथा मध्यमग्रामीय पञ्चम ?) ये पन्द्रह स्वर जाति प्रयोज्य मानते थे। काश्यप का कथन है कि रागभापाओ मे काकली और अन्तर के योग से चतुःश्रुति, द्विश्रुति एवं एकश्रुति स्वरों का प्रयोग करना चाहिए। यह 'एकश्रुति' स्वर, 'उत्कृष्ट पञ्चम,, और 'अन्य धवत' स्वर भरत-सम्प्रदाय में चर्चा का विषय नही बने है। भरत-सम्प्रदाय में 'स' के पश्चात् 'क, ख, ग' अन्तर पर ऋषभ स्थित है, यदि इस श्रुतिक्रम को उलटकर 'गकख' कर दिया जाय, तो षड्ज के पश्चात् 'ग क' अन्तर पर स्थित ध्वनि पड्ज से उतने ही अन्तर पर स्थित होगी, गान्वार से जितने अन्तर पर अन्तरगान्धार और निषाद से जितने अन्तर पर काकली निषाद है। पड्ज के पश्चात् इस अन्तर पर स्थित ध्वनि को आधुनिक संगीतज्ञ कोमल ऋषभ कहेगे और भरतोक्त ऋषभ उस ध्वनि से केवल 'ख' अन्तर पर स्थित होगा। यदि धैवत की श्रुतियो के क्रम 'क, ख, ग' को भी उलटकर 'ग, क, ख' कर दिया जाय, तो पञन्चम से 'ग, क' अन्तर पर आधुनिक कोमल धैवत सुनाई देगा और धैवत उससे एक 'ख' श्रुति के अन्तर पर होगा।

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श्रुतियों की अनन्तता और देशी रागो मे प्रयोज्य ध्वनियाँ २७९

प्रो० रामकृप्ण कवि ने कहा है कि 'जाति-विभाग' रागभापा-विभाग से सर्वथा भिन्न है और भरत (!) ने कहा है कि वह लक्ष्य मे असम्भव है। परन्तु जो श्लोक श्री कवि ने उद्धृत किये है, उनमे काश्यप ने अपने पन्द्रह स्वरो का प्रयोग 'जातियों' मे ही बताया है। काश्यप की उक्ति को लक्ष्य में असम्भव सूचित करनेवाले 'भरत' कौन है, इस दिशा मे श्री कवि ने कोई संकेत नही किया है। प्रो० रामकृष्ण कवि का कथन है कि याष्टिक एवं आञ्जनेय इत्यादि आचार्यो ने श्रुतिसंख्यानियम को छोडकर किन्ही स्वरो का पञ्चश्रुतिकत्व, पट्श्रुतिकत्व एव सप्तश्रुतिकत्व यथेच्छ रूप मे ग्रहण करने के परचात् लौकिक विनोद के लिए अनेक प्रकार के देशी रागो की सृष्टि की थी। श्री कवि ने यह भी कहा है कि हनुमन्मत मे श्रुतियॉँ केवल अठारह है। काश्यप, याष्टिक एव आञ्जनेय के ग्रन्थ जब तक प्राप्त न हो जायँ, तब तक इस सम्वन्ध मे निश्चयपूर्वक निष्कर्ष प्रस्तुत करना सम्भव नही। अभिनवगुप्त का कथन है कि इस सम्बन्ध में कोई प्रमाण नही कि माध्यमग्रामिक त्रिश्रुतिक पञ्चम द्वारा परित्यक्त श्रुति का उपभोग धवत ही करता है। सभी द्विश्रुतिक एव त्रिश्रुतिक स्वर श्रुति की उत्कृष्टता के कारण अधिकश्रुति किये जाते है, काकली और अन्तर के द्वारा चतुश्रुतिक एवं त्रिश्रुतिक स्वर भी न्यूनश्रुति होते है, अत. सभी स्वरो का श्रृतिकृत वैचित्र्य है। अभिनवगुप्त के इस कथन मे 'त्रिश्रुतिक' स्वरो की न्यूनश्रुतिकता, जो काकली और अन्तर प्रयोग अर्थात् चतुश्रुतिक स्वर के पश्चात् 'ग-क' अन्तर के प्रयोग का परिणाम हो सकती है, जिसकी चर्चा ऊपर हो चुकी है। किसी स्वर के पश्चात् 'काकली' अन्तर का प्रयोग एक ऐसी अवस्था सूचित करता है, जिसका प्रयोग भरत-सम्प्रदाय मे नही। 'नि, नि' या 'गन्ग' का क्र्मश. प्रयोग भरत- . सम्प्रदाय मे नही मिलता, परन्तु भरतोक्त श्रुत्यन्तरों मे ही कुछ ऐसे आधुनिक राग प्राप्त हो जाते है, जिनमे भरत के 'नि-नि' या 'ग-ग' क्रमश. प्रयुक्त है। यथास्थान कहा जा चुका है कि नाट्यशास्त्र मे एक स्थान (मन्द्र, मध्य, तार) के अन्तर्गत मुख्य ध्वनियॉ दस है। पड्जग्राम मे प्रयुक्त गान्धार का प्रयोग मध्यमग्राम मे और मध्यमग्रामीय काकलीनिपाद का प्रयोग पड्जग्राम मे नही होता था। नीचे इस स्थिति को पुन. स्पप्ट किया जा रहा है-

स रे ग ग म 1 म प घ नि नि -पड्जग्राम म प घ नि नि स रे ग ग -मध्यमग्राम

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२८० भरत का संगीत-सिद्धान्त

पड्जग्रामीय स्वरो में 'म' वृत्त के अन्तर्गत दिखाया गया है, इस व्वनि का प्रयोग पड्जग्राम मे नही होता था, परन्तु पाड्जग्रामिक पञ्चम ही माव्यमग्रामिक पड़ज हो जाता है, फलत. उससे दो श्रुति पूर्व स्थित 'काकली निपाद' षाड्जग्रामिक स्वरो मे नही मिलता। यदि इस काकलीनिषाद को पाड्जग्रामिक स्वरों मे सम्मिलित कर दिया जाय और इसका नाम तीव्र मध्यम रखकर इसे प्रयोग मे सम्मिलित कर दिया जाय, तो दोनो ग्रामो का संश्लेप हो जायगा। पाड्जग्रामिक 'ग' का प्रयोग मध्यमग्नाम मे नही है, यदि इसे मध्यमग्राम मे भी सम्मिलित करके 'उत्कृप्ट पञ्चम' नाम इसलिए दे दिया जाये कि मव्यमग्नामीय त्रिश्ुतिक पञ्चम से दोश्रुति ऊँचा है (यदि यह पञ्चम चतु श्रुतिक होता, तो यह उत्कृष्ट पञ्चम उससे एक ही श्रुति ऊँचा होता) तो भी दोनो ग्रामो का सश्लेष हो जायगा। माव्यमग्नामिक पञन्चम के पश्चात् और माध्यमग्रामिक चतु श्रुतिक धैवत से पूर्व इस स्वर का जन्म वृद्ध काश्यप के समय में ही सम्भवत हो चुका था, क्योकि 'उत्कृप्ट पञ्चम' सज्ञा की चर्चा वृद्ध काश्यप भी करते है। अभिनवगुप्त ने भी यह कहकर सम्भवत. इसी ध्वनि की ओर सकेत किया है कि इस सम्वन्ध मे कोई प्रमाण नही कि मध्यमग्राम मे पञ्चम द्वारा परित्यक्त श्रृति का उपभोग धैवत ही करता है। माव्यमग्नामिक पञन्चम से 'ग, क' अन्तर पर 'उत्कृप्ट पञ्चम' की स्थिति है, जो काकली अन्तर है। उपर्युक्त भरतोक्त दस ध्वनियों का एकत्र प्रयोग ग्रामो के संश्लेप का कारण हुआ। कुछ आधुनिक ठाठ भी इस दृप्टि से ग्राम-संश्लेष के उदाहरण है, जिसमे 'नि-नि', 'गनग', या 'म-म' (मव्यमग्नामीय काकली) का क्रमश. प्रयोग है और जिनमे दोनों ग्रामो की ध्वनिया मिल गयी हैं, जैसे भरतोक्त- नि, नि, रे, ग, म, म, ध, नि भैरव ठाठ के स, रे, ग, म, प, ध, नि, सं है और भरतोक्त

ग, ग, म, ध, नि, नि, रे, गु, 1

टोडी ठाठ के स, रे, ग, म, प, ध, नि, स हैं। आरोह-अवरोह मे 'नि-नि', 'ग-ग' या 'म-म' का कमश प्रयोग एवं पाड्जग्रामिक ध्वनियों में ऐसे स्थलों पर तीव्रमध्यम के नाम से माध्यमग्रामिक काकलीनिषाद

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श्रुतियों की अनन्तता और देशी रागों में प्रयोज्य ध्वनियाँ २८१

का भी प्रयुक्त होने लगना लोकरुचि का परिणाम हो, परन्तु ये ध्वनियॉ नाट्यगास्त्र के स्वरविधान से बाहर नही। नाट्यशास्त्र मे जातियो के अन्तर्गत अन्तर स्वरो का प्रयोग केवल आरोह मे विहित है, रागो मे अन्तर स्वरो का प्रयोग आरोह एव अवरोह दोनो गतियो मे विहित है। कम्बल और अश्वतर ने अल्पनिपाद एव अल्पगान्वार जातियो मे अन्तर स्वरो के प्रयोग की वात कही है और शार्ङ्गदेव ने पाड्जी-जैसी अल्पनिषाद जाति मे क्वचित् काकली का प्रयोग बताया है। इससे सिद्ध है कि कुछ जातियो मे निषाद और गान्धार के शुद्ध रूप के साथ इनकी द्विश्रुति-साधारण अवस्थाओ का प्रयोग भी होता था। परन्तु शुद्ध एव साधारण अवस्था का क्मश प्रयोग होता था या नही होता था, इस सम्बन्ध मे नाट्यशास्त्र मौन है। काकली एव अन्तर स्वरो के प्रयोग का जो नियम शार्ङ्गदेव ने बताया है, उतसे तो यही सिद्ध होता है कि गान्धार एव निपाद की दोनो अवस्थाओ का क्रमश. प्रयोग शार्ङ्गदेव के विधान मे नही। ध्यान देने की वात यह है कि शार्ङ्गदेव ने 'द्विग्राम' रागो की चर्चा की है, परन्तु आश्रय मूर्च्छना पद्धति का लिया है, उनका 'द्विग्रामत्व' वह 'ग्रामसशलेप' नही, जिसकी चर्चा यहॉ की गयी है। रत्नाकर मे उत्कृष्ट पञ्चम, पञ्चश्रुति, षट्श्रुति एव सप्तश्रुति इत्यादि स्वरो की चर्चा तक नही हुई है, जब कि काश्यप, याप्टिक, आञ्जनेय इत्यादि ग्रन्थ उनके समय मे विद्यमान थे। आचार्य्य शाङ्गदेव ने 'वराटी' के जनक 'भिन्नपञ्चम' को 'काकली' एव 'निषाद' दोनों से युक्त वताया है। कल्लिनाथ ने इस उक्ति पर एक शका उठायी है कि एक ही राग मे एक ही स्वर के शुद्ध एव विकृत दोनो रूपो के प्रयोगभेद से रागभेद हो जायगा? और इसी शका का समाधान यह कहकर किया है कि इस राग मे मन्द्र एव मध्यम सप्तक के निपाद काकली है, इस राग के माध्यमग्रामिक होने के कारण इसमे तार- व्याप्ति है और तार निपाद शुद्ध है। कल्लिनाथ के इस रका-समाधान से यह सिद्ध होता है कि एक ही स्थान मे एक स्वर की दोनो अवस्थाओ का प्रयोग मूर्च्छनाधारित पद्धति मे नही था। शार्ङ्गदेव ने तृतीय सैन्धवी को 'मृदुपञ्चम' से युक्त वताया है, यह 'सैन्धवी' मालव- कैगिक का भापाङ्ग है, मालवकैशिक 'कैशिकी' जाति से उत्पन्न हुआ है, कैगिकी माध्यमग्रामिक जाति है। माध्यमग्रामिक कैशिकी जाति से उत्पन्न मालवकैशिक राग मे पञ्चम त्रिश्रुतिक है, जो माध्यमग्रामिक शुद्ध पञ्चम है। इस राग के भाषाङ्ग 'कैशिकी' के लक्षण मे पञ्चम के पहले 'मृदु' विशेषण का प्रयोग वताता हे कि यह पञ्चम

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२८२ भरत का संगीत-सिद्धान्त

मन्द्र पञ्चम है भी और आधुनिक 'तीव्र मध्यम' नही।' 'मृदु' शन्द का प्रयोग 'रत्ना- कर' मे मन्द्रवाची है। इस सैन्धवी की मूर्च्छना पड्जादि है अर्थात् इसमे अंशस्वर षड्ज है। शार्ङ्गदेव ने 'तुरुष्क गौड' और 'तुरुष्क तोडी' जैसे विदेशी रागो की मूर्च्छनाएँ ढूँढकर उनका वर्गीकरण भी मूर्च्छना-पद्धति मे किया है। शार्ङ्गदेव ने अनेक ऐसे रागो की चर्चा की है, जिनके 'स्थायी स्वर' उनके समय बदल चुके थे। संगीत-रत्नाकर की रचना से पञ्चीस-तीस वर्ष पूर्व उत्तर भारत के कन्नौज प्रदेश में मूर्च्छना-पद्धति प्रचलित थी। कान्यकुब्जनरेश जयचन्द के सभापण्डित महाकवि श्रीहर्प मूर्च्छना-पद्धति के मर्मज्ञ थे। 'नैपध' के नायक राजा नल 'पञ्चम की मूर्च्छनाओ' के छिडने पर दमयन्ती के वियोग का अनुभव और भी तीव्रता से करने लगते है। सह मूर्च्छना मालकोष, दरबारी एवं आसावरी-जैसे रागो की अभिव्यक्ति का कारण होती है, इस मूर्च्छना का अशस्वर 'पञ्चम' वियोग शृङ्गार का अभिव्यजक है। जयचन्द की पराजय एक प्रकार से मूर्च्छना-पद्धति के तिरोहित होने का कारण है। कश्मीर से बहिष्कृत मूर्च्छना-पद्धति कन्नौज से भी लुप्त होती और दक्षिण की ओर जाती है, परन्तु रत्नाकर की रचना से प्राय. सौ वर्ष बाद मलिक काफूर का आक्रमण दक्षिण में भी उसे क्षत-विक्षत कर देता है। १३३६ ई० में श्री विद्यारण्य के द्वारा विजयनगर की स्थापना के पश्चात् मुकाम- पद्धति का मेल-पद्धति के रूप मे ग्रहण किया जाना आर्ष मूर्च्छना-पद्धति पर पूर्ण पटाक्षेप है। उस समय के वैणिकों और उनके आश्रित आचार्य्यो को अचल सारिकाओवाली वीणा पर रागप्रयोज्य ध्वनियो के वादन की सुविधा का ध्यान है, रस एवं भाव के विनियोग को दृष्टि में रखते हुए ध्वनियो की भावानुसारी संज्ञाओं की चिन्ता उन्हे नही। इसी लिए मेल-पद्धति रस-भाव के विचार से सर्वथा शून्य है। चौदहवी शती मे एक ओर जहाँ अचल सारिकावाली वीणाओ के प्रताप से मुकाम- पद्धति दक्षिण तक मे मेल-पद्धति का रूप ले रही थी, वहाँ विन्ध्याचल एवं श्रीशैल के मध्य मे सिहभूपाल के द्वारा 'रत्नाकर' पर टीका लिखी जा रही थी और सिहभूपाल की दृष्टि मे ऐसे वैणिक थे, जो वीणा मे यथेच्छ स्थान पर स्वरी की स्थापना करते थे। पन्द्रहवी शती ई० मे 'पण्डित-मण्डली' (१४००-१४४० ई०) प्रयाग मे, महाराणा कुम्भवर्ण (राज्यकाल १४३३-१४६८ ई०) मेवाड़ मे तथा विजयनगर-नरेश इम्मडिदेव

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श्रुतियों की अनन्तता और देशी रागों मे प्रयोज्य ध्वनियां २८३

(रा० का० १४४६-१४६५ ई०) के आश्रित आचार्य्य कल्लिनाथ मूर्च्छना-पद्धति के विशेषज्ञ थे। देशी रागो की चर्चा करते हुए कल्लिनाथ ने अपने समय की स्थिति का वर्णन करते हुए कहा है- (१) दोनो ग्रामो से 'जाति' इत्यादि की परम्परा से उत्पन्न इन रागो की मूच्छना का आरम्भ मध्य सप्तक मे स्थित 'पड्ज' या 'मध्यम' (के स्थान) से करना यद्यपि शास्त्रविहित है, तथापि मध्यमग्राम से उत्पन्न मध्यमादि तोडी इत्यादि रागो में मूरच्छना का आरम्भ मध्य मध्यम से न किया जाकर मध्य षड्ज के ही स्थान से किया जा रहा है। लक्षण का विरोध करके ग्रह स्वर के अधीन उस स्वर-साधारण का भी अभाव है, जो पश्चाद्वर्ती स्वरो मे होना चाहिए। (२) त्रिश्रुतिक या चतु श्रुतिक होकर जिस पञ्चम को ग्राम-भेदक होना चाहिए, उसका प्रयोग अलोप्य रूप मे हो रहा है और सभी रागो मे पञ्चम का रूप एक-जैसा ही है। (३) रामक्रिया नामक क्रियाङ्ग-राग मे मध्यम के द्वारा पञ्चम की दो श्रुतियो का ग्रहण तथा नट्ट, देवक्री इत्यादि रागो मे ऋपभ और धैवत के द्वारा क्रमशः अन्तर- गान्वार एवं काकलीनिषाद की दो-दो श्रुतियॉ ग्रहण कर लिये जाने के कारण ऋषभ और धैवत की पञ्चश्रुतिकता शास्त्र मे 'विवक्षित' है। (४) श्रीराग मे गान्धार एवं निषाद के द्वारा मध्यम एव पड्ज की एक एक श्रुति ले लिये जाने के कारण गान्धार एवं निपाद की त्रिश्रुतिकता यद्यपि शास्त्र-विहित है, तथापि मध्यम एव षड्ज की त्रिश्रुतिकता शास्त्रविरोधिनी है। उसी राग मे ऋषभ एव धैवत के द्वारा क्रमश गान्धार एव निषाद की आदिम श्रुति का ग्रहण कर लिये जाने के कारण ऋषभ एव धैवत का चतु श्रुतित्व शास्त्रविहित है। (५) आन्धाली के लक्षण मे पञ्चम 'ग्रह' एवं 'अंश' कहा गया है और इसी दृष्टि से प्रस्तार भी लिखा गया है, परन्तु प्रयोग मे मध्यम ग्रह और अंश है। (६) कर्नाट गौड के लक्षण मे पड्ज 'ग्रह' और 'अश' है, परन्तु लक्ष्य मे अंश एव ग्रह स्वर निषाद है। (७) ग्राम रागो मे हिन्दोल का ऋपभ-धैवतहीनत्व शास्त्रोक्त है, परन्तु प्रयोग में ऋपभ-पञ्चम का परित्याग है। (८) पाडव-औड्व रागो मे कही लोप्य स्वरों का प्रयोग भी होता है। (९) कही जन्य और जनक के मेलन (ठाठ?) मे भेद और 'रस' इत्यादि के विनि- योग मे अनियम भी दिखाई देता है।

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२८४ भरत का संगीत-सिद्धान्त

आचार्य्य कल्लिनाथ ने इन अनियमो का समाधान यह कहकर किया है कि 'देशी' रागो में ये अनियम ही रागो का 'देशित्व' है, क्योकि आञ्जनेय ने कहा है कि देशी रागो मे श्रुति, स्वर, ग्राम, जाति आदि का नियम नही होता। आञ्जनेय की सहिता हमारे समक्ष नही, अत. उनकी व्यवस्था के विपय में हमे कुछ नही कहना हे, परन्तु यह कहा जा सकता है कि 'सङ्गीत' या किसी भी अन्य कला के सम्बन्ध मे ये उक्तियाँ पर्य्याप्तरूपेण सन्तोपप्रद नही। 'सवाद' सगीत का प्राण है, इतके अभाव मे सङ्गीत की सृष्टि हो ही नही सकती, 'स्वर' के अनुरणनमयत्व अर्थात् स्वत. रञ्जकत्व की भी आवश्यकता सङ्गीत के लिए अनिवार्य्यरूपेण है और 'राग' या 'स्वर' सन्निवेशविशेप मे रञ्जकत्व भी अनिवार्य्य है। अत कोई भी सङ्गीत-पद्धति हो, रज्जन के लिए उसमे भावाभिव्यञ्जन की योग्यता तथा आनन्दाभिव्यक्ति के कुछ व्यापक एव सनातन कारण होने ही चाहिए। यह एक पृथक् तथ्य है कि उन कारणो की खोज न हुई हो। इन कारणो की यथासम्भव खोज अनुसन्धानकर्ता का लक्ष्य होना चाहिए। आधुनिक ठाठों मे प्रयुक्त ध्वनियों की भावानुसारी संज्ञाएँ

यह कहा जा चुका है कि आधुनिक अनेक राग 'ग्रामसंश्लेप' का परिणाम है और यह ग्राम-संश्लेप भारत में सहस्रो वर्ष पूर्व हो चुका था। काश्यप एव याष्टिक के रघुनाथोक्त विधान इस दिशा की ओर इद्गित करते है। - यदि ऐसी मूर्च्छनाएँ निर्मित की जायॅ, जिनमे 'नि-नि', 'ग-ग' और 'म-म' का क्रमग प्रयोग भी ग्राह्य हो, तो ये मूर्च्छनाएँ भरत-सम्प्रदाय से भिन्न भले ही हो, परन्तु इनके स्वर भरत-सम्प्रदाय के सात शुद्ध एव तीन अन्तर स्वरो मे भी मिल जायँगे। मध्यम- ग्रामीय काकलीनिषाद का प्रयोग इन मूच्छनाओं मे तीव्र मध्यम, पत पञ्चम, मृदु पञन्चम या वराली मध्यम के नाम से किया जायगा। हम इनमे से 'तीव्र मध्यम' सज्ञा चुन लेते है। काकलीनिषाद, और अन्तरगान्वार अन्तर स्वर होने पर भी गान्धार और निपाद ही है, फलत ये स्वर 'शोक' या 'करुणा' के बोधक है, काकलीनिषाद के साथ पड्ज-मध्यम-भाव से संवाद करनेवाला तीव्र मध्यम भी अन्तर स्वर है और उसकी मूल संज्ञा माव्यमग्रामिक काकलीनिषाद ही है, फलत वह भी 'शोक' या 'करुणा' का बोधक है।

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श्रुतियों की अनन्तता और देशी रागों में प्रयोज्य ध्वनियाँ २८५

अव यदि उत्तर भारत मे प्रयुक्त ठाठो को महर्षि भरत द्वारा बोधित दस स्वरो मे देखा जाये, तो स्थिति यह होगी :- (१) भैरव सश्लिष्ट मूर्च्छना नि का रे 1 ग म म ध नि श्रुति-परिमाण ०गकखगक खग खगग के खगग क ख ग क स ग ख ग ठाठ स रे ग म प ध नि स

यदि कोई चाहे, तो ठाठ मे प्रयुक्त 'गान्धार' और 'निपाद' को पञ्चश्रुतिक कह सकता है, क्योकि वे अपने पूर्ववर्ती प्रयोज्य स्वर 'रे' और 'ध' पाँच पॉच श्रुतियो के अन्तर पर स्थित है। मूरच्छना के द्विश्रुतिक काकलीनिषाद और तीव्र मध्यम 'ठाठ' मे क्रमश द्विश्रुतिक ऋपभ और धैवत वन गये है। मूर्च्छना में स्वरों की सज्ञाएँ भावानुसारिणी है। उनके अनुसार हम कह सकते है- इस मूच्छना का स्थायी स्वर निपाद है, जो करुणा का अभिव्यञ्जक है। काकली- निपाद एवं तीव्र मध्यम जैसे शोक-बोधक स्वरो का अस्तित्व इसके करुण प्रभाव मे और वृद्धि करता है। उत्साह, क्रोध एवं विस्मय का व्यञ्जक षड़ज इस मूर्च्छना मे लुप्त है और उसका सवादी पञ्चम भी। (२) पूरबी सश्लिप्ट मूर्च्छना नि का. रे अ म म ध नि श्रुति-परिमाण A N ठठ स रे ग म प ध नि स _न

यहाँ भी करुणावोधक निपाद स्थायी स्वर है, काकली, अन्तर गान्धार एव तीन अन्तर स्वरों का प्रयोग है। मूर्च्छना मे गान्धार के स्थान पर अन्तर गान्वार के प्रयोग ने इस मूर्च्छना मे अन्तर कर दिया है। (३) मारवा सश्लिप्ट मूर्च्छना नि का. रे अ. म प ध नि श्रुति-परिमाण ०गकख्गकख गख गगकख गगक ख गक स गख ग

의 하 स रे ग म प घ नि स

यहाँ भी करुणावोधक 'निषाद' स्थायी स्वर है, काकली और अन्तर स्वर है, और मूर्च्छना का पञ्चम ठाठ मे चतु श्रुतिक धवत हो गया है।

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२८६ भरत का संगीत-सिद्धान्त

(४) तोड़ी

संस्लिष्ट मूच्छंना ग अ. 1 म व नि का. रे ग श्रुति-परिमाण ०गकखगगकखग क ख ग ख गग क ख गक ख गख ग

ठाठ स रे ग म प ध नि स

इस मूर्च्छना में करुगावोवक 'गान्वार' स्थायी स्वर है, उसके सवादी निषाद-अन्तर, गान्वार एव काकलीगान्वार का अस्तित्व उस करुणा को और भी उभारता है। तीव्र मध्यम के नाम से प्रयुक्त माध्यमग्रामिक काकली भी उस करुणा का परिपोष करता है। पड्ज, मध्यम एव पञ्चम लुप्त है।

(५) बिलावल शुद्ध मूर्च्छना नि स रे ग म प ध नि श्रुति-परिमाण ०गकख ग क ख ग ख ग ग क ख ग ग क ख ग क ख ग ख ग ठाठ स रे ग म प ध नि स इस मूच्छना का स्थायी स्वर निपाद है, जो करुणा का अभिव्यञ्जक है, परन्तु उस करुणा के परिपोषक अन्तर स्वरों का इसमें सर्वथा अभाव है, फलत इसकी करुणा, 'दैन्य' अथवा 'निवेदन' का ही रूप ग्रहण करती है। पड्ज, मध्यम, पञन्चम का अस्तित्व भी करुणा मे गहराई उत्पन्न नही होने देता। आधुनिक ठाठ-वादियो को अपने ठाठ के चतु श्रुतिक ऋषभ और धैवत इस पाड्ज- ग्रामिक शुद्ध नैषादी मूर्च्छना में मिल जाते है। उनके मध्यम के साथ धैवत का षड्- जान्तरभाव इस मूर्च्छना में नष्ट हो जाता है। यह मूर्च्छना शुद्ध 'रजनी' है।

(६) कल्याण

शुद्ध मूर्च्छना ग म प ध नि स रे ग श्रृति-परिमाण ०गकखगग क ख ग क ख ग ख ग ग क ख ग क ख ग ख ग

ठाठ स रे ग म प ध नि स विलावल की मूर्च्छना से इसमें भेद यह है कि इसमे गान्धार के स्थान पर अन्तर- गान्वार का प्रयोग है, जो ठाठ मे 'तीव्र मध्यम' वन गया है। स्थायी निपाद ही है, परन्तु उसका संवादी गान्धार यहाँ नही है। पड्ज, मध्यम एव पञ्चम का अस्तित्व है। यह मूर्च्छना पाड्जग्रामिक सान्तरा 'रजनी' है।]

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धुतियों की अनन्तता और देशी रागों में प्रयोज्य ध्वनियाँ २८७

(७) खमाज

शुद्ध मूर्च्छना म प ध नि स रे ग म श्रुति-परिमाण ०गकखगक खगख ग गक ख ग क ख गख ग ग क ख ग ठाठ स स ग म प ध नि स

इस मूर्च्छना का स्थायी स्वर मध्यम है जो 'रति' या 'अनुराग' का बोधक है, यह षाड्जग्रामिक मध्यमादि मूर्च्छना है। ठाठ मे बतायी हुई स्वरसज्ञाएँ उत्तर-भारतीय सरस्वती वीणा मे प्रयुक्त स्वर- संज्ञाएँ है। इस ठाठ के ऋपभ-धैवत मे सवाद नही।

(८) काफी

शुद्ध मूर्च्छना स रे ग म प ध नि स श्रुति-परिमाण ० क ख ग ख ग ग क ख ग ग क ख ग क ख ग ख ग ग क ख ग ठाठ स रे ग म प ध नि स

वास्तव मे काफी ठाठ के ऋषभ का पञ्चम से संवाद नही और यह ठाठ पड्जग्रामीय उत्तरमन्द्रा से भिन्न नही। पड्ज इस मूर्च्छना का स्थायी स्वर है, जो उत्साह, क्रोध या विस्मय का व्यञ्जक है। नाट्यशास्त्र के कुछ पाठो मे पड्ज को शृगार का अभिव्यञ्जक बताया गया है। जिन्हे काफी ठाठ मे चतु श्रुतिक ऋषभ ही चाहिए, उन्हे निम्न मूर्च्छना मे अपना 'काफी' मिल जायगा-

सश्लिष्ट मूर्च्छना ध का. स रे अ. म प ध

श्रुति-परिमाण ०ख ग ग क ख ग क ख ग ख ग ग क ख ग ग क ख ग क ख ग ठाठ स रे ग म प ध नि स

इस मूर्च्छना का स्थायी स्वर धैवत है, जो 'भय' या 'जुगुप्सा' का अभिव्यञ्जक है, काफी ठाठ से इन भावों का कोई सम्बन्ध नही, फलत इस दृष्टि से भी यह रूप काफी का नही। ठाठवादियो को इस रूप मे चतु श्रुतिक ऋपभ, अपने पडज से छ'श्रुति दूर अपना कोमल गान्धार और उसके साथ सवाद करनेवाला कोमल निपाद प्राप्त हो जायगा। मध्यम एव पड्ज त्रिश्रुतिक मिलेगे तथा अपने मध्यम एवं कोमल निपाद मे सवाद नही मिलेगा। फलतः काफी के इस रूप के लिए आग्रह ठीक नही।

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२८८ भरत का संगीत-सिद्धान्त

(९) आसावरी

शुद्ध मूर्च्छना प ध नि स रे ग म प श्रुति-परिमाण ० क ख ग ख ग ग क ख ग क ख ग ख ग ग क ख ग ग क ख ग ठाठ - स रे ग म प ध नि स

यह षड्जग्रामिक पञ्चमादि मूर्च्छना है। पञ्चम इसमे स्थायी स्वर है, जो शृगार का अभिव्यञ्जक है। दरवारी, आसावरी एव मालकोस जैसे राग इस मूर्च्छना से सम्बद्ध है। इन रागो मे 'प' के नाम से प्रमुज्यमान ध्वनि वस्तुत ऋपभ है, जो स्थायी स्वर पञ्चम से वारह श्रुतियो के अन्तर पर स्थित है तथा 'ध' के नाम से प्रयुज्यमान ध्वनि प्राचीन 'गान्वार' है, जो स्थायी स्वर पञ्चम से चौदह श्रुतियो के अन्तर पर स्थित है। गुणियो मे यह प्रसिद्ध भी है कि इन रागो का धैवत भैरव इत्यादि के वैवत से उतरा हुआ है। वस्तुत इन रागो के प्रयोग के समय तानपूरे का पञ्चमवाला तार मध्यम मे मिलाया जाना चाहिये। उस अवस्था मे जोडे के तार एव पञ्चम के तार की ध्वनियो की प्राचीन संज्ञाएँ कमश 'प'-'स' हो जायँगी। जिन्हे आसावरी ठाठ मे चतु श्रुतिक ऋषभ एवं स्वस्थानस्थ पञ्चम का आग्रह है, उन्हे अपने अभीष्ट स्वरान्तराल प्राचीन 'धैवत, काकली निपाद, षड्ज, ऋपभ, अन्तर गान्वार, मध्यम, पञ्चम, मे मिलेगे, परन्तु भय एव जुगुप्सा के व्यञ्जक धैवत के 'स्थायी' हो जाने पर न तो स्वरो की भावानुसारी सज्ञाएँ मिलेगी, न राग प्रयोज्य वास्तविक ध्वनियॉ ही।

( १०) भैरवी

सान्तरा मूर्च्छना ध नि स रे अ. म प ध

श्रुति-परिमाण ०खगगकखगकखगखगगक खगगक खगक खग ठाठ - स रे ग म प ध नि स

इस मूर्च्छना का स्थायी स्वर धैवत है, जो भय का व्यञ्जक है। इसमे अन्तर गान्वार प्रयुक्त हो रहा है, जिसका स्थायी स्वर के साथ षड्ज-पञ्चम भाव से सवाद है। अत. यह 'सान्तरा' उत्तरायता है। प्राचीन भैरवी की मूर्च्छना शुद्ध उत्तरायता है। ठाठ-वादियो को अपना गान्धार इसमे अपने 'स' से छः श्रुति दूर दिखाई देगा और उसका सवादी 'निषाद' पञ्चम से छ'श्रुति दूर दिखाई देगा।

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श्रुतियों की अनन्तता और देशी रागों में प्रयोज्य ध्वनियाँ २८९

भैरवी मे प्रयोग के समय ठाठ के ऋषभ-धैवत यही रहेगे विलासखानी में 'गान्धार-निपाद' एक एक प्रमाणश्रुति उतरेगे। उपयर्युक्त विश्लेषण भरत-बोधित स्वर समूह मे आधुनिक रागो मे प्रयुज्यमान ध्वनियो का अस्तित्व दिखाने और उन ध्वनियो की भावानुसारी सज्ञाएँ ढूँढने का प्रयत्न है, परन्तु भाव का यथायोग्य प्रकाशन या 'रस' का परिपाक रागनियमानुसार स्वरो के यथाक्रम बहुत्व एव अल्पत्वयुक्त प्रयोग का परिणाम होता है। स्वरो का आरोह- अवरोह मात्र 'राग' सज्ञा नही ग्रहण करता। निपादादि मूर्च्छना मे 'अन्तर गान्धार' एव गान्धारादि मूर्च्छना मे 'धैवत' आधुनिक ठाठो के तीव्र मध्यम वन जाते है, इससे यह सिद्ध है कि जिस ध्वनि को हम आज तीव्र मध्यम समझते है। उसका प्रयोग प्राचीनो के द्वारा भली भाति होता था। एक ही मूर्च्छना (यह मूर्च्छना सप्तस्वर नही) मे ग्रामो का सश्लेष अथवा एक स्वर की शुद्ध एव विकृत अवस्था का प्रयोग भरत-विहित नही, इसी लिए हमने ऐसी मूर्च्छनाओ को साश्लेष्ट भी कहा है। भैरव मे प्रयोज्य मूर्च्छना मे निषाद एव मध्यम के दोनो रूपो का प्रयोग है। प्राचीन दृष्टिकोण के अनुसार एक ही स्वर के दो रूपो को मूर्च्छना मे न तो स्थान है और न उन दो रूपो को दो विभिन्न स्वर कहा जा सकता है। परन्तु जो लोकरुचि ऐसी नवीन मूर्च्छनाओ की उत्पत्ति मे कारण है, वह इन्हे दो पृथक्-पृथक् स्वर मान सकती है। विहाग के आधुनिक दोनो मध्यम पड्जग्रामीय निषादादि मूर्च्छना के दोनों गान्धार है और करुणावोधक है, यही स्थिति ललित और पूर्वी के दोनो मध्यमो की है। खमाज के दोनो मध्यम मध्यमादि मूर्च्छना के दोनो निषाद एवं दोनो निपाद उसी मूर्च्छना के दोनो गान्धार है। अत ऐसे रागो की नवीन मूर्च्छनाओ मे हमे दोनो रूपो मे प्रयोज्य भभीष्ट स्वरो की स्थिति सम्बद्ध मूर्च्छना के अन्तर्गत माननी होगी। इस विधान के तीन लाभ है- (१) ध्वनियो की भावानुसारी संज्ञाओ की प्राप्ति। (२) प्रयोज्य ध्वनियो का स्थायी स्वर से अभीष्ट अन्तर पर मिलना। (३) भरतवोधित दस स्वरो मे अनेक आधुनिक रागो की प्राप्ति।

१९

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अनुबन्ध (४)

भारतीय संगीत की महाविभूतियाँ (पद्रहवीं शती तक) १. ब्रह्मा नाट्यशास्त्र के अनुसार ये सर्वपितामह ब्रह्मा है, जिन्होने देवासुर-सग्राम मे थके हुए देवताओ के लिए 'नाटयवेद' का आविष्कार मनोरञ्जनार्थ किया। शैव ग्रन्थकार शारदातनय के अनुसार ब्रह्मा ने नाटयवेद भगवान् शकर के शिप्य तण्ड से पढ़ा था। नाटयशास्त्र के अनुसार नारद को गानयोग, स्वाति को भाण्डविधि एवं भरत मुनि को नाटय में नियोजित करनेवाले यही थे। सप्तगीतों के प्रवर्तक भी शार्ङ्गदेव के अनुसार ब्रह्मा ही है और शुप्काक्षरो के नियोजक भी। एकतन्त्री वीणा 'आदिवीणा' है, जिसे 'ब्रह्मवीणा' भी कहा जाता है। आचार्य अभिनवगुप्त के परिचित एक आचार्य प्रचलित नाटयशास्त्र को सग्रह ग्रन्थ मानते थे, जिसमे ब्रह्ममत के प्रतिपादक ग्रन्थो के खण्ड सम्मिलित है और जिसकी रचना ब्रह्ममत की श्रेप्ठता प्रतिपादित करने के लिए, उनके विचार में, हुई है। इससे सिद्ध होता है कि ब्रह्मा के मत के प्रतिपादक पृथक् ग्रन्थ कभी रहे होगे, जो आज अनुपलव्व है। २. शिव, शंकर 'नन्दिकेश्वरकारिका' के अनुसार भगवान् शकर के डमरू से व्याकरण के प्रसिद्ध माहेश्वर सूत्र उत्पन्न हुए। ये चौदह सूत्र समस्त वाङमय तथा इनमे प्रद्शित स्वरवर्ण सगीतसम्बन्धी स्वरो का आधार है। 'रुद्रडमरूद्भवसूत्र विवरण' के आधार पर स्वरवर्णो का साङ्गीतिक रूप भी है, जैसे-अ, इ, उ इत्यादि ही क्मश. पड़ज, ऋृपभ, गान्धार इत्यादि है।

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भारतीय संगीत की महाविभूतियाँ २९१ .

शारदातनय के अनुसार नाट्यवेद के आविष्कारक शिव है, जिन्होंने तण्डु को नाटय- चेद पढ़ाया। शिव की वीणा 'अनालम्बी' कही जाती है। नाट्यशास्त्र के अनुसार सन्ध्या समय प्रति दिन नृत्य करते करते भगवान् शंकर ने अङ्गहारो की रचना की और तण्डु को शिक्षित किया। ब्रह्मा के द्वारा आविष्कृत नाटय के पूर्वरङ्ग को सुशोभित करने के लिए भगवान् शकर ने भरत को तण्डु के द्वारा नृत्य की शिक्षा दिलायी। अनुश्रुति के अनुसार शिवमत मे पाँच रागो के जनक भगवान् शंकर हैं। कहा जाता है कि 'शिव-पार्वती-सवाद' नामक कोई ग्रन्थ शिवमत का प्रतिपादक था, जो आज अनुपलब्ध है। 'औमापतम्' नामक एक ग्रन्थ प्राप्त होता है। इसमे स्वर, मूर्च्छना, जाति, प्रबन्ध, रागं एवं वाद्य आदि के विषय में जो कुछ कहा गया है, वह भरत एव उनके अनुयायियों के मत से सर्वथा भिन्न है। संभव है, इसका ग्रथन शिवमत के सिद्धान्तों की रक्षा के लिए किसी पश्चाद्वर्ती लेखक ने किया हो। ३. पार्वती, शिवा, दुर्गा, शक्ति शार्गदेव ने अपनी उपजीव्य महाविभूतियो मे 'शिवा', दुर्गा' और 'शक्ति' का निर्देश पृथक्-पृथक् किया है। 'दुर्गाशक्ति' एव 'दुर्गशक्ति' एक नाम भी कही-कही मिलता है। सम्भव है, शार्ङ्गंदेव, द्वारा प्रयुक्त 'शिवा' शब्द पार्वतीवाची हो। शार्ङ्गदेव के अनुसार भगवती पार्वती ने लास्य का आविष्कार किया और वाणासुर की पुत्री उषा को सिखाया। उपा से यह लास्य द्वारका की स्त्रियो तक पहुँचा और तत्पश्चात् लोक मे प्रचलित हुआ। नन्दिकेश्वर के सिद्धान्तो के प्रतिपादक ग्रन्थ 'भरतार्णव' मे पार्वतीमत का ग्रन्थ 'भरतार्थचन्द्रिका' बताया गया है।

४. नन्दिकेश्वर आचार्य अभिनवगुप्त ने 'नन्दी' का ही दूसरा नाम 'तण्डु' बताया है। राजशेखर के अनुसार नन्दिकेश्वर या नन्दी रस के प्रथम आचार्य है। नन्दिकेश्वर के सिद्धान्तो के प्रतिपादक ग्रन्थ 'नन्दिकेश्वर-कारिका' पर उपमन्यु की टीका उपलब्ध है। 'भरतार्णव' नामक एक ग्रन्थ मे नन्दिकेश्वर के संगीत-सिद्धान्तो का प्रतिपादन

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२९२ भरत का संगीत-सिद्धान्त

है, ये सिद्धान्त भरत-सम्प्रदाय से सर्वथा भिन्न है। भरतार्णव मे वारहवी शती ई० के ग्रन्थकार हरिपाल तथा उसकी उपाधियो के उल्लेख के साथ उसकी रचना 'सङ्गीत- सुधाकर' के अनेक श्लोक भी मिलते है। 'भरतार्णव' नन्दिकेश्वर-मतानुयायी किसी व्यक्ति की कृति है, जिसका निर्माणकाल तेरहवी शती ईसवी के पश्चात् है। A75 भरतनाटयशास्त्र के पाँचवे अध्याय के अन्त मे प्राप्त पूर्वरङ्भ के विशेष अङ्ग के लिए वणित ध्रुवा-विनियोग नन्दिकेश्वर-सम्प्रदाय की वस्तु है। नन्दिकेश्ववर मत में तीन ग्राम 'नन्द्यावर्त', 'जीमूत' और 'सौभद्र' है।

५. नारद

नाट्यशास्त्र मे नारद भरत के सहयोगी है, जिन्हें गानयोग का कार्य ब्रह्मा ने सौपा है। नाटयशास्त्र एवं वाल्मीकि रामायण मे इन्हे गन्धर्व कहा गया है। इनके सिद्धान्तो के प्रतिपादक ग्रन्थ दो कहे जाते है, 'पञ्चमसारसहिता' एवं 'नार- दीय शिक्षा'। शुभाकर नामक किसी आचार्य ने नारदीय शिक्षा की व्याख्या लिखी थी। 'पञ्चमसारसंहिता' मे रागो के ध्यान भी है। 'संङ्गीतमकरन्द' को भी नारद- सिद्धान्तो का प्रतिपादक कहा जाता है, जो तेरहवी शती के पश्चात् किसी व्यक्ति की कृति प्रतीत होता है। इसमें महामाहेश्वर (अभिनवगुप्त) की चर्चा तो है ही, संगीत- रत्नाकर के अनेक श्लोक भी हैँ। नारद की वीणा का नाम 'महती' है, जिसमे इक्कीस तार थे। नारद को गान्धार ग्राम का प्रयोक्ता कहा गया है। नारद की सम्मति मे ग्रामरागो का प्रयोग लौकिक विनोद के लिए न होकर स्तुति या यज्ञ मे होना चाहिए। महाकवि वाण ने 'नारदीय' नामक एक ग्रन्थ की ओर सकेत किया है, सोलहवी शती के एक ग्रन्थकार शुभकर ने भी इसकी चर्चा की है। ६. स्वाति

भरतनाटयशास्त्र के अनुसार व्रह्मा ने इन्हे वाद्य-वादन में नियुक्त किया था, ये अनेक अवनद्ध वाद्यो के आविष्कारक है। 'स्वाति' विपञ्ची के वादक कहे जाते है, जिसमें नौ तारो पर स, रे, ग, अन्तर ग म, प, ध, नि, काकली निषाद मिले होते थे।

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७. तुम्बुरु

नाटयशास्त्र और वाल्मीकिरामायण मे इनका नाम नारद के साथ आता है और इन्हे गन्धर्व कहा गया है। इनकी वीणा 'कलावती' कही जाती है। तुम्बुरु के मत मे मूर्च्छना शब्द का अर्थ श्रुति का 'मार्दव' है। शार्ङ्गदेव ने भी नारद के साथ ही साथ इनका नाम लिया है।

८. भरत

नाटय के आदिम प्रयोक्ता भरत ब्रह्मा के शिप्य कहे गये है। मत्स्यपुराण मे भी इनकी चर्चा मिलती है। डॉ० मनमोहन घोप भरत को काल्पनिक व्यक्तित्व मानते है, परन्तु कविकुलगुरु कालिदास इन्हे नाटय का आदिम प्रयोक्ता मानते है। वाण ने 'भरत' का स्मरण नृत्यशास्त्र के प्रणेताओ मे किया है। नाटयशास्त्र भरत के पुत्रो की सख्या 'सौ' और शारदातनय का भावप्रकाशन 'पॉच' बताता है। उपलब्ध नाट्यशास्त्र के अनुसार अत्यन्त प्राचीन काल मे 'भरत' शब्द जातिवाची हो गया था। 'अमरकोश' मे भी 'भरत' शब्द 'नट' का पर्याय है। शारदातनय के अनुसार ब्रह्मा ने भरत एवं उनके पुत्रो से कहा-'नाट्यवेद' भरत'- अर्थात् नाटयवेद का भरण (धारण, ग्रहण) करो।' तुम लोक मे 'भरत' नाम से प्रसिद्ध हो जाओगे। नाटयशास्त्र को भरत से सम्बद्ध किया जाता है, परन्तु आज से एक सहस्र वर्प पूर्व भी यह धारणा विद्यमान थी कि नाट्यशास्त्र एक सडग्रह-ग्रन्थ है और यह धारणा सत्य है। नाटयशास्त्र के आधार पर महर्षि भरत का काल-निर्णय किया जाना ठीक नहीं। नाटयशास्त्र के आधार-ग्रन्थ आज अनुपलब्ध है।

९. दत्तिल

नाटयशास्त्र के अनुसार ये महर्षि भरत के पुत्र थे। इन्हे गान्धर्वशास्त्र के संक्षेप का कर्ता कहा जाता है। रत्नाकर के टीकाकार सिहभूपाल ने अनेक स्थानो पर इनका मत उद्धृत किया है। दत्तिल ने मूर्च्छना के चार भेद,-पूर्णा, पाडवा, औडुविता और साधा- रणी माने है, इस सम्बन्ध मे मतङ्ग ने भी दत्तिल का अनुसरण किया है। प्रथम शती ई० के एक शिलालेख मे दत्तिल की चर्चा है।

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२९४ भरत का संगीत-सिद्धान्त

'नृत्तलक्षण' नामक एक ग्रन्थ की चर्चा भी प्रायः आती है, जो दत्तिल के सिद्धान्तो का प्रतिपादक कहा जाता है। 'दत्तिल-कोहलीयम्' नामक एक ग्रन्थ किसी मध्ययुगीन आचार्य की कृति है, जो रत्नाकर के कुछ श्लोकों का संग्रहमात्र है।

१०. कोहल

महर्पि भरत के पुत्र एवं महर्षि भरत के सिद्धान्तो का विस्तृत निरूपण करनेवाले प्रसिद्ध हैं। इन्होंने श्रुतियों की अनन्तता प्रतिपादित की है। कोहलकृत कहे जानेवाले ग्रन्थ के खण्डित भाग ही मिलते है। 'कोहलमतम्' नामक एक छोटी-सी पुस्तक भी मिलती है। 'कोहलरहस्यम्' नामक एक ग्रन्थ भी मिलता है, जो नाम से कोहलानुयायी किसी व्यक्ति की कृति प्रतीत होता है।

११: स्कन्द और शुक्र

इनके विषय मे विशेष विवरण नही मिलता। एक द्रविड़ ग्रन्थ के अनुसार स्कन्द ने नाट्यशास्त्र की शिक्षा अगस्त्य को दी थी। शृङ्गारशेखरकृत ग्रन्थ 'अभिनयभूषण' के अनुसार शुकाचार्य की कृति 'शुक्रमतम्' है। शारदातनय तथा अन्य अनेक ग्रन्थकारो ने शुकमत की चर्चा की है।

१२. विश्वावसु इन्हे अर्जुन का गुरु कहा जाता है। कल्लिनाथ ने विश्वासवसुमत का उल्लेख किया है। इनका विशेष विवरण अभी प्राप्त नही हुआ है।

१३. अगस्त्य नाट्यशास्त्र काशी-संस्करण के अनुसार महर्पि भरत से नाट्यशास्त्र का श्रवण करनेवालो मे अगस्त्य भी है। द्रविड भाषा का एक ग्रन्थ 'तालसमुद्र' अगस्त्य की रचना कहा जाता है। ताल के सम्वन्ध में इतना विस्तृत विवेचन और कही नही प्राप्त होता।

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१४. विशाखिल ये सप्तगीतो के प्रामाणिक आचार्य्य माने गये है। मतङ्ग ने तान और मूर्च्छना का अन्तर प्रतिपादित करते समय विशाखिल से असहमति प्रकट की है। नान्यदेव ने इनके ग्रन्थ मे ध्रुवा गीतो के उदाहरण भी देखे थे, जो अव अप्राप्य है।

१५. कम्बल, अश्वतर इन दोनो विभूतियो के नाम साथ-साथ आते है। शार्ङ्गदेव ने स्वरसाधारण के विपय मे चर्चा करते समय इनके मत का उल्लेख किया है। १६. कश्यप

इन्हे 'मुनि' कहा गया है। कश्यप एवं वृद्ध कश्यप की चर्चा प्राय. आती है। शार्ङ्गदेव ने इनकी चर्चा की है। कल्लिनाथ ने कश्यप की उक्ति के रूप मे कुछ श्लोक दिये है। एक जाति के शुद्ध एव विकृत भेदो के लिए एक मूर्च्छना का विधान भी कश्यप ने किया है। वारह ग्रामरागो को भापाओ का जनक कश्यप ने बताया है। मतङ्ग ने कश्यप या काश्यप के मत का उल्लेख किया है। वृद्ध काश्यप के कथना- नुसार जातियो मे प्रयोज्य स्वर पन्द्रह है। उनकी सज्ञा पड्ज, ऋपभ, गान्धार, मध्यम, पञ्चम, धैवत, निषाद, उत्कृष्ट पञ्चम, अन्य धैवत, काकली, अन्तर, साधारित षड्ज, साधारण मध्यम, साधारण गान्धार (और कैशिक निपाद) है। चतु श्रुतिक, त्रिश्रुतिक, द्विश्रुतिक एव एकश्रुतिक स्वरो को काकली एव अन्तर के संयोग से रागभाषाओ मे प्रयुक्त करने का विधान कश्यप ने किया है। विकृत स्वरीं के प्रयोग के कारण रागभापा-विभाग ग्रामराग-विभाग से भिन्न है। १७, याष्टिक इनकी रचना 'याष्टिकसहिता' कही जाती है, जो आजकल नही मिलती। मतङ्ग ने इनके मत की चर्चा की है और याष्टिकसहिता के श्लोक भी उद्धृत किये है। इन्होन देशी रागो के भापा, विभाषा और अन्तरभापा नाम से तीन भेद बताये है। पञ्च- श्रुतिक, षट्श्रुतिक और सप्तश्रुतिक स्वर भी इनके मत मे हैं। १८. आञन्जनेय आञ्जनेय के सिद्धान्तो का प्रतिपादक ग्रन्थ 'आञ्जनेयसहिता' कहा जाता है, इसे ही कुछ लेखको ने 'हनुमत्सहिता' कहा है। इसी का एक नाम 'भरतरत्नाकर' भी कहा जाता है।

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२९६ भरत का संगीत-सिद्धान्त

आञ्जनेय का मत ही 'हनुमन्मत' कहलाता है। इसमे श्रुतिसंख्या अठारह है। रघुनाथ का कथन है-एक वार आञ्जनेय कदलीवन मे पहुँचे, जहॉ याष्टिक मुनि अपने दक्ष इत्यादि शिष्यो को शिक्षा दे रहे थे। देशी रागो तथा उनके स्वरो की श्रुतियो मे शास्त्रवणित स्थिति से विरोध देखकर दक्ष इत्यादि शिष्यो ने याष्टिक मुनि से पूछा कि सप्त शुद्ध एवं द्वादरा विकृत स्वरो में एक स्वर की अधिक से अधिक चार (एवं कम से कम दो) श्रुतियाँ है, परन्तु देशी रागो मे पञ्चश्रुति, पट्श्रुति एव सप्तश्रुति स्वर भी है। इन स्वरो का शास्त्रो से विरोध है, परन्तु इनके परित्याग से राग-लाभ नही होता। इस प्रकार विरोधसम्वन्धिनी शङ्का किये जाने पर याष्टिक मुनि ने इस प्रकार समाधान किया कि शास्त्रविरोव न रहा और रागप्राप्ति भी सम्भव हो गयी। याप्टिक के शिष्यो की गान-शैली एवं याप्टिक मुनि के द्वारा उपदिष्ट पद्धति को ध्यान मे रखकर आञ्जनेय ने लक्ष्याविरोधी शास्त्र की रचना की। आञ्जनेय का मत है-"जिन रागो मे श्रुति-स्वर, ग्राम, जाति इत्यादि का नियम नही होता और जिन पर विभिन्न स्थानो की प्रादेशिक छाया होती है, वे 'देशी राग' है।" ऊपर जिन आचार्य्यो की चर्चा की गयी है, उनमे पौर्वापर्य्य-सम्बन्ध किसी सीमा तक भले ही स्थापित किया जा सके, परन्तु उनके काल-निर्णय का कोई वैज्ञानिक उपाय अभी तक उपलब्ध नही है। १९• शार्दूल इनका अनुमानित काल प्रो० रामकृष्ण कवि के अनुसार चौथी या पाँचवी शती ई० है। ये अभिनय के सम्बन्ध मे प्रामाणिक लेखक कहे जाते है। इनके ग्रन्थ 'हस्ता- भिनय' मे हस्ताभिनय के सोलह भेद है। यह ग्रन्थ आजकल अनुपलब्ध है। मतङ्ग ने शार्दूल की चर्चा की है। शाङ्गदेव एवं रघुनाथ की श्रुति-जातियॉ शार्दूलमत के अनुसार है, इससे सिद्ध होता है कि स्वरविधि पर भी इनका कोई ग्रन्थ होगा। २०. राहल (राहुल) ये एक बौद्ध आचार्य्य थे। इनका अनुमानित काल पॉचवी शती ई० या उससे कुछ पूर्व है। इन्होने 'भरतवार्तिकम्' के रूप मे नाट्यशास्त्र की व्याख्या की है। अभिनवगुप्त इत्यादि आचार्य्यो ने 'भरतवार्तिकम्' से श्लोक उद्धृत किये है। शार्गदेव ने भी इनका स्मरण किया है।

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२१. मतङ्ग जनश्रुति के अनुसार इनका काल छठी शती ई० है। प्रो० रामकृष्ण कवि इनका काल नवी शती ई० का मध्य भाग मानते है। मतङ्ग के ग्रंथ का नाम 'बृहद्देशी' है, जिसमे आठ अध्याय है। इस ग्रन्थ मे ताल और वाद्य पर भी विचार किया गया है, परवर्ती सभी आचार्य्यों ने मतङ्ग का मत सम्मानपूर्वक उद्धृत किया है। मतङ्ग ने काश्यप, नन्दी, कोहल, दत्तिल, दुर्गशक्ति, याष्टिक, वल्लभ, विश्वावसु, शार्दूल, विशाखिल इत्यादि पूर्वाचार्य्यो की चर्चा की है। इन्होने भरतोक्त सप्तस्वर मूर्च्छनाएँ मानी तो है, परन्तु रागसिद्धि के लिए मूर्च्छना के आकार को विस्तृत करके उसे 'द्वादशस्वर' मानने पर बल दिया है। यह द्वादशस्वर-मूर्च्छनावाद नन्दिकेश्वर का कहा जाता है। आचार्य्य अभिनवगुप्त ने इस द्वादशस्वर-मूर्च्छनावाद का खण्डन किया है, उसके पश्चात् यह वाद पनप नही सका। मतङ्ग चित्रावादक थे, इसलिए इन्हे 'चैत्रिक' कहा जाता है। प्रो० रामकृष्ण कवि के अनुसार मतङ्ग ही किन्नरी वीणा के आविप्कारक है, इनसे पूर्व वीणा पर सारिकाएँ नही होती थी। कुम्भ के अनुसार मतङ्ग की किन्नरी पर चौदह पर्दे होते थे, वैसे उनकी संख्या अठारह तक हो सकती थी। आधुनिक वे सभी तन्त्रीवाद्य किन्नरी के विकसित रूप है, जिन पर सारिकाएँ विद्यमान है। मतङ्ग ने देशी रागो को भी ग्रामो मे वर्गीकृत किया है।

२२. कीरतिघर ये एक प्राचीन आचार्य्य है। आचार्य्य अभिनवगुप्त ने अभिनवभारती के छठे एवं उन्नीसवे अध्याय मे इनकी चर्चा की है। ये रस एव सगीत के प्रामाणिक आचार्य्य और नाट्यशास्त्र के व्याख्याता है। गार्ङ्गदेव ने भी इनका स्मरण किया है

२३• सुधाकलश इनका काल नवी शती ई० के लगभग कहा जाता है। ये राजशेखर के गुरु जैनाचार्य्य के शिष्य थे। सुवाकलश की रचना 'सङ्गीतोपनिपत्सार' है। इसी ग्रन्थ के आघार पर रचित एक कृति 'सङ्गीतोपनिपत्सारोद्वार' है, जिसमें

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२९८ भरंत का संगीत-सिद्धान्त

भोज, तालरत्नाकर, शिवमत, गौरीमत, विश्वावसु, तुम्बरु, वसिष्ठपुत्र, पालक भूपाल इत्यादि की चर्चा है। इसी ग्रन्थ में अर्जुन को विश्वावसु का शिष्य बताया गया है। इस ग्रन्थ के अन्त मे 'भवेश भूपाल' एवं 'भवेत्स भूपाल' दो पाठ भिन्न-भिन्न प्रतियो मे मिलते है। यदि भवेश भूपाल शुद्ध पाठ हो, तो इस ग्रन्थ का रचनाकाल चौदहवी गती ई० होना चाहिए। मिथिलानरेश भवेश के द्वारा १३३० ई० मे लिखा एक दानपत्र प्राप्त होता है। २४. लोल्लट लोल्लट नाट्यशास्त्र के प्रसिद्ध व्याख्याता हुए है, इनकी व्याख्या का नाम 'गुण- निका' है। अभिनवगुप्त ने रस-प्रकरण मे इनके मत का खण्डन किया है। रस का प्रत्येक विद्यार्थी इनके नाम से परिचित है। शार्ङ्गदेव ने भी इनका स्मरण किया है।

२५. धण्टक भरत-नाट्यशास्त्र का सक्षिप्त संस्करण इनकी व्याख्या का विपय बना है। अभिनवगुप्त ने इनकी चर्चा की है। २६. रुद्रट ये कश्मीरनिवासी थे, इनका समय नवी शती ई० है। इनका दूसरा नाम 'शता- नन्द' था और ये सामवेदी व्राह्मण थे। राजशेखर ने 'काकु' के सम्बन्ध मे इनके मत का खण्डन किया है। २७. देवराज ये एक अप्रसिद्ध सङ्गीताचार्य्य हुए है, इनका अनुमानित काल नवी शती ई० है। २८. सागरनन्दी ये नाटकरत्नकोश और निघण्टुरत्नकोश इत्यादि ग्रन्थो के व्याख्याता हुए है। अमरकोश की व्याख्या में सुभूति तथा 'सङ्गीतराज' मे कुम्भ ने इनका नाम लिया है। इनका काल ९८० ई० है। अभिनवगुप्त ने इनकी कुछ मान्यताओ का खण्डन भी किया है। २९. अभिनदगुप्त प्रत्यभिज्ञादर्शन, नाट्य एवं सङ्गीत के प्रामाणिकतम आचार्य्य श्रीमान् अभिनव- गुप्त का काल दशम शती ई० का अन्तिम भाग है। ये कश्मीरी थे। इन्होने वितस्ता

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भारतीय संगीत की महाविभूतियाँ २९९

नदी के तट पर स्थित प्रवरपुर के एक मठ मे 'भरतनाट्यशास्त्र' की अमर टीका 'अभिनवभारती' की रचना की। संस्कृत भापा के सर्वश्रेप्ठ व्याख्याग्रन्थो में 'अभिनवभारती' का स्थान है।

दिया गया है। इसमे न तो कोई अनुपयुक्त बात कही गयी है, न कोई दुर्वोध स्थल अस्पष्ट रहने

रस के सम्बन्ध मे उद्भट, लोल्लट, शडकुक इत्यादि के मतो का निराकरण करके इन्होने 'रस' पर अपने मत की स्थापना सप्रमाण एवं युक्तियुक्त रूप मे की है, जो आज भी प्रमाण है। इन्होने मतङ्ग के द्वादशस्वर-मूर्च्छनावाद का खण्डन किया है। इन्होने लिखा है कि इनके समय के लक्ष्यवेदियो का कथन है कि मध्यमग्राम मे पञ्चम के द्वारा परित्यक्त एक श्रुति का ग्रहण केवल धैवत ही करता हो, इस सम्बन्ध मे कोई प्रमाण नही। इससे सिद्ध है कि इनके समय मे ग्रामो का संर्लिष्ट प्रयोग होने लगा था। पड्जग्रामीय ऋपभ और अन्तर गान्वार क्रमश. मध्यमग्रामीय पञ्चम और वैवत बनते है। षड्ज- ग्रामीय ऋषभ के पश्चात् और अन्तर गान्धार से पूर्व शुद्ध गान्धार विद्यमान है, प्रतीत होता है कि त्रिश्रुतिक पञ्चम के पश्चात् भी उसका प्रयोग अभिनवगुप्त के काल में होता था। इनके समय मे श्रुत्युत्कर्ष से द्विश्रुतिक एव त्रिश्रुतिक स्वर भी अधिक श्रुतियो से युक्त किये जाकर प्रयुक्त होते थे। काकली और अन्तर के प्रयोग से चतु- श्रुति एव त्रिश्रुति स्वर भी न्यूनश्रुति होते थे। अभिनवगुप्त के मत मे सभी स्वरो का श्रुतिकृत वैचित्र्य सम्भव है। अभिनवगुप्त का यह मत देशी रागो मे प्रयोज्य स्वरो के सम्बन्ध मे है, ग्रामरागो एवं जातियो से इस मत का कोई सम्बन्ध नही। शुद्ध रागो के निर्वचन के पश्चात् अभिनवगुप्त ने काश्यप एवं दुर्गा इत्यादि के मत के अनुसार छियानवे रागों का वर्णन करके उनका रस औस भाव में विनियोग वताया है। 'अभिनवभारती' का आतोद्यविधि भाग अभी तक अप्रकाशित है। ३०. महाराज भोज प्रसिद्ध विद्याव्यसनी धारानरेश महाराज भोज का काल ९९८ ई० से १०६२ ई० तक है। इनका अलंकारगास्त्र-विपयक विशाल ग्रन्थ 'शृंगारप्रकाश' है, जिसमे छत्तीस 'प्रकाश' है। 'सरस्वतीकण्ठाभरण' भी भोज का प्रसिद्ध ग्रन्थ है। व्याकरण एव सङ्गीत पर भी इनकी रचनाओ की चर्चा मिलती है। राङ्गदेव ने इनका स्मरण किया है।

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महमूद गजनवी के आक्रमण का प्रतिरोध करने के लिए संघटित एक राजसघ मे इन्होने भी सहायता दी थी।

३१. नान्यदेव

इनका काल १०८० ई० है। ये मिथिला के कर्णाटजातीय राष्ट्रकूट नरेश थे। इन्होने अपने भाई कीर्तिराज को नेपाल के राजसिहासन पर अधिष्ठित किया था। इनकी उपाधियाँ 'मोहनमुरारि', 'क्षमापालनारायण' थी। नान्यदेव का प्रसिद्ध ग्रन्थ 'सरस्वती हृदयालङ्ार' है। इसमें आपिशल, पाणिनि, विशाखिल, काश्यप, मतङ्ग, देवराज, शातातप तथा 'रत्नकोश' इत्यादि की चर्चा है। 'सरस्वतीहृदयालद्दार' का दूसरा नाम 'भरतभाष्य' भी है। नान्यदेव ने गान्धारग्राम की चर्चा करते हुए उससे उत्पन्न रागो को लौकिक व्यवहार के लिए भी उपयुक्त बताया है। 'ग्रन्थमहार्णव' नामक एक ग्रन्थ को भी नान्यदेव की कृति कहा जाता है।

३२. त्रिभुवनमल्ल

पश्चिम चालुक्यचकवर्ती त्रिभुवनमल्ल का शासनकाल १०७६ ई० से ११२६ ई० तक है। इन्हे जयसिह भी कहा जाता है। इतिहास में ये 'विक्रमाङ्गदेव' एवं 'परमर्दी' नाम से भी प्रसिद्ध है। महाकवि विल्हण ने 'विक्रमाङ्कदेवचरितम्' नामक महाकाव्य की रचना इन्ही के गुणगान में की है। महाराज त्रिभुवनमल्ल की राजधानी 'कल्याण', दक्षिण हैदराबाद का कल्याणी नामक प्रदेश, थी। इनका ग्रन्थ उपलब्ध नही, परन्तु जगदेकमल्ल, शार्ङ्गदेव एव हम्मीर ने सादर इनके मत का उल्लेख किया है। ३३. सोमेश्वर ये महाराज त्रिभुवनमल्ल के प्रतापी पुत्र थे, इन्होने अपने पिता के यशोगान मे 'विक्रमाङ्काभ्युदय' की रचना की है। इनके द्वारा रचित दूसरा ग्रन्थ 'अभिलपितार्थ- चिन्तामणि' है, जिसे एक विश्वकोश समझा जाना चाहिए, इसमे पॉच प्रकरण है और इन प्रकरणो मे सौ अध्याय है। यह प्रधानतया राजविद्या का ग्रन्थ है, जिसकी रचना राजकुमारों को शिक्षा देने के लिए हुई है। इस ग्रन्थ के चीथे प्रकरण मे एक हजार एक सौ सोलह श्लोक सङ्गीत है।

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भाषा, विभाषा, क्रियाङ्ग इत्यादि मे विभक्त छियानवे देशी रागों का कथन सोमेखवर ने किया है। उदाहरणो के द्वारा प्रबन्धो का स्पष्टीकरण इस ग्रन्थ मे है और यह एक उत्कृष्ट ग्रन्थ है। अनेक आचार्य्यो ने आदरपूर्वक सोमेश्वरमत का उल्लेख किया है। महाराज सोमेश्वर को भूमल्ल भी कहा जाता है। ये 'कुण्डलीनृत्तम्' के आविष्कर्त्ता एत प्रवर्त्तक हुए है। इनका राज्यकाल ११२७-११३४ ई० है।

३४. जगदेकमल्ल

ये महाराज सोमेश्वर के पुत्र थे, इनकी उपाधि 'प्रतापचक्रवर्ती' थी। इनका राज्यकाल ११३४-११४५ ई० है। इनके ग्रन्थ का नाम 'सङ्गीतचूडामणि' है, जिसमे परमर्दी, सोमेश्वर, पाण्डसूनु एव 'बृहद्देशी' की चर्चा है। 'प्राकृतछन्द' के रचयिता स्वयम्भू की चर्चा भी इस ग्रन्थ मे है। इस ग्रन्थ के पॉच अध्यायो मे प्रबन्ध, ताल, राग, वाद्य एव नृत्य का वर्णन हुआ है। वाद्याव्याय और नृत्याध्याय असम्पूर्ण प्राप्त हुए है। सङ्गीतसमयसार के रचयिता पार्श्वदेव (तेरहवी शती ई०) ने 'सङ्गीतचूडामणि' से अनेक श्लोक उद्धृत कर लिये है। मलाबार मे 'सार' नामक एक ग्रन्थ उपलब्ध है, जो अनेक प्रतियो के आधार पर किया हुआ 'सगीतचूडामणि' का पुन. सस्कारमान्र है। जगदेकमल्ल-कृत एक ग्रन्थ 'नाटयटिप्पणी' भी है, जिसे नाटयशास्त्र की सक्षिप्त व्याख्या समझा जाना चाहिए। जगदेकमल्ल ने जातियो के ध्यान भी दिये है।

३५, शारदातनय

इनके पिता का नाम कृष्णभट्ट एव गुरु का नाम दिवाकर था। इनका काल प्रायः ११५० ई० है। गारदातनय के दो ग्रन्थ 'भावप्रकाशन' और 'शारदीय' है। भावप्रकाशन नाट्य का ग्रन्थ है, परन्तु इसके एक अध्याय मे सङ्गीत के सिद्धान्त सार रूप मे दिये गये है, सङ्गीत के विपय मे विस्तृत निरूपण इन्होने 'शारदीय' मे किया है, जिसकी चर्चा 'भावप्रकाशन' मे है। 'शारदीय' आजकल अप्राप्य है। अभिनवभारती, काव्यप्रकाश, शृगारप्रकाश, अभिलषितार्थचिन्तामणि, कल्पतरु, योगमाला इत्यादि ग्रन्थ एवं मातृगुप्त, शंकुक, व्यास, वासुकि इत्यादि आचाय्यों

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की चर्चा 'भावप्रकाशन' में है। रूपकलक्षण मे व्राह्मणमत एवं बौद्धमत का स्मरणीय उल्लेख किया गया है। ३६, हरिपाल महाराज हरिपाल चालुक्यदंशीय सौराप्ट्रनरेश थे, इनकी राजधानी अभिनवपुर (नवानगर) थी। ये महाराज भीमदेव के पुत्र थे और इनकी उपाधि' (विचार- चतुम्मुर्ख' थी। इनका काल ११७५ ई० है। महाराज हरिपाल ने नाट्यविद्या-सम्बद्ध नारियों के लिए कावेरीतीर पर स्थित श्रीरङ्गम् मे 'सङ्गीतसुधाकर' नामक ग्रन्थ की रचना की। यद्यपि महाराज हरिपाल भरत के अनुयायी प्रतीत होते है, तथापि इन्होने 'भरता- रणव' (नन्दिकेश्वर मत के ग्रन्थ) से भी कुछ संगृहीत किया है। शुद्ध, छायालग इत्यादि वर्गीकरण एवं रागाङ्ग, भापाङ्ग, क्रियाङ्ग इत्यादि वर्गीकरण भी इनकी चर्चा का विषय बने है और सत्तर रागो का निदर्शन इन्होने किया है। महाराज हरिपाल ने करण- प्रकरण में कीतिधर एव नन्दी का अनुगमन किया है। सङ्गीतसुधाकर के प्रथम अध्याय में नृत्य, द्वितीय एवं तृतीय मे वाद्य और चतुर्थ मे गीत का प्रतिपादन है। ३७. सोमराजदेव इन्होने ११८० ई० में 'संगीत-रत्नावली' की रचना की। सोमराजदेव को सोमभूपाल भी कहा जाता है। ये सम्राट् अजयपाल और भीमपाल के वेत्राधिपति थे। ये स्वयं को 'चौलुक्यनृपतिप्रतिहारचूडामणि' कहते है। इनकी उपाधि 'नाट्यवेद- विरिज्चि' थी। सोमराजदेव अत्यन्त दानी थे, इनके पिता जगद्देव ने सिन्धु देश के राजा को पराजित किया था। 'सङ्गीत-रत्नावली' एक प्रौढ़ रचना है, इसमे नौ अध्याय है। इनमे क्रमश, वस्तु-सामान्य, स्वर और ग्राम, प्रवन्ध, बयालीस राग, देशी राग, ताल तथा अन्तिम तीन अध्यायो मे वाद्य का वर्णन है। इन्होने एकतन्त्री वीणा (ब्रह्मवीणा) एवं आलापिनी वीणा के लक्षण भी दिये है और नवीन प्रबन्धो की रचना भी की है। ३८. शार्द्गदेव वारहवी शती ई० मे सम्भवत राजनीतिक अस्थिरता के कारण कदमीर के एक विद्वान् ब्राह्मण श्रीभास्कर को दक्षिण मे आश्रय लेना पड़ा।

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श्रीभास्कर के पुत्र श्रीसोढल देवगिरि (दौलताबाद) के यादवनरेश भिल्लम और तत्पश्चात् उनके पुत्र सिघण (राज्यकाल १२१०-१२१७ ई०) के आश्रय मे रहे। श्रीसोढल के पुत्र आचार्य शार्गदेव भी महाराज सिंघण के आश्रित थे। 'सिहभूपाल (चौदहवी शती) का कथन है कि आचार्य शार्ङ्गदेव से पूर्व समस्त सङ्गीत- 'पद्धति विखर गयी थी, जिसे स्पष्ट रूप से शार्ङ्गदेव ने सँजो दिया। आचार्य शार्गदेव ने जिन-जिनके मत का मन्थन करके अपनी अमर कृति 'सङ्गीत- "रत्नाकर' का प्रणयन किया वे है-सदाशिव, शिवा, व्रह्मा, भरत, काश्यप, मतङ्ग, -याष्टिक, दुर्गा, शक्ति, शार्दूल, कोहल, विशाखिल, दत्तिल, कम्वल, अश्वतर, वायु, विश्वावसु, रम्भा, अर्जुन, नारद, तुम्बुरु, आञ्जनेय, मातृगुप्त, रावण, नन्दिकेश्वर, स्वाति, गण, बिन्दुराज, क्षेत्रराज, राहल, रुद्रट, नान्यदेव, भोज, परमर्दी, सोमेश्वर, जगदेक, नाटयशास्त्र के व्याख्याता लोल्लट, उद्भट, शकुक, अभिनवगुप्त, कीर्तिघर तथा अन्य अनेक सङ्गीतपारङ्गत। सङ्गीत-रत्नाकर उपलब्ध सङ्गीतग्रन्थो का मुकुट है। केशव, सिंहभूपाल तथा कल्लिनाथ ने सस्कृत मे तथा विट्ठल ने तेलुगु मे इस पर टीका की है। इसकी हिन्दी (व्रजभाषा) टीका के कर्ता कोई गङ्गाराम हुए है। रत्नाकर में प्राचीन एवं सामयिक सङ्गीत का विस्तृत वर्णन है। सात अव्यायों मे क्रमशः स्वर, राग, प्रकीर्ण विषय, प्रबन्ध, ताल, वाद्य एवं नृत्य का विशद वर्णन शार्गदेव ने किया है, इसी लिए इनका ग्रन्थ 'सप्ताध्यायी' कहलाता है। रत्नाकर मूर्च्छना-पद्धति का ग्रन्थ है, फलतः मेल-पद्धति या ठाठपद्धति की मान्य- न्ताओ से सवथा मुक्त होकर ही इस ग्रन्थ का समझा जाना सम्भव है।

किया है। शार्ङ्गदेव ने दुर्गा इत्यादि के मतो का आश्रय लेकर दो सौ चौसठ रागो का निरूपण

मेल-पद्धति के विचारक सङ्गीतसुधाकार रघुनाथ ने रत्नाकर के विपय को न समझने के कारण शार्गदेव का उपहास किया है। पाड्जी जाति की मतङ्गनिर्दिष्ट द्वादशस्वर-मूर्च्छना धैवतादि को रघुनाथ 'मेल' समझे है, जव कि मतङ्ग या शार्ङ्गदेव के ग्रन्थों में 'मेल' शब्द की चर्चा तक नही है। प्रो. के० वासुदेव शास्त्री का मत है कि पश्चाद्वर्ती रघुनाथ जैसे ग्रन्थकार संगीत- रत्नाकर तथा उससे पूर्व के ग्रन्थो को समझने मे असमर्थ रहे है। शार्ङ्गदेव द्वारा 'तुरुष्क गौड' एव 'तुरुष्क तोडी' चर्चा यह प्रमाणित करती है कि दक्षिण तक मे उस समय मुस्लिम सङ्गीत का प्रभाव पड चुका था।

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रत्नाकरवणित रागो में अनेक राग ऐसे है, जिनके साथ मालव, गौड, कर्णाट, बङ्गाल, द्रविड़, सौराष्ट्र, दक्षिण, गुर्जर-जैसे शब्द संलग्न है, जो इन रागो का विभिन्न प्रदेशो के साथ सम्बद्ध होना सिद्ध करते है। आचार्य्य शार्ङ्गदेव ने लिखा है कि मेरे समय मे वङ्गाल, भैरव, वराटी, गुर्जरी, वसन्त, धन्नासी, देशी, देशाख्या इत्यादि रागाङ्गो, डोम्बकी, प्रथममञ्जरी, कामोदा जैसे भाषाङ्गो, गौडकृति, देवकृति जैसे क्रियाङ्गो तथा भैरवी, मल्हार, कर्णाट गौड, तुरुष्क गौड, द्राविड गौड, ललिता इत्यादि उपाङ्गो के रूप मे सर्वथा परिवर्तन हो गया है।

रागो के वर्तमान रूपो के आधार पर रागवर्गीकरण की कुछ पद्धतियो को असङ्गत समझनेवाले व्यक्तियो के लिए शार्ङ्गंदेव का यह कथन ऑख खोल देनेवाला है। रत्नाकर के अनेक रागों का प्रत्यक्षीकरण करके 'वाक्' और 'गेय' की रचना हम कर चुके है।

३९. ज्याय सेनापति

ये वारङ्गल-नरेश महाराज गणपति के साले एवं सेनाध्यक्ष थे। गणपति स्वय भी शास्त्रकार थे, परन्तु उनकी कृति उपलब्ध नही। ज्याय सेनापति ने 'नृत्तरत्नावली' 'वाद्यरत्नावली' एवं 'गीतरत्नावली' की रचना की। नृत्तरत्नावली के अतिरिक्त अन्य दोनो ग्रन्थ अनुपलब्ध है। नृत्तरत्नावली के पूर्वार्द्ध में 'मार्ग' एव उत्तरार्ध में 'देशी' नृत्त पर अच्छा विचार किया गया है। इसका रचना-काल १२४९ ई० है। ज्याय सेनापति ने कीतिधर, तण्ड, अभिनवगुप्त एवं सोमेश्वर के मतों मे यत्र- तत्र कुछ सशोधन किये है। इनके ग्रन्थ मे 'आत्मचरित' नामक किसी ग्रन्थ की चर्चा भी है। ४०. पाल्कुरिकि सोमनाथ ये एक तेलुगु लेखक है। इनके ग्रन्थ 'पण्डिताराघ्यचरितम्' का रचनाकाल प्रायः १२७० ई० है। इनके द्वारा उल्लिखित वीणाएँ वीणोत्तमा, ब्रह्मवीणा, कैलासवीणा, सारङ्गवीणा, कर्मवीणा, आकाशवीणा, मार्गवीणा, रावणवीणा, गौरीवीणा, अम्विका- वीणा, वाणवीणा, काश्यपवीणा, स्वयम्भूवीणा, भुजङ्गवीणा, भोगवीणा, किन्नरवीणा, त्रिस्वरी वीणा, सरस्वतीवीणा, मोल्लिवीणा, मनोरथवीणा, गणनाधवीणा, रावण-

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हस्ता, चित्रिका, नाटयनागरिका, कुम्भिका, विपञ्ची, कसरि-वीणा, परिवारि-वीणा, स्वरमण्डल, घोषवती, औदुम्बरी, तन्त्रीसागर एव अम्बुज-वीणा है। मृदङ्गो मे समहस्त, वैसालम् इत्यादि की चर्चा है। नन्दी के एक सौ आठ भङ्ग, वंश के उनचास भेद, वाईस गमक, एक सौ आठ राग, बारह वाचक, पाँच स्वादु, तीन स्थान, वत्तीस शुद्ध ठाय, पन्द्रह सालग ठाय, अडतालीस लास्य रङ्ग, बीस अङ्गहार, इत्यादि वस्तुएँ इस ग्रन्थ के पर्वत-प्रकरण मे उद्धृत है। इनमें से अधिकांश अन्यत्र अज्ञात है।

४१. महाराणा हम्मीर 'तिरिया तेल, हमीर-हठ, चढै न दूजी वार' लोकोक्ति में जिन स्वाभिमानी नरेश महाराणा हम्मीर की चर्चा है, वे प्रतापी योद्धा होने के अतिरिक्त संगीत के धुरन्वर आचार्य एवं ग्रन्थकार भी थे। ये 'शाकम्भरी' प्रदेश के अधिपति थे, इन्होने अपने प्रसिद्ध ग्रन्थ 'शृङ्गारहार' की रचना १३०० ई० से पूर्व की। श्रङ्गारहार मे व्रह्ममत के 'गान्धर्वामृतसागर' से उद्धरण दिये गये हैं। अन्तिम अध्याय में रसो के उदाहरण 'अमरुकशतक', 'उत्तररामचरित', 'सप्तशती' (प्राकृत), 'मेघसन्देश', 'कुमारसम्भव', 'वीरचरित', 'नागानन्द' एव 'राकुन्तला' (नाटक) से लिये गये है। महाराणा हम्मीर ने अन्य लेखको के अतिरिक्त अर्जुन, याष्टिक, रावण, दुर्गाशक्ति, अनिल, कोहल, कम्बल, जैत्रसिह, रुद्रट, भोज, विक्रम, जगदेव, केशिदेव, सिंहण, गणपति एवं जयसिह की प्रशसा की है। ये शैव थे। 'प्रसिद्धालकारो' का वर्णन इन्होने किया है। इनका कथन है कि जातियों की उत्पत्ति सामवेद से हुई है। इन्होने प्राचीन रागो के अतिरिक्त याष्टिक के बीस भापारागो एव पन्द्रह जनक रागो का वर्णन भी किया है। तिरपन देशी राग भी इन्होने दिये है। 'रूप' और 'गीत' पर पृथक्-पृथक् अध्याय लिखे है। मोक्षदेव ने इस ग्रन्थ से बहुत कुछ जैसा का तैसा ले लिया है। हम्मीर ने तालाघ्याय में एक सौ वीस ताल दिये है। एकतन्त्री, नकुला, किन्नरी और आलापिनी के विषय में इन्होने लिखा है। इन्होने दृष्टियो का वर्णन किया है, फिर पुष्पाञ्जलि की चर्चा की है। इनके ग्रन्थ का अन्तिम अध्याय नाटय पर है। २०

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४२. अल्लराज ये महाराणा हम्मीर के पुत्र थे। इनकी रचना 'रसतत्त्व समुच्चय' में पाँच अध्याय है। आदिम चार अध्यायों मे 'संगीत' एवं अन्तिम अध्याय में साहित्य का वर्णन है। 'रसतत्त्वसमुच्चय' एक प्रौड़ रचना है।

४३. पार्श्वदेव

पाश्वदेव जैनमतावलम्त्री आचार्य थे। इनके पिता व्राह्मण थे। पार्श्वदेव का काल प्राय: १३०० ई० है। इनके ग्रन्थ 'सङ्गीतसमयसार' मे दस अध्याय है। प्रथम अध्याय मे वेदमूलक 'सङ्गीत' है, द्वितीय अध्याय में नाड़ी से सम्वद्ध विचार है। अवशिष्ट अध्याय देशी सङ्गीत से सम्वद्ध है। सिहभूपाल ने 'रत्नाकर' की टीका में पार्श्वदेव के ग्रन्थ से अनेक श्लोक उद्धृत किये है। पार्श्वदेव ने जाति-गान को मार्गसगीत कहा है। इन्होने छियासठ श्रुतियो के नाम दिये है, जो 'कोहल' के अनुसार है। तानयज्ञो पर विचार करते हुए पार्श्वदेव ने कहा है कि गायको को तानो के द्वारा यनफल की प्राप्ति होती है। तृतीय अध्याय मे पार्श्वदेव ने रागो पर विचार किया है। इनके ग्रन्थ को प्रामाणिक रचना समझा जाता है।

४४. गोपाल नायक

तेरहवी शती ई० मे ये सङ्गीत के प्रामाणिक आचार्य, रचनाकार एवं कलाविद् हुए है। कुछ लोगों के अनुसार ये देवगिरि के राजा के आश्रित थे, परन्तु इस सम्बन्ध में कुछ प्रमाण नहीं। हमारी दृष्टि में ये उत्तर-भारतीय आचार्य थे। कारण निम्नलिखित है- (१) इनके प्रसिद्ध गुरु 'वैजू' थे। बजनाथ का संक्षेप 'वैजू' हो जाना उत्तर- भारतीय भापाओं तथा व्रज-प्रदेश की विशेपता है। (२) अनेक प्रामाणिक ध्रुवपदों मे वैजू गोपाल को 'गुपला' कहकर सम्बोधित करते है। 'गुपला' अपभ्रंश भी हिन्दी की विशेषता है। (३) दक्षिण से मलिक काफूर के द्वारा जो सङ्गीतज्ञ वलात् लाये गये, उनमें इनका नाम नही।

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(४) इनके कुछ सुरक्षित ध्रुवपदो से साक्ष्य मिलता है कि इन्होने नान्यदेव मिथिलानरेश की कृति से प्रभाव ग्रहण किया। (५) इनके एक ग्रन्थ 'तौर्य्यंत्रिकसार' का पता हमे चला है, जो व्रजभापा में है। उसके अनेक ध्रुवपद तत्कालीन स्थिति एव यवनो द्वारा सङ्गीत में किये जानेवाले परि- वर्तनो की चर्चा करते है। इनके सम्बन्ध मे डागुर वश के एक वृद्धतम प्रतिनिधि के पास सुरक्षित ध्रुवपदो से ये तथ्य प्रमाणित होते है- गोपाल, वैजू के प्रिय एव होनहार शिष्य थे। इन्हे गान्धार स्वर पर जब विलक्षण अधिकार हो गया तब इन्हे अभिमान हुआ और ये निकल खड़े हुए। दिल्ली आये, और इनकी चर्चा अलाउद्दीन खिलजी तक पहुँची। खिलजी के समक्ष इन्होने सस्कृत का ध्रुवपद गाया, जब वह उस ध्रुवपद को नही समझा, तब इन्होने हिन्दी मे ध्रुवपद गाये। मुसलमानो ने षड्ज-मध्यम-भाव का विनाश करके षड्ज-पञ्चम-भाव की स्थापना की। मूर्च्छना-पद्धति के स्थान पर एक और पद्धति (मुकाम-पद्धति) अपनायी। वीणा मे सारें अचल कर दी। फलतः एक राग की दो 'सरगम' हो गयी। स्वरो के नाम बदल गये, सात प्रकट रहे और सात गुप्त। उधर अपने प्रतिभाशाली शिष्य के वियोग मे वैजू 'बावरे' हो गये और ढूँढते- ढूंढते उन्होने यवनो मे फँसे हुए गोपाल को पाकर डाँटा और कहा कि तूने केवल एक गान्धार सिद्ध किया और तुझे इतना अभिमान हो गया, तेरे अवशिष्ट स्वरो की स्थिति क्या है? तू यवनों मे आ फँसा, तूने विद्या दी नही, छिना दी। इन लोगो को श्रुति, स्वर, ग्राम, मूर्च्छना इत्यादि का भेद न बता। शत्रुओ पर नागपाश डाल, जव कोई गुणी इस जाति मे उत्पन्न होगा, तब यह भेद खुलेगा। एक सहस्र बैजू के और एक सहस्र अपने ध्रुवपदो का सग्रह गोपाल ने किया। नान्यदेव के भरतभाष्य का अध्ययन करनेवाले गोपाल नायक का पाण्डित्य असन्दिग्ध है। कल्लिनाथ एव वेंकट मखी ने इनकी चर्चा सम्मानपूर्वक की है।

४५. अमीर खुसरो इस महान् प्रतिभाशाली कूटनीतिज्ञ, विद्वान्, कवि एवं सगीतज्ञ का जन्म १२५४ ई० मे हुआ। इन्होने दिल्ली के सिहासन पर क्रमश. ग्यारह सम्राटो को देखा था। ये तुर्की, फारसी, अरवी एवं हिन्दी के मर्मज्ञ विद्वान् थे, सस्कृत का भी कुछ ज्ञान इन्हे था। हिन्दी साहित्य के इतिहास, सूफी परम्परा, इतिहास, फारसी साहित्य एवं

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सङ्गीत के विद्यार्थियो के लिए इनका नाम विस्मरणीय नही। निस्सन्देह इन जैसी प्रतिभाओ से संसार कही शतान्दियों मे सुशोभित होता है। ये सूफी थे और प्रसिद्ध सूफी सन्त हजरत निजामुद्दीन के मुरीद। इनमें नकल करने की प्रवृत्ति बहुत अधिक थी। फारसी रचनाओ को सम्मुख रखकर वैसी ही रचना करने मे इनको आनन्द आता था। ईरानी सङ्गीत का इन्हे सैद्धान्तिक एवं व्यावहारिक ज्ञान था और भारतीय संगीत का केवल व्यावहारिक। भारतीय सिद्धान्तों से इन्हे परिचय न प्राप्त हो सका। मुसलमान इनका नाम 'हजरत अमीर खुसरो रहमतुल्ला अलेह' कहकर लेते है। इन्होने अपने समय दिल्ली के आसपास प्रचलित रागो का सम्भवतः मुकाम-पद्धति से वर्गीकरण किया। मूर्च्छना-पद्धति का जान इन्हे नही था। ये ईरानी और भारतीय संगीतज्ञो मे विवाद कराते और सार-ग्रहण की चेप्टा करते थे। ईरानी सङ्गीत पर प्रागैतिहासिक काल से भारतीय प्रभाव था, इसी लिए वह भारतीय रागो मे घुल-मिल गया। इन्होने नये संकीर्ण रागो, नये तालों की रचना की। कौल और तराना की रचना इन्होने अवुलफज्ल के कथनानुसार 'समित' और 'तातार' की सहायता से की। सम्भव है 'समित' शब्द भारतीय गायकों को किसी 'समिति' का वाचक हो। खयाल के प्रवर्तक भी यही कहे जाते है। सितार और तवले की चर्चा खुसरो के किसी ग्रन्थ में कही नही है। ईरानी संगीत ने खुसरो के बहुत पूर्व से 'सहतार' की चर्चा है, जो भारतीय 'त्रितन्त्री' शब्द का ठीक- ठीक पर्याय है। वाजिदअली शाह ने कहा है-"खुसरो ने अपने आविष्कारों से उन नियमो एवं बाद्यो का विनाश कर दिया, जो सहस्रों वर्पों से चले आते थे। खुसरो के शिष्यों ने अपनी घृष्टता मे आकर उन कलावन्तो से झगडा किया, जो महादेव के समय से चली आनेवाली परम्पराओ के प्रतिनिधि थे। खुसरो ध्रुवपद के नही, खयाल के नायक थे।" औरंगजेवकालीन लेखक फ़करुल्लाह ने एक जनश्रुति के रूप मे कहा है- "खुसरो ने छिपकर अलाउद्दीन के दरवार मे निमन्त्रित गोपाल नायक का संगीत सुना, फिर उन्ही रागो की 'नकल' करके गोपाल नायक को चकित कर दिया और कहा कि मैं पहले ही इन रागों का आविष्कार स्वयं कर चुका हूँ।" अमीर खुसरो के अधिकाश आविष्कार आज काल के गर्भ मे समा चुके है।

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भारतीय संगोत की महाविभूतियाँ २०९ ४६. श्रृङ्गारशेखर

ये वारङ्गल तैलङ्गाना के निवासी थे। इनकी रचना 'अभिनयभूपण' है। प्रताप- रुद्र (१३३० ई०) के सभासद् वीरभल्लट को इन्होने अपना गुरु कहा है। 'अभिनयभूपण' पर तामिल टीका भी उपलब्ध है। इस ग्रन्थ का भरत-पद्धति से सम्वन्ध खोजना कठिन है। इसमे शुकाचार्य, स्कन्द, वृहस्पति, कोहल, दुर्वासा, अर्जुन, वायुसूनु, भरताणंव, नन्दिकेश्वर, यात्वल्क्य इत्यादि के उद्धरण है। शृङ्गारशेखर ने नक्षत्रो एव राशियो का साङ्गीतिक वर्णन किया है। पुरुष एवं स्त्री-रागों की चर्चा भी इन्होने की है। इनके अनुसार पुरुष राग आठ है, जिनके नाम भूपाल, भैरव, श्री, कलपञ्जर, वसन्त, बङ्गाल, मालव एवं टक है।

भूपाल की पत्नियॉ- वेलाकुली, मलहरी और मौलि, भैरव की पत्नियॉ- देवक्रिया, मेघरञ्जी और करञ्जी, श्रीराग की पत्नियॉ- हिन्दोली और माहुरी, कलपञ्जर की पत्नियॉ- शकराभरण, देशी और ललिता, वसन्त की पत्नियॉ- रामक्रिया, वराली और कौलिका, मालव की पत्नियॉ- गुण्डक्रिया और गुर्जरी, वङ्गाल की पत्नियॉ- धन्यासिका, काम्भोजी एवं कर्णाटगौडिका, नाटक या नाट की पत्नियॉ- नारायण, गौड, देशाक्षी और आहिरी है। कुछ लोग राग-रागिनी-वर्गीकरण को केवल उत्तर भारत की विशेपता मानते हैं, परन्तु दाक्षिणात्य शृङ्गारशेखर का उपर्युक्त वर्गीकरण इस धारणा को भ्रान्त सिद्ध करता है।

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३१० भरत का संगीत-सिद्धान्त

४७. शम्भुराज ये काञ्चीनरेग थे। इनका काल १३५० ई० है। इनका ग्रन्थ है 'शम्भुराजीय'। पण्डित-मण्डली ने अपने उपजीव्य ग्रन्थो मे 'शम्भुराजीय' की चर्चा की है।

४८. मदनपाल

ये दिल्ली के सम्राट् थे और १३७५ ई० मे दिल्ली पर इनका अधिकार था। ये एक तेलुगु राजकुमार थे और इन्होने धर्म्मशास्त्र, निघण्टु एवं सङ्गीत पर कई ग्रन्थ लिखे थे। विश्वेश्वर नामक एक महाविद्वान् इनके सहायक थे। इनके ग्रन्थ 'आनन्द- सञ्जीवन' की चर्चा कुम्भकर्ण ने 'नृत्यरत्नकोश' एव पण्डितमण्डली ने 'सङ्गीत- शिरोमणि' मे की है। मदनपाल के ग्रन्थ का आरम्भ तालाव्याय से है, जिसमें एक सौ तीस ताल और तत्पश्चात् प्रस्तार है। दूसरे अध्याय मे राग और तीसरे अध्याय मे प्रवन्ध है, जो अकस्मात् समाप्त हो जाता है। यह ग्रन्थ सक्षिप्त है। रागलक्षणों में रागों की तानें दी गयी हैं। रचना-काल १३५० ई० है।

४९. विद्यारण्य

ये अनेक शास्त्रो के प्रकाण्ड पण्डित एवं उद्धारक थे। इन्हीं की सहायता से १३३६ ई० मे तुङ्गभद्रा नदी के तट पर विजयनगर साम्राज्य की आधारशिला रखी गयी। विद्यारण्य साधवाचार्य इस साम्राज्य के महामन्त्री थे और हरिहर प्रथम नरेश। नवस्थापित विजयनगर मे देश भर के विद्वान् एवं गुणियों को आकृष्ट करने का श्रेय श्री विद्यारण्य को है। के० वासुदेव शास्त्री का कथन है कि अत्यन्त प्रयत्न करने पर श्री विद्यारण्य को प्रचलित पचास राग मिले, जिनका दर्गीकरण उन्होने पन्द्रह मेलो में किया। हमारी दृष्टि मे मेल-पद्धति ईरानी मुकाम-पद्धति का रूपान्तर है, जो सारिकाओं का अचल रूप लिये उत्तर भारत से पहुँची, विद्यारण्यजी के पन्द्रह मेलों में 'हेजुज्जी- मेल' भी ईरानी 'हिजाज' का प्रभाव विद्यारण्यजी की मेल-पद्धति पर प्रमाणित करता है। मूर्च्छना-पद्धति उस समय सुवोध नही रही थी, फलत वादको के लिए सुकर मेल- पद्धति चल पड़ी।

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भारतीय संगीत की महाविभूतियाँ ३११

मेल शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम विद्यारण्यजी ने किया है, उनका ग्रन्थ 'सगीत- सार' था, जो आज उपलब्ध नही। रघुनाथ ने विद्यारण्यजी के मत का वर्णन किया है। विद्यारण्यजी के पन्द्रह मेल (१) नट्टा, (२) गुर्जरिका, (३) वराटिका, (४) श्री (५) भैरविका, (६) शकराभरण, (७) आहरिका, (८) वसन्तभैरवी, (९) सामन्त, (१०) काम्बोदिका, (११) मुखारिका, (१२) शुद्धरामक्रिया, (१३ ) केदारगौड, (१४) हीजुज्जी, (१५) देशाक्षिका नामक रागो मे प्रयोज्य है, इन्ही मे अन्य प्रचलित राग भी आ जाते थे।

५०. भुवनानन्द ये वङ्गाल-निवासी थे। इनका काल १३५० ई० है। ये जन्मना मैथिल थे और इनकी उपाधि 'कविकण्ठाभरण' थी। इनका ग्रन्थ 'विश्वप्रदीप' है, जिसमे विविध विपय है। सङ्गीतभाग का नाम 'सङ्गीतालोक' है, जिसमे २६०० श्लोक है। सगीता- लोक के छः अध्यायो मे क्रमश. नाद, राग, ताल, गीत, प्रकीर्णक एव वाद्य का वर्णन है। भुवनानन्द ने शिव, नन्दिकेश्वर, शिवा, तुम्बुरु, वायु, नारद, कम्वल, अश्वतर, विश्वावसु, काश्यप, शार्दूल, परमर्दी, कुण्डिन, कोहल, शक्ति, श्रीभरत, याष्टिक, दशग्रीव, उद्भट, लोल्लट, शकुक, अभिनवगुप्त, विशाखिल, श्रीभूवल्लभ, अनिलज, लाटक (?) मातृगुप्त इत्यादि का स्मरण किया है। ५१. देवेन्द्रभट्ट ये महाकवि रुद्राचार्य के शिष्य एव ग्वालियर के निवासी थे। इनका काल १३५० ई० है। इनकी रचना 'सङ्गीतमुक्तावली' मे शार्ङ्गदेव इत्यादि की भी चर्चा है। पण्डितमण्डली ने अपने सहायक ग्रन्थो मे 'सगीतमुक्तावली' की चर्चा की है। मुक्तावली मे नवीन नृत्यप्रक्रिया पर भलीभॉति विचार किया गया है। आन्ध्र, महाराष्ट्र, कर्णाटकी शौलियाँ भी दी गयी है। ५२. भट्टमाधव ये वाराणसी-निवासी थे। इन्होने 'सङ्गीत-दीपिका' या 'सङ्गीतचन्द्रिका' की रचना की है। नन्द्यावर्त, जीमूत और सौभद्र ग्राम इनके द्वारा चर्चा का विपय बने हैं और इनके द्वारा राग-रागिनी-वर्गीकरण अपनाया गया है। इनके ग्रन्थ का रचना-काल प्राय १४०० ई० है। रघुनाथ ने सगीतसुधा मे इनकी चर्चा की है।

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३१२ भरत का संगीत-सिद्धान्त

५३. विप्रदास

इनकी उपाधियॉ शुक्लपण्डित, सत्यवाक्, शिववल्लभ, विचित्रक, विचित्रवाक्, करणाग्रणी और प्रभुसूरि थी। इनके पिता 'निधिकर' थे। विप्रदास के ग्रन्थ का नाम 'सङ्गीतचन्द्र' है, जिसका भाग 'नृत्यप्रकाश' ही उपलब्ध है। विप्रदास ने सिंगण, माधव, शार्ङ्गदेव तथा अन्य कुछ पूर्ववर्ती आचायों की चर्चा की है। इनकी शैली प्रौढ़ एव सक्षेपप्रिय है। इन पर अभिनवगुप्त का पर्याप्त प्रभाव है। ५४. वेम

ये कोण्डवीटि नगर के रेड्डिवशीय राजा थे। इनकी रचना 'सङ्गीतचिन्तामणि' है। इस ग्रन्थ के वही खण्ड उपलब् है, जिनमे वाद्य एवं नृत्य का वर्णन है। इन दोनो खण्डो मे छः सहस्र श्लोक है। इनका आनुमानिक काल चौदहवी शती ई० है।

५५. सिगणार्य

ये वेम तथा प्रौढ देवराय इत्यादि राजाओ के आश्रय मे रहे थे। इन्होने 'भरत- मिति' नामक ग्रन्थ लिखा, जो नाटयशास्त्र की व्याख्या मात्र है। इनके पौत्र विट्ठल ने तेलुगु मे सङ्गीतरत्नाकर की टीका की है। विप्रदास, वेम, हम्मीर इत्यादि ने एक और सिंगणार्य की चर्चा की है।

५६. सिगभूपाल या सिहभूपाल

इनका समय चौदहवी शती ई० है। ये सगीतरत्नाकर के सर्वप्रथम टीकाकार है। अपनी एक अन्य रचना 'रसार्णवसुधाकर' में इन्होने अपने वश का परिचय दिया है। ये शूद्र जातीय राजा थे। इनके पिता अनपोत (उपनाम अनन्त)और पितामह दाचन थे, जिन्होने पाण्डयनरेश को पराजित करके 'खड्गनारायण' उपाधि धारण की। सिहभूपाल के अग्रज देवगिरीश्वर का स्वर्गवास शीध्र ही हो गया। विन्ध्यपर्वत एवं थ्रीशैल के मध्य मे स्थित 'रागाचल' सिहभूपाल की राजधानी थी। रत्नाकर की टीका 'संगीत-सुधाकर' मे सिहभूपाल ने कहा है कि शार्गदेव के उदय से पूर्व भरत इत्यादि के ग्रन्थ दुर्वोध हो गये थे और संगीतपद्धति विखर गयी थी। शार्गदेव ने उसे एकत्र एव सुवोध कर दिया। संगीतरत्नाकर के मर्म को गिने-चुने

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लोग ही जानते है, सिहभूपाल ही उसकी व्याख्या करने मे समर्थ है, क्योकि उसने ही चिरन्तन अभ्यास से भरत इत्यादि के दुर्बोध ग्रन्थों को समझा है। सिहभूपाल की टीका सुंवोध एव महत्त्वपूर्ण है। इसमे 'सङ्गीतसमयसार', 'नन्दिकेश्वर', मतङ्ग, नैपध, वेदान्तकल्पतरु, विचार-चिन्तामणि, दत्तिल पर प्रयोग- स्तवक व्याख्या इत्यादि की चर्चा है। सिहभूपाल ने लिखा है कि लोक में वैणिक यथेच्छ स्थानो पर स्वरों की स्थापना करते है। ५७. पण्डितमण्डली जौनपुर के सुलतान इब्राहीम शर्की (१४००-१४४० ई०) के समय मलिक सुलतान कडा का अधिपति था। इसके पुत्र बहादुर मलिक ने सङ्गीत एव नाटय पर अनेक ग्रन्थ एकत्र किये तथा भारत के प्रत्येक भाग से अनेक शास्त्रों के पण्डितो को बुलाकर इकट्ठा किया। उस पण्डित-मण्डली के समक्ष बहादुर मलिक ने कहा कि पण्डितवृन्द मेरा ग्रन्थ- सग्रह देखें और उसके आधार पर एक ऐसे ग्रन्थ की रचना करे, जिसमे सङ्गीत-सम्बन्धी मतभेदो का निर्णय हो। गम्भीर चिन्तन एव विचार-विनिमय के परिणामस्वरूप इस ग्रन्थ मे सङ्गीतसम्वन्धी विभिन्न सिद्धान्त एव निष्कर्प होने चाहिए। बहादुर मलिक के विद्या-प्रेम के परिणामस्वरूप उन समस्त पण्डितो के सम्मिलित प्रयत्न के द्वारा 'सङ्गीतशिरोमणि' नामक एक सुन्दर ग्रन्थ की रचना १४२९ ई० मे हुई। संगीत-शिरोमणि की प्रति खण्डित रूप मे उपलब्ध हुई है, फलत. इसके कर्ताओं के नाम तो नही मिलते, आधारग्रन्थो के नाम प्राप्त है। वे आधारग्रन्थ, सगीतसागर, रागा्णव, सङ्गीतदीपिका, सङ्गीतचूडामणि, वादिमत्तगजाकुश, सगीतरत्नाकर, सङ्गीतदर्पण, तालार्णव, सङ्गीतकल्पवृक्ष, सङ्गीतरत्नावली, नृत्यरत्नावली, सङ्गीत- मुद्रा, संगीतोपनिषत्सार, सगीतसारकलिका, सङ्गीतविनोद, आनन्दसञ्जीवन, मुक्ता- वली तथा अन्य अनेक ग्रन्थ है। 'सङ्गीतशिरोमणि' मे सम्भवत. पाँच या छ प्रकाश रहे होगे, अब केवल प्रथम एव चतुर्थ उपलब्ध है। प्रथम अध्याय का परिशीलन बताता है कि इस ग्रन्थ के सग्राहक व्यर्थ विस्तार से बचे है। जिस विपय मे मतभेद है, वहाँ सभी सम्प्रदायों की चर्चा की गयी है। 'संगीतशिरोमणि' का प्रबन्ध भाग भी पृथक् मिला है, जिसमे परमर्दी, अर्जुन, सोमेश्वर, प्रताप पृथ्वीपति आदि की चर्चा है।

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५८. कुम्भ मेवाड के प्रसिद्ध विजयी महाराणा कुम्भकर्ण या कुम्भा 'संगीतराज' नामक एक प्रौढ ग्रन्थ के रचयिता है। इस ग्रन्थ मे पॉच अध्याय है। प्रत्येक अध्याय मे चार प्रकरण और प्रत्येक प्रकरण मे चार परिच्छेद है। सोलह सहस्र श्लोको मे यह ग्रन्थ पूर्ण हुआ है। कुम्भ ने विपय-विभाजन इत्यादि मे शार्ङ्गदेव का अनुकरण किया है तथा अभिनव- गुप्त, विप्रदास, अशोक, देवेन्द्र, मदन एवं पण्डित-मण्डली का प्रभाव भी उन पर है। महाराणा कुम्भ की पुत्री और पुत्र ने १४८० ई० के अभिलेख में महाराणा कुम्भः की कृति 'गीतगोदिन्दटीका' एवं 'सगीतराज' की चर्चा की है। महाराणा कुम्भ ने जहाँ भरत, मतङ्ग एव अभिनवगुप्त इत्यादि के सिद्धान्तो पर असाधारण अधिकार प्रकट किया है, वहॉ देशी संगीत की कुछ विशिष्ट प्रवृत्तियो की ओर भी सकेत किया है। रागो के ध्यान भी दिये है। ५९. देवण भट्ट

इनका समय १४५० ई० है। 'सगीतमुक्तावलि' नामक एक अच्छा ग्रन्थ इनकी रचना है। देवेन्द्र के गतिलक्षण से भी इसमें कुछ श्लोक उद्धृत है। ६०. कल्लिनाथ इनके पिता लक्ष्मीधर एवं पितामह वल्लभदेव शाण्डिल्यगोत्रीय विद्वान् थे।* विजयनगर के यादव वंशीय राजा इम्मडिदेव (१४४६-१४६५ ई०) आचार्य कल्लिनाथ के आश्रयदाता थे। आचार्य कल्लिनाथ संगीतरत्नाकर पर अपनी टीका के कारण प्रसिद्ध है।

*इस अनुवन्ध का प्रयोजन शोध मे रुचि रखनेवाले सज्जनों को सगीत सम्बन्धी आचार्यो एवं ग्रन्थो का परिचय कराना है। जिन विभूतियो या कृतियो की चर्चा यहाँ की गयी है, उनके अतिरिक्त भी आचार्य और रचनाएँ होगी, उनकी खोज एक महत्त्वपूर्ण विषय है। भारतीय सङ्गीत के प्रामाणिक इतिहास एवं विकास को जानने के लिए उन कृतियो का सूक्ष्म परिशीलन आवश्यक है, जिनकी चर्चा हुई है। इस कार्य के महत्त्व की ओर देग के सभी सङ्गीतानुरागियो का ध्यान जाना चाहिए। इन समस्त उपलब्ध ग्रन्थो की प्रतिलिपियों का सग्रह एक केन्द्र मे होना और उपयुक्त स्थितियों का उत्पन्न किया जाना परमावश्यक है।

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भारतीय संगीत की महाविभूतिया ३१५

उपजीव्य सामग्री

ग्रन्थ लेखक संस्करण

२. अभिज्ञानशाकुन्तलम् कालिदास कलकत्ता-संस्करण, सं० १९४६ वि० २. अभिनवभारती अभिनवगुप्त गायकवाड-सीरीज ३. अमरकोश अमरसिह निर्णयसागर-सस्करण, १८८२ ई० ४. अमरविवेक महेश्वर 11 11 ५. कलानिधि कल्लिनाथ आनन्दाश्रम-सस्करण एवं अडयार- सस्करण ६. काव्यप्रकाश मम्मट बम्वई-सस्करण, १९१७ ई० ७. काव्यप्रकाश टीका वामन 11 ८. तर्कसंग्रह अन्नभट्ट टीकात्रयोपेत, प्रथम काशी-संस्करण ९. तैत्तिरीय प्रातिशाख्य मद्रास-युनिवर्सिटी-सस्करण १०. ध्वन्यालोक आनन्दवर्धन गौतम बुकडिपो, दिल्ली, प्रथम संस्क- रण १९५२ ई० ११. नाटयशास्त्र वम्बई-सस्करण, काशी-संस्करण, वडोदा-सस्करण, प्रो० भोलानाथ कृत हिन्दी व्याख्या सहित प्रथम तीन अध्याय, साहित्य-निकेतन कानपुर १२. निरुक्त यास्क भास्कर पुस्तकालय, कनखल १३. निरुक्त-टीका दुर्गाचार्य भास्कर पुस्तकालय, कनखल १४. भरत-कोग प्रोफ़ेसर रामकृष्ण तिरुपति-सस्करण कवि १५. महाभाष्य पतञ्जलि निर्णयसागर-सस्करण १६. माहिपेय भाष्य. मद्रास युनिवर्सिटी-सस्करण १७. रामायण वाल्मीकि रामकृत टीकासहित निर्णयसागर- संस्करण १८. श्रीमद्भागवत (मूल) वेदव्यास वेकटेश्वर प्रेस-सस्करण १९. साहित्यदर्पण विश्वनाथ विमलाटीकासहित, लखनऊ

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ग्रन्थ लेखक संस्करण

सस्करण (द्वितीय) २०. सिद्धान्तकौमुदी भट्टोजिदीक्षित तत्त्ववोधिनी सहित, वम्बई-संस्करण २१. सङ्गीतरत्नाकर गार्गदेव अडयार-संस्करण एवं आनन्दाश्रम- संस्करण २२. सुधाकर सिंहभूपाल 11

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सल्ुकमारका

अ अंश स्वर (लक्षण), ४९,७८,८४ अन्ववसर्ग, १७ अपन्यास (लक्षण), ४९, ८३, १२१ अगस्त्य, २९४ अपरान्तक, २४४ अचलवीण, २० अवुलफ़ज़्ल, ३०८ अजयपाल, ३०२ अभिनय भूपण, २९४,३०९ अतीतग्रह, २४४ अभिनवगुप्त, २,३,५४, ५५, ७४, अथववेद, ४ १३३, १३४, १३५, २५१, २५६, अनश (लक्षण), ८४ २६२, २६३, २६८, २६९, २७९, अनपोत, ३१२ २८०, २९०, २९१, २९२, २९६, अनभ्यास (लक्षण), ८४ २९७, २९८, २९९, ३०३, ३०४, अनागत, २४४ ३११, ३१२, ३१४ अनालम्वी, २९१ अभिनवपुर, २०२ अनिबद्ध पद (लक्षण), २५० अभिनव भारती, २,२९९ अनिल, ३०५ अभिरुद्गता, ३८, ४४, ४५, ५१, अनिलज, ३११ ७१, ७३ अनुभाव (लक्षण), २५८ अभिलपितार्थ चिन्तामणि, ३००, ३०१ अनुमितिवाद, २५९ अमरकोश, १८, २९३, २९८ अन्तर (लक्षण), ७ अमरविवेक, १८ अन्तर गान्वार, (लक्षण), ७,९,११, अमरुकशतक, ३०५ १४,२७,२८,१९१ अम्बाहेरिका, २२७ अन्तर मार्ग (लक्षण), ८४,८६ अम्विका, ३०४ अन्तर साधारण (लक्षण), १९२ अम्बुजवीणा, ३०५ अन्तरा (लक्षण), २५३ अर्जुन, २९४, २९८, ३०३, ३०५, अन्नभट्ट, १ ३०९, ३१३ अन्योपरागजा, २३२ अर्धमागधी (लक्षण), २४५, २४६

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अर्ववेसरी, २२९ आभीरी, २२७, २३२ अलाउद्दीन, २०७, ३०८ आम्रपञ्चम, २२५ अल्पत्व (लक्षण), ८४ आयतत्व, १६, १७ अल्लराज, ३०६ आयाम, १६, १७ अवपाणि, २४४ आंरम्भ (लक्षण), १३५ अविनाशी, ४७ आर्पमी, ७४, ७५, ७६, ७१, ८०, ८२ अविलोपी, ४७ ९५, ८३, ८५, १३०, अशोक, ३१४ आलाप (लक्षण) १३५, २५४ अश्वकान्ता, ३८, ४४, ४६, ५१, ५२, आलापिनी, ३०२ ७०, ७३ आवाप, २३५ अग्वतर, १९४, १९६, १९७, २८१, आवृत्ति, (लक्षण), २४२ २९५, ३०३, ३११ आसारित, २४४ आ आसावरी, २८७ आक्षिप्तिका, २५५ आहरिका, ३११ आक्षेपिकी (लक्षण), २५३ आहरी, ३०९ आब्जनेय, २७८, २७९, २८१, २८४, इ २९५, २९६, ३०१ इम्मडिदेव, २८२, ३१५१ आञ्जनेय सहिता, २९५ उ

आत्मचरित, ३०४ उत्तर, २३६, २४४ आनन्दवर्वन, २६६ उत्तरमन्द्रा, ३८, ४३, ४६, ५१, ५२, आनन्दसञ्जीवन, ३१०, ३१३ ५३, ५४, ५५, ५९, ६०, ६१, ६४, आन्वालिका, २२८ ६५, ६६, ६७,६८, ७१, १३३,२७७ आन्वाली, २८३ उत्तररामचरित, ३०५ आन्ध्र, ३११ उत्तरायता, ३८, ४३, ४६, ५१, ६७, आन्ध्री, ७४, ७५, ७६, ८०, ८२, ८३, ६८, ७२ १३०, १३२, १८१ उत्पत्तिवाद, २५९ आन्ध्री (भापा), २२७ उद्घट्ट, २४१ आन्ध्री (विभापा), २२७ उद्भट, २, ३०३, ३११ आपिर्गलल, ३०३ उपनिपद्, २ आभीरिका, २२७, २२९ उपमन्द्र, २९१

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  • ३१९-

उपराग, २२४ औरङ्गजेब, ३०८ उपरिपाणि, २४४ क

उपाङ्ज, २३३ 'क' अन्तर, २६, ३० उपोहन (लक्षण), ८७,८८ ककुभ, २२४, २२६ उरता, १७ कच्छेल्ली, २२९ उल्लोप्य, २४४ कन्दर्प, २२५ उपा, २९१ कम्बल, १९४, १९६, १९७, २८१,

ऋ २९५, ३०३, ३०५, ३११ ऋक, २४४ कन्रिका, ४८

ऋग्वेद, ४ करञ्जी, ३०९

ऋषभ-पञ्चम, ७,९,२३,२४ करण (लक्षण), २५५ ऋपभाश आन्ध्री, १३१ करुण, ९९, १०८ ऋषभांश आर्पभी, ९६ करणाग्रणी, ३१२ ऋपभाश कार्मारवी, १२८ कर्णाट, ३०० ३०४, ऋपभाश विककृत धैवती, १०७ कर्णाट (देश), ३११ ऋपभाश विकृत नैपादी, १०९ कर्णाट गौड, २८३, २०४ ऋपभाश विकृत पञ्चमी, १०४ कर्नाट गौडिका, ३०९

ऋषभाश पड्जमध्यमा, ११७ कलपञन्जर, ३०९ कला, २३५

एककल, २३६ कलावती, २९३ एकतन्त्री, ४८, ४९, ५५, ५९, ६३, कलोपनता, ३९, ४५, ४७, ५२, ७२ ११०, २७६, २९०, ३०२, ३०५ कल्पतरु, ३०१

ओ कल्याण, ३००, २८६

ओवेणक, २४४ कल्लिनाथ, १०, २८, ४९, ५०, ६०, ओहारी (लक्षण), २४९ ६१, ७९, ८१, ८२, ८६, ८८, ९४, औ १११, ११४, १२७, १३२, १९६, औडुद्वेपी, ७७ १९९, २००, २२१, २२२, २२५, औडुवित (लक्षण), ३६, ३८, ८५ २२६, २२८, २२९, २३६, २४८, औदुम्बरी, ३०५ २५४, २५५, २८१, २८३, २८४, ओमापतम्, २९१ २९४, २९५, ३०३, ३०७, ३१४

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  • ३२० -

कविकष्ठाभरण, ३११ १४१, १४४, १४६, १४८, १५१, कश्मीर, २८२ १५४, १५७, १६०, १६३, १६६, कश्यप, ५०, ९३,२०१,२०४, २२६, १६९, १७१, १७५, १७८, , १८१, २९५ १८४, १९०, २०४, २९७, ३०५ कसरि वीणा, ३०५ किरणावली, २३१ काकली निषाद, ११, १४, १९१, २७२ कीतिधर, २,२९७, ३०२, ३०३,३०४ काकली (लक्षण),,'७,८ कीर्तिराज, ३०० काकलीसहिता, ३७ कुणप, १८ काकली साधारण (लक्षण), १९२ कुण्डलीनृत्त, ३०१ काञ्ची, ३१० कुण्डिन, ३११ कात्यायन, २ कुमारसम्भव, ३०५ काफ़ी, २८७ कुम्भ, ६, १२, १८, २८, ३१, ३७, कामोद (प्रथम), २२५ ३८, ५२, ५३, ५४, ५५, ६०, ८९, कामोद (द्वितीय), २२५ १३३, १३४, १९५, १९८, २८२, कामोदा, २०४ २९७, ३१४ काम्बोदिका, ३११ कुम्भकर्ण, ३१०, ३१४ काम्भोजी, २२६, २२९, ३०९ कुम्भिका, ३०५ कार्मारवी, ७४, ७६, ८०, ८२, ८३, कूर्म्मवीणा, ३०४ १२६, १७५, २१२, २१३ कृष्णभट्ट, ३०१ कालसाघारणता, १९१ कृशता, १६ कालिदास, २६७, २७०, २९३ केदारगौड, ३११ कालिन्दी, २२९, २३० केशव, ३०३ कावेरी, ३०२ कैलासवीणा, ३०४ काव्यप्रकाश, २५८, २६०, २६२, कैशिक (राग, लक्षण), १९२, २१२ २६५, ३०१ कैशिक ककुभ, २२५ काश्यप, २७८, २७९, २८०, २८१, कैशिकी, ७४, ७६, ७७, ७८, ७९, ८०, २९५, २९७, २९९,३००,३०३,३११ ८२, ८३, ८५, १२२, १६९, १९५, काश्यपवीणा, ३०४ १९६, २१२, २१३, २१८, २८१ किन्नरवीणा, ३०४ कैशिकी निपाद (लक्षण), १९२ किन्नरी, ५७, ५८, ६४, ८९, ९१, १३९, कैशिकी (भापा), २२७

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कोकिला पञ्चम, २२५ गणपति, ३०४, ३०५ कोण, १८, १९ गर्भ, २५४ कोण्डवीरि, ३१२ गाथा, २४४ कोलाहला, २२७ गान्धर्व कल्प, ७८ कोहल, २६, २७६, २९४, २९७, गान्धर्वामृतसागर, ३०५ ३०३, ३०५, २०६, ३०९, ३११ गान्वारग्राम, ६ कोहलमतम्, २९४ गान्धारपञ्चम, २२४, २२६,२२९ कोहलरहस्यम्, २९४ गान्वारपञ्चमी, ७६, ७९, ८०, ८२, कोहलहास, २२५ ८३, १२८, १२९, १७८ कौले, ३०८ गान्वार पञ्चमी (भाषा), २२७ कौलिका, ३०९ गान्धारवल्ली, २२९ कौशली, २८८ गान्धाराश आन्ध्री, १३१ क्रिया, २३५ गान्धारांश कैशिकी, १२४ क्रियाङ्ग, २३३ गान्वाराश रक्तगान्वारी, १२१ कीडनीयक, ४ गान्धाराश विकृत नैपादी, १०९ क्षेत्रल, ३०३ गान्धारांश शुद्ध गान्धारी, ९९ क्ष्मापाल नारायण, ३०० गान्धारांश षड्जकैगिकी, ११२ स गान्धारांश षड्जमध्यमा, ११७ ख, १६, १७, १९ गान्धारांग पाडगी, ९२ 'ख' अन्तर (लक्षण), २५ गान्वारी, ७४, ७५, ७६, ७७, ७८, खञ्जनी, २२९ ७९, ८०, ८२, ८३, ८५, ९८, १२८, खड्ग नारायण, ३१२ १४१, १६३, २०१, २०२ खमाज, २१६ गान्धारी (भापा), २२६, २२९ खयाल, ३०८ गान्धारोदीच्यवती, ७४, ७५, ७६, ८०, खुम्माण कुलनन्दन, ५२ ८२, ८३, ११७, ११८, १२५, १६३ खुसरो, ३०८ गीत (लक्षण) १, २, ५, २५०, २६५ ग गीतगोविन्दटीका, ३१४ 'ग' अन्तर, २४, २९ गीतलक्षण, ३१४ गङ्गाराम, ३०३ गीतरत्नावली, ३०४ गण, ३०३ गीति, ९१, २४५ २१

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गुणनिका, २९८ च गुण्डक्रिया, ३०६ चञ्चत्पुट, १०१, २३६ गुपला, ३०६ चतुरस्र, २३६ गुरु (लक्षण), २३४ चतुर्थ सारणा (लक्षण), २१ गुर्जर (देश), ३०४ चतुष्कल, २२६ गुर्जरिका, ३१० चतुष्कल चञ्चत्पुट, २३९ गुर्जरी, २२७, २२९, ३०४, ३०९ चतुष्फल चाचपुट, २३९ गोपाल, ३०६,३०७ चतुष्कल पट्पिता पुत्रक, २४० गोपालनायक, ३०६ चतुस्सारणा, १७ गोपुच्छा, २४३ चाचपुट, २३६ गोड (देश), ३०४ चालुक्य, ३०२ गोड (लक्षण), २२३, ३०९ चित्र, ९०, ९१, ९४, ९६, ९८, ९९, गौडकृति, ३०४ १०६, १०८, ११०, १११, ११२, गौड कैशिक मध्यम, २२४ ११५, ११६, १२०, २४१ (लक्षण) गौडी, २२८, २२९ चित्रिका, ३०५ गौडी (गीति), २४९ चूतमञ्जरी, २२८ गौरीमत, २९८ चूर्णपद (लक्षण), २५० गौरीवीणा, ३०४ चैत्रिक, १९, २९७ ग्रन्थमहाणव, ३०० चौथी सारणा, २४ ग्रह, २४४ चौलुक्यनृपति प्रतीहार चूडामणि, ३०२ ग्रहस्वर (लक्षण), ८१ च्युतपड्ज (लक्षण), १९२ ग्राम (लक्षण), ५ छ ग्रामद्वयबोधकसारणी, ४१ छन्दक, २४४ छेवाटी, २२७, २२८ घ ज

घण्टक, २९८ जगदेक, ९४, ९७, १०१, १०३, १०५, घुडच, १३ १०७, ३०३ घोषक, ४८ जगदेक मल्ल, ३००, ३०१ घोषवती, ३०५ जगदेव, ३०५ घोपा, ४८ जगद्देव, ३०२

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जयचन्द, २८२ ताल, ९१, २३४, २३५ जयचन्द, २८२ तालरत्नाकर, २९८ जयसिंह, ३००, ३०५ तालसमुद्र, २९४ जोति (लक्षण) ४९, ७४ तालार्णव, ३१३ जातिभिन्न (लक्षण), २२१ तीव्रगाधार, २९ जातिसाधारण (लक्षण), १९८ तीव्रनिपाद, २८ जीमूत, २९२, ३११ तुङ्गभद्रा, ३१० जैत्रसिह, ३०५ तुम्बुरा, २२९ जौनपुर, ३१३ तुम्बुरु, ३५, २९२, २९८, ३०३, ३११ ज्याय सेनापति, ३०४ तुरुष्क गौड, २८२, ३०३, ३०४ झ तुरुष्क तोडी, २८२, ३०३ झण्टुम्, ८७ तृतीय सारणा (लक्षण), २१, २३ ट तैत्तिरीय०, १६ टक्क, २२४, २२६, २२७ तौर्य्यत्रिक, ५ टक्ककैगिक, २२४, २२५, २२६ तौय्यंत्रिकसार, ३०७ टोडी, २८५ त्रवणा, २२७, २२९

ड त्रवणोद्भवा, २२७ डोम्बकरी, ३०४ त्रावणी, २२७ त त्रितन्त्री, ३०८ तण्ड, २, २९१, ३०४ त्रिभुवनमल्ल, ३०० तन्त्रीसागर, ३०५ त्रिस्वरी, ३०४ तवला, ३०८ त्र्यस्त्र, २३६ तराना, ३०८ द तातार, ३०८ तान, २२६, २३० दक्ष, २९६ तानयज्ञ, ३०६ दक्षिण, ३०४ तानवलिता, २२७ दक्षिण (मार्ग), ९३, ९४, ९६, ९८, ताना, २२७ ९९, १०६, १०८, १११, ११२, तानोद्भवा, २२७, २३० ११५, ११६, १२०, २४१ (लक्षण) तारगति (लक्षण), ८१ दत्तिल, १३, ३६, ३७, ४७, ९९,

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  • ३२४-

१२२, १२३, १२८, १२९, १३२, देशारव्य, २२५ १९८, २९३, २९७, ३०३, ३१३ देशाख्या, २३२, ३०४ दत्तिलकोहलीयम्, २९४ देशी, ३०४, ३०९ दमयन्ती, २८२ दोह्या, २२७ दशग्रीव, ३११ दौलताबाद, ३०२ दाक्षिणात्या, २२७, २२९ द्राविड, ३०३ दाचन, ३१२ द्राविडी, २२८ दारवी, १७ द्रुत, २४२, २४४ दारुण्य, १६, १७ द्रुतलय, ६३ दिवाकर, ३०१ द्वादशस्वर मूर्च्छनावाद (लक्षण), ५१ दुन्दुभि, १८ द्वारका, २९१ दुर्गशक्ति, २९१, २९७ द्विकल, २३६ दुर्गा, २९१, २९९, ३०३ द्विकल चञ्चत्पुट, २३७ दुर्गाचार्य्य, ४ द्विकल चाचपुट, २३८ दुर्गममत, २४८ द्विकल पट्पितापुत्रक, २३९ दुर्गाशक्ति, २९७, २०५ द्वितीय सारणा, २०, २२ दुर्वासा, ३०९ ध देवकृति, ३०४ देवक्रिया, ३०९ धन्नासी, ३०४ देवक्री, २८३ धन्यासिका, ३०९ देवगिरि, ३०६ धैवत, २४ देवगिरीश्वर, ३१२ धवत भूषिता, २२८ देवण, ३१४ घैवतांश आर्षमी, ९६ देवराज, २९८, ३०० धैवतांश कार्मारवी, १२७ देवारवर्द्धनी, २२७, २२८, २३० धैवतांश कैशिकी, १२४ देवेन्द्र, ३१४ घैवतांश विकृत मध्यमा, १०२ देवेन्द्र, ३१ धैवतांश शुद्ध धैवती, १०७ देशजा, २३२ धैवतांश शुद्ध मध्यमा, ११६ देशाक्षिका, ३११ धैवतांश षड्जोदीच्यवा, ११४ देशाक्षी, ३०९ धैवतांश षाड्जी, ९३

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चैवती, ७५, ७९, ८०, ८२, ८३, नाटकरत्नकोश, २९८ ८५,१०५, १०६, १०७, १४९ नाटय, १, ४, ५ व्वनि, २२५ नाटयटिप्पणी, ३०१ ध्वन्यालोक, २६६, २६७ नाटयनागरिका, ३०४ ध्रुव, २३५ नाटयवेदविरिज्चि, ३०२ ध्रुव (मार्ग), २४१ नाद्या, २३०, प्रुवा, ८७ नान्यदेव, ६, ११, ३५, ४८, ५४, ५५, ध्रुवा (लक्षण), २५२ ६४, ६८, ६९, ९९, ११८, १२७, घ्रुवागान, २, ११५ २९२, २९५, ३००, ३०३, ३०७ ध्रृवावृत्त, २५४ नायक, ३०८ नारद, २, ६, २५१, २९०, २९२, न २९३, ३०३, ३११ नकुला, ३०५ नारदीय, २९२ नट्ट, २२५,२८३ नारदीय शिक्षा, २९२ नट्ट नारायण, २२५ नारायण, ३०९ नट्टा, ३११ निघण्टु, ३१० नन्दयन्ती, ५३, ७३, ७६, ७९, ८०,१३१ निघण्टुरत्नकोश, २९८ नन्दिकेश्वर, २९१, २९२, २९७, ३०२, निधिकर, ३१२ ३०३, ३०९, ३११, ३१३ निवद्धपद, २५० नन्दिकेश्वरकारिका, २९०, २९१ निर्गीत, २५० नन्दी, २७, २९७, २०२, ३०५ निर्वहण, २५४ नन्दावर्त, २९२, ३११ निश्शन्द, २३५ नल, २८२ निषाद, ११, २७, ३८ नवतन्त्री, १०, ११, १२, १३, १५, ३९ निषादांश आन्ध्री, ९७, १३१ नवानगर, ३०२ निपादाश कार्मारवी, १२८ नागगान्धार, २२५ निषादाश कैशिकी, १२४ नागपञ्चम, २२५ निपादाश रक्तगान्वारी, १२१ नागानन्द, ३०५ निपादांश विकृत गान्वारी, १०० नाट, ३०९ निषादांश शुद्ध नैपादी, १०९ नाटक (राग) ३०९ निषादांश षड्जमघ्यमा, ११७

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निपादाश पड्जोदीच्यवा, ११४ पञ्चमी, ७४, ७५, ७६, ७८, ७९, ८०, निपादिनी, १०७, २२९ ८२, ८३, ८५, १०३, १०५, १२८, निष्काम (लक्षण), २३५ १४७, १९७, २०१, २०२,२१० नृत्तरत्नावली, ३०४ पञ्चमी (भापा), २२७ नृत्तलक्षण, २९४ पण्डितमण्डली, ३४, ३७, ६०, ६२, नृत्यरत्नकोश, ३१० १९८, २८२, ३१०, ३११, ३१३,३१४ नृत्यप्रकाश, ३१२ पण्डिताराध्यचरितम्, ३०४ नैषध, ३१३ पतपञन्चम, २८ नैषादी, ७४, ७५, ७६, ७९, ८०, ८२, पत्ञ्जलि, २, १६, १७ ८३, ८५, १०७, १०८, ११०, १५१ पद (लक्षण), २४९ नैष्कामिकी (लक्षण), २५३ पदाश्रित गीति (लक्षण), २४५ न्यास स्वर, ४९, ८२ परमर्दी, ३००, ३०१, ३०३, ३११,३१४ प परिवर्तन, २४२ पञ्चपाणि, ९०, १३७, २३६ परिवारिवीणा, ३०५ पञ्चम, ९, २४, ३८, २२७ पल्लवी, २३१ पञन्चम (राग, लक्षण), २१०, २२६ पश्चिम चालुक्य चक्रवर्ती, ३०० पञन्चम लक्षिता, २२७ पाठ, २५६ पञ्चम पाडव, २२५, २२६, २३० पाठय, ४ पञ्चम सारसंहिता, २९२ पाणिक, २४४ पञ्चमाश आन्ध्री, १३१ पाणिनि, २, २१, ३०० पञ्चमाश कार्म्मारवी, १२७ पाण्डुसूनु, ३०१ पञ्चमाश कैशिकी, १२४ पात, २३५ पञ्चमाश नन्दयन्ती, १३४ पार्वती, २३, २३०, २९१ पञ्चमाश मध्यमोदीच्यवा, १२६ पार्वतीमत, २९१ पञ्चमांश रवतगान्धारी, १२१ पार्श्वदेव, ३०१, ३०६ पञ्चमाश विकृत मध्यमा, १०२ पालक भूपाल, २९८ पञ्चमांश शुद्ध पञ्चमी, १०४ पाल्कुरिकि सोमनाथ, ३०४ पञ्चमांश पड्जकैशिकी, ११२ पिञ्जरी, २२८ पञ्चमाश पड्ज मध्यमा, ११७. पुलिन्दका, २२९ पञ्चमांश पाड्जी, ९३ पुष्पाञ्जलि, ३०५

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  • ३२७-

पूरबी, २८५ प्रासादिकी (लक्षण) २५३ पूर्णा, ३६ प्रेडखक, २२८ पूर्वरङ्ग, २,२५४ (लक्षण) प्रौढ देवराय, ३१२ पृथुला, ९०, ९४, ९६, ९९, १०६, प्लुत, २३४ १११, ११२, ११५, ११६, १२०, फ २४५, २४७, (लक्षण) फकरुल्लाह, ३०८ पोता, २३० व पौरवी, ३९, ४५, ४७, ५२, ७३ बड्डाल, ३०४, ३०९ पौराली, २२९, २३० बङ्गाल (प्रथम), २२५ प्रकरण गीतक, २४४ वङ्गाल (द्वितीय), २२५ प्रकरी, २४४ बहादुर मलिक, ३१३ प्रताप चक्वर्ती, ३०१ वहिर्गीत (लक्षण), २५० प्रताप पृथ्वीपति, ३१४ बहुत्व (लक्षण), ८४ प्रतापरुद्र, ३०९ वाङ्गाली, २२९ प्रतिमुख, २५४ वाण, २९२ प्रत्यभिज्ञादर्शन, २९८ बाणवीणा, ३०४ प्रथममञ्जरी, ३०४ वाणासुर, २९१ प्रथम सारणा (लक्षण), २०, २२ वाह्यपाडवा, २३० प्रभुसूरि, ३१२ बिन्दुराज, ३०३ प्रमाणश्रुति (लक्षण), १६,२०, २२,४२ विलावल, २८६ प्रयोगस्तवक, ३१३ विल्हण, ३०० प्रवरपुर, २९९ बृहद्देशी, २३९, २९७, ३०१ प्रवेश, २३५ वृहस्पति, २०४, ३०९ प्रसंसन, १७ वजनाथ, ३०६ प्रसव, २२५ वौर, ३०६,३०७ प्रसारित्व, १६ ब्रह्मगीत, २४४ प्रस्तार, १३६, १९० ब्रह्ममत, २९०, ३०५ प्रस्थानत्रयी, २ ब्रह्मवीणा, ४८, २९०, ३०२, ३०४ प्रातिशाख्य, १६, १७ ब्रह्मसूत्र, २ प्रावेशिकी (लक्षण), २५३ ब्रह्मा, २९०, ३०३

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भ भिन्नवलिता, २२८ भट्टनायक, ३, २६१, २६२, २६३ भिन्नषड्ज, २२३, २२६ भट्टमाधव, ३११ भिन्ना (गीति, लक्षण) २४९ भट्टलाल्लट, ३, २५९ भिल्लम, ३०३ भम्माण पञ्चम, २२४ भीमदेव, ३०२ भम्माणी, २२८ भीमपाल, ३०२

भरत, २९३ भुजङ्गवीणा, ३०४ भरतभाष्य, ३००, ३०६ भुवनानन्द, ३११ भरतमिति, ३१२ भूपाल, ३०९ भरतरत्नाकर, २९५ भूमल्ल, ३०१ भरतवार्तिकम्, २९६ भैरव, २२५, २८५, ३०४, ३०९ भरतार्थचन्द्रिका, २९१ भैरविका, ३११ भरतार्णव, २९१, २९२, ३०२, ३०९ भैरवी, २८८, ३०४ भयानक, १०६ भोगवर्द्धनी, २२७ भवेशभूपाल, २९८ भोज, २९८ भावना पञ्चम, २२५ भोगवीणा, ३०४ भावनी (भाषा), २२७, २३० म

भावनी (विभाषा), २२७ मण्डलप्रस्तार, ७, ८, २९, ४०, १९३ भावप्रकाशन, २९३, ३०१ मतङ्ज, ५, ९, ३४, ३५, ३७, ३६,५०, भापाङ्म २३३ ५२, ५४, ५५, ५७, ६१,६२,७३,७४, भास, २२५ ८९, ९१, ९२, ९३, ९५, ९६, ९७, भासवलिता, २३१, ९८, ९९, १०३, १०६, १०७, १०८, भास्कर, ३०२, ३०३ ११०, १११, ११२, ११३, ११५, भिन्न (लक्षण), २२१ ११६, ११९, १२०, १२२, १२३, भिन्न कैशिक, २२३ १२६, १३३, १३४, १३९,'१६२, भिन्न कैशिक मध्यम, २२३ १९६, २००, २१६, २२१, २२२, भिन्न तान, २२३ २२५, २३१, २३२, २३४, २४८, भिन्न पञ्चम, २२३, २२८, २३६ २७८, २९३, २९५, २९६, २९७, भिन्न पञ्चमी, २२६ ३००, ३०३, ३१३, ३१४ भिन्न पौराली, २२८ मतङ्गकिन्नरी, ५६, ५७, ८९, ९२,

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-३२९ -

९६, ९९, १०२, १०४, १०७, १०९, ८३, ८५, १०१, १०३, १०४, १४५, १११, ११४, ११६, ११८, १२१, १९७, २०१, २०२, २१०, २१५ १२४, १२५, १२७, १२९, १३१, मध्यमा (भापा), २२९ १३३, १३४ मध्यमादितोडी, २८३ मतङ्ज किन्नरी लक्षण, ५५ मध्यमोदीच्यवा, ७४, ७५, ७६, ७९, मत्तकोकिला, १९, ४९, ५९, ११० ८०, ८१, ९२, ८३, १२५, १७२, २७ मत्सरीकृता, ३८, ६९, ७८ मनमोहन घोप, २९३ मत्स्यपुराण, २९३ मनोरथ वीणा, ३०४ मदन, ३१४ मन्द्रगति (लक्षण), ८१ मदनपाल, ३१० मन्द्रावधि, ५० मद्रक, २४४ मलहरी, ३०९ मधुकरी, २२७ मलार, ३०४ मधुरी, २२६, २२८ मलावार, २०१ मध्य, २४२, २४४ मलिक काफ़ूर, २८२, ३०६ मध्यमग्राम (लक्षण), ६, ७, ११ मलिक सुलतान, ३१२ मध्यमग्राम (राग, लक्षण), २०१ महती, २९२ मध्यमग्राम (सिद्धि) , ११ महमूद गजनवी, ३०० मध्यमग्रामदेहा, २२७ महादेव, ३०८ मध्यमग्रामा, २२६ महाभाष्य, १६, १७, २५७ मध्य-मध्यम, ५६ महाराष्ट्र, ३११ मध्यम पाडव, २२५ महेश्वर, १८ मध्यम साधारण (लक्षण), १९२ मागवी, ९०, ९३, ९४, ९६, ९७, ९९, मध्यमांश कैशिकी, १२४ १०६, ११०, १११, ११२, ११५, मध्यमांश गान्वारोदीच्यवा, ११९ ११६, १२०, २४५ मध्यमाश रक्त गान्धारी, १२१ माड्गली, २२७, २२८, २२९ मध्यमांश विकृत गान्वारी, ९९ मातृगुप्त, ३०१, ३०३, ३११ मध्यमांश शुद्ध मध्यमा, १०२ मावव, ३१२

मध्यमाश पड्जमध्यमा, ११७ मान, २४२ मध्यमांश पड्जोदीच्यवा, ११४ भारवा, २८५ मध्यमा, ७४, ७५, ७९, ८०, ८१, ८२, मार्ग, ९१, २४१

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मार्गवीणा, ३०४ य मार्गो, ३९, ४५, ४७, ५२, ७३ यजुर्वेद, ४ मादव, १६ यति, २४३ मालव, ३०९ यथाक्षर च्चत्पुट, २३७ मालव (देश), ३०४ यथाक्षर चाचपुट, २३८ मालव कैगिक, २२४, २२६ यथाक्षर षट्पितापुत्रक, २३९ मालव पञ्चम, २२४, २२६, २३० याज्ञवल्क्य, ३०९ मालवरूपा, २२९ याष्टिक, २२५, २२६, २३२, २७८, मालववेसरी, २२७, २२८, २२९ २७९, २८१, २८४, २९५, २९६, मालवा, २३० २९७, ३०३, ३०५, ३११ मालवी (भाषा), २२०, २२७ याष्टिक-संहिता, २९५ माहिपेय भाष्य, १६ , १७ यास्क, ३,४३ माहुरी, ३०९ योगमाला, ३०१ माहेश्वरसूत्र, २८९ मुक्तावली. ३१३ र

मुख, २५४ रक्तगान्धारी, ७४, ७५, ७७, ७८, ७९, मुखारिका, ३११ ८०, ८२, ८३, ८५, ११९, १२०, १६६ मुख्या, २३२ रक्तहस, २२५ मूर्च्छना (व्युत्पत्ति), ३४, ३६, ३८ रगन्ती, २६, २३२ मूला, २३२ रघुनाथ, २८४, २९६, ३०३, ३११ मृदुत्व, १८ रजनी, ३८, ४३, ४६, ५१, ६१, मेघरब्जी, ३०९ ६२, ६५, ६६, ७२, ८५ मेघराग, २२५ रत्नाकर, १५५, २८१ मेधसन्देश, ३०५ रत्नकोश, २९८, ३०० मेदिनी, १८ रम्भा, ३०३ मेरु, १७ रविचंन्द्रिका, २२७ मोक्षदेव, २०८, २१३, २१५, २१८,३०५ रस, २५८, २६५, २६८, २७० मोहन मुरारि, ३०० रसकौमुदी, २६७ मौलि, ३०९ रसतत्त्वसमुच्चय, ३०६ मौल्लिवीणा, ३०४ रसाणव सुधाकर, ३१२

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-३३१-

राग (लक्षण) ४९, १९१, २०० लास्य, २९१ रागाङ्ज, २३२ लोप्य (लक्षण), ८४ रागाचल, ३१२ लोल्लट, २९८, २९९, ३०३, ३११ रागाणंव, ३१३ व राजशेखर, २९७, २९८ वराटिका, ३११ रामकृष्ण, ३, ३५, ५४, ८९, २७८, वराटी, ३०९ २७९, २९६, २९७ वर्तनी (लक्षण), २५५ रामक्रिया, २८, २८३, ३०९ वर्धमान, २४४ रामानुज, २ वल्लभ, २९७ रावण, ३०३, ३०५ वल्लभदेव, ३१४ रावणवीणा, ३०४ वसन्त, ३०४, ३०९ रावणहस्ता, ३०४ वसन्त भैरवी, ३११ राष्ट्रकूट, ३०० वसिप्ठपुन, २९८ राहल (राहुल), २९६, ३०३ वाजिद अलीशाह, ३०८ रुद्रट, १३४, २९८, ३०३, ३०५ वादिमत्तगजाडकुश, २१३ रुद्रडमरूद्भवसूत्रविवरण, २९० वाद्य, १, २, १०२ रुद्राचार्य, ३११ वाद्यरत्नावली, ३०४ रूपक, २५५ वामन, ३, २५९, २६१, २६३ रूपसाधार, २२४ वायु, ३०३, ३११ रेवगुप्त, २२५, २३१ वायुसूनु, ३०९ रोविन्दक, २४४ वारज्जल, ३०८

ल वारङ्गलनरेग, ३०४ लक्ष्मीधर, ३१४ वाराणसी, ३११ लक्ष्मीनारायण, ६ वाराही, २२८ लघु, ८७, २३४ वार्तिक, ९०, ९६, ९८, ९९, १०६, लडघन (लक्षण), ८४ ११०, १११, ११२, ११५, ११६,

लय, २४२ १२०, २४१ ललित, २८९ वाल्मीकि, २७७ ललिता, २२७, २२९, ३०४, ३०९ वाल्मीकि रामायण, २९२, २९३ लारक, ३११ वासना, २५७

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वासुकि, ३०१ विशाला, २२८ वासुदेवशास्त्री, २०३, ३१० विश्वप्रदीप, ३११ विकलेन्द्रिय, १९ विश्वावसु, २१६, २७६, २९४, २९७, विक्रम, ३०५ २९८, ३०३, ३११ विक्रमाङ्गदेव, ३०० विश्वेश्वर, ३१० विकमाङ्कदेवचरितम्, ३०० विहाग, २८९ विक्माड्काभ्युदय, ३०० वीणोत्तमा, ३०४ विक्षेप, २३५ वीरभल्लट, ३०९ विचारचतुर्मुख, ३०२ वृत्ति, ९३, ९४ विचारचिन्तामणि, ३१३ वृद्ध काश्यप, २९५ विचित्रक, ३११ वेड्कट मखी, २८,३०७ विचित्रवीणा, ४८ वेगमध्यमा, २२६ विजयनगर, २८२, ३१०, ३१४ वेगरञ्जी, २२७ विट्ठल, ३०३, ३१२ वेणीसंहार, १८ विदारी (लक्षण), ८६ वेणु-गीत, २६६ विद्यारण्य, २८२, ३१०, ३११ वेदवती, २३० विन्व्य पर्वत, ३१२ वेदव्यास, २६६ विन्ध्याचल, २८२ वेदान्तकल्पतरु, ३१३ विन्यास (लक्षण), ८७ वेम, ३१२ विपञन्ची, १९, २९२, ३०५ वेलाकुली, ३०९ विद्रदास, ३१२, ३१४ वेसर (लक्षण), २२३ विभाव, (लक्षण), २५७ वेसर पाडव, २२४, २२६, २३० विभावती, २२० वेसरा (लक्षण), २४९ विभावनी, २३० वेसरी, २२७, २२८ विमर्श, २५४ वैणिक, विलम्बित, ६३, २४२, २४४ वैपञ्चिक, १९ विवादी (लक्षण), ४२ वैरज्जी, २२७ विवृतता, १७ वैसालम्, ३०५ विशाखिल, ३५, २९५, २९७, ३००, वोट्ट, २२४, २२६, २३० ३०३, ३११ व्यभिचारी भाव (लक्षण), २५८

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व्यास, ३०१ १९४, १९७, २०१, २०४, २०७, श २१२, २१५, २१८, २३४, २४१, शक, २२४ २७७, २८१, २९०, २९१, २९५, शकतिलक, २२४ २९६, २९७, २९८, २९९, ३००, शकमिश्रा, २२६ ३११, ३१२, ३१४ शकवलिता, २३१ शार्दूल, २२६, २९६, २९७, ३०३, ३११ शका, २३१ शालवाहनिका, २२७ शकुन्तला, ३०५ शिव, २९०, २९१, ३११ शक्ति, २९१, ३०३, ३११ शिव-पार्वती-सवाद, २९१ शङ्कर, २, २९० शिवमत, २९१, २९८ शङ्राभरण, ३०९, ३११ शिवा, २९१, ३०३, ३११ शाङकुक, २, ३, २५९, २६०, २९९, शुक्र, २९४ ३०१, ३०३, ३११ शुकराचार्य्य, ३०९ शतपथब्राह्मण, २५७ शुक्लपण्डित, ३१२ शतानन्द, २९८ शुद्ध (लक्षण), २२१ शम्भुराज, ३०९ शुद्ध कैशिक (राग, लक्षण), २१२ शम्भुराजीयम्, ३१० शुद्ध कैशिक मध्यम (राग, लक्षण), २१८ शम्या (लक्षण), २३५ शुद्ध पञ्चम (राग, लक्षण), २१० शाकम्भरी, ३०५ शुद्ध भिन्न (लक्षण), २२२ शातातप, ३०० शुद्ध भिन्ना, २२८ शारदातनय, २९०, २९१, २९३, शुद्ध मघ्या, ३९, ४५, ४७, ५२, ७२ २९४, ३०१ शुद्ध रागक्रिया, ३११ शारदीय, ३०१ शुद्ध पड्जा, ३८, ४४, ४६,५१, ६८, ७२ शाङ्जदेव, ५,३, ९, १९, २१, ३५, शुद्धपाडव (राग, लक्षण), २१५ ३७, ४८, ५५, ६१, ६२, ८८, ८९, शुद्ध साधारित (राग, लक्षण), २०७ ९३, ९५, ९६, ९७, ९८, १००, १०१, शुद्धा, ३७, २२९, २४८ १०३, १०८, ११०, १११, ११२, शुभङ्कर, २००, २९२ ११४, ११६, ११८, १२०, १२३, शुभाकर, २९३ १२५, १२६, १२७, १२९, १३०, शुष्काक्षर, (लक्षण), २५१ १३२, १३३, १३४, १३५, १९२, शृङ्गारप्रकाश, २९९, ३०१

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शृङ्गारशेखर, २९४, ३०४ ७८, ७९, ८०, ८२, ८३, ८५, ११५, शृङ्गारहार, ३०५ ११६, १६०, १९७, २०४, २०८, २१८ श्रुतिदर्पण, २२, २३, २४, २५, ३१ पड्जमध्यमा (भाषा), २२८ श्रुतिनिदर्शन, १६ पड्जसाधारण (लक्षण), १९२ श्रुतिपरिमाण, २४ पड्जांश कैशिकी, १२५ श्रुतिभिन्न (लक्षण), २२२ पड्जांश गान्धारोदीच्यवा, ११९ श्रुतिवीणा, २९ पड्जांश रक्त गान्वारी, १२२ श्री, ३०९, ३११ पड्जाश विकृत मध्यमा, १०२ श्रीकण्ठ, २८, ४८, २६७ पड्जांश पड्जकैशिकी, १११ श्रीकण्ठिका, २२९ पड्जांश पड्जोदीच्यवा, ११५ श्रीकण्ठी, २३० पड्जांश पाडजी, ९२ श्रीभरत, ३११ पड्जोदीच्यवती, ७४, ७५, ७७, ७९, श्रीभूवल्लभ, ३११ ८०, ८२, ८३, ८५, ११५, ११६, श्रीमद्भागदत, २७० १६०, १९७, २०४, २०८, २१८ श्रीरड्गम्, ३०२ पाड्जी, ७४, ७५, ७६, ७७, ७९, ८०, श्रीराय, २२५, २८३ ८२, ८३, ८९, ९१, ९२, ९३, ९४, श्रीशैल, २८२, ३१२ १३६, १३७, १३९, १९७, २७२, श्रीहर्ष, २८२ २८१, ३०३ पाड्जी (लक्षण), ८९ ष पाडव, २१५ पट्पितापुत्रक, २३६, २३९ पाडवा, ३६ पड्जकैशिक, २२५ पाडवित (लक्षण), ८४ पड्जकैगिकी, ७४, ७६, ७९, ८०, स ८२, ८३, ८५, ११०, ११५, ११६, सव्यास, ८६ १६०, १९७, २०४, २०८, २१८ सवृतता, १६, १७ पड्ज ग्राम (लक्षण), ६,९, १०, २०४ संहार, १७ पड्ज-मध्य-भाव, १२ संकीर्णा, २३२ पड्ज-पञ्च-भाव, १३ सङ्गीतकल्पवृक्ष, ३१३ पड़्जभापा, २२९ सङ्गीतचन्द्र, ३१२ पड्जमध्यमा, ७४, ७५, ७६, ७७, सङ्गीतचन्द्रिका, ३११

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सङ्गीतचिन्तामणि, ३१२ समपाणि, २४४ सङ्गीतचूडामणि, ३०१, ३११ समहस्त, ३०५ सङ्गीतदर्पण, ३१३ समा, २४३ सङ्गीतदीपिका, ३११,३१३ समित, ३०८ सङ्गीतमकरन्द, २९२ समुच्छाय, ३४ सङ्गीतमुक्तावली, ३११, ३१४ सम्पक्वेष्टाक, २४१ सङ्गीतमुद्रा, ३१३, ३१४ सम्भाविता, ९०, ९३, ९६, ९९, १०६, सङ्गीतरत्नावली, ३०२, ३१३ ११०, १११, ११२, ११५, ११६, सङ्गीतविनोद, ३१३ १२०, २४५, २४६ सङ्गीतशिरोमणि, ३१०, ३१३, ३१४ सरस्वतीकण्ठाभरण, २९९ सङ्जीतसमयसार, ३०१, ३०६, ३१३ सरस्वतीवीणा, २७३, ३०४ सङ्गीतसागर, ३१३ सरस्वती हृदयालङ्कार, ३०० सज्जीतसार, ३११ सरोद, ४८ सङ्गीतसारकलिका, ३१३ सशब्द, २३५ सङ्गीतमुधा, ३११ सागरनन्दी, २९८ राङ्ग्ीतसुधाकर, २९२, ३०२, ३१३ साधारण (लक्षण), १९१ सङ्गीतालोक, ३११ साधारण (रागभेद, लक्षण), २२३ सङ्गीतोपनिपत्सार, २९७, ३१३ साधारण (गीति, लक्षण), ३६, २४९ सङ्गीतोपनिषत्सारोद्वार, २९७ साधारण गान्वार (लक्षण), १९१ सञ्चारीभाव (लक्षण), २५८ साधारित (राग, लक्षण), २०७ सत्यवाक, ३१७ साधारिता, २२६ सदाशिव, ३०३ साम, २४४ सन्धि, २५४ सामन्त, ३१,१ सन्निपात, २३५ सामवेद, ४ सप्तमी, ७५ सार, ३०१ सप्ताध्यायी, ३०३ सारङ्भ वीणा, ३०४ सप्तरुप, २, १८, २५२ सारङ्गी, ४८ सप्तशती, २०५ सारणायुक्त श्रुतिदर्पण, २५ सम, २४४ साहित्यदर्पण, २६८ समग्रह, २४४ सिंहण, ३०३, ३०५

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सिहभूपाल, ९, ३४, ३५, ३७, १९८, स्रोतोगता, २४३ २३६, २४८, २८२, २९२, ३०३, स्वयम्भू, ३०१ ३०६, ३१२, ३१३ स्वयम्भू वीणा, ३०४ सिङ्गण, ३१२ स्वरप्रवत्व, ६१ सिङ्भणार्य, ३१२ स्वर साधारण, १९१, १९७ सिद्धान्त कौमुदी, २ स्वराख्या, २३२ सिन्धु, ३०२ स्वराश्रिता (गीति, लक्षण), २४८ सुधाकलश, २९७ स्वाति, २९०, २९२, ३०३ सुलतान हुसेन शर्की, ३१३ सैन्धवी, २२७, २२९ ह

सोढल, ३०३ हनुमत्संहिता, २९५ सोमनाथ, २८ हनुमन्मत, २७९, २९६ सोमभूपाल, ३०२ हम्मीर, ३००, ३०५, ३०६ सोमराज, १४, २५५ हरिपाल, ३५, ३६, ४८, १२५, १२०, सोमराजदेव, ३०२ २९२, ३०२ सोमेश्वर, ६,३००, ३०१, ३०३,३०४, हरिहर, ३१० ३१४ हर्पपुरी, २२९ सौभद्र, २९२, ३११ हस्ताभिनय, २९६ सौराष्ट्र, ३०१, ३०४ हरिणाश्वा, ३९, ४४, ४७, ५१, ६१, सौराष्ट्री, २२७ ६२, ७२ सौवीर, २२४, २२६ हिजाज, ३१० सौवीरी, ३९, ५४, ७१, २२६ हिन्दोल, २२४, २२६, २२८, २८३ स्कन्द, २९४, ३०९ हिन्दोली, ३०९ स्तोमक्रिया (लक्षण), २५२ हीजज्जी, ३११ स्तोभाक्षर (लक्षण), २५१ हृष्यका, ३९, ४५, ४७, ५२, ७३, १३२ स्थायीभाव (लक्षण), २५७ हेजुज्जी, ३१० स्थायी स्वर (लक्षण), ८७, १३६ हैदराबाद, ३००