Books / Brahma Upanishad

1. Brahma Upanishad

Text

1

अथास्य पुरुषस्य चत्वारि स्थानानि भवन्ति। नाभिर्हृदयं कण्ठं मूर्धेति । तत्र चतुष्पादं ब्रह्म विभाति ।जागरितं स्वप्न सुषुप्तं तुरीयमिति। जागरिते ब्रह्मा स्वप्ने विष्णुः सुषुप्तौ रुद्रस्तुरीय-मक्षरम् । स आदित्यो विष्णुशेश्वरश्च स्वयममनस्कमश्रोत्रमपाणिपादं ज्योतिर्विदितम्॥

athāsya puruṣasya catvāri sthānāni bhavanti। nābhirhṛdayaṃ kaṇṭhaṃ mūrdheti । tatra catuṣpādaṃ brahma vibhāti ।jāgaritaṃ svapna suṣuptaṃ turīyamiti। jāgarite brahmā svapne viṣṇuḥ suṣuptau rudrasturīya-makṣaram । sa ādityo viṣṇuśeśvaraśca svayamamanaskamaśrotramapāṇipādaṃ jyotirviditam॥

इस विराट् पुरुष के शरीर में आत्मा के चार विशेष स्थान-नाभि, हृदय, कण्ठ एवं ब्रहारन्ध्र बताये गये हैं। वहाँ इन चारों क्षेत्रों में चतुर्थ चरण से युक्त ब्रह्म प्रकाशित होता है। ऐसे ही आत्मा की चार अवस्थाएँ जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति तथा तुरीय कही गयी हैं। इन अवस्थाओं में से जाग्रत् अवस्था में ब्रह्मा, स्वप्नावस्था में विष्णु, सुषुप्तावरथा में रुद्र तथा चतुर्थ तुरीयावस्था में अक्षर रूप परमात्मा प्रकाशित होता रहता है। यह आत्म तत्त्व स्वयं मन एवं हाथ-पैर आदि इन्द्रियों से रहित होते हुए भी प्रकाश युक्त कहा गया है ॥


2

यत्र लोका न लोका देवा न देवा वेदा न वेदा यज्ञा न यज्ञा माता ने माता पिता न पिता स्नुषा न स्नुषा चाण्डालो न चाण्डालः पौल्कसो न पौल्कसः श्रमणो न श्रमणः तापसो न तापस इत्येकमेव परं ब्रह्म विभाति निर्वाणम्॥

yatra lokā na lokā devā na devā vedā na vedā yajñā na yajñā mātā ne mātā pitā na pitā snuṣā na snuṣā cāṇḍālo na cāṇḍālaḥ paulkaso na paulkasaḥ śramaṇo na śramaṇaḥ tāpaso na tāpasa ityekameva paraṃ brahma vibhāti nirvāṇam॥

यहाँ (आत्मा अर्थात् ब्रह्म में) लोक-लोक के रूप में नहीं है, देव-देवरूप में नहीं है, वेद-वेदरूप में नहीं है, यज्ञ-यज्ञरूप में नहीं है, माता-माता के रूप में नहीं है, पिता-पितारूप में नहीं है, स्न्नुषा (पुत्रवधू)-स्न्नुषा रूप में नहीं है, चाण्डाल-चाण्डालरूप में नहीं है, पौल्कस (भील)-पौल्कस रूप में नहीं है, श्रमण (संन्यासी)-श्रमण के रूप में नहीं है, और तपस्वी-तपस्वी के रूप में नहीं है; किन्तु वह ब्रह्म सदैव एक निर्वाण स्वरूप एवं प्रकाश स्वरूप है॥


3

न तत्र देवा ऋषयः पितर ईशते प्रतिबुद्धः सर्वविद्येति ॥

na tatra devā ṛṣayaḥ pitara īśate pratibuddhaḥ sarvavidyeti ॥

वहाँ (इस ब्रह्म पर) देवगण, ऋषिगण और पितृगण भी शासन करने में समर्थ नहीं हैं। उस अविनाशी ब्रह्म को ज्ञान के द्वारा ही जाना जा सकता है, वह सर्वविद्या के स्वरूप वाला है॥


4

हृदिस्था देवताः सर्वा हृदि प्राणा: प्रतिष्ठिताः। हृदि प्राणश्च ज्योतिश्च त्रिवृत्सूत्रं च तद्विदुः । हृदि चैतन्ये तिष्ठति ॥

hṛdisthā devatāḥ sarvā hṛdi prāṇā: pratiṣṭhitāḥ। hṛdi prāṇaśca jyotiśca trivṛtsūtraṃ ca tadviduḥ । hṛdi caitanye tiṣṭhati ॥

हृदय में सभी देवगण स्थित हैं, प्राण भी हृदय में निवास करता है और हृदय में ही प्राण तथा ज्योति भी प्रतिष्ठित है। इस तरह से हृदय में तीन स्वरूपों में परम ब्रह्म का निवास है। (इस तथ्य को प्रकट करने के लिए) तीन सूत्रों (धागों) से युक्त ‘यज्ञ सूत्र’ अर्थात् जनेऊ (यज्ञोपवीत) है, ऐसा उसके रहस्य को समझने वाले मानते हैं। वह अविनाशी परमब्रह्म चेतना के रूप में हृदय में प्रतिष्ठित है ॥


5

यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं प्रजापतेर्यत्सहजं पुरस्तात्। आयुष्यमग्रयं प्रतिमुञ्च शुभ्रं यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेजः ॥

yajñopavītaṃ paramaṃ pavitraṃ prajāpateryatsahajaṃ purastāt। āyuṣyamagrayaṃ pratimuñca śubhraṃ yajñopavītaṃ balamastu tejaḥ ॥

(यह) परम पवित्र यज्ञोपवीत सर्वप्रथम प्रजापति (ब्रह्माजी) के साथ ही सहज (देहेन्द्रिय की तरह) प्रादुर्भूत हुआ। वह दीर्घायुष्य प्रदान करने वाला है। (हे मनुष्य!) ऐसा जान करके तुम उत्तम और शुभ्र यज्ञोपवीत धारण करो। यह यज्ञोपवीत तुम्हारे लिए बल एवं तेज प्रदान करने वाला (सिद्ध) हो ॥


6

सशिखं वपनं कृत्वा बहिःसूत्रं त्यजेद्बुधः। यदक्षरं परं ब्रह्म तत्सूत्रमिति धारयेत् ॥

saśikhaṃ vapanaṃ kṛtvā bahiḥsūtraṃ tyajedbudhaḥ। yadakṣaraṃ paraṃ brahma tatsūtramiti dhārayet ॥

शिखा के सहित मुण्डन करने के पश्चात् (संन्यास धर्म को ग्रहण करके) ज्ञानी जनों को ब्रह्मसूत्र अर्थात् यज्ञोपवीत का परित्याग कर देना चाहिए। जिस अविनाशी तत्त्व को परब्रह्म कहा गया है, वही इस सूत्र के रूप में प्रतिष्ठित है। ऐसा जान करके उसी श्रेष्ठ यज्ञोपवीत को हृदय में प्रतिष्ठित करना चाहिए ॥


7

सूचनात्सूत्रमित्याहुः सूत्रं नाम परं पदम्। तत्सूत्रं विदितं येन स विप्रो वेदपारगः ॥

sūcanātsūtramityāhuḥ sūtraṃ nāma paraṃ padam। tatsūtraṃ viditaṃ yena sa vipro vedapāragaḥ ॥

यज्ञोपवीत यह सूचित करता है (कि अविनाशी शाश्वत परब्रह्म हृदय में ही स्थित है), इस कारण से उसे ‘सूत्र’ के नाम से जाना जाता है। यह ‘सूत्र’ ही परम पद है। इस परम पद रूपी सूत्र को जिस मनुष्य ने जान लिया, वही ब्राह्मण वेद को जानने में समर्थ अर्थात् पारगामी होता है ।।


8

येन सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव। तत्सूत्रं धारयेद्योगी योगवित्तत्त्वदर्शिवान्॥

yena sarvamidaṃ protaṃ sūtre maṇigaṇā iva। tatsūtraṃ dhārayedyogī yogavittattvadarśivān॥

जिस प्रकार सूत्र रूपी धागों में माला के रूप में मणियों के दाने पिरोये जाते हैं, उसी तरह अविनाशी ब्रह्म में यह सम्पूर्ण जगत् गूँथा हुआ है, इसलिए इसे सूत्र कहा गया है। तत्त्वज्ञानी एवं योग में निष्णात मनुष्यों को इस सूत्र रूप ब्रह्म को हृदय में प्रतिष्ठित करना चाहिए ॥


9

बहिःसूत्रं त्यजेद्विद्वान्योगमुत्तममास्थितः। ब्रह्मभावमिदं सूत्रं धारयेद्यः स चेतनः। धारणात्तस्य सूत्रस्य नोच्छिष्टो नाशुचिर्भवेत् ॥

bahiḥsūtraṃ tyajedvidvānyogamuttamamāsthitaḥ। brahmabhāvamidaṃ sūtraṃ dhārayedyaḥ sa cetanaḥ। dhāraṇāttasya sūtrasya nocchiṣṭo nāśucirbhavet ॥

इस श्रेष्ठ योग रूपी ब्रह्मसूत्र को धारण करने वाला विद्वान् मनुष्य ब्रह्मसूत्र का परित्याग कर दे। ब्रह्म स्वरूप को जानना ही ‘सूत्र’ समझना चाहिए। इस ‘ब्रह्मसूत्र’ को जो भी मनुष्य धारण करता है, वह चैतन्य स्वरूप है। इस ब्रह्मरूपी सूत्र को धारण करने से व्यक्ति न उच्छिष्ट होता है और न ही अशुद्ध होता है ॥


10

सूत्रमन्तर्गतं येषां ज्ञानयज्ञोपवीतिनाम्। ते वै सूत्रविदो लोके ते च यज्ञोपवीतिनः ॥

sūtramantargataṃ yeṣāṃ jñānayajñopavītinām। te vai sūtravido loke te ca yajñopavītinaḥ ॥

इस शाश्वत ज्ञान रूपी यज्ञोपवीत को ग्रहण करने वाले मनुष्यों के हृदय में ब्रह्मरूपी सूत्र स्थित रहता है। इस प्रकार के ही मुनष्य ब्रह्मरूपी सूत्र के वास्तविक स्वरूप को जानने वाले होते हैं तथा वे ही व्यक्ति वास्तव में सच्चे यज्ञोपवीतधारी हैं ॥


11

ज्ञानशिखिनो ज्ञाननिष्ठा ज्ञानयज्ञोपवीतिनः । ज्ञानमेव परं तेषां पवित्रं ज्ञानमुच्यते ॥

jñānaśikhino jñānaniṣṭhā jñānayajñopavītinaḥ । jñānameva paraṃ teṣāṃ pavitraṃ jñānamucyate ॥

जो मनुष्य ज्ञानरूप शिखा वाले, ज्ञान में ही निष्ठा रखने वाले और ज्ञानरूपी यज्ञोपवीत को धारण करने | वाले हैं, ऐसे उन श्रेष्ठ व्यक्तियों को ज्ञान ही परम पवित्र बना देता है॥


12

अग्नेरिव शिखा नान्या यस्य ज्ञानमयी शिखा। स शिखीत्युच्यते विद्वान्नेतरे केशधारिणः ॥

agneriva śikhā nānyā yasya jñānamayī śikhā। sa śikhītyucyate vidvānnetare keśadhāriṇaḥ ॥

जिस मनुष्य के अग्नि की शिखा की भाँति ज्ञान की शिखा होती है, उनके लिए और दूसरी अन्य शिखा होती ही नहीं है और वे ही सच्चे अर्थों में शिखा को धारण करने वाले तथा विशेष ज्ञानी कहे जाते हैं। इनके अतिरिक्त जो अन्य मनुष्य बाह्य केशों की चोरी रखते हैं, वे व्यक्ति शिखा को धारण करने वाले नहीं कहे जा सकते ॥


13

कर्मण्यधिकृता ये तु वैदिके ब्राह्मणादयः। तैः संधार्यमिदं सूत्रं क्रियाङ्गं तद्धि वै स्मृतम् ॥

karmaṇyadhikṛtā ye tu vaidike brāhmaṇādayaḥ। taiḥ saṃdhāryamidaṃ sūtraṃ kriyāṅgaṃ taddhi vai smṛtam ॥

ब्राह्मण आदि जो (वर्ण) वैदिक कर्म के अधिकारी हैं, उन्हीं (मनुष्यों) को ही यह ब्रह्मसूत्र धारण | करना चाहिए, क्योंकि यही इसकी कार्य पद्धति का अनिवार्य अङ्ग कहा गया है ॥


14

शिखा ज्ञानमयी यस्य उपवीतं च तन्मयम्। ब्राह्मण्यं सकलं तस्य इति ब्रह्मविदो विदुः ॥

śikhā jñānamayī yasya upavītaṃ ca tanmayam। brāhmaṇyaṃ sakalaṃ tasya iti brahmavido viduḥ ॥

जिस (ब्राह्मण) की शिखा एवं यज्ञोपवीत दोनों ही ज्ञानस्वरूप हैं, ऐसे उन (ब्राह्मणों) का ब्राह्मणत्व ही पूर्ण सफल है, ऐसा ब्रह्मपरायण विद्वज्जन कहते हैं ॥


15

इदं यज्ञोपवीतं तु पवित्रं यत्परायणम्। स विद्वान्यज्ञोपवीती स्यात्स यज्ञः तं यज्वानं विदुः ॥

idaṃ yajñopavītaṃ tu pavitraṃ yatparāyaṇam। sa vidvānyajñopavītī syātsa yajñaḥ taṃ yajvānaṃ viduḥ ॥

यह (ज्ञान ही) यज्ञोपवीत है, यही परम पवित्र और परायण अर्थात् कल्याणकारी है। अतः ज्ञानवान् मनुष्य ही वास्तव में (सच्चे) यज्ञोपवीत धारण करने वाले हैं, स्वयं यज्ञरूप हैं और उन्हीं श्रेष्ठ पुरुषों को ‘यज्वा’ कहते हैं ॥


16

एको देवः सर्वभूतेषु गूढः सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा। कर्माध्यक्षः सर्वभूताधिवासः साक्षी चेता केवलो निर्गुणश्च ॥

eko devaḥ sarvabhūteṣu gūḍhaḥ sarvavyāpī sarvabhūtāntarātmā। karmādhyakṣaḥ sarvabhūtādhivāsaḥ sākṣī cetā kevalo nirguṇaśca ॥

एक ही परमात्मा समस्त भूत-प्राणियों में विद्यमान (छिपा हुआ) है, (वह) सर्वव्यापी है। समस्त भूतों का अन्तरात्मा है, सभी के कर्मों को नियन्त्रित रखने वाला है, सभी भूतों का अधिवास है, साक्षीरूप, चैतन्य स्वरूप, पवित्र एवं निर्गुण (त्रिगुणातीत) है ॥


17

एको वशी सर्वभूतान्तरात्मा एकं रूपं बहुधा यः करोति । तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरास्तेषां शांतिः शाश्वती नेतरेषाम् ॥

eko vaśī sarvabhūtāntarātmā ekaṃ rūpaṃ bahudhā yaḥ karoti । tamātmasthaṃ ye'nupaśyanti dhīrāsteṣāṃ śāṃtiḥ śāśvatī netareṣām ॥

वह (परमात्मा) एक होते हुए भी सभी को वश में रखने वाला है, सभी प्राणियों का अन्तरात्मा है तथा अपने एक ही रूप को विभिन्न रूपों में प्रकट करता है। इस परम तत्त्व को जो बुद्धिमान् व्यक्ति अपने में प्रतिष्ठित देखते हैं, उन्हें शाश्वत शान्ति की प्राप्ति होती है, दूसरों को इसकी प्राप्ति नहीं हो सकती ॥


18

आत्मानमरणिं कृत्वा प्रणवं चोत्तरारणिम्। ध्याननिर्मथनाभ्यासद्देवं पश्येन्निगूढवत् ॥

ātmānamaraṇiṃ kṛtvā praṇavaṃ cottarāraṇim। dhyānanirmathanābhyāsaddevaṃ paśyennigūḍhavat ॥

आत्मा को नीचे की अरणि और प्रणव को ऊर्ध्व की अरणि बनाकर ध्यान रूपी मंधन के अभ्यास द्वारा इस अप्रकट आत्मा का साक्षात्कार मनुष्य को करना चाहिए ॥


19

तिलेषु तैलं दधनीव सर्पिरापः स्त्रोतः स्वरणीषु चाग्निः । एवमात्मात्मनि गृह्यतेऽसौ सत्येनैनं तपसा योऽनुपश्यति ॥

tileṣu tailaṃ dadhanīva sarpirāpaḥ strotaḥ svaraṇīṣu cāgniḥ । evamātmātmani gṛhyate'sau satyenainaṃ tapasā yo'nupaśyati ॥

जिस प्रकार तिल में तैल, दही में घृत, स्त्रोत के प्रवाह में जल, काष्ठ में अग्नि अप्रत्यक्ष रूप से विद्यमान रहती है, उसी प्रकार से आत्मा भी हमारे अन्त:करण में विद्यमान है। वह आत्मा सत्य एवं तप के द्वारा देखा जा सकता है ॥


20

ऊर्णनाभिर्यथा तन्तून्सृजते संहरत्यपि। जाग्रत्स्वप्ने तथा जीवो गच्छत्यागच्छते पुनः॥

ūrṇanābhiryathā tantūnsṛjate saṃharatyapi। jāgratsvapne tathā jīvo gacchatyāgacchate punaḥ॥

जिस प्रकार ऊर्णनाभि (मकड़ी) तन्तु (सूत्र) का सृजन एवं संहार अर्थात् सूत्र का निर्माण करती और पुनः खींच (निगल) लेती है, उसी प्रकार जीवात्मा भी जाग्रत् एवं स्वप्नावस्था में पुनः पुनः गमनागमन करता रहता है ॥


21

नेत्रस्थं जागरितं विद्यात्कण्ठे स्वप्न समाविशेत्। सुषुप्तं हृदयस्थं तु तुरीयं मूर्ध्नि संस्थितम्॥

netrasthaṃ jāgaritaṃ vidyātkaṇṭhe svapna samāviśet। suṣuptaṃ hṛdayasthaṃ tu turīyaṃ mūrdhni saṃsthitam॥

जाग्रत् अवस्था का वैश्वानर नाम से युक्त आत्मा चक्षु में प्रतिष्ठित रहता है, स्वप्नावस्था का तैजस नामक आत्मा कण्ठ में निवास करता है, सुषुप्तावस्था का प्राज्ञ नामक आत्मा हृदय में स्थित रहता है और तुरीय अर्थात् तीनों अवस्थाओं से परे इस तुर्या नामक चौथी अवस्था का आत्मा ब्रह्मरन्ध्र में निवास करता है, इस प्रकार से बुद्धिमान् मनुष्य को जानना चाहिए ॥


22

यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह। आनन्दमेतज्जीवस्य यं ज्ञात्वा मुच्यते बुधः ॥

yato vāco nivartante aprāpya manasā saha। ānandametajjīvasya yaṃ jñātvā mucyate budhaḥ ॥

जहाँ मनुष्य की वाक्शक्ति एवं एकादश इन्द्रिय मन नहीं पहुँच सकते, वहाँ पर उस आत्मा के आनन्द को जान करके बुद्धिमान् मनुष्य मुक्त हो जाते हैं॥


23

सर्वव्यापिनमात्मानं क्षीरे सर्पिरिवान्वितम्। आत्मविद्यातपोमूलं तद्ब्रह्मोपनिषत्पदं तद्ब्रह्मोपनिषत्पदमिति ॥

sarvavyāpinamātmānaṃ kṣīre sarpirivānvitam। ātmavidyātapomūlaṃ tadbrahmopaniṣatpadaṃ tadbrahmopaniṣatpadamiti ॥

दुग्ध में घृत के सदृश सर्वत्र विद्यमान आत्म तत्त्व, आत्म-विद्या एवं तप के द्वारा ही प्राप्त होता है। यह आत्मा ही स्वयं ब्रह्म है और यही उपनिषदों का परम पद (परब्रह्म) है॥