Books / Brahma Sutra Brahma Sutra Sara Artha Dipika of Mauktiknath Yogi Venkateswara Steam Press

1. Brahma Sutra Brahma Sutra Sara Artha Dipika of Mauktiknath Yogi Venkateswara Steam Press

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ब्रह्मसूत्राणि

श्रीमन्महर्षिवर्यव्यासप्रणीतानि।

श्रीमन्मौक्तिकनाथयोगिविरचित- ब्रह्मसूत्रसारार्थदीपिकानाम भाषाटीकासहितानिमी Jain ns

तानि च

क्षेमराज-श्रीकृष्णदासश्रेष्ठिना मुम्बय्यां स्वकीये "श्रीवेङ्कटेश्वर" (स्टीम्) मुद्रणयन्त्रालये मुद्रयित्वा प्रकाशितानि। 1909 संवत् १९६६, शके १८३१.

अस्य ग्रंथस्य पुनमुद्रणादय: सर्वधिकारा: १८६७ तमीय २५ शराज- नियमानुसारेण प्रकाशकाधीना: सन्ति।

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भूमिका।

प्रिय पाठकगण ! इस महादुःखसागररूप संसारके विपे धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष इन चारों पुरुषाथोंकी इच्छा कौन नहीं करते हैं उनमें भी जो अतिउत्तम संस्कारवाले भव्य पुरुष हैं वे अध्यात्म, अधिभूत, अधिदैव इस त्रिविधतापरूप दुःखकी अत्यन्त निवृत्तिके अर्थ परमपुरु- पार्थरूप मोक्षकीही इच्छा करते हैं और अत्यन्त दुःखनिवृत्तिरूप मोक्ष वेदान्तशासत्रके श्रवण, मनन, निदिध्यासनादि साधनोंसे ही होता है और संस्कृत वेदान्तशास्त्रके श्रवण, मनन, निदिध्यासनादि साधनोंमें व्याकरणादि शासत्रके संस्काररहित पुरुपोंकी प्रवृत्ति नहीं होसकती ऐसा विचार करके श्रीमन्महाराजाधिराज छत्रपति जोधपुर महाराजके पुराने दिवान श्रीयुत मुहुतो- पाह्मय पूर्णचन्द्रात्मज भगवद्धक्तिविवेकादिसत्साधनसंपन्न सारासारविचारकठिनकुठारमार- विदारिताशेषमहामोहान्धकार वैश्यजनसमूहदाग्रगणनीय श्रीयुत मुहुता गणेशचंदजीकी प्रार्थनासे संवत् १९५० में श्रीमच्छंकराचार्य भगवत्पूव्यपादकृत भाष्यके अनुसार यह ब्रह्मसूत्रसारार्थ- प्रदीपिकानाम श्रीमद्वेदव्यासभगवत्प्रणीत ब्रह्मसूत्रोंकी भाषाटीका वनायके प्रसिद्ध सेठ खेमराज श्रीकृष्णदासके अतिश्रेष्ट "श्रीवेङ्कटेश्वर" स्टीम्-प्रेसमें मुद्रित करायके सर्वसज्जनोंके अभिसुख मैंने निवेदित की थी, परन्तु उस प्रथम आवृत्तिमें हमारे दृष्टिदोपसे वा छापनेवालेके दष्टिदोपसे कहीं २ अक्षर मात्राकी अशुद्धि रही थीं उन अशुद्धियोंको निकालके यह द्वितीय आवृत्ति बहुत शुद्ध कियी गई है और प्रथम आवृत्तिमें द्वादशसूत्रोंके पदच्छेद मैंने किये थे पीछे ग्रन्थवृद्धिके भयसे अग्रिमसूत्रोंके पदच्छेद नहीं किये थे अब बहुतसे सज्न कहने लगे कि सब सूत्रोंके पदच्छेद होवें तो बहुत उपयोगी होवे इससे इस द्वितीय आवृत्तिमें सव सूत्रोंके पदच्छेद कर दिये हैं सो भव्य पुरुप देखेंगे और भूलचूक माफ करेंगे. यहभी ्यान रहे कि, इस अंथका पुनर्सुद्रणादि सर्वाधिकार "श्रीवेङ्कटेश्वर" (स्टीम्) यन्त्रालयाव्यक्ष सेठ खेमराज श्रीकृष्णदास महोदयको दे दियां है। अन्य महाशय छापनेका इरादा न करें इत्यलम्।। श्रीमन्मौक्तिकनाथयोगीन्द्र: अबकी वार तृतीयावृत्तिमें भी संशोधन कर उत्तम व्यवस्थाले इसका सुद्रण हुआहै। आशा है कि सज्जन महोदय इसे स्वीकार कर स्वयं लाभ उठावेंगे और मुझे भी कृतार्थ करेंगे।

भवदीय कृपाकांक्षी- खेमराज श्रीकृष्णदास, "श्रीवेद्ठटेश्वर स्टीमू प्रेस-बँबई,

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॥ श्रीः ।।

अथ ब्रह्मसूत्रविषयाऽनुक्रमणिका।

प्रथमोऽध्यायः १.

सं० विषय. पृष्ठ. सं० विपय. पष्ट

प्रथम: पादः १. उपास्यत्वका कथन ... ... १३-१७ १ त्रह्मविचारकथन १ १६ प्रधान और जीवसे इतर ईश्वर-

२ ब्रह्मको लक्ष्यत्वकथन २ कोही अन्तर्यामि शब्द वाच्य- .. ३ ब्रह्मको वेदकर्तृत्व कथन .... ३ त्वकाकथन ... ... ... १८-२० ४ वेदान्तको न्रह्मवोधकत्वकथन ४ १७ प्रधान और जीवके निराकरण ५ प्रधानको जगत्कर्तृत्वाडभावकथन ५-११ पूर्वक ईश्वरको भूतयोनित्वका ६ आनन्दमयकोशको परमात्मत्व- कथन ... ... ... ... ११-२१ कथन ... ... ... ११-१९ १८ त्रह्मको वैश्वानरश्द वाच्यत्वका ७ आदित्यान्तर्गत हिरण्यमय कथन ... पुरुषको ईश्वरत्व कंथन .... २०-२१ ... .... २४-३२

८ परत्रह्मको आकाश़ शब्दवाच्य- तृतीय: पाद: ३.

त्वकथन १९ सूत्रात्मा हिरण्यगर्भ प्रधानभोक्त्ता .. .... ९ ब्ह्मको आकाश शब्दकी न्याई जीव ईश्वर इनके मध्यमें केवल

... २३ ईश्वरकोही सवोधिष्ठानभूतत्वका १० परत्रह्मको ज्यातिश्शब्दवाच्यत्व कथन ... .. .. • १-७ कथन .... ... .. ... २४-२७ २० प्राण परेशके मध्यमें परेशकोही ११ त्ह्मंको प्राणशब्दग्रतिपाद्यत्व- सत्यशबदकरके श्रेष्टत्वका कथन ८-९ कथन .:. ... .... २८-३१ २१ प्रणव और ब्रह्मके मध्यमें न्रह्मकोही द्विंतीयः पाद: २. अक्षर शब्द वाच्यत्वका कथन १०-१२ १२ ब्रह्मको उपास्यत्वका कथन ... १-८ २२ अपर और परन्नह्मके मध्यमें १३ ब्रह्मको जगत्कर्तृत्वकाकथन ... ९-१० परन्नह्मकोही त्रिमात्रप्रणव करके १४ चेतन जीव और ईश्वरको हद्द- ध्ययत्वका कथन ... ... १३ हागतत्वकाकथन ... .... ११-१२ १'१ छाया और जीव और अन्यदेव २३ दहराकाशकरके प्रतीयमान वियद्.

इनको त्यागके परत्रह्मकोही जीव ब्रह्म इनके मध्यमें ब्रह्मकोही दुहराकाशवाच्यत्वका फथन .:.. १४-१८

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(६) ब्रह्मसूंत्र -

सं० विषय. पृष्ठ, सं० विपय, पृष्ठ, २४ अक्षिपुरुष करके प्रतीयमान जीव परेशके मध्यमें परेशकोही तत्पद ३५ त्राण चक्षु श्रोत्र मन अन्न इन- को पच्चप च्चजनशब्दवाच्यत्व- वाच्यत्वका कथन ... ... १९-२१ २५ जगत्प्रकाशत्व करक प्राप्त भया का कथन .. .. .... ११-१३

सूर्यादि तेजःपदार्थ चैतन्यके ३६ त्रह्मप्रतिपादक वेदान्तवाक्यस-

मध्यमें चैतन्यकोही तत्प्रका- मन्वयको युक्ति युक्तत्वका कथन १४-१५

शत्वका कथन ३७ प्राण जीव परमात्माके मध्यमें ... .... २२-२३ २६ जीवात्मा परमात्माके मध्यमें परमात्माकोही समस्त जगत्- परमात्माकोही अंगुष्ठमात्र पुरुष कंतृत्व करके वालाकि करके शन्दवाच्यत्वका कथन ... २४-२५ व्रह्मत्वन उक्त पोडश पुरुषको २७ देवतोंको निर्गुणविद्याके विषे कर्तृत्वका निराकरण .... ... १६-१८

अधिकारका कथन ... .... २६-३३ ३८ संशयित जीव परमात्माके मध्य-

२८ शूद्रको वेदानधिकारकथनपूर्वक में परमात्माकाही श्रवण मनना- शोकाऽडकुलताकरके शूद्र नाम- दि विपयीकृतत्वका कथन ... १९-२२ मात्रधारी जानश्रुति राजाको ३९ व्रह्मको निमित्त उपादान उभय वेदविद्याकी प्राप्तिका कथन ... ३४-३८! कारणत्वका कथन ... .. २३-२७ २९ प्राणशब्दकरके वज्र वायु परेश ४० शत्युक्त परमाणु शून्यादिकोंको इनके मध्यमें परेशकोही प्राण- जगत्कारणत्वनिराकरणपूर्वक शच्दवाच्यत्वका कथन ३९. न्रह्मकोही जगत्कारणत्व कथन २८ ३० ब्रह्मको परज्योतिष्टका कथन ४० इति प्रथमोऽव्यायः॥१॥।

३१ ्रह्मको आंकाश श्द वाच्यत्व- का कथन द्वितीयोऽध्याय: २. ... ... ४१ ३२ ब्रह्मको विज्ञानमयशब्द वाच्य- प्थम: पादु: १. त्वका कथन ... ... ... ४२-४३ चतुर्थः पाद: ४. ४१ सांख्यस्मृतिकरके वेदसंकोचको अयु कत्वकथन ... ... १-२ ३३ कारणावस्थाको प्राप्त हुये स्थूल- ४२ योगस्मति करके वेदसंकोचको शरीरकोही अव्यक्त शच्द वा- अयुक्तत्व कथन ... ३

च्यत्वका कथन १-७ ४३ वैलक्षण्याख्ययुक्तिद्वाराऽपि वेदा- ... ३४ श्रुतिप्रमित प्रकृति और स्मृति- न्तवाक्यको अबाधत्वका कथन ४-११ संमत प्रधानके सध्यमें तादश ४४ काणात् वौद्धादिकोंकी स्मृति- प्रकृतिकोही अजाशव्दवाच्यत्व- युक्तिकरके भी वेदान्तवाक्यको का कथन ८-१० अवाध्यत्वका कथन ... ... १२

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विषयानुकमणका। (७)

सं० विपय. पृष्ठ. सं० विपय, पृष्ठ,

४५ भोत्तृ भोग्य भेदवाले परत्रह्म- ५६ परमाणुसंयोगकरके जगदुत्प- कोभी अवाध्य अद्वैतत्वका- त्तिको युक्ति विरुद्धत्व १२-१७ कथन ... ... . १३ ५७ ईश्वरसे मिन्न और वाह्यवस्तु ४६ त्रह्मके विषे भेद अभेदकी व्या अस्तित्ववादि वौद्धविशेषोंके स- वहारिकत्व और अद्वैतत्वको म्मत जो परमाणु और शब्द- पारमार्थिकत्वका कथन .... १४-२० स्पर्शादिक तिनको जगदुत्पा- ४७ सर्वज्ञता करके जीव और संसा- दकत्वमतखण्डन ... ... १८-२७ रको मिथ्या और अपनेको नि- ५८ विज्ञानवादिवौद्धसंमत विज्ञा- लंप देखनेवाले परमेश्वरक्तो नको जगत्कर्तृत्वादि खण्डन ... २८-३२ हिताहितभाग्दोप भावका कथन २१-२३ ५९ जीवादि सप्तपदार्थवादी बौद्धके ४८ अद्वितीय त्रह्मकोभी क्रमकरके नानाकार्यसष्टिकी संभावनाका मतका खडन ... ... ... ३३-३६ ६० तटस्थ ईश्वर वादको अयुक्तत्त्रक- कथन ... ... ...... २४-२५ ४९ ईश्वरको उपादानरूप परिणामि- थन ... .. ... ३७-४१ ६१ जीवोत्पत्त्यादिकोंको अयुक्तत्व- कारणत्वका व्यवस्थापन .... २६-२९ कथन 1 ... ५० ईश्वरको अशरीरी होनेपरभी ... ... ४२-४५

मायावित्व कथन तृतीय: पाद: ३ ... .... ३३-३१ ५१ नित्यतृप्त ईश्वरकोभी प्रयोज- ६२ वेदान्तवादीके मतमें आकाशको नके बिना अशेष जगत्के उत्पा- अनित्यत्वकथन ... ... १-७

द्कत्वका कथन ........ ... ३२-३३ ६३ स्वरूपवाले ब्रह्मसे वायुकी उत्प- ५२ कर्म करके नियंत्रित जीवको त्तिका कथन ... ... V सुख दुःखका निमित्तमात्र और ६४ चिद्रपन्नह्मको अनन्यत्व और जगत्के संहारका कर्त्ता जो जगजजनकत्वकथन ... ईश्वर तिसको नैर्धृण्य दोषाभा- JO ६५ कार्यकारणके अभेदकरके वायु- वका कथन ... ... ३४-३६ .५३ निर्गणव्रह्मकाभी विचर्त्तरूप क- भूतब्रह्मस तजकी सृ० क० ... १०

रके प्रकृतित्व सिद्धि ... ६६ वेदोक्त तेजोरूप ब्रह्मसे जलोत्प- ३७ त्तिका कथन ... द्वितीय: पाद: २: ११ ६७ छान्दोग्यउपनिपद्में उक्त जलसे ५४ सांख्यानुमतप्रधानको जगद्धेतु- उत्पन्न भये अन्नको पृथिवीत्व्का त्वखण्डन .. १-१० कथन .... .... ... ... १२ ५५ असदशोद्भवमें काणाद हष्टा- ६८ पूर्वपूर्वकार्योपाधिक ज्रह्मसे उत्त- न्तका अस्तित्व ११ रोत्तर कार्योत्पत्तिकथन .... १३

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(6) ब्रह्ममत्र-

सं० विपय. सं० विपय, पृष. ६९ लयकालमें पृथिन्यादिकोके वि- ८२ प्राणको अनादित्व खंडनपूर्वक परात क्रमका कल्पन कथन ... १४ तिसकी उत्पत्तिका समाधान ८ ७० प्राणादिकोंका भूतोंके विषे ,३ प्राणवायुको स्वतंत्रताका कथन ९-१२ अन्तभीव होनेसे तिनको सृष्टि- ८४ प्राणको समष्टिरूपकरके आधि- क्रमका भंग नहीं ... १५ दैविकी विभुता और आध्या- ७१ देहके जन्ममरणको मुख्य होने त्मिकी अल्पता अदश्यता च से जीवको तिनकी गौणता ... २६ इन्द्रियवत् .. .. .. १३ ७२ जीके जन्मको औपाधिक हो- ८५ इन्द्रियगणको देवविशेषाधानत्व्र नेसे जीवको वस्तुतो नित्यत्व २७ कथन ... १४-१६

०३ जीवको अचिद्रपत्वखंडनपूर्वक ८६ विलक्षण होनेसे प्राणसे इन्द्रिय-

चिदूपत्वका कथन ... १८ को पृथक्त्व कथन ... ... १७-१९ .

७४ जीवको अणुत्वखंडनपूर्वक सर्व- ८७ सर्वजगन्ंक रचनेमें जीवको अशेक्त होनेसे और ईशकोसर्व- गतत्व्रका कथन .. १९-३२: ७५ जीवको अकर्तृत्वखंडन पूर्वक शक्तिमान् होनेसे ईशकोही जग- त्कर्तृत्व कथन .. कतत्वप्रतिपादन ... ३०-२२ ... .. ३३-३९ ७६ जीवकर्तृत्वको अध्यस्त होनेसे इति द्विर्तीयोऽव्यायः ॥२॥

अवास्तवत्वकथन ... -तृतीयोऽध्याय: ३. ७७ जीवको ईश्वर करके प्रवृत्त होने- से रागप्रवृत्तत्वाभाव ... ... ४१-४२ प्रथम: पाढ: १.

७८ औपाधिक कल्पनाकरके जीव ८८ भावि शरीर बीजरूप सूक्ष्मभूत-

ईशकी और जीवोंकी परस्पर वेष्टित जीवका यहांसे गमन ... १-७

व्यवहारव्यवस्था ·.. ४३-१३/ ८९ कमान्तरकरके सानुशय जीवका चतुर्थ: पाद: ४. लोकान्तरमें आरोहण ...... ८-११

७९ इन्द्रियोंको अनादित्वखंडनपूर्वक ९० पापियोंका यमलोकमें गमन १२-२१ ९१ अवरोही जीवको वियदादि आत्मसमुत्पन्नत्वकथन ... १-४ समानत्वकथन .... ... २२ ८० इन्द्रियोंकी एकादश संख्या ९२ स्वगसे अवतरणकालमें स्वर्ग- वेदान्तसम्मत .... ... : ५-६ वृष्टि पृथिवी पुरुष योपित् इनके ८१ सांख्यमतमें इन्द्रियोंको सर्व- विपे क्रमसे उत्पन्न जीवका स्वर्ग गतत्वनिराकरणपूर्वकपारिच्छि- और वृष्टिमें जो जन्म तिसमें न्त्वका कथन ७ त्वरा इतरके विषे विलंत :। २३

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विषयातुक्रमणिका । (९)

सं० विषय, पृष्ट. सं० विषय. पृष्ठ,

९३ सस्यादिकोंमें जीवका मुख्य व्यवस्थापक विधिका अभाव जन्म नहीं किंतु संग्लेषमात्र २४-२७ होनेतें तिनको उपसंहर्त्तव्यत्व ११-१३ द्वितीय: पाद: २ १०८ पुरुपज्ञानको संसार कारण

९४ स्वप्रदृष्टिको मिथ्यात्वकथन .... १-६ अज्ञानका निवर्त्तक होने तैं

९५ सुपुप्तिस्थानरूप हृद्यस्थब्रह्मको पुरुषकोही वेद्यत्वकथन ... १४-१५'

एकत्वस्थापन ... १०९ ईश्वरकोही आत्मशव्द वाच्य- .. " .. ९६ स्वप्नावस्थित जीवकाही स्नमस त्व है विराटको नहीं ... १६-१७

समृद्रोधन ... ... ९ ११० काण्व और छान्दोग्यपष्टीको ९७ मूच्छाको जाग्रदादि अवस्थासे वस्तुएकत्व्र कथन ... ... १८

भिन्नत्वकथन ... :.. ... १० १११ प्राणोपासनाके प्रति प्राणवि- ९८ त्रह्मको रूपरहितत्व वेदान्त- द्यामें प्राप्त भया जो अनम्रता संमत ... .... .. ... ११-२१ वुद्धि और आचमन तिनमें ९९ त्ह्मको निपधाऽतीतहोनेतैं स- अनग्नताबुद्धिकोही विधेयत्व १९

त्यत्त्र स्था० .... ... ... २२-३० ११२ काण्तोंके अभनिरहस्य न्राह्मणमें १०० त्रह्मसे अन्यको अवस्तुत्व व्य- और वृहदारण्यकमें पठितशा-

वस्थापन ... ण्डिल्य विद्याको एकविघत्व २०-२२ ... ... ३१-३७ १०१ कर्मफलोत्पत्तिके प्रति ईश्वरको- ११३ अहः इति आदित्यगत और ही कतृत्व अन्यको नहीं ... ३८-४१ अहम् इति अक्षिगत वेद्यपुरुपको

तृतीय: पाद: ३. एक होनेतैंभी स्थानविरेपमें

१०२ छान्दोग्य चहदारण्यक श्रुति तन्नाम विशेपको युक्तव ... २३

करके उक्त पभ्चागनिविद्या और ११४ विद्याको एकत्त्रका अभाव

उपासनाको विधि, अनु- होनेतैं संभृत्यादि गुणोंको शा-

प्टानफलकी साम्यतासे एकत् १-४ ण्डिल्यविद्यामें अनुपसंहार्यत्व्र

१०३ गृणापसंहारकोकर्तेन्यत्वकयन ५ ११५ तैत्तिरीयमें और ताण्ड्यशा-

१०४ छान्दोग्य और काण्त्रशाखाका खामें पुरुप विद्याको पृथकृत्व २५ - उद्गोथविद्यासे भेदकथन ... ६-८ ११६ वेद मंत्रप्रवर्ग्यादिकोंको विद्या १०५ त्रह्मदष्टिका हेतु होनेतैं अक्षर अनंगत्व .... ... २६

और उद्गीथको एकत्व कथन ११७ पुण्यपाप विधूननको हाना १०६ वसिष्टत्वादि गुणोंको उपसं- र्थकत्व ..... ... ... २७-२८

हत्तव्यत्वकथन १० ११८ उपासकका अर्चिरादि मार्ग है १०७ आनन्द .सत्यत्त्वादि ब्रह्मके ज्ञानीका नहीं ... २९-३० गुणोंको प्रतिपत्तिफलता परके. ११९ सर्व उपासनाके- विपे. उत्तर सर्व शाखामें समान होनेतैं मार्गका वरिधान ... ... ३१

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:१० ) ब्रह्ममत्र --

सं० विषय, पृष्त, सं० विषय. पृष्ठ.

१२० ब्रह्मज्ञानीकी नियमसे मुक्ति रादि विद्याको वेद ब्रह्मको नतुपाक्षिकी ... ३२ भिन्न होनतें भिन्नत्व कथन ... ५८ ... १२१ आत्मस्वरूपलक्षकनिषेधाका १३५ आत्माकी सगुण उपासनामें परस्परमें उपसंहर्तव्यत्व ... ३३ एककी वा दोकी वा बहुतकी १२२ ऋतंपिवंतौ इस मंत्रमें और उपासनाका वैकल्पिक नियम

द्वासुपणौ इस मंत्रमें एकवेद्य ३५ कथन ...

१२३ एक शाखामें स्थित उषस्त क १३६ विकल्प करके वा समुचय

होल ब्राह्मणमें एकविद्या करके प्रतोक उपासनाको ऐ-

कथन. ... ३५-३६ च्छिकत्व .. .. ... ... . ६०

१२४ उपासनाके अर्थ पृथक होनेतैं १३७ विकल्प और समुच्चयको यथा-

उपास्यका द्विविधज्ञान ... ३७ कामता ... .. ६१-६६

१२५ सत्यविद्याको एकत्व प्रतिपादन ३८ चतुर्थः पाद: ४. १२६ दहराकाश और हार्दीकाशको १३८ आत्मज्ञानको स्त्रतंत्रत्त्र है उपसंहत्तव्यत्व .... ३५ क्रत्वर्थत्व नहीं और ऊर्द्धरताके ... १२७ उपासकके भोजनमें प्राणाहु- आश्रमको अस्तित्वव्यवस्थापन १-१७ तिके लोपकी आपत्ति ... ४०-४१ १३९ लोककी कामनावाले आश्रमी- १२८ उद्रीथकर्मकी अंगीभूत देवतो- को व्रह्मनिष्ठत्वकी अयोग्यता १८-२० पासनाको अनियतत्व ... १४० उद्रीथाऽवयव ओंकारको १२९ संवर्गविद्योकत आधिदैव वायु ध्येयत्व ... २१-२२ .. ... और अध्यात्मप्राणके अनुचि- १४१ औपनिषदके आख्यानको वि न्तनको पृथक्त्व कथन 1 ... ४३ च्यास्तावकत्व ... २३-२४ १२० मनश्च्चिदादिकोंको स्वतंत्र वि- १४२ आत्मबोधको कर्माऽनपेक्षत्व २५

द्यात्वका स्वीकार ... .. ४४-५२ १४३ विद्याको स्वोत्पत्तिमें कर्म- १३१ भौक्तिककोआत्मत्वखंडनपूर्वक सापेक्षत्व .... :२६-२७

तदुन्यको आत्मत्वप्रति० .... ५३-५४ १४४ आपत्कालमें सर्वाSन्रभक्षण २८-३१

१३२ ऐतरेयगत उक्थउपासनामें १४५ विद्यांके अर्थ आश्रमके धर्म पृथिव्यादिदृष्टिके कौषीतकीमें यज्ञादिकोंका सुकृत अनुष्ठान ३२-३५ लमानता .... ... ... ५५-५६ १४६ अनाश्रमीको ज्ञानकी संभावना ३६-३९ १३३ विराटरूप समग्र वैश्वानरको १४७ आश्रमीको. अवरोहाजभावनि- ध्यातन्यत्व है, तिसके अंशको रूपण ४०

नहीं ..... .... .... ५७ १४८ म्रष्ट ऊर्द्धरेताको प्रायश्वित्तका . १३४ अनुष्ठानके योग्य शांडिल्पदह- सद्धाव ... ४१-४२ ...

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विषयातुक्रमणिका। (११)

सं. विषय, पृष्ठ. सं० विषय.

१४९ भ्रष्ट ऊर्द्धरेताके प्रायश्ित्तको १६५ जैसेज्ञानोदय कालमें संचित आमुष्मिकशुद्धिजनकत्व्र और पुण्यपापका नाश होता है तस ताहश शुद्धिवालेको न्यवहा- आरव्य पुण्यपापके नाशका राजयोग्यत्व .... ... .... ४३ अभाव ... १५ २५० उपासनाको ऋत्विककमत्व- १६६ अग्निहोत्रादि नित्यक्कर्मका वि- कथन ... ... ४४-४६ द्योपयोगी जो अंश तिसकाअ- १५१ मौनको विधेयत्वकथन ... ४७-४९ विनाश ... .... ... १६-१७ १५२ वाल्यको भावशुद्धित्व और १६७ सोपासन और निरुपासन जो कामचारत्वाऽभाव ... ... ५० नित्यकर्म तिसको तारतम्यता १५३ इस जन्ममें वा जन्मान्तरमें करक विद्यासाधनत्व . १८ ज्ञानोत्पत्ति ... .. ... ५१ १६८ अधिकारीको मुक्तिका सद्भाव १९ १५४ सालोक्यादि मुक्तिका जन्य 1 होनेतैं सातिशयत्व आर नि- द्वितीय: पाद: २.

र्वाण मुक्तिको निरतिशयत्व ५२ १६९ मनके त्रिपे वागादिकोंकी वृत्ति-

इति तृतियोऽव्यायः ॥ ३॥ का लय है स्वरूपसे नहीं .... १-० १७० प्राणके विषे मनकी वृचिका चतुर्थोऽध्याय: ४: लय ... ... ३ ... ...

प्थम: पाद: १. १७१ प्रणका जीवमें लय पुनः भू-

१५५ श्रवणादिकोंको आवर्तनीयत्व १-२ तोमें लय ... ... ... ४-६

१५६ झञाता जीवके स्वात्मता करके १७२ ज्ञानी और अज्ञानीकी उत्का-

ब्रह्मका ग्रहण न्ति सम ३ ... ... ... ... ... १५७ प्रतीककेविषेअहंदप्टिकाअभाव १७३ तेजादिकोंका वृत्तिद्वारा परमा-

१५८ अन्रह्म प्रतीकके विषे ब्रह्मधी- त्मामें लय .... ८-११

कर्त्तव्यत्न ... .... .... ५ १७४ देहसे प्राणोत्कान्तिका निषेध १२-१४

१५९ कमके अंगमे आदित्यादि ह- १७५ तत्त्व्रज्ञानीके वागादिकों का

ष्टिको कर्त्तव्यत्व ६ परमात्मामें लय १५ ... १६० उपासनामें आसनका नियम ७-१० १७६ तत्त्वज्ञानीके वागादिकोंका निः- १६१ ध्यानके साधन ऐकाग्न्यको शेष करके परमात्मामें लय ... १६ प्रधान होनेतैं दिग्देशकालका १७७ उपासककी उत्कान्तिकी विशे- अनियम .. " ११ ता ... .... १७ १६२ उपासनाकी मरणपर्यत आ- १७८ रात्रिमें मरणवालेको भी रश्मि- . वृत्ति १२ .१८-१९ ... की प्राप्प्ति .. १६३ ज्ञानीका पापलेपका अभाव १३१७९ दक्षिणायनमं मरे उपासकको १६४ ज्ञानीको पुण्यलेपका अभाव १४ ज्ञानफलकी प्राप्ति ... ... २०-२१

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( १२ ) ब्रह्मसूत्र-विषयानुक्रमणिका ।

सं० विषय, पृष्ठ. सं० विपय. पृष्ठ.

तृतीय: पाद: ३. चतुर्थः पाद: ४.

१८० अर्चिरादि व्रह्मलोकमार्गकी १८६ मुक्तिरूपवस्तुकोपुरातनत्व .... १-३ १८७ सुक्तपुरुषको ब्रह्मसे अभिन्नत्व एकता ... १ १८१ संवत्सर और आदित्यके म- १८८ मुक्त स्वभूत त्रह्मको युगपत्स- विशेषत निर्विशेषत्व .. ध्यमें देवलोक वायुलोकका १८९ अर्चिरादि मार्ग करके न्रह्म- सन्निवेश ... ... ... २ लोकको प्राप्त भये उपासकक १८२ वरुणादिकोंके सन्निवेशसे अ- भोग्यवस्तुकी सृष्टिमें मानस चिरादि मार्गका व्यवस्थापन संकल्पकोही हतुता ... ८-5

१८३ अर्चिरादिकोंको आतिवाहि- १९० एक पुरुषकोभी देहके भाव

कृत्व ... अभावमें एच्छिकत्व ... १०-१४ ... १८४ उत्तरमार्ग करके काय ब्रह्मके १९१ सर्वदेहोंको सात्मकत्व ... १५-१६

। प्रति गमन ... ७ -- १४ १९२ ब्रह्मलोकमें गये उपासकको ... १८५ प्रतीकोपासकको ब्रह्मलोककी जगत्सृष्टिके विषे स्वतंत्रता नहीं परंतु भोग मोक्षमें स्वतंत्रताहै १७-२२ अप्राप्ति ... ... १५ -- १६। इति चतुर्थोऽध्याय: ॥४ ॥ ॥ इति ब्रह्मसूत्रविषयाऽतुक्रमणिका।।

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अथ ब्रह्मसूशराण

भाषाटीकासहितानि।

प्रथमोडध्याय: १.

प्रंथम: पाद:। ॐ-अथातो ब्रह्मजिज्ञासा॥१॥ प्रणम्य सच्चिदानंदं गुरुं चाज्ञाननाशकम्।। सारार्थं ब्रह्मसूत्राणां कथयामि यथामति॥३ ॥ इस सूत्रके-अथ१अतः२ ब्रह्मजिज्ञासा शयह तीन पद हैं।। अथ शब्दका आनंतर्य अर्थ है। अतः शब्दका हेतु अर्थ है। ब्रह्म जिज्ञासा शब्दका अर्थ ब्रह्मको विषय करनेवाली इच्छा है। कर्तव्य पदका अध्याहार करना। तथाच। यस्मात् अग्निहोत्रादिकोंका फल जो स्वर्गादिक सो अनित्य है तस्मात धर्मजिज्ञासाके अनंतर अथवा साधनसंपत्तिके अनंतर ब्रह्म की जिज्ञासा (जाननेकी इच्छा) करनी अथवा ब्रह्मका विचार करना यह सूत्रका सारार्थ है।। १॥ प्रथम तत्रमें कहा है कि ब्रह्मकी जिज्ञासा सुसुक्षु पुरुषको करने योग्य है तिस ब्रह्मका लक्षण क्या है अतः भगवान् सूत्रकार ब्रह्मकां तटस्थ लक्षण कहते हैं।।

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(२) बह्मसूत्राणि। [अध्याय १ जन्माद्यस्य यतः ॥२।। इस सूत्रके-जन्मादि १ अस्यर यतः ३ यह तीन पद हैं। जन्म शब्दका अर्थ उत्पत्ति है। आदि शब्दसे स्थिति और प्रलय गृहीत होते हैं। अस्य इस पदका अर्थ नामरूपात्मक संपूर्ण जगत् है।। यतः यह कारणका निर्देश है। तथाच॥ नामरूपात्मक संपूर्ण जगत्का जन्म स्थिति प्रलय (यतः) जिस सर्वज्ञ सर्वशक्तिमान् कारणरूप परमेश्वरसे होतेहैं सो ब्रह्महै। यह सूत्रका सारार्थ है और इसी अर्थको "यतो वा इमानि भूतानि जायंते येन जातानि जीवंति यत्प्रयंत्यभिसं विशंति" ॥ यह श्रुति भी कहती है। इसका अर्थ यह है कि जिस कारण रूप परमेश्वरसे यह भूत(प्राणी) उत्पन्न होतेहैं और जिस करके जीवते हैं और जिसको प्राप्त होके लीन होते हैं सो ब्रह्म है ॥। २ ।। पूर्व जो कहा कि नामरूपात्मक सर्व जगत्का कारण सर्वशक्तिमान ब्रह्म है इसी अर्थको दढ करते हैं भगवान् सूत्रकार ॥ शास्त्रयोनित्वात्॥ ३ ॥ इस सूत्रका-शास्त्रयोनित्वात् १ यह एकही समस्त पद है।। अनेक विद्याका स्थानभूत और सर्व अर्थका प्रकाशक जो महान् ऋग्वेदादि शास्त्र तिसका योनि (कारण) ब्रह्म है. ऐसे ऋग्वेदादि शास्त्रका सर्वज्ञ ब्रह्म के दिना अन्य कोईभी कारण नहीं होसकता॥अथवा ऋग्वेदादि शास्त्रही ब्रह्मसद्भादमें योनि (कारण) अर्थात् प्रमाण है॥ ३॥ ब्रह्म में वेद प्रमाण नहीं होसकता, काहेतैं वेद यज्ञादि क्रियाको तथा उपासनाको कहता है और ब्रह्म सिद्धवस्तु है, तिसको वेद प्रतिपादन करे नहीं। इस पूर्वपक्षको दूर करते हैं भगवान् सूत्रकार॥ तत्तु समन्ययात्।४।। इस सूत्रके-तत् १ तुर समन्वयात् यह तीन पद हैं।। तु शब्दका १ व्याकरण रीतिसे समास किये पदको समस्त कहते हैं।

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पाद १ ] भाषाटी का सहितानि। ( ३ )

अर्थ पूर्वपक्षकी निवृत्ति है। तव्शब्दका अर्थ जगत्की उत्पत्ति स्थिति लयका कारण सर्व शक्तिमान् ब्रह्म है। समन्वयात् इस पदका अर्थ सर्व वेदान्त वाक्योंका तात्पर्यसे व्रह्ममें संबंधहै।। तथा च ।।(तत) जगत्की उत्पत्ति स्थिति लयका कारण सर्व शक्तिमान् ब्रह्म वेदांत शास्त्रसे प्राप्त होता है।। कथम् ? (कैसे) (समन्वयात) सर्व वेदांत वाक्योंका तात्पर्य करके ब्रह्ममें संबंध होनेतैं॥४॥ सांख्यशास्त्रवादी त्रिगुणात्मक अचेतन प्रधान प्रकृतिको जगत्- का कारण मानंते हैं तिनका मत दूर करते हैं भगवान् सूत्रकार॥

इस सूत्रके-ईक्षतेः १ न २ अशव्दम् ३ यह तीन पद हैं॥ ईक्षतेः इस पदका अर्थ ईक्षण (संकल्प) है। न शव्दका अर्थ निषेध है। अशब्दम् इस पदका अर्थ इहां प्रधान है ॥ तथा च I (अशव्दम्) प्रधानप्रकृति जगत्का कारण।(न)नहीं है कथम्-(ईक्षतेः)"तदैक्षत बहु स्यां प्रजायेय" इत्यादि श्रुतिमें ईक्षणका श्रवण होनेतैं ईक्षण चेतनमें होता है अचेतन प्रधानमें नहीं होसकता। श्रुतिका अर्थ यह है। तत्। सत शव्दवाच्य कारण ब्रह्म ईक्षण करता भया मैं बहु प्रपंचरूप करके उत्पन्न होओं इति ॥५।। पूर्व जो कहा कि अचेतन प्रधान जगतका कारण नहीं हो सकता है।ईक्षणका श्रवण होनेतें। सो ईक्षण जैसे "तत्तेज ऐक्षत"सो तेज ईक्षण करता भया इति श्षत्यर्थ:॥ इस श्रुतिवाक्यमें उपचारमात्रसे अर्थात् अमुख्यतासे अचेतन तेजमें ईक्षणप्रतीत होताहै तैसे अचेतन प्रधान में भी हो सकता है इस शंकाको दूर करते हैं भगवान् सूत्रकार।।

इस सूत्रके-गौण: १ चेत् २ न ३ आत्मशब्दात्४ यह चार पदहैं।। गौण शब्द का अर्थ अमुख्यता है। चेतू शब्दकाअर्थ यदिहै। न शब्द

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(8-) ब्रह्ममूत्राणि। [ अध्याय १

का अर्थ निषेध है। आत्मशब्दात् इस पदका अर्थ हेतु है।। तथा च। (चेत्) यदि अचेतन तेजकी न्याईं सांख्यवादी अचेतन प्रधानमेंभी (गौणः) अमुख्य ईक्षण कहें सो (न) काहिये नहीं हो सकता है। कस्मात काहेतें (आत्मशब्दात्) ईक्षणका मुख्य कर्ता ब्रह्महै तिस ब्रह्ममें ही चेतन जीव रूप करके आत्मशब्दका प्रयोग होनेतें॥६॥ पूर्व जो कहा कि आत्मशव्दका प्रयोग अचेतनमें नहीं हो सकताहै किंतु जीव चेतनमें होता है सो समीचीन नहीं, काहेतें आत्मशब्द का प्रयोग चेतन और अचेतन दोनोंमें साधारण होनेतें। जैसे इंद्रि- यात्मा इस वाक्यमें आत्मशब्दका प्रयोग अचेतन इंद्रियमें है तैसं अचेतन प्रधानमेंभी हो सकता है इत्याशंक्याह !! तन्निष्ठस्य मोक्षोपदेशात॥७॥ इस सूत्रके-तन्निष्टस्य १ मोक्षोपदेशात् २ यह दो पद हैं॥। तन्निष्ठस्य इसपदका अर्थ सत्पदार्थ ब्रह्मविषे अभेद ज्ञानवान् पुरुष है। मोक्षोपदेशात इस पदका अर्थ मोक्षका उपदेश है॥ तथा च। सत्पदार्थ ब्रह्मविषे अभेद ज्ञानवाले पुरुषको मोक्षका उपदेश कथन है। और प्रधान सत् शब्दका वाच्य नहीं है।। ७॥ प्रधान सत् शब्दका वाच्य क्यों नहीं है अत आह।।

इस सूत्र के-हेयत्वावचनात१ चशयह दो पदहैं। हेयत्व जो त्याग तिसका अवचन नहीं कहना यह हेयत्वावचानात् इस पदका अर्थ है। च शब्दका अर्थ प्रतिज्ञाविरोधहै॥ तथाच ॥ यदि अनात्मा प्रधान सत शब्दका वाच्य होवे तो जैसे कोई पुरुष किसीको अरु- न्घती दिखावे सो प्रथम तिसके समीप स्थूलतारेको दिखायके पीछे तिसका त्यागकरायके अरुंधती दिखाताहै।तैसे सआत्मा तत्त्वमसि

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पदा १ ] भाषाटीकासहितानि। (५) इत्यादि वाक्योंमें आत्माको बतायके पीछे तिसका त्याग करायके प्रधानकों बताया चाहिये और नहीं बताता है। और जो आत्मा का त्याग करावे तो प्रतिज्ञाविरोध होवे। कारण कि ज्ञानसे सर्व कार्यका ज्ञान होता है यह प्रतिज्ञा है जैसें सुवर्णके ज्ञानसे सुवर्णके कार्य कुण्ड- लादिकोंका ज्ञान होता है तैसे प्रधानके ज्ञानसे सर्व जगत्का ज्ञान होना चाहिये और होता नहीं है।। ८।। प्रधान शब्दका वाच्य कैसे नहीं है अत आह भगवान् सूत्रकारः॥ स्वाध्ययात ।।९।। इस सूत्रका-स्वाप्ययाव १ यह एकही समस्त पद है।। तथाच। सुधुप्ति अवस्था विषे स्व्र कहिये जीवात्मका सत् शब्द वाच्य पर- मात्मामें (अप्यय लय) होता है। और जिसमें जीवात्मा लीनहोता है सो सत शव्दका वाच्य है और जगत्का करण-है प्रधान करण नहीं है।। ९ ।। प्रधान जगत्का कारण क्यों नहीं है अत आह। गतिसामान्यातू॥ १०॥ इस सूत्रका-गतिसामान्यात्१यह एकही समस्त पद है।। जैसे सर्व नेत्रोंसे एकरूपकाही समान अवगति (ज्ञान) होता है तैसे सर्वं वेदांत शास्त्रसे समान एक चेतन कारणकीही अवगति (ज्ञान) होता है। इसीसे सर्वज्ञ ब्रह्म जगत्का कारण है॥ १० ॥ सर्वज्ञ ब्रह्म जगत्कां कारण कैसे है अत आह।। श्रुतत्वाच् ॥११॥ इस सूत्रके-श्ुतत्वात्१च २ यह दो पद हैं। श्रुतत्वात् इस पदका अर्थ श्रवणहै।च शब्द पुनःअर्थको कहताहै।। तथा च।।(च)पुनः सर्वज्ञ ईश्वर जगत्का कारण है।। क्योंकि श्वेताश्वतरमंत्रोपनिषद्के विषे श्रवण होनेतैं॥ ११ ॥

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(६ ) ब्रह्मसूत्राणि। [अध्याय १- तैत्तिरीय उपनिषद् के विषे अन्नमय १ प्राणमय २ मनोमय ३ विज्ञानमय ४ आनंदमय ५ यह पंचकोश कथन करेहैं। तहां संशय होताहै कि,आनंदमय शब्दसे मुख्य आत्माका ग्रहणहै अथवा अन्नमयादिकोंकी न्याई अमुख्य आत्माका ग्रहणहै? अत आह. सूत्रकार॥। आनंदमयोभ्यासात्॥१२॥ इस सूत्रके-आनंदमयः १अभ्यासात्श्यह दो पद हैं।आनंदमय शब्दका अर्थ इहां सुख्य परमात्मा है।। अभ्यास शब्द का अर्थ वारंवार कथन है।। तथा च। आनंदमय नाम मुख्य परमात्माका है कस्मात अभ्यासात् "आनंदं ब्रह्मणो विद्वान्न विभेति कुतश्चन॥आनंदो ब्रह्मेति व्यजानावर"इत्यादि बहुत श्रुतियोंके विषे आनंद श्दका वारंवार कथन होने तैं। यह इस सूत्रका सारार्थ है।। और प्रथम श्रुतिका अर्थ यह है: ककि ब्रह्मके आनंदको जाननेवाला विद्वान् किसीसे भी भय नहीं करताहै। १। द्वितीय श्रुतिका-जो. आनंदहै सो ब्रह्म जानना यह अर्थ है।। १२।। शंका और समाधानका विधायक सूत्र कहतेहैं॥ विकारशब्दान्नेति चेन्न प्राचुर्यात्।१३॥। इस सूत्रके-विकारशव्दात्१न२ इति ३ चेत्४न५ प्राचुर्याव६यह छह पद हैं।। आनंदमय शब्दसे परमात्माका ग्रहण(न) नहीं हो सकता कस्मात् (विकारशब्दात्) आनंद शब्दके अगाडी व्याकरण सूत्रसे विकार अर्थके विषे मयट् प्रत्यय होनेतैं।। आनंदमय नाम विकारवान का है और परमात्मा विकारवान् नहीं है।( इति चेन्न) ऐसे न कहो। कस्मात् (प्राचुर्यात) प्रचुर अर्थके विषे मयट् प्रत्यय होने तैं॥। आनंदमय नाम प्रचुर (बहुत) आनंदवाले परमात्माका है।। १३॥ इसी अर्थको हढ़ करतेहैं।।

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पाद १] भाषाटीकासाहतानि। (७)

तद्धेतुव्यपदेशाच्॥ १४॥ इस सूत्रके-तद्धेतुव्यपदेशात १ च२ यह दो पद हैं।। जैसे इहां प्राचुर्य अर्थके विषे मयट् प्रत्यय है तैसेही "एष हेवानंदयति" इत्यादि श्रुति ब्रह्मको आनंद हेतुका व्यपदेश कथन करती है यह इस सूत्रका सारार्थ है।। श्रुतिका अर्थ यह है कि यह परमात्मा सर्वको आनंद देताहै। अर्थात सर्वके आनंदका हेतु परमात्मा है इति॥१४ ॥ मांत्रवर्णिकमेव च गीयते॥ १५॥ इस सूत्रके मांत्रवर्णिकम्१एव २च ३ गीयते ४ यह चार पद हैं।। "सत्यं ज्ञानमनंतं ब्रह्म"। इस मंत्रके विषे। सत्य १ ज्ञान २ अनंत ३ इन विशेषणों करिके जो ब्रह्म निश्चित भया है सो(मांत्र- वर्णिकम्) ब्रंह्म है, सो ब्रह्म आनंदमय शब्द करके (गीयते) कथन करिये है।l १५ ॥ नेतरोनुपपत्तेः॥ १६॥ इस सूत्रके-न १ इतरः२अनुपपत्तेः ३ यह तीन पद हैं। ईश्वरसे इतर अन्य संसारी जीवात्माकाआनंदमय शब्द करके कथन नहीं हो- सकता। कस्मात् (अनुपपत्तेः) "सोडकामयत बहुस्यां प्रजायेय" इंत्यादि श्वति आनंदमय कोही जगत्का कर्ता कहती है। सो जगत्का कर्तृत्वपना जीवात्माके विषे अनुपपत्र है यह इस सूत्रका सारार्थ है।। और श्रतिका अर्थ यह है कि सो आनंदमय परमात्मा इच्छा करता भया मैं बहु प्रपंचरूप करके उत्पन्न होओं इति ॥ १६॥ भेदव्यपदेशाच॥ १७॥ इस सूत्रके-भेदव्यपदेशात् १ चश्यह दो पद हैं। (च)पुनःआ- नंदमय संसारी जीव नहीं है। कस्मात् (भेदव्यपदेशात्) आनंदमय १ वनता नहीं।

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(८) ब्रह्मसूत्राणि। [अध्याय १ प्रकरणके विषे "रसो वैसः। रसं ह्येवायं लब्ध्वानंदी भवति" इत्या- दि श्रुतिकरके जीव और आनंदमयके भेदका कथन होनेतैं। यह इस सूत्रका सारार्थ है।। और श्रुतिका अर्थ यह है कि।सो आनंदमय (रस) सुखरूपहै और तिस रसकोही प्राप्त हाके यह जीव आनंदित होता है इति॥ १७ ॥ लनु आनंदरूप सत्त्वगुणवाला प्रधान आनंदमय शब्दका अर्थहै। अत आह॥ कामाच्च नानुमानापेक्षा ।१८॥ इस सूत्रके-कामात १ च २न ३ अनुमानापेक्षा ४ यह चार पद हैं।। आनंदमय प्रकरणके विषे। "सोऽकामयत बदु स्यां प्रजायेय"॥ इस श्रुतिकरके। काम (इच्छा)का निर्देश होनेतें अनुमानसे जानने योग्य सांख्यपरिकल्पित अचेतन प्रधान। आनंदमय शब्दकरके अथवा कारण शब्द करके। अपोक्षित वांछित नहीं है। यह इस सूत्रका सारार्थ है।। और श्रुतिका अर्थ 'नेतरोतुपपत्तेः' इस सूत्रकी व्याख्यामें कर आयेहैं।। १८ ॥ अस्मिन्नस्य च तद्योगं शास्ति॥१९।l इस सूत्रके-अस्मिन् १ अस्य २ च ३ तद्योगम् ४ शास्तिद यह पांच पद हैं। सांख्यपरिकल्पित प्रधान और जीव आनंदमय शब्दके अर्थ नहीं हैं। कथं (अस्मिन्) इस आनंदमय परमात्माके विषे(अस्य) इस प्रतिबुद्ध जीवका (तद्योगं) तदूप करके आनंदस्वरूपकी प्राप्तिको अर्थात् मुक्तिको शास्त्रहै सो। शास्ति। कहता है॥ १९॥ "य एषोंडतरादित्ये य एषोंऽतराSक्षिणि"इत्यादि श्षति उपासनाके वास्ते कहती है कि आदित्यमण्डलके विषे पुरुष है। और नेत्रके विषे पुरुष है। तहां संशय है कि सो पुरुष संसारी है अथवा नित्य सिद्ध परमेश्वर है अत आइ।।

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पाद १ ] भापाटी कास हितानि। (९)

अंतस्तडर्मोपदेशात्॥२०॥ इस सूत्रके-अंतः १ तद्धर्मोपदेशात् २ यह दोपदहैं। आदित्य- मण्डल के विषे और नेत्र के विषे संसारी पुरुष नहींहै। किंतु नित्यसिद्ध परमेश्वर है।। कस्मात्(तद्धमोंपदेशात्)"य आत्मा अपहतपाप्मा"। इत्यादि श्रुतिकरके सर्वपापरहितत्व धर्मका उपदेश होनेतैं। यह इस सूत्रका सारार्थ है।। और श्रुतिका अर्थ यह है कि जो आत्मा है सो अपहतपाप्मा (सर्व पापसे रहित) है। इति ॥ २० ॥ भेदव्यपदेशाच्चान्यः ॥२१॥ इस सूत्रके-भेदव्यपदेशात् १ च २ अन्यः ३ यंह तीन पदहैं।। आदित्यादि शरीराभिमानी जीवसे अंतर्यामी ईश्वर (अन्यः)न्यारा है कस्मात्। भेदव्यपदेशात्)"य आदित्ये तिष्ठन्नादित्यादंतरो यमा- दित्यो न वेद"इत्यादि श्ुतिकरके भेदका व्यपदेश(कथन) होनेतैं।- यह इस सूत्रका सारार्थ है।। और श्रुतिका अर्थ यह है कि जो ईश्वर, आदित्यके विषे स्थित है और आदित्यसे न्यारा है जिसकों आदित्य भी नहीं जानता है इति ॥ २१॥ छांदोग्योपनिषद्के विषे श्रत्ण होताहै कि शालावत्यब्राह्मण जैवा लिराजाके प्रति पूछताभया कि इस भूलोकका तथा अन्य लोकका आधार कौन है? तब राजा कहता भया कि आकाशहै। तहां संशय होताहै कि इहां आकाश शब्द कारकै परब्रह्म का ग्रहणहै अथवा भूताकाशका ग्रहणहै अत आह॥ आकाशस्तलिङ्गात् ॥ २२।। इस सूत्रके-आकाश:१तल्िद्गातर यह दो पद हैं। इहां आकाश शब्द करिकै परब्रह्मका ग्रहण युक्त है। कस्माव (तल्िङ्गात्) "सर्वाणि ह वा इमानि भूतानि आकाशादेव समुत्पद्यंते आकाशं प्रत्यस्तं यंति"

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(१०) ब्रह्मसूत्राणि। [अध्याय १ इत्यादि श्वतिकों ब्रह्मका लिङ्ग ज्ञापक होनेतैं यह इससूत्रका सारार्थ है।। और श्रुतिका अर्थ यह है कि यह सर्वभूत अकाशसेही उत्पन्न होते हैं और आकाशके विषैही लीनहोते हैं और सर्वकी उत्पत्ति और लय- का भूताकाशमें संभव नहीं किंतु परब्रह्ममें संभव है इति ॥ २२ ॥ सामवेदीयोद्रीथप्रकरणके विषेश्रवण होताहै कि। चाक्रायणऋषि प्रस्तोता (स्तुतिकरनेवाले) को कहता भया कि हे प्रस्तोतः जिस देवताकी तूं स्तुति करता है तिस देवताकों नहीं जानके मेरे समीप स्तुति करेगा तो तेरा शिर टूट पडेगा जब प्रस्तोता भयकरके पूछता भया कि सो देवता कौन है। तब ऋपि उत्तर देता भया कि सो देवता प्राण है तहां संशय है कि प्राण शब्दसे परब्रह्मका ग्रहण है अथवा प्राणवायुका ग्रहण है। अत आह॥ अत एव प्राणः॥।२३ ।। इस सूत्रके-अतः १ एव २ प्राणः ३ यह तीन पद हैं॥ इहाँ प्राण शब्दसे परत्रह्मकाही ग्रहण है और प्राणवायुका नहीं। कस्मात्। अतः "सर्वाणि ह वा इमानि भूतानि प्राणमेवाभिसंविशंति प्राणमभ्युज्निः हते" इस श्रुतिके विषे प्राणकों ब्रह्मका लिंग होनेतैं। यह इस सूत्रका सारार्थ है।। और श्रुतिका अर्थ यह है कि सर्वभूति प्राणके विषे लीन होतेहैं।और प्राणसे ही उत्पन्न होते हैं ॥ २३ ॥ छांदोग्यउपनिषद्में श्रवण होता है कि इस दयुलोकसे परे ज्यो; तिका प्रकाश है तहां संशय है कि ज्योतिःशब्दसे आदित्यादिज्यो- तिका ग्रहण है, अथवा परमात्माका ग्रहण है अत आह।। ज्योतिश्ररणाभिधानात्॥२४॥ इस सूत्रके-ज्योति: १ चरणाभिधानीत् २ यह दो पद हैं।।यहां ज्योतिःशब्द करके आदित्यादि ज्योतिका ग्रहण नहीं है किंतु पर- मात्माका ग्रहण है। कस्मात् (चरणाभिधानात)पादोऽस्य सर्वां भूतानि

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पाद १ ] भाषाटीकासहितानि। (११)

त्रिपादस्यामृतं दिवि" इस मंत्र करके चरणपादका अभिधान कथन- होणे तैं। यह इस सूत्रका सारार्थ है।। और मंत्रका अर्थ यह है कि यह सर्व जगत् इस पुरुषका एकपाद अंश है और 'दिवि' स्वप्रक्ा- शस्वरूपके विषे त्रिपाद (अमृतरुप) है॥ २४ ॥ छन्दोभिधानान्नेति चेन्न तथा चेतो- ऽर्पणनिगदात्तथा हि दर्शनम् ॥२५॥ इस सूत्रके-छंदोभिधानाव १ न २ इति३ चेत् ४ न ५ तथा६ चेतोऽर्पणनिगदात् ७ तथा ८ हि ९ दर्शनम् १० यह दश पद हैं।। पूर्वपक्षः॥"पादोस्य सर्वा भूतानि"इस वाक्य करके चतुष्पद गायत्री छंदका अभिधान होनेसे ब्रह्मका अभिधान नहीं है।। उत्तरपक्षःII (इतिचेन्न) ऐसे न कहो। कस्मात्।(तथा चेतोर्पणनिगदात) गायत्री रूपछंदके द्वारा गायत्र्यनुगतब्रह्मके विषे चित्तके समाधानंका कथन होनेसे। जैसे गायत्रीद्वारा ब्रह्मकी उपासना है तैसे औरभी विकार द्वारा ब्रह्मकी उपासना दीखती है॥ २५॥ भूतादिपादव्यपदेशोपपत्तेश्रैवम्॥ २६॥ इस सूत्रके भूतादिपादव्यपदेशोपपत्तेः १च२ एवम् ३ यह तीन पद हैं।। भूत१ पृथिवी २ शरीर ३ हृदय४ यह चार गायत्रीके पादहैं तिनका व्यपदेश जो कथन तिसका (उपपत्तेः। ज्ञान होनेसे (एवम्) "पादोऽस्य सर्वांभूतानि" इस वाक्यके विषे ब्रह्मका ग्रहण है ब्रह्मको नहीं ग्रहण करके केवल छंदके भूतादि पाद नहीं हो सकते ॥२६॥। उपदेशभेदान्नेति चेन्नोभयस्मिन्नप्यावरीधात्ं॥२७॥ इस सूत्रके-उपदेशभेदात् १ न२ इति ३ चेत् ४ न५ उभयास्म- न६ अपि७ अविरोधात् ८ यह आठ पद हैं।। पूर्वपक्षः ।।"त्रिपादस्या- मृतं दिवि" इस वाक्यके विषे 'दिवि' यह सत्तमी विभक्ति आधारको

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.(१२) त्रह्मसूत्राणि। [अव्याय ३ कहती है।। और "यदतः परो दिवोज्योतिर्दीप्यते" इस वाक्यके विषे।। 'दिवः' यह पंचमीविभक्ति मर्यादको कहती है इन पूर्वोक्त वाक्योंसे उपदेशका भेद होनेसे ब्रह्मका ज्ञान नहीं होसकता॥ उत्तरपक्ष: ॥ (इति चेन्न) ऐसे न कहो। कस्मात (उभयस्मिन्नप्यविरोधात्)ब्रह्म- ज्ञानके विषेसतम्यंतपदका और पंचम्यंतपद का अविरोध होनेसे।यह इस सूत्रकां सारार्थ है।।और "यदतःपरोदिवः"इस श्वतिका अर्थ यह है कि इस दिव(स्वर्ग) से परे यज्योतिः। ब्रह्मप्रकाश करताहै इति।।२७।। कौषीतकिव्राह्मणोपनिषदके विषे श्रवण होता है कि दिवोदासका पुत्र प्रतर्दन काशीका राजा स्वर्गमें जायके इंद्रके साथ युद्ध करता भया जब इंद्र प्रसन्न होके बोला कि हे प्रतर्दन तू मैरेसे वर मांग तब प्रतर्दन बोला कि हे इंद्र जो मनुष्यके वास्ते अतिहित वर तूं मानताहै सोई मेरा वर है जब इंद्र बोला कि।।'प्राणोस्मि प्रज्ञात्मा तें मामायुरमृतमित्युपास्त्र इति" अस्थार्थः ॥ मैं प्रज्ञानस्वरूप प्राण हूं तिस मेरी आयु अमृत इस रूप करके उपासना कर इति। तहां संशयहै कि यहां प्राणशब्दसे वायुमात्रका ग्रहण है अथवा देवतात्माका ग्रहणहै अथवा जीवका ग्रहण है अथवा परब्रह्मका ग्रहण है। अत आह।। प्राणस्तथानुगसात्॥ २८ । इस सूत्रके-प्राणः १ तथा २ अनुगमात् ३ यह तीन पद हैं।। यहां प्राणशव्दसे परव्रह्मका ग्रहण है। कस्मात्। (तथानुगमात्) तैसही पूर्वापर पदोंका ब्रह्मके विषे संबंध होनेसे ॥२८ ॥ न वकुरात्मोपदेशादिति चदध्यात्मसंवंध- भूमा ह्यस्मिन्॥२९ ॥। इस सूत्रके-न १ वक्तु: २ आत्मोपदेशात् ३ इति ४ चेत्५अध्यात्म- संबंधभूमा ६ हि ७ अस्मिन्८यह आठ पद हैं।। प्राणशब्दका वाच्य

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पाद १ ] भाषाटीकासहितानि। (१३).

परब्रह्म नहीं है। काहेतैं(वकुरात्मोपदेशात्) तिस मेरी आयु अमृत इस रूप करके उपासना कर यहां देवताविशेष इन्द्रके आत्माका उपदेश होनेसे॥ ऐसा आक्षेप करके समाधान करतेहैं सूत्रकार ॥ (अध्यात्मसम्बन्ध) भूमा ह्यस्मिन् इति॥ अस्मिन् (इस अध्यायके. विषे) अध्यात्मसम्बन्ध जो प्रत्यगात्माका सम्बन्ध तिसका भूम (बाहुल्य) है इसीसे परब्रह्मका प्राणशब्दसे ग्रहण है देवताविशेष इंद्रका नहीं ॥ २९॥ जो प्राणशब्दसे इन्द्रदेवतात्माका ग्रहण नहीं है तो हे प्रतर्दन। ·"मामेव विजानीहि" मेरेहीको तू जान ऐसा अपने आत्माका उपदेश इंद्र क्यों करताभया अत आह॥ शास्त्रदृष्टया तूपदेशो वामदेववत्।३०॥ इस सुत्रके-शास्रदष्टया १ तु २ उपदेशः ३ वामदेववत् ४ यह. चार पद हैं।। जैसे वामदेवऋषि गर्भके विषे कहता भया कि मैं मतु होता भया और सूर्य होता भया। तैसेही इंद्रदेवता अपने आत्माको शास्त्रदृष्टिसे परमात्मा जानके ।! मामेव विजानीहि। ऐसा उपदेश करता भया ॥ ३० ॥ जीवमुख्यप्राणलिङ्गान्नेति चेन्नोपासात्रै विध्यादाश्रितत्वादिह तद्योगाल्॥३१॥ इस सूत्रके-जीवमुख्यप्राणलिद्गत् १ न २ इति ३ चेत् ४ न ५ उपासात्रैविध्यात्६्आश्रितत्वात् ७ इह ८ तद्योगाव९यह नव पद हैं। 'मामेव विजानीहि'इत्यादि वाक्य ब्रह्मके प्रतिपादक नहीं हैं। कस्मात्। 'जीवलिङ्गात् । सुख्यप्राणलिद्गाच्च'"न वाचं विजिज्ञासीत वक्तारं वि- द्यात्" इस वाक्यको जीवका लिङ्ग(ज्ञापक)होनेतैं।।अस्यार्थः'वाचं' वाणाके जाननेकी इच्छा नहीं करनी किंतु वाणाके वक्ताको जानना

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(१४) ब्रह्मसूत्राणि। [.अध्याय १ इति॥और "प्राण एव प्रज्ञात्मा" इस वाक्यको सुख्य प्राणका लिङ्ग होनेतें।इसका अर्थ पूर्व कर आये हैं। समाधान(इति चेन्न)ऐसे न कहो। कस्मात् (उपासात्रैविध्यात्) जीवोपासना १ प्राणोपासना २ ब्रह्मो पासना ३ इस तीन प्रकारकी उपासनाका प्रसंग होनेतैं। और ब्रह्म के योगसे प्राणको ब्रह्मके आश्रित (अधीन) होनेतैं "मामेव विजानीहि" यह वाक्य ब्रह्मपर है॥ ३१॥ इति श्रीमन्मौक्तिकनाथयोगिविरचितयां ब्रह्मसूत्रसारार्थपदी- पिकायां प्रथमाध्यायस्य प्रथम: पादः ॥१॥

प्रथमाध्याये द्वितीय: प्राद: । प्रथमपादके विषे 'जन्माद्यस्य यतः' इस सूत्रकरके सर्वजगवका कारण ब्रह्म कहाहै तहां और भी आनंदसयादि वाक्यों का ब्रह्मके विषे समन्वय कियाहै। जब जिनके विषे ब्रह्मलिंग स्पष्ट नहीं है ऐसे मनो- मयादि वाक्य ब्रह्मके प्रतिपादक हैं अथवा नहीं इस निर्णयके वास्ते द्वितीय तृतीय पादकाआरम्भ है मनोमयत्वादिधर्म करके जीवकी उपासना है अथवा ब्रह्मकी उपासना है अत आह।। सर्वत्र प्रसिद्धोपदेशात्॥१॥ इस सूत्रके-सर्वत्र १ प्रसिद्धोपदेशात् २ यह दो पद हैं॥ सर्व वेदांत शास्त्रके विषे प्रसिद्ध ब्रह्मका उपदेश होनेतैं मनोमयत्वादि धर्म करके परव्रह्मही उपासनाके योग्य है॥। १ ॥ विवक्षितगुणोपपत्तेश्र ॥२॥ इस सूत्रके-विवक्षितगुणोपपत्तेः १च२ यह दो पद हैं॥ विवक्षित (वांछित) जो सत्यकाम सत्यसंकल्पत्वादिगुण तिनका ब्रह्मके विषै उपपत्ति (ज्ञान) हौनेतैं ब्रह्मही उपासनाके योग्य है॥ २॥

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पाद२ ] भाषाटीकासहितानि। (१५)

अनुपपत्तेस्तु न शारीरः।।३॥ इस सूत्रके-अनुपपत्तेः १ तु २न ३ शारीरः४ यह च्यार पदहैं।। सत्यकाम सत्यसंकल्पत्वादि गुणोंको जीवके विषे न होनेतैं शारीर (शरीरके विषे होनेवाला)जीवात्मा मनोमयत्वादि धर्म करके उपास- नाके योग्य नहीं है। किंतु परत्रह्मही उपासनाके योग्यहै। ३॥ कर्मकर्तृव्यपदेशाच् ॥४॥ इस सुत्रके-कर्म कर्तृव्यपदेशात् १च २ यह दोपदहैं।।"एतमितः प्रेत्याभिसंभवितास्मि"। इस श्रुतिवाक्यके विषे। कर्म और कर्त्ता कथन होनेसे मनोमयत्वादि धर्मकरके जीवात्मा उपासनाके योग्य नहीं। किंतु परब्रह्म ही उपासनाके योग्यहै। यह इस सूत्रका सारार्थ हैं।। और श्षतिवाक्यका अर्थ यह है। उपासक जीव कहताहै कि मैं 'इतः' इस लोकसे 'प्रेत्य' मरके 'एतम्' इस मेरे उपास्य परमा- त्माको 'अभिसंभवितास्मि' प्राप्त होऊंगा इति। उपास्य परमात्मा कर्म है और उपासक जीव कर्त्ता है। और जो जीव उपास्य होवै तो एकही जीव कर्म और कर्त्ता नहीं हो सकता॥४॥ शब्दविशेषात्॥५॥ इससूत्रका-शब्दविशेषात्१ यह एकही पदहै।।"यथाव्रीहिवा यंवोवा श्यामाको वाश्यामाकतण्डुलो वैवममयन्तरात्मन पुरुषोहिरण्मयः" इस श्रुतिवाक्यके विषे अन्तरात्मन् यह सतमीविभत्तयंत शब्दजीवा- त्माको कथन करताहै।और 'पुरुषः'यह प्रथमाविभत्त्यंत शब्द मनो- मयत्वादिगुणविशिष्ट परमात्माको कथन करताहै इस रीतिसेशब्द- का भेद होनेतैं जीवात्मासे परमात्मा भिन्न है। इति सूत्रसारार्थः॥ और श्रुतिवाक्यका अर्थ यह है कि जैसे ब्रीहि-चावल। यव-जव। श्यामाक-ऋषिअन्न। श्यामाकतंडुल। शामक चावल। यह तुषके अर्थाव पडदेके भीतर होते हैं तैसे यह 'हिरण्मयः' प्रकाशस्वरूप।

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(१६ ) ब्रह्मसूत्राणि। [ अध्याय ३ 'पुरुषः' परमात्मा। 'अन्तरात्मन्' जीवात्माके भीतर हृदय देशमें है इति॥द ॥ स्मृतेश्च ॥६॥ इस सूत्रके-स्मृते: १ चश्यह दो पदहैं।।"ईश्वरः सर्वभूतानां हद्दे- शेर्ऽर्जुन तिष्ठति।भ्रामयन् सर्वभूतानि यंत्रारूढानि मायया।"इत्यादि स्मृतिसेभी जीवात्माका और परमात्माका भेद सिद्ध होता है। इतिसूत्र सारार्थः॥ और स्मृतिका अर्थ यह है-भगवान् कहते भये कि हे अर्जुन ! ईश्वर-अन्तर्यामी। यंत्र-शरीरके विषे।आरूढ-सर्व जीवों को सायाकरके भ्रमाता है और सर्व प्राणियोंके ह्ृदय देशके विषे स्थित है इति ॥ ६॥ अर्भकौकस्त्वात्तद्यपदेशाच्च नेति चे- न्न निचाय्यत्वादेवं व्योमवच्च।७॥ इस सूत्रके-अर्भकौकस्त्वाद १तद्यपदेशात २ च ३ न४ इतिद चेव ६न ७ निचाय्यत्वात् ८ एवं ९ व्योमवत् १०च११ यह एका दश पद हैं।। पूर्वपक्षII (अर्भकौकस्त्वात्) हृदयरूप अल्प स्थानके विषे होनेतें॥ और "अणीयान् व्रीेर्वा यवाद्वा" इस वाक्यके विषै। व्रीहि चावल तैं। यव जवतैंबी । आणीयान् सूक्ष्मका कथन होनेतें। व्यापक ईश्वर ह्ृदयकमलके विषे नहीं है किंतु सूक्ष्म जीव है।। उत्तरपक्ष: ॥। (इति चेन्न) ऐसे न कहो। कस्मात् (निचाय्यत्वादेवं व्योमवच्च) यद्यपि व्योम (आकाश) व्यापक है तथापि सुईके पाशेमैं अल्पस्थानवाला और सुक्ष्म कहाताहै तैसेही व्यापक ईश्वर हृदयके विषे निचाय्य (देखनेके योग्य) होनेतें अल्पस्थानवाला और सूक्ष्म कहाता है।। ७ ॥ संभोगप्राप्तिरितिचेन्न वैशेष्यात्॥८।। इस सूत्रके-संभोगप्राप्ति: १इति २ चेत ३ न ४ वैशेष्यात५ यह

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पादं २] भाषाटीकासाहतानि। (१७) पांचपदहैं।। सर्वगत ब्रह्मको चेतन होनेतैं औसर्वप्राणियोंकेहदेकेसाथ सम्बंध होनेतैं औ शरीर जीवात्मासें अभिन्नहोनेतैंसुखदुःखादिकोंके संभोगकी प्राप्ति होवैगी (इति चेन्न) ऐसे न कहो । कस्मात् (वैशे- ष्यात्) जीवात्मा धर्माधर्मका कर्त्ता है औ सुखदुःखका भोक्ता है।। औ परमात्मा न धर्माधर्मका कर्त्ता हैऔ न सुखदुःखका भोक्ता है इस रीतिसे जीव और ब्रह्मके विषै विशेषता होनेतैं ॥८ ॥ कठवल्ली उपनिषद्के विषै श्रूवण होता है कि॥ "यस्य ब्रह्म च क्षत्रं चोभे भवत ओदन: मृत्युर्यस्योपसेचनम्। क इत्था वेद यत्र सः" इति ॥ अस्यार्थ :- जिसके ब्राह्मण औ क्षत्रिय यह दोनु ज़ो ओदन (भक्ष्य) हैं औ मृत्यु जिसका उपसेचन (घृत) है। ऐसा सर्वका भक्षक सो इहां है एस कौन जान सकता है इति।अब इहां संशय है कि ब्राह्मण क्षत्रिय औ मृत्यु जिसके भक्ष्य हैं सो अग्नि है अथवा जीव है वा परमात्मा है ? अत आह।। अत्ता चराचरग्रहणात् ॥९॥ इस सूत्रके-अत्ता १ चरचरग्रहणात् २ यह दो पद हैं।। चरा- . चर (स्थावर जंगम)का ग्रहण होनेतैं ब्राह्मण क्षत्रिय मृत्युसे आदिलेके सर्वको भक्षण करनेवाला परमात्माहै और कोई नहीं हो सकता ॥ ९॥ प्रकरणाच्च ॥ १० ॥ इस सूत्रके-प्रकरगात १ च २ यह दो पद हैं। "न जायते त्रियते वा विपश्चित" विपश्चित् (सर्वको जाननेवाला परमात्मा न जन्मता है औ न मरताहै इस प्रकरणसैंबी परमात्माही सर्वका भक्षक होने योग्यहै॥ १ ॥ "ऋतं पिबंतौ सुकृतस्य लोके गुहां प्रविष्टौ परमे परार्धे॥ छाया- तपौ ब्रह्मविदो वदन्ति पंचाग्नयो ये च त्रिणाचकेताः"॥ यहश्रुति

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(१८) [अध्याय१ कठवल्लीके विषे है। तहां संशय है कि इस श्रुतिके विषै वुद्धि औ जीवका निर्देश है वा जीव और परमात्माका निर्देशहै? अत आह। गुहां प्रविष्टावात्मानौ हि तद्दर्शनात्॥११॥ इस सूत्रके-गुहां १ प्रविष्टौ २ आत्मानौ ३ हि४ तदर्शनात् ५ यह पांच पदहैं।हदयाकाशरूप गुहाके विषै जीव औ परमात्मा स्थित हैं बुद्धि जीव नहीं। कस्मात (तद्दर्शनात्) जैसै लोकके विषै गौके समान स्वभाववाली गौ है अश्व नहीं तैसेही चेतन जीवके समान स्वभाववाले चेतन परमात्माक्का दर्शनहोनेतैं बुद्धि औ जीवकासमान स्वभाव नहीं इति सूत्रसायर्थः ॥ औ श्रुतिका अर्थ यह है कि पुण्यकर्मका कार्य जो देह तिसके विषे परब्रह्मका श्रेष्टस्थान हृदय तिसके विषे जो आकाशरूपा वा बुद्धिरूपा गुहा तिस गुहामें स्थितहैं 1 औ अवश्यभावि कर्मफलको भोगते हैं औ छाया धृपकी न्याईं पर- स्पर विरुद्धहैं ऐसे ब्रह्म के वेत्ता पुरुष और पंचागनिके उपासक कर्मिपुरुष औ त्रिणाचिकेत अग्निके उपासक पुरुष कहते हैं इति॥११॥ विशेषणाच्च॥ १२॥ इस सूत्रके-विशेषणात् १च २ यह दो पद हैं।।"आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेवतु" इस वाक्यके विषै 'रथिनं' इस पदको जीवा- त्माका विशेषण होनेतैं औ "सोऽध्वनः पारमाप्नोति तद्विष्णोःपरमं पदम्।।इस वाक्यके विषे 'परमं पदम्' इसको परमात्माका विशेषण होनेतैं उदाहृत श्रुतिके विषे जीवात्माका ग्रहणहै। इति सूत्रसारार्थः।। औ प्रथमवाक्यका अर्थ यह है कि जीवात्माको रथी (रथमें बैठने वाला) जानना औ शरीरकों रथ जानना इति॥ औ द्वितीयका अर्थ यह है कि सो जीव संसारमार्गके पारको प्रांप्त होता है सो पार व्यापक परमात्माका परम स्वरूप है इति ॥ १२॥

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पाद २ ] भाषाटीकासाहितानि। (१९) "य एषोडक्षिणि पुरुषो दृश्यते एष आत्मा" अस्यार्थ :- जो यह नेत्रके विष पुरुष दीखताहै सो यह आत्मा है इति। तहां संशय है कि नेत्रके विषै प्रतिबिम्बात्मा है अथवा जीवात्मा है वा नेत्र का अधिष्ठाता देवतात्मा है वा परमात्मा है? अत आइ। अन्तर उपपत्तेः॥ १३॥ इस सूत्रके-अंतर १ उपपत्तेः२ यह दो पद हैं। नेत्रके अन्तर (भीतर) परमेश्वर है। कस्माव (उपपत्तेः) परमेश्वरके विषैअमृतत्व अभयत्वादिगुणोंका ज्ञान होनेतैं ॥ १३॥ आकाशवत् सर्वगत ब्रह्मका अल्प नेत्रस्थान नहीं होसकता अंत आइ॥। स्थानादिव्यपदेशाच॥ १४॥ इस सूत्रके-स्थानादिव्यपदेशात् १ च२ यह दो पद हैं।। एक नेत्रही ब्रह्मका स्थान नहीं है किंतु'यः पृथिव्यां तिष्ठन्' इत्यादि श्रुतिवाक्यसे बहुतसे पृथ्वीनै आदिलेके परमेश्वरके स्थान दिखाये हैं तिनके विषै एकनेत्रभी परमेश्वरका स्थान है इति सुत्नसारार्थ:॥ औश्षुतिवाक्यका अर्थ यह है कि यह परमेश्वर पृथवीके विषै स्थित है इति॥१४ ॥ सुखविशिष्टाभिधानादेव च॥१५॥ इस सूत्रके-सुखविशिष्टाभिधानात् १ एव२ च ३ यह तीन पंद हैं।। ध्यानके वास्ते भेदकी कल्पना करके सुखगुणविशिष्ट ब्रह्मका "य एषोऽक्षिणि पुरुषो दृश्यते" इस श्रतिवाक्य करके अभि- धान होनेतैं नेत्रके विषे परमेश्वर है॥ १५॥ श्रुतोपनिषत्कगत्यभिधानाच॥ १६॥ इस सूत्रके-श्रुतोपनिषत्कगत्यभिधानात् १च२ यह दो पद हैं।

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(२०) ब्ह्मसूत्राणि। [अध्याय १ जिसपुरुषनैं उपनिषदोंकारहस्य श्रवण किया हैतिस ब्रह्मवेत्ता पुरुषकों श्रतोपनिषत्क कहते हैं। तिस पुरुषकी गति जो प्रसिद्ध देवयानमार्ग तिसका श्रुतिस्मृतिके विषै अभिधान होनेतैं नेत्रस्थानके विषै परमेश्वर है॥ १६॥:

है? अत आह।। छायात्मावा जीवात्मा वा देवतात्मा नेत्रस्थानवाले क्यों नहीं

अनवस्थितेशसंभवाच्च नेतरः॥१७॥ इस सूत्रके-अनवस्थिते: १ असंभवात् २ च ३ न ४ इतरः ५ यह पांच पद हैं ।।(इतरः) छायात्मादि नेत्रस्थानवाले नहीं हो सकते। कस्मात (अनवस्थितेः) सदा स्थिति नहीं होनेतैं। जब कोई पुरुष नेत्रके सामने होवै तब छायात्मा दीखता है सदा नहीं। और जीवा- त्माका सर्व शरीरेंद्रियके साथ सम्बंध होनेतैं केवलनेत्रके विषे स्थिति नहीं यद्यपिव्यापकब्रह्मकासम्बन्धभी सर्वके साथहै तथापि हृदया- दिदेश ब्रह्मके श्रति कहती है। औ देवतात्माको बहिर्देशमें होनेतैं आत्मत्व नहीं है (असंभवाच्च) छायात्मा१ जीवात्मा २ देवतात्मा३ इन तीनोंके विषै अमृतत्व अभयत्वादि गुणोंका असंभव होनेतैं नेत्र स्थानवाला परमेश्वर है।। १७।। अन्तर्यामी ब्राह्मणके विषै श्रवण होता है कि "अधिदेवतमधिलो- कमधिवेदमधियज्ञमधिभूतमध्यात्मंच कश्िविदन्तखस्थितो यमयिता- न्तर्यामी" इति॥ तहां संशय है कि अन्तर्यामिशब्दसे अधिदैवाद्य- भिमानी देवताका ग्रहण है अथवा अणिमादि ऐश्वर्यवाले योगीका ग्रहण है वा परमात्माका ग्रहण है ? अत आह।।

१ सिद्धांत।

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पाद २] भाषाटी का सहितानि। (२१) अन्तर्याम्यधिदैवादिषु तडर्मव्यपदेशात्॥१८॥ इस सूत्रके-अंतर्यामी १ अधिदैवादिपुरतद्धर्मव्यपदेशाव ३यह तीन पद हैं।। अधिदेवादि सर्वका प्रेरक जो अन्तर्यामी तिसके विषै प्रेरकत्वधर्मका कथन होनेतैं अधिदैवादिकोंके विषे अन्तर्यामि श- बदसे परमात्माका ग्रहण है इति सुत्नसारार्थः॥औश्रुतिका अर्थ यह है कि जो पृथिव्यादि देवताके विषै है सो अधिदैवत है औ जो सर्वलोकके विषै है सो अधिलोकहै। औ जो सर्व वेदके विषै है सो अधिवेदहै औ जो सर्व यज्ञके विषे है सो अधियज्ञ है औ जो सर्वभूतके विषै है सो अधिभूत है औ जो सर्व आत्माके विषै है सो अध्यात्म है इन सर्वको जो कोई अन्तःस्थित होके प्रेरता है सो अन्तर्यामी है इति ॥ १८॥ सांख्यस्मृति कल्पित प्रधान जगत्का कारण औ प्रेरक है सो अन्तर्यामिशंव्दका वाच्य है। अत आह।। न च स्मार्तमंतडर्माभिलापात्॥ १९॥ इस सूत्रके-न १च २ स्मार्त्तम् ३ अतद्धर्माभिलापांद्४ यह चार पद हैं।। सांख्य स्मृति कल्पित अचेतन प्रधानके विषै दष्टत्वादि धर्मका असंभव होनेतैं प्रधान अंतर्यामि शन्दका वाच्य नहीं किंतु परमेश्वर है।। १९ ॥ शारीर जीवात्माको चेतनत्वद्रषटत्वादि धर्मवाला होनेतैं शारीरा- त्मा अन्तर्यामि है अत आह। शारीरश्षोभयेपि हि भेदेनैनमधीयते ॥ २०॥ इस, सूत्रके-शारीरः १ च २ उभये ३ अपि ४ हि भेदेन६ एनम् ७ अधीयते८यहं आठ पद हैं। पूर्वसूत्र सैं नकारकीअनुवृत्तिकरणी यद्यपि द्रष्टत्वादि धर्म शारीरात्माके हैं तथापि घटाकाशकी न्याईं उपाधि करक परिच्छिन्न होनेतैं शारीरात्मा सर्व परथिव्यादिकोंका निमायक़

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.(२२) बल्सूत्राणि। [अध्याय अन्तर्यामी नहीं होसकता (उभयेऽपिहि) काण्व शाखावाले औ माध्यं दिन शाखावालेइस शारीरात्माका अन्तर्यामीसैं भेद करके अध्ययन करतेहैं ॥ २०॥ . . सुण्डकोपनिषदकेविष श्रवण होताहै कि"यत्तददृश्यमग्राह्यसगो- तमवर्णमचक्षुःश्रोत्रंतदपाणिपादं नित्यं विभु सर्वगतंसुसूक्ष्मंतदव्ययं यद्दूतयोनिं परिपश्यंति धीराः"इति॥ तहां संशयहै कि अदृश्यत्वा- दि गुणवाला औ भूतयोनि प्रधान है अथवा शारीरात्मा है वा परमात्मा है अत आह॥। अदृश्यत्वादिगुणको धर्मोक्क: ॥२१॥ इस सूत्रके-अदृश्यत्वादिगुणकः १धर्मोक्त:२यह दो पद हैं।। धर्मोंक्ते 'यःसवज्ञ-सर्ववित' जो सामान्यरूपसैं सर्वकों जानताहै सो विशेष रूपसे सर्वको जानता है इति। सर्वसत्वादि धर्मका परमेश्वरके विषै कथन होनेतें जो यह अदृश्यत्वादि गुणवाला औ भूतयोनिहै सो पर- मात्मा है अन्य कोई नहीं इति सुत्रसारार्थः॥ औ श्रुतिका अर्थ यह हैं कि जो परमात्मा 'अदृश्यम्' अदृश्यहै 'अग्राह्यम्' ज्ञानेन्द्रिय कमेन्द्रिय करके अग्राहहै 'अगोत्रम्' वंशरहितहै 'अवर्णम्' ब्राह्मण- त्वादि जातिरहित हैं अचक्षुःश्रोत्रम्' चक्षु औ श्रोत्रसे रहित है 'तदपाणिपादम्' सो हस्त पैरसे रहितहै औ नित्य है 'विसुम्' प्रशु है 'सर्वगतम्' व्यापक है 'सुसूक्ष्मम्' अतिसूक्ष्म है 'तदव्ययम्' सो नाशरहित है यद्धतयोनिम्' जो सर्वभूतोंका कारण है तिसकों 'धीराः' पंडित हैं सो देखते हैं इति॥२१॥ विशेषणभेदव्यपदेशाभ्यां च नेतरौ ।। २२॥ इस सूत्रके-विशेषणभेदव्यपदेशाभ्याम १ च२ न ३इतरौ४्यह चारपदहैं।।"दिव्यो ह्यमूर्त्तःपुरुषः"इत्यादि वाक्यके विषै दिव्यत्वादि विशेषणवाले परमात्माका कथन होनेतैं। औ"अक्षरात् परतः परः इस वाक्यके विषै प्रधानसैं परमात्माके भेदका कथनहोनेतैं (नेतरौं

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पाद २] भाषाटी कासहितानि। (१३)

शारीरात्मा औ प्रधान सर्व भूतोंका कारण नहीं किंतु परमेश्वर कारण है इति सूत्रसारार्थः॥ औ प्रथम वाक्यका अर्थ यह है कि दिव्य (स्व्रयंज्योतिः)अमूर्त (पूर्ण) पुरुष (पुरीमें सोनेवाला)परमात्माहै इति। द्वितीयका अर्थ अक्षर प्रधानसै पर परमात्मा है इति।।२२।। रूपोपन्यासाच् ॥ २३॥ इस सूत्रके-रुपोपन्यासात १ च२यह दो पदहैं।।"अग्निर्मूर्द्धाचक्षुषी चंद्रसृर्यौ दिश: श्रोत्रे वाग्विवृताश्चवेदाःवायुः प्राणो हृदयं विश्वमस्य पद्यां पृथवी ह्वेष सर्वभूतान्तरात्मा"।। इस श्रुति करके परमेश्वरके रूपका कथन होनेतैं सर्वभूतयोनि परमेश्वर है इति सूत्रसारार्थः॥ औ श्रुतिका अर्थ यह है कि अभ्नि मस्तक है। चन्द्रसूर्य नेत्र हैं। दिशा श्रोतरहैं। प्रसि वेद वाणी है।वायु प्राण है।विश्व इसका हृदयहै। पृथि्वा पादहैं. जिसका यह रूपहै। सो सर्वभूतोंकाअन्तरात्माहैइति॥ छान्दोम्यके विषै श्रवण होता है कि। प्राचीनशाला १ सत्ययज्ञ इंद्रदुन्न ३ जनक ४ वुडिल ५ उद्दालक ६ यह छह पुरुप मिलके जो कैकयदेशका राजाअश्वपति नामथा तिसकेसमीसजायके पूछतेभये कि हे राजन् जो तूं वैश्वानर आत्माकोजानता है तोहमारेकोकहोतहां संशय है कि वैश्वानर शब्दसे जाठराग्निका ग्रहणहै अथवा भूताि ग्रहण है वा अग्न्यभिमानी देवता ग्रहणहै वा शारारीत्माका ग्रहणहै वा परमात्माका ग्रहणहै अत आह।। वैश्वानरःसाधारणशब्दविशेषात्॥२४॥ इस सूत्रके-वैश्वानर: १ साधारणशब्दविशेषात् २ यह दो पदहैं। यद्यपि आत्मशब्द शारीरात्माके औ परमात्माके विषै साधारणहै। औ वैश्वानरशब्द जाठराग्नि भूता्नि औ अग्न्यभिमानी देवता इन तीन के विषैसाधारण है तथापि आत्मशब्दका औ वैश्वानरशन्दका

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(२४) ब्रह्मसूत्राणं। [अध्याय १ परमात्माके विषै विशेष होनेतें वैश्वानरशब्दसे परंमात्माक्का ग्रहण है॥। २४॥ स्मर्यमाणमनमानं स्यादिति॥२५॥ इस सूत्रके-स्मर्यमाणम् १ अनुमानम् रस्यात ३ इति ४ यह चार

श्रोत्रे तस्मै लोकांत्मनेनमः" इस स्मृतिकरके स्मर्यमाण जो.परमा- त्माका रूप सो वैश्वानर शब्दको परमात्म परत्वका (अनुमान)लिङ्ग है। इति शब्दका अर्थ हेतु है। यस्मात् यह स्मर्यमाणरूप लिंग है तस्मात वैश्वानर परमात्माहै इति सूत्र सारार्थः॥ औ स्मृतिका अर्थ यहहै कि जिस परमात्माका अग्नि सुखहै दयुलोक मस्तकहै आकाश नाभिहै पृथिवी चरणहै सूर्य चक्षुहै दिशा श्रोत्रहैं तिस सर्व लोकरूप परमात्माको नमस्कार है इति ॥ २५॥ शब्दादिभ्योऽन्तःप्रतिष्ठानाच्च नेति चेन्न तथा दृष्टयु पदेशादसंभवात् पुरुषमपि चैनमधीयते॥ २६॥ इस सूत्रके-शब्दादिभ्य १ अन्तःप्रतिष्ठानात् २च ३ नइतिद चेत् ६ न ७ तथा ८ दृष्टयुपदेशात ९ असंभवात् १० पुरुषम् ११ अपि१२च१३एनम्१४अधीयते१५ यह पंचदश पदहैं।।"सएषोडग्रि वैश्वानरः"अस्यार्थ :- सो यह अग्नि वैश्वानरहै इति।उस वाक्यकेविषै वैश्वानरशव्दसे अग्निका ग्रहण होनेतें औ"पुरुषेऽन्तःप्रतिष्ठितं वेद" अस्यार्थ :- पुरुषके मीतर स्थित अग्निको जाने इति। इस वाक्यके विषैजाठराग्रिकाग्रहणहोनेतैंपरमेश्वर वैश्वानर नहींहै किंतुवैश्वानर अग्नि है (इति चेन्न) ऐसे न कहो कस्मात (तथा दष्टयुपदेशात) परमेश्वर दृष्टिकरके वेश्वानरशब्दसे जाठरानिकीउपासनाकाउपदेश हानेतें और जो केवल जाठराग्रि विवक्षितहोवै तो "मूर्घैव सुतेजा'

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पाद २] भाषाटीकासहितानि। (२५) अस्यार्थ :- परमेश्वरका मस्तक सुंदर तेजवाला है इति। इस वाक्यका असंभवहोवै और वाजसनेथि शाखावाले इस वैश्वानरको पुरुषरूप करकेअध्ययन करते हैं इसीसे परमेश्वरही वैश्वानर है अन्य नहीं२६।। अत एव न देवता भृतं च ।२७ ।। इस सूत्रके-अतः १ एव २ न ३ देवता ४ भूतम् ५च ६ यह छह पद हैं।। (अत एव) जिस पर मेश्वरका छुलोक मस्तक है इत्यादि पूर्वोक्त हेतुसे न कोई देवता वैश्वानर है और न भूतादि वैश्वानर है किंतु परमेश्वरही वैश्वानर है॥ २७॥ साक्षादप्यविरोधं जैमिनिः॥ २८॥ इस सुत्रके-साक्षात् १ अपि २ अविरोधम् ३ जैमिनि:४यह चार पदहैं।। पूर्व कहाहै कि जाठराग्रिरूप उपाधिवाला परमेश्वर उपासनाके योग्य है अब कहते हैं कि उपाधिके विना साक्षात परमेश्वरही उपास- नाके योग्य है इसमें कोई विरोध नहीं है ऐसे जैमिनिआचार्य मानता है॥ २८ ।। अभिव्यक्तेरित्याश्मरथ्यः॥।२९॥ इस सुत्रके-अभिव्यक्ते: १ इति २ आश्मरथ्यः ३ यह तीन पदहैं।। व्यापक परमेश्वरको प्रादेशमात्रत्वका कथनहै सो तिसकी। अभि- व्यक्ति प्रगटताके निमित्तहै। प्रदेशविशेष हदयादि स्थानोंके विषै प्रगट होवै सो परमेश्वर प्रादेशमात्र कहिये ऐसें आश्मसथ्य आचार्य मानता है॥।२९। अनुस्मृतेर्वादरिः॥ ३० ॥ इस सूत्रके-अनुस्मृतेः १ बादरिः २ यह दो पद हैं।। अथवा प्रादेशमात्र जो हृदय तिसके विष प्रविष्ट जो मन तिस मन करके परमेश्वरका अनुस्मरण होनेतें परमेश्वरको प्रादेश मात्र कहते हैं ऐसे बादार आचार्य मानता है॥ ३० ॥

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(२६ ) ब्रह्मसूत्राणि। [अध्वाय १ संपत्तेरिति जैमिनिस्वथा हि दर्शयति॥३१॥ इस सूत्रके-संपत्तेः१इति रजैमिनि: ३ तथा ४ हि ५ दर्शयति६ यह छह पद हैं।। अथवा संपत्ति जो परमेश्वरके मूर्धादि तत्त- तस्थानकी प्राप्ति तिस संपत्तिरूप निमित्तसे परमेश्वरको प्रादेशमात्र कहते हैं। (तथाहि दर्शयति) तैसेही प्रादेशमात्रताकोश्षतिबी दिखाती है ऐसें जैमिनि आचार्य मानता है इति सूत्रसारार्थः॥ औ श्रुति यह है कि"प्रादेशमात्रमिव ह वै देवाः सुविदित अभिसम्पन्नाः"अस्यार्थ :- देव हैं सो अपरिच्छिन्न परिमाणवाले परमेश्वरको प्रादेशमात्रकी कल्पना करके जानते भये औ तिसीको प्राप्त होते भये इति॥३१॥ आमनन्ति चैनमस्मिन्॥३२॥ इस सूत्रके-आमनंति १ च २ एनम् ३ अस्मिन् ४ यह चार पद हैं।। इस परमेश्वरको सूर्धा औचुबुकके मध्यमें जाबाल कथन करतेहैं मूर्धा नाम मस्तकका है औ सुखके नी चे भागका नाम चुबुक हैतिन के मध्य विषे परमेश्वरका कथन होनेतैं परमेश्वर प्रादेशमात्र है औ वैश्वानर है इति॥३२ ॥

पिकायांप्रथमाध्यायस्यद्वितीयः पादः ॥२॥

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पाद ३ ] भाषाटीकासहितानि। (२७ ) प्रथमाध्याये तृतीयः पादः॥ सुण्डकोपनिषद्के विषै श्रवण होताहै कि "यस्मिन् द्यौः पृथ्वी चान्तरिक्षमोतं मनःसह प्राणैश्रसर्वैस्तमेवैकं जानथ आत्मानमन्या वाचो विमुश्चथामृतस्यैष सेतुः" इति॥ तहां संशय है कि दुलोकादि- कोंका आधार परब्रह्म है अथवा अन्य प्रधानादिक हैं अत आह।। दुभ्वाद्यायतनं स्वशब्दात॥१॥ इस सुत्रके-दुम्वाद्यायतनम् १ स्वशब्दात् २ यह दो पद हैं।। दुलोकभूलोकादिकोंका आयतन (आधार) परब्रह्महै कस्मात् (स्वशब्दात्) उक्त श्रुतिके विषै "तमेवैकं जानथ आत्मानम्" इस आत्मशब्दका अर्थ यह है कि सर्व प्राणोंकरके सहित दुलोक भूलोक अंतरिक्षलोक इन तीनलोकस्वरूप विराद् (मनः)सूत्रात्मा चकाराव अव्याकृत कारण यह जिसके विषै(ओतं) कल्पित हैं तिस एक आत्माको जानना चाहिये औ अनात्म वाणीका त्याग करना चा- हिये। यह आत्मा मोक्षका 'सेतुः' प्रापक है इति॥१॥ मुक्तोपसृ्यव्यपदेशात्। २॥ इस सुत्रका-मुक्तोपसृप्यव्यपदेशात्१ यह एक ही पदहै।।"यदा सर्वे प्रसुच्यंते कामा ये ऽस्य हदि स्थिताः। अथ मत्योंऽमृतो भवत्यत्र ब्रह्मः समश्नुते" इस श्रुतिके विषै सुक्त पुरुषोंके प्राप्त होनेयोग्य परव्रह्मका कथनहोनेतैंपरव्रह्म छुलोक भूलोकादिकोंका आयतनहै प्रधानादिक नहीं इति सूत्रसारार्थ:॥ औ श्रुतिका अर्थ यह है कि जिस कालके विषै इस पुरुषके हद्यमें स्थित सर्व काम दूर होवें तिसके अनन्तर यह पुरुष अमृत होताहै औ इहांही ब्रह्मको प्राप्त होताहै इति ॥२।। नानुमानमतच्छब्दात्॥ ३ ॥। इस सूत्रके-न१अनुमानम् २अतच्छब्दात् ३ यह तीन पदहैं।।

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(२८) ब्ह्मसूत्राणि। L अध्याय ३ अचेतन प्रधानप्रतिपादक शब्दका अभाव होनेतैं औ "यः सर्वज्ञ: सर्ववित्" इत्यादि चेतन ब्रह्मप्रतिपादक शब्दका सद्धाव होने तें सांख्यस्मृति परिकल्पित अचेतनप्रधान द्युलोक भूलोकादिकोंका आयतन नहीं किंतु परब्रह्म है।। ३ ।।

इस सूत्रके-प्राणभृत् १ च२ यह दो पद हैं। यद्यपि प्राणको धारण करनेवाले जीवके विषै आत्मत्व चेतनत्वादि धर्म हैं तथापि उपाधिपरिच्छिन्न जीवके विषै सर्वज्ञत्वादि धर्मका अभाव होनेतें जीवात्मा छुलोक भूलोकादिकोंका आयतन नहीं किंतु सर्वज्ञ ब्रह्महै8 प्राणभृत् जीवात्माहयलोकादिकोंका आयतनक्योंनहीं!अत आह।। भेदव्यपदेशात्॥५॥ इस सूत्रका-भेदव्यपदेशाव १ यह एकही पदहै।"तमेवेकं जानथ आत्मानम्" इत्यादि वाक्यके विषै ज्ञाता औ ज्ञेयके भेदका कथन होनेतें सुसुक्षु, प्राणभृत् (जीवात्मा) ज्ञाता है औ आत्मशब्दवाच्य ब्रह्म ज्ञेय है सो त्रह्मही दुलोकादिकोंका आयतन है॥ ५। प्रकरणात् ॥ ६ ॥ इससूत्रका-प्रकरणात्१ यह एकहीपदहै।। "कस्मिन्न भगवो विज्ञाते सर्वभिदं विज्ञातं भवति" इस श्षुतिवाक्य करके एकके विज्ञानसेसर्वके विज्ञानका अपेक्षा होनेतैं एकपरमात्माके विज्ञानसेहीं सर्वका विज्ञान हो सकताहै केवल प्राणभृत् जीवके विज्ञानसें सर्वके विज्ञानका संभव नहीं इत्यादि परमात्मसंबन्धि प्रकरण होनेतें परमात्मा छुलोकादि कोंका आयतन है इति सूत्रसारार्थः॥ औ श्षुतिवाक्यका अर्थ यह है कि हे भगवन् किसके जानेतें यह सर्व जगव जाना जाता है इति।।

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पाद ३ ] भाषाटीकासहितानि। (२९ ) स्थित्यदनाभ्यां च ।।७॥ इस सूत्रके-स्थित्यदनाभ्याम्१चरयह दो पद हैं॥ "द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया" इत्यादि श्रुतिके विषै परमेश्वरकी उदासीन रूपतासे स्थितिका कथन होनेतैं औ क्षेत्रज्ञ (जीव)के कर्म फलभोगका कथन होनेतैं परमेश्वरही छयुलाकादिकोंका आयतन है।। ७॥ छान्दोग्यके विषै:श्रवण होताहै कि "भूमा त्वे वविजिज्ञासितव्यः" इति॥ अस्यार्थ :- भूमा निश्चय करके जिज्ञासा करने योग्य है इति। तहां संशय है कि प्राणभूमा है वा परमेश्वर भूमा है! अत आह॥। भूमा सम्प्रसादादध्युपदेशात॥८।। इस सूत्रके-भूमा १ संप्रसादाव २अध्युपदेशात ३ यह तीन पद हैं।। संप्रसाद शब्दका वाच्यार्थ सुषुप्ति स्थान है औ तिस सुषुपिके विषै जागनेवाला प्राण लक्ष्यार्थ है विस प्राणके अगाडी भूमाका उपदेश होनेतैं भूमा व्यापक परमेश्वरं है प्राण नहीं ॥। ८॥ धर्मोपपत्तेश्र ॥९॥ इस सूत्रके-धर्मोपपत्ते:१चश्यह दो पद हैं। "यो वै भूमा तदमृ- तम्" अस्यार्थ :- जो भूमा (व्यापक)है सो अमृत हैं.इति। इन श्रुतिवा- क्योंकरके श्रूयमाण जो अमृतत्व सत्यत्व स्वमहिम प्रतिष्टितत्व सर्वंग- तत्व सर्वात्मत्वादि धर्म तिनको परमात्माके विषै उपपन्न होनेतैं भूमा परमात्मा है। ९ ॥ बृहदारण्यकके विषे श्रवण होता हैं कि "कस्मिन्नु खल्वाकाश ओतश्चं प्रोतश्रेति सहोवाचैतद्वैत दक्षरं गार्गि ब्राह्मणा अभिवदन्त्यस्थू- लमनणु" इति॥ तहां संशय है कि अक्षर शब्द करके वर्णात्मक ओंकारका ग्रंहण है अथवा परमात्माका ग्रहण है? अत आह॥। अक्षरमम्वरान्तधृतेः॥ इस सूत्रके-अक्षरम् १ अंबरांतधृतेः २ यह दो पद हैं।। पृथवीसे

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( ३० ) बह्सूत्राणि। [ अध्याय१ आदि लेकै अम्बर (आकाश) पर्यंत सर्वजगत्का (धृतेः) धारण होनेतैं सर्वको धारणेवाला परमात्मा अक्षर है इति सूत्रार्थः॥औ श्रुतिका अर्थ यह है कि याज्ञवल्क्य सुनिके प्रति गार्गी पूछती भई कि हे सुने यह आकाश किसके विषै ओत प्रोत है तब सुनि बोला (कि हे गार्गी जिसको ब्राह्मण ब्रह्मज्ञानी पुरुष) अस्थूल अनणु कहते हैं सो यह अक्षरः है औ तिस अक्षरके विषै आकाश ओत प्रोत है इति।। १० ।. शंकते। जो अम्बरान्तधृतिरूप कार्य करणके अधीन है तो प्रधानकारणवादि सांख्य मतके विषैवी अंबरान्तधृतिरूप कार्य . प्रधानरूप कारणके अधीन होसकताहै अत उत्तरमाह। सा च प्रशासनात्॥ ११ ॥ ~

इस सुत्रके-साश्चर प्रशासनातश्यह तीन पद हैं।।"एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गिसूर्याचंद्रमसौ विधृतौ तिष्ठतः"॥इसश्रुतिके विषै परमेश्वरका प्रशासन (शिक्षा) होनेतैं (सा) अम्बरान्तधृति। चेतन परमेश्वरका कर्म है अचेतन प्रधानका नहीं इति सूत्रसारार्थ:। औ श्रुतिका अर्थ यह है कि हे गार्गि इस अक्षर परमेश्वरकी शिक्षाके विषै सूर्य चन्द्रमा धारण करेहुये स्थित हैं इति॥११॥ अन्यभावव्यावृत्तेश्र ।१२।। इस सूत्रके-अन्यभावव्यावृत्ते:9चयह दोपदहैं।। अम्बरान्त सर्व जगत्का आधार जो अक्षर ब्रह्म तिसका अन्यभाव (प्रधानादिकों)से (व्यावृत्तेः) भेद होनेतैं अक्षर शब्दका वाच्य परब्रह्म है और तिसीका अम्बरान्तधृति कर्म है अन्यका नहीं॥ १२॥ पश्नोपनिषद्के विषै पिप्पलाद गुरु सत्यकाम शिष्यके प्रति ओंकारद्वारा ब्रह्मका ध्यान कहता भया। तहां संशय है कि ओं

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पाद ३ ] भाषाटीकासहितानि। (३१ )

कारद्वारा।(पर निर्गुण) ब्रह्म ध्यानके योग्य है अथवा अपर (सगुण) ब्रह्म ध्यानके योग्य है? अत आह॥ ईक्षतिकर्मव्यपदेशात्सः॥१३।। इस सूत्रके-ईक्षतिकर्मव्य पदेशात्१सः२यह दो पदहैं।।"स एतस्मा- ज्जीवघनात् परात् परं पुरुषं धुरिशयम् ईक्षते"इस श्रतिवाक्यके विषै ईक्षते इस पदका अर्थ जो दर्शन तिसका कर्म जो पर पुरुष तिसका कथन होनेतें परव्रह्म ओंकारद्वारा ध्यानके योग्यहै इति सूत्रसारार्थ:। औ श्रुति वाक्यका अर्थ यह है कि सो उपासक पुरुषाइस हिरण्य गर्भसे परै निर्गुण ब्रह्मको देखताहै इति॥१३॥ छान्दोग्यके विषै अल्प ह्ृदय कमलका नाम दहर कहाहै तिस हृदयरूप दहरके विषै ध्यानके वास्ते दहराऽडकाश कहाहै तहां संशय है कि दहराSSकाश भूताकाश है अथवा जीव है वा परमात्मा है? अत आह॥। दहर उत्तरेभ्यः॥१४॥ इस सूत्रके-दहर:१उत्तरेभ्यःशयह दो पद हैं।। उत्तर वाक्य शेष के विषै हेतु होनेतैं भूताकाश औ जीव दहराSडकाश नहीं है किंतु दहराS Sकाश परमात्मा है॥ १४ ॥ गतिशब्दाभ्यां तथा हि दष्टं लिंगश्च॥ १५॥

छह पद हैं।। पूर्व जो कहा कि उत्तर दहर वाक्य शेषके विषै हेतु होनेतैं दहराकाश परमात्मा है इति। सो हेतु अब दिखातेहैं "इमाः सर्वाः प्रजा अहरहर्गच्छन्त्य एतं ब्रह्मलोकं न विन्दन्तीति" अस्यार्थ :- यह सर्व जीवहैं सो दिनदिनके प्रति सुषुप्तिकालके विषै अपने हृदय में स्थित 'बरह्म लोक' ब्रह्मस्वरूपको प्राप्त होतेहैं औ तिस ब्रह्म- लोकको नहीं जानतेहैं इति। यह गति लिङ्गहै अर्थात् गविरूप हेतु

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( ३२ ) ब्ह्ममूत्राणि। [अध्याय १ है। औ तैसेही "सता सोम्य तदा सम्पत्रो भवति" इस श्रुतिवाक्यके विषैबी देखाहै।अस्यार्थ :- हे सोम्य श्वेतकेतो यह जीव सुषुप्तिके विषै सद् ब्रह्मके साथ प्राप्त होताहै इति। औ ब्रह्मवाचक ब्रह्मलोक शब्दसे पूर्वोंक्त गति हेतुसे औ शब्द हेतुसे दहराSडकाश परमात्मा है॥१५॥ धृतेश्च महिम्रोऽस्यास्मित्रुपलब्धेः॥१६॥ इस सूत्रके-धृतेः१च२महिम्रः३अस्य ४ अस्मिन् ५ उपलब्घे: यह छह पद हैं॥ (धृतेः) सर्व जगतके धारण रूप हेतुतैं औ इस धृति रूप नियमके महिमाको इस परमात्माके विषै (उपलब्घेः) प्राप्त होणें तैं दहराऽडकाश परमात्माहै॥ १६॥ प्रसिद्धेश्र ॥१७॥ इस सूत्रके-प्रसिद्धे:१च२यह दी पदहैं।। "सर्वाणि ह वा इमानि भूतान्याकाशादेव समुत्पद्यन्ते" इत्यादि श्रुतिकरके कारणरूपा SSकाश शब्दको परमेश्वरके विषै प्रसिद्ध होनेतैं दहराऽडकाश परमेश्वर है औ श्रुतिका अर्थ यह है कि। यह सर्वभूत आकाश शब्दवाच्य परमेश्वरसे उत्पन्न होता है इति॥१७ ॥ इतरपरामंशात स इति चेन्नासम्भवात्॥१८॥ इस सूत्रके-इतरपरामर्शीत् १ सः २ इति ३ चेत् ४ न ५ असं- भवात् ६ यह छह पद हैं शंकते "अथ य एष सम्प्रसादोऽस्माच्छरी- रात् समुत्थाय परंज्योतिरुपसम्पद्य स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यते" इस श्रुतिके विषै सम्प्रसाद शव्दसे इतर (जीव) का परामर्श (ग्रहण) होने तैं सो जीव दहराऽडकाश है (इति चेन्न) ऐसे न कहो। कस्मात्। (असंभवात)बुद्धयाछयुपाधिकरके परिच्छिन्न जीवकों आकाशके साथ उपमाका असंभव होनेतें दहराऽडकाश परमात्मा है।औ श्षुतिका अर्थ यह है कि अथ जाग्रत स्वप्नके अनंतर जो यह सम्प्रसाद (जीव) है

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पाद ३ ] भाषाटीकासहितानि। (३३) सो इस शरीरसे उठके समुत्थान करके परंज्योति (परब्रह्म) साक्षा- त्कार करके अपने ब्रह्मरूपसे तिसीको प्राप्त होता है इति ॥१८॥ उत्तराचेदाविर्भूतस्वरूपस्तु ॥ १९ ॥ इस सूत्रके-उत्तरात् १ चेत् २ आविर्भूतस्वरूप: ३ तु ४ यह चार पद हैं।। पूर्वसूत्रके विषै असंभव हेतुतैं जीवाSडशंकाको दूर करी है। अब (उत्तरात्) उत्तर जो इंद्रके प्रति प्रजापतिके वाक्य तिन वाक्यों करके पुनः जीवाऽडशंकाको उठातेहैं "य एषोडक्षिणि पुरुषो दृश्यते एष आत्मा" इस वाक्यकरके प्रजापति व्रह्मा इंद्रके प्रति कहता भया कि हे इंद्र जो यह नेत्रके विषै पुरुष दीखताहै सो यह आत्मा है ऐसे नेत्रके विषै जीवका कथन करके पुनः "य एष स्वप्ने महीयमानश्चरत्येष आत्मा" जो यह स्वप्नके विषै वासनामय विष- योंकरके पूजित हुआ विचारता है सो यह आत्मा है इत्यादि वाक्यों करके जीवका निर्देश होनेतें दहराSडकाश जीव है। (चेत्) यदि ऐसे कोई कहै तिसके प्रति (आविर्भृतस्वरूपस्तु) ऐसा कहना चाहिये। तु शब्द पूर्वपक्षकी निवृत्तिके अर्थ है। तथाच-उत्तर प्रजापतिवा- क्योंके विष उपाधिरहित शुद्ध जीवस्वरूपका कथन होनेते दहराSड काश जीव नहीं है किंतु परमात्मा है।। १९ ॥ अन्यार्थश्र परामर्शः॥२०॥ इस सूत्रके-अन्यार्थ: १ च २ परामर्शः३ यह तीन पद हैं॥ जो यह अर्थ "य एष संप्रसादः" इस दहरवाक्यशेषके विषै संप्रसादश- बदसे जीवका परामर्श ग्रहण है सो जीवका जो स्वरूप है तिसके अर्थ नहीं किंतु जीव करके उपासनाके योग्य जो परमेश्वर तिसका जो स्वरूप है तिसके अर्थ है॥ २०।।

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(३४ ) ब्रह्मसूत्राणि। [अध्याय १ अल्पश्रुतरिति चेत्तटुक्तम् ॥२१॥ इस सूत्रके-अल्पश्रुतेः १ इति २ चेत् ३ तत् ४ उक्तम् ५ यह पांच पद हैं।। चेत् (यदि) ऐसे कहै कि अल्पहृदयके विषै अल्प आकाशका कथन होनेतैं व्यापक परमेश्वर दहराSSकाश नहीं किंतु अल्प जीव दहराSडकाश है सो कहना ठीक नहीं, काहेतैं "अर्भ- कौकस्त्वात्तव्यपदेशाच्च नेति चेन्न निचाय्यत्वादेवं व्योमवच्च"इससूत्र के विषै अल्प हृदय की अपेक्षासेपर मेश्वरके अल्पतत्त्व्रका कथनहै२१ सुण्डकके विषै श्रवण होता है कि न "तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रता रकं नेमा विद्युतो भांति कुतोऽयमग्निः। तमेव भांतमनुभाति सर्व तस्य भासा सर्वमिद विभाति" इति॥ तहाँ संशय है कि जिसके भानक 'अनु' पश्चात् सर्वका भान होताहै सो तेजो धातु अर्थात् तेजको धारण करनेवाला कोई पदार्थ है अथवा प्राज्ञ आत्मा है! अत आह।। अनुकृतेस्तस्य च ॥ २२॥ इस सूत्रके-अनुकृते: १तस्य २च ३ यह तीन पद हैं॥अनुक्ृति नाम अनुकरणका है अर्थात् जिसके भानके 'अनु' पश्चात् भान नास अनुकृति है तिस अतुकृतिरूप हेतुतैं सत्यसंकल्प प्राज्ञ आत्मा का उक्त श्रुतिमें ग्रहण है औ सूत्रके विषै (तस्य च) यहहै सो 'तस्य भासा सर्वमिदं विभाति' इसके अर्थको सूचन करता है। तथाच- जिसके प्रकाश करके सर्वसूर्यादिकोंका प्रकाशदोता है सोप्राजञआत्मा है।। औ श्षतिका अर्थ यह है कि तिस ब्रंह्मके विषै न सूर्य प्रकाश करताहै औ न चन्द्रमा औ न तारा प्रकाश करतेहैं औ न यह बिजली प्रकाश करती है जहां सूर्यादिक नहीं प्रकाशैं तहां अल्पतेजवाला अधनि कैसे प्रकाश करै औ तिस ब्रह्मके प्रकाशके पश्चात् सर्व जगत प्रकाशित होताहै औ तिसकी (भासा) दीप्ति करके यह सर्व जगत भासता है इति ॥ २२॥

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याद ३ ! भाषाटीकांसहितानि। (३५) अपि च स्मर्यते ॥२३॥ इस सूत्रके-अपि १ च २ स्मर्यंते ३ यह तीन पद हैं । (अपि) निश्चय करके अन्य किसीसे प्रकाशित न होवै औ आप सर्वको प्रकाशै ऐसे प्राज्ञ आत्माके स्वरूपका भगवद्गीताके विषै स्मरण होता है"न तद्भासयते सूर्यों न शशांको न पावकः।यद्गत्वा न निवत्तते तद्धाम परमं सम॥।"इति। अस्यार्थ :- हे अर्जुन! तिस मेरे स्वरूपको सूर्य चन्द्रमा औ अग्नि यह नहीं प्रकाशते हैं औ उपासक लोक जिसको प्राप्तहोके पीछे इस संसारमें नहीं आते हैं सो मेरा परम धाम स्वरूप है इति॥। २३॥ कठवल्लीके विषै श्रवण होता है कि "अङुश्टमात्र पुरुषो

तहां संशय है कि अङ्गुष्टमात्र पुरुष किंवा जीवात्मा है किंवा परमात्मा है ? अत आह॥। शब्दादेवप्रमितः।२४।। इस सूत्रके-शव्दान् १ एव २ प्रमित: ३ यह तीन पद हैं।। 'ईशानो भूतभव्यस्य' इस वाक्यसे निश्चय होताहैकि अङ्डुष्ठमात्र परि- माणवाला पुरुष परमात्मा है औ श्रुतिका अर्थ यह है-यमराज़ कहता भया कि हे नचिकेतः धूमरहितअग्निकी ज्योतिकेसदश अ्ङ्गं- ष्ठमात्र परिमाणवाले हृदयके विषै अद्गुष्ठमात्र परिमाणवाला पुरुषडै औभूत भविष्यत् वर्त्तमानका ईशान (नियंता) है औ सोई अब है सोई कह है जो तूं पूंछता है सो यह पुरुष है इति ॥२४ ॥

हृद्यपेक्षया तु सनुष्याधिकारत्वात् ।॥। २॥ इस सूत्रके-हदि १ अपेक्षया २ तु ३ मनुष्याधिकारत्वात् ४ यह चार पद हैं।। समर्थ औ सकाम मनुष्य को शास्त्रका अधिकार होनेतैं

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(३६ ) त्रह्मसूत्राणि। [ अध्याय १ औ मनुष्यके हृदय में परमात्माकी स्थिति हौनतैंतिस स्थितिकी अपेक्षासे परमात्माको अङ्गुष्टमात्र परिमाणका कथन है॥ २५॥ तद्ुपर्यपि बादरायण: सम्भवात्॥ २६ ।। इस सूत्रके-तदुपार १ अपि २ बादरायण:३संभवात्४ यह चार पदहैं।। जोपूर्वसूत्रके विषे कहा कि मनुष्यकोशास्त्रका अधिकारहै औ मनुष्यके हृदयकी अपेक्षासे परमात्माको अङ्गष्टमात्र परिमाणका कथन है सो कहना ठीक है परंतु मनुष्योंके उपरि जो शरीरधारी देवादिकहैंतिनके सामर्थ्यका औ मोक्षकी इच्छाका संभव होनेतैं देवा दिकोंकोभी शास्त्रका अधिकार है औ तिनके हृदय औ अद्ुष्टकी अपेक्षासे परमात्मा अङ्ष्ठमात्र है ऐसे बादरायण आचार्य मानता है।। २६ ॥ विरोध: कर्मणीति चेन्नानेकप्रतिपत्तेर्दर्शनात॥२७॥ इस सूत्रके-विरोध: १ कर्मणि२ इति श्चेत् ४न ५अनेकप्रतिपत्तेः ६ दर्शनात् ७यह सात पद हैं।। जो इंद्रादिक देवों के शरीरका स्वीकार करके शास्त्रका अधिकार कहोगे तो शरीरधारी इंड्ादिक देवोंको एककालके विषै बहुत यज्ञकर्मका अंग नहीं होनेतैं यज्ञकर्मके विषै विरोध होवैगा (इतिचेन्न) ऐसे न कहो। कस्मात (अनेकप्रतिपत्ते- दर्शनात्) जैसे एक योगी अपने योगबलसे अनेक शरीर धारताहैं तैसे एक देवके भी अपने सामर्थ्यबलसे अनेक शरीरकी प्राप्तिका श्रुतिस्मृतिके विषै दर्शन होनेतैं यज्ञादि कर्सके विषै विरोध नहीं॥ शब्द इति चन्नातः प्रभवात्प्रत्यक्षातमानाभ्याम्॥२८।। इस सूत्रके-शब्दः १ इति २ चेत् ३ न४अतः प्रभवात्६ुप्रत्यक्षा- नुमानाभ्याम् ७ यह सात पद हैं।। यद्येपि कर्मके विषै विरोध नहीं तथापि औत्पत्तिक सूत्रके विषै शब्द औ अंर्थको अनादि मानके बिनके सम्बन्धको अनादि मानाहै औवेदको अन्य किसी प्रमाणकी

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पाद ३ ] भाषाटीकासहितानि। (३७ ) अपेक्षा न होनेतैं वैदिक शब्दके विषै प्रामाण्य स्थापित किया है। भ्रमाणके धर्मका नाम प्रामाण्यहै औ जो अब अनित्यजन्ममरणवा- ले देवादि शरीरके साथ नित्यशब्दका सम्बंध कहोगे तो सम्बन्धको अनित्य होनेतें शब्दके विषै विरोध होवैगा(इति चेन्न)ऐसे न कहो। कस्मात् (अतः प्रभवात्) इसी वैदिकशव्दसे देवादि जगत्की उत्पत्ति होनेतें। शंकते-तुम शब्दसे जगत्की उत्पत्ति कैसे जानते हो? अत आह (प्रत्यक्षानुमानाभ्याम्)अन्य प्रमाणकी अपेक्षा न करनेतें श्रुति प्रत्यक्ष हैऔ अन्य प्रमाणकी अपेक्षा करनेतें स्वृति अनुमानहै सो श्रुति स्मृति नित्य वैदिकशव्इसे जगत्की उत्पत्ति कही है।।२८।। अत एव च नित्यत्वम् ॥ २९॥ इस सूत्रके-अतः १एव२च शनित्यत्वमूध्यह चारपदहैं। देवादिसर्व जगतको वेदशब्दसे उत्पन्न होनेतें वेदशब्द नित्य है इसी अर्थको वेदव्यासकी स्मृति कहती है "युगान्तेऽन्तर्हितान्वेदान्सेतिहासा- न्महर्षयः।लेमिरे तपसा पूर्वमनुज्ञाताःस्वयंसुवा।।"इति।अस्यार्थ :- प्रलयकालके विषय इतिहासकरके सहितअन्तरधानभये जोवेद तिनको सृष्टिके आदिकालमें ब्रह्माकरके आज्ञाको प्रातभये महर्षषि तप करके प्राप्त होते भये इति ॥२९॥ महाप्रलयके विषै सर्वजगत्अपनेनामरूपको त्यागकेलीनहोता है औ महासृष्टिके विषै नवीन उत्पन्न होताहै इसीसे शब्द औ अर्थके सम्बन्धको अनित्य होनेतें शब्द प्रामाण्यके विषै विरोधहै अतआह।। समाननामरूपत्वांचावृत्तावप्यविरोधो दर्शनात् स्मृतेश्र ॥३०॥ इस सूत्रके-समाननामरूपत्वात् १ च २ आवृत्तौ ३अपि ४ अवि रोध:५ दर्शनाव६ स्मृते:७ च८ यह आठ पदहैं।।"सूर्याचन्द्रमसौ धाता यथापूवर्मकल्पयत्"इत्यादि श्रुतिसे औ"ऋषीणां नामधेयानि

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(३८) ब्रह्मनूत्राणि। [अध्याय ३ याश्र वेदेषठ दृष्टयः ॥शर्वर्थन्तेप्रसूतानां तान्येवैभ्यो ददात्यजः" इत्या दि स्मृतिसे (आवृत्तावपि)वारंवार महाप्रलय महासृष्टिके विषै भी जग त्समान नामरू पवाला होनेतैं शब्द प्रामाण्यकेविषै विरोध नहीं 'धा- ता' परमेश्वर पहिले(पूर्व कल्पमें) जैसे सूर्य चन्द्रमा थे तैसेही रचता भया इति शत्यर्थ: ॥ औ 'अजः' परमेश्वर प्रलयके अन्तमें उत्पन्न भये ऋषियोंके नाम औ वेदोंके विषै दृष्टि जैसे पहले (पूर्वकल्प) में थे तैसेही तिनको देता है इति स्मृत्यर्थ: ॥ ३०॥ मध्वादिष्वसम्भवादनधिकार जैमिनि:॥।३१।। इस सूत्रके-मध्वादिषु १असंभवात्२अनधिकारम् ३ जैमिनि:8 यह चार पद हैं।। ब्रह्मविद्याके विषै देवादिकोंका अधिकार नहीं ऐसे जैमिनि आचार्य मानता है।कस्मात (मध्वादिष्वसंभवात्)"असौआ- दित्यो मधु" यह मधुविद्याका वाक्यहै इसका अर्थ यहहै कि देवोंके मोदका हेतु होनेतें यह आदित्य मधुकी न्याई मधु है ऐसे मनुष्य लोक आदित्यका मधुरूपसे ध्यान करते हैं इहां मनुष्य ध्याताहै औ आदित्य ध्येय है। जो देवोंको विद्या अधिकार होवै तो इस विद्याके विषै आदित्यदेव किसका ध्यान करै अपना आपही ध्याता औ ध्येय नहीं होसकता ॥ ३१॥ ज्योतिषि भावाच॥३२॥ इस सूत्रके-ज्योतिषि१ भावावरचश्यह तीन पद हैं॥ आदित्य सूर्य चंद्र इत्यादि शब्दोंका ज्योतिर्मंडलके विषै प्रयोगहोनेतें औ "आदित्यः पुरस्तादुदेता पश्चादस्तमेता" इस मधुविद्यावाक्यशेष करके ज्योतिर्मंडलके विषै आदित्य शब्दको प्रसिद्ध होनेतें आदि- त्यादि देव शरीरधारी नहीं हैं। औ वाक्यशेषका अर्थ आदित्य सबके पहले उदय होताहै औ सर्बके पछि अस्त होताहै इति ॥ ३२ ॥

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पाद ३ ] भाषाटीकासहितानि। (३९)

भावं तु बादरायणोऽस्ति हि॥ ३३॥ इस सूत्रके-भावम् १ तु २ बादरायण: ३ अस्ति ४ हि५ यह पांच पद हैं।। 'तु'शब्द पूर्वपक्षकी निवृत्तिके अर्थ है यद्यपि देवता करके मिलित मध्वादि विद्याके विषै देवादिकोंका अधिकार नहींहै तथापि शुद्धत्रह्मविद्याके विषै देवादिकोंके अधिकार भावको बादरायण आचार्य मानता है। औ इस अर्थको श्रुतिभी कहती है "तद्योयो देवा नां प्रत्यबुध्यत ससएव तद्भवत्"इति।अस्यार्थ :- देवोंके विषे जो जो देव ब्रह्मको जानता भया सो सो ब्रह्म होता भया इति।औ देवताके शरीर धारनेमें स्मृति प्रमाण है "आदित्यः पुरुषो भूत्वा कुंती- सुपजगाम" इति। अस्यार्थ :- आदित्य पुरुष होके कुंतीके समीप जाताभया इति ॥३३ ॥ शुगस्य तदनादरश्रवणात्तदा द्रवणात्सूच्यते हि।।३४॥ इस सूत्रके-शुक् १अस्य रतदनादरश्रवणात इतदा ४ द्रवणात् ५ सूच्यते६हि७यह सात पद हैं।। जैसे देवता औ द्विजांतिमनुष्यों को वि- द्याका अधिकार है तैसे शूद्रकोभी विद्याका अधिकार है इसशंकाको दूर करने वास्ते इस अधिकरणका आरंभ है। श्रवण होताहै कि-जान- श्रुति राजा निदाघकालमें रात्रिके विषै अपने महलके ऊपर सोताभ- या तब तिस राजाके अन्नदानादिकोंसे प्रसन्नभये ऋषि हैं सो हंसहाके राजाके ऊपर आते भये तिन हंसौमें जो पीछे हंस था सो अगाडी च- लनेवाले हंसको बोला कि हे भदराक्ष!जानश्रुति राजाका तेजस्वर्ग- पर्यंत स्थित होरहा है सो तेरेको दग्ध करेगा तब अगाडी चलनेवाला हंस बोला कि इस विद्याहीन राजाका क्या तेज है ब्रहमज्ञानी रैक ऋषि का तेज बहुत है हमारे वचनसे राजा रैक्कके समीप जायके विद्यावान् होवैगा यह हंसों का अभिप्राय था हंसोंके वाक्यसे अपना अनादर सुना तब राजाको शोक उत्पन्न भया तबदसौ गौ औ एक रथ लेके रैंक्क के समीप जाताभया गौऔ रथ निवेदन करके राजा बोला कि हे

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(४0) ब्रह्मसूत्राणि। [ अध्याय १ सुरो मेरेको विद्याका उपदेश करो तब कन्यार्थी रैक्क बोला कि हे शूद्र! यह रथ गौ तेरेही रहो मेरे पत्नीहीनके किसकामका है इति॥ यद्यपि राजा जातिशूद्र नहींथा तथापि जो हंसवाक्यसे राजाको शोक उत्पन्न भया सोही हे शूद्र ! इस रैक्द वाक्यसे सूचित भया॥३४ ॥ क्षत्रियत्वगतेश्रोत्तरत्र चैत्ररथेन लिङ्गात् ।३५॥ इस सूत्रके-क्षत्रियत्वगतेः १ च २. उत्तरत्र ३ चैत्ररथेन ४ लिंगात् ५ यह पांच पद हैं।। संवर्ग विद्या वाक्यशेषके विष श्रवण होता है कि चित्ररथ राजाके वंशमें अभिप्रतारिनाम क्षत्रिय राजा होता भया तिसके साथ समान विद्याके विषै जानश्ुति राजाका कथन होनेतें जानश्रुति राजा क्षत्रिय था जातिशूद्र नहीं था जाति शूद्रको विद्याका अधिकार नहीं॥३५॥ संस्कारपरामर्शात्तद् भावाभिलापाच्च॥ ३६॥ इस सूत्रके-संस्कार परामर्शात् १ तद्भावाभिलापात् २च ३ यह तीन पद हैं।। शास्त्रके विषै विद्या ग्रहणका अङ्ग उपनयनादि- संस्कार कहाहै और शूद्को उपनयनादि संस्कारका अभाव कहाहै इसीस शूद्रको विद्याका अधिकार नहीं॥ ३६॥ तदभावनिर्धारणे च प्रवृत्ते:॥३७॥ इस सूत्रके-तदभावनिर्धारणे १ चरप्रवृत्ते: ३ यह तीन पद हैं।। श्रवण होता है कि सत्यकामका पिता मरगया जब अपनी माता जा- बाला को पूछा कि मेरा गोत्र क्या है तब जाबाला बोली कि मैं तेरे पि ताकी सेवामें व्यग्रचित्त रही इसीसे तेरे पिताका गोत्र नहींजानती इत ना जानतीहों कि जाबाला मेरा नाम है औ सत्यकाम तेरा नामहैं ति- सके अनन्तर सत्यकाम गौतमऋषिके समीप जाताभया जब गौतम बोला कि तेरा गोत्र क्याहै? तब सत्यकामबोला कि मैं मेरा-गोत्र नहीं जानता औ मेरी माताभी नहीं जानती है परंतुमेरी माता बोली कि

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पाद ३ ] भाषाटी कासहितानि। (४३) तुम उपनयन संस्कारके वास्ते आचार्यके समीप जाओ औ ऐसे कहो कि सत्यकाम मेरा नाम है औ जाबालाका पुत्रहों इति। तब गौतम बोला कि हे सौम्य तेरे सत्यवचन करके निर्धार होताहै कि तूं शुद्ध नहीं है तृं समिध लेआ तेरा उपनयन करेंगे इस गौतमकी प्रवृत्तिसे जाना जाताहैं कि शूद्को विद्याका अधिकार नहीं है।।३७।। श्रवणाध्ययनार्थप्रतिषेधात्स्मृतेश्र॥३८॥ इस सूत्रके-श्रवणाध्ययनार्थप्रतिषेधात१स्मृते:२ चश्यह तीन पद्हैं।। "अथास्यवेदसुपशृण्वतस्रपुजतुभ्यांश्रोत्रप्रतिपूरणम् "इतिं। "न शुद्राय मति दद्यात्" इति चा।इन स्मृतियों करके शूद्रको वेदश्रव- णका औ वेदके अध्ययनका औ वेदार्थके अनु्ठानका निषेध होनेतैं शूद्रको वेदविद्याका अधिकार नहीं। औ स्मृतिका अर्थ यह है कि जब ब्राह्मण वेदका पाठ करे तब शूद् प्रमादसे वेदको सुने तो सीसे को वा लाखको तपायके तिसके श्रोत्रको पूरण करे इति औ शूद् को वेदका ज्ञान नहीं देना इति च॥ ३८ ॥ जिस करके यह सर्व जगत् चेष्टा करता है सो प्राण है वा चिदा- त्मा है ;? अत आह॥ कम्पनात् ॥३९। इस सूत्रका-कम्पनात१ यह एकही पद है।। "भीषास्माद्वातः पवते भीषोदेति सूर्य: ॥ भीषास्मादग्निश्वेंद्रश्र सृत्युर्धावति पंचमः" इस श्रुतिसे जाना जाता है कि सर्वजगतकी चेष्टाका हेतु चिदात्मा है। औ श्रुतिका अर्थ यह है कि इस परमेश्वरसैं भय करके वायु पवित्र करता है औ सूर्य उदय होता है औ अग्नि दाह करता है औ इंद्र वृष्टि करता है औ पांचमा मृत्यु दौडता है इति॥३९॥ छान्दोग्यके विषे श्रवण होताहै कि यह जीव सुषुप्तिकालमें इस शरीरको त्यागके परज्योतिके साथ मिलता है तहां संशय है कि

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(४२) ब्रह्मसूत्राणि। [अध्याय१ ज्योतिशब्दसे तमोनाशक तेजका ग्रहण है वा परत्रह्मका ग्रहण है। यद्यपि "ज्योतिश्ररणाभिधानात्" इस सूत्रके विषै ज्योतिका विचार किया है तथापि तहां ज्योतिःशब्द अंपने अर्थकों त्यागके ह्रके विषै वर्तता है औ इहां अर्थ त्यागमें कोई कारण नहीं दीखता यह पूर्व पक्षीका अभिप्राय है अत आह॥ ज्योतिर्दर्शनातू्॥४० ॥ इस सूत्रके-ज्योतिः १ दर्शनात् २ यह दो पद हैं।। "य आत्माड पहतपाप्मा" अस्यार्थ :- जो आत्मा है सो सर्वपापरहित है इति॥ इस श्रुतिवाक्यके विषै सर्वपापरहितत्वका दर्शन होनेतैं ज्योतिश- बदसे परब्रह्मका ग्रहण है॥ ४०॥ छान्दोग्यके विषै श्रवण होताहै कि "आकाशो ह वे नामरूप योनिर्वहिता" अस्यार्थ :- नामरूपका निर्वाह करनेवाला आकाशहै इति। तहां संशय है कि आकाशशब्दसे भूताकाशका ग्रहण है वा परब्रह्मका ग्रहण है! अत आह॥।

इस सूत्रके-आकाश:१अर्थांतरत्वादिव्यपदेशात्श्यह दो पदहैं। "ते यदन्तरा तद्ह्न"। अस्यार्थ :- जो तेरे भीतर है सो ब्रह्म है इति। इस श्रुतिवाक्य करके नाम रूप से भिन्न आकाशका कथन होनेतैं आकाशशब्दसे परब्ह्मका ग्रहण है। औ जो पूर्व "आकाशस्तल्लिं- ङ्रात" यह सूत्र कहा है तिसका विस्तार इहां कहा है इसीसे पुनरु- क्तिदूषण नहीं ॥४१ ॥ बृददारण्यकके विषै श्रवण होता है कि याज्ञवल्क्य ऋषिके प्रति राजाजनक पूछतामया कि हे भगवन् ! आत्मा कौन है ? तब ऋषि बोले कि विज्ञानमय आत्मा है। तहां संशय है कि याज्ञवल्क्य ऋषि संसारी जीवत्माका स्वरूप कहतेभये वा असंसारी प्राज्ञात्मा का स्वरूप कहतेभये? अत आह॥

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पाद ४ ] भाषाटीकासहितानि। (४३)

इस सूत्रके-सुषुस्युत्कान्त्यो:१भेदेन २ यह दो पदहैं। सुषुतिक विषै औ मरणके विषै जीवात्माका औ प्राज्ञात्माका भेद करके कथन किया है इसीसे जानाजाता है ककि याज्ञवल्क्य ऋषि असंसारी प्राज्ञात्माका स्वरूप जनकके प्रति कहतेभये ॥४२ ॥ पत्यादिशब्देभ्यः॥४३॥ इस सूत्रका-पत्यादिशव्दृभ्य: १ यह एकही पद है। "सर्वस्य वशी सर्वस्येशानः सर्वस्याधिपतिः" इत्यादि श्रुतिवाक्योंके विषै पत्यादि शब्दोंसेभी असंसारी प्राज्ञात्माके स्वरूपका कथन है। औ श्रुतिवाक्यका अर्थ यहहै कि सो परमात्मा सर्वके अपराधीन है औ सर्वका नियंता है औ सर्वका अधिपति है इति॥४३॥ इति श्रीमन्मौक्तिकनाथयोगिविरचितायां ब्रह्मसू त्रसारार्थप्रदीपि- कायांप्रथमाध्यायस्यतृतीयःपादः ॥३॥

प्रथमाध्याये चतुर्थ: पाद:। आनुमानिकमप्येकेषामिति चेन्न शरीररूपकविन्यस्त गृहीतेर्दर्शयति च॥१॥ इस सूत्रके-आनुमानिकम्१ अपि २ एकेषाम्३इति ४ चेत ५ न ६ शरीररूपकविन्यस्तगृहीते: ७ दर्शयति ८ च ९ यह नौ पद हैं।। "ईक्षतेर्नाशन्दम्" इस सूत्रके विपे कहाहै कि अशव्दप्रंधान जगतका कारण नहीं इति। अब सांख्यवादी कहताहै कि यद्यपि प्रधान अनु- मानसे जानाजाताहै तथापि किसी वेदकी शाखावाले पुरुषों को प्रधान शब्द प्राप्त होताहै जैसे कठवल्लीके विषै "महतः परमव्यक- मव्यक्ताद पुरुष: परः"इति।अस्यार्थ :- महतत्त्वसे पर अव्यक्तहै औ;

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(४४) ्रह्मसूत्राणि। [अध्याय ३ अव्यक्तसे परपुरुष है इति। इस वाक्यमें अव्यक्त नाम प्रधानका है सो प्रधान कारण है यह सांख्यवादीका कहना समीचीन नहीं, काहेतैं? किसी प्रकरणके विषै आत्माको रथीरूपसे ग्रहण करके औ शरीरको रथरुपसे ग्रहण करके दिखाया है इसीसे यहभी जाना- जाता है कि उक्तवाक्यके विषै अव्यक्त शब्दसे शरीरका ग्रहण है प्रधानका नहीं ॥। १॥ पूर्व जो कहा कि उक्तवाक्यके विषै अव्यक्तशब्दसे प्रधानका ग्रहण नहीं किंतु शरीरका ग्रहण है सो कहना ठीक नहीं, काहेतैं! अ- व्यक्त शब्दका अर्थ सूक्ष्म है औ शरीर स्थूल है सो अव्यक्त शब्दका अर्थ नहीं होसकताहै अत आह।। सूक्ष्मं तु. तदहत्वात ॥२ ॥ इस सूत्रके-सूक्ष्मम् १ तु २ तदर्हत्वात् ३ यह तीन पद हैं॥। 'तु'शब्द पूर्वपक्षकी निवृत्तिके अर्थ है इहां सूक्ष्मशरीर कारण रूप करके विवक्षित है सो अव्यक्तशब्दके योग्य है पूर्व अवस्थाके विषै यह जगत् अपने नामरूपको त्यागके बीजशक्तिके विषै स्थित है सोई अव्यक्त शब्दके योग्य है॥ २ ॥ शंकते-जो तुम कहते हो कि सृष्टिसे पूर्व अवस्थाके विषै यह जगत् अपने नामरूपको त्यागके बीज शक्तिमें स्थित रहताहै इसीको हम प्रधान कारण वाद कहते हैं अत आह॥ तदधीनत्वादर्थवत्॥३॥ इस सूत्रके-तदधीनत्वात् १ अर्थवत् २ यह दो पद हैं॥ जो हम इस जंगतकी पूर्व अवस्थाको स्वतंत्र मानें तो हमारे मतमें प्रधान कारण वादका प्रसंग होवै किंतु इस जगतकी पूर्व अवस्थाको परमे- श्वरके अधीन मानते हैं इसीसे यह पूर्व अवस्था अर्थवाली है।।३।। ज्ञेयत्वावचनाच्च॥४॥ इस सुत्रके-ज्ञेयत्वावचनात् १च२ यह दो पदहैं।। "गुणपुरुषा-

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पाद ४ ] भापाटी कासहितानि। (४५) न्तरज्ञानात्कैवल्यम्" इति। यह सांख्यस्मृति है इहां सांख्यवादी कह- ताहै कि जब सत्त्व रज तम इन तीन गुणरूप प्रधानसे पुरुषका भेद ज्ञान होवे तब मोक्ष होवै औ तीन गुणरूप प्रधान को जाने बिना पुरु- षका भेदज्ञान होवै नहीं इसीसे प्रधान ज्ञेय है यह सांख्यवादीका कहना ठीक नहीं। काहेतैं "महतःपरमव्यक्तमव्यक्तात्पुरुषःपरः"इस वाक्यके विषै प्रधानको ज्ञेय नहीं कहा किंतु अव्यक्त इतना शष्द- मात्र कहा है इसीसे अव्यक्त शब्द करके प्रधानका ग्रहण नहीं॥8॥ वदतीति चेन्न प्राज्ञो हि प्रकरणात् ॥५॥ इस सूत्रके-वद्ति १ इति २ चेत् ३ न ४ प्रा: ५ हि ६ प्रकर- णात७ यह सातपदहैं। "अशव्दमस्पर्शमरूपमव्ययम्"इत्यादि श्ुति अव्यक्तशब्दवाच्य प्रधानको ज्ञेय कहती है यह सांख्यवादीका कहना समीचीन नहीं, काहेतैं यह प्रकरण प्रधानका नहीं किंतु प्राज्ञात्माका. है इस श्रुतिके विषे जो शब्दसे रहित औ स्पर्शसे रहित औ रुपसे रहित औ अखण्ड़ एकरस कहा है सो भज्ञात्मा है॥ ५॥ त्रयाणायेव चैवसुपन्यास: प्रश्नक्ष ॥६।। इस सूत्रके-त्रयाणाम् १ एव २च ३ एवम्४ उपन्यास:५प्रश्ः६ च७ यह सात पद हैं।। कठवल्लीके विषै श्रवण होता है कि नचिकेताके प्रति यमराज कहता भया कि हे नचिकेत: तूं मेरेसे तीन वर मांग तब नचिकेता अग्नि १ जीव वपरमात्मा ३ इन तीनके जाननेवास्ते तीन प्रश्न करताभया औ नचिकेताके अगाडी इन तीनहांका निरूपण य- मराज करताभया प्रधानको विषय करनेवाला न प्रश्न है औ न निरु पण है इससे प्रधान अव्यक्तशव्दका वाच्य नहीं औ जञेयभी नहीं६ु।। महद्रच ॥ ७ ॥ इस सूत्रके-महद्वत् १ च २ यह दो पद हैं।। जैसे सत्त्वगुण प्रधान प्रकृतिका जो पहिला परिणाम है तिसके विषै सांख्यवादी महतंशब्द

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( ४६) नह्ासूत्राणि। [अध्याय १ का प्रयोग करते हैं तैसे"बुद्धेरात्मा महान्परः"वुद्धिसे महान् आत्मा परेहै इत्यर्थः। इत्यादि वैदिक प्रयोगके विषैआत्मशव्दरूप हेतु होनेतैं महत् शब्द प्रकृतिके परिणामको नहीं कहता तैसेही वैदिक प्रयोगके विषै अव्यक्त शब्द प्रधानको नहीं कहता इसीे प्रधान अशब्द है ७।। "अजामेकां लोहितशुक्कृष्णां बह्वी: प्रजाःसृजमानां सरूपाः"॥ अजो हयेको जुषमाणोडनुशेते जहात्येनां भुक्तभोगामज्योन्यः"अस्या र्थः-रज सत्त्व तम इन तीन गुणमयी औ अपने सदश बहुत प्रं- जाको उत्पन्न कररही ऐसी एक अजा प्रकृति है तिसको एक अज- परुष सेवताहुवा सुखी दुःखी होके संसारको प्राप्त होता है औ दूस- रा अज विरक्त पुरुष किया है भोग जिसका ऐसी प्रकृतिको त्याग- ता है इति॥। इस श्षुतिके विषै अजा नाम प्रधानका है सो क्षतिमू- लक प्रधान अशव्द नहीं यह सांख्यवादीकी शंका है तिसको दूंर करते हैं।। चमसवदविशेषात्॥८॥ इस सूत्रके-चमसवत् १ अविशेषात् २ यह दो पद हैं॥ "अर्वा- ग्वलश्रमस ऊर्ध्ववुध्नः"॥ जैसे इस मंत्रके विषै यह नियम नहीं होस- कता कि जिसका नीचे बिल होवै औ ऊपरसे गोल होवै ऐसा चमसनामा यज्ञपात्र ही होता है अन्यभी सर्वत्र यथा कथंचित ऐसा होसकता है तैसे 'अजामेकां' इस मंत्रके विषैभी यह नियम नहीं होसकता कि अजाशब्दसे सांख्यपरिकल्पित प्रधानका ग्रहण है अन्यमायादिकोंकाभी ग्रहण होसकता है॥। ८॥ सांख्यपरिकल्पित प्रधानका नाम अजा नहीं है तो अजा नाम किसका है ? अत आह। ज्योतिरुपक्रमात्तु तथा ह्यधीयत एके।। ९॥ इस सूत्रके-ज्योतिरुपक्रमात् १ तु २ तथा ३ हि ४ अधीयते ५

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पाद ४ ] भाषाटीकासहितानि। (g७) एके ६ यह छह पदहैं।। 'तु' शब्द निश्चयार्थहै जो ज्योतितें आदिलेके घरमेश्वरसे उत्पन्न भयेहैं औजरायुज अण्डज स्वेदज उद्भिज्न इन चार प्रकारके भूतोंके कारण हैं ऐसे तेज १ जल २ पृथिवी ३ इन तीन भूतोंका नाम अजा है सांख्यकल्पित तीनगुणका नाम अजा नहीं औ छान्दोग्यशाखावाले कहते हैं कि लोहित लालरूप तेजका है औ शुकरूप जलकाहै औ कृष्णरूप पृथिवीका है इसीसे इन तीन भूतोंका नाम अजा है इति ॥ ९॥ शंकते-तेज १जलरपृथिवी३ इन तीनके विषैअजाकी आकृति नहीं है औ इन तीिके जन्मका श्रवण होता है औ अजा नाम अजन्माकाहै सो अजन्माप्रधानहै तिसीका नामअजाहै अतआह।। कल्पनोपदेशाच्च मध्वादिवदविरोधः ॥ १०॥ इस सूत्रके-कल्पनोपदेशान् १ च २ मध्वादिवत् ३ अविरोधः ४ यह चार पद हैं।। यह अजाशव्दआकृतिऔ अजन्मके निमित्त नहींहै किंतु जैसे आदित्य मधु नहींहै परन्तु आदित्यके विषै मधुकी कल्पना करके उपासना करतेहैं तैसे तेज१जल २ पृथिवी ३इन तीन के विषै अजाकी कल्पनाका उपदेशहोनेतें कोई विरोध नहीं॥१॥ पुनःशंकते-"यस्मिन् पश्च पश्चजना आकाशश्च प्रतिष्ठितः।तमेव- मन्य आत्मानं विद्वान् ब्रह्मामृतोऽमृतम्" इति॥ इस श्षुतिके विषै दो पश्च शब्दका श्रवण होता है औ पश्चको पश्चगुणा करनेसे पच्चीस होते हैं सोईं पच्चीसतत्त्व सांख्यमें कहे हैं इसीसे प्रधानश्द श्रुति सूलक है अत आह।। न संख्योपसग्रहादपि नानाभावादतिरेकाच्च॥ ११॥ इस सृत्रके-न १संख्योपसंग्रहात्र अपिश्नानाभावात्थ्अति- रकात५चध्यह छह पद हैं।। संख्याका उपसंग्रह हानेतें प्रधान श्रति-

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(४८) [अध्याय१ मूलक नहीं हो सकता काहेतें!यह पच्चीस तत्त्व नाना हैं इन पश्च पं- ख्चके विषे ऐसा साधारण धर्म कोई नहीं है जिस से पच्चीसकी संख्या का ग्रहण होवै जैसे सप्तऋषि सत हैं तैसेही पश्चजन पश्च हैं पचचीस नहीं हैं औ इस श्रुतिके विषै आकाश औ आत्मायह दोअधिक कहेहैं इसी से पच्चीस तत्त्वका ग्रहण नहीं होसकता। औ श्रुतिका अर्थ यह है कि प्राण१ चक्षु २ श्रोत्र ३ अन्नध्मन५औ इनका कारण आकाश यह जिसके विषै स्थित हैं तिस अमृत ब्रह्म आत्माको में मानंताहूं औ इस मननसे मैं विद्वान् अमृतरूप होंइति॥११॥ जो पचीस तत्त्वका नाम पञ्चजन नहीं तो किसका नाम है इस शंकाको दूर करते हैं सूत्रकार।। प्राणादयो वाक्यशेषात्॥१२॥ इस सूत्रके-प्राणादय:१वाक्यशेषात २ यह दो पद हैं।। 'यस्मिन पञ्च पञ्चजनाः' इस वाक्यके उत्तर ब्रह्मस्वरूपनिरूपणके वास्ते "प्राणस्य प्राणसुतचक्षुषश्चक्षुरूत श्रोत्रस्य श्रोत्रमन्नस्यान्नं मनसोये मनो विदुः" यह वाक्यशेष है इसके विषै जो प्राण१चक्षु २श्रोत्र३ अन्न ४ मनयह पश्च कहे हैं सो पच्चजनहैं, काहेत!पच्चजनशब्दकी प्राणादिकोंमें लक्षणा है। औ वाक्यशेषका अर्थ यह है कि जो विवेकी पुरुष है सो तिस ब्रह्म को प्राणका प्राण औ चक्षुका चक्षु औ श्रोत्रका श्रोत्र औ अन्नका अन्न औमनका मनजानते हैं इति।।१२॥ पुनः शंकते-माध्यंदिनीशाखावाले प्राणादिकोंके विषै अन्नका कथन करतेहैं तिनके मतमें प्राणादिक पञ्चजन हैं औ काण्वशाखा वाले प्राणादिकोंके विषै अन्नका कथन नहीं करते तिनके मतमें प्राणादिक पश्चजन कैसे हैं? अत आह॥ ज्योतिषकेषामसत्यन्ने॥ १३॥ इस सूत्रके-ज्योतिषा१ एकेषामूं२असति ३अन्नेध्यहचार पदहैं ।।

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पाद ४] भाषाटीकासहितानि। (28 )

यद्यपपि काण्वशाखावाले प्राणादिकोंके विषै अन्नका कथन नहीं क- रते तथापि ज्योति करके पश्च संख्याको पूरतेहैं॥ १३॥ "आत्मन आकाशःसंभूतः"आत्मासे आकाश उत्पन्न होताभया "तत्तेजोऽसृजत" सो ब्रह्म तेजको रचताभया "स प्राणमसृजत" सो प्राणको रचताभया इत्यादि वेदांतवाक्योंके विषै सृष्टिकमका विरोध होनेतैं जगत्का कारण ब्रह्म नहीं हो सकताहै अत आहं।। कारणत्वे न चाकाशादिषु यथा व्यपदिष्टोक्े: ॥१४॥ इस सूत्रके-कारणत्वे १न२ च आकाशादिषु ४ यथा ५व्यप- दिष्टोक्ते: ६ यह छह पद हैं।। जैसा एक वेदांतके विषे सर्वज्ञ सर्वेश्वर अद्वितीय ब्रह्म जगत्का कारण कहा है तैसाही दूसरे वेदांतके विषै कहा है इसीसे नाना आकाशादि कार्यके विषै सृष्टिकमका विरोध है औ कारण ब्रह्मके विषै कोई विरोध नहीं॥। १४॥ "असद्वा इद्मत् आसीत" यह जगत सृष्टिके पूर्व असत होता- भया इस वाक्यसे जाना जाता है कि इस जगत्का कारण असत् है सत् नहीं अत आह।। समाकर्षात्॥१५॥। इस सूत्रका-समाकर्षाद १ यह एकही पद है। "असद्वा इदमग्र आसीत" इस वाक्यके अगाडी असववादकों दूर करके "सद्वाइदमग्र आंसीत्" यह जगत सृष्टिके पहिले सत होताभया इस वाक्यका समाकर्षण कियाहै इसीसे जानाजाता है कि इस जगत्का कारण सत् ब्रह्म है।। १५।। कौषितकि ब्राह्मणके विषै श्रवण होताहै कि काशीका राजा अ- जातशत्ु बालाकि ब्राह्मणके प्रति कहताभया कि "यो वै बालाक एतेषां पुरुषाणां कर्त्ता यस्य वैतत्कर्म स वै वेदितव्यः इति। अ- स्यार्थ :- हे बालाके जो आदित्यादि पुरुषोंका कर्ता है जिसका यह सर्व जगद कर्म (कार्य) है सो जानने योग्य है इति। तहां संशय

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(५०) बह्मसूत्रांणि। [अध्याय १ है कि जानने योग्य जीव कहा है वा सुख्य प्राण कहा है वा परमा- त्मा कहा है अत आह।। जगद्वाचित्वात् ॥१६ ॥ इस सूत्रका-जगद्राचित्वात् १ यह एकही समस्त पद है।। उक्त श्रुतिके विषै परमात्मा जानने योग्य कहा है काहेतैं श्रुतिके विषै क- मपद है सो सर्व जगत्का वाचक है सर्व जगतरूप कार्य परमात्माके विना अन्य किसीका नहीं हो सकता ॥ १६॥ जीवमुख्यप्राणलिङ्गान्नेति चेत्तद्वयाख्यातम् ॥१७॥ इस सूत्रके-जीवमुख्यप्राणलिङ्गात् १न२ इति ३ चेतु ४ तत्५ व्याख्यातम् ६ यह छह पद हैं। जो यह कहाहै कि वाक्यशेष के विषै जीवका लिङ्ग होनेतें औ मुख्य प्राणका लिद्ग होनेतें जीवका वा मुख्य प्राणका ग्रहण करना योग्य है सो कहना समीचीन नहीं, का- हेतें? "नोपासात्रैविध्यादाश्रितत्वादिहतद्योगात्" इस सूत्रके विषै त्रिविध उपासनाके प्रसंगरूप दूषणतैं इसका व्याख्यान पूर्व कर आयेहैं। १७॥ अन्यार्थ तु जैमिनिःप्रश्नव्याखयानाभ्यामपि चैव मेके१८ इस सूत्रके-अन्यार्थम्१ तु२जैमिनिः ३ प्रश्नव्याख्यानाभ्यामु४ अपि५ चद एवम्७ एकेट यह आठ पद हैं। अजातशत्रु औ बाला- किके प्रश्नसे औउत्तरसे यह निश्चय होताहै कि उक्तवाक्यके विषै ब्रह्मज्ञानके अर्थ जीवका ग्रहण है ऐसे जैमिनि आचार्य मानता है औ ऐसे ही वाजसनेयी शाखावाले मानते हैं ॥ १८॥ बृहदारण्य कमें मैत्रेयी ब्राह्मण के विषै श्रवण होताहै ककि "आत्मावा अरे द्रष्टव्यःश्रोतव्यो मंतव्यो निदिध्यासितव्यःइति।अस्यार्थः-याज्ञ वल्क्य कहतेभये किअरे मैत्रेयि आत्मा श्रवणकरनेयोग्य है औ मनन करनेयोग्य हैऔनिदिध्यासनकरनेयोग्य हैऔदेखनेयोग्य है इति। तहां संशयहै कि श्रवण मननके योग्य जीवात्माहैवा परमात्माहैअतआह।।

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पाद ४ ] भाषाटी कासाहेतानि। (५१)

वाक्यान्वयात॥ १९॥ इस सूत्रका-वाक्यान्वयात्१यह एकही समस्त पद है। पूर्वापर विचार करनेसे 'आत्मा वा अरे' इस वाक्यका परमात्माके विषै अन्वय (सम्बन्ध) प्रतीत होता है इसीसे जाना जाताहै कि श्रवण मननके योग्य परमात्मा है॥ १९ ॥

इस सूत्रके-प्रतिज्ञासिद्धेः१ लिंगम्२ आश्मरथ्यः ३ यह तीन पढ हैं।। एक आत्माके जाननेसे सर्व जगत् जाना जाता है यह वेदकी प्रतिज्ञा है इस प्रतिज्ञाकी सिद्धिका सूचक जो द्रष्टव्यत्वादि तिनका कथन है सो जीवात्मा परमात्माके अभेद अंशको लेके है ऐसे आ- श्मरथ्य आचार्य मानता है॥ २०॥ उत्क्रमिष्यत एवम्भावादित्यौडुलोमिः ॥२१ ॥ इस सूत्रके-उत्क्रमिष्यतः१ एवंभावात २ इति ३ औडुलोमि:४ यह चार पद हैं। संसार दशाके विषै देह इंद्रिय मन बुद्धिरूप उपाधि- के सम्बन्धसे मलिन जीव है सो ज्ञान ध्यानादि साधनके अनुष्ठानसे शुद्ध होके देहादिक उपाधिको त्यागके सुक्तिदशामें परमात्माके साथ अभेदको प्राप्त होताहै ऐसे औडुलोमि आचार्य मानताहै॥ २१ ॥ अवस्थितेरिति काशकृत्स्नः ॥२२ ॥ इस सूत्रके-अवस्थिते:१ इति२काशकृत्स्न: ३यह तीन पद हैं।। इस परमात्माकीही जीवभावकरके अवस्थिति होनेतैं जीवात्मा औ पर- मात्माका अत्यन्त अभेद है ऐसे काशकृत्स आचार्य मानताहै काश- कृत्स्नके मतमें परमेश्वरही जीव है इसीसे यह मत श्रुतिके अनुसार है औ आश्मरथ्यके मतमें यद्यपि जीव औ परमात्माका अभेदहै तथा- पिजीव औ परमात्माका कार्य कारण भाव है औ औडलोमिके मतमें संसार औ मुक्तिकी अपेक्षासे जीव औ परमात्माका भेद अभेद है२२

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(५२) ब्ह्मसूत्राणि। [अध्याय १: "जन्माद्यस्ययतः" इससूत्रके विषै कहाहै कि इस जगत्का कारण ब्रह्म है तहां संशय है कि जैसे घटका उपादान कारण मृत्तिका हैऔ निमित्त कारण कुलाल है तैसे ब्रह्म जगत्का उपादान कारण है वा निमित्त कारण है ? अत आह॥। प्रकृतिश्र प्रतिज्ञादृष्टान्तानुपरोधात्॥२३॥ इस सूत्रके-प्रकृति: १ च २ प्रतिज्ञादष्टांतानुपरोधात्श्यह तीन पद हैं।। 'येनाश्रुतं श्रुत भवत्यमतं मतमविज्ञातं विज्ञातम्"यह प्रति- ज्ञावाक्य है। अस्यार्थ :- जिस वस्तुका श्रवण मनन विज्ञान नहीं भया है तिस वस्तुका श्रवण मनन विज्ञान ब्रह्मके जाननेसे होता है इति। ओ "यथा सौम्यैकेन मृत्पिण्डेन सर्व मृन्मयं विज्ञातं स्यात" यह दष्टांतवाक्य है। अस्यार्थ :- हे सौम्य जैसे एक मृत्पिण्ड के जान- नेसे सर्व मृद्विकार जानाजाता है तैसे एक ब्रह्मके जाननेसे सर्व जगव जाना जाता है इति। इस प्रतिज्ञा औ दृष्टांतके नहीं रुकनेसे यह निश्चय है कि ब्रह्म जगवका उपादान कारण है क्योंकि उपादा नके ज्ञानसे तिसके कार्यका ज्ञान होता है औ जैसे मृत्तिकासे भिन्न कुलाल घटका कारण है तैसे ब्रह्मसे भिन्न जगत्का अन्यः कारण है नहीं इसीसे ब्रह्मही जगतका निमित्तकारण है॥ २३ ॥ एकही आत्मा जगत्का उपादान कारण औ निमित्त कारण कैसे है? अंत आह।। अभिध्योपदेशाच्च॥२४॥ इस सूत्रके-अभिध्योपदेशात्१ चश्यह दो पद हैं।। "सोऽकामयत बहु स्याँ प्रजायेय" सो परमात्मा संकल्प करता भया कि मैं बहु (प्रपंचरूप करके) उत्पन्न होऊं इत्यर्थः । इस वाक्यके विषै अभिध्य (संकल्पपूर्वक स्वतंत्र प्रवृत्ति)के उपदेशसे निश्चय होताहै कि ब्रम्म जगत्का निमित्त कारण है औ अपनेको बहुत होनेके संकल्पसे ब्रह्म उपादान कारण है॥ २४ ॥

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पाद ४ ] भाषाटी कासहितानि। (५३)

साक्षाच्चेभयाम्नानात्॥।२५। इस सूत्रकें-साक्षात् १ च २ उभायान्नानाव ३ यह तीन पदहैं।। वेदके विषै कहाहै कि इस जगतकी उत्पत्ति औ प्रलय साक्षाव ब्रह्मसे होतेहैं इसीसे यह निश्चय है किजगत् का उपादानकारण ब्रह्महै।।२५॥। आत्मकृतेः परिणामात् ॥२६॥ इस सूत्रके-आत्मकृते: १ परिणामात् २ यह दो पद हैं। जैसे मृत्तिका घटाSकार परिणामको प्राप्त होती है तेसे आत्मा अपना आपही जगदाकार परिणामको प्राप्त होता भया इसीसे जगत्का उपादान कारण है ॥ २६ ॥। योनिश्र हि गीयते॥२७॥ • इस सूत्रके-योनिः१च२हि गीयते ४यह चार पद्हैं॥ इसजग- तका(योनिः) उपादान कारण ब्रह्म है ऐसे वेदान्तके विष कहतेहैं। त- थाहि-'यद्भूतयोनिं परिपश्यन्ति धीराः" अस्यार्थ :- जो सर्व भूतोंका योनि (कारण) है तिसको धीर पुरुष ध्यानके विषै देखते हैं इति॥।२७॥ एतेन सर्वे व्याख्याता व्याख्याताः॥२८।। इस सूत्रके-एतेन १ सर्वेर व्याख्याताः३ व्याख्याताः४ यह चार पद हैं।। "ईक्षतेर्नांशव्दम्" इस सूत्रसे आदि लेके सांख्य पररिकल्पित प्रधान कारणवादका निषेध कियाहै इस प्रधान-कारणवाद के निषेध करके ही न्यायादिपरिकल्पित सर्व परमाण्वादि कारणवादके निषे- धका व्याख्यान होताभया इहां दोबेर 'व्याख्याताः'इस पदका कथन है सो इस समन्वयाध्यायकी समाप्तिको द्योतन करताहै॥ २८॥

तायां ब्रह्मसूत्रसारार्थप्रदीपिकायां प्रथमाध्यायस्य चतुर्थः पादः ॥४॥ इति प्रथमाध्यायः समाप्ः ॥१॥

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(५४) ब्रह्मसूत्राणि। [अध्याय २ द्वितीयोऽध्याय: २

प्रथम: पाद: । प्रथम अध्यायके विषै कहाहै कि प्रधानादिक अशब्द्हैं सो जगत् के कारण नहीं हैं किंतु सर्वज्ञ सर्वेश्वर सर्वशक्तिमान परमेश्वर जग- वका कारण है इति। अब अपने मतमें स्मृति न्यायादिकोंका विरोध दूर करनेके वास्ते इस द्वितीय अध्यायका प्रारंभ करतेहैं।। स्मृत्यनवकाशदोषप्रसङ्ग इति चेन्नान्यस्मृत्यनवकाश- दोषप्रसङ्गात्॥१। इस सूत्रके-स्मृत्यनवकाशदोषप्रसंगः१इतिरचेत्३न४अन्यस्मृ- त्यनवकाशदोषप्रसंगात् ५ यह पांच पद हैं॥ शंकते-जो सर्वज्ञ ब्रह्म को जगत्का कारण कहोगे तो अचेतन प्रधानको स्वतंत्र जगत्का कारण कहनेवाली कपिलस्मृतिके अनवकाशरूप दोषका प्रसंग वेदान्त मतमें होवैगा(इतिचेन्न)ऐसा कहो तो यह ठीक नहीं है। काहेतैं? "अहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा।"हे अर्जुन मैं सर्व जग- बूकी उत्पत्तिका हेतु औ प्रलयका स्थान हों इस परमेश्वरको जग- वुका कारण कहनेवाली गीतास्मृतिका कपिलके मतमें अनवकाश- रप दोषका प्रसंग होनेतैं परमेश्वरही सर्व जगत्का कारण है॥१ ॥ rS सांख्यस्मृतिका अनवकाश प्रसंगरुप दोष वेदान्तमतमें क्यों नहीं है? अत आह॥। इतरेषां चातुपलब्धेः ॥२॥ इससूत्रके-इतरेषाम् १ च२अनुपलब्धे:शयह तीनपद्हैं। प्रधानसे इतर(भिन्न) औ प्रधानका परिणाम जो महत्तत्त्व अहंकारादि सो देवकेः

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पाद १ ] भाषाटीकासहितानि। (५५) विषे वा लोकके विषे प्रसिद्ध नहीं इससि साँख्यस्मृतिका अनवकाश प्रसंगरूप दोष वेदांत मतमें नहीं ॥ २ ॥ एतेन योग: प्रत्युक्त:॥३। इस सूत्रके-एतेन १ योग: २ प्रत्युक्त: २ यह तीन पद हैं। इस सांख्यस्मृतिके निषेध करके योगस्मृतिका भी निषेध होताभया परंतु जो श्रुतिसे विरुद्ध प्रधानको स्वतंत्र कारण कहती है औ लोक वेद करके अप्रसिद्ध महत्तत्वादिकोंका प्रधानका कार्य कहती है ऐसी योगस्मृतिका निषेध है औ आसन प्राणायामादि योगका विस्तार श्वेताश्वतरोपनिषद्के विषै है सो श्रुतिके अनुसार है औ योगशा- स्त्रमें कहाहै कि"अथ तत्त्वदर्शनाभ्युपायो योगः" तत्त्वदर्शनकी उपायका नाम योग है इस योगका हमारे अंगीकार है॥ ३ ॥ न विलक्षणत्वादस्य तथात्वं च शब्दात्॥४। इस सूत्रके-न १ विलक्षणत्वात् २ अस्य ३ तथात्वम ४ च ५ शुब्दात् ६ यह छह पद हैं।। पूर्वपक्षी पुनःतर्कसे आक्षेप करता है जो यह कहाहै कि चेतन ब्रह्म जगत्का उपादान कारणहै सो कहना ठीक नहीं, काहेतैं!यह जगत् ब्रहम से विलक्षणहै जगत् अचेतनहै औ अशुद्ध है औ ब्रह्म चेतन है औ शुद्धहै औ विलक्षणोंका कार्यकार- णभाव बनें नहीं जैसे कटकादि भूषणका औ मृत्तिकाका कार्यकारण भाव नहीं औ"विज्ञानं चाडविज्ञानं च" इत्यादि शब्दभी विज्ञानस्व- रूप चेतन ब्रह्मसे अविज्ञानस्वरूप अचेतन जगत्को विलक्षण कहताहै॥४ ॥ वेदान्ती आशंका करता है कि जैसे 'मृदबवीत्' इस वाक्यके विषैःश्रवण होता है कि मृत्तिका बोलती भई तैसे और भी अचेतन इंद्रियादिकोंके विषै चेतनताका श्रवण होताहै अत आह।। अभिमानिव्यपदेशस्तु विशेषानुगतिभ्याम् ॥५॥ इस सूत्रके-अभिमानिव्यपदेश: १ तु २ विशेषानुगतिभ्याम् ३

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(५६) ब्रह्मसूत्राणि। ध्याय २ यह तीन पद हैं ॥तु शब्द आशंकाकी निवृत्तिकें अर्थ है 'मृदन्वीत् 7

इस वाक्यके विषै अचेतन मृत्तिका बोलती भई ऐसा कथन है, किंतु तिसका अभिमानी चेतन देवता बोलताभया ऐसा कथन है, काहेतैं?चितन भोक्ता है औ अचेतन भोग्यहै जो सर्वही चेतन होवैं तो यह भोक्ता है औ यह भोग्य है ऐसा विशेष कथन होवै नहीं औ अभिमानी चेतनदेवता संर्व अचेतनके विषै अनुगतहै इस रीतिसे चेतनब्रह्म अचेतन जगत्का कारण नहीं यह सांख्यवादीका आक्षेप है इसका उत्तर "दृश्यते तु" इस अग्रिम सूत्र करके सूत्रकार कहते हैं।। ५॥। दृश्यते तु ॥६ ॥ इस सूत्रके-दश्यते१ 'तु'२यह दो पद हैं।। तुशन्द पूर्वपक्षकी निवृ- त्तिके अर्थ है जो यह कहा कि विलक्षण होनेतैं चेतन ब्रह्म अचे- तन जगत्का कारण नहीं हो सकता है सो कहना ठीक नहीं, काहेतैं।इस लोकके विषै चेतन पुरुषोंसे अचेतन केश नखादिकों- की उत्पत्ति दीखती है औ अचेतन गोमयादिकोंसे चेतन वृश्चि- कादिकोंकी उत्पत्ति दीखती है॥ ६॥ असदिति चेन्न प्रतिषेधमात्रत्वात्॥७॥ इस सूत्रके-असत् १ इति २ चेत् ३ न ४ प्रतिषेधमात्रत्वाव् ५ यह पांच पद हैं।। जो शब्दादि हीन शुद्ध चेतन ब्रह्मको शब्दादि- मान् अशुद्ध अचेतन जगत्का कारण कहोगे तो तुम्हारे सत्कार्य- वादीे मतमें उत्पत्तिसे पैहिलीइस जगतरूप कार्यके असत्पनेका प्रसंग होवैगा(इति चेन्न) ऐसे कहो तो ठीक नहीं, काहेतैं!यह तुम्हारा कहना प्रतिषेध मात्र है प्रतिषेध करनेके योग्य वस्तु कोई नहीं है जैसे अब यह जगत् कारणरूप करके सत् है तैसे उत्पत्तिके पहिले भी कारणरूप करके सत् ही था असत् नहीं।। ७॥

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पादं १ ] भाषाटीकासहितानि। (५७)

अपीतौ तद्त प्रसङ्गादसमञ्जसम्ं ॥८॥ इस सूत्रके-अपीतौ १ तद्त् २ प्रसंगात् ३ असमंजसम् ४ यह चार पद हैं।। यह शंका सूत्र है जो स्थूलत्व सावयवत्व अचेतनत्व परिच्छित्रत्व अशुद्धत्वादि धर्मवाला जगत् ब्रह्मका कार्य कहोगे तो जैसे जलके विष लीयमान लवण जलको दूषित करता है तैसे प्रल- यकालमें कारण ब्रह्मके विषै लीयमान जगत् ब्रह्मको दूषित करेगा ऐसे ब्रह्मको अशुद्धताका प्रसंग होनेतैं जो उपनिषद् ब्रह्मको जगत्का कारण कहता है सो समीचीन नहीं ।। ८॥ न तु दृष्टान्तभावात्॥।९। इस सूत्रके-न १ तु २ दष्टान्तभावात् ३ यह तीन पद हैं। यह सिद्धान्तसूत्र है जो कहा कि यह जगत् प्रलयकालमें अपने कार- णके विषै लीन होके कारणको दूषित करेगा सो कहना ठीक नहीं, काहेतैं! कार्य है सो कारणको दूषित नहीं करे इसमें दृष्टान्त होनतें जैसे घट शरावादि बडे छोटे मृत्तिकाके कार्य हैं औ फटक कुंड- लादि सुवर्णके कार्य हैं परंतु जब यह नष्ट होके अपने कारण मृत्ति- कामें तथा सुवर्णमें लीन होते हैं तब मृत्तिकाको तथा सुवर्णको दूषित नहीं करते तैसही यह जगत कारणमें लीन होके अपने कारणको दूषित नहीं करता औ तुम्हारे पक्षमें दृष्टान्त है नहीं जो जल लवणका दष्टान्त कहा सो विषम है काहेतैं मधुर जल है सो लवणका कारण नहीं ॥ ९ ॥ स्वपक्षदोषाच्च॥१० ॥ इस सूत्रके-स्वपक्षदोषाव १ च २ यह दो पद हैं। जितने दोष वेदान्त पक्षमें कहे हैं उतनेही दोष सांख्यपक्षमें भी समान हैं जैसे यह कहा कि विलक्षण होनेतैं ब्रह्म जगत्का कारण नहीं तैसेही विलक्षण होनेतैं प्रधानभी जगतका कारण नहीं औ जो उत्प-

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(५८) ब्रह्मसूत्राणि। [अध्याय २ त्तिके पहिले असत्कार्यवादका प्रसंग कहा सो प्रसंग सांख्य पक्षमें भी समान है औ जो यह कहा कि प्रलयकालमें कार्य करके कारण दूषित होवैगा सो सांख्यपक्षमें भी होंवैगा इत्यादि सर्वदाष समान हैं१॥ तर्काप्रतिष्ठानादप्यन्यथाऽनुमेयमिति चेदेवम-

इस सूत्रके-तर्काप्रतिष्ठानात् १ अपि२ अन्यथा ३ अनुमेयमू४ इति५ चेत्६ एवम्७ अपिट अविमोक्षप्रसंगः९ यह नौ पद हैं। ब्रह्म- निष्ठ कारणताको वेद करके सिद्ध होनेतैं केवल तर्क करके तिसका बाध नहीं हो सकता काहेतैं वेद प्रमाणसे रहित औ कपिल, कणा- दादि पुरुषोंकी भिन्नं भिन्न बुद्धिमात्रसे अन्यथा अन्यथा कल्पित तर्ककी प्रतिष्ठा नहीं औ जो तर्कवादी ऐसे अन्यथा अनुमान करे कि.सर्व तर्कको अप्रतिध्ित कहोगे तो सर्वलोक व्यवहार तर्कसे सिद्ध होताहै तिसका उच्छेद होवैगा यह तर्कवादीका कहना ठीक नहा काहेतैं एक वस्तुके सम्यक ज्ञानसे मोक्ष होताहै ऐसे सर्वमोक्षवादी मानतेहैं औ परस्पर विरोधी पुरुषोंकी कल्पनामात्रसे रचित तर्कके ज्ञानसे मोक्ष होवे नहीं ऐसे तर्कवादीके पक्षमें अमोक्षका प्रसंग है यह बड़ाभारी कष्ट है॥। ११॥ एतेन शिष्टापरिग्रहा अपि व्याख्याताः।१२।। इस सुत्रके-एतेन १ शिष्टापरिग्रहाः२ अपि३ व्याख्याताः४ यह चार पद हैं।। मनु व्यास वसिष्ठादि शिष्टपुरुष भये हैं सो किसीभी अंश करके न्यायादि परिकल्पित अण्वादिकारणवादका ग्रहण नहीं करते भये तिस अण्वादि कारणवादको प्रधान कारणवादके तुल्य होनेतैं इस प्रधानकारणवादके निराकण करकै अण्वादिका- रणवादका भी निराकरण होताभया ॥ १२ ॥

इस सूत्रके-भोक्कापत्ते: १ अविभाग:२चेत्३स्यात् ४ लोकवत

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पाद १ ] भाषाटीकासहितानि। (५९) यह पांच पद हैं। अद्वैतवादके विषै भोक्ता है सो भोग्यभावको प्राप्त होवेगा वा भोग्य है सो भोकृभाव को प्राप्त होवैगा तो इतरेतर भावकी आपत्ति होनेतैं लोकके विषै चेतन जीवात्मा भोक्ता है औ शब्दादि विषय भोग्य हैं इस भोकृभोग्यका विभाग न रहेगा यह कहना समी- चीन नहीं, काहेतैं।जैसे लोकके विषै समुद्रसे जल अभिन्न भी है परंतु फेन तरङवुद्धुदादि रूपकरके भिन्न है तैसेही अभिन्न भोकृभोग्यभी उपाधिकरके भिन्न हैं॥ १३ ॥। तदनन्यत्वमारम्भणशब्दादिभ्यः॥१४॥ इस सूत्रके-तदनन्यत्वम् १आरंभणशव्दादिम्यःशयह दो पद हैं। पूर्व सुत्रके विषै व्यावहारिक भोकृ भोग्य मानके तिनका विभागक- हाहै औ परमार्थ दृष्टिसे न कोई भोक्ता है न भोग्य है काहेतें "यथा सौम्यैकेन मृत्पिण्डेन सर्व मृन्मयं विज्ञातं स्याद्वाचारम्भणं विकारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव सत्यम्" इस दष्टान्तभूत श्रुतिरूप आरम्भण शब्दसे तथा "बह्नैवदं सर्वम्" यह सर्व जगत ब्रह्मही है इस श्रुति- वाक्यसे कार्यमात्रका अभाव निश्चित है यह इस सुत्रका अर्थ है।।औ श्रुतिका अर्थ यह है कि हे सौम्य श्वेतकेतो एक मृत्पिण्डके यथार्थ ज्ञा नसे सर्व घटशरावादि मृत्तिकाके विकार जाने जाते हैं, काहेतें।वाणी करके जिसका आरम्भ भया ऐसा घटादि विकार नाम मात्रहै अपने कारण मृत्तिकासे जुदा नहीं औ कारणरूप मृत्तिकाही सत्य है इति।। १४ ॥ भावे चोपलब्धेः॥ १५॥ इस सूंत्रके-भावे १ च २ उपलब्धे: ३ यह तीन पद हैं॥। जब मृत्तिकारूप कारण विद्यमान है तबही घटादि कार्यका उपलब्धि (ज्ञान)होताहै ऐसेही ब्हम रूप कारण के होनेतें जगतरूप कार्यका ज्ञान होताहै इसीसे कार्य कारणका भेद नहीं है।। १५॥

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(६०) बह्मसूत्राणि। [ अध्याय २

सत्त्वाच्चावरस्य ॥ १६ ॥ इस सूत्रके-सत्त्वात् १ च २ अवरस्य यह तीन पद हैं। "स- देवसोम्येदमग्र आसीत" इस श्षतिकरके इस कालमें विद्यमान जग- तुरूप कार्यके सत्त्वका सृष्टिके पूर्व कारणरूप करके श्रवण होनेतें कार्य कारणका भेद नहीं। औ श्रुतिका अर्थ यह है कि हे सौम्य श्वेत केतो यह जगत सृष्टिसे पहिले सत्कारणरूपही होताभया इति॥१६॥ असद्रयपदेशान्नेति चेन्न धर्मान्तरेण वाक्यशेषात्।।१७। इस सूत्रके-असव्यपदेशाव १न २ इति ३ चेत् ४ न ५ धर्मान्त- रेण ६ वाक्यशेषात् ७ यह सात पद हैं। "असदेवेदमग्रआसीत"। अस्यार्थ :- यह जगत सृष्टिके पूर्व असवही होताभया इति। इस श्रुति करके असत्का कथन होनेतें सृष्टिके पहिले यह जगत सव नहींथा(इति चेन्न) ऐसे न कहो, काहेतैं।"तत्सदासीत"सो जगत सत् होताभया इस वाक्यशेषसे निश्चय है कि सृष्टिके पूर्व अस्पष्ट नाम रूप धर्मान्तरको लेके श्रति असत्का कथन करती है॥ १७॥ युक्ते: शब्दान्तराच॥१८ ॥ इस सूत्रके-युक्त: १ शब्दान्तरात् २ चं ३ यह तीन पद हैं। जिस पुरुषको दधि बनानेकी वा घट बनानेकी इच्छा होवे सो तिसके कारण दुग्घको वा मृत्तिकाको ग्रहण करताहै औ जो असत्की उ- त्पति होवे तौ कदाचित दुग्धसे घटबना चाहिये वा मृत्तिकासे दधि हुआ चाहिये औ कदाचित शशशृङ्गकी वा वन्ध्याके पुत्रकी भी उत्पत्ति होनी चाहिये इस युक्तिसे औ "एकमेवाद्वितीयम्" एकही अद्वितीय ब्रह्म है इस शब्दान्तरसे यही जाना जाताहै कि उत्पत्तिके पूर्व यह जगत सत् ही था असत् नहीं॥ १८ ॥। पटवच्च॥ १९॥: इस सूत्रके-पटवत१चरयह दो पदहैं।। जबपटहै सो किसी वस्तुमें

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पाद १ ] भाषाटीकासहितानि। (६१ ) दबा रहताहै तब देखनेवाले पुरुषको यह पट है ऐसा स्पष्ट ज्ञान नहीं होता किंतु यह पट है वा अन्य द्रव्य है ऐसा ही ज्ञांन होताहै औ जब पटको पसारे तब यह पट है ऐसा स्पष्ट ज्ञान होता है ऐसेही तन्तुरूप कारणके विषै यद्यपि पट है तथापि पटका ज्ञान नहीं होता औ तुरी वेम कुविन्दादि कारक व्यापारके अनंतर यह पट है ऐसा स्पष्टज्ञान होताहै इस रीतिसे कार्य कारणका भेदं है वास्तव भेद नहीं।।१९॥। यथा च प्राणादि।२० ।। इस सूत्रके-यथा १ चर प्राणादि३ यह तीन पद हैं।। जैसे लोकके विषै प्राणाऽपानादि प्राण के भेद प्राणायाम करके जब निरुद्ध होते हैं तब कारणमात्र प्राणकरके जीवन मात्रही शेष रहताहैआकुश्चन प्रसा- रणादि कार्य नहीं रहता औजब निरुद्ध नहीं है तब जीवनसे अधिक आकुश्चन प्रसारणादि कार्यभी होताहै तहां कारणरूप प्राणसे प्राणा- पानादि भेद भिन्न नहीं तैसेही सर्व जगत अपने कारण ब्रह्मसे भिन्न नहीं इसप्रकारसे "येनाश्चुतं श्रुतं भवत्यमतंमतमविज्ञातंविज्ञातम्"यह श्रुतिकी प्रतिज्ञा सिद्ध भई इस श्रुतिका अर्थ"प्रकृतिश्रप्रतिज्ञादृष्टा- न्तानुपरोघात्"इस सूत्रकी व्याख्यामें कर आयेहैं ॥ २०॥ इतरव्यपदेशाद्विता करणादिदो- षप्रसक्तिः॥२१।। इस सूत्रके-इतरव्यपदेशात १ हिताकरणादिदोषप्रसक्ति:२ यह दो पद हैं।। यह पूर्वपक्षका सुत्र है जो चेतनको जगत्का करणमानोगे तो चेतनके अहित जो जन्ममरण जरारोग नरकादि तिनके करणे- रूप दोषका प्रसंग होवेगा, काहेतैं? "तत्त्वमसि श्वेतकेतो" हे श्वेतकेतो 'तत्' सो ब्रह्म 'त्वमासि' तूं है इस महावाक्य करके इतर (जीवात्मा) ब्रह्म कहाहै औ ब्रह्म स्वतंत्र है जो स्वतंत्र ब्रह्म सुष्टिको करे तो अपने अहित नरकादिक नहीं बनावै॥ २१ ॥

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(६२ ) ब्रह्मसूत्राणि। [अध्याय २ अधिकं तु भेदनिर्देशात् ॥२२ ॥ इस सूत्रके-अधिकम्१ तुर भेदनिर्देशात्३ यह तीन पद हैं॥ यह सिद्धांतसूत्रहै तु शब्द पूर्वपक्षकी निवृत्तिके अर्थ है "सोऽन्वेष्टव्यः"सो परमात्मा देखने योग्यहै इत्यादि श्ुति करके अल्पज्ञ अल्पशक्तिमान् जीवात्सासे सर्वज्ञ सर्वशकत्तिमान् नित्य शुद्ध बुद्ध मुक्त परमात्माके भेदका कथन होनेतें जीवात्मासे परमात्मा अधिक(भिन्न)है तिसके विषै अहित करणादि दोष नहीं हो सकते औ जो पूर्वपक्षी ऐसे कहै कि तत्त्वमसि महावाक्य करके भेदसे विरुद्ध जीव ब्रह्मका अभेद क्यों कहा सो दोष हमारे मतमें नहीं काहेतैं? महाकाश घटाकाशकी न्याईं भेदाभेदका कथन है परमार्थसे नहीं ॥ २२॥ अश्मादिवच्च तदनुपपत्तिः ॥२३॥ इस सूत्रके-अश्मादिवत् १ च२ तदतुपपंत्तिः३ यह तीन पद हैं ।। जैसे लोकके विषै सर्व अश्म (पत्थर) एक पृथिवीत्व धर्मवाले है परंतु तिनके विषै वञ्र वैड्र्यादिमाण बहुत मौल्यके योग्य हैं औ सूर्यकान्तादिसणि न्यूनमोल्यके योग्य हैं कोई पत्थर काक कुत्तेके संसुख फेंकने योग्य है तैसेही एक ब्रह्म जीव प्राज्ञ भेद करके भिन्न है औ विचित्र कार्यवाला है इसीसे पूर्वपक्षी कल्पित दोहोंकी हमारे पक्षमें अनुपपत्ति है अर्थात् भेदको लेके कोई दोष नहीं॥२३॥ उपसंहारदर्शनान्नेति चेन्न क्षीरवद्धि ॥२४। इस सूत्रके-उपसंहारदर्शनात् १ न २ इति ३ चेतु४ नदक्षीरवत ६ हि ७ यह सात पद हैं। शंकते-एक अद्वितीय चेतन ब्रह्म जगत का कारण नहीं हो सकता काहेतें लोकके विषै उपसंहार का दर्शनहै उपसंहार नाम मेलनका है जैसे लोकके विषै घटादि कार्यके कर्त्ता कुलालादिक हैं सो मृत्तिका दण्ड चक्र सूत्रादि अनेक साधन- वाले हैं तैसे अद्वितीय ब्रह्मके सृष्टि बनानेका कोई साधन नहीं।

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पाद १] भाषाटीकासहितानि। (६३) (इति चेन्न) ऐसे न कहो काहेतैं-जैसे लोकके विषै क्षीर दुग्ध किसी । बाह्य साधनकी अपेक्षा नहीं करता औ अपना आपही दधि- रूप परिणामको प्राप्त होता है तैसे ब्रह्म भी किसी साधनकी अपेक्षा -- नहीं करके जगदाकार परिणामको प्राप्त होताहै॥ २४॥ यद्यपि अचेतन दुग्धादि अपने दध्यादि कार्यके वास्ते किसी साधनकी अपेक्षा नहीं करते तथापि चेतन कुलालादि अपने घटादि iकार्य करनेके वास्ते दण्ड चक्रादि साधन सामग्रीको ग्रहण करते हैं तैसे ब्रह्म चेतन भी बाह्यसाधनकी अपेक्षा क्यों नहीं करता अतआह।। देवादिवदपि लोके॥। २५॥ इस सूत्रके-देवादिवत् १ अपि २ लोके ३ यह तीन पद हैं।। जैसे लाकक विषै देव ऋषि योगी इत्यादि चेतन पुरुष ऐश्वर्यसंयुक्त हैं सो किसी बाह्य साधनको नहीं लेके अपने संकल्पमात्रसे अपूर्व शरीर प्रासाद रथादि अनेक कार्यको बनाते हैंतैसे महाऐश्वर्यवान् ब्रह्म चेतन सृष्टिके बनाने वास्ते किसी साधनकी अपेक्षा नहीं करता॥२५॥ कृत्स्नप्रसक्तिर्निरवयवत्वशब्दकोपो वा ॥ २६॥ इस सूत्रके-कृत्स्प्रसक्ति: १ निरवयवत्वशब्दकोप: २ वा शयह तीन पद हैं।। यह पूर्व पक्ष सूत्र है ब्रह्म निरवयव है वा सावयव है जो निरवयव है तो सर्वही ब्रह्म का रूप परिणामको प्राप्त होवेगा औ जो सावयव है तो यद्यपि एकदेशही परिणामको प्राप्त होवेगा तथापि "निष्कलं निष्कियं शांतम्"इत्यादि श्रुति ब्रह्म को निरवयव कहती है तिसका कोप होवेगा।। श्रुत्यर्थ :- ब्रह्म निष्कल है अर्थात निरवयवहै औ क्रियारहित है औ शांत है इति ॥ २६॥ श्रुतेस्तु शब्दमूलत्वात ॥ २७। इस सूत्रके-श्रुतेः१तु २ शब्दमूलत्वात् ३ यह तीन पद हैं।।'तु' शब्द पूर्वपक्ष की निवृत्ति के अर्थ है।"एतावानस्य महिमातो ज्यायांश्र

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(६४) त्रह्म सूत्राणि। [अध्याय २ पूरुषः"इस श्रुतिसे यह निश्रय है कि सर्व ब्रह्म कार्यरूप परिणामको प्राप्त नहीं होता औ निरवयव ब्रह्मका अंगीकार होनेतें "निष्कलम्" इत्यादि श्षुतिका कोप भी नहीं होता इस रीतिसे ब्रह्म में शब्दमूल प्रमा ण है इंद्रिय प्रमाण नहीं औ श्रुतिका अर्थ यह है कि सर्व प्रपंच इस ब्रह्मकी विभूति है औ पुरुष पूर्ण ब्रह्म तिस प्रपंचसे अधिक है इति २७ आत्मनि चैवं विचित्राश्च हि॥ २८॥ इस सूत्रके-आत्मनि १ च२ एवम् ३ विचित्रा:४च५ दि ६यह छह पद हैं।। जैसे स्वप्नावस्थामें एक आत्माके विषै अपने स्वरूप- नाशके विनाहीं अनैक प्रकारकी विचित्र सृष्टि उत्पन्न होतीहै तैसेही एक ब्रह्मके विषै अपने स्वरूपनाशके विनाहीं अनेक प्रकारकी विचित्र सृष्टि उत्पन्न होती है इसीका नाम विवर्त्तवाद है औ इस अर्थमें यह श्रुति प्रमाण है। "न तत्र रथा न रथयोगां न पन्थानो भवन्त्यथ रथांन् रथयोगान् पथ: सृजते" अस्यार्थ :- तिस स्वप्ना- वस्थाके विषै न रथ हैं औ न रथके योग्य घोडा हैं औ न चलनेके योग्य मार्ग हैं परंतु रथ घोडा मार्ग इन सर्वको आपही रचताहै इति।। स्वपक्षदोषाच्च॥ २९॥ इस सूत्रके-स्वपक्षदोषात् १ च २यह दो पद हैं॥ जो सर्व ब्रह्म को परिणामका प्रसंग औ निरवयवके अंगीकारका कोप इत्यादि वेदान्त पक्षमें दोष कहे सो प्रधान कारणवादी सांख्य पक्षमें औ अणुकारण- वादी न्याय वैशेषिक पक्षमें भी समान हैं॥ २९॥ सर्वोपेता च तद्दर्शनात्॥३० ॥ इस सूत्रके-सर्वोपेता१ च २ तददर्शनात ३ यह तीन पदहैं।।"सर्व- कर्मा सर्वकाम: सर्वगन्ध: सर्वरसः" इत्यादि श्रुतिके विषै श्रव्ण होता है कि सर्व विचित्र शक्तिवाला परदेवताही सर्व विचित्र जगत्का कर्त्ता है।।औ श्रुतिका अर्थ यह है कि सो परमेश्वर सर्व कर्मवाला है

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पाद १ ] भाषाटीकासहितानि। (६५)

औ सर्व कामवाला है औ सर्व गंधवाला है औ सर्व रसवाला है अर्थात् सर्व विचित्र शक्तिवाला है इति ॥ ३० ॥ विकरणत्वान्नेति चेत्तदुक्तम्॥३१॥ इस सूत्रके-विकरणत्वात् १ न २ इति ३ चेत ४ तत् ५ उक्तम् ६ यह छह पद हैं।। "अचक्षुष्कमश्रोत्रमवागमनाः"। अस्या अर्थ :- परब्रह्म चक्षु श्रोत्र वाक मन इत्यादि सर्वइंद्रियोंसे रहित है इति इस श्रुतिकरके परब्रह्म इंद्रियरहित प्रतीत होता है औ इंद्रियके विना कर्त्ता नहीं होसकता (चेत्)यदि पूर्वपक्षी ऐसे कहै सो कहना ठीक नहीं, काहेतैं? "देवादिवदपि लोके" इस सूत्रकरके उक्त शंकाका उत्तर कर आये हैं औ "अपाणिपादो जवनो गृहीता पश्यत्यचक्षुः स शृणोत्य- कर्ण:" यह श्रुति इंद्रियर हित ब्रह्म के सर्व सामर्थ्यको कहती है। अस्या अर्थ :- परमात्माके हस्तपाद नहीं हैं औ वेगवाला है औ सर्वको ग्रहण करता है औ चक्षु श्रोत्र नहीं हैं औ सर्वको देखता है औ सुनता है इति॥३१॥ • न प्रयोजनवत्त्वात् ॥ ३२ ।। इस सूत्रके-न १ प्रयोजनवत्त्वाव् २ यह दो पद हैं।। यह शंका सूंत्र है, लोकमें यह वार्त्ता प्रसिद्धहै कि अपने प्रयोजनके विना मंद पुरुषभी प्रवृत्त नहीं होता है औ परमात्मा नित्य तृप्त है तिसके जगतं रचनेमें कोई प्रयोजन नहीं ॥ ३२ ॥ लोकवत्तु लीलाकेवल्यम्॥ ३३॥ इस सूत्रके-लोकवत् १ तु २ लीला ३ कैवल्यम् ४ यह चार पद हैं।। तु शब्द शंकाकी निवृत्तिके अर्थ है जैसे लोकके विपै सर्व- कामनाकरके रहित कोई राजा अपने प्रयोजनके विनाही कद्ा- चित् केवल लीला करनेको प्रवृत्त होता है तैसे ईश्वर भी अपने प्रयोजनके विनाही केवल स्वभावमात्रसे सृष्टिरूप लीला करनेको प्रवृत्त होता है॥ ३३ ॥ ५

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(६६) ब्रह्मसूत्राणि। [अध्याय २ वैषम्यनैर्घृण्ये न सापेक्षत्वात्तथाहि दर्शयति॥३४॥ इस सूत्रके-वैषम्यनैर्घृण्ये १ न २ सापेक्षत्वात ३ तथा ४ हि।' दर्शयति ६ यह छह पद हैं। इस जगत्के विषै देवादि शरीर अति सुखको भोगनेवाले बनाये औ पंश्वादि शरीर अति दुःखंको भोग- नेवाले बनाये औ मनुष्यादि शरीर मध्यम भोग भोगनेवाले बनाये औ सर्वके नाशका हेतु प्रलय इसा जाना जाता है कि ईश्वर विष- मकारी है औ अतिकर है यह पूर्वपक्षीका आक्षेप है सो समीचीन नहीं काहेतैं ईश्वर निरपेक्ष होके सृष्टि स्थिति प्रलयको नहीं बनाता किंतु सर्वजीवोंके धर्माधर्मकी सापेक्षतासे बनाता है सो धर्माऽ- धर्मही सुखदुःखादिकोंके हेतु हैं औ ईश्वर सर्वका साधारण कारण हैं सो न विषमकारी है औ न क्रूर है औ इस अर्थको श्रुतिभी कहती है "पुण्यो वै पुण्येन कर्मणा भवति पापः पापेन" अस्या अर्थ :- पुण्यकर्म करके पुण्यात्मा होता है पापकर्म करके पापात्मा होता है इति॥ ३४ ॥ न कर्माविभागादिति चेन्नाऽनादित्वात्॥३५॥ इस सूत्रके-न १ कर्म २ अविभागात् ३ इति ४ चेत् ५ न ६ अनादित्वात् ७ यह सात पद हैं।। जो यह कहा कि विषम संसा- रकां कर्ता ईश्वर नहीं है किंतु जीवोंके कर्म हैं सो कहना ठीक नहीं काहेतैं "सदेव सोम्येदमय्र आसीत" यह श्रुति सृष्टिसे पहिले इस संसारको सत् कहती है जब यह संसार सतरूप था तब कोईभी कर्म नहीं था (इति चेन्न) ऐसा न कहो, काहेतैं! यह संसार बीजांकुर न्यायसे अनादि है जैसे बीजसे अंकुर होताहै औं अंकुरसे बीज होताहै तैसेही कर्मसे संसार होताहै औ संसारसे कर्म होताहै।।३५॥ शंका-आप इस संसारको अनांदि कैसे जानतेहो? अत आह॥ उपपद्यते चाप्युपलम्यते च ॥ ३६ ॥ इंस सुत्रके-उपपद्यते १ चर अपि उपलभ्धते ४ च५ यह पांच

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पाद २ ] भाषाटीकासहितानि। (६७ ) पद हैं।। जो संसार अनादि न होवै तो कर्मके विनाही संसारकी ड- स्पत्ति होनेतें सुक्त पुरुषकाभी जन्म होना चाहिये औ होताहै नहीं, काहेतें! कर्मसे शरीर होवे है औशरीरसे कर्म होवैहै औ मुक्तके कर्म है नहीं इसीसे सुक्तका जन्म नहीं होता है औ संसारके अनादित्वमें श्रुति प्रमाणहै "मूर्याचन्द्रमसौ धाता यथापूर्वमकल्पयत्" अस्या अर्थ :- घाता (परमेश्वर) जैसे पहिले कल्पमें सूर्यचन्द्रमा थे तैसेही इस कल्पमें बनाता भया इति॥३६॥

इस सूत्रके-सर्वधर्मोपपत्ते: १ च२ यह दो पद हैं। पूर्वोक्त प्र- कार करके सर्वज्ञत्व सर्वशक्तित्वादि सर्व धर्म कारण ब्रह्मके विषैही प्राप्त होतेहैं इसीसे औपनिषदर्शन निर्दोष है॥ ३७ ॥ इति श्रीमन्मौक्तिकनाथयोगिविरचितायांत्रह्म सृत्रसारार्थप्रदीपिकायां द्वितीयाध्यायस्य प्रथम: पादः ॥३॥ द्वितीयाध्याये द्वितीय: पाद:। यद्यपि सुमुक्षु पुरुषोंके हित के वास्ते वेदान्तवाक्योंका तात्पर्य दिखाने को वेदान्तशास्त्र प्रवृत्तभयाहै तथापि वेदान्तके विरोधी जो सांख्यादि दर्शन हैं तिनका खण्डन करनेके वास्ते इस द्वितीयपादका आरम्भ है। रचनातुपपत्तेश्र् नानुमानम्॥१॥ इस सूत्रके-रचनानुपपत्ते: १ च २न ३ अनुमानम् ४ यह चार पद हैं।। प्रधान कारणवादीके पक्षमें संसाररचनाकी अनुपपत्ति रूप दूषण होनेतें यह अनुमान नहीं होसकता कि केवल अचेतन प्रधान संसारका कारण है काहेतें यह केवल अचेन अपने कार्यको कर्त्ता है ऐसा दृष्टान्त नहीं जैसे लोकके विषै कुलालादि चेतनके विना केवल

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(६८) बह्मसूत्राणि। [अध्याय २ अचेतन मृदादि अपने घटादि कार्यको नहीं करसकते तैसे चेतन परमेश्वरके विना अचेतन प्रधान भी संसारको नहीं रचसकता ।9॥ प्रवृत्तेश्र ॥२॥ इस सूत्रके-प्रवृत्ते: १ च २ यह दो पद हैं॥ च शब्द अनुपपत्ति पदकी अनुवृत्तिके अर्थहै सांख्यवादी सत्त्व रज तम इन तीनगुणोंकी साम्यावस्थाका नाम प्रधान औ प्रकृति कहते हैं औ कहते हैं कि मृष्टिके आदिकालमें संसाररचनाके वास्ते साम्यावस्थाका परित्याग रूप प्रधानकी प्रवृत्ति होती है सो कहना ठीक नहीं, काहेतें? जैसे लो कके विषै अश्व कुलालादि चेतनके विना अपने आपही रथ मृदा- दिकोंकी प्रवृत्ति नहीं होती तैसे चेतन परमात्माके विना अचतन प्रधानकीभी अपनी आपही प्रवृत्ति नहीं होसकती ॥ २ ॥ पयोंऽबुवच्चेत्तत्रापि॥ ३ ।। इस सूत्रके-पयोंडयुवत् १ चेत २तत्र३अपि ४ यह चार पदहैं।। जैसे लोकके विषै बच्छेकी वृद्धिके अर्थ अचतन दुग्ध अपना आपही प्रवृत्त होताहै औ लोकके उपकारके वास्ते अचेतन जल स्वभावसे प्रवृत्त होताहै तैसे पुरुषार्थकी सिद्धिके अर्थ अचेतन प्रधानभी स्वभा वसे प्रवृत्त होताहै (चेत्) यदि ऐसे सांख्यवादी कहै सो कहना ठीक नहीं, काहेतं।चितन(धेतु)के स्नेहकरके दुग्धकीप्रवृत्ति होती है स्वभावसे नहीं औ जलभी चेतनकी प्रेरणासे चलता है इस अर्थमें श्रृति प्रमाण है"एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि प्राच्योऽन्या नद्ः स्यन्दन्ते" अस्या अर्थ :- याज्ञवल्क्य कहतमये कि हेगार्गि इस अक्षरब्रह्म की आ- ज्ञाके विषै पूर्वदिशाकी नदी औ अन्य सर्व नदी चलती हैं इति।।३।।

इस सूत्रके-व्यतिरेकानवस्थितेः१ च २ अनपेक्षत्वातश्यह तीन पद हैं। सांख्यमतमें तीन गुणकी साम्यावस्थाको प्रधान कहते हैं

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पांद २ ] भाषाटी का सहितानि। (६९) औ साम्यावस्थाके विना प्रधानका प्रवर्त्तक वा निवर्त्तक कोई अ- पेक्षित बाह्य वस्तु स्थित है नहीं औ पुरुष उदासीन है न प्रवर्त्तक है न निवर्त्तक है इसीसे अनपेक्ष प्रधान जगत्का कारण नहीं हो- सकता औ ईश्वर सर्वज्ञ सर्वशक्तिमान् है तिसकी प्रवृत्ति निवृत्तिमें कोई विरोध नहीं ॥४ ॥ अन्यत्राभावाच्च न तृणादिवत्॥५॥ इस सूत्रके-अन्यत्र १ अभावात २ च ३न४ तृणादिवद ५ यह पांच पद हैं। जैसे तृण पह्लव उदक इत्यादिक हैं सो किसी निमि- त्तकी अपेक्षा नहीं करके अपने स्वभावसेही दुग्धाकार परिणामकी प्राप्त होते हैं तैसे प्रधानभी अन्य किसी निमित्तकी अपेक्षा नहीं करके स्वभावसे महदाद्याकार परिणामको प्राप्त होता है: यह सां- ख्यवादीका कहना ठीक नहीं, काहेतैं धेन्वादि निमित्तकी अपेक्षा करकेही तृणादिक दुग्धाकार परिणामको प्राप्त होतेहैं स्वभावसे न हीं जो स्वभावसेही दुग्धाकार परिणामको प्राप्त होवे तो बैल करके भुक्त तृणादिकभी दुग्धाकार परिणामको प्राप्त हुआ चाहिये इस रींति से. प्रधानभी स्वभावसे परिणामको प्राप्त नहीं होसकता॥। ५॥ अभ्युपगमेऽप्यर्थाभावात्॥६॥ इस सूत्रके-अभ्युपगमे१अपि२अर्थाभावात् ३ यह तीन पद हैं॥। पूर्वोक्त प्रकारसे यह सिद्धभया कि प्रधानकी प्रवृत्ति स्वभावसे नहीं होसकती है अब कहतेहैं कि जो स्वभावसे प्रवृत्ति मानोगे तो भोग मोक्षादिपरुषर्कम अभाव होवेगा काहेतैं जो प्रधान अपनी प्रवृत्तिके ह्रस्व परिमाणवाला व्यणुकां नहीं करता है तो भोग मोक्षादि पुरु- भतम न्म्ऊं चक्षा नेहीं करेंगा तब पुरुषार्थकी सिद्धिके अर्थ प्र- धानकी प्रवृत्ति होती है इस तुम्हारी प्रतिज्ञाकी हानि होवेगी॥ ६॥

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(७०) ब्रह्मसूत्राणि। [ अध्याय २ पुरुषाश्मवदितिचेत्तथापि।। ७।। इस सूत्रके-पुरुषाश्मवत्१ इति २ चेत्३ तथा४ अपि ५ यह पाँच पद हैं। जसे कोई पंगु पुरुष है सो किसी अन्य पुरुषके उपरि चढके तिसको प्रवृत्त करता है औ अयस्कांतमणि लोहको प्रवृत्त करता है तैसे पुरुष है सो प्रधानको प्रवृत्त करेगा यहभी सांख्यवादीका कहना ठीक नहीं, काहेतैं! प्रधान स्वभावसे प्रवृत्त होता है औ पुरुष उदासीन है इस सांख्यसिद्धान्तका त्याग होवेगा औ प्रधान औ पुरुष नित्य हैं औ व्यापक हैं तिनका नित्य सम्बन्ध होनेतैं नि- त्यही प्रवृत्ति होवैगी॥७॥

इस सृत्रके-अङ्गित्वानुपपत्तेः १च२ यह दो पद हैं। सत्त्व रज तम इन तीन गुणोंकी सम अवस्थाका नाम प्रधान है औ जब प्रधानकी प्रवृत्ति होवेगी तब तीनों गुण विषम होके अङ्गाङ्गीभावको प्राप्त होवें गे औ जब अङ्गाङ्गीभावको प्राप्त होवेंगे तब सम अवस्थारूप प्रधान भी नष्ट होवैगा यह मूल प्रंधानका नष्टहोनाही प्रधानवादीके बडा- भारी कष्ट है इसीसे अङ्गाङ्गीभाव नहीं होसकता ॥८॥ अन्यथानुमितौ च ज्ञशक्तिवियोगात्।९॥ इस सूत्रके-अन्यथा १ अनुमितौ२ च३ज्ञशक्तिवियोगात४ यह चार पद हैं।। यह तीनों गुण परस्परमें सापेक्ष होके जो जो कार्य करना होवै तिस तिस कार्यके अनुकूल स्वभाववाले होते हैं यह प्रधानवादीका अन्यथा अनुमान है सो समीीक म काहेतें?प्र- धानके विषै ज्ञानशक्तिका अभाव होनेते अत्वात्॥४।। सकती औ जो प्रधानके विषै ज्ञानशक्तिका: अनाग दखातू३यह तीन चेतन संसारका कारण हैं इस ब्रह्मवादका प्रसंग होवे। ९ ॥

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पाद २ ] भाषाटी कास हितानि। (७१)

विप्रतिषेधाच्चासमञ्जसम॥१॥ इस सूत्रके-विप्रतिषेधात १ च २ असमंजसम् श्यह तीनपद हैं।। सांख्यवादी किसी जगह एक त्वङमात्रकोही ज्ञानेद्रिय मानके औ एक त्वककाही श्रोतरादि पंचभेद कहके पंचकमेंद्रिय एक मन यह सत इंद्रिय कहते हैं औ किसी जगह पंच ज्ञानेंद्रिय पंच कर्मेंद्रिय एक मन यह एकादश इंद्रिय कहते हैं औ कहीं महत्तत्त्वसे तन्मा- त्राकी उत्पत्ति कहते हैं ओ कहां अहंकारसे कहते हैं औ कहां वुद्धि अहंकार मन यह तीन अन्तःकरण कहते हैं औ कहां एक बुद्धिको ही अन्तःकरण कहते हैं इस प्रकारसे परस्परमें विरुद्ध होनेतैं औ श्रुतिस्मृतिसे विरुद्ध होनेतैं यह सांख्यमत समीचीन नहीं॥१०॥ पूर्वोक्त प्रकारसे प्रधान कारणवादका निराकरण किया अव न्या- यवैशेषिकाभिमतपरमाणुकारणवादका निराकरण करतेहैं-नैयायि. क परमाणुसे जगतकी उत्पत्ति मानते हैं औयह नियम करते हैं कि कारणका गुण है सो कार्यके विषे अपने समान जातीय गुणको उत्पन्न करता है जैसे शुकतन्तुसे शुकपट कीही उत्पत्ति होतीहै तैसे चेतन ब्रह्मसे उत्पन्नभया सर्वजगत् चेतनही होना चाहिये इस रीतिसे वेदांतमतमें आक्षेप करते हैं. इसका उत्तर औ पूर्वोक्त नियममें व्यभि- चार नैयायिककी प्रक्रियासे ही दिखाते हैं सूत्रकार। महद्दीर्घवद्रा ह्रस्वपरिमण्डलाभ्याम्॥११॥ इस सूत्रके-महद्दीर्घवत् १ वा २ हस्वपरिमण्डलाथ्याम् ३ यह तीन पद हैं।। परिमण्डल नाम परमाणुका है औ तिसके परिमा- णका नाम पारिमाण्डल्य है जैसे नैयायिकमतमें परिमण्डलसे अणु ह्रस्व परिमाणवाला व्यणुक उत्पन्न होता है औ तद्रत पारिमाण्डल्य उत्पन्न नहीं होता है औ व्यणुकसे महत् दीर्घ परिमाणवाला त्र्यणुक उत्पन्न होता है व्यणुकगत ह्रस्व परिमाण उत्पन्न नहीं

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(७२). ब्रह्ममूत्राणि। [अध्याय २ होता तैसेही चेतन ब्रह्मसे जगत् उत्पन्न होता है औ ब्रह्मगत चैतन्य उत्पन्न नहीं होता। ११॥ उभयथापि न कर्मातस्तदभावः ॥ १२॥ इस सूत्रके-उभयथा १ अपि २ न ३ कर्म ४ अतः ५ तद- भाव: ६ यह छह पद्हैं।। सृष्टिके आदि कालमें सर्व परमाणुके विषे कर्म उत्पन्न होता है तिसके अनंतर दो दो परमाणुका संयोग होके व्यणुक उत्पन्न होते हैं औ तीन तीन व्यणुकका संयोग होके त्र्यणुक उत्पन्न होते हैं इस रीतिसे औरभी चतुरणुकादि उत्पत्ति क्रमसे महापृथिवी महाजल महातेज महावायु उत्पन्न होतेहैं औ प्रलयके आदिकालमें सर्व परमाणुमें कर्म होके व्वयणुकादिकोका विभाग होके सर्व पृथिव्यादिकोंका नाश होताहै ऐसे वैशेषिक कहतेहैं सो कहना ठीक नहीं, काहेतैं ? मृष्टिके आदिकालमें परमाणुके कर्मका कोई निमित्त नहीं अभावसे संयोग विभाग नहीं होसकते संयोग विभागके अभावसे निमित्तके सृष्टि प्रलयभी नहीं होसकते॥१२॥ समवायाभ्युपगमाच्च साम्यादनवस्थितेः॥१३॥ इस सूत्रके-समवायाभ्युपगमात् १ च२ साम्यात् ३ अनवस्थि- ते:४ यह चार पद हैं।। वैशेषिक मतमें समवायका अंगीकार होनेतें सृष्टिप्रलयका अभावही सिद्ध होताहै काहेतें जैसे परमाणुसे अत्य- न्त भेदवालां व्यणक है सो समवायसम्बन्धसे परमाणुमें रहता है तैसेही परमाणुसे अत्यन्त भेदवाला समवायभी किसी अन्यसमवा यसम्बन्धसे परमाणमें रहेगा तैसे समवायका समवायभी किसी अन्य समवायसे रहेगा इस प्रकारसे अनवस्थाका प्रसंग होनेतें सृष्टिप्रलय सिद्ध नहीं होसकते ॥ १३॥ नित्यमेव च भावात्॥।१४॥ इस सूत्रके-नित्यम् १ एव २ च३ भावात् यह चार पदहैं।। पर

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पाद २ ] भाषाटीकासहितानि। (७३) माणु नित्यप्रवृत्तिस्वभाववाले हैं वा नित्य निवृति स्व्भाववालेहैं वा प्रवृत्ति निवृत्ति दोनों स्वभावाले हैं जो नित्य प्रवृत्ति स्व्भाववाले हैं वा प्रवृत्ति निवृत्ति दोनों स्वभाववाले हैं तो प्रलयका अभाव होवेगा औजो निवृत्ति स्वभाववाले हैं तो सृष्टिका अभाव होवैगा औ जो उभय स्वभाववाले कहो सो समीचीन नहीं, काहेतैं ? प्रवृत्ति निवृत्ति का परस्पर विरोध हैं॥। १४ ॥ रूपादिमत्त्वाच्च विपर्यंयो दर्शनात्॥१५॥ इस सूत्रके-रूपादिमत्त्वात् १ च २ विपर्ययः ३ दर्शनात् ४ यह चार पद हैं।। पृथवी जल तेज वायु यह चार प्रकारके परमाणु हैं सो रूपादि गुणवालेहैं औ नित्यहैं ऐसा वैशेषिक कहतेहैं सो कहना ठीक नहीं, काहेतें। वैशेषिक मतमें विपरीतताका प्रसंग होनेतेंजैसे लोक- के विषै रूपादि गुणवाला पट है सो अपने कारण तन्तुकी अपेक्षासे स्थूल है औ अनित्यहै तैसे परमाणुभी रुपादि गुणवाले होनेंतैं अपने परम कारणकी आपेक्षासे स्थूल औ अनित्य होवेंगे॥। १५॥। उभयथा च दोषात्॥ १६ ॥ इस सुत्रके-उभयथा१च २ दोषात् ३ यह तीन पद हैं।। जैसे लो- ककेविषै गन्ध रस रूप स्पर्श इन चारगुणवाली पृथिवी स्थूल हैऔ रूप रस स्पर्श इन तीन गुणवाला जल सूक्ष्म है औ रूप स्पर्श इन दो- गुण वाला तेज़ सूक्ष्मतर है औ एक स्पर्श गुणवाला वायु सूक्ष्मतम है. तैसे परमाणु अधिकन्यून गुणवाले हैं वा नहीं इन दोनोंही पक्षके विषै तुम्हारे मतमें दोष है काहेतैं जो अधिक न्यून गुणवाले परमाणु हैं तो जिसमें अधिक गुण है सो स्थूल होनेतें ! परमाणु न रहेगा औ जो सर्व परमाणु सर्व गुणवाले हैं तो जलके विषै गन्ध होना चाहिये औतेजके विषै गन्ध रस होने चाहियें इत्यादि दोषका प्रसंग होविगा ॥ १६

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(७४) ब्रह्ममूत्राणि। [अध्याय २ अपरिग्रहाच्चात्यन्तमनपेक्षा॥१७॥ इस सूत्रके-अपरिग्रहात् १ च २अत्यंतम् ३अनपेक्षा १ यह चार पद हैं।। इस परमाणु कारणवादको कोईभी मन्वादि शिष्टपुरुष ग्रहण नहीं करतेभये इसीसे वेदवादी पुरुष परमाणुकारणवादका अत्यन्त अनादर करते हैं॥ १७॥ पूर्वोंक्त प्रकारसे परमाणु कारण वादका खण्डन किया अब सर्व क्षणिकवादी बौद्धमतका खण्डन करते हैं।। समुदाय उभयहेतुकेऽपि तदप्रात्तिः॥१८॥। इस सूत्रके-समुदायः१ उभयहेतुकेरअपिव्तदप्राप्ति: ४ यह चार पद हैं।। सर्व पदार्थ बाह्यान्तर मेदसे दो प्रकारके हैं पृथिव्यादिभूत औ रुपादि भौतिक यहबाह्य पदार्थहैं चित्त औ कामादि चैत्त यह आन्तर पदार्थहैं औ कठिन स्न्नेह उष्ण चलनस्वभाववाले पृाथवी जल तेज वायुके परमाण मिलके बाह्य समुदाय होताहैऔ रूप विज्ञान वेदना संज्ञा संस्कार यह पांच स्कंध मिलके सर्वव्यवहरका हेतु आ- ध्यात्म समुदाय होताहै ऐसे सर्वास्तित्ववादी बौद्ध कहता है सोकहना ठीक नहीं, काहेतें? बौद्धके सतमें कर्त्ता भोक्ता वा प्रेरक कोई चेतन है नहीं औ परमाणुको तथा रूपादि पंचस्कंधको अचेतनहोनेते पर- माणु हेतुक बाह्य सखुदाय औ रूपादिहे तुक आध्यात्मसमुदाय नहीं होसकता औसमुदायके न होनेतें लोकयात्राकाभी लोप होवेगा १८ इतरेतर प्रत्ययत्वादिति चेन्नोत्पत्तिमात्र निमित्तत्वात् ॥१९॥।. इस सूत्रके-इतरेतरप्रत्ययत्वाव १ इति २ चेत् ३ न ४ उत्पत्ति- मात्रनिमित्तत्वात यह पांच पद हैं।। शंकते-यद्यपि हमारे मतमें भोक्ता वा प्रेरक कोई स्थिर चतन नहीं है तथापि अविद्या संस्कार विज्ञान नामरूप षडायतन स्पर्श वेदना तृष्णा उपादान भव जाति जरा मरण

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पाद २] भाषाटीकासहितानि। (७५) शोक परिदेवना दुःख दुर्मनस्ता यह अविद्यादिक परस्परमें कारण हैं तिनके विषे अविद्यादि जन्मादिकोंके कारण हैं औजन्मादि अवि- द्यादिकोंके कारण हैं इस रीतिसे समुदायकी उत्पत्ति होनेतैं लोकया- ताकी सिद्धि है (इति चेन्न) ऐसे न कहो, काहेतें १ अविद्यादिक उत्पत्तिमात्रके कारण हैं समुदायकी उत्पत्तिका कोई निमित्त नहीं औ निमित्तके अभावतैं लोकयात्राकी सिद्धि नहीं होसकती॥१९॥ उत्तरोत्पादे च पूर्वनिरोधात॥२०॥ इस सूत्रके-उत्तरोत्पादे १ च २ पूर्वनिरोधात श्यह तीन पद हैं॥। पूर्व यह कहाकि अविद्यादिक उत्पत्तिमात्रके निमित्त हैं ससुदायके निमित्त नहीं अब कहते हैं कि अविद्यादिक उत्पत्तिमात्रके भी निमित्त नहीं होसकते, काहेतैं?जब उत्तरक्षणकी उत्पत्ति होती है तब पूर्वक्षण नष्ट होजाताहै ऐसे क्षणभंगवादी मानते हैं जो पूर्वक्षण नष्ट होगया तो उत्तरक्षणका कारणही नहीं होसकता इसीसे यह सुगतका मंत समीचीन नहीं ॥ २०॥ असति प्रतिज्ञोपरोधो यौगपद्यमन्यथा॥२१॥ इस सूत्रके-असति १ प्रतिज्ञोपरोध: २ यौगपद्यम् ३ अन्यथा ४ यह चार पद हैं।। जो हेतुके विनाही कार्यकी उत्पत्ति कहै तो वि- षय करण सहकाररि संस्कार इन चार प्रकारके हेतुको प्राप्त होके चित्त रूपादिकोंका विज्ञानऔ चैत्त सुखादि उत्पन्न होतेहैं इस प्रति- ज्ञाकी हानि होवै औ जो उत्तरक्षणकी उत्पत्ति पर्यत पूर्वक्षण रहताहै ऐसे कहै तो कार्यकारणको एक कालमें स्थित होनेतैं सर्व पदार्थ. क्षणिक हैं इस प्रतिज्ञाका उपरोध होवै ॥ २१ ॥ प्रतिसंख्याSप्रतिसंख्यानिरोधाप्रा- प्तिरविच्छेदात् ॥ २२ ॥ इस सूत्रके-प्रतिसंख्या प्रतिसंख्यानिरोधाप्राप्ति: १ अविच्छेदाव २ यह दो पद हैं।। क्षणिकवादी है सो बुद्धिपूर्वक पदार्थोंके नाशको

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(७६) ब्ह्मसूत्राणि [अध्याय२ प्रतिसंख्यानिरोध कहता है औ अबुद्धिपूर्वक नाशको अप्रतिसंख्या निरोध कहताहै परंतु उत्तरक्षण औ पूर्वक्षणका जो कार्य कारण रूप प्रवाह है तिसका विच्छेद न होनेतें दोनोंही प्रकारका निरोध नहीं होसकता ॥ २२॥ उभयथाच दोषात् ॥२३ ॥ इस सूत्रके-उभयथा १ च २ दोषात् ३ यह तीन पद हैं॥ क्षणि- कवादी कहताहै कि प्रतिसंख्यानिरोध अप्रतिसंख्यानिरोधके अन्त- भूतही अविद्यादिकोंका निरोध है सो कहना ठीक नहीं, काहेतैं! जो यमनियमादिसाधनसहित सम्यक् ज्ञानसे अविद्यादिकोंका निरोध होताहै तो हेतुके विनाही अविद्यादिकोंका नाश होताहै इस क्षणिक वादीके मतकी हानि होवैगीऔ जो अपना आपही अविद्यादिकोंका नाश होताहै तो सर्व दुःख क्षणिक हैं यह क्षणिकवादीका मार्गोपदेश अनर्थक होवेगा इस रीतिसे क्षणिकवादीका मत समीचीन नहीं २३ आकाशे चाविशेषात्॥ २४॥ इस सूत्रके-आकाशे १ च २ अविशेषात ३ यह तीन पद हैं।। क्षणिकवादी कहताहै कि आकाश कोई वस्तु नहीं है सो कहना स- मीचीन नहीं, काहेतैं? प्रतिसंख्या अप्रतिसंख्या निरोधकी न्याई आकाशकोभी वस्तुत्वज्ञानका अविशेषहै औ "आत्मन आकाशः संभूतः"आत्मासे आकाश होताभया इस श्रुतिकरकेभी आकाश वस्तु सिद्ध है औ 'शब्द: वस्तुनिष्ठः गुणत्वात् गन्धवान्' इस अनु- मानसैभी आकाश वस्तु सिद्ध है॥ २४ ॥ अनुस्मृतेश्र ॥२५॥ इस सूत्रके-अनुस्मृते: १ च २ यह दो पद हैं। क्षणिकवादी आत्मासे आदि लेके सर्व वस्तुको क्षणिक कहता है सो कहना ठीक नहीं, काहेतें ? जो आत्मा क्षणिक है तो जो मैं पहिले घटको

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पाद २ ] भाषाटीकासहितानि। (७७)

देखता भया सो अब घटका स्मरण करता हो ऐसा अनु- स्मरण होताहै सो न होना चाहिये, काहेतैं? क्षणिकवादीके मतमें घटको देखनेवाला आत्मा नष्ट हो गया औ अन्य पुरुष वस्तुका दूसरेको स्मरण होता नहीं ॥२५॥ नासतोऽदृष्टत्वात् ॥२६ ॥ इस सूत्रके-न १ असतः२ अदष्टत्वात् ३ यह तीन पदहैं॥ नष्ट बीजसे अंकुर उत्पन्न होता है औ नष्ट दुग्धसे दधि उत्पन्न होताहै नष्ट मृत्पिण्डसे घट उत्पन्न होताहै ऐसे अभावसे भावकी उत्पत्ति होतीहै यह सुगतका मतहै सो समीचीन नहीं, काहेतैं!अभावसे भाव की उत्पत्ति देखी नहीं औ जो अभावसे भावकी उत्पत्ति होवे तो बीजके अभावसे घट उत्पन्न होना चाहिये औ दंड चक्रादि कारणका ग्रहण न करना चाहिये॥ २६॥ उदासीनानामपि चैवं सिद्धिः ॥।२७।। इस सूत्रके-उदासीनानाम् १ अपि २ च ३ एवम् ४ सिद्धि: ८ यह पांच पद हैं। जो अभावसे भावकी उत्पत्ति होवे तो यत्र करके रहित उदासीन पुरुषोंकेभी वांछित अर्थकी सिद्धि होनी चाहिये यत्रके विनाही कुलालको घट मिलना चाहिये तन्तुवायकों वस्त्न मिलना चाहिये।। २७॥ क्षणिकविज्ञानवादी योगाचार बौद्धका यह मत है कि विज्ञानसें व्यतिरिक्त कोईभी घटपटादि बाह्य पदार्थ नहीं हैं जैसे स्वप्नके विषै बाह्यवस्तुके विनाहीं सर्व व्यवहार विज्ञान मात्रसे होताहै तैसे जाग्रतके विषैभी प्रमाण प्रमेयादि सर्व व्यवहार विज्ञानमात्रसेही होताहै अत आह।। नाभाव उंपलब्धेः ॥२८॥ इस सूत्रके-न१अभावः २ उपलब्धेः३ यह तीन पदहैं।। घट पट

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(७८) ब्रह्मसूत्राणि। [अध्याय २ कुड्य कुसूल इत्यादि सर्व बाह्यपदार्थोंका ज्ञान होनेतैं तिनका अ- भाव नहीं होसकता॥ २८ ॥ वैधर्म्याच्च न स्वप्ादिवत ॥२९।। इस सूत्रके-वैधर्म्यात् १च २ न ३ स्वप्रादिवत् ४ यह चार पदहें जो यह कहा कि जैसे बाह्य वस्तुके विनाही स्वप्नके विषै ज्ञान होता है तैसे जागरितके विषै भी बाह्यवस्तुके विनाही ज्ञान होता है सो कहना ठीक नहीं काहेतैं! स्वप्नके पदार्थका औ.जागरितके पदार्थका बाध अबाघ रूप वैधर्म्य है जब पुरुष जागताहै तब: स्वप्न दृष्टव- स्तुका वाघ होता है औ जागरितके विषै दृष्ट घटादि वस्तुका वाघ कभी होता नहीं यहही स्वप् जागतके पदार्थोका वैधर्म्य है।।२९।। न भावोऽतुपलब्घेः॥ ३० ॥ इस सूत्रके-न9 भावः २ अनुपलव्धे: ३ यह तीन पदहैं॥ बाह्य वस्तुके विनाही वासनाकी विचित्रतासे घटपटादिज्ञानकी विचित्रता है यह कहना भी ठीक नहीं, काहेतैं! तुम्हारे मतमें बाह्य वस्तुका ज्ञान है नहीं औ बाह्य वस्तुके ज्ञान विना वासनाकी उत्पत्ति होती नहीं३o क्षणिकत्वाच्च ॥ ३१॥ . इस सूत्रके-क्षणिकत्वा् १च२यह दो पदहैं।। यद्यपिक्षणिकज्ञान- वादी योगाचार 'अहं अहं' इस आलय विज्ञान को वासनाका आश्रय कहताहै तथापि 'अयं घटः अयं पटः' इस प्रवृत्तिविज्ञानकी न्याईआल यविज्ञानको भी क्षणिक होनैतैं वासनाका आश्रय नहीं होसकता३१ सर्वथानुपपत्तेश्र ॥ ३२ ॥ इस सूत्रके-सर्वथा १ अनुपपत्तेः २ चश्यह तीन पद हैं। बहुत कहने करके क्या है सर्व प्रकार करके जैसे जैसे इस क्षणिकवादीके सिद्धान्तकी परीक्षा करे तैसे तैसे वालुकाकूपकी न्याईं विदीरण होताहै अपने कल्याणकी इच्छावाला पुरुष इस सुगतमतको सर्वथा अनुपपन्न जानके इसका अनादर करै॥। ३२ ॥।

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पाद २] भाषाटी कासहितानि। (७९)

नैकस्मिन्नसंभवात्॥३३॥ इस सूत्रके-न १ एकस्मिन् २ असंभवात् ३ यह तीन पद हैं। सु- गतके मतका निराकरण किया अब विवसन (दिगंबर) के मतका निराकरण करते हैं विवसन है सो स्याद्वाद सपभङ्गी न्यायको अपना सिद्धान्त मानते हैं सोसप्तभङ्ग यह है। स्यादस्ति १ स्यात्रास्ति २ स्यादस्ति चनास्ति च ३ स्यादवक्तव्यः ४ स्यादस्तिचावक्तव्यश्च५ स्यान्नास्तिचावक्तव्यश्र ६ स्यादस्तिचनास्तिचावक्तव्यश्च७ इति। इस सप्तभङ्गके समुदायको सप्तभङ्गी कहते हैं स्यादू अव्यय कर्थचित् अर्थको कहता है इसका संक्षेपसे अर्थ यह है कि घटादि वस्तु कथं- चित है १ कथंचित् नहीं है २ कर्थचित है औ नहीं है ३ कथंचित् अवक्तव्य है : कथंचित है औ अवक्तव्य है ५ कथंचित् नहीं है औ अवक्तव्य है ६ कथंचित है औ नहीं है औ अवक्तव्य है ७ इति। यहभी मत समीचीन नहीं काहेतैं एक कालमें एक वस्तुके विषे सत्त्व असत्त्वादि विरोधि धर्मोंका संभव नहीं जहां सत्त्व है तहीं असत्त्व नहीं औ जहां असत्त्व है तहां सत्व नहीं॥ ३३।

इस सूत्रके-एवम् १ च २ आत्माSकात्स्नर्यम् ३ यह तीन पद हैं।। जैसे एक धर्सिके विषै विरुद्ध धर्मका असंभव रूप दोष स्याद्रा- दमें है तैसे जीवात्माका अकारत्स््य दोषभी है काहेतैं विवसन कह- तेहैं कि शरीरका परिमाणही जीवका परिमाण है जो शरीरका परि- माण जीव है तो असर्वगत परिच्छिन्न जीवात्मा मध्यम परिणाम- वाला होनेतैं घटादिकोंकी न्याईं अनित्य होवेगा॥। ३४ ॥ न च पर्यायादप्यविरोधो विकारादिभ्यः।। ३५॥ इस सूत्रके-न १ च २ पर्यायात् अपि ४ अविरोध: ५ विका- रादिभ्य: ६ यह छह पद हैं।। पर्यायता करके जब जीव हस्तीके

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(60) ब्रह्ममूत्राणि। अध्याय २ शरीरको त्यागके कीटपतंगके शरीरमें जाता है तब जीवके अवयव कम हो जातेहैं औ जब कीटपतंगके शरीरको त्यागके हस्तीके शरीरमें जाता है तब अवयव बढजाते हैं इस रीतिसे हमारे मतमें विरोध नहीं ऐसे दिगंबर कहते हैं सो ठीक नहीं काहेतैं जो जावक अवयव घटते बढते हैं तो जीव विकारी होनेतैं अनित्य होवेगा३६

इस सूत्रके-अन्त्यावस्थितेः १ च २ उभयनित्यत्वात् ३ अवि- शेष: ४ यह चार पद हैं॥। मोक्ष अवस्थाके विषै जीवका अन्त्य- परिमाण है सो नित्य है ऐसे जैनमतवाले मानते हैं सो समीचीन नहीं काहेतैं जैसे अन्त्यपरिमाण नित्य है तैसे आद्य मध्य परिमा- णकोभी नित्यत्वका प्रसंग होनेतैं तीनोंही परिमाणोंको अविशेष प्रसंग है जैसे सौगतमत आदरके योग्य नहीं तैसे आर्हत मतभी असंगत होनेंतैं आदरके योग्य नहीं ॥ ३६॥

इस सूत्रके-पत्यु: १ असामञ्जस्यात् २ यह दो पदहैं। ईश्वरहै सो इस जगत्का केवल निमित्त कारणही है उपादान कारण नहीं ऐसे शैव वैशेषिकादिक कहते हैं सो समीचीन नहीं काहेतैं हीन मध्यम उत्तम प्राणियोंके भेदको करनेवाले ईश्वरके रागद्वेषादिदोष का प्रसंग होनतें अस्मदादिकोंकी न्याई अनीश्वरताका प्रसंग होवे गा जो विषमकारी है सो दोषवालाहै यह व्याप्ति लोकमें प्रसिद्धहै ३७ सम्बन्धानुपपच्तश्र ।।३८।। इस सूत्रके-संबन्धानुपपत्ते:१च २ यह दो पद हैं।। प्रधान पुरुषसें जुदा ईश्वर संयोगसमवायादि संबंधके विना प्रधान पुरुषको प्रेर नहीं सकता औ प्रधान पुरुष ईश्वर इनतीनोंका संयोगसंबंध बने नहीं का हेतैं यहतीनों सर्वगतहैं औ निरवयवहै औ इनके आश्रयाश्रयिभावकों

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पाद २] भाषाटी कासहिवानि। (८३) न होनेतैं समवायादि संबंधभी नहीं होसकता इसी से सांख्या दिकोंके ईश्वरकी कल्पना ठीक नहीं॥ ३८ ।। अधिष्ठानानुपपत्तेश्र ॥३९॥ इस सुत्रके-अधिष्ठानानुपपत्ते: १च२ यह दो पद हैं।। जैसे मृदा दिकोंको लेके कुंभकार कुंभ करनको प्रवृत्त होताहै तैसे ईश्वर भी प्रधानादिकोंको लेके प्रवृत्त होता है ऐसे तार्किक कहते हैं सो समी- चीन नहीं काहेतैं मृदादिकोंसे विलक्षण रुपादि हीन अप्रत्यक्ष प्रधानादिकोंको लेके ईश्वर प्रवृत्त नहीं हो सकता॥ ३९ ॥ करणवच्चेन्न भोगादिम्यः।।४।। इस सूत्रके-करणवत् १ चेत्रन ३ भोगादिभ्यः ४ यह चार पद हैं।। जैसे रुपादिहीन अप्रत्यक्ष चक्षुरादि करणोंको लेके पुरुष प्रवृत्त होताहै तैसे प्रधानादिकोंको लेके ईश्वर प्रवृत्त होताहै (इति चेन्न) ऐसे न कंहों काहेतैं।जो चक्षुरादि करणके सम प्रधानादिकोंको मोनोंगे तो संसारीपुरुषकी न्यांई ईश्वरको भी भोगादिकोंका प्रसंग होवेगा ४० अन्तवत्त्वमसर्वज्ञता वा ॥४१ ॥ इस सूत्रके-अन्तवत्त्वम् १ असर्वज्ञता२ वा ३ यह तीन पद हैं।। ईश्वर सर्वज्ञ औ अनंत है प्रधान औ पुरुष अनंत है ऐसे तार्किक कहते हैं तहीं हम पूछते हैं कि ईश्वर है सो अपनी तथा प्रधान पुरुषकी संख्याको वा परिमाणको जानता है वा नहीं जो जानता है तो जैसे लोकमें संख्या परिमाणवाला घटादि पदार्थ अनित्य है तैसे प्रधान पुरुष ईश्वर यह तीनोंही अनित्य होवेंगे औ जो नहीं जानता है तो ईश्वर सर्वज्ञ नहीं इस रीतिसे तार्किकपरिकल्पित ईश्वरकारणवाद असंगत है।। ४१ ॥ उत्पत्त्यसंभवात् ॥४२।। इस सूत्रका-उत्पत्त्यसंभवांत् १ यह एकही समस्तपद है। एकही ६

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(८२) ब्रह्मसूत्राणि। [अध्याय २ भगवान वासुदेव संकर्षण प्रद्युम्नअनिरुद्ध इसचतुर्व्यूहरूपकरके स्थि त है. वासुदेव परमात्मा है संकर्षण जीवहेप्रद्युन्न मनहै अनिरुद्ध अहं- कारहै.वासुदेवसे संकर्षण उत्पन्न होता है संकर्षणसे प्रहुन्न उत्पन्न हो- ताहै प्रद्यन्नसे अनिरुद्ध उत्पन्न होताहै ऐसे भागवत मानतेहैं सो ठीक नहीं, का हेतैं! वासुदव परमात्मासे संकर्षण जीवकी उत्पत्तिका असं- भवहै औ जो जीवकी उत्पत्ति होती है तो उत्पत्तिवाले जीवको घटा- दिवत अनित्य होनेतैं जीवकी भगवत्प्राप्तिरूप मोक्ष न होवेगी ४२ न च कतुः करणम्।।४३।। इस सूत्रके-न१ चर कर्तुः३ करणमध्यह च्यार पद हैं। संकर्ष- णाख्य जीव कत्तांसे प्रहुन्नसंज्ञक मनरूप करण उत्पन्न होताहै औ प्रद्युम्नसंज्ञक मनसे अनिरुद्ध संज्ञा अहंकार उत्पन्न होता है ऐसेभाग वत कहते हैं सो समीचीन नहीं काहेतैं लोकमें देवदत्तादि कत्तासे कुठारादि करण उत्पन्न होते देखे नहीं औ जो ऐसे कहै कि देवदत्त अपना आपही कुठारको बनायके छिदिक्रिया को करसकताहै सो भी ठीक नहीं काहेतैं देवदत्त अपने हस्तसे कुठारको बनाता है जीवके हस्तभी नहीं औ जीव करत्तासे मन करण उत्पन्न होताहै ऐसी कोई श्रुतिभी नहीं है।। ४३ ।। विज्ञानादिभावे वा तदप्रतिषेधः॥ इस सूत्रके-विज्ञानादिभावे १ वा २ तदप्रतिषेधः ३ यह तीन पदहैं।। जो ऐसे कहै कि वासुदेव संकर्षण प्रदयुम्न अनिरुद्ध यह च्यारों ही विज्ञानादि शक्तिवांले इश्वर हैं सो कहना बने नहीं काहेतैं जो यह च्यारों परस्पर भिन्न हैं तो च्यार ईश्वर मानना निरर्थक हैं औ एक भगवान् वासुदेव परमार्थ तत्त्व है इस तुम्हारी प्रतिज्ञाकी हानि होवैगी औ जो एकहीके च्यार भेद हैं तो वासुदेवसे संकर्षणकी उत्पत्तिका असंभव है॥। ४४ ॥

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हद ३ ] भाषाटीकासाहतानि। (८३)

विप्रतिषेधाच्च ॥४५ ॥ इस सूत्रके-विप्रतिषेधात् १ च २ यह दो पदहैं। इस शास्त्र के विषै आत्माही गुण औ गुणी है प्रद्युन्न अनिरुद्ध आत्मासे भिन्न हैं वासुदे- बादि चारों आत्मा हैं इत्यादि विरुद्धोक्ति बहुत हैं औशांडिल्यऋषि चारों वेदोंके विषै कल्याणको नहीं देखके इस शास्त्रको पढताभया इत्यादि वेदकी निंदा है इसीसे यह कल्पना असंगत है।। ४५।। इति श्रीमन्मौकिकनाथयोगिविरचितायां ब्रह्मसूत्रसारार्थप्रदीपिकायां द्विवीयाध्यायस्य द्वितीयः पादः॥२॥ द्वितीयाध्याये तृतीयः पाद:। वेदान्तके विषै तैत्तिरीय उपनिषद्में आकाश वायुकी उत्पत्ति मानते हैं औ छान्दोग्यके विषै नहीं मानते हैं औ वाजसनेयी शाखा वाले जीवप्राणकी उत्पत्ति मानते हैं औ अथर्ववदके विषै प्राणकी उत्पत्ति मानते हैं ऐसे उत्पत्तिश्रुतियोंका परस्परमें विरोध है तिसको दूर करते हैं सूत्रकार।। न वियदश्रुतेः॥१॥ इस्र सूत्रके-न १ वियत् २ अश्रुतेः ३ यह तीन पढ़ हैं॥ आकाश की उत्पत्ति नहीं होती काहेतैं छान्दोग्यकेविषे "तत्तेजोऽसृजत"यह श्रुति तेजपूर्वक जगतकी उत्पत्तिको कहती है औ आकाशकी उत्पत्तिमें कोई श्रति नहीं ऐसे एकदेशी मानता है॥। १ ॥ अस्ति तु ॥ २ ॥ इस सूत्रके-अस्ति १ तु २ यह दो पद हैं।'तु'शब्द पक्षान्तर ग्रह- णके वास्ते है जो छान्दोग्यके विषे आकाशकी उत्पत्तिको कहनेवाली श्रुति नहीं है तो न रहो परन्तु तैत्तिरीयके विषै "तस्माद्वा एतस्मादा- त्मन आकाश:संभूतः"यह श्रुति कहती है कि इस आत्मासे आकाश उत्पन्न होताभया इसीसे श्रुतियोंका परस्पर विरोध है॥ २ ॥

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(८४) ब्रह्मसूत्राणि। [अध्याय २ गौण्यसंभवात॥। ३॥ इस सूत्रके-गौणी१ असंभवात २ यह दो पद हैं। कोई कहता है कि आकाशकी उत्पत्ति नहीं होसकती औ जो आकाशकी उत्पत्तिमें श्रुति प्रमाण कहा सो श्रुति गौण है सुख्य नहीं काहेतैं कारणसामग्रीके अभावतैं आकाशकी उत्पत्तिका असंभव है औ जितने काल कणा दके शिष्य जीवते है उतनेकाल आकाशकी उत्पत्ति कोई भी नहीं कह सकता ॥ ३ ॥ शव्दाच्॥४॥ इस सूत्रके-शब्दात् १ च २ यह दो पद हैं।। "वायुश्रान्तरिक्षं चैतदमृतम्" यह श्रुति वायुको औ आकाशको अमृत कहती है अमृत नाम नित्यका है नित्यकी उत्पत्ति होती नहीं औ "आका- शशरीरं ब्रह्म" आकाशशरीरवाला ब्रह्म है इस श्रुतिसेभी आकाश अनादि भान होता है॥।४॥ एकही संभूत शब्द आकाशके विषै गौण औतेजके विषै सुख्य कैसा है इस शंकाका उत्तर एकदेशी कहता है।। स्याच्चैकस्य ब्रह्मशब्दवत्॥५॥ इस सूत्रके-स्यात् १ च २ एकस्य ३ ब्रह्मशब्दवत् ४ यह . चार पढ हैं।। जैसे एक ब्रह्म प्रकरणके विषै"अन्नं ब्रह्म" "आनंदों ब्रह्म" इन दो वाक्यों करके अन्नको औ आनंदको ब्रह्म कहा है तहां अन्नके विषै ब्रह्मशब्द गौण है औ आनंदके विषै सुख्य है तैसे एक ही संभूत शब्द आकाशके विषैगौण है औ तेजके विषै मुख्य है॥५॥ प्रतिज्ञाऽहानिरव्यतिरेकाच्छव्देभ्यः॥६॥ इस सूत्रके-प्रतिज्ञाSहानिः १ अव्यतिरेकात् २शब्देभ्य: ३ यह तीन पद हैं।। यह वेदकी प्रतिज्ञा है कि एक आत्माके जाननेसे सर्व

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पाद ३ ] भाषाटीकासहितानि। (८५) जगत् जाना जाताहै जो सर्व जगत्को ब्रह्मसे अभिन्न मानें तो इस प्रतिज्ञाकी हानि न होवै औ जो आकाशको ब्रह्मका कार्य न माने तो ब्रह्मके ज्ञानसे आकाशका ज्ञान न होवैगा तब प्रतिज्ञाकी हानि होवेगी औ"ऐतादात्म्यमिदं सर्वमं" यह सर्व जगत् रूप इस आत्म- रूप है इत्यादि शब्दोंसे भी जगत औ ब्रह्मका अभेदभान होताहै॥।६॥ जो यह कहा कि आकाशकी उत्पत्तिको कहनेवाली श्रुति गौण है तहां कहते हैं।। यावद्विकारं तु विभागो लोकवत्॥७॥ इस सूत्रके-यावत १ विकारम् २ तु ३ विभाग: ४ लोकवत् ५ यह पांच पद हैं। 'तु' शब्द शंकाकी निवृत्तिके अर्थ है जैसे लोकके विषै घट घटिका शराव कटक केयूर कुण्डलादि जितना विकार है उतनाही तिसका विभागहै औ विकार रहित वस्तुका विभाग है नहीं औआकाश दिक कालादिकोंका पृथिव्यादिकोंसे विभाग होनेतैं आकाशादिकोंसे विभाग है तथापि आत्मासे परे कोई वस्तु है नहीं जिसको आत्मा विकार होवे॥।७॥ एतेन मातरिश्रवा व्याख्यातः॥८।। इस सूतके-एतेन १ मातरिश्वा २ व्याख्यातः ३ यह तीन पद हैं।। इस आकाशके व्याख्यान करके आकाशके आश्रित वायुका भी व्याख्यान होता भया जो श्ुति आकाशको आत्माका विकार कहती है सो श्षुति वायुको आकाशका विकार कहती है।। ८॥ असंभवस्तु सतोऽतुपपत्तेः॥९ इस सूत्रके-असंभवः १ तु२ सतः ३ अनुपपत्तेः ४ यद चार पद हैं। जो कोई ऐसे कहै कि जैसे आकाश वायुकी उत्पत्ति होती है तैसे ब्रह्मकी भी उत्पत्ति होवेंगी सो कहना असंभव है काहेतैं सतब्रह्मकी उत्पत्ति सवसे है वा असतसे है जो सतसे कहोतो ब्रह्मसे

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(८६). बह्म सूत्राणि। [अध्याय २ दूसरा कोई सत् नहीं औ जो असत्से कहो तो कदाचित् वन्ध्याके पुत्रसे भी किसीकी उत्पत्ति होनी चाहिये औ त्रह्मकी उत्पत्तिको कहने वाली कोई श्रुति भी नहीं है।। ९।। तेजोऽतस्तथाह्याह॥ १॥ इस सूत्रके-तेज:१ अतः२ तथा३हि ४ आह ५यह पांच पद हैं। तेज है सोवायुसे उत्पन्न होताभया, काहेतैं? "वायोरझिः" यह श्रति- वाक्य वायुसे तेजकी उत्पत्ति कहता है औ जो छान्दोग्यमें "तत्तेजो- सृजत" यह श्रुतिहैः सो परंपरासे तेजको ब्रह्मका कार्य कहती है साक्षांत् नहीं ॥ १०॥ आपः ॥११॥ इस सूत्रका-आप: १यह एकही पद है।। पूर्व सूत्रसे "अतस्तथा ह्याह" इन पदोंकी अनुवृत्ति करणी, आप है सो तेजसे उत्पन्न होते भये, काहेतैं? "अग्नेरापः" यह श्रुतिवाक्य अग्निसे आपकी उत्पत्ति कहता है।। ११ ॥

इस सूत्रके-पृथिवी १ अधिकाररूपशव्दान्तरेभ्यः २ यह दो पद हैं।। वेदके विषै श्रवण होता है कि "ताअन्नमसृजत" अस्या: र्थ :- आप है सो अन्नको रचतेभये इति। तहां संशय है कि अन्नश- ब्दसे ब्रीहि यवादिकोंका ग्रहण है वा पृथिवीका ग्रहण है इति। तहां कहते हैं कि अन्नशब्दसे पृथिवीका ग्रहण है, काहेतैं?"तत्तेजोऽसृजत" यह महाभूतोंका अधिकार है व्रीहि यवादिकोंका नहीं, औ "यत्कृ- ष्णां तद्न्नस्य" जो कृष्णरूंप है सो अन्नका है इहां अन्नशब्दसे प्ृथिवीका ग्रहण है औ "अन्यः पृथिवी" आपसे पृथिवी होतीभई इस शब्दान्तरसे भी पृथिवीका ग्रहण है॥ १२॥

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पाद ३] भाषाटीकासहितानि। (८७) आकाशादि पंचमहाभूत अपने आपही अपने कार्यंको रचते हैं, वा परमेश्वर तिस तिस आकाशादि रुपसे स्थित होके तिस तिस कार्यका चिंतन करके तिस तिस कार्यको रचता है अतआह।। तदभिध्यानादेव तु तालिङ्ात्सः ॥१३॥। इस सूत्रके-तदभिध्यानात् १ एव २ तु३ तल्लिंगात४ सः५ यह पांच पद हैं। सो परमेश्वरही तिस तिस आकाशादिरूपसे स्थित होके तिस तिस कार्यका चिंतन करके तिस तिस कार्यको रचताहै, काहेतें?"यः पृथिव्यां तिष्ठन्" इत्यादि श्रुति कहती है कि जो परमे- श्वर पृथिवीमं स्थित होके पृथिवीको प्रेरता है औ पृथिवी तिसको नहीं जानती है इति॥१३॥ विपर्ययेण तु क्रमोऽत उपपद्यते च॥ १४॥ इस सूत्रके-विपर्ययेण १ तु२क्रमः ३ अतः ४ उपपद्यते ५ च ६ यह छह पद हैं।। भूतोंका उत्पत्तिक्रम कहके अब प्रलयक्कम कहते हैं जैसे उत्पत्तिकम है तैसेही प्रलयक्रम है वा विपरीत है. तहां कहते हैं कि उत्पत्तिकमसे प्रलयक्रम विपरीत है, काहेतैं! जैसे जिस क्रमसे पुरुष मकानके ऊपर चढता है तिसतैं विपरीत क्रमसे उतरता है तैसे ही उत्पत्ति क्रमसे प्रलयक्रम विपरीत है औ इस अर्थको स्मृति भी कहतीहै "जगतप्रतिष्ठादेवर्षेपृथिव्यपसुप्रलीयते। ज्योतिष्यापः प्रलीयंते ज्योतिर्वायौ प्रलीयते। वायुश्च लीयते व्योष्नि तच्चाव्यके प्रलीयते" इत्यादि। अर्थः-हे नारद जगत्को धा- रण करनेवाली पृथिवी जलके विषै लीन होतीहै औ जल ज्योतिके विषै लीन होता है औ ज्योति वायुके विषै लीन होताहै औ वायु आकाशके विषै लीन होता है औ आकाश अव्यक्तके विष लीन होता है।। १४॥

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(८८) ब्रह्मसूत्राणि।. [अध्याय २ अन्तराविज्ञानमनसी क्रमेण तलिड्रादिति चेन्नाविशेषात् ॥ १५॥ इस सूत्रके-अन्तराविज्ञानमनसी१ क्रमेण२ तल्टिद्गात ३ इति ४ चेत ५ न ६ अविशेषात् ७ यह सात पद हैं। अथववेदके विषै उ- त्पत्ति प्रकरणमें "एतस्माज्ायतेप्राणो मनःसवेद्ियाणिच"इत्यादि मंत्रलिङ्गसे आत्माके औ भूतोंके मध्यमें सर्व इंद्रियसहित बुद्धि औ मनकी उत्पत्तिका श्रवण होताहै तिस मन बुद्धिके उत्पत्ति क्रम क- रके पूर्वोक्त भूतादि क्रमका भंग होवैगा (इति चेन्न) ऐसे न कहो, का- हेतें!मन बुद्धि इंद्रिय यह सर्व भूतोंके कार्य हैं भूतोंके उत्पत्ति प्रलय करकेही इनकाभी उत्पत्ति प्रलय सिद्ध है और कुछ विशेषता नहीं। मंत्रार्थ :- इस आत्मासे प्राण मन सर्व इंद्रिय इत्यादि सर्वही उत्पन्न होते हैं इति॥१५ ॥ चशाचरव्यपाश्रयस्तु स्यात्तद््यपदेशो भाक्तस्तद्भाव- भावित्वात्॥।१६ ॥। इस सूत्रके-चराचरव्यपाश्रयः १ तु२ स्यात ३ तद्यपदेशः४ भात्त: ५ तद्धावभावित्वात् ६ यह छद्द पद हैं।। जीव जन्मता है औ मरता है यह किसी पुरुषको भ्रांति है तिसको दूर करते हैं जन्ममरण शब्दका कथन चराचर शरीरके आश्रय मुख्य है औ जीवके विषै जन्ममरण शब्दका कथन गौण है शरीरके प्रादुर्भाव तिरोभावका नाम जन्ममरण है शरीरके विना जीवका न जन्म है न मरण है१६ नात्माऽश्रुतेर्नित्यत्वाच्च ताभ्यः॥।१७॥ इस सूत्रके-न १ आत्मा २ अश्रुतेः ३ नित्यत्वात् ४ च ५ ता- भ्यः ६ यह छह पद हैं।। जैसे व्योमादिक परब्रह्मसे उत्पन्न होते हैं तैसे जीव उत्पन्न होता है वा नहीं तहां कहते हैं कि जीव उत्पन्न नहीं होता, काहेतैं ? उत्पत्तिप्रकरणके विषै जीवकी उत्पत्तिका श्रवण

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पाद ३ ] भापाटीकासहितानि। (८९) नहीं औ "स वा एष महानज आत्माऽजरोऽमरोऽमृतोऽभयो ब्रह्म" इंत्यादि श्रुंतिसे जीवात्मा नित्य सिद्ध है। श्रुत्यर्थः-यह जीव है सो महान् है अज है आत्मा है अजर है अमर है अमृत है अभय है ब्रह्म है इति॥१७॥ वैशेषिक कहते हैं कि जीवात्मा स्वतः जड है आत्मा मनके सं- योगसे जीवमें चैतन्य गुण उत्पन्न होता है औ सांख्यवादी कहतेहैं कि जीव नित्य चैतन्यस्वरूप है इस संशयको दूर करते हैं सूत्रकार।। ज्ञोत एव ॥ १८॥ इस सूत्रके-ज: १ अतः २ एव ३ यह तीन पद हैं । जीवात्मा नित्य चैतन्यस्वरूप है इसी हेतुसे जीवका उत्पत्ति नहीं होती१८॥ जीवका अणु परिमाण है वा सध्यम परिमाण है वा महत् परिमाण है अत आह।। उत्कान्तिगत्यागतीनाम्॥ १९॥ इस सुत्रका-उत्क्रान्तिगत्यागतीनाम्१यह एकही पद समस्त है।। जीवका अणु परिमाण है, काहेतैं।शास्त्र के विषै जीवकी उत्क्रान्ति गति आगति का श्रवणहै इस शरीर को त्यागनेका नाम उत्कान्ति है इस लोकसे चन्द्रलोकादिकोंमें जानेका नाम गति है चन्द्रलोकों से इस लोकमें आनेका नाम आगति है॥। १९ ॥ स्वात्मना चोत्तरयोः॥ २०॥ इस सूत्रके-स्वात्मना१च२उत्तरयोःश्यह तीन पद हैं।। यद्यपि जै- से कोई पुरुष किसी आ्रामका स्वामी है सो न चले तौभी कदोचित तिसका स्वामीपना दूर होजाता है तैसे जीव इस शरीरसे न चले तौ- भी इसशरीरके स्वामीपनेकी निवृत्तिरूप उत्क्रान्ति होसकती है तथा- पि उत्तर जो गति आगति है सो अपने आत्माके संयोग विना नहीं

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(९०) ब्रह्मसूत्राणि। [अध्याय २, होसकता इस हेतुसेभी जीव अणु हैअणुके विना संयोग नहीं होता सं योगविना चलना नहीं होता चले विना गति आगतिनहीं होसकती।। नाणुरतच्छ्रुतेरिति चेन्नेतराधिकारात्॥२१॥ इस सूत्रके-न १ अणुः २ अतच्छुतेः ३ इति ४ चेत् ५ न ६६- तराधिकारातश्यह सात पद हैं ॥ जीवका अणु परिमाण नहीं है, काहे- तैं?"महानज आत्मा"यह श्रुतिवाक्य आत्माका अणुपरिमाणसे वि- परीत महत् परिमाण कहता है (इति चेन्न)ऐसे न कहो, काहेतैं ?उक्त श्रुतिवाक्यमें परमात्माका अधिकार होनेतैं परमात्मा महत्परिमा- णवाल है जीवात्मा नहीं॥२१ ॥ स्वशब्दोन्मानाभ्यां च।। २२।। इस सूत्रके-स्वशब्दोन्मानाभ्याम्१चश्यह दा पदहैं।। जीवके अणु परिमाणकों साक्षात्श्रुति कहती है "एषोडणुरात्मा चेतसा वेदितव्यो. यस्मिन्प्राण:पंचधा संविवेश" इति।अस्यार्थ :- यह आत्मा अणुहै औ चित्त करके जानने योग्य है औ जिसके विषै प्राण पांच प्रकार करके प्रवेश करताभया इति।औ शास्त्रमें यह भी कहा है कि केशके अग्रभा- गका सौ भाग करे तिसमें भी एक भागका सौ भाग करे तिस परिमा णवाला जीव है इस उन्मानसे भी जीवका अणु परिमाण सिद्ध है२२ जो जीवात्मा अणुपरिमाणवाला है तो सर्व शरीरके विषै शीता- दिकोंका ज्ञान न होना चाहिये इस शंकाका उत्तर कहते हैं सूत्रकार॥। अविरोधश्चन्दनवत् ॥२३॥ इस सुत्रके-अविरोध: १ चंदनवत् श्यह दो पद हैं। जैसे हरिच- न्दनका एक बिन्दु शरीरके एकदेशमें लगाहुआ सर्वशरीर व्यापी आनन्दको करता है तैसे जीवात्मा भी त्वक्के साथ संयोग पायके शरीरके एकदेशमें स्थित हुआ भी सर्वशरीखव्यापी शीतादि ज्ञानको करसकता है॥ २३ ॥

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पाद ३ ] भापाटीकासहितानि। (९१) अवस्थितिवैशेष्यादिति चेन्नाभ्युपगमाददृदि हि ॥२४॥ इस सूत्रके-अवस्थितिवैशेष्याद १ इति २ चत् ३ न ४अभ्युपग- मात् ५ हदि ६ हि ७ यह सात पद हैं।। शरीरके एकदेशमें चन्द्र- नकी अवस्थिति औ सर्वशरीरमें चन्दनकृत आनन्द यह दोनों प्रत्यक्ष हैं औ आत्मकृत सर्वशरीरव्यापी ज्ञान प्रत्यक्ष है परंतु शरी- रके एकदेशमें आत्माकी अवस्थिति प्रत्यक्ष नहीं इस रीतिसे अव- स्थिति विशेष होनेतैं चन्दनका दृष्टान्त विषम है (इति चेत्र) ऐसे न कहो, काहेतैं।"हृदिहेष आत्मा"यह आत्मा हृदय के विषैहै इस श्र- तिवाक्यसे एकदेश हृदयके विषैआत्माकी अवस्थितिका निश्चयहै। गुणाद्वा लोकवत् ॥२५॥ इस सूत्रके-गुणात् १ वा २ लोकवत् ३ यह तीन पद हैं।। जैसे लोकके विषै मणि वा प्रदीप किसी मकानके एकदेशमें स्थित है परंतु तिनकी प्रभा सर्व मकानमें है तैसे आत्मा अणु है परंतु तिसका चैतन्य गुण सर्वशरीर्यापी है॥ २५ ॥ जैसे पटका शुक्क गुण है सो पटके विना और जगह नहीं रहता तैसे जीवका चैतन्य गुण भी जीवके विना सर्वशरीरमें नहीं रहेगा इस शंकाका उत्तर कहते हैं। व्यतिरेको गन्धवत्॥२६॥ इस सूत्रके-व्यतिरेक: १ गंधवत्शयह दो पदहैं।। जैसे गन्ध गुणहै सो अपने आश्रय पुष्पमें वर्त्तके और जगहभी वर्त्तताहै तैसे चैतन्य गुण भी अपने आश्रय जीवमें वृर्त्तके सर्वशरीरमें वर्त्तता है॥२६॥ तथा च दर्शयति॥२७॥ इस सूत्रके-तथा १ च२ दर्शयति ३ यह तीन पद हैं।। "आलोम- भ्य आनखाग्रभ्यः" यह श्रुति कहती है कि सर्व लोम पर्यंत औ सर्व नखके अग्रभागपर्यंत सर्वशरीरमें जीवका चैतन्य गुण वर्त्तता है २७

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(९२ ) ब्रह्मसूत्राणि। [अध्याय २ पृथंगुपदेशात ॥२८।। इस सुत्रके-पृथक् १ उपदेशात २ यह दो पद हैं ।। "प्रज्ञया शरीरं समारुह्य" इस श्रुति करके आत्माका औप्रज्ञाका कर्तृकरण भाव करके पृथक् उपदेश होनेतैं चैतन्य गुण करके जीव सर्वशरीर- व्यापी है॥ २८ ॥ जो यह जीवका अणु परिमाण कहा सो एकदेशीका मत है तिसको दूषित करनेके वास्ते सुख्य सिद्धान्ती कहता है कि पर ब्रह्मका नाम जाव है औ परव्रह्मको विसुहानत जीव विसु है। शंका- जो जीव विभु है तो शास्त्रके विषै अणु क्यों कहाहै अत आह॥। तद्गुणसारत्वातु तद्यपदेश प्राज्ञवत् ॥२९।। इस सूत्रके-तह्ण सारत्वात् १ तु २ तव्यपदेश: ३ प्राज्ञवत् ४ यह चार पद हैं।। 'तु' शब्द एकदेशी पक्षकी निवृत्तिके अर्थ है जैसे प्राज्ञ परमात्मा विसुहै परंतु सगुण उपासनाके विषै उपाधिको लेके व्रीहि यवादिकोंसे भी अणु कहा है तैसे वुद्िका गुण जो इच्छा द्वेष सुखदुःखादि तिनको संसारदशामें जीव अपने विषै सार मानता है इस उपाधिको लेके वुद्धिके अणु परिमाणका जीवके विषै कथन है ॥ २९ ॥ जो वुद्धिके संयोगसे आत्मा संसारी है तो जब बुद्िका वियोग होवैगा तब आत्मा संसारी न रहेगा इस शंकाको दूर करते हैं॥। यावदात्मभावित्वाच्च न दोषस्तदर्शनात्॥३० ।। इस सूत्रके -- यावत् १ आत्मंभावित्वात् २ च ३ न ४ दोषः ५ तदर्शनात् ६ यह छह पद हैं।। जो दोष तुम कहते हो सो नहीं लग- सकता, काहेतैं ! जितने काल इस जीवको सम्यक् ज्ञान न होगा उत- नेकाल बुद्धिका संयोग रहनेसे यह जीव संसारीही रहेगा औ शास्त्र भी विज्ञानमय शब्दसे इस जीवको वुद्धिमय कहता है॥ ३०॥

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पाद ३ ] भाषाटीकासहितानि। (९३) सुषुप्ति औ प्रलयके विषै सर्वविकारका नाश होनेतैं बुद्धिका संयोग भी नहीं रहता इस शंकाको दूर करते हैं।। पुंस्त्वादिवत्तस्य सतोऽभिव्य्तियोगात् ॥३१॥ इस सूत्रके-पुंस्त्वादिवद् १ तस्य २ सतः ३ अभिव्यक्तियोगाव ४ यह चार पद हैं।। जैसैं लोकके विषै पुंस्त्वादिधर्म विद्यमान भी हैं परंतु बाल्यावस्थाके विषै अविद्यमानकी न्याई रहते हैं औ यौवनादि अवस्थाके विषै ्रगट होते हैं तैसे सुषुप्ति प्रलयके विषै भी वुद्धिसंयोगादि सर्व हैं परंतु अविद्यमानकी न्याईं रहते हैं औ जागरितादि अवस्थाके विषै प्रगट होते हैं॥। ३१ ॥ नित्योपलब्ध्यनुपलब्धिप्रसंगोऽन्यत- रनियमो वाऽन्यथा॥३२॥ इस सूत्रके-नित्योपलब्ध्यनुपलब्धिप्रसंग: १ अन्यतरनियम: २ वा ३ अन्यथा ४ यह चार पद हैं।। मन वुद्धि चित्त अहंकार यह चार प्रकारका अन्तःकरण आत्माकी उपाधि है औ जो अन्तः- करणकों न माने तो आत्मा इंद्रिय विषय इनका नित्य संबंध होनेंतैं नित्यही ज्ञान होना चाहिये अथवा नित्यही न होना चाहिये अ- थवा आत्माकी वा इंद्रियकी शक्ति रुकनेसें कदाचिव ज्ञान होताहै कदाचित् नहीं होता ऐसा मानना चाहिये जिसके समवधानसे ज्ञान होताहै औ असमवधानसे नहीं होता सो मन है औ "मनसा हयेव पश्यति मनसा श्रृणोति" यह श्रुति भी कहती है कि मन कर- केही देखता है औ मन करकेही सुनता है इति॥ ३२॥ कर्ता शास्त्रार्थवत्त्वात्॥ ३३॥ इस सूत्रके-कर्त्ता १ शास्त्रार्थवत्त्वात् २ यह दो पद हैं।। बुद्धिके संबंधसे जीव कर्त्ता है औ जो जीवको कर्त्ता न मानोगे तो "यजेव,

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(१४ ) ब्रह्मसूत्राणि। [अध्याय २ जुहुयात्, दद्यात" इत्यादि विधिशास्त्र अनर्थक होवैगा, काहेतैं ? यजन! करना होम करना दान करना यह सर्व चेतन कर्ताके विना नहीं हो सकते ॥ ३३ ॥ विहारोपदेशात्॥३४॥ इस सूत्रका-विहारोपदेशात् १.यह एकही समस्त पद है।। "स ईयतेऽमृतो यत्र कामम्" सो अमृत आत्मा स्वप्रस्थानके विषै इच्छापूर्वक गमन करताहै यह विहारका उपदेश करनेवाली श्रुति भी जीवको कर्ता कहती है॥। ३४ ।। उपादानात् ॥ ३५॥ इस सूत्रका-उपादानात् १ यह एकही पद है।। वेदके विषै कहा है कि जीवात्मा प्राणइंद्रियादिकोंका उपादान कर्त्ता है॥। ३५॥ व्यपदेशाच्च क्रियायां न चेन्निर्देशविपर्ययः॥ २६॥ इस सूत्रके-व्यपदेशात १ च २ क्रियायाम् ३ न ४ चेत् ५ नि- र्देशविपययः६ यह छह पद हैं। "विज्ञानं यज्ञं तनुते" इत्यादि शास्त्र लौकिक वैदिक क्रियाके विषै जीवात्माको कर्ता कहता है इहां वि- ज्ञानशब्दसे जीवात्माका निर्देश है औ जो जीवात्माका निर्देश न होवै तो 'विज्ञानेन' ऐसे करणमें तृतीया होके प्रथमासे विपरीत निर्देश होना चाहिये। विज्ञान (जीवात्मा) यज्ञका विस्तार करता है इति शृत्यर्थः ॥३६॥ जो जीव स्वतंत्र कर्त्ता हैं तो नियमसे अपने हित कार्यको करना चाहिये अहितको न करना चाहिये इस शंकाका उत्तर कहते हैं।। उपलब्धिवदनियमः ॥३७॥ इस सूत्रके-उपलब्धिवत १ अनियम: २ यह दो पद हैं॥। जैसे जीव अपने ज्ञानके प्रति स्वतंत्र है परंतु अनियमसे इष्ट अनिष्टको प्राप्त होता है तैसे जीव स्वतंत्र होके भी देश कालादि निमित्तको लेके अनियमसे हित अहित कार्यको करता है॥। ३७॥

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पाद ३ ] भाषाटीकासहितानि। (९५)

शक्तिविपर्ययात्॥३८॥ इस सुत्रका-शक्तिविपर्ययात् १ यह एकही समस्त पद है।। वि- ज्ञानशब्दवाच्य बुद्धि करण है औ वुद्धिसे भिन्न जीव कर्त्ता है औ जो बुद्धिको कर्त्ता कहै तो बुद्धिकी करण शक्ति विपरीत होवे औ कर्त्ताके विषै 'अहं गच्छामि' इत्यादि 'अहं'शब्दका प्रयोग होताहै सो जडबुद्धिके विषै नहीं होसकता इसीसे बुद्धि करण है कर्त्ता नहीं३८ समाध्यभावाच्च ॥३९॥ इस सूत्रके-समाध्यभावात्१च २ यह दो पद हैं॥ "ओमित्येवं ध्यायथ आत्मानम्" 'ओम्' इस प्रकार आत्माका ध्यान करना यह वेदान्तके विषै समाधि कहा है सो चेतन कर्त्ताके विना नहीं होसकता इसीसे जीव कर्त्ता है वुद्धि नहीं ॥३९॥ जो यह कहा कि जीव कर्त्ता है तहां संशय है कि जीव स्वभावसे कर्त्ता है वा किसी निमित्तसे कर्त्ता है अत आह।। यथा च तक्षोभयथा॥४०॥ इस सुंत्रके-यथा १ च २ तक्षा ३ उभयथा४ यह चार पद हैं॥। जैसे लोकके विषै काष्ट छेदनकरनेवाला तक्षा है सो जितने काल वास्यादि करणको अपने हाथमें धारण करे उतने काल कर्त्ता है औ दुःखी है औ जब अपने घरमें जायके वास्यादि करणको त्या गता है तब निर्व्यापार होके सुखी रहता है तैसे जीवात्माभी जाग- रित स्वप्नके विषै बुद्धयादि करणको लेके कर्त्ता है औ दुःखी है औ सुषुप्ति मोक्षके विषै बुद्धचादि करणको त्यागके सुखी रहताहै न कर्त्ता है न दुःखी है।। ४० । जो यह कहा कि अविद्या अवस्थाके विषै उपाधिको लेके जीव कत्ता है तहां संशय है कि जीवको अपने कर्तापने में ईश्वरकी अपे- कषा है वा नहीं अत आह।।

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(९६ ) ब्रह्मसूत्राणि। [अध्याय २: परात तच्छतेः॥४॥ इस सूत्रके-परात् १ तु२ तच्छुतेः ३ यह तीन पद हैं। अवि- द्यारूप तिमिर, करके अंधा जीव है सो परमेश्वरकी आज्ञासे कर्तृत्व भोकृत्वरूप संसारको प्राप्त होताहैऔ परमेश्वरके अनुग्रहरूप हेतुसे सम्यकज्ञान होके मोक्षको प्राप्त होताहै इस अर्थको यह श्रुतिभी कहती है "एष हेव साधु कर्म कारयति" यह परमेश्वरही श्रेष्ठक- र्मको कराता है।। ४१ ॥ जो ईश्वरही शुभ अशुभ कर्मको कराता है तो ईश्वरमें विषमता दि दोषका प्रसंग होवैगा इस शंकाका निराकरण करते हैं।। कृतप्रयत्नापेक्षस्तुविहितप्रति-

इस सूत्रके-कृतप्रयत्नापेक्ष:१ तु२विहित प्रतिषिद्धावैयर्थ्यादिभ्यः ३ यह तीन पद हैं।। ईश्वरमें विषमतादि दोष नहीं, काहेतैं! जीवकृत धर्म अधर्मकी अपेक्षासे ईश्वर कर्म कराता है स्वतः नहीं इसीसे विहित निषिद्धकर्मको कहनेवाले वेदादि शास्त्र व्यर्थ नहीं होते ४२ अंशो नानाव्यपदेशादन्यथा चापि दा- शकितवादित्वमधीयत एके ।। ४३ ।। इस सूत्रके-अंश: १ नानाव्यपदेशात् २ अन्यथा ३ च ४ अपि ५ दाशकितवादित्वम् ६ अधीयते ७ एके ८ यह आठ पद हैं ॥। जीव है सो ईश्वरका अंश है, काहेतैं! शास्त्रके विषै नाना जीवका कथन है यद्यपि ईश्वर निरवयव है तिसका जीव सुख्य अंश नहीं होसकता तथापि जीव अंशकी न्याई अंश है औ शास्त्रके विषै अ- नानात्वका कथन होनेतैंभी जीव ईश्वरका अंश है. कोई शाखावाले कहते हैं कि दाशकितवादि सर्व ब्रह्म हैं इस रीतिसे जीव ईश्वरका भेद अभेद होनेतैं अग्नि विस्फुलिङ्की न्याईं अंशांशी भाव है ४३

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पाद ३ ] भाषाटीकातहिवानि। (९७ )

मंत्रवर्णाच्च॥४४॥ इस सूत्रके-मंत्रवर्णांत १ च २ यह दो पद हैं। "पादोऽस्य सर्वां भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि" इस मंत्रवर्णसेभी जीव ईश्वरका अंश प्रतीत होता है इहां पाद नाम अंशका है। अस्यार्थ :- यह सर्व स्थावर जंगम इस परमेश्वरके अंश हैं औ इसके अमृतरूप तीन अंश अपने स्वरूपके विषै हैं इति॥ ४४ अपि च स्मर्यते॥४॥ इंस सूत्रके-अपि १ च २ स्मर्यते ३ यह तीन पद हैं।। ईश्वरगी- ताके विषै स्मरण होता है कि ईश्वरका अंश जीव है "ममैवांशोजीव लोके जीवभूतः सनातनः"अस्यार्थ :- हे अर्जुन इस जीवलोकके विषै यह सनातन जीव है सो मेराही अंश है इति॥४५. ॥ जैसे हस्त पादादि एक अंगमें दुःख होनेसे अंगी देवदत्त दुःखी होताहै तैसे जीव अंशके विष दुःख होनेतैं अंशी ईश्वर भी दुःखी होना चाहिये इस शंकाका उत्तर करते हैं।। प्रकाशादिवत्नैवं परः ॥४६ ॥। इस सूत्रके-प्रकाशादिवत् १ न २ एवं ३ परः यह चार पदहैं।। जैसे अंगुल्यादि उपाधिको ऋजु वक्र होनेतैं अकाशमें स्थित सूर्यादि- प्रकाश ऋजु वक्र भान होता है परंतु परमार्थसे न ऋजु होता है न वक्र होता है तैसे अविद्यादि उपाधिवाले जीवोंको दुःखी होनेतैं ईश्वर दुःखी नहीं होता।। ४६।। स्मरन्ति च ॥४७ ॥ इस सूत्रके-स्मरंति १च२ यह दो पद हैं।। जीवके दुःख करकें परमात्मा दुःखी नहीं होता इस अर्थके विषै व्यासादिकोंकी स्मृति- भी है"तत्र यः परमात्मा हि स नित्यो निगुर्णः स्मृतः। न लिप्यते ७

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(९८) ब्रह्मसूत्राणि। [अध्याय २ फलैश्वापि पद्मपत्रमिवांभसा"॥ अस्या अर्थ :- जीवात्मा परमात्माके मध्यमें जो परमात्मा है सो नित्य है औ निर्गुण है औ जैसे कमल- का पत्ता जलकरके लिपायमान नहीं होता तैसे सुख दुःखादि फ- लकरके परमात्मा लिपायमान नहीं होता इति॥४७॥ अनुज्ञापरिहारौ देहसम्बन्धाज्ज्योतिरादिवत॥४८॥ इस सूत्रके-अनुज्ञापरिहारौ१ देहसंबंधात्२ ज्योतिरादिवत् ३ यह तीन पद हैं।। जैसे लोकके विषै सर्व ज्योति एकही है परन्तु श्मशा- नकी अग्निका निषेध है औरका नहीं तैसे एकही आत्माको देहके सम्बन्धसे अनुज्ञा परिहार है अनुज्ञा नाम विधिका है जैसे ऋतु काल में अपनी भार्यासे संग करना यह शास्त्रकी अनुज्ञा है औ परिहार ना- म निषेधका है जैसे गुरुकी भार्यासे संग नहीं करना यह परिहारहै४८ एक आत्माका सर्व शरीरके साथ संबंध होनेतैं देवदत्तके कर्मका फल यज्ञदत्त क्यों नहीं भोगता इस शंकाका परिहार करते हैं सूत्रकार। असंततेश्चाव्यतिकरः॥ ४९॥ इस सूत्रके-असंततेः १ च २ अव्यतिकरः ३ यह तीन पद हैं।। बुद्धि अहंकारादि उपाधिवाला जीव कर्त्ता भोक्ता है तिसका सर्व शरीरके साथ संबंध नहीं हो सकता इस हेतुसे एक पुरुषके कर्मका फल दूसरा पुरुष नहीं भोग सकता॥ ४९॥ आभास एव च ॥ ५०॥ इस सूत्रके-आभास: १एव२चश्यह तीन पद हैं।। जसे जलके विपे सूर्यका प्रतिबिम्ब सूर्यका आभास है तैसे अन्तःकरणके विषै परमा- त्माका प्रतिबिम्ब जीव आभास है औ जैसे एक जल प्रतिबिम्बके कं- पनेसे दूसरा नहीं कंपता तैसे एकजीवके कर्म फलको दूसराजीव नहीं भोगता औ जिसके मतमें नाना आत्मा हैं तिसके मतमें सर्व आत्मा

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पाद ३ ] भापाटीकासहितानि। १९) शरीरके साथ संबंध होनेतैं एक पुरुषके कर्मका फल दूसरे पुरुषको भोगना चाहिये॥ ५०॥ अदृष्टानियमात ॥५१॥ इस सूत्रका-अदष्टानियमात् १ यह एकही पद है।। जिस अदृष्ट करके जिस आत्माका औ मनका संयोग भयाहै सो संयोग उसही आत्माके सुखादिकोंका हेतु है दूसरेका नहीं यह वैशेषिकका कहना ठीक नहीं काहेतैं अदृष्टको सर्व आत्माके साथ साधारण होनेतैं अदृष्ट करके नियम नहीं हो सकता॥५१॥ असिसंध्यादिष्वपि चैवस् ॥ ५२॥ इस सूत्रके-अभिसंध्यादिषु १ अपि २ च ३ एवम् ४ यह चार पद हैं।। मैं इस कर्मको करके इस फलको प्राप् होऊंगा इत्यादि संकल्प है सो भिन्न भिन्न आत्माका औ अदृष्टका नियम करता है यह कहना भी समीचीन नहीं, काहेतैं? सर्व साधारण आत्मा मन संयोग करके संकल्प होताहै सो नियमका हेतु नहीं हो सकता।५२। प्रदेशादिति चेन्नान्तर्भावात्॥५३॥ इस सूत्रके-प्रदेशात् १ इति २ चेत् ३ न ४ अंतर्भावात् ५नह पांच पद हैं।। यद्यपि आत्मा विस्ु है तथापि शरीरके विषै स्थिंत मनका संयोग शरीरविशिष्ट आत्माके विषै होताहै जिस शरीरवि- शिष्ट आत्मामें मनका संयोग है तिस शरीरविशिष्ट आत्माहीं अपने सुखदुःखको भोगता है दूसरा नहीं भोगता (इति चेन्न) ऐसे न कहो, काहेतैं! तुम्हारे मतमें सर्व आत्माका सर्व मनके साथ संयोग होके एकका सुख दुःख दूसरेको भोगनाही होवेगा इस दोषका रिद्दार हमारे एकात्मपक्षमें हो सकता है॥ ५३॥

यां द्वितीयाध्यायस्य तृतीयः पादः ॥३॥

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( १०० ) ब्रह्ममूत्राणि। [अध्याय २ द्वितीयाऽध्याये चतुर्थः पाद:। तृतीयपादके विषै आकाशादि पंचभूतकी उत्पत्तिका विचार किया औ तिसके अनंतर कर्ता भोकता जीवके स्वरूपका विचार किया अब भौतिक प्राणकी उत्पत्तिका विचार करनेके वास्ते इस चतुर्थ पादका प्रारंभ है वेदके विै उत्पत्तिप्करणमें कहां प्राणकी उत्पत्ति कही है औ कहां नहीं कही है तहाँ संशय है कि प्राण उ- त्पन्न होते हैं वा नहीं इस संशयको दूर करते हैं भगवान् सूत्रकार।। तथा प्राणाः॥१। इस सूत्रके-तथा १ प्राणा: २ यह दो पद हैं॥ जैसे आकाशादि पंचभूतकी उत्पत्ति परव्रह्मसे होतीहै तैसे प्राणकी उत्पत्ति भी परत्र- हनसे होतीहै औ प्राणकी उत्पत्तिको श्रति भी कहती है "एतस्माज्ना- यते प्राणो मनःसवेंद्रियाणि च"अस्या अर्थ :- इस परमात्मासे प्राण मन औ सर्व इंद्रिय उत्पन्न होते हैं इति ॥ १॥ गौण्यसंभवात्॥२।। इस सूत्रके-गौणी १ असंभवात् २ यह दो पद हैं॥ जो श्रुति प्राणकी उत्पत्तिको कहती है सो गौण है यह पूर्वपक्षीका कददना ठीक नहीं, काहेतैं? एक कारण परमेश्वरके जानेतैं सर्व कार्य जाना जांता है यह वेदकी प्रतिज्ञा है जो प्राणादि सर्व जगत् ब्रह्मका कार्य न होवे तो प्रतिज्ञाकी हानि होवैइसीसे प्राणकी उत्पत्तिको कहने- वाली श्रति गौण नहीं किंतु सुख्य है।। २ ॥ तत्प्राक्कुतेश्र ॥ ३।। इस सूत्रके-तत्माक्कते: १च शयह दो पद हैं। जायते यह एकही जन्मवाची शब्द है सो पहिले प्राणकी उत्पत्तिको कहके पश्चात् आ- कांशादिकोंकी उत्पत्तिको कहता है एक प्रकरणके विषै एक बेर कथन कियाहुआ बदुतके साथ संबंधवाला एकही शब्द है सो कहीं गौण कहीं मुख्य नहीं कहाता किंतु सर्वत्र मुख्यही कहाता है॥ ३॥

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पाद ४ ] भापाटीकासहितानि। (१०१)

तत्पूर्वकत्वाद्वाचः ॥४॥ इस सुत्रके-तत्पूर्वकत्वात्१वाच: २ यह दो पद हैं ॥ यद्यपि "तत्ते- जोऽसृजत" इस प्रकरणके विषै प्राणकी उत्पत्ति नहीं कही है तेज जल पृथिवी इन तीनकी उत्पत्तिका श्रवण है तथापि तेजं जल पृथि- वीको ब्रह्मका कार्य होनेतैं वाकू प्राण मन यह भी ब्रह्म के कार्य हैं इस अर्थको श्रुतिभी कहती है "अन्नमयं हि सोम्य मनः आपोमयः प्राणः तेजोमयी वाक" इति। अस्या अर्थः-हे सोम्य श्वेतकेतो यह मन पृथिवीमय है औ प्राण जलमय है औ वाकू तेजोमयी है इति ॥ ४ ॥

इस सुत्रके-सप्तगतेः विशेषितत्वात् २ च ३ यह तीन पद हैं।। अब प्राणकी संख्या कहते हैं तिनमें सुख्य प्राणको अगाडी कहैंगे वेदके विषै कहीं पंच ज्ञानइंद्रिय वाकू मन यह सप् प्राण कहे हैं औ कहीं यही हस्त.करके सहित अष्ट प्राण कहे हैं औ कहीं दो श्रोत्र दो चक्षु दो भ्राण वाकू पायु उपस्थ यह नव प्राण कहे हैं औ कहीं पंच ज्ञानेंद्रिय पंच कमेद्रिय यह दश प्राण कहे हैं औ कहीं यही मनस- हित एकादश प्राण कहे हैं औ कहीं यही वुद्धिसहित द्वादश प्राण कहे हैं औ कहीं यही अहंकारसहित त्रयोदश प्राण कहे हैं तहां संशय है कि इनमें प्राणकी कौनसी संख्या माननी चाहिये तहां पूर्वपक्षी कह- ताहै कि "सत वै शीर्षण्याः प्राणाः" इस श्रुतिसे शिरके विषै दो श्रोत्र दो चक्षु दो ब्राण एक वाक् इन सप प्राणका ज्ञान होता है यह शिर करके विशेषित सत प्राणही मानने चाहियें॥ ५॥ हस्तादयस्तु स्थितेऽतो नैवम् ॥६ ॥ इस मुत्रके-हस्तादय: १ तु२ स्थिते ३ अतः ४ न ५ एवम् ६ यह छह पद हैं।। सप प्राणसे अधिक हस्तादिक प्राण कहे हैं सप् प्राण- से अधिक हस्तादि प्राणको स्थित होनेतैं सप्ही प्राण हैं ऐसे नहीं

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(१०२) ब्रह्मसूत्राणि। [अध्याय २ मानना चाहिये औ सिद्धान्त कोटि यह है कि पंच ज्ञानेंद्रिय पंच कमेंद्रिय एक मन यह एकादशही प्राण हैं इनसे न न्यून हैं न अधिक हैं ॥ ६॥ अणवश्च॥७॥ इस सूत्रके-अणवः१ च २ यह दो पद हैं। यह प्राण अणु है अर्थातसूक्ष्म औ परिच्छिन्न परिमाणवाला है परमाणुकी तुल्य नहीं औ जो स्थूल होवें तो जैसे बिलसे निकलता सर्प दीखता है तैसे मरण कालमें देहसे निकलते प्राण भी दीखने चाहियें॥ ७॥

इस सूत्रके-अेष्ठ:१ च २ यह दो पद हैं। जैसे और प्राण ब्रह्मसे उत्पन्न भये हैं तैसे सुख्य प्राण भी ब्रह्मसे उत्पन्न भया है "स प्राणम- सृजत" यह श्रतिवाक्य कहता है कि सो परमात्मा सुख्यप्राणको रचता भया इति॥८॥ न वायुक्किये पृथयपदेशात्।।९।। इस सूत्रके-न १ वायुक्रियेर पृथगुपदेशात् ३ यह तीन पद हैं॥ अब मुख्यप्राणके स्वरूपका विचार करते हैं सुख्यप्राण है सोन वायु है औ न इंद्रियोंका व्यापार है, काहेतैं।"प्राण एव ब्रह्मणश्चतुर्थ: पाद: सवायुना ज्योतिषा भाति च तपति च" यह श्रुति कहती है कि मनोरूप ब्रह्मका वाक प्राण चक्षु श्रोत यह चार पाद हैं तिनके विषै प्राण है सो अपने अधिंदेव वायु करके प्रगट होती है औ ज्योतिक- रके अपना कार्य करनेको समर्थ होता है ऐसे वायुसे औ इंद्रियव्याः पारसे सुख्यप्राणका पृभक् उपदेश है॥ ९॥। जैसे इस शरीरके विषै जीव स्वतंत्र है तैसे प्राण भी सर्ववागादि- कोंसे श्रेष्ठहै सो स्वतंत्र होना चाहिये इस शंकाका उत्तर करते हैं।।

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पाद ४ ] भाषाटीकासहितानि। (१०३ ) चक्षुरादिवत्तु तत्सहशिष्टयादिभ्यः॥।१०॥ इस सूत्रके-चक्षुरादिवत् १ तु२ तत्सहशिष्ट्यादिभ्यः श्यह तीन पद हैं॥ तुशब्द प्राणकी स्वतंत्रताकी निवृत्तिके अर्थ है जैसे चक्षु श्रोतादिक जीवके कर्तृत्व भोकृत्वका साधन हैं तैसे सुख्यप्राण भी राजमंत्रीकी न्याईं जीवके सर्व अर्थको सिद्धकरनेवाला है स्वतंत्र नहीं, काहेतें? प्राण है सो चक्षुरादिकोंके साथही शेष रहताहै अर्थाद चक्षुरादिकोंके समानधर्मवाला है॥१० ॥ अकरणत्वाच्च न दोषस्तथाहि दर्शयति॥११॥ इस सूत्रके-अकरणत्वात् १ च २ न ३ दोषः ४ तथा ५ हि ६ दर्शयति ७ यह सात पढ़ हैं।। जैसे नेत्र श्रोत्रादिकोंका रूप शव्दादिक विषय हैं तैसे प्राणका भी कोई विषय होना चाहिये यह दोष प्राण के विषै नहीं आ सकता काहेतें जैसे नेत्रादि करण हैं तैसे प्राण कर- ण नहीं है। प्रश्न-जो प्राण करण नहीं तो प्राणसे कोई कार्य न होना चाहिये। उत्तर-यद्यपि प्राण करण नहीं तथापि शरीररक्षाही प्राणका कार्य श्रुति कहती है "प्राणेन रक्षन्नवरं कुलायम्" अस्या अर्थ :- प्राण करके इस नीच देहकी रक्षा करताहुआ जीवात्मा सोता है इति॥११॥

इस सूत्रके-पंचवृत्तिः १ मनोवत् २ व्यपदिश्यते ३ यह तीन पद हैं।जैसे श्रोत्रादि निमित्तद्वारा शब्दादिकोंकों विषय करनेवाली मनकी पांच वृत्ति हैं तैसे सुख्यप्राणकी भी कार्यद्वारा प्राण अपान ध्यान उदान समान यह पांच वृत्ति श्षतिके विषै कथन करी हैं।।१२।। अणुश्च ॥ १३ ।। इस सूत्रके-अणुः १च २ यह दो पद हैं। सुख्यप्राणकी उत्पत्तिको औ स्वरूपको कहके अब तिसका परिमाण कहते हैं मुख्यप्राण अणु

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(१०४) ब्रह्मसूत्राणि। [अध्याय २ परिमाणवाला है अणुशब्दसे इहां सूक्ष्म औ परिच्छित्र परिमाणका ग्रहण है, काहेतैं ! मरणकालमें समीप बैठे पुरुषको दीखता नहीं इस हेतुसे सुक्ष्म है औ अपनी प्राणादि पंच वृत्तिसे सर्वशरीरमें वर्त्तता है औ लोकांतरमें जाता आता है इस हेतुसे परिच्छित्रपरि- माणवाला है।। १३ ।। जो पूर्व जितने प्राण कहे सो अपने स्वभावसे अपनेअपने कार्यमें प्रवृत्त होते हैं वा अपने अधिष्ठातृ देवताके अधीन होके प्रवृत्त होते हैं तहां पूर्वपक्षी कहता है कि अपने स्वभावसे ही प्रवृत्त होते हैं औ जो देवताके अधीन होके प्रवृत्त होवेंगे तो देवताही भोक्ता रहेगा जीव भोका न रहैगा इस शंकाका उत्तर कहते हैं।। ज्योतिराद्यधिष्ठानं तु तदामननात् ।। १ ॥ इस सूत्रके-ज्योतिराद्यधिष्ठानम् १ तु २ तदामननात् ३ यह तीन पद हैं।। 'तु' शब्द पूर्वपक्षकी निवृत्तकें अर्थ है अग्न्यादि देवताके अधीन होके वागादि सर्व प्राण प्रवृत्त होते हैं इस अर्थमें श्षति प्रमाण है "अग्निर्वाग्भूत्वा मुखं प्राविशत्"अस्याअर्थः-अग्नि है सो वाकू इंद्रिय होके सुखमें प्रवेश करता भया इति॥१४ ॥ प्राणवत्ता शब्दात्॥१५॥। इस सूत्रके-प्राणवत्ता १शब्दातरयह दो पद हैं।। जो यह कहा कि देवताके अधीन होके प्राण प्रवृत्त होवँये, तो देवताही भोक्ता होवेगी सो कहना ठीक नहीं, काहेतैं ! कार्यकरणससुदायका स्वामी जो शारीर जीवात्मा तिसके साथ ही सर्व प्राणका संबंध श्रुति कहती है और एक शरीरात्माही भोक्ता है बहुत देवता भोक्ता नहीं होसके तस्य च नित्यत्वात् ॥१६॥ इस सुत्रके-तस्य १ च २ नित्यत्वात्३ यह तीन पदहैं। शारीर आत्मा इस शररिके विषै भोकृरूप करके नित्य है तिसकेही पुण्य

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पाद ४ ] भाषाटीकासहितानि। (१०५)

पापका लेप होताहै औ सुखदुःखका भोग होताहै औ देवता परमऐ श्वर्यवालेहैं इस हीन शरीरके विषै भोग नहीं भोगते औ करण पक्षके अग्न्यादि देवता हैं भोकृपक्षके नहीं ॥ १६॥ - एक सुख्य प्राण है औ दूसरे वागादि एकादश प्राण हैं तहां संशय - है कि वागादि सुख्यप्राणके भेद हैं वा नहीं!इस संशयको दूर करते हैं।। त इन्द्रियाणि तद्यपदेशादन्यत्र श्रेष्ठात्।१७।। इस सूत्रके-ते १ इन्द्रियाणि २ तद्यपदेशात् ३ अन्यत् ४श्रेष्ठात्द यह पांच पद हैं। वागादिक सुख्यप्राणके भेद नहीं हैं किंतु सुख्यप्राणसे जुदे हैं, काहेतैं ! श्रुतिके विषै सुख्य प्राणको बरजके वागादि एकादश इन्द्रिय कहे हैं औ सुख्यप्राण इंद्रिय है नहीं॥।१७॥ भैदश्रुतेः॥१८॥ इस सूत्रका-भेदश्रुतेः १ यह एकही पद है। उद्गीथ कर्मके विषै पापवृत्ति असुरोंके नाशके वास्ते वागिंद्रियको देवता कहते भये कि तूं हमारे मध्यमें उद्धान कर जिस उद्धानसे पापवृत्ति असुर नष्ट होवें जब वाक उद्रान करने लगी तब असुर हैं सो अनृत दोष करके वाकूका विध्वंस करतेभये ऐसे सर्वइंद्रियोंको पाप करके ग्रस्त करते भये पीछे निर्विषय औ संग दोष रहित सुख्य प्राण उद्गान करने लगा तब असुर नष्ट होतेभये इत्यादि स्थलके विषै सारे सुख्यप्रा- णसे वागादिकोंके भेदका श्रवण होता है॥ १८॥ वैलक्षण्याच्च॥ १९ ॥ इस सूत्रके-वैलक्षण्यात १च२ यह दो पद हैं।। वागादिकोंसे सुख्य प्राण विलक्षण है काहेतैं जब वागादिक सर्व इंद्रिय सोते हैं तब एक मुख्य प्राणही जागता है औ प्राणकी स्थितिसे देहकी स्थिति रहती है औ.प्राणके निकलनेसे देहका पतनहोता है॥ १९॥ संज्ञामूर्त्तिक्तप्तिस्तु त्रिवृत्कुर्वत उपदेशात्॥२०। इस सूत्रके-संज्ञामूर्तिकृति: १ तु २ त्रिवृत्कुर्वतः ३ उपदेशात्४

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(१०६) ब्रह्मसूत्राणि। [अध्याय २ यह चार पद हैं।। इस सूत्रके विषै संज्ञाशब्दसे नामका ग्रहण है मूर्तिश ब्दसे रूपका ग्रहण है कृत्तिनाम करनेका है वेदमें ऐसे कहा है कि जो परमात्मा तेज जल पृथिवी इन सूक्ष्म भूतोंका त्रिवृत् करके इनको स्थूल करताभया सोही परमात्मा इस जगत्का नामरूप करताभया इति। यह त्रिवृत्करण है सो पंचीकरणका उपलक्षण है। २०।। मांसादिभौमं यथाशब्दसितरयोश्च ॥२१ ॥ इस सूत्रके-मांसादिभौमम्१यथाशव्दस् २ इतरयोः ३च४ यह चार पद हैं।। बाह्यतिवृत् कहकेअब इस सूत्रसे अध्यात्मतिवृत कहते हैं पुरुष करके भक्षित अन्नरूप पृथिवीका स्थूलभाग हैसो पुरीष होके बाहिरनिकलताहै औ मध्यसभाग मांस होजाताहै औअजुभाग मनहै औ जलकास्थूलभाग सूत्र होके बाहिर निकलता है औ मध्यम भाग रुधिर होजाता है औ अणुभाग प्राण है औ तेजका स्थूलभाग अस्थि है औ मध्यमभाग मज्जा है औ अणुभाग वाकू है इति २१ जो सर्वभूतोंका समानही त्रिवृत करण है तो यह तेज है यह जल है यह पृथिवी है ऐसा विशेष कथन क्यों है? इस शंकाको दूरकरते हैं।। वैशेष्यात्तु तद्वादस्तद्वाद: ।। २२।। इस सूत्रके-वैशेष्यात् १ तु२ तद्वाद: ३ तद्ादुः ४ यह चार पद हैं। 'तु' शब्द उक्त शंकाकी निवृत्तिके अर्थ है यद्यपि सर्वभूतोंका त्रिवृत्करण समान है तथापि जहां जिस भूतका विशेषभाग है तहां तिस भागको लेके विशेष कथन है इहां दो बेर तद्वाद पदका अभ्यास है सो इस विरोधपरिहाराध्यायकी समाप्तिको द्योतन करता है २२

तायां ब्रह्मसूत्रसारार्थप्रदीपिकायां द्वितीयाध्यायस्य चतुर्थः पादः ॥४॥ इति द्वितीयोऽध्यायः समापः ॥२।।

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पाद १ ] भाषाटीकासहितानि। (१०७ )

तृतीयोऽध्याय: ३. प्रथम: पाद:। पूर्वोक्तवागादिउपकरणसहित जीवके संसारगति प्रकारादि दिखानेके वास्ते इस तृतीय अध्यायका प्रारंभ है तहां प्रथमपादमें वैराग्यके वास्ते पंचाग्निविद्याको दिखाते हैं सुख्यप्राण इन्द्रिय मन उपासना धर्म अधर्म पूर्वसंस्कार इन सर्वको लेंके जीव है सो पूर्व देहको त्यागके दूसरे देहको प्राप्त होताहै तहां संशय है कि उत्तर देहके कारण जो भूत सुक्ष्म तिनको त्यागके जाताहै वा तिनको लेके जाताहै अ़त आह॥। तदनन्तरप्रतिपत्तौ रंहति संपरिष्वक्तः प्रश्ननिरूपणाभ्याम्॥१॥ इस सूत्रके-तदनन्तरप्रतिपत्तौ १ रंहति २ संपरिष्वक्त: ३ प्रश्र- निरूपणाभ्याम् ४ यह चार पद हैं।। प्रश्नसे औ निरूपणसे यह निश्चय है कि जब जीव पूर्वदेहको त्यागके उत्तरदेददको प्राप्त होताहै तब उत्तर देहके बीज जो भूत सूक्ष्म तिनको लेके जाता है वेदके विषै उपासनाके वास्ते द्यु पर्जन्य पृथिवी पुरुष योषित यह पांच अग्नि कहे हैं जब इन पांच अग्निके विषै आप (जल) को होसे तब पंचमी आहुतिमें जैसे पुरुष शब्द वाच्य होतेहैं अर्थात पुरुषरूप करके परिणामको प्राप्त होतेहैं तैसे हे श्वेतकेतो तूं जानता है यह श्वेतकेतुके प्रति प्रवाहण राजाका प्रश्न है. जब इस प्रश्नका उत्तर श्वेत- केतु नहीं जानताभया तब तिसके पिताके प्रति राजा बोला कि हे गौतम यह दुलोक अगनि है इसमें श्रद्धारूप जलकी आहुति है औ यह पर्जन्य अग्नि है इसमें सोमरूप जलकी आहुति है इस लोकमें अग्निहोत्रके विषै श्रद्धा करके दध्यादिरूप जल होमे हुये यजमा- नके संलग्न होके स्वर्गलोकको प्राप्त होके सोमरूप दिव्य देह करके

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(१०८) त्रह्मसूत्राणि। [अध्याय ३ स्थित होते हैं पीछे कर्मके अंतमें पर्जन्यमें होमेंजाते हैं पीछे वृष्टि- रूप जल पृथिवीमें होमेजाते हैं पीछे अन्नरूप जल पुरुषमें होमे- जाते हैं पीछे रतरूप जल योषितमें होमे हुये पुरुषशब्दवाच्य हो जाते हैं यह निरूपण है॥। १ ॥ उक्तप्रश्ननिरूपणसे यह सिद्ध भया कि केवल जलकरके सहित जीवात्मा देहान्तरमें जाता है सर्वभूत सूक्ष्म करके सहित नहीं जाता इस शंकाको दूर करते हैं॥। आत्मकत्वात्तु भूयस्त्वात्॥२। इस सूत्रके-आत्मकत्वात् १ तु २ भूयस्त्वात् ३यह तीन पद हैं।। 'तु' शब्द शंकानिवृत्तिके अर्थ है त्रिवृत्करण श्रुतिसे तीन प्रका- रके जल जानेजाते हैं जो तीन प्रकारके जल देहके आरंभक हैं तो तेज पृथिवी यह दो भूत सूक्ष्म और भी मानने चाहिये, काहेतैं ! यह देह तीन भूतका है। प्रश्न-जो देह तीन भूतका है तो आप पंचमी आहुतिमें पुरुषशब्दवाच्य होतेहैं यह कथन क्यों है। उत्तर-इस देहमें जल बहुत है तिसकी अपेक्षासे यह कथन है।। २।। प्राणगतेश्च ॥ ३ ॥। इस सूत्रके-प्राणगते: १ च २ यह दो पद हैं। वेदमें श्रवण होता है जब जीवात्मा पूर्व देहको त्यागके उत्तर देहके प्रति गमन करता है तब जीवके पीछे सुख्यप्राण भी गमन करता है औ मुख्य प्राणके पीछे अन्य प्राण गमन करते हैं औ आश्रयके विना प्रा णका गमन होता नहीं सो प्राणगमनके आश्रय जल तेज पृथिवी यह तीन भूत हैं।। ३ ।। अगन्यादिगतिश्रुतेरिति चेन्न भाक्तत्वात्॥४। इंस सूत्रके-अग्यादिगतिश्ुतेः १ इति २ चेत् ३ न ४ भाक्तत्वाव. ५ यह पांच पद हैं।। अन्यदेहके प्रति जीवके साथ प्राण नहीं जाते हैं,

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पाद १ ] भाषाटीकासहितानि। (१०९) काहेतैं? मरणकालमें वागादि सर्व प्राण अपने अग्न्यादि देवताको प्राप्त होते हैं यह अग्न्यादिकोंमें गतिकी श्रुति है (इति चेन्न) ऐसे न कहो काहेतैं अग्न्यादिकोंमें गतिकी श्रुनि गौणतिहै मुख्य नहीं॥४॥ प्रथमेऽश्रवणादिति चेन्न ता एव छुपपत्तेः॥॥ इस सूत्रके-प्रथमे १ अश्रवणात् २ इति ३ चेत ४ न ५ ताः६एव ७ हि ८ उपपत्ते: ९ यह नव पद हैं।। पंचमी आहुतिके विषै जल है सो पुरुषशब्द वाच्य नहीं होसकता, काहेतैं।ुलोकरूप प्रथम अग्निके विषै श्रद्धाहोमका श्रवणहै जलहोमका श्रवण नहीं (इति चेन्न)ऐसे न कहो काहेतैं प्रथम अग्निमें श्रद्धाशब्दसे जलहोमका विधान है अन्य- था प्रथमअग्निमें श्रद्धाहोमका विधान होनेतैं औ उत्तर चार अगनिमें जल होमका विधान होनेतैं वाक्यभेद होके एकवाक्यता न रहेगी५ अश्रुतत्वादिति चेन्नेष्टािकारिणां प्रतीतेः ॥६॥ इस सूत्रके-अश्रुतत्वात १ इति २ चेत ३ न ४ इष्टादिकारिणाम् ५ प्रतीतेः६यह छह पद हैं। यद्यपि पूर्वोक्त प्रश्न निरूपणसे यह नि- श्रय भया कि श्रद्धादि क्रम करके पंचमी आहुतिमें जल पुरुपाका- रको प्राप्त होता है तथापि श्रद्धादिसहित जीव नहीं जाता, काहेतें? श्रद्धादिकों करके सहित जीव जाता है ऐसा कहीं वेदमें श्रवण नहीं (इति चेन्न) ऐसे न कहो, काहेतैं।जिसे यज्ञ वापी कूपादि करनेवाले पुरुष धूमादि पितृयाण मार्ग करके चन्द्रलोकको जाते हैं तैसे श्र- छादि होम करनेवाले भी जाते हैं यह वार्त्ता शास्त्रप्रसिद्ध है॥६ ॥ इष्टादि कर्मको करनेवाले चन्द्रलोकमें जाते हैं यह प्रतिज्ञा ठीक नहीं, काहेतैं श्रुति कहतीहै? कि यह चन्द्रमा देवोंका अन्न है तिसको देवतना भक्षण करते हैं जो इष्टादि कर्म करनेवाले चन्द्रलोकमें जावेंगे तो अन्न होजावेंगे जब तिनको देवता भक्षण करेंगे तब भोग्यही होजावैं गे तो भोक्ता कहां से होवेंगे? इस शंकाका उत्तर कहतेहैं॥।

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( ११०) ब्रह्मसूत्राणि। [ अध्याय ३ भाक्तं वाऽनात्मवित्त्वात्तथा हि दर्शयति॥७॥ इस सूत्रके-भाक्तम् १ वा २ अनात्मवित्वात ३ तथा ४ हि ५ दर्शयति ६ यह छह पद हैं।। चन्द्रलोकमें जानेवाले गौण अन्न होते हैं सुख्य अन्न नहीं होते औ जो सुख्य अन्न होवें तो "स्वर्गका- सो यजेत" इत्यादिश्रुतिका उपरोध होवै औ देवता अमृतको देखके ही तृप्त रहते हैं न खाते हैं न पीते हैं औ वेदमें यह भी कहा है कि इष्टादि कर्म करनेवाले अनात्मज्ञानी पशुकी न्याईं देवोंके उपकारक हैं भक्ष्य नहीं ॥ ७॥

मने वंच॥८।। इस सूत्रके-कृतात्यये १ अनुशयवान् २ दृष्टस्मृतिभ्याम ३् यथा ४ इतम् अनेवम् ६ च ७ यह सात पद हैं।। इष्टादि कर्म करनेवाले धूमादि मार्गकरके चन्द्रलोकमें जायके विभूतिको भोगके पीछे क- रमके अंतमें इस लोकमें आते हैं तहां संशय है कि सर्व कर्मफलको भोगके आते हैं वा कुछ कर्म शेष लेके आते हैं तहां कहते हैं कि जैसे तैल निकाले पीछे भी तैलका भांडा कुछ चिकना रहताहै तैसे कर्मके अंतमें जब पछिे आते हैं तब कुछ कर्म शेष रहता है, काहेतें? इस लोकमें ब्राह्मणसे आदिलेके चांडाल पर्यंत योनिके विषै उत्पन्न होते औ उच्च नीच भोगको भोगतेहुये पुरुष दिखते हैं औ स्मृति भी कहती है कि पुरुष मरके परलोकमें कर्म फलको भोगके कुछ क्मशेषको लेके इस लोकमें आते हैं औ सोपानारोहण अवरोहण की न्याईं जिस क्रम करके चन्द्रलोकमें जाते हैं तिससे विपरीत क्रम करके पीछे उतरते हैं ॥ ८॥l चरणादिति चेन्नोपलक्षणार्थेति कार्ष्णाजिनिः।।९॥ इस सूत्रके-चरणात् १ इति २ चेत् ३ न ४ उपलक्षणार्था4इति६ः

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पाद १] भाषाटी कासहितानि। (१११)

कार्ष्णाजिनिः ७ यह सात पद हैं।। श्रुति कहती है कि रमणीय चरण अर्थाव शुद्ध आचारवाले ब्राह्मणादि योनिको प्राप्त होते हैं औ कुपूयचरण अर्थात अशुद्ध आचारवाले श्वादियोनिको प्राप्त होतेहैं. चरण चारित्र आचारशील इन शव्दोंका एकही अर्थ है. जो अच्छे चरणसे ब्राह्मणादि योनिको प्राप्त होते हैं औ वुरे चरणसे श्वादि योनि को प्राप्त होते हैं तो कर्म शेष मानना निर्थक है(इति चन्न) ऐसे न कहो काहेतें श्रुतिमें चरण शन्द कर्मशेषकाही उपलक्षण है ऐसे कार्ष्णाजिनि आचार्य मानता है॥९॥ आनर्थक्यमिति चेन्न तदपेक्षत्वात् ॥१०॥ इस सुत्रके-आनर्थक्यम् १ इतिर चेत्३न४ तदपेक्षत्वात् ५ यह पांच पद हैं।। श्रुतिविहित शीलको त्यागके चरण शब्दकी कर्मशेपमें लक्षणा माननी ठीक नहीं औ जो लक्षणा मानोगे तो श्रुतिप्रतिपादित शील अनर्थक होवैगा (इति चेन्न) ऐसे न कहो, काहेतें! चरणकी अपेक्षासेही इष्टादि कर्म होता है औआचारहीनको कर्मका अधि- कार नहीं है इस अर्थको स्मृति भी कहती है "आचारहीनं न पुनंति वेदाः" आचारहीन पुरुषको वेद पवित्र नहीं करते इत्यर्थः॥१०॥ सुकृतदुष्कृते एवेति तु बादिः॥११ ॥ इस सुत्रके-सुकृतदुष्कृते१एव २ इति ३तु४ बादारः५ यह पांच पद हैं।। चरणशव्दसे सुकृत दुष्कृतका ग्रहण है ऐसे बादरि आचार्य मानता है जो वेदविहित इष्टादि कर्मको करताहै तिसको लोक कहते हैं कि यह महात्मा पुण्यकर्मको करता है औ तिससे विपरीत कर्म करनेवालेको कहतेहैं कि यह निषिद्धकर्मको करता है॥ ११॥ अनिष्टादिकारिणामपि च श्रतम् ॥ १२॥ इस सूंत्रके-अनिष्टादिकारिणाम्१अपि२च ३्श्रतम्४ यह चार पद हैं।। जो यह कहा कि इष्टादि कर्म करनेवाले चंद्रलोकमें जाते

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(११२) ब्रह्ममूत्राणि। [अध्याय ३ हैं तहां पूर्वपक्षी कहता है कि अनिष्टादि कर्म करनेवाले चंद्रलोकमें जाते हैं ऐसा भी श्रवण होता है कौषीतकी शाखामें कहा है कि "ये वै केचास्मालोकात्प्रयन्ति चन्द्रमसमेव ते सवें गच्छन्ति"जो कोई इस लोकसे जाते हैं सो सर्वही चन्द्रमाको प्राप्त होते हैं इत्यर्थ: १२ संयमने त्वनुभयेतरेषामारोहावरोहौ तह्- तिदर्शनात ॥ १३ ॥ इस सूत्रके-संयमने १तुर अनुभूय ३ इतरेपाम् ४ आरोहावरोही ५ तद्गतिदर्शनात् ६ यह छह पढ़ हैं। 'तु' शब्द पूर्वपक्षकी निवृत्तिक अर्थ है अनिष्ट कर्म करनेवाले चन्द्रलाकमें भोग नहीं भोग सकते इसीसे चन्द्रलोकमें नहीं जाते किंतु यमलोकमें जायके अपने अ- निष्ट कर्मका फलभोगके पीछे इसी लोकमें आते हैं अपने अनिष्ट कमका फल भोगनेके वास्तेही तिनका यमलोकमें जाना आनाहै. ऐसेही नचिकेताके प्रति यमराज कहते भये कि हे नचिकेतः जो मूर्ख परलोकके उपायको नहीं जानता है औ वित्तके मोह करके मूढ हुआ प्रमादको करता है और यही स्त्री पुत्रादिलोक है परलोक नहीं है ऐसे मानता है सो वारंवार मेरे वश होता है इति ॥ १३॥ स्मरन्ति च ॥ १४॥ इस सूतके-स्मरन्ति १ च २ यह दो पद हैं। मनुव्यासादि शिष्ट पुरुष हैं सो यमपुरके विषै निन्दित कर्म करनेवाले पुरुषोंके कर्मफलका स्मरण करते हैं ॥ १४ ।। अपि च सप्त ॥ १५ ॥। इस सुत्रके-अपि १ चरसत ३ यह तीन पद हैं।। अपि (निश्चय करके) पौराणिक कहते हैं कि पापकारी पुरुषोंके वास्ते रौरादिं सात नरक हैं तिनके विषै पापकारी पुरुष जातेहैं चन्द्रलोकको नहीं जाते ॥ १५॥

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पाद १ ] भाषांटी कासहितानि। (११३)

जो यह कहा कि यमराजकी यातनाको पापकारी पुरुषभोगते हैं सो कहना विरुद्ध है, काहेतैं? रौरवादि नरकके विषै चित्रगुप्तादि नाना अधिष्ठाताका स्मरण होता है इस शंकाको दूर करते हैं।। तत्रापि च तद््यापारादविरोधः॥ १६॥ इस सूत्रके-तत्र १ अपि च ३ तद्यापारात ४ अविरोध: ५ यह पांच पद हैं। तिन रौरवादि सात नरकके विषे यनराज अधिष्ठाताका व्यापार होनेतैं कोई विरोध नहीं यमराज करके प्रेरित चित्रगुप्तादि अधिष्ठाताका स्मरण होता है॥ १६॥ विद्याकर्मणोरिति तु प्रकृतत्वात्॥१७॥ इस सूत्रके-विद्याकर्मणोः १ इति २त ३ प्रकृतत्वात्४ यह चार पद हैं।। जो पंचाग्निविद्यावाले चन्द्रलोकमें जाते हैं तो तिन करके जब चन्द्रलोक पूरित होजायगा तब चन्द्रलोकमें अवकाश न रहेगा तहां कहते हैं कि प्रकरणमें विद्या और इष्टादि कर्म यह दो देवयान पितृयानके साधन कहे हैं औ जिनके यह दोनों नहीं हैं तिनका 'जायस्त्र, त्रियस्व' यह तृतीय मार्ग कहा है इसीसे चन्द्रलोक पूरित नहीं होता॥ १७॥ जो यह कहा कि देहलाभके वास्ते सर्वही चन्द्रलोकमें जाने योग्य हैं, काहेतैं? पंचमी आहुतिमें जल पुरुषाकार होता है यह पंचत्व संख्याका नियम है इस आक्षेपका समाधान कहते हैं॥। न तृतीये तथोपलब्घेः ॥१८॥ इस सूत्रके-न १ तृतीये २ तथा ३ उपलब्धेः४ यह चार पद हैं॥ तृतीयस्थानमें देहलाभके वास्ते आह्ठुतिकी संख्याके नियम नहीं मानना चाहिये कहेतैं आहुति संख्याके नियमके विनाही उक्त प्रकार करके 'जायस्व त्रियस्त्र' इस तृतीय स्थानकी प्राप्तिका ज्ञान ८

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(११४) ञह्म सूत्रांण। [अध्याय ३ है औ पंचमी आहुतिमें जल पुरुषाकार होता है यह मनुष्य शरीरके वास्ते संख्याका नियम है कीटादि शरीरके वास्ते नहीं ॥ १८॥ स्मर्यतेऽपि च लोके॥ १९॥ इस सूत्रके-स्मर्यते १ अपि २ च३ लोके ४ यह चार पद हैं।। पंचमी आहुतिमें जल पुरुषाकार होता है यह नियम है औ यह नियम नहीं है कि पंचमी आहुतिके विना जल पुरुषाकारन होवै, काहेतैं? लोकमें स्मरण होता है कि द्रोण धृष्टघुन्न सीता द्रौपदी इत्यादि सर्व योनिके विनाही उत्पन्न भये हैं॥ १९॥ दर्शनाच्॥ २०॥ इस सूत्रके-दर्शनात् १च२ यह दो पद हैं जरायुज अण्डज स्वेदज उद्भिज्ज यह चार प्रकारके भूत हैं तिनमें मैथुन धर्मके विनाही स्वेदज उद्धिज् की उत्पत्तिका दर्शन होनेतैं आहुति संख्याका अनादर है२० इन भूतों के अण्डज जीवज उंद्विज्ज यह तीन बीज होनेतैं तीन प्रकारकेही भूत हैं चार प्रकारके भूतोंकी प्रतिज्ञा क्यों करते हो ? इस शंकाका समाधान कहते हैं॥२०॥ तृतीयशब्दावरोध: संशोकजस्य॥२१॥ इस सूत्रके-तृतीयशब्दावरोध: १ संशोकजस्यं२ यह दो पद हैं। अण्डेज जरायुज उद्भिज्ज यहां तृतीय उद्धिज्न शब्दकरके संशोक जका ग्रहण है, काहेतैं? जैसे उद्भिज्न भूमिको भेदन करके निकलते हैं तैसे संशोकज जलको भेदन करके निकलतेहैं इस रीतिसे तुल्यता है संशोकजनाम स्वेदजका है॥। २१॥ साभाव्यापत्तिरुपपत्तेः ॥ २२ ॥ इस सूत्रके-साभाव्यापत्तिः १ उपपत्तेः२ यह दो पद हैं। इष्ावि कर्म करनेवालेआकाशादिद्वारा चन्द्रलोकसे पाे आतेहैं इस अर्थको

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पाद १ ] भापाटीकासाहितानि। (११५) यह श्रुति कहती है-"अथैतमेवाध्वानं पुनर्निवर्तन्ते यथेतमाकाश माकाशाद्वायुं वायुर्भूत्वा धूमो भवति धूमो भूत्वाऽअं भवत्य्रं भूत्वा मेघो भवति मेघो भूत्वा प्रवर्षति" इति।तहां संशयहै कि जब चन्द्रलो- कसे पीछे आते हैं तब आकाशादिकोंका स्वरूपही होजाते हैं वा आकाशादिकोंके सदश होजाते हैं इति। तहां कहते हैं कि आका- शादिकोंके सदश होजाते हैं।औ जो आकाशादिकोंका स्वरूप होवै तो आकाशको विभ्ु होनेतैं वाय्वादिक्म करके आनाही न बनेगा औश्रुतिका अर्थ यह है कि जिस क्रमसे जातेहैं तिससे विपरीत क्रम करके आते हैं कर्मके अंतमें द्रवीभूत देहवाले होतेहैं पीछ आका- शको प्राप्त होके आकाशकी सदश होते हैं पीछे पिण्डीकृत अति- सूक्ष्म लिङ्गदेहसहित वायु करके जहांतहाँ भ्रमते हुये वायुके समान होतेहैं पीछे धूमको प्राप्त होके धूमके समान होते हैं पीे अभ्रको प्राप्तं होके अ्रके समान होते हैं जो जलको धारे सो अम्र कहाता है औ जो जलको वर्षे सो मेघ कहाता है अभ्रसे मेघको प्राप्त होके मेघके समान होतेहैं पीछे वृष्टिद्वारा पृथ्वीमें प्रवेश करके न्रीहि य वादिरूप होते हैं इति ॥ २२ ॥ नातिचिरेण विशेषात्॥ २३।। इस सूत्रके-न १ अतिचिरेण २ विशेषात् ३ यह तीन पद हैं। चन्द्रलोकसे पीछे आनेवाले ब्रीहि यवादि प्रातिसे पूर्व बहुत बंदुत कांल आकाशादिकोंके सदश रहके उत्तर उत्तरके सदश होते हैं वा अल्प अल्प काल रहके होते हैं तहां कहते हैं कि अल्प अल्प काल आकाशादिकोंके सदृश रहके उत्तर उत्तरके सदश होते हैं, काहेतैं? अगाडी वाक्य विशेषमें कहा है कि ब्रीहि यवादिकोंसे दुःख करके निकलना होता है इससे यही निश्चय भया कि आकांशादिकोंसे अल्पकालमेंही सुखपूर्वक निकलते हैं।। २३॥

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(११६ ) ब्रह्मसूत्राणि। [अध्याय ३ अन्याधिष्टिते पूर्ववद्भिलांपात् ॥२४॥ इस सूत्रके-अन्याधिष्टिते १ पूर्ववत् २ अभिलापात ३ यह तीन पद हैं।। चन्द्रलोकसे आनेवाले वृष्टिद्वारा भूमिमें प्रवेश करके ब्री हियवादिभावको प्राप्त होते हैं तहां संशय है कि स्थावर जातिके सुखदुःखको भोगते हैं वा जीवान्तरके अधीन स्थावर शरीरमें संबंध मात्रको प्राप्त होते हैं। तहां कहते हैं कि जैसे वायु धूमादिक में संबंध मात्रको प्राप्त होते हैं तैसे जीवान्तरके अधीन ब्रीहियवादिकोंके विषै संबंध मात्रको प्राप्त होते हैं सुखदुःखको नहीं भोगते यह शा- स्त्नका कथन है।। २४ ।। अशुद्धमिति चेन्न शब्दात् ॥२५॥ इस सूत्रंके-अशुद्धम् १ इति २ चेत् ३ न ४ शब्दात् ५ यह पांच पद हैं॥ हिंसाके यागसे इष्टादि कर्म अशुद्ध हैं औ अशुद्ध कर्मका फल ब्रीहियवादि जन्मभी होसकता है (इति चेन्न) ऐसे न कहो,का- हेतैं? धर्म अधर्म ज्ञानका हेतु शास्त्र है "अग्नीषोमीयं पशुमालभेत" यह श्रुति यज्ञके विषै हिंसाका विधान करती है इसीसे इष्टादि कर्म अशुद्ध नहीं किंतु शुद्ध हैं ॥२५।। रैतःसिग्योगोऽथ।२६ ।। इस सूत्रके-रेतःसिग्योग: १ अथ २ यह दो पद हैं। त्रीहियवा- दिभावके अनंतर वीर्यसेचनका विधान है सो वीर्यसेचन यौवनादि अवस्थामें होताहै औ त्रीहियवादि अवस्थामें वीर्यसेचनका अयरोग होनेतैं ब्रीहियवादिकोंके साथ संबंध मात्र है ॥ २६ ॥। योने: शरीरम॥ २७॥ इस सुत्रके-योने: १ शरीरम् २ यह दो पद हैं। योनिमें वीर्यसे- चनके अनंतर कर्मफल भोगके वास्ते शरीर उत्पन्न होताहै।। २७॥ इति श्रीमन्मौक्तिकनाथयोगिविरचितायाँ ब्रह्म सूत्रसारार्थप्रदीपिकायां तृतीयाध्यायस्य प्रथम: पादः ॥१॥

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पाद २ ] भापाटीकासहितानि।. (११७) तृतीयाध्याये द्वितीय: पाद:। पूर्व पांदके विषै पंचाग्निविद्याको कहके जीवकी संसार गतिका भेद कहा अब तिस जीवकी अवस्थाका भेद कहते हैं॥। संध्ये मृष्टिराह हि। १ ॥ इस सूत्रके संध्ये १ सृष्टिः २ आह ३ हि ४ यह चार पद हैं ।। संध्य नाम स्वप्नका है स्वप्नकी सृष्टि जागरितकी न्याई व्यावहारिक सत्तावाली है वा शुक्ति रजतकी न्याई प्रातिभासिक सत्तावाली है तहां पूर्वपक्षी कहताहै कि स्वप्नकी सृष्टि व्यावहारिक सत्तावाली है, काहेतें? श्रुति कहती है कि, "अथ रथान् रथयोगान् पथः सृजते"इति। अस्या अर्थ :- जागरितके अनंतर स्वप्नस्थानमें रथ औ रथके योग्य घोड़ा औ चलनेके योग्य मार्ग इनं सर्वको आपहौ रचता है इति॥। १॥ निर्मातारं चैके पुत्रादयश्र ॥२॥ इस सूत्रके-निर्मातारम् १ चरएके ३ पुत्रादय: ४ च ५ यह पांच पदहैं।। कोईशाखावाले इस आत्माको स्वप्नके विषै सर्व कामको रच- नेवाला मानते हैं "य एष सुप्तेषु जागर्ति कामं कामंपुरुषोनिर्मिमाणः" अस्या अर्थ:जो यह पुरुष है सो जब स्वप्नके विषै सर्व इंद्रिय व्यापा- रहीन होवैं तब काम कामको रचताहुआ जागताहै, इति। इहाँ काम शब्दसे पुत्रादि विषयका ग्रहण होनेतैं स्वप्नकी सृष्टि सत्य है॥२॥ मायामानं तु कार्त्स्न्येनानभिव्यक्तस्वरूपत्वात्॥ ३॥ इस सूत्रके-मायामात्रम्१ तु२ कार्त्स्न्येन ३अनभिव्यक्तस्वरूप- त्वात४ यह चार पद हैं। 'तु'शव्द पूर्वपक्षकी निवृत्तिके अर्थ है स्वप्नकी सृष्टि सत्य नहीं किंतु मायामयी है, काहेतैं !स्वप्नके देश काल निमित्त संपत्ति इनमें कोई भी अपने प्रगट स्वरूपसे सत्य नहीं "न तत्र रथा न रथयोगा न पंथानो भवन्ति " यह श्रुति कहती है कि

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(११८) बल्सूत्राणि। [ अध्याय ३ स्वम्नके विषै न रथ हैं न रथके योग्य घोडा हैं न चलनेके योग्य .मार्ग हैं इति ॥ ३ ॥। सूचकश्च हिश्रुतेराचक्षते च तद्विंदः।।४।। इस सूत्रके-सूचक: १च२ हि ३श्तेः आचक्षते ५ चछ तद्विदः ७ यह सात पद हैं।। भविष्यत् साधु असाधु वस्तुका सूचक स्वप्न है ऐसेही श्रुति कहती है "यदा कर्मसु काम्येषु स्त्रियं स्वप्नेषु पश्यति। समृद्धिं तत्र जानीयात्तस्मिन्स्वप्ननिदर्शने"इति। "पुरुषं कृष्णं कृष्ण- दंत पश्यति स एनं हन्ति" इति च॥पुरुष है सो जिस स्वप्नमें का- म्यकर्मके विषै स्त्रीको देखे तिस स्वप्नमें समृद्धि जाननी इति प्रथम- श्रुत्यर्थः। औ जो कृष्णदांतवाले कृष्ण पुरुषको देखे तो देखनेवा- लेको हनन करे इति द्वितीयश्जत्यर्थः। औ स्वप्नाध्यायको जानने- वालेभी कहते हैं कि स्वप्में कुंजरके ऊपर चढना शुभकारी है औ खरके ऊपर चढना अशुभकारी है इति। यद्यपि स्वप्रके स्त्रीदर्शना- दिसे सूचित वस्तु सत्य है तथापि स्वप्नक्े स्त्रीदर्शनादिक सत्य नहीं॥ पराभिध्यानात्तु तिरोहितं ततो ह्वस्य बन्धविपर्ययौ॥५॥ इस सूत्रके-पराभिध्यानात् १ तु २ तिरोहितम् ३ ततः४ हिद अस्य ६ बंधविपर्ययौ ७यह सात पद हैं।। जो जीव ईश्वरका अंशहै तो ईश्वरके समान धर्मवाला होनेतैं जैसे ईश्वरकी सृष्टि सत्य है तैसे स्वप्नके विषै जीवकी सृष्टिभी सत्य होनी चाहिये यह कहनाभी ठीक नहीं।काहेतैं!अविद्याकेव्यवधानसे जीवके सत्यसंकल्पत्वादिधर्म तिरों हित होरहे हैं जब कोई जीव ईश्वरका ध्यान करे तब ईश्वरकी कृपासे किसी जीवके सत्यसंकल्पत्वादि धर्म प्रकट होते हैं औ ईरश्वके स्वरू- पके अज्ञानसे इसी जीवके बन्ध है औ तिसके ज्ञानसे मोक्ष है॥५॥ देहयोगाद्रा सोऽपि॥ ६॥ इस सूत्रके-देहयोंगात् १ वा २सः३.अपि ४ यह चार पद हैं।।

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पाद २] भापाटीकासहितानि। (११९) जो जीव ईश्वरका अंश है तो तिसके ज्ञान ऐश्वर्यादि धर्म तिरस्कृत न होने चाहियें यह कहना ठीक है परंतु जीवके ज्ञानऐश्वर्यादि धर्मका तिरोभाव देह इंद्रिय मन वुद्धि विषयादिकोंके योगसे हैं इसीसे जीवरचित स्वप्नकी सृष्टि सत्त्य नहीं ॥ ६॥ तदभावो नाडीषु तच्छ्ृतेरात्मनि च ।। ७।। इस सूत्रके-तदभाव:१नाडीषु २ तच्छुतेः ३ आत्मनिध्च५यह पांच पद हैं।। पर्वोक्त रीतिसे स्वप्नावस्थाको परीक्षा करी अब सुषुपि अवस्थाकी परीक्षा करते हैं नाडी प्राण हृदय ब्रह्म यह जीवके सुषुप्ति स्थान हैं ऐसे श्रुति कहती है तहां संशय है कि यह स्थान परस्परमें भिन्न हैं वा एकही है तहां कहते हैं कि प्राण औ हृदय यह ब्रह्मके नाम है औ नाडीद्वारा एक ब्रह्मकोही स्वप्रदर्शनाSभावरूप सुषुति स्थानका श्रवण होनेतें एक ब्रह्मही जीवका सुषुप्ति स्थान है।। ७॥ अंतः प्रबोधोऽस्मात्॥८॥ इस सूत्रके-अतः १ प्रबोध:२ अस्माव३ यह तीन पद हैं। जिस हेतुसे अत्माही सुषुत्तिस्थान है तिस हेतुसे अत्मासेही प्रबोध होता है जैसे अग्निके क्षुद्र विस्फुलिद् अग्निसे निकलते हैं तैसे सर्व प्राण आत्मासे ही निकलते हैं ॥८॥ . इस सुत्रके-सः १ एव २ तु३ कर्मातुस्मृतिशब्दविधिभ्यः४ यह चार पद हैं। जो सोता है सो ही जागता है वा अन्य जागताहै ! तहां कहते हैं कि जो सोता है सोही जागताहै, काहेतें!जो पहिलेदिन कर्म- का अनुष्ठान कर्त्ता है सो ही दूसरे दिन शेष रहे कर्मका अनुष्टान कर्त्ता है औ उत्थित पुरुषको यह स्मरण होताहै कि जो सोया था सोई मैं हूं औ दिनदिनके प्रति यह प्रजा ब्रह्मलोकको प्राप्त होवे है इत्यादि शब्द भी तिसका उत्थान कहतेहैं औ. कर्म विद्या विधिसेमी तिसीका उत्थान जाना जाता है अन्यथा विधि अनर्थक होवेगा

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(१२०) ब्रह्मसूत्राणि। [अध्याय ३ सुग्धेऽर्ड्सम्पत्ति: परिशेषात १०॥ इस सूत्रके-सुग्धे १ अर्द्धसंपत्तिः २ परिशेषांत३ यह तीन पदहें सुग्ध नाम मूच्छिका है तिसकी मूर्छावस्था जायत स्वम्न सुषुप्ति मरण इन सर्वसे विलक्षण होनेतें परिशेषसे अर्द्ध सम्पत्ति कहातीहै सुषुप्तिके सर्व धर्मोंकरके सम्पन्न न होनेतें सुषुप्त नहीं कहाता औ मरणके सर्व धर्मोंकरके सम्पन्न न होनेतैं मृत नहीं कहाता किंतु सुषुपिके औ मरणके अर्द्ध अर्द्ध धर्म करके सम्पन्न होनेतें अर्द्ध- सम्पत्तिवाला है॥ १० ॥ न स्थानतोऽपि परस्योभयलिङ्गं सर्वत्र हि॥ ११।।

हि ७ यह सात पद हैं।। सुषुप्तिके विषै जीव जिस ब्रह्मको प्राप्त होता है तिस ब्रह्मके स्वरूपका निरूपण करते हैं "सर्वकर्मा सर्व कामः" इत्यादि श्रुति ब्रह्मको सर्व कर्मवाला औ सर्व कामवाला कहती है सो सविशेष ब्रह्मका लिङ्ग है औ "अस्थूलमनणु" इत्यादि श्रुति ब्रह्ममें स्थूलताका औ अणुताका अभाव कहती है सो निर्विशेष ब्र- हका लिङ्ग है तहां संशयहै कि सविशेष निर्विशेष दोनोंहीं प्रकारका ब्रह्म प्राप्त होने योग्य है वा एक प्रकारका तहां कहते हैं कि परब्रह्म निर्विशेषही है सोई प्राप्त होने योग्य है औ स्थान जो पृथव्यादि उपाधि तिसके योगसे भी निर्विशेषही रहता है, काहेतैं ? अशब्दम इत्यादि श्रुति सर्वत्र निर्विशेष ब्रह्म कोही प्रतिपादन करती हैं ॥१9॥ न भेदादिति चन्न प्रत्येकमतद्वचनात्॥ १२।। इस सूत्रके-न १ भेदाव २इति ३ चेत् ४ न ५ प्रत्येकम् ६ अत- दचनात् ७यह सात पद हैं।। जो यह कहा कि ब्रह्म सविशेष नहींहै किंतु निर्विशेष है सो कहना ठीक नहीं, काहेतें? कोई श्षति ब्रह्मको

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पाद २ ] भाषाटीकासहितानि:। (१२१) चुतुष्पाद कहती है औ कोई षोडशकल कहती है ऐसे श्रुतिभेदसे ब्रह्मका भी सविशेष निर्विशेष भेद प्रतीत होता है (इति चेन्न) ऐसे न कहो काहेतें जुदे जुदे उपाधिभेदको लेके भी शास्त्र अभेदही कहता है औ जो श्षुंति भेदको कहती है सो उपासनाके वास्ते कहती है तिसका तात्पर्य अभेदमेंही है॥ १२॥ अपि चैवमेके ॥ १३ ॥ इस सुन्नके अपि १ च २ एवम् ३ एके ४ यह चार पद हैं।। अपि (निश्चय करके) कोईशाखावाले भेददर्शनकी निन्दापूर्वक अ- भेद दर्शनको कहते हैं "मनसैवेदमाप्तव्यं नेह नानास्ति किश्चन॥ मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेवर पश्यति"इति। अस्या अर्थः- यह ब्रह्म मन करकेही प्राप्त होने योग्य है औ इसके विषै नाना वस्तु कोई नहीं है औ जो कोई इसके विषै नानाकी न्याई देखता है सो मृत्युके सकाशसे मृत्युकोही प्राप्त होताहै इति ॥ १३॥ श्रुतिसे तो साकार निराकार दो प्रकारका व्रह्म प्रतीत होताहै तुम निराकारही कैसे कहतेहो इस शंकाका उत्तर कहते हैं।। अरूपवदेव हि तत्प्रधानत्वात्॥१४॥ इस सुत्रके-अरूपवत् १ एव २ हि ३ तत्प्रधानत्वात् ४ यह चार पद हैं।। रूपादि आकार करके रहितही ब्रह्म है, काहेतैं? "अ- स्थूलमनणु" इत्यादि श्षति निराकारके प्रतिपादनमेंही प्रधान हैं१४ जो निराकार व्रह्म है तो साकार ब्रह्मप्रतिपादक श्रुतिकी क्या गति है इस शंकाका समाधान कहते हैं।। प्रकाशवच्ावैय्थ्यम्॥१५॥ इस सूत्रके-प्रकाशवत् १ च २ अवैय्थ्यम् ३ यह तीन पद हैं।। जैसे सूर्य चन्द्रमाका तेज आकाशमें स्थित है परंतु अंगुल्यादि

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(१२२) ब्रह्मसूत्राणि। [अध्याय ३ उपाधिके संबंधसे ऋजु वक्र भान होताहै तैसे ब्रह्म भी पृथिव्यादि उपाधिके संबंधसे साकार भान होताहै उपासनाके वास्ते श्वति साकार ब्रह्मको कहती है इसीसे व्यर्थ नहीं॥ १५.॥ आह च तन्मात्रम् ॥ १६॥ इस सूत्रके-आह १ च २ तन्मात्रम् ३ यह तीन पद हैं।। जैसे लवणका पिण्ड बाहिर भीतरसे एक रस है तैसे रूपान्तर करके रहित निर्विशेष चैतन्यमात्र ब्रह्म है ऐसे श्रुति कहती है॥ १६॥ दर्शयति चाथो अपि स्मर्यते॥१७॥ इस सूत्रके-दर्शयति १ च २ अथो ३ अपि ४ स्मर्यते ५ यह पांच पद हैं।। "नेतिनेति" इत्यादि श्रति पररूपका निषेध करके निर्विशेष ब्रह्म को(तीहै औ'ज्ेयं यत्तत्प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वामृतम श्नुते। अनादिमत्परं ब्रह्म न सत्तत्रांसदुच्यते" यह गीतास्मृति भी निर्विशेष ब्रह्म को कहती है। अस्याअर्थ :- हे अर्जुन जो जानन योग्य वस्तु है सो मैं तेरेकों कहूंगा जिसको जानके पुरुष मोक्षको प्राप्त होता है औ पर ब्रह्म है सो अनादि है न सत् कहाता है न असत् कहाता है. इति॥ १७॥ अत एव चोपमा सूर्यकादिवत् ॥१८॥। इस सूतके-अतः १ एव २ च ३ उपमा ४ सूर्यकादिवत् ५ यह पांच पंद हैं।। जिस हेतुसे ब्रह्म निर्विशेष है तिसी हेतुसे ब्रह्मको जल सूर्यादिकोंकी उपमा है जैसे अनेक जलपात्रोंके विषै अनेक सूर्य भासते हैं तैसे अनेक शरीरोंके विषै अनेकही आत्मा भासते हैं१८ अम्बुवदग्रहणातुन तथात्वम्॥१९॥ इस सूत्रके-अंबुवत्१ अग्रहणातर तुश्न ४ तथात्वम्५ यह पांच पद्हैं।।जल सूर्यादिकोंकी उपमाके योग्य ब्रह्म नहीं है, का हेतैं!सूर्य मूर्ति- मान् है तिसकी उपाधि जल दूरदेशके विषै ग्रहीत होता है तिसके

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पाद २] भाषाटीकासहितानि। (१२३)

विषै सूर्यका प्रतिबिम्ब होना युक्त है औ मूर्तिरहित ब्रह्म सर्वगत है तिसकी उपाधिको दूरदेशमें न होनेतैं तिसके विषै ब्रह्मका प्रतिवि- म्ब नहीं हो सकता॥१९॥

इस सूत्रके-वृद्धिह्वासभाकम्१अंतर्भावात् २ उभयसामंजस्याव ३ एवम् ४यह चार पद हैं।दष्टान्त दार्टान्तिकके सर्वअंश सम नहीं होते हैं किंतु विवक्षित अंशको लेके दृष्टान्त होता है जैसे जलगत सूर्यका प्रतिबिम्ब है सो जलके बधनेसे बधता है औ जलके घटनेसे घटता है तैसे एक परब्रह्म है सो देहादि उपाधिके अंतर्गत होनेतैं उपाधिके धर्म जो वृद्धि ह्वासादि तिनको भजता है ऐसे दष्टांतदा- ष्ान्तिकको समीचीन होनेतैं कोई विरोध नहीं ॥२०॥। दर्शनाच्च॥२१॥ इस सूत्रके-दर्शनाद १ च २ यह दो पद हैं। देहादिक उपाधिके विषै परव्रह्म का प्रवेश श्रति कहती है 'पुरश्वके द्विपदःपुरश्चक्रेःचतुष्पदः पुरः स पक्षी भूत्वा पुरः पुरुष आविशत"अस्याअर्थ :- ईश्वर है सो मतु ष्यादि शरीरोंको रचके औ पश्चादि शरीरोंको रचके चक्षुरादिकोंकी प्रगटतासे पहिले लिङ्गशरीरवाला होके तिन शरीरोंके विषै प्रवेश करता भया प्रवेश करनेसे भी पूर्णही है. इति॥ २१ ॥ प्रकृतैतावत्त्वं हि प्रतिषेधति ततो व्रवीति च भूय:॥२२॥ इस सूत्रके-प्रकृतैतावत्त्वम्१हि २ प्रतिषेधति ३ ततः ४ व्रवीति 4 च ६ भूय: ७ यह सात पद हैं।। प्रकरणके विषे मूर्त अमूर्त यह दो ब्रह्मके रूप हैं तिनका नेति नेति यह श्रुति निषेध कहती है तिस नि- षेधके पीछे"अन्यत् परमस्ति" यह श्रुति कहती है कि मूर्त अमूर्त इन दोनोंसे परे ब्रह्म है।। २२ ।।

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(१२४ ) ब्रह्मसूत्राणि। [अध्याय ३ तदव्यक्तमाह हि॥। २३ ॥ इस सूत्रके-तत् १ अव्यक्तम् २ आह ३ हि ४ यह चार पद हैं।। जो सर्व प्रपंचसे परब्रह्म न्यारा है तो नेत्रादिकोंसे गृहीत क्यों नहीं होता तहां कहते हैं कि परव्रह्म अव्यक्त है नेत्रादिइंद्ियोंका विषय नहीं ऐसेही श्रुति कहतीहै "न चक्षुषा गृह्यते नापि वाचा"इति परव्रह्म न चक्षुकरके गृहीत होता है औ न वाणी करके गृहीत होता है अर्थात् कोई भी इंद्रिय करके गृहीत नहीं है।। २३॥ अपि संराधने प्रत्यक्षानुमानाभ्याम् ॥२४॥. इस सूत्रके-अपि१ संराधनेर प्रत्यक्षानुमानाभ्याम्श्यह तीन पद हैं।।श्रुति स्मृतिसे यह निश्चय है कि संराधन कालके विषै अव्यक्त ब्रह्मको योगी देखते हैं संराधन नाम भक्ति ध्यान प्रणिधानादि अनुष्ठानका है॥ २४ ॥ जो संराध्य संराधक भाव मानोगे तो पर अपर आत्माका भेद मानना होवेगा इस शंकाका समाधान कहते हैं।। प्रकाशादिवच्चावैशेष्यं प्रकाशश्र कर्मण्यभ्यासात्॥।२५।। इस सूत्रके-प्रकाशादिवत १ च२ अवैशेष्यम् ३प्रकाश: ४च५ कर्मण ६ अभ्यासात् ७ यह सात पद हैं। जैसे प्रकाशादिक हैं सो उपाधिके विषैं भेदको प्राप्त होतेहैं स्वतः भेदवाले नहीं हैं तैसे चिदा- त्माभी ध्यानादि कर्मरूप उपाधिके विषै भेदको प्राप्त होताहै स्वतः नहीं काहेतैं? 'तत्त्वमसि' इस महावाक्यके अभ्याससे ब्रह्म एकरसही प्रतीत होताहै॥ २५ ॥ अतोऽनन्तेन तथा हि लिङ्गम् ॥२६॥ इस सुत्रके-अतः १ अनन्तेन २ तथा ३ हि ४ लिङ्गम् ५ यह पांच पंद हैं। अभेदको स्वाभाविक होनेतैं औ भेदको अविद्याकृत

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पाद २] भाषाटीकासाहितानि। (१२५)

होनेतैं विद्यासे अविद्याको दूंर करके जीव है सो अनन्त प्राज्ञात्माके साथ एकताको प्राप्त होता है ऐसेही श्षति कहती है "ब्रह्मविद्वल्लैव भवति"अस्या अर्थः-व्रह्मको जाननेवाला ब्रह्मही होता है इति २६ उभयव्यपदेशात्त्वहिकुण्डलवत् ।२७।। इस सूत्रके-उभयव्यपदेशात् १ तु २: अहिकुण्डलवत ३ यह तीन पद हैं।। कहीं ध्यातृध्यातव्यरूप पक्रे औ कहीं दष्ट्द्रष्टव्य रूप करके जीवका औ प्राज्ञका भेद कहा है जो अभेदही मानोगे तो भेदकथन निरर्थक होवैगा यह कहना ठीक नहीं, काहेतैं? जैसे सर्प एकही होताहै परंतु कुण्डलित्व वक्राकारत्व दीर्धदण्डाकारत्व- रूप करके तिसका भेद है तैसेही एक ब्रह्मके विषै उपाधि अनुपा- घिको लेके भेद अभेदका कथन है।। २७ ॥ प्रकाशाश्रयवद्ा तेजस्त्वात् ॥२८॥ इस सूत्रके-प्रकाशाश्रयवत् १ वा २ तेजस्त्वाव ३ यह तीन पद हैं।। जैसे प्रकाश औ प्रकाशका आश्रय सूर्य इन दोनोंको तेज होनेतैं अत्यंत भिन्न नहीं है परंतु लोक इनको भिन्न कहते हैं तैसे प्रकरणमेंभी जानना चाहिये॥ २८॥ पूर्ववद्रा । २९ ।। इस सूत्रके-पूर्ववत् १ वा २ यह दो पद हैं।। "प्रकाशादिवच्चा- वैशेष्यम्1 इस सूत्रमें जो कहा है कि प्रकाशादिकोंकी न्याइं ब्रह्म एकरस है सो वेदान्तसिद्धान्त कहा है औ बन्ध अविद्याकृत है तिसकी विद्यासे निवृत्ति है।। २९ ॥। प्रतिषेधाच्च॥३० ॥ इस सूत्रके-प्रतिषेधान१ चर यह दो पद हैं। परमात्मासे अन्य चेतनका निषेधभी शास्त्र कहता है "नान्योऽतोऽस्ति द्रष्टा" यह श्रुति कहती है कि परमात्मासे अन्य कोई द्रष्टा नहीं है॥ ३० ॥

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(१२६ ) ब्रह्मसूत्राणि। [ अध्याय ३

तीन पद हैं। यह पूर्वपक्षसूत्र है। जो सर्व प्रंपचसे रहित ब्रह्म कहा तिसतैं परे औरभी तत्त्व वस्तु है काहेतैं! सेतु १उन्मान २ सम्बंध ३ भेद४ इनका कथन होनेतैं "अथ य आत्मा स सेतुर्विधृतिः"यहश्रुति कहती है कि जो आत्मा है सो सर्वको धारण करनेवाला सेतु है इसतें यही निश्चय भया कि आत्मरूप सेतुसे परे औरभी तत्त्व वस्तु है औ "तदेतत् ब्रह्म चतुष्पात्" यह श्रति कहती है कि वह ब्रह्म चारपाद- वाला है जो चारपांद करके परिमित ब्रह्म है तो तिसतैं अन्य वस्तु भी है औ "सता सोम्य तदा सम्पन्नोभवति"यह श्चात कहती है कि है सौम्य यहं जीव सुषुप्ति कालमें सत ब्रह्मके साथ सम्बन्धको प्राप्त होताहै औ "अथ य एषोऽक्षिणि पुरुषः" इत्यादि श्रुति अक्षिस्थ पुरुषका औ आदित्यमण्डलस्थ पुरुषका भेद कहती है इन सर्वसे यही जाना गया कि परब्रह्मसे परे कोई तत्त्व वस्तु है॥३१॥ सामान्यातु॥ ३२ ॥ इस सूत्रके-सामान्यात् १ त२ यह दो पद हैं। 'तु'शब्द पूर्वप- क्षकी निवृत्तिके अर्थ है ब्रल्लसे अन्य कोई तत्त्ववस्तु है यह कहना प्रमाण करके शून्य है औ सेतुके कथन करकेभी ब्रह्मसे भिन्न काइ वस्तुकी सिद्धि नहीं होसकती, काहेतैं! लौकिकसेतुकी समानतासे श्रुति आत्मा को सेतु कहती है औ यह नहीं कहती कि आत्मासे अन्य कोई तत्त्व वस्तु है॥ ३२ ॥। बुद्धयर्थ: पादवत् ॥३३ ॥ इस सूत्रके-बुद्धचर्थ: १ पादवत् २ यह दो पद हैं। जो यह कहा कि उन्सानका कथन होनेतैं ब्रह्मसे भिन्न कोई वस्तु है सो कहना

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पाद २] भापाटीकासहितानि। (१२७ ) ठीक नहीं, काहेतैं? जैसे ध्यानके वास्ते वाकू प्राण चक्षु श्रोत यह मनके चार पाद हैं तैसे (बुद्धयर्थः) उपासनाके वास्ते ब्रह्मके चार पाद हैं॥ ३३ ॥ स्थानविशेषात्प्रकाशादिवत्।३४॥ इस सूत्रके-स्थानविशेषात् १ प्रकाशादिवत् २ यह दो पद हैं। जैसे सूर्यका प्रकाश एकही है परंतु उपाधिके योगसे विशेष कहाता है औ उपाधिके वियोगसे महाप्रकाशके साथ सम्बन्धवाला कहाता है औउपाधिके भेदसे भिन्न कहाता है तैसे एकही आत्मा जाग्दादि अवस्थामें वुद्धयादि उपाधिके योगसे विशेष विज्ञानवाला कहाता है औ सुषुप्तिमें उपाधिकी शान्ति होनेतैंःपरमात्माके साथ सम्ब- न्घवाला कहाता है औ उपाधिके भेदसे भिन्न कहाता है॥। ३४ ॥ उपपत्तेश्र॥ ३५॥ इस सूत्रके-उपपत्तेः१ च २ यह दो पद हैं। अपने स्वरूपसे ही ब्रह्म के साथ भेदनिवृत्तिरूप सम्बन्ध जीवका है सुख्य सम्बन्ध नहीं, काहेतैं! श्रुति करके एक ब्रह्मका कथन होनेतैं वस्तुद्वयका अभाव है।। तथान्यप्रतिषेधात्॥३६ ॥ इस सूत्रके-तथा१ अन्यप्रतिषेधाव श्यह दो पद हैं।"नेह नाना- स्ति किश्चन"यह श्रुति ब्रह्मसे भिन्नवस्तुका प्रतिषेध करती है इससे यही निश्चय भया कि परब्रह्मसे परे कोई तत्त्व वस्तु नहीं है।।३६॥। अनेन सर्वगतत्वमायामशब्दादिभ्यः॥३७॥ इस सूत्रके-अनेन१ सर्वगतत्वम्२आयामशब्दादिभ्यःश्यह तीन पद हैं।। इस सेत्वादिकथनके निषेधसे सर्वगत आत्मा सिद्ध भया। प्रश्न-तुम आत्माको सर्वगत कैसे जानतेहो!उत्तर-आयाम शव्दसे जानते हैं। प्रश्न-आयामशब्द किसको कहते हो? उत्तर-व्यापि- वाचक शब्द आयामशव्दहै जैसे "ज्यायान् दिवो ज्यायानाकाशात्

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(१२८) ब्ह्मसूत्राणि। [अध्याय ३' यह ब्रह्मको व्यापक कहनेवाला आयाम शब्दहै। अस्यार्थ :- परमा- त्मा झुलोकसे बडा है औ आकाशसे बडा है अर्थात् सर्वगत है ३७ फलमत उपपत्तेः॥३८॥ इस सूत्रके-फलम् अतः २उपपत्ते: ३ यह तीन पद हैं।। शुभ अशुभ व्यामिश्र यह तीन प्रकारके कर्म हैं तिनका सुख दुःख व्यामि- श्र यह तीन ही प्रकारके फल हैं तिन फलोंको देव नारकीय मनुष्या- दिक भोगते हैं तिन फलोंको सुगानेवाला कर्म है वा ईश्वर है तहां कहते हैं कि फलको भुगानेवाला ईश्वर है, काहेतैं ? सर्वेश्वर सर्वज्ञ चेतनके विना जड कर्मके विषै फल भुगानेकी योग्यता नहीं॥३८॥। श्रुतत्वाच्च ॥३९॥ इस सूत्रके-अुतत्वात१चरयह दो पद हैं॥ "सवा एष महानज आत्माऽन्रादो वसुदानः"यह श्रुति कहती है कि सो यह महान अज आत्मा है सो सर्वको अन्न देता है औ धन देता है इति॥३९॥ धर्मे जैमिनिरत एव॥ ४०॥ इस सूत्रके-धर्मम् १ जैमिनि:२ अतः३एव ४ यह चार पद हैं ॥ .. "स्वर्गकामो यजेत" इत्यादि श्रतिसे धर्मही फलका दाता है ऐस जैमिनि आचार्य मानता है॥४० ॥ पूर्वै तु बादरायणो हेतुव्यपदेशात्॥४१॥ इस सूत्रके-पूर्वम् १ तु२बादरायण: ३हेतुव्यपदेशात् ४:यह चार पद हैं।। केवल कमही फलका दाता है इस पक्षकी निवृत्तिके अर्थ 'तु'शब्द है पूर्वोक्त ईश्वरही फलका दाता है ऐसे बादरायण आचार्य मानता है काहेतैं सर्ववेदान्तके विषै ईश्वरही जगतका हेतु कहाहै ४१ इति श्रीमन्मौक्तिकनाथयोगिविर चितायां ब्रह्मसूत्रसारार्थप्रदीपिकायां तृरवीयाध्यायस्य द्वितीयः पादः ॥२॥

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पाद ३ ] भाषाटी कासहितानि। (१२९) तृतीयाध्याये तृतीय:पादः। पूर्वपादके विषै विज्ञेय ब्रह्मका तत्त्व कहा अब विचार करते हैं कि सर्व वेदान्तके विषै विज्ञानका भेद है वा नहीं इस संशयको दूर करते हैं भगवान् सूत्रकार।। सर्ववेदान्तप्रत्ययं चोदनाद्यविशेषात्॥१॥ इस सूत्रके-सर्ववेदान्तप्रत्ययम्१चोदनाद्यविशेषात्र यह दो पद हैं।। सर्ववेदान्तके विष एकही विज्ञान है, काहेतैं? चोदनादिकोंकी अविशेषता होनेतैं चोदना नाम प्रेरणाका है वा विधायकशव्दका नाम चादना है जैसे एकही अग्निहोत्रके विषै शाखाभेद हैं परंतु 'जुहुयात' यह चोदना शब्द पकही है तैसे वाजसनेयी शाखामें औ छान्दोग्यके विषै "ज्येष्टश्व श्रेष्ठश्र" इत्यादि ज्येष्ठत्वादिगुणविशिष्ट प्राणविद्या एक है तैसे पंचागिनिविद्या भी एक है।। १ ।। भेदान्नेति चेन्नैकस्यामपि॥२॥ इस सूत्रके-भेदाव १न२ इति ३ चेत् ४ न५ एकस्याम् ६ अपि७ यह सात पद हैं। वाजसनेयी शाखामें पंचागनिविद्याकी स्तुति करके छठा अग्निऔर माना हैऔ छान्दोग्यमें पंचाग्ि- विद्याही मानी है ऐसे गुण भेद होनेतै सर्व वेदान्तके विषै एक विद्या नहीं (इति चेन्न) ऐसे न कहो, काहेतैं? एक विद्याके विषै भी गुण भेदका संभव होनेतैं एकही विद्या है॥ २।। स्वाध्यायस्य तथात्वेन समाचारेऽधिका राच्च सववच तन्नियमः ॥३॥ इस सूत्रके-स्वाध्यायस्य १ तथात्वेन रसमाचारे ३ अधिकाराव ४ चद सववत् ६ च७ तन्नियमः८ यह आठ पद हैं॥ जो ऐसे कदते हैं कि अथर्ववेदके विषै विद्याके प्रति शिरोव्रतादि धर्मकी अपेक्षा है औ

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(9३०) ब्रह्मसूत्राणि। [अध्याय ३ दूसरे वेदमें नहीं है इसीसे विद्याका भेद है सो कहना ठीक नहीं, काहेतैं? शिरोव्रतादि अध्ययनका धर्म है विद्याका धर्म नहीं औ अध्ययन धर्म करके ही वेदवतोपदेश ग्रंथके विषै आथर्वणििक कहते हैं कि शिरोत्रतादिरहित पुरुष इसका अध्ययन न कर जैसे एक ऋषि संज्ञक अग्निमें सौर्यादि सप्त होम करे यह नियम भी अथर्वमें है परंतु शिरोत्रतादिधर्मविद्याका है यह नियम नहीं॥ ३ ॥' दर्शयबि च।४।। इस सूत्रके-दर्शयति१ च २ यह दो पद हैं। एकही विद्याको. वेद कहता है "सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति" अस्या अर्थः-जिस ब्रह्म स्वरू- पको सर्व वेद कहते हैं. इति॥४ ॥ उपसंहारोऽर्थाभेदाद्विधिशेषवत्समाने च। ५॥ इस सूत्रके-उपसंहार: १ अर्थाभेदात् २ विधिशेषवत्३ समाने४ च५ यह पांच पद हैं। उक्त प्रकारसे सर्व वेदान्तके विषै एकही विद्या सिद्ध भई औ.जो शाखान्तरमें विद्याके गुण कहे हैं तिनका समानविद्यामें उपसंहार करना, अर्थाव जिस शाखामें नहीं है तिस शाखामें शाखान्तरसे इकट्ठा करना काहेतैं!तिनके अर्थका अभेद है जैसे विधिके शेष अग्निहोत्रादि धर्मोंका एकविधिमें उपसंहार होता है तैसे शाखान्तरस्थ गुणोंका समानविद्यामें उपसंहार जानना॥५॥ अन्यथात्वं शब्दादिति चन्नाविशेषात्॥।६।। इस सूत्रके-अन्यथात्वम् १शब्दात्२.इति३ चेत्४न५अविशेषाव छं यह छह पद हैं। वाजसनेयी शाखामें श्रवण होताहै कि सात्त्विक वृत्तिवाले देव कहतेभये कि यज्ञके विषै उद्ीथ करके राजसतामस वृत्तिवाले असुरोंको जीतैंगे पीछे वागादिक सर्व प्राणोंको कहा कि तुम हमारें मध्यमें उद्रान करो जब वागादिक उद्धान करने लगे तब

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पाद ३ ] भाषाटीकासहितानि। (१३१) अनृतादि दोष करके ग्रस्त होतेभये पीछे सुख्यप्राणको कहा कि "त्वं न उद्गाय"तूं हमारे मध्यमें उद्गान कर जब सुख्यप्राण उद्गान कर- नेलगा तब असुर नष्ट होतेभये इति।औ छान्दोग्यके विषै भी श्रवण होता है कि "तमुद्रीथसुपासांचक्रिरे"जब वागादिक सर्व प्राण दोष करके ग्रस्त होतेभये तब सुख्यप्राण उद्धानकरता भया पीछे असुर नष्ट होगये तब तिस उद्धीथरूप सुख्य प्राणकी देवता उपासना करते- भये इति। इन दोनों स्थलोंमें प्राणविद्या कही है तहां संशय है कि यह विद्या एक है वा नहीं। पूर्वोंक्त न्यायसे प्राणविद्या एक है यह पूर्व- पक्षीका मत है। सिद्धान्ती-प्राणविद्या एक नहीं, काहेतैं? वाजसनेयी शाखामें "त्वंन उद्धाय" इस वाक्य करके प्राणको कर्ता माना है औ छान्दोग्यमें "तसुद्रीथसुपासांचक्रिरे"इस वाक्य करके प्राणको कर्म माना है ऐसे उपास्य कर्त्ता कर्मका भेद होनेतैं विद्याका भेद है। पूर्व पक्षी-कर्ता कर्मरूप विशेषता करके विद्याका भेद नहीं होसकता, काहेतैं? बहुत स्थलमें प्राणविद्याकी अविशेषता प्रतीत होती है इसीसे प्राणविद्या एक है।। ६॥ न वा प्रकरणभेदात्परोवरीयस्त्वादिवत्।७।। इस सूत्रके-न १ वा २ प्रकरणभेदाव ३ परोवरीयस्त्वादिवत् ४ यह चार पद हैं।। यह सिद्धांत सूत्र है जैसे प्रकरणका भेद होनेतैं आदित्यादिगताहरेण्य श्मश्रुत्वादिगुणविशिष्ट उद्गीथकी उपासनासे परोवरीयस्त्वादि अर्थात (परमश्रेष्ठत्वादिगुणविशिष्ट उद्धीथकी उ- पासनाका भेद है तैसे प्रकरणका भेद होनेतैं प्राणविद्याका भेद है ७. संज्ञातश्रेत्तुक्तमस्ति तु तदपि। ८॥ इस सूत्रके-संज्ञातः १ चेत २ तत् ३ उक्तम् ४ अस्ति ५ तु ६ तत् ७ अपि ८ यह आठ पद हैं।। वाजसनेयीशाखामें औ.छान्दो- यमें 'उद्गीथविद्या' ऐसी एक संज्ञा होनेतैं एकही विद्या है यह कहना

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(१३२) [अध्याय ३ भी ठीक नहीं, काहेतैं। "न वा प्रकरणभेदात् परोवरीयस्त्वादिवत्" इस पूर्वसूत्रमें जो कह आये हैं सोई ठीक है औ एकसंज्ञा यह कहना भी श्रुतिके अक्षरोंसे बाह्य है श्रुतिमें तो उद्गीथ इतनाही पद है।।८।। व्याप्रेश्च समञ्जसम् ॥९॥ इस सुत्रके-व्याप्ते: १ चरसमंजसम् ३ यह तीन पद हैं॥"ओ- मित्येतदक्षरुद्ीथमुपासीत" अर्थ :- 'ओम्'यह अक्षर उद्गीथ है ऐसे उपासना करनी इति।इस वाक्यमें अक्षरशब्दका औ उद्दीथशन्दका सामानाधिकरण्य होनेतैं अध्यास अपवाद एकत्व विशेषण यह चार पक्ष प्रतीत होते हैं बुद्धिपूर्वक अभेदके आरोपका नाम अध्यास है, बाधका नाम अपवाद है, वास्तव अभेदका नाम एकत्व है व्यावर्त कका नाम विशेषण है।तहां संशय है कि इन चार पक्षोंमें कौनसे पक्षका ग्रहण करना ठीक है? तहां कहते हैं कि विशेषणपक्षका ग्र. हण करना ठीक है, काहेतैं? इस उपासनामें सर्ववेदव्याप्य ओङ्कार प्राप्त भया तिसका निरास करके ओङ्कारके विषै प्राणदृष्टि विधान के वास्ते अक्षरका उद्गीथ विशेषण है ऐसे ही मानना ठीक है।९॥ सर्वाभेदादन्यत्रेमे॥१॥ इस सुत्रके-सर्वाभदात् १ अन्यत्र २ इमे ३ यह तीन पद हैं।। वाजसनेयीशाखा में औ छान्दोग्यमें प्राणका संवाद है तहां प्राणको श्रेष्ठ मानके उपास्य माना है तिसके विषै वागादिकोंके वसिष्ठत्वादि गुणोंका समर्पण किया है वाणीका वसिष्ठत्व गुण है औ चक्षुका प्रतिष्ठा गुण है, काहेतैं!वाणीवाला सुखपूर्वक वस्ता है औ चक्षुवालेकी सुखपूर्वक पादप्रतिष्टा होती है औ कौषीतकी शाखामें प्राणसंवादके दिषै वसिष्ठत्वादिगुणोंका श्रवण है नहीं तहां संशय है कि वाजसनेयी शाखासे वसिष्ठत्वादिगुणोंका आकर्षण करना वा नहीं? तहां कहते हैं कि आकर्षण करना, काहेतैं? सर्वशाखामें प्राणविज्ञान एकही है १०

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पांद ३ ] भाषाटीकासहितानि। (१३३ )

आनन्दादय: प्रधानस्य॥ ११॥ इस सूत्रके-आनन्दादयः १ प्रधानस्य २ यह दो पद हैं॥ जो भ्रुति ब्रह्मके स्वरूपको कहती है तिनके विषै आनन्दरूपत्व विज्ञान- घनत्व सर्वगतत्वादि ब्रह्म के धर्म कहे हैं तहां संशय है कि जिस श्रुतिमें जो धर्म कहा है सो वहांही जानना वा सारे धर्म सारेही जानने तहां कहते हैं कि सारे धर्म सारेही जानने, काहेतैं ? सर्व श्रुतियोंमें एकही ब्रह्म प्रधान है तिसका भेद नहीं॥। ११॥ तैत्तिरीय उपनिषद्में प्रियशिरस्त्व मोदग्रमोदादि ब्रह्मके धर्म कहे' हैं सो भी सारे ही जानने चाहियें इस शंकाका उत्तर कहते हैं।।

इस सूत्रके-प्रियशिरस्त्वाद्यपात्ति:१उपचयापचयौ २हि ३भेदे४ यह चार पद हैं।। प्रियशिरस्त्वादि धर्मोंकी सारे प्राप्ति नहीं है, काहे तैं ! पुत्रादि दर्शन सुखका नाम प्रिय है पुत्रकी वार्त्तासे मोद होता है यह सर्व कोशके धर्म हैं ब्रह्मके नहीं, काहेतैं? परस्परकी अपेक्षासे औ भोगनेवालेकी अपेक्षासे इन धर्मोंकी वृद्धि औ हानि होती है औ हानि वृद्धिभेदके विना होवें नहीं औ ब्रह्म भेदरहित है॥।१२॥ इतरे त्वर्थसामान्यात्॥१३॥ इस सूत्रके-इतरे १ तु २ अर्थसामान्याद ३ यह तीन पद हैं। ज्ञान आनन्दादि धर्म सारेही जानने चाहियेँ, काहेतैं! इन धर्मों करके प्रतिपाद धर्मि ब्रह्म सारे एकही है।। १३॥ आध्यानाय प्रयोजनाभावात्॥१४॥ इस सूत्रके-आध्यानाय १ प्रयोजनाभावात् २ यह दो पद हैं। 4इन्द्रियेभ्यःपरा हर्था अर्थेभ्यश्च परं मनः"इत्यादिश्वतिवाक्य कठ- वल्लीके विषै श्रवण होता है तहां संशय है कि तिस तिसकी अपेक्षासे

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(१३४) ब्रह्मसूत्राणि। [ अध्याय ३ अर्थादिक परे कहे हैं वा इन सर्वकी अपेक्षासे पुरुषही परे कहाहै!तहां कहते हैं कि इन सर्वकी अपेक्षासे पुरुषही परे कहा है, काहेतें! इव द्वारा पुरुषका दर्शन होना यही इनका प्रयोजन है और कोई प्रयोजन नहीं औ ब्रह्मको परे कहनेका प्रयोजन मोक्षंकी सिद्धि है॥ १४॥ आत्मशब्दाच॥ १५॥ इस सूत्रके-आत्मशब्दा् १ च २ यह दो पद हैं। पुरुषज्ञानके वास्तेही इन्द्रिय अर्थादिकोंका प्रवाह माना है, काहेतें! "एष सर्वेषु भूतेषु गूढोऽऽतमा न प्रकाशते" इत्यादि श्रुतिमें पुरुषके विषै आत्मशब्दका प्रयोग होनेतैं इन्द्रिय अर्थादिक सर्व अनात्मा हैं औ श्रुतिका अर्थ यह है कि सर्वभूतोंके विषै आत्मा गूढ है इसीसे प्रकाशता नहीं है इति॥१८॥ आत्मगहीतिरितरवदुत्तरात् ॥१६॥ इस सुत्रके-आत्मगृहीतिः १ इतरवत् २ उत्तरात् ३ यह तीन पद हैं।। ऐतरेयं उपनिषद्में कहा है कि इस सृष्टिसे पहिले एक आत्माही रहा और कुछ नहीं था सो आत्मा इन लोकोंको रचता भया इति तहां संशय है कि आत्मशब्दसे परमात्माका ग्रहण है वा अन्य किसीका ग्रहण है? तहां कहते हैंकि परमात्माका ग्रहण है, काहेतें! जैसे इतर सृष्टि वाक्योंमें परमात्माका ग्रहण करते हैं तैसे इहांभी करना चाहिये ॥ १६॥ अन्वयादिति चेत्स्यादवधारणात्॥१७॥ इस सूत्रके-अन्वयात् १ इति२ चेत् ३ स्यात् ४ अवधारणात्५ यह पांच पद हैं।। सृष्टिवाक्यका प्रजापतिके विषै अन्वय होनेतैं पर मात्माका ग्रहण नहीं होसकता ऐसे कहे तो ठीक नहीं, काहेतैं! जों परमात्माका ग्रहण न होगा तो सृष्टिसे पहिले एकही आत्मा रहा ऐसा निश्चयभी न होगा इसीसे परमात्माका ग्रहण करना ठीकहै १७

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पाद ३ ] भापाटीकासहितानि। (१३५) कार्याख्यानादपूर्वम्॥१८ ॥ इस सुत्रके-कार्याख्यानाव १ अपूर्वम् २ यह दो पद हैं।। छन्दोग्यमें औ वाजसनेयी शाखामें प्राणसंवादके विषै श्वादिपर्यन्त प्राणका अन्न कहके पीछे कहा है कि जल प्राणका वस्त्र है ऐसे उपासक पुरुष प्राणकी अनग्नताका चिन्तन करे औ तिसके पीछे छान्दोग्यमें कहाहै किभोज़नसे पहिले औ पीछे आचमन करना यह प्राणको आच्छादन करनेके वास्ते आचमन विधि है इति। तहां संशय है कि यह दोनोंही मानने चाहियें वा आचमनविधि मानना चाहिये वा अनग्नताचिन्तन मानना चाहिये इति। तहां कहते हैं कि ध्यानके वास्ते अनग्नताचिन्तनही मानना ठीक है, काहेतैं? शुद्धिके वास्ते कार्यरूपसे आचमन नित्यही प्राप्त है तिसकी विधि नहीं है॥। १८।। समान एवंचाभेदात्॥१९ ॥ इस सूत्रके-समान:१ एवम् २ च ३ अभेदाद् ४ यह चार पद हैं। वाजसनेयी शाखामें अिरहस्यके विषै शाण्डिल्यविद्या है तहां मनो- मयत्व प्राणशरीरत्व भारूपत्वादि आत्माके गुण कहे हैं औ तिसी शाखामें कहा है कि आत्मा सर्वका अधिपति है सर्वका प्रशास्ता है इति। तहाँ संशय है कि यह विद्या एक है औ मनोमयत्वादि गुणका उपसंहार है वा दो विद्या हैं वा गुणकाअनुपसंहार है! तहां कहते हैं कि जैसे कहीं भिन्न शाखामें एक विद्या औ गुणका उपसंहार होता है तैसे इहाँ भी एक शाखामें एकही विद्या औ गुणका उपसंहार है, काहेतैं? मनोमयत्वादि गुणवाला एक ब्रह्मही उपास्य है।। १९ ॥ सम्बन्धादेवमन्यत्रापि॥ २० ॥ -इस सूत्रके-सम्बन्धात१ एवम्र अन्यत्र३अपिश्यह चारपदहैं।। वृहदारण्यकमें कहा है कि इस मण्डलके विषै औ दक्षिण नेत्रके विषै आदित्य पुरुष है औ पीछे दो उपनिषद् कहे हैं एक तो यह कहा कि

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(१३६) ब्रह्मसूत्राणि। [अध्याय ३ अहर इस नामवाला मण्डलस्थ पुरुष अधिदैवत है औ दूसरा यह कहा कि अहम इस नामवाला नेत्रस्थ पुरुष अध्यात्म है तहाँ संशय है कि अविभाग करके यह दोनों उपनिषद् दोनोंही जगह मानने वा विभाग करके एक अधिदैवत औ दूसरा अध्यात्म मानना इति। तहां पूर्वपक्षी कहता है कि जैसे शाण्डिल्यविद्यामें एकविद्या औ गु- णका उपसंहार माना है तैसे इहां भी एकविद्या औअधिदैवतत्वादि गुण का उपसंहार मानना चाहिये॥२० ॥ न वा विशेषात् ॥२१॥ इस सूत्रके-न १ वा २ विशेषात ३ यह तीन पद हैं। यह सिद्धांत सूत्र है इन दोनों उपनिषदोंकी दोनो जगह प्राप्ति नहीं है, काहेतैं। मण्डलस्थ पुरुषकी अहर इस नामसे उपासना कही है औनेत्रस्थ पुरुषकी अहम् इस नामसे उपासना कही है ऐसे स्थानविशेष होनेतें दोनों उपनिषद् भिन्न हैं एक नहीं ॥२१॥ दर्शयति च ॥ २२॥ इस सूत्रके-दर्शयति १ च २ यह दो पद हैं। मण्ड़लस्थ पुरुष औ नेत्रस्थ पुरुषरूप स्थानके भेदसे भिन्न धर्मोंका अतिदेशके विना परस्परमें उपसंहार नहीं होसकता इसीसे "तस्यैतस्य तदेव रूपं यद- मुष्य रूपम्" इत्यादि श्रुतिरूप अतिदेश करके आदित्यपुरुषगत- रूपादिधमोंका नेत्रस्थ पुरुषके विषै उपसंहार मानाहै।श्रुत्यर्थः-जो इस मण्डलस्थपुरुष का रूप है सोई नेत्रस्थ पुरुषका रूप है इति २२ सम्भृतिद्युव्याप्त्यपि चातः ।। २३ ।। इस सूत्रके-संभृतिद्युव्याती १ अपि २ च ३ अतः ४ यह चार पद हैं।। आकाशादिकोंको उत्पन्न करनेवाला औधारण करनेवालाजो ब्रह्मका पराक्रमतिसका नाम संम्भृतिहैऔस्वर्गादिकोंके साथ ब्रह्मकी याप्तिका नाम दयुव्याप्ि है सो यह सभृति औछव्याप्तिब्रह्मकी विभूति

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पाद ३ ] भाषाटीकासहितानि। (१३७ )

वेदमें कही है औ तिसी वेदमें शाण्डिल्यविद्यासे आदिलेके ब्रह्म- विद्या कही है तहां संशय है कि ब्रह्मविद्यांके विषै ब्रह्मविभृतिका उ- पसंहार करना वा नहीं! तहां कहते हैं कि नहीं करना, काहेतैं।शाण्डि- ल्यविद्यादिकेंके हृदयादि स्थान कहे हैं तिनके विषे ब्रह्मविभूतिकी प्राप्ति नहीं होसकती॥ २३॥ पुरुषविद्यायामिव चेतरेषामनाम्नानात्॥२४॥ इस सूत्रके-पुरुषविद्यायाम् १ इवर च ३ इतरेषाम् ४ अनाम्ना- नात् ५ यह पांच पद हैं। छान्दोग्यके विषै पुरुषका यज्ञरूपकरके वर्णन किया है तिसकी आयुका तीन विभाग करके तीन सवन कहे हैं तिस पुरुषके चौविसवर्षपर्यंत प्रातःकालका सवन है औ तिसके आगे चवालिसवर्ष पर्येत मध्यंदिनका सवन है औ तिसके आगे अडतालिसवर्षं पर्यत सायंकालका सवन है ऐसे एक सौ सो- लहवर्ष पर्यंत पुरुषका जीवनरूप फल कहाहै औ तैत्तिरीयके विषैभी पुरुषको यज्ञरूप कहाहै तिस विद्वान यज्ञपुरुषका आत्मा यजमान हैश्रद्धा पत्नी है इति। तहां संशय है कि छान्दोग्यमें पुरुषयज्ञके जो धर्म कहे हैं तिनका तैत्तिरीयमें उपसंहार करना वा नहीं? तहां क- हते हैं कि नहीं करना, काहेतैं? छान्दोग्यमें जो पुरुषयज्ञ कहा है तिसतैं विलक्षण तैत्तिरीयमें कहाहै इन दोनोंकी तुल्यता नहीं॥।२४।। वेधाद्यर्थभेदात्॥२५। इस सुत्रके-वेधाद्यर्थभेदाव् १ यह एकही समस्त पद है।। अथर्व- वदके विषे उपनिषदके प्रारम्भमें प्रविध्यादि मंत्र कहे हैं "सर्व प्र- विध्य हृदयं प्रविध्य धमनीः प्रवृज्य शिरोऽभिप्रवृज्य त्रिधा विपृक्तः" इति। अर्थ :- अिचारकर्त्ता पुरुष देवताकी प्रार्थना कर्त्ता है कि हे देवते! मेरे शत्रुके सर्व अंगोंको विदीर्ण कर विशेष करके हृदयको विदीर्ण कर नाड़ीको तोड शिरका नाश कर ऐसे तीन प्रकारसे मेरा

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(१३८) ब्रह्मसूत्राि। [अध्याय ३ शत्रु नष्ट होवै इति। तहां संशय है कि इन प्रविध्यादि मंत्रोंका उप- निषंद् विद्याके विषै उपसंहार करना वा नहीं तहां कहते हैं कि नहीं करना, काहेतैं? इन मंत्रोंके हृदयवेधादि अर्थ भिन्न हैं तिनका उप- निषद् विद्याके साथ सम्बन्ध नहीं ॥२५॥ हानौ तूपायनशब्दशेषत्वात्कुशाच्छन्द:

इस सूत्रके-हानौ १ तु २ उपायनशब्दशषत्वात् ३ कुशाच्छन्द: स्तुत्युपगानवत् ४ तत् ५ उक्तम् ६ यह छह पद हैं । विद्वान् अपने पुण्यपापको त्यागके शुद्ध होके परत्रह्मको प्ाप्त होता है ऐसे अथर्व- वेदमें पुण्यपापका हान कहा है हान नाम त्यागका है औ विद्वान्के जो. प्रिय हैं सो तिसके पुण्यको ग्रहण करते हैं अप्रिय हैं सो पाप- को ग्रहण करते हैं ऐसे कौषीतकी शाखामें पुण्यपापका उपायन कहा है उपायन नाम ग्रहणका है तहां संशय है कि अथवमें हानका श्रवण है उपायनका नहीं तहां उपायनका सन्निपात करना वा नहीं? तहां कहते हैं कि करना, काहेतैं ? हानशब्दका शेष उपाय- न शब्द है ऐसे कौषीतकीरहस्यमें कहा है जैसे उद्गाता अपने स्तोत्र गणनेके वास्ते काष्टकी (कुशा) शलाका अपने समीप रखता है सो कुशा कहीं अविशेष करके वनस्पतिमात्रकी कही है परंतु कहीं विशेष करके उदुम्बरकी कही है तहां उदुम्बरकीही ग्रहण करनी औ जैसे नव अक्षरका आसुर छन्द है तिसतैं अन्य दैव छंद है तिनका अविशेष करके पौर्वापर्यके प्रसंगमें दैवछन्द पूर्व है ऐसे पैङ्गी वाक्यसे विशेष ग्रहण है औ जैसे षोडशीकमका अंगभूत स्तोत्र पढना ऐसे अविशषेकालकी प्रहरमें सूर्योदयमें पढना ऐसे विशेषकालका ग्रहण है औ जैसे अविशेष करके सर्व ऋत्विजोंको उपगानकी प्राप्तिमें अध्वर्युसे भिन्न ऋत्विक उपगान करें यह विशेष ग्रहण है तैसे प्रकरणमें भी जानना चाहिये ॥ २६॥

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पाद ३ ] भाषाटीकासहितानि। (१३९)

साम्पराये कर्तव्याभावात्तथा हन्ये।।२७ ।। इस सूत्रके-साम्पराये १ कर्त्तव्याभावात २ तथा ३हि४अन्ये ५ यह पांच पद हैं।। कौषीतकी शाखावाले कहते हैं कि जब विद्वान् मरके देवयानमार्ग करके ब्रह्मलोकको जाता है तब मार्गके मध्यमें विरजानाम नदी आती है तिसको मन करके ही तरता है औ वहांही पुण्य पापको दूर करता है इति। तहां संशय है कि विद्वान्के पुण्यपाप विरजामें दूर होते हैं वा देह त्यागसे पहिलेही दूर होते हैं इति। तहां कहते हैं कि पहिलेही दूर होते हैं, काहेतैं? मृत विद्वान्को मार्गके विषै पुण्यपापसे कुछ कर्त्तव्य नहीं ऐसेही अन्य शाखावाले कहते हैं।।२७॥ छन्दत उभयाविरोधात्॥२८॥ इस सूत्रके-छन्दतः१उभयाविरोधाव २ यह दो पदहैं॥ मार्गके मध्यमें विद्वान्के पुण्यपापका नाश मानना सर्वथा असंगत है, काहेतैं पुण्यपापके नाशक जो यमनियमादि साधन तिनका इच्छापूर्वक अ- नुष्ठान देहके पडे पीछे नहीं हो सकता औ देहपातके पूर्वही विद्वान्- के पुण्यपापका नाश होता है ऐसे ताण्डीश्रुति औ शाव्यायनी श्रुति कहती है तिनके साथ विरोध होवेगा औ जो देहपातसे पूर्वही पुण्यपापका नाश मानो तो विरोध नहीं ॥ २८ ॥ गतेरर्थवत्त्वमुभयथाऽन्यथा हि विरोधः ॥२९॥ इस सूत्रके-गतेः १ अर्थवत्त्वम् २ उभयथा ३ अन्यथा४ हि५. विरोध:६ यंह छह पद हैं। सगुण विद्याके विषै पुण्यपापके हानकी सन्निधिमें देवयानमार्गका श्रवण है औ निर्गुण विद्याके विषै नहीं है तहां संशय है कि सगुण निर्गुण दोनोंही विद्यामें हान तो है परंतु देव- यान मार्गका उपसंहार दोनों विद्यामें है वा कहीं है कहीं नहीं है इति। तहां कहते हैं कि सगुणमें है निर्गुणमें नहीं ऐसा माननेसेही देवयान

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(१४०) जह्ममूत्राणि। [अध्याय ३ मार्ग अर्थवाला होसकताहै अन्यथा जो श्रुति पुण्यपापके त्यागपूर्वक विद्वान्की परब्रह्म के साथ एकता कहतीहै तिसके साथ विरोध होवैगा, काहेतैं ? निर्गुण विद्यामें देवयानमार्गकी अपेक्षा नहीं ॥ २९॥ उपपन्नस्तलक्षणार्थोपलब्घेलोंकवत् । ३ । इस सूत्रके-उपपन्रः १ तल्लक्षणार्थोपल्घेः २ लोकवत् ३ यह तीन पद हैं।। सगुणविद्यामें देवयानमार्ग है औ निर्गुणमें नहीं यही मानना ठीक है, काहेतैं! पयंकविद्या के विषै कहा है कि सगुणका उपा- सक देवयानमार्ग करके ब्रह्मलोक को जाता है औ ब्रह्मा के साथ पर्यंक- परं बैठके संवाद करताहै औ दिव्य गंधादिकों को भोगता है इति। औ निर्गुणका उपासक कहीं जाता नहीं इसीसे देवयानमार्गकी अपेक्षा नहीं औ इस लोकमें भी यह वार्त्ता प्रसिद्ध है कि किसी ग्राम जा नेवालेको मार्गकी अपेक्षा होती है दूसरेको नहीं॥ ३० ॥ अनियम: सर्वासामविरोध: शब्दानुमानाभ्याम्॥३१॥ इस सूत्रके-अनियम: १ सर्वासाम २अविरोध:शशब्दानुमाना- भ्यामूध्यह चार पद हैं।। सगुणविद्यामें भी पर्यकविद्या पंचाग्निविद्या उपकोसलविद्या दहरविद्या इनके विषै देवयानमार्गका श्रवण हैऔ मधुविद्या शाण्डिल्यविद्या षोडशकलविद्या वैधवानरविद्याके विषै नहीं है तहां संशय है कि जिस विद्यामें देवयानमार्ग कहा है तिसमें तिसको जानना यह नियमहै वा अनियमसे सर्व सगुण विद्याके विषै जानना इति।तहां कहते हैं कि सर्वही सगुणविद्या ब्रह्म लोकको प्रात्त करनेवाली हैं तिन सर्वके विषै ही देवयानमार्ग जानना ऐसेही श्रुति स्मृति कहती हैं इसीसे कोई विरोध नहीं॥ ३१॥ सगुणविद्याका ब्रह्मलोक फल कहा औ निर्गण विद्याका सुक्ति फल कहा सो ठीक नहीं, काहेतैं। इतिहांस पुराणादिकोंके विषै तत्त्वज्ञा नीके जन्मका श्रवणहै जैसे 'अपान्तरतमाः' नाम वेदाचार्य विष्णुकी

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पाद ३ ] भाषाटीकासहिवानि। ( १४१) आज्ञासे कलि द्वापरकी सन्धिमें कृष्णद्वैपायन होता भया औ ब्रह्माका मानसपुत्र वसिष्ठ निमिराजाके शापसे पूर्वदेहको त्यागके ब्रह्माकी आज्ञासे मित्रावरुणके सकाशसे उत्पन्न होताभया ऐसे भृगु सनत्कुमार दक्ष नारदादिकोंके जन्मका भी श्रवण है इस शंकाका समाधान कहतेहैं। यावदधिकारमवस्थितिराधिकारिकाणाम् ॥। ३२ ॥ इस सूत्रके-यावदधिकारम् १अवस्थितिः२आधिकारिकाणाम् ३ यह तीन पद हैं।। लोकस्थितिका हेतु जो वेदप्रवर्त्तनादिक अधिकार है तिनके विषै परमेश्वर करके अपान्तरतम वसिष्ट भृगु नारदादिक नियुक्त हैं इसास जितनेकाल अधिकार है उतनेकाल वसिष्ठादि- कोंकी स्थिति रहेगी॥ ३२ ॥ अक्षरधियां त्ववरोध: सामान्यतद्भावा- भ्यामोपसदवत्तदुक्त्तम् ॥३३॥ इस सूत्रके-अक्षरधियाम्१तु२अवरोधः३ सामान्यतद्धांवाभ्याम ४ औपसदवत ५ तत् ६ उक्तम् ७ यह सात पद हैं।। अक्षरब्रह्म न स्थूल है न अणु है न ह्रस्व है न दीर्ध है ऐसे वाजसनेयी शाखामें अक्षरब्रह्मके विषे स्थूलतादि द्वैतका निषेध किया है तहां संशय है कि जिस शाखामें स्थूलतादिद्वैतकी निषेधवुद्धि होती है तहांही तिस बुद्धिको जाननी चाहिये वा सारे ही सर्वनिषेध बुद्धिका उपसंहार करना, तहां कहते हैं कि सारे सर्व निषेध बुद्धिका उपसंहार करना, काहेतैं? सारे ही अद्य ब्रह्मका प्रतिपादन समान है जैसे उपसद कर्म के विषै उद्धाताके वेदमें स्थित पुरोडाश प्रदानमंत्रोंका अध्व्युके साथ संबंध होता है तैसे इहां भी सर्वनिषेधवुद्धिका अक्षरब्रह्मके साथ संबंध है। ३३ ॥। इयदामननात् ॥ ३४ ॥ इस सूत्रका-इयदामननात १ यह एकही समस्त पद है। अथर्व

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(१४२) ब्रह्मसूत्राणि। [अध्याय ३' वेदमें अध्यात्मअधिकारके विषै "दा सुपर्णां सयुजा सखाया" इत्या दिमंत्र कहाहै औ कठवल्लीके विषै "ऋतं पिबन्तौ सुकृतस्य लोके" इत्यादि मंत्र कहा है तहां संशय है कि यह विद्या एक है वा नाना हैं तहाँ कहते हैं कि एक है, काहेतैं ? इन दोनों मंत्रोंमें इयत्ता करके, परिच्छिन्न द्वित्वसंख्यावाला वद्यरूप एकही है परिच्छिन्र परिमाण का नाम इयता है॥। ३४॥ अन्तरा भृतग्रामवत्स्वात्मनः ॥३५॥ इस सूत्रके-अन्तरा १ भूतग्रामवत्र स्वात्मनः ३ यह तीन पद हैं।। वाजसनेयी शाखांमें याज्ञवल्क्यके प्रति उषस्ति ब्राह्मणका प्रश्न है कि हे याज्ञवल्क्य जो साक्षात् अपरोक्ष ब्रह्म है औ जो सबके अन्तर आत्मा है सो मेरे प्रति कहो इति। औ यही प्रश्न कहोल ब्राह्मणका है तहां संशय है कि इन दोनों ब्राह्मणोंमें एकविद्या है वा नाना हैं तहां कहते हैं कि एक है, काहेतैं? जैसे श्रुति कहती है कि एक देव सर्वभूतोंके विषे गूढ है सर्वव्यापी है सर्वका अन्तर आत्मा है इति। तैसे इहांभी दोनोंको सर्वान्तरत्वकी अनुपपत्ति होनेतें एक ही अपना आत्मा सर्वान्तरात्मा है इसीसे विद्या एक है।। २५॥ अन्यथा भेदानुपपत्तिरिति चेन्नोपदेशान्तरवत्॥ ३६॥ इस सूत्रके-अन्यथा १ भेदानुपपत्तिः २ इति ३ चेत् ४ न ५ उपदेशान्तरवत् ६ यह छह पद हैं।। जो दोनों ब्राह्मणोंमें एकही विद्या है तो प्रश्नका भेद न होना चाहिये अर्थात एकही प्रश्न होना चाहिये (इति चेन्न) ऐसे न कहो, काहेतैं?जैसे श्वेतकेतुके प्रति नौबेर "तत्त्व मसि" महावाक्यका उपदेश है परंतु विद्या एक है तैसे इहां भी प्रश्न दो हैं परंतु विद्या एकही है। ३६ ॥ व्यतिहारो विशिषन्ति हीतरवत्ं॥३७॥ इस सूत्रके-व्यतिहार: १ विशिंषन्ति २ हि ३ इतरवत् ४

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पाद ३ ] भापाटीकासहितानि। (१४३) यह चार पद हैं।। इहां जीव ईश्वरके विशेषणविशेष्यभावका नाम व्यतिहार है ऐतरेय उपनिषद्में कहा है कि जो मैं हूं सो यह ईश्वर है औ जो यह ईश्वर है सो मैं हूं इति। तहां सशय है कि इहाँ व्य- तिहार करके उभयरूप मति करनी वा एकरूप मति करनी ? तहां कहते हैं कि व्यतिहार करके उभयरूप मति करनी, काहेतैं!जैसे ध्या- नके वास्ते ईश्वरके सर्वात्मत्वादि गुण कहे हैं तैसेही ध्यानके वास्ते व्यतिहार कहा है ऐसे और जगह भी व्यतिहारका श्रवण होता है कि तूं है सो मैं हूं औ मैं हूं सो तूं है इति॥ ३७ ॥ सैव हि सत्त्यादयः॥ ३८॥। इस सूत्रके-सा१एवरहि३स्त्त्यादयः ४ यह चार पद हैं।। गाज- सनेयीशाखामें सर्वसे पहिले उंत्पन्न होनेवाले सत्यव्रह्म हिरण्यगर्भ- की जो कोई उपासना करे सो अच्छे लोकको प्राप्त होताहै ऐसे नामो- क्षरकी उपासना कही है सत्त्य इसनाममें स १ त् २ त्य ३ यह तीन अक्षर हैं औ तिसके अनन्तर "तद्यत् तत्सत्यम्" इत्यादि श्रतिमें कहा है कि जो यह, मंडलके विषे औ दक्षिण नेत्रके विषै पुरुष है सो सत्य है इति। तहां संशय है कि यह सत्यविद्या दो हैं वा एक है। तहां कहते हैं कि एक है, काहेतैं ? तद्यत् तव इन पदों करके पूर्वोंक्त सत्यादिगुणविशिष्ट ब्रह्मकाही आकर्षण किया है ३८ कामादीिरत्र त्र चायतनादिभ्यः॥३९॥ इस सूत्रके-कामादि १ इतरत्रर तत्र ३ चः आयतनादिभ्यः ५ यह पांच पद हैं।। छान्दोग्यमें हृदयरूप ब्रह्मपुरके विषै अन्तराका- शरूप आत्माको कहके तिसके सत्यकामत्व सत्यसंकल्पत्वादिगुण कहे हैं औ वाजसनेयीशाखामें हृदयाकाशके विषै आत्माको कहके तिसके सर्ववशित्वादिगुण कहे हैं तहां संशय है कि यह विद्या एक औ सत्यकामत्वादिगुणोंका परस्परमें योग है वा नहीं! तहां कहते हैं कि

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( १४४) ब्रह्मसूत्राणि । [ अध्याय ३ विद्या एक है औ.सत्यकामत्वादिगुणका वाजसनेयीशाखामें योग करना औ सर्ववशित्वादि गुणका छान्दोग्यमें योग करना, काहेतैं ? दोनों स्थलोंमें हृदयस्थान समान है औ तिसमें जानने योग्य ईश्वर भी समान है।। ३९।। आदरादलोप:॥४०॥ इस सूत्रके-आदरात१ अलोप: २ यह दो पद हैं।। छान्दोग्यमें वैश्वानरविद्यामें कहा है कि जो भोजनके वास्ते पहिले स्थालीमें वा पत्तलादिकोंमें अन्न प्राप्त होवै तिसका प्राणाग्निमें होम करना प्रथम आहुति प्राणाय स्वाहा इस मंत्रसे होमनी ऐसे पांच आह्ति होमनी इति।तहां संशय है कि भोजनका लोप होनेतैं प्राणाग्निहोत्रका लोप होता है वा नहीं ? तहां पूर्वपक्षी कहता है कि नहीं होता, काहेतैं। वैश्वानरविद्याके विषै जाबाल श्रुति प्राणाग्निहात्र का आदर कहती है भोजनका लोप होवे तो भी प्रतिनिधि न्यायसे जल करके वा अन्य किसी अविरुद्ध द्रव्य करके प्राणाग्निहोत्रका अनुष्ठान करना॥४॥ उपस्थितेऽतस्तद्वचनात्॥४१॥ इस सूत्रके-उपस्थिते १ अतःरतद्चनात् ३ यह तीन पद हैं।। सिद्धान्ती कहता है कि जो अन्न भोजनके वास्ते प्रथम प्राप्त होवे तिस अन्नसे प्राणाग्निहोत्र करना, काहेतैं।श्रुतिने यही नियम किया है जो अन्न भोजनके वास्ते प्रथम प्राप्त होवै तिसीको होमना इति।इस नियमसे यह भी जानागया कि भोजनका लोप होनेतैं प्राणाग्रि होत्रका भी लोप है।। ४१ ॥ तन्निर्धारणानियमस्तदृष्टेः पृथग्व्यप्र- तिबन्धः फलम्॥ ४२ ॥ इस सूत्रके-तन्निर्धारणानियम: १तदष्टेः २ पृथक्३हि४ अप्रति बन्धःफलमूध्यह छह पद हैं। 'ओं' इस अक्षरकी उद्गीथरूप करके

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पाद ३ ] भाषाटी कास हितानि। (१४५) उपासना करनी इत्यादि विज्ञान कमांगके आश्रित हैं तहां संशय है कि यह विज्ञान कर्मके विषै नित्य है वा अनित्य है? तहां कहते हैं कि अनित्य है, काहेतें ? तिनके निर्धारणका नियम नहीं औ श्रुतिभी कहती है कि जो "ओम्" इस अक्षरको रसतमत्वादिरूप करके जानता है औ जो नहीं जानता है सो दोनोंही पुरुष कर्म करते हैं औ दोनोंकेही पृथक कर्मके फलकी सिद्दिका अप्रतिबन्ध है. जो जानता है तिसको अधिक फल होता है औ जो नहीं जानता है तिसको न्यून फल होता है।। ४२ ॥ प्रदानवदेव तदुक्तम् ॥४३ ॥ इस सूत्रके-प्रदानवत् १ एव २ तत ३ उक्तम् ४ यह चार पद हैं।। वाजसनेयीशाखामें वागादि सर्वके विषै अध्यात्मरूप प्राणको श्रेष्ट कहाहै औ छान्दोग्यमें अध्यादिसर्वके विषे अधिदैवरूप वायुको श्रेष्ठ कहा है तहां संशय है कि, प्राणको औ वायुको भिन्न जानना वा अभिन्न जानना? तहाँ कहते हैं कि भिन्न जानना, काहेतैं?जैसे इंद्र देवता एकही है परन्तु राज १ अधिराज २ स्वराज ३ इन गुणोंके भेदसे तिसका भेद है औ तिसके अर्थ पुरोडाश प्रदानका भी भेद है तैसे इहां भी ध्यानके वास्ते अध्यात्म अधिदैवका विभाग हानतें प्राणका औ वायुका भेद है।। ४३॥

इस सूत्रके-लिङ्ग्भूयस्त्वाद १ तत २ हि ३ बलीयः ४ तत् ५ अपिक््यह छह पद हैं।। अग्निरहस्य ब्राह्मणके विषै वाजसनेयी कहते हैं कि, मनुष्यकी सौ वर्षकी आयु है तिसके अंतर्गत छत्तीसहजार अहो- रात्र हैं तिन करके अविच्छिन्न छत्तीसहजार मनकी वृत्तिहैं यद्यपि मनकी वृत्ति बहुत हैं तथापि छत्तीसहजारकीही गणना करते हैं तिन अपनी वृत्तियोंको मनहै सो अग्रिरूप करके देखताभया ऐसेही वागा १०

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(१४६.) ब्रह्मसूत्राणि। [अध्याय ३ दिक अपनी अपनी वृत्तियों को अनिरूप करके देखतेभये इति। तहां संशय है कि यह वृत्ति यज्ञका अंगहै वा स्वतंत्र केवल विद्यारूप है? तहाँ कहते हैं कि केवल विद्यारूप है, काहेतैं! इस आग्नरहस्यब्राह्मण के विषै बहुतसे लिद्ग केवल विद्याकोही कहते हैं औ प्रकरणसे लिङ्ग बलवान होता है ऐसे पूर्वकांडके विषै जैमिनि आचार्यने कहा है४४ पूवावकल्पः प्रकरणात्स्यात्क्रियामानसवत्॥४५॥ इस सूत्रके-पूर्वविकल्प: १ प्रकरणात् २ स्यात् ३ क्रियामानस- वत्ः यह चार पद हैं।। पूर्वपक्षी कहता है-कि या मनोवृत्तिरुप अग्नि है सो केवल विद्यारुप नहीं है किंतु इनके पूर्व क्रियारूप अधिनिका प्रकरण होनेतैं तिसीके विकल्पविशेषका उपदेश है, औ जो यह कहा कि प्रकरणसे लिङ्ग बलवान् होता है सो कहना ठीक है परन्तु इहां लिङ्ग बलवान् नहींहै औ जैसे द्वादशरात्र कर्मके विषै दशमें दिन मानस ग्रहकी कल्पना करते हैं तिस मानसग्रहके पूर्वक्रियाका प्करण होनेतें मानसग्रह भी क्रियाका शेष है तैसे इहां भी जानना चाहिये।। ४५। अतिदेशाच्च॥४६ ॥ इस सुत्रके-अतिदेशात् १ च २ यह दो पद हैं। यह मनोवृ- त्तिरूप छत्तीसहजार अध्नि हैं तिनके विषै एक एक अगिक्रिया अग्निके सदश है इस अतिदेशसे यही निश्चय भया कि यह मनो- वृत्तिरूप अग्नि क्रियाका अंग है।।४६।। विद्यैव तु निर्धारणात्॥४७। इस सुत्रके-विद्या १ एव २तु निर्धारणात् ४ यह चार पद हैं। 'तु'शब्द पूर्वपक्षकी निवृत्तिके अर्थ है। सिद्धान्ती कहताहै-कि यह मनोवृत्तिरूप अग्नि स्वतंत्र केवल विद्यारूप है क्रियाका अंग नहीं ऐसा श्रुति करके निर्धारण है॥।४७ ॥

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पाद ३ ] भापाटीकास हिदानि। (१४७) दर्शनाच् ॥४८ ॥ इस सुत्रके-दर्शनाव् १ च २ यह दो पद हैं। इन मनोवृत्तिरूप अग्नियोंकी स्वतंत्रताका बोधक लिङ्ग भी दीखता है सो "लिङ्गभू- यस्त्वात् तद्दि बलायस्तदपि" इस सूत्रके विषे दिखाया है। ४८ ।। प्रकरणकी सामर्थ्यसे स्वतंत्रपक्षका बाघ होनेतैं मनोवृत्तिरूप अथि क्रियाके अंग हैं इस शंकाका उत्तर कहते हैं सूत्रकार। श्ुत्यादिवलीयस्त्वान्च न बाधः ।४९। इस सुत्रके-अत्यादिबलीयस्त्वात १च २ न ३ बाघ: ४ यह चार पद हैं।। प्रकरणकी सामथ्यसे स्वतंत्रपक्षका बाघ नहीं हो सकता, काहेतैं? स्वतंत्रपक्षको कहनेवाले श्रुति लिद्ग वाक्य यह तीनों प्रकरणसे बलवान् हैं।। ४९ ।। अनुबन्धादिम्यः प्रज्ञान्तरपृथक्त्व- वदृषृश्च तटुक्तम्॥५०॥ इस सूत्रके-अनुबन्धादिभ्य: १ प्रज्ञान्तरपृथक्कतवत २हष्टः ३ च ४ तत् ५ उक्तम् ६ यह छह पद हैं।। अनुबन्धादिकोंसे प्रकरणको बाधके मनोवृत्तिरूप अध्नि स्वतंत्र हैं संपत्के वास्ते जो उपासना तिस उपासनाके वास्ते मनोवृत्तिके विषै क्रियाके अंगको जोड- नेका नाम अनुबन्ध है ऐसेही श्रुति कहती है कि अगिका आधान, इष्टकाका चयन, पात्रका ग्रहण इत्यादि जो यज्ञके कर्म हैं सो सर्व मनोमय करना इति। औ जैसे शाण्डिल्यविद्यादिरूप प्रज्ञान्तर क्रियासे मिन्न है तैसे सनोवृत्तिरूप अग्नि भी क्रियासे भिन्न है क्रियाका अंग नहीं ऐसेही पूर्वकांडकी श्रुतिमें दीखता है ॥ ५० ॥ न सामान्यादप्युपलब्धर्मृत्युवन्न हि लोकापातिः॥५१॥। इससूत्रके-न १ सामान्यात् २ अपि३ उपलब्धे:४ सृत्युवत्ः न ६ हि श लोकापत्ति:८ यह आठ.पद हैं।। जो यह कहा कि जैसे द्ा-

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(१४८) ब्रह्मसूत्राणि। [अध्याय ३ दशरात्र कर्मके विषै दशमें दिन मानसग्रहकी कल्पना करते हैं सों मानसग्रह क्रियाका अंग है तैसे मनोवृत्तिरूप अग्निभी क्रियाका अंग है सो कहना ठीक नहीं, काहेतैं? पूर्वोक्त श्रुत्यादिरूप हेतुसे मनोवृत्तिरूप अग्निकी केवल विद्यारू पसे उपलब्धि है औ जैसे वेदमें आदित्यको औ अग्निको मृत्यु कहे हैं यद्यपि इन दोनोंके विषै मृत्यु शब्दका प्रयोग समान है तथापि यह दोनों अत्यंत सम नहीं औ 超 頭 食 道 保 यह भी कहा है कि यह लोक अग्नि है तिसका आदित्य इंधन है परंतु इंधनकी समानतासे इस लोकको अगनिभावकी. प्राप्ति नहीं तैसे मानसग्रहकी यत्किंचित् समानतासे मनोवृत्तिरूप अगनि क्रि याके अंग नहीं ॥ ५१ ॥ परेण च शब्दस्य ताद्विध्यं भूयस्त्वात्त्वनुबन्धः ।।५२।। इस सूत्रके-परेण १ च २शब्दस्य ३ ताद्विध्यम् ४ भूयस्त्वात् तु ६ अनुबन्ध: ७ यह सात पद हैं। पूर्व उत्तर ब्राह्मणोंके विषै स्व- तंत्र विद्याका विधान होनेतैं मध्यव्राह्मणके विषैभी स्वतंत्रविद्याका विधानही शब्दका प्रयोजन है। प्रश्न-जो मनोवृत्तिरूप अग्नि कि- यका अंग नहीं तो क्रिया अग्निके साथ तिनका पाठ क्यों है। उ- त्तर विद्यामें अधनिके बहुत अवयवोंका संपादन करना, इसीसे किया अग्निके साथ तिनका अनुबन्ध है क्रियाका अंग मानके नहीं।।५२।। एक आत्मन: शरीरे भावात्॥ ५३।। इस सूत्रके-एके १ आत्मन: २ शरीरे ३ भावात् ४ चार पद हैं।। बन्धमोक्षकी सिद्धिके वास्ते देहसे पृथक आत्माके सद्धावका विचार करते हैं देहात्मवादी लोकायतिक चार्वाक कहते हैं कि देहसे न्यारा आत्मा नहीं है, काहेतैं।प्राण चेष्टा चेतनत्व स्मृत्यादिक आत्माके धर्म हैं सो देहके होतेही होते हैं औ देहके न होते नहीं होते हैं इसीसे दे हके धर्म हैं औ देहका नाम ही आत्मा है और कोई आत्मा नहीं५३

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पाद ३ ] भाषाटीकासहितानि। (१४९)

इस सुत्रके-व्यतिरेक: १ तद्धावाभावित्वात् २ न३तु४ उप- लब्धिवत् ५ यह पांच पद हैं।। सिद्धान्ती कहता है-कि देह आत्मा नहीं है किंतु देहसे आत्मा जुदा है, काहेतैं? देहके धर्म रूपादिक मृतदेहके विषै भी रहते हैं औ तिनका दूसरे पुरुषको ज्ञान होता है औ आत्माके धर्म प्राण चेष्टादिक मृतदेहके विषै नहीं रहते हैं औ न तिनका दूसरे पुरुषको ज्ञान होता है।। ५४ ॥ अङ्गावबदास्तु न शाखासु हि प्रतिवेदम् ॥५५॥ इस सूत्रके-अङ्गावबद्धाः१ तु२नश्शाखासु४ हिद प्रतिवेदमू६ यह छह पद हैं।। उद्धीथाऽवयव ओंकारमें प्राण दृष्टि करनी उक्था- र्य शास्त्र में पृथिवी दृष्टि करनी इष्टकाचित अग्निमें लोक दृष्टि करनी ऐसे उद्रीथादि कर्मोंके अंगके आश्रित उपासना कही है तहां संशय है कि जिस वेदकी शाखामें जो उपासना कही है सो वहांही जाननी वा सर्व उपासना सर्वशाखाओंमें जाननी।तहां कहते हैं कि जो उपास- ना जिस शाखामें कहीहै सो वहांही नहीं जाननी किंतु सर्व उपासना सर्वशाखाओंमें जाननी, काहेतैं! उद्रीथादि श्रुति सर्वत्र समानहैं५ मन्त्रादिवद्वाSविरोधः ॥५६॥ इस सूत्रके-मंत्रादिवत् १ वा २ अविरोध ३ यह तीन पद हैं।। अथवा मंत्रादिकोंकी न्याईं अविरोध है जैसे अन्यशाखागत जो मंत्र कर्म गुण तिनका शाखान्तरमें उपसंहार होता है तैसे अन्य शाखागत उद्गीथादि कर्ममें शाखान्तरगत उपासनाका उपसंहार जानना चाहिये॥ ५६॥ भूम्नः ऋतुवज्ज्यायस्त्वं तथा हि दर्शयति॥५७॥ इस सूत्रके-भूत्न: १क्रतुवत् रज्यायस्त्वम् इतथा ४ हिद दर्शयति६

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(१५०) ब्रह्मसृत्राणि। [अध्याय ३ यह छह पद हैं।। कैकेय देशके अश्वपति नाम राजाके समीप प्राची- नशालको आदिलेके छह ऋषि विद्याके वास्ते जातेभये तिस आ- ख्यायिकामें व्यस्त समस्त वैश्वानरकी उपासनाका श्रवण है हुलो- कादि प्रत्येक अवयवके विषै वैशानरकी उपासना व्यस्तउपासना है औ सर्व अवयवके विषै समस्तउपासना है तहां संशय है कि व्य- स्त समस्त दोनों उपासना करनी वा समस्तही करनी।तहां कहते हैं कि जैसे दर्श पूर्णमासादियज्ञमें सर्व अंगसहित प्रधान एकही प्रयोग श्रेष्ठ है तैसे भूमा वैश्वानरकी समस्त उपासनाही श्रेष्ठ है ऐसेही श्रुति कहती है।। ५७ ।।

इस सूत्रका-नानाशब्दादिभेदाव१ यह एकही समस्त पदहै।। जो यह कहा कि वैश्वानरकी समस्त उपासना श्रेष्ठ है तहां ऐसी बुद्धि हो तीहै कि औरभी जो भिन्नभिन्न श्रुतिके विषै ईश्वर प्राणादिकोंकी उपा- सना कही हैं सो समस्तही श्रेष्ट हैं, काहेतैं। यद्यपि उपासनाकी प्रति- पादक श्रुति अनेक हैं तथापि उपासनाके योग्य ईश्वर एक है औ प्राणभी एकहै तहां कहते हैं कि उपास्यका अभेदहै परंतु उपासनाका भेद है, काहेतैं? नाना शब्दका भेद होनेतैं कर्मका भेद है औ कर्मका भेद होनेतैं उपासनाका भेद है॥। ५८॥ विकल्पोऽविशिष्टफलत्वात् ॥५९॥ इस सूत्रके-विकल्प: १अविशिष्टफलत्वातरयह दो पद हैं। विद्या का स्वरूप कहके अब अनुष्ठान प्रकार कहते हैं-जो यह विद्या कही हैं तिनका समुचय जानना वा समुच्चय विकल्प दोनों जानने वा विक रपही जानना! एक विद्यामें दूसरी विद्याको मिलनेका नाम समुचचय है औनहीं मिलानेका नाम विकलप है. तहां कहते हैं कि विकल्पही जानना, काहेतैं! यह जो अहंग्रह विद्या हैं तिनका उपास्य ईश्वरादिकों

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पाद ३ ] भाषाटीकासहितानि। (१५१) का साक्षात्काररूप फल एकही है जहां एकविद्यासे साक्षात्कार होवे तहां दूसरी निरर्थक है॥५९॥ काम्यांस्तु यथाकाम समुच्चीयेरन्न वा पूर्वहेत्वभावात६० इस सूत्रके-काम्याः १ तु२ यथाकामम् रससुच्चीयेरन्४्न५वा ६ पूर्वहेत्वभावात् ७ यह सात पद हैं॥ यह वायु दिशाका वत्स है ऐसे जो पुरुष उपासना करता है सो पुत्रमरणनिमित्त रोदन को नहीं पाता है इत्यादि काम्यविद्या कही हैं तिनका ससुचय उपासक अपनी इच्छासे करे वा नहीं करे इसमें कोई पूर्व हेतु नहीं कहा है॥। ६० । अङ्गेषु यथाश्रयभावः॥६१॥ इस सूत्रके-अङ्गेषु१यथाश्रयभाव: २ यह दो पद हैं॥ वेदत्रयके विषै कर्मके अङ्ग जो उद्रीथादि तिनके आश्रित जो उपासना तिनका समुचय करना वा नहीं! तहां पूर्वपक्षी कहता है-कि जैसे कतुके अनुष्ठानमें तदाश्रित अंगोंके समुच्चयका नियम है तैसे अंगोंके अ- तुष्ठानमें तदाश्रित उपासनाके ससुच्चयकाभी नियम है॥ ६१॥ शिष्टेश्च ॥ ६२। इस सूत्रके-शिष्टे: १ च २ यह दो पद हैं।। जैसे वेदत्य में कर्मके अंग स्तोत्ादिकोंका विधान है औ समुच्चय है तैसे अंगाश्रित उपा- सनाका भी विधान है औ समुच्य है॥। ६२ ॥ समाहारात ॥ ६३ ॥ इस सूत्रका-समाहारात् १ यह एकही पद है।। ऋग्वेदियोंका जो प्रणव है सोई सामवेदियोंका उद्गीथ है छान्दोग्यमें प्रणव उद्धीथकां एकही ध्यान कहा है जब उद्गाता स्वरादिउच्चारणके प्रमादसे अपने उद्गीथको सदोष देखता है तब होताके कर्मसे तिसका अनुसमाहार करता है अर्थात्ं तिसको अनुसमाहार करके निर्दोष करता है,

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(१५२) ब्ह्मसूत्राणि। [अध्याय ३ काहेतैं? उद्रीथ प्रणवका ध्यान एक है यह समाहार भी उपासनाके समुच्चयमें हेतु है ॥ ६३ ॥ गुणसाधारण्यश्ुतेश्च ॥ ६४॥ इस सूत्रके-गुणसाधारण्यश्चुतेः १च२ यह दो पद हैं।। विद्याका गुणभूत ओंकार वेदत्रयके विषै साधारण है औ ओंकार करकेही वेदत्रयका कर्म प्रवृत्त होता है औ ओंकारके आश्रित जो उपासना है तिनका समुचय है॥। ६४ ॥ न वा तत्सहभावाश्चुतेः ॥६५॥ इस सुत्रके-न १ वा २ तत्सहमावाश्रुतेः ३ यह तीन पद हैं।। सिद्धान्ती कहता है-कि अंगाश्रित उपासनाके समुच्चयका नियम नहीं है, काहेतैं? जैसे वेदत्रयविहित स्तोत्रादि अंगोंके सहभावका श्रवण है तैसे अंगाश्रित उपासनाके सहभावका श्रवण नहीं है॥।६५॥ दर्शनाच् ॥६६ ॥ इस सूत्रके-दर्शनात् १ च २ यह दो पद हैं। उपासनाके समुच्च- यका नियम नहीं, काहेतैं।श्रुति कहती है-कि यज्ञके विषै ऋग्वेदा- दिविहित अंगका लोप होवै तो व्याहतिहोम प्रायश्चित्तादि विज्ञा- नवाला ब्रह्माहै सो यज्ञ यजमान ऋत्विज इन सर्वकी रक्षा करे इति। जो उपासनाका समुच्चय होवे तो सर्वही सर्वविज्ञानवाले होवे तब ब्रह्मा किसकी रक्षा करे उपासककी इच्छासे समुच्चय वा विकल्प है एकका नियम नहीं ॥ ६६॥ इति श्रीमन्मौकिकनाथयोगिविरचितायां ब्रह्मसूत्रसारार्थप्रदीपिकायां तृतीयाध्यायस्य तृतीयः पादः ॥३ ॥

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पाद ४ ] भाषाटीकासहितानि। (१५३) तृतीयाध्याये चतुर्थःपादः। पुरुषार्थोऽतः शब्दादिति बादरायणः॥ १॥ इस सूत्रके-पुरुषार्थ: १ अतः २ शव्दात् ३ इति ४ बादरायण:५ यह पांच पद हैं। आत्मज्ञान अधिकारीद्वारा कर्मके विषे प्रवेश कर- ता है वा स्वतंत्र पुरुषार्थको सिद्ध करताहै? तहां सिद्धान्ती कहताहै- कि वेदान्तविहित स्वतंत्र आत्मज्ञानसे पुरुषार्थकी सिद्धि होती है ऐसे बादरायण आचार्य मानताहै, काहेतें?"तरति शोकमात्मवित्" इत्यादि श्रुति केवल आत्मज्ञानको पुरुषार्थका हेतु कहती है॥।१॥ शेषत्वात्पुरुषार्थवादो यथाऽन्येष्विति जैमिनिः॥२॥ इस सूत्रके-शेषत्वात १ पुरुषार्थवादः २ यथा अन्येषु ४इति ५ जैमिनि: ६ यह छह पद हैं।। आत्माको कर्त्ता होनतैं कर्मका शेष है औ तिसका ज्ञानभी ब्रीहिप्रोक्षणादिकोंकी न्याईं विषयद्वारा कर्मके साथ स म्बंधको प्राप्त होता है।औ जैसे "यस्य पर्णमयी जुहूर्भवति न स पापं श्रोकं श्रृणोति" यह अर्थवाद है तैसे पुरुषार्थवाद भी अर्थ वाद है ऐसे जैमिनि अचार्य मानता है। जिसके पर्णमयी जुहू होती है सो पापरुपी श्लोक अर्थात् अपकीर्तिको नहीं सुनता है इति श्रुत्यर्थः ॥२ ॥ आचारदर्शनात् ॥३॥ इस सूत्रका-आचारंदर्शनात्१ यह एकही समस्त पद है।जनक अश्वपति उद्दालक व्यास याज्ञवल्क्य इनको आदिलेके ब्रह्मवेत्ता गृहस्थाश्रममें रहके यंज्ञादिकर्मको करते भये इससे यही निश्चय भया कि केवल ज्ञानसे पुरुषार्थकी सिद्धि नहीं होसकती॥३॥ तच्छुतेः॥४॥ इस सूत्रका-तच्छुतेः १ यह एकही पद है। श्रुति कहती है-कि

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(१५४) ब्रह्मसूत्राणि। [अध्याय ३ विद्याकरके श्रद्धाकरके जो कर्म होता है सो वीर्यवत्तर होता है इससे यही जानागया कि केवल विद्या पुरुषार्थका हेतु नहीं किंतु विद्या कर्मका शेष है।।४।।

इस सूत्रका-समन्वारम्णात् १ यह एकही पद है।। फलके आरम्भमें विद्या कर्म इन दोनोंके सहभावका श्रवण होनेतैं विद्या स्वतंत्र नहीं है। श्रुति कहती है कि जब पुरुष परलोकको जाता है तब विद्या कर्म यह दोनों तिसके संगही जाते हैं॥ ५॥ तद्दतो विधानात्॥।६।। इस सूत्रके-तदतः १ विधानात २ यह दो पद हैं।। श्रति कहती है-कि जो आचार्यकुलमें वेदका अध्ययन करे गुरुकी शुश्रूषा करे पीिे ब्रतका विसर्जन करके दाराको ग्रहण करे कुटुंबमें स्थित रहे पवित्र देशमें वेदका अध्ययन करताहुआ वेदविहितकर्मको यथा शक्ति करे सो ब्रह्मलोकको प्राप्त होता है इससे भी यही जानागया कि सर्व वेदार्थके ज्ञानवाले पुरुषको कर्मका अधिकार है स्वतंत्र विद्याफलका हेतु नहीं है॥ ६ ॥। नियमाच्च॥७॥ इस सुत्रके-नियमात् १च २ यह दो पदहैं॥ केवलविद्याफल का हेतु नहीं है किंतु विद्या कर्मका शेष है, काहेतैं? "कुर्वन्रेवेह कर्माणि" इत्यादि श्रुति नियम करती है कि विहितकर्मको करता हुआ सौ वर्ष जीवनेकी इच्छा करे ।। ७॥ अधिकोपदेशात्तु बांदरायणस्यैवं तद्दर्शनात्॥८॥ इस सूत्रके-अधिकोपदेशात् १ तु२ बांदरायणस्य ३ एवम् ४ तदर्शनात ५ यह पांच पद हैं॥ 'तु' शब्द पूर्वपक्षकी निवृ-

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पाद ४ ] भाषाटीकासहितानि। (१५५) त्तिके अर्थ है जो यह कहा कि कर्मका शेष होनेतैं पुरुषार्थवाद अर्थवाद है सो कहना ठीक नहीं, काहेतैं ? संसारी जीवात्मासे अधिक असंसारी ईश्वरात्माका वेदान्तमें उपदेश है.औईश्वरात्माका ज्ञान कर्मका प्रवर्तक नहीं किंतु कर्मका उच्छेदक है औ "यः सर्वज्ञः सर्ववित्" इत्यादि श्रुति जीवात्मासे ईश्वरात्माको अधिक कहती है इसीसे "पुरुषाथोंडतः शब्दात" यह बादरायण आचार्यका मतही समीचीन है।। ८॥। तुल्यं तु दर्शनम्॥ ९ ॥ इस सूत्रके-तुल्यम् १ तु २ दर्शनम् ३ यह तीन पद़ हैं॥ जो यह कहा कि आचारंदर्शनसे विद्या कर्मका शेष है सो कहना समीचीन नहीं है, काहतैं ? विद्या कर्मका शेष नहीं है इस अर्थमें भी आचार- दर्शन तुल्य है.श्रुति कहती है-कि ब्राह्मण है सो पुत्रैषणा वित्तैषणा लोकैषणासे दूर होके भिक्षाटन करतेभये इति.औ याज्ञवल्क्यादिकों के संन्यासका श्रवण होनेतैं विद्या कर्मका शेष नहीं है।। ९।। असार्वत्रिकी॥ १० ॥ इस सूत्रका-असावंत्रिकी १ यह एकही पद है।। जोश्रुति विद्या करके करे कर्मकों वीर्यवत्तर कहती है तिस श्रुतिका सर्व विद्याके साथ सम्बन्ध नहीं है किंतु प्रकृत उद्धीथविद्याके साथ ही तिसका सम्बन्ध है॥ १० ॥ विभाग: शतवत्॥११ ॥ इस सूत्रके-विभाग: १ शतवत् २ यह दो पद हैं। जो यह कहा कि जब पुरुष परलोकको जाता है तब विद्या कर्म यह दोनों तिसके संगही जाते हैं सो कहना ठीक नहीं, काहेतैं ? इहाँ विभाग जानना चाहिये जैसे किसीने कहा कि इन दो पुरुषोंको सौ

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(१५६) ब्रह्मसूत्राणि। [अध्याय ३ रुपैये देओ तब पचास एकको औ पचास दूसरेको देतेहैं तैसे इहाँ भी इच्छावाले संसारीपुरुषके संग कर्म जाता है औ इच्छारहित सुसुक्षुपुरुषके संग विद्या जाती है ऐसे जानना चाहिये।। ११ ॥ अध्ययनमात्रवतंः।।१२।। इस सूत्रका-अध्ययनमात्रवतः १ यह एकही पद है।। जो यह कहा कि आचार्यकुलमें वेदका अध्ययन करके पीछे गृहस्थाश्रममें रहके कर्मको करे सो कहना अध्ययनमात्रवाले पुरुषके प्रति है औ जिस पुरुषको वेदके अर्थका ज्ञान है तिसके प्रति नहीं है। १२॥ नाविशेषात्॥ १३ ॥ इस सूत्रके-न9अविशेषात् २ यह दो पद हैं। "कुर्वन्नेवेह कर्मा- णि" इत्यादिनियम श्रवणके विषै विशेष करके विद्वान्को कर्म करने का नियम नहीं किंतु अविशेष करके नियमका विधान है॥ १३॥

इस सूत्रके-स्तुतये १ अनुमतिः२ वाश्यह तीन पद हैं। "कुर्व- न्नेवेह कर्माणि" इहां और भी विशेष कहते हैं-यद्यपि प्रकरणके सामर्थ्यसे विद्वान्का कर्मके साथ सम्बन्ध है तथापि यह विद्याकी स्तुतिके वास्ते कर्मका अनुज्ञान कहा है॥ १४॥ कामकारेण चैके॥१५॥ इस सूत्रके-कामकारेण १ च २ एके ३ यह तीन पद हैं।। प्रत्यक्ष है विद्याका फल जिनके ऐसे कोई विद्वान् फलान्तरके साधन प्रजा- दिकोंके विषै प्रयोजनका अभाव कहते हैं औ कहते हैं कि अपनी इच्छासे कर्म प्रजादिकोंका त्याग करना चाहिये॥ १५ ॥

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पाद ४ ] भाषाटीका सहितानि। (१५७ )

उपमईश्च ॥१६ ॥ इस सूत्रके-उपमईम्१च२ यह दो पद हैं। कर्माधिकारका हेतु औ क्रियाकारकका फलरूप औ अविद्याका कार्य जो सर्वप्रपंच तिसके स्वरूपका उपमई विद्याके सामथ्यसे होता है ऐसे श्रुति कहती है इससे यही निश्चय भया कि विद्या स्वतंत्र है कर्मका शेष नहीं ॥ १६॥ ऊर्ध्वरेतःसु च शब्दे हि॥ १७॥ इस सूत्रके-ऊर्ध्वरेतःसु १ च २ शब्दे ३ हि ४ यह चार पद हैं।। ऊर्ध्वरेत आश्रममें विद्याका ग्रहण है परंतु तहां विद्याकर्मका अंग नहीं, काहेतैं? ऊर्द्धरेता अग्निहोत्रादि वैदिक कर्मको नहीं करते हैं। शंका-ऊर्द्धरेताके आश्रमका वेदमें श्रवण नहीं है ? समाधान- वैदिकशब्दोंमें उर्द्धरताके आश्रमका श्रवण है कि अरण्यमें श्रद्धा तपका सेवना औ इस आत्मलोककी इच्छा करके संन्यास धारना औब्रह्मचर्यसे ही संन्यास धारना यह तीन धर्मके स्कन्ध हैं इति १७ परामर्श जैमिनिरचोदना चापवदति हि॥ १८॥ इस सूत्रके-परामर्शम् १ जैमिनि: २ अचोदना ३ चश्अपवद- ति ५हि ६ यह छह पद हैं॥। "त्रयो धर्मस्कन्धाः" इत्यादि शब्दोंसें उर्द्धरेताके आश्रमकी सिद्धि नहीं होसकती, काहेतैं! इन शब्दोंके विष पूर्व सिद्ध आश्रमोंका परामर्श है विधि नहीं ऐसे जौमनि आचार्य मानता है. इहां सिद्धवस्तुके कथनका नाम परामर्श है औ इहां कोई चोदनावाचक शब्द भी नहीं है औ आश्रमान्तरका निषेध भी श्रुति कहती है॥ १८ ॥ अनुष्ठेयं बादरायण: साम्यश्रुतेः ॥१९॥

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(१५८) ब्रह्मसूत्राणि। [अध्याय ३ आश्रमान्तरका अनुष्ठान करना ऐसे बादरायण आचार्य मानताहै, काहेतैं। गाईस्थ्यके परामर्शकी श्रुतिके समानहीं आश्रमान्तरके परा- मर्शकी "त्रयो धर्मस्कन्धाः"इत्यादि श्रुति है. जैसे इहां अन्यश्रुति- विहित गार्ईस्थ्यका परामर्श करते हो तैसेही अन्य श्चतिविहित आश्रमान्तरका "त्रयो धर्मस्कन्धाः"इहां परामर्श करना चाहिये १९ विधिर्वा धारणवत् ॥२०॥ इस सूत्रके-विधि: १ वा २ धारणवत् ३ यह तीन पद हैं।। जैसे महापितृयज्ञके विषै"अधस्तात् समिधं धारयन्" इत्यादि वाक्यक रके हविषके नीचे समिघका धारण करनसेही अधस्तात' इत्यादि वाक्योंके एकवाक्यताकी प्रतीति होती है परंतु अपूर्व होनेतैं ऊपर भी समिघधारणका विधान है तैसे इहां भी परामर्शमात्र नहीं है किंतु आश्रमान्तरकी विधि है इसीसे विद्या स्वतंत्र है कर्मका शेष नहीं ॥ २० ।। स्तुतिमात्रमुपादानादिति चेन्नापूर्वत्वात्॥२१। इस सूत्रके-स्तुतिमात्रिम् १ उपादानात् २ इति ३ चेत् ४ न ५ अपूर्वत्वात ६ यह छह पद हैं।। पृथिवी जल औषधि पुरुष वाक ऋकू साम इन सर्वसे ओंकाररूप उद्रीथ श्रेष्ट है औ परत्रह्मकी प्र- तीक होनेतैं उपासनाके योग्य है ऐसे श्रुति कहती है. तहां संशय है कि यह क्ति उद्गीथादिकों की स्तुतिके अर्थ है वा उपासनाविधिके अर्थ है? तहां पूर्वपक्षी कहता है कि कर्मके अंग उद्धीथादिकोंको लेके श्रवण होनेतैं स्तुतिके अर्थ है सो कहना ठीक नहीं, काहेतैं? इन श्रुतियों का स्वुतिमात्र प्रयोजन नहीं है किंतु अपूर्व प्रयोजन है सो अपूर्व उपासना विधिके अर्थ होनेतैंही सिद्ध होता है ॥२१॥। भावशब्दाच ॥ २२॥ इस सुत्रके-भावशब्दात् १ च २ यह दो पद हैं। "उद्रीथमुपा-

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पाद ४ ] भाषाटीकासहितानि। (१५९) सीत" इत्यादि विधिशब्दोंका स्पष्ट श्रवण होनेतैं उद्गीथादि श्रति उपासना विधिके अर्थ हैं स्तुतिमात्रके अर्थ नहीं हैं॥। २२ ।। पारिष्ठवार्था इति चेन्न विशेषितत्वात्॥२३।। इस सूत्रके-पारिषुवार्थाः १ इति २ चेत् ३ न ४ विशेषितत्वाव्५ यह पांच पद हैं।। वेदान्तके विषे आख्यानश्रुति कहती है कि याज्ञ वल्क्यके मैत्रेयी कात्यायनी यह दो भार्या होती भई दिवोदासका पुत्र प्रतर्दन इंद्रके प्रियधाम स्वर्गको जाताभया जानश्चति राजा बहुदायी होता भया इति। तहां संशय है कि यह श्रुति। परिष्ठव प्रयोगके अर्थ है वा सन्निहित विद्याकी प्राप्तिके अर्थ है इति। अश्वमेधयज्ञमें पुत्र अमात्यादिसहित राजाके अर्थ नाना विद्याके आख्यानका कथन करनेका नाम पारिपुवप्रयोग है तहां पूर्वपक्षी कहताहै कि आख्यान का कथन होनेतैं यह श्रुति पारिपुव प्रयोगके अर्थ हैं सो कहना ठीक नहीं, काहेतैं ? जो श्रुति पारिपुवप्रयोगके अर्थ है तिनके विषै "मनुर्वैवस्वतो राजा यमो वैवस्वतःवरुण आदित्यः"इत्यादि विशे- षणोंका श्रवण है औ इहाँ इन विशेषणोंका श्रवण है नहीं इसीसे सन्निहित विद्याकी प्राप्तिके अर्थ हैं ॥ २३ ।। तथा चकवाक्यतोपवन्धात्॥२४॥ इस सूत्रके-तथा १ च २ एकवाक्यतोपबन्धात् ३ यह तीन पद है।। सन्निहितविद्याके साथ एकवाक्यताका सम्बन्ध होनेंतैं आख्या- नसन्निहितविद्याके प्रतिपादक हैं मैत्रेयी ब्राह्मणके विषै "आत्मा वाअरे द्रष्टव्यः" इस विद्याके साथ आख्यानकी एकवाक्यता है औ प्रतर्दनके आख्यानकी "प्राणोस्मि प्रज्ञात्मा" इस विद्याके साथ एकवाक्यता है ऐसे और भी जानलेना ॥ २४ ॥। अत एव चागीन्धनाद्यनपेक्षा ॥२५॥ इस सूत्रके-अतः १ एव २ च ३ अग्नीन्धनाद्यनपेक्षा ४ यह

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(१६० ) ब्रह्मसूत्राणि। [अध्याय ३ चार पद हैं।। विद्याको पुरुषार्थका हेतु होनेतैं अपनेफलकी सिद्धिकें वास्ते आश्रमके कर्म अग्नि इन्धनादिकोंकी अपेक्षा नहीं करते२६ सर्वापेक्षा च यज्ञादिश्वतेर्श्ववत् ॥ २६॥ इस सूत्रके-सर्वापेक्षा १ च २ यज्ञादिश्रुतेः ३ अश्ववत् ४ यह चार पद हैं।। विद्याको आश्रम कर्मकी सर्वथा अपेक्षा नहीं है वा कोई अपेक्षा है तहां कहते हैं कि जैसे अश्वको हलके जुतनेकी योग्यता नहीं है औ रथके जुतनेकी योग्यता है तैसे विद्याको अपने फलकी सिद्धिके वास्ते कोई कर्मकी अपेक्षा नहीं है औ अपनी सिद्धिके वास्ते सर्वकर्मकी अपेक्षा है, काहेतैं! यज्ञादि श्रति कहती है कि ब्राह्मण हैं सो वेदानुवचन करके यज्ञ करके दानकरके तप करके तिस ब्रह्मको जानते हैं॥ २६॥ शंमदमांछुपेतः स्यात्तथापि तु तद्विधेस्तद- ङतया तेषामवशयातुष्ठेयत्वात्। २७॥ इस सूत्रके-शमदमाद्युपेतः १ स्यात् २ तथा ३ अपि ४ तु ५ तद्विधे:६ तदङतया ७ तेषाम् ८ अवश्यानुष्टेयत्वात् ९ यह नौ पद हैं।। विधिका अभाव होनेतैं विद्याके साधन यज्ञादिक नहीं हैं औ "यज्ञेन विविदिषन्ति" यह श्चति विद्याकी स्तुति करती हैं ऐसे कोई कहे तो विद्याकी इच्छावाला शम दमादिकोंका ग्रहण करे, काहेतैं? शमदमादिक विद्याके साधन कहे हैं तिनका अनुष्ठान अवश्य करना चाहिये औ गीतास्मृतिमें यज्ञादिक विद्याके साधन कहे हैं तिनका अनुष्टान भी करना चाहिये यज्ञादिक बहिरंग साधन हैं और शमादिक अन्तरंग साधन हैं॥२७॥ सर्वान्नानुमतिश्च प्राणात्यये तद्दर्शनात॥ २८॥ इस सूत्रके-सर्वान्नानुमति: १ च २ प्राणात्यये ३ तददर्शनाव्४, यह चार पद हैं। छान्दोग्यमें औ वाजसनेयीशाखामें प्राणसंवादके

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पाद ४ ] भाषाटी कासहितानि। (१६१) विषै श्रवण होताहै ककि जो प्राणको जानता है तिसके सर्व अन्य भक्ष्य हैं तहां संशय है कि यह सर्व अन्नका अनुज्ञान है सो शमादि- कोंकी न्याईं विद्याका अंग है वा विद्याकी स्तुतिके अर्थ है ? तहां कहते हैं कि विद्याकी स्तातके अर्थ है, काहेतें ? प्राणनाशक आप- त्कालके विना अभक्ष्य भक्षण करना योग्य नहीं औ इस अर्थके विषै चाकायण ऋषिकी आख्यायिकाहै सो ऐसेहै कि एकसमें कुरुक्षेत्रके विष दुर्भिक्ष होताभया तब चाक्रायण ऋषि अपनी भार्या करके स हित देशांतरमें भ्रमता हुआ इम्य ग्राममें वसताभया तहां हस्तीकें ऊपर चढनेवाले महावतके उच्छिष्ट माष खाताभया जब महावत जलपान देने लगा तब ऋषि बोला कि तेरा उच्छिष्ट जल मेरे पीने- योग्य नहीं जंब महावत बोला कि यह माष क्या उच्छिष्ट नहीं थे तब ऋषि बोला कि हां उच्छिष्ट थे परंतु यह मैं नहीं खाता तो मेरे प्राण नहीं रहते औ जल तडागादिकोंके विषै बहुत है तहां जलपान करूंगा इति। इस आख्यायिकासे भी यही निश्चय भया कि आपत्- कालके विना अभक्ष्यका भक्षण नहीं करना ॥ २८ । अबाधाच् ॥२९ ॥ •इस सूत्रके-अबाधात् १ च २ यह दो पद हैं। जो अभक्ष्यभक्षण न करे तो "आहारशुद्धौ सत्त्वशुद्धिः" आहारकी शुद्धि होनेतैं अन्त करणकी शुद्धि होती है इत्यादि भक्ष्य अभक्ष्यके विभागको कहने वाले शास्त्रका भी बाध न होवे।। २९॥ अपि च स्मर्यंते॥ ३० ॥ इस सुत्रके-अपि १ च २ स्मर्यंते ३ यह तीन पद हैं।। स्मृति कहती है-कि आपत्कालके विषै विद्वान् वा अविद्वान् जहां तहां सर्व अन्न. भक्षण करे तो भी जैसे कमलका पत्र जलसे लिंपायमान नहीं होता ११

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(१६२) ब्रह्मसूत्राणि। [ अध्याय ३ है तैसे पापसे लिंपायमान नहीं होता है परंतु ब्राह्मण कोई भी काल- के विषै सुरापान न करे ॥ ३० ॥ शब्दश्रातोऽकामकारे ॥ ३१॥ इस सूत्रके-शब्द: १ च२ अतः ३ अकामकारे ४ यह चार पद हैं।। ब्राह्मण अपनी इच्छासे सुरापान न करे ऐसा शब्द भी कठसं- हिताके विषै है औ जो ब्राह्मण सुरापान करे तो मरणांतप्रायश्चित्तके विना शुद्ध नहीं होवे॥ ३१॥

इस सूत्रके-विहितत्वात् १ च २आश्रमकर्म३ अपि ४ यह चार पद हैं।। पूर्व यह कहा कि आश्रमके कर्म विद्याके साधन हैं, तहां संशय है कि जो पुरुष सुसुक्षु नहीं है औ आश्रममें निष्ट है तिसकरके यहकर्म अनुष्ठेय है वा नहीं? तहां कहतेहैं कि अनुष्ठेय है, काहेतैं?जितने जीवे उतने अग्निहोत्र करे,ऐसे श्रति नित्यकर्मका विधान करती है ३२ सहकारित्वेन च ॥ ३३ ॥ इस सूत्रके-सहकारित्वेन १ च २ यह दो पद हैं। जो ऐसे कहे कि अमुसुक्षु पुरुष आश्रमके कर्मका अनुष्ठान करेगा तो यह कर्म विद्याके साधन न रहेंगे सो कहना ठीक नहीं, काहेतैं ? श्रुति करके विहित होनेतैं आश्रमके कर्म विद्याके सहकारी हैं॥ ३३॥ सर्वथापि त एवोभयलिङ्गात॥ ३४॥ इस सूत्रके-सर्वथा १ अपि २ ते ३ एव ४ उभयलिद्वात् ५ यह पांच पद हैं।। सर्वप्रकार करके आश्रमधर्मपक्षमें औं विद्या सहकारी पक्षमें तिन अग्निहोत्रादिधमोंका अनुष्ठानकरना, काहेतैं ? इन दोनोंको विधान करनेवाले श्रुति स्मृतिरूप हेतु हैं॥ ३४ ॥

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पाद ४ ] भाषाटीकासहितानि। (१६३) अनभिभवं चदर्शयति॥३५॥ इस सूत्रके-अनभिवभवम् १ च २ दर्शयति ३् यह तीन पद हैं। जो पुरुष ब्रह्माचर्यादि साधन करके संपन्न है तिसका रागद्वेषादि केश करके तिरस्कार नहीं होता ऐंसे श्रुति कहती है इससे यही सिद्ध भया कि आश्रमके कर्म विद्याके सहकारी हैं॥ ३५॥ अन्तरा चापि तु तहृष्टेः॥ ३६॥ इस सूत्रके-अन्तरा १ च २ अपि ३तु ४ तदृष्टेः ५ यह पांच पद हैं। जो द्रव्यादिसंपत करके हीन हैं औ आश्रम करके हीन हैं ऐसे मध्यवर्ती पुरुषोंको विद्याका अधिकार है वा नहीं? तहां कहते हैं कि विद्याका अधिकार है, काहेतैं? आश्रमहीन रैक् गार्गोको आदि लेके ब्रह्मवेत्ता भये हैं, ऐसे श्वति कहती है॥ ३६ ॥ अपि च स्मर्यते॥३७॥ इस सूत्रके-अपि १ च २ स्मर्यते ३ यह तीन पद हैं॥ संवर्त्ता- दिक नग्रचर्याको धारण करतेभये औ किसी भी आश्रमका कर्म नहीं करते भये परंतु तिनको इतिहास स्मृतिमें महायोगी कहे हैं३७॥ विशेषानुग्रहुश्च॥३८॥ इस सूत्रके-विशेषानुग्रहः १ च २ यह दो पद हैं। यद्यपि रैक् गार्गो संवर्त्तादिक किसी आश्रमके कर्मको नहीं करतेथे तथापि पुरुषमात्रके संबंधि जप उपवास देवताSडराधनादिधर्मविशेष करके तिनके ऊंपर विद्याका अनुग्रह होताभया॥ ३८ ॥ अतस्त्वितरज्ज्यायो लिझञ्च॥ ३९॥ इस सूत्रके-अतः १ तु २ इतरत् ३ ज्यायः ४ लिद्गात् ५ च ६ यह छह पद हैं।। इस मध्यवत्तीसे आश्रमवर्त्ती श्रेष्ट है, काहेतैं? श्रुति कहती है कि अपने आश्रम विहित कर्मको करनेवाला ज्ञानमार्ग

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(१६४) ब्रह्ममूत्राणि। [अध्याय ३ करके ब्रह्मको प्राप्त होताहै औ स्मृति भी कहती है कि द्विज एक दिन भी अनाश्रमी न रहे औ जो संवत्सरपर्यत अनाश्रमी रहे तो एक कृच्छ्रचान्द्रायणव्रत करनेसे शुद्ध होवे॥ ३९॥ तद्ूतस्य नातद्भावो जैमिनेरपि नियमा-

इस सूत्रके-तद्धूतस्य १ न २ अतद्भावः ३ जैमिने:४ अपि ५ नियमाव ६ तद्रूपाभावेभ्यः ७ यह सात पद हैं। जो पूर्व यह कहा कि अर्द्धरेताके आश्रम हैं, तहां संशय है कि जो जिस आश्रमको प्राप्त होता है तिसका तिस आश्रमसे पतन होता है वा नहीं ! तहां कहते हैं कि जो उर्द्धरेतोभावको प्राप्त भया है तिसका पतन नहीं होता, काहेतैं! आचार्यकी आज्ञासे चारों आश्रमोंमेंसे कोईसे एक आश्रममें शरीरपातपर्यंत यथाविधि रहे यह नियम पतनके अभा- वको कहता है औ ब्रह्मचर्यके अनंतर गृही होवे वा संन्यासी होवै इत्यादि वचन पतनके अभावको कहते हैं यह जैमिनि औ बादरा- यणका एकही प्रामाणिक मत है॥ ४० ॥ न चाधिकारिकमपि पतनानुमानात्तदयोगात्॥४१।। इस सूत्रके-न१च२ अधिकारिकम्अपि४ पतनानुमानात्५ तद्योगात्६यह छह पद हैं।। जो नैष्ठिक ब्रह्मचारी प्रमादसे योनिके विषै वीर्यका सेचन करे तो तिसका प्रायश्वित्त है वा नहीं है? तहां पूर्वपक्षी कहता है-कि नहीं है, काहेतैं? शास्त्र कहता है कि जो नैष्ठिक धर्मको प्राप्त होके पतित होवे तो तिस आत्महा पुरुषकी शुद्धिके वास्ते कोई प्रायश्चित्त नहीं है इति॥४१ ॥ उपपूर्वमपि त्वेके भावमशनवत्तदुक्तम् ।।४२।। इस सूत्रके-उपपूर्वम् १ अपिर तु३ एके४ भावम्५ अशनवत्६ तत् ७ उक्तमू८ यहआठ पद हैं।। सिद्धान्ती कहता है-कि गुरुदारादि-

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पांद ४ ] भापाटीकासहितानि। (१६५) कोंके विना अन्ययोनिके विषै जो ब्रह्मचारी के वीर्यका त्याग है सो महापातक नहीं किंतु उपपातक है ऐसे कोई आचार्य मानते हैं औ तिसका प्रायश्वित्त भी मानते हैं जैसे मांसभक्षण करनेसे ब्रह्मचारीके ब्रतका लोप होता है औ पीछे संस्कार करनेसे तिसकी शुद्धि होती है तैसे इहां भी जानलेना ॥ ४२ ॥ बहिस्तूभयथापि स्मृतेराचांराच्च॥४३॥ इस सुत्रके-बहिः १ तु २ उभयथा ३ अपि ४ स्मृतेः ५ आचा- रात् ६ चश्यह सात पद्हैं।। जो ऊर्द्धरताका अपने आश्रमसे पतन है सो महापातक है वा उपपातक है दोनों ही प्रकारसे शिष्टलोग तिनको पक्तिके बाहिर करें ऐसे स्मृति कहती है। औयज्ञ अध्ययन विवाहादि कार्य तिनके साथ न करें यह शिष्टोंका आचार है॥४३।। स्वामिन: फलश्रुतेरित्यात्रेयः॥४४ ।। इस सूत्रके-स्वामिन: 9फलश्चुतेः २ इति ३ आत्रेयः४ यह चार पद हैं।। यज्ञादि कर्मके अंगोंकी उपासनाके विषै संशय है कि यह उपासना यजमानका कर्म है वा ऋत्विकूका कर्म है ? तहां पूर्वपक्षी कहता है-कि यंजमानका कर्म है, काहेतैं ? उपासनाके फलका श्रवण कर्ताके विषै होता है ऐसे आत्रेय आचार्य मानता है॥ ४॥॥ आर्त्विज्यंमित्यौडुलोमिस्तस्मै हि प- रिक्रीयते ॥४५॥ इस सुत्रके-आर्त्विज्यम् १ इति २ औडुलोमि:३ तस्मै४ हि५ परिक्रीयते ६ यह छह पद हैं।। सिद्धान्ती कहता है-कि यज्ञादिक- मंके अंगोंकी उपासना यजमानका कर्म नहीं है किन्तु ऋत्विकका कर्म है ऐसे औडुलोमि आचार्य मानता है, काहेतैं ! अंगसहित कर्मके वास्तेही यजमान ऋत्विकूका ग्रहण करता है।।॥ ॥

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(१६६ ) ब्रह्मसूत्राणि। [अध्याय ३ श्रुतेश्च ॥ ४६ ।। इस सूत्रके-भुतेः १च २ यह दो पद हैं। श्षति कहती हैं-कि यज्ञके विषै जो कोई आशीर्वाद ऋत्विकू कहता है सो यजमानके वास्ते कहता है इति। इससे यही निश्चय भया कि उपासना ऋत्वि- कूका कर्म है औ जिसका फल यजमानकों होता है॥ ४६॥ सहकार्यन्तरविधि: प्रक्षेण तृतीयं तद्रतो विध्यादिवत्॥।४७॥! इस सुत्रके-सहकार्यन्तरविधि: १ पक्षेण २ तृतीयम् ३ तद्तः४ विध्यादिवत् ५ यह पांच पद हैं।। बृद्धदारण्यमें श्रवण होता है कि, जो ब्राह्मण पाण्डित्यको प्राप्त होके बाल्यको प्राप्त होता है औ बाल्य को प्राप्त होके मौनको प्राप्त होता है सो ब्रह्मको प्राप्त होता है इति। इहां पाण्डित्य बाल्य मौन यह क्रमसे श्रवण मनन निदिध्यासनका नाम जानना तहां संशय है कि मौनकी विधि है वा नहीं ! तहां कहते हैं कि मौनको विद्याका सहकारी होनेतैं विद्यावाले संन्यासीको पाण्डित्य बाल्यकी अपेक्षासे इस तृतीय सौनका विधान है। प्रश्न- मौनविधिका क्या प्रयोजन है? उत्तर-जैसे दर्शपूर्णमास वििके विषै सहकारी होनें तैं अग्न्याघानादि अद्गका विधान है तैसे जिस पक्षमें भेद दर्शनकी प्रबलतासे ब्रह्मकी प्राप्ति न होवै तिस पक्षमें मौनका विधान है।।४७ ।। जो बाल्यादिविशिष्टसन्न्यासही अनुष्ठेय है तो छान्दोग्यमें गृहीका उपसंहार क्यों किया है इस शंकाका समाधान कहते हैं।। कृत्स्नभावातु गृहिणोपसंहारः।।४८ ।। इस सूत्रके-कृत्स्नभावान् १ तु २ गृहिणा ३ उपसंहार: ४ यह. चार पद हैं।। कृत्स्नभाव गृहीके प्रति विशेष है अर्थांत् बहुत परिश्रम

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पाद ४ ] भाषाटीकासहितानि। (१६७ ) करके सिद्ध होनेवाले यज्ञादिकर्मका उपदेश गृहीके प्रति होनेतैं गृहीके उपसंहार किया है औ अन्य आश्रममें अहिंसा इन्द्रियसं- यमादि धर्म कहे हैं ॥। ४८ ।। मौनवदितरेषामप्युपदेशात् ॥४९॥ इस सूत्रके-मौनवत् १ इतरेषाम २ अपि ३ उपदेशात् ४ यह चार पद हैं।। जैसे मौन संन्यास औ गार्हस्थ्य यह दो आश्रम श्रुति करके विहित हैं तैसे वानप्रस्थ औ गुरुकुलमें वास यह दो आश्रम भी श्रुति करके विहित हैं॥। ४९।। अनाविष्कुवन्नन्वयात्॥५०॥ इस सूत्रके-अनाविष्कुर्वन् १ अन्वयाद २ यह दो पद हैं। पूर्व यह कहा कि ब्राह्मण पाण्डित्यको प्राप्त होके बाल्यको प्राप्त होवै तहां संशय है कि पुरुषकी प्रथम अवस्थाका नाम भी बाल्य है जैसे बालक जहां तहां मूत्रपुरीष करता है औ भक्ष्याभक्ष्य करता है ऐसा बाल्य लेना चाहिये वा दंभ दर्प प्ररूढ इन्द्रियादिकों से रहित होना ऐसा बाल्य लेना चाहिये? तहाँ कहते हैं कि ज्ञान अध्ययन धार्मिकत्वादिकोंसे अपने आत्माको प्रगट न करै औ दंभ दर्प प्ररूढइन्द्रियत्वादिकोंसे रहित रहे ऐसा बाल्य विवक्षित है॥५॥ ऐहिकमप्यप्रस्तुतप्रतिबन्धे तद्र्शनात ॥५१॥ इस सूत्रके-ऐहिकम् १ अपि २ अप्रस्तुतप्रतिबन्धे ३ तद्दर्शनांत ४ यह चार पद हैं।। "सर्वापेक्षा च यज्ञादिश्रुतेः" इस सूत्रको आदि लेके विद्याके साधन कहे तहां संशय है कि इन साधनोंसे इसी जन्ममें विद्याकी उत्पत्ति होती है वा जन्मान्तरमें होती है? तहां कहते हैं कि जो इस जन्ममें कोई प्रतिबन्धक न होवे तो इसी जन्ममें विद्याकी उत्पत्ति होवे औ जो प्रतिबन्धक होवै तो जन्मा- न्तरमें होवै ऐसे श्रति स्मृति कहती हैं ॥५१॥

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(१६८) ब्रह्मसूत्राणि। [अध्याय ४ एवं मुक्तिफलानियमस्तदवस्थावधृते- स्तदवस्थावधृतेः ॥५२॥ इस सूत्रके-एवम् १ सुक्तिफलानियम: २ तदवस्थावधृतेः ३ तदवस्थावधृतेः ४ यह चार पद हैं। मुक्तिफलके विषै कोई विशेष नियम नहीं है, काहेतैं ? सर्व वेदान्तके विषै एक ब्रह्मस्वरूप मुक्ति- रूप अवस्थाका अवधारण है औ इस सूत्रमें "तदवस्थावधृतेः" इस,पदका दो बेर अभ्यास है सो इस साधनाध्यायकी समाप्तिको द्योतन करता है॥ ५२॥

तायां ब्रह्म सूत्रसारार्थंप्रदीपिकायांतृतीयाध्यायस्य चतुर्थः पादः॥४॥ इति नतायोऽध्यायः समापः ॥३॥

चतुर्थोडध्याय: ४. प्रथम: पाद:। आवृत्तिरसकृदुपदेशात् ॥१॥ इस सूत्रके-आवृत्ति: १ असकृद २ उपदेशात ३ यह तीन पद हैं।। तृतीय अध्यायके विषै साधनका विचार किया अब चतुर्थ अध्यायके विषै प्रथम साधनविशेषका विचार करके फलका विचार करते हैं "आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मंतव्यो निदिध्यासि- तव्यः"अस्या अर्थः-याजवल्क्य कहताभया कि अरे मैत्रेयि आत्मा श्रवण करने योग्य है, मनन करने योग्य है,निदिध्यासन करने यो ग्यहै जानने योग्यहै इति। तहां संशय है कि श्रवणमननादिकोंका एक बर अनुष्ठान करना वा वारंवार करना ? तहां कहते हैं कि वारंवार करना काहेतै? "श्रोतव्यो मंतव्यः"इत्यादि वारंवार उपदेश है॥१॥

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पाद १ ] भाषाटीकासाहितानि। (१६९ )

लिङ्गाच्न ॥२ ॥ इस सूत्रके-लिङ्गात-१ च २ यह दो पद हैं।। उद्गीथादिलिद्गसे भी श्रवणादिकोंकी आवृत्ति जाननी जैसे उद्धीथकी ध्यानकी आवृत्ति कहीहै तैसे श्रवण मनन निदिध्यासनकी भी आवृति कही है॥२॥ आत्मेति तूपगच्छन्ति ग्राहयन्ति च॥ ३॥ इस सूत्रके-आत्मा १ इति २ तु ३ उपगच्छन्ति ४ ग्राहयन्ति च ६ यह छह पद हैं।। ध्यान कालके विषै 'अहं ब्रह्म' ऐसा ध्यान करना वा मेरेसे अन्य मेरा स्वामी ईश्वर है ऐसा ध्यान करना! तहां कहतेहैं कि 'अहं ब्रह्म' ऐसा ध्यान करना, काहेतैं? परमेश्वर प्रक्रि- याके विषै जाबाल आत्मरूप करकेही ईश्वरका अंगीकार करतेहैं औ "तत्त्वमसि अहं ब्रह्मास्मि" इत्यादि महावाक्यभी जीवात्मा यरमात्माकी एकताको ग्रहण करातेहैं ॥ ॥ ३ ॥ न प्रतीकेन हि सः । ४ ॥ इस सूत्रके-न १ प्रतीकेनरहि ३ सः४ यह चार पद हैं। जैसे अहंग्रह उपासनाके विषै आत्मवुद्धि करते हैं तैसे "मनो व्रह्लेत्युपासीत आकाशो ब्रह्म" इत्यादि प्रतीक उपासनाके विषै आत्मवुद्धि करनी वा नहीं करनी? तहां कह ते हैं कि नहीं करनी, काहेतैं? यह मन आकांशा दिक ब्रह्म के विकार हैं तिनकी आत्माके साथ एकता बनें नहीं॥8।। ब्रह्मदृष्टिरुत्कर्षांत् ॥५॥ इस सूत्रके-ब्रह्मदृष्टि:१उत्कर्षातरयह दो पदहैं।। तिन उदाहरणों: के विष औरभी संशयहै कि मन आकाश आदित्य इत्यादिकोंकी दृष्टि ब्रहम के विषै करनी वा ब्रह्म की दृष्टि इनके विषै करनी? तहां कहते हैं कि त्रह्मकी दृष्टि इनके विषै करनी, काहेतैं! उत्कृष्टकी दृष्टि निकृष्टके विषै होती है जैसे लोकमें कदाचित् राजाकी दृष्टि दासमें करतेहैं परंतु दा- सकी दृष्टि राजाके विषै नहीं करते तैसे इहांभी जानना चाहिये॥५॥

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(१७०) ब्रह्मसूत्राणि। [ अध्याय ४: आदित्यादिमतयश्चाङ्ग उपपत्तेः॥६॥ इस सुत्रके-आदित्यादिमृतयः १ च २ अङ्गे ३ उपपत्तेः ४ यह चार पह हैं।। "य एवासौ तपति तथुद्रीथमुपासीत" जो यह आदि- त्य तपता है तिसकी उद्गीथरूप करके उपासना करनी इत्यादि कर्म के अंगकी उपासना है तहां संशयहै कि आदित्यादिकोंके विषै उ- द्ीथादिकोंकी सति करनी वा उद्धीथादिकोंके विषै आदित्यादिकोंकी मति करनी!तहाँ कहते हैं कि उद्ीथादिकोंके विषै आदित्यादिकोंकी मति करनी! काहेतैं? जब आदित्यादिमति करके उद्रीथादिक संस्क्रिंयमाण होते हैं तब कर्मकी समृद्धि होती है॥ ६॥ आसीन: सम्भवात् ॥७॥ इस सूत्रके-आसीनः १ सम्भवात् २ यह दो पद हैं।। कर्मका अनुष्ठान बैठके करतेहैं औ उठके भी करते हैं इसीसे कर्म औ. कर्मके अंगकी उपासनाम बैठनेका नियम नहीं परंतु और उपास- नामें बैठनेका नियम है वा नहीं? तहां कहते हैं कि बैठनेका नियम है, काहेतैं ? समानप्रत्ययके प्रवाहका नाम उपासना है सो बैठनेसेही ठीक होता है उठनेमें चलनेमें सोनेमें चित्तविक्षेप निद्धा- दिकं होजाते हैं॥ ७ ।। ध्यानाच् ॥८। इस सूत्रके-ध्यानात् १ च २ यह दो पद हैं।। जो यह समान प्रत्ययका प्रवाह करणरूप उपासना है सो ध्यायति धातुका अर्थ है जैसे लोकमें, 'बको ध्यायति' यह प्रयोग होता है तैसे स्थितदृष्टि- पूर्वक एक विषयमें जो चित्तको लगाता है तिसके विषै ध्यायति ऐसा प्रयोग होता है।। ८ ॥ अचलत्वं चापेक्ष्य ।।९।। इस सूत्रके-अचलत्वम्१च२अपेक्ष्य श्यह तीन पदहैं।।घ्यायतीव

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पाद १ ] भाषाटीकासहितानि। (१७१) पृथिवी इहां पृथिवीके विषै अचलताकी अपेक्षासे ध्यायति प्रयोग होता है।। ९ ॥ स्मरन्ति च ॥१०॥ इस सुत्रके-स्मरन्ति १ च २ यह दो पद हैं।। "शुचौ देशे प्रतिष्ठा- प्य स्थिरमासनमात्मनः" इत्यादि वाक्यों करके शिष्ट पुरुष स्मरण करते हैं कि आसन उपासनाका अंग है इसीसे योगशास्त्रके विषै पद्मादिक आसन कहे हैं॥ ॥ १०॥ यत्रैकाग्रता तत्राविशेषात्॥११ ॥ इस सूत्रके-यत्र १ एकाग्रता २ तत्र ३ अविशेषात् ४ यह चार पद हैं।। उपासनाके विषै दिशा देश कालका नियम है वा नहीं ? तहां कहते हैं कि मनकी एकग्रता नियम है और कोई विशेष नियम नहीं जिस दिशा देश कालमें मनकी एकाग्रता सुखपूर्वक होवै तिस दिशा देश कालके विषे उपासना करनी।११॥ आप्रयाणात्तत्रापि हि दृष्टमू ॥१२॥ इस सूत्रके-आप्रयाणात् १तत्रर अपि ३ हि ४ दृष्टम् ५ यह पांच पद हैं।। पूर्व यह कहा कि सर्व उपासनाके विषै आवृत्ति करनी, तहां संशय है कि अहंग्रह उपासनाके विषै किंित्काल आवृत्ति करनी वा मरणपर्यंत करनी तहां कहते हैं कि मरणपर्यंत करनी, काहेतैं? "प्रयाणकाले मानसाऽचलेन" इत्यादि स्मृति मरणपर्यंत ही आवृत्ति को कहती है॥ १२॥ तदधिगम उत्तरपूर्वाघयोर श्लेषविना- शौ तद्वयपदेशात्॥१३॥ इस सूत्रके-तदधिगमे १ उत्तरपूर्वाधयोः २ अश्लेषविनाशौ ३ तव्यपदेशात् ४ यह चार पद हैं।। अब ब्रह्मविद्याके फलका विचार

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(१७२) ब्रह्मसूत्राणि। [अध्याय ४ करते हैं कि व्रह्मविद्याकी प्राप्ति होनेतैं पापकर्मका क्षय होता है वा नहीं! तहां कहते हैं कि ब्रह्मविद्याकी प्राप्ति होनेतैं आगामी पापक संबंध नहीं होता है औ संचित पापका नाश होता है, काहेतैं! श्षति कहती है-कि "यथा पुष्करपलाश आपो न क्विष्यंत एवमेव विदि पापकर्म नक्लिष्यते"अस्या अर्थ :- जैसे कमलपत्रके विषै जल स्पर्श नहीं करते तैसे ब्रह्मवेत्ताके विषै पापकर्म स्पर्श नहीं करते इति ॥१३।। इतरस्याप्येवमसंश्ेषः पाते तु॥१४ ॥ इस सूत्रके-इतरस्य १ अपिरएवम्३ असंक्लेषः ४ पाते ५तु ६ यह छह पद हैं।। जैसे विद्वान्के विषै पापकर्मका असंबंध विनाश है तैसे पुण्यकर्मकाभी असबंध विनाश जानना, काहेतैं।पापकी न्याई पुण्यभी सुक्तिका प्रतिबंधक है ऐसे पापपुण्यका संबंध न होनेतैं शररिपातके अनंतर अवश्य विद्वान्की सुक्ति होती है॥ १४॥ अनारब्धकार्ये एव तु पूर्वे तदवधेः॥१५॥ इस सूत्रके-अनारब्घकार्ये १ एव २ तु ३ पूर्वे ४ तदवधे:५ यह पांच पद हैं।। जो यह कहा कि ज्ञानसे पुण्यपापका नाश होताहै तहां संशयहै कि सर्व पुण्यपापका नाश होताहै वा जिस पुण्यपापने अपने फलका आरम्भ न किया है तिसका होता है तहां कहते हैं कि जिस पूर्वजन्मके वा इस जन्मके कर्मने फलका आरम्भ नहीं किया है ति- सका ज्ञानसे नाश होता है सर्वका नहीं, काहेतैं।जिस कर्मनें फलका आरम्भ किया है तिसकी शरीरपातपर्यंत अवधि है॥ १५॥ अग्निहोत्रादि तु तत्कार्यायैव तद्दर्शनात्॥१६॥ इस सूत्रके-अग्निहोत्रादि १ तु २ तत्कार्याय३ एवश्तदर्शनावड यह पांच पदहैं।। जो अग्निहोत्रादि नित्यकर्म हैं सो ज्ञानका जो कार्य है तिसी कार्यके अर्थ हैं, काहेतैं! श्रुति कहती है-कि ब्राह्मण हैं सो

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पाद १ ] भाषाटीकासहितानि। (१७३ ) वेदानुवचन करके यज्ञ करके दान करके तिस परमात्माको जानते हैं ॥ १६ ॥ अतोऽन्यापि होकेषामुभयोः॥१७॥ इस सूत्रकें-अतः १ अन्या २ अपि ३ हि ४ एकेषाम् ५ उभयो: ६ यह छह पद हैं।। इस अग्निहोत्रादि नित्यकर्मसे औरभी श्रेष्ट कर्म है तिसको काम्यकर्म कहते हैं तिसको लेके कोई शाखावाले कहते हैं कि तिस ज्ञानीके पुत्र दायको लेते हैं सुहृद्ू साधुकर्मको लेते हैं द्वेषी पापकर्मको लेते हैं इति। यह काम्यकर्म विद्याका विरोधी हैं ऐसे जौमिनि औ बादरायण आचार्य मानते हैं॥ १७॥ यदेव विद्ययेति हि॥ १८ ॥ इस सूत्रके-यत् १ एव२ विद्यया३ इति ः हि ५ यह पांच पद हैं।। केवल अग्निहोत्रदि कर्म आत्मविद्याका हेतु है वा अपने अङ्गकी उपासना करके सहित हेतु है? तहां कहते हैं कि दोनोंही प्रकारका कर्म अत्मविद्यांका हेतु है औ ज्ञानकी उत्पत्तिसे पूर्व सुसुक्षुपु- रुषके करने योग्य है॥। १८ ॥ भोगेन त्वितरे क्षपयित्वा सम्पद्यते॥ १९ ॥ इस सूत्रके-भोगेन १ तु२ इतरे ३ क्षपयित्वा ४ संपद्यते ५.यह पांच पद हैं। जिस पुण्यपापने फलका आरम्भ नहीं किया है तिसका विद्याके सामथ्यसे क्षय होता है ऐसे पूर्व कहा है औ जिसने फलका आरम्भ कियाहै तिसका भोगसे क्षय करके ब्रह्म को प्राप्त होता है।१९ इति श्रीमन्मौक्तिकनाथयोगिविरचितायां ब्रह्मसूत्रसारार्थप्रदीपिका; कायां चतुर्थाध्यायस्य प्रथमः पादः ॥१॥

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(१७४) ब्रह्मसूत्राणि। चतुर्थाध्याये द्वितीय: पाद:। [अध्याय ४

वाङ्मनसि दर्शनाच्छव्दाच् ॥१॥ इस सूत्रके-वाक् १ मनसि २ दर्शनात ३ शब्दात ४ च ५ यह पांच पद हैं।। अपर विद्याके विषै देवयानमार्ग कहनेको प्रथम उत्कान्तिकम कहते हैं। श्रुति कहती है-कि त्रियमाण पुरुषकी वाकू मनमें लीन होती है मन प्राणमें लीन होता है प्राण तेजमें लीन होता है तेज रदेवतामें लीन होता है इति। तहां संशय है कि अपने स्वरूपसे वाकू मनमें लीन होती है वा वाक्की वृत्ति लीन होती है? तहां कहतेहैं कि वाककी वृत्ति लीन होती है, काहेतैं? विद्यमान मनोवृत्तिके विषै वाक्की वृत्तिका उपसंहार दीखताहै औ जोश्रुतिमें "वाङ्मनसि सम्पद्यते" यह शब्द है सो वाकू औ वृत्ति के अभेदके उपचारको लेके है।। १ ॥ अत एव च स्वोण्यनु॥२ ॥ इस सूत्रके-अतः १ एव २ च ३ सर्वाणि ४ अनु ५ यह पांच पद हैं।। वाग्वृत्तिकी न्याई चक्षुरादिकोंकी वृत्तिभी मनके विषै लीन होती है वृत्तिद्वारा सर्व इन्द्रिय मनके पीछे वर्त्तते हैं॥२॥ तन्मनः प्राण उत्तरात्॥३ ॥। इस सूत्रके-तत् १ मनः २ प्राणे ३ उत्तरात ४ यह चार पद हैं।। लीन भई है बाह्य इन्द्रियोंकी वृत्ति जिसमें ऐसा मन है सो अपनी वृत्ति द्वारा प्राणमें लीन होता है, काहेतैं। उत्तरवाक्यमें कहा है कि जो पुरुष सोता है औ मरता है तिसके मनकी वृत्ति प्राणवृत्तिमें लीन होती है।। ३ ।। सोऽध्यक्षे तदुपगमादिम्यः॥४॥ इस सूत्रके-सः१ अध्यक्षे २ तदुपगमादिम्यः ३ यह तीन पद्हैं। प्राण तेजमें लीन होता है वा देह इन्द्रियादि पंजरके स्वामी जीवोंमें लीन होता है? तहां कहते हैं कि सो प्राण अविद्या कर्म वास-

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पाद २ ] भाषाटीकासहितानि। (१७५) नादि उपाधिवाले जीवमें लीन होता है, काहेतैं? श्रुति कहती हैं- कि अन्तकालमें सर्व प्राण जीवके सन्मुख होते हैं॥४॥ भूतष्वतःशृतेः॥५॥ इस सूत्रके-भृतेषु १ अतः २ श्रुतेः श्यह तीन पद हैं। जो प्राणका जीवमें लय होताहै तो "प्राणस्तेजसि" यह श्रुति तेजमें प्राणका लय क्यों कहती है? तहाँ कहते हैं कि इस श्रुतिका यह अर्थ जानना चाहिये कि प्राण करके संयुक्त जीव है सो देहके कारण जो तेज सहित सक्ष्म भूत है तिनके विषै स्थित होताहै।। ५॥। जो यह कहा कि तेजसहित सूक्ष्मभूतोंके विषै प्राणसंयुक्त जीव स्थित होता है सो कहना ठीक नहीं, काहेतैं? "प्राणस्तेजि" इस श्ुतिके विषै एक तेजमात्रकाही श्रवण है इस शंकाका समाधान कहते हैं।। नैकस्मिन्दर्शयतो हि॥ ६ ॥ इस सुत्रके-न १ एकस्मिन् २दर्शयतः ३ हि ४ यह चार पद हैं॥ शरीरान्तरकी प्राप्तिकालमें एक तेजके विषैही जीव स्थित नहीं होता है, काहे तैं! कायररूपशरीर अनेक भृतोंका है ऐसे श्रुतिस्मृति कहती हैंद समाना चामृत्युपकरमादमृतत्वं चानुपोष्य॥७॥ इस सुत्रके-समाना १च २ आसृत्युपकमात् ३अमृतत्वम् ४च५ अनुपोष्य ६ यह छह पद हैं। विद्वान् अविद्वानकी उत्क्ान्ति स- मान है वा विशेष है? तहां कहते हैं कि अचिरादि मार्गकी प्राबिसे पूर्व "वाङ्मनसि सम्पद्यते" इत्यादि उत्क्रान्ति दोनोंकी समान है विद्वान् मस्तककी नाड़ीद्वारा अचिरादि मार्गको प्राप्त होता है औ अविद्वान् नहीं होता है इतना विशेषहै, काहेतैं! विद्वान् अपर विद्याके सामथ्यसे अविद्यादिक सर्व क्रेशको दग्ध करके अमृतको प्राप्त होता है परन्तु यह अमृत आपेक्षिक है सुख्य नहीं।। ७॥।

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(१७६) त्रह्मसूत्राणि। [अध्याय ४. तदार्पीतेः संसारव्यपदेशात्॥८।। 'इस सुत्रके-तद १ आपीतेः २ संसारव्यपदेशात् ३ यह तीन पद हैं।। जो श्रुति कहती है कि तेज परदेवतामें लीन होता है तिसका यह तात्पर्य है कि जीव प्राण इन्द्रिय भूतान्तर इन सर्व करके सहित तेज परदेवतामें लीन होता है। तहां संशय है कि तेज अपने स्वरूपसे ही लीन होता है वा सुषुप्ति प्रलयकी न्याईं बीज रूप करके बना रहताहै? तहां कहते हैं कि श्रुति स्मृतिमें पुनः संसारका कथन होनेतैं जितने सम्यक ज्ञान न होवै उतने बीजरूप करके बनाही रहता है ॥ ८। सूक्ष्मं प्रमाणतश्च तथोपलब्घेः॥९॥ इस सूत्रके-सूक्ष्मम् १ प्रमाणतः २ च ३ तथा ४ उपलब्घे:५यह पांच पद हैं।। इस शरीरसे निकलनेवाले जीवका आश्रय औ अन्य भूतोंकरके सहित जो तेज है सो सूक्ष्म पारिमाणवाला है, काहेतैं!जब तेज इस शरीरसे निकलता है तब सूक्ष्मनाडीद्वारा निकलता है इसी से समीप बैठे पुरुषको दीखता नहीं॥ ॥

इस सूत्रके-न १ उपमर्देन २ अतः ३ यह तीन पद हैं। सूक्ष्म होनेतैं जब दाहादि निमित्तसे स्थूल शरीरका उपमर्देन होता हैं तब सूक्ष्मशरीरका उपमर्दन नहीं होता॥ १०॥. अस्यैव चोपपत्तेरेष ऊष्मा॥११॥ इस सूत्रके-अस्य १ एव २ च ३ उपपत्तेः४ एषः ५ ऊष्मा ६ यह छह पद हैं।। जीवत शरीरके विषै स्पर्श करनेसे जो ऊष्मा जाना जाताहै सो ऊष्मा सूक्ष्मशरीरका है इसीसे मृतशरीरके विषै शारीरकें रूपादि गुण विद्यमान भी हैं परंतु ऊष्माका ज्ञान नहीं होता।।११॥

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पांद २] भापांटीकासहितानि। (१७७) प्रतिषेधादिति चेन्न शारीरात्।१२। इस सूत्रके-प्रतिषेधात् १ इति २ चेत्३्न४शारीरात् ५ यह पांच पद हैं।। इस पांदके सातवें सूत्रमें 'अनुपोष्य' यह पद है तिस करके सूचित भया कि दग्ध होगये हैं सर्व क्केश जिसके ऐसे परब्रह्मवेत्ताकी उत्क्रान्ति नहीं होती है इति। तहांकिसी कारणसे उत्क्रान्तिकी आशं- का करके श्रुति प्रतिषेध करती है कि परब्रह्मवेत्ताके शरीरसे प्राणोंकी उत्क्रान्ति नहीं होती है किंतु परब्रह्मवेत्ता ब्रह्मरूप होके ब्रह्मकोही प्राप्त हो ता है इति।तहां पूर्वपक्षी कहता है कि यह प्राणकी उत्क्रान्तिका प्रतिषेध शारीरात्मासे है शरीरसे नहीं अर्थात् जीवके साथही प्राण रहता है॥। १२ ॥। स्पष्टो होकेषाम्। १३॥ इस सूत्रके-स्पष्टः १ हि २ एकेषाम् ३ यह तीन पद हैं।। परत्रह्म वेत्ताकी प्राणसहितही इस देहसे उत्क्रान्ति होती है औ प्राणकी उत्का- न्तिका प्रतिषेध है सो देहीको लेके है देहको लेके नहीं यह पूर्वपक्षीका कहना ठीक नहीं, काहेतैं! कोई शाखावालोंके प्राणकी उत्क्ान्तिका प्रति षेध देहको लेके स्पष्टही भान होता है अर्थाव ज्ञानीके प्राणकीं उत्क्रान्ति इस देहसे हातीही नंहीं ॥ १३॥ स्मर्यते च॥ १४॥ इस सुत्रके-स्मर्यंते १ च २ यह दो पद हैं। ब्रह्मवेत्ताकी गति औ उत्क्ान्तिके अभावका महाभारतमें स्मरण होता है "सर्वभूतात्मभूत- स्य सम्यग्भूतानि पश्यतः। देवा अपिमार्गे सुह्यन्त्यपदस्य पदै षिणः।।" इति।अस्यार्थ :- जो सर्व भूतोंका आत्मभूत है औ सर्व भूतों- को आत्मभावकरके देखता है औ प्राप्य स्वर्गादि पद करके रहित है १२

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(१७८) ब्रह्मसूत्राणि। [अध्याय ४ एस ज्ञानीके पदकी इच्छा करनेवाले देवहैं सो भी तिसके मार्गके विषे मोहको प्राप्त होते हैं अर्थात तिसके मार्गको नहीं जानते हैं ॥१४॥ तानि परे तथा ह्याह॥ १५॥ इस सूत्रके-तानि १ परे २ तथा ३ हि ४ आह ५ यह पाँच पद हैं।। परत्रह्मवेत्ताके प्राणशब्दवाच्य श्रोत्रादिक इन्द्रिय हैं सोतिस पर- मात्माके विषै लीन होते हैं तैसेही श्रति कहती है कि जैसे नदी स- मुद्रको प्राप्त होके ससुद्रमेंही लीन होती है तैसे सारे ब्रह्म देखनेवालेकी प्राण श्रद्धादिक षोडशकला हैं सो ज्ञेयपुरुष को प्राप्त होके पुरुषके विषेही लीन होती हैं ॥ १५ ।। अविभागो वचनात् ॥१६ ॥ इस सूत्रके-अविभाग:१ वचनात २ यह दो पद हैं।। विद्वान्की प्राणश्रद्धादि षोडश कलाका लय है सो अविद्वानकी न्याई पुनर्जन्म का हेतु है वा नहीं!तहां कहते हैं कि पुनर्जन्सका हेतु नहीं है, काहेतैं? जैसे समुद्रमें लीन हुये पीछे नदीके नाम रूप नहीं रहते हैं सर्व समु द्रही कहाता है तैसे जब षोडक कलाका लय होता है तब पुरुष अकल अमृतही कहाता है॥ १६ ॥ तदोकोऽग्रज्वलनं तत्प्रकाशितद्वारो विद्यासामर्थ्या-

शताधिकया॥१७॥ इस सूत्रके-तदोकोडग्रज्वलनम् १ तत्प्रकाशितद्वार: २ विद्यासा मर्थ्यात् ३ तच्छेषगत्यनुस्मृतियोगात् ४च५हार्दानुगृहीतः६ शताघि कया७यह सात पद हैं।। प्रसंगसे प्राप्त भई परविद्याका विचार करके अब अपरविद्याका विचार करते हैं मरणकालमें उपसंहृत होगई हैं बागादि सर्व इन्द्रिय जिसकी ऐसे जीवात्माका हृदय स्थान है तिस

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पाद २] भाषाटीकासहितानि। (१७९)

हृदयका अम्र जो नाडियोंका सुख तिसका ज्वलन जो भावि फलका स्फरणरूप प्रद्योतन तिस प्रद्योतन करके जब जीवात्मा निकलता है यद्यपि तब चक्षुसे वा मूर्धासे वा और किसी शरीरके द्वारसे निकलता है यद्यपि हृदयाग्र प्रद्योतन औ तिस करके प्रकाशित चक्षुरादि द्वार विद्वान् अविद्वान्के समान हैं तथापि विद्वान् विद्याके सामर्थ्यसे मूर्धस्थानसेही निकलता है औ अविद्वान् चक्षुरादि स्थानसे निक- लताहै औ विद्याकी शेष जो मूर्धामें होनेवाली सुषुन्ञाख्यनाडी- द्वारा गति तिसका जो अनुस्मरण तिसके योगसे औ हृदयमें स्थित जो उपास्य ब्रह्म तिसके अनुग्रहसे ब्रह्मभावको प्राप्त भया विद्वान् है सो सौ नाडीसे अधिकं सुषुम्नाख्य नाडीद्वारा निकलता है औ अविद्वान् दूसरी नाडीद्वारा निकलताहै।। १७॥ रम्यनुसारी।।१८।। इस सूत्रका-रश्म्यनुसारी १ यह एकही पद है।। प्रारब्ध कर्मके अंतमें विद्वानका उत्क्रमण होता है सो नाडी संबंधि रश्मीके अनु- सार होता है तहां संशय है कि दिनके विषै वा रात्रिके विषै जो विद्वान् मरता है सो रश्मीके अनुसारी होता है वा दिनके विषे मरनेवालाही होता है? तहाँ कहते हैं कि दिनमें मरे वा रात्रिमें मरे रश्मीके अनुसारी ही होता है यह नियम है॥ १८॥ निशि नेति चेन्न सम्बन्धस्य यावद्वेहभावित्वात् दर्शयति च॥ १९॥ इस सुत्रके-निशि १ न २ इति ३ चेत् ४ न ५ सम्बन्धस्य ६ यावद्देद्दभावित्वात ७ दर्शयति ८ च ९ यह नौ पद हैं। नाडी औ रश्मिका संबंध दिनमें ही रहता है इसीसे जो दिनमें मरता है सो रश्मिके अनुसारी होता है औ जो रात्रिमें मरता है सो रश्मिके अनु- सारी नहीं होता है यह कहना ठीक नहीं, काहेतें । नाडी औ रश्मिका

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(१८०) ब्रह्मसूत्राणि। ।अध्याय ४ संबंध देहकी स्थितिपर्यंत बनाही रहता है औ श्रुति भी कहती है कि आदित्यसे निकली रश्मि नाडीके साथ संबद्ध रहती है।।१९। अतश्रायनेऽपि दक्षिणे॥२०।। इस सूत्रके-अतः १ च रअयने ३ अपि ४ दक्षिणे५ यह पांच पद हैं।। विद्याके फलको नित्य होनेतैं जो विद्वान् दक्षिणायनमें मरता है सो भी विद्याके फलको प्राप्त होता है औ जो भीष्मनें उत्त- रायणकी प्रतीक्षा करी है सो अपने पिताके वरसे प्राप्त भया जो इच्छा पूर्वक मृत्यु तिसकी प्रसिद्धिके वास्ते करी है औ अज्ञानीका मरण उत्तरायणमें श्रेष्ट है॥ २० ॥ गीतास्मृतिमें अनावृत्तिके वास्ते अहरादिकाल कहा है तुम रांत्रिमें वा दक्षिणायनमें मरनेवालेकी अनावृत्ति कैसे कहते हो इस शंकाका समाधान कहते हैं॥l योगिनः प्रति च स्मर्यंते स्मार्ते चैते ॥२१॥ इस सूत्रके-योगिन: १ प्रति २ च ३ स्मर्यते ४ स्मार्ते ५ च ६ एते ७ यह सात पद हैं।। जो अनावृत्तिके वास्ते अहरादिकालका स्मरण है सो योगीके प्रति है योग औ सांख्य स्मार्त हैं श्रौत नहीं इसीसे स्मार्त अहरादिकालका श्रौत विज्ञानके विषै उपयोग नहीं२१ इति श्रीमन्मौक्तिकनाथयोगिविरचितायां ब्रह्मसृत्रसारार्थ- प्रदीपिकायां चतुर्थाध्यायस्य द्वितीयः पादः ॥२॥ चतुर्थाध्याये तृतीय: पाद:। अर्चिरादिना तत्प्रथितेः॥१॥ इस सूत्रके-अचिरािना १ तत्प्रथिते: २ यह दो पद हैं। पूर्व यह कहा है कि आसृतिके उपक्रमसे पहिले विद्वान औ अविद्वान्की उत्क्रान्ति समान है औ सृतिनामं मार्गका है इति।अब सृतिका विचार

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पाद ३ ] भाषार्टीक्ासहितानि। (१८१)

करते हैं कि अनेक श्रतियोंके विषै अनेक सृति दिखती हैं एक सृति नाडीरश्मिके संबंधसे कही है औ दूसरी अर्चिरादि सृति कही है औ तिसरी देवयानसे अगनिलोकको प्राप्त करनेवाली कहीहै औ चोथी इस लोकसे मरे पीछे वायुलोकको प्राप्त करनेवाली कही है औ पंचमी सूर्यद्वार करके कही है तहाँ संशय है कि यह सृति परस्पर भिन्न हैं वा अभिन्न हैं? तहां कहते हैं कि अभिन्न हैं, काहेतैं? तिस सृतिको प्रसिद्ध होनेतैं सर्व विद्वान् अ्चिरादि मार्ग करकेही जाते हैं विशेष- णके भेदसे सृतिका भेद है वास्तव भेद नहीं॥१॥

  • इस सूत्रके-वायुम् १ अ्दात २ अविशेषविशेषाभ्यांम् ३ यह तीन पद हैं।। अब सृतिका क्रम कहते हैं कि विद्वान् उत्क्रान्तिके अनन्तर अर्चिको प्राप्त होता है इहां अचि नाम अगनिका है अचिसे अड़को प्राप्त होता है अहसे शुक्कपक्षको प्राप्त होता है शुक्कपक्षसे उत्तरायणको प्राप्त होता है उत्तरायणसे संवत्सरको प्राप्त होता है संवत्सरसे आदित्यको प्राप्त होता है ऐसे श्रति कहती है; परंतु इहां ऐसे जानना चाहिये कि संवत्सरसे वायुको प्राप्त होके आदित्यको प्राप्त होता है, काहेतैं। "स वायुलोकम्" इस श्रुतिके विषै अविशेष करके वायुका पाठमात्रही है परंतु अन्य श्रुति विशेष करके कहती है कि इस लोकसे प्राप्त भये उपासकको वायु अपने आत्मामें रथचक्रके छिद्रके तुल्य छिद्र देताहै तिस छिद्द्वारा आदित्यको प्राप्त होता है इति ॥ २ ॥ तडितोऽधिवरुण: सम्बन्धात्॥३॥ इस सुत्रके-तडितः १ अधिवरुण:२संबंधात् यह तीन पद हैं॥ आदित्यसे चंद्रमाको प्राप्त होताहै चंद्रमासे बिजलीको प्राप्त होताहै इहां बिजलीके उपरि वरुणका संबंध जानना अर्थाव बिजलीसे वरु-

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(१८२) ब्रह्मसूत्राणि। [अध्याय ४ णको प्राप्त होताहै इसी क्रमसे इंद्रलोक प्रजापतिलोक ब्रह्मलोककी प्राप्ति जाननी ॥ ३ ॥ आतिवाहिकस्तालेङ्गात्।।४।। इस सुत्रके-आतिवाहिक: १ तलिद्गात २ यह दो पद हैं॥ तिन अर्चिरादिकोंके विषै संशय है कि यह मार्गके चिह्न हैं वा भोगभूमि हैं वा आतिवाहिक हैं!तहां कहते हैं कि आतिवाहिक हैं, काहेतैं ? श्रुति कहती है कि जो ब्रह्मलोकको जाता है तिसको अमानव पुरुष लेजाता है सो अमानव पुरुष अरचिरादिक है गमन करनेवालेको जो गमन करावै तिसका नाम आतिवाहिक है।४ ॥ उभयव्यामोहात्तत्सिद्धेः ॥ ५॥ इस सूत्रके-उभयव्यामोहात१ तत्सिद्धेः२यह दो पद हैं।। अर्चि- रादि मार्ग जानेवाले स्वतंत्र नहीं रहते हैं, काहेतें १ देहके वियोगसे तिनके सर्व इंद्रिय संकुचित होजाते हैं औ अचेतन अर्चिरादिक भी स्वतंत्र नहीं हैं इसीसे अर्चिरादिकोंके अभिमानी देवता तिनको लेजाते हैं॥५॥ वैद्युतेनैव ततस्तच्छ्ुतेः ॥ ६॥ इस सूत्रके-वैद्युतेन १ एवं २ ततः ३ तच्छुतेः ४ यह चार पद हैं।। जो अमानव पुरुष बिजलीके लोकमें लेके आया है सोई बिजलीके लोकसे उपरि वरुणादिलोकद्वारा ब्रह्म लोकमें ले जाता है औ श्वति भी कहती है कि ब्रह्मलोकमें जानेवालेको अमानवपुरुष लेजाताहै औ वरुणादिक अप्रतिबंधक होनेतैं सहायक हैं॥ ६॥ कार्य बादरिरस्य गत्युपपत्ते: ।।७।। इंस सूत्रके-कार्यं१ बादरि:२ अस्य३ गत्युपपत्तेः४ यह चार पद़ हैं।। जो अचिरादिमागसे जातेहैं सो कार्यरूप अपरव्रह्म को प्राप्त होते हैं

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पाद ३ ] भाषाटीकांसहितानि। (१८३) वा सुख्यपरब्रह्म को प्राप्त होतेहैं। तहां कहते हैं कि कार्यरूप सगुण अप- रब्रह्मको प्राप्त होतेहैं ऐसे बांदरि आचार्य मानताहै, काहेतैं ? कार्य ब्रह्मको एक देशमें होनेतें गंतव्यत्वका संभव है औ अकार्यब्रह्मको सर्वगत होनेतें गंतव्यत्वका संभव नहीं ।७॥ विशेषितत्वाच्च ॥ ८॥ इस सुत्रके-विशेषितत्वान् १ च २ यह दो पद हैं॥"ते तेषु ब्रह्म- लोकेषु परा परावतो वसन्ति"इस श्तिमें बहुवचन:लोकशब्द आ- धारमें सप्तमी इत्यादि विशेषणों करके कार्यब्रह्मको विशेषित होनेतैं कार्यब्रह्मही गमनका विषय है अवस्थाभेदसे कार्यब्रह्म के विषही बहु- वचनका संभव है औ.श्रुतिका अर्थ यह है कि उपासक हैं सो ब्रह्मलो- कके विषे दीर्घ आयुवाले हिरण्यगर्भके दीर्घ संवत्सरपर्येत वसते हैं८ कार्यके विषे ब्रह्मश्दका प्रयोग नहीं होसकता, काहेतैं! समन्वयाध्यायमें सर्व जगत्का कारण ब्रह्म कहा है इस शंकाका समाधान कहते हैं।। सामीप्यातु तद्वयपदेशः॥९॥ इस सूत्रके-सामीप्यात् १ तु २ तब्यपदेशः ३ यह तीन पद हैं।। तु शब्द शंकाकी निवृत्तिके अर्थ है पख्रह्मके समीप होनेतैं अपर कार्यके विषै ब्रह्म शब्दका प्रयोग है।। ९ ॥ कार्यब्रह्मकी प्राप्तिमें अनावृत्तिका श्रवण है सो समीचीन नहीं, काहेतैं? परब्रह्मसे अन्यत्र अनावृत्तिका संभव नहीं इस शंकाका समाधान कहते हैं।। कार्यात्यये तदध्यक्षेण सहातः परमभिधानात्॥१०॥ इस सूत्रके-कार्यात्यये१ तदध्यक्षेण २ सह ३.अतः ४ परम् ५ अभिधानात् ६ यह छह पद हैं।। जब कार्यब्रह्मलोकका प्रलय प्राप्त होता है तब कार्यव्रह्मलोकमें सम्यक् ज्ञानको प्राप्त होके हिरण्यगर्भके

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(१८४) बह्मसूत्राणि। [अध्याय ४ साथ इस कार्यब्रम्मलोकसे परे विष्णुके शुद्ध पदको प्राप्त होते हैं ऐसे क्रममुक्तिमें अनावृत्तिका अभिधान है॥ १०॥ स्मृतेश्र ॥११॥ इस सूत्रके-स्मृते: १ च २ यह दो पद हैं।। इस अर्थको स्मृतिभी कहती है कि "ब्रहमणा सह ते सर्वे संप्राप्ते प्रतिसश्चरे॥ परस्यान्ते कृता- त्मान: प्रविशन्ति परं पदम्"॥ अस्या अर्थः। जब महाप्रलय प्राप्त होता है तब हिरण्यगर्भके अन्तमें ब्रह्मलोकनिवासी सम्यकू ज्ञानको प्राप्त होके सर्व ब्रह्माके साथही परमपदको प्राप्त होते हैं इति॥११॥ परं जैमिनिर्मुख्यत्वात॥१२॥ इस सूत्रके-परम् १ जैमिनि: २ सुख्यत्वातं ३ यह तीन पद हैं।। यह पूर्वपक्षसूत्र है परत्रह्मको सुख्य होनेतैं अरचिरादिमार्गसे जानेवाले परब्रह्मकोही प्राप्त होते हैं ऐसे जैमिनि आचार्य मानता है ॥ १२॥ दर्शनाच्॥ १३॥ इस सूत्रके-दर्शनात् १ च२ यह दो पद हैं। कठवल्लीके विषै पर ब्रह्मके प्रकरण में कहा है कि जो सुषुन्ना नाडीद्वारा ऊपरको जाता है सो अमृतको प्राप्त होता है इति। सो अमृत परत्रह्मही है विनाशी कार्यब्रह्म अमृत नहीं है।। १३ ॥ न च कार्ये प्रतिपत्त्यभिसन्धिः॥१४॥ इस सूत्रके-न १ च २ कार्ये ३ प्रतिपत्त्यभिसंधि: ४ यह चार पद हैं।। प्रजापतिकी सभा औ वेश्मको मैं प्राप्त होऊं ऐसा मरण कालमें उपासकके संकल्प होताहै सो संकल्प कार्यब्रह्मकी प्राप्तिका नहीं किंतु परब्रह्मका प्रकरण होनतैं परंत्रह्मकी प्राप्तिका है यह जैमि- निका पूर्वपक्ष है औ सिद्धान्तपक्ष "कार्यं बादरिः" इत्यादि सुत्र करके पूर्व कहा है सो जानना॥। १४ ॥

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पाद 8 ] भाषाटीकासहितानि। (१८५)

अप्रतीकालम्बनान्नयतीति बादरायण उभ- यथाऽदोषात्तत्क्रतुश्च॥१५॥ इस सूत्रके-अप्रतीकालम्बनात१ नयति २ इति ३ बादरायण:४ उभयथा ५ अदोषात ६ तत्क्तुः ७ च ८ यह आठ पद हैं।। जो विकारका उपासना करते हैं तिन सबको अमानव पुरुष ब्रह्मलो- कमें लेजाता है वा किसीको लेजाता है? तहां कहते हैं कि जो अप्रतीककी उपासना करता है तिसको लेजाता है प्रतीककी उपासनावालेको नहीं लेजाता ऐसे दोनों प्रकार माननेमें कोई दोष नहीं अप्रतीककी उपासनावालेका नाम ब्रह्मकतु है तिसीको लोक ऐश्वर्य मिलता है ऐसे बादरायण आचार्य मानता है ब्रह्मकी उपासनाका नाम अप्रतीकउपासना है औ नाम वाकू मन इत्या- दिकोंकी उपासनाका नाम प्रतीकउपासना है॥ १५ ॥ विशेषं च दर्शयति॥१६॥ इस सूत्रके-विशेषम्१ चर दर्शयतिश यह तीन पद हैं। नामादि प्रतीक उपासनाके विषै पूर्वपूर्वकी अपेक्षासे उत्तर उत्तरका फल वि- शेष है, काहेतैं। श्षति कहती है कि नामसे वाक् श्रेष्ट है वाक्से मन श्रेष्ट है ऐसेही इनकी उपासना औ उपासनाका फल जानना चाहिये औ ब्रह्म एक है तिसकी उपासना औउपासनाका फलभी एक है१६ इति श्रीमन्मौकिकनाथयोगिविरचितायां ब्रह्मसूत्रसारार्थप्रदी- पिकायां चतुर्थाध्यायस्य तृतयिः पादः ॥३॥ चतुर्थाध्याये चतुथः पाद:। सम्पाद्याविर्भावः स्वेन शब्दात्॥।१।। इस सूत्रके-सम्पाद्याविर्भावः १ स्वेन २ शब्दाव ३ यह तीन पद हैं। श्रुति कहती है पर ब्रह्मको जाननेवाला इस शरीरसे उठके

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(१८६) ब्रह्मसूत्राणि। [अध्याय परज्यीतिको प्राप्त होके अंपने रूपकरके ब्रह्मभावको प्राप्त होता है इति।तहां संशयहै कि स्वर्गादिकोंकी न्याई आगंतुक विशेषरूप करके प्राप्त होता है वा आत्मामात्र करके प्राप्त होता है। तहां कहते हैं कि "स्वेन रुपेणाभिनिष्पद्यते"इस श्रृतिके विषै स्वशब्दका प्रयोग हो- नेतैं केवल आत्ममात्र करके ही प्राप्त होता है धर्मान्तर करके नहीं१॥

इस सूत्रका-मुकप्रतिज्ञानाद१यह एकही समस्त पद है!जाग- रितमें देहके आन्ध्यादि धर्म करके युक्त रहता है औ स्वप्नमें पुत्रा दिशोकसे रुदन करतकी न्याई रहता है औ सुषुपिमें विनष्टकी न्याई रहता है औ सोक्षमें सर्व बन्धसे विनिर्मक्त शुद्धस्वरूप करके स्थित रहताहै इतनी जागरितादि अवस्थात्रयसे मोक्षमें विशेषता है काहेतैं:"स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यते स उत्तमः पुरुषः" इत्यादि श्रुतिसे मुक्तात्माका प्रतिज्ञान होता है जो अपने स्वरूपकरके ब्रह्मभावको प्राप्त होता है सो उत्तम पुरुष है इति श्रुत्यर्थः ॥ २॥ आत्मा प्रकरणात् ॥३ ॥ इस सूत्रके-आत्मा १ प्रकरणात २ यह दो पद हैं॥ ज्योति- शशन्दको कार्यरूप भौतिक ज्योतिके विषै रूढ होनेतें ज्योतिको प्राप्त होके ब्रह्मभावको प्राप्त नहीं होसकता ऐसे पूर्वपक्षी कहता है सो ठीक नहीं, काहेतैं? आत्माका प्रकरण होनेतें ज्योतिश्शन्दसें इहां आत्माकाही ग्रहण है।। ३ ॥ अविभागेन दष्टत्वात्॥४॥ इस सूत्रके-अविभागेन १. दष्टत्वात् २ यह दो पद हैं।। जो पर- ब्रह्मको प्राप्त होता है सो परब्ह्मसे पृथक् स्थित रहता है वा अविभाग करके स्थित रहता है।तहां कहते हैं कि अविभाग करके स्थि रहता है,

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पाद ४ ] भाषाटी कासहितानि। (१८७)

काहेतें १ तत्त्वमसि अहं ब्रह्मास्मि इत्यादि महावाक्य अविभाग करकेही आत्माको दिखाते हैं।। ४॥ ब्राह्मेण जैमिनिरुपन्यासादिम्यः॥५॥ इस सूत्रके-ब्राह्मेण१जैमिनिः२उपन्यासादिम्यः ३ यह, तीनपद हैं।। यह आत्मा पापरहित है सत्यकाम है सत्यसंकल्प है इत्यादिउप- न्यास होनेतें अपहतपाप्मत्व सत्यकामत्व सत्यसंकल्पत्व सर्वज्ञत्व इत्यादि ब्राह्मरूप करके ब्रह्मभावको प्रांप्त होता है ऐसे जैमिनि आचार्य मानता है॥। ५॥ चिति तन्मात्रेण तदात्मकत्वादित्यौडडलोमिः॥६॥ इस सुत्रके-चिति १ तन्मात्रेण २ तदात्मकत्वात् ३ इति४ औड- लोमिः ५ यह पांच पद हैं। यद्यपि अपहतपाप्मत्व सत्यकामत्वादि धमोंका भेद करके निर्देश किया है तथापि यह धर्म अत्यन्त असत है पाप्मत्वादिकोंकी निवृत्तिमात्र चैतन्यही आत्माका स्वरूप है तिस स्वरूप करके ही ब्रह्मभावको प्राप्त होता है ऐसे औडुलोमि आचार्य मानता है॥ ६॥ एवमप्युपन्यासात्पूर्वभावादविरोध वादरायण:।।७।। इस सूत्रके-एवम् १ अपि २ उपन्यासात् ३ पूर्वभावात४ अवि. रोधम् ५ बादरायण: ६ यह छह पद हैं। ऐसे पारमार्थिक चैतन्य- मात्र स्वरूपका अंगीकार भी है परंतु व्यवहारकी अपेक्षासे पूर्वउपं- न्यासादिकों करके प्राप्तभये ब्राह्मऐश्वर्यका विरोध नहीं ऐसे बादरा- यण आचार्य मानता है ७॥ संकल्पादेव तु तच्छृतेः॥॥ इस सूत्रके-संकल्पात् १ एव २तु ३ तच्छुतेः ४ यह चार पद हैं।। ऐसे परविद्याका फल कहा अब अपरारवद्याका फल कहते हैं- हार्द विद्याके विषे श्रवण होता है कि जब उपासक पितृलोककी

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(१८८) [अध्याय ४ कामना करता है तब इसके संकल्पसेही पितर उठते हैं इति। तहां संशय है कि केवल संकल्पही पित्रादिकोंके समुत्थानका हेतु है वा निमित्तान्तर करके सहित हेतु है! तहां कहते हैं कि केवल संकल्पही हेतु है, काहेतें? "संकल्पादेवास्य पितरः समुत्तिष्ठन्ति" यह श्रुति केवल संकल्पसेही पित्रादिकोंका समुत्थान कहती है ।। ८ ॥। अत एव चानन्याधिपतिः॥९॥ इस सूत्रके-अतः १ एव २ च ३ अनन्याधिपतिः ४ यह चार पद हैं।। अवन्ध्यसंकल्पवाला होनेतें विद्वान् अनन्याधिपति होता है अर्थात् इसका अन्य कोई अधिपति नहीं होता है॥ ९॥ अभावं बादरिराह ह्ेवम्॥१०॥ इस सूत्रके-अभावम् १ बादरिः २ आह ३ हि ४ एवम् ५ यह पांच पद हैं।। विद्वान्के संकल्पसेही पित्रादिकोंका समुत्थान होता है इस कहनेसे संकल्पका साधन मन सिद्ध भया परंतु ऐश्वर्यप्राप्ति के अनंतर विद्वान्के शरीर इन्द्रिय होते हैं वा नहीं? तहां कहते हैं कि नहीं होते हैं ऐसे बदरिआचार्य मानता है, काहेतें।श्चुति कहती है ककि जो ब्रह्मलोकमें जाता है सो सन करकेही सर्व कामोंको देखेता है और मानता है॥ १०॥ भावं जैमिनिर्विकल्पामननात् ।। ११।। इस सूत्रके-भावम १ जैमिनिः २ विकल्पामननात् ३ यह तीन पद हैं।। जैसे मुक्तके मन रहता है तैसे शरीर इन्द्रियभी रहते हैं ऐसे जैमनि आचार्य मानता है, काहेतें!"सएकधा भवति त्रिधा भवति" इत्यादि शास्त्र सो मुक्त एक प्रकारका होता औहै तीन प्रकारका होता है ऐसें अनेक प्रकारका विकल्प कहता है औ शरीरभेदके विना अनेक प्रकारता बने नहीं॥११॥

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पाद ४ ] भाषाटीकासहिवानि। (१८९)

द्वादशाहवदुभयविधं बादरायणोऽतः ॥१२॥ इस सूत्रके-द्वादशाहवत् १ उभयविधम् २ बादरायण: ३ अतः ४ यह चार पद हैं।। जैसे उभयालङ्ग श्रुतिका दर्शन होनेतैं द्वादशाह सत्र होता है औ अहीन होता है तैसे इहांभी उभयलिङ्ग श्रुतिका दर्शन होनेतैं उभयविधही श्रेष्ट है ऐसे बादरायण आचार्य मानता है जब सशरीरताका संकल्प करता है तब सशरीर होता है औ जब अशरीरताका संकल्प करता है तब अशरीर होता है॥। १२॥ तन्वभावे सन्ध्यवदुपपद्यते॥। १३। इस सूत्रके-तन्वभावे१ सन्ध्यवत २ उपपद्यतेश्यह तीन पद हैं। जब अशरीर होता है तब जैसे स्वप्नस्थानमें शरीर इन्द्रिय विपयके न होनेतैंभी ज्ञानमात्रसे पित्रादिकोंकी कामनावाला होता है तैसे मा- क्षमेंभी जानलेना।। १३ ॥। भावे जाग्रद्वत्।१४॥ इस सूत्रके-भावे १ जागद्वव शयह दो पद हैं।। जब सशरीर होता है तब जैसे जाग्रवमें विद्यमान पित्रादिकोंकी कामनावाला होता है तैसे मोक्षमेंभी होता है॥। १४ ॥ प्रदीपवदावेशस्तथाहि दर्शयति॥१५॥ इस सूत्रके-प्रदीपवत् १ आवेशः २ तथा३ हि४ दर्शयति५ यह पांच पद हैं।। जो यह कहा कि जैमिनिके मतमें सुक्तपुरुषके एकं प्रकारका औ अनेक प्रकारका शरीर होता है तहां संशय है कि अनेक प्रकारके शरीर दारुयंत्रकी न्याईं निरात्मक होतेहैं वा सात्मक होतेहैं? तहां कहतेहैं कि सात्मक होतेहैं, का हेतैं ।जिसे एक प्रदीप अनेक वर्त्तिके संयोगसे अनेक प्रदीपभावको प्राप्त होता है तसे एक विद्वान् अपने ऐश्वर्यके योगसे अनेक शरीर भावको प्राप्त होता है ऐसही श्रति कहती

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(१९० ) ब्ह्मसूत्राणि। [ अध्याय ४ है "स एकधा भवति त्रिधा भवति पश्चधा सपधा नवधा"इति॥१५ मुक्तपुरुषके अनेक शरीर प्रवेशादि रूप ऐश्वर्य नहीं हो सकता काहेतैं "न तु तद्वितीयमस्ति"इत्यादि श्रुतिविशेष विज्ञानका अभाव कहती है इस शंकाका समाधान कहते हैं,।। स्वाप्यसंपत्त्योरन्यतरापेक्षमाविष्कृतं हि॥ १६॥। इस सुत्रके-स्वाप्यसंपत्त्योः १ अन्यतरापेक्षम् २ आविष्कृतम् ३ - हि ४ यह चार पद हैं। कहीं सुषुप्ति अवस्थाकी अपेक्षासे औ कहीं कैवल्य मुक्तिकी अपेक्षासे विशेष विज्ञानका अभाव कहा है क्रम- सुक्तिकी अपेक्षासे नहीं ॥ १६॥ :जगद्वयापारवर्ज् प्रकरणादसन्निहितत्वाच॥१७॥ इस सूत्रके-जगव्यापार वर्जम् १ प्रकरणात् २ असत्निहितत्वात च ४ यह चार पद हैं। जो सगुणब्रह्मकी उपासनासे मन करके सहित ईश्वरभावको प्राप्त होते हैं तिनका ऐश्वर्य स्वतंत्र होता है वा परतंत्र होता है? तहां कहते हैं कि जगतकी उत्पत्ति स्थिति प्रलयरूप व्यापारको वर्जके अन्य सर्व अणिमादि ऐश्वर्यं स्वतंत्र होता है औ. जगत्का उत्पतत्यांदि व्यापार नित्यसिद्ध ईश्वरके अधीन, है, काहेतें। उत्पत्त्यादि प्रकरण ईश्वर का है औ ईश्वर अन्य पुरुषों के असत्निहित है ईश्वरको जानके ही अन्य पुरुष अणिमादि ऐश्वर्यको प्राप्त होता है१७ प्रत्यक्षोपदेशादिति चेन्नाधिकारिकमण्डलस्थोक्ते:। इस सूत्रके-प्रत्यक्षोपदेशाद १ इति २ चेत् ३ न ४ आधिकारिक मण्डलस्थोक्ते:५यह पांच पद हैं 'प्राप्ोति स्वाराज्यम्' इत्यादि प्रत्यक्ष उपदेश होनेतें विद्वान्का ऐश्वर्य स्वतंत्र होता है यह कहना ठीक नहीं,

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पाद ४ ] भाषाटी कासहिवानि। (१९१) काहेतैं ? जो सवितृमण्डलादि विशेष स्थानके विषे आधिकारिक पर मेश्वर स्थित है तिसके अधीन स्वाराज्यकी प्राप्ति कही है॥ १८ ॥ विकारावर्त्ति च तर्थाहि स्थितिमाह॥ १९ ॥ इस सूत्रके-विकारावर्ति १च२ तथा३ हि ४ स्थितिमूद आह ६ यह छह पद हैं।। सवितृमण्डलमें स्थित जो नित्यमुक्त परमेश्वर है तिसका रूप केवल विकारवर्ति नहीं है किंतु निर्विकार है काहेतें? "पादोऽस्य सर्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि" यह श्रुति परमेश्वरके सविकार औनिर्विकार इन दोनों रूपोंकी स्थितिको कहती है औ इस श्रुतिका अर्थ पूर्व कर आये हैं । १९ ।। दर्शयतश्रैवं प्रत्यक्षाुमाने॥२० ॥ इस सूत्रके-दर्शयतः १ च२ एवम् ३ प्रत्यक्षातुमाने ४यहचार पद हैं।। ऐसेही परमज्योति परमात्माके रूपको श्रुति स्मृति कहती है: "न तत्न सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं नेमा विद्युतो भान्ति कुंतोयमग्निः" यह श्रुति है औ "न तद्धासयते सूयों न शर्शाको न पावकः" यह गी- ता स्मृति है तिस परमात्मस्वरूपके विषे सूर्य चन्द्रमा तारा औ यह बिजली इनमें कोई भी नहीं प्रकाशता है तो अल्पतेजवाला अग्नि कैसे प्रकाशै इति श्रुत्यर्थः। औ यही अर्थ स्मृतिका जानना॥ २०॥ भोगमात्रसाम्यलिंगाच्च॥२१ ॥ इस सूत्रके-भोगमात्रसाम्यलिद्गाव १ च२ यह दो पद हैं। जो उपासक ब्रह्मलोकमें जाता है तिसका ऐश्वर्य स्वतंत्र नहीं है, काहे तैं? तिसका भोगमात्रही अनादिसिद्ध ईश्वरके भोगके समान है ऐसे श्रवण होता है॥ २१॥ जो उपासकका ऐश्वर्य स्वतंत्र नहीं है तो ऐश्वर्यको अन्तवाला होनेतें उपासककी आवृत्ति होनी चाहिये इस शंकाका समाधान कहते हैं भगवान् सुत्रकार॥

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(१९२) ब्रह्मसूत्राणि। [अध्याय ४. अनावृत्ति: शब्दादनावृत्ति: शब्दात् ॥।२२।। इस सूत्रके-अनावृत्ति: १ शब्दात् २ अनावृत्तिः ३.शब्दात्४ यह चार पद हैं।। श्रुति कहती है कि जो नाडीरश्मिके संबंधद्वारा देवयानमार्ग करके ब्रह्मलोकको जाता है तिसकी आवृत्ति नहीं होती है किंतु ब्रह्मलोकके भोग भोगके ब्रह्माके साथही मुक्त होता है इति। इहां "अनावृत्तिः शब्दादनावृत्तिः शब्दात्" यह सूत्रका अभ्यास है सो इस शास्त्रकी परिसमाप्तिकों द्योतन करता है॥। २२॥

गिविरचितायां ब्रह्मसूत्रसारार्थंप्रदीपिकायां चतुर्था- ्यायस्य चतुर्थः पादः ॥४ ॥ इति चतुर्थोऽध्याय: ४.

इति ब्रह्मसूत्रसमाप्तिः।

पुस्तक मिलनेका ठिकाना- खेमराज श्रीकृष्णदास, "श्रीवेङ्टैश्वर" स्टीम् प्रेस-बंबई.