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संगीतसुदर्शन

हिन्दीभाषामें संगीतशासत्र

"संगीतं चापि साहित्यं सरस्त्याः कुचदूयम्"

-##&-

प्रकाशक

इंडियन प्रेस, लिमिटेड, प्रयाग

द्वितीय बार ] सन् १६२३ [मूल्य १।)

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Printed by Bishweshwar Prasad, at The Indian Press, Ltd., Benares-Branch.

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क का निवेदन

पाठक महोदय ! 'संगीत-सुदर्शन' आज आपके सामने है। इस विषय पर हिन्दी में पुस्तकें कम हैं इसी लिए हमने इसे प्रका- शित किया है। संभव है इसे पढ़कर आप इसकी भाषा को कुछ अशुद्ध ठहरायें और इसके लिए प्रेस को उत्तरदाता समझें; इस- लिए हम पहले ही से यह निवेदन कर देना उचित समझते हैं कि यह पुस्तक विषय की उपयोगिता के कारण ही इस प्रेस द्वारा प्रकाशित की गई है। भाषा-सम्बन्धी त्रुटियों के दूर करने का जो प्रयत्न प्रेस ने किया था वह ग्रंथकर्त्ता को पसंद न आया,और उन्होंने इस बात का आग्रह किया कि उनकी पुस्तक में ज़रा भी परिवर्तन न किया जावे, क्योंकि उनकी राय में उन्हीं की लेखन- शैली आदर्श है। अस्तु, भाषा-सम्बन्धी या विषय-सम्बन्धी त्रुटियों के लिए प्रेस उत्तर-दाता न समझा जावे यही हमारी प्रार्थना है।

विनीत-

प्रकाशक।

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विषयसूची

विषय पृष्ठ विषय पृष्ठ भूमिकारम्भ सितारसे ज्वरकीनिवृत्ति ... ... 60 सुख ... ... रहीमसेन त्मृतसेनजी पूर्वपुरुषशैली २ विद्याहासकारण विद्यासुख २ त्रसीरखांजी 10 विद्यामहिसा २ वेश्यासंगसे हानि संगीतमहिमा ३ पदकवाल १२ संगीताचारयों के नाम ४ वास्तविक विद्वान् १२ आचीनसंगीत विद्या दंभी १२ प्रौढ़ संगीतका हासकाल ... भारत १३ प्रढ़संगीतके अरंतिम आचार्य् औ्रौढ़संगीतारम्भकाल ... भारतमें शांतादिरसक्रम १३ विद्यावीर १४ सादकअलीखांजी ... गानग्रशालीभेद १४ श्रीकुंभनदासजी आलापश्रेष्ठता १५ श्री हरिदासस्वामीजी ६ सरगमलच्षण १५ संगीतविद्या हिंदुओंकी धुरपतका लक्षणा १६ तानसेनव शका संगीतश्रम धुरपतप्रणालीकाल १७ श्रीहरिदासस्वामीजी ... ७ दीपकरागका फल तानसेनव शघुरपत ... १७

... ७ तानसेनदौहित्रव श धुरपत १७ दंभियोंका दंभ खयालका बयान १८ विद्यासे महत्व हस्सूखांहद्द खांजी १६ IS दीपकराग महम्मदखांजी १६ रागोंके फल ... हस्सूखांजीकी मृत्यु . २०

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विषयसूची

विषय पृष्ठ विषय पृष्ठ

खयालकी गवाई ... २१ हुसेनखांजी .. २८

खयाल लक्तण २१ सितारसे सर्पका आरना ... २६

फिकरेबंदी २२ रहीमसेनजीका सितार और घुरपत और खयाल ... २२ गांभीर्य्य ... २६ सब कुछ गाने बजाने वाले २३ रहीमसेनजी ३० वाद्यभेद 1 .. २३

ततवाद्य .. २३ रहीमसेनजीका बाज

तुंबूरा २४ श्रीअमृतसेनजी ३१ ... वीसाभेद श्रीअमृतसेनजी ३२ २४

नौवातखांजी अमृतसेनजी आगरेमें ३३ ... २४

बहादरखांजी अमृतसेनजी और सादकअली- २५

सादकतरलीखांजी २५ खांजीका जोड़ ३३

रसवीनखांजी २५ अमृतसेनजी जयपुरमें ... ३४

सुषिर वाद्य २५ अरमृतसेनजीका सितार सुन

काशीकी शहनाई २६ एकबंगालीका पागल होना २५

मृदङ् कदौसिंह २६ ग्रंथकारके (मेरे) विद्यागुरु ३६ सितारेत्पित्ति २६ अमृतसेनजीके गुए ... ३६ तरमीरखुसरो २६ हफीजखांजी .. ३८ मसीतखांजी २६ हैदरवख्शजी .. दूलहखांजी २६ त्रमीरखांजी ३६ रहीमसेनजी २७ निहालसेनजी ३६ अमृतसेनजी २७ अरमृतसेनजीके शागिर्द ... ४० सुखसेनजी २७ श्रीअमृतसेनजीका वृत्त. ४० बहादुरखांजी गवालियरनरेशकी चाह ... २७ ४५ रहीमसेनजीपुत्र २८ अभृतसेनजीका जन्म ... ४५ लालसेनजी ... २८ अमृतसेनजी अलवर आए ४५

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विषयसूची ३

विपय पृष्ठ विषय पृष्ठ

अमृतसेनजीका कदौसिंहके आलमसेनजी .. ६० साथ सितार बजाना ... ४६ धुरपतसमाप्ति .. ६० शिवदानसि हमहाराजा ... ४६ अमृतसेनजीका घर ... ६१ असृतसेनजी जयपुरआए ४७ अमृतसेनसितारमहत्व ... ६१ अमृतसेनजीने निजपौत्रियोंका सितारका परिष्कार ... ६१ विवाहकरना ४७ रहीमसेनजीलखनागए ... ६२ अ्रसृतसेनजीकी मृत्यु ... लखनाके कत्थक वि दादीनजी ६४ अरमृतसेनजी नैपाल गए ... ग्रन्थकारकी शिक्षा ... ६४ अमृतसेनजीको ईरानके पाढ- संगीतसुदर्शनसमालेचिना ६५ शाहने बुलाना ... ५० संगीतग्रन्थाध्ययन निवृत्ति ६५ ,, इंदौर नरेशने बुलाना ५७ तानसेनव शधर पूर्वीलोग ६६ अमृतसेनजीके लयताल ... तानसेनव शघर पश्चिमीलोग ६६ सितारकी गतें ... ५२ अमृत सेनजीका आदर ... ५२ संकेत विशेष .. १-३

अमीरखांजी वजीरखांजी ४ हैदरवख्शजी .. ५४ स्वराध्याय

अ्रमीरखांजी ५४ त्नाहत नाद ..

मीयांतानसेनजी आहत नाद ..

तानसेनव शमें हिन्दुरीति ५६ नादशब्दार्थ ...

तानसेनपुत्रव श ५६ नादके ₹ प्रकार ... २ MY MY नौवातखांजी नादके ३ प्रकार .. ... ३

संगीतशित्षा ५८ स्वरोंके ३ सप्तक ... ३

तानसेनव शावली २२ श्रुतिये AY ...

शरमृतसेनजी ... ६० श्रति जातियें ... ४

अमीरखांजी ६० सप्त स्वर ... ... हफीजखांजी L .. ६० षडजादिशब्दार्थ ...

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विषयसूची

विषय पृष्ठ विषय पृष्ठ

श्रुतिस्वरकोष्ठ गाने बजानेवालेके गुए ३७

षड्ज पंचम शब्दप्रकार ३७

उतरे चढ़े स्वर १० गाने बरजानेके २ प्रकार ३७

शास्त्रकेऔर लोकके स्वर वीखाका वृत्तांत ३६

षड्ज पंचप्र सितारका वृत्तांत शुद्ध विकृत स्वर चर्मसे मढ़े वाद् ... ४०

श्रुतिस्वरभेद १३ संवादिप्रभृति ९४ रागाध्याय

ग्रह अंशादि १३ रागलत्तण ४१

३ ग्राम १६ रागभेद

श्रुतिस्वरग्रामकाष्ट १८ ६ राग ४२

प्रचलितग्रामसमीक्षा प्रभातके ११ राग ४३ -५४

मूछनालत्तण २१ प्रातःकालके १० राग २४-६६

तानलन्ण २३ द्वितीयप्रहर के १० राग ६६-७४

कूटतानलच्षरा ... २७ तृतीयप्रहर के ४ राग ७४-७७

आचिकादि भेद २७ चतुर्थप्रहरके १२ राग ७७-८८

वर्सालक्षस २८ पंचमप्रहरके २१ राग

अलङ्कार (फिकरे) २८ षष्ठप्रहरके = राग गानकी शुद्ध जातियें ३० पष्ठसप्तमग्रहर के ७ राग १११-११६

गानकी विकृत जातिये ३१ सप्तमग्रहरके ४ राग ११६-११६ गीति ३२ ग्रीष्मऋतु के ११ राग ११६-१२१

लयभेद ३२ वर्षाऋतु के म राग १२६-१३६ स्वरोंके स्वभाव .. ३४ मीर्रांके मलारका हाल १३० सारेगमादिनास ३४ तथा वैजू और गोपाल सितारके ठाट ३५ शीतऋतुके ४ राग १३६-५३६ गाने बजानेवालेके दोष ... ३६ कुछ रागों का हाल १३६

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विषयसूची

विषय पृष्ठ विषय पृष्ठ

रागपरिवार कोष्ठ १४४ रहीमसेनजीका चित्र ... १३२रागोंकाविवरणाचक्र१४६-१५८ श्रीअमृतसेनजीका चित्र चास्तविकसंगीतका लक्षण १५६ अमीरखांजीका चित्र निहालसेनजीका चिन्न ...

तालाध्याय हफोजखांजीका चित्र ...

ताललनख ९६० फिदाहुसेनजीका चित्र ... ... तालविशेष ६० १६५-१७६ ग्रंथकारका (मेरा ) जीवन

लयलक्षणा १७७ वृत्तांत शिवाष्टपदी ... श्रीकृष्णपंचक ... नृत्याध्याय ग्रंथकारकृतग्रंथसूची ... नृत्यका कुछहाल ... ग्रंथकारका चित्र .. नट नर्तक लक्षण १८८ ग्रंधसमाप्तिके दोहे भूमिकामें नेावातखांजी की जगह शौरीन्द्रमोहनकी चिट्ठी ... नैवतखां प्रसादसे छपगया है, एव श्रीहरिदासस्वामीजीका चित्र और भी कहीं शब्दकी अशुद्धि हो मीयांतानसेनजीका चित्र सो सुधार लेनी।

अच्छा कहा है कि-

"बोद्धारो मत्सरग्रस्ताः प्रभवःस्मयदूषिताः" इति।

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शुद्धिपत्र।

पृष्ठ पंक्ति अ्रशुद्ध शुद्ध २२ २१ बुद्धिजनों मंदबुद्धिजनों ६७ १६ चाय्य चार्य

२४ १ रखासा रेखासा

•७६ १० बीराग श्रीराग १२५ बताई बनाई १४१ ५ू जोड़कर जोड़का १४३ ३ पंचमपंचम पंचम

१४३ १६ बनाने बजाने

१४७ २२ पित्तप्रधान कफवातपित्तप्रधान १५५ १६ मेघे मेघ

१५८ रकी सूरकी ב

१८२ ननर्वना नर्तना ?55 २० न क नर्तक: ६५ पृष्ठपर लिखी खयालियों की रामकली का समय प्रभात है। इसकी गत में दूसरी मोंड सात के पड़दे पर जाननी। ६द पृष्ठपर गुनकरी की गत में प्रथम मींड को पांचवें पड़देपर जानना ७१ पृष्ठपर शुद्ध विलावल की गत में जो पहली तथा दूसरी मोंड के नीचे 'डाडिड़' ये दो दो बोल हैं उनको मिंडे तारपर ही बजाना जो निषाद मध्यम स्पष्ट न बोले।

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शुद्धिपत्र

७३ पृष्ठपर सुघरई तथा सूहे की गत में जो छै के पड़देपर माड़ें हैं उनको मटका देकर निकालना। ७र्र् पृष्ठपर जयश्री की गत के अंतिम डाको दसके पड़देपर जानना। ८२ पृष्ठपर पूरवी को गत में जो मीड है उसको दसके पड़देपर जो प्रथम डा है उस पर जानना। इसके तोड़े में बारहवें डाका नौ तथा आठ के पड़देपर जानना मौंड को इससे आगेकं डा पर जानना। ८३ पृष्ठपर पूरिया धनाश्री के तोड़ेमें चतुर्थ बोल डा को पंचम पड़देपर बजाना एक स्वर की मीड देनी, और पंचम बोल ड़ा को तीसरे पड़देपर बजाना। ६१ पृष्ठ पर केदारनटके तेोड़ में जो मीड है उसे नौ के पड़दे पर जानना। १०५ पृष्ठपर अड़ाने की गत में छैके पड़देपर जो मीड़े हैं उनको मटका देकर निकालना। १०८ पृष्ठपर दरवारी के तोड़े में दूसरी मीड को एक के पड़देपर और तीसरी मीड को नौके पड़देपर जानना। ११३ पृष्ठपर मालकौस के तोड़े में जो ठाकी ठाके चार बोल हैं मी उनका 'डा ड़ा डा ड़ा' इस प्रकार जानना। १ ८ १५ ५ १२१ पृष्ठपर तिलंग की गत में तीसरे पड़देपर जो डा है उसके आगे चतुर्थ पड़देपर एक डा और लगाना। १२३ पृष्ठपर मीयांकी सारंग की गत में जो दो मीड़ें हैं उनको बारह के पड़देपर एक एक स्वर की जानना।

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शुद्धिपत्र ३. १२५ पृष्ठपर शुद्ध सारङ्ग की गत में जो दो मीडें हैं उनको नौकं पड़देपर जानना अर्थात् ड़ा बजाकर पंचम को मीड़ना लौटते समय मध्यम की मीड पर डा बजाना। १२८ पृष्ठपर धूरिया मलार की गत में जो एक का अंक है उसे ११ का अंक ड़ा के नीचे जानना। १२६ पृष्ठपर नट मलारी में कभी कभी ऋषभ को छोड़ देना। १३८ पृष्ठपर हिंडोल की गत में तीसरी मीड को तथा तोड़े में भी तोसरी मीड को चढ़े मध्यम की मीड जानना। १४७ पृष्ठपर पित्त प्रधान रोगों के लिए आसावरी प्रभृति का गाना बजाना हितकर है। यदि और कोई अशुद्धि नजर में आए तो अपनी बुद्धि से उसे शुद्ध कर लेना। गतों की शुद्धि के लिए उस उस राग के लक्षसपर पूरा ध्यान देना, जिस राग में जो सवर वर्जित लिखा है वह स्वर उस राग में कदापि न लगाना। मेरे जीते जी यदि यह ग्रन्थ तीसरी वेर छपा तो इसको कुछ और भी बढ़ा दूँगा। किसी उत्तम गुरु से कुछ सीखिये। इत्यलम्।

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॥ श्रीः ।।

भूमिका श्रीसरस्वत्यै नमः

अपये र्नगर्भाSनर्घरत्नशिरोमये संगीतविद्याविशारद! जीवमात्र सुखको चाहताहै कहा भी है-"सुखार्थ' सर्वलोकानां प्रवृत्तिः परिचीयताम्" इति. वह सुख अंतःकरय (मन) का धर्म है अतएव भोजनपानादि पुत्रकलत्रादि बाह्य सामप्रोसे भी यदि सुख होता है तो अंतःकरसमें ही होताहै यथा उसगृहमें प्रज्वलित दीपसे उसगृह में जैसा प्रकाश होसकता है वैसा प्रकाश बाहरके दीपकसे उसमें नहीं होसकता तथा अंतःकरयमें होनेवाले विद्यादिपदार्थोंसे जैसा सुख होसकताहै वैसा सुख बाह्यपदाथोंसे नहीं होसकता, क्योंकि सुख और विद्या दोनों अंतःकरयके धर्म हैं और कार्यकारयोंका सामा- नाधिकरण्य अपेच्ित है। आजकलके लोगोंने जिसको सुख समझाहै वह वस्तुगत्या सुख नहीं सुखाभास है; इसी कारखसे भारतके पूर्वपुरुष विशेषकर साइन्स- की ओर नहीं भुके वे जानतेथे कि विशेष आयास तथा दौड़ धूनमें सुख नहीं; इसीलिए उन्होंने रेल तार प्रभृति भयङ्कर तथा घोर पदार्थोंका निर्माय न किया अन्यथा वे भी बड़े बुद्धिमान् थे चाहतेतो बहुत कुछ बनाडालते कहा भी है कि "जो सुख छज्जूके चौबारेमें, वह न बल्ख शबुखारे में"। महाभारतमें भी कहा है कि "अनृखी चाSप्रवासी च

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२ संगीतसुदर्शन- स वारिचर! मोदते"इति. इसलिए पूर्वपुरुष जैसी कैसी भी कुटिमें बैठ विद्याचर्चामें तथा परमेश्वरके ध्यानमें सर्वोत्तम सुख समभतेथे वैसे ही करतेथे, वे प्रायः वनोंमें रहतेथे। नगर भी जो थे वे बहुत छोटे छोटे थे। अयोध्याप्रभृति सात नगर सबसे बड़े होनेके कारख ही पुरी कहातेथे। गोचर भूमि तथा गौएं बहुत थीं इस कारय दुग्धकी कुछ कमी न थी वे थोड़ासा तंडुलादि त्न्न उत्पन्न करलेतेथे और बड़े आ्रनन्दमें रहतेथे। राजा लोग भी विद्वान् ब्राह्मणोंकी सहायता बहुत करतेथे। रोगादि उपद्रव बहुत ही कम थे, सत्यधर्मका बड़ा विस्तार था।' वस्तुगत्या देखा जाय तो ऐहिक सुख विद्यासे बढ़कर और किसी पदार्थसे नहीं होसकता क्यों कि सुख भी अंतःकरणका धर्म है और विद्या भी ज्ञानस्वरूपा होनेसे अंतःकरसका धर्म है बस सामानाधिकरण्य होगया; कहा भी है कि-"अर्धमात्रालाघवेन पुत्रोत्सवं मन्यन्ते वैयाकरखः"। तथा-

"मातेव रक्षति पितेव हिते नियुङ क्ते, कान्तेव चाभिरमयत्यपनीय दुःखम्। कीति® च दिन्तु वितनोति तनोति लक्ष्मी किं किं न साधयति कल्पलतेव विद्या॥" यथार्थ तो यह है कि विद्यासे ही पुरुष पुरुष कहला सकताहै विद्याके बिना तो उसे एकप्रकारका पशु ही कहनाचाहिए कहा भी है- "अहितहितविचारशून्यबुद्धेः श्रुतिसमयैर्बहुभिर्बहिष्कृतस्य। उदरभरगमात्रकेवलेच्छोः पुरुषपशोश्च पशोश्च को विशेषः॥"

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भूमिका। ३

"वित्तभ्रष्टान् जगति गएयेत् करतृसेनापि मूर्खान् विद्वांसस्तु प्रकृतिसुभगा: कस्य नाभ्यर्हीयाः।" इत्यादि। उन विद्याओंमेंसे भी साहित्य और संगीत विद्या बहुत ही सुखजनक है कहा भी है- "संगीतं चापि साहित्यं सरस्वत्याः कुचद्वयम्। एकमापातमधुरं परमालोचनामृतम्॥" अर्थात्-यथा नायिका का समग्र ही वपु नेत्रद्वारा सुखजनक होने पर भी स्तनमंडल अधिक सुखजनक होता है तथैव सरस्वती देवीका समग्र ही विद्यारूपी वपु सुखजनक होने पर भी संगीत और साहित्य मधुर होनेसे अधिक सुखजनक हैं। इन दोनोंमेंसे भी संगीत अधिक सुखजनक है यह स्पष्ट है इसकेलिए किसी प्रमाखकी अपेक्षा नहीं। उत्तमोत्तम संगीत से भी मूर्खसे मूर्ख जन भी प्रसन्न ही होगा, विशेषज्ञलोगोंके आरनंदकी तो कथा ही क्या ? इसीलिए कहा कि "एकमापातमधुरम्" इति। संगीतविद्याके आनंदमें बहुत लोग फूक़ोर होगये, उनमें नारदजीभी हैं। आधु- निक्न कालमें मियाँ तानसेनजीके ज्येष्ठ पुत्र तथा उनके वंशमें होने- वाले और भी कई पुरुष संगीतके आनंदसे फ़क़ीर हो गये। भभर- में मियाँ अमृतसेनजीका सितार सुन एक बंगाली पागल होगया था। कहा है- "ऐहिकामुष्मिके त्यकत्वा देवषिर्नारदः सदा। ब्रह्मानन्दोपि वीखाया वादने नियताSभवत्।। मृगः सोपि तृषाहारो विचरन्नटवीं सदा। लुब्घकादपि संगोतं श्रत्वा प्रायान् प्रयच्छति॥

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४ संगीतसुदर्शन- करुद्धो विष वमन सर्पः फणामान्दोलयन् मुहुः। गानं जाङलिकाच्छ त्वा हर्षोत्कर्ष प्रपद्यते।। नाह' वसामि वैकुण्ठे योंगिनां हृदये न च। मद्भक्ता यत्र गायन्ति तत्र तिष्ठामि नारद।। वीखावादनतत्वज्ञः श्रुतिजातिविशारदः । तालज्ञश्चा Sप्रयासेन मोक्षमाग नियच्छति॥ तस्य गीतस्य माहात्म्य के प्रशंसितुमीशते। धर्मार्थकाममोक्षायमिदमेवैकसाधनम्॥" इत्यादि। संगीतविद्या अनादिकालसे चलीआती है प्राचीनकालमें इसविद्या- के बहुतसे आचार्य होचुकेहैं उनमेंसे कुछ आचार्योंके नाम संगीत- रत्नाकरकारने लिखेहैं यथा- "विशाखिलो दन्तिलश्च कम्बलोSश्वतरस्तथा। वायुर्विश्वावसू रम्भार्जुनो नारदतुम्बरू॥ आज्जनेयो मातृगुप्तो रावयो नन्दिकेश्वरः । स्वातिगुया बिन्दुराजः च्ेत्रराजश्र राहलः । रुद्रसेनश्र भूपालो भोजभूवळ्वभस्तथा। परमर्दी च सेोमेशो जगदेकमहीपतिः ॥ व्याख्यातारो भारतीये लोल्लटोद्धटशङ कुकाः । भट्टाभिनवगुप्तश्च श्रीमत्कीर्ति धरोऽपरः ॥" इति। पदार्थमात्रका स्वभाव है कि प्राथमिक बीजावस्थासे परमपोषा- वस्थाको प्राप्त होकर क्रमशः चीख होताहुआ नष्ट होजाता है ये ही-"अस्ति, जायते, वर्द्धते, परिएमते, चीयते, नश्यति" ये छै भावविकार कहेहैं। तथा च और विद्याओंके तुल्य यह संगीतविद्या

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  • भूमिका। ५ भी आदिकालमें सर्वथा सीधी सादी होगी ऐसा संभव है; कबसे इसका उत्कष होनेलगा यह कहना अशक्य है अथापि श्रीहरि- दासस्वामीजीके कालमें आकर इसका उत्कर्ष निरुद्ध होगया यह कहाजा सकताहै; अरथात् श्रीहरिदासस्वामीजी और मियाँ तान- सेनजीके अनंतर इसविद्याका ह्रास होनेलगा तबसे यह विद्या च्षीय होती हुई इससमय लुप्तप्राय होरहीहै, क्यों कि इससमय इस- विद्याके दोतीन ही वास्तविक उस्ताद शेष रहगयेहैं वे भी वृद्ध हैं तत एव दस पाँच वर्षमें उनके अनंतर इतिश्री ही है। रोना गाना कौन नहीं जानता; और इससमय भी एकप्रकार की संगीतविद्या बढ़ ही रहीहै, किन्तु मैंने जो बात ऊपर लिखीहै वह एक प्रौढ़ संगीतपरिपाटीकी लिखीहै, जो इससमयमें आकर नष्ट होरहीहै। इसी प्रौढ़परिपाटीके अन्त्यकालमें ध्रुवपदके सुख- सेनजी दूलहखाँजी हैदरवख़ शजी; सितारके रहीमसेनजी अमृत- सेनजी; रबाब और स्वरश्ंगारके बहादुरसेनजी सादिकअलीख़ाँजी; वीकाके रागरसखाँजी रसबीनख़ाँजी; ख़यालके ममदख़ाँजी हस्सूख़ाँहद्दख़ाँजी; ये लोग अंतिम बड़े नामी उस्ताद होगये इन लोगोंके अनंतर प्रकृत संगीतपरिपाटी बहुत ही चीस होगई। . मैं तर्क करताहूं कि संगीतविद्याकी यह प्रकृत प्रौढ़परिपाटी एक हज़ारवर्षसे अधिककी प्राचीन न होगी क्यों कि एकहज़ारवर्षसे पूर्वके अन्यविद्याओंके ग्रन्थ देखनेसे यही सिद्ध होता है कि उस कालमें विद्याओंकी पद्धति बहुत सरल थी कुटिल पद्धति तो एक हज़ारवर्षसे पश्चाद्भावीग्रन्थोंमें ही देखीजाती है ऐसा ही इस विद्यामें भी जाननाचाहिए। कुटिल करनेवालोंने विद्याकी पद्धतिको इतना

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संगीतसुदर्शन-

कुटिल करदिया कि विद्वानोंमें विद्वान् (उस्ताद) कहाना कठिन हो गया। विद्वान् लोग ऐसेवैसेके हाथसे तुम्बूरा वीखा प्रभृति साजको खोसलेतेथे। इसकार्यमें सादकअलीख़ाँजी बड़े ढोठ थे। उन्होंने बहुतसे लोगोंके हाथसे साज (वाद्य) खासे। चार उस्ताद लोगों- में बैठ वीखाको बजाना आजकलके सद्दश सहज न था। मियाँ अमृतसेनजी कहतेथे कि "आज कल वीखा तो तीतरका पिंजड़ा होगयाहै जो चाहताहै वह उठालेताहै पूर्वकालमें ऐसा न था"। वस्तुगत्या पूर्वज उस्तादों ने इसको ऐसा परिष्कृत किया कि उसका कहना तथा लिखना अशक्य है। कुम्भनदासजीको बादशाह अकबर ने बड़े आग्रहसे बुलाकर बहुत संमानसे गान सुना सुनकर बहुत प्रसन्न हुए। श्रीहरिदासस्ामीजीका गान सुननेकेलिए बाद- शाह अकबर मियाँ तानसेनजीके भृत्य बन बग़लमें उनका तुम्बूरा उठा उनके साथ स्वामीजीके पास गये स्वामीजीका गान सुन अकबरके त्रप्रानंदकी सीमा न रही, क्यों न हो एक तो स्वामीजी संगीतविद्याके आचार्य दूसरे परम विरक्त भगवद्भक्तोंके शिरोरत्न थे वस्तुगत्या वे गोलोकके दिव्यगायक थे। लोभ और नौकरी पेशेसे इसविद्याकी तासीर नष्ट होतीगई यही बात अमृतसेनजी भी कहते- थे। पूर्वपुरुषोंने इस विद्यासे भी बहुत संमान पायाहै। कईकारणोंसे विद्याके ह्राससे संमानका भी ह्रास होतागया; होते होते इसविद्या- वाले कुछ लोग बहुत ही अपमानको सहन करने लगगयं, इस अपमानका हेतु भी विद्याहास ही है। प्रथम यह विद्या हिन्दुओंके पास थी बादशाही समयसे मुसल- मानोंके पास जानेलगी। बादशाही समयमें मुसलमानोंने अपनी बहुत

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भूमिका। ७

ही उन्नति की। होते होते मियाँ तानसेनजीके अनंतर तो मानो इसविद्याने हिन्दुओंको त्याग ही दिया। तानसेनजीके पुत्रपौत्रादि तथा शिष्योंने इसविद्या पर बहुत ही परिश्रम किया खुब जान लड़ाई। कहते हैं कि मियाँ तानसेनजी के मृतशरीरके आगे उनके एक शिष्यने गाया उससे मृतशरीरसे भी वाह वाह यह शब्द निकला फिर उनके पुत्रने गाया तो मृतशरीर भी एक बार उठकर बैठगया, एवं और भी इसविद्याकी तासीरकी बहुतसी बातें सुननेमें आतीहैं यथा श्री- हरिदासस्वामीजीने अकबरको लंकदहनसारंग सुनाई तो वनमें अग्नि लगगई अकबर बहुत डरे तब स्वामीजीने तानसेनजीको मेघराग गानेको कहा इनके मेघरागसे वर्षा हुई जिससे वह अप्नि शांत होगई। दीपकराग गानेसे उससमय गानेवालेको इतना संताप होताथा कि उसका जीना कठिन होजाताथा इसीसे तानसेनजीने दीपकका गाना बंद करदियाथा। अब वस्तुगत्या कोई भी दीपकरागको नहीं जानता। कोई लोग दीपक जलनेको दीपकरागका फल बताकर कुछ गाकर किसीयुक्तिसे दीपकको जलादेते हैं यह कुछ सयुक्तिक प्रतीत नहीं होता क्योंकि यदि दीपकका जलना ही दीपकरागका फल होता तो तान- सेनजी दीपकरागके गानेको बन्द क्यों करते ? दीपक जलनेसे तो कोई अनिष्टापत्ति नहीं है इससे प्रतीत होता है कि दीपकरागका फल कोई भोरीअनिष्ट है जिसके भयसे दीपकरागका गाना बन्द करदिया गया। यों अपने घरमें तथा अपनेसे अल्पज्ञ लोगोंके बीचमें बैठकर तो मनुष्य जो चाहे सो गप्प मार सकता है कि तु उससे विद्वत्समाजमें संमान प्राप्त नहीं होसकता। विद्वत्समाजमें तो जितनी विद्या होगी उतना ही संमान प्राप्त होगा। यहाँ पर यह भी जानलेना आवश्यक

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संगीतसुदर्शन- U है कि विद्वान् लोगोंके भी आरतिथ्योचित आवश्यक संमानसे भी कोई विद्वान् नहीं कहलासकता क्यों कि यदि कोई मूर्ख भी पूर्विद्वान्के पास जायगा तो क्या विद्वान् उसको 'आओ जी' न कहेगा ? बा आसन न देगा ? आयेहुएका आदर करना मनुष्यमात्रका धर्म है वह आदर विद्वत्ताका सूचक नहीं होसकता; विद्वत्ताका सूचक किं वा विद्वत्ताप्रयुक्त आदर कुछ और ही होता है। जो पुरुष मनुष्यत्वप्रयुक्त उक्त सामान्यसंमानसे अपनेको विद्वान् सिद्ध करतेहैं उनका वह प्रयास विद्वत्समाजमें सफल नहीं होसकता। तानसेनवंशके संगीतविद्याके पांडित्यसे चिढ़कर केवल ईर्षासे उनके परोक्षमें बैठ बहुत लोगोंने उनकी निंदा की और अपने महत्वकी गाथा गाई तो भी उससे कुछ न बना। बात तो तब थी यदि उनके संमुख बैठ कुछ चमत्कार दिखाते। मंदबुद्धिलोग ऐसे लोगोंकी गप्पोंको सत्य समझलेतेहैं तर्क कुछ नहीं करते और तर्क तो तब करें जब परमेश्वरने तर्कशक्ति दी हो। कुछ लोग अपनेको पूर्वाचार्योंका दंशोत्पन्न बताकर सिद्ध बनबैठतेहैं मैं पूछताहूँ कि यदि कोई किसी सिद्धपुरुषके वंशका होनेसे ही सिद्ध बन सकताहै तो वह पहले सिद्ध कैसे सिद्ध बने ? वे तो किसी सिद्धके वंशमें उत्पन्न नहीं हुए। एकप्रकारसे तो सभी जगत् परमात्मासे किं वा ब्रह्मासे कि वा पूर्वजऋषियोंसे ही उत्पन्न है उनसे बढ़कर कौन सिद्ध होगा ? तब तो सभी जगत् सिद्ध बनगया ? फिर किसीका विशेष महत्त्व ही क्या ? इससे यही बात सिद्ध होतीहै कि जो कोई बड़ा बनसकताहै वह अपने ही गुणोंसे बड़ा बनसकताहै न कि अपने पूर्वजोंके गुखोंसे कि वा दूसरेकी निंदासे। श्रीशंकराचार्यस्वामी

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भूमिका। श्रहरिदासस्वामी मियाँ तानसेनजी प्रभृति महामान्य लोग कौनसे जगन्मान्यवंशमें उत्पन्न हुएथे ? कहा भी है- "लोकोत्तरं चरितमर्पयति प्रतिष्ठां पुंसां कुलं न हि निमित्तमुदात्ततायाः । वातापितापनमुनेः कलशात् प्रसूति- र्लीलायितं पुनरमुद्रसमुद्रपानम्।" "किं कुलेन विशालेन विद्याहीनस्य देहिनः। अ्रकुलीनोपि विद्यावान् देवैरपि सुपूज्यते ॥" "गुयाः सर्वत्र पूज्यन्ते पितृवंशो निरर्थकः । वसुदेव परित्यज्य वासुदेव नमेज्जनः ॥" "गुैगौरवमायाति न महत्यापि संपदा।" "गुगैरुत्तुङ्गतां याति नोच्चैरासनसंस्थितः । प्रासादशिखिरारूढ: काकः किं गरुडायते ॥" "गुगोषु क्रियतां यत्न: किमाटोपैः प्रयोजनम्। विक्रीयन्ते न घण्टाभिर्गावः च्षोरविवर्जिताः ॥"इत्यादि। (पुनः प्रकृत ) यदि मियाँ तानसेनजी दीपकरागका निरोध न करते तो भी इससमय कोई अनिष्टापत्तिकी संभावना न थी क्यों कि जैसे इस समयमें मेघादिरागोंसे वर्षादि फल नहीं होता, वैसे दीपकरागसे भी इससमय कोई फल होनेकी संभावना न थी अथापि उसकाल में कुछ लोगोंको दीपकरागसे अनिष्ट फल होता इससे ही इस राग का निरोध करदियागया ऐसा प्रतीत होताहै। कोई कोई रागोंसे कोई कोई रोग भी निवृत्त होतेहैं ऐसा

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१० संगीतसुदर्शन-

सुनाहै। कहते हैं कि दिव्वीके एक बादशाहको एक रोग हुआ जो किसी भी चिकित्सासे दूर न हुआ तब हकीमोंने किसी रागविशेष- को सुननेकों उनसे कहा, बादशाहने तानसेनवंशके एक वृद्ध फ़कोर उस्तादको बड़े आग्रह तथा सम्मानसे बुलाकर सुना तो वह रोग नष्ट होगया। अलवरके विनयसिंहजीराजाका ज्वर किसी चिकित्सासे जब न हटा तो वैदने कहा कि किसी उस्तादकी भैरवीमें तासीर हो तो उससे यह ज्वर जायगा राजाने रहीमसेनअमृतसेनजीसे यह वृत्तान्त कहा उन्होंने सितारमें भैरवी ऐसी बजा सुनाई जिससे राजाका ज्वर दूर होगया। भभरमें एकदिन सर्प एकघंटाभर इनका सितार सुनतारहा। पंजाबमें नाभेके राजाकी निद्रा नष्ट होगईथी एकगायकके रागविशेषको गानेसे फिर निद्रा आनेलगगई। जयपुरके रूपनिवासबागमें अरमृतसेनजीने ऐसा सितार बजाया कि कई चिड़ियाँ सितारपर आबैठीं। अमृतसेनजीने एकदिन किदारेकी एक ऐसी तान ली जिससे चाँदनी कुछ अधिक प्रतीत होनेलगी। पूर्वज पुरुषोंके रागोंसे जलाशय लहराने लगतेथे, लहराते हुए स्तब्ध होजातेथे, मृग आजातेथे, बादल उड़जातेथे इत्यादि बहुतसे फल सुननेमें आतेहैं। आजकलता अधिकसे अधिक मनोनुरखजनसे अधिक कुछ फल देखनेमें नहीं आता इसका कारए भी कुछ निश्चित नहीं होता न जाने रागस्वरूपोंमें कुछ भेद होगया, या उनलोगोंके कोई योगादिसामथ्य का वह फल था, या उन उन रागोंकी कोई विशेष तानोंसेवे फल होतेथे और वे ताने आगेके शिष्योंको प्राप्त न होनेसे ॥फलदर्शन नष्ट होगया; कुछ पूरा पता नहीं चलता। उच्तरोत्तर बुद्धि और श्रमके मंद होजानेसे भी विद्याकी अल्पता

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भूमिका। ११ होतीगई, और कुछ दुर्जनशिष्योंकी दुर्जनताके कारय गुरुलोग संशयित होकर सज्जनशिष्यों से भी विद्यामर्मको छिपाने लगे। इस छ्विपावसे भी विद्याएँ नष्ट हुई। गुरु बुद्धि और श्रम ये तीन जैसे ही उत्कृष्ट होतेहैं वैसी ही विद्या भी उत्कृष्ट होती है, यह भी एक चमत्कार है कि पूर् नैयायिकसे तर्कसंग्रह पढ़नेसे जैसा तर्कसंग्रह आताहै मुक्तावलीमात्र पढ़ेसे पढ़नेसे वैसा नहीं आता यही रीति और भी सब विद्याओंमें जाननी चाहिए इस कारय भी विद्याओंका ह्रास होताजाताहै। भारतवर्षका न जाने क्या दुर्दैव है जो चाहे शिष्य कितना भो बुद्धिमान् और श्रमी क्योंन हो तो भी गुरुके बराबर नहीं पहुँचता। जो विद्वान् उठ जातेहैं उनकी समताका आगे कोई नहीं निकलता, श्रीगंगाधरशास्त्रोजीमहाराजका विद्याचमत्कार उनके साथ ही चलागया, अमृतसेनजीके भागिनेय शागिर्द मियाँ अमीरख़ाँजी (१) ने कुछ कम श्रम नहीं किया और इस समयमें ये संगीतविद्या- के अद्वितीय उस्ताद भी हैं तो भी अमृतसेनजीकी अपेक्षा ये उनके चतुर्थांशसे अधिक नहीं हैं। यही दशा और विद्याओंकी भी जानिए। यह भारतीयविद्याओंका ह्रास हृदयको विदीर्स करे डालताहै बड़े शोककी बात है तथापि वश कुछ नहीं, यदि वश होता तो मैं अपने उस्ताद मियाँ अमृतसेनजीसे सितारके निजप्रावीण्यमें रत्तीभर भी कमी न होनेदेता। किसीने अच्छा कहा है-"दैया कहाँ गये वे लोग !" इति। इसविद्यामें वेश्याओरंके प्रवेशसे भी बड़ो च्षति हुईहै इनके संगसे मनुष्य प्रायः मनुष्यत्वसे भी त्षीय और अप्रामासिक होजाताहै फिर विद्याकी तो कौन कथा ?। (१) ये मिर्याँ अमीरखाँजी अब वत्त मान नहीं हैं सं० १६७२ काति कमें मरगये।

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१२ संगीतसुदर्शन-

आजकल जैसे कुछ लोग अपने ही मुखसे उस्ताद बनजातेहैं चैसे कुछ लोग पदकों (तमगों) से उस्ताद बनजातेहैं बहुतसे पदक छातीपर लटका लिये बस होगया शेष कुछ नहीं रहता उन पदकोंसे उनका पैर पृथ्वीपर नहीं डटता। उनपदकोंमेंसे कुछ तो खुशामद- पसंद श्रीमानोंके दियंहोतेहैं कुछ अपने मित्रबंधुबांधवोंके दियेहोतेहैं, शेष स्वयं बनवा लियेजाते हैं। विद्या के ह्रासमें गुसग्राहकोंका अरविवेक भी भारी कारय है। गुसग्राहक लोग मूर्ख दंभी पाखंडियोंका आदर करनेलगगये तत एव वास्तविकविद्वान् भूखे मरनेलगे। इसभेदको जाननेवालोंने विद्याश्रमको त्याग दंभ पाखंड मार्गका ग्रहण करलिया क्यों कि सब कोई आदर और धनको प्रथम चाहता है। गुप- ग्राहकोंके इस अविवेकके कारय वास्तविक विद्वानोंने अपनी संतानको भी विद्याश्रमका क्लेश देना कम करदिया। वास्तविक विद्वान् अपने मुखसे अपनी प्रशंसा नहीं करते; इतना ही नहीं वे अपनी विद्याके सत्यस्वरूपको भी अपने मुखसे नहीं कहते, न कभी दूसरेका निरादर करतेहैं। वास्तविक विद्वानोंके सवभावादिक कैसे होतेहैं इसको वही जानसकताहै जिसने किसी वास्तविक विद्वान्का संग कियाहो। सी० आई०ई० महामहोपाध्याय श्रोगंगा- धरशास्त्रोजीसे किसी मादश मूर्खने पूछा कि 'आप क्या पढ़ेहैं ?' उन्होंने उत्तर दिया कि 'कौमुदीके दो चार सूत्र' ऐसी बोलचाल विद्वानोंकी होतीहै। मादश दंभी तो यही उत्तर देता कि 'सब कुछ पढ़ेहैं'। दंभी लोग प्रथम तो अपने ही मुखसे अपने गीत गालेतेहैं, फिर कुछ लोगोंको रुपया पैसा देकर गवालेतेहैं इससे अविवेकी लोग उन दंभियोंको ही विद्वान और विद्वानोंको मूरख जानलेनेहैं।

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भूमिका। १३

परमेश्वर जिसको नष्ट करे उसको ऐसा ही नष्ट करे जैसा उसने भारतको नष्ट कियाहै। जिस भारतमें बड़ी बड़ी बुद्धि और परिश्रमोंसे वृद्धावस्थामें जाकर विद्याके आचार्य कहला सकतेथे, अब उस भारतमें आठ आठ दस दस वर्षके बालक भी विद्याके आचार्य कहातेहैं, अत एव वे विद्याहीन रहजातेहैं, क्यों कि बालककेलिए आदर विषके समान है। आठ दस वर्षकी अवस्थामें बृहस्पति भी जिस विद्याके मर्मकोपा नहीं सकता उस विद्याके मर्मकोआठदस- वर्षका भनुष्य-बालक कैसे पायगा ? इतना भी विचार लोग नहीं करते बड़े शोकका स्थान है। न जाने इस भारतने परमेश्वरका ऐसा क्या अपकार कियाहै जो यह ऐसी अधोगतिको पहुँचा है। ऐसी दशामें वे ही लोग विद्वान् हुए जिनको विद्याका नशा लग गया और लोगोंसे धनमानकी परत्राह न रही। इस लापरवा- हीसे विद्वान् बनजानेपर भी लोगोंके अविवेकसे उनका भी उत्साह अवश्य टूट जाताहै। विद्वानोंके बालकोंकी बिना कारण स्वय ही विद्यासे रुचि निवृत्त होतीजातीहै ये सब ईश्वरकोपके फल हैं, अन्यथा बालक उक्त अविवेक कथाको क्या जाने ? यूरपपर आज परमेश्वरकी कृपा होनेसे वहाँ विवेक है अत एव वहॉ दिन दूनी रात चौगुनी विद्यावृद्धि होरहाहै। हमारे देशमें प्रथम शांतरसका बड़ा प्रस्तार था इसकार उस समय बड़े बड़े भगवद्भक्तऔर ज्ञानी होगये। उससमय विद्यायें भी बड़ी शांत थीं। काल सदा एकसा नहीं रहता इससे तदनन्तर वीररस का प्रभाव बढ़ा बहुतसे व्यवहारोंमें अभीतक वीररसानुसरय चला- आताहै यथा पंजाबमें वर वधू एक दिन लकड़ी खेलतहैं, बहिन

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१४ संगीतसुदर्शन-

भाईको वीर कहती है इत्यादि। उस समय विद्याओंमें भी वीररस घुस- गया; विद्वान् लोग विद्याकेलिए प्रा देदेतेथे। उसीसमय विद्याओंने भी उन्नति पाई। किं तु विद्यावीरोंका समय एक दो हज़ार वर्षसे प्राचीन प्रतीत नहीं होता। तदनन्तर शृंगाररसका राज्य बढ़ा इसरसके राज्य- से सभी विद्याओंकी बहुत च्ति हुई; देश नष्टप्राय होगया; संगीत- विद्यामें वेश्याओंके प्रवेशसे भी बहुत क्षति हुई, यही दशा प्रायः सब देशोंकी क्रमसे होतीहै क्यों कि उक्त तीनों रसोंका चक्र निरंतर घूमता रहताहै। अब आगे फिर प्रकृत विषयको लिखताहूँ। जैसे अनेक प्रकारके वाद्य होनेसे उनकी वादनप्रशाली अ्र्नेक प्रकारकी है वैसे गानप्रखाली भी अ्रनेक प्रकार की है यथा ध्र वपद (धुरपत) खयाल टप्पा ठुमरी इत्यादि। इनमेंसे धुरपत की प्राली सबसे प्राचीन है श्री हरिदास स्वामी तानसेनजी बैजू इत्यादि लोग इसी प्रखालीके आचार्य थे। इस प्रखालीके उस्ताद लोग गानकालमें प्रथम गेय रागका आलाप करतेहैं फिर उस रागकी सरगमोंकोऔर फिर चीज़ों (पदों) को गातेहैं। आलाप करना बड़ा क्िष्ट है आलापको वे ही उस्ताद करसकतेहैं जिनमें कल्पनाशक्ति होती है। उस्ताद शागिर्द आलापका मार्ग (प्रकार) बतादेतेहैं आलाप घोखा नहीं जाता। गायक अपनी कल्पनाशक्तिसे आलाप करता है। यदि आलापकी दस पाँच तानोंको घोख भी ले तो उतनेसे कुछ बन नहीं सकता जब घंटा आधाघंटा आलाप किया तो वहाँ घोखीहुई दस पाँच तानोंसे क्या बनेगा ? बड़े उस्ताद लोग तो तीन तीन चार चार घंटे एक एक रागका आलाप करतेथे, इसीकारय उन लोगोंमें आज कलके सद्दश एकबार बहुतसे रागोंको गानेका प्रचार न था, किन्तु एकबार (एक

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भूमिका। १५ मुजरेमें) एक वा दो रागोंको गाते बजाते थे। जिस रागको गाते बजातेथे उसका दरिया बहादेतेथे; कानोंमें वह राग रम जाताथा। लखनऊके एक गुगग्राहीने कहाथा कि रहीमसेनजीकी भीमपलासी आजतक कानोंसे नहीं निकली। आलापकी श्रेष्ठता यह है कि एक तो रागका स्वरूप न बिगड़े यह भी छोटीसी बात नहीं क्यों कि उस राग के समीप समीप जो राग खड़ेहैं उनसबसे उसरागको बचाकर शुद्ध रखनाचाहिए इसके- लिए उन समीपस्थ सब रागोंके स्वरूपका ज्ञान होनाचाहिए, दूसरे कल्पना उत्तरोत्तर नवीन होनीचाहिए उन्हीं तानोंको बारबार लेनेसे विज्ञलोग हँसदेतेहैं, तीसरे कल्पना मार्मिक होनीचाहिए, चौथे कल्पना रमगरीय =मनोहर होनीचाहिए जिससे विज्ञ श्रोतालोग आनंद में मग्न होजाएँ। जैसे अपना कुरूप भी पुत्र अपनेको चंद्रमासे भी बढ़कर सुन्दर लगताहै एवं अपना तुच्छसा भी गुर अपनेको भारी रमगीय प्रतीत होताहै तथा आनंदित करदेताहै तो भी वैसे गुयसे विद्वूत्समाज में मान प्राप्त नहीं होसकता। गुखीको तटस्थ होकर अपने गुसकी ओर देखनाचाहिए इस प्रकार बार बार देख अपने गुसको विद्वूत्समाजग्राही बनानाचाहिए। विद्याके दोषोंको सर्वथा निकाल उसे उत्कृष्ट करनाचाहिए। ये ही विशेष खयालकी फिकरे- बंदीमें भी जानने। 'ताय नों री तनन नों री ता आ आ रीत नों' इत्यादि बोलोंसे आलाप कियाजाताहै। जिसरागकी जो 'सा रेग म प' इत्यादि खरानुपूर्वी है वह उस- रागकी 'सरगम' कहलाती है। इन अक्षरोंपर रागोंके स्वरोंको शुद्ध अभिव्यक्त करना सहज नहीं; दूसरे सरगमसे रागस्वरूपको पूर्ण

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१६ संगीतसुदर्शन-

रूपसे खड़ा करदेना भी सहज नहीं क्यां कि सरगमके स्वर खड़े होतेहैं। सरगमको गायक प्रायः घोख लेतेहैं। बड़े उस्ताद तो कुछ सरगमकी भी तत्काल कल्पना करतेहुए भी गातेहैं यह भो बहुत कठिन है। कोई कोई कभी कभी सरगमको नही भी गाते। किसी छंदोबद्ध कविता (पद) में जो किसीरागकी तानोंको तथा किसीतालको नियत करदेतेहैं उसे धुरपत कहतेहैं यह तानोंका नियत करना सहज नहीं है, बड़े उस्ताद लोग ही उत्तम प्रकारसे करसकते हैं। मट्टी ख़राब करनी तो कौन नही जानता? इसकारण प्रायः पुराने उस्ताद लोगोंके ही बनायेहुए घुरपत चले आतेहैं, उन्हींको गायकलोग सीखकर गातेहैं। यद्यपि घुरपतमें कल्पनाशक्त- का काम नहीं तथापि उसको यथार्थरूपसे यादकर यथार्थरूपसे सभामें गाना सहज नहीं। उस्तादने धुरपतकी तानें जैसी बताई हैं वैसी ही रहनीचाहिएँ बिगड़ न यही इसमें मर्म है। बिगड़ी तानोंको सुधारना तो फिर बड़ी ही बुद्धिका काम है। वस्तुगत्या उत्तरोत्तर कालमें वे ताने बिगड़ ही जातीहैं इसमें उत्तरोचर सीखनेवालोंके बुद्धिमांदय तथा प्रमादादिक ही कारण हैं। जिन छंदोंमें रागकी उत्तम मार्मिक ताने रक्खी जातीहैं वे ही उत्तम धुरपत कहाते हैं। ऐसे धुरपत प्रत्येक रागके दस बीस से अधिक प्राप्त नहीं होसकते। पूर्वज उस्ताद स्वयं कविता करके भी उसमें रागतानोंको नियत करतेथे और किसी अन्य उत्तम कविकी कवितामें भी रागतानोंको नियत करलेतेथे। सूरदासजी प्रभृति उत्तम कवियोंके पदोंमें भी तानसेनवंशके उस्ताद लोगोंने रागताने नियंत कीहैं जो अभीतक गानेमें आतीहैं। धुरपतिये उस्ताद

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भूमिका। १७

लोग उक्तरीतिसे आलाप कर सरगम गा पाँच सात उत्तम धुरपत गाकर गानेको समाप्त करदेतेहैं। घुरपतके उत्तम उस्तादों को सब रागोंके मिलाकर हज़ारों घुरपत याद होतेहैं। मैंने जिस घुरपतप्रखालीका यह इतिवृत्त लिखाहै वह कबसे चली यह जानना असाध्य ही है, तो भी मेरी रायसे यह हज़ार आठ सौ वर्षसे अधिककी प्राचीन न होगी इससे प्राचीन जो प्रयाली थी उसी का यह परिष्कृत रूप है; यह सर्वथा उससे भिन्न भी नहीं। सौभाग्यकालमें विद्या (पदार्थमात्र) परिष्कृत होती होती बहुत उत्कृष्टावस्थाको प्राप्त होजातीहै, दौर्भाग्यकालमें विकृत होती होती नष्टप्राय वा नष्ट ही होजाती है। अंत में इस विद्यामें तानसेनवंशने बहुत ही उत्कर्षका सम्पादन किया। गाना श्वासके अधीन है इसकारय जैसाही श्वास लंबा होगा वैसा ही गाना अच्छा होगा क्यों कि जहाँ- तक एक श्वाससे पहुँचनाचाहिए वहाँतक पहुँचनेसे पूर्व यदि श्वास टूटजाय तो तान टूटजानेसे गानका आनंद बिगड़ जाताहै उस पर भी तानसेनजीने तथा उनके पुत्रपौत्रोंने तो घुरपतोंमें ऐसी तानें रक्खीहैं जिनकेलिए बहुत ही लंबे श्वासकी अपेक्ा है। धुर- . पतके जो अस्ताई प्रभृति खंड (पाद) हैं उनमेंसे एक खंड समाप्त हुए बिना श्वास टूटना न चाहिए। हैदरबर्शजीके पुत्र अज्जूख़ाँ- जीने समग्र एकधुरपतको एकश्वासमें गानेका अभ्यास कियाथा किन्तु इस अभ्यासकी कठोरतासे उनकी छातीसे मुखके मार्ग रुधिर गिरने लगगयाथा इसीसे वे मर भी गये यह काम ऐसा" कठोर है। तानसेनजीके दौहित्रवंशने यह विशेषता की कि अपने धुरपतोंमें वीखाकी तानोंको रखदिया इससे इनके घुरपत और २

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१८ संगी तसुदर्शन-

भी कठिन होगये। वस्तुगत्या जिसको वीखाका तत्व ज्ञात नहीं उसकेलिए इनके घुरपत बहुत ही क्लेशप्रद हैं। तानसेनवंशके घुरपतियोंके साथ कुछ ईर्षा द्वेष बढ़जानेके कारग तानसेनजीके दौहित्रवंशमें होनेवाले सदारंगजीने ख़याल- प्रसालीकी रचना की। इनका पैतृक नाम न्यामतखाँ था। सुनते हैं कि बादशाही दरबारमें जब धुरपतका गान होताथा तब तान- सेनदौहित्रवंशके वीाकार लोगोंको धुरपतियागायकके पीछे बैठ वीखा बजानी पड़तीथी कुछकालतक तो यह क्रम चला, तदनन्तर वीखाकारलोगोंने इसमें अपना निरादर जान पीछे बैठ वीखाके बजानेको त्याग दिया इस कारय इनका दरबार बंद होगया यही ईर्षा द्ूष बढ़नेका कारण सुननेमें आताहै आगे परमेश्वर जानें। सदारंगजीने खयालप्रणालीकी रचना करके प्रथम दो भित्तुक बालकोंको अपने पास रख उनको ख़याल सिखाया जब वे खयालगानेमें प्रवीय होगये तब बादशाहीवज़ीरके द्वारा बाद- शाहको उनका गाना सुनवाया, नवीनप्रकारका गान सुन बाद- शाह बहुत ही प्रसन्न हुए, इस कारग फिर सदारंगजीका दरबार में प्रवेश हुआ। इस घटनाको करनेवाले वज़ीर सदारंगजीके किं वा उनके पिताके शागिर्द थे, और वे बादशाह तानसेनपुत्रवंशके किसी घुरपतियेके शागिर्द थे। इन खयालियोंने अपने लिए बहुतसे रागोंके स्वरूपोंमें भी कुछ भेद करलिया उसे यथामति रागाध्यायमें लिखूँगा। तानसेनजीके पुत्रवंशके तथा दौहित्रवंशके लोग गानेमें घुरपत ही गातेथे बजानेमें वीणा रबाब स्वरश्रंगार सितार

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भूमिका। १६

इन्हीं वाद्योंको बजातेथे तथा सभामें एतदतिरिक्त गाने बजाने में अप्रतिष्ठा समझतेथे इसकारय सदारंगजीके किसी भी पुत्रादि ने सभामें ख़याल न गाया इससे सदारंगजीके नीचे उनके सिखाये उक्त भिक्तुक बालक ही खयालप्रशालीके उस्ताद हुए। इनका भी ख़यालविद्याके कारय दरबारमें और प्रजामें बहुत संमान हुआ। ये बालक तानसेनवंशके न थे। इनसे डम ( तानसेनवंशातिरिक्त गायक मुसलमान) लोगोंने खूब अच्छी तरह ख़याल सीखा। खयालविद्यामें अंतमें हस्सूख़ाँहद्दूख़ॉजीने बहुत कीर्त्ति सम्पादित की। हस्सूखॉ हद्दूख़ाँ और नत्थेख़ाँ ये तीन ब्राता थे प्रथम इन्होंने किसी औरसे ख़याल सीखा पीछे उसकालके सर्वोत्तम खयालिये ममदखाँजीसे रीवाँमें जाकर पूर्श्रमसे खयाल सीखनेका आरंभ किया। ये बड़े बुद्धिमान थे इस कारय ममदख़ॉजीने जाना कि ये थोड़े ही कालमें मेरी सब विद्याको लेलेंगे यह सोच इनको सिखाना छोड़ घरसे निकालदिया। इनको विद्याकी बड़ी लगन थी इससे ममदखाँजी जब रातमें गाते तब ये उनके घरके नीचे खड़े रहकर उनका गाना सुन सुन कर उड़ानेलगे। इस चोरीको समझ ममदखॉजी रीवॉसे चल दिये, ये भी चोरीसे ममदख़ाँजीके पीछे पीछे गये। अप्रनेक विपत्तियाँ उठाई किन्तु ममदखाँजीका पीछा इन्होंने न छोड़ा। इसी प्रकार उड़ा उड़ाकर ममदखाँजीकी शेष विद्या इन्होंने ले ही तो ली। ममदखाँजीकी जैसी ही विद्या थी वैसी ही आवाज़ भी बड़ी मधुर थी कंठ बड़ा सुरीला था यही हाल हस्सूखाँजीका भी था। इस विद्याप्रावीण्यके कारग हस्सूखॉहद् दूखाँजी गवालियरनरेश- के उस्ताद बने और बहुत संमान पाया। एक दिन लोकसभामें

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२० संगीतसुदर्शन-

इन्हेोंने गाया और अमृतसेनजीने सितार बजाया इन्होंने अमृतसेन- जीसे कहा कि 'मैंने सितार आज ही सुना' अमृतसेनजीने कहा कि 'मैंने खयाल आज ही सुना' ये लोग ऐसे प्रवीस थे। इस उक्त विद्याकी चोरीसे हद्दूख़ाँहस्सूख़ाँजीसे और ममदख़ाँजीसे वैर बढ़ गया गुरुशिष्यभाव कुछ न रहा आपसमें काटकतर चलती- थी। एकदिन गवालियरनरेशके दरबारमें रातको ममदख़ाँजीने बड़े ज़ोरशारसे बहुत ही उत्तम गाया हस्सूखाँजीसे यह सहा न गया इसकारस ममदख़ॉजीके पीछे गाने बैठगये। इनकी पसलीमें बहुत पीड़ा थी हकीम तथा डाकृरने इनको बहुत रोका यहाँतक कहा कि 'आप गानेसे मर जायँगे' इन्होंने कुछ न सुना यही कहा कि 'एक- दिन मरना तो ज़रूर है' इन्होंने भी बड़े ज़ोरशोरसे ऐसा गाया कि ममदख़ाँजीका सब गाना गादिया चारों ओरसे 'वाह वाह' की वर्षा हो रहीथी इतने में इन्होंने एक तान ऐसे जोरशोरसे ली कि तानके साथ आयुष्य भी समाप्त होगया वही पसलीकी पीड़ा इतनी बढ़ी कि उन्होंने बड़े क्लेशसे उस तानको समाप्त किया, समाप्त करते ही पृथ्वीपर गिरगये और हाय हाय करने लगे किं तु चमत्कार यह है कि इतनी पीड़ा होनेपर भी तानको बिगड़ने नहीं दिया। ये थोड़े ही कालके अनंतर मरगये। महाशय! पूर्वज विद्वान् विद्यामें ऐसा अभिनिवेश रखतेथे देखिए प्राय देदिये किं तु विद्यामें अपनी बात नीची न होनेदी। हस्सूखाँहद्दूख़ाँजी तो मर गये परन्तु उनका नाम नहीं मरा वह तो जब तक ख़याल विद्या है तब तक बराबर अमर ही रहेगा। इस समय इनका पुत्र रहमतखाँ भी ख़यालका अद्वितीय विद्वान् है इसकी आवाज़ भी

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भूमिका। २१

बहुत हो उत्तम है। इस समय इसके बराबरका दूसरा ख़यालिया नहीं है। उक्त अंतिम गानके विषयमें यह भी सुना है कि जब ममदखाँजी गाते थे तब हस्सूख़ाँजी वहाँ न थे हद्दूखाँजी थे ममद- खाँजी के गानेके अनंतर हद्दूखाँजीने भ्राता हस्सूख़ाँजीको नीचेसे बुला कर गानेको बिठादिया आगे वही हुआ जो ऊपर लिखा है, ऐसा सुननेमें आताहै आगे राम जाने। खयालगानेवाले उस्ताद लोग गानकालमें प्रथम ख़यालको गाकर फिर उस राग में फिकरेबंदी करते हैं (फिकरे लेते हैं) इसके अनंतर गानको समाप्त करदेतेहैं। कोई कोई तरानेको भी गाते हैं। धुरपतकी गानक्रियामें कभी भी गला फिराया नहीं जाता अर्थात् कंठ स्थिर रहता है। खयालकी गानक्रियामें गला फिराया भी जाता है अर्थात् कंठ कंपित भी होताहै। यही इन दोनों गानकियाओंमें विशेष भेद है। रागस्वरूप तो सर्वत्र एकसमान ही रहताहै तो भी धुरपतियोंके और ख़यालियों के वसंतप्रभृति किसी किसी रागके स्वरूपमें भी भेद पड़गयाहै इसको आगे लिखूँगा। घुरपतियोंके रागोंके ख़याल भी बन सकते हैं और ख़यालियोंके रागोंके घुरपत भी बन सकते हैं तथा बने हुए भी हैं, ख़याल और घुरफ्त की प्रणाली का भेदक कारख तो दूसरा ही है कुछ रागस्वरूप नहीं। खयालकी अपेक्षा धुरपतमें रागका स्वरूप भारी प्रतीत होताहै। छंदोबद्ध कविता (पद) में जो किसी रागकी तानोंको और किसी तालको नियत करदेतेहैं उसे ख़याल कहते हैं यह तानोंका नियत करना बड़ा कठिन है। धुरपतकी और ख़यालकी तानों- का भेद अवश्य है कि तु उसे लिखना कुछ कठिन है। बहुतसे

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२२ संगीतसुदर्शन- खयाल सदारंगजीके बनाये हैं उन्हींको लोग गातेहैं। सदारंगजी ही ख़यालके मूल पुरुष हैं। और जो विशेष धुरपतके प्रकरयमें लिखे हैं वे इस विषयमें भी समझ लेनेचाहिएँ। कोई लोग धुरपत और खयाल का यह भी भेद कहतेहैं कि घुरपत के अस्ताई अंतरा भोग ये तीन खंड होतेहैं खयालके अस्ताई और अंतरा ये दा ही खंड होते हैं, प्रथा ऐसी होने पर भी इसमें व्यतिक्रम होनेसे भी कुछ क्षति प्रतीत नहीं होती। धुरपत और ख़यालके जो कई एक अवां- तर भेद हैं उनको गुरुसे जानना चाहिए। घुरपत और ख़याल- का परस्पर उतना ही भेद है जितना हस्ती और अश्वकी चालमें भेद है। घुरपतकी अपेक्ा ख़यालमें चपलता है। उक्त खयालके अस्ताई अंतरेको गाकर जो उस्ताद लोग उस राग- में तालबद्ध चलते फिरतेहैं अर्थात् कंपितकंठसे जो तानोंकी कल्पना- को करतेहैं उसे फिकरेबंदी कहते हैं, इसीमें खयालियोंका पाण्डित्य देखाजाताहै, यह भी कल्पनाशक्तिके बिना नहीं होसकती; इसकी भी वही श्रेष्ठता है जो आलापकी लिखीहै, अर्थात् १ रागका स्वरूप न बिगड़े, २ कल्पना उत्तरोत्तर नवीन हो, ३ कल्पना मार्मिक हो, ४ रमखीय हो। धुरपतऔर ख़यालकी तानोंके स्वरूप- में भी कुछ भेद रहताहै। इस ख़यालकी गवाईने घुरपत और आलापमें अरुचिका बीज बोदिया जो इस समय खूब लहरा रहा- है। तदनंतर ठुमरी टप्पेने ख़यालसे भी अरुचि उत्पन्न करदी, सत्य अनुगम तो यह है कि निकृष्टसंगीतने उत्कृष्टसंगीतसे बुद्धिजनों- की अरुचि कर दी। पुर्वोक्त धुरपतकी गवाईमें जितनी गंभीरता है उतनी गंभीरता

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भूमिका। २३

ख़यालकी गवाईमें नहीं, टप्पेमें और भी कम है। ख़याल टप्पा प्रभृति गानेवालेका कंठ धुरपत गानेके योग्य नहीं रहता क्यों कि खयाल प्रभृतिके गानेसे कंठमें कुछ न कुछ कंप उत्पन्न हो ही जाता है और कंठकंप तो घुरपतमें सर्वथा निषिद्ध है। जब कि घुरपत- प्रभृति एक भी प्रशालीमें पूर्ण पांडित्यका सम्पादन करना कठिन है तब अनेक प्रसालियोंमें पूर्ण पांडित्य भला कैसे सम्पादित हो सकता है ? इसी कारख पूर्वज उस्ताद लोग एक ही प्रथालीमें व्याम करतेथे एक ही प्रकारका गान गाते थे; घुरपतिए ख़याल नहीं गातेथे, खयालिये धुरपत नहीं गातेथे। आजकल जो लोग कहते हैं कि 'हम घुरपत ख़याल सब गातेहैं' उन लोगोंकों वस्तुगत्या कुछ भी नहीं आताजाता; वे मूर्ख मंडलीमें ही विद्वान् (उस्ताद) कहासकतेहैं। यही बात वाद्योंमें भी जानलेनीचाहिए। किसी भाग्यवान्को ही एक वाद्य बजाना आसकताहै; अनेक वाद्य बजाने वाले कुछ भी नहीं जानाकरते, किं वा अभ्यस्तातिरिक्तकी मट्टो ख़राब कियाकरतेहैं ऐसा कहनाचाहिए। उस्ताद लोग ऐसा न करते हैं न बोलतेहैं। श्रीगंगाधरशास्त्रीजीमहाराज कहाकरतेथे कि 'जिसको एक दो अ्रंथ आजायँ उसका भारी भाग्य समझना चाहिए शास्त्रोंकी बात तो बहुत दूर है' वस्तुगत्या ऐसा ही है। वाद्य दो प्रकारके हैं-१रागके, २ तालके। रागवाद्य भी दो प्रकारके हैं-१जो तार चढ़ाकर बजायेजातेहैं यथा वीया सितार रबाब स्वरशृं गार सरोद सारंगी तुंबूरा इत्यादि। इनको 'तत' कहते हैं "ततं वीशादिकं वाद्यम्" इति। २ जो कंठसे बजायेजातेहैं यथा "शी शहनाई अलगोजा इत्यादि इनका सामान्य नाम 'सुषिर' है

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२४ संगीतसुदर्शन-

क्यों कि इनमें छिद्र होतेहैं-"वंशादिकं तु सुषिरम्" इति। तालवाद्य भी दो प्रकार के हैं-१ जिनका मुख चमड़ेसे मढ़ा होताहै यथा मृदंग ढोलक तबला नगारा इत्यादि इनका सामान्य नाम आनद्ध है-"आनद्धं मुरजादिकम्" इति। २ जो परस्परमें टकराकर बजायेजातेहैं यथा खड़ताल प्रभृति इनका सामान्य नाम 'घन' है- "कांस्यतालादिकं घनम्" इति। ततवाद्योंमें वीखा सबसे प्राचीन है वीखाके ही आधारसे लोगोंने सितार रबाब प्रभृति वाद्य बनायेहैं। रबाबके बाद स्वरश्ंगार निकला फिर सरोद सारंगी निकले ऐसा तर्क होताहै। तुंबूरा भी बहुत. प्राचीन वाद्य है, प्रतीत होता है कि गानेमें स्वरस्थिरताके साहाय्यकेलिए इसे तुंबुरु गंधर्वने प्रथम बनाया है इसी कारय इसका 'तुंबुरीय' यह नाम पड़ा वह बिगड़ता बिगड़ता तंबूरा होगया। तुंबूरी' यह नाम कुछ लोगोंसे सुना भी है। आज कल जो लोग स्वपाण्डित्यप्रकटनार्थ इसे 'तानपूरा' कहते हैं वह कुछ युक्तिसंगत नहीं प्रतीत होता क्यों कि स्वरोंके आरोहावरोहको ही तान कहते हैं उसकी पूर्ति तुंबूरेके अधीन नहीं, तुंबूरेसे षड्ज और पंचम ये ही दो खवर निकला करतेहैं इस कारख तुंबूरा तो केवल सवरका सहा- यक मात्र है। वीखाके अनेक प्रभेद हैं यथा रामवीखा भरतवीखा रुद्रवीया नारदवीया इत्यादि।,वीखाके वादनमें तानसेनजीके दौहित्र- वंशने खूब उत्कर्ष किया। तानसेनजीके जामाता (दामाद) नौवात- खाँजी वीखावादनमें श्रीहरिदासस्वामीजीके शागिर्द थे ये वीषामें बड़ प्रवीस थे शरीरसे बड़े बलिष्ठ थे इनकी पाचनशक्ति और तुधा भी बहुत थी, सुना है कि एक दिन ये बादशाहअकबरको रात्रिमें वीका

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सुना रहेथे इतनेमें वायुके भोंकसे मोमबत्ती बुझगई इन्होंने एक ऐसी ठोक बजाई कि मोमबत्तो फिर जलउठी। इनकी वीणाकी ध्वनि बहुत दूरतक सुनाई देवीथी। तानसेनजीके वंशमें होनेवाले कुछ लोग रबाब स्वरशृङ्गारको भी बजाने लगगये। अरंतमें रबाब स्वरश्ृङ्गारमें बहादुर- सेनजीने और सादिकअलीख़ाँजीने बहुत कीर्ति पाई, इनमेंसे बहादुर- सेनजी प्यारखाँजीके ानजे थे और बाँदा लखनऊ रामपुर इन स्थानोंमें रहतेथे। सादिकअलीखाँजी प्यारखाँजीके भतीजे थे और काशीमें ही ज्यादा रहतेथे ये स्वभाव के क्रोधी थे छोटे मोटे गुखी- की इज्ज़तको फकट उतारदेतेथे। नौवातखाँजीके वंशमें अन्तमें रसवीनख़ाँजी भारी वीखाकार हुए, लोग इनको दूसरे नौवातखाँजी कहतेथे, ये प्रथम ऐसे ही फिरा करतेथे एक दिन एकसमाजमें निरादर पाकर पितासे खानेको संखिया माँगा पिताने बहुत समझाया कहा कि संखिया खानेकी कोई ज़रूरत नहीं, परिश्रम करो, चौबीस दिनमें तुमसे वीया बजवा दूँगा, वैसा ही किया; फिर तो ये वीखाके अद्वितीय उस्ताद होगये। रागरसखाँजी भी उस समय भारी वीषाकार थे ये रसवीनख़ाँजीसे बड़े थे उनकी बूआ के पुत्र भाई थे और रसवीनख़ाँजीके पिताके ही सिखाये हुएथे। इन लोगोंका गोत खँडारे कहाताहै। नावातखाँजीके वंशमें कोई कोई लोग घुरपत भी गातेथे। इन लोगोंने धुरपतमें वीणा की भी तानें रखदीहैं यह विशेष कियाहैं। इस वंशमें इस समय वज़ीरखाँजी हैं ये भी वीशामें बड़े प्रवीय हैं रामपुरनवाबके उस्ताद हैं और वहाँ बड़ी प्रतिष्ठासे रहतेहैं। सुषिरवाद्योंमें वंशी सबसे प्राचीन है तो भी शहनाई बहुत उत्तम

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२६ संगीतसुदर्शन- है। शहनाई काशीकी प्रसिद्ध है। आनद्धवाद्योंमें मृदंग सबसे प्राचीन समझा जाताहै। मेरी ज़ानमें तो नगाड़ा डफ इत्यादि मृदंगसे भी प्राचीन प्रतीत होतेहैं। मृदंगसे ही तबलेकी रचना हुई। मृदंगवा- दनमें अन्तमें कदौसिंहने बहुत कीरति पाई ये अद्वितीय मार्दगिक थे लय ताल बोल हाथ सभी इनके उत्तम थे इन्होंने बहुत लोगोंको मृदंग सिखाया ये बॉदा दतिया प्रभृति कई रियासतोंमें नौकर रहे। सुनत्तेहैं कि इन्होंने गणेशपरन बजाई तो हाथीने इनके आगे मस्तक झुकादिया। घन वाद्य तो बहुत मामूली वाद्य है। अब मैं आगे सितारका वृत्तान्त लिखताहूँ। सितारको अमीरखुसरों फ़क़ीरने निकाला और इसपर तीन तार चढ़ाये इसी कारण इसका नाम 'सहतार' रक्खा, फ़ारसीमें'सह' नाम तीनका है। यह भी सुनाहै कि अमीरखुसरोके पीर की सिद्धि किसी फ़क़ीरने चिढ़कर छीन लीथी उस फ़क़ीरको प्रसन्न कर अपने पीरकी सिद्धिको लौटा लानेकेलिए ही अमीरखुसरोने सितारको निकाला। उस समय यह एक साधारख वाद्य था। अमीरखुसरो तानसेनजीके दाहित्रवंशमें थे, इनके पुत्र फ़ीरोज़ख़ॉजी हुए फीरो- ज़खाँजी के पुत्र मसीतख़ॉजी हुए मसीतख़ाँजीने पितासे सीख सितारको कुछ परिष्कृत किया। बिलंपतका मसीतखॉनी बाज इन्हीं- के नामसे प्रसिद्ध है इसीको दिल्लोका बाज (बजाना) भी कहते हैं। उस समय सितारमें जोड़ बजानेका प्रचार न था केवल गत तोड़ा बजाया जाताथा। मसीतख़ाँजीने अपने भागिनेय दूलहखाँजीको सिवार बताया, दूलहखाँजी धुरपत तथा वीखा दोनोंमें बड़े प्रवीग थे उस समयके भारी उस्ताद थे ये कुछ काल गवालियरनरेशव

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भूमिका। २७

निकट भी रहे। दूलहख़ाँजीने अपने जामाता रहोम सेनजीको सितार सिखाया रहीमसेनजीने सितारको ऐसापरिष्कृत किया कि वीखाके समान बनादिया। रहीमसेनजीने अपने पुत्र अमृतसेनजीको सितार बताया इन्होंने सितारको यहाँ तक परिष्कृत किया कि जगत् में सितार रहीमसेनअमृतसेनजीका कहागया। इनके सितारसे वीगा- कार डरतेथे। वीखाका कोई अंग इन्होंने बाक़ी न छोड़ा बल्कि कई बातें वीणासे भी अधिक कर दिखाईं। असलमें वीखाका नाम बड़ा होनेपर भी इनका सितार वीखासे भी कठिन है क्यों कि वीणामें तालका कुछ काम नहीं सितारमें तालका भी काम है रागदारी तथा जोड़ ता जैसे वोयामें हैं वैसे इनके सितारमें भी है ही। सच तो यह है कि इन्होंने वीय घुरपत खयाल इन तीनोंको अपने सितार में भरदिया क्यों कि इन्होंने प्रथम जोड़ फिर गत तोड़ा फिर फ़िकरे इनको सितारमें बजानेका अरंभ किया, इनमेंसे जोड़ वीखा- का और आलापका अनुकरय है; गत तोड़ेको धुरपतके तथा खया- लके अस्ताई अंतरेका अनुकरण कह सकतेहैं, फ़िकरे ख़यालकी फ़िकरेबन्दीका अनुकरय हैं। कोई कोई बात इनके सितारमें ऐसी भी है जो कंठ और वीा इन दोनोंसे भी नहीं निकल सकती यथा मिज़राब प्रभृति। मियाँ तानसेनजीके पुत्रवंशमें सबसे प्रथम मियाँ रहीमसेनजीने ही सितार बजाया इनसे पूर्व सितार तानसेनजीके दाहित्रवंशमें ही था। रहीमसेनजीके पिता सुखसेनजी तो धुरपतके भारी उस्ताद थे, उनके पिता पितामह भी ऐसे ही थे। मसीतखाँजी संबंधमें अरमृतसेनजीके दादा लगतेथे। मसीतखाँजीके पुत्रका नाम बहादुरख़ाँजी था इन्होंने भी सितारकें बहुत से गत तोड़े बनाये,

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२८ संगीत सुदर्शन- उनमेंसे शुद्धसारंगकी गत बहुत हो उत्तम है, अतएव अभीतक चलोआतीहै। अमृतसेनजी इनको चचा कहतेथे। रहीमसेनजीके अमृतसेनजीसे छोटे दो पुत्र न्यामतसेनजी और लालसेनजी नामके और थे। इनमेंसे न्यामतमेनजीको ब्राता अमृतसेनजीने और लालसेनजीको पिता रहोमसेनजीने सितार सिखायाथा। दोनों ही अत्युत्तम सितारिये बनगयेथे। न्यामत- सेनजीका हाथ बहुत कोमल था, ये छोटी अवस्थामे ही मथुरामें मरगये। लालसेनजीको मैंने भी देखाहै इनकी आकृति विशेषकर तानसेनजीकी तसवीरके तुल्य थी। दैवात् एक कच्चो धातु खानेसे इनके हाथ ख़राब होगयेथे ये भी अपने भ्राता अमृतसेनजीसे दोवर्ष पूर्व जयपुरमें मरगये। इनके मरनेसे मिया अमृतसेनजीको बहुत शोक हुआ।अमृतसेनजीने इनके मरनेका कार्य (दशमाप्रभृति) और तुकता बहुत उत्तम किया। इस अवसरकी सेवासे मिया अमृतसेनजी मुझपर बहुत प्रसन्न हुए। रहीमसेनजीने और भी बहुतसे शागिदोंको तथा अपने कुलवालोंको सितार बताया था, इनमेंसे हुसेनख़ॉजी सबसे प्रवीय निकले ये संबंधमें रहीमसेनजीके छोटे भ्राता लगतेथे। रहोमसेनजीने एक दिन बहुतसे लोगोंको भभरमें हुसेनख़ॉजी का सितार सुनवाया लोगोंसे पृछा कि 'आप लोग प्रसन्न हुए?' उनमेंसे रत्नसिंह पखावजी बोला कि प्रसन्न तो बहुत हुए कि तु आपने यह अमृतसेनके गले पर छुरी फेरी है। यह सुन रहीमसेनजी बोले कि 'रंज मत करो अमृत- सेनका हिस्सा जुदा रक्खा है।' उस समय अमृतसेनजी बालक थे। फिर अमृतसेनजीको अप्पना आ्ंतरिक सितार सिखा उन लोगोंको

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भूमिका। २६ सुनवाकर अपने पूर्वोक्त वचनको सत्य करदिखाया। अनेक शिष्यों- को एक ही विद्या भिन्न भिन्न प्रकारसे बतानी सहज नहीं यह बड़े पाण्डित्यका काम है। हुसेनखाँजी इंदौरमें रहे और वहीं मरे इंदौर तथा उस देशमें और राजदरवारमें इनकी बड़ी प्रतिष्ठा थी। एक बार झभरके नवाबने रहीमसेनअमृतसेनजीसे सितारमें सारठ बजा सर्पको बुलानेकी फरमायश की उस पर प्रथम तो इन्होंने जवाब देदिया; फिर नवाबने इनकी और इनके पूर्वजोंकी बहुत प्रशंसा की तो इन्होंने सारठ बजानेका आरंभ किया, शीघ्र ही एक मोटा श्याम सर्प नवाबकी कोठोमें प्रकट हुआ। नवाब तथा और सब तो डरकर परे हटगये किं तु ये पिता पुत्र देर तक सितार बजातेरहे सर्प भी फन उठा मस्त हो इनका सितार सुनतारहा। सितार बंद करते ही चुपसे चला गया, उसने किसीको कुछ नहीं कहा। यह चमत्कार छोटी सी बात नहीं। अलवरनरेशके ज्वरको सितारमें भैरवी बजाकर उतारनेके विषयमें पूर्वमें लिखा ही गया है। ये लोग अपने मुखसे कभी अपनी प्रशंसा नहीं करतेथे विशेष बोलते भी न थे, जो बनसकताथा उसे कठसे वा हाथसे करके दिखादेतेथे। एक बार मियाँ रहीमसेनजी देहलीमें बड़े बड़े उस्ताद तथा श्रीमान् और बादशाहज़ादों में बैठ सितार बजारहेथे चारोंओरसे वाह वाह होरहीथी; इन्होंने एक फ़िकरा ऐसा ज़ोरसे लियाकि स्वयं इनके मुख से विवश 'शह ओह' यह शब्द आश्च्चर्यबोधक निकलगया इस शब्दके मुखसे निकलतेही इन्होंने सितार रखदिया। लोगोंने पृछा कि 'खाँ साहेब! क्या चाहिए ?' इन्होंने कहा कि 'छुरी चाहिए' लोग इस वचनको सुन चकित हो अभिप्राय पूछने

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३० संगीतसुदर्शन- लगे इन्हेोंने कहा कि 'आज हमारी जिह्वाने ऐसा बुरा काम किया- है कि इसको काटडालना उचित है कैसी बुरी बात है कि मेरे बजाने पर मेरी जिह्वासे 'वाह वाह' निकले? इस पर लोगोंने कहा कि खाँ साहेब! आपने ऐसा ज़ोरका उत्तम फ़िकरा लियाथा कि अगर पत्थरके जिह्वा होती तो वह भी 'वाह वाह' कहे बिना न रहता फिर आपकी जिह्वासे 'वाह वाह' निकल गई तो कौन बड़ी बात है? इसपर रहीमसेनजीने कहा कि 'एक तो हमारे बड़े इस विद्याको ऐसा करगये हैं कि उनकी अपेक्ा हम कुछ भी वस्तु नहीं; दूसरे स्वयं अपनी प्रशंसा करना यह भारी दोष है; इससे जिह्वाको काट देना चाहताहूँ। इसपर लोगोंने इनको बहुतशांत कर फिर सितार बजानेको कहा ये लोगोंके कथनसे शांत तो हो गये कि तु फिर उस समय सितार न बजाया इनके मुखपरसे शोक भी न उतरा। इन्होंने कहा "इस आत्मप्रशंसासे मेरे चित्तपर शोक छागयाहै इस कारय अब मुझसे सितार अच्छा न बजेगा आप लोगोंको फिर कभी सुनाऊँगा।" देखिए पूर्वज विद्वान् ऐसे होतेथे। आजकलके मादश लोग तो प्रशंसाकेलिए किसी दूसरेकी अपेक्षा ही नहीं रखते अपने ही मुखसे भरपेट अपनी प्रशंसा करलेतेहैं उससे लजाते भी नहीं। एक दिन मियाँ रहीमसेनजी एक सीधी सी गत बजारहेथे चम- त्कार यह हुआ कि रत्नसिंह पखावजीने बहुतेरा यत्न किया किं तु उसे उस गतका समज्ञात नहीं हुआ। रत्नसिह भी सामान्य पखा- बजी न था किंतु उस समयका बहुत उत्तम उस्ताद पखावजी था। सत्य तो यह है कि सितारके मसीतख़ाँजी सूत्रकार हुए रहीमसेनजी भाष्यकार हुए और अमृतसेनजी वार्तिककार हुए।

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भूमिका। ३१

मियाँ रहीमसेनजी स्वभावके इतने मृदु न थे। एक बार अ्रमृतसेनजीकी स्वरश्ृंगारपर श्रम करनेकी इच्छा हुई रहीमसेनजीने स्पष्ट कहदिया कि बेटा सितारके सिवाय किसी दूसरे वाद्यपर परिश्रम करेगा तो तेरे हाथ काट डालूँगा सितारमें सब है उसीपर ध्यान लगाओ; अनेक वाद्य बजानेवाला धोबीका कुत्ता बनजाताहै। यह सुन फिर अमृतसेनजीने सितारके सिवाय और वाद्यपर श्रम करनेकी इच्छा न की, यों तो वे सभी वाद्योंके तत्वको जानतेथे। आजकल तो जिस सांगीतिकको देखिए वह सब प्रकारके गाने गाताहै और वाद्य बजाताहै। असल तो यह है कि मट्टी ख़राब करनी कुछ कठिन नहीं; पांडित्य तो एक भी वाद्यमें अथवा गानमें एवं और विद्या में प्राप्त होना कठिन है। यह उन्हींको प्राप्त होताहै जो पूर्वजन्ममें कोई भारी पुण्य कर इस जन्ममें अपनी पूरी जान मारतेहैं और किसी उत्तमगुरुकी दीर्घकालपर्यन्त सेवा करतेहैं। मियाँ रहीमसेनजी तथा अमृतसेनजी मसीतखाँनी बाज बजा- तेथे। सितारका दूसर बाज 'पूर्वीबाज' कहलाताहै। इसको पूर्वमें रहनेवाले तानसेनवंशघर उस्तादोंने निकालाहै। इस बाजमें मसीत- ख़ाँनी बाजके बराबर गंभीरता नहीं और इस बाजमें मध्य और द्रुत लयका प्राधान्य है अतएव रागदारीका प्राधान्य नहीं, तालका प्राधान्य है। इस बाजमें 'डाड़ डाड़ डा डा' ऐसे बोल विशेष रहतेहैं। रागाध्यायमें मैंने इस बाजकी एक गत भैरवीकी लिखीहै, और सब गतें मसीतख़ॉनी बाजकी लिखीहैं। मसीतख़ाँनी बाजमें रागदारीका प्राधान्य है अतएव बिलंपत और मध्य लयका प्राधान्य है। मियाँ अमृतसेनजी यद्यपि रहीमसेनजीके पुत्र थे तथापि सितार

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३२ संगीतसुदर्शन-

के पांडित्यमे ये रहीमसेनजीके पुत्र प्रतीत न होतेथे किंतु भ्राता प्रतीत होतेथे इसी पांडित्यके कारय लोग-'अमृत सेनरहीमसेनजी' इसतरह दानों नामोंको इकट्ठा करके बोलतेहैं। एक दिन बड़े बड़े संगीतविद्वानोंमें रहीमसेनजीने स्वयं सितार बजा अमृतसेन- जीको सितार बजानेको कहा इन्होंने पिताके अनंतर सितार बजाना उचित न समझ कहा कि 'आपने कुछ बाक़ो नहीं छोड़ा अब मैं क्या बजाऊँ !' रहीमसेनजीके फिर बहुत कहनेसे इन्होंने वही राग ऐसा बजाया कि लोग रहीमसेनजीके सितारको भूलगये। विद्वूत्समाज प्रसन्न हो 'वाह वाह' करनेलगा। सबने कहा कि 'अमृतसेनजी ! आपका मार्ग कुछ दूसरा ही है' रहीमसेनजीने कहा कि 'भाइयो! शुकर है जो अमृतसेन मेरा बेटा हुआ यदि यह किसी औरके घर जन्मकर ऐसा सितार बजाता तो मैं विष खाकर मरजाता' अमृतसेनजी ऐसे थे। लखनऊमें अमृतसेनजीका सितार सुन एक विज्ञ बोला कि 'यह वही सितार और भीमपलासी है जिसे यहॉ रहीमसेनजी बजागयेहैं' तब उन्होंने कहा कि 'मैं उन्ही का पुत्र अमृतसेन हूँ' यह सुन वह वृद्ध बोला कि 'सत्य है'। मिया अमृतसेनजी एक बार अपनी जागीर के ग्राममें गये वहॉ उन्होंने सितारमें किसी गमीषगीतका बजाना जो आरम्भ किया तो समग्र ग्रामके लोग इकट्ठ होगये। एकबार अमृतसेनजी जयपुरमें रात्रिको अपने मकानमे सितार बजारहेथे बाहिरके ओर की खिड़की फटसे खुलगई और 'वाह वाह' यह शब्द सुनाई दिया किन्तु उस शब्दके कहनेवाला कोई दिखाई न दिया, ऐसा और भी तीन चार बार हुआ कहा तक लिखँ।

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भूमिका। ३३

मिया अमृतसेनजी अपने कनिष्ठ भ्राता लालसेनजीको विवाहने गवालियर गये जाते समय मार्गमें इनकी सितार बजानेकी वाम अंगुलिपर व्रम (फुंसी) होगया। गवालियरमें वैवाहिकसंगीतोत्सव हुआ तो इनके इस अंगुलिव्रसको देख श्रोता लोग उदास होगये, क्यों कि उनको इनसे सितार सुननेका बड़ा चाव था। अमृतसेनजी ममें उस रात्रिको श्रोताओं का चाव पूर्ण करनेको सबके रोकते हुए भी उस सव्रगअंगुलिसे ऐसा सितार बजाया कि श्रोता लोग वकित होगये, व्रम चिरजानेसे रुधिर टपकताथा सितार भी घिरसे रङगगया ये ऐसे थे। एक बार आगरेमें दरबार था बहुतसे संगीतविद्वान् अपने सपने राजा लोगोंके साथ उस समय आगरेमें इकट्ठे हुए मियाँ पमृतसेनजी रहीमसेनजी भी गये। पूर्वसे बहादुरसेनजी भी येथे। बहादुरसेनजो रबाब स्वरश्रङ्गारके अद्वितीय उस्ताद थे। नसेनजी के वंशमें थे। संबंध में अमृतसेनजीके छोटे भ्राता गतेथे। पूर्व में इनका बड़ा मान था। उस समय एक दिन एक थिकके घर अमृतसंनजो का सितार बजा तदनन्तर रहीमसेनजीने हादुरसेनजी को स्वरङ्गार बजानेको कहा तब बहादुरसेनजोने उक कह दिया कि 'भाई अमृतसेन ऐसा बजा चुकेहैं कि अब बनाका रंग जम नहीं सकता इसलिए मैं फिर किसी समय तथा गा इस समय मेरा रंग जमेगा नहीं। भाई अमृतसेन तो कि यैकुलका मुकुट है।' तदन्सादिकअररलीख़ॉजी और काज़िमअलीख़ाँजी ये दोनों भ्राता उसबाब स्वरशङ्गारके अरद्वितीय उस्ताद थे ये ऐसेवैसेकी इज्ज़त

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३४ संगीतसुदर्शन- भकट बिगाड़ देतेथे औरे छोदेमोटे गानेबजानेवालेके हाथसे साजको खोसलेतेथे ये एक बार बनारससे अलवर गये वहाँ अमृतसेनजीने इनका बड़ा आदर किया क्यों कि एक तो ये संगीत के भारी विद्वान् थे दूसरे सम्बन्धमें छोटे भ्राता लगते थे। ये भी तानसेन- जोके वंशमें थे। अमृतसेनजीके घर पर इन्होंने स्वरशृङ्गार ऐसा बजाया कि चारों ओरसे सैकडाँ संगीतके विद्वान् 'वाह वाहन कहने लगे। इनके अनंतर लोगोंने अमृतसेनजोको सितार बजानेको कहा किन्तु अमृतसेनजीने इनके आतिथ्यके कारण सितारं बजानेसे इनकार करदिया फिर सादिकअलीख़ॉजीके आग्रहसे अमृतसेनजकतो सितार बजाने बैठे तो जो कुछ सादिकअलीख़ॉजी काज़िमअलीखॉजीन ने बजायाथा वह सब बजादिया, फिर अमृतसेनजीने अपना बजानदि बजाया तो अमृतसेनजोका सितार सुन काज़िमअलीख़ॉसादिकाष अलीख़ाँजीका मुख छोटासा होगया क्यों कि ये ममभेहुएथे किा 'इस समय संगीतमें हमारे सदृश भी दूसरा कोई नहीं फिर हमस्ंती अधिक तो क्या होसकता है !' सब लोगोंके बीचमें ये बोले कि मैं 'भाई अमृतसेनको तो परमेश्वरने अपने हाथसे संगीत विद्या गांड'। नहीं तो हमारे ऊपर बैठ कर कौन है जो रंग जमाये।' बह गये जयपुरमें जब ये रामसिंहजीके नौकर हुए तो निरंतर आठशरम्भ तक रात्रिमें एक कल्याए रागको सुनाते रहे। आाठवें दिस्टतसेनजी सितार बजाकर घर चलेजानेके अनंतर दीवान फ़तेसिंहने बाहिरके सिंहजीसे कहा कि 'सरकार! मिया अमृतसेनजोको क्यान्द सुनाई और राग बजाना नहीं आता जो आठ दिनसे एक ही कल्यां, ऐसा सुनारहेहैं ?' इसपर रामसिंहजीने कहा कि 'आप समझे

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वे अपना पाण्डित्य दिखारहेहैं फतेहसिंहजी! एक ही रागको आठ दिन नित्य नये प्रकारसे सुनाना बहुत ही कठिन है ऐसा इस समय और कोई नहीं करसकता। मियाँ अमृतसेनजी शद्वितीय उस्ताद हैं अपनेको बड़े भाग्यसे यह रत्न मिल गयाहै ये पृथ्वीके रत्न हैं' यह वृत्तांत ज्ञात होनेसे नवम दिन अमृतसेनजीने कल्याए न बजा और ही राग बजाया सितार बंद होने पर रामसिंहजीने कहा कि 'मियाँ जी आज कल्याए नहीं सुनाई ?' इसपर अमृतसेनजी बोले कि सरकार! मेरे जीमें तो एकमासभर आपको एक ही कल्याय सुनाने की थी किन्तु आपके दरबारमें कल इसकी कुछ चर्चा चली इससे मैंने कल्याय नहीं बजाई।' यह सुन रामसिहजी बोले कि 'आप सब करसकतेहैं आपजैसे आप ही हैं।' एक दिन जयपुरके रूपनिवास बाग़में इन्होंने ऐसा सितार बजाया कि बहुतसी चिड़ियाँ इनके सितारपर आबैठों ! ये सब चमत्कार सहज नहीं हैं। * बंगालसे एक बंगाली भभरमें अमृतसेनजीसे सितार सीखने आया वह कुछ काल सीखतारहा। एकदिन इनका सितार सुन ऐसा सितार हमको नहीं आवेगा यही बार बार कहता कहता पागल होगया। यों तो अमृतसेनजी प्रथमसे ही बहुत कम शागिर्द करतेथे उसपुर भी इस बंगालीके पागल होजानेसे तो इन्होंने शागिर्द बनाना एकप्रकारसे छोड़ ही दिया क्योंकि ये प्रकृतिके बहुत ही साधु तथा भोले थे इनको पहले ही देखकर कोई नहीं जानसकताथा कि ये पृथ्वीके रत्न हैं। उस बंगाली के पागल होनेसे ये डरगये। तदनंतर जो कोई बहुत ही आग्रह कर इनके पीछे पड़ा तो कहीं उसको शागिर्द बनाया। मैं ही संवत् १६४५ के चैत्रसे श्रवयतक

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३६ संगीतसुदर्शन- पाँच मास जब इनके पीछे पड़ा रहा तब इन्होंने मुझको शागिर्द बनाया। मेरा यह भारी सौभाग्य है जो संस्कृतविद्यामें मुझको महामहोपाध्याय सी. आई. ई.श्रीगंगाघरशास्त्रीजी महाराज और संगीतविद्यामें ये मियाँ तमृतसेनजी साहेब गुरु प्राप्त हुए। दाहा-'जिमि निषाद रघुवीर पद पायो परम पुनीत। ईशकृपा पाये तथा ये गुरु दोउ सुरीत।।' पीछे इन दोनों ही गुरुवरों की मुझपर पूर्ण कृपा रही। अमृतसेन- जीने तो मरयकालमें सबके संमुख यह कहा कि "सुदर्शनाचारीको मैं अपना पुत्र समझता हूँ" मेरी योग्यताकी अपेक्ा उन्होंने मुझको बहुत संगीतविद्या दी उनकी विद्याकी तरफ़ देखाजाय तो रुपयेमेंसे एक पैसा भी मुझको प्राप्त नहीं हुआ इसपर मैं यहाँ एक दोहा लिखता हूँ- अमृतसरोवर गुरु दिये अरंजलिभर संगीत। बिन्दुयुगल मायो मेरी मनमटकीमें मीत। अर्थात् अमृतसेनजी गुरु संगीतविद्यारूपी अमृतसे भरा एक भारी सरोवर था उसमेंसे उन्होंने मुझ भिन्तुककों अंजलि भरके विद्या दी उस अंजलिमेंसे भी केवल दो बूँद मेरी मनरूपी मटकी (गगरी) में समाई सो मेरी उनकी विद्याका इतना अंतर है ज़ितना एक भारी सरोवरका और दो बिन्दुओंका होता है वस्तुगत्या वे वे ही थे, वैसा मनुष्य फिर न देखा परमेश्वर भी फिर वैसे मनुष्यको उत्पन्न करसकताहै वा नहीं इसमें भी संदेह है। सच पूछिए तो वे किसी न किसी गंधर्वका अवतार थे। जैसी उनकी विद्या थी वैसे ही उनमें और भी सब गुम थे, ये स्वभावके बड़े गंभीर तथा धीर

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थे, इन्होंने अपने मुखसे किसीको भी बुरा न कहा, अपने मुख से स्वविद्याके विषयमें ये कुछ न बोलतेथे जो मनमें होतीथी उसे सितारमें हाथसे करदिखातेथे। इनके उत्तरोत्तर दो विवाह हुए अपनी उन दो पत्नियोंके सिवाय इन्होंने तीसरी स्त्ीको कामाभिलाषा- से हाथ भी नहीं लगाया इस कारय कोई कोई सांगीतिक लोग इनको कामशक्तिसे हीन भी कहतेथे क्योंकि ये संयमी थे और सांगीतिक लोग तो प्रायः कामी होतेहैं। असल में ये कामशक्तिसे रहित न थे किं तु संयमी थे। मुसलमान संगीतविद्वानोंको तो प्रायः वेश्या और मद्यका व्यसन लगही जाता है। ये दोनों ही ब्यसनोंसे दूर थे। इसी कारय जब ये अधिक कालकेलिए कहीं जाते तो इनका पानदान और पानी (जल) साथ जाताथा क्यों कि मद्यपलोगोंके स्पष्ट भ्रष्ट पान और पानी तकसे इनकों ग्लानि थी। साधु महात्माओंमें इनको बड़ी श्रद्धा थी, यदि एक हो काल में किसी श्रीमान्का और साधु फ़क़ीरका बुलावा आता तो ये प्रथम साधु फ़क़ोरके यहाँ जातेथे। कोई कोई साधु फ़क़ोर सितार सुन इनको एक पैसा प्रसाद देदेतेथे ये उस पैसेको प्रसाद समझ सम्हालकर रखतेथे। बड़े बड़े साधु फ़क़ीर इनके पास भी आतेथे, ये उनका पूर्ण सत्कार करतेथे और बड़े आदरसे सितार सुनाते थे। वृद्ध साधु इनको 'अरमृतघट' 'अमृतकलश' कोई 'अमृतवान्' ऐसा कहदेतेथे। हिंदू धर्मको ये बहुत उत्तम समझतेथे। हिंदू धर्म की जो प्रथाएँ इनके कुलमें चलीआतीथीं उनका पूर्णरूपसे निर्वाह करतेथे क्यों कि इनके मूलपुरुष तानसेनजी आदिमें ब्राह्मय थे। ये ग़रीब शागिदोंसे कुछ न चाहतेथे प्रत्युत उनकी सहायता करतेथे।

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३८ संगीतसुदर्शन- ये शागिर्द कम करतेथे तो भी इनके शागिर्द बहुत थे, झभरके नवाब और अलवरके राजा शिवदानसिंहजी इन्हींके शागिर्द थे। भभार और अलवरमें तो उस समय मानों इनका राज्य था। उस भारी तनख्वाहको भी ये कुछ न गिनतेथे क्यों कि उक्त दोनों ही नरेश इनको अपने भ्राताओंके तुल्य रखतेथे अपना जैसा खिलाते पहनातेथे और सदा इनको अपने पास रखतेथे। मियाँ अमृतसेनजीमें कुटुंबपालनका भी भारी गुए था। इनके मातुल मियाँ हैदरबख्शजीका ही कुटुम्ब इनका कुटुम्ब समझना चाहिए क्यों कि इनके कोई संतान नहीं हुई और इनके भ्राताओंकी कोई संतान बची नहीं। हैदरबख्शजीके कुटुम्बका इन्होंने ऐसा पालन किया कि दूसरा कोई क्या करेगा। ये मामा हैदरबख्शजी को सदा अपने पास रखतेथे उनके पुत्रोंको अपना सहोदर भ्राता समभतेथे उनमेंसे भी मम्मूख़ाँजी और अलमूख़ाँजीपर बहुत प्रीति थी। अलमूखाँजी तो सब प्रकारसे इनके कारकुन मुंशी थे जो चाहतेथे सो करतेथे सब इन्हींके अधीन था। मम्मूख़ाँजीके प्रेम से उनके पुत्र हफ़ोज़खाँको इन्होंने ऐसा सितार बताया कि हफ़ीज़ख़ाँ भी सितारमें नाम कर गये। हफ़ीज़ख़ाँपर इनको बहुत वात्सल्य था। हफ़ीज़खाँ प्रथम टोंकमें फिर रामपुरमें नवाबके नौकर रहे और बड़ा आदर पाया। ये काशीमें मेरेपास भी आये इनका सितार सुन काशीके लोगोंने कहदिया कि 'ऐसा सितार आजतक कभी नहीं सुना।' ये स्वभावके बड़े लायक थे। मम्मूख़ाँजी घुरपतके और सांगीतिक ग्रंथविद्याके उत्तम विद्वान् थे। हैदरबखूशजी तो घुरपत के बादशाह तथा संगीतविद्याके समुद्र थे, इनमें यह एक भारी

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भूमिका।

गुम था कि सीखनेवालेकी लायक़ी नालायकीकी ओर ध्यान न दे सबको बहुत मनसे बतातेथे बहुत लोगोंको इन्होंने बताया। ये धुरपतके सिवाय सितार वीणा भी सिखातेथे। इनके मरनेके दिन मियाँ अमृतसेनजोने कहदिया कि 'आज हमारे घरकी पाठशाला (संगीतशाला) उठ गई ।' ये ऐसे साहंसी थे कि प्राय निकलनेसे केवल एक घंटा पूर्व इनके पुत्रने एक धुरपत पूछा सो उस समय भी अच्छी तरह बता दिया। ये एकसौछःवर्षकी अवस्था भोग १८४८ के शीतारंभमें जयपुरमें मरगये नाम तो इनका अमर है। इनको यह व्यसन था कि पखावजी चाहे जितना उस्ताद क्यों न हो उसे बेताला किये बिना न छोड़तेथे। बेताला करनेमें राजा लोगोंसे भी नहीं डरतेथे। इस विषयमें इनका रीवाँका वृत्तांत प्रसिद्ध है। ये संवत् १८१३ में पंजाब भी गयेथे औरे वहाँ बहुत मान पाया। मियाँ अमृतसेनजीकी भगिनी हैदरबख्शजीके ज्येष्ठ पुत्र वज़ोरख़ाँजीको ब्याही थी उससे अमीरख़ाँजी और निहालसेनजी ये दो पुत्र हुए दोनोंपर अमृतसेनजीका प्रेम था। उन्होंने दोनों को ही सितार सिखाया। उनमेंसे अमीरखाँजी विद्यामें प्रधान हुए। सच तो यह है कि अमीरख़ाँजी हैदरबख्शजीके कुलमें अद्वितीय विद्वान हैं। प्रथम ये जयपुरमें रामसिंहजीके पास नौकर रहे फिर गवालियरमें जीयाजी महाराजके नौकर और अत्यन्त कृपापात्र हुए फिर उनके पुत्र माधवरावमहाराजके उस्ताद बने; अब विशेष कर जयपुरमें रहतेहैं। इन के दो पुत्र फ़िदाहुसेन औौर फ़ज़लहुसेन हुए दोनों ही सितारमें प्रवीख हुए। उनमेंसे छोटा फ़ज़लहुसेन मरगया। यह भारतका दौर्भाग्य है कि जो होनहार होताहै वह

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शीघ्र ही उठजाता है। दूसरे भागिनेय निहालसेनजी को अ्रमृतसेनजी ने अपना दत्तक पुत्र बनालिया। ये भी जयपुरमें अ्रमृतसेनजीकी जगहपर थे तथा जागीरदार थे और तीनसौ रुपया तनख्वाह पाते थे, ये' बड़े लायक और सितार वीखामें बड़े प्रवीण थे, इनके दो पुत्र हैं। अमृतसेनजीका इनकी ज्येष्ठपुत्रीपर बहुत ही वात्सल्य था उस आठनौ वर्षकी कन्याका नाम लेकर अमृतसेनजी कहा करतेथे कि 'यदि यह कन्या लड़का होता तो इस अवस्था में इसके हाथसे सभामें सितार बजवादेता।' मियाँ अमृतसेनजीने प्रथम अपने भ्राता न्यामतसेनजीको फिर भागिनेय अमीरख़ाँजीको फिर उक्त निहालसेनजी तथा हफ़ीज़ख़ाँजीको खूब ही सितार बताया और चारोंको पृथक पृथक प्रकारका बताया। अंतमें इस लेखकको भी मुष्टिभर भिक्षा देगये। मैं उनसे संवत् १८४५ से लेकर १८५० में उनके अंतकाल पर्यन्त निरन्तर सीखता रहा। मैं उनको पिता समझताहूँ; वे मुझको पुत्र समझतेथे। उनकी मुझपर इतनी कृपा हुई कि रोगावस्थामें उनके घरके लोग भी उनका हाल मुझसे पूछा करतेथे यह सब केवल उनकी लायकी थी मैं तो इस लायक न तब था न अब हूँ। अमृत सेनजीके सिखाये हुओंमेंसे अमीरख़ाँजी सबसे बढ़कर विद्रान और कीर्ततिमान हुए। मियाँ अमृतसेनजीका शरीर उत्तम पुष्ट लंबा चौड़ा तथा बल- वान् था। इनका रंग श्यामल था। इनको मिठाइयोंमेंसे कलाकंद और सवारियोंमेंसे तामभाम प्रिय था। प्रायः जहाँ जाते ताम- १ भारी अफसोस है कि इस समय ये भी नहीं हैं।

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आामपर ही जातेथे। घरसे बाहिर जाते तो अरंगरखा पहनकबसौसे दिल्वोकी पगड़ी बॉधकर जातेथे। घर में दुकली टोपी पहिनते थी; खभावके बहुत भोले थे। सबका यथोचित आदर करतेथे। प्राचीनशैलीके मनुष्य थे इससे सूर्योदयसे दो घंटा पूर्व जागजातेथे। बड़े उदार थे। तानसेनवंशके धुरपतियोंके जो 'गुवरहारे' 'खंडारे' 'डागर' 'सरौत' ये चार गोत प्रसिद्ध हैं उनमेंसे तमृतसेनजीका 'गुवरहारे' गोत था। यद्यपि ये सभामें गाते न थे तो भी घुरपतमें बड़े प्रवीण थे। इनके मुखसे जैसा धुरपत निजमें सुना वैसा इनकं भी घरमें दूसरेके मुखसे न सुना। एवं ये वीखाके तत्वको भी पूर्णप्रकारसे जानतेथे इसीसे अपने पुत्र निहालसेनजीको वीका भी सिखाईथी। इनको पिताकी आज्ञा थी कि 'सभामें बैठ सितार बजानेके अतिरिक्त दूसरा संगीतकार्य नहीं करना' इस कारय ये सभामें सितारके अतिरिक्त और कुछ गाते बजाते न थे। इनके सितारका नाम 'मसिराम' था। इनका युवावस्थाका चित्र इस- पुस्तकके अंतभागमें दियागया है। मियॉ अमृतसेनजी बड़े भाग्यवान् प्रतापशाली और तेजसवी पुरुष थे। किसी सांगीतिकको इनके बराबर बैठते नहीं देखा। बड़े बड़े कड़े कंठे पहिनेहुए भी जो संगीतविद्वान् आतेथे वे हाथ जोड़ कर इनके आगे बड़े अदबसे बैठतेथे। बहुत लोग इनके नामसे कान पकड़तेहैं। ये ऐसे भाग्यवान् थे कि गद्दीपर जन्मे और गद्दीपर ही मरे। इनके जन्मसे पूर्व इनके पिता रहीमसेनजी आर्थिक विपत्ति में बहुत ही फँसगयेथे सुना है कि किसी किसी दिन भोजन भी प्रोप्त न होता था। अमृतसेनजो जबसे उनकी पत्नोके गर्भमें आये

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४० संगी तसुदर्शन- शीघ्र उनकी विपत्ति दूर हो ऐश्वर्य बढ़नेलगा-भरके नवाब ने, के शागिर्द होगयेथे इसीसे कहते हैं कि अमृतसेनजी गद्दोपर जन्मे। अमृतसेनजोपर कभी भारी विपत्ति नहीं पड़ो बस यही विपत्ति समझिए कि जयपुरनरेश रामसिंहजोके मरनेके अनंतर इनको ऊपरकी कोई विशेष आमदनी न रही, रियासतसे जो तनख़्वाह और जागीर थी प्रायः उसीमें निर्वाह करना पड़ताथा इतनेमें इन- का निर्वाह क्लेशसे ही होता था। जयपुरमें इनकी पाँचसौकी तनख़्वाह थी एकसौरुपये मासिक का लवाज़मा (तामभाम सोलह नौकर मशालका तेल एक रथ इत्यादि) था, जागीर में एक ग्राम था, इतने पर भी ये तङ्ग रहतेथे। रामसिंहजी इनको ऊपरसे भी बहुत देते रहतेथे। इनका रईसी ठाठ था। इनके पास चाँदीके पात्र, चाँदो का हुक़ा बहुमूल्य दुशाले रहतेथे। भभर और अलवरमें भी इनकी यही तनरवाह व जागीर थी किन्तु वहाँके नरेश इनके शागिर्द थे इससे वहाँ ये बहुत ऐश्वर्यसे रहे। चौदह वर्षकी अव- स्थामें भभरमें इनकी पूर्वोक्त तनर्वाह प्रभृति पितासे पृथक नियत होगईथी। ये दसवें वर्ष सभामें पिताके साथ और तेरहवें वरष स्वतंत्र सितार बजाने लगगयेथे। सब लोग इनसे बहुत प्रसन्न थे। मियाँ अमृतसेनजी बड़े संतोषी थे इन्होंने कभी भी किसीसे कुछ नहीं माँगा जो देदिया उसीमें संतुष्ट होजातेथे। इनकी जो पूर्वोक्त तनख्वाह थी उसे भी इन्होंने स्वयं नहीं माँगाथा किन्तु पूर्वोक्त नृपतियोंने उसे स्वयं ही अपनी इच्छासे नियत कियाथा। जब कोई श्रीमान् इनको बुलाता तो ये मुजरेका रुपया कभी नहीं ठहरातेथे जो श्रीमान् देता सो लेलेतेथे किन्तु विद्वान और भाग्यवान

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ऐसे थे कि जो श्रीमान जयपुरमें बुलाता वह इनको हज़ार पाँचसौसे कम न देताथा। मुजरेका रुपया ठहरानेसे इनको बड़ी ग्लानि थी; यही कहाकरतेथे कि माँगना तो परमेश्वरसे माँगना जो सबको देताहै, श्रीमान् हमसे प्रसन्न होगा तो अपनी शक्तयानुसार देगा ही। जब इन्होंने इंदौरकी यात्रा की तो वहाँ एक दिन एक गोस्वामीजीने कह कर भेजा कि 'हम आपको दोसौ रुपया देंगे आप हमारे यहाँ सितार बजाने आइए' इन्होंने उत्तर दिया कि 'यदि आप रुपया ठहराकर मुझको बुलातेहैं तो मैं चारसौसे कमपर नहीं आऊँगा, आपको ठहरानेकी क्या ज़रूरत थी? यदि आप मुझे बुलाकर और सुन कर दोसौकी जगह दो ही रुपये देते तो क्या मैं आपपर नालिश करता ?' पटियालानरेश नरेंद्रसिंहके एक चचा दिव्वीमें रहतेथे इनपर उस समयके बादशाहकी भी बड़ी कृपा थी ये संगीतविद्याके बड़े रसिक थे और बड़े उदार भी थे। पटियालेसे जो रुपया आताथा वह बहुत शीघ्र समाप्त हो जाता फिर ऋगासे काम चलाते उसके अनंतर ऋष भी न मिलता तो मूसे कलोल करते। झभरका राज्य नष्ट होनेसे अमृतसेनजी दिव्वी गये तो उन्होंने सितार सुननेको इन्हें बुलाया सितार सुन बहुंत प्रसन्न हुए किन्तु देनेको पास एक पैसा भीन था इससे बड़े उदास होकर अमृतसेनजीसे बोले कि 'आपके लायक़ तो मैं किसी दशामें भी दे नहीं सकता फिर इस समय तो मेरे पास कुछ भी नहीं खैर यह छोटीसी कोठी है आप इसे ले लीजिए मैं और कहीं जारहताहूँ' यह कह उठ खड़ेहुए। अमृतसेनजीने उनको बहुत समझाया कहा कि 'मैं फिर कभी भकर आपसे नकूद

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ही इनाम लूँगा, कोठी मैं नहीं लेता, आप कोठी छोड़नेकी तक़लीफ़ न करें; आपसे कोठी लेनी मुझको मुनासिब नहीं' इत्यादि बहुत कुछ कह सुन उनको कोठीमें बैठाया। फिर बुलानेसे आनेका करार राजाने इनसे करालिया; राजा फिर अपने ज़नानेमें गये इधर उधर बहुत खोजा और तो कुछ न मिला केवल एक सुवर्सकी डब्बी मिली उसमें इलायची भरकर और लाकर खड़ेहो अमृतसेनजीसे बोले कि 'ये चार इलायची तो लेतेजाइए मैं इस समय आपसे बहुत ही लज्जित हूँ जो आप जैसे अद्वितीय उस्तादको कुछ नज़र न करसका आप इस समयके तानसेनजी हैं।' ऐसी ही बहुत प्रशंसा कर अमृत- सेनजी को बिदा किया। यह बात पटियालाके एक आदमीसे भी सुनी है। पाठक महाशय! यदि कोई और होता तो मिली कोठीको कभी न छोड़ता। कोठी महाराजा पटियालाकी होनेसे छोटीसी वस्तु न थी। उसके अनंतर अमृतसेनजीको दिख्ोसे अलवरनरेशके आदमी आकर लेगये। जब इस राजाके पास पटियालेसे रुपया आया तो इसने अलवरसे अमृतसेनजीको बुलाया किन्तु अमृतसेनजी नहीं गये तो इसने दो हज़ार रुपया अलवरमें ही भेजदिया। भ्कभारमें एक अँग्रेज़ अफ़सर इनका सितार सुन ऐसा प्रसन्न हुआ कि गवर्नमेंटसे इनको एक मुक्तामाला भिजवाई। और भौ कई अच्छे अच्छे अँग्रेज़ अफ़सरोंने इनका सितार सुना। कई दर- बारोंमें इनका सितार बजा। लंदनतक इन पितापुत्रोंका नाम प्रसिद्ध होचुकाहै। भारतके कई एक नरेशोंने इनका चित्र उतर- आपथा। जयपुरमें जो संगीतरसिक श्रीमान लोग जातेथे वे इनके

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सितार सुननेकी जयपुरनरेशसे फ़रमायश करतेथे और बड़े कृतज्ञ हो सुनतेथे। गवालियरनरेश जियाजीने तो रामसिंहजी से इनको मुँहखोल माँग ही लिया, रामसिंहजीने कहा कि 'अमृतसेनजीको लेजानाहै तो मुझे भी लेचलिए।' यह सुन जियाजीराव चुप रह- गये। वर्तमान गवालियरनरेश माधवरावने अपने उस्ताद पूर्वोक्त अमीरख़ाँजीसे उस समय कईबार कहा कि 'मियाँ अमृतसेन- जोको देखनेको बहुत मन चाहताहै किन्तु रियासत पर अख्ति- यार न होनेसे इस समय मेरी शक्ति उनको बुलानेयोग्य नहीं खैर कभी तो वह दिन आवेगा।' इनको अधिकार मिलने से पूर्व ही वह संगीतसूर्य अस्ताचलको चलागया इससे वर्तमान गवालियरनरेशकी मनकी मनमें ही रहगई। इनकी मृत्युकी खबर सुन ये बहुत शोकाकुल हुए। इनको अधिकार प्राप्त होनेतक यदि मियाँ अमृतसेनजी जीवित रहते तो ये बड़े आदरसे उन्हें बुलाते। मियाँ अमृतसेनजी विक्रमसंवत् १८७० में जन्मे। चौदहवें - वर्षकी अवस्थामें, अपने पिता रहीमसेनजीके शागिर्द नवाब झभरके नाकर हुए, नवाबने प्रसन्न हो इनकी पाँचसौकी तनख़वाह जागीरका ग्राम और पूर्वोक्त सवारी नौकर प्रभृति लवाज़मा नियत करदिया क्यों कि ये नवाबके ख़लीफ़ा थे, नवाब, सदा इनको अपने पास रखते और अपना जैसा खाने पहननेको देतेथे इस कारय तनख़्वाह- की ओर इनकी कुछ दृष्टि न थी। विक्रम संवत् १६१४ में ग़दरके अनंतर भभरके नवाबको दोषी ठहरा फाँसी दे रियासतको गवर्न- मेंटने ज़प्त करलिया तब ये नवाबके वियोगसे दुःखी हो देहली चलेगये। वहाँसे अलवरनरेशने इनको बुलाकर अपना उस्ताद

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बनाया। तनख्वाह प्रभृति सब पूर्व तुल्य ही नियत करदिया। अलवरमें भी ये बड़े ऐश्वर्यसे रहे। यहाँ इनका कदौसिंह पखावजीके साथ सितार बजा प्रथम इन्होंने इतना विलंपत बजाया कि कदौसिंह साथ न करसका। कदौसिंह के कहनेसे इन्होंने लय बढ़ाई तो एकदम इतनी बढ़ाई कि फिर भी कदौसिंह साथ न करसका (ऐसा करना सहज नहीं) फिर कदौसिहके कहनेसे मध्यलय चलाई तो कदोसिंह साथ चला किन्तु कई बार बेताला हुआ। फिर धीरे धीरे ऐसी लय बढ़ाई कि कदौंसिंह इनके बराबर न मिलसका। उस दिन इन्होंने अपने मुख से कदौसिंहको इतना कहा कि 'सिंहजी! आपके दोनों हाथ काम देरहेहैं, मेरी केवल एक उँगलीमात्र काम देरहीहै देखिए' बस कदौंसिंहने कहा कि 'मियाँजी! आप आप ही हैं लयसे गिरनेक मेरा यह प्रथम दिन है; आपके सिवाय आज दूसरा कोई न जो मेरी द्रुतलयसे आगे निकलजाय।' अलवरनरेश कदौसिंह खफा होनेलगे तो अमृतसेनजीने कदौसिंहकी बड़ी प्रशसा कर हज़ार रुपया एक उत्तम दुशाला और सुवर्स के कंकर-यंह इनाम दिलाया। अलवरके राजा शिवदानसिंहजी रियासतको भूल तन म़न धनसे संगीतविद्यारसमें ऐसे लीन हुए कि ऐसा सांगीतिकसमाज फिर किसी भी राज्यमें नहीं जमा। उस समय संगीतके उस्ताद भी बड़े बड़े थे उनका अलवरनरेशने आदर सत्कार भी खूब किया। इस राज्य विस्मरसे कि वा और किसी कारगसे अप्रसन्न हो गवर्नमेंटने रियासतपर कोर्ट करदिया। जो गवर्नमेंटकी ओरसे

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व्यवस्थापक अफ़सर आया था उसने शिवदानसिंहजीसे कहा कि 'संगोतविद्वानोंमेंसे अर्प्रमृतसेनजी प्रभृति पाँच चार सत्पुरुषोंको आरप अपने पास रखिए हम रियासतसे उनकी पूरी तनख्वाह देंगे और दूसरे सैकड़ों सांगीतिक जो आपने रखछोड़ेहैं उनको निकाल दीजिए रियासत इन सबको पूरी तनख्वाह नहीं देसकती। इसपर शिवदानसिंहने यह हठ पकड़लिया कि रक्खूँगा तो सबको ही रक्खूँगा, उस समय राज्यमें बहुत ही गड़बड़ हुई। सुना है कि राजा उदास हो फ़कोर होनेको तैयार होगयथे, सच भूठ की राम जानें। ऐसे कारणोंसे अमृतसेनजो राजा शिवदानसिंहसे बिदा हो दिख्वीको चलेगये। यह वृत्तांत ज्ञात होनेपर गवालियरनरेश जियाजोने और जयपुरनरेश रामसिंहजीने अमृतसेनजीको लेशनेको दिल्ली में अपने भृत्य भेजे। उनमेंसे राजारामसिंहजीके आदमी प्रथम पहुँचे सो अमृतसेनजीको जयपुर लेगय। राजारामसिंहजीने इनका बड़ा आदर किया तथा पूर्वोक्त तनख्वाह प्रभृति सब नियत कर दिया। वे कभी कभी इनके मकान पर भी आतेथे। ताजियोंमें तो एक दिन नियमसे इनके मकानपर आतेथे। अपने निजसे भी कुछ देतेरहतेथे। जैसे और भाई बेटोंके यहाँ वर्षमें एक दिन महा- राजका काँसा (भोजनपूर् थाल) जाताहै वैसे अमृतसेनजीके यहाँ भी आताथा। जयपुरमें यह भारी प्रतिष्ठा गिनी जातीहै। अलवरसे जयपुर आनेकी यह घटना अंदाजन संवत् १६२०- २१-२२ की है। संवत् १८५० के आश्विनमें मियाँ अमृतसेनजाने अपनी दो पौत्नियोंका अमीरखाँजोके दो पुत्रोंके साथ स्वरूपानुरूप ऐसे समा-

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संगीतसुदर्शन- रोह से विवाह किया कि सब कोई जैसा नहीं कर सकता या। रुपयेकी तो केवल मठाई घरमें बनीथी जो बाज़ारसेआई वह 2 रही। अमीरख़ाँजी गवालियरसे बरात लेकर आएथे उस विवाहपस उक्त्तमियॉँहैदरबख्शजीकं पुत्रपौत्रोंमें कुछ ऐसा बेढब कलह हुआ कि उससे अमृतसेनजी इतने दुःखित हुए जो मुखसे कह दिया कि 'यदि मुझे इस कलहकी मालूम होती तो मैं जीतेजी इस विवाहको न करता ।' अंतरात्मा इस कलहसे संतप्त होनेसे और वैवाहिककार्यश्रमसे शरीरके श्रांत होनेसे उस विवाहमें ही इनको ज्वर आनेलगा। परम वात्सल्यपात्र ज्येष्ठ पौत्रीके बिदा होते ही ये वृक्ष के तुल्य जो शय्यापर गिरे फिरन उठे, ज्वर बढ़ता ही गया फिर दस्त भी लगगए। बड़े बड़े लोग इनकी ख़बरको आते थे। पुत्र निहालसेनजीने उस समय बहुत सेवा की उत्तम चिकित्सा कराईगई किन्तु कुछ फल न हुआ, अंतमें उसी संवत् १६५० पौषकृष्णअष्टमीके दिन सूर्योदयसे डेढ़ घंटा पूर्व अस्सी वर्षकी अवस्था (आयु) भोग यह संगीतका सूर्य शीलका चंद्रमा अस्त हो ही गया यह सितारविद्याका समुद्र अगस्त्यरूपी कालने पी ही लिया। घरभर रोने लगा सूर्योदय होते होते लोगोंसे घर भरगया। वर्त्तमान जयपुरनरेश माधवसिंह- जीके पास ख़बर भेजो इनोंने सुन कर बड़ा शोक मनाया अपनेमुखसे कहा कि 'आज मेरी रयासतका एक भारी रत्न उठगया' फिर भाई- बेटोंके तुल्य मरगकालके आदरकी आज्ञा दी उससे राज्यसे मरय- कालिक डफड़ेका बाजा और निशानका हाथी आया वह अमृतसेन- जीकी शवसवारीके आगे आगे चला इनके शवशरीरपर एक उत्तम दुशाला उढ़ायागया सैकड़ां भद्रमनुष्य साथ थे होते होते इंदाज़न

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भूमिका। 8६

दोबजे इनको दफन (समाधिस्थ) कियागया। पुत्र निहालसेनजीने इनका दशमा प्रभृति तथा नुकता ये सब मृत्युकार्य बहुत उत्तम किये। नुकतेपर राज्यसे भी कुछ रुपया मिला। हाय अब वैसे महा- .. 3 पुरुष कहाँ, किसी ने अच्छा कहा है-"दैया कहाँ गए वे लोग।" मियाँ अमृतसेनजी जब जयपुरमें थे तब नैपाल के महाराजने इनको अपने सांगीतिक जलसेमें बुलायाथा। बहुत आदर किया प्रसन्न हो दस हजार रुपया बिदाउगीमें दिया। छोड़ जानेको सवारी तथा आदमी भी दिये, यह बहुत कालकी बात है, उससमय नैपालके महाराजने संगीतका एक जलसा कियाथा और भी बहुत से उत्तम उत्तम सांगीतिकविद्वानोंको बुलायाथा। उस जलसेमें इनके साथ लखनऊके कालिकप्रसाद कत्थकने तबला बजाया। होश सीधे होगए। वहाँसे ये अपने चाचा पूर्वोक्तु सेनखाँजी की मृत्युका शोक प्रकट करने इंदौर गए तो इंदौरके राजा तुकाजीरावने इनको बड़े आदरसे बुला सितार सुना बहुत कुछ दिया भी, किन्तु इंदैौरमें चाचाकी मृत्युपर गएथे इसकारख वहाँ इनका ख़र्च भी बहुत हुआ। फिर वहाँसे गवालियर आए वहाँ भी संबंधी बांधव थे। इससे वहाँ भी खर्च हुआ, राजासाहेब वहाँ थे नहीं इससे लाभ कुछ हुआ नहों। ये लोग लखलुटा थे सो जयपुर पहुँचते पहुँचत बहुत कुछ खर्च होगया जो शेष रहाथा सो सब रामसिंह- जीको दिखा यात्राका सब वृत्तांत कहा-रामसिंहजी देख सुन प्रसन्न हुए कहा कि 'आपकेलिए यह कुछ बड़ी वस्तु नहीं आप तो इस समयके मियाँ तानसेनजी हैं।' अमृतसेनजी केवल दो मासकी छुट्टी लेकर गएथे और लौटे पाँच मासमें इससे रामसिंहजीके ४

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५० संगीतसुदर्शन-

खजानचीने तीन मासकी तनख्वाह काटली यह वृत्तांत सुन रामसिं- हजी ख़ज़ानचीपर बड़े नाराज़ हुए कहा कि 'ऐसा भारी कार्य हमसे पूछकर किया करो अमृतसेनजीकी जितनी तनख्वाह काटी है सब स्वयं उनके घर जाकर देकर माफी माँगो।' ख़ज़ानधीको वैसा ही करना पड़ा। अमृतसेनजीको लेजानेकेलिए जयपुरमें ईरानके बादशाह का भी आदमी आयाथा वह दस हज़ार तो घरखर्चकेलिए देवाथा कहताथा कि बादशाह एक लक्ष रुपया तो आपको नियमेन देंगे ही यदि अधिक प्रसन्न हुए तो और भी अधिक देंगे। अमृतसेन- जीने सोचा कि 'वह स्वतंत्र बादशाह है यदि हमको लौटने न दिया तो हम क्या करेंगे, और कुटुम्बको छोड़कर इतने धनका भी क्या करेंगे' यह सोच ईरान जानेसे इनकार करदिया इस प्रतिषेधसे रामसिंह बड़े प्रसन्न हुए। संवत् १६४८ के आरम्भमें इनको इंदारनरेशने बड़े आदरसे बुलाया एकमास अपने पास रक्खा, उत्तम सत्कार से विदा किया विदाके समय अपने हाथसे एक पन्नोंका कंठा इनके कंठमें पहराया इस आदरसे इंदौरनिवासी चकित हो गए। इंदौरमें एक दिन इनके शागिरद एक गायकने इनका अपने मकानपर आतिथ्य किया इनके कारम बहुत लोग एकत्रित हुएथे इनके पुत्र निहाल- सेनजी और पूर्वोक्त हफोज़ख़ाँजी सितारमें इमनकल्या बजानेलगे तदनंतर इनकी भी बजानेकी इच्छा हुई सो सितार उठा ऐसे विलक्षय-प्रकारसे इमनकल्याया बजाई कि सब लोग चकित होगये औौर तो क्या उक्त निहालसेनजी हफीज़ख़ाँजीको भी वह प्रकार

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भूमिका। ५१

ज्ञात न था इससे उनोंने विवश सितार रखदिया अमृतसेनजीने उनको बजानेको कहा तो उनोंने स्पष्ट कहदिया कि 'हमको यह प्रकार ज्ञात ही नहीं हम क्या बजाएँ' तब अमृतसेननीने उनके ध्यानको अपनी तरफ खैंचा और कानमें कुछ समझाया तब आठ दस जोड़ सुनकर वे भी जैसे कैसे साथ बजानेलगे, गृहपतिने उठकर अमृतसेनजीके चरग पकड़लिए। इ दौरमें एक दिन इनोंने अपने एकांतमें निजचित्तोख्वासके लिए सबसे चोरी भीमपलासी बजाई, उस समय इनके साथके सब सोरहेथे एक मैं ही इनसे कुछ परे ओटमें लेटा हुआ जागताथा, उस सितारको सुनकर कान खुलगए। ऐसा कभी सितार सुना न था और न कभी फिर सुना। मानों राग का नशा चढ़ताजाताथा उस सितारका वर्णन लिखना छोड़ जिव्हासे कहना भी अशक्य है। सितार बजानेके कुछ काल अनंतर मैंने कहा कि 'हजूर सितार तो आज सुना' तब चकित होकर बोले कि 'तुम कहाँ थे' मैंने अपने लेटनेका स्थान बतादिया सुनकर चुप होगए। इंदौरको जाते समय रतलाममें उतरे वहाँ अच्छे अच्छे लोग इनको सुनने आए रात्रिके आठ बजेथे चंद्रिका खिलरहीथी इनोंने शुद्धकल्याय ऐसी बजाई कि लोग सुन कर चकित होगए बीचमेंसे इनोंने किदारेकी एकतान जो बजाई तो यह मालूम हुआ कि मानों चंद्रिका सवाई डेढ़ी होगई। फिर रतलामनरेशने भी इनको चार पाँच दिन अपने पास रक्खा। मियाँ अमृतसेनजी जैसे रागके पादशाह थे वैसे लयवाल के भी पादशाह थे। बड़े बड़े पखावची इनके लयतालके पांडित्यसे

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५२ संगीतसुदर्शन- चकित होजातेथे। ये जोड़ बजाकर जो नत बजाते थे तो पखावची के तालके विश्वासपर नहीं बजातेथे, किंतु अपने पैरके विश्वासपर बजातंथे इनका पैर बराबर ताल देता रहताथा कभी बंद न होता था यह विशेष भी किसी औरमें देखा नहीं गया। एक दिन जय- पुरमें इनका लयकारीका ऐसा सितार सुना कि बड़े बड़े सांगीतिक उस्ताद दांतसे अंगुलि दबातेथे (चकित होगए)। समपर आरगिरने में कोई लयतालका पांडित्य नहीं क्योंकि यदि बजानेवाला समपर आकर न गिरेगा तब तो बेताला ही कहावेगा लयतालका पांडित्य तो कुछ और ही है यथा तालके उन उन सूक्ष्ममात्रास्थानोंमें आराकर मिलना इत्यादि, विशेष रहस्यको अ्रंथमें लिखना अशक्य है। सितारकी बहुतसी गतें तो मसीतखॉजी प्रभृति उस्तादोंकी बनाई चलीआतीहैं वे सीधी साधी हैं प्राचीन कहातीहैं, कुछ रागोंकी गतें रहीमसेनजीने भी बनाईहैं शेष बहुतसी गतें अमृतसेनजीने बनाईहैं ये रहीमसेनजी अमृतसेनजीकी बनाई गतें अमूल्य रत्न हैं उस उस रागके मानों लक्षया हैं, ये लयकी टेढ़ी और मीड़ोंसे भरी हैं इन गतोंको यथार्थ रूपसे बजाना सहज नहीं, फिर इनगतों के अनुरूप आगे तोड़ेफ़िकरोंकी कल्पना करनी तो अशक्य ही है। जिस राग की मीया रहीमसेनजी वा अमृतसेनजीकी बनाई गत याद हो उस रागका ऐसा ज्ञान (साक्षात्कार) होजाताहै कि उस रागमें चलना फिरना सहज होजाता है, अत एव ये गतें इस लेखकके सिवाय साकल्येन इनके घरसे बाहिर और किसीके पास नहीं पहॅुँची। जयपुरनरेश रामसिंहजीके मरनेके अनंतर और सब सांगी- तिकोंके साथ साथ हरेबंगलेकी नौकरीका परमाना अमृतसेनजीक्रो

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भूमिका। ५३

और इनके मातुल हैदरवख्शजीके पास भी पहुँचा अमृतसेनजीने हैदरवख़्शजीको साथ ले दीवान फ़त्तेसिंहजीसे जाकर कहा कि 'मैं और मेरा मामा हरेबंगलेकी नौकरी नहीं करेंगे महाराजासाहेब जब सुनेंगे तब उनको सुनाएँगे आपको रखना हो तो हमें रक्खो नहीं तो और कहींसे परमेश्वर आधसेर आटा दिलादेगा।' यह सुन फ़त्तेसिंहजी बोले कि 'मीयाँजी आपकेलिए हमसे बड़ो घड़ी कई रयासतें मौजूद हैं हमको तो आपसा रत्न दूसरा मिल नहों सकता आप राज्यके रत्न हैं हरेबंगलेकी नौकरीका परमाना आप दोनोंके पास भूलकर चलागया माफ कीजिए आप दोनोंको हरेबंगलेसे कुछ काम नहीं महाराजासा हेबको जब इच्छा होगी तो वे आपको बुलाएँगे।' सो अमृतसेनजी और हैदरवख्शजीको हरेबंगलेकी नौकरी भी माफ थी। अमृतसेनजीके' पुत्र निहालसेनजोको भी यह नौकरी माफ है। निहालसेनजोकी तीनसौकी तनखाह है एक ग्राम में जागीर है। हैदरवख्शजोकी दोसौकी तनखाह थी। जयपुरनरेश माधवसिंहजी संगीतचर्चाके काल अभीतक अमृत- सेनजीका स्मरस करतेहैं यह भी सुना है कि जयपुरनरेश माधव- सिंहजी अपने राज्यके जिन चार मृत पुरुषरत्नोंका प्रायः स्मरख किया करते हैं उनमें से एक यह मीयां अमृतसेनजी हैं। वे चार पुरुषरत्न यथा-१ बाबू कांतिचन्द्रजी, २ मीयां अमृतसेनजी, ३ पढ़ाने वाले, ४ एक खुशनज़र। मीयां अमृतसेनजीका फोटू उतरानेका मेरा संकल्प कई

१ मीर्या अरमृतसेनजीका जो सुझे थोड़ासा जीवनवृत्तान्त ज्ञात है उसमेंसे मैंने थोड़ासा यहाँ लिखा है अन्यथा बहुत विस्तर होजाता।

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५४ संगीतसुदर्शन- कारखोंसे मनमें ही रहगया इसकारय इनकी युवावस्थाका जो चित्र प्राप्त हुआ उसका फोटू इस पुस्तकके अंतमें देताहूँ। वृद्धावस्थामें इनकी आकृति विशेषकर निजपिता रहीमसेनजोके सदृश ही प्रतीत होतीथी विशेष यही था कि इनका नाक आगेसे गोल था। इनके पिता मीयां रहीमसेनजीका तथा इनके पूर्वपुरुष मीयां तानसेनजीका भी चित्र इस पुस्तकमें वर्तमान है, इनीके कारय श्रीहरिदासस्वामीजीका भी चित्र इस पुस्तकमें दियाहै। सितारमें मीयाँ अमीरखांजीने भी इस कालमें बड़ा नाम पाया है इससं इनका फोदूचित्र भी आगे दिया है। मीयां अमीरखांजी अमृतसेनजीके भागिनेय थे इनके पिता वजीरखांजी वीखाकार थे, पितामह हैदरबख्शजी घुरपतके भारी उस्ताद (पादशाह) थे। शमीरखांजीने झभरमें जन्म पा अलवरमें विशेषकर अमृतसेनजीसे सितारकी शिक्षा पाई कुछ अपने मातामह रहीमसेनजीसे भी शिक्षा पाई। ये प्रथम अलवरनरेशके फिर जयपुरनरेश रामसिंहजीके फिर गवालियरनरेश जयाजोरावके नौकर रहे। जयाजीरावकी सितारचमत्कारसे इनपर बहुत कृपा थी। इनोंने बड़े बड़े संगीत- विद्वानोंमें सितार बजाया इनका हाथ बहुत कोमल था। वर्तमान गवालियरनरेश माधवरावजीने संगीतमें इनको अपना उस्ताद बनाया। इनके तीन पुत्र हुए दो मरगए एक फ़िदाहुसेन वर्त्तमान है, जयपुर में नौकर है। अमीरखांजी®भी अब जयपुरमें रहते हैं। अब मैं मीयां तानसेनजीकी वंशावलीको लिखता हूँ-गवा-

१. इस अ्रंथको लिखनेके समय ये जीतेथे, उसके अनन्तर संवत् १६७२ कार्तिकमें सरगए।

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भूमिका। ५५

लियरमें एक गौड़ ब्राह्मय मकरन्दपाँडे थे उनकी कोई संतान बचती न थी इस कारया उनके जब तानसेनजी जन्मे तो यह बच्चा बचजाय इसकेलिये मातापिताने इनको महम्मदगौसके भेट करदिया। महम्मदगौस उससमय गवालियरमें एक सिद्ध मुसल- मान फकीर थे अब तक वहाँ इनका उत्तम मकबरा (समाधिस्थान) बनाहै, उसीके पास तानसेनजीकी भी कबर है उसपर एक इम्लीका वृक्ष प्राचीन लगाहै सांगीतिक लोग वहाँ जातेहैं तो इसकी पत्तीको चबातेहैं। महम्मदगौसकी भेट हो जानेके कारख तानसेनजी चिरायु हुए। इनका पैतृक नाम 'वनआयो- व्यास' था। इनकी संगीतविद्यामें रुचि हुई कुछ सीखने लगे। कोई कहतेहैं कि महम्मदगौसने ही इनको संगीत- विद्यामें निजसिद्धिसे सिद्ध बनादियाथा श्रीहरिदासस्वामीजीके ये शागिरद न थे किन्तु उनमें श्रद्धा रखतेथे क्यों कि हरिदासस्वामीजी भारी सिद्ध साधु महात्मा थे और संगीतमें भी इनसे अधिक थे। कोई कहतेहैं कि तानसेनजी हरिदासस्वामीके शागिरद ही थे उनींके प्रभावसे संगीतमें ये सिद्ध हुए। उस समय लौकिक जनोंमें संगीत- विद्यामें तानसेनजीसे बढ़कर और कोईन था यह अविवाद सिद्ध है। सुनाहै कि तानसेनजी प्रथम रीवांमें रामराजाके पास उस्ताद बनकर रहे। फिर इनकी संगीतकी कीर्ति जो दिगंत व्याप्त हुई तो इनको पादशाह अकबरने बुलाकर अपना उस्ताद बनाया। अकबर के नवरत्नोंमेंसे एक ये भी रत्न गिने जातेहैं। वस्तुगत्या आपामर- पंडित इनने संगीतविद्यामें ऐसी कीर्ति पाई जैसी आजतक और कोईको प्राप्त नहीं हुई। संगीतमें उस समय इनोंने बहुत लोगोंको

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५६ संगीतसुदर्शन- पराजित किया और शिक्षा दी। मद्रासहातेको छोड़ और समग्र- भारतके सांगीतिकोंमें सैकड़े पीछे नब्बे सांगीतिक इनींके वंशके साक्षात् किं वा परंपरया शागिरद निकलेंगे। बैजूप्रभृति भी उस समय उत्तम संगीतविद्वान् थे किन्तु उनसे लोकोपकार इतना नहीं बना। कोई कहतेहैं कि बैजू तानसेनजीसे प्राचीन हैं जो हो। श्री- हरिदासस्वामीप्रभृति तो अलौकिक पुरुष थे। कोई कहतेहैं कि तानसेनजी अकबरके संगसे मुसलमान हुए। कोई कहतेहैं कि महम्मदगौसके पास ही मुसलमान होगएथे। किसी कविने कहाहै कि 'अच्छा हुआ जो सर्पके कान न हुए नहों तो तानसेनकी तान सुन शेषनागके सिर हिलानेसे पृथ्वीपर प्रलय ही होजाती'-"भलो भयो विधि ना दिये शेषनागके कान।" मीयां तानसेनजीके मुसलमान होजानेपर भी इनके वंशमें अभीतक हिंदुधर्मकी बहुतसी प्रथाएं चलीआतीहैं-यथा दीपमा- लाकी रात्रिको सरस्वतीका और वाद्योंका पूजन करना। विवाहमें वरकन्याके जन्मपत्र लिखवा पूजन करना। वरकन्याका नकाह होनेपर भी वे एकवेर हिंदूमंडप्तुल्यमंडपमें बैठते हैं, उसदिन स्त्रीलोग धोती पहिरती हैं इत्यादि। मीयां रहीमसेनजी तो बहुत् ब्राह्मयों को गैएँ मोल खरीददेतेथे। ये लोग मद्यका तो स्पर्शतक नहीं करते बल्के कोई प्रकारके भी नशेका सेवन नहीं करते। पानके अतिरिक्त इनलोगोंको और कोई व्यसन नहीं। सैव्राहयमें श्रद्धा रखतेहैं। मीयां तानसेनजीके तानतरङ्गखां सूरतसेन विलासखां निचोड़- सेन ये चार पुत्र हुए एक पुत्री हुई, कोई कहते हैं कि तानसेनजी के छी पुत्र हुए, इनमेंसे विलासखांजी फकीर होगए। अपने

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भूमिका। ५७

उस्तादकी पुत्रीकेलिए पादशाह अकबरकी इच्छा हुई कि "यह कन्या किसी भारी सांगोतिकविद्वानको देनी चाहिए' इससे बहुत अन्वेषए करनेसे वीणाकार नौवातखांजी मिले उनको कन्या दीगई। उसके पुत्रसे जो वंश चला वही तानसेनजीका दाहित्रवंश है इनका पूर्वोक्त चारगोतोंमेंसे खंडारे गोत है। नौवात- खॉजी भी प्रथम हिदू थे पीछे इस विवाहके कालमें मुसलमान हुए। नौवातखांजी दामाद होनेके कारग तानसेनजीके पुत्रतुल्य ही थे इससे संभव है कि इनको कुछ शिक्षा तानसेनजीसे भी प्राप्त हुईहो तो भी ये प्राधान्येन वीखामें श्रीहरिदासस्वामीजीके ही शिष्य थे वीखाके अद्वितीय उस्ताद हुए। इनके वंशके लोग वीया बजातेरहे धुरपत भी गातेथे पीछेसे कुछ लोग रबाब और स्वरशृंगारको बजाने लगगए, इसकालमें वीखा इस वंशके शाहलोगोंके अधीन थी। ख़यालके आदिपुरुष सदारंगजी भी इसी वंशमें हुएहैं और रामपुरके वर्तमान वीखाकार वजीरखांजी भी इसी वंशमेंसे हैं। रागरसखां रसवीनखां इत्यादि वीखाकार भी इसी वंशमें थे। नौवातखांजीके जीवनखां इनके वजीतखां इनके दूलहखां पुत्र हुए ऐसा सुनाहै। तानसेनजीके पुत्र तथा दौहित्र इन दोनों वंशोंमें संबंध होनेसे पीछे पुत्रवंशवाले भी कुछ लोग वीषाको बजाने लगगए। यह भी सुना है कि नौवातखांजी स्तंत्र संगीतविद्रान् होने के कारख अपने श्वशुर मीयाँ तानसेनजीसे आंतरिक ईर्षा रखतेथे, एकदिन नौवातखांजी वीया बजारहेथे एकतानपर तानसेनजीने कहा कि 'बेटा यह तान पूरी नहीं हुई' यह सुन नौवातखांजीने कहा कि 'और पूरी आप कर दिखाइये. ?' तब तानसेनजीने उस तानको पूरा गादिया,

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भूमिका। पूर्र

इस देशकी नस नसमें भर गया इसीका फल यह दुर्गति है। अब मैं तानसेनजीके ज्यष्ठपुत्रकी वंशावली लिखताहूँ- (तानसेनजी) तानतरंगख़ांजी

·सूरजसनजी

सुफलसेनजी

भडसन जी

सुभागसेनज़ी 1 सूरतसनजी 1 दयालसनजी 1 कृपालसेनजी

निहालसेनजी 1

खयाल सेनजी 1

I कृपालसेनज़ी

खुशालसेनजी 1 अद्भुतसेनजी बालसेनजी प्रभृति पॉच पुत्र हुए 1 रूपसेनजी

निहालसेनजी 1

1 लालसनजी

फ़ाज़िलसेनजी 1.

मुरादसेनजी

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६० संगीतसुदर्शन- इन मुरादसेनजीके नूरसेनजी सुखसेनजो और बहादुरसेनजी ये तीन पुत्र हुए। सुखसेनजी के रहीमसेनजी, और रहीमसेनजी के अमृतसेनजी न्यामतसेनजी और लालसेनजो ये तीन पुत्र हुए। इन्हीं रहीमसेनजी अमृतसेनजी का थोड़ा सा जोवनवृत्तांत पूर्वमें लिखा है। अमृतसेनजीके निहालसेनज़ी दत्तक पुत्र वर्तमान हैं। उक्त बहादरसेनजीके हैदरबख़शजी पुत्र हुए ये घुरपतके अंतिम पादशाह होगए, अमृतसेनजीके मामा थे। इनका भी थोड़ा सा वृत्तांत पूर्वमें लिखाहै। ये दूलहखांजी के गोद गये। संगीतसे इनका नाम बुधप्रवीय था। इनके वजोरखाँजी मम्मूखाँजो अज्जूखाँज़ो अलमूखाँजी और सलावतखाँजी ये पाँच पुत्र हुए। वजीरखांजी वीसाकार थे। इनके अमीरखाँजी पुत्र जन्मे ये वर्तमान काल में ७० वर्ष के हैं सितारके और वीकाके अद्वितीय उस्ताद हैं। मम्मूखाँजीके हफीजखांजी हुए इनको अमृतसेनजीने उत्तम सितार सिखायाथा ये प्रथम नवाबटौंकके फिर नवाबरामपुरके बड़ेआरदरसे नौकर रहे। दस वर्ष हुए मरगये। काशीमें मेरे पास आये थे सितारमें बड़ा नाम करगये। पूर्वोक्त सुखसेनजीके भ्राता नूरसेनजीके गुलमसेनजी इनके हस्सूसेनजी इनके उत्तमसेनजी इनके आलमसेनजी पुत्र हुए। आलमसेनजीके साथ तानसेनवंशका सभामें घुरपतका गाना भस्त होगया, तानसेनवंशमें इनके पीछे कोई ऐसा नहीं जो सभा में धुरपत गाकर वाहवाह कहावे, जब मूलभूत तानसेनवंशमें ही कोई उत्तम घुरपतगायक नहीं तो और जगत्में कहाँसे आवेगा ? आलमसेनजी बड़े सुरीले और घुरपतके भारी विद्वान् थे। इनका

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भूमिका। ६१

गाना इतना सुरीला था कि लोग इनको नश्तरसेन कहदेतेथे। मीयाँ अमृतसेनजीने कहाथा कि 'हमारे घर की यत्किंचित् ताय- नोम् (घुरपतका गाना) जो शेष है वह आलमसेनके गलेमें है इसके अनंतर समाप्ति ही है।' इनके कोई संतान नहीं हुई। मीयाँ अमृतसेनजीका घर मानों संगीतविद्याका सर्वोत्तम कालिज था। मेरे शिक्षाकालमें भी इस घरमें अमृतसेनजी और हैदरबखशजी ये दो तो साक्षात् गंधर्व ही थे। इनसे नीचे लालसेन- जी आलमसेनजी चाउसेनजी वजीरखांजी मम्मूखाँजी सलावत- खांजी अमीरखांजी निहालसेनजी तथा हफोजफखांजी ये लोग थे। सभी संगीतके उस्ताद थे, अब इनके सद्दश कोईभी दृष्टिगोचर नहीं होता। इस घरमें उस समय चारों ओर संगीतविद्या लहरातीथी इसी कार मुझे संगीत का ज्ञान कुछ प्राप्त होगया। यह घर अलवर झभर और दिव्वी में तो मानों पूर् गन्धर्वालय ही था। और ये लोग बड़े सत्पुरुष थे व्यसनी न थे।' तानसेनवंशके धुरपतविद्याके नाशका कारय रहीमसेनजी अमृतसेनजीका सितार ही है। इनोंने ऐसा सितार बजाया कि इनके वंशके बालक धुरपतको त्याग सितारमें लगगये सितार भी वैसा किसी को आया नहीं। उक्त मम्मूखांजीने स्पष्ट कहदियाथा कि 'भाई अमृतसेनके सितार ने घरका धुरपत नष्ट करदिया।" स्वयं ऐसा कहकर भी फिर अपने पुत्र हफीजखाँको अमृतसेनजीसे सितार ही सिखलाया; इनका सितार ऐसा चमत्कारी था। रहीमसेनजी धुरपतविद्यामें अभी परिपूर्ण प्रवीख नहीं हुएथे कि इनके पिता सुखसेनजी मरगए, सुखसेनजीका गाना ऐसा हृदय-

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६२ संगीतसुदर्शन-

आाही था कि लोग इनको सुखचैन कहाकरतेथे, इनके भाईबरादर बड़ी जान मारमारकर इनका अनुकरए करते किन्तु इनको पहुँच न सकतेथे। पिताके मरयानंतर रहीमसेनजीको और कोई से आगे धुरपत सीखने की इच्छा न हुई इससे अपने श्वथुर दूलहखांजीसे सितार सीखा, उस समय सितार एक साधारय (मामूली) वाद् था, इससे किसीने रहीमसेनजीको चिढ़ाकर कहा कि 'तुम तो अब डिड़ डा डिड़ डाड़ा बजायाकरो' रहीमसेनजीने भी इसपर गुस्सा खाकर कहा कि 'भाइयो निस्सन्देह सितार धुरपतके आगे दोकौड़ोका है धुरपत रत्नके तुल्य है और सितार कंकड़के तुल्य किन्तु इस कंकड़को ऐसा परिष्कृत करूँगा कि रत्नके बराबर का बनादूँ गा।' तदनंतर सितारपर ऐसी बुद्धि लगाई और परिश्रम किया कि सितार में वीखा धुरपत ख़याल तीनोंको भरदिया, जिससे बड़े बड़े सांगीतिक इनके सितारको सिर झुकाने लगे। इसीसे विज्ञ लोग कहते हैं कि 'सितार रहीमसेन अमृतसेनजीका है।' जिसने इनका सितार सुना उसको फिर दूसरा गाना बजाना वैसान जचा। तानसेनवंशमें भी इनीके पूर्वज सर्वोत्कृष्ट होतेरहे। मीयां रहीमसेनजी एकबेर लखना गए इनके एक ईर्षाग्रस्त भ्राताने इनके साथ यों घात किया कि इनको भोजनका निमंत्रण दे लखनौके उत्तमोत्तम गाने बजानेवालोंको इकट्ठा किया। उस समाजमें प्रथम वे आप बजाए फिर एक सुन्दर सुरीली वेश्य को गवाया यह वेश्या 'मेरा पियरवा जोगिया होगया' ऐसी एक ठुमरी ऐसी गातीथी कि समग्र समाज रोदेता था। उसी डुमरीको इसने ऐसे आवेशमें गाया कि दोसौ रुपयेकी

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भूमिका। ६३ अपनी चुनरी (शढनेका दुपट्टा) भी फाड़ डाली ऐसा रंग जमाया कि समाज में सन्नाटा छागया। इस वेश्याकी इसी ठुमरीके गाने का यह प्रभाव था कि उसके अनंतर किसीके भी गाने बजानेका रंग नहीं जमताथा। उसपर भी इस वेश्याने रहीमसेनजीके कारग उस समय और भी अधिक आवेशसे ठुमरी गाईथी। इस ठुमरीका इस वेश्याको भारी घमंड था, क्योंकि इसके अनंतर किसीका रंग जमता न था। सो इस वेश्याके उस ठुमरीको गाने के अनं- तर उक्त गृहपति भ्राताने रहीमसेनजीको सितार बजानेको कहा। ठीक सूर्यास्तका समय था वह समय भी संगीत के उत्तम अनुकूल नहीं होता, भोजनसे रहीमसेनजीका पेट भराहुआ था उक्त वेश्या रंग जमाचुकीथी, ये ही सब घातें थीं। रहीमसेनजीने उस भ्राता से कहा कि 'भाई दुमने मेरे साथ दगा तो बहुत किया क्यों कि उक्त वेश्या अपना रंग जमाचुकीहै पेट ऐसा भरा है कि लेटनेको मन चाहताहै बैठा भी नहीं जाता संगीतसे प्रतिकूल सूर्यास्तका समय है खैर खुदा इज्जतरखने वाला है बजाताहूं।' उस समाजमें डेढ़दोसौ तो केवल सितारिये रहीमसेनजीका सितार खोसनेके संकल्पसे इकट्ठे हुए थे क्यों कि इनको रहीमसेनजीके सितारका तत्वज्ञान था नहीं। उस समय रहीमसेनजीने श्याम- कालंगड़ेको सितारमें ऐसा बजाया कि पूर्वोक्त वेश्याका रंग सब बह गया-समग्र समाजके मुखसे वाहवाहकी वर्षा होनेलगी समाजने १-सूर्यास्तका समय संगीतसे प्रतिकूल यों है कि सूर्यास्तके समय श्ररंभ करनेको कोई भी उत्तम राग नहीं, सब इधर विधरके समयमें श्ररंभ करनेके हैं।

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६४ संगीतसुदर्शन- स्पष्ट कहा कि 'आप आप ही हैं हम लोग आपको ऐसा नहीं जानतेथे आपका सितार तो आफत है ऐसे लय ताल आलाप गत तोड़े फ़िकरे तो आज तक कभी नहीं सुनेथे आपके सितारने तो वीखा धुरपत खयाल तीनों को मात कर दिया सितार तो आप ही का है।' रहीमसेनजीने कहा कि हमारे पूर्वज पुरुष ऐसे होचुकेहैं कि मैं उनकी अपेक्षा तृसके तुल्य हूँ परमेश्वरने इस समय मेरी इज्ज़त रखली यह बड़ी बात है।' उक्त भ्राताने लज्जासे सिर भुक्रा- लिया उक्त वेश्याने रहोमसेनजीके पैर पकड़लिए कहा कि 'आप उस्ताद क्या हैं आप तो वे ही मीयां तानसेनजी हैं।' जो उक्त सितारिये जमा हुए थे वे धीरे धीरे मुख छिपा खिसकने लगे उनमेंसे बहुतसे रहीमसेनजीके शागिरद होगए। फिर बड़े बड़े सांगीतिक और श्रीमानोंने रहीमसेनजीके आतिथ्य कर सितार सुने, लखनौके इलाकेमें इनकी धूम मचगई। इसीसे कहतेहैं कि सितार रहीमसेनजीअमृतसेनजीका ही है, जिसने इनका सितार सुनाहै उसको दूसरेका गाना बजाना रुचिकर नहीं होसकता। लखनौमें कत्थक बहुत उत्तम होचुकेहैं। अंतमें विंदादीनजीने नृत्यमें बहुत कीर्ति पाई। ये अभी विद्यमान हैं प्राचीन गुखियों मेंसे हैं। मैंने उक्त मीयां श्रीशमृतसेनजीसाहेबसे रागविद्या (सितार) की शिक्षा पाईहै और काशीमें महामहोपाध्याय सी०आई० ई० श्रीगंगाधरशास्त्री जीमहाराजसे संस्कृतविद्याकी शिक्षा पाईहै। संस्कृत में तर्क वेदांत मीमांसादि शास्त्रोंके तथा हिन्दीभाषामेंभी मैंने कई ग्रंथ बनाकर छपवाएहैं, संगीतविद्या बहुत लुप्त होजातीहै इसकारय

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भूमिका। ६५

सीखनेवालोंको सहायता प्राप्त्यर्थ मैंने यह संगीतसुदर्शन नामका छोटासा ग्रंथ लिखाहै, इसके चार अध्याय हैं-१ खराध्याय, २ रागाध्याय, ३ तालाध्याय, ४ नृत्याध्याय। मैंने अपनी मतिके अनुसार थोड़ासा विषय इस ग्रंथमें लिखदियाहै इस ग्रंथका पसंद करना बाचनेवालेके अधीन है। मीयाँ रहीमसेनजीअमृतसेनजोका कुछ जीवनवृत्त लिखनेसे इसग्रंथकी भूमिका कुछ बढ़गईहै। चारों अध्यायोंमेंसे नृत्याध्याय बहुत संच्षिप्त है शेष तीन अध्याय अधिक सविस्तर नहीं तो बहुत संचिप्त भी नहीं हैं, इन तीन अध्यायोंसे जिज्ञासु को कुछ साहाय्य प्राप्त होसकताहै विशेषज्ञान तो गुरुमुखके अधीन है, यह इसग्रंथका और मेरा स्वरूप है। खवराध्यायका और अधिक ज्ञान संगीतरत्नाकरादिग्रंथोंसे होसकता है। आधु- निक रागाध्यायका विशेषज्ञान तो गुरुशिक्षाके बिना प्राप्त हो नहीं सकता। संगीतविद्याके मुसलमानोंके हाथ चलीजानेसे भी संगीतग्रंथोंके पठनपाठनकी परिपाटी उठगई क्यों कि संगीतग्रंथ संस्कृतभाषामें हैं मुसलमान तो संस्कृतभाषाको छोड़ ग्रांथिक हिंदीभाषाको भी नहीं जानते अत एव हिंदीभाषाके ग्रंथोंको भी वे पढ़ा नहीं सकते। आरजकल्हके गानेबजानेवालोंके जो बालक कुछ अक्रमात्रका किंवा चिट्ठोपत्रोयोग्य पढ़ने लिखनेका अभ्यास कर संगीतग्रंथविद्यामें पैर अड़ातेहैं प्रायः वह अशुद्ध है कुछ औरका और ही समझ बैठेहैं। उसका तत्व इतना ही है कि उनोंने 'वाँदी विवादी तान मूर्छना' इत्यादि कुछ शब्दोंको कंठ करलिया है उनमेंसे भी जिसने 'ग्रह अंश न्यास श्रुति' इत्यादि शब्दोंको कंठ करलिया वह तो मानों ५

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६६ संगीतसुदर्शन-

संगीतभट्टाचार्य बनगया, वे लोग कंठ किए शब्दोंके भी वास्तविक अर्थको कहसकते नहीं। गानेबजानेवालोंमें ग्रांथिकविद्याका ज्ञान इतना चीय होगयाहै कि प्रतिसैकड़े दश भी ऐसे लोग दुर्लभ हैं। जो श्रुति और सवरके यथार्थ भेदको कहसकें। और इस संगीतविद्याका लक्ष्य (गानाबजाना) अत्यधिक मधुर होनेसे भी संगीतग्रंथोंके पठनपाठनकी परिपाटी उठ गई क्यों कि उस माधुर्यके कारग लोग ग्रंथोंको छोड़ गानेबजानेपर ही टूटपड़े। इसी माधुर्यके कारण ही रागादिस्वरूपोंमें कुछ भेद पड़गया यथा कोई वागीश्वरीमें तीव्र ऋषभ लगातेहैं कोई कोमल ऋृषभ लगातेहैं कोई दोनों ही, एवं कोई तीव्र धैवत लगाते हैं कोई दोनों ही, इस संशयमें इससमय तानसेनवंश ही प्रधान प्रमाय है अर्थात् मीयां तानसेनवंशके लोग जैसा गाते बजातेहैं। उसे ही यथार्थ समझना चाहिए। इसवंशमें भी जहाँ भेद प्रतीत हो वहाँ विकल्प जानना। तानसेनवंश संगीतविद्यामें इतना प्रतिष्ठित है कि मेरी जानमें उसको प्रमाय माननेमें किसीको भी वैमत्य न होगा। तानसेनजीके वंशके कुछलोग पूर्व (काशीप्रभृति) में रहतेहैं कुछलोग पश्चिम (जयपुरप्रभृति) में रहतेहैं दोनों ही समुदायोंमें कई अद्वितीय संगीतविद्वान् होचुके हैं इसमें कुछ संशय नहीं किन्तु कुछ पूर्वके लोग जो कहाकरतेहैं कि 'पश्चिमवाले जोड़ बजाना नहीं जानते' सो सब अशुद्ध है और ऐसा वही लोग कहा करतेहैं जिनोंने पश्चिमके उत्तमसंगीतविद्वानोंको नहीं सुना। पूर्वके बहुतसे उत्तमोत्तमसंगीतविद्वान् पश्चिमके संगीतविद्वानोंको सुनकर

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भूमिका। ६७

चकित होचुकेहैं। पूर्व और पश्चिमके गततोड़ेमें जितना भेद है वस्तुगत्या उतना ही भेद जोड़में भी होनाचाहिए। पूर्ववालोंके जाड़में ऐसा कोई विशेष ज्ञात नहीं होता जिसको पश्चिमवाले न निकालसकें। इस समय भी दोनों दलोंकी एकसमान दशा है। बल्के पूर्ववालोंकी अपेक्षा पश्चिमवालोंका जोड़ बहुत खिला होता है। अपने मुखसे अपनी प्रशंसा और दूसरेकी निंदा करदेनेसे विद्यामें उत्कर्ष नहीं होसकता। पश्चिमवाले स्वभावके भी बहुत साधु होते आयेहैं। वस्तुगत्या दोनों ही दल गुगी थे प्रशंसनीय थे एकदलके पक्षसे दूसरे दलकी निंदा करनी सर्वथा अनुचित है। ये दोनों दल भारतकी अंतिमसंगीतविद्याके मानों सूर्य चंद्र थे और क्या लिखृ। अब मैं इस भूमिकाको और न बढ़ा समाप्त करता हूँ और निवेदित करताहूँ कि जो महोदय मेरे इस्रंथकी निंदा स्तुति छापे वे उसे मेरे पास भी भेजदें जो उस निंदास्तुतिका मुझे भी ज्ञान होजाय इति शम्।

"मत्यैरसर्वविदुरैविहिते क नाम ग्रन्थेस्ति दोषविरहः सुचिरन्तनेपि" काशी, आपका- लेखसंवत् १८७१ सुदर्शनाचाय्यशास्त्री

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संकेतविशेष। मैंने अपने हृदयकी सरलता वा कुटिलताकी अपेक्षा इस ग्रंथ को तथा और ग्रंथोंको भी बहुत कुछ स्पष्ट लिखाहै अन्य अ्रंथोंमें इतना मर्म प्रायः कोई नहीं लिखता। मैंने तो रागोंके परमगोष्य मर्मको भी यहां बहुतकुछ स्पष्ट लिखदियाहै यह सब ध्यानपूर्वक देखनेसे ज्ञात होगा। रागाध्यायमें सर्वत्र उपयोगकेलिए यहाँ कुछ संकेत भी लिखदेताहूं- रागाध्यायमें मैंने सरगम पद और गत ये तीन प्रकारके उदा- हरय लिखेहैं उनमेंसे सरगमका विशेषकर द्वितीयसप्रकसे भरंभ करना क्रमसे प्रथमसप्तक और तृतीयसप्तकमें जाना फिर द्वितीय सप्तक में समाप्ति करनी जहाँ 'सा रेग म पध नी सा रेग' ऐसाआरोहहो वहाँ अंतके 'सा रे ग' ये तृतीयसप्तकके जानने जहाँ 'सा नी ध प म ग रे सा नी ध प' ऐसा अवरोह हो वहां अंतके 'नी ध प' ये प्रथमसप्नकके जानने इसी आरोहावरोहसे सप्तक जानलेना। पदोंके ऊपर मैंने स्वराक्षर लगादिये हैं जिस पदाच्षरपर जो स्वर हो उस पदाचरको उसी स्वरमें निकालना, और जो जो विशेष है वह वहां वहां लिखदियाहै। गतोंकेलिए यह सङ्कत है कि मेरे उस्तादघरानेके सितारपर १७ पड़दे 'म प ध ध नी नी सा रेग म म प ध नी सा रेग' इन स्वरोंके कमसे होतेहैं। यही क्रम इनगतोंमें भी पड़दोंका तथा गतोंके नीचे दिये अंकोंका जानना। तूंबेकी ओरके पड़देसे संख्याका आरंभ

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२ संगीतसुदर्शन-

करना यथा-गतके जिसबोलके नीचे १ अंक हो उसको तूंबेकी ओरके सबसे नीचेके पड़देपर बजाना यह पड़दा तीसरे सप्तकके गंधारका है, २ अंकवाले बोलको उसके ऊपरवाले ऋषभके पड़दे- पर बजाना, एवं आगे भी जानना। जिस बोलके नीचे शून्य हो उसे खुले तारपर बजाना।

सितारमें सूत भी होतीहै इसके संकेतकेलिए बोलपर 'सू' ऐसा अक्तर दियाहै ऐसे बोलके नीचे दोअंक दियंहैं प्रथमअंकके पड़देसे दूसरे अंकके पड़देतक सूतसे जानना। काटकेलिए बोलों- पर 'का' अक्षर दिया है उसबोलके नीचे जितने अंक हों उतने पड़- दोंपर उसबोलको काट (कतर) से बजाना चाहिये, इसमें दोनों अंगुलियोंका व्यापार होता है। पड़देपर अंगुलिसे उसस्वरको कंपित करनेको गमक कहतेहैं इसकेलिए बोलपर 'ग' यह चिह्न दियाहै। मीड़केलिए बोलपर 'मी' यह अत्तर दियाहै इसके आगे जिस खरका अक्षर हो उस स्वरकी मौंड़ देनी। यदि मीं के आगे अंक हो तो १ अंकसे एकस्वरकी २ अंकसे दूसरे स्वरकी मींड़ देनी यथा गंधारके पड़देके बोल पर जब मींड़के लिए १ अंक हो तो गंधारसे दूसरे मध्यमकी मींड़ देनी डा ऐसे २ अंक हो तो

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संकेतविशेष। ३

गत किसी न किसी तालमें बंधी होतीहै सो जहां तालका नाम न हो वहां धीमतिताला तालजानना क्यों कि गतें विशेषकर धीमेतितालामें ही बनी हुईहैं, यह ताल सबतालोंसे कठिन है। गतको बनाने तथा बजानेवाला चाहे तो 'डिड़ ड़ा' इनबोलों पर भी तालकी जरबोंको स्थिर करसकताहै किंतु इन बोलोंपर जरबें सुन्दर नहीं होतीं इससे 'डा' बोलपर जरब होतीहै। बड़े उस्तादोंकी मीड़दार गतोंमें डा बोल अधिक होताहै क्योंकि डापर मोंड़ तथा आंस सुंदर होती है। धीमेतितालेकी मात्रा १६ होनेसे एक आवृत्त की गतमें १६ बोल होतेहैं, लय को घटानेसे बोल घट भी सकतेहैं बढानेसे बढ़ भी सकतेहैं। गतें एक आवृत्तसे लेकर चार आवृत्त- तककी देखनेमें आतीहैं। डिंड़ डा डिड़ डाड़ा इसक्रमकी गतोंका धीमे तितालेकी सोल- हवीं मात्रासे आरंभ जानना। बोलोंके क्रमका कुछ नियम नहीं अनेक प्रकारके बोलक्रम देखनेमे आतेहैं। तालमें सम ही प्रधान होता है: वह सम किस बोलपर होताहै यह नियम नहीं तथापि गतमें यदि 'डिड़ डा डिड़ डाड़ा' ये इसक्रमसे बोल हो तो प्रायः इनसे आगेके बोलपर सम रहताहै-इत्यादि प्रकारसे समको खोज लेना, जहां अनेक बोलोंपर सम होसकता हो वहां समयोग्य प्रधान बोलपर समकी कल्पना करनी, बोलकी प्रधानता स्वरकी प्रधानतासे जाननी। यहां गतोंपर (स) यह समका संकेत जानना। धीमे तितालेकी गतोंमें जरबोंके मध्यमें तीनतीन बोलोंका अंतर रहताहै लयको घटाने बढ़ानेसे घट बढ़ भी सकताहै। डिड़ को एक ही बोल जानना इत्यादि।

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४ संगीत सुंदर्शन-

विशेष सूचना। इस ग्रंथका यह द्वितीय मुद्रय है। इस वार मैंने इसको कुछ और भी परिष्कृत कियाहै।

श्रापका- सुदर्शनाचायेंशास्त्रो

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॥ श्रीः ।।

प्रथ संगीतसुदर्शन

स्वराध्याय वीयाप्रवीखां स्वरतालविग्रहां समग्रविद्य कपराधिनायिकाम्। श्रुत्यादिप्रत्यक्षविसर्जनोत्सुकां दयानिधिं नौमि मुदा सरस्वतीम्।। अमृतसेनपदपद्मयुग वंदौं वारं वार। मोसम जो मतिमंदको दीनों गीतविचार।। समग्र संगीत नादके अधीन है वह नाद आहत तथा अनाहत रूपसे दो प्रकारका है कहा भी है- "आहतोऽनाहश्चेति द्विधा नादो निगद्यते।" "गीतं नादात्मकम्, वाद्य नादव्यक्ा प्रशस्यते। तद्द्वयानुगतं नृत्यं नादाधीनमतस्त्रयम् ।" "गीतं वाद्य तथा नृत्यं त्रयं संगीतमुच्यते।" जो नाद आघातके बिना होताहै उसे भनाहत नाद कहतेहैं यथा जो कानमें अंगुली देनेसे साँ साँ सुनाई देता है, इस अनाहत- नादका संगीतसे कोई सम्बन्ध नहीं। जो नाद आघातसे उत्पन्न होताहै उसे आहतनाद कहतेहैं यथा सितारवीयादि वाद्योंके

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२ संगीतसुदर्शन-

तारपर मिज़राबादि मारनेसे और मृदंगादि वाद्योंपर हाथ मारनेसे और कंठसे नाद निकलता है इत्यादि नाद आहतनाद है। इसीका संगीतसे सम्बन्ध है कहा भी है। "सोपि रक्तिविहीनत्वान्न मनोरञ्जको नृखाम्। तस्मादाहतनादस्य श्रुत्यादि द्वारतोSखिलम्। गेय* वितन्वतो लोकरञ्जनं भवरञजनम् ॥" यहाँ पर "सोपि" यह पद अनाहतनादका परामर्शक है। कंठसे निकलनेवाला भी नाद प्रेरित कीहुई भीतरकी वायुके आघातसे किं वा भोतरकी वायु और अग्निके संयोगसे उत्पन्न होता है इसकारए आहतनाद कहाताहै कहा है- "नकारं प्राखनामानं दकारमनल विदुः । जातः प्रायाभ्निसंयोगात् तेन नादोभिधीयते ॥" "आत्मा विवत्मायोय मनः प्रेरयते भैनः-। देहस्थं वह्निमाहन्ति, स प्रेरयति मारुतम् । ब्रह्मग्रन्थिस्थितः सोथ (वायुः) कमादूर्ध्वपथे चरन्। नाभिहत्कण्ठमूर्धास्येष्वाSSविर्भावयति ध्वनिम् ॥" वह आहतनाद यद्यपि नाभि हृदय कंठ मुख और शिर इन पाँचस्थानोंके भेदसे पाँच प्रकारका है तथापि लोकव्यवहारमें हृदय कंठ और शिर इन तीनस्थानोंके प्रभेदसे तीनप्रकारका हो गिना- जाताहै कहा भी है- "नादोतिसूद्त्मः सूद्मश्र पुष्टोऽपुष्टश्च कृत्रिमः । इति पश्चाभिधां धत्ते पश्वस्थानस्थितः क्रमात्॥

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सराध्याय। ३

व्यवहारे त्वसौ त्रेधा दृदि मन्द्रोभिधीयते। कंठे मध्यो मूर्ध्नि तारो द्विगुपश्चोत्तरोत्तरः ॥" इति । नाभिप्रदेशगत नादका प्रत्यव नहीं होता और कंठगत और ख़गत नादोंका भेद स्पष्ट ज्ञात नों होता इस कारय व्यवहारमें रप्रकारके ही नादका ग्रहय कियाहं उनमेंसे हृदयदेशमें होने- ना नाद मन्द्र (पहले दर्जेका) नाद कहाताहै। कंठमें होने- वाला नाद मध्य (दूसरे दर्जेका) नाद हाताहै। शिरमें होने- वाला नाद तार (तीसरे दर्जेका सबसे ऊँच) नाद कहाताहै। मन्द्रसे मध्य दुगुना ऊँचा (खिंचा) होता ह मध्यसे तार दुगुना ऊँचा होताहै। नादकी तारता वीकादिवाद्यके तरको खैंचकर देखने से ज्ञात होसकतीहै सो यहां ऊँचा पदसे जादा नोरका यह अर्थ नहीं जानना इत्यादि बातोंका ज्ञानं केवल शिक्षाके ही अधीन है। इन ही तीनस्थानोंके भेदसे खरोंके तीन सप्तव कहातेहैं यथा हृदयदेशमें मंद्रनादात्मक प्रथम सप्तक, कंठदेशन मध्यनादात्मक द्विताय सप्तक, शिरमें तारनादात्मक तृतीय सफ्क, कहा भी है- "ते मन्द्रमध्यताराख्यस्थानभेदात वधा मताः ।"इति। उक्त तीनोंप्रकारके नादमेंसे प्रत्येक दके प्राधान्येन प्रत्यक्ष- योग्य बाईस भेद होतेहैं इन्हों भेहोंकी श्रुतियें कहतेहैं। हृदयदेशमें एकप्रकारकी बाईस नाड़ीहैं इनकेकारय हृदयदेशमें मन्द्रनादात्मक बाईस श्रुतियें उत्पन्न होती हैं, उनमेंसे भी वे बाईस नाड़ो क्रमसे एकसे एक ऊँची होनेके कारम एकसे एक श्रुति ऊँची ( तार) होतीजातीहै। एवं कंठदेशमें भी बाईस नाड़ी होनेसे मध्य नादकी

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४ संगीत्ार्शन -- भी बाईस श्रुति हैं और शिरोदेशमें भंब्राईस नाड़ी होनेसे तारनाद की भी बाईस श्रुति हैं, कहा भी है -- "तस्य द्वाविंशतिर्भेदाः श्रवण तयो मताः । हृद्यू ध्र्वनाड़ीसंलग्ना नाड्या विंशतिर्मताः ॥ तिरश्च्यस्तासु तावत्य: 'ियो मारुताहताः (मरुत्याहते)। उच्चोच्चतरतायुक्ता: प्रवन्त्युत्तरोत्तरम्॥ एवं कण्ठे तथा श श्रुतिद्वाविंशतिर्मता ॥" इति। इन बाईस श्रुतियक क्रमसे 'तीत्रा कुमुद्रती मंदा छन्दोवती दयावती रंजनी रतिका की रौद्री क्रोधा वज्तका प्रसारिणी प्रीतिः मार्जनी च्िति रह संदीपिनी आलापिनी मदंती रोहिी रम्या उग्रा चोभिणी ये नाम हैं। इन श्रुतियोंकी पांच जाति हैं दोप्ता आयता करुणा धृदध मध्या, कहा भी है- "दीप्ाSSयता च करुणा मृदुर्मध्येति जातयः ।" दीप्ताजातिवा ली श्रुतियोंके श्रवरसे मन दीप्त होताहै; आयता जातिवाली श्रुतिये के श्रवससे मन आयत (विस्तृत ) होताहै, करुखाजातिवाली शतयोंके श्रवससे मन करुणप्रधान होताहै, एवं आगे भी जानना। अतिजातियोंकेलिए यही कारण कहाहै। श्रुतिकी अ्पपेक्षा भी श्रुतिजातिक। ज्ञान कठिन है। "तीत्रा रौद्री वज्निकोश्रेत्युक्ता दाप्त चतुर्विधा। कुमुद्वत्याSऽयतायाः स्यात् क्रोधा चाथ प्र सारियी॥ संदीपिनी रोहियी च भेदा: पञ्चेति कीतिर्ताः। दयावती तथाSSलापिन्यथ प्रोक्ता मदन्तिका॥

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स्वराध्याय।

त्रयस्ते करुणाभेदाः, मृदोर्भेंदचतुष्ट्यम्-। मन्दा च रतिका प्रीतिः दमेति, मध्या तु षड्मिदा-II छन्दोवती रजनी च मार्जनी रक्तिका तथा। रम्या च क्षोभिसीत्यासामथ बमः स्वरस्थितिम् ॥" अर्थात् 'तीव्रा रौदी वज्िका उग्र इन चार श्रुतियोंकी दीप्ता जाति है, 'कुमुद्रती क्रोधा प्रसारिणी संदीपिनी रोहियी' इन पॉच श्रुतियोंकी आयता जाति है, 'दयावती आलापिनी मदन्तिका' इन तीन श्रुतियोंकी करुणा जाति है, 'मंदा रतिका प्रोति चिति' इन चार श्रुतियोंकी मृदु जाति है, 'छंदोवती रखनी मार्जनी रक्तिका रम्या चषोभिसी' इन छः श्रुतियोंकी मध्या जाति है। इनहीं बाईस श्रुतियोंसे षड्जादि सातों सवर होतेहैं कहा है- "अ्रुविभ्यः स्युः खवराः षडजषभगान्धारमध्यमाः । पश्चमो धैवतश्चाथ निषाद इति सप्त ते।। तेषां संज्ञाः सरिगमपधनीत्यपरा मताः ॥" इन बाईस श्रुतियोंमेंसे तीव्रा कुमुदूती मन्दा और छंदोवती ये चार श्रुतिये षड्जस्वरकी हैं, द्यावती रखनी रतिका ये तीन श्रुतियें ऋषभखरकी हैं, रौद्री क्रोधा ये दो श्रुतियें गान्धारखरकी हैं, वज्तिका प्रसारिशी प्रीति मार्जनी ये चार श्रुतियें मध्यमस्वरकी हैं, च्िति, रक्ता संदीपिनी आलापिनी ये चार श्रुतियें पंचमख्वरकी हैं, मदंती रोहिसी रम्या ये तीन श्रुतिये धैवतस्वरकी हैं, उम्रा और क्षोभिखी ये दो श्रुतिये निषादस्वरकी हैं, कहा है-

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६ संगीतसुदर्शन- "तीत्राकुमुदूती मन्दा छन्दोवत्यस्तु षड्जगाः । दयावती रख्जनी च रतिका चर्षभे स्थिता॥ रौद्रो क्रोधा च गान्धारे, वज्रिकाSथ प्रसारिणी। प्रीतिश्च्मार्जनीत्येताः श्रुतयो मध्यमश्रिताः ॥ च्िती रक्ता च संदीपन्यालापन्यपि पञ्चमे। मदन्ती रोहियी रम्येत्येतास्तिस्रस्तु धैवते।। उग्रा च च्षोभिणीति द्वे निषादे वसतः श्रुती ।" इति। "प्रथमश्रवणाच्छब्दः श्रयते हस्वमात्रकः । सा श्रुतिः संपरिज्ञेया स्वरावयवलत्तका॥" इन बाईस श्रुतियोंके और भी अवातर भेद बहुत होसकतेहैं किं तु वे स्पष्ट प्रत्यक्ष योग्यन होनेसे उनकी सांगीतिकों ने गयना नहीं की। श्रुतियोंके अवांतर भेद छोड़ आजकल्ह तो इन बाईस श्रुतियों का भी परस्पर भेदज्ञान बहुत अल्प पुरुषोंको है। संगीतसमय- सारमें तो तीनों सप्तकों की मिल्ता कर छयासठ श्रुतियांके छयासठ ही नाम पृथक पृथक् तथा और ही कहेहैं यथा- "मन्द्रा चैवातिमन्द्रा च घोरा घोरतरा तथा। मण्डना च तथा सौम्या सुमना पुष्करा तथा ॥" इत्यादि। किं तु ये नाम सकल सांगीतिकाभिमत न होनेसे मैंने यहाँ नहीं लिखे और प्रत्येक सप्तककी श्रुतियोंके नाम पृथक पृथक् होनेमें कोई हेतु भी नहीं अन्यथा सप्तकभेदसे स्वरोंके नाम भी भिन्न मिन्न होनेचाहियें तथा च यथा तीनों सप्तकोंमें स्वरोंके राम एकसमान हैं तथा तीनों सप्तकोंमें श्रुतियोंके नाम भी एक

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स्वराध्याय। ७

समान ही हैं वे तीत्रा कुमुद्रती मन्दा छन्दोवती दयावती इत्यादि लिखदियेहैं। स्वरश्रुतियोंके कार्यकारणभावको प्राचीन ग्रंथकारोंने कई प्रकार से लिखाहै किसीने तादात्म्य किसीने विवर्त किसीने परिणाम वाद मानाहै इन सब पत्तोंमें परिणामवाद ही श्रेष्ठ तथा अधिकजनसंमत है। संगीतसमयसारमें स्वरनामोंकी व्युत्पत्ति यां कही है- नासा कण्ठ उरुस्तालुर्जिह्वा दन्तास्तथैव च। षड्भि: संजायते यस्मात् तस्मात् षड्ज इति स्मृतः ॥ नाभे: समुदितो वायुः कण्ठशीर्षसमाहतः। कृषभवन्नदेद् यस्मात्तस्माद् ऋषभ ईरितः ।। नाभे: समुदितो वायुः कण्ठशीर्षसमाहतः। गन्धर्वसुखहेतुः स्याद् गान्धारस्तेन कथ्यते। वायु: समुत्थिता नाभेरहृदयेषु समाहतः । मध्यस्थानोद्भवत्वाच्च मध्यमस्तेन कीर्तितः। वायुः समुत्थितो नाभेरोष्ठकण्ठशिरोहदः । पश्चस्थानसमुद्भूत: पश्चमस्तेन संमतः ।। नाभे: समुत्थितो वायुः कण्ठतालुशिराहृदि। तत्तत्स्थाने धृतो यस्मात्ततोसौ धैवतो मतः ॥ नाभे: समुत्थिता वायुः कण्ठतालुशिरोहत: । निषीदन्ति खराः सर्वे निषादस्तेन कथ्यते।" इति।

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संगीत सुदर्शन- n

(श्रुतिस्वरादिका कोष्ठ =नक़शा)

स्वर के चढ़ेस्वर शुद्ध स्वर व्यवहाम्के श्रुतिनाम के उतरे स्व. श्रुतिजाति षडअग्राम के से षडजग्राम श्रुतिसंख्या से पड़जग्राम शाख्त्रोंक्त प्रकार उतरानि प्रचलितलोक शास्त्रोक्त प्रकार

तीव्रा दीक्ा तीच्र नि 60

२ कुमुद्दती श् यता तीत्रतर नि चढ़ा नि

३ मंदा मृदु तीव्रतम नि

छंदोवती मध्या स स oC

दयावती कणाा पूर्व रि

६ रंजनी मध्या कोमल रि उतरा रि

1 ७ रतिका मृदु रि पूर्व ग

रौद्री दीक्षा कोमल ग तीव्र रि चढ़ा रि

क्रोधा श्यता ग तीव्रतर रि

वज्रिका दीप्ता तीव्र ग उतरा ग

प्रसारिणी आयता पूर्व म तीव्रतर ग

१२ प्रीति मृदु कोमल म तीव्रतम ग चढ़ा ग

मार्जनी अ्रति ती मध्या म तम ग उतराह

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स्वराध्याय।

स्वर शुद्ध स्वर के उतरे स्वर श्रतिनाम श्रृतिजाति व्यवहार के के चढ़े स्वर श्रृतिसंख्या प्रचलितलोक से षडजग्राम से षडजग्राम षडजग्राम के शास्त्रोक्त प्रकार शाखोक्त प्रकार

१४ च्षिति मृदु तीव्र म

रका मध्या तीव्रतर म चढ़ा म

१६ संदीपिनी आायता तीव्रतम म

१७ आलापिनी करुणा प प

मदुंती करुखा पूर्व ध

रोहिणी भयता कोमल ध उतरा ध

२० रम्या मध्या ध पूर्व नि

२१ दीक्षा कोमल नि तीव्र ध चढ़ा ध उग्रा

२२ चोभिणी मध्या नि तीव्रतर ध

(१ मैंने इन खानोंमें प्रचलितस्वरोंका श्र तियोंके जिन अंशोपर लिखाहै उन्हीं अंशोपर जानना यथा उत्रानिषाद तीवाके प्रथम अंशपर है एवं आगे भी जानना ।) के उक्त सातों स्वरोंमेंसे षड्ज और पंचम एक ही प्रकारके होतेहैं (सरे चढ़े नहीं होते, शेष ऋषभ गंधार मध्यम धैवत निषाद ये पाँच र उतरे चढ़े भी होते हैं, ऋषभादि शुद्ध स्वर जब आ्गेकी श्रुति- षड जातेहैं तब तीव्र कहातेहैं और भी आगेकी श्रुतिपर जानेसे

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१० संगीतसुदर्शन- तीव्रतर कहातेहैं, जब पीछेकी श्रुतिपर आते हैं तब कोमल कहातेहैं और भी पीछे हटनेसे पूर्व कहातेहैं संगीतपारिजातमें कहा भी है- "स्वरः सोत्तरगामी चेतू तीव्रादिवचनोदितः । स्वरोग्रिमश्रुतिं याति तीव्रसंज्ञां प्रयात्यसौ ॥ ततोग्रिमश्रुति याति तदा तोव्रतरो भवेत्। ततोभ्रिमश्रुतिं याति तहि तीव्रतमः स्मृतः ॥ स्वरः पश्चान्निवृत्तश्चेत् कोमलादिभिरीरितः । एकश्रुतिपरित्यागात् स्वरः कोमलसंज्ञकः ॥ श्रुतिदवयपरित्यागात् पूर्वशब्देन भण्यते ।।" इति ॥ यद्यपि शास्त्रोक्त तीव्रतर तीव्रतम पूर्वइत्यादि स्वरोंका प्रचलित संगीतमें भी प्रयोग होताहै तथापि प्रचलित सांगीतिकव्यवहारमें तीव्रतमादि शब्दोंका व्यवहार नहीं किन्तु पूर्व कोमल शुद्ध ये तीनों प्रकारके स्वर कोमल वा उतरे कहाते हैं और तीव्र तीव्रतर तीव्रतम ये सब स्वर तीव्र वा चढ़े कहाते हैं। कोमल तीव्र शब्दोंको भी कुछ पढ़े लिखे लोग बोलतेहैं शेष लोग तो उतरा चढ़ा यही कहते हैं। षड ज और पंचम शास्त्रके और लोकके एकसमान हैं, शास्त्रमें जो कोमल ऋषभ है लोकमें वही उतरा ऋषभ कहाताहै, शास्त्रमें जो तीव्र ऋषभ है वही लोकमें चढ़ा ऋषभ कहाताहै, शास्त्रमें जो तीव्र गंधार है वही लोकमें उतरा गंधार कहाताहै, शास्त्रमें जो तीव्रतम गंधार है वही लोकमें चढ़ा गंधार कहाताहै, शास्त्रमें जो शुद्ध मध्यम है वही लोकमें उतरा मध्यम कहाताहै, शास्त्रमें जो तोव्रतर मध्यम है वही लोकमें चढ़ा मध्यम कहाता शासतरमें जो कोमल ैवत है लोकमें भी वही उतरा धैवत कहा है

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स्वराध्याय। ११

शास्त्रमें जो तीव्र धैवत है लोकमें भी वही चढ़ा धैवत कहाताहै, शास्त्रमें जो तीव्र निषाद है वही लोकमें उतरा निषाद कहाताहै, शास्त्रमें जो तीव्रतर निषाद है, वही लोकमें चढ़ा निषाद कहावाहै, मैंने जो यह शास्त्रोय तथा लौकिक सवरोंका मिलान लिखाहै वह श्रुतियोंके स्थूल मानसे लिखाहै श्रुत्यंशोंके सृक्ष्म मानसे इसमें कुछ अंतर है यथा-षड ज छंदोवतीके अंत्य भागपर, उतरा ऋषभ रंजनीके मध्यभागपर, चढ़ा ऋषभ रौद्रीके मध्य भागपर, उतरा गंधार व्तिका के प्रथमभागपर, चढ़ा गंधार प्रीतिके प्रथम भागपर, उतरा मध्यम मार्जनीके अंत्यभागपर, चढ़ा मध्यम रक्ता के अंत्य भाग पर, पंचम आलापिनी के अंत्य भाग पर, उतरा धैवत रोहिसीके तृतीय भागपर, चढ़ा धैवत उग्राके प्रथमभागपर, उतरा निषाद तीव्राके प्रथमभाग पर, चढ़ा निषाद कुमुदवूती के अंत्यभागपर प्राप्त होताहै, ऐसी लौकिक स्वरोंकी व्यवस्था प्रतीत होतीहै। श्रुतिभेदसे ही सवरोंका भेद है, लोक प्रचलित स्वर भिन्न भिन्न होने पर भी शास्त्रीय कोई कोई स्वर श्रुतियोंके ऐक्यसे परस्पर मिल भी जातेहैं यह विषय पूर्व लिखित कोष्ठमें स्पष्ट है यथाशुद्ध ऋषभ तथा पूर्व गंधार ये श्रत्यैक्यसे एक ही पदार्थ हैं, एवं कोमल गंधार तीत्र ऋषभ, शुद्ध ग तीव्रतर रि, पूर्व म तीव्रतर ग, कोमल म और तीव्रतम ग, शुद्ध म अतितीव्रतम ग, शुद्ध ध पूर्व नि, कोमल नि तीव्र ध, तथा शुद्ध नि तीव्रतर ध ये भी एक ही पदार्थ (स्वर) हैं। षड ज और पंचम उतरे चढ़े नहीं होते इसका यह हेतुहै कि षड ज और पंचमके ही आश्रयसे सब स्वर स्थिर (कायम) किये

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१२ संगीतसुदर्शन- जातेहैं यदि षड ज पंचम एकरूप न हों तो और स्वरोंकी व्यवस्था न होसके, यथा अवधिकी स्थिरता अपेत्तित होतीहै एवं षड ज पंचम- की स्थिरता अपेत्ित है, क्योंकि ये दोनों स्वर अवधिभूत हैं। और शास्त्रमर्यादासे षड जके पीछेकी श्रुतियों को निषादने और आगेकी श्रुतियों को ऋषभने रोक रक्खा है एवं पंचमसे पीछेकी श्रुतियोंको मध्यमने और आगेकी श्रुतियोंको धैवतने रोक रक्खा है इस कारख भी षड्ज पंचम उतर चढ़ नहीं सकते। और षड्ज पंचमकी जैसी ध्वनि अपेत्तित है वह एक छाड़ आधी श्रुति भी आगे पीछे करनेसे प्राप्त नहीं हो सकती इस कारख भी षड्ज पंचम उतरे चढ़े नहीं होते, इसी कारए भूमंडलमें गंधारप्रामका प्रचार नहीं क्योंकि गंधार ग्राममें पंचम एक श्रुति उतरा संदीपिनीपर होताहै लोकमें तो पंचम आलापिनी श्रुतिपर होताहै। यह पंचम षड्जग्रामका है इस कारय लोकमे षड्जग्राम ही प्रचलित है। मेरी जानमें कंठछिद्रका उत्तरोत्तर संकुचित होतेजाना भी सवरकी तीव्रतामें कारण प्रतीत होता है। वस्तुगत्याँ स्वरोंकी कोमलता तथा तीव्रताका कारय प्रत्यन्ष नहीं होता।

शास्त्रमर्यादासे सात स्वर शुद्ध हैं और बाईस विकृत हैं मिल कर उनतोस हुए कहा भी है- "शुद्धाः सप्त विकाराख्या द्ूरधिका विशतिर्मताः । एकोनन्रिंशदुच्यन्ते ते सवे मिलिताः खराः ॥" इति। लोकव्यवहारमें तो षड्ज पंचम ये दो शुद्ध हैं शेष ऋषभादि सर उतरे चढ़े दो दो प्रकारके होनेसे मिलकर बारह हैं।

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स्वराध्याय। १३

सामान्यरूपसे खर सात ही कहातेहैं, इन खवरोंके मंद्र मध्य और तार ये तीन सप्तक (प्रकार) हैं, यह पूर्वमें लिखाहै। प्रथम उत्पन्न रखन (ध्वनि) मात्रश्रुति कहातीहै तदनंतर जो अनुरखन (अनुध्वनि=आँस) होता है उसे स्वर कहतेहैं यथा षड्जके पड़देपर तार बजाकर तुरत पकड़लेनेसे जो टुनसा शब्द निकलताहै वह छंदोवती श्रुति है उसी पड़देपर तार बजाकर जब न पकड़ो तब जो लंबा शब्द (उसी टुन की आँस) सुनाई देवा है वह सवर है यही श्रुति और खरोंका भेद कहाहै एवं और खवरों का भी श्रुतियोंसे भेद जानना, कहा भी है- "श्रुत्यनन्तरभावी यः स्त्निग्धोऽनुरणनात्मकः । सवरो रजजयति श्रोतृचित्तं स सर उच्यते ॥" इति। चार श्रुतियं षड्जकी हैं तीन ऋषभक्ी हैं यह गगना शुद्ध सवरोंके आश्रयसे है, यथा चतुर्थ श्रुतिपर षडज होनेसे षड्ज की चार श्रुतियें कहातीहैं, षड्जसे आगे तीसरी श्रुतिपर शुद्ध ऋषभ होने से ऋषभक्री तीन श्रुतियें कहातीहैं इत्यादि। तीव्र कोमल स्वरोंको मिलालेनेसे यह व्यवस्था हो नहीं सकती। वस्तुगत्या बाईस श्रुतियोंके बाईस ही स्वर हैं किन्तु बाईसकी संख्या अधिक होनेसे तथा बाईस नाम कंठ करनेमें श्रमाधिक्य होनेसे उन बाईस श्रुतियोंमेंसे अधिकानुरंजक सात श्रुतियोंपर सात स्वर स्थिर करदिये। फिर उनके कोमल तीव्रादि भेद करदिये इसमें लाघव है क्योंकि नौ ही शब्दोंसे ऐसे काम चलसकताहै। चाहें तो एक ही स्वर के उत्तरोत्तर तीव्र बाईस भेद मानसकतेहैं कहा भी है "सिद्धस्य गतिश्चिन्तनीया।" इति।

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१४ संगीतसुदर्शन-

रागापेत्षया सवरोंके चार प्रकार कहेहैं-संवादी वांदी अनुवादी और विवादी। जिन दो खरोंके बीच आठ वा बारह श्रुतियोंका अंतर पड़ता हो वे दोनों सवर परस्परमें संवादी कहाते हैं यथा षडूज और मध्यम के बीच आठ श्रुतिहैं तथा मध्यम और षड्जके बीच बारह श्रुति हैं इसलिए षड्ज मध्यम परस्परमें संवादी हैं, एवं षड्ज और पंचमके बीच बारह श्रुति हैं तथा पंचम और षड्जके बीच आठ श्रुति हैं इससे षड्ज पंचम भी परस्पर संवादी हैं, इसी कारए षड्जमध्यम और षड्जपंचमको मिलाना कुछ सहज है। एवं ऋषभ और धैवत गंधार और निषाद ये भी उक्त व्यवस्थाके कारय परस्परमें संवादी हैं। जिस रागमें जो स्वर प्रधान हो वह सर उस रागका राजा के तुल्य होनेसे वादी कहाताहै यथा मालकौसमें मध्यम, वादी से नीचे दरजेका सवर उस रागमें वादीखवरका अमात्य (वज़ीर) तुल्य होनेसे संवादी कहाताहै यथा मालकौसमें गंधार। जिस रागमें जो स्वर वर्जित होताहै वह स्वर उस रागका शत्रुतुल्य होनेसे विवादी कहाताहै तथा मालकौसमें ऋषभ और पंचम, शेष स्वर वादी और संवादी खरके भृत्यतुल्य होनेसे अनुवादी कहाते हैं, कहा भी है- "चतुर्विधाः खराः वादी संवादी च विवाद्यपि। अनुवादी च, वादी तु प्रयोगे बहुलः खरः॥ श्रुतयोSष्टौ द्वादश वा ययोरन्तरगोचराः । मिथः संवादिनौ तै स्तःसपौ स्यातां पसौ तथा।। (मसौ रिधा गनी ज्ञेयावेवं संवादिना मिथ्र:)

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स्वराध्याय। १५

विवादी विपरीतत्वाद्धीरैरुक्तो रिपृपमः । शेषाखामनुवादित्वम्, वादी राजात्र गीयते।।

नृपामात्यानुसारित्वादनुवादी तु भृत्यवत् ॥" इति। जो ध्रुवपद वा ख्यालादि रूपसे पद (छंद कविता) गाया जाता है यथा "वरन वरनके पहिरे चीर यमुनाके तीर गोविंद ग्वाल लिए संग भीर" इत्यादि तदपेक्षया खरोंके छः प्रकार कहे हैं-ह अंश न्यास अपन्यास संन्यास और विन्यास, जिस खरसे उक्त-पद (चीज़) के गानेका आरंभ होताहै वह खर ग्रह स्वर कहाता है। जिस सवरका उक्त पदमें विशेष प्रयोग हो वह अ्रंश स्वर कहाताहै। उस पदकी (भोगकी) समाप्तिमें जो खर नियत कियागयाहो वह न्यास स्वर कहाताहै। एक पदके कई पाद होतेहैं सो प्रथम अंतिम पादातिरिक्त पादोंकी (अंतरोंकी) समाप्तिमें जो स्वर नियत कियागयाहो वह अपन्यास स्वर कहाताहै। अंशका अविवादी हो और पदके प्रथमपादकी (अस्ताईकी) समाप्तिमें जो सर नियत कियागयाहो वह संन्यास स्वर कहाताहै। पदके पादोंके भी अनेक भाग रहतेहैं सो अंशका अविवादी होकर जो पादके किसी अवांतर भागके अंतमें नियत कियागया हो वह स्वर विन्यास स्वर कहाताहै। कहाहै- गीतादिनिहितस्त्त्र स्वरो ग्रह इतीरितः। रागश्च यस्मिन् वसति यस्माच्चैव प्रवर्तते। अनुवृत्तश्च यश्चेह सोंश: स्याद् दशलचयः । गीते समाप्तिक्न्न्यास एकविंशतिधा च सः ॥

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१६ संगीतसुदर्शन-

अपन्यास: स्वर: स स्याद् यो विदारी समापकः । अंशा 5विवादी गीतस्याSSद्यविदारीसमाप्तिकृत्-।। संन्यासों, Sशाविवाद्य व विन्यासः सः तु कथ्यते-। यो विदारीभागरूपपदप्रान्ते5वतिष्ठते ॥" इति। इस स्थलपर संगीतरत्नाकरकारने कुछ और भी भेद लिखे हैं, किंतु उनका आधुनिक संगीतसमाजमें प्रचार ने होनेसे वे यहाँ नहीं लिखे, इतनी ज्यादा जिसकी जिज्ञासा हो उसे संगीत- रत्नाकरादि ग्रंथ देखनेचाहिएँ। श्रुतियों पर शुद्ध स्वरोंकी स्थापनाके तीन भेद होनेसे षड ज- ग्राम मध्यमग्राम और गांधारग्राम ये तीन ग्राम शास्त्रोंमें कहे हैं। मूर्छना प्रभृतिके आश्रयभूत स्वरसमुदायको यहाँ आ्राम कहतेहैं। यदि बाईस श्रुतियोंमेंसे छदोवतीपर षड्जको, रतिकापर ऋषभको, क्रोधापर गंधारको, मार्जनीपर मध्यमको, आलापिनीपर पंचमको, रम्यापर धैवतको, और चोभिसीपर निषादको सिथिर कियाजाय तो यह पड्जग्राम कहाता। यदि और छः स्वरोंको इसीप्रकार स्थिर करके केवल पंचमको संदीपिनी श्रुतिपर स्थिर कियाजाय तो मध्यमग्राम बनजायगा। षड जग्राममें पंचम की चार श्रुति होतीहैं, और धैवतकी तीन, मध्यमग्राममें पंचम की तीन श्रुति होतीहैं और धैवतकी चार, पीछे लिखा श्रुतिस्वरकोष्ठ देखिये सब स्पष्ट हो जायगा। कहा है- "आमः स्वरसमूहः स्यान्मूर्छनादेः समाश्रयः । तौ द्रौ धरातले तत्र स्यात् षड्जग्राम आदिमः॥ द्वितीयो मध्यमग्रामस्तयोर्लचसमुच्यते।

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षडजग्राम: पश्चमे वचतुर्थश्रुतिसंस्थिते। स्वोपान्त्यश्रुतिसंस्थे Sस्मिन्मध्यमग्राम इष्यते ॥" इति। (स्वस्य पंचस्यान्त्या श्रुतिरालापिनी तत्समीपे वर्तमाना श्रुतिः स्वोपान्त्या सा च संदीपिनी तस्यां पश्चमे स्थिते सति मध्यमग्राम इष्यते इत्यन्वयः)। यदि बाईस श्रुतियोंमेंसे छंदोवतीपर षड्जको, रंजनीपर ऋषभ को, वज्तिकापर गंधारको, मार्जनीपर मध्यमको, संदीपिनीपर पंचमको, रोहिणीपर धैवतको, तीव्रापर निषादको स्थिर किया- जाय तो संगीतरत्नाकरके मतसे गान्धारग्राम होताहै, कहा भी है- "रिमयो: श्रुतिमेकैकां गान्धारश्चेत्समाश्रितः । पश्रुतिं धो निषादस्तु धश्रुति सश्रुतिं श्रितः (गृह्णाति) ॥ गान्धारग्राममाचष्टे तदा तं नारदो मुनिः । प्रवर्तते स्वर्गलोके ग्रामोऽसौ न महीतले ॥" इति। इसप्रकार शुद्ध स्वरोंकी स्थापनाको प्राधान्येन लिखनेसे यह प्रतीत होताहै कि अत्यन्त प्राचीनकालमें गानेबजामेमें शुंद्ध स्वरोंका ही विशेष प्राधान्य था उसके अनंतर खवरों के तीव्र कोमल भेद हुए क्यों कि शुद्ध स्वरोंकी अपेक्षा तीव्र कोमल स्वर अधिक अनुरंजक प्रतीत होतेहैं इसी कारय अनंतरकालमें तीव्र कोमल स्वरं का ही प्राधान्य होोगया, इस परिवर्तनका कारय कालही है, कालके प्रभावसे सभी पदार्थों का परिवर्तन होता रहता है इ सीसे देखते देखते संगीतपरिपाठी बहुतकुछ बदलगई। और आरी भकालमें सभी पदार्थ परिष्कारहीन होतेहैं अंतमें भी परिप कारहीन होजाते हैं मध्यमें ही परिष्कृत होतेहैं।

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१८ संगीतसुदर्शन-

(श्रुतिस्वरग्रामचक्र )

सर्वमतसे गांधारग्राम पडजग्राम श्रुति संख्या श्रुतिनाम के शुद्ध स्वर के शुद्ध स्वर के शुद्ध स्वर मध्यमग्राम के शुद्ध स्वर के शुद्ध स्वर पारिजातमत पारिजातमत रत्नाकर मतसे से मध्यमग्राम रस्नाकर मतसे से गांधारग्राम ४ छंदोवती स स स 4 स स

दयावती

६ रंजनी रि

रतिका रि रि रि रि 6

रौद्री

क्रोधा ग ग ग

१० वजिका ग ग

प्रसारियी

१२ प्रीति

१३ मार्जनी म म म म म

१४ च्विति

१₹ रका

१६ संदीपिनी प प a

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खवराध्याय। १६

के शुद्ध स्वर मध्यमग्राम के शुद्ध स्वर सर्वमतसे के शुद्धस्वर पारिजातमत षडजग्राम के शुद्ध स्वर श्रतिनाम गांधारग्राम पारिजातमत के शुद्ध स्वर से गांधारग्राम से मध्यमग्राम श्रुतिसंख्या रत्नाकर मतसे रत्नाकर मतसे

१७ आलापिनी A

१८ मदंती

रोहिणी ध ध

२० रम्या ध ध ध

२१ उग्रा

२२ चोमिणी नि नि

तीव्रा नि नि नि

२ कुमुद्दती

३ मंदा

इंदोवती स स स स स

(संसकृत के संगीत-्रंथोंमेंसे आजकल संगीतपारिजात और संगीतरत्नाकर ये ही दो ग्रथ प्रायः मिलतेहैं इन दोनों अंथोंमें षड अग्राम तो एक सा ही है मध्यमग्राम और गंधारत्रासमें परस्पर कुछ भेद है सेो इस नकशे में स्पष्ट है।) आाजकल लोकमें कौनसा ग्राम प्रचलित है इसमें यद्यपि कोई भी स्पष्ट प्रमाय नहीं तथापि लोकमें जो आम प्रचलित है उसमें

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२० संगीतसुदर्शन- षड्जके मध्यम और पंचम संवादी हैं क्योंकि षड्जसे मध्यम तथा पंचमके तारको मिलालेतेहैं, शास्त्रमें षड्जग्राममें ही षड्जका पंचम संवादी है, मध्यमग्राम और गंधारग्राममें नहा क्योंकि इन दोनों आ्रामोंमें पंचम संदीपिनीपर रहनेसे षड्ज और पंचमके बीच ग्यारह श्रुति पड़ती हैं, और वे स्वर परस्परमें संवादी होतेहैं जिनके बीच आठ वा बारह श्रुतियोंका अंतर हो यथा तीनों ही ग्रामोंमें षड्ज- मध्यम, षड्जग्राममें तो पंचम आलापिनी पर होनेसे षड्ज और पंचमके बीच बारह श्रुतियों का अंतर होनेसे षडुज पंचम परस्पर संवादी हैं लोकमें भी संवादी हैं इससे सिद्ध होताहै कि लोकमें षड्जग्राम ही प्रचलित है। और सितारपर श्रुतियोंकी स्थापना करक भी देखाहै कि पंचम आलापिनीपर आता है, आप भी सितारादिए वाद्यपर श्रुतियों की स्थापना करके देखसकतेहैं, इस परीक्षाके समय इतना ध्यान कर लेना कि वीणादि वाद्योंके दंडमें यह एक वैलक्षण्य है कि ज्यों ज्यों नीचेको जाओ त्यों त्यों श्रुति स्वरोंका अंतरस्थान छोटा होता जाता है यथा षड्ज ऋषभका तीनों ही सप्तकोंमें एकसमान अंतर है किन्तु वीकादिदंडमें द्वितीय सप्तकके षड्ज- ऋषभके सार पड़दाप्रभृति स्थानोंमें जितना अंतर होताहै तदपेक्षया तृतीयसप्तकके षड्जऋषभके सार पड़दा प्रभृति स्थानोंमें बहुत कम अतर होता है, एवं और सवरोंपर भी यह नियम सर्व स्पष्ट है। इसका कारण यही है कि तार जितना ही छोटा होगा उतना ही समीप समीपमें स्वरोंको प्रकट करेगा। इसी कारएसे छोटे वादमें बड़े वाधके सवरस्थानोंकासा अंतर नहीं होता, इससे २२ श्रुतियोंको

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भी स्थिर करनेके समय उत्तरोत्तर अंतर कम रखना यथा- एवं वीखादि दंडपर २२ श्रुतियें स्थिर करने से आलापिनीपर ही पंचम आता है इस से षड्जग्रामका ही प्रचार कहाजासकताहै। और तीनों ग्रामोंमेंसे षडजग्राम ही प्रधान है इससे भी षड्जग्रामका ही प्रचार सिद्ध होताहै कहा भी है-"षड्जग्रामस्त्िषूत्तम" "उभयोर्ग्रमयोर्मध्ये मुख्यत्वं कस्य गण्यते? षड्जस्यैव हि मुख्यत्वं गण्यते वचनान्मुनेः ॥" इति। षड्जादि तीन आ्राम कहातेहैं ऋषभादि ग्रम नहीं कहाते इसका कारग विशेषरूपसे कुछ ज्ञात नहीं होता। शास्त्रकारोंने तो यही कहा है कि षड्ज गंधार और मध्यम ये स्वर प्रधान होने से इनके नामसे षड्जादि ग्राम कहातेहैं। संगीतपारिजातसे यह भी प्रतीत होताहै कि षड जग्रामका तार षड्जमें मध्यमग्रामका तार मध्यममें और गंधारग्रामका तार गंधारखरमें मिलाना चाहिए। यद्यपि वीकामें एक तार गंधारमें भी मिलायाजाताहै तथापि वह गंधारग्राम नहीं कहासकता क्योंकि उस तार से भी षड्जग्रामके ही स्वर निकलतेहैं। क्रमसे सात ही ख़रोंके आरोहावरोहको मूर्छना कहतेहैं यथा 'सा रेग म प ध नि-निधप मगरेसा', सात ही खर होनेसे प्रत्येक ग्राममें सात सात मूर्छना कही हैं। उनमेंसे षड्ज ग्रामकी मूर्छनाओंके उत्तरमंद्रा रजनी उत्तरायता शुद्धषड्जा मत्सरी- कृता अश्वक्रांता अभिरुद्गता-ये सात ही नाम हैं। मध्यमग्रामकी

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२२ संगीतसुदर्शन-

मूर्दनाओंके 'सौवीरी हरिणाश्वा कलोपनता शुद्धमध्या मार्गी पौरवी हृष्यका' य नाम हैं। कहा भी है- "आरोहेषावरोहेष क्रमेग स्वरसप्तकम्। मूर्धनाशब्दवाच्यं हि विज्ञेयं तद्विचक्यैः ॥" "कमात् स्वरायां सप्तानामारोहश्चावरोहयम्। मूर्छनेत्युच्यते ग्रामद्ूये ताः सप्त सप्त च।। षडूजे तूत्तरमन्द्रादौ रजनी चोत्तरायता। शुद्धषड्जा मत्सरीकृद Sश्वकान्ताSभिरुद्गता।। मध्यमे स्यात्तु सौवीरी हरिखाश्वा ततः परम्। स्यात् कलोपनता शुद्धमध्या मार्गी च पौरवी॥ हृष्यकेत्यथ तासां तु लक्षएं प्रतिपाद्यते। मध्यस्थानस्थषड्जेन मृछनाSरभ्यतेग्रिमा। अधस्तनैर्निषादाद : षडन्या मूर्छना: क्मात्। मध्यमध्यममारभ्य सौवीरी मूछना भवेत्।। षडन्यास्तदधोधस्स्थस्वरानारभ्य तु क्रमात्।" इति। षड जग्राममें द्वितीय सप्तकके षड जसे प्रथमसूर्छनाका आरंभ करना, द्वितीयमूर्छनाका प्रथमसप्तकके निषादसे तृतीयमूर्छनाका प्रथमसप्तकके धैवतसे आरंभ करना ऐसे ही आगे भी जानना। यदि द्वितीयमूर्छनाका द्वितीयसप्तकके ऋषभसे तृतीयमूर्दनाका द्वितीय- सप्तकके गंधारसे इसक्रमसे मूर्छनाओंका आरंभ करें तो सप्तमी- मूर्छनामें द्वितीयसप्तकके निषादसे तृतीयसप्तकके धैवततक जाना- चाहिए तृतीयसप्तकके धैवततक कंठसे पहुँचना कठिनहै और वीया प्रभृतिवाद्योंमें तो तृतीयसप्तकके धैवतका स्थान ही नहीं होता इसी

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स्वराध्याय।

कारख से प्रतीत होताहै कि द्वितीयादिमूर्छनाका प्रथमसप्तकक निषादादि खरसे आरंभ कहाहै। इस कमसे मूर्छनाओंके आरंभ से प्रथम और द्वितीय सप्तक के सभी स्र सातों मूर्छनाओंमें आाजायँगे प्रथम सप्तकका षड्जमात्र छूटेगा। षड्जग्राममूर्छनाओंके स्वरूप यथा-

(१) सा रेग म प ध नि-नि ध प.म, ग रेसा-इति उत्तरमंद्रा, (२) निं सा रेग म प ध-ध प म ग रेसा निं-इति रजनी,. (३) धं निं सा रेग म प-प म ग रे सा निं घं-इति उत्तरायता, (8) पं धं निं मा रेग म-म ग रे सा निं घं पं-इति शुद्धषड्जा, (v) मं पंधं निंसा रेग-ग रे सा निं धंपं मं-इति मत्सरीकृता, (६) गं मं प धं निं सा रे-रे सा निं धं पं मं गं-इति अश्वक्रांता, (७) रे गं म प धं निंसा-सानिं धंप म गरे-इति अभिरुद्गता, मध्यमग्राममें मध्यसप्तकके मध्यमसे प्रथममूछनाका आरंभ करना यह मूर्छना ततीयसप्तकके गंधारतक जाकर लौटेगी, द्विती- यमूर्छनाका द्वितीयसप्तकके गंधारसे आरंभ करना एवं आ्रगे भी जानना। मध्यमग्रामकी मूर्छनाएँ यथा- (१) म प ध नि सा रेग-ग रेसा नि ध प म-इति सौवारी, (२) ग म प ध निसा रे-रे सा नि ध प म ग-इति हरिाश्वा, (३) रेग म प धं नि सा-सा नि ध पमग रे-इति कले।पनता, (४) सा रेग म प ध नि-विध प म ग रेसा-इति शुद्धमध्या, (१) नि सा रेग म प ध-ध प म ग रेसा नि-इति मार्गी, (६) घं नि सा रेग म पं-प म ग रे सा नि घं-इति पौस्त्री, (७) प' घं वि सा रेग म-म ग रेसा नि धं प-इति हृष्यका (यहाँपर जिन स्वरों परअनुस्वारसा चिह्न है उनको प्रथमसप्तक के

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स्वराध्याय। २५

गांधारग्रामकी तो "नन्दा विशाला सुमुखी चित्रा चित्रावती सुखा। आलापा चेति गान्धारग्रामे स्युःसप्त मूर्छना:।।" ये सात मूर्छनाँ कहीहैं। यद्यपि इनके विशेष रूप नहीं कहे तथापि पूर्वरीतिसे प्रतीत होता है कि मध्यमगंधारसे इनका आर्रारंभ करना चाहिए। यथा-

(१) ग म प ध नि सा रे-रे सा नि ध प म ग इति नंदा, (२) रेग म प ध नि सा-सा नि ध प म ग रे इति विशाला, (३) सा रेग म प ध नि-निध प म ग रेसा इति सुमुखी, (४) निं सा रेग म प ध-घ प म ग रेसा निं इति चित्रा, (४) धं निं सा रेग म प-प म ग रेसा निं धं इति चित्रावती, (६) पं ध निं सा रेग म-म ग रे सा निं धं पं इति सुखा, (७) मं पं धं निं सा रे ग-ग रे सा निं धं पं मं इति आलापा, इन मूर्छनाओंका बहुतसा प्रस्तार लिखाहै यथा छप्पनप्रकार की मूर्छनाओंमेंसे प्रत्येक मूछना सात सात प्रकारकी होजाती है वह प्रस्तार जानना हो तो शास्त्र देखो यहाँ विस्तर भयसे नहीं लिखा। यदि मूर्छना छः या पांच स्वरकी हो तो उसे तान कहतेहैं। यथा-"ताना: स्युर्मूर्छनाः शुद्धाः षाडवौडुवतीकृताः।" इति मतंगने कहाहै कि "ननु मूर्छनातानयोः को भेदः? बम :- आरोहावरोहक्रमयुक्तः खरसमुदायो मूर्छनेत्युच्यते। तानस्त्वाSS रोहक्रमेय भव्रति।" इति, इससे यह प्रतीतहोता है कि जैसे प्रथममूर्छनाका षड्जसे द्वितीयमूर्छनाका निषादसे आरंभकरना- ७

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२६ संगीतसुदर्शन- तथा च अवरोहक्रम से प्रस्तार हुआ; वैसे तानका प्रस्तार नहीं करना; किन्तु आरोहक्रम से यानी प्रथम तान षड्जसे द्वितीय तान ऋषभसे, इस क्रमसे प्रस्तार करना, और शडुव षाउव मूर्छनाओं का ही तान कहाहै इससे सा रेगमपध-ध प म ग रेसा, रेगमपधनी-नीध प म ग रे, गम प ध नी सा-सा नी ध प म ग' इस कमसे षाडव तानें होनी चाहिएँ। तथा 'सा रे म पध-ध प मरेसा, रेगम ध नी-नी ध म ग रे, गम ध नी सा-सानीधमग' इस क्रम से शडुव तानें होनी चाहिएँ, ऐसा ग्रन्थकारों का अभिप्राय प्रतीत होताहै, आज कल्ह तो स्वरसमुदायको तान कहतेहैं, उसमें भी स्वरोंका कुछ नियम नहीं, हॉ रागविरुद्ध स्वर नहीं होता। षाडवतानोंमें यथेच्छ एक स्वरका और शडुवतानोंमे यथेच्छ दो स्वरोंका लोप होसकताहै अथापि भरतादिआचार्यों ने नियम करदियाहै कि षड्जग्रामकी षाडवतानोंमें षड्ज ऋषभ पंचम और निषाद इन्हीमेंसे एक स्वरका लोप होसकता है औरका नहीं तथा षड्जग्रामकी शडुव तानोंमें षड ज पंचम, संधार निषाद, ऋषभ पंचम इन्हीं दो दो खरोंका लोप होसकता है शरोंका नहीं, कहा है- "षडजगाः सप्त हीनाश्चेत् क्रमात् सरिपसप्तमैः । तदाऽष्टाविंशतिस्तानाः मध्यमे सरिगोज्भिताः ॥ सप्त क्रमाद् यदा ताना: स्युस्तदा त्वेकविंशतिः। एते चैकोनपश्चाशदुभये षाडवा मताः ॥ सपाभ्यां द्विश्रुतिभ्यां च रिपाभ्यां सप्त वर्जिताः।

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स्वराध्याय। २७

षड्जग्रामे पृथक् ताना एकविंशतिरौडुवाः ॥ रिधाभ्यां द्विश्रुतिभ्यां च मध्यमग्रामगास्तु ते। हीनाश्चदुर्दशैव स्युः पश्चत्रिंशत्तु ते युवाः॥ सर्वे चतुरशीतिः स्युर्मिलिता: षाडवौडुवाः ॥" इति। यथा पाँच वा छः खरोंकी मूर्छनाको तान कहतेहैं तथा क्रमरहित सूर्छनाको कूटतान कहतेहैं कहा भी है-"अवरोहे सत्यामपिविपरीतानुपूर्व्यां क्रमत्वाभावने कूटतानत्वमेव। कूटत्वं नाम व्युत्क्रमोच्चारितस्वरत्वम्।" "असंपूर्णाश्च संपूर्णा व्युत्कमोच्चरितस्वराः । मूछना: कूटताना: स्युः ॥" इति। इनकूटतानोंका प्रस्तार करनेसे लक्षावधि संख्या होजातीहै प्रत्यक संपूर्णमूर्छनाकी पाँच पाँच हज़ार चालीस कूटतानें कहीहैं- "पूर्णाः पश्च सहस्रागि चत्वारिंशद्युतानि च। एकैकस्यां मूर्छनायां कूटताना: सहक्रमैः ॥" एवं षाडव शडुवादि कूटतानोंकी भी भारी संख्या जाननी यहाँ लिखनी विशेष सार्थक नहीं इससे सब संख्या नहीं लिखी। एक सवरके प्रयोगको आर्चिक कहतेहैं, दासवरोंके प्रयोगको गाथिक, तीन सवरोंके प्रयोगको सामिक, चारस्वरोंके प्रयोगको स्वरांतर, पाँचसवरोंके प्रयोगको शडुव, छःखरोंके प्रयोगको षाडव, सातस्वरोंके प्रयोगको संपूर् कहतेहैं ये संज्ञा हैं, कहा है- · "आर्चिको गाथिकश्चैव सामिकश्च स्वरान्तरः । औडुवः षाडवश्चैव संपूर्णश्चेति सप्तमः॥

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२८ संगीतसुदर्शन-

एकस्वरप्रयोगो हि आर्चिकस्त्वभिधीयते। गाथिको द्विस्वरो ज्ञेयस्तिस्वरश्चैव सामिकः ॥ चतुःस्वरप्रयोगो हि स्वरान्तरक उच्यते। शडुवः पश्वभिश्चैव षाडवः षट्स्वरो भवेत्॥ संपूर्ण: सप्तभिश्चैव विज्ञेयो गीतयेोक्कतृभिः ॥" इति। संगीतशास्त्रवाले गानक्रियाको-खवरोच्चारयको वर्ष कहतेहैं। उसके चार प्रकार हैं-स्थायी आरोही अवरोही और संचारी, एक स्वरके निरंतर अनेकवार प्रयोगको 'स्थायी' कहतेहैं यथा-'सा सा सा' 'मममम' इत्यादि, आरोहयको 'आरोही' कहतेहैं यंथा-'सारेगम प ध नि' इत्यादि, अवरोहएको अवरोही कहतेहैं यथा-'नि ध प म ग रे सा' इत्यादि, इन तीनोंका यदि संकर हो तो उसे 'संचारी' कहतेहैं यथा-'सा सासा नि मम रेसामपपधपमगम षपध निनिध पम म प ध प ध नि ध नि सा' इत्यादि। कहा भी है- "गानक्रियोच्यते वर्षः स चतुर्धा निरूपितः । स्थाय्या SSरोह्य Sवरोही च संचारीत्यथ लक्षगम्- स्थित्वा स्थित्वा प्रयोग: स्यादेकैकस्यैव स्वरस्य यः । स्थायी वर्षः स विज्ञेयः, परावन्वर्थनामकौ। एतत्सांमिश्रणादवर्य: संचारी परिकीर्तितः ॥" इति। जिसको आजकल्हके सांगीतिक फिकरा कहतेहैं उसको शास्त्र- कार अलंकार कहतेहैं उनके बहुतसे भेद हैं, कहा है- "विशिष्टवर्णसंदर्भमलद्कारं प्रचक्षते।, वस्य भेदा बहुविधाः ॥" इति।

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खराध्याय। २६

यहाँ वर्स पदसे गानक्रियाका ग्रहय करना। यथा-सारेग रेगम मपध धनिसा, सानिध निधप पमग गरेसा १, सासा रेरे गग मम पप धध निनि सा २, सारेगमप गमपधनि मपधनिसा ३, सारे गरेसा गम गरेसा पधनि पमगरेसा ४, सासा गग रेरे मम गग पप मम धध पप नीनी धध सा ५, सारेसा पमगरेसा सानिधपमगरेसा ६, सानीसा गम पम गरेसा नी पमगरेसा ७, सासा नि गग रेसा धध पप मम रेगरेसा ८, सानीध पधनीसा नीसा ग गरेसा धपमग नीधपम पमगरे गमप मपधनि पमगरे पप नीनी धध मम रेरे गरेसा ई, सानीधपम गमपधनी गग मम पप सा रेसा गगरेसा गमप सासा रे सानीधप सानिधपम धधनी रेरे सा गरेसा सारेगम पमगरेसा धप धप मप पम पम पधनी पमगरेसा गम गरेसा गम पम धमगरेसा नी धपमगरेसा १०, इत्यादि। इन समग्र अलङ्कारोंका लिखना अशक्य है। अलंकारकल्पनाके समय इतना ध्यान अवश्य चाहिए कि अलंकारकी कल्पना उत्तम हो, गंभीर (वज़नी) हो और राग के अनुकूल हो, रागमें जो स्वर छूटताहो उसके अलंकारमें भी वह स्वर नही लगता, गानेबजाने- वालेको रागके स्वरूपपर खूब ही ध्यान रखनाचाहिए। यथा कंठका माधुर्य विशेषकर परमेश्वरके अरधीन है तथा हस्तका माधुर्य भी विशेषकर परमेश्वरके ही अधीन है, तो भी जैसे गला खटाई प्रभृति कुछ पदार्थों से बिगड़जाताहै और मलाईप्रभृति पदार्थों से सुधरताहै वैसे हस्त भी मुद्ररफेरनाप्रभृति व्यायाम (कसरत) से बिगड़जाताहै और तैलादि मलकर गरमजलसे धोनेसे कुछ सुधर भी जाताहै।

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३० संगीतसुदर्शन- गानक्रियाकी षाड्जी आर्षभी गान्धारी मध्यमा पंचमी धैवती और नैषादी ये सात शुद्ध जाति कही हैं। पूर्वमे लिखदियाहै कि गीतारंभकस्वरको ग्रह कहतेहैं, गीतव्यापकस्वरको अरंश कहतेहैं अंतरेकी समाप्तिमे जो स्वर होताहै उसे उपन्यास कहतेहैं, गीतकी समाप्तिमें जो स्वर होताहै उसे न्यास कहतेहैं। जिस गानक्रियामे षड्ज ही ग्रह अंश न्याम तथा अपन्यास हो उस गानक्रियाकी षड्जके प्राधान्यसे षाड्जी जाति जाननी, अर्थात् जिस गानका आरंभ भी षड जसे हो समाप्ति भी षड्जसे हो उसके अवांतरखंडोंकी समाप्ति भी षड जसे हो और उसमें षड जका प्रयोगभी अधिकहो उस गानकी षाड जी जाति जाननी, और इन सात ही शुद्ध जातियोंमें न्यास (गीतसमापक) स्वर तृतीयसप्तकका न होनाचाहिए। एवं जिस गानमें ग्रह अंश न्यास तथा अपन्यास ऋषभ हो उसकी आर्षभी जाति जाननी। जिस गानमें ग्रह अंश न्यास अपन्यास गंधार हो उसकी जाति गांधारी जाननी। जिस गानमें ग्रह अंश न्यास अपन्यास मध्यम स्वर हो उसकी मध्यमा जाति जाननी। जिस गानमें ग्रह अंश न्यास अपन्यास पंचम हो उसकी पश्चमी जाति जाननी। जिस गानमें ग्रह अंश न्यास अपन्यास धैवत हो उसकी धैवती जाति जाननी। जिस गानमें ग्रह अ्रंश न्यास अपन्यास निषाद हो उसकी नैषादी जाति जाननी। कहा भी है- "शुद्धाः स्युर्जातयः सप्न ताः षड जादिस्वराभिधाः । षाड ज्यार्षभी च गान्धारी मध्यमा पश्चमी तथा। धैवती चाथ नैषादी, शुद्धतालक्ष्म कथ्यते-॥१॥

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स्वराध्याय। ३१

यासां नामस्रो न्यासे5पन्यासोंडशेग्रहस्तथा। तारन्यासविहीनास्ता: पूर्णाः शुद्धाभिधा मताः ॥२॥ एवं ग्यारह विकृत जाति कहीहैं यथा- १ षाड्जी और गांधारी जातिके संकरसे षड्जकैशिकी जाति होती है इसमें गंधार न्यास स्वर होताहै और षड्ज निषाद पंचम अरपन्यास स्वर होतेहैं और षड्ज ग्रह षड्ज गंधार पंचम ये अरंश होते हैं। २ षाड्जी और मध्यमा जातिके संयोगसे षड्जमध्यमा जाति होतीहै इसमें षड्ज वा मध्यम न्यास और सातों ही स्वर अपन्यास होसकतेहैं; और मध्यम ग्रह सातों ही खर अंश हो सकतेहैं। ३ गान्धारी तथा पंचमी जातिके योगसे गांधारपंचमी जाति होतीहै इसमें गंधार न्यास और ऋषभपंचम अपन्यास होतेहैं पंचम ही ग्रह तथा अंश होताहै। ४ गांधारी और आर्षभी इन दोके संयोगसे 'आंध्री' जाति होती है इसमें गंधार न्यास और ऋषभ गंधार पंचम और निषाद ये अपन्यास होसकतेहैं, गंधार ग्रह ऋषभ गंधार पंचम निषाद ये अंश होतेहैं। ५ षाडजी गांधारी धैवती इनके योगसे षड्जोदीच्यवा जाति होतीहै इसमें मध्यम न्यास और षडूज वा धैवत अपन्यास जानने, षड्ज ग्रह षड्ज मध्यम धैवत निषाद ये अंश होतेहैं। ६ नैषादी पंचमी आर्षभी इनके संकरसे कार्मारवी जाति

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३२ संगीतसुदर्शन- होतीहै इसमें पंचम न्यास और ऋषभ पंचम धैवत निषाद ये अप- न्यास होतेहैं, ऋषभ ग्रह ऋषभ धैवत निषाद ये अ्रंश होतेहैं। ७गांधारी पंचमी आरर्षभी इनके संयोगसे नंदयंती जाति होतीहै इसमें गंधार न्यास और मध्यम अपन्यास होताहै, गंधार ग्रह और पंचम अंश होताहै। ८ गांधारी धैवती षाड्जी मध्यमा इनके संकरसे गांधारो- दीच्यवा जाति होतीहै इसमे मध्यम न्यास षड्ज वा धैवत अप- न्यास होताहै, षड ज ग्रह षड ज और मध्यम अंश होतेहैं। ्गांधारी धैवती मध्यमा पंचमी इनके योगसे मध्यमोदीच्यवा जाति होतीहै इसमें मध्यम न्यास षड्ज धैवत अपन्यास जानने, भध्यम ग्रह और पंचम अ्रंश होताहै। १० गांधारी नैषादी मध्यमा पंचमी इनके योगसे रक्तगांधारी जाति होतीहै इसमे गंधार न्यास और मध्यम अपन्यास होता है, पंचम ग्रह षड्ज गंधार मध्यम पंचम निषाद ये पॉच स्वर अंश होतेहैं। ११ षाड जी गांधारी मध्यमा पंचमी इनके योगसे कैशिकी जाति होतीहै इसमें गंधार वा पंचम वा निषाद न्यास होता है ऋषभके भिन्न सभी स्वर अपन्यास तथा अंश होसकतेहैं। वणेंसे अलंकारोंसे पदोंसे तथा लयसे विशिष्ट गानक्रिया को गीति कहतेहैं। वर्ष स्थायी आरोही अवरोही संचारी ये चार प्रथम कहेहैं, तलंकार=फिकरे, पद यथा-"वरन वरन के पहिरे चीर" "तव विरहे सा दीना" इत्यादि। सुबंत तिङ तरूप, वीषादिवादन कालमें उस रागवादके बोल ही पद जानने। लेय द्रुत मध्य विलंबित तथा

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स्वराध्याय। ३३ मिश्रित यह चार प्रकारकी है। प्रथम "गानक्रियोच्यते वर्षः"ऐसा वर्शको भी गानक्रियारूप कहाहै सो वर्णरूप जो गानक्रिया है वह अवांतरभूत विशेषसरूप है अत एव वहाँ गानक्रियासे खरोच्चारग मात्रका ग्रहण करना और यह गीतिरूप गानक्रिया तो प्रधानभूत विशेष्यरूप है यही वर्सका और गीतिका भेद है। यथा पाकक्रिया प्रधान होनेसे अग्निप्रज्वालनादि अवांतरक्रियासे विशिष्ट होतीहै तथा यहाँ खवरोच्चारणरूप अवांतरक्रियाभूत वर्णसे विशिष्ट गीतिरूप प्रधान गानक्रियाको जानना। इसगीतिके चार भेद कहेहैं मागधी अर्धमागधी संभाविता और पृथुला, कहा भी है- वर्षाद्यलङ कृता गानक्रिया पदलयान्विता। गीतिरित्युच्यते सा च बुधैरुक्ता चतुर्विधा॥ मागधी प्रथमा ज्ञेया द्वितीया चार्धमागधी। संभाविता च पृथुलेत्येतासां लक्ष्म चत्त्महे ।" इति। प्रथम लय विलंबित हो फिर मध्य हो फिर द्रुत हो इस लयक्रमसे जो गान है उसे मागधी गीति जानना। जो पद गाया है उसके आधे भागको फिर आगेके पदके साथ मिलाकर जो गाना है यथा 'रामचरय' इसको 'राम'-'मचरय' इस प्रकारसे गाना उसे अर्धमागधी गीति जानना, कि वा पदोंका दो दो बेर जो गानाहै उसे अर्धमागधी गीति जानना। जो पदोंके अक्षरोको पृथक् पृथक करके गाना है यथा-'रा म च रय' एवं रूपसे उसे संभाविता गीति जानना। इसी संभाविनागीतिके यदि सब अक्षर लघु ही हो तो उसे पृथुला गीति जानना। मैंने जो ये चारों गीतियोंके लक्षय लिखेहैं य यद्यपि प्राचीन-

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३४ संगीतसुदर्शन- ग्रंथकारोंके लक्षयोंसे कुछ विलत्तयहैं, तो भी बहुत विरुद्ध नहींहैं। और मैंने प्रचलित सांगीतिक व्यवहारका भी इनमें मिलान कर- दियाहै, शास्त्रीय शुद्धलक्षण तो प्रचलितसांगीतिक व्यवहारसे मेल नहीं खाते इससे वे वैसेके वैसे नहीं लिखे। आज कल्ह जो धुरपत ख़याल प्रभृति कई प्रकारकी गीति प्रच- लित है उसका सब हाल भूमिकामें लिघदियाहै वहॉँ देखो। सातों सवरों में से- षड ज का स्वभाव शांत है ।।१।। ऋृषभ का स्वभाव तीक्षण है इसकारय ऋषभसंयोगसे रागमें तीच््यता (चमक) होजातीहै। सारंगमें यह स्पष्ट प्रतीत होतीहै।२॥ गंधारका स्वभाव गंभीर होनेसे गंधारसंयोगसे रागमें गंभीरता आती है।३॥ उतरामध्यम भी शांत स्वभाव है॥४॥ यथा नीबूके रससे हरिद्राका रंग खिल जाताहै तथा पंचम संयोगसे रागका स्वरूप भी खिल जाताहै।५।। धैवत भी गंधारतुल्य गंभीरस्वभाव है।६।। निषादसंयोगसे रागमें सौकुमार्य और आतुरता व्यक्त होतेहैं॥७॥ उसपर भी स्वरोंके ये स्वभाव तीव्र होनेसे अरधिक व्यक्त होतेहैं और स्वानुभव मात्र गम्य हैं, यह स्वभावज्ञान कुछ बारीक़ है। इन स्वरोंकी जो 'सा रेग म प ध नी' ये संज्ञा पड़ी हैं उसमें भी बहुत संदेह हैं आद्यानरका ग्रहय कहा जाय तो या तो ध की

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· स्वराध्याय। ३५

जगा धै चाहिए किंवा नीकी जगह न चाहिए इत्यादि। मेरी जानमें उचारणसौकर्यकेलिए ही ऐसा हुआ है इसीलिए षड्जके षकी जगह सा और ऋषभके ऋकी जगह रे हो गया, इसी लिए आदि के सारे ये दो और अंतका नी ये दीर्घ स्वरांत कर लिए आगे राम जाने। सितारवाले स्वरसमुदाय को ठाठ भी कहते हैं इस ठाठपदसे स्वरोंका निर्देश करनेमें बड़ा सुबीता (सक्षेप) होता है। ये ठाठ अनेक प्रकारके हैं यथा- १ यदि सभी स्वर उतरे हो तो उसे भैरवीका ठाठ कहते हैं। २ यदि सभी स्वर चढ़े ( तीव्र) हो तो उसे इमनका ठाठ कहतेहैं। ३ यदि ऋषभ मध्यम धैवत ये उतरे हो और गंधार तथा निषाद चढ़े हो तो उसे भैरवका ठाठ कहते हैं। षड ज और पंचम तो एकरूप ही रहते हैं उतरते चढ़ते नहीं यह प्रथम लिख दियाहै सो उतार चढ़ाव रिगमध नी इन्हीं पाँच सवरोंमें होताहै इसका स्मरख रहे। ४ यदि ऋषभ धैवत चढ़े हं, गंधार मध्यम निषाद ये उतरे हो तो उसे काफीका ठाठ कहतेहैं। ये ही चार ठाठ अताइयोंमें विशेष प्रसिद्ध हैं। ५ यदि ऋषभ धैवत उतरे हो और गंधार मध्यम निषाद ये चढ़े हो तो उसे पंचमका ठाठ कहतेहैं। ६ यदि ऋषभ गंधार और धैवत ये उतरे हो मध्यम निषाद ये चढ़े हो तो उसे टोड़ीका ठाठ कहतेहैं।

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३६' संगीतसुदर्शन-

७ यदि ऋषभ चढ़ा हो और सब स्वर उतरे हो तो उसे दरबारी का ठाठ कहतेहैं। ८ यदि ऋषभ उतरा हो और सब स्वर चढ़े हो तो उसे मारवे का ठाठ कहते हैं। ६ यदि मध्यम उतरा हो और सब स्वर चढ़े हो तो उसे अल्हैया वा बिलावलका ठाठ कहते हैं। १० यदि मध्यम और द्वितीय सप्कका निषाद उतरा हो, और स्वर चढ़ेहो तो उसे सारठका ठाठ कहते हैं। इत्यादि रूपसे अनेक ठाठ हैं। प्रस्तार करनेसे ३२ ठाठ सिद्ध होते हैं किं तु ३२ ठाठोंके राग उपलब्ध नहों होते इस लिए १५। १६ ही ठाठ काममें आते हैं। इन ठाठोंमेंसे सीखनेवालेको हस्ताभ्यासकेलिए भैरवका ठाठ सबसे अधिक हितकर है मेरी जानमें इसीलिए सबसे प्रथम कालंगड़ेकी गत सिखाई जातीहै। गाते बजाते दाँत सिकोड़ना. सर्वथा नेत्र मृं दना. भयभीत होना. कांपना. मुँहको भयानक फाड़ना. हाथ और कंठका क्रूर (कठोर) होना. श्र ति का उल्लंघन करना. गाना बजाना नीरस होना. शब्द व्यक्त न होना. सानुनासिक स्वरसे गाना इत्यादिक गानेबजाने वालेके पचीस दोष कहेहैं। यथा-

कराली विकल: काकी वितालकरभादूडाः । भोम्बकस्तुम्बकी वक्रो प्रसारी विनिमीलकः । विरसापखराव्यक्तस्थानभ्रष्टाव्यवस्थिताः ।।

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स्वराध्याय। ३७

मिश्रकोऽनवधानश्च तथाऽन्यः सानुनासिकः । पश्चविंशतिरित्येते गायना निन्दितामताः ॥" इति। कंठका वा हाथका शब्द उत्तम होना शरीर सुदर होना तानके तथा गान वादनके आरम्भ और समाप्ति करनेमें कुशल होना. हाथ वा कंठ वशमें होना इत्यादि गाने बजानेवालेके कुछ गु भी कहेहैं। यथा- "हृद्यशब्दः सुशारीरो ग्रहमोक्षविचक्तयः । रागरागाङ्गभाषाङ्गत्रियाङ्गोपाङ्गकोविदः। प्रबन्धगाननिष्णाता विविधालप्तितत्ववित्। सुसंप्रदायो गीतज्ञ र्गीयते गायनाग्रखीः ॥" इत्यादि। शब्दके भी अनेक प्रकार कहेहैं यथा कफज. अंतःनिस्सार. त्रिस्थानगम्भीर (यही सर्वोत्तम है) चतुर्थ मिश्रित। "चतुर्भेदो भवेच्छब्दः खाहुलो नारटाभिघः। बोम्बको मिश्रकश्चेति तल्वक्षयामथाच्यते ॥" इति। शब्दके पन्द्रह प्रकार और भी कहेहैं यथा- "मृष्टो मधुरचेहालत्रिस्थानकसुखावहः। प्रचुर: कोमलो गाढः श्रावकः करुणोघनः ॥ स्निग्ध: श्लक्षणा रक्तियुक्तश्छविमानितिसूरिभिः । गुसैरेभि: पश्चदशभेद: शब्दो निगद्यते ॥" इति। इनके लक्षय संगीतरत्नाकरादिमें देखनेचाहिएँ। गाना बजाना एक और रीतिसे दो प्रकारका है-एक टूटे स्वरोंका यथा खड़ी सरगमका गाना और हारमोनियमप्रभृति वाद्योंका बजाना. इनमें लचक वा मीड वा सूत न होनेसे स्वर

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३८ संगीतसुदर्शन- परस्परसे पृथक होनेसे टूटे कहातेहैं, इसी कारएसे हमारे देशी भारी राग हारमोनियमप्रभृतिवाद्योंमें योग्यरूपसे व्यक्त नहीं होते, इन वाद्योंमें लयद्रुत करनेसे स्वरोंका दूदापन कुछ कम अभिव्यक्त होनेसे कुछ रङ्ग जम जाता है, वस्तुगत्या ये वाद्य हमारे देशी रागोंके तथा विलंबित लयके याग्य नहीं हैं, सत्य तो यह है कि थीयेटरने हमारे देशी गानका और हारमोनियमने हमारे देशी राग- वाद्योंका लोप कर दिया। ये ही दो हमारे देशी संगीतके विनाशक हैं। यही बात राजा शौरिन्द्रमोहन ठाकुर भी मुझसे कहतेथे। दूसरा-संश्लिष्टस्वरोंका यह स्वरोंका परस्पर संश्लेष गानेमें कंठकी लचकसे होताहै बजाने में मीड वा सूतसे होताहै, इसी प्रकारके गाने बजानेमें भारी रागोंका योग्यस्वरूप प्रकट होताहै। जब गानेवाला गंधारसे पंचम पर कंठकी लचकसे जाएगा तब मध्यके मध्यमस्वरका स्पर्श अवश्यही होगा, एवं जब बजानेवाला गंधारसे पं चमपर सूतसे जायगा वा गन्धारपर पंचमकी मीड देगा तब मध्यके मध्यमस्वरका स्पर्श अवश्य ही होगा. इस रीतिमें मध्यके स्वर सर्वथा कभी भी छूट नहीं सकते एवं और खवरोंकी लचक मीड तथा सूतमें भी जानना। इस उत्कृष्ट प्रकारके गानेबजानेमें वस्तुगत्या सब रागोंमें सब स्वर लगत हैं यथा मालकौसमें यद्यपि पंचम वर्जित है तथापि यदि लचकसे वा मीडसे वा सूतसे मध्यम स्वरसे धैवत पर जायाजाय तो मध्यके पंचम खरका भी स्पर्श होगा ही, तब मालकौसादि रागमें पंचमादि खर वर्जित है गंधा- रादि स्वर अनुकूल है यह जो व्यवस्था है सो स्थिति की अपेना से है,पर्थात जिस रागमें जिन स्वरोंपर स्थिति हो सकतीहै उस

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स्वराध्याय। ३६

रागमें वे स्वर लगतेहैं ऐसा कहाजाताहै जिन स्वरोंपर स्थिति नहीं होसकती वे स्वर वर्जित हैं। ऐसा कहाजाताहै। इस पुस्तकमें मीया अमीरखॉजीके चित्रके साथ वीसाका चित्र है। वीखाके नीचे दा बड़े तूँबे रहते हैं ऊपर गोल डाँड़ी होती है डॉड़ी पर कोई लोग २२ कोई २१ सारोंको मोमरालसे जमाते हैं इस कारय ग्रीष्म ऋतु वीषाके प्रतिकूल है क्योंकि ग्रीष्मसंताप से सारोंका मसाला नरम होजाताहै अत एव ग्रीष्ममें वीखाको संताप से बचाना पड़ताहै वर्षा और शीत वीखाके अनुकूल हैं क्योंकि इसमें सरेशका जोड़ नहीं होता। वीखाके 'डग डगड़ डौं इत्यादि बोल हैं। वीखामें केवल जोड़ही बजाया जाताहै। प्रथम कालमें वीखाके साथ मृदंग बजानंका भी प्रचार था वह अब नहीं है। वीखाकी डांड़ीपर मध्यम षड ज पंचम तथा गंधार इनके यथाक्रम चार तार होतेहैं, प्रथम मध्यमका तार लोहेका होताहै शेष तीन तार पीतलके उत्तरोत्तर मोटे होतेहैं। दत्तिगहस्तकी ओर दो चिकारी होतीहैं, बाम हस्तकी ओर एक खरज (षडज) होताहै ये तीनों तार षड जमें मिलाए जातेहैं। डांड़ीके आगे जो मयूराकार होताहै उसे कड़ा कहतेहैं। उस मयूरकी पृष्ठपर जो दांतकी स्वरधरी होतीहै उसे तख्त कहतेहैं। सितारमें सरेश का जोड़ होनेसे वर्षाऋतु इसके अनुकूल नहीं शीतऋतु अनुकूल है। सितारके एक ही तूँबा हाताहै। मीयाँ रहीमसेनजीने सितारकी डांड़ीके पीछे दो छोटी तूंबी लगा लों अतएव यह चिह्न उन्हींके कुलके सितारका है उनको देख और भी कोई कोई लोगोंने अपने अपने रागवाद्यके पीछे एक तूंबी

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४० संगीतसुदर्शन-

लगाली। सितारके 'डा डिड़ डाड़ा डिड़ा डाड़' इत्यादि बोल होते हैं। सितारमें जोड़ भी बजाया जाताहै गत तोड़ा भी बजाया जाताहै। सितारपर १ मध्यम २ षड ज २ पंचम ये यथाक्रम तार होतेहैं। कोई १ खरज और भी चढ़ालेते हैं। जो वाद्य चर्मसे मढ़े जातेहैं यथा रवाब मृदंगादि उनके वर्षा- ऋतु बहुत प्रतिकूल है ग्रीष्म ऋतु अपरनुकूल है। इत्यादि। कुछ काल जोरसे साजको बजानेसे साजका भी कुछ काल- केलिए श्वास खराब होजाताहै इसकारए बजाकर कुछ काल साजको भी विश्राम देनाचाहिये, एवं हाथको भी विश्राम देनाचाहिये, सिद्धावस्थामें तो विशेषरूपसे साजको औरर हाथ को विश्राम देनाचाहिये। । इति स्वराध्यायः समाप्तः ॥

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रागाध्याय

सांगीतिकसमाजके अनुरंजक और प्राचीनसंगीतविद्वानोंके नियत किए स्वरसमुदायविशेष (स्वरोंकी आरोहावरोहीविशेष) को राग रागिनी कहतेहैं. कहा भी है- "रञ्जकः स्वरसंदर्भो राग इत्यभिधीयते।" "योसौ ध्वनिविशेषस्त स्वरवर्षविभूषितः । रञ्जको जनचित्तानां स राग: कथितो बुधैः।" इति। ग्रामीखोंके चित्तानुरंजक भी स्वरसमुदाय राग नहीं कहासकते इससे लक्षयमें सांगीतिकसमाजके अनुरंजक यह कहाहै। रागरागिनियोंके चार भेद हैं। १ राग. २ रागपत्री. ३ रागपुत्र. ४ रागपुत्रवधू। प्रधान भेद दो ही हैं-राग और रागिनी। रागों में जो पुंस्त्व है और रागिनियोंमें जो स्त्रीत्व है उसको कोई भी स्पष्टरूपसे बता नहीं सकता। अथापि यथा दो कन्या बालक वाल्यावस्थामें यदि एकसमान वस्त्रादि पहिरेहों तो स्थूलबुद्धिपुरुष यह नहीं जान सकता कि यह कन्या है और यह बालक है किंतु सूक्मदर्शी चतुर पुरुष उनके सौकुमार्यादिसे जानलेताहै कि यह कन्या है और यह बालक है तथा सूच्मदर्शी सांगीतिक विद्वान् समझसकतेहैं कि यह राग है और यह रागिनी है, जो राग हैं उनमें ओरज (खड़ापन) कुछ अवश्य प्रतीत होता है, जो रागिनी हैं उनमें सौकुमार्य कुछ अवश्य प्रतीत होताहै यही राग और

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४२ संगीतसुदर्शन-

रागिनियोंका प्रधान भेद है। मेरी जानमें तो इसी ओरज ही के कारय राग राग कहातेहैं और सौकुमार्यके ही कारण रागिनी रागिनी कहातीहैं। आरजकल्ह प्रायःकरके तीनप्रकारके राग रागिनी प्रसिद्ध हैं १ शडुव. २ षाडव. और ३ संपूर्ण। जिसमें पाँच ही स्वर लगतेहेो उसे शडव कहतेहैं यथा मालकौसप्रभृति, जिसमें छ् स्वर लगतेहो उसे षाडव कहतेहैं यथा गूजरीप्रभृति, जिसमें सातों स्वर लगतेहा उसे संपूर्ण कहतेहैं यथा भैरवादि। चार स्वरकी कोई राग रागिनी प्रसिद्ध नहीं, तीन स्वरोंकी जलधरसारंग प्रसिद्ध है। यह विषय स्वराध्यायमें स्पष्ट है। १ भैरव २ श्री ३ मालकौस ४ दीपक ५ मेध ६ हिंडोल ये आदिके छै राग प्रसिद्ध हैं, इनमेंसे प्रथम तीन सदाके हैं उनमेंसे भैरव प्रातःकालका श्री दिनके चदुर्थप्रहरका मालकौस रात्रिका है ये ही तीन समय गाने बजानेके प्रधान हैं। पीछेके तीन तीनों ऋतुओं (मौसमो) के हैं उनमेंसे दीपक गरमीका. मेघ वर्षाका हिंडोल शीतकालका है। दीपकरागका गाना बजाना मियाँ तान- सेनजीके समयसे बन्द है यह हाल भूमिकामें लिखाहै। मेघराग भी सामान्य ही है शेष चार राग बहुत अच्छे हैं उनमेंसे भी मालकौस बड़ा मस्त और तासीर करनेवाला राग है। सोरठा- AY "प्रथमहि भैरव राग. मालकौस. हिंडोल गिन। 8 मेघ बहुरि.श्री राग. छठवों दीपक गाय जिन।"इति स्वयसागरे।

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रागाध्याय। ४३ इन रागरागिनियोंके पूर्वजसंगीताचार्योंने अरनेक प्रकारसे परि- वारकी कल्पना कीहै यथा एक रागकी कई पत्निये फिर उनके पुत्र उन पुत्रोंकी भी वधुएँ इत्यादि, इस कल्पनामें ऐकमत्य न होनेसे उसे मैंने यहाँ नहीं लिखी. और इस परिवारकल्पनासे गानेबजानेमें कुछ उपयोग भी नहीं। यह कल्पना इसदेशमें नैसर्गिक है। संगीत- रत्नाकरादि आकरग्रंथोंमें तो इस परिवारकल्पनाका नाम भी नहीं, वास्तविक विद्याचमत्कारमें असमर्थपुरुषोंकी ही ऐसे विषयोंमें विशेषकर प्रवृत्ति होतीहै। अब मैं प्रथम प्रभातकालके कुछ रागोंके स्वरूपोंको लिखताहूँ। यहाँ सूर्योदयसे एकघंटा पूर्वसे लेकर सूर्योदयानन्तर एकघंटा पर्यत प्रभातकाल जानना। यद्यपि सभी राग सभी समयोंमें गाए बजाए जा सकते हैं तथापि यथा उत्तमोत्तम रसौषधको भी अनुपानकी अपेक्षा रहती है तथा रागों को भी अपने उस उस नियत निज- कालकी अपेक्षा रहती है क्योंकि वह वह समय उस उस रागकी तासीरका वर्धक है। इसका नियामक बुद्धिमें कुछ आता नहों किसी ग्रंथमें भी लिखा देखा नहीं। १ अथ भैरवराग भैरव छैरागोंमेंसे प्रथम राग है कहा भी है "प्रथम राग भैरों"। आजकल्हके कुछ लोग इसे भैरों कहतेहैं यह प्रभातकालका राग है। इसमें सातों सवर लगनेसे यह संपूर्ग कहाताहै इसमें ऋषभ म्ही 7डधैवत ये तीन स्वर उतरे लगतेहैं और गंधार निषाद ये दो स्वर ढ़े लगतेहैं। गंधारस्वर इसका वादी (प्राथ) है। इसमें गंधार मध्य पंचम इन तीन स्वरोंका प्राधान्य है। गंधारपर पंचमकी

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४४ संगीतसुदर्शन-

मींडको या गंधारसे पंचमतककी सृतको यह राग बहुत चाहता है एवं अवरोहीके समय ऋषभपर गंधारकी मींडको बहुत चाहता है। सितारवीणाप्रभृति वाद्योंमें मींड होती है। स्वरश्रंगार रवाब सारंगी इत्यादि वाद्योंमें मींडकी जगह सूत होतीहै गलेमें उसीका लचक समझना चाहिए। सैनियोंके स्वरसागर में दूलहखाँजीने कहाहै- "महादेव हैं देवता त्रिया भैरवी संग। शरत्चंद्रकी रैनसम भैरव उज्ज्वल अ्ररंग।।" २ "भैरव राग भैरवी रानी और नारि सुनि लैहि वरारी। 8 मधुमाद सैधवी बंगाली पांच नारि संग रहैं जुवाली ।।" इति शिवमतम्। १ SY "भैरवी विभाकरी अरु तीजै गिन गूजरीकौ चौथी गुनकली श

विलावल सुनारि है। पुत्र इनके सुनौ भैरवीकौ देवगंधार ताकौ सुघरईसौं अधिक पियार है। दूजै विभाकरी अरु पुत्र है विभास वाकी सूहीकौ विभास मन राखत सँवार है। तीजै सुन गूजरीकौ पुत्र देवसाग भयो रागनिके वागवेल जूही निहारिहै। चौथे गुनकली पुत्र वाकौ गंधार सुनौ कुर क रागनी तौ वाके मन की पियारी है। पाँचै विलावल पुत्र वाकौ सूहा सुन सूहे की पियारी नारि बहुली निहारी है ।।" इति गगशमतम्। इनमेंसे विभाकरी सूही जूही कुर क बहुली ये पाँच र प्रायः अपसिद्ध है चौर सब प्रसिद्ध हैं। गरे

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सरगम यथा-'सा रेरेग म पध नी सा रेसा गरे सानि ध प म ग. पम गरेसा, गमप ध प म ग. पमग रेसा इत्यादि। ध्रुवपद यथा-"सारेरेग मपध नीसा सप्त स्वर मो मन ऐसे आए। आरोही अवरोही सुन लेश सब कोई नी ध प म ग- रे साग १॥ थ सा रे सा सारेय म मगरेसा सरेग म प वप मगरे "रघुपति प्राखनाथ नाथन को नाथ अष्ट सिद्धि नव निधि रेगमप म गरेसा ध निसा धनिसा रेसासनिधपनग रेग मगरेसा तुमसों पैयत। नाम धाम सब तेरो मंगल सिमरत दुख मिट जैयत"॥२॥ इसपदपर स्त्रर भी लगादियेहैं अस्ताईमें प्रथम सप्तकके धैवतसे द्वितीय सप्तकके धैवत तक जाना फिर पीछे लौट आना, अंतरेमें द्वितीय धैवतसे तृतीय ऋषभ तक जाकर द्वितीय षड जपर लौट आना। यह राग बहुत प्रसिद्ध है। प्राचीन विद्वानोंने इसके वसंतमैरव और आनंदभैरव ये दो भेद और भी कहेहैं किन्तु आजकल्ह इनका प्रचार नहीं। संगीतपारिजातवालेने इसी भैरवको वसंतमैरव कहाहै, और शुद्धभैरव्रको ऋषभपंचमरहित कहाहै॥ १ ॥ गत यथा- सम डिड़ डा डिड़ डाड़ा डाडाड़ा डिड़ डा डा ड़ा डिड़ डा डिड़ डाड़ा ८ ६ १० ११ १० १९ १२ १५१६ मडा डिड़ डाड़ा डा डिड़ डाड़ा डा डिड़ डाड़ा डा डाड़ा। १५१२ ११ SY U मध्य शरह राग सर्वथा सीधा है भैरवका ठाठ बनाकर उसपर चाहे

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४६ संगीतसुदर्शन-

जैसे दौड़ो हॉ दूसरा कोई राग प्रकट न होजाए इसपर पूरा ध्यान अवश्य रखनाचाहिए। वस्तुगत्या बिना गुरुशिक्षाके काम चल नही सकता। इसमें कभी कभी आरोहमें ऋषभको तथा पंचमको छोड़ भी देतेहैं। गतमें जो अंक लगाएहैं उनके लिए सितारके तूंबेकी ओरके सबसे नीचेके परदेसे एकसंख्यासे संख्याका आररंभ जानना। सितारमें समग्र पड़दे १७ सत्तरह जानने यथा 'म प ध ध निनि सा रेगमम पध निसा रे ग' इति। ऐसे ही आगे भी जानना। २ अरथ पंचम पंचम हिडोलसैंधवीका पुत्र है इसमें सातों स्वर लगनेसे यह संपूर्ण रागपुत्र है। इसमें ऋषभ धैवत उतरे और गंधार मध्यम निषाद ये चढ़े लगतेहैं। भैरवसे इसका विशेष भेद यही है कि भैरवमें मध्यम उतरा लगताहै इसमें चढ़ा लगताहै हां चाल इसकी भिन्न है। इसमें आरोहीमें पंचम बहुत ही कम लगताहै। यह भी प्रभातका राग है इसमें मध्यसप्तकके 'सा नी रेसा' इन स्वरोंको बजाकर इकदम तृतीय सप्तकके षड जपर जाकर 'सा नी रेसा निध प म गरेसा' इस क्रमसे लौटना चाहिए यही तान इसके स्वरूपको प्रकट करनेवाली है। सरगम यथा 'सा नी रे सा-सा नी रेनी ध प म ग. ग म ध नी रेनी ध म गरे सा। रेसाधमगरेसा रेनी रेसा म ध प म धमग रेसा

नी रे सा-सा नी रे सा ग रे सा रेनी घ, म ध प म गग नी सा नी ध प म ग म ग रे सा' इत्यादि।

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३ अथ कालंगड़ा कालंगड़ेमें सातों स्वर लगतेहैं उनमेंसे ऋषभ मध्यम धैवत ये तीन स्वर उतरे और गंधार निषाद ये दो स्वर चढ़े लगतेहैं। इसकी चाल बहुत सीधी है गानेबजानेवाले इसमें मींडका प्रयोग अधिक नहीं करते और इसमें पंचम विशेष लगताहै और मध्यमसे धैवत- पर जाकर पंचमपर लौटकर कुछ ठहरना चाहिये यही इसका भैरवसे विशेष भेद है। यह बहुत प्रसिद्ध है। स गत-डिड़ डा डिड़ डाड़ा डाडाड़ा डिड़ डा डिड़ डाड़ा डाडाड़ा।।१।। U तोड़ा-डिड़ डा डिड़ डाड़ा डाडाड़ा डिड़ डा डिड़ डाड़ा डाडाड़ा॥।१।

सरगम यथा-रेसा नि सा रेनि ध पम मध निस,रेगरेरेगम ध प प ध नि सा रे सा नि सा रे सा नि ध प म ग रेसा, इत्यादि। यह प्रभातका कालंगड़ा है एक श्यामका भी कालंगड़ा है। जिन गतोंपर तालका नाम नहीं उनका ताल धीमातिताला जानना। ४ सथ जोगिया जोगिया भी संपूर्ण राग पुत्र है इसमें भी कालंगड़ेके तुल्य ऋषभ मध्यम धैवत ये तीन स्वर उतरे और गंधार निषाद ये दो स्वर चढ़े लगते हैं। इसमें आरोहमें गंधार और निषाद नहीं लगते यही इसमें विशेष है। 'सा रेगरे म प घ रेसा' यह तान इसमें अधिक चमत्कारी है। गंधारीका और इसका ठाठमात्रका भेद है और चालढाल सब एकसमान है। सरगम यथा-म म प ध धप म गरेम म प धसा सा नि

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४८ संगीतसुदर्शन-

धपमपध पम गरेसा। स ग रेरेम पध सा निध रेसा निधपमधपध पध सानिध प म गरेसा।१।। इत्यादि। प्रभातके रागोंमेंसे कालंगड़ा और जोगियाको अताई लोग अधिक गाते बजाते और पसंद करतेहैं। ५ सय ललित ललित षाडव रागपुत्र है इसमें ऋषभ धैवत उतरे और गंधार निषाद ये चढ़े लगते हैं मध्यम उतरा चढ़ा दोनों प्रकारका लगताहै किंतु आरोहमें उतरा ही मध्यम लगता है और अवरोहमें चढ़ा मध्यम लगता है प्रकारविशेषसे अवरोहमें दोनों भी मध्यम लगसकते हैं इसमें पंचम नहीं लगता यही सब इसका विशेष है। सरगम यथा-'सारेग्मम गगममधध पप म म (तीव्र) गम ध नी नी ध ध मग रेग ध म ग रेसा। ग म ध व सासारेसा नीनी म ध मम गग मम गरे गरे सा ।' इत्यादि। कोई उस्ताद लोग इसमें अवरोहमें जरासा पंचम लगा भी देतेहैं। स गत-डिड़ डा डिड़ डाड़ा डाडाड़ा डिड़ डा डिड़ डाड़ा डाडाड़ा ।।१।। 9990 € 90 ¢ ५ C € 8€90999 तोड़ा-डिड़ डा डिड़ डाड़ा डा डिड़ डाड़ा डा डिड़ डाड़ा डाडाड़ा।।१। 8 ५ 50 AC ६ अथ विभास विभास रागपुत्र है षाडव है इसमें ऋषभ उतरा लगताहै गंधार मध्यम धैवत निषाद ये चढ़े लगतेहैं। वस्तुगत्या इसमें पंचम वर्जित है तो भी उस्ताद लोग कभी कभी जरासा पंचम लगा भी देते हैं. पंचम ऐसी रीतिसे अल्पसा भवरोहमात्रमें लगाना चाहिए

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रागाध्याय।

जो इसका आकार न बिगड़े यह बात शिचाके अधीन है। षड ज भी इसमें कम लगता है। इसमें यथार्थ फैलना कुछ कठिन है। सरगम यथा-रे नी सा नि ध नि रेग म म ग रेनि सा। गम ध सा नि रेसा नि रेग रेनि धम ग ग म ध सा नि रेनि ध म ग रे नि रेग रेसा, इत्यादि। सरगममें यह स्मरस रखना कि सरगमके प्रथमभागमें द्वितीय सप्तकसे आगे नहीं जाना द्वितीयभागमें द्वितीयसप्तकसे तृत्तीयसप्तकमें जाना।

गत-डिड़ डा डिड़ डाड़ा डाडाड़ा डिड़ डा डिड़ डाड़ा डा डा ड़ा ।।१।। १२१३१० ६७६७ ६ ७ ६ १० ११ AC AC 9 पय देशकार देशकार संपूर्ण रागपुत्र है इसमें भी ऋषभमात्र उतरा लगता है गंधार मध्यम धैवत निषाद ये चढ़े लगतेहैं। विभासकी अपेच्षा खरोंमें इसका यही विशेष है कि इसमें पंचम स्पष्ट लगता है हाँ चाल इसकी पृथक है। बजानेवालेको इसमें चढ़ेमध्यमके पड़देपर पंचम धैवतकी मींड ज्यादा खैंचनी चाहिए उसमें भी यह विशेष है कि तारको ऐसा खैंचना जो प्रथम पंचम बोले फट ही आगे धैवत बोले इन सब बातोंका बिना शिक्षा ज्ञान होना कठिन है क्योंकि मींडके अनेक प्रकार हैं जो लिखने कठिन हैं। मी१-२ मी१। नी१-२ गत-डिड़ डा डिड़ डाड़ा डाडाड़ा डा डाड़ा डा डिड़ डा डा डा ।।१।। ६ s ६ १० ६ *गतपर (मी) यह मीड का संकेत जानना उसके आगे त्रंक स्वरोंके जानने यथा यहाँ सात का पड़दा मध्यम स्वरका है उसपर १ अंक से पंचम की औौर २ अँकसे धैवतकी मींड देनी एवं आगे भी सर्वत्र जानना।

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५० संगीतसुदर्शन- यह मीयाँ तमृतसेनजीकी बनाई गतका टुकड़ा है अतएव रत्न- तुल्य है. मोया अमृतसेनजीकी बनाई गते ऐसी प्रायसे भी प्यारी हैं कि उनको लिखदेनेका प्रथम तो साहस ही नहीं होता फिर उनके लिखनेसे लाभ भी कुछ नहीं क्यों कि वे गते सीखनेपर भी हाथसे यथार्थ निकलनी कठिन ही हैं इसीकारख वे गते बहुत कम लोगों के पास हैं।

सरगम यथा-सा रेसागरेसा रेसा सानि रेसाग रेरेसारेगमपपध पमगमग रेसा। प ध म ध ग रे ३ ३ ३ सा नि सा रेसा निध प म ग प म ग रेसा। इत्यादि। सरे स गरेसरस सरसग निसरेगगरेसा नी ध्रुवपद यथा-पढ पढ पंडित भाए पच पच नाचन लागे जो सग म प प चपसग म ग र सा पथप धप पमगमगगरे स प रचै पचै तौ गायवा कठिन अत। जौन ग्राम गावत गुखिगस और ध पमगरेस निसरसा नि धप म गग रसा हूं विभेदहैं बताए श दिखाए गुरु अमृत।। १ ।। इसमें अस्ताई प्राचीन है अंतरा मेरा बनायाहै, इस अंतरेमें जो स्वर हैं वे मीयाँ शमीरखाँजीके स्थिर किये हुएहैं। अंतरेमें 'वताए' इसपदमें व तो प्रथमसप्नकके निषादपर है शेष 'ताए' ये दो अक्षर तृतीय सप्तकके 'सारेसा' पर हैं यह ध्यान रखना। इसका फैलाव कठिन है। यह धुरपतियोंका देशकार है, खयालि- योंके देशकारमें ऋषभ चढ़ा लगताहै यही विशेष है, इसका स्वरूप आगे लिखे भकार से बहुत मिलता है विशेष यह है कि भकार में ऋषभ उतरा है और इसमें चढ़ा है, इस खयालियोंके देशकारको

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रात्रिकी रागिनियोंसे बचाना कुछ कठिन है। इसभेदको करनेवाले भी तानसेनजीके ही दौहित्रवंशके संगीतविद्वान् हैं। ८ अथ परासा आरसा रागिनीका पंजाबकी वेश्याओंमें अधिक प्रचार है पूर्वमें इसका प्रचार कम है। इसमें मध्यम उतरा लगताहै और रि ग ध नी ये चार स्वर चढ़े लगतेहैं यह भी संपूर्ष रागिनी है। इसके आरोहमें गंधार निषाद वर्जित हैं, कभी कभी आरोहमें पंचमको भी छोड़ देतेहैं। सरगम यथा-सारेमप धरेसा, रेसा निध पमध पमगंरेसा।म पध सा गरेसा प ध रे, सा घ सा रेसा ग रेसा नीध प म ध प म ग रेसा। सत स काट का का गत-डिड़ डा डिड़ डाड़ा डाडाड़ा डिड़ डा डिड़ डाड़ा डाडाड़ा ।।१।। १११० ८ ६ ५ ३ ४ ५ ६ c € € € 9099 ५ = = ६ १० 8 का तोड़ा-डिड़ डा डिड़ डाड़ा डाडाड़ा डिड़ डा डिड़ डा ड़ा डाडाड़ा ।।१॥ ६ ५३ ३ ३ २ १ २ ३ १ र्ट अथ जीलफ जीलफ रागिनी संपूर्ण है इसमें ऋषभ मध्यम धैवत ये उतरे और गंधार निषाद ये चढ़े लगतेहैं। यह छोटीसी रागिनी है। इसके आरोहमें ऋषभ छूटताहै अवरोहमें प्रायः षड जको छोड़ देतेहैं। सरगम यथा-सा गम पध पध नी सा। ग म प ध म

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५२ संगीतसुदर्शन-

पधनीसारेसाग रेसा नीधपध प म प म ग म गरे नी सा। इत्यादि। स गत-डिड़ डा डिड़ डाड़ा डा डिड़ डाड़ा डाडिड़ डाड़ा डा डाड़ा ।।१।। ६ ५ ६ ६ = ६ १० 99 U عر तोड़ा-डिड़ डा डिड़ डाड़ा डाडाड़ा डिड़ डा डिड़ डाड़ा डाडाड़ा।।१।। १० १२ ११ ६ ८ ६ ५ ६ ५४ ३ ४ ५ ६ ६

१० प्रथ भकार

भकारमें ऋषभ उतरा है गंधार धैवत निषाद ये चढ़े हैं मध्यम दोनों प्रकारका है वस्तुगत्या इसमें पंचम वर्जित छै ही स्वर होनेसे यह षाडव रागिनी है अथापि पंचमकी कहीं छूत कर भी देते हैं। कोई लोग इसमें उतराही धैवत लगाते हैं। यह रागिनी छोटीसी होने पर भी मजेदार है। छोटीसीका अभिप्राय सर्वत्र यह जानना कि उसमें फैलनाफूलना ज्यादा नहीं हो सकता। इसको प्रायः तृतीयसप्तकके षड जसे शुरू करते हैं षड जसे सूत देकर धैवतपर आकर फिर षड जपर ही चलेजाना यह इसमें विशेष है। और आरोहावरोह दोनोंमें मध्यम चढ़ा लगता है कि तु अस्ताई अंतरेके अंतमें उतरा मध्यम लगता है यह भी विशेष है। आरोहमें निषाद नहीं। ३ सरगम यथा-सा ध सा रेसाध म ग ग रेसा नी रे सा म ३ ३ ग म ध सा म। सा ध सा ग रे सा निधम गग रेसा, सा म ग

मघसा. गरेसा नी ध म ग रेसा म ग म ध सा म (उतरा)

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रागाध्याय।

सध स म ग र स मग म घ सा म उतरा ध्रुवपद यथा-आज रे आज दिन मंगल राधा घर श्री रामकृष्ण। सथस गरससरसा मगरस समग मधमु म उतरा आज तिलक चढ़ाइये आज नवल यशादा घर श्री रामकृष्ण ।।१।। अस्ताई अंतरा दोनों ही तृतीयसप्तक के षड जसे शुरू करने।। गत-डिड़ डा डिड़डाड़ा डा डाड़ा डिड़ डा डिड़ डाड़ा डाडाड़ा॥। ३ ५ ५ १० ११ U ताड़ा-डिड़डाडिड़ डा ड़ा डा डिड़ डाड़ा डा डिड़ डाड़ा डाडाड़ा ।।१।। 99 ३ १ २ ३ U ११ अरय रहीरी यह रागिनी संपूर्ण है, इसमें ऋषभ मध्यम धैवत ये उतरे और गंधार निषाद ये चढ़े लगतेहैं। यह अवरोहमें ऋषभको बहुत चाहती है। प्रायः लोग इसको धैवतसे शुरू करते हैं। आरोहमें ऋषभको प्रायः छोड़ देते हैं। सरगम यथा-ध ध प मगरेरेसानीरेसा। गम पध नी सारेसा नीध प मध पम गम म गरे रेसा मग रेरेसा।१। स मी१ गत-डिड़ डा डिड़ डाड़ा डाडाड़ा डाडाड़ा डाडिड़ डाडाड़ा॥I X १० १२ ११ ६ ६ ६१०११ U का तोड़ा-डिड़ डा डिड़ डाड़ा डाडाड़ा डाडाड़ा डाडिड़ डाडाड़ा।।१॥ =१० U 50 DY 8

मैंने यहाँ प्रभातकालके भैरव पंचम कालंगड़ा जोगिया ललित विभास देशकार आसा जीलफ भकार शहीरी ये ११ रागरागिनी सविस्तर लिखे हैं। इनके सिवाय प्रभातकी पार्वती गौरा बंगाल

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५४ संगीतसुदर्शन-

उमातिलक इत्यादि और भी कुछ रागिनी मुझे मालूम हैं किं तु उनका लिखना यहां व्यर्थ है क्योंकि विना शिक्षासे लेखमात्रसे उनके स्वरूपका ज्ञान होना कठिन है। एक प्रकारसे पार्वतीप्रभृति कुछ रागनियोंके कुछ संगीतविद्वानोंके पास नमूनेमात्र ही हैं यथा- र्थमें इनको फैलफूल कर आधा घंटा भी गाना बजाना बहुत कठिन है, श्रोताकी आँखमें धूल डालदेना यह दूसरी बात है। यदि हम किसी अज्ञात रागकी फरमायश करें तो धूत पुरुष चाहे जो खाक धूल गा देवे हम उसके यथार्थ तत्वको नहीं जानसकते, ऐसा प्रायः धूर्त लोग खमानरच्ार्थ करते भी हैं, इसी धूर्ततासे कुछ रागराग- नियों के यथार्थ स्वरूप सर्वथा नष्ट ही होगए, और तौक्या धूर्तोंने प्रसिद्ध भी रागरागनियोंका सत्यानाश करदियाहै। मीयां अमृत- सेनजी कहतेथे कि पाँच सात रागरागनियें भी यथार्थ गानेबजाने आजायँ तो बहुत है इसमें कुछ फरक नहीं।

अब मैं सूर्योदयसे लेकर मध्यान्हके वारह वजेतककी कुछ रागनियों को अकारादिक्रमसे लिखताहूँ। मैं जो रागरागनियों के नामके साथ यहां अंक देरहाहूं वह संख्या करने मात्रकेलिए दे- रहाहूं कुछ क्रमकेलिए नहीं देरहा। केवल एक भैरवकेलिए ही यह कहा है कि "प्रथम राग भैरों" और किसी रागरागिनीकेलिए कालातिरिक्त्त क्रम प्राप्त नहीं। १ अथ आसावरी आसावरीमें सभी स्वर उतरे लगतेहैं यह संपूर् रागिनी है, इसके आरोह में गंधार वर्जित है, ऋषभ इसका प्राय् है, निषाद भी इसमें

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प्रधान है। यह रागिनी बड़ी उत्तम तथा सुकुमार है खूब गाने बजानेकी है, इसको गंधारीसे बचाना कुछ कठिन है, वस्तुगत्या गंधारी और आसावरी ये दोनों सहोदर भगिनी हैं यह भी कह सकते हैं। यदि 'प ध सा' इस प्रकार से तान लेंगे तो गंधारी हो जायगी, यदि 'प नि सा' इस प्रकार से तान लेंगे तो भीमपलासी आकूदेगी, यदि 'प ध नि सा' इस प्रकार चलेंगे तो भैरवी बन जायगी, इस कारख गुरुसे खूब ध्यानसे इसकी चालको सीखना चाहिए जो सबसे बचीरहे अर्थात् पंचमसे निषाद पर जाकर धैवत पर आकर वहां एक फटका देकर षड जपर जानाचाहिए यही तख् है। इसमें 'सा रेगरेमपनीनी धप नी पधपमग रे रे रे सा नी साग रे सा' यह तान बहुत प्रधान तथा इसके स्वरूप को बनानेवाली है। इसके अवरोहमें ऋषभके पड़दे पर गंधारकी दो तीन मींड़ें देनी चाहिए, और पंचमपर निषादकी मीड़ें देनी चाहिएं। कभी कभी आरोहमें षड्जको छोड़ ऋषभपर जाकर षड्ज पर आनाचाहिए यथा-'मपनीनीध-रेसा'। कभी 'रेसानि BT ध प सा' ग रे रेसानि धप म सा' ऐसे भी तान लेनी चाहिए याने द्वितीय सप्तकके पंचमसे वा मध्यमसे इकदम तृतीय षड ज पर जाना। सो१ मी१ गत-डिड़ डा डिड़ डाड़ा डाडाड़ा डिड़ डाडिड़ डाड़ा डाडाड़ा ॥। १॥ ११ १० ६१० ८ ६ 8 ४ ६ ८ ६ १०१०११ सरगम यथा-नी सा ग ग रेमपध प प म म पनी धध प ध मगगरेरेम पध ध म ग रेखानी रेसा। म म प ध ध म

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५ू६ संगीतसुदर्शन-

गगरेम पध सा रेरेग सा नी ध प म ग रेम प नी ध पम ग रे सा। इत्यादि। जोगियाके मिलापसे एक जोगिया आसावरी भी है इसका गाना बजाना कुछ टेढ़ा है। २ सरथ खट खट संपूर्ण रागिनी है इसमें उतरा चढ़ा दोनों ऋषभ लगते हैं और सब स्वर उतरे लगते हैं। आरोहमें ऋषभ गंधार दोनों छूटते हैं, अवरोहमें प्रायः पंचम छूटता है। इसकी आरोहमें विशेषकर गंधारीके तुल्य चाल है और अवरोहमें सूहेके तुल्य 'सा रेसा' इस तानमें ऋषभ चढ़ा लगाना, 'मग रेसा' इस तानमे ऋषभ उतरा लगाना यही तत्व है, यह रागिनी यथार्थ गानी बजानी कुछ कठिन है लोकमें बहुत कम प्रसिद्ध है। चढ़ा धैवत भी जरा लगता है। मम्मूखाँजी तो कहते थे कि यह भैरवी के ठाठका कान्हड़ा है। मी१ मी१ गत-डिड़ डा डिड़ डाड़ा डाडाड़ा डाडाड़ा डा डिड़ डाडाड़ा। ११ १३ ११ ८ 5 डिड़ डा डिड़ डाड़ा डा डिड़ डाड़ा डाडिड़ डाडा डाडाड़ा ॥ १ ॥ ६ ८ ६ 8 ५ ६ = ६१० ur U सरगम यथा-पध नी सा.नी ध मग रेसा. म म ग म प प नी ध नी ध म ग रेसा। ध नी सा सा सा नीसा रे नीध नी नी नी ध म प ध नी सा म रे नी ध सा, सा सा म ग मप रेसा सा नी घ प धध म । १ ॥ एक अमीरखुसरोको खट परृथक है इसमें ऋषभचढ़ा नहीं लगता अर्थात् सभी स्वर ऊतरें ही लगते हैं, आरोहमें ऋषभ गंधार भी प्रायः नहीं छूटते यही इससमें पूर्वोक्त खटसे विशेष है, यह खट

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बहुत ही अप्रसिद्ध है। यह अमीरखुसरो पूर्वोक्त वे ही हैं जिनने सितार निकाला है। सरगम यथा-मपधनीसा नी ध पध प मर गम प। नी ध नी ध प म ग रेसा. नी सा रेग म प।ग रेसा नी ध पपप म ध नी प ध नो सा रे सा नी ध पप ध पम ग रेसा। इत्यादि। ३ अथ गंधारी गंधारी रागिनी संपूर्ष है इसमें सबी स्वर उतरे ही लगते हैं इसके आरोहमें गंधार निषाद वर्जित हैं, यह भी ऋषभको तथा ऋृषभ स्थानपर गंधारकी मींडको बहुत चाहतीहै, इसकी चाल सीधी है। इसका आसावरीसे बहुत कम भेद है। 'सा रेग रे म प ध सा नी ध प म प ध रेसा' यह तान इसमें प्रधान है। सरगम यथा-ममपधधपध मगरेममपधसा.सा नी ध प म प ध ध म ग रेग रेसा। ग रेम प ध सा.नी सा रे सानोधप पध म प मध पध म ग रेग रेनी सा। इत्यादि। सु गत-डिड़ डा डिड़ डाड़ा डा डाड़ा डिड़ डाडाड़ा डिड़ डा डाड़ा ११ १२ १० ११ १० ६ १० १ ६ ५ ६ U ६ मी२ मी१मी१ डिड़ डाडिड़ डाड़ा डाडिड़ डाड़ा डा डिड़ डाड़ा डाडाड़ा ॥। १ ॥ ३ ३ 8 ५५ ६ ६ ८ ६ १०१०१९ ४ अथ राजरी गूजरी षाडव रागिनी है क्योंकि इसमें पंचम वर्जित है। टोड़ीसे इसका यही भेद है कि टोड़ीमें पंचम है इसमें नहीं है। इसमें ऋषभ गंधार धैवत ये उतरे लगतेहैं और मध्यम निषाद ये 45

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संगीतसुदर्शन- चढ़े लगतेहैं। गंधार और धैवत इसमें प्रधान हैं, यह मध्यमपर धैवतकी और धैवत पर षड्जकी मौंडको बहुत चाहती है। धैदतपर निषाद षडुज और ऋषभ तककी मींडको इसमें खैंचतेहैं। कोई कोई उस्तादलोग इसमें तनिकसा पंचम लगा भी देतेहैं कितु इसके स्वरूप पर पूरा ध्यान रखनाचाहिए जो बिगड़ न जाय। गत-डिड़ डा डिड़ डाड़ा डाडाड़ा डाडाड़ा डाडिड़ डाडाड़ा।। १ ।। २ ३ ४ ५ २ ६ १० १९ सरगम यथा-गग म ध सा नी ध म ग ध ध ध म ग रेसा। गग म म ध ध ध म म ध ध सा रेसा रेरे नी नी ध ध ध ग ग गरेसा।गग म म ध ध नी म ध नी ध म ग ग म ध म ध म ग मध नी सा। ग रेसा नी रेसा ध नी सा ग ग ध धम म ग ग ध ध ग रे सा सा नी धध ग ग ग रेसा। इत्यादि। ५ अथ जौनपुरी जौनपुरी संपूर्ण रागिनी है इसमें सभी स्वर उतरे लगतेहैं, जौनपुरी टोड़ीका ही एक भेद है। इसके आरोहावरोहमें किसी भी स्वर के छूटनेका नियम नहीं अथापि ऋषभसे इकदम पंचमपर अधिक जातेहैं और अवरोहमें ऋषभ गंधार टोड़ीके तुल्य लगतेहैं इसमें 'सा रेगरेग रेसा रेगग रेसा रेपमग रेसा, ग प म गरेसा रेम पगग रेग रेसा' यह तान विशेष शोभा देतीहै। रसगरसा पम रग मय मगर सा र ग रग ध्रुवपद यथा-कौनके रंग रंगें नैन, ललना तुम्हारे। न्रु म प य नी सा घ जी सा नी र अ ऐेसा नी च प म ग र सा यग रेग दे सा अरन वरन देखत निस जागे रसीले बोलत वैन ॥ १॥

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रागाध्याय।

सरगम यथा-सारे ग गरेसा गरे सारे म प ध म प मरे गग रैसा। म प ध नी सा पध सा ध नी सा रे सा गगरे गरे सा नी ध प म प ध प म गरे गगरे सा। यह जौनपुरी घुरपतियोंकी है और कुछ नवीन मालूम होतीहै। खयालियोंकी दोप्रकारकी जौनपुरी औौर हैं एकमें ऋषभ चढ़ा भी लगता है और सब सवर उतरे लगतेहैं इसकी स गमक मी१-२मी१ लौटती गत-डिड़ डा डिड़ डाड़ा डाडाड़ा डाडाड़ा डाडिड़ डाडाड़ा। €CEE€ 9099 90 6 ६ ५ 8 ३३३ ६ AC तोड़ा-डिड़डाडिड़ डाड़ा डा डिड़ डाड़ा डा डिड़ डाड़ा डाडाड़ा।। 8 ६ ६ €90 9990 E €9099 U ११ इसगतको दरवारीके ठाठपर बजानाचाहिए। खयालियोंकी दूसरी जौनपुरीमें मध्यम चढ़ा लगताहै और सब स्वर उतरे लगतेहैं यह जौनपुरी डोड़ीको बहुत कुछ मिलती है। ६ अय टोड़ी टोड़ी रागिनी सं र्ख है बुद्धिमान् संगीतविद्वान इसको घंटन गाबजासकताहै यह रागिनी भारी होकर भी बहुत सीधी है। इसमें ऋृषभ गंधार धैवत ये उतरे और मध्यम निषाद ये चढ़े लगतेहैं, गंधार और धैवत इसके प्राय हैं। इसमें घूमना फिरना कुछ भारी कठिन नहीं। यह गंधारके पड़देपर मध्यम पंचम की मींडको और धैवखपर निषाद और षड्जकी मींडको बहुत चाहतीहै। सरगम यथा-सा रेगमपधनीधपमगरेसा, नीध

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६० संगीतसुदर्शन-

गाशलस। रे ग म प धघध म प म गग रेरे ग म प ध पम गरेसा मेमम.धध.सा रेसा गरेसा नीध नीध प भ गरे म गरे सा। गग धे पम धध नी सा ध सा रेध सा गग म धध प म ग रे सा ।शा गम न ध सपम धमग ध म घ म गरे सा सा नरग मग नपय ध्रुवपद यथा-हौं तव जानौं वाकौ बड़ौ ज्ञान जो कंठसों कर नथ म ध धनी धम धसानि चगरेसा निधमग रे सासा न सा सा रेनसासारेग गरेनीसा दिखलावै याकौ विस्तार। गंधार सुरको धैवत होतहै मथ मग म ग मपथसा चगरेसानिषमग धैवत सुरको गंधार। मी गत-डिड़ डा डिड़ डाड़ा डाडाड़ा डिड़ डा डिड़ डाड़ा डाडाड़ा & १० ११ १२ १९ 90 99 मी१ तोड़ा-डिड़ डांडिड़ डाड़ा डाडिड़ डाड़ा डा डिड़ डाड़ा डाडाड़ा।।१। १५ ११ १० ६ ६ ६ इसकी अस्ताई मध्यगंधारसे शुरू करनी और अंतरा तृतीय ऋषभसे शुरू करना, अस्ताई अंतरेकी अंत्यकी तान इसप्रकार है कि द्वितीय धसे प्रथम तृतीय सातक जाना फिर उसी धसे तृतीय गतक जाना वहांसे क्रमसे द्वितीय गतक लौट आना, यह तान कुछ कठिन है। गंधारसुरका धैवत और धैवत सुरका गंधार बनाना यह शास्त्रकी बात है पातके ओटमें पहाड़ है बड़ी मेहनत से यह रहस्य मिलाहै इसकारय सर्वसाधारय इस पुस्तक में लिखदेनेका उत्साह नहीं होता। इस घुरवतको बनानेवाले तानसेनवंशके एकपुरुषाई जो संगीतके भारी विद्वान होचुकेहैं इतने भारी विद्वान्के इसप्रसासे ही

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अनुमान होसकता है कि यह एक संगीतशास्त्रका अप्रसिद्ध रहख अवश्य है। यदि कोई दोचारसौ रुपयेकी शरत लगाए तो उसे इस रहस्यको ग्रंथसे निकाल दिखासकताहूँ। किसी योग्य शिष्यको अंतमें बताऊंगा भी। टोड़ो लाचारी एक लाचारी टोड़ी भी है इसमें ऋषभ चढ़ा लगताहै औैर सब स्वर उतरे लगतेहैं और इसके आरोहमें ऋषभ गंधार दोनों ही छूट- नातेहैं यही इसमें विशेष है। सरगम यथा-स निस मग रेसा मम पप धपमग

रेसा।सा नीध प प सा नी मम ग रेसा। सा-सा गरेसा म गरेसा नी ध प मम गरेसा म गरेसा इत्यादि। टोड़ी विलासखानी इस टोड़ीकी मीयां तानसेनजीके पुत्र फकीर मीयां बिलासखां- जीने कल्पना की है इसीसे यह विलासखानी टोड़ी कहातीहै। इसमें भी ऋषभ चढ़ा और सब स्वर उतरे लगतेहैं, इसमें गंधार प्रधान है अतएव यह गंधारको बहुत चाहतीहै। सरगम यथा-सारेगगग म प ध प म गरे सा रेगग रेसा। गगग मम प ध नी सा रेसा गगग म ग रे सानी ध पम सा रेग, गरे सा नी ध सा रे गरेसा इंत्यादि। गत-डिड़ डा डिड़ डाड़ा डाडाड़ा डाडाड़ा डाडिड़ डाडाड़ा। १० 90 98 99 90 E € 90 99 ११

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कोई कोई उस्तादलोग इसमें चढ़ा ऋषभ न लगाकर उतराही लगातेहैं, एकप्रकारसे यह उतरे ऋषभकी देशी दूसरी ही है। गत-डिड़ डाडिड़ डाड़ा डाडाड़ा डाडाड़ा डाडिड़ डाडाड़ा।I $ 6 € 9993 99 ११ S € 5 € 90 99 १०

तोड़ा-डिड़ डाडिड़ डाड़ा डा डिड़ डाड़ा डाडिड़ डाड़ा डाडाड़ा।१। ११ ८ ६ ४ ३ २ ३ 8 ५ ६ = ६८ ८१० ११ ८ सथ भैरवी भैरवी रागिनी संपूर्ण है इसमें सबी स्वर उतरे ही लगातेहैं इसको रंगीन करनेकेलिए कोई लोग कभी कभी इसमें चढ़ा मध्यम भी लगादेतेहैं। यह बहुत ही प्रसिद्ध रागिनी है। गाने- बजानेवाला शायद ही कोई ऐसा होगा जो सांगीतिकविद्वानोंमेंसे मीयां वानसेवजी के नामको न जानता हो तथा भैरवीको गाने बजाने न जानताहो। उत्कर्षापकर्ष तो सर्वत्र ही लगेहैं। इसमें पंचम प्रधान है। इसके आरोहावरोहमें कोई भी स्वर छूटता नहीं अ्रथापि रंगीन करनेकेलिए कभी कोई स्वर छोड़ भी देतेहैं इसमें 'सा नी ध प ग म ध नी सा' यह तान भी उत्तम है।

स गत-डा डाडाड़ा डा डाडाड़ा डा डाड़ा डिड़ डा डिड़ डाड़ा। १० ११ १० तोड़ा-डा डिड़ डाड़ा डा डिड़ डाड़ा डाडाड़ा डिड़ डा डिड़ डाड़ा।१। ५ 8 ६ ५ ६ = १०१९ १३ १४ १६० १५९ U

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६४ संगीतसुदर्शन-

स२ पूर्वीबाजकीगत-डाड़ा डा डिड़ डिड़ डा डाड़ डाड़ डा डा डाड़ा डा १११० ६ U 8 डिड़ डिड़ डा डाड़ डाड़ डा डा ।।२।। बोलोंपर तालके अंक दिये हैं। ६ = १९ E १० 5 हअय रामकली रामकली रागिनी संपूर्ण है इसमें सबी स्वर उतरे लगतेहैं तोभी कभी कभी चढ़ा गंधार भी लगताहै, यह एक बारीक रागिनी है इसका यथार्थ रूप दरसाना तथा उसे घंटा आधाघंटा भी उत्तम- रीति से गानाबजाना कुछ कठिन है। प्रायः लोग ऐसी रागिनियों के नमूनेमात्र जानाकरतेहैं, कोई लोग तो नमूना भी शुद्ध नहीं जानते। जिन रागोंकी आरोही वा अवरोहीमें कोई स्वर छूटता हो उन रागोंका गानाबजाना कुछ सहज होताहै। जिन रागोंकी आरोही वा अवरोहीमें कोई भी स्वर नहीं छूटता उनका गाना बजाना कुछ कठिन होता है क्योंकि समीपका राग उसको आपकड़ताहै यथा पूर्वोक्त जौनपुरी और रामकली इन दोनोंको पृथक पृथक करके कुछ काल गानाबजाना कठिन है। सरगम यथा-धध्रपमपमगरेसा सा रेगम ध प म ग पम ग रे सा रेसा। ग ग म म पप नी ध सा.रेसाग रेसा. ध नी सा. ग रेसा नी ध प म ध प म ग प म गरे सा ध ध प मगरेसा। ध प मप मगरेसा रेगडेसा रेधप चपमग पमग गरसा भ्रुवपद यथा-आज वन बांसुरी बजाई, लेत सूधी सूधो तान।

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गमपचनीसनीसा रग रेसानोथप मगरे ध प म ग रेसा बांसुरीकी धुन सुन के मेरी सुध बिसराई। यहां 'धुन सुन' ये पद तृतीय सप्तकके स्वरों पर हैं। यह रामकली घुरपतियोंकी है।

खयालियों की रामकली खयालियोंकी रामकलीमें ऋषभ मध्यम धैवत ये उतरे औौर गंधार निषाद ये चढ़े लगतेहैं यही विशेष भेद है और इसके आरोहमें कभी कभी ऋषभ छूट भी जाता है। मी१ स मी१ गत-डिड़ डा डिड़ डाड़ा डाडाड़ा डाडाड़ा डाडिड़ डा डाड़ा। ५ ७६ ८५ ६७६ ह १० ११ ह दोनों ही रामकलियोंमें गंधार तथा धैवत प्रधान है। इस धुरपतिये और खयालियोंके परस्पर भेदको जाननेवाले बहुत कम लोग हैं। १० सथ सिंधभैरवी सिंधभैरवी संपूर् रागिनी है भैरवीकी अपेक्षा इसमें यही विशेष है कि इसमें चढ़ा ऋषभ लगता है सो भी कम ही लगता है और सभ भैरवीके तुल्य है। इसमें चढ़ा ऋषभ ऐसी रीतिसे लगाना चाहिये जो इसका स्वरूप बिगड़ न जाय। स सू का गत-डा डिड़ डाड़ा डा डिड़ डाड़ा डाडाड़ा डिड़ डा डिड़ डाड़ा। १६ ६ १०६ १११ १० १३११ १३१११३१०१३ १३ १६१६ ६१० ११ १५ ० ११

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६६ संगीतसुदर्शन-

सू का तोड़ा-डा डिड़ डाड़ा डाडिड़ डाड़ा डाडाड़ा डिड़ डा डिड़ डाड़ा ।।१।। १५० १६१३ १६ १३११ १३१११३ १० १३ १३ १६१६ ६१० ११ १५० ११ मैंने यहां सूर्योदय से लेकर दोपहर तककी 'आसावरी खट २ गंधारी गूजरी जौनपुरी३ टोड़ी३ देशी२ भैरवी रामकलीर सिंध-भैरवी' ये दस रागिनी लिखोहैं इनके सिवाय इस समयकी वंगाली सैंधवी प्रभृति कुछ और भी रागिनी हैं उनको यहां नहीं लिखा। वंगाली भैरवीके ठाठ पर बजतीहै सैंधवीमें निषाद चढ़ा लगताहै और सब स्वर उतरे लगतेहैं। जहाँपर उतरे वा चढ़े सब खर लिखे जाते हैं वहाँ षड्ज और पंचम बिना सब स्वर जानने क्योंकि बड ज पंचम ये दो सर एकरूप ही रहतेहैं चढ़ते उतरते नहीं।

अब मैं दोघंटा सूर्योदयानंतरसे मध्यान्हकं बारहबजेतककी कुछ रागिनियोंको अकारादिक्रमसे लिखता हूं। शीतकालमें इन रागि- नियोंको लोग दुपहरके एकबजेतक भी गाबजा लेतेहैं। इस समय की जो रागिनिये हैं वे विशेषकर विलावलके ही भेद हैं।

१ सथ अल्हैया अल्हैया संपूर्ष रागिनी है और विलावलका ही एक भेद है। इसको अल्हैयाविलावल भी कहतेहैं। इसमें मध्यम उतरा लगताहै और सब स्वर चढ़े लगतेहैं। यह बहुतसीवीसी रागिनी है। इसमें 'म प ध नी सा रे नी सा' यह तान बहुत उत्कृष्ट है।

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रागाध्याय। ६७

सरगम यथा-घ नी ध प म गग रेसा. सारे प घ नी ध प म गरे सा। गम प ध नीसा रेसा गरे सा प म गरे सा म प ध नी सा रे नी सा। गग रेरे सा ग म गरेसा सा रेग म प प प म पध गम पघ नीम पध नी सा रेगम पध नी सा रेनी सा, इत्यादि। गत-डा डिड़ डाड़ा डा डिड़ डाड़ा डाडाड़ा डिड़ डा डिड़ डाड़ा। ११ १० ६८ ६ ५ ४ ३ ३४४ ३ ४ ५ ६ ८ * तोड़ा-डा डिड़ डाड़ा डा डिड़ डाड़ा डाडाड़ा डिड़ डा डिड़ डाड़ा। १ २ ३४५६ =६१०६६६१०११ २ रथ कुकव कुकव भी सम्पूर्ण रागिनी है इसमें भी अल्हैयाके, तुल्य एक मध्यम ही उतरा लगताहै, औरं सब स्वर चढ़े लगतेहैं। यह कुछ अप्रसिद्धसी रागिनी है इसमें ज्यादा फैलना कठिन ही है। अवरोहमें उतरे निषादका भी स्पर्श है। सरगम यथा-म गरेगरेसासारेगम प म ग रेसा। सानीधपमपमगरेसा नीसा प म ग ध प म नीध प म गरे सा नी ध सारे ग म, इत्यादि। म गरे सा निध नचसरेगमगरेगम पद यथा-री हैं। ढूँढन को कित जाऊँ। य प नीसा ममग रेनीसाप म मपमगरे प्रीतम प्यारे प्राय नाथ को कौन ठौर ह। पाऊँ। ३ अ्रथ गुनकरी गुनकरी षाडव रागिनी है इसमें मध्यम वर्जित है और

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संगीतसुदर्शन- स्वर चढ़े लगतेहैं। कोई लोग इसे गुनकली भी कहतेहैं। यह भी विलावलका भेद है। यह गंधारपर पंचमकी और पंचमपर धैवतकी मींडको तथा षड्जसे पंचमतककी सूतको बहुत चाहती है, पंचमसे धैवतका स्पर्श कर गंधारपर आना इसे भी बहुत चाहती है। PT सरगम यथा-सा-प पध प ग रेसा सा ग परपे ग रेसा। गग प ध प गरेसा ग प सा नी ध पग रेसा सा ग प प ग प नी साग रे सा रे सा धनी साध साग रेसा नीध पगध प गपगप ग रे ग गरे सा, इत्यादि। मी१ समी१-२ मी१ मी१ गत-डा डिड़ डाड़ा डाडाड़ा डिड़ डा डिड़ डाड़ा डा डिड़ डाड़ा ३ ३ ४ ५ ५७६ ६७५७ ६ १०११ ६ मी९ मीपंचम डाडाड़ा डिड़ डा डिड़ डाड़ा। इसका ताल इकताला है। 9₹ € € 90 9 90 ११ ४ अथ देवगिरी देवगिरी संपूर्ष रागिनी है यह भी विलावलका एक भेद है। यह शांत रागिनी है। इसके आरोहमें प्रायःऋषभको छोड़ देतेहैं। इसमें मध्यम उत्तरा लगताहै और सब स्वर चढ़े लगतेहैं। * सरगम यथा-सा रे सा सानी ध सा सा ग रेसा गमग रेगरेसासासारेगम प पम गरेग रेसा। ग ग म म प ध नी घ पम ग रेसा नी घ नी सा ध सा ग रेसा। ग ग म प ध सारेसाग म प प म ग रेसा ग रेसासा नी ध पध धप अ प म प प म ग म म गरे सा ग रेसा। 'म

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स गत-डिड़ डा डिड़ डा ड़ा डा डाड़ा डिड़ डा डिड़ डा ड़ा डा डा ११ १२ १४ १२ ११ ६ १० ६ १० ११ १२ ११ १० ११ ड़ा ।। १।। १२ तोड़ा-डिड़ डा डिड़ डाड़ा डाडाड़ा डिड़ डा डिड़ डा ड़ा डा १२ ११ १० १०६ ६८ ६ १० 4

डा डा ।।१।। १११२ ५ सय देवसाग देवसाग षाडव रागपुत्र है क्योंकि इसमें धैवत वर्जित है। इसमें ऋषभ चढ़ा लगता है और गंधार मध्यम निषाद ये उतरे लग- तेहैं। सितारमें यह काफीके ठाठपर बजायाजाताहै। यह राग सुहा और सारंग इनदोको मिलाकर बनायागया प्रतीत होताहै क्योंकि इसकी कुछ चाल सूहदेके सद्दशहै, सारंगमें गंधार नहीं यह गंधार को विशेष चाहताहै यही इसका सारंगसे विशेष भेद है। इसके आरोहमें ऋषभको और अवरोहमें गंधारको प्रायः छोड़देतेहैं। सरगम यथा-सा नी रेसा नी नी प नीसा ग ग म प प म म रेसा। रेसा रेनी सा प नी प मप प नी म प ग ग म ग म पम रेसा गगरेसा। म प नी सा रे सा गग रे सा नी प म गम प नी पस मग रेसा, इत्यादि। गत-डिड़ डा डिड़ डाड़ा डाडाड़ा डिड़डा डिड़ डाड़ा डाडाड़ा।।१॥ १०११ १३ ११ १३१६ १३११६६८६ ६८ १०११

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७० संगीतसुदर्शन-

६ अथ लच्छासाग लच्छासाग संपूर्ण रागिनी है कोईलोग इसको लच्छासारभी कहतेहैं यह भी एक विलावल ही है, इसमें मध्यम उतरा लगताहै और सब स्वर चढ़े लगतेहैं। इसमें 'नी प ध म प म' यह तान बहुत खपती और आवश्यक है। सरगम यथा-सारेगम प ध नीप धम पम गरे सा प म ग रेसा।ग गप प धनी सा रेसा नीध पमग रेसा सा रेग मपम ३ ग रेग म. सा रेसा ग रेसा नी ध प म पम गरे सा, १ सारेगम पध नीप धम पम म ग रेसाप मगरेसा। सारेगम प सानीध नीप धम पम ग रे सा, २ इत्यादि। गत-डिड़ डा डिड़ डाडा डाडाड़ा डाडाड़ा डाडिड़ डाडाड़ा।। ११ ११ १०६८ ६५४ ६५८ ६८६१०११ तोड़ा-डिड़ डा डिड़ डाड़ा डाडिड़ डाड़ा डाडिड़ डाड़ा डाडाड़ा ।।१।। ५४ ३३ २३ ५४ ६८६१० ११ 9 मरथ विलावल शुद्ध इसमें ऋषभ गंधार धैवत निषाद ये चढ़े लगतेहैं, मध्यम दोनों प्रकारके लगतेहैं किन्तु बहुत अल्प सो भी अवरोहमें ही, दोनों मध्यमोंको एकबेर नहीं लगाना, अवरोहमें तनिकसा उतरा मध्यम लगाते रहना चाहिये जो इसका स्वरूप स्पष्ट होतारहे। आरोहमें चढ़े मध्यम और निषादका शुद्धकल्याखके तुल्य स्पर्शमात्र है, चढ़े मध्यमपर पंचमकी और चढ़े निषादपर षडजकी मींड़ इसमें अवश्य देनीचाहिये बस आरोहमें इतने ही मध्यम निषादकी

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इसमें अपेक्षा है, कोईलोग चढ़े मध्यमसे निषाद वा षड ज पर चले भी जातेहैं। निषाद तो अवरोहमें भी स्पष्ट नहीं। यह रागिनी अवरोहमें ऋषभपर गांधारकी मींड़को बहुत चाहतीहै। यह संपूर्य रागिनी है कई रागिनियोंसे हाथ मिला बैठतीहै इससे बड़ी कड़ी है।

सरगम यथा-ध सासा सारे सा गरे ग म गरे सारे सा सा गम ग प नी धध पम गगग रेरे सा। ग प ध सा ससरे सा धध सा रेसानी ध प म गग रेग म गरेसा, इत्यादि।

सारेगगरेसा वेगम प म ग रेसा रेगम प गरेसा स ग न ध्र वपद यथा-वरन वरन पहिरें चीर यमुनाके तीर गोविंद

PY नीध पमग गमग गरेसा ममप सरेस गरेस नीचव म ग ग प ध नी स ग्वाल लिएँ संग भीर। तैसोई वहत नीर तरंगन तैसीय

नी रेसा नीध पप म ग रेगम गरेसा गग रेसा

सुवास अरगजा सीरी लागत समीर ॥१॥

गानेकी अपेक्षा इसका बजाना कुछ कठिन है। शुद्ध कल्याय और गौड़सारंगप्रभृतिसे बचानेका ध्यान रखनाचाहिये।

मी१ मी२ मी१ मीर मी१

गत-डाडिड़ डाड़ा डाडिड़ डाड़ा डाडाड़ा डिड़डा डिड़ डाड़ा।

१२ ६ ५५५५६ ६ ६ १० १० ११ मा१ मीर मी१ मी१

तोड़ा-डाडिड़ डाड़ा डाडिड़ डाड़ा डाडाड़ा डाडिड़ डाडाड़ा॥।१॥

ह ६६ ५५ ३ ४५६ ६ ६ १०१०११

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७२ संगीतसुदर्शन-

८ सय शुकल यह भी एक विलावल ही है इसमें मध्यम उतरा और सब सर चढ़े लगतेहैं। इसमें ऋषभ कम लगताहै। और इसके आरोहमें निषाद चढ़ा लगताहै और अवरोहमें उतरा यही इसमें विशेष है। सरगम यथा-मगसारेगमग रेसासाग रेसा।सा नीधप २ प ध नी ध पम गपमगरेसा।म प ध पम धनीसारेसा नी ध प म ग, इत्यादि। (इसमें जहॉ २ दोका अंक दियाहै वहॉसे अंतरेके सर द्वितीयसप्तकके जानने ) स गमक मी१ गत-डिड़ डा डिड़ डाड़ा डाडाड़ा डिड़ डा डिड़ डाड़ा डाडाड़ा। ८६ १० ११६८ ६१०/ मी नी तोड़ा-डिड़ डा डिड़ डाड़ा डा डिड़ डाड़ा डाडिड़ डाड़ा डाडा १ २ ३ ४५२ ३४५ ५२५६८ र्ट अ्रथ सुघरई सुघरई संपूर्ष रागिनी है यह कान्हड़ा सूहा सारंग इनके मेलसे बनी प्रतीत होतीहै, इसमें ऋषभ धैवत चढ़े और गंधार मध्यम निषाद ये उतरे लगतेहैं। धैवत इसमें बहुत कम लगताहै यह एक उत्तम रागिनी है। मध्यमसे ऋषभतककी सूतको बहुत चाहतीहै। अर्थात् सूतसे मध्यमसे ऋषभपर जाकर फिर मध्यमपर ही आजाना चाहिये आरोहमें यही सूत इसको सूहेसे बचातीहै अवरोहमें कान्हड़ेकी तान सुहेसे बचातीहै।

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रागाध्याय। ७३

मो २ मी१ मी मी मी१ मी। गत-डिड़ डा डिड़ डाड़ा डाडिड़ डाड़ा डाडिड़ डाड़ा डाडाड़ा॥I ६ ६ ६ ६६६६ १० ११ 4 U मी१ मी२ मी मी१ तोड़ा-डिड़ डाडिड़ डाड़ा डाडिड़ डाड़ा डाडिड़ डाड़ा डाडाड़ा ।।१। ३ ४ ३ ६६ ६ ६ ८६६ ६ C€ € 9099 सरगम यथा-रेरे गू मप पम पध प प म प ग म ध म प गमगरे सा (कभी ग म रे सा) म प धनी सा सारे सा गरे सा मप म गरेसा नीनी ध प म प धनी रेसा नीध पम गरे सा।१।। सारे मरे मप मप धय मप गम धप मप गम रेसा। ३ मप नी पनी सारेसारे नी सा नीप मप नीसा पनी प म प ग मरे सा २ यह दूसरी सरगम बहुत ही उत्तम है अमृतसेनजीके शागिरद अमीरखांजीकी बनाई है।

१० सथ सूहा सूहाको भी सुघरईके तुल्य ही जानना हां इसकी चाल पृथक (खड़ो ) है इसमें (म रेम) (ग म रेसा) ये तानें नहीं हैं। इसमें वैवत नहीं लगता ऐसा भी मत है। सरगम यथा-सारेसा गग रे सा नीनी धप नी सा गग पम पम प्रग रेसा। नीनी सा गप मप गग मप नीनी मप धम गरे सा रेसा। गम प ध सानीरेसा नी ध प प मम ध प मम प मम गग

र सा। मी१ स मी१ मी९ गत-डिड़ डा डिड़ डाड़ा डाडाड़ा डिड़ डा डिड़ डाड़ा डा डाड़ा।

१०

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७४ संगीतसुदर्शन-

मो१ मी१ तोड़ा-डिड़डा डिड़ डाड़ा डा डिड़ डाड़ा डाडिड़ डाड़ा डा डाड़ा। ur सूहा सुघरई दोनों ही गंधार मध्यम पंचम इनपर एक एक स्वर की मींडको बहुत चाहतेहैं। मैंने यहाँ दोघंटा दिन चढ़ेसे दुपहरतककी 'अल्हैया कुकब गुनकरी देवगिरी देवसाग लच्छासाग विलावल शुकल सुघरई सूहा ये दश रागिनी लिखी हैं इनके सिवाय इस ममयकी पूर्वा प्रभृति कुछ और भी रागिनी हैं।

अब दिनके एकबजेसे लेकर दिनके चारबजे तककी कुछ रागिनियोंको अकारादि क्रमसे लिखताहूँ, ग्रीष्मकालमें दिन बड़ा होनेके कारय पांचबजेतक भी इनका गानावजाना होसकताहै क्योंकि रागरागिनियोंका समय सूर्यके हिसाबसे है। १ सथ धानी धानी रागिवी संपूर्ण है इसमें ऋषभ धैवत चढ़े लगतेहैं और गंधार मध्यम उतरे लगतेहैं, प्रथमसप्रकका निषाद चढ़ा लगताहै और द्वितीय तृतीयसप्तकका निषाद उतरा लगता है सोरठके तुल्य। सरगम यथा-स गग म प नी पनी सा सा रेसा गरेसा गग मम पप नीसा नी पम गम प गम पनी सा गरे सा नी ध प गम गरे सा।

गव-डिड डा डिड़ डाड़ा डाडाड़ा डाडाड़ा डाडिड़ डा डाड़ा।

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रागाध्याय। ७५

तोड़ा-डिड़ डा डिड़ डाड़ा डा डाड़ा डा डा ड़ा डाडिड़ डा डाड़ा।।१।। = ६ ४ ३ १ २ 00 इसके अवरोहमें 'प ग म ग रे सा' इस प्रकारसे चलना चाहिए। आरोहमें ऋषभ धैवत वर्जित हैं।

२ अथ भीमपलासी भीमपलासी संपूर्ण रागिनी है इसमें सबी सर उतरे लगतेहैं इसके आरोहमें ऋषभ धैवत छूट ही जातेहैं अवरोहमें लगतेहैं अवश्य किन्तु अल्पही। गंधार पंचम निषाद ये इसमें प्रधान हैं। यह गंधारपर मध्यम तथा पंचमकी और पंचमपर निषादकी मींडको बहुत चाहतीहै। इसके अवरोहमें चढ़े ऋषभकी भी छूतछात ज़रासी होजातीहै। अवरोहमें ऋषभपर गंधारको मींडना चाहिए। यह बहुत प्रसिद्ध रागिनी है। सरगम यथा-नी नी सा सा ग म प म गरेसा। नी नी सानी ध पप सा गसा गम थम गम प सा नी ध प म ग रे सा। मप ध प म ग मसा सा नीनी ध प म ग म गग रे स नी सा। ग म प ग म प नी प नी सा ग रेसा नी ध प म ग रेसा मग रेसा इत्यादि।

स गत-डा डिड़ डा ड़ा डा डिड़ डाड़ा डा डाड़ा डिड़ डा डिड़ डाड़ा १६६ ६ 8 ६=६ U (मम) तोड़ा-डा डिड़ डाड़ा डाडिड़ डाड़ा डा डाड़ा डिड़ डा डिड़ डाड़ा १३ 8 ११

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७६ संगीतसुदर्शन- ३ सय मुलतानी मुलतानी संपूर् रागिनी है इसमें ऋषभ गंधार धैवत ये उतरे और मध्यम निषाद ये चढ़े लगतेहैं यही इसका भीमपलासीसे भेद है और सब बात भीमपलासीके तुल्य है ये दोनों रागिनिये बहुत उत्तम हैं। यह सितारमें टोड़ीके ठाठपर बजती है। सरगम यथा-मप धपम गरेसा, नीनी सा गम पंघ पमगमपनीसा नीधपम गरेसागनी सा पनी सा। गम पम गम पनी सा नीसा रेसा नी ध प म नी धनी प ध प म गम गरे सा, इत्यादि। स मी१ गत-डाडा ड़ा डिड़ डा डिड़ डाड़ा डाडाड़ा डिड़ डा डिड़ डाड़ा। २ २ इ 9099 तोड़ा-डा डिड़डाड़ा डा डिड़ डाड़ा डा डा ड़ा डिड़ डा डिड़ डाड़ा ६ < १०११ यह मुलतानी धुरपतियोंकी है, ख़यालियोंकी मुलतानीमें गंधार चढ़ा लगताहै यही विशेष है और सब इसीके तुल्य है। ४ अथ सिंधूरा सिंधूरा संपूर् रागपुत्र है इसमें ऋषभ धैवत चढ़े और गँधार मध्यम निषाद ये उतरे लगतेहैं। इसके आरोहमें गंधार और धैवत वर्जित हैं। सरगम यथा-सा नी सा रेमप ध प म प नी सानी ध पम गरे सा। समप ध प पम गरे सा,सा नी ध प नी सा, रेमपप घ प मम प नी सा रेसा म गरे सा गरेसा नीसा सानी धपम सेबन न्म गरेम गरेसा।

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रागाध्याय। ७७

स गत-डाडा ड़ा डिड़ डा डिड़ डा ड़ा डा डाड़ा डिड़ डा डिड़ डा ड़ा। 8 ३ २ ३ 8 १०११ U तोड़ा-डा डिड़ डाड़ा डा डिड़ डाड़ा डाडा ड़ा डिड़ डा डिड़ डा ड़ा १३ ११ १०८ ६ ४ ३२ ३ ४ ६ = ६ १०१९ मेरे पास गतें अद्वितीय बड़ी बड़ी भारी हैं किन्तु उनका यहाँ लिखना व्यर्थ हे क्योंकि बिना सीखे वाँचनेमात्रसे वे हाथसे निक- ल नहीं सकतीं। मैंने यहाँ दिनके एकबजेसे लेकर चारपाँच बजे तककों 'धानी भीमपलासी मुलतानी २ सिंधूरा' ये चार राग रागिनी लिखी हैं इनके सिवाय इससमयकी एक दो और भी हैं। अमृतमंजरीमें ऋषभ धैवत नहीं लगते गंधार मध्यम निषाद ये उतर लगते हैं भीमपलासीके तुल्य है। अपने उस्ताद मीयां अमृतसेनजीके नाम- पर मैंने ही इसकी कल्पना कीहै।

अब मैं दिनके तीनबजेसे सूर्यास्तके समयतककी कुछ रागिनि- योंको अकारादिक्रमसे लिखताहूँ। पीलूके सिवा इन और सब रागिनियों को परज और सोहनीसे बचानेका यत्न करना चाहिये। 'सारेसा' इत्यादि तान लेनेसे इनमें परज तथा सोहनी आकूदती है।

१ सथ गौरी गौरी रागिनी संपूर्ष है इसमें ऋषभ धैवत उतरे लगतेहैं और गंधार मध्यम निषाद ये चढ़े लगतेहैं। इसके आरोहमें ऋषभको नियमेन छोड़ देतेहैं कभी कभी पंचमको या वैवतको भी छोड़देते

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७८ संगीतसुद्र्शन-

हैं। यह रागिनी अताइयोंमें बहुत प्रसिद्ध है। प्रायः लोग इसे चारबजेके अनंतर ही गाते बजातेहैं। सरगम यथा-सा रेनी सा ग म प म प म गरे सा नी सा गरे सा। गग मप ध मपध म ध नी सा गरेसा नी ध प मग गम पनीध प म गरेसा। स गत-डा डिड़ डा डा ड़ा डिड़ डा डिड़ डाड़ा डाड़ा डा ड़ा डाड़ा। 90 94 99 3 ६ १० ११ १० १२ ११ ६ १०१९

तोड़ा-डा डिड़ डाडाड़ा डिड़ डा डिड़ डाड़ा डाड़ा डाड़ा डाड़ा ।।१। ६६ १०१० ६ 9 २ सय जयश्री जयश्रीको आजकल्ह कोई लोग जैतश्रो तथा जैतसिरी भी कहतेहैं। यह रागिनी बहुत उत्तम तथा कुछ अप्रसिद्धसी है और कठिन भी है इसमें ऋषभ धैवत उतरे और गंधार निषाद चढ़े लगतेहैं। कोई उस्ताद कहतेहैं कि इसमें मध्यम वर्जितहै इससे यह षाडव रागिनीहै, कोई उस्ताद कहतेहैं कि इसमें चढ़ा मध्यम थाड़ा लगता है इससे यह संपूर्ण रागिनी है। इसके आरररोहमें ऋृषभ धैवत नहीं लगते मध्यम भी प्रायः नहीं लगता। यह गंधारपर पंचमकी और पंचमपर धैवतकी मोंडको बहुत चाहतीहै। सरगम यथा-प धध ग रेसा प ध नीसा। सा ग प धध गरे सागपधध पम गरे सा। म प नी सानी ध प म गप धप म गरे सा। गम पम गसा ग प घध प म गरे सा इत्यादि। यह संपूर्ष मवकी सरगमहै। अवरोह में धैवत निषाद अल्पहैं।

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रागाध्याय।

मध३ग रस म ध मसगपथ ३ पम गरस गप पथ मगरेसा पद यथा-माई आवत लाड़ गहेली कमल फिरावत ॥ १ ॥ (इसपदपर जहाँ जहाँ (ध ३) यह चिह्नहै वहाँ वहाँ धैवतकी तीन तीन लचकहैं) मी१ मी१ मीर गत-डिड़ डा डिड़ डा ड़ा डाडाड़ा डिड़ डा डिड़ डाड़ा डाडाड़ा।१। ५ ७ ६६६ ११ tuy ३ अथ तिरवन तिरवनमे ऋषभ धैवत उतरे और गंधार मध्यम निषाद ये चढ़े लगतेहैं। यह ऋषभको बहुत चाहतीहै, इसमें पंचम बहुत ही कम लगताहै। एकप्रकारसे वर्जित के तुल्य ही है। अवरोहमें गंधार वर्जितहै इसमें मध्यमसे इकदम ऋषभपर आना चाहिये यही तान इसकी प्राय है। यह ब्रीराग और गूजरीके मेलसे बनी प्रतीत होतीहै। सरगम यथा-म रेरे गरे सा नीसा रे ग रे सा मरे ग रेरे सा रे। पधनी रेसा नी धप मेरेसा म प रेगरेसा। मम रेनी सा म रेसा पसा रेसा गरेसा मप ध मध नीसानी ध म ध म ध पम रेसा रे।। मी१ सू सी१ मी१ गत़-डिड़ डा डिड़ डा ड़ा डाडाड़ा डाडाड़ा डाडिड़ डा डा ड़ा ।।१।। १0 १९ 9 8 90 90 90 90902₽ 90 90 90 90 99* ११ ११ मी१ मी१ मी मी९ मी१ मी१ मी१ तोड़ा-डिड़ डा डिड़ डाड़ा डाडिड़ डाड़ा डाडिड़ डाड़ा डाडाड़ा ।।१।। 8 ९० ११ .x. है ड

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50 संगीतसुदर्शन- ४ अय धनाश्री लोग इसे धनासिरी भी कहतेहैं यह संपूर्ण रागिनी है। धनाश्रीका पंजाबमें अधिक प्रचार है किंतु कुछ मनमाना ही गाते बजाते हैं वस्तुगत्या पंजाब का उत्कृष्ट गानाबजाना भी अताइयोंके तुल्य ही है। धनाश्रीमें ऋषभ धैवत उतरे और गंधार मध्यम निषाद ये चढ़े लगतेहैं। इसके आरोहमें ऋषभ धैवत वर्जित हैं अत एव इसकी चाल मुलतानीके तुल्य है। सरगम यथा-नी सा नी रेसा गग मप म गरेसा साग मप नी सानीसानीध प म गरेसा। गग मम पध पम गरे सा। नीनी सा रेसा गरेसा नी धपम पध पम ग पमग रेसा, इत्यादि। स गत-डिड़ डा डिड़ डाड़ा डाड़ा डाड़ा डाड़ा डा डिड़ डा डा ड़ा ।।१।। E 9 € 9099 999₹ 99 9099 90 93 99 € 9 तोड़ा-डिड़ डा डिड़ डाड़ा डाड़ा डाड़ा डाड़ा डा डिड़ डा डा ड़ा ।।१।। ७ ६ १०११ ६७६ ४ ५६१० १२ ११ ६७ ५ सथ पीलू पीलूको अताईलोग ही विशंषकर गाते बजातेहैं वस्तुगत्या पीलू- में गज़ल ठुमरीके ही विशेष गाते हैं ख़याल वा घुरपतका इसमें प्रचार नहीं, इसीकारण इसके खरोंका पूर्ण कुछ नियम नहीं सबी- प्रकारके स्वरोंको इसमें लगादेतेहैं, अताइयोंमें यह बहुत प्रसिद्ध है। मथुराके मृत सेठ सी. आई. ई. राजा लक्ष्मणदासजीको यह बहुत प्रिय था। इसमें ऋषभ चढ़ा ही विशेष लगवाहै किंतु उतरे ऋषभक्ी भी छूतछात है, गंधार धैवत उतरे हीहैं, निषाद चढ़ा है। मध्यम

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रागाध्याय।

दोनों प्रकार का लगताहै यह गतमें स्पष्ट है। धैवत इसमें बहुत ही कम लगताहै, मध्यम भी कम लगताहै, निषाद और गंधार इसके प्राथ हैं। सितारमें यह काट कतर ही ज्यादा चाहताहै। लोग इसे रात्रिमें भी गातेबजातेहैं। सरगम यथा-रे सा नी नी सा रे गा रेसा सानी पधू प सूप नी सा। गरे गम् सा नी सारे गग रे सा नी घपसा नी पनी सा। मप नीसा नी सा रेग गम गरे सा नी पध पम गरे सा नी सारे ग गरे सा नीनी सारे सा, इत्यादि। स गत-डिड़ डा डिड़ डा ड़ा डाडाड़ा डा डा ड़ा डा डिड़ डा डा ड़ा १० १६१७१६१२१२ ११ १२१०१११२६१०१२१० ११ १५ ११ ११ ११ ११ ११ १२ १० 4 ६ अरथ पूंरवी पूरवी संपूर्स रागिनी है इसमे ऋषभ उतरा लगताहै, गंधार धैवत निषाद ये चढ़े लगतेहैं, मध्यम दोनोंही लगते हैं उनमेंसे चढ़ा मध्यम अधिक लगताहै और आरोहावरोह दोनोंमें स्पष्ट लगताहै, उतरा मध्यम अवरोहमें 'गम ग' इसीप्रकार अल्पसा लगता है। यह रागिनी बहुत ही उत्तम तथा सुकुमार और खृब फैलकर गाने बजाने योग्य है। चतुर्थ प्रहरकी रागरागिनियोंमें यह सर्वोत्कृष्ट है, लोग इसे घड़ीभर रात्रि जाते तक भी गावजा लेतेहैं। इसके आारोहमें कभी कभी षभ तथा पंचमको छोड़ भी देतेहैं। यह चुरपतियोंकी पूरवी का वृत्तांत है, यह पूर्व देशमें उत्पन्न होनेसे

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द२ संगीतसुदर्शन-

पूरवी कहातीहै इसीसे संस्कृतके संगीत प्रंथोंमें इन रागोंको देशी राग कहाहै। मी१ गत-डिड़ डाडिड़ डाड़ा डाडाड़ा डिड़ डा डिड़ डाड़ा डाडाड़ा। १० १०१२ ११ १०६८६६ ७६१०१०११ ११ मी१ तोड़ा-डिड़ डाडिड़ डाड़ा डा डिड़ डाड़ा डा डिड़ डाड़ा डा डाड़ा । १। ह ७५ ४३२ ३ ४५६ ७ ६६ ६१०११

सरगम यथा-ममम गगरे गमध मगरे सा। सा नी गरे गम ग मम गग रेरे गमप मध नी रे नीरे सा नी धप म गरे सा। म ध प ग म ध मम सा रेसा गरेसा ग मप म गरे सा। नी ध प म म घ म पम गरे सा। म ध म ग म पध नी सा नी ध प म ग म गरे सा, इत्यादि। 9 य पूरियाधनाश्री पूरियाधनाश्री संपूर्ण रागिनी है, यह बड़ी कड़ी रागिनी है। इसको उत्तमरीतिसे गाना बजाना प्रत्येक कारीगरका भी काम नहीं। इसमें ऋषभ धैवत उतरे और गंधार मध्यम निषाद ये चढ़ें लगते हैं, इसके आरोहमें पंचम निषाद बहुत कम लगतेहैं, यह गंधार पर पंचम मध्यमकी मौंडको ज्यादा चाहतीहै। मानों वसंत की बहिन है। सरगम यथा-नी ध ध प मम गरे ग प म धध प म गर सा। नीसा रेग म प गग मम प म ध सा नीसा नी रेसा गरे सा नी ध नीसा नी घघ प म गम गप म गरे सा। ग भम घ सॉ गरे सा नी घसा नी ध प म गरे सा।।

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रागाध्याय। ८३

य म न गरेसा रेग मधसा धत्ता निधयनगरे गरेसा पद यथा-इन बतियां प्रथ प्रिया की. कीनी।

गनधप वसा निधम धम चप म गरे सा रेग गम थ धसानी धम घ प गरे गरेसा श्रवम परत जिन हिय हुलसायो दुख खोयो रस भीनी।। यह पद मेरे बनाए अनर्धनलचरित्र नाटकका है, इसमें तानें मीयाँ अमीरखाँजीने रक्खी हैं। इसकी गतें बहुत टेढ़ी हैं। मीर मी२ मीर मीर, गत-डिड़ डा डिड़ डाड़ा डाडाड़ा डाडाड़ा डाडिड़ डाडाड़ा।I १० ११ १२१०९ ९६७ ७६ ६१०११ w

मी१ मीर तोड़ा-डिड़ डा डिड़ डाड़ा डा डिड़ डाड़ा डा डिड़ डाड़ा डाडाड़ा। ७५५३ १ २ ३ 6 ५ ६७ ६१०११

८ सय मारवा मारवेमें पंचम वर्जित होनेसे यह षाडव रागपुत्र है। इसमें एक ऋषभ उतरा लगताहै और सब स्र चढ़े लगतेहैं. इसके आरोहमें षडजका छोड़ देतेहैं। यद्यपि अताइयोंमें यह प्रचलित नहीं तथापि इसके गाने बजानेमें विशेष कुश नहीं। सरगम यथा-मध मध मगरे सा, रेसानी ध म मध नी सा। नीरे गम गम ध म घ,नी सा नी गरे सा नी ध म गरे सा। गग मम धध मध सानी रेसा नीरे ग म धम गम म गरेसा, इत्यादि। स गत-डिड़ डा डिड़ डाड़ा डाडाड़ा डिड़ डा डिड़ डाड़ा डा डाड़ा।१। Y GY ७ १० ६ ७ ६ १०११

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संगीतसुदर्शन-

तोड़ा- डिड़ डा डिड़ डा ड़ा डा डा ड़ा डिड़ डा डिड़ डा ड़ा डा डाड़ा ।१। १० १२ १४ १७१४१२१०६७५४ ५७९१०११ ३ यह गत मेरी ही बनाईहै सीधी है।

स्य मालश्री आाजकल्ह कोई लोग इसे मालसिरी भी कहतेहैं, इसमें ऋषभ चर्जित होनेसे यह षाडव रागिनी है यही इसका जयश्रीसे विशेष भेद है। इसमें धैवत उतराहै, गंधार मध्यम निषाद ये चढ़े लगतेहैं, कोई उस्ताद लोग कहते हैं कि इसमें धैवत भी चढ़ा ही लगताहै, असलमें धैवत उतरा ही लगाना चाहिये ऐसा ही मीयॉ श्री अरमृतसेनजीने बतायाहै। सरगम यथा-गस स सानीसागम पध ध म ग सा। गम गप म म धप धप म ग मग सा। गग म ध प म प ध नी सा ग सानी ध प म ग मग सा। पप धध ममग गम धप सा गसा नी घ प म ध म ग सा।।

मीर मी२ मीर गत-डिड़ डा डिड़ डाड़ा डाडाड़ा डिड़ डाडिड़ डाड़ा डाडाड़ा॥I १२११६६६ ७५६५ ६७ ६६ ६ ११ सा ग म् पध पमग साग प चम गप गसा पद यथा-अखियाँ काहू की काहू सों ना लगें। गप चसाग स पध मगसा निंसगम यपथ पथ गपगस मिल बिछुरे ते दोष दूनों निसदिन सोवें न जगें ॥ १ ॥

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रागाध्याय।

१० अथ मालीगौरा यह संपूर्ष रागपुत्रहै इसमे ऋषभ उतराहै, प्रथमसप्तकका धैवत चढ़ा लगताहै और द्वितीय तृतीय सप्कका धैवत उतरा लगताहै, गंधार मध्यम निषाद ये चढ़े लगतेहैं। यह प्रायःअप्रसिद्ध राग है। इसके आरोहमें पंचम नही। तो ती सरगम यथा-सा नी रेसा नी ध प म ध नी रेसा। सा रे ग म ध नी सा रेनी सा गरे सा नी ध प मगरे सा। गग मम धसा नीध पम धम ग मग रेसा। पम धम ग ध पम सानीरे सा नी धप म धम गरे सा। स

गत-डिड़ डा डिड़ डाड़ा डाडाड़ा डा डाड़ा डा डिड़ डा डाड़ा ।।१। ११ १२१० १२१४ १६ १७ १४ १२ १० १० ११ तोड़ा-डिड़ डा डिड़ डाड़ा डा डिड़ डाड़ा डा डिड़ डाड़ा डा डा ड़ा । १। ७६१०१११७१४१२१०६७५७६१०११ ११ अथ वराड़ी वराड़ी रागिनी संपूर्ण है, लोग इसे टोड़ीका भेद कहतेहैं, इस में ऋषभ धैवत उतरे और गंधार मध्यम निषाद ये चढे लगतेहैं, कोई उस्ताद कहतेहैं कि इसमें उतरा भी मध्यम लगताहै उसका यह प्रकार है कि किसी अंतरेके आरंभमें उतरा मध्यम लगाकर ऋषभपर आजाना चाहिए। इसमें ऋषभ प्रधान है। इसके आरोहमें प्रायः गंधारको छोड़देतेहैं और कभी पंचमको कभी धैवतको कभी निषाद को भी आरोहमें छोड़देतेहैं अर्थात् कभी 'म ध सा' कभी 'मप ध

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संगीतसुदर्शन- सा' कभी 'मधनी सा' इसप्रकार बढ़ना चाहिये। यह श्रोराग और टोडोके मेलसे बनी प्रतीत होतीहै। सरगम यथा-नीनी रेग रेरे सा नोनी रेरे सप धम प स गर सा नी रे। मरे पम गरे सा प ध नी सा रे सा रे नी सारे गरें सा। गग मम सा नीरे सा सारे गरे सा नी ध प धध म पम गरे पम ध पम रे पम गरे मा। मी१ मी१ गत-डिड़ डाडिड़ डाड़ा डाडाड़ा डिड़ डा डिड़ डाड़ा डाडा ड़ा ||१।। १० १०७७१०६१०१११११२ १२ १११०१०१०११ रे नी रेस-गर नीध प म रे रेग * पद यथा-पी मन ले काहं रिसा ने। मको रेसा रे प थ मीसा रेस रेसा रेमा रे-गस रे-ग शसारे प्रेम सागर तुम कोमल हीके कौन हेतु निठुराने। अंतरेका 'कौन' पद द्वितीयसप्तकके रे मा पर है। यह रागिनी बहुत उत्तम है ऋषभपर गंधारके भटकेको बहुत चाहती है। १२ अय श्रीराग श्रीराग छः रागोंमेंसे एक राग है संपूर्ग है, इसमें ऋषभ धैवत उतरे गंधार निषाद चढ़े और मध्यम दोनों लगतेहैं किंतु विशेषकर चढ़ाही मध्यम लगताहै उतरा मध्यम इसमें लगाना कुछ चातुर्यका काम है नहीं तो राग बिगड़ जाएगा। इसके आरोहमें गंधार धैवत वर्जित हैं तो भी उस्ताद लोग कभी कभी आरोहमें पंचमको छोड़ धैवतको लगा भी देतेहैं। इसमें ऋषभ प्रधान है। इसमें ऋषभसे ऋषभ पर ऋपभसे मध्यम पंचमपर मध्यमसे पंचमसे ऋपभपर

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रागाध्याय।

यथायोग्य आना जाना चाहिये। इसरागको सरोवरादि जलाशयके तटपर गाने बजानेसे कुछ अधिक चमत्कार होताहै ऐसा उस्तादसे सुनाहै। सरगम यथा-नी सा रेप गरे रे गरे सा। रे मप नी धप गम मग रेरे गरे सा। रेरे म प गरेम्प मप धप नी सा रेरे सा नीरे साग रेरेसा। नी. ध पप म गरे सा। सा रे ग ररे प मम ध पप नीनी रे सा रे-रे गरे सा। स मी१ गत-डिड़ डा डिड़ डाड़ा डा डिड़ डाड़ा डा डिड़ डा ड़ा डा डा ड़ा। ६ ७ ६ १०१११०६ ७ ६७ ६१०११ मी १मी१ तोड़ा-डिड़ डा डिड़ डा ड़ा डा डिड़ डाड़ा डा डिड़ डा ड़ा डा डा ड़ा । १। २ ३ ४ ५५७२ २१० १२१०१०१०१०११

सैनियोंके स्वरसागरमें श्रीरागकी देवता पृथ्वी. पटरानी गौरी. हरितवर्स है ऐसा कहाहै, यथा- "गौरी गौरा नार, नीलावती विहागरो। विजयंतीसा प्यार, षटी गिनलै पूरिया। गौरीसुत कल्याय अहीरी वाकी नारी। गौरासुत है गौर टंक वाकी अधिकारी।। तनैना नीलापुत्र सिवाड़ा वाकी कहिये। सुत विहागकौ हेम विहंगम वाकै रहिये।। विजय ती सुख खेम (चेम) वधू बाल छामावत। पुत्र पूरिया नाट मांभ भरतार कहावत।।" इसप्रकार गखेशमतसे श्रीरागका परिवार भी सवरसागरमें कहाहै।

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संगीतसुदर्शन- בל

मैंने यहाँ दिनकं तीनबजेसे लेकर सूर्यास्ततककी गौरीसे लेकर श्ररागपर्यत ये बारह रागरागिनी लिखेहैं, इनके अतिरिक्त कुछ औरर भी इससमयकी धवलश्रो श्यामकालंगड़ा प्रभृति रागिनी हैं वे यहाँ नहीं लिखीं 'सर्वे दद्यात् कदापि न'। यह भी जान लेना कि विद्या नाशमें क्षति केवल आगेके जिज्ञासुओंकी और देशकी है विद्वानोंकी कुछ क्षति नहीं इसकारगभी विद्रानोंको विद्याप्रदानमें कुछ कार्पण्य होजाताहै।

अब मैं सूर्यास्तके अनंतर दीपक जलनेके कालसे रातके दश बजेतककी कुछ रागिनियोंको अकारादि क्रमसे लिखता हूँ। १ सथ इमन इमन संपूर्ण तथा बहुत सीधी रागिनी है इसमें सभी सवर चढ़े लगतेहैं। इसमें लिखनेयोग्य और विशेष कुछ नहीं चाहे जैसे चलो। कभी कभी आराहमें षड ज को छोड़ भी देते हैं, इसमें निषाद की बहुत खपत है। सरगम यथा-सारेग म प पम गरेसा नी धप म पप ध नीनी रेसा। सारे गग म पप धनी सा रेसा नीरे सा गरेसा गमप पम गरे सा रे नी सा नीनी ध पप गग पम गरे सा, इत्यादि। स गत-डिड़ डा डिड़ डा ड़ा डा डा ड़ा डा डा ड़ा डिड़ डा डिड़ डा ड़ा ।।१।। तोड़ा-डा डिड़ डा ड़ा डिड़ डा डिड़ डा डिड़ डा डिड़ डा डिड़ डाडाड़ा १ २ ३ ४ १२ १११० ६७ ६ ५४ ३ ६ १०११

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रागाध्याय।

टा डिड़ डा डिड़ डा ड़ा डा डा ड़ा डा डिड़ डा ड़ा डाडाड़ा ।।१॥ ६ १० ११ १०६६७६ ४ ५ ६७१०११ १२ ह

२ स्थ इमनकल्याणा

इमनकल्याय संपूर्ण और उत्तम सुकुमार रागिनी है। इसमें मध्यम दोनों लगतेहैं और सब स्वर चढ़े लगतेहैं, आरोहावरोहमें चढ़ा ही मध्यम लगताहै, उत्तरामध्यम थोड़ासा 'गमग' इस प्रकारसे लगताहै। इसका और इमनका केवल उतरे मध्यमसे ही भेद है और कुछ भेद नहीं। सरगम यथा-सारेगमपधनीध नी नीध पगम ध प म गम गरे सा। गम प ध नी रंसा गरे सा पम गरे सा। गग मप नी धनी सा रेसा गरे गरे सा नी धप नीनी धप म ग पप म गरे सानी रेसा, इत्यादि। स गत-डिड़ डा डिड़ डा ड़ाडाडा ड़ा डा डा ड़ा डा डिड़ डा डा डा। ४ ५७ ५६ ६८ ६ १०१०६ ६ ६ ६ १० ११ ७

तोड़ा-डिड़ डा डिड़ डाड़ा डा डिड़ डा ड़ा डा डिड़ डा ड़ा डा डा डा ।।१। ३ ४४ ६१०६६ ५४५ ६ ७ ६ ६१०१९

प्रधान कल्यासको शुद्ध कल्याय कहतेहैं इस कारम उसे आगे लिखूँगा। ११

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संगीतसुदर्शन-

३ अय कामोद कामोद संपूर्ण रागिनी है इसमें मध्यम दोनों लगतेहैं और सब स्वर चढ़े लगतेहैं। चढ़ा मध्यम कम है, और आरोहमें धैवत भी कम है, जरा भी चूकनेसे इसमें छाया आकूदती है। अवरोहमें केदारेके तुल्य गंधारपर उतरे मध्यमके दो भटके (मींड) देने चाहिये. गंधारपर उतरामध्यम वुलाकर ऋषभपर आ्रानाचाहिये और ऋषभसे इकदमपंचमपर जानाचाहिये यही इसका तत्व है। ती स सरगम यथा-सानी रेसा रेरे पप मप ध प म गम् गम् रे सा। मानी ध पप सा रेसा रे प मप सा रे सा नी धप म गम् गम् रे सा। गग रे सा नीरे सा नी ध पप स पम ग प सा नी प सा रे प म गरे सा नी ध पम गम् गरे सा, इत्यादि। सी9 मु मी १ गत-डिड़ डा डिड़ डा ड़ा डा डिड़ डा ड़ा डाडिड़ डाड़ा डाडाड़ा। ११ १२ १० १० ६ = १० ११ १० W ६ १० ११ 99 मी१ मी१ तोड़ा-डिड़ डा डिड़ डाड़ा डाडिड़ डाड़ा डाडिड़ डाड़ा डाडाड़ा।।१। ६ है ६ ६६ १० 4

४ सथ केदारनट

कोई लोग इसे नटकेदार भी कहतेहैं यह नट और केदाराके संयोगसे बनाहै अत एव इसके आरोहमें ऋषभ नहीं लगता। मध्यम दोनों पूर्वोक्त कामोदके तुल्य लगतेहैं और सब स्वर चढ़े लगतहैं। आरोहमें धैवव कम लगता है। संपूर्ण जाति है।

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रागाध्याय। ६१

सरगम यथा-सानी रेसा गम पध प मप म गम् गम् गरेसा। स गम पप नी ध प म प ध प म पम गम् गम् रेसा। सा मम प गम पूध मप नी पसा गसा रेसा पसा नी धप मप धप मम गम् गम् रे सा। खरज स मी१ गत-डिड़ डा डिड़ डाड़ा डाडिड़ डाड़ा डा डिड़ डा ड़ा डा डा डा । १६ १७ १४१६ ० 99 99 U मो१ वोड़ा-डिड़ डा डिड़ डा ड़ाडा डिड़ डाड़ा डा डिड़ डा ड़ा डा डा डा ।। १ ।। ६ ६८६३४ २ ३ ४ ५ ६ ८ ६ ६ १०११ इसगतमें १४ पड़देपर जो (डा) है इसे पीतलके तारोंपर बजाना.

पीतलके तारोंको दूसरीअंगुलि (मध्यमा) से दबाना चाहिये, ऐसा करनेसे यहॉ चढ़ागंधार बोलेगा।

५ अथ केदारा

केदारा संपूर्ण है इसे दीपककी रागिनी कहाहै। इसमें षड्जसे एकदम उतरे मध्यमपर जानाचाहिये यही इसका कामोदसे भेद है और सब कामोदतुल्य जानना। उतरामध्यम इसका प्राय है। सरगम यथा-पध प गम पप सा मम गगरे नी ध पप सा। मम गग पध पम गरे सा सारे सा। गगग पप सा गसा पम सा मम पप सा नी धप मम प मरे सा। सा म सा मम पध पनी प सा रेसा मसा नी ध पम ध पम पम गम् गम् रे सा।

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संगीतसुदर्शन-

मी१ स मीहू ह मी१ मी९ गत-डिड़ डा डिड़ डाड़ा डाडाड़ा डिड़ डा डिड़ डाड़ा डाडाड़ा। 99 92 90 99 ११ ६ ६ ६ १० U n मी१ मी मी१ मी१ मी१ तोड़ा-डिड़ डा डिड़ डाड़ा डा डिड़डाडा डा डिड़ डा ड़ा डा डा ड़ा।।१।। 99 6 ३ 8 ५ ६ ७ ६६ १० केदारे चारप्रकारके हैं ऐसा लोग कहतेहैं यथासंभव और भेदों को आगे क्रम प्राप्त होनेपर लिखूंगा। मुझे तीन ही केदारे मालूम हैं। लोग इसीकेदारेको चांदनीकेदारा कहतेहैं, यह चंद्र- प्रकाशमें गानेबजानेके योग्य है। मीयां अमृतसेनजीकी केदारेकी एकतान से चंद्रिकामें कुछ अधिक चमत्कार प्रतीत हुआ यह मैं स्वानुभूत लिखताहूँ। ६ अथ खमाच खमाच संपूर्ण रागिनी है इसमें मध्यम और द्वितीयस प्रकका निषाद ये उतरे लगतेहैं प्रथमसप्नकके निषाद दोनों लगतेहैं औ्रर सब खर चढ़े लगतेहैं। इसके आरोहमें ऋषभ नहीं लगता यही इसका सोरठसे विशेष भेद है। यह वेश्याओंमें बहुत प्रसिद्धहै ठुमरीकी रागिनी है, घुरपत इसमें कभी सुना नहीं। सरगम यथा-गम धप सा नी ध प म गम गरे सा। गग मप धसा नी धप धनी सारे सा गरेसा नीसा धनी पध मप नी धनी पम गरे सा इत्यादि। स मी९ क गत-डा ड़ा डा ड़ा डा ड़ा डा डिड़ डा डा ड़ा डिड़ डा डिड़ डा ड़ा। ३४४ ३yE२४ ५६८६ ८८ ६y'" ४ ४₹

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रागाध्याय। ६३

तोड़ा-डा डिड़ डा ड़ा डा डिड़ डा ड़ा 'डाड़ा डाड़ा डाड़ा डाड़ा ६८ ६१०११६८ ६ ६८६५ ४३२१ डाड़ा डाड़ा डाड़ा डाड़ा ।।१।। १२३४५६८६ ' इसचिन्हके भीतरके बोल दुगुनमें लेने। यह गत बहुत उम्दा है, मीयां अमृतसेनजीके पुत्र निहालमेनजीकी बनाईहै। 9 पथ गारा गारा संपूर्ण रागिनी है यह भी खमाचके तुल्य ठुमरीकी रागिनी है अतएव इसकी आरोहावरोही कुछ नियत नहीं। इसमें मध्यम उतरा और सब स्वर चढे लगते हैं। इसमें ऋषभपर कुछ जादा ठहरतेहैं कभी आरोहमें ऋषभसे इकदम पंचमपर चले जातहैं कभी आरोहमें ऋषभको छोड़ भी देते हैं 'स ग म प' 'सा रेरे पम गम् रेगू सा' ये तानें इसकी अधिक प्रधान (व्यंजक) हैं। सितारमें यह काट कतर बहुत चाहती है। आरोहमें धैवत कम है। ऋषभ निषाद इसमें प्रधान हैं। सरगम यथा-ध नी प ध प नी रे नी धनी सा रेरे प मप गम् रेग सा। सानी सा गम रे गम परे पम गग रेसा। गम पनी सा रेरैसा गरे सा नी. रे सानी धप म गरे नी सारे प मपू गम् रेगू सा। सम गत-डा ड़ा डा डाड़ा डिड़ डा डिड़ डा ड़ा डाडा ड़ो डा डा ड़ा। ११ १२१११० १२ १०१०६८६१०१११०१११२

तोड़ा-डा डिड़ डा डा ड़ा डिड़ डा डिड़ डाड़ा 'डाड़ा डाड़ा डाड़ा : ६ 8 ९ 8 १२ ३४ ५६

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संगीत सुदर्शन-

डाड़ा डाड़ा डाड़ा'I। $6 290 999⑈ ' १ इस चिन्हके भीतरके बोल दुगनमें बजाने।

द परथ छाया

छाया संपूर्ग तथा बड़ी उत्तम और सुककुमार रागिनी है इसको विशेष कालतक गानाबजाना कुछ कठिन है। इसमें मध्यम उतरा और सब स्वर चढ़े लगतेहैं इसके आरोहमें मध्यम कम है। ऋषभसे पंचमतक तथा पंचम से ऋषभतक की घसीट इसकी प्राप है। अवरोहमें कभी मध्यम छोड़देतेहैं कभी गंधार मध्यम दोनों को भी छोड़ देते हैं।

सरगम यथा-नी ध प म ग रेसा नीसा रेरे गम् पप गरे सा निसा रेसा गरे सा नी प सा रेरे गूम् पप नीनी धप सा गरे सा नीध प रेरे गमूप गरे सा। गमग पर ग र सरेगरेस रेग्मूप रेगरेसा पद यथा-जाके हिय न राम वै देही। गप नी सा नी रेसा परग्म्प रेगरेस गपनीसा नीरेसा प रेगूस्प रेगरेसा तजै वाहि कोटि शत्रु सम यद्यपि परम स ने ही। 'नीनी ध परे रे गमूप प गरे सा' यही तान इसकी प्राय है मीयां शरमृतसेनजीकेलिये कहागयाहै कि 'छायापि यस्यासित सदा प्रशस्ता छायापद श्लिष्ट है। जयपुरनरेशरामसिंहजीने अमृतसेनजीसे कहकर छाया सुनी इनने भी उसदिन ऐसी छाया मनार्ड कि रामसिहजी जीवनपर्यंत न भूले।

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रागाध्याय।

नी१ मी१ मी२ का मी१ आ्रा गत-डिड़ डा डिड़ डाड़ा डाडाड़ा डाडाड़ा डाडिड़ डाडाड़ा। ११ 9₹ 90 9099 989990 90 E € € 9099

स मी१ १० मी१ तोड़ा-डिड़ डा डिड़ डाड़ा डाडिड़ डाड़ा डाडिड़ डाड़ा डाडाड़ा।।१। सू सू

१० १० ६ ५६४ २ ३ ५६ ६१०६१०११ १० ६ इस गत्त में जो ऋषभ से पंचम तक सूत है उसमें गंधार मध्यम भी लगते हैं। ट अथ छायानट छायानट संपूर्ण रागपुत्र है, यह छाया और नटके संयोगसे बनाहै, इसमें दोचार ताने नटकी और दोचार ताने छायाकी लेनी चाहिये यही इसका तत्व है किंतु यह संयोग कुछ कठिन है दालभातके संयोग सदश सहज नहीं। इसमें मध्यम उतरा और सब स्वर चढ़े लगते हैं, छायामें ऋषभ प्रधान है और नट में ऋषभ वर्जित है इसविरोधके कारण छायानटके आरोहमें ऋषभ छोड़देनाचाहिये। सरगम यथा-धध पप म गगरे सा रेसा गम गरे सा। गग पप सा सारेसा गम गरे सा सानी धप नी धप धप म ग पप गमू गरे सा। नीध परे गुम् प गरे सा साग मप धप म गरे सा रेरे गम् पप रे सा गूम गरे सा। छाया स नट गत-डिड़ डा डिड़ डाड़ा डा डा ड़ा डा डा ड़ा डाडिड़ डा डा ड़ा। ११ १० ११ १० ६ ६ 8 ५ ६ १०११ ६ ८ ६ ५ ६ W U

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६६ संगीत्सुदर्शन-

खाया नट

डिड डा डिड़ डा ड़ा डा डिड़ डाड़ा डा डिड़ डाड़ा डाडाड़ा ।। १॥ ६ १ २ = 8 ६ ६ १० = ६ ११ ६ ६ ११ १० L ह

यह गत मेरी बनाई है। १० पथ जैत (जय) जैत संपूर् रागिनी है इसमें सबी स्वर चढ़े लगते हैं, मध्यम बहुत ही कम लगता है सो भी अवरोहमें.आरोहमें मध्यम नहीं लगता एवं ऋषभको भी आरोहमें छोड़ देते हैं, यह षड्जसे पंचम तक और पंचमसे षड्जतक की सूतका बहुत चाहती है। वस्तु- गत्या यह शुद्धकल्याय और इमन इनके संयोगसे बनी है अत एव आरोहमें इसकी चाल शुद्धकल्याएके तुल्य है अवरोहमें इमनके तुल्यहै क्योंकि अवरोहमें निषाद और मध्यम थोड़ांसा लगजातेहैं। यह गंधारपर पंचमकी मींडको चाहतीहै।

सरगम यथा-सा पप सा गग गप पध प गपू गरे सा। सा गग प ग प धपम् गप गरे सा। सानी धनी रेसा नी ध प सा पसा। गग पसा सानी रेसा गग प गग रे सा. सानी ध पम् गरे सा गग प गरे सा सानी धप प सा।

स मी२ मो२ मी१ मी१ नी१ गत-डिड़ डा डिड़ डाड़ा डाडाड़ा डाडाड़ा डा डिड़ डाडाड़ा ।।१।। ११ १२' १8 १६ १९ ६ १२ १० १०१० १० A . ९६- गरेगरेसा गरेसा गप गरे पग गरेसा गप गप थ गरेसा धुरपत यथा-फकोरन वरीवरीबूंदन आयो ओ पानी। इत्यादि।

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रागाध्याय।

यह रागिनी कम प्रचलित है अच्छे विद्वानोंके गानेबजानेकी वस्तु है। ११ अथ तिलंग तिलंग रागिनी खमाचके ही तुल्य है, खमाचमें गंधारकी अपेक्षा मध्यम जादा है इसमें मध्यमकी अपेक्षा गंधार कुछ जादा है और आरोहमें धैवत वर्जित है कभी कभी आरोहमें धैवत निषाद दोनोंको भी छोड़देतेहैं, वस्तुगत्या ऋषभ और धैकत इसमें वर्जित ही है यही विशेष है। इसमें मध्यम निषाद उतरे और सब स्वर चढ़े लगतेहैं। आरोहमें ऋषभ भी वर्जित है अवरोहमें भी ऋषभ कम है। गंधार इसमें प्रधान है। सरगम यथा-सा गग म प सा सानी पप मग। नीनी सा नीप म गम पप सा गरे सासा नी प गमप नीप मग, इत्यादि। स सू मी १ गत-डाडिड़ डाड़ा डाडिड़ डा ड़ा डा डा ड़ा डिड़ डा डिड़ डा ड़ा । u मं ११ 3 8 U

सी१ स मी १ तोड़ा-डाडिड़ डाड़ा डाडिड़ डाड़ा डा डा डा डिड डाडिड़ डा डा। U WU w W U 8 8 00

१२ अथ तिलककामाद तिलककामोद भी खमाचके तुल्य ठुमरीकी रागिनी है इसीसे इसकी आरोही अवरोही कुछ नियत नहीं और यह काटकतरको साजमें बहुत चाहती है। यह कामोद और गाराके संयोगसे बनी

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संगीतसुदर्शन-

प्रतीत होती है क्योंकि इसकी कुछ चाल कामोद और कुछ चाल गाराके तुल्य है। इसके अवरोहमें निषाद उतरा और आरोह में निषाद चढ़ा लगताहै, कभी अवरोहमें चढ़ामध्यम भी जरासा लगा देतेहैं, उतरा मध्यम अच्छीतरह लगताहै, धैवत इसमें वर्जितप्राय है तो भी अवरोहमें जरासा चढ़ा धैवन लगादेतेहैं शेष ऋषभ गंधार चढ़े लगतेहैं। 'सा प म रे गसा' 'सा रेप म गरे सा इत्यादि ताने इसका प्राय हैं। सरगम यथा-गग सा नीसा रेसा पम ग रेग सा नीध पम प नी सा। सारे पम पनी सा रेसा नीधू पम पम गम रेग सा, इत्यादि। स का गत-डिड़डाडिड़ डाड़ा डाडाड़ा डिड़ डा डिड़ डाड़ा डा डाड़ा। ६१११२ ११ ५ F ८१०१०६८६ १० ११

१३ सथ नट नटमें ऋषभ वर्जित हैं इससे यह बाडव रागपुत्र है, इसमे मध्यम उतरा लगताहै और सब सर चढ़े लगतेहैं। यद्यपि यह प्रचलित कम है तथापि इसकी चाल सीधी है, कभी कभी आरो- हमें धैवत निषादको छोड़ भी देते हैं। कोई लोग ऋषभका भी स्पर्श इसमें करदेतेहैं। सरगम यथा-स गग म प ध प मप मग गंसा, नीसा नी घ प म प सा। गग मप ध पम ग मप मम पध पनी सा नी ध पसा गसा नी ध प म गसा गम गसा।

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रगाध्याय।

गत-डिड़ डा डिड़ डाड़ा डाडाड़ा डा डा ड़ा डा डिड़ डा डा ड़ा।

= ६ ११ ६ ६८६८६८६११ तोडा-डिड़ डा डिड़ डाड़ा डा डिड़ डा ड़ा डा डिड़ डा ड़ा डा डा ड़ा।

३ ३ ३ ४ १३३ ४ ५६= ६ ११

१४ सथ पहाड़

पहाड़ भी खमाचके तुल्य ठुनरीके योग्य है इसमें मध्यम नहीं है और सब स्वर चढ़े लगतेहैं। धैवतसे इकदम ऋषभपर षड्जसे गंधारपर ऋषभसे पंचमपर पंचमसे षड्जपर जाना तथा कतरतेहुए सुतसे जाना इसमें अधिक शोभाजनक है।

सरगम यथा-सा सारेग गरेसा. सानीसा। सानी ध ध रेरे सा। सारेग रेगप गप ध गप नी प सा ध रेरे सा सारे गसा। सरा निध प धपग पगरे गरेसा ध रेरे सा, इत्यादि।

स स

गत-डिड़ डा डिड़ डाड़ा डा डा ड़ा डाडाड़ा डाडिड़ डा डा डा ।।१।।

६ १०६१० ११ १२१२१४ १० ११ ११ ६ ११११ १०१०११ १०१२ ११

तोडा-डिड़ डा डिड़ डा ड़ाडा डिड़ डाड़ा डा डिड़ डाड़ा डा डा डा ।।१॥

६ ६ 6 ६ १० ११ ११ ६ ११ w x x १०१० १० ह

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रागाध्याय। १०१ १६ सय भूपाली भूपाली रागिनी शडुव है इसमें मध्यम निषाद ये दो स्वर वर्जित हैं और सब स्वर चढ़े लगतेहैं, यह उत्तम रागिनी है बहुत प्रसिद्ध तथा सीधीहै, बजानेकी अपेक्षा गानेमें यह अधिक सुंदर है। सरगम यथा-सारेसा गरेसा सारे गग प ध प ध ग प गग रेसा। गग प ध सा धसा रेसा गग रेसा धप धसा धप गरे सा गग रेसा, इत्यादि। सा मी२ गत-डिड़ डा डिड़ डा डा डाडाड़ा डिड़ डा डिड़ डा ड़ा डा डा डा। १६ १४,११ ११ १० ८ ६६ ६ १०१११०१११४ तोड़ा-डिड़ डा डिड़ डा ड़ा डा डा ड़ा डिड़ डा डिड़ डा ड़ा डा डा डा ।।१। १० ६६ ५३५६६ ५ ६ ६ १११०६१०११ १७ स्रथ शंकरा

शंकरा संपूर्ण रागपुत्र है इसमें सबी स्वर चढ़े लगतेहैं मध्यम बहुत कम शुद्धकल्यासके सदश लगताहै। गंधार पंचम इसमें प्रधान हैं। यह बड़ा कड़ा राग है अत एव बड़े विद्वानोंके गाने- बजानेकी वस्तु है। ऋषभ भी कम लगता है कल्याख और विहागके मेलसे बना प्रतीत होताहै। घुरपतियोंके शंकरेमें विहागका मेल कमहै खयालियोंक शंकरेमें विहागका मेल जादा है यही दोनोंका विशेष है। सरगम यथा-सासा नी ध प नी सा नी ध प म गग सा। नी ध प सा रेसा प म गरे सा गसा। गम प सा सारे सा गरे

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१०२ संगीतसुदर्शन-

सानीधपमगगमग सा साग सा गम सा रेसा गरे सा नी ध प म गरे सा, इत्यादि ॥ १८ सथ शुद्धकल्याण शुद्धकल्याण भी संपूर्ण रागिनी कहातीहै इसमें सबी खर चढ़े ही लगते हैं, इसमें मध्यम और निषाद ये दो स्वर स्पष्ट नहीं लगते, यदि मध्यम निषाद स्पष्ट लगाए जाएँ तो इमन होजायगी यदि मध्यम निपाद सर्वथा छोड़ दिय जाएँ तो भूपाली होजायगी इस कारस इसमें मध्यम निषाद बड़ी युक्तिसे लगाए जातेहैं यह बात शिक्षामात्रके अधीन है। यह शुद्धकल्याय केवल तानसेनजीके पुत्रवंशकी है और लोग इसप्रकार शुद्धकल्यायको नहीं गाते बजाते ेंतु मध्यम निषादको अधिक मिला देतेहैं यही खयालियोंकी शैली है। इसमें गंधार प्रधान है। यह गंधारपर पंचमकी मध्यम- पर पंचमधैवतकी निषादपर षड्जकी मींडको बहुत चाहती है। इसमें 'स गगमूप ध गग रे सा' यह तान बहुत शोभा देती है। सरगम यथा-सान् रेसा गग रे सा गगम् पप ध गग रे सा। गगम् पप धध नसा रेसा गग रेसा न धध प ध पम् गगम् पध गग रे सा, इत्यादि। मी९ मी१ गत-डिड़ डा डिड़ डाड़ा डा डाड़ा डा डाड़ा डा डिड़ डा डा डा। ११ ११ ६ १० ह ० १० ११ १६ १४१२१०११

भी १ मी१ नी२ मी१ नी१-२ तोड़ा-डिड़ डा डिड़डाड़ा डा डिड़ डाड़ा डा डिड़ डा ड़ा डा डाडा ।।१।। १२ ११ ६ ७ ६५३४ ५६७६१०११ यह गत घुरपतियों के शुद्धकल्याख की है।

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रागाध्याय। १०३

१र्८ स्रथ श्यामकल्याण श्यामकल्याख संपूर्ण रागिनी है इसमें मध्यम दोनों लगते हैं और सब स्वर चढ़े लगतेहैं। इसके आरोहमें मध्यम नहीं लगता पीछेकी तान केदारे के तुल्यहै यही विशेष है।

च सरगम यथा-सारे सा नीरे सा गग प ध पम गग म रेसा। च उ गग प ध नीसा रेसा गग रेसा नी धध पप ध पम गगमरे सा, इत्यादि। नी१ गत-डाडिड़ डाड़ा डाडिड़ डाड़ा डाडा ड़ा डिड़ डाडिड़ डाड़ा।। ६ + 5 ७ ६ ५ ६ ६ ८१० ११ १२१० ११ २० पय हेमकल्याश हेमकल्याख भी संपूर्ष रागिनी है इसमें मध्यम उतरा औरर मब स्वर चढ़े लगतेहैं। सरगम यथा-सारं सागरेसा पप धनी सा सारे गम गरे सा। गम गप धनी सा नीध पध पग म गर स सारेगम. पधनीसा इत्यादि। गत-डिड़ डा डिड़ डा ड़ा डाडाड़ा डाडाड़ा डाडिड़ डाडाड़ा ।। १ ।। ५६ ८ १० १११२१४ १८१८ ४२ ११ २१ अथ हमीर हमीर भी संपूर्ण रागपुत्रहै इसमें मध्यम उतरा है थोड़ासा चढ़ा मध्यमभी अवरोहमें लगताहै और सब सवर चढ़ेहैं इसके आरोहमें पंचम वर्जित है कभी कभी मध्यम पंचम दोनोंका भी

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१०४ संगीतसुदर्शन- आरोहमें छोड़ देतेहैं। अवरोहमें उतरा मध्यम नहीं है गंधार- पर पंचमको मौंडकर ऋषभपर जानाचाहिये। धैवत इसमें प्रधान है। यह प्रसिद्ध राग है। गत-डिड़ डाडिड़ डाड़ा डाडाड़ा डिड़ डाडिड़ डाड़ा डाडाड़ा॥। ७ ५४ ३४ ५E w

सरगम यथा-मग म धध मध नी सा नी धप मध धप गरे सा। गगर गम पम धध पम धप धप गग रेसा। सानी सा धघ प सा नीध ध गरे सा। सानी धप धप म धध पम् गरे सा, इत्यादि। ध नीसा नथपम व पम म गगेसा पद यथा-जौ रघु नाथ न चा ही। गगप सा रेसानीधपमगम थप म गप मगरे स सारेगमधनीसा नीधपमगप म गरेसह राजन राज धराधर धूर मिलें सब जौ चाहेरघु राई। भ्रम इत उत चहुँ दिश चाहे तू कितहु न पाय निकाई। तनिकहु कोप किय जब देखत कोटिन भुवन विलाई। रामकापशरविद्धदीनको कोउ न सकत वचाई। कोटि करै जु उपाय तऊ सुन अवसहि सो मिटजाई। ब्रह्मलोकलौं धावै तबहू को उन शरख रखाई। रावस मधु सुर विपुलबली सब छिनमधि धूरमिलाई। कौन गती पुनि मोसम तृखकी नखशिखलौं जरजाई। करहु कृपा रघुवीर तुरत अब तू इक दीनगुसाईं ।१॥ यह पद तो मेरा बनायाहै इसमें तानें मीयां अमीरख़ांजीकी रक्खीहुई है। मैंने ये इमनसे लेकर हमीरतक २१ रागरागनियें

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रागाध्याय। १०५

संध्याकालसे रातके दशबजेतककी लिखदीहैं इनके सिवाय इससमय, की और भी कुछ रागिनी हैं वे यहाँ नहीं लिखीं।

अब मैं रात्रिके आठ नौ बजेसे रात्रिके ग्यारह बारह बजेतककी कुछ रागिनियोंको लिखताहूं-

१ सथ सडाना अड़ाना एक कान्हड़ा है दीपककी रागिनी है संपूर्ष है। ऋषभ चढ़ा लगताहै और सब स्वर उतरे लगतेहैं। आरोहमें ऋषभ और धैवत नहीं लगता, धैवत तो अवरोहमें भी कम लगताहै। दरवारीसे इसमें यह विशेष है कि इसमें स्वरोंकी छूट अधिक होतीहै।

सरगम यथा-नीसा गग मध पप मग म गग प म प मग मध म गम रे सा। गग म पप ध सा नी सारे सा गग मरे सा नीनी ध पप मप गम रेसा। नी ध प म प सा नी प रे सा गग म ध पप रे सा प सा नी धप म गम रे सा, इत्यादि। मी२ मी२ मी२ मी१ मी९ मी१

गत-डिड़ डा डिड़ डाड़ा डाडाड़ा डाडाड़ा डाडिड़ डाडाड़ा।

६ ६ ६१०११ X

गमक मी१ तोड़ा-डिड़ डा डिड़ डाड़ा डा डिड़ डाड़ा डाडिड़डाडा डाडाड़ा। १० ११ ३ ३ ४ २ ३ १ १ १२३ ११

१२

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१०६ संगीतसुदर्शन-

मी१ मी मी? मी३ डा डिड़ डा डाड़ा डाडाड़ा डाडाड़ा डाडिड़ डाडाड़ा ॥। १ । २ ३ १ २३ ४५६ ८८६८६६१०११ २ थ कौंसिया (कौशिक) कान्हड़ा यह कान्हड़ा बहुत ही अप्रसिद्ध है, इसमें ऋषभ धैवत चढ़े और गंधार मध्यम निषाद ये उतरे लगतेहैं और इसमें गंधार वैवत बहुत कम लगतेहैं। यह सारंग और दरवारी के मेलसे बना प्रतीत होताहै। और कान्हड़ोंकी अपेक्षा इसमें ऋषभ मध्यम अधिकहैं। सरगम यथा-सा नी सा रे सा गरे म पप मम गूम रेसा। नी रेरे सा मम प नी सा रेसानी पप मम पपगूम रे सा, इत्यादि। मी१ गत-डिड़ डा डिड़ डा ड़ा डाडाड़ा डिड़ डा डिड़ डा ड़ा डा डाड़ा । ६ ६८ ६ ३५ ६ ६ ८६ ६ ८ १० ११ तोड़ा-डिड़ डा डा ड़ा डिड़ डा डा ड़ा डिड़ डा डा ड़ा डिड़ डा डा ड़ा ।।१।। २ ३ ४ ६ ३ ४६८४ ८ १० ६ ८१०११ ३ अथ जैजैवंती जैजैवंती (जयवंती) संपूर्ण रागिनी है इसमें ऋषभ धैवत चढ़े और गंधार मध्यम निषाद ये उतरे लगते हैं। जैजैवंती दो हैं-एक तानसेन वंशकी दूसरी चलतू, तानसेनवंशकी जैजैवंती वागीश्वरी के तुल्य है भेद यही है कि वागीश्वरीमें पंचम नहीं लगता इसमें लगता है और वागीश्वरीमें धैवतका कुछ नियम नहों इसम चढ़ा धैवत लगता है यह नियम है।

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रागाध्याय। १०७

सरगम यथा-म परे मारेगगम पम गरे सा। सानी रेसा सा नी ध प ध नी रेसा नी धनी धनी रेसा। सारे सा गम ध पध नी धप रेसासानी धप धनी धप म गम म गरे सा, इत्यादि। स् स गत-डिड़ डा डिड़ डाड़ा डाडाड़ा डाडा ड़ा डा डिड़ डा डा डा। ० १६ १० १० ६ ८ ६ = ६ १० १११३ ११ मी१

तोड़ा-डिड़ डा डिड़ डा ड़ाडा डिड़ डा ड़ा डा डिड़ डा ड़ा डा डा डा १ ९३ १९ ६ ८ ५ ६ ५ ५ ६ ६ २ ३ 8 8 ५ ६ यह जैजैवंती तानसेनवंशकी है। ४ अथ दरवारी कान्हड़ा यह कान्हड़ा संपूर्ण तथा बहुत ही उत्तम रागिनी है। इसमें ऋषभ चढ़ा लगता है और सब स्वर उतरे लगते हैं। इसके आरोह में ऋषभ वर्जित है धैवत भी आरोह में वर्जित के तुल्य ही है। यद्यपि यह रागिनी बहुत प्रसिद्ध है तथापि इसका यथार्थ शुद्ध गाना बजाना कुछ कठिन है। सरगम यथा-नी सा गग रे सा ग म प म गग रे सा। मप धूनी सा पनी सा सारे नी सा गग रे सा नीध पम पप म गगम् रे सा। गग मप पम प ध पनी सा, सारे ग म प ध नी सा। गग रेसा गम पध पनी ध प म गम्रे सा, इत्यादि। स. गमक मी सु गत-डिड़ डा डिड़ डा ड़ा डाडाड़ा डिड़ डा डिड़ डा ड़ा डा डा डा। १६ ० १६ १३ ११ ६ 6 ६ ६ ६ १0 ११ १३ १: 9९ १६

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१०८ संगीतसुदर्शन-

मी१ तोड़ा-डिड़ डा डिड़डा ड़ा डा डाड़ा डिड़ डा डिड़ डा ड़ा डाडाड़ा। 90 90 90 93 9999 ३ ३ २ २ ३ मी१ स मी१ डिड़ डा डिड़डाड़ा डाडिड़ डाड़ा डाडिड़ डाड़ा डाडा ड़ा ।।१।। २ ३ १ २ ३ ३ ६ ४ ३ ४ ५ ६ ८ १०११

५ अथ नायकीकान्हड़ा नायकीकान्हड़ा भी संपूर्ण है तथा कौंसियेके तुल्य बहुत अप्र- सिद्ध है। इसमें ऋषभ चढ़ाहै, धैवत दोनों हैं, किन्तु चढ़ा धैवत विशेष कर आरोहमें है और उतरे धैवतपर ही मींडसे ही चढ़ा धैवत लगाना चाहिये। उतरा धैवतकमहै इसकेआरोहमें प्रायः ऋषभ गंधार दोनोंको छोड़ देतेहैं। और सबस्र उतरे लगतेहैं। सरगम यथा-सा निधप ध नी सा मम गगरे सा। सासा पप म गरे म प धनी सा। मम पप धनी सा रेसा मगरे सा पम गरे सा। रेसा नी धम पध नीसा धनी सा। सारे सा मगरे सा नीध मप म गरे सा, इत्यादि। मी१ ग गत-डिड़ डा डिड़ डाड़ा डा डा ड़ा डाडाड़ा डाडिड़ डा डा ड़ा। १० ११ १३ ९५१६ ९५ ९३ १९ ६ १० ११ मी स मी१ तोड़ा-डिड़ डा डिड़ डाड़ा डा डिड़ डाड़ा डाडिड़ डाड़ा डाडाड़ा ।।१।। २ ३ ६ ५ 8 ३ ३ १५ ९३ ११ इसमें धैवतपर जो मीड़े हैं वे चढ़े धैवतकी जाननी यही विशेष है इस कारम यह कान्हड़ा सितारमें दरवारीके ठाठपर बजाना चाहिये।

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रागाध्याय। १०६

ई अथ वागीश्वरी कान्हड़ा इसे बाघेश्वरी कहतेहैं यह षाडव रागिनी है इसमें पंचम वर्जित है, यह कान्हड़ा मालकौसके मेलसे बना प्रतीत होताहै। इसमें ऋषभ चढ़ा है। कोई लोग इसमें चढ़ा धैवृत लगातेहैं कोई उतरा धैवत लगातेहैं। वस्तुगत्या प्राचीनप्रथासे इसमें धैवत उतरा ही है किंतु इसको रंगीन करनेकेलिए खयालिये लोग इसमें चढ़ा धैवत लगाने लगगयेहैं, इसमें और उक्त जैजैवंतीमें पंचमसे ही भेद है। और सब स्वर उतरे लगते हैं। इसके आरोहमें ऋषभ छूटता है कभी ऋषभ गंधार दोनों को भी छोड़ देते हैं। अवरोहमें 'सा नी ध नी म' इसप्रकार प्रायः धैवतको छोड़देतेहैं। सरगम यथा-सा रेसा नी धनी सा नी म ध नी सा। सा गग मम ध नी सा रेसा गरेसा म गरे सा नी धनी म नी धनी म गरे सा नीरे सा, इत्यादि। स मी१ मी१ गत-डिड़ डा डिड़ डा ड़ा डा डा ड़ा डाडाड़ा डा डिड़ डा डा ड़ा। १३ ११ ८ ६ १० ५५५ ६ १० ११ U ११ मी१ तोड़ा-डिड़ डा डिड़ डा ड़ा डा डिड़ डाड़ा डा डिड़ डा ड़ा डा डा ड़ा ।।१। १३ ११ ८ ६ १०१९ १३ १३९५ १३ ८ ६ १० १० १११९ १३ यह गत प्राचीन वागीश्वरीकी है। 9 परथ शहाना कान्हड़ा यह कान्हड़ा अताइयोंमें बहुत प्रसिद्ध है अतएव इसकी आरोही अवरोही पूर्ण नियत नहीं, इसमें ऋषभ धैवत चढ़े गंधार मध्यम

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११० संगीतसुदर्शन-

निषाद ये उतरे लगते हैं उस्तादलोगोंके शहानेमें कुछेक अड़ानेकी चाल मिलीरहतीहै। पस रसनीधप मप नीधपम अष्टपदी यथा-तव विरहे सा दीना। अपनी नीसारेसा मोधप धनोरेसा नीधप रे सानी धपम माधव मनसिज विशिख भयादिव भावतया त्वयि लीना ।। इसमें 'या' तृतीयसप्तकके ऋषभ पर है। सरगम यथा-पपम पधसा रेसा गरेसा नी धप नीपम पप मम गरेसा। सारे म गरे सा मम पध सा नी धप नीनी रेसा नी धप मप म गम गरे सा, इत्यादि। मी मी२ मी२ मी२ क कं मी१ गत-डा डा ड़ा डिड़ डा डिड़ डा ड़ा डा डा ड़ा डिड़ डा डिड़ डा ड़ा ।।१।। U ६ ६ ६ ६ w

यह गत सैनियाके शहानेकी है। मैंने यहाँ ये सात कान्हड़े लिखहैं कुछ पूर्वमें भी लिखचुकाहूँ कुछ और भी कान्हड़े हैं, कुछ अप्रसिद्ध भी हैं, प्रदीपकान्हड़ा पूर्वमें लिखदेना भूलगया हूँ। ८ सथ सावन

सावन भी खमाच सोरठके तुल्य हलकीसी रागिनी है। इसमें मध्यम उतरा लगताहै इसके अवरोहमें निषाद उतरा और आरो- हमें चढ़ा लगताहै और सब सर चढ़ लगतेहैं, गंधार इसमें बहुत ही कम है सोरठके तुल्य। आरोहमें धैवत भी नहीं। वस्तुगत्या यह वर्षाऋतुकी रागिनी है।

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रागाध्याय। १११

सरगम यथा-मम पप नी ध प म पप मरे सा। सा नी रेसा रेरे सा मम रेसा। सारे मप म पप धप नीसा पसा रेरे सा मरे सा नी ध पप मम गूम रेसा, इत्यादि। मी१ स मी१ गत-डिड़ डा डिड़ डाड़ा डा डाड़ाडा डाड़ा डा डिड़ डाडाड़ा ।।१।। ८६ ५ = ६ १०१११२ १२१०८६ ४ ३ ५५८ १२११ ११ मैंन यहॉ अड़ानेसे लेकर सावन तक आठ रागिनियें रात्रिके आठनौबजेसे लेकर रात्रिके ग्यारहबारहबजेतककी लिखीहैं इनके सिवाय कुछ और भी रागिनिये इससमयकी हैं वे नहीं लिखीं। न लिखनेका कारण यह है कि कोई कोई रागिनी ऐसी होतीहै जो लेखसे समझाई जा सकती नहीं। वस्तुगत्या तो कोई भी ऐसी विद्या नहीं जो पूर्ण गुरुशिक्षा के बिना प्राप्त होसके, गुरु शिक्षाके अनंतरही उसविद्याकेग्रंथ कुछ उपयोग देसकतेहैं। सत्य तो यह है कि लोगोंको वास्तविक रागविद्यामें रुचि ही नहीं, हां कुछ लोगोंका ठुमरीमें वा थीयेटरी गानेबजानेमें रुचि है।

अब मैं रातके दशबजेसे रातके एकबजेतककी कुछ रागरागि- नियोंको लिखताहूँ- १ सथ कुंबाएनी पंचमवर्जित होनेसे कुंबाएती षाडव रागिनी है कुछ बहुत सुन्दर भी नहीं, इसमें निषाद कोमल है और सब स्वर तीव्र हैं। यह एकग्रंथसे उपलब्ध हुईहै।

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११२ संगीतसुदर्शन-

सरगम यथा-ध म गरे सासनीरेमासा रेरेसा।गम ध म ध नी सा रेसा नी ध म धनी धम धम गरे सा, इत्यादि। २ सथ, गिरिनारी गिरिनारी भी एक प्रकारकी सारठ ही है इसमें निषाद मध्यम उतरे और तीन स्वर चढ़े लगतेहैं, गंधार बहुत ही कम है, आरोहमें धैवतगंधारवर्जित है। ऋषभपर मध्यमकी मींडका बहुत चाहतीहै। सरगम यथा-सानी रेसा रेरे म प मम पप मगू मरे रे सा। मम रेरे सारे म पप नी सा नीनी रेरे सा नी ध पप मम गूम मरेरे सा, इत्यादि। सभ गत-डा डिड़ डा डा ड़ा डिड़ डा डिड़ डाड़ा डाड़ा डाड़ा डाड़ा। १३ ११ १० ८ १० १० ८ ६ ६ मी मी२ तोड़ा-डा ड़ा डाड़ा डाड़ा डा डिड़ डाड़ा डा डिड़ डाड़ा डाड़ा।।१।। २ = १० 93 99 906 € 8 ३ २ G१0 8 ३ स्रथ देस देस भी संपूर्ण है इसमें मध्यम कोमल और सब स्वर चढ़े लगते हैं इसका सोरठसे यही भेद है कि इसमें सबी निषाद चढ़े लगतेहैं और गंधार भी स्पष्ट लगताहै। आरोहमें धैवत वर्जित है और गंधार भी कम है। सरगम यथा-सानी सा रेरे सा ग रेरे सा नी ध पप नी सा रेरे सा। रेरे गरे म पप मग रेरे पप नीसा रेरे सा नी ध पप मम गरे मम ग्रेरेसा, इत्यादि।

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रागाध्याय। ११३

सु गत-डिड़ डा डिड़ डा ड़ा डा डा ड़ा डिड़ डा डिड़ डा ड़ा डाडाड़ा। 99 9R 99 90 € 90 € c E € 90 99 9₹ 99 तोड़ा-डिड़डा डिड़ डा ड़ाडा डिड़ डा ड़ा डा डिड़ डा ड़ा डाडाड़ा ।। १। ३ ४ ५६१० ६ ८ ६ ६ १०१११२ ११ ४ अय मालकौस मालकौसको मालवकौशिक भी कहतेहैं इसमें ऋषभ पंचम ये दो स्वर वर्जित होनेसे यह शडुब राग है। इसमें सब स्वर उतरे ही लगतेहैं यह राग बहुत उत्तम तथा भारी है अथापि इस- की आरोहावरोही कुछ कठिन नहीं। कभी कभी आराहावरोहमें गंधारको भी छोड़ देतेहैं। कोई प्राचीन लोग इसमें ऋषभको भी लगादेतेथे अतएव वे इसे षाडव, राग मानतेथे ऐसी भी सरगम देखी है।

सरगम यथा-मग सा नी धनी ध म गग मध नी सा धनी सा गग सा मग सा नी ध मग सा सानी ध म गग सा। सा मम सा गम धनी सा गग सा, सानी मग सा, सानी सा म सा गग मम गम धध मग सा मसा॥ इसीमें ऋषभ मिलादेनेसे षाडव मालकौस होजायगा। ठाकीठा गत-डिड़ डा डिड़ डा ड़ा 'डाडा' डा ड़ा डा ड़ा डा डा ड़ा। ११ १३ १५ १३ १९ ८ ६ ८ n ठाकीठा तोड़ा-डिड़ डा डिड़ डा ड़ा 'डाड़ाडाड़ा' डा डा ड़ा ॥१॥ १ ३ १३ ५ = ६ १९ U

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११४ संगीत सुदर्शन-

यह गत तोड़ा मेरा ही बनाया है। म्वरसागरमें कहाहै कि यह राग साधुवेश है इसका विष्यु देवता है अत एव यह शांत सात्विक राग है इसकी भठहारी पट- रानी है। दोहा-भठहारी अरु सरस्वती रूपमंजरी वाम। चतुरकदंवी पाँचवीं रूपरसाला नाम ।।१॥ चौ०-भठहारीकौ पुत्र अहंग। बधू सोहनी वाके संग॥ अरु सरस्वतीसुत वैराग। ताहि अरघटी अधिक सुहाग॥ रूपमंजरी पुत्र विहंग। नागवतीकी ताहि उमंग। चतुरकदंवीपुत्र सुढंग। ललितावधू रहै नितसंग। २। दोहा-पंचम कौशिकनंदनी परज पुत्र वा गेह। रामकली वाकी वधू गयपतिमत सुन एह।।३।। इनमेंसे भठहारी सोहनी परज और रामकली ये चार प्रसिद्ध हैं। कुछ दाचियात्यलोग इसे प्रातःकाल गातेहैं कितु इसका स्वरूप मध्यरात्रिके ही योग्य है इससे इसदेशके लोग इसे मध्यरात्रिमें ही गातेबजातेहैं यही उचित है। ५ अथ विहंगिनी यह संपूर् रागिनी है इसमें मध्यम कोमल और सब स्वर चढ़े लगातेहैं। आरोहमे ऋषभधैवत छूट जातेहैं। यह बिहागकी तुल्यतामें भगिनी ही है। वस्तुगत्या आजकल्ह बहुत लोग इसीको विहाग कहतेहैं। सरगम यथा-सानीधपप नीसा रेसा म गरे सा। मम गग

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रागाध्याय। ११५

म पप ध प नी सा नी रेसा गरेसा नीनी ध पप मम प मर प म गग म गरे सा, इत्यादि। मो१ स मी१ गत-डिड़ डाडिड़ डाड़ा डाडिड़ डाड़ा डाडिड़ डाड़ा डाडाड़ा। ५ U C 909099 मी १ मी१ तोड़ा-डिड़ डा डिड़ डा ड़ाडा डिड़ डाड़ा डा डिड़ डा ड़ा डाडाड़ा २ ५ ६ ६ = ६ १०१०१०११ m oC ऋषभ छोड़देनेसे यही बिहागड़ा होजायगा। ६ सय विहाग विहाग संपूर्ण रागिनी है और उत्तम तथा प्रसिद्ध है, इसमें दोनों मध्यम लगतेहैं और सब खर चढ़े हैं, पंचमसे ही चढ़े मध्यम- पर जाना फिर पंचम पर ही आजाना यही चढ़े मध्यमके लगाने- का प्रकार है। आरोहमें ऋषभ धैवत नहीं लगते। सरगम यथा-सासा नीनी रेसा मसा सा गग म पप पम गग रे सा। मम पप गग मप मप म गरे सा। पप नीसा रेसा म गरेसा नी ध प नी पम गरे सा इत्यादि। मी मी२ मी२ गत-डिड़ डा डिड़ डा ड़ा डा डा ड़ा डा डाड़ा डाडिड़ डाडाड़ा ।।१।। ११ १२ ११ ६ ७ ६ ४ ५६= ६ ६१०११ ७

9 सथ सारठ सारठ में गंधार बहुत कम है आरोहमें गंधार धैवत छूट जाते- हैं मध्यम कोमलहै, निषाद द्वितीयसप्तकका कामल और प्रथम

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११६ संगीतसुदर्शन- सप्नकका दोनों प्रकारका लगताहै और सब स्वर चढ़े लगतेहैं। यह बहुत प्रसिद्ध रागिनी है। इसी सोरठसे मीयां रहीमसेनजी अमृतसेनजी मेरे उस्तादने झभरमें सर्पको बुलायाथा वह सर्प एक घंटा पूरा इनसे सोरठ सुनता रहा। सरगम यथा-नीसा नीनी रेरे मम गूरेरे सा। सानी धू पप नी सा रेरे सा। मम पप नीनी धप सा नीसा नी ध प नी सा रेरे सा नी ध पप मम गरेरे सा, इत्यादि। स गत-डाडिड़ डा ड़ा डाडिड़ डा ड़ा डा डा ड़ा डिड़ डा डिड़ डा ड़ा। १६ १२११ १० ६८६१०१११११०८६४ डा डिड़ डा ड़ा डा डिड़ डा ड़ा डा डा ड़ा डिड़ डा डिड़ डा ड़ा ।। १॥। ३ २ ३४८६ ५८८६१०६८६१२११ मैंने ये कुंबाएतीसे लेकर सेरठ तक सात राग रागिनियें रात्रिके दशबजेसे एकबजेतककी लिखीहैं इस समयकी कुछ और भी रागिनी हैं।

अब मैं रात्रिके ग्यारहबजेसे लेकर रात्रिके दोतीनबजेतककी कुछ रागरागनियें लिखताहूँ- १ सथ तनक तनक रागिनी षाड़व है क्योंकि इसमें धैवत वर्जित है, इसमें ऋषभ और मध्यम कोमल हैं गंधार और निषाद चढ़ा है। सरगम यथा-गम प सानी रेसा गरे सा नी पप मप म गरे सा।

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रागाध्याय। ११७

सारे ग गम प म पप म गग म गर सा। सारे सा नी गर सा नी पम प गम पम गरे सा, इत्यादि। यह रागिनी एकग्रंथसे प्राप्त हुईहै इससे इसमें अधिक नहों कुछ लिखसकता। सोहनीका इसका यही भेद है कि सोहनीमें पंचम नहीं धैवत है इसमें पंचम है वैवत नहीं।

२ सरथ परज परज रागपुत्र संपूर्ण है इसमें ऋषभ धैवत उतरे और गंधार मध्यम निषाद ये स्वर चढ़े लगतेहैं, आरोहमें ऋषभ नहीं लगता। यह राग मध्यम श्रेणीका है तथा प्रसिद्ध है। सरगम यथा-सा गमपध नी सा धसा रेसाग रेसा नी धप म गरे सा। नीनी ध नीनी धप ध मप धनी सा नीसा रेसा नी धप मप धध मप म गग रेसा। गग मप म पप धप गम धप धसा नी ध पम पप म गग रे सा, इत्यादि। गत-डिड़ डा डिड़ डा ड़ा डा डिड़ डा ड़ा डा डिड़ डा ड़ा डा डा ड़ा। ११६ ७ ६ ५४ ३ ५ ५ ७ ६ ६१०१११२ ७

तोड़ा-डिड़ डा डिड़ डाड़ा डा डाड़ा डा डाड़ा डा डिड़ डा डाड़ा ६७ ५४ ४ ३ ४ ३ ४ ५४ डिड़ डा डिड़ डा ड़ा डा डिड़ डाड़ा डा डिड़ डा ड़ा डा डा ड़ा । २ । ४ ३ १ २३ ३४ ५६५७६ ६१०१११२

इसपरजको विहागमें मिलादेनेसे परजविहाग बनजायगा। मिलानेका प्रकार यह है कि चढेमध्यमसे गंधारपर आजाना। इसको बजानेलगे तो ठाठ विहागका ही रखना।

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११८ संगीतसुदर्शन-

३ सथ परजकालंगड़ा परजकालंगड़ा बहुत रंगीन है खमाचादिके तुल्य हलकी चीज ठुमरीके योग्य है। इसमें ऋषभ मध्यम धैवत ये उतरे और गंधार निषाद ये चढ़े लगतेहैं, इसके आरोहमें ऋषभ और निषादको छोड़ देतेहैं संपूर्ण जाति है। सरगम यथा-स ग म पप मप ध सा रेसा नी ध सा नी धप म धप म गरे सा। गग म ध पप मप धसा धसा गरे सा नी ध पध सा नी धप मध पप म गरे सा इत्यादि। स गत-डिड़ डा डिड़ डा ड़ा डा डिड़ डाड़ा डा डिड़ डाड़ा डा डा ड़ा। ११६ ६८६ ६ ५ ३ ४ ५ ६८ ६१०११ तोड़ा-डिड़ डा डिड़डाड़ा डा डिड़ डा ड़ा डा डिड़ डा ड़ा डा डा ड़ा ।। १। ६ १०१११२१५१६०१६१५११ ४ सय सोहनी सोहनीमें पंचम नहीं लगता इससे यह षाडव रागिनी है इसमें ऋषभ मध्यम उतरे और गंधार धैवत निषाद ये स्वर चढ़े लगतेहैं। आरोहमें ऋषभ नहीं लगता। सरगम यथा-सा ग म धनी सा नीध गम गरे सा। ध नी सा गम धनी सा नीसा रेनी सा धनी धध गम गरे सा। मध सा नी ध मम धध मध सा। गरे सा नी ध म मध सा नी धम धध मम गरे सा, इत्यादि। स गत-डिड़ डा डिड़ डा ड़ा डा डाड़ा डिड़ डा डिड़ डा ड़ाडाडाड़ा। ३० ११ १२ १४ १२ ११ ६ ८ ६ १०११ १२ ११

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रागाध्याय। ११६ ताड़ा-डिड़ डा डिड़ डा ड़ा डाडिड़ डा ड़ा डा डिड़ डा ड़ा डा डा डा ।। १ ।। ५३ ४ ४८५=६११ १० मैंने तनकसे लेकर सोहनी तक ये चार रागरागनियें रात्रिके ग्यारह बजेसे रात्रिके दो तीन बजेतककी लिखीहैं इस समयकी कुछ और भी राग रागिनी हैं। कोई लोग मालकौसका भी रातके दोबजे तक गातेबजातेहैं।

मैंने भैरवरागसे लेकर सोहनीपर्यत ८७ रागरागनिये प्रभात- कालसेरात्रिशेषपर्यंतकालकी लिखीहैं। मध्यान्हसे लेकर रात्रिके दशबजेतकके जंगला और जिला ये दो प्रसिद्ध हैं इससे यहां नहीं लिखे। अब मैं मौसमी रागरागिनियोंमेंसे प्रथम ग्रोष्मत्रतुकी कुछ रागरागनियोंको लिखताहूँ। गौड़सारंगके बिना सभी सारंगोंका समय ग्रीष्मऋ्तुमें दुपहर याने दिनकेदसग्यारहबजेसे दिनके एकबजेतक है, गौड़सारंग तृतीय पहरकी है। १ सथ प्र्पाहंग सारंग इसमें मध्यम और निषाद उतरे हैं ऋषभ धैवत चढेहैं। गंधार वर्जित है षड्ज भी नहीं लगता, धैवत भी थोड़ा ही लगताहै सो भी अवरोहमें। सरगम यथा-पप मप धप ममरेरे। नी रेरेरे नी पध प नीनी

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१२० सगीतसुदर्शन-

रेरे पपम ध पप मप धप नी रेरे। म रे नी ध प म पप मम रेरे। नी रे, इत्यादि। मी१ गत-डिड़ डा डिड़ डाड़ा डाडिड़ डाड़ाब डाडिड़ डाड़ा डा डा ड़ा ।।१।। १३ १६ १३ १३ १० ५ ५६८ १० २ य गौड़सारंग गौड़ सारंगमें सभी स्वर चढ़े लगतेहैं किन्तु मध्यम उतरा ही लगताहै चढ़ा मध्यम बहुत कम लगताहै। इसमें गंधारस्पष्ट लगता है यही विशेष है 'सा गरे ममगरे सा' यह नान इसमें प्रधान है, कुछ छायाकी औरबिलावलकी छायाभी पड़तीहै। यह तृतीय प्रहरकी सारंग है।

सरगम यथा-सारेसा गरे म गरे ग पप ध नी रेसा नीनी ध पप मगरे मम गरे सा। गग पप मगरे म ग म प ध नी पप म गरे सा। पप नी सा रेसा गम गरे म गरे सा सानी ध प धप नी पप मम ग मम पप ग मम गरे सा, इत्यादि।

स मी१ गत-डिड़ डा डिड़ डा ड़ा डा डा ड़ा डिड़ डा डिड़ डा ड़ा डा डाड़ा। ६ १०१० ११ ६१०१०६६६ ७६७२०१०६ १२ ५६६ ६ ८ मी१ तोड़ा-डिड़ डा डिड़ डा ड़ा डा डिड़ डा ड़ा डा डिड डा ड़ा डा डा डा।।१।। २३ ४५६६७ ६७६ ६७१०१०६ ५६ ५६ ६६ ८

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रागाध्याय। १२१ ३ अथ जलधर सारंग यह तीन सवरकी रागिनी है इसमें षड्ज और चढ़ा ऋषभ और उतरानिषाद ये ही तीन स्वर लगतेहैं इनीका प्रस्तार करना चाहिये। यथा-सा नीनी रेरे सा नीसा रेसा नीनी रेरे नी सा, इत्यादि। ४ सय तिलंग तिलंगको लोग ग्रोष्म ऋतुमें सूर्यास्तसे लेकर रात्रिके दशग्यारह- बजेतक गाते बजातेहैं, कोई लोग इसका श्रष्मऋतुके साथ नियम नहीं भी मानते यह भी एक खमाचके तुल्य हलकी रागिनी है इसमें मध्यम उतरा है निषाद प्रथमसप्तकका दोनोंप्रकारका और द्वितीयसप्तकका उतरा है, और सब सवर चढ़े हैं, आरोहमें ऋषभ धैवत नहीं लगते, वस्तुगत्या ऋषभ धैवत ये स्वर बहुत कम लगतेहैं वर्जितप्राय हैं निषादभी कम लगताहै। सरगम यथा-सा गग मम पप म धू प म गरे सा। सा नी रेसा सा. गग म पसा सानी धू पप मम धप म गरे सा, इत्यादि। स् मी१ गत-डाडिड़ डाड़ा डाडिड़ डा ड़ाडाड़ा डिड़ डा डिड़ डा ड़ा ।। १ ॥। ११ ३ ६ ५६८६ ८ ७

५ पपथ बढहंस बढहंस भी एकप्रकारकी सारंग है समय मध्यान्हहै। इसमें गंधार धैवत नहीं लगते, ऋषभ चढ़ा है मध्यम निषाद उतरे हैं। १३

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१२२ संगीतसुदर्शन-

सरगम यथा-सारे मम पप नी प मरे पम रे सा। मम पप नीसा रेसा मरे सा नी पप सा नी प म पप मम रेग्मप म रर सा. इत्यादि।

स गत-डिड़ डा डिड़ डाड़ा डाडाड़ा डिड़ डा डिड़ डाड़ा डाडा ड़ा। 99 99 90 c ६ 290 99 U

तोड़ा-डिड़ डा डिड़ डाड़ा डा डिड़ डाड़ा डा डिड़ डा ड़ा डा डा डा ।।१ । c 90 ६ ३ २ 8 ६ c ६ = १० १९ U ३

६ अथ बरवा

बरवामें ऋषभ धैवत चढ़े और गंधार मध्यम निषाद ये उतरे लगतेहैं, यहभी एकप्रकारकी सारंग ही है किंतु जरा कान्हड़ का मेल है, समय मध्याह्नहै। आरोहमें ऋषभ धैवत नहीं लगते गन्धार भी कम लगताहै।

सरगम यथा-म गगरे गम पम गरे सा नीरेसा। नीनी म गरे गम पध मप मप म गरे सा। सारे सा सानी धप मप नीनी धनी सारे सा नी धप म गम पनी ध पम गग रे सा नी।

अताईलोगोंका बरवा एक और भी है। यह बरवा धुरपति- योंका है। मी१ मी।मी। मी१मी१ गत-डा डिड़ डा डा ड़ा डिड़ डा डिड़ डाड़ा डा डा ड़ा डा डा ड़ा ।।१। ६ $ 5 € 90 € € 90 90 9099 4 n

9 प्रथ मधुमाद मधुमाद भी सारंगका भेद है इसमें ऋषभ चढ़ा और मध्यम

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निषाद ये उतरे लगतेहैं। चढ़े धैवतका स्पर्श मात्र है वस्तुगत्या गन्धार और धैवत नहीं लगते। सरगम यथा-सानी रेसा रे मम पप म रेरे सा। मम पप नी सा रेरे सा नीरे सा नी धू प म पप मम पम रेरे सा, इत्यादि। मी गत-डाडिड़ डा डा ड़ा डिड़ डा डिड़ डा ड़ा डा डा ड़ा डा डाड़ा ५ ६ = १०१०१० ११ १२ ११ १० ८ १११० ११ ८ मीयांकी सारंग यह सारंग मीयां तानसेनजीकी बनाईहै अत एव मीयांकी सारंग कहातीहै एवं और भी कई रागरागनियें मीयां तानसेनजीने बनाएहैं। इसमें मध्यम दोनोहैं और सब स्वर चढ़ेहैं इसका शुद्ध सारंगसे यही भेद है कि इसमें मध्यम और निषाद चढ़े स्पष्ट लगतहैं किंतु अल्प ही। यह सारंग बहुत उत्तम है। गंधार नहीं लगता। च च च सरगम यथा-सानसा रेसा रेनी ध पम धप धनी रेरे सा। च ससा रेरे मूप मम पप धप नीरे सा नी धूप पम म रेरे सा, इत्यादि। स मो गत-डिड़डा डिड़ डा ड़ा डाडिड़ डा ड़ा डा डिड़ डा ड़ा डा डा ड़ा ।।१।। ११ १०७६ ८१०१११०१२१४१२ १०१०११ १२ ११ र्ट सथ लंकदहन सारंग इसमें गंधार लगता नहीं मध्यम निषाद उतर हैं ऋषभ धैवत चढ़े हैं।

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१२४ संगीतसुदर्शन-

सरगम यथा-रेसा धनी सा रेरे मम पम रे साधनी सा। सा नी पप मम रेरे सा। मम पप रे पम प ध पनी सा रेसा नी धूप मप म रेरे सा।। क गत-डिड़ डा डिड़ डाड़ा डाडाड़ा डाडाड़ा डाडिड़ डाडाड़ा।। १० ११ १४ १३११ १० ८ १० १११४१३ ११ तोड़ा-डिड़ डा डिड़ डाड़ा डाडिड़ डाड़ा डाडिड़ डाड़ा डाडाड़ा।।१॥ १०११ १० ८ ४३ २ ३ ४ ६ ८१०११ १० पय वृंदावनी सारंग इस में ऋषभ धैवत चढ़े और गंधार मध्यम निषाद ये उतरे लगतेहैं, इसके अवरोहमें गंधार धैवत जरासा लगतेहैं यही इसमें विशेष है। सरगम यथा-रेसा नी मप नीनी सा रेसा। रेरे मम पप मम गूरेसा। मम पप नीसा रेसब नी धूपप मप मम रेरे गरेसा, इत्यादि। मी१ स गत-डिड़ डा डिड़ डा ड़ा डा डिड़ डाड़ा डा डिड़ डा ड़ा डाडाड़ा। १०१० १०१०११६ ११ १३ १३ ३१ १३१० ११ १० तोड़ा-डिड़डा डिड़ डा ड़ा डा डिड़ डाड़ा डा डिड़ डा ड़ा डा डा डा ।।१।। १० १०८६५ ४ ३ ३४५८६११ १०

११ सय शुद्धसारंग यह प्रधान तथा सब सारंगोंकी मूलभूत सारंग है बड़ी उत्कृष्ट है मीयांकी सारंगके तुल्य इसका भी गाना बजाना कुछ कठिन है।

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इसमें मध्यम उतराहै निषाददोनोंहैं और सब सर चढ़ेहैं गंधार वार्जत है धैवतका स्पर्शमात्रहै विशेषकर षड्ज ऋषभ पश्चम ही लगतेहैं अतएव इसका गाना बजाना कठिन है, गंधार पर पश्चम- मध्यमकी मींडको बहुत चाहती है। इससारंगकी मसीतखाँजीके पुत्र बहादुरखाँजीकी बढ़ाई गत बहुत ही उत्तम है। इस कृप हृदयपर इतनी उदारता नहीं जो उस रत्नको यहाँ पटकदे, दूसरी गत मीयां रहीमसेनजीकी बनाईहै वह भी बहुत उत्तम है। इनरत्नों का योग्य ग्राहक आरज तक कोई न मिला।

मी। मीर मी१लौटती गत-डिड़ डाडिड़ डाड़ा डाडिड़ डाड़ा डाडिड़ डाड़ा डाडाड़ाII ११११ १०८६६५६८१२१०१०१०६६१०११

सरगम यथा-ध् सरे म गरे सा रेरे सा मप धू पसा रेसा। मप धू पप नीसा रेसा मरे सा नी पप म ध् पप धू गू मम पम रेरे सा, इत्यादि। समग्रसारंगोंका ऋषभ प्राण है। मैंने ये अहंगसारंगसे लेकर शुद्धसारंगतक ग्यारह रागिनियें ग्रीष्मऋ्रतुकी यहां लिखीहैं इस ऋतुकी कुछ और भी रागिनी हैं। दीपक राग भी ग्रीष्म ऋतुका ही है किंतु दीपकका गाना- बजाना मीयां तानसेनजीने बन्द करदियाहै यह सब सविस्तर भूमिकामें लिखाहै। दीपकका वर्स लाल और देवता सूर्य वा अभ्नि कहाहै। स्वरसागरमें कहाहै-

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१२६ संगीतसुदर्शन- "कान्हरा किदारा अरु अड़ाना चौथे मारु गिन पांचमैं विहाग नार दीपकके मन वसी। कान्हरेके पुत्र गारा सोरठ है वाकी नार केदारासुत जलधर नारी लंकधर (लंकदहन) सी। तीसरी अड़ाना नार सुत वाके सक्तरन (शंकराभरख) वाकी है नार काफी कोमल- सेतनकसी। चौथी है मारु नारि पुत्र वाके सक्तकरन (शंकरा- करख) वाके घर नारी पारवती ओपनसी। पांचमी विहाग है सुनार ताकै पुत्र सत्ततरन वाको तो पूरबी पियारीसी?" इनमेंसे कान्हरा (दरवारी) पटरानी है। यहां श्रीष्मऋतु होरीसे लेकर जबतक वर्षाका आ्रम्भ नहो तब तक जाननी। संगीतशास्त्रके स्थूलमानसे तीनही ऋतु हैं-ग्रीष्म, वर्षा और शीत।

अपरब मैं वर्षाऋरमतुकी कुछ राग रागनियें लिखताहूँ। वर्षाके आ्र्प्रारंभ- से आश्विनप त यहाँ वर्षा ऋतु जाननी, और इन रागरागनियों- का मध्यान्हसे रातके दस ग्यारह बजेतक प्रधान समय है, कोई लोग सूर्योदयसे रातके एक दो बजेतक भी इनका समय मानतेहैं। वस्तुगत्या मेघमंडलका समय ही इनका समय है। इनसबमें मीयां- की मलार ही सरदार है। समग्रमलारोंका धैवत प्राण है। १ अय गौनमलार कोईलोग इसे गौड़मल्हार भी कहतेहैं, इसमें मध्यम और निषाद उतरे ऋषभ गँधार धैवत ये चढ़े लगतेहैं, आराहमें निषाद कम है, घैवतपर निषाद तथा षड्जकी मींड विशेष अपेक्तित है।

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रागाध्याय। १२७

सरगम यथा-धध पप मप धसाध प म मप म रे सा पमग रेसा। म पप धसा सा रेसा नीध पप मप धसा धप म पम गरे सासारेगम रेसा। मी१ मी१मी१ मी१ मी१ गत-डिड़ डा डिड़ डा ड़ा डाडिड़ डा ड़ा डाडिड़ डा ड़ा डाडा डा ।। ६६ १०१११२१०६=६१०११

मी१ मी? ताड़ा-डिड़ डा डिड़ डा ड़ा डा डिड़ डा ड़ा डा डिड़ डा ड़ा डाडा ड़ा ।। १ ।। ११ १२३ ३ : ४ ३ २ ३ ४ ४ ६ = ६ १०११ यह घुरपतियोंका गौन है, खयालियोंके गौनमें उतरा निषाद नहीं कितु चढ़ा लगताहै और कुछ चालमें भी फरक है उसकी भी गत लिखदेताहूँ।

स गत-डा डाड़ा डिड़ डा डिड़ डा ड़ा डा डिड़ डा ड़ा डा ड़ा डा ड़ा। ६ ८१० ६ ६ ११ १२१११०६८ मी? ताड़ा-डा डाड़ा डाडाड़ा डा डिड़ डाडा ड़ा डिड़ डा डिड़ डा ड़ा ।।१।। ६ १ १२३४३ ५१८६८६८६ आजकल्ह रासधारीप्रभृति जो मलार गातेहैं वह कौनसा मलार है यह निश्चित नहीं होता वस्तुगत्या वह मलार नहीं किंतु मलारकी छायाका हिंडोला है ऐसा गुशीलोग कहतेहैं अतएव उस अताईमलारका और इन मलारोंका बहुत भेद है हाँ अताईमलार इन मलारोंकी अपेक्षा मधुर है और सहज भी है। इनमलारोंमें 'सारेनीसा साधनीप' यह तान उत्तम है।

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१२८ संगीतसुदशन-

२ अथ ॐ फाटी इसमें मध्यम उतरा है निषाद दोनोंहैं ऋषभ गंधार धैवत ये चढ़े हैं, आरोहमें निषाद नहीं लगता। यह हलकी रागिनी है। इसमें ऋषभसे पंचमपर इकदम जादा जानाचाहिए। स गत-डिड़ डा डिड़ डाड़ाडा डाड़ाडा डा ड़ा डा डिड़ डा डाड़ा। १० ११ १३ १६० १४ ११ १६१४११ १० ६ ६ १०११ १४ १४१६ U

तोड़ा-डिड़ डा डिड़ डा ड़ा डा डिड़डा ड़ा डा डिड़डा ड़ा डाडाड़ा। १०६६ ५३२११३२१ १२ ३ मी१ डिड़ डा डिड़ डा ड़ा डाडिड़ डा ड़ा डा डिड़ डा ड़ा डाडा ड़ा ।। १ II २ ३ ४ ४६५५६८६ ११ १०६६१० ११

३ थ धूरिया मलार इसमें ऋषभ धैवत चढ़े और गंधार मध्यम निषाद ये उतरे लगतेहैं। आरोहमें धैवत निषाद कम हैं। सरगम यथा-सा नी रेसा नी धप पसा रेसा गरेसा। गग मम पप धप सा नी रेसा नी धप म गरे सा, इत्यादि। स मोa मी गत-डिड़डा डिड़डाड़ा डा डिड़ डाड़ा डा डिड़ डा ड़ा डाडाड़ा ।।१।। 4 Y € 90 99 989 90 99 ४ अय नटमलारी इसमें मध्यम उतरा प्रथमनिषाद चढ़ा और द्वितीयनिषाद

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उतरा लगताहै ऋषभ गंधार धैवत ये चढ़े लगतेहैं। आरोहमें गंधार धैवत कम हैं। सरगम यथा -- रेरे म प नीसा नी धप धप पम गरे पम गरे सा। मम पप नीसा रेसा म गरे सा सानी ध प म गरे पम गरे सा, इत्यादि। मी१ क गत-डिड़ डा डिड़ डाड़ा डाडाड़ा डिड़ डाडिड़ डाड़ा डाडाड़ा ॥।१। 9090 ६ १० ६ U U ५ू ६ л

५ अथ मीयांकी मलार यह मलार बहुत ही उत्तम तथा कठिनहै अतएव बड़े उस्ताद- लोगोंके गानेबजानेका है। इसमें ऋषभ धैवत चढ़े और गँधार मध्यम निषाद ये उतरे लगतेहैं इसमें कान्हड़ेका मेल है। आरोहमें कभी निषादको छोड़ भी देतेहैं, कभो ऋषभसे इकदम आगेके पंचम- पर भी जाते हैं। इसमें धैवतपर निषादषड्जकी क्रमसे मौंड अधिक अपेत्ितहै। मी१ मी१ मी९ मी१ मी१ मी॥ मी। स् मी: मी२ मी१ मी१ गत-डिड़डा डिड़ डाड़ा डाडिड़ डाड़ा डाडिड़डाड़ा डाडाड़ा ।।१। ५ ६ = ६ ६ १० ११ १३१३ १३१९ १०१११९ AC १०१० सरगम यथा-ध नी सा रेरे सा सारे ध प म प ध नीनी ध सा।रेपम गग रेगमरे सा नीनी ध सा। रेरे पप मम गरेसा मप गग रे धनी सा। मम पप धध सा गसा गरे सा सानि ध प पध नी सा रेसा नी धप म गगरे ग मरे सा। सानि धप पध नी सा ध सा, इत्यादि।

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१३० संगीतसुदर्शन-

रसानीसा नीधप धनीसा सा रे मपमगरेमग रेसाधनीसा नीधप धुरपत यथा-गगन घन छाए मोर दादुर अकुलाए चपला धनोरेसा रेसा धनीसा सारे म प मगमरेसा नीधपथनीसारेसा चमक डर पाए श्याम आरज हून आ्ायरे।

६ अरथ मीरांका मलार इसमें भी ऋषभ धैवत चढ़े और गंधार मध्यम निषाद उतरे लगतेहैं। इसके आराहमें गंधार निषादको छोड़देतेहैं अवरोहमें भी कमही लगातेहैं 'रे मम पप म गप ध सा' इसप्रकार विशेष चलना चाहिये।

सरगम यथा-सानी ध सा रेरे मप मप म गम रे सा। मम गम गप मप धसा नूध पम पप म गग मरे सा गरे सा धसा रे सा, इत्यादि।

मी१ स गत-डिड़ डा डिड़डाड़ा डा डिड़ डा ड़ा डा डिड़ डा ड़ा डा डा ड़ा। ६ ६ E € E 9099 U U U

मीरांका मलार इसनामसे प्रतीत होताहै कि यह मलार जगत्- प्रसिद्ध भगवद्भक्त श्रीमीरांबाईजीका हो, किंतु उस्तादघरानेसे सुनाहै कि गोपालनायककी लड़कीका भी मीरांबाई ही नाम था यह उसी का मलार है, यही संभव भी है क्योंकि गोपालनायक संगीतके भारी विद्वान् थे उनने अपनी मीरां लड़कीको संगीतविद्या सिखाई होगी इससे उस मीरांने यह मलार बनायाहो। यह भी संभव है कि इस मीरांने अपने पिताके गुरु वैजूवावरेसे भी कुछ संगीतशिक्षा पाईहो क्योंकि वैजूका गोपालपर बहुत स्नेह था।

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अकबरपादशाह तथा मीयां तानसेनजीकं समय किंवा कुछ पूर्व कालमें वैजूवावरे संगीतके भारी विद्वान थे, य स्वभावसे फ़कीर थे और कुछ विक्िप्त भी थे ऐसा सुनाहै अतएव इनसे लोकोप- कार अधिक नहीं हुआ, गोपाल कोई छोटी जातिका सुंदर लड़का था इसपर इनका बहुत प्रेम हुआ इससे ये गोपाल को सदा पास रखतथे और संगीतविद्या सिखातेथे, इनने गोपालका ऐसी मनसे शिक्षादी कि एक तुच्छ घरका लड़का गोपाल नायक कहागया और जगत्में प्रसिद्ध होगया और ता क्या अवतक गोपालका नाम चलाआताहै। शास्त्रमें कहाहै कि "लब्धविद्यो गुरुं द्वेष्टि" अर्थात् विद्या प्राप्त होनके अनंतर विद्यार्थी गुरुसे दूष करताहै, सो गोपाल भी विद्या- प्राप्ति के अनंतर नायक कहा अपने गुरु वैजूसे लड़कर किसी राज्यमें चलागया तथा कृतन्न बन गया, उसराज्यके राजा गोपालका गान सुन बहुत प्रसन्न हुए गोपालको बड़े आदरसे राजान नौकर रख- लिया। राजाने सोचा कि ऐसे विद्वान गोपालके गुरु न जाने कैसे होंगे उनका गान सुने ता बहुत ही अच्छा हो इससे राजान गोपा- लसे गुरुका नाम पूछा गोपालने कहा ऐसीविद्या मनुष्यसे प्राप्त नहीं होसकती अतएव मेरा कोई गुरु नहीं मुझे यह विद्या देवप्रसादसे प्राप्त हुईहै, राजाने कहा कि 'चाहे जो हो बिना गुरुके विद्या नहीं प्राप्त होती' सो तुम अपने गुरुको बताओ इसमें तुमारी कोई क्षति नहीं, हम और भी आपकी तनखाह जादा करदेंगे और तुमारे गुरुको भी बुलाकर सुनेंगे, गोपालने कहा कि 'मेरा गुरु कोई नहीं' इसपर दोनोंका आग्रह बढ़गया गोपालने जो गुरुद्वेषरूपी दौर्भा-

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१३२ संगीतसुदर्शन-

ग्यका बीज बोयाथा अब उसका अंकुर निकल आया सो राजाने कहा कि 'या तो तुम अपने गुरुको बताओ नहीं तो यदि कभी तुमारा कोई गुरु सिद्ध होगया तो तुमको प्रासदण्ड मिलेगा पक्का जानना' गोपालने इस नियमको (प्रायदंडको) स्वीकृत किया किंतु गुरुको स्वीकृत न किया। इधर गोपालके बिना वैजूको चैन कहां वावरे ही ठहरे सो वैज्ू गोपलको खोजते खोजते जहॉँ गोपाल था वहां ही जापहुँचे उस समय गोपाल आमदरबारमें राजाके संमुख गारहाथा वैजू एक तो विद्वांन् दूसरे वावरे फिर उन्हें भय कहां सो मारे स्नेहके दरबार के बीच जाकर गोपालसे लिपट रोने लगगये (स्नेह बुरी बला है) इसीसे कहाहै कि "अँखियां काहूकी कांहूसों न लगे।" गोपालने दरबारी चपड़ा- सीको वैजूको परे दूर हटानेका हुकुमदिया भला वैजू परे क्यों हटें! राजाने गोपालसे पूछा 'यह कौन है?' गोपाल बोला 'मैं नहीं जानता कौन है।' वैजूका वेश परमदरिद्र था याने एक फटी गुदड़ी वैजू ओढ़ेथा कितु वैजूके मुखपर वैराग्य और विद्या का बड़ा तेज था बेचारा यथा भरत मृगके स्नेहमें फंसगया तथा वैजू गोपालके स्नेहमें फंसगयाथा, उस तेजके कारए वैजूका कोई निरादर कर न सका। राजाने वैजूसे पूछा कि 'आप कौन हैं और यह कौन है' वैजूने कहा 'मैं वैजू वावरा हूँ यह तो मेरा ही लड़का गुपला है मैंने इसको बड़े श्रमसे संगीत विद्या सिखाई अब यह मेरे बुढ़ापेमें मुझसे लड़ कर चला आया मुझसे इसके बिना रहा नहीं जाता इससे इसे खोजता खोजता यहां आयाहूँ' राजाने गोपालसे कहा कि 'क्यों तेरा गुरु निकल आया न।' गोपालने अब भी गुरुको सवीकृत न

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. कर कहा कि 'यह पागल है व्यर्थ बोलताहै मैं इसे जानता भी नहीं मेरा गुरु कोई नहीं' राजाने कहा कि 'अब भी आग्रहको छोड़ दो जो सत्य है सो कही तुमारा प्राखदण्ड माफ किया जायगा मिथ्या बोलनेसे प्राखदण्ड माफ़ न होगा' अथापि गोपालने गुरुको खवीकृत न किया। राजाने वैजूसे पूछा कि 'हम आपको गोपालका गुरु कैसे समझें?' वैजू बोला कि 'जैसे आपकी इच्छा हो' राजाके हृदयपर बैठगया कि वैजू सच्चा है अन्यथा ऐसी चेष्टा नहीं होसकती गुरु बिना विद्या ता प्राप्त होती ही नहीं सो गोपाल भूठा है, यह विचार सोचा कि दोनोंके गानके तारतम्यसे इसका निश्चय होजायगा सो दोनोंका गान सुना तो वैजू वैजू ही था गोपालकागाना वैजूका शेष प्रतीतहुआ तव राजा ने गोपालसे कहाकि 'वैजू तुमारा गुरु अवश्य है' गोपालने स्वीकृत न कर एक धुरपत गाया उससे वनका मृग आया गोपालने उस मृगके कंठमें एकमुक्तामाला पहना दी गाना बंद किया मृग वनको चलागया तब गोपालने राजासे कहा कि यदि यह मेरा गुरु है तो भला उस मृगको तो बुलावे राजाने यह वात वैजूसे कही वैजू गाने लगे सो एक छाड़ बीस तीस मृग मुक्तामाला पहिरेहुए वनसे आगए वैजूने राजा और गोपालसे कहा कि अपनी माला पहचानकर उतारलो फिर क्या था राजा चकित और गद्गद हो सिंहासनसे नीचे उतर आए गोपाल लज्जित होगया राजाने बड़े क्रोधसे गोपालको आत्तेपवचन कहा कि ऐसे लोकोत्तर महात्मा गुरुके साथ तूऐसी की तेरेसे कृतन्नका मुख देखना पाप है अब तुझे प्राखदण्ड मिलताहै, पूर्व वृत्तांत वैजूसे कहकर गोपालके तत्क्षर वधकी आज्ञादी वैजू रोने लगा हाथ जोड़ पल्लापसार गोपालप्राकी

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१३४ संगीतसुदर्शन-

राजासे मिक्षा मांगी राजाने एक न मानी राजहठ चढ़गया वैजूसे कहा कि 'आपकी सेवाकेलिए मैं स्वयं हाज़िर हूँ आप अपनी कुछ चिंता न करें किंतु इस कृतन्नको मरवाए बिना न छोडूंगा' बस गोपाल मारागया उसका दाह कर उसकी अस्थिए एक जलाशयमे गेर दीगईं। वैजूकी फिर क्या दशा हुई सो विदित नहीं। गोपालका यह वृत्तांत सुन उसकी मीरां लड़की ने पितृस्नेहसे वहां आकर उस जलाशयपर स्नान कर यह (मीरांकामलार) मलार ऐसा गाया अर्थात इसप्रकार मलार ऐसा गाया कि सुनतेहैं कि गोपा- लकी अस्थिएँ जलपर तैर आई उनको मीरांने इकट्ठा करलिया। इस मलारकी यह कथा सुनीहै आगे सचझूठकी रामजाने, उस समयके उनलोगोंकी लड़कियोंकी यह सामर्थ्य थी। यदि गोपालका कोई लड़का होता तो न जाने क्या करता। इस समय तो सब गप्पे हैं, गप्पें चाहे जितनी सुनलो। 9 अथ मेघराग मेघरागमें वस्तुगत्या गंधार तथा धैवत वर्जित होनेसे यह शडुव रागहै अनएव सारंगके सदशहै सारंगका पति भी है इसमें ऋषभ चढ़ाहै मध्यम निषाद ये उतरेहैं। गंधार धैवत इनको सर्वथा त्याग देनेसे सारंग ही.बनजातीहै इसकारण उस्तादलोग इसमें गंधार धैवत इनको भी थोड़ा लगादेतेहैं। सरगम यथा-सा रेरे म पप मप मम रेरं सा। मम पप नीसा रेरे सा रेरे नीनी पप मप मम रेरे सा। सानी पनी पम पप मप सा नी रेरे सा। रेरे नी सा मरे पप मप रे सारे पम प नी सा रेरे सा रे नी पम रेरे सा इत्यादि।

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रागाध्याय। १३५

गत-डिड़डा डिड़डाड़ा डा डिड़ डाड़ा डा डिड़ डा ड़ा डाडा ड़ा। 9090 ४ ६ 90 90 9992 99 90 99 U तोड़ा-डिड़ डा डा ड़ा डिड़ डा डा ड़ा डिड़ डा डा ड़ा डिड़ डा डा ड़ा ।। १।। २ ३ ४ ६ ३ ४ ई ८ ४ ६ ८ १० ६ = १० १० स्वरसागरमे मेघकी पटरानी सारंग देवता इंद्र मौसम वर्षा कहाहै। "सारंग अरु गौडगिरी श जैजैवन्ती धूरिया सभावती है नारी मेघरागकी। सारंगके पुत्र सुनौ सावत (सावन्त वा सावन) है वाको नाम ताकी तो नार सकवनसी बड़भाग की। गौड़ (गौन) पुत्र गौड़वती वाकी नार, तीजै जैजैवंतीको पुत्र नट वाउकी। देवगिरी, चौथे धूरियाको पुत्र सुना मोदमल्हार कुकुव भारजा सुहागकी। पांचवी सभावतीका पुत्र मधुमाध वाकी ना नारी मधुमाधवी सुनौ पियारी अतिमानकी ।१॥" ८ अय सूरकी मलार इसमें धैवत नहीं लगता, ऋषभ चढ़ा है गंधार मध्यम निषाद उतरेहैं आरोहमें गंधार कम है, इसमें सारंगका मेल विशेष है अत एव ऋषभ जादा लगताहै। ऋषभसे गंधारपर ठहरकर फिर ऋषभपर वहाँसे षड्जपर आजाना चाहिए। सरगम यथा-नीसा रेरे सा सारे ग रेरे सा। सारे म पप मप म गरे सा नी रेरे सा। मम पप नी सा पसा रेरे नी पम पप मरे रे गरे सा नी रेरे सा नी इत्यादि। गत-डिड़डा डिड़ डा ड़ा डाडा ड़ा डिड़ डा डिड़ डा ड़ा डा डा ड़ा। C c € 88 ३ २ ३ 8 € ⑉ 90 999⑈

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१३६ संगीतसुदर्शन-

स तोड़ा-डिड़ डा डिड़ डा ड़ा डा डिड़डा ड़ा डा डिड़ डाड़ा डा डा ड़ा ।।१।। ६ ४ ३ 8 c १0१099 U W 99 मैंने यहॉ गौनमलारसे लेकर सूरकी मलार तक आठ राग- रागनिये वर्षा ऋतुकी लिखी हैं इनके सिवाय कुछ और भी इस ऋतुकी रागिनी हैं।

अब मैं वसंत ऋतुकी अर्थात मार्गशीर्षसे लेकर फाल्गुन- पर्यतकी कुछ रागरागनियें लिखताहूँ दुपहरसे अर्धरात्रतक इनका समयहै।

१ अथ काफी काफीको विशेषकर फाल्गुनमें ही गाते बजातेहैं यह प्राधान्येन होरीकी रागिनी है बहुत प्रसिद्ध है। इसमें ऋषभ धैवत चढ़े औरर गंधार मध्यम निषाद उतरे लगतेहैं। सरगम यथा-सारे नी सा रेग मम प ध पम पम गरे सा। मम प ध नीसा सारे सा नी धप म गरे सा रेनी सारे गग मम प मप म गरे सा, इत्यादि। स दुगन गत-डिड़ डा डिड़ डा ड़ा डाड़ा डाड़ा डा ड़ा डाड़ा डाड़ा डाड़ाडाड़ाडाडा' ६ १० = ६ ५ U 8 8 ६८ ६५ ६८ ६८६१० ११ तोड़ा-डिड़ डा डिड़ डाड़ा डा डिड़ डा ड़ा डा डिड़ डा ड़ा डा डा ड़ा ।। १।। ११ १०६ ८६६५८६८६६८६१०११

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रागाध्याय। १३७ २ स्रथ वसंत वसंत वहुत ही उत्तम रागपुत्र है बड़े विद्वानोंके गानेबजाने- याग्य है। इसमें ऋषभ उतरा गंधार धैवत निषाद ये चढ़े मध्यम दोनों लगते हैं किंतु उतरा मध्यम बहुत कम है। इसके आरोहमें प्रायः ऋषभ और पंचमको छोड़ देतेहैं, वस्तुगत्या इसका गाना- बजाना कुछ कठिन है। अवरोहमें भी ऋषभको जरासाही लगाना चाहिए। च च च सरगम यथा-नी सा ग म ध 'ममम' गगरे सानी ध पमधनी च च च सा। मम ग मम ग सा सानी सा रेसा नीध सा मगरे सा। सा च मध नीध प म धम गरे सा। स ग म ध सा धनी सा गरे सा सानीधप मध मग रेसा, इत्यादि। मी१ स मी१ गत-डिड़ डा डिड़ डाड़ा डा डा डा डा डा ड़ा डा डिड़ डा डा ड़ा। av ३ ६ ७ >0 ५५ ७ ६१०११ عر

७ मीर तोड़ा-डिड़डा डिड़ डा ड़ा डा डिड़ डा ड़ा डा डिड़डा ड़ा डा डा डा ।।१। ६६७२४४३ ३४५५६७६११ २ १० यह धुरपतियोंका वसंत है, खयालियों का वसंत इससे पृथक है उसमें मध्यम तथा धैवत उतरे ही विशेष लगते हैं यही उसका इससे भेद है। मीयां अमीरखांजीने इन दोनों वसंतोंसे पृथक भी एक और वसंत सुनायाथा, बताया भी था। १४

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रागाध्याय। १३६ मीर मीर मीर तोड़ा-डा डिड़ डाड़ा डाडिड़ डाड़ा डाडा ड़ा डिड़ डाडिड़ डाड़ा।।१।। ४४/ ७४४७६६ ६११ स्वरसागरमें हिंडोलकी पटरानी टोड़ी देवता ब्रह्मा वर्ण पीत कहा है। "पाँचों नार हिंडोलकी टोड़ी पहिली वाम। जैतश्री आसावरी अरु वंगाली नाम।। और पाँचवीं सैंधवी सुत इनके सुन कान। टोड़ोपुत्र भकार बधू रूपमंजरी जान।। जैतश्रीको पुत्रसो लङ्कदहन कहलाय। पटमंजरी वाकी बधू वाको अधिक सुहाय। सुनौ पुत्र आसावरी जाहिकहौ खट राग। भीमपलासी नार है वाघर अति बड़ भाग। वंगालीकौ पुत्र वसंत वधूवसंतीको वह कंत।। पुत्र सैंधवीका सुनौ पंचम ताको नाम। बाकी वधू रिवासुरी मनमोहनसी वाम॥" इति। मैंने शीतऋतुके ये चार रागरागिनी लिखेहैं। यद्यपि मेरे लिखे ये रागस्वरूप वाद्यमात्रकेलिए एक समानहैं तथापि वीषादिवाद्योंकी वादनप्रशाली पृथक पृथक है वह बिना शिक्षा के प्राप्त नहीं होसकती। इतना ही नहों किंतु बड़े बड़े गुरुघरानोंका तो एक प्रकारकं भी गानेबजानेमें परस्पर भेद रहताहै, यथा गुवर- हारों और खंडारोंके धुरपतका एवं वाद्योंमें भी। वीणा रवाब स्वर- श्रृंगार सैनीसितार इत्यादि वाद्यों की वादनप्रशाली बहुत कठिन है। आदि से मैंने भैरवरागसे लेकर हिंडोलराग तक पूरे एकसौ

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१४० संगीतसुदर्शन-

रागरागिनी लिख दिये हैं, यद्यपि इनके सिवाय पचामरागरागिनी तो मुझे भी और मालूम हैं और कितने हैं इसका कुछ नियम नहीं होसकता सबमिलकर दो अढ़ाईसौ रागरागिनी अवश्य हैं, उनमें से पचास साठ तो सर्वथा लुप्त हो चुके हैं जो वर्तमान हैं वे भी ठुमरीरसिकोंकी कृपासे नष्ट होरहेहैं। कुछ कालतक ये सब राग नष्ट होकर देसी गीत ही प्रधान हो जाएँगे। उस्तादघरानों को वस्तुगत्या विद्यामें प्रेम नहीं कितु वे धन चाहतेहैं धनदेनेवाले श्रीमानोंके बोध जैसे हैं वे स्पष्ट ही हैं फिर ये बेचारे राग कैसे बचें, जो लोग विद्यामें प्रवृत्त होते भी हैं वे समयके प्रभावसे विद्यातच्वको त्याग कर दंभपाखंडमें अग्रसर होजातेहैं इससे भी विद्या नष्ट हो- रहीहै। तथापि जो मैंने एक सौ रागरागनी यहॉ लिखेहैं वे भी कम नहों हैं। वस्तुगत्या शिक्षाके बिना विद्या आ नहीं सकती जिसने किसी भी अच्छे गुरु (उस्ताद) से शिक्षा पाईहै उसको मेरे इस ग्रन्थसे कुछ सहायता मिलसकतीहै। जिसने गुरुमुखसे उस- राग का स्वरूप ही जाना नहीं वह उसरागको कभी भी गाबजा सकता नहीं, गाने बजानेमें प्रथम यह है कि रागका स्वरूप न बिगड़े, यह रागस्वरूपज्ञानके बिना होसकता नहीं, फिर स्वर ताल ठीक होने चाहिए, तानें मार्मिक होनीं चाहिए, गानेमें गला बजाने में हाथ सुरीला होनाचाहिये यह बात इसविद्यामें और विद्याओंसे विशेष है। बहुत से रागरागिनी ऐसे भी हैं कि जिनके गानेबजाने की शैली पृथक पृथक है सभी एक शैलीसे गाए बजाए नहीं जाते यह भी एक गूढ़ तत्व है। यद्यपि चढ़े उतरे सर सभी रागोंकेलिए एक समानहैं तो भी सूक्ष्मभेद भी रहताहै यथा

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रागाध्याय। १४१ ऋषभ विलावलमें चढ़ाहै सारंगमें विलावलसे भी सूतभर चढ़ा रहता है एवं और रागोंमें भी जानना। जो राग शांत हैं उनका प्रायः रात्रिका और दिनका तृतीय चतुर्थ प्रहर काल है शांतातिरिक्त रागोंका अन्य काल है। ताल- रहित आलाप जोड़कर गानाबजाना शांतरसानुकूल है अतएव उसका दरजा बड़ा है और आजकलके रसिकोंको वह पसंद भी नहीं। ताल युक्त गानाबजाना शृंगाररसके अनुकूल है। जिस रागरागनीके गानेबजानेका अभ्यास छूट जाताहै उसका फिर अभ्यास किये विना उत्तम गानाबजाना नहीं बनता। थोड़ा थोड़ा काल अनेक रागोंको सदा गानेबजानेसे एक रागको अरधिक कालतक गानेबजानेकी शक्ति नहीं उत्पन्न होती। जो गानवाद्यकी शैली हज़ार आठ सौ वर्षसे परिष्कृत होकर चली अब उसकी अंत्यावस्था है जो उत्पन्न होता है वह एक न एक दिन अवश्य नष्ट होताहै भगवत्ने भी कहा है कि "जातस्य हि ध्रुवं मृत्युः" मीयां अमृतसेनजी हैदरबख़शजी आलमसेनजी इनलोगोंसे जो मैंने गानाबजाना सुनाहै उसकी अब छाया भी शेष नहीं रही, जो कुछ शेष है वह भी अमीरख़ॉजी® और रहमतख़ां- जीके दमतक है इनके अनंतर सर्वथा इसविद्याकी इतिश्री समभ- लेनी, इस इतिश्रीमें भी उनलोगोंकी कोई क्षति नहीं क्षति तो केवल हम आगेवाले जिज्ञासुओं की ही है। "सकल पदारथ या जगमाहीं, कर्महीन नर पावत नाहीं।" स्त्रोके तुल्य रागनियों के भी सुकुमारमध्यपुष्टत्वभेदसे तीन प्रकार हैं। १ अब ये भी दोनों नहीं रहे अर्थात् इतिश्री होगई।

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१४२ संगीतसुदर्शन-

१ सुककुमार यथा आसावरी छाया प्रभृति, २ मध्यरूपा यथा टोड़ी भैरवी प्रभृति, ३ पुष्टरूपा यथा कन्हाड़ा भीमपलासी इत्यादि।

१ केवलऋषभरहित-मालश्री नट इत्यादि। २ केवलगंधाररहित-गिरिनारी शुद्धसारंग इत्यादि। ३ केवलमध्यमरहित-गुनकरी प्रभृति। ४ केवलपंचमरहित-गूजरी पूरिया मारवा दर्शमंजरी इत्यादि। ५ केवलधैवतरहित-देवसागप्रभृति। ६ केवलनिषादरहित -आसा प्रभृति। ७ षडजगंधारदूयरहित-आहंगसारंग, ८ ऋषभपंचमद्ठयरहित-मालकौस हिडोल प्रभृति। र् गंधारधैवतरहित-मधुमाद प्रभृति । १० मध्यमनिषादरहित-भूपालीप्रभृति। ११ गंधारमध्यमपंचमधैवतरहित-जलघरसारंग। मेरी जानमें सबसे प्रथमका गाना वह है जो ऋग्वेद यजुर्वेद का है उसके अनंतर उन्नति होने से सामवेदका गाना स्थिर हुआ। उसके अनंतर सवरोंके प्रस्तारसे भैरवादि छै राग क्रम से वा तक्रमसे बने उसके अनंतर जो राग बने उनको रागिनियें बनाया उसके अनंतर रागपुत्र उनके अनंतर रागपुत्रवधू बनीं ऐसा तर्क होताहै आगे राम जाने। सब रागों की प्रधान प्रकृति तो स्वरही हैं संकीर्य रागोंमें अप्रधान प्रकृति वह वह राग भी होताहै यथा बराड़ी श्रीराग और टोड़ीके मेलसे बनीहै सो श्रीराग और

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रागाध्याय। १४३

टांड़ो ये भी बराड़ीके प्रकृति हुए अर्थात् प्रकृति विकृतिभाव रागोंमें भी है। और भैरवीमेंसे उतरे मध्यम निषाद निकाल- कर चढ़े लगादिये सो टोड़ो बनगई उसमेंसे भी पंचम पंचम निकाल देने से गूजरी बनगई यह प्रस्तारका क्रम है। रागवाद्योंमें गानकी सहायताकेलिए प्रथम तुम्बूरा बनाया- गया, जब गानेमें कुछ लोगोंको लज्जा होने लगी तो उनकेलिए वीखा बनाईगई उसके अनंतर क्रमसे और रागवाद्य निकले। यथा वेदांत- शास्त्रमें कई शास्त्रोंकी अपेक्षा होनेसे वेदांतशास्त्रियोंने सबसे अरधिक प्रतिष्ठा पाई तथा गानकी अपेक्षा रागवाद्य उत्तम बजानेमें अधिक क्लेश (श्रमादि) तथा बुद्धिव्यय होनेसे वीणाकारोंने गायकोंसे भी अधिक प्रतिष्ठा पाई। वीकाके अ्नंतर ही और रागवाद्य बने। तालवाद्योंमें नगारा सवसे अधिक प्राचीन प्रतीत होताहै, नगारे का स्वरूप भी इस तर्कका सहकारी है उसके अनंतर मृदंग बना फिर तबला प्रभृति बने ऐसा प्रतीत होता है। आगे राम जाने। डमरू तो रागताल दोनों का वाद्य है वस्तुगत्या डमरू को बनाने वाला अब कोई नहीं। कांस्य के तालवाद्य की विशेष उन्नति नहीं हुई। यद्यपि मैंने सितार सीखाहै तथापि मुझे रागवाद्योंमें सबसे बढ़कर सनाई पसंद है एक तो सनाईकी आवाज़ सैकड़ों जनोंपर छाजाती है दूसरा इसका आकार छोटा सा है एक हाथ में चाहे चार सनाई उठालो ये गुय दूसरे रागवाद्यमें नहीं। हमारे सितारके लिए तो रेलवेका एक सीट चाहिये।

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१४४ संगीतसुदर्शन-

रागपरिवारकोष्ठ

रागिनीनाम रागपुत्र नाम रागपुत्रवधूनाम रागनाम

भैरवी देवगंधार सुघरई

विभाकरी विभास सूही भैरव गूजरी देवसाग जूही

गुनकरी गंधार कुरंक

बिलावल सूहा बहुली

गौरी कल्याण अहीरी

गौरा गौड टंक

नीलावती तनैना सिवाड़ा

विहंगड़ा हेमकल्याण विहंगिनी श्रीराग

विजयन्ती खेम कल्याण लक्ष्मी

पूरिया नट मांभ

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रागाध्याय। १४५

रागपरिवारकोष्ठ

रागिनीनाम रागपुत्रनाम रागपुत्रवधूनाम रागनाम

भठहारी अ्रंग सोहनी

सरस्वती वैराग तरघटी

रूपमंजरी विहंग नागवती मालकौंस

चतुरकदंबी सुढँग ललिता

कौशिक नंदिनी परज रामकली

कान्हड़ा गारा सोरठ

किदारा जलधर लंकधर

छड़ाना शंकराभरण काफ़ी दीपक

मारू शंकराकरण पार्वती

विहाग शंकशा पूरवी

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१४६ संगीतसुदर्शन-

रागपरिवारकोष्ठ

रागिनीनाम रागपुत्रनाम रागपुत्र वधू नाम रागनाम

सारंग सावन सकवनी

गौड़गिरी गौड (मलार) गौडवती

जैजैवंती नट (मलार) देवगिरी मेघ

धूरिया मोदमलार कुकुच

सभावती मधुमाध मधुमाधवी

टोड़ी भकार रूपमंजरी

जयश्री लंकदहन पटमंजरी

आासावरी खट भीमपलासी हिडोल

वंगाली वर्सत वसंती

सैंधवी पंचम रिवासुरी

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रागाध्याय। १४७ मैंने यह रागपरिवार स्वरसागरके अनुसार लिखाहै इसमें मूलग्रंथलेखकके प्रमादसे कुछ गड़वड़ अवश्य होगईहै उसमें वश कुछ नहीं। और रागपरिवार भी मतभेदसे भिन्न भिन्न प्रकारका है वस्तुगत्या यह कल्पनामात्र है, यह परिवारकल्पना इसदेशमें निसगसे ही चलीआतीहै। रागके रूपवेशपरिवारादिके श्रवण- से चित्तको विशेष चमत्कार न होनेसे ही संगीतविद्वानोंने इसकी उपेक्षा करदी अतएव बहुत अल्प विद्वानोंको इसका ज्ञान है, वस्तु- गत्या यह विषय कुछ चमत्कारी नहीं। प्रातःकाल चतुर्थप्रहर और रात्रि ये तीन काल और ग्रीष्म वर्षा और शीत ये तीन ऋतु प्रधान होनेसे छैराग हुए। और षडजातिरिक्त ऋषभादि छैस्वरोंके प्राधान्यसे भी छैराग हुए ऐसा तर्क हाताहै, उनमेंसे ऋषभप्राधान्यसे श्री. गंधारप्राधान्यसे भैरव. मध्यमप्राधान्यसे मालकौस. पंचमप्राधान्यसे दीपक. धैवतप्राधान्यसे हिंडोल. निषादप्राधान्यसे मेघ. बनाहै, षड्जका ता सभीमें प्राधान्य है क्योंकि षड्ज सब खरोंका राजा है, ऐसे राग रागिनी दो चार ही हैं जिनमें षड्जका प्राधान्य नहीं। रागोंकी षटसंख्यामें औरर भी इसीप्रकार कोई तर्क करसकतेहैं। गाना विप्रलंभश्ृंगारके गीत गानेकेलिए चला फिर संभोग- शृंगारमेँ फिर शाँतमें फिर वीरमें घुसा अंतमें बात बातमें घुस गया ऐसा तर्क होताहै, अति करदेना यह लोकरीति ही है। कफवातप्रधान रोगोंकेलिए सारंगोंका. उन्मादकेलिए टोड़ी प्रभृतिका, जाफजिगरकेलिए भैरवी प्रभृतिका, पित्तप्रधान रोगोंके- लिए देशी दरवारी प्रभृतिका गाना बजाना हितकारी है।

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१४८ संगीतसुदर्शन- प्रत्येक राग प्रत्येक रागपर जम नहीं सकता किन्तु विलक्षण जमता है। कुछ राग ऐसे हैं जो प्रथम सप्नकको विशेष चाहतेहैं यथा दरबारी प्रभृति, कुछ राग द्वितीय सप्तकको विशेष चाहतेहैं यथा इमन प्रभृति, टोड़ी प्रभृतिके तीनों सप्तक अनुकूल हैं, खमाच प्रभृतिके प्रथम सप्नक विशेष अपरनुकूल नहीं। ये सब रहस्य दुर्लभ हैं। बजाई भी अनेक प्रकार की है यथा देर तक एक राग को बजाने के लिए वाद्य का एक एक स्वर बढ़ते जाना, अस्ताई अंतरे का बजाना, बिलंबित मध्यद्रुत तीनों लयोंको क्रमसे बजाना फिर संकीर्य करके बजाना, छोटी रागनियोंमें अंतरेको मंद बजाकर अस्ताईको जोरसे बजाना किवा एक सम बजाना, इत्यादि।

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रागाध्याय। १४६

अकारादिक्रमसे कुछरागोंका विवरसकोष्ठ

रागनाम ऋतु प्रहर जाति उतरे स्वर चढ़े स्वर वजि तस्वर

१ अडाना सच संपूर्ण ग म ध नी रे

२ अल्हैया सव २ संपूर्ण स रेगध नी O

३ अहीरी सव प्रभात संपूर्णं रेमध ग नी O

४ आसा सरव प्रभात षाडव म रेग ध नी

५ आसावरी सव १-२ संपूर्ण सभी

६ आहंगसारङ्ग ग्रीष्प २॥। तडव मनी रेधू स ग

७ इमन सव शा संपूर्ण सभी

= इमनकल्याण सवें संपूणा मू सभी

६ उमातिलक सव प्रभात संपूण रेम ध ग नी

१० काफी फागुन १-६ संपूर ग म नी रे ध

११ कामोद सव ५-६ संपूण म रेग ध नी

सरगममें गू ऐसे स्वरों का प्रयोग अल्प जानना। * पंचमप्रहर आधा और षष्ठ ग्रहर संपूर् अड़ानेका समय है। इसी रीतिसे आगे भी अङ्कोंसे समय जानना।

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१५० संगीतसुदर्शन-

अकारादिक्रमसे कुछरागोंका विवरणकोष्ठ

रागनाम ऋतु ग्रहर जाति उतरे स्वर चढ़े स्वर वजितस्व

१२ कालगड़ा सर्व प्रभात संपूर्स रेमध ग नी 0

१३ कुंवाएती सर्व षाडव नि रेगम व प

0 १४ कुकव सर्वे २ संपूर्णा म नी रेग ध नी

१५ केदारनट सर्व संपूर्ण म रेग धनी ぐ ー ®

१५ केदारा सर्व ぐ ー ® संपूर्ण म रेगम्ध नी

१६ कौंसिया- सर्व संपूर्ण 0 7 कानड़ा ग म नी रे ध

१७ खट सर्व १-२ संपूर्ण रेगमधनी रे 0

१८ खट (अमीर- खुसरोकी) सर्व १-२ संपूर्स सभी

१६ खसाच सर्व ५-६ संपूर्ण मनी रेग धनी

२० गंधारी सर्व १-२ संपूर्ण सभी 7

२१ गारा सर्व ५-६ संपूर्ण म रेग धनी

२२ गिरिनारी सर्व ६। षाडव मनी रे ध ग

२३ गुनकरी (ली) सर्व २ षाडव रेनी ग ध म

२४ गूजरी सर्व १-२ पाडव रेगध म नी प

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रागाध्याय। १५१

अकारादिक्रमसे कुछरागोंका विवरयकोष्ठ

रागनाम ऋतु प्रहर जाति उतरे स्वर चढ़े स्वर व जितस्वर

२५ गौड़सारंग ग्रीष्म ३॥ संपूर्या म रेगम्धनी

२६ गौन वर्षा १-६ संपूर्णा मनीग रेगधनी

२७ गौरा स प्रभात संपूर्ण रे ध गम नी

२८ गौरी सर्वे संपूर्ण रे ध ग मनी

२६ छाया सर्व ५-६ संपूर्ण मू रेग मूध नी

३० छायानट सर्व ५-६ संपूर्ण म रेगमूध नी 0

३१ जंगला सर्व ३-६ संपूर्ण गमनी रेधनी O

३२ जयश्री सवे 118 संपूर्ण रे ध गभ् नी

३३ जलघरसा- ग्रीष्म २-॥। सामिक रङ्ग नि रे गम पध

३४ जिला सर्वे ३-६ षाडव गम नी रे घ प

३५ जीलफ सर्वे प्रभात संपूर्ण रेमध ग नी

३६ जैजैवंती सर्व ।६ संपूण गम नी रेध

३७ जैत . सर्व ५-६ पाडव सभी मू

३म जोगिया सर्वे प्रभात संपूर्ण रेमध गनी

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१५२ संगीतसुदर्शन-

अकारादिक्रमसे कुछरागोंका विवरयकोष्ठ

रागनाम ऋतु प्रहर जाति उतरे स्वर चढ़े स्वर वर्जितस्वर

३६ जौनपुरी सर्च १-२ संघूर्स सभी

४० भंफोटी वर्षा २-६ संपूर्ण म नी रेग ध नी

४१ टोडी सर्व १-२ संपूरं रेग ध म नी

४२ तनक सरवे ६। षाडव रे म ग नी ध

४ ३ तिरवन सर्व संपर्शा रे ध ग म नी

४४ तिलंग ग्रीष्म ५-६ षाडव म नी ग ध

४५ तिलकका- मोद सर्व इ-६ षाडव म नी रेग म् नी ध

४६ दरबारी सर्वे ।६ संपूर् ग मध नी रे

४७ दर्शमंजरी# सर्व ५-६ षाडव सभी प

४= देवगिरी सर्व संपूर्णा म रेग धनी 0 २

४६ देवसाग सर्वे २ षाडव ग म नी रे ध

५० देस सवें ६। संपूर्सा म रेगध नी ०

५१ देसकार सर्व प्रभात संपूर्र रे ग म ध नी

  • यह दुर्शमंजरी और अमृतमंजरी ये दो रागिनी मेरी ही बनाई हैं।

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रागाध्याय। १५३

अरकारादिक्रमसे कुछरागोंका विवरसकोष्ठ

रागनाम ऋतु प्रहर जाति उतरे स्वर चढ़े स्वर वजि तस्वर

२२ देसी सर्व १-२ संपूर्णं ग मध नी 0

५३ धनाश्री सर्व 118 संपूर्ण रे ध ग स नी 0

५४ धवलश्री सर्व शडुव मनी गध

५५ धानी सर्व ३।। संपूर्ख गमनी रेध 0

५६धूरियामलार वर्षा १-६ संपूर्ण गमनी रेध

२७ नट v सर्व ५-६ षाडव म गधनी

५= नटमलारी वर्षा ५-६ संपूर्ण सनी रेगधनी

५६ नायकी कानडा सर्व ॥ ६ ् पूर्ण गसनीध रेध 0

६० पंचम सर्व प्रभात संपर्स रेध गम नी

६१ पटमंजरी* सर्व सायं प्रायः सबी प

६२ परज सर्व ६-७ संपूर्य रेध गमनी 0

६३ परजका- सर्व ६-७ रेमध गनी 0 लंगड़ा कोई २ लोग 'पटमंजरीको ग्रातःकालकी बतातेहैं विलावल के तुल्य। वस्तुगत्या पटमंजरी और रूपमंजरी ये दोनों ही लुप्तप्राय हैं। कोई केदारे के तुल्य कहते हैं। मेरे पास इसकी एक छोटी सी गत है बस। १५

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१५४ संगीतसुदर्शन-

अकारादिक्रमसे कुछरागोंका विवरयकोष्ठ

रागनास ऋतु परहर जाति उतरे स्वर चढ़े स्वर वर्जितस्व

६४ पहाड़ सर्व षाडव मू रेगधनी मू

६५ पार्वती सर्व प्रभात संपूर् रेमध गनी 0

६६ पीलू सर्व ३-६ संपूर्य गमध् रेमधनी 0

६७ पूरवा सर्व २ संपूर्णा म रेगधनी 0

६८ पूरवी सर्वे संपूस रे गमधनी 0

६६ पूरिया प 0 धुरपती सर्व ५-६ षाडव सभी

७० पूरिया खयाली सर्व ५-६ षाडव रे गसधनी

७१पूरियाधनाश्री सर्व 118 संपूर्ण रेध गमनी 0

७२ ्रदीप सर्व ३॥ संपूर्ण गसनी रेध

७३ प्रभाती सर्व प्रभात संपूर्या रेम गमधनि् 0

७४ भकार सर्व प्रभात पाडव रेम गमधन् प

७५ भटहारी सर्व संपूर्णा म रेग धनी

७६भीमपलासी सर्व ३॥ संपूर्णा सभी ० 0

७७ भूपाली सर्व ५-६ औडुव रेगध मनी 0

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रागाध्याय। १५५

अरकारादिकरमसे कुछरागोंका विवरणकोष्ठ

रागनाम ऋतु ग्रहर जाति उतरे स्वर चढ़े स्वर वर्जितस्वर

७८ भैरव सचें प्रभात संपूर्स रेस ध ग नी

७६ भैरवी सर्व १-२ संपूर् सभी O 0

८० मधुमाद ग्रीष्म २॥। औडुव मनी रे ग ध

र१ मलोया- केदारा सर्व संपूर्ण म रेगध नी 0

म२ मारवा सरवें षाडव रे ग म ध नी प

८३ सालकौस सर्व ६-७ तडुव ग म ध नी रे प 0

म४ सालश्री सर्व पाडव ग स ध नी

८५ मालीगौरा सवें 11४ संपूर्ण रे ध ग स ध नी 0

र६ मीयांकी- मलार वर्षा १-६ संपूर्णा ग म नी रे ध 0

८७ मीयांकी- 0 सारंग ग्रीष्प २॥ पाडव रे म् ध नी ग

दम मीरांकी- 0 मलार वर्षा १-६ संपूर्ण ग म नि रेध

८ह मुलतानी 0 धुरपती सवे ३ ॥ संपूर्ण रे गध म नी

६० मुलतानी खयाली सर्व ३॥ संपूर् रे ध ग म नी

६१ मेघे वर्षा १-६ औडुव नीम रे ग ध

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१५६ संगीतसुदर्शन-

अकारादिक्रमसे कुछ रागोंका विवरसकोष्ठ

रागनाम ऋतु प्रहर जाति उतरे स्वर चढ़े स्वर वर्जितस्वर

६२ रामकली सर्व १-२ संपूर्ण सभी गू

६३ लङ्गदहन ग्रीष्म २॥। षाडव मनी रे ध ग

६४ लच्छासाग सर्व २ संपूर् म रेगधनी

६५ ललित सर्व प्रभात षाडव रे म ध ग म नी प

६६ लाचारी टोड़ी सर्वे १-२ संपूर्र गस ध नी रे

६७ बंगाल सर्व प्रभात संपूर्ण रेध स ग नी

हम वंगाली सर्व १-२ संपूर् सभी 0

६६ वढ़हंस ग्रीष्म २॥ ्राडुव मनी रे ग ध

१०० वरवासैनी ग्रीष्म २॥ संपूर् ग स नी रे ध 0

१०१ वराड़ी सर्वे 11४ संपूर् रे ध ग स नी 0

१०२ वसंत- खयाली शीत ४-६ संपूर्ण रेमध ग स नी

१०३ वसंत घुरपती शीत ४-६ संपूर्णा रे म् ग म ध नी

१०४ वहार शीत ४-६ संपूर ग स नी रे ध

१०५ वागीश्वरी सर्व ॥६ षाडव ग स ध नी रेध प

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रागाध्याय। १५७

अकारादिक्रमसे कुछरागोंका विवरसकोष्ठ

रागनाम ऋतु प्रहर जाति उतरे स्वर चढ़े स्वर वर्जितस्वर

१०६ विभास सर्व प्रभात पाडव रे ग स ध नी प

१०७ बिलावल सर्व २ संपूर्ण रेगमूधनि 0 शुद्ध मू

१०८ विलास- खानीटोडी सर्व १-२ संपूर्ण ग म ध नी

१०६ विहंगिनी सर्व ६।। संपूर्णा स रेगध नी 0

११० विहाग सर्व ६।। संपूर्ण स रेगसधनी 0

१११ वृ दावनी ग्रीष्स संपूर्ण ग स नी रेध O

११२ शङ्करा सर्व ५-६ संपूर्ण रे ग म् ध नी 0

११३ शहाना सर्वे संपूर्स गसनी रेध

११४ शुकल सर्व २ संपूर्ण म रेगधनी

११५ शुद्ध ५-६ रे ग म् ध नि 0 कल्याया सर्वे संपूर्

१९६शुद्धसारङ्ग ग्रीष्स २।। षाडव स रे धू नी ग

११७ श्याम सर्व संपूर्ण सभी O

११८ श्यामका सर्व संपूर्ण रेध लङ्गड़ा ग स नी

११६ श्रीराग सर्वे संपूर्ण रेध ग म नी

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१५८ संगीतसुदर्शन-

अकारादिक्रमसे कुछरागोंका विवरसकोष्ठ

रागनाम ऋतु प्रहर जाति उतरे स्वर चढ़े स्वर वर्जितस्वर

१२० सावन वर्षा ५-६ षाडव मनि रे ध ग

१२१ सिंधभैरवी सर्व १-२ संपूर्र ग स धनी रे O

१२२ सिंधूरा सर्व ३॥ संपूर्णी ग म नी रे ध 0

१२३ सुघरई सर्व २ संपूर्णा ग स नी रे ध

१२४ सुरपरदा सर्व २ संपूर्णा म रेग धनी 0

१२५, रँकी- रे ध् नी • मलार वर्षा १-६ संपूर्ण ग म नी

१२६ सूहा सर्व २ संपूर्या ग स नी रे ध

१२७ सैंधवी सर्व १-२ संपूर्णा रेगस ध नी

१२८ सेरठ सर्व ॥६ ।। संपूर्णा मनी रेग् ध नी 0

१२६ सोहनी सवे ।७ षाडव रेम ग ध नी प

१३० हमीर सर्वे ५-६ संपूर्णा स सभी 0

१३१ हिंडोल शीत ४-६ शडुव ध नी रे प 0

१३२ हेम- कल्याय सर्व ५-६ संपूर्ण म रे ग ध नी 0

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रागाध्याय। १५- शुद्धं रागस्वरूपं मिलितमपि परैवुद्धिपूर्व हि किं वा व्याप्तं संगीतशालां श्रवरसुखकरं तानसौन्दर्ययुक्तम्। आदौ मध्ये5वसाने त्रिविधलययुतं युक्तरीतिप्रयुक्तं प्रौढाचार्योपदिष्टं हरति यदि मनः सा हि संगीतरीतिः॥१॥ ज्ञानाभावेन तावन्मिलितमपि परैर्विस्वरं रीतिरिक्त्तं मन्देष्वेव प्रयुक्तं श्रवणसुखहरं तानसौन्दर्यहीनम्। अज्ञाचार्योपदिष्टं लयनयवियुतं स्वात्मनैव प्रशस्तं स्वल्पं यद्रागरूपं मधुरिमरहितं सा न संगीतरीतिः ॥२।।

।। इति रागाध्यायः समाप्तः ॥

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तालाध्याय

कालगतिका वा कालका जो मान करना (नापना है) वही तालपदार्थ है कहा भी है "ताल: कालक्रियामानम्" इति। जिस तालकी जितनी मात्राएं होतीहैं उन मात्राओंसे उसतालके योग्य कालका नाप कियाजाताहै, उन मात्रओंकी अभिव्यक्तिकेलिए 'एक दो तीन' इत्यादि किंवा तालवाद्यके 'धा धा दिंता' 'घिं घिं ता ता' इत्यादि किंवा रागवाद्यके 'डा डिड़ डा ड़ा' इत्यादि शब्दोंका उच्चा- र किया जाता है क्योंकि वस्तुगत्या स्वस्वरूपेय काल तथा काल- गति अप्रत्यक्ष पदार्थ हैं, कालका तथा कालगतिका ज्ञान कोई शब्दादि उपाधि द्वारा ही होसकताहै यथा घड़ीकी सूईके कुछ दूर घूमनेसे घंटा वा मिनटका ज्ञान होताहै यथा च सूर्यके उदयाचलसे अस्ताचलतक जानेसे दिन कालका और अस्ताचलसे उदयाचलतक पहुँचनेसे रात्रिकालका ज्ञान होताहै एवं एकसे सोलह तक संख्या- शब्दोंके समान उच्चारससे सोलह मात्रा अभिव्यक्त होतीहैं उन- सोलहमात्राओंका जो काल है वही धीमें तितालेका काल है, जो बारह मात्राका काल है वही चौतालेका काल है इत्यादि। मात्रा- भिव्यंजक शब्दोंकी संख्याके विना यह कालमान स्थिर नहीं हो सकता इसीकारणसे तालवाद्योंकी सृष्टि हुई और गानवादनके साथ तालवाद्यके बजानेकी अपेक्षा पड़ी क्यों कि रागको गानेबजाने वालेका ध्यान रागकी ओर रहताहै और उसकी तानोंका जब

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तालाध्याय। १६१

प्रवाह चलताहै तब वह मात्राभिव्यंजक शब्दोंकी संख्या कर नहीं सकता इसलिए मात्राओंको गिनतेहुए किंवा उसतालावृत्तक बंधे बोलोंको बजातेहुए समप्रभृतिस्थानोंको गानेबजानेवालेको दिखाते जाना यही तालवाद्यबजानेवालेका प्रधान कार्य है। तदनंतर ताल- वाद्य वादकोंने सोचा कि यथा गाने बजाने वाले रागतानोंकी अ्र्प्रनेक प्रकारसे कल्पना कर वाह वाह लेतेहैं ऐसे हम भी अपने ताल- वाद्यमें कल्पना कर वाहवाह क्यों न लें यह सोच उनने तालवादन में भी ऐसे परिष्कार किये कि उनका वादन भी स्वतंत्र होगया यथा. कदौसिंह प्रभृति तालवाद्यके विद्वान् स्वतंत्र अपने वाद्यको बजाते सुनातेथे। सर्वथा पारतंत्रय किसीको भी अभीष्ट नहीं होता इस कारख गानेवाले हाथसे और बजानेवाले पैरसे ताल देने लगगए, मीयां अमृतसेनजीको पैरसे तालचलानेका इतना पूर्ण अभ्यास था कि वे तालवाद्यवादक पर विश्वास न रख अपने पैरपर ही विश्वास रखतेथे और पैरसे बराबर ताल देतेजातेथे इसमें कभी चूके नहीं। यह अवश्य है कि गाने वालेको हाथसे ताल देनेकी अपेक्षा बजाने- वालेको पैरसे ताल देना बहुत कठिन है। संमीतपारिजातकारने क्रियापारिच्छित्न ( उक्तशब्दादिक्रियासे परिमित) कालको ही ताल कहाहै यथा-"कालः क्रियापरिछिन्नः तालशब्देन भण्यते" इति, अभिप्राय वहीहै जो पूर्वमें कहाहै, चाहे क्रियाविशेषसे परिच्छिन्नकालको ताल कहिये चाहे कालक्रियामान को ताल कहिए तात्पर्य एक ही निकलताहै केवल विशेष्यविशेष भावमें भेदहै। यथा सातस्वरोंकी आरोहावरोहीके प्रस्तारसे राग अनेक होगए

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१६२ संगीतसुदर्शन-

यथा च छंदके :प्रस्तारसे छंद अनेक होगए एवं कालक्रियामानके किंवा तालप्रकारके प्रस्तार से तालभी अनेक होगए। यथा कोई ताल दश मात्राका कोई ग्यारहमात्राका कोई बारह मात्राका इत्यादि, फिर दश मात्राके भी ताल समस्थानके भेदसे तथा और जरवोंके भेदसे अ्रनेक होसकतेहैं, एवं ग्यारह बारह प्रभृति मात्रा- त्ंके भी तालोंमें जानना। सभी तालोंके स्वरूप अर्थात् मात्राएँ और समादिजरवोंके स्थान पृथक पृथक होतेहैं। आरंभकरनेको हम उसतालकी चाहे जिस मात्रासे गाने बजानेका आरंभ करसकतेहैं इसमें कोई दोष नहीं हाँ उस तालकी मात्राओंमें और समादिजरवोंके स्थानमें तनिक भी भेद नहीं होसकता, समस्थानके तनिक भी भेद से उस भेदको करनेवाला बेताला ही कहायेगा इसकारय समपर आाकर वराबर पूरा मिलना अत्यावश्यक है। समपर पूरा मिलजाना पद्य- रचनामें वृत्तनिर्वाहके तुल्य दोषाभावमात्र है कुछ गुय नहीं क्योंकि समपर पूरा न मिलनेसे बेताला होना दोष माथे लगताहै इस कारए समपर पूरा मिलजाना कुछ लयतालका पांडित्य नहीं किंतु पहिली दूसरी प्रभृति उन उन मात्राओंमें पूरा मिलकर जो समपर मिलनाहै वही तालका पांडित्य है, अत्यन्त सूच््मदर्शी लोग तो मात्राके भी दो दो तथा चार चार भाग करके उन मात्राभागस्था- नोंमें मिलकर दिखादेतेथे यह काम बहुत कठिन है और प्राचीन- लोग इसीको लयकारी कहतेथे समपर मिलजानेको लयकारी नहीं कहतेथे, इन मात्राभागस्थानोंमें मिलनेमें मीयाँ अमृतसेनजी बहुत निपुए थे कदौंसिंह प्रभृति पखावजी इनकी लयकारीकी स्पष्ट

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तालाध्याय। १६३ प्रशंसा करतेथे। और आड़ी टेढ़ी इत्यादिक भी लयकारीके अ्रपनेक विशेष हैं। जिस तालकी जिसमात्रापर जो जरव है वह जरव उसीमात्रा- पर रहेगी इसमें भेद नहीं होसकता। यथा उसतालकी चाहे जिस मात्रासे गाने बजानेका आररंभ होसकताहै एवं समाप्ति भी चाहे जिसमात्रापर होसकतीहै तो भी समपर समाप्त करनेका लोकमें प्रचारहै यही उत्तमहै क्योंकि तालमें समस्थान ही प्रधान होताहै। कुछकाल तालचलनेसे तालका चक्र बँधजाताहै उस तालचक्रमें उस तालकी वह वह मात्रा और वह वह जरव उतने उतने कालके ही अनंतर बराबर आती रहतीहै। तालवाद्य बजानेवालेका यह भी कर्तव्य है कि वह तालवाद्य को ऐसे मुलायम हाथसे बजावे जो रागका गाना बजाना दब न जाय। तालरहित भी कुछ गाना बजाना होता है यथा धुरपति- योंका आलाप और तंत्रीकारका जोड़। तालनिर्वाहके कारय गानेबजानेवालेको रागतानों के प्रवाहको कुछ रोकना पड़ताहै इसकारण आलाप तथा जोड़के साथ तालका प्रचार नहीं। गानेबजानेवाले ऐसी आड़ी तान भी लियाकरतहैं जिससे तालवाद्यबजानेवाला चूक जाताहै किंतु पूर्ण विद्वान नहीं चूकता वह उस आड़ीकी ओर ध्यान न दे अपने तालके बोलोंको नहीं छोड़ता। आाजकल्ह तालस्वरूपनिरूपसमें उस तालकी मात्रासंख्या और समादिजरवोंकी संख्या तथा स्थान कहने पड़तेहैं, संस्कृतके ताल-

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ग्रंथोंमें यह सब उपलब्ध नहीं होता किंतु छंदशशास्त्रके तुल्य केवल लघुगुरु बताएहैं यथा "ताले निश्शङ्कलीलाख्ये प्लुतौ द्वौ ग्ूयं लघुः" अर्थात् निश्शङ्कलीलाख्य तालमें 'दो प्लुत दो गुरु एक लघु' ये होते हैं। "श्रीरङ्ग:सगयोलपौ" अर्थात् श्री रंगनामकतालमें 'दो लघु एक गुरु एक लघु एक प्लुत' ये होतेहैं, इन लक्षगोंसे मात्रा तो निकल सकतीहैं किंतु समादिजरवोंके स्थान और संख्या नहीं निकल सकती इससे प्रतीत होताहै कि प्राचीनकालमें अर्थात् संस्कृत- ग्रंथोक्त तालोंका कुछ स्वरूप और ही था। किं वा यह भी कह- सकतेहैं कि प्राचीनकालमें तालमें छंदके तुल्य गुरुलघुप्लुतोंका ही प्राधान्य था जरवों का कुछ नियम न था किंतु मनोनुरंजनके अनु- कूल जरवें लगादेतेथे यह बात देशीतालोंकेलिए संगीतरत्नाकरमें कहीभीहै यथा- "देशीतालस्तु लध्वादिमितया क्रियया मतः । यथाशेभं कांस्यतालध्वननादिकया युतः ॥" इति। संस्कृतके संगीतग्रंथोंमें रागोंके तुल्य ताल भी मार्ग तथा देशी भेदसे दो प्रकारके कहेहैं, चंचत्ुट चाचपुर संपक्वेष्टक षटपिता- पुत्रक इत्यादि कुछ मार्गताल कहे हैं, संगीतरत्नाकरकारने एकसौबीस देशी ताल कहेहैं, मार्ग ताल तथा देशीतालोंका जो कुछ स्वरूप उस समय था उसको ग्रंथकारोंने अपने अपने ग्रंथमें भली भाँति लिखदियाहै किंतु उससे लोकमें अब कुछ उपयोग प्रतीत नहीं होता इसकारय मैं उनतालोंको यहाँ लिखना नहीं चाहता क्योंकि मेरा यह ग्रंथ तो केवल प्रचलित विषयोंके संग्रहार्थ ही है, उन तालोंका स्वरूप दो लक्षणोंसे यहाँ दिखादियाहै जिसको विशेष

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जिज्ञासा हो उसकेलिये संगीतरत्नाकरादि ग्रंथ वर्तमान हैं। ग्रंथकारोंने कालकलालयादिक दश पदार्थ तालके प्राण कहेहैं यथा- "कालो मार्ग: क्रियाङ गानि ग्रहोजातिः कलालयः। यतिः प्रस्तारकश्चेति तालप्राया दश स्मृताः ॥" इति। अब मैं लोकप्रचलित कुछ तालोंके स्वरूपको लिखताहूँ- १ अथ धीमा तिताला यह ताल बड़ा कड़ा है इसमें सोलह मात्रा हैं पहिली पांचवीं और नवीं मात्रापर जरवें पड़ती हैं तेरहवींमात्राकी जरव खाली जाती है, पांचवीमात्रापर जो दूसरी जरव है उसको सम कहते हैं। १ २ ३ 'धिं घिंता ता धिं घिं ता ता धिं धिं ता ता तिं ति ता ता' इस प्रकार इसका ठेका बजातेहैं। सितारके बोल कई प्रकारसे संकलित हो सकतेहैं अथापि इतना अवश्य चाहिये कि सम डा पर पड़े। २ अथ जलद तिताला इसका त्योहरा भी कहतेहैं इसकी जरवें जलदी पड़तीहैं धीमेतितालेसे इसका परिमा आधा है अतएव इसकी आठ मात्रा कह सकतेहैं इन आठ मात्राओंमेंसे पहिली तीसरी तथा पांचवींपर जरवें हैं, पांचवींपर जो तीसरी जरव है उसे सम कहतेहैं। ३ अथ चौताला इसमें बारह मात्रा हैं पहिली पाँचवीं सातवों तथा नवीं मात्रा- पर जरव पड़तीहैं इन चार जरवोंमेंसे चौथी जो जरव है उसे सम

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20 २ ३ कहतेहैं 'धाधादिंता किटितक गिदिगिना घाघादिता' इस प्रकार इसे मृदंगमें बजातेहैं। ४ अथ आाड़ाचौताला इसमें चौदहमात्रा हैं पहिली तीसरी सातवीं तथा ग्यारहवीं मात्रापर जरव पड़तीहै। पहिलीपर जो जरव है उसे सम कहतेहैं। कोई लोग इसमें दो दो मात्राके सात खंड करके पहिली तीसरी सातवीं तथा ग्यारहवों पर भरी जरवें और पांचवीं नवीं तथा तेरहवीं मात्रापर खाली जरवें हैं ऐसा भी कहतेहैं। सम तो इनके मतमें भी पहिलीपर ही है, पर्यवसान दोनों मतोंका एकसा ही है केवल खंडसंख्यामे भेद है। सीधाचौताल भी एक है इनकी दशमात्रा कहीहैं। ५ अथ दादरा इसमें छै मात्रा हैं उनमेंसे पहिली और चौथी मात्रापर जरव है, पहिलीमात्रापर जो जरव है उसे ही सम कहतेहैं। अरंगरेज़ीबाजे- वाले प्रायः इसी तालको बजाया करतेहैं। ६ अथ कवाली इसमें आठ मात्रा हैं पहिली तीसरी पांचवीं और सातवीं मात्रा पर जरवे हैं इनमेंसे पहिलीमात्रापर जो जरव है उसे सम कहतेहैं। कव्वाल लोग प्रायः इसी तालसे गाया करतेहैं। 9 अथ फरोदस्त इसमें चौदह मात्रा हैं उनमेंसे पहिली तीसरी पांचवीं सातवीं और ग्यारहवीं मात्रापर जरवें हैं, सातवीं मात्रा पर जो चौथी जरव है

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तालाध्याय। १६७ उसे ही सम कहते हैं। और नवीं तथा तेरहवीं मात्रापर ख़ाली जरवें हैं। = सरथ इकताला इसमें बारह मात्रा हैं उनमेंसे पहिली पांचवीं और नवीं मात्रा- पर जरवें हैं उनमेंसे पांचवीं मात्रापर जो दूसरी जरव है उसे ही सम कहतेहैं। र्ट स्रय रूपक ताल इसमें सात मात्रा हैं उनमेंसे पहिली तीसरी और पांचवीं मात्रापर जरवें हैं सातवींपर एकमात्राकी खाली है, पांचवीं मात्रापर जो तीसरी जरव है उसे सम कहतेहैं। १० सरथ भूमरा इसमें चौदह मात्रा हैं उनमेंसे पहिली पांचवीं और आठवीं मात्रापर जरवें भरी हैं बारहवीं मात्रापर खाली है, उनमेंसे पांचवों मात्रापर जो जरव है उसे ही सम कहते हैं। ११ सथ मूलफाखता इसमें दस मात्रा हैं उनमेंसे पहिली पांचवीं और सातवीं मात्रा- पर जरवें हैं उनमेंसे पहिलीमात्रापर जो जरव है उसे ही सम कहतहैं। १२ सथ रामताल इसमें अठारह मात्रा हैं, पहिली छठी दशवीं और पंद्रहवीं मात्रापर जरवें हैं उनमेंसे पहिलीपर जो जरव है वही सम है। १३ सथ सुरंगताल इसमें तेरह मात्रा हैं उनमेंसे तीसरी सातवीं और ग्यारहवीं मात्रापर जरवें हैं उनमेंसे दूसरी जरव सम है।

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१६८ संगीतसुदशन- १४ अय मेघताल इसमें बीस मात्रा हैं, पहिली छठी ग्यारहवीं और सोलहवों मात्रापर जरवें हैं। पहिली जरव ही सम कहाती है। १५ सथ धमार ताल+१ इसमें सात मात्रा हैं उनमेंसे पहिली चौथी और सातवीं इन- मात्राओंपर जरवें हैं, उनमेंसे पहिली जरवको सम कहतेहैं। कोई- लोग कहते हैं कि इसकी सात मात्राओंमेंसे पहिली चौथी तथा छठी इनमात्राओंपर जरवें हैं और दूसरी जरव सम है, मेरी जानमें यही मत संगत है। १ २ ३ बोल यथा-क धिटि धिटि धा धि किटि किटि ता १६ स्रद्धा यह धीमेतितालेका अद्धा (अरधपरिमासका) ताल है जरवों- में भेद है। इसमें आठ मात्रा है उनमेंसे पहिली तीसरी और सातवां इन मात्राओंपर जरवें हैं उनमेंसे दूसरी जरव सम है, पांचवीं मात्रा पर खालीहै यही धीमेतितालेसे भेद है। १ २ २ बोल यथा-ता धिंधा धाधिंधा धातिता ताघिंधा। १७ दीपचंद इसमें दश मात्राहैं उनमेंसे पहिली चौथी और छठी इन १ जिन तालों के नासपर +यह चिन्ह है उनतालोंमें मुझे कुछ संशय है। इससंशयका कारण यहीहै कि इब तालोंको किसी उत्तम उस्तादसे नहीं समझा।

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तालाध्याय। १६ मात्राओंपर जरवे हैं उनमेंसे दूसरी जरव समहै नवमीं मात्रापर खाली है। १ २ ३ बोल यथा-धागेधिन् धादिन धागेतिन् तातिन मात्रा - १२३ ४ ५ ६७८ ६१० १८ भपताल इसमें दश मात्रा हैं उनमेंसे पहिली और पांचवों मात्रापर जरवें हैं, दूसरी जरव सम कहातीहै, नवमीं मात्रापर खाली है। १६ पिश्तों इसमें पाँच मात्रा हैं पहिली और दूसरी मात्रापर जरवें हैं, दूसरी जरव सम है, चौथी मात्रापर खाली है। २० चंचल ( चपक) इसमें तीन मात्रा हैं उनमेंसे पहिली और दूसरी मात्रापर जरवें हैं, तीसरी मात्रापर खाली है, दूसरी जरव सम है। २१ सवारी कोई लोग इसे असवारी भी कहतेहैं। इसमें पंद्रह मात्रा हैं उनमेंसे पहिली पांचवीं नवीं और तेरहवीं इन मात्राओंपर जरवें हैं, उनमेंसे दूसरी जरवको सम कहतेहैं। १ २ बोल यथा-धिनक धिनक ता धीधीना धीधीना तीन्तीना कता। सेलह मात्राका भी एक सवारी ताल है उसमें पाँच जरव हैं पहिली जरवको सम कहतेहैं, किन मात्राओंपर जरवें हैं यह विशेष ज्ञात नहीं हुआ। आजकल्हके मार्दगिकोंका इधर ध्यान नहीं। १६

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२२ ब्रह्मताल+ इसमें चौदह मात्रा हैं उनमेंसे पहिली चौथी पाँचवीं आठवों नवीं ग्यारहवीं बारहवीं तेरहवीं और चौदहवीं इनमात्राओंपर जरवें है अंतिम जरव सम है, ऐसा कहतेहैं। कोई लोग कहतेहैं कि इसमें-पहिली, तीसरी चौथी, छठी सातवीं आठवों, दसवीं ग्यारहवीं बारहवीं तेरहवीं, इनमात्राओंपर जरवें है। प्रथम जरव सम है। २३ यो गब्रह्म+ इसमें पंद्रह मात्रा हैं उनमेंसे पहिली तीसरी चौथी छठी सातवीं आठवीं दसवीं ग्यारहवीं बारहवीं और तेरहवीं इनमात्रा- ओंपर जरवें हैं उनमें से पहिलीपर सम है। १ २ ६ U AC OC बोल यथा-तद्धा दिद्धा गद्दी गिनता धा गद्दो गिनता धा दीधा 90 गह्दी गिनता गद्दी गिन धा काई लोग कहतेहैं कि इसमें अठारह मात्रा हैं उनमेंसे पहिली तीसरी चौथी, छठी सातवीं आठवीं, दसवीं ग्यारहवीं बारहवीं तेरहवीं, पंद्रहवीं और सत्रहवीं इन मात्राओंपर जरवेंहैं, पहिली जरव सम है। २४ लक्ष्मीताल+

इसमें अठारह मात्रा हैं उनमेंसे पहिली दूसरी तीसरी, छठी सातवीं, नवीं दसवीं, बारहवीं सवाचौदहवीं सवापंद्रहवीं सोलहवीं और सत्रहवीं इन मात्राओंपर एक एक जरव है और पांचवीं ग्यार-

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तालाध्याय। १७१ हवीं तथा तेरहवीं इन तीन मात्राओंपर दो दो जरवें हैं, पहिली जरव सम है, ऐसा कहते हैं। १२३ ४५६७ = ६ १०१११२ १३१४ १५ १६११ बोल-त्तेत्तेथेइ त्तेत्तेत्तेथेइ त्तेथेइ त्ते त्ते थेइ त्ते त्ते त्ते तत त्ते थेइ। कोई लोग कहतेहैं कि लक्ष्मीतालकी सोलह मात्रा हैं अठा- रह जरवें हैं। २५ रुद्र १६ मात्राका इसमें सोलह मात्रा हैं उनमेंसे पहिली तीसरी चौथी छठी सातवीं आठवीं दसवों बारहवीं तेरहवीं चौदहवीं और पंद्रहवीं इन मात्राओंपर जरवें हैं, पहिली जरव मम है। रुद्रताल १५ मात्राका इसमें पंद्रह मात्रा हैं उनमेंसे पहिली तीसरी चौथी छठी सातवीं आठवीं नवीं दसवीं ग्यारहवीँ बारहवीं तेरहवीं चौदहवीं इन मात्राओंपर जरवें हैं, प्रथम जरव सम है। कोई कहतेहैं कि इसमें बारह मात्राहैं प्रत्येक मात्रापर जरवहै। प्रथम जरव समहै। २६ बटूताल इसमें नौ मात्रा हैं उनमेंसे पहिली तीसरी पाँचवीं सातवीं आठवीं और नवमी इन मात्राओंपर जरवें हैं दूसरी जरव सम है। २9 श्रुति (सात) ताल इसमें ग्यारह मात्रा हैं उनमेंसे पहिली तीसरी पाँचवों सातवीं नवमी दसवी और ग्यारहवीं इन मात्राओंपर जरवें हैं, उनमेंसे अंतिम जरव सम है।

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१७२ संगीतसुदर्शन-

२८ परपष्टमंगल इसमें चौदह मात्रा हैं उनमेंसे पहिली तीसरी चौथी छठी सातवों नवी ग्यारहवीं और तेरहवी इन मात्राओं पर जरवें हैं, प्रथम जरव सम है। र्ट नवधा इसमें नौ जरवें हैं। ३० मयरताल इसमें सत्ररह मात्रा हैं उनमेंसे पहिली तीसरी सातवीं और तेरहवीं मात्रापर जरवें हैं दूसरी जरव सम है। ३१ सिंहताल इसमें तेरह मात्रा हैं उनमेंसे तीसरी सातवी और ग्यारहवीं मात्रापर जरवें हैं दूसरी जरव सम है। ३२ शादूलताल इसमें सोहल मात्रा हैं उनमेंसे दूसरी छठी नवमी और तेर- हवीं मात्रा जरवें हैं प्रथम जरव सम है। ३३ घोरताल इस में तीस मात्रा हैं उनमेंसे दूसरी चौथी छठी आठवीं दसवीं बारहवी चौदहवी सोलहवी अठारहवी बीसवीं बाईसवीं चौबीसवीं छब्वीसवी अट्ठाईसवीं और तीसवीं इन मात्राओंपर जरवें हैं, दूसरी जरव सभ है। ३४ श्रीताल इसमें आठ मात्रा है उनमेंसे पहिली तीसरी और छठी इन मात्राओंपर जरवें हैं, दूसरी जरव सम है।

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३५ चंद्रताल इसमें सोलह मात्रा है उनमेंसे वहिली तीसरी पांचवीं और तेरहवीं इन मात्राओंपर जरवें हैं, दूसरी जरव सम है। ३६ सूर्यताल इसमें अठारह मात्रा है उनमेंसे पहिली तीसरी सातवी ग्यारहवीं और पंद्रहवीं मात्रापर जरव है, दूसरी जरव सम है। ३७ क्रमताल इसमें बाईस मात्रा हैं उनमेंसे पहिली तीसरी छठी दसवीं पंद्रहवी और इकीसवीं मात्रापर जरवें हैं, पहिली सम है। ३८ बृहत्क्रमताल इसमें सत्ताईस मात्रा हैं उनमेंसे पहिली तीसरी छठी दसवीं पंद्रहवी और इक्कीसवीं इनमात्राओंपर जरवें हैं, दूसरी जरव सम है। इन दोनों क्मतालोंमें एकएकमात्राकी छूट बढ़ती जाती है। ३्ट विष्णुताल इसमें बारह मात्रा हैं उनमेंसे तीसरी सातवीं और ग्यारहवी मात्रापर जरवें हैं उनमें पहिली जरव सम है। ४० इंद्रताल इसमें पंद्रह मात्रा हैं उनमेंसे पहिली पाँचवीं नवमी ग्यार- हवी और तेरहवीं मात्रापर जरवें हैं, दूसरी जरव सम है। ४१ रणताल इसमें बारह मात्राहैं उनमेंसे पहिली दूसरी पाँचवीं छठी नवमी और दशवीं इन मात्राओंपर जरवें हैं उनमेंसे दूसरी छठी और दशवीं ये तीनों जरवें सम कहाती हैं।

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१७४ संगीतसुदर्शन-

४२ राजताल इसमें सोलह मात्रा हैं उनमेंसे पहिली दूसरी नवमीं और दशवीं इन मात्राओंपर जरवें हैं, दूसरी जरव सम है। ४३ महाराजताल इसमें बीस मात्रा हैं उनमेंसे पहिली दूसरी नवमी दशवी तेरहवी चौदहवीं सत्रहवीं और अट्ठारहवी इन मात्राओंपर जरवें हैं, दूसरी जरव सम है। ४४ गोपालताल इसमें बीस मात्रा हैं उनमेसे पहिली दूसरी पाँचवीं छठी सातवी आठवी ग्यारहवीं बारहवीं सत्रहवी और अट्ठारहवीं इन मात्राओंपर जरवें हैं, चौथी जरव सम है। ४५ गजताल इसमें अट्ठाईस मात्रा हैं उनमेंसे पहिली सातवीं और पंद्रहवी मात्रापर जरव है बाईसवीं मात्रापर खाली है, दूसरी जरव सम है। ४६ शंखताल इसमें दश मात्रा हैं उनमेंसे पहिली दूसरी तीसरी सातवीं और आाठवी इन मात्राओंपर जरवे हैं, तीसरी जरव सम है। ४७ शरताल इसमें सोलह मात्रा हैं उनमेंसे पहिली पाँचवीं ग्यारहवी तेरहवीं और पंद्रहवीं मात्रापर जरवें हैं, नवमी मात्रापर खाली है। पहिली जरव सम है। ४८ धनताल इसमें चौबीस मात्रा हैं उनमेंसे पहिली दूसरी तीसरी, नवमी

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तालाध्याय। १७५ दशवी ग्यारहवी' बारहवीं, सत्रहवी अट्ठारहवीं उन्नीसवीं बीसवीं और इक्कीसवीं इनमात्राओंपर जरवें हैं, तीसरी जरव सम है। ४र्ट घनताल इसमें चौदह मात्रा हैं उनमेंसे पहिली दूसरी तीसरी चौथी नवमी दशवी ग्यारहवीं और बारहवी इनमात्राओंपर जरवे हैं, उनमेंसे चौथी जरव सम है। ५० दीपकताल इसमें सात मात्रा हैं उनमेंसे पहिली तीसरी और पांचवीं मात्रापर जरव है तीसरी जरव ही सम है। ५१ कौशिकताल इसमें अट्ठारह मात्रा हैं उनमेंसे पहिली नवमी और सत्रहवीं मात्रा पर जरव है, पहिली जरव सम है। ५२ महेशताल इसमें नौं मात्रा हैं उनमेंसे पहिली पाँचवीं और सातवीं मात्रा- पर जरव है पहिली जरव सम है। ५३ चामरताल इसमें बारह मात्रा हैं उनमेंसे पहिली तीसरी पाँचवीं और सातवीं इन मात्राओंपर जरवें हैं दूसरी जरव सम है। ५४ कोकिलताल इसमें आठ मात्रा हैं उनमेंसे पहिली दूसरी और तीसरी मात्रापर जरव है, तीसरी जरव सम है।

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तालाध्याय। १७७

मैंने यहाँ ये (पूर्वोक्त) साठ तालों के लक्षणा लिखेहैं। आज- कल्ह सांगीतिकोंमेँ 'इकताला दोताला (चंचल) तिताला चौताला, फरोदस्त षट्ताल (खटताल) श्रुतिताल तष्टमंगल नवधा ब्रह्म योग- ब्रह्म रुद्र रूपक' ये साढ़े बारह ताल कहातेहैं क्योंकि रूपकको क्रमापेक्षया छोटा होनेसे आधा ताल गिनतेहैं। इनमेंसे फरो- दस्ततक ५ और रूपक ये छै ताल प्रसिद्ध हैं। वस्तुगत्या रागोंके तुल्य ताल भी बहुत हैं किंतु मुझे अधिक तालोंका ज्ञान नहीं, जो ज्ञात हैं वे प्रायः लिखदियेहैं। स्वरसागर- मैँ कहाहै- "पच हजार नौ सौ कई ताल कहावत नाम इनमेँते सेलह लए वर्तमान सों काम" इससे प्रतीत होताहै कि स्वरसागरकर्ता दूलहखाँजीके समय- में १६ ताल प्रसिद्ध थे, दूलहखाँजीको मरे लगभग अस्सी वर्ष हुए ये संबंधमें अमृतसेनजीके पितामह तथा नाना लगतेथे। बड़ेभारी नामी उस्ताद थे। तालगतिकी समताको लय कहतेहैं "लयः साम्यम्" इति, वह लय द्रुत मध्य और विलंबित भेदसे तीन प्रकारका है उत्तरात्तर लयका दुगना परिमाए कहाहै। संगीतरत्नाकरमे तो तालक्रियाके अनंतर अर्धात् तालों (जरवों) के मध्यमें जो विश्रांति (अवकाश) है उसे लय कहाहै, तात्पर्य एक ही निकलताहै- "क्रियानन्तरविश्रान्तिर्लयः स त्रिविधो मतः । द्रुतो मध्यो विलम्बश्च, द्रुतो शीघ्रतमो मतः । द्विगुणद्विगुगौ ज्ञेयौ तस्मान्मध्यविलम्बितौ।।" इति ।

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वस्तुगत्या ताल (जरव) गति ही लय पदार्थ है उसीके द्रुत मध्य विलम्बित ये तोन भेद हैं। निरंतर एक चालसे चलना कठिन होनेसे लय बड़ा कठिन पदार्थ है। आजकल्ह जिसे लयकारी कहतेहैं वह सब इस अध्यायके आरंभमें लिखाहै। आधुनिक सांगीतिक लोग विलम्बितको 'ठाकीठा' मध्यको 'ठा' द्रुतको 'दुगन' ऐसा कहते हैं। चतुर्थ एक संकीर्य लय भी है जिस गाने बजानेमें निरंतर एकप्रकारकी लय न हो किन्तु अनेक प्रकारकी लय हो याने कभी द्रुत कभी मध्य कभी विलं- बित लय हो वहाँ लयसंकर होनेसे उसे संकीर्ण लय कहतेहैं। द्रुतलयमैं तालावृत्तका जितना परिमाय होगा मध्यलयमेँ उससे द्विगुय होगा और विलंबितलयमें उससे भी द्विगुय होगा-अतएव विलंबितकी अपेक्षा मध्यमें तथा मध्यकी अपेक्षा द्रुतमें शीघ्र शीघ्र ताल (जरवें) पड़तेहैं। इतने विलंबितको विलंबित लय कहना चाहिये यह कुछ नियम नहीं, हाँ उत्तरोत्तर द्विगुखित होना चाहिये। आजकल्ह सांगीतिक लोग गानेबजाने में कभी तो विलंबितकी अपेक्षा मध्यमें मध्यकी अपेक्षा द्रुतमें तालगतिको बढ़ा देतेहै (त्वरित करदेतेहैँ) इस कममें उत्तरोत्तरलयमें ताल शीघ्र शीघ्र पड़तेहैं अर्थात् विलंबितलयमें वह तालावृत्त यदि आठ पलमें पूरा होगा तो मध्यलयमेँ चारपलमेँ और द्रुतलयमें दो पलमें पूरा होगा यही प्रधान पक्ष है। कभी तो तालगतिको नहीं बढ़ाते अरथात् जरवोंका अंतरकाल तीनों लयोंमेँ एकसमान ही रहता है किन्तु गायक कंठकी और वादक हस्तकी गतिको बढ़ादेतेहैं इस- पत्तमें यदि विलंबितलयमँ उस तालावृत्तमें सोलहशब्द (वाद्यादिके

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तालाध्याय। १७६ बोल) समाएँगे तो मध्यलयमें ३२बत्तीसशब्द और द्रुतलयमें ६४चांसठ शब्द समाएँगे यथा धीमें तितालेमें। कंठ तथा हस्तकी गतिके बढ़नेमें शब्द अवश्य ही बढ़ेंगे क्योंकि तालगतिको बढ़ाया नहीं, लयके बढ़नेसे तालगति वा शब्दसंख्या अवश्य बढ़ेगी। और विशेष विशेषज्ञगुरुकी शिक्षाके अधीन है। उत्तमगुगियोंकी कठिनविषयमें प्रवृति विशेष होतीहै और तालोंमेँ धीमा तिताला बहुत कठिन है क्योंकि इसका आवृत्त भी बड़ा है चारों जरवें एकसम हैं उनमेंसे भी एक खाली जातीहै इत्यादि इससे लोग धीमातितालेके और चौताला बहुत सुन्दर है इससे चौतालेके पीछे पड़गए इसकारय और सब ताल दबगए। सातही सर होने से रागोंके प्रभेद उतने नहीं होसकते जितने ताल- के प्रभेद होसकतेहैं क्योंकि मात्रासंख्याकी और जरवस्थानोंकी कुछ सीमा नहीं, चाहे तो एकहजार मात्राका भी ताल बनसकताहै और उसकी चाहे जिन मात्राओंपर जरदोंको स्थिर कियाजास कताहै। आजतक जितने ताल बनेहैं वे सब इसी प्रस्तारक्रमसे ही बनेहैं। आजकल्हके किसी किसी तालविद्वान्को यह भ्रम है कि सबी तालोंकी प्रथममात्रापर ही उनका सम होताहै, इस भ्रमका कारख यह है कि तालवाद्यको बजानेवाले प्रायः समसे ही अपने बजानेका आरंभ किया करतेहैं क्योंकि तालमें समस्थान ही प्रधान है और रागको गानेबजानेवालेके साथ जब वे बजातेहैं तो भी उनको विवश समसे ही आरम्भ करना पड़ताहै क्योंकि ताल- के समस्थानसे अतिरिक्त स्थानको पकड़ना एक प्रकारसे अशक्य ही है, कोई कोई उस्ताद लोग तो समको भी ऐसा छिपा लेतेहैं कि

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१८० संगीतसुदर्शन-

उसका भी पकड़ना अशक्य होजाताहै, एकदिन मीयाँ रहीमसेनजी- की गतका सम रत्नसिंह जैसे भारी उस्ताद पखावचीसे भी पकड़ा न गया। इन कारगोंसे तालवाद्यशिक्षकलोग अपने शागिरद को भी जो तालबोल बताते हैं वे समसे हो आरम्भ कर बतातेहैं. शागि- रद जब उनसे उसतालके समको पूछताहै तो वे प्रथमबोल (शब्द) पर समको बता देतेहैँ इसी प्रकार सबी तालोंका सम प्रथमबोल- पर बतानेसे शागिरद निश्चय करलेताहै कि सबी तालोंका सम प्रथमही मात्रापर है वस्तुगत्या ऐसा नहीं, जैसे सितारकी गतको चाहे जिसमात्रासे उस्ताद बाँधतेहैं वैसे तालवाद्यके उस्ताद सौक- र्यादिकारससे समसे ही प्रायः तालके शब्दोंको बाँधते हैं इसीसे पूर्वोंक्त भ्रम फैल गयाहै। 'सम किस मात्रापर होताहै यह समग्र- तालोंकेलिए एकसम नियम नहीं' यह अच्छे अच्छे ताल तथा राग- के विद्वानोंसे भी सुनाहै। यदि कहो कि 'रागविद्वान् तालके मर्मको क्या जानें तो यह भी उचित नहीं क्योंकि यथा सितार बजानेवाला वीखाके कायदेको न जाननेपर भी वीकाके रागको जानसकताहै क्योंकि रागस्वरूप उभयत्र एकसमानहै तथा राग- विद्वान भी तालवाद्यके कायदेकोन जानकर भी तालको पूर्णरीतिसे जानसकताहै क्योंकि तालस्वरूप सर्वत्र एकसमान है और जब कि तालरागको गानेबजानेका एक अरंग है तब रागको गानेबजानेवाला तालको न जानेगा तो और कौन जानेगा। जो हमको अज्ञान और भ्रम है वह हमारे कर्म और शिक्ाका दोष है उससे दूसरा कोई दूषित नहीं होसकता इत्यलमधिकेन। । इति तालाध्यायः समाप्तः ॥

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अथ

नृत्याध्याय "गीतं वाद्य® च नृत्यं च त्रयं संगीतमुच्यते" गाना बजाना और नृत्य ये तीनों मिलकर संगीत कहाताहै इसकारण गीतका रागाध्याय और तालवाद्यका तालाध्याय लिखकर अब मैं संक्ेपसे नृत्याध्याय लिखताहूँ। भरतसूत्रमें इसका बहुत विस्तर है। प्रथम कालमें नृत्य केवल स्त्रियोंके ही अधीन था और बड़े बड़े कुलोंकी स्त्रिये नृत्य करतीथीं ऐसा ग्रंथोंसे पाया जाताहै, लास्यनृत्यकी प्रथम करनेवाली श्रीपार्वतीजीको लिखाहै, वह समय बड़ा शुद्ध था अतएव बड़े बड़े कुलकी भी स्त्रियें स्वपांडित्यप्रदर्श- नार्थ नृत्य करनेमें दोष नहीं समभतीथों। जब नृत्य करनेमें कुछ अप्रतिष्ठा प्रतीत होने लगी तब इसके लिए वेश्याएँ स्थिर कीगई, ऐसा प्रतीतहोता है। नृत्य बहुत कामोद्गावक है इसकारण पुरुष वेश्याओंके संग कुकर्ममें प्रवृत्त होगए इसकारण वेश्यालोग भी नृत्यपांडित्यकी उपेक्षा कर पुरुषसंमोहनमें विशेष प्रवृत्त होगईं क्योंकि इसमें धनलाभ अधिक है इन कारणोंसे वेश्याओंका नृत्य- पांडित्य च्ीस होगया, तदनन्तर स्त्रीवेशको धारस कर पुरुष ही नृत्य करने लगगए इनका नाम भावबतानेके कारय कत्थक (कथक) पड़गया, संस्कृतमें इनका नाम भ्रुकुंस इत्यादि है पीछेके कालमें लखनऊके इलाकेमें इनका बहुत आधिक्य था। हनुमान् प्रभृति

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१८२ संगीतसुदर्शन- कई उत्तमत्तम कत्थक होचुकेहैं, वर्तमान कालमें लखनऊके विन्दादीनजी कत्थकोंमें सर्वप्रधान हैं और ये उनी वृद्ध गुगियों- मेंसे हैं इनने अपने भतीजोंको अच्छी शिक्षा दीहै। यद्यपि तांडवनृत्यके प्रथमपुरुष श्रीमहादेवजी हैं एवं श्रीकृष्ण- चंद्रने भी व्रजमेँ नृत्य कियाहै एवं और भी अर्जुनादि कई नृत्या- चार्योंके नाम चलेआतेहैँ तथापि वे सामान्यतः उत्सवादिमें नृत्य नहीं करतेथे और नृत्यक्रियामें प्राधान्यस्त्रीलोगोंका ही था यही उचित भी है इसीकारयसे मैंने इस अध्यायके आरंभमे 'प्रथम काल में नृत्य केवल त्तियोंके ही अधीन था, ऐसा लिखाहै। कहा भी है- "पात्रं स्यान्नर्वनाधारो नृत्ते प्रायेश नर्तकी" इति। नृत्यादि पद "नृती गात्रवित्षेपे" इस धातुसे बनाहै अत एव रसोद्भावक जो हस्तपादादि शरीरांगोंकी विशेष चेष्टा है उसे नृत्य कहतेहैँ कहा भी है-"नृतेर्गात्रवित्ेपार्थत्वेनाङगिकबाहुल्यात् तत्कारिषु च नर्तकव्यपदेशात्" इति। पूर्वाचार्योंने इसके तीन भेद किये हैं नाट्य, नृत्य और नृत्त, उनमेंसे दूसरेके अनुकरको नाट्य कहतेहैँ, लयतालरहित नाचको नृत्य कहतेहैं, लयताल सहित नाचको नृत्त कहतेहैं कहा भी है- आङ्गिकाभिनयैरेव भावानेव व्यनक्ति यत्। तन्नृत्यं मार्गशब्देन प्रसिद्धं नृत्यवेदिनाम् ॥ गात्रविन्षेपमात्रं तु सर्वाभिनयवर्जितम्। आङ्गिकोक्तप्रकारेग नृत्तं नृत्तविदो विदुः ॥" "अवस्थानुकृतिर्नाट्यम्" "अन्यद्भावाश्रयं नृत्यम्" 'नृत्त' ताललयाश्रयम्"

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नृत्याध्याय। १८३ "तन्यते शाङ्ग देवेन नर्त्तनं तापकर्तनम्। नाट्य नृत्यं तथा नृत्तं त्रेधा तदिति कीर्त्तितम् । अन्यद् भावाश्रयं नृत्यं नृतं ताललयाश्रयम्। आद्यपदार्थाभिनयो मार्ग:, देशी तथा परम्।।" इत्यादि उनमेंसे नृत्य मार्गपदार्थ है और नृत्त देशी पदार्थ है। नृत्य और नृत्तके फिर दोदो भेद हैं यथा-सुकुमार जो नृत्य तथा नृत्त उसे लास्य कहते हैं अर्थात् लास्यनृत्य लास्यनृत्त, उद्धत जो नृत्य तथा नृत्त उसे तांडव कहतेहैं अर्थात्-तांडवनृत्य तांडवनृत्त। "मधुरोद्धतभेदेन तद्द्वयं द्विविधं पुनः। लास्यताण्डवरूपे नाटकाद्यु पकारकम्। लास्यं तु सुकुमाराङगं मकरध्वजवर्धनम् ॥" इत्यादि चतुर्मुख ब्रह्माने भरतमुनिको यह शास्त्र दिया तब क्मसे यह शास्त्र और लोगोंको प्राप्त हुआ ऐसा कहाहै- "नाट्यवेदं ददौ पूर्व भरताय चतुर्मुखः । ततश्च भरतः सार्ध गन्धर्वाप्सरसां गएैः ॥ नाट्य® नृत्यं तथा नृत्तमग्रे शंभो: प्रयुक्तवान्। प्रयोगमुद्धृतं स्मृत्वा स्वप्रयुक्तं ततो हरः ॥ तण्डुना स्वगणाग्रण्या भरताय न्यदीदिशत्। लास्यमस्याग्रतः प्रीत्या पार्वत्या समदीदिशत्॥ बुद्ध्वाथ ताण्डवं तण्डोर्मर्त्येभ्यो सुनयोऽवदन्। पार्वती त्वनुशास्ति स्म लास्यं बाखात्मजामुषाम्। तया द्वारवतीगोप्यस्ताभिः सौराष्ट्रयोषितः । ताभिस्तु शिच्षिता नार्यो नानाजनपदास्पदाः ।

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१८४ संगीतसुदर्शन-

एवं परम्पराप्राप्तमेतल्लोके प्रतिष्ठितम् ।" इति। तथा- "तण्डूक्तमुद्धतप्रायप्रयोगं ताण्डवं मतम्। लास्यं तु सुकुमाराङ़' मकरध्वजवर्धनम् ॥" ऐसा कहाहै। करगोंसे तथा अंगहारोंसे नृत्यकी संपत्ति कही है- "करगैरङ्गहारैश्च साधितं नृत्तमुच्यते" इति। हस्तपादादि अंगोंकी जो रसोद्भावक क्रियाहै उसे करय कहतेहैं- "स्यात् क्रिया करपादादेर्विलासेनाSत्रुटद्रसा। करएं नृत्तकरयम्" इति। हस्तपादादि अंगोंकी उचित प्रदेशमें जो प्राप्ति है उसे अंगहार कहतेहैं- "अङ्गानामुचिते देशे प्रापएं सविलासकम्।

शिर दोनोंहस्त दोनोंपाद दोनोंपार्श्व वत्ःस्थल कटी दोनोंस्कंध ये सात अंग कहेहैं। दोनोंभुजा दोनोंजंघा दोनोंऊरू दोनोंमखिबन्ध दोनोंजानु ग्रीवा पृष्ठ उदर और भूष ये नौ प्रत्यंग कहेहैं। दृष्टि भ्रू तारा कपोल नासिका श्वास अधर दंत जिह्वा चिबुक (ठोड़ो) मुख और मस्तक ये बारह उपांग कहेहैं। शिरकी उन्नीसप्रकारकी चेष्टा कहीहैं यथा- 'धुत विधुत आधूत अवधूत कंपित आरकंपित उद्धाहित परि- वाहित अंचित निहंचित परावृत्त उत्तिप्त अरधोमुख लोलित तिर्यग्नत उन्नत स्कंधानत आरात्रिक पार्श्वाभिमुख' इति।

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नृत्याध्याय। १८५ हस्तकी चेष्टा बहुत प्रकारकी कहीहै यथा- 'पताक त्रिपताक अर्धचन्द्र कर्तरीमुख अरालमुष्टिशिखर कपि- त्थमुख खटकामुख अंजलि कपोत कर्कट खवस्तिक आविद्धवल्क सूच्यास्य रेचितार्ध अरेचित' इत्यादि। "सर्वे च मिलिताः सन्तः सप्तषष्ठिरिमे कराः । आनन्त्यादभिनेयानां सन्त्यऽनन्ता: परे कराः॥" ऐसा कहाहै। वक्षःस्थलके पांच प्रकार कहेहैं- 'सम आभुग्र निर्भुझ्न प्रकम्पित उद्राहित' इति। पार्श्वके भी पाँच प्रकार कहेहैं- 'विवर्तित अपसृत प्रसारित नत उन्नत' इति। कटीके भी पांच प्रकार कहेहैं- 'कंपिता उद्धाहिता छिन्ना वितृता रेचिता' इति। पादके प्रकरार अ्नेक कहेहैं यथा- 'सम अंचित कुंचित सूची अग्रतलसंचर उद्घटित त्रोटित घटित उत्सेध घट्टित मर्दित अग्रग पार्षणिग पार्श्वग' इत्यादि। स्कंधके पांच प्रकार कहेहैं- 'एकोच्च कर्सलम्न उच्छ्रित स्रस्त लोलित' इति। ग्रीवाके नौ प्रकार कहेहैं- 'समा निवृत्ता वलिता रेचिता कुंचिता अंचिता त्र्यस्ना नता उन्नता।' दृष्टिके प्रकार अ्रप्रनेक हैं- 'कांता हास्या करुणा रौद्री वीरा भयानका वीभत्सा अद्भुता' ये आठ आठों रसोंकी दृ्टि कहीहैं।' १७

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१८६ संगीतसुदर्शन-

'स्निग्धा हृष्टा दीना क्रुद्धा दप्ता भयान्विता जुगुप्सिता विस्मिता ये आठ आठों स्थायिभावोंकी दृष्टि कहीहैं। 'शून्या मलिना श्रांता लज्जिता शांङगता' इत्यादि और भी दृष्टि कही हैं। भके सात प्रकार कहेहैं -- 'सहजा पतिता उत्तिप्ता रेचिता कुंचिता भ्रुकुटी चतुरा' इति। कपोलके छै प्रकार कहेहैं- 'कुंचित कंपित पूर् चाम फुल्ल सम' इति। मुखके भी छै प्रकार कहेहैं- 'व्याभुग्न भुग्न उद्ढाहि विधुत विवृत विनिवृत्त' इति। जिह्वाके भी छै प्रकार कहे हैं- 'ऋज्वी स्टक्कानुगा वक्रा लोला उन्नता अवलेहिनी' इति।

एकसौआठ नृत्तके करण कहेहैं- तलपुष्यपुट लीन वर्तित वलितोरु मण्डलस्वस्तिक शररत्तप्तरेचित अर्धस्वस्तिक दिकस्वस्तिक पृष्ठस्वस्तिक स्वस्तिक अंचित अपविद्ध समनख उन्मत्त स्वस्तिकरेचित निकुट्ट अर्धनिकुट्ट कटीच्छिन्न कटीसम भुजङ्गत्रासित अलात वितिप्तात्िप्तक निकुंचित घूर्यित अर्ध्वजानु अर्धरेचित मतल्लि अर्धमतल्लि रेचकनिकुट्टक ललित वलित दंडपक्त पादापविद्धक नूपुर भ्रमर च्छिन्न भुजद्गत्रस्तर्रोचित भुजगांचित दंड- रेचित चतुर कटिभ्रांत व्यंसित क्रांत वैशाखरेचित वृश्चिक वृश्चिक- कुट्टित वृश्चिकरेचित लतावृश्चिक आत्िप्त अर्गल तलविलासित ललाटतिलक पार्श्वनिकुट्टक चक्रमण्डल उरोमण्डल आवर्त कुंचित

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नृत्याध्याय। १८७ दोलापाद विवृत्त विनिवृत्त पाश्वकरांत निशुम्भित विद्यु द्भ्रांत अति- क्रांत वित्िप्त विवरतित गजक्रीडित गंडसूचि गरुडप्लुत तलसंस्फोटित पार्श्वजानु गृध्रावलीनक सूचि अर्धसूचि सूचीविद्ध हरिएप्लुत परिवृत्त दंडपाद मयूरललित प्रेंखोलित संनत सर्पित करिहस्त प्रसर्पित अप्रप- क्रांत नितंब स्खलित सिंहविक्रोडित सिंहाकर्षित अवहित्थक निवेशित एलकाक्रीडित जनित उपसृत तलसंघट्टित उद्वृत्त विष्ु- क्रांत लोलित मदस्खलित संभ्नांत विष्कम्भ उद्घट्टित शकटास्य ऊरू- द्वृत्त वृषभक्रोडित नागापसर्पित गंगावरय इति "इत्यष्टोत्तरमुद्दिष्टं करखानां शतं मया। गतिस्थितिप्रयोगायामानंत्यात् करणान्यपि अनन्तान्यऽङ्गहारेषु क्रियातामुपयोगिता ॥" इत्युक्तम् । बत्तोस अंगहार कहेहैं -- 'स्थिरहस्त पर्यस्तक सूचीविद्ध अपराजित वैशाखरेचित पार्श्व- स्वस्तिक भ्रमर आत्तिप्तक परिच्छिन्न मदविलसित आलीढ आच्छु- रित पार्श्वच्छेद अपसर्पित मत्ताक्रीड विद्यु दुभ्रांत विष्कंभापसृत मत्तस्खलित गतिमंडल अपविद्ध विष्कंभ उद्घट्टित आरत्तिप्तरेचित रेचित अर्धनिकुट्टक वृश्चिकापसृत' अलातक परावृत्त परिवृत्तक- रेचित उद्वृत्तक संभ्रांत स्वस्तिक रेचित' इति। "करणव्रातसंदर्भानन्त्यात् तेषामनन्तता। द्वात्रिंशत् ते तथाप्युक्ताः प्रधान्यविनियोगतः" इति

गतिरहितअ्रंगका जो संनिवेशविशेष है उसे स्थान कहतेहैं "संनिवेशविशेषोङ्ग निश्चलः स्थानमुच्यते" इति

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155 संगीतसुदर्शन- इसस्थानके इक्कावन प्रकार कहेहैं यथा- 'वैष्णव समपाद वैशाख मंडल आलीढ प्रत्यालीढ आयत अवहित्थ अश्वक्रांत गतागत वलित विनिवर्तित मोटित स्वस्तिक वर्ध- मान नंद्यावर्त संहत एकपाद समपाद पृष्ठोत्तानतल चतुरस्त्र पार्षि- विद्ध पार्षि्यापार्श्वगत एकपार्श्वगत एकजानुनत परावृत्त समसूचि विषमसूचि खंडसूचि ब्राह्म वैष्णव शैव गारुड़ कूर्मासन नागबंध वृष- भासन स्वस्थ मदालस क्रांत विष्कंभित उत्कट स्रस्तालस जानुगत मुक्तजातु विमुक्त सम आकुंचित प्रसारित विवतित उद्धाहित नत, इति। "एकपञ्चाशदाचष्ट स्थानानि करणाग्रणीः" इति॥ मैंने नृत्याध्याय के कुछपदार्थोंके ये नाममात्र लिखेहैं इनके लक्षय इसकारण नहीं लिखे कि जिन लोगोंमें नाच करनेका प्रचार है उनमें पढ़ने लिखनेका प्रचार बहुत अल्प है, जिन लोगोंमेँ पढ़ने लिखनेका प्रचार है उनमें नाच करनेका प्रचार नहीं। जिनलोगोंको इनके लक्षणा देखनेहों वे भरतसूत्रादिग्रंथोंमेँ देखलें। यहाँ लिखनेसे ग्रंथ बहुत बढ़जायगा इससे भी नहीं लिखे। और मैं स्वयं तनिक भी नृत्यक्रियामें कुशल नहीं इसकारय भी विशेष लिखसकता नहीं। चारोंप्रकारके अभिनयमें अभिज्ञको नट कहते हैं नृत्तके पंडितको नर्तक कहतेहैं- "चतुर्धाभिनयाभिज्ञो नटो भागादिभेदवित्" "न कः सूरिभिः प्रोक्तो मार्गनृत्ते कृतश्रमः" इति। पात्रं स्याद् नर्तनाधारो नृत्ते प्रायेण नर्तकी। मुग्धं मध्यं प्रगल्भं च पात्रं त्रेधेति कीर्तितम्। सुग्धादेलक्षएं प्रोक्तं यौवनत्रितयं क्रमात् ॥" इति।

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नृत्याध्याय। १८६ इत्यादिक और भी बहुतसा विषय संगीतग्रंथोंमें कहाहै वहाँ ही देख लेना, मेरा यहाँ नृत्यपर लक्ष्य नहीं किंतु खराध्याय और रागाध्यायपर ही है वह विषय जितना उचित समझा उतना यथामति लिख ही दियाहै इससे अब मैं इस ग्रंथको समाप्तकर निवेदन करताहूँ कि भ्रमप्रमादादिदोष पुरुषसाधारय होनेसे जो विषय आपको अशुद्ध जँचे उसे त्याग जो शुद्ध जँचे उसका ग्रहस करना बड़े बड़े भट्टपादादि अरप्रवतार पुरुषोंने भी अपने ग्रंथोंमें यही कहाहै कि 'ऐसा कोई जीव नहीं जो चूके न' फिर मुझ पामर मंदमतिकी तो कथा ही क्या इत्यलम्, इति शम्। ।। इतिनृत्याध्यायः समाप्तः ॥ अ्रमृतसेनपदपद्मयुग सिमर सिमर सिर नाइ। संगीतसुदर्शन प्रंथ इह हों मतिमंद बनाइ ।१॥ एक सात नव एक (१८७१) अरु संवत् काशीधाम। रच्यौ प्रंथ संगीतकौ हैं निजनामसनाम (संगीतसुदर्शन)।।२।। स्वराध्याय इह प्रथमहै रागाध्याय द्वितीय। नृत्याध्याय चतुर्थ है तालाध्याय तृतीय ।।३।। महामहोपाध्याय अरु सी आइ ई गुरुराज। काशीमें पंडितमुकुट गंगाधर महाराज ।।४।। इनकी चरगकृपा हि ते कीने ग्रंथ पचीस। जिनको पढ़ विद्यारथी वैष्यव देत असीस।।५।। अर्रमृतसेन नायक अरु गंगाधर बुधराज। ए दोऊ मेरे गुरू गुगियनके सिरताज ॥६॥ नितप्रति इनके चरगकौं सिमरौं वारं वार।

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१६० संगीतसुदर्शन-

ज्ञानसरोवरमें सदा ए दोड लावत पार॥७। दोऊ परम कृपालु थे करत न बनत बखान। मोसम दुर्जनकौ जिन जान्यौ तनुजसमान ॥८॥ सुदर्शनकौहौं पुत्रसम समझौं सब सुनलेहु। अमृतसेन निजमुख कह्यौ वचन अंतमें एहु ।।६।। जिमि निषाद रघुवीरपद पायौ परमपुनीत। ईशकृपा पाए तथा हौं गुरु दऊ सुरीत।१०।। अमृतसेनपदपद्मकौ पुनि प्रयाम करि ध्यान। संगोतसुदर्शनग्रंथकौ करौं समापत जान ॥११। संगीतरसिक या ग्रंथकौ निरखैं कछु चित लाय। तिनके रुचिकर होय तौ मोमन हर्ष मनाय ॥१२॥ अमृतसेन गुरुते लह्यौ जौ प्रसाद हौं मंद। सो तव संमुख कीन है रागरसिकवरचंद ।१३।। भूल चूक सब माफ कर गुनको ग्राहक होउ। कहूँ न चूके जोय सो मनुजदेह ना कोउ ॥१४॥ और कहौं कहँ लग सखे वचन अंत ना पाय। बुरौ सबनते ग्रंथ मम निजमुख कहौं बनाय॥१५॥ प्रथमपुरुष संगीतको पुस्तक रचे अ्र्प्रनेक। परम तुच्छ तहँ तनिकसौ पुस्तक मम इह एक।१६।। करौं प्रनाम तुहि अंतमें श्रीगुरुकौ सिरनाय। श्रीहरिकौ अरु शारदाचरसनकौ मनलाय ।१७॥। इति पंजाबीपंडितसुदर्शनाचार्यशास्त्रिविरचित संगीतसुदर्शन ग्रंथ समाप्त हुआ।

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१६१ कलकत्तेके संगीतडाकुर सी. आइ.ई. राजा शैौरीन्द्रमोहन ठाकुर ने जो मेरे सांगीतिकशास्त्रज्ञानसे और सितारसे प्रसन्न हो मुझे चिट्ठी दी उसको मैं यहाँ प्रमाएत्वेन उपस्थित करताहूँ। PATHURIAGHATA, CALCUTTA, 9th January, 1912. I had the pleasure of listening to a performance on the SITAR of Pt. Sudarshanacharya Shastri of Benares. The Pandit is a Sanskrit scholar and has studied the theory of Musie as laid down in the Sanskrit treatises on the subject. SHOURINDRAMOHAN TAGORE, Music Doctor, Raja, C. I. E. अर्थात्- हमको काशीस्थ पं० सुदर्शनाचार्यशास्त्रीजीके उत्तम सितार सुननेका सौभाग्य प्राप्त हुआथा। पण्डितजी संस्कृतके भारी विद्वान् हैं और सङ्गीतविषयके संस्कृतग्रन्थोंके भी सिद्धान्तोंका अभ्यास किये हैं।

. राजा शौरीन्द्रमोहन ठाकुर म्यूसिक डाकूर सी० आई० ई० कलकत्ता।

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श्रीः निजंजीवनवृत्तांत

पाठकवर इस समय मेरे तीन कनिष्ठ भ्राता हैं और एक ज्येष्ठ भगिनी। इससे पूर्व दो तीन बहन भाई मेरे मर भी चुके हैं। मेरे श्रीपिताजीका श्रीवंशोधराचार्य नाम था उनके पिताका श्री- राधाकृष्णाचार्य और पितामहकाश्रीरामप्रतापाचार्य नाम था इनके नामसे ही प्रतापका संबंध न था किंतु पंजाब देशमें इनका भारी प्रताप था पंजाबके राजा महाराजा तथा विद्वान और साधु महात्मा सभी इनको बहुत कुछ मानतेथे क्योंकि ये स्वयं अत्यन्त महात्मा तथा विद्वान् थे पटियालेके राजानरेन्द्रसिंहकी इन- में अतिशयित श्रद्धा थी। द्रविड़देशसे कश्मीरको जाते तथा आते समय श्रोरामानुजस्वामी मेरे पूर्वजपुरुषोंके घरपर ठहरेथे कुछ लोगों- को शिष्य भी किया ऐसा सप्रमाण सुनाहै। मेरे पिता पंजाब ज़िला लुधियानेके जगराओं शहरमेँ रहतेथे संवत् १६२६ आश्विनकृष् षष्ठोकी अपर रात्रिमेँ जगराओंमें मेरा जन्म हुआ उससमय पिताकी केवल २६ वर्षकी अवस्था थी और ब्राह्मय वैष्यव होनेके कारय मेरे जन्मका उत्सव मनानेकी कुछ भी अपेक्षा नथी तथापि मातापिताने भारी उत्सव मनाया तथा अपनी शक्तिकी अपेक्षा बहुत अधिक धन बाँटा ऐसा सुना है। पंचमवर्षपर्य त मेरा बहुत लाड रहा फिर धीरे धीरे भ्ष्टमवर्षपर्यत १ ग्रंथकारका ।

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( २ ) घटता घटता निश्शेष होगया। पंचमवर्षमें चूडाकर्म और अ्ष्टम- वर्षमें उपनयन हुआ अब शिक्षाका आरम्भहोगया। जराजरासी बातपर खूब ही मार पड़ती थी। एक दिन एक भित्तुक आया वह आटा (चून) लेता था माताने मुझे भिक्षा देनेको कहा मैंने बालशाठ्यसे नीचे दाना रख ऊपर आटा रख उसकी भोलीमें डालदिआ उसके आटेमें दाना मिलजानेसे उसने मातासे कहदिआ माताने उसका आटा छनवाके फिरसे भिक्षा दिलवादी उसके चले- जाते ही माता मेरी छातीपर छुरी लेकर चढबैठी और यही कहा कि तैंने भित्तुकके साथ दगा किया फिर भी करेगा इससे आज तेरा गला काटडालतीहूँ। बड़ो कठिनसे मजूरिन तथा भगिनीने मुझको छुड़ाया। ऐसी वारदाते बहुतवार हुईं। मैं मातापिताकी उन शिक्षाओंका बड़ा उपकार समभताहूँ उनसे मेरे बहुतसे काँटे झड़गए पिताने एकबार मुझे अनवसरमें हँसदेनेपर भी पीटाथा। बाल्यावस्थामें जैसी कुछ मुझे मातापितासे ताडना प्राप्त हुई भगवत् करे वैसी सभको प्राप्त हो किंतु देखनेमें आताहै कि अब वैसी ताडना तथा शिक्षा प्राप्त नहीं होती, मेरे कनिष्ठ भ्राताओरँको भी वह प्राप्त न हुई। माता मुझे संतोष और दया करनेकी भी बड़ी शिक्षा देतीथी। मेरी माताके सदश संतोष और दया करनेवाली स्त्री बहुत अल्प हैं। संवत् १६३७ के आरम्भसे ही पिताने मुझे अपने साथ रख- नेका आरम्भ किआ प्रथम मुझे अपने साथ अमृतसर लेगए फिर मार्गमासमें श्रीवृन्दावन लेगए वहां उनने अपने आचार्यपुत्र श्रीमान स्वामिश्री १०८ श्रीनिवासाचार्यजीमहाराजसे मुझको श्रोरामानुज-

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( ३ ) संप्रदायकी दीक्षा दिलाई क्योंकि असीमकालसे लेकर हमारे घरमें श्रीरामानुजसंप्रदाय ही चलीआतीहै और पूर्वपुरुषोंसे लेकर स्वयं शिष्य करनेकी भी मर्यादा चली आतीहै इससमय भी मेरे पिताके बहुतसे शिष्य वर्तमान हैं तथा मेरे भी। संवत् १६३८ लगते ही पिता घरको चले आए और मुझे श्रीसंप्रदायानुयायी शौच आचार व्यवहारकी खूब शिक्षा दीगई मैं भी अल्पकालमें ही यथाशक्ति उसमें निपुण होगया। संवत् १६३६ में पिताने मेरा विवाह करदिआ। १८४० में मैं वृन्दावनको चला- गया मेरे पिताको वहाँके सी.आई. ई. राजा सेठ लक्ष्मणदासजीने बड़े आदरसे बुलायाथा इससे २ मास पीछे पिता भी आगए उनने पुत्रप्राप्तिकेलिए पितासे अनुष्ठान करायाथा। दो चार जीव ऐसे पिताके मुह लगेथे और मुझसे उनसे पटी नहीं इससे उन लोगोंने पिताको मेरीओरसे सिखाने पढ़ानेका आरम्भ किआ जिससे पिताकी कृपामें अंतर पड़ने लगगया। वृन्दा- वनमें पहुँचनेके समय भेदसे मेरे और पिताके निवासस्थानका भी भेद था इससमय पिताके यहां एक बार ब्राह्मय-भोजन था पिता ने मुझे भोजनकेलिए भी नहीं कहा और भोजनकी कोई वस्तु भी नहीं भेजी मुझे भी पिताकी इस निठठराईसे कुछ खेद हुआ इससे मैं भी उस दिन पिताके मकानपर नहीं गया। यह रख्ज बराबर सं० १८४५ तक बढ़ताही गया। मैंने बहुत चाहा भी कि पिताकी कृपा प्राप्त हो परन्तु सभ यत्न व्यर्थ गया, सं० ४० से ४४ तक कई बार पिता वृन्दावन गए कई बार नाभे गए शेष काल घर भी रहे और मैं भी पिताके साथ ही था कितु अनबनसे ही। मुझे

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( ४ ) चारों दिशाआंमें अ्ंधकार ही प्रतीत होताथा क्योंकि पिताके विना मेरेलिए और कोई अन्नका भी आश्रय नहीं था, पिता मुझे कुछ पढ़ाते अवश्य थे किन्तु अपनी सेवा इतनी कड़ी करातेथे कि पढ़ने पर श्रमको समय प्राप्त नहीं होताथा, पिताने मुझे इतनी उपेक्षा दिखाई कि सं० ४२ के बाद वस्त्रकी भी तङ्गी होगई और ४४ में मुझे ४० दिन तक ज्वर आतारहा किन्तु पिताने बाततक न पूछी औषध और विश्रामको समय देना तो दूर रहा, यह सब प्रभाव केवल दुष्टोंकी चुगलखोरीका ही था। इस निठुराईसे भीतरो भीतर पिताकी भी निन्दा हुई। किन्तु मेरे गोचर जितना काम था मैं उस सभको उस ज्वरमें भी नित्यंप्रति पूरा करताथा ४० दिन पीछे मैं अच्छा भी होगया। पिताका इतना पानी भरा है कि अबतक हाथों में अट्टन वर्तमान हैं। अब मेरीओरसे पिताका हृदय इतना बिगड़ गया कि कोई वस्तुको इधरसे उधर रखनेमें भी अनेक संदेह करने लग मूसे बिलैयाके खाजानेसे उस खाद्यकी चारी भी मेरे माथे मढ़ने लग यहाँतक कि उनके रक्खे मोदकोंको सूसोंने नोचलिआ पिता- को उस नोंचनेका मुझपर भ्रम ऐसा पक्का हुआ कि दो पुरुषोंक संमुख वह मोदक मेरे माथेपर ही मारा जिससे मेरे कुछ चोट भी लगो और लज्जाकी तो क्या लिखूँ यही जीपर आया कि पृथ्वी फट जाए तो उसमें समा जाऊँ। पिताके इन अत्याचारोंसे चित्त बड़ा दुखी होगया। मथुराके सेठ लक्ष्मणदासजी वृन्दावनके पंडित सुदर्शनाचार्यशास्त्रीजी नाभेके बाबा बासुदेवदासजी इन तीन महा- पुरुषोंसे पिताका प्रथम असीम प्रेम था फिर स्वयं पिताने निज बेपरवाहीसे उस प्रेमको बिगाड़ डाला और उस प्रेमके बिगड़ जाने

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( ५)

में मुझे ही हेतु समझलिआ किंतु मेरा इसमें रत्ती भी अपराध न था प्रत्युत ऐसे बहुतसे उपाय किए जिससे इन लोगोंका प्रेम न बिगड़े उन का कुछ फल भी हुआ किंतु पिताकी भारी उपेक्षासे पूर्णफल न हुआ। इधर वैमनस्य बहुत बढ़गया था पिताकी ओरसे बड़ा दुःख भोगना पड़ताथा तथापि अन्न वस्त्रका कोई आश्रय न होनेसे सभ सहता था। संवत् १६४४ के माघमेँ एक दिन पिताके मुहलगा एक नौकर पिताको भडका रहाथा मैंने उस नौकरको कुछ डाटा किंतु मेरा डाटना पिताको सह्य न हुआर पिताने मुझे बहुत गालिएँ दी'और बहुतसे शाप दिए मैंने पिताके उस समग्र भाषसके उत्तर में इतनाही कहा कि यदि मैंने जानबूभकर आपका कुछ बिगाड़ किश हो तो मुझे चौदह नहीं अट्ठाईस कुष्ट हों और मेरे हाथसे यदि कोई वत्त्रभूषणादि आपका खोगया हो वा टूटगया हो तो आप कहिए मैं अपना देह बेचकर भी उसका पलटा दूँगा और आपका घर मौजूद है आप सम्हाल लेना मैं जुम्मेवार नहों और आप अब मुझपर विश्वास नहीं करना मैं बहुत शीघ्र आपके घरसे निकल जाऊँगा, मेरा यह उत्तर सुन पिताका कोप शांत होगया और पिताको मेरी सम्हाली हुई भगवत्सेवा के सम्हालनेकी भारी चिंता उत्पन्न होगई इस हेतु पिताने बहुत यत्न किआ कि मैं बाहिर न जाऊँ किंतु मैंने न माना, मैंने हृदयपर दढ़सङ्कल्प करलिआथा कि भिक्षा मॉगनी अच्छी पिताके घर अब रहना उचित नहों सो मैं फाल्गुन लगते ही घरसे चलपड़ा उस समय माता पिता बहुत रोए और जैसे जैसे पिताकी निठुराई बढ़ती जातीथी माताकी कृपा भी उतनी ही बढ़ती जातीथी।

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( ६ ) मैं घरसे निकलकर हरिद्वार होकर जयपुर पहुँचा इधर पिताके चित्तपर चलनेके समय जो मृदुता थी वह दुष्टपिशुनतासे नष्ट होगई कोप वैसेही फिर आजमा किंतु पूर्वकी अपेक्षा बढ़ा नहीं। मुझे उस समय गानेबजानेवालोंसे मिलनेकी बड़ी रुचि थी सो मैं जयपुरमें श्रीतानसेनवंशावतंस मीयाँ श्रीअमृतसेनजीसाहेबके मकानपर गया उनका सितार सुनकर मैं मुग्ध होगया मैंने उनसे सितार सीखनेका दढ़संकल्प करके उनसे कहा मेरी प्रार्थना मानी नहीं किंतु ऐसा मुझे समझाया कि जिससे मेरा वह संकल्प टूट जाय किंतु टूटा नहीं। एक दिन उनके एक भ्राताने मुझे उद्दश्य करके समयकी तथा सीखनेवालोंकी निंदा की मैंने कहा 'यदि लायकपुरुषके द्वारपर कोई नालायक भिन्तुक आता है तो घरवाला भिन्तुककी नालायकी- की ओर देख जवाब नहीं देता किंतु अपनी लायकीकी ओर देख भिक्षा देता ही है' यह सुनवे चुप होगए मैं उनके पीछे पड़ा ही रहा। इतनेमें काशीवासी राजा भरतपुरकी ज्येष्ठ कन्याका मेरे द्वारा सम्बन्ध हुआ था इससे मुझे काशी आना पड़ा काशी से मैं फिर जयपुर गया बड़ी कठिनसे पाँच मास पीछे पीछे फिरनेसे श्रीअमृतसेनजीने मुझे सं० १८४५ के श्रावरामें शागिरद बनाया फिर उनने मेरे साथ कोई बातका कपट नहीं किश मेरी अनुकूलतासे उनकी मुझपर असीम कृपा होगई। कुछ दिनके बाद मैंने वहाँ पंडित श्रीसुन्दरजी- ओभासे पढ़नेका भी आरंभ करदिआ मैंने काव्यकोश सिद्धांतकौमुदी काव्यादर्श इत्यादि कुछ ग्रंथ यथाक्रम उनसे पढ़े। और अमृतसेन- जीसे सितार भी सीखता रहा। पिता मुझे स्वयं भी बहुत ही अल्प खर्च भेजतेथे कि ४५ से ५० तक छै वर्षमें सब मिलाकर मुझे

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७ ) चौसठ रुपए भेजेथे और दूसरेको भी खर्च या कर्ज भेजने नहीं देते थे इस कारग मुझे धनकी इतनी तंगी उठानी पड़ो कि मासमें कई बेर फाके करने पड़ते थे दो दो चार फाकोंकी तो अब संख्या का भी स्मरण नहीं। एकबार ऐसा भी समय आया कि नौ दिन मुझे अरन्न प्राप्त नहीं हुआ केवल जल पीकर मैंने - दिन बिताए। एक जाड़ाभर वस्त्रकी भी इतनी तंगी भोगी कि मेरे पास दो चटाई थीं उनमेंसे एकको मैं नीचे बिछाताथा एकको शीतसे त्रारा- केलिए ऊपर ओढ़ताथा पाठकवर वह समग्र जाड़ा एक चटाई ओढ़कर बिताया और क्या लिखृँ। मैंने उस समय अपनी शक्त्य- नुमार भारी विपत्ति भोगी किन्तु आजतक किसीसे यह हाल नहीं कहा यहाँपर मिथ्या लिखना उचित न समझ विवश लिखना पड़ा। वस्तुगत्या जीवमात्रकेलिए उसपर भी ब्राह्मयाकेलिए तो विपत्ति बहुत हितकर है मेरी जानमें मनुष्य विपत्तिसे ही मनुष्य बनताहै। और पिताकी निठठुराईसे चित्त इतना दुखी था कि सभ उक्तविपत्ति तो सह ली किन्तु पिताको कुछ नही लिखा। और विपत्तिसे असीम दुःखी होनेपर भी मैंने अपने विद्या Sभ्यासमें तनिक भी त्रुटि नहीं की किन्तु निरंतर अभ्यास करता ही रहा क्योंकि विपत्कालकी सेवासे सरस्वतीदेवी बड़ी प्रसन्न होतीहैं। पिताको विश्वास था कि सुदर्शन भख मारकर हमारा ही फिर आश्रय लेगा किंतु मैं फिर पिताके यहाँ रहनेको नहीं गया इससे पिताका वह अभिमान टूटगया और कोप भी कुछ कुछ शांत होने लगा ५० के संवत्तक कोप सर्वात्मना शांत होगया। इधर मीयां श्रीभमृतसेनंजी मुझे बड़े स्नेह तथा श्रमसे सितार सिखातेरहे वाद्य

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( = ) बजानेवाले लोग गैर आदमीको जोड़ नहीं सिखाते किन्तु श्रीअमृत- सेनजीने मुझे जोड़ भी सिखाया मैं उनकी उस उदारता तथा कृपाका सात जन्ममें भी प्रत्युपकार पूरा नहीं करसकता। उनके शिष्य तथा मातुलपौत्र हफीजखाँजीने भी मुझे सितार सीखनेमेँ वड़ी सहायता दी। उस समय मीयां अमृतसेनजीके घरमेँ उनसे नीचेके दस बारह उस्ताद लोग और थे सबी कृपा रखते थे। वह घर क्या था मानों संगीतका कालिज था अब वह बात नहीं रही। हम लोगों के दौर्भाग्यसे सं० १८५० पौषकृष्ण अष्टमीको प्रातःही श्रोअमृत- सेनजी सदाकेलिए इसलोकसे बिदा होगये मानों संगीतका सूर्य अरस्त होगया यद्यपि उनकी अवस्था उस समय प0 वर्षकी थी तथापि लोगोंने बड़ा शोक मनाया। मैं उनकी मृत्युसे उदास होकर घर गया वहाँ रोगग्रस्त होगया कुछ कालमें अच्छा होकर और कुछ माताकी आज्ञासे गृहस्थके कामोंको समेट कर श्रीअमृत- सेनजीके पुत्र मीयाँ निहालसेनजीको मिलने जयपुर गया वहाँ से अपने पिता तथा परममित्र राजासेठ लक्ष्मगदासजीको मिलने वृं दा- वन गया वहाँसे पढ़नेकेलिए काशीको चलाआया। पाठकवर उक्त विपत्तिका खेद चार वर्ष मैंने निरन्तर भोगा उसके अनंतर एक परमश्रीमान मेरा मित्र मुझे खोजकर जयपुरमें मिला वह मेरी उस दशाको देख बड़ा दुखी हुआ और विपत्तिवृत्तांत न लिखनेका बड़ा उपालंभदिआ। उसने जयपुरसे चलते समय एक हजारका नोट मुझे दिश और आगेको खर्च देनेका करार किया। मैंने उस रुपयेसे सब ऋय चुकता किया। आगेको जो उक्त महापुरुष से खर्चको मिलता रहा उससे मैं अपना काम चलाता

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(६) रहा और उस पुरुषने छात्रावस्थाकी योग्यतासे बहुत अधिक खर्च मुझे दिआ याने पाँच छैसौसे कम किसी वर्ष नहीं दिआ और बड़े आदरके साथ विना माँगे देतारहा। किन्तु वह सब रुपया सुझसे खर्च होजाताथा इसीतरह उस पुरुषने मुझे छै वर्ष तक खर्च दिश जिससे मैंने बड़े सुखसे विद्याभ्यास किआ। उसके पलटेमें यही आशीर्वाद देताहूँ कि भगवान् उसके पुत्रपौत्रोंकी सभतरह से वृद्धि करें। छै वर्षके अनंतर वह स्वयं बड़ी धनकी तंगीमें फंसगया इससे उसने खर्च भेजना बंदकरदिआ किन्तु जवाब नहीं दिश यह लिखा कि किसी समय सब इकट्ठा ही देदूँगा, तदनन्तर रोगग्रस्त होकर कुछ ही दिनमें वह भी इस लोकसे चलदिआ उसकी पति- व्रता पत्नो के साथ मेरी विद्या भी मानों उसदिन विधवा होगई। यदि इस समय जीता रहता तो इस समय उससे मुझे बहुत धन तथा मानप्रतिष्ठा प्राप्त होनेकी आशा थी, क्योंकि उसने सुझे बहुत कुछ कहा हुआथा। मैं भी संवत् १६६५ तक उसके विना और किसी धनवान्के द्वारपर नहीं गया यदि वह जीता रहता तो कभी किसीके द्वारपर जानेका समय न आता। किंतु ऐसा सौभाग्य कहाँ। मैं संवत् १६५१ के मार्गमें काशी पहुँचकर महामहोपाध्याय सी. आइ. ई. श्रीमान् विद्यानिधि श्रीगंगाधरशास्त्रीजीमहाराजसे पढ़नेलगा प्रथम काव्यप्रकाश कुवलयानंद अलंकारसर्वस्व ध्वन्यालोक चित्रमीमांसा तथा रसगंगाधर ये ग्रंथ पढ़े फिर सांख्य औरर योगके ग्रंथ पढ़े फिर अद्धैत वेदांत तथा पूर्वमीमांसाका अध्ययन किया न्यायके दर्शनभागका भी अध्ययन किया कुछ विशिष्टाद्वत तथा शब्दखंडका भी अध्ययन किश साहित्य और अद्वैतवेदांतका अध्य-

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सकललोकप्रसिद्ध अकबरपादशाहके उस्ताद अखिललोकसंमान्य अद्वितीयभगवद्भक्त सारस्वत- तथा एकरत्न संगीतपरमाचार्य कुलाब्धिकौस्तुभ दिव्यसंगीतपरमाचार्य भूतपूर्व

मीयां श्रीतानसेनजी श्रीहरिदासस्वामीजीमहाराज।

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संगीतसुद्शन

अकबरपादशाहके उस्ताद तथा एकरत सकललोक- प्रसिद्ध संगीतपरमाचार्य मीयां श्रीतानसेनजी

इंडियन प्रेस, लिमिटेड, प्रयाग।

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संगीतसदुर्शन-

नवाबझकरके उस्ताद जगद्विख्यात उत्कृष्टसितारवादनके प्रथमपुरुष (उस्ताद) मृत मीयां श्रीरहीमसेनजी

इंडियन ग्रेस, लिमिटेड, प्रयाग।

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संगीतसदर्शन

अलवरनरेशके उस्ताद जयपुरनरेशके जागीरदार जग- द्विख्यात उत्कृष्टसितारवादनके द्वितीयपुरुष (उस्ताद) मृत मीयां श्रीशमृतसेनजी

इंडियन प्रेस, लिमिटेड, प्रयाग।

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संगीतसुदर्शन

गवालियरनरेशके उस्ताद जगद्विख्यात उत्कृष्टसितारवादनके प्रथमखलीफा मृत मीयां अमीरखांजी

इंडियन प्रेस, लिमिटेड, प्रयाग।

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संगीतसुदर्शन

जयपुरनरेशके जागीरदार श्रीशमृतसेनजीके पुत्र उत्कृष्टसितार- वादनके द्वितीयखलीफा मीयां निहालसेनजी

इंडियन ग्रेस, लिमिटेड, प्रयाग।

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संगीतसुदर्शन . wwh.mmmwgyyr

नवावटौंक तथा नवावरामपुरके परमकृपापात्र उत्कृष्ट सितारवादनके तृतीयखलीफा मृत मीयां हफीजखांजी

इंडियन ग्रेस, लिमिटेड, प्रयाग।

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संगीतसुदर्शन

मृत मीयां अमीरखांजीके पुत्र फिदाहुसेनजी

इंडियन प्रेस, लिमिटेड, प्रयाग।

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( १० ) यन प्रचारापेक्षया मैंने बहुत अधिक किआ किंतु सभ उक्त श्रीगुरु- प्रवरोंसे ही इतना अध्ययन करते करते १६६३ का संवत् बीतगया। और इस कालमें मैंने स्वयं भी कई ग्रंथ बनाए यथा संस्कृतमें- 'श्रीरंगदेशिकशतक 'संस्कृतभाषा 'अरद्रैत चंद्रिका 'विशिष्टाद्वैवाधिकर- रमाला, भाषामें 'स्ीचर्या, 'भगवद्गीतासतसई 'आल्बारचरितामृत अष्टादशरहस्यभाषा, संस्कृत तथा भाषा दोनोंमें अनर्घनलनाटक, संस्कृतके कुछ उपयोगी पद्योंका संग्रह करके उसका नाम'नीति- र्नमाला नियतकरके उसकी भाषामें टीका लिखी ये सब ग्रंथ छूप भी चुकें हैं। इन ग्र थोंके कारण लोकसे मुझे बहुत कुछ मान भी प्राप्त हुआ।और रघुनाथचंपृ एक कोश ये दो ग्रंथ मैंने भाषाके लिखने आरंभ किए किंतु अभीतक अधूरे पड़ेहैं। और "सिद्धांत- कौमुदीकी भाषाटीका तथा भगवद्गीतापर विशिष्टादवैतकी रीतिसे अद्धू तमतखंडनपुरस्सर'तत्त्वार्थसुदर्शनी नामकी भाषाटीका लिखी जिसका और लोगोंने भगवद्गीताभाषाभाष्य यह भी नाम रखदिश ह बंबईके वेंकटेश्वर प्रेसमें छपी है। इन सभके पीछे१ १शास्त्रदीपि- १ श्रीरंगदेशिकशतक मैंने अपने परसाचार्यों का स्तोत्ररूप बनाया है। २ संस्कृतभाषामें 'आरदिकालमें भारतकी भाषा संस्कृत थी' यह प्रतिपादन किआहै। ३ अद्वैतचंद्रिका अद्वैतवेदांतानुसार प्रमाण तथा प्रमेयका अ्रंथ है इतना प्रमेयस ग्रह और किसीएक ग्रंथमें नहीं मिलेगा। ४ विशिष्टाद्वैताधिक- रणसाला श्रीभाष्यका सारभूत है ५ स्त्रीचर्या स्त्रियोंके उपयोगी है। ६ भग- वद्गीतासतसई में भगवद्गीताके प्रत्येक श्लोकका एक एक दोहेमें अनुवाद है। ७ आल्वारचरितामृतमें श्रीसंप्रदायके १२ भक्तोंका चरित्रहै। म अ्र्ष्टा- दशरहस्यभाषा श्रीरामानुजाचाय-प्रणीत अ्ष्टादशरहस्यका अनुवाद है। १० नीतिरत्नमाला धर्म और नीति प्रतिपादक श्लोकोंका संग्रह है। १८

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( ११ ) काप्रकाश नामकी शास्त्रदीपिकाके तर्कपादकी संस्कृतमें सविस्तर टीका लिखी यह काशीकं विद्याविलामप्रेसमें छपीहै। इस ग्रंथके लिखनेपर मुझे भारी श्रम उठाना पड़ा। हिदी भाषाका व्याकरख (हिंदीदर्पग) बनाया, शक्तिवाद व्युत्पत्तिवादपर भी आदर्श नामक टीका बनाई इस टीकासे छात्रलोग बहुत प्रमन्न हुए। इधर काशीमें आनेके अनंतर मैं तीन चार बेर पितासे मिला। सं० १६५७ के कार्तिकमें मेरी माताकी मृत्यु होगई केवल डेढ़मास मैं माताकी कुछक सेवा करसका। मार्गमास समाप्त होते पिता से मिलकर मैं फिर अध्ययनकेलिए काशी आगया। संवत१८५८ के आवसमेँ पिताकी भी अमृतसरमेँ मृत्यु होगई उस समय भी मैं वहाँ था पिताकी मृत्युके ३ दिन पीछे मेर छोटे भाइओ्ररोंने मुझे पैत्रिकदायसे कोरा जवाब देदिआ उसके प्रमाखकेलिए एक कागज़ लिखाहुआ मुझे दिखाया जिसमें लिखाथा कि "हमारे ज्येष्ठपुत्र सुदर्शनका हमारी किसी वस्तुपर भी कुछ हक्क नही" मैं इस वज्र- पातको संतोषसे इतना सहलिआ कि मैंने भाइओप्रोंसे यह भी न पूछा कि यह क्या हुआ किवा क्यों हुआ। यही उत्तरमें कहा बहुत ठीक है। उसी समय दुःखी होकर मैंन हृदयसे अपने पैत्रिकदायको त्याग दिआ और ऐसा त्यागा कि आजतक उधर दृष्टि भी कभी नहीं दी। उक्त अन्यायसे मेरे पिता तथा भ्राताओंकी निंदा भी हुई और मेरे संतोषसे मुझे इतना यश प्राप्त हुआ कि लाखन रुपया खर्च करनेसे भी जो प्राप्त होना कठिन है, एकबार सभ पंजाबमें यह चर्चा फैल गई तथा मध्यप्रदेशक भी कई नगरोंमें। मैं भ्राताओरंके जवाब देनेसे अपनी पत्नोको साथ ले सूखे हाथन घरसे निकलपड़ा

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( १२ ) मेरे निकलते ही नगरमें त्राहि त्राहि मचगई दानों भैंने बड़ी रोईं पीटीं उस समय जो पुरुष मुझसे मिला वह रोदिआ उस समय बड़ा करुष बीतगया। भ्राताओंके इस अन्यायसे रुष्ट होकर पिताके बहुतसे शिष्यलोग मेरे पक्षमें होगए। पिताने जो अंतसमय असीम निठठुराई दरसाई वह भी एक जीवके सिखानेसे, उसने मेरी ओरसे पिताको इतना सिखादिआ कि मैं अंत्यसमय जीवितपिताके दर्शनतक न करनेपाया, इधर पिताको मेरी ऑखका बड़ा लिहाज था सिखाने- वाला जानता था कि यदि सुदर्शन इनकं संमुख आगया तो मेरी मंथरानीति समग्र नष्ट होजायगी ये सर्वस्व सुदर्शनको सम्हाल जाएँगे यह सोच सिखानेवालेजीवने मेरा पिताके निकट पहुँचना ही बंद करादिआ। और मैंने भाइओंको यथाशक्ति बहुत कुछ सहायता दीथी तथापि उसीके सिखानेसे तथा धनलोभमें पड़कर भाइओरोंने मुझे पैत्रिकदायसे जवाब दिश परतु कुछ कालबाद भाइ- ओंको पछताना पड़ा और पिताका घर भी नष्ट भ्रष्टसा होगया। बहुतसे लोगोंने भाइओ्ंक साथ मुकद्दमा लड़नेका मुझसे आग्रह किया किन्तु मैंने एक न मानी संतोष करना ही उचित ममझा और यद्यपि इदालतमें जानेसे मुझे मेरा पैत्रिकदाय तुरत मिल जाता तथापि इदालतमें जानापड़ता। नाभेके वाबा वासुदेवदास- जीने सभ हाल जानकर यही कहा कि "आपके इससंतोषसे मैं बड़ा प्रसन्न हुआरआपन बहुत हो उचित किआ जो पैत्रिकदाय त्याग दिआ ऐसे निरादरकारिओंसे न लेना ही उचित है।" और यद्यपि मेरे भाइओोंने मेरे साथ कम नहीं की और मेरा उनका कोई प्रकारका व्यवहार भी रहा नहीं तथापि मैं उनको प्रेमकी

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( १३ ) हो दृष्टिसे देखताहूँ और यही चाहताहूँ कि श्रीनारायए उनको सदा आनंद प्रसन्न रक्खे। भाइओंने जो मुझे दायसे जबाब दंदिआ उस बातको लोकमें उचित ठहरानेकेलिए भाइओोंने मुझपर बहुतसे भूठे दोष लगाने आरम्भ किए किन्तु देशके लोग उनकी शेषारापकी बातोंका मुहतेोड़ उत्तर देतेर हे क्योंकि लोग मेरे आचार व्यवहारसे भली भांति परिचित थे और भाइओोंके अनुचित लोभ को भी समझ गएथे। मैं भी काशीमें बैठा उन दोषारोपोंको सुनता था किन्तु उन भूठी बातों का उत्तर देना उचित नहों समझा। और देशके लोग स्वयं उन भूठी बातोंका उत्तर देते थे। उस समय परिचिताSपरिचित सर्वसाधारय जीवमात्र ने जैसा कुछ मेरा पक्त पकड़ा तथा प्रीति जताई उतनी मुझे आशा न थी। महाशय उस मेरे मित्र महापुरुषने मुझे छैही वर्ष खर्च दिश था और मैंने उससे खर्च मिलना बंद होने पर भी अध्ययन को बंद नहीं किआ किन्तु ऋस लेकर उससे ख़र्च चलाकर अध्ययन चलाया और मातृमृत्यु कार्यपर डेढ़ हज़ार रुपया नक़द खर्च उठाथा उसमेंसे एक हज़ार पिताकी तरफसे मिलाथा शेष पाँच सौ ऋए लेकर मैंने अपनी ओरसे मातृसेवा समझ खर्च किआथा इत्यादि खचोंके कारण जिस समय भाइओ्रोंके जबाब देनेसे मैं सूखे हाथ घरसे निकला उस समय दो हज़ार रुपया मेरे सिरपर ऋ था उसकी मुझे बड़ी चिन्ता लगी किन्तु उसी समय पिताके शिष्यभूत दो घरोंने मिलकर तीन हजार रुपया मेरे भेंट किश मैंने भी उस- मेंसे समग्र ऋय चुकता करदिआ और काशी आकर शेष धनमेंसे

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( १४ ) कुछमें कुछ दिन अपना काम चलाया कुछ धन से विशिष्टाद्वैताधि- करणमाला और अद्धू त चन्द्रिका ये दो स्वनिर्मितसंस्कृत ग्रन्थ छपवाए। और अध्ययनका आररम्भ किश उसके अनंतर तीनवर्ष पर्यत शिष्य- लोगोंसे उचित धन प्राप्त होतारहा इसके अनंतर शिष्यलोग धन- प्रदानके कारण अभिमान दिखाने लगे और मानमर्यादाको भी बिगाड़ने लगे इससे मैंने शिष्यलोगोंसे भी धन लेना बंद करदिआ क्योंकि तुच्छ धनकेलिए मैंने उनकी खुशामद करनी और अपनी मानमर्यादाको अल्प करालेना उचित नहीं समझा यदि मैंने खुशामद ही करनी होती तो मथुराके राजा लक्ष्मणदासजीसे बहुत कुछ धन कुमालेता। मेरे स्वभावमें बहुतसे दोष हैं यथा गुरुलोगोंके सिवा और कोईकी खुशामद न करनी और कोईसे अपमान भी न सहना इत्यादि। और मैं अपनी ओरसे ऐसी चेष्टा यथाशक्ति नहीं ही करता जिससे किसीके साथ वैमनस्य उत्पन्न हो यदि दैवात् वैमनस्य उत्पन्न होजाय तो उस दूसरेके वैमनस्य छोड़े विना मैं भी वैमनस्यको नहीं छोड़ता हाँ इतना अधिकतर ध्यान रखता हूँ कि जहाँतक बने कोई के अनिष्टमें प्रवृत्त नहीं होता यदि दूसरा वैमन- स्यको त्याग दे तो मैं भी तुरत त्याग दे ताहूँ मैं कोईका द्वूषी नहीं द्वषसे बहुत डरताहूँ वैमनस्योत्पत्तिके ही भयसे दूसरेके साथ वार्तालापमें यदि मैं किसी बातपर दूसरेका आग्रह देखताहूँ तो अट अपने पक्षको शिथिल करदेता हूँ जो वैमनस्य उत्पन्न न हो। और व्यावहारिक बातमें मिथ्या बोलनेसे भी बचताहूँ मेरी श्रद्धा वैष्णवसंप्रदायमें ही है। मैं विपत्तिको उपकारियी तथा भूषय समझताहूँ दूषए नहीं। प्राचीन कालमें नलादि बड़ बड़े चक्र

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( १५ ) वर्त्तिओंन भारी विपत्ति भोगी है फिर मादशानिर्भाग्य जीवोंकीकौन कथा। ग्रन्थ लिखनेकी चाट मुझे मेरे मित्र काशीके राधाकृष्णदासने लगा दी इसे मैं अपने वर्तमानसमयकेलिए कुछ अच्छी नहीं सम- झता इससे विद्याभ्यासमें भी कुछक क्षति हुई तथापि सभ मिलाकर मैंने बाईस वर्ष विद्याभ्याममें विताए हैं। यदि कोई मेरा वास्तविक दोष दिखाता है तो यद्यपि उससे पश्चात्ताप बड़ा होता है तथापि दोषको स्वीकार करलेताहूँ। पिताकं मरनेके अनंतर एक मेरा छोटा भ्राता मेरे पक्षमें रहा यह विदित नहीं कि वह कपटसे मेरे पक्षमेँ था किंवा सत्यसे। सुझसे जो बनशई सो मैंने उसकी सहायता की और शिष्य- सेवकोंमेँ उसे मैंने अपना मुखत्यार बनादि सभको यह कहाकि इसका मेरा ही रूप जानना। तीनचार वर्षमेँ जब उसके शिष्य- वर्गमैँ पैर जमगये तब वह भीतरोभीतर मेरा शत्रु बनगया इसकी मित्रमुखशत्रुताने मेरी बहुत हानि की, कुछकालके अनंतर इसकी शत्रुता सभको प्रकट होगई। और यह स्पष्ट शत्रु बनगया। इधर निजव्ययसे और शास्त्रदीपिक्ाके तर्कपादपर टीकाके बनाने तथा स्वयं छपवाने के व्ययसे मेरे सिरपर बहुत भारी ऋए होगया उससमय मैं शक्तितरादसमाप्त कर चुकाथा। व्युत्पत्तिवादको उत्तश्रीगुरुपादोंसे पढ़नाचाहताथा कितु ऋष तथा खर्चकी तंगीसे उससमय न पढ़सका ऋए उतारनेकेलिए काशीसे बंबईकी ओर चलागया। बंबई जाकर गीतापरजो तत्वार्थसुदर्शनी (भाषाभाष्य) नामकी टीका लिखीथी उसके छपनेका वेंकटेश्वरप्रेसमें प्रबंध किया तदनतर अर्शरोगसे पीड़ित हो पूना पंढरपुर शोलापुर होताहुआ

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( १६ ) दक्षिए हैदराबादमें जा पहुँचा, एक वेर आरोग्य प्राप्त हुआ किंतु फिर वही अशरोग इतना बढ़ा कि आठमासतक अत्यंत पीड़ित रहा। आरोग्यहोनेपर मनमें आया कि श्रीरंगधामकी यात्रा करनी- चाहिये इससे खर्चकी तंगीके कारए केवल श्रीरंगधामयात्राकेलिए उद्यत हुआ, मेरे इससंकल्पको जान हैदराबादके कुछ श्रीमानोंने सेवा की जिससे मेरे पास सातसौ रुपया इकट्ठा होगया तब मैंने यथाशक्ति दक्षियमें हानेवाले बहुतसे वैष्णवधामोंकी यात्राका आ्र्रंभ किया जहाँ जहाँ सवारी जासकतीथी वहाँवहाँकी प्रायः यात्रा नहीं होड़ी यथा- हैदराबादसे-विजवाडा, पखानृसिंह, कांची, भूतपुरी, वीर- राघव, मदरास (यहाँभी कई दिव्यदेश हैं) मधुरांतक चिदंवर श्रीमुष्टि, सियाडी, मायावरम्, कुंभकोए तंजौर, श्रीरंगनाथ, मदुरा, सुंदर- बाहु, रामेश्वर धनुष्कोटि, दर्भशयन विल्लुपत्तर, अल्वारतिरुनगरी (यहांनौ ग्राम तीर्थ हैं) तोताद्रि, त्रिकनगुडी छोटेनारायए, त्रिप्तिसार, पद्मनाभ जनार्दन फिर श्रीरंगम्, श्रीरंगपट्टन, मयसूर मैलकोटा, हैंदराबाद इसक्रम से छैमासमें यात्रा समाप्त की। लौटकर हैदराबाद आया तो जिस सर्वोत्तम लाभकी आशा थी वहतो न हुआ किंतु सेठ लोगोंसे एक हज़ार प्राप्त हुआ उसे ऋसवालोंको भेजदिया हैदराबादसे नाशिक स्नान करताहुआ बंबई आया इसवेर बंबईसे भी अच्छा लाभ हुआ वहांसे गुजरात काठियावाड़ होताहुआ द्वारकाको गया। इस यात्रांमें मान बहुत पाया। महाराजबड़ौदा भी बड़े मानसे

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(१७ )

मिले और पांचसौ रुपया दिया। भावनगरसे भी अच्छा लाभ हुआ यहां के दीवान बड़ेयाग्य पुरुष थे। द्वारिकासे सिंधमें आया यहां लाभ तो अच्छा नहीं हुआ कितु अद्धू तवेदांतके रसिक अच्छे अच्छे मिले जो सूक्ष्मविषयोंको भी अच्छा समझ जातेथे। सिधसे पंजाबमें आया, पंजाब अमृत- सरमें बहुत ही अच्छेलाभकी आशा थी कितु उक्त शत्रुभूतभ्राताकी शत्रुताके कारण वैसा लाभ न हुआ पंजाबसे जयपुर आया। यहां से ऋस उतारनेको राजपूतानेमेँ घूमनेका विचार था किँतु जयपुरमे ज्वर बड़ेजरसे आया इधर सवावर्षसे अन्न छोड़ाहुआथा (फलाहार करताथा) इन दोकारणों से निर्बलता इतनी बढ़गई कि विवश होकर काशीको चलाआया। काशी आकर फिर व्युत्पत्तिवाद के पाठका आारंभ किया। इस जगापर ऋणदेनेवालोंकी प्रशंसाकिये बिना मुझसे नहीं रहाजाता कि समयातिक्रमहोने पर भी मुझे किसीने तंग नही किया यह उन लोगोंकी लायकी है इसके अनंतर मैंन शक्तिवाद औरर व्युत्पत्तिवादपर आरदर्शनामक टीका लिखकर छपवाई इनदोनों टीका- ओंके बनाने तथा छपवाने में भी बुद्धि तथा धनका बहुत व्यय हुआ। इसके अनंतर श्रीवैष्णवव्रतनिर्य बनाकर छपवाया। श्रीगुरुचरणोंके अलिविलासिसंलापपर भी उनकी आज्ञासे टीका लिखी जो अभीतक छपी नहीं। यह अलिविलासिसंलाप दार्शनिकविषयका बहुत ही उत्तम पद्यात्मक ग्रंथ है, यह ग्रंथ बेजोड़ है यह कहनेमें भी कुछ अत्युक्ति नहीं। पूर्वोक्त भ्रातामहाशय ने जैसा कुछ मेरे साथ विश्वासघात किया

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( १= )

उसे कुछ लिख नहीं सकता। इसके अनंतर यह संगीतसुदर्शन ग्रंथ लिखा। अष्टश्लोकीपर भाषाटीका लिखकर वेंकटेश्वरप्रेसमें छपवाई यह वैष्णवसंप्रदाय का ग्रंथ है। धीरे धीरे ऋण भी उतरा किंतु ऋगा पीछा नहीं छोड़ता कुछ न कुछ बनाही रहता है। तदनंतर दशरूपक न्यायभाष्य श्रीभाष्य इन ग्रंथोंपर टीका लिखकर छपवाई इन ग्रंथोंसे विद्वान्लोगभी बहुत प्रसन्न हुए। महाशय मैंने जो यह अपना जीवनवृत्त लिखाहै इसकी कुछ भी अपेक्षा न थी किंतु लोगोंकी देखादेखी लिखदिआहै त्मा करना और जो कुछ मैंने यहां लिखाहै वह बड़े संतेपसे लिखाहै यदि पूर्णरीतिसे लिखता तो सौ पचास पेजसे कम न होता सविस्तर लिखता तो दो सौ पेज होजाता किंतु मैं इतने संच्ेपको भी विस्तर ही समझता हूँ क्योंकि वस्तुगत्या देखा जाय तो मेर जीवनवृत्तमेंसे यदि वक्तव्य श्तव्य हो सकतीहैं तो दो ही वार्ता होसकतीहैं- एक तो-मैंने अपनी शक्त्यनुसार उक्त भारी विपत्तिके समय भी विद्याभ्यासमें न्यूनता नहीं की और अत्यंत अपरिचित गुरुसे दो अक्षर संपादितकिए तथा विजातीय संगीतविद्याको भी सीखा। द्वितीय-भ्राताओंके पैत्रिकदायसे जवाब देनेसे मैंने सर्वथा संतोष किशर पैत्रिकदाय त्यागनेमें भगवदनुग्रहसे मैं कोईतरह भी ब्राह्मय- वैष्णव मर्यादासे भ्रष्ट नहीं हुआ, बस। मैंने यहां अपने पिता तथा भ्राताओरोंकी निठठुराईका जो वृत्तांत लिखाहै इससे भ्राताश्रंको अवश्य खेद हुआ होगा इससे मैं भ्राताओंसे चमा मांगता हूँ, सत्यको छिपाना उचित न समझ मैंने यह वृत्तांत लिखाहै और जगतशिक्षा-

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( १६ ) केलिए भी लिख दिआ है, इस वृत्तांतकेलिए अब भ्रातालोग भी पश्चात्ताप करतेहैं, इस विपत्तिने मेरा तो पूर्ण उपकार ही किया। आगे कैसे बीतेगी यह कुछ प्रतीत नहीं। वस्तुगत्या जिनका जीवन- वृत्त कुछ अलौकिक हो उनीका पढ़ने तथा लिखने योग्य होताहै ना कि मेरेसे साधारण जीवका। अच्छा कहाहै- "चरितं रघुनाथस्य शतकोटिप्रविस्तरम्। एकैकमक्षरं पुंसां महापातक नाशनम् ॥" चरित्रं रामचन्द्रस्य ज्ञेयं गयं ह्यलौकिकम्। संवत १६७२ पंजाबी पं० सुदर्शनाचार्यशास्त्री, काशी।