Books / Brahadaranyaka, Swetaswatara & Kaushitaki Upanishads with Vidya Vinoda Bhashya Swami Vidyananda

1. Brahadaranyaka, Swetaswatara & Kaushitaki Upanishads with Vidya Vinoda Bhashya Swami Vidyananda

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प्रधानसंपादक-स्वामी श्री हरिहरानन्दजी मण्डलेश्वर, तर्कवेदान्तभूषण संपादक-चिरव्जीवलाल भत्ति, ज्ञान, वैराग्य, अनासक्ति, लोकसंग्रह का शिक्षक, धार्मिक आध्यात्मिक सचित्र मासिकपत्र- गीताधर्म2्व उपनिषद्-वार्षिक विशेषाङ्क (तृतीय खण्ड)

बृहदारययकोपनिषद् [श्वेताश्वतर-कौषीतकिसमेत ] विद्याविनोद भाष्यसहित

रचघिता- श्रीगत्परमहंस परिव्राजकाचार्य ब्रह्मनिष्ठ लोकसंग्रही रगाताव्यास श्री १०८ जगद्गुरु महामण्डलेश्वर स्वामी श्री विद्यानन्दजी महाराज।

इस अङ्गका मूल्य ५) पाँच रुपया, वार्षिक मूल्य ६।) सवा छै रुपया। वर्ष-१५ ] जनवरी, फरवरी-१६५० [ अङ्क १-२

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शुभ अभिलाप

शान्तिमय हो विश्व सारा, प्रेम हो सबका सहारा। मुकुल मानस में निरखकर, आत्मा की दिव्य आमा। कह रहा भारत अकेला, ब्रह्ममय सब विश्व देखा। ब्रह्म ही है आत्म-ज्योति, भुवन मानस के क्षितिज में॥। मातृभू के रजत कण में, अक्षर पुरुष की एक रेखा। मोह माया वासना से, उस निरञ्जन ने उबारा ।। शान्तिमय हो विश्व सारा, प्रेम हो सबका सहारा। प्रेम, समता, त्याग-नश्वर, मोद परमानन्द भीतर॥ र-उद्धि में भक्ति निर्मेल, बह चळी धारा निरन्तर। अश्रुकण की मालिका ले, एक सद्गुरु का सहारा।। जीव अनुगत कह उठें फिर, ज्ञानमय घनश्याम प्यारा। शान्तिमय हो विश्व सारा, प्रेम हो सबका सहारा ॥ -श्री सुरेन्द्रनाथ विशारद-

मुद्रक तथा प्रकाशक- स्वामी हरिहरानन्दजी महाराज मण्डलेश्वर गीताधर्म प्रेस, मिश्रपोखरा, बनारस।

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संस्थापक-श्रीमत्परमहंस परिवाजकाचार्य ब्रक्षनिष्ठ लोकसंग्रही गीताव्यास श्री १०८ जगदगुरु महामण्डलेश्वर स्वामी श्रीविद्यानन्दजी महाराज।

गीता धर्म

सवधर्मान् परित्यञ्य मामेकं शरणं व्रज। अहं त्वासर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामिमा शुचः॥ वर्ष १५ } जनवरी, फरवरी १६५० काशी अङ्क: १-२

ज्ानी का ख्वरूफानुसंधान

क्षर अक्षर के पार विमळ सत्ता है मेरी। अखिळ विश्व है तनू ब्रह्म संज्ञा है मेरी॥ पणवाक्र में सभी लोग भजते हैं सुझको। त्रिशुणा प्रकृति सहित ईश कहते हैं मुझको।। नित्य सत्य अविकार सनातन चेतन हूँ मैं। करूँ विश्व निर्माण प्रकृतिसंचालक हूँ मैं।। जीवन्मुक्त स्थितमज्ञ निर्दन्द्व दशा है मेरी । तन्ु से कर्म करूँ आत्मछिप्सा नहीं मेरी।।

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प्रकाशकका निवेदन

प्रभुप्रेमी पाठक महानुभावों की सेवा में 'गीताघर्म' का यह वार्षिक विशे- षाट्क ग्रन्थ समर्पित करते हुए हमें अत्यन्त प्रसन्नता हो रही है। इस विशेषांक द्वारा 'गीतावर्म' पंदरहवें वर्ष में प्रवेश कर रहा है। गत दो वर्ष से पाठकों के समक्ष हम महान् से महान्, गम्भीर और परमपावन पारमार्थिक साहित्य भेट कर रहे हैं, जो वेदों के मस्तकस्थानीय उपनिषद् नामसे प्रसिद्ध हैं। गीताधर्म का आरम्भिक संकल्पसूत्र यह था कि गीता, रामायण, वेद जैसे मान्य अ्न्थोंका सरल, सरस, लौकिक भाषमें विस्तार कर प्रकाशन किया जाय। तदनुसार विशाल 'गीतागौ- रवभाष्य' और 'रामचर्चाभाष्य' व्याधयानके साथ गीता एवं अध्यात्मरामायण के प्रकाशन द्वारा दो विषयों की यथासाध्य पूर्ति की गई। इतने ही प्रकाशनमें उन दोनों अगाध ग्रन्थों का व्याख्यान पूरा हो जाता हो ऐसी बात नहीं है। फिर भी स्वाध्यायप्रिय जनता के बुद्धिबल, रुचि, अनुकूल अवसर आदिको देखते हुए, उक्त दोनों भाष्योंका प्रकाशन अपूर्व लोकप्रिय हुआ है। क्योंकि उनको जनता ने इतना महत्त्वपूर्ण माना कि हजारों की संख्यामें कई कई बार वे प्रकाशित हुए और हाथों हाथ बिक गये। फिर भी उनके लिए पाठकों की माँग वैसी ही बनी हुई है, एवं उसे कागज-सामग्री की दुर्लभ परिस्थितिके कारण पूरी करना असं- भव हो रहा है। गीता और रामायणके अपूर्व प्रकाशनके बाद दो व्षसे उपनिषदों का प्रकाशन आरम्भ किया गया है। ईशावास्योपनिषद्से लेकर ऐतरेयोपनिषद् तक आठ उपनिषदोंके रूपमें पहला खण्ड प्रथम प्रकाशित दिया गया था। गत वर्ष उन आठ उपनिपदोंकी अग्रवर्ती व्वान्दोग्योपनिपद् उसी शैली और आकार प्रकारमें प्रकाशित की गई। इस वर्ष क्रमप्राप्त यह बृददारण्यक उपनिषद् प्रकाशित की जारही है। इसका कलेबर गत उपनिष्दों की अपेक्षा भी अधिक है। अतः विशेषांकका परिमाण इतनेसे हो परिपूर्ण हो जाता था, तो भी उपयोगी समभकर श्वेताश्तर एवं कौषीतकि उपनिषद् भी साथ ही प्रकाशित की जा रही है। गीताधर्मसंस्थापक पूज्य श्रीमत्परमहंस परिव्राजकाचार्य ब्रह्मनिष्ठ लोकसं- ग्रही गीताव्यास श्री १०८ जगद्गुरु महामण्डलेश्वर स्वामी श्री विद्यानन्दजी महाराज

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श्रीमत प. प. ब्र. लो. गीताव्याम श्री १०८ जगद गुरु महामण्डलेश्वर स्वामी श्री विद्यानन्दजा

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प्रकाशकका निवेदन ध

अपने प्रसिद्ध गीतापवचनों में स्थल स्थल पर उननिपदोंके प्रसंग कहा करते हैं। गीता और उपनिषदों का जन्यजनकरूप संबन्ध "सर्वोपनिषदो गात्रो .. दुग्घं गीता- मृतं महत्" इस उक्ति से प्रसिद्ध ही है। यह देखकर हमने पूज्य स्व्रामीजी महाराज से निवेदन किया कि गुरुदेव ! आप अपने उपनिघत्संबन्धी प्रवचनों को आनुपूर्वी क्रम से लिपिबद्ध कराने का सुभ्वसर दीजिये, जिससे उपनिषतप्रेमी सुमुतु जनता उपकारभागी हो। स्व्ामीजी महाराज इस प्रार्थनाको स्वीकार कर अपनी जंगमवृत्तिमें से भी समय निकालकर लेखकोंसे इस उपनिषद् भाष्यका पूर्वरूप लिखाने लगे। स्व्रामीजी महराज के पास गुरुपरंपरासे प्राप्त उपनिषदोंकी अपूर्व व्याख्यानशैली है। क्योंकि आपकी आचार्यपरंपरामें बड़े बड़े वेदान्तशास्त्र वेत्ता संन्यासी महानुभाव हो गये हैं, जैसे स्वामी श्री गोविन्दानन्दजी महाराज, उनके पूर्ववर्ती स्व्रामी श्री चिद्घनानन्दजी महाराज आदि। उनके निबन्वोंमें स्वामी विद्घनानन्दजीकी 'दशोपनिषद् भाषान्तर" पुस्तक आपको अतिप्रिय है। इस विशेषांकके लेखनमें उक्त पुस्तक, एवं मणिप्रभा, गीता प्रेसके भाव्यानुवादका भी उपयोग किया गया है। उक्त सामग्री तथा स्त्रानुभवसे प्रसून इस भाष्यको स्वामीजी महाराजने वेदशास्त्रनिष्जात, वेदमूर्ति, संन्याससम्रट् स्वामी श्री रामानन्दजी महाराज काशी- निवासीकी सेवामें भेजते हुए संशोधित, संस्कृत करा लेनेकी आज्ञा दी। तदनुसार उक्त स्वामीजीकी सहायतासे यह ग्रन्थ "विद्याविनोदभाष्य" के साथ प्रस्तुत हुआ है। स्वामीजी महाराजके प्रवचन जनताको बड़े ही रुचिकर तथा प्रबोधन करने- वाले होते हैं यह त्रांसद्ध ही है। इनके द्वारा लोगोंको गंभीर अध्यात्मविषयोंका अध्ययन अनायास हो जाता है। किन्तु प्रवचन करनेकी भयासे वेदान्तिक भाषा कठिन दुरूह हो ही जाती है। फिर भी स्वामीजी महाराजने लिखाते समय इस तरंककी माघको सरल सुबोध रखनेका ही प्रयास किया है। तो भी विषयकी गहन- तावश क्रिष्ट पारिभाषिक शब्दोंका प्रयोग करना ही पड़ा है। क्योंकि ऊँचे अध्यात्म- विषयको बोलचालकी भाषामें प्रकट करना अशक्य है। साधारण बोलीमें इन वातोंको प्रकट करनेकी योग्यता भी नहीं है। विशेपाङकी अन्तरङ्ग रचना जिस प्रकार स्वामीजीके बुद्धिवैभवसे पूर्ण हुई है, उसी प्रकार इस की ब्राह्य रचना भी उन्हीं के आश्रय और आशीर्वाद के भगेसे पर की गई है। क्योंकि छपाईकी सामग्रीकी भववृद्धि तथा दूसरे व्ययभार वर्षोंसे बेहद बढते जा रहे हैं। इस दशामें ऐसा सर्वाङ्गसुन्दर और पिछले वर्षोंके बराबर ही आकार प्रकार का विशेषांक पाठकोंको भेट करना हमारी

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६ गीताघम

स्वल्प शक्तिके बाहर है। इसके लिए गीताधमप्रेमी सहृदय सहायकों, आजीवनसदस्यों, सेवाभावी शाखासंचालकों एवं प्रचारक महानुभावोंने जो सहायता और तत्परता दिखाई है, आशा है उनका वैसा ही प्रेम आगे भी बना रहेगा। ये महानुभाव एवं प्रेमी पाठरु दो दो नये आ्राह्क बनानेका क्रम उत्साहसे जारी रखें, ऐसी हमारी प्रार्थना है। आशा है इघर ध्यान देकर सब महानुभाव हमारी कठिनाईको कम करनेमें सहायक बनेंगे। इस दढ आशासे प्रभुकृपाके सहारे पर जैसा कुछ बन पडा, यह विशेषांक पाठकोंकी सेवामें समर्पित है, मानवस्त्रभाव सुलभ दोषवश और स्वामीजी महाराजके गीताप्रचारार्थ विदेशगमनकी त्वरामें प्रकाशनवश इसमें जो त्रुटियाँ रह गई हों उन्हें विज्ञ पाठक क्षमा करते हुए संशोधित करनेके लिए हमें सूचित करनेकी कृपा करेंगे। इस अवसर पर हम अपने सभी संरक्षक, सहायक, निष्काम सेवंक, पचारक पवं संमान्य लेखक महानुभावोंके सहयोगका आभार मानते हैं एवं शिष्टाचार परंपरासे उनके प्रति धन्यवाद ज्ञापन करते हैं। वैसे तो यह पारमार्थिक आयोजन उनका अपना ही है, अतः वे सब गताधर्मके ही अङ्गभूत हैं। इसी प्रकार अपने सहयोगी पूज्य स्वामी श्री रामानन्दजी मदाराज; भूमिकालेखक विद्वद्वर पं० श्री रामगोविन्द शास्त्री 'गंगा'' कल्याण' आदि के विशेष संपादक, संपादक मण्डलके बन्धु श्री चिरञ्जीवलाल शास्त्री, विद्यावयोवृद्ध श्री मणिभाई जसभाई देसाई (गुजराती भाषान्तरकार) के हम हृदयसे कृतज हैं। साथ ही अपने निकट सहयोगी सभी प्रेसकर्मचारी बन्धुओंके भी हम अत्यन्त आभारी हैं, इनके ही अथक परिश्रम, लगन और हार्दिक प्रेमके बलसे यह विशे- षांक इस रूपमें शीघ्र प्रकाशित हो सका है। ये सब सज्जन अपने ही हैं, इनका धन्यवाद अपनी ही प्रशंसाके तुल्य है। अन्तमें हम सबके प्रति यही शुभकामना प्रकट करते हैं कि सब को गीतामति श्री कृष्णप्रभु आयु, आरोग्य, योग च्षेम प्रदानं कर अपने भक्त बना लें।

विनम्र- 'गीताधर्म' व्यवस्थापक।

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भमिका

(ले०-संपादकाचार्य पं० श्रीरामगोविन्द शास्त्री त्रिवेदी)

"Brahma or Absolute is grasped and definitely expressed for the first time in the history of humah thought in the Brihadaranyak upanishad". 'मानवीय चिन्तनके इतिहासमें पहले पहल 'बृहदारण्यक उपनिषद्' में ही ब्रह्म अथचा पूर्ण तत्त्वको ग्रहणा कर उसकी यथार्थ व्यजनाकी गई है।'-मेकडानल। उपनिपद् शब्दके ऊपर ध्यान देनेसे भी प्रसिद्ध वेदाभ्यासी मैकडानलकी उपरिलिखित राय सत्य सिद्ध होती है। 'उप' शब्द का अर्थ समीप है और 'निषद्' का अर्थ बैठनेवाला है। इस तरह जो परमतत्व अर्थात् ब्रह्मके समीप पहुँचाकर बैठनेवाला ज्ञान है, उसे 'उपनिषद्' कहते हैं। 'समीप पहुँचाने' का अभिप्राय है ब्रह्ममें विलीन करना और बैठनेवालेका तात्पर्य है सदा स्थिर रहनेवाला। मथितार्थ यह है कि आत्माको ब्रह्मरूपसे प्रतिष्ठित करनेवाले स्थिर ज्ञानको उपनिषद् कहा जाता है। इसीसे इसका एक नाम ब्रह्मविद्या भी है। वस्तुतः उपनिषद् का एक मात्र प्रतिपाद्य ब्रह्म है। ब्रह्म क्या है, ब्रह्ममें विश्वका अध्यास क्योंकर है, ब्रह्म और जीवात्माका भेद कैसे है, ब्रह्म की प्राप्ति कैसे होती है, ब्रह्मात्मक्य ज्ञानका रहस्य क्या है, आत्मा, प्रज्ञात्मा और प्रज्ञान क्या है आदि आदि बातोंका विस्तृत और सूक्ष्म विचार उपनिषदोंमें भरा पड़ा है। किसी भी उपनिपद्को देखा जाय, उसमें आदिसे अन्त तक ब्रह्मविचार ओतप्रोत है। जहाँ देखिये, वहीं ब्रह्मज्ञानके उपदेश हैं-चारो ओर ब्रह्म ही ब्रह्मका रहस्य है। इसीसे उपनिषदोंको ब्रह्मविद्याकी संज्ञा दी गयी है। निस्सन्देह उपनिषदोंमें ज्ञानकी पराकाष्ठा है। उनमें शाश्वत सत्य है। उनमें अनिर्वचनीय पूर्ण तत्त्व है। उनकी दिव्य और भव्य शिक्षासे मानव भव- सागरसे पार पाकर ब्रह्मलीन हो रहता है। उनके प्रत्येक मन्त्रमें ब्रह्मद्रव फूट पड़ा है। 'वेदान्तसार' में सदानन्द योगीन्द्रने ठीक ही कहा है-"वेदान्तो नाम उप- निषत्प्रमाणं तदुपकारीणि शारीरकसूत्रादीनि च" अर्थात् मुख्य और गौण भेदसे वेदान्त शब्दके दो अर्थ हैं-'वेदका अन्त वेदान्त है' इस व्युत्पत्तिसे वेदान्त शब्दका मुख्य

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गीताधर्म

अर्थ उपनिषद्' है (क्योंकि वेदका अन्त भाग उपनिषद् है) और उपनिपद् के अर्थ- बोधके अनुकूल अथवा उसमें सहायक शारीरक सूत्र आदि एवम् उपनिपदर्थसंग्राहक भागवत, गीता आदि गौण अर्थ है। फलतः प्रमुख वेदान्त उपनिपद् ही है। साथ ही वेदका ही अंश होनेसे उपनिपद् वेद भी है। शुक्क यजुर्वेदीय माध्यन्दिन संहिताका अंश वा अन्तिम अध्याय ईशावास्योपनिपद् है और कृष्ण यजुर्वेदीय श्वेतीश्वतर संहिताका शेपांश श्वेताश्वतरोपनिपद् है। इसी तरह अनेक उपनिपदें ब्राह्मण ग्रन्थोंके शेषांश हैं। कुछ उपनिषदे आरण्यकोके अन्तिम भाग हैं, अतएव उपनिषद् वेद और वेदान्त दोनों हैं। इन दोनोंका ही अन्तिम प्रतिपाद्य ब्रह्म है। यही कारण है कि उपनिषदोंका इतना महत्त्व है। देश और विदेशके विद्वान् इसी- लिये उपनिषदोंपर इतने मुग्ध हैं? वस्तुनः उपनिपदोके समान शान्ति, आनन्द और कैवल्य प्रदान करनेवाला विश्वमें कोई भी ग्रन्थ नहीं है। हमारे यहाँ अनेक सम्प्रदाय हैं-अद्वैतवादी, विशिष्टाद्वतवादी, द्वैतवादी, विशुद्धाद्वतवादी, द्वताद्वैतवादी आदि। पूर्व समयमें जिस सम्प्रदायकी उपनिपदोंपर भाष्य-टीकाएँ नहीं होती थीं, उसको देशमें कोई पूछता ही नहीं था। जो सम्प्रदाय समाजमें अपनी प्रतिष्ठा और प्रामाणिकता स्थापित करना चाहता था, उसको उप- निषदोंके द्वारा अपने मत, पन्थ वा सम्प्रदायको समर्थित और अनुमोदित करना पड़ता था। इसीलिये प्रत्येक वादके आचार्यने अथवा उनके शिष्य-प्रशिष्योने उप- निषदोंपर भाष्य-टीकाएँ लिखी हैं। उपनिषदोंकी भापा इतनी सरस-सुन्दर है और इनके उपदेश इतने विमल-निर्मल हैं कि पृथिवीके असंख्य मनुष्योंने इनसे दिव्य शान्ति प्राप्त की है औरर बड़े बड़े मनुष्योंने ब्रह्मानन्दमें गोते लगाये हैं। यूरोपके विद्वानोके मतसे भी उपनिपद् ज्ञान, शान्ति, मानव-संस्कृति आदिकी आधारशिला हैं। वे भी हमारी ही तरह उपनिषदोंपर आसक्त और विमुग्ध हैं। यूरोपियनोंकी ही बात नहीं, संसार भरके विद्वान् उपनिषदोंकी महत्ताके कायल हैं। उपनिषदोंसे ही संसारने पहले पहल हिन्दूजातिकी महत्ता समभी। बादशाह शाहजहाँ के ज्येष्ठ पुत्र दाराशिकोहने १६४० ई० में काश्मीरमें पहले पहल उपनिषदोंकी महिमा जानी। तुरत उन्होंने काशीसे विद्वानोंको बुलाकर फारसीमें पचास उपनिषदोंका अनुवाद १६५७ तक किया-कराया। अकबरके समय भी १५५६ से १५८५ तक, कुछ उपनिषदोंका फारसीमें अनुवाद कराया गया था; परन्तु दाराशिकोह- के अनुवादने ही उपनिषदोंकी ओर दुनियाकी दृष्टि आकृष्ट की। दाराके अनुवादकी एक पाण्डुलिपि नबाव सुजाउद्दौलाकी सभाके फ्रेंच रेजिडेंट एम० गेंदिलने 'जिन्द-

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भूमिका

अवस्ता' के आविष्कारक एंक्रेटिल डुपेर्रनको १७७५ ई० में भेजी। इपेरनने इसका लैटिन अनुवाद करके १८०२ में 'औपनेखत' (Oupnekat) नामसे छपाया। जर्मनीके प्रसिद्ध दार्शनिक आर्थर शोपेनहरने बड़े परिश्रमसे इस अनुवादका सूत्ष्म अध्ययन किया और वे उपनिषदोंके परम भक्त बन गये। शोपेनहरने लिखा है-'उपनिषदोंसे वैदिक साहित्यका परिचय मिलना इस शताब्दी (१८१८) का परम लाभ है। १४ वीं शतान्दीमें श्रीक साहित्यका जो प्रभाव यूरोपीय साहित्यपर पड़ा, उससे कम प्रभावोत्पादक संस्कृतसाहित्य नहीं हो सकता। यदि लोग इस साहित्यका परिशीलन करें तो मेरी बातका समर्थन करेंगे। जो कोई भी 'औपनेखत' को पढ़कर उपनिषद्की भावधारासे परिचित होंगे, उन- की आत्माके गम्भीरतम प्रदेशमें एक हलचल मच जायगी। एक एक पंक्ति सुदद, सुनिर्दिष्ट और सुसमञ्जस अर्थ बताती है, प्रत्येक वाक्यसे गंभीर और मौलिक विचार प्रकट होता है। सारी उपनिषद् उच्च, पावन और ऐकान्तिक भावोंसे ओतप्रोत है। उपनिषद्के समान, सारी धरित्रीमें उदात्त भावोत्पादक ग्रन्थ नहीं है। इसने मुझे जीवनमें शान्ति प्रदान की और मरणमें भी शान्ति देगी । XXXX भारतमें ईसाई धर्मकी जड़ कभी नहीं जमेगी, प्रत्युत भारतीय ज्ञानकी धारा यूसेपमें प्रवाहित होगी और हमारे ज्ञान और विचारमें आमूल परिवत्तन ला देगी।' शोपेनहरकी यह भविष्यवाणी सफल हुई, स्वामी विवेकानन्दकी शिष्या 'सारा बुल'ने स्वीकार किया है कि 'जर्मनीके दार्शनिक मत, इङ्गलैंडके प्राच्य पण्डित और अमेरिकाके एमसन साक्षी दे रहे हैं कि पाश्चात्त्य विचार वस्तुतः वेदान्तके द्वारा अनुप्रागित हैं।' यह बात प्रसिद्ध ही है। कि बर्लिनमें १८४४ में शेलिंगकी 'उपनिषद् व्याख्या- नावली' सुनकर मैक्समूलर साहब संस्कृतके अध्ययनकी ओर आकृष्ट हुए और उपनिषद्का यथार्थ तत्व समझनेके लिए ही उन्होंने पहले वेदके मन्त्रभाग और ब्राह्मस भागका स्वाध्याय किया एवम् टीका टिप्पणियोंके साथ ऋग्वेदका प्रकाशन किया। डा० एनी वेसेन्टको प्रायः]सभी शिक्षित भारतवासी जानते हैं। उन्होंने उपनिषद को 'मानवचिन्तन का सर्वोच्च फल' बताया है। ('Prsonally I rofard the upanishads as the hifhest prbduct of the human mind' y i अपने एक ग्रन्थ 'उन्नीसवीं शताब्दी'में शोपेनहरने फिर लिखा है कि 'यह निश्चित है कि शीघ्र या देरसे उपनिषद्धर्म ही संसारका धर्म बनेगा।' इसी विद्वान्ने २

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१० गीताधम

एक स्थलपर स्पष्ट ही लिखा है कि 'औपनिषद सिद्धान्त अपौरुपेय हैं ? ये जिनके मस्तिष्ककी उपज है, उन्हें निरे मनुष्य कहना कठिन है।' इस उक्तिके द्वारा, वेदोंको किसीने बनाया नहीं, वे अपौरुषेय हैं, इस बातको वितनी खृबीसे शोपेनहरने कहा है! उपनिपदों (वेदों) का सूक्म अध्ययन करनेवाला ऐसा ही अभिमत देता है। पाल डासन नामके एक जर्मन विद्वानने उपनिषदोंका गहन अध्ययन करके 'Philosophy of the upanishads' नामकी एक पुस्क लिखी है, आपका मत है कि उपनिषदोंमें जो दार्शनिक सूझ है, वह भारतमें ता अद्वितीय तै ही, सम्मवतः सारे संसारमें अतुलनीय है।' एक दूसरे जर्मन विद्वान् फ्रेडरिक श्लेगनने तो इतनी दूर तक कहा हैकि 'उपनिषदोंके सामने यूरोपीय तत्त-ज्ञान प्रचण्ड मात्तण्डके सामने टिमटिमाता दिया है, जो अब बुझा, तब बुझा।' इसी प्रकार फ्रेंच विद्वान् कजीस, ऐंडरूज हकस्ले आदि विद्वान् विश्वके सम्पूर्ण ज्ञानका मूल उपनिषदोंको बताते है। स्वामी विवेकानन्दने इन्हीं उपनिपदोंकी निर्मल ज्योत्स्नाको दिखाकर समूचे यूरोप और अमेरिकाको परितृप्त किया था। स्वामीजीने अपने "भारतीय जीवनमें वेदान्तकी उपयोगिता" नामक व्याख्यानमें कहा है-'स्वदेशवासी बन्धुओ, मैं जितना ही उपनिषदोंको पढ़ता हूँ, उतना ही तुम लोगोंके लिए आँसू बहाता हूँ। यह आवश्यक है कि उपनिषदुक्त तेजस्विताको ही हम अपने जीवनमें विशेष रूपसे परिणत करें। शक्ति, बस, हमें केवल शक्ति चाहिये। वह शक्ति कौन देगा? उपनिषदें शक्तिकी महान् खान हैं। जिस शक्तिका संचार करनेमें उपनिषदें समर्थ हैं, वह ऐसी है कि उससे सम्पूर्ण विश्वको पुनर्जीवन, शक्ति और शौर्य वीर्यकी प्राप्ति हो जाय। जगत्की समस्त जातियों, सारे मतों और सभी सम्प्रदायोंके दीन, दुर्बल, दुःखी और पदद- लिव प्राणियोंको पुकार पुकारकर उपनिषदें कह रही हैं कि 'सभी अपने पैरोंपर खड़े होकर मुक्त हो जाओ।' मुक्ति या स्वाधीनता-दैहिक स्वाधीनता, मानसिक स्वाधीनता और आध्यात्मिक स्वाधीनता उपनिषदोंका मूल मन्त्र है। निखिल विश्वमें यही एक शास्त्र है, जो उद्धार (Salustion), की बात नहीं कहता, मुक्तिकी बात कहता है; 'बन्धनसे मुक्त हो जाओ, दुर्बलतासे मुक्त हो जाओ।' विश्वकवि रवीन्द्रनाथ ठाकुरने लिखा है-'आँखवाले देख्नेंगे कि भारतका ब्रह्मज्ञान निखिल जगत्का धर्म बनने लगा है। प्रातःकालीन सूर्यकी अररुण किरणोंसे पूर्व दिशा आलोकित होने लगी है, परन्तु जब वह सूर्य मध्याह्न गगनमें प्रकाशित होगा, तब उसकी प्रचण्ड दीप्तिसे समग्र भूमण्डल दीप्तिमय हो उठेगा।'

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भूमिका ११

वस्तुतः उपनिषदोंसे जीवनको एक अपूर्व प्रेरणा मिलती है। उनका जागरूक आदेश है- "उत्तिष्ठत, जाग्रव, भाप्य वरान्निबोषत।" उठो, जागो और बड़ोंके पास जाकर सीखो-ऐसा ज्ञान प्राप्त करो कि निर्भय और अमर हो जाओ। अस्तु, वैदिक साहित्यके प्रधान चार भाग हैं-मन्त्र, ब्राह्मण, आरण्यक और उप- निषद्। इन चारोंमें से प्रत्येकके ११३० ग्रन्थ थे। परन्तु इन दिनों संहिताएँ (मन्त्र भाग) केवल ११ मिलती हैं, ब्राह्मण अन्थ १८, आरण्यक पुस्तकें ७ और उपनिषद् ग्रन्थ २२०। विश्यके विविध देशोंमें ये ग्रन्थ छप चुके हैं। संसारकी लाइब्ररियोंमें इन चार प्रधान विभागोंके अनेक खण्डित-अखण्डित अ्रन्थोंकी पाण्डुलिपियाँ पायी जाती हैं। ब्रिटिशम्युजियम लन्दन, बर्लिनलाइजरी बर्लिन, नेशनल लाइब्रेरी कलकत्ता, सरस्वतीभवन लाइब्ररी बनारस आदि संसारकी अनेक लाइबररियों में संस्कृतकी हस्तलिखित लाखों पुस्तकें पड़ी हैं, जिनकी खोज और सम्पादन करके प्रकाशित करनेकी अतीव आवश्यकता है।

हाँ, तो दो सौ बीस उपनिपदोंमेंसे नीचे लिखी १२ उपनिषदोंपर श्रीमच्छक्करा- चार्यका भाष्य है-

ऋग्वेदीय कौषीतकि और ऐतरेय, कृष्ण यजुर्वदीय तैत्तिरीय, कण्ठ और श्वेता- श्वतर, शुत्क यजुर्वेदीय बृहृदारण्यक और ईश, सामवेदीय छान्दोग्य और केन तथा अथर्ववेदीय प्रश्न, मुण्डक और माण्डूक्य। गत दो वर्षोंके विशेषांकोंके रूपमें काशीस्थ श्री गीताघर्मकार्यालय द्वारा नौ उपनिपदें मूल, शाकरभाष्यानुसारी विद्याविनोद- भाष्य, विशेष आदिके साथ, पाठकोंको दी जा चुकी हैं। इस वर्षं कौषीतकि,श्वेताश्वतर समन्वित बृहदारण्यक उपनिषद्को मूल, शांकरभाष्यानुसारी, विद्याविनोद- भाष्यके साथ, सहृदय वाचकोंके सामने उपस्थित किया जा रहा है।

शुर् यजुर्वेदकी दो शाखाएँ उपलब्ध हैं-माध्यन्दिन और काण्व। दोनोंके ब्राह्मण भी उपलब्ध हैं। एकका नाम माध्यन्दिन शतपथ है और दूसरेका नाम काण्व शतपथ है। प्रथममे चौदह काण्ड हैं और दूसरेमें सघह। पहलेमें १०० अध्याय हैं और दूसरेमें, विख्यात वेदविद्यार्थी कैलेण्टके मतानुसार १०४। पहलेमें ४३८ू ब्राहण

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१२ गीताधर्म

हैं औौर दूसरेमें ४४६। पहलेमें ७६२४ कण्डिकाएँ हैं और दूसरेमें ५८६५.। पहलेके शेषांशके ६ अ्रध्याय 'बृहृदारण्यकोपनिषद्" कहे जाते हैं। दूसरेके भी अ्रन्तिम ६ अध्याय "बृहदारण्यक" कहाते हैं। पहलेको 'माध्यन्दिन वृदद्वारण्यक' और दूसरेको 'काण्व बृह्दारण्यक' कहते हैं। पहलेको सन् १८८६ में ओरटो बोहटलिंगने छपाया था और दूसरा त्रप्रनेक स्थानोंसे प्रकाशित हुआ है। दोनोंमें ही ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषद् तीनों ही मिले हुए हैं। दोनोंमें ही बीच- बीचमें-यज्ञरहस्यका थोड़ा वर्णन करके आत्मज्ञानका विस्तृत उपदेश दिया गया है। इस तरह उपनिषद्का अधिक कथन होनेसे इनका नाम बृहदारण्यकोपनिषद् पड़ गया। इसमें मिले हुए ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषद्को पृथक् पृथक् करके-प्रकाशित करनेकी अत्यन्त आवश्यकता है।

दोनोंमें थोड़ासा ही भेद है-पाठान्तर विशेव हैं। याज्वल्क्य और जनकर्की कथा दोनोंमें है। गार्गी और मैत्रेयीकी अनूठी कथाएँ भी दोनोंमें हैं। प्राप्त २२० उपनिषदोंमें बृहदारण्यकोपनिषद् सबसे बड़ी है। इसीसे इसके नामके पहले बृहत् (बड़ा) शब्द है। प्रस्तुत विशेषांकमें माध्यन्दिन बृहदारण्यक है।

इसके प्रथम अध्यायमें सृष्टि और उसके कर्ताका विचार है; द्वितीयमें गार्ग्य बालाकिने काशीराज अजातशत्रुसे ब्रह्म-विद्याका उपदेश लिया है। इसीमें मधु-बिद्याका उपदेश दिया गया है और प्रसिद्ध याजवल्क्-मत्रेयीसंवाद भी इसीमें है। तृतीयमें वर्णन आया है कि राजा जनकने एक बड़ी विद्वत्परिषद् बुलायी थी, जिसमें शास्त्रार्थ करके जनक-पुरोहित याज्ञवल्कपने सारे विद्वानोंको परास्त करके राजपुरस्कार प्राप्त किया था। चतुर्थं अध्यायमें जनक और याज्ञ- वल्क्चके बीच ब्रह्म की आलोचना और याज्ञवल्कचके द्वारा जनकको उपदेश है। इसमें भी याज्ञवल्क्य-मैत्रेयीसंवाद है। मत्रेयीको ब्रह्म-सम्बन्धी उपदेश दिये गये हैं। पाँचवें अध्यायमें ब्रह्म, प्रजापति, वेद, गायत्री आदि की बातें हैं। छठे अध्यायमें प्रवाहण जैबलिने उद्दालक आरुणिको ब्रह्मका उपदेश दिया है। अन्तमें उद्दालक ने याज्ञवल्क के पास आकर कहा-सूखे काठको भी यदि यह अमृतमय उपदेश दिया जाय, तो उसमें भी टहनियाँ और पत्ते निकल आवें।" वस्तुतः इस उपनिषद्में ऐसे ही प्रभावशाली उपदेश हैं। जैसा कि पहले लिखा जा चुका है, इसके तीसरे अध्यायके प्रथम ब्राह्मणसे

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भूमिका १३

जाना जाता है कि राजा जनकने एक बड़ा यज्ञ किया था, जिसमें कुरु, पांचाल आदि देशोंके विद्वान् ब्राह्मण आये थे। राजाकी यह जाननेकी प्रबल इच्छा हुई कि इनमें सबसे बड़ा कौन वेदज है। राजाने एक हजार गायोंके शृक्गोंमें सोना मढ़वाकर ब्राह्मणोसे कहा कि 'जो आप लोगोंमें से सबसे बड़ा वेदज्ञाता (ब्रह्म- वेत्ता) हो, वह इन हजार गायोंको अपने घरपर ले जाय।' दूसरे तो चुप रहे; परन्तु याज्ञवल्क्य ने अपने एक शिष्यसे स्वर्णमण्डित शृङ्गवाली गायोंको अपने घरपर भिजवा दिया। इसपर विद्वानोंमें शास्त्रार्थ छिड़ गया, किन्तु याज्ञवल्कचने सबको पराजित कर दिया। ब्रह्मवादिनी वाचक्नवी गार्गीसे भी शास्त्रार्थ हुआ ; पर्तु वह भी याज्ञवल्क्यसे परास्त हुई। इस अध्यायके आठवें ब्राह्मणमें यह कथा समाप्त हुई है, जो विशेष ध्यानसे पढ़ने योग्य है। चतुर्थ अध्यायके पाँचवें ब्राह्मणमें कहा गया है कि याज्ञवल्क ऋषिकी दो स्त्रियाँ थीं-मैत्रेयी और कात्यायनी। कात्यायनी तो साधारण नारी थी; परन्तु मत्रेयी ब्रह्म-वादिनी थी। घर-बार छोड़कर एक बार परिव्राजक बननेकी इच्छा याज्वल्क्चकी हुई। उन्होंने मैत्रेयीको बुलाकर कहा-'मैं परिव्राजक बनना चाहता हूँ, इसलिये कात्यायनीके साथ तुम्हारे हिस्सेका धन बाँट देना चाहता हूँ।' इस पर मैत्रेयीने उत्तर दिया-'भगवन्, यदि धन-धान्य-पूर्णं समूची धरित्री ही मुझे मिल जाय तो क्या मैं अमर हो जाऊँगी ? याज्ञवल्कचने कहा-'नहीं, अमरता तो नहीं मिलेगी; परन्तु धनाढ्यों के समान तुम्हारा जीवन अवश्य हो जायगा।' मैत्रेयीने कहा-'जिसे पाकर मैं अमर नहीं बनूँगी, उसे लेकर क्या लाभ ? भगवन. अमर-प्राप्तिका ही मुझे तो उपाय बताइये।" इनके अनन्तर याज्ञवल्क्यने जो उपदेश दिया है, वह अद्भुत है। एकसे एक उत्तम उदाहरण देकर याज्ञवल्क्यने ब्रह्म-विवेचन किया है। अन्तमें याज्ञवल्क्यने कुहा-जिस समय सर्वत्र व्याप्त परमात्माका ज्ञान हो जाता है, उस समय कौन किसको देखता, सुनता, छूता वा अभिवादन करता है। सब तो एक ही हैं ? जिसकी सत्तासे ही सारा विश्व जाना जाता है, उसको कैसे समझा जाय ? 'यह नहीं, यह नहीं'- इस प्रकार कहते २ जो शेष बच जाता है, वही ब्रह्म है। वह अगृह है, क्योंकि उसका ग्रहण नहीं किया जा सकता। वह अशीर्य है, क्योंकि उसका च्षय नहीं होता। वहू असङ्ग है, क्योंकि उसका संग नहीं हो सकता। वह किसीको पीड़ा नही पहुँचाता, क्रद्ध नही होता। वह सबका बाहर भीतर जानता है। उस सवज्ञाताकी कैसे जाना

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१४ गीवाधर्म

जाय ? मैत्रेयी, उसीकी शिक्षासे अमरता ग्राप्त होती है। यह कहकर याज्वल्क परिव्राजक बन गये। याजञवल्क्च के इस 'नेति नेति' उपदेशमें सारा वेदान्त कूट-कूटकर भरा है।

कृष्णयजुबदकी अप्राप्य श्वेताश्वतर-संहिताका ही एक अंश श्वेताश्वतरोपनिपद् है। इसमें छैअध्याय हैं। प्रथम अध्यायमें परमात्म-साक्षात्कारका उपाय ध्यानको बताया गया। अगले अध्यायमें ध्यानकी सिद्धि, प्रार्थनाके प्रकार, ब्रह्म-महिमा, वेदान्त, सांख्य, योग आदि शास्त्रोंकी बातें हैं। इसकी भापा बड़ी सरल और विपय अत्यन्त उच्च- कोटिके हैं। इसमें कहा गया है-'चयशील और अक्षय, व्यक्त और अ्रव्यक्त, इन दोनों वस्तुओंके परस्पर संयोगसे उत्पन्न इस संसारका भरण वे जगदीश ईश्वर ही करते हैं। किसी भी कार्यमें जीवात्माका कर्तृत्व न रहनेपर भी वह भोक्ता है और इसीलिये वह बद्ध है। परन्तु परमतत्त्व्र (ब्रह्म) को जान लेनेपर सान ही पापोंसे वह विमुक्त हो जाता है। श्वेताश्वतर उपनिषद्का यह परम श्रेयःकारक उपदेश है।

ऋग्वेद के दो ब्राह्मण ग्रन्थ विशेष विख्यात हैं-कौपीतकि वा शाखायन और ऐतरेय। कौकिषीतब्राह्मण ३० अध्यायोंमें विभक्तक है। इसमें यज्ञके सारे विवरण पाये जाते हैं। कुपीतक ऋपि इस ब्राह्मणके उपदेषा हैं। ब्राह्मण ग्रन्थोंके जो भा अरण्य बा विपिनमें पढ़ने योग्य हैं, वे आरण्यक कहे जाते हैं। कौपीतकि आरण्यक के सब-कुल पन्द्रह अध्याय पाये जाते हैं, जिनमें तीसरेसे छठे अध्यायोंको कौषी- तकि-उपनिषद् कहा जाता है। इसे कौषीतकि-ब्राह्मणोउपनिपद् भी कहते हैं। इसमें ब्राह्मण भी मिले हुए हैं; इसलिये इसका एक यह भी नाम है। इसके प्रथम अध्यायमें चित्र गार्गायणि नामके क्षत्रिय राजाने उद्दालक आरुणि नामके विद्वान् ब्राह्मणको परलोककी शिक्षा दी है। द्वितीय अध्यायमें प्राणों की विविध उपासनाएँ, महा- प्राणा (ब्रह्म) की विवृति, पिता और पुत्रमें स्नेह-सम्बन्ध आदि हैं। तृतीय अध्यायमें इन्द्रने काशीराज दिवोदासको प्राण और प्रज्ञाके सम्बन्धमें उपदेश दिया है। चतुर्थ अध्यायमें काशीराज अजातशत्रुने बालाकि को परब्रह्मका उप- देश दिया है। चतुर्थ अध्यायमें कहा गया है कि 'गार्ग्य बालाकि नामके एक विद्वान् ब्राह्म थे, जो उशीनर, मत्स्य, कुरु. पांचाल. काशी और विदेह आदि भारतके

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भूमिका १५

पश्चिमसे पूर्व तकके प्रान्तोंका पर्यटन करते थे। एक बार काशी आकर वहाँके राजा अजातशत्रुसे वे बोले-'मैं आज तुमको परब्रह्म का विवरण बतलाऊँगा।' इस पर राजा बोले-'इसके लिये तुम्हें मैं एक हजार गायें देता हूँ। मेरी तो धारणा है कि महाराज जनक ही ब्रहावादियोंके जनक-स्वरूप हैं, इसीलिये प्रायः सभी ब्रह्मवादी जनकके पास ही जाते हैं।' इसके अनन्तर बालाकिने कहना प्रारम्भ किया-'सूर्य, चन्द्र, विद्युत्, मेघ, आकाश, वायु, अग्नि, जल, दर्परा, छाया, प्रतिध्वनि, शब्द, स्वप्न, दक्षिण और वामचन्तु आदि की उपाधियोंसे युक्त जो आत्मा है, वही ब्रह्म है।' परन्तु अजातशत्रुने प्रत्येक उपाधिका खण्डन करते हुए कहा-'नहीं, जा सूर्य, चन्द्र आदिको बनानेवाला है, उसीको जानना चाहिये-एतेपां पुरुणां कर्त्ता, यस्य वै तत् कर्स स वै वेदितव्य इति।" इसके अनन्तर बालाकि समित्काष्ठ लेकर राजाके पास आकर बोले-'मैं शिष्य होकर आपसे ब्रह्मोपदेश लेना चाहता हूँ।' राजाने उत्तर दिया-'क्षत्रिय ब्राह्मणको शिष्य बनावे-यह बात उलटी है। मैं बिना शिष्य बनाये ही तुम्हें यह विषय समझा देता हूँ।' यह कहकर एक सोये हुए मनुष्यको जगाकर बालाकिसे राजाने पूछा-'इस मनुष्यका चैतन्य कहाँ चला गया था और अब कहाँसे आ गया ?' यह पूछनेपर एक विनम्र शिष्यकी तरह बालाकि मौन रहे। रजाने कहना प्रारम्भ किया-'स्वप्नशून्य निद्राके समय हृदषयकी 'हिता' नामक हजारों शिराओंमें चेतन पुरुष (चैतन्य) अवस्थान करता है। मन और ज्ञानेन्द्रियाँ भी उसके साथ ही एकीभाव धारण करती हैं। जब मनुष्य जाग जाता है, तब अग्निके स्फुलिंग की तरह सारी इन्द्रियाँ, सारे प्राण, सारी दिव्य शक्तियाँ अपने अपने स्थानोंपर निकल पड़ती हैं। जैसे काठमें अग्नि व्याप्त है, उसी तरह प्रज्ञात्मा भी शरीर, लोमों और नखों तकमें अनुप्र- विष्ट है। जैसे धनीके पीछे सब लोग चलते हैं, वैसे ही सारी प्राण-चेष्टाएँ भी प्रज्ञात्माके साथ चलती हैं। इसी प्रज्ञात्मा (आत्मा) को न जाननेके कारण ही इन्द्र असुरोंके द्वारा पराजित हुए थे। जो इस ज्ञानको प्राप्त करता है, वह सारे पापोंसे छूटकर सव प्राणियोंका श्रेष्ठत्व, साम्राज्य और आधिपत्य प्राप्त करता है-"एवं विद्वान् सर्वान् पाप्मनोऽपहृत्य सर्वपां च भूनानां श्रैष्ठयं स्वाराज्यमाधिपत्यं पर्यति ।"

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१६ गीताधर्म

सरस-सुन्दर शब्दोंमें कितनी उच्च शिक्षा दी गयी है !!! झागे रन्यास का विधान बड़ा ही सुन्दर बताया गया है। कहा गया है-'इसी आत्माको जानने पर मुनि होता है, ब्रह्मलोककी इच्छा करनेवाले संन्यासका ग्रह्दण करते हैं। प्रवीण विद्वान् भी प्रजाकी इच्छा नहीं करते और कहते हैं कि हमे प्रजा लेकर क्या करना है, जब कि यह आत्मा ही इमें इष्ट है। इसीसे पुत्र, धन और कीर्तिको छोड़कर हम भिक्षा माँगते हैं।' इस प्रकार इन उपनिषदोंके प्रस्तुत विशेपांकमें ब्रह्म वा पूर्ण तत्वको अनेकानेक प्रकारोंसे समझाया गया है। इसी अनूठी शैली और अपूर्व उपदेशोंका मनन करके मैकडानलने भी ठीक कहा है-'मानवीय चिन्तनके इतिहासमें पहले पहल 'बृहदार- ण्यकोपनिषद्'में ही ब्रह्म अथवा पूर्ण तत्त्वको ग्रहण करके उसकी यथार्थ व्यञ्जना की गई है। प्रत्येक विद्वान् मैकडानलकी रायसे सहमत होगा।

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ॐ नमः सचिदानन्दाय

बृहदाररयकोपनिषद् विद्याविनोद भाष्य सहित

प्रथम अध्याय, प्रथम ब्राह्मण ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते। पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥ ॐ उषा वा अश्वस्य मेध्यस्य शिरः। सूर्यश्चततुवातः प्राणो व्यात्तमभि्वैश्वानरः संवत्सर आत्माऽश्वस्य मेध्यस्य द्यौः पृष्ठमन्तरिक्षमुदरं प्रथिवी पाजस्यं दिशः भावार्थ-यह प्रसिद्ध-ब्राह्ममुहूर्त काल यज्ञसम्बन्धी अश्वका सिर है, सूर्य नेत्र है, वायु प्राण है, वैश्वामर अभि खुला हुआ मुख है और संवत्सर उस यज्ञ- * वास्तवमें उपनिषद् ही तत्वज्ञानके भण्डार हैं। जगवप्रसिद्ध-गीताकी अनुपम मालामें जिन तत्व-रलोको गँथा गया है उनका उद्गमस्थान उपनिषद्रूप खान ही है। संसार- वापोंको शमन करनेकी अचूक महौषधि उपनिषद्रप दबाखानेकी मन्त्ररूप बोतलोंमें मिलेगी। धन्वन्तरि श्रीकृष्णचन्द्रने अजुंन रोगीके मोहरूप रोगकी जिस श्रीगीता नामक नुसखेसे निळत्ति की थी, उस नुसखेमें जो-जो बूंटियाँ आई हैं, वे सब उपनिषद्रूप हिमालयमें पैदा हुई थीं। उपनिषदोंमें बृहदारण्यक अपनिषद्की अत्यधिक महिमा है। यह उपनिषद् वाज- सनेयी ब्राह्मयके अन्तगत है। आकारमें यह सबसे बड़ा है, इसलिए इसे 'बृहत' कहा है। बनमें इसका अध्ययन किया गया है इसलिए यह 'आरण्यक' है। बम्मज्ञानकी प्राप्ति ३

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१८ बृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय १

पाश्वें अवान्तरदिशः पर्शव ऋतवोऽद्गानि मासाश्चार्ध- मासाश्च पर्वाण्यहोरात्राणि प्रतिष्ठ नक्षत्राण्यस्थीनि नभो माथसानि। ऊवध्यथ सिकताः सिन्धवो गुदा यकृच्च क्ोमानश्च पर्वता ओषधयश्च वनस्पतयश्च लोमान्युद्यन् पूर्वार्धो निम्लोचञ्जघनार्धो यद्विजुम्भते तद्विद्योतते यद्विधूनुसे तरस्तनयति यन्मेहति तद्वर्षति वागेवास्य वाक् ॥ १॥ सम्बन्धी अश्वका आत्मा है। धुलोक उसकी पीठ है, अन्तरिक्ष पेट है, पृथिवी पाँव रखनेकी जगह है, पूर्वादि दिशाएँ पार्श्व हैं, आग्नेयादि-बीचकी दिशाएँ-पसलियाँ हैं। ऋतुएँ अङ्ग हैं, महीने तथा पक्ष सन्धि हैं, दिन और रात पैर हैं, नक्षत्र अस्थियाँ हैं। आकाशस्थ मेघ मांस है। बालू उदरमें रहनेवाला अर्धजीर्ण अन्न, नदियाँ भाड़ी, पर्वंत यकृत और मांसखण्ड हैं। ओश्रधि और वनस्पतियाँ रोम हैं, उदय होता हुआ सूर्य उसका पूर्वार्द्ध (नाभिसे ऊपरका) और अस्त हो रहा सूर्य उसकी कटिके नीचेका भाग है। जो जँभाई लेता है वह बिजलीका चमकना है, श्रीरका हिलाना मेघका गर्जन है। वह जो मूत्र त्याग करता है वही वर्षा है और जो हिनहिनाता है वही उसकी वाणी है।। १ ।

इसका प्रयोजन है, अतः इसे 'उपनिषद्' कहते हैं। अतएत्र इसका पूरा नाम है- 'बृहदारण्यकोपनिषद्'। यह उपनिषद् आकारमें ही बड़ा है, यह बात नहीं, किन्तु अर्थमें भी बड़ा है, इसलिए सवाशमें बृहद-बड़ा-है। यही कारण है-भगवान् शङ्राचायने जैसा विशद और विवेचनापूर्णं भाष्य इस उपनिषद् पर रचा वैसा किसी दूसरे पर नहीं। स्वतन्त्रता-स्वाधीनता-मुत्ति-सभी चाहते हैं। आधिभौतिक स्वाधीनताकी प्राप्तिभे कितना आह्लाद होता है यह सवपर विदित है, परन्तु आध्यात्मिक स्वतन्त्रताकी प्राप्तिसे जो आनन्द मिलता है उस आनन्दका तो पर्णन करना ही कठिन है। जब तक आत्माका वज बढ़ न जाय अर्थात व्यष्टि स्वार्थका समष्टि स्व्रार्थमें विलीनीकरण न हो जाय, तब तक किसीको स्वतन्त्रता प्राप्त नहीं हो सकती, जब तक प्रत्येक वम्तुको अपनो आत्मा नहीं समझेंगे तव तक दुःखका प्रेत पीछा नहीं छोड़ेगा। इसनए नअ्ज्ञान आवश्यक है। वेदोंमें जगह-जगह लिखा है कि-त्रह्मज्ञानके बिना मोक्ष नहीं हो सकता। और ब्ह्मज्ञानकी प्राप्ति विवेक, वैराग्य और शमदमादि मुमुस्ुता प्रभृति साधनोंमे हो सकती है।

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ब्राह्मण १ ] विद्याविनोद भाष्य १९

सोने और चाँदीके दो ग्रह हैं यानी यज्ञद्रव्यको रखनेके लिए दो पात्र होते हैं-उनका नाम है-'महिमा'। ये अश्वके आगे पीछे रखे जाते हैं, इस मन्त्रमें उन्हींसे सम्बन्ध रखनेवाली दृष्टिका वर्णन है, यथा- विवेक वैराग्यादि साधनोंकी कारण चित्तशुद्धि है। शुभ कर्म किये बिना चित्तशुद्धि होती नहीं। इसीलिए वेदोंमें चित्तशुद्धिके साधन कर्मोका पहले कर्मकाण्डमें निरूपण किया गया है। और कर्मोंके फलस्वरूप ज्ञानके प्रतिपादक ज्ञानकाण्डका पीछे वर्णन किया गया है। इस बृहदारण्यक उपनिषद्के आठ अध्याय हैं। इनमें पहले दो अध्यायोंमें कमोंका वंन किया गया है, इससे वे यहाँ छोड़ दिये गये हैं, क्योंकि-यह ज्ञानका प्रकरण है। इस उपनिषद्का जो पहला अध्याय है, वास्तत्रमें वह तीसरा अध्याय है। भगवान् श्रीशकराचायंका भाष्य तीसरे अध्यायसे आठवें अध्याय तक है अर्थात-छ' अध्यायों पर उनका सतोत्तम किेचना पूर्ण भाष्य है। इसमें ब्रह्मात्मैक्यरूप आध्यात्मिकताका प्रतिपादन किया गया है। संसार एक वक्ष है, उसमें सुख-दुःख फल लगा करते हैं, दुःखादिका कारण शरीर है, शरीरके कारण धर्म-अधमं हैं, धर्माधमके कारण शुभाशुभ क्रियाएँ हैं, क्रियाके कारण राग-देष हैं, रागादिका कारण अनुकूल-प्रतिकूल ज्ञान है, इसका कारण भेदज्ञान है और भेदज्ञानका कारण ब्ह्मसे अभिन्न आत्माका अज्ञान है। जिन लोगोंको 'मैं ब्रह्मस्वरूप है औद संसार में जो भी कुछ है, वह सभी ब्रह्मरप ही है' ऐसा ज्ञान हो जाता है, उन्हीं लोगोंकी दृष्टिमें सारा संसार अपना ही आत्मा बन जाता है, फिर किसीसे द्वेष नहीं रहता; क्योंकि अपना आत्मा सबको पिय है। मनुष्यको अपनेमें सर्वात्मता लानी कठिन भले ही हो, पर असम्भव नहीं है। समीका सवत्र आत्मभाव हो जाय, यह इस विकट कालमें नहीं हो सकता। जगतनें थोड़ेसे भी सच्चे जन टपनिषदोंकी शिक्षाके अनुकूल सबको अपना ही स्वरूप देखने लगें, तो भी संसारका अधिकसे अधिक कल्याण हो सकता है। थोड़ेसे अच्छे बहुससे बुगेको मुधार सकते हैं। एक ही गुरु बहुतसे शिष्योंको ज्ञानी बना सकता है। कुछ मल्जाह बहुतसे आरोहियोंको पार लगा देते हैं। उपनिषद् एक अमृतकुण्ड है, उसमें अवगाहन करनेवाला मनुष्य अजर अमर बन जाता है। अश्वमेधयक्ष सब यज्ञोंमें श्रेष्ठ दै, उपासना सहित अश्वमेघयज्ञका डिरण्यगर्भप्राप्तिरुप संसार ही फल है। जब इतने बड़े यज्ञका भी संसार ही फल है, तब अत्यन्त छोटे अग्नि- होत्रादिका संसार फल है, इसमें तो कहना ही क्या ? इसलिए अधिकारी पुरुषको कर्मोंके फलोंसे विरक्त हो जाना चाहिए। पर जो अनधिकारी हैं, उनको अश्वमेधकी उपासनासे उसके फलकी पाप्तिके लिए उस यक्ष में प्रधान अङ्गरूप अश्वविषयक छपासनाका वर्णन करते हैं। अश्वमेध यक्षमें अश्वकी प्रधानता होनेके कारण यहाँ अश्वविषयक दष्टि ही कही गई है।

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२० [ अध्याय १

अहर्वा अश्वं पुरस्तान्महिमाऽन्वजायत तस्य पूर्वे समुद्रे योनी रात्रिरेनं पश्चान्महिमाऽन्वजायत तस्याऽपरे समुद्रे योनिरेतौ वा अश्वं महिमानावभितः संबभूवतुः। हयो भूता देवानवहद्वाजी गन्धर्वानर्वाऽसुरानश्वो मनुष्यान् समुद्र एवास्य बन्धुः समुद्रो योनिः ॥२॥ .भावार्थ-उस अश्वके आगे रखा गया जो सुवर्णका महिमा नामक पात्र है, तद्रूपसे दिन हुआ यानी दिवस प्रकट हुआ, [क्योकि सुवर्ण और दिनकी प्रकाशको लेकर तुल्यता है, ] उसकी पूर्व समुद्र योनि आसादन-स्थान है। इसके पीछे चांदीके रखे गये महिमा नामक पात्रके रूपमे रात्रि प्रकट हुई, [क्योंकि रात और चाँदीमें वर्णकी तुल्यता है ही। ] उसकी पश्चिम समुद्र योनि-आसादन स्थान है। इस अश्वके आगे-पीछेके महिमा नामक ये ही दोनो ग्रह हुए। इसने हय होकर देवता वहन किये, वाजी होकर गन्धर्व, अवा होकर असुर और अश्व होकर मनुष्य। समुद्र ही इसका बन्धु और समुद्र ही इसकी योनि (कारण) है ॥ २ ॥ वि. वि० भाष्य-भाष्यकार भगवान् श्रीशङ्गराचार्यने इस ब्राह्मणके मन्त्रोंमें आये अश्वके विशेषणोंमें प्रायः प्रत्येक विशेषणका अर्थ किया है। इस उपनिषद्के आरम्भमें यानी बृहदारण्यक ब्रह्मविथ्याके प्रारम्भमें जो अश्वमेध-कर्म-सम्बन्धी विज्ञानका उल्लेख किया गया है, वह समस्त कर्मोंमें संसारसम्बन्धित्व प्रदर्शित करनेके लिए; क्योंकि उसका फल समष्टि और व्यष्टि हिरण्यगर्भकी प्राप्ति है, अतः सम्पूर्ण कर्मोंमें अश्वमेध उत्कृष्ट है। किसी-किसी विद्वान्का मत है कि इस ब्राह्मणमें जो अश्व शब्द आया है वह घोड़ेका वाचक न होकर परमात्माका वाचक है। और जो 'उषा' आदि कालादि- बोधक शब्द हैं वे केबल उक्त ब्रह्म-परमात्माकी उपासनाके लिए हैं। इसलिए विराटके जो उपा आदि प्रधानतम अङ्ग है उन्हें परमात्माके ही अङ्ग जानना चाहिए, 'अश्नुते व्याप्तोति सर्व जगत् इति अश्वः' अर्थात् जो सारे संसारको व्याप्त करता है, उसका नाम अश्व है; ऐसा परमात्मा ही हो है सकता। भाव यह है कि-इस स्थलमें परमात्माकी विभूतिका विराटरूपसे वर्णन किया गया है, जैसे-उषा-त्राह्ममुहूर्त-उस परमात्माका सिर है और चन्द्र-सूर्य नेत्र हैं, इत्यादि।

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विद्याविनोद भाष्य

कोई कहत हैं कि कालरूप परमात्माका महत्त्व बतलानेके लिए इस विराटरूप विभूतिका वर्णन किया है। 'कालो अश्वो वहति सप्तरश्मिः सहस्रात्ो अजरो भूरिरेता। तमारोहन्ति कवयो विपश्चितस्तस्य चक्रा भुवनानि विश्वा॥ इस अथर्ववेदके (१६/ ६। ५३।१) मन्त्रमें परमात्माके अश्व और काल-ये भी दो नाम हैं, यह कथन किया गया है। यह औपनिषद् विज्ञान है, औपनिपद मन्त्रोंसे कोई चाहे जो भाव निकाल सकता है, पर भगवान् श्रीशङ्कराचार्यजीने अकाट्य युक्ति एवं भावशुद्धिसे उपनिवद्- मन्त्रोंका जैसा विवेचन किया है, वैसा किसीने न किया और न कर ही सकेगा। अतः वही समीचीन प्रतीत होता है ॥२।।

द्वितीय ब्राह्मण

स्तुति करनेके लिए अग्निविषयक दृष्टि करनेकी इच्छासे ही आगे अश्वमेधो- पयोगौ अभिकी उत्पत्तिका वर्णन किया जाता है, यथा- नैवेह किंचनाग्र आसीन्मृत्युनैवेदमावृतमासीत्। अशनाययाऽशनाया हि मृत्युस्तन्मनोऽकुरुताSऽतमन्वी स्यामिति। सोऽर्चन्नचरत्तस्यार्चत आपोऽजायन्तार्चते वै मे कमभूदिति तदेवार्कस्यार्कत्वं कथ ह वा अस्मै भवति य एवमेतदर्कस्यार्कत्वं वेद ॥। १ ॥। भावार्थ-इस सृष्टिकी रचनासे पहले कुछ नहीं था। यह सब मृत्युसे (प्रलयसे) ही ढका था, यह सुधासे आवृत था। वह अशनाया (भूख) ही मृत्यु है। उसने 'मैं मनसे युक्त होऊँ' ऐसा संकल्प किया, अर्थात्-उस अशनाया- रूप मृत्युने संकल्प किया कि-मैं मनवाला होऊँ। अर्चन-पूजन कर रहे उसने 'मैं कृतार्थ होऊँ' यों भावना की। अर्चन कर रहे उसको जल हुआ। पूजा कर रहे मुझे क-जल मिला यानी मुझको उत्पन्न हुआ है, इसीसे अकमें अर्कपना है यानी

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२२ बृहदारण्यकार्पानपद् [अध्याय १

अर्क-अभिके अर्कत्वमें हेतु है। जो कोई इस प्रकार अर्कका अकत्व जानता है, उसे अवश्य ही 'क' होता है, यानी सुख़ मिलता है॥ १ ॥ वि० वि० भाष्य-क' यह जल और सुखका समान नाम है, इसे इस प्रकार जाननेवालेको जल तथा सुख होता है। 'अर्चते कम् इति अर्कः' इस व्युत्पत्तिसे "अर्क' अिको कहा गया है। उक्त व्युत्पत्तिका अर्थ है कि-जिसका अर्चन करनेवालेको 'क' हा उसको अर्क कहते हैं, 'क' नाम है जलका और सुखका। विद्वानोंने 'मृत्यु' का अर्थ 'अग्नि' किया है वैसा करनेमें उनका भाव यह है कि-जिस प्रलयकी महाअगनिसे सम्पूर्ण ब्रह्माण्डका प्रलय हुआ. उसको यहाँ मृत्यु शब्दसे कहा गया है। यह रहस्य जाननेवालेको इसलिए सुखकी प्राप्ति कही गई है कि सृष्टिविद्याका तत्व जननेसे सम्पूर्ण दुःखोंका मोह निवृत्त हो जाता है। जल भी अत्यन्तोपयोगी पदार्थ है, क्योंकि उससे प्राणीके प्राणधारक धान आदि अन्न पैदा होते हैं और यज्ञादिमें भी काम आते हैं ॥ १ ॥ अर्क क्या है ? यह कहा जाता है, यथा- आपो वा अर्कस्तयदपा्थ शर आसीत्तत्समहन्यत। सा पृथिव्यभवत्तस्यामश्राम्यत्तस्य श्रान्तस्य तेजोरसो निरवर्तताननिः॥२॥ भावार्थ-जलको ही अर्क कहते हैं, उन जलका जो झाग (स्थूल भाग) था वह इकट्ठा हो गया, वह पृथिवी हो गई। उसके उत्पन्न होने पर वह मृत्यु श्रमके कारण थक गया। उस श्रान्त तथा तप्त प्रजापतिके शरीरसे उसका सारभूत तेज प्रकट हुआ, वह तेजोरस अभि था॥२॥ उत्पन्न हुए उस प्रजापतिने कार्यकरणसंघातरूप अपनेको अर्थात् भूत और इन्द्रियसमूहरूप स्वस्वरूप को तीन प्रकारसे विभक्क किया, यह कहते हैं, यथा- स त्रेधात्मानं व्यकुरुतादित्यं तृतीयं वायुं तृतीयथ स एष प्राणस्त्रेधा विहितः। तस्य प्राची दिक् शिरोऽसौ चासौ चेर्मौं। अथास्य प्रतीची दिक्पुच्छमसौ चासौ च सकथ्यौ दक्षिणा चोदीची च पार्श्वें द्यौः पृष्ठमन्तरिक्षमु-

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ब्राश्मण २ ] विद्याविनोद भाष्य २३

दरमियमुरः स एषोऽप्सु प्रतिहितो यत्र क् चैति तदेव प्रतितिष्ठत्येवं विद्वान्॥ ३ ॥। भावार्थ-उसने अपनेको तीन प्रकारसे विभक्त किया। उसने आदित्यको तीसरा भाग किया और वायुको तीसरा। यों वह प्राण तीन प्रकारका हो गया। पूर्व दिशा उसका सिर है, ईशानी तथा आग्नेयी ये दो इधर-उधरकी दिशाएँ भुजा, पश्चिम दिशा पुच्छ यानी कटिभाग, वायव्य एवं नैऋत्य ये दो दिशाएँ उसकी जडघाएँ हुई। दक्षिण और उत्तर दिशाएँ उसके पार्श्व, दुलोक पीठ तथा अन्तररिक्ष उदर हुआ। यह पृथिवी उसका हृदय हुई। यह विगट, जो अग्निरूप है, जलमें स्थित है, ऐसा जाननेवाला विद्वान् जहाँ कहीं भी जाता है वहीं प्रतिष्ठा पाता है॥ ३।। वि० वि० भाष्य-यहाँ जा जलके स्थूल अंशोंस पृथिवीकी उत्पत्ति कही, उसका अभिप्राय यह है कि-सृष्टिके आरम्भमें प्रथम द्रव्यकी अवस्था जल सी द्रवधर्मा थी, फिर उसकी घनीभूत स्थूलावस्था हुई, उसे पृथिवी कहते हैं॥ ३ ॥ उक्त तीसरे मन्त्रमें आदित्य, वायु और अग्नि, यों तीन संख्याको पूर्ण करनेमें इन तीनोंकी ही शक्ति समान है, यह समझाते हैं, जैसे-त्रिधा विभक्त किया, कैसे ? अग्नि और वायुकी अपेक्षा आदित्यको तीसरा बनाया, इसी प्रकार अग्नि और आदित्यकी अपेक्षा वायुको तृतीय बनाया, तथा ऐसे ही वायु और आदित्यकी अपेक्षा अग्निको तीसरा बनाया। इस प्रकार यहाँ इस वाक्यकी अनुवृत्ति की गई है। तीसरे मन्त्रके भावार्थमें जो 'उसने आदित्यको तीसरा भाग बनाया और वायुको तीसरा' यह कहा है, इसका ही उपर्युक्त विवरण समझाया गगरा है। इस प्रकार हिरण्यगर्भका तीन भाग होना बनलाया है॥३॥ उसने क्या व्यापार करते हुए यह रचना की, यह बताते हैं, यथा- सोडकामयत द्वितीयो म आत्मा जायेतेति स मनसा वाचं मिथुन समभवदशनाया मृत्युस्तयद्रेत आसीतस संवत्सरोऽभवत्। न ह पुरा ततः संवत्सर आस तमेता- वन्तं कालमविभः। यावान्संवत्सरस्तमेतावतः कालस्य परस्तादसृजत तं जातमभिव्याददात्स भाणकरोत्सैव वागभवत् ॥ ४ ॥

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२४ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १

भावार्थ-उसने सङ्कल्प किया-'मेरा दूसरा शरीर उत्पन्न हो।' इसलिए अशनायारूप मृत्युने मनसे वेदरूप मिथुनकी भावना की, अथवा यह सङ्कल्प करके उसने मन द्वारा वेदरूप वाणीको मिथुन यानी शब्दार्थ भावसे उत्पन्न किया। उससे जो रेत (बीज) हुआ, वह संवत्सर हुआ, इससे पहले संवत्सर नहीं था। लोकमें जितने कालका संवत्सर होता है उतने काल तक उस संवत्सरका वह मृत्यु- .रूप प्रजापति गर्भमें धारण किये रहा। इतने समयके अनन्तर उसने उसको उत्पन्न किया। उस पैदा हुए कुमारके प्रति उसने खानेको मुख फाड़ा। इससे उसने डर- कर 'भाणू' ऐसा शब्द किया, वही वाणी हुई॥ ४॥ •वि० वि. भाष्य-उस मृत्युने कामना की यानी मनके द्वारा वेदत्रयीकी भावना की-आलोचना की, वेक्त्यीविहित सृष्टिक्रमका मनसे विचार किया, वह मृत्यु अशनायासे-तुधा-से लक्षित था। वेदकी आलोचना करनेपर उसने जो जन्मान्तर- कृत ज्ञानकर्मरूप बीज देखा, उस बीजभावसे भावित होकर जलकी रचना कर उस रेतरूप बीजके द्वाग जलमें प्रवेश किया और अण्डरूपसे गर्भस्थ रह वह संवत्सर हुआ। पहले संवत्सर नहीं था। फिर कुछ काल बाद वह अण्डा फोड़ दिया गया। मृत्युने त्ुधायुक्त होनेके कारण इस प्रकार उत्पन्न हुए उस प्रथम शरीरी कुमार अग्निके प्रति उसे खा जानेके लिए मुँह बाया। स्वाभाविकी अविद्याके वशवर्ती उस कुमारने मारे डरके 'भाण' ऐसा शब्द कहा, यही वाणी हो गृया। पहले संवत्सर नहीं था, इसके कहनेका तात्पर्य यह है कि-कालका व्यवहार वेदोत्पत्तिके अनन्तर हुआ है। अर्थात्-वेदके ज्ञाता लोगोंने ही भूत, भविष्यत् तथा वतमान इस प्रकार कालका व्यवहार किया। कुछ दिन बाद घटी, लव, निमेष (घण्टा, मिनट-सेकेण्ड) आदिका व्यवहार होने लगा। यद्यपि काल बहुत ही पुराना है, पर वेद भी तो कम प्राचीन नहीं है। वैदिक ज्ञानकी धारा कबसे जगत्में प्रवाहित हुई, इसे स्यात् ही कोई जानता हो। यह पहले कहा जा चुका है कि यह जो मृत्यु थी, उसने स्वयं ही अपनेको ब्रह्माण्डके अन्दर जलादिके क्रमसे कार्यकरणसंघातवान् विराट् अग्निके रूपमें रचा और अपनेको तीन भागोंमें विभक्त किया॥ ४ ॥ यद्यपि मृत्यु तुधातुर थी, तथापि डरकर शब्द कर रहे कुमारको देखकर उसने विचार किया, यह कहते हैं, यथा- स ऐक्षत यदि वा इममभिमथ स्ये कनीयोऽन्नं करिष्य

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आाश्ण २] विद्याविनोद भाष्य २५

इति स तया वाचा तेनात्मनेदथ सर्वमसृजत यदिदं किंचर्चो यजूषि सामानि च्छन्दासि यज्ञान्प्रजाः पशून्। स यद्यदेवासृरजत तत्तदत्तुमधियत सर्वं वा अन्तीति तददितेरदितित्व सर्वस्यैतस्यात्ता भवति. सर्वमस्यान्नं भवति य एवमेतददितेरदितित्वं वेद ॥ ५ ॥ भावार्थ-उसने विचार किया यानी सङ्कल्प किया-यदि मैं इसे मार डालूॅगा तो यह थोड़ासा ही भोजन करूँगा। अतः उसने उस वाणी और मनके द्वारा इन सबको उत्पन्न किया जो कुछ ये ऋक, यजुः, साम और अथर्व, उनसे होनेवाले यज्ञ, यज्ञोंको करनेवाली प्रजा तथा उनके लिए घृतादि पदार्थ देनेवाले गौ आदि पशु हैं। उसने जिस-जिसको उत्पन्न किया उसी-उसको भक्षण कर जानेका विचार किया। वह सबको खाता है, यही उस अदितिनामक मृत्युका अदितित्व प्रसिद्ध है। जो इस प्रकार अदितिके इस अदितिपनको जानता है वह सबका भोक्ता होता है और इस प्रकार जाननेवालेका यह सब अन्न खाद्य होता है॥। ५॥ वि० वि० भाष्य-यह सम्पूर्ण जगत् उसका अन्नभूत है, वह जगत्का सर्वात्मभावसे अत्ता है, संसारमें कोई एक सबका भक्षक नहीं हो सकता। अतः जो सर्वात्मभावसे युक्त है, उसीका सब कुछ अन्न होना सम्भव है। सबका अदन- भक्षण करनेसे जो अदितिसंज्ञक मृत्यु प्रजापतिका अदितित्व जानता है, उसे यह फल प्राप्त होता है।। ५ ।। यज्ञेच्छुक प्रजापतिके प्राण और वीर्यके निकलनेका प्रकार यह है- सोऽकामयत भूयसा यज्ञेन भूयो यजेयेति। सोऽ- श्राम्यत्स तपोऽतप्यत तस्य श्रान्तस्य तप्तस्य यशो वीर्यमुद- क्रामत्। प्राणा वै यशो वीर्य तत्प्राणोषूत्क्रान्तेषु शरीर श्वयितुमध्रियत तस्य शरीर एव मन आसीत् ॥ ६ ॥ भावार्थ-उसने यह संकल्प किया कि 'मैं बड़े भारी यज्ञसे यजन करूँ।' इससे वह श्रमयुक्त हो गया। उस थके हुए और परितप्त मृत्युका यश एवं वीर्य निकल गया। प्राण ही यश और बल है। अनन्तर प्राणोंके निकल जाने पर शरीरका फूलना शुरू हुआ। किन्तु उसका मन शरीग्में ही रहा। ४

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२६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १

वि. वि. भाष्य-प्रजापतिने जन्मान्तरमें अश्वमेघ यज्ञ किया था, अतः उसकी भावनासे युक्त हुआ ही वह कल्पके प्रारम्भमें प्रजापति हुआ। अश्वमेधके क्रिया, कारक और फलोंसे सम्पन्न होकर उसने कामना की कि मैं पुनः महान् यज्ञ द्वारा यजन करूँ। इस बड़े कामकी कामना करके वह अन्य लोगोंकी तरह थक गया। चक्षु आदि जो प्राण हैं वे ही यशके हेतु होनेके कारण यश हैं, क्योंकि उनके रहनेपर ही ख्याति होती है, तथा वे ही इस शरीरमें वीर्य यानी बल है। जब यश-वीर्यरूप प्राण निकल गये तो शरीर फूल गया और वह अपवित्र भी हो गया। इसका तात्पर्य यह है-श्रुति उपदेश देती है कि जैसे प्राणके निष्क- मण होनेसे शरीर फूल जाता है, उसी प्रकार मेरी उपासनासे रहित मन भी विषयोंसे फूलकर अमेध्य-अपवित्र-हो जाता है। यह बात है कि जैसे किसी प्रिय वस्तुके दूर हो जानेपर भी मन उसमें लगा रहता है, वैसे ही शरीरसे निकल जानेपर भी उस प्रजापतिका मन उस शरीर में ही लगा रहा॥ ६॥। उस शरीरमें ही जिसका मन लगा हुआ है, ऐसे उस प्रजापतिने क्या किया ? यह कहते हैं, यथा- सोऽकामयत मेध्यं म इद७ स्यादात्मन्व्यनेन स्यामिति। ततोऽश्रः समभवद्यदश्वत्तन्मेध्यमभूदिति तदे- वाश्वमेधस्याश्वमेधत्वम्। एष ह वा अश्वमेधं वेद य एनमेवं वेद। तमनवरुध्यैवामन्यत। तथ संवत्सरस्य पर- स्तादात्मन आलभत। पशून्देवताभ्यः प्रत्यौहत् । तस्मात्स- रवदेवत्यं प्रोक्षित प्राजापत्यमालभन्त। एषह वा अश्र- मेधो य एष तपपि तस्य संवत्सर आत्माऽयमगनिरर्कस्त- स्येमे लोका आत्मानस्तावेतावर्कांश्वमेधौ। सो पुनरेकैव देवता भवति मृत्युरेवाप पुनर्मृत्युं जयति नैन मृत्युराप्रोति मृत्युरस्यात्मा भवत्येतासां देवतानामेको भवति ॥७॥ भावार्थ-उसने संकल्प किया कि-यह मेरा शरीर मेध्य-यज्ञिय या पवित्र हो, मैं इस शरीरसे शरीरवाला होऊँ। क्योंकि यह शरीर उसके वियोगसे यशोवीर्यहीन होकर अश्वत् यानी फूल गया था। अतः यही अश्वमेघका अश्व-

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विद्याविनोद भाष्य २७

मेधत्व है। इसी लिए वह अश्व हो गया और वह मेध्य हुआ। जो इस अश्वमेधको जानता है, वही ठीक ज्ञाता है। उसने उसे बन्धनरहित जाना। उसने पूरे संवत्सरके पीछे अपने ही लिए आलभन किया तथा अन्य पशुओंको भी अन्यान्य देवताओंके प्रति प्राप्त कराया। इसीलिए यज्ञकर्ता जन वेदमन्त्रों द्वारा संस्कृत, सर्वदेवसम्बन्धी प्राजापत्य पशुका आलभन करते हैं। यह जो सूर्य अपने तेजसे जगत्को प्रकाशित करता है वही अश्वमेध है। संवत्सर उसका शरीर है। यह अग्नि अर्क है, ये लोक उस अकके शरीरके अवयव हैं। अग्नि और आदित्य ये ही दोनों अर्क तथा अश्वमेध हैं। पर वे मृत्युरूप देवता एक ही हैं। जो इस प्रकार अश्वमेधको मृत्युरूप एक देवता जानता है, वह पुनः मृत्युको जीत लेता है। उसे मृत्यु नहीं पा सकता, मृत्यु उसका अपना हो जाता है यानी शत्रु नहीं रहता तथा इन देवताओंके मध्यमें ही वह कोई एक हो जाता है।।७॥ वि० वि• भाष्य-मैं ही अश्वमेघरूप मृत्यु हूँ' 'अग्नि और अश्वरूप साधनसे सिद्ध होनेवाला एक देवता मेरा ही रूप है।' जो इस प्रकार उपासना करता है, वह एक बार मरकर पुनः मरनेके लिए उत्पन्न नहीं होता। क्योंकि इस प्रकार जाननेवालेका मृत्यु आत्मा हो जाता है अर्थान् मृत्यु ही फलरूप होकर इन देवताओंमेंसे कोई एक हो जाता है। कोई विद्वान् इस ब्राह्मणका यह तात्पये बतलाते हैं कि परमात्माने इस विराट् रूपको उत्पन्न करके इस अल्प रचनासे सन्तोष नहीं प्राप्त किया, अतः इस सम्पूर्ण कार्यसंघातकी विस्तारपूर्वक रचना की। फिर इसको बनाकर सर्वश्रेष्ठ प्राणोंको रचा। जैसे प्राणोंके निकल जानेसे शरीर अमङ्गल हो जाता है, वैसे ही ईश्वरोपासना- विहीन मनुष्यका मन अमंगलरूप हो जाता है। अश्वमेधका यही अश्वमेधत्व कहा गया है। जो ऐसा जानता है यानी जो अपने मनरूपी शरीर में ईश्वरो- पासनारूप प्राण डालता है, ऐसी उपासना करनेवाला जाव परमात्मा को प्राप्त करता है, ऐसा ज्ञान प्राप्त करने से उसकी सब इन्द्रियाँ सफल होती हैं। ऐसा मनुष्य मृत्युको जीत लेता है, क्यों कि मृत्यु उसका आत्मा हो जाता है। जब कि उसने अपनेको परमात्माके अर्पण कर दिया तो उसको मृत्युका भय कैसा ? ऐसा मनुष्य ब्रह्मविद्याका ज्ञाता होकर सब प्रकारकी विद्या जाननेवालोंमें प्रधान हो जाता है। भाष्यकार श्रीशंकराचार्य 'अश्व' यह नाम प्रजापतिका बतलाते हैं, उसीकी स्ुति यहाँ की गई है। यज्ञ ही क्रिया, कारक और फलरूप होता है, वही प्रजापति

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२८ बृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय १

है; ऐसा कहकर उसकी स्तुति की गई है। इस प्रकरणमें प्रजापतिरूप मेध्य अश्वकी और यज्ञफलरूपसे उसीके समान उपर्युक्त अग्निकी उपासनाका विधान किया गया है।।७॥।

तृतीय ब्राह्मण

यह स्वाभाविक पापका सङ्गी मृत्यु क्या है ? उसकी उत्पत्ति कहाँ से होती है, उसका अतिक्रमण किसके द्वारा हो सकता है तथा किस प्रकार हो सकता है? इस प्रयोजन के वर्णन करनेके लिए आख्यायिका आरम्भ की जाती है, जैसे- दया ह प्राजापत्या देवाश्चासुराश्च। ततः कानीयसा एव देवा ज्यायसा असुरास्त एषु लोकेष्वस्पर्धन्त ते ह देवा ऊचुर्हन्तासुरान् यज्ञ उदगीथेनात्ययामेति ॥१॥ भावार्थ-इस सृष्टिमें प्रजापतिकी देवता और असुर दो प्रकारकी सन्तात थीं, उनमें देव कम थे और असुर अधिक थे। वे लोकमें आपसमें डाह करने लगे। उनमें से देवताओंने विचार किया कि हम यजमें उद्गीथ-प्रणवोपासना द्वारा असुरोंको अवश्य अतिक्रमण कर जीतेंगे ॥ १ ॥ वि० वि० भाष्य-वे देवता और असुर कौन थे? उत्तर यह है कि प्रजा- पतिके वागादि प्राण ही देवासुर थे। अच्छा तो उनका देवासुरपना किस बातसे है ? इसपर कहते हैं-शास्त्रजनित कर्म और ज्ञानसे भावित जो प्राण हैं वे प्रकाशमय होनेके कारण देवता हैं, और वे प्राण ही स्वाभाविक प्रत्यक्ष एवं अनुमानजन्य इष्ट प्रयोजन- वाले ज्ञान और कमसे भावित होने पर असुर हैं। असुर अधिक हैं, क्योंकि वे ज्ञान और कर्मका प्रयोजन प्रत्यक्ष मिलना चाहिए, इस भावनासे भरे हैं। बात यह है कि शात्त्रजनित जो कर्म ज्ञान है उसमें होनेवाली प्रवृत्तिकी अपेक्षा स्वाभाविक कर्म-ज्ञानमें प्रधृत्ति ज्यादा होती है। इसीलिए देवताओंको छोटा कहा, क्योंकि उनकी शासत्र- जनित प्रवृत्ति कम है, क्योंकि उसमें काफी यत्न करना पड़ता है। यहाँ दैवी और आसुरी वृत्तियोंका उठना और दबना ही देवता और असुरोंकी परस्पर स्पर्धा है। जब कभी प्राणोंकी शाख्त्रीय कर्म और ज्ञानकी वृत्ति उठती है, उस समय उनकी दृष्ट प्रयोजनवाळी, प्रत्यन्न एवं आनुमानिक कर्म जानकी भावनास्मक

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३० बृहदारण्य कार्पनिपद् ।अधपाय १

अथ ह प्राणमूचुस्त्वं न उदगायेति तथेति तेभ्यः प्राण उद्गायढ यः प्राणे भोगस्तं देवेभ्य आगायद्यत् कल्याणं जिघ्रति तदात्मने। ते विदुरनेन वै न उदगात्राS- त्येष्यन्तीति तमभिद्रुत्य पाप्मनाऽविध्यन्स यः स पाप्मा यदेवेदमप्रतिरूपं जिघ्रति स एव स पाप्मा ॥ ३ ॥ भावार्थ-फिर वे देवता घ्राणरूप प्राणसे बोले-तुम हम लोगोंके उद़ाता वनो। तब उसने 'तथास्तु' कहकर उनके लिए उद़ान किया। घ्राणरूप प्राणमें जो भोग है उसे उसने देवताओंको दिया और जो उसका सुगन्ध ग्रहण करना है उसे अपने लिए रख लिया। उन असुरोंने जाना कि अवश्य ही इस उद्धाताके द्वारा देवता हमाग अतिक्रमण करेंगे। अतः असुरोने उसके समीप जाकर उसे विपया- सक्तिरूप पापसे विद्ध किया। वह जो पाप है. वह यही पाप है कि जो वाणसे शास्त्र- निषिद्ध सूघना है। वही यह पाप है।। ३ ।। चन्तुका पापविद्ध हो जाना- अथ ह चक्षुरूचुस्त्वं न उदगायेति तथेति तेभ्यश्च- क्षुरुदगायत्। यश्चक्षुषि भोगस्तं देवेभ्य आगायय्यत्कल्याणें पश्यति तदात्मने। ते विदुरनेन वै न उदगात्राऽयेग्यन्तीति तमभिद्ुत्य पाप्मनाऽविध्यन्स यः स पाप्मा यदेवेदम- प्रतिरूपं पश्यति स एव स पाप्मा ॥४ ॥ भावार्थ-फिर उन्होंन चन्तुसे कहा-तुम हमारे उद्धाता बना। देवताओंकी इस प्रार्थनाको 'तथास्तु' से स्वीकार कर चत्तुने उनके लिए उद्धान किया। जो चन्तुका उत्तम भोग था वह उसने देवताओंको दिया जो लमका सुन्दर रूप प्रहण करना था वह अपने लिए रख लिया। इस उद्धाताके द्वारा देवता हमें परास्त कर देंगें' यह सोचकर असुरोंने उसे विषयासक्तिरूप पापसे युक्त कर दिया। जो वह पाप है, वह यही है कि वह शास्त्रविरुद्ध देखती है। वही पाप है, वही पाप है।।४।। श्रोत्रको उद्धाता बनाया गया तो वह भी पापविद्ध हो गया- अथ ह श्रोत्रमूचुसत्तवं न उदगायेति तथेति तेभ्यः

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माहण ३ ] विद्याविनोद भाष्य

आसुरी वृत्ति दव जाती है। यही देवताओंकी विजय और असुरोंकी पराजय है। कभी इसके विपरीत देवताओंकी वृत्ति दब जाती है और असुरोंकी वृत्ति उठ जाती है। देवताओंकी विजयसे धर्मके बढ़नेसे प्रजापतिपदकी प्राप्ति तक उत्तरोत्तर उत्कर्ष होता जाता है और असुरोंकी विजय होनेसे अधर्मके बढ़नेसे स्थावर भावकी प्राप्ति तक नीचे नीचे क्रमशः अधोगति होती जाती है। दोनों समान हों तो मनुष्यत्वकी प्राप्ति होती है। तब अधिकसंख्यक असुरोंके द्वारा दबाये गये देवता अपना उद्धार पानेके लिए परस्पर यों कहने लगे-हाँ, वर्तमानमें हम लोग इस ज्योतिष्टोम, यज्ञमें उद्गीथ नामक क्मके कर्ता बनकर (प्राणरूपताका आश्रय लेकर) असुरोंका पगभव कर शास्त्र सम्मत देवभावको प्राप्त कर लें। उद्गीथ नामका जो कर्म पदार्थ है, उसके कर्ताके स्वरूपका आश्रयण ज्ञान और कमके द्वारा किया जा सकता है। १॥। उस उपास्यके स्वरूपको निश्चय करनेके लिए 'तेह वाचमूचुः' इत्यादि छ् कण्डिकाओंसे परीक्षाका प्रकार दिखाते हैं, यथा- ते ह वाचमूचुस्त्वं न उदगायेति तथेति तेभ्यो बागुदगायत्। यो वाचि भोगस्तं देवेभ्य आगायद्यत्क- लयाणं वदति तदात्मने। ते विदुरनेन वै न उदगात्रात्ये- ष्यन्तीति तमभिद्रुत्य पाप्मना विध्यन् स यः स पाप्मा यदेवेदमप्रतिरूपं वदति स एव स पाप्मा ॥ २॥। भावार्थ-उन देवताओंने वैसा निर्णय कर वाणीके अभिमानी देवतासे कहा-तुम हम लोगोंके लिए उद्राताका कर्म सम्पादन करो। वाणीने कहा-'तथाऽस्तु' मैं ऐसा ही करूँगी। ऐसा कहकर उनके लिए वाणीने उद्धाताका कर्म (उद्रान) किया। जो वागिन्द्रियमें भोग था यानी वाणीको निमित्त बनाकर जो वाक आदि इन्द्रियोंका उपकार वचनादि व्यापार से होता है, उसे तो उन देवताओंके लिए उद्गान किया और जो अच्छा भाषण था-वक्तव्य था-उसे अपने लिए किया। तब उन असुरोंने जाना कि इस उद्राताको लेकर देवगण हमें पराजित करेंगे। अतः उन्होंने पास जाकर उसे पापसे बींध डाला। यह वाणी जो शाब्त्रसे प्रतिषिद्ध भाषण करती है वही यह पाप है, वही यह पाप है।।२ ।। देवसाओं द्वारा उद्ाता बनाये गये घाणरूप प्राणका पापविद् होना-

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३० बृहदारण्य कार्पनिपद् ।अधपाय १

अथ ह प्राणमूचुस्त्वं न उदगायेति तथेति तेभ्यः प्राण उद्गायढ यः प्राणे भोगस्तं देवेभ्य आगायद्यत् कल्याणं जिघ्रति तदात्मने। ते विदुरनेन वै न उदगात्राS- त्येष्यन्तीति तमभिद्रुत्य पाप्मनाऽविध्यन्स यः स पाप्मा यदेवेदमप्रतिरूपं जिघ्रति स एव स पाप्मा ॥ ३ ॥ भावार्थ-फिर वे देवता घ्राणरूप प्राणसे बोले-तुम हम लोगोंके उद़ाता वनो। तब उसने 'तथास्तु' कहकर उनके लिए उद़ान किया। घ्राणरूप प्राणमें जो भोग है उसे उसने देवताओंको दिया और जो उसका सुगन्ध ग्रहण करना है उसे अपने लिए रख लिया। उन असुरोंने जाना कि अवश्य ही इस उद्धाताके द्वारा देवता हमाग अतिक्रमण करेंगे। अतः असुरोने उसके समीप जाकर उसे विपया- सक्तिरूप पापसे विद्ध किया। वह जो पाप है. वह यही पाप है कि जो वाणसे शास्त्र- निषिद्ध सूघना है। वही यह पाप है।। ३ ।। चन्तुका पापविद्ध हो जाना- अथ ह चक्षुरूचुस्त्वं न उदगायेति तथेति तेभ्यश्च- क्षुरुदगायत्। यश्चक्षुषि भोगस्तं देवेभ्य आगायय्यत्कल्याणें पश्यति तदात्मने। ते विदुरनेन वै न उदगात्राऽयेग्यन्तीति तमभिद्ुत्य पाप्मनाऽविध्यन्स यः स पाप्मा यदेवेदम- प्रतिरूपं पश्यति स एव स पाप्मा ॥४ ॥ भावार्थ-फिर उन्होंन चन्तुसे कहा-तुम हमारे उद्धाता बना। देवताओंकी इस प्रार्थनाको 'तथास्तु' से स्वीकार कर चत्तुने उनके लिए उद्धान किया। जो चन्तुका उत्तम भोग था वह उसने देवताओंको दिया जो लमका सुन्दर रूप प्रहण करना था वह अपने लिए रख लिया। इस उद्धाताके द्वारा देवता हमें परास्त कर देंगें' यह सोचकर असुरोंने उसे विषयासक्तिरूप पापसे युक्त कर दिया। जो वह पाप है, वह यही है कि वह शास्त्रविरुद्ध देखती है। वही पाप है, वही पाप है।।४।। श्रोत्रको उद्धाता बनाया गया तो वह भी पापविद्ध हो गया- अथ ह श्रोत्रमूचुसत्तवं न उदगायेति तथेति तेभ्यः

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आंश्ण ३ ] बिध्याविनोद भाष्य ३१

श्रोत्रमुद्गायद्यः श्रोत्रे भोगस्तं देवेभ्य आगायद्यत्कल्याणथ शृणोति तदात्मने। ते विदुरनेन वै न उदगात्राऽत्येष्य- न्तीति तमभिद्गुत्य पाप्मनाऽविध्यन्स यः स पाप्मा यदेवेदमप्रतिरूपछ शृणोति स एव स पाप्मा ॥ ५ ।। भावार्थ-अनन्तर देवताओंने श्रोत्रसे कहा-तुम हम लोगोंके लिए उद्रान करो, शोत्रने 'तथास्तु' कहकर उनके लिए उद्धान किया। श्रोत्रने अपना भोग तो देवताओंको दिया पर शुभ श्रवण करना अपने लिए रख लया। असुरोंने उसे पहले ही यह जानकर पापसे विद्ध कर दिया कि इसीके द्वारा देवता हमारा अतिक्रमण कर लेंगे। यह जो अननुरूप श्रवण करता है, वही यह पाप है, वही यह पाप है। जब देवोंने मनको उद्राता नियुक्त किया तो वह भी पापलिप् हो गया, जैसे- अथ ह मन ऊचुस्त्वं न उदगायेति तथेति तेभ्यो मन उद्गायद्यो मनसि भोगस्तं देवेभ्य आगायद्यत् कल्याणथ संकल्पयति तदात्मने। ते विदुरनेन वै न उदगात्राऽत्येष्यन्तीति तमभिद्रुत्य पाप्पनाSविध्यन्स यः स पाप्मा यदेवेदमप्रतिरूप संकल्पयति स एव स पाप्मैवमु खल्वेता देवताः पाप्मभिरुपासृजन्नेवमेनाः पाप्मनाऽविध्यन्॥। ६।। भावार्थ-उन देवताओंने मनसे कहा कि 'तुम हमारे लिए उद्रान करो। यह सुन मनने 'अच्छा ठीक है' यह कहकर उनके लिए उद्गान किया। मनमें जो भोग था उसका उसने देवताओंके लिए आगान किया और यह जो शुभ सङ्कल्प करता है अर्थान् उसका जो उत्तम संकल्प है वह उसने अपने लिए गाया। 'इस उद्राताके द्वारा देवता हमपर आक्रमण करेंगे' यह जब असुरोंको मालूम पड़ा, तो उसके पास जाकर उन्होंने उसे पापसे विद्ध कर दिया। यह जो अननुरूप-शास्त्र- विरुद्ध संकल्प करता है वही यह पाप है, वही पाप यह है। अवश्य ही इस तरह इन देवताओंको पापका संसर्ग हुआ, और ऐसे ही असुरोंने इन्हें पापबिद्ध

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३२ बृहदारण्य कोपनिषद् [अव्याय १

किया। अर्थात् इस प्रकार सब इन्द्रिय विपयामक्त होनेसे पापिष्ठ हो गई, और वे पापी होनेके कारण आसुरी वृत्तियोपर विजय न पा सकीं। ६॥ अब देवता मुख्य प्राणको अपना उद्गाता बनाते हैं, यथा- अथ हेममासन्यं प्राणमूचुरत्वं न उदगायेति तथेति तेभ्य एष प्राण उदगायत्ते विदुरनेन वै न उदगात्रात्ये- व्यन्तीति तदभिद्गत्य पाप्मन,विव्यतसन्स यथाऽश्म/नमृत्वा लोष्टो विध्वथ सेतैव हैव विध्वसमाना विप्वञ्चो विनेश- स्ततो देवा अभवन् परासुरा भवत्यामना परास्य द्विषन्भ्ातृव्यो भवति य एवं वेद ॥ ७॥ भावार्थ-वागादि सब इन्द्रियोके अनन्तर देवता शरीरको चेष्टा देनेवाले मुख्य प्राणसे बोले कि आप हमारे उद्राता बनना स्व्रीकार करें। प्राणने 'तथास्तु' कहकर उनके लिए उद्धान किया। असुरोने जाना कि देवता इस उद्गाताके द्वारा हमागा अतिक्रमण करेंगे। अत उन्होंने उसके ममीप जाकर उसको भी पापसे विद्ध करनेकी चेष्टा की। किन्तु जिस प्रकार मिट्टीका ढेला पत्थरसे टकराकर चूर चूर हो जाता है, उसी प्रकार वे विध्वस्त होकर-बिखरकर-अनेक प्रकारसे नष्ट हो गये। तब देवता लाग प्रकृतिस्थ हो गये, यानी चैनकी सॉस ली और असुरोकी पराजय हुई। जो इस प्रकार जानता है वह प्रजापतिरूपसे स्थित होता है और उससे शत्रुता रखनेवाले सौतेले भाईकी हार होती है॥। ७॥ वि० वि० भाष्य-यह समझना चाहिये कि प्रत्येक पुरुषक अन्त.करणमें दो प्रकारकी वृत्तियॉ उत्पन्न होती हैं, एक धर्म परोपकार त्यागकी, २-दूसरी पापमय त्यागकी। ये वृत्तियॉ इन्द्रियो द्वारा उत्पन्न होती हैं, इसीलिए इन्द्रियोको देव तथा असुर रूपसे वर्णन किया गया है। स्वार्थपूर्ण वृत्तियाँ मनुष्यके साथ ही जन्मती है इसीलिए वे बड़ी यानी अधिक होती हैं। और धार्मिक वृत्तियॉ शास्त्रके अभ्यास तथा सद्गुरु-आचार्य-के प्रसाद द्वारा कठिनतासे उत्पन्न होती हैं, इसीसे वे छोटी यानी कम है। जब धार्मिक वृत्तियाँ या धारणाऍ उदय होती है तब व स्वार्थपरायण वृत्तियोका दबाना चाहती हैं और दूसरी ओर आसुरी वृत्तियॉ, जिन्होने जन्मखे ही मनुष्यके अन्दर घर कर रखा है, वे देवी वृत्तियोको निकाल बाहर करनेकी

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नाक्ण २] विद्याविनोद भाष्य ३

चेष्टा करती हैं। यही इस आख्यायिकाका संतिप्त अभिप्राय है, इसीको देवासुर संग्राम कह सकते हैं। तत्त्व यह है कि जिस प्रकार प्राण शरीरमें रहकर निःस्वार्थ भावसे अपने कर्तव्यका पालन करता है, इसी तरह मनुष्यको स्व्रार्थरहित होकर लोककल्याणार्थ काम करना चाहिए। स्वार्थपरायण मनुष्य वाक आदि इन्द्रियोंकी तरह कृतकार्य नहीं हो सकते। जो परोपकारी लोग हैं वे प्राणोंकी तरह सदा अपना कर्तव्य सफल करनेमें समर्थ होते हैं।।७ ॥। अब प्राणविषयक अन्य महत्त्वोंका वर्णन करते हैं, यथा- ते होचुः क नु सोऽभूद्यो न इत्थमसक्तेत्ययमास्येS- न्तरिति सोऽयास्य आद्गिरसोऽङ्गानाथ हि रसः ॥८॥ भावार्थ-व्रे वागादि इन्द्रिय बोलीं-किसने हमें देवभावको प्राप्त कराया है, वह कहाँ रहता है ? इस प्रकार विचार करने पर ज्ञात हुआ कि सुवके भीतर जो आकाश है, उसमें वह रहता है। इसी कारण उसको 'अयास्य' कहते हैं। इसका नाम 'आङ्गिरस' भी है, यह शरीरके सब अङ्गोंका सारभूत हैं, क्योंकि इसके निकल जानेसे शरीर सूख जाता है।। ८। 'प्राण स्वतः शुद्ध है, किन्तु अशुद्ध वागादिके सम्बन्धसे अशुद्ध हो आता है' इस आशङ्काकी निवृत्तिके लिए उस विशिष्ट उपासनाको कहते हैं जिसका पापहानि रूप असाधारण गुण है, यथा- सा वा एषा देवता दूर्नाम दूरथ ह्यस्या मृत्युर्दूरथ ह वा अस्मान्मृत्युर्भवति य एवं वेद ॥ ६ ॥ भावार्थ-वह यह देवता अर्थात् प्राण दूर नामधारी भी है, क्योंकि इससे मृत्यु दूर है। जो ऐसा जानता है, उससे मृत्यु दूर रहता है। भाव यह है कि प्राण असङ्ग- धर्मी है, यानी असङ्ग है। अतः समीपमें स्थित होनेपर भी इससे मृत्युकी दूरी है॥ ९॥ यही स्पष्ट करते हैं, यथा- सावा एषा देवतैतासां देवतानां पाप्मानंमृत्युमपहत्य यत्रासां दिशामन्तस्तद्गमयांचकार तदासां पाप्मनो

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३४ बृहदारण्यकोपनिषद् [अभ्पाय १

विन्यदधात्तस्मान्न जनमियान्नान्तमियान्नेत्पाप्मानं मृत्यु- मन्ववायानीति॥१० ॥ भावार्थ-इस प्रसिद्ध प्राण देवताने वागादि देवताओके पापको यानी मृत्युको हनन करके-हटाकर जहॉ इन दिशाओका अन्त है वहाँ पहॅुँचा दिया। इसने तिरस्कारके साथ उनके पापको वहॉ स्थापित कर दिया। 'मैं पापरूप मृत्युसे अनुगत न हो जाऊँ' इस भयसे अन्त्यजनोके पास न जाय तथा अन्त दिशाके पास भी न जाय ॥ १० ॥ वि० वि. भाष्य-प्राणने इन्द्रियरूप देवोके पापको असस्कृत जनोमें स्थापित कर दिया, वह इसलिए कि विषयी जनोसे ये भापणादि संसर्ग न करे, या यों कहो कि विषयी लोगोसे भय करे। क्योकि यदि हम उक्त जनोसे ससर्ग करेंगे तो विषयासक्तिरूप मृत्युको प्राप्त होगे। स्वाभाविक अज्ञानप्रेरित इन्द्रिय- विषयोके ससर्गजनित अभिनिवेशसे होनेवाले पापसे ही सब जीव मरते हैं, इस- लिए वही मृत्यु है। 'दिशाओके अन्तमें पहॅुॅचा दिया' यह क्या कहा? दिशाओका तो अन्त ही नहीं है। इसपर कहते हैं कि दिशाओंकी कल्पना श्रौतविज्ञानवान् पुरुषोंकी सीमा पर्यन्त ही की गई है, अतः उनसे विरुद्ध आचरणवाले लोगोंसे बसा हुआ देश ही दिशाओका अन्त है। पहले यह नियम था कि धर्मसे पतित लोगोको ग्राम या नगरकी सीमापर वास दिया जाता था और धार्मिक पुरुष उनसे पृथक् रहते थे ॥ १० ॥ अब इस कण्डिकासे सगृहीत देवताभावके फलको स्पष्ट करते हैं, यथा- सा वा एषा देवतैतासां देवतानां पाप्मानं मृत्युमपहत्याथैना मृत्युमत्यवहत् ॥ ११ ॥ भावार्थ-इस प्रसिद्ध प्राणने इन वागादि देवताओके पापरूप मृत्युको यानी विषयासक्तिरूप पापको दूर करके फिर इन्हे मृत्युसे परे पहुँचाकर अपने अपने अग्नि आदि भावोको प्राप्त कराया। अर्थात् प्राणने वागादि देवताओंको इनके अपरिच्छ्विन्न अभि आदि देवतात्मस्वरूपको (इनके प्रकृत पापरूप मृत्युको पार कर) प्राप्त करा दिया॥ ११ ।। इस प्रकार सामान्य रूपसे कहे 'अतिवहन' को ही प्रत्येकके लिए कहते हैं, यथा-

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विद्याविनोद भाष्य

स वै वाचमेव प्रथमामत्यवहत्सा यदा मृत्युमत्यमुच्यत सोभिरभवत्सोऽयमनिः परेण मृत्युमतिक्रान्तो दीप्यते।।।१२।। भावार्थ-उस प्रसिद्ध प्राण देवताने प्रधान वागदेवताको मृत्युके पार पहुँचाया, याने प्रथम वाणीको मुक्त किया, क्योंकि वही सबमें मुख्य है। जिस समय वह वाणी मृत्युसे पार हुई तो वह अभि हो गई। वह यह अमि मृत्युका अतिक्रमण करके उससे परे होकर प्रकाशमान हो रही है॥ १२।। वि• वि. भाष्य-जब वाणी असत्यभाषणादि पापोंसे (मिथ्या-भाषण ही वाणीका पाप है-मृत्यु है) रहित हो जाती है तो सत्यके प्रभावसे वह अग्िकी तरह चमकने लगती है। या यों कह सकते हैं कि वेदके यथार्थ कथनरूप प्रकाशसे वाणी अज्ञानरूप अन्धकारको छ्िन्न-भिन्न करनेमें समर्थ होती है। लोकमें आप्त पुरुष प्रामाणिक माना जाता है, आप्त वह है जो सत्य बोलता हो, अर्थात् जिसकी वाणी असत्यभाषणरूप पापसे विद्ध न हो। जिसकी वाणी उक्त दोषसे रहित होती है, वह पंचायतन गोष्ठीमें सूर्यके समान चमकता है॥ १२॥ अथ प्राणमत्यवहत्स यदा मृत्युमत्यमुच्यत स वायुर- भवत्सोऽयं वायुः परेण मृत्युमतिक्रान्तः पवते॥ १३॥ भावार्थ-फिर उसने प्राणका अतिवहन किया, अर्थात् वाणीके पश्चात् घ्राणे- न्द्रियको पापसे मुक्त किया। जिस समय वह मृत्युसे पार हुई वायुरूप हो गयी। वह अतिक्रान्त वायु मृत्युसे पार होकर वहता है॥ १३ ॥ अथ चक्षुरत्यवहत्तयदा मृत्युमत्यमुच्यत सआदित्योङ भवत्सोSसावादित्यः परेण मृत्युमतिक्रान्तस्तपति ॥ १४॥ फिर चन्चु इन्द्रियको अतिवहन यानी पापसे मुक्त किया। वह जिस समय-मृत्युसे पार हुई तो आदित्य हो गई, अथ त् सूर्यकी तरह असङ्ग होकर चमकने लगी। वह यह अतिक्रान्त आदित्य मृत्युसे परे होकर तपता है॥ १४॥। अथ श्रोत्रमत्यवहत्तयदा मृत्युमत्यमुच्यत ता दि- शोऽभवथस्ता इमा दिशः परेण मृत्युमतिक्रान्ताः॥ १५ ॥ भावार्थ-बसुके अनन्तर प्राणने श्रोत्रका अतिवहन किया, वह जब मृत्युसे-

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३६ बृहदारण्यकार्पानषद् । अध्याय १

विषयासक्तिरूप पापसे मुक्त हुआ तो वही दिशा हो गयीं। वे ये अतिकरान्त दिशाएँ मृत्युसे परे हैं ॥ १५ ॥ इस प्रकार इनको अग्न्यादि देवत्व प्राप्त होनेपर भी उपासकको क्या मिला ? इस विषयमें कहते हैं. यथा- अथ मनोऽत्यवहत्तयदा मृत्युमत्यमुच्यत स चन्द्रमा अभवत्सोऽसौ चन्द्रः परेण मृत्युमतिक्रान्तो भात्येव५ ह वा एनमेषा देवता मृत्युमतिवहति य एवं वेद ॥ १६ ॥ भावार्थ-श्रोत्र इन्द्रियके बाद प्राणने मनको अतिवहन-मुक्त किया, जब यह विपयासक्तिरूप पापसे मुक्त हुआ तो चन्द्रमा हो गया। यानी जिस प्रकार चन्द्रमा शीतल तथा आह्वादक है उसी प्रकारका मन भी हुआ। वह यह अतिक्रान्त चन्द्रमा मृत्युसे परे प्रकाशमान है। जो इसको इस प्रकार जानता है, यह देव्ता उसका इसी प्रकार मृत्युसे अतिवहन-पार-करता है॥ १६॥ वि० वि० भाष्य-उक्त मन्त्रोंका तात्पर्य किसी महात्माने यह भी बताया है कि विषयासक्त इन्द्रियाँ इस शरीरको पापी बनाकर स्वयं ऐसे नष्ट हो जाती हैं जैसे पाला खेतीको जलाकर स्वयं गल जाता है। जैसे अभि स्पर्श करनेवालेके अङ्गोंको जला देती है, ऐसे ही विषयासक्तिरूप पाप इन्द्रियोंको मृत्युको ओर ले जाते हैं। जितेन्द्रिय मनुष्य इन्द्रियोंके संयम द्वारा विषयासक्तिरूप पापसे मुक्त हो संसारमें निर्भय होकर विचरता है। पहले कह आये हैं कि वाणीका वास्तिक रूप अभि, माणका वायु, तेजका आदित्य, श्रोत्रका दिशाएँ और मनका चन्द्रमा है, जो संयमी पुरुष हैं उनकी ही इन्द्रियॉ अग्नि आदित्यादि रूपसे चमकती हैं। ऐसे मनुष्य ही चतुर्वगके अधिकारी होते हैं। जो इन्द्रियोंके दास हैं वे कभी बन्धनमुक्त नहीं हो सकते ॥ १६।। अब प्राणको अन्नका भोक्ता कथन करते है, यथा- अथात्मने Sन्नाद्यमागायद्यद्दि किंचान्नमद्य तेडनेनैव तद्द्त इह प्रतितिष्ठति ॥१७॥ भावार्थ-इसके अनन्तर उसने अन्नादयका आगान किया, अर्थात् जो अन्न हो और भद्त्य हो उस अन्नाद्यका आगान किया, यानी पाचनक्रियाको अपने ही अधीन रखा। क्योंकि जो भी कुछ अन्न खाया जाता है वह प्राणसे ही खाया जाता

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ब्राह्मण ३ ] विद्याविनाद भाष्य ३७

है, और उस अन्नमें प्राण प्रारताष्ठत होता है। तात्पय यह है कि प्राणका अन्नभक्षण वागादि इन्द्रियोंकी तरह स्वार्थ साधनके लिए नहीं होता, किन्तु 'इस शरीरमें प्रतिष्ठा पाकर अन्य इंद्रियांको जीवन दे सके'इस अभिप्रायसे उसका भक्षण होता है।।१७।। प्राणके प्रति अन्न चाहनेवाली इन्द्रियोंकी प्रार्थनाका वर्णन करते हैं, यथा- ते देवा अबुवन्नेतावद्वा इदथ सर्व यदन्नं तदात्मन आगासीरतु नोऽस्मिन्नन्न आभजस्वेति ते वै माऽभिसंविश- तेति तथेति तथसमन्तं परिण्यविशन्त। तस्माद्यद नेनान्नमत्ति तेनैतास्तृप्यन्त्येवथ ह वा एनथ स्वा अभिसंविशन्ति भर्ता स्वानाथ श्रेष्ठः पुर एता भवत्यन्नादोऽधिपतिर्य एवं वेद य उ. हैवंिदथ स्वेषु प्रति प्रतिर्बुभूषति न हैवालं भार्येभ्यो भवत्यथ य एवैतमनुभवति यो वैतमतु भार्यान् बुभूर्षति स हैवालं भार्येभ्यो भवति ॥१८ ॥ भावार्थ-वे वागादि इन्द्रियॉ प्राणसे बोलीं कि हे प्राण, यह जो अन्न है, वह सब इतना ही तो है ही, उसे तुमने अपने लिए आगान कर लिया, यानी अपने ही लिए रख लिया। अपने लिए रखे गये अन्नमें से उपयोगके बाद हमें भी कुछ भाग दो। प्राणने कहा-तुम अन्न चाहनेव्राले चारो ओरसे मुझमें प्रविष्ट हो जाओ। तदनन्तर 'ऐसा ही होगा' यह कहकर वे सब ओर से उसमें प्रवेश कर गयीं। अतः मनुष्य प्राण द्वारा जो अन्न भक्षण करता है उससे ये प्राण यानी वागादि इन्द्रियाँ तृप्त होती हैं। इसीसे जो इस प्रकार जानता है उसके सब सम्बन्धी इसका आश्रय ग्रहण करते हैं। वह पाणकी तरह अपने सम्बन्धियोंका पालन करनेवाला, उनमें पूज्य, उनका अग्रगामी होता है तथा अन्नका भोक्ता और सबका अधिपति होता है। ज्ञातियोंमें जो भी इस प्रकारके ज्ञाताके प्रति स्पर्धावाला यानी प्रतिकूल होना चाहता है वह अपने आश्रितोंका पालन करनेमें समर्थ नहीं होता। जो भी इस ज्ञाताके अनुकूल रहता है, जो कोई भी इसके अनुसार रहकर अपने सम्बन्धियोंका-पोषणियोंका पालन पोषण करना चाहता है, वह अवश्य ही अपने आश्रितोंका भरण कर सकता है॥ १८ ।। प्राण अङ्गोंका रस है, इसकी उपपत्ति दिखाते हैं, यथा-

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३८ बृहदारण्यकोपनिषद् अध्याय १

सोडयास्य आद्िरसोऽद्वानाथ हि रसः प्राणो वा अङ्गानाथ रसः प्राणो हिवा अङ्गानाथ रसस्तस्माद्यस्मा- त्कस्माच्चाङ्गात्प्राण उत्क्रामति तदेव तच्छ्रुष्यत्येष हि वा अङ्गानाथ रसः॥ १६ ॥ भावार्थ-अयास्य-मुखमें रहनेवाला प्राण निश्चय करके अङ्गोके मध्यमें रसरूप है, यानी यह अङ्गोंका सार है। प्राण ही अङ्गोंका रस-तत्व है। इसी कारण जिम अङ्गसे प्राण निकल जाता है, वह उसी जगह सूख जाता है। इसीलिए प्राणको अङ्गोंका रस वर्णन किया गया है॥ १६ ॥ प्राण ऋग्वेदस्वरूप है, अतः उस रूपसे उसकी उपासनाके लिए कहते हैं, यथा- एष उ एव बृहस्पतिर्वाग् वै बृहती तस्या एष पतिस्तस्मादु बृहस्पतिः ॥ २० ॥ भावार्थ-यह प्राण ही बृहस्पति है और ऋचारूप वाणी बहती है। प्राण वाणीका पति है, इसीलिए यह बृहस्पति है॥ २० ।। वि० वि० भाष्य-यह प्राण हो प्रकृत आङ्गिरस बृहस्पति है। वह ऐसा कैसे है यह बताते हैं-वाक् ही छत्तीस अक्षरोंवाला बृहती छन्द है, यद्मपि वाक अनुष्ठुपू भी है तथापि वह बृहती छन्दमें अन्तर्भूत हो जाता है। यह प्राण बृहती यानी ऋकूका पति है, क्योंकि यही उसका अभिव्यक्त करनेवाला है। अथवा वाणीका पालन करनेके कारण यह उसका पति है। क्योंकि प्राणहोनमें शब्दोब्चारण करनेकी शक्ति नहीं होती। असः यह बृहस्पतिऋचाओंका प्राण है याने आत्मा है॥२०।। ऐसे ही यह यजुर्वेदके मन्त्रोंका भी आत्मा है. सो कैवे, यह कहते हैं, यथा- एष उ एव ब्रह्मणस्पतिर्वाग वै ब्रह्म तस्या एष पतिस्तस्मादु ब्रह्मणस्पतिः॥ २१॥ भावार्थ-इसी प्राणको ब्रद्मणस्पति भी कहते हैं, वाणी ही बरद्म है, उसका यह पति है, इसी कारण इसको ब्रह्मणस्पति कहा है॥ २१ ॥ वि० वि० भाष्य-अनेक श्रुतिप्रमाणोंसे यह सिद्ध है कि बृहती और ब्रह्म क्रमराः ऋक और यज्जु:के ही वाचक हैं॥ २१॥ भब 'प्राण सामनेवरूप है' यह कहते हैं, यथा-

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ब्राह्मण ३ ] विद्याविनोद भाष्य ३९

एष उ एव साम वागू वै सामैष सा चामश्रेति तत्साम्नः सामरवम्। यद्ेव समः पृषिणा समो मशकेन समोनागेन सम एभिस्त्रिमिरलोकै:समोSनेन सर्वेण तस्माद्वेव सामाश्नुते साम्रः सायुज्यथ सलोकतां य एवमेतत साम वेद ।२२। भावार्थ-यह प्राण ही साम है, क्योंकि वाणी 'सा' तथा प्राण 'अम' है, ये ही दोनों मिलकर 'साम' बनते हैं। यही सामका सामत्व है। क्योंकि यह प्राण मक्खीके समान है, मच्छरके तुल्य है, हाथीके जैसा है, इस त्रिलोकीके बराबर और इन सभीके सदृश है, इसीसे यह साम कहाता है। जो उक्त प्रकारसे प्राणके सामभावको जानता है वह सामके सायुज्य तथा उसकी सलोकताको प्राप्त करता है। या यों कहो कि प्राणके समान उसकी महिमा होती है॥। २२।। वि. वि• भाष्य-यह प्राण किस प्रकारसे साम है ? यह कहते हैं। वाकू ही 'सा' है, जो कुछ भी स्त्रीशन्दवाच्य हे वह वाक है, समस्त स्त्रीलिङ्ग शब्दों द्वारा कही जानेवाली वस्तुओंको 'सा' यह सर्वनाम शब्द विषय करता है। तथा 'अम' यह प्राण है। 'अम' शब्द सम्पूर्ण पुल्लिङ्ग शब्दों द्वारा कहे जानेवाले पदार्थीका परामर्श करता है। यह भी है कि प्राणसे निष्पन्न होनेवाला जो स्वरादि समुदायमात्र गान है वह भी साम शब्दसे कहा जाता है। साममें किस प्रकारसे प्राणकी तुल्यता है ? सो कहते हैं कि जिस प्रकार गो-शरीरमें गोत्वकी पूर्णतया व्याप्ति होती है उसी प्रकार यह कीड़ी आदिके शरीरोंमें व्याप्त है इसीलिए प्राण उनके समान है, शरीर मात्रके बराबर होनेके कारण ही नहीं। क्योंकि यह अमूर्त और सर्वगत है। भाव यह है कि प्राण छोटेसे छोटे और बड़ेसे बड़े जीवका समान है, यह सारी प्रजा प्राणाश्रित होनेसे प्राणके समान है। जो प्राणके साथ एक ही देह और इन्द्रियादिका अभिमान प्राप्त करता है तथा भावनाविशेषसे सालोक्य यानी समान- लोकता प्राप्त करता है, उसका उद्धार हो जाता है॥ २२॥। देहलीदीपक न्यायसे इसी फलश्रुतिका अनुसरण करके प्राणके अन्य गुणोंको कहते हैं, यथा- एष उ वा उद्गीथः प्राणो वा उत्प्राणेन हीद सर्वमुत्त्धं वागेव गीथोच्च गीथा चेति स उदगीथः ॥२३ ॥

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४० बृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याम १

भावार्थ-यह प्राण ही उद्गीथ है, क्चोंकि यह सम्पूर्ण प्रपञ् प्राणसे हं धारण किये जानेके कारण 'उत्' कहा गया है। वाक 'गीथा' है, वह 'उत्' और 'गीथा' भी है, इसलिए 'उद्रीथ' है॥ २३ । वि० वि• भाष्य-यहाँ सामका प्रकरण होनेके कारण उद्गीथसे सामकी अवयवभक्तिविशेष समझनी चाहिए, उद्गान नही। प्राणसे ही यह सब जगन 'उत्' याने विधृत है अतः प्राण 'उत्' है और 'गीथा' प्राणतन्त्रा वाक है। जिस एक शब्दसे इन दोनोंका ग्रहण होता है, वह शब्द 'उद्गीथ' है॥ २३॥ उद्गीथ देवता प्राण ही है, वागादि नहीं, इसी बातको दढ़ करनेके लिए आख्यायिकाका कथन करते हैं, यथा- तद्धापि ब्रह्मदत्तश्चैकितानेयो राजानं भक्षयन्नुवाचायं त्यस्य राजा मूर्धानं विपातयताद्यदितोऽयास्य आङ्गिरसोऽ- न्येनोदगायदिति वाचा च ह्येव स प्रागोन चोदगायदिति॥।२४। भावार्थ-चिकितायनके प्रपौत्र ब्रह्मदत्तने यज्ञमें सोम भक्षण करते हुए कहा-यदि अयास्य तथा अङ्गिरस नामक प्रधान प्राणने वाक्संयुक्त प्राणसे अतिरिक्त देवता द्वारा उद्गान किया हो तो यह सोम मेरा सस्तक गिरा दे। इससे यह निश्चय होता है कि उसने प्राण तथा वाणीसे ही उद्गान किया था॥२४॥ वि० वि• भाष्य-प्राचीन ऋषियोंके सत्रमें ब्रह्मदत्तने कहा कि उद्गाताने यदि वाक्संयुक्त प्राणसे भिन्न किसी अन्य देवता द्वारा उद्गान किया हो तो मैं मिथ्यावादी ठहरूँगा, अतः देवता विपरीत ज्ञान रखनेव्राले मुझको मस्तकरहित करें, यानी मेरा सिर गिरा दें। यह शपथ साम विज्ञानमें दृढ़ता प्रकट करती है। यहाँ सिर गिरनेका तात्पर्य यह है कि सभामें सबके सामने लज्जित हो जाना। ऐसे मनुष्य का मस्तक नीचा हो जाता है, यानी नीचेकी ओर लटक जाता है, गिर जाता है।।२४॥। अब सामके उद्गाताके लिए फलका कथन करते हैं, यथा- तस्य हैतस्थ सान्नो यः स्वं वेद भवति हास्य स्वं तस्य वै स्वर एव स्वं तस्मादार्िज्यं करिप्यन्वाचि स्वर- मिच्छेत तथा वाचा स्वरसंपन्नयार्तिज्यं कुर्यात्तस्माद्यज्ञे स्वरवन्तं दिद्दक्षन्त एव। अथो यस्य स्वंभवति भवति हास्य स्वं य एवमेतत्साम्न: स्वं वेद्॥ २५ ।।

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ब्राह्मण ३] विद्याविनोद भाष्य ४१

भावार्थ-जो पुरुष उस प्रसिद्ध साम-मुख्य प्राणके धनको जानता है, उसे धन मिलता है, क्योंकि उस प्राणका स्वर ही धन है। इस कारण उचित है कि ऋत्विककर्म करनेवाला वाणीमें स्वरकी इच्छा करे, उस स्वरयुक्त वाणीसे ऋत्विककर्म करे। क्योंकि जिसका धन स्वर होता है यज्ञमें सब उसीको देखना चाहते हैं, जैसे लोकमें सभी धनवान्को देखते हैं। जो सामके इस स्वररूप धनको जानता है, वह धनसे युक्त होता है॥। २५॥। वि० वि० भाष्य-कण्ठगत मधुरताको स्वर कहते हैं, सामकी वही शोभा है, स्वर सामका धन है, वह उसीसे विभूषित होता है। यज्ञ एक महोत्सव होती है, उसके अयोजनमें सामग्रीकी प्रधानता है, पर विशेषतः व्यक्ति ही मुख्य है। भाव यह है कि जितना ही मनुष्य प्रभावशाली होगा, उसका यज्ञानुष्ठानायोजन भी "उतना बृहत् होगा। उसमें जो मनुष्य मधुरतासे सामगायन करेगा, उसे सब लोग ऐसे आनन्दसे देखेंगे, जैसे लोकमें अच्छे रागीको या धनिकको देखते हैं। इसलिए सस्वर साम गायन करना चाहिए। २५।। सामको जो सुवर्ण जानता है, उसे जो फल होता है, उसे कहते हैं, यथा- तस्य हैतस्य साम्नो यः सुवर्ण वेद भवति हास्य सुंवर्ण तस्य वै स्वर एव सुवर्ण भवति हास्य सुवर्णं य एवमेतत्साम्न: सुवर्ण वेद ॥२६ ॥ भावार्थ-जो मनुष्य इस प्रसिद्ध सामके सुवर्णको जानता है, वह सुवर्णवाला होता है, उसका स्वर ही सुवर्ण है। ओ इस प्रकार सामके सुवर्णको जानता है वह धनाळ्य होता है ॥ २६ ।। वि० वि. भाष्य-स्वर और सुवर्ण इन दोनोंके लिए सुवर्ण शब्दका प्रयोग समान रूपसे होता है, अतः उस गुणके विज्ञानका फल लौकिक सुवर्ण ही होता है। सुवर्णका अर्थ सुन्दर अक्षरोच्चारण भी होता है। अर्थात् जो स्वरके साथ सुन्दर अक्षरोच्चारपूर्वक साम गायन करता है, उसे सुवर्ण-सोना मिलता है तथा वह् सुवर्ण-सुन्दर वर्ण (आकार-रूप-जातिवाला) समझा जाता है॥ २६॥ अब सामके प्रतिष्ठा गुणके विधानके विषयमें कहा जाता है, यथा- तस्य हैतस्य साम्नो यः प्रतिष्ठां वेद प्रति ह तिष्ठति

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४२ बृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय १

तस्य वै वागेव प्रतिष्ठा वाचि हि खल्बेष एतत्प्राणः प्रतिष्ठितो गीयतेऽन्न इत्यु हैक आहुः॥ २७ ॥ भावार्थ-जो मनुष्य इस सामकी प्रतिष्ठाको जानता है वह सर्वत्र प्रतिष्ठित होता है। उसकी वाणी ही प्रतिष्ठा है। क्योंकि यह प्राण वाणी में प्रतिष्ठित हुआ ही गाया जाता है। कई एक आचार्योंका कथन है कि प्राण अन्नमें प्रतिष्ठित हुआ ही गाया जाता है॥२७।। वि० वि० भाष्य-वाक सामकी प्रतिष्ठा है, वाणीके जिह्वामूल आदि आठ स्थानोंमें प्रतिष्ठित होकर ही यह प्राण गीतिभावको प्राप्त होता है। कोई आचार्य यह भी कहते हैं कि यह अन्नमें यानी अन्नके परिणामभूत शरीरमें प्रतिष्ठित करके गाया जाता है। यहाँ दोनोंके ही 'वाक् प्रतिष्ठा हैं''अन्न प्रतिश्ठा है' ये मत निर्दोष हैं।२७।। अब अपने तथा यजमानके लिए प्रस्तोताकी प्रार्थनाका कथन करते हैं, यथा -- ' अथातः पवमानानामेवाभ्यारोहः स वै खलु प्रस्तोता साम प्रस्तौति स यत्र प्रस्तुयात्तदेतानि जपेत्। असतो मा सद्गमय तमसो मा ज्योतिर्गमय मृत्योर्माऽमृतं गमयेति स यदाहासतो मा सदगमयेति मृत्युर्वा असत्स- दमृतं मृत्योर्माSमृतं गमयामृत्षं मा कुवित्येवैतदाह तमसो मा ज्योतिर्गमयेति मृत्युवैं तमो ज्योतिरभृतं मृत्योर्माSमृतं गमयामृतं मा कुर्वित्येवैतदाह मृत्योर्मा5वृहं गमयेति नात्र तिरोहितमिवास्ति। अथ यानीतराणि स्तोत्राणि तेष्वा- त्मने Sन्नाद्यमागायेत्तरमादु तेषु वरं वृणीत यं कामं कामयेत तथ स एष एवंविदुदगातात्मने वा यजमानाय वा यूं कामं कामयते तमागायति तद्दैतल्लोकजिदेव न हैवालोक्य- ताया आशाऽस्ति य एवमेतत्साम वेद.॥। २८ ।। भावार्थ-प्राणविज्ञानका कथन करनेके अनन्तर पवमानोंका अभ्यारोह कहा जाता है। अर्थात् 'प्राणवेत्ता देवके लिए अभ्यारोहका फल प्राप्त हो' इस कथनके कारण पवमानोंकी अभ्यारोह नामक उपासनाका वर्णन करते हैं। वह प्रस्तोता निश्चय करके

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ब्रह्मण ४ ] विद्याविनोद भाष्य ४३

यज्ञमें सामको प्रस्तुत याने आरम्भ करता है। जिस कालमें तह सामको आरम्भ करे तब प्रथम इन अर्थो वाले मन्त्रोंका जप करे-'मुझे असत्से सत्की ओर ले आओ' 'मुझे अन्धकारसे प्रकाशकी ओर ले जाओ' तथा 'मुझे मृत्युसे अमरत्वकी ओर ले जाओ।' वह जिस समय यह कहता है कि मुझे असत्से सत्की ओर ले जाओ' तो यहाँ मृत्यु ही असत् है तथा अमृत सत् है। इसलिए उसका कहना यही है कि मुझे मृत्युसे छुड़ाकर अमृत प्राप्त करा दो अर्थात् मुझे अमर कर दो। इसमें छ्विपाव कैसा है ? यह तो खुली बात है कि पुरुष परमात्मासे प्रार्थना करे कि मुझे मृत्युसे अमृतकी ओर ले जाओ। इसके अनन्तर उद्गाता गान करे, यानी इसके अनन्तर जो स्तोत्र हैं उनमें वह अपने लिए अन्नाद्यका आगान करे। इसका कथन करनेके बाद यह वर माँगे तथा जिस भोग्य पदार्थकी इच्छा हो उसकी याचना करे। वह यह जाननेवाला उद्याता अपने अथवा यजमानके लिए जिस भोग्य पदार्थकी इच्छा करता है, उसीको प्राप्त कर लेता है। वह यह प्राणदर्शन-नवविधस्तोत्र कर्मं लौकिक पदार्थों की प्राप्तिका साधन है। जो इस प्रकारसे इस सामको जानता है, उसकी लोकप्राप्तिकी अयोग्यताके लिए प्रार्थना होती ही नहीं है॥ २८।। वि० वि० भाष्य-ज्योतिष्टोमके बारह स्तोत्रोंमें कुछ स्तोत्रोंका नाम पवंमान स्तोत्र है। जिस जपसे साक्षान् देवभात्रकी प्राप्ति हो उस मन्त्रजपका नाम अभ्यारोह मन्त्रजप है।। २८।।

चतुर्थ ब्राह्मणा

अब विराट् पुरुषका वर्णन करते हैं, यथा- आत्मैवेदमग्र आसीत् पुरुषविधः सोऽनुवीक्य नान्य- दात्मनोऽपश्यत् सोऽहमस्मीत्यन्रे व्याहरत्ततोऽहंनामाभ-

प्रब्रूते यदस्य भवति स यत्पूर्वो डस्मात्सर्वस्मात्सर्वान्पाप्मन औषत्तस्मात्पुरुष ओषति ह वै स तं योऽस्मात्पूर्वों बुभूषति य एवं वेद ॥ १ ॥

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४२ बृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय १

तस्य वै वागेव प्रतिष्ठा वाचि हि खल्चेष एतत्प्राणः प्रतिष्ठितो गीयतेऽन्न इत्यु हैक आहुः ॥ २७ ॥ भावार्थ-जो मनुष्य इस सामकी प्रतिष्ठाको जानता है वह सर्वत्र प्रतिष्ठित होता है। उसकी वाणी ही प्रतिष्ठा है। क्योंकि यह प्राण वाणी में प्रतिष्ठित हुआ ही गाया जाता है। कई एक आचार्योंका कथन है कि प्राण अन्नमें प्रतिष्ठित हुआ ही गाया जाता है॥२७।। वि० वि० भाष्य-वाक सामकी प्रतिष्ठा है, वाणीके जिह्वामूल आदि आठ स्थानोंमें प्रतिष्ठित होकर ही यह प्राण गीतिभावको प्राप्त होता है। कोई आचार्य यह भी कहते हैं कि यह अन्नमें यानी अन्नके परिणामभूत शरीरमें प्रतिष्ठित करके गाया जाता है। यहाँ दोनोंके ही 'वाक् प्रतिष्ठा है" 'अन्न प्रतिश्ठा है' ये मत निर्दोष हैं।।२७।। अब अपने तथा यजमानके लिए प्रस्तोताकी प्रार्थनाका कथन करते हैं, यथा- अथातः पवमानानामेवाभ्यारोहः स वै खलु प्रस्तोता साम प्रस्तौति स यत्र प्रस्तुयात्तदेतानि जपेत्। असतो मा सद्गमय तमसो मा ज्योतिर्गमय मृत्योर्माऽमृतं गमयेति स यदाहासतो मा सदगमयेति मृत्युर्वा असत्स- दमृतं मृत्योर्माSमृतं गमयामृक्ं मा कुवित्येवैतदाह तमसो मा ज्योतिर्गमयेति मृत्युवैं तमो ज्योतिरभृतं मृत्योर्माSमृतं गमयामृतं मा कुर्वित्येवैतदाह मृत्योर्मा5वृहं गमयेति नात्र तिरोहितमिवास्ति। अथ यानीतराणि स्तोत्राणि तेष्वा- त्मने Sन्नाद्यमागायेत्तरमादु तेषु वरं वृणीत यं कामं कामयेत तथ स एष एवंविदुदगातात्मने वा यजमानाय वा यूं कामं कामयते तमागायति तद्दैतल्लोकजिदेव न हैवालोक्य- ताया आशाऽस्ति य एवमेततसाम वेद॥। २८ ।। भावार्थ-प्राणविज्ञानका कथन करनेके अनन्तर पवमानोंका अभ्यारोह कहा जाता है। अर्थात् 'प्राणवेत्ता देवके लिए अभ्यारोहका फल प्राप्त हो' इस कथनके कारण पवमानोंकी अभ्यारोह नामक उपासनाका वर्णन करते हैं। वह प्रस्तोता निश्चय करके

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श्राध्सा ४ ] विद्याविनोद भाष्य ४५

स इममेवात्मानं द्वेधाऽपातयन्ततः पतिश्च पत्नी चाभवतां तस्मादिदमर्धबृगलमिव स्व इति ह स्माह याज्ञवल्क्यस्त- स्माद्यमाकाशः स्त्रिया पूर्यत एव ताथ समभवत्ततो मनुष्या अजायन्त ।। ३॥ भावार्थ-वह रममाण यानी प्रसन्न नहीं हुआ। इसीसे अकेला मनुष्य रममाण नहीं होता। फिर उसने अपनेसे भिन्न दूसरका सङ्कल्प किया। वह विराद् इतने परिमाणवाला हो गया जैसे कि परस्पर आलिङ्गित स्त्री पुरुष होते हैं। उसने अपने देहका ही दो भागोमें विभक्त कर दिया, जिससे पति और पत्नी प्रकट हुए। इसी कारण पुरुषका शरीर आध सीपके दलकी तरह होता है, या द्विदल अन्नके एक दलके समान होता है। ऋपि याज्ञबल्क्यने ऐसा कहा है कि यह पुरुषका आधा शरीर आकाश स्त्रीसे पूर्ण होता है। उसका स्त्रीके साथ संग होनेसे मनुष्य उत्पन्न हुआ।। ३॥ इस समय गवादि सृष्टिका प्रपश्व (विस्तार) दिखाते हैं, यथा- सा हेयमीक्षांचक्रे कथं नु माऽडत्मन एव जनयित्वा संभवति हन्त तिरोऽसानीति सा गौरभवद्दषभ इतरस्ताथ समेवाभवत्ततो गावोऽजायन्त वडवेतराभवद्श्ववृष इतरो गर्दभीतरा गर्दभ इतरस्ताय समेवाभवत्तत एकशफम- जायताऽजेतराऽभवद्वस्त इतरोऽविरितरा मेष इतरस्ता2 समेवाभवत्ततोऽजावयोऽजायन्तैवमेव यदिदं किंच मिथुनमा पिपीलिकाभ्यस्तत्सर्वमसृजत ॥४॥ भावार्थ-उस स्रीने विचार किया कि मुझे अपने आप ही उत्पन्न करके यंह किस प्रकार समागम करनेकी इच्छा करता है, इसलिए मैं छिप जाती हूँ, यानी रूपान्तरमें लीन हो जाती हूँ। तब वह गी हो गई तो मनुष्य बृषभ होकर उसके साथ रहने लगा, इससे गाय बैल उत्पन्न हुए। फिर वह घोड़ी हो गई, तब वह अच्छा घोड़ा हो गया। फिर वह गधी हो गई, तो वह गर्दभ हो गया। उनके संयोगसे एक खुरवाले पशु पैदा हुए। इसके बाद वह बकरी हो गई और वह बकरा हो गया। फिर वह भेड़ हो गई तो वह भेड़ा बन गया। इससे भेड़ बकरियाँ उत्पन्न हुई। इख

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४६ बृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय १

प्रकार चीटीसे लेकर जितना कुछ चर जगत् हं याने जितने भी स्त्ी पुरुपके जोड़े हैं, उन सबकी उन्होंने उत्पत्ति की॥४ ॥ वि० वि० भाष्य-भव्यकारने प्रकृत स्त्रको शतरूपा और पुरुाको मनु कहा है। शतरूपा स्त्री अपनेको उस मनुकी कन्या मानकर शाखके कन्यागमन सम्बन्धी प्रतिषेध वाक्यको स्मरण करके विचार करने लगी कि यह पुरुन मुझे अपने से उत्पन्न करके मेरे साथ पत्नीका व्यवहार क्यों करता है ? यर्वाप यह तो. निर्दय है तथापि मैं छिप जाती हु। ऐसा विचार कर वह गौ, घोड़ी आदि हो गई। किन्तु उत्पन्न किये जाने योग्य प्राणियोके करमोसे प्रेरित हुई शतरूपाकी और मनुकी भी पुनः पुनः वैसी ही मति होती रही। इस प्रसंगमें एक शंका लोकव्यवहारमें ओर भी हुआ करती है, प्रकरण प्राप्त होनेसे उसपर भी विचार कर लेना चाहिए, यथा-पति और पत्नी इन दोनोंको एक गुरुसे दीक्षा ग्रहण करनी चाहिए या नहीं ? यदि दोनों एक ही पुरुषको गुरु धारण करेंगे तो वे भाई बहिन जैने हो जायेंगे और यह सम्बन्ध दाम्पत्य- धर्मके प्रतिकूल है। इसका उत्तर यह है कि यह विचार तो विवाहके समय ही करना चाहिए था, जब कि सब स्त्री पुरुष एक ही परमात्माकी सन्तान होनेसे बहन भाई हुए, तो उनका विवाहसंस्कार अनैतिक ही होना चाहिये। पर पाणिग्रहण होता है। इसका भाव यह है कि पारमार्थिक दष्टिसे तो सभी बहन भाई है, पर व्यव- हारमें प्रत्येकके पिता पुत्री, स्त्री पुरुन आदि अनेक सम्बन्धोंकी कल्पना कर ली गई है। इन सम्बन्धोंका पालन करना शिष्ठाचार है, भ्रषाचार वुरा है। फिर शिष्यका सम्बन्ध तो परम पवित्र है, यानी स्त्रीका पवित्र सम्बन्व गुरुसे है ओर पतिका भी यह संबन्ध गुरुसे है। व्यवहारमें वे परस्पर दंपती होते हुए भी परमार्थमें एक गुरुके शिष्य होनेके कारण बराबर हैं। फिर उस समान सम्बन्धको चाहे कुछ भी समझ लो। प्रकृतमें भी एक ही शरीरसे दोनों उत्पन्न हुए, यानी एक ही शरीरके दो दल होकर उनसे मैथुनी सृष्टि उत्पन्न हुई है॥४॥ सृष्टिसंज्ञक प्रजापतिकी सृष्टिरूपसे उपासनाका फल कहते हैं, यथा- सोडवेदहं वाव सृष्टिरस्म्यहथ हीद सर्वमसटृक्षीति ततः सृष्टिरभवततृष्टयाछ हास्यैतस्यां भवति यएवं वेद ।।५।। भावार्थ-उक्त सृष्टिको उत्पन्न करके प्रजापतिने विवार किया कि इस सब प्रपद्च का कर्ता मैं हो हूँ। इस कारण वह 'सूष्टि' नामनाला हुआ। जो उसको

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नाक्ण ४ ] विधाविनोद भाष्य

सृष्टिकर्ता जानता है वह प्रजापति की सृष्टिमें जगत्का स्रष्टा होता है, अर्थात् इस सृष्टिमें प्रसिद्ध होकर चिरजीवी होता है॥ ५॥ इस प्रकार अनुग्रहयोग्य सृष्टिको कहकर अनुग्राहक सृष्टिका प्रस्ताव करते हैं,यथा- अथेत्यभ्यमन्थत्स मुखाच्च योनेर्हस्ताभ्यां चाग्निम सृजत तस्मादेतदुभयम लोमकमन्तरतोऽलोमका हि योनिरन्तरतः। तद्यदिदमाहुरमुं, यजामुं यजेत्येकैकं देवमेतस्यैव सा विसृष्टिरेष उ ह्येव सर्वें देवाः। अथ यत्किंचेदमार्द्र तद्रे- तसोसृजत तदु सोम एतावद्वा इदथ सर्वमन्नं चैवान्नादश्च सोम एवान्नमगनिरन्नाद: सैषा ब्रह्मणोऽतिसृष्टिः यच्छ्रेयसो देवानसृजताथ यन्मत्यः सन्नमृतानसृजत तस्मादतिसृष्ठि- रतिसृष्ठयाथ हास्यैतस्यां भवति य एवं वेद ॥ ६ ॥ भावार्थ-इसके अनन्तर उसने इस प्रकार मन्थन किया, उसने मुखरूप योनिसे दोनों हाथों द्वारा मन्थन करके अमिको रचा। यही कारण है कि दोनों भीतरकी ओरसे लोमरहित हैं। इस कारण यज्ञ करनेवाले लोग अभि, इन्द्र आदि देवताओंको अलग अलग मानते हुए 'इस अगिका यजन करो' 'इस इन्द्रका यजन करो' जो ऐसा कथन करते हैं, यह तो उस एककी ही विसृष्टि है। अर्थात् इसकी पूजा करो, उसकी अर्चा करो, यह उस प्रजापतिका ही कार्यजात विकार है। निश्चय ही यह प्रजापति सर्व देवताओंका स्वरूप है। इसके अनन्तर जो यह गीला है उसको उसने वीर्यंसे रचा, वही सोम है। इतना ही यह सब अन्न तथा अन्नाद है। सोम ही अन्नरूप और अभि ही अन्नाद है। यह अगिसोमात्मक ब्रह्मकी अतिसृष्टि है कि उसने अपनेसे श्रेष्ठ देवताओंकी रंचना की यानी अपने उत्तम भागसे देवता बनाये। उसने स्वयं मर्त्य होकर भी अमृतोंको उत्पन्न किया, इस कारण यह अतिसृष्टि है। जो इस प्रकार जानता है वह निश्चय करके अतिसृष्टिमें ही हो जाता है, यानी वह अवश्यमेव विभूतिमान् हो जाता है।। ६।। वि० वि. भाष्य-उस प्रजापतिने मुखको हाथोंसे मथकर मुखरूप योनि और हाथरूप योनियोंके द्वारा अभिदेवको उत्पन्न किया। यह उसका

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४८ बृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय

ब्राह्मणोंपर अनुग्रह था, क्योंकि व्राह्मण भी प्रजापतिके मुखसे ही उत्पन्न हुए हैं। अतः एक ही योनिसे उत्पन्न होनेके कारण दोनों भाई हुए। छोटे भाई पर बड़े भाई की नरह अभि भी ब्राह्मणपर अनुग्रह करता है, अतः अभि ब्राह्मणका देवता है। ये हाथ और मुख दोनों दाह कर नेवाले अभ्िदेव की योनि हैं। इसलिए ये दोनों भीतरसे चालरहित हैं, इसीसे इन दोनोंकी योनिसे समानता है। ऐसे ही उसने बलकी आश्रयभूत भुजाओंसे क्षत्रिय और उनके नियन्ता इन्द्रादिकों की सृष्टि की और चेष्टक आश्रयरूप ऊरुओंसे वैश्य जाति एवं उसके नियन्ता वसु आदिकोंको रचा। इसी तरह चरणोंसे पृथिवीदैवत, परिचर्यापरायण शूद्र जाति और पूषाको उत्पन्न किया। यदयपि मूलमें क्षत्रियादि तथा देवताओंकी उत्पत्तिका वर्णन नहीं है, तथापि यहाँ सृष्टिकी सर्वाङ्गताका अनुकीर्तन करनेके लिए श्रृति उसका कहे हुएके समान पपसंहार करती है। यह प्रजापतिकी अतिसृष्टि है, अर्थान अपनेसे भी बढ़ी हुई सृष्टि है। अतिसृरष्टि नाम उत्कृष्ट ज्ञानका फल है॥६ ॥। इस ग्रन्थमे संसारसे उद्धार होनेके लिए व्यक्त जगन्की बीजरूप अव्याकृता- वस्थाका वर्णन करते हैं, यथा- तद्द्ेदं तर्हव्याकृतमासीन्तन्नामरूपाभ्यामेव व्याक्रिय- तासौनामायमिद रूप इति तदिदमप्येतर्हि नामरूपा- भ्यामेव व्याक्रियते Sसौनामायमिटथ रूप इति स एष इह प्रविष्टः। आनखाभ्रेभ्यो थथा क्षुरः क्षुरधानेऽवहितः स्याद्विश्वंभरो वा विश्वंभरकुलाये नं न पश्यन्ति। अकृरस्नो हि स प्राणन्नेत्र प्राणो नाम भवति। वदन् वाक् पश्यश्रत्तुः शृण्वन् श्रोत्रं मन्वानो मनस्तान्यश्यैस्तानि कर्मनामान्येव। स योऽन एकैकमुपास्ते न स वेदाकृरस्ो ह्ेषोऽत एकैकेन भवत्यात्मेत्येवोपासीतात्र हेने सर्व एकं भवन्ति। तदेतत्प- दनीमस्य सर्वस्य यदयमारमाSनेन ह्येतत् सर्वं वेद। यथा ह त्रै पदेनानुविन्देदेवं कीर्ति श्लोकं विन्दते य एवं वेढ॥७॥। भावार्थ-यह जगन उत्पत्तमे पहले अव्याकृत था। फिर यह 'यह देवढत्त है 'यह शुक्क कृष्ण है' इस प्रकार नाम रूपके योगसे व्यक्त हुआ। जैसा कि इस

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म्राह्मस ४ ] विद्याविनोद भाष्य ४९

समय भी व्यवहारमें देखा जाता है कि 'यह पदार्थ इस नामवाला है तथा इस रूपवाला है।' अर्थात् इस समय भी यह अव्याकृत बस्तु 'इस नाम तथा इस रूपवाली है' इस प्रकार व्यक्त होती है। यह आत्मा नख-सिख पर्यन्त शरीरमें प्रविष्ट है, जैसे छुरा म्यानमें छिपा रहता है, अथवा जैसे विश्वका भरण करनेवाला अभि काष्ठमें गुप्त रहता है, किन्तु उसे कोई देख नहीं पाता। वह असम्पूर्ण है यानी वह इसलिए अपूर्ण है कि उसमें क्रियान्तरका संग्रह नहीं है। वह प्राणनक्रिया करनेके कारण प्राण, बोलनेके कारण वाक्, देखनेके कारण चन्ु, सुननेके कारण श्रोत्र और मनन करनेके कारण मन है। ये इसके कर्मानुसार नाम हैं, इसलिए जो इनमेंसे एक एककी उपासना करता है वह उसका नहीं जानता। वह असम्पूर्ण ही है, वह एक एक विशेषणसे ही युक्त होता है। उसकी 'आत्मा है' इस प्रकार ही उपासना करे. क्योंकि आत्मामें ही सारे धर्म एक हो जाते हैं। सो प्रत्येक षुरुपको इसी आत्माकी प्राप्तिका यत्न करना चाहिए। क्योंकि यह आत्मा है, इसी के द्वारा पुरुपको प्रत्येक पदार्थका ज्ञान होता है। जैसे लोग खोये हुए पशुका उसके खुरोंके चिह्नोंसे पता लगा लेते हैं ऐसे ही जो ऐसा जानता है, वह इसके द्वारा कीर्ति तथा स्तुति को प्राप्त करता है अथवा इष्टजनोंका सान्निध्य पाता है॥७॥ वि. वि० भाष्य-जब कोई नया पदार्थ उत्पन्न होता है तो उसमें नाम तथा रूपकी ही विशेपता होती है। जैसे सुवर्ण तो पहले भी था, पर बादमें उसका कटक, कुण्डल नाम हो गया, पर वास्तवमें है वह सोना ही। इसी प्रकार पहले यह जगत् अ्रव्यक्त था, जब नामरूपवाला हुआ तो व्यक्त हो गया। जिसके ईक्षणसे इसमें नामरूपकी विशेषता आई वही आत्मा अन्वेषण करने योग्य है, सबमें छिपे हुए उसको पाना ही पुरुपार्थ है।।७॥। अब यह समझाते हैं कि लोकहष्टिसे सबका अनादर करके आत्मतत्व ही क्यों जानने योग्य है. यथा- तदेतत्प्रेय: पुत्रात्प्रेयो वित्तातप्ेयोऽन्यस्मात्सर्वस्माद न्तरतरं यद्यमारमा। स थो्यमातमनः प्रियं ब्रुवाणं ब्रयात् प्रिय ५ रोत्स्यतीतीश्वरो ह तथैव स्यादात्मानमेव प्रियमुपासीत सय आत्मानमेव प्रियमुपास्ते न हास्य प्रियं प्रमायुकं भवति ॥८॥ ७

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बृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय ₹

भावार्थ-वह यह आत्मतत्त्व पुत्रसे अधिक प्रिय है, धनसे अधिक प्यारा है और अन्य सभी पदार्थोंकी अपेक्षा अधिक प्रेमास्पद है। क्योंकि यह आत्मपदार्थ उन सबकी अपेक्षासे अन्तरतम है। जो आत्मासे भिन्न पदार्थको प्रिय मानना है. उससे यदि आत्मवेत्ता पुरुष कहे कि 'तेरा प्राण जैसा प्रिय पदार्थ नष्ट हो जायगा' तो वैसा ही होकर रहेगा। क्योंकि वह आत्मप्रियदर्शी जन समर्थ होता है। अतएव उचित है कि पुत्रादिकोंमें प्रियताका अभिमान छोड़कर आत्मरूप प्रियतमकी ही उपासना करे। जो आत्माको प्रिय जानता हुआ उसकी उपासना करता है उसका अत्यन्र प्रिय मरणधर्मा नहीं होता. अथवा उसे कोई अनात्मपदार्थ दुःखदायी नहीं होता है ॥ ८ ॥ वि० वि० भाष्य-लोकमें पुत्र अत्यन्त प्रिय है. पर आत्मा उससे भी परम प्रिय है। यद्यपि प्राणादि भी प्रिय हैं और पुत्र धनादि बाह्य पदार्थोंकी अपेक्षा अभ्यन्तर हैं, पर आत्मा उनसे भी अभ्यन्तर है। आत्माको सबसे प्रियतम माननेवाला ब्रद्मवेत्ता ऐसा समर्थ हो जाता है कि वह जिसको जो कह देता है वह वैसा ही हो जाता है।८।। श्रुतिने सर्वोपनिषठ्प्रतिपाद्य ब्रह्मविद्याको 'आत्मेत्येवोपासीत' इस वाक्से सूत्र रूपमें कह दिया। अब उस सूत्रकी व्याख्या करनेकी इच्छा से श्रुति उसका प्रयोजन बोधन करती हुई उपोद्घात करती है, यथा- तदाहुर्यदब्रह्मविद्यया सर्वं भविष्यन्तो मनुष्या मन्यन्ते किमु तदब्रह्माऽवेद्यस्मात्तरसर्वमभवदिति ॥ ६॥ भावार्थ-ब्रह्मको जाननेके अभिलाषियांने यह कहा कि ब्रह्मविद्या द्वारा हम सब हो जायँगे। मनुष्य ऐसा मानते हैं, सो उस ब्रह्मने क्या जाना, जिसके कारण वह सर्व हो गया ? ॥। है।। ब्रह्म क्या जानकर सर्व हुआ ? श्रुति इस प्रश्नका निर्दोष उत्तर देती है., यथा- ब्रह्म वा इदमग्र आसीत्तदात्मानमेवावेदहं ब्रह्मा- स्मीति। तस्मात्तत्सर्वमभवत् तद्यो यो देवानां प्रत्यबुध्यत स एव तदभवत्तथर्षीणां तथा मनुष्याणां तद्धैतत्पश्यन्नृषि- र्वामदेवः प्रतिपेदेऽहं मनुरभव५ सूर्यश्रेति। तदिदमप्ये- तर्हिं य एवं वेदाऽहं ब्रह्मास्मीति स इद५ स्वं भवति

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ब्राध्मस ४ ] विद्याविनोद भाष्य ५१

तस्य ह न देवाश्चनाभूत्या ईशते। आत्मा ह्येषाथ स भव- त्यथ योऽन्यां देवतामुपास्तेऽन्योSसावन्योऽहमस्मीति न स वेद यथा पशुरेवध स देवानाम्। यथा ह वै बहवः पशवो मनुष्यं भुञ्जयुरेवमेकैकः पुरुषो देवान् भुनक्त्येक- स्मिन्नेव पशावादीयमानेऽप्रियं भवति किमु बहुषु तस्मा- देषां तन्न प्रियं यदेतन्मनुष्या विद्युः।। १० ।। भावार्थ-सृष्टिसे पहले एकमात्र ब्रह्म ही था। उसने अपने आपको "मैं ब्रम्म हूँ' ऐसा जाना। इसीसे वह सर्व हो गया। देवोंमें से जिस जिसने उसे जाना वह ब्रह्मवत् हो गया। इसी प्रकार ऋषियों तथा मनुष्योंमें से भी उसके ज्ञाता तद्रूप हो गये। उस ब्रह्मके अपहतपाप्मादि गुणोंको धारण करके वामदेव ऋषिने कहा-'मैं मनु हुआ और सूर्य भी हुआ। अब भी जो इस प्रकार समझता है कि मैं ब्रह्म हूँ, वह सर्वात्मभावयुक्त हो जाता है। ऐसे मनुष्यका ऐश्वर्य दूर करनेमें देवता भी समर्थ नहीं होते, क्योंकि वह उनका आत्मा ही हो जाता है। 'यह दूसरा है, मैं अलग हूँ' इस प्रकार जो अन्य देवताकी उपासना करता है वह अनजान है। जिस प्रकार पशु होता है उसी प्रकार वह देवताओंका पशु है। जैसे बहुतसे पशु दोहन वाहन आदिसे एक एक मनुष्य का पालन करते हैं उसी तरह एक एक मनुष्य देवताओंका पालन करता है, यानी पशुस्थानीय अज्ञानी मनुष्य विषयभोग द्वारा इन्द्रियोंका पोषण करते हैं। यदि किसीका एक पशु भी ले लिया जाय तो उसको बुरा लगता है, फिर बहुत पशुओंका हरण होनेपर तो कहना ही क्या है ? अत एव देवताओंको यह प्रिय नहीं हैं कि मनुष्य ब्रह्मज्ञानी बन जायँ। यानी केवल कर्मी या पामर पुरुषोंकी इन्द्रियोंको यह प्रिय नहीं कि मनुष्य ब्रह्मात्मतत्त्वसे परिचित हों॥ १० ॥ वि• वि• भाष्य-मनुष्यको इन्द्रियोंका दास नहीं होना चाहिये। ये शत्रु भी हैं और मित्र भी हैं, जो इनके वशीभूत हो जाता है वह जीती हुई बाजी हार जाता है और जो इन्हें वश कर लेता है वह हारी हुई बाजी जीत लेता है। प्रमादग्रस्त इन्द्रियाँ मनुष्यको ऊँचा नहीं उठने देतीं, इसमें अधिक कहनेकी आवश्यकना नहीं है। बुद्धिमानोंको सक्केत ही पर्याप्त है। जो इन्द्रियोंके गुलाम हो रहे हैं उन्हें अपनी दुद्शाका हाल मालूम ही है, अतः हानि लाभ खुद सोचना चाहिए॥ १० ।

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।अध्याय*

अविद्वान्को कर्म करनेका अधिकार है, इसनं हेतु दिग्वानेके लिए उसीका वर्णन किया जाता है, यथा- ब्रह्म वा इदमग्र आसीदेकमेव तदेक सन्न व्यभ- वत्। तच्छ्रेयोरुपमत्यसृजत क्षल यान्येतानि देवत्रा क्षला- जीन्द्रो वरुणः सोमो रुद्रः पर्जन्यो यमो मृत्युरीशान इति। तस्मात् क्षलारपरं नास्ति तस्माद ब्राह्मणः क्षलियमधस्तादु- पास्ते राजसूये क्षत्र एव तद्यशो दधाति सैषा क्षत्रस्य योनिर्यद ब्रह्म। तस्माद्यद्यपि राजा परमतां गच्छति ब्रह्मैवा- न्तत उपनिश्रयति स्वां योनिं य उ एन हिनस्ति स्वा" स योनिमृच्छति स पापीयान् भवति यथा श्रेया"स हिॐसित्वा॥ ११॥ भावार्थ-प्रारम्भमें वह एक ब्रह्म ही था। वह विभूतियुक्त कर्म करनेमें इस लिए समर्थ नहीं हुआ कि वह उस समय अकेला था। उसने कल्याणस्वरूप क्षत्रिय जातिको उत्पन्न किया एवं देवताओंमें क्षत्रिय इन्द्र, वरुण, सोम. रुद्र, मेघ यम, मृत्यु और ईशानादिकोंकी रचना की। अतः क्षत्रियोंसे उत्तम कोई नहीं है। इसीसे राजसूय यज्ञमें ब्राह्मण नीचे स्थित होकर क्षत्रियका सत्कार करता है, उपा- गना करता है। वह क्षत्रियमें ही अपने यशको स्थापिन करता है। यह जो ब्राह्मण है क्षत्रियका कारण है, इसलिए यद्यपि क्षत्रिय उत्कृष्टना को प्राप्त होना है तथापि दाजसूयके अन्तमें ता वह ब्राह्मणका ही आश्रय लेता है। जो क्त्रिय इस ब्राह्मण को मारता है वह अपने कारणका ही विनाश करता है। जिम प्रकार उत्तम व्याक्त की हिंसा करनेसे मनुष्य पापी होता है वैसे ही वह कल्याणतर पदार्थके नाश करनेसे पापी होता है॥ ११ ॥। वि० वि० भाष्य-ब्राह्मण विज्ञानी होता है, वह अपने विज्ञानका मनन, प्रचार, प्रसार शान्त वतावरणपूर्ण प्रदेशमें ही करनेमें समर्थ होता है। शान्ति बनाये रखना बलका काम है, ज्ञानी तो शान्तिकालमे लाभ उठाने या अन्यको लाभ देनेवाला होता है। इससे ज्ञानीको किसी रक्षक बलीकी आवश्यकता पड़ी। अत एव क्षत्रिय जाति- की रचना की गई। यद्यपि श्रेष्ठता ज्ञानीको है तो भ्री ज्ञानियोंको यानी ब्राअ्मणोकुी

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शाह्ण ४ ] विद्याविनोद भाष्य ५३

बलवानोंकी यानी क्षत्रियोंकी उपासना, साहाय्यप्रार्थना करनी होती है। इस कारण ये दोनों अपने अपने स्थानपर श्रेष्ठ हैं ॥ ११ ॥ क्षत्रियोंकी उत्पत्तिके अनन्तर अन्योंकी उत्पत्तिको कहते हैं- स नैव व्यभवत् स विशमसृजत यान्येतानि देवजा- तानि गणश आख्यायन्ते वसवो रुद्रा आदित्या विश्वेदेवा मरुत इति॥ १२ ॥ भावार्थ-जब उस ब्रह्मने क्षत्रियोंकी रचना करके भी ऐश्वर्ययुक्त कर्म करने- में अपनेको समर्थ नहीं पाया, तो उसने वैश्य जातिकी रचना की। साथ ही वसु, रुद्र, आदित्य, विश्वेदेव और मरुन् इत्यादि देवगण जो ये गणशः कहे जाते हैं, उनकी भी रचना की ॥ १२॥ वि० वि० भाष्य-कोई ऐसी वस्तु चाहिए जो भिन्न भिन्न स्व्रार्थ और पृथक पृथक विचार आदिसे युक्त मनुष्योंको एकत्र करनेमें समर्थ हो। ऐसा लोकमें धन ही है। देखो, वह ब्रह्म अपनेमें धनोपार्जन करनेका अभाव होनेके कारण कर्म करनेमें समर्थ नहीं हुआ। उसने कर्मके साधनभूत धनका उपार्जन करनेके लिए वैश्य जातिको रचा। ये वैश्य गणदेवताओंसे जात हैं, गणदेवना वे हैं जो गणशः (बहुतसे एक साथ) रहते हैं। इसीलिए वैश्य लोग गणप्राय होते हैं. यानी वे प्रायः अनेकों मिलकर ही धन कमानेका कारोबार करते हैं। जो देवता गण (समूह) बनाकर रहते हैं उनके गण ये हैं-वसु आठ संख्याका गण, रुद्र ग्यारहका, आदित्य बारहका और विश्वेदेव तेरहका समूह है तथा मरुन् उनंचास सदस्योंवाली श्रेणी है॥। १२ ।। अब परिचारकोंकी सृष्टि कहते हैं, यथा- स नैव व्यभवत् स शौद्ं वर्णमसृजत पूषणमियं वै पूषेयथ हीद& सर्वं पुष्यति यदिदं किंच ॥ १३ ॥ भावार्थ-इसपर भी वह ऐश्वर्यपूर्ण काम न कर सका। अतः उसने शूद्र वर्णकी उत्पत्ति की। शूद्रवर्ण पूषण है, यह परथिवी ही पूवा है. क्योंकि यह सम्पूर्ण प्राणिजातको अन्नादिसे पुष्ट करती है ॥ १३ ।। वि• वि. भाष्य-ज्ञानी भी हो गये. उनके रक्षक भी बन गये, उनके लिए जीवनधारणकी सामग्री देनेवाले भी तैयार हो गये। पर सेवकका अभाव होनेके कारण विभूतियुक्त कर्मोंकी गति रुकी ही रह गई। परिचर्यारप स्वाभाविक कर्म

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५४ बृह दारण्यकार्पानपद् [सध्याय १

करनेवाला शूद्र पुरुष सभी इतर वर्णोंका ऐसे पोपण करता है जैसे प्रथिवी अन्नादिकों- से सबका पालन करती है। आजकलके किसान और मजदूरोमें उक्त शूद्रका लक्षण घटता है। भगवान्का चरणस्थानीय शूद्र सबका सम्मान्य है। किसान देरके भण्डारोंको धान्यसे परिपूर्ण करता है और मजदूर धनसे खजाने भरता है॥ १३॥ उग्र क्षत्रियोंको नियन्त्रणमें रखनेवाले धर्मकी रचनाका वर्णन करते हैं, यथा- स नैव व्यभवत्तच्छ्ेयोरूपमत्यसृजत धर्मं तदेतत् क्षत्रस्य क्षत्रं यद्धर्मस्तस्माद्धर्मात्परं नास्त्यथो अबलीयान् बलीयाथ समाशथ सते धर्मेण यथा राजैवं यो वै स धर्मः सत्यं वै तत्तस्मात् सत्यं वदन्तमाहुर्धर्मं वदतीति धर्मं वा वदन्तथ सत्यं वदतीत्येतद ध्येवैतदुभयं भवति॥ १४ ॥ भावार्थ-वह चारों वर्णोंकी रचना करके भी विभूतियुक्त कम करनेमें समर्थ नहीं हो सका। उसने अत्यन्त कल्याणकारी धर्मका रचना की, यह धर्म क्षत्रियका भी नियन्त्रण करनेवाला है। इसीलिए ध्मसे बढ़कर कोई श्रेष्ठ नहीं है। धर्मके द्वारा निबल पुरुष भी बलवान्को जीतनेकी ऐसे इच्छा करता है, जैसे दुर्बल राजाकी सहायतासे प्रबल शत्रुको परास्त करनेकी शक्ति रखता है। यह जो धर्म है, वही सत्य है। इसी कारण लोग सत्यवक्ताको धर्मात्मा यानी धमयुक्त कथन करनेवाला और धर्मोपदेशकको सत्यवादी कहते हैं। क्योंकि ये सत्य तथा धर्म दोनों एक ही हैं॥ १४ ॥ पहले देव ब्राह्मणादि की सृष्टि कही गई थी, उसका अनुवाद करते हुए अब मनुष्य-ब्राह्मणादिकी सृष्टिका कथन करते हैं, यथा- तदेतद ब्रह्म क्षत्रं विट् शूद्रस्तदभिनैव देवेषु ब्रह्माभवद ब्राह्मणो मनुष्येषु क्षत्रियेण क्षत्रियो वैश्येन वैश्यः शूद्रेण शूद्रस्त- स्मादभावेव देवेषु लोकमिच्छन्ते ब्राह्मरो मनुष्येष्वेताभ्याy हि रूपाभ्यां ब्रह्माभवत्। अथ यो ह वा अस्माल्लोकात्सवं लोकमद्दष्ट्वा प्रैति स एनमविदितो न भुनक्ति यथा वेदो वाननूक्तोऽन्यद्वा कर्माकृतं यदिह वा अप्यनेवंटिन्महत्पुण्यं

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भाक्मण ४ ] विद्याविनोद भाष्य ५५

कर्म करोति तद्धास्यान्ततः क्षीयत एवात्मानमेव लोकमुपा- सीत स य आत्मानमेव लोकमुपास्ते न हास्य कर्म क्षीयते। अस्माद ध्येवात्मनो यद्यतकामयते तत्तत्सृजते।। १५।। भावार्थ-ये ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र चार वर्ण हैं। यह उत्पत्तिकर्ता ब्रह्म अगनिरूपसे देवताओंमें ब्राह्मण हुआ। फिर मनुष्योंमें ब्राह्मण रूपसे ब्राह्मण, क्षत्रिय रूपसे क्षत्रिय, वैश्य रूपसे वैश्य और शूद्र रूपसे शूद्र हुआ। इसीसे जो देवताओंके बीचमें रहकर कर्मका फल चाहते हैं वे अग्निमें ही कर्म करके ऐसा कर सकते हैं तथा उससे मनुष्योंके बीच ब्राह्मण जातिमें ही कर्मफलकी इच्छा करते हैं। भाव यह है कि जो मनुष्योमें रहकर कर्मका फल भोगना चाहता है उसे अभिमें कोई क्रिया नहीं करनी पड़ती। हाँ, जहाँ पुरुषार्थसिद्धि दैवाधीन है वहीं अगिसे सम्बन्ध रखनेवाले कर्मोंकी आवश्यकता होती है। जो स्वस्वरूपका याने आत्माका दर्शन किये बिना ही इस लोकसे चला जाता है, उसका यह अविदित आत्मलोक पालन नहीं करता, यानी उसके शोक मोहादिकी निवृत्ति नहीं होती। जिस प्रकार बिना अध्ययन किया हुआ वेद अथवा बिना अनुष्ठान किया हुआ कोई कर्म मनुष्यको लाभ नहीं पहुँचा सकता, इसी प्रकार स्व स्वरूपानुसन्धान विना मनुष्य यदि इस लोकमें कोई बड़ा भारी पुण्यजनक कर्म करे तो भी अन्तमें उसका वह कर्म च्ीण हो ही जाता है। अतः आत्मलोककी उपासना करनी चाहिये, यानी मनुष्यको आत्मानु- सन्धानमें कभी प्रमाद करना उचित नहीं है। आत्मलोककी उपासना करनेवालेके कर्म कदापि क्षीण नहीं होते, वह जिस जिस इष्ट पदार्थकी इच्छा करता है वह सब उसको मिल जाता है॥ १५।। वि. वि. भाष्य-जिसने अपने आत्माको पहचान लिया, उसने सब कुछ पा लिया। उसे आत्मतत्त्वानुचिन्तनसे आत्मैक्यका पता लग गया तो वह फिर किससे दुरव करना चाहेगा ? वह किसीसे द्रोह भी क्यों करेगा ? कोई अनुन्मत्त पुरुत आत्महा नहीं हो सकता, किसी दोपसे जो उन्मत्त हो उसकी बान अलग है॥१५॥ वे कर्म कौनसे हैं जिनसे मनुष्य पशुओंकी तरह परतन्त्र हो जाता है ? और वे देवादि कौन हैं जिनका कर्मों द्वारा उपकार किया जाता है? इन दोनोंको विस्नारसे कहते हैं, यथा- अथो अयं वा आत्मा सर्वेषां भूतानां लोक: स

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५६ बृहदारण्यकोर्पानपद् [अध्याय'

यज्जुहोति यद्यजते शेन देवानां लोकोऽथ यदनुब्नुते तेन ऋषीणामथ यत्पितृभ्यो निपृणाति यत्प्रजामिच्छते तेन पितृणामथ यन्मनुष्यान्वासयते यदेभ्योऽशनं ददाति तेन मनुष्याणामथ यत्पशुभ्यस्तृणोदकं विन्दति तेन पशूनां यदस्य गरहेषु श्वापदा वयाशस्था पिपीलिकाभ्य उपजीवन्ति तेन रेषां लोको यथा ह वै स्वाय लोका- यारिष्टिमिच्छेदेवश हैवंविदे सर्वाणि भृतान्यरिप्रिमिच्छन्नि तद्वा एतद्विदितं मीमाश सितम् ॥१६ ॥ भावार्थ-यह शरीरेन्द्रियसंघातविशिष्ट गृहम्थ कर्माधिकारी आत्मा सम्पूर्ण भूतोंका (जीवोंका) लोक है (भोग्य है, प्रकाशक है, सामर्थ्य देनेवाला है)। यह जो होम और यज्ञ करता है इससे देवताओंका भोग्य होता है। जो स्वाध्याय करता है उससे ऋपियोंका, जो पितरोंके लिए पिण्डोदकादि दान करता है तथा सन्तानकी इच्छा करता है उससे पितरोंका, जो मनुष्योंको वासस्थान तथा भोजनादि देता है उससे मनुष्योंका भोग्य पदार्थ होता है। इतना ही नहीं, बल्कि इस गृहस्थके घरमें जो कुत्ते मिल्ली आदि श्वापद् जन्तु, पत्ती और चींटी आदि जीव इसके सहारे जी रहे हैं, उससे यह इनका लोक है। जिस प्रकार लोकमें सध जीव खान पानादिसे अपना अविनाश चाहते हैं, उसी प्रकार ऐसा जाननेवालेका सब जीव (जिनके यह कम करता है, वे) संरक्षण चाहत हैं। कर्म अवश्य करना चाहिए यह बात ज्ञात है, यानी पंचमहायज्ञप्रकरण प्रसंगमें प्रसिद्ध है और वहीं इसकी मीमांसा की गई है। भाष्यकार कहते हैं कि अवदान प्रकरणमें इसपर विचार किया गया है॥ १६ ॥ वि. वि० भाष्य-यहाँ आत्मा शब्दमे उस गृहम्थ पुरुका ग्रहण ह जो ज्ञानवान नहीं है। जिसकी रुचि कमकाण्डमें बनी हुई है वह देवताओंसे लेकर चींटी पर्यन्त सबका लोक है-भोग है यानी सबके काम आनेवाला है। क्योंकि वर्णाभ्रमादि विहित कर्मोंके द्वारा वह सबका उपकारी है। जिन स्वाध्याय आदि कर्मोंसे वह सबको लाभान्वित करता है उनका मन्त्रमें स्पष्ट वर्णन है। होम यागादि रूप कर्मसे उसकी अवश्यकर्तव्यताके कारण मनुष्य पशकी तरह देवताओंके भधीन

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विद्याविनोद भाष्य ५७

होनेसे बँधा हुआ है, इसलिए वह उनका भोग्य है। जैसे मनुष्य अन्न पानादिसे अपने शरीरकी रक्षा चाहता है, उसी तरह सब देव पितर कीट आदि अपना उपकारी होनेके नाते इसकी रक्षा चाहते हैं। जिस प्रकार कोई कुटुम्बी अपने पशुओंकी रक्षा करता है, उसी प्रकार अपने अधिकारकी उन्नतिके लिए वे इसकी सब ओरसे रक्षा करते हैं। क्योंकि वे समझते हैं कि इस गृहस्थके शरीरके विनाशसे हम यज्ञभागोंके अधिकारसे च्युत हो जायँगे यानी रहित हो जायँगे। यही अच्युतिका भाव उन्हें गृहस्थकी रक्षा करनेको बाध्य करता है। भूतयज्ञ, मनुष्ययज्ञ, पितृयज्ञ, देवयज्ञ और ब्रह्मयज्ञ, ये पञ्चमहायज्ञ कहे जाते हैं। अवदान उसे कहते हैं जो घृतादिरूप हव्य एक आहुतिकी पूर्तिके लिए लिया जाता है॥ १६ ॥ उक्त विद्या-अविद्यारूप निवृत्ति-प्रवृत्ति मार्गोंमेंसे किसी भी एकमें प्रवृत्त होनेमें समर्थ ब्रह्मचारी स्वतन्त्र है, तो फिर वह किसकी प्रेरणासे भूताविष्ट मनुष्यकी तरह लाचार होकर दुःखरूप प्रवृत्तिभार्गीय कर्मोंमें ही प्रवृत्त होता है ? निवृत्ति- मार्गमें क्यों नहीं प्रवृत्त होता ? उसका वह कौन ऐसा प्रेरक है ? इस शङ्काके उत्तरमें कहा जाता है कि काम या कामना है, इसीके निर्णयके लिए कहते हैं, यथा- आत्मैवेदमग्र आसीदेक एव सोऽकामयत जाया मे स्यादथ प्रजायेयाथ वित्तं मे स्यादथ कर्म कुर्वीयेत्येतावान् वै कामो नेच्छश्चनातो भूयो विन्देत्तस्मादप्येतर्ह्येकाकी कामयते जाया मे स्याद्थ प्रजायेयाथ वित्तं मे स्वादथ कर्म कुर्वीयेति स यावदप्येतोषमेकैकं न प्राप्तोत्यकृरस् एव तावन्मन्यते तस्यो कृतस्नता मन एवास्यात्मा वाग्जाया प्राणः प्रजा चक्षुर्मानु्षं वित्तं चक्षुषा हि तद्विन्दते श्रोत्रं बैवंथ श्रोत्रेण हि तच्छृणोत्यात्मैवास्य कर्मात्मना हि कर्म करोति स एष पाङक्तो यज्ञः पाङक्त: पशुः पाङूक्त: पुरुषः पाङ्क्तमिद् सर्व यदिदं किंच तदिदश सर्वमान्नोति य एवं वेद॥ १७ ॥ भावार्थ-पहले वह एक आत्मा ही था, आत्मा यानी वह ब्रह्मचारी विवाहसे पहले अकेळा ही था। उसने इच्छा की कि 'मेरी स्त्री हो, फिर मैं

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५८ शृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय ₹

उसमें प्रजारूपसे पैदा होऊँ, मुझे धन मिले, जिससे मैं कर्म करूँ।' बस इतनी ही कामना है, इच्छा करनेपर इससे अधिक कोई नहीं पाता। इससे अब भी वह अकेला मनुष्य यह सङ्कल्प करता है कि मेरी स्त्री हो, फिर प्रजा हो, पुनः धन भी हो, तो फिर मैं कर्म करूँ। सो वह जबतक इनमेंसे एक एक को नहीं प्राप्त कर लेता तबतक अपने आपको अपूर्ण ही मानता है। उस ब्रह्मचारीकी पूर्णता इस प्रकार होती है-मन ही उसका आत्मा है, वाणी ही स्त्री है, प्राण ही सन्तति है और चक्षु ही मानुष धन है। क्योंकि आँखसे ही वह गौ प्रभृति मानुब धनको जानता है। श्रोत्र देववित्त है. क्योंकि श्रोत्रसे ही वह उपदेशको सुनता है। आत्मा (देह) ही इसका कर्म है, क्योंकि शरीरसे ही कमे करता है। यह यज्ञ पाङक्त है, पशु पाङ्क्त है, पुरुष पाङ्क्त है और यह जो कुछ है सब पाड्क है। जो ऐसा जानता है वह सब सुखोंको प्राप्त होता है॥ १७ ॥ वि० वि• भाष्य-इस मन्त्रमें आत्मा शब्दमे इन्द्रियसङघात, अवि- द्वान, देह तथा वर्णीका ग्रहण है। उसने अपनेमें कर्ता आदि कारक, क्रिया एवं कर्मात्मताकी अध्यारोपरूपा, स्वाभाविकी अविद्याजनित कामनासे युक्त हाकर कामना की। यह वह कामना है जो स्त्री आदि विपयके मूलमें दिखाई गई है। साध्य साधनरूप जो एषणायें हैं वे ही काम हैं। इसी कामसे प्रेरित हुआ अज्ञानी मनुष्य रेशमके कीड़के समान अपनेको विवश होकर उसमें लपेट लेता है, एवं अपनेको कर्ममागमें ही अटकाये रखकर बहिर्मुख हो आत्मलोकको नहीं जान पाता। जब वह पूर्णताका सम्पादन करनेमें असमर्थ होता है तो उससे श्रुति कहती है कि यह तेरा मन ही आत्मा है, क्योंकि यह कार्य-कारणसङघात मनका अनुसरण करनेवाला है, इससे प्रधान होनेके कारण उसमें मन ही आत्माके समान हैं। इस मन्त्रमें जो 'पाङक्त' शब्द भाया है. इसका अर्थ पॉच है। जैसे यह आत्मदर्शन पाडक्त है, यानी पाँचके द्वागा निष्पन्न हुआ यज्ञ है।१७।।

पञ्चम ब्राह्मण *2 यह सम्पूर्ण संसार कार्य-कारणरूपसे मात प्रकारसे विभक्त है और भाज्य है, इस कारण सप्तान्न कहा जाता है। ये मन्त्र सूत्रूप हैं, क्योंकि विनियोगके सहित ये संत्ेपसे इन अन्नोंके प्रकाशक हैं. यथा-

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त्राह्मण x ] विद्याविनोद भाष्य ५ूह

यत्सप्तान्नानि मेधया तपसाऽजनयत्पिता। एकमस्य साधारणं द्वे देवानभाजयत्। त्रीण्यात्मनेऽकुरुत पशुभ्य एकं प्रायच्छत्। तस्मिन्स्व प्रतिष्ठितं यच्च प्राणिति यच्च न। कस्मात्तानि न क्षोयन्तेऽय्यमानानि सर्वदा। यो वैताम- क्षितिं वेद सोऽन्नमत्ति प्रतीकेन। स देवानपिगच्छति स ऊर्जमुपजीवतीति श्र्लोकाः ॥ १॥ भावार्थ-पिता यानी प्रजापतिने धारणावती बुद्धिसे आलोचना करके, विज्ञान और कर्मके द्वारा सात अन्नोंकी रचना की। जिसे प्रतिदिन प्राणी खाते हैं वह सबका साधारण अन्न है, वह सभी प्राणियोंका भोज्य है। दो अन्न उसने देवताओंमें वितरण कर दिये। तीन अन्न अपने लिए रखे, एक अन्न पशुओंको दिया। पशुओंको दिये हुए अन्नमें जो प्राणनक्रिया करते हैं और जो नही करते वे सभी उस आहारके आधार पर टिके है। वे उक्त अन्न प्रतिदिन खाये जाने पर भी क्यो नहीं नाशको प्राप्त होते ? जो इस अन्नके अक्षयभाव यानी नाश न होनेवाले कारणको जानता है, वह मुखरूप प्रतीकके द्वारा श्रन्न भक्षण करता है, वह देवभावको प्राप्त होकर अमृतका भोक्ता होता है। इस विषयमें ये निम्नलिखित मन्त्र हैं। १ ॥। वि० वि. भाष्य-प्रकृत मन्त्रमें सप्तान्न तो कह दिये, किन्तु उनका नाम नही बताया। यह अगले मन्त्रमें कहा जायगा। अगला मन्त्र इसीकी व्याख्या है।। १ ।। वेदमें (मन्त्र, ब्राह्मण, आरण्यकमें) मन्त्रोंका अर्थ गूढ़ होता है, इसी कारण प्रायः जल्दी समझमें नही आता। अतः उसके दुर्बोध रहस्यार्थकी व्याख्या करनेके लिए ब्राह्मणादि प्रवृत्त होते है, जैसे यह निचला ब्राह्मण है- त्ससान्नानि मेधया तपसाऽजनयत्पितेति मेधया हि तपसा ऽजनयत्पिता। एकमस्य साधारणमितीदमेवास्य तत्सा- धारणमन्नं यदिदमद्यते। स य एतदुपास्ते न स पाप्मनो व्यावर्शते मिश्रथ ह्येतत्। द्े देवानभाजयदिति हुतं च प्रहुतं

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६० [अध्याय १

च तस्माददेवेभ्यो जुह्वति च प्र च जुह्वत्यथो आहुर्दर्शपूर्ण- मासाविति। तस्मान्नेष्टियाजुकः स्यात्। पशुभ्य एकं प्राय- च्छदिति तत्पयः । पयो ह्येवाग्रे मनुष्याश्च पशवश्चोपजीवन्ति तस्मात् कुमारं जातं घृतं वैवाओ्रे प्रतिलेहयन्ति स्तनं वाऽनु- धापयन्त्यथ वत्सं जातमाहुरतृणाद इति। तस्मिन् सर्व प्रतिष्ठितं यच्च प्राणिति यच्च नेति पयसि हीद सर्व प्रतिष्ठितं यच्च प्राणिति यच्च न। तद्यदिदमाहुः संवत्सरं पयसा जुह्ृदप पुनर्मृत्युं जयतीति न तथा विद्याददहरेव जुहोति तदहः पुनर्मृत्युमपजयत्येव्रं विद्वान्सर्व" हि देवे- भ्योऽन्नादं प्रयच्छति। कस्मात्तानि न क्षीयन्तेऽद्यमानानि सर्वदेति पुरुषो वा अक्षितिः स हीदमन्नं पुनः पुनर्जनयते। यो वैतामक्षितिं वेदेति पुरुषो वा अक्षितिः स हीदमन्नं धिया घिया जनयते। कर्मभिर्यद्धैतन्न कुर्यात्क्षीयेत ह सोs- न्नमत्ति प्रतीकेनेति मुखं प्रतीकं मुखनेत्येतत्। स देवानपिग- च्छति स ऊर्जमुपजीवतीति प्रशसा । २।। भावार्थ-परमपिताने ज्ञान कर्मसे सात अन्नोंको उत्पन्न किया, जिसको प्राणी प्रतिदिन खाते हैं वह साधारण अन्न है। जो इसकी उपासना करता है वह पापसे दूर नहीं होता है, क्योंकि यह सम्पूर्ण जीवोंका सम्मिलित भाग है, यानी इसमें सर्वसाधारणका हिस्सा है। उसने 'हुत' और 'अहुत' ये दो अन्न देवता- ओंको बाँट दिये। इसलिए अब भी गृहस्थ लोग होम, बलिवैश्वदेव करते हैं। कई आचार्य दर्श और पौर्णमास यज्ञको देवान्न मानते हैं। इसलिए गृहस्थको उचित है कि वह कामना सहित यज्ञ न करे। एक अन्न पशुओंको दिया गया, वह दूध है, क्योंकि जन्म होते ही मनुष्यका तथा पशुका दूधसे ही जीवन धारण होता है। इस- लिए उत्पन्न होते ही बालकको प्रथम घृन चटाते हैं या स्तनपान कराते हैं और उत्पन्न हुए बछड़ेको अतृणाद कहते हैं. याने घास न खानेवाला कहते हैं, अर्थान् कहते हैं कि यह अ्रभी दुग्धाहारी है। जो प्राणन करते हैं और जो प्राणनक्रिया नहीं

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शह्मणे ५ ] विद्याविनोद भाष्य ६१

करते वे सब इस पश्वन्नमें ही प्रतिष्ठित हैं, यानी सम्पूर्ण प्राणी दूधके ही आधारपर हैं। कोई आचार्य ऐसा कहते हैं कि मनुष्य जो एक वर्ष पर्यन्त दूधसे (धृत दुग्घादिसे) हवन करता हुआ मृत्युको जीत लेता है, यह इतना ही कहना ठीक नहीं है। हाँ, यह सही है कि वह जिस दिनसे होम करता है उसी दिनसे मृत्युको जीत- लेता है। अर्थात् सालभरकी अपेक्षा नहीं करता, वह तो उसी दिनसे मृत्युको जीतनेके लिए मार्ग बनाता है। इस प्रकार जाननेवाला यानी ऐसा उपासक पुरुष देवताओंको अन्नाद्य प्रदान करता है। पहले जो यह प्रश्न किया गया था कि प्रतिदिन भक्षण करने पर भी अन्न क्यों नहीं समाप्त हो जाते ? ऐसा न होनेका कारण यह है कि पुरुष अविनाशी है, यानी भोक्ता ही अन्नके क्षीण न होने देनेका कारण है, क्योंकि वही यज्ञ द्वारा बार बार अन्नको उत्पन्न कर देता है। जो कोई भी इस अक्षय भावक्रो जानता है, अर्थात् पुरुष ही क्षय रहित है, यही इस अन्नको ज्ञान और कर्म द्वारा उत्पन्न करता है, यदि वह इस अन्नको पैदा न करे तो निश्चय ही यह अन्न प्रतिदिन भोगनेसे नष्ट हो जाय, ऐसा जाननेवाला मुखरूप प्रतीकके द्वारा अन्न खाता है। वह देवताओंको प्राप्त होता है और अमृतका उपजीवी होता है। यह प्रशंसा यानी फलश्रुति है॥२ ॥ वि० वि० भाष्य-'एतावान् वै कामः' इस वाक्यसे यह बतलाया गया है कि स्त्री आदि ही एषणा है, एषणा किसी फलको लेकर होती है। यहाँ शंका होती है कि जैसी जाया आदि-विनयक कामना है, वैसी ही मोक्षविषयक भी कामना है। यदि जायादि-विषयक कामना संसारके बंधनमें डालनेवाली है, तो ऐसी ही मोक्षविषक कामनाको भी होना चाहिए। उत्तर है कि कामना रागके कारण होती है, किन्तु राग दूसरेमें होता है। ब्रह्मविद्याके विषयभूत मोक्षमें द्वैतका यानी द्वितीयताका सर्वथा अभाव है, अतः ब्रह्मविद्याके विपयमें कामनाका होना नहीं बनता। ब्रह्मविद्याके विषयमें तो सबकी एकता हो जाती है, वहाँ कामना का होना कहाँ सम्भव है? ॥२ ॥ इस समय मन्त्रक्रमका उल्लंघन कर अर्थक्रमके अनुरोधसे साधनरूप चार अन्नोंका व्याख्यान करके साध्य फलभूत तीन अन्नोंका प्रतीक लेकर व्याख्या की जाती है, यथा- त्रीण्यात्मनेऽकुरुतेति मनोवाचं प्राणं तान्यात्मनेडकुरु-

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६२ पृहदारण्य कापनपद [अष्याय ₹

नान्यत्रमना अभूवं नादर्शमन्यत्रमना अभृवं नाश्रोषमिति मनसा ह्येव पश्यति मनसा शृणोति। कामः संकल्पो विचि- कित्सा श्रद्धाऽश्रद्धा धृतिर्हीर्धीर्भीरित्येतत्सर्व मन एव तस्मादपि पृष्ठत उपस्पृष्टो मनसा विजानाति यः कश्च शब्दो वागेव सा। एषा ह्यन्तमायतेषा हि न प्राणोडपानो व्यान उदान: समानोऽन इत्येत्सर्व प्राण एवैतन्मयो वा अयमात्मा वाऊ्वयो मनोमयः प्राणमयः॥३॥ भावार्थ-उसने तीन अन्न अपने लिए किये, वे हैं मन. वाणी और प्राण। इनको उसने अपने लिए निश्चित किया। जैसे लोकमें मनुष्य कहता है कि 'मेरा मन अन्यत्र होनेसे मैंने नहीं देखा' 'मेरा चित्त दूसरी तरफ था इससे मैंने नहीं सुना' इससे निश्चय होता है कि वह मनसे ही देखता है तथा मनसे ही सुनता है। स्त्री- विधयक कामना, निश्चयात्मिका बुद्धि, संशय, श्रद्धा, अश्रद्धा, धृति. अधय, लज्जा. बुद्धि, भय ये सब मन ही हैं। पृष्ठभागमें किये हुए स्पर्शको भी मनुष्य मनसे ही जानता है, इससे भी मनका अस्तित्व असन्दिग्ध है। वाक ही सम्पूर्ण अर्थके प्रकाशक वर्णात्मक शब्दोंका स्वरूप है, क्योंकि वाणी ही पदार्थोंके निर्णय तक पहुँचती है, इसीलिए प्रकाश्य नहीं है। प्राण, अपान, व्यान, उदान, समान और अन ये सब प्राण ही हैं। यह आत्मा-शरीर एतन्मय है, यानी वाङमय, मनोमय और प्राणमय है, अर्थात् यह कार्यकारण-संघातरूप देह वाणी, मन तथा प्राणका ही विकार है।। ३ ।।

वि० वि• भाष्य-नेत्र रूप ग्रहण करता है, पर एक ऐसी भी वस्तु है जिसकी सन्निधि न रहनेसे रूप उस दशामें भी ग्रहण नहीं होता जब कि नेत्र विद्यमान है। इससे प्रतीत हाता है कि उन नेत्रादिसे भिन्न, समस्त इन्द्रियोंके विषयोंसे सम्बन्ध रखनेवाला मन नामका कोई अन्तःकरण है। इससे यह आया कि लोग मनसे ही देखते सुनते हैं। इससे मनका अस्तित्व तो सिद्ध हो गया, किन्तु उसका स्वरूप क्या है यह भी मालूम होना चाहिए। इसपर कहते हैं-काम-अनेक तरहकी अभिलाषादि, सक्कल्प-सामने जो वस्तु है तद्विषयक शुक्क नीलादि भेदसे विशेष कल्पना करना, विचिकित्सा-संशयज्ञान, श्रद्धा-जिनका भटष्ट फल हो उन

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बाघ्ण ५] विद्याविनोद भाष्य ६३

कर्मोंमें और देवतादिकोंमें आस्तिकबुद्धि, अश्रद्धा-श्रद्धासे विपरीत भाव रखना,धृति- देहादिकोंके शिथिल होनेपर उन्हें सँभाले रखने, अधृति-धृतिके विपरीत होना, ह्री- लज्जा, धी-बुद्धि, भी-भय इत्यादि प्रकारके ये सब भाव मन यानी अन्तःकरणके रूप हैं-। मनकी सिद्धिमें दूसरी यह भी बात है कि किसीको पीछेसे छूवो तो भी मनुष्य विवेक द्वारा यह जान लेगा कि पीठपर हाथ आदिका स्पर्श है। यहाँ विवेक करने- वाला मन है, अन्यथा त्वचामात्रसे ऐसा विवेकज्ञान कैसे हो सकता है? वस, इसका कारण मन है।। ३ ॥। वागादिकोंकी आध्यात्मिकी विभूतिको कहकर अब इनकी आघिभौैतिक विभूतिका वर्णन किया जाता है, यथा- त्रयो लोका एत एव वागेवायं लोको मनोऽन्तरिच्षलोक: प्राणोऽसौ लोकः ॥४ ॥ भावार्थ-ये ही तीनों लोक है; वाणी ही यह लोक है, मन अन्तरिक्षलोक है और प्राण वह लोक है, यानी स्वर्ग है।।४ ।। वि० वि० भाष्य-वाणी भूलोक, इसलिए है कि इससे सबकी सत्ताका प्रकाश होता है। मन अन्तरिक्षलोक है, यानी रहस्यका प्रकाशक है, और प्राण स्वर्गलोक यानी जीवनरूप सुखका प्रकाशक है। ये तीनों लोक भूः, भुवः तथा स्व: नामक हैं । ४ ॥ इसी प्रकार वेदोंका भी समन्वय है, यह कहते हैं- त्रयो वेदा एत एव वागेवर्ग्वेदो मनो यजुर्वेद: प्राण: सामवेदः ।। ५ ।। भावार्थ-ये ही तीनों वेद हैं; वाक ऋग्वेद है, मन यजुवंद है और प्राण सामवेद है।। ५।। वि० वि० भाष्य-वाणीको ऋग्वेद इसलिए कहा गया है कि ऋग्वेदके बिना मनुष्य मूककी तरह प्रतीत होता है। मन यजुवद है, क्योंकि यजुःके बिना पुरुष नष्टमन प्रतीत होता है। प्राण सामवेद है, क्योंकि सामगायनके बिना मनुष्यके प्राण आप्यायमान नहीं होते, यानी आनन्दसे पूर्ण नहीं होते ।। ५॥

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६४ बृहदारण्यकोपनिषद् [अभ्याय १

देवाः पितरो मनुष्या एत एव वागेव देवा मनः पितरः प्राणो मनुष्याः ॥६॥ भावार्थ-देवता, पितृगण और मनुष्य ये ही है; वाक ही देवता है, मन पितृगण हैं और प्राण मनुष्य हैं॥ ६ ॥ वि० वि० भाष्य-सत्य भापण करनेवाली वाणी देवता है, 'सत्यमेव जयते' सदा सत्यकी जय होती है, साँचको आँच नहीं। सत्यसङ्कल्प मनुष्य ही पितृगण यानी पितृतुल्य पूज्य और सबमें बड़ा होता है। सत्कर्मका हंतु प्राण है उस्ीसे मनुष्यका सफल जीवन होता है॥ ६ ॥ पिता माता प्रजैत एव मन एव पिता वाखयाता प्राण: प्रजा।।७।। भावार्थ-ये ही पिता, माता और प्रजा हैं; मन ही पिता है, वाणी माता है और प्राण प्रजा है।। ७।। वि० वि० भाष्य-सत्य सङ्कल्पवाला मन ही पिता है, यानी सत्य भाषण करनेवालेका पालक मन होता है। सत्य भापण करनेवाली वाणी मातृवत हित करनेवाली माता ही होती है और सत्कर्मका हेतु प्राण प्रजा यानी प्रजावत् प्रिय होता है।।७॥ विज्ञातं विजिज्ञास्यमविज्ञातमेत एव यत्किंच विज्ञानं वाचस्तद्रूपं वाग्घि विज्ञाता वागेनं तन्ज्ृत्वाऽवति ॥८॥ भावार्थ-विज्ञात, विजिज्ञास्य और अविज्ञात ये ही हैं; जो कुछ विज्ञात है वह वाकका रूप है, वाक ही विज्ञाता है, वाकू अपने ज्ञाताकी विज्ञात होकर रक्षा करती है।। ८॥ वि० वि० भाष्य-प्रकाशरूप होनेके कारण वाक ही विज्ञाता है, यानी अर्थोंकी बोधक है। वाककी विभूतिको जो जानता है, उसकी यह विज्ञात होकर अन्नरूपसे रक्षा करती है॥ ८॥ यत्किंच विजिज्ञास्यं मनसस्तद्रपं मनो हि विजिज्ञास्यं मन एनं तन्द्ूत्वाऽवति॥ ६॥ भावार्थ-जो कुछ विजिज्ञास्य है वह मनका रूप है, मन ही विजिज्ञास्य है वह विजिज्ञास्य होकर इस ज्ञाताकी रक्षा करता है।। ९॥ वि० वि० भाष्य-जो कुछ विचारने योग्य है वह मनका स्वरूप है, क्नोंकि

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शाख्मण x ] विद्याविनोद भाष्य ६५

मनसे ही अर्थका विचार होता है। इसलिए विचारका साधन मन ही विचारकर्ताके लिए अन्न है, यानी विचार द्वारा उसका रक्षक है।।ह।। यत्किंचाविज्ञातं प्राणस्य तद्रपं प्राणो ह्यविज्ञातः प्राण एनं तन्द्रूरवाऽवति ॥ १० ।। भावार्थ-जो कुछ अविज्ञात है, वह प्राणका रूप है, प्राण ही अविज्ञात है। प्राण अविज्ञात होकर इसकी रक्षा करता है॥ १०॥ वि० वि० भाष्य-यह कहा गया है कि जो कुछ अविज्ञात है वह प्राणका स्वरूप है, क्योंकि जो मन-वाणीका विपय ज्ञातव्य है वही प्राणके लिए अज्ञात है। क्योंकि प्राणमें केवल क्रियाशक्ति है, ज्ञानशक्ति नहीं, अतः प्राण ज्ञानशक्तिसे शून्य है। वह क्रियाशक्ति द्वारा रक्षक है, इस कारण प्राणको इसका अन्न कहा है॥ १० ।। यहाँ तक वाक, मन और प्राणके आधिभौतिक विस्तारकी व्याख्या की गई, अब उनका आधिदैविक विस्तार आरम्भ किया आता है- तस्यै वाचः पृथिवी शरीरं ज्योतीरूपमयमग्निस्तद्याव- त्येव वाक्तावती पृथिवी तावानयमभनिः॥११॥ भावार्थ-उस वाणीका पृथिवी शरीर है और वह अभि ज्योतिरूंप है। वहाँ जितनी वाणी है, उतनी ही पृथिवी है और उतना ही वह अभि है॥ ११ ।। वि० वि० भाष्य-वाणी प्रथिवी है यानी वह पृथिवीकी तरह अतिविस्तृत है और प्रकाशस्वरूप होनेसे अभि है। जितनी पृथिवी है उतनी ही वाणी है, तथा उतनी ही अभि है॥ ११ ।। अब उपासनाके फल सहित इन्द्ररूप प्राणकी सृष्टिका वर्णन करते हैं, यथा- अथैतस्य मनसो ययौः शरीरं ज्योतीरूपमसावादित्य- स्तयावदेव मनस्तावती द्यौस्तावानसावादित्यस्तौ मिथुन। समैतां ततः प्राणोऽजायत स इन्द्रः स एषोऽसपल्नो द्वितीयो वै सपत्ो नास्य सपलो भवति य एवं वेद ॥ १२।। भावार्थ-इस मनका शरीर दुलोक है, यानी यह मन द्युलोककी तरह विस्वृत है। यह ज्योनिरूप आदित्य है, क्योंकि इन्द्रियोंका प्रकाशक है। जितना ९

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६६ बृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय १

मन है उतना ही दुलोक और उतना ही वह आदित्य है क्योंकि अन्तरिक्षकी तरह मन भी सब विषयोंकी ओर फैला हुआ है। या यों कहो कि अन्तरिक्षमें सूर्य विस्तृत है। वे आदित्य और अगि मिथुन हुए-संगत हुए, तब प्राण उत्पन्न हुआ। भाव यह है कि जब अन्तरित्ष में सूर्यकी उष्णता फैली तो उससे मार्ताररश्वा (वायु-प्राण) उत्पन्न हुआ। वह इन्द्र ह यानी उसीका नाम इन्द्र है। वह असपत्र यानी शत्रुहीन है, क्योंकि उसके समान अन्य कोई वायु नहीं। दूसरा होनेपर ही प्रतिपक्ी शत्रु होता है। जो प्राणके भावको इस पूर्ण प्रकारसे जानता है उसका कोई शत्रु नहीं होता ।। १२।। वि० वि० भाष्य-जैसे यहाँ अभ्यात्म दृष्टिसे यह बताया गया है कि 'मन इसका आत्मा है, वाणी जाया है और प्राण प्रजा है, तथा अधिभूत दृष्टिसे यह भी कहा गया है कि मन पिता है, वाणी माता है और प्राण प्रजा है। ऐसे ही अधिभूत दृष्टिसे भी उसे उनकी प्रजा बोधन करनेके लिए यह सब कथन किया गया है ॥ १२ ।। आत्माके लिए जिन अन्नोंकी रचना की गई है, उनकी अन्तवान् तथा अनन्त रूपसे जो उपासना करता है, उसको होनेवाले फलका वर्णन करते हैं- अथैतस्य प्राणस्यापः शरीरं ज्योतीरूपमसौ चन्द्रस्त- द्यावानेव प्राणस्तावत्य आपस्तावानसौ चन्द्रस्त एते सर्व एव समा: सर्वेऽनन्ताः स यो हैतानन्तवत उपास्तेऽन्त- वन्तथ स लोकं जयत्यथ यो हैताननन्तानुपास्तेऽनन्त११ स लोकं जयति॥१३ ॥ भावार्थ-इस प्राणका जल शरीर है, अर्थान् प्राण जलकी तरह सारे शरीरमें व्याप्त है तथा यही शरीरमें जीवनप्रद होनेसे चन्द्रमा है। वहाँ जितना प्राण है, उतना ही जल है अर्थात् जलकी तरह प्राण शरीरमें व्यापक है, तथा जलके आधार पर है। जितना जल है, उतना ही चन्द्रमा है, क्योंकि जहाँ जहाँ जल है वहाँ वहाँ शीतलता है। जो इन्हें अन्तवान् समझकर उपासना करता है वह अन्तवान् होकर विजयी होता है, एवं जो इनको अल्प जानता है उस का ज्ञान भी अल्प होता है। जो इनको अनन्त समझकर उपासना करता है वह अनन्त होकर जय प्राप्त करता है। भाव यह है कि जो इनको बड़ा जानता है उसका ज्ञान भी बृहत् होता है।। १३ ।।

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शेक्ण ५ ] विद्याविनोद भाष्य ६७

वि० वि० भाष्य-वे ये वाक, मन और प्राण सब समान है, अर्थात् तुल्य व्याप्तिवाले ही हैं। अध्यात्म और अधिभूतके सहित जितना भी प्राणियोंका विषय है ये उस सबको व्याप्त करके स्थित हैं। अतः ये अनन्त हैं यानी संसार की स्थिति पर्यन्त रहनेवाले हैं ॥ १३ ॥ अब पुरुषको षोडशकल संवत्सर रूपसे वर्णन करते हैं, यथा- स एष संवत्सरः प्रजापतिः षोडशकलस्तस्य रात्रय एव पञ्चदश कला ध्रुवैवास्य बोडशी कला स रात्रिभिरेवा च पूर्यतेऽप च क्षीयते सोऽमावास्याथ रात्रिमेतया षोडश्या कलया सर्वमिदं प्राणभृद्नुप्रविश्य ततः प्रातर्जायते तस्मा- देताथ रात्रिं प्राणभृतः प्राणं न विच्छिन्यादपि कृकलास- स्यैतस्या एव देवताया अपचित्यै॥१४ ॥ भावार्थ-वह यह तीन अन्नरूप संवत्सर प्रजापति सोलह कलाओंवाला है। रात्रियाँ ही उसकी पन्द्रह कला हैं, उसकी सोलहवीं कला ध्रुवा है, यानी उसकी सोलहवीं चिद्रूपा कला नित्या है। वह रात्रियोंके द्वारा ही वृद्धिको प्राप्त होता है और क्षीण होता है, यानी वह पुरुष कलाओंके द्वारा ही शुक्ध पक्षमें पूर्ण और कृष्ण पक्षमें न्यून होता है। अमावस्या की रात्रिमें वह इस सोलहवीं कलासे इन सब प्राणियोंमें अनुप्रविष्ट होकर फिर अगले दिन प्रातः कालमें उत्पन्न होता है। भाव यह है कि वह सोलहवीं कलासे लिङ्गशरीरमें प्रवेश करके फिर सुधुप्ति के अन्तमें जाग्रत् अवस्थाको प्राप्त होता है। इसी लिए इस रात्रिको किसी प्राणीके जीवनका हनन न करे-किसी प्राणीके प्राणका घात न करे। यहाँ तक कि इस देवताकी पूजाके लिए इस रात्रिमें गिरगिटके भी प्राण न ले, यानी छिपकली तकको न मारे ॥ १४ ॥ वि० वि० भाष्य-यह संवत्सरात्मा यानी कालरूप प्रजापति सोलह कला-अवयवोंवाला है। कालरूप प्रजापतिकी तिथियाँ ही पन्द्रह कलाएँ हैं और सोलह संख्या की पूर्ति करनेवाली कला नित्य व्यवस्थित है। उसका रात्रि दिन- से ही घटने बढने का व्यापार होता रहता है। यह पूर्णमासी तक बढ़ता है तथा अमावस्या तक घटता है, ये दो उसकी ध्रुवा कला हैं ( ये दो नहीं हैं, ये तो उसकी

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[अध्याय ?

बढने घटनेको अवधि है)। अमावस्याकी रात्रिमें यह चन्द्रमा अपनी ध्रुवा कला के सहित समस्त प्राणिसमुदायमे अनुप्रवष्ट होकर विद्यमान रहता है, इसलिए इस अमावस्याकी रात्रिमे प्राणीका न मारे। यहों तक कि गिरगिटके भी प्राण न ले। प्रकृत मन्त्रमे विशेष रूपसे गिरांगटका ही नाम लेनेका क्या आशय है? इसपर कहते हैं-गिरगिट पापी प्राणी है, यह किसीका कोई खास काम भी नही करता। अतः बहुतसे लोग इसे यह समझकर मार डालत हैं कि यह देखनेमे अमङ्गलस्वरूप है, मनहूस है तथा वेकाम भी है। यहां इस छविपकलीका ग्रहण उपठक्षणार्थ है, यानी इस दिन किसी भी तुच्छातितुच्छ, पापीसे पापी जीवको जरा भी पीडा न पहॅुचावे॥। १४ ॥ सालह कलावाला संवत्सर प्रजापति अन्य् नही है, वह अन्रापासक ही है, यह कहते हैं, यथा- यो वै स संवत्सरः प्रजापतिः षोडशकलोऽयमेव स योऽयमेवंवितपुरुषस्तस्य वित्तमेव पश्चदश कला आत्मैवास्य षोडशी कला स वित्तेनैवा च पूर्यतेऽप च क्षीयते तदेत- न्नभ्यं यद्यमात्मा प्रधिर्वित्तं तस्माय्यद्यपि सर्वज्यानिं जीयत आत्मना चेज्जीवति प्रधिनाSगादित्येव्राहुः ॥ १५ ॥ भावार्थ-जो यह पूर्वोक्त षोडशकल पुरुष संवत्सररूप प्रजापति कथन किया गया है उसका जाननेवाला मनुष्य ही संवत्सररूप प्रजार्पात होता है। क्योंकि उसका गौ आदि धन पन्द्रह कलाओके समान और अपना शरीर सोलहवी कला है। वह कभी धनसे बढता है और कभी घटता है। यह जो आत्मा यानी शरीर है यह रथचक्रकी नाभिके समान है, और धन रथचक्रके बाहरी घेरेकी नेमिके समान है। अतः यदि मनुष्य सर्वस्वहरणसे नष्ट हो जाय किन्तु शरीरसे जीवित रहे तो यही कहा जाता है कि यह केवल नेमिसे ही क्षीण हुआ है ॥ १४॥ वि० वि० भाष्य-संसार का सारा काम धनसे इस प्रकार चल रहा है जैसे जगत् का परिणाम चन्द्रमाकी कलाओसे साध्य होता है। सर्वस्वापहरण होनेसे मनुष्य ग्लानि को प्राप्त हो जाता है, यदि वह चक्रकी नाभिस्थानीय अपने देहपिण्डसे जीवित है तो लोग यही कहते हैं कि बाह्य परिवारसे कीण हो गया। भाव यह हुआ कि यदि मनुष्य जावित रहता है तो फिर भी धनसे

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ब्राध्मय ५] विद्यावनाद भाष्य ६५

ऐसे वृद्धिको प्राप्त हो सकता है, जैसे ग्थचक्र अरे और नेमिसे युक्त हो जाता है।। १५।। अब पुत्रादि साधनोंका साध्यविशेपोके साथ सम्बन्ध बताते है, यथा- अथ त्रयो वाव लोका मनुष्यलोकः पितृलोको देव- लोक इति सोडयं मनुष्यलोकः पुत्रेणैव जय्यो नान्येन कर्मणा कर्मणा पितृलोको विद्यया देवलोको देवलोको वै लोकानाथ श्रेष्ठस्तस्माद्विद्यां प्रशसन्ति ॥ १६ ॥ भावार्थ-मनुष्यलोक, पितृलोक और देवलोक ये ही तीन लोक हैं। यह मनुष्यलोक पुत्रके द्वारा ही जीता जा सकता है, यानी सन्तानोत्पत्तिसे मनुष्यलोक बनता है। क्योकि यह लोक पुत्रसाध्य है। अभिहोत्रादि कर्मोंसे पितृ- लोक प्राप्त होता है और विद्यासे देवलोक मिलता है। सब लोकोंमें देवलोक ही श्रेष्ठ है, अतः विद्या की प्रशंसा की गई है ॥ १६ ॥। वि० वि. भाष्य-शास्त्रोक्त साधनसे प्राप्त होने योग्य तीन ही लोक हैं। यह मनुष्यलोक पुत्ररूप साधनसे ही प्राप्त होता है, किसी अन्य कर्म अथवा विद्यासे नहीं। अभिहोत्रादिरूप केवल कर्मसे पितृलोक जीतने योग्य है, पुत्र से अथवा विद्यासे नहीं। विद्यासे देवलोक प्राप्त करने योग्य है, पुत्रसे अथवा कर्मसे नहीं। यह याद रखना चाहिए कि तीनों लोकोंमें देवलोक ही श्रेष्ठ है, यानी सबसे अधिक प्रशंसनीय है। अतः उसका साधन होनेसे विद्याकी प्रशंसा की गई है।। १६ ।। विद्या और कम लाकजयक हेतु हा सकत है, पर पुत्र तो अक्रियात्मक है, वह किस प्रकार लोकजयका कारण होता है. यह कहते हैं. यथा- अथातः संप्रत्तिर्यदा प्रैष्यन्मन्यतेऽथ पुत्रमाह त्वं ब्रह्म त्वं यज्ञस्त्वं लोक इति स पुत्रः प्रत्याहाहं ब्रह्माहं यज्ञोऽहं लोक इति यद्वै किंचानूक्तं तस्य सर्वस्य ब्रह्मेत्ये- कता। ये वै के च यज्ञास्तेषा" सर्वेषां यज्ञ इत्येकता ये वै के च लोकास्तेषा" सर्वेषां लोक इत्येकतैतावद्ा इदथ

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७० बृहदारण्गकार्पानपद् [अध्याय १

सर्वमेतन्मा सर्व9 सन्नयमितोऽभुनजदिति तस्मात् पुत्रमनुशिट्टं लोक्यमाहुस्तस्मादेनमनुशासति सयदैवंविद- स्माल्वोकात्प्रैत्यथैभिरेव प्राणैः सह पुत्रमाविशति। स यद्यनेन किंचिदच््णयाऽकृतं भवति तस्मादेन" सर्वस्मात्पुत्रो मुश्चति तस्माश्पुत्रो नाम स पुत्रेणैवास्मिँललोके प्रतितिष्ठत्य- थैनमेते दैवा: प्राणा अमृता आविशन्ति ॥ १७ ॥ भावार्थ-अब सम्प्रत्ति कहीं जाती है। जब पिता यह समझ कि मैं मरता हूँ अथवा यह विचार कर ले कि मैं संन्यास लेता हूँ, तब पुत्रक प्रति यह उपदेश करे कि 'तू ब्रह्म है' 'तू यज्ञ है' और 'तू लोक है।' तब पुत्र उत्तर दे कि 'हॉ मैं ब्रह्म हूँ' 'मैं यज्ञ हूँ' तथा 'मैं लोक हूँ'। जो कुछ भी स्त्राधाय है उस सबकी 'ब्रह्म' यह एकता है, अर्थात् पिताका जो शेष अध्ययन है उसका नाम यहाँ 'ब्रह्म' है। जो कुछ भी यज्ञ है उसकी 'यज्ञ' यह एकता है और जो कुछ्र भी लोक है उसकी 'लोक' यह एकता है। इतना ही गृहस्थ पुरुषका सारा कर्तव्य है। इतना होनेपर पिता यह मान लेता है कि जब मैं इस लोकसे या घरसे चला जाऊँगा तब भी यह पुत्र मेरा पालन करेगा यानी मेरी आज्ञाका पालन करेगा। इस प्रकार उपदेश दिये हुए पुत्रको श्रुतिमें 'लोक्य' कहा है, यानी उसे लोकमें यश प्राप्तिके लिए हिनकर कहा है। इसीसे पिता उसे उपदेश देता है। भाव यह है कि शिक्षित पुत्र को पिताका हित करनेवाला कहते हैं, इसीसे वह पुत्रको शिक्षा देता है। इस प्रकारका शिक्षक पिता जब इस लोकसे प्रयाण करता है तो अपने इन्हीं प्राणोंके सहित पुत्रमें व्याप्त हो जाता है, यानी सब वागादिकोंके साथ पुत्रमें प्रवेश करता है। यदि किसी भूलसे पिताका कोई कर्तव्य बाकी रह जाता है तो पुत्र उसका सम्पादन करके पिताको निश्चिन्त कर देता है यानी शोकमुक्त कर देता है। इसी कारण उसको पुत्र कहते हैं। ऐसे आज्ञाकारी पुत्रको प्राप्त हाकर ही पिता पुत्रके द्वारा इस लोकमें विद्यमान रहता है यानी पुत्र मानो पिताके ही रूपसे प्रतिष्ठित है। फिर उसमें ये हिरण्यगर्भं- संबन्धी अमृत प्राण प्रविष्ट होते हैं, यानी ऐसे अनुष्ठान करनेवाले पुरुषका दिव्य तथा अमृतरूप वागादि इन्द्रिय और प्राण प्राप्त होते हैं ॥ १७ ।। वि. वि० भाष्य-आगे कहे जानेवाले कमका नाम संप्रत्ति यानी सम्प्रदान है। पिता पुत्रमें अपने व्यापारका सम्त्दान करता है, उसीसे यह कर्म

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ब्राह्मस ५] विद्याविनोद भाष्य ७१

संप्रत्ति है, यह सम्प्रत्ति पिता उस समय करता है जब उसमें मरनेके पूर्वचिन्ह प्रकट हो जाते हैं। वह उस समय पुत्रको बुलाकर 'तू ब्रह्म, यज्ञ तथा लोक है' यह कहता है। उत्तरमें पुत्र भी स्वीकार कर लेता है। इन वाक्योंका भाव गूढ़ होनेके कारण श्रुति स्वयं व्याख्या करती है-जो कुछ भी पढ़ा, बिना पढ़ा हुआ है, उसका 'ब्रह्म' नाम है यानी उस सभीकी इस पदमें एकता है। अध्ययन एवं बिना अध्ययन किया हुआ सब एक ब्रह्म शब्दसे कहा जाता है। यहाँ पिताका भाव यह है कि जो वेद- विषयक स्वाध्यायकार्य इतने समय तक मेरे लिए कर्तव्य था उसका आजके बादसे पुत्र करनेवाला हो, इसीसे कहा है 'तवं ब्रह्म'। इसी प्रकार जो यज्ञ मैंने किये थे तथा जो मुझसे नहीं किये जा सके थे वे 'त्वं यज्ञः' तुझे करने होंगे। एवं जो लोक मैं जीत सका तथा नहीं जीत सका वे लोक तेरे द्वारा जीते जाने योग्य हों, इसीसे 'त्वं लोकः' कहा गया है। अर्थात् हे पुत्र, आजसे आगेके लिए अध्ययन, यज्ञ और लोकजय सम्बन्धी कर्तव्यका सङ्कल्प मैंने तुझे सौंप दिया है, अब मैं इनकी कर्तव्यताके बन्धनसे मुक्त हो गया। श्रुतिका यह भाव है कि गृहस्थ पुरुषोंके लिए जो कर्तव्य है वह इतना ही है कि वेदोंका अध्ययन, यज्ञोंका यजन और लोकोंपर जय प्राप्त करनी चाहिए। मृत पिताका पालन यही हैकि पिता यह समझता हुआ निश्चिन्त होकर मरे कि पुत्रने मेरे भारको मुझसे लेकर अपने ऊपर रख लिया है। इसलिए पुत्रको लोक्य यानी लोक परलोकमें हित करनेवाला कहा है। जिस पिता का इस प्रकार अनुशासित पुत्र होता है वह पुत्ररूपसे इसी लोकमें विद्यमान रहता है। यानी पिताको मरा हुआ न समझना चाहिए, पुण्यकर्मोंके लिए उसका प्रतिनिधि मौजूद है। पुत्रका अर्थ ही यह है कि पिताके बचे हुए मनोरथकी पूर्ति करके उसका त्राण कर दे।। १७ ।। वाकू, मन और प्राण कैसे प्रविष्ट होते हैं, यह दिखाते हैं, यथा- पृथिव्यै चैनमन्नेश्च दैवी वागाविशति सा वै दैवी वाग्यया यद्यदेव वदति तत्तन्भ्वति॥१८ ॥

भावार्थ-उक्त सम्प्रत्ति कर्म करनेवाले पितामें पृथिवी और अग्निसे दैवी वाकका आवेश होता है। पुरुप जिससे जो जो बोलता है वह वैसा ही वैसा हो जाता है, वही दैवी वाकू है। अर्थात् अनृतादि दोषोंसे रहित ही दैवी वाणी कही जाती है ॥ १८ ॥

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७२ बृहदारण्यकोपनिषद् [अभ्याय १

दिवश्चैनमादित्याच्च दैवं मन आविशति तद्वै दैवं मनो येनानन्येव भवत्यथो न शोचति॥ १६ ॥ भावार्थ-धुलोक और आदित्यसे इसमें दैव मनका आवेश होता है। शोक- रहित आनन्दवालेको दिव्य मन कहते हैं ॥ १६॥ अद्भ्य श्चैनं चन्द्रमसश्च दैवः प्राण आविशति स वै दैवः प्राणो यः संचरथश्चासंचरशंश्च न व्यथतेऽथो न रिष्यति स एवंवित्सर्वेषां भूतानामात्मा भवति यथैषा देवतैवथ स थथैतां देवताथ सर्वाणि भृतान्यवन्त्येवथ हैवंविद सर्वाणि भूतान्यवन्ति। यदु किंचेमाः प्रजा: शोचन्त्यमैवासां तद्भ्वति पुण्यमेवामुं गच्छति न ह वै देवान् पापं गच्छति॥ २०॥

भावार्थ-जल और चन्द्रमासे भी दिव्य प्राण इसको प्राप्त होते हैं। जंगम तथा स्थावरोंमें विचरता तथा न विचरता हुआ जो पीड़ाको प्राप्त नहीं होता वही.देव प्राण है, वह नष्ट नहीं होता। इस प्रकार जाननेवाला सम्पूर्ण भूतों का आत्मा हो जाता है, जसा यह देवता है यानी हिरण्यगर्भ है वैसा ही वह हो जाता है। जैसे सब जीव इस देवताके रक्षक होते हैं, वैसे ही ऐसी उपासना करनेवालेका समस्त भूत पालन करते हैं। जो कुछ ये प्रजाएँ शोक करती हैं वह उन्हींके साथ रहता है, यानी वह शोक उसे स्पर्श नहीं करता। कारण यह है कि देवताओंके समीप पाप नहीं जाता, अतः इस ज्ञाताको भी पुण्य ही प्राप्त होता है॥२०॥ पहले वाणी, मन और प्राणकी सामान्यतः उपासना बताई गई है, उनमेंसे किसी एककी विशेषता नहीं बताई गई। क्या ऐसा ही समझा जाय, या व्रत उपासनाके विषयमें उनमें परम्पर कोई विशेषता जानी जाय, यह कहा जाता है, यथा- अथातो व्रतमीमायसा प्रजापतिर्ह कर्माणि ससृजे तानि सृष्टान्यन्योन्येनास्पर्धन्त वदिष्याम्येवाहमिति वाग्दधे द्रत्याम्यहमिति चक्षः श्रोष्याम्यहमिति श्रोत्रमेवमन्यानि

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ब्राअण ५ ] विद्याविन द भाष्य ७३

कर्माणि यथाकर्म तानि मृत्यु: श्रमो भूत्वोपयेमे तान्याप्नो त्तान्याप्ता मृत्युरवारुन्ध तस्माच्छ्राम्यत्येव वाक् श्राम्यति चक्षुः श्राम्यति श्रोत्रमथेममेव नान्नोद्योऽयं मध्यमः प्राणस्तानि ज्ञातुं दघिरे। अय वै नः श्रेश्े यः संचर- श्रासंचर&श्र न व्यथतेऽथो न रिष्यति हन्तास्यैव सर्वें रूपमसामेति त एनस्यैव सर्वे रूपमभवथ स्तस्मादेत एतेनाख्यायन्ते प्राणा इति तेन ह वाव तत्कुलमाचक्षते यस्मिन्कुले भवति य एवं वेद य उ हैवंविदा स्पर्धतेऽनुशु- ष्यत्यनुशुष्य हैवान्ततो म्रियत इत्यध्यात्मम् ॥ २१॥ भावार्य-इसके अनन्तर व्रतका विचार करते हैं, यथा-प्रजापतिने कर्मोंकी रचना की, यानी कर्मके सावन वागादि इन्द्रियोंकी अपने अपने कर्मोंके लिए सृष्टि की। रचे जानेपर वे एक दूसरीके साथ डाह करने लगीं यानी परस्परके कर्ममें निःसहाय सी वर्तने लगीं। 'मैं कथन हो करती रहूँगी' यह वाणीने व्रत लिया। 'मैं देखता ही रहूँगा' यह व्रत चन्तुने लिया। श्रोत्रने यह व्रत लिया कि मैं सुनता ही रहूँगा'। इसी प्रकार अन्य इन्द्रियोंने भी अपने अपने व्यापारका व्रत लिया। ऐसी स्थितिमें मृत्युने श्रमयुक्त होकर उनसे सम्बन्ध किया, फिर उनमें व्याप्त होकर उन्हें कर्म करनेसे रोक दिया। इसीसे वाणी श्रान्त होती है, नेत्र श्रमित होता है, श्रोत्र थक जाता है, इसीसे वाणी आदि इन्द्रिय अपने अपने व्यापारमें लगी हुई थक जाती हैं। यह जो शरीरान्तर्वर्ती प्राण है उसको श्रम व्याप्त करके न रोक सका, तब उन इन्द्रियोंने उसे जाननेका निश्चय किया। तब इन्द्रियोंने विचार किया कि यह प्राण ही हमर्में श्रेष्ठ है. जो जंगम एवं स्थावरोंमें विचरता हुआ भी व्यथाको प्राप्त नहीं होता और न क्षीण ही होता है। इसलिए इसीके रूपको प्राप्त होना चाहिए, ऐसा निश्रय करके वे सब इसीके रूपवाली हो गई। इसी कारण सब इन्द्रियाँ प्राण नामसे प्रसिद्ध हुई। इसलिए जो ऐसा जानता है वह जिस कुलमें सत्पन्न होता है वह कुल उसीके नामसे प्रसिद्ध हो जाता है भाव यह है कि यद्यपि बागादि इन्द्रियोंमें अपने अपने ठयापारकी सामर्थ्य है, तथापि प्राणके बिना उनका सामर्थ्य अकिश्वित्कर है। ऐसे प्राणके दढ़ व्रतका ज्ञाता जिस कुलमें उत्पन्न होता है

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७४ बृहदारण्यकोर्पनिपदू [अध्याय १

इसीके नामसे वह कुल बोला जाता है। जो इस प्रकारके सत्य सङ्कल्पवाले पुरुषके साथ ईर्पा करता है वह नष्ट हो जाता है। यानी वह सूख जाता है और मूखकर अन्त्में मर जाता है। यानी ईर्पालु चित्तमें जलता रहता है। यह अध्यात्मदर्शन है. यानी इसी प्रकार वागादि इन्द्रियों द्वारा आध्यात्मिक कर्मका कथन किया गया है।। २१।। वि० वि० भाष्य-त्रतमीमांसा का अभिप्राय यह है कि जिसमें छपासना- कर्मका विचार किया जाय। यानी यहाँ यह विचार आरम्भ होता है कि प्राणोंमेंसे किस प्राणके कर्मको वरतरूपसे धारण किया जाय। अन्य इन्द्रियोंके व्रत यादी व्यापार श्रमरूपसे प्राप्त मृत्युको पार नहीं कर सबते। हाँ. वे इन्द्रियाँ यदि प्राणका आश्रय ग्रहण कर लें तो थकावटसे बच सकती हैं। सब इन्द्रियाँ प्राणके चलनात्मक रूपसे अपने प्रकाशात्मक रूपको पाकर ही रूपवती हुई हैं। इन्द्रियाँ चलती हुई ही अपने व्यापारमें प्रवृत्त होती हैं, और भाणके बिना चलनकी उपपत्ति नहीं हो सकती।। २१॥ अब अधिदैवत व्रतका वर्णन करते हैं, यथा- अथाधिदैवतं ज्वलिष्याम्येवाहमित्यग्निर्दध्रे तप्स्याम्य- हमित्यादित्यो भास्याम्यहमिति चन्द्रमा एवमन्या देवता यथादैवतथ स यथैषां प्राणानां मध्यमः प्राण ए. मेतासां देवतानां वायु्म्लोचन्ति हयन्या देवता न वायुः सैषाऽनस्त- मिता देवता यद्वायुः ॥ २२ ॥ भावार्थ-अब अधिदव दर्शन कहा जाता है। अम्निने जलनेका व्रत धारण करते हुए कहा कि मै जलता ही रहूँगा। सूर्य ने नियम किया कि मैं तपता ही रहूँगा। इसी प्रकार चन्द्रमाने निश्चय किया कि मैं सबको आह्लाद देता रहूँगा। इसी प्रकार अन्य देवताओंने भी यथादवत व्रत लिया, यानी जिस देवताका जो व्यापार था तदनुसार उसने व्रत धारण किया। जिस प्रकार इन वागादि प्राणोमें मध्यम प्राण है उसी प्रकार इन देवताओंमें वायु है। अन्य देवता अपने अपने व्यापारसे उपरत हो जाते हैं, परन्तु वायु नहीं। यह जो वायु है, अस्त न होनेवाला देवता है क्योंकि। यह वायु देवता अविनाशी व्रतवाला है॥ २२॥। वि. वि० भाष्य-इस मन्त्रमें देवताविषयक दर्शन कहा गया है, यानी इस बातका विचार किया गया है कि किस देववाविशेषका व्रत धारण करना

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भाक्मण ५ ] विद्याविनोद भाष्य ७५

श्रेष्ठ है। वाकआदि अध्यात्म प्राणोंके समान अगनि आदि अन्य देवगण अस्त होते हैं, अपने कर्मोंसे निवृत्त हो जाते हैं, किन्तु वायु अस्त नहीं होता, जैसे कि मध्यम प्राण है।। २२ ।। उक्त बातको ही दढ करने के लिए कहते हैं, यथा- अथैष श्रोको भवति यतश्चोदेति सूर्योडस्तं यत्र च गच्छतीति प्राणाद्वा एष उदेति प्रागोऽस्तमेति तं देवाश्च- किरे धर्मथ स एवाद्य स उश्व इति यद्वा एतेमुर्द्यधरियन्त तदेवाप्यद् कुर्वन्ति। तस्मादेकमेव व्रतं चरेत्प्राण्याच्चैवापा- न्याच्च नेन्मा पाप्मा मृत्युराप्नुवदिति यद्यु चरेत्समापिप- यिषेत्तेनो एतस्ये देवतायै सायुज्यथ सलोकतां जयति॥२३॥ भावार्थ-पूर्वोक्त अ्थमें यह श्लोक प्रमाण है-"जिस वायु देवतासे सूर्यं उदय होता है और और जिसमें अस्त होता है" इत्यादि। वागादि इन्द्रिय तथा अगि आदि देवताओंने उसप्राणव्रत तथा वायुव्रतको जो अवश्य कर्तव्य है, आज तक धारण कर रखा है और वे भविष्य कालमें भी इसी प्रकार धारण किये रहेंगे।.अतः एक ही व्रतका आचरण करे, प्राण और अपानका व्यापार करे। इस व्रतका इस भयसे आचरण करे कि-मुझे कहीं पापी मृत्यु व्याप्त न कर ले। जिस प्राणव्रतका आरम्भ करे उसको अवश्य ही समाप्त करे। इस प्राणव्रतके धारण करने से वह इस देवतासे;सायुज्य और सालोक्यको प्राप्त करता है, यानी प्राणकी तरह दृढश्रती होता है।। २३।। वि० वि० भाष्य-यहाँ इस मन्त्रकी व्याख्या की गई है कि "प्राणसे ही यह सूर्य उदय होता है और प्राणमें ही अस्त हो जाता है।" इन वाक और अग्नि आदिने उस समय क्रमशः जिस प्राणघ्रत और वायुव्रत को धारण किया था, इसी को वे आज भी धारण करते हैं, उसीका अनुवर्तन करते हैं और उसीका अनुवर्तन करेंगे। यह व्रत उनके द्वारा अखण्डित ही है, क्योंकि सायकाल और सुषुप्ति के समय उनका क्रमशः वायु और भाणमें अस्त होना देखा जाता है। कहा है कि जिम समय मनुष्य सोता है उस समय वाक, मन, चनु और श्रोत्र प्राणमें ही लीन हो जाते हैं और उठने के समय वे पुनः उत्पन्न हो जाते हैं। यह अध्यात्म दष्टिके अनुरोधसे कहा गया है। किन्तु आधिभौनिक दष्टिसे यह कथन

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७६ वृहेदारण्यकोपनिषद् [अध्याय ₹

है कि अग्नि जब शान्त होता है तो वह वायुक अधीन हाकर शान्त हाता है। जिस समय सूर्य अस्त होता है, वह वायुमें ही अनुगमन करता है। इमी तरह बायुमें ही चन्द्रमा तथा दिशाएँ भी प्रतिष्ठित होती हैं एवं वे पुनः वायुसे ही उत्पन्न हो जाती हैं। वागादि और अग्न्यादिकोंमें यही व्रत अनुगत है, यानी वायु और प्राणका जो परिस्पन्दरूप धर्म है वही समस्त देवताओं द्वारा अनुवर्तित होनेवाला व्रत है। कहने का तात्पर्थ यह है कि सभी प्राणके सहारे जीवित हैं, सबको प्राणोंकी उपासना यानी रक्षा करनी चाहिये, वे प्राण चाहे अपने हों चाहे दूसरेके हों।। २३॥ -- 888 -- षष्ठ ब्राह्मण

अब नाम, रूप तथा कर्मका कारण कथन किया जाता ह, यथा- त्रयं वा इदं नाम रूपं कर्म सेषां नाम्नां वागित्येत- देषामुक्थमथो हि सर्वाणि नामान्युत्तिष्ठन्ति। एतदेषाथ सामैतद्धि सर्वैरनामभिः सममेतदेषां ब्रह्मैतद्धि सर्वाणि नामानि बिभर्ति ॥१। भावार्थ-यह जो नाम, रूप और कर्म इन तीनका समुदाय है, इसमें यह जो वाणी है वह देवदत्तादि नामोंका कारण है, क्योंकि सब् नाम वाणीसे ही निक- लते हैं। यह इनका साम है, यही सब नामोंमें समान है, यह इनका ब्रह्म है, क्योंकि यही सब नामोंको धारण करता है॥। १॥ वि० वि० भाष्य-नाम, रूप और कर्म यह अनात्मा ही यहाँ त्रय' शब्द- से लिया गया है। जो साक्षात् अपरोक्ष ब्रम्म है वह आत्मा नहीं है, अतः इससे विरक्त होनेके लिए ही इस मन्त्रका आरम्भ किया गया है। जिसका इस अना- त्मासे मन नहीं हटा उसकी बुद्धि आत्मलोककी उपासना मे प्रवृत्त नहीं हो सकती ॥ १ ॥ अब रूपका कारण कथन करते हैं, यथा- अथ रूपाणां चक्षुरित्येतदेषामुक्थमतो हि सर्वाणि

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भ्राख्मण ६ ] विद्याविनोद भाष्य

रूपाण्युत्तिष्ठन्त्येतदेषाथ सामैतद्धि सर्वै रूपैः सममेतदेषां ब्रह्मैतद्धि सर्वाणि रूपाणि बिभर्ति ॥ २।। भावार्थ-वत्तु सब मामान्य रूपोंका कारण है, क्योंकि इसीसे सब रूप उत्पन्न होते हैं। इन रूपोंका यह चक्षु साम है यानी सम है, अर्थात् सबमें व्यापक है और यही इन रूपोंका आत्मा है, क्योंकि यही सब रूपोंको धारण करता है ।।२ । सबके कर्मका आत्मामें अन्तर्भाव हो जाता है, यह दिखाते हैं, यथा- अथ कर्मणामात्मेत्येतदेषामुक्थमतो हि सर्वाणि कर्मा- ्युत्तिष्ठन्त्येतदेषाथ सामैतद्धि सर्वैः कर्मभिः सममेतदेषां ब्रह्मैतद्धि सर्वाणि कर्माणि बिभर्ति तदेतत् तय सदेकमय- मात्माऽडत्मो एक: सन्नेतत् लयं तदेतदमृतसत्येन च्छन्नं प्राणो वा अमृतं नामरूपे सत्यं ताभ्यामयं प्राणश्छन्रः।।३।। भावार्थ-सब कर्मों का सामान्य आत्मा शरीर है, यह इनका उक्थ है यानी कारण है। इसीसे सब कर्म उत्पन्न होते हैं। यही सबका साम है अर्थात् यह सामान्य क्रिया ही सब कर्मों में व्यापक रहती है। यह इनका ब्रह्म यानी आस्मा है. क्योंकि यही मब कर्मों को धारण करना है। वह यह तीन होते हुए भी एक आत्मा है और आत्मा भी एक होते हुए यह तीन है। अर्थात् यह नामादिक तीनों ही कार्यकारणरूप एक प्रप् हैं, तथा यह प्रपक्व तीनों का रूप है। यह अमृत सत्यसे आच्छादित है। प्राण ही अमृत है और नाम रूप सत्य हैं. उनसे यह प्राण आच्छादित है॥ ३॥ वि० वि० भाष्य-दर्शनरूप एवं चलनात्मक समस्त कर्मविशेषों का क्रिया- सांमान्यमात्रमें अन्तर्भाव बतलाया जाता ह, जैसे-समस्त कर्मविशेषा का आत्मा यानी शरीर सामान्य आत्मा है। आत्माका कार्य होनेसे यहाँ कर्मको आत्मा कहा गया है। जीव शरीरम कर्म करता है, शरीरमें ही सम्पूर्ण कर्मों की अभिष्यक्ति होती है। यह कर्मसामान्य मात्र आत्मा अखिल कर्मों का उक्थ यानी कारण है। ये उक्त नाम, रूप और कर्म तीनों एक दूसरेके आश्रित, एक दूसरेकी अभित्यक्तिके कारण, एक दूसरेमें लीन होनेवाले तथा आपसमें

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पृहेदारण्यकोपनिषद [अभ्याये १

मिले हुए तीन खण्डोंके समूहके समान एक हैं। उनकी किस रूपसे एकता है, यह कहते हैं-यह जो नाम, रूप और कर्म हैं, इतना ही यह सारा व्याकृत और अव्याकृत जगत् है। आत्मा भी एक यह कार्यकारणसंघात मात्र होते हुए यही एक अध्यात्म, अधिभूत और अधिदैव भावसे स्थित नाम, रूप, कर्म यह त्रय है। जो इन्द्रियरूप शरीरका आन्तर आधारभूत और आत्मस्वरूप है. वह प्राण ही अमृत अविनाशी है एवं शरीरावस्थित कार्यात्मक नाम रूप सत्य हैं। उनका आधारभूत क्रियात्मक प्राण वृद्धि-क्षयशील, बाह्य, शरीरस्वरूप, मरणधर्मा, नाम और रूपोंसे अप्रकाशित किया हुआ है। बस, यही अविद्याके विषयभूत संसार- का स्वरूप दिखलाया गया है। इसके बाद विद्याका विषयभूत आत्मा ज्ञातव्य है। ब्रद्मात्मैक्य तत्वज्ञानको प्राप्त करना बड़ा ही कठिन है। जो लोग रात दिन संसारके माया मोहमें रचे पचे रहते हैं, बे वेदान्तप्रतिपाद्य आत्मपदार्थसे दूर ही रहते हैं। पहले तो वेदान्तमें रुचि होना कठिन है, यदि हो भी जाय तो इसकी कठिन प्रतीत होनेवाली मंजिल तय नहीं हो पाती, किसी बिरले पर प्रसुकपा, गुरुकृपा और स्वकृपा होती है तो वह वेदान्तके परमपावन ब्रह्मकुण्डमें अवगाहन करनेका सौभाग्य प्राप्त कर सकता है। जिन्हें कुछ ज्ञान प्राप्त होने लगता है उनके अनुष्ठानमें अनेक विघ्न बाघाएँ आड़ी आ जाती हैं। उन मुमुत्तुओंके सन्मागमें जो अनेक काँटे बिद्ये रहते हैं उनमें चार शूल महाभयानक हैं, यथा-विषयासक्कि, प्रमाणगत संशय, प्रमेयगत संशय और भ्रम। ये चारों ज्ञान को दुर्बल बनानेवाले प्रतिबन्धक हैं, या तो ज्ञान नहीं होने देते, अथवा उसे नष्ट कर देते हैं, अर्थात् ज्ञानको हढ़ नहीं होने देते हैं। उपनिषदों में इन विघ्नों की निवृत्ति के लिए अनेक तरहके छपाय बताये गये हैं, जैसे भयानक रोगीके लिए औषधि, पध्य प्रभृति अनेक उपचार समय समय पर करने पड़ते हैं। उसी प्रकार इस चिररोगी जीवके लिए उपनिषदोंमें अनेक उपाय बताये गये हैं। जैसे विषयासक्तिरूप प्रतिबन्धककी निबृत्तका उपाय वैराग्यको बताया है। प्रमाणगत संशय की निवृत्ति श्रवणसे, प्रमेयगत संशयकी निवृत्ति मननसे और भ्रम यानी विपर्यय की निवृत्ति निदिभ्यासनसे बताई गई है। पर विषयासक्तिके नाश विना श्रवण नहीं हो सकता, वे दोनों बिना मननके नहीं हो सकते और इसी तरह वे तीनों विना निदिध्यासनके नहीं हो सकते। मिथ्यातमा शरीरके वर्णाश्रमसम्बन्धी कर्मोंसे, चान्द्रायणादि तपसे, हरिभजनसे तथा सर्वं भूतोंपर दयारूप हरिके सन्तोषकारक व्यवहारसे वैराग्यादि

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ब्राश्य ६ ] विद्याविनोद भाष्य

चारों साधन प्राप्त होते हैं। इसके अनन्तर प्माण सशयादि प्रतिबन्ध नाशरूप फलपर्यन्त श्रवण, मनन निदिध्यासन अवश्य करना योग्य है। जो श्रवण की सिद्धि हो जाय तो मनन और ध्यानके अनुष्ठानमें सुभीता हो सकता है। इसके अनन्तर उन दोनोंके परम प्रसिद्ध मूल श्रवण-रत्नको उपलब्ध करना चाहिए। ये बातें उपनिषद्रूप आकरमें भरी पड़ी हैं। इस उपनिषद्के इस प्रथम अध्यायमें ऐसे ही बहुत सुन्दर अध्यात्मिक, आधिभौतिक तथा आधिदैविक विषयोंका वर्णन किया गया है।। ३ ॥

षष्ठ ब्राह्मण एवं प्रथम अध्याय समाप्त।

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द्वितीय अध्याय

प्रथम ब्राह्मण

"आस्मेत्येंबोपासीत" इत्यादि श्रुतिसे आात्माकी उपासनाका विधान किया गया है। आत्माको खोज लेनेसे सब कुछ मिल जाता है। केवल आत्मतस्वँ ही विद्याका विषय है। जो भेददृष्टि का विषय है, वह तो "अन्योडसी अन्योऽ- हमस्मीति न स वेद" इत्यादि श्रुतिसे अविद्याका विषय है। इस प्रकार मब्र उपनि- षदोंमें विद्या और अविद्याका विषय अलग अलग कहा गया है। उनमें अतिया- के विषयका, साधन आदि भेदोसे प्रथम अध्र्यायमें कथन कर चुके। अभ्र यह कहते हैं कि वह उक्त अविद्याका विषय दो प्रकारका है-एक आन्तर और दूमराबाहय। आन्तर प्राण है, जो गृहके आधारभूत खम्भोंके समान शरीरका आधारभूत, प्रकाशक और अमृतस्वरूप है। जो बाह्य है, वह कार्यरूप घरके तृणादिके समान, अप्रकाशात्मक तथा सत्य शब्दवाच्य है, इसीसे अमृतशब्दवाच्य प्राण प्रच्छम है। यही उपसंहारमें कहा गया है। इसी प्राणका बाह्य आधारके भेदसे अनेक प्रकारका विस्तार है। इस अध्यायके आरम्भमें अविद्याविषयको ही आत्मा समझनेवाला गा्ग्य ब्राह्मण वक्ता है और वस्तुतः आत्मदर्शी अजातशत्रु श्रोता है। इस प्रकार पूर्वोत्तरपक्षरूप आख्यायिकासे कहा गया अर्थ श्रोताके चित्तमें अनायास आा जाता है। क्योंकि अतिगम्भीर ब्रह्मविद्या पूर्वपक्ष और सिद्धान्त रूपसे आख्यायिका द्वारा निरूपित होनेपर ही सरलवासे ज्ञात होती है, इसलिए इस अध्यायमें आख्यायिका का आरम्भ करते हैं- ॐ दसवालकिर्हानूचानो गार्ग्य आस स होवा- चाजा शत्रु' काश्यं ब्रह्म ते ब्रवाणीति स होवाचाजातशत्रुः

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विधाविनोद भाष्य

सहस्रमेतस्यां वाचि दझ्ो जनको जनक इति वै जना धावन्तीति ॥ १॥ भावार्थ-अभिमानी तथा वाग्मी बालाकिने, जिसका गर्गगोत्र था, किसी समय अजातशत्रु नामक काशीराज के पास जाकर कहा कि मैं आपको ब्रह्मका उपदेश करूँगा। यह सुनकर राजा बड़ा प्रसन्न हुआ, उसने कहा कि मैं आपको केवल इस प्रकार की वाणी बोलनेसे ही हजार गौएँ देता हूँ। क्योंकि लोग 'जनक-जनक' ऐमा कहकर दौदते हैं। यानी सब लोग यही कहते हैं कि जनक बड़ा दानी है, जनक बड़ा ोता है। ये दोनों बाते आपने अपने वचनसे मेरे लिए सुलभ कर दी है।। १।। वि० वि० भाष्य-किसी समयगें अविद्याके विषयको ही ब्र्म जानने- वाला, गर्गगोत्रोत्पन्न बालाकि, जो ब्रह्मको सम्यक् रूपसे न जानने के कारण ही गरबीला था तथा बलाकाका पुत्र हानेसे बालाकि कहलाता था, वह ब्रह्मविद्याके अनुवचनमें बड़ा वाचाल था। उसन अजातशत्रु नामक काशीराजके पास जाकर कहा कि मैं तुम्हारे प्रति ब्रह्मका निरूपण करूँगा। राजाने जब ऐसा सुना तब वह कहने लगा कि इस प्रकारकी केवल वाणी बोलनेसे ही मैं तुम्हें हजार गौएँ देता हूँ। लोकमें अब् तक तो यही प्रसिद्धि रही है कि जनक ही ब्रह्मको सुनने की इच्छा रखता है और जनक ही दाता है. वही ब्रह्मज्ञानी है। इसलिए ब्रह्मको कहने सुनने के लिए लोग जनकके पाम ही जाते थे। लेकिन आप मुझमें भी उक्त गुणों की संभावना कर मेरे पाम आये हैं। अतः ब्रह्मनिर्णय आप भले ही न कर सकें किन्तु केवल 'ब्रह्म ते त्रवाणि' इस शब्द मात्रको सुनकर मैं आपको हजारों गौएँ देता हूँ॥१॥ अब सुननेकी इच्लामे मामने उपस्थित गजाको बालाकि ब्रह्मका उपदेश करता है, यथा- स होवाच गाग्यो य एवासावादित्ये पुरुष एतमेवाहं ब्रह्मोपास इति स होवाचाजातशतरुर्मा मैतस्मिन्संवदिष्टा अतिष्ठाः सर्वेषां भूतानां मृर्धा राजति वा अहमेतमुपास इति सय एतमेवमुपास्तेऽतिश्ः सर्वेषां भृतानां मूर्धा राजा भवति॥२॥

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दर [अध्याय २

भावार्थ-उस गाग्य बालाकिने कहा-जो आदित्यमें यह पुरुष है, इसीकी मैं ब्रह्मरूपसे उपासना करता हूँ। अजातशत्रुन कहा-इस ब्रझ्मके विषयमें ऐसा मत कहो, ऐसा मत कहो। वह सूर्यस्थ पुरुप सब जीवोंको परतिक्रमण करके रहने- वाला है, सब प्राणियोंका सिर है तथा राजा यानी प्रकाशवाला है। ऐसा मानकर मैं अवश्य इसकी उपासना करता हूँ और ऐमा ही मानकर जो इसकी इस प्रकार उपासना करता है, वह उपासक सबको अतिक्रमण करनेवाला, सब प्राणियोंका सिर तथा राजा होता है॥ २ ॥ वि० वि० भाष्य-म्रह्मके शुश्रपु काशीराजके प्रति गार्ग्यने कहा कि जो आदित्यमें यह पुरुप है तथा चक्षुमें जो पुरुष है, वही चन्तुक द्वारा हृदयमें प्रविष्ट होकर इस देहमें कर्ता और भोक्ताके रूपसे व्यवस्थित है। आदित्य और चन्तुमें स्थित पुरुपोंको एक समझकर में उनकी ब्रक्मवुद्धिसे उपासना करता हूँ, आप वैसी ही उपासना कीजिये। यह सुनकर राजाने निपेध करते हुए कहा कि ऐसा मत कहिये, मैं इसकी वास्तविकता को जानता हूँ। आदित्य पुरुष सब भूतोंका अतिक्रमण कर स्थित है, इसलिए यह अतिष्ठा कहलाता है। यह सब भूतों का सिर है और दीप्िगुणविशिष्ट होनेसे राजा भी है। इन विशेषणोंसे विशिष्ट आदित्यात्मा को मैं जानता हूँ और उसकी वैसी ही उपासना करता हूँ। इस प्रकार गुणन्यविशिष्ट ब्रह्मकी उपासनास हानवाल फलको भी बतलाते हैं-जो जिस प्रकारके गुणसे विशिष्ट ब्रह्मकी उपासना करता है, उसको उसी गुणके अनुसार फल होता है। अतपव भगवती श्रुति कहनी है-'तं यथा यथो- पासते तदेव भवति'। इसलिए प्रकृत उपासक मचका अतिक्रमण करनेवाला, सबका मूर्धन्य और राजा होता है यानी सर्वश्रेष्ठ होता है॥।- ॥। इस प्रकार अजातशत्रुने जब संवादके द्वारा आदित्य ब्रम्मका निषेध कर दिया, तब गार्ग्य चन्द्रमण्डलवर्ती अन्य ब्रह्मका प्रतिपादन करने लगा, ग्था- स होवाच गाग्यो य एवासौ चन्द्रे पुरुष एतमेवाहं ब्रह्मोपास इति स होवाचाजातशत्रुर्मा मैतस्मिन्संवदिश्ठ बृह- न्पाण्डरवासाः सोमो राजेति वा अहमेतमुपास इति स य एतमेवमुपास्तेऽहरहर्ह सुतः प्रसुतो भवति नास्यान्नं क्षीयते ॥ ३॥

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विद्याविनाद भाष्य نا

भावार्थ-उस गार्ग्यने कहा-जो चन्द्रमामें यह पुरुन है, इसकी मैं ब्रह्मरूप- से उपासना करता हूँ। अजातशत्रुने कहा-ब्रह्मके विपयमे ऐसा मत कहो। यह महान, शुक्क वस्त्रधारी, सोम राजा है-इस प्रकार मैं इसकी उपासना करता हूँ। इसी प्रकार जो इसकी प्रतिदिन उपासना करता है, उसके लिए नित्य प्रति सोम सुत तथा प्रसुत होता और उसका अन्न कभी क्षीण नहीं होता है ॥ ३ । वि० वि० भाष्य-फिर उस गर्गगोत्री बालाकिने कहा कि जो यह चन्द्रमा तथा बुद्धिमें एक पुरुष हैँ. इसकी ब्रह्मबुद्धिस मैं उपासना करता हूँ। यह सुनकर अजातशत्रु राजाने कहा कि इस ब्रह्मसंवादमें इस प्रकार कहना ठीक नहीं है, अर्थात् यह ब्रह्म नहीं है। निःमन्देह यह श्वेतवस्त्रवारी चन्द्रमा प्रकाशमान है, मैं इसकी उपासना ऐसा समझकर करता हू, और जो इसकी उपासना इसी प्रकार प्रतिदिन करता है, उसके लिए नित्य प्रति प्रकृति यज्ञमें सोमरस प्रस्तुत रहता है तथा विकृति यज्ञमें अधिकतासे निरन्तर सोमरस प्रस्तुत रहता है। यानी उसे प्रकृति विकृतिरूप दोनों प्रकारक यज्ञानुष्ठानमे सामर्थ्य प्राप्त हो जाती है तथा इस अन्ना- त्मक ब्रह्मके उपासकका अन्न भी कभी क्षीण नहीं होता ॥ ३॥ स होवाच गाग्यों य एवासौ विद्युति पुरुष एतमेवाहं ब्रह्मोपास इति स होत्राचाजातशत्रुर्मा मैतस्मिन्संवदिश्ठास्ते- जस्वीति वा अहमेतमुपास इति सय एतमेवमुपास्ते तेज- स्वी ह भवति तेजस्विनी हास्य प्रजा भवति ॥ ४॥ भावार्थ-गार्ग्यने कहा-जो विद्युत्में यह पुरुष है, इसकी मैं ब्रममरूपसे उपासना करता हूँ। अजातशत्रुने कहा-नहीं नहीं, इसकी चर्चा मत करो, इसकी तो मैं तेजस्व्रीरूपसे उपासना करता हूँ, जो कोई इस प्रकार उपासना करता है, वह तेजस्त्री होता है तथा उसकी प्रजा भी तेजस्विनी होती है॥४॥ वि० वि० भाष्य-सूर्य और चन्द्रमाका तेज मेघमालासे अभिभूत हो जाता है, किन्तु बिजलीका तेज और भी बढ़ जाता है, इसलिए बिजलीका तेज एक्त तेजोंसे पत्कृष्ट है। उत्कृष्ट तेजका ही ध्यान करना चाहिए, इस तात्पर्थसे गार्ग्य विद्युत्पुरुषकी ब्रह्मदष्टिसे उपासना करनेके लिए ऐसा उपदेश देता है कि विद्युत्में और हदयमें जो एक देवता है वह ब्रम्म है। राजाने पूर्ववत् कहा कि नहीं, नहीं. वह तेजस्त्री है, और वैसा मानकर मैं उसकी उपासना करता हूँ।

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८४ बृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय २

जो कोई इस बुद्धिसे उसकी उपासना करता है, वह तेजस्वी होता है और उसकी सन्तति भी तेजस्विनी होती है॥४ ॥ स होवाच गा्ग्यो य एवायमाकाशे पुरुष एतमेवाहं ब्रह्मो- पास इति स होवाचाजातशत्ुर्मा मैतस्मिन्संवदिश्ठः पूर्णम- प्रवर्तीति वा अहमेतमुपास इति स य एतमेवसुपास्ते पूर्यंते

भावार्थ-पुनः)वह प्रसिद्ध गर्गगोत्री बालाकि बोला-यह जो आकाशमें पुरुष है, इसकी मैं ब्रह्मरूपसे उपासना करता हूँ। यह सुनकर अजातशत्रु राजा बोला कि नहीं, नहीं; इसके विषयमें बात मत करो। मैं इसकी पूर्ण तथा क्रियाशून्य रूपसे उपासना करता हूँ। जो कोई उनकी इस प्रकार उपासना करता है, वह प्रजा तथा पशुओंसे पूर्ण होता है और इस लोकमें उसकी सन्ततिका नाश नहीं होता॥५॥ वि० वि० भाष्य-फिर भी वह प्रसिद्ध गर्गगोत्रमें उत्पन्न हुआ बालाकि बोला कि हे राजन, आकाश तथा हृदयाकाश में जो पुरुप है, वही ब्रह्म है, ऐसी हम उपासना करते हैं। ऐसा सुनकर राजा अजातशत्रु कहने लगा कि नहीं, इस ब्रह्मके विषयमें ऐसा मत कहो, यह ब्रह्म नहीं है जिसको तुम ब्रह्म समझते हो। मैं तो पूर्ण और अप्रवर्ती (क्रियारहित) मानकर उसको उपासना करता हूँ। जो कोई पूर्ण और क्रियाशून्य मानकर उसकी उपासना करता है, वह प्रजा तथा पशुओं- से परिपूर्ण होता है तथा कभी उसकी सन्तानका उच्छेद नहीं होता ॥ ५॥ स होवाच गाग्यो य एवायं वायौ पुरुष एतमेवाहं ब्रह्मोपास इति स होवाचाजातशत्रुर्मा मैतस्मिन्संवदिष्ठा इन्द्रो वैकुण्ठो Sपराजिता सेनेति वा अहमेतमुपास इति स य एतमेवमुपास्ते जिष्पुर हांपराजिष्णुर्भवत्यन्यतस्त्यजायी॥। ६ ।। भावार्थ-उल गाग्यने कहा-यह जो वायुमें पुरुष है इसकी मैं ब्रह्मरूपसे उपासना करता हूँ। अजातशत्रुने कहा-नहीं, नहीं, इसके विषयमें इस प्रकारकी बात मत करो, इसकी तो मैं इन्द्र, वैकुण्ठ तथा अपराजिता सेना; इस रूपसे उपासना करता हूँ। जो कोई इसकी इस प्रकार उपासना करता है, वह बिजयी, कभी न हारनेवाला और शत्रुविजेता होता है॥ ६ ॥

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विद्याविनाद भाष्य

वि० वि० भाष्य-पुनः गाग्यने कहा कि जो वायुमें पुरुष है, उसकी मैं ब्रह्मबुद्धिसे उपासना करता हूँ। राजाने पूर्ववत् कहा कि वह जो इन्द्र (परमेश्वर), वैकुण्ठ (जो विशेष रूपसे सहन न किया जा सके) और अपराजिता सेना है, ये सब श्रह्म नहीं हैं, मैं तो उनकी उपासना उक्त गुणों द्वारा ही करता हूँ। जो कोई इन्द्र, वैकुण्ठ और अपराजित आदि गुणोंसे विशिष्ट उनकी उपासना करता है, वह उपा- सनाके गुणभेदसे जयशील, अपराजिष्णु तथा अजित स्वभाववाला होता है। तीनों विशेषणोंके क्रमशः तीन फल हैं, यानी इन्द्रगुण विशिष्टकी उपासनासे जयशील होता है, वैकुण्ठगुणविशिष्टकी उपासनासे स्वयं अजेय होता है और अपराजिता सेनाके गुणविशिष्टकी उपासनासे सापत्न भाइयोंपर विजय पाता है॥ ६॥ स होवाच गाग्यो य एवायमऔ पुरुष एतमेवाहं ब्रह्मो- पास इति स होताचाजातशत्रुर्मा मैतस्मिन्संवदिशा विषासहिरिति वा अहमेतमुपास इति स य एतमेवमुपास्ते विषासहिर्ह भवति विषासहिर्हास्य प्रजा भवति ॥ ७॥ भावार्थ-उस गाग्यने कहा-यह जा अभिमें पुरुप है, इसकी मैं ब्रह्मरूपसे उपासना करता हूँ। यह सुनकर अजातशत्रुने कहा-नहीं, इसके विषयमें ऐसा मत कहां, इसकी तो मैं विपासहिरूपसे उपासना करता हूँ। जो कोई इसकी इस प्रकार उपासना करता , वह अवश्य विषासाह (सहनशील) होता है तथा उसकी प्रजा भी विपासहि होती है॥७॥ स होवाच गार्ग्यो य एवायमप्सु पुरुष एतमेवाहं ब्रह्मोपास इति स होवाचाजातशत्रुर्मा मैतस्मिन्संवदिश्ठाः प्रतिरूप इति वा अहमेतमुपास इति स य एतमेव- मुपास्ते प्रतिरूप हैवैनमुपगच्छति नाप्रतिरूपमथो प्रंतिरूपोऽस्माज्जायते ॥ ८ ॥ भावार्थ-उस गाग्यने कहा-यह जो जलमें पुरुष है, इसकी मैं ब्रह्मरूपसे। उपासना करता हूँ। यह सुनकर अजानशत्रुने कहा-नहीं, इसके विपयमें ऐसा मत कहो, इसकी मैं 'प्रतिरूप' रूपसे उपासना करता हूँ। जो कोई इसकी इस प्रकार उपासना करता है, उसके पास प्रतिरूप ही आता है, अप्रतिरूप नहीं आता तथा उससे प्रतिरूप (पुत्र) उत्पन्न होता है।। ८ ।।

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७६ बृहदारण्यकोपनिषदू [अध्याय १

है कि अग्नि जब शान्त होता है तो वह वायुके अधीन होकर शान्त होता है। जिस समय सूर्य अस्त होता है, वह वायुमें ही अनुगमन करता है। इसी तरह वायुमें ही चन्द्रमा तथा दिशाएँ भी प्रतिष्ठित होती हैं एबं वे पुनः वायुसे ही उत्पन्न हो जाती हैं। वागादि और अग्न्यादिकोंमें यही व्रत अनुगत है, यानी वायु और प्राणका जो परिस्पन्दरूप धर्म है वही समस्त देवताओं द्वारा अनुवर्तित होनेषाला व्रत है। कहने का तात्पर्य यह है कि सभी प्राणके सहारे जीवित हैं, सबको प्राणोंकी उपासना यानी रक्षा करनी चाहिये, वे प्राण चाहे अपने हों चाहे दूसरेके हों।। २३॥

षष्ठ ब्राह्मण

अब नाम, रूप तथा कर्मका कारण कथन किया जाता ह, यथा- न्रयं वा इदं नाम रूपं कर्म सेषां नाम्नां वागित्येत- देषामुक्थमथो हि सर्वाणि नामान्युत्तिष्ठन्ति। एतदेषाथ सामैतद्धि सर्वैरनामभिः सममेतदेषां ब्रह्मैतद्धि सर्वाणि नामानि बिभर्ति ॥ १॥ भावार्थ-यह जो नाम, रूप और कर्म इन तीनका समुदाय ह, इसमें यह जो वाणी है वह देवदत्तादि नामोंका कारण है, क्योंकि सब नाम वाणीसे ही निक- लते हैं। यह इनका साम है, यही सब नामोंमें समान है, यह इनका ब्रह्म है, क्योंकि यही सब नामोंको धारण करता है॥ १॥ वि० वि० भाष्य-नाम, रूप और कर्म यह अनात्मा ही यहाँ त्रय' शब्द- से लिया गया है। जो साक्षात् अपरोक्ष ब्रह्म है वह आत्मा नहीं है, अतः इससे विरक्त होनेके लिए ही इस मन्त्रका आरम्भ किया गया है। जिसका इस अना- त्मासे मन नहीं हटा उसकी बुद्धि आत्मलोककी उपासना में प्रवृत्त नहीं हो सकती ॥ १ ॥ अब रूपका कारण कथन करते हैं, यथा- अथ रूपाणां चक्षरित्येतदेषामुक्थमतो हि सर्वाणि

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विद्याविनोद भाष्य ट७

मैतस्मिन्संवदिष्ठा असुरिति वा अहमेतमुपास इति स य एतमेवमुपास्ते सर्वथ हैवास्मिँलोक आयुरेति नैनं पुरा कालात्प्राणो जहाति।। १० ।। भावार्थ-उस गाग्यने कहा कि जो यह गमन करनेवाले पुरुषके पीछे शब्द उत्पन्न होता है, इसकी मैं ब्रह्मरूपसे उपासना करता हूँ। यह सुनकर अजात- शत्रुने कहा कि इसके विषयमें ऐसा मत कहो। इसकी तो मैं प्राणरूपसे उपासना करता हूँ। जो कोई इसकी इस प्रकार उपासना करता है वह इस लोकमें पूर्ण आयुको प्राप्त होता है और नियत समयके पहले प्राण इसको नहीं छोड़ते हैं॥ १ ॥ वि० वि० भाष्य-मनुष्यके चलते समय कुछ शब्द अवश्य उत्पन्न होता है। जैसे घोड़ेके चलनेसे टापका शब्द सुन पड़ता है, वैसे ही दूसरेके पादविक्तेप- से भी शब्द होता है। उसमें तथा अध्यात्मबुद्धिमें जो पुरुष है, वही ब्रह्म है, यह बालाकिका मत था। इसपर राजाने पूर्ववत् निपेध कर कहा कि वह असु है, ऐसी ही बुद्धिसे मैं उसकी उपासना करता हूँ। असु यानी प्राण जीवनका हेतु है। मार्गमें जब पुरुप दौड़ता है तब भी शरीरकी उच्छवासादि वृत्तिसे शब्द होता है, जिसको हाँफना कहते हैं, उस शब्दमें पुरुपका ध्यान करना चाहिए, यह भी बालाकिका तात्पर्य हो सकता है। शाब्द पुरुषका 'असु' यह जो विशेषण दिया है उसका तात्पर्य यह है कि बाह्य प्राणवृत्तियोंका त्याग कर जो प्राणात्मा स्थित है वही असुगुणवाला है। जो असुगुणसे विशिष्ट प्राणकी उपासना करता है, वह संपूर्ण आयु पाता है, रोगादिसे पीड़ित होनेपर भी प्रार्वकालसे पहले देहपिण्डको नहीं छोड़ता, यानी प्राप्त आयुका पूर्ण भोग करता है ॥ १० ॥ स होवाच गा्ग्य य एवायं दिक्षु पुरुष एतमेवाहं ब्रह्मोपास इति स होाचाजातशत्रुर्मा मैतस्मिन्संवदिष्ठा द्वितीयोऽनपग इति वा अहमेतमुपास इति स य एतमेव- मुपास्ते द्वितीयवान् ह भवति नास्मादगणश्छियते॥ ११॥ भावार्थ-उस गाग्यने कहा कि यह जो दिशाजोंमें पुरुष है, इसकी मैं ब्रक्म- रूपसे उपासना करता हूँ। यह सुन अज्ातशत्रुने कहा कि इसके विषय में ऐसा मत कहो। मैं इसकी द्वितीय अनपग रूपसे उपासना करता हूँ। जो कोई इसकी इस

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वृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय בב

प्रकार उपासना करता है, वह भी द्वितीयवान् होता है तथा उससे गणका विच्छेद नहीं होता ।। ११॥ वि० वि. भाष्य-अनपग माने अविमुक्तस्वभाव, जैसे अश्विनीकुमार सदा जोड़ेके रूपमें ही रहते हैं, इनका कभी वियोग नहीं होता। दिशा तथा अश्विनीकुमारोंका साधर्म्य यह है कि जैसे दिशाओंमें परस्पर वियोग नहीं है, वे सदा संयुक्तस्वभाव होती हैं, वैसे ही वे देवता कभी भी परस्पर वियुक्त नहीं होते, सदा संयुक्त ही रहते हैं। जो इस गुणसे विशिष्ट कान और हृदयरूप दिशाओंकी उपासना करता है, वह सदा द्वितीयवान् ही रहता है, यानी पुत्र भृत्य आदि परिवारसे सदा संयुक्त ही रहता है, उनसे कभी वियुक्त नहीं होता। ११॥ स होवाच गार्ग्यो य एवायं छायामयः पुरुष एतमेवाहं ब्रह्मोपास इति स होवाचाजातशत्रुर्मा मैतस्मिन्संवदि्श्ठा मृत्यु रिति वा अहमेतमुपास इति स य एतमेवमुपास्ते सर्वथ हैवास्मिँल्लोक आयुरेति नैनं पुरा कालान्मृत्युरागच्छति॥१२। भावार्थ-उस गार्ग्यने कहा कि जो यह छायामय पुरुप है, इसकी मैं ब्रह्मरूपसे उपासना करता हूँ। तब अजातशत्रु बोला कि नहीं नहीं, इसके विषयमें ऐसा मत कहो। मैं तो इसकी मृत्युरूपसे उपासना करता हूँ। जो कोई इसकी इस प्रकार उपासना करता है वह अवश्य इस लोकमें पूर्ण आयुको प्राप्त होता है तथा उसके निकट मृत्यु नियत कालसे पहले नहीं आता है ॥ १२।। वि० वि० भाष्य-छायामें यानी बाह्य अन्धकारमें तथा शरीरान्तर्गत आवरणरूप अज्ञानमें और हृदय में भी एक ही देव है। उसका विशेषण मृत्यु है, उस मृत्युकी बाधानिवृत्तिके साथ ही रोगादि पीड़ाका अभाव भी उपासकको होता है।१२।। स होवाच गाग्यो य एवायमात्मनि पुरुष एतमेवाहं ब्रह्मोपास इति स होवाचाजातशत्रुर्मा मैतस्मिन्संवदिष्ठ आत्मन्वीति वा अहमेतमुपास इति सथ एतमेवमुपास्त आत्मन्वी ह भवत्यात्मन्विनी हास्य प्रजा भवति स ह तूष्णीमास गार्ग्य:।। १३ ।। भाषार्थ-उस गाग्यने कहा कि जो यह आत्मामें पुरुप है, इसकी मैं ब्रह्मरूपसे

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८६ अध्याय २

वि. वि. भाष्य-बालाकि अजातशत्रु राजागे बोला कि जो जलमें पुरुष है अर्थात् पुरुपका प्रतिबिम्ब है, मैं उसको ब्रह्म समझकर उपासना करता हूँ, आप भी ऐसा ही करें। यह सुनकर राजा बोला कि हे ब्राह्मण, इसके विषयमें ऐसा मत कहो, यह ब्रह्म नहीं है। जिसकी तुम उपासना करते हो, यह केवल पुरुषका प्रतिबिम्ब है। अर्थात् इसमें अनुकूलत्वगुण हैं, ऐसा जानकर मैं इसकी उपासना करता हूँ। जो कोई दूसरा इसको ऐसा ही जानकर उपासना करता है वह भी अनुकूल पदार्थोंको प्राप्त होता है, त्रिपरीत वस्तुको नहीं और इस पुरुषके समान ही इसके पुत्र-पौत्र उत्पन्न होते हैं॥ ९॥ स होवाच गाग्यों य एवायमादर्शे पुरुष एतमेवाहं त्रह्मोपास इति स होवचाजातशत्ुर्मा मैतस्नन्संवदिठा रोचिषपुरिति वा अहमेतमुपास इति स य एतमेवमुपास्त्ते रोचिष्पुर्ह भवति रोचिष्ुर्हास्य प्रजा भवत्यथो यैः संनिग- च्छति सर्वाथस्तानतिरोचते ॥ ६॥ भावार्थ-उस गाग्यने कहा-यह जो दर्पणमें पुरुष है यानी पुरुषका प्रति- बिम्त है, इसकी मैं ब्रह्मरूपसे उपासना करता हूँ। तब उस अज्ञातशत्रुने कहा कि नहीं, नहीं, इसके विषयमें ऐसा मत कहो। इसकी मैं रोचिष्णु (देदीव्य मान) रूपसे उपासना करता हूँ। जो कोई इसको इस रूपसे उपासना करता है वह दे- दीव्यमान हाता है, उसकी प्रजा भी देदोप्यमान होतो है तथा उसका जिनसे साथ होता है उन सबसे बढ़कर वह देदीप्यमान होता है ।। ९।। वि• वि. भाष्य-गार्ग्यने फिर कहा-अच्छा तो जो यह आदर्शमें पुरुषका प्रतिविम्ब है, वहों ब्रह्म है। राजाने कहा-नहीं, नहीं, वह तो रोचिष्णु-दे- दीप्यमान है तथा उसक उसी वुद्धिसे हम उपासना। करते हैं अर्थात् देदी व्यमान और कान्तियुक्त पुरुषकी आदर्श, चन्ु आदि स्वच्छ पदार्थ तथा स्व्च्छ बुद्धिमें उपासना करते है। जो उक्त गुगसे विशिष्ट पुरुवकी उक्त आश्रयोंमें उपासना करता है, वह स्व्रयं राचिष्णु होता है तथा उसकी सन्तति भी उक्त गुगसे विशिष्ट होती है। स होवाच गाग्यो य एवायं यन्तं पश्चाच्छब्दोऽ नूदेत्येतमेवाहं ब्रम्मोपास इति स होत्राचाजातशत्रुर्मा

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बृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय २

भिरामन्त्रयांचक्रे बृहन्पाण्डरवासः सोम राजन्निति स नोत्तस्थौ तं पाणिनापेषं बोधयांचकार स होत्तस्थौ।। १५॥ भावार्थ-तब वह अजातशत्रु राजा बोला कि जो ब्राह्मण इस आशासे क्षत्रियके समीप जाय कि यह मेरे लिए अवश्य ब्रह्मका उपदेश करेगा, तो यह प्रति- लोम, विपरीत यानी शास्त्रविरुद्ध है। किन्तु मैं निश्चय करके ब्रह्मके विपयमें कहूँगा। इतना कहकर राजा उसका हाथ पकड़कर उठ खड़ा हुआ तथा वे किसी सोये हुए पुरूषके पास आये और उसको इन नामोंसे जगानेके लिए पुकारने लगे कि हे श्रेष्ठ पुरुष, हे श्वेत वस्त्धारी, हे सोम, हे राजन्, जागो। किन्तु वह सोया हुआ पुरुप नहीं उठा, तब उसे हाथसे दबा दबाकर जगाया तो वह जाग गया॥ १४॥ स होवाचाजातशत्रुर्यत्रैष एततसुप्तोऽमूद एष विज्ञान- मयः पुरुषः क्वैष तदाभूत्कुत एतदागादिति तदु ह न मेने गार्ग्यः ॥। १६ ।। भावार्थ-इसके बाद अजातशत्रु राजा बोला कि हे बालाकि, जो यह विज्ञान- मय पुरुष है, जिस समय सोया हुआ था उस समय कहाँ था ? यह कहाँसे आ गया ? परन्तु गार्ग्य इन दोनों प्रश्नोंको अच्छी तरह नहीं समझा ॥१६ ॥ वि० वि० भाष्य-अजातशत्रु इस प्रकार देहसे व्यतिरिक्त आत्माका अस्तित्व प्रतिपादन कर गाग्यसे बोला कि हे गार्ग्य, जब यह जीवात्मा सोया हुआ था, तब यह विज्ञानमय पुरुप कहाँ था ? तथा किस समय शरीरको दबाकर जगाया गया तो यह कहाँसे आ गया ? अर्थान इस पड़े हुए शरीरमें कौन सोने और जागनेवाला है ? और वह कहाँसे आया है ? हे ब्राह्मण, क्या तुम इन सब प्रश्नोंके उत्तरको जानते हो ? यह सुनकर उस ब्राह्मणने कहा कि मैं आपके प्रश्नोंका उत्तर नहीं दे सकता, क्योंकि मैं इस विपयको नहीं जानता हूँ॥ १६ ॥ स होवाचाजातशत्रुर्यत्रैष एतत्सुप्तोऽभूद एष विज्ञानमयः पुरुषस्तदेषां प्राणानां विज्ञानेन विज्ञानमादाय य एषोऽन्नर्हृदय आकाशस्तस्मिउ्छेते तानि यदा गह्णात्यथ हैततपुरुषः स्वपिति नाम तदगृहीत एव प्राणो भवति गृहीता वाग्गृहीतं चचतुर्गहीत" श्रोत्रं गृहीतं मनः ॥ १७॥

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विदाविनाद माध्य

भावार्थ-अजातशत्रु बोला कि जब यह जीवात्मा शरीरमें सोया हुआ था, उस अवस्थामें यह विज्ञानमय पुरुप अपने ज्ञानके द्वारा इन वागादि इन्द्रियोंकी विषयग्रहण सामर्थ्यको ग्रहण कर हृदयके भीतर आकाशमें शयन कर रहा था। जब वह पुरुष उन वागादि इन्द्रियोंको अपनेमें लय कर लेता है तब वह 'स्वपिति' इस नामसे कहा जाता है। तभी प्राण यानी घ्राणोन्द्रिय गृहीत होती है, वाणी गृहीत होती है, नेत्र गृहीत होता है, श्रोत्र गृहीत होता है और मन भी गृहीत होता है। अर्थात् ये सब अपने अपने कार्यमें असमर्थ हो जाते हैं॥ १७॥ वि० वि० भाष्य-जब पुरुप देह तथा इन्द्रियांकी अध्यक्षता त्याग देता है, तब अपने आत्माम ही विद्यमान रहता है। यह नामकी प्रसिद्धिसे जाना जाता है, नामकी प्रसिद्धिको श्रुति भगवती स्वयं बतलाती है-जब यह उनवागादिके विज्ञानोंको ग्रहण कर लेता है तब यह पुरुप 'स्वपिति' नामसे कहा जाता है, यानी उस समय इस पुरुपका यही नाम प्रसिद्ध हाता है। यह इसका गुणजनित नाम है। यह 'स्व' यानी आत्माको ही 'अपिति' यानो प्राप्त हा जाता है, अतः 'स्त्रपिति' ऐसा कहा जाता है। यहाँ वागादिका प्रकरण होनेसे 'प्राण' शब्दसे घाणेन्द्रिय समझनी चाहिए, कारण यह है कि वागादिका सम्बन्व हानेपर हो उनकी उपाविसे युक्त होनेके कारण इसका संसारवर्मयुक्त होना देखा जाता है। उस समय उन वागादिका वह उपसंहार कर लेता है, क्योंकि उस समय वाणी गृहीत रहती है, नेत्र गृहत रहता है, श्रोत्र गृहीत रहता है तथा मन भी गृहीत रहता है। इसलिए यह मालूम होता है कि बागादि इन्द्रियोंका उपसंहार हा जानेपर क्रिया, कारक तथा फलका अभाव हो जानेसे आत्मा अपने स्वरूपमें स्थित हो जाता है॥ १७।। अब स्वप्रवृत्तिका स्वरूप प्रतिपादन करते हैं, यथा- स यत्रैतत्स्वप्न्यया चरति ते हास्य लोकास्तदुतेव महाराजो भवत्युतेव महाब्राह्मण उतेवोच्चावचं निगच्छति सं यथा महाराजो जानपदान् गृहीत्वा स्वे जनपदे यथाकामं परिवर्तेतैवमेवैष एतत्प्राणान् गहीत्वा स्वे शरीरे यथाकामं परिवर्तते ॥ १८ ॥ भावाथ-जिस कालमें यह पुरुष इस देहमें सवप्नके व्यापारोंको करता है एस समय इसके किये हुए सब कर्मफल उदय हो आते हैं। उस अवस्थामें यह

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[अध्याय २

कभी महाराजके समान इस शरीरमें विचरता है. कभी महाव्राह्मणके समान विचरता है, कभी ऊँच नीच शानिका प्राप्त होता है नथा जैसे कोई महाराज जीते हुए देशोंके पदार्थोंको लेकर अपने देशमें अपनी च्छानुमार धृमता फिरता है, इसी प्रकार यह पुरुष भी वागादिक इन्द्रियोंका लेकर अपने शरीरमें अपनी इच्छाके अनुसार भ्रमण करता है॥ १८॥ वि० वि० भाष्य-जिस समय यह जीवात्मा इस देहमें स्वप्न द्वारा स्वपके व्यापारोंको करता है, उस समय कभी राजा होता है, कभी चाण्डाल बनता है, कभी हँसता है. कभी रोता है, कभी मारता है और कभी माग जाना है। किन्तु इसके ये महाराजत्वादि लोक मिथ्या ही हैं, क्योंकि इनके साथ 'इव' शब्दका प्रयोग किया गया है तथा रवप्नसे इतर अवस्थाओोमें इनका व्यभिचार भी देखा जाता है। अतः स्वप्नावस्था। बन्धुवियोगादिजनिन शोकमोहादिसे संबन्ध होता हो ऐसी बात नहीं है। किन्तु जाग्रत्कालके समान स्त्रप्रकालमें महाराजत्वादि लोकोंको भी, उस कालमें अव्यभिचारी होनेसे, सत्य ही मानना चाहिये, अन्यथा जाग्रत्कालिक महाराजत्वादि भी स्व्प्में व्यभिचरित हैं, अतः वे भी सत्य नहीं होंगे। इसलिए स्वाप्निक महाराजत्वादि अविद्यारोपित हैं, जाप्रत्कालिक महाराजत्वादि नहीं, यह वैषम्य युक्तिशून्य है। जैसे सेवकवर्ग तथा अन्य दर्शकगणको लेकर राजा अपने विजित देशमें यथेष्ट विहार करता है, वैसे ही यह विज्ञानमय आत्मा वागादि इन्द्रियोंको लेकर जार्गारत स्थानसे उठकर अपने शरीरमें ही स्वप्रस्थानमें यथेष्ठ विहार करता है, यही स्वप्न कहलाता है। वह कामकमीनुकूल पूर्वानुभूत वस्तुओंके समान वस्तुओंको देखता है इमलिए स्त्रप्न मिध्या है. इसीलिए अध्यस्त लोक अविद्यमान ही रहता है। एवं जाग्रन् अवस्थामें प्रतीयमान लोक भी मिश्या ही समझना चाहिए, अतः दर्शनमात्रसे उक्त दा अवस्थाओंमें वस्तुसत्ता सिद्ध नहीं हो सकती। इससे विशुद्ध तथा क्रियाकारक-फलशून्य विज्ञानमय आत्मा है, यह सिद्ध होता है। जिस प्रकार सवप्नमें दष्ट लोक मिथ्या है उसी प्रकार जाग्रतमें भी क्रियाकारक-फल- स्वरूप कार्यकारणलक्षण लोंक मिथ्या है, इससे अतिरिक्त विज्ञानमय आत्मा विशुद्ध है ॥ १८ ।। स्वप् मिथ्या ही सिद्ध होता है, पर उसका द्रष्टा आत्मा शुद्ध है, यह पहले कहा गया है। किन्तु आत्मामें कामका सम्बन्ध भी प्रतीत होता है, द्रष्टाका दृश्यके साथ सम्बन्ध स्वाभाविक है। इसलिए पुनः आत्मामें अशुद्धता प्राप्त हुई, इस शंका- निवृतिके लिए भगवती शुति कहती है, यथा-

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विद्याविनोद भाष्य ६३

कर्मोंमें और देवतादिकोंमें आस्तिकबुद्धि, अश्रद्धा-श्रद्धासे विपरीत भाव रखना,धृति- देहादिकोंके शिथिल होनेपर उन्हें सँभाले रखने, अधृति-धृतिके विपरीत होना, ह्वी- लज्जा, धी-बुद्धि, भी-भय इत्यादि प्रकारके ये सब भाव मन यानी अन्तःकरणके रूप हैं-। मनकी सिद्धिमें दूसरी यह भी बात है कि किसीको पीछेसे छूवो तो भी मनुष्य विवेक द्वारा यह जान लेगा कि पीठपर हाथ आदिका स्पर्श है। यहाँ विवेक करने- वाला मन है, अन्यथा त्वचामात्रसे ऐसा विवेकज्ञान कैसे हो सकता है ? वस, इसका कारण मन है।। ३ ।। वागादिकोंकी आध्यात्मिकी विभूतिको कहकर अब इनकी आधिभौतिक विभूतिका वर्णन किया जाता है, यथा- त्रयो लोका एत एव वागेवायं लोको मनोऽन्तरिच्षलोक: प्राणोऽसौ लोकः ॥४ ॥ भावार्थ-ये ही तीनों लोक हैं; वाणी ही यह लोक है, मन अन्तरिक्षलोक है और प्राण वह लोक है, यानी स्वर्ग है॥४॥ वि० वि० भाष्य-वाणी भूलोक इसलिए है कि इससे सबकी सत्ताका प्रकाश होता है। मन अन्तरिक्षलोक है, यानी रहस्यका प्रकाशक है, और प्राण स्वर्गलोक यानी जीवनरूप सुखका प्रकाशक है। ये तीनों लोक भूः, भुवः तथा स्व: नामक हैं॥४ ॥ इसी प्रकार वेदोंका भी समन्वय है, यह कहते हैं- त्रयो वेदा एत एव वागेवर्ग्वेदो मनो यजुर्वेद: प्राणः सामवेदः ।। ५ ।। भावार्थ-ये ही तीनों वेद हैं; वाक ऋग्वेद है, मन यजुर्वद है और प्राण सामवेद है।। ५ ।। वि. वि० भाष्य-वाणीको ऋग्वेद इसलिए कहा गया है कि ऋग्वेदके बिना मनुष्य मूककी तरह प्रतीत होता है। मन यजुवद है, क्योंकि यजु:के बिना पुरुष नष्टमन प्रतीत होता है। प्राण सामवेद है, क्योंकि सामगायनके बिना मनुष्यकरे प्राण आप्यायमान नहीं होते, यानी आनन्दसे पूर्ण नहीं होते ।। ५॥

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बृ हदारण्य कोपनषद् [भध्याय ₹

शयन करता है' ऐसा कहा जाता है। सुषुप्तिकालमें उसका शरीरसे सम्बन्ध नहीं रहता, अतएव उस समय वह हृदयके सारे शोकोंको पार कर लेता है। सब सांसारिक दुःखोंकी विमुक्तिस्वरूप वह अवस्था है। इसमें दष्टान्त कहते हैं कि वह आत्मा इस प्रकार आनन्दपूर्वक सोता है जैसे कोई अत्यन्त छोटा बालक अथवा शाखोक्त आचरण करनेवाला महाराज अथवा अत्यन्त परिपक्क विद्या-विनयसंपन्न दिव्य ब्राह्मण आनन्दमें पड़ा हुआ सोता है। तात्पर्य यह है कि इस प्रकार सुषुप्ता- वस्थामें वह अपने स्वाभाविक स्वरूपसे सारे सांसारिक धर्मोंसे अतीत होकर विद्युमान रहता है॥ १९॥ 'उस समय यह आत्मा कहॉ था' इस प्रश्नका उत्तर दिया गया। इस प्रश्नके निर्णयसे ही विज्ञानरूप आत्माकी स्वभावतः विशुद्धि और असंसारिता भी बतला दी गई। अब 'यह कहाँसे आया' इस प्रश्नका उत्तर आरम्भ किया जाता है, यथा- स यथोर्णनाभिस्तन्तुनोच्चरेद्यथाSये: क्षुद्रा विस्फुलिङ्गा व्युच्चरन्त्येवमेवास्मादात्मनः सर्वे प्राणाः सर्वें लोकाः सर्वे देवाः सर्वाणि भूतानि व्युच्चरन्ति तस्योपनिषस्सत्यस्य सत्यमिति प्राणा वै सत्यं तेषाभेष सत्यम् ॥ २० ॥ भावार्थ-जैसे मकड़ी अपने तन्तुके आश्रयमें विचरती है तथा जैसे अ्िसे छोटी चिनगारियाँ निकलती हैं, ऐसे ही इस आत्मासे सब वागादि इन्द्रियाँ, सब भूआदि लोक, सब आदित्यादि देवता, सब आकाशादि महाभूत निकलते हैं। उस आत्माका ज्ञान ही सत्यका सत्य है। प्राण ही सत्य है। उन्हींका यह सत्य है॥ २०।। वि० वि० भाष्य-लोकमें जैसे ऊर्णनाभि मकडी अकेली ही अपनेसे भेद न रखनेवाले तन्तुओं द्वारा ऊपरकी ओर जाती है, उसके ऊपर जानेमें उससे भिन्न कोई अन्य साधन नहीं है। वैसे ही ब्रह्म भी अपनेसे किये हुए जगत्के आश्रयमें विचरता हुआ प्रतीत होता है। जैसे अगिसे छोटी छोटी चिनगारियाँ इधर उघर उद़ती हुई दिखाई देती हैं वैसे ही इस आत्मासे वागादि सब प्राण, पृथिवी आदि सब लोक, सब कर्मफल, सब देवता और सब भूत यानी ब्रह्मासे लेकर स्तम्ब पर्यन्त सम्पूर्ण प्राणिसमुदाय उत्पन्न होते हैं। अर्थात् जिस कारणरूप ब्रह्मसे स्थावर जङ्गमात्मक प्रपक् उत्पन्न होता है, जिसमें रहता है तथा जिसमें जलबुद्बुद्के समान लीन होता है, उस आत्मस्वरूप ब्रझका ज्ञान ही परमसम्य है। इसो तरह वागादि इन्द्रि याँ भी उसके

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ब्राह्मण २ ] विद्याविनोद भाष्य

आश्रयमें होनेके कारण ही सत्य है, वैसे तो वे विनाशी हैं, उन सबोंमें यह आत्मा ही सत्य आवनाशी है॥२० ॥

द्वितीय ब्राह्मणा

आत्माकी प्राण उपाधि है, इसलिए प्राण उपास्य कहा गया है। उपाधि- भूत प्राण और उपाधेयभूत आत्मा-इन दोनोंका इस ब्राह्मणमें विवेचन किया जाता है। प्राण और आत्मा इन दोनोंका भेद स्फुट नहीं है, अन्यथा बालाकि- सदृश विद्वान्को इसमें भ्रम नहीं होता, अतः सर्वसाधारणको विवेक हो इस कामनासे दोनोंका विवेक दिखाया जायगा, जो उपासकोंके लिए अत्यन्त आवश्यक है। प्राणके विवेकके विना आत्माका विवेक नहीं हो सकता, अतः उसके उपायभूत प्राणका विवेक भी आवश्यक है। जैसे मार्गमें कोई रमणीक कूप या तालाब प्राप्त होता है, तो पथिककी यह जिज्ञासा होती है कि इसका निर्माता कौन था ? उस जिज्ञासाकी निवृत्तिके लिए यदि उस पुरुषका परिचय कराया जाय, तो वह प्रासङ्गिक होनेके कारण अजिज्ञासित नहीं कहा जा सकता। इसी प्रकार प्रकृतमें भी आत्माके निरूपणके समय प्राप्त, प्राणका निरू- पण अजिज्ञासित नहीं हो सकता। अतः प्राणोंके स्वरूपका निश्चय भगवती श्रुति कराती है, यथा- यो ह वै शिशु साधान सप्रत्याधान सस्थूण सदामं वेद सप्त ह द्विषतो आ्रातृव्यानवरुणद्धि। अयं वाव शिशुर्योडयं मध्यमः प्राणस्तस्येदमेवाधानमिदं प्रत्या- धानं प्राणः स्थूणाऽन्नं दाम ॥। १ ॥ भावार्थ-जो निश्चय करके आधानसहित, प्रत्यावानसहित और दाम- सहित शिशुको जानता है, वह द्वेष करनेवाले सात भ्रातृव्योंको अवश्य वशमें कर लेता है। जो यह तीन शत्रुओंके बीच रहनेवाला प्राण है यही निःसन्देह शिशु है, उसका यह स्थूल शरीर ही आधान है, यह शिर ही प्रत्याधान है, प्राण स्थूणा है और अन्न रस्सी है।। १ ।

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६६ शृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय २

वि० वि० भाष्य-इस मन्त्रमें मुख्य प्राणकी गौके बछड़ेके साथ उपमा दी गई है, जिस प्रकार बछड़ा खूटेसे बँधा हुआ घासादि खाकर बलिष्ठ हो जाता है, उसी प्रकार अनेक प्रकारके भोजनादि करनेमे प्राण भी बलिष्ठ हो जाता है। जिसमें कोई पदार्थ रहे उसको आधान कहते हैं। प्राणके रहनेका स्थान यह स्थूल देह ही आधान कहा है, क्योंकि इस देहमें ही प्राण रहता है। एक स्थानके भीतर और कोई जगह रहनेकी हो तो उसे प्रत्याधान कहते हैं, यह सिर प्रत्याधान है, क्योकि इसमें प्राणके रहनेकी जगह सात है, अर्थात दो आँख, दो कान, दो नासिका और एक रसना है। यह अन्नसे उत्पन्न हुआ बल ही प्राणरूपी बछड़े का खूँटा है, तथा अन्न इसका भोज्य है, जिस प्रकार खूँटेसे बँधा हुआ बछड़ा घास फूँसादि जो उसका भोग है, खाकर बली होता है, उसी प्रकार यह प्राण शरीरसे बँघा हुआ अनेक प्रकारके भोजन करके बली बनता है। उस ग्राणरूप शिशुको जाननेवाला पुरुष उन सात द्वेपी भ्रातृव्योंका अवरोध करता है। शिरमें स्थित जो सात प्राण विपयापलब्धिके द्वार हैं, उनसे होनेवाले विषयसम्बन्धी राग, साथ-साथ उत्पन्न होनेवाले भ्रातृव्य हैं। क्योंकि वे ही उसकी आत्मस्थ दृष्टिको विषयोन्मुख करते है, इसलिए वे द्वेप करनेवाले भ्रातृव्य हैं, कारण, वे प्रत्यगात्मदर्शन को रोकनेवाले हैं। कठोपनिषद्में भी कहा है-"स्वयम्भू परमात्माने इन्द्रियोंको बहिर्मुख करके हिसित कर दिया है, इसलिए जीव बाह्य विषयोंको देखता है, अन्तरात्माको नहीं देखता।" सो जो कोई इस शिशुको जानता है यानी इनके यथार्थ स्वरूपका निश्चय करता है वह इन भ्रातृव्यों का विनाश कर देता है॥ १॥ सात रुद्रादि देवता नेत्रस्थित प्राणकी सेवा करते हैं। इसीलिए वे अक्षीण हैं। प्राणकी अन्नभूत सातों इन्द्रियाँ निरन्तर प्राणकी उपासना करती हैं ऐसी भावनासे उपासना करनेवालेका अन्न कभी क्षीण नहीं होता, इसी बातको भगवती श्रुति स्पष्ट रूपसे कहती है, यथा- तमेताः सपताक्षितय उपतिष्ठन्ते तथा इमा अक्षन्लो- हिन्यो राजयस्ताभिरेनथ रुद्रोऽन्वायत्तोऽथ या अक्षन्नाप- स्ताभि: पर्जन्यो या कनीनका तथा SSदित्यो यत्कृप्णं तेनाभि- र्यच्छुक तेनेन्द्रोऽधरथैनं वर्तन्या पृथिव्यन्वायत्ता द्यौरुत्तरया नास्यान्नं क्षीयते य एवं वेद ॥२ ॥

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ब्राह्मण २ ] बिधाविनोद भाष्य

भावार्थ-उस प्राणकी ये सात अजय देवता स्ुति करते हैं-उनमेंसे जो ये नेत्रमें लाल रेखायें हैं उनके द्वारा रुद्र इस मध्यम प्राणके अनुगत हैं तथा जो नेत्रमें जल है, उसके द्वारा मेघ, जो पुतली है उसके द्वार सूर्य्य, जो कालिमा है उसके द्वारा अभि और जो शुक्कता है उसके द्वारा इन्द्र अनुगत है। नीचेके पलक द्वारा पृथिवी एवं ऊपरके पलक द्वारा दुलोक अनुगत है। जो इस प्रकार जानता है, उसका अन्न कभी क्षीण नहीं होता ॥२ ॥ वि० वि० भाष्य-इस लिङ्गात्मक प्राणकी ये सात अत्ितियाँ करणात्मक रूपसे उपासना करती हैं। वे अक्षितियाँ कौन-सी हैं सो बतलायी जाती हैं। उनमें ये जो नेत्रके भीतर लाल रेखाकी धारियाँ हैं, उन्हींके द्वारा रुद्र देवता मध्यम प्राणकी उपासना करते हैं और जो आँखमें जल है-धूमादिके संयोगवश नेत्रसे जलात्मक अश्रु गिरता है, इसलिए आँखमें जल रहता है, यह निश्चित है-उसके द्वारा पर्जन्य देवता नेत्रमें स्थित होकर प्राणकी उपासना करता है। वही अन्न होकर प्राणका अच्षिति कहलाता है। समयपर आवश्यकतानुसार जलके बरसनेसे प्रजावर्ग- को आनंद होता है, यह लोकमें प्रसिद्ध है। जो नेत्रमें काली पुतली है, उसके द्वारा सूर्य भगवान् मध्यम प्राणकी उपासना करते हैं और जो नेत्रमें कृष्ण रूप है, उसके द्वारा अभि और जो शुक् रूप है, उसके द्वारा इन्द्र उपासना करते हैं और नेत्रके नीचे की पलकोंमें पृथिवी स्थित होकर उक्त उपासना करती है। जिस प्रकार पलक आँखसे नीचे है, उसी प्रकार पृथिती भी नीचे है, अतः नीचे रहनेके कारण निचले पलकोंमें पृथिवीका रहना ठीक ही है। और नेत्रके ऊपरकी पलकोंमें धौ रहकर उक्त प्राणकी उपासना करती है, क्योंकि इन दोनोंमें ऊर्ध्वत्व समान है। ये सात देवगण अन्नभूत होकर प्राणकी निरन्तर उपासना करते हैं। इस प्रकार जो प्राणोपासना करता है उसके पास अन्नकी कभी कमी नहीं होती है॥।२।। तदेष श्ोको भवति। अर्वाग्बिलश्चमस ऊर्ध्वबुध्न- सतस्मिन्यशो निहितं विश्वरूपम्। तस्याऽसत ऋषयः सप्त तीरे वागष्टमी ब्राह्मणा संविदानेति। अर्वाग्बिलश्चमस ऊर्ध्वबुध् इतीदं तच्छिर एष ह्यर्वाग्विलश्चमस ऊर्ध्वबुभ्- स्तस्मिन्यशो निहितं विश्वरूपमिति प्राणा वै यशो विश्व- रूपं प्राणानेतदाह तस्याऽऽसत ऋषयः सप् तीर इति १३

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बृहदारण्यकोपनिषद् [भध्याय २

प्राणा वा ऋृषयः प्राणानेतढाह वागष्टमी ब्रह्मणा संविदानेति वाग्ध्यष्टमी ब्रह्मणा सवित्ते ॥ ३॥ भावार्थ-जो पिछले मन्त्रमे कहा गया है कि जीवात्माके सात शत्रु हैं, उन्हीका व्याख्यान इस मन्त्रमे किया जाता है। चमस सोमरसके आधार- भूत पार्त्रावशेषका नाम है वह नचेकी ओर छिद्रवाला और ऊपरकी ओर उठा हुआ होता है। यानी जिसका मुख नीचे है तथा पेदा ऊपर है, ऐसा चमसके-यजके कटोरेके समान मनुष्यका शिर है, उसमे अनेक प्रकारका निभववाला प्राण स्थित है। उसके किनारेपर सात प्राणयुक्त इन्द्रियाँ हैं और वेदसे सनाद करनेवाली आठवी वाणी स्थित है। नीचे है मुखरूप बिल जिसमे, और ऊपर है पेदा जिसमें, ऐसा यह चमसाकार मनुष्यका शिर है, क्योकि यह मनुष्यका शिर नीचे छिद्रवाला तथा ऊपर पेदेवाला यज्ञका कटोरा है। उसी शिरमे अनेक प्रकारका विभववाला प्राण स्थित है, वही सर्वशक्तिमान् विभववाला प्राण है, अत. प्राणको ही विश्व- रूप यश कहते है। उसके समीप सात इन्द्रियॉ रहती हैं, इस प्रकार सात इन्द्रियाँ यानी दो नेत्र, दो कर्ण, दो नासिका और एक जिह्वा प्राण ही हैं, अतएव मन्त्रने इसको प्राण कहा है और वेदसे सवाद करनेवाली आठवी वाणी है। इस प्रकार मन्त्रने कहा है, क्योकि आठवी वाणी वेदके साथ सम्बन्व रसती है॥। ३ ॥ अब पूर्वोक्त श्रोत्रादकामे निभागपूर्वक मपर्षिटष्टि बतलाते हैं, यथा- इमावेव गोतमभरद्वाजावयमेव गोतमोऽय भरद्वाज इमावेव विश्वामित्रजमढसी अयमेव विश्वामित्रोऽय जम- दझनिरिमावेव वसिष्टकश्यपावयमेव वशिष्ठोऽयं कश्यपो वागेवात्रिर्वाचा ह्यन्नमद्यतेनतिर्हं वै नामैतद्यदत्रिरिति सर्व- स्यात्ता भवति सर्वमस्यान्नं भवति य एव वेढ ॥ ४॥ भावार्थ-ये दोनो, वर्ण निश्चय करके गोतम और भरद्वाज हैं यानी दहिना कर्ण गोतम है और बायॉ कर्ण भरद्वाज है। ये दोनो नेत्र निश्चय करके विश्वामित्र और जमदग्नि हैं यानी दहिना नेत्र विश्वामित्र है तथा बायॉ नेत्र जमदभि है। ये दोनो नासिका नि मन्देह वसिष्ठ और कश्यप हैं, अर्थात् दहिनी नासिका वसिष्ठ है और बाई नासिका कश्यप है। 'दविग वाम' इस क्रममे प्रमाण नहीं है

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श्रीशन ३ ] विर्द्याविनोद भाष्य

इसलिए विपरीत भी हो सकता है, इस तात्प्यसे श्रुति ४ सम्त तथा असमस्त भेदसे दो बार नाम लिया गया है। वाणी-वागिन्द्रिय ही अत्रि है, क्योकि वागि न्द्रियके द्वारा ही अन्न भक्षण किया जाता है, अत यह प्रसिद्ध 'अत्ति' नामवाली है यानी अत्ता होनेके कारण यह अत्ति है, जो कि 'अत्ति' होते हुए ही परोक्ष रूपसे 'अन्रि' कही जाती है। जो उपासक इस प्रकार जानता है वह प्राणके इस सम्पूर्ण अन्नसमुदायका अत्ता-भक्षण करनेवाला होता है, और सब अन्न इसका भोज्य होता है यानी सब जगह वह भोक्ता ही होता है, कभी भोज्य नही होता है॥४॥ वि. वि० भाष्य-जैसे खूटेसे बँधा हुआ बछड़ा घास फॅसादि अपना उपभोज्य खाकर बली होता है वैसे ही यह प्राण शरीरसे बँधा हुआ नाना प्रकारके भोजन करके बली होता है। इम प्राणको सात अजय देवता-रुद्र, पर्जन्य, आदित्य, अगि, इन्द्र, परथिवी तथा द्यो-इसक निकट रहकर पूजते हैं और नेत्रादि सात इन्द्रियॉ (विषयोको भोगनेवाली, अत एन जीवको शत्रु) चमसाकार शिररूपी कटोरेके किनारे पर स्थित है, जिस शिग्स अनेक प्रकारके चमत्कारवाले प्राण स्थित है और वही वेदसे सवाद करनेवाली आठशी वाणी भी स्थित है। इन सात इन्द्रियोको ही गोतमादि सप्तर्षि भी कहा गया है और अन्त+ वागिन्द्रियका नाम अत्रि कहा गया है।।४।।

तृतीय ब्राह्मरा

ऊपर यह कहा गया है कि प्राण ही सत्य हैं। जो प्राणोकी उपनिषदे हैं, उनमे 'वे ये प्राण हैं' ऐसा कहकर व्रम्मोपनिनद्के प्रमगमे व्यारुपा कर दी गई है। अब यह बतलाना है कि उनका स्वरूप क्या हे तथा उनकी सत्यता किस प्रकार है? इसलिए शरीर एव इन्द्रियशप 'सत्य'सज्ञक पञ्चभूतोके स्वरूपका निश्चय करनेके लिए तृतीय ब्राह्मणका आरम्भ किया जाता है, जिम उपाधिविशेषके निषेध द्वारा 'नेति नेति' इत्यादि रूपसे श्रुतिको ब्रह्मस्व चूपका निश्चय करना अभीष्ट है, यथा- द्वे वाव ब्रह्मणो रूपे मूर्त चैवामूर्त च मत्य चामृहं च स्थितं च यच्च सच्च त्यं च।। १।। भावार्थ-ब्रह्मके दो रूप हैं-मूर्त तथा अमूर्त, मत्य तथा अमृत, स्थित तथा यत् (चर) और सत् तथा त्यत् ।। १।।

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$00 बृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय २

वि० वि० भाष्य-ब्रह्मके दो रूप हैं, एक मूर्तिमान्, दूसरा अमूर्तिमान, एक मरणधर्मी, दूसरा अमरणधर्मी, एक चल, दूसरा अचल, एक सत्-व्यक्त दूसग त्यत्-अव्यक्त। कार्यरूपसे संसारके अथवा ब्रह्माण्डके जितने रूप हैं सब मूर्तिमान् हैं, इसलिए विनाशी हैं, किन्तु जो परमाुरूपसे सृष्टिके नाश होनेपर स्थित रहते हैं, वे अमूर्तिमान् तथा अमरणधर्मा कहे जाते हैं। यही परमाणु. जब ईश्वर जगत्के रचनेकी इच्छा करता है, एक दूसरेसे मिलकर स्थूल गोलाकार 'लोक' आदिक बन जाते हैं और पुनः उन लोकोंमें ईश्वरकी प्रेरणासे चलनशक्ति होने लगसी है, और उसके बाद मूर्तिमान् वृक्ष, कीड़े आदि जीव न्तु उत्पन्न हो जाते हैं। पृथिवी आदि पाँच भूतोंसे जन्य शरीर, इन्द्रिय आदिसे संबद्ध, मूर्तामूर्तनामक वासनासे सहित, सर्वज्ञ और सर्वशक्तिसे समन्वित ब्रम्मका एक रूप है। यही सोपाधिक कहा जाता है और सोपाधिक ही समस्त व्यवहारका विषय है तथा कारणत्व, ज्ञातृत्व, प्रमाण-प्रमेयत्व, अधिष्ठातृदेवतात्व, अधिष्ठेय इन्द्रियादिमत्व, अन्तर्यामित्व, साकित्व, असर्वज्ञत्व इत्यादि सकल धर्म व्यवहारमें अप्रमेय ब्रह्ममें अविद्यासद्भाव दशामें प्रतीत होते हैं। वे सब सोपाधिक ब्रह्मके ही धर्म माने जाते हैं। ब्रह्मज्ञानके उत्पन्न होनेपर उक्त सब धर्मोंके साथ अविद्या भी निवृत्त हो जाती है, तब 'यतो वाचो निवर्तन्ते' इत्यादि श्रुतिके अनुसार ब्रह्म सकल धर्मातीत शुद्ध माना जाता है और उसीके ज्ञानसे मोक्ष होता है॥ १॥ इस प्रकार मूर्त और अमूर्त ये चार विशेषणयुक्त हैं, उनमें कौन विशेपण मूर्तके हैं और कौनसे अमूर्तके, इसका तथा मूर्त रूपके रसका वर्णन करते है, यथा- तदेतन्मूर्तं यदन्यद्वायोश्वान्तरिक्षाच्चैतन्मर्त्यमे तरिस्थि- तमेतत्सत्तस्यैतस्य मूर्तस्यैतस्य मर्त्यस्यैतस्य स्थितस्यैतस्य सत एष रसो य एष तपति सतो ह्येष रसः ॥ २॥ भावार्थ-जो वायु और आकाशसे भिन्न है वह मूर्त है। यह मर्त्य है, यह स्थित है और यह सत् है। इस मूर्तका, इस मर्त्यका, इस स्थितका, इस सत्का यह रस है, जो कि यह तपता है। यह सत्का ही रस है। २। वि. वि० भाष्य-मूर्त और अमूर्तोंमें मूर्त यानी परस्पर मिलितावयव समुदाय-वायु और आकाशरूप-अमूर्तसे अतिरिक्त है। शेष पृथिवी, जल, तेज, ये तीन ही मूर्त-मत्यं हैं, विनाशी हैं, क्योकि वे स्थित हैं, अर्थात् परिच्छ्विम् हैं।

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बाह्मय ३ ] विद्याविनोद भाष्य १०१

यह सत् यानी विशेष्यमाण असाधारण धर्मोवाला है, अतएव परिच्छिन्न है, परिच्छिन्न होनेके कारण मर्त्य है और इसीसे मूर्त है। अथवा मूर्त होनेके कारण मर्त्य है, स्थित है और स्थित होनेके कारण सत् है। अतएव इस मूर्तका, इस मत्यंका इस स्थितका और इस सत्का अर्थात् इन चार विशेषणोंसे युक्त भूतत्रयका यह सार है। अमूर्तत्रयके कार्यवर्गोंमें आदित्य प्रधान है। 'य एष तपति' इसका अर्थ यह है कि भूतत्रयका सविता रस-सार है, इसलिए 'तपनि'-मूर्त सविता ही संसारको प्रकाशित करता है। यद्यपि श्रुतिमें 'सतो ह्येष रसः' इस प्रकार कहा है तो भी उक्त मूर्तत्वादि तीन गुणोंका 'सत्' शब्द उपलक्षण है। जो मण्डलान्तर्गंत आधिदैविक कारण है उसे आगे कहेंगे। वे पृथिवी आदि परिच्छिन्न हैं, अन्य अर्थके साथ एक समयमें अधिकरणमें वे नहीं रह सकते, क्योंकि जिस स्थलमें जिस समयमें घट है, उस स्थलमें उसी समय दूसरे घटकी सत्ता नहीं रह सकती, यह सर्वानुभवसिद्ध है। इसलिए मूर्तोंका एकाधिकरणमें एक साथ रहनेमें विरोध है। अमूर्तकी अपेक्षा मूर्तका यह असाधारण धर्म है। अमूर्त वायु और आकाश संघटितावयव नहीं हैं, अतएव उनमें उक्त विरोध नहीं होता। मूर्तत्व, मर्त्यत्व, स्थितत्व और सत्व इन चारोंमें नियमेन सद्भाव ही रहता है, इसलिए इनमें परस्पर विशेष्य विशेपणभाव वक्ताकी इच्छापर निर्भर है, विषय स्वभावके अनुसार अन्यत्रके समान नियत नहीं है एवं कार्य कारणभाव भी परस्पर समुचित है। सर्वथा तीन भूत-मूर्तत्वादिचतुष्टय विशेषणसे विशिष्ट मूर्त-ब्रह्मके रूप हैं, इन चार विशेषणों में एकका ग्रहण करनेसे उससे भिन्न विशे- षणत्रयका ग्रहण हो जाता है, क्योंकि ये चारों परस्पर अव्यभिवरित हैं। अतएव भगवती श्रुतिने चारों विशेपणोंका अनुवाद कर इनमें सारभूत पदार्थका निर्णय किया है। तात्पर्य यह है कि उक्त चार विशेपणोंसे युकत तन भूतोंका कार्य्य सूर्यमण्डल है, एक एकका कार्य नहीं है, इस विशेष अर्थका बोधन करनेके लिए पुनः उक्त विशेषणोंका अनुवाद श्रुतिने किया है। उक्त चार गुणोंसे विशिष्ट तीन भूतोंका सार आदित्य है, क्योंकि 'यद्रोहितं तद्ग्नेः यच्छुक्लं रूपं तद्पां यत्कृष्णं तद्त्रस्य' इत्यादि श्रुतिसे रोहित, शुक्क और कृष्ण-ये तीनों असाधारण विशेषण तीनों भूतोंके हैं, उक्त तीन रूप आदित्यसे ही विभक्त होते हैं, इसलिए मघुविद्यामें 'रोहिताभी रश्मिनाडीभि: शुक्काभि: कृष्णाभिः' इत्यादि विशेपण आदित्यकी रश्मियोंमें दिये गये हैं। मूर्तके निरूपणके बाद अमूर्त पदार्थका निरूपण भगवती श्रुति करती है, यथा- अथामूरत वायुश्चान्तरिक्षं चैतदमृतमेतद्यदेतत्यं

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१०२ [अध्याय २

तस्यैतस्यामूर्तस्यैतस्यामृतस्यैतस्य यत एतस्य त्यस्यैष रसो एष य एतस्मिन्मण्डले पुरुषस्त्यस्य ह्येष रस इत्यधिदैवतम्॥ ३ ॥ भावार्थ-वायु और आकाश अमूत हैं, यै अमर धर्मवाले हैं, ये यत्-चल है तथा ये ही त्यत्-अव्यक्त है। इस अमूतका, इस अमृतका, इस चलका और इस अव्यक्तका यह सार है, जो कि इस मण्डलमें पुरुष है। यह देवतासम्बन्धी दर्मान है॥। ३ ॥।

वि० वि० भाष्य-अब इस मन्त्रमें ब्रह्मके अमूर्तिमान् रूपका वर्णन किया जाता है-पॉच महाभूतामसे तीन-तेज, जल और पृथिवी मूर्तिमान् हैं, जिनका वर्णन पूर्वोक्त मंत्रमें हो चुका है, शेष दो-वायु और आकाश अमूर्तिमान् हैं, अर्थात् उन तीन भूतोंकी अपेक्षा ये दोनों अमरणधर्मी हैं, चलने फिरनेवाले हैं और अव्यक्त हैं। इन दोनोंका सार सूर्यमण्डलस्थ पुरुष है, यह देवतासम्बन्धी विज्ञान है। जो अपरिच्छिन्न दो भूत-वायु और आकाश-हैं ये दोनों अमृत हैं, इनका किसीके साथ विरोध नहीं है, क्योंकि ये मूर्तके समान संघटित नहीं हैं, एक स्थलमें अन्यके साथ भी रहते हैं तथा अविनाशी और स्थितिसे विप्ररीत हैं, व्यापी और अपरिच्छ्िन्न हैं। जिस कारण अमूर्त अन्यसे अविभज्यमान है, इसलिए 'त्यत्' कहलाता है, त्यत् परोक्षको कहते हैं, वह अचानुष है। अमूर्त, अमृत, यत् औौर त्यत् इन चार विशेषणोंसे विशिष्ट अमूर्तके रसभूत सूर्यमण्डलमें जो कारणात्मक पुरुष हिरण्यगर्भ है वही प्राण कहा जाता है, वह दा अमूर्तोंका सार है। पुरुषका सार ही अमूत है। हिरण्यगर्भरूप लिङ्गके आरम्भके लिए दो भूतोंकी अभिव्यक्ति है। अ्व्याकृत दो भूतोंका सार हिरण्यगर्भ है। सूर्यमण्डलस्थ पुरुष जो सूर्यमण्डलक समान दृष्टिगोचरनहीं होता, वही डक्त दो भूतोंका सार है। उस पुरुष और दो भूतोंमें अमूर्तत्वादि विशेषण-चतुष्टय-विशिष्ट साधम्य है, इसलिए 'त्यस्य एष रसः' इस प्रकार श्रुतिका कथन है। अथवा सूत्रात्मा लिङ्ग- शरीरके आरम्भके लिए ही तीन मूर्तोंको उपसर्जन कर दो अमूर्तोंकी सृष्टि परमात्माने की. अतः दो भूतोंका सार सूत्रात्मा है। जिस प्रकार मण्डल तीन मूर्तोंका सार है, इसमें हेतु मूर्तत्वादि चतुष्टयकी अनुवृत्ति है, उसी प्रकार लिङ्गात्मा दो भूतोंका सार है, इसमें उक्त अमूर्तत्वादि विशेवणचतुष्रय हेतु हैं॥ ३॥

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भाक्ण ३ ] विद्याविनोद भाष्य १०३

अथाध्यात्ममिदमेव मूर्त यदन्यत्प्राणाच्च यश्चायम- न्तरात्मन्नाकाश एतन्म्त्यमेतति्स्थितमेतत्सत्तस्यैतस्य मूर्त- स्यैतस्य मर्त्यस्यैतस्य स्थितस्यैतस्य सत एष रसो यच्चक्षः सतो ह्येष रसः।।४ ।। भावार्थ-इसके अनन्तर शरीरसम्बन्धी उपदेश कहा जाता है। जो प्राण और शरीरके भीतर आकाश है उससे जो भिन्न है, यही मूर्त है। यह मर्त्य है, यह स्थित है, यह सत् है। जो यह चन्तु है, वही इस मूर्तका, इस मर्त्यका, इस स्थितका एवं इस सत्का सार है।।४। वि० वि० भाष्य-अब मूर्तामूर्तका अध्यात्मविभाग बतलाया जाता है- वह मूर्त क्या है ? जो वायु और वायुके विकारसे भिन्न है, जो शरीरस्थ आकाश तथा आकाशके विकारसे भिन्न पदार्थ है अर्थात् जो अभि, जल, पृथिवी ह, वही मूर्तिमान् है, वही मरणधर्मी है, वही स्थायी है वही व्यक्त है। इनका जो सार है वही नेत्र है, यह नेत्र सत् यानी अभि, जल और पृथिवीका सार है। 'यही सत्का सार है' यह कथन सत् (तीनों भूतों) का चन्ुके मूर्तत्व एवं सारत्वमें हेतु प्रतिपादन करनेके लिए है। तात्पर्य यह है कि चन्षु मूर्त है, इस- लिए उसको तीनों मूर्त भूतोंका कार्य होना उचित ही है, क्योंकि वह मूर्तके समान धर्मवाला है तथा देहके सम्पूर्ण अवयवोंमें प्रधान होनेके कारण वह आध्यात्मिक तीनों भूतोंका सार है॥४ ॥ अथामूर्त प्राणश्च यश्चायमन्तरात्मन्नाकाश एतदमृत- मेतददेतत्यं तस्यैतस्यामूर्तस्यैतस्यामृतस्यैतस्य यत एतस्य त्यस्यैष रसो योऽयं दक्षियो क्षन्पुरुषस्त्यस्य ह्येष रसः।।५।। भावार्थ-अब अमूर्तका वर्णन करते हैं-प्राण तथा शरीरके भीतर जो आकाश है, वह अमूर्त है, यह अमरणधर्मी है, यह यत् है और त्यत् है। इस अमूर्तका, इस अमृतका, इस यत्का, इस त्यत्का यह रस है जो कि यह दहिने नेत्रमें पुरुष है, यही त्यत्-अव्यक्तका सार है॥५॥ वि० वि० भाष्य-इसके अनन्तर अमूर्तके विषयमें उपदेश किया जाता है। जो बचे हुए दो भूत, प्राण और शरीरान्तर्गत आकाश हैं तथा समस्त प्राण और

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१०४ बृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय २

आकाशके भेद हैं वही यह अमरणधर्मी है, वही गमनशील है, वही अव्यक्त है, वही दृक्षिण नेत्रमें पुरुष है, अथवा दहिना नेत्रस्थ पुरुष आकाश और वायुका सार है। 'यह त्यत्का सार है' यह कथन पूर्ववत् विशेप रूपसे ग्रहण न होनेके कारण त्यत् अर्थात् अमूर्त दोनों भूतोंके दक्षिणनेत्रस्थित पुरुषके अमूर्तत्व और सारत्वमें ही हेतु प्रतिपादन करनेके लिए है॥। ५॥ सत्यशब्द-वाच्य एवं ब्रह्मके उपाधिभूत अध्यात्म तथा अधिदैव मूर्तामूर्तके विभागका कार्यकारण भेदसे विभाग किया गया, अब इस विख्यात पुरुप-जीवा- तमीके रूपको कहते हैं, यथा- तस्य हैतस्य पुरुषस्य रूपम्। यथा माहारजनं वासो यथा पाण्ड्वाविकं यथेन्द्रगोपो यथाऽग्न्यचिर्यथा पुण्डरीकं यथा सकृद्विद्युत्तथ सक्ृद्विद्युत्तेव ह वा अस्य श्रीर्भवति य एवं वेदाथात आदेशो नेति नेति न ह्येतस्मादिति नेत्य- न्यत्परमस्त्यथ नामधेय सत्यस्य सत्यमिति प्राणा वै सत्यं तेषामेष सत्यम् ॥ ६॥ भावार्थ-इस प्रसिद्ध पुरुषका रूप ऐसा है जैसा हल्दीमें रँगा हुआ वस्त्, जैसा सफेद ऊनी वस्त्न, जैसा इन्द्रगोप-धीरबहूटी कीट, जैसी अग्निकी ज्वाला, जैसा श्वेत कमल तथा जैसी बिजलीकी चमक होती है। जो इस प्रकार जानता है, उसकी सम्पत्ति बिजलीकी चमकके समान यानी सब जगह एक साथ फैलनेवाली होती है। अब हे बालाकि, यहाँसे परमात्माके विषयमें उपदेश 'नेति नेति' करके आरम्भ करते हैं, क्योंकि इस उपदेशसे और कोई भी उपदेश उत्कृष्ट नहीं है। अब ब्रह्मके नामको कहते हैं-उसका नाम सत्य है। प्राण ही सत्य है॥ ६।। वि. वि. भाष्य-इस इन्द्रियात्मा लिङ्गशरीररूप पुरुषके वासनामय, मूर्तामूर्त स्वरूपके विज्ञानमय संयोगसे उत्पन्न हुए, वस्न्र या भित्तिपर लिखे हुए चित्रके समान विचित्र तथा इंद्रजाल एवं मृगतृष्णाके समान सब प्रकारके व्यामोहके आश्रयभूत रूपका वर्णन करते हैं-हे सोम्य, कभी इस जीवात्माका स्वरूप हल्दीमें रंगे हुए कपड़ोंकी तरह हो जाता है, कभी कुछ सफेद भेड़के रोमकी तरह हो जाता है, कभी इन्द्रगोप नामक कीट (बीरबहूटी) की तरह

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बिदाविनोद भाष्य 1 १०५

हो जाता है, कभी अगिकी ज्वालाकी तरह उसका रूप हो जाता है, कभी श्वेत कमलकी तरह उसका रूप हो जाता है, कभी विद्युत् के प्रकाशकी तरह उसका रूप बन जाता है। अर्थात् जैसी इसकी उपाधि होती है वैसे ही यह आत्मा भी देख पड़ता है। जो पुरुष इस रहस्यको अच्छी तरह जानता है उसकी सम्पूर्ण सम्पत्ति विद्युत्के प्रकाशकी तरह चमकनेवाली होती है। हे बालाकि, जो कुछ अभी तक कहा गया है, वह प्रकृति और जीवके विषयमें कहा गया है, अब परमात्माके विषयमें उपदेश प्रारम्भ करते हैं-उस परमात्माका उपदेश 'नेति नेति' शब्दोंसे होता है, क्योंकि इस उपदेशसे बढ़कर दूसरा कोई भी उपदेश नहीं है, अतः 'नेति नेति' शब्दके द्वारा उसका उपदेश किया जाता है। हे बालाकि, जगतके दो भाग हैं, मूर्तिमान् और अमूर्तिमान, इन दोनोंके लिए दो नकार प्रयुक्त है। अर्थात् मूर्तिमान् वस्तुको देखकर शिष्यके प्रश्न करनेपर कि यह ब्रह्म है, गुरु कहता है-यह नहीं है, यह नहीं है। ज्यों ज्यों ब्रह्मके विषयमें शिष्य प्रश्न करता जाता है त्योंत्यों गुरु'नेति नेति' करके उत्तर देता जाता है। जब सम्पूर्ण मूर्तिमान् विषय अर्थात् अभि, जल, पृथिवीकी सभी वस्तुओंकी समाप्ति हो जाती है, और जब शिष्य अमूर्तिमान् यानी वायु और आकाशके कार्योंके विषयमें प्रश्न करता है, तब गुरु फिर भी नेति नेति शब्दसे उसको उपदेश करता जाता है। जहाँ शिष्यका प्रश्न समाप्त हो जाता है, वहाँ दोनों यानी शिष्य और गुरु चुप हो जाते हैं, वहींपर शिष्यको ब्रह्मकी तरफ निदश करके गुरु बताता है कि यह ब्रह्म है। पुनः वहाँसे ही ऊपरको अर्थात् कारणके कार्यको बताता चला आता है कि यह भी ब्रह्म है, यह भी ब्रह्म है, क्योंकि कार्यमें कारण अनुगत रहता है, अथवा कार्य कारण एक रूप होते हैं। सब संसार ब्रह्मरूप ही है, इस प्रकार उपदेश पानेपर परमानन्द प्राप्त हो जाता है, तथा पुनः दोनोंका शिष्यत्व और गुरुत्वभाव नष्ट हो जाता है। हे बालाकि इस ब्रह्मका नाम सत्य है, जो बाह्य और आभ्यन्तर प्राण हैं उनका नाम भी सत्य है, उन प्राणोंका भी जो प्रेरक हो अर्थात् सत्ता देनेवाला हो, वही त्रिकालाबाघित सच्विदानंदस्वरूप है, यही उसका नाम है। प्रकृत मन्त्रमें उस निर्गुण परमात्माका वर्णन किया गया है जिसमें कि विज्ञान- बादी वैनाशिकोंको ऐसा भ्रम हो गया है कि बस इतना ही आत्मा है। नैयायिक और वैशेषिक ऐसा मानने लगे हैं कि यह वासनारूप ही पटके रूपके समान 'आत्मा' नामक द्रव्यका गुण है। तथा सांख्यवादियोंका मत है कि यह तीन गुणवाला स्वतन्त्र अन्तःकरण पुरुषार्थके हेतुसे आत्माके लिए प्रवृत होता है। किसीका मत है कि एक तो मूर्तामूर्त राशि है और दूसरी परमात्मसंज्ञक उत्तम राशि है तथा १४

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१०६ बृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याथ २

अजातशत्रु द्वारा जगाये हुए कर्ता, भोक्ता, विज्ञानमयके साथ विद्या, कर्म और पूर्व प्रजाका जो समुदाय है, वह पूर्वोक्त दोनोंसे भिन्न तीसरी मध्यम राशि है। विद्या, पूर्व प्रज्ञा और कर्मका समुदाय प्रयोजक है तथा पूर्वोक्त मूर्तामूर्त भूतराशि एवं ज्ञान कर्मके साधन कार्यकारणसमूह प्रयोज्य हैं। इस प्रकार तीन राशिकी कल्पना कर लेनेके बाद वे तार्किकोंके साथ सन्धि कर लेते है और यह कर्मराशि लिङ्गदेहके आश्रित है, इस प्रकार कहकर पुनः उससे सांख्यसिद्धांतका मेल हो जानेके डरसे डरते हुए ऐसा कहने लगते हैं कि जैसे पुष्पके आश्रयमें रहनेवाला गन्ध, पुष्पके न तहनेपर भी तैलके आश्रित रहता है, वैसे ही सम्पूर्ण कर्मराशि लिङ्गदेहका वियोग होनेपर भी, परमात्माके एक देशको आश्रय करती है। परमात्माका वह एक देश दूसरे प्राप्त हुए उस गुणरूप कर्मके द्वारा निर्गुण होनेपर भी सगुण हो जाता है, तथा वह विज्ञानात्मा कर्ता भोक्ता ही बद्ध या मुक्त होता है, इस प्रकार वे वैशेषिकोंके चित्तका भी अनुसरण करते हैं। भूतराशिसे आनेवाली वह कर्मराशि स्वतः निर्गुण ही है, क्योंकि वह परमात्माका ही एक देश है। स्वयं उत्पन्न हुई अविद्या अनागन्तुक होनेपर भी (पृथिवीके धर्म) ऊसरके समान अनात्माका धर्म है। इस तरह बहुतसे मत हैं परन्तु सिद्धान्तमें आत्मा स्वप्रकाश अतएव स्वयं सिद्ध है, इसलिए वह न कार्य है और न ज्ञेय, केवल अविद्योपस्थापित नामादिसे संसृष्ट होकर सबका प्रकाशक होता है। इसीसे दार्शनिकोंको आत्मतत्वके निर्णयमें अनेक प्रकारकी भूलें हुई हैं। केवल तर्कादि द्वारा आत्मतत्त्वका विवेचन जिन लोगोंने किया है, वे प्रायः आत्मतत्त्वका यथार्थ निर्णय नहीं कर पाये हैं। आत्मा आगमसे ही गम्य है, इसलिए आगम द्वारा ही उसका यथार्थ निर्णय हो सकता है, अन्यथा नहीं। जिस प्रकार मिश्रित अष्टधातुओंका विश्लेषण अभिज्ञ पुरुष ही प्रयोग द्वारा कर सकता है, अनभिज्ञ नहीं कर सकता, वैसे ही चिद्चिन्मिश्रित शरीरादिमें चिदंश कौन है और अचिदंश कौन है और कितना है ? इत्यादिके निर्णयका उपाय आगम ही है, तर्कादि नहीं। धातुओंके विश्लेषणका उपाय नियत है. भेद इतना ही है कि वे भौतिक हैं, इसलिए उनके विश्लेषके उपाय भी भौतिक ही हैं। चिदचिद् विभागके उपाय आध्यात्मिक हैं। आगमोक्त उपाय तथा महात्माओंके उपदेशपर नो विश्वास कर उसमें परायण होते हैं, वे ही उक्त विभागमें कुशल होते हैं, इसीसे यह कहा जाता है कि बुद्धिका तत्त्वमें पक्षपात होता है, इसी क्षणमें उत्पन्न भी तत्त्व- बुद्धि दीर्घ कालोत्पन्न प्रबल अतत्त्वबुद्धिको समूल नष्ट करती है, अतएव भविष्यमें पुनः अतत्त्वबुद्धि द्वारा तत्त्वबुद्धिके तिरोभावकी शङ्का नहीं रह जाती।

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ब्राह्मम ४ ] विद्याविनोद भाष्य १०७

आत्मा स्वप्रकाश है और बुद्धिका आत्मामें पक्षपात है, इसलिए 'नेति नेति' इत्यादि वाक्य द्वैतमात्रके निषेधपरक हैं अर्थात् द्वैतनिषेधमें ही उनका पर्यवसान है। आत्मतत्त्व स्वतः सिद्ध है॥ ६ ॥

चतुर्थ ब्राह्मण

'आत्मेत्येवोपासीत' इस वाक्यसे परमात्माका ही उपासनाके लिए प्रति- पादन करना अभोष्ट है, क्योंकि वही अन्वेषणीय है। पूर्वोक्त तीन ब्राह्मणोंमें मूर्त, अमूर्त आदिके भेदसे समारोपित प्रपश्व को ब्रह्मका रूप बतलाकर 'नेति नेति' इस वाक्यसे उसका निराकरण कर 'निष्प्रपक्च ब्रह्म ही मुक्तिकी कामनासे उपासनीय है' ऐसा कहा है। शाकल्यसे 'ब्रह्म ते ब्रवाणि' अर्थात् मैं आपसे ब्रह्मका निरूपण करता हूँ, ऐसी प्रतिज्ञा करके राजाने मूर्तामूर्तादि ब्रह्मरूपका जो निरूपण किया है, वह प्रतिज्ञाके त्रिपरीत प्रतीत होता है, किन्तु दूसरा उपाय न देखकर राजाने उक्त रूपके प्रतिषेध द्वारा ही ब्रह्मका निर्देश किया है। इसमें विद्या ही साधन है और मुक्ति फल है। 'तदात्मानमेत्रावेहहं ब्रझ्मास्मि' 'तक्मात्ततसर्वनमत्रत्' इत्यादि पहले स्पष्ट कह चुके हैं। इससे यह निश्चित हो चुका है कि प्रत्यगात्मा ही ब्रह्म विद्याका विषय है। अविद्याका विवय 'अन्योऽसी अन्योऽहमस्मीति न स वेद' इत्यादिसे भेददर्शन हो माना गया है। अतएव चतुवर्ग, चतुराश्रम आदिका विभाग, निमित्तभूत पाङक्त कर्म और साध्यसाधनलक्षण व्याकृताव्याकृतस्त्रभाव, नाम रूप कर्मात्मक संसारका 'त्रयं वा इदं नाम रूपं कर्म' इत्यादि वाक्यसे उपसंहार किया गया है। शास्त्रीय ज्ञान कर्मका उत्कर्ष हिरण्यगर्भलोककी प्राप्ति तक ही सीमित है और अशा- खतीय स्वाभाविक ज्ञान कर्मका निष्कर्ष स्थावरान्त अधोभाव है, इत्यादि पहले निरूपित हो चुका है। इस अविद्याके विषय संसारसे जो विरक्त हैं, उन्हींका प्रत्यगात्मविषयक ब्रह्मविद्यामें अधिकार है। समस्त अविद्याविषयका उपसंहार तृतीय ब्राह्मणमें हो चुका है। चतुर्थ ब्राह्मणमें 'ब्रह्म ते ब्रवाणि' 'ब्रह्म ते जपयिष्यामि' इत्यादि वाक्योंसे सब विशेषोंसे शून्य अद्वय ब्रह्मका प्रस्ताव कर क्रिया, कारक, फल आदि सत्यशब्दवाच्य सम्पूर्ण द्वेतका 'नेति नेति' वाक्यसे प्रतिषेध कर ब्रह्म ही समझाया गया है। उसीके ज्ञानसे ब्राह्मणत्व क्षत्रियत्वादि प्रत्ययको निवृत्ति जिसे हो गई है उसे तत्सम्ब्रन्धी प्रत्यय न रहनेके कारण स्वतः ही उसके कार्यभूत कर्म और कर्मके साधनोंका संन्यास

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१०८ शृहदेारण्यकापानषद् [अध्याय २

प्राप्त हो जाता है। इसलिए आत्मज्ञानके प्रसङ्गरूपसे संन्यासका विधान करनेके लिए यह आख्यायिका आरम्भ की जाती है- मैत्रेयीति होवाच याजवल्क्य उद्यास्यन्वा अरेडहमस्मात्सथा- नादस्मि हन्त तेऽनया कात्यायन्याऽन्तं करवाणीति ॥१॥ भावार्थ-एक समय राजा जनक तथा याज्ञवल्क्य ऋषि परस्पर बातचीत कर रहे थे, राजा जनकने याज्ञवल्क्य ऋषिसे कहा कि हे प्रभो, मैंने वैराग्यके स्वरूपको नहीं देखा है, उसका कैसा स्वरूप होता है, यह मैं देखना चाहता हूँ। याज्ञवल्क्य महर्षिने कहा-कल मैं तुमको वैराग्यका स्वरूप दिखा दूँगा। इस प्रकार कहकर ऋषि अपने घर चले आये और संन्यास लेनेका दढ़ संकल्प कर अपनी प्रिय भार्या मैत्रेयी- को संबोधित किया कि हे मैत्रेयि, मैं इस गृहस्थाश्रमको त्याग कर दूसरे आश्रममें जानेके लिए इच्छुक हूँ, अतः तेरी अनुमति चाहता हूँ। इसके सिवा (यह भी इच्छा है कि) इस अपनी दूसरी भार्या कात्यायनीके साथ तेरा अन्त यानी विच्छेद (बटवारा) भी कर दूँ। तात्पर्य यह है कि आपसमें झगड़ा न हो, अतः धनका बरा- बर बटवारा करके मैं चला जाऊँगा ।। १॥ सा होवाच मैत्रेयी यन्नु म इयं भगोः सर्वा पृथिवी वित्तेन पूर्णा स्यात्कथं तेनांमृता स्यामिति नेति होवाच याज्ञवल्क्यो यथैवोपकरणवतां जीवितं तथैव ते जीवितथ स्यादमृतत्वस्य तु नाऽऽशास्ति वित्तेनेति ॥२॥ भावार्थ-यह सुनकर मैत्रेयी बोली कि हे भगवन्, दैव इच्छासे यदि समुद्रसे घिरी हुई तथा धनसे पूर्ण सारी पृथिवी मेरी हो जाय तो क्या मैं उसके द्वारा तापत्रयसे छूट जाऊँगी ? यानी मुक्त हो जाऊँगी? याज्ञवल्क महर्षिने उत्तर दिया कि नहीं। अर्थात् जैसे उत्तम सुख साधनवालोंका जीवन होता है वैसे ही तेरा भी जीवन हो जायगा, परन्तु धनसाध्य कर्मसे अमृतत्व-मोक्षकी तो मनसे भी आशा नहीं है॥ २॥ सा होवाच मैत्रेयी येनाहं नामृता स्यां किमहं तेन कुया यदेव भगवान्वेद तदेव मे ब्रूहीति॥३॥ भावार्थ-उस मैत्रेयीने कहा कि हे भगवन, जिस धनसे मैं मुक्त नही

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भ्राह्मण ४ ] विद्यावनद भाष्य १०६

हो सकती उस धनसे क्या लाभ उठाऊॅगी ? श्रीमान् जो कुछ केवल अमृतत्वका साधन जानते हों, उस अमृतत्वके साधनका ही मुझे उपदेश करें॥ ३॥ स होवाच याज्ञवल्क्यः प्रिया वतारे नः सती प्रियं भाषस एह्यास्स्व व्याख्यास्यामि ते व्याचक्ष/णस्य तु मे निदिध्यासस्वेति॥४ ॥ भावार्थ-ऐसा सुनकर वे प्रसिद्ध याज्ञवल्क्च महार्प बोले कि मैत्रेि, तुम मेरी पतिव्रता स्त्री हो, आओ, बैठो, तुम्हे अमृतत्व सावनका उपदेश देता हूँ, मेरे उपदेशवाक्योंका ध्यानपूर्वक श्रवण करो, तब कल्याण अवश्य होगा ॥४ ॥ स होवाच न वा अरे पत्युः कामाय पतिः प्रियो भव- त्यात्मनस्तु कामाय पतिः प्रियो भवति। न वाअरे जायायै कामाय जाया प्रिया भवत्यात्मनस्तु कामाय जाया प्रिया भवति। न वा अरे पुत्राणां कामाय पुत्राः प्रिया भवन्त्या- त्मनस्तु कामाय पुत्राः प्रिया भवन्ति। न वा अरे वित्तस्य कामांय वित्तं प्रियं भवत्यात्मनस्तु कामाय वित्तं प्रियं भवति। न वा अरेब्रह्मणः कामाय ब्रह्म प्रियं भवत्यात्मनस्तु कामाय ब्रह्म प्रियंभवति। न वा अरे क्षत्रस्य कामाय क्षत्रं प्रियं भवत्यात्मनस्तु कामाय क्षत्रं प्रियं भवति। नवा अरे लोकानां कामाय लोकाः प्रिया भवन्त्यात्मनस्तु कामाय लोका: प्रिया भवन्ति। न वा अरे देवानां कामाय देवाः प्रिया भवन्त्यात्मनस्तु कामाय देवाः प्रिया भवन्ति। न वा अरे भूतानां कामाय भूतानि प्रियाणि भवन्त्यात्मनस्तु कामाय भूतानि प्रियाणि भवन्ति। न वा अरे सर्वस्य कामाय सर्व प्रियं भवत्यात्मनस्तु कामाय सर्वं प्रियं भवति। आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदि-

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११० [अध्याय र

ध्यासितव्यो मैत्रेय्यात्मनो वा अरे दर्शनेन श्रवगोन मत्या विज्ञानेनेद सर्व विदितम् ॥ ५ ॥ भावार्थ-मैत्रेयी देवीने याज्ञवल्क्च महर्पिसे सविनय प्रार्थना की कि जिस साधनसे आप अपने आत्मसम्बन्धी ज्ञानरूपी धनको अपने साथ लिये जाते हैं, उसमें मुझको भी संमिलित कीजिये। यह सुनकर याज्ञवल्क्य महर्षि बड़े प्रसन्न हुए और अमृतत्वके साधन वैराग्यका उपदेश करनेकी इच्छासे स्त्री, पति एवं पुत्रादिसे, उनका त्याग करनेके निमित्त वैराग्यकी उत्पत्ति कराने लगे। उन्होंने कहा कि मैत्रेयि, पतिकी प्रीतिके लिए स्ीको पति प्रिय नहीं होता, किन्तु अपनी प्रीतिके लिए पति स्त्रीको प्रिय होता है, अतः स्त्री अपने सुखके लिए ही पतिसे प्रेम करती है। एवं स्त्रीकी प्रीतिके लिए पतिको स्त्री प्रिय नहीं होती, किन्तु पतिको स्त्रीसे सुख होता है, इसलिए पति अपने सुखके लिए ही स्त्रीमे प्रेम करता है। एवं पुत्रप्रीतिके लिए पुत्र प्रिय नहीं होता है, किन्तु अपनी प्रीतिके लिए पुत्र प्रिय होता है। धनकी कामनाके लिए धन प्रिय नहीं होता, किन्तु आत्मकामनाके लिए धन प्रिय माना जाता है। एवं ब्रह्मकी कामनाके लिए ब्रह्म प्रिय नहीं होता, किन्तु आत्मकामनाके लिए ब्रह्म प्रिय होता है। क्षत्रियकी कामनाके लिए क्षत्रिय प्रिय नहीं होता, आत्मकामनाके लिए क्षत्रिय प्रिय होता है। लोककी कामनाके लिए लोक प्रिय नहीं होता, आत्मकामनाके लिए ही लोक प्रिय होता है। एवं देवताओंकी कामनाके लिए देवता प्रिय नहीं होते, आत्मकामनाके लिए ही देवता प्रिय माने जाते हैं। एवं भूतोंकी कामनाके लिए भूत प्रिय नहीं होते किन्तु अपनी कामनाके लिए भूत प्रिय होते हैं। इस तरह सबकी कामनाके लिए सब प्रिय नहीं होते किन्तु आत्माकी कामनाके लिए सब प्रिय माने जाते हैं। इसलिए प्रिय मैत्रेयि, यह आत्मा ही दर्शनके योग्य है, यही गुरु और शास्त्र द्वारा सुनने योग्य है, यही विचागने योग्य है, यही निश्चय करने योग्य है। हे मैत्रेयि, आत्माके दर्शनसे, श्रवणसे, मननसे तथा विज्ञानसे यह सब प्रपञ् विदित हो जाता है, अतः आत्मा को जानो, इसीसे तुम्हारा कल्याण होगा। वही प्रिय है जिससे इस आत्माको आनन्द मिलता है, क्योंकि यह आत्मा आनन्दस्वरूप है। इससे अतिरिक्त कहीं आनन्द नहीं है, जो कुछ है वह आत्मा है।। ५।। आत्मा ही सब कुछ किस प्रकार है, यह श्रुति बतलाती है- ब्रह्म तं परादाय्योऽन्यत्रात्मनो ब्रह्म वेद क्षत्रं तं परा-

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भाकण ४ ] विद्याविनोद भाष्य १११

दाद्योऽन्यत्रात्मनः क्षत्रं वेद लोकास्त परादुर्योऽन्यत्रात्मनो लोकान्वेट देवास्त परादुर्योऽन्यत्रारमनो देवान्वेद भूतानि तं परादुर्यो ऽन्यत्रात्मनो भूतानि वेढ सर्व त परादाद्योऽन्य- त्रात्मनः सर्व वेदेदंब्रह्मेदं क्षामिमे लोका इमे देवा इमानि भूतानीदथ सर्वं यद्यमात्मा ॥ ६॥ भावार्थ-ब्राह्मणजाति उसे परास्त कर देती है जो ब्राह्मणजातिको आत्मा- से भिन्न जानता है। क्षत्रियजाति उसे परास्त कर देती है जो क्षत्रियजातिको आत्मासे भिन्न देखता है। लोक उसे परास्त कर देते हैं जो लोकोंको आत्मासे भिन्न देखता है। देव और भूतगण उसे परास्त कर देते हैं, जो देवो और भूत- गणोको आत्मासे भिन्न देखता है। सभी उसको परास्त कर देते हैं जो सबको आत्मासे भिन्न देखता है। यह ब्राह्मणजाति, यह क्षत्रियजाति, ये लोक, ये देव- गण, भूतगण और ये सब जो कुछ भी हैं, सब आत्मा ही है।। ६।। यहॉ तक 'श्रोतव्य' इस वाक्यका तात्पर्यानुसारी विचार समाप्त हुआ। अनन्तर मन्तव्य' इस मनन विद्याके विस्तारके लिए दुन्दुभि आदिका दष्टान्त कहते हैं, यथा-

स यथा दुन्दुभेर्हन्यमानस्य न बाह्याञ्छब्दाञ्छक्कयादु- ग्रहणाय दुन्दुभेस्तु ग्रहगोन दुन्दुभ्याघातस्य वा शब्दोः गृहीतः॥७॥

भावार्थ-जैसे बजाये जानेपर दुदुभिसे (नगाड़ेसे) बाहर निक्लनेवाले शब्दोको कोई मनुष्य नही पकड सकता, वैसे ही आत्माको कोई बाहरसे नही पकड़ सकता। किन्तु जैसे दुन्दुभिके पकड लेनेसे अथवा दुन्दुभिके बजानेवाले- को पकड लेनेसे शब्द पकडा जा सकता है, वसे ही आत्माके समीप जो इन्द्रिय समूह है उसके रोकनेसे आत्माका ज्ञान हो सकता है।।७॥

स यथा शङ्गस्य ध्मायमानस्य न बाह्याञ्छब्दान्छक्तु-

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११२ बृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय २

याद ग्रहणाय शङ्गस्य तु ग्रहगोन शङ्गध्मस्य वा शब्दो गृहीतः ॥ ८ ॥ भावार्थ-जैसे बजाए गये शङ्गसे बाहर निकलते हुए शब्दोंको कोई ग्रहण नहीं कर सकता, वसे ही इस आत्मासे निकले हुए शास्त्र आदिके ग्रहण करनेसे आत्माका ग्रहण नहीं किया जा सकता है। किन्तु शङ्ध अथवा शङ्गके बजानेवाले का ग्रहण करनेसे शङ्गके शब्दका ग्रहण हो जाता है, वसे ही इन्द्रियादिकोंके ग्रहण कर लेनेसे उनके साथ जो आत्मा है उसका भी ग्रहण हो जाता है॥ ८॥ स यथा वीणायै वाद्यमानायै न बाह्याञ्छब्दाञ्छक्- याद ग्रहणाय वीणायै तु ग्रहगोन वीणावादस्य वा शब्दो गृहीतः ॥ ६। भावार्थ-जैसे बजती हुई वीणाके बाहर निकल रहे शब्दोको अच्छी तरह ग्रहण करनेमें कोई समर्थ नहीं होता है, वसे ही बाहरसे सुने गये उपदेशोंसे आत्माका ग्रहण नही होता है। किन्तु वीणा अथवा वीणाके बजानवालेके ग्रहण करनेसे शब्दका ग्रहण हो जाता है। वसे ही मन आदिक इन्द्रियोंके वशमें करने- से आत्माका ज्ञान हो जाता है॥। ९॥ उत्पत्तिसे पूर्व ब्रह्म ही रहता है, ब्रह्मव्यतिरिक्त जगत् नहीं है, इसमें दृष्टान्त कहते हैं- स यथाऽडद्रैधागेरभ्याहितात्पृथग्धूमा विनिश्चरन्त्येवं वा अरेऽस्य महतो भूतस्य निश्वसितमेतद्यद्ग्वेदो यजुर्वेद: सामवेदोऽथर्वाङ्गिरस इतिहासः पुराणं विद्या उपनिषदः श्लोका: सूत्राण्यनुव्याख्यानानि व्याख्यानान्यस्यैवैतानि सर्वाणि निःश्ववसितानि ॥ १० ॥ भावार्थ-जैसे एक जगह रखी हुई गीली लकड़ियाँ जब जलाई जाती हैं, तब उनमेंसे नाना प्रकारके धूम तथा चिनगारियाँ आदि निकलती हैं। वैसे ही देश, काल और वस्तुरूप त्रिविध परिच्छेदोंसे शून्य, इस पारमार्थिक आत्मासे पुरुषके निश्वासके समान, प्रयत्नके विना ऋग, यजुः, साम और अथर्व इन चार वेदोंके

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माश् ४ ] विद्याविनोद भाष्य ११३

मन्त्रोंका समूह, इतिहास यानी ब्राह्मण (जिसमें उर्वशी और पुरुरवाका संवाद आदि है), पुराण-'असद्या इदमग्र आसीत्' इत्यादि, विद्या, उपनिषद्-'प्रिय- मित्येतदुपासीत' इत्यादि श्लोक यानी ब्राह्मणमन्त्र जो 'तदेते शलोकाः' इत्यादिसे स्फुट हैं, सूत्र-वस्तुसंग्रह वाक्य, अनुव्याख्यान-वम्तुसंग्रह वाक्योंका विवरण, मन्त्रोंका विवरण; इत्यादि सब उत्पन्न हुए हैं। जिस प्रकार कि मनुष्योंके वाक्य प्रयत्नपूर्वक उच्चारण किये जाते हैं, वसे परमात्माके वाक्य नहीं होते। ये वाक्य निश्वासके समान अनायास उत्पन्न हुए हैं।। १० ।। जैसे स्थिति और सगमें ब्रह्मसे अतिरिक्त किसी वस्तुकी सम्भावना नहीं है, वैसे ही प्रलयमें समझना चाहिए। इसी बातको कहते हैं- स यथा सर्वासामपा समुद्र एकायनमेवथ सर्वेषाथ स्पर्शानां त्वगेकायनमेव सर्वेषां गन्धानां नासिके एकाय- नमेवश सर्वेषाथ रसानां जिह्वैकायनमेवथ सर्वेषाथ रूपाणां चक्षुरेकायनमेव५ सर्वेषां थ शब्दानाथ श्रोत्रमेकाय- नमेवथ सर्वेषाथ संकल्पानां मन एकायनमेवथ सर्वासां विद्यानाथ हृदयमेकायनमेव सर्वेषां कर्मणाथ हस्तावे- कायनमेवथ सर्वेषामानन्दानामुपस्थ एकायनमेवथ सर्वेषां विसर्गाणां पायुरेकायनमेव सर्वेषामध्वनां पादावेकायन- मेवथ सर्वेषां वेदानां वागेकायनम् ॥ ११ ॥ भावार्थ-जैसे नदी, बावड़ी, कूप, तड़ाग आदि विभिन्न नाम और रूप- वाले जलोंका एक (अभिन्न) नाम रूप समुद्र ही है, वही सब जलोंका एकमात्र स्थान है, यानी सब जलोंकी समुद्रमें ही प्राप्ति हो जाती है। वैसे ही सब मृदु, कठिन, कर्कश, पिच्छिल आदि स्पर्शोका त्वक ही एक अयन है। त्वक शब्दसे सब त्वगविषय स्पर्शमात्र विवचित है। सब गन्धोंके रहनेकी एक जगह इसी प्रकार दोनों नासिका हैं। वैसे ही सब रसोंके रहनेकी एक जगह जिह्वा है। वसे ही सब रूपोंके रहने की एक जगह नेत्र हैं, वसे ही सब शब्दोंके रहनेकी एक जगह श्रोत्ेन्द्रिय है। वसे ही सब संकल्पोंके रहनेकी एक जगह मन है। वसे ही सब ज्ञानोंके रहनेकी एक जगह हृदय है। वसे ही सब कर्मोंके रहनेकी १५

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११४ शृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय २

एक अगह दोनों हाथ है। वसे ही सब आनन्दोके रहनेकी एक जगह उपस्थ है। वैसे ही सब त्यागोंके रहनेकी एक जगह गुद-इन्द्रिय है वसे ही सब मार्गों के रहनकी जगह दोनों पाद हैं। वसे ही सब वेदोके रहनेकी एक जगह वाणी है। ऐसे ही हे मेत्रेयि, सबके रहनेका एक स्थान आत्मा है ।। ११ ।। यह प्रतिज्ञा की गई है कि 'यह जो कुछ है सब आत्मा है।' इसमें आत्मसामान्यत्व, आत्मजनितत्व और आत्मप्रलयत्व ये हेतु बतलाये हैं। इसलिए उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयकालोंमें प्रज्ञानसे भिन्न किसी कि सत्ता नहीं है। ब्रह्म- वेत्ताओंका जो ब्रह्मिद्याजनित बुद्धिपूर्वक प्रलय होता है, वह आत्यन्तिक है, जो कि अविद्याके निरोध द्वागा होता है। उसीका निरूपण अब आरम्भ किया जाता है- स यथा सैन्धवखिल्य उदके प्रास्त उदकमेवानुविली- थेत न हास्योदग्रहणायेव स्थात् यतो यतसत्वाददीत लवणमे- वैंवं वा अर इदं महद्भूतमनन्तमपारं विज्ञानघन एव। एतेभ्यो भूतेभ्यः समुत्थाय तान्येवानु विनश्यति न प्रेत्य संज्ञा- स्तीत्यरे ब्रवीमीति होवाच याज्ञवल्क्यः ॥ १२ ॥ भावार्थ-सामुद्रिक नमकका ढेला अपने कारण समुद्रमें गिरकर जलरूपसे विलीन हो जाता है अर्थात् जो भूमिके तेजके योगसे कठिन हुआ था उस ढेलेका काठिन्य स्वकारण समुद्रजलके संपकसे हट जाता है। उस विलीन ढेलेको समुद्रजलसे पूर्ववत् निकालनेमें कोर्ड समर्थ नहीं है। कितना भी कुशल पुरुष हो. वह पूर्व आशरवाले ढेलेको निकाल नहीं सकता। कारण यह है कि किसी भी प्रदेश के जलका ग्रहण कर आस्वादन करते है, उस जलमें नमकका स्वाद तो रहता है पर ढेला नहीं मिल मकता। जैमे यह दष्टान्त है, वैसे ही मैत्रेयि जो यह परमात्मा नामक वस्तु है, इस महान वस्तुसे अविद्या द्वारा परिच्छिन्न होकर कार्यकारणोपावि सम्बन्बसे तुम खण्डभावको प्राप्त हुई हो। इसीसे जन्म मरण भूख प्यास आदि संसारधर्मवतो हुई हो। कार्यात्मक नाम रूपके सम्बन्धसे 'अहम्' ऐसा खिल्यभाव तुमको प्राप्त हुआ है। यह खिल्यभाव कार्यकारण शरीरेन्द्रियोपाधि संबन्धसे अनित भ्रान्ति द्वारा उत्पन्न हुआ है। इससे तुम अपने को जो परिच्छ्िन्न और संसारधर्मविशिष्ट मानती हो, वह वस्तुतः भ्रान्तिसे ही। समुद्रस्थानीय अजर. अमर, अभय, समान, एकरस और शुद्ध प्रज्ञानघनमें सैन्धवघन

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भीमण ४ ] विद्याविनाद भाष्य ११५

(नमकका ढेला) के समान लीन हानपर, अर्थान् खिल्यभावक निवृत्त होनेपर या अविद्याकृा भदभानका समूल नाश होनपर यही एक अद्वत, सबसे महत्तर, तीनो कालोमे एक रूपम रहत, है। वह महान् ब्रह्म पारमाथिक है, उसका अन्त नही है किन्तु सबके अन्तका वहा साक्षा है अनण्व अपार हे विज्ञानघनरूप है। यह जो कार्यकरणभूत शरीरेन्द्रियादि नाम रूपात्मक प्रपश्र जलके फेन या बुद्बुदके समान प्रतोत हाना है वह परमात्माका ही स्नच्छ सलिलस्वरूप है। जैसे फनादि जलसे अतिरित्त नही हैं किन्तु अनिरिक्तस प्रतीत हाते हैं, वैसे ही शरीर आदि आत्मस्व्रूपम प्रतात हाते हैं। जिन पदार्थांका प्रज्ञ नघन आत्मामे परमाथविवेक ग ज्ञानमे नदी-समुद्रके समान प्रविलायन कहा गया है, वे इन्ही हेतुभूत सत्यशब्दनाच्य भूताम सन्धवस्विल्यवत् 3पन्न होकर उसीमे नष्ट हो जाते हैं। देहेन्द्रियभावस मुल्त हानेपर इनकी कोई विशप सज्ञा नहीं रहती। मैत्राय, एसा मै तुझसे कहता हूँ। इस प्रकार याज्ञवल्कने कहा॥ १२ ॥ सा होवाच मैत्रेय्यत्रैव मा भगवानमूमुहन्न प्रेत्य सज्ञाऽस्तीति स होवाच याज्ञवल्क्यो न वा अरेऽह मोह ब्रवीम्यलं वा अर इदं विज्ञानाय॥ १३ ॥ भावार्थ-याज्ञवल्क महर्षिके वचनका सुनकर मत्रयी बोली कि मृत्युके बाद इस जीवात्माका कोई नाम नही रह जाता है, यह सुनकर मैं बडी भ्रान्तिको प्राप्त हुई हूँ। ऐसा जान पडता है कि आपने मुझे भममे डाल दिया है। तब याज्ञवल्क्य महर्षि बाले कि हे मरत्रोय, इस प्रकार मत कहो, जो कुछ मैने तुमसे कहा, वह ठीक कहा है मेरा उपदेश भ्रमसे निकालनेके लिए है न कि भ्रममे डालनेके लिए। जो कुछ मैने तुममे कहा है, वह तुम्हारे पूण ज्ञानके लिए कह्ा है। अर्थान मेरे कथनका तात्पर्य यह है कि आत्माका जा अविद्या द्वारा प्रस्तुत किया हुआ देहेन्द्रियसम्बन्धी खिल्यभाव है, -मका विद्या द्वारा नाश कर दिय जानपर उस खिल्यभावके कारण पडी हुई जो शरारादिसम्बन्धिनी अन्यत्व दर्शन- रूपा विशेप सज्ञा है, वह इसी प्रकार नष्ट हा जाती है जिस प्रकार जलादि आधार- का नाश हो जाने पर चन्द्रिकाका प्रतिबिम्न और उमसे हानेनाले प्रकाशादिका नारा हो जाता है। किन्तु वास्तनिक चन्द्रमा तथा सूर्यादिके स्वरूपका नाश नही होता वने ह। अससारी ब्रह्मके स्वरूप विज्ञानघनका भी नाग नहीं होता है। वही सम्पूर्ण जगत् का आात्मा है, भूतोका नाश होनेपर भी परमार्थत उसका नाश नहीं होता॥१३॥

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११६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय रे

यत्र हि द्वैतमिव भवति तदितर इतरं जिघ्रति तदि- तर इतरं पश्यति तदितर इतर शृणोति तदितर इतर- मभिवदति तदितर इतरं मनुते तदितर इतरं विजानाति यत्र वा अस्य सर्वमात्मैवाभूत्ततकेन कं जिघ्रेत्ततकेन कं पश्येत्ततकेन कथ शृणुयात्तरकेन कमभिवदेत्तत् केन कं मन्वीत तत् केन कं विजानीयाद्येनेदथ सर्वं विजानाति त केन विजानीयाद्विज्ञातारमरे केन विजानीयादिति ॥१४।। भावार्थ-जिस अवस्थामें द्वैतके समान प्रतीत होता है, उस अवस्थामें परमात्मासे भिन्न शरीरादिउपाधिक जीव अपनी इन्द्रियोंसे घ्राणयोग्य गन्धका आघ्राण करता है, अन्यको देखता है, अन्यको सुनता है, अन्यका अभिवादन करता है, अन्यका मनन करता है और अन्यको जानता है। तात्पर्य यह है कि जिस अवस्थामें आत्मैकत्व अज्ञात रहता है, उसी अवस्थामें भ्रमसे सद्वितीयके समान होता है तथा उसी अवस्थामें व्राता घ्राणसे घ्रातव्य गन्धका ग्रहण करता है, वहीं पर कर्तृकर्मादि भेदबुद्धि होती है। जिससे अविद्योपहित आत्मा अपने रूपको नहीं देखता। किन्तु जहाँ ब्रह्मविद्यासे अविद्या नाशको प्राप्त हो गई है, वहॉ आत्मासे अन्य वस्तुका अभाव हो जाता है। जहाँ इस ब्रह्मवेत्ताके सम्पूर्ण नाम रूपादि आत्मामें ही प्रतिलीन हो जाते हैं, सब आत्मा ही हो जाते हैं, वहाँ किस इन्द्रियसे किस घ्रातव्य पदार्थको कौन सूँघे ? किसके द्वारा किसे देखे? किसके द्वारा किसे सुने ? किसके द्वारा किसका अभिवादन करे ? किसके द्वारा किसका मनन करे तथा किसके द्वारा किसे जाने? जिसके द्वारा इन सबको जानता है, उसे किसके द्वारा जाने ? हे मैत्रेयी, विज्ञाताको किसके द्वारा जाने ?॥ १४॥ वि० वि० भाष्य-याज्ञवल्क्य ऋषिकी दो स्त्रिया थी, एकका नाम मैत्रेयी था, दूसरीका नाम कात्यायनी। जब याज्ञवल्क्य वनमें जाने लगे, तब उन्होंने मैत्रेयीसे कहा कि मैं संन्यास आश्रममें जानेवाला हूँ, चाहता हूँ कि धनमें काश्यायनीके साथ तेरा बटवारा कर दूँ। मैत्रेयीने कहा कि क्या इस धनसे किसी प्रकार मैं अमर हो सकती हूँ ? याज्वल्क्यने कहा कि नहीं, इससे अमर होना बिलकुल असंभव है। तब मैत्रेयीने कहा-जिससे मैं अमर नहीं हो सकती हूँ. उसे लेकर क्या करँगी ?

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नाअ्मण ४ ] विद्याविनोद भाष्य ११७

आप जो कुछ अमर होनेका साधन जानते हैं, उसका ही मुझे उपदेश करें। यह सुनकर याज्ञवल्क् बहुत प्रसन्न हुए और उसे धन्यवाद देकर कहने लगे- हे मैत्रेयी, सांसारिक सकल पदार्थ अपने लिए प्रिय होते हैं। इसलिए आत्माका ही श्रवण, मनन, निदिध्यासन करना चाहिए, इस श्रवणादिसे ही सब कुछ जाना जा सकता है। क्योंकि सब कुछ आत्मासे ही उत्पन्न होता है, आत्मामें ही लीन होता है और स्थिति कालमें भी आत्मस्वरूप ही है। आत्माको छोड़कर उपलब्ध न होनेके कारण सब कुछ आत्मा ही है। इस प्रकार ऋषिने सबकी आत्मस्वरूपताके ग्रहणको दुन्दुभि, शङ्ध और वीणाका दष्टान्त देकर बतलाया कि आत्मा वैसे ही सबका आश्रय है, जैसे समस्त जलोंका समुद्र, समस्त स्पर्शोंकी त्वचा एक अयन है। जब शास्त्र और गुरुके उपदेश द्वारा प्राप्त ब्रह्मविद्यासे आत्मखिल्य भावके हेतुभूत कार्य- करणात्मक विपयाकारोंमें परिणत भूत नदी-समुद्रन्यायसे नष्ट हो जाते हैं, तब सलिल फेन बुददुद्के समान उनका नाश होनेपर खिल्यभाव भी नष्ट हो जाता है। जैसे प्रतिचिम्बके हेतु जल, रक्तभावके हेतु जपाकुसुम आदिके हटानेपर सूर्यका प्रतिबिम्ब और स्फटिकका रक्तभाव नष्ट हो जाता है, वैसे ही उक्त प्रतिबिम्बभूत जीव ब्रह्म रूपसे अवस्थित हा जाता है। उस कैवल्यमें विशेष संज्ञा नहीं रहती, शर्रारे- न्द्रियादिसे रहितकी विशेष संज्ञा हो ही नहीं सकती। अतः यह मेरा है, मैं अमुकका पुत्र हूँ, मेरा धन है, मैं सुखी, दुःखी हूँ इत्यादि सब अविद्याकृत हैं, अतएव वे अविद्यासद्भाव तक ही रहते हैं। जब अविद्या ब्रह्मविद्यासे निवृत्त हो जाती है तब विशेष संज्ञा कैसे हो ? क्योंकि निमित्त के अभावसे नैमित्तिकका अभाव न्यायसिद्ध है। उस समय ब्रह्मवेत्ता चैतन्यस्वभाव रहता है। इस प्रकार बोध कराये जानेपर मैत्रेयीने कहा कि इस कथनसे आपने मुझे मोह में डाल दिया। तब याजवल्क्यने कहा कि मैं मोहका उपदेश नहीं कर रहा हूँ, यह कथन तो अतरिनाशी परमात्माका विज्ञान करानेके लिए पर्याप्त है, क्योंकि व्यवहार द्वैत में है, परमार्थतः ब्रह्म व्यवहारातीत है। तात्पर्य यह है कि जैसे सुषुप्ति अवस्था- में सकल ववहारोंकी निवृत्ति हो जाती है, वैसे ही मुक्ति दशामें भी व्यवहारोंकी निवृत्ति हो जाती है। इसलिए अज्ञानदशाने ही क्रिया कारक फलका व्यवहार होता है, ब्रह्मचेत्तामें उक्त व्यवहार नहीं हो सकता। उसके कारणके अभावसे सब कुछ आत्मा ही हो गये हैं, अतः उससे व्यतिरिक्त कारक क्रिया या उसका फल कुछ भी नहीं है। यहाँ इम बातपर अवश्य ध्यान देना चाहिए कि अनात्मपदार्थ यदि वास्तविक होते, तो ब्रह्मज्ञान होनेपर वे आत्मा कैसे हो जाते ? यह तो निश्चय

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११६ शृहदारण्यकापनिषद् [अध्याय ३

है कि घट, पट ये दोनों पदार्थ परस्पर भिन्न हैं, कोई भी कितना ही निपुण कारीगर क्यों न हो, दोनों को एक नहीं कर सकता। फफर श्रुति ब्रह्मज्ञान होनेपर अखिल जगत्को ब्रह्मस्वरूप बतलाती है। श्रुतिमे अविश्वास करनेका भी कोई कारण नहीं है। इस अर्थकी उपर्पा्त श्रुति स्त्रयं करती है। इससे यह सिद्ध होता है कि संसार अज्ञानजनित है। जब तक अज्ञान है. तब तक अनेक अनात्मपदार्थ दृष्टिगोचर होते है। ज्ञान होनेसे अज्ञान आर उसके कार्यकी निवृत्ति हा जाती है और परमार्थ अद्वत ब्रह्म ही अवशिष्ट रह जाता है। इससे यह निष्कर्ष निकला कि परमार्थतः आात्माका एकत्वृनत्यय होनेपर क्रिया कारक फल किसीका प्रत्यय नही हा सकता। ब्रह्मवेत्ताके प्रति क्रिया और उसके सावनकी अत्यन्त निवृत्ति ही सिद्ध होती है। अतः हे मैत्रेयि, आत्माका ही श्रत्रण, मनन और निदिध्यासन करो, इसीसे तुम्हारे सकल अभीष्टकी सिद्धि होगी ॥ १४॥ -- B88- पञ्चम ब्राह्मण

पहले केवल कर्मनिरपेक्ष साक्षका साधन वर्णन करनेके लिए 'मैत्रेयी- ब्राह्मण' का आरम्भ किया गया था। मोक्षका साधन आत्मज्ञान है, जो सवसंन्यास- रूप अङ्गसे विशिष्ट है। आत्माका ज्ञान होनेपर यह समस्त जगत् ज्ञात हो जाता है। आत्मा सबसे अधिक प्रिय है, इस लिए यही दर्शनीय है, श्रत्णीय है, मननीय है तथा ध्यैय है। इस ताह उसके साक्षात्कार के उपाय बतलाय गये हैं। उसे गुरु और आगमसे सुनना चाहिए, तकसे मनन करना चाहिए, यहॉँ पर नक यह कहा गया है कि यह समस्त जगत् आत्मा ही है। इसकी पुष्टिके लिए इस ब्राह्मणका आरम्भ करत हैं। अथवा यह सब आत्मा ही है' ऐसी जो प्रतिज्ञा की थी, उसमें आत्मासे उत्पत्ति तथा उसीमें स्थिति और लय होनारूप हेतु बतलाकर अब इस शास्त्रप्रधान मधु- ब्राह्मण द्वारा प्रतिज्ञा किये हुए उमी अर्थका पुनः निगमन किया जाता है। भव यह है कि इस ब्राह्मणमें पूर्ववर्ती दोनों अध्यायोंके अर्थका उपसंहार किया जाता है, यथा- इयं पृथिवी सर्वेषां भूतानां मध्वस्यै पृथिव्यै सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमस्यां तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चा- यमध्यात्म शारीरस्तजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मेदमभृतमिदं ब्रह्मेदथ सर्वम्॥ १॥

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बिधाविनोद भाष्य ११६

भावार्थ-यह प्रसिद्ध प्रथिवी सब भूतोंका मधु है, यानी ब्रह्मासे लेकर स्तम्घपर्यन्त समस्त प्राणियोंका मधुकार्य है। जैसे मधु कार्य है, वसे पांथवी भी कार्य है। जैसे एक मधुका छत्ता अनेक मधुमक्खियों द्वारा निर्मित है. वैसे ही सब भूत पृथिवीके मधु हैं। इस प्रथिवीमें जो यह प्रकाशस्वरूप अमृतमय पुरुष है और हृदयमें जो यह शरीरउपाधिवाला प्रकाशस्वरप अमृतमय पुरुप है यही वह है जिसके विषयमें प्रतिज्ञा की गई है कि यह जो कुछ है सब आत्मा है। मैत्रेयीको जो अमृतत्वका साधन बतलाया गया था वह यह आत्मविज्ञान अमृत है। जिससे सम्बन्ध रखनेवाली विद्या ब्रह्मविद्या इस नामसे कहो जाती है। यही सर्व है, क्योंकि ब्रह्मका ज्ञान होनेसे इसकी सर्वरूपता हो जाती है ॥ १॥ इमा आपः सर्वेषां भृतानां मध्वासामपा सर्वाणि भृतानि मधु यश्चायमास्वप्सु नजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्म रैतसस्तेजोमयोमृतमयः पुरुषोऽयमेवस योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेद& सर्वम् ॥ २ ॥ भावार्थ-ये जल सब भूनोंके मधु हैं और इन जलं के सब भूत मधु हैं। जो जळमें यह ने जोमय अमृतमय पुरुष है और यह अध्यात्म (शरीरके अन्तर्गत) वीर्यसम्बन्धी प्रकाशस्वरूप अमृतमय पुरुप है, नही वह है जो यह आत्मा है। यही अमृत है. यही ब्रह्म है, यही मब्र है॥२॥ अयमग्निः सर्वेां भृतानां मध्वस्य्राग्ने: सर्वाणि भृतानि मधु यश्चायमस्मिन्नग्नौ तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चाय- मध्यात्मं वाऊगस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेवस योऽय- मात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेद* सर्वम् ॥ ३ ॥ भावार्थ-यह अग्नि सब भूतोंका मधु है और इस अग्निके सब भून मधु हैं। जो यह अगिमें प्रकाशस्त्ररूप अमृतमय पुरुप है तथा जो शीरमें वाणीमय प्रकाश- स्वरूप अमृतमय पुरुप है, यही वह है जो यह आत्मा है। यही अमृत है, यही ब्रद्म है, यही सव है।। ३ ।। अयं वायुः सर्वेषां भृतानां मध्वस्य वायोः सर्वाणि

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१२० बृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय ?

भूतानि मधु यश्चायमस्मिन्वायौ तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मं प्राणस्तेजोमयोSमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदथ सर्वम् ॥ ४ ॥ भावार्थ-यह वायु सब भूतोंका मधु है और सप भूत इस वायुके मधु हैं। जो यह इस वायुमें प्रकाशस्वरूप अमृतमय पुरुप है तथा जो यह अध्यात्म प्राण प्रकाशस्वरूप, अमृतमय पुरुष है, यही वह है जो यह आत्मा है। यही अमृत है, यही ब्रह्म है, यही सब है। अध्यात्म प्राण भूतोंके शरीरका आरम्भक होनेसे उपकारक है, इसलिए उसमें मधुत्व है। तदन्तर्गत ते जोमयादिमें भी करणरूपसे उपकारकत्व होनेसे मधुत है।।४ ।। अयमादित्यः सर्वेषां भूतानां मध्वस्यादित्यस्य सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमस्मिन्नादित्ये तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मं चाक्षुषस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽ- यमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेद७ सर्वम् ॥ ५ ॥ भावार्थ-यह आदित्य सब भूतोंका मधु है तथा इस आदित्यके सब भूत मधु हैं। जो यह इस आदित्यमें प्रकाशस्वरूप अमृतमय पुरुप है, तथा जो यह अध्यात्म चानुष प्रकाशस्वरूप अमृतमय पुरुष है, यही वह है जो यह आत्मा है। यही अमृत है, यही ब्रह्म है, यही सब है॥ ५॥ इमा दिश: सर्वेषां भूतानां मध्वासां दिशाथ सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमासु दिच्ु तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्म श्रोत्रः प्रातिश्रुत्कस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोडयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेद४ सर्वमू॥।६॥। भावार्थ-ये दिशायें सब भूतोंकी मधु हैं तथा इन दिशाओंके सब भूत मधु हैं। जो यह इन दिशाओंमें प्रकाशस्वरूप अमृतमय पुरुष है, यही वह है जो यह आत्मा है। यही अमृत है, यही ब्रह्म है, यही सब है। प्रतिश्रवण वेलामें जो सन्निहित पुरुष है, वह प्रातिश्रुत्क है। श्रोत्र आकाशात्मक है, इसलिए वह सदा सन्निहित रहता है॥ ६ ॥।

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ब्राक्मण x ] विद्याविनोद भाष्य १२१

अयं चन्द्रः सर्वेषां भूतानां मध्वस्य चन्द्रस्य सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमस्मिथश्चन्द्रे तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मं मानसस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदथ सर्वम् ॥ ७॥ भावार्थ-यह चन्द्रमा सब भूतोंका मधु है और इस चन्द्रमाके सब भूत मधु हैं। जो यह इस चन्द्रमामें तेजोमय, प्रकाशस्वरूप, मनःसंबन्धी अमृतमय पुरुष है, यही वह है जो यह आत्मा है। यही अमृत है, यही ब्रह्म है, यही सब है।। ७।। इयं विद्युत्सर्वेषां भृतानां मध्वस्यै विद्युतः सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमस्यां विद्युति तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मं तैजसस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽ- यमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेद७ सर्वम् ॥ ८ ॥ भावार्थ-यह विद्युत् सब भूतोंकी मधु है तथा सब भूत इस विद्युत्के मधु हैं। जो यह इस विद्युत्में प्रकाशस्वरूप अमृतमय पुरुष है तथा जो यह त्वचाके तेजमें रहनेवाला अध्यात्म तैजस तेजोमय अमृतमय पुरुप है यही वह है, जो यह आत्मा है। यही अमृत है, यही ब्रह्म है, यही सब है ॥ ८॥ अय स्तनयित्नुः सर्वेषां भूतानां मध्वस्य स्तनयित्नोः सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमस्मिन्स्तनयिल्ौ तेजोमयोऽ- मृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्म" शाब्द: सौवरस्तेजोमयो- डमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदथ सर्वम् ॥६।। भावार्थ-यह मेघ सब भूतोंका मधु है तथा इस मेघके सब भूत मधु हैं। जो यह इस मेघमें प्रकाशस्वरूप अमृनमय पुरुष है तथा जो यह विशेष रूपसे स्वरमें रहनेवाला, अतएव स्व्ररसम्बन्धी अध्यात्म प्रकाशस्वरूप अमृतमय पुरुप है, यही वह है जो यह आत्मा है। यही अमृत है, यही ब्रह्म है, यही सब है।। है'। अयमाकाश: सर्वेषां भृतानां मध्वस्याकाशस्य सर्वाणि १६

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१२२ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय

भूतानि मधु यश्चायमस्मिन्नाकाशे तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्म हृद्याकाशस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव सयोऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेद४ सर्वम्॥१०॥ भावार्थ-यह आकाश सब भूतोंका मधु है, तथा सब भूत इस आकाशके मधु हैं। जो यह इस आकाशमें प्रकाशस्वरूप अमृतमय पुरुष है और जो यह अध्यात्म हृदयाकाश प्रकाशस्वरूप अमृतमय पुरुष है, यही वह है जो यह आत्मा है। यही अमृत है, यही ब्रह्म है, यही सब है॥ १० ॥ पृथिवीसे लेकर आकाश पर्यन्त भूतगण और देवगण कार्यकारण-सङघात्मा होते हुए परस्पर उपकारकत्व रूपसे मधु होते हैं। प्रत्येक शरीरियोंके लिए यह कहा गया है। जिसके द्वारा शरीरियोंसे सम्बन्ध रखनेवाले भूतगण तथा देवगण परस्पर उपकारक होते हैं, उसको समझाना है, इसलिए यह प्रकरण आरम्भ किया जाता है- अयं धर्मः सर्वेषां भूतानां मध्वस्थ धर्मस्य सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमस्मिन्धरमें तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मं धर्मस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेद सर्वम्॥ ११ ॥ भावार्थ-यह धर्म सब भूतोंका मधु है और इस धर्मके सब भूत मधु हैं। जो यह इस धर्ममें प्रकाशस्वरूप अमृतमय पुरुष है और जो यह अध्यात्म धर्मसम्बन्धी तेजोमय अमृतमय पुरुष है, यही वह है जो यह आत्मा है। यही अमृत है, यही ब्रह्म है, यही सब है ॥ ११ ॥ वि० वि० भाष्य-यद्यपि धर्म अप्रत्यक्ष है, परन्तु धर्मका व्याख्यान श्रति और स्मृतियोंमें किया गया है। मनुष्योंका नियन्ता क्षत्रिय राजा है और राजाका भी नियन्ता धर्म है। एवं जगद्वैचित्र्यका आदि कारण धर्म ही है, पृथिव्यादि परिणामका हेतु और प्राणियोंसे अनुष्ठीयमान भी धर्म है। इस कारणसे यहाँ शास्त्र तथा आचाररूप सत्य और धर्मका अभेदरूपसे निर्देश किया गया है। किन्तु एक होनेपर भी यहाँ भेदेन निर्देशका तात्पर्य यह है कि दष्ट रूपसे तथा अटृष्ट रूपसे कार्योंका आरम्भक होनेके कारण धर्म दो रूपसे कार्यका कारण है, इस लिए दो रूपोंसे उसका निदेश किया गया है। जो अदष्ट

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विद्यवनाद भाष्य १२३

(अपूर्व) नामक धर्म है वह सामान्य और विशेष दो रूपोसे कार्योंका आरम्भक होता है। वह सामान्य रूपसे पृथिव्यादिका प्रयोजक होता है और विशेष रूपसे शरीरेन्द्रियादिका ॥ ११॥ इद्थ सत्यथ सर्वेषां भूतानां मध्वस्य सर्वाणि भूतानि मधु यश्चाऽयमस्मिन्सत्ये नेजोमयोऽमृतमथः पुरुषो यश्चाऽयमध्यात्मथ सात्यस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोडयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदथ सर्वम् ॥ १२ ॥ भावार्थ-यह सत्य सब भूतोका मधु है तथा इस सत्यके सब भूत मधु हैं। जो यह इस सत्यमे प्रकाशस्वरूप अमृतमय पुरुष है और जो यह अध्यात्म सत्यसबन्धी प्रकाशस्वरूप अमृतमय पुरुष है, यही वह है, जो यह आत्मां है। यही अमृत है, यही ब्रह्म है, यही सब है॥ १२॥ वि० वि. भाष्य-दष्ट आचाररूपसे अनुष्ठायमान आचार भी धर्म ही है। इसमे- श्रतिः स्पृतिः सदाचारः स्वस्य च भियमात्मनः । एवच्चतुविधं माहुः सात्ताद्मस्य लक्षणम्।। वेदोऽखिळो धममूलं स्मृतिशीले च तद्षिदाम्। आचारश्रैव साधूनाम् आत्मनरु्तुष्टिरेव च।। इत्यादि वचन प्रमाण हैं। वर्म दो प्रकारका है, एक सामान्य और दूसरा विशेष। सामान्य धर्म पृथिवी आदिमे कारणरूपसे अनुगत है और विशेष धर्म शरीर-इन्द्रियादिके समूहमे अनुगत है ॥ १२॥ इदं मानुषथ सर्वेषां भूतानां मध्वस्य मानुषस्य सर्वाणि भूतानि मधु यश्चाऽयमस्मिन्मानुषे तेजोमयोमृ- तमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदथ सर्वम् ॥१३ ॥ भावार्थ-यह मनुष्यजाति सब भूतोका मधु है तथा इस मनुष्यजातिके सब भूत मधु हैं। यह जो इस मनुष्य जातिमे प्रकाशस्वरूप अमृतमय पुरुष है, यही बह है जो यह आत्मा है। यहो अमृत है, यही ब्रम्म है, यही सब है।। १३ ।।

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१२४ शृहदारण्य कार्पानसद् [अध्याय २

अयमात्मा सर्वेषां भूतानां मध्वस्यात्मनः सर्वाणि भृतानि मधु यश्चायमस्मिन्नात्मनि तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमात्मा तेजोमयोमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदथ सर्वम्॥ १४ ॥ भावार्थ-यह आत्मा सब भूतोंका मधु है तथा इस आत्माके सब भूत मधु है। जो यह इस आत्मामें प्रकाशस्वरूप अमृतमय पुरुप है और जो यह आात्मा प्रकाशस्वरूप अमृतमय पुरुप है, यही वह है, जो यह आत्मा है। यही अमृत है यही ब्रह्म है, यही सब है ॥ १४ ॥ वि० वि० भाष्य-जो कार्य-करणसंघात मनुष्यादि जातिविशिष्ट है, वह सब भूतोका मधु है। शंका-यह तो शारीर शब्दसे निर्दिष्ट है. अतः पृथिवीका पर्याय ही है। समाधान-पार्थिव अंशका ही वहाँ ग्रहण है, यहाँ तो अध्यात्म. अधिभूत आदि सब विशेषोंमे रहित, सकल भूत तथा देवगणसे विशिष्ट कार्यकरणसंघातरूप सर्वात्मा 'सोऽमात्मा' कहा गया है। इस आत्मामें तेजोमय, अमृतमय, अमूर्त, रस एवं सर्वात्मक पुरुषका निदश है। एक देशसे जो पृथिव्यादि निर्दिष्ट हैं, उनका यहॉपर अध्यात्मविशेपका अभाव होनेसे निर्देश नही करते हैं। जो परिशिष्ट विज्ञानमय आत्मा है, जिसके लिए देहलिङ्गसंघात है, वही 'यश्चायमात्मा' कहा जाता है॥ १४।। स वा अयमात्मा सर्वेषा भूतानामधिपतिः सर्वेषां भूतानाथ राजा तद्यथा रथनाभौ च रथनेमौ चारा सर्वे समर्पिता एवमेवास्मिन्नात्मनि सर्वाणि भूतानि सर्वे देवाः सर्वे लोकाः सर्वे प्राणाः सर्व एत आत्मान: समर्पिताः ॥ १५ । भावार्थ-यह परमात्मा सब भूतोका अधिपति है तथा सब प्राणियोंमें राजा-प्रकाशस्वरूप है। जैसे रथके पहियेमें सब अरे समर्पित रहते हैं, वैसे ही इस आत्मामें सब भूत, सब देव, सब लोक, सब प्राण तथा ये सभी आत्मा समर्पित हैं ॥ १५ ॥

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प्रेश्ण ५ ] विद्याविनाद भाष्य १२५

वि० वि० भाष्य-इस मन्त्रमे वह आत्मा बतलाया गया है जिससे कोई पूर्व और पर नही है, अतएव यह मध्य भी नही है। इस तरहका जो सब उपाधियोंसे शून्य, अन्तर्बाह्यशून्य, पूर्ण, प्रज्ञानघन, अजन्मा, अजर, अमर, अभय अचल, नेतिनेति, अस्थूल, असूक्ष्म प्रत्यगात्मा है. उसीका दष्टान्तके साथ व्याख्यान करते है। उस आत्मामें अविद्याकी निवृत्ति होनेपर नमकके दष्टान्तके अनुसार विज्ञानात्मा का प्रवेश होता है। तब उस ब्रक्मीभूत पुरुषके लिए सब कुछ आत्मस्वरूप ही प्रतीत होता है। जैसे भ्रमदशामें रज्जूमें सर्पकी प्रतीति होती है किन्तु रज्जूका साक्षात्कार होनेपर सर्पकी सत्ता रज्जूसे अतिरिक्त प्रतीत नहीं होती। वैखे ही पुरुषको ब्रह्मसाक्षात्कार होने पर ब्रह्मातिरिक्त कोई सत्ता प्रतीत नहीं होती। उस समय वह पुरुष भी सब भूतोंका अधिपति तथा सबमें प्रकाश- स्वरूप हो जाता है। ब्रह्मवेत्तामें उक्त विशेषण जीवन्मुक्ति दशाके तात्पयसे है। उस दशामे प्रारब्ध-कर्मवश विच्षेपकी अनुवृत्ति रहती है, इसलिए उसमे वह विशेषण हो सकता है। ज्ञानसे अज्ञानका नाश होनेपर अप्रतिबद्ध स्व-स्वरूपका भान होता है, इसलिए ब्रह्मज्ञानी राजाके समान सुशोभित होता है। अज्ञानके नाशमें हेतु 'अहं ब्रह्माडस्मि' ऐसा विज्ञान है। आत्मा यद्यपि स्वयंप्रकाश है, तो भी अविद्यासे उसका स्वयंप्रकाशत्व तिरोहित रहता है। अविद्यानिवर्तक उक्त ज्ञानसे अविद्याकी निवृत्ति द्वारा आत्माका प्रकाश प्रकट हो जाता है, अतः वह राजाके समान शोभित होता है। जो देही अपनी अविद्याके कारण तत्त्वज्ञानसे पहले ससारीके समान था, वस्तुतः उस समयमें भी वह संसारी नही है, किन्तु अपनेको संसारीके समान अज्ञानसे मानता है। जैसे मलिन दर्पणमें मुख देखनेसे अपना मुख मलिन सा प्रतीत होता है और अज्ञानी पुरुष उस मालिन्यको वस्तुतः अपने मुखमें समझकर दुःखी होता है। फिर विवेक होनेपर यह समझता है कि मालिन्य दर्पणगत है, मुखगत नहीं है। वैसे ही संसारी पुरुष मनोगत सुख दुःख आदिको आत्मगत मानकर संसारीके समान होता है। वही पुरुष विद्या होनेपर यानी 'अहं ब्रह्माडस्मि' इस बोधके होनेपर ब्रह्म हो जाता है, इसलिए सब जगत् उसमें अर्पित यानी स्थित है। इसी अर्थको स्फुट करनेके लिए श्रुति यह दृष्टान्त देती है, जैसे-रथके पहियेमें एक नाभि होती है, उसके बीचमें छिद्र रहता है और उसमें धुरी रहती है। नेमि ऊपरका चक्का कहलाता है। नाभि और नेमिके बीचमें छोटे-छोटे काष्टके टुकड़े लगे रहते हैं वे 'अरा' कहलाते हैं। जैसे अरे रथकी नाभिमें लगे रहते हैं, वैसे ही इस परमात्मामें ब्रह्मासे लेकर तृणपर्यन्त

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१२६ अध्याय

सब भूत, सब अग्नि आदि देवता, सब भूआदि लोक, सब इन्द्रियॉ तथा सब जीव अर्पित यानी आश्रित हैं। अर्थात् कोई परमात्माके आधार विना रह नहीं सकता, इसीसे सबकी उत्पत्ति है, इसीमें सबका लय है, इसीमें सबकी स्थिति है। ऐसा यह परमात्मा सबका आत्मा है, हे मैत्रेयि, यही तुम्हारा स्वरूप है॥ १५॥ इदं वै तन्मधु दध्यङ्डथर्वणोऽश्विभ्यामुवाच। तदे तदृषिः पश्यन्नवोचत्। तद्ां नरा सनये द४स उग्रभावि- ष्कृणोमि तन्यतुर्न वृष्ठिम्। दध्यङ् ह यन्मध्वाथर्वणो वाम- श्वस्य शी्ष्णा प्र यदीमुवाचेति॥१६ । भावार्थ-हे मैत्रेयि, निश्चय करके मैं उस मधु ब्रह्मविद्याका कहता हूँ- जिसको अथर्ववेदी दध्यङ ऋषिने अश्विनीकुमारोंके प्रति कहा था। दध्यङ ऋषिने उनसे इस प्रकार कहा कि हे अश्विनीकुमारो, तुम दोनोंक प्रति इस ब्रह्मविद्याको तुम्हारे लाभके लिए इस प्रकार स्पष्ट प्रकाश करूँगा, जैसे बिजली वृष्टिके आनेको सूचित करती है। इसके अनन्तर उस उग्र कर्मका अनुभव करते हुए अथर्ववेदी द्ध्यङ ऋषिने घोड़ेके सिरसे ब्रह्मविद्याका उपदेश किया ॥१६ ॥ वि० वि० भाष्य-एक समय देवताओके वैद्य दोनों अश्विनीकुमार अथर्व- वेदी दध्यङ ऋषिके पास गये और सविनय यह प्रार्थना की-हे प्रभो, हम लोगों- के प्रति आप कृपा करके ब्रह्मविद्याका उपदेश करें। ऋपिने कहा कि मै उपदेश करनेको तो तैयार हू किन्तु मुझको इन्द्रका भय है। क्योंकि उसने कहा है कि यदि तुम कभी ब्रह्मविद्याका उपदेश किसीको करोगे तो तुम्हारा सिर में काट डालूँगा। अतः यदि मैंने तुमको उपदेश किया तो वह मेरा सिर अवश्य काट डालेगा। अश्विनीकुमारोंने ऋषिको आश्वासन देकर कहा कि आप न घबड़ाइए। जब्र आप हम दोनोंको शिष्य बनायेंगे, तो हम आपका सिर काटकर दूसरी जगह छ्विपाकर रख देंगे, उसके अनन्तर घोड़ेका सिर लाकर आपके धड़से जोड़ देंगे। उपदेश देनेपर जब इन्द्र आपका सिर काट देगा, तब जो सिर अन्यत्र छिपाकर रखा रहेगा, उसे हम पुनः आपके धड़से जोड़ देंगे। ऋषिने यह बात मान ली और दोनोंको शिष्य बना लिया। शिष्योंने गुरुका सिर काटकर दूसरी जगह रख दिया, उसके स्थानपर घाड़ेका सिर जोड़ दिया गया। घोड़ेके सिर से उन दोनों- को ऋषिने उक्त विद्याका उपदेश दिया। जब इन्द्रको यह हाल मालूम हुआ तब

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श्राह्मण x ] विद्याविनोद भाष्य १२७

उसने आकर अपनी पूर्व प्रतिज्ञाके अनुसार दध्यङ ऋपिके घोड़ेवाले सिरको काट दिया। पुनः अश्विनीकुमारोने सुरक्ित सिरको लाकर धड़से जोड़ दिया। इस आख्यायिकासे ब्रह्मविद्याका महत्त्व दिखाया गया है। १६॥ इदं वै तन्मधु दध्यड्डाथर्वणोऽश्विभ्यामुवाच तदे- तदृषिः पश्यन्नवोचदाथर्वणायाश्िना दधीचेऽशव्यथ शिर: प्रत्यैश्यतम्। स वां मधु प्रवोचहतायन्वाष्ट्र यद्दस्रावपि कच््यं वामिति॥ १७॥। भावार्थ-उस मधुका अथर्ववेदी दध्यङ ऋपिने अश्विनीकुमारोंके प्रति उपदेश किया। इसे देखते हुए ऋषि (मन्त्रद्रष्टा) ने कहा कि हे अश्विनीकुमारो, तुम दोनों अथर्ववेदी दध्यडके लिए घोड़ेका सिर लाये। उसने सत्यका पालन करते हुए तुम्हें त्वाष्ट्र (सूर्यसम्बन्धी) मधुका उपदेश किया तथा हे दस्रो (शत्रुहिंसको), जो आत्मज्ञानसम्बन्धी कक्य (गोप्य) मधु था वह भी तुमसे कहा॥ १७॥ वि. वि० भाष्य-जिस मधु नामक ब्रह्मविद्याको अश्विनीकुमारोंके लिए अथर्ववेदी दध्यङ ऋषिने उपदेश किया। उसी ब्रह्मविद्याके उपदेशको सुनकर एक ऋषि मन्त्रद्रष्टाने अश्विनीकुमारोंसे इस प्रकार कहा-हे अश्विनीकुमारो, ब्राह्मणका सिर छ्िन्न होनेपर तुमने अतिकर कर्म करते हुए घोड़ेका सिर काटकर उसे ब्राह्मणके घड़में लगा दिया। उस अथर्वाने आप दोनोंको मधुविद्याका उपदेश दिया, जिसने पहले प्रतिज्ञा कीथी कि यह मैं तुमसे कहूँगा। उस ऋषिने जीवनसंशयमें आरूढ़ होकर भी पूर्वप्रतिज्ञात सत्यके परिपालनकी कामनासे ऐसा किया। यह इस बातका सूचक है कि जीवनसे भी सत्यधर्मका पालन गुरुतर है। उसने जिस मधुका उपदेश किया उसका नाम है त्वाष्ट्र मधु। त्वष्टा नाम आदित्यका है, तत्सम्बन्धी यज्ञका छिन्न सिर सूर्य हुआ, उसके जोड़नेके लिए जो प्रवर्ग्य कर्म किया गया, उसका अङ्गभूत विज्ञान त्वाष्ट मधु है। यज्ञके शिरश्छेदनके प्रतिसन्धानादिका जो सम्बन्ध- दर्शन है, वही त्वाष्ट मधु है। हे शत्रुओंके हिसको. उन्होंने तुम्हें केवल कर्मसम्बन्धी त्वाष्ट मधुका ही उपदेश नहीं किया, अपि तु जो चिकित्साशास्त्रमम्बन्घी ज्ञान है तथा जो गोप्य परमात्मसम्बन्धी रहस्यभूत मधुविज्ञान है उसका भी उपदेश तुम्हारे लिए किया। इस मन्त्रसे यह प्रकट होता है कि दध्यड ऋपिसे चिकित्साशास्त्र और आत्मज्ञान अश्विनीकुमारोंको मिले हैं ॥ १७ ॥

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१२८ बृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय २

इदं वै तन्मधु दध्यङ्डाथर्वणोश्चिभ्यामुवाच। तदेतदृषिः पश्यन्नवोचत्। पुरश्चक्रे द्विपदः पुरश्चक्रे चतुष्पदः। पुरः स पक्षी भूत्वा पुरः पुरुष आविशदिति। स वा अयं पुरुषः सर्वासु पूर्षु पुरिशयो नैनेन किंचनानावृतं नैनेन किंचनासं- वृतम् ॥ १८ ॥ भावार्थ-इस मधु-ब्रह्मविद्याका अथर्ववेदी दध्यङ ऋषिने अश्विनीकुमारोंको उपदेश किया। इसे देखते हुए मन्त्रद्रष्टाने कहा-परमात्माने दो पैरोंवाले शरीर बनाये तथा चार पैरोंवाले शरीर बनाये। पहले वह पुरुष पत्ती होकर शरीरोंमें प्रविष्ट हो गया। वह पुरुष सब पुरों (शरीरों) में पुरिशय है। ऐसा कुछ भी नहीं है जो पुरुषसै आच्छ्ादित न हो तथा ऐसा भी कुछ नही है जिसमें पुरुषका प्रवेश न हुआ हो, यानी जो पुरुषसे व्याप्त न हो ॥ १८ ॥ वि० वि• भाष्य-याज्ञवल्क्य महर्षि कहते हैं कि हे मैत्रेयी, उसी मधुनामक ब्रह्मविद्याका उपदेश अथर्ववेदी दध्यङ ऋषिने अश्विनीकुमारोंको किया था। इसके अनुसार परमात्माने दो पैरवाले पत्तियों तथा मनुष्योंके शरीरोंको और चार पैरवाले पशुओंके शरीरोंको बनाया। उसी परमात्माने आरम्भमें लिङ्गशरीर होकर पुरुष यानी पुरमें रहनेवाला, इस प्रकारका अर्थग्राही नाम धारण करते हुए प्रवेश किया। पर- मात्मा सब शरीरोंमें सोनेवाला पुरुष है, इसी पुरुषके द्वारा सब कुछ ढका हुआ है, अर्थात् इसी पुरुषके द्वारा समस्त चराचर ब्रह्गण्ड व्याप्त है। इसीके द्वारा कुछ भी अननुप्रवेशित नहीं है अर्थात् सब कुछ प्रवेशित है या सबमें यह व्याप्त है। हे मैत्रेयि, जो कुछ दृष्टिगोचर है वह सब ब्रह्मरूप ही है॥ १८॥ इदं वै तन्मधु दध्यङ्डथर्वणोऽश्विभ्यामुवाच। तदेतदृषिः पश्यन्नवोचद्रपथ रूपं प्रतिरूपो बभूव तदस्य रूपं प्रतिचक्षणाय। इन्द्रो मायाभिः पुरुरूप ईयते युक्ता ह्यस्य हरयः शता दशेति। अयं वै हरयोऽयं वै दश च सहस्राणि बहूनि चानन्तानि च तदेतद ब्रह्मापूर्वमनपरम- नन्तरमबाह्यमयमात्मा ब्रह्म सर्वानुभूरित्यनुशासनम् ॥१६।।

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भ्ाश्मय ५ ] विद्याविनोद भाष्य १२९

भावार्थ-इस मधुनामक ब्रह्मविद्याका अथर्ववेदी दध्यङ् ऋषिने अश्विनी- कुमारोंके प्रति उपदेश किया। यह देखते हुए एक ऋषिने कहा कि वह रूप रूपके प्रति प्रतिरूप हो गया। ईश्वर मायासे अनेक रूपोंमें प्रतीत होता है। शरीररथमें जुड़े हुए इसके इन्द्रियरूप घोड़े सौ और दस हैं। यह परमेश्वर ही हरि यानी इन्द्रियरूप अश्व है, यही दस, सहस्र, अनेक और अनन्त है। यह ब्रह्म अपूर्वं यानी कारणरहित, अनपर अर्थात् कार्यरहित, अनन्तर यानी विजातीय द्रव्यसे रहित तथा अबाह्य है। यह आत्मा ही सबका अनुभव करनेवाला ब्रह्म है। यही समस्त वेदान्तों- का अनुशासन अर्थात् उपदेश है॥ १६॥ वि० वि० भाष्य-'वह परमात्मा रूप रूपके प्रति प्रतिरूप हो गया' इसका तात्पर्य यह है कि प्रति उपाधिमें उसका रूपान्तर प्रतिबिम्ब हुआ। जैसे एक ही मुखका मणि, दर्पण, कृपाण आदि उपाधिके भेदसे अनेक प्रकारका प्रतिबिम्ब होता है, क्योंकि उपाधियोंके अनुरूप प्रतिबिम्बभेद लोकमें दृष्ट है एवं देव, असुर, मनुष्य, अश्व आदि उपाधिभेदसे उनके अनुरूप एकरस आत्माका प्रतिबिम्ब होता है। अथवा प्रतिरूपका अर्थ अनुरूप है। जिस संस्थानके माता और पिता होते हैं तदनुरूप ही पुत्र होता है, यह नहीं देखा जाता कि माता और पिता चतुष्पाद हों और उनकी सन्तान द्विपाद हो। यदि अपूर्वके विपर्यय से कहीं ऐसा हो भी, तो वह जीवित नहीं रह सकता, क्योंकि सृष्टिनियमके विपरीत है। वही परमेश्वर नाम और रूपका व्याकरण करता हुआ रूप रूपके प्रति प्रतिरूप हुआ। उसका प्रतिरूपको प्राप्त होना इसलिए हुआ है कि वह अपने नाम रूपको प्रकट करे, क्योंकि यदि नाम रूपोंकी अभिव्यक्ति न होती तो इस आत्मा का प्रज्ञानघनसंज्ञक निरुपाधिक रूप प्रकट नहीं हो सकता था। किन्तु जिस समय कार्यकारण-भावसे नाम रूपोंकी अभिव्यक्ति होती है, तभी इसका रूप प्रकट होता है। इन्द्र-परमेश्वर मायासे (अज्ञानसे) अथवा नाम-रूपकृत मिथ्याभिमानसे, न कि परमार्थतः, बहुरूप कहा जाता है। यानी एक प्रज्ञानघन पुरुष अविद्याजनित प्रज्ञाओंसे बहुविध कहा जाता है। वास्तवमें वह एक ही है। जिस प्रकार रथमें जुते घोड़े रथको अपने नेत्रके सामनेकी तरफ ले जाते हैं, उसी प्रकार इस प्रत्यगात्मा अर्थात् जीवको शरीरमें लगी हुई, विषय हरण करनेवाली इन्द्रियाँ भी विषयकी तरफ ले जाती हैं। वे इन्द्रियाँ एक सहस्र हैं, दस सहस्र हैं, बहुत हैं, असंख्य हैं, यानी जितनी वे हैं उतना ही यह प्रत्यगात्मा भी दिखलाई देता है। यही प्रत्यगात्मा व्यापक ब्रह्म है, यही अद्वितीय है, यही सब व्यवधानोंसे रहित है, यही प्रत्यगात्मा सबका अनुभवी है। हे मैत्रेयि, यही सब वेदान्तोंका उपदेश है।।१९॥। १७

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१३० बृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय १

वि० वि० भाष्य-पृशिवी, जल, अभि, वायु, आदित्य, दिशायें, चन्द्रमा, विद्युत्. मेघ, आकाश, धर्म, सत्य, मनुष्यजाति तथा परिच्छिन्न बुद्धि; ये भूतोंके कार्य हैं तथा इनका कार्य सब भूत हैं। इस पृथिवीमें जो प्रकाशस्वरूप, अमरधर्मी पुरुष है, वही हृदयस्थ, शरीर उपाधिवाला, प्रकाशस्वरूप, अमरधर्मी पुरुष है, यानी दोनों एक ही है और जो हृदयस्थ पुरुप है यही अमर है, यही ब्रह्म है, यही सर्व- शक्तिमान् है, यही सब भूतोंका अधिपति है। यही समस्त प्राणियोंमें प्रकाशस्वरूप ह, इसीसे उत्पत्ति, इसीमें स्थिति तथा इसीमें लय होता है। अतः जो श्रुति और आचार्यके दिखाये हुए मार्गका अनुसरण करनेवाले हैं, वे ही अविद्याका पार पाते हैं और वे ही इस अगाध मोहसमुद्रसे तर जाते हैं। दूसरे लोग, जो बुद्धिकुशलताका अनुसरण करनेवाले हैं, उसे पार नहीं कर सकते। जिसके विषयमें मैत्रेयीने अपने पतिसे पूछा था कि 'आप जो भी अमृतत्वका साधन जानते हों वही मेरे प्रति कहिये' वह अमृतत्वकी साधनभूत ब्रह्मविद्या समाप्त हो गई। इस ब्रह्मविद्याकी स्तुतिके लिए आगे कही जानेवाली आख्यायिका प्रस्तुत की जाती है, उस आख्यायिकाके तात्पयको संक्षेपसे प्रकाशित करनेके लिए ये दो मन्त्र हैं। इन्हींके द्वारा स्तुत होनेके कारण ब्रह्मविद्याका अमृतत्व एवं सर्व प्रप्तिका साधनत्व प्रकट किया गया है। जैसे उदय होनेवाला सूर्य रात्रिके अन्धकारको दूर कर देता है, उसी प्रकार उदय होनेवाली विद्या अविद्याका नाश कर देती है। इसके सिवा उस ब्रह्मविद्याकी इस प्रकार भीं स्तुति की गई है कि जो विद्या इन्द्रसे सुरक्षित होनेके कारण देवताओंके लिए भी दुष्प्राप्य हो रही थी, वह विद्या देववैद्य अश्विनीकुमारोंको भी बड़ी कठिनतासे प्राप्त हुई। उन्होंने ब्राह्मणका सिर काटकर उसपर घोड़ेका सिर लगाया और जब उसे इन्द्रने काट दिया तो पुनः उसका असली सिर जोड़कर फिर उस सिरसे ही कहे जानेपर समग्र ब्रह्मविद्याका श्रवण किया। इसलिए उससे बढ़कर कोई अन्य पुरुषार्थका साधन न कभी हुआ है और न होगा ही, वर्तमानमें तो हो ही कैसे सकता है? अतः उससे बढ़कर उसकी स्तुति नहीं हो सकती है। ब्रह्मविद्याकी इस प्रकार भी स्तुति की जाती है-यह लोकमें प्रसिद्ध है कि समस्त पुरुषार्थोंका साधन कर्म ही ह, वह कर्म धनसाध्य है, अतः उससे अमतत्व- की आशा भी नहीं है। यह अमृतत्व तो कर्मकी अपेक्षासे रहित केवल आत्मविद्याके द्वारा ही प्राप्त होता है, अतः इससे बढ़कर कोई और पुरुपार्थका साधन नहीं है। इसके सिवा ब्रह्मविद्याकी इस प्रकार भी स्तुति की गई है-सारा ही लोक द्वन्द्वोंमें रमण करनेवाला है, जैसा कि 'वह विराट् पुरुष अकेला होनेके कारण रममाण नहीं

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श्राह्मण ६ ] विद्याविनाद भाष्य १३१

हुआ' 'इसीसे अकेला पुरुप रमण नही करता' इस श्रुतिसे सिद्ध होता है। याज्ञवल्क्य साधारण लोकके सदृश होते हुए भी आत्मज्ञानके बलसे स्त्री, पुत्र एवं धन आदि संसार की आसक्तिको छोड़कर ज्ञानतृप्त हो आत्मामें प्रेम करनेवाले हो गये थे। इसके सिवा ब्रह्मविद्याकी इस प्रकार भी स्तुति की गई है-क्योंकि संसार- मागसे निवृत्त होते हुए भी याज्ञवल्क्यजीने अपनी भार्याको प्रेमके कारण ही इसका उपदेश किया था, जैसा कि "तू प्रिय भाषण करती है, अतः आ, बैठ जा" इस विशेष कथनरूप प्रमाणसे ज्ञात होता है। इस विद्यासे प्राप्य परमात्मा नाम रूपा- त्मक अन्तर्बाह्य भावसे देह और इन्द्रियरूपमें स्थित है, उसीसे समस्त प्रपञ् ज्याप्त है। ऐसा कोई पदार्थ नहीं जो उससे व्याप्त न हो, वह मायासे अनेकरूप है पर वस्तुतः एक है। वह प्रत्यगात्मा द्रष्टा, श्रोता, मन्ता, जाननेवाला, सबको अच्छी तरहसे अनुभव करनेवाला है। यही संपूर्ण वेदान्तोंका उपसंहारभूत अर्थ है। अतः आत्माका ही श्रवग, मनन, निदिध्यासन करना चाहिए। इसीसे परमपद प्राप्त हो सकता है, अन्यथा नहीं। क्योंकि आत्मा ही अमृत और अभय है॥ १६॥

षष्ठ ब्राह्मण

इस ब्राह्मणमें मधुविद्याकी सम्प्रदायपरम्परा बतलायी जाती है- अथ वशः पौतिमाष्यो गौपवनाद गौपवनः पौतिमा- ष्यात्पौतिमाष्यो गौपवनाद गौपवनः कौशिकात्कौशिक: कौण्डिन्यास्कौण्डिन्यः शाण्डिल्याच्छाण्डिल्य: कौशिकाच्च गौतमाच्च गौतमः ॥ १॥ आग्निवेश्यादाभिवेश्यः शाण्डि- ल्याच्चानभिम्लाताच्चानभिम्लात आनभिम्लातादानभि- म्लात आनभिम्लातादानभिम्लातो गौतमादगौतमः सैतव- प्राचीनयोग्याभ्याथ सैतवप्राचीनयोग्यौ पाराशर्यात्पाराशर्यो भारद्वाजाद्द्ारद्वाजो भारद्वाजाच्च गौतमाच्च गौतमो भार- द्ाजान्व्ारद्वाज: पाराशर्यात् पाराशर्यो बैजवापायनादबैजवा-

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१३० बृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय १

वि० वि० भाष्य-पृशिवी, जल, अभि, वायु, आदित्य, दिशायें, चन्द्रमा, विद्युत् मेघ, आकाश, धर्म, सत्य, मनुष्यजाति तथा परिच्छिन्न बुद्धि; ये भूतोंके कार्य हैं तथा इनका कार्य सब भूत हैं। इस पृथिवीमें जो प्रकाशस्वरूप, अमरधर्मी पुरुष है, वही हृदयस्थ, शरीर उपाधिवाला, प्रकाशस्वरूप, अमरधर्मी पुरुष है, यानी दोनों एक ही है और जो हृदयस्थ पुरुप है यही अमर है, यही ब्रह्म है, यही सर्वं- शक्तिमान् है, यही सब भूतोंका अधिपति है। यही समस्त प्राणियोंमें प्रकाशस्वरूप ह, इसीसे उत्पत्ति, इसीमें स्थिति तथा इसीमें लय होता है। अतः जो श्रुति और आचार्यके दिखाये हुए मार्गका अनुसरण करनेवाले हैं, वे ही अविद्याका पार पाते हैं और वे ही इस अगाध मोहसमुद्रसे तर जाते हैं। दूसरे लोग, जो बुद्धिकुशलताका अनुसरण करनेवाले हैं, उसे पार नहीं कर सकते। जिसके विषयमें मैत्रेयीने अपने पतिसे पूछा था कि 'आप जो भी अमृतत्वका साधन जानते हों वही मेरे प्रति कहिये' वह अमृतत्वकी साधनभूत ब्रह्मविद्या समाप्त हो गई। इस ब्रह्मविद्याकी स्तुतिके लिए आगे कही जानेवाली आख्यायिका प्रस्तुत की जाती है, उस आख्यायिकाके तात्पयको संक्षेपसे प्रकाशित करनेके लिए ये दो मन्त्र हैं। इन्हींके द्वारा स्तुत होनेके कारण ब्रह्मविद्याका अमृतत्व एवं सर्व प्रप्तिका साधनत्व प्रकट किया गया है। जैसे उदय होनेवाला सूर्य रात्रिके अन्धकारको दूर कर देता है, उसी प्रकार उदय होनेवाली विद्या अविद्याका नाश कर देती है। इसके सिवा उस ब्रह्मविद्याकी इस प्रकार भीं स्तुति की गई है कि जो विद्या इन्द्रसे सुरक्षित होनेके कारण देवताओंके लिए भी दुष्प्राप्य हो रही थी, वह विद्या देववैद्य अश्विनीकुमारोंको भी बड़ी कठिनतासे प्राप्त हुई। उन्होंने ब्राह्मणका सिर काटकर उसपर घोड़ेका सिर लगाया और जब उसे इन्द्रने काट दिया तो पुनः उसका असली सिर जोड़कर फिर उस सिरसे ही कहे जानेपर समग्र ब्रह्मविद्याका श्रवण किया। इसलिए उससे बढ़कर कोई अन्य पुरुषार्थका साधन न कभी हुआ है और न होगा ही, वर्तमानमें तो हो ही कैसे सकता है ? अतः उससे बढ़कर उसकी स्तुति नहीं हो सकती है। ब्रह्मविद्याकी इस प्रकार भी स्तुति की जाती है-यह लोकमें प्रसिद्ध है कि समस्त पुरुषार्थोंका साधन कर्म ही ह, वह कर्म धनसाध्य है, अतः उससे अमतत्व- की आशा भी नहीं है। यह अमृतत्व तो कर्मकी अपेक्षासे रहित केवल आत्मविद्याके द्वारा ही प्राप्त होता है, अतः इससे बढ़कर कोई और पुरुपार्थका साधन नहीं है। इसके सिवा ब्रह्मविद्याकी इस प्रकार भी स्तुति की गई है-सारा ही लोक द्वन्द्वोंमें रमण करनेवाला है, जैसा कि 'वह विराट् पुरुष अकेला होनेके कारण रममाण नहीं

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माशण ६ विद्याविनोद भाष्य १३३

पाराशर्यायणने पाराशयसे, पाराशर्यने जातूकण्यसे. जातूकर्ण्यने आसुरायणसे और यास्कसे, आसुरयणने त्रवणिसे, त्रैवणिने औपजन्धनिसे, औपजन्धनिने आसुरिसे, आसुरिने भारद्वाजसे, भारद्वाजने आत्रेयसे, आत्रेयने माण्टिसे, माण्टिने गौतमसे, गौतमने गौतमसे, गौतमने वात्स्यसे, वात्स्यने शाण्डिल्यसे, शाण्डिल्यने कैशोर्य काप्यसे, कैशोर्य काप्यने कुमार हारितसे, कुमार हारितने गालवसे, गालवने विदर्भी कौडिन्यसे, विदर्भी कौडिन्यने वत्सनपात् बाभ्रवसे, वत्सनपात् बाभ्रवने पन्था सौभरसे, पन्था सौभरने अयास्य आङ्गिरससे, अयास्य आङ्गिरसने आभूति त्वाट्ट्रसे, आभूति त्वाष्टरने विश्वरूप त्वा्ट्रसे, विश्वरूप त्वाष्टरने अश्विनीकुमारोंसे, अश्विनीकुमारोने दध्यङ्डथर्वणसे, दध्यङडथवणने अथर्वा दैवसे, अथर्श दैवने मृत्युप्राध्वंसनसे, मृत्यु- प्राध्वंसनने प्रध्वंसनसे, प्रध्वंसनने एकर्षिसे, एकर्षिने विप्रचित्तिसे, विप्रचित्तिने व्यष्टिसे, व्यष्टिने सनारुसे, सनारुने सनातनसे, सनातनने सनगसे, सनगने परमेष्ठीसे और परमेष्ठीने ब्रह्मासे इस विद्याको प्राप्त किया है। ब्रह्मा स्वयंभू है, ब्रह्माको नमस्कार है॥ ३॥ वि० वि० भाष्य-ब्रह्मविद्यार्थक मधुकाण्डका वंश ब्रह्मविद्याकी स्तुतिके लिए कहा जाता है। यह मन्त्र स्वाध्याय और जपके लिए है। यह वंश यानी बाँसके समान है। जिस प्रकार बाँसमें पोर होते हैं तथा वह प्रति पोरस भिन्न होता है, उसी प्रकार अग्रभागसे लेकर मूलप्राप्ति पर्यन्त यह वंश है। आचार्य परम्परा क्रम वंश कहलाता है। परमेष्ठी और ब्रह्मा एक ही अर्थके वाचक हैं, इस शंकाकी निवृत्तिके लिए परमेष्ठी शब्दका यहॉ विराट् यह अर्थ किया है। ब्रक्मासे (हिरण्यगर्भसे) पूर्व आचार्यपरम्परा नहीं है, क्योंकि जो ब्रह्मा है वह तो नित्य और स्वयम्भू है, उस स्वयम्भू ब्रह्माको नमस्कार है। यहाँ शंका होती है कि यदि हिरण्यगर्भसे आचार्यपरम्परा नही है तो हिरण्य- गर्भको विद्याप्राप्ति कैसे हुई ? यद्यपि ब्रह्मस्वरूप ही वेद हैं और ब्रह्मके नित्य होनेसे उसको कारणकी अपेक्षा नहीं है, तो भी ज्ञानार्थ अध्यापककी आवश्यकता है। इसका समाधान यह है-पूर्व जन्ममें अधीत वेदका ईश्वरके अनुग्रहसे कल्पके आदिमें आविर्भूत ब्रह्माकी बुद्धिमें अपने तपःप्रभावसे स्त्रयं भान हुआ। जैसे सुप्त-प्रबुद्ध को पूर्वभात विषयोंका भान होता है, वैसे ही हिरण्यगर्भको वेदोंका स्वतः भान हो गया, इसलिए उसको अध्यापककी आवश्यकता नहीं हुई। १-३ ॥ द्वितीय अध्याय और षष्ठ ब्राह्मण समाप्त।

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तृतीय अध्याय

प्रथम ब्राह्मण

अब 'जनको ह वैदेहः' इत्यादि याज्ञवल्कीय काण्ड आरम्भ किया जाता है। गत मधुकाण्डसे इसकी समानार्थता होनेपर भी युक्तिप्रधान होनेके कारण इसमें पुनरुक्तिका दोप नहीं है, क्योंकि मधुकाण्ड शास्त्रप्रधान है। जब शासत और युक्ति दोनों ही आत्मैकत्व प्रदर्शित करनेके लिए प्रवृत्त हों तो वे उसका हथेली पर रखे हुए बिल्वफलके समान साक्षात्कार करा सकती हैं। 'श्रवण करना चाहिये, मनन करना चाहिये' ऐसा पहले कहा गया है, इसलिए शास्त्रतात्पर्यको ही परीक्षापूर्वक निश्चय करनेके लिए यह युक्तिप्रधान याज्ञवल्कीय काण्ड आरम्भ किया जाता है। यहाँ जो आख्यायिका है, वह विज्ञानकी स्तुतिके लिए और उसके उपायका विधान करनेके लिए है। दान इसका प्रसिद्ध उपाय है और शास्त्रोंमें भी विद्वानोंने इसे ही देखा है, क्योंकि दानसे प्राणी अपने प्रति विनीत हो जाते हैं। यहाँ बहुतसे सुवर्ण और सहस्र गौओंका दान देखा जाता है, इसलिए यहाँ शास्त्रका प्रतिपाद्य विषय दूसरा होनेपर भी यह आख्यायिका विद्याप्राप्तिके उपायभूत दानको प्रदशित करनेके लिए आरम्भ की गई है। इसके सिवा किसी विद्यामें निष्णात पुरुषोंका संग तथा उनके साथ वाद करना भी तर्कशास्त्रमें विद्याप्राप्तिका उपाय देखा गया है और वह वाद इस अध्यायमें बड़ी प्रौढ़िके साथ दिखाया गया है। विद्वानोंके संगसे प्रज्ञाकी वृद्धि होती है-यह तो प्रत्यक्ष ही है, इसलिए यह आख्यायिका विद्या प्राप्तिका उपाय प्रदर्शित करनेके लिए ही है। यथा- ॐ जनको ह वैदेहो बहुदक्षियोन यज्ञेनेजे तत्र ह कुरुपश्चालानां ब्राह्मणा अभिसमेता बभूवुस्तस्य ह जन-

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ब्राष्ृण् १ ] बिद्याविनोद भाष्य १३५

कस्य वैदेहस्य विजिज्ञासा बभूव क: स्विदेषां ब्राह्मणाना- मनूचानतम इति स ह गवाथ सहर्मवरुरोध दश दश पादा एकैकस्याः शृङ्गयोराबद्धा बभूकुः ॥१॥ भावार्थ-प्रसिद्ध विदेह देशके राजा जनकने बहुद च्िणासम्बन्धी यज्ञ किया। उसमें कुरु और पख्ाल देशोंके परमप्रसिद्ध विद्वान् ब्राह्मण इक्ट्ठे हुए। तब राजा जनकको यह जाननेकी तीव्र इच्छा हुई कि इन उपस्थित मान्य ब्राह्मणोंमें कौन-सा अति ब्रह्मवेता है ? ऐसा विचार करके उसने, जिनके प्रत्येक सींगोंमें दस दस पाद सुवर्ण बँधा हुआ था, ऐसी एक हजार गौओंको गोशालामें एकत्र करवाया ॥ १ ॥

वि• वि. भाष्य-विदेह देशमें जनक नामक राजा था। उसने बहु- दक्षिण नामक यागसे, अथवा अश्वमेध यागसे (अश्वमेधमें दच्षिणा बहुत दी जाती है) यज्ञ किया। उस यज्ञमें पञ्चाल और कुरुक्ेत्र देशके ब्राह्मण एकत्रित हुए, उस सभामें महान् विद्वत्समुदायको देखकर यजमान जनककी यह जाननेकी तीव्र इच्छा हुई कि इस त्रिद्वत्समूहमें सबसे बड़ा ब्रह्मवेत्ता कौन है, जो मुझको उपदेश देनेके लिए योग्य हो? ऐसी जिज्ञासा होनेपर उक्त निश्चयपर पहुँचनेके लिए राजाने आदेश देकर एक हजार गौओंको एकत्र किया और दस दस पाद सोना प्रत्येक गौके सींगोंमें बँधवाया ॥ १ ॥ तान्होवाच ब्राह्मणा भगवन्तो यो वो ब्रह्मिष्टः स एता गा उदजतामिति। ते ह ब्राह्मणा न दधपुरथ ह याज्ञ- वल्क्य: स्वमेव ब्रह्मचारिणमुवाचैताः सोम्योदज सामभ्रवा३ इति ता होदाचकार ते ह ब्राह्म णाश्चुक्रुधुः कथं नो ब्रह्मिश्टे ब्रुवीतेत्यथ ह जनकस्य वैदेहस्य होताऽश्वलो बभूव स हैनं पप्रच्छ तवं नु खलु नो याज्ञवल्कप ब्रह्मिष्टेऽसी३ इति स होवाच नमो वयं ब्रह्मिष्ठाय कुर्मो गोकामा एव वय४ स्म इति तथ ह तत एव प्रषुं दधे होताऽश्रलः ॥ २ ॥ भावार्थ-इस प्रकार सुवर्णयुक्त एक हजार गाओको एकत्रित कर राजा बोला

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१३६ शृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय ₹

कि माननीय पूज्य ब्राह्मणो, आप लोगोंमें से जो सबसे बड़ा ब्रह्मवेत्ता हो वह इन गौओंको अपने घर ले जाय। इतना कहकर राजा जनक चुप हो गया। यह सुनकर उन ब्राह्मणोंमेंसे किसीको साहस न हुआ कि उन गौओंको अपने घर ले जाय। कारण कि 'मैं सबसे अधिक ब्रह्मवेत्ता हूँ' ऐसी प्रतिज्ञा करनेका साहस किसीमें न था। ब्राह्मणोंको असमर्थ देखकर याज्ञवल्क्यने अपने प्रिय शिष्य सामश्रवासे कहा कि हे सोम्य, तू इन गौओंको मेरे घर ले जा। ऐसा सुनकर वह उन सब गौओंको लेकर याज्ञवल्क्यके घर चला। यह देखकर समस्त ब्राह्मण क्रद्ध हो सहसा बोल उठे कि यह याज्ञवल्क्य हम लोगोंमें अपनेको सबसे बड़ा ब्रह्म- वेत्ता कैसे कह सकता है? तब यजमान जनकका एक अश्वल नामक होता, जो ब्रह्मिष्ठ राजा के यहाँ रहनेसे निडर तथा प्रगल्भ हो गया था, उसने याज्ञवल्क्यसे पूछा कि याज्ञवल्क्य, क्या तू ही सबसे श्रेष्ठ ब्रह्मवेत्ता है ? याज्ञवल्क्यने कहा-ब्रह्मि- ष्ठको हम नमस्कार करते हैं, इस समय तो हम गौओंकी इच्छावाले हैं। यह सुन अश्वलने उससे प्रश्न करनेका निश्चय किया॥ २॥

वि. वि. भाष्य-याज्ञवल्कच महपिका शिष्य सामश्रवा सामवेद गान करनेमें बड़ा निपुण था, उसको सामश्रवा सम्बोधन करनेका कारण यही था कि यह शिष्य याज्ञवल्क्यजीसे सामवेदका श्रवण (अध्ययन) करता था। साम ऋगवेद में अध्यारूढ होकर गान किया जाता है, ऋषि स्वयं यजुर्वेदी हैं तथा अथर्व- वेद इन वेदोंके ही अन्तर्भूत है। अतः इस कथनसे याज्ञवल्क्य चारों वेदोंके ज्ञाता सिद्ध होते हैं। ऐसे याज्ञवल्क्के ऊपर जब अश्वलने क्रुद्ध होकर कहा कि क्या तू ही सबसे श्रेष्ठ ब्रह्मवेत्ता है ? तब याज्ञवल्क्यने कहा-हे होता अश्वल, मैं अपनेको ऐसा नहीं समझता हूँ मैं ब्रह्मवेत्ता पुरुपोंका दास हूँ, उनको मै प्रणाम करता हूँ। मैंने अपनेको गौओंकी इच्छासे युक्त और आप लोगोंको गौओंकी कामनासे रहित पाकर गौओंको अपने घर ले जानेके लिए शिष्योसे कहा है। पर यह बात अश्वलको न जॅची, क्योंकि राजाके उक्त पणसे (बाजीसे) उनकी ब्रह्मिष्ठकी प्रतिज्ञा इतर लोगोंके मनमें तोभका कारण हुई। अतएव अश्वलने उनसे प्रश्न करनेका निश्चय कर लिया॥ २ ॥ याज्ञवल्क्येति होवाच यदिदथ सर्वं मृत्युनाऽसथ सर्व मृत्युनाडभिपन्नं केन यजमानो मृत्योराप्तिमतिमुच्यत

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बृहदारएयकोपनिषद

ज्ञानियोंमें श्रेष्ठ याज्ञवल्क्य जनकके यज्ञमें गोदान ले रहे हैं, अन्य ऋषि इसका विरोध कर रहे है ज्ञानियोमा श्र यात्तवस्धय कनडना यज्ञमा जोधान यरध रहा के, मृन्य ऋ तेनो विशेष हशो र

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विद्याविनोद भाष्य १३७

इति होत्रर्त्विजागनिना वाचा वाग्वै यज्ञस्य होता तद्येयं वाक् सोऽयमनि: स होता स मुक्ति: साडतिमुक्तिः ॥३॥ भावार्थ-इस प्रकार निश्चय कर अश्वलने पूछा कि हे याज्ञवल्क्य, जो यह सब मृत्युसे ग्रस्त हैं तथा मृत्युसे ही वशीकृत हुए हैं, उस मृत्युकी व्याप्तिका यजमान किस साधनसे अतिक्रमण कर सकता है ? याज्ञवल्क्यने उत्तर दिया- वह यजमान होता ऋत्विकरूप अग्निद्वारा तथा वाणीद्वारा मृत्युव्याप्तिका अति- क्रमण कर सकता है। वाणी ही यज्ञका होता है, जो यह बाणी है, वही अभि है, वह होता है, वह मुक्ति है और वही अतिमुक्ति है॥। ३॥ वि० वि भाष्य-अश्वल के कहनेका भाव यह है कि यज्ञमें जो कुछ पदार्थ दिखाई देता है वह सब मृत्युसे अ्रसित है, ऐसी दशामें किस साधनके द्वारा यज- मान मृत्युसे छुटकारा पा सकता है, अर्थात् अहोरात्ररूप पाशका उल्लङ््घन कर सकता है ? इसके उत्तरमें याज्ञवल्क्यने यही समझाया कि होतानामक ऋत्विककी सहा- यतासे यजमान मुक्त हो जाता है, वह होता अभिरूप है। अमिसे तात्पर्य वाक्यसे है अर्थात् जब होता शुद्ध वाणीसे उदात्त, अनुदात्त, स्वरित स्वरोंके साथ वैदिक मन्त्रोंका उच्वारण करता है तब देवगण प्रसन्न होकर यजमानको स्वर्गमें ले जाते हैं। अतः वाणी ही यज्ञका होता है वही अि है और वही मुक्तिका साधन है, अतएव वही अतिमुक्ति कही जाती है॥ ३॥ याज्ञवल्क्येति होवाच यदिदश सर्वमहोरात्राभ्या- माप्तथ सर्वमहोरात्राभ्यामभिपन्नं केन यजमानोहोरात्रयो- रात्तिमतिमुच्यत इत्यध्वर्युणर्त्वजा चक्षुषाSSदित्येन चक्षवै यज्ञ्याध्वर्युस्तद्यदिदं चक्षुः सोऽसावादित्यः सोऽध्वर्यु: स मुक्ति: साडतिमुक्तिः॥४॥ भावार्थ-पुनः अश्वलने कहा-हे याज्ञवल्क्, जो यह सब दिन तथा रात्रि से व्याप्त हैं, वे सब दिन तथा रात्रिके वशमें हैं। तब किस साधनसे यजमान दिन रातके पाशका उल्लंघन कर सकता है ? इसके उत्तरमें याज्ञवल्क्यने उत्तर दिया कि ऋत्विक तथा नेत्ररूप सूर्यके द्वारा। अध्वर्यु यज्ञका नेत्र है। इसलिए जो यह नेत्र है, वह यह सूर्य है तथा वह अध्वर्यु है, वह मुक्ति है और वही अतिमुक्ति है॥४॥ १८

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१३८ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ३

वि० वि० भाष्य-प्रथम प्रश्नका समुचित उत्तर पानेसे अश्वल कुछ संतुष्ट हुआ, आगे उसने पुनः प्रश्न किया कि हे याज्ञवल्क्, संसारमें जितनी वस्तुएँ हैं सब दिन तथा रात्रिसे गृहीत हैं, ऐसी दशामें किस यत्न द्वारा यजमान दिन रात्रिके पाशको उल्लंघन करके मुक्त हो सकता है ? इसपर याज्ञवल्कने उत्तर दिया कि अध्वर्युनामक ऋत्विककी सहायतासे यजमान दिन रात्रिके पाशसे छुटकारा पा सकता है। अध्वर्युका तात्पर्य चक्षु और आदित्य है, जिस समय यजमान चक्षुके द्वारा अच्छी तरह सविधि यज्ञ करता है उस समय आदित्यदेव अपनी रश्मियों द्वारा उस यजमानको ब्रह्मलोकमें ले जाकर आवागमनसे मुक्त कर देते हैं। अतः यज- मानका शुद्ध नेत्र ही अध्वर्युं है, वही मुक्तिका साधन है, इसीलिए वह अतिमुक्ति भी कहा जाता है।।४।। याजवल्क्येति होवाच यदिदथ स्वं पूर्वपक्षापरपक्षा- भ्यामाप्तथ सर्वं पूर्वपक्षापरपक्षाभ्यामभिपन्नं केन यजमान: पूर्वपक्षापरपक्षयोराप्तिम तिमुच्यत इत्युदगात्रर्तिजा वायुना प्रारोन प्राणो वै यज्ञस्योदगाता तद्योऽयं प्राणः स वायुः स उदगाता स मुक्ति: साडतिमुक्ति:॥ ५ ॥ भावार्थ-पुनः अश्वलने इस प्रकार कहा कि हे याज्ञवल्क्य, ये सब शुक्ल तथा कृष्णपक्षसे ग्रस्त हैं और सब शुक्ल तथा कृष्णपक्षसे वशीकृत हुए हैं, तब यजमान किस साधनके द्वारा शुक्ल तथा कृष्णपक्षके पाशको उल्लंघन करके मुक्त हो सकता है ? इसपर याजवल्क्यने कहा कि उद्गाता ऋत्विक द्वारा तथा वायुरूप प्राणद्वारा मुक्त हो सकता है। उद्गाता यज्ञका प्राण है तथा जो यह प्राण है, वही वायु है, वही उद्गाता है, वही मुक्ति है और वही अतिमुक्ति है।। ५॥ वि० वि० भाष्य-संसारमें समस्त पदार्थ शुक्ल तथा कृष्णपत्ोंसे व्याप्त हैं, ऐसी दशामें किस यत्नके द्वारा शुक्ल-कृष्णपक्षकी व्याप्तिसे यजमान मुक्त हो सकता है ? इस अश्वलके प्रश्नपर याज्ञवल्क्य महर्षिने समझाया कि उद्गाता नामक ऋत्विककी सहायतासे यजमान दोनों पक्षोंकी व्याप्तिसे छूट जाता है, प्रकृतमें मनुष्यसंबन्धी उद्गातासे तात्पर्य नहीं है किन्तु घ्राणवायु तथा बाह्यवायुसे है। यह घ्राणवायु ही प्राणतायु है, यही उद्गाता है, यही बाह्यवायु है, यही प्राण है, प्राणको ही इन्द्रियाँ भी कहते हैं। प्रत्येक इन्द्रियको निर्मल करना ही परम साधन है, जब इन्द्रियाँ शुद्ध हो जाती हैं तब इनकी सहायतासे यजमानका कल्याण होता है॥ ५॥

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बाश्ण १ ] विद्याविनोद भाष्य १३९

याज्ञवल्क्येति होवाच यदिदमन्तरिक्षमनारम्बणमिव केना SSक्रमेण यजमान: स्वर्ग लोकमाक्रमत इति ब्रह्मण- तिवजा मनसा चन्द्रेण मनो वै यज्ञस्य ब्रह्मा तद्यदिदं मनः सोडसौ चन्द्रः स ब्रह्मा समुक्ति: साडतिमुक्तिरित्यतिमोक्षा अथ संपद: ॥ ६ ॥। भावार्थ-पुनः अश्वल होताने प्रश्न किया कि हे याज्ञवल्क्य, जो यह आकाश है वह आलम्धनरहित सा दिखाई देता है, इसलिए यजमान किस आधारसे स्वर्गलोक- को प्राप्त होता है ? इसपर याज्ञवल्क्यने कहा कि ब्रह्मा ऋत्विकके द्वारा तथा मनरूप चन्द्रमा द्वारा। ब्रह्मा यज्ञका मन है तथा जो यह मन है, वही यह चन्द्रमा है, वह ब्रह्मा है, वह मुक्ति है और वही अतिमुक्ति है। इस प्रकार जानकर यजमान अतिमोक्ष अर्थात् तापत्रयसे छूट जाता है। अब आगे पुरुषार्थनिमित्तक सम्पत्तियाँ कही जाती हैं ॥ ६ ।। वि० वि० भाष्य-यह आकाश निरालम्ब सा प्रतीत होता है, और स्वर्ग- लोक इससे आगे है, ऐसी अवस्थामें यजमान किसकी सहायतासे स्व्र्गलोकको प्राप्त होता है? इस प्रश्नके समाधानमें ऋषिने कहा कि ब्रह्मासे तात्पर्य मनरूपी चन्द्रमा से है, यजमानका कल्याण केवल शुद्ध मनके द्वारा ही हो सकता है, यही मन यज्ञका ब्रह्मा है। अतः जो यह मन है वही चन्द्रमा है, वही ब्रह्मा है, वह चन्द्रमा ही मुक्तिका साधन है। इसलिए शुद्ध मन ही यजमानको चन्द्रलोकमें पहुँचाकर उसको अत्यन्त सुखी बनाता है ॥ ६ ॥ याज्वल्क्येति होवाच कतिभिरयमद्यग्भिर्होतास्मिन्यज्ञे करिष्यतीति तिसृभिरिति कतमास्तास्तिस्त्र इति पुरोऽतु- वाक्या च याज्या च शस्यैव तृतीया किं ताभिर्जयतीति यत्किंचेदं प्राणमृदिति ॥७॥ भावार्थ-पुनः अश्वलने कहा कि हे याज्ञवल्क्य, आज कितनी ऋचाओंसे होता इस यज्ञमें शंसन करेगा ? याज्ञवल्क्यने उत्तर दिया-तीन ऋचाओंसे। लश्वळ-'वे तीन कौनसी हैं?' याज्ञवल्क्य-'पुरोनुवाक्या, याज्या और शस्या।'

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१४० शृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय ३ै

अश्वल-'इनसे यजमान किसको जीतता है?' याज्ञवल्क्य-जितने इस जगत्में प्राण धारण करनेवाले हैं, उन सबको जीत लेता है॥।७॥ वि० वि. भाष्य-अश्वलने पुनः प्रश्न किया कि कितनी ऋचाओंके द्वारा आज यह होता प्रस्तुत यज्ञमें हवनादि कार्य करेगा? उत्तरमें याज्ञवल्क्यने तीन ऋचा बतलाई, पहली पुरोनुवाक्या है, दूसरी याज्या है, तीसरी शस्या है। अर्थात् जो ऋचा कार्यारम्भके पहले पढ़ी जाती हैं, वे पुरोनुवाक्या हैं, और जो ऋचा प्रत्येक विधिमें पढ़ी जाती हैं वे याज्या कही जाती हैं और जो अन्तमें स्तुतिके निमित्त बहुतसी ऋचा पढ़ी जाती हैं, वे शस्या कहलाती हैं। उन्ही सब ऋचाओंको पढ़कर होता प्रस्तुत यज्ञ करता है। इसका यह फल है कि संसारमें जितने प्राणी हैं वे सब यजमानको उपलब्ध होते हैं॥।७॥ याज्ञवल्क्येति होवाच कत्ययमद्याध्वर्युरस्मिन्यज्ञ आहु- तीर्होष्यतीति तिस्र इति कतमास्तास्तिस्र इति या हुंता उज्ज्वलन्ति या हुता अतिनेदन्ते या हुता अधिशेरते किं ताभिर्जयतीति या हुता उज्ज्वलन्ति देवलोकमेव ताभिर्ज- यति दीव्यत इव हि देवलोको या हुता अतिनेदन्ते पितृ- लोकमेव ताभिर्जयत्यतीव हि पितृलोको या हुता अधिशेरते मनुष्यलोकमेव ताभिर्जयत्यध इव हि मनुष्यलोकः ॥ ८ ॥ भावार्थ-पुनः अश्वलने कहा कि हे याज्ञवल्क्य, आज यह अध्वर्युं इस यज्ञमें कितनी आहुतियोंसे होम करेगा ? इसपर याज्ञवल्क्यने कहा कि तीन आडु- तियोंसे होम करेगा। वे तीन कौन आहुतियाँ हैं ? इसके उत्तरमें याज्ञवल्क्य महर्षि कहते हैं कि पहली आहुति वे हैं जो अभिकुण्डमें डालनेपर ऊपरको प्रज्तलित होती हैं, जैसे समिध् और घृतकी आहुतियाँ। दूसरी वे हैं जो अभिकुण्डमें डालनेपर अत्यन्त शब्द करती हैं, जैसे मांसादिकी आहुतियाँ। तीसरी वे हैं जो अभिकुण्डमें डालनेपर नीचे पृथिवीपर जाकर लीन हो जाती हैं, जैसे दुग्व और सोमकी आहुतियाँ। इसपर अश्वलने पूछा कि इस प्रकार सम्पन्न की हुई उन आह्ुतियोंसे यजमान किस वस्तुका जय करता है ? याज्ञवल्कयने उत्तर दिया कि जो आहुतियाँ ऊपरको प्रज्वलित होती हैं उनके द्वारा यजमान देवलोकका जय करता है। क्योंकि

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बह्य १ ] विद्याविनोद भाष्य १४१

देवलोक प्रकाशवान् है, अतः देवलोककी प्राप्ति प्रज्वलित आहुतियोंके द्वारा कही गई है। जो आहुतियाँ अत्यन्त शब्द करती हैं, उनके द्वारा यजमान पितृलोकका जय करता है, क्योंकि पितृलोकमें पितरलोग सुखके कारण उन्मत्त होकर शब्द करते हैं। अतः पितृलोककी प्राप्ति शब्द करती हुई आहुतियोंके द्वारा कही गई है। जो आहुतियाँ नीचे पृथिवीपर जाकर लीन हो जाती हैं, उनके द्वारा यजमान मनुष्य- लोकका जय करता है। क्योंकि मनुष्यलोक नीचे है, अतः इसकी प्राप्ति उन आहु- तियोंके द्वारा कही गई है जो नीचेको जाती हैं । ८ ॥। याज्वल्क्येति होवाच कतिभिरयमद्य ब्रह्मा यज्ञं दक्षि- णतो देवताभिरगोपायतीत्येकयेति कतमा सैकेति मन एवे- त्यनन्तं वै मनोऽनन्ता विश्वे देवा अनन्तमेव स तेन लोकं जयति॥६॥। भावार्थ-पुनः अश्वलने पूछा कि हे याज्ञवल्क्य, आज यह ब्रक्मा दक्तिण- दिशामें बैठकर कितने देवताओंसे यज्ञकी रक्षा करता है? इसपर याज्ञवल्क्यने उत्तर दिया कि एकके द्वारा। तब अश्वलने पूछा कि वह एक देवता कौन है? याजवल्क्यने उत्तर दिया कि वह मन है। मन यद्यपि एक है किन्तु उसकी वृत्तियाँ अनन्त हैं, अतः मनःसम्बन्घसे विश्वेदेव भी अनन्त हैं। इस प्रकार मनके द्वारा यजमान अनन्त लोकोंको जीत लेता है।। ९॥ याज्ञवल्क्येति होवाच कत्ययमद्योदगातास्मिन्यजे स्तोत्रियाः स्तोष्यतीति तिस्र इति कतमास्तास्तिस्त्र इति पुरोनुवाक्या च याज्या च शस्यैव तृतीया कतमास्ता या अध्यात्ममिति प्राण एव पुरोनुवाक्याऽपानो याज्या व्यान: शस्या किं ताभिर्जयतीति पृथिवीलोकमेव पुरोनुवाक्यया जयत्यन्तरिक्षलोकं याज्यया द्ुलोकं शस्यया ततो ह होताऽश्वल उपरराम ॥ १० ॥ भावार्थ-पुनः अश्वलने इस प्रकार पूछा कि हे याज्ञवल्क्य, आज यह उद्गाता इस यज्ञमें ऋग्वेद और सामवेदकी कितनी ऋचाओंसे स्तुति करेगा ? इस- पर याज्ञवल्कयने कहा कि तीन ऋचाओंसे। तब पुनः उसने पूछा कि वे तीन ऋचाए

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१४२ बृहदारण्यकोर्पानषद् [अध्याय ३

कौन हैं ? याज्ञवल्क्यने उत्तर दिया कि पुरोनुवाक्या पहली ऋचा है, दूसरी याज्या ऋचा है और तीसरी शस्या ऋचा है। पुनः उसने प्रश्न किया कि कौनसी वे ऋचा हैं, जो अध्यात्मविद्यासे सम्बन्ध रखती हैं ? याजवल्क्यने उत्तर दिया कि प्राण ही पुरोनुवाक्या ऋचा है, अपान याज्या ऋचा है और व्यान शस्या ऋचा है। पुनः अश्वलने पूछा कि उन तीन ऋचाओंसे यजमान किसको जीतता है ? इसपर याज्ञवल्क्यने उत्तर दिया कि पुरोनुवाक्या ऋचाके द्वारा यजमान पृथिवीलोकको जीतता है, याज्या ऋचाके द्वारा अन्तरिक्ष लोकको जीतता है और शस्या ऋचाके द्वारा स्वर्गलोकको जीतता है। इसके बाद होता अश्वल चुप हो गया ॥ १०। वि० वि० भाष्य-इस खण्डके सातवें मन्त्रमें जो यह कहा गया है कि यह जो प्राणिसमुदाय है, उसके ऊपर यजमान विजय प्राप्त करता है, वह किस समा- नतासे कहा है-यह बतलाते हैं। इस प्रकरण द्वारा यह बतलाया जाता है कि प्राण ही पुरोनुवाक्या है, क्योंकि 'प' शब्दमें इन दोनोंकी समानता है। अपान याज्या है, क्योंकि आनन्तयमें दोनोंकी समानता है। अर्थात् जैसे अपान प्राणके अनन्तर है वैसे ही याज्या ऋचाएँ पुरोनुवाक्या ऋचाओंके अनन्तर हैं। इसके सिवा देवगण दी हुई हविको अपानसै ही ग्रहण करते हैं, तथा प्रदान ही याग है, इसलिए अपान याज्या ऋचा है। व्यान शस्या है, जैसा कि 'प्राण अपान व्यापार न करता हुआ ऋचाओंका उच्चारण करता है" इस दूसरी श्रुतिसे कहा गया है। इन ऋचाओंसे वह जिन्हें जीतता है उनके बारेमें कुछ कहा जाता है-लोकोंमें पृथिवी- लोक पहले है तथा ऋचाओंमें पुरोनुवाक्या ऋ वाएँ पहले हैं। इस तरह 'प्रथमत्व' रूप सम्बन्धकी दोनोंमें समानता होनेसे पुरोनुवाक्यासे पृथिवीलोकको ही जीतता है। मध्यमत्वमें समानता होनेसे याज्यासे अन्तरिक्षलोकपर जय प्राप्त करता है और ऊर्ध्वत्वमें समानता होनेसे स्वर्गलोक पर विजय प्राप्त करता है। तब उस अपने प्रश्नके निर्णयसे अश्वल यह समझकर कि यह याज्ञवल्क्य हमारे वशका नहीं है, शान्त हो गया। प्रमाणसे पदार्थका प्रतिपादन करनेके बाद उसकी उपकारक युक्तिकी अपेक्षा होती है। युक्ति स्वयं प्रमाण नहीं है, कारण कि व्यवस्थार्पक प्रमाण होता है। इसलिए आगमप्रधान मधुकाण्डका पहले तथा युक्तिप्रधान याज्ञवल्कीय काण्डका उसके पश्चात् आरम्भ करना ठीक ही है। इस अध्यायमें नौ ब्राह्मण हैं, इन ब्राह्मणों का क्रमशः अर्थ यह है कि पहले ब्राह्मणमें मृत्युका अतिक्रमण, दूसरेमें मृत्युका निर्णय, तीसरेमें संसारव्याप्ति तथा चौथेमें आत्माका निर्णय, पञ्चममें आत्मामें ब्रह्मस्वरूपता, छठे में ऋह्मकार्यवाद, सातवेंमें कारणकी व्यवस्था, आठवेंमें ब्रम्मतत्त्वका निरूपण और

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भाशण २ ] विद्याविनोद भाष्य १४३

नवममें सक्षेप तथा विस्तारसे देवताओका निरूपण। इसके बाद राब अधिकारियोके लिए सगुण और निर्गुण ब्रह्मनिरूपण किया गया है। यानी जो सगुण ब्रह्मोपासनाके अधिकारी है, उनके लिए सगुण ब्रह्मका निरूपण किया गया है और जो निर्गुण ब्रह्मोपासनाके अधिकारी हैं, उनके लिए निर्गुण ब्रह्मका निरूपण किया गया है। दान, तत्त्वज्ञानियोका सग तथा उनका संवाद-ये तीनो विद्याप्राप्तिके उपाय है, यह इस आख्यानसे सूचित होता है। सहिरण्य हजारो गोदान, जनकसभामे अनेक ब्रह्मज्ञानियोका समागम और उनके साथ याज्ञवल्क्यका सवाद-ये सब विद्याप्राप्तिके उपाय हैं। इस आख्यायिका मे इन सबकी सूचना स्पष्टरूपसे की गई है॥ १० ॥

द्वितीय ब्राह्म

पिछले ब्राह्मणमे कहा गया है कि याज्ञवल्क्य विद्याके प्रकर्षसे पूजाके भागी हुए, उनकी पूजाका कारण विद्या है। जिससे सब पूज्य होते हैं वह विद्या धन्य है, अतः उसकी प्राप्तिके लिए पूर्ण श्रम करना चाहिए। पहले कानरूप तथा कर्मरूप मृत्युसे अतिमुक्तिकी व्याख्या की गयी है। अब प्रश्न यह है कि मृत्यु क्या है ? नैसर्गिक अनादिसिद्ध अज्ञानके द्वारा विषयादिमें आसङ्गास्पद तथा अध्यात्म और अधिभूत विषयोसे परिच्छिन्न ग्रह, अतिग्रह लक्षणवाला मृत्यु है, उस मृत्युसे अतिमुक्त हुए पुरुषके अग्नि-आदित्यादि रूपोका व्याख्यान उद्गीथप्रकरणमे किया गया है। अश्वलके प्रश्नमे उसीके अन्तवर्ती किसी विशेपका वर्णन है। यह विशेष ज्ञान- सहित कर्मोंका फल है। इस साध्य साधनरूप ससारसे गोक्ष पाना चाहिए, अत. यहो बन्धरूप मृत्युका स्वरूप कहते हैं, यथा- अथ हैनं जारत्कारव आर्तभाग: पपच्छ याज्ञवल्क्येति होवाच कति ग्रहाः कत्यतिग्रहा इति। अष्टौ ग्रहा अष्टा- वतिग्रहा इति ये तेऽष्टौग्रहा अष्टावतिग्रहाःकतमे त इति॥१॥ भावार्थ-इसके अनन्तर याज्ञवल्क्यसे जारत्कारव आर्तभागने पूछा कि हे याज्ञवल्क्य, कितने ग्रह हैं और कितने अतिग्रह हैं? याजवल्क्यने कहा-भाठ ग्रह हैं और आठ अतिग्रह हैं। पुन. आर्तभागने पूछा कि जो आठ ग्रह और आठ अतिग्रह हैं, वे कौनसे हैं।। १ ।।

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१४४ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ३

ये जो आठ ग्रह और आठ अतिग्रह बतलाये गये हैं, इनमें से नियमसे किन्हें ्रहण करना चाहिए ? इसपर याज्ञवल्क्य घ्राणादि इन्द्रियोंका अहत्व और गन्धादि विषयोंका अतिग्रहत्व आठ मन्त्रोंके द्वारा बतलाते हैं, यथा- प्राणो वै ग्रहः सोऽपानेनाडतिग्राहेण गहीतोऽपानेन हि गन्धाञ्जिघ्रति ॥२॥ वाग्वै ग्रहः स नाम्नाऽतिग्राहेण गृहीतो वाचा हि नामान्यभिवदति॥ ३॥ जिह्वा वै ग्रहः स रसेनाऽतिग्राहेण गृहीतो जिह्रया हि रसान्वि- जानाति॥४॥ चत्तुर्वै ग्रहः स रूपेणाSतिग्राहेण गृहीतश्चक्षुषा हि रूपाणि पश्यति॥ ५ ॥ श्रोत्रं वै ग्रहः स शब्देनाS- तिग्राहेण गृहीतः श्रोत्रेण हि शब्दाञशृणोति ॥६॥ मनो वै ग्रहः स कामेनाऽतिग्राहेण गरहीतो मनसा हि कामान्कामयते ॥ ७॥ हस्तौ वै ग्रहः सकर्मणाऽतिग्राहेण गृहीतो हस्ताभ्या हि कर्म करोति ॥ ८॥ त्वग्वै ग्रहः स स्पर्शेना Sतिग्राहेण गृहीतस्त्वचा हि स्पर्शान्वेदयत इत्येतेऽष्टौ ग्रहा अष्टावतिग्रह्ाः ॥६।। भावार्थ-प्राण ही ग्रह है, वह अपानरूप ग्रहसे गृहीत है, क्योंकि प्राणीमात्र अपानसे यानी घ्राणसे ही सूँघता है। वाणी ही ग्रह है, वह नामरूप अतिग्रहसे गृहीत है, क्योंकि प्राणीमात्र वाणीसे ही नामोंका उच्चारण करता है। रसना ही ग्रह है, वह रसरूप अतित्रहसे गृहीत है, क्योंकि प्राणीमात्र रसनासे ही रसोंको विशेष रूपसे अनुभत्र करता है। नेत्र ही ग्रह है, वह रूप अतिग्रहसे गृहीत है, क्योंकि प्राणीमात्र नेत्रसे ही रूपोंको देखता है। कर्ण ही ग्रह है, वह शब्दरूप अतिग्रहसे गृहीत है, क्योंकि प्राणीमात्र कर्णसे ही शब्दोंको सुनता है। मन ही ग्रह है, वह कामरूप अतिग्रहसे गृहीत है, क्योंकि प्राणीमात्र मनसे ही कामोंकी इच्छा करता है। हस्त ही ग्रह हैं, वे कर्मरूप अतिग्रहसे गृहदीत हैं, क्योंकि प्राणीमात्र हस्तसे ही कर्म करता है। त्वचा ही ग्रह है, वह स्पर्शरूप ग्रहसे गृहीत है, क्योंकि प्राणीमात्र त्वचासे ही स्पर्शोंको जानता है। इस तरह ये आठ अह और आठ अतिग्रह हैं।।६।।

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वाश्ण २ ] विद्याविनोद भाष्य १४५

वि० वि० भाष्य-ग्रह और अतिग्रहका विवरण यह है कि आठ अ्रहोंमेंसे पहला ग्रह घ्ाणेन्द्रिय है, इसका विपय सुगन्ध तथा दुर्गन्ध अतिग्रह हैं, अतः वह विषयरूप अतिग्रहसे गृहीत है। क्योंकि अपानवायुसे घ्राणेन्द्रिय अनेक प्रकारके गन्धोंको ग्रहण करता है। याज्ञवल्क्यके कहनेका तात्पर्य यह है कि आठ ग्रह यानी इन्द्रियाँ हैं, और आठ ही अतिग्रह हैं यानी विषय हैं। विषय इन्द्रियोंको अतिक्रमण कर लेते हैं, अतः इन्द्रियोंकी अपेक्षा विपय बलवान् होने हैं, इसीलिए विषयोंका नाम अतिग्रह है। इसी प्रकार वागिन्द्रिय ग्रह है, वह वागिन्द्रिय वाणी और नामरूप अतिग्रह से गृहीत है। क्योंकि जितने नाम हैं वे सब वाणीके प्रकाशक हैं, और वाणी बागिन्द्रियकी प्रकाशिका है। विना नामके वाणीकी सिद्धि नहीं हो सकती है, यह घट है, यह पट है, यह ब्रह्म है, यह संसार है, इन सबकी सिद्धि नामके द्वारा ही हो सकती है। यदि नाम न हो तो किसी पदार्थकी सिद्धि कभी नहीं हो सकती, और यदि वाणी न हो तो वागिन्द्रियकी सिद्धि नहीं हो सकती है, अतः वागिन्द्रियसे वाणी श्रेष्ठ है, वाणीसे नाम श्रेष्ठ है। वागिन्द्रियको ग्रह (बन्वक) इस कारण कहा है कि वह पुरुषोंको बाँधती है, क्योंकि जगत्में असत्य अधिक कहा जाता है, यदि वागिन्द्रियसे सत्य अधिक कहा जाय तो वही वागिन्द्रिय उस कहनेवालेकी मुक्तिका कारण हो सकती है। प्रकृतमें संसारके व्यवहारकी अधिकताके कारण वागिन्द्रियको ग्रह कहा है। शेष मन्त्रोंका अर्थ इसीके समान है। इस तरह ये त्वक पर्यन्त आठ ग्रह हैं और स्पर्श पर्यन्त आठ अतिग्रह् हैं॥ २-६॥। ग्रह तथा अतिग्रहका प्रसङ्ग समाप्त हो जानेपर फिर आर्तभागने पूछा, यथा- याज्ञवल्क्येति होवाच यदिदथ सर्वं मृत्योरन्नं का स्वित्सा देवता यस्या मृत्युरन्नमित्यग्निवै मृत्युः सोऽपामन्न- मप पुनर्मृत्युं जयति॥१० ॥ भावार्थ-हे याज्ञवल्क्य, यह जो कुछ है सब मृत्युका भक्ष्य है, सो वह देवता कौन है जिसका भत्य मृत्यु है ? याज्ञवल्क्यने उत्तर दिया कि अभि ही मृत्यु है, वह जलका भत्य है। इस प्रकारके ज्ञानसे पुनः मृत्युका पराजय होता है॥१०॥ वि० वि० भाष्य-जरत्कारुके पुत्र आर्तभागने देखा कि याज्ञवल्क्यका उत्तर समुचित है, तब पुनः उसने इस प्रकार प्रश्न किया कि जो यह सब दष्ट अदृष्ट अथवा मूर्त अमूर्त अथवा स्थूल सूक्ष्म दिखाई देता है, वह सब ग्रह्द और अतिग्रहरूप १९

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१४६ शृहदारण्य कोपनिषद् [अध्याय ₹

मृत्युका खाद्य है, तब वह कौन सा देवता है जिसका खाद्य ग्रह और अतिग्रहरूप मृत्यु है ? इसपर याज्ञवल्कयने उत्तर दिया कि वह देवता अग्नि है, वह अभनि जलका खाद्य है। जो मनुष्य इस विज्ञानको जानता है वह मृत्युपर विजय प्राप्त करता है। याज्ञवल्क्यने जो इस प्रकार दष्टान्त देकर मृत्युका मृत्यु बताया, उससे उनका तात्पर्य यह है कि जगत् मे जितने पदार्थ हैं सब मृत्युसे ग्रसित हैं। जो मृत्युसे अ्रसित नहीं है उसका अन्वेषण करना सगुचित है, वही आत्मज्ञानका साधन है, ऐसा आत्मज्ञान ईश्वरका साक्षात् कराता है और तभी पुरुष सब दु.खोंसे छुटकारा पाता है॥ १० ॥ याज्ञवल्क्येति होवाच यत्रायं पुरुषो म्रियत उदस्मा- त्प्राणाः क्रामन्त्याहो३ नेति नेति होवाच याज्ञवल्क्योडत्रैव समवनीयन्ते स उच्छ्वयत्याध्मायत्याध्मातो मृतः शेते॥११॥ भावार्थ-आर्तभागने पुनः कहा कि हे याज्ञवल्क्य, जिस समय्र यह मनुष्य मृत्युको प्राप्त होता है, उस समय इसके प्राणोंका उत्क्रमण होता है या नहीं ? याज्ञवल्क्यने उत्तर दिया कि नही, वे यहाँ ही लीन हो जाते हैं। ऐसा ज्ञानी पुरुष ऊपरको श्वास लेने लगता है। पुनः खरखराहटका शब्द करने लगता है, वायुसे धौंकनीके समान फूल जाता है यानी वायुको भीतर खीचता है और वायुसे पूर्ण हुआ ही मृत होकर पड़ा रहता है॥ ११ ॥ वि० वि. भाष्य-आर्तभागका प्रश्न था कि परमात्मदर्शनस्वरूप पर मृत्युसे मृत्युका भक्षण होनेपर जो मुकत विद्वान पुरुष है, वह जब मरता है तब वासनारूपसे उसके भीतर स्थित वाणी आदि ग्रह और नाम आदि अतिग्रहोंका ब्रह्म- वेत्तासे उत्क्रमण होता है या नही ? याज्ञवल्क्यने इसका 'नहीं' कहकर उत्तर दिया कि वे यहीं परमात्माके साथ एकीभूत हो जाते हैं। विद्वान्के कार्य करण (शरीर इन्द्रिय) आदि स्वकारण परव्रह्मतत्त्वमें लीन हो जाते हैं। जिस प्रकार समुद्रमें तरङें लीन हो जाती हैं इसी प्रकार 'इस सर्वद्रष्टाकी सोलह कलाएँ (एकादश इन्द्रियाँ और पाँच प्राण मिलकर सोलह) पुरुपको प्राप्त होकर अस्त हो जाती हैं। शंका-यदि प्राणोंका उत्क्रमण नहीं होता, तो वह मरा हुआ कैसे कहा जाता है ? समाधान-वह निश्चेष्ट, कर चरण आदिके व्यापारसे शून्य हो जाता है, इसलिए मरता ही है। किन्तु प्राणोंका उत्क्रमणरूप जो मरण है, वह नहीं होता, क्योंकि बन्घका नाश होनेपर मुक्तका कहीं गमन नहीं होता। वह आत्मज्ञानी धोंकनीके समान शरीरको बाह्य वायुसे भरता है और इस प्रकार मरा हुआ निश्चेष्ट पड़ा रहता है। यद्यपि वस्तुतः

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बिद्याविनाद भाष्य १४७

आत्मा मरता नहीं और शरीर अचेतन ही है, तो भी जिस प्राणादिके संयोगसे शरीरमें कर चरण आदिके व्यापार होते हैं, उस प्राणादिका त्याग करनेसे शरीर उस प्रकारके व्यापार से शून्य हो जाता है। इसलिए शरीरमें ही मुख्य मरणका व्यवहार है और उस शरीरके सम्बन्धसे आत्मामें मरणव्यवहार गौण है॥११॥ मुक्त पुरुपके प्राण ब्रह्ममें लीन होते हैं या काम, कर्म आदि भी ? यदि प्राण ही लीन होते हैं तो उनके प्रयोजक काम आदिके रहनेपर, पुनः प्राणोंका प्रसङ्ग प्राप्त होगा, इससे मुक्ति नहीं हो सकेगी। इसी विषयको स्पष्ट करनेके लिए अग्रिम प्रश्न होता है, यथा- याज्ञवल्क्येति होवाच यत्रायं पुरुषो म्रियते किमेनं न जहातीति नामेत्यनन्तं वै नामानन्ता विश्वे देवा अबन्तमेव स तेन लोकं जयति॥ १२ ॥ भावाथ-आर्तभागने पुनः याज्ञवल्क्यसे कहा-हे याज्ञवल्क्य, जिस कालमें यह पुरुष मृत्युको प्राप्त होता है, उस कालमें इसे कौन नहीं छोकता ? इसपर याज्ञ- वल्क्चने उत्तर दिया कि नाम नहीं छोड़ता, नाम अनन्त ही हैं, विश्वेदेव भी अनन्त ही हैं, इस आनन्त्यदर्शनके द्वारा वह अनन्त लोकोंके ऊपर विजय प्राप्त करता है॥१२॥ वि• वि० भाष्य-आर्तभागके प्रश्नके समाधानमें ऋषिका आशय यह है कि मुक्त प्राणी श्रेष्ठ कर्मोंकी प्रसिद्धिसे अर्जित अपने नामको छोड़ जाता है। जिस प्रकार पाणिनि ऋषिकी बनाई हुई अष्टाध्यायीके पठन पाठनका प्रचार रहनेसे पाणिनि- का नाम अभी तक चला आता है, इसी प्रकार ज्ञानी पुरुपके मरनेके बाद उसका नाम बना रहता है। अतः नाम अनन्त हैं, लोक भी अनन्त हैं और उनके अभिमानी देवता भी अनन्त हैं, इसलिए वह विद्वान् जिसने अनेक शुभ कार्योंके द्वारा अनेक नाम अपने पीछे छोड़े है, उनके द्वारा अनेक देवताओंके अविनाशी लोकोंको वह प्राप्त होता है।। १२ ।। अब यह निश्चय करनेके लिए कि वह ग्रह अतिग्रहरूप वन्धन किसकी प्रेरणासे प्राप्त होते हैं, भगवती श्रुति कहती हैं, यथा- याज्ञवल्क्येति होवाच यत्रास्य पुरुषस्य मृतस्याभनि वागप्येति वातं प्राणश्चक्षुरादित्यं मनश्चन्द्रं दिशः श्रोत्रं

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१४८ वृह्दारण्यकोपनिषद् [अष्याय ३

पृथिवी शरीरमाकाशमात्मौषधीर्लोमानि वनस्पतीन्केशा अप्सु लोहितं च रेतश्च निधीयते क्वायं तदा पुरुषो भवती- त्याहर सोम्य हस्तमार्तभागाSSवामेवैतस्य वेदिष्यावो न नावेतत् सजन इति तौ होत्क्रम्य मन्त्रयांचक्राते तौ ह यदूचतुः कर्म हैव तदूचतुरथ यत्प्रशशथसतुः कर्म हैव तत्प्रशश सतुःपुण्योवै पुण्येन कर्मणा भवति पापः पापेनेति ततो ह जारत्कारव आर्तभाग उपरराम ॥ १३ ॥ भावार्थ-पुनः आर्तभागने इस प्रकार कहा-हे याज्ञवल्क्य, जब इस मृत पुरुषकी वाणी अभिमें लीन हो जाती है तथा प्राण वायुमें, नेत्र सूयमें, मन चन्द्रमामें, श्रोत्र दिशामें, शरीर पृथिवीमें, हृदयाकाश भूताकाशमें, लोम ओपधियोमें और केश वनस्पतियोमें तथा लोहित और वीर्य जलमें जा मिलते हैं, तब यह पुरुष किस आधार पर स्थित रहता है ? इसके उत्तरमें याज्ञवल्क्यने कहा-हे सोम्य आर्तभाग, तुम मेरी ओर अपना हाथ बढ़ाओ, तब हम तुम दोनों ही इस प्रश्नका उत्तर जानेगे, यह प्रश्न जनसमुदायमें निश्चय होने योग्य नहीं है। तब उन दोनोंने एकान्त स्थानमें जाकर विचार किया। जो कुछ उन दोनोंने कहा वह कर्मको ही कहा और इसके बाद जो कुछ प्रशंसा की वह कर्मकी ही प्रशंसा की। वह यह कि मनुष्य पुण्यकर्मसे पुण्यवान् होता है तथा पापकर्मसे पापी होता है। यह सब सुनकर जारत्कारव आर्त- भाग चुप हो गया।। १३ ।। वि० वि० भाष्य-आर्तभागने अति कठिन प्रश्न किये थे, किन्तु उनका समुचित उत्तर सुनकर वह अत्यन्त प्रसन्न हुआ। उसका अन्तिम प्रश्न यह था कि जिस कालमें इस सम्यक ज्ञानहीन, हाथ आदि अवयवोंवाले मरे हुए पुरुषकी सभी इन्द्रियशक्तियाँ एवं सभी शरीरके भौतिक अंग उपांग अपने उत्पत्तिस्थान मूल- कारणोमें विलीन हो जाते हैं, तब यह पुरुष कहाँ और किस आधारपर रहता है? याजवल्कयने उससे कहा कि इस प्रश्नका उत्तर जनसमूहमें देना उचित नहीं है, चलो, इस प्रश्नके विषयमें जो कुछ विचारणीय है उसका हम तुम दोनों एकान्तमें विचार करेंगे। इस प्रश्नके उत्तरको इस सभामें कोई नही समभेगा, इसलिए सभाके बीचमें उसका कहना ठीक नही। फिर वे दोनों एकान्तमें जाकर विचार करने लगे, अन्तमें ऐसा निश्चय हुआ कि कर्म ही श्रेष्ठ है, कर्मके ही आश्रयपर पुरुषकी स्थिसि

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नाह्ण ३ ] विद्याविनोद भाष्य १४९ है। जब तक पुरुष कर्म करता रहेगा, तब तक वह बना रहेगा, उसकी मुक्ति नही होगी। पुण्यजनक कर्मसे प्राणी पुण्ययोनियुक्त होता है और उससे विपरीत पाप- जनक कर्मसे पापयोनियुक्त होता है। इस प्रकार प्रश्नोका निर्णय हो जानेपर याज्ञ- बल्क्यको शास्त्तरार्थके द्वारा स्वसिद्धान्तसे विचलित करना अशक्य समझकर जरत्कारुका पुत्र आर्तभाग चुप हो गया ।। १३।।

तृतीय ब्राह्मण

ग्रह अतिग्रहरूप बन्धनका वर्णन पहले किया गया। जिस बन्धनसे मुक्त हुआ पुरुष मोक्ष प्राप्त करता है तथा जिससे बद्ध होनेपर ससारको प्राप्त होता है वही मृत्यु है। उससे मुक्त होना सभव है, क्योकि उस मृत्युका भी कोई मृत्यु है। जो मुक्त है उसका कही गमन नही होता, क्योकि वह तो दीपनिर्वाणके समान सबका उच्छेद कर केवल नाम मात्र अवशिष्ट रह जाता है, इस प्रकार निश्चय किया जा चुका है। कर्मका क्षय हो जानेपर बाकी सबका उच्छेद होकर जो नाममात्र शेष रहता है उसे मोक्ष कहते हैं। वह कर्म पुण्य और पापसज्ञावाला है, उसमे स्वभावतः ही दु खकी अधिकता है, क्योकि इसके बलसे ही नरक, तिर्यक, पश, मनुष्य, देव आदि स्थावर जगम योनियोमे पुन पुन जन्म तथा मरणको प्राप्त होता हुआ पुरुष सुख दु ख अनुभव करता है। किन्तु यहॉ श्रुति 'पुण्यो वै पुण्येन कर्मणा भवति' इस वाक्यसे प्रतिपादित जो शास्त्रीय मार्ग है, उसीमे आदर करती है। पुण्यकर्म समस्त पुरुषार्थोंका साचक है-ऐसा समस्त श्रुति स्मृतियोका सिद्धान्त भी देखा जाता है। इसलिए पुरुषार्थ होनेके कारण मोक्षका भी उस पुण्यकर्मसे साध्य होना प्राप्त होता है। जितनी जितनी पुण्यकी उत्कृष्टता होती है, उतनी उतनी ही फलकी उत्कृष्टता प्राप्त होती है। अत ऐसी आशका हो सकती है कि उत्तम पुण्योत्कर्षसे मोक्ष प्राप्त होगा, सो इसकी निवृत्ति करनी चाहिए। कोई भी ज्ञान सहित प्रकृष्ट कर्म हो उसकी तो इतनी (ससारमात्र) ही गति है, क्योकि कर्म और उसके फल के आश्रय व्याकृत नाम रूप ही हैं। जो किसीका कार्य नही है, उस नित्य, अव्याकृत- धर्मा, नामरूपरहित, क्रिया कारक फल स्वभावहीन मोक्षमे कर्मका कोई व्यापार नही हो सकता। जहॉ व्यापार है, वहॉ समार ही है-इम बातको प्रदर्शित करनेके लिए ही यह ब्राह्मण आरम्भ किया जाता है यथा- अथ हैनं भुज्युर्लाह्यायनिः पप्रच्छ याज्ञवल्क्येति

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१५० बृहदारण्य कोपनिषद् [अध्याय ३

होवाच मद्रेषु चरकाः पर्यत्रजाम ते पतञ्चलस्य काप्यस्य गृहानैम तस्यासीददुहिता गन्धर्वगृहीता तमपृच्छाम कोSसीति सोऽत्रवीत्सुधन्वाSSङ्गिरस इति तं यदा लोका- नामन्तानवृच्छामाथैनमब्रूम क्व पारिक्षिता अभवन्निति क् पारिक्षित अभवन् स त्वा पृच्छामि याज्ञवल्क्य क्व पारि- क्षिता अभवन्निति ॥१॥ भावार्थ-इसके बाद लाह्यायन भुज्युने ऐसा प्रश्न किया-हे याज्ञवल्क्य, मैं व्रताचरण करता हुआ और मद्र देशमे विचरता हुआ कपिगोत्रोत्पन्न पतखलके घर पहॅुँचा। उसकी कन्या गन्धर्वसे गृहीत थी यानी उसको गन्धर्वकी बाधा थी। मैंने उस गन्धवसे पूछा-तू कौन है ? उसने ऐसा कहा कि मैं आद्गिरस सुधन्वा हूँ। जब उस गन्धवसे लोकोके अन्तको पूछा गया और उससे कहा कि परित्ित वंशके लोग कहॉ थे? परितित वशके लोग कहॉँ गये ? तब उसने सब वृतान्त कहा। अब मैं तुमसे पूछता हॅूँ कि हे याज्ञवल्क्य, परिकित वशके लोग कहॉ गये॥ १॥ स होवाचोवाच वै सोऽगच्छन्वै ते तद्यत्राश्वमेधयाजिनो गच्छन्तीति क्व न्वश्वमेधयाजिनो गच्छन्तीति द्वात्रियशतं वै देवरथाह न्यान्यय लोकस्त समन्तं पृथिवी द्विस्तावत्प- येति ताथ समन्त पृथिवीं द्विस्तावत्समुद्रः पर्येति तद्यावती क्षुरस्य धारा यावद्ा मक्षिकायाः पत्रं तावानन्तरेणाकाशस्ता- निन्द्रः सुपर्णो भूत्वा वायवे प्रायच्छत्तान्वायुरात्मनि धित्वा तत्रागमयद्यत्राश्वमेधयाजिनोऽभवन्नित्येवमिव वै स वायुमेव प्रशशस तस्माद्वायुरेव ।व्यष्टिर्वायुः समष्टिरप पुनर्मृत्युं जयति य एवं वेद ततो ह भुज्युर्लाह्यायनिरुपरराम ॥ २ ॥ भावार्थ-याज्ञवल्क्यने कहा कि उस गन्धवने निश्चय ही आपसे यह कहा था कि वे पारिच्ित वहॉ चले गये, जहॉ अश्वमेध यज्ञके करनेवाले जाते हैं। पुनः भु्युने कहा कि अच्छा तो अश्वमेधयाजी कहा जाते हैं? याजवल्क्यने उत्तर दिया कि हे

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भाष्मण ३ ] विद्याविनोद भाष्य १५१

भुज्यु, सूर्यका रथ एक दिन रातमें जितने विस्तीर्ण देशमें जाता है उसका बत्तीसगुना यह लोक है, जहॉ वैराज शगीर है और जिसमें प्राणियोंके कर्मफलका उपभोग होता है। उसके ऊपर अन्तरिक्ष लोक है, उस लोकके चारों तरफ द्विगुण परिमाणवाला पृथिवीलोक है, उस पृथिवीके चारों तरफ द्विगुण परिमाणयुक्त समुद्र विद्यमान है। उन दोनों यानी अन्तरिक्ष तथा पृथिवीलोकके मध्यमें आकाश व्याप्त है वह इतना सूक्ष्म है जितना छुरेका अग्रभाग और मक्खीका पंख होता है। ऐसे अति सूद्ष्म तथा दुर्विज्ञेय देशमें इन्द्र-परमात्माने पक्षीके आकारमें होकर उन पारिक्षितोंको वायु- अभिमानी देवताके सुपुर्द किया और उस वायुने उन्हें अपनेमे स्थापित कर अर्थात् अपने स्वरूपभूत कर वहाँ पहुँचा दिया जहाँ अश्वमेधकर्ता रहते थे। ऐसा उत्तर देकर याज्ञवल्क्य महर्षिने वायुकी प्रशंसा की, क्योंकि सारा ब्रह्माण्ड और उसके भीतर सारी सृष्टि, व्यष्टि और समष्टि वायुसे व्याप्त है। जो विद्वान् पुरुष वायुको इस प्रकार जानता है और उसकी उपासना करता है वह समष्टि व्यष्टि भावसे अपने स्वरूपभूत वायुको ही प्राप्त होता है। वह पुनः मृत्युको जीत लेता है अर्थात् एक बार मरकर फिर नहीं मरता, यानी अजर, अमर हो जाता है। तब अपने प्रश्नका निर्णय हो जानेसे लाह्यायनि भुज्यु चुप हो गया ॥२॥ वि० वि० भाष्य-यज्ञोंमें सबसे बड़ा अश्वमेधयज्ञ है। क्षत्रिय सम्राट् ही इस यज्ञमें अधिकारी है, दूसरा नहीं। अन्य जातिके सम्राटोंका उसमें अधिकार नहीं है। उस यज्ञमें प्राणोपासनाका भी विधान है। उपासना और यज्ञ दोनोंको एक साथ करनेसे अधिक फल होता है। जो उक्त कर्मके अधिकारी नहीं हैं और उसके फलकी अभिलाषा करते हैं, उनके लिए केवल उपासना मात्रका विधान है। यह उपासना बड़ी है, इसलिए इसका नाम महोपासना है। इस महोपासनाका फल हिरण्यगर्भ- स्वरूप होना श्रुतियोंसे सवष्ट है। यह फल भी संसार ही है। ससारका वास्तविक लक्षण जनन-मरणशीलत्व है। हिरण्यगर्भ भी 'हिरण्यगर्भः समवर्तताय्रे' 'ब्रम्मणो वर्षशतमायुः' इत्यादि शास्त्रसे जनन-मरणशील है। अतः वह भी संसार ही है, नित्य नहीं है। यह समझकर याज्ञवल्क्यसे भुज्यु शपि संसृतिकी अवधि पूछ्ता है। भुज्युको यह अभिमान था कि संसारकी अवधिका ज्ञान गन्धर्व द्वारा मुझे ही हुआ है, याज्ञवल्क्य इस विषयमें कोर हैं, अतः इस प्रश्नसे याज्ञवल्क्यका पराजय अवश्य होगा। इसलिए भुज्युने याज्ञवल्क्यसे अवधिविषयक प्रश्न किया। कितु उनके उत्तरसे भुज्युको पूर्ण विश्वास हो गया और उसका यह अभिमान निवृत्त हो गया कि भुवन परिमाणका ज्ञान उक्त गन्धर्व द्वारा मुझको है, दूसरेको नहीं।

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१५२ बृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय ३

इस प्रकरणका भाव यह है कि जिस जन्मप्रयोजक कर्मराशिसे मुक्त होनेपर पुरुष मोक्ष पाता है और जिससे बद्ध होकर संसारी होता है, वही मृत्यु है। मुक्तकी गति कहीं नहीं होती। सबका नाश हो जाता है, पर वह केवल नाममात्र अवशिष्ट रहता है। जैसे कि दीपकके बुझनेपर आलोक आदि कुछ अवशिष्ट नहीं रहता, केवल नाममात्र शेष रह जाता है। इस विपयमें संसारियोंका और तत्त्वज्ञानियोंका शरीर, इन्द्रियादिके साथ संबन्ध समान है। केवल भेद इतना है कि तत्वज्ञानियोंको शरीर, इन्द्रिय आदिका कभी ग्रहण नहीं करना पड़ता और संसारियोंको पुनः पुनः शरीरेन्द्रियोंका ग्रहण करना पड़ता है। वही कर्म शरीर आदिके अ्रहणका प्रयोजक है, यह विचारपूर्वक निश्चित हुआ । जिस कर्मका क्षय होनेपर नाममात्र अवशेष रहता है और सर्वोत्साद मोक्ष होता है, वह कर्म दो प्रकारका है-एक पुण्य और दूसरा पाप। 'पुण्यो वै पुण्येन कर्मणा भवति पाप: पापेन' इत्यादि वाक्यसे पुण्यसे पुण्य योनि और पापसे पाप योनि प्राप्त होती है, यह योनिभेदका भी निश्चय हो चुका। इन्हीं दोसे संसार बना है, इस विषयमें यह निश्चय हुआ कि प्राणी स्थावर जङ्गम आदि स्वभावतः दुःखमय तिर्यक प्रेत आदि योनियोंमें पुनः पुनः उत्पन्न होकर मरता है। मोक्ष कर्मका व्यापार नहीं है, जहाँ तक व्यापार है, वहाँ तक संसार ही है। जो कोई यह कहते हैं कि विद्यासहित फलेच्छाशून्य कर्म अन्य कार्यका भी आरम्भक होता है, अर्थात् जैसे केवल विप और दही मृत्यु तथा ज्वरादिके कारण होते हैं किन्तु औपधविशेष और शर्कराके साथ सेवन किये जानेपर वे ही आरोग्यवर्धक हो जाते हैं, उसी प्रकार यद्यपि केवल कर्म बन्धनका कारण है, तथापि निष्काम और ज्ञानके सहित होनेपर वही मुक्तिका कारण हो जाता है। सो ठीक नहीं है, कारण कि मोक्ष साध्य (कार्य) नहीं है। वह यदि साध्य हो तो उसे ज्ञानसमुच्चित कमसे साध्य कह सकते हैं। वस्तुतः बन्धनाश ही मोक्ष है, कार्य नहीं। बन्धन वास्तवमें अविद्या है, यह कह चुके हैं। अविद्याका कर्मसे नाश नहीं हो सकता। कर्मकी शक्ति उत्पत्ति, प्राप्ति, संस्कार और विकार इन चार विषयोंमें ही देखी गई है, अन्यत्र नहीं। यानी उत्पादन करने, प्राप्ति करने, विकृत करने और संस्कृत करनेकी शक्ति कर्ममें देखी गई है, मोक्ष इन चारोंमें कोई भी नहीं हो सकता। अविद्यामात्र व्यवहित शुद्धात्म- स्वरूप मोक्ष है। शंका-यदि आत्मस्वरूपमो्ष नित्य है तो संसारदशामें क्यों नहीं प्रतीत होता ? समाधान-वह अविद्यासे आच्छादित है, इसलिए आवरण निवृत्तिके अनन्तर प्रतीत होता है।

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आह्यण ४ ] विद्याविनोद भाष्य १५३

यहाँ तक यह निश्चित हुआ कि मोक्ष कर्मसाध्य नही है, अतः ऊपर जो कर्मके विषयमें विप, दधिका द्ष्टान्त दिया है सो ठीक नहीं। क्योंकि मन्त्र एवं शकेरादि युक्त विप, दधि आदि तो प्रत्यक्ष और अनुमान प्रमाणके विषय हैं, इसलिए उनके विषयमें वैसा कहनेमें कोई विरोध नहीं है। परन्तु जो विषय सर्वथा शब्दसे ही जाना जा सकता है, उसके विपयमें उस अथका प्रतिपादन करनेवाला कोई वाक्य न होनेके कारण उसका विप एवं दधि आदिसे साधर्म्य कल्पित नहीं किया जा सकता। जो विषय प्रमाणान्तरसे विरुद्ध है, उसमें श्रुति प्रामाण्यकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। जैसे कोई कहे कि अ्नि शीतल होता है और भिगो देता है, यह बात प्रत्यक्ष प्रमाणसे विरुद्ध है। इसलिए यदि कोई ऐसा वाक्य हो तो वह प्रमाण नहीं माना जा सकता। अतः यह सिद्ध हुआ कि कर्मोंका फल मोक्ष नहीं है, इसलिए कर्मफलोंका संसारप्रदत्व प्रदर्शन इस ब्राह्मणमें स्पष्ट रूपसे किया गया है।१-२।।

चतुर्थ ब्राह्मण

अज्ञानके ध्वंसक ज्ञानकी उत्पत्तिके लिए इस ब्राक्मणका आरम्भ है। अज्ञान युक्त आत्मामें कर्तृत्व, भोक्तृत्व आदिका आरोप कर ग्रह-अतिग्रहस्वरूप बन्धसे आत्मा बद्ध होता है, अतएव विविध शुभाशुभ योनिमें विविध दुःख आदिको भोगनेके लिए उत्पन्न होकर मरता है, वही बद्ध है। संसारीको ही कर्मफल प्राप्त होता है, यह सब पहले कह चुके। प्रमाताका जो साक्षी है और आत्मामें जो संसारको अध्यस्त मानता है, वही मुमुत्तु 'त्वं' पदार्थ है, उसीका निरूपण करनेके लिए इस प्रसंगको आरम्भ करते हैं, यथा- अथ हैनमुषस्तश्राक्रायणः पश्रच्छ याज्ञवल्क्येति होवाच यत्साक्षादपरोक्षादुब्रह्म य आत्मा सर्वान्तरस्तं मे व्याचच्व इत्येष त आत्मा सर्वान्तरः कतमो याज्ञवल्क्य सर्वान्तरो यः प्रागोन प्राणिति सत आत्मा सर्वान्तरो योऽपानेनापानिति स त आत्मा सर्वान्तरो यो व्यानेन व्यानिति स त आरात्मा सर्वान्तरो य उदानेनोदानिति स त आत्मा सर्वान्तर एष त आत्मा सर्वान्तरः ।।१। २०

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१५४ बृहदारण्यकपनिषद् [ अध्याय ३

भावार्थ-पुनः याज्वल्क्यसे उषस्त चाक्रायण ब्राह्मणने पूछा-कि हे याज्ञवल्क्य, जो साक्षात् प्रत्यक्ष ब्रह्म है तथा जो सबके अभ्यन्तर है, उसका व्याख्यान मेरे प्रति कीजिए। यह सुनकर याज्ञवल्क्य महपिने उत्तर दिया कि हे उपस्त, तेरा हृदयगत आत्मा ही सब मे विराजमान है। इस उत्तरसे संतुष्ट न होकर उपस्नने पुनः पूछा कि हे याज्ञवल्क्य, वह कौनसा आत्मा सर्वान्तर है ? याज्ञवल्क्यने उत्तर दिया कि हे उस्त, जो प्राणवायुसे चेष्टा करता है वही तेरा आत्मा सर्वान्तर है। जो अपानवायुसे अपानक्रिया करता है वही तेरा आत्मा सर्वान्तर है। जो व्यानवायुसे व्यानक्रिया करता है वही तेरा आत्मा सर्वान्तर है। जो उदानवायुसे उदानक्रिया करता है वही तेरा आत्मा सर्वान्तर है। यह तेरा आत्मा सबके अभ्यन्तर स्थित है॥१ ॥ वि० वि० भाष्य-भुज्युके यह कहनेपर कि पहला जो पिण्ड है, उसके भीतर इन्द्रियसंघातरूप लिङ्गदेह है. तीसरा वह है जिसके विपयमे संदेह है। इनमें तुम किसे मेरा सर्वान्तरात्मा बतलाना चाहते हो ? ऐसा प्रश्न करनेपर याज- वल्क्यने कहा कि जिसके द्वारा प्राण चेष्टायुक्त होता है, वह विज्ञानमय, कार्यकरण- संघातरूप तेरा आत्मा है। शेष वाक्यका अर्थ इसीके समान है। तात्पर्य यह है कि काष्ठ यन्त्रके समान देहेन्द्रियसंघातमें होनेवाली प्राणनआदि समस्त चेष्टाएँ जिसके द्वारा की जाती हैं वही तेरा आत्मा सर्वान्तर है। जिस प्रकार किसी चेतन अधिष्ठता- की प्रेरणाके बिना लकड़ीका यन्त्र हिल नहीं सकता, उसी प्रकार इस स्थूल शरीरकी प्राणनादि चेष्टा भी चेतन आत्माके विना नहीं हो सकतीं। इसलिए यह अपनेसे भिन्न विज्ञानमय आत्मासे अधिष्ठित होकर काष्ठयन्त्र के समान प्राणनादि चेष्टा करता है। अतः जो इससे चेष्टा कराता है, वह कार्यकरणसंघातसे विलक्षण तेरा सर्वान्तरात्मा है।। १ ॥

स होवाचोषस्तश्चाक्रायणो यथा विब्र यादसौ गौरसा- वश्च इत्येवसेवैतदव्यपदिष्ठं भवति यदेव साक्षादपरोक्षाढुब्रह्म य आत्मा सर्वान्तरस्तं मे व्याचत्वेत्येष त आत्मा सर्वा- न्तर: कतमो याज्ञवल्क्य सर्वान्तरोन दष्ठे्रष्टारं पश्येर्न श्रुतेः श्रोतारथ शृुयान्न मतेर्मन्तारं मन्वीथा न विज्ञासेविज्ञा-

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भ्राअण ४ ] विदाविनोद भाष्य १५५

तारं विजानीया। एष त आत्मा सर्वान्तरोऽतोऽन्यदातं ततो होषस्तश्राक्रायण उपरराम ॥ २ ॥ भावार्थ-चाक्रायण उपस्तने कहा-जैसे कोई कहे कि यह चलनेवाला बैल है, यह दौड़नेवाला अश्व है, वैसे ही तुम्हारा यह कथन है। इसलिए जो भी साक्षात् प्रत्यक्ष ब्रह्म तथा सर्वान्तर आत्मा है, उसे तुम स्पष्ट रूपसे बतलाओ। वह कौन सा सर्वान्तर आत्मा है ? याज्ञवल्क्यने उत्तर दिया कि तुम दष्टिके दष्टाको नहीं देख सकते, श्रुतिके श्रोताको नहीं सुन सकते, मतिके मन्ताको मनन नहीं कर सकते, विज्ञातिके विज्ञाताको नहीं जान सकते। तुम्हाग यह आत्मा सर्वान्तर है, इससे अन्य नश्वर है। इसके बाद उपस्त शान्त हो गया ॥ २ ॥

वि० वि० भाष्य-याज्ञबल्क्यके प्रति उपस्तका आच्षेप यह था कि जैसे कोई प्रथम और ही प्रतिज्ञा कर पुनः विपरीत भापण करे, यानी पहले ऐसी प्रतिज्ञा करके कि तुम्हें प्रत्यक्ष गौ और अश्व दिखलाऊॅँगा, पुनः चसना आदि देखकर कहे कि जो चलनी है वह गौ है और जो दौड़ता है वह अश्व है, वैसे ही इस व्रद्मका तुम प्राणनादि लिङ्गों द्वारा व्यपदेश कर रहे हो। इसलिए तुम गौओकी तृष्णाके कारण ब्रह्मवेत्ता हानेका बहाना छोड़कर जो साक्षात प्रत्यक्ष ब्रह्म है तथा जो सर्वान्तर, आत्मा है, उसे स्पष्टतया बतलाओ। इसपर याज्ञवल्कयने कहा कि मैंने पहले प्रतिज्ञा की थी कि तुम्हारा आत्मा ऐसे लक्षणोंवाला है, उस प्रतिज्ञाका मैं अनुसरण कर ही रहा हूँ, मैंने जैसा कहा है वह वैसा ही है। तुमने जो कहा कि उस आत्माको घटादिके समान हमारे नेत्रोंका विषय कर दो, वह असम्भव है। क्योंकि हे उषस्त, दर्शनशक्तिके दष्टाको तुम गौ अश्वादिके समान नहीं देख सकते, अर्थान् जिस शक्तिसे दर्शनशक्ति अपने सामनेके पदार्थोंको देखती है उस अपने पीछे स्थिन हुई शक्तिको वह दर्शनशक्ति नहीं देख सकती है। इसी प्रकार जो श्रवणशक्तिका श्रोता है उसको तुम नहीं सुन सकते हो। अर्थात् जिंस शक्तिसे श्रवणशक्ति बाह्य पदार्थोंके शब्दोंको सुनती है उस शक्तिको श्रवणशक्ति नहीं सुन सकती है। मनशक्तिके मन्ताका तुम मनन नहीं कर सकते हो, यानी जिस शक्तिके द्वारा मन मनन करता है उस शक्तिका मननशक्ति मनन नहीं कर सकती है। विज्ञानशक्तिके विज्ञाताको तुम नहीं जान सकते हो, अर्थात् उस शक्तिको विज्ञानशक्ति नहीं जान सकती है। जो दृष्टिका दष्टा है, श्रुतिका श्रोता है, मतिका मन्ता है, विज्ञप्तिका विज्ञाता है, वही तुम्हारा आत्मा है,

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१५६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ३

वही सबके अन्दर विराजमान है। इस आत्मविज्ञानसे भिन्न जो पदार्थ हैं, वे सब विनाशी हैं, यह सुनकर उषस्त चुप हो गया ॥। २ ।। --

पञ्चम ब्राह्मण

अब सकारण बन्धनसे मुक्त होनेके साधनरूप संन्यास सहित तत्वज्ञानका प्रतिपादन करना है, इसलिए कहोलके प्रश्न रूपसे पञ्चम ब्राह्मणका आरम्भ किया जाता है, यथा- अथ हैनं कहोल: कौषीतकेय: पमच्छ याज्ञवल्क्येति होवाच यदेव साक्षादपरोक्षादुवह्म य आत्मा सर्वान्तरस्तं से व्याचत्वेत्येष त आत्मा सर्वान्तरः । कतमो याज्ञवल्कय सर्वान्तरो योऽशनायापिपासे शोकं मोहं जरां मृत्यु- मत्येति। एतं वै तमात्मानं विदित्वा ब्राह्मणाः पुत्रैषणायाश्च वित्तैषणायाश्च लोकैषणायाश्च व्युत्थायाथ भिक्षाचयं चरन्ति या ह्येव पुत्रैषणा सा वित्तैषणा या वित्तैषण सा लौकेषणोभे ह्येते एषणो एव भवतः। तस्माद ब्राह्मणः पाण्डित्यं निर्विद्य बाल्येन तिष्टासेद्बाल्यं च पाण्डित्यं च निर्विद्याथ मुनिरमौनं च निविद्याऽथ ब्राह्मणः स ब्राह्मणः केन स्यादेन स्यान्तेनेदश एवातोऽन्यदार्त ततो ह कहोल: कौषीतकेय उपरराम ॥ १॥ भावार्थ-इसके बाद कुपीतकके पुत्र कहोलने प्रश्न करते हुए इस प्रकार सम्बोधन किया, हे याज्ञवल्क्य !जो निश्चय ही साक्षात् और प्रत्यक्ष ब्रह्म है तथा जो आत्मा सबका आभ्यन्तर है उस आत्माको मेरे प्रति कहिये। याज्ञवल्क्यने कहा कि हे कहोल ! यही हृदयस्थ तेरा आत्मा सर्वान्तर्यामी है। पुनः कहोलने पूछा कि हे याज्ञवल्क्य!वह कौन सा आत्मा सर्वान्तर्यामी है ? याज्ञवल्क्यने कहा कि जो आत्मा सुधा पिपासा, शोक मोह जरा मृत्युका उल्लंधन करके विद्यमान है वही तेरा आत्मा

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विद्याविनोद भाष्य १५७

है। वही सबके अभ्यन्तरमें विगजमान है। निश्चय करके उसी आत्माको जानकर और पुत्रकी इच्छासे, वित्तकी इच्छासे तथा लोककी इच्छासे छुटकारा पाकर ब्राह्मण भिक्षाचर्याके साथ विचरते हैं। जो पुत्रकी इच्छा है, वही निश्चय करके वित्तकी इच्छा है, वही लोककी इच्छा है, ये दोनों निकृष्ट इच्छाऍ एक दूसरेके बाद अवश्य होती है। इसलिये ब्राह्मण पाण्डित्य (आत्मज्ञान) का पूर्णतया सम्पादन कर आत्म- ज्ञानरूप बलसे स्थित रहनेकी इच्छा करे। पुनः ताल्य और पाण्डित्यको पूर्णतया प्राप्त कर वह मुनि होता है तथा अमौन (ज्ञान, विज्ञान) और मौन (मनन वृत्ति) का पूर्णतया सम्पादन करके ब्राह्मण कृतकृत्य होता है। वह ब्राह्मण जिस किसी साधनसे हो, उसीके द्वारा ऐसा ब्रह्मवेत्ता होता हैं। इस लिये और सब साघन दुःखरूप हैं, अर्थात् स्वप्न, माया और मरूमरीचिकाके जलके समान असार हैं, केवल आत्मा ही नित्यमुक्त है। इस प्रकार याज्ञवल्क् महर्षिसे उत्तर पानेके बाद कुशीतकका पुत्र कहोल चुप हो गया।। १।। वि० वि० भाष्य-जल से अतिरिक्त फेन, बुद्बुद् आदि, मृत्तिकासे अतिरिक्त घट, शराव आदि विकार नहीं हैं, किन्तु कार्यकरणसंघात अविद्यामय होने से तन्मात्र ही हैं। अविद्या की निवृत्ति विद्या से होती है, अतः पहिले अविद्या की प्रतीति होनेपर भी उसकी निवृत्तिके बाद कुछ भी नहीं रहता। जिस समय श्रुत्यनु- सारी परमार्थ दृष्टिसे विचार करनेवर मृदादि विकार मृत्तिकासे अन्य नहीं है, यह निश्चय होता है, तब 'एकमेवाद्वितीयम्' 'नेह नानास्ति किश्च्न' इत्यादि श्रुतियों से परमार्थतत्त्वका ज्ञान होना है। ब्रह्मस्वरूप स्व्राभाविक अविद्यासे रज्जू. शुक्ति तथा गगनके समान अपने स्वमपसे विद्यमान तथा किसी वस्तुस्वभावसे सर्वथा अस्पष्ट होने पर भी जिस समय नाम-रूपप्रयुक्त शरीर, इन्द्रिय आदि उपाधियोंसे विवेक बुद्धि द्वारा निश्चित नहीं होता, प्रत्युत उसमें नाम, रूप आदि दृष्टि ही होती है, उस समय अन्यवस्तु के अस्तित्व का वयवहार होता है। यह भेदकृत मिध्या व्यवहार है, किसीकी दृष्टिमें ब्रह्मतत्त्वसे अतिरिक्त वस्तु है और किसीकी दृष्टिमें नहीं है। परमार्थवादी विद्वान् श्रुतिके अनुसार वस्तुतत्त्वका है या नहीं, तब यही निश्चय करते हैं कि अद्वितीय एक ब्रह्म सम्पूर्ण व्यवहारोंसे शून्य है। इस प्रकार अधिकारीके भेदसे दोनों व्यवहार होते है, इनमें कुछ विरोध नहीं है व्यवहारदृष्टिके आश्रयसे भेदका मिथ्याव्यवहार और तत्त्वदष्टिसे अनात्मविषयक शास्त्रीय व्यवहार होता है, इस प्रकार उभयविध व्यवहार सिद्ध होता है। परमार्थ-निश्चयकी दशामें दूसरी वस्तुकी सत्ता नहीं मानी जाती, क्योंकि 'एकमेताद्वितीयम्' 'अनन्तरमबाह्यम्' इत्यादि

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१५८ शृहदारण्य कोपनिषद् [अध्याय ३

श्रुतिके अनुसार अद्वितीय ब्रश्मही केवल है, दूसरा नहीं। संआ्ारद्शामें अज्ञानियोंको क्रिया 'कारक' फल आदिका जो व्यवहार होता है, वह नहीं है ऐसा नहीं कह सकते। ज्ञान और अज्ञानकी अपेक्षासे सब शास्त्रीय व्यवहार और लौकिक व्यवहार होता है। इस प्रकार प्रकृतमें किसी विरोधकी भी शङ्का नहीं है। ऐसी परिस्थितिमें आत्मस्त्ररूपकी जिज्ञासाको शान्त करनेके लिए ही याज्ञवल्क्यने बतलाया है कि चुना पिपासादिसे रहित आत्मा सर्वान्तर है। जिस प्रकार अविवेकियोंको आकाशके तलमें मलिनता प्रतीत होती है; किन्तु आकाश मलिनतासे रहित है, क्योकि वास्तवमें मलका आकाशमें स्पशही नहीं है। उसीप्रकार मूढबुद्धियोंको आत्मा चुधा पिपासासे युक्त प्रतीयमान होता है; किन्तु उनसे आत्माका कुछ भी सम्बन्ध नहीं है, क्योंकि आत्मा स्व्भावसेही उनसे असंसृष्ट है। इस अर्थको श्रुति भी दढ़ करती है-'न लिप्यते लोकदुःखेन बाह्यः' इत्यादि। यह संसार उस आत्माको अपना ततत्व मानकर अर्थात् मैं परब्रह्म हूँ''सदा संसार से मुक्त तथा नित्यतृप्त हूँ' ऐसा समझकर ब्राह्मण एपणात्रयसे पुत्रकी अभि. लाषा, धनकी अभिलाषा और यशकी अभिलाप से विमुख हो सन्यास ग्रहण करते हैं। ऐसा उत्तर पाकर कहोल चुप होगया ।। १।।

षष्ठ ब्राह्मण

प्रथम 'ब्रह्म साक्षान् अपरोक्ष है' तथा सर्वान्तरात्मा है' ऐसा कहा गया है। उस सर्वान्तरात्माके स्व्ररूपज्ञानके लिए शाकल्यव्राह्मणका आरम्भ किया जाना है। पृथिवीसे लेकर आकाशपर्यन्त जो भूत हैं, वे सब अपने कारणमें ब्राह्यान्तर भावसे अवस्थित हैं. उनमें जो जो बाह्य हैं, परिज्ञानपूर्वक उनको हटाकर आत्म- ज्ञानके अभिलाषीको सर्वान्तर तथा संसारधर्मोंसे रहित आत्माका दर्शन कराना है। इस आशयमे 'अथ हैनम्' इत्यादि मन्त्र आरम्भ किया जाता है- अथ हैनं गार्गी वाचक्रवी पप्रच्छ याजवल्वयेति होवाच यदिद थ सर्वमप्स्वोतं च प्रोतं च कस्मिन्नु खल्वाप ओताश्च प्रोताश्रेति वायौ गार्गीति कस्मिन्नु खलु वायुरोतश्च प्रोतश्चेत्यन्तरिक्षलोकेषु गार्गीति कस्मिन्नु खल्वन्तरिक्ष- लोका ओताश्च प्रोताश्चेति गन्धर्वलोकेषु गार्गीति कस्मिन्नु

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ब्राध्मण ६] बिद्याविनोद माव्य १५६

खलु गन्धवलोका ओताश्च प्रोताश्चेरयादित्यलोकेषु गार्गीति कस्मिन्नु खल्वादित्यलोका ओताश्च प्रोताश्चेति चन्द्रलोकेषु- गार्गीति कश्मिन्नु खलु चन्द्रलोका ओताश्च प्रोताश्चेति नक्षत्रलोकेषु गार्गीति कस्मिन्नु खलु नक्षत्रलोका ओताश्च प्रोताश्चेति देवलोकेषु गार्गीति कस्मिन्नु खलु देवलोका ओताश्च प्रोताश्चेतीन्द्रलोकेषु गार्गीति कस्मिन्नु खल्विन्द्र- लोका ओताश्च प्रोताश्चेति प्रजापतिलोकेषु गार्गीनि कस्मिन्नु खलु प्रजापतिलोका ओताश्च प्रोताश्चेति ब्रह्मलोकेषु गा- र्गीति कस्मिन्नुखलु ब्रह्मलोका ओताश्च प्रोताश्चेति स होवाच गार्गि माऽतिप्राक्षीर्मा ते मूर्धा व्यपप्दनतिप्रश्न्यां वै देवतामतिपृच्छसि गार्गि मातिप्राक्षीरिति ततो ह गार्गी वाचक्रव्युपरराम ॥ १॥ भावार्थ-अब वचक की पुत्री गार्गीने प्रश्न किया कि हे याज्ञवल्क, जो ये भू:आदि सब लोक वा पदार्थ जलमें ओत और प्रोत हैं, वह जल किसमें ओत प्रोत है ? यह मेरा प्रश्न है। याज्ञवल्क्य-हे गार्गि, यह सब जल अपने कारण वायुमें ओत प्रोत है। गार्गी-वह वायु किसमें ओत प्रोत है ? याज्ञवल्क्य-हे गार्गि, अन्तरिक्ष लोकमें। गार्गी-वे अन्तरिक्षलोक किसमें ओत प्रोत हैं? याज्ञवल्क्य-हे गार्गि, गन्धर्वलोकमें। गार्गी-वे गन्धर्वलोक किसमें ओोत प्रोत हैं ? याज्ञवल्क्-हे गार्गि, आदित्यलोकमें। गार्गी-वे आदित्यलोक किसमें ओत प्रोत हैं? याज्ञवल्क्य-हे गार्गि, चन्द्रलोकमे। गार्गा-वे चन्द्रलोक किसमें ओत प्रोत हैं ? याज्ञवल्क्य-े गार्गि, नक्षत्रलोकमें।

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१६० शृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ३

गार्गी-वे नक्षत्रलोक किसमें ओत प्रोत हैं। याज्ञवल्क-हे गार्गि, देवलोकमें। गार्गी-वे देवलोक किसमें ओत प्रोत है? याज्ञवल्क्-हे गार्गि, इन्द्रलोकमें। गार्गी-वे इन्द्रलोक किसमें ओत प्रोत हैं ? याज्वल्क्-हे गार्गि, प्रजापतिलोकमें। गार्गी-वे प्रजापतिलोक किसमे ओत प्रोत हैं? याज्ञवल्क्य-हे गार्गि, ब्रह्मलोकमें। गार्गी-वे ब्रह्मलोक किसमें ओत प्रोत है ? इस प्रश्नका उत्तर न देकर याज्ञवल्क्य बोले कि हे गार्गि, इस प्रकार अति- प्रश्नोंको न पूछ, इस प्रकार प्रश्न करनेपर तेरा मरतक गिर पड़ेगा। सुन, सब लोक लोकान्तरोंका एकमात्र आधार ब्रह्म किसीके आश्रित नहीं है, प्रत्युत उसीमें सब पदार्थ ओत प्रोत हैं। अतः हे गार्गि, मैं फिर कहता हूँ कि तू केवल शास्त्रसे जानने योग्य ब्रह्मको तर्क द्वारा जाननेकी इच्छा मत कर। यह सुन गार्गी चुप हो गयी।। १।। वि० वि० भाष्य-कहोलके बाद अब ब्रह्म बादिनी वाचक्वी गार्गी याज्ञवल्कच महर्षिसे प्रश्न करनेको उद्यत हुई। यह देखा गया है कि जो कार्य परिमित तथा स्थूल है वह अपरिच्छिन्न सूक्ष्म कारणसे व्याप्त रहता है। इसलिए जिस प्रकार पृथिवी जलसे व्याप्त है, उसी प्रकार पूर्व पूर्व पदार्थका व्यापक उत्तर-उत्तर पदार्थ होना चाहिए। यही सर्वान्तर्व्यापी आत्मापर्यन्त प्रश्न हैं। यहॉपर पाँचों भूत परस्पर मिश्रित हैं और वे उत्तरोत्तर सूक्ष्म, व्यापक तथा कारणरूपसे व्यवस्थित हैं। किन्तु परमात्मा के अतिरिक्त उससे उत्तर कोई वस्तु ही नहीं है। इसीलिए श्रुतिने ब्रम्मको सत्यका सत्य कहा है। लोग पाँच भूनोंको भी सत्य समझते हैं, किन्तु श्रुति उनको सत्य नहीं मानतो, उनका भी सत्य आत्मा ही है। आत्मव्यति- रिक्त वस्तुमात्र अज्ञानकल्पित और असत्य है, परमार्थसत्य परमात्मा ही है। इसी प्रकार जल भी कार्य, स्थूल और परिच्छिन्न है, इसलिए उसको भी कहीं ओत प्रोत अवश्य होना चाहिए। इसी प्रकार उत्तरोत्तर प्रश्न समझने चाहिएँ। जल को कहा गया कि वह वायु में ओत प्रोत हैं। ओतप्रोत शब्दों का अर्थ यह है कि दोर्घ तन्तुओंमें पट 'ओत' कहा जाता है और तिर्यक तन्तुओंमें 'प्रोत' कहा जाता है, अन्त- व्याप्ति 'ओत' शब्दका अर्थ है, और बहिर्व्याप्ति 'प्रोत' शब्दका अर्थ है। गार्गीका सबसे अन्तिम प्रश्न आनुमानिक हुआ है, इसलिए ऋषिने कहा कि जिस ब्रह्मदेवता-

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ब्ाह्मण ७ ] विद्याविनोद भाष्य १६१

के विषयमें तुम प्रश्न करती हो वह अनतिप्रश्न्य है अर्थात् केशल अनुभवसे जाना जा सकता है, अतः उसके विषयमें प्रश्न इस प्रकारसे नहीं करना चाहिए। इस प्रकारके प्रश्नोत्तर अनुमेय विषयमे ही हो सकते हैं, उससे अतिरिक्तमें नहीं। उसके बाद वचक् की पुत्री गार्गी चुप हो गयी।। १।।

सप्तम ब्राह्मण

ब्रह्म सबके अन्तर्गत है। उसके निर्णयके लिए अनुमानसे ज्ञातव्य समस्त कार्यों का निर्णय करके अब आगमसे ज्ञातव्य सूत्र तथा अन्तर्यामीके निर्णयके लिए सप्म ब्राह्मणका आरम्भ है। जिन सूत्र तथा अन्तर्यामीको अनुमान द्वारा जाननेके लिए गार्गी ने प्रश्न किया था और सिर गिरनेका भय दिखलाकर ऋषिने जिन्हें रोक दिया था, तर्क का त्याग कर उन्हीं विषयोंको आगम द्वारा जाननेके लिए उद्दा- लकने इस ब्राह्मणमें प्रश्न किया है। यथा- अथ हैनमुद्दालक आरुणि: पप्रच्छ याजवल्क्येति होवाचमद्रष्ववसाम पतञ्चलस्य काप्यस्य गृहेषु यज्ञमधी- यानास्तस्याSSसीन्भार्या गन्धर्वगहीता तमपृच्छाम कोऽसीति सोडत्रवीत्कबन्ध आथर्वण इति सोऽब्रवीत्पतञ्चलं काप्यं याज्ञिकाथश्च वेस्थ नु त्वं काप्य तर्सूत्रं येनायं च लोक: सर्वाणि च भूतानि संब्धानि भवन्तीति सोऽब्रवीत्पतञ्चलः काप्यो नाहं तन्भ् गवन्वेदेति सोब्रवीत्पतञ्चलं काप्यं याजि- काथश्च वेत्थ नु ववं काप्य तमन्तर्यामिएं य इमं च लोकं परं च लोक2 सर्वाणि च भूतानि योऽन्तरो यमयतीति सोऽब्रवीत्पतञ्चलः काप्यो नाहं तं भगवन्वेदेति सोऽब्रवीत्प- तश्चलं काप्यं याज्ञिकाथश्च यो वै तत्काप्य सूत्रं विद्यानं चान्तर्यामिणमिति स ब्रह्मवित्स लोकवित्स देववित्स वेद- २१

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१६२ बृहदारण्यकोपनिषद् अध्याय ३

वित्स भृतवित्स आत्मवित्स सर्वविदिति सेभ्योSब्रवीत्तदहं वेद तच्चेदतरं याज्ञवल्कय सूत्रमविद्वाथस्तं चान्तर्यामिणं ब्रह्मगवीरुदजसे मूर्धा ते विपतिष्यतीति वेद वा अहं गौतम तत्सूत्रं तं चान्तर्यामिणमिति यो वा इदं कश्चिद्बरूयाद्वेद वेदेति यथा वेत्थ तथा ब्रहीति॥१॥ भावार्थ-गार्गीके चुप होनेपर अरुणके पुत्र उद्दालकने याज्ञवल्क्यसे पूछा, वह बोला कि हे याज्ञवल्क्य, हम लोग कविगोत्रोत्पन्न पतख्चलके घर यज्ञशास्त्रको पढ़ते हुए मद्र देशमें रहते थे। उसकी स्त्री गन्धर्वगृहीत थी। हम लोगोंने उस गन्धर्व से पूछा कि तू कौन है ? तब गन्घर्व बोला कि मैं कबन्ध नामक अथर्वाका पुत्र हूँ। इसके बाद उस गन्घवने कपिगोत्रोत्पन्न पतञ्ल और उसके याज्ञिकोंसे पूछा कि हे काप्य, क्या तू उस सूत्र को जानता है जिससे यह लोक, परलोक और समस्त प्राणी अ्थित हैं ? तब उस काप्य पनञ्वलने कहा कि भगवन् मैं उसे नहीं जानता। उसने फिर कपिगोत्रीय पतञ्वल और उसके याज्ञिकोंसे पूछा कि हे काप्य, क्या तू उस अन्तर्यामीको जानता है, जो इस लोक, परलोक तथा समस्त प्राणियोंको नियन्त्रित करता है ? उस पतञ््वल काप्यने कहा कि हे पूज्य, मैं उसे नहीं जानता। उसने पतञ्ल काप्य और याजिकोंसे फिर कहा कि हे काप्य, जो कोई उस सूत्र और अन्तर्यामीको जानता है, वह ब्रह्मवेत्ता है. वह लोकवेत्ता है, वह देववेत्ता है, वह वेदवेत्ता है, वह भूतवेत्ता है, वह आत्म- वेत्ता है और वह सर्ववेत्ता है। इसके बाद जो कुछ गन्धर्वने उन लोगोंसे कहा, उसे मैं जानता हूँ। हे याज्ञवल्क्य, यदि तुम उस सूत्रको तथा उस अन्तर्यामीको नहीं जानते हुए ब्राह्मणोंकी गौओंको ले जाओगे तो तुम्हारा सिर गिर पड़ेगा। यह सुनकर याज्ञवल्क्यने कहा कि हे गौतम, मैं उस सूत्र और अन्तर्यामीको जानता हूँ। तब गौतमने कहा-हे याज्ञवल्क्य, इस प्रकार तो कोई भी कह सकता है कि मैं जानता हूँ, यदि वास्तवमें तुम जानते हो तो जैसा हो वैसा कहो ॥ १ ॥ वि. वि. भाष्य-जब याज्ञवल्क्यको दुर्धर्ष और अजेय विद्वान् पाकर प्रश्न करनेसे गार्गी उपरत होगगी, तब उद्दालकने याज्ञवल्क्यसे प्रश्न करना आरम्भ किया। देशमें एक समय मैं मद्रदेशमें कपि नामक गोत्रमें उत्पन्न हुए पतञ्चल नामक विद्वान्के घरमें यज्ञशास्त्रका अध्ययन करते हुए निवास करता था। पत-

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भाधण ७ ] विद्याविनोद भाष्य १६३

ख़लकी भार्या गन्धर्वसे गृहीत थी, हम सबने गन्धवसे उसका परिचय पूछा, बात- चीतके बीच गन्धर्वने काप्यसे कई प्रश्न किये, जिनका वह नकारात्मक उत्तर ही देता गया। तब उस काप्य तथा यज्ञशास्त्रके अध्ययन करनेवाले हम लोगोंसे गन्ध- वने कहा कि जो कोई उस सूत्रको तथा उस अन्तर्यामीको भलिमाँति जानता है, वही त्रह्मवित्। वही भूः, भुः, स्वः लोकवित्, वही अभि, सूर्य आदि देवत्रित्, वही ऋग्, यजुः, साम, अथर्वं वेदवित्, वही भूतवित्, वही आत्मवित्, तथा वह सर्ववित् कहलाता है। इस प्रकार अन्तर्यामीके विज्ञानकी स्तुति होनेपर उसके ज्ञानकी प्राप्तिके लिये लुब्ध काप्य तथा हमलोग भी संमुख स्थित हुए। इसके बाद गन्वर्वने कहा कि जब आप लोग उस सूत्र तथा अन्तर्यामीको नहीं जानते हैं, तब अध्यापक वृत्ति किस प्रकार करते हैं ? इसपर पतञ्ल और हम लोगोंने कहा-यदि आप उस सूत्रको और अन्तर्यामीको जानते हैं तो कृपया उसका उपदेश करें। यह सुन उस गन्ववंने हम लोगोंको सूत्र और अन्तर्यामीके विपयमें उपदेश दिया। क्योंकि मैं उस गन्धर्वके द्वारा सूत्र और अन्तर्यामीका ज्ञान पा चुका हूँ, इसलिये यदि आप उस सूत्र और अन्तर्यामीको न जानते हुए ब्रह्मवेत्ताओंके निमित्त आई हुई गौओको उन ब्रह्मज्ञोंका निरादर करके ले जाते हैं तो आपका मस्तक अवश्य गिर जायेगा। उद्दालकके इस प्रकार कहने पर याज्ञवल्क्जी सावधान होकर बोले कि मैं जानता हूँ,। गन्धर्वने जो कुछ कहा है यानी जिस अन्तर्यामीको गन्धर्वसे आपलोगोंने जाना है, उसको हम जानते हैं। इस प्रकार कहनेपर गौतम बोले कि प्राकृत मनुष्य उस अन्तर्यामीको कैसे जानेगा जिसको कि भाग्यवश हम लोगोंने गन्धवसे जाना है? 'हम जानते हैं' इस प्रकार आप आत्मश्लाघा कर रहे हैं। केवल गर्जनसे काम नहीं चलेगा यदि आप जानते हैं तो उस विषयको कहें॥ १ ॥ स होवाच वायुर्वै गौतम तत्सूत्रं वायुना वै गौतमसूत्रेणायं च लोक: परश्च लोकः सर्वाणि च भूतानि संदब्धानि भवन्ति तम्माद्वै गौतम पुरुषं प्रेतमा हुर्व्यस्त्रथ सिषतास्याङ्गानीति वायुना हि गौतम सूत्रेण संब्धानि भवन्तीत्येवमेवैतद्याज्ञवत्क्यान्तर्यामिणं ब्रूहीति ॥२॥

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१३४ बृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय ३

भावार्थ-उस याज्ञवल्क्यने कहा कि हे गौतम ! निःसंदेह वह सूत्र वायु है, हे गौतम ! वायुरूप सूत्र करके ही यहलोक, परलोक और सब प्राण ग्रथित हैं। हे गौतम ! अतएव मृत पुरुषके शरीरको देखकर मनुष्य कहते हैं कि इसके अङ्ग ढीले हो गये हैं, क्योंकि हे गौतम! वायुरूप सूत्र करके सब अङ्ग ग्रथित होते हैं। यह सुनकर गौतमने कहा कि हे याज्ञवल्क्य ! यह विज्ञान ऐसा ही है जैसा आप कहते है। अब आप अन्तर्यामीको कहें ॥ २ ॥ वि० वि. भाष्य-याजवल्क्यजी बोले कि हे गौतम! वायुही वह सूत्र है दूसरा नहीं। वह वायु आकाशके समान अतिसूक्ष्म परृथिवी आदिका धारयिता है। सत्रह प्रकारके लिङ्ग उसीके स्वरूप हैं, वही प्राणियोंके कर्म और वासनाका आाश्रय है, वही भावी सृष्टिका कारण, नर्म और वासनाका आधार है। एवं उसीके समुद्र- की तरंगोंके समान उच्छवास मरुद्गण हैं। यही वायुका तत्व सूत्र कहा आता है। हे गौतम ! वायुरूप सूत्र करके ही यहलोक, परलोक और सब पदार्थ अ्थित हैं। लोकमें भी ऐसीही प्रसिद्धि है कि वायु सूत्र है। वायु रूप सूत्रसे सब वस्तुयें अपने- अपने स्थानमें स्थित हैं। हे गौतम ! मरे हुए पुरुषके शरीरको देगकर लोग ऐसा कहते हैं कि इसके सब अङ्ग ऐसे ढीले पड़गये हैं, जैसे सूतमें गुंथी हुई मणियाँ सूत्रके टूट जानेपर सब बिखर जाती हैं। वैसेही वायुरूपी सूत्रमें मणि आदिके समान सब अङ्ग गुथे हैं। सूतके टूटनेपर जैसे मणियॉ अलग अलग हो जाती हैं, वैसेही वायुरूप सूत्रके अपगमसे सब अङ्गोंका पतन होना ठीक ही है। इसलिये हे गौतम ! वायुरूप सूत्रसे सब गुथे हुए है। यह सुनकर उद्दालकने कहा कि हाँ, ऐसा ही है, हे याज्ञवल्क्य ! आपने सूत्रका यथार्थ रूपसे प्रतिपादन किया यानी आपने जो उत्तर दिया है सो बहुतही ठीक है। एक प्रश्नका उत्तर तो हो गया। अब कृपा करके सूत्रान्तर्गत और सूत्रके नियन्ता अन्तर्यामी विषयक दूसरे प्रश्नका भी उत्तर दें ?॥ २ ॥ यः पृथिव्यां तिष्ठन् पृथिव्या अन्तरो यं पृथिवी न वेद यस्य पृथिवी शरीरं यः पृथिवीमन्तरो यमयत्येष त आत्माS- न्तर्याम्यमृतः ॥ ३॥ भावार्थ-जो पृथिवीके भीतर पृथिवीमें रहनेवाला है, जिसको पृथिवी नहीं जानती है। जिसका शरीर पृथिवी है, जो पृथिवीके भीतर रहकर पृथिवीका निय- मन करता है, वही तेग आत्मा अन्तर्यामी तथा मरण भर्म रहित है॥ ३॥

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भावय ७] विद्याविनोद भाष्य १६५

योऽप्सु तिष््न्नदभ्योऽन्तरो यमापो न विदुर्यस्यापः शरीरं योऽपोऽन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृतः॥।४।। भावार्थ-जो जलके भीतर जलमें रहनेवाला है, जिसको जल नहीं जानता है, जिसका शरीर जल है। जो जलके भीतर रहकर जलको नियमन करता है। वही तेरा आत्मा अन्तर्यामी तथा मरणधर्म रहित है ॥४॥ योऽयौ तिष्ठन्नग्नेरन्तरो यमननिर्न वेद यस्यागि: शरीरं योऽगिमन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृतः ॥ ५ ॥ भावार्थ-जो अभिके भीतर अग्निमें रहने वाला है, जिसको अग्नि नहीं जानता है। जिसका शरीर अग्नि है, जो अग्निके भीतर रहकर अग्निको निय- मित करता है, वही तेरा आत्मा अन्तर्यामी तथा मरणधर्म रहित है ॥ ५॥ योऽन्तरिक्षे तिष्ठन्नन्तरिक्षादन्तरो यमन्तरिक्षं न वेद यस्यान्तरिक्षथ शरीरं योऽन्तरिक्षमन्तरो यमत्येष त आ- त्मान्तर्याम्यमृतः ॥ ६॥ भावार्थ-जो अन्तरिक्ष (आकाश) के भीतर अन्तरिक्षमें रहनेवाला है, जिसको अन्तरिक्ष नहीं जानता है। जिसका शरीर अन्तरिक्ष है। जो अन्तरिक्षके भीतर रहकर अन्तरिक्षका नियमन करता है, वही तेरा आत्मा अन्तर्यामी तथा मरण- धर्म रहित है ॥ ६ ॥ यो वायौ तिष्ठन्वायोरन्तरो यं वायुर्न वेद यस्य वायुः शरीरं यो वायुमन्तरो यमयत्येष त आत्मन्तर्याम्यमृतः॥७ भावार्थ-जो वायुके भीतर वाथुमें रहनेवाला है, जिसको वायु नहीं जानता है, जिसका शरीर वायु है। जो वायुके भीतर रहकर वायुका नियमन करता है, वही तेरा आत्मा अन्तर्यामी तथा मरणधर्म रहित है॥७॥ यो दिवि तिष्ठन्दिवोन्तरो यं दयौर्न वेद यस्य द्यौः शरीरं यो दिवमन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृतः ॥८॥ भावार्थ-जो युलोकके भीतर घुलोकमें रहनेवाला है, जिसको द्ुलोक नहीं

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१६६ शृददारण्यकोपनिषद् [अध्याय ₹ै

जानता, जिसका शर्गर दुलोक है। जो दुलोकके भीतर रहकर द्युलोकका नियमन कस्ता है, वही तेरा आत्मा अन्तर्यामी तथा मरण रहित है ॥ ८॥ य आदित्ये तिष्ठन्नादित्यादन्तरो यमादित्यो न वेद यस्यादित्यः शरीरं य आदित्यमन्तरो यमयत्येष त आत्मा- न्तर्याम्यमृतः॥६। भावार्थ-जो आदित्यके भीतर आदित्यमें रहनेवाला है जिसको आदित्य नहीं जानता है जिसका शरीर आदित्य है, जो आदित्यके भीतर रहकर आदित्यका नियमन करता है, वही तेरा आत्मा अन्तर्यामी तथा मरणधर्म रहित है॥ह॥। थो दिक्षु तिद्न्दिग्भ्योऽन्तरो य दिशो न विदुर्यस्थ दिश: शरीरं यो दिशोऽन्तरेो यमयत्येष त आत्मान्त- र्याम्यमृतः॥१० ॥ भावार्थ-जो दिशाओंके भीतर दिशाओमें रहनेवाला है, जिसको दिशायें नहीं जानती हैं, जिसका शरीर दिशायें हैं। जो दिशाओंके भीतर रहकर दिशाओंका नियमन करता है. वही तेरा आत्मा अन्तर्यामी तथा मरणधर्म रहित है॥ १०॥ यश्चन्द्रतारके तिछ्ठ श्चन्द्रतारकादन्तरो यं चन्द्रतारकं न वेद यश्य चन्द्रतारकय शरीरं यश्चन्द्रतारकमन्तरो- यमयत्येष त आत्मान्तर्याभ्यमृतः॥११।। भावार्थ-जो चन्द्रमा तथा ताराओके भीतर चन्द्रमा तथा ताराओं में रहने वाला है, जिसको चन्द्रमा तथा तारायें नहीं जानती हैं, जिसका शरीर चन्द्रमा तथा तारायें हैं। जो चन्द्रमा तथा दिशाओके भीतर रहकर चन्द्रमा तथा दिशाओं- को नियमन करता है, वही तेरा आत्मा अन्नर्यामी तथा मरणधर्म रहित है ॥ ६१ ।। य आकाशे तिषन्नाकाशादन्तरो यमाकाशो न वेद यस्याकाशः शरीरं य आकाशमन्तरो यमयत्येष त आत्मा- न्तर्याम्यमृतः ॥।१२।।

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नाषण ७ ] विद्याविनोद भाष्य १६७

भावार्थ-जो आकाशके भीतर आकाशगें रहनेवाला है, जिमको आकाश नहीं जानता है, जिसका शरीर आकाश है। जो आकाशके भीतर रहकर आकाश- का नियमन करता है, वही तेरा आत्मा अन्तर्यामी तथा मरणध्म रहित है ॥१२ यस्तमसि तिठय स्तमसोऽन्तरो यं तमो न वेद यस्य तमः शरीरं यस्तमोऽन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्या- म्यमृतः ॥१३।। भावार्थ-जो अन्धकारके भीतर अन्यकारमें रहनेवाला है, जिसको अन्ध- कार नहीं जानता है, जिसका शरीर अन्धकार है, जो अन्यकारके भीतर रहकर अन्धकारका नियमन करता है. वही तेरा आत्मा अन्तर्यामी तथा मरणधर्म रहित है ॥। १३ ।। यहनेजसि तिछठश स्तेजसोऽन्तरोयं तेजो न वेद यस्य तेज: शरीरं यस्तेजोऽन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्य- मृत इत्यधिदैवतमथाधिभूतम् ॥१४॥ भावार्थ-जो तेजके भीतर तेजमें रहनेवाला है, जिसको तेज नहीं जानता है, जिसका शरीर तेज है, जो तेजके भीतर रहकर तेजका नियमन करता है, वही तेरा आत्मा अन्तर्यामी तथा मरणधर्म रहित है॥ १४॥ दूसरे मंत्र से चौदहवे मंत्र तक का साथ- वि० वि० भाष्य-याज्ञवल्क्यने कहा कि हे गौतम ! जो पृथिवीमे रहता हुआ वर्तमान है वही अन्तर्यामी है, इसपर गौतमने कहा कि हे याज्ञवल्क्य! पृथिवी में तो सब पदार्थ रहते हैं, क्या सभी अन्तर्यामी हैं ? याज्ञवल्क्य महर्षिने उत्तर दिया कि हे गौतम ! ऐसा नहीं जो पृथिवीके अन्तर है, जो पृथिवीके बाहर है, जो पृथिवी के ऊपर है, जो पृथिवीके नीचे है, जिसको पृथिवी नही जानती है, जो पृथिवीको जानते हैं, जिसका शरीर पृथिवी है' अर्थात् पृथिवी देवताका जो शरीर है, वही जिसका शरीर है, दूसरा शरीर अन्तर्यामीका नही है। यहाँ शरीर ग्रहण उपलक्षण है-इन्द्रियाँ भी वे ही हैं यानी पृथिवी देवताके जो कारण हैं वे ही अन्तर्यामी के हैं। पृथिवी देवताके स्वकर्म प्रयुक्त ही कार्य (शरीर) और करण (इन्द्रियाँ) हैं। पृथिवी देवताके देह और इन्द्रियोंकी प्रवृत्ति-निवृत्ति साक्षिमात्र ईश्वरके सानिध्यसे

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१६८ शृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय ३

नियमानुसार हुआ करती है। जो ऐसा नारायण संज्ञक पृथिवीके बाहर भीतर रहकर पृथिवीको उसके व्यापारमें नियुक्त करता है तथा जो विनाश रहित है, निर्विकार है और जो तुम्हारा, हमारा समस्त प्राणियोंका आत्मा हैं, हे गोतम? वही अन्तर्यामी है। तीसरे मन्त्रसे चौदह मन्त्रों तकके भावार्थमें जो यह अर्थ किया गया है कि "जो पृथिवीके भीतर पृथिवीमें रहनेवाला है" इसका क्या अभिप्राय है ? कहते हैं "जो पृथिवीमें स्थिर होकर पृथिवीका अन्तरात्मा है" यह अर्थ जानना इसी प्रकार अन्य मन्त्रोंमें भी-"जो जलके भीतर जलमें रहनेवाला है" 'जो अभिके भीतर अगिमें रहनेवाला है' ऐसा समझलेना। यहाँ 'अन्तर' शब्दका अर्थ 'अन्तरात्मा' है यदि इन प्रकृत मन्त्रोंका हमारे कथनानुसार अर्थ कर लिया जाय तो स्पष्ट बोध हो जायगा, जैसे-(तीसरे मन्त्रका अर्थ) जो पृथिवीमें रहता हुआ भी पृथिवीसे अन्तर अर्थात् बाहर विद्यमान है, जिस को पृथिवी नहीं जानती है। जिसका शरीर पृथिवी है। जो आभ्यन्तर और बाहिर स्थित होकर परथिवीको शासन करता है। जो आपका आत्मा है। जो अमृत है वही अन्तर्यामी है। अर्थात् जो पृथिवीके भीतर ही नहीं, किन्तु पृथिवीके ऊपर यानी चारों तरफ है। जिसके विषयमें पृथिवी यह नहीं जानती कि मेरे अन्दर कोई मेरा शासक रहता है। जिसकी महिमा पृथिवी, जल, अभि, अन्तरिक्ष, वायु, दु, आदित्य, दिशा, चन्द्र, तारों आकाश, तम और तेज आदिकों से बढ़कर है। वही अन्तर्यामी है। शेष मन्त्रोंका व्याख्यान इसीके समान है। इस प्रकार यह अन्तर्यामी विषयक अधिदैवत दर्शन है॥१४॥ इसके आगे आदीभूत दर्शन कहते हैं- यः सर्वेषु भूतेषु तिध्वन्सर्वेभ्यो भूतेभ्योऽन्तरो यथ सर्वाणि भूतानि न विदुर्यस्य सर्वाणि भूतानि शरीरं यः सर्वाणि भूतान्यन्तरो यमयत्येष त आत्माऽन्तर्याम्यमृत इत्यधिभूतमथाध्यात्मम् ॥ १५ ॥ भावार्थे-सब भूतोंके भीतर सब भूतोंमें रहनेवाला है, जिस्को सब भूत नहीं जानते हैं, सब भूत जिसके शरीर हैं और जो सब भूतोंके भीतर रहकर-सब भूतोंको नियमित करता है, वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी तथा मरणधर्म रहित है। यह अधिभूत दर्शन है, अब अध्यात्म दर्शन कहा जाता है॥ १५ ।।

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माशय ] विद्याविनोद भाष्य १६६

यः प्राणे तिष्टन्प्राणादन्तरो यं प्राणो न वेद यस्य प्राणः शरीरं यः प्राणमन्तरो यमयत्येष त आत्माड- न्तर्याम्यमृतः ॥ १६ ।। भावार्थ-जो प्राणके भीतर प्राणमें रहनेवाला है, जिसको प्राण नहीं जानता है, प्राण जिसका शरीर है और जो प्राणके भीतर रहकर प्राणका नियमन करता है, वद्द तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी तथा मरणधर्म रहित है॥ १६ ॥ यो वाचि तिष्ठन्वाचोऽन्तरो यं वाङू न वेद यस्य वाक् शरीरं यो वाच मन्तरो यमयत्येष त आत्माऽन्तर्या- म्यमृतः ॥१७॥ भावार्थ-जो वाणीके भीतर वाणीमें रहनेवाला है, जिसको वाणी नहीं जानती है, वाणी जिसका शरीर है और जो वाणीके भीतर रहकर वाणीका नियमन करता है, वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी तथा मरणधम रहित है॥ १७ ॥ यश्चत्तुंषि तिष्ठश्चन्तुषोऽन्तरो यं चततुर्न वेद यस्य चक्षुः शरीरं यश्चक्षुरन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्या- म्यमृतः ॥१८ ।। भावार्थ-जो नेत्रके भीतर नेत्रमें रहनेवाला है, जिसको नेत्र नहीं जानता है, नेत्र जिसका शरीर है और जो नेत्र के भीतर रहकर नेत्र को नियमन करता है, वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी तथा मरणधर्म रहित है॥ १८ ॥। यः शोत्रे तिष्ठञ्छोत्रादन्तरो यथ श्रोत्रं न वेद यस्य श्रोत्र शरीरं यः श्रोत्रमन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्या- न्यमृतः ॥१६ ॥ भावार्थ-जो श्रोत्रके भीतर श्रोत्रमें रहनेवाला है, जिसको श्रोत्र नही जानता है, श्रोत्र जिसका शरीर है और श्रोत्रके भीतर रहकर श्रोत्रको नियमन करता है, वह तुम्हारा आस्मा अन्तर्यामी तथा मरणधर्म रहित है॥ १९॥ यो मनसि तिष्टन्मनसोऽन्तरो यं मनोन वेद यस्य २२

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१७० बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ३

मनः शरीरं यो मनोऽन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्या म्यमृतः ॥ २० ॥ भावार्थ-जो मनके भीतर मनमें रहनेवाला है, जिसको मन नहीं जानता है, मन जिसका शरीर है और जो मनके भीतर रहकर मनका नियमन करता है, वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी तथा मरण धर्म रहित है॥ २०॥ यस्त्वचि तिष्ठथस्त्वचोऽन्तरो यं त्वङ् न वेद यस्य त्वक शरीरं यस्त्वचमन्तरो यमयत्यष त आत्माऽन्तर्या- म्यमृतः ॥ २१॥ वि० वि० भाष्य-जो त्कके भीतर त्वकमें रहनेवाला है, जिसको त्वक् नही जानती जिसका शरीर है और जो त्वकके भीतर रहकर त्वकको नियमन करता है, वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी तथा मरणघर्म रहित है॥ २१ ॥ यो विज्ञाने तिष्ठन्विज्ञानादन्तरो यं विज्ञानं न वेद यस्य विज्ञानथ शरीरं यो विज्ञानमन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृतः ॥२२ ॥ भावार्थ-जो विज्ञानके भीतर विज्ञानमें रहनेवाला है, जिसको विज्ञान नहीं जानता है, विज्ञान जिसका शरीर है और जो विज्ञानके भीतर रहकर विज्ञानका नियमन करता है, वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी तथा मरणधर्म रहित है ॥ २२॥ यो रेतसि तिश्ठ्व्ेतसोडन्तरो यथ रेतो न वेद यस्य रेतः शरीरं यो रेताऽन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्य- मृतोऽ्दष्टो द्रष्टाऽश्रतः श्रोतामतो मन्ताSविज्ञातो विज्ञाता नान्योऽतोसि्ति द्रष्टा नान्योडतोऽस्तिश्रोता नान्योऽतोडस्ति मन्ता नान्योडतोस्ति विज्ञातैष त आत्मान्तर्याम्यमृतोऽ तोऽन्यदार्तं ततो होदालक आरुणिरुपरराम ॥ २३ ॥ भावार्थ-जो वीर्यके भीतर वीर्यमें रहनेवाला है, जिसको वीर्य नहीं जानता है, वीर्य जिसका शरीर है और जो वीर्यके भीतर रहकर वीर्यका नियमन करता है,

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विद्याविनोद भाष्य १७१

वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी तथा मरणधर्म रहित है। वह दिखाई न देनेवाला किन्तु देखनेवाला है, सुनायी न देनेवाला, किन्तु सुननेवाला है, मननका विपय न होनेवाला, किन्तु मनन करनेवाळा है और अविज्ञात होता हुआ विज्ञाता है। इससे अन्य कोई द्रष्टा नहीं है, इससे अन्य कोई श्रोता नहीं है, इससे अन्य कोई मन्ता नहीं है तथा इससे अन्य कोई विज्ञाता नहीं है। यही तुम्हारा अविनाशी आत्मा अन्तर्यामी है। इससे अन्य सब विनाशी है इसके बाद अरुण का पुत्र उद्दालक चुप हो गया ।। २३ ॥ पन्द्रहवें मंत्रसे तेईसवें मंत्रका एक साथ-

वि० वि० भाष्य-'यः सर्वषु भूतेषु तिष्ठन्' इस पन्द्रहवें मंत्र से अधिमूत दर्शन कहा गया है, अब इसके आगे शेष मंत्रोंसे अध्यात्म दर्शन कहा जाता है- जो प्राणवायु सहित घाणोन्द्रियमें, वाणीमें, नेत्रमें, श्रोत्रमें, मनमें, त्वचामें बुद्धिमें तथा वीर्य-प्रजननेन्द्रियमें रहनेवाला है; किन्तु पृथिव्यादिके अधिष्ठातृ देव बड़े प्रभावशाली होने पर भी मनुष्यादिके सदृश अपने भीतर रहनेवाले अपने नियामक अन्तर्यामीको नहीं जानते, क्योंकि वह किसीकी नेत्रदृष्टिका विषयी भूत नहीं है, किन्तु स्वयं नेत्रमें सन्निहित होने के कारण दर्शन स्वरूप है, इसलिए द्रष्टा है। इसी तरह वह किसीके भी श्रोत्रकी विषयताको अप्राप्त है, किन्तु स्वयं जिसकी श्रवणशक्ति लुप्त नहीं होती-ऐसा है। और समस्त श्रोत्रोंमें सन्निहित होनेके कारण श्रोता है। इसी प्रकार वह मनके संकल्पोंकी विषयताको अप्राप्त है, क्योंकि सबलोग देखे-सुने पदार्थों का ही संकल्प करते हैं, इसीलिए अद्ृष्ट तथा अश्रुत होनेके कारण ही वह अमृत है और मनन शक्ति लुप्त न होने से तथा समस्त मनों में सन्निहित होनेके कारण वह मन्ता है। इसीप्रकार रूपादि अथवा सुखादिके सद्दश निश्चयकी विषयता को अप्राप्त है, किन्तु स्वयं जिसकी विज्ञानशक्ति लुप्त नहीं है-एवं बुद्धिमें सन्निहित होनेके कारणविज्ञाता है। यहाँ जिसे पृथिवी नहीं जानती, जिसे समस्त भूत नहीं जानते, इत्यादि कथनसे यह बात सिद्ध होती है कि जिनका नियमन किया जाता है, वे विज्ञाता भिन्न हैं और उनका नियमन करनेवाला अन्तर्यामी उनसे भिन्न है। उनके भिन्नत्वकी शंकाको दूर करनेके लिए यह कहा जाता है कि इस अन्तर्यामी से अतिरिक्त कोई श्रोता, मन्ता विज्ञाता नहीं है। जो दिखाई न देनेवाला किन्तु देखने- वाला है। सुनायी न देनेवाला किन्तु सुननेवाला है। मननका अविषय किन्तु मनन करनेवाला है, स्वयं अविज्ञात किन्तु सबका विज्ञाता है तथा समस्त संसार धर्मोंसे

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१७२ शृहदारण्यकोपनिषद् [अष्याय ३

शून्य एवं सम्पूर्ण संसारियोंके कर्म फलोंका विभाग करनेवाला है। वह सुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है, इस ईश्वर आत्मासे अतिरिक्त और सब विनाशी हैं। तब यह सुन अरुणका पुत्र उद्दालक चुप हो गया॥ १५-२३॥ -88&-

ऋरष्टम ब्राह्मरा

पूर्व ब्राह्मणमें जिस सूत्र और अन्तर्यामीका निरूपण किया गया है, वह सोपाधिक होनेसे हेयपक्षमें ही है, इसलिए उसके ज्ञानसे पुरुषार्थका लाभ नहीं हो सकता, पुरुषार्थ लाभ तो तुधादि रदित निरुपाधिक साक्षात् अपरोक्ष सर्वान्तर ब्रह्मज्ञानसे ही होगा, अतः उसके निरुपणके लिए अष्टम ब्राह्मणका आरम्भ किया जाता है- अथ ह वाचक्युवाच ब्राह्मणा भगवन्तो हन्ताहमिमं द्वौ प्रश्नौ प्रत्यामि तौ चेन्मे वच्यति न जातु युष्मा- कमिमं कश्चिदबह्मोदं जेतेति पृच्छ गार्गीति॥१॥ भावार्थ-पुनः वाचक्रवीने कहा कि हे माननीय पूज्य विद्वद्गण! अब मैं इनसे दो प्रश्न पूछूँगी। यदि याज्ञवल्क्य मेरे उन दो प्रश्नोका उत्तर अच्छी तर्हसे दे देंगे, तो आप लोगोंमेंसे कोई भी विद्वान् ब्रह्मज्ञान विषयक वादमें उनको जीत नहीं सकेगा। इस प्रकार कहनेपर ब्राह्मणोंने अनुमति देते हुए कहा कि हे गार्गि! पूछ ॥ १ ॥ वि० वि० भाष्य-पहिले याज्ञवल्क्यने पुनः प्रश्नके विषयमें शिरपतनका भय दिखलाकर गार्गीको विरत किया था, इसीलिए अरुणपुत्र उद्दालकके चुप होने पर पूर्वोक्त भयसे मौन हुई वचक्र की कन्या वह प्रसिद्धा गार्गी बोली कि हे परमपूज्य ब्रह्मवेत्ताओं! यदि आप लोगोंकी आज्ञा हो तो मैं इस याज्ञवल्क्यसे दो प्रश्न पूछू? यदि ये उन मेरे दोनों प्रश्नोंका समुचित उत्तर दे देगे तो मुझे निश्चय हो जायेगा कि आप लोगोंमेंसे कोईभी ब्रह्मवादी ब्रह्मवादके विषयमें किसी प्रकार इनका विजेता न होगा, ऐसा कहनेपर सब ब्राह्मण प्रसन्न होकर वोले कि हे गार्गि! तू अपनी इच्छानुसार याज्ञवल्क्यसे प्रश्न अवश्य कर, तात्पर्य यह है कि-इसी अध्यायके षष्ठ

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बृहदारएयकोपनिषद्ध

जनकसभामें याज्ञवल्क्यके साथ शास्ार्थके लिए गार्गीका आगमन। ननदसलाभां याजवस्सयनी सांभे शाखार्थं माटे भागानुं भाशमन

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शांधण = ] विद्याविनोद भाष्य १७३

ब्राह्मणमें गार्गीका ही प्रश्न है, वहाँ वह चुपहो गई थी। यदि ऐसा है तो फिर वह क्यों प्रश्न करनेके लिए उद्यत होती है ?। इसका उत्तर यह है कि वहाँ याज्ञवल्क्यके कोपके भयसे (तेरा सिर गिर जायगा इस कथनके भयसे) यद्यपि गार्गी ने प्रश्न करना छोड़ दिया था। यह तो हुआ था, पर उसे सन्तोष नहीं हो सका था। अब उसने पुनः प्रश्न करनेका अवसर देखा। पर बात यह है कि सभामें जब कि उसे एक बार प्रश्न करने का अवसर दे दिया गया है तो फिर मौका कैसे दिया जासकेगा ?। इसी वातको मनमें सोचकर वह ब्राह्मणोंसे जो उस समय सभामें उपस्थित थे तथा विद्वानोंसे अनुमति लेती है ॥ १ ॥ विद्वान् ब्राह्मण उसे अनुमति देते हैं कि तूँ पूछ सकती है। सा होवाचाहं वै त्वा याज्ञवल्क्य यथा काश्यो वा वैदेहो वोग्रपुत्र उज्ज्यं धनुरधिज्यं कृत्वा द्वौ बाणवन्तौ सपत्ातिव्याधिनौ हस्ते कृत्वोपोत्तिष्ठेदेवमेवाहं त्वा द्वाभ्यां प्रश्नाभ्यामुपोदस्थां तौ मे ब्रहीति पृच्छ गार्गीति ॥ २॥ भावार्थ-वह बोली, हेयाज्ञवल्क्! जैसे काशी या विदेहवासी कोई वीर- वंशोत्पन्न ज्यारहित धनुष पर डोरी यानी रस्सी चढ़ाकर रिपुओंको अत्यन्त पीड़ा देनेमें समर्थ तीक्णाग्रबाण को हाथमें लेकर उपस्थित हो। वैसेही मैं आपके सामने दो प्रश्नों को लेकर उपस्थित हूँ, आप उन प्रश्नोंका उत्तर दीजिये। इसपर याज्ञवल्कयने कहा कि हे गार्गि ! पूछ ॥ २ ॥ वि० वि० भाष्य-ब्राह्मणों की आज्ञा पाकर याज्ञवल्क्यके प्रति वह गार्गी बोली, मैं आपसे दो प्रश्न करूँगी, वे दोनों प्रश्न दुस्तर हैं, यह सूचन करनेके लिये दृष्टान्त पूर्वक दोनों प्रश्नोंको कहती है-हेयाज्ञवल्क्य ! जैसे काशी या विदेहके शूरवंशी राजा प्रत्यञ्व्ा हीन धनुष पर डोरी चढ़ा करके शत्रुके हननके लिये उपस्थित हों, वैसे ही मैं शरस्थानापन्न उन दोनों प्रश्नोंके साथ आपके सामने आपके पराजयके निमित्त उपस्थित हुई हूँ। यदि आप ब्रह्मवेत्ता हों तो उन मेरे प्रश्नोंका उत्तर दीजिये, ऐसा सुनकर याज्ञवल्क्यने कहा कि हे गार्गी! तुम प्रश्मतापूर्वक उन प्रश्नोंको मुझसे पूँछ ॥ २ ॥ सा होवाच यदूर्ध्व याज्ञवल्क्य दिवो यदवाक् प्रथिव्या

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१७४ बृहदारण्य कोपनिषद् [अध्याय ३

यदन्तरा द्यावापृथिवी इमे यद्भूतं च भवच्च भविष्य- च्चेत्याचक्षते कस्मिथस्तदोतं च प्रोतं चेति ॥ ३ ॥ भावार्थ-उस गार्गीने कहा कि हे याज्ञवल्क्य! जो दुछोकक ऊपर है, जो भूलोकके नीचे है तथा जो द्ुलोक और भूलोकके मध्यमें है और स्वयं भी जो ये द्युलोक तथा पृथिशी हैं और जिन्हें भूत, वर्तमान तथा भविष्य-ऐसा कहते है, वे किसमें ओत प्रोत हैं ? ॥। ३ ।। वि० वि० भाष्य-गार्गी बोली कि हे भगवन्! जलमें सुवर्णका अण्डा था जिससे ब्रह्मा उत्पन्न हुए। उस अण्ड़ेके लोक और उसके परितः स्थित लोक उसके लिए शुलोक है। अनन्त पृथिवी हैं, अनन्त सूर्य हैं, अनन्त चन्द्र है, अनन्त नक्षत्र राशि हैं, अनन्त अन्य लोक लोकान्तर हैं, जिनको हम देख नहीं सकते। सबदी निराधार हैं तो परस्पर टकराकर क्यों नहीं विनष्ट हो जाते?। अथवा क्यों नहीं कही इधर-उधर चले जाते ? क्यों नहीं यह पृथिवी नीचेको धस जाती ? या ऊपरको चढ़ अथवा उड़जाती ? क्यों नहीं सूर्य या चन्द्र वा ग्रह पृथिवी पर गिर पड़ते ?। इसीप्रकार पृथिवी ही सूर्य आदिकों में क्यों नहीं उड़कर जा चिपकती ? परन्तु ये सब पदार्थ स्व-स्व स्थानको परित्याग करके कहीं नहीं जाते हैं, अुमात्र भी स्वकीय निर्दिष्ट स्थानको नहीं छोड़ते। इन सबको कौनसी शक्तिने बाँध रखा है ? यह मैं नहीं जानती. यह प्रश्न याज्ञवल्क्यसे पूछ देखे, वे क्या उत्तर देते है ? इस प्रकार विचार कर और महान् आश्रर्य देख विमोहित हो याज्ञवल्क्य की आज्ञा पा गार्गी प्रश्न पूछनेके लिए उद्यत्त होती है। प्रश्नका भाव यह है कि ये सब किस आधार पर ठहरे हुए हैं ? जैसे स्तम्भके ऊपर गृह, सूत्रके आधारपर माला, तथा जलके आधारपर मत्स्य तरते हैं और वायुके आधारपर जैसे पक्षी उड़ते हैं वैसे ये किसके आधारपर हैं,। ३॥ स होवाच यदूर्ध्व गार्गी दिवों यदवाक् प्रृथिव्या यद- न्तरा द्यावापृथिवी इमे य्जूतं च भवच्च भविष्यच्चेत्याच- क्षत आकाशे तदोतं च प्रोतं चेति।४ ।। भावार्थ-उस याज्ञवल्कयने कहा कि हे गार्गी! जो दुलोकके ऊपर, पृथिवी- लोकके नीचे और जो दुलोक एवं पृथिवीके बीचमें है तथा स्वयं भी जो ये दुलोक

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ब्राह्मण = ] विद्याविनोद भाष्य १७५ और पृथिवी हैं और जिन्हें भूत, वर्तमान एवं भविष्य ऐसा कहते हैं, सब आकाशमें ओत प्रोत हैं ।।४ ।। वि० वि० भाष्य-याज्ञवल्क्यने गार्गीके ऊत्तरमें कहा कि-जो यह नाम- रूपादि व्याकृत सूत्रात्मक जगत् है वह अव्याकृत आकाशमें भोत-प्रोत है, यानी गुथा हुआ है, अर्थात् आकाशके आश्रित है। ब्रह्मकी शक्तिकी तरह जो आकाश स्वतः स्थित है उसी आकाशीय शक्तिके ऊपर सब स्थिर हैं। हे गार्गि। यह आपका प्रथम प्रश्नका उत्तर हो गया ॥ ४ ॥ सा होवाच नमस्तेऽस्तु याज्ञवल्क्य यो म एसं व्यवो- चोऽपरस्मै धारयस्वेति पृच्छ गार्गीति॥५ ॥। भावार्थ-वह बोली; हे याज्ञवल्क्य! आपको नमस्कार है, जिन आपने मुझे इस प्रश्नका उत्तर देदिया। अब आप दूसरे प्रश्नके लिये अपनेको तैयार करें। याज्ञवल्क्य ने कहा कि हे गार्गी! पूछ ॥ ५॥ वि. वि० भाष्य-याजवल्क्च महर्षिके समिचीन उत्तरको सुनकर गार्गी अत्यन्त प्रसन्न हुई और विनय पूर्वक बोली [ प्रश्न दुर्वच है-इस आशयसे गार्गीने याज्ञवल्क्य जीको नमस्कार किया ] आपने मेरे दुर्वच प्रश्नका जो यथार्थ उत्तर देदिया [ इस प्रश्नके दुर्वचत्वमें कारण यह है कि जब सूत्रही पहिले आगमैकगम्य होनेसे दूसरोंके लिये दुर्वाच्य है तब सूत्र जिसमें ओत प्रोत है, उसके विषयमें तो कहना ही क्या ? ] इसके लिए आपको नमस्कार है, अब द्वितीय प्रश्नके उत्तर देने के लिए आप अपनेको हढ़ता पूर्वक तैयार करें। इस वचनको सुनकर याज्ञवल्क्यने कहा कि हे गार्गी! तुम अपने दूसरे प्रश्नको भी पूछ, मैं उत्तर देनेके लिए तैयार हूँ ।। ५ ।। सा होवाच यदूर्ध्व याज्ञवल्क्य दिवो यदवाक् प्रथिव्या यदन्तरा द्यावापृथिवी इमे यदभूतं च भवच्च भविष्यच्चे- त्याचक्षते कस्मिँस्तदोतं च प्रोतं चेति॥ ६ ।। भावार्थ-गार्गी बोली हे याज्ञबल्क्य। जो दुलोकके ऊपर है, जो भूलोकके नीचे है तथा जो दुलोक और भूलोकके मध्यमें है और स्वयं भी जो ये द्युलोक तथा पृथिवी हैं, और जिन्हें भूत, वर्तमान तथा भविष्य ऐसा कहते हैं, वे किसमें ओत प्रोत हैं ? ॥ ६ ।।

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१७६ बृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय ३

वि. वि० भाष्य-तीसरा तथा छठवाँ मंत्र समान है, अतः इसकी व्याख्या तीसरे मन्त्रके ही समान है। पूर्वोक्त अर्थका ही निश्चय करनेके लिए पुनः कहा गया है॥ ६ ॥। स होवाच यदूर्ध्व गार्गि दिवो यदवाक् परृथिव्या यद- न्तग द्यावापृथिवी इमे यदभूतंच भवच्च भविष्यच्चेत्याच- क्षत आकाश एव तदोतं च प्रोतं चेति कस्मिन्नु खल्बाकाश ओतश्च प्रोतश्चेति ॥७॥ भावार्थ-उस याज्ञवल्क्य ने कहा कि हे गार्गि ! जो दुलोकके ऊपर, पृथिती लोकके नीचे और जो दुलोक एवं पृथिवीके वीचमें है तथा स्वयं भी जो ये द्युलोक और पृथिवी हैं तथा जिन्हें भूत, वर्तमान एवं-भविष्य ऐसा कहते हैं, वे सब आकाश- में ही ओत प्रोत हैं। पुनः गार्गिने पूछा कि हे याज्ञवल्क्च! आकाश किसमें ओत- प्रोत हैं ?॥ ७ ॥ वि. वि० भाष्य-याज्ञवल्क्यने गार्गीके पूर्वाक्त वाक्यको सुनकर 'आकाश में ही ओत-प्रोत है' इस प्रकार कहकर प्रथम कही हुई बातकी ही पुष्टि की है। फिर भी गार्गिने पूछा कि आकाश किसमें ओत-प्रोत है ? गार्गि इस प्रश्नका उत्तर अत्यन्त कठिन समझती है, क्योंकि सूक्ष्म होनेसे प्रथम सूत्र ही दुर्वच है। आकास सूत्रसे भी सूत्ष्मतर है और आकाशका आश्रय इससे भी सूक्ष्मतम है। बृहस्पति भी इसको नहीं कह सकते, तब साधारण विद्वान्की तो बात ही क्या ? वह अवाच्य है, उसे कोई अनुभव नहीं कर सकता, और यदि याज्ञवल्क्यने इस अवाच्य विषयका भी वर्णन किया तो (विपरीत अनुभवरूप) निग्रह स्थान होगा, क्योंकि अवाच्यको कइना विरुद्ध प्रतिपत्ति ही है॥७ ॥ स होवाचैतद्वै तदक्षरं गार्गि ब्राह्मणा अभिवदन्त्य- स्थूलमनण्वह्स्वमदीघंमलोहितम स्नेहमच्छाय मतमोऽवाय्व- नाकाशमसङ्गमर समगंधम चक्षुष्कमश्रोत्रमवागमनोSतेजस्क मप्राणममुखममात्रमनंतरमबाह्यं न तदश्नाति किंचन न तदश्नाति कश्चन ॥८ ॥

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वचाविनोद भाष्य १७७

भावार्थ-उस याज्ञवल्क्यने कहा कि हे गार्गि! वह यह अविनाशी है, जिसमें आकाश ओत-प्रोत है, वह न स्थूल है, न सूक्ष्म है, न छोटा हैं, न बड़ा है, न लाल है, न द्रव है, न छाया है, न तम है, न वायु है, न आकाश है, न संग है, न रस है, न गन्ध है, न नेत्र है, न कान है, न वाणी है, न मन है, न तेज है, न प्राण है, न मुख है, न परिमाण है, उसमें न अन्तर है, न बाहर है, न वह कुछ खाता है और न कोई पदार्थ उसको खाता है। हे गार्गि ! इस प्रकार ब्रह्मवेत्ता लोग कहते है ॥ ८ ॥ वि० वि० भाष्य-उस याजवल्क्यने कहा कि हे गार्गि! जिसके विषयमें तूने पूछा था कि यह आकाश किसमें ओत-प्रोत हैं ? वह अक्षर है जो कमी क्षीण नहीं होता, इस प्रकार तत्त्वज्ञानी लोग कहते हैं अर्थात् विद्वान् त्वं पदार्थको सामान्यतः जानकर ही एषणात्रयसे रहित होकर संन्यासका भ्रहण करते हैं। संन्यासी होकर श्रवण, मनन आदि द्वारा तत् पदार्थ अक्षर स्वरूप स्वात्माका अनुभ। करते हैं। गार्गीने अपने मनमें ऐसा सोचकर यह प्रश्न किया था कि याज्ञतल्क्य यदि इस प्रश्नका उत्तर देंगे, तो अवाच्यके कथनसे विप्रतिपत्ति नामक निग्रह स्थानसे निगृहीत हो जायँगे। यदि उत्तर न देंगे तो वादित्वकी हानि हो जायगी अथवा अप्रतिपत्ति नामक निग्रह स्थान हो जायगा, किन्तु याज्ञवल्क्य तो कथानिपुण थे, इस लिये प्रश्नका उत्तर भी दिया और निग्रहके पासमें भी न फँसे, क्योंकि उक्त प्रश्नका विषय शाख्त्रकसमधिगम्य है, इस तात्पर्यसे याज्ञवल्क्यने (वदन्ति) पदका प्रयोग किया अर्थात् तत्व ज्ञानी लोग कहते हैं-मैं नहीं कहता हूँ, इसलिये अवाच्य वचनका अपराध मुझको नहीं लग सकता। जब वह अवाच्य ही है तब तत्त्व ज्ञानियोंने कैसे कहा ? यदि कहा तो वह अवाच्य स्वभाव नहीं रहा। ठीक है, प्रश्न विषय वस्तुतः अवाच्य स्वभाव ही है, अतएव साक्षात् पदोंसे उक्त अर्थका अभिधान उन लोगोंने भी नहीं किया, किन्तु स्थूलादिकोंके निषेध द्वारा अक्षरको प्रकाशित किया है-जैसे वह स्थूल भिन्न है, तो क्या अशु है ? नहीं, अणुसे भी भिन्न है। अच्छा, तो दीर्घ होगा? नहीं दीघसे भी भिन्न है, तो क्या हस्व है? नहीं, हस्वसे भी भिन्न है, इस प्रकार चारों प्रकारके परिमाणोंका प्रतिषेध करनेसे द्रव्य धर्मोंका प्रति- षेध सिद्ध हो जाता है. इससे वह द्रव्य नहीं है। अच्छा, तो उसमें लाल गुण होगा ? नहीं, वह लोहित भी नही है, लोहित गुण अमिका है, अतः वह अगि भी नहीं है। जल गुण स्नेह है, उससे भी भिन्न है, छायासे भिन्न है, तमसे भी भिन्न है। वायु स्वरूप भी नहीं है, किंतु अवायु है, आकाशसे भिन्न है, असङ्ग अर्थात् असङ्गात्मक २३

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१७८ शृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय १

नहीं है, रससे भिन्न अरस है, गन्धसे भिन्न अगन्ध है' चक्षुष्मान्से भिन्न तथा श्रोत्र- वान्से भिन्न है, जैसा कि (पश्यत्यचतुः) इत्यादि मन्त्र वर्णसे प्रमाणित होता है। वागू भी नहीं है-अवाग है एवं अमना है, अतेजस्क है अर्थात् जैसे अभि आदिमें तेज है, उसके द्वारा अभिका प्रकाश होता है वैसे तेज अक्षरमें नहीं है, वह स्वयं प्रकाश है। अप्राण ऐसा कहकर शरीरान्तर्गत वायुका प्रतिषेध किया जाता है, इसलिए अप्राण है। तो फिर यह मुख अर्थात् द्वार है ? नहीं वह मुख है, वह अमात्र है, जिससे माप किया जाय उसे मात्र कहते हैं, अर्थात् नापबोल करनेवाला, वह अमात्र अर्थात् मात्रा रूप नहीं है, कारण कि अक्षरसे किसी वस्तुका परिच्छेद नहीं हो सकता, कोई इसके भीतर नहीं है, सबके भीतर यही है, इसके भीतर दूसरा नहीं है। अबाह्य है, कुछ खाता नहीं। अच्छा तो स्वयं किसीका भक्य होगा? नहीं, उसका भक्षक भी कोई नहीं है, वह सब विशेषणोंसे रहित है, अतएव वह अद्वितीय अक्षर है॥ ८ ॥ अनेक विशेषणोंके प्रतिषेध रूप प्रयाससे अक्षरका अस्तित्व श्रुति द्वारा ज्ञात हुआ, फिर भी लोक बुद्धिकी अपेक्षासे उसके अस्तित्वमें शङ्का होती है, अतः उसके अस्तित्वकी सिद्धिके लिए भगवती श्रुती अनुमान प्रमाणका उपन्यास करती है, यथा- एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि सूर्याचन्द्रमसौ विधृतौ तिष्ठत एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि द्यावा- परथिव्यौ विधृते तिष्ठत एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि निमेषा सुहूर्ता अहोरात्राण्यघंमासा मासा ऋतवः संवत्सरा इति विधृतास्तिष्ठन्त्येतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि प्राच्योऽन्या नद्यः स्यन्दन्ते श्वेतेभ्यः पर्वतेभ्यः प्रतीच्यो- डन्या यां यांच दिशमन्व तरस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गागि ददतो मनुष्याः प्रशथसन्ति यजमानं देवा दर्वी पितरोS- न्वायत्ता: ॥ ६ ।। भावार्थ-हे गार्गी! इसी अक्षरकी आज्ञामें सूर्य तथा चन्द्रमा नियमित होकर स्थित हैं, इसी अक्षरकी आज्ञामें हे गार्गि! स्वर्ग और पृथिवी नियमितरूपसे स्थित हैं, इसी अक्षरकी आज्ञामें हे गार्गि ! निमेष, मुहूर्त, दिनरात, अर्धमास, ऋतु और

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माल्य = ] विर्द्याविनोद भाष्य १७६

संवत्सरादि नियमित हुए इसतरह स्थित हैं, हे गार्गि ! इसी अक्षरकी आज्ञामें कुछ नदियाँ श्वेतपानी बरफवाले पहाड़ोंसे निकलकर पूर्वदिशाको बहती हैं तथा दूसरी कुछ नदियाँ-पश्चिमदिशाको बहती हैं अर्थात् जो जो नदियाँ जिस जिस दिशाको जाती हैं, उस उस दिशाको नहीं छोड़ती हैं, हे गार्गि ! निःसन्देह इसी अक्षरकी आज्ञामें मनुष्य दान देनेवालोंकी प्रशंसा करते हैं और देवगण यजमानके अनुगामी होते हैं तथा पितृगण दर्वी होमके अधीन होते हैं ।।६ ।। वि• वि० भाष्य-यह अक्षर सर्वान्तर है, जिसके विषयमें भगवती श्रुतिने कहा है कि 'यत्साक्ादपरोक्षाद्ब्रह्म' तथा आत्मा अशनापिपासाऽदिसे रहित है। इसी अक्षरके शासनमें सूर्य तथा चन्द्रमा स्थित हैं जैसे राजा के शासनमें अनुगत राज्य नियमितरूपसे स्थित रहता है एवं हे गार्गि ! इस अक्षरके शासनमें दिन और रात्रिके लिए संसारका उपकार होगा, इनका निर्माण किया है। जैसे साधारण समस्त प्राणियोंको प्रकाश हो, इस उद्देश्यसे राजमार्गमें राजाकी तरफसे प्रदीप जलाये जाते हैं। वैसेही ईश्वरने समस्त लोकके प्रकाशके लिए आकाशमें इन दोनोंको प्रज्वलित किया है। सूर्यका इतने समय तक प्रकाश रहे और चन्द्रमाका प्रकाश इतने समय तक रहे तथा उन दोनोंके प्रकाश देशमें भी नियत उदय और अस्तकालका भी नियम है ही चन्द्रमाकी कलावृद्धि और कलाक्षय भी नियत ही है। इससे स्पष्ट जान पड़ता है कि प्रदीप कर्ता एवं धारयिताके समान इनका भी प्रदीप कर्ता एवं धारयिता अक्षर संज्ञक अवश्य है। यही एक लिङ्ग नहीं है और भी हेतु हैं। जैसे-हे गार्गि ! यद्यपि स्वर्ग और पृथिवी सावयव हैं, इसलिए फूटनेके योग्य हैं तो भी फूटते नहीं, गुरु होनेसे गिरने के योग्य हैं फिर भी गिरते नहीं, संयुक्त होनेसे वियुक्त स्वभाव हैं फिर भी निरन्तर संयुक्त ही रहते हैं, चेतनावान् अभिमानी देवसे अधिष्ठित अतएव स्वतंत्र हैं, तो भी इस अक्षरके शासनके परतंत्र हैं सर्वथा स्वतंत्र नहीं हैं। यह अक्षर सब व्यवस्थाओंका सेतु है, समस्त मर्यादाओंका धारयिता है; इस अक्षरक शासनका अतिक्रमण स्वर्ग या पृथिवी नहीं कर सकती, इससे इस अक्षरका अस्तित्व सिद्ध होता है। स्वर्गलोक और पृथिवी इससे नियमित होकर स्थित हैं-यह इसकी सत्ताका अव्यभिचारी लिद्ग है, क्योंकि किसी चेतनावान असंसारी शासकके विना ऐसा होना असंभव है, जैसा कि "जिसके द्वारा दुलोक उग्र और पृथिवी दढ़ की गई है" इत्यादि मत्रवणैसे सिद्ध होता है। हे गार्गि ! इसी अक्षरके शासनमें कालके अवयव निमेष, मुहूर्तादि सम्पूर्ण अतीत अनागत तथा वर्त्तमान पदार्थोंकी गणना करनेवाले हैं, जैसे राजनियुक्त आयव्ययको लिखनेवाला सावधानीसे आयव्ययकी गणना करता है

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१८० बृहदारण्यकार्पानषद् [ अध्याय ३

वैमेही राजस्थानापन्न यह अक्षर इन कालावयवोंका नियन्ता है। तथा पूर्व दिशामें बहनेवाली गङ्गा आदि नदियाँ-जैसे श्वेत पर्वत हिमालयसे निकलकर पूर्वकी ओर समुद्रमें जा मिलती है, जो गङ्गासागरके नामसे पुकारा जाता है-हमेशासे वैसीही बहती हैं, जैसी अक्षरकी आज्ञा है। आज्ञा भङ्गके भयसे अन्य दिशामें बहनेकी इच्छा होनेपर भी नहीं बह सकतीं, अर्थात् भगवती भागीरथी चेतन देवता है, अतएव स्वक्रियामें स्वतंत्र एवं समर्थ है फिरभी न जानेके कारण उसकी आज्ञाभङ्गभयके सिवाय दूसरा कारण नहीं है, ऐसी ही व्यवस्था पश्चिमवाहिनी सिन्धु, नर्मदा इत्यादि नदियोंकी भी है, यह अक्षरकी सत्तामें अव्यभिवारीलिङ्ग हैं। किश्र जो दाता स्वयं दुःख सहकर अपनेसे उपार्जित सुवर्णादिका दान करता है, विद्वज्न उसकी प्रशंसा करते हैं। प्रकृतमें विचारणीय यह है कि जो दिया जाता है, जो देता है तथा जो ग्रहीता है, उनका यहाँ ही समागम और विश्लेन प्रत्यक्ष सिद्ध है, देशान्तर, कालान्तर तथा अवस्थान्तरमें समागम अदष्ट है तो भी विद्वान् लोग दाताका दानफलके साथ संब्रन्ध जानकर दाता की प्रशंसा करते है कि बहुत अच्छा काम किया, इनको बहुत आनन्द होगा, यह प्रशंसा कर्मफल संयोजयिता और किस कर्मका क्या फल होना चाहिये, यह विवेकी शासिताके बिना नहीं हो सकता, क्योंकि दानक्रिया तो प्रत्यक्षसे हो विनाशी है, इसलिए दाताका फलके साथ संयोग करानेवाला कोई अवश्य है। इन्द्रादि देवगण यद्यपि स्वयं जीवन निर्वाहके लिए समर्थ है तो भी पशु, चरु, पुरोडाशादि द्वारा स्वजीवनार्थ यजमानके अधीन होते हैं, कौन पुरुष ऐसा होगा, जा स्व्रतंत्रतासे निर्वाह योग्य होनेपर स्वापेक्ष या अधर्मकी अपेक्षा करेगा। उनकी दीनवृत्ति परमात्माकी आज्ञासे ही होती है एवं पितरलोग उक्तानुशासन वंशही दर्वी होमके अश्रित होते हैं। जो किसीकी प्रकृति तथा विक्ृति नहीं है, वह दर्वीहोम कहा जाता है।। ६ै ।। अक्षर की सत्तामें फिरभी भगवती श्रुति प्रमाण बतलाती है जैसे- यो वा एतदक्षरं गार्ग्यविदित्वाऽस्मिँल्लोके जुहोति यजते तपस्तप्यते बहूनि वर्षसहस्राण्यन्तवदेवास्य तद्द्रवति यो वा एतदक्षरं गार्ग्यविदित्वाऽस्माल्लोकारप्रैति स कृप- णोडथ य एतदक्षरं गार्गि विदित्वास्माऽ्ल्लोकात्प्रैति स ब्राह्मणः ॥ १० ॥। भावार्थ-हे गार्गी! जो कोई इस अक्षरको न जानकर होम या यज्ञ करता है,

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बाक्रण = ] विद्याविनोद भाष्य १८१

पूजा करता है और अनेक सहस्रो वप तक तप करता है, उनका वह सब वर्म नष्ट 5 वश्य होता है। हे गार्गी! इस अक्षरको न जानकर इस लोकसे मरकर जाता हैं वह दीन होता है तथा जो हे गार्गी। इस अक्षरको जानकर इस लोकसे मरकर जाता है, वह ब्राह्यण यानी ब्रह्यके तुल्य होजाता है॥ १०॥ वि० वि० भाष्य-जो पुरुष इस अक्षरको न जानकर चाहे हजारो वषो तक इस लोकमे हवन करे, याग करे, पूजा करे, जप करे, पर उसका फल अन्तवान ही होता है अर्थात् स्वर्गादिही हो सकता है, मोक्ष नही। 'यथेह कर्मीचतो लोक त्ीयते एवमेवामुत्र पुण्यचितो लोक क्षीयते' इत्यादि श्रुतिसे तथा अनुमानादिसे भी वर्म साध्य फल अन्तवान् ही माना जाता है। मोक्ष तो नित्यसिद्ध है, इसलिए कर्म- साध्य नही। और जिसके ज्ञानसे दीनताका नाश होता है और ससारका विच्छेद होता है। तथा जिसके ज्ञानके विना कर्मकृत पुरुष दीन होता है, जो कर्म किया गया है उसी का फल भोगता है और जनन मरणरूप चक्रपर आरूढ़ होकर ससारी होता है, वह अक्षर प्रशासिता अवश्य है। हे गार्गि। जो पुरुष इस अक्षरको न जानकर इस लोकसे परलोकको जाता है वह पैसोसे खरीदे हुए भृत्यके समान दीन है और हे गार्गी। जो इस अक्षरको जानकर मरता है वह ब्रह्मके समान होता है॥। १० ।। साख्यवादीका कथन है कि जैसे अभिसे प्रकाशक धर्म स्वाभाविक है वैसे यह अचंतन ही स्वाभाविक शासन करनेवाला है अत. ईश्वरत्वके निरास द्वारा उपाधि शून्य ब्रह्मकी सिद्धि किस प्रकार हो सकती है? इसपर याज्ञवल्क्यजी कहते हैं- तद्वा एतदक्षरं गार्ग्यदष्ट द्रष्ट्रश्रुतथ श्रोत्रमतं मन्त्र- विज्ञातं विज्ञातृ नान्यदतोऽस्ति द्रष्ट नान्यदतोऽस्ति श्रोतृ नान्यदतोऽस्ति मन्तृ नान्यदतोऽस्ति विज्ञात्रे तस्मिन्नु खल्वक्षरे गार्ग्याकाश तरप्रोतश्च प्रोतश्चेति॥ ११॥ भावार्थ-हे गार्गी। वही यह अक्षर अद्ष्ट होते हुए भी द्रष्टा है, अश्रुत होत भी श्रोता है, अमन्ता होते हुए भी मन्ता है और स्वयं अ्रविज्ञात होते हुए भी सबका विज्ञाता है। इससे पृथक और कोई दूसरा द्रटा नही है, इससे भिन्न और कोई दुसरा श्रोता नही है, इससे भिन्न और कोई दूसरा मन्ता नही है, और इससे भिन्न और कोई दूसरा विज्ञाता नही है। हे गार्गी। नि.संदेह इस अक्षरमे ही आकाश ओत प्रोत है।। ११ ॥

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१८२ शृहदारण्यकोपनिषद् अभ्याय ३

वि० वि० भाष्य-हे गार्गी! इस अक्षरको किर्सीने नेत्रसे नही देखा है, क्योकि वह किसीकी दृष्टिका विषय नही है, किन्तु स्वय दृष्टि स्वरूप है यानी वह स्वय सबको देखनेवाला हैं तथा किसीके श्रोत्रका विषय नही है, स्वय श्रोत्र स्वरूप है, एव मनका विषय न होनेम अमृत है, स्वय मति स्वमप होनेसे मन्ता है, विज्ञानका विषय न होने से अमृत है, किन्तु विज्ञान स्वरूप होनेसे सबका विज्ञाता अर्थात् जानने- वाला है और इस अक्षरसे अन्य कोई दर्शन क्रियाका कर्ता नही है, यही सब जगह दर्शन क्रियाका कर्ता है तथा श्रोता भी कोई दूसरा नही सर्बत्र स्वय श्रोता है एव मन्ता तथा विज्ञाता भी कोई दूसरा नही है, किन्तु स्वय सर्वत्र मन्ता तथा विज्ञाता है। अचेतन प्रधान या और कोई द्रष्टा आदि नही है, इसी अक्षरमे हे गार्गी ! आकाश ओत प्रोत है, यही साक्षात् अपरोक्ष ब्रह्म है, जो अशनायादि समस्त ससार धर्मो से अतीत है, जिससे आकाश ओस प्रोत है, वही पराकाष्ठा परागति है, वही परन्रह्म है तथा पृथिवीसै लेकर आकाश पर्यन्त सत्यका सत्त वही है ॥ ११॥ सा होवाच ब्राह्मणा भगवन्तस्तदेव बहु मन्येध्वं यद- स्मान्नमस्कारेण मुच्येध्वं न वै जातु युष्माकमिमं कश्चिद- ब्रह्मोदं जेतेति ततो ह वाचक्रव्युपरराम ॥ १२ ॥ भावार्थ-वह गार्गी बोली कि पूज्य ब्राह्मणो। आप लोग इसीको अधिक समझे कि इस याज्ञवल्कयसे नमस्कार करके आप लोग छुटकारा पा जाये, इसमे बिलकुल सदेह नही कि आप लोगोमे से कोई भी कभी इस ब्रह्मवादी याज्ञवल्क्यको जीत नही सकेगा, इस तरह कहकर पुन वचक्र कन्या गार्गी चुप हो गई। १२॥ वि० वि. भाष्य-पूज्य ब्राह्मणोका सम्बोधन कर गार्गी बोली कि हे माननीय विद्वद्गण। आप लोग इसीको बहुत समझें कि याज्ञवल्क्यको प्रणाम कर उनकी आज्ञा पाकर अनुचिताचरणसे मुक्त हो जायॅ। इन पर विजय पानेका तो मनोरथ भी नही करना चाहिये, फिर कार्यत. इन पर विजय पाना तो दूर रहा, क्योकि आप लोगोमे कोई भी विद्वाम् ऐसा नही है, जो याज्ञवल्क्यका ब्रह्मज्ञानके विषयमे पराजय कर सके। 'मेरे इन दोनो प्रश्नोका यदि ये उत्तर देगे तो इन्हें कोई नही जीत सकता' यह पहिले ही मैं कह चुकी हूँ। उत्तर सुननेसे इस समय मेरा यही दृढ निश्चय हुआ है, कि ब्रह्मज्ञानमे इनके समान दूसरा कोई नही है, यह कहकर बचक्र की पुत्री गार्गी चुप हो गेई ॥ १२॥

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विद्याविनोद भाष्य १८३

नवम ब्राह्मण

अब 'विद्ग्घ' नामा अविक प्रश्न करता है, यथा- अथ हैनं विदग्धः शाकल्यः पप्रच्छ कति देवा याज्ञ- वल्क्येति स हैतयैव निविदा प्रतिपेदे यावन्तो वैश्वदेवस्य निविदुच्यन्ते त्रयश्च त्री च शता त्रयश्च त्री च सहस्रेत्यो- मिति होवाच कत्येव देवा याजवल्क्येति त्रयस्त्रिशशदित्यो- मिति होवाच कत्येव देवा याजवल्क्येति षडित्योमिति होवाच कत्येव देवा याज्ञवल्क्येति त्रय इत्योमिति होवाच कत्येव देवा याज्ञवल्क्येति द्वावित्योमिति होवाच कत्येव देवा याज्ञवल्क्येत्यध्यर्ध इत्योमिति होवाच कत्येव देवा या- शवत्ययेत्येक इत्योमिति होवाच कतमे ते त्रयश्च त्री च शता त्रयश्च त्री च सहस्रेति॥१।। भावार्थ-गार्गी के प्रश्नोंका निर्णय होनेके बाद विदृग्व नामक शकलके पुत्रने पूछा कि हे याज्ञवल्क्य! कितने देवता है ? इस पर याज्ञवल्क्यने इस आगे कही जानेवाली 'निविद्' से ही उनकी संख्याका प्रतिपादन किया। (मंत्र रूप वाणीसे देवताओंकी संख्या जिसके द्वारा कही जाती है, वह मंत्र पदात्मक वाक्य 'निविद्' कहाजाता है। अर्थात्-बहुतसे मन्त्र ऐसे हैं जिनके एक-एक पद्से काम चल सकता है, इस अवस्थामें सम्पूर्ण मन्त्र कहने की आवश्यकता नहीं होती। इस हेतु यज्ञादि अनुष्ठानके समय बोलनेके लिए मन्त्रोंसे चुन चुन करके बहुतसे पद एकत्र किये हुए हैं वा अब भी हो सकते हैं, उन्हीं पदोंका नाम 'निष्वद्' या 'निविदा' है। जितने वैश्वदेवकी निविद्में यानी देवताओं की संख्या बतानेवाले मंत्रपदोंमें बतलाये गये हैं, वे तीन और तीन सौ और तीन हजार (तीन हजार तीन सौ छ) (३३०६) हैं। शाकल्यने ठीक कहा है। इस तरह इनकी मध्यमा संख्या ज्ञात हुई। पुनः उन देवताओं की संकुचित संख्या पूछते हैं-हे याज्ञवल्क्! कितने देव हैं ? याज्ञ-

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१८४ शृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय ३े

वल्क्यने कहा तेतीस। शाकव्यने कहा ठीक है। फिर पूछा-हे याज्ञवल्क्! इससे भी कम संख्यामें कितने देव हैं ? याज्वल्क्यने कहा-छ। शाकल्यने कहा-ठीक है। फिर पूछा-हे याज्ञवल्क्य! इससे कम संख्यामें कितने देव हैं ? याज्ञवल्कने कहा-तीन शाकल्यने कहा-ठीक है। फिर पूछा-हे याज्ञवल्क्य! कितने देव हैं ? याज्ञवल्क्पने कहा-दो। शाकल्यने कहा-ठीक है। फिर पूछा-हे याज्ञबल्क्य! कितने देव हैं ? याज्ञवल्क्यने कहा अध्यर्ध (डेढ़)। शाकल्यने कहा- ठीक है। फिर पूछा -हे याज्ञवल्क्य! कितने देव हैं ? याज्ञवल्क्यने कहा-एक। शाकल्यने कहा-ठीक है। इस तरह देवताओंके संकोच तथा. विकाश विपयक संख्या पूछकर फिर संख्येय स्वरूपको पूछता है-वे तीन हजार तीन सौ छः (३३०६) देव कौनसे हैं ? ॥ १ ॥ स होवाच महिमान एवैषामेते त्रयस्त्रिशशत्वेव देवा इति कतमे ते त्रयस्त्रि शदित्यथ्टै वसव एकादश रुद्रा द्वादशादित्यास्त एकत्रिथ शदिन्द्रश्चैव प्रजापतिश्च त्रयस्त्रिथ- शाविति॥ २॥ भावार्थ-इसके उत्तरमें याज्ञवल्क्यने कहा-ये ३३०६ देवगण इन तैंतिस देवताओंकी महिमा-विभूति ही हैं। परमार्थतः तैतीस ही देवगण हैं। शाकल्यने पुनः याज्ञवल्क्यसे पूछ्रा कि वे तैंतोस कौन हैं ? याज्ञवल्क्यने उत्तर दिया कि आठ वसु, एकादश रुद्र, द्वादश आदित्य, ये इकतीस हुए, बत्तीसवाँ इन्द्र और तैंतीसवाँ प्रजापति है॥ २ ॥ कतमे वसव इत्यग्निश्च पृथिवी च वायुश्चान्तरिक्षं चादित्यश्च दयौश्च चन्द्रमाश्च नक्षत्राणि चैते वसव एतेषु हीदं सर्वथ हितमिति तस्माद्वसव इति ॥३॥ भावार्थ-इसपर शाकल्यने पूछा कि वसु, कौन हैं ? याज्ञवल्क्यने उत्तर दिया कि अग्नि, पृथिवी, वायु, अन्तरिक्ष, आदित्य, घौ, चन्द्रमा तथा नक्षत्र ये सब वसु हैं। इन्हींमें सब स्थित हैं, अतएव ये वसु हैं अर्थात् प्राणियोंके कर्म- फलके आश्रय होकर उनके निवासस्थान देहेन्द्रिय संघात रूपसे विपरिणामको प्राप्त होकर इस समस्त जगत्को वसाये हुए हैं तथा स्वयं भी बसते हैं, [ यह उनका

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न्ाश्ण &] विद्याविनोद भाष्य १८५

वसुत्व है ]। वे क्योकि [दूसरोको अपनेमे ] वसाये।हुए हैं, इसीलिए ये वसु हैं।। ३ ।। कतमे रुद्रा इति दशेमे पुरुषे प्राणा आतमैकादशस्ते यदा डस्माच्छरीरान्मर्त्यादुत्क्रामन्त्य रोदयन्ति तद्यद्रोदयन्ति तस्माद्ुद्रा इति ॥४ ॥ भावार्थ-पुन शाकल्य ने पूछा कि हे याज्ञवल्क्य ! रुद्र कौन हैं? याज्ञवल्क्य ने उत्तर दिया कि इस पुरुषमे पञ्चकमन्द्रिय, (वाक, पाणि, पाद, पायु तथा उपस्थ) पञ्च ज्ञानेन्द्रिय, (श्रोत्र, चन्रु, रसना, घ्राण और त्वक्) और ग्यारहवॉ आत्मा (मन)। जब प्राणियोके कर्मफलोपभोगका क्षय हो जानेपर इस विनश्वर शरीरसे ये निकलते हैं, तब ये अपने सम्बन्धियोको रुलाते हैं, अत उत्क्रमणकालमे सम्बन्धियोको रुलाते है, इसलिए रोदनमे निमित्त होनेसे रुद्र कहलाते हैं॥४॥ कतम आदित्या इति द्वादश वै मासा: संवत्सरस्यैत आदित्या एते हीदथ सर्वमाददाना यन्ति ते यदिदथ सर्वमाददाना यन्ति तस्मादादित्या इति ॥५ ॥ भावार्थ-पुन शाकल्यने पूछा कि आदित्य कौन हैं? याज्ञवल्कने कहा कि वर्षके जो ये बारह महीने हैं, वेही बारह आदित्य हैं, क्योकि येही वारम्वार गमना- गमनसे प्राणियोकी आयु तथा कर्म फलोको ग्रहण करते हुए जाते है, जिस कारण ये ग्रहण कर जाते हैं (आदाययन्ति) इससे आदित्य कहे जाते हैं ॥ ४॥ कतम इन्द्रः कतमः प्रजापतिरिति स्तनयिलुरेवेन्द्रो यज्ञः प्रजापतिरिति कतमः स्तनयित्ुरित्यशनिरिति कतमो यज्ञ इति पशव इति ॥६॥ भावार्थ-पुन शाकल्यने पछा कि इन्द्र कौन हैं? और अ्रजापति कौन है? याज्वल्क्यने उत्तर दिया कि स्तनयित्तु (विद्युत्) ही इन्द्र है और यज्ञ प्रजापति है। पुन उसने पूछा कि स्तनयित्नु कोन है ? याज्ञवल्क्यने कहा अशनि-वज्र-यानी वीर्य (बल) जो प्राणियोका हिसक है, वह इन्द्र है, क्योकि यह इन्द्रका ही काम है। पुन उसने पूछा कि यज्ञ २४

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१८६ ृहदारण्यकोपनिषद् अध्याय ३

कौन है ? याज्ञवल्कयने उत्तर दिया कि पशु। यद्पि पशु स्वयं यज्ञके रूप नहीं हैं तौ भी वे यज्ञके साधन हैं, इसलिए पशु ही यज्ञ हैं-इस प्रकार कहा जाता है॥ ६ ।। कतमे षडित्यगनिश्च पृथिवी च वायुश्चान्तरिक्षं चाऽSदि- त्यश्च द्योश्चैते षड़ेते हीद& सर्वथ षडिति॥७॥ भावार्थ-शाकल्यने पूछा कि छ देवता कौन है ? याज्ञवल्क्यने उत्तर दिया कि अग्नि, पृथिवी, वायु, अन्तरिक्ष, आदित्य और दयौ। वसु रूपसे जो आठ पठित हैं, उनमेंसे चन्द्रमा और नक्षत्रको छोड़कर छ होते हैं, तात्पर्य यह है कि वसु आदि समस्त देवताओंका विस्तार इन छ मैं ही अन्तर्भूत हो जाता है॥ ८॥ कतमे ते त्रयो देवा इतीम एव त्रयो लोका एषु हीमे सर्वे देवा इति कतमौ तौ दौ देवावित्यन्नं चैव प्राणश्चेति कतमोऽध्यर्धं इति योऽयं पवत इति ॥८ ॥ भावार्थ-शाकल्यने पूछा कि वे तीन देवता कौन हैं ? याज्ञवल्क्यने उत्तर दिया कि ये तीन लोक ही तीन देव हैं ( पृथिवी और अग्नि मिलाकर एक देव है, अन्तरिक्ष और वायु मिलाकर दूसरा देव हैं तथा द्युलोक और आदित्य मिलाकर तीसरा देव हैं), क्योंकि इन तीन देवताओंमें ही समस्त देवताओंका अन्तर्भाव होता है। कोई-कोई 'भू:, भुवः, स्व,' इन्हींका तीन लोकसे ग्रहण करते हैं। इसपर उसने पूछा कि दो देव कौन हैं? याज्ञवल्क्यने उत्तर दिया कि अन्न तथा प्राण दो देव हैं, क्योंकि इन्हींमें पूर्वोक्त सब देवताओंका अन्तर्भाव हो जाता है। पुनः उसने पूछा कि डेढ़ देव कौन है ? जो यह बतलाता है, वह वायु ड़ेढ़ देव है ॥। ८ ।। तदाहुर्यदयमेक इवैव पवतेऽथ कथमध्यर्ध इति यद- स्मिन्निदश सर्वमध्याधोत्तेनाव्यर्ध इति कतम एको देव इति प्राण इति स ब्रह्म त्यदित्याचक्षते॥ ६॥ भावार्थ-इस विषयमें कोई इम प्रकार कहते हैं कि जो यह वायु है, एकसा ही चलता है, फिर अध्यर्ध क्यों ? [समाधान ] जिस कारणसे यह समस्त प्रपश् इसी वायुमें ऋद्धिको प्राप्त करता है, अतः वायु अध्यर्ध (डेढ़ ) कहा जाता

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बाक्मण & ] विद्याविनोद भाष्य १८७

है। शाकल्य-एक देव कौन है ?, याज्ञवल्क्य-प्राण। यही प्राण ब्रह्म है, क्योंकि सर्वदेवतात्मक होनेसे सबसे महान् है, अतएव 'स ब्रह्मेत्यदित्याचक्षते' यह कहा है, त्यत् शब्दसे ब्रह्म ही कहा जाता है, यह परोक्षवाची शब्द है। यही देवताओं में एकत्व तथा नानात्व है, अनन्त देवोंका निवित्संख्या विशिष्टमें अन्तर्भाव है। उन ३३ तैतीसोंका उत्तरोत्तरमें तथा अन्ततः एक प्राणमें अन्तर्भाव होता है, अतः एक प्राणका ही अनन्त संख्या विस्तार है। इसतरह एक, अनन्त और अवान्तर संख्या विशिष्ट प्राण ही होता है। अधिकार भेदसे ही एक देवका नानारूप गुण- कर्म शक्तिसे भेद है।। ह।। अब उस प्राणके ही आठ तरहके भेद बतलाये जाते हैं- पृथिव्येव यस्यायतनमननिलोको मनोज्योतिर्यो वै तं पुरुषं विद्यात्सर्वस्यात्मनः परायण सवै वेदिता स्यात्। याज्ञवल्क्य वेद वा अहं तं पुरुषं सर्वस्यात्मनः परायणं यमात्थ य एवायथ शारीरः पुरुषः स एष वदैव शाकल्य तस्य का देवतेत्यमृतमिति होवाच ॥ १० ॥ भावार्थ-जिस देवताका परथिवी ही आश्रय यानी शरीर है, अग्निलोक (लोकयति अनेन इति लोकः) नेत्र है, मन ज्योति है कारण कि मनसे हीं जीव संकल्प विकल्प करता है, प्रथिव्यादि का अभिमानी शरीर, इन्द्रिय वाला देव है, जो ऐसे पुरुषको जानता है, वह सबके आत्माओं को जानता है, क्योंकि वही सब कार्य करण सङघात आध्यात्मिक आत्माका परम आश्रय है। वही वस्तुतः आत्मज्ञानी है, जो इस परायणको जानता है। मातृज त्वक, मांस तथा रुधिर रूपसे जो क्षेत्र स्थानीय है और बीजस्थानीय पितृज जो अस्थि, मज्ज्ा और शुक्ररूप है, इन दोनों का परम अयन है। इसीका ज्ञाता सर्वात्मज्ञानसे पण्डित होता है। याज्ञवल्क्यने कहा कि मैं बस परायणको जानता हूँ, जिसको तुम कहते हो। यदि आप जानते हैं, तो उस पुरुषको कहिये वह कैसा है ? सुनो, जैसा वह है, जो शारीर पार्थि- वांस शरीरमें स्थित मातृत्व कोशत्रयरूप है, यही वह देव है, हे शाकल्य ! जिसके विषयमें तुमने पूछा है। किन्तु उसके विषयमें एक और विशेषण बतलाना आव- श्यक है सो हे शाकल्य ! उसके सम्बन्धमें पूछो।' इम प्रकार अत्यन्त तुभित किये आनेपर उसने अंकुशसे पीड़ित हुए हाथीके समान क्रोधके वशीभूत होकर

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शहंदारण्यकोपनिषद् [अष्याय ३े גבב

पूछा-उस शरीरका देवता कौन है ? जिससे उसकी उत्पत्ति होती है, याज्ञवल्क्यने कहा-अमृत हैं अर्थात् भुक्त अन्नका रस जो मातज लोहित की निष्पत्तिका कारण है, उस अन्न रससे रुधिर होता है, जो स्त्रियोंमें रहता है, वही लोहितमय शरीर बीजका आश्रय है॥ १० ॥ काम एव यस्थाऽऽयतनय हृदयं लोको मनो ज्योतिर्यो वै तं पुरुषं विद्यात्सर्वस्याSSत्मनः परायणथ सवै वेदिता स्यात्। याज्ञवल्क्यवेद वा अहं तं पुरुष 2 सर्वस्याऽऽत्मनः परायणं यमात्थ यएवायं काममयः पुरुषः स एष वदैव शाकल्य तस्य का देवतेति स्त्रिय इति होवाच॥ ११ ॥ भावार्थ-[शाकल्यने] कहा काम ही जिसका आयतन है, हृदय यानी बुद्धि नेत्र है, क्योंकि बुद्धि से ही सब जीव देखते हैं। तथा मन ज्योति है, जो सबके जीवा- त्माका परम आश्रय है, हे याज्ञवल्क्य ! जो उस पुरुषको जानता है, वही निश्चय करके सबका ज्ञाता है, ऐसा सुनकर याज्ञवल्क्यने कहा जो सबके आत्माका उत्तम आश्रय है, उस पुरुषको मैं जानता हूँ, जिसको तुम कहते हो। जो निश्चय करके यह काम सम्बन्धी पुरुन है वही यह सबका आत्मा है। हे शाकल्य ! और तुम पूछो ? पुनः शाकल्यने कहा कि हे याज्ञवल्क्य! उसका देवता यानी कारण कौन है? इसपर याज्ञवल्कयने स्पष्ट कहा कि कामका कारण स्त्रियाँ हैं, क्योंकि स्त्रियोंसे ही कामका उद्दीपन होता है॥ ११ ॥ रूपाण्येव यस्याSSयतनं चक्षुरलोको मनोज्योतिर्यो वै तं पुरुषं विद्यात्सर्वस्याSSमनः परायणस वै वेदिता स्यात्। याज्ञवल्क्य वेद वा अहं तं पुरुषथ सर्वस्यात्मनः परायणं यमात्थ य एवासावादित्ये पुरुषः स एष वदैव शाकल्य तस्य का देवतेति सत्यमिति होवाच।। १२ ।। भावार्थ-जिस पुरुषका रूप ही आश्रय है, नेत्र ही रहनेका स्थान है, मन ही प्रकाश है, जो सबके आत्माका उत्तम आश्रय है, उस पुरुषको जो निश्चय करके समस्त अध्यात्म कार्य कारण समूहका आश्रय जानता है, हे याज्ञवल्क्! वह

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माश्णा हे ] विद्याविनोद भाष्य

सबका ज्ञाता होता है, ऐसा सुनकर याज्ञवल्क्यने कहा कि हे शाकल्य ! तुम जिसे समस्त अध्यात्म कार्य-कारण समूहका परम आश्रय बतलाते हो; उस पुरुषको मै जानता हूँ। जो भी यह सूर्यमें पुरुष है, वही यह है। हे शाकल्य ! और पूछा. इसपर शाकल्यने कहा कि उस पुरुषका कारण कौन है ? तब याज्ञवल्कने कहा कि इसका कारण सत्य है। प्रकृतमें सत्य शब्दसे नेत्र कहा गया है, कारण कि अध्यात्मनेत्रसे ही अधिदैवत सूर्यकी निष्पत्ति होती है॥१२ ॥ आकाश एव यस्याSऽयतन & श्रोत्रं लोको मनोज्योतिर्योवै तं पुरुषं विद्यात्सर्वस्याSSत्मनः परायण2 सवैवेदिता स्यात्। याज्ञवल्क्य वेद वा अहं तं पुरुषथ सर्वस्याऽऽत्मनःपरायणं यमात्थ य एवायथ श्रौत्रः प्रातिश्रुत्कः पुरुषः स एष वदैव शाकल्य तस्य का देवतेति दिश इति होवाच ॥ १३ ॥ भावार्थ-पुनः शाकल्यने पूछा कि जिस पुरुषका आकाश ही आश्रय है, कर्ण रहनेका स्यान है, मन प्रकाश है, जो सबके आत्माका उत्तम आश्रय है, उस पुरुषको जो निश्चय करके समस्त अध्यात्म कार्य-कारण समूहका आश्रय जानता है, हे याज्ञवल्क्यः वह सबका ज्ञाता होता है, ऐसा सुनकर यात्वल्क्यने कहा कि हे शाकल्य ! तुम जिसे समस्त अध्यात्म कार्य-कारण समुह का परम आश्रय बतलाते हो, उस पुरुष को मैं जानता हूँ। जो भी यह श्रोत्र सम्बन्धी प्रातिश्रुत्क-श्रोत्र में रहने वाला श्रौत्र, उसमें भी प्रति श्रवणके समय विशेष रूपसे रहने वाला यानी श्रवण साक्षी-पुरुष है, वही यह है। हे शाकल्यः और पूछो, इसपर शाकल्यने कहा कि इसका देवता यानी काराण कौन है ? तब याज्ञवल्क्यने उत्तर दिया कि दिशायें है। क्योंकि दिशाओं से ही यह आध्यात्मिक पुरुष निष्पन्न होता है॥१३॥ तम एव यस्याऽडयतन हृदयं लोको मनोज्योतिर्यो वैतं पुरुषं विद्यात्सर्वस्यात्मनः परायण५स वै वेदिता स्यात्। याज्ञवल्क्य वेद वा अहं तं पुरुष सर्वस्याSऽत्मनः परायणं यमात्थ य एवायं छायामयः पुरुषः स एप वदैव शाकल्य तस्य का देवतेति मृत्युरिति होवाच॥। १४ ॥ भावार्थ-[शाकल्य ] कहते हैं कि जिस पुरुका तम ही आश्रय है, हृदय

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६९० बृहदारण्यकार्पनषद् [अष्याय ₹

रहनेका स्थान है, मन प्रकाश है, जो सबके आत्माका उत्तम आश्रय है, उम पुरुष को जो निश्चयकरके समस्त अध्यात्म कार्य-कारण समूहका आश्रय जानता है, हे याज्वल्क्य! वह सबका ज्ञाता हाता है, ऐसा सुनकर याज्ञवल्क्यने कहा कि हे शाकल्य। तुम जिसे समस्त अध्यात्म कार्य कारण समूह का परम आश्रय बतलाते हो उस पुरुष को मैं जानता हूँ। जो छायामय पुरुष है, वही यह है [ प्रकृतमें तम' शब्दसे रात्रि आदि का अन्धकार ग्रहण किया जाता है। अध्यात्म पक्षमें छायामय अज्ञानमय पुरुष ही तम है ] हे शाकल्य ! और पूछो इसपर शाकल्य ने कहा कि उस छायामय पुरुष का देवता यानी कारण कोन है? याज्ञवल्क्यने उत्तर दिया कि अधिदैवत मृत्यु ही उसकी निष्पत्तिक कारण है 'मृत्यु' शब्दसे प्रकृतमें ईश्वर (अव्याकृत) समझना चाहिए, जैसा कि यह भगवती श्रुति प्रतिपादन करती है-'मृत्युनैवेदमावृतमासीत्' अर्थात् पहिले यह मृत्युसे ही व्याप्त था। अविवेक की प्रवृत्तिईश्वरके ही अधीन है, अतः वह अज्ञानमय आध्यात्मिक पुरुपकी उत्पत्तिका कारण है। ॥ १४ ॥ रूपाण्येव यस्यायतनं चक्षुलोको मनोज्योतिर्ज्यो वै तं पुरुषं विद्यात्सर्वस्यात्मनः परायणथ सवै वेदिता स्यात्। याज्ञवल्क्य वेद वा अहं तं पुरुषथ सर्वस्यात्मनः परायणं यमात्थ य एवायमादर्शे पुरुषः स एष वदैव शाकल्य त- स्य का देवतेत्यसुरिति होवाच॥ १५ ॥ भावार्थं-शाकल्यने कहा जिस पुरुषका रूप ही आश्रय है, नेत्र ही रहनेका स्थान है, मन ही प्रकाश है, जो सबके आत्माका उत्तम आश्रय है, उस पुरुषको जो निश्चयकरके समस्त अध्यात्म कार्य कारण समूहका आश्रय जानता है, हे याज्ञवल्क्य। यह सबका ज्ञाता होता है। [पहिले साधारण रूप कहे गये हैं, किन्तु यहाँ प्रकाश करनेवाले विशिष्ठ रूप ग्रहण किये जाते हैं] ऐसा सुनकर याज्ञवल्कचने कहा कि हे शाकल्य ! तुम जिसे समस्त अध्यात्म कार्य-कारण समूहका परम आश्रय बतलाते हो, उस पुरुषको मैं जानता हूँ, जो यह दर्पणमें पुरुष है, वही यह है। हे शाकल्य ! और पूछो, शाकल्यने कहा कि जिस देवका विशेष आश्रय प्रतिबिन्बके आधार भूत आदर्शादि हैं, उसका कौन देवता है ? इसके उत्तरमें याज्ञवल्क्यने कहा कि उसका देवता प्राण है। तात्पर्य यह है कि उस प्रतिबिम्ब संज्ञक पुरुषकी उत्पत्ति प्राणसे ही होती है; क्योंकि प्राणसे घर्षणके द्वारा मालिन्यके निवृत्त होने पर ही,

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विद्याविनोद भाष्य w १६१

आदर्शादिमें प्रतिबिम्ब ग्रहण करनेकी शक्ति आती है, अतः प्राणको प्रतिबिम्ब संज्ञक पुरुषकी उत्पत्तिका कारण बतलाना ठीक है॥ १५ ॥ आप एव यस्यायतनश हृदयं लोको मनोज्योतियो वै वं पुरुषं विद्यातसर्वस्यात्मनः परायण स वै वेदिता स्यात् याज्ञवल्क्य वेद वा अहं तं पुरुष सर्वस्यात्मनः परायणं यमात्थ य एवायमप्सु पुरुषः स एष वदैव शाक- ल्य तस्य का देवतेति वरुण इति होवाच ॥ १६ ॥ भावार्थ-शाकल्यने कहा कि जिस पुरुषका जल ही आश्रय है, हृदय लोक है, मन प्रकाश है, जो सबके आत्माका उत्तम आश्रय है, उस पुरुषको जो निश्चय करके समस्त अध्यात्म कार्य कारण समूहका आश्रय जानता है, हे याज्ञवल्क्य ! वह सबका ज्ञाता होता है. [प्रकृतमें जलसे वापी, कूप, तड़ागादिमें रहनेवाला जलमात्र विवचित है ऐसा सुनकर याज्ञवल्क्ने कहा कि हे शाकल्य ! तुम जिसे समस्त अध्यात्म कार्य-कारणसमूहका परम आश्रय बतलाते हो उस पुरुपको मैं जानता हूँ, जो यह जलमें पुरुष है वही यह है। हे शाकल्य ! और पूछो ? शाकल्यने कहा कि उसका कौन देवता है ? इसपर याज्ञवल्क्यने कहा कि वरुण। यहाँ वरुण शब्दसे किरणों द्वारा पृथिवी पर गिरनेवाला जल विवच्नित है, वही वापी. कूपादि जलका कारण है, इसलिए जलमय अध्यात्म पुरुषका भी वही कारण है॥ १६ ॥ रेत एव यस्यायतन हृदयं लोको मनोज्योतिर्यो वै तं पुरुषं विद्यात्सर्वस्यात्मनः परायणथ स वै वेदिता स्याद्याज्ञवल्क्य वेद वा अहं तं पुरुष सर्वस्यात्मनः परायणं यमात्थ य एवायं पुत्रमयः पुरुषः स एष वदैव शाकल्य तस्य का देवतेति प्रजापतिरिति होवाच ॥ १७ ॥ भावार्थ-शाक्ल्यने कहा-जिस पुरुष का वीर्य ही आश्रय है, हृदय लोक है मन ग्रकाश है, जो सबके आत्मा का उत्तम आश्रय है, उस पुरुषको जो निश्चय करके समस्त अध्यात्म कार्य-कारण समूह का आश्रय जानता है, हे याज्ञवल्क्य ! वह सबका ज्ञाता होता है। ऐसा सुनकर याज्ञवल्क्य ने कहा कि हे शाकल्य ! तुम जिस समस्त अध्यात्म

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१९२ बृहदारण्यकोपनिषद् अध्याय ३

कार्य कारण समूहका परम आश्रय बतलाते हो, स पुरुषको मैं जानता हूँ, जा यह वीर्य रुप आश्रयवाले पुरुषका पुत्ररुप विशेप आयतन है वही यह है, पुत्रमयसे तात्पर्य पिता से जनित अस्थि, मज्जा तथा शुक्र है। हे शाक्ल्य ! और पूछो। शाक्ल्य ने कहा कि उसका कौन देवता है ? इसपर याज्ञवल्क्यने उत्तर दिया कि प्रजापति। प्रजापतिका तात्पर्य पितासे है, क्योकि पितासे ही पुत्रकी उत्पत्ति होती है॥ १७।। अब विभिन्न दिशाओके अनुसार पाँच भागोमें विभक्त हुए उस प्राण भेदका आत्मामें उपसंहार करनेके लिये भगवती श्रुति कहती है। अपने प्रश्नोका ठीक-ठीक उत्तर पाकर चुपहुए शाकल्यसे क्रोधवश होकर याज्ञव- ल्क्यने कहा- शाकल्येति होवाच याजञवल्क्यस्त्वाथ स्विदिमे ब्राह्मणा अद्गारावक्षयणमक्रता ३ इति ॥ १८ ॥ भावार्थ-हे विदग्ध निश्चय करके इन ब्राह्मणोने तुमको अङ्गारावक्षयण (संदशन स्थानीय बनाया है अर्थात् जिस प्रकार चिमटा अंगारेको पकड़ता हुआ दोनों ओरसे दग्ध होता है। इसी प्रकार तुम मेरे सन्मुख प्रश्नोत्तर करनेसे अत्यन्त दुःखी हो। क्योंकि मै तुमारे कठिनसे कठिन प्रश्नोंका उत्तर भले प्रकार दे रहा हू, इसलिए मैं तुमसे दयापूर्वक कहता हॅूँ कि तुम अतिप्रश्न करने से निवृत्त हो जाओ ॥ १८ ॥ वि० वि० भाष्य-क्योंकि 'अतिनिर्मथनादग्निश्चन्दनादपि जायते' यानी चन्दन शीत स्वभाव है, पर अत्यन्त रगड़ने पर उससे भी अग्नि प्रगट होजाती है। एवं यद्यपि अतिशान्त स्वभाव याह्ञवल्क्य हैं तथापि दुशग्रह पूर्वक विवादसे उत्पन्न अग्नि शाकल्यको भस्म कर देगी। तुम बालकके समान यह नहीं समझ रहे हां कि हम अग्निमें कूद रहे हैं, ये ब्राह्मण भी तुमको मना नही कर रहे हैं, उससे ज्ञान होता है कि इन लोगोकी भी राम्मति इसमें है। किन्तु मैं दयासे कहता हूँ कि तुम आत्मनाशकी चेष्टा कर रहे हो ॥ १८॥ याजल्कयेति होवाच शाकल्यो यदिदं कुरुपञ्चालानां ब्राह्मणानत्यवादी किं ब्रह्म विद्वानीति दिशो वेद सदेवा: सप्रतिष्ठा इति यदिशो वेत्थ सदेवाः सप्रतिष्ठाः ॥ १६ ॥ भावार्थ-शाकल्यने कहा कि हे याज्ञवल्क्य! जो यह तुम कुरु तथा पख्ाल

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विद्याविनोद भाष्य १६३

देशीय ब्राह्मणों पर आच्षेप करते हो सो क्या ब्रह्मको जानते हुए करते हो?। इसपर याज्ञवल्क्यने उत्तर दिया कि मेरा ब्रह्मज्ञान यह है कि जैसे तुम देवता और प्रतिष्ठा के सहित दिशाओंका ज्ञान रखते हो वैसेही मैं भी देवता और प्रतिष्ठाके सहित दिशा- ओंका ज्ञान रखता हूँ॥ १६॥ वि० वि. भाष्य-शाकल्यने कहा कि हे याज्ञवल्क! आपने कुरू तथा पशाल देशके ब्राह्मणोंका आक्षेप द्वारा तिरस्कार किया है कि ये इन सब ब्राह्मणोंने स्वयं डराकर तुमको अङ्गारावक्तयण बना रखा है, यदि भ्राप ब्रह्मवेत्ता हैं तो यह आपका निरादर सह्ा है अन्यथा सह् नहीं। याज्ञवल्क्यने उत्तर दिया कि हे- शाकल्य ! में नहीं कह सकता हूँ कि मैं ब्रह्मको जानता हूँ और यह भी नहीं कह- सकता कि ब्रह्मको नहीं जानता हूँ, क्यों कि जानना न जानना बुद्धिके धर्म हैं, मुझ आत्माके नहीं है, मैं ब्रह्मज्ञानी पुरुषोंको बारम्बार नमस्कार करता हूँ, मैं पूर्व दिशाओं को तथा उनके देवता और प्रतिष्ठाको जानता हूँ जिनको आपभी जानते हैं, यदि उनके विषयमें कुछ पूछना हो तो पूछ सकते हैं। शाकल्यने क्रोधमें आकर कहा कि यदि आप देवता और प्रतिष्ठाके सहित दिशाओको जानते हैं तो कहिये कि पूर्व दिशामें कौन देवता है?॥ १६॥ वि० वि० भाष्य-गार्गी के चुप होने के बाद शाकल्य ब्राह्मण याजवल्क्यसे एक प्रश्न के बाद एक दूसरा प्रश्न, दूसरेके बाद तीसरा प्रश्न इस तरह उत्तरोत्तर प्रश्न करने लगा। पहिले उसने पूछा कि कितने देव है, इसके उत्तरमें याज्ञवल्क्यने कहा कि ३३०६ देव हैं, वस्तुतः ३३ ही देव हैं और शेष इनकी महिमा है। ३३ कौन हैं ? इसके उत्तर में उन्होंने कहा कि-अग्नि, पृथिवी, वायु, अन्तरिक्ष, आदित्य, धौ, चन्दमा नक्षत्र, ये आठ वसु, पाँच कमेन्द्रिय, पाँच ज्ञनेन्द्रिय, एक मन, मे ११ रूद्र, १२ आदित्य यानी १२ मास, इन्द्र-विद्युत्-अशनि और प्रजापति-यज्ञ-पशु ये ३३ हुए। इन तैतिसों का अंतर्भाव यानि, पृथिवी, वायू आकाश, सूर्य, दौइन छ देवों में हैं। इन छ हो का अन्तर्भाव भू, अन्तरिक्ष, स्वर्ग इन तीन लोकोंमें है, क्योंकि भूलोकमें अग्नि देव की, अन्तरित्ष में वायु देव की, स्वर्ग में आदित्य की स्थिति रहती है। इन तीनोंका अन्तर्भाव प्रण और अन्न में है। यहाँ पर प्राण शब्द से नित्य पदार्थ ग्रहण ह तथा अ्न्न से अनित्य पदार्थ का ग्रहण हैं, अथवा पहिला कारणरूप हैं, दूसरा कार्यरूप ह इन्हीं दोनों में सब ओत प्रोत हैं। इन दोनों का अन्तर्भाव अध्यर्ध में है, वायु अध्यर्ध है, क्योंकि उसी में यह दश्यमान समस्त जगत् अधिक ऋद्धि को यानी वृद्धि को प्राप्त

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१२४ शृहदारण्यकोपनिषद् [अभ्भाय २

होता है, अत• वह अध्यर्ध कहलाता ह, इनका भी अन्तर्भाव एक प्राण यानी ब्रह्ममें ह, क्योंकि ब्रह्म ह। मे समस्त प्रपख् ओत प्रोत है। इसके बाद साकल्य का यह प्रश्न है कि-पृथिवी का आश्रय पुरुष कौन है? उत्तर देते हैं-शरीरस्थ पुरुष। प्रश्न है उसका देवता कौन है ? उत्तर देते है-अमृत यानी वीर्य ह। प्रश्न करते हैं-कामायतन पुरुष कौन है ? उत्तर हुआ-काममय पुरुप। प्रश्न करते है-उसका देवता कौन है? उत्तर देते हैं खी है। प्रश्न करते हैं। सामान्य रूपाश्रय पुरुष कौन है ? उत्तर हुआ-सूर्य- स्थ पुरुष, प्रश्न करते है। उसका देवना कौन ह ? उत्तर देते है-सत्य यानी ब्रह्म है। प्रश्न करते हैं-आकशाश्रय पुरुष कौन है? उत्तर देते हैं-श्रोत्र सम्बन्धी श्रवण साक्षी पुरुष। प्रश्न करते हैं-उसका देवता कौन है? उत्तर देते हैं-दिशायें हैं। प्रश्न करते है-तमाश्रय पुरुष कौन है ? [उत्तर ] हुआ-छायामय पुरुष। फिर पूछते है-उसका देवता कौन है१ [उत्तर ] मृत्यु है। [फिर प्रश्न ]-विशेषरुपाश्रय पुरुष कौन है ? इसका उत्तर आदर्शगत पुरुष। पुन प्रश्न-उसका तेवता कौन है? उत्तर-असु-प्राण है। फिर प्रश्न-जलाश्रय पुरुष कौन है ? उत्तर जलगत पुरष, पुन· प्रश्न-उसका देवता कौन है ? उत्तर-है। [वीर्याश्रय पुरुप कौन है? उत्तर-पुत्रमय पुरुष प्रश्न-उसका देवता कौन है ? उत्तर-प्रजापति यानी पिता है। यहॉ तकका अभिप्राय यह है कि एक एक देवता ही अपनेको देव, लोक और पुरुष भेदसे तीन- तीन भागोमें विभक्त करके आठ प्रकारसे स्थित हुआ है,[ लोक-सामान्याकार, पुरुष-विशेषाकारमे म्थित चेतन और देवता-इन दोनोका कारण] प्राणभेद अर्थात् पृथक-पृथक इन्द्रिय समुदाय ही वह देवना है, उपासना की सुविधाके लिए यहॉ विभाग पूर्वक उनका उपदेश किया गया है॥ १६ ॥ कि देवतोऽस्यां प्राच्यां दिश्यसीत्यादित्यदेवत इति स आदित्य: कस्मिन्प्रतिष्टित इति चक्षुषीति कस्मिन्नु चक्षः प्रतिष्ठितमित रूपेष्विति चक्षुषा हि रूपाणि पश्यति कस्मिन्नु रूपाणि प्रतिष्ठितानीति हृदय इति होवाच हृदयेन हि रूपाणि जानाति हृदये ह्येव रूपाणि प्रतिष्ठि- तानि भवन्ती येत्रमेवैतद्याज्ञवल्कय ॥ २० ॥ भावार्थ-शाकल्यने पूछा-तुम इम पूर्व दिशामें किम देवतासे युक्त हो? याजल्क्यने कहा, मैं आदित्य देवतासे युक्त हूँ। शाकल्यने पूछा' आदित्य किसमे

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बाभ्षण & ] विद्याविनोद भाष्य १६५

स्थित है ? याजवल्क्यने कहा चन्तुमें। (शाकल्पने) पूछा चन्ु किसमें स्थित है? तब याज्ञवल्क्यने उत्तर दिया रूपोंमें, कारण कि चन्नुसे ही पुरुष रूपोंको देखता है। शाकल्यने प्रश्न किया रूप किसमें स्थित है ? याजवल्क्यने कहा कि हृदयमें क्योंकि पुरुष हृदयसे ही रूपों को जानता है, इसलिए हृदयमें रूप स्थित है। शाक- लयने कहा कि हे याज्ञवल्क्य ! यह बात ऐसी ही है जैसा आप कहते हैं॥ २० ।।

वि. वि• भाष्य-शाकल्यने कहा, ह याज्ञवल्क्य! यदि'आप सदेव तथा सैप्रतिष्ठ दिशाओंको जानते हैं, यदि आपको इस विपयका प्रत्यक्ष है, तो कहिये कि आप किस देवतासे विशिष्ट होकर पूर्व दिशामें स्थित हैं ? याज्ञवल्क्य पूर्वाभिमुख थे, अतपव पहिले शाकल्यने पूर्व दिशाके विषयमें ही पूछा। यहॉ इस प्रकार प्रश्न करने- का कारण यह है कि दिशाओंमें पञ्नधा विभक्त अपने हृदयका आत्मा मानकर यानी पाँच दिशाओंका आत्मा मेश हृदय है। यह मान कर हम ही दिगात्मा हैं, यह निश्चय याज्ञवल्क्यने कहा था कि देवसे प्रतिष्ठित दिशाओंको हम जानते हैं ऐसी ही याज्ञव- ल्क्यकी प्रतिज्ञा थी, उसके अनुसार ही शाकल्यका प्रश्न हैं कि 'कि देवतस्त्वमस्यां' बर्थात् आप किस देवतासे विशिष्ट होकर पूर्व दिशामें स्थित हैं, अतः शाकल्यका प्रश्न ठीक ही है। याज्ञवल्क्यने उत्तर दिया कि पूर्व दिशामें मै आदित्य देवतासे युक्त हूँ यानी पूर्व दिशामें आदित्य मेरा देवता है। वेदमें यह लिखा है कि 'यां यां दे- वता सुपास्ते इहैव तद्भूतः तां तां प्रतिपद्यते' अर्थात् जिस जिस देवताकी जो उपा- सना करता है, वह उपासक इसीलोकमें तत्तदेवता स्वरूप होकर उस उस देवताको स्वस्वरूप जानता है, ऐसा ही भगवती श्रुति आगे कहेगी कि देव होकर देवोंमैं लीन होता है। इस तरह सदेव पूर्व दिशा तो कह दी गई. अब प्रतिष्ठा सहित कहनी है, अतः शाकल्य कहता है कि वह आदित्य किसमें प्रतिष्ठित है ? उत्तर चन्तुमें, क्योंकि कार्य कारणमें ही प्रतिष्ठित होता है। सूर्यका कारण 'चक्षो सूर्योऽजायत' इस श्रुतिके अनुसार चक्षु ही है, अतः आदित्य चन्तुमें प्रतिष्ठित है। प्रश्न चन्तु किसमें प्रतिष्ठित है ? उत्तर-रूपमें यहाँ शङ्का होती है कि चक्षुका कारण तो रूप नहीं है फिर रूपमें चक्षु कैसे प्रतिष्ठित है ? समाधान-रूप ग्रहण करनेके लिए रूपात्मक चन्तु रूपोंके द्वारा प्रयुक्त होता है, रूपोंने अपने ग्रहणके लिए चन्तुका आरम्भ किया है, अतः चन्तु रूप प्रयुक्त होनेके कारण रूपमें प्रतिष्ठित है, इसलिए आदित्यके साथऔर उस दिशा में स्थित पदार्थोंके साथ रूपमें प्रतिष्ठित है, जिस गुणसे जो इन्द्रिय उत्पन्न है वह उस गुणकी त्हिका है। पुनः शाकल्यने कहा कि अच्छा तो चनुके सहित समरन

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१६६ शृहदारण्यकोपनिषद् अध्याय ३

पूर्व दिशा रूप मात्र है, किंतु रूप किसमें प्रतिष्ठित है ? याज्ञवल्चने उत्तर दिया कि हृदयमें। हृदयारब्ध रूप है। हृदय ही रूपाकारसे परिणत होता है, इसालिए समस्त प्राणी हृदयसे रूको देखते हैं। हृदय शब्दसे बुद्धि तथा मन दोनोका ग्रहण है। हदयकी दो वृत्तियाँ होती है, एक अध्यवसायात्मिका, जिसका बुद्धि कहते हैं। और दूसरी संकल्पात्मिका, जिसको मन कहते हैं। व्यावृत्त व्यवहारके लिये बुद्धि और मन आदि शब्द हैं और सम्मिलित-व्यवहारक लिए अन्तःकरण तथा हृदय आदि शब्द हैं, इसलिए हृदयमें ही रूप प्रतिष्ठित हैं। हृदयसे वासनात्सक रूपका स्मरण होता है, अतः हृकयमें रूप प्रतिष्ठित है, यह कहना उचित ही है। इसपर शाकल्यने कहा कि हे याज्ञवल्क्य ! यह बात ऐसी ही है॥ २०॥ किंदेवतोऽस्यां दक्षिणायां दिश्यसीति यमदेवत इति स यमः कस्मिन्प्रतिष्ठित इति यज्ञ इति कस्मिन्नु यज्ञः प्रतिष्ठित इति दक्षिणायामिति कस्मिन्तु दक्षिणा प्रतिष्ठितेति श्रद्धायामिति यदा ह्येव श्रद्धत्तेऽथ दक्षिणां ददाति श्रद्धाया : ह्येव दक्षिणा प्रतिष्ठितेति कस्मिन्तु श्रद्धा प्रतिष्ठितेति हृदय इति होवाच हृदयेन हि श्रद्धा जानाति हृदये ह्येव श्रद्धा प्रतिष्ठिता भवतीत्येवमेवैत- द्याजवल्कय॥ २१॥ भावाथ-प्रश्न-तुम इस दक्षिण दिशामें किस देवतासे युक्त हो? उत्तर यम देवतासे। प्रश्न-वह यम किसमें स्थित है? उत्तर-यज्ञमें। प्रश्न-यक्ष किसमें स्थित है? उत्तर-दक्षिणामें। प्रश्न-दृक्षिणा किसमें स्थित है? उत्तर-श्रद्धामें। क्योंकि जब पुरुष श्रद्धायुक्त होता है तभी दक्षिणा देता है, अतः श्रद्धामें ही दक्षिणा प्रतिष्ठित है। तब शाकल्यने पुनः प्रश्न किया कि श्रद्धा किसमें स्थित है ? याज्ञवल्कने उत्तर दिया कि हृदयमें, क्योंकि हृदयसे ही पुरुष श्रद्धाको जानता है, इसलिए हृदयमें ही श्रद्धा स्थित है। इसपर शाकल्यने कहा कि हे याज्ञवल्क्य ! यह बात ऐसी ही है॥२१।। वि• वि० भाष्य-शाकल्यने पूछा कि दक्षिण दिगभूत आपका देवता कौन है ? याज्ञवल्क्यने अपने हृदयका पञ्वधा विभागकर स्वयं दिकस्वरूप होकर उसके द्वारा अपनेको समस्त जगदात्मक समझकर पूर्वके समान उत्तर दिया कि

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विरधाविनोद भाष्य १६७

दक्षिणदिगरूप मेरा देवता यम है। यम किसमे प्रतिष्ठित है? यज्ञरूप कारणमे दक्षिण दिशा के साथ यम प्रतिष्ठित है। यज्ञका कार्यं यम इम तरह है कि ऋत्विग आदि द्वारा किये गय यज्ञ को दक्षिणा द्वारा यजमान खरीद कर उस यज्ञसे दक्षिण दिशाके साथ यमको जीत लेता है, इसलिए यज्ञमे यमकार्य होनेसे यम यज्ञमे दक्षिण दिशाके साथ प्रतिष्ठित है। यज्ञ किसमे प्रतिष्ठित है? श्रद्धामे श्रद्धासे तात्पर्य है देनेकी इच्छा यानी भक्ति सहित आस्तिक्य बुद्धि। शका दक्षिणा उसमे कैसे प्रतिष्ठित है? समाधान- जब यजमान श्रद्धा करता है तब दक्षिणा देना है, इमलिए दक्षिणा श्रद्धामे ही प्रतिष्ठित है। श्रद्वा किसमे प्रतिष्ठित है? हृदयमे। श्रद्वा हृदयकी ही वृत्ति है, क्योकि हृदयसे ही लोग श्रद्धाको जानत हैं। वृत्ति वृत्तिमान्मे ही प्रनिष्ठित होती है इसलिए हृदयमे ही श्रद्धा प्रतिष्वित है। शाकल्यने कहा कि हे याज्ञवल्क्य । हॉ यह ऐसी ही बात है, इस प्रकार कहकर स्वीकार किया॥ २१॥ किंदेवतोऽस्यां प्रतीच्यां दिश्यसीति वरुणदेवत इति स वरुण: कस्मिन्प्रतिष्ठित इत्यप्स्विति कस्मिन्वापः प्रति- छठिता इति रेतसीति कस्मिन्नु रेतः प्रतिष्ठितमिति हृदय इति तस्मादपि प्रतिरूपं जातमाहुहदयादिव सृप्तो हृदया- दिव निर्मित इति हृदये ह्येव रेतः प्रतिष्ठितं भवतीत्येवमे- वैतद्याजवल्क्य।। २२।। भावार्थ-शका-इस पश्चिम दिशामे तुम किस देवतासे युक्त हो ? समा- धान। वरुणसे यानि पश्चिम दिशामे मेरा अधिष्ठातृदेव वरुण है। शंका-वरुण किसमे प्रतिष्ठित है?, समाधान-जलमे। जळ वरुणका कारण है, क्योकि 'श्रद्धा वा आप' यानी श्रद्धा ही जल है तथा 'श्रद्धातो वरुणमसृजत' अर्थात् श्रद्धासे वरुणको रचा। ऐसी श्रुति है। शंका-जल किसमें प्रतिष्ठित है? समाधान- रेत-वीर्यमे, क्योकि रेतसो हि आप सृष्टा'-वीर्यसे जलकी रचना हुई' यह श्रुति है। शका-वीय किसमे प्रतिष्ठित है? समाधान-हृदयमे, क्योकि वह हृदयका कार्य है-रेत (काम) हृदय की वृत्ति है कामी पुरुषके हृदयसे रेत गिरता है, अत एव अनुरूप पुत्र होनेपर लोग कहते है कि इसके पिताके हृदयसे पुत्र उत्पन्न हुआ है। हृदयसे ही मानो यह रचा गया है। जैसे कि कनकसे कुण्डल बनता है, अत. हृदयमे ही वीर्य प्रतिष्ठित है, शाकल्यने कहा कि हे याज्ञवल्क्य । यह ऐसी ही बात है ॥।२२।।

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ृहदारण्यकोपानपद अेध्याय ३

किं देवतोऽस्यामुदीच्यां दिश्यसीति सोमदेवत इति स सोम: कस्मिन्प्रतिष्ठत इति दीक्षायामिति कस्मिन्नु दीक्षा प्रतिठ्ठितेति सत्य इति तस्मादपि दीक्षितमाहुः सत्यं वदेति सत्ये ह्येव दीक्षा प्रतिष्ठितेति कस्मिन्नु सत्यं प्रति- छठितमिति हृदय इति होवाच हृदयेन हि सत्यं जानाति हृदये ह्येव सत्यं प्रतिष्ठिनं भवतीत्येवमेवैतद्याज्ञवल्क्य।।२३।। भावार्थ-शंका-इस उत्तर दिशामें तुम किस देवतायुक्त हो ?, समा- धान-सोम देवतासे. 'सोमदेवतः' इसमें सोमलता तथा चन्द्रमा दोनोंके अभि- प्रायसे सोम शब्दका प्रयोग किया गया है। शंका-वह सोम किसमें प्रतिष्टित है? समाधान-दीक्षामें, क्योंकि दीक्षित यजमान सोमक्रमण करता है, तथा क्रीत सोमसे यज्ञ कर ज्ञानी होकर सोम देवसे अधिष्ठित सोम सम्बन्धिनी उत्तर दिशाको प्राप्त होता है। शंका-दीक्षा किसमें प्रतिष्ठित है ?, समाधान-सत्यमें, क्योंकि दीक्षा सत्यमें प्रतिष्ठित है, अत एव दीक्षित पुरुषसे यह कहा जाता है कि सत्य बोछो, कारण कि सत्यरूप कारणका नाश होनेसे दीक्षारूप कार्यका नाश न हो, इसलिये सत्यमें ही दीक्षा प्रतिष्ठित है। शंका-सत्य किसमें प्रतिष्ठित है?, समाधान- हृदयमें, क्योंकि हृदयसे ही सत्य जाना जाता है, इसलिये हृदयमें ही सत्य प्रति- छ्वित है। 'हाँ हेयाज्ञवल्क्य ! यह ऐसी ही बात है, इस प्रकार कहकर शाकल्यने स्वीकार किया॥ २३ ॥ किंदेवतोऽस्यां ध्रुवायां दिश्यसीत्यन्निदेवत इति सोऽ- भिः कस्मिन्प्रतिष्ठित इति वाचीति कस्मिन्नु वाक् प्रतिष्ठि- तेति हृदय इति कस्मिन्नु हृदयं प्रतिष्ठितमिति॥२४॥ भावार्थ-शाकल्यने पूछा कि हे याज्ञवल्क्य! ध्रुवा दिशामें तुम किस देवतासे युक्त हो ?, ध्रुवासे उर्ध्व दिशा विवत्ित है। मेरु पर्वतके चारों ओर रहनेवालों की जो अव्यभिचारी उर्ध्व दिशा है, ध्रुवा कहलाती है अर्थात् अव्य- भिचरितको ध्रुवलोक कहा जाता है, समाधान-अग्नि देवतासे, क्योंकि उद्धूर्व दिशा प्रकाशमय है और प्रकाश ही अग्नि है। शंका-अग्नि किसमें प्रतिष्ठित है १, समा- धान-बाजीमें। शंका वाणी किसमें प्रतिप्वित है? समाधान-हदयमें॥ २४ ॥

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माक्रण : ] वविद्याविनोद भाष्य १६६

अहल्लिकेति होवाच याज्ञवल्क्यो यत्रैतदन्यत्रास्मन्म- न्यासै यध्ह्येतदन्यत्रास्मत्स्याच्छ्वानो वैनदद्युर्वयाथसि वैन- द्विमथ्नीरन्निति॥२५ ॥ भावार्थ-याज्ञवल्क्यने कहा कि अरे अहंल्लिक! जब तुम ऐसा मानोगे कि यह आत्मा (ह्ृदय) इस हमारे देहसे अलग है तब जो यह आत्मा इस शरीर से अलग हो जाय तो इस शरीरको कुत्ते खा जायँ या इस शरीरको पक्षी चोंध मारकर खाडालें । २५॥ वि• वि० भाष्य-अहंल्लिक, शब्द 'अहनि लीयते-इति अहंल्लिकः, अर्थात् जो दिनमें कहीं छविप जाय और रात्रिमें दीखे, इस अर्थका बोधक है। इसका अर्थ निशाचर, राक्षस आदि हुआ। क्या तूँ 'हृदय किसमें प्रतिष्ठित है ? इसै भी नहीं जानता था, जो ऐसा प्रश्न किया, अतः ज्ञान होता है कि यह तेरी जान बूझकर घृष्टता है। 'तुम इस हृदयको हमसे कहीं अन्यत्र मानते हो ?, यह जानकर याज्ञवल्क्य क्रुद्ध हो विद्ग्ध वा शाकल्य आदि नामोंसे इसको सम्बोधन न करके 'अहंल्लिक, इस नामसे सम्बोधितकर समाधान करते हैं॥ २५॥। कस्मिन्नु त्वं चात्मा च प्रतिष्ठितौ स्थ इति प्राण इति कस्मिन्नु प्राणः प्रतिष्टिति इत्यपान इति कस्मिन्वपान: प्रतिठिति इति व्यान इति कस्मिन्तु व्यान: प्रतिष्ठित इत्युदान इति कस्मिन्नूदानः प्रतिष्ठित इति समान इति स एष नेति नेत्यात्माऽगह्यो न हि गह्यतेS- शीर्यों त हि शीर्यतेऽसङ्गो न हि सज्यतेऽसितो न व्यथते न रिष्यति। एतान्यष्टावायतनान्यष्टौ लोका अष्टौ देवा अष्टौ पुरुषा: स थस्तान्पुरुषान्निरुह्य प्रत्युद्यात्यक्रामन्तं त्वौपनिषदं पुरुषं पृच्छामि तं चेन्म न विवत्यसि मूर्धा ते विपतिष्यतीति। तथ हन मेने शाकल्यस्तस्य ह मूर्धा विपपातापि हास्य

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२00 बृहदारण्यकोपनिषद् [अभ्याय ₹

भावार्थ-शाकल्यने पूछा कि आप और आपका आत्मा किसमें स्थित है ? याज्वल्क्यने उत्तर दिया-प्राणमें। शाकल्यने पूछा, प्राण किसमें स्थित है ? अपान में। अपान किसमें स्थित है?, व्यानमें। व्यान किसमें स्थित है? उदानमें। वदान किसमें प्रतिष्ठित है ? समानमें, जो वेदमें नेति-नेति करके कहा गया है, वही यह आत्मा अग्राह्य है, क्योंकि वह ग्रहण नहीं किया जा सकता, अशीर्य है- वह नष्ट नहीं होता, असङ्ग है-उसका संग नहीं किया जा सकता, वह असित यानी बन्धन रहित है-वह पाड़ित तथा नष्ट नहीं होता। हे शाकल्य ! ये आठ स्थान है, आठ लोक है, आठ देव हैं तथा आठ पुरुप हैं। सो जो कोई बन पुरुषोंको जानकर और अपने अन्तः करणमें रखकर उपाधि विशिष्ट धर्मोंका अतिक्रमण किये हुए है, उस उपनिषत्सबन्धी तत्वभित् पुरुपको जानता है मैं पूछता हूँ यदि तुम मुझसे उसको न कहेगा तो वेरा सिर गिर जायगा, परन्तु शाकल्य उस पुरुषको नहीं जानता था, इसलिये उसका मस्तक सबके सामने गिर पड़ा। यही नहीं, अपित उसकी हड्डियोंको और कुछ समझते हुए चोरलोग लेकर भागगये ॥ २६॥ वि. वि० भाष्य-शाकल्य-हृदय तथा शरीर परस्परमें प्रतिष्ठित हैं, यह तो आपने कहा। अब कार्य और कारणके विषयमें पूछता हूँ, उसका भी उत्तर दीजिये। तुम (शरीर) और आत्मा (हृदय)-ये दोनों किसमें प्रतिष्टित है?, प्राणमें। शरीर और आत्मा ये दोनो प्राणमें यानी प्राणवृत्तिमें प्रतिष्ठित हैं। प्राण किसमें प्रतिष्ठित है ? अपानमें, क्योंकि यदि अपान न रहता तो प्राणवृत्ति पहिले ही निकल जाती, इसलिये अपानसे निगृहीत प्राण शरीरमें स्थित रहता है। अपान किसमें प्रतिष्ठित है ?, व्यानमें, क्योंकि अपान नीचेसे चलाजाता और प्राण उपरसे चला जाता, यदि मध्यस्थित व्यान दोनोंको रोकता। व्यान किसमें प्रतिष्ठित है ?, उदानमें, क्योंकि उक्त तीनों वृत्तियाँ कीलस्थानापन्न उदानमें यदि बँधी न होती, तो चारों तरफसे निकल जाती। उदान किसमें प्रतिष्ठित है समानमें। समानमें ही ये सब तृत्तियाँ प्रतिष्ठित हैं। तात्पर्य यह है कि अन्योन्य प्रतिष्ठित शरीर, हृदय तथा वायु नियमपूर्वक संहत हैं। संहत परस्पर प्रतिष्ठित होते हैं, जैसे घटादि पा- र्थिव आदि चार तत्वोंसे बने हैं वे चारों तत्व परस्पर प्रतिष्ठित हैं, यदि घटमें पार्थिव तत्व न रहे ता घटके अवयव बालूके कणके समान एक दूसरेसे नहीं सटेंगे। अवयव के दढ़ संश्लेषका कारण स्नेह है और स्नेह जलका गुण है, अतः संहतका परस्पराश्रयत्व होना ठीक ही है। उक्त सब जिससे नियत हैं, जिसमें

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भाजन : ] बिद्याविनोद भाष्य २०१

प्रतिष्ठित हैं तथा आकाश पर्वत सम्पूर्ण पदार्थ ओत-प्रोत हैं, उस उपाधिशून्य सा- नात् अपरोक्ष ब्रह्मका निदेश अवश्य करना चाहिये। अतः यह आरम्भ है। जो मधुकाण्डमें 'नेति-नेति' इत्यादि वाक्यसे निर्दिष्ट है, वह यही है। यह आत्मा अगृह्य है, कोई भी इसका ग्रहण नहीं कर सकता, क्योंकि आत्मा सम्पूर्ण कार्य धर्मोंसे परे है, इसलिए अगृह्य है, जो पदार्थ व्याकृत है, वही ज्ञानविपय है। यह आत्म- तत्व उक्तसे विपरीत है, इसलिये अगृह्य है। वैसे ही अशीर्य है अर्थात् अविनाशी है तथा असङ्ग है। अन्य मूर्तसे संबद्ध होकर मूर्त ही सटता है। उदम्बर आदिकी शाखा और जन्तु ये दोनों मूर्त हैं, अतः उक्त शाखा और जन्तुका परस्पर संश्लेष होता है। यह उसके विपरीत है, इसलिये संसक्त नहीं होता। तथा असित यानी जबद्ध है जो मूर्त होता है, वह बद्ध होता है, यह उससे विपरीत है। अवद्ध होने हीके कारण व्यथित भी नहीं होता, इसलिए हिंसित्त भी नहीं होता। ग्रहण, विशरण सङ्ग संबद्ध आदि कार्य-धर्मो से शून्य होनेके कारण आत्मा हिंसाविषय नहीं होता यानी कभी उसका विनाश नहीं होता। आख्यायिका क्रमको छोड़कर तथा आ- ख्यायिकासे संबन्ध हटाकर औपनिषद् पुरुषके स्वरूपका निदेश भगवती श्रुतिने शीघ्र करदिया। अब पुनः भगवती श्रति आख्यायिकाके अनुसार ही वर्णन करती है-ये जो थाठ आायतन हैं (पृथिवी, काम, रूप, आकाश, तम, रूप, उदक और रेत-वीर्य), जो आठलोक हैं-(अग्नि, हृदय, नेत्र, कर्ण, हृदय, चन्नु हृदय, और हृदय), जो आठदेव हैं (अमृत, स्त्री, सत्य, दिशा, मृत्यु, असु, वरुण, और प्रजा- पति) तथा आठ जो शारीर आदि पुरुष हैं ( पुरुष-शारीर, काममय, आदित्यस्थ, श्रौत प्रातिश्रुत्क, छायामय, दर्पणादिस्थ प्रतिबिम्ब जलस्थ-वापी, कूप, तड़ाग आदि का अभिमानी, तथा पुत्र मय) जो कोई पुरुष उन शारीर आदिको जानकर अर्थात् अष्ट चतुष्क भेद से लोक स्थितिका उपपादन कर पुनः प्राची दिशा आदि द्वारा आत्मामें उपसंहार कर हृदयादि उपाघि धर्मोसे अतिक्रान्त हो स्वस्वरूपसे व्यव- स्थित जो औपनिषद् अशनायादि शून्य है, उस पुरुषको मैं तुमसे पूछता हूँ और यह भी कहा कि हे साकल्य ! यदि हमसे उसको न कहोगे, तो तुम्हारा शिर धड़से अलग हो जायेगा; किन्तु शाकल्य उस पुरुषको न समझ सका, इसलिये उसका शिर गिर गया। और चोरोंने दाहके निमित्त ले जाते हुए उस शरीरको देखकर और कुछ समझ उसे वे लेकर भाग गये ॥ २६ ॥ विशेषशिक्षा-इस वृत्तान्तसे यह शिक्षा ग्रहण करनी योग्य है कि परमशान्त महामुनि याज्ञवल्क्य जिस विवादसे ऐसे क्लेशित हुए कि इन्होंने कर्मनिष्ठ विद्वान् २६

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२०२ शृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याब ३

तपस्वी शाकल्यको भस्मकर दिया, ऐसे विवादमें कल्याणार्थीको कभी प्रवृत्त नहीं होना चाहिये, अतएव धर्मशास्त्रमें लिखा है- गुरु हुंकृत्य त्वंकृत्य विमं विर्जित्य वादवः । श्मशाने जायत वृक्षः कङ्कगृधरोपसेवितः ॥ इत्यादि शास्त्रके अनुसार शास्त्रार्थद्वारा विद्वान्का पराजय करना अत्यन्त निकृष्टकर्म है, इसलिये इसका स्वथा त्याग करना चाहिये। याज्ञवल्क्य और शाकल्य दोनों ब्राह्मण विद्वान् तपस्वी तथा सुशीतल चन्दन शाखाके समान थे, जब उनमें भी उक्त घटनासे भयङ्कर परिणाम होगया, तब साधारण मनुष्योंके विषयमें तो कहना ही क्या है ? वादसे अधिक कष्टप्रद दूसरा पदार्थ नहीं है, याज्ञवल्क्य और शाकल्यने भी इससे अन्तनः शत्रुभाव उत्पन्न करही दिया, इसलिये कल्याणार्थियोंको सदा इससे दूर रहना चाहिये। अन्त्येष्टिद्वारा जो पिताको नरकमें जानेसे रोकता है, वह पुत्र है, इस अर्थकी भी शाकल्यको आशा नहीं रही। यह तब होती जबकि शाकल्यका अस्थिपस्जर निर्विन्न घर पर पहुँच जाता वहाँ जानेपर पुत्र आदि द्वारा यथाविधि संस्कारसे द्वेषप्रयुक्त पापका प्रतीकार होसकता था और शाकल्यका परलोक भी सुधर जाता, किन्तु वह भी न होने पाया, इसलिये विवाद इहलोक परलोक दोनोंका विनाश करता है, इसलिये सर्वथा अनुपादेय है, यह सूचित करनेके लिये यह आख्यायिका है॥ २५-२६॥ शाकल्य तथा याजञवल्क्यकी संवाद स्वरूप आख्यायिकाकी समाप्तिके बाद आई हुई 'अथ होवाच' इत्यादि श्रुतिका अभिप्राय यह है कि जो औपनिषद पुरुष कहा गया है, उसमें विज्ञानानन्दरूपत्व एवं भोगमुक्तिदातृत्व भी है, जिसका अभीतक निर्वचन नहीं किया गया है, अतः उसको कहना आवश्यक है, 'नेति नेति' इत्यादि वाक्योंसे अनात्मभूत समस्त पदार्थोंके निपेधद्वारा जिसका निर्देश किया गया है, विधिद्वारा भी उसका निर्देश होना चाहिये, अतः उत्तर श्रुति है। इसकारण औपनिषद पुरुष कहा जायेगा, यह भी आख्यायिका द्वाराही कहा गया है। इसमें प्रधान हेतु यह है कि दुर्बोध अर्थका भी आख्यायिकाद्वारा निर्वचन होनेपर वह सुगमतासे समझमें आजाता है, इसलिये सुखावबोधके लिये आख्यायिका है- अथ होवाच ब्राह्मणा भगवन्तो यो वः कामयते तं वः पृच्छामि सर्वान्वा वः पृच्छामीति। ते ह ब्राह्मणा न दधृषुः ॥२७।

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ब्राश्मण & ] विद्याविनोद भाष्य २०३

भावार्थ-उसके बाद याज्ञवल्क्यने कहा कि हे पूज्य ब्राह्मणों! आप लोगोंमेंसे जिसकी इच्छा हो वह मुझसे प्रश्न करे, या सब कोई मिलकर मुझसे प्रश्न करें। या आपलोगोंमें जो कोई चाहता हो उससे मैं प्रश्न करूँ, या आप सब लोगोंसे मैं प्रश्न करूँ, इसपर उन ब्राह्मणोंने पूछनेका साहस नहीं किया, क्योंकि वे शाकल्यकी दुर्वस्थासे भयभीत हो चुके थे॥ २७ ॥ वि० वि. भाष्य-शंका-शाकल्यके बाद जब सब ब्राह्मण चुप हो गये, तब मना करनेवाला तो कोई था नहीं, इसलिये ब्रह्मविज्ञानका पणभूत गौरु पीधनको ले जानेमें कोई रुकावट थी नहीं, पुनः याज्ञवल्क्य क्यों बोले ? समाधान-जब वह गौरूपी धन सर्व ब्राह्मण साधारण है, तो उसे सर्वं सम्मतिके विना लेजाना ठीक नहीं, अतः सभामें स्थित सब विद्वानोंसे अनुमति लेना आवश्यक था। जो बादमें भाग ले चुके थे, तथा ठीक उत्तर पाकर संतुष्ट होचुके थे, उनकी तरफसे तो इसमें कोई रुकावट ही न हो सकती थी, यह ठीक है परन्तु जो वाकी थे, उनकी संमति लेना परमावश्यक था। उनकी भी सम्मति लेनेकी रीति यही है कि हम उनसे पूछें या वे हमसे पूछें, यदि इस विषय में किसीकी प्रश्नोत्तरकी इच्छा होगी, तो याज्ञवल्क्य समस्त बिद्वानोंमें ब्रह्मिष्ठ हैं, यह सर्व सम्मतिसे निश्चित समझा जायेगा। उसके अनुसार उक्त गोधन लेनेका उनको अधिकार होगा, इस तात्पयंसे पुनः याज्ञवल्क्य का प्रश्न है॥२७ ।। याज्ञवल्क्यने उनसे इन श्लोकोंद्वारा प्रश्न किया, यथा- तान्हैतैः श्रोकैः पप्रच्छ- यथा वृक्षो वनस्पतिस्तथैव पुरुषोऽमृषा॥ तस्य लोमानि पर्णानि त्वगस्योत्पाटिका बहिः॥ १॥ भावार्थ-जैसे विशालता आदि गुणोंसे युक्त वृक्ष है वैसेही पुरुष है, इसमें सन्देह नहीं कि उस पुरुषके रोएँ वृक्षके पत्तोंके समान हैं और इसकी त्वचा वृक्षके बाहरी छालके समान है।। १ ॥ त्वच एवास्य रुधिरं प्रस्यन्दि त्वच उत्पटः॥ तस्मा- तदातृण्णात्प्रैति रसो वृक्षादिवाऽऽहतात् ॥ २॥ भावार्थ-इस पुरुषके च्मसे ही रुधिर निकलता है वैसेही वृक्षकी त्वचासे गोंद

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२०४ बृहदारण्यकोपनिषद् [अष्याय ३

निकलता है तथा जैसे कढे हुए वृक्षसे रस निकलता है, वैसे कटे हुए पुरुषशरीरसे रक्त निकलता है॥२ ॥ माथसान्यस्य शकराणि किनाटथस्नाव तत्स्थिरम्॥ अस्थीन्यन्तरतो दारूणि मज्जा मज्जोपमा कृता ॥ ३॥ भावार्थ-इसतरह पुरुष तथा वनस्पतिका मांस शकरल यानी खंड (अंश) है, कोनाट-सकरके भीतर काष्ठ संलग्न वल्कल रहता है, (शकरके भीतरी अंश विशेषको किनाट कहते हैं) उसके समान पुरुषमें स्त्नायु (नस) रहती है, वह कीनाट स्नायुके समान दढ़-कड़ा होता है। स्नायुके भीतर जैसे कड़ी हड्डियाँ होती हैं, वैसेही कीनाटके भीतर कड़ा दारु-काष्ट होता है। जैसे पुरुषमें मज्जा रहती है, वैसेही वनस्पतिमें भी मज्जा रहती है। काष्ठ मज्जामें पुरुष मज्जाही उपमा है दूसरी नहीं, इन दोनोंमें विशेष अन्तर नहीं है। जैसे वनस्पतिकी मज्जा है वैसेही पुरुषकी मज्जा है, जैसे पुरुषकी मज्जा है वैसेही वनस्पतिकी मज्जा है॥ ३॥ यद्वृत्षो वृक्णो रोहति मूलान्नवतरः पुनः॥ मर्त्यः स्विन्मृत्युना वृक्ण: कस्मान्मूलात्प्ररोहति॥।४।। भावार्थ-परन्तु यदि वृक्षको काट दिया जाय तो वह वारम्बार अपने मूलसे पहिलेकी अपेक्षा अतिशय नवीन होकर अंकुरित होजाता है, इसीतरह यदि मृत्युद्वारा मनुष्यका छेदन कर दिया जाय, तो वह किस मूलसे उत्पन्न होता है ?॥४ ॥ रेतस इति मा वोचत जीवतस्तत्प्रजायते। धानारुह इव वै वृत्तोऽञ्जसा प्रेत्य संभवः ॥। ५ ॥। भावार्थ-मृत पुरुषके वीर्यसे पुरूप्रादुर्भाव होता है, ऐसा नहीं कह सकते हैं, क्योंकि वह वीर्य जीते हुए पुरुषसे उत्पन्न होता है मृतसे नहीं, और बीजसे उन्पन्न होनेवाला वृक्ष कटजानेके बाद पुनः अंकुरित होकर उत्पन्न हो जाता है, यह प्रत्यक्ष दष्ट है।। ५ ॥ यत्समूलमावृहेयुर्वृत्षं न पुनराभवेत्। मर्त्यः स्विन्मृ- त्युना वृकण: कस्मान्मूलात्प्ररोहति ॥ ६।। भावार्थे-यदि वृक्षको जड़ सहित नष्टकर दिया जाय तो वह पुनः उत्पन्न

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विदयाविनोद् भाष्य २०५

नहीं होता, तब आपलोग बतलाइये कि यह मृत्युके द्वारा छ्वन्न हुआ पुरुष किस मूलसे उत्पन्न होता है ? ॥ ६ ॥ जाक एव न जायते को न्वेनं जनयेत्पुनः । विज्ञान- मानन्दं ब्रह्म रातिर्दातुः परायणं तिष्ठमानस्य तद्विद इति ॥७॥२८॥ भावार्थ-यदि ऐसा कहो कि पुरुप तो उत्पन्न होही गया है, इसलिये पुनः उत्पन्न नहीं होता, तो यह ठीक नहीं, क्योंकि वह मरकर भी पुनः उत्पन्न होता ही है, ऐसी दशामें मृत्युके बाद इसे पुनः कौन उत्पन्न करेगा ? यानी उसकी उत्पत्तिका कारण कौन होगा ? जब किसी ब्राह्मणने इसका उत्तर नहीं दिया तब याज्ञवल्क्यने स्वयं कहा कि मृत पुरुषकी उत्पत्तिका कारण ज्ञानस्वरूप आनन्दस्वरूप ब्रह्म है 'वह ब्रह्म' जो धन देनेवाले हैं यानी यज्ञकर्ता हैं, जो ज्ञानमें दढ़ हैं तथा जो ब्रक्मको जाननेवाले हैं उनकी परमगति अर्थात् पॅरम आश्रय है।। ७ ॥ वि० वि० भाष्य-पूर्वोक्त छश्लोकोंका भाष्य भावार्थसे ही गतार्थ होनेके कारण पृथक नहीं लिखा गया। अब सातवें श्लोकका भाष्य लिखा जाता है-यदि मूलके साथ बीजका नाश किया जाय तो वृक्ष पुनः उत्पन्न नहीं होगा, इसरलिये आप लोगोंसे मैं पूछता हूँ कि यदि समस्त जगत्का मूल मृत्युसे छ्विन्न हो जाता है तो किस मूल से पुनः वह उत्पन्न होता है ?। जो पैदा होनेवाला हो, उसके विषयमें तो प्रश्न हो सकता है कि वह किससे पैदा है, किन्तु जिसकी उत्पत्ति हो चुकी है, उसके विषयमें प्रश्न ही क्या ?, ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि मृतकी पुनः उत्पत्ति होती है, अन्यथा उससे किये गये पुण्य, पाप निष्फल हो जायेंगे यानी कृतनाश तथा अकृताभ्यागमरूप दोष हो जायेगा, अतः आप लोगोंखे मैं पूछता हूं कि मरे हुए पुरुषको पुनः कौन उत्पन्न करता है ? इस बातको ब्राह्मण न जान सके अर्थात् मरे हुए प्राणी जिससे पुनः पैदा होते हैं, उस जगत् मूल कारणको ब्राह्म- णोंने नही जाना, अतः यह बात स्पष्ट हो गई कि उपस्थित विद्वानोंमें ब्रह्मविद् अप्रणी याज्ञवल्क्य ही हैं, इसलिये उक्त पणभूत गोधनको मुनिने ही ले लिया और समस्त विद्वानोंके ऊपर विजय भी प्राप्त की। यह आख्यायिका समाप्त हुई। अब जो जगत् का मूल है जिसका शब्दसे साक्षात् व्यपदेश होता है तथा जिसके वि- घयमें बाद्मणोंसे याज्ञवल्कयने पूछा था, उसको भगन्रती श्रुति स्त्रयं प्रतिपादन

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२०६ शृहदारण्यकार्पानषद् [अष्याय ३

करती है-वह विज्ञानस्वरूप, आनन्दस्वरूप ब्रह्म है, यह विज्ञानानन्द विषय विज्ञान के समान दुःखानुविद्ध नहीं है, परन्तु प्रसन्न, शिव, अतुल, अनायास, नित्यतृप्त तथा एकरस ब्रह्म है, वह धन देनेवाले यजमानकी परागति है। किश्र एषणात्रयसे विरत होकर और उसी में स्थिर रहकर जो कर्म नहीं करते उन व्रम्मज्ञानियोंका भी परम आश्रय है ॥ १ से ७ तक ॥ अब प्रकृतमें विचाणीय विषय यह है कि जो आनन्द शब्द लोकमें सुखवाची प्रसिद्ध है, वह यहॉपर ब्रह्ममें विशेषण रूपसे श्रुत है-आनन्द ब्रह्म, आनन्दो ब्रह्मेति व्याजानात्, आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान्, यदेष आकाश आनन्दो न स्यात् यो वै भूमा- तत्सुखम्, एष परमआनन्द, इत्यादि। संवेद सुखमें आनन्द शब्द प्रसिद्ध है। ब्रह्मानन्दको यदि संबेद्य मानो, तो ब्रह्ममें आनन्दादि शब्दोंका प्रयोग करना उचित है, इसलिये यह विचारना चाहिये कि लोकवत् यहाँ आनन्दवेद्य है या नहीं ? श्रुतिरूप प्रमाणसे ब्रह्मको संवेद्य आनन्द स्वरूपही मानते हैं, पुनः उसमें विचारही क्या करना है?, नहीं, विचार करना आवश्यक है, क्योंकि विरुद्ध श्रुतिवाक्य देखे जाते हैं वह सत्य है कि आनन्द शब्द ब्रह्ममें श्रुत है, किन्तु वह लौकिक आनन्दके समान ज्ञायमान नहीं है। प्रत्युत आनन्दके ज्ञानका श्रुतियोंमें प्रतिषेध है-यत्र त्वस्य सर्वमात्मैवाभूत् तत् केन कं पश्येत् केन कं विज्ञानीयात्' यत्र नान्यत् पश्यति नान्य- चळ्ृणोति नान्यद्विजानाति स भूमा, प्राज्ञनात्मना सम्परिष्वक्तो न बाह्यकिंश्न वेद' इत्यादि। तात्पर्य यह है विचारके बिना कि श्रुतियोंके तत्वार्थका निर्णय नहीं ले सकता, अतः विचार आवश्यक है और मोक्षवादियोंकी विप्रतिपत्तियाँ भी हैं। सांख्य और वैशे- षिकभी मोक्षवादी है, किन्तु उनका मत है कि मोक्षमें संवेधसुख नहीं है। सांख्यवादी कहते हैं कि ज्ञान बुद्धिका धर्म है। प्रकृति और पुरुषका भेदज्ञान ही तत्वज्ञान है, तत्वज्ञानसे बुद्धिका लय हो जाता है, इसलिये ज्ञान नहीं होता। वैशेषिक अशेष- विशेष गुणोच्छेदको या आत्यन्तिक दुःखध्वंसको मोक्ष मानते हैं। शरीरेन्द्रियादि द्वारा ही आत्मामें ज्ञान होता है। शरीरेन्द्रियादि कर्मनिवन्धन हैं, कर्मोंके निःशेष समाप्त होनेपरही मोक्ष होता है, स्वतः आत्मा पृथिव्यादिके समान जड़ है, इसलिये ज्ञानजनक सामग्रीकी विकलतासे आत्मामें उस समय ज्ञान नहीं होता। भागवतोंका मत है कि मोक्ष कालमें भी ज्ञान होता है, उस समयका सुख निरतिशाय और स्वसंवेद है। यदि ज्ञान न माना जाय तो अविदितसत्ताकसुख अपुरुषार्थही होगा, इस परिस्थितिमें उसके उद्देश्य मोक्षमा्गमें किसीकी प्रवृत्ति नहीं होगी। ठीक है, फिर इस विषयमें क्या मानाजाय ? ज्ञायमान आनन्डका हो श्रुियोंमें श्रत्रण पाया जाता

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बृहदारएयकोपनिषद्

स्थूल

मरणांन्तर ब्रह्मलाकप्राप्ति (भ्र०५ ब्रा० १०) भरणात्तर प्रह्मसोडप्रापति (भ. प 0्ा. १०)

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श्राह्मण &] विद्याविनोद भाष्य २०७

है।-'जक्षन् क्रीड़न् रममाणः, स यदि पितृलोककामो भवति संकल्पादेवास्य पितरः समुत्तिष्ठन्ति' यः सर्वज्ः ससर्ववित्, सर्वान् कामान् समश्नुते, इत्यादि श्रुतियोंमें स्पष्ट है कि मोक्षसंवेद है, अवेद्य नहीं है। वस्तुतः ऐसी बात नहीं है, क्योंकि सुखित्वादि विशेषधर्म नामरूप जनित देह तधा इन्द्रियरूप उपाधिके सम्पर्कसे होनेवाली भ्रान्तिसे आत्मामें आरोपित हैं आत्मा तो, निर्गुण निर्विकार है, इसतरह पूर्वोक्त सब शङ्काओंका पहिलेही परिहार किया जा चुका। विरुद्ध श्रुतियोंका विषय भी हम पहिले कह चुके हैं। मधुकाण्डमें जो ब्रह्मका वेद्यत्व है, सोपाधिक होनेके कारण है। निरुपाधिक ब्रह्म तो सर्वथा अवेदयही है। इसलिये आनन्द प्रतिपादक समस्त वाक्योंको 'एषोडस्य परम आनन्द' इस वाक्यके समानही समझना चाहिये। एक्त सकल भेदादि तो पूर्वानुभूतका केवल अनुवादमात्र हैं॥७॥२८॥

तृतीया अध्याय और षष्ठ ब्राह्मण समाप्त।

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चतुर्थ अध्याय प्रथम ब्राह्मणा

तृतीयाध्यायमे जल्प कथा द्वारा ब्रह्मका वर्णन किया गया। अब वादकथा द्वारा उसी ब्रह्मका विस्तारपूर्वक निरूपण करनेके लिए हम अध्यायका आरम्भ करते हैं, यथा- ॐ जनको ह वैदेह आसांचक्रेथ ह याज्ञवल्क्य आवव्राज। तथ होवाच याजवल्क्य किमर्थमचारीः पशू- निच्छन्नण्वन्तानिति। उभयभेव सम्राडिति होवाच॥१॥ भावार्थ-जब विदेहधिपति जनक आसनपर बैठे थे, उसी समय याज्ञ- वल्क्य महर्षि आये। उनसे जनकने कहा कि हे याज्ञवल्क्य। आप किस लिए पघारे हैं? पशुओको लेनेकी इच्छासे या सूच््मान्त प्रश्न श्रवण करनेके लिए ? इसपर याज्ञवल्कयने कहा कि हे महाराज ? मैं दोनोके लिए आया हूँ ।। १॥ वि० वि०भाष्य-जिस समय प्रसिद्ध निद्वान् विदेहपति राजा जनक दशनेच्छुकोको अवसर देनेके निमित्त गद्दीपर विराजमान थे, उसी समय विद्वान् याज्ञवल्क्य योगक्षेमार्थ या राजाकी विविदिषा समझ कर उसके ऊपर दया करनेके लिए यानी सूक्म पदार्थ विषय प्रश्नोका उचित निर्णय करनेके लिए आगये, उनको देखकर उनकी विधिवत् पूजा करके महाराजने उन्हे आसन पर बैठाया और प्रसन्नता पूर्वक बोले कि हे याज्ञवल्क्य ? आप पशु रूपी धनकी इच्छासे या मुझसे अत्यन्त सूक्षम परमाण्वन्त गुह्य पदार्थोंके, प्रश्नोको सुननेके लिए आये है। अर्थात् जो कुछ अन्य आचार्योंने मुझको उपदेश किया है वह यथार्थ किया है और उसको यथार्थ समझा है इसको जाननेके लिए आप पधारे हैं? इसपर याज्ञवल्कयने उत्तर दिया कि हे सम्राट्' पश्ुग्रहणार्थ तथा तत्व निर्णयार्थ दोनोके लिए आया हूँ । १॥

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विद्याविनाद माष्य

यत्ते कश्चिदबवीत्तच्छण वामेत्यत्रवीन्मे जित्वा शैलि निर्वाग्वै ब्रह्मेति यथा मातृमान्पितृमानाचार्यवान्त्रूयात्तथा तच्छैलिनिरब्वीद्वाग्वै ब्रह्मेत्यवदतो हि कि स्यादित्यब्रवीत्तु ते तस्यायतनं प्रतिष्ठां न मेऽववीदित्येकपाद्वा एतत्सम्रा- डिति स वै नो बूहि याज्ञवल्क्य। वागेवायतनमाकाशः प्रतिष्ठा प्रज्ञेत्येनदुपासीत। का प्रज्ञता याज्ञवल्क्य, वागेव सम्राडिति होवाच। वाचा वै सम्राड्बन्धुः प्रज्ञायत ऋग्वेदो यजुर्वेद: सामवेदोऽथर्वाङ्गिरस इतिहासः पुराणं विद्या उपनिषदः श्ोका: सूत्राण्यनुव्याख्यानानि व्याख्या- नानीष्टथ हुतमाशितं पायितमयं च लोक: परश्च लोकः सर्वाणि च भूतानि वाचैव सम्राट् प्रज्ञायन्ते वाग्वै सम्राट् परमं ब्रह्म नैनं वाग्जहाति सर्वाण्येनं भूतान्यभित्तरन्ति देवो भूखा देवानप्येति य एवं विद्वानेतदुपास्ते। हस्त्यृ- षभथ सहस्रं ददामीति होवाच जनको वैदेहः। स होवाच याज्ञवल्क्यः पिता मेऽमन्यत नाननुशिष्य हरेतेति ॥ २॥ भावार्थं-याज्ञयल्क्यने जनकसे कहा कि हे जनक! जो कुछ् आपसे किसी। कहा है, उसको मैं सुनना चाहता हूँ। इसपर जनकने कहा कि शिलिन ऋषिके पुत्र जित्वाने मुझसे कहा है कि वाणी ही ब्रह्म है। यह सुनकर याज्ञवल्क्यने कहा कि शैलिनिने ठीक कहा है, जैसे जननी, जनक तथा आचार्यके द्वारा भलीभाँति शिक्षित पुरुष अपने शिष्यको उपदेश कने, वैसे ही शैलिनिने आपसे कहा है, इसमें सन्देह नहीं कि वाक ब्रह्म है; क्योंकि न बोलनेवालेसे लोगोंका क्या लाभ हो सकता है? परन्तु क्या उसने उसके आयतन और प्रतिष्ठाको भी बताया है ? जनकने कहा कि नहीं। तब याज्ञवल्क्यने कहा कि हे सम्राट्! यह उपदेश एकपादके ब्रझ्मका है। यह सुनकर जनकने कहा हे याज्ञवल्क्य! यदि ऐसी बात है तो कृपया आप उसे बतलावें, कि वाणीका आयतन तथा प्रतिष्ठा क्या है ? इसपर याज्ञवल्कचने कहा २७

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२१० धृहदारण्यकोपनिषद् [अष्पाय ४

कि वाणी ही उसका आयतन है और आकाश प्रतिष्ठा है। प्रज्ञा रूपसे ही इसकी उपासना करनी चाहिए। 'प्रज्ञा' यह उसका चतुथ पाद है। जनकने कहा कि हे याज्ञवल्क्य! प्रज्ञता क्या है ? याज्ञवल्क्यने कहा कि हे गजन् ! वाणी ही प्रज्ञता है। हे सम्राट्! वाणीसे ही बन्धुका ज्ञान होता हैं तथा हे राजन्। ऋगवेद, यजुवद, सामवेद, अथर्वाङ्गरस वेद, इतिहास, पुराण, विद्या, उपनिपद्, श्लोक, सूत्र, अनुव्याख्यान, व्याख्यान, इष्ट, हुत, आशित, पायित, यह लोक, परलोक; तथा स- मस्तभूत वाणीसे ही जाने जाते हैं। हे सम्राट् ! वाणी ही परब्रह्म हैं, इस तरह उपासना करने वालेको वाणी नहीं। छोड़ती, सबभूत उसका अनुसरण करते हैं। जो विद्वान् इसकी इस तरह उपासना करता है, वह देव होकर देवोको प्राप्त होता है। विदेहाधिपति जनकने कहा कि मैं आपको जिनसे हाथीके समान बैल उत्पन्न हों. ऐसी हजार गौयें देता हूँ। इसके उत्तरमें उस याज्ञवल्क्यने कहा कि हे राजन! मेरे पिताका उपदेश है कि शिष्यको उपदेशके द्वारा कृतार्थ किये बिना उसकी दक्षिणा नहीं लेनी चाहिए।। २ ।। वि० वि० भाष्य-याजवल्क्यने जनकसे कहा कि हे राजन् ! हमने सुना है कि आपने अनेक आचार्योंकी सेवाकी है, इसलिए आपसे जिस किसी आचायने जो कुछ कहा है, उसे हम सुनना चाहत है, इस पर राजा ने कहा कि 'हॉ' कहा है। हमारे आचार्यका नाम जित्वा था। वे शिलिनिके पुत्र थे, उन्होंने कहा है कि 'वाग्वैत्रह्म' वागदेवता ही ब्रह्म है। याज्वल्क्यने कहा कि ठीक है, जिस प्रकार माता जिस पुत्रका अच्छी तरह अनुशासन करने वाली हो, वह मातृमान् कह- लाता है। इसके बाद जिसका पिता अनुशासन करने वाला है, वह पितृमान् कह- लाता है। उपनयनके बाद समावर्त्तन पर्यन्त जिसका अनुशासन आचार्य करता है, वह आचार्यवान् कहलाता है, जो आचार्य इस प्रकार त्रिविध शुद्धिसे विशिष्ट है, वह कभी अप्राणिक नहीं हो सकता, वह शिष्यके लिए जैसा उपदेश दे, ठीक वैसा ही उपदेश शैलिनिने दिया है-' बागवै ब्रह्मेति' क्योंकि वाणीके बिना पुरुष गूँगा कह- लाता है उससे लोगोंका क्या अर्थ निकल सकता है ? अर्थात् कहे बिना ऐहिक या पारलौकिक किसी भी इष्टकी सिद्धि नही हो सकती' किन्तु आप यह तो बताइये कि जित्वाने ब्रह्मका आयतन और प्रतिष्ठा भी आपसे कही है ? आयतन-आश्रय यानी शरीर कहलाता है और तीनों कालोमे आश्रयको प्रतिष्ठा कहते हैं। जनक महराजने उत्तर दिया कि इसका उपदेश तो मुझे नहीं किया है। इसपर याज्ञ वल्क्यने कहा कि तब तो उन्होंने आपसे ब्रह्मके एक पादका ही निर्देश किया है और एकपाद ब्रह्मकी उपा-

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विद्याविनोद भाष्य २११

सनासे इष्ट फलकी सिद्धि नहीं हो सकता, क्योंकि पादत्रयशून्य होनेसे वह उपासना अपूर्ण हो जाती है। तब जनकने कहा कि हे याज्ञवल्क्य! आप तो विद्वान् हैं, ब्रह्मके अवाशष्ट तीन पादका उपदेश कृपया हमे कीजिये। याज्ञवल्क्यने कहा कि वागिन्द्रिय ब्रह्मका आयतन है और आकाश (अव्याकृ तावस्थ आकाश) उसकी प्रतिष्ठा-उत्प- त्ति, स्थिति और लय इन तीनों कालोंमें आश्रय-है। प्रज्ञा रूपसे ही इसकी उपासना करनी चाहिए। 'प्रज्ञा' यह उपनिषद् ब्रह्मका चतुर्थ पाद है। जनकने कहा कि प्रज्ञ- ता क्या है ? क्या वह स्वयं ही प्रज्ञा है, या प्रज्ञाका निमित्त है ? जैसे आयतन तथा प्रतिष्ठा ब्रक्मसे भिन्न हैं, वैसे ही क्या प्रज्ञा भी उससे भिन्न है या नहीं ? मुनिने उत्तर दिया कि हे राजन् ! नहीं, वाणी ही प्रज्ञता है, अतिरिक्त नहीं है, क्योंकि वाणीसे ही बन्धु, मित्र, अपने, पराये सब जाने जाते हैं, वाणीसे हो ऋगवेदादि, इतिहास, पुराण, पशुविद्या, वृक्षविद्या, भूगलविद्या, अध्यात्मविद्या, श्रोकबद्धकाव्य, अति संक्षिप्त सार- वाले सूत्र, विविधयागसंबन्धीधर्म, अन्नदाननिमित्त धर्म, पानदाननिमित्तधर्म, पृथिवीलोक, सूर्यलोक, उनलोकोंके अन्दरविद्यमान आकाशादि महाभूत तथा उन म- हाभूतोंमें स्थित प्राणी आदि सृष्टि सब जाने जाते हैं, अतः हे राजन् ? वाणी पर ब्रक्म है। एवंभूत ब्रह्मवेत्ताको वाणी नहीं छोड़ती। समस्त प्राणी इसका अनुसरण करते हैं, जो पुरुष इसको इस प्रकार जानकर इसकी उपासना करता है, वह शरीर त्यागने के अनन्तर देव होकर देवोंमें ही जाता है अर्थात् उपास्य देवरूप हो जाता है, इसपर जनकने कहा कि विद्यानिष्क्रयके लिए मैं आपको-जिनसे हाथीके समान बैल उत्पन्न हों ऐसी-पहस्र गौएँ देता हूँ, क्योंकि गुरु शुशपया विद्या पुष्कलेन धनेन बा। (गुरूकी सेवासे या विपुल धनसे विद्याका उपार्जन करना चाहिए) वाक्य से विपुल धन देना समुचित था। याज्ञवल्कने कहा कि मेरे पिताका यह सिद्धान्त था कि शिष्यको अनुशासनसे कृतार्थ करके ही धन लेना चाहिए अन्यथा नहीं, मेरा भी यही सिद्धान्त है, अतः आपको शिक्षा द्वारा कृतार्थ करके ही धन लूँगा, उससे पहिले नहीं ले सकता। क्योंकि 'हरहिं शिष्य धन शोक न हरहीं। सो गुरु घोर नरक में परहीं, इत्यादि बचन सन्तोंने कहे हैं ॥ २ ॥ यदेव ते कश्चिदबरवीत्तच्छणवामेत्यब्रवीन्म उदङ्ग: शौल्बायन: प्राणो वै ब्रह्येति यथा मातृमान्पितृमानाचार्य- वान्ब्रूयात्तथा तच्छौल्वायनोऽब्रवीसप्राणो वै ब्रह्मेत्यप्राणतो हि किथ स्यादित्यब्रवीत्तु ते तस्यायतनं प्रतिष्ठां न मेब-

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२१२ घृहदारण्यकोपांनषद् [अध्याय ४

वीदित्येकपाद्वा एतत्सम्राडिति स वै नो ब्रृहि याज्ञवल्क्य प्राण एवायतनमाकाशः प्रतिष्ठा प्रियमित्येनदपासीत का प्रियतो याज्ञवल्क्य प्राण एव सम्राडिति होवाच प्राणस्य वै सम्राट्कामायायाज्यं याजयत्यप्रतिगह्यस्य प्रतिगह्वात्यपि तत्र वधाशङ्कं भवति यां दिशमेति प्राणस्यैव सम्राट् कामाय प्राणो वै सम्राट् परमं ब्रह्म नैनं प्राणो जहाति सर्वाण्येनं भृतान्यभिक्तरन्ति देवो भूख्वा देवानप्येति य एवं विद्वानेतदुपास्ते हस्त्यृषभथ सहस्रं ददामीति होवाच जनको वैदेहः स होवाच याज्ञवल्क्यः पिता मेऽमन्यत नाननुशिष्य हरेतेति ॥३ ॥ भावार्थ-पुनः याज्ञवल्कने जनकसे कहा कि हे राजन् ! जो कुछ आपसे किसीने कहा है, उसको मैं सुनना चाहता हूँ। इसका जनकने उत्तर दिया कि हे याज्ञवल्क्य ! शुल्व ऋषिके पुत्र उदङने मुझसे कहा कि प्राण ही ब्रह्म है। यइ सुनकर याजवल्क्यमे कहा कि शौल्वायनने ठीक कहा है, जैसे जननी, जनक तथा आचार्यके द्वारा भलीभाँति शिक्षित पुरुष अपने शिष्यको उपदेश करे, बैसे ही शौल्वायनने आपसे कहा है। इसमें सन्देह नहीं कि प्राण ही ब्रझम है, क्योंकि प्राणरहित पुरुषसे क्या लाभ हो सकता है ? परन्तु क्या उसने उसके आयतन और प्रतिष्ठाको भी बताया है ? जनकने कहा कि नहीं। तब याज्ञवल्म्यने कहा कि हे सम्राट्! यह उपदेश एक पादके ब्रह्मका है। यह सुनकर जनकने कहा कि हे याज्ञवल्क्य ! यदि ऐसी बात है तो कृपया आप उसे बतलावें कि प्राणका आयतन तथा प्रतिष्ठा क्या है? इसपर याज्ञवल्कचने कहा कि प्राण ही उसका आयतन है और आकाश प्रतिष्ठा है। प्रिय रूपसे उसकी उपासना करनी चाहिये। 'प्रिय' यह उमका चतुर्थ पाद है। जनकने कहा कि हे याज्ञवल्क्य ! प्रियता क्या है ? याज्ञवल्कयने उत्तर दिया कि हे राजन् ! प्राण ही प्रियता है; हे राजन् ! प्राणके लिए ही अयाउ्यसे-प्रांतिपादकोंसे भी यज्ञ कराते हैं तथा प्रतिग्रहके अयोग्य उत्र (उद्दण्ड) आदि पुरुषसे भी दान लेते हैं और जिस दिशामें जाते हैं, उसमें चोर तथा लुटेरािकोसे वघकी आशंका करते हैं। हे सम्राट् यह सब प्राण ही परब्रह्म है। जो विद्वान् इस प्राणकी इस तरह

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खिय १ ] विद्याविनाद भाष्य २१३

पासना करता है, उसे प्राण नहीं छोड़ता। सब भूत उसका अनुशरण करते हैं और ह देव होकर देवोंको प्राप्त होता है। इसपर राजाने कहा कि हे याज्ञवल्क्य! मै मापको हाथीके समान बैल उत्पन्न करनेवाली एक सहस्र गौएँ देता हूँ। यह सुनकर पाज्ञवल्क्यने कहा कि मेरे पिताका यह सिद्धान्त था कि शिष्यको उपदेश द्वारा कुतार्थ किये विना उसका धन नहीं लेना चाहिए॥ ३। यदेव ते कश्चिदबवीत्तच्छृणवामेत्यब्रवीन्मे बर्कुर्वार्ष्ण- श्चक्षुर्वे ब्रह्मेति यथा भातृमान्पितृमानाचार्यवान्ब्रयात्तथा

ते तस्यायतनं प्रतिष्ठां न मे Sब्रवीदित्येकपाद्वा एतत्स- म्राडिति स वै नो ब्रूहि याज्ञवल्क्य चन्तुरेवायतनमाकाशः प्रतिठा सत्यमित्येनदुपासीत का सत्यता याज्ञवल्क्य चन्षु- रेव सम्राडिति होवाच चन्तुषा वै सम्राट् पश्यन्तमाहुरद्रा- क्षीरिति स आहाद्राक्मिति तत्सत्यं भवति चत्तुर्वे सम्राट् परमं ब्रह्म नैनं चक्षुर्जहाति सर्वाण्येनं भृतान्यभित्षरन्ति देवो भत्वा देवानप्येति य एवं विद्वानेतदुपास्ते हस्त्यृषभथ सहस्त्रं ददामीति होवाच जनको वैदेहः स होवाच याजव- ल्क्यः पिता मेSमन्यत नाननुशिष्य हरेतेति ॥४॥ भावार्थ-पुनः याज्ञवल्क्य जनकसेने कहा कि हे राजन् ! जो कुछ आपसे किसीने कहा है, उसको मैं सुनना चाहता हूँ। इसका उत्तर जनकने दिया कि हे याज्ञवल्य ! वृष्ण ऋषिके पुत्र बकुने मुझसे कहा कि नेत्र ही ब्रह्म है। यह सुनकर याजवल्क्यने कहा कि वृष्णकुमारने ठीक कहा है जैसे जननी, जनक तथा आचार्यके द्वारा भलीभाँति शिक्षित पुरुष अपने शिष्यको उपदेश करे वैसे ही वृष्णकुमारने कहा है। इसमें सन्देह नहीं कि नेत्र ही ब्रह्म है, क्योंकि नेत्ररहित पुरुपसे क्या लाभ हो सकता है ? किन्तु क्या उसने उसके आयतन और प्रतिष्ठाको भी बताया है? जनकने कहा कि नहीं, तब याजवल्कयने कहा कि हे सम्राट! यह उपदेश एक पादके ब्रह्मका है। यह सुनकर जनकने कहा कि हे याज्ञवल्क्य ! यदि ऐसी बात है तो

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२१४ धृहदारण्यकोर्पानषयू [अध्याय ४

आप उसे बतलावें कि नेत्रका आयतन तथा प्रतिष्ठा क्या है ? इसपर याज्ञवल्क्चने कहा कि नेत्र ही आयतन है और आकाश प्रतिष्ठा है। सत्य रूपसे उसकी उपासना करनी चाहिये। 'सत्य' यह उसका चतुर्थपाद है। जनकने कहा कि हे याज्ञ- वल्क्य। सत्यता क्या है? याज्ञवल्कयने उत्तर दिया कि हे राजन! नेत्र ही सत्यता है, क्योंकि हे मम्राट्! नेत्र से देखनेवालेसे पूछा जाय कि क्या तृने देखा है ? इसपर यदि वह कहे कि मैंने देखा है तो वह बात सत्य होती है। हे राजन् ! नेत्र ही पर व्रक्म है। जो विद्वान् इस नेत्रकी इस तरह उपासना करता है, उसे नेत्र नहीं छोड़ता। सब्र भूत उसका अनुसरण करते हैं और वह देव होकर देवोंको प्राप्त होता है, इसपर जनकने कहा कि हे याजवल्क्य! मै आपको हाथीके समान बैल उत्पन्न करनेवाली एक सहस्र गौएँ देता हूँ, यह सुनकर मेरे पिताका यह सिद्धान्त था कि शिप्यको उपदेश द्वारा कृतार्थ किये बिना उसका धन नहीं लेना चाहिए।।४।। यदेव ते कश्चिदबवीत्तच्छणवामेत्यब्रवीन्मे गर्दभी- विपीतो भारद्वाजः श्रोत्रं वै ब्रह्मेति यथा मातृमान्पितृमा- नाचार्यवान्त यात्तथा तद्भ्ारद्वाजोऽबवीच्छोत्रं वै ब्रह्मेत्य- शृण्वतो हि कि4 स्यादित्यव्रवीत्तु ते तस्यायतनं प्रतिष्ठां न मेSत्रवीदित्येकयाद्वा एतत्सम्राडिति स वै नो ब्रहि याजवल्क्य श्रोत्रमेवाऽऽयतनमाकाशःप्रतिष्ठाऽनन्त इत्येनदु- पासीत काऽनन्तता याज्ञवल्क्य दिश एव सम्राडिति होवाच तस्माद्वै सम्राडपि यां कां च दिशं गच्छति नैवास्या अन्तं गच्छत्यनन्ता हि दिशो दिशो वैं सम्राट् श्रोत्रं8 श्रोत्रं वै सम्राट् परमं ब्रह्म नैन श्रोत्रं जहाति सर्वाण्येनं भूतान्यभिक्षरन्ति देवो भूखा देवानप्येति य एवं विद्वानेतदुपास्ते हस्त्यृषभथ सहस्त्रं ददामीति होवाच जनको वैदेहः स होवाच याज्ञवल्क्यः पिता मेऽमन्यत नाननुशिष्य हरेतेति ॥ ५ ॥ भावार्थ-पुनः याज्ञवल्क्यने जनकसे कहा कि हे राजन्! जो कुछ आपसे

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विद्याविनोद भाष्य २१५

किर्सीने कहा है, उसको मैं सुनना चाहता हूँ। इसका उत्तर जनकने दिया कि हे याज्ञवल्क्य ! भरद्वाज गोत्रोत्पन्न गदभी विपीतने मुझस कहा है कि श्रोत्र ही ब्रद्म है। यह सुनकर याज्ञवल्क्यने कहा गदभी विपीतने ठीक कहा है जैसे ज ननी. जनक तथा आचार्यके द्वारा भलीभाँति शिक्षित पुरुष अपने शिष्यको उपदेश करे वैसे ही गर्दभी विपीतने कहा है। इसमें सन्देह नहीं कि श्रोत्र ही ब्रह्म है, क्योंकि श्रोत्र रहित पुरुषसे क्या लाभ हो सकता है। किन्तु क्या उसने उसके आयतन और प्रतिष्ठाको भी बताया है? जनक ने कहा कि नहीं। तब याज्ञवल्क्यने कह्दा हे सम्राट् ! यह उपदेश एकपादके ब्रह्मका है। यह सुनकर जनकने कहा कि हे याज्ञवल्क्य ! यदि ऐसी बात है तो आप उसे बतलावें कि श्रोत्रका आयतन तथा प्रतिष्ठा क्या है ?। इसपर याज्ञवल्क्यने कहा कि श्रोत्रही आयतन है और आकाश प्रतिष्ठा है। अनन्तरूपसे उसकी उपासना करनी चाहिये। 'अनन्त' यह उसका चतुर्थपाद है। जनकने कहाकि हेयाजवल्क्य ! अनन्तता क्या है ?। याज्ञ- वल्क्यने उत्तर दिया कि हे राजन् ! दिशाएँ ही अनन्तता हैं। अतएव हे सम्राट्! कोई भी जिस किसी दिशाको जाता है, वह उसका अन्त नहीं पाता, क्योंकि दिशाएँ अनन्त हैं। और हे सम्राट्! दिशाएँ ही श्रोत्र है। श्रोत्रही परब्रह्म है। जो उपासक इसकी इसतरह उपासना करता है, श्रोत्र उसको कभी नहीं छोड़ता सब भूत उसका अनुसरण करते हैं और वह देव होकर देवोंको प्राप्त होता है। इसपर जनकने कहा कि हे याज्ञवल्क्य ! मैं आपको हाथीके समान बैल उत्पन्न करनेवाली एक सहस्र गौएँ देता हूँ। यह सुनकर याज्ञवल्क्यने कहा कि मेरे पिताका यह मत था कि शिष्यको उपदेशद्वारा कृतार्थ किये विना उसका घन नहीं लेना चाहिये॥ ५॥ यदेव ते कश्चिद बवीत्तच्छणवामेत्यब्रवीन्मे सत्यकामो जाबालो मनो वै ब्रह्मेति यथा मातृमान्पितृमानाचार्यवा- न्ब्र यात्तथा तज्जाबालोऽब्रवीन्मनो वै ब्रह्मेत्यमनसो हि किश स्थादित्यब्रवीत्तु ते तस्यायतन प्रतिष्ठां न मेऽब्रवी- दित्येकपाद्वा एतत्सम्राडिति स वै नो ब्रहि याज्ञवल्क्य मन एवाऽऽयतनमाकाशः प्रतिष्ठाSSनन्द इत्येनदुपासीत का आनन्दता याज्ञवल्क्य मन एव सम्राडिति होवाच मनसा वै सम्राट् स्त्रियमभिहार्यते तस्यां प्रतिरूपः पुत्रो जायते स

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२१६ शृहदारण्यकोर्पनषद् मष्याब ४

आनन्दो मनो वै सम्राट् परमं ब्रह्म नैन मनो जहाति सर्वाण्येन भूतान्यभिक्षरन्ति देवो भृवा देवानप्येति च एवं विद्वानेतदुपास्ते हस्त्युषभ2 सहस्त्रं ददामीति होवाच जनको वैदेहः स होवाच याजवल्क्यः पिता मेऽमन्यत नाननुशिष्य हरेतेति॥६॥ भावार्थ-पुनः याज्ञवल्कयने जनकसे कहा कि हे राजन् ! जो कुछ् आपसे किसीने कहा है, उसको में सुनना चाहता हूँ, इसका उत्तर जनकने दिया कि हे याज्ञवल्क्य! जवालाके पुत्र सत्यकामने मुझसे कहा है कि मनही ग्रका है। मुनिने कहा कि ठीक है जैसे जननी, जनक तथा आचार्यके द्वारा मलीभॉति शिक्षित पुरुप अपने शिष्यको उपदेश करे, वैसेही सल्कामने कहा है। इसमें सन्देह नही कि मन ही ब्रह्म है, क्योंकि मनके बिना क्या हो सकता है? अर्थात् कुछ नहीं। किन्तु क्या उसने उसके आयतन और प्रतिष्ठाको भी बताया है?। अनकने कहा कि नहीं। तब याज्ञवल्कपने कहा कि हे सम्राट्। यह उपदेश एकपादके ब्रह्मका है, यह सुनकर जनकने कहा कि हे याज्ञवल्क्य! यदि ऐसी बात है तो आप उसे बतलावें कि मनका आयतन तथा प्रतिष्ठा क्या है?। इसपर याज्ञवल्कने कहा कि मन ही आयतन है और आकाश प्रतिष्ठा है। आनन्दरूपसे उसकी उपासना करनी चाहिये। 'आनन्द' यह उसका चतुर्थपाद है। जनकने कहा कि हे याज्ञवल्क्य! आनन्दता क्या है?। याज्ञवल्क्यने उत्तर दिया कि हे राजन् ! मनही आनन्दता है, क्योंकि पुरुष मनसेही स्त्रीकी प्रार्थना करता है, उससे अपने सद्दश पुत्र पैदा होता है, वह आनन्द- आनन्ददायक है। हे सम्राट् ! मनहीं परब्रह्म है। जो पुरुष इसप्रकार जानता हुआ इसकी उपासना करता है. उसको मन कभी नहीं छोड़ता। समस्त प्राणी उसका अनुसरण करते हैं, वह देव हाकर देवोंको प्राप्त होता है। इसपर जनकने कहा कि हे याज्ञवल्क्य! मैं आपको हार्थाके समान बैल उत्पन्न करनेवाली एक सहस्र गौएँ देता हूँ। यह सुनकर याज्ञवल्क्यने कहा कि मेरे पिताका यह सिद्धान्त था कि शिष्यका उपदेशद्वारा कृनाथ किये विना उसका घन नहीं लेना चाहिये॥ ६ ॥ यदेव ते कश्चिदबवीत्तच्छृणवामेत्यब्रवीन्मे विदग्धः शाकल्यो हृदयं वै ब्रह्मेति यथा मातृमान्पितृमानाचार्यवा न्यूयात्तथा तच्छाकल्योडब्रवीदृदयं वै ब्रह्मेत्यहृदयस्य हि

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विद्याविनोद माष्य २१७

किध स्यादित्यब्रवीत्तु ते तस्यायतनं प्रतिष्ठां न मेऽब्वी- दित्येकपाद्वा एतत्सम्राडिति स वै नो ब्रूहि याजवल्क्य हृदयमेवायतनमाकाशः प्रतिष्टा स्थितिरित्येनदुपासीत का स्थितता याज्ञवल्क्य हृदयमेव सम्राडिति होवाच हृदयं वै सम्राट् सर्वेषां भूतानामायतनथहृदयं वै सम्राट् सर्वेषां भूतानां प्रतिष्ठा हृदये ह्येव सम्राट् सर्वाणि भूतानि प्रति- ष्वितानि भवन्ति हृदयं वै सम्राट परमं ब्रह्म नैनथ हृदयं जहाति सर्वाण्येनं भूतान्यभिक्षरन्ति देवो भूत्वा देवानप्येति य एवं विद्वानेतदुपास्ते हस्त्यृषभ सहसत्रं ददामीति होवाच जनको वैदेहः स होवाच याजवल्क्यः पिता मेSम- न्यत नाननुशिष्य हरेतेति॥७॥ भावार्थ-पुनः याज्ञवल्कयने जनकसे कहा कि हे राजन्! जो कुछ आपसे किसीने कहा है, उसको मैं सुनना चाहता हूँ। इसका उत्तर जनकने दिया कि हे याजवल्क्य! शकलकुमार विद्ग्धने मुझसे कहा है कि हृदय ही ब्रह्म है। मुनिने कहा कि ठीक है, जैसे जननी, जनक तथा आचायके द्वारा शिक्षित पुरुष अपने शिष्यको उपदेश दे, वैसे ही शाकल्यने कहा है। इसमें सन्देह नहीं कि हृदय ही ब्रह्म है, क्योंकि हृद्यशून्य पुरुषको क्या लाभ हो सकता है, अर्थात् कुछ नहीं। किन्तु क्या उसने उसके आयतन और प्रतिष्ठा भी बताये हैं? जनकने कहा कि नहीं। तब याज्ञवल्क्यने कहा कि हे सम्राट्! यही उपदेश एकपादके ब्रह्मका है। यह सुनकर जनकने कहा कि हे याज्ञवल्क्य! यदि ऐसी बात है तो आप उसे बतलाघें कि हृदयका आयतन तथा प्रतिष्ठा क्या है ? इसपर याज्ञवल्क्यने कहा कि हृदय ही आयतन है और आकाश प्रतिष्ठा है। स्थितिरूपसे इसकी उपासना करना चाहिये। जनकने कहा कि स्थितता क्या है? याज्ञवल्क्यने उत्तर दिया कि हे राजन् ! हृदय ही स्थितता है, क्योंकि हे सम्राट्! हृदय ही सब भूतोंका आयतन- स्थान है। हे सम्राट ! हृदय ही सब प्राणियोंकी प्रतिष्ठा-आश्रय है, कारण कि सब भूत हृदयमें ही प्रतिष्ठित-स्थित हैं। हे सम्राट्! हृदय ही परब्रह्म है, जो इस प्रकार २८

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२१८ मृहदारण्यकोपनिषद् [अध्पाय ४

जानता हुआ इस हृदयरूपी ब्रह्मकी उपासना करता है, उस उपासकको हृदयात्मक ब्रह्म कभी नही छोड़ता। सब प्राणी उसका अनुसरण करते हैं, वह देव होकर देवोंको प्राप्त होता है। इसपर जनकने कहा कि हे याज्ञवल्क्य ! मैं आपको हाथीके समान बैल उत्पन्न करनेवाली एक सहस्र गौएँ देता हूँ। यह सुनकर याज्ञवल्क्यने कहा कि मेरे पिताका यह सिद्धान्त था कि शिष्यको उपदेशद्वारा कृतार्थ किये िना उसका धन नही लेना चाहिये।। ७॥ वि० वि० भाष्य-एक-एक पादका उपदेश तो तत्-तत् उपदेश करनेवाले आचार्योंने किया है, अवशिष्ट पादत्रयका यथार्थ उपदेश याज्ञवल्क्यने किया है। जैसे जित्वा शैलिनिने कहा कि वाणी ही ब्रह्म है, किन्तु उसने आयतन आदि पादत्रयका उपदेश नहीं किया। अपूर्ण ब्रह्मकी उपासनासे अभीष्ट सिद्धि नहीं होती, अतः अव- शिष्ट तीन पादोंका उपदेश याज्ञवल्क्यने किया। 'वाग व ब्रह्म' इसमें वाक तत्-तत् इन्द्रियोंके अधिष्ठात अग्नि आदि देवतापरक है। वाक देवता अभि है, इसमें 'अभि र्वाग् भूत्वा मुखं प्राविशत्' यह श्रुति प्रमाण है। उक्त देवताका आधार तदिन्द्रिय द्वितीय वाद है। 'आकाशः प्रतिष्ठा' इससे उसके आधाररूपसे उक्त अव्याकृत तृतीय पाद है। प्रज्ञादि नामक चतुर्थ पाद है। प्रथम पर्यायके समान उत्तर पाँच वाक्योंमें देवता, आयतन, प्रतिष्ठा और उपनिषद् ये चार पदार्थ अव- श्य ज्ञातव्य हैं। 'मातृमान्' इत्यादि विशेषणोंसे जित्वा शैलिनि यथार्थवक्ता है, यह सूचित किया गया है। इसी तरह अग्रिमवाक्योंमें भी मातृमान् इत्यादिका अभि- प्राय जानना चाहिये। विना बोले संसारमें कोई भी दृष्ट या अदष्ट प्रयोजन सिद्ध नहीं होता, इसीलिये समस्त पुरुषार्थसाधक वाणी ही ब्रह्म है। आयतनादि उपदेश के विना एकपाद ही ब्रह्मका निर्देश होता है, वह अपूर्ण है। अपूर्ण ब्रह्मकी उपा- सनाका फल नहीं है। अपूर्ण उपासना व्यर्थ है। यहाँ विराडात्माकी उपासना कही गई है। चतुष्पाद ब्रह्म सर्वात्मकस्वरूप है, इस चिन्तनसे उपासक समस्त प्राणियोंसे स्तुत होता है। कार्यकारणात्मक सब जगत् देवतारूपसे कहा गया है, अतः अग्न्यादि देवताओोंमें सब जगन् उपास्यत्वेन विवच्ित है। एक उपासना से अनेक देवत्वकी प्राप्ति नहीं हो सकती, इसलिये छः प्रकृत उपासनाओंमें 'देवान्' इस बहुवचन श्रुतिसे 'एक पर्यायोपासना अन्य पर्यायोपासनासे अभिन्न है', यह सूचित किया गया है। अब ब्रह्मविद्याकी अपेक्षा उपासनामें स्फुट विलक्षणता को कहते हैं-जैसे ब्रह्मविद्याकी उत्पत्तिसे पहिले भी जीव ब्रह्मस्वरूप ही रहता है, वैसे प्रकृत उपासनासे पहिले उपासक उपास्य अग्न्यादिके स्वरूपको प्राप्त

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भखण ? ] विद्याविनोद माष्य २१६

नहीं होता, किन्तु उपासनाके बाद ही उपास्यस्वरूप होता है, ब्रह्मविद्या प्राप्त- प्रापक है और प्रकृत उपासनायें अप्राप्तप्रापक है। अधिकारी के भेदसे फलमें भी विलक्षणता है। मुमुक्ु पूर्वमें भी ब्रह्मस्वरूप है। केवल अविद्या व्यवधायक है। उपासक उपासनासे पहिले अदेव रहता है, उपासनासे देव होता है। ज्ञान और उपासनाके स्वरूप में भी भेद है। उपासना मानसी क्रिया है, इसलिए वह पुरुषतन्त्र है, ज्ञान वस्तुतन्त्र है। विषय द्वारा भी दोनोंमें भेद स्पष्ट है-उपासना विभिन्नार्थ विषयक है और विद्या एकरस विषयक है। उपासनाकालमें निरन्तर अग्न्यादि देवताओंके ध्यानसे उपासक अपने को तत् तत् देवतास्वरूप मानता है, मृत्युके बाद तादृश भावनावश तत्-तत् देवतास्वरूपको प्राप्त होता है। गीतामें भी यह बात स्पष्ट लिखी है- यं यं वापि स्मरन् भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम्। तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः ॥ प्रत्येक मंत्रोंके भाष्यमें लिखा है कि अकृतार्थ शिष्यसे दक्षिण लेना उचित नही है, तो याज्ञवल्कने पहिले एक सहस्र गौओंको क्यों लिया ? उत्तर यह है कि-वह ब्रह्मवेत्ताओं की परीक्षाका काळ था। उपस्थित विद्वानों पर जो विजय प्राप्त करे, वही उन गौओंको ले जा सकता था, याज्ञवल्क्यने सबपर विजय प्राप्त की, अतः उनका लेना उक्त अभिप्रायके विरुद्ध नहीं था। पुनर्दच्षिणा गुरुदत्तिणा है, उसे कृतार्थ होनेपर ही ग्रहण करना मुनिका अभिप्राय था। मुक्तिफलक अनुशासनसे शिष्य कृतार्थ होता है। तादृश अनुशासन अभीतक नहीं हुआ, अतः जनककी दक्षिणा अभी ब्राह्य नहीं है, तत्वज्ञानसै ही पुरुपार्थ प्राप्ति होती है। तत्वज्ञान अभी जनकको नहीं हुआ। याज्ञवल्क्यने जनकसे कहा कि हे राजन् जिसके ज्ञात होनेपर सब ज्ञात हो जाता है, सब कर्तव्य कृत हो जाता है, प्राप्तव्य प्राप्त हो जाता है और त्याज्य त्यक्त हो जाता है, वही मुख्य अनुशासन है। यह केवल पिताजीका ही मत नहीं किन्तु मेरा भी यही मत है, क्योंकि सब वस्तु ब्रह्मात्मक हैं, इसलिए ब्रह्मद्दष्टि सम्यगदृष्टि है, अन्य बुद्धि मिथ्याबुद्धि है। यदि ऐसा है तो तत्वज्ञान- का ही उपदेश देना उचित था, प्रकृत उपासनाओं में मुनिकी सम्मति क्यों हुई ? 'तमेतं वेदानुवचनेन ब्राह्मणा विविदिषन्ति यज्ञेन दानेन तपसानाशकेन' इत्यादि श्रुति वाक्यसे सब कार्य मोक्ज्ञानजनक हैं अतः प्रकृत उपासनायें तदुपयोगी हैं। इस- लिये मुनिकी सम्मति उक्त उपासनाओंमें ठीक ही है। प्रत्येक मंत्रोंमें 'सम्राट' यह

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शृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय ४

राजसूय यज्ञ करनेवालेका सूचक है, जो अपनी आज्ञासे राज्यपर शासन करता है या समस्त भारतवर्षका राजा होता है वह सम्राट् कहा जाता है। इस आशयसे याजञ- वल्क्यने सम्राट् ऐसा सम्बोधन किया॥१-७॥

द्वितीय ब्राह्मण

द्वितीय ब्राह्मणमें जामत्, स्वम्न तथा सुषुप्ति दशा द्वारा आत्मज्ञानके लिये प्रत्यगभिन्न आत्माका अनुशासन किया जाता है। ॐँ जनको ह वैदेहः कूर्चादुपावसर्पन्नुवाच नमस्ते- डस्तु याज्ञवल्क्यानु मा शाधीति स होवाच यथा वै सम्रा- एमहान्तमध्वानमेष्यन् रथं वा नावं वा समाददी तैव मेवैताभि- रुपनिषद्धिः समाहितात्माऽस्येवं वृन्दारक आढ्यः सन्नधी- तवेद उक्तोपनिषत्क इतो विमुच्यमानः क्व गमिष्यसीति नाहं तन्द्गवन्वेद यत्र गमिष्यामीत्यथ वै तेऽहं तद्वच्या- मि यत्र गमिष्यसीति ब्रवीतु भगवानिति ॥ १।। भावार्थ-विदेहपति जनकने सिंहासनसे उठ मुनिके सभीप जाकर कहा कि हे याज्ञवल्क! आपको नमस्कार है, आप मुझको उपदेश दें। तब उस मुनिने कहा कि हे राजन ! जैसे लम्बे मार्गको जानेवाला पुरुष रथ या नावका आश्रयण करे, वैसे ही तुम पूर्वोक्त उपासनायें करके समाहितचित्त हो गये हो, और वैसे ही पूज्य, धनी, अधीतवेद तथा उक्त उपनिषद्से युक्त हो गये हो। इतना होनेपर भी तुम इस देहसे छूटकर कहाँ जाओगे ? जनकने कहा कि हे भगवन ! जहाँ जाऊँगा, उसे मैं नहीं जानता। इस पर याजञवल्कने कहा कि जहाँ जाओगे उसे मै तुमसे अवश्य कहूँगा। यह सुनकर जनकने कहा कि भगवन् ! आप उसे अवश्य कहें ॥ १॥ इन्धो ह वै नामैष योऽयं दक्षिणऽत्तन्पुरुषस्तंवा एत- मिन्धथ सन्तमिन्द्र इत्याचक्षते परोत्तेणैव परोक्षप्रिया इव हि देवा: प्रत्यन्तद्विषः ॥२।।

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बाजन २ ] विद्याविनोद् भाष्य २२१

भावार्थ-जो यह दहिनी आँखमें पुरुष है, यही निस्सन्देह इन्च नामवाला है, उसी प्रसिद्ध इस सत्य पुरुषको परोक्षरूपसे इन्द्र कहते हैं। क्योंकि देव- गण मानो परोक्षप्रिय होते हैं और प्रत्यक्ष वस्तुसे द्वेप करनेवाले होते हैं॥२॥ अथैतद्वामे Sक्षणि पुरुषरूपमेषास्य पत्नी विराट् तयो- रेष सथस्तावो य एषोऽन्तर्हदय आकाशोऽथैनयोरेतदन्नं य एषोऽन्तर्हदये लोहितपिण्डोडथैनयोरेतत्प्रावरणं यदेत- दन्तर्हृदये जालकमिवाथैनयोरेषा सृतिः संचरणी यैषा हृदयादूर्ध्वा नाड्युच्चरति यथा केशः सहस्त्रधा भिन्न एव- मस्यैता हिता नाम नाड्योऽन्तर्हदये प्रतिष्ठिता भवन्त्येता- भिर्वा एतदास्रवदास्त्रवति तस्मादेष प्रविविक्ताहारतर इवैव भवत्यस्माच्छारीरादात्मनः ।। ३॥ भावार्थ-इसके बाद जो यह पुरुषाकार वायें नेत्रमें प्रतीत होती है, यह उस पुरुषकी विराट् नामक सत्री है। जो यह हृदयके भीतर आकाश है, यही एन दोनोके मिलनेका स्थान है, जो गरह हृदयके भीतर लाल मांमपिंड है, यही इन दोनोंका अन्न है और जो यह हृदयके भीतर जालके समान है, यही उन दोनोंका प्रावरण (ओढ़ना) है और जो यह हृदयसे ऊपर नाड़ी जाती है, यही इन दोनोके गमनका मार्ग है। जैसे सहस्रवा विभक्त हुआ केश अति सूत्ष्म होता है वैसे ही ये हिता नामकी नाड़ियाँ हृदयके भीतर अति सूदम स्थित हैं। निस्संदेह इन नाड़ियोंके द्वारा ही यह अन्नरस जाता हुआ शरीरमें सब जगह पहुँचता है। अतएव इस स्थूल शरीराभिमानी वैश्वानरसे यह सूक्ष्म देहाभिमानी तैजस अति सूक्ष्म आहार गहण करनेवाला ही होता है॥ ३॥ वि• वि• भाष्य-वाम नेत्रमें जो पुरुष है, वही इस पुरुषकी पत्नी विराट् है, जिस वैश्वानररूप आत्माको आप प्राप्त हैं, उस भोक्ता इन्द्रकी यह भोग्य पत्नी है। इन्द्राणी सहित इन्द्र-इन दोनोंका युगल दक्तिण वामनेत्रस्थ पुरु- षद्वय है। यह अन्न और अत्ताका युगल रवननमें हैं। जो हृदयके भीतर आकाश है, वह इन्द्र इन्द्राणीका संगम स्थान है, जिसमें मिलकर परस्पर संगम होता है। हूदय शब्दसे यहाँ मांसपिण्ड विवच्ित है, जो हदयके भीतर लोहित पिण्ड

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२२२ शृहदारण्यकोपनिषद् [अषयाय ४

यानी सूक्ष्म अन्नरस है. वह इन दोनोंका भोज्य यानी स्थितिहेतु है। भुक्त अन्न दो प्रकारसे परिणत हाता है, जो स्थूल है, वह मल होकर नीचे गिर जाता है और जो उससे भिन्न सूक्ष्म है, वह अगिसे पच्यमान होकर दो रूपोंमें परि- णत होता है, जो मध्यम रस है वह लोहित क्रमसे पाध्भौतिक शरीरपिण्डको बढ़ाता है, जो अणिष्ठरस है, वही लिङ्गात्मा इन्द्रका लोहित पिण्ड है। जिसकेो तैजस कहते हैं, वही हृदय सूक्ष्म नाड़ियोंमें प्रविष्ट होकर मिथुनीभूत इन्द्र तथा इन्द्राणीका स्थितिहेतु होता है। जो हृदयमें अनेक नाडीरूप छिद्राधिक्यसे जालके समान है. वही इन दोनोंका प्रावरण है। और जो हृदयदेशमें ऊर्ध्वा भिमुखी नाड़ी है वही इन दोनोंके चलनेका मार्ग है। शेप भाष्य भावार्थके ही समान है।। ३ ।। तस्य प्राची दिक् प्राञ्चः प्राणा दक्षिणा दिग्दक्षिणो प्राणाः प्रतीची दिक् प्रत्यश्चःप्राणा उदीची दिगुदञ्चः प्राणा ऊर्ध्वा दिगूर्ध्वाःप्राणा अवाची दिगवाञ्चःप्राणाः सर्वा दिशः सरवें प्राणाःसएष नेति नेत्यात्माऽग्रह्यो नहि ग्रह्यतेऽशीयों नहि शीर्यतेऽसङ्गो नहि सज्यतेऽसितो न व्यथते न रिष्य- त्यभयं वै जनक प्राप्ोसीति होवाच याज्ञवल्क्यः । स होवाच जनको वैदेहोऽभयं त्वा गच्छताद्याज्ञवल्क्य यो नो भगवन्नभयं वेदयसे नमम्तेऽस्त्विमे विदेहा अयम- हमस्मि॥ ४ ॥ भावार्थ-प्राची दिशा उस विद्वान्के पूर्व प्राण है, दक्षिण दिशा दक्षिण प्राण हैं, प्रतीची दिशा पश्चिम प्राण हैं, उदीची दिशा उत्तर प्राण हैं, ऊर्ध्व दिशा ऊर्ध्व प्राण हैं, नीचेकी दिशा नीचेके प्राण हैं तथा समस्त दिशायें समस्त प्राण हैं। वह यह नेति-नेति शब्दसे कहा गया आत्मा अग्राह्य है, क्चोकि वह ग्रहण नहीं किया जा सकता। वह अक्षीण है, क्योंकि कभी क्षीण नहीं होता, वह सङ्गरहित है, क्योंकि कभी आसक्त नहीं होता, वह बन्धनशून्य है, क्योंकि कभी पीड़ित नहीं होता तथा कभी हिंसित नहीं होता। याज्ञवल्कयने कहा कि हे जनक । तुम अवश्य अभय पदको प्राप्त हो चुके हो। इसपर विदेहपति

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विधाविनोद भाष्य २२३

जनकने कहा कि हे भगवन् याज्ञवल्क्य! जिन आपने मुझे अभय ब्रह्मका ज्ञान कराया है, उन आपको अभय पद प्राप्त हो, आपको नमस्कार है, ये विदेह देश तथा हम सब आपके अधीन हैं।।४ ।। वि. वि• भाष्य-क्रमसे वैश्वानरसे तैजसको, तैजससे हृदयात्माको तथा हृदयात्मासे प्राणात्मभावको प्राप्त हुए उस विद्वान्के प्राची दिशा पूर्वगत प्राण हैं। अग्रिम व्याख्यान पूर्ववत् है। इस तरह विद्वान् क्रमसे सर्वात्मक प्राणको आत्मा मानता है। वह सर्वात्माका प्रत्यगात्मामें उपसंहार कर द्रष्टाके दृष्ट स्वरूप 'नेति नेति' से निर्दिष्ट आत्माको जानता है। इसको विद्वान् क्रमसे जानता है। 'नेति नेति' यहाँसे लेकर 'न रिष्यति' यहाँ तकका व्याख्यान पूर्ववत् है। मुनिने राजासे कहा कि हे राजन् ! तुम जन्म और मरणादिके भयसे शून्य हो गये। अब अवश्य अभय पदको तुम जाओगे। विदेहराज जनकने कहा कि हे पूज्य याज्ञवल्क्य ! आपने उपाधिकृत अज्ञानके व्यवधानका निराकरण किया है, इस विद्याप्रदानका मूल्य मैं आपको नहीं दे सकता हूँ। साक्षात् आत्मज्ञान देनेवाले को आत्मासे अधिक या आत्माके समान संसारमें कोई वस्तु नहीं है, जो मूल्यरूपसे दी जाय, इसलिए आपको नमस्कार है। सविनय आपसे यही निवेदन करता हूँ कि समस्त विदेह राज्य आपका है और मैं आपका सेवक हूँ, अतः मेरे ऊपर सेवकदष्टिसे आप इस राज्यका यथेष्ट उपभोग अपना समझकर कीजिये। अपरंच-उक्त उपासनाओंसे देवभावकी प्राप्ति होती है, यह देवांभूत्वा देवानप्येति' इस वाक्यसे कह चुके हैं, इसलिए इंस विषयमें प्रश्न नहीं है। देव- भाव प्राप्त होनेपर वह भी तो नित्य नहीं है, उसका भी देहवत् त्याग करना ही होगा, पुनः आप कहाँ जायेंगे ? जनकके प्रति मुनिका यह प्रश्न है। जनकने उत्तर दिया कि हे भगवन् ! मैं नहीं जानता कि कहाँ जाऊँगा। उक्त उप,सनाओंके दो फल हैं-एक देवप्राप्ति और दूसरा मोक्ष, प्रथम फलका ज्ञान तो जनकको है किन्तु द्वितीय फलका ज्ञान नहीं है, अतः जनकने उत्तर दिया कि नहीं जानता। पर ब्रह्मविद्यापकरणमें इन उपासनाओंका विधान है, इसलिए ये उपासनायें क्रम- मुक्तिफलक हैं, यह इस प्रश्नवाक्यसे ही सूचित होता है। जनक यह नहीं जानते थे कि इन उपासनाओंका फल ब्रझभाव भी है, अतः 'मैं नहीं जानता' यह उनका उत्तर भी ठीक ही है। मुनिके आत्मोपदेशके बाद जनकने कहा कि भगवन् ! आपने जो उपदेश दिया, उसका पूर्ण अनुभव मुझको हुआ। उत्तम दक्षिणा आशीर्वाद है, मध्यम दक्षिणा नमस्कार है। विदेहराज्य तथा स्त्र शरीरकादान वित्तशाठ्य

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२२४ [मध्याय ४

यानी कृपणताकी निवृत्तिके लिए है। वस्तुतः इसका तात्पर्य यह है कि आपके आत्मकत्वके उपदेशसे यह निश्चित हुआ है कि आप हम हैं और हम आप है, इसलिए हमारा राज्य भी आपका ही है। हम और आपमें जब भेद नहीं रहा, तब यह राज्य किसका कहें ? यदि हमारा है, तो आपका ही है। यदि राजाका यह तात्पर्य है, तो यही कहना पड़ेगा कि राजाको तत्वज्ञान हुआ ही नहीं। आत्मै कत्व विज्ञान होनेपर राज्यज्ञान तथा उसमें ममता यदि अभी बनी है, तो तत्वज्ञान कहाँ ? एवं देय, दान, सम्पदान आदि भेदज्ञानके विना तादश उक्तिकी संभा- बना नहीं है। हाँ, ठीक है। यह सब निरूपण व्यावहारिक दष्टिसे किया गया है। तत्वदृष्टिसे न दक्षिणा ही है, न प्रतिग्राह्य ही है। मैं हूँ, यह मेरा है इत्यादि ज्ञान अविद्यासे होता है। इसकी हेतु अविद्या जब तत्वज्ञानसे नष्ट हो गई, तब जीव- न्मुक्त पूर्णात्मामें अवस्थित हो जाता है, इसलिए कौन किसको क्या देनेकी इच्छा करेगा ? उक्त ज्ञानसे क्रिया, फल तथा उसके साधन आदि द्वत ज्ञानका उपमर्दन हो जाता है, अतः सब कथन विद्यास्तुति और आचार प्रद्शनके लिए कहा गया है॥ १-४ ॥

तृतोय ब्राह्मण

याज्ञवल्क्यने जाग्रत्, स्वम् तथा सुषुप्तिरूप तीन अवस्थाओके उपन्यास द्वारा राजा जनकको अभयपद प्राप्त कराया। अब आगे वक्तव्य यह है कि द्वितीय ब्राह्मणमें स्वप्न, सुषुप्तिका कथन अति संक्षेपमें किया है। जनककी बुद्धि अति तीक्षण थी, अतः उनको संकेपसे भी ज्ञान हो गया। सर्व साधारणको तावन्मात्रसे ज्ञान नहीं हो सकता, अतः सर्व साधारणको ज्ञानकी प्रप्तिके लिए तृतीय ब्राह्मणमें उक्त अवस्थाओंका विस्तारसे वर्णन किया जाता है- जनकथ् ह वैदेहं याज्ञवल्क्यो जगाम स मेने न वदिष्य इत्यथ ह यज्जनकश्च वैदेहो याज्ञवल्क्यश्चामिहोत्रे समूदाते तस्मै ह याज्ञवल्क्यो वरं ददौ स ह कामप्रश्न- मेव वब्रे तथ हास्मै ददौ तथ ह सम्राडेव पूर्व पप्रच्छ।।१। भावार्थ-एक समय याज्ञवल्क्य विदेहपति राजा जनकके पास गये, ऐसा

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आश्रय ३ ] विद्याविनोद भाष्य २२५

विचार करते हुए कि आज कुछ नहीं कहूँगा। किन्तु पहिले कभी विदेहपति जनक और याज्ञवल्क्यने आपसमें अग्निहोत्रके विषयमें संवाद किया था। उस समय याज्ञवल्क्यने उसे वर दिया था और जनकने इच्छानुसार प्रश्न करना ही माँगा था। यह वर याज्ञवल्क्यने उसे दे दिया था, इसी कारण उनसे जनकने पहिले ही विना आज्ञा पूछना आरम्भ किया॥ १॥ वि० वि०भाष्य-किसी समय याज्ञवल्क्य अपने मनमें वह विचार निश्चित कर जनकके पास चले कि आज मैं जनकको कुछ भी उपदेश नहीं करूँगा, केवल शान्तिपूर्वक बैठा हुआ जो कुछ वह कहेंगे उसको सुनता रहूँगा। जब मुनि जनकके पास पहुँचे तब जनकने जीवात्माके विषयमें प्रश्न किया, उसका उत्तर मुनिने दिया। इसपर शंका होती है कि जब याज्ञवल्क्यने मनमें निश्चय कर लिया था कि मैं कुछ न कहूँगा, तो पुनः राजाके प्रश्नका उत्तर क्यों दिया ? इसका समाधान भगवती श्रुति स्वयं करती है कि एक समय जब कमकाण्डमें बहुत सन्त महात्मा प्रवृत्त थे उस समय अभिहोत्रके विषयमें जनक तथा अन्य राजा, याज्ञवल्क्य और अन्य मुनिवृन्द परस्पर संवाद करने लगे, उस समय जनककी दक्षता देख संतुष्ट हो याज्ञ- वल्क्यने राजासे कहा कि तुम जो चाहो सो वर मागो। इस पर राजाने कहा कि मैं यही वरदान चाहता हूँ कि जो मैं पूछू, उसका कृपया आप उत्तर दें। याज्ञवल्कपने उनको वही वरदान दिया, यानी मुनिने कहा कि हे राजन्, जब तुम चाहो मुझसे प्रश्न कर सकते हो, अतः महर्षि याज्ञवल्क्यको अपनी इच्छाके विरुद्ध बोलना ही पड़ा ॥ १। याज्ञवल्क्य किंज्योतिरयं पुरुष इति। आदित्यज्योतिः सम्राडिति होवाचादित्येनैवायं ज्योतिषास्ते पल्ययते कर्म कुरुते विपल्येतीत्येवमेवैतद्याज्ञवल्क्य ॥ २॥ भावार्थ-राजाने मुनिसे कहा कि हे याज्ञवल्क्य! यह पुरुष, किस ज्योतिवाला है ? याज्ञवल्क्यने उत्तर दिया कि हे सम्राट! यह पुरुष आदित्यरूप ज्योतिवाला है, क्योंकि यह आदित्यरूप ज्योतिसे ही बैठता है, इधर उधर जाता है, कर्म करता है तथा कर्म करके पुनः अपने स्थानपर लौट आता है। इसपर जनकने कहा कि हे याज्ञवल्क्य ! यह ऐसी ही बात है॥। २ ।। वि० वि० भाष्य-याज्ञवल्क्यका सम्बोधन कर जनकने पूछा कि यह २९

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२०६ शृहदारण्यकोपनिषद् [अष्याय ४

पुरुष 'किज्योति' है? यानी किसके प्रकाशसे यह प्रकाशित होता है ? प्रकृतमें पुरुष शब्द कार्यकारणसघातस्वरूप हस्तपादादि विशिष्टपरक है। प्रश्नका तात्पर्य यह है कि स्वावयवसघातसे बाह्य किसी दूसरी ज्योतिसे पुरुष अपना व्यवहार करता है या शरीरान्तवर्ती ज्योतिसे अपना सब काम किया करता है। राजा यद्यपि स्वय बुद्धिमान् था तथापि मुनिसे पूछना ठीक ही है, क्योकि पुरुषोके विज्ञान तथा कुशलताका तारतम्य होना सभव है, अथवा पुरुषकी बुद्धिका अनुमान करनेवाली भगवती श्रुति आख्यायिकाव्याजसे प्रकृत प्रश्नके उत्तरको स्वय प्रतिपादन करती है। (इसमे राजा या मुनि किसीकी भी बुद्धिकी कुशलता अभिप्रेत नही है।) जनकके तात्पर्यक ज्ञाता मुनिने भी देहादिसे व्यतिरिक्त आत्मज्योतिका बोध करानेके लिए जनकको व्यतिरिक्त ज्योतिका प्रतिपादक लिङ्ग बतलाया, यथा-हे गजन्। वह प्रसिद्ध आदित्य ज्योतिवाला है। किस प्रकार आदित्य ज्योतिवाला है, सो कहते हैं-स्ावयव सघातव्यतिरिक्त नेत्रकी अनुग्राहक आदित्य- ज्योतिसे प्राकृत पुरुष उपवेशनादिको करता है, उसी ज्योतिसे पुरुप क्षेत्र या जङ्गलमें जाता है, वहाँ जाकर उसके उचित अपने कार्योंको करता है, पुन घर लौट आता है। इसपर जनकने कहा कि हे याज्ञवन्क्य। यह बात ऐसी ही है।। २।। अस्तमित आदित्ये याज्ञवल्क्य किंज्योतिरेवायं पुरुष इति चन्द्रमा एवास्य ज्योतिर्भवतीति चन्द्रमसैवायं ज्योति- षास्ते पल्ययते कर्म कुरुते विपल्येतीत्येवमेवैतद्याजवल्क्य।।३। भावार्थ-राजाने मुनिसे कहा कि हे याज्ञवल्क्य। सूर्यके अस्त होनेपर यह पुरुष किस ज्योतिवाला है? यानी तब यह पुरुप किसके प्रकाशसे अपना व्यवहार करता है? याज्ञवल्क्यने उत्तर दिया कि हे सम्राट्। यह पुरुष चन्द्ररूप ज्योतिवाला है, क्योकि यह चन्द्ररूप ज्योतिसे ही बैठता है, इधर उधर जाता है, कर्म करता है तथा कर्म करके पुन अपने स्थानपर लौट आता है। इसपर जनकने कहा कि हे याज्ञवल्क्य, यह ऐसी ही बात है।। ३।। अस्तमित आदित्ये याज्ञवल्क्य चन्द्रमस्यस्तमिते किंज्योतिरेवायं पुरुष इत्यशनिरेवास्य ज्योतिर्भवतीत्यमिनैवायं ज्योतिषास्ते पल्ययते कर्म कुरुते विपल्येतीत्येवमेवैतय्ा- ज्ञवल्क्य ।। ४ ।।

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ब्राम्मण ३ ] विद्याविनोद भाष्य २२७

भावार्थ-हे याश्वल्क्य, सूर्यके अस्त होनेपर तथा चन्द्रमाके अस्त होनेपर यह पुरुष किस ज्योतिवाला है ? यानी तब यह पुरुष किसके प्रकाशसे अपना व्यवहार करता है ? याज्ञवल्कपने उत्तर दिया कि हे सम्राट् ! यह पुरुष अभिरूप ज्योतिवाला है, क्योंकि यह अभनिरूप ज्योतिसे ही बैठना है, इघर उधर जाता है कर्म करता है तथा कर्म करके पुनः अपने स्थानपर लौट आता है। इसे सुन जनकने कहा कि हे याज्ञवल्क्य, यह ऐसी ही बात है॥४ ॥ अस्तमित आदित्ये याज्ञवल्क्य चन्द्रमस्यस्तमिते शान्तेऽयौ किज्योतिरेवायं पुरुष इति वागेवास्य ज्योति- र्भवतीति वाचैवायं ज्योतिषास्ते पल्ययते कर्म कुरुते विपल्येतीति तस्माद्वै सम्राडपि यत्र स्वः पाणिर्न विनि- र्ज्ञायतेऽथ यत्र वागुच्चरत्युपैव तत्र न्येतीत्येवमेवैतद्या- ज्ञवल्क्य ।। ५ू ।। भावार्थ-हे याज्ञवल्क्, आदित्यके अस्त होनेपर, चन्द्रमाके अस्त होनेपर तथा अभिके शान्त होनेपर यह पुरुष किस ज्योतिवाला है ? यानी तब यह पुरुष किसके प्रकाशसे अपना व्यवहार करता है ? याज्ञवल्क्यने उत्तर दिया कि हे सम्राट् ! यह पुरुष वाणीरूप ज्योतिवाला है, क्योंकि यह वाणीरूप ज्योतिसे ही बैठता है, इधर उवर जाता है, कर्म करता है तथा कर्म करके पुनः अपने स्थानपर लौट भाता है। अतएव हे सम्राट्! जहाँ अपना हाथ भी नहीं दिखलाई देता है किन्तु जहाँ वाणी उच्चरित होती है वहाँ अर्थात् उस अन्धेरेमें पुरुप वाणी उच्चारण करके पास चला जाता है। यह सुनकर जनकने कहा कि यह ऐसी ही बात है॥। ५। वि• वि० भाष्य-सूर्य चन्द्रमाके अस्त होने पर तथा अभिके भी शान्त होनेपर पुरुष किं ज्योति है ? याज्ञवल्क्यने कहा कि हे राजन्! वाणीज्योति है। जिस प्रकार मेघमण्डल युक्त, वर्षाकालीन निविड अन्धकारयुक्त निशीथमें भ्रान्त कोई पुरुष मार्ग पूछता है कि किस मार्गसे अमुक आममें जा सकते हैं, तो उत्तर मिलता है कि इधरसे जाओ। वाणी सुनकर उसको यह अनुमान होता है कि अमुक दिशाखे, इतनी दूरसे, यह शब्द आया है, इसलिए इधर ही चलना चाहिए। तब उसके अभिमुख गतिसे उस स्थानपर पहुँच जाता है। अतीत तथा अनागत सूक्ष्म

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२२८ शृहदारण्यकोपनिषद् [अभ्याय ४

आदि की प्रकाशिका तो वाणीज्योति प्रसिद्ध ही है। वाणीसे वागिन्द्रिय विवच्ित नहीं है, किन्तु उसका विषय शब्द विवक्षित है। शव्दसे श्रोत्रेन्द्रिय दीप्त होती है। उक्त इन्द्रियके दीप् होनेपर मनमें विवेक उत्पन्न होता है। उस मनसे बाह्य चेष्टाका यानी स्वानुकूल गत्यादिका ज्ञान होता है। मनसे देखता है, मनसे सुनता है, मनके समवधानके निना तत् तत् इन्द्रियोंसे तत् तत् विषयका ज्ञान नहीं होता, यह अनुभव सिद्ध ही है। 'वाचैवायं ज्योतिषा आस्ते' इत्यादि श्रुतिसे वाणीमें ज्योतिष्ट् प्रसिद्ध है। वाणीसे कर्म करता है, वाक गन्धादिका उपलक्षण है। गन्धादिसे घ्राणादिका अनुग्रह होता है और उसके अनुकूल प्रवृत्ति आदि भी होती है, इसलिए इनसे भी कार्यकरणसंघातका अनुग्रह होता है। इसपर जनकने कहा कि हाँ यह ऐसी ही बात है।। ५।। अस्तमित आदित्ये याज्ञवल्क्य चन्द्रमस्यस्तमिते शान्तेऽयौ शान्तायां वाचि किंज्योतिरेवायं पुरुष इत्यात्मै- वास्य ज्योतिर्भव्तीत्यात्म नैवायं ज्योतिषास्ते पल्ययते कर्म कुरुते विपल्येतीति ॥६॥ भावार्थ-हे याज्ञवल्क्य, सूर्यके अस्त होनेपर, चन्द्रमाके अस्त होनेपर, अग्निके शान्त होनेपर तथा वाणीके भी शान्त होनेपर यह पुरुष किस ज्योतिवाला रहता है ? यानी उस समय यह पुरुष किसके प्रकाशसे अपना व्यवहार करता है? याज्ञवल्क्यने उत्तर दिया कि हे सम्राट्, उस समय आत्मा ही इस पुरुषकी ज्योति होता है। क्योंकि यह आत्मज्योतिसे ही बैठता है, इधर उधर जाता है, कर्म करता है तथा कर्म करके पुनः अपने स्थानपर लौट आता है ॥ ६॥ वि० वि. भाष्य-इस मन्त्रमें 'किंज्योतिः' इस प्रश्नका उत्तर 'आत्म- ज्योतिः' ऐसा कहा गया है। तात्पर्य इसका यह है कि वाणी तथा तदुपलक्षित गन्धादि अनुग्राहक विषयोंके शान्त होनेपर पुरुषकी प्रवृत्ति निवृत्ति आदिका निरोध हो जाता है। जाग्रत् विषयोंमें इन्द्रियोंकी बहिर्मुख प्रवृत्ति होती है, जिस समय आदित्यादिकी ज्योतिसै चन्नुआदि अनुगृहीत होते हैं, उस समय पुरुषका व्यवहार स्फुटतर होता है, उस समय जागरित अवस्थामें स्वावयवसंघातसे व्यतिरिक्त जयोतिसे ही पुरुवज्योतिसे होनेवाले कार्योंकी सिद्धि होती है। इसलिए समस्त बाह्य ज्योतियोंके अस्तसमयमें स्वप्न, सुषुन तथा जाग्रन्कालमें उस अवस्थामें स्वावयव-

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भाह्मण ३ ] विद्याविनोद भाष्य २२६

संघातसे व्यतिरिक्त ज्योतिसे ही पुरुषके प्ोतिहेतुक कार्य होते हैं। स्वम्नमें ऐसे ज्योतिकार्य देखे जाते हैं-बन्धुका संग, वियोग तथा देशान्तर गमन आदि। सुषुप्तिसे उत्थान होने पर "सुखपूर्वक सोया, कुछ नहीं जाना" यह स्मरण होता है अतः व्यतिरिक्त कोई ज्योति है, यह ज्ञात होता है। वाणीके शान्त होने पर भी आत्मा ही ज्योति है। कार्यकरण संघातसे व्यतिरिक्त आत्मा यहाँ आत्म- शब्दसे विवक्ित है। उक्त ज्योति कार्यकरणकी भासक आदित्यादि बाह्य ज्योतिके समान अन्यसे प्रकाशमान नहीं है। यह ज्योंति परिशेषात् हृदयके भीतर है तथा कार्यकरण व्यतिरिक्त है, यह तो निविवाद रूपसे सिद्ध है। जो कार्यकरण संघातकी अनुग्राहक ज्योति है, वह बाह्य चक्षु आदि करणोंसे उपलभ्यमान देखी गई है, जैसे आदित्यादि। किन्तु आदित्यादि ज्योतिके अस्त होनेपर प्रकृत ज्योति नेत्रादिसे उपलब्ध नहीं होती, केवल उसका कार्य ही उपलब्ध होता है। अतः आत्मा ही ज्योंति है, उसीसे पुरुष कार्य करता है, अतः यह निश्चित है कि अन्तःस्थ ज्योति है। यह ज्योति आदित्यादिसे विलक्षण है। आदि- त्यादि भौतिक हैं और यह अभौतिक है, अभौतिकत्व ही चक्षुआदि ग्राह्यत्वा- भावमें हेतु है। शेष अथ भावार्थमें स्पष्ट है॥ ६॥ यद्यपि शरीरादिसे अतिरिक्त आत्मा है, इत्यादि बातें सिद्ध हो गयीं, तथापि समानजातीयानुग्राहकत्व दर्शननिमित्त भ्रान्तिके करण इन्द्रियोंमेंसे कोई एक या उनसे अतिरिक्त आत्मा है, इसका विवेक न होनेसे जनक पुनः प्रश्न करता है, यथा- कतम आत्मेति योऽयं विज्ञानमयः प्रागोषु हृद्यन्त- ज्योतिः पुरुषः स समान: सन्नुभौ लोकावनुसंचरति ध्या- यतीव लेलायतीत स हि स्वन्नो भूत्वेमं लोकमतिक्रामति मृत्यो रूपाणि ॥ ७॥ भावार्थ-[जनक-] कौन आत्मा है? [याज्ञवल्क्य-] जो यह प्राणोंमें बुद्धिवृत्तियोंके भीतर रहनेवाला विज्ञानमय ज्योतिःस्वरूप पुरुष है वही बुद्धरूप होता हुआ दोनों लोकोंमें संचरण करता है। वही बुद्धिवृत्तिके अनुसार मानो चिन्तन करता है तथा प्राणवृत्तिके अनुरूप होकर मानो चेष्टा करता है। वही स्वम् होकर इस लोक (देहेन्द्रियसंघात) का अतिक्रमण करता है और शरीर तथा इन्द्रियरूप मृत्युके रूपोंका भी उलंघन करता है।।७ ॥

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२३० [अध्याय ४

वि० वि. भाष्य-[प्रश्न-] इस पुरुषका आत्मा ही स्वयंज्योतिस्वरूप है, किन्तु इस शर्रार में इन्द्रिय और अन्तःकरण भी स्थित है। तो क्या वह ज्योतिस्वरूप पुरुष इन इन्द्रियों तथा अन्तःकरणसे उत्पन्न हुआ है ? अथवा इनसे वह कोई अतिरिक्त पुरुष है ? या इन्द्रिय सहित शरीरसमुदाय ही आत्मा है, या इनसे वह भिन्न है ? [उत्तर-] जो इन्द्रियोंमें विज्ञानरूपसे स्थित है तथा जो बुद्धवृत्तियोंमें अन्तःप्रकाशमय पुरुष है. वही आत्मा है। या जो मनके द्वारा समस्त इन्द्रियोंके समीप जाकर उन सबको सजीवित कर प्रज्वलित करता है, जैसे राजा अपने सह- चारियों को लेकर इधर उधर विचरता है, वैसे ही जो इन्द्रियोंके साथ विचरनेवाला है वह आत्मा है। या जो हृदयमें स्थित है तथा जिसके भीतर सूयके समान स्वयं- ज्योति:स्वरूप समस्त शरीरोंमें रमण करता है वह आत्मा है। वही आत्मा सामान्य रूपसे उभय लोकोंमें गमन करता है। यानी देहादिसे भिन्न कोई कर्ता भोक्ता है जो मरकर दूसरे जन्ममें स्त्रकृत कर्मफलको भोगता है। कारण कि जिस समय यह मूर्च्छित होकर देहको छोड़ने लगता है उस समय स्त्र-उपारजित धर्म अधर्मको याद करने लगता है, यह सोचते हुए कि इन सबको मैं छोडूँगा, क्या ये सब सुझको पुनः प्राप्त होंगे ? यह किस प्रकार ज्ञात होता है ? इस बातको जाननेके लिए आगे स्वप्नका दष्टान्त दिया जाता है-मुनिने कहा कि हे जनक, जब मनुष्य स्वप्रावस्थाको प्राप्त होता है उस समय वह स्त्रप्रमें देखता है कि मैं सुखी हूँ, मुझमें कुछ भी दुःख नहीं है। इसी प्रकार इस लोकमें भी परलोकके सुखका अनुभव करता है और जानता है कि परलोक कोई अतिरिक्त वस्तु है। जो जाग्रत् तथा स्वप्ावस्थामें सामान्य रूपसे विचरण करता है वही आत्मा है। जिस्र तरह जाग्रत् अवस्था तथा स्व्रपावस्थामें कुछ भेद नहीं है उसी तरह इस लोक और परलोकमें भी कोई भेद नहीं है। जो कुछ इस लोकमें करता है उसका फल परलोकमें भोगता है।। ७ ॥ स वा अयं पुरुषो जायमानः शरीरमभिसंपद्यमानः पाप्मभिः स५सृज्यते स उत्क्रामन् ब्रियमाणः पाप्मनो विजहाति ॥|८ ॥ भावार्थ-यह पुरुष उत्पन्न होते समय, देहको आत्मभावसे प्राप्त होते समय पापोंसे संश्लिष्ट हो जाता है और मरते समय सब पापोंको छोड़ देता है॥८ ।।

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विद्याविनोद भाष्य २३१

वि० वि. भाष्य-जैसे एक शरीरमें सुप्त होकर मृत्युके रूपोंका यानी कार्यकरणसंघातका अतिक्रमण कर आत्मज्योतिमें पुरुष स्थित होता है, वैसे ही वह प्रकृत पुरुष जायमान है। शंका-आत्मा तो नित्य है, फिर वह जायमान किस प्रकार होता है? समाधान-शरीरेन्द्रियसंघातको प्राप्त कर यानी शरीरमें आत्मभाव- का ग्रहण कर देहादिकी उत्पत्तिसे आत्मा अपनेको उत्पद्यमान समझता है, पाप- समवायी धर्माधर्माश्रय कार्यकरणोंसे संयुक्त होता है, वही मृत्युसमय में अन्य शरीरमें जाता हुआ उन्ही संशलिष्ट पापरूप कार्यकरणसंघातोंका त्याग करता है, यानी उनसे वियुक्त होता है। जैसे स्वप्न और जाग्रत् कालकी वृत्तियोंमें वर्त- मान यह पुरुष एक देहमें पापरूप कार्यकरणके उपादान तथा त्यागोंसे बुद्धिके समान होकर निरन्तर संचरण करता है, वैसे ही इहलोक तथा परलोकमें जन्म और मृत्युस शरीर और इन्द्रियोके त्याग तथा उपादानको निरन्तर प्राप्त करता हुआ, जबतक मोक्ष नहीं प्राप्त करता तबतक संचरण करता है। इसलिए आत्मज्योति शरीरादिसे अति- रिक्त है। यदि जन्म मरण, पुण्य पाप आदि आत्माके स्वाभाविक धर्म होते, तो उनसे संयोग तथा वियोग आत्माका नहीं होता, जैसे वहिके स्वाभाविक औषण्य धर्मका संयोग और वियोग नहीं होता है ॥। ८ ॥ तस्य वा एतस्य पुरुषस्य द्वे एव स्थाने भवत इदं च परलोकस्थानं च सन्ध्यं तृतीयथ स्वप्नस्थानं तस्मिन्सन्ध्ये स्थाने तिष्ठन्नेते उभे स्थाने पश्यतीद च परलोकस्थानं च। अथ यथाक्रमोऽयं परलोकस्थाने भवति तमाक्रममाक्रम्यो- भयान् पाप्मन आनन्दाथश्च पश्यति स यत्र प्रस्वपित्यस्य लोकस्य सर्वावतो मात्रामपादाय स्वयं विहत्य स्वयं निर्माय स्वेन भासा स्वेन ज्योतिषा प्रस्वपित्यत्रायं पुरुषः स्वयंज्यो- तिर्भवति ॥६॥। भावार्थ-इस पुरुपके दो ही स्थान हैं-यहलोक तथा परलोक, तीसरा स्व- प्नस्थान संध्यस्थान है। उस संध्यस्थानमें स्थित रहता हुआ यह इस लोकरूप स्थान तथा परलोकस्थान इन दोनोंको देखता है। यह पुरुष परलोक स्थानके लिए जैसे साधनसे युक्त्त होता है, उस साधनका आश्रय लेकर यहाँ दुःख तथा सुख दोनों ही को अनुभव करता है। जब यह सोता है तब इस सर्वावान् लोकके

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२३२ बृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय ४

एकदेशको लेकर अपने आप ही इस स्थूल देहको चेतनाशून्य करके और स्वयं अपने वासनामय शरीरको रचकर अपने प्रकाशसे यानी अपने ज्योतिस्वरूपसे शयन करता है। इस अवस्थामें यह पुरुष स्वयंज्योतिस्वरूप हो जाता है।६।। वि० वि० भाष्य-इस पुरुषके दो ही स्थान हैं-यह वर्तमान जन्मका शरी- रेन्द्रियविषयवेदनाविशिष्ट स्थान, जो प्रत्यक्षसे अनुभूयमान है। दूसरा परलोक- स्थान, जो शरीरादिके वियोगके अनन्तरकालमें अनुभवसिद्ध है। इहलोक तथा परलोककी जो संधि है, उसमें होनेवाला संध्य है, वह तृतीय स्वप्नस्थान है। इसस दो ही स्थान हैं, ऐसा निश्चय किया गया है। लोकमें दो ग्रामोंकी सन्धि (सीमा) को उन ग्रामोंकी अपेक्षा तीसरा ग्राम नहीं कहा जा सकता। वैसे ही दोनोंकी संधिमें वर्तमान लोक तृतीय लोकमें परिगणित नहीं है। चार्वाक परलोक नहीं मानता, अतः वह पूछता है कि परलोक स्थानका अस्तित्व किस प्रकार है, जिसकी अपेक्षा स्वप्नस्थान संध्य कहा जाय ? उत्तर-चा्वाक प्रत्यक्षको ही प्रमाण मानता है। प्रकृत प्रत्यक्ष प्रमाण स्पष्ट है कि संध्याख्य स्वप्नस्थानमें स्थित होकर पुरुष इन दोनों लोकोंको देखता है-इसलोक तथा परलोक स्थानको। अतः स्वप्न जागरित व्यतिरिक्त दोनों लोक हैं। वह समान होकर जन्म-मरण परम्परासे दोनों लोकोंमें संचरण करता है, जो कि विमोक्ष पर्यन्त जीवमें सदा बनी रहती है। शंका-स्वप्नमें स्थित होकर जीव दोनों लोकोंको कैसे देखता है ? अविद्या कर्मादि उपाय किसमें आश्रित रहता है और किस तरहसे रहता है ? समाधान-देखता कैसे है, पहले इसको सुनिये, यह पुरुष अपने प्राप्त करने योग्य परलोकस्थान निमित्तमें जैसे आक्रमवाला होता है, यानी विद्या, कर्म तथा पूर्व प्रज्ञारूप जिस प्रकारके परलोकप्राप्तिके साघनसे युक्त होता है, यथाक्रम परलोक स्थानके लिए, ऊर्ध्वमुख अङ्गुरप्रादुर्भाव योग्य वीजके समान उस आक्रमका आलम्बन कर दोनोंको देखता है। यानी अदृष्ट पुण्य और पापके फल सुख और दुःखका अनुभव करता है। वह पूर्व प्रकृत आत्मा जिस कालमें स्वापका अनुभव करता है, उस समय समस्त वासनासे युक्त इसलोककी मात्रा (एकदेश) को लेकर (दृष्ट जन्म वासना वासित होकर) अपनेसे ही शरीरका पातन कर तथा स्वयं वासनामय देह का निर्माण कर आत्मीय दीप्तिसे, सर्ववासनात्मक अन्तःकरणवृत्ति दीप्तिसे स्व्राप्निक सुख आदिका अनुभव करता है। स्वाप्निक शरीर मायामयके समान अतर्कित सामग्रीसे उत्पन्न अचिरस्थायी है, यह शरीर भी आत्मकर्मनिमित्त है, अतः स्वयंकर्तृक है। इस अवस्थामें इस कालमें यह आत्मा स्वयंप्रकाश होता है।

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भाकण ३ ] विद्याविनोद भाष्य २३३

शंका-इस लोकमें मात्रोपादान किकृत है और अन्तःकरण रहनेपर आत्मा स्वयंप्रकाश किस प्रकार होता है ? समाधान-अन्तःकरणविषयक भूत प्रकाश्य है, अतएव यहाँ 'वह पुरुष स्वयंज्योति है' यह कह सकते हैं, अन्यथा नहीं। यदि विषय ही नहीं रहेगा, तो किसीका प्रकाश होगा नहीं, 'फिर पुरुष स्वयंज्योति है' यह नहीं कह सकते। जिस प्रकार सुषुप्तिदशामें यह नहीं कह सकते कि पुरुष स्वयं- ज्योति है, क्योंकि उस समय कोई ज्योतिकार्य नहीं होता। स्वप्नदशामें विषयोंका भान होता है। किससे होता है, इस जिज्ञासासे विचार करनेपर अन्तःकरण स्वयं जड़ है, वह आत्मस्वरूपका भी साक्षात् भासक नहीं हो सकता। अन्य विषयके भानकी उसके द्वारा आशा दूर ही है, इस लिए उसकी भासक आत्मज्योतिको स्वयं- प्रकाश मानना आवश्यक है। जिस समय वासनात्मक विषयभूत वह उपलब्ध होती है, उस समय म्यानसे निकली तलवारके समान समस्त संसर्गरहित चक्षुरादि कार्यकरण- व्यावृत्तस्वरूप अलुप्तद्दगात्मज्योति अपने रूपसे भान कराती हुई गृहीत होती है, अतः पुरुष स्वयंज्योति है, यह सिद्ध हुआ ।। ९ ॥ न तत्र रथा न रथयोगा न पन्थानो भवन्त्यथ रथान् रथयोगान्पथः सृजते न तत्रानन्दा मुदः प्रमुदो भवन्त्य- थानन्दान् मुदः प्रमुदः सृजते न तत्र वेशान्ताः पुष्करि- ण्यः स्रवन्त्यो भवन्त्यथ वेशान्तान् पुष्करिणीः स्त्रवन्तीः सृजते स हि कर्ता॥ १० ॥ भावार्थ-स्वप्नावस्थामें न रथ है, न रथयोग (अश्वादिक) हैं, न रास्ते ही हैं, किन्तु वह जीवात्मा रथोंको, अश्वोंको तथा मार्गोंको बना लेता है। उस समय आनन्द, मोद, प्रमोद नहीं हैं किन्तु वह आनन्द, मोद, प्रमोदोंको पैदा कर लेता है। उस समय सरोवर, तालाब तथा नदियाँ नहीं हैं किन्तु वह सरोवर, तालाब और नदियो को बना लेता है, क्योंकि स्वप्नावस्थामें वही कर्ता धर्ता है ॥ १० ॥ वि० वि० भाष्य-यहाँ शंका होती है कि पुरुष स्वयंज्योति कैसे है? जाग्रत् अवस्थामें ग्राह्यग्राहकादिलक्षण समस्त व्यवहार देखते हैं। चक्षुरादिके अनुग्राहक आदित्यादि लोक वैसे ही देखे जाते है, जैसे जाग्रत् अवस्थामें देखे जाते हैं। तो किस प्रकार विशेपावधारण करते हैं कि इस अवस्थामें यह पुरुष स्वयं- ३०

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२३४ शृहदारण्यकोपनिषद् [अभ्याय ४

ज्योति है ? समाधान-स्वप्नदर्शनमें विलक्षणता है। जाग्रत् अवस्थामें इन्द्रिय, मन, आलोकादिके व्यापारसे आत्मज्योति संकीर्ण रहती है। इस स्वप्नमें इन्द्रिया- भाव तथा तदनुग्राहक आदित्यादिका भी अभाव होनेसे केवल आत्मा विविक्त्त होता है, अतः विलक्षणता है। स्वप्नमें भी वैसे ही विषय उपलब्ध होते हैं जैसे कि जाग्रत् अवस्थामें, तब उनकी इन्द्रियाभावसे विळक्णता इस प्रकार है कि स्वप्नमें रथ यानी ग्राह्य विषय नहीं हैं, न रथयोग यानी अश्वादिक ही हैं और न रथ- गमनमार्ग ही है। किन्तु रथ, रथयोग और मार्ग स्वप्न बनाता है। रथके निर्माणो- पयोगी काष्ठादिके न होनेपर भी वह सर्वावत् इस लोककी मात्रा लेकर ग्वयं जाग्रत् लोकका विनाश कर स्वप्नलोकका स्वयं निर्माण करता है यानी अन्तःकरण- वृत्ति जाग्रत् लोककी मात्रा वासनाको लेकर रथादि वासनारूप अन्तःकरणवृत्ति, तदुपलब्धिनिमित्तक कमसे प्रेरित रथादि दृश्यत्व रूपसे व्यवस्थित होते हैं। इसी अभिप्रायसे 'स्वयं निर्माय' कहा गया है, यही बात भगवती श्रुति प्रतिपादन करती है कि मन रथादिकी सृष्टि करता है, न करण है, न करणानुग्राहक आदित्यादि ज्योति है और न तद्वभास्य रथादि विषय ही हैं। केवल तद्वासनामात्र तदुपल- ब्धिनिमित्त प्रेरित उद्धृत अन्तःकरण वृत्तिका आश्रय देखा जाता है, जिस ज्योतिसे ये सब दृश्य हैं वह अलुप्तदक आत्मज्योति है। जैसे म्याननिष्कृष्ट तलवार विविक्त देखी जाती है वैसे ही दृश्य बुद्धि आदिसे विविक्त आत्मज्योति है। उस अवस्थामें न आनन्द ही है और न हर्ष ही है तथापि वह आनन्दादिकी सृष्टि करता है तथा वहाँ छोटे तालाब, तड़ाग और नदियाँ भी नहीं हैं तो भी वेशान्तादिकी सृष्टि करता है। क्योंकि वह कर्ता है, उसकी वासनाश्रय चित्तवृत्ति उद्भवनिमित्त कर्म कारण रूपसे कही गयी है। आत्मज्योतिमें कर्तृत्व औपचारिक है अतएव 'ध्यायतीव लेलायवतीव' ऐसा कहा गया है॥ १० ॥ अब इस मन्त्रमें स्वाप्र सृष्टिका वर्णन करते हैं, यथा- तदेते श्लोका भवन्ति। स्वन्नेन शारीरमभिप्रहत्याS- सुप्तः सुपानभिचाकशीति॥ शुक्रमादाय पुनरैति स्थानथ हिरण्मयः पुरुष एकहथसः॥ ११ ॥ भावार्थ-पूर्वोक्त विषयमें ये श्लोक (मन्त्र) प्रमाण होते हैं, यथा-यह जीवात्मा रवम्नके द्वारा शरीरको चेष्टारहित करके स्वयं असुप्त हो सुप्तावस्थापन्न

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ययाविवाह सा २३५

समस्त पदार्थोंको चारो ओोरसे देखता रहता है या प्रकाशित करता है। वह हिर- पमय, एक हंस, जीवात्मा पुरुष इन्द्रियोंकी तेजोमात्राकी लेकर पुनः जागरण- स्थानको प्राप्त होता है॥ ११ ॥ वि० वि० भाष्य-स्वप्नदशामें शरीर निर्व्यापार हो जाता है, यानी उस समय सभी इन्द्रियाँ निश्चेष्ट हो जाती हैं। उस समय वह अलुप्रज्ञानादि शक्तिस्वरूप होनेके कारण असुप्त रहकर सुप्र पदार्थों को यानी वासनारूपसे उद्भूत अन्त :- करणवृत्तिके आश्रित बाह्य तथा आध्यात्मिक सभी भावोंको, जो अपने स्वरूप से सोये रहते हैं, प्रकाशित करता है। जो पहले स्वप्न-अवस्थामें था वही ज्योंति- ष्मान् जागरित स्थानमें आ जाता है। वह कौन ? जो ज्योति स्वरूप तथा सब शरीररूप पुरियोंमें स्थित है, फिर वह एकहंस है यानी अकेला ही दोनों लोकोंमें गमनागमन करनेवाला है॥ ११ ॥ अब पूर्वोक्त अर्थको दृष्टान्त द्वारा पुष्ट करते हैं, यथा- प्राणोन रक्षन्नवरं कुलायं बहिष्कुलायादमृतश्चरि- त्वा। स ईयतेऽमृतो यत्र कामथ हिरण्मयः पुरुष एकहथसः ॥ १२ ॥ भावार्थ-वह ज्योतिस्वरूप, एकहंस, अमृत धर्मवाला जीवात्मा निकृष्ट शरीररूप नीड़ (घोंसले) की प्राणसे रक्षा करता हुआ, शरीररूप नीड़से मानो बाहर विचरता हुआ जहाँ-जहाँ कामना होती है वहाँ वहाँ जाता है॥ १२॥ वि० वि० भाष्य-यह शरीर निकृष्ट है, क्योंकि अनेक अपवित्र वस्तुओं का संघाव होनेसे अत्यन्त बीभत्स घोंसलेकी तरह है। वह अमरणधर्मा पुरुष इसकी प्राण, अपान आदि पाँच वृत्तियोंवाले प्राणसे रक्षा करता हुआ आकाशके समान मानो बाहर विचरा करता है। भाव यह है कि एकहंस पाँच प्रकारके प्राणों द्वारा अपने शरीरकी रक्षा करता हुआ स्वप्नसे पुनः जाग्रत्में ऐसे आ जाता है जैसे पक्षी देशान्वरोंमें भ्रमण करके पुनः अपने घोंसलेमें आकर विश्राम लेता है॥ १२॥ स्वप्नान्त उच्चावचमीयमानो रूपाणि देवः कुरुते बहूनि। उतेव स्त्रीभिः सह मोदमानो जक्षदुतेवापि भयानि पश्यन् ॥ १३ ॥

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२३३ बृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय ४

भावार्थ-वह जीवात्मा देव स्वप्नावस्थामें विविध उच्च तथा नीच भावोंको प्राप्त होता हुआ अनेक रूपोंको बना लेता है। कभी स्त्रियोंके साथ आनन्दका अनुभव करता हुआ, कभी मित्रोंके साथ हँसता हुआ और कभी व्याघ्रादिकोंका विविध भय देखता हुआ सा स्वप्में खेल करता है॥ १३ ॥ वि० वि.भाष्य-वह द्योतमान दिव्यगुणविशिष्ट पुरुष स्वप्नस्थानमें कभी ब्राह्मणादि उच्च भावको, कभी पशुःपक्षी आदि निकृष्ट भावको प्राप्त होता हुआ असंख्य वासनामय रूप बना लेता है। कभी आचार्य बनकर शिष्यको पढ़ाने लगता है, कभी स्वयं पढ़ने लगता है, इत्यादि। इसीका श्रुति प्रतिपादन करती है कि कभी स्त्रियोंके साथ क्रीड़ा करता है, कभी मित्रोंके साथ हँसता है और कभी भयविह्वल होता है।। १३ ।। अब स्वप्रस्थानके विषयमें सतभेद प्रकट करते हुए उसके स्वयंज्यो- तिष्टका निर्णय करते हैं, यथा- आराममस्य पश्यन्ति न तं पश्यति कश्चनेति। तं नायतं बोधयेदित्याहुः। दुर्भिषज्यथ हास्मै भवति यमेष न प्रतिपद्यते। अथो खल्वाहुर्जागरितदेश' एवास्यैष इति यानि ह्येव जागत्पश्यति तानि सुप्त इत्यत्रायं पुरुषः स्वयं- ज्योतिर्भवति सोऽहं भगवते सहस्त्रं ददाम्यत ऊर्ध्व विमोक्षाय ब्रूहीति॥१४ ॥ भावार्थ-सब कोई इस जीवात्माकी क्रीड़ाको या क्रीड़ासामग्रीको देखते हैं, उस आत्माको कोई नहीं देखता। कोई चिकित्सक आदि लोग ऐसा कहते हैं कि उस सोते हुएको एकाएक न जगावे, क्योंकि इस देहके लिए वह स्थान दुश्चि- कित्स्य हो जाता है, जहाँ वह जीवात्मा प्राप्त नहीं होता। इसीसे कोई आचार्य- ऐसा कहते हैं कि यह स्वप्नस्थान इसका जागरित देश है क्योंकि यह जागता हुआ जो देखता है सोकर भी उन्हीको देखता है। किन्तु यह कथन यथार्थ नहीं प्रतीत होता, क्योंकि इस अवस्थामें वह पुरुष स्वयंज्योंति होता है। राजा जनक कहते हैं-सो मैं आपको एक सहस्र देता हूँ, यानी एक हजार गौएँ देता हूँ या मुद्राएँ प्रदान करता हूँ। इसके आगे मुझे विमोक्ष यानी सम्यगू ज्ञानके लिए उपदेश दीजिये॥ १४॥

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विद्याविनोद भाष्य २३७

वि० वि० भाष्य-हे जनक, अज्ञानी लोग इस आत्माके क्रीडास्थानस्वरूप सर्व जगत् को ही देखते हैं, उस द्रष्टा आत्माको कोई नहीं देखते। जागरित और स्वप्न दोनों तुल्य हैं, दोनों अवस्थाओंमें आत्मा स्वप्रकाश है। स्वप्नकथामें जो स्व- प्रकाशता श्रुतिमें वर्णन की है वह मुमुत्तुओंके बोधनके लिए है। जागरित अव- स्थामें सूर्यादिक प्रकाशकोंके संकीर्ण होनेसे आत्माकी स्व्रयंज्योतिरूपता मुमुन्ु लोगोंको निर्णीत नहीं होती। सुषुप्ति अवस्थामें मन आदि सबके लीन होनेसे विशेष ज्ञानका अभाव है, इसीसे सुषुप्ति अवस्थामें मुमुक्षुओंको कोई व्यवहार नहीं प्रतीत होता, जिस व्यवहारका साधक आत्मा अङ्गीकार किया जाय। अतएव उन जाग्रत सुषुप्ति दोनों अवस्थाओंका त्याग करके केवल स्वप्न अवस्थामें श्रुति भगवतीने आत्माकी प्रकाशता निरूपण की है। ऐसे उपदेश को ग्रहण करके राजा जनकने याज्ञ- वल्क्यसे कहा कि हे मुने, आपने मेरे प्रति उपदेश किया, इस कारण मैं आपको एक सहस्र गौएँ देता हूँ। कोई कहते हैं कि जनकने एक हजार मुद्रा देनेको कहा था। १४॥ जनकके ऐसी प्रार्थना करने पर कि अब आगे मोक्षके लिए उपदेश दीजिए, याज्ञवल्क ऋषि कहते हैं, यथा- स वा एष एतस्मिन्संप्रसादे रत्वा चरित्वा दृष्ट्वैव पुण्यं च पापं च पुनः प्रतिन्यायं प्रतियोन्याद्रवति स्वन्ना- यैव स यत्तत्र किंचित्पश्वत्यनन्वागतस्तेन भवत्यसङ्गो ह्ययं पुरुष इत्येवमेवैतद्याजवल्क्य सोऽहं भगवते सहस्त्रं ददा- म्यत ऊर्ध्व विमोत्तायैव ब्रुहीति॥१५ ॥ भावार्थ-सो यह आत्मा इस सुषुप्ति अवस्थामें स्थित होकर सब दुःखोंसे पार उतर जाता है, प्रथम रमण तथा भ्रमण कर पुण्य और पापको देखकर ही जैसे आया था तथा जिस जगहसे आाया था, फिर स्वप्न अवस्थामें ही लौट आता है। आत्मा वहाँ जो कुछ देखता है उससे बद्ध नहीं होता, क्योंकि यह पुरुष असङ्ग है। जनक कहते हैं कि हे याज्ञवल्क्य, एक सहस्र गायें देता हूँ, इसके आगे सम्यग ज्ञानके लिए ही आप उपदेश दें ॥ १५॥ वि० वि• भाष्य-जैसे मुक्त आत्मा सभी तरहके हर्ष शोक आदि विकारों- से सदाके लिए सम्बन्धरहित हो जाता है, ऐसे ही सुषुप्त जीव भी कुछ क्षणके

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२३८ अध्याद 6

लिए हर्ष शोकादि अनुभूतिसे रहित होता है। इसासे सुषुप्ति अवस्थामें स्थित तथा मुक्त पुरुपकी प्रायः समान ही स्थिति होती है। इससे कोई यह समझनेकी भूल न करे कि मुक्ति और सुपुप्ति एक ही बात होती है। मुक्तिसे पुनरावृत्ति नहीं होती, सुषुप्तिमेंसे फिर उसी पूर्व अवस्थाकी प्राप्ति हो जाती है॥ १५॥ इसी प्रकार स्वप्नावस्थाकी तरह जाग्रतमें भी आत्माका वास्तवमें कमके साथ स्वतः सम्बन्ध नहीं है, यह कहते हैं, यथा- सवा एष एतस्मिन्स्वन्ने रत्वा चरित्वा दष्ट्वैव पुण्यं च पापं च पुनः प्रतिन्यायं प्रतियोन्याद्रवति बुद्धान्तायैव स यत्तत्र किंचित्पश्यत्यनन्वागतस्तेन भवत्यसङ्गो ह्ययं पुरुष इत्येवमेवैतद्याज्ञवल्क्य सोऽहं भगवते सहसत्रं ददा- म्यत ऊर्ध्व विमोक्षायैव ब्रहीति ॥१६ ॥ भावार्थ-अवश्य ही यह जीवात्मा इस स्वप्नमें रमण करता है, रमण और भ्रमण कर पुण्य और पापको देखकर ही जैसे गया था उससे छलटा जागरणके लिए पुनः दौड़ता है। यहॉ वह आत्मा जो कुछ देखता है, उससे वह बद्ध नहीं होता। जनक कहते हैं कि हे याज्ञवल्क्य, यह ऐसा ही है, सो मैं आपको एक सहस्र गार्ये देता हूँ, इसके आगे आप मुझे मोक्षप्राप्तयर्थ उपदेश दें ॥ १६ ॥ वि० वि भाष्य-मुनि बोले कि हे राजन्, जिस प्रकार यह जीव स्वप्नसे सुषुप्ति और सुषुप्तिसे स्वप्नको प्राप्त होता है. इसी प्रकार सुषुप्तिसे जाग्रतको प्राप्त होकर कर्मानुसार यथाप्राप्त विषयोंके भोगने पर भी स्वरूपसे विकारी नहीं होता, क्योंकि यह पुरुष असङ्ग है। इस वचनको राजा जनक स्वीकार कर कहते हैं कि हे याज्ञवल्क्य, यह ऐसा ही है, सो मैं आपको एक हजार गायें देता हूँ। आपका वचन श्रवण करके मुझे परम सन्तोष हुआ है, आप एक हजार गायें लीजिये। मैं आपको कुछ देता नहीं इन गायोंसे केवल मैं पत्र पुष्प द्वारा आपका सत्कार करना चाहता हूँ। साथ ही यह भी प्रार्थना करता हूँ कि इसके आगेका विज्ञान बतलाईए ॥ १६ ॥ जैसे यह पुरुष स्वप्नसे जाग्रत अवस्थामें आकर स्वप्नप्रसङ्गजनित दोषोंसे लिप्त नहीं होता, ऐसे ही यह जाग्रत् में जामतके किसी दोषसे युक्त नहीं होता, यह कहते है, यथा-

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भाकण ३ ] विदाविनोद भाष्य २३६

स वा एष एतस्मिन्बुद्धान्ते रत्वा चरित्वा दृष्ट्वैव पुण्यं च पापं च पुनः प्रतिन्यायं प्रतियोन्याद्रवति स्वझ्ा- न्तायैव॥१७ ॥ भावार्थ-अवश्य ही यह आत्मा इस जागरणमें रमण और भ्रमण कर पुण्य तथा पापको देखकर ही पुनः प्रत्यागमनसे अपने स्थानके प्रति स्वप्नके लिए? दौड़ता है॥ १७ ॥ वि० वि० भाष्य-जागरण पहले कहा गया है, जीवात्मा फिर जागरणसे स्वप्न, उससे पुनः सुपुप्तिको प्राप्त होता है। चक्र भ्रमणके समान यह व्यापार सदा हुआ ही करता है। वैराग्यके लिए प्रत्यक्ष विषयको भी यहाँ बार बार कहा गया है। पहले दो मन्त्रोंमें आत्माकी असङ्गताका ही प्रतिपादन किया गया है। बात यह है कि स्वप्नदशामें पहुँचकर सम्प्रसाद (खूब अच्छी तरह पूरे आनन्द) को प्राप्त हुआ यह पुरुष जागरणावस्थामें किये हुए कमसे सम्बद्ध नहीं होता। इसमें कारण कया है? तो कहते हैं कि स्वप्रावस्थामें इसे चौय आदि कर्म करते नहीं देखा गया। इसीसे यह विलक्षण है॥ १७ ॥ जागरणसे स्वप्नको, स्वप्रसे सुषुप्तिको, सुषुप्तिसे पुनः स्वप्नको; इस प्रकार क्रमिक संचारके द्वारा तीनों स्थानोका जानेका जो विस्तारसे प्रतिपादन किया गया है उसमें जो दष्टान्त रह गया था, उसका प्रतिपादन करते हैं, यथा- तद्यथा महामत्स्य उभे कूलेऽनुसंचरति पूर्व चापरं चैवमेवायं पुरुष एतावुभावन्तावनुसंचरति स्वप्तान्तं च बुद्धान्तं च ॥। १८ ॥ भावार्थ-इस विषयमें यह दष्टान्त है, जैसे-महामत्स्य नदीके पूर्व और अपर दोनों तटोंके ऊपर क्रमसे आता जाता रहता है, वैसे ही यह पुरुष स्व- प्रान्त यानी रवप्नस्थान तथा बुद्धान्त यानी जागरितस्थान-इन दोनों ही स्थानोंमें क्रमशः आता जाता रहता है॥ १८ ॥ वि. वि० भाव्य-जो मत्स्य नदीके वेगसे अवरुद्ध न हो, जो नदीके स्त्रोतको भी रोक दे सकता होऔर म्वच्छन्द तथा बलिष्ठ हो उसे महामत्स्य कहते हैं। भाष्यकारके वथनानुसार दष्टरन्त प्रदर्शन करनेका' प्रयोज्ञन यह है कि

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२४० [अभ्याय ४

स्वप्प्रयोजन काम तथा कर्मोंके सहित मृत्यु रूप देहेन्द्रिय सङ्घात अनात्मधर्म है यह आत्मा इससे विलक्षण है। हे जनक! जैसे एक महामत्स्य नदीके पूर्व तथा परतीरमें विचरता है, और वह उन दोनों तीरोसे स्वयं असङ्ग,। एवं भिन्न है, वैसेही यह आत्मा जागरित तथा स्वप्न इन दोनों स्थानोंको प्राप्त होता है, पर उन स्थानोंके संबन्धसे रहित होनेके कारण उन स्थानोंसे भिन्न है॥१८॥ अब श्येन (बाज) के दश्चान्तसे आत्माके विश्रान्तिस्थान सुषुप्तिका वर्णन करते हैं, यथा- तद्यथास्मिन्नाकाशे श्येनो वा सुपर्णो वा विपरिपत्य श्रान्तः सथहत्य पक्षौ संलयायैव ध्रियत एवमेवायं पुरुष एतस्मा अन्ताय धावति यत्र सुप्ो न कंचन कामं काम- यते न कंचन स्वन्नं पश्यति ॥ १८ ॥ भावार्थ-इस विषयमें यह दष्टान्त है कि जैसे इस आकाशमें बाज या सुपर्ण (गरुड़) नामक पक्षी इधर उघर उड़कर थक जानेसे अपने पक्षोंको फैलाकर घोंसलेमें जानेके लिए इच्छा करता है, ऐसे ही यह पुरुष इस सुषुप्तिस्थानके लिए दौड़ता है। जहॉ शयन करनेपर न तो कुछ चाहता है और न किसी स्वप्न- को देखता है॥ १६॥ वि० वि० भाष्य-जिस प्रकार बाज या गरुड़ पक्षी अनेक प्रकार की चेष्टाओंसे थकावटको प्राप्त होकर अपने पंखोंको फैलाकर घोंसलेकी ओर दौड़ता है, ऐसे ही यह विज्ञानमय जागरित एवं स्वप्नमें भ्रमण करनेसे श्रमको प्राप्त हुआ अपने नीड़रूप ब्रह्ममें आनन्द की प्राप्तिके वास्ते धावन करता है। श्येन और सुपर्ण ये दो भिन्न भिन्न पक्षी होते हैं। किसी विद्वात्ने 'सुप्णको' श्येनका विशेषण माना है। सुन्दर, पर्ण-पंख, यानी अच्छे पंखवाला बाज अर्थात् उड़नेवाला बाज पक्षी, यह अर्थ होता है। जैसे पकीके दो पंख होते हैं, वैसे ही इस जीवात्माके धर्म एवं अधर्म ये दो पंख हैं। इनकी सहायतासे जीवात्मा पंखवाले पंकीकी तरह जहाँ तहाँ आने जानेमें समर्थ हैं ॥ १६॥ अब् सम्पूर्ण अनथों की बीजभूत अ्विद्याका स्वरूप निर्णय करते हैं, यथा- ता वा अस्यैता हिता नाम नाड्यो यथा केशः सह- स्त्रधा भिन्नस्तावताऽणिम्ना तिष्ठन्ति शुक्कस्य नीलस्य पि-

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विद्याविनोद भाष्य २४१

द्लस्य हरितस्य लोहितस्य पूर्णा अथ यत्रैनं अन्तीव जिनन्तीव हस्तीव विच्छाययति गर्तमिव पतति यदेव जाग्रन्भ्रयं पश्यति तदत्राविद्यया मन्यतेऽथ यत्र देव इव राजेवाहमेवेदथ सर्वोडस्मीति मन्यते सोऽस्य परमो लोकः ॥ २० ॥ भावार्थ-इस शरीरमें बहुतसी नाड़ियाँ हैं जिनमें जीवात्मा भ्रमणादि क्रिया किया करता है, हित करनेवाली होनेके कारण उन्हें 'हिता कहते हैं। वे बालके सहस्रवे भागके समान सूक्ष्म हैं एवं शुक्क, नील, पीत, हरित और लाल रंगके रंगसे या रससे भरी हैं। सो उनमें इस पुरुषको स्वप्ावस्थामें प्रतीत होता है कि कोई इसे मार रहा है, कोई मानो इसे वशमें कर रहा है और मानो इसे हाथी चारों ओर दौड़ा रहा है अथवा यह मानो गढ़ेमें गिर रहा है। अर्थात् जगता हुआ यह पुरुष जिस भयको देखता है, उसीको स्वप्ना- वस्थामें अविद्याके कारण सत्य मानता है। जिस स्वप्न दशामें मैं देवके समान हूँ' 'मैं राजाकी तरह हूँ' और 'मैं ही सब कुछ हूँ' ऐसा मानता है, वह इसका परमलोक, परमधाम है॥२० ॥ वि० वि० भाष्य-बालके सहस्रवें भागके समान, शुक्कादि रसोंसे पूर्ण और सम्पूर्ण शरीरमें जालकी तरह फैली हुई सूक्ष्म नाड़ियोंमें सत्रह तत्त्वोंका लिङ्गशरीर रहता है। उसीके अधीन सारी वासनायें हैं जो संसारके अनेक धर्मोंके अनुभवसे उत्पन्न होती हैं। वह नाड़ीगत रसस्वरूप उपाधिके संसगसे धर्माधर्मप्रेरित उद्भूत वृत्तिविशेपवाला और स्त्री, रथ, हाथी आदि आकारवाली विशेष वासनाओंसे युक्त भासित होता है। जागरण अवस्थामें जो कुछ यह हाथी आदिसे भय देखता है, इस स्वप्नावस्थामें भी हस्त्यादिरूप भयके विना ही जाग्रत् हुई अविद्या वासनासे उस भयरूपको जो मिथ्या ही है, सच मानने लगता है॥ २० ॥

करते हैं, यथा- अब् अविद्या, काम तथा कर्माभावविशिष्ट सर्वात्मभावरूप मोक्षका वर्णन

तद्वा अस्यैतदतिच्छन्दा अपहतपाप्माभयथ रू- पम्। तद्यथा प्रियया स्त्रिया संपरिष्वक्तो न बाह्यं किंचन ३१

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२४२ बृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय ४

वेद नान्तरमेवमेवायं पुरुषः प्राजेनातमना संपरिष्वक्तो न बाह्यं किंचन वेद नान्तरं तद्ा अस्यैतदाप्काममात्म- काममकाम७१ रूपथ शोकान्तरम्॥ २१ ॥ भावार्थ-अवश्य ही इस पुरुषका जो यह रूप कामविवर्जित, पापरहित तथा निर्भय है। इसमें जैसे निज सत्ीसे आलिङ्गित पुरुष न बाहर, न भीतर, कुछ नहीं जानता है, वैसे ही यह पुरुष प्रज्ञात्मासे आलिङ्गित होनेपर न कुछ बाहरका विषय जानता है और न भीतरका; यह इसका आप्रकाम, आत्मकाम, अकाम और शोकशून्य रूप है।। २१ ।। वि. वि० भाष्य-हे राजन्, जिस प्रकार अपनी पत्नीके आनन्दमें मम्र होकर आलिङ्गन करनेवाला कामी पुरुष सुखका अनुभव करता हुआ बाह्य घटादिकोंको तथा आन्तर दुःखादिकोंको नहीं जानता। उसी प्रकार सुषुप्ति अवस्थामें अन्तःकरण- रूप उपाधिके लीन होनेसे ब्रह्मके साथ एकताको प्राप्त हुआ यह विज्ञानमय बह्य आन्तर प्रपश्नको नहीं जानता। सुषुप्ति अवस्थामें जिस ब्रम्मके साथ अभेदभावको यह विज्ञानमय प्राप्त होता है, वह ब्रह्म सर्व काम तथा पाप शोकादि अनात्मधर्मोंसे रहित है और उस सुषुप्ति अवस्थामें स्थूल शरीरादिकोंके सम्बन्धसे रहित है॥ २१ ॥ इस प्रकार प्रत्यक्षरूपसे काम आदिकोंके साथ सम्बन्धाभाव कहकर इस समय उनकी कारणरूपा कर्माख्य अविद्याके सम्बन्धाभावका वर्णन करते हैं, यथा- अत्र पिताऽपिता भवति माताऽमाता लोका अ- लोका देवा अदेवा वेदा अवेदाः । अत्र स्तेनोऽस्तेनो भ- वति भ्र णहाऽम् णहा चाण्डालोऽचाण्डाल: पौल्कसोऽपौ- ल्कसः श्रमणोऽश्रमणस्तापसोSतापसोऽनन्वागतं पुण्ये- नानन्वागतं पापेन तीणों हि तदा सर्वाञ्छोकान् हृदयस्य भवति॥ २२॥ भावार्थ-यहाँ पिता अपिता हो जाता है, माता अमाता होती है, लोक अलोक हो जाते हैं, देव अदेव और वेद अवेद होते हैं। यहाँ चोर अचोर होता है। भ्रणघाती अभ्रूणघाती और चाण्डाल अचाण्डाल होता है। पौल्कस अपौल्कस तथा श्रमण अश्रमण होता है। तापस अतापस हो जाते हैं। यहाँ इसका रूप

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भाखन २] विद्ाविनोद भाष्य २४३

पुण्यसे असंबद्ध तथा पापसे भी असम्बद्ध होता है। क्योंकि यह उस अवस्थामें हृदयके सब शोकोंको पार कर लेता है॥। २२।।

वि० वि. भाष्य-ईश्वरकी ऐसी महिमा है कि गाढ सुषुप्तिमें किसी पदार्थका बोध नहीं रहता, इसीको विस्तारसे इस मन्त्रमें कहा गया है। जगत्में सर्वप्रथम पिता पुत्रका सम्बन्ध माना गया है, इस अवस्थामें इसका भी ज्ञान नहीं रहता है। यहाँ पिता यह नहीं जानता कि मैं इसका पिता हूँ, यह मेरा पुत्र है इसी प्रकार पुत्रको मैं इनका पुत्र हूँ, ये मेरे पिता हैं ऐसा बोध नहीं रहता है। ऐसे ही संसारमें सबसे पूज्य सम्बन्ध माता पुत्रका है, इसका भान भी इस अवस्थामें नहीं रहता है। मरनेके अनन्तर पिता तथा माताका सम्बन्ध छूट जाता है, किन्तु 'मेरा अच्छे कुलमें जन्म हो, उत्तम लोकमें गमन हो' ऐसी आशा बनी रहती है। किन्तु इस सुषुप्ति अवस्थामें यह आशा भी नहीं रहती। जिसके द्वारा सर्वंधमका संचय होता है ऐसे सर्वप्रिय वेदविज्ञानका भी यहाँ भान नहीं रहता है। इसमें पुरुष अत्यन्त निकृष्ट जातिकी प्राप्तिकरानेवाले अपने स्वाभाविक कर्मसे भी वियुक्त हो जाता है, इसीसे चाण्डाल चाण्डा नहीं रहता, पुल्कस पुल्कस नहीं रहता। (शूद्रसे ब्राह्मणीमें उत्पन्न हुई सन्तानको चण्डाल कहते हैं, शूदमें ब्राक्मणसे उत्पन्न को निषाद और निषादसे क्षत्रियामें उत्पन्नको पुल्कस कहते हैं।) कहनेका तात्पर्य यह है कि इस अवस्थामें पुरुष पाप तथा पुण्यसे कुञ्र भी सम्बन्ध नहीं रखता है, क्योंकि उस अवस्थामें यह हृदयके सब शोकोंको दूर कर अवस्थित रहता है। इस प्रकार इस स्थूल शरीरके सवधर्मोंसे रहित हुआ तथा पुण्य पापके फल सुखदुःखोंसे रहित हुआ यह पुरुष सम्पूर्ण शोकादिकोंसे शून्य स्थितिमें विराजता है ॥ २२॥ सुषुप्ति अवस्थामें स्वयंज्योति आत्माकी दृष्टि आदिका अनुभव न होनेमें कारण प्रदर्शन करते हैं, यथा- यद्वै तन्न पश्यति पश्यन्वै तन्न पश्यति न हि द्रष्टरद- ष्टेविपरिलोपो विद्यतेऽविनाशित्वात् न तु तद्द्वितीयमस्ति ततोऽन्यद्विभक्तं यत्पश्येत् ॥ २३॥ भावार्थ-अवश्य ही उस अवस्थामें वह जीवात्मा नहीं देखता है यह बात नहीं है, किन्तु देखता हुआ वह उसको नहीं देखता, क्योंकि वहाँ द्रष्टाकी दृष्टिका

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२४४ शृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय ४

विलोप नहीं होता है, वह अविनाशी है। किन्तु उस अवस्थामें जिसको वह देख सके ऐसी उससे भिन्न द्वितीय वस्तु ही नहीं है, इस कारण नहीं देखता ॥२३॥ यद्वै तन्न जिघ्रति जिघ्रन्वै तन्न जिघ्रति न हि धातु- घ्रातेरविपरिलोपो विद्यतेSविनाशित्वान्नतु तद्द्वितीयमस्ति ततोऽन्यद्विभक्तं यज्जिघ्रत्॥ २४॥ भावार्थ-जो उस अवस्थामें सूँघता नहीं, इससे यह तात्पर्य नहीं है कि उसकी गन्धग्राहक शक्तिका लोप हो गया है, किन्तु जहाँ गन्ध ही नहीं तब उस अवस्थामें किसे सूँघे॥ २४॥ यद्वै तन्न रसयते रसयन्वै तन्न रसयते नहि रस- यितू रसयतेर्विपरिलोपो विद्यतेSविनाशित्वान्न तु तद्ुद्वि- तीयमस्ति ततोऽन्यद्विभक्तं यद्रसयेत्॥ २५॥ भावार्थ-यह जो रसास्वाद नहीं करता, सो रसाख्वादन करता हुआ ही नहीं कस्ता। रसास्वाद करनेवालेकी रसग्रहण शक्तिका स्वथा लोप नहीं होता, क्योंकि वह अविनाशी है॥ २५॥ यद्वै तन्न वदति वदन्वै तन्न वदति न हि बक्तुर्वक्ते- विपरिलोपो विद्यते Sविनाशित्वान्न तु तद्द्वितीयमस्ति ततेोS- न्यद्विभक्तं यद्रदेत् ॥ २६ ॥ भावार्थ-निश्चय ही उस अवस्थामें वह जीवात्मा नहीं बोलता, ऐसा जो मानते हैं सो यथार्थ नहीं है। अवश्य ही, बोलता हुआ वह उसको नहीं बोलता, वक्ताकी भाषणशक्तिका तो विलोप नहीं होता है, बात यह है कि वह अविनाशी है। किन्तु उस अवस्थामें द्वितीय नहीं जो उससे अम्य हो, जिसको वह बोल सके ॥ २६॥ यद्वै तन्न शृशति शृण्वन्वै तन्न शृशति न हि श्रोतुः श्रुतेर्विपरिलोपो विद्यतेSविनाशित्वान्न तु तद्द्वितीयमस्ति ततोऽन्यद्विभक्त यच्छृणुयात् ॥२७ ॥। भावार्थ-अवश्य ही उस अवस्थामें वह जीवात्मा सुन नहीं सकता, ऐसा

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विद्याविनोद भाष्य २४५

जो मानते हैं सो ठीक नहीं। सुनता हुआ ही वह उसको नहीं सुनता, श्रोताकी श्रवणशक्तिका तो विलोप नहीं होता है, क्योकि वह अविनाशी है। परन्तु उस अवस्थामें द्वितीय वस्तु नहीं है जो उससे अन्य हो, जिसको वह सुने ॥२७ ॥ यद्वै तन्न मनुते मन्वानो वै तन्न मनुते न हि मन्तु- मंतेरविपरिलोपो विद्यतेSविनाशित्वान्न तु तदुद्वितीयमर्ति ततोऽन्यद्विभक्तं यन्मन्वीत ॥ २८ ॥ भावार्थ-उस अवस्थामें वह जीवात्मा मनन नहीं करता, ऐसा मानना ठीक नहीं। मनन करता हुआ वह उसको नहीं मनन करता। क्योंकि मन्ताकी मनन- शक्तिका तो विलोप नहीं होता, इसलिए कि वह अविनाशी है, पर उस अवस्थामें दूसरा वहाँ है क्या, जिसका वह मनन कर सके॥ २८॥ यद्वै तन्न स्पृशति स्पृशन्वै तन्न स्पृशति नहि स्प्रष्टः स्पृष्टेरविपरिलोपो विद्यतेऽविनाशित्वान्न तु तद्द्वितीयमस्ति तताऽन्यद्विभक्तं यत्स्पृशेत्॥२६ ॥। भावार्थ-उस अवस्थामें वह स्पर्श नहीं करता ऐसा मानना सही नहीं है। स्पर्श करता हुआ भी वह उसको स्पर्श नहीं करता, क्योंकि स्प्ष्टाकी स्पर्शशक्तिका विलोप नहीं होता, वह अविनाशी है। पर बात यह है कि उस दशामें अन्य कोई वस्वन्तर नहीं है जिसे वह स्पर्श कर सके ॥ २९॥ यद्वै तन्न विजानाति विजानन्वै तन्न विजानाति न हि विज्ञातुर्विज्ञातेविपरिलोपो विद्यते Sविनाशित्वान्न तु तद्द्विती- यमस्ति ततोऽन्यद्विभक्तं यद्िजानीयात्॥३० ॥ भावार्थ-उस अवस्थामें वह जीवात्मा नहीं जानता, ऐसा जो कहते हैं, क्या यह सही है ? जानता हुआ उसको नहीं जानता, विज्ञाताकी जाननेकी शक्तिका तो विलोप नहीं होता, क्योंकि वह अविनाशी है। किन्तु उस अवस्थामें दूसरी वस्तु कोई नहीं है जो उससे अन्य हो, जिसको वह जाने ॥ ३० ॥ इसी प्रकार सुषुप्तिमें अविधाजन्य द्वैतके अभावसे विशेष ज्ञान नहीं होता, यह

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२४६ शृहदारण्य कोपनिषद् [षध्याय ४

व्यतिरेकसे कहकर जाग्रत् आदिकोंमें द्वैतके रहनेसे विशेष ज्ञान होता है, यह अन्वयसे कहते हैं, यथा-

भावार्थ-जिस् अवस्थामें चाहे वह जागरित हो या स्वप्नावस्था हो, आत्मासे भिन्न अन्य सा होता है, वहाँ अन्य अन्यको देख सकता है, अन्य अन्यको सूँघ सकता है, दूसरा दूसरेका रस लेता है, अन्य दूसरेसे बोलता है, अन्य अन्यको सुन सकता है, दूसरा दूसरेका मनन करता है, अन्यका अन्य स्पर्श कर सकता है और दूसरा दूसरेको जान सकता है॥ ३१ ॥ वि० वि० भाष्य-याज्ञवल्कच कहते हैं कि हे जनक, सुषुप्तिअवस्थामें आत्मा नाम रूप प्रपश्को नहीं जानता है, वह आत्माद्वारा प्रपश्चको न जानना प्रपश्का अभाव होनेके कारण ही है, कोई आत्माके अभवके कारण नहीं। कारण यह है कि साक्षी कूटस्थ आत्माकी स्वरूपभूत जो दृष्टि है उसका कदाचित् नाश नहीं होता। उस सुषुप्ति अवस्थामें साभास अन्तःकरण नहीं है, चन्तु आदि करण नहीं हैं तथा रूपादि विषय नहीं हैं। इसी कारण उस अवस्थामें आत्मा नाम रूप प्रपश्चको नहीं जानता हैं। ऐसे ही सुषुप्ति अवस्थामें व्राणसे गन्धको नहीं जानता तथा रसनासे रसको, वाणीसे शब्द कथनको, श्रोत्रसे शब्दको, मनसे चिन्त- नको, त्वचासे स्पर्शको और बुद्धिसे किसी निश्चयको नहीं जानता। पूर्वोक्त रीति से उस सुषुप्तिमें प्रमाता, प्रमाण और प्रमेयका अभाव होनेसे श्रोत्रादि इन्द्रि- योंसे शब्दादिकोंका ज्ञान नहीं होता। किन्तु जागरित तथा स्वप्न अवस्थामें साभास अन्तःकरणरूप प्रमाता है, इन्द्रियादिरूप प्रमाण हैं. तथा रूपादि विषय हैं, इसी वास्ते जागरित एवं स्त्रप्रमें भिन्न भिन्न रूप आदिकोंको उन नेत्रादिकों से देखते हैं। ऐसे उपाधिसे तीन अवस्थाओंको प्राप्त होनेवाला आत्मा वास्तव में शुद्ध है ।। २३-३१ ।। यह अविद्या ही अन्य वस्तुको प्रस्तुत करनेवाली है, जहाँ सुषुप्तावस्थामें यह यह शान्त हो जाती है वहाँ उससे अतिरिक रूपसे अविद्या द्वारा विभक वस्तु का अभाव हो जानेके कारण किस इन्द्रियसे किसे देखे, सूँवे जाने ? अतः-

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विद्याविनोद भाष्य २४७

सलिल एको द्रष्टाऽद्वैतो भवत्येष ब्रह्मलोक: सम्रा- डिति हैनमनुशशास याज्ञवल्क्य एषास्य परमा गतिरेषास्य परमा संपदेषोऽस्य परमो लोक एषोऽस्य परम आनन्द एतस्यैवाननदस्यान्यानि भूतानि मात्रामुपजीवन्ति ॥३२ ॥ भावार्थ-वह जलके समान एक द्रष्टा अद्वूत है। हे सम्राट्! यह ब्रह्म- लोक है। ऐसा याज्ञवल्कपने जनकको उपदेश दिया। इसकी यही परम गति है, इसकी यही परम सम्पत्ति है, इसका यही परम लोक है, इसका यही परम आनन्द है। इसी आनन्दकी एक कलाको लेकर अन्य सब प्राणी भोग कर रहे हैं।। ३२।। वि• वि० भाष्य-यह आत्मा शुद्ध जलके समान परिशुद्ध है, इस कारण इस आत्मामें विजातीय भेद नहीं है। एक कहनेसे सजातीय भेद भी नहीं है। अद्वत नाम द्वितीय हस्त पादादिकोंसे होनेवाले स्वगत भेदसे भी वह रहित है। ऐसे विजातीय, स्वजातीय तथा स्व्रगत भेदरहित होनेसे आत्मा स्व. प्रकाश द्रष्टा है तथा परम पुरुषार्थरूप है। विज्ञानमय आत्माकी यह आत्मा ही परमगति है, ब्रह्मलोकादिकी गति तो अपरम है। उन सर्व गतियोंसे यह आत्मा ही गति नाम परमगन्तव्य स्थान है और कुबेरकी सम्पत्तिकी तरह परम सम्पद्रूप है, तथा स्वप्रकाश परमानन्दरूप है। इस आनन्दरूप आत्माका लेशमात्र आनन्द ग्रहण करके चक्रवर्ती राजासे लेकर हिरण्यगर्भ पर्यन्त सम्पूर्ण भूत आनन्दी हो रहे हैं।। ३२ ॥ इसी प्रकार अतिशय आनन्दके प्रतिपादन द्वारा परमानन्दका बोधन करते हैं, यथा- स यो मनुष्याणा राद््ःसमृद्धो भवत्यन्येषामधिपतिः सवैर्मानुष्य कैर्भोगैः संपन्नतमः स मनुष्याणां परम आन- न्दोऽथ ये शतं मनुष्याणामानन्दाः स एक: पितृणां जित- लोकानामानन्दोऽथ ये शतं पितृणां जितलोकानामा- नन्दा: स एको गन्धर्वलोक आनन्दोऽथ ये शतं गन्धर्व- लोक आनन्दीः स एक: कर्मदेवानामानन्दो ये कर्मणा

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२४८ शृहदारण्यकोपनिषद् [अध्बाय ४

देवत्वमभिसंपद्यन्तेऽथ ये शतं कर्मदेवानामानन्दाः स एक आजानदेवानामानन्दो यश्च श्रोत्रियोऽवृजिनोऽकामह- तोऽथ ये शतमाजानदेवानामानन्दाः स एकः प्रजापति- लोक आनन्दो यश्च श्रोत्रियोऽवृजिनोऽकामहतोऽथ ये शतं प्रजापतिलोक आनन्दाः स एको ब्रह्मलोक आनन्दो यश्च श्रोत्रियोऽवृजिनोऽकामहतोऽथैष एव परम आनन्द एष ब्रह्मलोक: सम्राडिति होवाच याज्ञवल्क्यः सोऽहं भग- वते सहस्त्रं ददाम्यत ऊर्ध्वं विमोत्तायैव ब्रूहीत्यत्र ह याज्ञव- ल्क्यो बिभयांचकार मेधावी राजा सर्वेभ्यो माऽन्तेभ्य उदरौत्सीदिति॥ ३३॥ भावार्थ-वह जो मनुष्योमे सर्वाद्गपूर्ण, समृद्ध, दूसरोका अधिपति और मनुष्यसम्बन्धी समस्त भोगोसे सम्पन्नतम होता है, यही मनुष्योका परम आनन्द है। मनुष्योके जो ऐसे सौ ानन्द हैं उतना पितरोका एक आन न्द है, उन पितरोका, जिन्होने भूमण्डलको जीता है। उन विजयी पितरोके जो सौ आनन्द है उतना गन्धर्वोंका एक आनन्द है, गन्घर्वो के जो सौ आनन्द हैं, उतना क्मदेवोका एक आनन्द है [ जो कर्मसे देवत्वको प्राप्त होते हैं वे कर्मदेव कहाते हैं ]। जो कर्मदेवोके सौ आनन्द हैं उतना आजानदेवोका एक आनन्द है [ जन्मसिद्ध देव आजानदेव कहाते हैं ] और जो निष्पाप, निष्काम श्रोत्रिय हैं उनका भी वही आनन्द है। जो आजानदेवोके सौ आनन्द हैं उनका सौ गुना प्रजापतिका एक आनन्द है। यही आनन्द अपाप, अका- महत श्रोत्रियका भी है। जो प्रजापतिलोकके सौ आनन्द हैं उतना ब्रह्मलोकका एक आनन्द है, निष्पाप, निष्काम श्रोत्रियका भी यही आनन्द है और यही परम आनन्द है। हे सम्राट्, यही ब्रह्मलोक है। याज्ञवल्कने यह शिक्षा दी। उपर्युक्त कथन सुनकर जनकने कहा कि मैं श्रीमान्को सहस्र मुद्रा अथवा गौए देता हॅू, अब धागे भी आप मोक्के लिए ही उपदेश करें। यह सुनकर याज्ञवल्कच भयभीत हो गये कि इस चतुर राजाने तो मुझको समस्त प्रश्नोके उत्तर देनेके

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माक्ण : ] विद्याविनोद भाष्य २४६

लिए बाँध लिया है, यानी सम्पूर्ण प्रश्नोंके निर्णय पर्यन्त इसने बुद्धिमानीसे मुझे वचनबद्ध कर लिया है। ३३॥ वि• वि० भाष्य-इस मन्त्रमें चक्रवर्ती राजासे लेकर हिरण्यगर्भ पर्य- न्त शत-शतगुण अधिक आनन्दका प्रतिपादन किया गया है। ऐसे उपदेशको सुनकर राजा जनकने कहा कि हे भगवन, मैं आपको हजार गायें प्रदान करता हूँ। कृपा कर आप ऐसा उपदेश दें जिससे मेरा मोक्ष हो जाय। राजाके मनमें यह अभिप्राय था कि जो वास्तवमें असङ्ग आत्मा अविद्या द्वारा जागरित-खवमके भोगप्रद कर्मो के क्षीण होनेसे सुषुप्तिमें ब्रह्मानन्दको प्राप्त होता है, पुनः उन कर्मो से जागरित-स्वप्रको प्राप्त होता है। एवं अवस्थान्रयसे विवेक करने पर भी जन्म मरणरूप संसारके हेतु अविद्या काम कर्मका युक्तियोंसे निराकरण करने से उपदेशसे भी मुक्ति नहीं हो सकती। इस कारण कर्तृत्व-भोक्तृत्व आदिकोंका निवर्तक, मोक्ष करनेवाला उपदेश मुनिसे सुनना चाहिए। ऐसे प्रश्नको सुनकर याज्ञवल्क्य मुनि चकित हो गये। कारण यह है कि उनके हजारों शिष्य हैं, किंतु जनक राजाके समान कोई बुद्धिमान् नहीं है, जिस जनकने एक बरसे सम्पूर्ण विद्या ग्रहण कर ली है। याज्ञवल्क्य मनमें यह विचार कर सर्वप्रथम अविद्यासे प्राप्त होनेवाले संसारका वर्णन करते हैं ॥ ३३॥ अब उपसंहारमें याज्ञवल्क्य जीवकी परलोकगतिको सदष्टांत कथन करनेके लिए सुषुप्तिसे जाग्रत्प्राप्तिका पुनः अनुवाद करते हैं, यथा- स वा एष एतश्मिन्स्वप्रान्ते रत्वा चरित्वा दृष्ट्टैव पुण्यं च पापं च पुनः प्रतिन्यायं प्रतिययोन्याद्रवति बुद्धान्तायैव॥ ३४॥ भावार्थ-अवश्य ही यह जीवात्मा इस स्वप्नस्थानमें रमण और विहार कर तथा पाप पुण्यको देखकर ही पुनः गये हुए मार्गसे यथास्थान जागरित भव- स्थाको लौट आता है। ३४॥ वि० वि० भाष्य-हे जनक! जैसे स्वप्नके भोगप्रद कमके चीण होनेसे यह जीव जागरित अवस्थाको प्राप्त होता है, ऐसे ही शरीरके निमित्तभूत प्रारब्ध कर्मके क्षीण होनेसे जीव अन्य शरीरको प्राप्त होता है। पूर्व शरीरके त्यागमें अगला दष्टान्त श्रवण करो ॥ ३४॥

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२५० शृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय ४

स्वप्रसे जागरण प्राप्तिकी तरह लोकसे लोकान्तर प्राप्तिका दष्टान्तपूर्वक वर्णन करते हैं, यथा- तद्यथाऽनः सुसमाहितमुरसर्जद्यायादेवमेवाय शा- रीर आत्मा प्राज्ञेनात्मनान्वारूढ उत्सर्जन्याति यत्रैतदूर्ध्वो- च्छ्वासी भवति॥ ३५ ॥ भावार्थ-जैसे खूब भारसे लदी हुई गाड़ी शब्द करती हुई चलती है, वैसे ही जिस समय यह देही आत्मा प्रज्ञात्मासे अधिष्ठित हो शब्द करता हुआ जाता है। अर्थात् जिस कालमें यह मरनेके निमित्त ऊर्ध्वश्वासी होता है, उस समयमें यह शारीर आत्मा निज प्राज्ञ विज्ञानवान् स्वभावसे संयुक्त हो अतिशब्द करता हुआ जाता है।। ३५॥ वि० वि भाष्य-जैसे किसी धनीका कोई छकड़ा अपने पदार्थोंसे परिपूर्ण हो किसी प्रामान्तरको जा रहा हो तो उस समय वह अनेक पदार्थोंके बोझसे खूब लदा होनेके कारण रास्तेमें चूँ-चू आदि शब्द करता हुआ मन्द मन्द चलता है। इसी प्रकार जीवरूपी धनीका पुण्य पापरूप पदार्थोंसे पूर्ण हुआ यानी लक्षा हुआसा सूदम शरीररूपी शकट इस स्थूल देहके त्यागनेके समय नाना प्रकारके शब्दोंको करता हुआ परलोकमें गमन करता है। वे शब्द कौनसे हैं जिन्हें पुरुष मरते समय बोलता या स्मरण करता है? जिन बातोंको याद कर करके यह दम तोड़ता है, वे शब्द या बातें ये हैं, जैसे- मरण समयमें प्रिय पुत्र कलत्र आदिके वियोगमें यह कहता है-हा पुत्र ! हा पत्नि! हा धन ! हा मित्र ! हा बन्धुजन ! धिक्कार है, मैं पापी हूँ, जो इन सबको त्याग करके अत्यन्त दूरमार्गमें अकेला ही जा रहा हूँ। मैं अत्याचारी हूँ, मैंने बालकोंको बहुत ताड़न किया है, तथा देवताओंके मस्तकपर अपने पाँवोंको रखा है यानी उन्हें ठुकराया है, और जिस माताने मुझे बहुत दु.ख मेलकर उत्पन्न किया है, जिस माताने मेरा मल मूत्र अपने हाथसे साफ किया एवं बड़े बड़े यत्नोंसे लालन पालन किया, मैंने उस माताकी कुछ भी सेवा टहल न की। उलटा उसे मैंने दुःख दिया और कटुवचन कहे, यानी गालियाँ दीं। केवल अपनी स्त्री तथा अपने शरीर के पालन पोषणमें ही आसक्त रहा। धिककार है मुझे, जिसने ऐसे उपकार करनेवाली माताका तिरस्कार किया।

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बाश्नख ३ ] विद्यावनाद भाष्य २५१

मैंने पिता, वेदवेत्ता ब्राह्मण, सन्तजन तथा सुहद्गण आदिकोंको कठोर वचन कहे, मैंने अभत्य भक्षण तथा अपेय पान किया। मैं लोकवेद विरुद्ध ही आचरण करता रहा। युवावस्थामे प्रिया युवतीका ही चिन्तन करता रहा। जैसे उत्तम मनुष्य अपने कल्याणके लिए शिव-विषणु-भगवती आदि देवताओंका सर्वदा चिन्तन करता बहता है, वैसे ही मैं यौवन अवस्थामें अपनी तथा पर स्त्रियोंका ही अहर्निश स्मरण करता रहा। जैसे व्याध शिकारकी तलाशमें रहता है ऐसे ही मैं भी सदा परकीय कामिनी-काञ्जनकी ही ताकमें लगा रहा। अर्थात् जिन स्त्रियोकी कूकर शूकर आदि योनियोंमें भी प्राप्ति होती रहती है उनका ही ध्यान धरता रहा, तथा अपने कल्याणके लिए उन शिव विष्णु आदिकोंका ध्यान न घरा, महाशोक है कि यह दुर्लभ मानुष- देह व्यर्थ ही खो दिया, और दुष्पूर लोभके नित्य वृद्ध होनेसे साघुजनोके तथा म्राह्मणोंके गृह क्षेत्रादि मैंने छीन लिये। जो ब्रह्महत्यादि घोर पाप मैंने किये थे वे अब (मरण कालमें) मुझे दुःख देर हे हैं, ये आगे भी मेरे मर्मस्थानमें शूलकी तरह चुभेंगे। जब मैं वृद्ध हो गया तब काम क्रोध लोभादि अत्यन्त अधिक हो गये, उस समय मेरी दशा 'तृष्णा न जीर्गा वयमेव जीर्णाः' हो गई। अब मैं असमर्थ अवस्थामें उन कामादिकोंके कारण दुःखका अनुभव कर रहा हूँ, मैंने वृद्ध अवस्थामें उन स्त्री पुत्रादिकोंके द्वारा महान् तिरस्कार सहन किया है जिनके लालन पालन तथा सुखी रखनेमें कोई अनर्थ करना नहीं छोड़ा। शरीर तो मेरा सर्वथा जीर्ण हो गया; परन्तु काम क्रोधादिकोंमें जरा भी शिथिलना न आई। अब मृत्यु भी मुझे मारने मेरे समीप आ गया है। हा कष्ट है, मेरे शरीरमें कोई काट रहा है, मानों कोई बहुतसी सुइयाँ मेरे शरीरमें चुमो रहा है, मुझे यह कुछ दिखाई नहीं देता। मेरे हाथ पाँव लकड़ीकी तरह जड़ होते जाते हैं, जैसे दुर्दान्त पशु अपने वशमें नही रहता वैसे ही मेरे नेत्र श्रोत्र मन आदि मेरे अधीन नहीं रहे। न आँखोंसे दीखता है, और न कानोंसे सुनाई ही देता। इसी प्रकार सब इन्द्रियोंके व्यापार मन्द हो गये। जठरामि पवनयुक्त होकर मेरे शरीरका दाह कर रहा है। मुझे ऐसी पीड़ा हो रही है जैसे हजारों विच्छुओंके एक साथ काटनेपर हो सकती है। हे जनक, ऐसे अनेक प्रकारके शब्द्ोंको उच्चारण करता हुआ मुमूषु इस स्थूल देहका त्याग करता है। जैसे सुषुप्ति अवस्थामें यह जीव विशेष ज्ञानसे रहित हुआ ब्रझ्मानन्दको प्राप्त होता है, वैसे ही मरणकालमें विशेष ज्ञानसे रहित हुआ यह जीव दीर्घ ऊर्ध्वश्वास्त लेता हुआ कारणोपाधिक ईश्वरसे अभिन्न हो जाता है॥ ३४ ॥

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बृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय ४

यह ऊर्ध्वश्वास किस समय किस कारणसे किस प्रकार तथा किसलिए होता है? यह बतलाया जाता है यथा- स यत्रायमणिमानं न्येति जरया वोपतपता वाणि- मान निगच्छति तद्यथाम्र वौदुम्बरं वा पिप्पलं वा बन्ध- नात्प्रमुच्यत एवमेवायं पुरुष एभ्योऽङ्वेम्यः संप्रमुच्य पुनः प्रतिन्यायं प्रतियोन्याद्रवति प्राणायैव ॥३६॥ भावार्थ-सो यह पुरुष जिस समय जरा अवस्थाके कारण अथवा किसी उपतापी रोगके कारण कशताको प्राप्त होता है, उस कालमे जैसे अपने बन्धन (डठल) से छूटकर आम्रफल या उदुम्बरफल अथवा पीपलफल गिर पड़ता है, वैसे ही यह पुरुष अवयवोसे छूटकर गिरता है, और जैसे बाया था वैसे ही प्राणके लिए ही योनि योनिके प्रति दौडता है॥ ३६ ॥ वि० वि० भाष्य-जब जरा अवस्थासे तथा ज्वरादि व्याधियोसे यह शरीर अत्यन्त कृश हो जाता है, तब इसका त्याग हो जाता है। जैसे आम्र आदि गल पककर पृथिवीपर गिर पडते हैं, वैसे ही इस शरीरके कारण प्रारब्ध कर्मोंके क्षीण होनेसे जीवात्मा इस देहका त्याग कर देता है। इस शरीरको छोड़कर पापोकी अधिकता होनेस नरकोंकी अनेक प्रकारकी पीडाका अनुभव करता है। जब पूर्वदेहके उत्पादक वासना तथा कमाके समान ही वासना तथा कर्म हाते हैं तब पूर्व देहके सददश ही दूसरे देहको प्राप्त होता है। विना ब्रह्मचोधसे इस सूक्ष्म शरीरका विनाश नही होता।। ३६ ॥ स्वप्रावस्था से जागरण स्थानको प्राप्त करनेकी इच्छ्रावाले पुरुषका शरीर पहलेसे ही केस रहता है, इस विषयमे लोकप्रसिद्ध दष्टान्त कहते हैं, जैसे- तद्यथा राजानमायान्तमुग्रा: प्रत्येनसः सूतग्रामण्यो- डन्नैः पानैरावसथैः प्रतिकल्पन्तेऽयमायात्ययमागच्छती- त्येवथ हैवंविद सर्वाणि भूतानि प्रतिकल्पन्त इदं ब्रह्मा- यातीदमागच्छतीति॥३७॥ भावर्थ-जैसे राजाका आगमन सुनकर उग्र, प्रत्यनस, सूत तथा प्रामणी आदिक राजकर्मचारी 'यह राजा आरहा है, राजा साहब आना ही

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विद्यवनाद भाष्य २५३

चाहते हैं' इस प्रकार प्रजाओंको सूचित करते हुए अन्न, पान और निवास स्थान आदिक राजसामग्रियोंको जुटाकर रखते हुए प्रतीक्षा करते हैं, वैसे ही इस कर्म- फछज्ञाताकी प्रतीक्षा समस्त भूत 'यह ब्रह्म आता है, इसे आया ही समझो' इस प्रकार कहते हुए करते हैं॥ ३७॥ वि० वि०भाष्य-हे जनक, जैसे राजाके किंकरादि किसी देशान्तरसे आनेवाले अपने राजाकी प्रतीक्षा करते हैं, वैसे ही जीव जब पूर्वदेहका त्याग करता है तब दूसरे स्थूल देहक जनक भूत उस शरीरमें इस जीवकी बाट जोहते हैं। यहाँ 'उम्र' शब्द आया है, उसका अर्थ है भयङ्कर कर्म करनेवाले, जैसे पुलिस होती है। 'प्रत्येनस' का अर्थ है, एक एक पाप वा अपराधका दण्ड देनेवाले, जैसे न्यायाधीश। सूतका अर्थ है सारथी, हाथी घोड़ेवाले या हाँकनेवाले और 'प्रामणी'का अर्थ है ग्रामके अधिष्ठाता-पञ्च आदि। ये सब मिलकर राजाकी पेश- वाईमें हाजिर रहते हैं॥ ३७॥ इस जीवके अपने साथियांके सहित परलोक गमन करनेमें दष्टान्त कहते हैं, यथा- तद्यथा राजानं प्रयियासन्तमुग्रा: प्रत्येनसः सूतग्राम- ण्योऽभिसमायन्त्येवमेवेममात्मानमन्तकाले सर्वे प्राणा अभिसमायन्ति यत्रैतदूर्ध्वोच्छवासी भवति॥३८ ॥ भावार्थ-जैसे पुनः जब राजा यहाँसे प्रस्थान करना चाहता है तब उसको बिदा करनेके लिए उसके अभिमुख उग्र, प्रत्येनस, सूत तथा ग्रामनायक एकत्रित होते हैं। वैसे ही जब यह आत्मा ऊर्व्वश्वास लेना प्रारम्भ करता है तब अन्तका- लमें इस आत्माके चारों ओर सब प्राण उपस्थित होते हैं, यानी सारी इन्द्रियाँ इस आत्माके अभिमुख होकर इसके साथ जाती हैं।। ३८॥। वि० वि० भाष्य-याज्वल्क्य कहते हैं कि हे जनक, जैसे राजाके किसी देशमें गमन करनेके समय भृत्यआदिक सबके सब साथ ही जाते हैं, वैसे ही मरणकालमें जब यह जीव ऊर्ध्वश्वास लेता है, तब वागादि इन्द्रियाँ मुख्य प्राण सहित इस जीवके साथ ही गमन कर जाती है, तब यह शरीर श्मशान- भूमिके योग्य हो जाता है: भाव यह है कि जिस प्रकार राजाके जानेपर सब

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२५४ बृह्दारण्यकोपनिषद् अष्बाब ४

अनुचर उसके पीछे हो लेते हैं, इसी प्रकार जीवके स्थूल शर्रारका त्याग करने पर वागादि मुख्य प्राण भी तत्काल साथ ही निकल जाते है॥ ३८॥

चतुर्थ ब्राह्मण

वैराग्यके लिए पूर्वमें जिस संप्रमोक्षका सूत्रपात किया गया है, वह किस समय अथवा कैसे होता है ? ऐसी जिज्ञासा होनेपर उसका सविस्तर वर्णनके करने लिए इस ब्राह्मणका आरम्भ किया जाता है, यथा- स यत्रायमात्माSवल्यं न्येत्यसंमोहमिव न्येत्यथैनमेते प्राणा अभिसमायन्ति स एतास्तेजोमात्राः समभ्याददानो हृ दय मे वान्त वक्रामति स यत्रैष चान्तुषः पुरुषः पराङ् पर्या- वर्ततेऽथारूपज्ञो भवति ॥ १॥ भावार्थ-प्रद जीवात्मा जब अति दुर्बल हो मूर्च्छ्ितसा हो जाता है तब ये वागादि प्राण इसके अभिमुख उपस्थित होते है, वह तैज्न अंशोंको चारों ओरसे खींचकर समेटता हुआ हृदयकी ओर ही आता है। जिन समय वह चानुष पुरुष वयावृत्त हो जाता है उस कलमें मुमूर्यु रूपज्ञानसे रहित हो जाता है।। १।। वि• वि. भाष्य-इससे पहलेके ज्योतित्राद्मणमें प्रथम आत्माके स्व- प्रकाश रूपका कथन करके अन्तमें आविद्यक संसारका वर्णन किया है। उस संसार के निरूपणके लिए तथा उसकी निवृत्तिके वास्ते इस शारीरकब्राह्मणका आरम्भ किया गया है। जब यह शरीर अति दुर्बलताको प्राप्त हो जाता है तब यह जीव अपने पुत्र कलत्र आदिको भी नही पहचानता है, तथा वागादि इन्द्रियोंको ग्रहण करके हृदयमें स्थित ब्रह्मको प्राप्त होता है। उस ब्रह्ममें एकताको प्राप्त होकर नेत्रादिक इन्द्रियोंसे दर्शनादिक नहीं कर सकता ॥ १ ॥ विभिन्न इन्द्रियोंका लिङ्गात्मामें लय और उसके उत्क्रमणका वर्णन किया जाता है, यथा- एकीभवति न पश्यतीत्याहुरेकीभवति न जिव्रतीत्या-

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भाखन ४ ] विचाविनोद भष्य २५५

हुरेकीभवति न रसयत इत्याहुरेकीभवति न वदतीत्याहुरे- कीभवति न शृणोतीतयाहुरेकीभवति न मनुत इत्याहुरेकी- भवति न र्पृशतीत्याहुरेकीभवति न विज्ानातीत्याहुस्तस्य हैतस्य हृदयास्याय्रं प्रद्योतते तेन प्रद्योतेनैष आत्मा नि- ष्क्रामति चन्तुष्टो वा मूर्धो वाऽन्येभ्यो वा शरीरदेशेभ्यस्त- मुत्क्रामन्तं प्राणोऽनूसक्रामति प्राणमनूरक्रामन्तथ सर्वे प्राणा अनूस्क्रामन्ति सविज्ञानो भवति सविज्ञान- मेवान्ववक्रामति। तं विद्याकर्मणी समन्वारभेते पूर्वपज्ञा च ॥ २ ॥ भावार्थ-मरणके समग उसके चारों ओर बैठे हुए बन्धु, मित्र तथा ज्ञाति आदिके लोग कहते हैं कि नयनेन्द्रिय अब बाह्य स्थूल चन्तुगोलकको छोड़- कर सूक्ष्म लिङ्गशरीर या हृद्यात्माके साथ एक हो रही हैं यानी सम्मिलित हो रही है, इस कारण अब यह पुरुप हम लोगोंको नहीं देखता है। इस प्रकार सब बैठे हुए परस्पर बोलते हैं। इसी प्रकार जब घ्राणशक्ति को नहीं पाते तो लोग कहते हैं कि घ्ाणेन्द्रिय आत्मामें सम्मिलित होती है, इस कारण वह मुमूर्पु जन पुष्पादिकोंको नहीं सूँघता है, यानी इसकी सूँघनेकी शक्ति जाती रही। इसी प्रकार अन्यान्य इन्द्रियोंके विषयमें भी जान लेना। रसनेन्द्रिय एकरूप हो जाती है तो 'नहीं चख सकता' ऐसा कहते हैं। वागिन्द्रिय सम्मिलित होती है, अतएव वह नहीं बोल सकता। श्रवणेन्द्रिय आत्मामें सम्मिलित होती है, इस कारण नहीं सुन सकता। सब इन्द्रियोंका अधिपति मन भी बाहरसे अन्त- र्लीन हो रहा है इस हेतु अब यह कुछ नही समझ सकता। अब स्पर्शका भी इसे बोध नहीं रहा, स्पर्शज्ञान भी लिङ्गात्माके साथ जा मिला। इस प्रकार सम्पूर्ण बाह्य ज्ञान सिमिटकर आत्माके साथ मिल रहा है, अतएव इसमें किसी प्रकारका बोध नहीं रहा। उस समय, जीवके हृदयका अग्रभाग विशेष रूपसे चमकने लगता है, अर्थात् हृदयस्थानमें मानो ईश्वरका अनुग्रह भी प्राप्त हुआ, हृदयका चमकना मानो ईश्वरका प्रसाद है। यह शरीरको त्याग करता हुआ जीव उसी मह्ाप्रकाशके साथ इस शरीरसे निकलता है।

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२५६ बृह्दारण्यकोपनिषद् [अध्याय ४

वह जिस मार्गसे निकलता है अब उसे कहते हैं, यथा- नेत्रके मार्गसे यह आात्मा शरीरसे निकलता है, अथवा अन्यान्य कर्ण, नासिका आदिक शरीरके मार्गोंसे यह जीवात्मा निर्गत होता है। जब यह आत्मा निर्गमनोत्सुक होता है तो उसके पीछे पीछे प्राण ऊपरको चलता है। प्राणके उत्क्रमणके पीछे सब इन्द्रिय मानों पीछे पीछे गमन करती हैं। पहले यह कहा गया है कि यह मूर्छित हो जाता है, यहाँ सन्देह हो जाता है कि क्या यह उसी मूर्च्छादस्थामें विदा होता है ? इसपर कहते हैं कि यह जीवात्मा उस समय पूर्ववत् ज्ञानवान् होता है. और विज्ञान स्थान को ही यहाँसे प्रस्थान करता है। अब आगे पाथेय (राहखर्च) कहते हैं, जैसे- यह आत्मा उपारजन करके किन पदार्थोंको साथ ले जाता है ? उत्तर है कि विद्या, विज्ञान और कर्म उसके पीछे सम्यक प्रकारसे जाते हैं, और पूर्व जन्मा- नुभूत बुद्धि भी उसके साथ जाती है॥२॥ वि० वि•भाष्य-जब मरण समयमें जीव पृथिती पर शयन करता है, सब पासमें बैठे हुए मनुष्य कहते हैं कि यह नहीं देखता, नहीं सुनता तथा मनन नहीं करता। जब सब इन्द्रियोंका उपसंहार करके यह हृदयमें स्थित होता है तब हृदयका नाड़ीरूप अग्रभाग चैतन्यके आमाससे प्रकाशित होता है। उस प्रकाशित नाड़ीरूप मार्ग द्वारा नेत्र, श्रोत्र, नासिका तथा मुख आदि द्वारोंसे प्राणोंके सहित बाहर गमन करता है। गुदासे नारकीय पुरुप बाह्य गमन करता है, लिङ्गसे कामी पुरुषका गमन होता है, अन्नरसमें आसक्त पुरुष मुखसे निकलते हैं, गन्धमें आासक्त मनुष्य नासिकासे जाते हैं, गायनविद्याके जाननेवाला श्रोत्रसे निकलकर गन्धर्वछोकको प्राप्त होता है, नेत्रसते निकलकर सूर्यको या चन्द्रमाको अथवा अग्नि को प्राप्त होता है। और मस्तकसे निकलनेवाला पुरुष ब्रह्मलोकको जाता है। इस प्रकार नेत्र श्रोत्रादि मार्गो के ज्ञानवाला होकर पुनः भावी शरीरके ज्ञानवाला होता है। पूर्वजन्मकी विहित निषिद्ध उपासना, विहित निषिद्ध कर्म तथा पूर्वजन्मके संस्कार ये तीनों इस जीवके साथ गमन करते हैं, यह जीव स्थूल शरीर विना टिक नहीं सकंता ॥ २। अब जोंकके दष्टान्तसे देहान्तर गमन का वर्णन करने हैं, यथा- तद्था तृणजलायुका तृणस्थान्तं गत्वाऽन्यमाक्रम-

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भ्राश्मण ४ ] विद्याविनोद भाष्य २५७ त्याऽविद्यां गमयित्वा ऽन्यमाक्रममाक्रम्यात्मानमुपस- हरति ॥ ३ ॥ भाषार्थ-जैसे जोंक तृणके अन्त भागको जाकर दूसरे तृणरूप आश्रयको पकड़कर अपनेको संकुचित कर लेती है यानी अपने शरीरके पूर्वभागको अग्रिम स्थानमें रखती हुई चलती है। वैसे ही यह आत्मा इस शरीरको निश्रेष्ट बना अविद्याको दूर कर अन्य शरीररूप आक्रमकका आश्रय कर अपनेको पूर्व शरीरसे पृथक करता है।। ३ । वि० वि० भाष्य-जिस प्रकार तृणजलौका नामक जीव अगले दूसरे तृणको ग्रहण करके ही पूर्व तृणका त्याग करता है, उसी प्रकार यह जीव भी उत्तर देहका ग्रहण करके ही पूर्व शरीरको छोड़ता है। वास्तवमें आत्मामें गमनागमनादि व्यवहार नहीं होता है, उसमें (आत्मामें) गमनागमनकर्म बुद्धिके सम्बन्धसे आरोपित है॥३॥ सुनारके दृष्टान्तसे भात्माके दूसरे देहके निर्माण करनेका वर्णन करते हैं, यथा- तद्था पेशस्कारी पेशसो मात्रामपादायान्यन्नवतरं कल्याणतरथ रूपं तनुत एवमेवायमात्मेदथ शरीरं निह- त्याऽविद्यां गमयित्वाऽन्यन्नवतरं कल्याणतरथ रूपं कुरुते फित्रियं वा गान्धर्वं वा दैवं वा प्राजापत्यं वा ब्राह्मं वाऽन्येषां वा भृतानाम् ॥४ ॥ भावार्थ-जैसे स्व्णकार सुवणकी मात्राको लेकर दूसरे नये तथा सुन्दर रूप को बनाता है यानी आकारन्तरकी रचना करता है, ऐसे ही यह आत्मा इस देहका विनाश कर यानी निश्चेष्ट बनाकर दूसरे पितर, गन्धर्व, प्रजापति, ब्रह्मा तथा अन्यान्य भूतोंके नवीन तथा अत्यन्त सुन्दर रूपका निर्माण करता है॥४॥ वि० वि० भाष्य-जैसे स्वर्णकार स्वर्णको ग्रहण कर के पूर्व रचनासे नवीन कुण्डलादिरूप रचनाको करता है, ऐसे ही यह आन्मा अविद्यारूपी सुवर्णसे नवीन देहको उत्पन्न करता है। पहले शुभ कर्मो से उत्तम पितृलोकमें, या गन्धर्वलोकमे अथवा विराट्लोकमें वा हिरण्यगर्भलोकमें देहको प्राप्त होता है, यानी तत् तत् लोकोंमें शरीर धारण करता है, मिश्रित कर्मोंसे मनुष्यादि देदोंको प्राप्त होता है और अधम कर्मो से श्वान शूकरादि योनियोंका लाभ करता है॥४॥ ३३

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यह बन्ध केवल उपाधि करके ही कल्पित है, वास्तविक नहीं, इस प्रयोजनके बोधनके लिए उन उपाधियोंका निरूपण करते हैं- स वा अयमात्मा ब्रह्म विज्ञानमयो मनोमयः प्राण- मथश्चचुर्मयः श्रोत्रमयः पृथिवीमय आपोमयो वायुमय आकाशमयस्तेजोमयोऽतेजोमयः काममयोऽकाममयः क्रोधमयोऽकोधमयो धर्ममयोऽधर्ममयः सर्वमयस्तद्यदेत- दिदंमयोऽदोमय इति यथाकारी यथाचारी तथा भवति साधुकारी साधुर्भवति पापकारी पापो भवति पुण्यः पुण्येन कर्मणा भवति पापः पापेन। अथो खल्वाहुः काममय एवायं पुरुष इति स यथाकामो भवति तत्क्रतुर्भवति यत्क्र- तुर्भवति तत्कर्म कुरुते यत्कर्म कुरुते तदभिसंपद्यते॥ ५॥ भावार्थ-यह आत्मा ब्रह्म है, यह विज्ञानमय, मनोमय, प्राणमय, चततुर्मय, श्रोत्रमय, पृथिवीमय, आपोमय, वायुमय, आकाशमय, तेजोमय, अतेजोमय, काममय, अकाममय, क्रोधमय, अक्रोधमय, धर्ममय, अधर्ममय एवं सर्वमय है। जो कुछ इदंमय यानी प्रत्यक्ष है और जो अदोमय यानी अप्रत्यक्ष है नह वही है। अतः इसको सर्वमय कहते हैं, जैसे कर्मके अनुष्ठान और आचरणका अभ्यासी होता है वैसा ही वह होता है। साधु कर्म करनेवाला साधु होता है, पाप कर्म करनेवाला पापी होता है। पुण्य कमसे पुण्यवान् और पापकमसे पापी होता है। कोई कहते हैं कि यह पुरुप काममय ही है, जैसी कामनावाला होता है वैसा ही संकल्प करता है, जैसे संकल्पवाला होता है वैसा ही कर्म करता है, और जैसा कर्म करता है वैसा ही फल प्राप्त करता है। यानी अध्यवसायानुकूल कर्म करता हुआ यह वैसा ही फल भोगता है॥५॥ वि० वि. भाष्य-याजवल्क्य कहते हैं कि हे जनक, यह ब्रह्म ही बुद्धिके साथ अध्यास करनेसे विज्ञानमय हो जाता है, मनके साथ अध्यास करनेसे मनोमय कहाता है, ऐसे ही प्राणमय, चक्षुमय और श्रोत्रमय कहा जाता है। परथिवीके साथ अध्यास होनेसे पृथिवीमय है, इसी प्रकार आपोमय, वायुमय, आकाशमय और तेजोमय यानी उन उन भुतोंके देहोंके साथ अध्यास होनेसे वायुमय आदि रूपोंवाला

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विचाविनोद भाष्य २५६

हो जाता है। पशु तथा प्रेत आदिकोंके शरीर अतेजोमय हैं, उन उन शर्ररोंके साथ मिलकर आत्मा भी अतेजोमय हो जाता है। कार्यशरीरोंके साथ मिलकर जनेक वृत्तियोंके भेद करके आत्मा काममय, अकाममय, क्रोधमय, अक्रोधमय, धममय, अधर्ममय एवं सर्वमय इत्यादि रूपवाला हो जाता है। प्रत्यक्ष घटादिरूप आत्मा ही है इसी कारण आत्माको इदंमय कहा गया है, परोक्ष पदार्थरूप भी आत्मा ही है, इससे आत्मा अदोमय कहाता है। देह तथा इन्द्रियादिकोंके साथ मिळकर आत्मा जैसे जैसे कर्म करता है वैसे वैसे शरीरोंको प्राप्त होता है। इस संसारका असाधारण कारण तो कर्म है, जैसा पुरुषका काम होता है वैसा ही उस पुरुषका निश्चय होता है, उस निश्चयके अनुसार ही मनुष्य कर्म करता है, और जैसे कम करता है उन कर्मो के अनुसार वैसे ही फल पाता है।। ५।। कामनानुसारी शुभाशुभ वर्णनके साथ कामनारहित ब्रभ्मवेत्ताके मोक्षका निरूपण किया जाता है, यथा- तदेष श्लोको भवति। तदेव सक्तः सह कर्मणैति लिङ्गं मनो यत्र निषक्तमस्य। प्राप्यान्तं कर्मणस्तस्य यत्किंचेह करोत्ययम्। तस्माल्लोकात्पुनरैत्यस्मै लोकाय कर्मण इति नु कामयमानोऽथाकामयमानो योऽकामो निष्काम आपकाम आत्मकामो न तस्य प्राणा उत्क्रामन्ति ब्रह्मैव सन्त्रह्माप्येति ॥ ६॥ भावार्थ-इस विषयमें मन्त्र प्रमाण हैं, इस जीवात्माके मरण समयमें अत्यन्त गमनशील अथवा लिङ्ग शरीर सहित मन जहाँ आसक्त होता है, वहाँ ही यानी उसी विषयके प्रति जाता है, अर्थात् इसका मन जिसमें अत्यंत आसक्त होता है, उसी फलको यह साभिलाष होकर कर्मके सहित प्राप्त करता है। यह वहाँ जो कुछ कर्म करता है उस कर्मके फलको भोगसे समाप्त कर उस लोकसे फिर इस लोकमें कर्म करनेके लिए ही आगमन करता है। इस प्रकार कामनायुक्त हो यह मारा मारा फिरता है। और जो कामना करनेवाला पुरुष नहीं है वह शरीर त्यागानन्तर भी अन्यत्र कहीं नहीं जाता। कौन, जो अकाम, निष्काम, आप्तकाम और आत्मकाम है उसके प्राण उत्क्रमण नहीं करते, वह पुरुष ब्रह्मवित् होकर ब्रह्मको ही पाता है। ६। वि० वि० भाष्य-जिस पदार्थमें इस मनुष्यका दढतासे मन आसक है,

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२५८ [अध्याय ४

यह बन्ध केवल उपाधि करके ही कल्पित है, वास्तविक नहीं, इस प्रयोजनके बोधनके लिए उन उपाधियोंका निरूपण करते हैं,- स वा अयमात्मा ब्रह्म विज्ञानमयो मनोमयः प्राण मयश्चचतुर्मयः श्रोत्रमयः पृथिवीमय आपोमयो वायुमय आकाशमयस्तेजोमयोऽतेजोमयः काममयोऽकाममयः क्रोधमयोऽक्रोधमयो धर्ममयोऽधर्ममयः सर्वमयस्तद्यदेत- दिदंमयोऽदोमय इति यथाकारी यथाचारी तथा भवति साधुकारी साधुर्भवति पापकारी पापो भवति पुण्यः पुण्येन कर्मणा भवति पापः पापेन। अथो खल्वाहुः काममय एवायं पुरुष इति स यथाकामो भवति तत्क्रतुर्भवति यत्क्र- तुर्भवति तत्कर्म कुरुते यत्कर्म कुरुते तदभिसंपद्यते।। ५ ॥ भावार्थ-यह आत्मा ब्रह्म है, यह विज्ञानमय, मनोमय, प्राणमय, चतुर्मय, श्रोत्रमय, पृथिवीमय, आपोमय, वायुमय, आकाशमय, तेजोमय, अतेजोमय, काममय, अकाममय, क्रोधमय, अक्रोधमय, धर्ममय, अधर्ममय एवं सर्वमय है। जो कुछ इदंमय यानी प्रत्यक्ष है और जो अदोमय यानी अप्रत्यक्ष है नह वही है। अतः इसको सर्वमय कहते हैं, जैसे कर्मके अनुष्ठान और आचरणका अभ्यासी होता है वैसा ही वह होता है। साधु कर्म करनेवाला साधु होता है, पाप कर्म करनेवाला पापी होता है। पुण्य कमसे पुण्यवान् और पापकर्मसे पापी होता है। कोई कहते हैं कि यह पुरुष काममय ही है, जैसी कामनावाला होता है वैसा ही संकल्प करता है, जैसे संकल्पवाला होता है वैसा ही कर्म करता है, और जैसा कर्म करता है वैसा ही फल प्राप्त करता है। यानी अध्यवसायानुकूल कर्म करता हुआ यह वैसा ही फल भोगता है॥ ५ ।। वि. वि. भाष्य-याज्ञवल्क्य कहते हैं कि हे जनक, यह ब्रह्म ही बुद्धिके साथ अध्यास करनेसे विज्ञानमय हो जाता है, मनके साथ अध्यास करनेसे मनोमय कहाता है, ऐसे ही प्राणमय, चक्षुमय और श्रोत्रमय कहा जाता है। पृथिवीके साथ अध्यास होनेसे पृथिवीमय है, इसी प्रकार आपोमय, वायुमय, आकाशमय और तेजोमय यानी उन उन भृतोंके देहोंके साथ अध्यास होनेसे वायुमय आदि रूपोंवाला

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वाशण ४ ] विद्याविनोद माष्य २५६

हो जाता है। पशु तथा प्रत आदिकोंके शरीर अतेजोमय है, उन उन शररोंके साथ मिलकर आत्मा भी अतेजोमय हो जाता है। कार्यशरीरोंके साथ मिलकर अनेक वृत्तियोंके भेद करके आत्मा काममय, अकाममय, क्रोधमय, अक्रोधमय, धममय, अधर्ममय एवं सर्वमय इत्यादि रूपवाला हो जाता है। प्रत्यक्ष घटादिरूप आत्मा ही है इसी कारण आत्माको इदंमय कहा गया है, परोक्ष पदार्थरूप भी आत्मा ही है, इससे आत्मा अदोमय कहाता है। देह तथा इन्द्रियादिकोंके साथ मिलकर आत्मा जैसे जैसे कर्म करता है वैसे वैसे शरीरोंको प्राप्त होता है। इस संसारका असाधारण कारण तो कर्म है, जैसा पुरुषका काम होता है वैसा ही उस पुरुषका निश्चय होता है, उस निश्चयके अनुसार ही मनुष्य कर्म करता है, और जैसे कम करता है उन कर्मों के अनुसार वैसे ही फल पाता है।। ५।। कामनानुसारी शुभाशुभ वर्णनके साथ कामनारहित व्रभ्मवेत्ताके मोक्षका निरूपण किया जाता है, यथा- तदेष श्लोको भवति। तदेव सक्तः सह कर्मणैति लिङ्गं मनो यत्र निषक्तमस्य। प्राप्यान्तं कर्मणस्तस्य यत्किंचेह करोत्ययम्। तस्माल्लोकात्पुनरैत्यस्मै लोकाय कर्मण इति तु कामयमानोऽथाकामयमानो योऽकामो निष्काम आपकाम आत्मकामो न तस्य प्राणा उत्क्रामन्ति ब्रह्मैव सन्त्रह्माप्येति ॥६॥ भावार्थ-इस विषयमें मन्त्र प्रमाण हैं, इस जीवात्माके मरण समयमें अत्यन्त गमनशील अथवा लिङ्ग शरीर सहित मन जहाँ आसक्त होता है, वहाँ ही यानी उसी विषयके प्रति जाता है, अर्थात् इसका मन जिसमें अत्यंत आसक्त होता है, उसी फलको यह साभिलाष होकर कर्मके सहित प्राप्त करता है। यह वहाँ जो कुछ कर्म करता है उस कर्मके फलको भोगसे समाप्त कर उस लोकसे फिर इस लोकमें कर्म करनेके लिए ही आगमन करता है। इस प्रकार कामनायुक्त हो यह मारा मारा फिरता है। और जो कामना करनेवाला पुरुष नहीं है वह शरीर त्यागानन्तर भी अन्यत्र कहीं नहीं जाता। कौन, जो अकाम, निष्काम, आप्तकाम और आत्मकाम है उसके प्राण उत्क्रमण नहीं करते, वह पुरुष ब्रह्मवित् होकर ब्रह्मको ही पाता है ॥ ६॥ वि. वि. भाष्य-जिस पदार्थमें इस मनुष्यका दढतासे मन आसक है,

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वह कर्मो सहित उस्ची पदार्थको प्राप्त होता है। इस मनुष्यदेहमे जो कर्म किये हैं, उन कर्मोंके फलका परलोक आदिमे भोग कर जीव फिर इस पृथिवी लोकमें प्राप्त हो जाता है। फफर पृथिवीमे किये कमके फलका भोग कर पुनः इस भुमण्डलमें प्राप्त होता है। इस प्रकार कामनावाला पुरुष इस संसारमे घटीयन्त्रकी तरह आता जाता रहता है। इससे मुमुक्षु जनों को कामनासे रहित होना चाहिए । हे जनक, जो पुरुष आत्मामें ही कामनावाला है वही आप्तकाम है। इसी कारण उस मनुष्यकी आन्तर बाह्य सर्व कामना निवृत्त हो जाती है। निवृत्तकाम उस जीवन्मुक्तके शरीरसे बाह्य प्राण न निकलकर ब्रह्ममें ही लीन हो जाते हैं। सो वह ज्ञानी पहले ब्रह्मरूप हुआ ब्रह्मको प्राप्त होता है॥ ६ ॥ विद्वान् पुरुषकी उत्क्रान्तिका प्रकार दिखाते हैं, यथा- तदेष शोको भवति। यदा सरवें प्रमुच्यन्ते कामा येडस्य हृदि श्रिताः । अथ मर्त्योऽमृतो भवत्यत्र ब्रह्म समश्रुत इति। तद्यथाऽहिनिल्वयनी वल्मीके मृता प्रत्यस्ता शयीतैवमेवेद शरीर2 शेतेऽथायमशरीरोऽमृतः प्राणो ब्रह्मव तेज एव सोऽहं भगवते सहस्रं ददामीति होवाच जनको वैदेहः॥ ७॥ भावार्थ-इस विषयमें ये मन्त्र प्रमाण हैं, इस ब्रह्माप्तिकाम पुरुषको हृदयमें स्थित जो कामनायें हैं वे जब सब प्रकारसे हृदयसे निकल जाती हैं, तब मर्त्य पुरुष भी अमृत हो जाता है, और यहाँ ही ब्रह्मानन्दमें निमम्र होता है। इसमें दष्टान्त कहते हैं, यथा-जैसे सर्पकी त्वचा, (कांचली) उसके शरीरसे निकलकर बल्मीकके ऊपर पड़ी रहती है, उसकी रक्षा आदिक करनेके लिए सर्प न यत्न ही करता है और न फिर उसे लेना ही चाहता है। ऐसे ही जीवन्मुक्तका यह शरीर स्थित रहता है यानी उसी तरह जीवन्मुक्तके देहकी दशा होती है। इसी कारण यह जीवन्मुक्त पुरुष अशरीर और अमृत कहा जाता है, वही प्राण है यानी जीवन्मुक्त है, इसमे ब्रह्मरूप तेज विद्यमान रहता है। यह सब सुनकर जनक वैदेहने कहा कि सो मैं आपको सहस्र (गाय या मुद्रा) देता हूँ।।७॥। वि० वि० भाष्य-कामना ही बड़ा भारी प्रतिबन्ध है, कामनाके निवृत्त

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विद्यवनाव भाध्य

होनेसे यह मनुष्य शरीरकालमे ही ब्रह्मको प्राप्त हो जाता है। जेसे सर्प अपनी त्वचा को अपना स्वरूप जानता हुआ उसका त्याग करता है, वैसे ही जीवन्मुक्त पुरुष स्थूल सूक्ष्म शरीरमे आत्मत्वबुद्धिका त्याग करके अशरीर साक्षी, अमृत, ब्रह्म, ज्ञानघन रूपसे स्थित होता है। जनकने ऐसे सदुपदेशको सुनकर ही हजार गाये देनेकी प्रार्थना की॥ ७ ॥ लब ब्रह्मवेत्ताका अनुभव वर्णन करते हैं, यथा- तदेते श्ोका भवन्ति। अशुः पन्था विततः पुराणो मा2 स्पृष्टोऽनुवित्तो मयैव। तेन धीरा अपियन्ति ब्रह्मविदः स्वर्ग लोकमित ऊर्ध्वं विमुक्ता: ॥८ ॥ भावार्थ-इस विषयमें ये मन्त्र प्रमाण हैं-अणु-सूक्ष्म, सवत्र विस्तीर्ण और पुरातन जो पथ है यानी ज्ञानमार्ग है, मुझे वह प्राप्त हुआ है, मैने ही इसको विचारा है या प्रचार किया है। उस पथसे अन्य ब्रह्मवित् और जीतन्मुक्त पुरुष इस शरीरपातके अनन्तर ही स्वर्गलोकको जाते है॥।८॥ वि० वि० भाष्य-राजा जनकने तत्वम्ञान तो श्रव्रण किया, परन्तु तत्व ज्ञानके कारण साधनोके जाननेकी इच्छा करता हुआ पहलेकी तरह प्रश्न करने लगा। यथा-हे भगवन्, आप ज्ञानके सावनोका भी कथन करे। यह सुन याज्ञवल्क्य मुनि आत्मज्ञानके साधनोका कथन करते हुए बोले कि हे जनक, यह ज्ञानरूप मोक्षका मार्ग सूक्म है, संसारसमुद्रसे पार करनेव्राला है और वैदिक होनेवे यह ज्ञानमार्ग पुराना है। इस ज्ञानमार्गके द्वारा ब्रह्मचर्यादि साधनयुक्त हुए विद्वान् इस देहका त्याग करके मोक्षको प्राप्त होते हैं। हे राजन्, यह ज्ञानमार्ग मुझे प्राप्त हुआ है॥ ८।। इस मोक्षसाधनरूप ज्ञानमार्गमे उपासकोके मतभेदकी दुर्विज्ञेयता बोधन करते हैं, यथा- तस्मिञ्छुक्कमुत नीलमाहु: पिङ्गलu हरित लोहितं च। एष पन्था ब्रह्मणा हानुवित्तस्तेनैति ब्रह्मवित्पुण्य- कृत्तैजसश्च ॥६।। भावार्थ-इस मार्गके विषयमे बड़े मतभेद हैं, कोई इस मार्गको शुक्, कोई नील, कोई पीला, कोई हरा तथा कोई लाहित बताते हैं। किन्तु यह मार्ग साक्षात

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२६२ शहदारण्य कोर्पानभद् [अध्याच ४

ब्रह्माद्वारा अनुभूत है। व्रह्मवित्, पुण्यकन् और तैजस पुरुष ही इस पथसे परमानन्द को पाते हैं॥ ६।। वि० वि० भाष्य-उस पूर्वोक्त मार्गके विषयमे यह पथ शुक्क अर्थात् शुद्ध है, कोई ऐसा कहते हैं। किसीने इसे शरद ऋतुके मेघके समान नील बत लाया है। कोई अग्निका ज्वालाके सहृश पिङ्गलवर्ण कहते हैं। कोई वैडूर्य मणिके समान हरित तथा कोई जपाकुसुमतुल्य रक्त कहते हैं। अस्तु, किसी विद्वान्ने इस मन्त्रकी यह व्याख्या की है कि मुक्ति अवस्थामे मुक्त पुरुषका स्वरूप शुक्क नीळ, पिड्गल, हरित तथा लोहित वर्णका होता है। अर्थात् मुक्त पुरुष अपनी इच्छानुसार विचित्र शक्तियोको धारण कर लेता है, और वह मार्ग उसको ब्रह्म (वेद) द्वारा ही प्राप्त होता है।। ६ ।। प्रस्तुत ज्ञानमागकी स्तुतिके लिए अज्ञानियोके मार्गकी निन्दा करते हैं, यथा- अन्धं तमः प्रविशन्ति येऽविद्यामुपासते। ततो भूय इव ते तमो य उ विद्यायाथ रताः।।१०।। भावार्थ-जो अविद्याकी उपासना करते हैं, यानी कर्मकाण्डमे ही प्रवृत्त रहते हैं वे अज्ञान नामक अन्धकारमे प्रविष्ट होते हैं और जो विद्यामें अनु रक्त रहते हैं यानी कर्मकाण्डात्मक त्रयी विद्यामे रत रहते है वे उससे भी अधिक अन्धेरे जा गिरते हैं॥ १० ॥ वि. वि० भाष्य-जो विद्यासे भिन्न साध्य-साधनरूप कर्मका अनु- गमन यानी उपासना करते हैं वे ससारके नियामक अन्धकारमे यानी अज्ञान- रूप अन्धकारमे पडनेसे नही बच सकते। और उससे भी अधिक वे अन्धकूपमे गिरते हैं जो विद्या कहाती हुई भी अविद्यारूप वस्तुका प्रतिपादन करनेवाली कर्मार्था त्रयीमे रत रहते हैं। वे उपनिषदर्थकी उपेक्षा करनेवाले हैं। इसकी व्याख्या किसी ने ऐसी भी कही है कि जो अज्ञानी पुरुष अविद्याकी उपासना करते हैं अर्थात् अनित्य में नित्य, शुचिमे अशुचि और अनात्ममे आत्मबुद्धि करते हैं, वे अन्धन्तम यानी मूढावस्थाको प्राप्त होते हैं। और जो कर्मानुष्ठान करनेके अभि- मानमें प्रवृत्त रहकर ज्ञानसे वर्जित रहते हैं वे उससे भी महामूढावस्थाके गड़हेमे गिरते हैं॥ १० ॥

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भाजण ४ ] विद्याविनोद भाष्य २६३

अदुर्शनात्मक अन्धकारमें प्रवेश करनेपर भी उनकी हानि क्या है? इस- पर कहते हैं, यथा- अनन्दा नाम ते लोका अन्धेन तमसाऽऽवृताः। ताथस्ते प्रेत्याभि गच्छन्त्यविद्वाथ सोऽबुधो जनाः ॥ ११॥। भावार्थ-वे जो अनन्द यानी भसुख नामक लोक हैं वे अन्धतमसै परिपूर्ण हैं। वे अविद्वान् तथा अज्ञानी जन मरकर उन्हीं लोकोंको प्राप्त होते हैं।। ११ वि० वि० भाष्य-इस मन्त्रमें जो लोक शब्द आया है उसके अनेक अर्थ हैं कितु भुवन और जन अर्थमें प्रायः इसका अधिक प्रयोग होता है, जैसे पृथिवीलोक, अन्तरिक्षलोक इत्यादि प्रयुक्त होता है। मनुष्योमें भी कोई कोई ऐखे अज्ञानी होते हैं कि वे ईश्वरके विषयमें कुछ भी नहीं जानते, अभी तक कोल भील और वनवासी पशुओंके समान ही हैं। सभ्य देशोंमें भी विद्वानोंके घरमें कोई कोई बड़े मूख उत्पन्न होते हैं; यह प्रत्यक्ष ही है। बहुतसे स्थान ऐसे हैं जहाँ सूर्यकी उष्णता भी नहीं पहुँच सकती। अति गम्भीर समुद्रके तले उष्णता नहीं जाती, अन्य भी ऐसे बहुतसे स्थान होगे। इस कारण यहाँ दोनों अर्थ हो सकते हैं। जो मनुष्य अथवा स्थान अन्धा बनानेवाले अज्ञानरूप या अप्रकाशरूप तम से ढके हुए है वे आनन्दरहित कहलाते हैं। जो अज्ञानी हैं, केवल सामान्य अज्ञानी नहीं किन्तु कुछ भी नहीं समझ सकते हैं, ऐसे मनुष्य मरकर उन्हीको प्राप्त होते हैं, यानी उन अन्धकारावृत मनुष्योमें अथवा स्थानोमें जन्म लेते हैं ॥ ११ ॥ फिर भी प्रकृत मार्गकी स्तुतिके लिए उसमें निष्ठा करनेवालेके क्लेश की हानि होती है यह कहते हैं, यथा- आत्मानं चेद्विजानीयादयमस्मीति पूरुषः । किमिच्छन्कस्य कामाय शरीरमनुसंज्वरेत् ॥१२। भावार्थ-जब पुरुष आत्माको भले प्रकारसे जान लेता है कि यह मैं हूँ, तो फिर क्या इच्छा करता हुआ और किस कामनाके लिए शरीरको सं- तप्त करे ? ॥ १२ ॥ वि. वि० भाष्य-जब अधिकारी नित्य अपरोक्ष पूर्ण आत्माको हृद समें स्थित, चुधा तृषादि धर्मो से रहित जानता है तब आत्मासे भिन्न किस

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२६४ शृहदारण्यकोपनिषद् [ अष्याय ४

फलकी इच्छा करता हुआ किस भोक्ताके वास्ते तथा किस फलकी प्राप्तिके लिए शरीरोंको दुःखी करके आप दुःखी हो ? तात्पर्य यह है कि विवेकी पुरुष प्रार- ब्ध कर्मानुसार शरीरोके दुःखी होते हुए भी अपनेको असङ्ग निविकार मानता हुआ तपायपान नहीं होता। इस श्रुतिकी व्याख्या करते हुए श्री विद्यारण्य- स्वामीने पंचदशी नामक ग्रन्थमें चिदाभासकी सप्त अवस्था कथन की है। अज्ञान, आवरण, विक्षेप, परोक्षज्ञान, अपरोक्षज्ञान, शोकापगम और निरंकुश तृप्ति; ये सात अवस्था हैं। जैसे सरलमतिवाले दस पुरुत नदीसे पार उतरकर दसवें मनुष्यको नदीमें बह गया मानते हैं, वस, उस दसवेंको न जानना यही अज्ञान है। यह चिदाभासकी पहली अवस्था है। 'दशम नहीं है' तथा 'दशमका भान नहीं होता' इन दोनों व्यवहारोंका कारण असत्त्वापादक तथा अभानापादक दो प्रकारका यह आवरण है। यह उसकी दूसरी अवस्था है। दशमके शोकसे रोना पीटना- रूप विक्षेप है, यह तीसरी अवस्था है। किसी कृपालु पुरुषके कहनेसे, 'दशम कहीं जीवित है' यह ज्ञान होना परोक्षज्ञान है, यह चौथी अवस्था है। 'दशम तू है' यह वचन श्रवण करके 'दशम मैं हूँ' यह ज्ञान होना अपरोक्ष ज्ञान है, यह पाँचवी अवस्था है। दशमके लाभ होनेसे शोककी निवृत्तिका नाम शोकापगम है, यह छठी अवस्था है। दशमके लाभ होनेसे ही पश्चात् होनेवाले परम आनन्दका नाम निरङकुश तृप्ति है, यह चिदाभास की सातवीं अवस्था है। जैसे चिदाभासरूप जीव विषयोंमें आसक्त हुआ अपने स्वरूपको नहीं जानता, अपने स्वरूप को न जानना यह अज्ञानरूप प्रथम अवस्था है। कूटस्थ नहीं है, कूटस्थका नहीं भान होता, यह द्विविध आवरण है। कर्ता-भोक्ता, सुखी-दुःखी, कामी-क्रोधी, तुधा तृषावाला और बली-निर्बल इत्यादि- रूप विक्ेप है। गुरुके उपदेशसे प्रथम 'कूटस्थ है' ऐसा ज्ञान होना परोक्ष है। विचार करनेके पश्चात् मैं ही कूटस्थ हूँ, ऐसे अपरोक्ष ज्ञानको प्राप्त होता है। उस अपरोक्ष ज्ञानको प्राप्त होकर कर्तृत्व-भोक्तृत्वादिरूप शोकको निवृत्त करता है। इसमें मैंने करने योग्य कर लिया तथा प्राप्त होने योग्य प्राप्त कर लिया; ऐसी निरंकुश तृप्ति होती है। ये सप्त अवस्थाएँ प्रसङ्गसे दिखायी गई हैं। इस मन्त्रका विद्वान् लोग इस प्रकार भी व्याखयान करते हैं-प्रायः अज्ञानी से अज्ञानी पुरुष भी यह समझता है कि मैं गौर हूँ, मैं कृष्ण, गरीब, रोगी तथा विद्वान् हूँ इत्यादि। यहाँ यह उदाहरण इसलिए कहा गया है कि प्रायः सब कोई अपने स्वरूपको प्रत्यक्ष रूपसे जानता है। सो जिस प्रकार अपने स्वरूपको प्रत्यक्ष जानता है कि 'मैं यह हूँ' इसी प्रकार प्रत्यक्षतया यदि कोई मनुष्य उस परमात्माको

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विदाविनोद भाष्य २६K

जान लेवे, तब वह कदापि शरीर धारण करके दुःख नहीं पाता है। यही बात आये कहते हैं-तब वह परमात्मवित् पुरुष क्या इच्छा करता हुआ किस पदार्थकी कामना के लिए शरीरके पीछे दुःखी होवे ? यानी आत्मज्ञानानन्तर मनुष्यको कोई भी कामना नहीं रहती, जब कि कोई इच्छा ही नहीं तब फिर किस कामनाके लिए शरीरको धारण करेगा, क्योंकि इच्छ्राकी पूर्तिके लिए ही शरीर धारण है।। १२।। आत्मवेत्ताकी महिमाका वर्णन करते हैं, यथा- यश्यानुवित्तः प्रतिबुद्ध आत्माऽस्मिन्संदेहो गहने प्रविष्टः । स विश्वकृत्स हि सर्वस्य कर्ता तस्य लोक: स उ लोक एव ।। १३ ।। भावाथ-जिस साधकका जीवात्मा विचारवान् और प्रतिबुद्ध परम ज्ञानी हो गया है, जो आत्मा इस गहन शरीरमें प्रविष्ठ है, वह साधक विश्वकृत् -- बहुत कुछ कर सकता है। क्योंकि वह सब पदार्थका कर्ता है, उसीका लोक है,वह लोक- स्वरूप ही है।। १३ ।। वि० वि० भाष्य-इस मन्त्रमें परमात्मज्ञानीकी प्रशंखा की गई है, यह अथवादश्रुति है। जिस साधकका जीवात्मा बहुत श्रवण, मनन तथा निदिध्यासनादि व्यापार करनेके अनन्तर परम विचारयुक्त हो गया है और जो मत्येक पदार्थ- विषयक ज्ञानवान् होकर परमात्मतत्त्वज्ञता प्राप्त कर सका है, जो आत्मा इस कठिन देहमें प्रविष्ट है, वह सब काम कर सकता है। क्योंकि वह सबका कर्ता है, उसीका लोक है, यह निश्चय है।। १३ ।। केवल श्रौत ही कृतकृत्यता नहीं है, किन्तु आनुभविक भी है, यह कहते हैं, यथा- इहैव सन्तोऽथ विद्यस्तद्वयं न चेदवेदिर्महती विनष्टिः। ये तद्विदुरमृतास्ते भवन्त्यथेतरे दुःखमेवापियन्ति ॥१४ ॥ भावार्थ-इस देहमें अवस्थित रहते हुए ही यदि पुरुष ब्रह्मका साचातकार नहीं करता तो वह नाशको प्राप्त होता है, और जो व्रश्मका सात्तास्कार कर लेता है वह व्रक्मको प्राप्त करके कृतकृत्य हो जाता है॥ १४॥। वि० वि० भाष्य-आत्माको यहीं जान लेना चाहिये, भाव यह है कि इस अनेकों अनर्थपूर्ण शरीरमें जहाँ मनुष्य अज्ञानरूप दीर्घ निद्रासे मोहित रहता है, वहाँ ३४

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२६६ शृद्ददारण्यकोपनिषद् [अब्बाब ४

किसी प्रकार यदि हम उस ब्रम्मतत्त्वको आत्मभावसे जान लें, तब तो हम कृतार्थ हो गये। जैसे ब्रम्मको जानकर हम इस विनाशसे सम्यक् प्रकारसे मुक्त हो गये हैं, ऐसे जो उसे जानते हैं वे अमृत हो जाते हैं। किन्तु जो उसे इस प्रकार नहीं जानते वे ब्रद्मवेत्ताओंस भिन्न अन्य लोग अर्थात् अब्रह्मवेत्ता जन्म मरणादिरूप दुःखोंको ही प्राप्त होते हैं। भाव यह है कि अज्ञानियोंकी उससे कभी निवृत्ति नहीं होती। क्योंकि वे दुःखको ही आत्मभावसे ग्रहण करते हैं॥ १४ ॥ यदैतमनुपश्यस्यात्मानं देवमञ्जसा ईशानं भूतभव्यस्य न ततो विजुगुप्सते ॥ १५ ॥ भावार्थ-जब साधक साधनके पश्चात् इस आत्मदेवको देखता है, जो भूत भविष्यत्का अनुशासन करनेवाला है, तब वह किसीकी निन्दा नहीं करता है॥१५॥ वि० वि० भाष्य-जब आचार्यके उपदेशके अनुसार अनुष्ठानके पश्चात् सोधक साक्षात् इस परमात्मदेवको देखता है वा जान लेता है, तब इस आत्माके साक्षात्कारके कारण किसी जीवसे घृणा नहीं करता तथा किसीकी निन्दा नहीं करता। भेददर्शी सभी लोग ईश्वरसे अपनी रक्षा चाहते हैं, किन्तु यह अभेददर्शी किसीसे भयभीत नहीं होता। इसी लिए जब यह ईशानदेवको सान्षात् आत्मरूपसे देखता है तो अपनेको सुरच्तित रखनेकी इच्छा नहीं करता। जो इस प्रकार देखने- वाला है, वह किसकी निन्दा करे ? ॥१५॥ जब कि ईश्वर भी कालकी अपेक्षा रखता है तो उसमें ईश्वरता कैसी ? इस पर कहते हैं, यथा- यस्मादर्वाक्संवत्सरोऽहोभि: परिवर्तते। तद्देवा ज्योतिषां ज्योतिरायुरहोंपासते ऽमृतम् ॥१६॥ भावार्थ-संवत्सरचक्र अहर्निश आदि अवयवोंके सहित जिसके अधो- भाममें घूमता रहता है, उस आदित्यादि तेजोंके तेज:स्वरूप यानी ज्योतिर्मयतत्त्व अमृतकी देवता लोग आयु नामसे उपासना करते रहते हैं ॥ १६ ॥ वि. वि० भाष्य-इस स्थलमें यह सन्देह होता है कि ईश्वरसे प्रथम काल था तो ईश्वर उस कालका स्वामी या निर्माता कैसे हो सकता है ? इसपर कहते हैं-दिनों के साथ यानी अहर्निश अपने अवयवोंसे उपलत्तिव संवत्सररूप काल जिस परमात्माके पीछे घूमता है, वह सूर्य, अभि, तथा विद्युत् आदि

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आाशन ४] वविध्याविनोद माव्य २६७

ज्योतियोंका भी ज्योति अर्थात् प्रकाशक है तथा सम्पूर्ण जगत्को आयु देनेवाला भी वही है, एवं अमर यानी मरणरहित है। अवश्य ही उसी परमात्माकी विद्वदूगण उपासना करते हैं, सर्वत्र निरन्तर उसीकी महिमाका अनुभव करते रहते हैं। वह अमृतज्योति है, सके अतिरिक्त जितनी ज्योतियाँ हैं वे मर जाती हैं, किन्तु उस ज्योतिका विनाश नहीं होता। देवता लोग उसे आायुरूपसे अपनी उपासनाका लच्त्य बनाते हैं। वह ज्योति सभीकी आयु है, देवगण उस ज्योतिकी आयुरूप गुणके कारण उपासना करनेसे आयुष्मान (अमर) होते हैं। भाव यह है कि जिसे आयुष्मान् बननेकी इच्छा हो वह ब्रह्मकी आयुरूप गुणके द्वारा उपासनामें अवश्य प्रवृत्त हो ॥१६।। इस अमृततत्त्वको सबके अधिष्ठानरूपसे सिद्ध करते हैं, यथा- यस्मिन्पञ्च पञ्चजना आकाशश्च प्रतिष्ठितः । तमेव मन्य आत्मानं विद्वान्त्रह्मामृतोमृतम् ॥ १७॥ भावार्थ-जिसमें पाँच पञ्जन्य अर्थात् प्राण, श्रोत्र, चन्ु, अन्न और मन ये पाँच पदार्थ तथा आकाश यानी अव्याकृत प्रतिष्ठित है, निश्चय करके उसकी उपासनासे जीवन्मुक्त हुआ मैं उसी ब्रह्मको अमृत मानता हूँ॥१७। वि. वि० भाष्य-जिस परमात्मामें पञ्च प्रकारके मनुष्य अर्थात् गन्धर्व, पितर, देव, असुर, और राक्षस अथवा ब्राह्मण, त्त्रिय, वैश्य, शूद्र और पब्रम निषाद अथवा पाँच पक्जन्य नामक ज्योति अर्थात् प्राण, चन्तु, श्रोत्र, मन और आकाश प्रतिष्ठित हैं उसीको मैं परमाव्मा मानता हूँ, उसीको मैं अमर मानता हूँ, उस ब्रह्मको जाननेवाला होनेसे मैं अमृत हूँ। मैं अज्ञानमात्रसे ही मरणधर्मा था, उसकी निवृत्ति हो जानेसे मैं ब्रह्मवेत्ता अमृत ही हूँ ।।१७।। वह प्राणका भी प्राण है, क्यों कि उस आत्मभूत चैतन्यात्मक ज्योतिसे प्रकाशित होता हुआ ही प्राण प्राणनक्रिया करता है, यह कहते हैं, यथा- प्रासस्य प्राणमुत चक्षुषश्चक्षुरुत श्रोत्रस्य श्रोत्रं मनसो ये मनो विदुः। ते निचिक्युर्बह्म पुराणमध्यम् ॥१८ ॥ भाषार्थ-जो उसको प्राणका प्राण, चन्षुका चन्ु, श्रोत्रका भ्रोत्र और मनका मन जानते हैं, निश्चय करके उन्हीं पुरुषोंने सबके पूज्य शाश्वत बम्मको पा लिया है।। १८ ॥

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बृहदारण्यकोपनिषद् [मध्याय ४

वि० वि० भाष्य-वह प्राणादिका प्राण है, क्योंकि उसी ब्रह्मकी शक्तिसे अधिष्ठित नेत्र आदिकों में दर्शन आदिका सामर्थ्य है। चैतन्य ज्योतिसे शून्य होनेपर तो वे स्वतः काष्ठ तथा मिट्टीके ढेलेके समान हैं। इस प्रकार जो जानता है, यानी चक्षु आदिके व्यापारसे जिसके अस्तित्वका अनुमान होता है उस प्रत्यगात्माको जो इस प्रकार जानता है कि वह 'इन्द्रियोंका विषयभूत नहीं है', उसने प्राचीन और आगेसे आगे रहनेवाले ब्रह्मको अवश्य ही जान लिया है॥ १८ ॥ अब शुद्ध मनको ब्रह्मसाक्षात्कारका साधन कथन करते हैं, यथा- मनसैवानुद्रष्टव्यं नेह नानास्ति किंचन। मृत्यो: स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति॥ १६ ॥ भावार्थ-निश्चय ही वह ब्रह्म शुद्ध मनसे जाना जाता है, उसके जाननेके लिए अन्य कोई उपाय नहीं है, अथवा उसमें नाना कुछ भी नहीं है। वह मृत्युसे मृत्युको प्राप्त होता है, जो ब्रम्ममें नानापन देखता है॥। १६॥ वि० वि. भाष्य-अनु-पश्चात् यानी आचार्योपदेशक अनन्तर उस शिक्षाके अनुसार श्रवण, मनन और निदिध्यासन आदि व्यापारके पश्चात् एकाम्र-शुद्ध वशीकृत मनसे ही (अन्य इन्द्रियों से नहीं) वह्देखा जा सकता है। इस द्रष्टव्य अरम्ममें कुछ भी अनेकत्व [भेद ] नहीं है, यानी अनेक ब्रह्म नहीं हैं, वह एक ही है। जैसे कोई अज्ञानी सूर्य आदिको को अथवा इस संसारको भी ब्रद्म मानते हैं, कोई उसी शुद्ध बक्षके अनेक भेद करके उसे हिरण्यगर्भ, विराट्, ईश्वर, जीव मानते हैं- और कोई ब्रह्मा, विष्णु तथा महेशके भेदसे तीन ब्रह्मोंको मानते हैं। ये ब्रह्म नहीं हैं-किन्तु उसकी शक्तिसे शक्तिमान् हैं, उसकी महिमासे महत्त्वको प्राप्त हो रहे हैं, वास्तवमें ये सब एक ब्रह्म ही हैं, नाना ब्रक्म नहीं हैं। जो आज्ञानी इस ब्रझ्ममें अनेकत्वसा देखते हैं, वे मृत्युसे मृत्युको पाते हैं 1 भाव यह है कि वे बार बार जन्म लेकर चौरासी लक्ष योनिमें चकर काटते रहते हैं। यह तत्व परमार्थज्ञानसे संस्कारयुक्त हुए सनसे ही आचार्योपदेशपूर्वक जाना जा सकता है। नानात्वके न रहते हुए भी जो अविद्यासे उसमें नानात्वका आरोप करता है वह आवागमनके चक्करसे छुटकारा नहीं पा सकता। भाव यह है कि समें अविद्याननित आरोपके अतिरिक्त परमार्थतः द्वत है ही नहीं ॥ १९ ॥ द्वतके अभावमें उसे कैसे देखना चाहिए, इस विषयमें कहते हैं, यथा-

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माजस ४ ] विद्यावनाद भष्य २६६

एकधैवानुद्रष्टव्यमेतदप्रमयं ध्रुवम् । विरज: पर आकाशादज आत्मा महान्ध्ुवः॥ २० ।। भावार्थ-वह ब्रह्म एक ही प्रकारसे द्रष्टव्य, अप्रमेय और ध्रुव है, वह आत्मा विरज, आकाशसे पर, अ्ज, महान् और ध्रुव है॥ २०॥ वि. वि. भाष्य-उस ब्रह्मको एक ही प्रकारसे यानी एक रूपसे 'एकत्वेन' देखना चाहिए, ऐसा देखने या जाननेमें आचार्योपदेश ही सहायक है। क्योंकि ब्रह्म एक होने से अप्रमेय है, विचलित न होनेसे ध्रुव है। जो किसी भी प्रमाणका विषय न हो, उसके बोध करानेमें सिवाय आचार्य गुरुके और कौन समर्थ हो सकता है। वेदसे सब कुछ जाना जाता है, पर उसके समझानेवाला भी तो गुरु ही हो सकता है। गुरुदेव कुछ तो शास्त्रसे कहता है और कुछ स्वानुभवसे, निज अनुभव ईश्वरके भजनसे प्राप्त किया जाता है, जिस ईश्वरकी कृपासे वह आचार्य जैसे उत्तरदायी पदको प्राप्त हुआ है। शास्त्रों तथा लोकमें आचार्यकी इसलिए प्रतिष्ठा है कि उन्होंने वेदादि विद्याओंके अध्ययनमें परिश्रम किया है और साथ ही तपश्चर्याके द्वारा ईश्वरानुग्रह प्राप्त किया है। इन दो योग्यताओंसे आचार्यका आचार्यत्व है। जिसमें विद्या नहीं तथा तप नहीं, वह आचार्य काहेका ? इसीसे औपनिषद् विज्ञान-प्रतिपादक अ्रन्थोंमें ब्रह्मनिष्ठ तथा ब्रह्मश्रोत्रियको जनकल्याण साधन कर्ता कहा गया है॥ २०।। ब्रम्मनिष्ठके लिए अधिक अनात्मशास्त्रोंका पठन पाठन बाघक है, यथा- तमेव धीरो विज्ञाय प्रज्ञां कुर्वीत ब्राह्मणः। नानुष्यायादुबहूञ्छब्दान्वाचो विग्लापन& हितदिति॥२१।। भावार्थ-विवेकी पुरुष आचार्य द्वारा शास्त्रका श्रवण करके ब्रह्मप्राप्ति के लिए निदिध्यासनरूप कर्म करे, और बहुत शब्दोंका अध्ययन न करे, क्योंकि ऐसा करना केवल वाणीका ही श्रम है।। २१।। वि• वि० भाष्य-यहाँ यह कहा गया है कि 'बहुतसे शब्दोंका अनुचि- न्तन न करे', यहाँ बहुत्वका प्रतिषेध करनेसे केवल आत्माका एकत्व प्रतिपादन करने- वाले थोड़ेसे शब्दोंके अनुशीलनके लिए अनुमति सूचित होती है। वेदोंमें कर्मकाण्ड और उपासनाकाण्ड बहुत बड़ा है, उसके समक्ष ज्ञानकाण्ड बहुत ही कम है, अतः उस औपनिषद्रूप ज्ञानप्रतिपादक वेद्भागके अध्ययनाध्यापनकी तो विधि है ही।

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२७०े बृह्दारण्यकोपनिषद्

व्यर्थ निष्प्रयोजन तथा सदाचारप्रतिकूल ग्रन्थोंके अध्ययन करनेमें दोष है। बहुत से लोग उपन्यास, नाटक तथा शृद्गार रसपूर्ण अ्रन्थोंको साहित्य कहकर अहर्निश अध्ययन करनेमें लगे रहते हैं। उनके प्रेमियोंका कथन है कि साहित्यसे भाषा परि- मार्जित हो जाती है, यह कथन तो ठीक है, पर अनुपम अथच अमूल्य सदाचारको जो आघात पहुँचता है, इसर क्षतिकी पूर्ति कहाँ होगी ? हम साधनरूपमें साहित्यके अध्ययन करनेका निषेध नहीं करते; ऐसा करना विद्वत्ता संपादन करनेके मार्गमें काँटे बिछाना है, पर इसके अत्यधिक अध्ययनका विरोध करते हैं। तात्पर्य यह है कि दुर्लभ मानवदेह प्राप्त करके आत्मज्ञानसे वंचित रह जानेसे बढकर और कोई दुर्भाग्यकी बात नहीं हो सकती। संसारमें चाहे जो भी करते धरते रहो, पर आत्मज्ञानसे अवश्य परिचित रहो। जगत्के सभी पदार्थ तभी शान्तिप्रद हो सकते हैं जब उन्हें ब्रह्ममें अनुस्यूत समझा जाय। संसारमें रहकर वे ही अनर्थसे बच सकते हैं जो आत्मतत्वसे परिचित होंगे। वे यह समझकर किसीसे अशिष्ट व्यवहार नहीं करेंगे कि 'कितने दिनोंके लिए किसे सताया जाय ? अनित्य संसारमें इस नश्वर शरीरसे कुछ नित्य-ध्रुव वस्तुकी प्राप्ति कर लेनी चाहिए। काचके महलमें बैठकर किसीके ऊपर ढेले फेंके जायेंगे तो प्रतिपक्षी ईंटोंकी बौछारसे आश्रयभूत काचके दुर्गको धूलमें मिला देगा। जो ऐसा समझ लेगा वह कयों किसीसे छेड़ छाड़ करने छगा है ? कोई भी बुद्धि रखनेवाला अपने साथ द्रोह नहीं करता, जब कि सर्वत्र सबके रोम रोममें वही एक आत्माराम रम रहा है, यानी सवत्र रामके ही आनन्दका स्रोत प्रवाहित हो रहा है। तो फिर कौन है वह दूसरा जिससे कुछ कहा सुना जाय, और बुरा भला समझा जाय। भाष्यकार कहते हैं कि उस ऐसे आत्माको ही आचार्यके उपदेश तथा शाख- विज्ञानसे जानकर धीर यानी बुद्धिमान् ब्राह्मण (ब्रह्मवेत्ता) शाख्त् और आचार्यने जिसके विषयका उपदेश दिया है तथा जो जिज्ञासाकी सर्वथा समाप्ति कर देने- वाली है ऐसी प्रज्ञा यानी बुद्धि स्थिर करे। भाव यह है कि इस प्रकारकी प्रज्ञा उत्पन्न करनेके साधन संन्यास, शम, दम, उपरति, तितिक्षा और समाधिका पाठन करे। अभ्यास करनेसे ऐसी प्रज्ञा का उदय हो जाता है। कोई यह न समझनेका भ्रम करे कि इस मन्त्रमें विविध विद्याओोंके अध्ययनका निषेध किया गया है। कई महाशयोंके मुखसे 'नानुध्यायाद् बहून् छन्दान् वाचो विग्लापनं हि तदिति' इस वचनको लेकर यह कहते सुना जाता है कि इस मन्त्र में बहुत पढ़नेका निषेध किया गया है। यह समझना ठीक ही है। भला समझो वो

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माजय ४ ] विच्याविनोद भष्य २७१

कि बहुतसा पढ़कर भी आचरण उसके अनुकूल न बनाना यह ठीक है, या थोड़ा पढ़कर भी अपनेको सदाचारी जीवनवाला बनाना यह ठीक है? चाहे कम ही पढ़ा हुआ हो पर वह ठीक हो, बहुत पोथियाँ क्या हित कर सकीं, जिनसे आत्माके पह- चाननेमें सहायता नहीं मिल सकी। वाणीको थकावट देना ही है, यदि उस अध्य- यनसे आत्मैकत्व विज्ञानकी पुष्टि न हो सकी तो ॥ २१॥ इस ब्राह्मणमें फलयुक्त आत्मज्ञानका निरूपण किया गया है, काम्य वेदगशिको छोड़कर अवशिष्ट वेदका इसी आत्मज्ञानमें उपयोग है। इसके लिए अब कहते हैं- स वा एष महानज आत्मा योऽयं विज्ञानमयः प्रागोषु य एषोऽन्तर्हदय आकाशस्तस्मिञ्छेते सर्वस्य वशी सर्वस्येशानः सर्वस्याधिपतिः स न साधुना कर्मणा भूयान्नो एवासाधुना कनीयानेष सर्वेश्वर एष भूताधिपतिरेष भूत- पाल एष सेतुर्विधरण एषां लोकानामसंभेदाय तमेतं वेदानुवचनेन ब्राह्मणा विविदिषन्ति यज्ञेन दानेन तपसा- Sनाशकेनैतमेव विदित्वा मुनिर्भवति। एतमेव प्रव्राजिनो लोकमिच्छन्तः प्रत्रजन्ति। एतद्ध स्म वै ततपूर्वे विद्वाथसः प्रजां न कामयन्ते कि प्रजया करिष्यामो येषां नोऽयमा- त्माडयं लोक इति ते ह स्म पुत्रैषणायाश्च वित्तैषणायाश्च लोकैषणायाश्च व्युत्थायाथ भिक्षाचर्य चरन्ति या ह्योव पुत्रैषणा सा वित्तैषणा या वित्तैषणा सा लोकैषणोभे हयोते एषसो एव भवतः। स एष नेति नेत्यात्माडगह्यो न हि गृह्यतेऽशीर्यों न हि शीर्यतेऽसङ्गो न हि सज्तेऽसितो न व्यथते न रिष्यत्येतमु हैवैते न तरत इत्यतः पापमकरव- मित्यतः कल्याणमकरवमित्युभे उ हैवैष एते तरति नैनं कृताकृते तपतः ॥ २२ ॥

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२७२ बृहदारण्यकोपनिषद् [अष्पाय ४

भावार्थ-अवश्य ही जोयह विज्ञानमय परमात्मा हृदयाकाशमें विगजमान है, वही सबका नियन्ता और व ही सबको वशमें रखनेवाला है, महान्, अजन्मा और वही सबका अधिपति है। वह किसी प्रकारके पुण्य पापसे लिप्त नहीं होता है। और वही सब लोकोंको मर्यादामें रखनेवाला सेतुरूप है। ब्राह्मण लोग वेदाभ्यास, यज्ञ, दान तथा तप आदि क्मोंसे उसके जाननेकी इच्छा करते हैं, क्योंकि eसीको जानकर पुरुष मुनि होता है और उसीके जाननेके लिए पुरुष संन्यास अ्रहण करता है। यह भी स्पष्ट है कि पूर्व समयके विद्वान् लोग प्रजाकी कामना न करते हुए यह कहते थे कि यदि परमात्माकी प्राप्ति न हुई तो हम प्रजासे क्या करेंगे ? यह विचार कर पुत्रषणा, वित्तषणा तथा लोकैषणा इन तीन एषणाओंसे व्युत्थानको प्राप्त हुए संन्यासी भिक्ताटन करते हैं। यदि विचार कर देखा जाय तो जो पुत्रषणा है वही वित्तेषणा है और जो वित्तषणा है वही लोकैषणा है। इस प्रकार ये दोनों ही एषणा बनती हैं। जिनसे यति लोग पार होकर केवल आत्माके आनन्दमें मम्न रहते हैं। हे राजन्, यह आत्मा अगृह्य यानी किसी इन्द्रियका विषय नहीं है,अशीर्य यानी उपचयापचयसे रहित है, असङ्ग है, असत यानी सब प्रकारके बन्धनसे रहित जानन्दस्व्ररूप हैं। इसीके साक्षात्कार द्वारा यति लोग शुक्क तथा कृष्ण नोदों प्रकारके करमोंसे पार हो जाते हैं। फिर उनके चित्तमें किसी प्रकारका ताप नहीं रहता ।। २२ ।। इस प्रकार उक्त ब्रह्मविद्याके फलके विषयमें मन्त्रका संवाद दिखाते हैं, यथा- तदेतदचाभ्युक्तम्। एष नित्यो महिमा ब्राह्मणस्य न वर्धते कर्मण नो कनीयान्। तस्यैव स्यात्पदवित्तं विदित्वा न लिप्यते कर्मणा पापकेनेति। तस्मादेवंविच्छान्तो दान्त उपरतस्तितिनुः समाहितो भूत्वाSऽत्मन्येवात्मानं पश्यति सर्वमात्मानं पश्यति नैनं पाप्मा तरति सर्व पाप्मानं तरति नैनं पाप्मा तपति सर्व पाप्मानं तपति विपाधो विरजोऽविचितत्सो ब्राह्मणो भवत्येष ब्रह्म- लोक: सम्राडेनं प्रापितोऽसीति होवाच याजञवल्क्यः सोऽहं भगवते विदेहान् ददामि मां चापि सह दास्यायेति ॥२३॥

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विद्याविनोद भाष्य २७३

भावार्थ-इस मन्त्रमे निष्काम ब्रह्मवित् की प्रशसा की गई है। पहले जिस सन्यासका जैसा वर्णन किया गया है, ऋचाके द्वारा भी वैसा ही प्रकाशित है, वह यह है-ब्रह्मवित् पुरुषकी यह पूर्वोक्त महिमा स्वाभाविक है, वह महिमा न कर्मसे बढती है और न स्व्रल्प ही होती है, उसी महिमाके मार्गवेत्ता मनुष्य हो। उसको जान- कर पापकर्मसे लिप्त नहीं होता, अर्थान् ज्ञानी पापकममे आसक्त नहीं होता। इस लिए ऐसा ज्ञाना पुरुष शान्त, दान्त, उपरत, तितित्ु और समाहित होकर आत्मामे ही आत्माको देखता है यानी सको आत्मतुल्य ही देखता है। इसको पाप नही प्राप्त होता, यह साधक ही सब पापोसे तैर जाता है। इसको पाप तपाता नही किन्तु यही पापको तपाता है। यह पापरहित, रजोगुणरहित और सशयरहित ब्राह्मण होता है। यह ब्रह्मलोक यानी ब्रह्मवित् पुरुषोका लोक है। हे सम्राट्, यहा तक आप पहॅच गये हैं, इस प्रकार याज्ञवल्क्यने कहा। यह सुनकर राजा जनक कहते हैं कि हे परमगुरो, सो मै आपको सम्पृर्ण विदेहराज्य देता हू, और सेवाके लिए मैं अपनेको भी समर्पित करता हू॥ २३॥ अब ब्रह्मज्ञानका अवान्तर फल कथन करते हैं, यथा - स वा एष महानज आत्माऽन्ादो वसुदानो विन्दते वसु य एवं वेद।| २४।। भावार्थ-निश्चय ही यह महान्, अजन्मा परमात्मा ही अन्नका सहर्ता और धनदाता है। जो ऐसा जानता है, वह धन पाता है। कोई विद्वान् इसका ऐसा अर्थ करते हैं कि अवश्य ही यह महान्, अज, आत्मा यानी परमात्मा अन्नाद्-अत्ता, सबका उपसहार करनेवाला तथा वसुदान-सबका कर्मफलदाता है। जो उसको इस प्रकार जानता है, वह सब प्रकारकी कामनाओको प्राप्त होता है॥ २४॥ अब उपसंहारमे ब्रह्मज्ञानका मुख्य फल कथन करते हैं, यथा- स वा एष महानज आत्माजरोऽमरोSमृतोऽभयो ब्रह्मा- भयं वै ब्रह्माभयथहि वै ब्रह्म भवति य एवं वेद॥ २५ ॥ भावार्थ-निश्चय करके यह महान् अज आत्मा सर्वव्यापक, अज्र, अमर, अमृत तथा अभयरूप ब्रह्म है। जो इस प्रकार ब्रह्मको अभय जानता है वह अवश्य- मेव अभय पदको पा जाता है, यानी मोक्षधाममे जा पहॅुँचता है। वि• विष भाष्य-इस आरण्यकमें जिस विषयका प्रतिपादन किया गया है ३५

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२७४ बृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय ४

वह सब इसी कण्डिकामें संग्ृहीत करके बतलाया गया है, यानी पूरे आरण्यकका इतना ही तत्व है, इसमें याज्ञवल्क्य महर्षिने महाराज जनकको यह उपदेश दिया है कि सूर्यादि ज्योतियोंके ज्योति, सर्वके अधिष्ठान, आकाशके समान व्यापक, अजन्मा, नित्य शुद्ध बुद्ध मुक्तस्वभाव इस आत्माको गुरु तथा शास्त्रके उपदेशसे जानकर मुमुत्ुजन आत्माकार वृत्तिको ही धारण करे। जिज्ञासुको चाहिए कि वह अनात्म वार्ताकी चर्चामें अपना तथा दूसरेका समय नष्ट न करे। ऐसा करना केवल कण्ठको शुष्क करना है, तथा मनको विक्षेप देना है। जो विद्वान् ऐसे आत्माको जान लेता है उसकी पापकमोंसे किश्िित् भी हानि नही होती और न पुण्यकर्मोंसे उसका उत्कर्ष ही होता है। अभिप्राय यह है कि सर्व प्रपञ्नको मिथ्या जाननेवाला तथा अपने आपको परमानन्दस्वरूप मानता हुआ पापोंके विषयमें कर्तृत्वबुद्धिके अभावसे प्रवृत्त नहीं होता है और न वह जो पिलीलिकामर्दनादि अज्ञात पाप हैं, उनसे लिपा यमान ही होता है। उसके पूर्व जन्मके संचित पुण्य पाप ज्ञानरूपी अभिसे भरमी- भूत हो जाते हैं। कमलमें जलकी तरह आगामी कर्म लिपायमान नही कर सकते, प्रारब्धका भोगसे नाश हो जाता है, इस प्रकार सर्वबन्धरहित हुआ विद्वान् मोक्षको प्राप्त होता है। हे जनक, ऐसे ज्ञानकी प्राप्तिके लिए हीं वेदका पठन पाठन, यज्ञ, दान, तप आदि साधन हैं। इस आत्माके जाननेकी इच्छा करते हुए अधिकारी जन विधिपूर्वक विविदिषासंन्यासको धारण करते हैं। तथा इस आत्माको जानकर भी जीवन्मुक्ति सुखकी प्राप्तिके लिए पुत्र, वित्त और लोक इन तीनोंकी एषणाका त्याग कर विद्वत्संन्यासको विधिपूर्वक ग्रहण करते हैं। हे जनक, यतः साधनोंके बिना आत्माकी प्राप्ति नहीं हो सकती अतः जिज्ञासुको बाह्य इन्द्रियोके निरोधरूप दमसे युक्त तथा शान्तमन हो संन्यास आश्रमका ग्रहण करना उचित है। फिर जिज्ञासु श्रद्धा तथा शीतोष्णादि द्वन्द्वसहनरूप तितिक्षा एवं चित्तकी सावधानता इन साधनोंसे सहित होकर अपने अन्तःकरणमें स्व स्वरूपका प्रत्यक्ष करे। उस आत्माके प्रत्यक्षसे सर्व पुण्य पापादिकोंको दूर कर निःसन्देह ब्रह्मको प्राप्त होता है। हे जनक, तू ऐसे अभय ब्रह्मको प्राप्त हुआ है। यह सुनकर जनक बोला-हे भगवन, आपकी कृपासे मैं अभय ब्रक्मको प्राप्त हुआ हूँ, इस कारण आप मेरे विदेहनामक देशोंको यानी मेरे सम्पूर्ण राज्यको ले लीजिये। मेरा शरीर भी आपकी सेवामें काम आवे, यानी मुझे अपना सेवक ज्ञानकर अङ्गीकार कीजिये ॥ २२-२५॥

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विद्याविनोद भाग्य २७K سا

पञ्चम ब्राह्मण

पूर्व ब्राह्मणमें विस्तारपूर्वक जिस तत्त्वका प्रतिपादन किया गया है, फिर उसी परमात्मतत्वकी दृढ़ताके लिए मैत्रेयीब्राह्णका आरम्भ करते हैं, यथा- अथ ह याज्ञवल्क्यस्य द्े भार्ये बभूवतुर्मैत्रेयी च कात्यायनी च तयोर्ह मैत्रेयी ब्रह्मवादिनी बभूव स्त्रीप्रज्ञैव तर्हि कात्यायन्यथ ह थाज्ञवल्क्योऽन्यद्वृत्तमुपाकरिष्यन् ॥१। भावा्थ-याजवल्क्यकी मैत्रेयी और कात्यायनी दो स्त्िरियाँ थीं, यह सर्वजनविदित बात है। उनमेंसे मैत्रेयी ब्रह्मवादिनी और कात्यायनी उतनी ही प्रज्ञावाली थी जितनी कि साधारण स्त्रियाँ होती हैं। तब याज्ञवल्क्यने दूसरी चर्याका प्रारम्भ करनेकी इच्छासे कहा, यानी जब याज्ञवल्क्य संन्यास ग्रहण करनेकी अभिलाषासे वनको जाने लगे तब उन्होंने मैत्रेयीसे कहा॥ १ ॥ वि० वि० भाष्य-याज्ञवल्क्यकी दो स्त्रियोंमें मैत्रेयी ब्रह्मवादिनी यानी ब्रह्मसम्बन्धी भाषण करनेवाली थी। उसका यह स्त्रभाव था कि वह आत्मसम्बन्धी विचार करनेमें प्रवृत्त रहती थी, उसे संसारी वार्ता करनेमें किञ्चिित् भी अनुराग नहीं था। दूसरी जो कात्यायनी थी वह गृहसम्बन्धी प्रयोजनकी ही खोजमें रहनेवाली बुद्धि रखती थी। भाव यह कि वृद्धावस्थाको प्राप्त हुए, विषयोंमें अनेक प्रकार का दोष देखकर परम वैराग्यको प्राप्त याज्ञवल्क्यने संन्यासाश्रम ग्रहण करने का विचार किया। याज्ञवल्क्य जानते थे कि मेरी बड़ी भार्या संसारको दुःखरूप जानकर मोक्षकी उत्कट इच्छा रखती है। संन्यास धारण करनेकी अपनी इच्छा प्र प्रकट करनेके लिए वे पहले उसीको बुलाकर पूछने लगे। १॥ अब मैत्रेयीसे याज्ञवल्क्यका जो संवाद हुआ था उसका वर्णन करते हैं, यथा- मैत्रेयीति होवाच याजवल्कयः प्रव्रजिष्यन्वा अरे- ड्यमस्मात्स्थानादस्मि हन्त तेऽनया कात्यायन्यान्तं करवाणीति ॥२॥

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२७६ शृहदारण्यकोपनिषद् [अष्पाय ४

भावार्थ-याजवल्क्यने ऐखा कहा कि हे मैत्रेि, तुझको तथा कात्यायनीको अलग अलग धन देकर मैं तुम्हारा विभाजन करना चाहता हूँ, क्योंकि मेरा संन्यास लेनेका संकल्प है। यानी मैं इस गृहस्थाश्रमको छोड़कर संन्यास धारण करना चाहता हूँ। इस लिए मेरा विचार है कि मैं सम्पूर्ण धन तुम दोनोंको बाँटकर दे जाऊँ ॥ २॥ याज्ञवल्क्यका विचार सुनकर मैत्रेयीने उत्तर दिया, यथा- सा होवाच मैत्रेयी चन्नु म इयं भगोः सर्वा पृथिवी विरेन पूर्णा स्यात्स्यां न्वहं तेनामृताऽsहो३ नेति नेति होवाच याज्ञवल्क्यो यथैवोपकरणवतां जीवितं तथैव ते जीवितथ स्यादमृतत्वस्य तु नाशास्ति वितेनेति ॥ ३ ॥ भावार्थ-याज्ञवल्क्यका कथन सुनकर मैत्रेयीने कहा कि हे भगवन्, यदि सम्पूर्ण भूमण्डल धनसे पूर्ण हो जाय तो क्या मैं उससे अमृत यानी मुक्ति प्राप्त कर सकती हूँ ? याज्ञवल्क्यने उत्तर दिया-नहीं, यह बात नहीं है, यह अवश्य है कि जिस प्रकार भोगसाम्रीसे सम्पन्न मनुष्योंका जीवन होता है उसी प्रकार तेरा भी हो जायगा। क्यों कि धनसे मोक्ष तो कदापि प्राप्त नहीं हो सकता॥ ३॥ मैत्रेयीने याज्ञवल्क्यसे मोक्षप्राप्तिविषयक जो प्रश्न किया, उसे कहते हैं, यथा- सा होवाच मैत्रेयी येनाहं नामृता स्यां किमहं तेन कु्यां यदेव भगवान्वेद तदेव मे ब्रूहीति ॥४ ॥ भावार्थ-मैत्रेयीने कहा कि जिससे मैं अमृतत्वको प्राप्त नहीं हो सकती उस घनसे मुझे क्या लाभ ? कृपा करके आप मेरे लिए भी वही साधन बतलावें जिससे मेरी मुक्ति हो॥। ४॥ वि• वि•भाष्य-अब मैत्रेगी कहती है-हे भगवन्, धन धान्यसे परिपूर्ण सारी संपत्ति भी यदि मुझे मिल जाय, तो उससे एवं धनसे तथा धनसे होनेवाले अग्निहोत्रादि कर्मोंसे क्या मैं मुक्त हो सकती हूँ ? याज्ञवल्क्यने कहा-हे मैत्रेयि, इस संसारमें धनसे नाना प्रकारके भोग प्राप्त हो सकते हैं, धन प्राप्त होनेसे भोजन आच्छादनादि द्वारा तेरा जीना ही हो सकता है, उस धनसे मोक्षकी आशा नहीं करनी चाहिए। यह सुनकर मैत्रेयीने कहा-हे भगवन्, जिस धनसे

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बृहदारएयकोपनिषद्

गृहत्यागेच्छुक याज्ञवल्क्यका मैत्रेयी और कात्यायनीके प्रति बँटवारा। गृहत्यागेशछुद् याजवस्डयना भै्री ने अन्यायनीन भाग उरी भपवे

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निद्याविनोद भाष्य २७७

मेरा मोक्ष नहीं हो सकता उसको मैं क्या करूँगी? मुझे आप मोक्षका साधन बताइए। आप मुक्तिके साधनको अवश्य जानते हैं। आपके सदुपदेशसे जनकादि बहुतसे जिज्ञासुओंका कल्याण हो गया है। आपकी कृपासे मेरा भी अवश्य उद्धार होगा इसकी मुभे पूर्ण आशा है।।४॥ याज्वल्क्यजी सान्त्वना प्रदान करते हुए कहते हैं, यथा- स होवाच याजवल्क्यः प्रिया वै खलु नो भवती सती प्रियमवृधद्धन्त तर्हि भवत्येतढ व्याख्यास्यामि ते उयाचक्षाणस्य तु मे निदिध्यासस्वेति॥ ५।। भावार्थ-तब याज्ञवल्क्यने कहा-मैत्रेयि, वास्तवमें तू प्रिय है, क्योंकि प्रिय कथन करती है, आ, मेरे समप बैठ, मैं तुझको मुक्तिका साधन कथन करता हूँ। तू मेरी बातको ध्यानपूर्वक सुन ॥। ५॥ वि० वि० भाष्य-जब मैत्रेयीने याज्ञवल्क्चसे आत्मज्ञानविषयक जिज्ञासा की तो वे बड़े प्रसन्न हुए, और बोले कि हे देवि, तेरे शील औदार्य प्रृति गुणोंके कारण मैं तेरे ऊपर पहले ही प्रसन्न था, और अब भी तूने ऐसा प्रश्न करके प्रियकी ही वृद्धि की है याने प्रसन्नताको ही बढ़ाया है। अर्थात् इस सन्तोषकारक निश्चयसे मुझे तूने परम प्रसन्न किया है। मैं तेरे लिए उस अमृतत्वकी व्याख्या करूँगा, जिससे बहुतोंका परमोद्धार हो गया है, जिसके जाननेसे शुक्र सनकादि ऋषि तथा अन्य जिज्ञासु अमर हो गये ॥ ५॥ संसारमें कोई किसीका प्रिय नहीं है, सब अपने प्रयोजनसे प्रिय प्रतीत होते हैं। प्रियतम तो आत्मा है, इसीके लिए सब वस्तुएँ प्रिय लगती हैं, यह कथन किया जाता है, यथा- स होवाच न वा अरे पत्युः कामाय पतिः प्रियो भवस्यात्मनस्तु कामाय पतिः प्रियो भवति। न वा अरे जायायै कामाय जाया प्रिया भवत्यात्मनस्तु कामाय जाया प्रिया भवति। न वा अरे पुत्राणां कामाय पुत्राः प्रिया भवन्त्यात्मनस्तु कामाय पुत्राः प्रिया भवन्ति। न वा अरे वित्तस्य कामाय वित्तं प्रियं भवत्यात्मनस्तु कामाय वित्तं

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शृहदारण्यकोपनिषद्

प्रियं भवति। न वा अरेपशूनां कामाय पशवः प्रिया भव- न्त्यात्मनस्तु कामाय पशवः प्रिया भवन्ति। न वा अरे ब्रह्मण: कामाय ब्रह्म प्रियं भवत्यात्मनस्तु कामाय ब्रह्म प्रियं भवति। न वा अरे क्षत्रस्य कामाय क्षत्रं प्रियं भव- त्यात्मनस्तु कामाय क्षत्रंप्रियं भवति। न वा अरे लोकानां कामाय लोकाः प्रिया भवन्त्यात्मनस्तु कामाय लोकाः प्रिया भवन्ति। न वा अरे देवानां कामाय देवा: प्रिया भवन्त्या- त्मनस्तु कामाय देवाःपिया भवन्ति।न वा अरेवेदानां कामाय वेदा: प्रिया भवन्त्यात्मनस्तु कामाय वेदा:प्रिया भवन्ति। न वा अरे भूतानां कामाय भूतानि प्रियाणि भवन्त्यात्मनस्तु कामाय भूतानि प्रियाणि भवन्ति। न वा अरे सर्वस्य कामाय सर्व प्रियं भवत्यात्मनस्तु कामाय सर्व प्रियं भव- ति। आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्या- सितव्यो मैत्रेय्यात्मनि खल्वरे दृष्टे श्रुते मते विज्ञात इदश सर्व विदितम् ॥ ६ ॥ भावार्थ-याज्ञवल्क्य वोले कि हे मैत्रेयि ! इसमें सन्देह नहीं है कि पतिकी कामनाके लिए पति प्रिय नहीं है, किन्तु आत्माकी कामनाके लिए पति प्रिय होता है। स्त्रीके प्रयोजनके लिए स्त्री प्रिया नहीं होती किन्तु अपने ही प्रयोजनके लिए स्त्री प्रिया लगती है। पुत्रोंकी कामनाके लिए पुत्र प्रिय नहीं होते किन्तु अपने ही प्रयोजनके लिए पुत्र प्रिय होते हैं। धनकी कामनाके लिए धन प्रिय नहीं होता किन्तु अपने प्रयोजनके लिए धन प्रिय लगता है, पशुओंकी कामनाके लिए पशु प्रिय नहीं होते किन्तु अपने प्रयोजनके लिए पशु प्रिय होते हैं। ब्राह्मणकी कामनाके लिए ब्राह्मण प्रिय नहीं होता किन्तु अपनी कामनाके लिए ब्राह्मण प्रिय होता है। क्षत्रियके प्रयोजनके लिए क्षत्रिय प्रिय नहीं होता किन्तु अपने ही प्रयोजनके लिए क्षत्रिय प्रिय होता है। लोकोंकी कामनाके लिए लोक प्रिय नहीं होते किन्तु अपनी कामनाके लिए

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विद्याविनोद भाष्य २७९

लोक प्रिय होते हैं। देवोके प्रयोजनके लिए देव प्रिय नही होते किन्तु अपने ही प्रयोजनके लिए देव प्रिय होते हैं। वेदोकी कामनाके लिए वेद प्रिय नही होने किन्तु अपनी ही कामनाके लिए वेद प्रिय होते हैं। भूतोके प्रयोजनके लिए भूत प्रिय नही होते किन्तु अपने ही प्रयोजनके लिए भूत प्रिय होते हैं, और सबके प्रयोजनके लिए सब प्रिय नही होते किन्तु अपने ही प्रयोजनके लिए सब प्रिय होते हैं। अत हे मैत्रेयि, आत्मा ही दृष्टव्य है यानी तत्वज्ञान द्वारा साक्षात् करने योग्य है, श्रोतव्य है यानी श्रुतिवाक्योसे श्रवण करने योग्य है, मन्तव्य है यानी वेदाSविरोधी तर्कोंसे मनन करने योग्य है, और निदिध्यासितव्य है यानी चित्त- वृत्तिनिरोध द्वारा बारबार अभ्यास करने योग्य है। हे मैत्रेयि, निश्चय करके आत्माके श्रवण, मनन तथा निदिध्यासन द्वारा उत्पन्न हुए विज्ञानसे ही सब कुछ जाना जाता है॥ ६।। वि० वि०भाष्य-प्रथम याज्ञवल्क्य मुनि आत्मज्ञानका साधन वैराग्यकी उत्पत्तिके लिए कथन करते हैं कि यह वार्ता ससारमं प्रसिद्ध है कि भार्याको पतिके प्रयोजनके लिए पति प्रिय नही है किन्तु अपने प्रयोजनके लिए भार्याको पति प्रिय है। ऐसे ही पतिको जायाके प्रयोजनके लिए जाया प्रिय नही है किन्तु अपने प्रयोजनके लिए पतिको जाया प्रिय है। इसी प्रकार पुत्र, धन, ब्राह्मणजाति, क्षत्रियजाति, भूआदिलोक, देवता तथा भूत प्रभृति सर्व जगत् अपने प्रयोजनके लिए ही प्रिय हैं, पुत्रादिकोके प्रयोजनके लिए पुत्रादि प्रिय नही हैं। इस कारण सर्व जगत्मे गौण प्रीति है, मुख्य प्रीति तो आत्मामे ही है। हे मैत्रेयि, परम प्रीतिका विषय ओ आत्मा है वह साक्षात् करने योग्य है, उस आत्माके साक्षात्के लिए शास्त्र तथा आचार्यसे श्रवण कर्तव्य है, तथा भेदबाधक युक्तियोसे मनन तथा बारबार ध्यान करने योग्य है। आत्माके श्रवण, मनन तथा निदिध्यासन पूर्वक प्रत्यक्ष करनेसे सर्व प्रपञ्का ज्ञान होता है॥। ६॥ यह जो भी कुछ दश्यादृश्य है सब आात्मा ही है, इस तत्वका उपदेश देते हुए भेददृष्टिमे हानि दिखाते हैं, यथा- ब्रह्म तं परादाद्योऽन्यत्रात्मनो ब्रह्म वेद क्षत्रं तं परा- दादोऽन्यत्रात्मनः क्षत्रं वेद लोकास्तं परादुर्योऽन्यत्रात्मनो लोकान्वेद देवास्तं परादुर्योSनयत्रात्मनो देवान्वेद वेदास्तं

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२८० मृहदारण्यकोपनिषद् [मस्यान ४

परादुर्योऽन्यत्रात्मनो वेदान्वेद भूतानि तं परादुर्योन्यत्रा- त्मनो भूतानि वेद सर्व तं परादादोऽन्यत्रात्मनः सर्व वेदेदं ब्रह्मेदं क्षत्रमिमे लोका इमे देवा इमे वेदा इमानि भूतानी- दथ सर्व यदयमात्मा॥७॥ भावार्थ-जो व्राह्मणजातिको आत्मासे पृथक समझता है, ब्राह्मणजाति उसे परास्त कर देती है। जो क्षत्रियजातिको आत्मासे अतिरिक जानता है, उसे क्षत्रि- यजाति परास्त कर देती है। जो लोकोंको आत्मासे पृथक् जानता है, उसे लोक परास्त कर देते हैं। जो देवताओंको आत्मासे भिन्न जानता है, उसे देवता परास्त कर देते हैं। जो वेदोंको आत्मासे पृथक जानता है, उसे वेद परास्त कर देते हैं। जो भूतोंको आत्मासे पृथक जानता है, उसे भूत परास्त कर देते हैं। जो सबको आत्मासे अतिरिक्त जानता है, उसे सब परास्त कर देते हैं। हे मैंत्रथि, यह ब्राह्मणजाति. यह क्षत्रियजाति, ये लोक, ये देव, ये वेद, ये भूत तथा ये सब जो कुछ भी हैं, यह सब आत्मा ही है॥।७॥। वि० वि० भाष्य-जो कोई पुरुष भेदरहित इस आात्मासे ब्राह्मणजाति तथा क्षत्रियजातिको भिन्न जानता है, वह ब्राह्मणजाति तथा क्षत्रियजाति उस भेद- द्रष्टाका तिरस्कार कर देती है। नीचजातिको प्राप्त होकर ब्राह्मणादि उत्तम जातियोंकी प्राप्ति न होना, यह ही उन जातियों द्वारा उस भेददर्शीका तिरस्कार है। इसी प्रकार सवर्गादिलोक, देवता तथा भूतादि सर्वजगत् उस भेदद्रष्टाका तिरस्कार करते हैं। इस कारण अभिन्न आत्मामें भेद नहीं देखना चाहिए। ब्राह्मण, क्षत्रिय, लोक तथा देवादि सर्व जगत् रूपसे यह सब कुछ आत्मा ही प्रतीत हो रहा है। तात्पर्य यह है कि ये उस अनाव्मदर्शीको 'यह मुझे अनात्मरूपसे देख रहा है' इस अपराधसे परास्त कर देते हैं, यानी कैवल्यसे सम्बन्धरहित कर देते हैं। किसी भी पदार्थको आत्मासे भिन्न न समे, नहीं तो ये पदार्थ इसके लिए भयदायक हो जायँगे। द्वैतसे भय होता है, अभेदज्ञानी किसीसे नहीं डरता। 'अभय' यह दैवी सम्पत्तिके भण्डारका पहला रत्न है। जो डरता रहता है, वह स्वतन्त्रतापूर्वक कुछ कर नहीं सकता। इस लिए सबको अपना आत्मा ही समझना चाहिए।। ७।। अब सबको आत्मरूपसे ग्रहण करनेमें द्ष्टन्त कथन करते हैं, यथा- स यथा दुन्दुभेर्हन्यमानस्य न षाझा्छब्दान्छ

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विद्याविनोद भाष्य २८१

गहसाय दुन्दुभेस्तु ग्रहणोन दुन्दुभ्याघातस्य वा शब्दो गृहीतः॥८ ॥ भावार्थ-जिस प्रकार दुन्दुभि (नकारे) के ताड़न करने पर बाह्य शन्द नहीं सुने जाते, किन्तु दुन्दुभिगत शब्दके ग्रहणसे ही बाह्य शब्दोंका ग्रहण होता है ॥।८।। अब दूसरा और दष्टान्त कथन करते हैं, यथ .- स यथा शङ्गस्य धमायमानस्य न बाह्याञ्छब्दाञ्छक्क- यादुग्रहणाय शङ्गस्य तु ग्रहरोन शङ्गध्मस्य वा शब्दो गृहीतः॥६॥ भावार्थ-जिस प्रकार शंखध्वनि होनेपर बाह्य शब्द नहीं सुने जाते, किन्तु शंखध्व्रनिके ग्रहणसे ही बाह्य शब्दोंका ग्रहण होता है।९॥ अब तीसरे दृष्टान्तका कथन करते हैं, यथा- स यथा वीणायै वाद्यमानायै न बाह्यान्छन्दान्छक्कुयाद ग्रहणाय वीणायै तु ग्रहोन वीणावादस्य वा शब्दो गृहीतः॥ १० ॥ भावार्थ-जिस प्रकार वीणाके बजनेपर और शब्द नहीं सुने जाते किन्तु यीणाके शब्दसे ही अन्य शब्दोंका ग्रहण होता है। इसी प्रकार ब्रह्मकी ससतासे ही सब पदार्थ प्रकाशित होते हैं। कोई विद्वान् महात्माइसका यह भी अर्थ करते हैं कि जिस प्रकार शब्दोके मन्द, तीव्र तथा पटु आदि भेद शब्दत्वसामान्यसे पृथक नहीं होते, इसी प्रकार पदार्थमात्रकी सत्ता ब्रह्मके अन्तर्गत है। अर्थात् ब्रह्माश्रित होनेसे ही सब पदार्थोंकी प्रतीति होती है, अन्यथा नहीं ॥ १० ॥ वि० वि० भाष्य-हे मैत्रेयि, जैसे दुन्दुभि, शंख तथा बीणा इनसे उत्पन्न हुए जो अनेक प्रकारके विशेष शब्द हैं, उन सब शब्दोमें रहनेवाले शब्दत्वरूप सामा- न्यके ग्रहणके विना उन दुन्दुभि आदिकोंसे उत्पन्न हुए विशेष शब्दोंका ज्ञान नहीं हो सकता, किन्तु शब्दत्वरूप सामान्यके ग्रहण होनेसे ही उन विशेष शब्दोंका ज्ञान होता है। वैसे ही अस्ति, भाति तथा प्रिय रूपसे व्यापक जो आत्मा है उसके भान बिना किसी पदार्थकी प्रतीति नहीं होती। जिस प्रकार यह सर्व जगत् ब्रह्म में स्थित है, इसमें दुन्दुभि आदिका दध्ान्त दिया गया है॥ ८-१० ॥ ३६

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बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ४

अब यह चौथा द्ष्टान्त कथन किया ज.ता है, यथा स यथाद्रैधाग्नेरभ्याहितस्य पृथग्धूमा विनिश्चरन्त्येवं वा अरेऽस्य महतो भूतस्य निश्चसितमेतद्यदग्वेदो यजुर्वेद: सामवेदोऽथर्वाद्गिरस इतिहासः पुराणं विद्या उपनिषदः श्लोकाः सूत्राण्यनुव्याख्यानानि व्याख्यानानीषथ हुतमाशितं पायितमयं च लोक: परश्च लोकः सर्वाणि च भूतान्यस्यैवैतानि सर्वाणि निःश्व्वस्तितानि ॥११ ॥ भावार्थ-जिस प्रकार गीली लकड़ी जिसमें लगी हैं ऐसी अग्निसे नाना प्रकारके धूम तथा चिनगारियाँ निकलती है। इसी प्रकार ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामघेद, अथर्ववेद, इतिहास, पुराण, विद्यायें, उपनिपद्, ब्राह्मणमन्त्र, सूत्र, अनुव्याख्यान, व्याख्यान, यज्ञ, होम, आशिन यानी खाद्यपदार्थ, पायित यानी पीनेके पदार्थ, यह लोक, परलोक और सब प्राणी उसी परमात्म, के निःश्वासभूत हैं यानी तदबीन हैं।११। वि० वि० भाष्य-यहाँ उत्पत्तिमें अग्निके दष्ान्तसे समझाते हैं, जैसे गीली कड़ियोंवाली प्रज्वलित अभिसे धूम स्फुलि दि उत्पन्न होते हैं, वैसे ही इस विभु आत्मासे पुरुषके श्वास की तरह चारों वेद, इतिहास, पुराण, विद्या, उपनिषद्, ब्राह्मणमन्त्र, वैदिक वस्तुसंग्रहवाक्य, विवरणव क्यादि सर्व जगत् उत्पन्न होता है। सब कुछ उस् परमात्मासे उत्पन्न हुआ है को सबका नियन्ता है। वास्तवमें वही सर्व- रूप हो गया है, ज्ञानी लोग सब में उसीको देखते हैं। अखिल विश्वमें जालकी तरह सर्वमयतासे वही फैल रहा है। वह जहाँ नहीं है, ऐसा कोई स्थान ही नहीं है। ११। अब पाँचवा दष्टान्त कहा जाता है, यथा- स यथा सर्वासामपाछ समुद्र एकायनमेवथ सर्वेषाथ स्पर्शानां खवगेकायनमेवथ सर्वेषां गन्धानां नासिके एका- यनमेवथ सर्वेषाथ रसानां जिह्नैकायनमेव सर्वेषाथ रूपाणां चक्षुरेकायनमेवथ सर्वेषाथ शब्दानाथ श्रोत्रमेका- यनमेवध सर्वेषाथ संकल्पानां मन एकायनमेवथ सर्वासां विद्यानाथ हृदयमेकायनमेवथ सर्वेषां कर्मणाथ हस्तावेका-

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विथाविनोद भाष्य २८२

यनमेव सर्वेषामानन्दानामुपस्थ एकायनमेवछ सर्वेषां विसर्गाणं पायुरेकायनमेव सर्वेषामध्वनां पादावेकायन- मेव७ सर्वेषां वेदानां, वागेकायनम् ॥ १२।। भावार्थ-जिस प्रकार सब जलोंका एक समुद्र आश्रय यानी प्रलयस्थान ह, इसी प्रकार समस्त स्पर्शोंका त्वचा एक आश्रय है, इसी प्रकार समस्त गन्धोंकां दोनों नासिकायें एक अयन है, समस्त रसोंका जिह्वा एक आश्रय है, सम्पूर्ण रूपोंका चक्षु एक आश्रय है, रुम्पूर्ण शब्दोंका श्रोत्र एक आश्रय है, सम्पूर्ण सङ्कल्पोंक मन एक आश्रय है, समग्र विद्याओंका हृद्य एक आश्रय है, समस्त कर्मोंका दोनों हाथ एक आश्रय है, सम्पूर्ण आनन्दोंका उपस्थ एक आश्रय है, सम्पूर्ण विसर्गोंका पायु एक आश्रय है, समस्त मार्गोंका दोनों च्वरण एक आश्रय हैं और ऐसे ही सम्पूर्ण वेदोंका वाक एक आश्रय है।। १२ ।। वि० वि० भाष्य-जैसे सब नदियोंके जलोंका समुद्र आश्रय होता है, वैसे ही सर्व स्पर्शोंका त्वक आश्रय है, रसोंका जिह्वा, गन्धोंका नासिका, रूपोंका चनु, शब्दोंका श्रोत्र तथा सर्व सड्कल्पोंका मन आश्रय है। इसी प्रकार सब इन्द्रियोंकी आश्रयता है। पूर्वाक्त दृष्टिसृष्टिवादके अभिप्रायसे शब्दादि विषयोंका श्रोत्रादि इन्द्रिय कारण हैं, अतः शब्दादि विषय अपने कारण श्रोत्रादिकोंमें लीन होते हैं। श्रोत्रादि अपने कारण आकाशा द भूतोमें लीन होते हैं और सब भूत मायाशबल ब्रह्ममें बिलीन होते हैं ॥ १२ ॥ अब छठे दृष्टान्तका वर्णन करते हैं, यथा- स यथा सैन्धवघनोऽनन्तरोडबाह्यः कृतस्नो रसघन एवैवं वा अरेऽयमात्माऽनन्तरोऽबाह्यः कृरसः प्रज्ञानघन एवैतेभ्यो भृतेभ्यः समुत्थाय तान्येवानुविनश्यति न प्रेत्य संज्ञाउस्तीत्यरे ब्रवीमीति होवाच याज्ञवल्कयः ।। १३ ।। भावार्थ-जैसे नमरुका ढेला भीतर तथा बाहरसे समग्र रसघन ही है, हे मैत्रेयि, ऐसे ही यह आत्मा आन्तर बाह्य भेदसे रहित समस्त प्रज्ञानघन ही है। विशेषतया यह इन भूतोंसे उठकर इन्हींके साथ विनाशको प्राप्त हो जाता है,

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[अभ्याय ४

इस प्रकार मृत्युको प्राप्त हो जाने पर इसका कुछ भी नाम नहीं रहता। याज्ञवल्कने 'हे मैत्रेयि. मैं इस प्रकार कहता हूँ' ऐसा कहा ॥ १३ ॥ अब मैत्रेयी शङ्का करती है और याज्ञवल्क्य उत्तर देते हैं, यथा- सा होवाच मैत्रेय्यत्रैव मा भगवान्मोहान्तमापीपिपन्न वा अहमिमं विजानामीति स होवाच न वा अरेऽहं मोहं ब्रवीम्थविनाशी वा अरेऽयमात्माऽनुच्छित्तिधर्मा॥१४ ॥ भावार्थ-हे भगवन्, आपने झुझे यहाँ भ्रममें डाल दिया है, मैं इस आपके कथनको विशेष रूपसे नहीं समझ सकी। मैत्रेयीका यह कथन सुनकर ऋषिने कहा- अरी मैत्रेथि, मैने मोहकी कोई बात नहीं कही है, यह जो आत्मा है सो अवश्य ही विनाशरहित तथा जिसका उच्छेद न हो सके ऐसे धर्र्वाला है, अर्थात् अनुच्छेदरूप धर्मयुक्त है। भाव यह है कि इसका न तो विकाररूप विनाश होता है और न उच्छेदरूप ही ॥! १४ ॥ अब याज्ञवल्क्यके संन्यासग्रहण करनेके साथ उपदेशका उपसंहार करते हैं, यथा- यत्र हि द्वैतमिव भवति तदितर इतरं पश्यति तदितर इतरं जिघ्रति सदितर इतरथ रसयते तदितर इतरमभि- वदति तदितर इतरथ श्रृणोति तदितर इतरं मनुते तदि- तर इतरथ स्पृशति तदितर इतरं विजानाति यत्र त्वस्य सर्वमात्मैवाभूत्तत्केन कं पश्येत्तरकेन कं जिघ्रेत्तत्केन कथ रसयेत्तत्केन कमभिवदेत्ततकेन क. शृखुयात्ततकेन क मन्वीत तत्केन कथ स्पृशेत्तरकेन कं विजानीयाद्येनेदथ सर्व विजानाति तं केन विजानीयात्स एष नेति नेत्यात्माSप्ृह्यो न हि गृह्यतेऽशीर्यों न हि शीर्यतेऽसङ्गो न हि सज्जतेऽ. सितो न व्यथते न रिष्यति विज्ञातारमरे केन विजानीया- दित्युक्तानुशासनासि मैत्रेय्येतावदरे खल्वमृतत्वमिति हो- वत्वा याज्ञवल्क्यो विजहार॥ १५ ॥

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माखय ५] विद्याविनोद भाष्य २८५

भावार्थ-अवद्यावस्थामें जहाँ द्वैतभाव सा होता है वहीं दूसरा दूसरेको देखता है, अन्य अन्यको सूँघता है, दूसरा दूसरेका रसास्वादन करता है, दूसरा दूसरेका अभिवादन करता है, दूसरा दूसरेको सुनता है, अन्य अन्यका मनन करता है, अन्य अन्यका स्पर्श करता है तथा दूसरा दूसरेको विशेष रूपसे जानता है। पर जहाँ इसका सब अपना आप ही है यानी सब अपना आत्मा ही हो गया है, वहाँ कौन किसको दखे, किसके द्वारा किसे सूँघे, कौन किसका रसास्वदन करे, कौन किसका अभिवादन करे, कौन किसे सुने, कौन किसका मनन करे तथा कौन किसके द्वारा किसे जाने ? मनुष्य जिससे इस सबको जानता है, उसे किस छपायसे जाने ? यह जो आत्मा है जिसका 'नेति नेति' इस प्रकार निर्देश किया गया है, वह भगृह्य है यानी उसका किस भी साधनसे ग्रहण नहीं किया जा सकता, वह अशीर्य है, यानी वह विनाशशील नहीं है। वह आत्मा असङ्ग है, यानी कहीं आसक्त नहीं होता, वह अबद्ध है यानी किसी प्रकारके बन्धनको नही प्राप्त होता और न किसी दुःखूको प्राप्त होता है। हे मैत्रेयि, जो सबका विज्ञाता है उसे किस साधनसे जाने ? अर्थात् वह अपना पूर्ण ज्ञाता आप ही है। मैत्रयि, निश्चय जान, इतना ही अमृतत्व है, और वही अमृत है। ऐसा कहकर याज्वल्क परिव्राजक यानी संन्यासी बनकर वनको चले गये । १५॥ वि० वि० भाष्य-उपर्युक्त तेरहवें मन्त्रमें दृष्टान्तसे आत्यन्तिक प्रलयका उपपादन किया गया है, जैसे-लवणका खण्ड जलमें गिरा हुआ जलभावको ही प्राप्त हो जाता है, उस विलीन लवणखण्डको कोई मनुष्य पुनः नहीं निकाल सकता। ऐसे ही त्रिविध परिच्छेद्शून्य जो यह विज्ञानघन आत्मा है, शरीरके सत्पन्न होनेसे यह आत्मा भी प्रतिबिम्बरूपसे उत्पन्न होता है। ब्रह्मवेत्ताके शरीराकार भूतोंका नाश होनेसे 'मैं अमुक देवदत्त नामक हूँ, अमुकका पुत्र हूँ, मेरा यह क्षेत्र है और मेरा यह धन है' इत्यादि सर्व विशेष ज्ञान नष्ट हो जाते हैं। यह सुनकर मैत्रेयीने शंका की कि ब्रह्मन्, आपने तो सुझे मोह उत्पन्न करने- वाला वचन कहा है, पहले आपने कहा था कि आत्मा विज्ञानघन है, किन्तु अब यह कहते हो कि मृत्युको प्राप्त हुआ यह ज्ञानसे रहित होता है। इस कारण पूर्वोत्तर विरेध होनेसे मुझको मोह उत्पन्न हो रहा है। यह सुनकर याज्ञवल्क्य उत्तर देते हैं कि हे मैत्रेयि, इस शरीरका ही नाश होता है, अविनाशी आत्माका नाश नहीं होता। शरीरका विनाश होनेसे यहाँ मन आदिकोंसे होनेवाले विशेष ज्ञानका अभाव कहा है,

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२८६ [ अध्याय ४

विज्ञानघन स्व्रभावनित्य आत्माका कदाचित् भी नाश नहीं होता। अज्ञानी अज्ञानकला में ही अपनेको भिन्न मानता हुआ स्वभिन्न गन्दको ग्रहण करता है, रूपको देखता है, शब्दको श्रवण करता है तथा वाणीसे शब्दका उच्चारण करता है। जिस ज्ञानकालमें विद्वान्के सर्व नाम रूप प्रपंच आत्मरूपताको ही प्राप्त हुए हैं उस ज्ञानसमयमें किस इन्द्रियसे रूपको देखे, गन्धको ग्रहण करे, तथा किसका कथन, किसका मनन एवं किसका निश्चय करे ? विदेह कैवल्यावस्थामें इन्द्रियादिकोंका अभाव होनेसे किसी पदार्थका भी दर्शन, श्रवण, मननादि नहीं होता। जिस आत्मासे नाम रूप प्रपश्को यह पुरुष जानता है उस आत्मदेवको किस साधनके द्वारा जाने ? सर्वके विज्ञाता आत्माको कोई श्रोत्रादिकोंका विषय नहीं कर सकता। इस प्रकारका उपदेश देनेवाले याज्ञवल्क मुनिने मंत्रेयीको ब्रह्मज्ञानोपदेश करके संन्य साश्रम स्वीकार कर लिया और प्रारब्ध कर्सका भोगसे क्षय करते हुए मोक्षधामको प्राप्त हो गये। उन्होने यही प्रारब्ध कर्मका भोग द्वारा च्षय कर लिया। ज्ञानाग्निदग्वकर्मा ज्ञानियोके कर्म भुने हुए बजकी तरह कभी फलोन्मुख नहीं होते। ज्ञानी लोग यहीं सब कुछ कर घर बाते हैं, उन्हें आगे करनेको कुछ भी शेष नहीं रह जाता। याजवल्क्यसे प्रदशित जो यह नेति नेति' इस प्रकार अद्वत आत्माका साक्षरकार करना है. वही किसी दूसरे सहकारी कारणकी अपेक्षासे रहित अमृतत्वका साधन है॥ १५ ॥

षष्ठ ब्राह्मर

अब ब्रह्मविद्याकी स्तुति के लिए वंशब्राह्मणका वर्णन करते हैं. यथा- अथ वधश: पौतिमाष्यो गौपवनादुगौपवनः पौतिमाष्यात्पौतिमाष्यो गौपवनादुगौपवनः कौशि- कारकौशिक: कौण्डिन्यारकौण्डिन्यः शाण्डिल्याच्छाण्डिल्यः कौशिकाच्च गौतमाच्च गौतमः ॥१॥ आग्निवेश्यादानि- वेश्यो गार्ग्यादगाग्यो गार्ग्यादगाग्यो गौतमाढगौतमः सैतवा- तसैतवः पाराशर्यायणात्पाराशर्यायणो गार्ग्यायणाढगार्ग्यायण

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भाश्ण ६] विद्याविनोद भाष्य २८७

उद्दालकायनादुद्दालकायनो जाबालायनाज्जाबालायनो माध्य- न्दिनायनान्माध्यन्दिनायनः सौकरायणात्सौकरायण: काषायणातकाषायणः सायकायनात्सायकायनः कौशिकायनेः कौशिकायनिः ॥ २ ॥ घृतकौशिकाद्घृतकौशिक: पाराशर्या- यणात्पाराशर्यायण: पाराशर्यात्पाराशर्यो जातू कर्ण्याज्ातू कर्ण्य आसुरायणाच्च यास्काच्चासुरायणस्त्रेवणे खवरैणिैपज

त्रेयो माण्टेर्माण्टिरगौ तमाढगोतमो गौतमाढगौतमो वात्स्या- द्वातस्यः शाण्डिल्याच्छाण्डिल्यः कैशोर्या काप्या कैशोर्यः काप्यः कुमारहारितात्कुमारहारितो गालवाढगालवो विद- र्भीकौण्डिन्याद्विदर्भीकौण्डिन्यो वत्सनपातो बाभ्रवाद्वत्सन- पाहाभ्रवः पथः सौभरात्पन्थाः सौभरोऽयास्यादाद्गिरसाद- यास्य आद्गिरस आभूतेस्त्वाष्ट्रादाभूतिरत्वाष्ट्री विश्वरूपा- त्वाष्ट्राद्विश्वरूपरत प्राष्ट्रोऽश्विभ्यामश्विनौदधीच आथर्वणाद्दध्य- डूडाथर्वणो ऽथर्वणो दैवादथर्वा दैवो मृत्यो: प्राध्बथसनान्मृत्युः प्राध्वथसनः प्रध्वसनात्प्रध्वथसन एकषेरेकर्षिर्विप्रचित्ते- र्विप्रचित्तिर्व्यष्टर्व्यष्टिः सनारोः सनारुः सनातनात्सनातनः सनगात्सनगः परमेष्ठिनः परमेष्ठी ब्रह्मणो ब्रह्म स्वयंभु ब्रह्मणे नमः ॥३ ॥ भावार्थ-इस ब्रह्मविद्याका उपदेश निम्नलिखित परंपरा द्वारा एक ऋषिने दूसरे ऋषिखे प्राप्त किया है, यथा-

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२८८ शृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय ४

१-पौतिमाष्यने गौपवनसे, ३०-औपजन्निने आसुरिसे, २-गौपवनने पौतिमाष्यसे, ३१-आसुरिने भारद्वाजसे, ३-पौतिमाष्यने गौपवनसे, ३२-भारद्वाजने आत्रयसे, ४-गौपवनने कौशिकसे, ३३-आत्रेयने माण्टिसे, ५-कौशिकने कौण्डिन्यसे, ३४-माण्टिने गौतमसे, ६-कौण्डिन्यने शाण्डिल्यसे, ३५-गौतमने गौतमसे, ७-शाण्डिन्यने कौशिकसे और गौतमसे, ३६-गौतमने वात्स्यसे, ८-गौतमने आग्निवेश्यसे, ३७-वात्स्यने शाण्डिल्यसे, ह-आग्निवेश्यने गार्ग्यसे, ३८-शाण्डिल्यने कैशोर्य काप्यसे १०-गार्ग्यने गार्ग्यसे, ३६-कैशोर्य काप्यने कुमार हारितसे, ११-गारग्यने गौतमसे, ४०-कुमार हारितने गालवस, १२-गौतमने सैतवसे, ४१-गालवने विदर्भी कौण्डिन्यसे, १३-सैतवने प.राशर्यायणसे, ४२-विदर्भी कौण्डिन्यने वत्सनपादू बाभ्रसे, १४-पाराशर्यायणने गार्ग्यायणसे, १५-गार्ग्यायणने उद्दालकायनसे, ४३-वत्सनपाद् बाभ्रने पन्था सौरभसे, ४४-पन्था सौरभने अपास्य आङगिरससे, १६-उद्दालकायनने जावालायनसे, ४५-अपास्य आङ्गिरसने आभूति त्वाट्टसे, १७-जावालायनने माध्यन्दिनायनसे, ४६-आभूति त्वाष्ट्रने विश्वरूप त्वाट्ट्रस, १८-माध्यन्दिनायनने सौकरायणसे, १६-सौकरायणने काषायणसे, ४७-विश्वरूप त्वाट्टने अश्विनीकुमारोंसे,

२०-काषायणने सायकायनसे, ४८-अश्विनीकुमारोंने दध्यङडाथर्वणसे,

२१-सायकायनने कौशिकायनसे, ४ह-दृध्यङ्डाथर्वणने अथर्वा दैवसे, ५०-अथर्वा दैवने मृत्यु प्राध्वसनसे, २२-कौशिकायनने ५१-मृत्यु प्राध्वंसनने प्रध्वंसनसे, २३-घृनकौशिकसे, ५२-प्रध्वंसनने एकषिसे, २४-घृतकौशिकने पाराशर्यायणसे, ५३-एकषिने विप्रचित्तिसे, २५-पाराशर्यायणने पाराशर्यसे, ५४-विप्रचित्तिने व्यष्टिसे, २६-पाराशर्यने जातूकरणसे, ५५-व्यष्टिने सनारुसे, २७-जातूकर्णने आसुरायण और यास्कसे, ५६-सनारुने सनातनसे, २८-आसुरायणने त्रवणिसे, २६-त्रवणिने औपजन्धनिसे, ५७-सनातनने सनगसे, ५८-सनगने परमेष्ठीसे, ५९-परमेष्ठीने ब्रह्मासे यह विद्या प्राप्त की। ब्रक्मा स्वयंभू है, ब्रह्मको नमस्कार है॥१-३

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भाश्न & ] विद्याविनोद भाष्य

वि. वि० भाष्य-यह याज्ञवल्क्यकांडीय वंशपरंपराकी तालिका दी गई है ब्रह्मविद्याकी स्तुतिके लिए। ब्रद्मविद्या जिसका प्रयोजन है, उस याज्ञवल्क्यकांडका ऐसे ही वर्णन किया गया है जैसे पहले इसी उपनिषद्में मधुकाण्डका वंश बतलाया गया था। यह मन्त्र भी उसीकी तरह स्वाध्याय सथा जपके लिए है। यहाँ ब्राह्मणभागीय आचार्यपरम्परा 'वंश' नामसे कही गई है। इसमें प्रथमान्त शिष्य हैं और पञ्चम्थन्त आचार्य हैं। परमेष्ठी यानी विराट्ने ब्रह्मा हिरण्यगभसे यह विद्या प्राप्त की। उसके आगे आचार्यपरम्परा नहीं है, क्योंकि जो व्रह्ा है वह नित्य स्वयंभू है, उस स्वयभू ब्रह्मको नमस्कार है। जो विद्या सम्प्रदायपूर्वक प्राप्त होती है, वह पूर्ण होती है, जिसमें पूर्णता है उससे पूरा लाभ होता है। जो बात अपने मनसे जान ली जाती है, उससे लाभ न हो यह बात तो नहीं है, पर अपनेपसे आना हुआ विषय त्रुटियुक्त हो सकता है। जैसे योगाभ्यासानुष्ठान स्वयं किया, उससे जितनी फलसिद्धि होती है, उससे अधिक तथा सौकर्यसे गुरुके द्वारा प्राप्त ज्ञानसे हो जाती है। इसीसे इस अध्यायमें वंशका वर्णन किया गया है॥ १-३ ॥

षष्ठ ब्राह्मण और चतुर्थ अध्याय समाप्।

३७

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पंचम अध्याय

प्रथम ब्राह्मण

अब 'पूर्णमदः पूर्णमिदम्' इत्यादि परिशिष्ट प्रकरणका आरम्भ करते है। इसे खिल काण्ड कहते हैं, खिल नाम उसका है जो पूर्वप्रतिपादित विषयसे बाकी रह जाय। गत चार अध्यायोंमें उस साक्षात् अपरोक्ष ब्रह्म, सर्वान्तर, निरुपाधिक तथा 'नेति नेति' आदि सङ्केतोंके लक्ष्य आत्मतत्वका निश्चय किया गया है, जिसका सम्यक ज्ञान ही अमृतत्वका एकमात्र साधन है। शब्दार्थादि व्यवहारकी विषमताको प्राप्त हुए उसी सोपाधिक आत्माकी जिन उपासनाओंका पहले उल्लेख नहीं हुआ है, जो कर्मानुकूल, परमोत्तम, अभ्युद्यकी साधनभूत और क्रम मुक्तिकी प्राप्ति करानेवाली हैं, अब उनका वर्णन करना है, इसी अभिनायसे आगेक्ता ग्रन्थ कहा जाता है। सम्पूर्ण उपासनाओंके अङ्गस्वरूपसे ओद्कार, दम, दान और दया, इनका विधान करनेके लिए अब कहते है- ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते। पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥ भावार्थ-सब जगह आकाशकी तरह व्यापक होनेके कारण ब्रह्म पूर्ण है, वह सोपाधिक ब्रह्म भी पूर्ण है, यह पूर्ण उस पूर्णसे ही उ.पन्न होता है, यह पूर्ण कार्य- रूप है जो कारणात्मक पूर्णसे उत्पन्न होता है। इस पूर्णका पूर्ण निकाल लिया जाय तो भी पूर्ण ही अवशिष्ट रह जाता है। यानी पूर्ण नाम कार्यरूप ब्रझ्मका है, पूर्ण नाम अविद्याकृत भूतमात्रोपाधिके संसगसे होनेवाली भेदप्रतीतिका है। उसे 'आदाय' नाम हटाकर या मिटाकर पूर्ण ही यानी शुद्ध त्रझ्म ही शेष रहता है।

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वि० वि० भाष्य-आदित्य, चंद्रमा, तारे, नक्षत्र, पृथिवी, जल आदि चराचर जगत् जिसकी सत्तासे उत्पत्ति स्थिति तथा लयको प्राप्त होता है, या ऐसे समझो कि जो सब कार्यकारणसंघातका कर्ता, धर्ता तथा हर्ता है वह सदा एकरस एवं आकाशकी तरह व्यापक होनेके कारण पूर्ण कहा जाता है। ऐसा कोई पदार्थ नहीं जो उसकी व्याप्तिसे रहित हो और न कोई ऐसी चीज है जो उसकी सत्ताके बिना आत्मलाभ कर सके यानी अपना अस्तित्व कायम रख सके। वह छोटी एवं बड़ी चीज्जोमें व्याप रहा है। सारे संसारके व्यवहार उसीसे चल रहे हैं। वह शक्तियोंका केन्द्र है, उसी भण्डारसे सब शक्तिमानोंको सामर्थ्य प्राप्त होती है। वह पहलेसे है और अन्ततक रहेगा। वह बड़ेसे बड़ा और छोटेसे छोटा है। अब 'ख' ब्रह्मकी उपासनाके फलका कथन करते है, यथा- ॐ खं ब्रह्म। खं पुराणं वायुरं खमिति ह समाह कौरव्या- यणीपुत्रो वेदोऽयं ब्राह्मणा विदुर्वेदैनेन यद्ेदितव्यम्॥ १॥ भावार्थ-यह जो आकाश ब्रह्म है सो कार है। ख-आकाश चिरन्तन ब्रह्म है। यहाँ आकाशसे प्रसिद्ध जड़ाकाश अभिप्रेत नहीं, यानी भौतिक आकाश न समझ लिया जाय, यहाँ आकाशका अर्थ परमात्माकाश है। वह आकाश ही ख है जिसमें वायुका निवास रहता है। ऐसा कथन कौरव्यायणीपुत्रका है। ब्राह्मण ऐसा समझते हैं कि ओंकार वेद है, क्योंकि इससे उसका बोध होता है जो ज्ञातव्य है॥१॥ वि० वि•भाष्य-यह जो 'खं' ब्रह्म है वह ॐ शब्दसे वाच्य है, अथवा ॐशन्दस्वरूप ही है। यहाँ 'खम्' इससे भूतान्तर्गत आकाशका ग्रहण नहीं है। किन्तु सनातन आकाश यानी परमात्मस्वरूपका ग्रहण है। वह जो परमात्माकाशरूप पुरातन आकाश है वह चक्षु आदिका विषय न होनेके कारण निरालम्ब है और ग्रहण नहीं किया जा सकता। इसलिए श्रुति श्रद्धाभक्तिपूर्वक भावविशेषके द्वारा उसका ओोङ्कारमें आवेश करती है। जिस प्रकार लोग विष्णुके अङ्गोंसे अङ्कित शिलादिकी प्रतिमामें विष्णुका आवेश करते हैं, उसी प्रकार यहाँ समझना चाहिए। 'वेदोडयं ब्राह्मणा विदुः' इस वाक्यके भाष्यकारने कई अर्थ किये हैं, जैसे- यह ओङ्कार वेद यानी वेदितव्य है, जिसका जिससे ज्ञान हो उसे वेद कहा जाता है, अतः ओङ्कार वेदवाचक है यानी नाम है। उस नामसे जो वेदितव्य-प्रकाशित होनेवाला अर्थात् कहा जानेवाला बह्म है, उसे साधक उपलब्ध करता है, इसलिए

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२ह२ शृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय ५

यह वेद है ऐसा ब्राह्मण जानते हैं। अतः ब्राह्मणोंको यह मान्य है कि 'ओम्' यह शब्द अपने नामसे ब्रह्मसाक्षात्कारका साधन है। अथवा 'वेदोऽयम्' इत्यादि वाक्य अर्थवाद है, क्योंकि ॐकारका ब्रह्मके प्रतीकरूपसे विधान किया गया है। क्योंकि 'ॐ खं ब्रह्म' इस प्रकार उनका समा- नाधिकरण है। अब वेदरूपसे उसकी रुति की जाती है कि यह सारा वेद ॐकार ही है। इससे प्रकट होनेवाला और इसीका स्वरूपभूत यह सब ऋक, यजु और सामरूप भेदोंमें विभिन्न हुआ श्रुतिसमुदाय भी ओङ्कार ही है। यह वेद इसलिए भी ओङ्कार है, क्योंकि ज वेदितव्य है वह सब इस ओङ्काररूप वेदसे ही जाना जा सकता है, अतः यह ऊकार वेद है। इसीलिए इससे भिन्न वेदका भी वेदत्व है, उससे विशिष्ट जो यह ॐकार है इसे साधनरूपसे जानना चाहिए। अथवा 'वेदोडयम्' वह वेद है, कौन वह ? जिसे ब्राह्मण लोग ॐकाररूपसे आनते हैं, क्योंकि यह ऊकार ब्राह्मणोंके लिए प्रणव उद्द थादि विकल्परूपसे विज्ञेय यानी उपास्य है। इसका साधनरूपसे प्रयोग करनेपर मानो समस्त वेदका प्रयोग हो नाता है ।। १ ।।

द्वितीय ब्राह्मण

इस प्रकार सब उपासनाओंका अन्तरङ्ग साधन जो ऊकार है उसे कहकर शमादि तीन बाहय साधनोंका विधान करनेके लिए प्रथम अर्थवादको कहते हैं, यथा- त्रयाः प्राजापत्याः प्रजापतौ पितरि ब्रह्मचर्यमूषुर्देवा मनुष्या असुरा उषित्वा ब्रह्मचर्यं देवा ऊचुर्वीतु नो भवानिति तेभ्यो हैतदक्षरमुवाच द इति व्यज्ञासिष्टा ३ इति व्यज्ञासिष्मेति होचुर्दाम्यतेति न आत्थेत्योमिति होवाच व्यज्ञासिष्टेति।१॥ भावार्थ-देवता, मनुष्य और असुर-भेदसे प्रजापतिके तीन पुत्रवर्ग थे, उन तीनोंने ब्रह्मप्राप्तिके लिए अपने पिताके निक्ट ही ब्रह्मचर्य आश्रम पूर्ण किया। ब्रह्म चर्यकी समापिके अनन्तर देवोंने पितासे कहा-आप हमें उपदेश दीजिये। यह

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बृहदारण्य कोपनिषद्

Xदवगण

द(दमन)

ट (दया) सुरगण

मनुष्य

प्रजापति ब्रह्मा अपने संतान देव, असुर, मनुष्योंको तीन 'दकारों का उपदेश दे रहे हैं। प्रन्तपति प्रक्मा योताना संतान देव, भसुर, भूनुष्योने ऋधु 'हडारो'ने। उपदेश उरी रहा ४े.

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शाखन ₹ ] विदाविनोद भाष्य २६३

सुन देवताओं से प्रजापतिने 'द' यह अक्षर कहा और बोले कि 'समझ गये न ?' यह सुन देवोंने उत्तर दिया कि समझ गये, आपने हमें 'इन्द्रियोंका दमन करो' ऐसा उपदेश दिया है। यह सुन प्रजापतिने कहा-हाँ ठीक है, तुम समझ गये॥ १॥ वि० वि.्भाष्य-त्रजापतिके तीनों पुत्रोंने पिताके पास ब्रह्मचर्यदूर्वक वास किया। शिष्यभावसे वर्तनेवाले पुरुषके जितने धर्म हैं, उनमें व्रह्मचर्य की प्रधानता है, उसके धारणपूर्वक उन्होंने शिष्य होकर वास किया; यह भाव है। उपदेशके किए प्रार्थना करनेपर प्रजापतिने उनको 'द' यह केवल वर्णमात्र कहा। 'तुम लोग समझे कि नहीं' यह प्रआपतिके पूछनेपर देवताओं ने उत्तर दिया कि हाँ हम समझ गये, आपने हमसे कहा है दमन करो, तुम लोग स्वभावसे अदान्त हो-अजितेन्द्रिय हो इसलिए दमनशील बनो।' यह सुन प्रजापतिने कहा-हाँ तुम लोग ठीक समझे हो॥१॥ अथ हैनं मनुष्या ऊचुर्ध्रवीतु नो भवानिति तेभ्यो हैत- देवाक्षरमुवाच द इति व्यज्ञासिष्ठा ३ इति व्यज्ञासिष्मेति होचुर्दन्तेति न आत्थेत्योमिति होवाच व्यज्ञासिष्टेति॥२॥ भावार्थ-देवोंके अनन्तर मनुष्योंने पितासे कहा कि प्रभो, हमने ब्रह्मचर्य समाप्त कर लिया है, अतः आप हमें भी उपदेश दें। उनसे भी देवताओंकी तरह प्रजापतिने द' यह अक्षर ही कहा और पूछा-समभे कि नहीं ? मनुष्योंने कहा समझ गये, आपने हमें दान करो' ऐसा कहा है। यह सुन प्रजापतिने कहा 'समझ तो ठीक गये' ।। २।। वि• वि• भाष्य-मनुष्योंने प्रजापतिके पूछनेपर कहा कि आपने हमें ऐसा समझकर यथाशक्ति दान देनेको कहा है कि तुम स्त्रभावतः लोभी हो, अतः संविभाग करो यानी दान दो। आपने हमारे हितकी वह बात कह दी है जो सबसे बढ़कर है।। २ ।। अथ हैनमसुरा ऊचुर्ब्रवीतु नो भवानिति तेभ्यो हैत- देवाक्षरमुवाच द इति व्यज्ञासिष्टा ३ इति व्यज्ञासिष्मेति होचुर्दयध्वमिति न आत्थेत्योमिति होषाच व्यज्ञासिष्टेति तदेतदेवैषा दैवी वागनुवदति स्तनयिलुर्द द द इति

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२ह४ शृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय ५

दाम्यत दत्त द्यध्वमिति तदेतत् त्रयथ शिक्षेददमं दानं द्यामिति॥३॥ भावार्थ-जब मनुष्योंने उपदेश ग्रहण कर लिया तो फिर असुरोने कहा- पिताजी, आप हमें उपदेश दीजिये। उनसे भी प्रजापतिने 'द' यही अक्षर कहा। फिर पूछा-समझे ? असुरोंने उत्तर दिया-'हाँ समझ लिया, आपने हमें दया करनेका उपदेश दिया है। प्रजापतिने कहा-बहुत ठीक समभे। प्रजापतिके इस अनुशासनका मेघगर्जनरूपी दैवी वाणी आज भी दद-द' इस प्रकार अनुवाद कर रही है। अर्थात् मेघोंसे भी वही ध्वनि निकलती है कि दमन करो, दान करो, दया करो। अतः मनुष्य दम, दान और दया इन तीनोंकी शिक्षा ग्रहण करे ॥ ३ ॥ वि० वि० भाष्य-प्रजापतिके पूछनेरर असुरोंने 'द' का अभिप्राय बताय्ा कि दया करो, क्योंकि हम क्रर और हिंसापरायण हैं इसलिए प्राणियोंपर दया किया करें। प्रजापतिके इस अनुशासनकी आज भी अनुवृत्ति हो रही है। जिस प्रजापतिने पूर्वकालमें देवादिका अनुशासन किया था वह आज भी मेघगर्ननरूपी दैवी वाणीसे उनका अनुशासन करता है। अर्थात् आजकलके समयमें जो प्रजापति है यानी शासक है वह भी प्रजाको यही कह रहा है कि दम, दान और दया इन तीनोंको सीखो। वर्तमान कालके लोग इसलिए दुःखी हैं कि वे इन्द्रियोंके दास हो रहे हैं, उनमें संयम नही है, फिर इस कारण भी कष्ट पा रहे हैं कि दैवात् जिनके पास विभूति है वे उसे दूसरोंको न देकर स्वयं भोगना चाहते हैं। उन्हें मालूम होना चाहिए कि 'भोगे रोगभयम्' का सिद्धान्त प्रसिद्ध है। धन सम्पत्ति भोगके लिए नहीं होती, वह तो जीवनोपयोगी व्यावहारिक वस्तु भ्रोंको समयपर एकत्र कर देनेका साधन मात्र है। जो लोग यह समझ रहे हैं कि 'हम खूब मजेमें भोग भोग रहे हैं' वे भूलमें हैं। क्योंकि भोग ही उनको भोग रहा है, 'भोगा न भुक्ता वयमेव भुक्ताः।' जनतामें दयाकी भावना भी कम है। अनेक मूक प्राणी हाहाकार कर रहे हैं पर शरीरसे लाचार होकर वे कह नहीं सकते, वे खानेको नहीं पाते। अशक्त होनेसे काम न देने पर निर्दयतासे मार खाते खाते उस निर्द्यको कोसते कोसते, तथा ऐसी सृष्टिका सत्यानाश मनाते मनाते असमयमें ही परलोकका रास्ता लेते है। अतः मनुष्यको 'द्- द्- द' इस प्रजापतिके उपदेशको हर समय याद करके

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विद्याविनोद भाष्य २६५

उसे आचरणमें लाकर अपना मनुष्यजन्म सफल करना चाहिए। अर्थात् दम, दान, दया इन तीनोंका सदनुष्ान अवश्य करते रहना अपना पवित्र कर्तव्य समझना चाहिए। यहाँ यह शङ्का होती है कि देवादि अलग अलग उपदेशके इच्छुक थे फिर उन्हें प्रआपतिने एक ही प्रकारका उपदेश क्यों दिया ? दूमरे, वे देवादि प्रजापतिके एक ही 'द' अक्षरके तीन भिन्न भिन्न अर्थ कैसे समझ गये ? उत्तर यह है कि प्रजा- पति उन देवादि तीनोंके मनोभावको जान गये थे क्यों कि प्रजापतिके पास वे ब्रह्मचर्यं पालनार्थ कुछ दिन रहे थे। उन्हें अजितेन्द्रियता, कृपणता और निर्दयताः रूप दोषके कारण अपनेको अपराधी मानकर शङ्गित रहते हुए ही अपनी आशङ्काके कारण 'दकार' के श्रवणमात्रसे ही उस उस अर्थको प्रतीति हो गई। आजकल भी यह व्यवहार प्रसिद्ध है कि जिसका अनुशासन करना हो उसे पहले दोपसे ही निवृत्त करना चाहिए। अतः प्रजापतिका 'द' उच्चारण करना उचित ही है। दम, दान, दया इन तीनोंमें 'द' का अन्वय होनेसे अपने दोषके अनुसार देव, मनुष्य तथा असुरोंका उन्हें अलग अलग समझ लेना भी उचित ही है। इसका फल यही है कि अपने दोषका ज्ञान होने पर थोड़ेसे उपदेशसे भी दोष निवृत्त किया जा सकता है। अब यह शंका होती है कि देव, मनुष्य, असुर इन तीनोंने जैसे 'द' का एक एक अर्थ स्वीकार कर लिया, तो फिर मनुष्यको दानका ही केवल अनुष्ान करना चाहिए, उसके लिए अन्य दो दम और दया उपादेय नहीं हैं, क्यों कि वे दूसरोंने अपना लिये। इसका समाधान यह है कि प्रजापतिने तीनों बातें अपने पुत्रोंके हितार्थ कही हैं अतः मनुष्यको तीनोंको मानना चाहिए। देवता लोग समर्थ हैं अतः उनका 'दमन' इसी उपदेशसे काम चल गया और राक्षस नासमझ हैं अतः वे भी एक ही बातको पकड़कर बैठ गये। पर मनुष्य तो दुर्बल है, उसे अपने उद्धारके लिए विशेषतः दानको तथा सामान्यतः दमन तथा दयाको समान रूपसे अङ्गीकार करना चाहिए। इस विषयको आधुनिक रीतिमें इस प्रकार भी समझ सकते हैं कि मनुष्योंके अतिरिक्त न कोई देव है न असुर है। मनुष्योंमें ही जो दमनशील नहीं हैं किन्तु अन्य उत्तम गुणोंसे सम्पन्न हैं उन्हें ही देव कहते हैं। ऐसे ही लोभप्रधान व्यक्ति मनुष्य कहे गये हैं और हिंसापरायण तथा क्रर व्यक्ति असुर हैं। वे मनुष्य ही

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२६६ शृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय ५

अजितेन्द्रियता, कृपणता, निर्दयता इन तीन दोषोकी अपेक्षा तथा सतत्व, रज, तम इन अन्य गुणोके अनुमार देवता, मनुष्य तथा असुर नाम धारण करते हैं। अत ये तीनो साधन मनुष्याको ही सीने चाहिए। उनको उद्देश्य करके ही प्रजापतिने इनका उपदेश किया है। मनुष्योमे अजितेन्द्रिय, लोभी और क्रर प्रकृतिके लोग देखे भी जाते हैं। भाव यह है कि इन्द्रियोका दमन करना, दान देना तथा प्राणियो पर द्यादृष्टि रखना-ये तीनो कर्म अन्त करणकी शुद्धिके मुख्य साधन हैं और इन्हीके अनुष्ठानसे शेष साधनोकी प्राप्ति होती है। अतएत्र पुरुवको उचित है कि वह उक्त सा- धनोके अनुष्ठानद्वारा अन्त करणकी शुद्धि सम्पादन करे, ऐसा करनेवाला मनुष्य सदा सुख भोगता हुआ परमात्मपरायण होता है।। ३॥

तृतीय ब्राह्मण

सम्पूर्ण उपासनाओके अङ्गभूत दमादि तीन साधनोका यहॉ विधान किया गया। दान्त, निर्लोभ तथा दयालु होने पर ही पुरुषका समस्त उपासनाओमे अधिकार होता है। यहॉ तक निरुपानिक ब्रह्मज्ञानका निरूपण समाप्त हो चुका, अब सोपाधिक ब्रह्मकी अभ्युद्यरूप फरवाली उपासनाऍ कहनी हैं, अत आगेका अ्रन्थ आरम्भ किया जाता है, यथा- एष प्रजापतिर्यद्धदयमेतढु ब्रह्मैतत्सवं तदेतत् त्र्यक्षर हृदयमिति ह इत्येकमक्षरमभिहरन्त्यस्मै स्वाश्चान्ये च य एवं वेद द इत्येकमक्षरं ददत्यस्मै स्वाश्चान्ये च य एवं वेद यमित्येकमक्षरमेति स्वर्ग लोकं य एवं वेद ॥ १ ॥ भावार्थ-यह प्रजापति है जो हृदय है, क्योकि उपासक लोग हृदयदेशमें ही उसका ध्यान करते हैं। यह ब्रह्म है, यह सर्व है। यह हृदय तीन अच्रोंवाला नाम है। 'ह' एक वर्ण हुआ, उस मनुष्यके प्रति अपने और पराये लोग भेट देते हैं जो ऐसा जानता है। 'द' यह भी एक अक्षर है, जो इस प्रकार जानता है उसे स्वजन और अन्य लोग देते हैं। 'यम्' यह एक अक्षर है, जो ऐसा जानता है उसी पुरुषको स्वर्ग प्राप्त होता है।। १॥

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भाशण ४ ] विद्याविनोद माध्य २६७

वि• वि• भाष्य-जो हृद्षय है, वह प्रजापति है यानी अनुशासनकर्ता है, यहाँ 'हृदयम्' इस पदके द्वारा हृदयस्थ बुद्धि कही जाती है, जिसमें कि शाकल्य ब्राह्मणके अम्तमें दिग्धिभागके द्वारा नाम, रूप और कर्मोंका उपसंहार बतलाया गया है। यह सम्पूर्ण भूतोंमें प्रतिष्ठित तथा सबका आत्मस्वरूप हृदय प्रजाओंका रचयिता है, यह ब्रह्म है-बृहत् है, यानी सबका आत्मा होनेके कारण यह ब्रह्म है। आागे 'हृदय' इस नामके अक्षरोंसे सम्बन्ध रखनेवाली उपासना कही जाती है। यह 'हृदयम्' डयक्षर है। 'ह' यह एक अक्षर है, जिखका अपहरण कर्म है, इन्द्रियाँ और शब्दादि दूसरे विषय अपने अपने कार्यका अभिहरण करते हैं और हृदय उन्हें अपने भोक्ताके पास ले जाता है। जो ऐसा जानता है उसे स्व-पर जन बलि देते हैं। 'द' यह भी एक अक्षर है, दानार्थ 'दा' धातुका 'द' यह रूप 'हृदय' नामके अक्षर रूपसे निबद्ध है, यहाँ भी हृदयरूप ब्रह्मको इन्द्रियाँ और अन्यान्य विषय अपना अपना वीर्य देते हैं। इसी तरह गत्यर्थक 'इण' धातुका 'यम्' यह रूप इस नामसे प्रसिद्ध एक अक्षर है-ऐसा जाननेवाला स्वगलोकको जाता है। इस प्रकार नामके अक्षर मात्रसे जब मनुष्य ऐसा विशिष्ट फल प्राप्त कर लेता है तो हृदयस्वरूप ब्रह्मकी उपा- सनासे जो फल मिलेगा उसके विषयमें तो कहना ही क्या है? ॥ १ ॥

चतुर्थ ब्राह्मर

अब इस हृदयब्रह्मकी ही सत्यरूपसे उपासना कहते हैं, यथा- तद्वै तदेतदेव तदास सत्यमेव स यो हैतं महयक्षं प्रथमजं वेद सत्यं ब्रह्मेति जयतीमाँल्लोकान् जित इन्न्वसा- वसय एवमेतन् यहदक्षं प्रथमजं वेद सत्यं ब्रह्मेति सत्यथ ह्ोव ब्रह्मा ॥ १ ।। भावार्थ-निश्चय करके वही हृदय वह ब्रह्म है जो कि सत्य है। इस महत्, यक्ष-पूजनीय, प्रथम उत्पन्न हुए को 'यह सत्य ब्रह्म है' जो ऐसा जानता है वह इस लोकको जीत लेता है। उसका प्रतिपक्षी भी अधीन हो जाता है और असत् हो जाता है, यानी शत्रुका अस्तित्व ही मिट जाता है। जो इस प्रकार इस महत्, पूज्य, प्रथम ३८

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२हन शृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय ५

उत्पन्न हुएको 'सत्य ब्रह्म' इस प्रकार जानता है उसे पहले कहा गया फल मिलता है, क्योंकि ब्रह्म सत्य ही है॥ १ ॥ वि० वि० भाष्य-निश्चय करके ब्रह्म सत्यस्वरूप है, क्योंकि सत्यपद-वाच्य पञ्च्भूत उसीकी सत्तासे जगत्को उत्पन्न करते हैं। वही सत्य ब्रह्म सबसे पूज्य तथा सबका आदि कारण होनेसे 'महद्यक्ष' कहाता है। जो इस 'महदयक्ष' सत्यस्वरूप परमात्माको जान लेता है, अवश्य ही वह सर्वोपरि विराजमान होकर परमात्माके अपहृतपाप्मादि गुणोंको धारण करनेसे पूज्य ब्रह्म हो जाता है॥ १॥

पञ्चम ब्राह्मण

अब उस सत्य ब्रह्मकी स्तुतिके लिए उसकी सर्वप्रथम उत्पत्ति बोधन करते हैं, यथा- आप एवेदमग्र आसुस्ता आपः सत्यमसृजन्त सत्यं ब्रह्म ब्रह्म प्रजापतिं प्रजापतिर्देवाथस्ते देवाः सत्यमेवोपा- सते तदेतत् त्र्यक्षरथ सत्यमिति स इत्येकमक्षरं तीत्येकमक्षरं यमित्येकमक्षरं प्रथमोत्तमे अक्षरे सत्यं मध्यतोऽनृतं तदे- तदनृतमुभयतः सत्येन परिगृहीत सत्यभूयमेव भवति नै· विद्वाथ समनृतथ हिनस्ति॥१॥ भावार्थ-पहले यह आप ही था, यानी यह अव्यक्त जगत् जल ही था। उस जलने सत्यको उत्पन्न किया, सत्य ब्रह्म ही है, ब्रह्मने विराट्को और विराट् यानी प्रजापतिने देवताओंकी सृष्टि की। वे देवता लोग सत्यकी ही उपासना करते हैं। वह यह सत्य तीन अक्षरोंवाला है। 'स' यह एक अक्षर है, 'ति' यह एक अक्षर है, और 'यम्' यह एक अक्षर है। इनमें पहला और अन्तक अक्षर सत्य है, और बीचका अक्षर अनृत है। यह जो अनृत है दोनों ओर सत्यसे व्याप्त है यानी दोनों ओरके 'स' तथा 'यम्' इन अक्षरोंसे अन्तर्भावित है, इस कारण यह प्रधान ही है यानी सत्यप्राय ही है। जो ऐसा जानता है उसे अनृत (असत्य) नष्ट नहीं कर सकता ॥ १ ॥

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विदाविनोद माध्य रहह

वि० वि० भाष्य-'आप' शब्दसे यहाँ कर्मसम्बन्धी अग्निहोत्रादिकी आहुतियाँ कही गई हैं। ये आहुतियाँ द्रव्यरूप ही हैं, इस कारण जल हैं। अग्निहोत्र कर्मकी समाप्तिके बाद वह आप (जल) किसी सूक्ष्म रूपसे, जो दिखाई नहीं देता, अपने कर्मसंबन्धको न छोड़ते हुए अन्य भूतोके साथ ही रहता है। कर्मसम्बन्धिता रहनेके कारण प्रधानता जल की ही है, इसीसे यहाँ उसे 'आप' कहा गया है। पश्चात् उस आपने सत्यकी रचना की, अतएव सत्य ब्रह्म प्रथमज है। वही यह सूत्रात्मा हिर- ्यगर्भकी उत्पत्ति है जो कि अव्याकृत जगत्का व्यक्त होना है। वह सत्य महत्ताके कारण ब्रह्म है। उसकी महत्ता सबका स्रष्टा होनेके कारण है। यानी सत्य ब्रह्मने सूर्यादि इन्द्रियोंवाले, प्रजाके स्वामी प्रजापति विराटको उत्पन्न किया, फिर उसने देवगणोंको। वस इस क्रमसे सब कुछ सत्य ब्रह्मसे ही उत्पन्न हुआ है, यही कारण सत्य ब्रह्मके महत्वमें है। सत्यमें जो स' 'ती' और 'यम्' ये तीन अक्षर हैं इनमें जो 'ती' है वह अनुबन्ध है याने स्पष्ट उच्चारणके लिए है। इनमें पहला और अन्तका अक्षर सत्य है क्योंकि उनके मृत्युरूपका अभाव है और बीचका जो 'ती' यानी 'त्' है वह अनृत है, क्योंकि मृत्यु और अनृत इनकी तकारमें समानता है। 'सत्यम्' इस शब्दमें सत्यका बाहुल्य है और असत्य कम है, अतः वह अकिध्चित्कर है। इस प्रकार इस सम्पूर्ण अक्षरके सत्यबाहुल्य और मृत्युरूप अनृतके अकिञ्च्ित्करत्वको जो जानता है, इस प्रकार जाननेवालेको कभी प्रमादसे बोला हुआ अनृत (झसत्य) नहीं मारता है॥१॥ अब उस सत्य ब्रह्मकी संस्थानविशेषमें उपासना बताई जाती है; यथा- तद्यन्तत्सत्यमसौ स आदित्यो य एष एतस्मि- न्मण्डले पुरुषो यश्चायं दक्तिरोत्न्पुरुषस्तावेतावन्यो- न्यस्मिन्प्रतिष्टितौ रश्मिभिरेषोऽस्मिन्प्रतिछठितः प्राणैरयम- मुष्मिन् स यदोत्क्रमिष्यन्भवति शुद्धमेवैतन्मण्डलं पश्यति नैनमेते रश्मयः प्रत्यायन्ति ॥ २ ॥ भावार्थ-जो यह सत्यब्रह्म है वही आदित्य है। जो आदित्यमण्डलव्र्ती पुरुष है, और जो यह दक्षिण नेत्रमें पुरुष है, ये दोनों एक दूसरेमें प्रतिष्ठित-संस्थित हैं, यानी दोनों सखा हैं। रश्मियोंसे यह आदित्य इस चानुष पुरुषमें प्रतिष्ठित

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३०० शृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय ५

है और प्राणोंसे चानषुष पुरुष आदित्यमें प्रतिष्ठित है। जिस समय अन्तिस्थ पुरुष उत्क्रमण करने लगता है उस समय यह इस मण्डलको शुद्ध ही देखता है; ये किरणें फिर उसके समीप नहीं आतीं ।। २।। वि० वि० भाष्य-किसी महात्माने इस मन्त्रका यह भाव प्रदर्शित किया है-यह सत्य ब्रह्म ही आदित्य (सूर्य) का नियन्ता है। यह आदित्यपद अन्य पदार्थोंका उपलक्षण है। इसका तात्पर्य यह हुआ कि वह सत्य ब्रह्म पदार्थ मात्रका नियन्त्रण करनेवाला है। जो आदित्यमण्डलवर्ती पुरुप है और जो चानुष पुरुष है वे परस्वर सखा हैं। आदित्यमण्डलान्तर्गत पुरुष ही सूर्यरश्मियों द्वारा चत्षु आदि सकल इन्द्रियोंका नियामक है। जो मनुष्य उक्त तत्त्वको अच्छी तरहसे जानता है वह सर्वनियन्ता ब्रह्मकी उपासना करनेसे शुद्ध हो जाता है। फिर उसको 'रश्मयः' यानी सांसारिक वासनाओंकी चमक दमक अपनी ओर नहीं खींच सकती। इसे यों समझा जा सकता है कि ऐसा मनुष्य बार बार जन्म जरा मृतिके चक्करमें नहीं फँसता ॥ २ ॥ य एष एतस्मिन्मण्डले पुरुषस्तस्य भूरिति शिर एकथ शिर एकमेतदक्षर भुव इति बाहू दौ बाहू द्वे एते अक्षरे स्वरिति प्रतिष्ठ द्े प्रतिष्ठे द्वे एते अक्षरे तत्यो- पनिषदहरिति हन्ति पाप्मानं जहाति च य एवं वेद ।३। भावार्थ-इस आदित्यमण्डलवर्ती पुरुषका 'भूः' यह मूर्द्धास्थानीय है। मूर्द्धा यानी मस्तक एक है और यह अक्षर भी एक है। 'भुवः' ये भुजा हैं, भुजायें दो हैं और ये अक्षर भी दो हैं। 'स्वः' यह प्रतिष्ठा यानी पाँव हैं, पाँव दो हैं और ये अक्षर भी दो हैं। इस सत्य ब्रह्मका 'अहः' यह नाम है, यह नाम भी उपनिषद् यानी गूढ़ है, गुप्त है। जो इस प्रकारसे जानता है वह पापको मारता है तथा उसे त्याग देवा है ।। ३ ॥ वि० वि० भाष्य-उस सत्य पुरुषके अवयव व्याहृतियाँ कैसे हैं? सो सुनो-'भूः' यह जो व्याहृति है वह प्रथम होनेके कारण उसका मस्तक है, क्योंकि सिर एक संख्यावाला है, वैसे ही भू: भी एक अक्षर है। दो वणोंमें समानता होनेके कारण 'भुवः' यह भुजा है, सुजायें दो होती हैं और ये अक्षर भी दो हैं। तथा 'स्वः' चरण हैं, इसमें दो अक्तर हैं-और प्रतिष्ठा-चरण भी दो ही होते हैं।

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प्राह्मण ५ ] विद्याविनोद भाष्य ३०१

"प्रति-तिष्ठति आभ्याम्" इस व्युत्पत्तिसे प्रतिष्ठा नाम पाँवका हुआ। उस व्याहृतिरूप अवयवोंवाले सत्य ब्रह्मका :उपनिष्द्-रहस्य यानी गूढ नाम (जिसके पुकारे जानेपर वह ब्रह्म अन्य लोगोंके समान अभिमुख हो जाता है) 'अह्र्' है। 'अहर' यह 'हन् हिसागत्योः' और 'हा' यह 'ओहाक त्यागे' इन धातुओंका रूप है। जो 'अहर' संज्ञक ब्रह्मकी उपासना करता है वह पापको मार भगाता है॥ ३ ॥ इस प्रकार आधिदैविक स्वरूपको कहकर आध्यात्मिक स्वरूपको कहते हैं, यथा- योऽयं दक्तिऐोऽक्षन्पुरुषस्तस्य भूरिति शिर एकथ शिर एकमेतदक्षरं भुव इति बाहू दौ बाहू द्े एते अक्षरे स्वरिति प्रतिष्ठा द्वे प्रतिष्ठे द्वे एते अक्षरे तस्योपनिषद- हमिति हन्ति पाप्मानं जहाति च य एवं वेद ॥ ४ ।। भावार्थ-दक्षिण अक्षिगत जो यह पुरुष है उसका 'भूः' यह सिर है, मस्तक एक है और यह अक्षर भी एक है। 'भुवः' यह भुजा है, भुजायें दो होती हैं और ये अक्षर भी दो हैं। 'स्वः' यह पाँव हैं, पाँव दो होते हैं और ये अक्षर भी दो हैं। उसका 'अहम्' यह गुप्त नाम है। जो ऐसा जानता है वह पापको पीट देता है और फिर उसे खदेड़ देता है॥।४ ॥ वि० वि० भाष्य-उस सत्य ब्रह्मका 'अहम्' यह उपनिषद् है, क्योंकि यह प्रत्यगात्मस्वरूप है। पूर्ववत् यानी 'अहर' की तरह 'अहम्' भी 'हन' और 'हा' इन दो धातुओंका रूप है। जो 'अहम्' संज्ञक ब्रद्मकी उपासना करता है वह पापको मार देता है, यानी अपने भीतर किसी अदृष्ट दोषसे उत्पन्न हुए पापको नष्ट कर देता है और पाप उसके पास आना चाहते हैं-उन्हें दूरसे भगा देता है। जिस प्रकार राम कृष्ण शिव आदि परमात्माके नामसंक्कीर्तनसे दुरित क्षय हो जाते हैं, उसी तरह 'अहम्' इस नामकी महिमा जाननेवालोंके पापपुञ्ज भस्म हो जाते हैं। वैदिकोपासनाप्रसङ्गमें प्रभुके 'अहर' तथा 'अहम्' जैसे बहुतसे नाम आते हैं, क्योंकि प्रभुके नाम अनन्त हैं, कीर्ति अपरिमित है तथा महिमा अपार है॥ ४॥।

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३०२ पृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय ६

षष्ठ ब्राह्मण

अब उस सत्य ब्रह्मकी ही फिर मन-उपाधिविशिष्ट रूपसे उपासना कहते हैं, यथा- मनोमयोऽयं पुरुषो भाः सत्यस्तस्मिन्नन्तर्हृदये यथा ब्रीहिर्वा यवो वा स एष सर्वस्येशानः सर्वस्याधिपतिः सर्व- मिदं प्रशास्ति यदिदं किंच ॥ १ ॥ भावार्थ-ऐसा यह पुरुष मनोमय है, जिसका प्रकाश ही सत्य- स्वरूप है। वह उस अन्तहृदयमें धान तथा यव जितने परिमाणवाला है। वह यह सबका स्वामी तथा सबका अधिपति है। जो यह चराचर जगत् प्रतीत हो रहा है वह इस सभीका शासन करनेवाला है॥ १ ॥ वि० वि० भाष्य-वह परमात्मा मनमें उपलब्ध होता है इसी कारण वह मनोमय यानी मनःप्राय है, तथा भाः और सत्य है, यानी भास्वर है। मनके सभी विषयोंका अवभासक तथा मनोभय होनेके कारण ही इसकी भास्वरता है। वह हृदयके अन्तर्भागमें योगियों द्वारा जैसा परिमाणतः ब्रीहि या राव होता है उतने ही परिमाणवाला देखा जाता है। वह सबका ईशान यानी अपने औपाधिक भेदसमु- दायका स्वामी है। प्रत्येक स्व्रामी मन्त्री आदिके अधीन रहते हैं, पर वह ऐसा नहीं है। इस प्रकार मनोमय ब्रह्मकी उपासनासें तद्रपताकी प्राप्ति ही फल मिलता है॥ १ ॥

सप्तम ब्राह्मण

इसी प्रकार सत्य ब्रह्मकी विशिष्टफलवाली एक दूसरी उपासना कहते हैं, यथा-

वेद विद्युदब्रह्मेति विद्युद्ध्येव ब्रह्म ॥१ ॥

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विद्याविनोद माध्य ३०३

भावार्थ-ऐसा कहते हैं कि विद्युत् ब्रह्म है। विदान (अवखण्डन) याने काट देने या विनाश करनेके कारण वह विद्युत् है। 'विद्युत् ब्रह्म है' जो ऐसा जानता है वह उन पापोंको नष्ट कर देता है जो आत्माके प्रतिकूल हैं, क्योंकि विद्युत् ही ब्रह्म है॥।१॥ वि• वि० भाष्य-ब्रह्मवेसाओंका कथन है कि जिस प्रकार यह प्रसिद्ध आकाशस्थ बिजली अथवा आजकल रोशनी, मशीन आदिके काममें आनेवाली बिजली चमक से अन्घकारको नष्ट भ्रष्ट कर देती है। इसी प्रकार उपासकके पापरूप अन्धकारका विनाशक होनेसे परमात्माका नाम विद्युत् है, अर्थात् 'विद्योतत इति विद्युत्' जो प्रकाशस्वरूप हो उसको 'विद्युत्' कहते हैं। इस प्रकार जो प्रकाशस्वरूप परमेश्वरको विद्युत् समभकर या विद्युत्में प्रकाश करनेकी सामर्थ्य देनेवाला जानकर उपासना करता है, वह पापरूप मलसे रहित होकर शुद्धस्वरूप हो जाता है। भाव यह है कि आत्माके प्रतिकूल जितने पाप होते हैं उनका यह खण्डन कर देता है। जो 'विद्युत् ब्रह्म है' ऐसा जानता है, उसको अनुरूप फल मिलता है। १॥

ऋरष्टम ब्राह्मर

इसके अनन्तर फिर इसीकी वाङमयरूप धेतुके सम्बन्धसे उपासना कहते हैं, यथा- वाचं धेनुमुपासीत तस्याश्चत्वारः स्तनाः स्वाहाकारो वषट्कारो हन्तकारः स्वधाकारस्तस्यै दौ स्तनौ देवा उप- जीवन्ति स्वाहाकारं च वषट्कारं च हन्तकारं मनुष्या: स्वधाकारं पितरस्तस्याः प्राण ऋषभो मनो वत्सः ॥ १॥ भावार्थ-वाणीरूप गौकी उपासना करनी चाहिये। स्वाहाकार, वषट्कार, हन्तकारऔर स्वधाकार ये उसके चार स्तन हैं। स्वाहाकार और वषटूकार उसके इन दो स्तनोंसे देवसालोग जीवन धारण करते हैं यानी ये दो देवताओंकी जीविका हैं, मनुष्य हन्तकार के उपजीवी हैं, और स्वधाकार के पितृगण। प्राण उस धेनुका बृषभ है तथा मन बछड़ा है।। १ ॥

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३०४ बृहदारण्यकोपनिषद् [अष्याय ५

वि० वि० भाष्य-वाकू नाम है त्रयी का, यानी ऋक, यजु और साम इन तीन वेदोका नाम बाणी है, उसकी धेनुके समान उपासना करे। उसके चार स्तन मूल मन्त्रमे कहे गये हैं, उनमे स्वाहाकार और वषटकार इन दो का उच्चारण करके देवताओको हवि दी जाती है। इन दो स्तनोके वत्सस्थानीय देवगण उपजीवी हैं। हन्तकारके उपजीवी मनुष्य है, क्योकि हन्त ऐसा कहकर मनुष्योको अन्न दिया जाता है। और स्ववाके उपजीवी पितृगण हैं, इस को कहकर ही पितरोको भाग समर्पग किया जाता है। उस धेनुका प्राण वृषभ है, क्योकि प्राणके द्वारा ही वाक प्रसव करती है। मनसे प्रस्त्नवित-पन्हानेके कारण मन उसका बछडा है। मनसे आलो- चना किये हुए विषयमे ही वाणीकी प्रवृत्ति होती है अतएव मन वत्सस्थानीय है। इस प्रकार वाकरूपी वेनुका उपासक तदुपाधिक ब्रह्मभावको ही प्राप्त हो जाता है। इसे स्पष्ट रीति से यो समझा जाय कि वेदवाणी गौके समान है जैसे गायके चार स्तन होते हैं उसी प्रकार वेदवाणीरूप धेनुके भी मूलोक्त चार स्तन हैं। उनमे दो स्व्राहाकार तथा वपटूकार अग्निहोत्रादि कर्मानुष्ठानरूप दुग्वका दोहन करते हुए देवताओके जीवनाधार है। हन्तकार नामवाला तीसरा स्तन मनुष्योंका आश्रय है, अर्थात् जो अन्य वैदिक कर्मोंके अनुष्ठानमे किसी कारणवशात् अवकाश न मिलनेके कारण केवल अतिथियज्ञको ही पूर्ण करते हैं, उनका पवित्र जीवन कृतकृत्य हो जाना है। मनुष्यको 'हन्त' कहकर अन्न जलादि द्वारा, नही तो वाङमात्रसे ही सही सत्कार करना सबसे श्रेष्ठ व्यापार है। और स्वधाकार यह प्रयत्न पितृगणोकी तृप्ति का साधन है। जिस प्रकार सॉडसे बछडा पैदा करके गाय दूध देती है, उसी तरह प्राणात्मक वृषभ द्वारा मनरूप वत्ससे वागरूप धेतु पुण्यरूप दुग्ध को स्रवण करती है। ऐसे ही प्राणात्मक वृषभ द्वारा मनरूप वत्ससे वागरूप धेनु पुण्यरूप दुग्धका स्वण करती है, बरसाती है। क्योकि प्राणके बलसे ही वाणी का उच्चारण होता है और मन द्वारा सङ्कल्प करके स्वाहाकारादि स्तनोसे पुण्यरूप दूधका दोहन किया जाता है। जो इस प्रकार वेदवाणीकी धेतुरूपसे उपासना करता है उसे अमृतकी प्राप्ति होती है। यहॉ तक कहनेका तातपर्य यही हुआ कि वेदवाणीरूप गाय मनुष्यजीवनको सफल बना देनेका सबसे बडा साधन है। वेदवाणी और धेनु ये दोनो जीवन हैं। धेनु मानव- शरीरको पुष्ट करती है, और वेदवाणीसे आध्यात्मिक जीवन सफल होता है॥१॥

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भाश्ण &] विद्याविनोद भाष्य ३०५

नवम ब्राह्मण

प्रकृत सत्य ब्रह्मको ही अठराभिरूप से अपरोक्ष दिखाते हुए उसकी जठराभि- रूप से उपासना कहते हैं, यथा- अयमन्निर्वैश्वानरो योऽयमन्तःपुरुषे येनेदमन्न' पध्यते यदिदमद्यते तस्यैष घोषो भवति यमेततकर्णावपिधाय शृणोति स यदोत्क्रमिष्यन्भवति नैनं घोष छ शृणोति॥१॥ भावार्थ-यह अगनि वैश्वानर है, जो कि यह पुरुषके भीतर है। जो अन्न भक्षण किया जाता है वह उस अगनिसे पकाया जाता है। जिसे मनुष्य कानोंको बन्द करके सुनता है यह शब्द उसीका है। जिस समय मनुष्य उत्क्रमण करने लगता है, उस समय इस घोषको नहीं सुनता ॥ १। वि० वि.भाष्य-इसमें महात्मा लोग कहा करते हैं कि अभि यानी प्रकाशस्वरूप परमात्मा ही वैश्वानर है, क्योंकि जो कुछ भक्षण किया आता है उसे परमेश्वरकी सत्तासे ही वैश्वानर-जठराग्नि जीर्ण करनेमें समर्थ होता है, स्वतः नहीं। और जो दोनों कान बन्द करनेसे घोषात्मक शब्द सुनाई पड़ता है वह इसी वैश्वानर अग्निका शब्द है, उसका श्रवण आसन्नमृत्यु यानी गतायु पुरुषको नहीं होता ।। १।।

दशम ब्राह्मण

इस प्रकरणमें उक्त समस्त उपासनाओंकी गति और जो फल नहीं कहा गया है; वह कथन किया जाता है, यथा- यदा वै पुरुषोडस्माल्लोकात्प्रैति स वायुमागच्छति तस्मै स तत्र विजिहीते यथा रथचक्रस्य खं तेन स ऊर्ध्व ३६

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३०६ बृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय ५

आक्रमते स आदित्यमागच्छति तस्मै स तत्र विजिहीते यथा लम्बरस्य खं तेन स ऊर्ध्व आक्रमते स चन्द्रमसमा- गच्छति तस्मै स तत्र विजिहीने यथा दुन्दुभे: खं तेन स ऊर्ध्व आक्रमते स लोकमागच्छत्यशोकमहिमं तरिमन्वसति शाश्वतीः समाः ॥१॥ भावार्थ-मनुष्य जिस समय इस संसारसे परलोकमें जाता है, उस समय वह वायुको प्राप्त होता है। वहाँ उसे वायु रास्ता दे देता है, इतना मार्ग जैअ कि रथके पहियेका छेद होता है, उससे वह ऊपरको चढ़ता है। ऐसा होनेपर वह आदित्यलोकमें पहॅुॅच जाता है, वहाँ उसके लिए सूर्य भी वैसा ही द्विद्र यानी मार्ग दे देता है, जैसा कि डम्बर नामक बाजेका छेद होता है, वह उसमें होकर ऊर्ध्वगामी होता है। इसके अनन्तर वह चन्द्रलोकमें पहुँचता है। उसके प्रति चन्द्रमा भी मार्ग दे देता है, ऐमा मार्ग जैसा दुन्दुभिका होता है, उससे वह ऊपरको चढ़ जाता है। ऐसा करके वह शोकरहित तथा हिमरहित लोकमें पहुँच जाता है और वहॉ अनन्त काल तक निवास करता है॥ १॥ वि० वि० भाष्य-जिस समय उपासक पुरुष इस लोकसे मरकर जाता है, उस समय वायुको प्राप्त होता है। वायु आकाशमें तिरछ्ा होकर अभेद्य रूपसे रास्ता रोके रहता है, वह उपासकको देखकर मार्ग दे देता है। यानी अपनेमें रथके पहिये जैसा छिद्रयुक्त हो जाता है, उसमेसे विद्वान् ऊर्ध्वोन्मुख होकर जाता है। जाते जाते वह आदित्यलोकमें जा पहुँचता है, आदित्य ब्रह्मलोकका मार्ग रोके खड़ा है, वह भी उपासकको अपनेमें डम्बर बाजेके छेद जैसा छिद्र करके उसे रास्ता दे देता है। उसमेंसे होकर उपासक ऊपरकी ओर चढ़ता है, चढ़ते चढ़ते चन्द्रलोक तक जा पहुँचता है। वहाँ वह भी उसके लिए अपनेको द्विद्रयुक्त कर देता है, जैसा कि डुन्दुभिका छिद्र होता है। वह उपासक इस खिड़कीसे होकर ऐसे लोकमें पहुँचता है, जो मानसिक दुःखसे शून्य और शारीरिक दुःखसे भी रहित है। वहाँ जाकर वह विद्वान् उपासक ब्रह्माके अनेकों कल्पों तक निवास करता है॥ १॥

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ब्रह्मण ११ ] विद्याविनोद भाव्य ३०७

एकादश ब्राह्म

इसके अनन्तर अनायास यानी यदच्छासे होनेवाले उवरादिकोंके कारणभूत जो तीन अनात्म पदार्थ हैं, उनकी उपासनाकी सफलताके विषयमें कहा जाता है, यथा- एतद्वै परमं तपो यद्चाहितस्तप्यते परम & हैव लोकं जयति य एवं वेदैतद्वै परमं तपो यं प्रतमरण्य थ हरन्ति परम हैव लोकं जयति य एवं वेदैतद्वै परमं तपो यं प्रतमयनावभ्यादधति परम थ हैव लोकं जयति य एवं वेद ।। १ ।। भावार्थ-जो रोगग्रस्त मनुष्यको ताप होता है-निश्चय ही वह 'परम तप' है। ऐसा जाननेवाला परम लोकको ही जीत लेता है। मृतक पुरुषको जंगलमें ले जाना यह भी निश्चय ही परम तप है, जो ऐसा जानता है वह परम लोकको जीत लेता है। मरे हुए मनुष्यको चितामें रखना भी अवश्य ही परम तप है, ऐसा जानने- वाला भी परमके ऊपर विजय पा लेता है।। १॥। वि० वि० भाष्य-ज्वरादि व्याघिसे अस्त हुआ पुरुष जो तपता है वह परमतप है, ऐसा चिन्तन करना चाहिए तप और ताप इनमें समान ही क्लेश है। इस प्रकार चिन्तन करनेवाले उस विद्वान् का, जो कि स्वतः प्राप्त हुए रोगा- दिकी निन्दा नहीं करता तथा उससे विषाद को प्राप्त नहीं होता, वही तप कर्म- क्षयका हेतु हो जाता है। जो इस प्रकार जानता है वही उस विज्ञानरूप तपके द्वारा पापोंको दुग्ध करके परम लोक पर विजय प्राप्त कर लेता है। इसी प्रकार मरणासन्न पुरुष पहले ही कल्पना करता है कि मर जाने पर मुझे ऋत्विग्गण अन्त्येष्टि कर्मके लिए जो आमसे वनमें ले जायँगे, वह निश्चय ही तप होगा। यानी ग्रामसे वनगमनमें समानता होनेके कारण वह परम तप होगा। यह तो प्रसिद्ध ही है कि गमसे वनमें जाना परम तप है, जो ऐसा जानना है वह अवश्य ही परम लोक को जीत लेता है, यानी उसे मरनेमें कष्ट अनुभव नहीं होता। इसी प्रकार मृतकको सब ओरसे अग्निमें रखना, यह उसके लिए परम तप है,

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३०८ पृहदारण्यकापनिषद् [अष्याय ५

क्योकि अग्निप्रवेशमे इसकी उससे समानता है। ऐमा जाननेनाला भी अवश्य परलोकविजयी होता है, यानी मरनेवाला जानता है कि मरनेके वाद यह मेरा शरौर पव्चाग्भि आदि धूनियोमे तपनेवाले साधु की तरह अग्नि मे तप करेगा। इस उपर्युक्त अखिल सन्दर्भ का तात्पर्य यह है कि ज्यरादि रोगोसे सन्तप् होकर अनेक प्रकारके दुखका भोगना परम तप है, अर्थान् मनुष्यको उचित है कि अब ज्वरादिकोसे किसी प्रकारकी पीडा प्राप्त हा तो बडी धीरतासे उसको सहन करे, ऐसा तितितु पुरुष उत्तम लोकको प्राप्त होता है। या यो समझो कि सहनशील पुरुष किसी प्रकारके क्लेशसे सन्तप्र नहीं होता, वह अपने जीवनमे मृत्युके दुख को भी तुच्छ जानकर अपने कर्तव्य पर दढ रहता है॥१॥

द्ादश ब्राह्मय

इसरके अनन्तर फिर अन्न तथा प्राणोपाधिविशिष्ट वीरगुणयुक्त ब्रह्मकी ही उपासनाका विधान करनेके लिए युक्ति कथन करते हैं, यथा- अन्न ब्रह्मेत्येक आहुस्तन्न तथा पूयति वा अन्नमृते प्राणात्प्राणो ब्रह्मेत्येक आहुस्तन्न तथा शुष्यति वैप्राण ऋते- उन्नादेते ह त्वेव देवते एकधाभूयं भृत्वा परमतां गच्छत- स्तद्द स्माऽऽह प्रातृद: पितरं किध स्विदेवैवं विदुषे साधु कुर्या किमेवास्मा असाधु कुर्यामिति स ह स्माऽह पा- णिना मा प्रातृद कस्तवेनयोरेकधाभूयं भूत्वा परमतां गच्छतीति तस्मा उ हैतदुवाच वीत्यन्नं वै व्यन्ने हीमानि सर्वाणि भूतानि विष्टानि रमिति प्राणो वै रं प्राणे हीमानि सर्वाणि भूतानि रमन्ते सर्वाषि ह वा अस्मिन्भूतानि वि- शन्ति सर्वाणि भूतानि रमन्ते य एव वेद ॥ १ ॥ भावार्थ-कई आचार्यो का कहना है कि अन्न ही ब्रह्म है, सो ठीक नहीं है। क्योकि प्राणके विना अन्न सड जाना है, यानी प्राणगारी जीवोके भोगे विना

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भाशन १२ ] विद्याविनाद माध्य ३०६

निरर्थक पड़ा हुआ उपादेय नहीं रहता। कोई कहते हैं कि प्राण ब्रह्म है, किन्तु ऐसी बात नहीं है, क्योंकि अन्नके विना प्राण सूख जाता है। किन्तु ये दोनों देव एकरूपताको प्राप्त होकर परम भावको प्राप्त होते हैं। ऐसा विचार कर प्रातृद नामक ऋषिने अपने पिताके प्रति कहा कि हे पितः, इस प्रकार जानकर मैं किसीका क्या अच्छा करूँ अथवा क्या बुरा करूँ ? यानी किसीके प्रति शुभ अशुभ कौनसा कर्म करूँ? अथवा मैं कौनसा पक्ष ठीक समझूँ? अर्थात् जो अ्न्न तथा प्राणको पृथक पृथक समझता है वह पूजनीय होता है या नहीं ? क्योंकि कृतकृत्य हो जानेके कारण उसका न तो कोई शुभ किया जा सकता है और न अशुभ ही। तब उसके पिताने सत्कारपूर्वक पुत्रका हाथ पकड़कर कहा, अथवा हाथ हिलाकर निवारण करते हुए कहा-हे प्रातृद, ऐसा मत कहो, इन दोनोंकी एकताको प्राप्त होकर कौन परमताका लाभ कर सका है ? फिर पुत्रसे पिताने वि' ऐसा कहा। निश्चय करके अन्नका नाम 'वि' है, क्योंकि सब भूत 'वि' रूप क्षत्रमें ही प्रविष्ट हैं यानी इसीके द्वारा जीवित रहते हैं। 'रम्' यह प्राण है, क्योंकि 'रं' में अर्थान् प्राणमें ही ये सब भूत रमण करते हैं, यानी प्राणके बलसे ही सब प्राणी स्वच्छन्द विचरते हैं एवं जितने बलसाध्य काम हैं उनको सब कोई प्राणकी ही सामथ्यसे करते हैं। जो इस प्रकार अन्नको वि' तथा प्राणको 'रम्' जानकर दोनोंसे यथायोग्य लाभ उठाता है, या यों समझो कि जो सबके प्रति यथाधिकार अन्न वितरण तथा विभक्त करता है तथा परोपकारार्थ अपने बलको अर्पण करता है, उसके साथ सब प्राणी प्रेम करते हैं। उसके आश्रय या अधीन सब रहते हैं, यानी उसमें ये सब भूत प्रविष्ठ होते हैं तथा उसमें सभी भूत रमण करते हैं ।। १॥ वि० वि० भाष्य-किसी महापुरुषने कहा-अन्न ब्रह्म है, कौन अन्न, जो खाया जाता है। दूसरेने कहा-प्राण ब्रह्म है। अन्न ब्रह्म होता तो वह सड़ता गलता नहीं, उसमें दुर्गन्ध न आाने लगती। फिर वह ब्रह्म किस प्रकार है ? ब्रह्म तो वही हो सकता है जो अविन.शी है, इससे अन्न ब्रझ्म नहीं है, प्राण ब्रह्म है। प्राण भी ब्रह्म नहीं हो सकता वह अन्नके बिना सूख जाता है, वह बिना अन्नके अपनेको धारण करनेमें समर्थ ही नहीं हो सकता। अतः यह समझो कि इनमें एक एकका ब्रह्मत्व सम्भव नहीं है अतएव ये अन्न और प्राण दोनों एकरूप होकर परम भावको यानी ब्रह्मत्वको प्राप्त हो जाते हैं। ऐसा विचार प्रातृद ऋषिने अपने पितासे प्रवट किया कि मैंने जिस प्रकार ब्रह्मकी कल्पना की है उस प्रकार जाननेवालेका मैं क्या साधु करूँ ? यानी पूजा करूँ

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३१० शृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ५

या न करूँ ? तात्पर्य यह है कि वह तो कृतकृत्य है, ऐसा जाननेवाला पण्डित पुरुष अशुभ करनेसे खण्डित नही होता न शुभ करनेसे मण्डित ही होता है। पिताने हाथके संकेतसे उससे कहा-नहीं ऐसा मत समझ, यानी इन अन्न और प्राणकी एकरूपताको प्राप्त होकर कौन परम भाव प्राप्त कर सकता है ? इस ब्रह्मदर्शनके द्वारा कोई भी विद्वान् परम भावको प्राप्त नहीं कर सकता। इस लिए तुहें ऐसे किसीको कृतकृत्य नहीं कहना चाहिए। यह सुन पुत्रने कहा-तब आप ही बताइए किस प्रकार परम भाव प्राप्त होता है ? तब उसके पिताने यह कहा-'वि' तथा 'रम्' इनमें अन्न ही 'वि' है और 'रम्' ही प्राण है। अन्न समस्त भूतोंके आश्रय गुणवाला है और प्राण सम्पूर्ण प्राणियोंके रतिरूप गुणवाला है। जो मनुष्य अन्नके आश्रय गुणवाला है उसके सब भूत आश्रय हो जाते हैं और जो प्राणके रति गुणवाला है उसमें सब भूत रमण करते हैं। इस प्रकार जाननेवाले उपासकको यह फल होता है। १ ॥

त्रयोदश ब्राह्मण

हैं, यथा- अब प्राणका महत्त्व कथन करते हुए प्रथम उसको उक्थरूपसे वर्णन करते

उक्थं प्राणो वा उक्थं प्राणो हीदथ सर्वमुत्थापयत्यु- द्धास्मादुक्थविद्वीरस्तिष्ठत्युक्थस्य सायुज्यथ सलोकर्ता जयति य एवं वेद ॥ १ ॥ भावार्थ-उक्थ निश्चय करके प्राग है, इस प्रकार उपासना करे। प्राण ही उक्थ है, क्योंकि सभी चराचरका उठानेवाला प्राण ही है। ऐसी उपासना करने- वालेको उक्थका ज्ञाता पुत्र प्राप्त होता है। जो ऐसी उपासना करता है, वह प्राणके सायुज्य और सालोक्यको प्राप्त करता है॥ १ ॥ वि• वि० भाष्य-उक्थ शस्त्र है, वही महात्रत क्रतुमें प्रधान है, प्राण ही उक्थ है। प्राण इन्द्रियोंमें प्रधान है और उक्थ शस्त्रोंमें प्रधान है। ऐसी उपासना करे कि प्राण उक्थ है। प्राणद्दीन कोई भी उठ नही सकता, अतः उठानेके कारण प्राण उक्थ है।। १ ।।

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भाकन १३ J विद्यानोद भाष्य ३११

अब प्राणको यजुःरूप कथन करते हैं, यथा- यजुः प्राणो वै यजुः प्राणे हीमानि सर्वाणि भूतानि युज्यन्ते युज्यन्ते हास्मै सर्वाणि भूतानि श्रैष्ठ्याय यजुषः सायुज्य सलोकतां जयति य एवं वेद ॥ २ ॥ भावार्थ-इस प्रकार यजुः प्राणकी उपासना करे-सब भूतोंका प्राणमें ही योग होनेके कारण प्राण ही यजुः है यानी यजुः नाम दूसरेसे सम्बन्ध करानेवाला है। क्योंकि प्राणकी श्रेष्ठताके कारण इसमें सम्पूर्ण भूत संयुक्त होते हैं। जो ऐसी उपासना करता है वह यजुः के सायुज्य तथा सालोक्यको प्राप्त होता है॥२।। अब प्राणको सामरूप कथन करते हैं, यथा- साम प्राणो वै साम प्राणे हीमानि सर्वाणि भूतानि सम्यश्चि सम्यश्चि हास्मै सर्वाणि भूतानि श्रैष्ठयाय कल्पन्ते साम्नः सायुज्य ६ सलोकतां जयति य एवं वेद ॥ ३ ॥ भावार्थ-निश्चय करके साम ही प्राण है, 'साम' इस प्रकारकी उपासना करे, क्योंकि प्राणमें ही सब भूत मिलते हैं यानी सम्मिलिस-सुसंगठित होते हैं। जो इस प्रकार उपासना करता है वह सामके सायुज्य तथा सालोक्यको प्राप्त होता है।। ३ ।। वि. वि० भाष्य-प्राण ही साम है, क्योंकि प्राणमें ही सब भूत संगत होते हैं, सङ्गमन यानी साम्य प्राप्तिके कारण प्राण साम है। सम्पूर्ण भूत इसके ज्ञाताके साथ संगत हो जाते हैं, केवल संगत ही नहीं होते उसके श्रेष्ठ भावके लिए भी समर्थ होते हैं ।। ३ । अब प्राणको कात्ररूपसे कथन करते हैं, यथा- क्षत्रं प्राणो वै क्षत्रं प्राणो हि वै क्षत्रं त्रायते हैनं प्राणः क्षणितोः प्र क्त्रमत्रमान्नोति क्षत्रस्य सायुज्य 2 सलोकतां जयति य एवं वेद ॥४ ॥ भावार्थ-निश्चय करके प्राण क्षत्र है, इस प्रकार उपासना करे। प्राण ही क्षत्र है, यह प्रसिद्ध है। प्राण शस्त्रके घावसे इस देहकी रक्षा करता है। 'अत्रम्'

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३१२ ृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय ५

यानी यह प्राण किसीसे रक्षा न पानेवाले क्षत्रको प्राप्त होता है। जो ऐसी उपासना करता है वह क्षत्रके सायुज्य तथा सालक्यको विज्य कर लेना दै॥४ ॥ वि• वि० भाष्य-यह प्रसिद्व है कि प्राण ही क्षत्र है, यह प्रसिद्धि इस लिए है कि प्राण क्षतसे यानी शस्त्रादिकी पीडासे शरीरकी रक्षा करता है, याने उसमे हानेवाले घावको फिर माससे भर देता है। अत कतसे रक्षा करनेके कारण प्राणका क्षत्रत्त्र प्रसिद्ध है। यह गाण अन्र' है, क्योकि इसका किसी दूसरेसे त्राण नहीं किया जा सकना, यह प्राण अन्न [त्राणहीन] क्षत्र है। इसकी उपासना करनेवाला उस अन क्षत्ररूप प्राणका प्राप्त होता है। भाव यह है कि प्राण ही क्षत्र यानी क्षत्रिय जातिका बल है, क्योकि प्राणको सामर्थ्यसे ही क्षत्रिय लोग धर्मकी रक्षा करते हैं। अर्थान् प्राण ही सब प्रकारकी क्षतिसे बचानेवाला है, जो महाप्राण हैं वे श्रेष्ठ हैं और जो अल्पप्राण है वे निकृष्ठ है। यानी जिसके प्राणमे ओज है, जो साहसी है, वह साहस भी जिसका दूसरेकी रक्षा करनेके लिए है, वह क्षत्रधर्मा वलम्बी है। प्राणायामकी विद्यासे योगी लोग मृत्युको जीत लेते हैं, जिन्होने प्राण व शक्तिको अपनाया-बढाया, वे सब कुछ कर गये। आजकलके साधारण लोग सभी कुछ त्याग कर एव अनेको अनर्थ करके भी अपने प्राण बचाना चाहते हैं, पर वे सफलता प्राप्त करनेमे विफल रहते हैं। इसका कारण क्या है? उत्तर यह है कि मनुष्य प्राणको क्षत्र नहीं बनाते, यानी दढ नही करते, जिससे शरीर के क्षतको- आघातको बचा सके। प्राणमे दढता कैसे आवेगी, उसका क्या साधन है, वह कहा कैसे तथा कब मिल सकता है? इत्यादि और भी अनेक जटिल प्रश्नोका उत्तर उपनिषदोमें तथा सन्तोके सत्सङ्गमे ही मिलता है॥४॥

चतुर्दश ब्राह्मण

हृदय आादि अनेक उपाधियोसे विशिष्ट ब्रह्मकी नपासना कही गई है, अब आगे गायत्रीरूप उपाघिसे विशिष्ट ब्रह्मकी उपासना कहते हैं, यथा- भूमिरन्तरिनं दयौरित्य ष्टावक्षराण्यष्टाक्षरथ ह वा एकं गायत्र्यै पदमेतदु हैवास्या एतत्स यावदेषु त्रिषु लोकेषु तावद्द जयति योऽस्या एतदेवं पदं वेद ॥ १ ॥

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भाकन १४ ] विदाविनोद भाष्य ३१३

भावार्थ-जैसे भूमि, अन्तरिक्ष तथा दयौ ये तीन पद आठ अक्षरोंके हैं, वैसे ही गायत्रीका एक पाद आठ अक्षरोंवाला है। ये ही इस गायत्रीके प्रथम पाद हैं। इसके इस पादको जो इस प्रकार जानता है वह इस त्रिलोकीमें जो भी कुछ है उस सबको विजय कर लेता है।। १।। वि० वि० भाष्य-यहाँ यह समझ लेना चाहिए कि गायत्री प्राणरक्षाका मुख्य साधन है। भूमि, अन्तरिक्ष और द्यौ (दियौ), इनमें आठ अक्षर हैं, और 'तत्सवितुर्व रेण्यम् (णियम्)' गायत्री मन्त्रके इस प्रथम पादमें भी आठ ही अक्षर हैं। जो उपासक इस प्रकार पद्साम्य विज्ञानको जानता है वह सर्वजित् सिंह हो जाता है। समग्र छन्दोंमें गायत्री छन्द ही प्रधान है, उसका प्रयोग करनेवाले गयका त्राण करनेके कारण वह गायत्री है। अन्य छन्दोमें अपने प्रयोक्ताके प्राणोंकी रक्षा करनेका सामर्थ्य नहीं है। किन्तु यह प्राणकी स्वरूपभूत है, और प्राण सम्पूर्ण छन्दोंका आत्मा है तथा कषतसे त्राण करनेके कारण प्राण क्षत्र है यह पहले कहा गया है। प्राण ही गायत्री है अतः उसकी उपासनाका विधान करना अभ.ष्ट है। इसके अतिरिक्त यह भी बात है कि यह गायत्री द्विजोत्तम जन्मका कारण है, द्विजो- चमका द्वितीय जन्म गायत्रीके कारण है, क्योंकि 'गायत्रीसे ब्राह्मणको रचा, त्रिष्टुपूसे क्षत्रियको और जगतीसे वैश्यको' ऐसा श्रुतिमें कहा है। अतएव गायत्री प्रधान है। अनेक श्रुतियोंमें ब्राह्मणका उत्तम पुरुषार्थसे सम्बन्ध प्रदशित किया है, और वह ब्राह्मणत्व गायत्रीजन्ममूलक है। जो गायत्री द्वारा रचा हुआ द्विजश्रेष्ठ है, उसीका उत्तम पुरुषार्थ साधनमें अधिकार है अतः परम पुरुषार्थका सम्बन्ध गायत्रीमूलक है। इस लिए उसकी उपासनाका विधान करनेके लिए प्रकृत श्रुतिका अवतार है। गायत्रीमन्त्रमें प्राधान्येन बुद्धिको शुभकर्मोंमें प्ररणा करनेकी प्रार्थना की गई है। जिनकी बुद्धि शुभकामोमें ही लगती है, अशुभोंमें नहीं, उनकी प्राणनशक्ति (जीवनसामर्थ्य) बढ जाती है। सद्बुद्धि ही दानवसे मानव बनाकर उसे पहाड़ों की चट्टानके समान दृढ़ बना देती है। सद्बुद्धिवाला पुरुष सदाचारी होता है. सदा- चार दीर्घ एवं सुखी जीवनका हेतु है ॥ १ ॥ ऋचो यजू षि सामानी यष्टावत्तराण्यष्टाक्षरथ ह वा एकं गायत्र्यै पद्मेतदु हैवास्या एतर्स यावतीयं त्रयी विद्या तावद्ध जयति योऽस्या एतदेवं पदं वेद ॥ २ ॥ ४०

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३१४ बृहदारण्यकोपनिषद् [अब्याय ५

भावार्थ-'ऋचः, यजूंषि, सामानि' इन तीनों का योग करनेसे आठ अक्षर होते हैं। गायत्रीका द्वितीय पाद भी आठ अक्षरोंवाला है। यही इम गायत्रीका द्वितीय पाद है, जो इस प्रकार इसके इस चरणका ज्ञाता है, वह समी त्रयी विद्याको जीत लेता है॥ २॥ वि. वि० भाष्य-जिस प्रकार 'ऋचः, यजूंषि, सामानि' इन तीनों वेदोंके वाचक तीन पदोंके अक्षरोंका योग करनेमे आठ होते हैं, उसी प्रकार 'भर्गो देवस्य धीमहि' यह गायत्री मन्त्रका दूसरा पाद भी आठ अक्षरोंवाला है। अर्थात् जो गायत्रीके इस दूसरे पादको भली प्रकार जानता है वह तीनों वेदोंसे होनेवाले फल का उपार्जन करता है। कोई कहते हैं कि जो गायत्रीके इस दूसरे पादका जप करता है, वह सब वेदोंके ज्ञानसे परिचित हो जाता है॥२॥ अब गायत्रीके तृतीय पादमें उभय प्रकारके जगत्को धारण करनेवाली प्राणादिरूपता है, इसका वर्णन करते हैं, यथा- प्राणो ऽपानो व्यान इत्यष्टावक्षराण्यष्टाक्षर थ ह वा एक गायत्र्यौ पदमेतदु हैवास्या एतत्स यावदिदं प्राणि तावद्द जयति योऽस्या एतदेवं पदं वेदाथास्या एतदेव तुरीयं दर्शतं पदं परोरजा य एष तपति यद्दै चतुर्थं तत्तुरीयं दर्शतं पदमिति दद्दश इव ह्येष परोरजा इति सर्वमु ह्येनैष रज उपर्युपरि तपत्येव हैव श्रिया यशसा तपति योऽ- स्या एतदेवं पदं वेद ॥ ३ ॥ भावार्थ-'प्राण, अपान, व्यान (वियान)' ये आठ अक्षर हैं, और यह गायत्रीका तृतीय पाद भी आठ अक्षरोंवाला है, यह प्राणादि ही इस गायत्रीका तृतीय पाद है। जो मनुष्य इस प्रकार गायत्रीके इस पादको जानता है, वह जितना भी प्राणिसमूह है सबको जीत लेता है। तथा यह जो तपता है, वही इसका 'तुरीय, दर्शत, परोरजा पद' है, चौथेको ही तुरीय कहते हैं। 'दर्शतं पदम्' मानो यह दीखता है, यह कौन? आदित्यमण्डलस्थ पुरुष। परोरजा का अर्थ है; रजोगुण तथा तत्कार्यसे रहित। अथवा रज नाम लोकका है, भाव यह हुआ कि यह सभी लोकोंके ऊपर रहकर प्रकाशमान हो रहा है। जो गायत्रीके इस चतुर्थ

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माशण १४ ] विद्याविनोद भाष्य ३१५

पद्को इस प्रकार जानता है, वह इसी प्रकार शोभा तथा कीतिसे प्रकाशित होता है॥। ३ ।।

वि० वि. भाष्य-प्राण, अपान, व्यान [वियान ]' इन प्राणवाची आठ अक्षरोंके समान ही धियो यो न. प्रचोदयात्' यह गायत्रीका तृतीय पाद भी आठ अक्षरोंवाला है। आगे शब्दात्मिका त्रिपदा गायत्रीका अभिधेयभूत चतुर्थ पाद भी कहा है। यह जो तपता है, वही इस प्रकृत गायत्रीका आगे कहा जानेवाला 'तुरीय दर्शत परोरजा' पाद है। यहाँ 'चतुर्थ' से वही अर्थ लेना जो उसका लोक- प्रसिद्ध है। 'दर्शतं पदम्' इसका अर्थ 'यह मण्डलारन्तगत पुरुष दीखता-सा है' यह है। 'परोरजा' का अर्थ है कि वह मण्डलस्थ पुरुष सम्पूर्ण रजःसमूहको यानी घतुर्दिक् आधिपत्यभावसे सम्पूर्ण लोकरूप रजःसमूहको प्रकाशित करता है। जो फल है वह पहले कहा ही गया है। यानी जो इस प्रकार गायत्रीके महत्त्व को जानता है वह श्रीमान् तथा यशस्त्री होता है॥ ३ ॥ इस प्रकार अभिधान और अभिधेयरूपा गायत्रीको कहकर अब 'अभिधान (शब्द ) अभिधेय (अर्थ) के अवीन है' यह कहते हैं, यथा- सैषा गायत्र्येतस्मिथस्तुरीये दर्शते पदे परोरजसि प्रतिष्ठिता तद्वै तत्सत्ये प्रतिष्ठितं चक्षुवै सत्यं चच्तुर्हि वै सत्यं तस्माद्यदिदानीं द्वौ विवदमानावेयातामहम दर्शमहम- श्रषमिति य एवं ब्रयादहमदर्शमिति तस्मा एव श्रद्द- ध्याम तद्वै तत्सत्यं बले प्रतिष्ठितं प्राणो वै बलं तस्प्राे प्रतिष्ठितं तस्मादाहुर्बल सत्यादोगीय इत्येवम्वेषा गायत्र्यध्यात्मं प्रतिष्ठिता सा हैषा गयाथस्तत्रे प्राणा वै गयास्तत्प्राणाथस्तत्रे तद्यद्गयाथस्तत्रे तस्मादुगायत्री नाम स यामेवामू सावित्रीमन्वाहैषैव सास यस्मा अन्वाह तस्य प्राणाथस्त्ायते ॥४ ॥ भावार्थ-यह प्रसिद्ध गायत्री इस चतुर्थ दर्शत परोरजा पदमें स्थित है, वह पद् सत्यमें स्थित है। नेत्र सत्य है, यह प्रसिद्ध है कि चन्ु ही सत्य है। अत

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एव दो मनुष्योमें झगड़ा हो जाय और वे यह कहते हुए आवें कि मैंने देखा है, तथा मैंने सुना है, तो हमे उसीका विश्वास होगा जो यह कह रहा होगा कि 'मैंने देखा है'। वह सत्य जो तुरीय पादका आश्रयरूप है बलमें प्रतिष्ठित है। प्राण ही बल है। वह सत्य प्राणमें स्थित है। इसीसे कहा जाता है कि सत्यकी अपेक्षा बलमें ओज- स्विता है। इख तरह यह गायत्री अध्यात्म प्राणमें स्थित है। उस गायत्रीने वागादि प्राणरूप गयोका त्राण (रक्षा) किया था। ये प्राण ही गय हैं। इन प्राणोंका इसने त्राण किया था। इसीसे इसका नाम गायत्री पड़ा कि इसने गयोंका त्राण किया था। उपनयनके समय आठ वर्षके बटुकको आचार्यने जिस सावित्रीका उपदेश दिया था वह यही है। वह जिस जिसको इसका उपदेश करता है यह उसके प्राणों- की रक्षा करती है ॥ ४ ॥ वि० वि० भाष्य-आदित्य जगत्का सार है, मूर्तामूर्तात्मक जगद्रूप त्रिपदा गायत्री तीनों पादोके सहित आदित्यमें प्रतिष्ठित है। इसलिए गायत्री सरस है। प्राण और वागादि इन्द्रियोका नाम गय है, उनकी रक्षा करनेवालीको गायत्री कहते हैं। भाव यह हुआ कि जो मनुष्य अहर्निश गायत्रीका जप करते हैं उनकी इन्द्रियाँ पापोंसे लिपायमान नही होती। उपनयन कराकर आचार्य जिस गायत्रीके एक पाद, अर्द्ध, सम्पूर्ण अथवा एक अक्षरका उपदेश करता है, उसे गायत्री कहते हैं। क्योंकि सविता (जो सबकी उत्पत्ति करता है) इसका देवता है। वह उन सब शिष्योंकी रक्षा करता है जो गायत्री मन्त्रसे दीक्षित हुए हैं ॥ ४॥। मतान्तरमें दोप दिखाते हुए गायत्री सावित्रीकी विशेषता दिखाते हैं, यथा- ताथ हैतामेके सावित्रीमनुष्टभमन्वाहुर्वागनुष्टबेत- द्वाचमनुबूम इति न तथा कुर्यादगायत्रीमेव सावित्रीमनु- ब्रूयाद्यदिह वा अप्येवंविदबह्निव प्रतिगह्लाति न हैव तदगा- यत्र्या एकंचन पदं प्रति ॥ ५ ॥ भावार्थ-किसी शाखावाले आचार्य उपनयनोत्तरकालमें अनुष्ठुपछ्वन्दवाली सावित्रीका उपदेश करते हैं। उनका कथन है कि वाक अनुष्टुप है, इसीलिए हम वाकका ही उपदेश करते हैं। पर ऐसा करना ठीक नही, उचित तो गायत्री छन्द- वाली सावित्रीका ही उपदेश है, यानी इसीका उपदेश करे। ऐसा समझनेवाला चाहे जितना भी ले तो वह गायत्री के एक पदके समान भी नही हो सकता ॥५॥

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भाकन १४ ] विद्याविनोद भाष्य ३१७

वि० वि० भाष्य-कई आचार्योंका कथन है कि यज्ञोपवीत संस्कारके अनन्तर ब्रह्मचारीके प्रति अनुष्ठुपछन्द द्वारा ही सावित्रीका उपदेश करना चाहिए, क्योंकि अनुष्टुप् वाणीका स्वरूप है। यानी वे लोग गायत्री न्दवाली सावित्रीका उपदेश न करके अनुष्टुपछन्दकी सावित्रीका उपदेश करना ही स्त्रमतानुसार उचित समझते हैं। किन्तु ऐसा नहीं करना चाहिए, क्योकि गायत्री सब छन्दोंमें मुख्य है, मुख्यके रहते अमुख्य नहीं लिया जाता। अतएव गायत्रीछन्द द्वारा ही सावित्रीका उपदेश करना चाहिए। जो इस प्रकार गायत्रीके रहस्यको जानता है वह बहुत प्रतिग्रह यानी दान लेनेपर भी प्रतिग्रह्जन्य दोषका भागी नहीं होता। तात्पर्य यह है कि शिष्य गायत्रीके उपवेष्टा आचार्यके प्रति चाहे जितना भी धन दे, सर्वस्व ही क्यों न अर्पण कर दे, तो भी वह दान गायत्रीके एक पाद क्या, एक अक्षरके उंपदेशके लिए भी पर्याप्त नहीं है, यानी एक मात्राके तुल्य भी नहीं है। ऐसे महत्त्व- विशिष्ट तत्त्वका उपदेश देनेवाला दान लेकर दोषभागी हो जाय, यह कथा ही अनोखी है। अनुष्टुप चार पादोंका होता है और गायत्रोछन्द तीन पादोंका। दोनोंके पाद आठ आठ अक्षरके होते हैं। अनु्ठुपछन्दमें उपलब्ध मन्त्र के देवता भी सविता है, इसीसे यह मतभेद सा है॥५॥ अब उक्त अर्थमें और विशेषता कथन करते हैं, यथा-

एतस्प्रथमं पदमाप्नुयादथ यावतीयं त्रयी विद्या यस्ता- वत्प्रतिएह्लीयात्सोऽस्था एतदुद्वितीयं पदमाप्नुयादथ याव- दिदं प्राणि यस्तावत्प्रतिशह्वीयात्सोऽस्या एतन्तृतीयं पद- माप्नुयादथास्या एतदेव तुरीयं दर्शतं पदं परोरजा य एष तपति नैव केनचनाऽडव्यं कुत उ एतावत्प्रति- गृह्णीयात् ॥ ६ ॥ भावार्थ-वह गायत्रीका वेत्ता धन-धान्यपूर्ण इन भूरादि तीनों लोकोंका प्रतिग्रह कर ले तो वह उस गायत्रीके प्रथम पादको ही व्याप्त करता है। यानी यदि गायत्रीका तत्त्ववेत्ता आचार्य विविध पदार्थोंसे त्रिलोकीको गुरुदृत्तिणामें ग्रहण करे तो वह गायत्रीके प्रथम पादसम्जन्वी विज्ञानके फलके समान ही है।

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३१८ बृहदारण्यकोपनषद् [अध्याय ५.

इससे गायत्रीके प्रथम पादका फल ही खच होता है, अधिक दोष नहीं होता। बहुत होगा तो यह हो जायगा कि गायत्रीके प्रथम पादका फल ही खर्च हो जायगा और अधिक दोष नही होगा। जितनी यह त्रयी विद्या है उसका जो प्रतिग्रह करता है वह इसके इस द्वितीय पादको व्याप्त करता है. यानी इससे गायत्रीके दूसरे पादका फल व्यय हो जा सकता है। इसी प्रकार ये जितने भी प्राणी हैं, उनका जो ग्रहण करता है यानी उनका दानादि लेता है, वह प्रतिग्रहण इसके तृतीय पादको व्याप्त करता है। यही इसका दर्शत परोरजा पद है यह जो प्रकाशमान है यानी तपता है। उसे कोई नहीं प्राप्त कर सकता, यानी वह किसीके द्वारा प्राप्य नहीं है, क्योंकि इतना परिग्रह कोई कर कहाँसे सकता है ? यानी गुरूपदेश द्वारा गायत्रीके चतुर्थ पादके उपदेशसे जिस शिष्यका परमलाभ हुआ है उसके बदले शिष्यके पास कोई पदार्थ है ही नहीं, जिसको वह भेट दे सके। अतः सर्वोत्कृष्ट गायत्री है। ६।। वि० वि० भाष्य-जो गायत्रीका उपासक इन गो, अश्व आदि धनसे पूर्ण भूर्लोकादि तीन लोकोंका दान अङ्गीकार करता है वह 'दान लेना' गायत्रीके इस प्रथम पादको, जिसकी कि व्याख्या की गई है, व्याप्त करता है। यानी उसके द्वारा केवल प्रथम पादके विज्ञानका फल भोगा जाता है। यह प्रतिग्रह इससे अधिक दोष उत्पन्न करनेवाला नहीं है। यह जितनी भी त्रयी विद्या है उसका प्रतिग्रह करके इस द्वितीय पादको ही व्याप्त करता है, यानी उसके द्वारा द्वितीय पादके विज्ञानका फल ही भोगा जाता है। एवं जितने ये भ्राणी हैं उनके बराबर जो प्रतिग्रह करता है वह प्रतिग्रह इसके तृतीय पादको ही व्याप्त करता है। उसके द्वारा तृतीय पादके विज्ञानका फल ही भोगा जाता है। यह गायत्रीकी उपासनाकी स्तुतिके लिए कहा गया है। यह जो तपता है, यही इसका चौथा दर्शत परोरजा पाद है, यह किसी भी प्रतिग्रहके द्वारा प्राप्तव्य नहीं है, जैसे कि पूर्वोक्त तीन पाद हैं। ऐसी गायत्री सदा उपास्य है।। ६ ।। उक्त विज्ञानका संग्राहक जो मन्त्र है वह ऐहिक आदि फलोंका भी साधक है, ऐसा कहनेके लिए प्रस्ताव करते हैं, यथा- तस्या उपस्थानं गायत्र्यस्येकपदी द्विपदी त्रिपदी चतुष्पद्यपदसि न हि पद्यसे। नमस्ते तुरीयाय दर्शताय पदाय परोरजसेSसावदो मा प्रापदिति यं द्विष्यादसावस्मै

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ब्राश्मण १४ ] ववद्याविनोद भाष्य

कामो मा समृद्धीति वा न हैवास्मै स काम: समृध्यते यस्मा एवमुपतिष्ठतेऽहमदः प्रापमिति वा ॥ ७॥ भावार्थ-हे गायत्रि, आप एकपदी हैं, दविपदी हैं, त्रिपदी हैं तथा चतुष्पदी हैं। आप अपद हैं, क्योंकि किसी इन्द्रियका विषय नहीं हैं, यानी जानी नहीं जातीं। अतः आपके तुरीय रूपको नमस्कार है, दर्शनीय स्वरूपको अभिवादन है, आपके सर्वलोकोंसे ऊपर विराजमान स्वरूपको प्रणाम है, और आपके व्यवहारके अविषय- भूत तत्त्वको वन्दन है। ऐसी कृपा करो कि यह पापरूपो शत्रु विन्नकरणरूप कार्यमें सफल न हो। उसकी कामना सफल न हो' ऐसा कहकर यह ज्ञाता जिससे द्वेष करता हो उसके प्रति उपस्थान करे। जिसके लिए इस प्रकार उपस्थान किया जाता है उसकी इच्छा सफल नहीं होती। अथवा यह भी है कि 'मुझे यह पदार्थ प्राप्त हो 'जाय' ऐसी अभिलाषासे उपस्थान करे। यह गायत्र का उपस्थान है॥७॥ वि० वि० भाष्य-विद्वान् कहता है कि हे गायत्रि, आप पूर्वोक्त प्रकारसे तीन लोकरूपी प्रथम पाद द्वारा एकपदी हैं, अर्थात् यह चराचर प्राणियोंका निवास- भूत ब्रह्माण्ड आपके एकदेशमें है। आप वेदत्रयीरूप द्वितीय पादसे द्विपदी हैं, अर्थान् वेदोंकी प्रकाशक है। आप ही प्राणापानव्यानरूप तीसरे पादसे त्रिपदी हैं, यानी वागादि समस्त इन्द्रियोंकी अधिष्ठात्री होनेसे त्रिपदी हैं। तथा आप चतुर्थ पाद होनेसे चतुष्पदी हैं यानी सूर्यमण्डलकी नियामिका होनेके कारण चतुष्पदी हैं। इस प्रकार उपासकोंसे चार पादोंवाली जानी गई हैं। आप अपने सर्वोत्तम निरुपाधिक स्व्ररूपसे अपद हैं, क्योंकि आपका कोई पद नहीं है जिससे कि आपका ज्ञान हो। क्योंकि 'नेति नेति' स्वरूप होनेके कारण आपका ज्ञान नहीं होता। धतः व्यवहाराविषय, तुरीय, दर्शनीय तथा सवलोकोपरि विराजमान आपको प्रणाम है। यह पाप मेग बड़ा भारी शत्रु है, यह आपकी प्राप्तिमें विन्न करनेके कार्यमें समर्थ न हो। इस प्रकारसे गायत्रीमन्त्रका उपासक किसीका बुरा चाहे तो उसका अनिष्ट हो जाता है अथवा वह जो भी अपना भला करना चाहे तो ऐसा ही हो जाता है। इस मन्त्रके उपासकका ब्रह्मवर्चस बढ़ आाता है॥७॥ अब अन्तमें गायत्रीविज्ञानकी परिपूर्णताके लिए उखका अर्थाद कहा जाता है, यथा- एतद्द वै तज्जनको वैदेहो बुडिलमाश्वतराश्चिमुवाच

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३२० शृहदारण्यकोपनषद् [अध्याय ५

यन्न हो तद्गायत्रीविदबरूथा अथ कथथ हस्तीभूतो वह- सीति मुखय ह्यस्याः सम्राण्न विदांचकारेति होवाच तस्या अग्निरेव मुखं यदि ह वा अपि बह्निवान्नावभ्यादघति सर्वमेव तत्संदहत्येवथ हैवैवंविद्यद्यपि बह्निव पापं कुरुते सर्वमेव तत्संप्साय शुद्धः पूतोऽजरोऽमृतः संभवति ॥८॥ भावार्थ-अश्वतराश्वके पुत्र बुडिलसे विदेहजनकने कहा था कि हे बुडिल, तू जो अपनेको गायत्रीतत्ववित् कथन करता था, तो फफिर हाथी होकर बोझ क्यों ढो रहा है ? यानी प्रतिग्रह दोषसे हाथी बनकर मुझे क्यों वहन कर रहा है ? यह सुन उसने उत्तर दिया था कि हे सम्राट, मैं गायत्रीका मुख नहीं जानता था। यह प्रत्युत्तर सुनकर जनकने बताया कि इसका अग्नि ही मुख है। अग्निका स्वमाव है कि उसमें लोग चाहे जितना अधिक इन्घन रख दें तो वह उस सभीको दग्ध कर देता है। ऐसे ही ऐसा जाननेवाला गायत्री-उपासक बहुत सा पाप करता रहा हो, तो भी वह उन सबको भक्षण करके शुद्ध, पवित्र, अजर एवं अमर हो जाता है॥८॥ वि० वि० भाष्य-विदेह जनकने बुडिल नामसे प्रसिद्ध अश्वतराश्विसे कहा था कि अहो! तू जो कहता था कि मैं गायत्रीका ज्ञाता हूँ, सो तेरे वचनके विपरीत यह क्यों है या क्या हो रहा है ? तू यदि गायश्रीका ज्ञाता है तो प्रति- ग्रहण दोषके कारण हाथी बनकर बोझ क्यों ढो रहा है ? बुडिल बोला कि मैं गायत्री- का मुख नहीं जानता था। अतः एक अङ्गसे रहित होनेके कारण मेरा गायत्रीविज्ञान निष्फल हो गया। राजाने अग्निको उसका मुख बताया। भाव यह है कि इस मन्त्रमें जनकबुडिल आख्यायिकासे यह बोधन किया गया है कि जो मनुष्य गायत्री को अच्छी तरह जानकर उसका मनन करता है, वह सब पापोंसे रहित होकर अमृतपद्को प्रप्त होता है। गायत्री मन्त्रको शास्त्रो तथा विद्वानोंने बड़ी महिमा कथनकी है, यहाँ तक कहा गया है कि गायत्रीमन्त्रापासक चाहे जैसा प्रतिग्रह यानी दान ग्रहण कर ले, तो भी उसकी कोई हानि नहीं हो सरती। वेवल यही हो सकता है कि उसका गायत्री- के प्रथम पादसे प्राप्त हुआ पुण्य नष्ट हो सकता है, कदाचित् किसी दान लेनेसे डूखरे पादका अथवा बहुत हुआ तो तीसरे पादका पुण्य क्षीण हो सकता है, पर चदुर्थ पाद्जन्य पुण्य तो अक्षय है, संसारमें ऐसा प्रतिग्रह ही नहीं है जो उसके पुण्यपर

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अ् अय १५ ] वययावनोद भाष्य ३२१

असर पहुँचा सके। जो ब्राह्मणवर्ग सर्वपूज्य है, जिसका देवादि भी सम्मान करते हैं, यह गायत्री देवीका ही प्रभाव है। ब्राह्मणोंका इसीलिए सम्मान है कि वे गायत्री- का अनुष्ठान करते हैं और गायत्रीमें प्रतिपादिन शुभकामोंमें बुद्धिकी प्रेरणाको आच- रणमें लाते हैं यानी अपनी बुद्धिशक्तिको कभी भी कुमार्गमें नहीं जाने देते। सब अ्रन्थोंमें वेद प्रधान हैं, उनका सार गायत्री है, उससे जो लाभ चठाते हैं, उन्हें धन्य है, वे नमस्कार्य हैं-आर्य हैं-शिरोधार्य हैं।।८।।

पञ्चदश ब्राह्मा

ज्ञान-कमेसमुच्चयकारी अन्त समयमें आदित्यकी प्रार्थना करता है, यहाँ आदित्यका प्रसङ्ग है क्योंकि यह गायत्रीका तुर्य चर्ण है। प्रकरण भी उसके उप- स्थानका है, अतः उसीकी प्रार्थना की जाती है, यथा- हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं सुखम्। तत्त्त्वं पूष- न्नपावृणु सत्यधर्माय दष्टये। पूषन्नेकर्षे यम सूर्य प्राजापत्य व्यूह रश्मीन्समूह तेजो यत्ते रूपं कल्याणतमं तत्ते प- श्यामि। योऽसावसौ पुरुषः सो Sहमस्मि। वायुरनिलममृत- मथेदं भस्मान्तथ शरीरम्। ॐ क्रतो स्मर कृतथस्मर क्रतो स्मर कृतथस्मर। अग्ने नय सुपथा राये अस्मान्वि- श्वानि देव वयुनानि विद्वान्। युयोध्यस्मज्जुहुराणमेनो- भूयिष्ठां ते नमउक्तिं विधेम ॥। १ ॥ भावार्थ-सत्यसंक्षक ब्रक्मका सुख सुवर्णकी तरह प्रलोभन करनेवाले एष- णात्रयरूप पात्रसे ढका है। हे सम्पूर्ण ब्रह्माण्डके पोषक सूर्यदेव, आप उसको अपने सत्य स्वरूपके दर्शनार्थ खोल दें, यानी ऐसी कृपा करें जिससे हम लोग एषणाओोंसे निवृत् होकर आपके यथार्थ स्वरूपका दर्शन कर सकें। हे पूषन्! (पुष्टिकारक !) हे एकर्षे! (प्रधान ऋषे या सबके ज्ञातः !) हे यम ! (सबके नियन्तः !) हे सूर्यं! (सर्वोद्भासक, सर्वोत्पादक !) हे प्राजापत्य ! (सबके स्वामिन्!) अपनी किरणों ४१

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३२२ बृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय ५

को और तेजको समेट लीजिए अर्थात् आप उक्त हिरण्मय पात्रकी प्रलोभनरूप रश्मियोंको भली प्रकार उपसंहार करें जिससे कि आपका ओ कल्याण देनेवाला तेजोमय स्वरूप है हम उसका दर्शन कर सकें। यह जो पुरुष है जो कि आदित्य- मण्डलान्तर्गत है, वही मैं हूँ जो अमृतश्वरप हूँ। देहावसानके अनन्तर इस शरीरके अन्तर्गत जो प्राणवायु है वह इस बाह्यवायुको यानी महावायुको प्राप्त हो और यह शरीर भस्मसात होकर पृथिन में मिल जाय। हे प्रणवरूप तथा मनोमय क्रतुरूप अग्निदेव ! जो स्मरण करने योग्य है उसका स्मरण कर, मैने जो किया है उसका स्मरण कर। हे क्रतुरूप अभिहेव ! जो स्मरण करने योग्य है, उसका स्मरण कर, मैने जो किया है उसका स्मरण कर। हे अग्ने! तू हमें शुभ मागेसे ले जा, यानी देवयान मागसे ले चल जहाँ चलकर हम कर्मफलोंको भोग सकेंगे। हे देव! तू समस्त प्राणियोंके सभी पज्ञानोंको जानता है। हमारे उन पापोंको दूर कर दे जो. हमारे कल्याण मार्गमें आड़े आ रहे हैं, यानी जो पाप बड़े ही कुटिल हैं। हम बार- बार अभिवादन करते हैं॥ १॥ वि• वि० भाष्य-जैसे किसी पात्रसे कोई अपनी अमीष्ट व्तु ढक दी जाती है, उसी तरह यह सत्यसंज्ञक ब्रह्म मानो ज्योतिमेय मण्डलसे ढका हुआ है। क्योंकि जिनका चित्त समाहित नही है यानी स्थिर तथा विशुद्ध नहीं है उन पुरुषोंके लिए यह अदृटश्य है। हे भगवन् ! वह आपका दुर्दर्श स्वरूप मैं देखना चाहता हूँ। ऐसी विनम्र प्रार्थनाके साथ परलोकप्रयागोप्तु साधक निवेदन करता है कि शरीर- पात होनेपर मुझ अमृतरूप सत्यका जो प्राण है वह बाह्यवायुको प्राप्त हो जाय, तथा दूसरे देव अपने अपने मूलको प्राप्त हो जायँ और यह शरीर भस्म होकर परथिबीमें मिल जाय। इस मन्त्रमें मनमें स्थित अपने संकल्पभूत अग्नि देवताकी प्रार्थना की गई है, जैसे -ॐ शब्द और क्रतु यह शब्द सम्बोधनके लिए है। अग्नि ॐकाररूप प्रतीकेवाला होनेके कारण ॐ, तथा मनोमय होनेके कारण करतु है। हे ॐ ! ह क्रतो ! जो स्मरण करने योग्य है उसका स्मरण कर, अन्तकालमें तेरे स्मरणके अधीन ही इष्टगति प्राप्त की जाती है। अतः प्रार्थना है कि मैंने जो कुछ किया है उसे स्मरण कर। चुनरुक्ति आदसार्थ है। इस मन्त्रमें अग्निसे प्रार्थना की गई है कि वह मुझे दक्षिण यानी धूममागसे न ले जाय, किन्तु देवयानमार्गसे ही ले चले। मैं तेरी परिचर्या-सेवा करनेमें समर्थ नहीं हूँ, अतः अनेकों वार नमउकि है यानी नमस्कार- बचनोंका विधान है। अर्थात् और कुछ करनेमें असमर्थ होनेके कारण नमस्कारोक्ति द्वारा तेरी परिचर्या करता हूँ। इस मन्त्रकी पूरी व्याख्या ईशावास्योपनिषद्में की

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मखय १५ ] तिद्याविनोद आष्य ३२३

जा चुकी है। यह मन्त्र आजकलके व्यवहार पर भच्छा प्रकाश डालता है। आज- कल सचाईको, सच्चे व्यवहारको सोनेके आवरणने ढक रखा है। यानी रुपयेका बल ऐसा है कि उसने सच्चे लोगोंकी बातें जहाँ तहाँ जानेसे रोक रखी हैं। कोई चाहे कितना ही अनर्थ कर डाले. परवाह नहीं, हिरण्मयपात्र याने चाँदीके टुकड़े उसकी बुराईको कहीं भी बाहर जाने या फैलनेसे रोक लेंगे। राजाको रुपये देनेवाला सभी तरहकी सुविधाओंका पात्र है, अधिकारी पुरुपको सुवर्ण समर्पण करनेवाला वर्जितसे वर्जित कर्म करनेका अधिकारी हो जाता है। सोनेके पात्रने यानी द्रव्यने सचाईको दवा रखा है। इस मन्त्रसे विज्ञोने यही प्रार्थना की है कि घनसे सचाई छिप रही है, यदि वह आवरण दूर हो जाय तो मनुष्य सत्य प्रदीपके सहारेसे अपना कर्तव्य मार्ग देख लें। इस मन्त्रका आध्यात्मिक अर्थ पहले कहा ही है।१॥

पञ्चदश ब्राह्मणा और पश्चम अध्याय समाप्।

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अध्याय

प्रथम ब्राह्मण

पहले कह आये हैं कि प्राण गायत्री है, सो इसमें भी प्राणकी उत्कृष्टता है, वागादिकी नहीं। इस कारण प्राण ज्येष्ठ श्रेष्ठ है, वागादि इसके पात्र नहीं हैं। प्राणमें ही ज्येष्ठता-श्रेष्ठता क्यों है ? अगले ग्रन्थसे इसका निश्चय करते हैं, यथा- ॐ यो ह वै ज्येष्ठ च श्रेष्ठं च वेद ज्येष्टश् श्रेष्ठश् स्वानां भवति प्राणो वै ज्येश््श् अष्वश ज्येश्व्श् श्रेष्ठश्च स्वानां भवत्यपि च येषां बुभूषति य एवं वेद ॥ १ ॥ भावार्थ-जो कोई ज्येष्ठ और श्रेष्ठको जानता है वह अपने सम्बन्धियोंमें ज्येष्ठ तथा श्रेष्ठ होता है, यानी ऐसा होकर अपने ज्ञातिजनोंमें मान पाता है। प्राण ही ज्येष्ठ श्रेष्ठ हैं। जो ऐसी उपासना करता है वह अपने संबन्धियोंमें तथा औरोंमें भी ज्येष्ठ और श्रेष्ठ होता है। जिस प्रकार प्राण सब इन्द्रियोंको बल देनेसे श्रेष्ठ हैं, उसी प्रकार प्राणकी तरह सबकी सहायता करनेवाला पुरुष भी अपने सम्बन्धीवर्गमें सम्मानको प्राप्त होता है ॥ १ ॥ वि० वि० भाष्य-नाणकी ज्येष्ठता और श्रेष्ठता गर्भाधानके समय जानी जाती है। यद्यपि प्राण, इन्द्रिय, सभीका शुक्र और शोणितसे समान सम्बन्ध है तो भी बिना प्राणके शुक्रमें शरीरका अड्गुर नहीं होता। इसीसे चक्षु आदि इन्द्रियोंकी अपेक्षा प्राणको पहले वृत्तिलाभ होता है, अतः वायुके द्वारा प्राण श्रेष्ठ है। गर्भाधानके समयसे ही प्राण गर्भका पोषण करता है। प्राणके वृत्तियुक्त हो जानेके बाद चन्तु आदिको वृत्तिलाभ होता है। इस लिए चक्षु आादिकी अपेक्षा प्राण श्रेष्ठ है। जैसे अन्न पान भक्षण आदिके कारण नेत्र आदि इन्द्रियोंमें जो वृत्तिलाभ होता है उसका कारण

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विद्याबिनोइ भाष्य ३२५

होनेसे प्राण श्रेष्ठ है, वैसे ही अन्य प्राणियोंका जीवन प्राणोंकी उपासना करनेवालेके अधीन है, इसीखे वह श्रेष्ठ है, आयुके कारण कोई श्रेष्ठ नहीं है॥ १ ॥ इस समय प्राणके ही वसिष्ठत्व आदि पाँच गुण दिखानेके लिए पहले उनमेंसे प्रत्येकके क्रमसे वाक, त्वक, चछु, श्रोत्र, मन और रेतके गुण कहते हैं, यथा- यो ह वै वसिष्ठां वेद वसिछः स्वानां भवति चाग्वै वसिष्ठा वसिष्टः स्वानां भवत्यपि च येषां बुभूषति य एवं वेद॥ २ ॥। भावार्थ-जो वसिष्ठाको जानता है वह सगे सम्बन्धियोंमें वसिष्ठ होता है। जो ऐसी उपासना करता है, वह स्वजनों तथा दूसरोमें भी वसिष्ठ होता है॥ २॥ वि० वि० भाष्य-यह वाणी ही वसिष्ठा है, यह अतिशयरूपसे वसाती है क्योंकि जो वाग्मी होते हैं, यानी अच्छे बक्ता होते हैं, वे धनवान् होनेके कारण अच्छी तरह निवास करते हैं। वाक-कुशल लोग वाणीसे दूसरोंका पराभव कर देते हैं। जिसे यु्तियुक्त बोलना आता है, उसका सामना कोई नहीं कर सकता। वह सम्पत्तिवाला होकर आगमसे निवास करता है॥२॥ यो ह वै प्रतिष्ठां वेद प्रतितिष्ठति समे प्रतितिष्ठति दुर्गे चक्तुवैं प्रतिश चक्तुषा हि समे च दुर्गे च प्रतितिष्ठति प्रतितिष्ठति समे प्रतितिष्ठति दुर्गे य एवं वेद ॥ ३ ॥ भावार्थ-अवश्य ही चक्षु ही प्रतिष्ठा-श्रेष्ठ है। जो प्रतिष्ठाको जानता है वह सम देश कालमें प्रतिछ्वत होता है और उसी चक्षुसे विषम देशमें भी प्रतिष्ठित होता है। जो ऐसी उपासना करता है वह सम-दुर्गममें प्रतिष्ठित होता है॥ ३॥ वि० वि० भाष्य-जो गुणवती प्रष्ठिताको जानता है, वह शान्तिके समय भी तथा दुर्गम्य देश एवं दुर्भिक्ष आदि कालोमें भी प्रतिष्ठित होता है। यह नेत्र ही प्रतिष्ठा है. इसीसे निम्नोन्नत स्थान देखे जाते हैं॥ ३॥ यो ह वै संपदं वेद सथ हास्मै पद्यते यं काम कामयते श्रोत्रं वै संपच्छोत्रे हीमे सर्वे वेदा अभिसंपन्नाः सथ हास्मै पद्मले यं कामं कामयते य एवं वेद॥४ ॥

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३२६ [अध्याय व

भावार्थ-निश्चय करके श्रोत्र ही सम्पत् है यानी ऐश्वर्य देनेवाला है। वह जिस भोगकी इच्छा करता है वही उसे सम्यक प्रकारसे प्राप्त हो जाता है। श्रोत्रमें ही ये सब वेद सर्वप्रकारसे निष्पन्न है, क्योंकि सब वेदशास्त्र श्रोत्रद्वारा ही सुने जाते हैं, और धारण किये जाते हैं। जो ऐसी उपासना करता है वह जिस भोगकी इच्छा करता है वही उसे मिल जाता है यानी उसकी सब कामना पूर्ण हो जाती हैं, जिन्हें वह चाहता है।।४।। वि० वि. भाष्य-सम्पद् गुणवाला श्रोत्र इस प्रकार है-क्योंकि श्रोत्रके रहते ही वेदाध्ययन किया जा सकता है। भोग भी वेदविहित कर्मोंके ही अधीन हैं। जैसा विज्ञान होता है वैमा ही फल मिलता है। श्रोत्र सम्पद् है, अनः जो श्रोत्रकी सम्पत्तिको जानता है वह विभूतिमान्, सबका आश्रय हो जाता है॥४॥ यो ह वा आयतनं वेदाऽऽयतन र्वानां भवत्यायतनं जनानां मनो वा आयतनमायतन स्वानां भवत्यायतनं जनानां य एवं वेद ।। ५ ॥ भावार्थ-जो आयतनको जानता है वह स्व्रजनोंका आयतन होता है तथा अन्य लोगोंका भी आयतन हेता है। मन ही आयतन है। जो इस तरह मनको आयतन जानता है वह सम्बन्धियों तथा अन्य लोगोका आयतन होता है॥ ५॥ वि० वि. भाष्य-आयतन आश्रयको कहते हैं, वह आयतन मन है यानी इन्द्रिय और विषयोंका आ्ाश्रय है। मनके आश्रित ही विषय आत्माके भोग्यत्वको प्राप्त होते हैं। मनके सङ्कल्पके अधीन ही इन्द्रियाँ अपने अपने विषयमें प्रवृत्त निवृत्त होती है। जो ऐसी उपासना करता है वह सबका आयतन होता है अर्थात् जैसे मन इन्द्रियोंका सहायक है, उसी प्रकार वह पुरुष सबका सहायक और पूज्य होता है।।X।। यो ह वै प्रजापतिं वेद प्रजायते ह प्रजया पशुभी रेतो वै प्रजापतिः प्रजायते ह प्रजया पशुभिर्य एवं वेद ॥६II भावार्थ-जो कोई निश्चय करके प्रजापतिको जानता है, वह प्रजा और पशुओंसे सम्पन्न होता है। रेतस् ही प्रजापति है। जो ऐसा जानता है वह प्रजा और पशुओंसे सम्पन्न होता है॥ ६ ।। वि. वि० भाष्य-यहाँ रेतस शब्दसे प्रजनेन्द्रियका ग्रहण करना। रेतस

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भाखान ₹ ] विद्याविनोद भाष्य ३२७

उसका उपलक्षक है। प्रऊतमे प्रजनेन्द्रियकी उपासनाका यह भाव है कि जो पुरुष सदा ब्रह्मचारी रहता है वह सब् प्रकारकी विभूतियोगाला हो जाता है। जो गृहस्थ है, सयमी रहता हुआ ऋतुगामी होता है, उमीके यहॉ उत्तन प्रजा और बलवान् होनेसे सब प्रकार की सम्पत्ति होती है। सदाचारीके पास ऐश्वर्य आता है और आया हुआ टिकना है। किन्तु जो दुराचारी है उसके समीप पहले तो सम्पत्ति भावेगो ही नहीं, यदि किसी पूर्वकृत पुण्यमहिमासे आा भी गई तो उसका संरक्षण नहीं किया जा सकता ॥ ६ ॥ एक्त वसिष्वादि गुग प्राणमें ही हो सकते हैं, इसे दिखानेके लिए आखयायिका का प्रारम्भ किया जाना है, यथा- ते हेमे प्राणा अहृथश्रेयसे विवदमाना ब्रह्म जग्मुस्त- द्धोचु: को नो वसिष्ठ इति तद्दोवाच यस्मिन्व उत्क्रान्त इदथ शरीरं पापीयो मन्यते स वो वसिष्ठ इति॥७॥ भावार्थ-वे ये प्राण यामी इन्द्रिया 'सबमें मैं श्रेष्ठ हॅ' इस तरहका कलह करवे हुए ब्रह्माके पास गई और उनसे कहने लगी, हममे कौन वसिष्ठ है ? उसने कहा-तुममेसे जिसके निकल जानेपर यानी शरीरसे अलग हो जानेपर यह देह अपनेको अतिशय पापी मानता है वही तुममे वसिष्ठ है। यानी जिसके हट जानेपर शरीर अमङ्गलसा हो जाता है वहीं श्रेष्ट है॥। ७ ॥। वि० वि. भाष्य-वे सब इन्द्रियॉ अपनेको श्रेष्ट बोधन करती हुई प्रजा- पतिके पास गई। प्रजापतिने कहा-जिसके निकल जानेपर पहलेको अपेक्षा शरीर अव्यन्त अपवित्र हो जाय, वही सर्वोपरि विराजमान है। यह स्म ण रखना चाहिये, अनेको अपवित्र वस्तुओंका संघात होनेके कारण जीवित पुरुषका शरीर भी पापमय है, किन्तु जिसके उत्क्रमण करनेपर यह उससे भी अधिक दुर्दशाग्रस्त हो जाय वही तुममे वसिष्ठ होगा। शरीरकी अपवित्रतामें इतने हेतु शास्त्रकारोने बतलाये हैं- स्थानाद् बीजादुषष्टम्भान्नि स्पन्दान्निधनाद्पि। कायमाधेयशौचत्वात् पण्डिता अशुचि विद्ु।। अर्थात्-जिस जगहसे यह शरीर उत्पन्न हुआ है-सोचो, वह मातृकुचि कितनी गन्दी है ? एक तो यह हेतु इसकी अपवित्रता मे है, दूसरा यह रजोवीर्य रूपी गढ़ें कारणोवाला है तीसरे यह हड्डी, रुधिर आदिके आधारपर टिका

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३२८ [भध्याय ६

हुआ है, ये चीजें कितनी गन्दी हैं। चौथे, इसमेंसे मल मूत्र आदि ही निकलता है। पाँचवे, मरनेपर कितना दुर्दशाग्रस्त हो जाता है, लाश तो मानो गन्दगीका ढेर है। फिर सबसे बड़ी बात यह हैं कि इस शरीरको धो-धाकर साफ स्त्रच्छ रखना पड़ता है, अन्यथा दुर्गन्धित होने लगे। इतने तो सामान्य कारण हैं इस शरीरकी मलिनता में। ब्रह्माजीने इन्द्रियोंको यही कहा कि तुम्हारे बीच बड़ा वही माना जाना चाहिए, जिसके अभावमें यह अपवित्र शरीर किसी भी उपाय-उपचार-अनुष्ठान करनेपर पवित्र न रहे।। ७ ॥ ब्रह्मार्ज के ऐसे उत्तरको सुनकर प्राणोंने अपनी महिमाकी परीक्षा करनेके लिए क्रमशः उत्क्रमण करना आरम्भ किया, यथा- बाग्घोच्चक्राम सा संवत्सरं प्रोष्या5Sगत्योवाच कथमशकत मटते जीवितुमिति ते होचुर्यथाऽकला अवदन्तो वाचा प्राणन्तः प्राऐोन पश्यन्तश्चचुषा शृण्वन्तःश्रोत्रेण विद्वाथसो मनसा प्रजायमाना रेतसैवम जीविष्मेति प्रविवेश ह वाक् ॥८॥ भावार्थ-सबखे पहले वाणीने उत्क्रमण किया, यानी शरीररूपी स्थानको छोड़ा। वह एक वर्ष तक बाहर रहकर फिर लौट आयी और अन्य इन्द्रियोंसे कहा- तुम मेरे बिना कैसे जीवित रहीं ? यह सुन उन्होंने उत्तर दिया कि जैसे मूक लोग वाणीसे न बोलते हुए भी प्राणोंसे जीवित रहते, चन्ुसे देखते, श्रोत्रसे सुनते, मनसे जानते और उपस्थसे प्रजा उत्पन्न करते हुए जीवित रहते , उसी प्रकार हम भी जीवित रहीं। यह सुन वागिन्द्रिय अपनेको वसिष्ठ न समझकर शरीरमें प्रवेश कर अपना व्यापार करने लगी ॥ ८ ॥ ऐसे ही चक्षुका उत्क्रमण और फिर लौटना कहते है. यथा- चत्तुर्होच्चक्राम तत्संवत्सरं प्रोष्याSSगत्योवाच कथम- शकत मदते जीवितुमिति ते होचुर्यथान्धा अपश्यन्तश्च- चुषा प्राणन्तः प्रारोन वदन्तो वाचा शृण्वन्तः श्रोत्रेण विद्वाथ सो मनसा प्रजायमाना रेतसैवमजीविष्मेति प्रवि- वेश ह चचुः॥ ६॥ भावार्थ-वाणीके पुनः प्रवेशके बाद नेत्रेन्द्रिय शरीरसे उत्क्रमण कर एक

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भाखन १ J विद्याविनोद भाष्य ३२९

वर्ष पर्यन्त बाहर रहकर लौट आयी और बाकी इन्द्रियोंसे बोली कि तुम मेरे बिना कैसे जीवित रहीं ? वे बोली-जिस प्रकार अन्धा मनुष्य नेत्रोंसे न देखते हुए प्राणखे प्राणन करता, वाणीसे बोलता, श्रोत्रसे सुनता, मनसे जानता और रेतस्से प्रज्ा उत्पन्न करता हुआ जीवित रहता है, उसी प्रकार हम जीवित रहीं। यह सुन चनुने प्रवेश करके अपना काम आरम्भ किया, साथ ही वह यह भी समझ गयी कि मैं वसिष्ठ नहीं हूँ ॥। ई ।। फिर श्रोत्रका भी वैसा ही हाल हुआ, यथा- श्रोत्रu होच्चक्राम तत्संवत्सरं प्रोष्याSSगत्योवाच कथमशकत मटते जीवितुमिति ते होचुर्यथा बधिरा अशृण्वन्तः श्रोग्रेणा प्राणन्तः प्राणेन वदन्तो वाचा पश्य- न्तश्चनुषा विद्वाथ सो मनसा प्रजायमाना रेतसैवम जीविष्मेति प्रविवेश ह श्रोत्रम् ॥ १० ॥ भावार्थ-इसके अनन्तर श्रोत्रने शरीरसे उत्क्रमण किया, फिर एक वर्ष बाहर रहकर वह फिर आ गया और शरीरमें प्रवेश कर अन्य साथी इन्द्रियोंसे बोला-तुम मेरे बिना कैले जीवित रहीं? यह सुन उन्होंने उत्तर दिया कि जिस प्रकार वहरा मनुष्य कानसे न सुनते हुए भी प्राणोंसे जीवित रहता, वाणीसे बोलता, आँखोंसे देखता, मनसे जानता और उपस्थसे प्रजा उत्पन्न करते हुए जीवित रहता है, उसी प्रकार हम भी जीवित रहीं। यह सुनकर श्रोत्र इन्द्रिय शरीरमें प्रवेश कर अपना काम करने लगी॥ १० ॥ अब मनका उत्क्रमण कथन करते हैं, यथा- मनो होच्चक्राम तत्संवत्सरं प्रोष्याSSगश्योवाच कथम- शकत मटते जीवितुमिति ते होचुर्यथा मुग्धा अविद्वाथ सो मनसा प्राणन्तः प्रागोन वदन्तो वाचा पश्यन्तश्चततृषा शृण्वन्तः श्रोत्रेण प्रजायमाना रेतसैवमजीविष्मेति प्रविवेश ह मनः ॥ ११ ॥ भावार्थ-श्रोत्र अपने पुराने स्थानपर लौट आाया तब मन शरीरसें निकळ गया, वह एक वर्षके बाद लौटा। आकर अपनी साथी इन्द्रियोंसे पूछा कि तुम मेरें

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३३० शृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय ६

बिना कैसे जीवित रहीं? उन्होंने उत्तर दिया-जिस प्रकार मुग्ध यानी बिना मनके बालक आदि मनसे कुछ भी न समझते हुए प्राणसे जीवित रहते, वाणीसे बोलते, आँखोंसे देखते, कानोंसे सुनते और रेतससे सन्तान उत्पन्न करते हुए जिन्दे रहते हैं उसी प्रकार हम भी रहीं। यह सुनकर मन अपने काममें लग गया ॥ ११॥ अब रेतस्का अभिमान भङ्ग दिखाते है, यथा- रेतोहोच्चक्राम तत्संवत्सरं ग्ोष्याSSगत्योवाच कथन- शकत महते जीवितुमिनि ते होचुर्यथा क्कीवा अप्रजाय- माना रेतसा प्रारान्तः मागेन वदन्तो वाचा पश्यन्तश्चन्तुषा शृण्वन्तः श्रोत्रेण विद्वाथसो मनसैवमजीविष्मेति प्रविवेश ह रेतः ॥ १२ ॥। भावार्थ-मनके अनन्तर प्रजननशक्ति उत्क्रमण कर एक वर्ष पर्यन्त बाहर रहकर लौट आई और अन्य इन्द्रियोंसे कहा-तुम मेरे बिना कैसे जीवित रहीं? उन्होंने उत्तर दिया-जैसे नपुंसक लोग प्रजा न उत्पन्न करते हुए भी प्राणोंसे जीवित रहते, वाणीसे बोलते, नेत्रसे देखते, श्रोत्रसे सुनते और मनसे जानते हुए जीवित रहते हैं, उसी प्रकार हम भी जीवित रहीं। यह सुनकर रेत मने शरीर में प्रवेश किया।१२। वि• वि० भाष्य-वाणी, चन्षु, श्रोत्र, मन और रेतस् ये प्रधान नहीं हैं, क्योंकि इनमेंसे किसीके न रहनेपर भी शरीर नष्ट नहीं होता, न इनकी आपसमें ही कुछ हानि होती है। हाँ जिसके न रहनेसे इनकी स्थिति नहीं रह सकती, उस प्राजका आगे वर्णन किया जायगा ॥ ८-१२॥ अब प्राणकी सबमें श्रेष्ठता दिखाते हैं, थथा- अथ ह प्राण उत्क्रमिष्यन्यथा महासुहृयः सैन्धवः पड्वीशशङकन्संवृहेदेव हैवेमान्प्राणान्संववर्ह ते होचुर्मा भगव उत्क्रमीरन वै शत्यामस्त्वदते जीवितुमिति तस्यो मे बलिं कुरुतेति तथेति॥१३।। भावार्थ-इसके अनन्तर जब प्राण उत्क्रमण करने लगा तब जैसे सिन्धु- देशोद्भव बलमान घोड़ा बाँधनेकी खूँटियोंको उखाड़ देता है, उसी प्रकार सब

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विययाविनोद भाष्य ३३१

इन्द्रियाँ अपने अपने स्थानोंसे चलायमान हो गई। इसी स्थितिमें इन इन्द्रियोंने कहा-हे भगवन्, कृपा कर आप इस शरीरसे उत्क्रमण न करें, क्योंकि आपके बिना हम एक क्षण भी जीवित नहीं रह सकतीं। प्राणने कहा-अच्छा तुम सुझे भेट दिया करो। इन्द्रियोंने 'तथास्तु' कहकर स्वीकार किया ॥१३॥ वि० वि० भाष्य-यह प्राणसंवादरूप कल्पित आख्यायिका है। इससे विद्वान्को श्रेष्ठ पुरुषकी परीक्षा करनेके प्रकारका उपदेश दिया गया है। वास्तव में श्रेष्ठ वही है जिसके रहनेसे दूसरोंका उपकार हो सके। यद्यपि लोक में जातिसे भी श्रेष्ठता मानी गई है, पर असल श्रेष्ठ वही है जो बहुतोंके हितसाधनमें समर्थ हो। उपनिषदोंमें प्राण की उपासना कही गई है, क्योंकि वह प्रधान है। प्राणकी उपासना यह है कि प्राणायामादि विधियोंसे प्राणको सबल-स्वच्छ बनाना, उसे महाप्राण बनाना। जो अल्पप्राण हैं वे कुछ नहीं कर सकते। सदाचारसे प्राणनशक्ति-जीवनी शक्ति प्राप्त होती है। पापसे प्राणोंकी जीवनसामर्थ्यका ह्रास हो जाता है अतः प्राणों को संभालो, इनको बचाओ, अपने एवं दूसरोंके प्राणोंको पूजो।। १३॥ अब प्रधान प्राणके लिए बलि प्रदानका वर्णन करते हैं, यथा- सा ह वागुवाच यद्ा अहं वसिष्ठाऽस्मि त्वं तद्वसिष्ठोS- सीति यद्वा अहं प्रतिष्ठास्मि त्वं तत्ग्रतिष्ठोऽसीति चक्षुर्यदवा अहथ संपदस्मि त्वं तत्संपदसीति श्रोत्रं यद्ा अह- मायतनमस्मि त्वं तदायतनमसीति मनो यदा अहं प्रजा- तिरस्मि त्वं तत्गजातिरसीति रेतस्तस्यो मे किमन्नं किं वास इति यदिदं किंचा श्वभ्य आ कुमिभ्य आ कीटपत- द्ेभ्यस्तत्तेSन्रमापो वास इति न ह वा अस्यानन्नं जग्धं भवति नानन्न प्रतिगहीतं य एवमेतदनस्यान्न वेद तद्विद्वाथसः श्रोत्रिया अशिष्यन्त आचामन्त्यशित्वाSडचा- मन्त्येतमेव तदनमनयं कुर्वन्तो मन्यन्ते॥ १४ ॥ भावार्थ -- प्रसिद्ध वागिन्द्रियने कहा कि हे प्राण, जो मैं वसिष्ठ हूँ, यानी शब्दार्थ प्रकाशरूप ऐश्वर्यंवाली हूँ, उस ऐश्वयसे युक्त आप हों, क्योंकि आपकी

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३३२ बृहदारण्यकोपनिषद् [अष्याय ६

शक्तिके बिना मैं अपने व्यापारको नहीं कर सकती। चन्तुने कहा-हे भगवन्, जो रूपादि ग्रहण करनेकी मेरी प्रतिष्ठा है वह आपकी हो। श्रोत्रने कहा-प्रभो, जो मेरी श्रवण-सामर्थ्य है, वह आपकी महिमा है। मनने कहा-महात्मन्, जो मैं संकल्प विकल्पात्मक क्रियामें प्रवृत्त होकर रूपादि विषयोंके लिए इन्द्रियोंका सहायक होता हूँ, वह आपके साहाय्यका फल है। रेतसने कहा-मैं जो प्रजापति हूँ सो आप ही प्रजापतिसे युक्त हूँ, यह सुन प्राणने कहा- मैं ऐसे गुणोंसे युक्त हूँ, ठीक है. पर मेरा अन्न क्या है और वस्त्र क्या है ? बागादि इन्द्रियोंने उत्तर दिया कि कुत्ते, कृमि तथा कीट, पतंग आदिसे लेकर यह जो कुछ भी है वह सब आपका अन्न है और जल ही वस्त्र है। जो इस प्रकार प्राणके अन्नको जानते हैं वे कभी अभत्य भक्षण नहीं कर सकते। वे कभी भक्षणके लिए वर्जित पदार्थका संग्रह भी नहीं करते। ऐसा जो जानते हैं वे श्रोत्रिय भोजन करनेसे पहले आचमन करते हैं, और मोजनोत्तर भी वे आचमन करते हैं। वे इसीको उस प्राणका अनग्न करना मानते हैं, यानी वे समझते हैं कि हमने प्राणको नम्न होने नहीं दिया, उसे ढक दिया॥ १४॥ वि० वि० भाष्य-प्रथम बलि देनेमें प्रवृत्त वागादि इन्द्रियोंने प्राणसे कहा कि हम जो वसिष्ठ, श्रेष्ठ हैं उस वसिष्ठत्वादिरूप गुणसे तुम ही वह वसिष्ठादि हो। प्राणके अन्न वस्त्रके उत्तरमें दूसरी इन्द्रियोंने कह दिया कि जो कुछ भी कुत्ते, कृमि, कीट, पतङ्गोंका अन्न है उसके सहित प्राणियों द्वारा भक्षण किया जानेवाला जितना अन्न है, वह सभी तुम्हारा अन्न है। तात्पर्य यह है कि जब सब इन्द्रियोंने निरभिमान होकर अपने अपने ऐश्वर्यको प्राणके अर्पण कर दिया तब प्राणने इन्द्रि- योंसे यह जानना चाहा कि मेरे लिए अन्न वस्त्रका क्या प्रबन्ध होगा ? इन्द्रियोंने उत्तर दिया कि यह जो कीट-पतङग-पशु-पक्षी आदि चराचर हैं वे आपका अन्न हैं और जल वस्त्र है। क्योंकि विद्वान् लोग भोजनसे पहले और भोजनके बाद आचमन द्वारा अन्नका आच्छादन करते हैं। जो इस प्रकार प्राणके अन्न तथा वस्त्रको जानता है वह अन्नके दोषसे लिपायमान नहीं होता, यानी ऐसा पुरुष भद्याभत्यके विवेक द्वारा युक्ताहारविहारी होनेसे रोगार्त तथा धर्मसे च्युत नहीं होता। इसी प्रकार छान्दोग्यो- पनिषद् में भी प्राणविद्याका अच्छा वर्णन आया है॥ १४॥

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ब्राह्मस २ ] विधाविनोद भाष्य ३३३

द्वितीय ब्राह्मण

अब श्वेत केतुकी आख्यायिका द्वारा पञ्चानि निद्याका कथन करते हैं, यथा- श्वेतकेतुर्ह वा आरुशोयः पश्चालानां परिषदमाजगाम स आजगाम जैवलि प्रवाहणं परिचारयमाणं तमुदी्या- भ्युवाद कुमारा ३ इतिसभो ३ इति प्रतिशुश्रावानुशिष्टोड न्वसि पित्रेत्योमिति होवाच ॥ १॥ भावार्थ-प्रसिद्ध है कि आरुणिका पुत्र श्वेतकेतु पञ्चाल देशकी सभामें आया। वह जीवलके पुत्र प्रवाहण राजाके पास पहॅुँचा जो सेवकोसे सेवा करा रहा था। श्चेतकेतुको देखकर राजा प्रवाहणने कहा-ओो कुमार" वह बोला 'जी हा।' प्रवाहणने पूछा-क्या तुमको पिताजीने शिक्षा दी है, यानी तुम पिता द्वारा शिक्षित हो कि नही ? श्वेतकेतुने उत्तर दिया- ॥ १॥ वि० वि० भाष्य-श्वेतकेतु अपने पितासे पढकर अपना यश फैलानेके लिए पाञ्चालोकी सभामे गया था। यानी वह प्रवाहण राजाके समीप इस साहस- पूर्वक आया कि इस सभामें ब्राह्मणोको जीतकर राजाको भी परास्त करूँगा । क्योकि पञ्चालदेशीय विद्वान् प्रसिद्ध हैं, इनको जीतनेसे मेरा नाम सर्वत्र प्रसिद्ध होगा। 'मै सभा सहित राजाको जीत लूँ।' इस प्रकार वह गर्व करता हुआ वहाँ गया। राजाने पहलेसे ही उसके विद्याभिमानके गर्वके विषयमें सुन रखा था, इस लिए श्वेतकेतुको आता देखकर 'ओ कुमार "' इस प्रकार सम्बोवन करके पुकारनेमें राजाका अभिप्राय यह था कि इसे विनीत करना चाहिए। यहॉ पुकारनेमें 'कुमारा' यह प्लुत स्वर भ सना यानी फटकारनेके लिए है। इस प्रकार पुकारे जाने पर श्वेतकेतुने 'जी हॉ' यह जो उत्तर दिया सो क्षत्रियके सामने 'जी' कहकर उत्तर देना उचित नहीं था, यह प्रत्युत्तर तो आचार्योंके समक्ष देने योग्य है। ता भी क्रुद्ध होकर उसने ऐसा कहा-क्या पिताने तुझे शिक्षा दी है ? राआके ऐसा पूछने पर श्वेतकेतुने उत्तर दिया कि पिताने मुझे शिक्षा दी है, आप चाहे तो पूछ सकते हैं। तात्पर्यं यह है कि विद्या- ध्ययन करके मनुष्यको नम्र हो जाना चाहिए, उद्धतोकी विद्या सफल होने नहीं पाती ॥ १ ॥

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३३४ बृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय ६

राजा श्वेतकेतुसे प्रश्न करते हैं कि यदि ऐसी बात है तो- वेस्थ यथेमा: प्रजाः प्रथत्यो विप्रतिपद्यन्ता ३ इति नेति होवाच वेत्थो यथेमं लोकं पुनरापद्यन्ता ३ इति नेति हैवोवाच वेत्थो यथाऽसौ लोक एवं बहुभिः पुनः पुनः प्रय- चिर्न सपूर्यता ३ इति नेति हैवोवाच वेत्थो यतिथ्यामा हुत्याथ हुतायामापः पुरुषवाचो भूत्वा समुत्थाय वदन्ती ३ इति नेति हैवोवाच वेत्थो देवयानस्य वा पथ: प्रतिपदं पितृयाणस्य वा यत्कृत्वा देवयानं वा पन्थानं प्रतिपद्यन्ते पितृयाणं वाऽपि हि न ऋषेर्वचः श्रुतम्। द्वे सृती अश्ृ- णवं पितृणामहं देवानामुत मर्त्यानाम्। ताभ्यामिदं विश्वमेजत्समेति यदन्तरा पितरं मातरं चेति नाहमत एकंचन वेदेति होवाच॥ २ ॥ भावार्थ-दे श्वेतकेतो, यहॉसे यह सब प्रजा मरने पर कहाँ जाती है, तू जानता है ? श्वेतकेतुने उत्तर दिया कि मैं नही जानता। फिर राजाने प्रश्न किया कि जो प्रजा पुन लौटकर आती है उसको जानता है? उसने कहा-मैं नहीं जानता। राजाने पूछा-इस प्रकार पुन. पुन बहुतोके मरकर जाने पर भी परलोक भरता नहीं है, इसे तू जानता है? ऋषिकुमारने इसका उत्तर भी नही मे दिया। राजाने पूछा-कितनी बार आहुतियोसे हवन करने पर जल पुरुषरूप होकर पुन वागादि व्यापार करते हैं, क्या इसे जानता है? उसने कहा-नही। राजाने पूछा-देवयान मार्गके कमरूप साधनको अथवा पितृयान मार्गके कर्मरूप साधनको क्या तू जानता है, जिसे करके मनुष्य देवयानमार्गको प्राप्त होते हैं या पितृयानमार्गसे जाते हैं? हमने तो मन्त्रका यह अर्थ सुना है कि एक मार्ग पितरो का है और दूसरा देवो का। इसमे ये दो मार्ग जो मनुष्योसे सम्बन्ध रखते हैं, सुने है तथा ये मार्ग पिता और माताके बीच मे हैं। यानी ये दोनो मार्ग दौ तथा पृथिवी लोकके मध्य वर्तमान हैं, जिनके द्वारा सब प्राणी एक स्थानसे दूखरे स्थान

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विद्याविनोद भाष्य ३३५ لا

को जाते हैं। इसका भाव यह है कि प्राणी एकके पश्चात् दूसरा अन्म ग्रहण करते है। यह सुन श्वेतकेतुने सत्तर दिया कि इन प्रश्नोंमें से एकका भी उत्तर नहीं जानता॥ २ ।। वि. वि• भाष्य-मनुष्यको यह कभी नहीं समझना चाहिये कि मैं सब कुद्द जान गया। संसारमें मनुष्यका संबन्ध ज्ञानकी अपेक्षा धज्ञानसे अधिक है। यानी मनुष्य जानता कम है, इसमें अनजानपना ही बहुत है। माया अपार है, इसका पार पाना कठिन है। श्वेतकेतुको इस सर्वजंमन्यताके कारण ही पाव्चालोंकी सभामें निरुत्तर हो लज्जित होना पड़ा। श्वेतकेतुरूपी महापात्र विद्वत्तारूपी दुग्घ से परिपूर्ण है, किन्तु उसमें शास्त्राभिमानरूपी खटाईका सम्पर्क हो गया ।। २।। अपने पिताके पास जाकर श्वेतकेतुने जो उलाहना दिया उसे कहते हैं, यथा- अथैनं वसत्योपमन्त्रयांचक्रेSनादृत्य वसतिं कुमारः प्रदुद्राव स आजगाम पितरं तथ होवाचेति वाव किल नो भवान्पुरानुशिष्टानवोच इति कथथ सुमेध इति पञ्च मा प्रश्ान् राजन्यबन्धुरप्राक्षीत्ततो नैकंचन वेदेति कतमे त इतीम इति ह प्रतीकान्युदाजहार ॥ ३॥ भावा -इसके अनन्तर जंब श्वेतकेतुका विद्याभिमान कुछ कम हुआ तब उससे राजाने कहा-यहाँ ठहरिये। किन्तु वह कुमार वहाँ रहना स्वीकार न कर चल दिया। वह अपने पिताके पास आया और कहने लगा-आपने समावर्तन के समय मुझसे कहा था कि तुझे सब विषयोंकी शिक्षा दी गई है। यह सुन पिता बोला-हे सुन्दर धारणाशक्तिवाले पुत्र, क्या हुआ ? पुत्रने कहा-मुझसे एक क्षत्रियबन्धुने पाँच प्रश्न पूछे थे, पर उनमें से मैं एकको भी नहीं जानता, यानी एकका भी जवाब न देसका। पिताने पूछा-वे प्रश्न कौनसे थे ? पुत्रने उन प्रश्नोंके प्रतीक बता दिये, यानी दिङ्मात्र कह सुनाया।। ३। वि० वि. भाष्य-राजाने जब यह समझ लिया कि ऋषिकुमारका विद्याभिमान टूट गया है, तब उससे कुछ दिन अपने यहाँ ठहर जाने की प्रार्थना की

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३३६ बृहदारण्यकोपनिषद् [अभ्याय ह

और नौकरोंको आज्ञा दी कि ऋषिके लिए सम्मान पूजाकी सामग्री लाओ। किन्तु राजाकी इस विनयपूर्वक की हुई ठहरनेकी प्रार्थना पर कुछ ध्यान न देकर श्वेतकेतु पिताके पास भा गया और पिताको उलाहना देते हुए, उसने पांचालोंकी सभामें किये गये प्रश्न और वहाँ निरुत्तर होनेका सब समाचार कह सुनाया। यानी पुत्रने पिताको सब वृत्तान्त सुनाते समय यह भी कहा कि एक क्षत्रियबन्धुने मुझसे पाँच प्रश्न पूछे थे। यहाँ यह 'क्षत्रबन्धु' शब्द तिरस्कारसूचक है, इसका भाव यह है कि उस ब्राह्मणकुमारने पितासे यह कहा कि एक उद्धत ठाकुरने मुझसे ऐसा पूछा था। ३ ॥ अब पिता इस विषयमें अपनी अनभिज्ञता प्रकट कर पुत्रको समझाकर राजा प्रवाहणके पास गया, यह कहते हैं, यथा- स होवाच तथा नस्त्वं तात जानीथा यथा यदहं किंच वेद सर्वमहं तन्तुभ्यमवोच प्रेहि तु तत्र प्रतीत्य ब्रह्म- चर्यं वत्स्याव इति भवानेव गच्छत्विति स आजगाम गौतमो यत्र प्रवाहसास्य जैवलेरास तस्मा आसनमाहृत्यो- दकमाहारयांचकाराथ हास्मा अर्ध्यं चकार तथ होवाच वरं भगवते गौतमाय दद् इति ॥४॥ भावार्थ-पिताने कहा-हे तात, मैं जो कुछ जानता था वह सब तेरे प्रति वर्णन किया, तू मेरे कथनानुसार ऐसा समझ। यदि मैं उक्त प्रश्नोंमें से किसीको जानता होता तो अवश्य तेरे प्रति कथन करता। आओ, अब हम दोनों चलें और वहीं विद्याके लिए ब्रह्मचर्यपूर्वक निवास करेंगे। श्वेतकेतुने कहा-आप ही जाइए, मैं नहीं जाता। इसके अनन्तर गौतम वहाँ आया जहाँ जैवलि प्रवाहणका निवास था। राजाने सत्कारपूर्वक आसन देकर जल मँगवाया, उसको अर्ध्य दिया। इसके अनन्तर कहा कि हे गौतम, आप पूज्य हैं, मैं आपको वर देता हूँ, यथेच्छ माँगिये ।। ४ ॥ वि० वि० भाष्य-क्रुद्ध पुत्रको पिताने यह कहकर शान्त किया कि जो कुछ विज्ञान मैं जानता था वह सब तुझे कह दिया था, क्या तुझसे अधिक मुझे कोई डूसरा प्रिय है जिसके लिए मैं कुछ छिपाकर रख छोड़ँ ? अब हम दोनों वहीं

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आशय २ ] विद्याविनोद भाष्य ३३७

नाकर राजासे पूछें। पुत्रने जाना स्वीकार न किया क्योंकि वह अपमानित हो गया था, अतः अकेला गौतम राजाके पास गया। राजाने उसका बड़ा सत्कारं किया और कहा कि कहिये क्या चाहते हैं, मैं आप जैसे महात्माके लिए गौ अश्व आदि सब कुछ दे सकता हूँ ।।४ ।। स होवाच प्रतिज्ञातो म एष वरो यां तु कुमारस्यान्ते वाचमभाषथास्तां मे ब्रूहीति॥ ५ ॥ भावार्थ-गौतमने कहा कि हे राजन्, आपने जो कुमारके सन्मुख पाँच प्रश किये थे, कृपा करके उनका उत्तर कथन करें, यही मेरा वर या प्रार्थना है। इस संबन्धमें मैं जानकार नहीं हूँ किन्तु जिज्ञासा है॥। ५॥ स होवाच दैवेषु वै गौतम तद्ूरेषु मानुषाणां ब्रूहीति ॥६॥ भावार्थ-राजा प्रवाहणने कहा कि हे गौतम, आपने जो वर माँगा है वह देवताओंके लिए है, आप वह माँग सकते हो जो मनुष्योंसे सम्बन्ध रखता है। अर्थात् आप भोग्य पदार्थोंमें से कोई वर माँगो, विद्वत्सम्बन्धी ज्ेय पदार्थन माँगो॥६।। स होवाच विज्ञायते हास्ति हिरण्यस्यापात्तं गोअश्वानां दासीनां प्रवाराणां परिदानस्य मा नो भवान्बहोरनन्तस्या- पर्यन्तस्याभ्यवदान्योऽभूदिति स वै गौतम तीर्थेनेच्छासा इस्युपैम्यहं भवन्तमिति वाचा ह स्मैव पूर्व उपयन्ति स होपायनकीर्त्योवास ।। ७।। भावार्थ-ऐसा कहे जाने पर उस गौतमने कहा-आप जानते हैं कि मेरे पास हिरण्य, गौ, अश्व, दासियाँ औौर पहरने योग्य विविध वसत्र इत्यादि सब प्रकारकी सामप्री और सम्पत्ति उपस्थित है। मुझे किसी प्रकारके मानुष वित्तकी इच्छा नहीं है। फिर आप देवसम्बन्घी वर देनेके लिए क्यों ननु नच करते हैं। यानी आप महान्, अनन्त और निःसीम घनके दाता होकर मेरे लिए अदाता क्यों होते हैं। यह सुनकर राजाने कहा-यदि ऐसा है तो अच्छा, हे गौतम, तुम शास्रविधिसे इसे पानेकी इच्छा करों, यानी शालमर्यादानुसार मेरे शिष्ष्य बनकर विद्या सीखो।

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३३६ बृहदारण्यकोपनिषद् [अभ्याय ह

और नौकरोंको आज्ञा दी कि ऋषिके लिए सम्मान पूजाकी सामग्री लाओ। किन्तु राजाकी इस विनयपूर्वक की हुई ठहरनेकी प्रार्थना पर कुछ ध्यान न देकर श्वेतकेतु पिताके पास भा गया और पिताको उलाहना देते हुए, उसने पांचालोंकी सभामें किये गये प्रश्न और वहाँ निरुत्तर होनेका सब समाचार कह सुनाया। यानी पुत्रने पिताको सब वृत्तान्त सुनाते समय यह भी कहा कि एक क्षत्रियबन्धुने सुझसे पाँच प्रश्न पूछे थे। यहाँ यह 'क्त्रबन्धु' शब्द तिरस्कारसूचक है, इसका भाव यह है कि उस ब्राह्मणकुमारने पितासे यह कहा कि एक उद्धत ठाकुरने मुझसे ऐसा पूछा था॥ ३ ॥। अब पिता इस विषयमें अपनी अनभिज्ञता प्रकट कर पुत्रको समझाकर राजा प्रवाहणके पास गया, यह कहते हैं, यथा- स होवाच तथा नस्त्वं तात जानीथा यथा यदहं किंच वेद सर्वमहं तन्तुभ्यमवोचं प्रेहि तु तत्र प्रतीत्य ब्रह्म- चर्यं वत्स्याव इति भवानेव गच्छत्विति स आजगाम गौतमो यत्र प्रवाहणस्य जैवलेरास तस्मा आसनमाहत्यो- दकमाहारयांचकाराथ हास्मा अ्ध्यं चकार तथ होवाच व्रं भगवते गौतमाय दद इति॥४॥ भावार्थ-पिताने कहा-हे तात, मैं जो कुछ जानता था वह सब तेरे प्रति वर्णन किया, तू मेरे कथनानुसार ऐसा समझ। यदि मैं उक्त प्रश्नोंमें से किसीको जानता होता तो अवश्य तेरे प्रति कथन करता। आओ, अब हम दोनों चलें और वहीं विद्याके लिए ब्रह्मचर्यपूर्वक निवास करेगे। श्वेतकेतुने कहा-आप ही जाइए, मैं नहीं जाता। इसके अनन्तर गौतम वहाँ आया जहाँ जैवलि प्रवाहणका निवास था। राजाने सत्कारपूर्वक आसन देकर जल मँगवाया, उसको अर्ध्य दिया। इसके अनन्तर कहा कि हे गौतम, आप पूज्य हैं, मैं आपको वर देता हूँ, यथेच्छ माँगिये। ४ ॥ वि० वि. भाष्य-क्रुद्ध पुत्रको पिताने यह कहकर शान्त किया कि जो कुछ विज्ञान मैं जानता था वह सब तुझे कह दिया था, क्या तुझसे अधिक मुझे कोई दूसरा प्रिय है जिसके लिए मैं कुछ छिपाकर रख छोडँ ? अब हम दोनों वह्दीं

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बाश्य २ ] विद्याविनोद भाष्य ३३७ जाकर राजासे पूछें। पुत्रने जाना स्वीकार न किया क्योंकि वह अपमानित हो गया था, अतः अकेला गौतम राजाके पास गया। राजाने उसका बड़ा सत्कार किया और कहा कि कहिये क्या चाहते हैं, मैं आप जैसे महात्माके लिए गौ अश्व आदि सब कुछ दे सकता हूँ।।४।। स होवाच प्रतिज्ञातो म एष वरो यां तु कुमारस्यान्ते वाचमभाषथास्तां मे ब्रूहीति ॥ ५ ॥ भावार्थ-गौतमने कहा कि हे राजन्, आपने जो कुमारके सन्मुख पाँच प्रभ् किये थे, कृपा करके उनका उत्तर कथन करें, यही मेरा वर या प्रार्थना है। इस संबन्धमें मैं जानकार नही हूँ किन्तु जिज्ञासा है॥ ५॥ स होवाच दैवेषु वै गौतम तदूरेषु मानुषाणां बुहीति ॥ ६॥ भावार्थ-राजा प्रवाहणने कहा कि हे गौतम, आपने जो वर माँगा है वह देवताओंके लिए है, आप वह माँग सकते हो जो मनुष्योंसे सम्बन्ध रखता है। अर्थात् आप भोग्य पदार्थोंमें से कोई वर माँगो, विद्वत्सम्बन्धी ज्ञेय पदार्थन माँगो।६।। स होवाच विज्ञायते हास्ति हिरण्यस्यापात्तं गोअश्व्वानां दासीनां प्रवाराणां परिदानस्य मा नो भवान्बहोरनन्तस्या- पर्यन्तस्याभ्यवदान्योऽभूदिति स वै गौतम तीर्थेनेच्छासा इस्युपैम्यहं भवन्तमिति वाचा ह स्मैव पूर्व उपयन्ति सं होपायनकीर्त्योवास ।। ७ भावार्थ-ऐसा कहे जाने पर उस गौतमने कहा-आप जानते हैं कि मेरे पास हिरण्य, गौ, अश्व, दासियाँ औौर पहरने योग्य विविध वस्त्र इत्यादि सब प्रकारकी सामग्री और सम्पत्ति उपस्थित है। मुझे किसी प्रकारके मानुष बित्तकी इच्छा नहीं है। फिर आप देवसम्बन्घी वर देनेके लिए क्यों ननु नच करते हैं। यानी आप महान्, अनन्त और निःसीम धनके दाता होकर मेरे लिए अदाता क्यों होते हैं। यह सुनकर राजाने कहा-यदि ऐसा है तो अच्छा, हे गौतम, तुम शास्त्रविधिसे ससो पानेकी इच्छा करो, यानी शालमर्यादानुसार मेरे शिष्य बनकर विद्या सीखो। ४३

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३३८ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ३

गौतमने कहा-हाँ, मैं शिष्यके नियमको पूर्ण करूँगा। इस प्रकार वाणीमात्रसे शिष्यत्व स्वीकार करके गौतम वहाँ रहने लगा। ७॥ वि• वि० भाष्य-गौतम ब्राह्मण था और प्रवाहण क्षत्रिय। आपत्तिके समय ब्राह्मण विद्याध्ययन करनेकी इच्छासे शास्त्रनियमसे क्षत्रियोंके शिष्य होते थे, कभी वैश्योंके भी। पर वे कथनमात्रसे ऐसा करते थे यानी 'मैं आपका शिष्य हूँ' बस, यह कह भर देते थे। किसी प्रकारकी भेट लेकर या शुश्रषा द्वारा उनका शिष्यत्व स्वीकार नहीं करते थे। यहाँ गौतमने भी उपसत्तिके कथनमात्रसे ही वहाँ निवास किया। इस कथनका तात्पर्य यह है कि वैदिककालमें पढ़ानेका काम ब्राह्मणोंका ही था इसलिए विद्यामूलक गुरुशिष्यभाव उनमें ही अधिकनर था। उस समय ब्राह्मणोंका तपोबल ऊँचा था, उनका त्याग भी सर्वोपरि था, इसी कारण ब्राह्मणोंकी श्रेणी सब वर्णोंमें श्रेष्ठ मानी जाती थी। उनको क्षत्रिय तथा वैश्यादि सभी अपनेसे ऊँचा मानते थे, क्योंकि उनमें तप, त्यागका गुण ही ऐसा था जो भारतीय सभ्यतामें सबमे अधिक महत्त्व रखता है। ऐसा ब्राह्मण यदि किसी कारणवश क्षत्रिय आदिके पास कभी कुछ शिक्षा लेने जाता था तो अपनेसे तप, त्यागमें कम अथच केवल विद्याविशेषमें अधिक क्षत्रियादिकोंका वाणीमात्रमे शिष्य बनकर विद्या ग्रहण करता था। आचार्गसे नियमपूर्वक प्राप्त की हुई विद्या सफल होती है, इसीलिए ब्राह्मण क्षत्रियादिको कहने भरके लिए ही गुरु बनाना था। न तो उसकी सेवा करता था, न उसके समीप कुछ भेट ही ले जाता था। पहले गुरुशुश्रषासे या प्रचुर धन देनेसे श्रथवा अपनी विद्याके बदलेसे यानी तीन उपायोंसे विद्या प्राप्त की जाती थी, पर अब तो केवल धन रह गया है। आज- कल जैसे भी हो विद्या अर्जन करनी चाहिये, फिर क्यों न इसके लिए किसी विजातीयकी सेवा-शुश्रूषा करनी पड़े। ७॥ स होवाच तथा नस्त्वं गौनम माऽपराधास्तव च पितामहा यथेयं विद्येतः पूर्व न कस्मिथश्रन ब्राह्मण उतास तां स्वहं तुभ्यं वत्यामि को हि त्वैवं ब्रवन्तमर्हति प्रत्याख्यातुमिति ॥८॥ भावार्थ-नैतमके इस प्रकारआपदन्तर कहने पर राजाने कहा-हे गौतम,जिस प्रकार आपके पिता-पितामह हमारे बड़ोको चषमा प्रदान करते आये हैं, उसी प्रकार

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बिद्या विनाद भाव्य ३३६

मैं भी आपसे क्षमाका प्रार्थी हूँ। आप जानते हैं कि इससे पहले यह विद्या किसी ब्राह्मणके यहाँ नहीं रही, इसे मैं आपको ही प्रथम कहता हूँ। भला आपके सदश विनीत बोलनेवालेको कोई विद्या देनेसे निषेध कर सकता है? कभी नहीं ॥ ८॥ वि० वि० भाष्य-रहले आपदन्तर शब्द आया है। इसका अर्थ आपत्ति- काल है। राजाने कहा कि हे गौतम. आप जानते हैं कि इससे पूर्व यह विद्या किसी ब्राह्मणको प्राप्त नहीं थी, किन्तु परंपरासे इसकी स्थिति क्षत्रियोंमें ही रही है। जहाँ तक हो सके उस स्थितिकी रक्षा मुझे भी करनी चाहिये थी, सो इसी मर्यादाको स्थिर रखनेके लिए मैंने आपसे कहा था कि दैव यानी आध्शत्मिक वर न माँगकर मानुष सम्पात्तिका ही ग्रहण करें। किन्तु आपका सौजन्य देखकर मैं आपको अर्भ.ष्ट विद्या प्रदान करनेको उद्यत हूँ। यहाँ शंका होती है कि जब राजा प्रवाहण यह जानता था कि इस विद्याको श्वेतकेतु नही जानता है, यही नहीं बल्कि उसका जानना भी असम्भव था, क्योंकि यह विद्या केवल क्षत्रियोंके ही पास थी, ब्राह्मणांके पास नहीं। तो फिर राजा प्रवाहणने श्वेतकेतुको एतद्विद्याविपयक प्रश्न पूछकर क्यों अपमानित किया ? क्या इससे राजाके गाम्भीर्य गुणको आँच नहीं आती ? उत्तर यह है-राजाका एतद्विद्याविषयक प्रश्न अपनी भरी सभामें किसी आगन्तुक ब्राह्मणसे नहीं पूछना चाहिये था, पर क्या किया जाय, परिस्थिति ही ऐसी आ गई थी। उस राजाको शासन करनेका अधिकार था, उधर ऋषिकुमारको विद्याके गवंका ज्वर चढ़ा हुआ था, वह मारे अभिमानकी अकड़के किसी दूसरेको कुछ गिनता ही नहीं था। राजाने उसका मद चू्ण करनेके लिए ऐसे अप्रसिद्ध प्रश्न पूछे। राजाका ऋषिकुमारके अप- मानमें तात्पर्य नहीं था, राजा तो उसके उस दोषको दूर करना चाहता था, जिससे वह पद पद पर अपमानित होता! श्वेतकेतुका पिता नम्र था अतः उसको राजाने वह सब कुछ बता दिया जो वह जानना चाहता था॥ ८॥ अब क्रमभंग करके पहले चौथे प्रश्नका निर्णय इस लिए किया जाता है कि इस प्रश्नके निर्णयके अधीन अन्य प्रश्नोंका निणय है, यथा- असौ वै लोकोऽभिर्गौतम तस्यादित्य एव समिद्र- श्मयो धूमोSहरचिर्दिशोऽद्वारा अवान्तरदिशो विस्फुलिद्गा- स्तस्मिन्नेतस्मिन्नमौ देवाः श्रद्धां जुह्वति तस्या आहुत्यै सोमो राजा संभवति॥६॥।

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बृहदारण्यकोपनिषद्

भावार्थ-निश्चय करके हे गौतम, प्रसिद्ध घुलोक ही आइवनीय अभि है। उसका आदित्य ही समिध यानी ईंधन है, किरणें धूम हैं, दिन ज्वाला है। दिशाएँ अक्गार हैं, एवं मध्यकी उपदिशाएँ चिनगारियाँ हैं। इस अगिमें देवता लोग श्रद्धाका हवन करते हैं। फिर उस आहुतिसे सोम उत्पन्न होता है ।।ह।। वि० वि• भाष्य-हे गौतम, यह दुलोक अभि है। अगिको दीप्त करता है, इससे आदित्य इसका ईंधन है। किरणें धूम हैं, जैसे लोकमें ईंधनसे धूआँ निकलता है, उसी तरह आदित्यसे किरणें निककती हैं। प्रकाशमें बराबरी होनेके कारण दिन ज्वाला है। उपशममें समानता होनेसे दिशाएँ अङ्गार हैं। अवान्तर दिशाएँ विस्फुलिङ्ग हैं, क्योंकि ये स्फुलिङ्गोंके समान बिखरी रहती हैं। उक्त गुणोंसे युक्त इस झुलोकरूप अग्निमें इन्द्रादि देवगण आहुतिद्रव्यस्थानीय श्रद्धाका हवन करते हैं। उस आहुतिसे पितरों और ब्राह्मणोंका राजा सोम उत्पन्न होता है। शरीर- का आरम्भ कर्मप्रयुक्त ही है और कर्म अप् यानी जलसे सम्बन्ध रखता है, अतः शरीररचनामें अपकी प्रधानता है। क्रम भंग करके इस मन्त्रमें चतुर्थ प्रश्नका उत्तर पहले इस अभिप्राय से दिया गया है कि शेष प्रश्नोंका निर्णय इस प्रश्नके अधीन है, क्योंकि इसमें पाँचवी आहुति- द्वारा जीवकी उत्पत्तिका प्रकार कथन किया गया है। इसी भावको स्फुट करनेके लिए दुलोकादिको अग्न्यादिरूपसे वर्णन किया गया है। यह पञ्चाभिविद्याका वर्णन पिछली उपनिषद्में भी आया है ॥ ९ ॥ अब द्वितीय पर्जन्यामिका वर्णन करते हैं, यथ- पर्जन्यो वागनिर्गौतम तस्य संवत्सर एव समिदभ्राणि धूमो विद्युदचिरशनिरङ्गारा हादुनयो विस्फुलिद्गास्तस्मिन्ने- तस्मिन्नऔ देवा: सोमथ राजानं जुह्वति तस्या आहुत्यै वृष्टिः संभवति ॥ १० ॥ भावार्थ-हे गौबम, निश्चय करके सेघ ही अभि है, संवत्सर ही उसकी समिधा है, अभ्र यानी बादल धूम है, बिजली ज्वाला है, इन्द्रका बज्र अङ्गार है एवं मेघगर्जन विस्फुलिङ्ग है। इस पर्जन्यरूप अग्निमें देवता लेग सोम राजाका हवन वरते हैं, उस आहुतिसे वर्षा होती है॥! १० ॥

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मावया १ ] विद्याविनोद भाष्य ३४१

वि• वि० भाष्य-मेघरूप अग्निकी संवत्सर लकड़ी है, क्योंकि शरत्मे लेकर ग्रीष्मपर्यन्त अपने अंशों द्वारा विभिन्नरूपसे परिवर्तित होते हुए संवत्सरके द्वारा ही मेघरूप अग्नि दीप्त होती है। अभ्र घूम है, यहाँ मेघ और अभ्र दोनों एक ही नहीं हैं, मेघ नाम है वृष्टिकी सामग्रीके अभिमानी देवताका और अभ्र नाम है बादलका। धूमके समान दिखाई देनेसे अभ्रको धूम कहा गया है। प्रकाश में समानता होनेके कारण विद्युत् ज्वाला है। अशनि अङ्गारे हैं, क्योंकि वे उपशान्तत्व तथा कठिनतामें समान हैं। विन्षेप और अनेकत्वमें समानता होनेके कारण मेघकी गर्जनाएँ विस्फुलिङ्ग हैं। मेघमें सोमकी आहुतिसे वृष्टि होती है॥ १०॥ अब तीसरी इहलोकाग्निका वर्णन करते हैं, यथा- अयं वै लोकोऽननिर्गौतम तस्य प्रृथिव्येव समिदगनि- धूमो रात्रिरर्चिश्चन्द्रमा अद्गारा नक्षत्राणि विस्फुलिद्गास्त- स्मिन्नेतस्मिन्नऔ देवा वृष्टिं जुह्वति तस्या आहुत्या अन्न& संभवति॥ ११ ॥ भावार्थ-हे गौतम, निश्चय करके यह प्रसिद्ध भूलोक ही अग्नि है, इसकी पृथिवी ही समिधा है, अग्नि धूम है, रात्रि जवाला है, चन्द्रमा अङ्गार है और नक्षत्र विम्फुलिङ्ग हैं। इस अग्निमें देवतागण वृष्टिरूप आहुति देते हैं, उस आहुतिसे अन्न उत्पन्न होता है।। ११ ।। वि० वि. भाष्य-नाणियों के जन्म और उपभोगका आश्रय तथा क्रिया, कारक और फलसे युक्त ऐसा जो यह लोक है वही तृतीय अग्नि है। उसकी पृथिवी समिधा है, प्राणियोंके अनेकों उपभोगोंसे सम्पन्न इस पृथिवीसे ही यह लोक दीप्त होता है। अग्नि घूम है, क्योंकि पृथिवीरूप आश्रयसे उठनेमें इसकी समानता है। बात यह है कि पार्थिव ईंधनद्रव्यको आश्रय करके ही अग्नि उठती है, जैसे लकड़ीसे धूआँ उठता है। समिधाके सम्बन्धसे उत्पन्न होनेमें रात्रि तथा ज्वालामें समानता है क्योंकि अग्निमें लकड़ीका सम्बन्ध होनेसे ही ज्वाला उत्पन्न होती है। पृथिवीकी छायाको ही रात्रिका अब्धकार कहते हैं। ज्वालासे उत्पन्न होनेमें चन्द्रमा अद्गारके समान है। ज्वालासे ही अङ्गार होते हैं, इसी प्रकार रात्रिमें से चन्द्रमा होता है। नक्षत्र इधर उधर बिखरे रहते हैं, अतः वे विस्फुलिङ्ग के समान हैं। इसमें वृष्टिका होम करनेसे अन्न उत्पन्न होता है।। ११ ।।

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३४२ [ अध्पाव ३

अब चौथी पुरुषाग्िका वर्णन करते हैं. यथा- पुरुषो वाडगिर्गौतम तस्य व्यात्तमेव समित्प्राणो धूमो

देवा अन्नं जुह्वति तस्या आहुत्यै रेतः संभवति॥१२॥ भावार्थ-हे गँ.तम. निश्चय करके यह पुरुष ही अग्नि है, उसका खुला हुआ मुख ही समिधा है, प्राण धूम है, वाणी जवाला है, आखें अङ्गार हैं और श्रोत्र स्फुलिङ्ग हैं। इस अग्निमे देवगण अन्नको होमते हैं, उस आहुतिसे वीर्य होता है॥ १२॥ वि० वि० भाष्य-वे पुरुप ही अग्नि है, वह पुरुष जो हाथ-पॉव आादि अवयवोंवाला है चतुर्थ आग्नि है। उसका खुला हुआ मुख समिया है, क्योंकि खुले हुए मुखसे ही बोलने और स्वाध्यायादिसे पुरुत दीप् होता है, जैसे काष्ठसे अग्नि। इँधनसे उठनेवाले धूमकी प्राणसे समानता है, क्योंकि मुखसे ही प्राण निकलता है। व्यञ्जकतामें तुल्यता होनेसे वाक ज्वाला है। जिस प्रकार ज्वाला वस्तुको प्रकाशित करती है, उसी प्रकार वाक भी वाच्यको अभिव्यक्त करने- वाली होती है। प्रकाशके आश्रय होनेके कारण नेत्र अंगार हैं, विच्ेपमें समानता होनेके कारण श्रोत्र विस्फुलिङ्ग हैं। उस पुरुवरूप अग्निमें अन्न होम किया जाता है। उस आहुतिसे वी्य होता है. क्योंकि वीर्य अन्नका ही परिणाम है॥ १२॥ अब पाँचवीं योषाग्निका वर्णन किया जाता है, यथा- योषा वा अग्निर्गौतम तस्या उपस्थ एव समिल्लोमानि धूमो योनिरचिर्यदन्तः करोति तेऽ्द्वारा अभिनन्दा विस्फु- लिङ्गास्तस्मिन्नेतस्मिन्नऔौ देवा रेतो जुह्वति तस्या आहुत्यै दुरुषः संभवति स जीवति यावज्जीवत्यथ यदा ब्रियते ॥१३॥ भावार्थ-हे गौतम, यह स्त्री हो प्रसिद्ध अग्नि है, उपस्थ ही उसकी समिधा है, लोम धूम है, योनि ज्वाला है, जो अन्तर्गमन है वह अङ्गार है, आनन्दलेश विस्फु- िङ्ग है। इस अग्निमें देवगण वीर्यका हन करते हैं। उस आहुतिसे मनुष्यकी उत्पत्ति होती है। वह जीवित रहता है, वह जब तक कर्म शेष रहते हैं, तब तक जीता रहता है, फिर कर्मोंके फलोपभोगानन्तर मर जावा है ॥ १३॥

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ब्ाह्ण २ ] विद्याविनोद भाष्य ३४३

वि० वि० भाष्य-हे गौतम, स्त्री यह पाँचवी होमाधिकरणरूप अग्नि है, उसका उपस्थ ही समिधा है. उसीसै वह दीप्न होती हैं। समिधसे उत्पन्न होनेके कारण लोम और धूमकी समानता है. वर्णमें समानता होनेके कारण योनि जवाला है। पति-पत्नी संयोग ही अङ्गार है, क्योंकि वीर्यके उपशमहेतु होनेमें उनकी समा नता है। ुद्रत्वमें समानता होनेके कारण अभिनन्द-लेशमात्रसुख विस्फुलिङ्ग है। वहाँ पर देवगण वर्यका होम करते हैं. उस आहुतिसे पुरुष उत्पन्न होता है। इस प्रकार द्युलोक, मेघ इहलोक, पुरुष और स्रीरूप अग्नियोंमें क्रमसे इवन किये गये श्रद्धा, सोम वृष्ठि, अन्न और वीर्यरूपसे स्थूल तारतम्य क्रमको प्राप्त हुआ श्रद्धापद्वाच्य आप (जल) पुरुषशरीरको आरम्भ करता है। पहले "क्या तू जानता है कि कितनी संख्यामें हवन किये जाने पर आप पुरुषशब्दवाच्य होकर उठकर बोलता है ?" यह चतुर्थ प्रश्न था, उसका निर्णय हो गया कि योषाग्निमें पाँचवीं आहुतिके हवन किये जाने पर वीर्यभून आप पुरुषशब्दवाच्य होता है। जब तक इस शरीरमें इसकी स्थितिके निमित्तभूत कर्म रहते हैं, तबतक जीवित रहता है, फिर उनका क्षय होने पर वह मर जाता है। कोई विद्वान् इस मन्त्रकी व्याख्यः इस प्रकार करते हैं-निश्चय करके यह प्रकृति ही अग्नि है, उसका सङगरूप आसक्ति ही समिधा है, जो रजोगुणके भावोंसे अपनी ओर खींचना है वही धूम है. कारणता ज्वाला है, जो अपने भीतर पुरुषको आसक करना है वही अङ्गार है, और प्राकृत आनन्द ही विस्फुलिङ्ग है। इस अग्निमें देवता वीर्यकी आहुति देते हैं, जिससे पुरुन उत्पन्न होता है और वह अपने कर्म फलपर्यन्त उपभोग करके पश्चात् मृत्युको प्राप्त हो जाता है। १३॥। अब प्रथम प्रश्नका उत्तर देते हैं, यथा- अथैनमग्नये हरन्ति तस्याग्निरेवाननिर्भवति समित्स- मिद्धूमो धूमो3चिरचिरद्वारा अङ्गारा विस्फुलिङ्गा विस्फुलि- ङ्गास्तस्मिन्नेतस्मिन्नऔ देवा: पुरुषं जुह्ृति तस्या आहुत्ये पुरुषो भास्वरवर्णः संभवति॥ १४॥ भावार्थ-इसके बाद यानी मरणानन्तर इसे अग्निके पास ले जाते हैं, उसका अग्नि ही अग्नि होता है, समिधा समिधा होती है, धूम धूम होता है, ज्व ला ज्वाला होती है. अङ्गारे अङ्गारे होते हैं, और विस्फुलिङ्ग विस्फुलिद्ग होते हैं। इस

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३४४ बृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय ६

अग्निमें देवगण पुरुपको होमते हैं। उस आहुतिमें पुरुष अत्यन्त दीप्तिमान होता है॥। १४॥ वि० वि० भाष्य-मृत पुरुषको अग्निके ही लिए अन्तिम आहुतिके प्रयोजनसे ऋत्विग्गण ले जाते हैं। वहाँ उसके लिए भौतिक अग्नि ही होमाधिकरण होता है, कोई कल्पित अग्नि नहीं, ऐसे ही प्रसिद्ध समिधादि ही समिधादि होते हैं। तात्पर्य यह कि ये सब जैसे प्रसिद्ध हैं वे ही होते हैं। उस आहुतिसे पुरुष अत्यन्त दीप्तिमान् होता है, यानी वह गर्भाधानसे लेकर अन्त्येष्टिसंस्कार पर्यन्त कर्मों द्वारा संस्कृत होनेके कारण देर्दीप्यमान होता है॥ १४॥ अब प्रथम तथा पाँचवें प्रश्नका उत्तर देते हुए देवयान मार्गका वर्णन करते हैं- ते य एवमेतद्विदुर्ये चामी अरण्ये श्रद्धाथ सत्यमु- पासते तेऽर्चिरभिसंभवन्त्यर्चिषोऽहरह आपूर्यमाणपक्षमा- पूर्यमाणपत्ताद्यान्षण्मासानुदङ्डादित्य पति मासेभ्यो देव- लोकं देवलोकादादित्यमादित्याद्वैद्युतं तान्वैद्युतान्पुरुषो मानस एत्य ब्रह्मलोकान् गमयति ते तेषु ब्रह्म लोकेषु पराः परावतो वसन्ति तेषां न पुनरावृत्तिः।। १५ ।। भावार्थ-वे जो इस प्रकार इसको जानते हैं तथा जो वनमें श्रद्धालु होकर सत्यकी उपासना करते हैं, वे अर्चिमार्गको प्राप्त होते हैं, इसी प्रकार अर्चिसे दिनको, दिनसे शुक्क पक्षको, शुक्र पक्षसे उत्तरायणको, उत्तरायणसे देवलोकको, देवलोकसे आदित्यको तथा आदित्यसे वैद्युतलोक को प्राप्त होते हैं। और फिर इनको ब्रह्म- लोक प्राप्त होकर पुनरावर्तन नहीं होता है॥ १५॥ वि० वि० भाष्य-जो गृहस्थाश्रमी लोग इस प्रकार अग्ति, समिध, धूम, ज्वाला, अङ्गार, विम्फुलङ्ग और श्रद्धादिविशिष्ट पञ्चाग्निविश्को जानने हैं और इसी प्रकार जो संन्यासी या वानप्रस्थ वनवासी श्रद्धायुक्त होकर सत्य-ब्रह्मकी यानी हिरण्यगर्भकी उपासना करते हैं. वे ज्योतिके अभिमानी देवताओंको प्राप्त होते हैं। उनसे दिनके अभिमानी देवनाओंको, उनसे शुक्कपक्षाभिमानी देवताको, उससे जिन कः महीनोंमें सूर्य भगवान् उत्तरायण हो कति हैं उन उत्तरायणके छ.मासोंके

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विद्याविनोद मध्य ३४८

अभिमानी देवताओंको प्राप्त होते हैं। षण्मासाभिमानी देवताओंसे देवलोकको, देव लोकसे आादित्यको और आदित्यसे विद्युत्सम्बन्धी देवताओंको प्राप्त होते हैं। उन वैद्युतदेवोंके पास एक मानस पुरुष आकर इन्हें ब्रह्मलोकमें ले जाता है। ये उन ब्रह्मलोकोमें अनन्त संवत्सर पर्यन्त रहते हैं। इनकी पुनरावृत्ति नहीं होती। जब तक गृहस्थ लोग पञ्चाग्निविद्या अथवा सत्य ब्रह्मको नहीं जानते तब तक बे श्रद्धादि आहुतियोके क्रमसे पाँचवीं आहुतिके हवन किये जाने पर उससे स्ररूप अग्निमें उत्पन्न होकर फिर लोकमें उत्थान करनेवाले होकर अग्निह त्रादि कर्मका अनुष्ठान करनेवाले होते हैं। स क्मके द्वारा वे धूमादि क्रमसे पुनः पितृलोकमें जाते हैं और पर्जन्यादि क्रमसे पुनः इस लोकमे लौटते हैं। उसमें पुनः स्त्रीरूप अग्निमें उत्पन्न होकर फिर कर्म करके पितृलोकमें जाते हैं। इस प्रकार घर्टायन्त्र (रहट) के समान गमनागमन द्वारा आते जाते रहते हैं। किन्तु जब वे ऐसा जानते हैं तो इस घटीयन्त्रके समान चक्कर काटनेसे छूटकर अचिमार्गको प्राप्त होते हैं ॥१५ ।। अब द्वितीय तथा तृतीय पक्षका उत्तर देते हुए पितृयान मार्गका कथन करते हैं. यथा- अथ ये यज्ञेन दानेन तपसा लोकाञ्जयन्ति ते धूमम- भिसंभवन्ति धूमाद्रात्रिथ रात्रेरपक्षीयमाणपक्षमपत्तीयमा- णपनाद्यान्षण्मासान्दत्िणादित्य एति मासेभ्यः पितृलोकं पितृलोकाच्चन्द्रं ते चन्द्रं प्राप्यान्नं भवन्ति ताथस्तत्र देवा यथा सोमथ राजानमाप्यायस्वापक्षीयस्वेत्येवमेनाथस्तत्र भक्षयन्ति तेषां यदा तत्पर्यवैस्यथेममेवाकाशमभिनिष्पद्यन्त आकाशाद्वायुं वायोरवृष्टिं वृष्टेः पृथिवीं ते पृथिवीं प्राप्यान्नं भवन्ति ते पुनः पुरुषाऔ हूयन्ते ततो योषाऔ जायन्ते लोकान्प्रत्युत्थायिनस्त एवमेवानुपरिवर्तन्तेऽथ य एतौ पन्थानौ न विदुस्ने कीटा: पतङ्गा यदिदं दन्दशूकम्॥१६॥।

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३४६ मृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय

भावार्थ-जो यज्ञ, दान तथा तपका अनुष्ठान करते हैं, वे धूमको यानी घूमाभिमानी देवताको प्राप्त होते हैं। इसी तरह धूमसे रात्रिदेवताको, रात्रिसे अपक्षीयमाण यानी कृष्णपक्षाभिमानी देवताको, कृष्ण पक्षसे जिन छे महीनोंमें मूर्य दृक्षिणकी ओर होकर गमन करता है उन छ मासके अभिमानी देवताको, छे माससे पितृलोकको और पितृलोकसे चन्द्रमाको प्राप्त होते हैं। चन्द्रमामें पहुँचकर ये अन्न हो जाते हैं वहाँ जैसे ऋत्विग लोग सोमको चमसमें धरकर पी जाते हैं उसी प्रकार इन्हें देवगण भक्षण कर जाते हैं। जब उनके पुण्य क्षय हो जाते हैं तो वे इस आकाश को ही प्राप्त होते हैं। फिर आकाशसे वायुको, वायुसे वर्षाको और वर्षास पृथिवी- को प्राप्त होते हैं। उसको प्राप्त होकर वे अन्न हो जाते हैं। फिर उनका पुरुष अग्निमें हवन किया जाता है। फिर पुरुषरूप अग्निमें आहुतिरूप होकर स्त्रीरूप अग्निसे पुनः इसलोकको प्राप्त होते हैं। वे इसी प्रकार बार बार अदल बदल होते रहते हैं। जो इन दोनों मार्गोंको नहीं जानते वे कीट, पतङ्ग, मक्खी, मच्छर आदि होते हैं ॥। १६ ।। वि. वि० भाष्य-जो उत्तर या दक्षिण इन दोनों ही मार्गोंको नहीं जानते यानी उत्तर अथवा दक्तिण मागकी प्राप्तिके लिए ज्ञान अथवा कर्मका अनुष्ठान नहीं करते वे कीट, पतङ्ग, और डाँस, मच्छर आदि योनियोंमें पड़ते हैं। इस प्रकार यह संसारगति बड़ी कष्टमय है। इसमें डूबेहुए का पुनः उद्धार होना ही दुर्लभ है। कर्मो द्वारा उत्तमोत्तमलोक यानी वहाँ होनेवाले भोग्य पदार्थोंकी प्राप्ति होती है पर अन्तमें इनका भी क्षय हो जाता है। अविनाशी सुख तो ब्रह्मत्मक्यज्ञान द्वारा ही प्राप्त हो सकता है। कोई कोई विद्वान् इस प्रकरणका यह तात्पर्य बताते हैं कि यहाँ देवयान तथा पितृयान मार्गका यह भाव है कि जो लोग परमात्मपरायग होकर अरण्यमें श्रद्धा भक्तिसे परमात्माकी उपासना करते हैं वे अर्चिके समान प्रकाशमान होकर पुनः आदित्यके तुल्य प्रकाशको प्राप्त होते हैं। एवं उत्तरोत्तर अधिक प्रकाशको पाकर मुक्तिको प्राप्त हो परान्तकालतक वहीं रहने हैं। उनका फिर पुनरावर्तन नहीं होता। जो उक्तमार्गसे मिन्न रागद्वेषपूर्वक लोकोंका विज्य करना चाहते हैं वे पहले धूम जै- अवस्थाको और फिर रात्रि जैसी अवस्थाको प्राप्त होते हैं, एवं उत्तरोत्तर क्षीणा- वस्थाको प्राप्त होकर कीट पतंगादि योनियोंमें जाते हैं। तात्पर्य यह है कि परमात्मविषयक उपासनादि साधनोंसे जे। ब्रह्मलोकको प्राप्त होते हैं उसंका नाम 'देवयान' है और जो यज्ञादिकों द्वार। सांसारिक भोग

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विथाविनोड भाव्य ३४७

प्राप्तिको ही मुख्य मानते हैं वे बारंबार जन्म मरणको प्राप्त होते हैं, इसका नाम पितृ- यान' है। यह मार्ग यानी पितृलोक केवल जन्मका ही साधन है। इस व्याख्य, न- की चर्चा भाष्यकारने नहीं की है अतः यह कहाँ तक प्रामाणिक है, इसका विज्ञ स्वयं विचार कर लें।

तृतीय ब्राह्मण

ज्ञान तो स्वतन्त्र है, किन्तु कर्म दैव और मनुष्य इन दो वित्तोंके अधीन है। कर्मके लिए जो प्रत्यवाय न करनेवाला हो ऐसे मार्गसे वित्त उपार्जन करना चाहिये। अतः उसकी महत्त्व प्राप्तिके लिए वह मन्थन कर्म आरन्भ किया जाता है जिससे वित्तकी स्वतः सिद्धि हो सके, जैसे कि कहते हैं- स यः कामयेत महत्प्रापुयामित्युदगयन आपूर्यमाण- पक्षस्य पुण्याहे द्वादशाहमुपसदब्रती भूत्ौदुम्बरे कथसे चमसे वा सर्वोषधं फलानीति संभृत्य परिसमुह्य परिलि- व्याभनिमुपसमाधाय परिस्तीर्यावृताज्यथ सस्कृत्य पुथसा नक्षत्रेण मन्थथ संनीय जुहोति। यावन्तो देवास्त्वयि जातवेदस्तिर्यश्चो अ्नन्ति पुरुषस्य कामान्। तेभ्योऽहं भागधेयं जुहोमि ते मा तृप्ताः सर्वैः कामैस्तर्पयन्तु स्वाहा। या तिरश्ची निपद्यतेऽहं विधरणी इति। तां त्वा घृतस्य धारया यजे सथराधनीमहथ स्वाहा ॥१ ॥ भावार्थ-जो महत्त्व प्राप्तिकी इच्छा करता है, वह उत्तरायणमें शुक्क पक्षकी पवित्र तिथिको बारह दिनों तक पयोव्रती होकर गूलरकी लकड़के प्याले या चम्मचमें सभी ओषधियाँ, फल और दूसरी सामग्रियोंको इकट्टी कर ले। हवन करनेवाली जगहको कुशोंसे बुहार तथा वेडोको गोवर-जलसे लीपकर अग्नि स्थापन करे।

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इसके अनन्तर अग्निक चारो तरफ कुशा बिछाकर गृह्यसूत्रोक्त प्रकारसे घृतका ससकार कर हस्त आदि पुल्लिद्ग नक्षत्रमे मन्थनको अपने और अग्निके बीचमे रखकर हवन करे। उस समय हवन करनेवाला उक्त दो मन्त्रोसे जैसे- १-'यावन्तो देवास्त्वपि कामस्तर्पयन्तु स्वाद्दा।' २-यातिरश्ची राधनीमहथ स्वाहा।' इन मन्त्रोका अर्थ यह है-हे जातवेद, तेरे अधीन जितने देवगण कु टलता युक्त होकर मनुष्यकी अभिलाषाओको पूर्ण नही होने देते, उनको उद्दश्य करके यह आज्यभाग मै तुझमे हवन करता हॅू, वे तृप्त होकर मेरी सम्पूण कामनाए पूरी करके मुझे तृप्त करे। स्वाहा, यानी ऐसा कहकर आहुति डाले। दूसरे मन्त्रका अर्थ मेरे अधीन सबकी मृत्यु है, ऐसे विचारसे जो कुटिलबुद्धि देवता तेरे सहारे रहता है, सम्पूर्ण साधनोको पूरा करनेमे समर्थ उस देवताके लिए मै घृत की धारासे यज्ञ करता हॅू, यानी उसको यह स्वाहाकार है। १ ॥ वि० वि० भाष्य-जो वित्तार्थी मै महत्त्वको प्राप्त करू, ऐसी कामना करता है यानी उच्च गतिको प्राप्त करनेकी इच्छा रखता है, उस पुरुषके लिए कर्तव्य है कि वह उत्तरायण शुक्कपक्षके किसी पवित्र दिनमे बारह दिन तक केवल दूध तथा दुग्वमिश्रित पदार्थो का ही सेनन करे और गूलर अथवा कासके चमसपात्रमे सब ओषधियो तथा सब फलोको रखकर फिर वेदीका लीपकर अग्न्यावान करे। तदनन्तर वेदीके चारो ओर कुश बिछाकर घूकका सस्कार कर शुभ पुरुष नक्षत्रमे होम करे। इसमे हवनकी सब सामग्री तथा ओषधियॉ पृथक पृथक् स्थानमे रखकर प्रथम यह प्रार्थना करे-हे जातवेद जो दैवी य नी प्राऊतशक्तियॉ पुरुषका कामनाओका हनन करती है, उनके लिए आहुति देते हैं कि वे अनुकूल होकर हमारी तृप्तिका साधन बने उन सबको हम घृकको धारासयुक्क हवनमे तृप्त करे ताकि स्वाहा यानी यह विचार शुभ हो। उक्त सम्पूर्ण ओषधियोके पिष्टपिण्डका यानी मन्थको उस औदुम्बर चमसमें दही मधु और घृ मे डालकर एक मथानीसे मथकर फिः अपने और अगिके मध्यमे रखे, फिर गूलरके स्रतासे आवापस्थानमे घृससे हवन करे॥ १ ॥ अब इन्द्रियोकी शुद्धिके उद्देश्यसे हवनके मन्त्र कहवे हैं, यथा- ज्येषठाय स्वाहा श्रेषाय स्वाहेत्यम्रौ हुत्वा मन्थे सथ- स्रवमवनयति प्राणाय स्वाहा वसिठठायै स्वाहेत्पत्रौ हुत्वा

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नाखन 1 ] विद्याविनाद माष्य ३४५

मन्थे सयस्रवमवनरति वाचे स्वाहा प्रतिट्ायै स्वाहेत्यऔ हुत्वा मन्थे सथस्वमवनयति चक्षुषे स्वाहा सपदे स्वाहे- स्यऔ हुत्वा मन्थे सथस्त्रवमवनयति भोत्राय स्वाहाऽऽय- तनाय स्वाहेत्यऔ हुत्वा मन्थे सथस्रवमवनयति मनसे स्वाहा प्रजात्यै स्वाहेत्यऔनौ हुत्वा मन्थे सथस्रवमवनयति रेतसे स्वाहेत्यऔौ हुत्वा मन्थे सथस्रवमवनयति॥२॥ भावार्थ-'ज्येष्ठाय स्वाहा श्रेष्ठाय स्वाहा' (जा सबसे बडा और मान्य है उसका स्वाहा यानी आहुति अर्पण है) इस मन्त्रसे अग्निमे हवन करके सस्त्रवको यानी स्त्रुवेमे रहे अवशिष्ट घीको मन्थमें यानी घोलमे डाले। प्राणाय स्वाहा वसिष्ठाय स्वाहा' इस मन्त्रसे अगिमे हवन करके सस्त्रवको मन्थमे डाले। 'वाचे स्वाहा प्रतिष्ठायै स्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निमे हवन करके धृतको पिष्ट पिण्डर डाले। 'च क्षुषे स्वाहा सम्पदे स्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निमे आहुति प्रदान करके अवशिष्ट आज्यको मन्थमे डाले। 'श्रान्राय स्नाहा आयतनाय स्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निमे हवन करके सस्त्रवको मन्थमे डाले। 'मनसे स्व्राहा प्रजात्य स्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निम आहुति डालकर घूरको पिष्टपिण्डमे डाले। 'रेतसे स्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निमे हवन करके सस्त्रत्रको मन्थमे डाले या मन्थमे डाल देता है।। २ ॥। वि• वि० भाष्य-जो सबसे बड़ा तथा श्रेष्ठ प्राण है, वह हमारा कल्याण साधन करे, जो साधारण प्राण है, उससे भी हम मङ्गलकी कामना करते है। इसी प्रकार वाणी, प्रतिष्ठा चन्तु, सम्पत्, मन तथा प्रजाति ये सब हमारे लिए मङ्गलकारी हो। इस उद्देश्यसे 'ज्यष्ठाय स्वाहा' इत्यादि पढ़कर अग्निमे आहुति दे और शेष बचे हुए आज्य भागका मन्थमे डाले। इसी प्रकार अन्य मन्त्रोको पढकर भी पूर्ववत् आहुति डाले ॥। २ ॥ अग्रये स्वाहेत्यत्रो हुत्ग मन्थे सथस्त्रनमवनयति सोमाय स्वाहेत्यओ्रो हुत्वा मन्थे सथस्त्रवमत्रनयति भू: स्वाहेत्यऔ हुखा मन्थे स०स्त्रतमवनयति भुबः स्वाहेत्यमौ

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३४० बृहदारण्यको्पनिषद् [अध्याय ६

हुत्वा मन्थे सथस्रवमवनयति स्वः स्वाहेत्यऔ हुता मन्थे सथस्त्रवमवनयति भूर्भुवःस्वः स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे सथ स्रवमवनयति ब्रह्मणे स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे सथस्त्रवम- वनयति क्षत्राय स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे सथ स्रवमवनयति भूताय स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे सथस्त्रवमवनयति भविष्यते स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे सथस्रवमवनयति विश्वाय स्वाहे- त्यग्नौ हुत्वा मन्थे सथस्रवमवनयति सर्वाय स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे सथस्त्रवमवनयति प्रजापतये स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे सथस्रवमवनयति॥३॥

भावार्थ-'अग्नये स्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निमें हवन करके संस्रवको मन्थ- में डाले। 'सोमाय स्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निमें हवन करके संस्वको मन्थमें डाले। 'भूः स्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निमें हवन करके बाकी बचे घृतको पिण्डमें डाले। 'भुवः स्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निमें हवन करके संस्रवको मन्थमें डाले। 'स्वः स्व्राहा' इस मन्त्रसे अग्निमें हवन करके अवशिष्ट आज्यको मन्थमें डाल दे। 'ब्रह्मणे स्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निमें हवन करके संस्रवको मन्थमे डाले 'क्षत्त्राय स्वाहा' यह वचन कहकर अग्निमें आहुति देकर आज्य को पिष्टपिण्डमें डाले। 'भूताय स्वादा' इस मन्त्रसे अग्निमें आहुति प्रतिप्त करके आज्यको मन्थमें डाले। 'भविष्यते स्वाहा' इस मन्त्रका उच्चारण करके अग्निमें आहुति दे अनन्तर संस्रवको मन्थमें डाल दे। 'विश्वाय स्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निमें आहुति डालकर संस्रवको मन्थमें डाले। 'सर्वाय स्वाहा' यह मन्त्र उच्चारण करके अग्निमें आहुति दे, अनन्तर संस्तवको मन्थमें डाल दे। 'प्रजापतये स्वाहा' इस मन्त्रका उच्चारण कर अग्निमें आाहुति डाल- कर अवशिष्ट घृतको पिष्टपिण्डमें डाले या डाल देता है ।। ३॥।

वि० वि० भाष्य-'जेष्ठाय स्व्राहा श्रेष्ठाय स्वाहा' यहाँसे लेकर दो दो आहुतियों का हवन करके संस्रवको मन्थमें डाल देता है, यानी स्तुवासे लगे हुए घृत- को सन्थमें गिरा देनेकी यह विधि है। भाष्यकार कहते हैं कि इस 'जयेष्ठाय श्रेष्ठाय'

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विद्याविनोद भाष्य ३५१

इत्यादि प्राणके लिङ्गसे ही यह निश्चय हो जता है कि इस कर्मविधानमें ज्येष्ठ श्रेष्ठादि रूप प्राणोपासकका ही अधिकार है। 'रेतसे स्वाहा' यहाँसे लेकर एक एक आहुति हवन करके संस्रवको मन्थमें डालता है। फिर दूसरी उपमथानीसे उसका मन्थन करता है। भाव यह है कि ब्रह्म, क्षत्र, भूत, विश्व, सर्व, प्रजापति इत्यादिकोंके उद्देश्यसे आहुति दे और शेष भाग मन्थमें डाले ॥। २-३ ॥ अब उक्त मन्थका अभिमर्शपूर्वक महत्त्व कथन करते हैं, यथा- अथैनमभिमृशति भ्रमदसि ज्वलदसि पूर्णमसि प्रस्तब्धमस्येकसभमसि हिंकृतपसि हिंक्रियमाणमस्युदगी- थमस्युदृगीयमानमसि श्रावितमसि प्रत्याश्रावितमस्यार्द्े संदीसमसि विभूरसि प्रभूरस्यन्नमसि ज्योतिरसि निधन- मसि संवर्गोऽसीति ॥४॥ भावार्थ-हे मन्थ, तू वायुके तुल्य गतिशील, अग्निके सदश तेजस्वरी, ब्रह्म- के समान सर्वत्र पूर्ण, आकाशके समान स्थिर और पृथिर्वीके समान अन्य कर्मोंका आधार है। तू प्रस्तोतासे स्तुति किया जाता है, उद्गातासे गाया जाता है, और अध्वयुसे सुनाया जाता है। तू आग्नीध्रखे प्रशंसा किया जाता है। तू बिजलीके समान चमकीला है। तू भूतोंका प्राणप्रद होनेके कारण अन्न और अनधिकारियोंके लिए प्रलयस्थान यानी मृत्यु है। अधिक क्या कहें तू संवर्ग है, यानी अपनेमें सब गुण रखनेवाला है॥४ ॥ वि० वि० भाष्य-कुछ कर्म करनेके अनन्तर 'भ्रमदसि' इस मन्त्रसे मन्थका स्पर्श किया जाता है। प्रकृत मन्त्रका अक्षरार्थ इस प्रकार समझना चाहिये- यह जेो मन्थ है सो प्राणात्मा होनेके कारण सभी शरीरोंमें घूमता रहता है। अग्नि- रूपसे सब जगह देदीव्यमान हो रहा है, ब्रह्मकी तरह परिपूर्ण है। आकाशरूपसे कम्प आदिकोंसे रहित है। किर्सका भी विरोधी न होनेसे तू यह अखिल विश्वरूप एक सभाके समान है। यज्ञारम्भमें प्रस्तोताकथित हिङकृत तू ही है। उसी प्रस्तोता द्वाग यज्ञमें हिडकृयमाण तू ही है। तू ही यज्ञारम्भमें उच्चस्वरसे उद्गाता गान किया गया उद्गीथ है। तू ही यज्ञके मध्यमें उसके द्वारा उदूगीयमान है। अधवर्यु द्वारा आषित तथा आग्तीभ द्वारा प्रत्याश्राक्ति तू हो है। तू मेघमें स्पष्ट प्रकाशन

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३५२ बृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय

मान है। तू विविध धारणकर्ता है। तू समर्थ है। तू भोक्ता अभिरपसे ज्योति है। कारणरूपसे सबका प्रलयस्थान है और सर्वसंहारी होनेसे तू संवर्ग है। पहले कहा गया है कि 'भ्रमदसि' इत्यादि मन्त्रसे इस मन्थका स्पर्श करना चाहिये। इस मन्त्रमें मन्थकी प्रशंसा की गई है, वह इस तात्प्यसे की गई है कि मन्थ यज्ञका शेष होनेसे उत्तम पदार्थ है, जो मनुष्य यज्ञ करता है वही इस उत्तम पदार्थको पाता है, अन्य नहीं। इमलिए प्रत्येक मनुष्यको उचित है कि वह यज् द्वारा इस उत्तम पदार्थको उपलब्ध कर अपने जीवनको सफल बनावे ॥४ ॥ स्तुतिधूर्वक मन्थपात्रका उठाना कहते हैं जैसे- अथैनमुद्यच्छत्यामथ स्यामहि ते महि स हि राजे- शानोऽधिपतिः स मा० राजेशानोऽधिपतिं करोत्वति ॥५।। भावार्थ-'अमसि' यानी तू जानता है, मुझे तेग माहात्म्य अच्छी रीतिसे मालूम है, यह प्राण राजा ईशान तथा अधिपति है। वह मुझे राजा, ईशान और अध्यक्ष बनावे॥ ५॥ वि० वि• भाष्य-वह हम सबका राजा, ईशान यानी शासनकर्ता और स्वामी है, वह हमें भी उक्त गुणोंसे विभूषित करे, इस प्रकार स्तुति करके पात्रके सहित मन्थको हाथपर ऊपर चठावे। यह सौभाग्यकी बात है कि यज्ञशेषको पाकर, जो यज्ञ करने जैसे शोमन वापारसे सिद्ध हो सकता है, यज्ञकर्ता परम प्रसन्नताका अनुभव करता है। जिन कर्मोंसे प्रसन्नता होती है, उनके करनेवालोंके अन्तःकरण शुद्ध हे ते हैं, यही ज्ञानाङ्गुरकी पूर्वपीठिका है॥ ५ ॥ अब मन्थका आचमन यानी भक्षण करना कहते हैं, यथा- अथैनमाचामति तत्सवितुर्वरेण्यम्। मधु वाता ऋतायते मधु क्षरन्ति सिन्धनः । माध्वीर्नः सन्त्वोषधीः। भूः स्वाहा। भर्गो देवस्य धीमहि। मधु नक्तमुतोषसो मधुमत्पार्थिव रजः। मधु द्यौरस्तु नः पिता। भुवः स्वाहा। धियो यो नः प्रचोदयात्। मघुमान्नो वनस्पति- मरधुमाँर अस्तु सूर्य:। माध्वीर्गावो भवन्तु नः ।स्व:

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शखन ३ ] विद्याविनोद भाष्य ३५३

स्वाहेति। सर्वा च सावित्रीमन्वाह सर्वाश्च मघुमतीरह- मेवेदथसर्वं भृयासं भूर्भुवः स्वः स्वाहेत्यन्तत आचम्य पाणी प्रताल्य जघनेनाग्निं प्राकशिरा: संविशति पातरा- दित्यमुपतिष्ठते दिशामेकपुण्डरीकमस्यहं मनुष्याणामेक- पुण्डरीकं भूयासमिति यथेतमेत्य जघनेनाग्निमासीनो वशं जपति ॥६॥ भावार्थ-इसके अनन्तर 'तत्सवितुर्वरेण्यम्' इस मन्त्रसे इस मन्थको भक्षण करे। 'मैं उस आदित्यके सर्वोत्तम पदका ध्यान करता हूँ।' 'वायु मधुर मन्दु गतिसे बह रहा है।' 'नदियोंमें शहद जैसा रस प्रवाहित हो रहा है।' 'हमें ओषधियाँ मधुर रसप्रद् हों।' उक्त अर्थ जिन मन्त्रोंके हैं, उन अर्थोवाले मन्त्रोंका उच्चारण करके मन्थका पहला भाग भक्षण करे। 'भूः स्वाहा।' 'हम सवितादेवके तेजका ध्यान करते हैं।' 'अहर्निश सुखप्रद हों।' 'भूमिके रज:कणोंसे किसी प्रकार घबराहट न हो।' 'पितृस्थानीय दुलोक हमें सुखकारी हो।' उप्युक्त अर्थवाले मन्त्रोंसे मन्थका दूसरा आस भक्षण करे। 'भुबः स्वाहा।' 'जो सवितादेव हमारी बुद्धियोंका प्रेरक है।' 'हमारे प्रति वह मधुर रसमय वनस्पति यानी सोम हो।' 'हमारे लिए आदित्य मधुवाला हो।' 'दिशाएँ या किरणें या गौएँ हमारे लिए सुखप्रद हों।' इस अर्थवाले मन्त्रोंसे तीसरा ग्रास खावे। 'स्त्रः स्वाहा।' इसके अनन्तर 'भूभुवः स्त्रः' इत्यादि समस्त गायत्रीमन्त्र, 'मधुवाता ऋता यते' इत्यादि सम्पूर्ण मधुमती ऋचा, तथा 'अह्मेवेदं सर्वं भूयासम्' 'भूर्भुवः स्वः स्वाहा' ऐसा कहकर अन्तमें सम्पूर्ण मन्थको खाकर दोनों हाथ धोकर अग्निके पश्चिम भागमें बैठे किन्तु सिर पूर्वकी ओर रहें। फिर सबेरेके समय 'दिशामेक ....... भूयासम्' (तू दिशाओंमें प्रसिद्ध एक पूर्ण सर्वोत्तम है, मैं मनुष्योंमें एक पुण्डरीक- श्रेष्ठ होऊँ) इस मन्त्रसे सूर्यका उपस्थान करे यानी भास्करदेवको नमस्कार करे। इसके अनन्तर जिस् रास्तेसे गया था उसीसे वापिस लौटकर अग्निके पश्चिमकी कमेर बैठे और वहाँ वंशको जपे जो आगे कहा जा रहा है। ६॥। ४५

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३५४ शृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याद ६

वि० वि० भाष्य यहाँ मन्थ भक्षण करनेका यह प्रकार है, यथा- गायत्रीके प्रथम पाद, एक मधुमती ऋचा, और एक व्याहृतिसे प्रथमग्रास करे, गायत्री के द्वितीय पाद, द्वितीय मधुमती ऋचा और द्वितीय व्याहृतिसे दूसरा ग्रास खावे, और गायत्रीके तृतीय पाद, तृतीय मघुमती ऋचा तथा तीसरी व्याहतिसे अन्तमें तीसरा ग्रास भक्षण करे। इसके अनन्तर सम्पूर्ण गायत्री, समग्र मधुमती ऋचा, और 'मैं ही यह सब हो जाऊँ' ऐसा कहते हुए 'भूर्भुवः म्वः स्व्राहा' ऐसा कह कर समस्त मन्थको भक्षण करना। पहलेसे ही सारे द्रव्यके ऐसे चार भाग करलेने जिससे चार ग्रासोंमें सारा द्रव्य समाप्त हो जाय। जो कुछ पात्रमें लगा वह जाय उस पात्रको धोकर उस सवको चुप चाप पी जाय। फिर हाथ धो ले। किसी किसी महात्माका यह कहना है कि इस मन्त्रमे मन्थद्रव्यको उद्देश्य करके परमात्मासे प्रार्थना की गई है। उनके कथनका तात्पर्य यह है कि जिस परमात्माकी कृपासे हम यज्ञ करनेमें समर्थ हो सके, इसीसे मन्थ मिला, हम उसे सधन्यवाद प्रार्थनाके साथ स्मरण क्यों न करें, जैसे-

सर्वोत्पादक परमात्मा जो सबसे श्रेष्ठ है, उसकी कृपासे हमारे लिए वायु मधु- समान हो, नदियाँ मधुसमान होकर बहें और ओषधियाँ मधुसमान स्वादिष्ठ हों। इस प्रकार पवित्र परमात्मदेवकी हम उपासना करें, ताकि हमारे लिए रात्रि और उषाकाल मधुसमान हों, अधिक क्या कहें ? पृथिवीके जितने रज हैं वे सब हमारे लिए मधुसमान हों और गौएँ हमारे लिए मीठा दूध दें. यह आपसे प्रार्थना है। इस प्रकार परमात्मासे प्रार्थना करता हुआ 'तत्सवितुर्वरण्यं भर्गो देवस्य धीमहि' इस मन्त्रका जप करे और जो ऋचायें ईश्वरको कर्ता तथा मङ्गलप्रद कथन करनेवाली हैं, उन सबका इस समय पाठ करे। अन्तमें 'भूर्भुवः स्त्रः' यह पढकर मन्थके सम्पूर्ण द्रव्यका भक्षण कर पात्रको धोकर रख दे। फिर हवनाग्रिके अभिमुख बैठकर यह प्रार्थना करे कि हे परमात्मन्, मैं सब दिशाओं और सब मनुष्योंमें फूले हुए कमलके समान होऊँ। फिर उसी अगनिके सन्मुख ब्रह्मवेत्ताओंके वंशका स्मरण करे ॥ ६ ॥

अब मन्थ द्रव्यका प्रभाव वर्णन करते हुए ब्रह्मवेत्ताओंकी वंशपरंपराको कहते हैं, यथा-

तथ हैतमुद्दालक आरुणिर्वाजसनेयाय याज्ञवल्वया-

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शश्य ३ विद्यावनाद भाड ३५५

यान्तेवासिन उक्त्वोवाचापि य एनथ शुष्के स्थाणौ निषि- ञ्चेज्ायेरञ्छाखा: प्ररोहेयुः पलाशानीति ॥७॥ भावार्थ-आरुणि उददालकने अपने शिष्य वाजसनेय याज्ञवल्क्यके प्रति कथन किया कि यदि उक्त मन्थद्रव्यको शुष्क लकड़ीके ऊपर डाल दिया जाय तो उसमें शाखाएँ फूटकर पत्ते निकल आवेगे।। ७॥ एतमु हैव वाजसनेयो याज्ञवल्क्यो मधुकाय पैङ्गया- यान्तेवासिन उक्त्वोवाचापि य एन शुष्के स्थाणौ निषि- ञ्चेजायेरञ्छाखाः प्ररोहेयुः पलशानीति ॥८॥ भावार्थ-इस मन्थका वाजसनय याज्ञवल्क्यने अपने शिष्य मधुरु पैङ्गचको उपदेश करके कहा था-यदि काई इसे सूखे ठूँठ पर डल देगा तो उसमें भी शाखाएँ उत्पन्न हो जायँगी और पत्ते निकल आवेंगे।। ८॥ एतमु हैव मधुकः पैङ्गचश्चूलाय भागवित्तयेऽन्ते- वासिन उक्त्वोवाचापि य एन शुष्के स्थाणौ निषिञ्चे- ज्ायेरञ्छाखाः प्ररोहेयुः पलाशानीति॥६॥ भावार्थ-मधुक पैङ्गने अपने शिष्य चूलभागवित्तिको उपदेश करके कहा-इस मन्थको यदि कोई सूखे ठूँठ पर डाल देगा तो उसमें शाखाएँ उत्पन्न हो जायँगी और पत्ते निकल आवेंगे।। ह ।। एतमु हैव चूलो भागवित्तिर्जानकथ आयस्थूणायान्ते- वासिन उक्त्वोवाचापि य एनश शुष्के स्थाणौ निषिञ्चे- ज्जायेरञ्छाखाः प्ररोहेयुः पलाशानीति॥१० ॥ भावार्थ-चूल भागवित्तिने अपने शिष्य जानकि आयस्थूणको 'यदि कोई इसे सूखे ठूँठ पर डाल देगा तो उसमें शाखाएँ चत्पन्न होकर पत्ते निकल आवेंगे' इस प्रकार उपदेश देकर इस मन्थका माहात्म्य बताया था ॥ १०॥ एतमु हैव जानकिरायस्थूणः सत्यकामाय जाबाला-

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३५६ शृंहदारण्यकोपनिषद् अध्याय ६

यान्तेवासिन उक्त्वोवाचापि य एन& शुष्के स्थाण निषि- ञ्चेज्जायेरञ्छाखा: प्ररोहेयुः पलाशानीति॥ ११ ॥ भावार्थ-जानकि आयस्थूणने अपने शिष्य सत्यकाम जाबालको इस मन्थके विषयमें 'यदि कोई इसे सूखी लकड़ी पर छोड़ दे तो उसमें डाली फूट आावेंगी और पत्ते निकल आवेंगे' इस प्रकार इसका उपदेश दिया था ॥। ११ ।। एतमु हैव सत्यकामो जावालोऽन्तेवासिभ्य उक्त्वो- वाचापि य एनथ शुष्के स्थाणौ निषिश्चज्जायेरञ्छाखा: प्ररोहेयुः पलाशानीति तमेतं नापुत्राय वाऽनन्तेवासिने वा बरुयात् ॥ १२ ॥ भावार्थ-तत्यकाम जाबालने अपने शिष्योंको उपदेश देते हुए इस मन्थकी महिमाके विषयमें कहा था कि कोई मनुष्य यदि इसे सूवे काष्ठ पर छोड़ देगा तो उसमें डालियाँ निकल आवेंगी और वे पत्तोंसे भर जायेंगो। इस मन्थका उपेश जो पुत्र था शिष्य न हो उसके प्रति न करे॥ १२ ॥ वि० वि० भाष्य-'तं हैसमुद्दालकः' यहॉँसे आरम्भ करके सत्यकामो बागालोऽन्तेवासिभ्य .... परोहेयुः पलाशानि' यहाँ तक उद्दालकसे लेकर एक एक आचार्यके क्रमसे प्राप्त हुए इस मन्थका सत्यकाम जायालने बहुतसे शिष्योंको उप देश दिया था, उन्होंने कहा कि यदि भक्षणके लिए संस्कार किये गये इस मन्थको किली शुष्क स्थाशु-नीरस काष्ठ पर भी गिरा दिया जय तो उस ठूँठमें शाखाएँ वृक्षके अवयव-उत्पन्न हो जायॅंगे और पत्ते भो निकल आवेंगे जैसे कि हरे वृक्षमें हाते हैं। ऐसी बात है तो फिर इस कर्मसे यदि कामनाको सिद्धि हो जाय तो यह कौन बड़ा काम है ? तात्पर्य यह है कि यह कर्म निश्चिन फल देनेवाला है। यह सब जो यहाँ कथन किया है. कर्मकी स्तुतिके लिए है। यहाँ इस विद्याके अधिकारी दो ही माने गये हैं। क्योंकि विद्या प्राप्तिके लिए १-शिष्य, २-वेद पढा हुआ, ३-धारणा शक्ति सम्पन्न, ४-घन देनेवाला, ५-प्रिय पुत्र और विद्यासे विद्यान्तर सिखानेवाला, ये छः तीर्थ हैं, यानी विद्या- दानाधिकारी हैं। उनमेंसे इस प्राणदुर्शनयुक्त मन्यविज्ञानकी प्राप्तिकी अनुज्ञा (आज्ञा) पुत्र और शिष्य दो ही तीर्थोंके लिए है। ६-१२॥।

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विद्याविनोद भाष्य ३५७

पहले सामान्यतः 'सर्वोपधपिष्ट द्रव्यरूप मन्थपदार्थ है' यह कहा गया था. अब विशेषतः मन्थद्रव्यके कर्मो का वर्णन करते हैं, अर्थात् अब यहाँ मन्थकर्मकी सामग्रीका विवरण कहा जाता है, यथा- चतुरौदुम्बरो भवत्यौदुम्बरः स्रुव औदुम्बरश्चमस औदुम्बर इध्म औदुम्बर्या उपमन्थन्यौ दश ग्रम्याणि धान्यानि भवन्ति व्रीहियवास्तिलमाषा अशुप्रियङ्गवो गोधू माश्च मसूराश्च खल्वाश्च खलकुलाश्च तान् पिष्टान्दधनि मधुनि घृत उपसिश्चत्याज्यस्य जुहोति॥१३ ॥। भावार्थ-यह मन्थकर्म चतुरौदुम्र है, यानी इसमें गूल को लकड़ीके बने चार पदार्थ होते हैं, जैसे-स्ुवा गूलरकी लकड़ीका, चमन भी गूलरका, गूलरको ही समिवा, और गूलरको ही दो उनमन्थनी होती हैं। इसमें बान, यब, तिल, उर्द, साँवा, काँगनी, गेहूँ, मसूर, बाल और कुलयी इन दस ग्रामीण अन्नोंका उपयोग होता है। इन्हें पोसकर दवि, मधु और घो में मिठाकर घृनसे हवन करे॥ १३ ॥ वि० वि० भाष्य-यह कहा गया है कि ग्रम्य धान्योंमें से दस तो अवश्य गहण करने चाहिये, जो कि उपर्युक्क हैं। इसके अतिरिक्त जो यज्ञसंबन्धी नहीं हैं, उनको छोड़कर यथाशक्ति सभी ओषधियाँ और फल लेने चाहियें। यानी दस प्रकार का अन्न पीसकर घृतमें संस्कार करके मन्थ द्रव्य बनाया जाता है उसमें सभी यज्ञौषधियाँ भी मिलाई जाती हैं। वेदान्त शासतरमें ज्ञानका प्राधान्य है और कर्म भी मान्य है। जो अपनेको वेदान्ती मानकर कर्मका परित्याग करता है वह कुछ नहीं जानता। वेदान्तीके लिए पहले कर्मयोगी होना आवश्यक है, पश्चात् वह ज्ञानयोगी हो सकता है। जैसे क्षेत्र जितना ही परिष्कृत होगा, धान्य भी उसमें वैसा हो उत्तम उत्पन्न होगा। ऐसे ही कर्मके साबुनसे हृदय-पट जितना ही निर्मल होगा उतना हो अच्छा उस पर ज्ञानका रंग चढ़ेगा। विद्वान् महात्मा कर्म तो करते हैं पर वह निष्काम होता है, इतर संसारी लोग सकाम कर्मो के करनेमें लगे हैं। उपनिषद् वेदान्तशास्त्रकी प्रतिपादक हैं उनमें ज्ञानकाण्ड प्रधान है। किन्तु साथ ही ज्ञानोपयोगी मात्र कर्मों का भी उनमें वर्णन हैं। ऐसे ही यहाँ इस कर्मकी चर्चा की गई है, यहाँ कर्मका स्वतन्त्र कथन करनेमें तात्पर्य नहीं है॥। १३।

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३५८ शृहदारण्यकापनिषद् [अध्याय ६

चतुर्थ ब्राह्मरा

धनकी च्छा करनेवाले प्राणोपासकके लिए श्रीमन्थ नामक कमका उपदेश देकर अब विशिष्ट (खास योग्यतावाले) पुत्रकी चाहना करनेवालेके प्रति पुत्रमन्थ नामक कम कथन करनके लिए इस ब्राह्मणका आरम्भ किया जाता है। उसमे पहले पुत्रकी उत्पत्तिके कारण रेत और वार्यकी स्तुति करते हैं जेमे- एषां वै भूतानां पृथिवी रसः पृथिव्या आपोऽपामो षधय ओषधीना पुष्पाणि पुष्पाणां फलानि फलानां पुरुषः पुरुषस्य रेतः ।। १ ॥ भावार्थ-सब भूतोका रस पृथिवी है पृथिवीका जल, जलोका ओषधियॉ, ओषधियोका पुष्प, पुष्पोका फल, फलोका रस मनुष्यशरीर और मनुष्यशरीरका रस वीर्य है।। १॥ वि० वि० भाष्य-ससारमे जिसने भी चर तथा अचर भूत हैं या और जो भी कुछ है सबका सारभूत पृथिवी है। यह सब भूताका मधु है ऐसा पहल कहा जा चुका है। जलमे ओत प्रोत होनेके कारण पृथिवीका रस जल है। जलोका रस ओषधियाँ हैं क्योकि वे जलसे वृद्धिको प्राप्त होती हैं, ओषधियोमे रस भरा रहता है। आगेका अर्थ स्पष्ट है।। १ ॥ इस प्रकार जब कि यह रेत सब भूतोका सार है तो फिर इसकी स्थितियोग्य स्थान कौनसा है ? यह कहते हैं, यथा- स ह प्रजापतिरीक्षांचक्रे हन्तास्मै प्रतिष्ठां कल्पया- नीति स स्त्रियथ ससृजे ताथसष्टाऽध उपास्त तस्मारस्न- यमध उपासीत स एत प्राञ्च ग्रावाणमात्मन एव समुद- पादयत्तेनैनामभ्यसृजत्॥२॥ भावार्थ-[ सस्कृतमे ]-स प्रजापतिर्विराडात्मा हेवामालोचना चक्रे कृत वान्, कथम्। हन्तास्मै सर्वसारभूताय रेतसे योग्या प्रतिष्ठा कल्पयानीति विचार्य स

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बाक्ण ४ ] विद्याविनोद भाष्य ३५९

प्रजापतिः स्तियं पत्नीशब्देनोकां शत्तरूपाख्यां ससृजे। तां सृष्टा प्रजापतिरधः प्रदेशे योन्याख्य उपास्त मैथुनाख्यमुपासनं कृतवान् यस्मात्तस्माद्द्यतनोपि स्ति्रियमघः प्रदेशेSवाच्यकर्मणोपासीत। नन्वेतत्किमर्थ विर्धीयतेऽस्य स्वभावत एव प्राप्तत्वादित्यतोऽत्र वाजपेयदृष्टि- करणार्थमिति तत्साधम्यमाह-स इति। पशुकर्मणि प्रवृत्तः काम्यात्मनः स्वीयमेवैतं प्राञ्चं प्रागञ्व्मानं सोमाभिष- वोपलस्थानीयं प्रजननेन्द्रियं समुदपारयत् उत्तूरितवान् स्त्रीव्यञ्जनाऽभिमुखं कृतवान्। तेन पाषाणवत्कठिनेनैनां स्वियमभ्यसृजदमि समन्ततो सुहुर्मुहुः संसर्ग कृतवान् ।।२।। वि० वि. भाष्य-इस ब्राह्मणमें कुछ मन्त्र ऐसे आये हैं जिनका हिन्दी अनुवाद नहीं करेगे। इन मन्त्रोंमें स्त्री पुरुषोंकी वे कुछ गुप्त क्रियायें लिखी गई हैं जिनका स्पष्ट वर्णन करना शायद बहुतसे पाठकोंको उचित न प्रतीत हो। साथ ही अपने संन्यासीके स्वरूपके अनुरूप न होनेके कारण भी हमने ऐसा नहीं किया। ऐसा ठीक किया या नहीं, यह तो हम पाठकों पर ही छोड़ते हैं। हाँ सुपरिपक्क- बुद्धि पुरुषोंके लिए संस्कृतमें व्याख्यान कर दिया है। यहाँ शंका हो सकती है कि जिसकी सर्वसाधारणमें व्याख्या करनी सभ्यताके विरुद्ध है, ऐसे विषयका इन उपनिषद जैसे ब्रह्मविद्याके ग्रन्थोंमें वर्णन क्यों किया गया ? इसका उत्तर यह है कि उपनिषद्विज्ञान परिपूर्ण है, उसमें सभी बातें आनी चाहियें, दूसरी बात यह प्रतीत होती है कि प्राचीनकालमें ऐसी चर्चासे किसी प्रकारके संस्कारोंके मलिन होनेकी सम्भावना नहीं थी, उस समय विद्याभिलाषियोंमें संयम बहुत था। फिर यह भी बात है कि किसी विशेष विषयकी चर्चा करनेका अथवा उसपर गवेषणापूर्वक विचार करनेका अधिकार विशेष पुरुषोंको ही होता है। आयुर्वेदमें चिकित्सार्थ शरीरके प्रत्येक अङ्ग उपाङ्गपर स्पष्ट विचार किया गया है। यहाँ भी सृष्टिक्रमादिबोधनार्थ अथवा इस रूपमें सृष्टिरचना करनेवालेके प्रशंसार्थ ऐसा वर्णन करना उचित ही है। कुछ बाते रहस्यपूर्ण होती हैं, उन्हें सर्वसाधारण के समक्ष गोप्य ही रखना ठीक होता है। इसी बातका अनुसरण करके हमने इस ब्राह्मणकी व्याख्या संस्कृतमें की है, जिसे कुछ विज्ञ लोग समझ लेंगे और बहुतसे नहीं भी समझेगे तो कोई हर्ज न होगा। प्रत्येक मन्त्रका संचिप्त भावार्थ बता दिया जायगा, जैसे इसी मन्त्रका भाव है कि प्रजापतिने यानी परमात्माने सन्तति उत्पन्न करनेके लिए स्त्रीकी रचना की॥२॥

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३६० वृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय ६

तस्या वेदिरुपस्थो लोमानि बर्हिश्चर्माधिषवणे समिद्धो मध्यतस्तौ मुष्कौ स यावान् ह वै वाजपेयेन यजमानस्य लोको भवति तावानस्य लोको भवति य एवं विद्वानधो पहासं चरत्यासाथ स्त्रीणाथ सुकृतं वृङ्क्तेऽथ य इदम- विद्वानधोपहासं चरत्याऽस्य स्त्रियः सुकृतं वृञ्जते ॥ ३॥ भावार्थ-[संस्कृत मे ] तस्याः स्तिय उपस्थ एव वेदिः, तत्स्थानि लोमानि बर्हिः योनिस्थचर्माSSनडुहं चर्म। तत्स्थी पुरुपस्य दक्षिणोत्तरौ सुष्कौ बृषणावधिष- वसे दक्षिणोत्तरे सोमाभिपवफलके। स्त्रीव्यञ्जनस्य मध्यप्रदेशः समिद्धो दीप्ोऽग्निः। अस्मिन् वाजपेयटृष्टिकरणो कि स्यादित्यत आह- स प्रसिद्धो यावत्परिमाणो लोको वाजपेयेन यजमानस्य भवति ताबानस्येवम- वाच्यकर्मोपासितुर्लोको भवति। किञ्च य एवं यथोक्तं वाजपेयसाम्यमस्य कर्मणो विद्वानधोपहास मवाच्यं वर्म चरत्यनुतिष्ठति स स्त्रीणां सुकृतं शुभकर्म वृङ्क्त आवजयति स्वीकरोति। अथ पुनर्योऽस्य वाजपेयसम्पन्नत्वं रेतसः सारतमत्वं चाविद्वानधोपहास चरत्यस्याविदुषः सुकृतं स्तिरिय उपभुञ्जते॥। ३ । वि. वि० भाष्य-स्तरी एक प्रकारकी वेदी है, जिसमें वीर्यरूप आहुतिखे शुभ सन्तान उत्पन्न होती है। जो इस प्रकार सन्तानोत्पत्तिका उद्देश्य समझता है वह वाजपेययज्के फलका भागी होता है। और ऐसा ही पुरुष स््रीको स्व्राधीन रख सकता है॥। ३ ॥ जो विद्वान् यानी ज्ञाता नहीं हैं उनको यह कर्म निन्दित है। इसमें अनेक आचार्यों की सम्मति दिखाते हैं, यथा- एतद्द स्म वै तद्विद्वानुद्दालक आरुणिराहैतद्ध स्म वै तद्विद्वान्नाको मौदगल्य आहैतद्द स्म वै तद्विद्वान्कुमा- रहारित आह बहवो मर्या ब्राह्मणायना निरिन्द्रिया विसु- कृतोऽस्माल्वोकास्प्रयन्ति य इदमविद्वाथसोऽघोपहासं चर- न्तीति बहु वा इदथ सुप्स्य वा जाग्रतो वा रेतः स्कन्दति॥ ४ ॥

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भ्राज्ञण ४ ] विद्याविनोद भाष्य ३६१

भावार्थ-[संस्कृतमें ] उद्दालक आरुणि्ह तदेतदवाच्यं कर्म वाजपेयसम्पन्नं विद्वानाह स्म तथा नाको मौद्गल्यः कुमारहारितश्राSडह स्म बहवो मर्त्या मरणवर्माणो मनुष्या अयनं येषां ते ब्राह्मणायना ब्राह्मणजातिमात्रपजीविनो ब्राह्मणाभासा निरि- न्द्रिया विश्लिष्टेन्द्रिया विसुकतो विगतपुष्पाः सन्तोऽस्माल्लोकात्प्रयन्ति परलोकनष्टाः सन्तो नरकं गच्छन्ति। के ते, ये पशुकर्माण इदं वाजपेयसम्पन्नत्वमविद्वांसोऽवि- जानन्तोऽघोपहास चरन्तीति। श्रीमन्थकम कृत्वा पल्या ऋतुकालं ब्रह्मचमण प्रतीक्षमाणस्य सुप्तस्य जाम्तो वा रागबाहुल्याद्वा स्वलं वा यदिदं रेतः स्कन्दृति निःसरति॥४॥। वि• वि० भाष्य-आरुणि उद्दालक, नाक मौद्गल्य तथा कुमार हारितका कथन है कि बहुतसे मनुष्य जो नाममात्रके बाह्मण हैं वे सन्तानोत्पत्तिके रहस्यको न जानकर पशुमार्ग समान अधोपहासका आचरण करते हैं। वे इस लोकसे नष्ट हो जाते हैं अर्थात् जाग्रत् तथा स्वप्नावस्थामें वीर्यको वृथा नष्ट करनेके कारण उनकी अल्पायु होती है।।४ ।। इस मन्त्रमें वीर्यको व्यर्थ नष्ट करनेवालेके लिए प्रायश्चित्त कथन करते हैं, यथा- तदभिमुशेदनु वा मन्त्रयेत यन्मेऽ्य रेतः पृथिवी- मस्कान्त्सीद्दोषधीरप्यसरद्यदपः । इदमहं तद्रेत आददे पुनर्मामैख्विन्द्रियं पुनस्तेजः पुनर्भगः। पुनरग्निर्धिष्ण्या यथास्थानं कल्पन्तामित्यनामिकाङ्गष्टाभ्यामादायान्तरेण स्तनौ वा भ्रृ वौ वा निमृज्यात् । ५ ॥ भावार्थ-[संस्कृतमें] तदा तत्स्कन्नं रेतो हस्तेनाभिमृशेत्स्पृशेदनुपश्चान्मंत्रयेथ। तन्मंत्रमाह-मे ममाद्याप्राप्तिकाले यद्रेतः पृथिवीं प्रत्यस्कान्त्सीत्सकन्रमासीद्यदोषधीः प्रति च पूर्वमप्यसरद्गमद्यचापः स्वयोनिं प्रतिगतमभूत्तदिदं रेतः संप्रत्यहमाददे गृह्ामि। इति मन्त्रणानामिकाङष्ठाभ्यामादाय गृहीत्वा भ्रुवौ स्तनौ वाऽन्तरेण भ्रुवोः स्तनयोर्वा मध्ये विमृज्याल्लेपयेदित्यन्वयः। तन्मन्त्रमाह- रेतोरूपेण बहिरनिर्गतमिन्द्रियं पुनर्मा प्रत्येतु समागच्छतु। तेजस्त्वग्गता कान्तिः, सा पि रेतोनिर्गमनान्निगंता पुनर्मामेत्वित्यनुषङ्गः। भगः सौभाग्यं ज्ञार्नं ४६

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३६२ वृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय ६

वा पुनरायातु। अग्निरधिष्णयं स्थानं येषां देवानां तेडगनिधिष्ण्या देवास्तद्रेतो यथास्थानं कल्पन्तां कल्पयन्तु। इतिशब्दो मन्त्रसमाप्रिद्योतकः ॥ ५ ॥। वि० वि० भाष्य-जो अवकीर्णी है यानी जो वीर्यको व्यर्थ नष्ट करनेवाला है वह पश्चात्ताप करे कि मुझसे जो उक्त पाप हुआ है उसकी शुद्धिका उपाय यही है कि मैं फिर तेज तथा ऐश्वर्यका सम्पादन करूँ, जिससे कि फिर पूर्ववत् तेजस्करी होऊँ, और 'मरणं विन्दुपातेन' सदा इसका ध्यान रखूँ ॥ ५॥ इस मन्त्रमें संतानार्थी द्वारा प्रार्थनाका कथन करते हैं, यथा- अथ यद्युदक आत्मानं पश्येत्तदभिमन्त्रयेत मयि तेज इन्द्रियं यशो द्रविणय सुकृतमिति श्रीर्ह वा एषा स्त्रीणां यन्मलोद्वासास्तस्मान्मलोद्ाससं यशस्विनीमभि- क्रम्योपमन्त्रयेत ॥ ६॥। भावार्थ-[संस्कृतमें] यदि कदाचित् प्रमादत उदके रेतः सिक्त्वा स्वस्या- SSत्मान छायां पश्येत्तदा तदुदकमभिमन्त्रयेत। तन्मन्त्रमाह-इन्द्रियं रेतो मय्य- स्त्वित्यथ्याहारः, कि लक्षणमिन्द्रियम्, तेजो विज्ञानं यशः कीतिद्रविणं वित्तं सुकृतं सत्कर्मेति। एतानि विशेषणानि तु ताहग्गुणपुत्रोत्पादनहेतुत्वात्। अथ यस्यां पुत्रो जनयितव्यस्तां स्तौति- स्त्रीणां मध्ये हैषा पत्नी श्रीर्गुणाढ्या यद्यस्मान्मलोद्वासा उद्भूतमलचद्वूरत्रा तस्मात्तां मलोद्वाससं यशस्विनीं कीर्तिमर्ती वक्यमाणत्रिरात्रव्रतं कृत्वा चतुथडहि

कथयेत ॥ ६ ॥ वि० वि० भाष्य-फिर जल अथवा दर्पणमें अपना मुख देखकर प्रार्थना करे कि प्रभो, अपनी कृपासे आप मुझे तेजस्वी तथा बलवान् बनावें। मुझे इन्द्रिय- शक्ति, शुभकर्म और धन दें। मेरी स्त्री को श्री एवं शुद्ध वस्त् रखने यानी पहननेका स्वभाव दें, अर्थात् मुझे धन धान्य एव स्वास्थ्य प्रदान करें पर साथ ही मेरी खीका फूहड़पन छुड़ा दें ॥ ६ ॥ सा चेदस्मै न द्द्यात्काममेनामवक्रीणीयात् सा चेदस्मै नैव दद्यात्काममेनां यष्टया वा पासिना वोपहत्या-

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ब्राह्मण ४ ] विद्याविनोद भाष्य ३६३

तिक्रामेदिन्द्रियेण ते यशसा यश आदद इत्ययशा एव भवति॥७॥ भावार्थ-[संस्कृतमें ] अभिलावपूर्तिमस्त्रीकुर्वतीं आर्या कामं यथाभिलषिति भोग्यादिभिरवक्रीणीयाद्वशीकुर्यादिति। एवमपि सा चेदस्म पशुकर्म कर्तुमवकाशं नैव दद्यात्तदैनां यष्टया दण्डेन पाणिना हस्तेन वोपह्ृत्य कामं यथेष्टमतक्रमेदभिगच्छेत। एवं बलात्कारासम्भवे पुनरुपायान्तरमाह-शप्स्यामि त्वां दुर्भगां करिष्या- मीति प्रख्याप्येन्द्रियेण पञ्चमेन्द्रियेण यशसा यशोहेतुना कृत्वा ते तव यशो यशोहेतुः पुत्रोत्पत्तिकरं रेतोऽहमाददे गृह्वामीति मन्त्रेण शपेन्। सा चैवं शप्ता सत्ययशा एवा- पुत्रैव भवति॥७॥ वि• वि. भाष्य-यदि स्री उक्त शोभाको धारण न करे यानी पुरुषके अनुकूल न वर्ते और मलिन रहे तो उसको शिक्षा दे। इतने पर भी न माने तो यथायोग्य शिक्षा और आग्रहसे श्री तथा शुद्ध वस्त्रोंवाली बनावे। इस पर भी स्त्री न माने तो उसको धमकी या अभिशाप दे। पहले खीको सभी प्रकारकी साम- प्रियोंसे परिपूर्ण करके खूच प्रेमका बर्ताव करे। इतने पर भी न माने तो शिक्षा और दण्डसे काम ले। जो पहले प्रेम और भोग्य सामग्रीसे सतरीको सन्तुष्ट नही करके उसे ताड़न करता है उसे नरकमें भी जगह नहीं मिलती और जो स्त्री सब कुछ अनु- कूलता करने पर भी आज्ञाकारिणी न हो वह भी नरकमें मारी मारी फिरती है॥७।। सा चेदस्मै दद्यादिन्द्रियेण ते यशसा यश आदधा- मीति यशस्विनावेव भवतः ।। ८ ॥ भावार्थ-[संस्कृतमे ] एवं शापभयात्सा चेदस्मा अवाच्य कर्म कर्तुमवकार्श दद्यात्तदा यशसेन्द्रियेणोक्तलक्षोन ते तव यश आदवाम्यारोपयामीत्यनेन भन्त्रेण शापे निवर्तिते सति यशस्त्रिनावेवोभावपि भवत इत्यर्थः ॥८ ॥ वि० वि० भाष्य-जब स्त्री पुरुषकी आज्ञाकारिणी हो जाय तब पुरुष उसके प्रति यह कथन करे कि मैं तेरा यश वर्धन करनेके लिए उपस्थित हुआ हूँ, सन्तानोत्पत्ति द्वारा हम दोनों यश लाभ करें। ८ ॥ अब जो सती पतिसे द्वेष रखती है उसे इस विषयमे प्रश्नन्न होनेका उपाय कहा जाता है, यथा-

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३६४ बृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय १

स यामिच्छेतकामयेत मेति तस्यामर्थं निष्ठाय मुखेन मुखथ संधायोपस्थमस्या अभिमृश्य जपेदङ्गादङ्गात्संभ- वसि हृदयादधिजायसे। स त्वमङ्गकषायोऽसि दिग्धवि- द्धामिव मादयेमाममू मयीति॥ ६॥ भावार्थ-[सस्कृतमे ] स पूर्वोक्तमन्थकर्मण्यधिकृत. कामीय मा मा काम- येताभिलषेतति स्वभार्या यामिच्छ्ेत्तस्या योनावर्थ प्रजननेन्द्रिय निष्ठाय निच्तिप्य श्रीमुखेन सह स्वमुख सवाय मेलयित्वा तस्या उपस्थ पाणिनाऽभिमृश्य स्पृष्टवा जपेन्मन्त्रम्। तमेवाह- हे रेत। त्व मदीयात्सर्वस्मादङ्गात्सम्भवसि समुत्पद्यसे विशेषतश्च हदया झाडीद्वारेणाधिजायसे प्रकटीभवसि। एवविध स त्वमङ्गाना कषायो रसोऽसि। अतो दिग्धविद्धामिव विषलिप्रशरविद्धा मृगीमिवेमाममू मद्धार्या मयि विषये मादय मद्युक्ता कुरु मद्वशा कुर्वित्यर्थ ॥। ३॥ वि. वि. भाष्य-इसके अनन्तर 'अङ्गादङ्गात्सभवसि' पुरुष उक्त मन्त्र को पढे। अर्थात् हमार अद्ग अङ्ग तथा हृदयकी नाडी नाड़ीसे वह रस उत्पन्न होता है। इसलिए इसरको सन्तानात्पत्तिके उपयोगमे ही लाना चाहिये, व्यर्थ नष्ट करना उचित नही है। इसलिए सबको चाहिये कि शुभ सङ्कल्पसे उत्तम सन्तान उत्पन्न करे।। ६।। अथ यामिच्छेन्न गर्भ दभीतेति तस्यामर्थ निष्ठाय मुखेन मुखथ सधायाभिप्राण्यापान्यादिन्द्रियेण ते रेतसा रेत आदद इत्यरेता एव भवति॥ १०॥ भावार्थ-[सस्कृतमें ] यौवनादिभ्रशभयाद्या स्वमार्यामिच्छेद्र्ं न धीत न धारयादात तस्यामर्थामत्यााद पूर्ववत्। अभभिप्राण्यापान्यात्पशुकर्मकाले प्रथम स्वीयपुस्त्वद्वारा तदायस्त्रीत्व वायुविसर्जनरूपमभिप्राणन कृत्वा तेनैव द्वारेण तदादान- लक्षणमपानन च कुर्यात्। तन्मन्त्रमाह-इन्द्रियेण रेतसा ते रेत आदद इत्यनेनैव मन्त्रेणेव कृते सत्यरेता एव सा भवात ॥ १० ॥ वि• वि० भाष्य-सन्तानार्थ एकाग्रता और समभावसे पति पत्नीको गर्भप्राप्ति करनी चाहिय ॥ १० ।

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विद्याविनोद भाष्य ३६४

अथ यामिच्छेद्दधीतेति तस्यामर्थ' निष्ठाय मुखेन मुखथ संधायापान्याभिप्राण्यादिन्द्रियेण ते रेतसा रेत आदधामीति गर्भिण्येव भवति ॥ ११ ॥ भावार्थ-[ संस्कृतमें ] अथ गर्भ दधीतेति यामिच्छेत्तस्यामर्थमित्यादि पूर्व- बदपान्याभिप्राण्यात्स्वकीयपञ्चमेन्द्रियेण तदीयपञ्चमेन्द्रियाद्रतः स्वीकृत्य तत्पुत्रोत्पत्ति- समर्थ कृतमिति मत्वा स्वकीयरेतसा सह तस्मिन्नित्षिपेदित्येताद्दशमपाननपूर्वक- मभिप्राणनं कर्मेन्द्रियेण रेतसा रेत आदधामीत्यनेन मन्त्रेण एवं कृते सति सा गभिण्येव भवति ॥ ११॥ अब पतिव्रतधर्मकी दढताके लिए जारकर्मकी निन्दा करते हैं, यथा- अथ यस्य जायायै जार: स्यानं चेदुद्विष्यादामपात्रेS ग्निमुपसमाधाय प्रतिलोमथ शरबर्हिस्तीर्त्वा तस्मिन्नेताः शरभृष्टीः प्रतिलोमा: सर्पिषाऽक्ता जुहुयान्मम समिद्धेऽ हौषी: प्राणापानौ त आददेऽसाविति मम समिद्देऽहौषी: पुत्रपशूस्त आददेऽसाविति मम समिद्देSहौषीरिष्ठासुकृते त आददे ऽसाविति मम समिद्देSहौषीराशापराकाशौ त आददेऽसाविति स वा एष निरिन्द्रियो विसुकृतोऽस्माल्लो- कात्प्रैति यमेवंविद ब्राह्मणः शपति तस्मादेवंविच्छ्रोत्रियस्य दारेण नोपहासमिच्छेदुत ह्येवंवित्परो भवति॥ १२ ॥। भावार्थ-[ संस्कृतमें ] अथ यस्य गृहिणो जायायें भार्याया जार उपपतिः स्यान्तं चेज्जारं स्वाभाविकः पतिर्द्विष्यात्तदाSSमपात्रेSपक्कमृन्मये भाजन उल्जेखनादि पञ्चभूसंस्कारपूर्वकमभ्निमुपसमाधाय प्रतिलोमं दक्षिणाग्रं पश्चिमाग्रं वा यथा स्यात्तथा शरमयं बर्हिस्तीर्त्वाSSस्तीर्य तस्मिन्नग्नावेताः प्रसिद्धाः शरभृष्टीः बाणेषीकाः प्रतिलोमा विपरीताआः सपिषाऽक्ता घृताक्ता जुहुयात्। तन्मन्त्रमाह-मम स्वभूते योपाग्नी यौवनादिना समिद्धेऽहौषी रेता हुतवानस्यतोऽपराघिनस्ते तव प्राणापाना-

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३६६ बृहदारण्यकोपनिषद् [अभ्याय

वादद इतिमन्त्रमुच्चार्य फडित्युक्त्वा होमं कुर्यादन्ते चासावित्यात्मनः शत्रोर्वा नाम गृहीयात्। तथा मम समिद्ेऽहीषी रिति शत्रोरपराधं ज्ञापयित्वा पुत्राश्च पशवश्च पुत्रपशवस्तान्पुत्रपशूंश्चाहमादद इति पूर्ववत् द्वितीयाहुति हुत्वाऽन्तेSसाविति नाम गृह्हीयात्। तथा मम समिद्धेऽहौषीरित्यत इष्टासुकृते श्रौतस्मार्ते कर्मणी त्वदीयेडहमादद इति तृतीयाहुति हुत्वाSसावित्युच्चारयेत्। तथा मम समिद्धेऽहौषीरित्वत आशा प्रार्थना पराकाशः प्रतिज्ञा तस्या निष्पादितस्य कर्मणः प्रतीक्षा तावाशापराकाशौ ते तवाSडदद इति चतुर्था हुति हुत्वाSसावित्युच्चारयेदिति। यथोक्ताभिचारकर्म द्वारा शापदानफलमाह-एवंविधमन्थकर्म विद्वान् प्राणदर्श्यव यं ब्राह्मणं शपति, स वा पष ब्राह्मणो निरिन्द्रियो निर्गतेन्द्रियो विसुकृद्विगत- पुण्यकर्मा सन्नस्माल्लोकात्प्रति गच्छति। तस्मादुक्त्वच्यमाणहेतोरेवंवित्पर दारगमने यथोक्तवच्यमाणानिष्टविच्छ्ोत्रियस्य दारेण सह नोपहासमिच्छेन्नर्मापि न कुर्यात् किमुताधपहासम्। हि यस्मादुतैवंविदप्युक्तकर्मादिविच्छ्ोत्रियोऽपि परः शत्रुर्भवति तस्मादिदं पापकम न कार्यमित्यर्थः ॥१२॥ वि० वि० भाष्य-किसी स्त्री को उपपतिसंसर्ग हुआ हो तो उस जार- संसगजन्य दोष की निवृत्ति के लिए प्रापश्चित्त में हवन का विधान इस प्रकार है कि अग्न्याधान करके कुशा के स्थान में उलटे सरकण्डे बिछाकर हवन करे। उस समय यह कथन करे कि किसी को भी ऐसा निन्दित कर्म नहीं करना चाहिये, जो इस प्रकारका कर्म करेगा वह विकलेन्द्रिय हो जायगा. तथा उसके सब पुण्य नष्ट हो जाँयगे। इसलिए परदारगमन करना पापकर्म है। यह कथन उपलक्षण है, यानी स्त्री और पुरुष इन दोनोंके लिए समान है, जैसे पुरुषको परदाराभिगमन पाप है, उसी प्रकार स्त्रीको भी परपुरुषको कुदृष्टिसे देखना अधर्म है॥ १२ ॥ अब अपनी भार्या के साथ ऋतुकालाभिगामी होने का कथन करते हैं, यथा- अथ यस्य जायामार्तवं विन्देत त्र्यहं कथसेन पिबेद- हतवासा नैनां वृषलो न वृषल्युपहन्यात् त्रिरात्रान्त आप्लुत्य व्रीहीनवघातयेत्। १३ ।। भावार्थ-[संस्कृत में ] अथ यदा यस्य मन्थविधिज्ञस्य जायामातवमृतु. भावो विन्देत्प्राप्तुयात्तदा तस्य भार्या तदारभ्य दिवसत्रयं कसे कांस्यपात्रे न पिबे- न्ाश्नीयादहतवासा अनुपहृतवासाश्च स्यात्स्नानोत्तरकाल इति बोध्यम्। पनां

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विद्याविनोद भाष्य ३६७

व्रतस्थां वृषलः शूद्रो नोपहन्यान्न स्पृशेद्वषली तद्धार्या च नोपहन्यात्। एवं त्रिरात्रान्ते चतुथSहनि प्रातःकाल आप्लुत्य स्नात्वा पूर्वोक्काहतवस्त्रादिविशिष्टां ब्रीहीनवघातये- कच रुश्र पणार्थम् ।।१३।। वि. वि० भाष्य-जो स्त्रीऋतुमती हो वह तीन दिन तक कांसे के बर्तन में न पानी पीबे न खावे। उसको कोई मलिन पुरुष या मलिन स्त्ी स्पर्श न करे। फर स्नान करनेके बाद सुन्दर वस्त्र पहन धानोंको कूटे। तात्पर्य यह है कि ऋतुमती सत्रीको यदि कोई मलिन स्री स्पर्श करेगी तो सम्भव है उसके शरीरमें दुर्गन्धित परमाशु प्रविष्ट होकर उसे हानि पहुँचा देगे इसलिए उचित है कि उस समय किसी मलिन द्रव्य अथवा वस्त्रादिकोंको उपयोगमें न लादे। साथ ही ऋतुमरताकी भावना भी पवित्र रहनी चाहिये, यानी मनमें क्रोध द्वेषादिक दोष न होने चाहियें॥ १३ ॥ संतान उत्पन्न होनेके लिए स्त्री पुरुषके आहारका वर्णन करते हैं, यथा- स य इच्छेतपुत्रो मे शुक्को जायेत वेदमनुश्नुवीत सर्व- मायुरियादिति क्षीरौदनं पाचयित्वा सर्पिष्मन्तमश्रीयाता- मीश्वरौ जनयितवै॥ १४ ॥ भावार्थ -- [सस्कृतमें ] मे मम पुत्रः शुक्को बलदेववद्गौरः शुद्धो वा जायेत, एकं वेदम्नुन्नुवीत पठेत्सर्वं शतवर्षप्रमितमायुरियादवाप्तुयादिति य इच्छेन्स क्ीरौदनं क्षीरेणौदनं स्वभार्ययैव पाचयित्वा सर्पिष्मन्तं घृताप्लुतं तमोदनं कृत्वा तौ दम्पती अश्नीयातां ततश्च तौ यथोक्तपुत्रं जनयितवै जनयितुमीश्वरौ समर्थौ॥ १४॥ वि. वि० भाष्यजो यह चाहते हैं कि हमारे यहाँ गौर वर्ण, एक वेद के जाननेवाला, पूर्ण सौ वर्ष आयुभोग करनेवाला पुत्र उत्पन्न हो तो उन दम्पती-स्ती पुरुपों को चाहिये कि वे दूधमें चावल पकाकर उनमें व डालकर खावें। इस प्रकारके आहारसे वे उपयुक्त योग्यतावाला पुत्र प्राप्त करनेमें समर्थ हो सकेगे॥ १४॥ अथ य इच्छेत्पुत्रो मे कपिलः पिङ्गलो जायेत द्वौ वेदावनुन्नुवीत सर्वमायुरियादिति दध्योदनं पाचयित्वा सपिष्मन्तमश्नीयातामीश्वरौ जनयितवै ॥१५ ॥

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३६८ बृहदारण्यकोपनिषद्

भावार्थ-[संस्कृतमें ] कपिलो वर्णतः पिङ्गलः पिङ्गलाचः। दृध्यौदनं पाचयित्वा दध्रा चरुं अ्रपयित्वा।। १५।। वि. वि० भाष्य-जिनकी यह अभिलाषा हो कि हमारे कपिल वर्ण, भूरे नेत्रोंवाला, दो वेदों का ज्ञाता तथा परमायु भोगनेवाला पुत्र हो तो वे दम्यती चावल पकाकर उसमें दही और घृत डालकर भोजन करें। ऐसा करके वे वैसा पुत्र लाभ कर सकेंगे जैसा इस मन्त्र में लिखा है।। १५॥ अथ य इच्छेत्पुत्रो मे श्यामो लोहितानो जायेत त्रीन्वेदाननुम्नवीत सर्वमायुरियादित्युदौदनं पाचयित्वा सर्पिष्मन्तमश्नीयातामीश्वरौ जनयितवै॥ १६ ॥ भावार्थ-[संस्कृतमें ] उदौदनमुदक ओदनं पाचयित्वेति नीरादिव्या- वृत्त्यर्थम्। १६॥ वि० वि० भाष्य-जो यह चाहते हों कि हमारे घरमे श्यामवर्ण, लाल आखोंवाला, तीन वेदोंको जाननेवाला तथा परमायुभोगी पुत्र उत्पन्न हो तो वे बी पुरुष चावल पकाकर उसमें घी डालकर खायें। तब वे ऐसी सन्तान उत्पन्न कर सकते हैं जैसी चाहते हों ॥ १६ ॥ अथ य इच्छेद्दुहिता मे पण्डिता जायेत सर्वमायु- रियादिति तिलौदनं पाचयित्वा सर्पिष्मन्तमश्नीयाता- मीश्वरौ जनयितवै॥ १७॥ भावार्थ-[संस्कृतमें ] दुहिता कन्या पण्डिता सत्रयुचितगृहकर्मणि कुशला, शास्त्रेऽनधिकारात्, इति केचित्। अन्येतु स्त्रीणामपि शास्त्ाध्ययने पुरुषाणामिव पूर्णा- विकार: अध्ययने योग्यता च। भाष्यकृद्भिः "दुहितुः पाण्डित्यं गृहतन्त्रविषयमेव वेदेऽनधिकारात्" इति कथितम् तन्तु क्षत्रधर्मप्रवृत्तानां खीणां विषये, नतु साधारणा उददिश्योक्तम्। विस्तरभयान्नाधिकमुच्यते ॥१७ ॥ वि० वि० भाष्य-जो यह चाहते हैं कि हमारी कन्या पण्डिता तथा पर- मायुष्मती हो, वे तिलोंसे मिले चावल पकाकर घीमें मिलाकर खायें तो वे सत्ी पुरुष पेसी लड़की प्राप्त कर सकेंगे॥। १७ ॥

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भावन ४ ] विद्याविनोद माष्य ३६९

अथ य इच्छेत्पुत्रो मे पण्डितो विगीतः समितिंगम: शुश्रूषितां वाचं भाषिता जायेत सर्वान्वेदाननुन्नुवीत सर्व- मायुरियादिनि माधसौदनं पाचयित्वा सर्पिष्मन्तमश्रीया तामीश्वरौ जनयितवा औच्षेण वार्षभेण वा ॥१८॥ भावार्थ-[संस्कृतमें ]-विविधं गीतो विजिगीथः प्रख्यातः समिति विद्व- तसभां प्रति गच्छतीति समितिंगमः शुश्रूषितां श्रोतुमीप्सितां वाचं वाणीं भ षिता जायेत। मांसमिश्रिमोदनं मांसौदनम्। तस्य नियममाह-आदोन वाऽडर्षभेण वेति। उक्षा पुंङ्गवस्तदीयं मांसमौद्तणम्। ततोऽ्यधिकतया ऋषभस्तदीयं मांस- मार्षभम्। एतच्च भिन्नदेशकालादिविषयमत्र निषिद्धत्वात्तत्स्थाने मृगादिमांसं क्रीत्वा आ्ह्यम् ॥ १८ ।। वि० वि० भाष्य-जो यह कामना रखते हैं कि हमारा पुत्र पण्डित हो, विद्वानोंकी सभामें खूब बोलनेमें पटु हो, प्रियवक्ता हो सब वेदोंका ज्ञाता हो, और पूर्ण आयुको प्राप्त होनेवाला हो, तो वे स्त्री पुरुष उक्षा या ऋषभका मांस मिला हुआ सघृत चावल खायें। तब उनकी इस इच्छाकी पूर्ति हो जाती है। इस मन्त्रकी व्याख्या करनेमें विद्वानोंका बड़ा मतभेद है, इस मन्त्रमें यह वाक्य है कि "मांसौदनं ......... भौत्षेण वाऽडर्षभेण वा।" इस मन्त्रमें शब्दमर्यादया मांस भक्षणका डल्लेख स्पष्ट प्रतीत हो रहा है, इससे मांस्भत्तियोंका मत पुष्ट होता है। किन्तु जो यह कहते हैं कि वेदमें कहीं मांस भक्षण करना नहीं लिखा, वे इस मन्त्रार्थके विषयमें यह बतलाते हैं, यथा- इस मन्त्रमें मांसका अर्थ पशुमांस नहीं है। क्योंकि जब प्रारम्भमें अम्, दुग्ध और घृत भक्षण का उपक्रम है, तब उपसंहारमें भी वही होना चाहिये। अन्य उपक्रमोपसंहारकी एकवाक्यता नहीं होगी। फिर यह भी बात है कि जब सत्रह्वें मन्त्रमें पण्डिता कन्या उत्पन्न करनेके लिए केवल तेल ओदनरूप भोजनका कथन किया गया है, तो फिर क्या कारण है कि पण्डित पुत्रकी उत्पत्ति करनेके लिए मांस खाने का विधान किया जाय ? और यह भी बात है कि जब 'उत्षा' एक ओषधिका नाम है तो उसका अर्थ बैल पशु क्यों माना जाय ? इसी तरह 'ऋषभ' भी ओषधिका ही नाम है। और मांस शब्दके अर्थ मांसचछदा, ४७

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३७० शृददारण्यकोपनिषद् [अध्याय ₹

मांसरोहिणी तथा मांसी आदि ओषधियाँ है। तब पवित्र वेदमें मांस शब्दसे आमिष क्यों लिया जाय ? इत्यादि अनेक त्कोंसे यह सिद्ध हो जाता है कि मांसका अर्थ ओषधि है, न कि गोस। कुछर शङ्करभाष्यानुसारियोंने इस भांस शब्दका खटकता सा अर्थ किया है, जैसे आनन्दगिरिजीने-देश- विशेषापेक्षया कालविशेषापेक्षया वा मांसनियमः" यह लिखा है। तथा बृहदा- रण्यकके वृत्तिकार पुरुषोत्तमानन्दने यहाँ व्यवस्था दी है कि "एतच्च भिन्नदेश- कालादिविषयमत्र निषिद्धत्वात्।' अर्थात् ये यहॉ मांस खाना तो मानते हैं, पर वह इस देशमें बैल या सॉड़का न हो, किसी अन्य पशुका हो। प्रकृत भत्त्याभत््यके विषयमे बहुत वुछ कहा जा सकता है, पर इतनी यहाँ जगह नहीं है। वस्तुतः इस विषयमें लोगोने बहुत ही खीचातानी कर दी है। कुछ लोग ऐसे हैं जो मांस शब्दको सुनना तक पसन्द नही करते और कुछ ऐसे हैं जो जीवहत्याको धर्मकार्य समभते हैं। पर हम तो अन्तमें यही कहेगे कि किसी भी निरपराध जीवको कष्ट पहुँचानेसे बढ़कर मनुष्यके लिए और कोई बड़ा पाप नहीं है॥ १८ ॥। इस प्रकार फिर उन कूटे हुए चावलोंका भात आदि बनाना चाहिये, इसपर कहते हैं, यथा- अथाभिप्रातरेव स्थालीपाकावृताज्यं चेष्टित्वा स्थाली- पाकस्योपघातं जुहोत्यन्नये स्वाहाऽनुमतये स्वाहा देवाय सवित्रे सत्यप्रसवाय स्वाहेति हुत्वोद्ृत्य प्राश्नाति प्राश्येत- रस्याः प्रयच्छति प्रक्षाल्य पाणी उदपात्रं पूरयित्वा तेनैनां त्रिरभ्युक्षत्युत्तिष्ठातो विश्वावसोऽन्यामिच्छ प्रपूर्व्यीं सं जायां पत्या सहेति॥१६ ॥ भावार्थ-[संस्कृतमें ]-अथ चतुर्थदिवसे प्रातरेव सन्ध्याद्यनुष्ठानपूर्वक भार्यापिण्डिततण्डुल नादाय स्थार्लपाकावृत्ता स्थालीपाकविधिनाऽडज्यं चेष्टित्वा संस्कृत्य, एतच्चर्वादि संस्काराणामप्युपलक्षणम्। ततः स्थालीपाकमुपहत्योपहत्य स्वल्पं स्वल्प गृहीत्वा प्रधानाहुतीर्जहोति। तन्मन्त्रानाह-'अग्नेय स्वाहा' 'अनुमतये स्वाहा' 'देवाय सवित्रे सत्यप्रस- वाय स्वाहा' इति। एतत्प्रधानाहुतित्रयं हुत्वा स्विष्टकदाहुतिं च पश्चात्स्थालीस्थं

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शाश्स ४ ] विद्याविनोद भाष्य ३७१

चरुशेषं पात्र उद्धत्य सर्पिनाऽक्तं कृत्वा पतिः प्रथमं प्राश्नाति प्राश्यच तदेवोच्छिष्ट- मिसरस्याः पत्न्याः पतन्यै प्रयच्छति। ततो हस्तौ प्रताल्य शुद्धाचमनं कृत्वोदपात्रं पूरयित्वा तेनोदकेनैनां भार्या त्रिस्तिर्वारमभ्युक्चति। तन्मन्त्रमाह-भो विश्वावसो गन्वर्वं त्वमतो मद्धार्यातः सकाशादुत्तिष्ठान्यां कार्माप प्रपूर्व्पा पीवरीं तरुणीं सह पत्या क्रीडमानामिच्छराह पुनः स्वीयामिमां जायां समुपैमीति। मन्त्रपाठस्तु सकृदेवेत्यर्थः।।१६।। वि० वि० भाष्य-प्रातः समयमें स्थालीपाककी विधिसे घृनका संस्कार करके चरुसहित घृतद्वारा 'अग्नये स्व्ाहा' 'अनुमतये स्वाहा' 'देवाय सवित्रे सत्यप्र- सवाय स्वाहा' इन वाक्योंसे हवन करे। ये आहुतियॉ देकर फिर स्त्रिष्टकृत आहुति दे। इसके अनन्तर स्थालीमें जो चरु शेष रहे उसको प्रथम पति खावे और पश्चात् पत्नीको दे। फिर हाथ धोकर एवं शुद्ध जलसे आचनन करके पानीसे पात्र भर अपनी स्नीके ऊपर तीनबार जल छविड़ककर प्रार्थना करे कि हे प्रभो ! आप हम दोनोंको प्रसन्न रखें॥ १९ ॥ अब उक्त दुम्पत्तीका प्राण वागादिकी तरह सम्बन्ध कथन करते हैं, यथा- अथैनामभिपद्यतेSमोऽहमस्मि सा त्वथ सा त्वमस्य- मोऽहं सामाहमस्मि ऋकत्वं द्यौरहं पृथिवी त्वं तावेहि सथरभावहै सह रेतो दधावहै पुथसे पुत्राय वित्तय इति॥ २० ॥ भावार्थ-[संस्कृतमें ]-अथैवं गन्धर्वं प्रस्थाव्य यथाकामं क्ीरोदनादिभोज- नानन्तरमेतां भार्यामभिपद्यते मन्त्रेणाSSलिङ्गयेत्। तन्मन्त्रमाह-अहं पतिरमः प्राणोडस्मि त्वं सा वागसि। कथमावयोरुक्तरूपत्वमित्याशङ्कायां वाच: प्राणाधीनत्व प्रसिद्धमित्यभिप्रेत्य सा स्वमस्यमोऽहमिति पुनर्वचनम्। तथाऽहं सामास्मि त्वं च ऋगसि। ऋकपत््योर्गानावाच्यकर्मवपये सामपुरुषयोराधारत्त्वसामान्यात्। धौ रहं जनकत्वात् पृथिवी त्वं मातृत्वात्। तावावां संरभावहै संरम्भमुद्यमं करवावहै, एहि त्वमागच्छ। कोऽसौ संरम्भ: सह मिलित्वा रेतो दधावहै, रेतोधारणमा- वाभ्यां कार्यमयमेत संरम्भ:। स किमर्थ पुंसे पुंसत्वविशिष्टाय पुत्राय वित्तये लाभायेति ॥ २०॥

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३७२ बृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय ६

वि० वि• भाष्य-इसके अनन्तर पति पत्नीसे कहे कि मैं प्राण हूँ और तू वाणी है। यानी जिस तरहसे वाणी प्राणके अधीन है उसी तरह तू मेरे अधीन है। फिर कहे-मैं साम हूँ, तू ऋचा है, यानी जिस प्रकार साम ऋचाके अधीन होता है इसी प्रकार मैं तेरे अधीन हूँ। तत्पश्चात् यह कहे कि मैं दौ हूँ और तू पृथिवी है, यानी जिस रीतिसे दौ उग्र वृष्टिसे पृथिवीको तृप्त करता है उसी प्रकार मैं भोग्य आदि पदार्थोंसे तुझको तृप्त करूँगा। हम दोनों संतानसे युक्त हों। ऐसा संकल्प उत्तम पुत्रोत्पत्तिका कारण होता है॥ २० ॥ अथास्या ऊरू विहापयति विजिहीथां द्यावापृथिवी इति तस्यामर्थ निष्ठाय मुखेन मुखथ संधाय त्रिरेनामनुलो- मामनुमाष्टि विष्युयोनिं कल्पयतु त्वष्टा रूपाणि पिथशतु। आसिश्चतु प्रजापतिर्धाता गर्भ दधातु ते। गर्भ धेहि सिनीवालि गर्भ धेहि परथुष्टके। गर्भ ते अश्विनौ देवा- वाधत्तां पुष्करसजौ ॥। २१ ॥ भावार्थ-[ संस्कृतमें ]-अथाSSलिङ्गनानन्तरमस्याः पतन्याऊरू विहापयति विश्लेषयति। तन्मन्त्रमाह-हे द्यावापृथिवी! ऊरुरूपे युवां विजिहीथां विश्िष्टे भवेतमिति मन्त्रेणावकाशे कृते सति तस्यां योनावर्थ प्रजननेन्द्रियं निष्ठाय नित्िप्य मुखेन मुखं सन्धायानन्तरमेनां भार्यामनुलमां मूर्धानमारभ्य पादान्तं त्रिवितिर्वारं पाणिनाऽनुमार्ष्टि मार्जनं कुर्यात्। तन्मन्त्रानाह-विष्ुर्व्याप्रनशीला भगवांस्तव योनिं कल्पयतु पुत्रोत्पत्ति- सम्थी करोतु। त्वष्टा सविता तव मे सुतस्य वा रूपाण्यवयवान् पिंशतु विभा- गशो दर्शनयोग्यान करोतु। प्रजापतिर्विराडात्मा मदात्मना स्थित्वा त्वयि रेत आसिश्तु प्रत्िपतु। घाता पुनः सूत्रात्मा ते तव गर्भ त्वदात्मना स्थित्वा दधातु धारयतु पुष्णातु। दशाहंदेवता सिनीवाली तस्या विशेषणं पृथुष्टुके पृथुर्विस्तीर्णा स्तुतिर्यस्या सा पृथुष्टका त्वदात्मना वर्तमाना तस्वाः सम्बुद्धिहें प्ृथुष्टुके! सिनीवालि गर्भ घेहिं धारय क् अश्विनौ देवौ तव गर्भ मदात्मना स्थित्वाSडघत्तां गर्भाधानं कुरुताम् ॥ २१॥

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बाक्ण ४ ] विद्याविनोद भाष्य २७३

हिरण्मयी अरणी याभ्यां निर्मन्थतामश्चिनौ। तं ते गर्भथ हवामहे दशमे मासि सूतये। यथाडग्निगर्भा पृथिवी यथा दयौरिन्द्रेण गर्मिणी। वायुर्दिशां यथा गर्भ एवं गर्भ दधामि तेऽसाविति ॥ २२ ॥ भावार्थ-[संस्कृतमें ]-ज्योतिर्मयी अरणी प्रागासतुर्याभ्यामरणीभ्यां पुरा- मृतरूपं गर्भमश्विनौ देवभिषजौ निर्मन्थतां मथितवन्तौ। तं तथाभूतं गर्भ ते तव जठरे हवामहे दधामहे दशमे मासि सूतये प्रसवार्थमित्यर्थः। एवमाधीयमानं गर्भ दृष्टान्तेन दर्शयति-यथा पृथिवी अग्निगर्भा यथा वा द्यौर्धुलोक इन्द्रेण सूर्येण गर्भिणी। यथा वा दिशां वायुर्गरभ एवं गर्भ ते तव दधामि असावहमिति स्वात्मनो नाम गृह्ाति भार्याया वाऽन्त इत्यर्थः ॥ २२॥ सोष्यन्तीमन्दिरभ्युक्षति यथा वायुः पुष्करिणीथ समिङ्गयति सर्वतः। एवा ते गर्भ एजतु सहावैतु जरा- युणा। इन्द्रस्थायं व्रजः कृतः सार्गलः सपरिश्रयः। तमिन्द्र निर्जहि गर्भेण सावाराथ सहेति॥२३ ॥ भावार्थ-[ संस्कृतमें ]-प्रसवकाले सोष्यन्तीं प्रसवं प्राप्तुवन्तीं भारयां भर्ता मन्त्राभ्यामद्ि: कृत्वाऽभ्युक्षति। तदाह-यथाऽयं वायुः पुष्करिणीं तद्धागं सर्वतः समिज्जयति स्वरूपोपघातमकृत्वा चालयति एवा एवमेव ते गर्भ एजतु चलतु जरायुणा गर्भवेष्टनचर्मणा मांसपेशीलक्षणेन सहावैतु निर्गच्छतु। इन्द्रत्य प्राणस्य गर्भस्य वाडयं योन्यात्मको व्रजो मार्ग: सार्गलः सर्गकाले गर्भाधानकाले वार्डर्गलया निरोधेन सहवर्तमान: कृतः सपरिश्रयः परिश्रयेण परिवेष्टनेन जरायुणा सहितः। तं मा्ग प्राप्य हे इन्द्र ! प्राणप्रसूतिमारुतात्मरत्वं गर्भेण सह निर्जहि निर्गच्छ निःसरणानन्तरं निर्गम्यमाना मांसपेशी सावरा तां च निर्गमयेत्यर्थः ॥२३॥ वि० वि० भाष्य-पहले पति गर्भावान करे, पश्चात् पति पत्नीसे कहे कि हे प्रिये, परमेश्वर तुझे गर्भ धारणकी सामर्थ्य दे। जिस प्रकार ज्योतिर्मयी अरणी मथन करनेसे तेजस्वी अभिको उत्पन्न करती है इसी प्रकार तेरा पुत्र तेजस्वी हो। जैसे पृथिवी अगनिसे गर्भवती होती है, और जिस तरह यौ सूर्यसै गर्भधारण करती

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३७४ बृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय ६

है, तथा जिस प्रकार दिशाओंका वायु गर्भ है इसी प्रकार मुझसे तूभी गर्भवती हो। इसके बाद प्रसवकालमें पुरुष स्त्री पर जल छिड़ककर प्रभुसे प्रार्थना करे कि हे प्रभो ! जिस प्रकार वायु तालाबके पानीको चारों ओरसे चलाता है उसी प्रकार इसके प्रसवके समय गर्भ निर्विन्न, निरक्षत, निरायास जरायुके साथ बाहर आवे ॥ २३॥ अब प्रसवकालिक हवनका विधान किया जाता है, यथा- जाते Sनिमुपसमाधायाङ्क आधाय कथसे पृषदाज्यथ संनीय पृषदाज्यस्योपघातं जुहोत्यस्मिन्सहसू पुष्यासमे- धमानः स्वे गहे। अस्योपसंद्यां मा च्छैत्सीत् प्रजया च पशुभिश्च स्वाहा। मयि प्राणाथस्त्वयि मनसाजुहोमि स्वाहा। यत्कर्मणाऽत्यरीरिचं यद्वा न्यूनमिहाकरम्। अभ्नि- ष्टत्स्विष्टकृद्विद्वान्स्विष्टथ सुहुतं करोतु नः स्वाहेति ॥२४॥ भावार्थ-[सस्कृतमें] पुत्रे जाते सति पिता तमङ्क उत्सङ्क आधाय संस्था- व्याग्निमुपसमाधाय कसे कांस्यपात्रे पृषदाज्यं द्धिमिश्रित घृतं संनीयावस्थाप्यपृष- दाज्यस्योपघातं पृषदाज्यमुपहत्योपहत्य स्व्ल्पं स्वल्पं गृहीत्वा जुहोति। तन्मन्त्रा- नाह-अस्मिन् स्व्रे गृहेऽहमेत पुत्ररूपेणेधमानो वर्द्धमानो मनुष्याणां सहस्रं पुष्यासम- नेकपोषको भूयासम्। अस्य मतपुत्रस्योपसन्यां सन्ततौ प्रजया पशुभिश्च सह श्रीर्मा चछ्ैत्सीन्मा विच्छिन्नाभूत्स्व्राहेति होमः। मयि पितरि ये प्राणाः सन्ति तान्प्राणं- सवर्वाय पुत्रे मनसा जुदोमि समर्पयामि स्वाहेति प्रधानं कर्म कृत्वा प्रकृतेन कर्मणा कृतेन यदत्यरीरिचमतिरिक्तं कृतवानस्मि। यद्वा इह कर्मणि किञ्चिन्न्यूनमकरमक- रवं तत्सर्व विद्वानग्निः स्विष्टं करोति इति स्विष्टकृत् भूत्वा, स्विष्टमनधिकं सुहुतमन्यूनं च नोऽस्मार्कं करोतु स्वराहेति ॥ २४॥ वि० वि० भाष्य-मनुष्य ऐसी प्रार्थना करे कि इस घरमें पुत्रके साथ बृद्धिको प्राप्त होकर मैं हजारों मनुष्योंका पोषक बनू। इस मेरे पुत्रकी सन्ततिरूप प्रजा तथा पशुरूप श्री कभी भी विच्छेदको प्राप्त न हो। ये हैं प्रार्थनायें, जिनके करनेके अनन्तर अग्निमें आहुति देनी चाहिये। फिर अन्तमें यह कहे कि मैंने जो कर्म किया है, इसमें जो कमी रह गई हो उसको प्रभु पूर्ण करें। फिर इसके बाद स्विष्टकृत् आहुति दे ॥ २४॥

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श्राह्मण ४ ] विद्याविनोद मष्य ३७K

अथास्य दक्षिणं कर्णमभिनिधाय वाग्वागिति त्रिरथ दधि मधु घृतथ संनीयानन्तर्हितेन जातरूपेण प्राशयति। भूस्ते दधामि भुवस्ते दधामि स्वस्ते दधामि भुर्भुवः स्वः सर्व त्वयिदधामीति॥ २५ ॥ भावार्थ- संसकृतमें ] अथ स्विष्टकृद्धोमानन्तरमस्य रिशोर्दक्षिणं कर्ण पिता स्वमुखे निधाय त्रयीलक्षणा वाक्त्वपि प्रविशत्वित्यभिप्रायवान् वाग्वागिति त्रिवारं जपति। अथानन्तरं दधि मधु घृतं सन्नीयैकी कृत्यानन्तर्हितेन वस्त्वन्तराव्यव हितेन जातरूपेण हिरण्येन प्राशयति भूस्त्वयि दधार्मत्यादि चतुर्मिर्मन्त्र: प्रत्येकम् ॥ २५॥ वि० वि० भाष्य-इस स्विष्टकृत् कमके अनन्तर पिता बालकके दाहिने कानमें यह कथन करे कि "कर्म उपासना तथा ज्ञानरूप वेदोंकी वाणी तुझमें प्रविष्ट हो" इस वाक्यको तीन वार पढकर दही, मधु तथा घृत मिलाकर सुब्णकी सलाईसे बालकको चटावे। चटाता हुआ यह वाक्य बोले कि 'भूस्ते दधामि' [ मैं तुझमें प्राण धारण करता हूँ], 'भुवस्ते दधामि' [ मैं तुझमें अपान धारण करता हूँ], 'स्त्रस्ते दधामि' [ मैं तुझमें व्यानका धारण करता हूँ] और 'भूर्भुवः स्वः सर्वं त्वयि दुधामि' [ मैं तुझमें सब प्राणोंका धारण करता हूँ]॥ २५॥ अत्र पिता द्वारा बालकका नाम धारण करना कहा जाता है, यथा- अथास्य नाम करोति वेदोऽसीति तदस्थ तदगुह्यमेव नाम भवति ॥ २६ ॥ भावार्थ-[संस्कृतमें ] अथानन्तरमस्य शिशोर्नाम करोति वेदोऽसीति, वेदोऽनुभवः सर्वस्य निज रूपं परमात्मलक्षणमसीति तदेतन्नामास्य शिशोगुद्य गोष्य भंवति ॥ २६॥ वि• वि• भाष्य-हे पुत्र! 'त्वंवेदोऽसि' तू वेद है-आत्मस्वरूप परमात्मा है। यह बालकका गुप्त नाम होता है। जो कोई 'त्वं वेदोऽसि' इस वाक्यका यह अर्थ करते हैं कि 'तू वेद है यानी तेरा उद्देश्य वेद पढना और वैदिकधर्मकी रक्षा करना हैं' वे भेदवादी हैं। भेद तो सिद्ध ही है, शास्त्रको अज्ञातज्ञापकता होती है। भेद तो लोकव्यवहारतः ज्ञात ही है, शास्त्र ऐसी बात बोधन करता है जो अज्ञात हो। अतः भेदवादानुसार अर्थमें अप्रामाण्य है॥ २६॥

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३७६ बृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय ६

स्तनपानविषयक प्रार्थना कहते हैं. यथा- अथैनं मात्रे प्रदाय स्तनं प्रयच्छति यस्ते स्तनः शशयो यो मयोभूर्यो रब्धा वसुविद्यः सुदत्रा। येन विश्वा पुष्यसि वार्याणि सरस्वति तमिह धातवे करिति ॥२७॥ भावार्थ-[संस्कृतमें ]-अथानन्तरमेनं स्वाङ्कस्थं पुत्रं तन्म त्रे प्रदाय तस्याः स्तनं पिता पुत्रस्य सुखे प्रयच्छति। तन्मन्त्रमाह-हे सरस्वति! यस्ते सवनः शशयः शय: कर्मफलं शेतेऽस्मिन्कर्तेति व्युत्पत्तेस्वेन सह वर्तत इति शशयः। यद्वा श सुखं तस्य हेतुभूतं शयः स्थितिः स्थानं स्तनोत्थानदेशरूपं यस्य स्तनस्य स शशयः। अस्मिन्पक्षे नाक्षरव्यत्यासः । मयः सुखं भूर्भावयतीयि मयोभूः। यद्वा मयोभू: : सर्व प्राणिनां स्यितिहेत्वन्नरूपेण जातो यो रत्नवा रत्नानां धनानां दाता। यद्वा रत्नस्य रमणीयस्यान्नस्य पयशश्च धाता। वसु कर्मफलं तद्विन्दुतीति वसुविद्यः। सुष्ठु ददा- तीति सुदत्रः कल्याणदः। तेन स्तनेन विश्वा विश्वानि वार्याणि वरणीयानि देवादि भूतानि त्वं पुष्यसि तं स्तनं मदीयपुत्रस्य धातवे पानायेह मदीयभार्यास्तने प्रविष्टा सत्यकरकरोः कृ1वत्यसि प्रयच्छेति यावत्॥२७॥ वि० वि० भाष्य-हे सरस्वति, जो यह स्तन सुखप्रद् है एवं सुखरूप है, जिससे मनुष्यादि रत्न पुष्ट होते हैं, जो धनका दाता है तथा कल्याणकारी है, वह आपकी कृपासे मेरे पुत्रके लिए हो॥ २७ ॥ अन्तमें पति स्त्रीको आशीर्वाद देता है, यह कहते हैं, यथा- अथास्य मातरमभिमन्त्रयते, इलाऽसि मैत्रावरुणी वीरे वीरमजीजनत्। सा त्वं वीरवती भव याडस्मान् वीरवतोऽकरदिति तं वा एतमाहुरतिपिता बताभूरतिपिता- महो बताभू: परमां बत काष्ठां प्रापच्छिया यशसा ब्रह्मवर्चसेन य एवंविदो ब्राह्मणस्य पुत्रो जायत इति॥२८ ॥ भावार्थ-[ संस्कृतमें ]-अथानन्तरमस्य पुत्रस्य मातरमभिमन्त्रयते। तन्म- त्रमाह-इला भोग्यासि। मित्रावरुणाभ्यां सम्भूतो मैत्रावरुणो वसिष्ठस्तस्य भार्या

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ब्राह्मण ४ ] विद्याविनोद भाष्य ३७७

मैत्रावरुणी, हे मैत्रावरुणि! अरुन्धति ! वीरे पुरुषे मयि निमित्तभ्ते सति भव्रती बीरं पुत्रमजीजनज्जनितवती सात्वं वीरवती जीवद्वहुपुत्रा भव। या भवत्यस्मान् वीर- वतः पुत्रसम्पन्नानकरदकरोत्कृतवतीति। एवं मन्त्रवद्गर्भाधानादौ कृते सति कि स्या- दित्यत आह-तं वा एवमुक्तविधिनोत्पन्नं पुत्रमाहुः। किमसौ पितरमतीत्याभूवतत इत्यतिपिता वत विस्मयोऽभूः। तथा पितामह्मती त्याभूर्वर्तत इत्यतिपितामहो बताभूः। कैरित्यत आह-श्रिया लद्ष्म्था यशसा कीर्त्या ब्रह्मवर्चसेन ब्रह्मतेजसा च परमां काष्ठां बताहो प्रापदिति स्तुत्यो भवतीत्यर्थः। न केवल पुत्र एवापि तु यस्यवंविदो ब्राह्मणस्य पुत्रो जायते स पिताऽप्येवं स्तुत्यो भवतीति शेषः ॥ २८॥

वि. वि० भाष्य-हे प्रिये, तूने इस बीर पुत्रको उत्पन्न किया है, इसलिए तू वीरतासे जीवित रहकर अनेक वीर पुत्रोंको उत्पन्न कर और यह पुत्र, पिता पिता- महसे भी श्री, यश तथा ब्रह्मतेजमें बढ़कर हो। जिस विद्वान्के घर योग्य पुत्र होता है, उस पिताको धन्य है। वह स्तुति करने योग्य यानी प्रशंसास्पद् है जिसने उक्त संस्कारोंसे पुत्ररत्न उत्पन्न किया है।

इस छठे अध्यायके चतुर्थ ब्राह्मणमें विवाहसे लेकर पुत्रोत्पच्ति पर्यन्त कर्मका वर्णन किया गया है। जिस मनुष्यशरीरसे सब कुछ साध्य होता है, उसकी उत्पत्ति का प्रकार न दिखाया जाता तो भारी त्रुटि रह जाती। इस ब्राह्मणमें स्त्रीपुरुष- सम्बन्ध तथा उनकी पुत्रोत्पादुनकी क्रियाविघि स्पष्ट दिखाई गई है। केवल पति पत्नीके उपयोगी और साधारण मुमुत्तुओंके अनुपयोगी इस ब्राह्मणका यहाँ हिन्दी अनुवाद नहीं किया, संस्कृतमें 'मिताक्षरा वृत्ति' व्याख्या कर दी है, जिसे संस्कृतज्ञ कर्मकाण्डी समझ सकेंगे। सांथ ही 'विद्याविनोद' भाष्यमें प्रत्येक मन्त्रकी संगति दी गई है, जिसमें कहीं भाव दिखाया है, कहीं प्रकरणमात्र लगा दिया है।

सबको शरीर प्रिय है, अतः सब कोई इसे ही सर्वस्व न मान बैठें इसीखरे इसकी उत्पत्ति दिखा दी गई है। यह 1इस लिए कि इसकी सब अनित्यता सम्रझमें आजायं ।। २८।!

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३७८ बृहदारण्यकोपननिषद् [अभ्याय ६ YWY पञ्चम ब्राह्मण

अब उक्त विद्याके ज्ञाताओंकी वंशपरंपराका वर्णन करते हैं, यथा- अथ वथशः। पौतिमाषीपुत्रः कात्यायनीपुत्रात् का- त्यायनी पुत्रो गौतमीपुत्राद्वौतमीपुत्रो भारद्वाजीपुत्राद्धारद्वा- जीपुत्र: पाराशरीपुत्रात्पाराशरीपुत्र औपस्वस्तीपुत्रादौपस्व- स्तीपुत्र: पाराशरीपुत्रात्पाराशरीपत्रः कात्यायनीपुत्रात्कात्या- यनीपुत्र: कौशिकीपुत्रात्कौशिकीपुत्र आलम्बीपुत्राञ्च वैया- व्रपदीपुत्राञ्च वैयाघपदीपुत्रः काण्वीपुत्राच्च कापीपुत्राच्च कापीपुत्रः ।। १ ।।

आत्रेयीपुत्रादात्रेयीपुत्रो गौतमीपुत्रादुगौतमीपुत्रो भारद्वा- जीपुत्राद्ध्ारद्वाजीपुत्रः पाराशरीपुत्रात्पाराशरीपुत्रो वात्सीपुत्रा- दात्सीपुत्र: पाराशरीपुत्रात्पाराशरीपुत्रो वार्कारुणीपुत्राद्वार्का- रुणीयुत्रो वार्कारुणीपुत्राद्वार्कारुणीपुत्र आर्तभागीपुत्रादार्त- भागीपुत्र: शौङ्गीपुत्राच्छौङ्गीपुत्रः सांकृतीपुत्रातसांकृतीपुत्र

पुत्रो जायन्तीपुत्राज्जायन्तीपुत्रो माण्टूकायनीपुत्रान्माण्डूका- यनीपुत्रो माण्डूकीपुत्रान्माण्डूकीपुत्र: शाण्डिलीपुत्राच्छा- ण्डिलीपुत्रो राथीतरीपुत्राद्राथीतरीपुत्रो भालुकीपुत्राद्ालुकी- पुत्रः क्रौख्चिकीपुत्राभ्यां क्रौश्चिकीपुत्रो वैदभृतीपुत्राद्वैदभृती -र

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श्राह्मण ५ ] विद्याविनोद भाष्य ३७६

पुत्र: कार्शकेयीपुत्रात्कार्शकेयीपुत्रः प्राचीनयोगीपुत्रास्त्ाची- नयोगीपुत्र: सांजीवीपुत्रात्सांजीवीपुत्र: प्राश्नीपुत्रादासुरिवा- सिन: प्राश्नीपुत्र आसुरायणादासुरायण आसुरेरासुरिः॥२॥ याज्ञवल्क्याद्याज्ञवल्क्य उद्दालकादुद्दालकोऽरुणादरुण उपवेशेरुपवेशि: कुश्रे: कुश्रिर्वाजश्रवसो वाजश्रवा जिह्वावतो

गणो हरितात्कश्यपाद्धरितः कश्यपः शिल्पात्कश्यपाच्छिल्पः कश्यपः कश्यपान्नैध्रुवेः कश्यपो नैध्रुविर्वाचो वागम्भिण्या अम्भिण्यादित्यादादित्यानीमानि शुक्कानि यजूषि वाज- सनेयेन याज्ञवल्क्येनाख्यायन्ते ॥ ३॥ समानमा सांजीवीपुत्रात्सांजीवीपुत्रो माण्डूकायनेर्मा- ण्डूकायनिर्माण्डव्यान्माण्डव्य: कौत्सात्कौत्सो माहित्थेर्मा- हित्थिर्वामकक्तायणाद्वामकन्तायण: शाण्डिल्याच्छाण्डिल्यो वात्स्याद्वात्स्यः कुश्रे: कुश्रिर्यज्ञवचसो राजस्तम्बायनाद्यज्ञ- वचा राजस्तम्बायनस्तुरात्कावषेयात्तुरः कावषेयः प्रजापतेः प्रजापतिर्रह्मणो ब्रह्म स्वयंभु ब्रह्मणो नमः ॥ ४॥ भावार्थ-इस मन्थविज्ञानको निम्नलखित संप्रदायपरंपराके क्रमसे एक ऋषिने अपर ऋषिसे प्राप्त किया है। यथा- १-पौतिमाषीपुत्रने कात्यायनीपुत्रसे, ६-औपस्वस्तीपुत्रने पाराशरीपुत्रसे, २-कात्यायनीपुत्रने गौतमीपुत्रसे, ७ -- पाराशरीपुत्रने कात्यायनीपुत्रसे, ३-गौतमीपुत्रने भारद्वाजीपुत्रसे, ८-कात्यायनीपुत्रने कौशिकीपुत्रसे, ४-भारद्वाजीपुत्रने पाराशरीपुत्रसे, ९-कौशिकीपुत्रने आलम्बीपुत्रसे, ५- पाराशरीपुत्रने औपस्वस्तीपुत्रसे, तथा वैयाघ्रपदीपुत्रसे,

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३८० बृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याप ६

१०-वैयाघ्रपदीपुत्रने काण्ीपुत्रसे, ३२-वैद्भृतीपुत्रने काशकेयीपुत्रसे, और कापीपुत्रसे, ३३-कार्शकेयीपुत्रने प्राचीनयोगीपुत्रसे, ११-कापीपुत्रने आत्रेयीपुत्रसे, ३४-प्राचीनयोगीपुत्रने साञ्जीवीपुत्रसे, १२-आत्रेयीपुत्रने गौतमीपुत्रसे, ३५-साञ्जीवीपुत्रने आसुरीवासीप्राश्नी १३-गौतमीपुत्रने भारद्वाजीपुत्रसे, पुत्रसे, १४-भारद्वाजीपुत्रने पाराशरीपुत्रसे, ३६-प्राश्नीपुत्रने आसुरायणसे, १५-पाराशरीपुत्रने वात्सीपुत्रसे, ३७-आसुरायणने आसुरीसे, १६-वात्सीपुत्रने पाराशरीपुत्रमे, ३८-आसुरीने याज्ञवल्क्से, १७-पाराशरीपुत्रने वार्कारुणीपुत्रसे, ३९-याज्ञवल्क्यने उद्दालकसे, १८-वार्कारुणीपुत्रने वार्काहणीपुत्रसे, ४०-उद्दालकने अरुणसे, १६-वार्कारुणीपुत्रने आर्तभागीपुत्रसे, ४१-अरुणने उपनिवेशिसे, २०-आर्तभागीपुत्रने शौङ्गीपुत्रसे, ४२-उपनिवेशिने कुश्रिसे, २१-शौङ्गीपुत्रने साङ्गतिपुत्रसे, ४३-कुश्रिने वाजश्रवासे, २२-साङ्कुतिपुत्रने आलम्बायनीपुत्रसे, ४४-वाजश्रवाने जिह्वावान् वाध्योगसे, २३-आलम्बायनीपुत्रने आलम्शीपुत्रसे, ४५-जिह्वावान् बाध्योगने असिित वार्षगणसे, २४-आलम्बीपुत्रने जायन्तीपुत्रसे, ४६-असित वार्षगणने हरित कश्यपसे, २५-जायन्तीपुत्रने माण्डूकायनीपुत्रसे, ४७-हरित कश्यपने शिल्य कश्यपसे, २६-माण्डूकायनीपुत्र ने माण्डूकीपुत्रसे, ४८-शिल्य कश्गपने कश्यप नैध्रुविसे, २७-माण्डूकीपुत्रने शाण्डिलीपुत्रसे, २८-शाण्डिली पुत्रने राथीतरीपुत्रसे, ४६-कश्यप नैध्रुविने वाकसे,

२६-राथीतरीपुत्रने भालुकीपुत्रसे, ५०- वाकने अम्भिणीसे, ३०- मालुकीपुत्रने दो क्रौव्कीपुत्रोंसे, ५१-अम्भिणीने आदित्यसे यह विद्या ३१-दोनों क्रौश्विकीपुत्रोंने वैद्भृतीपुत्रसे, प्राप्त की। इस लिए ये आदित्य द्वारा प्राप्त हुई शुक्त यजु श्रुतियाँ वाजसनेय याज्ञ- वल्क्य द्वारा प्रसिद्ध की गई हैं। यह वंशपरंपर साञ्जीवीपुत्र तक समान है, यानी साञ्जीवीपुत्र पर्यन्त यह एक ही वंश है। उक्त विज्ञानको प्राप्त करनेवाली दूसरी परंपरा सांजीवीपुत्रसे इस प्रकार चलती है- १-साञ्जीवीपुत्रने माण्डूकायनिसे, ४-कौत्सने माहित्थिसे, २-माण्डूकायनिने माण्डव्यसे, ५-माहित्थिने वामकक्षायणसे, ३-माण्डडयने कौत्ससे, ६-वामकक्षायणने शाण्डिल्यसे,

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श्रांह्मण ५] विद्या विनोद भाष्य ३८१

७- शाण्डिल्यने वात्स्यसे, १०-यज्ञवचा राजस्तम्बायनने तुरका- ८-वात्स्यने कुश्रिसे, वषेयसे, ह-कुत्रिने यज्ञवचा राजस्तम्बायनसे, ११-तुरकायषेयने प्रजापतिसे और

प्रजापतिने ब्रह्मसे [ब्रह्मासे ] यह विद्या प्राप्त की। ब्रह्म स्वयम्भु है, उस ब्रह्मको नमस्कार है॥ १-४॥

वि• वि० भाष्य-उक्त मन्त्रोंमें समस्त प्रवचनका वंश कहा है। यहाँ स्त्रीके प्रति किये जानेवाले कर्मकी प्रधानता होनेके कारण गुणवान् पुत्र होता है; यह प्रसङ्ग है। अतः स्त्रीविशेषणसे ही पुत्रका गोत्र बतलाते हुए आचार्यपरंपराका कथन किया गया है॥ १-४॥ स्वयम्भु ब्रह्मको नमस्कार है। उसके अनुवर्ती गुरुओंको भी नमस्कार है।

षष्ठ अध्याय और पश्चम ब्राह्मण समाप्त।

बृहदारएयकोपनिषद् समाप्त।

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ॐ नमः सचिदानन्दाय परब्रह्मो

श्वेताश्वतरोपनिषद् विद्याविनोद भाष्य सहित

इस उपनिषद्के कथन करनेवाले 'श्वेताश्वतर' नामक ऋषि है। यह कृष्ण यजुर्वेदके अन्तर्गत है। इसके आरम्भमें जगत्की कारणताका विचार किया गया है, उसीको लेकर इसका प्रारम्भ होता है। इस उपनिषद्का परस्पर विचार करने- वाले ऋषियोंको 'ब्रह्मवादी' कहा गया है। उन श्वेताश्वतर आदि महात्माओंको ब्रझ्मवेत्ता इस लिए कहा गया है कि वे साधारणतया जानते थे कि जगत्का कर्ता ब्रह्म है। इस लिए इस उपनिषद्में आरम्भका प्रश्न यही है कि 'कारण ब्रह्म क्या है ?'अर्थात् ब्रह्म क्या पदार्थ है, उसका क्या स्वरूप है ? यदि उन लोगोंको जगत् के कारणका सामान्य ज्ञान भी न होता तो वे यह पूछते कि 'कारण क्या है?' अर्थात् अपने प्रश्नमें 'ब्रह्म' यह शब्द न लगाते। किसीने जगत्का कारण कालको माना है, किसीने स्वभावको, और किसीने यदच्छा, कर्म तथा अशु आदिको माना है। इस विवादास्पद विषयको स्पष्ट करनेके लिए-कारण ब्रह्मका निर्णय करनेके लिए ऋषियोंकी प्रवृत्ति है। इस विचारपरंपरामें कालस्वभाव आदिकोंका निराकरण हो जायगा। अब प्रथम ब्रह्मविद्याके उपदेशार्थ चित्तकी स्थिरताके लिए शान्तिपाठ किया जाता है, यथा- ॐ सह नाववतु सह नौ भुनक्तु सह वीर्यं करवावहै। तेजस्वि नावधीतमस्तु मा विद्विषावहै॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!!

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महामुनि श्वेताश्वतर का ऋषियों को ब्रह्मज्ञानोपदेश। भहाभुनि श्वेताश्वतरनो ऋवियोंने प्रछ्मज्ञानोयदेश-

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मंत्र १-२] वियाविनोद भाष्य ३८३

प्रथम अध्याय

अब इस श्वेताश्वतरशाखीय मन्त्रोपनिषद्की संच्षिप्त व्याख्या की जाती है, यथा- ॐ ब्रह्मवादिनो वदन्ति। किं कारणं ब्रहम कुतः स्म जाता जीवाम केन क्व च संप्रतिष्ठाः । अधिष्ठिताः केन सुखेतरेषु वर्तामहे ब्रह्मविदो व्यवस्थाम् ॥ १॥ भावार्थ-ब्रह्मवेत्ता कहते हैं; कारण ब्रह्म क्या है ? हमें किसने उत्पन्न किया है ? हम किससे जीते हैं ? और किसमें लय होते हैं? तथा हम ब्रह्मवेत्ता किसकी प्रेरणासे सुख दुःखोंका अनुभव करते हुए नियमसे रहते हैं ? अर्थात् हम लय किसमें होते हैं या हम कहाँ स्थित होते हैं और हमारे सुख दुःखकी व्यवस्था कौन करता है ? ॥ १ ॥ विद्याविनोद भाष्य-'ब्रह्मवादी' वे कहे जाते हैं जो हर समय ब्रह्म- विषयक चर्चा करते रहते हैं, संसारकी नहीं, यानी ब्रह्मविषयक चर्चा करनेका जिनका स्वभाव हो जाता है। भाष्यकार 'हे ब्रह्मविदः' इस शब्दको सम्बोधन मानते हैं। जो 'ब्रह्मविदः' इस पदको सम्बोधन नहीं मानते वे कहते हैं-श्वेताश्र- तरादि ब्रह्मवादी ऋषि साधारणतया यह जानते हैं कि जगत्का कर्ता ब्रह्म है। पर वे विशेष रूपसे यह जानना चाहते हैं कि ब्रह्म कारण है तो क्या वह उपादान कारण है या असमवायिकारण अथवा निमित्तकारण ? इस मन्त्रमें 'ब्रह्मविद:' यह पद दो बार आया है। वस्तुतः सम्बोधन मानलेनेमें कोई कल्पना नहीं करनी पड़ती।। १ ।। कालादिक ब्रह्मकारणवादके विरोधी हैं, अब श्रुति उनके विषयमें विचार करती है, यथा- काल: स्त्रभावो नियतिर्यदच्छा भूतानि योनि: पुरुष इति चिन्त्यम्। संयोग एषां न त्वात्मभावादात्माप्यनीश: सुखदुःहेतोः॥२॥

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३८४ श्वेत।श्वतरोपनिषद् [अध्याय १

भावार्थ-अब विचार यह करना है कि काल, स्वभाव, नियति, यदच्छा तथा पुरुष, ये उक्त कारण हो सकते हैं या नहीं ? इनका सयोग भी कारण नही बन सकता, क्योंकि वह अपने शेषी आत्माक अधीन है। जीवात्माको भी कारण नहीं कह सकते, क्योकि सुख दु खके जनक पुण्य-पाप रुर्मोंके वशीभूत हैं। १ पदार्थांकी नियत शक्तिका नाम सभाव है, जैसे अमिका सनमान उष्गता। २-जिसका फल कभी विपरीत न हो ऐसे पुण्य पापरूप जो दृष्टिके अविषम कर्म हैं, उन्हें नियति कहते हैं। ३-जिस कारणका कुछ पता न लग सकता हो, जिसे अकरमात् कहते हैं, वही यटच्छ्रा है॥२ ॥ वि० वि. भाष्य-१-ऋषि लोग परस्पर यह कहते हैं कि क्या काल ही जगत्का कारण ब्रह्म है? क्योकि काल बिना कुछ भी नहीं हो सकता। सम्पूर्ण भूतोंकी रूपान्तरप्राप्तिमे जो कारण है, उसको काल कहते है। यह बडा प्रबल है सबको लीन कर जाता है।

२-पहले पक्षको दूषित करते हुए कुछ लोग कहते हैं कि पदार्थोंके स्त्रभावको अतिक्रमण कर के काल भी कुछ नही कर सकता। किसी भी पदार्थके स्वभावको काल नही बदल सकता, अत 'स्वभाव' ही कारण है। ३-इस दूसरी कोटिका खण्डन करते हुए फिर कहते हैं कि स्वभाव भी नियत (प्रारब्ध) के अधीन होता है, अतः प्रारब्धको ही कारणना है। ४-इस तीसरे पक्षमे यह अरुचि है कि-नियति (प्रारब्ध) भी अव्यवस्थित है, जैसे मिमे किसीका गाढा हुआ धन दैवात् किसी दूसरेको मिल जाता है, इससे प्रारब्ध से बढकर 'यदच्छा' है, बस यह अचानक पन ही कारण है। उक्तपक्षमे भी दूषण हैं कि जहां कोई साक्षात् कारण न दीखता हो, वहॉ भी गुप्त आकाशादि पद्चभूतोमें से एक या अधिक कोई कारण अवश्य होता है, साक्षात् नहीं तो परपरासे होता है। अत. अगत्के कारण पचभूत या इनमें से काई एक अवश्य है। ६-इस पक्षमें भी यह शङ्का है कि पञ्च महाभूत प्रकृतिका पाँचवॉ कारण है, जैसे साड्ख्यशास्त्रानुसार पहले प्रकृतिसे महचत्त्व, उससे अहन्तत्व, उससे पख्तन्मात्रा, दोनों तरहकी इन्द्रिय, बादमें पञ्चमहाभूत उश्यन्न हुए। इससे तो प्रकृति ही कारण प्रतीत होती है। ७-इसमें अरुचि यह है कि उक्त छहो जड़ पदार्थ होनेके कारण अपना काम स्वाधीनतापूर्वक नहीं कर सकते। इससे पुरुष यानी विज्ञानात्मा ही कारण है। ८-पर यह भी तो कालादिकोकी सहायताके बिना कुछ नही कर सकता। इसलिए उक्त सातोंका

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मन्त्र ३ ] विद्याविनोद भाष्य ३८५

संयोग ही कारण मानना होगा। -किंतु कालादिकोंका समूह भी कारण नहीं हो सकता। क्चोंकि समूह यानी संगति परार्थ यानी शेष है, उसका शेषी आत्मा विद्यमान है, अतः स्वतन्त्र न होनेसे वह सृष्टि, स्थिति, प्रलय और प्रेरणारूप कार्य करनेमें समर्थ नहीं है। तब तो आत्मा कारण हो सकता है। किंतु इस पक्षमें भी दोष है, क्योंकि आत्मा-जीव स्वतन्त्र नहीं है, वह सुख चाहता है, परन्तु परवश, बिना चाहे उसे दुःख भोगना पड़ता है। वह सुख दुःखके हेतुभूत पुण्यापुण्यरूप जो कर्म हैं उनके अधीन होनेसे परतन्त्र है। भाष्यकार कहते हैं कि ३सीसे न्रिलोवकी सृष्टि, स्थिति और निय मनमें इसका सामर्थ्य नहीं है। फिर यह कारण कैसा ?॥।॥ ब्रह्मवादी ऋषियोंके समक्ष कई पक्ष उपस्थित हुए, किन्तु कोई भी पक्ष उन्हें जगत्कारणताविषयमें सन्तुष्ट न कर सका। इस कारण वे लोग आागे विचार करने लगे, यथा- ते ध्यानयोगानुगता अपश्यन्देवात्मशक्ति स्वगुणै- निगूढाम्। यः कारणानि निखिलानि तानि कालात्मयुक्ता- न्यधितिष्ठत्येकः ॥३ ॥ भावार्थ-कालादिकोंको स्वतन्त्र कारण न समझनेवाले उन ऋषियोंने व्यानसे चिन्तकी एकाग्रताके साथ अपने गुणोंसे छिपी हुई परमेश्वरकी निज शक्तिको अथवा परमेश्वर, जीव और प्रकृतिको पहचाना, जो कि परमात्मा अकेळा कालसे लेकरं आत्मा पर्यन्त सब कारणोंका अधिष्ठान-आश्रय है।। ३। वि. वि. भाष्य-जब कि उन ब्रह्मवेत्ताओंने किसी भी प्रमाणान्तरसे ज्ञात न होनेवाले उस मूलतत्त्वके विषयमें दूसरा कोई उपाय न देखा तो ध्यान- बलसे याने चित्तवृत्ति निरोधरूप योगसे परममूल कारणको स्वयं ही अनुभव किया, यही इस मन्त्रमें कहा गया है। भाव यह है कि ब्रह्मवादी ऋषियोंने स्वगुणोंमें छिपे रहनेके कारण उसके गुणोंसे तर्क कर उसे ध्यानयोग से पहचाना। क्योंकि वह शक्ति सब किसीके पहचाननेमें नहीं आ सकती। किन्तु फिर भी हम लोग भी यत्न करें तो ध्यान- योगकी सहायतासे उसके चमत्कारका साक्षात्कार करनेमें सफल हो सकते हैं। मनुष्यमें सब कुछ कर सकनेकी सामर्थ्य है, पर उसे प्रमादसे अँधेरमें छिपी हुई शक्ति सूझती नहीं ॥ ३॥

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३८६ श्वेताश्वतरोपनिषद् [भध्याय १

इस मन्त्रमें श्रुति सर्वात्मा ब्रह्मका चक्ररूपसे वर्णन करती है, यथा- तमेकनेमिं त्रिवृतं षोडशान्तं शतार्धारं विंशतिप्रत्य- राभिः। अष्टकैः षड्भिर्विश्वरूपैकपाशं त्रिमार्गभेदं द्विनि मित्तैकमोहम् ॥४ ॥ भावार्थ-उस एकनेमि (पुट्ठी) वाले, त्रिवृत् (तीन ५ट्टियोंसे मढे), सोलह अन्त (१६ छोर) वाले, पचास अरोंवाले, बीस प्रत्यरों (बीचकी प्रत्यरोंसे ज़टित), छः अष्टकोंवाले (काठ आठके समुदायवाले छः गुच्छोंसे जटित), विश्वरूप एक पाश (कामरूप एक फांसवाले), तीन मार्गोंके भेदवाले तथा पाप पुण्य इन दोनोंके निमित्त और एक मोहवाले कारणको देखा।।४॥ वि० वि० भाष्य-जो अवेला ही समस्त कारणोंमें अधिष्ठित है, अर्थात् सम्पूर्ण कार्यवर्गका आधार है, उस नेमिके समान एक नेमिवाले (परमात्मा) को उन्होने कारणरूपसे देखा। जैसे रथके चक्रमें लोहेकी पट्टी मढी रहती है वैसे ही इसमें सत्व, रज, तम इन तीन गुणोंकी पट्टी हैं। सोलह विकार याने पाँच भूत और ग्यारह इन्द्रियाँ ये उस आत्माके अन्त यानी विस्तारकी समाप्ति हैं। अथवा प्राण, श्रद्धा, आकाश, वायु, अग्नि, जल, परृथिवी, इन्द्रिय, मन, अ्न्न, वीर्य, तप, मत्त्र, कर्म, लोक और नाम ये सोलह कला जिसके अन्त हैं, उसको जाना। जैसे रथचक्रमें नाभिसे नेमि तक बीचमें पँखड़ी जैसे अरे लगे रहते हैं, वैसे ही इसके पचास अरे हैं, यानी विपर्यय, अशक्ति, तुष्टि और सिद्धि नामक पचास प्रत्ययभेद जिसके अरोके समान हैं, उस ५० अरोंवालेको देखा। भाष्यानुसार तम, मोह, महामोह, तामिस्र और अन्घतामिस्र ये पॉच विपर्ययके भेद हैं, अशक्ति अट्ठाईस हैं, तुष्टि नौ प्रकारकी, और सिद्धि आठ प्रकारकी है। ये ही पचास प्रत्ययभेद हैं। दस इन्द्रियाँ और दस इनके विषय ये ही इसमें अरोंके प्रत्यरे हैं, अरोंकी दढताके लिए शलाकायें लगाई जाती हैं वे 'प्रत्यरा' कहाती हैं, उनसे युक्त देखा। जिस प्रकार रथचक्रमे बहुतसी कीलें लगाई जाती हैं, इसी प्रकार इस चक्रमें छः अष्टक हैं [प्रकृतिका अष्टक, धात्वष्टक, सिद्धिघष्टक, भावाष्टक, देवाष्टक और गुणाष्टक, ये छः है ], इन अष्टकोंवाला देखा। जैसे रथके पहियेमें फाँस लगती है, वैसे ही इस चक्रमें कामरूप एक फाँस लगी है, उससे युक्त देखा। रथचक्र जैसे किसी निमित्तसे चलाया जाता है इसी प्रकार यह चक्र भी पाप-पुण्य या राग-द्वेषादिके फलभोगार्थ

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मन्त्र x ] विद्याविनोद भाव्य ३८७

चलाया जता है, ऐसे उसको कार गरूपसे देखा। रथके पहियेकी चिकनाईकी तरह इस चक्रमें भी मोह नामक चिकनाई लगी है। भाष्यकार कहते हैं कि जिसका कामनामक एक ही विश्वरूप अनेक प्रकारका पाश है. धर्म, अधर्म तथा ज्ञानरूप जिसके मार्गभेद हैं, और पाप पुण्य इन दोनोंका एक ही निमित्त मोह यानी देहेन्द्रिय, मन, बुद्धि एवं जाति आदि अनात्माओंमें जिसका आत्माभिमान है, ऐसे उस दोके मोहरूप एक ही निमित्तवालेको ऋधियोंने कारणरूपसे देखा॥४॥ संसारको चक्रवत् घूमनेवाला कहकर अब्र नद्वत बहनेवाला कहते हैं। वैराग्यार्थ ऐसा वर्णन किया गया है, क्योंकि चक्र या नक्ीकी तरह अस्थिर जगत्में राग करनेवाला कभी स्थिर फलका भागी नहीं हो सकता, यथा- पश्चस्त्रोतोम्बुं पश्चयोन्युग्रवक्रां पश्चप्राणोरमि पञ्चबुद्ध्या- दिमूलाम्। पञ्चावर्ती पञ्चदुःखौघवेगां पश्चाशद्भेदां पञ्चपर्वामधीनः।।५ ।। भावार्थ-जिसमें पाँच स्रोतोंसे जल बह रहा है, जिसके पाँव उद्गमस्थान हैं, इसी कारण जो बड़ी उग्र और टेढी है, जिसमें पंचप्राणरूप तरङ्गें हैं, पाँच तरहके जो ज्ञान है, उनका मूल जिसका कारण है, जिसमें पॉच भँवर है, जो पाँच प्रकारके दुःखोंके समुदायरूप वेगवाली है, पाँच परवों (जाड़ों) वाली है, उस पचास भेदों- वाली नदीको हम जानते हैं ॥ ५॥ वि० वि० भाष्य-वास्तवमें संसार रात्रि दिन बहती रहनेवाली एक नदी है जिसमें कुछ भी स्थिर नहीं है। जिस प्रकार नदीमें स्रोतोंसे पानी बहता है इसी प्रकार इस संसारनदीमें ज्ञानेन्द्रियों द्वारा ज्ञानका जल बहता रहता है। जिस मनुष्यको आँखसे बहुत देखना पड़ता है उसकी देखनेकी शक्ति उतनी ही बह जाती है। इसी प्रकार जिसको बुद्धिसे अधिक काम पड़ता है, वह बुद्धिसे काम करते करते थक जाता है, मानो बुद्धिकी शक्ति बह जाती है। यही दशा अन्य इन्द्रियोंकी है। जिस प्रकार नदी उग्र और टेढी चलती है, उसी प्रकार यह नदी भी पाँच महाभूतों और उनकी विषमतासे बड़ी उग्र और बाँकी है। जैसे नदीमें लहरोंकी पड़क्ति उठती हैं और दब जाती हैं, वैसे ही इसमें भी प्राण, अपान, उदान, समान और व्यान, इन पाँच प्राणोंकी लहरें चलती हैं। जैसे नदीके प्रवाहका एक मूलस्थान होता है, वैसे ही इसमें भी पाँच ज्ञानेन्द्रियोंवे होनेवाले पाँच ज्ञानों (बुद्धियों) का

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श्वेताश्वत रोपनिषद् [अध्याय १

मूल मन नामक मूलस्थान है। जैसे नदामे भॅवर पड़ते हैं, वैसे ही इसमे भी शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्धरूपी पॉच भॅवर हैं, जिन विषयोके भ्रमरचक्रमे पडकर कुछ ठिकाना नहा लगता। जिस प्रकार नदीका बेग होता है, वैसे ही इसमें भी जन्मदु.ख, मृत्युदुःख, वृद्धावस्थाका दुख, रोगका दु.ख और गर्भ दुःखरूप बेग हैं। जैसे नदी जहॉ तहॉ टूटी हुई रहती है, वैसे ही इसमे भी पूर्व श्रलोकमे कहे पचास प्रत्ययभेद-तोड हैं। जिस प्रकार नदीके जोड़ होते हैं, उसी तरह इसमे भी अविद्या, अस्मिता, राग, द्वष और अभिनिवेश रूप पॉच पर्व हैं-जोड़ हैं। इस प्रकारकी ससारनदीको हम जानते हैं। ब्रह्मवादी ऐसा कहते हैं॥। ५॥ इस कार्यकारणात्मक ब्रझ्मचक्रमें जीवको किस कारण ससारकी प्राप्ति होती है, और किस साधनसे वह मुक्त हो जाता है, यह कहते हैं, यथा- सर्वाजीवे सर्वसंस्थे बृहन्ते अस्मिन् हंसो भ्राम्यते ब्रह्मचक्रे। पृथगात्मानं प्रेरितारं च मत्वा जुष्टस्ततसते ना- मृतत्वमेति॥६॥ भावार्थ-जीव तबतक इस सम्पूर्ण भूतोके जीवनाधार=े।गस्थल तथा सबके आश्रयरूप=पलय स्थान, बृहत्=महान् ब्रह्मचक्रमें भ्रमता रहता है, जबतक वह अपनेको सर्वनियामक परमेश्वरसे अलग माने बैठा है। और जब सच्चिदानन्द मय ब्रह्मसे अभिन्न ब्रह्मस्वरूपसे सेवित होता है, तब वह अमृतत्वको प्राप्त होता है।।६।। वि० वि. भाष्य-जो कोई भी अपनेको पूर्णानन्द ब्रह्मस्वरूपत्वसे अनुभव करता है वही मुक्त होता है, और जो अपनेको परमात्मासे मिन्न समझता है वह बँधता है, अर्थात् अनात्मभूत देहादिकोको आत्मा मानता हुआ देवता, मनुष्य एव तिर्यगादि भेदोवाली अनेको योनियोमे भ्रमण करता है, याने सब ओर भटकता है, शान्ति नही पाता ॥ ६ ॥ अब इस ससारचक्रसे तथा जगन्नदीसे पार होनेका उपाय बताते है, यथा- उदगीतमेतत्परमं तु ब्रह्म तस्मिस्त्रयं सुप्रतिष्ठाक्षरं च। अत्रान्तरं ब्रह्मविदो विदित्वा लीना ब्रह्मणि तत्परा योनि- मुकता: ॥ ७॥

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पेन्त्र = ] विद्याविनोद भाष्य

भावार्थ-पपञ्के धर्मो से रहित वर्णन किया गया यह ब्रह्म सर्वोत्कृष्ट ही है। इसमें भोक्ता, भोग्य और नियन्ता ये तीनों स्थित हैं। वह ब्रह्म इस भोक्तादि- रूपत्रय प्रपञ्की प्रतिष्ठा यानी उत्तम आश्रयस्थान है। और वह अक्षर=अविनाशी है। जो स्वरूपसे च्युत नहीं होता उसे अक्षर कहते हैं। उसमें प्रवेशका मार्ग पाकर ब्रह्मवेत्ता लोग ब्रम्ममें लीन हो समाधिनिष्ठामें स्थित हुए जन्म मरणसे मुक्त हो जाते हैं। अर्थात् गर्भवास, जन्म, जरा और मरणरूप संसारके भयसे छूट जाते है।। ७॥ वि• वि० भाष्य-मनुष्य इन्द्रियोंको अपने वशमें कर यमादि गुणोंसे युक्त हो मनको आत्मामें और आत्माको परमात्मामें लगावे। अनन्यचित्त पुरुष उस परमात्माको ही आत्मस्वरूपसे प्राप्त कर उसीमें लीन हो जाता है, यही समाधि कहाती है।।७ ॥ व्यवहारावस्थामें उपाधिवश जीव और ईश्वरका भेद दिखाकर श्रति पर- मात्माके विज्ञानसे अमृतत्वकी प्राप्ति दशर्शित करती है, यथा- संयुक्तमेतत् त्रमक्षरं च व्यक्ताव्यक्तं भरते विश्वमीशः। अनीशक्षात्मा बध्यते भोक्तृभावाज्ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः॥८ ॥ भावार्थ-व्यक्त और अव्यक्त याने कार्य कारण, अथवा क्षर और अक्षर याने नाशी अविनाशी ये दोनों परस्पर मिले हुए हैं। कार्य-कारणरूप विश्वका ईश्वर ही पोषण करता है और जीवात्मा भोक्तृभावके कारण मायाधीन होनेसे उसमें बन्धायमान होता है। किन्तु वह परब्रह्मको जानकर सम्पूर्ण पाशोंसे छूट जाता है॥। ८ ॥ वि. वि. भाष्य-व्यक्त जो कि स्थूल शरीर आदिक हैं सो सब्र कार्य हैं, और कार्य होनेसे ही नाशशील हैं। तथा अव्यक्त जो कारण है वह कारण होनेसे ही नाशरहित है। त्वं पदका वाच्यार्थ अनीश=अममर्थ जो जीवात्मा है सो अविद्या, तत्कार्य देहेन्द्रियादिकोके साथ मिलकर अपनेको कर्ता भोक्ता मानकर अस- मर्थ होरहा है। वह तत्पदलच्यार्थ जीवात्मा त्वंपद्लच्यार्थ चेतन आत्माका अभेद जानकर सम्पूर्ण अविद्या तथा काम कर्म आदि पाशोंसे छूटकर मुक्त हो जाता है॥।। ईश्वर, जीव तथा प्रकृतिकी विलक्षणता दिखाती हुई श्रुति उन तीनोंके ब्रह्म- रूपसे अनुभव करनेपर मोक्षका कथन करती है, यथा-

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३८८ श्वेताश्वत रोपनिषदू [अध्याय ₹

मूल मन नामक मूलस्थान है। जैसे नदीमें भँवर पड़ते हैं, वैखे ही इसमें भी शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्धरूपी पाँच भँवर हैं, जिन विषयोंके भ्रमरचक्रमें पड़कर कुछ ठिकाना नहीं लगता। जिस प्रकार नदीका बेग होता है, वैसे ही इसमें भी जन्मदुःख, मृत्युदुःख, वृद्धावस्थाका दुःख, रोगका दुःख और गर्भ दुःखरूप बेग हैं। जैसे नदी जहाँ तहाँ दूटी हुई रहती है, वैसे ही इसमें भी पूर्व श्रोकमें कहे पचास प्रत्ययभेद-तोड हैं। जिस प्रकार नदीके जोड़ होते हैं, उसी तरह इसमें भी अविद्या, अस्मिता, राग, द्वष और अभिनिवेश रूप पाँच पर्व हैं-जोड़ हैं। इस प्रकारकी संसारनदीको हम जानते हैं। ब्रह्मवादी ऐसा कहते हैं॥ ५॥ इस कार्यकारणात्मक व्रअ्मचक्रमें जीवको किस कारण संसारकी प्राप्ति होती है, और किस साधनसे वह मुक्त हो जाता है, यह कहते हैं, यथा- सर्वाजीवे सर्वसंस्थे बृहन्ते अस्मिन् हंसो भ्राम्यते ब्रह्मचक्रे। पृथगात्मानं प्रेरितारं च मत्वा जुष्टस्ततस्ते ना मृतत्वमेति ॥६॥ भावार्थ-जीव तबतक इस सम्पूर्ण भूतोंके जीवनाधार=भेगस्थल तथा सबके आश्रयरूप=पलय स्थान, बृहत्=महान् ब्रह्मचक्रमें भ्रमता रहता है, जबतक वह अपनेको सर्वनियामक परमेश्वरसे अलग माने बैठा है। और जब सच्चिदानन्द- मय ब्रह्मसे अभिन्न ब्रह्मस्वरूपसे सेवित होता है, तब वह अमृतत्वको प्राप्त होता है।।६।। वि० वि. भाष्य-जो कोई भी अपनेको पूर्णानन्द ब्रह्मस्वरूपत्वसे अनुभव करता है वही मुक्त होता है, और जो अपनेको परमात्मासे मिन्न समझता है वह बँधता है, अर्थात् अनात्मभूत देहादिकोंको आत्मा मानता हुआ देवता, मनुष्य एवं तिर्यगादि भेदोंवाली अनेकों योनियोंमें भ्रमण करता है, याने सब ओर भटकता है, शान्ति नहीं पाता ॥ ६ ॥ अब इस संसारचक्रसे तथा जगन्नदीसे पार होनेका उपाय बताते हैं, यथा- उदगीतमेतत्परमं तु ब्रह्म तस्मिस्त्रयं सुप्रतिष्ठाक्षरं च। अत्रान्तरं ब्रह्मविदो विदित्वा लीना ब्रह्मणि तत्परा योनि- मुक्ता: ॥ ७।

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पेन्त्र = ] विद्याविनोद भाष्य

भावार्थ-प्रपञ्चके धर्मों से रहित वर्णन किया गया यह ब्रह्म सर्वोत्कृष्ट ही है। इसमें भोक्ता, भोग्य और नियन्ता ये तीनों स्थित हैं। वह ब्रह्म इस भोक्तादि- रूपत्रय प्रपञ्की प्रतिष्ठा यानी उत्तम आश्रयस्थान है। और वह अक्षर=अविनाशी है। जो स्वरूपसे च्युत नहीं होता उसे अक्षर कहते हैं। उसमें प्रवेशका मार्ग पाकर ब्रह्मवेत्ता लोग ब्रह्ममें लीन हो समाधिनिष्ठामें स्थित हुए जन्म मरणसे मुक्त हो जाते हैं। अर्थात् गर्भवास, जन्म, जरा और मरणरूप संसारके भयसे छूट जाते है।।७॥। वि. वि० भाष्य-मनुष्य इन्द्रियोंको अपने वशमें कर यमादि गुणोंसे युक्त हो मनको आत्मामें और आत्माको परमात्मामें लगावे। अनन्यचित्त पुरुष उस परमात्माको ही आत्मस्वरूपसे प्राप्त कर उसीमें लीन हो जाता है, यही समाधि कहाती है।।७ ॥ व्यवहारावस्थामें उपाधिवश जीव और ईश्वरका भेद दिखाकर श्रुति पर- मात्माके विज्ञानसे अमृतत्वकी प्राप्ति दशर्शित करती है, यथा- संयुक्तमेतत् नरमक्षरं च व्यक्ताव्यक्तं भरते विश्वमीशः। अनीशश्चात्मा बध्यते भोक्तृभावाज्ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः॥ ८ ॥ भावार्थ-व्यक्त और अव्यक्त याने कार्य कारण, अथवा च्र और अक्षर याने नाशी अविनाशी ये दोनों परस्पर मिले हुए हैं। कार्य-कारणरूप विश्वका ईश्वर ही पोषण करता है और जीवात्मा भोक्तभावके कारण मायाधीन होनेसे उसमें बन्धायमान होता है। किन्तु वह परब्रह्मको जानकर सम्पूर्ण पाशोंसे छूट जाता है॥। ८ ॥ वि. वि० भाष्य-व्यक्त जो कि स्थूल शरीर आदिक हैं सो सब् कार्य हैं, और कार्य होनेसे ही नाशशील हैं। तथा अव्यक्त जो कारण है वह कारण होनेसे ही नाशरहित है। त्वं पद्का वाच्यार्थ अनीश=असमर्थ जो जीवात्मा है सो अविद्या, तत्कार्य देहेन्द्रियादिकोंके साथ मिलकर अपनेको कर्ता भोक्ता मानकर अस- मर्थ हो रहा है। वह तत्पदलत्यार्थ जीवात्मा त्वंपदलद्यार्थ चेतन आत्माका अभेद जानकर सम्पूर्ण अविद्या तथा काम कर्म आदि पाशोंसे छूटकर मुक्त हो जाता है।८।। ईश्वर, जीव तथा प्रकृतिकी विलक्षणता दिखाती हुई श्रुति उन तीनोंके ब्रह्म- रूपसे अनुभव करनेपर मोक्षका कथन करती है, यथा-

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३९० श्वेताश्वतरोपनिषदू [ अध्याय १

ज्ञाज्ौ द्वावजावीशनीशावजा ह्येका भोक्तृभोग्यार्थ- युक्ता। अनन्तश्चात्मा विश्वरूपो ह्यकर्ता त्यं यदा विन्दते ब्रह्ममेतत्॥ ६॥ भावार्थ-ईश्वर और जीव दोनों अनादि हैं, एक समर्थ है दूपरा असमर्थ है। अवश्य ही एक माया है जो कि भोक्ता=जीवके भोग् सम्पादनतें नियुकत है और ईश्वररूप आत्मा अनन्त, सर्वर्ूप तथा अकर्ता है। जिस समय ईश्वर, जीव और प्रकति, इन तीनोंको ब्रअमरुपपरे जान लिया जाता है तब जीव मुक् हो जाता है।। ६।। वि० वि० भाष्य-जब यह ज्ञ, अज्ञ और अजरूप ईश्वर, जीव और प्रकृति इन तीनोंको ब्रह्मरूपसे अतुभव कर लेता है उस समय यह कृनकृत्य हो जाता है, मुक्त हो जाता है।। ९ ।। जीव तथा ईश्वरका भेद दिखाकर उसके विज्ञानसे अमृतत्वका बोधन कर दिया। अब श्रुति भगववी प्रवान और ईश्वरकी विलक्षगता दिवलाकर उसके तत्व- ज्ञानसे अमृतत्वको दिखाती है, यथा- क्षरं प्रधानममृताक्षरं हरः क्षरात्मानावीशते देव एक:। तस्याभिध्यानाद्योजनात्तत्त्वभावादु भूयश्चान्ते विश्व मायानिवृत्तिः।। १० ।। भावार्थ-तकृति विनाशी है और परमेश्वर अमृत तथा नाशरहित है। वह हरसंज्ञक एक देव प्रधान तथा पुरुष=जीवका नियमन करता है। उसके चिन्तन करनेसे उसमें मनको लगानेसे, स्मरण करनेसे, और उसके तत्वकी भावना करनेसे प्रारब्ज कर्मके नाश होने पर दुःख मोहरूप प्रपश्वकी निवृत्ति हो जाती है। वि० वि० भाष्य-अविद्या आदिको हरनेके कारण परमेश्वरको इस मन्त्रमें 'हर' कहा गया है। भाव यह है कि १-प्रकृति परिणामिनी याने ऐसी है जिसकी अवस्था बदलती रहती है। २-जीवात्मा अपरिणामी है। ३-सबका हरण=नाश या प्रलय करनेवाला परमात्मा है, वह इन जीव तथा प्रकृति दोनोंका शाखन करता है। उसीके बार-बार ध्यान, योग और भक्ति करनेसे जीवातमा अविद्यादि कवेशोंसे कूटकर मुक्त हो जाता है॥ १० ।।

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मन्त्र ११-१२ ] विद्याविनोद भाष्य ३९१

अब आत्मज्ञान=आत्माके ध्यानके फलको दिखाते है, यथा- ज्ञात्वा देवं सर्वपाशापहानिः क्षीणैः क्ेशैर्जन्ममृत्यु- प्रहाणि:। तस्याभिध्यानात्तृतीयं देहभेदे विश्वैश्वर्यं केवल आपकामः ॥। ११ ।। भावार्थ-परमामाको जानकर सम्पूर्ण अविद्यारूपी पाशोंकी हानि हो जाती है। क्लेशोंके नाश होनेसे जन्म तथा मृत्युका भी त्याग हो जाता है और उसका ध्यान करनेसे शरीर छूटनेके बाद स श्वयमयी तीसरी अवस्थाकी प्राप्ति हो जाती है, फिर आप्रकाम होकर कैवल्य पदको प्राप्त हो जाता है। हिण्यगर्भ और विराट्की अपेक्षा कारणब्रह्म तृतीयावस्था है॥ ११॥ वि० वि० भाष्य-सब जीवोंमें एक ही आत्मदृष्टि करनेसे जो राग द्वेषकी निवृत्ति हो जाती है वह प्रथम ऐश्वर्यकी प्राप्ति है। 'अहं ब्रह्माम्मि' इस महावाक्यका अभ्यास करनेसे जो अविद्याकी निधृत्ति हो जाती है वह द्वितीय ऐश्चर्यका लाभ है। और प्रारब्धकर्मके क्षीण हो जानेके बाद स्वयंप्रकाश आत्मानन्दकी जो प्राप्ति है इसका नाम तृतीय विश्वश्वर्यप्राप्ति है॥ ११ ॥ क्योंकि ज्ञानके पश्चात् परम पुरुपार्थकी सिद्धि होती है, अत :- एतज्ज्ञेयं नित्यमेवात्मसंस्थं नातः परं वेदितव्यं हि किश्चित्। भोक्ता भोग्यं प्रेरितारं च मत्वा सर्वं प्रोक्तं त्रिविधं ब्रह्ममेतत् ॥ १२ ॥ भावार्थ-यह ब्रह्म सदा जानने योग्य है, अवश्य ही यह अपने आत्मामें स्थित है। इससे बढ़कर और कोई जानने योग्य पदार्थ नहीं है। भोक्ता=जीवात्मा, भोग्य=मायारूप सब भोग्य जगत् और प्रेरक=ईश्वर; यह तीन प्रकारसे कहा हुआ परिपूर्ण ब्रह्म ही है, ऐसा जानना चाहिये॥ १२।। वि० वि० भाष्य-जो जगत्का कारण जानना चाडे उसको इन तीनोंके अतिरिक्त मुख्य करके जाननेको कुछ बाकी नहीं है, किन्तु जगत्के कारण ये ही मुख्य तीन हैं। अन्य कालादि मुख्य न होनेसे गिनतीमें नहीं लाये गये ॥ १२ ॥ अब श्रुति प्रणवको आत्मचिन्तनके अङ्गरूपसे प्रदर्शित करती है, अन्य अनेक श्रुतियोंमें कहा है कि 'ॐ' इस अक्षरसे ही परम पुरुषका ध्यान करना चाहिये,

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३६२ श्वेताश्वतरोपनिषद् [अब्याय १

'ॐ' से ही आत्मचि तन और 'ॐ' से ही आत्माका ध्यान करना चाहिये। इस प्रकरणओें ध्यानमें प्रशव चिन्तनका नियम है, यह कहते हैं- वहूनेर्यथा योनिगतस्य मूर्तिर्न दृश्यते नैव च लिङ्गनाशः। स भूय एवेन्धनयोनिगह्यरतद्वोभयं वै प्रणवेन देहे॥१३॥ भावार्थ-जैसे अपने आश्रय काष्टमे अग्निका स्वरूप नही दिखाई देता, और उसके लिद्ग (सूक्ष्मरूप) का नाश भी नहीं होता, क्योकि अग्नि फिर भी इन्घनोके मथन करनेसे निकल आती है। इसी तरह अग्नि तथा अग्निके सूक्ष्म स्वरूपके समान ही इस देहमे प्रणवसे आत्माका ज्ञान या ग्रहण हो सकता है॥ १३ ॥

वि० वि० भाष्य-जैसे काष्ठादिकोमें अग्नि वर्तमान है, परन्तु उसका चमकीला स्वरूप दिखाई नही देता। पर इन्धनमे अग्निका अभाव भी नहीं है, काष्ठके रगडनेसे वह गरम हो जाता है। इसी तरह आत्मा हमारे शरीरमे है, पर दीखता नही। हॉ, मन्थन करनेसे प्रतीत होता है। जैसे, अभिस्थानीय आत्मा, उत्तरारणिस्थानीय प्रणवके द्वारा मननसे अधरारणिस्थानीय देहमे ग्रहण किया जा सकता है। अर्थात् ओक्कारके अर्थविचारपूर्वक जप करनेसे परमात्माका साक्षात्- कार हो सकता है॥ १३ ॥ अब श्रुति उस मन्थनका स्पष्टतया वर्णन करती है, यथा- स्वदेहमरणिं कृत्वा प्रणवं चोत्तरारणिम्। ध्याननिर्मथनाभ्यासाढ देवं पश्येन्निगूढवत्॥। १४ ।। भावार्थ-अपने देहको नीचेकी अरणि औरकारको ऊपरकी अरणि बनाकर ध्यानरूप मन्थनके अभ्याससे स्वप्रकाश देव (परमात्मा) को छिपे हुए नगिके समान देखे॥ १४ ॥ वि० वि० भाष्य-इस मन्त्रमे जो देहपद है उसका 'हृदय' लक्ष्यार्थ है। ऊकारका वाच्य ब्रह्म है, और ॐकार ब्रह्मका वाचक है। सो हृदयमें कारका निरन्तर ही उच्वारण करके मनका उसीमे निरोध करना, यही ध्यान है। इसका जो पुन पुनः अभ्यास करना है यही मानो प्रणव और हृदयरूपी अरणियोका मथन करना है॥ १४ ॥

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मन्त्र १४-१६ ] विद्याविनोद भाष्य

पूर्वोक्त आत्मदर्शनमें और बहुतसे दष्टान्तोंको दिखाते हैं. यथा- तिलेषु तैलं दधनीव स्पिरापः स्रोत: स्वरणीषु चाभिः। एवमात्मात्मनि गृह्यतेऽसौ सत्येनैनं तपसा योऽनुपश्यति॥ १५ ॥ भावार्थ-जैसे तिलोंमें तेल, दहीमें घी, नदियोमें खोदनेसे पानी और लकड़ियोंमें अग्नि प्रकट होता है. इसी तरह जो मनुष्य सत्य और तपके द्वारा इसे बार बार देखनेका यत्न करता है उस जिज्ञासुको यह आत्मा आत्मामें ही दिखाई दे जाता है॥ १४। वि० वि०भाष्य-पेरना, विलोना, खोदना और मन्थन ये व्यापार जिस प्रकार तेल, घी, जल और अग्निकी उपलब्धिके कारण हैं, उसी प्रकार सत्यसे यानी यथार्थ और प्राणिमात्रके लिए हितकर भाषणसे तथा मन और इन्द्रियोंकी एकाश्रता- रूप तपसे अपने अन्तरात्मामें ही इस आत्माकी उपलब्धि होती है। अर्थात् पूर्णानन्दस्वरूप आत्मामें ही इस परमात्माका अनुभव होता है॥ १५॥ इस परमात्माको किस प्रकार देखना चाहिये, यह कहते हैं, यथा- सर्वव्यापिनमात्मानं क्षीरे सर्पिरिवार्पितम्। आत्मविद्यातपोमूलं तदब्रह्मोपनिषत्परम्॥ तदुब्रह्मोपनिषत्परम् ॥ १६ ॥ भावार्थ-जैसे दूधमें घृत अर्पित=व्याप्त है, उसी तरह जो सर्वव्यापक है, जो आत्मविद्या तथा तपका कारण है तथा उपनिषद्का सार है, वही आत्मा=ब्रह्म है ॥ १६ ।। वि. वि० भाष्य-तद्ब्रक्मोपनिषत्परम्' इस वाक्यकी पुनरुक्ति अध्याय- समाप्त्यर्थ है। जो मनुष्य सत्यादि साधन सम्पन्न है, वही उस सर्वव्यापी आत्माको देखता है, जो दूधमें घीके समान सर्वगत और आत्मविद्या एवं तपका मूल है तथा ब्रह्मोपनिषत्पर है। अर्थात्-आत्मदर्शी पुरुष इस सवगत ब्रह्मको आत्मामें ही देखता है॥ १६ ॥ इस अध्यायके प्रथम मन्त्रमें कारणका प्रश्न, द्वितीय मन्त्रमें कालादिके कारण- त्वकी शङ्का, तृतीयमें उनकी परतन्त्रता और परमात्माकी अधीनता, चतुथमें संसार- चक्र और पञ्ागमें संसार नदीका वर्णन, षष्ठमें जीवात्माका उनमें भ्रमण और ५०

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३६४ श्वेताश्वतरोपनिषद् [अध्याय २

परमात्मज्ञानसे मुक्ति, ७-८-६-१०-११-१२ वें मन्त्रमें प्रकृति, जीवात्मा तथा परमा- स्माका भेद और परमात्माकी प्रधानता, १३-१४-१५-१६ वे मन्त्रमें अग्नि, तिल, दुग्ब, दही और झरनेके दृष्टान्तोंसे परमात्माका सर्वव्यापक होकर भी बिना उपायके न प्राप्त हो सकना; यह वर्णन किया गया है।

द्वितीय तरप्रध्याय

प्रथम अध्यायमें परमात्माके साक्षात् करनेका उपाय जो ध्यान है वह कहा, अब उसके लिए अपेक्षित साधनोंका विधान करनेके लिए दूसरा अध्याय आरम्भ करते हैं। पहले उसकी सिद्धिके लिए सविता देवतासे प्रार्थना करते हैं, यथा- युञ्जानः प्रथमं मनस्तत्वाय सविता धियः। अभ्नेरज्योतिर्निचाय्य पृथिव्या अध्याभरत॥ १॥ भावार्थ-प्राण (इन्द्रियों) को उत्पन्न करनेवाले प्रकाशस्वरूप परमात्मामें ध्यानके आरम्भमें मनको जोड़ना चाइिये। जो उसका अनुभव करनेवाला है वह संसारमें सब आध्यात्मिकको पोषण करनेवाला हो जाता है॥ १॥ वि० वि. भाष्य-प्रथम अध्यायमें आत्मज्ञानकी प्राप्तिके कुछ उपायोंको दिखाया गया है, अब इस दूसरे अध्यायमें बहिमुंखताके दूर करनेके लिए योगरूप उपायका बोधन करते हैं। क्योंकि नपुंसक पुरुषोंको जिस प्रकार संतान उत्पन्न नहीं हो सकती, ऐसे ही विना योगके आत्मज्ञान होना सम्भव नहीं। जिस प्रकार मधु- मक्खियोंके राजाके चलनेसे सब मत्िकायें चलती हैं, और उसके स्थित हो जानेसे बैठ जाती हैं, इसी प्रकार मनके चलनेसे सब प्राणादिक चलते हैं और अपने राजा मनके स्थिर हो जानेसे निश्चल हो जाते हैं। अतः आत्मज्ञानकी प्राप्तिमें मनका निरेध ही मुख्य साधन है। मन ही इन्द्रियोंको विषयोंमें दौड़ाकर सब अनर्थ कराता है, जब मन रुकेगा, तब बुद्धि (ज्ञान) का प्रसार होगा। जब ज्ञान फैलेगा तब योगी अपने हृदया- काशमें परमात्माका ध्यान करेगा। जैसे नीची नहरका पानी ऊँचे खेतोंमें नहीं जा सकता। हाँ, प्रवाहको रोककर जलको ऊँचा करदो तो पहुँच जायगा। वैसे ही

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मन्त्र २-३ ] विद्याविनोद भाष्य ३६५

मनुष्यके स्वल्प याने नीचे ज्ञानमें परमात्मा, जो अत्यन्त सूक्षम होनेसे उच्च है, उसका ध्यान नहीं हो सकता। किन्तु जब ज्ञानरूपी जलके प्रवाहको, जो इन्द्रियरूपी छिद्रों द्वारा विषयरूपी नीचाईमें बहा जाता है, रोका जाय तो ज्ञान उच्च होकर परमात्माका ध्यान कर सकते हैं। अतएव मन रोककर, ज्ञान बढ़ाकर हृदयमें ईश्वरक़ा ध्यान करे। इसीलिए चित्तवृत्ति निरोधार्थ योगका अभ्यास आवश्यक है॥ १॥ अब मन्त्रद्रष्टा ऋषिगण आत्मामें बहुत्वका आरोपण करके कहते हैं, यथा- युक्तेन मनसा वयं देवस्य सवितुः सवे। सुवर्गेयाय शक्त्या॥ २ ॥ भावार्थ-योग युक्त मनसे हम प्रकाशस्वरूप उत्पादककी आज्ञासे यथाशक्ति मोक्षकी प्राप्तिके साधनमें यत्न करते हैं॥२॥ वि० वि० भाष्य-मनकी एकाग्रताके विना न तो कर्मकाण्ड ही अच्छी तरह बनता है और न ज्ञान तथा उपासना ही॥ २ ॥ 'परमात्मा मनको एकाग्र करे' ऐसी प्रार्थना करते हैं, यथा- युक्त्वाय मनसा देवान सुवर्यतो धिया दिवम्। बृहज्ज्योतिः करिष्यतः सविता प्रसुवाति तान् ॥ ३ ॥। भावार्थ-मनसे, आत्मामें युक्त होनेके लिए सब इन्द्रियाँ पूर्णानन्दको प्राप्त हों, सम्यग दर्शन करके देव प्रकाशस्वरूप प्रकट हो। सवितृदेव मनके सहित इन्द्रियोंको परमात्मासे संयुक्त कर उन्हें सामर्थ्य प्रदान करे॥ ३ ॥ वि. वि० भाष्य-यदि इन्द्रियाँ और मन प्रबल हैं तो अल्प सामर्थ्यवाला जीवात्मा इन्हें कैसे रोके ? इसका उत्तर यही है कि परमात्माकी सहायतासे ऐसा करे। इसीलिए ऋषिलोग प्रार्थना करते हैं कि सविता परमेश्वर इन्द्रियोंको विषयों- की ओरसे हटाकर अपनी ओर ही लगावे जिससे मन और इन्द्रियाँ आत्मामें जुड़नेके लिए प्रयत्न करें, पूर्ण आनन्दरूप ब्रह्मकी ओर ही गमन करें, विषयोंकी ओर नहीं और बुद्धि प्रकाशस्वभाव एकरस चेतनका दर्शन करके पूर्ण आनन्दको अपनेमें प्रकट करे ॥ ३ ॥ योगी केवल मन और इन्द्रियोंको विषयोंसे ही रोककर न बैठे रहें, किन्तु उन्हें परमात्माकी बहुत प्रकारसे स्तुति भी करनी चाहिए यह कहते है-

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३६६ श्वेताश्वतरपिषद् [ अध्याय १

युञ्जते मन उत युञ्जते घियो विप्रा विप्रस्य बृहतो विपश्चितः। वि होत्रा दधे वयुनाविदेक इन्मही देवस्य सवितुः परिष्ठुतिः।४।। भावार्थ-योगयज्ञके होता विद्वान् ब्राह्मण मनको एकाग्र करते हैं, ज्ञानेन्द्रिय अथवा बुद्धिको समाहित करते हैं। जो अकेला ह। विज्ञानवेत्ता सृजता है, उस मेधावी, बड़े, अनन्तविद्यावाल सर्वजनक, ईश्वरकी सब प्रकारसे बहुत बहुत स्तुति करना चाहिये।। ४ ।। वि० वि० भाष्य-व्यापक, देश-काल वस्तु परिच्छेदसे रहित, ज्ञानस्वरूप आत्मामे साक्षात्करनके वास्ते सम्पूर्ण क्रियाको समतर बुद्धिकी वृत्तियोके साक्षी सजाताय-विजाताय-स्वगत भेदसे रहित ब्रह्मात्माके अर्पण करते हैं। जो कि सबसे महान् प्रकाशस्वरूप देव परमात्मा है, वही महान् स्तुतन करने याग्य है।।४। म्तुति एव उपासनाको स्वीकार करते हुए परमकपालु परमात्मा अपने भक्तोसे इस प्रकार कहत है कि- युजे वां ब्रह्म पूर्व्य नमोभिर्विश्लोक एतु पथ्येव सूरेः। शृण्वन्तु विश्वे अनृतस्य पुत्रा आ ये धामानि दिव्यानि तस्थु:॥ ५॥ भावार्थ-तुम लाग योगद्वारा अनादि ब्रह्मन सयुक्त हाजा, नमस्कार वथा स्तुति करके उसको प्राप्त होओ और दूसरासे की हुई स्तुतिको श्रत्रण करो। यही पण्डितोका निश्चित कया हुआ सन्मार्ग है। इससे ब्रह्मके सम्पूण प्रसिद्ध पुत्र दिव्य स्थानोको प्राम् होगे ॥ ५ ॥ वि० वि• भाष्य-जैसे पण्डित लोग आत्मा (ब्रह्म) का स्तुति करके उसमे मिल जाते हैं वैसे ह। अपाण्डत भी मनसे स्तुति करके उसमे लोन हो सकते हैं। यदि स्तुति करनेका प्रकार विदित न हा ता दूसरोसे सुन लेना चाहिये। सनकादिको- की तरह सभी 8 मृत ब्रह्मके पुत्र हैं, अत सभी स्तुति करनेसे प्रकाशमान धामम जा सकते हैं ॥ ५ ॥ पहले सविता आदिकी प्राथना कहा गइ, किन्तु जा मनुष्य उनको स्तुति न करके उनकी अनुज्ञाके बिना हो योगमे प्रवृत्त हाता है, उसकी भोगके हेतुमूत कर्मोंमे ही प्रवृत्ति हो जाती है, यहां श्रुति कहती है, यथा -

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भन्त्र ६-६ ] विद्याविनोद भष्य

अभनिर्यत्राभिमथ्यते वायुर्यत्राधिरुध्यते। सोमो यत्रातिरिच्यते तत्र संजायते मनः ॥ ६॥ भावार्थ-जहाँ अग्नि मथा जाता है, या सुलगाया जाता है, जहाँ वायु रोका जाता है और जहाँ सोम (अमृत) अतिशयसे होता है, वहाँ मन स्थिरताका लाभ करता है॥ ६ ॥ बि. वि० भाष्य-यह बात योगी लोगोंको विदित है कि शरीरमें मूलाधार नामक एक स्थान है, वहाँ प्राण रोका जाता है, वही मानस अग्नि प्राणवायुकी सहायतासे धोंककर सुलगाया जाता है और वही मूलावारसे सुषुम्ना नाड़ी तक अमृत टपकने जैसा आनन्द प्रतीत होता है। वहीं मन ठहर जाता है ॥ ६ ॥ वहाँ मनको रोककर फिर क्या करे? यह कइते हैं, यथा- सवित्रा प्रसवेन जुषेत ब्रह्म पूर्व्यम्। तत्र योनिं कृवसे न हि ते पूर्तमक्षिपत्॥७॥

भावार्थ-उत्पन्नकर्ता, जगत्का कारण अनादि चेतन ब्रह्म ही उपासना करने योग्य है, उस ब्रह्ममें तुम समाधि करो, मन लगाओ, फिर पूर्तकर्म तुम्हारा बन्धन करनेवाला नहीं होगा।। ७ ॥ वि० वि० भाष्य-चित्तकी वृत्तिका निरोध करनेसे जो चन्द्रमण्डलसे सुषुम्ना नाड़ी द्वारा अमृत टपकता है, मुमुत्ु उसी अमृतका पान करे। वह ब्रह्म है, अनादि है, उसी ब्रह्ममें समाधिरूप चित्तकी एकाग्रताको करे। अच्छा तो ऐसी समाधि करनेसे क्या लाभ होगा ? इस पर कहते हैं कि फिर तुम्हारे लिए इष्ट-पूर्त- दत्त ये कर्म बन्धनके कारण न होंगे, किन्तु सम्पूर्ण कर्म दग्ध हो जायँगे। ७॥ ऊपर कहा गया है कि 'समाधि करो,' सो यह समाधि किस रीतिसे करनी चाहिये ? ऐसी शङ्का करके उसका प्रकार दिखाते हैं, यथा-

त्रिरुन्नतं स्थाप्य समं शरीरं हृदीन्द्रियाणि मनसा संनिवेश्य। ब्रह्मोडुपेन प्रतरेत विद्वान् स्रोतांसि सर्गणि भयावहानि ॥८॥

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श्वेताश्वतरापांनषदू [नध्याय १

भावार्थ-छाती, पीवा और सिर इन तीनोंको ऊँचा रखे और शरीरको भी सीधा करके बैठे फिर मनके द्वारा इन्द्रियोंको हृदय कमलमें सन्निविष्ट कर ओंकाररूप नौकासै विद्वान् सम्पूर्ण भयानक संसाररूप जलप्रवाहको पार कर जाता है॥८॥ वि• वि० भाष्य-योगद्वारा मनका जो निरोध है यही संसाररूपी समुद्रको तैरनेका उपाय है। क्योंकि मन्त्रोंमें आलस्य नहीं होता, अतः उनमें बार बार मनो- निग्रहको परम पुरुषार्थका साधन कहा है। योगी शौचादि क्रिया करके कोमल आसन पर पद्मासन लगाकर बैठे, छाती, गर्दन और सिर इनके सहित शरीरको सीधा रखे, हिले डुले नहीं। फिर हृदय- प्रदेशमें मनके सहित सम्पूर्ण इन्द्रियोंको स्थापन करे, अनन्तर अपर ब्रह्मरूप प्रणवको संसाररूपी नदीसे तैरनेका साधन बनावे। बादमें उससे जन्ममरणरूपी भयको देनेवाले संसार सागरसे पार हो जावे। भर्तृहरिने 'आशा नाम नदी' इस श्रोकमें इस नदीकी भयङ्करताका वर्णन किया है॥८॥ वही शुद्ध चित्तवाला साधक ब्रह्ममें स्थित होता है जिसके प्राणायाम करनेसे मल आदि दोष दूर हो जाते हैं, मलिन चित्तसे कदापि स्थिरता नहीं हो सकती। यही कहते हैं, यथा- प्राणान् प्रपीड्येह संयुक्तचेष्टः क्षीणे प्राणे नासिक- योच्छ्वसीत। दुष्टाश्वयुक्तमिव वाहमेनं विद्वान् मनो धारयेताप्रमत्तः ॥ ६॥ भावार्थ-प्रमादरहित विद्वान् योगाभ्यास कालमें प्राणादि वायुओंको खींच और रोककर प्राणके निर्बल प्रतीत होनेपर नासिकासे शनैः शनैः बाहर निकाल दे। फिर वह सयुक्तचेष्ट (जिसने अच्छे अभ्यासकी चेष्टा की है) योगी पुरुष दुष्ट घोड़ोंसै जुते रथके सारथीकी तरह साववान होकर मनका नियन्त्रण करे॥ है॥ वि. वि० भाष्य-योगीको युक्तचेष्टावाला यानी अल्प आहार-व्यवहार- युक्त और अप्रमत्त यानी सावधान एवं विद्वान् होना चाहिये। जो साधक नित्यप्रति सोलह प्राणायामोंका अभ्यास करता है, वह समस्तप्राणों पर विजय प्राप्त करता हुआ मनोवान्ित फल पा जाता है। अभ्यासीको चाहिये कि वह प्राणायाम द्वारा शारीरिक दोषोंको भस्म करे, धारणासे पापोंका नाश करे, प्रत्याहारसे वैषयिक संसर्गों का अन्त करे ओर ध्यानसे अनीश्वर गुगोकी निवृत्ति करे। जो मनुष्य प्रति-

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मन्त्र १०-११ ] विदाविनोद भाष्य ३९९ दिन ख्नान करके सौ प्राणायाम करता है वह यदि साता, पिता या गुरुकी हत्या करनेवाला हो तो भी तीन वपमें उस पापसे सुक्त हो जाता है (ऐसा भाष्यकार कहते हैं)। शास्त्रान्तरोंमें भी योगाभ्यासकी बहुत महिमा कथन की गई है॥ ९॥ ध्यानके लिए कौन स्थान उपयुक्त हो सकते हैं ? इस प्रन्नके उत्तरमें कहते हैं- समे शुचौ शर्करावहिवालुकाविवर्जिते शब्दजलाश्रया- दिभिः। मनोऽनुकूले न तु चन्तुपीडने गुहानिवाताश्रयो प्रयोजयेत् ॥ १० ॥ भावार्थ-योगीको चाहिये कि वह चौरस, पवित्र, कंकडी, अभि और बालूसे रहित, तथा शब्द, जल, सील और आश्रय आदिसे शून्य हो, मनके अनुकूल हो, एवं जहाँ कोई नेत्रोंको कष्ट देनेवाला न हो, ऐसे गुफा आदि वायुके झोकोंसे रहित एकान्त स्थानमें योग साधन करे ॥ ११ ॥ वि० वि० भाष्य-जो जगह ऊँची नीची न हो, जहाँ दुर्गन्ध न हो, कंकड़ पत्थरके टुकड़े चुभते न हों, अगिका ताप न लगता हो, बालू उड़कर शरीरमें न लगता हो, क्रर या ऊँचा शब्द न सुनाई पड़े, जलकी सील न हो; ऐसा स्थान ध्थान- के लिए चुने। वहॉ पर सर्प भेड़िया आदिका स्थान न हो, और मच्छर, मक्खी खट- मल आदिका त्रास न हो, देखनेमें आँखोंको बुरी लगनेवाली कोई वस्तु सामने न हो, एकान्त हो, वायु प्रबल न चलता हो। ऐसे मनके अनुकूल देशमें योगाभ्यास करना चाहिये॥ १० ॥

जाते हैं, यथा- इम् मन्त्रसे योगाभ्यासीमें प्रकट होनेवाले ब्रह्माभिव्यक्तिके पूर्व चिन्ह बतलाये

नीहारधूमार्कानिलानलानां खद्योतविद्युस्स्फटिकशशी- नाम्। एतानि रूपाणि पुरःसराणि ब्रह्मण्यभिव्यक्ति- कराणि योगे॥। ११ ॥ भावार्थ-योगीको योगाभ्यास प्रारम्भ करने पर पहले अनुभव होनेवाली निम्नलिखित वस्तुयें सामने आती हैं, जैसे-कुहरा, धूआँ, सूयँ, वायु, अभि, खद्योत, विजली, स्फटिकमणि और चन्द्रमा। इनके दृश्यरूप ब्रह्मकी अभिव्यक्ति करनेवाले होते हैं।। ११ !१

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४०० श्वेताश्वतरोपनिषद् [अभ्याय २

वि० वि० भाष्य-ब्रह्मानुसन्धानके प्रयोजनसे किये जानेवाले योगमें ये सब रूप पहले दिखाई देते हैं, इसके अनन्तर योगकी सिद्धि होती है, जैसे-पहले प्राणोके सहित चित्तवृत्तिके सामने कुहरा सा छा जाता है उसके बाद धूवासा भासने लगता है, फिर सूर्यकी तरह बादमे वायु और अगिकी तरह कभी जुगन्सा कभी विजली जैसा कभा स्फटिकर्का तरह और कभी चन्द्रमासा दिगाई देता है ॥११॥ अकाल मृत्यु कैसे हटाई जाता है और रोग तथा जना पर कैसे विजय पाई जाती है? इन प्रश्नोके उत्तररूप चिन्होका वर्णन किया जाता है, यथा-

पृथ्ठयप्तेजोऽनिलखे समुत्थिते पञ्चात्मके योगगुऐो प्रवृत्ते। न तश्य रोगो न जरा न मृत्यु: प्राप्तस्य योगा- ग्निमय शरीरम्॥ १२ ॥ भावार्थ-पृथिवी, उल, तेज वायु और आकाश इन पॉचोसे पक्भूतरूप शरीर उत्पन्न होता है। जब कि उसमे अष्टाङ्ग योगसे 'सोह' रूपी गुण उत्पन्न होता है, तब फिर उस योगीको न काई रोग होता है न वद्धावस्था आती है और न मृत्यु ही होती है। क्योकि उस समय अभ्यासीका शरीर यागरूपी अगिसे युक्त हो जाता है॥। १२।। वि० वि. भाष्य-पञ्च महाभूतोको वशमे करनेवाले अषटाङ् योगयुक्त पुरुषको ज्वर, अतिसार और पीडा आदि रोग तथा शरीरको कुरूप करनेवाला, बालोको पकाकर गिरानेवाला बुढापा भी नही आता। इसलिए वान्छ्ित फलके लाभसे होनेवाला कोई प्रतिकूल दुख भी नही होता। स योगीकी अकाल मृत्यु भी नही होती, योगाग्िमय शरीर बन जाता है। जैसे-सुवर्णको अग्निमें डाल देने पर भी सुवर्ण तो रहता ही है, नष्ट नही होता, प्रत्युत अभ्िकी ज्योति सुवर्णमें व्याप्त हो जाती है, ऐसी दशामे मारे डरके उसे कोई स्पर्श नही कर सकता। इसी प्रकार जिस योगीने अपने आत्माको परमात्माके ध्यानमें लगाकर ज्योति याने अपूर्व तेज प्राप्त कर लिया है, अब भयके मारे उससे रोग आदि दूर रहते हैं। जितने समय- तक उसकी इच्छा होती है वह शरीरको धारण कर सकता है। इतना बड़ा लाभ है योगयुक्त पुरुषको । १२ ॥ पोगके और भी लाभ बतलाते हैं, यथा-

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मन्त्र १३-१५ ] विद्याविनोद भाष्य ४०१

लघुत्वमारोग्यमलालुपत्वं वर्णप्रसादं स्वरसौष्ठवं च। गन्धः शुभो मूत्रपुरीषमल्पं योगप्रवृत्तिं प्रथमां वदन्ति ॥१३॥ भावार्थ-योगीके शरीरका अति हलका होना, रोगरहितता, बिषयासक्तिकी निवृत्ति, शारीरिक कान्तिकी उ्वलता, मधुर भाषण, सुगन्ध और मल मृत्रकी न्यूनता; ये सब योगकी पहली सिद्धि कही गई हैं॥ १३॥ वि० वि० भाष्य-योगीका मन विषयोंकी ओर नही जाता, इसी लिए वह सदा प्रसन्न रहता है। योगीकी बोल चाल भी मधुर होती है, केतकी आदिक पुष्पोंकी शुभ गन्ध उसके शरीरसे आने लगती है और वह मल-मूत्र भी कम ही करता है। अष्टाङ्गयोग साधककी यह प्रथमावस्था है॥। १३ ॥ अब योगसिद्धिका प्रभाव कथन करते हैं, यथा- यथैव विम्बं मृदयोपलिसं तेजोमयं भ्राजते तत्सुधा- न्तम्। तद्वात्मत्त्वं प्रसमीच्य देही एक: कृतार्थो भवते वीतशोक:॥ १४।। भावार्थ-जैसे मिट्टी आदिसे मलिन हुए सोना, चाँदी आदि धातु अग्निसे शुद्ध होकर तेजोमय हो चमकने लगते हैं, वैसे ही देहधारी जीव आत्मतत्वका साक्षात् कर अद्वितीय, कृतकृत्य और शोकरहित हो जाता है॥ १४।। वि० वि. भाष्य-जैसे सोने चाँदी पर मल चढ़ा हो तो वह ढक जाता है, फिर अभि, मज्जन आदिसे मलिनता दूर होनेसे वह चमकने लगता है। वैसे ही आत्मतत्व भी मायासे आच्छादित हो रहा है, जब कि योगी सर्वभेदसे शून्य 'वह ब्रझ्मात्मा मैं हूँ' इस प्रकार अपना स्वरूप जान लेता है, तो सभी बन्धनोंसे छूट जाता है॥। १४ ।। किस प्रकार जानकर जीव शोकरहित होता है, अब श्रुति यह कहती है, यथा- यदात्मतत्वेन तु ब्रह्मतत्वं दीपोपमेनेह युक्त: प्रप- श्येत्। अजं ध्रुवं सर्वतत्वैर्विशुद्धं ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः।।१५ ।। ५१

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४0२ श्वेताश्वतरोपनिषद् [अध्याय २

भावार्थ-जिस अवस्थामे योगी दीपकके समान प्रकाशमान आत्मस्वरूपसे ब्रह्मतत्त्वका साक्षात्कार करता है, उस समय जन्मशून्य स्थाएु (निश्चल) सम्पूर्ण तत्वोसे पवित्र परमात्माको जानकर सब बन्घनोसे छूट जाता है॥ १४॥ वि० वि. भाष्य-योगी जिस समय इसी वर्तमान शरीरमे दीपककी तरह प्रकाशमान अपने आपसे ब्रह्मको देखता है याने मैं ही ब्रह्मरूप हॅू इस प्रकार आत्माको अजन्मा, नित्य, शुद्ध और अविद्या तत्कार्योंसे रहित जान लेता है, तब सम्पूर्ण अहन्ता, ममता आदि पाशोसे छट जाता है॥ १५ ॥ परमात्माको आत्मभावसे जाने, पहले यह कहा गया है। अब् उसीका सम्भावन करते हुए मन्त्र कहता है याने उसीकी सम्भूति कहता है, यथा- एष ह देवः प्रदिशोऽनुसर्वाः पूर्वो ह जातः सउगर्भे अन्तः। स एव जातः स जनिष्यमाणः प्रत्यङ्जनांस्ति- ष्ठति सर्वतोमुखः ॥१६ ॥ भावार्थ-यह परमात्मदेव ही पूर्व आदि समग्र दिशा और उपदिशाएँ है। यह हिरण्यगर्भरूपमे सबसे प्रथम उत्पन्न हुआ था। यही गर्भके भीतर विद्यमान है। यही बालरूपसे उत्पन्न हुआ है, यही उत्पन्न होनेवाला है, और यही सम्पूर्ण जीवोमे अन्तरात्मरूपसे स्थित है। तथा सर्व प्राणियोके मुख इसीके हैं, अतएव यह सर्वतोमुख है॥ १६॥ वि० वि० भाष्य-योगीने जिस परमात्माके विषयमे सन्तोसे सुन रखा था, अब उसका अनुभव करके वह आश्चयके साथ कहता है कि ओहो। यही देव है जो सर्व दिशा-विदिशाओंमे वर्तमान है या तद्रूप है। यही है जो मेरे जाननेसे पूर्व भी था। यही है जो भूत और भविष्यत् इन दोनो कालोमें एकरस है और यही है जो अब सबके भीतर अन्तर्यामी होकर छिपा बैठा है और पहले जो इन्द्रियोसे नहीं जाना जाता था ॥ १६॥ अब योगकी तरह नमस्कारादि अन्य साधनोको भी कर्तव्यरूपसे श्रुति प्रदशित करती है, यथा- यो देवो अमौ यो अप्सु यो विश्वं भुवनमा- विवेश। य ओषधीषु यो वनस्पतिषु तस्मै देवाय नमो नमः॥ १७ ॥

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मन्त्र १ ] विद्याविनोद भष्य ४०३

भावार्थ-जो देव अग्निमें, जो जलमें है और जिसने समग्र जगत्को व्याप्त कर रखा है तथा जो ओषधि तथा वट आदि वनस्पतियोंमें भी विद्यमान है, उस देवको नमस्कार है, नमस्कार है॥। १७ ।। वि. वि० भाष्य-जैसे आकाशकी उत्पत्ति नहीं होती, घटरूपी उपाधिकी उत्पत्तिसे घटाकाशमें उत्पत्तिका व्यवहार होता है। ऐसे ही लिङ्गशरीररूपी उपा- घियोंकी उत्पत्तिसे ही आत्मामें भी उत्पत्तिका व्यवहार होता है। वास्तवमें सर्वे- व्यापक निराकारका उत्पन्न होना नहीं बनता। उसी परमात्माकी पूणताका बोधक यह मन्त्र है।। १७ ।।

तृतीय त्र्रध्याय

एक ही परमात्मामें जिस प्रकार शासक और शासनीय दोनों भाव रहते हैं, उसे श्रुति कहती है, यथा- य एको जालवानीशत ईशनीभि: सवाल्लोकानीशत ईशनीभिः। य एवैक उद्भवे सम्भवे च य एतद्विदुरमृ- तास्ते भवन्ति ॥ १॥। भावार्थ-जो एक अद्वय परमात्मा मायापति अपनी शक्तियोंसे सब लोकोंको वशमें करता है और जो अकेला ही उद्धव=रचनाकालमें एवं सम्भव=प्रलय समयमें अपनी सामर्थ्यसे सब व्यवस्था स्वाधीन रखता है, उसे जो जानते हैं, वे अमर हो जाते हैं ॥ १॥ वि. वि० भाष्य-सचमुच ईश्वर जालवाला है, जैसे जालमें पकड़े हुए जन्तु जहाँ तहाँ नहीं भाग सकते, जिस तरह जालवाला रखता है वैसे ही उन्हें रहना पड़ता है। वैसे ही परमात्माकी व्यवस्थाका नियम भी एक जाल ही है, उसमें कर्मानुकूल बँधे हुए जन्तु छूट नहीं सकते। यही नहीं बल्कि सम्पूर्ण चर, अचर उसके निमयके अधीन हैं । १।। तो फिर वह जालवाला मायावी कैसे है ? सो कहते हैं, यथा-

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४०४ श्वेताश्वतरोर्पानषद् अध्याय रै

एको हि रुद्रो न द्वितीयाय तस्थुर्य इमॉल्लोकानीशत ईशनीभिः। प्रत्यङ् जनांस्तिष्ठति संचुकोचान्तकाले संसृज्य विश्वा भुवनानि गोपा: ॥ २ ॥ भावार्थ-क्योंकि एकही रुद्र है, अतः परमार्थदर्शी लोग स्वतः किसी दूसरी वस्तुके लिए अपेक्षा नहीं करते। वह अपनी सामथ्यसे इन लोकोंका शासन करता है। वह सम्पूर्ण प्राणियोंके भीतर वर्तमान है, वह सम्पूर्ण मुबनोंको रचकर उनका रक्षक हो प्रलयकालमें उनका संहार कर देता है॥ २॥ वि० वि. भाष्य-'सर्व रोदयति संहरति प्रलयादौ इति रुद्रः'[ ईश्व: ] अथवा-'रुजं दुःखं द्रावयतीति रुद्रः' (जो कि दुःखका नाश करे) अर्थात् जन्म- मरणरूपी दुःखके नाश करनेवाला वह परमात्मा हो है। वह एक है, द्वूतप्रपञ्से रहित है, पर मायावी भी है॥ २ ॥

विश्वतश्चक्षुरुत विश्वतोमुखो विश्वतोबाहुरुत विश्वत- स्पात्। सं बाहुभ्यां धमति संपतत्रैर्द्यावाभूमी जनयन् देव एक: ॥ ३ ॥

भावार्थ-उसके सब ओर नेत्र हैं, सब तरफ मुख हैं, हाथ भी उसके सभी ओर हैं और सब ओर पाँव हैं। वह अद्वय परमात्मदेव घुलोक और पृथिवीकी रचना करता है। वह मनुष्योंको ठीक दो हाथोंवाला और पत्ियोंको पंखोंवाला बनाता है॥ ३।। वि. वि० भाष्य-इस मन्त्रकी विद्वानोंने कई प्रकारसे व्याख्या की है, यह उपर्युक्त अर्थ शांकर भाष्यानुसार किया गया है। वह परमात्मा मनुष्योंको दो हाथोंवाला और पत्तियोंको पंखोंवाला ही नहीं करता प्रत्युत संसारके सभी पदार्थो का अ्ङ्गोपाङ्ग निर्माण करता है। किसीका कहना है कि दुलोक और पृथिवीकी रचना तो वह करता है अर सब वस्तुओंको कोई दूसरा बनाता है क्या ? इस शंकाका उत्तर यह है कि 'धु' शब्दसे प्रकाशमान और 'भूमि' शब्दसे बिना प्रकाशवाले लोकोंको लेना। अर्थात् ईश्वर सभीकी रचना करता है, किसी एक ही की नहीं॥ ३ ॥

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मन्त्र ४-६ J विद्याविनोद भाष्य ४०५

अब श्रुति हिरण्यगर्भ सृष्टिका कथन करती हुई ऋषियोंकी अभिप्रेत वस्तुके लिए प्रार्थना करती है, यथा- यो देवानां प्रभवश्चोन्वश्च विश्वाधिपो रुद्रो महर्षिः। हिरण्यगर्भ जनयामास पूर्व स नो बुद्धचा शुभया संयुनक्तु॥ ४ ॥ भावार्थ-जो रुद्र (परमात्मा) इन्द्रादिदेवताओंकी उत्पत्तिका और विभू- तियोंका कारण है, जो संसारका अधिपति है, तथा जो सर्वज्ञ है एवं जिसने उस हिरण्यगर्भको उत्पन्न किया, वह हमें अच्छी बुद्धियोंसे संयुक्त करै अर्थात् हमारी बुद्धियोंको अच्छे काममें लगावे॥ ४ ॥ वि० बि० भाष्य-जो परमेश्वर सबका आधार है, सबके रचने, पालनेवाला और अन्तमें अपनेमें सबको समेट लेता है, वह अनन्तकोटि ब्रह्माण्डनायक कृपया हम सबको सुमति दे ॥। ४ ।। अगले दो मन्त्रोंसे फिर भी उसके स्वरूपको प्रदर्शित करती हुई भगवती श्रति अभिप्रेत अर्थके लिए प्रार्थना करती है, यथा- या ते रुद्र शिवा तनूरघोरापापकाशिनी। तया नस्तनुवा शन्तमया गिरिशन्ताभिचाकशीहि॥५॥ भावार्थ-हे रुद्र!जो तुम्हारी कल्याण स्वरूप, प्रसन्न तथा पुण्योंको प्रकाश करनेवाली मूर्ति है, हे गिरिशन्त ! उस सुखस्वरूप मूर्तिके द्वारा हमको देखिये॥ ५॥ वि० वि० भाष्य-'गिरिशन्त' यह सम्बोधन है, इसका अर्थ यह है कि जो गिरिमें रहकर शम्-सुखका विस्तार करनेवाला हो। यहाँ परमात्माको 'रुद्र' इसलिए कहा है कि वह दुष्टोंको रुलाता है, दुःखदायक होकर दण्ड देता है। परन्तु हम तो उसके आज्ञाकारी भक्त हैं, इमें तो वह कल्याणमय शान्तरूपसे देखे, अर्थात् इस हमारी शरीररूपी सृष्टि पर कृपादृष्टिकी वृष्टि करता रहे॥ ५॥ यामिषुं गिरिशन्त हस्ते विभर्ष्यस्तवे। शिवां गिरित्र तां कुरुमाहिथसीः दुरुषं जगत् ॥ ६ ॥ भावार्थ-हे गिरिशन्त ! तुम जीवोंकी तरफ छोड़ने याने फेंकनेके लिए अपने हाथमें जो बाण लिए रहते हो, हे गिरित्र ! उसे शिव करो, कल्याणकारी बनाओ।

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४०६ श्वेताश्वतरोपनिषद् [अध्याय ह

वि० वि. भाष्य-'गिरिशन्त'का अर्थ 'कैलाश पर कल्याण मार्गका उपदेश देनेवाला' किया गया है। गिरित्रका अर्थ है (गिरीन्=अस्थिपुञ्जान्=देहान् त्रायते इति गिरित्रः) अर्थात् यह अस्थियोंके पुञ्ज शरीरकी रक्षा करनेवालेका नाम है।। ६॥। परमात्मा ही जगत्का कारण है ऐसी स्थिति दिखलाती हुई श्रुति ज्ञानसे अमृतत्त्वकी प्राप्ति बोधन करती है, यथा- ततः परं ब्रह्मपरं बृहन्सं यथानिकायं सर्वभूतेषु गूढम्। विश्वस्यैकं परिवेष्टितारमीशं तं ज्ञात्वाSमृता भवन्ति ॥७। भावार्थ-उस विराटरूप जगत्से परे ब्रह्म चेतन ही सूक्म है, महान् है, व्यापक है। जिस प्रकार शरीरमें आत्मा व्यापक है वैसे ही वह सम्पूर्ण प्राणियोंमें छिपा है तथा विश्वका एकमात्र परिवेष्ठा है या उपसंहर्ता है। उस परमेश्वरको जान-, कर मुमुत्तु अमृत (अमर) हो जाते हैं॥।७ ॥ वि० वि० भाष्य-हिरण्यगर्भसे भी वह चेतन ब्रह्म सूक्ष्म है, अधिक है और देश, काल, वस्तु परिच्छेदसे रहित है। जैसे टेढ़ी (तिरछ्ी) लकड़ियोंमें अग्नि भी बाँकी तिरछी प्रतीत होती है, वैसे ही टेढ़े-मेढ़े, छोटे-बड़े शरीरोंमें भी वह आत्मा व्यापकरूपसे स्थित है, किन्तु वह ऐसा नहीं है। उसीको 'तत्त्वमसि' महा- वाक्यसे अपनी आत्मा जानकर मुमुच जन अमर हो जाते हैं॥।७॥ मन्त्रद्रष्टा ऋषिका अनुभव दिखलाती हुई श्रुति कहती है कि पूर्णानन्द अद्वि- तीय ब्रह्मका आत्मरूपसे ज्ञान होने पर ही परम पुरुषार्थकी प्राप्ति होती है, चपायान्तरसे नहीं, यथा- वेदाहमेतं पुरुषं महान्तमादित्यवर्ण तमसः परस्तात्। तमेव विदित्वाऽतिमृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽ यनाय ॥८ ॥ भावार्थ-मैं उस परमात्माको जानता हूँ जो महान् है, सूर्यकी तरह प्रकाश- मान है और अज्ञानसे परे है। उसको ही जानकर अ्तिमृत्युको तैरा जा सकता है, मोक्षके लिए दूसरा रास्ता नहीं है ॥ ८॥ वि० वि० भाष्य-इस मन्त्रमें मन्त्रद्रष्टाने अपना अनुभव बताया है कि- जिसका अज्ञान (अविद्या) से तीनों कालोंमें भी सम्बन्ध नहीं है, उसीको मैं जानता

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मन्त्र ६-११ ] विद्याविनोद भाष्य ४०७

हूँ। उसीके ज्ञानसे ही मुक्ति होगी। क्या दुःख परिहारके संसारमें हजारों उपाय नहीं है, जो आत्मज्ञानको ही साधन बताया जाता है ?' उत्तर में कहते हैं कि और सब उपाय क्षणिक हैं, अधूरे हैं, केवल आत्मज्ञान ही भवबन्धनकी अचूक ओषधि है॥ ८ ॥ तो फिर जीव उसीको जानकर मृत्युको कैसे लाँघ जाता है, कहते हैं- यस्मात्परं नापरमस्ति किंचिद्यस्मान्नाणीयो न ज्यायोS सिति कश्चित्। वृक्ष इव स्तब्धो दिवि तिष्ठत्येकस्तेनेदं पूर्ण पुरुषेण सर्वम् ॥ ६॥ भावार्थ-जिससे बढ़कर और कोई नहीं है, उससे सूक्ष्म तथा महान् भी कोई नहीं है। वह अपनी महिमामें प्रकाशमान होता हुआ वृक्षके समान निश्चल भावसे स्थित है, उसी पुरुषसे यह सम्पूर्ण जगत् व्याप्त है।! ६।। वि० वि० भाष्य-उस आत्मासे न तो कोई किञ्न्मात्र उत्कृष्ट है न अपकृष्ट है, क्योंकि द्वतका अभाव है। यदि कोई दूसरा आात्मा उससे भिन्न होता तो छोटे बड़ेका व्यवहार बनता ॥ ६॥ ब्रह्मकी कार्य कारणता दिखलाकर श्रुति ज्ञानियोंको अमृतत्व और अन्य सबको संसारित्वकी प्राप्ति दिखलाती है, यथा- ततो यदुत्तरतरं तदरूपमनामयम्। य एतद्विदुरमृ- तास्ते भवन्त्यथेतरे दुःखमेवापियन्ति ॥ १० ॥ भावार्थ-जो हिरण्यगर्भसे परेसे भी परे है, अदृश्य और रोगरहित है, एसे जो जानते हैं, वे अमर हो जाते हैं। अन्य लोग दुःखोंको ही अवश्य प्राप्त होते हैं॥ १० ॥ वि० वि० भाष्य-इस्र कार्यजगत्से परे और कारणप्रकृतिसे भी परे जो ब्रह्म है, वह रूप तथा रोग दुःखसे रहित है। अतः उस्े जो साक्षात् करते हैं, वे ही दुःखरहित होकर मुक्त होते हैं, अन्यलोग तो वेचारे दुःख ही भोगते हैं॥ १०॥ अब श्रुति उसकी सर्वात्मता दिखलाती है, यथा- सर्वाननशिरोग्रीवः सर्वभूतगुहाशयः। सर्वव्यापी स भगवांस्तस्मात्सर्वगतः शिवः ॥११ ॥]

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४०८ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ३

भावार्थ-उसके सब ओर मुख, सिर और ग्रीवा हैं, वह सम्पूर्ण भूतोंकी बुद्धिरूप कन्दरामें शयन करनेवाला है। वह सर्वव्यापक भगवान् (ऐश्वर्यवाला) है, वह सब भूतोके अन्तःकरणमें वर्तमान है। अतः सर्वगत और मङ्गलरूप (आनन्द स्वरूप ) है। ११ ॥ वि० वि. भाष्य-ध्यान दीजियै, मनुष्य आदि जीवोके जहाँ मुख हैं, वहाँ सिर नही हैं, जहाँ सिर हैं, वहाँ कण्ठादि नही हैं। यह इस लिए कि स्थूल पदार्थ एक स्थानमें एक ही हो सकता है। किन्तु परमात्मा सूकमातिसूद्तम होनेसे अपनेमें सर्वत्र ही सब अङ्गोको रख सकता है या उन अवयवोंसे होनेवाले कामोंका सामर्थ्य रखता है। परन्तु तो भी वह प्राणियोंके हृदयमें प्रतीत होता है। हृदयाकाशमें प्रतीत तो होता है, पर उसमें परिच्छ्वन्न नहीं है। वह सर्वव्यापक और ऐश्ववर्ययुक्त बथा आनन्दस्वरूप है ॥ ११ ॥ महान्प्रभुवे पुरुषः सत्त्वस्यैष प्रवर्तकः। सुनिर्मलामिमां प्राप्िमीशानो ज्योतिरव्ययः ॥१२ ॥ भावार्थ-यह अनन्त है, अवश्य ही विभु (सबका स्वामी) है, परिपूर्ण है, अन्तःकरणका प्रेरक है, अविनाशी है, प्रकाशमय है और इस निर्मल मुक्तावस्थाका अधिकारी (मालिक) है॥ १२। वि० वि० भाष्य-वह महान् है अर्थात् कल्पित प्रपश्नसे बड़ा है, इसीसे समर्थ भी है और सवत्र परिपूर्ण भी है। फिर वह ज्ञानादि शक्तिवाले अन्नःकरणका प्रेरक भी है॥ १२ ।। फिर वह कैसा है, कहा रहता है, कैसे तथा किसे मिलता है? उसकी प्राप्तिका क्या फल है? उत्तरमें कहते हैं- अङ्युष्टमात्रः पुरुषोऽन्तरात्मा सदा जनानां हृदये संनिविष्टः। हृदा मन्वीशो मनसाभिवलृप्तो य एतद्विदुर- मृतास्ते भवन्ति ॥ १३ ॥ भावार्थ-वह अंगुष्ठमात्रपरिमाण पुरुष, चेतन, अन्तरात्मा देहधारियोके हृदयमें सदैव स्थित है। सबको धारण करनेवाला है, मनके द्वारा सु्राक्षित है। जा इसे जानते है वे मुक्त हो जाते हैं॥ १३॥

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मन्त्र १४-१५ ] विद्याविनोद भाष्य ४०६

वि. वि० भाष्य-शरीरके भीतर बायें स्तनके नीचे कमलके आकारवाला जो मांसका पिण्ड होता है उसे हृदय कहते हैं। उसके भीतर जो छिद्र है वह अँगूठेके बराबर है। उस छेदमें अन्तःकरण रहता है, वह भी अंगुष्ठ परिमाणवाला है। उसके अन्दर जो आत्मा रहता है, वह भी उपाधिके परिच्छेदसे अँगूठेके परि- गामवाला कहा गया है। प्रकृत मन्त्रमें एक वचनसे क्या एक किसी खास बड़े आदमीका हृदय लिया गया होगा ? यह नहीं है, वह सभी हृदयोंमें व्यापक है। तो क्या वह परमात्मा केवल हृदयमें ही रहता या मिलता है ? नहीं, यह बात नहीं है, है तो वह सब जगह, पर अधिकतर वहीं मिलता है, याने वहाँ मिलनेमें सुभीता होता है। पर मिलता सब जगह है क्योंकि उसकी सत्ता सब जगह है। जैसे राजाका राज्य सब जगह है, पर वह अधिकतर मिलता है अपनी कबहरीमें ही॥ १३॥ अब ईश्वरके सर्वात्मभावका वर्णन किया जाता है, यथा- सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्ष: सहस्रपात्। स भूमिं विश्वतो वृत्वाऽत्यतिष्ठद्दशाङ्गुलम् ॥ १४ ॥ भावार्थ-वह हजारों सिर, हजारों नेत्र और हजारों पाँववाला है, वह परि- पूर्ण है। वह भूमिका सब ओरसे व्याप्त करके दसगुना अधिक होकर स्थिर है॥१४॥ वि० वि० भाष्य-वह सबसे दस अंगुल अधिक है याने अनन्त रूपसे स्थित है। वह सम्पूर्ण ब्रह्माण्डसे भी दसोंगुना अधिक है। अधिक तो बहुत है, पर हमें ऐसा मालूम होता है कि वह सबसे आगे ही रहता दीखता है॥ ९४॥ जब कि ब्रह्म सर्वात्मक है तो वह सप्रपञ्च हुआ, क्योंकि उसके अतिरिक्त किसीकी सत्ता ही नहीं है, इस विषयमें श्रुति कहती है, यथा- पुरुष एवेदथ सर्व यन्द्रूतं यच्च भव्यम्। उतामृतत्वस्येशानो यदन्नेनातिरोहति॥ १५ ॥ भावार्थ-जो कुछ व्यतीत हो चुका और आगे आनेवाला है, और जो अन्नमय कोश करके वृद्धि को प्राप्त होता है, वह सब द्ृश्यमान सम्पूर्ण जगत् पुरुष ही है एवं वही अमृतत्व मोक्षका भी स्वामी है ॥ १५।। वि• वि० भाष्य-यदि परमात्मा सर्व प्रप्को उल्लडघन करके उससे भी दस गुना अधिक होकर रहता है तो वह सब प्रपश्से भिन्न ही सिद्ध होगा ? ५२

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४२० श्वेताश्वतरोपनिषद् [अध्याय ४ समष्टि व्यष्टि कार्यकारणरूप अनेक उपाधियोंमें प्रतिविम्बित हांकर अनेकरूप भी हो रहा है। फिर सम्पूर्ण विश्वके बाहर भीतर होकर सब विश्वका परिवेष्टा भी है. याने आच्छादन करनेवाला है। ऐसे कल्याणरूप चेतनको अपना आत्मा जान- कर मनुष्य अत्यन्त शान्तिको प्राप्त होता है। इस मन्त्रमें जो 'कलिल' शब्द आया है, टीकाकारोंने उसके अनेक अर्थ किये हैं, इसके अर्थमें उनके जो मतभेद हैं या अभिमत अर्थ हैं, उनमें कुछ ये हैं, यथा-गर्भम भागत शरीर सर्वप्रथम कलिल कहाता है। अथवा सृष्टिके आरम्भमें जगत्की रचना करनेवाले जलके बुदबुदकी पूर्वावस्था कलिल कहाती है, याने फेन- वाला पानी। कोई कलिलका तम याने अज्ञान अर्थ करते हैं और काई 'विद्या तथा समस्त अविद्याके कार्य' यह कलिलका अर्थ करते हैं॥ १४॥ जैसे पहले सनकादि तथा ब्रह्मादि देवताओंको आत्म-स्वरूपोपल िवि हुई है, ऐसे ही साधनचतुष्टयादिसे सम्पन्न होने पर हमें भी हो सकती है, यह कहते हैं, यथा- स एव काले भुवनस्य गोप्ता विश्वाधिपः सर्वभूतेषु गूढः। यस्मिन्युक्ता ब्रह्मर्षयो देवताश्च तमेवं ज्ञात्वा मृत्यु- पाशांश्छिनत्ति॥१५ ।। भावार्थ-वही परमेश्वर व्यतीत कल्पों में सम्पूर्ण भुवनका रक्षक था, वही विश्ववका स्वामी और सम्पूर्ण भूतोंमें छिपा हुआ है। ऐसे जिस परमात्मामें महर्षि और देवतालोग भेदभाबको परित्याग कर स्थित हैं, उसे इस प्रकार जानकर मनुष्य मृत्युके पाशोंको काट डालता है॥ १५॥ वि• वि. भाष्य-अविद्या याने तम ही मृत्यु है, तथा रूप आदि विषय पाश हैं, इनमें ही जीव बँधता है। सनकादि महर्षियोंने ईश्वस्को जानकर इन्हीं रोगोंको दूर किया है, हम भी उसी चिन्मात्रको अपना आत्मा जानकर संसाररुपी जालोंका छेदन कर सकते हैं॥ १५॥ ईश्वरके एकत्वज्ञानसे बन्घनका नाश होता है, यह दिखाते हैं, यथा- घृतात्परं मण्डभिवातिसूचमं जाव्वा शिवं सर्वभृतेषु गूढम्। विश्वस्यैकं परिवेष्टितारं ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः॥। १६ ।।

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मन्न्र १६-२०] विद्याविनोद भाष्य ४११

और भी कहते हैं, यथा- नवद्वारे पुरे देही हथसो लेलायते बहिः। वशी सर्वस्य लोकस्य स्थावरस्य चरस्य च ॥ १८ ॥ भावार्थ-सम्पूर्ण स्थावर और जंगम लोकको वशमें रखनेवाला याने उनका स्त्रामी, हंस परमात्मा देहाभिमानी जीवात्मा होकर नत्र द्वारोंवाले देहरूप पुरमें बाह्य विषयोंको ग्रहण करनेके लिए चेष्टा किया करता है॥ १८ ॥ वि० वि. भाष्य-परमात्माको हंस' इसलिए कहा गया है कि वह अविद्या तथा तज्जनित कार्यों का हनन किया करता है। पहले मन्त्रोंमें तत्पदके अर्थ का निरूपण किया गया है, और इस मन्त्रमें त्वंपदके अर्थ का कथन है॥। १८ ।। पहले ब्रह्मात्माका सर्वरूपसे प्रतिपादन किया गया है, अब निर्विकार आनन्द- रूप करके उसका कथन करते हैं, यथा- अपाणिपादो जवनो ग्रहीता पश्यत्यचनुः स शृणो- त्यकर्णः। स वेत्ति वेदं न च तस्यास्ति वेत्ता तमाहुरण्यं पुरुषं महान्तम् ॥ १६ ॥ भावार्थ-वह हाय-पाँत्रवाला नहीं, तो भी वह बड़े वेगवाला और ग्रहण करनेवाला है। नेत्र न होने पर भी देखता है और विना कानके भी सुनता है। वह सम्पूर्ण वेद्य याने जानने योग्योंको जानता है, पर उसे जाननेवाला कोई नहीं है। उसे महात्माओंने सबका आदि, पूर्ण और महान् कहा है।। १६॥ वि. वि० भाष्य-वह विना साधनोंके सब कुछ कर लेता है, वह सबको जानता है, पर उसे कोई नहीं जाननेवाला है, क्योंकि जड़ तो उसे जान नहीं सकता और चेतन उससे भिन्न दूसरा कोई है नहीं। एवं वह त्रिविध परिच्छेदशून्य भी है तथा अपरिच्छ्िन्न, वेत्ता सब कुछ है।। १६।। 'अत्यन्त सूत््मत्व आदि कारणोंसे उसे कोई नहीं जान सकता, किन्तु ईश्बर- की कृपासे ही उसे कोई विरला वीतशोक ज्ञानी जान सकता है, यह कहते हैं, यथा- अशोरणीयान्महतो महीयानात्मा गुहायां निहितोऽस्य जन्तोः । तमकतुं पश्यति वीतशोको धातुः प्रसादान्महि- मानमीशम्॥ २० ॥।

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४१२ श्वेताश्वतरोपनिषद् [अध्याय है

भावार्थ-वह चेतन अणु=सूक्ष्मसे भी सूक्ष्म और महान्=बड़से भी बड़ा है, वह आत्मा इस जीवके याने प्राणिमात्रके अन्तःकरणमें वर्तमान है। उस सङ्कल्प- रहित, महिमायुक्त आत्माको विधाताकी कृपासे जो ईश्वरत्वेन देखता है वह शोक- रहित हो जाता है॥ २० ।। वि० वि० भाष्य-परमात्मा सूद्मसे भी सूत्ष्म है अर्थात्-सर्वं पदार्थों की कारणभूत जो सूक्ष्म प्रकृति है उससे भी अशु है। सबसे महान् जो आकाश ह वह उससे भी बड़ा है। ब्रह्मासे लेकर स्तम्ब पर्यन्त जितने भी प्राणी हैं वह उनकी हृदयकन्दरामें स्थित रहता है। किसी विद्वान्ने 'घाता' का अर्थ 'इन्द्रिय' किया है। उनके मतमे मुमुक्ु 'इन्द्रियोंकी प्रसन्नतासे उसकी महिमाको देखता है' ऐसा अर्थ करना ॥ २० ॥ पूवोक्त अर्थको दढ करनेके लिए मन्त्रद्रष्टा श्रति द्वारा अपने अनुभवको दिखाता है, यथा- वेदाहमेतमजरं पुराणं सर्वात्मानं सर्वगतं विभुत्वात्। जन्मनिरोधं प्रवदन्ति यस्य ब्रह्मवादिनो हि प्रवदन्ति नित्यम् ॥ २१॥ भावार्थ-मैं उस अजर, अनादि, सर्वात्माको जानता हूँ, जा विभु=व्यापक होनेके कारण सर्वगत है, ब्रह्मवेत्ता लोग जिसके जन्मका अभाव बतलाते हैं और जिसे नित्य कहते है ॥ २१ ॥। वि० वि० भाष्य-इस अध्यायमें बार बार अनेक प्रकारसे जो परमात्माकी स्तुतिका दणन किया गया है, क्या इसमें पुनरुक्ति दोष नहीं है ? एक ही बातको बार बार कहकर घोटते रहना पिष्टपेषण या चर्वितचर्वण नहीं है तो क्या है ? यहाँ ऐसी शङ्कामे निम्र होनेकी आवश्यकता नहीं है। जिस मनुष्यको जिस बातमें आनन्द आता है, वह उसे बार बार बिना पूछे बिना किसीके सुन भी कहता है। यहाँ मुक्तात्माको परमानन्दके साक्षात्कारसे असीम आनन्द होता है, इस वास्ते वह बारंबार परमात्माका वणेन करता है, जैसे तुलसीकृत रामचरितमानस रामायणके बार बार पाठसे नया नया आनन्द आता है और गोताके स्वाध्यायसे भी नितनूतन आनन्दका अनुभव होता है। दूसरी बात यह भी है कि आत्मतत्व अतिगहन विषय है, उस अतिसूक्ष्म विषयको दढ करनेके लिए प्रकृत विषय बार बार कहना आवश्यक हो जाता है ॥ २१ ॥

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भन्त्र १-३ ] विद्याविनोद भाष्य ४१३

चतुर्थ अध्याय

आत्मपदार्थका यथार्थ रूपसे जानना अिकठिन है, अतः श्रुति पुनः पुनः उसीके म्वरूपका निरूपण करती है, यथा- य एकोऽवर्णो बहुधा शक्तियोगाद्वर्णाननेकान्निहितार्थो दधाति । वि चैति चान्ते विश्वमादौ स देवः सनो बुद्ध्या शुभया संयुनक्तु ॥ १॥ भावार्थ-जो सर्ग=सृष्टिके आरम्भमें अद्वय, अरूप और स्वार्थरहित याने विना किसी प्रयोजनके भी अनेक रूपों या जातियोंको धारण करता है एवं पोषण करता है तथा प्रलय कालमें जगत्को लीन करता है, वह तेजोमय परमात्मा हमें पवित्र बुद्धिसे संयुक्त करे ॥ १ ॥ वि० वि० भाष्य-परमात्मा एक है, स्वयंप्रकाश है, वह मायाके सम्बन्धसे अनक प्रकारक पदार्थोंको अपने प्रयोजनके बिना ही बनाता है। भाव यह है कि जो स्वयं अरूप होकर अनेक रूपवान पदार्थोंको बनाता. पालता और प्रलय करता है, वह परमात्मा हमें ऐसी ही निर्मल बुद्धिसे युक्त करे, जिससे हमें कभी संशय न घेरे ॥ १ ॥ वह सबका रचनेवाला है, और उसीमें सब लीन हो जाते हैं, वही सवरूप है, उससे भिन्न कुछ भी नहीं है। यह बात आगेके तीन मन्त्रोंमें कही जाती है, यथा- तदेवाग्निस्तदादित्यस्तद्वायुम्तदु चन्द्रमाः। तदेव शुक्रं तदब्रह्म तदापस्तत्प्रजापतिः ॥२॥ भावार्थ-वह परमात्मा ही अग्निरूप है, वही सूय बह़ा वायु, वही चन्द्रमा, वही शुक्र=शुद्ध और वही ब्रह्म है। वही जल तथा वहो प्रजापति है ॥ २॥ त्वं स्त्री त्वं पुमानसि त्वं कुमार उत वा कुमारी। तवं जीर्णो दण्डेन वञ्चसिस्वं जातो भवसि विश्वतोमुखः॥३॥

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४१४ श्वेताश्वत रोपनिषद् [अध्याय ४

भावार्थ-तू खती है, तू पुरुष है, तू ही कुमार या कुमारी है, तूही वृद्ध होकर लकड़ीका सहारा लेकर चलता है और तू ही उपाधि करके याने प्रपश्रूपस उत्पन्न होनेपर अनेक रूपोंवाला हो जाता है। ३।। नील: पतङ्गो हरितो लोहिताक्षस्तडिदगर्भ ऋतवः समुद्राः। अनादिमत्त्वं विभुत्वेन वर्तसे यतो जातानि भुवनानि विश्वा॥ ४॥ भावार्थ-तू ही नीले रंगवाला भ्रमर है, तूही हरे वर्णवाला आर लाल ऑखों- वाला शुक आदि निकष्ट प्राणिवर्ग है। तू मेघ है तथा ग्रीष्मादि ऋतु और सप्त समुद्र है। तू अनादि है, सर्वत्र वयाप्त होकर स्थित है तथा तुझ ही से सम्पूर्ण लोक उत्पन्न हुए हैं।। ४।। वि. वि. भाष्य-जब तक तत्त्वज्ञान नहीं होता तभी तक भेदबुद्धि रहती है, ब्रह्मज्ञान हानेपर सब कुछ चर-अचर ब्रह्मरूप ही प्रतीत होने लगता है। सिनेमाके चित्रपटका देखकर लोगोंको हर्ष शोक होते हैं। पर विचार करके देखा जाय तो वहाँ कुछ है नहीं। भेद स्वतः सिद्ध है, कठिन ता अभेदका स्थापित करना है। श्वेताश्वतर आदि ऋषियोंको जब तत्त्वज्ञान हुआ ता उनको जगत्में सिवाय ब्रह्मके और कुछ दिखाई नही दिया। घट पट, पुष्प वृक्ष प्रभृति पदार्थोंके जाननेमें अनेक जन्म बीत जा सकते हैं, फिर भा प्रत्येक पदा्थका पता नही चलेगा, यदि इनकी अनुगत मिट्टीका ज्ञान हो जाय तो सभीका ज्ञान हो जायगा। इसी प्रकार ऋषियोंने सब जगह उसीका देखा ॥ २-४ ॥ तेज, अपू औौर प्रकृति जो विवर्तरूपा है, उसके साथ सम्बन्ध होना संसार- का कारण है और निवृत्त होना मोक्षका हेतु है। अब यही दिखाते हैं, यथा-

अजामेकां लोहितशुक्ककृष्णां बह्नी: प्रजाः सृजमार्ना सरूपाः। अजो ह्येको जुषमाणोऽनुशेते जहात्येनां भुक्त- भोगामजोऽन्यः।। ५ ॥ भावार्थ-एक ही प्रकृति है, वह अपने अतुरूप बहुत सी प्रजाको उत्पन्न किया करता है और वह रजः, सच्व तथा तमोगुणरूपा या तेज:, अप, अनरूपा है

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मन्त्र ६-७ ] विद्याविनोद भाष्य ४१५

उस अजा= अनादि प्रकृतिको (बकरीको) एक अज= जीव (बकरा) सेवन करता हुआ भोगता है और दूसरा अज उस भुक्तभोगाको त्याग देता है॥ ५॥ वि. वि० भाष्य-अजा == मूलप्रकृति ही संसारकी का्णभूता है, वह एक ही है और वह त्रिगुणात्मिका है, क्योंकि तीनों गुणोंकी साम्यावस्थाका नाम ही प्रकृति है। वह अपने तुल्य गुणोंवाली प्रजाको उत्पन्न करती है, जीव उसी अजाके सम्बन्धसे भोगोंको भोगता हुआ प्रकृतिके धर्मों को अपने धर्म मान बैठता है। दूसरा उक्त भोगी हुईके सम्बन्धको परित्याग करके बन्धनोंसे मुक्त रहता है। छान्दोग्य उपनिषद्में प्रसिद्ध तेज, अप और अन्नरूपा प्रकृतिको इस श्रुतिमें अजा= बकरी स्वरूपसे कल्पित करके दिखलाया गया है॥। ५॥ इस मन्त्रमें जीव और ईश्वरको पक्षीरूपसे निरूपण किया जाता है, यथा- द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते। तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्ृत्यनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति ॥६।। भावार्थ-दा सुन्दर पक्षी हैं जो इकट्ठे रहते हैं मित्र भी हैं। और एक ही वृक्षको दोनों सेवते हैं, उन दोनोमें एक उसके स्वादिष्ठ फलोंको भोगता है और दूसरा उन्हें न भागता हुआ देखता रहता है। ६ ॥ वि० वि० भाष्य-यह शरीर एक वृक्ष है, इसे वृक्षकी उपमा इसलिए दी है कि 'वृक्षशब्द' छेदन अर्थवाले "ओत्रश्चू" धातुसे बना है या यह बुद्धिरूपी वृक्ष है, उसपर जीत्र और ईश्वर ये दो पक्षी रहते हैं। दोनों साथ रहते हैं और आपसमें मित्रता रखते हैं तथा इसमें जीव उपकार्य है, ईश्वर उपकारक है। दोनोंमें से जीवरूप पक्षी सुखदुःखादिरूप कर्मोंके फलोंको भोगता है, दूसरा=ईश्वर भोगोंको न भोगता हुआ अहं-मम अभिमानसे रहित हो सिर्फ देखता भर रहता है। ६॥ ऐसा होनेसे क्या होता है ? सो कहते हैं, यथा- समाने वृत्ते पुरुषो निमग्नोऽनीशया शोचति मुह्य- मान:। जुषट यदा पश्यत्यन्यमीशमस्य महिमानमिति वीतशोक:।।७॥ भावार्थ-उस एकही वृक्षपर जीवात्मा देहके साथ तादात्म्य भावको प्राप्त हो मोहग्रस्त होकर असमर्थ हुआ दीनतासे शोक करता है। जिस समय यह योग

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४१६ श्वेतान्वत रोपनिषद् [अभ्याय ४

मार्गसे सेवित, अन्य देहादिकोंसे जुदा हो उनकी महिमाको देखता है, उस समय शोकरहित हो जाता है॥७॥ वि. वि० भाष्य-जैसे जलसे भरा तुम्बा डूब जाता है, उसी तरह शरीर- रूपी वृक्षपर बैठा जीवात्मा अविद्या काम कर्मादि फलोंके भारसे दबा हुआ है। वह असमर्थ हुआ चिन्ताग्रस्त हो शोकसागरमें निमग्न होता हुआ 'मैं अमुकका पुत्र हूँ' 'अमुक मेरा पिता है''मेरे गृह-भार्या प्रभृति नष्ट हो गये' तथा 'मैं बड़ा दुःखी हूँ' इस प्रकार शोक करता हुआ तपायमान होता है। ऐसा करता हुआ वह तिर्यगादि अनेक योनियोंमें जाकर जन्म-मरणके अपार कष्टोंका अनुभव करता है। फिर किसी पुण्यके प्रभावसे जब मनुष्ययोनिमें आता है, तब किसी महात्माके बताये हुए योग- मार्ग करके याने ध्यानयोगसे ईश्ववरको देखता है याने 'अहं ब्रम्माऽस्मि' इस मह्दा वाक्यका अर्थानुसंधान करता है। अर्थात् प्राणिमात्रमें वह एकही चेतन व्यापक है, दूसरा कोई भी नहीं है और मायारूपी उपाधि तथा मायाके जितनेकार्य हैं ये सब इसकी विभूति हैं; जब इस प्रकार आत्माको एवं उसकी विभूतिको ज्ञानी जान लेता है, तब शोकसे रहित हो जाता है।। ७॥ अब इस मन्त्रमें ब्रह्मवेत्ताओंकी कृतार्थता प्रदर्शित की जाती है, यथा- ऋचो अक्षरे परमे व्योमन्यस्मिन्देवा अधि विश्वे निषेदुः। यस्तं न वेद किमृचा करिष्यति थ इत्तद्विदुस्त इमे समासते ॥८ ॥ भावार्थ-ऋगादि चारों वेद जिस नाशरहित सर्वोत्कृष्ट आकाश=व्यापकमें स्थित हैं और जिसमें सम्पूर्ण देवता निवास करते हैं. जो मनुष्य उसे नहीं जानता है वह वेदोंको पढ़कर ही क्या कर लेगा ? जो उसे जानते हैं वे सब कृतार्थ हुए स्थित हैं॥। ८ ।। वि० वि० भाष्य-जिसे नेद प्रतिपादन करता है. उमे यदि वेद पढ़कर भी न जाना तो उसका वेदाध्ययनश्रम राखमें होम करनेके बराबर है। क्या वेद पढ़ने से सर्व शोकोंकी निषृत्ति हो सकती है? इस प्रश्नका उत्तर यह है कि हो सकती है और नहीं भी हो सकती। क्योंकि समस्त वेदोंका मुख्य तात्पर्य परमात्मतत्त्वका ज्ञान होनेमें है, यदि कोई वेद पढ़कर भी ब्रक्मात्मतत्व ज्ञानसे शून्य रहे तो वेदका पढ़ना उसके लिए भार ही है। हाँ, वेद पढ़कर मनुष्यकी ऑख खुल जायँ तो वेदका स्वाध्याय क्लेशनाशक हो सकता है॥८॥

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मन्त्र १-१० ] विद्याविनोद आष्य ४१७

अक्षर परमात्मा जगत्का उपादान कारण है तथा निमित्त कारण भी है, यह सब मायारूप उपाधिके कारण है, इसीको अलग अलग दिखाते हैं, यथा-

छन्दांसि यज्ञा: क्रतवो व्रतानि भूतं भव्यं यच्च वेदा वदन्ति। अस्मान्मायी सृजते विश्वमेतत्तस्मिंश्चान्यो मायया संनिरुद्धः ॥ ६।

भावार्थ-वेद, यज्ञ, कतु, व्रत, भूत, भविष्यत् और वर्तमान तथा अन्य भी जो कुछ वेद बतलाते हैं, उस सब जगत्को मायाविशिष्ट ईश्वर उत्पन्न करता है और प्रपञ्में ही मायासे अन्य सा होकर याने जीवभावको प्राप्त होकर, वह बन्धको प्राप्त होता है ।। ६ ।। वि० वि० भाष्य-श्वेताश्वतर आदि ऋषि कहते हैं कि गायत्री आदि छन्दों, देवयज्ञ आदि यज्ञों, ज्योतिष्टोमादि क्रतुओं, सत्य भाषणादि व्रतों, हम सब ऋषियों और जो हो चुका उसे, जो होगा उसे और जो कुछ वेदोंमें कहा है उस सबको परमात्माने ही रचा है। वही सबको रचता है, वही आगे रचेगा। परमात्मा माया, तत्कार्यसे [ जो अगले मन्त्रमें कही जायगी ] निर्लेप रहता है, पर जीवात्मा उसमें बँध जाता है।। ह।। अब यह मन्त्र माया और मायावान्के स्वरूपको दिखाता है, यथा-

मायां तु प्रक्रृति विद्यान्मायिनं तु महेश्रवरम्। तस्यावयवभूतैस्तु व्याप्ं सर्वमिदं जगत् ॥ १० ॥ भावार्थ-मायाको प्रकृति जानो याने जगत्का मूल कारण समझो अथवा प्रकृतिको माया जानो और महेश्वरको मायावी मझो अथवा मायावालेको महेश्वर जानो। किन्तु यह सम्पूर्ण जगत् मायाविशिष्ट ईश्वरके एक देशमें=एक अवयवमें व्याप्त है।। १० ।। वि० वि० भाष्य-यहाँ माया शब्दसे छल न समझ लेना, किन्तु प्रकृति जानना। यह समझो कि जगत्के उपादानकारणका नाम माया है और मायोपा- धिक चैतन्यको महेश्वर कने सर्व प्रपक्का नियन्ता तथा स्वामी जानो। भाव यह हुआ कि व्यापक चेशनके एक देशमें माया रहती है, अर्थात् जितने देशमें माया ५३

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४१८ श्वेताश्वतरोपनिषद् [अध्याय ४

रहती है उतना ही मायाविशिष्ट ईश्वर कहाता है, उस मायाके एक देशमें जगत् है। अतः उस परमात्मासे यह सम्पूर्ण जगत् व्याप् हो रहा है॥ १० ॥ सच्चिदानन्द स्वरूपके साथ 'अहं ब्रह्माडस्मि' इस प्रकार एकत्व ज्ञानसे मुक्ति होती है, यह कहते हैं, यथा- यो योनिं योनिमधितिष्ठत्येको यस्मिन्निदं स च वि चैति सर्वम्। तमीशानं वरदं देवमीड्यं निचाय्येमां शान्तिमत्यन्तमेति॥ ११॥ भावार्थ-जो मायावी मूल प्रकृति तथा अवान्तर प्रकृति=आकाशादिको आश्रय करके स्थित है, अथवा प्रत्येक योनिका अधिष्ठाता है और द्वतसे रहित है, जिस ईश्वरमें यह दृश्यमान जगत् सम्यक प्रकारसे लय हो जाता है, फिर अनेक रूप हा जाता है, उस स्वनियन्ता, वरदायक, स्तुति करने योग्य परमात्मदेवका साक्षात्कार करके यानी उसे अपना आत्मा जानकर पुरुष इस पुनरावृत्ति रहित परम शान्तिको प्राप्त हो जाता है॥ ११ ॥। वि. वि० भाष्य-परमात्मा एक भी है, पर तो भी समस्त योनियोंका एक ही कालमें अधिष्ठाता भी है। जीवात्मा तो किसी कालमें किसी योनिमें और किसी समय किर्सीमें रहता है, परन्तु ईश्वर एक साथ सब जगह रह सकता है॥११।। अब अखण्डित तत्त्वज्ञानकी सिद्धिके लिए परमात्माकी प्रार्थना की जाती है, यथा- यो देवानां प्रभवश्चोन्भवश्च विश्वाधिपो रुद्रो महर्षिः । हिरण्यगभे पश्यत जायमानं स नो बुदुध्या शुभया संयुनक्तु । १२ ।। भावार्थ-जो परमेश्वर ब्रक्मा आदिक देवताओंकी उत्पत्ति और विभूतिका कारण है, विश्वका स्वामी है, रुद्र याने अविद्याका नाशक है तथा जिसने सबसे पथम हिरण्यगर्भको अपनेसे समुत्पन्न देखा था, वह हमें शुद्ध बुद्धियोंसे नंयुक्त करे॥ १२ ॥ वि० वि. भाष्य-श्वेताश्वतर आदि ऋषि आपसमें कहते हैं कि हे ृषियो ! देखो, जरा विचारो तो, अब वह अग्नि आदि देवोंका उत्पत्ति और लय-

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मैन्त्र १३-१४ विदाविनोद माष्य ४१९

स्थान, ज्योतिर्मय आपके हृदयोंमें प्रकट हुआ है। उसकी प्रार्थना करो जिससे वह कृपा करके हमारी एवं आपकी बुद्धियोंको पवित्र करे ॥ १२ ॥। अब श्रुति मुमुत्तुओं द्वारा परमात्माके प्रार्थनीयत्वादि गुणोंका वर्णन करती है, यथा- यो देवानामधिपो यस्मिँल्लोका अधिश्रिताः। य ईशे अस्य द्विपदश्रतुष्पदः कस्मै देवाय हविषा विधेम ।। १३ ॥ भावार्थ-जा ईश्वर देवताओंका स्वामी है, जिसमें सम्पूर्ण भूआदि लोक स्थित हैं, जो इस दो पाँववाले तथा चारपाँववाले प्राणिवर्गका शासन करता है, उस सुखस्वरूप देवकी हम हविके द्वारा पूजा करें॥ १३ ॥ वि० वि० भाष्य-हम अन्य देवताओंकी पूजा क्यों करें ? उसीकी परि- चर्या क्यों न करें जो अगि आदि जड़ पदार्यों का हो नहीं, प्रत्युत दोपाये एवं चौपाये आदि चेतन प्राणियोंका भो स्वामो है। हाथोके पॉवमें सब पाँव आ जाते हैं। प्रधान- मल्ल निवर्हणन्याय' [ जब बड़े पहलवानको पछाड़ दिया तो सब परास्त समझे गये ] से हमें उसीको पकड़ लेना है जिसमें सब समाये हुए हैं॥ १३ ॥ पहले अनेक प्रकारसे जिस परमात्मतत्त्रका प्रतिपादन किया जा चुका है, उसे सुगमतासे समझाती हुई श्रुति फिर कहती है, यथा- सूत्मातिसूत्मं कलिलस्य मध्ये विश्वस्य स्रष्टारमने- करूपम्। विश्वस्यैक परिवेष्टितारं ज्ञात्वा शिवं शान्ति- मत्यन्तमेति॥१४॥ भावार्थ-वह परमेश्वर सूद्षमसे भी सूद्षम है, तथा अविद्या-तत्कार्यरूप अति- दुर्गम स्थानमें भी समाया हुआ है। उस् सम्पूर्ण विश्व के रचनेवाले, अनेकरूप तथा संसारके एक मात्र भोगप्रदानकर्ता, कल्याणस्वरूपके ज्ञानसे जीव परम शान्तिको प्राप्त करता है॥ १४ ॥ वि० वि० भाष्य-पृथिवी तत्त्वसे जल तत्त्व सूकष्म है, जलसे अम्ि, अग्निजे वायु और वायुसे आकाश सूच्म है। इन सबसे सूद्म इन सबका कारण मूल प्रकृति है उससे भी चेतन आत्मा अतिसूदम है और कलिलरूप याने अविद्या तरकार्योंके चोंचमें व्यापक होकर स्थित है, सबका उत्पादक है, तथा चन्द्रमाकी तरह

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४२० श्वेताश्वतरोपनिषदू अध्याय ४

समष्टि व्यष्टि कार्यकारणरूप अनेक उपाधियोंमें प्रतिविम्बित हाकर अनेकरूप भी हो रहा है। फिर सम्पूर्ण विश्वके बाहर भीतर होकर सब विश्वका परिवेष्टा भी है, याने आच्छादन करनेवाला है। ऐसे कल्याणरूप चेतनको अपना आत्मा जान- कर मनुष्य अत्यन्त शान्तिको प्राप्त होता है। इस मन्त्रमें जो 'कलिल' शब्द आया है, टीकाकारोंने उसके अनेक अर्थ किये हैं, इसके अर्थमें उनके जो मतभेद हैं या अभिमत अर्थ हैं, उनमें कुछ ये हैं, यथा-गर्भमे भागत शरीर सर्वप्रथम कलिल कहाता है। अथवा सृष्टिके आरम्भमें जगत्की रचना करनेवाले जलके बुदबुदका पूर्वावस्था कलिल कहाती है, याने फेन- वाला पानी। कोई कलिलका तम याने अज्ञान अर्थ करते हैं और काई 'विद्या तथा समस्त अविद्याके कार्य' यह कलिलका अर्थ करते हैं॥ १४॥ जैसे पहले सनकादि तथा ब्रह्मादि देवताओंको आत्म-स्वरूपोपल न्धि हुई है, ऐसे ही साधनचतुष्टयादिसे सम्पन्न हाने पर हमें भी हो सकती है, यह कहते हैं, यथा- स एव काले भुवनस्य गोत्ता विश्वाधिपः सर्वभूतेषु गूढः। यस्मिन्युक्ता ब्रह्मर्षयो देवताश्च तमेवं ज्ञात्वा मृत्यु- पाशांश्छिनत्ति॥ १५ ।। भावार्थ-वही परमेश्वर व्यतीत कल्पों में सम्पूर्ण सुवनका रक्षक था, वही विश्वका स्वामी और सम्पूर्ण भूतोंमें छिपा हुआ है। ऐसे जिस परमात्मामें महर्षि और देवतालोग भेदभावको परित्याग कर स्थित हैं, उसे इस प्रकार जानकर मनुष्य मृत्युके पाशोंको काट डालता है॥ १५ ॥ वि• वि• भाष्य-अविद्या याने तम ही मृत्यु है, तथा रूप आदि विषय पाश हैं, इनमें ही जीव बॅवता है। सनकादि महर्षियोंने ईश्वस्को जानकर इन्हीं रोगोंको दूर किया है, हम भी उसी चिन्मान्रको अपना आत्मा जानकर संसाररूपी जालोंका छेदन कर सकते हैं ॥ १५॥ ईश्वरके एकत्वज्ञानसे बन्धनका नाश होता है, यह दिखाते हैं, यथा- घृतात्परं मण्डभिवातिसूदमं ज्ञावा शिवं सर्वभूतेषु गूढम्। विश्वस्यैक परिवेष्टितारं ज्ञात्वा देवं सुच्यते सर्वपाशैः॥। १६ ।।

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मेन्त्र १७ ] विद्याविनोद भाष्य ४२१

भावार्थ-घीके ऊपर जो उसका सार भाग रहता है, उसके तुल्य अति- सूक्षम, कल्याणस्वरूपको सर्व प्राणियों मे अन्तर्यामीरूपसे स्थित जानकर और सम्पूर्ण विश्वके एक ही परिवेष्टा, प्रकाश स्वरूपको जानकर मनुष्य सभा बन्धनोंसे छूट जाता है॥ १६ ॥ वि० वि. भाष्य-इस मन्त्रमें जो 'मण्ड' शब्द आया है उसका अमर- कोषमें 'सर्वरसाग्रे मण्डमस्त्रियाम्' यह अर्थ किया गया है। कोई कहते हैं कि जे सम्पूर्ण रसोंसे अधिक सूद्षम रस देहमें घृतादिके भोजनसे बनता है वह मण्ड है। जैसे घृतका सारभूत रस स्वादु तथा बल देनेवाला और घृतसे भी अतिसूद्षम है, वैसे ही प्रकृति आदिकोंसे भी अतिसूक््म सर्व विश्वका सारभूत चेवन आत्मा है। जिस प्रकार पुष्टिकी कामनावालोंको घृतका सार अतिप्रिय लगता है उसी प्रकार मुमुच जीवोंको आत्मा परम प्रेमास्वद है। बस उसके जाननेवाले मनुष्यका बेड़ा पार हो जाता है॥ १६ ॥ अब संन्यासियों द्वारा प्रापणीय मोक्षरूपताका वर्णन करते हैं, यथा- एष देवो विश्वकर्मा महात्मा सदा जनानां हृदये संनिविष्टः। हृदा मनीषा मनसाऽभिक्कसो य एतद्विदुर- मृतास्ते भवन्ति ॥१७ ॥ भावार्थ-वह परमात्मदेव, विश्वकर्मा यानी 'विश्वरूप कार्य है कर्म जिसका, ऐसा है। अर्थात् जगत्कर्ता, सर्वव्यापी और सदैवकाल सम्पूर्ण जावोंके हृदयमें स्थित है। वह विचार, बुद्धि और मनसे प्रकाशित होता है, उसे जो जानते हैं वे अमर हो जाते है॥। १७ ॥। वि० वि० भाष्य-प्रकृत मन्त्रमें 'हृदा' 'मर्नाषा' 'मनसा' ये तीन हेतु उसके प्रकाशनमे दिये गये हैं, इनका भाव यह है कि हदा=हृदय से याने विचारसे अर्थात् प्रपक्च निषेधके उपदेशसे, मनीषा=आत्मानात्मविवेकबुद्धिसे और मनसा=एकत्वके जञावसे वह प्रकाशमे आता है=प्रकट होता है। जो साधनचतुष्टयसम्पन्न संन्यासि- गण 'यह 'तत्त्वमसि' आदि वाक्योंसे प्रतिपादित अखण्डैकरसरूप है,' इस प्रकार जानते हैं, अर्थात् 'मैं ब्रह्म हूँ' इस प्रकार इसका साक्षात्कार करते हैं वे पुनसवृत्ति- शून्य हो जाते है। कहनेका तात्पर्य यह निकला कि ईश्वस्प्राप्तिमें हृद्न, बुद्धि और मन लगा देना चाहिये। तम्मज्ञानानुष्ठनसे प्रभ्वासीगण बन्धनराहत हा जात है॥१७।

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४२२ [अभ्याय ४

जाग्रत् प्वस्था हो या सुषुप्ति, सर्वत्र द्वैतकी प्रतीति भ्रान्तिसे ही हो रही है, वास्तवमें तो सर्वदा सर्वत्र अभेद हा है, इसे श्रुति कहती है, यथा- यदातमस्तन्न दिवा न रात्रिर्न सन्न चास्छिव एव केवलः। तदक्षरं तत्सवितुर्वरेण्यं प्रज्ञा च तस्मात्प्रसृता पुराणी॥ १८ ॥ भावार्थ-जिस समय अज्ञान नहीं रहता, उस समय न दिन रहता है न रात्रि और न सत् रहता है, न असत्। केवल एक शिव=कल्याणरूप रह जाता है, वह नाशसे रहित, आदित्यमण्डलाभिमानी देव वरणीय या भजनीय है। उसीसे पुरातन प्रज्ञाका प्रसार हुआ है याने उसीसे संसारमें गुरुपरंपरागत ज्ञानगङ्गाका प्रवाह बहा है, अर्थात् ज्ञान फैलकर हमतक आया है ॥ १८॥ वि. वि. भाष्य-अविद्या अपने कार्यरूप तमवाली है, जब 'तत्वमस्यादि' महावाक्यरूप दीपकसे अविद्या जल जाती है तो उस समय रात नहीं रहती, न दिनका ही आरोप होता है, उस समय सदा दिवाली साधु घर' वाला मसला सामने आ जाता है। उसकी महिमासे अन्य कुछ नहीं भासता, वही वह दीखता है। जैसे आचार्यके पूछने पर बहुत शिष्योमें से एकने उत्तर दिया था कि 'मुझे न आप दीखते हैं, न मेरे सपाठी, न और कुछ भी, सुझे तो इस समय केवल लक्ष्य ही दीख रहा है।' इसी प्रकारसे ऐसा वहो वरणीय है याने अङ्गोकार करने योग्य है॥१८॥ संसारमें जितनी वस्तुयें हैं, उनकी किसी न किसी देशमें प्रतीति अवश्य होती है, तब तो आत्मपदार्थ भी कहीं न कही मिलता रहना चाहिये, इस पर कहते हैं, यथा- नैनमूर्ध्व न तिर्यञ्चं न मध्ये परिजग्रभत् । न तस्य प्रतिमा अस्ति थस्य नाम महघशः ॥१६॥ भावार्थ-उसे कोई चाहे कि ऊपरसे, इधर उधरसे अथवा बीचमेंसे ग्रहण कर ले, तो नहीं पकड़ सकता। उस ब्रह्मकी कोई उपमा भी नहीं है क्योंकि उसका नाम महद्यश है ॥ १६ ॥ वि. वि० भाष्य-वह आकाशमें, पूर्वादि दिशाओंमें और जमीन पर कहीं पर भी बैठा हुआ नहीं है, क्योंकि वह निरतयत है, निरवयवका किसी एक देशमें

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मन्त्र २०-२१ ] वियाविनोद भाष्य ४२३

बैठना हो नहीं सकता। वह सर्वत्र व्यापक है इससे उसे कोई पकड़ नहीं सकता। फिर उसके साथ किसीकी उपमा भी नहीं दी जा सकती, क्चोंकि कोई दूसरा उसके बराबर या उस जैसा अथवा उससे अधिक है ही नहीं। उसकी प्रशंसा भी कोई करना चाहे तो कैसे करे ? क्योंकि वह महायशरवी है अथात् उसके यशोंका ओर छोर भी तो नहीं है॥। १९ ।। ईश्वर इन्द्रियादिकोंका विषय नहीं है, पर उनमें व्यापक है, उसके साथ आत्माके एकत्वका ज्ञान होनेसे मोक्षकी प्राप्ति होती है। इसका वर्णन करते हैं, यथा- न संदृशे तिष्ठति रूपमस्य न चन्षुषा पश्यति कश्चनैनम्। हदा हृदिस्थं मनसा य एनमेवं विदुरमृ- तास्ते भवन्ति ॥ २० ॥ भावार्थ-नेत्रादि इन्द्रियोंसे ग्रहण करने योग्य जो कोई प्रदेश है, उस स्थानमें उसका स्वरूप ग्रहण नहीं किया जा सकता। उसे नेत्र द्वारा कोई देख नहीं सकता। बुद्धि शुद्ध करके हृदयमें स्थित उस परमेश्वरको जो अधिकारी इस प्रकार जान लेते है वे अमृत=अमर हो जाते हैं॥ २०॥ वि० वि० भाष्य-न परमात्माको नेत्र देख सकते हैं, न यह किसी जगह किसीको मिलता है, याने किसी मेले तमाशेमें उसकी किसीसे मुलाकात नहीं होती है। तब तो प्रतीत होता है वह वन्ध्यापुत्रवत् कुछ है ही नहीं, पढे लिखे बुद्धिमानोंने बश्चोंके हौवाकी तरह उसका एक डरावा बना रखा है ? ऐसी आशंका करनेवालोंको समझाया जाता है कि वह है, उसकी सत्ता स्फूर्तिसे सब जड़-जगत् क्रियाशील हैं। फिर यह भी है कि शुद्ध बुद्धिमें उसका प्रतिबिम्ब पड़ता है। निराकार आकाशकी तरह उस निरवयवका प्रतिविम्ब पड़नेमें सन्देह नहीं करना चाहिये॥ २० ॥ उसीकी कृपासे इष्ट प्राप्ति और अनिष्टकी निवृत्ति हो सकती है, अब यह मान- कर दो मन्त्रोंसे उसकी स्तुति की जाती है, यथा- अजात इत्येवं कश्चिद्दीरुः प्रपद्यते। रुद्र यत्ते दक्षिणं मुखं तेन मां पाहि नित्यम् ॥ २१ ॥ भावार्थ-हे रुद्र, तुम जन्मसे रहिन हो, इस प्रकार जानकर कोई एक मेरी

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४२४ श्वेताश्वतरोपनिषद् [अध्बाय ४

तरह ससारभयसे डरा हुआ मनुष्य तुम्हारी शरण लेता है और यह कहता है कि तु म्हारा जो दक्िण मुख है, उससे मेरी संदा रक्षा करो ॥ २१॥

वि० वि० भाष्य-प्रभु अजन्मा है, यह जानकर जन्मदु खसे डरा हुआ कोई मनुष्य आपकी शरणमे आता है। वह मनुष्य जानता है कि जो खुद अजन्मा है वही मेरे जन्ममरणके क्लेशोका मोचन कर सकता है। जो खुद मरता जीता रहता है वह किसीके जन्ममरणके चक्करको कैसे रोक सकता है ? प्रभु जन्म, जरा, क्षुधा, पिपासादि धर्मो से रहिति है, यह जानकर मैं जन्म, जरा, मरण, चुघा, पिपासा एवं शोक मोहादि सम्पूण ससारसे भयभीत परतन्त्र जीव आपकी शरण ग्रहण करता हॅूँ, सुझे बचाओ ॥ २१॥

मा नस्तोके तनये मान आयुषि मा नो गोषु मा नो अश्वेषु रीरिषः। वीरान्मा नो रुद्र भामितो वधीर्ह- विष्मन्तः सदमित्वा हवामहे॥ २२ ॥

भावार्थ-हे रुद्र, तुम कुपित होकर इमारे पुत्र, पौत्र, आयु, गौ और घोड़ोंमें क्षय न करना, याने इन्हे नष्ट न कर देना। और हमारे वीर सेवकोका भी वध न करना। हम हविसे युक्त होकर सदैव सुम्हारा आवाहन करते हैं ॥ २२॥ वि. वि० भाष्य-महापुरुष लोग अपना ही स्वार्थ साधन नहीं करते, वे अपनी तरह दूसरोका भी खयाल रखते हैं। अत जो त्यागी हैं उनके लिए तों ज्ञानप्राप्तिके उपाय बोवन करनेवाले मन्त्र पहले कहे गये हैं। अब इस मन्त्रमें गृहस्थियोके लिए ईश्वरकी प्रसन्नतासे कल्याणके लिए प्रभुकी स्तुति कही गई है। श्वेताश्वतरादि ऋषियोंको पुत्रादिकोकी रक्षा प्रार्थनाका कोई प्रयोजन नही था। पर उन ऋषियोने जन्मादि दु खोसे व्याकुल हुए गृहस्थो पर दया करके ऋग्वेद तथा यजुवदमें आये मन्त्रको यहॉ पढा है।

फिर यह भी बात है कि ऋषिलोग भी शिष्य-पुत्र-कलत्रवाले होते थे। ऐसी स्थितिमे उनका यह मन्त्र पढना ठीक प्रतीत होता है॥ २२॥

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मन्त्र १-२ ] विद्याविनोद भाष्य ४२५

पञ्चम ऋरध्याय

चौथे अध्यायमें जो विषय अपूर्ण रह गया था उसका प्रतिपादन करनेके लिए इस पख्म अध्यायका प्रारम्भ किया जाता है, यथा- द्वे अक्षरे ब्रह्मपरे त्वनन्ते विद्याविद्ये निहिते यत्र गूढे। च्षरं त्वविद्या ह्यमृतं तु विद्या विद्याविद्ये ईशते यस्तु सोऽन्य:॥१॥ भावार्थ-विद्या और अविद्या ये दोनों जहाँ हिरण्यगर्भसे परे, उत्कृष्ट, अविनाशी तथा अनन्त ब्रह्ममें परिचछ्न्न रूपसे वर्तमान हैं, उन दोनोंमें क्षर अविद्या है तथा विद्या अमृत= अविनाशी है। जो इन विद्या एवं अविद्या दोनोंका शासन करता है वह इनसे पृथक है॥ १॥ वि० वि• भाष्य-पिछले अध्यायोंमें यद्यपि तत्पद तथा त्वं पदका निरू- पण किया गया है, तथापि त्वं पद्के अर्थका विशेष रूपसे कथन नही किया गया है। इसीलिए इस पञ्चम अध्यायमें उसका विशेष वर्णन करेंगे। नित्य मोक्षका हेतु विद्या है, और बन्धनका कारण अविद्या है। मुमुत्तुओंको चाहिये कि विद्याके साधन शम दमादिकोंका अनुष्ठान करें। परमात्मामें विद्या और अविद्या दोनों कल्पित हैं। वही इनका प्रेरक है पर साक्षी होनेसे भिन्न है। १॥

वह कौन है ? यह बताते हैं, यथा- यो योनिं योनिमधितिष्ठत्येको विश्वानि रूपाणि योनीश्ष सर्वाः। ऋषिं प्रसूतं कपिलं यस्तमम्रे ज्ञानैर्विभर्ति जायमानं च पश्येत् ॥ २ ॥ भावार्थ-जो परमात्मा सूक्ष्म और स्थूल कारणोंमें स्थित है, सम्पूर्ण कार्यों और कारणोंका अधिष्ठान है तथा जिसने सृष्टिके आरम्भमें कपिल ऋषिको उत्पन्न किया और ज्ञानवान् बनाया, उसने उसे जन्म लेते हुए भी देखा। वही उसका शासक है जो विद्या अविद्यासे पृथक है।। २।। ५४

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४२६ श्वेताश्वतरोपनिषद् [अध्याद ५

वि० वि० भाष्य-इस मन्त्रमें भाष्यकारने 'कपिल' शब्दका अर्थ सुवर्ण- सदृश कपिलवर्ण, हिरण्यगर्भ किया है॥ २ ॥ एकैकं जालं बहुधा विकुर्वन्नस्मिन्तेत्रे संहरत्येष देवः। भूय: सृष्टा पतयस्तथेशः सर्वाधिपत्यं कुरुते महात्मा ॥३॥ भावार्थ-इस प्रकृतिरूप क्षेत्रमें यह देव=परमेश्वर जगत् रचनाके समय एक एक जालको अनेक प्रकारसे विकारवाला करता है तथा अन्तमें प्रलयकालमें संहार कर लेता है। फिर सृष्टिके आरम्भमें वह परमात्मा हिरण्यगर्भादि प्रजा- पतियोंको पुनः उत्पन्न करके उनका स्वामी होता है॥ ३ ॥ वि. वि० भाष्य-जितना समष्टिरूप कार्य कारण है सब जालरूप ही है, इसमें प्राणिरूप मछलियाँ फँसती है। यहाँ पर 'जाल' शब्दके अर्थ विद्वानोने भिन्न भिन्न किये हैं, उन सबका यही भाव है कि यह संसार या इसके समस्त पदार्थ जाल हैं जिनमें फँसा पुरुष सद्गुरु सन्तके बताये परमात्माके अनुग्रहसे ही निकल सकता है। जहाँ देखो वहीं अनन्त अपार माया काम कर रही है। एक पदार्थके इतने अनन्त भेद उपभेद तथा भेदोपभेद हैं कि ब्रह्माकी आयु प्राप्त होने पर भी उनका पता पाना कठिन है। शेपनाग जितने मुख हों एवं शारदाकी मतिके समान बुद्धि हो तो भी उनका वर्णन नहीं हो सकता। फिर यह विश्व जालकी तरह नहीं है तो क्या है ? इसका आजतक किसीने पता नहीं पाया, पाया हो तो हमें उस पानेवाले भाग्यवान्का नाम सुननेमें नहीं आया, देखनेमें तो क्या आता। इसीसे यह जगत् इन्द्रजाल है, और इसके अधिष्ठाताका नाम 'मायी' है॥ ३॥ सर्वा दिश ऊर्ध्वमधश्च तिर्यक्प्रकाशयन्भ्राजते यद्व- नड्वान्। एवं स देवो भगवान्वरेण्यो योनिस्वभावानधि- तिष्ठत्येकः ॥ ४ ॥ भावार्थ-जैसे सूर्य प्रकाश करता है वैसे ही यह ऊपर और नीचे, इबर और उधर सम्पूर्ण पूर्वादि दिशाओंको देदीव्यमान करता हुआ प्रकाशित हो रहा है। ऐसे ही वह प्रकाशस्वरूप भजन करने योग्य परमात्मा अकेला ही कारणभूत पृथिवी आदिका नियन्त्रण करता है। अथवा कारणरूप अद्वय परमेश्वर ही अधिष्ठातृत्वेन स्थित है॥४ ॥

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मैन्त्र X-७ ] विद्याविनोद भाष्य

वि० वि० भाष्य-सूर्यकी तरह सबके अन्तःकरणोंमें उसीका प्रकाश है, सच पूछो तो सूर्य भी उस समुद्ररूपमेंसे एक बिन्दुके शतांश सहस्रांशकी तरह प्रकाशकणको लेकर सारे संसाग्में चाँदना कर रहा है।।४॥ यच्च स्वभावं पचति विश्वयोनि: पाच्यांश्च सर्वान्प- रिणामयेद्यः। सर्वमेतद्विश्वमधितिष्ठत्येका गुणांश्च सर्वा- न्विनियोजयेद्यः ।। ५ ।। भावार्थ-जो परमात्मा विश्वका कारण है, जो षड्विकारको या प्रत्येक वस्तुके स्वमावको बनाता है, जो पचनीय पदार्थोंको परिणत करता है, जो अकेला ही इस समग्र जगत्को अपने नियमाधीन रखता है और जो सत्वादिक गुणोंको उनके कार्योंमें नियुक्त करता है; ऐसे लक्षणांवाला परमात्मा है॥ ५॥ वि० वि• भाष्य-जो पूर्वकालमें उत्पन्न हुए कर्मादिकोंको अपनी सत्ता- मात्रसे परिणामको प्राप्त करा देता है वही अनन्त ऐश्वर्ययुक्त परब्रह्म ज्योति :- स्वरूप है॥ ५ ॥ तद्वेदगुद्योपनिषत्सु गूढं तद्ब्रह्मा वेदते ब्रह्मयोनिम्। ये पूर्वदेवा ऋषयश्च तद्विदुस्ते तन्मया अमृता वै बभूवुः॥६॥ भावार्थ-वही कारणस्वरूप ब्रह्म वेदोंके गुप भाग उपनिषदोंमें निगूढ़ है= छिपा है, उस ब्रह्मरूप कारणको हिरण्यगर्भ जानता है। जो पहलेके देवता और ऋषिलोग उसे जानते थे, वे तद्रप होकर अमर हो गये ।। ६ ॥ वि० वि० भाष्य-जैसे रुद्रादि प्राचीन देवता और वामदेव प्रभृति ऋषि उसे जानकर तत्स्वरूप हो अमरणधर्मा हो गये, वैसे ही आधुनिक पुरुष भी उसे जानकर अमर हो सकता है॥ ६। पहले मन्त्रोंमें तत्पदार्थका निरूपण किया गया है, अब अग्रिम मन्त्रोंमें त्वं पदार्थका वर्णन किया जायगा, यथा- गुणान्वयो यः फलकर्मकर्ता कृतस्य तस्यैव स चोप- भोक्ता। स विश्वरूपस्त्रिगुणस्त्रिवत्मा प्राणाधिपः संचरति स्वकर्मभिः।७।

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४२८ श्वेताश्वतरोपनिषद् [अध्याय ५

भावार्थ-जो गुणोंसे युक्त, फलके लिए कर्म करनेवाला और उस किये हुए कर्मका पाल भोगनेवाला है, वह नाना रूपोंवाला, तीनों गुणोंखे युक्त, तीन मार्गोसे चलनेवाला, प्राणोंका स्वामी अपने कर्मोंके अनुसार विचरता है॥७॥ वि० वि० भाष्य-जीवात्मा कर्म और वासना आदि गुणोंसे युक्त है। वह सुख-दुःखादि फलोंके लिए कर्म करता है। वह पहले किये कर्मों के फलोंका भोक्ता है। उसके विभिन्न रूप हैं, वह सत्त्व, रज, तम इन तीन गुणोंमें वर्तता है। धर्म, अधर्स तथा ज्ञान इन तीन अथवा देवयान, पितृयान चथा मर्त्यलोक इन तीन मार्गों वाला है और पाँच प्राणोंकी वृत्तियों सहित संसारमें गमन तथा आगमन करता है।।७ ॥ अङ्गष्ठमात्रो रवितुल्यरूपः संकल्पाहंकारसमन्वितोयः। बुद्धेर्गुगोनार्मगुगोन चैव आराप्रमात्रो ह्यपरोऽपि दृष्टः ॥ ८॥ भावार्थ-जो अंगुष्ठमात्र परिमाणवाळा, सूर्यके तुल्य प्रकाशमान, संकल्प तथा अहंकारसे युक्त और बुद्धि एवं शरीरके गुणोंसे भी युक्त है। वह जीवात्मा भी आरेकी नोक=अग्रभाग तुल्य आकारवाला देखनेमें आया है॥८॥ वि० वि० भाष्य-अंगुष्मात्र हृदयकी उपाधि करके आत्मा भी अंगुष्ठ- मात्र परिमाणवाला कहा गया है। वह सूर्यकी तरह ज्योति:स्वरूप है। 'यह वस्तु मुझको मिल जाय' इस मनके व्यापारका नाम संकल्प है, और 'मैं पण्डित हूँ' इस अन्तःकरणकी वृत्तिका नाम अहंकार है। वह इन संकल्प और अहंकार इन दोनोंसे युक्त है। बुद्धि अर्थात् अन्तःकरणके जो कामादि गुण हैं, और अपने गुण जो आनन्दादि हैं उनसे वह युक्त है। आरा नाम लोहेका शस्त्र, जिससे लकड़ी चीरी जाती है, उसका अग्रभाग सूक्ष्म होता है, ससे भी आत्मा अति सूक्म है। ज्ञानवानोंने उसे ऐसा देखा ॥। ८ ॥ एक दूसरे द्ृष्टान्तसे श्रुति फिर भी दिखाती है कि- वालाग्रशतभागस्य शतधा कल्पितस्य च। भागो जीवः स विज्ञेयः स चानन्स्याय कल्पते ।६।। भावार्थ-बालके अगले भागके सौ हिस्से बना लिये जायँ, फिर सौवें हिस्सेके भी सौ भाग बनाये जायँ, तब उस जीवको उस एक भागके बराबर जानना चाहिये। किन्तु वह अनन्तरूप हो जाता है।। ६।!

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मन्त्र १०,११ ] विद्याविनोद भाष्य ४२९

वि• वि० भाष्य-यह तो सभी जानते हैं कि 'बाल' केशको कहते हैं, अर्थात् सिरके एक बालका जो आगेका सूकम भाग है, उस एक बालके सूक्ष्म हिस्सेके सौ भाग किये जावें, और उन सौमें से एक भागके फिर सौ भाग किये जावें। यह काम हाथोंसे या किसी हथियारसे अथवा किसी यन्त्रसे भी करना कठिन है, हाँ, मनके संकल्पसे इतना सूक्म भाग हो सकता है, अस्तु। हाँ तो इतना सूक्ष्म परि- माण जीवका है, इसका तात्पर्य जीवकी अतिसूद्मता पर है। जीवको यदि इतना सूक्ष्म मान भी लिया जाय तो वह ईश्वरात्मासे भिन्न ही हो जायगा? जैसे परमाणु अरति सूद्ष्म है तो भी आकाशसे तो भिन्न ही है। यह शंका नहीं करनी चाहिये, क्योंकि जब जीवकी कार्यसहित अविद्या निवृत्त हो जाती है। तब उस कालमें जीवात्माका परमात्माके साथ अभेद हो जाता है-ऐक्य हो जाता है॥ ९॥ नैव स्त्री न पुमानेष न चैवायं नपुंसकः । यद्यच्छरीरमादत्ते तेन तेन स रक्यते॥ १० ॥ भावार्थ-यह न स्त्री है, न पुरुष है और न नपुंसक ही है, यह जिस जिस शरीरको ग्रहण कर लेता है, उसी उससे सुनक्षित रहता है-उसी उसीके धर्मोंवाला हो जाता है॥ १ ॥ वि० वि. भाष्य-आत्मा स्वमावसे ही स्त्री-पुरुषादि चिन्होंसे रहित है, वह जिस-जिस नाशवान् शरीरको धारण कर लेता है उसी उसीके धर्मो के अध्यासवाला हो जाता है। 'मैं मनुष्य हूँ''मैं ब्राह्मण हूँ' और 'मैं पाप-पुण्यवाला हूँ' इत्यादि शरीरके धर्मोंको अपनेमें मानने लगता है, वास्तवमें वह निर्धरमिक है॥ १० ॥ जीवात्माके शरीर धारणका कारण बतलाते हैं, यथा- संकल्पनस्पर्शनदृष्टिमोहैर्य्ासाम्बुवृष्ट्या चात्मविवृद्धि- जन्म। कर्मानुगान्यनुक्रमेण देही स्थानेषु रूपाण्यभि- संप्रपद्यते ॥ ११॥। भावार्थ-अन्न जलके खान पानसे जैसे शरीरकी वृद्धि होती है ऐसे ही कर्म करनेकी प्रवृत्ति संकल्प, स्पर्श, दर्शन तथा मोहसे होती है। यह जीवात्मा क्रमसे भिन्न भिन्न योनियोंमें जाकर उन कर्मो के अनुसार रूपोंको प्राप्त होता है याने कर्मानु- सार रूप धारण करता है। ११ ॥

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४३० श्वेताश्वतरोपनिषद् [अध्याय ५

वि• वि० भाष्य-सबसे पहले मनुष्य संकल्प करता है। इष्ट-अनिष्ट- रूप मनके व्यापारका नाम संकल्प है। फिर स्पर्श याने त्वगिन्द्रियका व्यापार होता है। अर्थात् पहले सोचकर फिर छूनेका मन करता है। तत्पश्चात् दृष्टि जाती है। नेत्रोंका व्यापार जो दर्शन है उसे दृष्टि कहते हैं। इसके बाद मोह होता है। इनसे शुभाशुभ कर्म सम्पन्न होते हैं। फिर कर्मानुगत याने कर्मो के अनुसार कर्मविपाककी अपेक्षासे यह जीव स्त्री, पुरुष एवं नपुंसकादि रूपोंको तथा देवता, तिर्यकू एवं मनुष्यादि योनियोंको प्राप्त करता है॥ ११ ॥ स्थूलानि सूक्ष्माणि बहूनि चैव रूपाि देही स्वगु- णैर्वृणोति। क्रियागुणैरात्मगुणैश्च तेषां संयोगहेतुरपरोऽपि दष्षः ॥१२ ॥ भावार्थ-पाप-पुण्यजनक कर्मोके वश हो जीवात्मा बहुतसे स्थूल-सूक्षम देह धारण करता है। पश्चात् उन उन शरीरोंके कर्मफल और मानसिक संस्कारों द्वारा उनके संयोगका दूसरा कारण भी देखा गया है, याने फिर वह जीव उन शरीरोंके कर्मफल और मानसिक संस्कारोंसे दूसरे शरीरसे युक्त हो जाता है, अन्य देह धारण कर लेता है॥ १२ ॥ वि० वि० भाष्य-जितने पार्थिव स्थूल शरीर हैं और जितने तैजस सूक्षम शरीर हैं, उनको जीव अपनेमें अध्यस्त सत्त्व, रज, तमरूप सत्तास्फुरणादि अपने गुणों करके और भौत स्मार्त, विहित प्रतिषिद्ध क्रियाके गुणों करके तथा अन्य जो धर्म-अ्रधर्म गुण हैं उनसे भी अपनेको आच्छादित कर लेता है अर्थात् पूर्वोक्त गुणोंसे जीवात्मा जन्मान्तरके शरीरोंका लाभ करता है॥ १२॥ जब मनुष्य ऐहिक आमुष्मिक फलभोगमें विरक्त तथा शमदमादि साधन- सम्पन्न होता है, तब वह उस आत्माको जानकर मुक्त हो आता है, यथा- अनाद्यनन्तं कलिलस्य मध्ये विश्वस्य स्रष्टारमनेक- रूपम्। विश्वस्यैकं परिवेष्टितारं ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्व- पाशैः॥ १३ ॥ भावार्थ-आदि अन्तसे रहित, विश्वके रचयिता, अनेक रूपवारी, अखिल जगत्को व्याप्त करनेवाले उस देवको जानकर जीव इस दुर्घर्ष संसारमें सभी बन्धनों- से छूट जाता है।। १३।।

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मन्त्र १ ४ ] विद्याविनोद माध्य ४३१

वि• वि. भाष्य-देव=प्रकाशस्वरूप ज्योतिःपुञ्ज परमात्माको जानकर जीव समस्त पाशोंसे अर्थात् अविद्या, काम, कर्मादिसे मुक्त हो जाता है॥। १३ ॥

अब्र 'यह किसके द्वारा ग्रहण किया जाता है' इसे कहते हैं, यथा-

भावग्राह्यमनीडाख्यं भावाभावकरं शिवम्। कलासर्गकरं देवं ये विदुस्ते जहुस्तनुम्॥ १४ ॥

भावार्थ-शुद्धान्तःकरणसे ग्रहण करने योग्यको एवं शरीरसे रहित, सृष्टि- प्रलयकरण समर्थ, कल्याणस्वरूप तथा प्राणादि कलाओंके रचनेवाले इस देव = प्रकाशस्वरूपको जो जान जाते हैं फिर वे शरीरको त्याग देते हैं, यानी देहके बन्धनसे रहित हो जाते हैं, जन्म-मृतिके चक्करमें नहीं आते-॥। १४ ॥

वि० वि० भाष्य-भाव नाम अन्तःकरणका है, उस शुद्ध अन्तःकरणमें उत्पन्न हुई जो ब्रह्माकार वृत्ति है उससे आत्मा ग्रहण किया जाता है, अन्य किसी भी इन्द्रियसे नहीं। आत्मा अनीड़ है, नीड़ नाम शरीरका है। आत्मा भाव= उत्पत्ति तथा अभाव=संहारको करनेवाला है, आत्मा शिव=कल्याणस्वरूप है। इससे बढ़कर मङ्गलमयता और किसीमें नहीं है। आत्मा कलासर्गकर है यानी प्राणादि बोडश कलाओंका कर्ता है और ज्योतिःस्वरूप है। इत्यादि विशेषशोंसे युक्त चेतन ब्रह्मको जो मुमुत्तु अपना आत्मा जान लेते हैं, वे फिर कदाचित् भी शरीरको धारण नहीं करते हैं, यानी मुक्त हो जाते हैं। फिर उनका शरीरान्तरसे सम्बन्ध नहीं होता। अर्थात् जो प्रभुप्रेमी ईश्वरभक्त परमेश्वरको यथार्थ भावसे जानकर उसकी भक्ि करते हैं, उनकी नौका भवसागरसे पार हो जाती है। भक्ति नाम सेवाका है, यह शब्दका अर्थ हुआ, यों तो भक्तिके अनेक भेदोपभेद हैं। सचा भक्त वह है जो देशको तथा कुटुम्बको साक्षात् ईश्वरका मन्दिर समझे और उनमें रहनेवालोंको प्रसु- की मूर्ति देखे॥ १४ ॥

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४३२ श्वेताश्वतरोपनिषद् [अध्याय ६

षष्ठ ऋ्रध्याय

दूसरे लोग जो मतमतान्तरोंकी सीमामें अवरुद्ध हैं वे कालादिकोंको कारण मानते हैं फिर ईश्वर किस प्रकार कलाओंकी रचना करनेवाला है ? इस आशङ्काकी निवृत्ति करती हुई श्रुति कहती है, यथा- स्वभावमेके कवयो वदन्ति कालं तथान्ये परिमुद्य- माना:। देवसयैष महिमा तु लोके येनेदं भ्राम्यते ब्रह्म- चक्रम् ॥ १ ॥ भावार्थ-जिससे यह ब्रझचक्र घूम रहा है, कोई पण्डित इसका कारण स्वभावको बताते हैं और दूसरे कालको। किन्तु ये सब भरममें पड़े हुए हैं। इसी कारण ये ठीक ठीक नहीं जानते। किन्तु संसारमें यह महिमा भगवान्की है॥१ ॥ विं० वि० भाष्य्रह्मचक्रका अर्थ है, संसाररूपमें विवर्तित ब्रह्मरूप चक्र। याने ब्रह्म ही संसाररूपसे दीख रहा है, यही चक्र है। यहाँ काल स्वभावसे यदच्छा, भूत, पुरुष आदिका भी ग्रहण कर लेना। ये अपने अपने गौणांशमें भले ही कारण रहें परन्तु महत्त्व यानी सबमें बड़ाई तथा प्रधानता तो परमेश्वरकी ही है। यही श्वेताश्वतरादिकोंने निश्चित करिया है॥ १ ॥ अब उस महिमाका निरूपण करते हैं, यथा- येनावृतं नित्यमिदं हि सर्व ज्ञः कालकारो गुणी सर्वविद्यः। तेनेशितं कर्म विवर्तते ह पृथ्वयप्तेजोS- निलखानि चिन्त्यम् ॥२॥ भावार्थ-जिससे यह सब सदा व्याप् रहता है, जो चेतन या ज्ञानस्वरूप, कालका भी कर्ता है, गुणोंका स्वामी है तथा सब विद्यावाला है, उसीसे प्रेरित होंकर यह पृथिवी, जल, अभि, वायु और आकाशरूप कर्म होते हैं। अतः वही विचारणीय है॥ २ ॥ वि० वि. भाष्य-'कर्म विवतते ह' इस वाक्यका अर्थ है 'ईश्वरसे

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मन्न ३ ] विद्याविनोद भाष्य ४२१

प्रेरितकर्म।' जो किया जाता है उसे कर्म कहते हैं, यह जो पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु एवं आकाशरूप ईश्वरप्रेरित प्रसिद्ध कर्म है, वह रज्जूमें सपके समान जगद्- रूपसे विवर्तित होता है। भाव यह है कि जिस ईश्वरसे नित्य ही सम्पूर्ण जगत् व्याप्त हो रहा है, उसी ईश्वरसे प्रेरित कर्म नानारूपवाला हो जाता है और पृथिवी, जल, तेज, वायु, आकाश यह सब प्रपक् उसी ईश्वरका विवर्तरूप होकर बर्तमान है॥। २ । पहले अध्यायमें जिसे चिन्तनीय बतलाया है, उसीका निरूपण करते हैं, यथा- ततकर्म कृरवा विनिवर्त्य भूयस्तत्त्वस्य तत्त्वेन समेत्य योगम्। एकेन द्वाभ्यां त्रिभिरष्टभिर्वा कालेन चैवात्मगु- णैश्च सून्मैः ॥ ३ ॥ भावार्थ-मनुष्य देहसे उस कर्मको करके, उसका निरीक्षण करे जो फिर उस तत्त्वके साथ, एक, दो, तीन या आठ सत्त्वोंके साथ अथवा काल और अन्तः- करणके सूक्ष्मगुणोंके साथ अपने सत्तारूप गुणका योग कराकर स्वयं स्थित रहता है। उसका चिन्तन करना चाहिये।। ३।। वि० वि० भाष्य-कर्मी पुरुष जो जो कर्म ईश्वरप्रीत्यर्थ करता है, उन निष्काम कर्मो के प्रभावसे वह शुद्धान्तःकरणवाला हो जाता है। चित्तशुद्ध होनेसे वह सब कमोंका त्याग कर देता है। १-तब आत्मतत्त्वार्थक त्वं पदका ईश्वरतत्त्वार्थक तत्पदके साथ अर्थात् दोनोंके अभेदका अनुभव करके एकबार ब्रह्मवित् गुरुका उपदेश सुनकर मुक्त हो जाता है। २-अथवा गुरुभक्ति तथा ईश्वरभक्ति, इन दो साधनोंसे आत्मज्ञान प्राप्त करके मुक्त हो जाता है। ३-अथवा श्रवण, मनन, निदिष्यासन इन तीन साधनोंकी सहायतासे ज्ञानद्वारा युक्त हो जाता है। ४-अथवा यम, नियम, आासन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि इन भठोंसे ज्ञान प्राप्त होनेपर मुक्त हो जाता है। ५-अथवा बहुतकालके नैरन्तर्याभ्याससे इस जन्ममें या जन्मान्तरमें साधनसम्पन्न हो ज्ञानसे मुक्त हो जाता है। ६-अथवा दया, नान्ति, शौचादि आत्माके गुणोंसे मुक्त हो जाता है। ७-अथवा सूक्ष्म पुण्य के संस्कारोंसे आत्माका साक्षात्कार करके मुक्त हो जाता है । ३॥ अब कर्मो का मुख्यविनियोग दिखाया जाता है, यथा-

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[गग्पाय

आरभ्य कर्माणि गुणान्वितानि भावाश्च सर्वान्विनि- योजयेद्यः । तेषामभावे कृतकर्मनाशः कर्मक्षये याति स तरवतोऽन्यः।।४॥ भावार्थ-गुमोंमे युक्त कर्मोंको आरम्भ करके जो पुरुष उन्हें तथा सम्पूर्ण चनतुरादिक भावोंको ईश्वरमें लय कर देता है, इनके साथ सम्बन्धका अभाव होनेसे उसके पहले किये हुए कर्मोंका नाश हो जाता है। कर्मोंका क्य होने पर वह जीवात्सा तत्त्वोंसे पृथक हुआ ब्रह्मको प्राप्त हो जाता है॥४॥ वि० वि. भाष्य-मुमुक्च त्रिगुणात्मक वेदप्रतिपादित कमोंका आरम्भ करके भाव जो चनु आदिक पदार्थ हैं उस्का अपने कारणमें लय कर दे। जैसे- रूपका चक्षुमें, चक्षुका सूर्यमें, सूर्यका तेजमें, तेजका वायुमें, वायुका आकाशमें, आकाशका प्रकृतिमें और प्रकृतिका ब्रह्ममें जो विद्वान् लय कर देता है, उसके सम्पूर्ण कभांका अभाव हो जाता है। कर्मोंका नाश होनेसे वह तत्वोंसे पृथक हुआ आानन्द- रूप ब्रह्ममें मिल जाता है।।४ ॥ उपर्युक्त अर्थकी दढताके लिए अगले मन्त्र प्रस्तुत किये जाते हैं। विषन यान्ध पुरुष भी किसी प्रकार ब्रह्मको जान जायँ, इस प्रयोजनसे श्रुति कहती है, यथा- आदि: स संयोगनिमित्तहेतु: परस्त्रिकालादकलोऽि दृष्टः। तं विश्वरूपं भवभूतमीड्यं देवं स्वचित्तस्थमुपास्य पूर्बम् ॥५ ॥ भावार्थ-वह सबका आदि कारण है, शरीर संयोगकी कारणरूपा अविद्याका हेतु है और वह तोनों कालोंसे रहित, कला परिच्छेद रहित देखा गया है। अपने हृदयमें वर्तमान उस सर्वरूप एवं विश्वरूपकी ज्ञानोत्पत्तिसे पहले उपासना कर साधक उसे प्राप्त हो जाता है।। ५। वि० वि० भाष्य-मुमुत्तुको सर्वं प्रथम उपासना ही करनी चाहिये। इससे उसको संसार हेतु, त्रिकालानवच्छिन्न, अखण्ड, जगत्स्ष्टा, स्तुति योग्य और जगत्पिताका इसे अपने हृदयमें ही साक्षात्कार हो जायगा ॥ ५॥। फफर भी उसे ही दिखाते हैं, यथा-

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विद्याविनोद भाष्य

स वृक्षकालाकृतिभि: परोडन्यो यस्मात्प्रपञ्चः परिव. सतेऽपम्। धर्मावहं पापनुदं भगेशं ज्ञात्वात्मस्थममृतं विश्वधाम ॥ ६ ॥ भावार्थ-वह परमेश्वर संसाररूपी वृक्ष और कालाकृतिसे भी परे है तथा वह प्रपख्चसे भिन्न है। यह दृश्यमान जगत् जिसकी सत्तासे प्रवृत्त होता है, उस धर्मकी प्राप्ति करानेवाले और पापको दूर करनेवाले, ऐश्वर्यंके स्वामी और शरीरमें स्थित-अमृतरूप विश्वके धामको जानकर पुरुष मुक्त हो जाता है॥ ६॥ वि० वि० भाष्य-वह परमेश्वर शरीररूपी वृक्षको देखकर जाना जाता है, उसने शरीरमें बनाया, वहो जगत्में वसा है। पिण्ड और ब्रह्माण्ड इसेकी दो सूक्ष्म तथा स्थूल रचना हैं, उसे जानो ॥ ६ ॥ अब त्रिद्वान्का अनुभव दिखलाती हुई श्रुतति उपर्युक्त अर्थको पुष्ट करती है, यथा- तमीश्वराणां परमं महेश्वरं तं देवतानां परमं च दैवतम्। पतिं पतीनां परमं परस्ताद्विदाम देवं भुवने- शमीड्यम्॥ ७॥ भावार्य-ब्रह्मादि ईश्वरोंके भी परम महान् ईश्वर, देवताओंके भी सर्वोत्कृष्ट स्वामी, प्रजापतियोंके भी पति, अव्यक्तादिसे पर तथा मुवनोके स्वामी उस स्तुति करने योग्य देवको हम जानते हैं॥७ ॥ वि• वि० भाष्य-परमेश्वर सबके अधिपति हैं और सब उनकी बिभूतियाँ है, साधकको चाहिये कि वह ईश्वरको भजे और उसकी विभूतियोंमें उसीकी महिमाका दर्शन करे॥७॥ उसकी महेश्वरता किस प्रकार है ? यह कहते हैं, यथा- न तस्य कार्यं करणं च विद्यते न तत्समश्चाभ्यधि- कश्च दृश्यते। पराम्य शकिर्विविधैत्र श्रूपते स्वाभा- विकी ज्ञानवलक्रिया च॥८ ॥

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४२६ श्वेताश्वतरोपनिषदू [अष्याय १

भावार्थ-उस परमेश्वरका न शरीर है, न उसकी इन्द्रियाँ ही हैं, उसके तुल्य तथा उससे बढ़कर भी कोई नहीं दिखाई देता। उसकी पराशक्ति नानारूपोंवाली, वेदादिकोंमें सुनी जाती है और वह स्वभावसिद्ध सर्व विषयक ज्ञानवाली तथा सबको अपने वशमैं करनेवाली है॥ ८॥ वि. वि. भाष्य-विश्वमें उसका कोई मालिक नहीं है, वह जो कुछ करता है, उसमें किसीकी सहायता नहीं लेता। सब कुछ् वही है, इसी लिए वेदमें 'सर्वे खल्विदं ब्रह्म' ऐसा कहा गया है॥। ८ ॥ क्योंकि ऐसा है, इसलिए- न तस्य कश्चित्पतिरस्ति लोके न चेशिता नैव च तस्य लिङ्गम्। स कारणं करणाधिपाधिपो न चास्य कश्चिज्जनिता न चाघिप: ।। ६ ।। भावार्थ-मंसारमें कोई दूसरा उसका अधिष्ठाता नहीं है, न कोई उसका नियन्ता है. वह प्रारम्भसे है और अन्ततक रहेगा। उसके प्रारम्भकालका किसीको पता नहीं है, कब अन्त होगा, कह नहीं सकते। इसीलिए वेहोंने और सन्तोंने उसे अनादि अनन्त बनाया है। बस, हम तो इतना ही जानते हैं कि वह है और उससे हमारा समुद्धार होगा । ९ ॥

अब श्रुति मन्त्रद्रष्टा ऋषयोंके अभिमत पदार्थकी प्रार्थना करती है, यथा- यस्तूर्णनाभ इव तन्तुभि: प्रधानजैः स्वभावतो देव एक: स्वमावृणोत्। स नो दधादुबह्माप्ययम् ॥ १० ॥ भावार्थ-जैसे मकड़ी अपने तन्तुओंसे अपनेको ही आच्छादन कर लेती है, उसी पकार एकमात्र अद्वय देवने प्रकृतिसे जन्यरूपोंसे स्वभावतः अपनेको आवृत कर लिया है, वह हमें ब्रह्मसे एकताको प्राप्त करे॥ १० ॥ वि० वि० भाष्य-जो तन्तुओंसे ढकी हुई मकड़ीकी तरह अ्रव्यक्त=प्रधानसे उदरन्न हुए तन्तुरूप नाम और रूप तथा कमांसे अपने आपको आ्च्छादित कर लेता है, हम ऐसे लीलामयसे यह प्रार्थना क्यों न करें कि वह हमें भी अपनेमें मिलाकर अवष्ट व्रम्मानन्दानुभवी बनावे॥ १० ॥

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मन्त्र ११-१२J विद्याविनोद माष्य ४३७

उसके विशेष ज्ञानसे ही परम पुरुपाथकी प्राप्ति होती है और किसीसे नहीं; यथा- एको देवः सर्वभूतेषु गूढः सर्वव्यापी सर्वभूतान्त- रात्मा। कर्माव्यक्ष: सर्वभृताधिवासः साक्षी चेता केवलो निर्गुणश्च ॥११॥ भावायें-एक ही परमात्मा जो देव=पकाशस्त्ररूप है, सर्व प्राणियोंमें गुप्त होकर स्थिर है। वह सर्वव्यापक, सम्पूर्ण प्राणियों का आत्मा, कर्मोंका अधिष्ठाता और सर्व जीवोंमें निवास कर रहा है। वह सबका साक्षी=द्रष्टा सबको चेतना प्रदान करनेवाला अद्वय तथा निर्गुण है॥ ११ ॥ वि० वि० भाष्य-सब प्राणियोंके यावत् कर्मोंका अशिष्ठाता वही है, जब यह बात है तो उससे छिपाकर कोई काम नहीं किया जा सकता। जो लाग छिपा- कर काम करते, उन्हें जानना चाइिये कि ईश्वरकी आँखोंमें धूल झोकनेका दुःसाहस करनेवाले अज्ञ हैं। जो कर्मोंका फल देनेवाला है उससे तो कोई कर्म छिपा नहीं रह सकता। अ्रतः अच्छे कर्म करने चाडिये जो कि छविपाने न पडें ॥ ११ ॥ परमेश्वरके ज्ञानसे ही स्थायी मोक्षानन्द प्राप्त हो सकता है, यह कहते हैं, यथा- एको वशी निष्क्रियाणां बहूनामेकं बीजं बहुधा यः करोति। तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरास्तेषां सुखं शाश्ववतं नेतरेषाम् ॥ १२ ॥ भावार्थ-वह परमात्मा एक ही है याने अद्वितीय है, उसने सबको अपने वशमें कर रखा है। वह प्रलयकालमें क्रियासे रहित बहुतसे जीवोंका एक ही कारण है, वही सृष्टिकालमें अनेक रूपोंसे उत्पन्न होता है। जो विद्वान् उस परमात्माका अपने अन्त.करणमें साक्षात्कार करते हैं, उन्हींको नित्य मोक्ष सुख प्राप्त होता है, औरोंको नहीं ॥ १२ ॥ वि० वि० भाष्य-इस सृष्टिका आविर्भाव-तिरोभाव करना महामहिम परमात्माके बायें हाथका खेल है। पण्डित लोग उसे अन्तःकरणमें स्थित देखकर

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४१६ श्वेताश्वतरोपनिषद् [अध्याय १

भावार्थ-उस परमेश्वरका न शरीर है, न उसकी इन्द्रियाँ ही हैं, उसके तुल्य तथा उससे बढ़कर भी कोई नहीं दिखाई देता। उसकी पराशक्ति नानारूपोंवाली, वेदादिकोंमें सुनी जाती है और वह स्वभावसिद्ध सर्व विषयक ज्ञानवाली तथा सबको अपने वशमैं करनेवाली है॥ ८ ॥ वि. वि. भाष्य-विश्वमे उसका कोई मालिक नहीं है, वह जो कुछ करता है, उसमें किसीकी सहायता नहीं लेता। सब कुद् वही है, इसी लिए वेदमें 'सर्वे खल्विदं ब्रह्म' ऐसा कहा गया है॥ ८॥ क्योंकि ऐसा है, इसलिए- न तस्य कश्चित्पतिरस्ति लोके न चेशिता नैव च तस्य लिङ्गम्। स कारणं करणाधिपाधिपो न चास्य कश्चिज्जनिता न चाधिपः ।। है।। भावार्थ-मंसारमें कोई दूसरा उसका अघिष्ठाता नहीं है, न कोई उसका नियन्ता है. वह प्रारम्भसे है और अन्ततक रहेगा। उसके प्रारम्भकालका किसीको पता नहीं है, कब अन्त होगा, कह नहीं सकते। इसीलिए वेदोंने और सन्तोंने उसे अनादि अनन्त बनाया है। बस, हम तो इतना ही जानते हैं कि वह है और उससे हमारा समुद्धार होगा । ९ ॥

अब श्रुति मन्त्रद्रष्टा ऋषियोंके अभिमत पदार्थकी प्रार्थना करती है, यथा-

यस्तूर्णनाभ इव तन्तुभि: प्रधानजैः स्वभावतो देव एक: स्वमावृणोत्। स नो दधादुबह्माप्ययम् ॥ १० ॥ भावार्थ-जैसे मकड़ी अपने तन्तुओंसे अपनेको ही आच्छादन कर लेती है, उसी पकार एकमात्र अद्वयदेवने प्रकृतिसे जन्यरूगेंसे स्वभावतः अपनेको आवृत कर लिया है, वह हमें ब्रह्मसे एकताको प्राप्त करे॥ १० ॥ वि० वि० भाष्य-जो तन्तुओंमे ढकी हुई मकड़ीकी तरह प्रव्यक्त=प्रधानसे बररन्न हुए तन्तुरूप नाम और रूप तथा कमांसे अपने आपको आच्छादित कर लेता हूं, हम ऐसे लीलामयसे यह प्रार्थना क्यों न करें कि वह हमें भी अपनेमें मिलाकर अवष्ट व्रह्मानन्दानुभवी बनावे॥ १० ॥

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मन्त् ११-१२J विद्याविनोद भाष्य ४३७

उसके विशेष ज्ञानसे ही परम पुरुषाथकी प्राप्ति होती है और किसीसे नहीं; यथा- एको देवः सर्वभूतेषु गूढः सर्वव्यापी सर्वभूतान्त- शत्मा। कर्माध्यक्ष: सर्वभूताधिवासः साक्षी चेता केवलो निर्गुणश्च॥११॥ भावार्थ-एक ही परमात्मा जो देव=पकाशस्त्ररूप है, सर्व प्राणियोंमें गुप्त होकर स्थिर है। वह सर्वव्यापक, सम्पूर्ण प्राणियोंका आत्मा, कर्मोंका अधिष्ठाता और सर्व जीवोंमें निवास कर रहा है। वह सबका साक्षी=द्रष्टा सबको चेतना प्रदान करनेवाला, अद्वूय तथा निर्गुण है॥ ११ ॥ वि० वि० भाष्य-सब प्राणियों के यावत् कर्मोंका अशिष्ठाता वही है, जब यह बात है तो उससे छिपाकर कोई काम नहीं किया जा सकता। जो लाग छिपा- कर काम करते, उन्हें जानना चाइिये कि ईश्वरकी आँखोंमें धूल झोकनेका दुःसाहस करनेवाले अज्ञ हैं। जो कर्मोंका फल देनेवाला है उससे तो कोई कर्म छिपा नहीं रह सकता। अतः अच्छे कर्म करने चाडिये जो कि छिपाने न पडें॥ ११॥ परमेश्वरके ज्ञानसे ही स्थायी मोक्षानन्द प्राप्त हो सकता है, यह कहते हैं, यथा- एको वशी निष्क्रियाणां बहूनामेकं बीजं बहुधा यः करोति। तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरास्तेषां सुखं शाश्रवतं नेतरेषाम् ॥ १२ ॥ भावार्थ-वह परमात्मा एक ही है याने अद्वितीय है, उसने सबको अपने वशमें कर रखा है। वह प्रलयकालमें क्रियासे रहित बहुतसे जीवोंका एक ही कारण है, वही सृष्टिकालमें अनेक रूपोंसे उत्पन्न होता है। जो विद्वान् उस परमात्माका अपने अन्त.करणमें साक्षात्कार करते हैं, उन्हींको नित्य मोक्ष सुख प्राप्त होता है, औरोंको नहीं ॥ १२ ॥ वि. वि. भाष्य-इस सृष्टिका आविर्भाव-तिरोभाव करना महामहिम परमात्माके बायें हाथका खेल है। पण्डित लोग उसे अन्तःकरणमें स्थित देखकर

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४३्८ श्वेताश्वतरोपनिषद्

सर्वोत्कृष्ट आनन्दको प्राप्त कर लेते हैं, किन्तु अज्ञानीजन इससे वश्ित रह जाते हैं। क्योंकि वे प्रकृतिके गुणोंसे मोहित हैं ॥ १२॥ नित्यो नित्यानां चेतनश्रेतनानामेको बहूनां थो विद- धाति कामान्। तत्कारणं सांख्ययोगाधिगम्यं झारवा देव मुच्यते सर्वपाशैः ॥१३ ॥ भावार्थ-वह परमात्मा नित्योंमें नित्य है और चेतनोंमें चैतन है. जो अकेला ही बहुतसे जीवोंकी कामना पूरी करता है, सांख्य-योगसे वह जाना जाता है। उस सबके कारण देवको जानकर पुरुष सम्पूर्ण पाशोंसे छूट जाता है॥ १२॥ वि० वि० भाष्य-वह नित्योंमें नित्य है याने आकाश, कालादि जो नित्यपदार्थ हैं. वह उनसे भी नित्य है। आकाश आदि पदार्थ बहुत दिनों तक रहेंगे, पर परमात्मा तो सदा ही रहनेवाला है। आकाशादि केवल अवकाश आदि दे सकते हैं, उनमें शब्दादि गुण रह सकते हैं किन्तु यह परमात्मा तो जीवोंको काम निमिच्तक भोगोंका विधान यानी प्रदान करता है। अर्थात् वह सबको देता है, वह सबमें है और सबसे न्यारा है, उसे जानना ही श्रेयस्कर है॥ १३ ॥

वह चेतनोंमें चेतन किस प्रकार है ? यह कहते हैं, यथा- न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमभनिः। तमेव भान्तमनुभाति सर्व तस्य भासा सर्वमिदं विभाति॥१४॥ भावार्थ-वहाँ सूर्य प्रकाशित नहीं होता, चन्द्रमा और तारे भी प्रकाशित नहीं होते। ये बिजलियाँ भी वहाँ नहीं चमकतीं। फिर अभि तो वहाँ प्रकाशित ही कहाँ होगा ? ये सब उसके प्रकाशित होनेसे ही प्रकाशित होते हैं, उसीके प्रकाशसे ये सब प्रकाशमान हो रहे हैं॥ १४।। वि० वि. भाष्य-सूर्य सबका प्रकाशक है, पर वह ब्रह्मको प्रकांशित नहीं कर सकता, प्रत्युत वह सर्वात्मा ब्रह्मके प्रकाशसे ही सब रूपोंको प्रकाशित करता है। क्योंकि सूयमें स्वयं प्रकाशित करनेको सामर्थ्य नहीं है। यही नहीं जितने चन्द्र, अग्नि आदि प्रकाशक पदार्थ हैं सभी उसके प्रकाशसे ऐसे प्रकाशित हो

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अब्य १५-१९] विदाविनोद भाज्य

रहें हैं जैसे लोहा आदि पदार्थ जलानेवाले अध्िके साथ ही उसीकी शक्तिसे जलते हैं, चमकते हैं, स्वतः नहीं। जो प्रकाश है उस सबका आदि स्रोत वही है।

जब कि वह प्रकाशस्वरूप है तो सूर्यकी तरह हम सबको दीखता क्यों नहीं ? क्योंकि आलोक-सहकृत चक्षुकी मदद पाकर आँखें उसे देखनेमें समर्थ हो सकती हैं तो फिर वे उसे देख क्यों नहीं पातीं? उत्तर यह है कि वह सूर्यकी तरह स्थूल नहीं है, वह परमाणुसे भी सूत्ष्मतम है, फिर उसे चर्मचन्नु कैसे देखनेमें समर्थ हो सकते हैं ? भाव यह है कि यह जो जगत् भान हो रहा है उसीके प्रकाशसे प्रकाश- मान है, क्योंकि स्वतः जड़ होनेसे इसमें प्रकाश करनेकी सामर्थ्य नहीं है॥ १४॥

उसीको जानकर क्यों मुक्त होता है ? किसी औरसे क्यों नहीं, यह कहते हैं, यथा- एको हथसो भुवनस्यास्य मध्ये स एवाभनि: सलिले संनिविष्टः । तमेव विदित्वाति मृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय ॥ १५ ॥ भावार्थ-वही भुवनोंके मध्यमें एक हंस है, वही जलमें स्थित अग्नि है, उसीको जानकर पुरुष मृत्युके पार हो जाता है। इसके अतिरिक्त मोक्षप्राप्तिका कोई और रास्ता नहीं है।। १५ ॥ वि० वि० भाष्य-बन्धनका कारण जो अविद्या है इसके हनन करनेवाले हूंस कहाते हैं। "हन्ति अविद्यादिबन्धनकारणमिति हंसः" यह उसकी व्युत्पत्ति है। ऐसा एक परमात्मा ही है, ऐसा तीनों भुवनोंमें दूसरा कोई नहीं है। वही परमेश्वर अविद्या- का नाशक होनेसे अभि भी है। सलिल नाम शुद्धका है, सो निष्काम कर्मोंको करके शुद्ध हुआ जो अन्तःकरण है उसीमें संनिविष्ट होकर अर्थात् प्रतिविम्बित होकर वह अविद्या आदिकोंका दाह करता है। उसीको अपना आत्मा जानकर पुरुष बन्धनसे मुक्त होता है। सिवाय आत्मज्ञानके और कोई भी मार्ग मोक्षके लिए विदमान नहीं है। १५ ॥ परमपद्की प्राप्तिके लिए फिर भी उस्रीको विशेष रूपसे दिखाया जाता है, यथा- स विश्वकृद्विश्वविदात्मयोनिर्ज्ञः कालकारो गुणी सर्व-

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४४० श्वेताश्वतरोपनिषद् [अभ्याव ₹

विद्यः । प्रधानक्षेत्रज्ञपतिर्गगोशः सथ सारमोक्षस्थिति- बन्धहेतुः । १६ ।। भावार्थ-वह सृष्टि करनेवाला, विश्वका वेत्ता, आत्मयोनि, स्वयम्भु अथवा आत्मा और कारण, कालका ज्ञाता या प्रेरक, गुणवान्, तथा सम्पूर्ण विद्याओंका भण्डार है। वही प्रधान एवं विज्ञानात्मा पुरुषका स्वामी, गुणोंका व्यवस्थापक या नियामक तथा संसारके मोत्त, स्थिति एवं बन्धनका कारण है॥ १६ ॥ वि० वि० भाष्य-जो यहाँ 'विश्ववित्' यह विशेषण आया है, उसीकी इस मन्त्रमें विस्तारपूर्वक व्याख्या की गई है। काल सबको लीन कर जाता है, जिनके चलनेसे पृथिवी हिलती थी, उन्हें भी काल खा गया, उसका काल भगवान् है। परमेश्वर मोक्षका कारण है, यह तो ठीक है, पर वह बन्धनका भी कारण है, यह क्यों? इसका उत्तर यह है कि उसीने उन पदार्थोंको रचा है, और रचकर उनमें सत्तास्फूर्ति दी है जो बाँधते हैं। इससे वह बन्धनका भी कारण है। तो फिर उसने बन्धनमें डालनेवाले पदार्थ क्यों रचे? इसके उत्तरमें निवेदन यह है कि प्रभु निश्रहा- वग्रहमें-कर्तुमकतुमन्यथा कर्तुम्म स्वतन्त्र है। यह तो उसीसे पूछा आय कि 'यह क्यों किया? वह क्यों रचा ? उसे क्यों बनाया या बिगाड़ा ?'॥ १६॥ स तन्मयो ह्यमृत ईशसंस्थो जः सर्वगो भुवनस्यास्य गोता। य ईशे अस्य जगतो नित्यमेव नान्यो हेतुर्विद्यत ईशनाय ॥ १७ ॥ भावार्थ-वह तन्मय, अमृतरूप, ईश्वररूपसे स्थित, जाननेवाला, सर्वत्र व्यापक और इस दृश्यमान जगत्का रक्षक है। जो सदा इस विश्वका शासक है. उसका शासन करनेके लिए और कोई समर्थ नहीं है॥ १७॥ वि० वि. भाष्य-वह 'तन्मय' है, विश्वरूप-जगत्रूप भी है तथा ज्योतिर्मय भी है। उसके बनाये कायदा कानून सबको मानने पड़ते हैं, पर वह किसीके नियन्त्रणमें नहीं है। जो उसके निमयानुकूल नहीं चलता उसे वह अशुद्ध अक्षरकी तरह जगत्पृष्ठ परसे सदाके लिए मिटा देता है। मिटानेका अभिप्राय यह है कि वह उसे उसी रूपमें नहीं रहने देता है॥ १७॥ ईश्वर ही संसारके मोक्ष, स्थिति और बन्धनका हेतु है, अतः मुमुत्तुको सब प्रकारसे उसीकी शरणमें जाना चाहिये, यह कहते हैं, यथा-

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विद्याविनोद भाष्य ४४१

यो ब्रह्माणं विद्धाति पूर्व यो वै वेदांश्च प्रहिणोति तस्मै। तथह देवमात्मबुद्धिप्रकार्शं मुमुकुवे शरणमहं प्रपद्ये।। १८ ।। भावार्थ-जो सृष्टिके आदि कालमें हिरण्यगर्भ ब्रह्माको उत्पन्न करता है, और जो उसके लिए वेदोंका स्फुरण कराता है, अपनी बुद्धिको प्रकाशित करनेवाले उस देवकी मैं मुमुत्तु शरण ग्रहण करता हूँ। अथवा जो प्रकाशस्वरूप देव 'ब्रह्माह- मस्मि' इस वृत्ति करके बुद्धिमें प्रकाशको करता है, मैं उसकी शरणमें प्राप्त होता हूँ ।। १८ ।। वि० वि० भाष्य-जिस परमात्माने ब्रह्माके द्वारा संसारमें अपनी वेद- रूप ज्ञानज्योतिका प्रकाश कराया, मुमुन्त उसकी शरणमें जाकर कृतार्थताका आनन्द लेता है।। १८ ।। सृष्टि आदि कार्यों से लक्षित होनेवाले जिस स्वरूपका वर्णन किया गया है, इसीको अब साक्षात् स्वरूपसे दिखाते हैं, यथा- निष्कलं निष्क्रिय शान्तं निरवद्यं निरञ्ञनम्। अमृतस्य परध सेतुं दग्धेन्धनमिवानलम् ॥१६॥। भावार्थ-जो निरवयव है, क्रियासे रहित है, शान्त है, जड़तासे रहित है और जो धूमरहित दहकती हुई अग्निके समान है, मैं उसका आश्रय ग्रहण करता हूँ । १६॥ वि. वि० भाष्य-वह अमृतका परम सेतु है, याने मोक्षकी प्राप्तिके लिए सेतुके समान है क्योंकि वह संसारसागरसे पार होनेका साधन है। वह दहकबे हुए अङ्गारोंके समान चमकीला है, याने प्रकाशस्वरूप है, प्रकाशके सहारेसे ही लोकमें मनुष्य घट पटादि पदार्थों के देखनेमें समर्थ होते हैं। इससे उसका समा- श्रयण ही श्रेयस्कर है १६॥ तो क्या उसको जानकर पुरुष मुक्त होता है, इसके लिए और उपाय नहीं है? इस पर कहते हैं, यथा- यदा चर्मवदाकाशं वेष्टयिष्यन्ति मानवाः। तदा देवमविज्ञाय दुःखस्यान्तो भविष्यति ॥ २० ॥ ५६

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श्वेताश्ववरोपनिषद् [अभ्याय ६

भावार्थ-जब कि मनुष्य आकाशको चर्मकी तरह लपेट सकेंगे तब आत्मा- को विना ही जाने दुःखका भी नाश हो जायगा ॥ २०॥ वि. वि० भाष्य-यदि मनुष्य निरवयव आकाशको चटाईकी तरह लपेटकर बगलमें दवा ले तो विना आतमज्ञानके मुक्ति भी हो का सकती है। इसका तात्पर्य यह हुआ कि परमात्माको विना जाने दुःखका अन्त होना ऐसा ही असम्भव है जैसा विभु तथा अमूर्त आकाशको परिच्छ्विन्न तथा मूर्तस्वरूप चर्मके समान लपटना। विना आत्मज्ञानके संसाररूपी रोगसे छूट जाना असम्भव है। मनुष्य चाहे कितने ही कर्म करे, चाहे जैसी उपासना करे, किन्तु वेदका डिण्डिमघोष है कि विना ब्रह्मज्ञानके 'जन्मशतैरपि' मुक्ति हो ही नहीं सकती॥ २०॥ जो ब्रह्मज्ञान सम्प्रदायपरंपरासे अर्जन किया जाता है, वही मोक्षप्रद होता है, अब उस सम्प्रदाय और इस विज्ञानविद्याके अधिकारीको दिखाते हैं, यथा- तप:प्रभावाद्देवप्रसादाच्च ब्रह्म ह श्वेताश्ववतरोऽथ विद्वान्। अत्याश्रमिभ्यः परमं पवित्रं प्रोवाच सम्यगषिस- सघजुष्टम् ॥ २१॥ भावार्थ-तपके प्रभावसे और परमात्माकी प्रसन्नतासे विद्वान् श्वेताश्वतर ऋषिने उस प्रसिद्ध ब्रह्मको जाना और अपने अनुभवकी दढताके अनन्तर उसने ऋषिसमुदायसे सेवित इस परम पवित्र तत्वज्ञानका अच्छी रीतिसे परमहंस सँन्यासियोंको उपदेश दिया ॥ २१॥ वि० वि० भाष्य-कृच्छ चान्द्रायणादिरूप तप या मन एवं इन्द्रियोंके निग्रहरूप तपके प्रभावसे, (तपसे ईश्वर भी प्रसन्न होता है) ऋषिने आत्माका साक्षात्कार किया। फिर उसने अत्याश्रमियोंको (अतिशब्द पूजार्थक है, अत्यन्त पूजनीय आश्रमवालोंको) अर्थात् साधनचतुष्टयकी पूर्णताके प्रभावसे जिनकी अपने शरीरादि तथा जीवन और भोगादिमें भी आस्था नहीं थी उन पूर्ण वैराग्यबानोंको इसका उपदेश दिया। बहूदक, कुटीचक, हंस, परमहंस ये चार भिन्षु संन्यासी हैं, जो इनमें उत्तरोत्तर श्रेष्ठ हैं। इन संन्यासियोंको उस प्रकृत ब्रह्मका, यानी उस सम्पूर्ण अविद्या और उसके कार्यसे रहित, निरतिशय सुखैकरसस्वरूप, पवित्र शुद्ध यानी प्रकृति और प्रकृतिके कार्य आदि मलसे रहित ब्रह्मका, जो ब्रह्म ऋषिसंघ जुष्ट यानी वामदेव एवं सनकादि ऋषियोंके समूहसे सेवित अर्थात् आत्मभावसे सम्यकरीत्या

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मेम्त्र १२ विधयाविनाद भाष्य ४४३

भावना किया हुआ, यानी प्रियतम आनन्दरूपसे आश्रित है, उस ब्रह्मका श्वेताश्वतरने जिस प्रकार वह आत्मस्वरूपसे पूर्णतया प्रत्यक्ष हो सके उस प्रकार उपदेश किया। (आचार्य शंकरने इस मन्त्रमें प्रतिपादित 'उपदिष्ट ब्रह्म' को इस प्रकार समझाया है।) इस कथनका भाव यह है कि श्वेताश्वतरादि ऋषियोंने परस्पर विचार करके इस उपनिषदमें प्रतिपादित ब्रह्मज्ञानमें अपना निश्चय किया, और फिर उनमेंसे श्वेताश्वतरने अन्य संन्यासियोंको बताया। इसी प्रकार सबको चाहिये कि प्रथम स्वयं जानकर खूब पक्का करके अन्य लोगोंको उपदेश करें। वे अच्छे नहीं होते जो ज्ञानाजनमें प्रीति नहीं रखते एवं श्रम नहीं करते, और वे तो और भी अच्छे नहीं होते जो ज्ञान प्राप्त करके पात्रोंको नहीं बताते। अच्छी बात दूसरोंको अवश्य बतानी चाहियै॥ २१ ॥ शिष्यकी परीक्षा करके उपदेश देना उचित है, इससे अन्यथा करनेमें दोष, विद्याका वैदिकत्व, गुह्यत्व और सम्प्रदायपरंपरा द्वारा प्रतिपादितत्त्र बतलाते हैं। यथा- वेदान्ते परमं गुह्यं पुराकल्पे प्रचोदितम्। नाप्रशान्ताय दातव्यं नापुत्रायाशिष्याय वा पुनः ॥।२२।। भावार्थ-वेदान्तशास्त्रमें परमगूढ इस विद्याका उपदेश अधिकारीको ही देना चाहिये। अर्थात् प्राचीन समयमें वर्णित इस ज्ञानको उस पुरुधको न देना चाहिये जिसका मन शान्त न हो, जो राग द्वबादि मलिनतावाला हो तथा जो पुत्र या शिष्य न हो ॥। २२॥ वि. वि० भाष्य-केवल स्नेह, लोभ तथा भयसे ब्रह्मविद्याका उपदेश नहीं करना, नहीं तो प्रत्यवाय लगता है। संसारमें सारे कामोंमें लेन देनकी दुकान- दारी करे तो कोई हज नहीं, पर दो बातोंको छोड़कर, १-एक तो ब्रह्मविद्याका उपदेश, कथा या अध्ययनाध्यापन, २-दूसरे गुरु शिष्यका सम्बन्ध। किसीको किसी लोभ लालचसे वेदान्तकी कथा न सुनावे, न पैसे वस् आदिके लालचसे कोई किसी- को गुरुमन्त्र देकर शिष्य बनावे। ये दोनों विषय पवित्र रहने चाहियें। लोभी लोग ब्रह्मविद्या और गुरुमन्त्रका दुरुपयोग न करें, यही प्रार्थना है। अधिकारीको ब्रद्मविद्याका उपदेश देना चाहिये। प्रकृत मन्त्रमें पुत्रको तथा शिष्यको ब्रह्मविद्याका अधिकारी बताया है, पर वे भी जब कि साधनचतुष्टयसम्पन्न हों और शान्तचित हों। जब कि लोग व्यवहारमें अयोग्य पुत्र तथा शिष्यको

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४४४ श्वेताश्वतरोपनिषद् [अध्याय १

राजकीय नियमानुरोध करके अपनी धन-धान्यादि सम्पत्तिके उत्तराधिकारसे वंचित कर देते हैं तो श्रुति भगवतीने परमार्थ दशामें साधनहीन, अशान्त पुत्र-शिष्योंको आात्मतत्त्व ज्ञान प्रदानाधिकारसे वंचित करके मर्यादाकी रक्षाका उपदेश दिया है। यहाँ यह तात्पर्य प्रतीत होता है कि जिसकी उपदेशके प्रति पूर्ण श्रद्धा न हो उसे उपदेश नहीं देना चाहिये, ऐसी श्रद्धा केवल पुत्र या शिष्यकी ही हो सकती है, उनको उपदेश करनेकी विधिका रहस्य यही जान पड़ता है। जैसे ऊषरमें बीज बोनेसे वृथा जाता है ऐसे ही अनधिकारीके साथ बकवाद करनेसे ज्ञानोपदेश व्यथ जाता है। भैंसोंके सामने बीन बजानेकी तरह मूखांसे तंग आये एक सहृदय कवि ने एक समय वरदान माँगते हुए परमात्मासे प्रार्थना की थी कि 'हे प्रभो ! आप मेरे भाग्यमें जो चाहें लिख दें, मुझे सहर्ष स्वीकार होगा, पर एक बात मत लिखना, वह यह कि कभी अरसिक मदान्ध अर्धविद्ग्ध, मूर्खायमाणोंके सामने कुछ सुनाना न पड़े, याने नासमझोंको कथा-श्रोक-कविता आदि कुछ भी सुनानेका मौका न आवे, बस।' इसीलिए शान्तस्वभाव अपने पुत्रों और शिष्योंको उपदेश करना चाहिये। इधर जिसे उपदेश ग्रहण करना हो उसे श्रद्धापूर्वक महात्माका शिष्य बनकर सीखना चाहिये॥ २२ ॥ देवता तथा गुरुकी भक्ति करनेवाले शिष्यकी ही विद्या सफल होती है, अब यह कहते हैं, यथा- यस्य देवे परा भक्तिर्यथा देवे तथा गुरौ। तस्यैते कथिता हयर्थाः प्रकाशन्ते महात्मनः प्रकाशन्ते महात्मन इति ॥ २३ ॥ भावार्थ-परमात्मामें जिसकी अत्यन्त भक्ति है और जैसी परमेश्वरमें है वैसी ही श्रद्धा गुरुमें, उसी महात्माके हृदयमें कहे हुए तत्त्वोंका प्रकाश होता है॥।२३।। वि० वि० भाष्य-जैसे धूपसे तपे हुए मस्तकवाले पुरुषके लिए अलाशय या शीतल छायाके अन्वेषणके सिवाय और कोई उपाय नहीं है, तथा तुधातुरको भोजनके अतिरिक्त और कोई शान्तिका साधन नहीं है, ऐसे ही गुरुकृपाके विना ब्रह्मविद्याका प्राप्त होना कठिन है। यानी जिस मनुष्यकी सविदानन्दरूप परमात्मामें सबसे उत्कृष्ट भक्ति है अर्थात् स्त्री-पुत्र आदिक पदार्थों की अपेक्षा अधिक प्रेम ईश्वरमें ही है, फिर जैसा अति प्रेम इसका ईश्वरमें है वैसा ही परम प्रेम ब्रह्मवित् गुरुमें भी

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मन्त्र २३ वियाविनोद भाष्य ४४५

है, उसी महात्मा पुरुषके हृदयमें ब्रह्मवादी गुरुद्वारा उपदेश किये हुए वेदान्तके तत्त्वार्थ प्रकाश पाते हैं। किसी प्रेमहीनके हृदयमें नहीं। इस मन्त्रमें 'प्रकाशन्ते महात्मनः' इन पदोंकी द्विरुक्ति याने दो बार कहनेका अभिप्राय यह है कि संसारमें मुख्य शिष्य और उसके साधनोंकी दुर्लभता है। अध्याय तथा ग्रन्थकी समाप्ति एवं आदरके लिए यहाँ द्विरुक्ति कही गई है।

इस मन्त्रमें गुरुकी भक्ति परमात्माके समान करनी चाहिये, ऐसा लिखा है। इसमें गुरु शब्दसे ब्रह्मनिष्ठ तथा ब्रह्मश्रोत्रियका ग्रहण किया गया है, किसी संसारी विद्याके गुरुका नहीं। ऐसे गुरुओंकी शिक्षासे ही भारत या जगतका कल्याण होता आया है। हम देशको उन्नत देखना चाहते हैं, वह उन्नत तब होगा जब सुयोभ्य ब्रह्मज्ञानी व्यक्ति तैयार होंगे। योग्यता आत्मिक बलसे आती है, उस आध्यात्मिक बल तथा ओजको देनेवाली ये उपनिषद् या अध्यात्मशास्त्र हैं। प्रकृत उपनिषद्में अखिल विश्वको प्रसुमय दिखाया गया है॥ २३ ॥

ॐ सह नाववतु सह नौ भुनक्तु सह वीर्यं करवावहै। तेजस्वि नावधीतमस्तु मा विद्विषावहै॥ ओं शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!!

श्रीमत्परमहंस परिव्ाजकाचार्य ब्रह्मनिष्ठ लोकसंग्रही गीताव्यास श्री १०८ अगद्गुरु महामण्डलेश्वर स्वामी श्रीविद्यानन्दजी महाराज द्वारा विरचित विद्याविनोद भाष्य सम्पूर्ण।

श्वेताश्वतरोपनिषद समाप।

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30

ॐ नमः सदानन्दाय क

कौषीत कि-उपनिषद्

यह कौषीताक-उपनिषद् ऋग्वेदके शांखायन ब्राह्मणके अन्तर्गत पढ़ी गई है। कुषीतक ऋषिने इसका प्रचार किया, जिससे यह कौपीतकि-उपनिषद् कही जाती है, जो कि इसी नामके आरण्यकका तीसरेसे छठा अध्याय है। अब इसका शान्तिपाठ कहते हैं- ॐ वाङ् मे मनसि प्रतिष्ठिता मनो मे वाचि प्रतिष्ठि- तमाविरावीर्म एधि। वेदस्य म आणीस्थः श्रुर्तं मे मा प्रहासी:। अनेनाधीतेनाहोरात्रान्संदधाम्यृतं वदिष्यामि सत्यं वदिष्यामि। तन्मामवतु तद्वक्तारमवतु। अवतु मामवतु वक्तारमवतु वक्तारम्॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्ति: ॥ भावार्थ-मेरी वागिन्द्रिय मनमें स्थित हो और मन वागीमें स्थित हा। ऐसा न हो कि मेरी वाणी कुछ कहे और मन कुछ और ही सोचे. अर्थात् वाणी और मन एक दूसरेके अनुकूल रहें। तुम मेरे समक्ष आविर्भूत होओ। तुम मेरे लिए वेदको लाओ। मेरा श्रवण किया हुआ सुझे परित्याग न करे। मैं अपने इस अध्य- यनके द्वारा रात दिन एक कर दूँ। अर्थात् हे वाक ! और हे मन ! तुम्हारे द्वारा मैं जिस वेदुज्ञानको प्राप्त करूँ, उसे कभी न भूलँ, प्रत्युत उसके अध्ययनमें रात दिन लगा रहूँ। मैं ऋत भाषण करूँ औौर सत्य बोलूँ, अर्थात् जो मनमें हो उसीको कहूँ। ब्रह्म मेरी रक्षा करे, वह वक्ताकी रक्षा करे। वह मेरी रक्षा करे, और वक्ताकी रक्षा करे-वक्ताकी रज्षा करे। त्रिविध तापकी शान्ति हो॥।

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मन्न्र : ] भावार्थ सहित

प्रथम ऋरध्याय

चित्रो ह वै गार्ग्यायणिर्यक्यमाण आरुणि वव्रे स ह पुत्रं श्वेतकेतुं प्रजिघाय याजयेति सं हासीनं पप्रच्छ गौत- मस्य पुत्रस्ते संवृत लोके यस्मिन्मा घास्यस्यन्यमुताहो बद्धूवा तस्य लोके धास्यसीति। स होवाच नाहमेतद्वेद हन्ताचार्य पृच्छानीति स ह पितरमासाय्य पप्रच्छेतीति माप्राक्षीत्कथं प्रतिव्रवाणीति स होवाचाहमप्येतन्न वेद सदस्येव वयं स्वाध्यायमधीत्य हरामहे यन्नः परे ददत्येह्यु- भौ गमिष्याव इति। स ह समित्पाणिश्चित्रं गार्ग्यार्यणिं प्रतिचक्रम उपायानीति तं होवाच ब्रह्मार्होऽसि गौतम यो मामुपागा एहि त्वा जपयिष्यामीति॥१॥ भावार्थ-गर्गगोत्रोत्पन्न प्रसिद्ध महात्मा चित्रने यज्ञ करनेकी इच्छासे अरुणके पुत्र उद्दालक ऋषिको प्रधान ऋत्विकके रूपमें वरण किया। परंतु उद्दालकने स्वयं न पधारकर अपने पुत्र श्वेतकेतुसे कहा कि वत्स, तुम जाकर चित्रका यज्ञ कराओ। तब श्वेतकेतु यज्ञमें पधारकर एक ऊँचे आसनपर विरा- जमान हुए। आसनपर बैठे देख उनसे चित्रने पूछा-गौतमकुमार, इस लोकमें कोई ऐसा आवरणयुक्त स्थान है, जिसमें मुझे ले जाकर रखोगे ? अथवा कोई उससे भिन्न सर्वथा विलक्षण आवरणशून्य पद है, जिसे जानकर तुम उसी लोकमें मुझे स्थापित करोगे ? श्वेतकेतुने कहा-मैं यह सब नहीं जानता, किंतु यह प्रश्न सुनकर मुझे प्रसन्नता हुई है। मेरे पिता आचार्य हैं-वे शास्त्रके गूढ अर्थका ज्ञान रखकर दूसरे लोगोंको शास्त्रीय आचारमें लगाते और स्वयं भी शास्त्रके अनुकूल ही आचरण करते हैं; अतः उन्हींसे यह बात पूछूँगा। यों कहकर वे अपने पिता आरुणि उद्दालकके पास जाकर बोले-पिताजी, चित्रने इस प्रकारसे मुझसे प्रश्न किया है। सो इसके सम्बन्धमें मैं किस प्रकार उत्तर दूँ? उदालकने कहा-वत्स ! मैं भी इस प्रश्नका उत्तर नहीं जानता। अब

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४४८ [अष्याक १

हम लोग महाभाग चित्रकी यज्ञशालामें ही इस तत्त्वका अध्ययन करके इस विद्याको प्राप्त करेंगे। जब दूसरे लोग हमें विद्या और धन देते हैं तो चित्र भी देगे ही। इसलिए आओ, हम दोनों चित्रके पास चलें। ऐसा विचार कर आरुणि हाथमें समिधा ले जिज्ञासुके वेशमें गर्गगोत्रिय चित्रके यहाँ गये। वहाँ 'मैं विद्या ग्रहण करनेके लिए आया हूँ' इस भावनाको व्यक्त करते हुए चित्रके समीप पहुँचे। उन्हें इस प्रकार आया देख चित्रने कहा-गौतम, आप ब्राह्मणोमें पूजनीय एवं ब्रह्मविद्याके अधिकारी हो; क्योंकि मेरे जैसे लघु व्यक्तिके पास आते समय मनमें अपने बड़प्पनका अभिमान आपको नहीं हुआ है। इसलिए आभो, निश्चय ही इस पूछे हुए विषयका मैं आपको स्पष्ट ज्ञान कराऊँगा ।। १ ।। स होवाच ये वैके चास्माल्वोकात्प्रयन्ति चन्द्रमसमेव ते सर्वे गच्छन्ति तेषां प्राणैः पूर्वपक् आप्यायते। अथापर- पत्ते न प्रजनयत्येतद्वै स्वर्गस्य लोकस्य द्वारं यश्चन्द्रमास्तं यत्प्रत्याह तमतिसृजते य एनं प्रत्याह तमिह वृष्टिभू- त्वा वर्षति स इह कीटो वा पतङ्गो वा शकुनिर्वा शार्दूलो वा सिंहो वा मत्स्यो वा परश्चा वा पुरुषो वाऽन्यो वैतेषु स्था- नेषु प्रत्याजायते यथाकर्म यथाविद्यं तमागतं पृच्छति कोऽसीति सं प्रतिब्रूयाद्विचक्षणादृतवो रेत आभृतं पश्चद- शात्प्रसूतात्पित्र्यावतस्तन्मा पुंसि कर्तर्येरयध्वं पुंसा कर्त्रा मातरि मासिषिक्तः स जायमान उपजायमानो द्वादशत्रयो- दश उपमासो द्वादशत्रयोदशेन पित्रा संतद्विदेहं प्रतितद्विदेहं तन्म ऋतवो मर्त्यव आरभध्वं तेन सत्येन तपसर्तुर- स्म्यार्तवोऽस्मि कोऽसि त्वमस्मीति तमतिसृजते ॥२॥ भावार्थ-अब यजमान चित्रने इस प्रकार उपदेश आरम्भ किया-त्रह्मन्, जो कोई भी अग्निहोत्रादि सत्कर्मोंका अनुष्ठान करनेवाले लोग हैं, वे सब-के-सब ज़ब इस लोकसे प्रयाण करते हैं तो क्रमशः धूम, रात्रि, कृष्णपक्ष और दच्ति-

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मन्त्र २ ] विद्याविनोद भाष्य ४४६

णायन आदिके अभिमानी देवताओोंके अधिकारमें होते हुए अन्ततोगत्वा चन्द्रलोक अर्थात् स्वगमें ही जाते हैं। उनकी इन्द्रियों और प्राणोंसे चन्द्रमा शुक्ञपक्तमें पुष्टिको प्राप्त होते हैं। चन्द्रमा कृष्णपक्षमें उन स्वर्गवासी जीवोंकी तृप्ति करनेमें समर्थ नहीं होता। जो चन्द्रमाके नामसे प्रसिद्ध है, निश्चय ही यह स्वर्गलोकका द्वार है। जो अ.धकारी दैवीसम्पत्तिसे युक्त होनेके कारण उस स्वर्गरूपी चन्द्रमाका प्रत्याख्यान कर देता है अर्थात् 'जहाँ से पुनः नीचे गिरना पड़ता है, ऐसा स्वर्गलोक मुझे नहीं चाहिये' इस प्रकार दृढ़निश्चय करके जो निष्काम धर्मका अनुष्ठान करते हुए चन्द्रलोकको त्याग देता है, उस पुरुषको उसका वह शुभ संकल्प चन्द्रलोकसे भी ऊपर नित्य ब्रह्मलोकमें पहुँचा देता है। परंतु जो स्वर्गीय सुखके प्रति ही आसक होनेके कारण उस चन्द्रलोकको अस्तीकार नहीं करता, उस सकामकर्मी स्वर्गवासीको, उसके पुण्यभोगकी समाप्ति होनेपर, देववर्ग वृष्टिके रूपमें परिणत करके इस लोकमें ही पुनः बरसा देता है। वह वर्षाके रूपमें यहाँ आया हुआ अनुशयी जीव अपनी पूर्व-वासनाके अनुसार कीट अथवा पतङ्ग या पत्ती अथवा व्याघ या सिंह अथवा मछली या साँप बिच्छू अथवा मनुष्य या दूसरा कोई जीव होकर इनके अनुकूल शरीरोंमें अपने कर्म और विद्या-उपासनाके अनु- सार जहाँ-कहीं[उत्पन्न होता है। फिर शरीर धारणानन्तर संसारकी स्वर्ग-नरकरूपा दुर्गातको समझकर जो उससे विरक्त हो जाय और ज्ञानोपदेशके लिए गुरुदेवकी शरणमें आये, उस शिष्यसे दयालु एवं तत्त्वज्ञ गुरु इस प्रकार पूछे-वत्स, तुम कौन हो ? गुरुके इस प्रकार प्रश्न करनेपर शिष्य अपनेको देहादि-संघातरूप मानकर यों उत्तर दे-हे देव, जो पखद्शकलात्मक-शुर्ञ और कृष्णपक्षके हेतुभूत, शदधाद्वारा प्रकट, पितृलोकस्वरूप एवं नाना प्रकारके भोग प्रदान करनेमें समर्थ हैं, उन चन्द्र- माके निकटसे प्रादुरभूत होकर पुरुषरूप अग्निमें स्थापित हुआ जो श्रद्धा, सोम, वृष्टि और अन्नका परिणामभूत वीर्य है, उस वीर्यके ही रूपमें स्थित हुए मुझ अनुशयी जीवको तुमने वीर्याधान करनेवाले पुरुषमें प्रेरित किया वत्पश्ात् गर्भा- धान करनेवाले पिताके द्वारा तुमने मुझे माताके ग्भमें भी स्थापित करवाया। कुछ्र संवत्सरों तक जीवन घारण करनेवाले पिताके साथ मैं एकताको प्राप्त हुआ था। ५७

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8५० कौषीतकि-उपनिषद् [अभ्याय १

मैं स्वयं भी कुछ संवत्सरों तक ही जीवन धारण करनेवाला होकर ब्रह्म- ज्ञान अथवा उसके विपरीत मिथ्याज्ञानके निमित्त योनिविशेषमें शरीर धारण करके स्थित हूँ। इसलिए अब मुझे अमृतत्वकी प्राप्तिके साधनभूत ब्रह्मज्ञानके लिये अनेक वर्षों तक अक्षय रहनेवाली दीर्घ आयु प्रदान करें-ब्रह्मसाक्षारकार- पर्यन्त मेरे दीर्घज्ञीवनके लिये चिरस्थायिनी आयुशी पुष्टि करें। क्योंकि यह जाब- कर मैं देवताओंसे प्रार्थना करता हूँ, अतः उसी सत्यसे, उसी तपस्यासे, जिनका मैं अभी इल्लेख कर आया हूँ, मैं ऋतु हूँ-संवत्सरादिरूप मरणधर्मा मनुष्य हूँ। आर्तब हूँ-ऋतु अर्थात् रज-वीर्यसे उत्पन्न देह हूँ। यदि ऐसी बात नहीं है तो आप ही कृपापूर्वक बतायें, मैं कौन हूँ ? क्या जो आप हैं, वही मैं भी हूँ ?' उसके इस प्रकार कहनेपर संसार-भयसे डरे हुए उस शिष्यको गुरु ब्रह्मविद्याके उपदेश- द्वारा भवसागरसे पार करके बन्धनमुक्त कर देता है॥ २॥ स एवं देवयानं पन्थानमासाद्यामनिलोकमागच्छति स वायुलोकं स वरुणलोकं स आदित्यलोकं स इन्द्रलोकं स प्रजापतिलोकं स ब्रह्मलोकं तस्य ह वा एतस्य ब्रह्मलोक- स्यारो हदो मुहूर्ता येष्टिहा विरजा नदी ल्यो वृक्षः सायुज्यं संस्थानमपराजितमायतनमिन्द्रप्रजापती द्वारगोपौ, विभुं प्रमितं विचन्तणासंध्यमितौजा: पर्यङ्गः प्रिया च मानसी प्रतिरूपा च चाचुषी पुष्पाण्यादायावतौ वैच जगत्यम्वाश्चा- म्वाक्यवाश्चाप्सरसोऽम्बया नय्यस्तमित्थंविदा गच्छति सं ब्रह्माहाभिधावत मम यशसा विरजां वायं नदीं प्रापन्न- वानयं जिगीष्यतीति ॥ ३ ॥ भावार्थ -- वह पर त्रक्मका उपासक पूर्वोक्त देवयान-मार्गपर पहुँचकर पहले अभिलोकमें आता है, फिर वायुलोकमें आता है; वहाँसे वह सूयलोकमें आता है, तदनन्तर वरुणलोकमें आता है; तत्पश्चात् वह इन्द्रलोकसे प्रजापततिलोकमें आता है तथा प्रजापतिलोकसे ब्रह्लोकमें आता है। इस प्रसिद्ध ब्रह्मलोकके

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मन्त्र ३ विद्याविनोद माष्य ४५१

प्रवेश-पथपर पहले 'आर' नामसे प्रसिद्ध एक महान् जलाशय है। यह उस मार्गका विघ्न है, कामक्रोषादि अरियों-शत्रुओं द्वारा निर्मित होनेसे ही उसका नाम 'आर' पड़ा है। उस जलाशयसे आगे मुहूर्ताभिमानी देवता हैं, जो काम-क्रोध आदिकी प्रवृत्ति उत्पन्न करके ब्रह्मलोक्-प्राप्तिके अतुकूल की हुई उपासना और यज्ञ-यागा- दिके पुण्यको नष्ट करनेके कारण 'येष्टिह' कहलाते हैं। उससे आगे विजरा नदी है, जिसके दर्शनमात्रसे जरावस्था दूर हो जाती है। (यह नदी उपासनारूपा ही है।) उससे आगे 'इल्य' नामक वृक्ष है। 'इला' पृथिवीका नाम है, उसका ही स्वरूप होनेसे उसका नाम 'इल्य' है। उससे आगे अनेक देवताओं द्वारा सैव्य- मान उद्यान, बावली, कुएँ, तालाब और नदी आदि भाँति-भाँतिके जलाशयोंसे युक्त एक नगर है, जिसके पक ओर तो विरजा नदी है और दूसरी ओर प्रत्यश्ाके आकारका (अर्द्धचन्द्राकार) एक परकोटा है। उसके आगे ब्रह्माजीका निवासभूत विशाल मन्दिर है, जो 'अपराजित' नामसे प्रसिद्ध है। सूर्यके समान तेजोमय होनेके कारण वह कभी किसीके द्वारा पराजित नहीं होता। मेघ और यज्ञरूपसे उपलत्तित वायु और आकाशरूप इन्द्र और प्रजापति उस ब्रह्म-मन्दिरके द्वाररक्षक हैं। वहाँ 'विभुप्रमित' नामक सभामण्डप है (जो अहङ्कारस्वरूप है)। उसके मध्यभागमें जो वेदी (चबूतरा) है, वह 'विचक्षणा' नामसे प्रसिद्ध है। (बुद्धि और महत्त्व आदि नामोंसे भी उसका प्रतिपादन होता है। वह अत्यन्त बिल क्षण है। जिसके बलका कोई माप नहीं है, वह 'अमितौजाः' प्राण ही ब्रह्माजीका सिंहासन-पलँग है। मानसी प्रकृति उनकी प्रिया है। वह मनकी कारणभूता अथवा मनको आनन्दित करनेवाली होनेसे ही मानसी कहलाती है। उसके आभू- षण भी उसीके स्वरूपभूत हैं। उसकी छायामूर्ति 'चाक्षुषी' नामसे प्रसिद्ध है। वह तैजस नेत्रोंकी प्रकृति होनेके कारण अत्यन्त तेजोमयी है। उसके आभूषणादि भी उसीके समान तेजोमय हैं।

जरायुज, स्वेदज, अण्डज और उद्धिज-इन चतुर्विध प्राणियोंका नाम जगत् है। यह सम्पूर्ण जगत्-जड-चेतन-समुदाय ब्रह्माजीकी वाटिकाके पुष्प तथा उनके धौत एवं उत्तरीयरूप युगल वस्त्र हैं। वहाँकी अप्सराएँ-साधारण युवतियाँ 'अम्बा' और 'आम्बायवी' नामसे प्रसिद्ध हैं। जगज्जननी श्रुतिरूपा होनेसे वे 'अम्बा' कहलाती हैं। तथा 'अम्ब' (अधिक) और अयव (न्यून) भावसे रहित बुद्धिरूपा

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४५० कौषीतकि-उपनिषद् [अभ्याय १

मैं स्वयं भी कुछ संवत्सरों तक ही जीवन धारण करनेवाला होकर ब्रह्म- ज्ञान अथवा उसके विपरीत मिध्याज्ञानके निमित्त योनिविशेषमें शरीर धारण करके स्थित हूँ। इसिए अब मुझे अमृतत्वकी प्राप्तिके साधनभूत ब्रह्मज्ञानके लिये अनेक वर्षों तक अक्षय रहनेवाली दीर्घ आयु प्रदान करें-ब्रह्मसाक्षात्कार- पर्यन्त मेरे दीर्घजीवनके लिये चिरस्थायिनी आयुक्ष पुष्टि करें। क्योंकि यह जान- कर मैं देवताओंसे प्रार्थना करता हूँ, अतः उसी सत्यसे, उसी तपस्यासे, जिनका मैं अभी छल्लेख कर छाया हूँ, मैं ऋतु हूँ-संवत्सरादिरूप मरणधर्मा मनुष्य हूँ। आर्तव हूँ-ऋतु अर्थात् रज-वीर्यसे उत्पन्न देह हूँ। यदि ऐसी बात नहीं है तो आप ही कृपापूर्वक बतायें, मैं कौन हूँ? क्या जो आप हैं, वही मैं भी हूँ ?' उसके इस प्रकार कहनेपर संसार-भयसे डरे हुए उस शिष्यको गुरु ब्रह्मविद्याके उपदेश- द्वारा भवसागरसे पार करके बन्धनमुक्त कर देता है॥२॥ स एवं देवयानं पन्थानमासाद्यागनिलोकमागच्छति स वायुलोकं स वरुणलोकं स आदित्यलोकं स इन्द्रलोकं स प्रजापतिलोकं स ब्रह्मलोकं तस्य ह वा एतस्य ब्रह्मलोक- स्यारो हदो मुहूर्ता येष्टिहा विरजा नदी ल्यो वृक्षः सायुज्यं संस्थानमपराजितमायतनमिन्द्रप्रजापती द्वारगोपौ, विभुं प्रमितं विचन्णासंध्यमितौजा: पर्यङ्गः प्रिया च मानसी प्रतिरूपा च चानतुषी पुष्पाण्यादायावतौ वैच जगत्यम्बाश्चा- म्वाक्यवाश्चाप्सरसोऽम्बया नय्यस्तमित्थंविदा गच्छति-सं ब्रह्माहामिधावत मम यशसा विरजां वार्य नदीं प्रापन्न- वानयं जिगीष्यतीति॥३॥ भावार्थ-वह परब्रह्मका उपासक पूर्वोक्त देवयान-मार्गपर पहुँचकर पहले अभिलोकमें आता है, फिर वायुलोकमें आता है; वहाँसे वह सूयलोकमें आता है, तदनन्तर वरुणलोकमें आता है; तत्पश्चात् वह इन्द्रलोकसे प्रजापतिलोकमें आछा है तथा प्रजापतिलोकसे ब्रहलोकमें आता है। इस प्रसिद्ध ब्रह्मलोकके

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मन्त्र x ] विद्याविनोद भाष्य ४५३

मालाएँ लिए होती हैं। वे उस महात्माको ब्रह्मोचित अलक्कारोंसे अलड्कृत करती हैं। वह ब्रह्मवेत्ता पुरुष ब्रम्माजीके योग्य अलद्कारोंसे अलङ्कृत हो ब्रझ्माजीके स्वरूपको ही प्राप्त कर लेता है। फिर वह 'आर' नामक जलाशयके पास आता है और उसे मनके द्वारा-सङ्कल्पसे ही लाँघ जाता है। उस जलाशय तक पहुँचने पर भी अज्ञानी मनुष्य उसमें डूब जाते हैं। फिर वह ब्रह्मवेत्ता मुहूर्ताभिमानी 'येष्टिह' नामक देवताओंके पास आता है; किंतु वे विन्नकारी देवता उसके पाससे भाग खड़े होते हैं। तत्पश्चात् वह विजरा नदीके तटपर आता है और उसे भी सङ्कल्पसे ही पार कर लेता है। वहाँ वह पुण्य और पापोंको झाड़ देता है।

जो उसके प्रिय कुटुम्बी होते हैं, वे तो उसका पुण्य पाते हैं; और जो उससे द्वेष करनेवाले होते हैं, उन्हें उसका पाप मिलता है। उस विषयमें यह दष्टान्त है। रथसे यात्रा करनेवाला पुरुप रथको दौड़ाता हुआ रथके दोनों चक्कोंको देखता है; उस समय रथचक्रोंका जो भूमिसे संयोग-वियोग होता है, वह उस द्रष्टाको नहीं प्राप्त होता। इसी प्रकार वह ब्रक्मवेत्ता रात और दिनको देखता है, पुण्य और पापको देखता है, तथा अन्य समस्त द्वन्द्वोंको देखता है; द्रष्टा होनेके कारण ही उसका इनसे सम्बन्ध नहीं होता। अतएत यह पुण्य और पापसे रहित होता है। फलतः वह ब्रम्मवेचा ब्रह्मको ही प्राप्त होता है॥४ ॥

स आगच्छतील्यं वृक्षं तं ब्रह्मगन्धः प्रविशति स आगच्छति सालज्यं संस्थानं तं ब्रह्मरसः प्रविशति आग- च्छत्यपराजितमायतनं तं ब्रह्मतेजः प्रविशति स आगच्छ- तीन्द्रप्रजापती द्वारगोपौ तावस्मादपद्रवतः स आगच्छति विभुप्रमितं तं ब्रह्मयशः प्रविशति स आगच्छति विचक्ष- णामासन्दी बृहद्रथन्तरे सामनी पूर्वो पादौ श्यैतनौघसे चापरौ पादौ वैरूपवैराजे शाक्कररैवते तिरश्री सा प्रज्ञा प्रज्ञया हि विपश्यति स आगच्छत्यमितौजसं पर्यङ्कं स प्राणस्तस्य भूतं च भविष्यच्च पूर्वो पादौ श्रीश्चेरा चापरौ

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४५४ कौषीत कि-उपननिपद् [अभ्याय १

बृहद्रथन्तरे अनूच्ये भद्रयज्ञायज्ञीये शीर्षण्ये ऋचश्च सा- मानि च प्राचीनातानानि यजूंषि तिरश्चीनानि सोमांशव उपस्तरणमुद्गीथ उप श्रीः श्रीरुपबर्हणं तस्मिन्ब्रह्मास्ते तमित्थंवित्पादेनैवाग्र आरोहति तं ब्रह्माह कोऽसीति सं प्रतिश्रूयात् ॥५ ॥

भावार्थ-तब वह इल्य वृक्षके पास आता है, उसकी नासिकामें ब्रह्म- गन्धका प्रवेश होता है। वह गन्ध इतनी दिव्य है कि उसके सामने अन्य लोकोंकी सुगन्ध दुर्गन्धवत् प्रतीत होती है। फिर वह सालज्य नगरके समीप आता है; वहाँ उसकी रसनामें उस दिव्यातिदिव्य ब्रह्मरसका अनुभव होता है, जिसका इसे पहले कभी अनुभव नहीं हुआ रहता। फिर वह 'अपराजित' नामक ब्रह्म- मन्दिरके समीप आता है, वहाँ उसमें व्रक्मतेज प्रवेश करता है। तत्पश्चात् वह द्वार-रक्षक इन्द्र और प्रजापतिके पास आाता है; वे उसके सामनेसे मार्ग छोड़- कर हट जाते हैं। तदनन्तर वह 'विभुपमित' नामक सभा-मण्डपमें आता है; वहाँ उसमें ब्रह्मयश प्रवेश करता है। फिर वह 'विचक्षणा' नामक वेदीके पास आता है। 'बृहत्' और 'रथन्तर'-ये दो मास उसके दोनों अगले पाये हैं, और 'श्यैत' एवं 'नौधस' नामक साम उसके दोनों पिछले पाये हैं। 'वैरूप' औौर 'वैराज' नामक साम उसके दृक्िण और उत्तर पार्श्व हैं तथा 'शाककर' और 'रैवत' साम इसके पूर्व एवं पश्चिम पार्श्व है। वह समष्टि-बुद्धिरूपा है। वह ब्रह्मवेचा उस बुद्धिके द्वारा विशेष दृष्टि प्राप्त कर लेता है। फिर वह 'अमितौजाः' नामक पलंग या सिहासनके पास आता है, वह पर्यक्क प्राणस्वरूप है। भूत और भविष्य- ये दोनों काल उसके अगले पाये हैं और श्रीदेवी एवं भूदेवी-ये दोनों उसके पिछले पाये हैं। उसके दक्षिण-उत्तर भागमें जो 'अनूच्य' नामके दी्घ खट्वाङ्ग हैं, वे 'बृहत्' और 'रथन्तर' नामक साम हैं और पूर्व-पश्चिम भागमें जो छोटे खट्बाङ्ग हैं, जिनपर मस्तक और पैर रक्खे जाते हैं, वे 'भद्र' और 'यज्ञायज्ञीय' नामक साम हैं। सिरकी अरका भाग ऊँचा और पैरकी ओरका भाग कुछ् नीचा है। पूर्वसे पश्चिमको जो बड़ी बड़ी पाटियाँ लगी हैं, वे ऋक और सामके प्रतीक हैं। तथा दक्षिपा- उत्तरकी ओर जो आड़ी-तिरछी पाठियाँ हैं, वे यजुर्वेदस्वरूपा हैं। चन्द्रमाकी

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मन्त्र ₹ J विधाविनोद भाष्य ४५५

कोमल किरणें ही उस पलँगका नरम नरम गद्दा हैं। उद्गीथ ही उसपर बिछ्ी हुई उपश्री (श्वेत चादर) है। लद्षमीजी तकिया हैं। ऐसे दिव्य पर्यङ्कपर ब्रद्माजी विराजमान होते हैं। इस तत्त्वको इस प्रकार जाननेवाला ब्रह्मवेत्ता उस पलँगपर पहले पैर रखकर चढ़ना है। तब ब्रह्माजी उससे पूछते हैं-तुम कौन हो ? ॥५॥ ऋतुरस्म्यार्ववोऽस्म्याकाशाद्योने: संभूतो भार्यायें रेतः त्संवत्सरस्य तेजोभूतस्य भूतस्यात्मा भृतस्य त्वमात्मासि यस्त्वमसि सोऽहमस्मीति तमाह कोऽहमस्मीति सत्य- मिति ब्र यारिकं तद्यत्सत्यमिति यदन्यद्देवेभ्यश्च प्रागो- भ्यश्च तत्सदथ यद्देवाश्च प्राणाश्च त्त्त्यं तदेतया वाचाभि- व्याहियते सत्यमित्येतावदिदं सर्वमिदं सर्वमसीत्येवैनं तदाह तदेतच्छूलोकेनाभ्युक्तम् ॥ ६ ॥ भावार्थ-ब्रह्माको इस प्रकार उत्तर दे-मैं वसन्त आदि ऋतुरूप हूँ। ऋतु सम्बन्धी हूँ। कारण भूत अव्याकृत आकाश एवं स्वयंप्रकाश परब्रह्म परमात्मासे उत्पन्न हुआ हूँ। जो भूत (अतीत), भूत (यथार्थ कारण), भूत (जडचेतनमय चतुर्विध सर्ग) और भूत (पश्महाभूततस्वरूप) है, उस संवत्सरका तेज हूँ। आत्मा हूँ। आप आात्मा है, जो भप हैं, वही मैं हूँ। इस प्रकार उत्तर देनेपर ब्रह्माजी पुनः पूछते हैं-मैं कौन हूँ ? इसके उत्तरमे कहे-आप सत्य हैं। 'जो सत्य है, जिसे तुम सत्य कहते हो, वह क्या है ?' ऐखा प्रश्र होने पर उत्तर दे-जो सम्पूर्ण देवताओं तथा प्राणोंसे भी सर्वथा मिन्न-विलक्षण हो, वह 'सत्' है और जो देवता एवं प्राणरूप है, वह 'त्य' है। वाणीके द्वारा जिसे 'सत्य' कहते हैं, वह यही है। इतना ही यह सब कुछ है। आप यह सब कुछ हैं, इसलिए सत्य हैं ।६I। यजूदर: सामशिरा असावृङ््मूर्तिरव्यय। स ब्रह्मेति हि विज्ञेय ऋषिव्रह्ममयो महानिति॥ तमाह केन पौंस्यानि नामान्याप्नोतीति प्रागेनेति ब्रयात्केन स्त्रीनामा-

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४५६ कौपीतकि उपनिपद् [अध्याय १

नीति वाचेति केन नपुंसकानीति मनसेति केन गन्धानिति घ्रागेनेति व्रयात्केन रूपाणीति चक्षुषेति केन शब्दानिति श्रोत्रेरोति केनाव्ररसानिति जिह्वयेति केन कर्मागीति हस्ताभ्यामिति केन सुखदुःखे इति शरीरेरोति केनानन्दं रतिं प्रजातिमित्युपस्थेनेति। केनेत्या इति पादाभ्यामिति केन धियो विज्ञातव्यं कामानिति प्रज्ञयेति प्रब्र यात्तमाहापो वै खलु मे ह्यसावयं ते लोक इति सा या ब्रह्मगि चितिर्या व्यष्टिस्तां चितिं जयति तां व्यष्टि व्यश्रुते य एवं वेद य एवं वेद॥७॥ भावार्थ-यही बात ऋतसम्बन्धी मन्त्रद्वारा भी बतायी गयी है-यजुवद जिसका उदर है, सामवेद मस्तक है तथा ऋग्वेद सम्पृर्ण शरीर है, वह अविनाशी परमात्मा 'ब्रह्मा' के नामसे जानने योग्य है। वह श्रक्मरूप महान ऋषि है। तद्नन्तर पुन ब्रह्माजी उस उपासकसे पूछते हैं-तुम मेरे पुरुषवाचक नामोको किससे प्राप्त करते हो ? वह उत्तर दे-प्राणसे। प्रश्न-स्त्रीवाचक नामोंको किससे ग्रहण करते हो ? उत्तर-ताणीसे। प्रश्न-नपुमकवाचक नामोंको किससे भ्रहण करते हो? उत्तर-मनसे। प्रश्न-गन्धका अनुभव किससे करते हो? उत्तर-प्राणसे-घ्राणेन्द्रियसे। इस प्रकार कहे। प्रश्र-रूपोको त्रहण किससे करते हो? उत्तर-नेत्रसे। प्रश्न-शब्दोको किससे सुनते हो ? उत्तर-कानोंखे। प्रश्र-अन्नके रसोंका आस्वादन किससे करते हो? उत्तर-जिह्वासे। प्रश्न-कमं किससे करते हो ? उत्तर-हाथेोसे। प्रश्न-सुख-दुखोका अनुभव किससै करते हो? उत्तर-शरीरसे। प्रश्न-रतिका परिणामरूप आनन्द, रति (मैथुनका आनन्द) और प्रज्ञोत्पच्तिका सुख किससे उठाते हो? उत्तर-उपस्थ-इन्द्रियसे यो कहे। प्रश्न-गमनकी क्रिया किससे करते हो ? उत्तर-दोनो पैरोसे। प्रश्न-बुद्धि-वृत्ति- योको ज्ञातव्य विषयोको और विविध मनोरथोंको किससे ग्रहण करते हो? उत्तर - प्रब्ञास यों कहे।

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q 网 ₹] विधयाविनोद् भाष्य ४५७

तब ब्रह्मा उससे कहते हैं-जल आदि प्रसिद्ध पाँच महाभूत मेरे स्थान हैं; अतः यह मेरा लोक भी जलादि-तत्त्वप्रधान ही है। तुम मुझसे अभिन्न मेरे उपा- सक हो, अतः यह तुम्हारा भी लोक है। वह जो ब्रम्माजीकी सुप्रसिद्ध विजय नामक-सबपर नियन्त्रण करनेकी शक्ति तथा सर्वत्र व्याप्ति-सर्वव्यापकता है, उस विजयको तथा उस सर्वव्यापकताको भी वह उपासक प्राप्त कर लेता है, जो इस प्रकार जानकर उपासना करता है। अर्थात् ह्माजीकी भाँति ही वह सबका शासक एवं सर्वव्यापक बन जाता है।। ७॥।

द्वितीय अध्याय

प्राणो ब्रह्मेति ह स्माह कौषीतकिस्तस्य ह वा एतस्य प्राणस्य ब्रह्मणो मनो दूतं वाक्परिवेष्ट्री चक्षुगोपृ श्रोत्रं संश्रावयितृ यो ह वा एतस्य प्राणस्य ब्रह्मणो मनो दूतं वेद दूतवान् भवति यश्चनतुर्गोप्त गोपृमान् भवति यः श्रोत्रं संश्रावयितृ संश्रावयितृमान् भवति यो वाचं परिवेष्ट्रीं परिवेष्ट्रीमान् भवति तस्मै वा एतस्मै प्राणाय ब्रह्मणा एताः सर्वा देवता अयाचमानाय बलिं हरन्ति तथो एवास्मै सर्वाणि भूतान्ययाचमानायैव बलिं हरन्ति य एवं वेद सस्योपनिषन्न याचेदिति। तद्यथा ग्रामं भिक्षिला लब्धो- पविशेन्नाहमतो दत्तमश्नीयामिति य एवैंनं पुरस्तात्प्रत्या- चक्षीरंस्त एवैनमुपमन्त्रयन्ते ददाम त इत्येष धर्मो याच- तो भवत्यन्यतस्त्वेवैनमुपमन्त्रयन्ते ददाम त इति ॥१॥ भावार्थ-प्रसिद्ध ऋषि कौषीतकि कहते हैं कि 'प्राण ब्रह्म' है। उस प्रसिंद्ध ५८

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४५८ कौषीत कि-उपनिषद् [अध्याय २

प्राणमय ब्रह्मकी यहाँ राजाके रूपमें कल्पना की गयी है। उसका मन ही दूत है, वाणी परोसनेवाली रानी है, चन्षु संरक्षक मन्त्री है, श्रन्रेन्द्रिय संदेश सुनानेवाला द्वार- पाल है। उस सुप्रसिद्ध प्राणमय ब्रह्मको बिना माँगे ही ये सम्पूर्ण इन्द्रियाभिमानी देवता भेंट समर्पित करते हैं, उसके अधीन हाकर रहते हैं। इसी प्रकार जो इस प्रकार जानता है, उसको भी सम्पूर्ण चराचर प्राणी बिना माँगे भेंट देते हैं। उस प्राणोपासकके लिए यह गूढ़ व्रत है कि वह किसीसे कुछ भी न माँगे। ठीक उसी तरह, जैसे कोई भिक्षु गाँवमें भीख मॉगनेपर भी जब कुछ नहीं पाता तो हताश होकर बैठ रहता और कुपित होकर यह प्रतिज्ञा कर लेता है कि अबसे इस गाँववाले लोगोंके देनेपर भी यहॉका अन्न नहीं खाऊँगा। तात्पर्य यह कि वह भिन्ु जिस दृढ़तासे अपनी बातपर डटा रहता है. उसी प्रकार उसको भी अपने व्रतपर अटल रहना चाहिये। जो लोग पहले इस पुरुपको कुछ देनेसे अस्वीकार कर चुके होते हैं, वे ही कुछ न माँगनेका निश्रय कर लेनेपर इसे देनेके लिए निमन्त्रिन करते हैं और कहते हैं कि आओ, इम तुम्हें देते हैं। दीनतापूर्वक दूसरोंके सामने प्रार्थना करना-यह याचकका धर्म होता है। अर्थात् याचना करनेवालेको ही दैन्य-प्रदर्शन करना पड़ता है। याचना और दैन्य-प्रदर्शनसे दूर रहनेपर ही उसे लोग यों निमन्त्रण देते हैं कि आओ, हम तुम्हें देंगे॥ १ ॥ प्राणो ब्रह्मेति ह स्माह पैङ्ग्यस्तस्य ह वा एतस्य प्राएास्य ब्रह्मणो वाकू परस्ताच्चचुरारुन्धे चक्तुः परस्ताच्छो त्रमारुन्धे श्रोत्रं परस्तान्मन आरुन्धे मनः परस्तात्प्राण आरुन्धे तस्मै वा एतस्मै प्राणाय ब्रह्मण एताः सर्वा देवता अयाचमानाय बलिं हरन्ति तथो एवास्मै सर्वाणि भूतान्ययाचमानायैव बलिं हरन्ति य एवं वेद तस्योपनि- षन्न याचेदिति तदथा ग्रामं भित्तित्वा लब्धोपविशेन्ना- हमतो दत्तमश्नीयामिति य एवैनं पुरस्तात्प्रत्याचचीरंस्त एवैनमुपमनायन्ते ददाम त इत्येष धर्मो याचतो भवत्यन्यतस्त्वेवैनमुपमन्त्रयन्ते ददाम त इति ॥ २ ॥

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मन्त्र ३] विद्याविनोद भाष्य

भावार्थ-प्रसिद्ध महात्मा पैङ्गय भी यही कहते हैं कि प्राण ब्रह्म है। उस प्रसिद्ध प्राणायाम ब्रह्मके लिए वाणीसे परे चक्षु-इन्द्रिय है, जो वागिन्द्रयको सब ओरसे व्याप्त करके स्थित है। अतः चक्षु वागिन्द्रियकी अपेक्षा आन्तरिक है; क्योंकि जैसा कहा गया हो, वैसा ही नेत्रसे भी देख लिया जाय तो विवादकी सम्भावना नहीं रहती-वह वस्तु यथार्थ समझ ली जाती है। चन्षुसे परे श्रवणोन्द्रिय है, जो चक्षुको सब ओरसे व्याप्त करके स्थित है। क्योंकि चन्तुसे कहीं कहीं भ्रान्त-दर्शन भी हेता है, जैसे सीपमें चाँदीका दर्शन। परन्तु कानसे विधमान अथवा प्रस्तुन वचनका ही श्रवण होता है। श्रवणेन्द्रियसे परे मन है, जो श्रवणेन्द्रियको सब ओरसे व्याप्त करके स्थित है; क्योंकि मनके सावधान रहनेपर ही श्रवणे न्द्रय सुन पाती है। मनखे परे प्राण है, जो मनको सब ओरसे व्याप्त करके स्थित है। प्राण ही मनको बाँध रखनेवाला है-यह बात प्रसिद्ध है। प्राण न रहे तो मन भी नहीं रह सकता; अतः सबकी अपेक्षा पर एवं आन्वरिक आत्मा होनेके कारण प्राणका ब्रह्म होना उचित ही है। उस प्राणमय ब्रह्मको ये सम्पूर्ण देवता उसके न माँगनेपर भी उपहार समर्पित करते हैं। इसी प्रकार जो यों जानता है, उस उपालकको भी सम्पूर्ण प्राणी बिना माँगे ही भाँति-भाँतिके उपहार भेंट करते हैं। उसका यह गूढ़ व्रत है कि वह किसीसे याचना न करे। इस विपयमें यह टष्टान्त भी है-कोई भिन्षु गाँवमें भीख माँगनेपर भी जब कुछ नहीं पाता तो हताश होकर बैठ रहता और यह प्रतिज्ञा कर लेता है कि अब यहाँ किसीके देनेपर भी अन्न ग्रहण नहीं करूँगा। ऐसी प्रतिज्ञा कर लेनेपर जो लोग पहले उसे कुछ देनेसे अस्वीकार कर चुके होते हैं, वे ही उसे यों कहकर निमन्त्रित करते हैं कि आओ, हम तुम्हें देते हैं॥२।। अथात एकधनावरोधनं यदेकधनमभिध्यायात् पौर्ण- मारयां वाऽमावास्यायां वा शुद्धपच्ते वा पुण्ये नक्षत्रेऽभि- सुपसमाधाय परिसमुहय परिस्तीर्य पर्युद्योत्पूय पूर्वदक्षिणं जान्वाच्य स्त्रुवेण वा चमसेन वा कंसेन वैता आज्याहुती- र्जुहोति। वाङ्नामदेवतावरोधिनी सा मेडमुष्मादिदमव रुन्धां तस्यै स्वाहा प्राणो नाम देवतावरोधिनी सा मेऽमु- षमादिदमवरुन्धां तस्यै स्वाहा। चचतुर्नाम देवतावरोधिनी

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४६० कौपीतकि-उपनिषद् [अध्याय २

सा मेSमुष्मादिदमवरुन्धां तस्यै स्वाहा। श्रोत्रं नाम देव तावरोधिनी सा मेडमुष्मादिदमवरुन्धां तस्ये स्वाहा । मनो नाम देवतावरोधिनी सा मेSमुष्मादिदमवरुन्धां तस्यै स्त्राहा। प्रज्ञा नाम देवतावरोधिनी सा मेSमुष्मादिदमव रुन्धां तस्यै स्वाहेत्यथ धूमगन्धं प्रजिघायाज्यलेपेनाङ्गान्य- नुविमृज्य वाचंयमोऽभिप्रव्ज्यार्थ ब्रुवीत दूतं वा प्रहिणुया- ल्लभते हैव । ३ ॥ भावार्थ-प्राणोपासकको धन प्राप्तिकी इच्छा हानेपर उसके लिए कर्तव्यका उपदेश करते हैं-अब एकमात्र धन प्राणके निरोधकी बात बतापी जाती है। यदि एकमात्र घन अथवा प्राणका चिन्तन करे तो पूर्णिमाको या अमावस्याको अथवा शुक्क या कृष्णपक्षकी किसी भी पुण्य तिथिको पवित्र नक्षत्रमें अमिकी स्थापना, वेदीका परिसमूहन सं्कार, कुशोंका आस्तरण, मन्त्रपूत जलसे वेदी आदिका अभिपेक तथा अग्निपर रखे हुए पात्रस्थ घृतका शोधन करके दाहिना घुटना पृथ्वीपर टेककर स्रुवासे, चमससे अथवा काँसेकी करछी आदिसे निम्नाङ्कित मन्त्रोंद्वारा घुनकी ये आहुतियाँ दे- वाङ नाम देवतावरोघिनी सा मेडमुष्मात् ( ...... ) इदम् अवरुन्धां तस्यै स्वादा। अर्थात् वाक् नामसे प्रसिद्ध देवी अवरोधिनी उपासककी अभीष्टसिद्धि करने- वाली है, वह मुझ प्राणोपासकके लिए अमुक व्यक्तिसे इस अमीष्ट अर्थकी सिद्धि कराये। उसके लिए यह घृनकी आहुति सादर समर्पित है। उपर्युक्त मन्त्रका उच्चारण करके 'अमुष्मात्' के आगे दिये हुए कोष्ठकमें उस वंयक्तिके नामका उल्लेख करे, जिससे अभीष्ट अर्थ प्राप्त करना है। तथा 'इदम्' के स्थानपर अभीष्ट अर्थका उच्चारण करे। आगेके मन्त्रोंका अर्थ भी इसी प्रकार समझना चाहिये। माशगो नाम देवतावरोघिनी सा मेऽमुष्पात् इदम् अवरुन्धां तस्यै स्वाहा। चशुनाम देकतावसेधिनी सा मेऽमुष्मात् इदम् अवरुन्धां तस्पै स्वाहा ।

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मन्ब् ४ ] विद्याविनोद भाष्य ४६१

श्रोतं नाम देवतावरोघिनी सा मेडसुष्पात इदम् अवरुन्धां तस्यै स्वाहा। मनो नाम देवतावरोधिनी सा मेडुष्मात् इदम् अवरुन्धां तस्ये स्वाहा। प्रज्ञा नाम देवतावरोधिनी सा मेडमुष्मात् इदम् अवरुन्धां तस्यै स्वाहा। इस प्रकार आहुतियाँ देनके पश्चात् धूमगन्वको सूँघकर होमावशिष्ट धृतके लेपसे अपने अङ्गोंका अनुमार्जन करके मौनभावसे धनस्वामीके पास जाय और अभीष्ट अर्थके विषयमें कहे कि इतने धनकी मुझे आवश्यकता है, सो आपके यहाँसे मिल जाना चाहिये। अथवा यदि धनस्वामी दूर हो तो उक्त संदेश कहलानेके लिए उसके पास दूत भेज दे। यों करनेसे निश्चय ही वह अभीष्ट धन प्राप्त कर लेता है॥ ३ ॥ अथातो दैवः स्मरो यस्य प्रियो बुभूषेद्यस्यै वा एषां

हुतीर्जुहोति वाचं ते मयि जुहोम्यसौ स्वाहा प्राणं ते मयि जुहोम्यसौ स्वाहा चक्षुस्ते मयि जुहोम्यसौ स्वाहा श्रोत्रं ते मयि जुहोम्यसौ स्वाहा मनसते मयि जुहोम्यसौ स्वाहा प्रज्ञानं ते मयि जुहोम्यसौ स्वाहेत्यथ धूमगन्धं प्रजिघायाज्य- लेपेनाङ्गान्यनुविमृज्य वाचंयमोऽभिप्रवृज्य संस्पर्श जिग- मिषेदपि वाताद्वा संभाषमाणस्तिष्ठेत्प्रियो हैव भवति स्मरन्ति हैवास्य ॥४॥ भावार्थ-इस प्रकार धन-प्राप्तिका उपाय बताकर अब उपासकके लिए वशीकरणका उपाय बतलाते हैं-अब इसके बाद वाक आदि देवताओं द्वारा साध्य मनोरथकी सिद्धिका प्रकार बताया जाता है। जिस किसीका प्रिय होना चाहे, निश्चय ही उन सबका प्रिय होनेके लिए पहले प्राणोपासकको वाक आदि देवताओंका ही प्रिय बनना चाहिये। किसी एक पर्वके दिन पूर्वोक्त रीतिसे शुभ पुण्पतथि एवं मुहूतमें पहले वताये अनुसार ही अगिकी स्थापना, परिसमूहन, कुशोंका आस्तरप, अग्निवेदी आदिका अभिपेक, घृतका उत्पवन आदि करके निम्नाद्गित मन्त्रोंसे ये इृसकी आहुतियाँ दे-

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४६२ कौषीतकि-उपनिषद् [भध्थार्य

वाचं ते मयि जुहोम्यसौ स्वाहा। मैं तुम्हारी वाक-इन्द्रियका अपनेमें हवन करता हूँ मेरा अमुरु कार्य सिद्ध हो जाय। इस उद्देश्यसे यह आहुति है। इसी प्रकार अन्य मन्त्रोंका भी अर्थ समझना चाहिये। इस मन्त्रका उश्चारण करनेके पहले उस व्यक्तिका नाम लेना चाहिये, जिसको वशमें करना हो; यथा-"अमुरुगोत्रस्य अमुकनामधेयास्य राज्ः, अमुरुगोत्राया अमुकनामधेयाया राइया वा वाचं ते मयि जुहोमि असौ स्वाहा।" यों कहकर घृतकी आहुति डालनी चाहिये। 'असौ' के बाद कार्यका उल्लेख करना आवश्यक है, यथा- 'असौ कामः सिद्धयतु स्वाहा।'

प्राणं ते मयि जुहोम्यतौ स्वाहा। चक्षुस्ते मयि जुहोम्यसौ स्वाहा। श्रोत्र ते मयि जुहोभ्यसौ स्वाहा। मनस्ते मयि जुहोम्यसौ स्व्राहा। पज्ञानं ते मयि जुहोम्यसौ स्वाहा। इसके बाद होम-धूमकी गन्ध सॅघकर होमावशिष्ट घृनके लेपसे अपने अङ्गोंका अनुमार्जन करके मौनभावसे अभीष्ट व्यक्तिके पास गमन करे और उसके संप्कमें जानेकी इच्छा करे। अथवा ऐसी जगह खड़ा रहकर वार्तालाप करे, जहाँ वायुकी सहायतासे उसके शब्द अभीष्ट व्यक्तिके कानोंमें पड़ें। फिर तो निश्रय ही वह उसका प्रिय हो जाता है। इतना ही नहीं, उस स्थानसे हट जानेपर वहाँके लोग उसका सदा स्मरण करते हैं॥। ४ ॥ अथातः सायमन्नं प्रातर्दनमान्तरमग्निहोत्रमिति चाच- क्षते यावद्वै पुरुषो भाषते न तावत्प्राणितुं शक्रोति प्राणं तदा वाचि जुहोति यावद्वै पुरुषः प्राणिति न तावद्भाषितुं शक्कोति वाचं तदा प्राणे जुहोति। एते अनन्ते अमृता- हुती जाग्च्च स्वपंश्च संततमव्यवच्छिन्नं जुहोत्यथ या

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मन्त् x-8] विद्याविनोद् भाष्य ४६३

अन्या आहुतयोऽन्तवत्यस्ता: कर्ममय्यो भवन्त्येतद्ध वै पूर्व विद्वांसोडनिहोत्रं न जुहुवाश्चकुः॥५॥ भावार्थ-अब इसके बाद दिवोदासक पुत्र प्रतर्दन द्वारा अनुष्ठित, अतएव 'प्रातर्दन' नामसे विख्यात और संयमसे पूर्ण होनेसे 'सांयमन' कहलानेवाले आध्या- त्मिक अग्निहोत्रका वर्णन करते हैं। निश्चय ही मनुष्य जबतक कोई वाक्य बोलता है, तबतक पूर्णतया श्वास नहीं ले सकता। उस समय वह प्राणका वाणीरूप अग्निमें हवन कर देता है। जबतक पुरुष श्वास खींचता है, तबतक बोल नहीं सकता; उस समय वह वाणीका प्राणरूप अग्निमें हवन कर देता है। ये वाक और प्राणरूप दो आहुतियाँ अनन्त एवं अमृत हैं। वाक और प्राणके व्यापारोंका जीवनमें कभी अन्त नहीं होता, इस लिए ये अनन्त हैं। तथा इनके व्यापारोंका जो एक-दूसरेमें ळय होता है, उसमें अग्निहोत्र-बुद्धि हो जानेसे ये आहुतियाँ अमृतत्वरूप फलको देनेवाली होती हैं, इसलिए इन्हें 'अमृत' कहा गया है। जाग्रत् और स्वप्रकालमें भी पुरुप सदा अविफिद्धन्रूपसे इन आह्गुतियोंका होम करता रहता है। इसके सित्रा अर्थान् वाक प्राणरूपा आहुति योंके अतिरिक् जो दूसरी द्रव्यमयी आहुतियाँ हैं, वे कर्ममयी हैं, स्वरूपसे और फलकी दृष्टिसे भी कृत्रिम हैं; वे पूर्वोक्त आहुतियोंकी भाँति अनन्त एवं अमृत नहीं हैं। यह प्रसिद्ध है कि इस रहस्यको जाननेवाले पूर्ववर्ती विद्वान् केवल कर्ममय अग्निहोत्र का अनुष्ठान नहीं करते थे । ५ ॥ उक्थं ब्रह्मेति ह स्माह शुष्कभृङ्गारस्तदृगित्युपासीत सर्वाणि हास्मै भृतानि श्रैष्ठ्यायाभ्यर्चन्ते तद्यजुरित्युपा- सीत सर्वाणि हास्मे भूतानि श्रैष्ठ्याय युज्यन्ते तत्सामे- त्युपासीत सर्वाणि हास्मे भूतानि श्रैष्ठ्याय सन्नमन्ते तच्छीरित्युपासीत तद्यश इत्युपासीत तच्तेज इत्युपासीत। तथ्थैतच्छास्त्राणां श्रीमत्तमं यशस्वितमं तेजस्वितमं भवति तथो एवैंवं विद्वान सर्वेषां भूतानां श्रीमत्तमो यशस्वितम- स्तेजस्वितमो भवति। तमेतमैष्टकं कर्ममयमात्मानमध्वर्युः

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४६४ कोपीतकि-उपनिषद् [अध्याय २

संस्करोति तस्मिन्यजुर्मयं प्रवयति यजुर्मरयं ऋङमयं होता ऋङूमयं साममयमुदगाता स एष सर्वस्यै त्रयीविद्याया आत्मैष उ एवास्यात्मैतदात्मा भवति य एवं वेद ॥ ६ ॥ भावार्थ-उक्थ (प्राण) ब्रह्म है-यह बात सुनसिद्ध महात्मा शुष्कभृङ्गार कहते हैं। वह उक्थ 'ऋक है' इस बुद्धिसे छपासना करे। जो प्राणरूप उक्थमें ऋग्बुद्धि कर लेता है, उसकी सम्पूर्ण प्राणी श्रेष्ठ बननेके लिए अर्चना करते हैं। वह उक्थ 'यजुवद' है इस बुद्धिसे उपासना करे। इससे सम्पूर्ण प्राणी श्रेष्ठताके लिए उसके साथ सहयोग करते हैं। वह उक्थ 'साम है' इस बुद्धिसे उपासना करे। उस उपारुकके समक्ष सम्पूर्ण प्राणी श्रेष्ठताके लिए मस्तक भुकाते हैं। वह उक्थ 'श्री है' इस बुद्धिसे उपासना करे। वह 'यश है' इस भावसे उपासना करे। वह 'तेज है' इस भावनासे उपासना करे। इस विषयमें यह दष्टान्त है-जैसे यह दिव्य धनुष सम्पूर्ण आयुधोंमें अत्यन्त श्रीसम्पन्न, परम यशस्वी और परम तेजस्त्री होता है, उसी प्रकार जो इस प्रकार जानता है वह विद्वान् सम्पूर्ण भूतोंमें सबसे अधिक श्रीसम्पन्न, परम यशस्व्री तथा परम तेजस्वी होता है। जो यहाँ ईंटोंकी बनी हुई वेदी अथवा कुण्डमें स्थापित किया गया है, वह यज्ञकमका साधनभूत अग्नि भी प्राणस्वरूप ही है, क्योंकि प्राण ही ऋग्वेदादिरूप है। यह प्राण ही ऋग्वेदादिसाध्य कर्मोंका निष्यादक तथा मुझ अध्वयुका भी स्वरूप है। इसलिए ऋग्वेदादिस्त्ररूप सर्वात्मा प्राण मैं हूँ, यह अग्नि भी मेरा ही स्वरूप है-इस बुद्धिसे अध्वर्यु अपना संस्कार करता है। इसी अभिप्रायसे कहते हैं- इस प्राणको तथा ईंटोंकी वेदीपर सश्वित कर्ममय अभिको भी अभिन्न एवं आत्मस्वरूप मानकर अध्वर्यु नामक ऋत्विक अपना संस्कार करता है। उस प्रागमें ही वह यजुर्वदसाध्य कर्मोंका बिस्तार करता है। यजुर्वेदसाथ्य कर्म-वितानेमें होता ऋग्वेदसाध्य कर्मोंका विस्तार करता है। ऋग्वेदसाध्य कर्म-वितानमें उढ्ढाता सामवेदसाध्य कर्मोंका विस्तार करता है। वह अध्वर्युरूप यह प्राण समपूर्ण त्रयी- विद्याका आत्मा है। यह प्रत्यक्षगोचर प्राण ही इस त्रयी-विद्याका आत्मा बताया गया है। जो इस प्राणको इस रूपमें जानता है, वह भी प्राणरूप हो जाता है।। ६।। अथातः सर्वजितः कौषीतकेस्त्रीण्युपासनानि भवन्ति यज्ञोपबीतं कररवाडप आचम्य त्रिरुदपात्रं प्रसिच्योग्यन्तमा-

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मन्त्र ७-८ ] विद्याविनोद भाष्य ४६५

दित्यमुपतिष्टेत वर्गोऽसि पाप्मानं मे वृद्धीत्येतयैवावृता मध्ये सन्तमुद्वर्गोऽसि पाप्मानं मे उद्दद्धीत्येतयैवावृताऽस्तं यन्तं संवर्गोSसि पाप्मानं मे संवृद्धीति। यदहोरात्राभ्यां पापं करोति संतद्वङ्क्ते।। ७।। भावार्थ-अब सर्वविजयी कौपीतकिके द्वारा अनुभवमें लायी हुई तीन बार की जानेवाली उपासना बतायी जाती है। यज्ञोपवीतको सव्यभावसे-बायें कन्धेपर रखकर, आचमन करके जलपात्रको तीन बार शुद्ध-स्वच्छ जलसे पूर्णतः भरकर उदयकालमें भगवान् सूर्यका उपस्थान करे, उनकी आराधनाके लिए खड़ा होकर अर्ध्य दे। अर्व्य देते समय इस मन्त्रका उच्चारण करे-'वर्गोऽसि पाप्मानं मे वृङधि।' (आत्मज्ञान होनेके कारण सम्पूर्ण जगत्को आप तृणकी भाँति त्याग देते हैं, इसलिए 'वर्ग' कहलाते हैं; मेरे पापको मुझसे दूर कीजिये) इसी प्रकार मध्याह्न कालमें भी भगवान् सूर्यका उपस्थान करे। उस समय इस मन्त्रका उच्चारण करना चाहिये-उद्वर्गोडसि पाप्मानं मे उद्वृङधि ।' फिर इसी प्रकार सायंकालमें अस्त होते हुए भगवान् सूर्यका निम्नाङ्कित मन्त्रसे उपस्थान करे-'संवर्गोऽसि पापमानं मे संवृङधि ।' इस उपासनाका फल यह है कि मनुष्य दिन और रातमें जो पाप करता है, उसका पूर्णतः परित्याग कर देता है॥। ७॥ अथ मासि मास्यमावास्यायां पश्चाच्चन्द्रमसं दृश्य- मानमुपतिष्ठेतैतयैवावृता हरिततृणाभ्यां वाक् प्रत्यस्यति यत्ते सुसीमं हृदयमधिचन्द्रमसि श्रितम्॥ तेनामृतत्वस्ये- शानं माऽहं पौत्रमघं रुदमिति न हास्मात्पूर्वाः प्रजाः प्रयन्तीति न जातपुत्रस्याथाजातपुत्रस्याप्यायस्व समेतु ते सं ते पयांसि समु यन्तु वाजा यमादित्या अंशुमाप्याययन्ती- त्येतास्तिस्र ऋचो जपित्वा नाडस्मार्क प्रारोन प्रजया पशु- भिराप्याययिष्ठा योऽस्मान्द्वेष्टि यं च वयं द्विष्मस्तस्य प्राणोन ५६

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४६६ कौधीतकि-उपनिषद् [मश्याय

प्रजया पशुभिराप्याययस्वेति दैवीमावृत्तमावर्त आदित्य स्यावृतमन्वावर्तय इति दक्षिणं बाहुमन्वावर्तते॥८॥ भावार्थ-अबर दूमरी उपासना बतायी जाती है। प्रत्येक मासकी अमावास्या तिथिको, जब सूर्यके पश्चिमभागमें उनकी सुषुम्गा नामक किरणमें चन्द्रमा स्थित दिखाई देते हैं, लौकिक नेत्रोंखे न दिखाया देनेपर भी शाख्त्नः देखे जाते हैं, उस समय उनका पूर्वोक्त प्रकारसे ही उपस्थान करे। विशेषता इतनी ही है कि अ्व्यपा- त्र में दो हरी दूबके अक्कुर भी रख ले और उससे अर्ध्य देते हुए, चन्द्रमाके प्रति 'यच्ते' इत्यादि मन्त्ररूपा वाणीका प्रयोग करे। वह मन्त्र इस प्रकार है- यत्ते सुसीमं हृदयमधि चन्द्रमसि श्रितं तेनामृतत्वस्येशानं माहं पौत्रमघं रुदम्। हे सोममण्डलकी अधिष्ठात्री देवि, जिसकी सीमा बद्ुत हो सुन्दर है, ऐसा जो तुम्हारा हृदय-हृद्यस्थित आनन्दमय स्वरूप चन्द्रमण्डलमें विराजित है, उसके द्वारा तुम परमानन्दमय मोक्ष पर भी अधिकार रखती हो। ऐसी कृपा करो, जिससे मुझे पुत्रके शोकसे न रोना पड़े। पुत्रका पहलेसे ही अभाव होना, पुत्रका पैदा होकर मर जाना या रुग्ण रहना अथवा पुत्रका कुपुत्र हो जाना आदिके कारण ओ घोर दुःख होता है, यही पुत्र-शोक है; इन सबसे छूटनेके लिए इस मन्त्रमें प्रार्थना की गयी है। यों करनेवाले उपासकको यदि पुत्र प्राप्त हो चुका हो तो उसके उस पुत्रकी उससे पहले मृत्यु नहीं होती। यदि उसके कोई पुत्र न हुआ हो तो वह भी पहलेकी ही भाँति सब कार्य करके अ्ध्यपात्रमें दो हरी दूबके अड्कुर भी रख ले और निम्नाङ्कित ऋचाओंका अप करे- भाप्यायस्व समेढु ते विश्वतः सोम वृष्ण्यं भवा बाजस्य संगये ॥।१।। हे स्रीरूप सोम ! तुम पुरुषरूप सूर्यके तेजसे वृद्धिको प्राप्त हाओो। पुरुषकी उत्पत्तिका हेतुभूत जो अभिसम्बन्धी तेज है, वह तुममें स्थापित हो। तुम अन्न आदि ओषधियोंके भी स्वामी हो, अतः सब ओरसे अन्नकी प्राप्तिमें निमित्त बनो। सं से फ्यासि समु यन्तु वाजा संवृष्ण्यान्यभिमाविषाह्यः। आप्यायमानो अमृताय सोम दिवि श्रवांस्युक्तमानि घिम्ब ॥२॥

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मन्त् ह ] विद्याविनोद माध्य ४६७

हे सोम! तुम सोममयी प्रकति हो; तुम्हारा उत्तम दुग्ध अथवा जल जो माताके स्तनोंमें दुग्वरूपसे, चन्द्रमण्डलमें सोमरस अथवा सुघारूपसे तथा मेघम- ण्डलमें स्वादिष्ट जलके रूपमे स्थित है, पुरुपमात्रके लिए अत्यन्त उपकारक है तथा उसका सेवन करनेवाले पुरुषोंको पुष्टि प्रदान करके उनके शत्रुओंका पराभव करानेमें भी समर्थ है। वे दुग्ब और जल अन्नसे जीवन-निर्वाह करनेवाले-निरामिषभोजी जीवोंको सुगमतापूर्वक प्राप्त होने रहें। आग्नेय तेजसे आह्वादको प्राप्त होते हुए तुम अमृतत्वकी प्राप्तिमें सहायक बनो और स्वर्गलोकमें उत्तम यशको धारण करो। यमादित्या अंशुमाप्याययन्ति यमचितमचिवयः पिबन्ति। तेन नो राजा वरुणो बृहस्पतिराप्याययन्तु सुवनस्य गोपा:॥ ३' द्वादश आदित्यरूप पुरुष जिस स्त्री-प्रकृतिमय अमृतांशु सोमका अपने तेजसे आह्वाद प्रदान करते हैं तथा स्वयं अत्षीण रहकर कभी क्षीण न होनेवाले जिस सोमका दुग्ध और जलके रूपमें पान करते हैं, उस सोममय अंशुसे, त्रिमुवनकी रक्षा करनेवाले राजा वरुग और बृहस्पति हमलोगोंको आनन्द एवं पुष्टि प्रदान करें। इन तीन ऋचाओंका जप करनेके पश्चात् चन्द्रमाके सम्मुख दाहिना हाथ उठाये और निम्नाङ्कित मन्त्रका पाठ करे- मास्माकं प्राणेन मजया पशुभिराप्याययिष्ठा योऽस्मान द्वेष्टि यं च चयं द्विष्मस्तस्य माणेन प्रजया पशुभिराप्याययस्व इति दैवीमाळृतमा- वर्त आदित्यस्याव्ृतमन्वावर्ते इति ।।४।। हे सोम तुम हमारे प्राण, संतान और पशुओंसे अपनी पुष्टि एवं तृप्ति न करो; अपितु जो हमसे द्वेष रखता है, अतएव हम भी जिससे द्वेष रखते हैं, उसके प्राणसे, संतानसे और पशुओंसे अपनी पुष्टि एवं तृप्ति करो। इस प्रकार इस मन्त्रके अर्थभूत देवतासे सम्पादित होनेवाली संचरण-क्रियाका मैं अनुवर्तन करता हूँ- उसीका चलाया हुआ चलता हूँ। अग्नीपोमात्मक सोम, मैं तुम्हारी ही गतिक। अनुसरण करता हूँ। यों कहकर अपनी दाहिनी बाँहका अन्वावर्तन करे यानी बारंवार घुमाये। सत्पश्चात् बाँह खींच ले ॥। ८ ।। अथ पौर्णमास्यां पुरस्ताच्चन्द्रमसं दृश्यमानमुपतिष्ठे- तैलयेवावृसा सोमो राजासि विचक्षण: पश्चमुखोऽसि प्रज्ञा

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४६८ कौपीत कि-उपनिषद् [अध्याय २

पतिर्ब्राह्मशस्त एकं मुखं तेन मुखेन राज्ञोऽत्सि तेन मुखेन मामन्नादं कुरु॥ राजा त एकं मुखं तेन मुखेन तेजो विशोऽत्सि तेन मुखेन मामन्नादं कुरु॥ श्येनस्त एकं मुखं तेन मुखेन पच्िणोडत्सि तेन मुखेन मामन्नादं कुरु॥ अभ्नि- स्त एक मुखं तेन मुखेनेमं लोकमत्सि तेन मुखेन मामन्नादं कुरु॥ सर्वाणि भूतानीत्येव पश्चमं मुखं तेन मुखेन सर्वाणि भूतान्यतिसि तेन मुखेन मामन्नादं कुरु॥ माडस्माकं प्राऐोन प्रजया पशुभिरवच्तेष्टा योऽस्मान्द्वेष्टि यं च वयं द्विष्म- स्तस्य प्रारोन प्रजया पशुभिरवत्तीयस्वेति स्थितिदैवीमा- वृतमावर्त आदित्यस्यावृत्तमन्त्ावर्तन्त इति दक्षिणं बाहुमन्वावर्तते॥ ६॥ भावार्थ-अब अन्य प्रकारकी उपासना बतायी जाती है-पूर्णिमाको सायं- कालमें जब प्राची दिशाके अङ्कमें चन्द्रदेवका दर्शन होने लगे, उस समय इसी रीतिसे जो पहले बतायी गयी है, चन्द्रमाका उपस्थान करे, उन्हें अर्ध्य प्रदान करे। उपस्थान के समय निम्नाक्कित मन्त्रोंका पाठ भी करे- सोमो राजसि विचक्तण: पञ्चमुखोऽसि पजापतिर्व्राह्मणस्त एकं सुखं तेन मुखेन राज्ञोत्सि तैन मुखेन मामनादं कुरु। राजा त एकं मुखं तेन सुखेन विशोऽत्सि तेन सुखेन मामन्ादं कुरु। श्येनस्त एकं मुखं तेन मुखेन पत्तिणोडत्सि तेन मुखेन मामब्नादं कुरु। अग्निष्ट एकं मुखं तेन मुखेनेमं लोकमत्सि तेन सुखेन मामन्नादं कुरु। त्वयि पश्चमं मुखं तेन मुखेन सर्वाणि भूत न्यत्सि तेन सुखेन मामन्ादं कुरु। मास्माकं पाणेन पजया पश्युभिरवन्तेष्टा योऽस्मान् द्वेष्टि यं वर्य द्विष्मस्तत्य प्राणेन मजया पशुभिरव-

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मन्त्र १० ] विद्याविनाद भाष्य ४६६

विश्वको स्त्री-पुरुपरूपा प्रकृति-उमाके साथ वर्तमान तुम सोम राजा हो, सम्पूर्ण लौकिक वैदिक कार्योंके साधनमे कुशल हो। तुम पाँच मुखवाले हो, समस्त प्रजाका पालन करनेवाले हो। ब्राह्मण तुम्हारा एक मुख है, उस मुखसे तुम क्षत्रियोंका भक्षण-दमन करते हो; उस मुखके द्वारा तुम मुझे अन्नको खाने और पचानेकी शक्तिसे सम्पन्न बनाओ। क्षत्रिय तुम्हारा एक मुख है, उस मुखसे तुम वैश्योंका भक्षण-शासन करते हो; उस मुखसे तुम मुझे अन्नका भक्षण करने और उसे पचानेकी शक्तिसे सम्पन्न बनाओ। बाज तुम्हारा एक मुख है, उस मुखसे तुम पत्ियोंका भक्षण-संहार करते हो; उस मुखसे मुझे अन्नका भोक्ता बनाओ। अभ्ि तुम्हारा एक मुख है, उस मुखसे तुम इस लोकका भक्षण करते हो; उस मुखसे मुझे भी अन्नका भोक्ता बनाओ। पाँचवाँ मुख तो तुममें ही है, उस मुखसे तुम सम्पूर्ण प्राणियोंका भक्षण-संहार करते हो, नस मुखसे मुझे भी अन्नका भोक्ता बनाओ। तुम प्राण, संतान और पशुओंसे हमें क्षीण न करो, अपितु जो हमसे द्वेष रखता है, अतएव हम भी जिससे द्वेष रखते हैं; उसे प्राण, संतान एवं पशुओंसे क्षीण करो। (शेष मन्त्रका अर्थ ऊपरकी तरह समझना चाहिए।) इस प्रकार मन्त्रपाठ करते हुए दाहिनी वाँहका अन्वावर्तन करे॥है॥ अथ संवेश्यन् जायायै हृदयमभिमृशेत्। यत्ते सुसीमे हृदये हितमन्तः प्रजापतौ मन्येऽहं मां तद्िद्वांसं माऽह पौत्रमघं रुदमिति न हास्मात्पूर्वाः प्रजाः प्रैतीति॥१० ॥ भावार्थ-इस तरह सोमकी प्रार्थनाके पश्चात् पत्नीके समीप बैठनेसे पूर्ष उसके हृदयका स्पर्श करे। उस समय निम्नाङ्कित मन्त्रका पाठ करना चाहिये- यत्ते सुसीमे हृदये हितमन्तः मजापतौ। मन्येऽहं मां वदिद्वांसं तेन माहं पौत्रमघं रुदम्।। हे सुन्दर सीमन्तवाली तुम सोममयी हो, तुम्हारा हृदय संततिका पालन है; उसके भतर जो चन्द्रमण्डल की ही भाँति अमृतराशि निहित है, उसे मैं जानता हूँ, अपनेको उसका जाननेवाला मानता हूँ। इस सत्यके प्रभावसे मैं कभी पुत्रसम्बन्वी शोकसे रोदन न करूँ, मुझे पुत्रशोक कभी देखना न पड़े। इस प्रकार प्रार्थना करनेसे उस उपासकके पहले उसकी संतानकी मृत्यु नहीं होती ॥ १० ॥

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४७० कौपीतकि-छपनिषद् [अध्याये ₹

अथ प्रोष्यायन् पुत्रस्य मूर्धानमभिमृशेत्। अङ्गादङ्गा- तसंभवसि हृदयादधिजायसे। आत्मा वै पुत्रनामासि स जीव शरदः शतमसाविति नामास्य गृह्णाति। अश्मा भव परशुर्भव हिरण्यमस्तृतं भव। तेजो वै पुत्रनामासि स जीव शरदः शतमसाविति नामास्य गह्णाति। येन प्रजा- पतिः प्रजाः पर्यगह्णादरिष्टयै। तेन त्वा परिगृह्लाम्यसाविति नामास्य गृह्णात्यथास्य दक्षियो कर्णे जपत्यस्मै प्रयन्धि मघवभ्नृजीषिन्नितीन्द्र श्रेष्ठानि द्रविणानि धेहीति सव्ये मा छ्ित्था मा व्यथिष्ठाः शतं शरद आयुषो जीव पुत्र। ते नाम्ना मूर्धानमवजिध्राम्यसाविति त्रिरस्य मूर्धानमवजि घ्रेदगवां त्वा हिंकारेणाभि हिं करोमीति त्रिरस्य मूर्धान- मभि हिं कुर्यात्॥ ११ ॥ भावार्थ-अब्न दूसरी उपासना बतायी जाती है-परदेशमें रहकर वहॉसे लौटा हुआ पुरुष पुत्रके मस्तकका स्पर्श करे और इस मन्त्रको पढ़े- अङ्गादङ्गात्सम्भवसि हृदयादघिजायसे। आत्मा त्वं पुत्र माऽडविथ स जीव कारद: शातम् असौ।। अमुक नामवाले पुत्र, तुम नरकसे तारनेवाले हो। मेरे अङ्ग-अङ्गसे प्रकट हुए हो। मेरे हृदयसे तुम्हारा आविर्भाव हुआ है। तुम मेरे अपने ही स्वरूप हो। तुमने नरकसे मेरी रक्षा की है। तुम सौ वर्षोंतक जीवित रहो। यहाँ 'असौ' के स्थानपर पुत्रका नाम उच्चारण करना चाहिये और नामोच्चारणके समय निम्ना्कित मन्त्र पढ़ना चाहिये- अश्मा भव परशुर्भेव हिरण्यमस्तृतं भव। तेजो वै पुत्र नामासि स जीव शरदः शतम् असौ ॥।

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मन्त्र ११ ] विधाविनोद भाष्य ४७१

वत्स, तुम पत्थर बनो, कुठार बनो और बिछा हुआ सुवर्ण बनो, अर्थात् तुम्हारा शरीर पत्थरके समान सुगठित, बलवान्, स्वस्थ एवं नीरोग हो। तुम कुठारकी भाँति शत्रुओंका नाश करनेवाले बनो और सब ओर फैली हुई सुवर्णराशिकी भाँति सबके प्रिय बनो। समस्त अङ्ग का सारभूत, संसार-वृक्षका बीजरूप जो वेज है, वह तुम्ही हो; तुम सैकड़ों वर्ष जीवित रहो। यहाँ पुनः 'असी' के स्थानपर पुत्रका नाम लेना चाहिये। साथ ही निम्नाङ्कित मन्त्रका पाठ भी करना चाहिये- येन प्रजापतिः पजाः पर्यगृद्लादरिष्टयै तेन त्वा परिगृद्धामि असौ। वत्स, प्रजापति ब्रझ्माजी अपनी सृष्टिको विनाशसे बचानेके लिये उसे जिस तेजसे सम्पन्न करके परिमृहीत अथवा अनुगृहीत करते हैं, उसी तेजसे सम्पन्न करके मैं तुम्हें सब ओरसे ग्रहण करता हूँ। यहाँ भी 'असौ' के स्थानपर पुत्रका नामोच्चारण करे। तत्पश्चात् पुत्रके दाहिने कानमें इस मन्त्रका जप करे- अस्मै प्रयन्धि मघवनृजीपिन्, इन्द्र श्रेष्ठानि द्रविखानि धेहि। मघवन्, आप सरल भावका अवलम्बन करके इस पुत्रकी रक्षा करें। इन्द्र, इसे श्रेष्ठ धन प्रदान करें। फिर इसी मन्त्रको बायें कानमें भी जपे। तदनन्तर पुत्रका मस्तक सूँबे और इस मन्त्रको पढ़े- माच्छिया माव्यथिष्ठाः शतं शरद आयुषो जीव पुत्र ते वाम्ना मूर्धानमवजिम्रामि, असौ। बेटा, संतान-परम्पराका उच्छेद न करना। मन, बाणी और शरीरसे तुम्हें कभी पीढ़ा न हो। तुम सौ वर्षोतक जीवित रहो। मैं तुम्हारा अमुक नामसे प्रसिद्ध पिता तुम्हारा नाभ लेकर तुम्हारे मस्तकको सूँघ रहा हूँ। यहाँ 'असौ' के स्थानपर पिता अपना नाम ले। इस मन्त्रको पढ़कर तीन बार पुत्रका मस्तक सूँघना चाहिये। इसके बाद नीचे लिखा मन्त्र पढ़कर मस्तकके सब ओर तीन बार हिंकार शक्द्का उच्चारण करे। मन्त्र इस प्रकार है- गवां त्व्रा हिङ्गारेणाभि हिङ्डन्रोमि। वत्स, गौएँ अपने बद्ध ड़ेको बुलाने के लिये जैखे रँभाती हैं, उसरी प्रकार-वैसे

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४७२ कौषीतकि-उमनिषद् [अध्याय २

ही प्रेमसे मैं भी तुम्हारे लिये हिङ्ार करता हूँ-हिङ्कारद्वारा तुम्हें अपने पास बुलाता हूँ ॥ ११ ॥ अथातो दैवः परिमर एतद्वै ब्रह्म दीप्यते यदग्निर्ज्व- लत्यथैतन्म्रियते यन्न ज्वलति तस्यादित्यमेव तेजो गच्छति वायुं प्राण एतद्वै ब्रह्म दीप्यते यथादित्यो दृश्यते। अथैत- न्म्रियते यन्न दृश्यते तस्य चन्द्रमसमेव तेजो गच्छति वायुं प्राण एतद्वै ब्रह्म दीप्यते यच्चन्द्रमा दृश्यते। अथैत- न्म्रियते यन्न दृश्यते तस्य विद्युतमेव तेजो गच्छति वायुं प्राण एतद्वै ब्रह्म दीप्यते यद्विद्यद्विद्योततेऽथैतन्म्रियते यन्न विद्योतते तस्य वायुमेव तेजो गच्छति वायुं प्राणः । ता वा एताः सर्वा देवता वायुमेव प्रविश्य वायौ मृता न मृच्छन्ते तस्मादेव उ पुनरुदीरत इत्यधिदैवतम- थाध्यात्मम् ॥ १२ ।। भावार्थ-अब इसके बाद देव-सम्बन्धी 'परिमर' का वर्णन किया जाता है। यहाँ अभि और वाक आदि ही देवता है; ये देवता प्राणके सब ओर मृत्युको प्राप्त होते हैं, अतः ब्रह्मस्वरूप प्राणको ही यहाँ 'परिमर' कहा गया है। यह जो प्रत्यक्ष रूपमें अभि प्रज्वलित है, इस रूपमें ब्रह्म ही देदीप्यमान हो रहा है-। जब अभि प्रज्वलित नहीं होती, उस अवस्थामें यह मर जाती है-बुझ जाती है। रस बुझी हुई अगिका तेज सू्यमें ही मिल जाता है और प्राण बायुमें प्रवेश कर जाता है। यह जो सूर्य दृष्टिगोचर होता है, निश्चष हो इस रूपमें ब्रह्म ही प्रकाशित हो रहा है। जब यह नहीं दिखायी देता, तब मानो मर जाता है। उस समय उसका तेज चन्द्रमाको ही प्राप्त होता और प्राण वायुमें मिल जाता है। यह जो चन्द्रमा दिखायी देता है, निश्चय ही इसके रूपमें ब्रह्म ही प्रकाशित हो रहा है। फिर जब यह नहीं दिखायी देता, तब मानो यह मर जाता है। उस समय उसका तेज विद्युत्को ही और प्राण वायुको प्राप्त हो जाता है। यह जो बिजली कौंघती है, निश्चय ही इसके

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मन्त्र १२ ] विद्याविनोद भाष्य ४७३

रूपमें यह ब्रम्म ही प्रकाशित हो रहा है। फिर जब यह नहीं कौंघती, तब मानो मर जाती है; उस समय उसका तेज वायुको प्राप्त होता है और प्राण भी वायुमें ही प्रवेश कर जाता है। वे प्रसिद्ध अग्नि, सूर्य, चन्द्रमा तथा विद्युत्-स्वरूप सम्पूर्ण देवता वायुमें ही प्रवेश करके स्थित होते हैं। आधिदैविक प्राणमें विलीन होकर वे विनष्ट नहीं होते; क्योंकि पुनः उस वायुसे ही उनका प्रादुर्भाव होता है। इस प्रकार आधिदैविक दृष्टि है। अब आध्यात्मिक दष्टि बतायी जाती है।। १२।। एतद्वै ब्रह्म दीप्यते यद्वाचा वदत्यथैतन्म्रियते यन्न वदति तस्य चन्तुरेव तेजो गच्छति प्राणं प्राण एतद्वै ब्रह्म दीप्यते यच्चचुषा पश्यत्यथैतन्त्रियते यन्न पश्यति तस्य श्रोत्रमेव तेजो गच्छति प्राणं प्राण एतद्वै ब्रह्म दीप्यते यच्छोत्रेण शृणोत्यथैतन्म्रियते यन्न शृणोति तस्य मन एव तेजो गच्छति प्राणं प्राण एतद्वे ब्रह्म दीप्यते यन्म- नसा ध्यायत्यथैतन्म्रियते यन्न ध्यायति तस्य प्राणमेव तेजो गच्छति प्रार्णं प्राणस्ता वा एताः सर्वा देवताः प्राणमेव प्रविश्य प्राणो मृता न मृच्छन्ते तस्मादेव उ पुनरुदीरते तद्यदिह वा एवं विद्वांस उभौ पर्वतावभिन्न- वर्तेयातां तुस्तूर्षमाणौ दक्षिणश्चोत्तरश्च न हैवैनं स्तृण्वी- यातामथ य एनं द्विषन्ति यांश्च स्वयं द्वेष्टि त एनं सर्वे परिम्रियन्ते ॥ १३ ॥ मनुष्य वाणीमे जो बातचीन करना है, यह माना ब्रह्म ही प्रकाशित हो रहा है। जब यह नहीं बोलता, उस समय मानो यह वाक-इन्द्रिय मर जानी है। उस समय वाणीका तेज नेत्रका प्राप्त का जाता है और प्राण प्राणवायुमें मिल जाता है। यह मनुष्य नेत्रद्वारा जो देखता है, यह मानो ब्रह्म ही प्रकाशित हा रहा है। जब ६०

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४७४ कौषीतकि-उपनिषद् [अध्याय २

नेत्रसे नहीं देखता, उस समय मानो नेत्रेन्द्रिय मर जाती है। उस समय नेत्रका तेज श्रवोन्द्रियको प्राप्त हो जाता है तथा प्राण प्राणमें ही मिल जाता है। यह जो श्रवणद्वारा सुनता है, मह मानो ब्रह्म ही प्रकाशित हो रहा है; जब यह नहीं सुनता, तब मानो श्रवरोन्द्रिय मर जाती है। उस समय उसका तेज मनको ही प्राप्त हो जाता है और प्राण प्राणमें मिल जाता है। यह जो मनसे चिन्तन करता है, यह मानो ब्रह्म ही प्रकाशित हो रहा है। जब चिन्तन नहीं करता, तब मानो मन मर जाता है। उस समय उसका तेज प्राणको ही प्राप्त हो जाता है और प्राण भी प्राणमें ही मिल जाता है। इस प्रकार ये सम्पूर्ण वाक आदि देवता प्राणमें ही प्रवेश करके स्थित होते हैं। प्राणमें लीन होकर वे नष्ट नहीं होते। अतएव पुनः प्राणसे ही उनका प्रादुर्भाव होता है। उस दैव-परिमर प्राणका सम्यगज्ञान हो जानेपर यदि वे ज्ञानी पुरुष ऐसे दो ऊँचे पर्वतोंको, जो भूमण्डलके उत्तरी सिरेसे लेकर दक्षिणी सिरेतक फैले हों, अपनी इच्छाके अनुसार चलनेको प्रेरित करें तो वे पर्वत इन ज्ञानी महापुरुपोंकी हिंसा-उनकी आज्ञाका परित्याग अर्थात् उनकी अवहेलना नहीं कर सकते। इसके सिवा, जो लोग इस दैवपरिमरके ज्ञाता पुरुषसे द्वेष करते हैं, अथवा वह स्वयं जिन लोगोंसे द्वेष रखता हो, वे सब-के-सब सवथा नष्ट हो जाते हैं॥१३॥ अथातो निःश्रेयसादानं सर्वा ह वै देवता अहंश्रेयसे विवदमाना अस्माच्छरीरादुच्चक्रमुस्तद्दारुभूतं शिश्येडथैन- द्वाक्प्रविवेश तद्वाचा वदच्छिश्य एव। अथैनच्चक्षुः प्रविवेश तद्ाचा वदच्चचुषा पश्यच्छिश्य एवाथैनच्छोत्रं प्रविवेश तद्वाचा वदच्चनुषा पश्यच्छोत्रेषा शृण्वञ्छिश्य एवाथैनन्मनः प्रविवेश तद्ाचा वदच्चक्षषा पश्यच्छोत्रेण शृण्वन्मनप्ता ध्यायच्छिश्य एवाथैनत्प्राणः प्रविवेश तत्तत एव समुत्तस्थौ ते देवाः प्राणो निःश्रेयसं विदित्वा प्राण- मेव प्रज्ञात्मानमभिसंभूय सहैतैः सर्वेरस्माल्लोकादुच्चकमुस्ते

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मन्त्र १४ ] वधाविनाद भाष्य ४७५

वायुप्रतिष्ठाऽडकाशात्मानः स्वरीयुस्तथो एवैवं विद्वान् सर्वेषां भूतानां प्राशामेव प्रज्ञात्मानमभिसंभूय सहैतैः सर्वैरस्माच्छरीरादुत्क्रामति स वायुप्रतिष्ठ आकाशात्मा स्वरेति स तद्भ्वति यत्रैते देवास्तत्प्राप्य तदमृतो भवति यदमृता देवाः॥ १४ ॥ भावार्थ-इसके पश्चात् अब मोक्ष-साधनके गुणसे विशिष्ट सर्वश्रेष्ठ प्राणकी उपासना बतायी जाती है। एक समय वाकू आदि सम्पूर्ण देवता अहङ्कारवश अपनी-अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करनेके लिए विवाद करने लगे। वे सब प्राणके साथ ही इस शरीरसे निकल गये। उनके निकल जानेपर वह शरीर काठकी भाँति निश्चेष्ट होकर सो गया। तद्नन्तर उस शरीरमें वाक-इन्द्रियने प्रवेश किया। तब वह वाणीसे बोलने तो लगा, परंतु उठ न सका, सोया ही रह गया। तत्पश्चात् चक्षु-इन्द्रियने उस शरीरमें प्रवेश किया। तथापि वह वाणीसे बोलता और नेत्रसे देखता हुआ भी साता ही रहा, उठ न सका। तब उस शरीरमें श्रवण-इन्द्रियने प्रवेश किया। उस समय भी वह वाणीसे बोलता, नेत्रसे देखता और कानोंसे सुनता हुआ भी सोता ही रहा, उठकर बैठ न सका। तदनन्तर उस शरीरमें मनने प्रवेश किया। तब भी वह शरीर वाणीसे बोलता, नेत्रसे देखता, कानसे सुनता और मनसे चिन्तन करता हुआ भी पड़ा ही रहा। तत्पश्चात् प्राणने उस शरीरमें प्रवेश किया। फिर तो उसके प्रवेश करते ही वह शरीर उठ बेठा। तब उन वाकू आदि देवताओंने प्राणमें ही मोक्षसाधनको शक्ति जानकर तथा प्रज्ञास्वरूप प्राणको ही सब ओर व्याप्त समझकर इन प्राण-अपान आदि समस्त प्राणोंके साथ ही इस शरीररूप लोकसे उत्क्रमण किया। वे वायुमें यानी आधिदैविक प्राणमें स्थित हो आकाशस्वरूप होकर स्वर्गलोकमें गये, अपने अधिष्ठातृ-देवता अग्नि आदिके स्वरूपको प्राप्त हो गये। उसी प्रकार इस रहस्यको जाननेवाला विद्वान सम्पूर्ण भूतोंके प्राणका हो प्रज्ञात्मारूपसे प्राप्तकर इन प्राण-अपान आदि समस्त प्राणोंके साथ इस शरीरसे उत्क्रमण करता है। तथा वह वायुमें प्रतिष्ठित हो आकाशस्वरूप हाकर स्वर्गलोकको गमन करता है। वह विद्वान् वहाँ उस सुप्रसिद्ध प्राणका स्वरूप हो जाता है जिसमें कि ये वाक आदि देवता स्थित होते हैं। उस प्राणस्वरूपको प्राप्तकर वह विद्वान् प्राणके उस अमृतत्व-

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४७६ कौषीतकि-उर्पानषद् अध्याय २

गुणसे युक्त हो जाता है, जिस अमृतत्व-गुणसे वे वाक आदि देवता भी संयुक्त होते हैं॥ १४ ॥ अथातः पितापुत्रीयं संप्रदानमिति चाचक्षते। पिता पुत्रं प्रेष्यन्नाह्मयति नवैस्तृणैरगारं संस्तीर्याग्निमुपसमाधा- योदकुम्भं सपात्रमुपनिधायाहतेन वाससा संप्रच्छन्नः स्वयं श्येत एत्य पुत्र उपरिष्टादभिनिपद्यते। इन्द्रियैरस्येन्द्रि- याणि संस्पृश्यापि वाऽस्याभिमुखत एवासीताथास्मै संप्रय- च्छति वाचं मे त्वयि दधानीति पिता वाचं ते मयि दध इति पुत्रः, प्राणं मे त्वयि दधानीति पिता प्राणं ते मयि दध इति पुत्रश्चक्षुर्मे त्वयि दधानीति पिता चन्तुस्ते मयि दष इति पुत्रः, श्रोत्रं मे स्वयि दधानीति पिता श्रोत्रं ते मयि दध इति पुत्रः, मनो मे त्वयि दधानीति पिता मनस्ते मयि दध इति पुत्रोऽन्नरसान्मे त्वयि दधानीति पितान्नरसाथस्ते मयि दध इति पुत्रः, कर्माणि मे त्वयि दधानीति पिता कर्माणि ते मयि दध इति पुत्रः । सुख- दुःखे मे त्वयि दधानीति पिता, सुखदुःखे ते मयि दध इति पुत्र:, आनन्दं रति प्रजाति मे त्वयि दधानीति पिता, आनन्दं रति प्रजातिं ते मयि दध इति पुत्रः, इत्या मे त्वयि दधानीति पिता इत्यास्ते मयि दध इति पुत्र:, धियो विज्ञातव्यं कामान्मे त्वि दधानीति पिता धियो विज्ञातव्यं कार्मास्ते मयि दध इति पुत्रः। अथ

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मन्त्र २५ ] विद्यावनाद भाष्य ४७७

दक्षिणावृत्याङुपनिष्क्रामति तं पितानुमन्त्रयते यशो ब्रह्मव- र्चसमन्नाद्यं कीर्तिस्त्वा जुषतामित्यथेतरः सव्यमंसमन्व- वेक्षते पाणिनान्तर्धाय वसनान्तेन वा प्रच्छाद स्वर्गाल्वो- कान्कामानापुहीति स यद्यगद: स्थात्पुत्रस्यैश्श्वर्यें पिता वसेत्परि वा व्रजेद्यद्यु वै प्रेयाद्यदेवैनं समापयति तथा समापयितव्यो भवति तथा समापयितव्यो भवति॥ १५॥

भावार्थ-अब इसके पश्चात् पिता-पुत्रका सम्प्रदान-कर्म बतलाते हैं। इसमें पिता पुत्रको अपनी जीवनशक्ति प्रदान करता है, अतएव इसको पितापुत्रीय सम्प्रदान-कर्म कहते हैं। पिता यह निश्चय करके कि अब मुझे इस लोकसे प्रयाण करना है, पुत्रको अपने समीप बुलाये। नूतन कुश कास आदि तृणोंसे अग्नि- शालाको आच्छादित करके विधिपूर्वक अग्निकी स्थापना करे। अग्निके उत्तर या पूर्वभागमें जलसे भरा हुआ कलश स्थापित करे। कलशके ऊपर धान्यसे भरा हुआ पत्र भी होना चाहिये। स्वयं भी नवीन धोती और उत्तरीय धारण करे। इस प्रकार श्वेत वस्त् और माला आदिसे अलंकृत हो घरमें आकर पुत्रको पुकारे। जब पुत्र समीप आ जाय तो सब ओरसे उसे अङ्कमें भर ले और अपनी इन्द्रियोंसे उसकी इन्द्रियोंका स्पर्श करे। तात्पर्य यह कि नेत्रसे नेत्रका, नाकसे नाकका तथा अन्य इन्द्रियोंसे उसकी अन्य इन्द्रियोंका स्पश करे। अथवा केवल पुत्रके सम्मुख बैठ जाय और उसे अपनी वाक-इन्द्रिय आदिका दान करे। यथा- पिता कहे-बेटा, मैं तुममें अपनी वाक-इन्द्रिय स्थापित करता हूँ। पुत्र उत्तर दे-पिताजी, मैं आपकी वाक-इन्द्रियको अपनेमे धारण करता हूँ। पिता-मैं अपने प्राणको तुममें स्थापित करता हूँ। पुत्र -आपके प्राण-घ्राणोन्द्रियको मैं अपनेमें धारण करता हूँ। पिता-अपनी चन्षु-इन्द्रियको तुममें स्थापित करता हूँ। त्र-आपके चक्षुको मैं अपनेमें धारण करता हूँ। पिता-अपने श्रोत्रको मैं तुममें स्थापित करता हूँ। पुत्र-आपके श्रोत्रको मैं अपनेमें धारण करता हूँ। पिंता- अपने अन्नके रसोंको मैं तुममें स्थापित करता हूँ। पुत्र-आपके अभ्नरसोंको मैं

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४७८ कौषीत कि-उपनिषद् [भध्याय २

अपनेमें धारण करता हूँ। पिता-अपने कर्मोंको मैं तुममें स्थापित करता हूँ। पुत्र-आपके कर्मोंको मैं अपनेमें धारण करता हूँ। पिता-अपने सुख और दुःखको मैं तुममें स्थापित करता हूँ। पुत्र-आपके सुख और दुःखको अपनेमें धारण करता हूँ। पिता-आनन्द, रति और सन्तानोत्पत्तिकी श्क्ति तुममें स्थापित करता हूँ। पुत्र-आपकी वह शक्ति मैं अपनेमें धारण करता हूँ। पिता- अपनी गतिशक्ति मैं तुममें स्थापित करता हूँ। पुत्र-आपकी गतिशक्ति अपनेमें धारण करता हूँ। परिता-अपनी बुद्धि-वृत्तियोंको, बुद्धिके द्वारा ज्ञातव्य विषयको तथा विशेष कामनाओंको तुममें स्थापित करता हूँ। पुत्र-आपकी बुद्धि- वृत्तियोंको, बुद्धिके द्वारा ज्ञातव्य विषयोंको तथा कामनाओंको मैं अपनेमें धारण करता हूँ।

तद्नन्तर पुत्र पिताकी प्रदक्िणा करते हुए पूर्व दिशाकी ओर पिताके समीपसे निकले। उस समय पिता पीछेसे पुत्रको सम्बोधित करके ऐसा कहे-

यश, ब्रह्मतेज, अन्नको खाने और पचानेकी शक्ति तथा उत्तम कीर्ति ये समस्त सद्गुण तुम्हारा सेवन करें।

पिताके यों कहनेपर पुत्र अपने बायें कन्धेकी ओर दृष्टि घुमाकर देखे और हाथसे भोट करके अथवा कपड़ेसे आड़ करके पिताको इस प्रकार उत्तर दे-

आप अपनी इच्छाके अनुसार कमनीय स्वर्गलोक तथा वहाँके भोगोंको प्राप्त करें।

इसके बाद यदि पिता नीरोग हो तो वह पुत्रके प्रभुत्वमें ही वहाँ निवास करे, पुत्रको घरका स्वामी समझे और अपनेको उसके आश्रित माने। अथवा सब कुछ त्यागकर घरसे निकल जाय, संन्यासी हो जाय। अथवा यदि वह परलोक- गामी हो जाय तो जिन जिन वाक आदि इन्द्रियोंको उसने पुत्रमें स्थापित किया था, उन सभीकी शक्तियोंका वह पुत्र उसी प्रकार आश्रय हो जाता है। वे सभी शक्तियाँ उसे प्राप्त होती हैं। यही यथार्थं उत्तराधिकार है॥ १५॥

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भन्त १ ] विर्द्ाविनोद् भाष्य ४७६

तृतीय श्रध्याय

प्रतर्दनो ह वै दैवोदासिरिन्द्रस्य प्रियं धामोपजगाम। युद्धेन च पौरुषेण च तं हेन्द्र उवाच। प्रतर्दन वरं ते ददानीति, स होवाच प्रतर्दनस्त्वमेव मे वृणीष्व यं स्वं मनुष्याय हिततमं मन्यस इति तं हेन्द्र उवाच। न वै वरोऽवरम्मै वृणीते त्वमेत्र वृणीप्वेत्येवमवरो वै किल म इति होवाच प्रतर्दनोऽयो खल्विन्द्रः सत्यादेव नेयाय। संत्यं हीन्द्रः स होवाच, मामेव विजानीद्येतदेवाहं मनु- ष्याय हिनतम मन्ये, यन्मां विजानीयात्त्रिशीर्षाणं त्वा्ट्रम- हनमवाङ्मुखान्यतीन्सालावृकेभ्यः प्रायच्छं बह्नीः सधा अतिक्रम्य दिवि प्रह्लादीनतृशवहमन्तरित्षे पौलोमान्पृ- थिव्यां कालखाआ्ंस्तस्य मे तत्र न लोम च मा मीयते, स यो मां विजानीयान्नास्य केन च कर्मणा लोको मीयते, न मातृवधेन न पितृवधेन न स्तेयेन न भ्रृणहत्यया नाश्य पापं च न चकृषो मुखान्नीलं व्येतीति।। १।। भावार्य-एक समयकी बात है कि राजा दिवोदासका पुत्र प्रतर्दन देवासुर संग्राममें देवताओकी सहायग करनेके लिए देवराज इन्द्रके प्रिय धाम स्व्रर्गलोकमें गये। वहाँ उसकी अनुपम युद्धरुला और पुरुगार्थसे सतुष्ट होकर इन्द्रने उससे कहा-प्रतर्दन बोलो, मे तुम्हे क्या वर दू? तब प्रसिद्ध वीर प्रतर्दन बोला-देवराज, जिस वरको आप मनुष्य जातिके लिए परम वल्याणमय मानते हो, वैसा कोई वर मेरे लिये आप स्वय ही वरण करके दें। यह सुनकर इन्द्रने कहा-राजन्।ले। कुमें

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४८० कौषीतकि-उपनिषद् [अध्याय ३

यह सवत्र विदित है कि कोई भी दूसरेके लिए वर नही माँगता। अत तुम्हीं अपने लिए कोई वर मॉगो। प्रतर्दन बोला-तब तो मेरे लिए वरका अभाव ही रह गया। क्योंकि आप स्वय तो वर प्रदान करेगे नही, और 'क्या माँगना चाहिये' इसका मुझको ज्ञान ही नहीं है। ऐसी दशामें मुझे वर मिलनेसे रहा। प्रतदनके ऐसा कहनेपर निश्चय ही देवराज इन्द्र अपने सत्यसे विचलित नही हुए, वे वर देनेकी प्रतिज्ञा कर चुके थे, अत. प्रतदनके न मॉगनेपर भी अपनी ही ओरसे वर देने को उद्यत हो गये। क्योकि इन्द्र सत्यस्त्ररूप हैं। उन प्रसिद्ध देवता इन्द्रने कहा-प्रतर्दन, तुम मेरे ही यथार्थ स्वरूपको समझो। इसे ही मै मनुष्य जातिके लिए परमकल्याणमय वर मानता हू कि वह मुझे भलीभॉति जाने। यदि कहो, आपमे ऐसी क्या विशेषता है ? तो सुनो, मैंने प्राण- ब्र्मके साथ तादात्म्य प्राप्त कर लिया है, अतएव मुझमें कर्तापनका अभिमान नहीं है। मेरी बुद्धि कही भी लिप्त नही होती। कर्मफलकी इच्छा मेरे मनमें कभी उत्पन्न ही नही होती, अतएव कोई भी कर्म मुझे बन्धनमे नहीं डालता। मैंने त्वष्टा प्रजापतिके पुत्र विश्वरूपको, जिसके तीन मस्तक थे, वज्रसे मार डाला। कितने ही मिथ्या सन्यासियोको, जो अपने आश्रमोचित आचारसे भ्रष्ट पव ब्रह्मविचारसे विमुख हो चुके थे टुकडे-टुकडे करके भेडियोको बॉट दिया। कितनी ही बार प्रह्लादके परिचा- रक दैत्य राजाओको मौतके घाट उतार दिया। पुलोमासुरके परिचारक दानवो तथा पृथिवीपर रहनेवाले कालखाञ्ज नामक बहुत-से असुरोका भी समस्त विघ्न-बाघा- ओका अतिक्रम करके सहार कर डाला। परन्तु इतनेपर भी अहङ्कार और कर्मफलकी कामनासे शून्य होनेके कारण मुझ प्रसिद्ध देवराज इन्द्रके एक रोमको भी हानि नही पहॅुची। मेरा एक बाल भी बॉका नहां हुआ। इसी प्रकार जो सुझे भलीभॉति जान ले, उसके पुण्यलोकको किसी भी कर्मसे हानि नही पहुँचती। मेरे स्वरूपका ज्ञान रखनेवाले पुरुषको बडेसे बड़ा पाप भी हानि नही पहॅुँचा सकता। अधिक क्या कहॅँ, उसे पाप लगता ही नही। पाप करनेकी इच्छा होनेपर भी उसके मुखसे नील आमा नही प्रकट होती यानी उसका मुह काला नही होता है। यह कथन अहङ्कारसे सवथा शून्य ब्रह्मज्ञानीकी महत्ता बतलानेके लिए है, न कि पाप कर्मोंका समर्थन करनेके लिए। वस्तुत अहङ्कार रहित, रागद्वेषशून्य पुरुषसे पापकार्य बननेका कोई हेतु होता ही नही है।। १।।

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मन्च २ ] विद्याविनोद भाष्य ४८१

स होवाच प्राणोस्मि प्रज्ञात्मा तं मामायुरमृतमित्यु- पासस्व, आयु: प्राणः, प्राणो वा आयुः, प्राण एवामृतं याव- द्वयस्मिञ्छरीरे प्राणो वसति तावदायुः, प्राऐेन होवामु- षिमिँल्लोके Sमृतत्वमवान्नोति, प्रज्ञया सत्यं संकल्पं, स यो म मायुरमृतमित्युपास्ते सर्वमायुरस्मिँल्लोक पत्याम्नोश्यमृतत्व- मक्षिति स्वर्गे लोके, तद्दैक आहुरेकभूयं वै प्राणा गच्छ- न्तीति। न हि कश्चन शक्कुयात्सकृदवाचा नाम प्रज्ञापयितुं चक्षुषा रूपं श्रोत्रेण शब्दं मनसा ध्यातुमित्येकभूयं वै प्राणा एकैकमेतानि सर्वाणि प्रज्ञापयन्ति, वाचं वदन्तीं सर्वे प्राणा अनुवदन्ति, चन्तुः पश्यत्सर्वे प्राणा अनुप- श्यन्ति श्रोत्रं शृण्वत्सर्वे प्राणा अनुशृण्वन्ति मनो व्यायत्सवें प्राणा अनुध्यायन्ति प्राणं प्राणन्तं सर्वे प्राणा अनुप्राणन्ती- श्येवमु हैतदिति हेन्द्र उवाच, अस्तित्वेव प्राणानां निःश्रे० यसमिति॥२॥ मावा -प्रसिद्ध देवराज इन्द्र फिर बोले-मैं प्रज्वास्वरूप प्राण हूँ। उस प्राण एवं प्राज्ञातमारूपमें विदित मुझ इन्द्रकी तुम 'आयु और अमृत' रूपसे उपासना करो। अर्थात् समस्त प्राणियोंकी आयु एवं जीवनभूत जो प्राण है, जो मृत्युसे रहित अमृतपद् है, वह मुझ इन्द्रसे भिन्न नहीं है; यों समझकर मेरी उपासना करो। आयु प्राण है. प्राण ही आयु है तथा प्राण ही अमृत है। जबतक इस शरीरमें प्राण निवास करता है, तबतक ही आयु है। प्राणसे ही प्राणी परलोकमें अमृतत्वके सुखका अनुभव करता है। प्रज्ञासे मनुष्य सत्यका निश्चय और संकल्प विकल्प करता है। जो 'आयु' और 'अ त' रूपसे मुझ इन्द्रकी उपासना करता है, वह इस लोकमें पूरी आयुतक जीवित रहता है तथा स्वर्गलोकमें जानेपर अक्षय अमृतत्वका सुख भोगता है। ६१

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४८२ कोपीतकि-उपनिषद् [अध्पाय ₹

इस प्राणके विषयमें निश्चय हो कुछ्ध विद्वान् इस प्रकार कहते है-अवश्य ही प्राण वाक आदि समस्त इन्द्रियाँ और प्राण एकीभावको प्राप्त होने हैं। कोई भी मनुष्य एक ही समय वाणीसे नाम सूचित करने, नेत्रम रूप देखने, कानसे शब्द सुनने और मनसे चिन्तन करनेमें समर्थ नहीं हो सकता। इससे सिद्ध हाता है कि अवश्य ही समस्त प्राण एकीभावको प्राप्त हाते हैं-एक होकर काय करते हैं। ये सब एक एक विषयका बारी बारीसे अनुभव कराते हैं। जब वाणी बोलने लगती है, उस समय अन्य सब प्राण मौन होकर उसका बनुमोदन करते हैं। जब नेत्र देखने लगता है, तब अन्य सब प्राण भी उसके पीछे रहकर देखते हैं। जब कान सुनने लगता है तब अन्य सब प्राण भी उसका अनुमरण करते हुए सुनते हैं, जब मन चिन्तन करने लगता है, तो अन्य सब प्राण भी उसके साथ रहकर चिन्तन करते हैं तथा मुख्य प्राण जब अपना व्यापार करता है, तब अन्य प्राण भी उसके साथ-साथ जेसी ही चेष्टा करते हैं, इस प्रकार प्रतर्दनने इन्द्रके प्रति निवेदन किया। 'यह बात ऐसी ही है' इस प्रकार देवराज इन्द्रने उत्तर दिया-सबे प्राण एक होते हुए भी जो पाँच प्राण हैं, वे परम कल्माणरूप हैं; निःसन्देद ऐसी ही बात है।।२ ॥। जीवति वागपेतो मूकान्हि पश्यामो जीवति चचुरपे तोऽन्धान्हि पश्यामो जीवति श्रोत्रापेतो बधिरान्हि पश्यामो जीवति मनोपेतो बालान्हि पश्यामो जीवति बाहुच्छिन्नो जीवत्यूरुच्छिन्न इत्येवं हि पश्याम इति। अथ खलु प्राण एव प्रज्ञात्मेदं शरीरं परिषद्योत्थापयति तस्मादेतदेवोक्थ- सुपासीत यो वे प्राणः सा प्रज्ञा या वा प्रज्ञा सः प्राणः, सह द्येतावस्मिञ्छरीरे वसतः सहोत्कामतस्तस्पैषैव दृष्टि- रेतद्विज्ञानं यत्रैतत्पुरुषः सुप्ः स्वनं न कञ्चन पश्यत्यथा- स्मिन्प्राण एवैकधा भवति, तदैनं वाक सर्वैनामभिः सहाप्येति, चन्तुः सर्वेः रूपैः सहाप्येति, श्रोत्रं सर्वेः शब्दैः

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मन्त्र ३] विदाविनोद भाष्य ४८३

सहाप्येति, मनः सर्वैर्ध्यानैः सहाप्येति, यदा प्रतिबुध्यते। यथाग्रेर्ज्वलतः सर्वा दिशो विस्फुलिङ्गा विप्रतिष्ठेरन्नेवमेवै- तस्मादात्मनः प्राणा यथायतनं विप्रतिष्ठन्ते प्रारोभ्यो देवा देवेभ्यो लोकास्तस्यैषैव सिद्धिरेतद्विज्ञानं यत्रैतत्पुरुष आर्तो मरिष्यन्नाबल्यं न्येत्य संमोह न्येति तदाहुरुदक्रमी- च्चितं, न शृणोति न पश्यति न वाचा वदति न ध्यायत्य- थास्मिन्प्राण एवैकधा भवति तदैनं वाक्सवैर्नामभिः सहा- प्येति चक्षुः सवैः रूपैः सहाव्येति श्रोत्रं सरवैः शब्दैः सहा- प्येति मनः सर्वैध्यानैः सहाप्येति स यदा प्रतिबुध्यते। यथान्नेरज्वलतो विस्फुलिङ्गा विप्रतिष्ठेरन्नेवमेवैतस्मादा- तमनः प्राणा यथायतनं विप्रतिष्ठन्ते प्राऐोभ्यो देवा देवेभ्यो लोकाः॥ ३ ॥ भावार्थ-वाक इन्द्रियसे वश्चित होनेपर भी मनुष्य जीवित रहता है, क्योंकि इमलोग गूँगोंको प्रत्यक्ष देखते हैं। नेत्रहीन मनुष्य भी जीवित रहता है, क्योंकि इमलोग अन्धोंको जीवित देखते हैं। श्रवण-इन्द्रियसे रहित होनेपर भी मनुष्य जीवित रहता है, क्योंकि हमलोग बहरोंको जीवित देखते हैं। मनःशकतिसे शून्य होनेपर भी मनुष्य जीवन धारण कर सकता है, क्योंकि हमलोग छोटे शिशुओंको जीबित देखते हैं। इतना ही नहीं, प्राणशक्तिके रहनेपर बाँह कट जानेपर भी वह जीवन धारण कर सकता है। परन्तु प्राणके न रहनेपर तो एक क्षण भी जीवित रहना असम्भव है, यह हम प्रत्यक्ष देखते हैं। अतः क्रियाशक्तिका उद्बोधक प्राण ही ज्ञानशतति का रद्बोधक प्रज्ञात्मा है। अतयव यह निःश्रेयसरूप है। यही इस शरीरको सब ओरसे पकड़कर उठाता है। इसीलिये इस प्राणकी ही उक्थ'रूपसे उपासना करनी चाहिये। क्योंकि उत्था- पनके कारण ही वह उक्य है। निश्रय ही जो प्रसिद्ध प्राण है, वही प्रज्ञा है।

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४८४ कौषीतकि-पनिषद् अध्याय

अथवा जो प्रज्ञा बतायी गयी है वही प्राण है, क्योंकि ये प्रज्ञा और प्राण दोनों साथ साथ ही इस शरीरमें रहते हैं और जीवात्मासे मिलकर साथ ही साथ यहाँसे उत्क्रमण करते है। इस प्राणमय परमात्माका यही ज्ञान है, यही विज्ञान है कि जिस अवस्थामें यह सोया हुआ पुरुष किसी स्वप्नको नहीं देखता, उस समय वह इस मुख्य प्राणमें ही एकीभावको प्राप्त हो जाता है। उस अवस्थामें वाक सम्पूर्ण नामोंके साथ इस प्राणमें ही लीन हो जाती है। नेत्र समस्त रूपोंके साथ इसमें ही लीन हो जाता है। कान समग्र शब्दोंके साथ इसमें ही लीन हो जाता है तथा मन सम्पूर्ण चिन्तनीय विषयोंके साथ इसमें ही लयको प्राप्त हो जाता है। वह पुरुष जब जाग रठता है, उस समय, जैसे जलती हुई आगसे सब दिशाओंकी ओर चिनगारियाँ निकलती हैं, उसी प्रकार इस प्राणस्वरूप आत्मासे समस्त वाक आदि प्राण निकलकर अपने अपने योग्य स्थानकी ओर जाते हैं। फिर प्राणोंसे उनके अघिष्ठाता अभि आदि देवता प्रकट होते हैं और देवताओंसे लोक नाम अयदि विषय प्रकट होते हैं। इस प्राणस्वरूप आत्माकी यह आगे बतायी जानेवाली ही सिद्धि है, यही विज्ञान है कि जिस अवस्थामें पुरुप रोगसे आत हो मरणासन्न हो जाता है, अत्यन्त निर्बलताको पहुँचकर अचेत हो जाता है, किसीको पहचान नहीं पाता, उस समय कहते हैं कि इसका मन उत्क्रमण कर गया। इसीलिये यह न तो सुनता है, न देखता है, न वाणीसे कुछ बोलता है और न चिन्तन ही करता है। उस समय इस प्राणमें ही वह एकीभावको प्राप्त हो जाता है। उस अवस्थामें वाक सम्पूर्ण नामोंके साथ इसमें लीन हो जाता है। नेत्र समस्त रूपोंके साथ इसमें लीन हो जाता है। कान समप्र शब्दोंके साथ इसमें लीन हो जाता है तथा मन सम्पूर्ण चिन्तनीय विषयोंके साथ इसमें लोन हो जाता है। वह पुरुष मृत्युके बाद जब पुनः जन्मान्तर ग्रहण करता है, उस समय जैसे जलती हुई आगसे सब दिशाओंकी ओर चिनगा- रियाँ निकलती हैं, उसी प्रकार इस प्राणस्वरूप आत्मासे वाक आदि प्राण प्रकट हो अपने अपने योग्य स्थानकी ओर चल देते हैं। फिर प्राणोंसे उनके अधिष्ठाता अग्नि आदि देवता प्रकट होते हैं और देवताओंसे लोक, नाम आदि विषय प्रकट होते हैं।। ३ ।। स यदास्माच्छरीरादुस्क्रामति सहैवैतैः सर्वेरुत्कामति वागस्मात्सर्वाणि नामान्यभिविसृजते, वाचा सर्वाणि

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न्ा x-५ ] बिद्याविनोद भाष्य ४८५

नामान्याप्नोति, घ्राणोSस्मात्सर्वान्गन्धानभिविसृजते घ्राऐोन सर्वान्गन्धानाप्नोति, चक्षरस्मात्सर्वाणि रूपाण्यभिविसतृजते, चनुषा सर्वाणि रूपाण्याम्ोति, श्रोत्रमस्मात्सर्वाञछ्व्दान- भिविसृजते, श्रोत्रेया सर्वाञ्छन्दानान्नोति, मनोSस्मात्सर्वाणि ध्यानान्यभिविसृजते, मनसा सर्वाणि ध्यानान्याप्नोति, सैषा प्राणे सर्वाप्तिः। यो वै प्राणः सा प्रज्ञा या वा प्रज्ञा स प्राणः स ह ह्येतावस्मिञ्छरीरे वसतः सहोत्क्रामतोऽथ खलु यथाऽस्यै प्रज्ञायै सर्वाणि भूतान्येकीभवन्ति तदव्या- ख्यास्याम: ॥४॥ भावार्थ-वह मुमूर्ु पुरुष जब इस शरीरसे उत्क्रमण करता है, उस समय इन सब इन्द्रियोंके साथ ही उत्क्रमण करता है। वाक-इन्द्रिय इस पुरुषके पास सब नामोंका त्याग कर देती है, अतः वह नामोंको ग्रहण नहीं कर पाता, क्योंकि वाक- इन्द्रियसे ही मनुष्य नामोंको ग्रहण कर पाता है। घ्राण-इन्द्रिय उसके निकट समस्त गन्धोंका स्याग कर देती है, अतः वह गन्घसे भी वश्चित हो जाता है। क्चोंकि घ्राण-इन्द्रियसे ही मनुष्य सब प्रकारके गन्धोंका अनुभव करता है। नेत्र उसके समीप सब रूपोंको त्याग देता है, नेत्रसे ही मनुष्य सब रूपोंको ग्रहण करता है। कान उसके समीप समस्त शब्दोंको त्याग देता है, कानसे ही मनुष्य सब प्रकारके शब्दोंको ग्रहण करता है। मन उसके समीप समस्त चिन्तनीय विषयोंको त्याग देता है; मनसे ही मनुष्य सब प्रकारके चिन्तनीय विषयोंको ग्रहण करता है। यही प्राणस्वरूप आत्मामें सब इन्द्रियों और विषयोंका समर्पित हो जाना है। निश्चय ही जो प्राण है, वही प्रज्ञा है अथवा जो प्रश्ा है, वही प्राण है। क्योंकि ये कोनों इस शरीरमें साथ साथ ही रहते हैं अर साथ साथ ही इससे सत्क्रमण करते हैं। इसके आगे अब निश्चय ही जिस प्रकार इस प्रज्ञामें सम्पूर्ण भूत एक हो जाते हैं, इसकी हम स्पष्ट शब्दोंमें व्याख्या करेंगे।४॥ वागेवास्या एकमङ्गमदूहूलं तस्यै नाम परस्तात्प्रतिवि- हिता भूतमात्रा व्राणमेवास्या एकमङ्गमदूहूलं तस्य गन्धः

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४८६ कौपीतकि-उपनिषद् अध्याम ३

परस्तात्प्रतिविहिता भूतमात्रा चक्षुरेवास्या एकमङ्गमदूहूलं तस्य रूपं परस्तात्प्रतिविहिता भूतमात्रा श्रोत्रमेवास्या एकमङ्गमदूहूलं तस्य शब्द: परस्तात्प्रतिविहिता भूतमात्रा जिह्वैवास्या एकमङ्गमदूहूलं तस्या अन्नरसः परस्तात्प्रतिवि- हिता भूतमात्रा हस्तावेवास्या एकमङ्गमदूहूलं तयोः कर्म परस्तात्प्रतिविहिता भूतमात्रा शरीरमेवास्या एकमङ्गमदूहूलं तस्य सुखदुःखे परस्तात्प्रतिविहिता भूतमात्रा उपस्थ एवास्या एकमङ्गमदूहूलं तस्थानन्दोरतिःप्रजातिः परस्तास्पतिविहिता भूतमात्रा पादावेवास्या एकमङ्गमदूहूलं तयोरित्या: परस्ता- स्प्रतिविहिता भूतमात्रा प्रज्ञैवास्या एकमङ्गमदूहूलं तस्यै धियो विज्ञातव्यं कामा: परस्तात्प्रतिविहिता भूतमात्रा ॥॥ भावार्थ-अवश्य ही वाक-इन्द्रियने इस प्रज्ञाके एक अङ्गकी पूर्ति की हैं। बाहरकी ओर उसके विघयरूपसे कल्पित पञ्भूतोंका अंश-विशेष शब्द है। निश्चथ ही घराणोन्द्रियने भी इस प्रज्ञाके एक अङ्गकी पूर्ति की है। बाहरकी ओर उसके विषयरूपसे कल्पित जो भूतमात्रा है, वह गन्ध है। निश्चय ही नेत्रने भी इस प्रज्ञाके एक अङ्गकी पूर्ति की है। बराहरकी ओर उसके विषयरूपसे कल्पित जो भूतमात्रा है, वह रूप है। निश्चय ही कानने भी इस प्रज्ञाके एक अङ्गकी पूर्ति की है। बाहर की ओर उसके विषयरूपसे कल्पित जो भूतमात्रा है, वह शब्द है। निश्चय ही जिह्वाने भी इस प्रज्ञाके एक अङ्गकी पूर्ति की है। बाहरकी ओर उसके विषयरूपसे कल्पित जो भूतमात्रा है, वह अन्नका रस है। निश्चय ही हाथोंने भी इस प्रज्ञाके एक अङ्गकी पूर्ति की है। बाहरकी ओर उनके विषयरूपसे कल्पित जो भूतमात्रा है, वह कर्म है। निश्चय ही शरीरने भी इस प्रज्ञाके एक अङ्गकी पूर्ति की है। बाहरकी ओर उसके विषयरूपसे कल्पित जो भूतमात्रा है, वह सुख और दुःख है। निश्चय ही उपस्थने भी इस प्रज्ञाक्रे एक अङ्गकी पूर्ति की है, बाहरकी ओर इसके विषयरूपसे कल्पित जो भूतमात्रा है, वह आनन्द, रति और प्रजोल्पति

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भन्त्र ६] विद्याविनोद भाष्य ४८७

है। निश्चय ही पैरोंने भी इस प्रज्ञाके एक अङ्गकी पूर्ति की है। बाहरकी ओर उनके विषयरूपसे कल्पित जो भूतमात्रा है, वह गमन-क्रिया है। अवश्य ही प्रज्ञाने भी इस प्रज्ञाके एक अङ्गका पूर्ति का बाहरकी ओर उसके विपयरूपसे कल्पित जो भूतमात्रा है. वह बुद्धिके द्वारा अनुभव करने योग्य वस्तु और कामनाएँ हैं ॥ ५॥ प्रज्ञया वाचं समारुह्य वाचा सर्वाणि नामान्याप्नोति, प्रज्ञया प्राणं समारुह्य प्राणेन सर्वान्गन्धानाप्नोति, प्रज्ञया चत्तुः समारुह्य चन्षुषा सर्वाणि रूपाण्यामोति प्रज्ञया श्रोत्रं समारुह्य शोत्रेण सर्वाञ्छव्दानानोति प्रज्ञया जिहूवां समारुह्य जिह्वया सर्वानन्नरसानान्नोति प्रज्ञया हस्तौ समारुह्य हस्ताभ्यां सर्वाणि कर्माण्यान्नोति प्रज्ञया शरीरं समारुद्य शरीरेण सुखदुःखे आप्नोति प्रज्ञयोपस्थं समारुह्यो- पस्थेनानन्दं रति प्रजातिमाप्नोति प्रज्ञया पादौ समारुह्य पादाभ्यां सर्वा इत्या आप्नोति प्रज्ञयैव घियं समारुह्य प्रज्ञयैव धियो विज्ञातव्यं कामानाप्नोति ।। ६।। भावार्थ-प्रज्ञासे वाक-इन्द्रियपर आरूढ़ होकर मनुष्य वाणीके द्वारा नामोंको ग्रहण करता है। प्रज्ञासे प्राण पर आरूढ़ होकर उसके द्वारा समसत गन्घोंको ग्रहण करता है। प्रज्ञासे नेत्रपर आरूढ़ होकर नेत्रसे सब रूपोंको ग्रहण करता है। प्रज्ञासे अवण-इन्ट्रिय पर आरढ़ होकर उसके द्वारा सब प्रकारके शब्दोंको ग्रहण करता है। प्रज्ञासे जिह्वापर आरद़ होकर जिह्वासे सम्पूण अन्नरसोंको ग्रहण करता है। प्रबासे हाथोंपर आरूढ़ होकर हाथोंसे समस्त कर्मोंको ग्रहण करता है। प्रज्ञासे शरीरपर आरूढ़ होकर शरीरसे भोग और पीड़ाजनित सुख-दुःखॉको ग्रहण करता है। प्रज्ञासे उपस्थपर आरूढ़ होकर उपस्थसे आनन्द, रति और प्रजोत्पत्तिको ग्रहण करता है। प्रज्ञासे पैरोंपर आरूढ़ होकर पैरोंसे सम्पू्ण गमन-क्रियाओंको ग्रहण करता है। तथा प्रज्ञासे ही बुद्धिपर आरूढ़ होकर उसके द्वारा अनुभव करनेयोग्य वसतु एवं कामनाओंको ग्रहण करता है॥ ६॥

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कीमीतकि-उपनिषद् [अध्याय ३

न हि प्रज्ञापेता वाड्नाम किंचन प्रज्ञापयेदन्यत्र मे मनोऽभूदित्याह नाहमेतन्नाम प्राज्ञासिषमिति। न हि प्रज्ञापेतः प्राणो गन्धं कंचन प्रज्ञापयेदन्यत्र मे मनोऽभू- दित्याह नाहमेतं गन्धं प्राज्ञासिषमिति न हि प्रज्ञापेतं चतू रूपं किंचन प्रज्ञापयेदन्यत्र मे मनोऽभूदित्याह नाहमेतद्रपं प्राज्ञासिषमिति। न हि प्रज्ञापेतं भोत्रं शब्दं कंचन प्रज्ञा- पयेदन्यत्र मे मनोऽभूदित्याह नाहमेतं शब्दं प्राज्ञासिष- मिति। न हि प्रज्ञापेता जिह्राSन्नरसं कंचन प्रज्ञापयेदन्यत्र मे मनोऽभूदित्याह नाहमेतमन्नरसं प्राज्ञासिषमिति। न हि प्रज्ञापेतौ हस्तौ कर्म किंचन प्रज्ञापयेतामन्यत्र मे मनोऽ भूदित्याह नाहमेततकर्म प्राज्ञासिषमिति। न हि प्रज्ञापेतं शरीरं सुखं दुःखं किंचन प्रज्ञापयेदन्यत्र मे मनोSभूदित्याह नाहमेततसुखं दुःखं प्राज्ञासिषमिति। न हि प्रज्ञापेत उपस्थ आनन्दं रति प्रजापिं कांचन प्रज्ञापयेदन्यत्र मे मनोऽ भूदित्याह नाहमेतमानन्दं नरति न प्रजाति प्राज्ञासिषमिति न हि प्रज्ञापेतौ पादावित्यां कांचन प्रज्ञापयेतामन्यत्र मे मनोऽभूदित्याह नाहमेतामित्यां प्राज्ञासिषमिति न हि प्रज्ञापेता घी: काचन सिद्ध्येन्न प्रज्ञातव्यम्॥७॥ मावार्थ-प्रश्वासे रहित होनेपर वाक-इन्द्रिय किसी भी नाम का बोध नहीं करा सकती, क्योंकि उस अवस्थामें मनुष्य यों कहता है कि मेरा मन अन्यत्र चला गया था। मैं इस नामको नहीं समझ सका। प्रज्ञासे पृथक होनेपर घ्राण- इन्द्रिय किसी भी मन्धका बोध नहीं करा सकती। उस दशामें मनुष्य यों कहता

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मन्त्र * ] विद्याविनोड भाष्य

है कि मेरा मन अन्यत्र चला गया था, इसलिए मैं इस गन्घको नहीं जान सका। प्रज्ञासे पृथक होकर नेत्र किसी भी रूपका ज्ञान नहीं करा सकता। उस दशामें मनुष्य यों कहता है कि मेरा मन अन्यत्र चला गया था, इसलिए मैं इस रूपको नहीं पहचन सका। प्रज्ञासे पृथक रहकर कान किसी भी शब्दका ज्ञान नहीं करा सकता। उस दशामें मनुष्य यह कहता है कि मेरा मन अन्यत्र चला गया था, इसलिर मैं इस शब्दको नहीं समझ सका। प्रज्ञासे पृथक रहकर जिह्वा किसी भी अन्न-रसका अनुभव नही करा सकती। उस दशामें मनुष्य यह कहता है कि मेरा मन अन्यत्र चला गया था, इसलिए मैं इस अन्नरसका अनुभव न कर सका। प्रज्ञास पृथक होकर हाथ किसी भी कर्मका ज्ञान नही करा सकते। उस दशामें मनुष्य यह कहता है कि मेरा मन अन्यत्र चला गया था, इसलिए मैं इस कमको नहीं जान सका। प्रज्ञासे पृथक होकर शरीर किसी सुख- दुःखका ज्ञान नहीं करा सकता, उस दशामें मनुष्य कहता है कि मेरा मन अन्यत्र चला गया था, इसलिए मैं इन सुख-दुःखोंको नहीं जान सका। प्रज्ञासे पृथक हो उपस्थ किसी भी आनन्द रति और प्रजोस्पत्तिका ज्ञान नहीं करा सकता, उस दशामें मनुष्य कहता है कि मेरा मन अन्यत्र चला गया था, इसलिए मैं इस आनन्द, रति और प्रजेत्पत्तिका ज्ञान नहीं प्राप्त कर सका। प्रज्ञासे पृथक रहकर दोनों पैर किसी भी गमन क्रियाका बोध नहीं कश सकते, उस दशामें मनुष्य यह कहता है कि मेरा मन अन्यत्र चला गया था, इसलिए मैं इस गमन-क्रियाका अनुभव नहीं कर सका। कोई भी बुद्धिवृत्ति प्रज्ञासे पृथक होनेपर नहीं सिद्ध हो सकती, उसके द्वारा क्षातव्य वस्तुका बोध नहीं हो सकता।।७॥ न वाचं विजिज्ञासीत वक्तारं विद्यान्न गन्धं विजि ज्ञासीत घातारं विद्यान्न रूपं विजिज्ासीत रूपविदं विद्यान्न शब्दं विजिज्ञासीत भोतारं विद्यान्नान्नरसं विजिज्ञासीतान्न- रसस्य विज्ञातारं विद्यान्न कर्म विजिज्ञासीत कर्तारं विद्यान्न सुखदुःखे विजिज्ञासीत सुखदुःखयोर्विज्ञातारं विद्यान्नानन्द रतिं न प्रजातिं विजिज्ञासीतानन्दस्य रतेः प्रजातेविज्ञातारं ६२

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कौषीस कि-उपनिषद् [अध्याय व

विद्यान्नेत्यां विजिज्ञासीतैतारं विद्यान्न मनो विजिज्ञासीत मन्तारं विद्यात्ता वा एता दशैव भूतमात्रा अधिप्रज्ञं दश प्रज्ञामात्रा अधिभूतं यद्धि भूतमात्रा न स्युर्न प्रज्ञामात्रा: स्युर्यद्वा प्रज्ञामात्रा न स्युर्न भूतमात्रा स्युः ॥८।। भावार्थ-वाणीको जाननेकी इच्छा न करे; वक्ताको-वार्णीके प्रेरक आत्माको जाने। गन्वको जाननेकी इच्छा न करे; जो गन्वको ग्रहण करनेवाला आत्मा है, उसको जाने। रूपको जाननेकी इच्छा न करे; रूपके ज्ञाता साक्षी आत्माको जाने। शब्दको जाननेकी इच्छा न करे; इसे सुननेवाजे आत्माको जाने। अन्नके रसको जाननेकी इच्छा न करे; उस अन्नरसके ज्ञाता आत्माको जाने। कर्मको जाननेकी इच्छा न करे; कर्ता आत्माको जाने। सुख्-दुःको जाननेकी इच्छा न करे; सुख- दुःखके विज्ञाता साक्षी आत्माको जाने। आनन्द, रति और प्रओोत्पत्तिको जाननिकी इच्छा न करे; व्ानन्द रति और प्रजेत्पत्तिके ज्ञाता आत्माको जाने। गमन- क्रिया को जाननेकी इच्छा न करे; गमन करनेवाले साक्षी आत्माको जाने। मनको जाननेकी इच्छा न करे; मनन करनेवाले आत्माको जाने। वे ये दस ही भूतमात्राएँ (नाम आदि विषय) है, जो प्रजामें स्थित हैं तथा प्रज्ञाकी भी दस हो मात्राएँ (वाक आदि इन्द्रियरूप) हैं, जो भूतोंमें स्थित हैं। यदि वे प्रसिद्ध भूनमात्राएँ न हों तो प्रज्ञाकी मात्राएँ भी नहीं रह सकतीं और प्रश्ञाकी मात्राएँ न हों तो भूतमात्राएँ भी नहीं गह सकतीं। इन दोमेंसे किसी भी एकके द्वारा किसी भी विषय अथवा इन्द्रियकी सिद्धि नहीं हो सकती। तात्पर्य यह कि इन्द्रियसे विषयकी और विभ्यसे इन्त्रियकी सत्ता जानी जाती है, यदि केवल विषय हो तो निषयसे विषयका ज्ञान नहीं हो सकता अथवा यदि केवल इन्द्रिय रहे तो उससे भी इन्द्रियका ज्ञान होना सम्भत्र नहीं है। अतः भूनमात्रा और प्रश्ञामान्राका (विषय तथा इन्द्रिय दोनोंका) होना अवश्यक है।। ८ ॥ न हन्तरतो रूपं किंचन सिध्धेन्नो एतन्नाना, तदथा रथस्यारेषु नेमिरर्पितो नाभावरा अपरपिता एवमेवैता भूत- मात्रा: प्रज्ञामाश्रास्वर्पिताः प्रज्ञामात्राः प्राणे अर्पिताः।स

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मन्त्र & ] विद्याविनोष भाष्य ४६१

पष प्राण एव प्रज्ञात्मानन्दोSजरोऽमृतो न साधुना कर्मणा भूयान्नो एवासाधुना कर्मणा कनीयानेष ह्येवैनं साधु कर्म कारयति तं यमेभ्यो लोकेभ्य उन्निनीषत एष उ एवैनम साधु कर्म कारयति तं यमधो निनीषते एष लोकपाल एष लोकाधिपतिरेष सर्वेशः स म आत्मेति विद्यास्स म म आत्मेति विद्यात्॥ ६।।

भावार्थ-विषय और इन्द्रियोंमें जो परस्पर भेद है, वैसा प्रज्ञामात्रा और भूतमा- त्रामें भेद नहीं है-इस आशयसे कहते हैं-इनमें नानात्व नहीं है। अर्थात् प्रज्ञामात्रा और भूतमात्राका जो स्वरूप है, उसमें भेद नहीं है। वह इस प्रकार समझना चाहिये। जैसे रथकी नेमि अरोंमें और अरे रथकी नाभिके आश्रित हैं, इसी प्रकार ये भूतमात्राएँ प्रज्ञामात्राओंमें स्थित हैं और प्रज्ञामात्राएँ प्राणमें प्रतिष्ठित हैं। वह यह प्राण ही प्रज्ञात्मा, आनन्दमय, अजर और अमृतरूप है। वह न तो अच्छे कर्मसे बढ़ता है और न खांटे कर्मसे छोटा ही होता है। यह प्राण एवं प्रज्ञारूप चेतन परमात्मा ही इस देहाभिमानी पुरुषसे साधुकर्म करवाता है। वह भी उसीसे करवाता है, जिसे इन प्रत्यक्ष लोकोंसे ऊपर ले जाना चाहता है; तथा जिसे वह इन लोकोंकी अपेक्षा नीचे ले जान चाहता है, उससे असाधु कर्म करवाता है। यह लोकपाल है, यह लोकोंका अधिपति है और यह सर्वेश्वर है। इन सब गुणोंसे युक्त वह प्राण ही मेरा आत्मा है-इस प्रकार जाने। वह मेरा आत्मा है, इस प्रकार जाने ।। ह।।

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४९२ कौपीतकि-उपनिषद् [अध्याय ४

चतुर्थ अध्याय

अथ गाग्यो ह वै बालाकिरनूचानः संस्पष्ट आस सोऽवसदुशीनरेषु संवसन्मस्स्येषु कुरुपश्चालेषु काशीविदेहे- ्विति स हाजातशत्रुं काश्यमेत्यावाच ब्रह्म ते ब्रवाणीति तं होवाचाजातशत्रुः सहस्त्रं सदस्त इत्येतस्यां वाचि जनको जनक इति वा उ जना धावन्तीति ॥ १॥ भावार्थ-गार्गगोत्रंमें उत्पन्न एवं गार्ग्य नामक एक ब्राह्मण थे, जो बलाकाके पुत्र थे। उन्होने सम्पूर्ण वेदोंका अध्ययन किया था, वे वेदोंके अच्छे वक्ता भी थे। उन दिनों सब ओर उनकी बडी रयाती थी। वे उशीनर देशके निवासी होते हुए भी सदा विचरण करते रहनेके कारण कभी मत्स्य देशमें, कभी कुरुपाख्रालमें और कभी काशी तथा मिथिला-प्रान्तमें रहते थे। इस प्रकार वे सुभसिद्ध गाग्य एक दिन काशीके विद्वान् राजा अजातशत्रुके पास गये और अभिमानपूर्वक बोले- राजन्, मैं तुम्हारे लिए ब्रह्मतत््वका उपदेश करूँगा। गार्ग्यके यों कहनेपर राजा अजातशत्रुने कहा-ब्रह्मन् ! आपकी इस बातपुर हम आपको एक हजार गौएँ देते हैं। निश्चय ही आजकल लोग जनक-जनक कहते हुए उनके समीप दौड़े जाते हैं। अर्थात् राजा जनक ही ब्रह्मविद्याके श्रोता और दानी हैं, ऐसा कहकर प्रायः लोग उन्हींके निकट जाते हैं। आज आपने हमारे पास इसी उद्देश्यसे आकर राजा जनकके समान ही हमारा गौरव बढ़ाया है। अतः हम आपको एक हजार गौएँ देते हैं।। १।

स होवाच बालाकिर्य एवैष आदित्ये पुरुषस्तमेवाह- मुपास इति तं होवाचाजातशरुर्मा मैतस्मिन्संवादयिष्ठा बृहत्पाण्डरवासा अतिष्ठाः सर्वेषां भूतानां मूर्घेति वा अह. मेतमुपास इति स यो हैतमेवमुपास्तेऽतिष्ठाः सर्वेषां भूतानां मूर्धा भवति॥ २ ॥

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पम्त्र ३-४ ] विद्याविनोद भाष्य ४६३

भावार्थ-नब वे प्रसिद्ध गार्ग्य बोले-राजन्, यह जो सूर्यमण्डलमें अन्त- रयामी पुरुष है, इसीकी मैं ब्रह्मबुद्धिसे उपासना करता हूँ। यह सुनकर उनसे प्रसिद्ध राजा अजातशत्रुने कहा-नहीं-नहीं, इसके विपयमें आप संवाद न करें। निश्चय ही यह सबसे महान् और शुक्क वसत्र धारण करनेवाला है। यह सचका अतिक्रमण करके सबसे ऊँची स्थितिमें स्थित है तथा यह सब। मस्तक है। इस प्रकार मैं इसकी उपा- सना करता हूँ। इसी प्रकार वह मनुष्य भी, जो इस प्रसिद्ध सूर्यमण्डलान्तर्गत पुरुषकी इस रूपमें उपासना करता है. सबका अतिक्रमण करके सबसे ऊँची स्थितिमें स्थित होता है तथा समस्त भूनोंका मस्तक माना जाता है॥ २ ॥ स होवाच बालाकिर्य एवैष चन्द्रमसि पुरुषस्तमेवाह- मुपास इति तं होत्राचाजातशत्रुर्मा मैतस्मिन्संवादयिष्ठाः सोमो राजाऽन्नस्यात्मेति वा अहमेतमुपास इति स यो हैतमेवमुपास्तेन्नस्यात्मा भवति॥ ३ ॥ भावार्थ-तब गाग्य बोते यह जो चन्द्रमण्डलमें अन्तर्यामी पुरुप है, इसीकी मैं ब्रह्म रूपसे उपामना करता हूँ। यह सुनकर उनसे प्रसिद्ध राआ अज्ञानशत्रुने कहा-नहीं नहीं, इसके विषयमें आप सम्वाद न करें। यह सोम राजा है और अन्नका आ मा है। निश्चय ही इस प्रकार मैं इसकी उपासना करता हूँ। इसी प्रकार वह भी, जो इस प्रसिद्ध चन्द्रमण्डलान्तर्गत पुरुपकी इस रूपमें उपासना करता है, अन्नका आत्मा होता है यानी अन्न-राशिसे सम्पन्न होता है।। ३। स होवाच बालाकिर्य एवैष विद्युति पुरुषस्तमेवाह- मुपास इति तं होवाचाजातशत्रुर्मा मैतस्मिन्संवादयिष्ठा- स्तेजस आत्मेति वा अहमेतमुपास इति स यो हैतमेव. मुपास्ते तेजस आत्मा भवति॥४॥ भावार्थ-गार्ग्य वाले-गह जो विद्युम्मण्डलमें अन्तर्यामी पुरुष है, इसी की मैं श्रह्मरूपसे उपासना करता हूँ। यह सुनकर उनसे प्रसिद्ध राजा अजञात- शत्रुने कहा-नहीं नहीं, इसके विषयमें आप संवाद न करेयह तेजका आलमा है, निश्वय ही इम सावसे मैं इसकी उपासना करता हूँ।

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४६४ कौषीतकि सवर्वनषद्

इसी प्रकार वह भी जो इस प्रमिद्ध विद्युन्मण्डलान्तर्गत पुरुपकी इस रूपमें उपा- सना करता है इस ते नसे महान् तेजस्त्री होता है ॥४ ॥ स होवाच बालाकिर्य एवैष स्तनयिलौ पुरुषस्तमेवाहं ब्रह्मोपास इति तं होवाचाजातशत्रुर्मा मैतस्मिन्सवादयिष्ठाः शब्दस्यात्मेति वा अहमेतमुपास इति स यो हैतमेवमुपास्ते शब्दस्यात्मा भवति ॥ ५ ॥ भावार्थ-गाग्यने कहा-यह जो मेघमण्डलमें अन्तर्यामी पुरुष है, इसीकी मैं ब्रम्मरूपसे उपासना करता हूँ। यह सुनकर उनसे प्रसिद्ध राजा अजञातशत्रुने कहा-नहीं नही, इसके निषयमें आप सवाद न करें। यह शब्दका आत्मा है- निश्चय ही इसी भावसे मे इसकी उपासना करता हूँ। इसी प्रकार जो इस प्रसिद्ध मेघ मण्डलान्तर्गत पुरुपकी इस रूपमें उपासना काता है, वह समस्त वाड्मयके समस्त तातपर्यका ज्ञाता हो जाता है।। ५ ॥ स होवाच बालाकिर्य एवैष आकाशे पुरुषस्तमेवाह. मुपास इति तं होवाचाजातशत्रुर्मा मैतस्मिन्संवादयिश्ठाः पूर्णमप्रवर्ति ब्रह्मेति वा अहमेत्मुपास इति स यो हैतमेव- मुपास्ते पूर्यंते प्रजया पशुभिनो एव स्वयं नास्य प्रजा पुरा कालात्प्रवर्तते ॥ ६ ॥ भावार्थ-भ्यने कहा-यह जो आकाशमण्डलमें अन्तर्यामी पुरुप है, इ सीकी मै ब्रह्मरूपसे उपासना करता हूँ। यह सुनकर उनसे प्रसिद्ध राजा अजातश- च्ुने कहा-नही, इसके विपयमें आप सवाद न करें। यह पूर्ण, प्रवृत्तिशून्य और ब्रह्म (सबसे शृहत्) है, निश्चय ही इसा भावसे मै इसकी उपासना करता हूँ। इसी प्रकार वह भी, जो इस प्रसिद्व आकाशमण्डलान्तर्गत पुरुपकी इस रूपमें उपासना करता है, प्रजा और पशुसे पूर्ण होता है। इसके सित्रा, न तो स्व्रयं वह उपासक और न उसकी अंतान ही मनुष्यके लिए नियत सामान्य आयुसे पहले सत्युको प्राप होती है।। ३ ।।

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विद्याविनोद भाष्य

स होवाच बालाकिर्य एवैष वायौ पुरुषस्तमेवाहमुपास इति तं होवाचाजातशत्रुर्मा मैतस्मिन्संवादयिष्ठा इन्द्रो वैकु- ण्ठोऽपराजिता सेनेति वा अहमेतमुपास इति स यो हैत- मेवमुपास्ते जिप्णुर्हं वाऽपराजयिष्ुरन्यतस्तज्ज्यायान् भवति ।७॥ भावार्थ-तथ फिर गारग्य बोले-यह जो वायुमण्डलमें अन्तर्यामी पुरुष है, इसीकी मैं ब्रह्मरूपसे उपासना करता हूँ। यह सुनकर उनसे प्रसिद्ध गजा अज्ञातश- घुने कहा-नहीं-नहीं, इसके विषयमें आप संवाद न करें। यह परम ऐश्व्यसे सम्पन्न वहीं भी कुण्ठित न होनेवाला और कभी परास्त न होनेवाली सेना है। निश्चय ही इसी भावसे मैं इसकी उपासना करता हूँ। इसी प्रकार वह भी, जो इस प्रसिद्ध वायुमण्डलान्तर्गत पुरुपकी इस रूपमें उपासना करता है, अवश्य ही विजयशील, दूसरोंस पगजत न होनेवाला और शत्रु ओंपर विजय पानेवाला होता है।।७ ॥ स होवाच बालाकिर्य एवैषोऽस पुरुषस्तमेवाहमुपास इति तं होवाचाजातशत्रुर्मा मैतस्मिन्संवादयिष्ठा विषास- हिरिति वा अहमेतमुपास इति स यो हैतमेवमुपास्ते विषासहिहैंवान्वेष भवति॥८ ॥ भावार्थ-गाग्यने फिर कहा-यह जो अभिमण्डल में अन्तर्यामी पुरुष है, इस की मैं ब्रह्म रूपसे उपामना करता हूँ। यह सुनकर उनसे प्रसिद्ध राग अजञातश- चुने कहा-नहीं-नहीं, इसके बिषयमें आप संबाद न करें। यह विषासहि (दूसरोंके आक्रमणका सह सकनेवाळा) है, निश्चय ही इसी भावसे मैं इसकी उपासना करता हूँ। इसी प्रकार वह उपासक भी, जो प्रसिद्ध अग्रिमण्डतान्वर्गत पुरुप की इस रूपमें उपासना करता है, वह उपासनाके पश्चात् विपासहि (दूसरोंका बेग सह सकने- वाळा) होता है॥ ८ ॥ स होवाच बालाकिर्य एवैषोऽसु पुरुषस्तमेवाहमु- पास इति त होवाचाजातशत्रुर्मा मैतस्मिन्संवादयिश्ठ

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कौषीतकि-सपनिषद् [अध्याय ४

नाम्न आत्मेति वा अहमेतमुपास इति स यो हैतमेवमु- पास्ते नाम्न आत्मा भवतीत्यधिदैवतमथाध्यात्मम्॥ ६॥ भावार्थ-गाग्यने कहा-यह जो जलमण्डउमें अन्नर्यामी पुरुष है, इसीकी मैं ब्रह्मरूपसे उपासना करता हूँ। यह सुनकर उनसे प्रिद्ध राजा अजातशत्रुने कहा-नहीं-नहीं, इसके विषयमें आप संवाद न करें। यह नामका आत्मा है अर्थात् जितने भी नामधारी जीव हैं, उन सबका आत्मा-जीवनरूप है। निश्चय ही इसी भावसे मैं इसकी उपासना करता हूँ। इसी प्रकार वह भी, जो इस प्रसिद्ध जलमण्- ान्तर्गत पुरुषकी इम रूपमें उपासना करता है, नामधारी जीवमात्रका आत्मा होता है। यह अधिदैवत उपासना बतायी गयी। अब अध्यात्म-उपासना बतायी जाती है॥। ९ ।। स होवाच बालाकिर्य एवैष आदर्शे पुरुषस्तमेवाहमु- पास इति तं होताचाजातशत्रर्मा मैतस्मिन्संत्रादयिष्ठाः प्रतिरूप इति वा अहमेतमुपास इति स यो हैतमेवमुपारते प्रतिरूपो हैवास्य प्रजायामाजायते नाप्रतिरूपः ॥ १० ॥ भावार्थ-गार्ग्य ऋषि फिर बोले-यह जो दर्पणमें पुरुत है, इसीकी मैं ब्रह्मरूपसे उपासना करता हूँ। यह सुनकर उनसे प्रसिद्ध राजा अजातशत्रुने कहा- नहीं-नहीं, इसके विपयमें आप संवाद न करें। यह प्रतिरूप है-निश्चय हो इसी बावसे मैं इसकी उपासना करता हूँ। इसी प्रकार वह भी, जो इस दर्पणान्तर्गत पुरुषकी इस रूपमें उपासना करता है, उस प्रतिरूपगुणसे विभूषित होता है। इसकी संततिमें सब उसके अनुरूप ही जन्म लेते हैं, प्रतिकूल रूप और स्वभाव- बाले नहीं॥ १० ॥ स होवाच बालाकिर्य एवैष प्रतिश्रुत्कायां पुरुषस्तमे- वाहमुपास इति तं होवाचाजातशत्रुर्मा मैतस्मिन्संवादयिष्ठाः द्वितीयोऽनपग इति वा अहमेतमुपास इति स यो हैतमे- वमुपास्ते विन्दते द्वितीयादुद्वितीयवान्भवति॥११॥

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मन्त्र १२-१३ ] विदयाविनोद भाष्य ४६७

भावार्थ-गा्ग्यने फिर कहा-यह जो प्रतिध्वनिमें पुरुन है, हनीकी मैं ब्रह्मरूपसे उपासना करता हूँ। यह सुनकर उनसे प्रसिद्ध राजा अजातशत्रुने कह- नहीं-नहीं इसके विपयमें आप संबाद क करें। यह द्विनीय और अनपग है. निश्चय ही इसी भावसे मैं इसकी उपामना करता हूँ। इसी प्रकार वह भी, जो इस प्रतिध्व- निगत पुरुषकी इस रूपनें उपासना करता है, अपने सिवा द्वितीय स-पुत्रादिको प्राप्त करता है तथा सदा द्वतीयधान् बल रहता है: अर्थात् उन स्त्री-पुत्र आदिसे उसका वियोग नहीं हाता ॥ ११॥ स होवाच बालाकिर्य एवैष शब्द: पुरुषमन्वेति तमे- वाहमुपास इति तं होवाचाजातशत्रुर्मा मैतस्मिन्संवाद- यिष्ठा असुरिति वा अहमेतमुपास इति स यो हैतमेवमु- पास्ते नो एव स्वयं नास्य प्रजा पुरा कालात्संमोहमेति॥१२ ॥ भावार्थ-तब ऋषि गार्ग्य बोले-यह जो जाते हुए पुरुषके पीछे ध्वन्या- त्मक शब्द उसका अनुसरण करता है, उसीकी मैं ब्रह्मरूपसे उपासना करता हूँ। यह सुनकर उनसे प्रसिद्ध राजा अजातशत्रुने कहा-नहीं-नहीं, इसके विषयमें आप संवाद न करें। यह प्राणरूप है, निश्चय ही इसी भावसे मैं इसकी उपासना करता हूँ। इसरी प्रकार वह भी, जो इसकी इस रूपमें उपासना करता है, न तो स्वयं पूरी 'आयुके पहले मृत्युको प्राप्त होता है और न उसकी संतान ही पूर्ण आयुके पहले निधनको प्राप्त होती है।। १२ ।। स होवाच बालाकिर्य एवैष छायापुरुषस्तमेवाहमुपास इति तं होवाचाजातशत्रुर्मा मैतस्मिन्संवादयिष्ठा सृत्युरिति वा अहमेतमुपास इति स यो हैतमेवमुपास्ते नो एव सवयं नास्य प्रजा पुरा कालात्प्रमीयते। १३ ॥ भावार्थ-तब गाग्यने कहा-यह जो छायामय पुरुष है, इसीकी मैं ब्रक्- रूपसे उपासना करता हूँ। यह सुनकर उनसे प्रसिद्ध राजा अजातशत्रुने कहा- नहीं-नहीं, इसके विषयमें आप संवाद न करें। यह मृत्युरूप है-निश्रय ही इसी भावसे मैं इसकी उपासना करता हूँ। इसी प्रकार जो इसकी इस रूपमें उपाखना ६३

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४९८ कौषीतकि-उपनिषद् [अध्याय ४

करता है, न सो स्वयं ही मनुष्यके लिये सामान्यतः नियत आयुसे पहले वह मृत्युको प्राप्त होता है और न उसकी सन्तान ही समयसे पहले जीवनसे वियुक्त होती है।। १३ ।। स होवाच बालाकिर्य एवैष शारीर: पुरुषस्तमेवाह- मुपास इति तं होवाचाजातशत्रुर्मा मैतस्मिन्संवादयिष्ठाः प्रजापतिरिति वा अहमेतमुपास इति स यो हैतमेवमुपास्ते प्रजायते प्रजया पशुभिः ॥१४ ॥ भावार्थ-गाग्यने फिर कहा-यह जो शरीरान्तवर्ती पुरुष है, इसीकी मैं ब्रह्मरूपसे उपासना करता हूँ। यह सुनकर उनसे प्रसिद्ध राजा अजातशत्रुने कहा- नहीं-नहीं, इसके विषयमें आप संवाद न करें। यह प्रजापतिरूप है, निश्चय ही इस भावसे ही मैं इसकी उपासना करता हूँ। इसी प्रकार वह भी, जो इसकी इस रूपमें उपासना करता है, प्रजा और पशुओंसे सम्पन्न होता है॥ १४॥ स होवाच बालाकिर्य एवैष प्राज्ञ आत्मा येनैतत्सुपः स्वप्रमाचरति तमेवाहमुपास इति तं होवाचाजातशत्रुर्मा मैतस्मिन्संवादयिष्ठा यमो राजेति वा अहमेतमुपास इति स यो हैतमेवमुपास्ते सर्व हास्मा इदं श्रेष्ठयाय यम्यते॥ १५॥ भावार्थ-यह सुनकर गार्ग्य बोले-यह जो प्रज्ञासे नित्य संयुक्त प्राणरूप आत्मा है, जिससे एकताको प्राप्त होकर यह सोया हुआ पुरुष स्वम्मार्गसे विचरता है, नाना प्रकारके स्वप्रोंका अनुभव करता है, उसीकी मैं ब्रह्मरूपसे उपासना करता हूँ। यह सुनकर उनसे प्रसिद्ध राजा अज्ञातशत्रुने कहा-नहीं-नहीं, इसके विषयमें आप संवाद न करें। यह यम राजा है-निश्चय ही इसी भावसे मैं इसकी उपासना करता हूँ। इसी प्रकार जो इसकी इस रूपमें उपासना करता है, उस उपासककी श्रेष्ठताके लिए यह खारा जगत् नियमपूर्वक चेष्ा करता है॥ १५॥ स होवाच बालाकिर्य एवैष दचिणेSनन्पुरुषस्तमेवा- इसुपास इति तं होवाचाजातशत्रुर्मा मैतस्मिन्संवादयिष्ठा

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मन्त्र १६-१८ ] विद्याविनोद भाष्य ४९९

नान्न आत्माऽग्नेरात्मा ज्योतिष आत्मोति वा अहगेतमुपास इति स यो हैत मेवमुपास्त एतेषां सर्वेषामात्मा भवति॥१६॥ भावार्थ-प्रत्युत्तर में गाग्यने कहा-यह जो दाहिने नेत्रमें पुरुष है, उसीकी मैं ब्रह्मरूपसे उपासना करता हूँ। यह सुनकर उनसे प्रसिद्ध राजा अजातशत्रुने कहा-नहीं-नहीं, इसके विषयमें आप संवाद न करें। यह नामका आत्मा, अभिका आत्मा तथा ज्योतिका आत्मा है, निश्चय ही इसी भावसे मैं इसकी उपासना करता हूँ। इसी प्रकार वह भी, जो इसकी इस रूपमें उपासना करता है, इन सबका आात्मा होता है॥ १६ ॥ स होवाच बालाकिर्य एवैष सव्ये Sक्षन्पुरुषस्तमेवाहमु- पास इति तं होवाचाजातशत्रुर्मा मैतस्मन्संवादयिष्ठाः सत्यस्यात्मा विद्युत आत्मा तेजस आत्मेति वा अहमेतमु- पास इति स यो हैतमेवमुपास्त एतेषां सर्वेषामात्मा भवतीति॥१७ ॥ भावार्थ-गार्ग्य फिर बोले-यह जो बायें नेत्रमें पुरुष है, इसीकी मैं ब्रश्म- रूपसे उपासना करता हूँ। यह सुनकर उनसे प्रसिद्ध राजा अजातशत्रुने कहा- नहीं-नहीं, इसके विषयमें आप संवाद न करें। यह सत्यका आत्मा, विध्ुत्का आत्मा और तेजका आत्मा है, निश्चय ही इसी भावसे मैं इसकी उपासना करता हूँ। इसी प्रकार वह भी, जो इसकी इस रूपमें उपासना करता है, इन सबका आत्मा होता है।। १७ ।। तत उ ह बालाकिस्तूष्णीमास तं होवाचाजातशत्रुरेता वन्नु बालाका३इ इति एतावद्धीति होवाच बालाकिस्तं होवा- चाजातशत्रुर्मृषा वै किल मा संवादयिष्ठा ब्रह्म ते ब्रवाणीति, स होवाच यो वै बालाक एतेषा पुरुषाणां कर्ता यस्य वैतस्कर्म स वै वेदित्तव्य इति तत उह चालाकि: समि-

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कौषीत कि-उपनिषद् [अष्याय ४

त्पाशि: प्रतिचक्रम उपायानीति, तं होवाचाजातशत्रुः प्रति- लोमरूपमेव्र तत्स्याव्यत्क्षत्रियो ब्राह्मणमुपनयेत्। एहि व्येव सा ज्ञपयिष्यामीति तं ह पाणावभिपद्य प्रवव्राज तौ ह सुप्तं पुरुषमाजग्मतुस्तं हाजातशत्रुरामन्त्रयांचक्रे बृहन्पाण्ड रवासः सोम राजन्निति, स उ ह तूष्णीमेव शिश्ये। तत उ हैनं यष्टचाSडविचिच्षेप स तत एव समुत्तस्थौ त होवाचा- जातशत्रुः क्वैष एतद्वालाके पुरुषोऽशयिष्ट कवैतदभूत्कुत एतदागा ३ दिति तत उ ह बालाकिर्न विजजे॥ १८ ॥ भावार्थ-उसके बाद बालाकि गाग्य चुप हो गये। तब उनसे प्रसिद्ध राजा अजातशत्रुने कश्ा-बालाके, क्या इतना ही आपका ब्रह्मज्ञान है ? इस प्रश्नपर गार्ग्य बोले-हॉ इतना ही है। तब उनसे राजा अजातशत्रुने कहा-तब तो ठयर्थ ही आपने मेरे साथ यह सवाद किया था कक मैं तुम्हे ब्रम्मका उपदेश करूँगा। बलाका- नन्दन, अवश्य ही जो आपके बनाये हु इन सभी सोपाधिक पुरुगोका कर्ता है अथवा ये सभी जिसके कर्म हैं, वही जानने योग्य है। यह सुनकर ऋषि गार्ग्य, हाथमें समिधा लेकर उनके पास गये और बोले- मैं आपको गुरु बनानेके लिये समीप में आया हूँ। तब राजा अजातशत्रुने कहा-यह बिपरीत बात हो जायगी यदि क्षत्रिय ब्राह्मणको शिष्य बनानेके लिये अपने समीप बुलाये। इसलिये आइये एकान्तमे चले, वहॉ आपको मैं अवश्य ब्रह्मका ज्ञान कराऊँगा। यो कहकर राजाने बालाकि गार्ग्यका हाथ पकड़ लिया और वहाँसे चल दिये। वे दोनो एक सोये हुए पुरुषके पास चले आये। वहा प्रसिद्ध राजा अजात- शत्रुने उस साये हुए पुरुषको पुकारा-

ओ बृहन् ' हे पाण्डरवासा ' हे सरोम राजन्' इस प्रकार सम्जोधन करनेपर भी वह पुरुष चुपचाप सोया हो रहा। तब राजाने उस पुरुषके शरीरपर छरडीसे आघात किया। वह सोया हुआ पुरुष छड़ीकी चोट लगते ही उठकर खडा हो गया। तब बालाकि गाग्यसे राआ अजातशचुने कहा-वालाके यह पुरुष इस

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मुश्न १६ ] विद्याविनोद मान्य

प्रकार अचेत-सा होकर कहाँ सोता था? किस प्रदेशमें इसका शयन हुआ था? और इस जाप्रत्-अवस्थाके प्रति यह कहाँसे चला आया ? राजाके इस प्रकार पूछने पर भी बालाकि गार्ग्य इस रहस्यको समझ न सके॥ १८ ॥

तं होवाचाजातशत्रुर्यत्रैष एतद्वालाके पुरुषोडशयिष्ट यत्रैतदभूदयत् एतदागादिति, हिता नाम हृदयस्य नाड्यो हृदयात्पुरीततमभिप्रतन्वन्ति तद्यथा सहस्रधा केशो विपा- टितस्तावदण्व्यः पिङ्गलस्याणित्रा तिष्ठन्ति शुक्कस्य कृष्णस्य पीतस्य लोहितस्येति तासु तदा भवति यदा सुप्तः स्वमं न कंचन पश्यत्यथास्मिन्प्राण एवैकधा भवति तदैनं वाकू सर्वैरनामभि: सहाप्येति चक्षुः सर्वै रूपैः सहाप्येति भ्रोत्रं सवैः शब्दैः सहाप्येति मनः सर्वैर्ध्यानैः सहाप्येति स यदा प्रतिबुध्यते, यथाग्नेर्जर्वलगो सर्वा दिशो विस्फुलिङ्ग विप्र- तिष्ठेरन्नेवमेवैतस्मादात्मनः प्राणा यथायतनं विप्रतिष्ठन्ते प्राऐोभ्यो देवा देवेभ्यो लोकास्तयथा चुरः चुरधानेऽवहित: स्याद्विश्वंभरो वा विश्वंभरकुलाय एवमेवैष प्रज्ञ आत्मेदं शरीरमात्मानमनुप्रविष्ट आ लोमभ्य आ नखेम्यः ॥ १६।।

भावार्थ-तब राजा अजातशचुने फिर कहा-बालाके, यह पुरुष इस प्रकार अचेत-सा होकर जहाँ सोता था, जहाँ इसका शयन हुआ था और इस जागत्- अवस्थाके प्रति यह जहाँसे आया है, वह स्थान है-'हिता' नामसे प्रसिद्ध बहुत-सी नाड़ियाँ, जो हृदय-कमलसे सम्बन्ध रखनेवाली हैं। वे हृदय-कमलसे निकलकर समूण शरीरमें व्याप्त होकर फैली हुई हैं। इनका परिणाम इस प्रकार है-एक केशको एक हजार बार चीरनेपर जो एक खण्ड हो सकता है, उतनी ही सूच्ष्म वे सबकी सब नाडियाँ हैं। पिकळ अर्थान् नाना प्रकारके संगोंका जो अति सूक्ष्मतम रस है, उससे

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५०२ कौषीत कि-उपनिषद् [अध्याय ४

वे पूर्ण हैं। शुक्र, कृष्ण, पीत और रक्त-इन सभी रंगोंके सूद्मक्षम अंशसे वे युक्त हैं। उन्हीं नाड़ियोंमें वह पुरुष सोते समय स्थित रहता है। जिस समय सोया हुआ पुरुष कोई स्वप्न नहीं देखता, उस समय वह इस प्राणमें ही एकीभावको प्राप्त हो जाता है। उस समय वाक सम्पूर्ण नामोंके साथ इस प्राणमें ही लीन हो जाती है। नेत्र समस्त रूपोंके साथ इसमें ही लीन हो जाता है। कान समग्र शब्दोंके साथ इसमें ही लीन हो जाता है तथा मन भी सम्पूर्ण चिन्तनीय विषयोंके साथ इसमें ही लयको प्राप्त हो जाता है। वह पुरुष जब जाग उठता है, उस समय जैसे जलती हुई आगसे सब दिशाओंकी ओर चिनगारियाँ निकलती हैं, उसी प्रकार इस प्राणस्वरूप आत्मासे समस्त वाकू आदि प्राण निकलकर अपने-अपने भोग्य-स्थानकी ओर जाते हैं। फिर प्राणोंसे उनके अधिष्ठावा अमि आदि देवता प्रकट होते हैं और देवताओंसे लोक नाम आदि विषय प्रकट होते हैं ॥। १६॥ तमेतमास्मानमेत आत्मानोऽनववस्यन्ति यथा श्रेष्ठिनं स्वास्तयथा श्रेष्ठैः स्वैर्भुङक्ते यथा वा स्वाः श्रेष्ठिनं भुअ्य- न्त्येवमेवैष प्रज्ञात्मैतैरारमभिर्भुङ्क्तत। यथा श्रेष्टी स्वैरेवं वैतमात्मानमेत आत्मानो भुअ्जन्ति यथा श्रेष्ठिनं स्व्राः स यावद्ध वा इन्द्र एतमारमानं न विजज्ञे तावदेनमसुरा अभिवभूवुः स यदा विजज्ञेऽथ हत्वाऽसुरान्विजित्य सर्वेषां देवानां श्रैष्ठ्यं स्वाराज्यमाधिपत्यं परीयाय तथो एवैंवं विद्वान्सर्वान्पाप्मनोऽपहत्य सर्वेषां भूतानां श्रैष्ठं स्वाराज्य- माधिपस्यं पर्येति य एवं वेद य एवं वेद ॥। २० ।। भावार्थ-उस आत्माकी उपलब्धिका द्ष्टान्त इस प्रकार है, जैसे-छुरा रखनेके लिये बनी हुई चर्ममयी पेटोमें छुरा रखा रहता है, उसी प्रकार शरीरा- म्तवर्ती हृदय-कमलमें अङ्कुष्टमात्र पुरुषके रूपमें परमात्माकी उपलब्धि होती है। तथा जिस प्रकार अभ्ति अपने नौडमूत अरणी आदि काष्ठमें सवत्र व्याप रहती है,

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वियावनोद भाष्य ५०३

एस्ी प्रकार यह प्रज्ञानवान् आत्मा इस 'आत्मा' नामसे कहे आनेवाले शरीरमें नखसे शिखातक व्याप है। इस साक्षी आत्माका ये वाक आदि आत्मा अनुगत सेवककी भाँति अनुसरण करते हैं, ठीक उसी तरह, जैसे श्ेष्ठ गुणोंसे युक्त बनीका उसके आश्रित रहनेवाले स्वजन अनुवर्तन करते हैं। जिस प्रकार घनी अपने स्वजनोंके, साथ भोजन करता है और स्वजन जैसे उस धनीको ही भोगते हैं, इसी प्रकार यह प्रज्ञावान् आत्मा इन वाक आदि आत्माओोंके साथ भोगता है तथा निश्चय ही इस आत्माको ये वाक आदि आत्मा भोगते हैं। प्रसिद्ध देवता इन्द्र जबतक इस आत्माको नहीं जानते थे, तबतक असुरगण इनका पराभव करते रहते थे। किंतु जब वे इस्र आत्माको जान गये, तब असुरोंको मारकर, उन्हें पराजित करके इन्द्र सम्पूर्ण देवताओंमें श्रेष्ठताका पद, स्वर्गका राज्य और त्रिभुवनका आधिपत्य पा गये। उसी प्रकार यह सब जाननेवाला विद्वान् सम्पूर्ण पापोंका नाश करके समस्त प्राण्णियोंमें श्रेष्ठताका पद, स्वाराज्य और प्रसुत्व प्राप्त कर लेता है। जो यह जानता है, जो यह जानता है,उसे पूर्वोक्त संपूर्ण फळ मिलता है॥। २० ।

चतुर्थ अध्याय समाप।

श्रीमत्परमहंस परिवाजकाचार्य ब्रह्मनिष्ठ लोकसंग्रही गीताव्यास श्री १०८ जगद्गुरु महामण्डलेश्रर स्वामी श्रीविद्यानन्दुजी महाराज द्वारा विरचित विद्याविनोद भाष्य स्रमेत वृददारकाण्यादि छपनिषद्भाग समापत।

कौषीतकि-उपनिषद् संपूर्ण।

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अथ शान्तिपाठ: ओं वाङ मे मनसि प्रतिष्ठिता मनो मे वाचि प्रति- छवितमाविरावीर्म एधि। वेदस्य म आणीस्थः श्रुतं मे मा प्रहासी:। अनेनाधीतेनाहोरात्रान्संदधाम्यृतं वदि- ष्यामि। सत्यं वदिष्यामि। तन्मामवतु। तद्वक्तारम- वतु। अवतु मामवतु वक्तारमवतु वक्तारम्॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः ॥ शान्तिः !!