1. brahmavaivartapurana01
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ॐ तत्सद्ब्रह्मणे नमः
ब्रह्मवैवर्तपुराणम्
तत्राऽडदिमं ब्रह्मखण्डम्
अथ प्रथमोध्यायः
गणेशब्रह्मेशसुरेशशेषाः सुराश्च सर्वे मनवो मुनीन्द्राः। सरस्वतीश्रीगिरिजादिकाश्च यं नमन्ति देव्यः प्रणमामि तं विभुम् ॥१॥ स्थूलास्तनविदधतं त्रिगुणं विराजं विश्वानि लोमविवरेषु महान्तमाद्यम् । सृष्टयुन्मुखः स्वकलयाऽपि ससर्ज सूक्ष्मं नित्यं समेत्य हृदि यस्तमजं भजामि ॥२॥ ध्यायन्त ध्याननिष्ठा: सुरनरमनवो योगिनो योगरूढा: सन्तः स्वप्नेऽपि सन्तं कतिकतिजनिभियं न पश्यन्ति तप्त्वा।
अध्याय १
मंगलाचरण, ब्रह्मवैवर्तपुराण का परिचय तथा महत्त्व गणेश, ब्रह्मा, शंकर, इन्द्र, शेषनाग, देवता, समस्त मनु, मुनिवर, सरस्वती, लक्ष्मी तथा पार्वती आदि देवियाँ जिनको नमस्कार करती हैं, उन व्यापक परमात्मा को मैं प्रणाम करता हूँ॥१॥ जो स्थूल शखरों का धारण करने वाले, त्रिगुणात्मक, विराट्स्वरूप, अपने लोमकूपों में अनेक विश्वों को निहित करने वा्ले, महान्, आदिपुरुष, सृष्टि करने में प्रवृत्त होने पर अपनी कला से भी सृष्टि-रचना करने वाले तथा सूक्ष्म रूप से सदा (सब के) हृदय में रहने वाले हैं, उन अजन्मा ब्रह्म का मैं भजन करता हूँ ॥२॥ देवता, मनुष्य तथा मनु ध्याननिष्ठ
१. क. माद्यः। २. क. स्वप्नोन्मिषन्तं। ३. क. तप्ताः।
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२ प्रथमोऽध्यायः
ध्याये स्वंच्छामयं तं त्रिगुणपरमहो निर्विकार निरोहं भक्त्या ध्यानक हेतोनिरुपमरुचिरश्यामरूपं दधानम् ॥३। वन्दे कृष्णं गुणातीतं परं ब्रह्माच्युतं यतः । आविर्बभूवुः प्रकृतिब्रह्मविष्णुशिवादयः ॥।४।।
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय। ( ॐ नमः सर्वलोकविघ्नविनायकाय। ॐ नमो ब्रह्मणे। ॐनमः शिवाय। ॐ नमो गणपतये। ॐ नमो नारदाय। ॐ नमो व्यासाय। ॐ नमः प्रकृत्यै)। नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम्। देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत्।१॥ अमृतपरमपूर्व भारतीकामधेनुं श्रुतिगणकृतवत्सो व्यासदेवो दुदोह। अतिरुचिरपुराणं ब्रह्मवैवर्तमेतत्पिबत पिबत मुग्धा दुग्धमक्षय्यमिष्टम् ॥२॥ भारते नैमिषारण्ये ऋषयः शौनकादयः । नित्यां नैमित्तिकों कृत्वा त्रियामूषुः कुशासने ।।३॥ एतस्मिन्नन्तरे सौतिमागच्छन्तं यदृच्छया। प्रणतं सुविनीतं तं विलोक्य ददुरासनम्॥४॥ तं संपूज्यातिथिं भक्त्या शौनको मुनिपुंगवः । पप्रच्छ कुशलं शान्तं शान्तः पौराणिकं मुदा॥५॥ वर्त्मायासविनिर्मुक्तं वसन्तं सुस्थिरासने । सस्मितं सर्वतत्त्वज्ञं पुराणानां पुराणवित् ॥६।। परं कृष्णकथोपेतं पुराणं श्रुतिसंमतम्'। मङ्गलं मङ्गलाहं च मङ्गल्यं मङ्गलालयम्॥७॥
होकर और योगी लोग योगारूढ़ होकर जिनका ध्यान करते हैं एवं कतिपय साधक कई जन्मों तक तपस्या करके भी स्वप्न में भी जिनको नहीं देख पाते हैं, उन, भक्त पुरुषों के ध्यान के लिए अनुपम सुन्दर तथा श्याम रूप धारण करने वाले भगवान् का मैं ध्यान करता हूँ॥३। जिनसे प्रकृति, ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव आदि प्रकट हुए हैं, उन त्रिगुणातीत परब्रह्म श्रीकृष्ण की मैं वन्दना करता हूँ ॥४॥ * भगवान् वासुदेव को नमस्कार है। ओं नमो भगवते वासुदेवाय (भगवान् नारायण, नरश्रेष्ठ नर तथा सरस्वती देवी को नमस्कार करके जय बोले (अर्थात् इतिहास-पुराण का पाठ करे) ॥१॥ सरस्वती को कामधेनु तथा वेदों को बछड़ा बना कर व्यासदेव ने अत्यन्त मनोरम ब्रह्मववर्तपुराण रूप अपूर्व अमृत का दोहन किया है। सज्जनो! इस अक्षय्य दुग्ध का यथेच्छ पान करो।।२॥ भारतवर्ष के नैमिषारण्य (तीर्थ) में शौनक आदि ऋषि नित्य और नैमित्तिक क्रियाओं का अनुष्ठान करके कुशासन पर बैठे हुए थे। इसी बीच सूत-पुत्र (उग्रश्रवा) को अकस्मात् (वहाँ) आते हुए तथा विनीत भाव से (सबको) प्रणाम करते हुए देख कर ऋषियों ने उन्हें आसन दिया। उस अतिथि की भक्तिपूर्वक पूजा करके मुनिवर शान्त शौनक ने उस शान्त पौराणिक (सूत) से हर्षपूर्वक कुशल-समाचार पूछा। मार्ग की थकावट से रहित होकर सुस्थिर आसन पर बैठे हुए, मुसकराते हुए, पुराणों के सकल तत्त्वों के ज्ञाता तथा परम विनीत सूत से आकाश में तारों के बीच चन्द्रमा की
१ अयं पाठः ख. पुस्तके नास्ति। २. क.० ष्णवरोपे०। ३. क. ०तिसुन्दरम्।
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ब्रह्मवैवर्तपुराणम् ३
सर्वमङ्गलबीजं च सर्वदा मङ्गलप्रदम्। सर्वामङ्गलनिघ्नं च सर्वसंपत्करं परम्।।८।। हरिभक्तिप्रदं शञवरत्सखदं मोक्षदं भवेत्। तत्त्वज्ञानप्रदं दारपुत्रपौत्रविवर्धनम् ।।९।। पप्रच्छ सुविनीतं च सुप्रीतो मुनिसंसदि। यथाऽडकाशे तारकाणां द्विजराजो विराजते ॥१०॥ शौनक उवाच
प्रस्थानं भवतः कुत्र कुत आयासि ते शित्रम् । किमस्माकं पुण्यदिनमद्य त्वद्दर्शनेन च॥११॥ वयमेव कलौ भीता विशिष्टज्ञानवर्जिताः । मुमुक्षवो भवे मग्नास्तद्धेतुस्त्वमिहागतः ॥१२॥ भवान्साधुर्महाभागः पुराणेधु पुराणदित्। सर्वेषु च पुराणेषु निष्णातोऽतिकृपानिधि: ॥१३॥ श्रीकृष्णे निश्चला भक्तिर्यतो भवति शाश्वती। तत्कथ्यतां महाभाग पुराणं ज्ञानवर्धनम्॥१४॥ गरीयसी या साक्षाच्च कर्ममूलनिकृन्तनी। संसारसंनिबद्धानां निगडच्छेदकतंरी।१५॥ भवदावाग्निदग्धानां पीयूषवृष्टिदषिणी। सुखदाऽडनन्ददा सौते शश्वच्चेतसि जीविनाम्॥१६॥ यत्राऽडदौ सवबीजं च परब्रह्मनिरपणम् । तस्य सृष्टयुन्मुखस्यापि सृष्टेरुत्कीर्तनं परम्॥१७॥ साकारं वा निराकारं परमात्मस्वरूपकम् । किमाकारं च तद्ब्रह्म तद्धयानं कि च भावनम् ॥१८॥
भांति मुनि-सभा में शोभा पाने वाले पुराणवेत्ता सुप्रसन्न शौनक ने ऐसे पुराण के विषय में प्रश्न किया, जो परम उत्तम, श्रीकृष्ण की कथा से युक्त, सुनने में सुन्दर एवं सुखद, मंगलमय, मंगलयोग्य, मंगलयुक्त, मंगलधाम, सकल मंगलों का बीज, सर्वदा मंगलदायक, समस्त अमंगलों का नाशक, निखिल सम्पत्तियों की प्राप्ति कराने वाला, श्रेष्ठ, हरिभक्तिदायक, सदा सुख एवं मोक्ष देने वाला, तत्त्वज्ञान देने वाला और स्त्री, पुत्र एवं पौत्रों की वृद्धि करने वाला हो॥३-१०॥ शौनक ने पूछा-आपने कहाँ के लिए प्रस्थान किया है? कहाँ से आये हैं ? आपका कल्याण हो। आज आपके दर्शन से हमारा दिन कैसा पुण्यमय हो गया है। हम सभी लोग कलियुग में भयभीत हैं, विशिष्ट ज्ञान से शून्य हैं, संसार में डूबे हुए हैं और मोक्ष के अभिलाषी हैं। इसी कारण आप यहाँ पधारे हैं। आप सज्जन, महाभाग्यवान्, पुराणों के वेत्ता, समस्त पुराणों में निष्णात तथा महान् कृपानिधान हैं। महाभाग! आप (कोई) ऐसा ज्ञानवर्धक पुराण बताइए जिससे श्रीकृष्ण में निश्चल एवं नित्य भक्ति प्राप्त हो। क्योंकि हे सूतपुत्र! श्रीकृष्ण की भक्ति मोक्ष से मी श्रेष्ठ, कर्म का मूलोच्छेद करने वाली, संसार में बँधे हुए जीवों का बन्धन काटने वाली, जगत् रूपी दावानलों से दग्ध हुए जीवों पर अमृत-वर्षा करने वाली तथा प्राणियों के हृदय में नित्य-निरन्तर सुख एवं आनन्द देने वाली है॥११-१६।। (आप ऐसा पुराण सुनाइए), जिसके आदिम भाग में सबके बीज (कारणतत्त्व) का प्रतिपादन और परब्रह्म का निरूपण हो। सृष्टि के लिए प्रवृत्त हुए उस (परमात्मा) की सृष्टि का भी उत्तम वर्णन हो। (हम आपसे यह पूछना चाहते हैं कि) परमात्मा का स्वरूप साकार है या निराकार? उस ब्रह्म का स्वरूप क्या है? उसका
१ क. ०लविघ्नं। २ क. सुमहाभागो विनी।
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४ प्रथमोऽध्यायः
ध्यायन्ते वैष्णवाः किं वा शान्ताश्च योगिनस्तथा। मतं प्रधानं केषां वा गूढं वेदे निरूपितम्॥१९॥ प्रकृतेश्च® य आकारो यत्र वत्स निरूपितः। गुणानां लक्षणं यत्र महदादेश्च निश्चयः॥२०॥ गोलोकवर्णनं यत्र यत्र वैकुण्ठवर्णनम्। वर्णनं शिवलोकस्य यत्रान्यत्स्वर्गवर्णनम्॥२१॥ अंशानां च कलानां च यत्र सौते निरूपणम्। के प्राकृताः का प्रकृतिः क आत्मा प्रकृतेः परः॥२२॥ निगूढं जन्म येषां वा देवानां देवयोषिताम्। समुत्पत्तिः समुद्राणां शैलानां सरितामपि॥२३॥ के वांऽशा: प्रकृतेश्चापि कला: का वा कलाकलाः। तासां च चरितं ध्यानं पूजास्तोत्रादिकं शुभम् ॥२४॥ दुर्गासरस्वतीलक्ष्मीसावित्रीणां च वर्णनम्। यत्रव राधिकाख्यानमत्यपूर्वं सुधोपमम्।२५॥ जीवकर्मविपाकश्च नरकाणां च वर्णनम्। कर्मणां खण्डनं यत्र यत्र तेभ्यो विमोक्षणम्॥२६॥ येषां च जीविनां यद्यत्स्थानं यत्र शुभाशुभम्। जीविनां कर्मणो यस्माद्यासु यासु च योनिषु॥२७॥ जीवानां कर्मणो यस्माद्यो यो रोगो भवेदिह। मोक्षणं कर्मणो यस्मात्तेषां च तन्निरूपय ।।२८।। मनसा तुलसी काली गङ्गा पृथ्वी वसुंधरा। आसां यत्र शुभाख्यानमन्यासामपि यत्र वै ॥२९॥ शालग्रामशिलानां च दानानां च निरूपणम्। अपूर्वं यत्र वा सौते धर्माधर्मनिरूपणम्॥३०॥ गणेश्वरस्य चरितं यत्र तज्जन्म कर्म च। कवचस्तोत्रमन्त्राणां गूढानां यत्र वर्णनम्॥३१॥
ध्यान और चिन्तन कैसे किया जाय ? वैष्णव या शान्त योगी जन किसका ध्यान करते हैं? वेद में किनके प्रधान या गूढ़ मत का निरूपण हुआ है? ।।१७-१९।। वत्स! जिस पुराण में प्रकृति के स्वरूप का निरूपण हुआ हो, गुणों का लक्षण (बताया गय। हो) 'महत्' आदि का निर्णय किया गया हो, गोलोक, वैकुण्ठ, शिवलोक तथा स्वर्गों का वर्णन हो और अंशों एवं कलाओं का निरूपण हो, वह हमें सुनाइए। सूतनन्दन ! प्राकृत पदार्थ कौन हैं ? प्रकृति कौन है? और प्रकृति से परे आत्मा कौन है? जिन देवों और देवांगनाओं का जन्म (पृथ्वी पर) गूढ़ रूप से हुआ है, उनके विषय में तथा समुद्रों, पर्वतों और नदियों की उत्पत्ति के विषय में भी हमें बताइए। प्रकृति के अंश कौन हैं ? कलायें कौन हैं ? कलाओं की कलायें कौन हैं ? उनके चरित्र, ध्यान, पूजन तथा पवित्र स्तोत्र आदि जिस पुराण में वणित हों, दुर्गा, सरस्वती, लक्ष्मी तथा सावित्री का वर्णन जिसमें हो, राधिका का अत्यन्त अपूर्व तथा अमृतोपम आख्यान जिसमें हो, जीवों के कर्म-फल तथा नरकों का वर्णन जिसमें हो, कर्मों का खण्डन तथा उनसे मुक्ति पाने का उपाय जिसमें प्रतिपादित हो, वह हमें बताइए। जीवधारियों को जहाँ जो शुभ या अशुभ स्थान प्राप्त होता हो उन्हें जिन कर्मों से जिन योनियों में जाना पड़ता हो, जिन कर्मों से जो रोग होते हों तथा जिन कर्मों से मोक्ष मिलता हो, उनका प्रतिपादन कीजिए॥२०-२८। सूतपुत्र! जिस पुराण में मनसा, तुलसी, काली, गंगा और वसुन्धरा पृथ्वी-इनका तथा अन्य देवियों का भी पवित्र आख्यान हो, शालग्राम शिलाओं तथा दानों का निरूपण हो, धर्म और अधर्म का अपूर्व निरूपण हो, गणपति के चरित्र, जन्म, कर्म, गूढ़ कवच, स्तोत्र तथा मन्त्रों का वर्णन हो तथा जो उपाख्यान पहले न सुना गया हो
१ क. श्च ०किमाका०। २ क. स्य देवस्य उत्पत्तिर्ज
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ब्रह्मवैवर्तपुराण म् ५
यदपूर्वमुपाख्यानमश्रुतं परमान्द् तम्। कृत्वा मनसि तत्सवं सांप्रतं वक्तुमर्हसि ॥३२॥ यत्र जन्मभ्रमो विश्वे पुण्यक्षेत्रे च भारते। परिपूर्णतमस्यापि कृष्णस्य परमात्मनः॥३३॥ जन्म कस्य गृहे लब्धं पुण्ये पुण्यवतो मुने। सुतं प्रसूता का धन्या मान्या पुण्यवती सती॥३४॥ आविर्भूय च तद्गेहात्वव गतः केन हेतुना। गत्वा कि कृतवांस्तत्र कथं वा पुनरागतः॥।३५।। भारावतरणं केन प्रा्थितो गोश्चकार सः। विधाय किंवा सेतुं च गोलोकं गतवान्पुनः॥३६।। इतीदमन्यदाख्यानं पुराणं श्रुतिदुर्लभम्। दुविज्ञेयं मुनीनां च मनोनिर्मलकारणम्॥३७॥ स्वज्ञानाद्यन्मया पृष्टमपृष्टं वा शुभाशुभम्। सद्यो वैराग्यजननं तन्मे व्याख्यातुमर्हसि॥३८॥ शिष्यपृष्टमपृष्टं वा व्याख्यानं कुरुते च यः। ससद्गुरुः सतां श्रेष्ठो योग्यायोग्ये च यः समः॥३९॥
सौतिरुवाच
सवं कुशलमस्माकं त्वत्पादप्मदर्शनात्। सिद्धक्षेत्रादागतोऽहं यामि नारायणाश्रमम्॥४०॥ दृष्ट्वा विप्रसमूहं च नमस्कर्तुमिहागतः। द्रष्टुं च नैमिषारण्यं पुण्यदं चापि भारते॥४१॥ देवं विप्रं गुरुं दृष्टवा न नमेद्यस्तु संभ्नमात्। स कालसूत्रं व्रजति यावच्चन्द्रदिवाकरौ॥४२॥ हर्रिब्राह्मणरूपेण शश्वद्भ्रमति भूतले। सुकृती प्रणमेत्पुण्याद्ब्राह्मणं हरिरूपिणम्।।४३॥
और परम अद्भुत हो, वह सब आप मन में सोचकर इस समय बताएँ। जिस पुराण में विश्व के पुण्य-क्षेत्र भारतवर्ष में परिपूर्णतम परमात्मा कृष्ण के जन्म (अवतार) लेने की बात हो, वह हमें सुनाइए। मुने! किस पुण्यवान् के पवित्र गृह में (भगवान् कृष्ण का) जन्म हुआ? किस धन्य, मान्य एवं पुण्यवती पतिव्रता ने उन्हें पुत्र रूप में जन्म दिया? प्रकट होकर वे उसके घर से कहाँ चले गए? किसलिए गए? जाकर उन्होंने क्या किया? या वे फिर वहाँ कैसे आये? किसकी प्रार्थना करने पर उन्होंने पृथ्वी का भार उतारा? अथवा किस सेतु (मर्यादा) की स्थापना करके वे पुनः गोलोक को पधारे ? इन बातों से तथा अन्य आख्यानों से युक्त जो श्रुतिदुर्लभ पुराण है, उसका सम्यक् ज्ञान मुनियों के लिए भी दुर्लभ है। वह मन को निर्मल करने का साधन है। मैंने अपने ज्ञान के अनुसार जो कुछ शुभ तथा अशुभ बातें पूछी हैं, उनसे सम्बद्ध (या उनका उत्तर देते हुए) जो पुराण सद्ः वैराग्य उत्पन्न करने वाला हो, उसे आप बताएँ। जो शिष्य के पूछे या न पूछे हुए विषय की भी व्याख्या करके बता देता है तथा योग्य और अयोग्य (शिष्य) के प्रति भी समान भाव रखता है, वही सत्पुरुषों में श्रेष्ठ सद्गुरु है ॥२९-३९॥ सूतनन्दन बोल-आपके चरणारविन्द के दर्शन से मेरे लिए सब कुशल है। मैं सिद्ध क्षेत्र से आ रहा हूँ और नारायण-आश्रम को जाऊँगा। ब्राह्मण-समूह को देखकर नमस्कार करने के लिए तथा भारतवर्ष में पुण्यदायक नैमिषारण्य को देखने के लिए भी यहाँ चला आया हूँ। देवता, ब्राह्मण तथा गुरु को देखकर जो झट से उन्हें प्रणाम नहीं करता है, वह कालसूत्र नरक में तब तक पड़ा रहता है जब तक सूर्य और चन्द्रमा रहते हैं। पृथ्वी पर विष्णु
१ क. भारते। २ क. ०कृतिस्तं नमे०।
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६ प्रथमोऽध्यायः
भगत्रन्यत्त्वया पृष्टं ज्ञातं सर्वमभीप्सितम्। सारभूतं पुराणेषु ब्रह्मवैवर्तमुत्तमम्॥४४॥ पुराणोपपुराणानां वेदानां भमभञ्जनम्। हरिभक्तिप्रदं सर्वतत्त्वज्ञानविवर्धनम् ॥४५॥ कामिनां कामदं चेदं मुमुक्षूणां च मोक्षदम्। भक्तिप्रदं वैष्णवानां कल्पवृक्षस्वरूपकम्॥४६॥ ब्रह्मखण्डे सर्वबीजं परब्रह्मनिरूपणम्। ध्यायन्ते योगिनः सन्तो वैष्णवा यत्परात्परम्॥४७॥ वैष्णवा योगिनः सन्तो न च भिन्नाश्च शौनक। स्वज्ञानपरिपाकेन भवन्ति जीविनः क्रमात्॥४८॥ सन्तो भवन्ति सत्सङ्गाद्योगिसंगेन योगिनः। वैष्णवा भक्तसंगेन क्रमात्सद्योगिनः पराः ॥४९॥ यत्रो.द्धवश्च देवानां देवीनां सर्वजीविनाम्। ततः प्रकृतिखण्डे च देवीनां चरितं शुभम्।५०॥ जीवकर्मविपाकश्च शालिग्रामनिरूपणम्। तासां च कवचस्तोत्रमन्त्रपूजानिरूपणम्॥५१॥ प्रकृतेर्लक्षणं तत्र कलांशानां निरूपणम्। कीर्तेरुत्कीतनं तासां प्रभावश्च निरूपितः॥५२।। सुकृतीनां दुष्कृतीनां यद्यत्स्थानं शुभाशुभम्। वर्णनं नरकाणां च रोगाणां मोक्षणं ततः॥५३।। ततो गणेशखण्डे च तज्जन्म परिकीरतितम्। अतीवापूर्वचरितं श्रुतिवेदसुदुर्लभम्॥५४॥ गणेशभृगुसंवादे सर्वतत्त्वनिरूपणम्। निगूढकवचस्तोत्रमन्त्रतन्त्रनिरुपणम् ।।५५।।
ब्राह्मण के रूप में सदा भ्रमण करते रहते हैं। (इसलिए) पुण्यात्मा व्यक्ति (अपने) पुण्य के प्रभाव से विष्णु रूपी ब्राह्मण को प्रणाम करता है। भगवन् ! आपने जो कुछ पूछा है, वह सब (आपका) अभिप्राय मैंने जान लिया। पुराणों में सारभूत ब्रह्मवैवर्तपुराण है। यह पुराण पुराणों, उपपुराणों एवं वेदों के भ्रम का निराकरण करने वाला, हरि-भक्ति देने वाला और समस्त तत्त्वों का ज्ञान बढ़ाने वाला है। यह भोगियों को भोग तथा मुमुक्षुओं को मोक्ष प्रदान करता है। यह वैष्णवों के लिए भक्तिदायक तथा कल्पवृक्ष-स्वरूप है। इसके ब्रह्मखण्ड में सर्व-बीजस्वरूप उस परात्पर परब्रह्म का निरूपण है, जिसका योगी, सन्त तथा वैष्णव ध्यान करते हैं। शौनक ! वैष्णव, योगी तथा सन्त में कोई भेद नहीं है। जीवधारी मनुष्य अपपे ज्ञान के परिणामस्वरूप क्रमशः सन्त आदि होते हैं। सत्संग से मनुष्य सन्त होते हैं, योगी के संग से योगी और भक्त के संग से वैष्णव होते हैं। ये क्रमशः उत्तरोत्तर श्रेष्ठ योगी हैं।४०-४९।। इसके बाद प्रकृतिखण्ड है, जिसमें देवों, देवियों तथा सकल जीवधारियों की उत्पत्ति और देवियों का पवित्र चरित्र व्णित है। जीवों के कर्म-परिणाम तथा शालिग्राम का निरूपण है। उन देवियों के कवच, स्तोत्र, मन्त्र तथा पूजा का भी निरूपण है। उस (प्रकृतिखण्ड) में प्रकृति के लक्षण तथा उसकी कलाओं और अंशों का वर्णन है। उन देवियों की कीर्ति का कीर्तन एवं प्रभाव का प्रतिपादन है। पुण्यात्माओं तथा पापात्माओं को जो-जो शुभ तथा अशुभ स्थान प्राप्त होते हैं, उनका तथा नरकों एवं रोगों और उनसे छूटने के उपाय का भी वर्णन है ॥५०-५३॥ तदनन्तर गणेशखण्ड में गणेश के जन्म एवं वेद-शास्त्रों में अत्यन्त दुर्लभ उनके चरित्र का वर्णन है। गणेश और भृगु के संवाद में सकल तत्त्वों का निरूपण हुआ है। (गणेश के) गूढ़ कवच, स्तोत्र, मन्त्र तथा तन्त्रों का वर्णन है॥५४-५५॥
१ ख. खण्डं स।
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ब्रह्मवैवर्तपुराणम् ७
श्रीकृष्णजन्मखण्डं च कीतितं च ततः परम्। भारते पुण्यक्षेत्रे च श्रीकृष्णजन्म कर्म च।५६।। भुवो भारावतरणं क्रीडाकौतुकमङ्गलम्। सतां सेतुविधानं च जन्मखण्डे निरूपितम्॥५७॥ इदं ते कथितं विप्र पुराणप्रवरं परम्। चतुःखण्डैः परिमितं सर्वधर्मनिरूपणम्।५८॥ सर्वेषामीप्सितं' श्रीदं सर्वाशापूर्णकारकम्। ब्रह्मवव्तकं नाम सर्वाभीष्टफलप्रदम् ॥५९॥ सारभूतं पुराणेषु केवलं वेदसंमतम्। विवृतं ब्रह्म कात्स्न्यं च कृष्णेन यत्र शौनक।६०।। ब्रह्मववतकं तेन प्रवदन्ति पुराविदः ॥।६१।। इदं पुराणसूत्रं च पुरा दत्तं च ब्रह्मणे। निरामये च गोलोके कृष्णेन परमात्मना॥६२।। महातीर्थे पुष्करे च दत्तं धर्माय ब्रह्मणा। धर्मेण दत्तं पुत्राय प्रीत्या नारायणाय च।।६३।। *नारायणषिभगवान्प्रददौ नारदाय च। नारदो व्यासदेवाय प्रददौ जाहवीते॥६४॥। व्यास: पुराणसूत्रं तत्संव्यस्य विपुलं महत्। मह्यं ददौ सिद्धक्षेत्रे पुण्यदेशे मनोहरम्॥६५॥ मयेदं कथितं ब्रह्मँस्तत्समग्रं निशामय। अष्टादशसहस्त्रं तु व्यासनेदं पुराणकात्स्न्यश्रवणे यत्फल पुराणकम् ॥६६।। लभते ननमध्यायश्रवणन च॥६७॥ इति श्री ब्रह्मवैवर्तमहापुराणे सौतिशौनकसंवादे ब्रह्मखण्डे ऽनुक्मणिकानाम प्रथमोऽध्यायः।१।।
तदनन्तर श्रीकृष्णजन्मखण्ड का कीर्तन हुआ है। (उसमें) भारतवर्ष के पुण्य क्षेत्र में श्रीकृष्ण के जन्म-कर्म, (उनके द्वारा) पृथ्वी के भार उतारने, (उनके) मंगलमय क्रीडाकौतुक और सज्जनों के लिए सेतु (मर्यादा)-विधान का वर्णन है। विप्र! यह मैंने परम उत्कृष्ट पुराण के विषय में तुमसे कहा है। यह चार खंडों में सीमित है। इसमें समस्त धर्मों का निरूपण है। यह सबको प्रिय, लक्ष्मीदायक तथा सबकी आशाओं को पूर्ण करने वाला है। इसका नाम ब्रह्मवैवर्त है। यह सम्पूर्ण अभीष्ट फलों को देने वाला है। यह पुराणों का सार है और पूर्णतया वेदों के अनु- कूल है। शौनक! इसमें श्रीकृष्ण ने (अपने) सम्पूर्ण ब्रह्मभाव को प्रकट किया है, इसलिए पुराणवेत्ता इसे ब्रह्म- वैवर्तक कहते हैं ॥५४-६१॥ पूर्वकाल में रोग-रहित गोलोक में परमात्मा श्रीकृष्ण ने यह पुराण-सूत्र ब्रह्मा को दिया था। फिर ब्रह्मा ने महान तीर्थ पुष्कर में यह धर्म को दे दिया। धर्म ने (अपने) पुत्र नारायण को प्रसन्नतापूर्वक यह प्रदान किया। भगवान् नारायण ने नारद को प्रदान किया। नारद ने गंगा-तट पर व्यास जी को दिया। व्यास जी ने उस मनोहर पुराणसूत्र को बहुत विस्तृत करके पुण्य प्रदेश वाले सिद्धक्षेत्र में मुझे दिया। ब्रह्मन् ! मेरे कहे हुए इस सम्पूर्ण पुराण को आप सुनिए। व्यासजी ने इस पुराण को अठारह हजार श्लोकों में विस्तृत किया है। मनुष्य सम्पूर्ण पुराणों के श्रवण से जो फल प्राप्त करता है, वह फल इसके एक अध्याय के श्रवण से ही प्राप्त हो जाता है॥६२-६७।। श्री ब्रह्मवैवर्तमहापुराण के ब्रह्मखण्ड में अनुक्रमणिका नामक पहला अध्याय समाप्त ॥१॥
*इदं श्लोकार्धं ख. पुस्तके नास्ति। १ क. ०प्सिततमं स०। २ ख. ०रणम्। ३ ख. समितम्। ४ क. सिद्धिक्षेण।
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द्वितीयोऽध्यायः
अथ द्वितीयोध्यायः
शौनक उवाच किमपूर्व श्रुतं सौते परमा्द तदर्शनम्। सर्वं कथय संव्यस्य ब्रह्मखण्डमनुत्तमम्॥१॥
सौतिरुवाच
वन्दे गुरोः पादपदमं व्यासस्यामिततेजसः। हरि देवान्द्वजान्नत्वा धर्मान्वक्ष्ये सनातनान्॥२॥ यच्छतं व्यासवक्त्रण ब्रह्मखण्डमनुत्तमम्। अज्ञानान्धतमोध्वंसि ज्ञानवर्त्मप्रदीपकम्॥३॥ ज्योतिः समूहं प्रलये पुराऽडसीत्केवलं द्विज। सूर्यकोटिप्रभं नित्यमसंख्यं विश्वकारणम्॥४॥ स्वेच्छामयस्य च विभोस्तज्ज्योतिरुज्ज्वलं महत्। ज्योतिरभ्यन्तरे लोकत्रयमेव मनोहरम्।।५॥ तेषामुपरि गोलोकं नित्यमीश्वरवद्द्विज। त्रिकोटियोजनायामं विस्तीणं मण्डलाकृति॥६॥ तेजः स्वरूपं सुमहद्रत्नभूमिमयं परम्। अदृश्यं योगिभिः स्वप्ने दृश्यं गम्यं च वैष्णवैः।७॥
अध्याय २
गोलोक आदि की स्थिति का वर्णन तथा श्रीकृष्ण के परात्पर स्वरूप का निरूपण
शौनक बोले-सूतनन्दन! आपने कौन-सा अपूर्व एवं परम अद्भुत शास्त्र (पुराण) सुना है। सबका विस्तार करके (पहले) अत्युत्तम ब्रह्मखण्ड सुनाइए।।१॥ सौति ने कहा-मैं अमित तेजस्वी गुरु व्यासदेव के चरणारविन्द की वन्दना करता हूँ। विष्णु, देवों और ब्राह्मणों को नमस्कार करके मैं सनातन धर्मों का वर्णन कर रहा हूँ। मैंने व्यासजी के मुख से जिस परमोत्तम ब्रह्मखण्ड का श्रवण किया है, वह अज्ञान रूपी अन्धकार का विनाशक तथा ज्ञानमार्ग का प्रकाशक है। द्विज! पहले प्रलयकाल में केवल ज्योतिः समूह था, जिसकी प्रभा करोड़ों सूर्य के समान थी। वह ज्योतिःपुंज नित्य, असंख्य तथा विश्व का कारण है। स्वेच्छामय परमात्मा की वह ज्योति महान् उज्ज्वल है। उस ज्योति के भीतर तीनों लोक मनोहर रूप में विद्यमान हैं। द्विज ! उन (तीनों लोक) के ऊपर गोलोक है, जो परमात्मा के समान नित्य है। उसकी लंबाई-चौड़ाई तीन करोड़ योजन है। वह मंडलाकार में फैला हुआ है। वह महान् तेजःस्वरूप है तथा वहाँ की भूमि परम रत्नमयी है। योगी स्वप्न में भी उसे नहीं देख पाते हैं, जब कि वैष्णव (उसे) देखते और प्राप्त भी
१ क. ०तमीप्सितम्। २ क. ०त्यममरव० ।
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ब्रह्म वैवर्तपुराणम् ९
योगेन धृतमीशेन चान्तरिक्षस्थितं वरम्। आधिव्याधिजरामृत्युशोकभीतिविवजितम्॥८॥ सव्रत्नरचितासंख्यमन्दिरैः परिशोभितम्। लये कृष्णयुतं सृष्टौ गोपगोपीभिरावृतम्।।९॥ तदधो दक्षिणे सव्ये पञ्चाशत्कोटियोजनात्। वैकुण्ठं शिवलोकं तु तत्समं सुमनोहरम्॥१०॥ कोटियोजनविस्तीणं वैकुण्ठं मण्डलाकृति। लये शून्यं च सृष्टौ च लक्ष्मीनारायणान्वितम्॥११॥ चतुर्भुजैः पार्षदैश्च जरामृत्यवादिवजितम्। सव्ये च शिवलोकं च कोटियोजनविस्तृतम् ॥१२॥ लये शून्यं च सृष्टौ च सपार्षदशिवान्वितम्। गोलोकाभ्यन्तरे ज्योतिरतीवसुमनोहरम् ॥१३॥ परमाह्लादकं शश्वत्परमानन्दकारकम्। ध्यायन्ते योगिनः शश्वद्योगेन ज्ञानचक्षुषा॥१४॥ तवेवानन्दजनकं निराकारं परात्परम्। तज्ज्योतिरन्तरे रूपमतीवसुमनोहरम्॥१५॥ नवीननीरदश्यामं रक्तप ङ्ूजलोचनम्। शारदीयपार्वणेन्दुशोभितं चामलाननम् ॥१६॥ कोटिकन्दर्पलावण्यं लीलाधाम मनोरमम्। द्विभुजं मुरलीहस्तं सस्मितं पीतवाससम् ॥१७॥ 'सद्रत्नभूषणौघन भूषितं भक्तवत्सलम्। चन्दनोक्षितसर्वाङ्गं कस्तूरीकुङकुमान्वितम् ॥१८॥ श्रीवत्सवक्ष:संभ्ाजत्कौस्तुभेन विराजितम् । सद्रत्नसाररचितकिरोटमुकुटोज्ज्वलम्॥१९।।
करते हैं। आकाश में स्थित उस श्रेष्ठ लोक को परमात्मा ने योगशक्ति से धारण कर रखा है। गोलोक आधि (मानसिक रोग), व्याधि (शारीरिक रोग), मृत्यु, शोक तथा भय से रहित है। उत्तम रत्नों से खचित असंख्य मन्दिर उसकी शोभा बढ़ाते हैं। प्रलयकाल में वहाँ केवल श्रीकृष्ण रहते हैं और सृष्टिकाल में वह गोप-गोपियों से भरा रहता है ॥२-९।। गोलोक से नीचे पचास करोड़ योजन दूर दक्षिण भाग में वैकुंठ और वामभाग में शिवलोक है। ये दोनों लोक मी गोलोक के समान अत्यन्त सुन्दर हैं। वैकुंठ मंडलाकार में एक करोड़ योजन तक फैला हुआ है। प्रलय- काल में वह शून्य रहता है और सृष्टिकाल में वहाँ लक्ष्मी और नारायण विराजमान रहते हैं। उनके साथ चार भुजा बाले पार्षद मी रहते हैं। वैकुंठ भी जरा, मृत्यु आदि से रहित है। उसके वाम भाग में एक करोड़ योजन में फैला हुआ शिवलोक है। प्रलयकाल में शिवलोक शून्य रहता है और सृष्टिकाल में पार्षदों समेत शंकर वहाँ विराजमान रहते हैं। गोलोक के भीतर अत्यन्त मनोहर ज्योति है, जो परम आह लादजनक तथा नित्य परमानन्द उत्पन्न करने वाली है। योगी जन सदा योग के द्वारा ज्ञानचक्ष से उसका ध्यान करते हैं। वह ज्योति ही आनन्ददायक, निराकार तथा परात्पर ब्रह्म है। उस ज्योति के भीतर अत्यन्त मनोहर रूप विराजमान है, जो नये बादल के समान श्यामवर्ण है। उसके नेत्र लाल कमल के समान हैं। उसका निर्मल मुख शरत्पूर्णिमा के समान शोभायमान है। करोड़ों कन्दर्प के तुल्य उसका लावण्य है। वह मनोरम रूप (विविध) लीलाओं का धाम है। उसकी दो भुजाएँ हैं, हाथ में मुरली है। चेहरा मुसकराता हुआ है और शरीर पीताम्बरधारी है। वह उत्तम रत्नों के आभूषणों से विभूषित, भक्त-वत्सल है। उसके अंग चंदन से चर्चित तथा कस्तूरी और केसर से युक्त हैं। उसका वक्षःस्थल श्रीवत्स चिह्न तथा कौस्तुभ मणि से सुशोमित है। उत्तम रत्नों के सार-तत्त्व से बने हुए किरीट-मुकुटों से उसका मस्तक भासमान है। वह रत्न-सिंहासन पर आसीन तथा वनमाला से विभूषित है। वही परम ब्रह्म एवं सनातन भगवान् है। वह स्वेच्छामय
१ क. ०द्रत्नर्भूषणैः प्रेमभू० । २
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१० तृतीयोऽध्यायः ररत्नासहासनस्थं च वनमालाविभूषितम्। तदेव परमं ब्रह्म भगवन्तं सनातनम् ॥२०॥ स्वेच्छामयं ससर्वबीजं दुसर्वाधारं उपरात्परम्। किशोरवयसं शश्वद्गोपवेषविधायकम् ॥२१॥ कोटिपूर्णेन्दुशोभाढयं भक्तानुग्रहकारकम्। निरीहं निर्विकारं च परिपूर्णतमं विभुम्॥२२। रासमण्डलमध्यस्थं शान्तं रासेश्वरं' वरम्। माङ्गल्यं मङ्गलाहं च मङ्गलं मङ्गलप्रदम् ॥२३॥ परमानन्दबीजं च सत्यमक्षरमव्ययम्। सर्वसिद्धेश्वरं सर्वसिद्धिरूपं च सिद्धिदम् ॥२४॥ प्रकृतेः परमीशानं निर्गुणं नित्यविग्रहम्। आद्यं पुरुषमव्यक्तं पुरुहूतं पुरुष्टुतम् ॥।२५॥ सत्यं स्वतन्त्रमेकं च परमात्मस्वरूपकम्। ध्यायन्ते वैष्णवाः शान्ताः शान्तं तत्परमायणम्॥२६॥ एवं रूपं परं बिभ्रं्द्गवानेक एव सः। दिग्भिश्च नभसा सार्धं शून्यं विश्वं ददर्श ह।२७। इति श्रीब्रह्मवैवर्ते महापुराणे सौतिशौनकसंवादे ब्रह्मखण्डे परब्रह्मनिरूपणं नाम द्वितीयोऽध्यायः ॥२॥
अथ तृतीयोऽध्यापः
सौतिरुवाच दृष्टवा शून्यमयं विश्वं गोलोकं च भयंकरम्। निर्जन्तुनिर्जलं घोरं निर्वातं तमसाऽडवृतम् ॥१॥
सब का आदिकारण सब का आधार तथा परात्पर ब्रह्म है। उसकी नित्य किशोरावस्था रहती है और वह गोपवेष धारण किये रहता है। वह करोड़ों पूणंचन्द्र की शोभा से युक्त है तथा मक्तों पर अनुग्रह करने वाला है। वह निरीह, निर्विकार, परिपूर्णतम, सर्वव्यापक, रासमंडल के मध्य में अवस्थित, शान्त, रासेश्वर, श्रेष्ठ मंगलकारी, मंगलयोग्य, मंगलमय, परमानन्द का बीज, सत्य, अक्षर, अविनाशी, समस्त सिद्धियों का प्रभु, सकल सिद्धियों का स्वरूप, सिद्धिदायक, प्रकृति से परे, ईश्वर, निगुण, नित्यशरीरधारी, आदिपुरुष, अव्यक्त, बहुत नामों से पुकारा जाने वाला, बहुतों द्वारा स्तवन किया जाने वाला, सत्य, स्वतन्त्र, एक, परमात्मस्वरूप, शान्त तथा परम आश्रय है। शान्त वैष्णव जन उसी का ध्यान करते हैं। इस प्रकार परम रूप धारण करने वाले वे भगवान् एक ही हैं। उन्होंने (प्रलय काल में) दिशाओं और आकाश के साथ विश्व को शून्य देखा।१०-२७॥ श्री ब्रह्मवैवतंमहापुराण के ब्रह्मखण्ड में परब्रह्मनिरूपण नामक दूसरा अध्याय समाप्त ॥२॥
अध्याप ३ श्रीकृष्ण से सृष्टि का आरंभ तथा नारायण द्वारा श्रीकृष्ण की स्तुति सौति बोले-द्विज ! स्वेच्छामय प्रभु ने देखा कि गोलोक भयंकर लग रहा है और विश्व शून्यमय,
१ क. ०से हरं हरिम्० । २ क. ०न्दराजं। ३ क. ०रं सिद्धसि०। ४ क. एकं रू०।
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ब्रह्मववतपुरणम् ११
वृक्षशलसमुद्रादिविहोनं विकृताकृतिम्। निमृत्तिकं' च निर्धातुं निःसस्यं निस्तृणं द्विज ॥२॥ आलोच्य मनसा सर्वमेक एवासहायवान्। स्वेच्छया स्रष्टुरमारेभे सृष्टिं स्वेच्छामयः प्रभुः॥३॥ आविर्बभवुः सर्गादौ' पुंसो दक्षिणपाश्वतः। भवकारणरूपाश्च मूर्तिमन्तस्त्रयो गुणाः।।४।। ततो महानहंकारः पञ्चतन्मात्र एव च। रूपरसगन्धस्पशशब्दाश्चर्वेति संज्ञकाः॥५॥ आविबंभूव तत्पश्चात्स्वयं नारायण: प्रभुः। श्यामो युवा पीतवासा वनमाली चतुर्भुजः ॥६॥ शङ्चकरगदापद्मधरः स्मेरमुखाम्बुजः। रत्नभूषणभूषाढयः शार्ङ्गो कौस्तुभभूषणः।७।। श्रीवत्सवक्षाः श्रीवासः श्रीनिधिः श्रीविभावनः। शारदेन्दुप्रभामृष्टमुखेन्दुसुमनोहरः॥८i कामदवप्रभामृष्टरूपलावण्यसुन्दरः। श्रीकृष्णपुरतः स्थित्वा तुष्टाव तं पुटाञ्जलि:॥९॥ नारायण उवाच वरं वरेण्यं वरदं वराहँ वरकारणम्। कारणं कारणानां च कर्म तत्कमंकारणम्॥१०॥ तपस्तत्फलदं शश्वत्तपस्वीशं च तापसम्। वन्दे नवघनश्यामं स्वात्मारामं मनोहरम्॥११॥ निष्कामं कामरूपं च कामघ्नं कामकारणम्। सर्वे सर्वेश्वरं सवंबीजरूपमनुत्तमम्॥१२॥ वेदरूपं वेदबीजं वेदोक्तफलदं फलम्। वेदज्ञं तद्विधानं च सर्ववेदविदां वरम्॥१३॥
मयंकर, जीव-जन्तुओं से रहित, जल-विहीन, दारुण, वायुशून्य, अंधकार से आवृत, वृक्ष, पर्वत एवं समुद्र आदि से विहीन, विकृताकार, मृत्तिका, धातु, सस्य और तृण से रहित हो गया है। मन ही मन सब बातों की आलोचना करके सहायक रहित, एकमात्र प्रभु ने स्वेच्छा से सृष्टि-रचना आरंभ की॥१-३॥ सृष्टि के आदि में (उस परम) पुरुष के दक्षिण पार्श्व से संसार के कारण रूप तीन मूर्तिमान् गुण प्रकट हुए। उन (गुणों) से महत्तत्त्व, अहंकार, पंचतन्मात्राएं और रूप, रस, गन् स्पशं और शब्द (क्मशः) उत्पन्न हुए। तत्पश्चात् स्वयं नारायण प्रभु प्रकट हुए जो श्यामवणं, तरुण, पीताम्बर, चतुर्ुज, शंख, चक्र्, गदा और पद्म धारण किए हुए, मुखारविन्द पर मन्द मुसकान से युक्त, रत्नों के आमूषणों से सम्पन्न, शार्ङ्गघनुष धारण किए हुए, कोस्तुभ मणि से विभूषित, वक्षःस्थल पर श्रीवत्स चिह्न से युक्त, लक्ष्मी के निवास, शोभा के निधान, श्री के चिन्तक, शरत्काल की पूर्णिमा के चन्द्रमा की प्रभा से सेवित मुखचन्द्र के कारण अत्यन्त मनोहर और कामदेव की कान्ति से युक्त रूप-लावण्य के कारण सुन्दर थे। वे श्रीकृष्ण के सामने खड़े होकर दोनों हाथ जोड़ कर उनकी स्तुति करने लगे।४-९।। नारायण बोल-जो वर (श्रेष्ठ), वन्दनीय, वरदायक, वर देने में समर्थ, वर (की प्राप्ति) के कारण, कारणों के मी कारण, कर्मस्वरूप, उस कर्मं के भी कारण, तपः स्वरूप, निरन्तर उस तप के फल देने वाले, तपस्वी, तपस्वियों के प्रभु, नवीन मेघ के समान श्याम, स्वात्माराम, मनोहर, निष्काम, कामरूप, कामना के नाशक, कामदेव की उत्पत्ति के कारण, सब, सब के ईश्वर, सवंबीजस्वरूप, सर्वोत्तम, वेदस्वरूप, वेदों के बीज, वेदोक्त फल के दाता फलरूप, वेदों के ज्ञाता, उसके विधान को जानने वाले तथा सम्पूर्ण वेदवेत्ताओं के शिरोमणि हैं, उनकी मैं वन्दना करता हूँ॥१०-१३।।
१ ख. निर्मुक्तिकं। २क. सर्वादौ। ३ क. ०मपूरं च। ४ ख. ०दभवं वे०।
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१२ तृतीयोऽध्यायः
इत्युक्त्वा भक्तियुक्तश्च स उवास तदाज्ञया। रत्नसिंहासने रम्ये पुरतः परमात्मनः॥१४॥ नारायणकृतं स्तोत्रं यः पठेत्सुसमाहितः। त्रिसंध्यं यः पठेन्नित्यं पापं तस्य न विद्यते॥१५॥ पुत्रार्थी लभते पुत्रं भार्यार्थी लभते प्रियाम्। भ्रष्टराज्यो लभेद्राज्यं धनं भ्रष्टधनो लभेत्॥१६॥ कारागारे विपद्ग्रस्तः स्तोत्रेणानेन मुच्यते। रोगात्प्रमुच्यते रोगी' वर्ष श्रुत्वा च संयतः॥१७। इति ब्रह्मवैवर्ते नारायणकृतं श्रीकृष्णस्तोत्रम्।
सौतिरुवाच आविर्बभूव तत्पश्चादात्मनो वामपाश्वतः। शुद्धस्फटिकसंकाशः पञ्चवक्त्रो दिगम्बरः॥१८॥ तप्तकाञ्चनवर्णाभजटाभारधरो वरः। इंषद्धास्यप्रसन्नास्यस्त्रिनेत्रश्चन्द्रशेखरः ॥१९॥ त्रिशूलपट्टिशधरो जपमालाकरः परः। सर्वसिद्धेश्वरः सिद्धो योगीन्द्राणां गुरोर्गुरुः॥२०॥ मृत्योमृ त्युरीश्वरश्च मृत्युरमृ त्युंजय: शिवः। ज्ञानानन्दो महाज्ञानी महाज्ञानप्रदः परः॥२१॥ पूर्णचन्द्रप्रभामृष्टसुखदृश्यो मनोहरः। वैष्णवानां च प्रवरः प्रज्वलन्ब्रह्मतजसा ॥२२॥ श्रीकृष्णपुरतः स्थित्वा तुष्टाव तं पुटाञजलिः। पुलकाङकितसर्वाङ्ग: साश्रुनेत्रोऽतिगद्गदः ॥२३॥
ऐसा कह कर भक्ति से युक्त वे (नारायण) उनकी आज्ञा से परमात्मा (कृष्ण) के सामने रत्न-निर्मित रमणीय सिंहासन पर आसीन हो गये। जो एकाग्रचित्त होकर नारायण द्वारा किये गये इस स्तोत्र का पाठ करता है और जो नित्य, तीनों संध्याओं के समय (इसको) पढ़ता है, वह निष्पाप हो जाता है। इसके पाठ से पुत्र चाहने वाले को पुत्र मिलता है, पत्नी की कामना करने वाले को पत्नी मिलती है,राज्य से भ्रष्ट हुए को राज्य मिलता है और धन से वंचित हुए को धन की प्राप्ति होती है। कारागार के भीतर विपत्ति में पड़ा हुआ व्यक्ति इस स्तोत्र के प्रभाव से (कारागार से) छूट जाता है। एक वर्ष तक संयमपूर्वक इस स्तोत्र को सुन कर रोगी रोग से मुक्त हो जाता है॥१४-१७॥ श्रीब्रह्मववर्तमहापुराण में नारायणकृत श्रीकृष्णस्तोत्र समाप्त। सौति बोले-अनन्तर उनके बायें पार्श्व से शुद्ध स्फटिक मणि के समान धवल, पाँच मुख वाले, दिगम्बर (नग्न), तपाये हुए सुवर्ण की कान्ति के समान जटाओं को धारण किये हुए, श्रेष्ठ, मन्द मुसकान करते हुए प्रसन्न- मुख, त्रिनेत्र, भाल पर चन्द्रमा को धारण किये हुए, हाथों में त्रिशूल, पट्टिश और जपमाला लिए हुए, सर्वसिद्धेश्वर, सिद्ध, योगीन्द्रों के गुरु के गुरु हैं, मृत्यु के मृत्यु, ईश्वर, मृत्यु रूप, मृत्यु को जीतने वाले, कल्याणकारक, ज्ञानानन्द, महाज्ञानी, श्रेष्ठ, महाज्ञानदाता, पूर्ण चन्द्रमा की प्रभा से भूषित मुख वाले, मनोहर, वैष्णवों के शिरोमणि और ब्रह्म तेज से देदीप्यमान शंकर प्रकट हुए। उन्होंने भगवान् श्रीकृष्ण के सामने खड़े होकर हाथ जोड़कर उनकी स्तुति करना
१ ख. ०गी ध्रुवं श्रु० ।
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ब्रह्मवैवर्तपुराणम् १३
महादेव उवाच जयस्वरूपं जयदं जयेशं जयकारणम्। प्रवरं जयदानां' च वन्दे तमपराजितम्॥२४॥ विस्वं विश्वेश्वरेशं च विश्वेशं विश्वकारणम्। विश्वाधारं च विश्वस्थं विश्वकारणकारणम् ॥२५॥ विश्वरक्षाकारणं च विश्वघ्नं विश्वजं परम्। फलबीजं फलाधारं फलं च तत्फलप्रदम्॥२६।। तेजःस्वरूपं तेजोदं सर्वतेजस्विनां वरम्। इत्येवमुक्त्वा तं नत्वा रत्नसिंहासने वरे। नारायणं च संभाष्य उवास स तदाज्ञया ।।२ ७।। इति शंभुकृतं स्तोत्रं यो जनः संयतः पठेत्। सर्वसिद्धिर्भवेत्तस्य विजयं च पदे पदे॥२८।। संततं वर्धते मित्रं धनमैश्वर्यमेव च। शत्रुसैन्यं क्षयं याति दुःखानि दुरितानि च ॥।२९।। इति ब्रह्मवैवर्ते शंभुकृतं श्रीकृष्णस्तोत्रम्।
सौतिरुवाच आविर्बभूव तत्पश्चात्कृष्णस्य नाभिप ङ्कजात्। महातपस्वी वृद्धश्च कमण्डलुकरो वरः॥३०॥ शुक्लवासा: शुक्लदन्तः शुक्लकेशश्चतुर्मुखः। योगीशः शिल्पिनामीशः सर्वेषां जनको गुरुः॥३१॥
आरम्म किया। उस समय उनके शरीर में रोमांच रहा था, आँखें आसुओं से भरी थीं और वाणी अत्यन्त गदुगद हो रही थी॥१८-२३॥ महादेव बोल-जयस्वरूप, जय देने वाले, जय के कारण, जय देने वालों में सर्वश्रेठ और अपराजित उस देव की मैं वन्दना कर रहा हूँ जो विश्वरूप, विश्वेश्वराधिपति, विश्व के ईश,विश्व के कारण, विश्व के आधार, विश्व में स्थित, विश्वकारण के कारण, विश्व की रक्षा के कारण, विश्वहन्ता, विश्व की सृष्टि में सर्वोत्तम, फल के बीज, फल के आधार, फलस्वरूप, फल के भी फलदाता, तेज:स्वरूप, तेजोदायक और समस्त तेजस्वियों में श्रेष्ठ हैं ॥२४-२६३।। ऐसा कह कर नमस्कार करके उनकी आज्ञा से श्रेष्ठ रत्नमय सिंहासन पर नारायण के साथ वार्तालाप करते हुए वे बैठ गए। जो मनुष्य संयतचित्त होकर इस शम्मु-रचित स्तोत्र का पाठ करता है उसके सभी कार्यों की सिद्धि और पग-पग पर विजय प्राप्त होती है। उसके मित्र, धन, ऐश्वर्य की सदा वृद्धि होती है और शत्रुओं की सेनाएं, दुःख एवं पाप नष्ट होते हैं।२७-२९।। श्रीब्रह्मववर्तमहापुराण में शम्भुकृत श्रीकृष्ण-स्तोत्र समाप्त।
सौति बोल-तदनन्तर भगवान् कृष्ण के नाभि-कमल से महातपस्वी, श्रेष्ठ और हाथ में कमण्डलु लिए वृद्ध ब्रह्म प्रकट हुए। उनके वस्त्र, दाँत और केश धवल थे। चार मुख थे। वे योगिराज, शिल्पियों के अधीश्वर,
१ क. दाने च। २ ख. ०श्वस्तं वि०।
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१४ तृतीयोऽ्ध्याय: तपसां फलदाता च प्रदाता सर्वसंपदाम्। स्रष्टा विधाता कर्ता च हर्ता च सर्वकर्मणाम् ॥।३२। धाता चतुर्णां वेदानां ज्ञाता वेदप्रसूपतिः। शान्तः सरस्वतीकान्तः सुशीलश्च कृपानिधिः॥३३॥ श्रीकृष्णपुरतः स्थित्वा तुष्टाव तं पुटाञ्जलिः। पुलका्गितिसर्वाङ्गो भक्तिनम्ात्मकंधरः॥३४।। ब्रह्मोवाच कृष्णं वन्दे गुणातीतं गोविन्दमेकमक्षरम्। अव्यक्तमव्ययं व्यक्तं गोपवेषविधायिनम्॥३५॥ किशोरवयसं शान्तं गोपीकान्तं मनोहरम्। नवीननीरदश्यामं कोटिकन्दर्पसुन्दरम्॥३६॥ वृन्दावनवनाभ्यर्णे रासमण्डलसंस्थितम्। रासेश्वरं रासवासं रासोल्लाससमुत्सु कम् ॥३७॥ इत्येवमुक्त्वा तं नत्वा रत्नसिंहासने वरे। नारायणेशौ संभाष्य स उवास तदाज्ञया॥३८।। इति ब्रह्मकृतं स्तोत्रं प्रातरुत्थाय यः पठेत्। पापानि तस्य नश्यन्ति दुःस्वप्नः सुस्वप्नो भवेत् ॥३९॥ भक्तिर्भवति गोविन्दे श्रीपुत्रपौत्रवधिनी। अकीतिः क्षयमाप्नोति सत्कीतिर्वर्धते चिरम्॥४0। इति ब्रह्मवैवर्ते ब्रह्मकृतं श्रीकृष्णस्तोत्रम्। सौतिरुवाच आविर्बभूव तत्पश्चाद्वक्षसः परमात्मनः। सस्मितः पुरुषः कश्चिच्छुकलवर्णो जटाधरः॥४१॥ सबके उत्पादक, गुरु, तपस्याओं के फलदाता, समस्त सम्पत्तियों के प्रदायक, स्रष्टा, विधाता, समस्त कर्मों के कर्ता, हर्ता, धाता (धारण करने वाले), चारों वेदों के ज्ञाता, वेदों के प्रकट करने वाले और उनके पति, शान्त, सरस्वती के कान्त, सुशील तथा कृपानिधान हैं। उन्होंने भगवान् श्रीकृष्ण के सामने हाथ जोड़ कर उनका स्तवन किया। उस समय उनके सम्पूर्ण अंगों में रोमांच हो आया तथा उनकी ग्रीवा भगवान् के सामने भक्तिभाव से झुक गई थी॥३०-३४॥ ब्रह्मा बोल-मैं भगवान् कृष्ण की वन्दना करता हूँ, जो गुणों से परे, एकमात्र गोविन्द, अविनाशी, अव्यय (नित्य एक रस रहने वाले), व्यक्त, गोपवेषधारी, किशोर अवस्था वाले, शान्त, गोपियों के कान्त, मनोहर, नवीनधन की माँति श्यामल, करोड़ों काम से सुन्दर, वृन्दावन के भीतर रास-मण्डल में विराजमान, रासेश्वर., रास में सदैव रहने वाले और रासजनित उल्लास के लिए सदा उत्सुक रहने वाले हैं॥३५-३७॥ ऐसा कहकर श्रीकृष्ण को नमस्कार करके उनकी आज्ञा से नारायण और सिव के साथ संभाषण करते हुए ब्ह्मा श्रेष्ठ रत्नसिंहासन पर बैठ गये। जो प्रातःकाल उठकर ब्रह्मा द्वारा किए गए इस स्तोत्र का पाठ करता है उसके पाप नष्ट हो जाते हैं और द्वःस्वप्न सुस्वप्न हो जाता है। उसे शी, पुत्र एवं पोत्र बढ़ाने वाली गोविन्द की मक्ति प्राप्त होती है। उसकी अपकीति नष्ट हो जाती है और सत्कीर्ति चिरकाल तक बढ़ती रहती है॥३८-४०॥ श्रीबह्मवेवतंमहापुराण में ब्रह्मकृत श्रीकृष्णस्तोत्र समाप्त। सौति बोले-तत्परचात उस परमात्मा के वक्षःस्थल से शुक्ल वर्ण का कोई एक जटाधारी पुरुष प्रकट हुआ, जो मन्द मुसकान कर रहा था और सभी जीवों के समस्त कर्मों का साक्षी, सवज्ञाता, सर्वत्र समभाव से रहने
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ब्र ह्मवैवर्तपुराणम् १५
सर्वसाक्षी च सर्वज्ञः सर्वेषां सर्वकर्मणाम्। समः सर्वत्र सदयो हिंसाकोपविवर्जितः ।।४२।। भर्मज्ञानयुतो धर्मो धर्मिष्ठो धर्मदो भवेत्। स एद धर्मिणां धर्मः परमात्मा फलोनद्धव: ॥४३॥ श्रीकृष्णपुरतः स्थित्वा प्रणम्य दण्डव्ड्ध वि। तुष्टाव परमात्मानं सर्वेशं सर्वकामदम् ॥४४॥ श्रीधर्म उवाच कृष्णं विष्णुं वासुदेवं परमात्मानमोश्वरम्। गोविन्दं परमानन्दमेकमक्षरमच्युतम्॥४५॥ गोपेश्वरं च गोपीशं गोपं गोरक्षकं विभुम्। गवामीशं च्व गोष्ठस्थं गोवत्सपुच्छधारिणम्।।४६।। गोगोपगोपीमध्यस्थं प्रधानं पुरुषोत्तमम्। 'वन्देऽनवद्यमनघं श्यामं शान्तं मनोहरम्॥४७।। इत्युच्चार्य समुत्तिष्ठन्रत्नसिंहासने वरे। ब्रह्मविष्णुमहेशांस्तान्संभाष्य स उवास है।४८।। चतुरविशतिनामानि धर्मवव्त्रोद्गतानि च। यः पठेत्प्रातरुत्थाय स सुखी सर्वतो जयी॥४९॥ मृत्युकाले हरेरनाम तस्य साध्यं भवेद्ध्रुवम्। स यात्यन्ते हरे: स्थानं हरिदास्यं भवेद्ध्रुवम्॥५०॥ नित्यं धर्मस्तं घटते नाधर्मे तद्रतिर्भवेत्। चतुर्वर्गफलं तस्य शश्वत्करगतं भवेत्॥५१। तं दृष्टवा सर्वपापानि पलायन्ते भयेन च। भयानि चैव दुःखानि वैनतेयमिवोरगाः ॥५२॥ इति ब्रह्मववर्ते धर्मकृतं श्रीकृष्णस्तोत्रम्।
वाला, सहृदय, हिंसा और कोध से हीन, धर्म ज्ञान से युक्त, धर्ममूर्ति, धर्मिष्ठ, धर्मियों का धर्म, परमात्मा तथा फल- दाता था। उन्होंने भगवान् श्री कृष्ण के सामने खड़े होकर भूमि में दण्डवत् प्रणाम किया और सबके प्रभु एवं समस्त कामनाओं के देने वाले उन परमात्मा की स्तुति करना आरम्भ किया॥४१-४४॥ धर्म बोल-कृष्ण, विष्णु, वासुदेव, परमात्मा, ईश्वर, गोविन्द, परमानन्दरूप, एक, अविनाशी, अच्युत, गोपेश्वर, गोपीश, गोप, गोरक्षक, व्यापक, गोओं के ईश, गोष्ठ (गोशाला) में रहने वाले, गौओं के बछड़ों की पूंछ धारण करने वाले तथा गौ, गोप और गोपियों के मध्य रहने वाले, प्रधान, पुरुषोत्तम, अनवद्य, अनघ, श्याम, शान्त और मनोहर (परमात्मा) की मैं वन्दना करता हूँ॥४५-४७॥ ऐसा कह कर धर्म उठकर खड़े हुए। फिर वे भगवान् की आज्ञा से ब्रह्मा, विष्णु और महादेव के साथ वार्तालाप करते हुए उस श्रेष्ठ रत्नमय सिंहासन पर बैठे॥४८॥ जो प्रातःकाल उठकर धर्म के मुख से निकले हुए इन चौबीस नामों का पाठ करता है वह सर्वत्र सुखी और विजयी होता है।४९।। मृत्यु के समय उसके मुख से हरि-नाम का उच्चारण निश्चित रूप से होता है और अन्त काल में भगवान् के स्थान में जाकर वह भगवान् की दास्य-भक्ति अवश्य प्राप्त करता है।५०। नित्य उसे धर्म की ही प्राप्ति होती है और अधर्म में उसकी रुचि कभी नहीं होती है। चारों वर्गों (धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष) का फल सदा के लिए उसके हाथ में आ जाता है ॥५१॥ उसे देखते ही समस्त पाप, भय तथा दुःख भयभीत होकर उसी तरह भाग खड़े होते हैं जैसे गरुड को देख कर साँप (भाग जाते हैं) ।।५२।। श्रीब्रह्मववतंमहापुराण में धर्मकृत श्रीकृष्णस्तोत्र समाप्त।
१ क. ०न्दे नवधनश्यामं कामवासं म०। २ स. ०वेद्भवि०। ३ क. स्यं लभेदघ्ु० ।
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१६ तृतीयोऽध्यायः
सौतिरुवाच आविर्बभूव कन्यैका धर्मस्य वामपाश्वतः। मूर्तिर्मूरतिमती साक्षाद्द्वितीया कमलालया।५३॥ आविर्बभूव तत्पश्चान्मुखतः परमात्मनः। एका देवी शुक्लवर्णा वीणापुस्तकधारिणी॥५४॥ कोटिपूर्णेन्दुशोभाढ्या शरत्पङ्वजलोचना। वह्निशुद्धांश काधाना रत्नभूषणभूषिता।५५॥ सस्मिता सुदती श्यामा सुन्दरीणां च सुन्दरी। श्रेष्ठा श्रुतीनां शास्त्राणां विदुषां जननी परा ॥५६॥ वागधिष्ठातृदेवी सा कवीनामिष्टदेवता। शुद्धसत्त्वस्वरूपा च शान्तरूपा सरस्वती॥५७। गोविन्दपुरतः स्थित्वा जगौ प्रथमतः सुखम्। तन्नामगुणकीतिं च वीणया सा ननर्त च॥५८॥ कृतानि यानि कर्माणि कल्पे कल्पे युगे युगे। तानि सर्वाणि हरिणा तुष्टाव च पुटाञ्जलि:॥५९॥ सरस्वत्युवाच रासमण्डलमध्यस्थं रासोल्लाससमुत्सुकम्। रत्नसिंहासनस्थं च रत्नभूषणभूषितम् ॥६०॥। रासेश्वरं रासकरं वरं रासेश्वरीश्वरम्। रासाधिष्ठातृदेवं च वन्दे रासविनोदिनम्॥६१।। रासायासपरिश्रान्तं रासरासविहारिणम्। रासोत्सुकानां गोपीनां कान्तं शान्तं मनोहरम्॥६२।। प्रणम्य च तमित्युक्त्वा प्रहृष्टवदना सती। उवास सा सकामा च रत्नसिंहासने वरे॥६३॥ इति वाणीकृतं स्तोत्रं प्रातरुत्थाय यः पठेत्। बुद्धिमान्धनवान्सोऽपि विद्यावान्पुत्रवान्सदा।।६४।। इति ब्रह्मवैवर्ते सरस्वतीकृतं श्रीकृष्णस्तोत्रम्। सौति बोले-तत्पश्चात् धर्म के वाम पार्श्व से एक रूपवती कन्या प्रकट हुई, जो साक्षात् दूसरी लक्ष्मी के समान थी। वह मूर्ति नाम से विख्यात हुई॥५३॥ उसके अनन्तर परमात्मा के मुख से वीणा और पुस्तक लिए हुए एक शुक्ल वर्ण की देवी प्रकट हुई, जो करोड़ों पूर्णचन्द्रमा की शोभा से सम्पन्न थी। उसके नेत्र शरत्कालीन कमल के समान थे। वह अग्नि में तपाये हुए सुवर्ण की भाँति वस्त्र और रत्नों के भूषणों से विभूषित थी॥५४-५५॥ वह मन्द मुसकान करती थी एवं उसके दाँत बड़े सुन्दर थे। वह श्यामा (सोलह वर्ष की युवती) सुन्दरियोंमें भी श्रेष्ठ सुन्दरी, श्रुतियों, शास्त्रों और विद्वानों की परमोत्तम जननी, वाणी की अधिष्ठात्री देवी, कवियों की इष्ट देवी, शुद्ध सत्त्व स्वरूप वाली और शान्तरूपिणी सरस्वती थी। उसने भगवान् कृष्ण के सामने स्थित होकर सर्वप्रथम वीणावादन के साथ उनके नाम और गुणों का सुन्दर कीर्तन किया। फिर वह नृत्य करने लगी। उसने हाथ जोड़ कर प्रत्येक कल्प और युगों में किए हुए भगवान के सभी कार्यों का गान करते हुए उनकी स्तुति की ॥५६-५९॥ सस्स्वती बोली-रास-मण्डल के मध्य में स्थित, रासोल्लास के लिए अत्यन्त उत्सुक, रत्नजटित सिंहासन पर सुशोभित, रत्नों के भूषणों से विभूषित, रासेश्वर, श्रेष्ठ रास करने वाले, रासेश्वरी (श्री राघिक। जी) के प्राण- वल्लभ, रास के अधिष्ठाता देव और रासविनोदी (आप) की मैं वन्दना करती हूँ। जो रास-क्रीडा से श्रान्त हैं, प्रत्येक रास में विहार करने वाले हैं तथा रास से उत्कण्ठित हुई गोपियों के प्राणवल्लभ हैं, उन शान्त मनोहर श्रीकृष्ण को मैं प्रणाम करती हूँ। इस प्रकार उन्हें प्रणाम करके वह सती सरस्वती प्रसन्नचित्त एवं सफलमनोरथ होकर उस उत्तम रत्न सिंहासन पर समासीन हो गई।६०-६३।। प्रातःकाल उठ कर जो इस सरस्वती कृत स्तोत्र का पाठ करेगा वह सदा बुद्धिमान्, धनवान्, विद्वान् और पुत्रवान् होगा॥६४।। श्रीब्रह्मववर्तमहापुराण में सरस्वती कृत श्रीकृष्णस्तोत्र समाप्त।
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ब्रह्मवैवर्तपुराणम् १७
सौतिरुवाच आविर्बभूव मनसः कृष्णस्य परमात्मनः। एका देवी गौरवर्णा रत्नालंकारभूषिता ।६५।। पीतवस्त्रपरीधाना सस्मिता नवयौवना। सर्वेश्वर्याधिदेवी सा सर्वसंपत्फलप्रदा।। स्वर्गे च स्वर्गलक्ष्मीश्च राजलक्ष्मीश्च राजसु १६६।। सा हरे: पुरतः स्थित्वा परमात्मानमीश्वरम्। तुष्टाव प्रणता साध्वी भक्तिनम्रात्मकंधरा॥६७।।
महालक्ष्मीरुवाच सत्यस्वरूपं सत्येशं सत्यबीजं सनातनम्। सत्याधारं च सत्यज्ञं सत्यमूलं नमाम्यहम् ।६८।। इत्युक्त्वा श्रीहरिं नत्वा सा चोवास सुखासने। तप्तकाञ्चनवर्णाभा भासयन्ती दिशस्त्विषा॥६९।। आविर्बभूव तत्पश्चाद्बुद्धेश्च परमात्मनः। सर्वाधिष्ठातृदेवी सा मूलप्रकृतिरीश्वरी॥७०॥ तप्तकाञचनवर्णाभा सूर्यकोटिसमप्रभा। ईषद्धास्यप्रसन्नास्या शरत्प ङ्गजलोचना।७१।। रक्तवस्त्रपरीधाना रत्नाभरणभूषिता। निद्रातृष्णाक्षुत्पिपासादयाश्रद्धाक्षमादिकाः ॥७२।। तासां च सर्वशक्तीनामीशाऽधिष्ठातृदेवता। भयंकरी शतभुजा दुर्गा दुर्गार्तिनाशिनी॥७३॥ आत्मनः शक्तिरूपा सा जगतां जननी परा। त्रिशूलशक्तिशा्ङ्ग च धनुःखङ्गशराणि च ।।७४।
सौति बोल-मगवान् कृष्ण के मन से एक गौर वर्णा देवी प्रकट हुई, जो रत्नों के अलंकारों से भूषित पीताम्बर धारण किये हुए तथा मंदमुसकान से युक्त नवयुवती थी। वह समस्त ऐश्वर्यों की अधिष्ठात्री देवी और समस्त सम्पत्ति का फल प्रदान करने वाली है। वही स्वर्ग में स्वर्ग की लक्ष्मी एवं राजाओं के यहाँ राजलक्ष्मी कही जाती है। उसने भगवान के सामने खड़ी होकर उन्हें प्रणाम किया और भक्तिभावसे ग्रीवा को झुका कर परमात्मा की स्तुति की ॥६५-६७॥ महालक्ष्मी बोली-सत्य स्वरूप, सत्य के स्वामी, सत्य के बीज, सनातन, सत्य के आधार, सत्य के ज्ञाता और उस सत्य के कारण को मैं नमस्कार कर रही हूँ॥६८॥ तपाये हुए सुवर्ण की भाँति प्रभा से पूर्ण और दिशाओं को अपनी कान्ति से प्रकाशित करती हुई वह (महालक्ष्मी) भी हरि को नमस्कार कर के उस सुखमय सिंहासन पर बैठ गयी।६९।। अनन्तर उस परमात्मा की बुद्धि से मूल प्रकृति प्रकट हुई, जो सब की अघिष्ठात्री देवी और ईश्वरी है॥७०॥ वह तपाये हुए सुवर्ण के समान कान्ति वाली वह देवी करोड़ों सूर्यों का तिरस्कार कर रही थी। उसका मुख मंद मु सकान से प्रसन्न दीख रहा था। उसके नेत्र शारदीय कमल के समान थे। वह लाल रंग के वस्त्र पहने हुये थी तथा रत्नों के आभूषणों से भूषित थी। निद्रा, तृष्णा, क्षुधा, पिपासा, दया, श्रद्धा, क्षमा आदि जो देवियाँ हैं, उन सब की तथा समस्त शक्तियों की वह अधिष्ठात्री देवी है। वह भयंकरी, सौ भुजाएँ धारण करने वाली और दुर्ग के समान दुःखों का नाश करने वाली दुर्गा है। वह आत्मा की शक्तिरूपा और समस्त जगत की श्रेष्ठ जननी है। त्रिशूल, शक्ति,
१ क. ०त्यराजं स०। ३
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१८ तृतीयोऽध्याय:
शङ्गचक्रगदापद्ममक्षमालां कमण्डलुम्। वज्मङकुशपाशं् भुशुण्डोदण्डतोमरम्।७५॥ नारायणास्त्रं ब्रह्मास्त्रं रौद्रं पाशुपतं तथा। पार्जन्यं वारुणं वाह्नं गान्धर्व बिभ्रती सती। कृष्णस्य पुरतः स्थित्वा तुष्टाव तं मुदान्विता ।७६॥ प्रकृतिरुवाचष अहं प्रकृतिरीशाना सर्वेशा सर्वरूपिणी। सर्वशक्तिस्वरूपा च मया च शक्तिमज्जगत् ॥७७॥ त्वया सृष्टा न स्वतन्त्रा त्वमेव जगतां पतिः। गतिश्च पाता स्रष्टा च संहर्ता च पुनववधि:।७८।। स्रष्टुं स्रष्टा च संहतुँ संहर्ता वेधसां विधिः। परमानन्दरूपं त्वां वन्दे चाऽऽनन्दपूर्वकम्। चक्षुनिमेषकाले च ब्रह्मण: पतनं भवेत् ।।७९।। तस्य प्रभावमतुलं र्वणितुं क: क्षमो विभो। भ्रूभङ्गलीलामात्रेण विष्णुकोटिं सृजेत्तु यः॥८०।। चराचरांश्च विश्वेषु देवान्ब्रह्मपुरोगमान्। मद्विधाः कति वा देवीः स्त्रष्टुं शक्तशच लीलया।।८१।। परिपूर्णतमं स्वीडयं वन्दे चाऽऽनन्दपूर्वकम्। महान्विराड् यत्कलांशो विश्वसंख्याश्रयो विभो। वन्दे चाऽऽनन्दपूर्व तं परमात्मानमीश्वरम् ।।८२ ।। यं च स्तोतुमशक्ताश्च ब्रह्मविष्णुशिवादयः। वेदा अहं च वाणी च वन्दे तं प्रकृतेः परम्॥८३॥ वेदाश्च विदुषां श्रेष्ठा: स्तोतुं शक्ताश्च लक्ष्यतः। निर्लक्ष्यं कः क्षमःस्तोतुं तं निरोहं नमाम्यहम् ॥८४॥
धनुष, खङ्ग, बाण, शंख, चक्र, गदा, पद्म, अक्षमाला, कमण्डलु, वज्र, अंकुश, पाश, भुशुण्डी, दण्ड, तोमर, नारायणास्त्र, ब्रह्मास्त्र, रौद्रास्त्र, पाशुपतास्त्र, पार्जन्यास्त्र, वारुणास्त्र, आग्नेयास्त्र तथा गान्वर्वास्त्र-इन सब को हाथों में धारण किये वह सती भगवान् कृष्ण के सामने खड़ी होकर प्रसन्न चित्त से उनकी स्तुति करने लगी।७१-७६। प्रकृति बोली-मैं प्रकृति, ईश्वरी, सर्वश्वरी, सर्वरूपिणी और सर्वशक्तिस्वरूपा कहलाती हूँ। मुझसे यह जगत् शक्तिमान् है ॥७७।। आप इस जगत् के स्वतन्त्र स्रष्टा नहीं हैं, किन्तु इसके पति, गति, रक्षक, स्रष्टा, संहारक एवं पुनः सृष्टि करने वाले हैं॥७८।। आप सर्जन करने के लिए स्रष्टा, संहार करने के लिए संहर्ता एवं ब्रह्मा के मी उत्पादक हैं। ऐसे परमानन्द रूप आपकी मैं सहर्ष वन्दना करती हूँ। हे विभो! आपके पलक भाँजते ही ब्रह्मा का पतन हो जाता है। जो अपनी भ्रूमङ्ग की लीला मात्र से करोड़ों विष्णु को उत्पन्न कर सकता है ऐसे आपके अनुपम प्रभाव का वर्णन करने में कौन समर्थ हो सकता है?॥७९-८०।। उसी प्रकार आप सारे ब्रह्माण्ड में चर-अचर प्राणियों, ब्रह्मा आदि देवगणों और मेरे समान कितनी देवियों को लीला मात्र से उत्पन्न करने में समर्थ हैं ॥८१॥ अतः परिपूर्ण- तम एवं अपने से स्तुति के योग्य आपकी मैं सानन्द वन्दना करती हूँ। असंख्य विश्व का आश्रयभूत महान् विराट् पुरुष जिनकी कालामात्र का अंश है, उन परमात्मा (श्रीकृष्ण) की मैं सहर्ष वन्दना करती हूँ ॥८२॥ जिसकी स्तुति करने में ब्रह्मा, विष्णु, शिव, वेद, मैं और वाणी (सरस्वती) असमर्थ हैं तथा जो प्रकृति से परे हैं उन (ईश) की मैं वन्दना करती हूँ।८३॥ श्रेष्ठ विद्वान् तथा वेद भी जिनकी स्तुति करने में समर्थ नहीं हैं और जो लक्ष्यहीन एवम् निरीह हैं, उनकी स्तुति करने में कौन समर्थ हो सकता है? अतः मैं उन परमात्मा को प्रणाम कर रही हूँ॥८४॥ १ क. ०वाय्वं गा०। २ क. ०स्रष्टुः स्रष्टा च संहर्तु: सं०। ३. क. ०चरेषु वि० ।
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ब्रह्मवेवर्तपुराणम् १९
इत्यवमुक्त्वा सा दुर्गा रत्नसिंहासने वरे। उवास नत्वा श्रीकृष्णं तुष्टुवुस्तां सुरेश्वराः।८५। इति दुर्गाकृतं स्तोत्रं कृष्णस्य परमात्मनः। यः पठेदर्चनाकाले स जयी सर्वतः सुखी ॥८६॥ दुर्गा तस्य गृहं त्यक्त्वा नैव याति कदाचन। भवाब्धौ यशसा भाति यात्यन्ते श्रीहरे: पुरम्।।८७। इति श्रीब्रह्मवैवर्ते महापुराणे ब्रह्मखण्डे सौतिशौनकसंवादे सृष्टिनिरूपणे दुर्गास्तोत्रं नाम तृतीयोऽध्यायः ।३।
अथ चतुर्थोऽध्यायः
सौतिरुवाच आविर्बभूव तत्पश्चात्कृष्णस्य रसनाग्रतः। शुद्धस्फटिकसंकाशा देवी चैका मनोहरा॥१॥ शुक्लवस्त्रपरीधाना सर्वालंकारभूषिता। बिम्नती जपमालां च सावित्री सा प्रकीर्तिता।।२।। सा तुष्टाव पुरः स्थित्वा परं ब्रह्म सनातनम्। पुटाञ्जलिपरा साध्वी भक्तिनम्रात्मकंधरा।।३।।
इस प्रकार कह कर और भगवान् श्रीकृष्ण को प्रणाम करके वह दुर्गा देवी रत्न-सिंहासन पर बैठ गई। उपरान्त देवनायकों ने दुर्गा की स्तुति की ।८५॥ इस प्रकार जो पूजाकाल में दुर्गा रचित परमात्मा श्रीकृष्ण के इस स्तोत्र का पाठ करता है वह सभी स्थानों में विजयी और सुखी होता है।। ८६।। दुर्गा उसका गृह छोड़ कर कभी नहीं जाती हैं। इस संसार-सागर में उसका यश सुशोभित रहता है और अन्त काल में वह भगवान् श्री हरि की पुरी में जाता है।८७। श्रीब्रह्मवैवर्त महापुराण के ब्रह्मखण्ड में सौति-शौनक-संवाद के द्वारा सृष्टि-निरूपण के प्रसंग में दुर्गास्तोत्र नामक तीसरा अध्याय समाप्त ॥३॥
अध्याय ४
सावित्री, कामदेव, रति आदि के प्राकट्य का वर्णन
सौति बोले-उसके अनन्तर भगवान् श्री कृष्ण की जिह वा के अग्र भाग से शुद्ध स्फटिक के समान उज्जवल वर्ण की एक मनोहारिणी देवी प्रकट हुई, जो शुक्लवस्त्र पहने हुए, समस्त आभूषणों से विभूषित और (हाथ में) जपमाला लिए हुए थी। उसे सावित्री कहा गया है॥१-२। वह पतिव्रता सामने खड़ी होकर हाथ जोड़ भक्ति से शिर झुकाकर सनातन परब्रह्म (श्रीकृष्ण) की स्तुति करने लगी ।।३।।
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२० चतुर्थोषध्याय: सावित्रयुवाच नमामि सर्वबीजं त्वां 'ब्रह्मज्योतिः सनातनम्। परात्परतरं श्यामं निर्विकारं निरञ्जनम्॥४। इत्युक्त्वा सस्मिता देवी रत्नससिंहासने वरे। उवास श्रीहरिं नत्वा पुनरेव श्रुतिप्रसूः॥।५॥ आविर्बभूव तत्पश्चात्कृष्णस्य परमात्मनः। मानसाच्च पुमानेकस्तप्तकाञ्चनसंनिभः॥६॥ मनो मथ्नाति सर्वेषां पञ्चवाणेन कामिनाम्। तन्नाम मन्मथं तेन प्रवदन्ति मनीषिणः।।७।। तस्य पुंसो वामपाश्वात्कामस्य कामिनी वरा। बभूवातीवललिता सर्वेषां मोहकारिणी॥८।। रतिर्बभूव सर्वेषां तां वृष्टवा सस्मितां सतीम्। रतीति तेन तन्नाम प्रवदन्ति मनीषिण:।।९।। हरि स्तुत्वा तया साद्वं स उवास हरे: पुरः। रत्नसिंहासने रम्ये पञ्चबाणो धनुर्धरः॥१०॥ मारणं स्तम्भनं चैव जुम्भणं शोषणं तथा। उन्मादनं पञ्चबाणान्पञ्चबाणो बिर्भत सः॥११॥ बाणांरिचिक्षेप सर्वाश्च कामो बाणपरीक्षया। सद्यः सर्वे सकामाश्च बभूवुरीश्वरेच्छया॥१२॥ रतिं दृष्ट्वा ब्रह्मणश्च रेतःपातो बभूव ह। तत्र तस्थौ महायोगी वस्त्रेणाऽऽच्छाद्य लज्जया॥१२॥ वस्त्रं दग्ध्वा समुत्तस्थौ ज्वलदग्निः सुरेश्वरः। कोटितालप्रमाणशच सशिखश्च समुज्ज्वलन्॥१३॥ कृष्णस्तद्वर्धनं' दृष्टवा ससर्जापः स्वलीलया। निःश्वासवायुना साधं मुखबिन्दून्समुदि्गरन्॥१५॥ सावित्री बोली-सबके बीज (आदि कारण) उस सनातन ब्रह्म ज्योति को मैं नमस्कार करती हूँ, जो पर से मी अत्यन्त परे, श्याम, निर्विकार और निरञ्जन (ब्रह्म) है ।४।। इतना कहकर मुसकराती हुई वह वेदमाता (सावित्री) मगवान् श्री हरि को नमस्कार कर उस उत्तम रत्न-सिंहा सन पर आसीन हो गई॥५॥ अनन्तर परमात्मा कृष्ण के मन से तपाये हुए सुवर्ण के समान एक पुरुष उत्पन्न हुआ, जो अपने पाँच बाणों से समस्त कामियों के मन को मथ डालता है। इसीलिए बुद्धिमान् लोग उसे 'मन्मथ' (कामदेव) कहते हैं।६-७।। उस कामदेव के वाम पार्श्व से एक अत्यन्त सुन्दरी एवं परमोत्तम कामिनी प्रकट हुई, जो समस्त पुरुषों को मुग्ध करती है।।८।। मन्द-मन्द मुसकराती हुई उस सती को देखकर सभी प्राणियों की उसमें रति हो गई। इसीलिए बुद्धिमानों ने उसका नाम 'रति' बताया है।९॥ भगवान् के सामने उनकी स्तुति करने के उपरान्त बाण तथा (पुष्पमय) धनुष धारण करनेवाला कामदेव रत्नसिंहासन पर उस रति के साथ आसीन हुआ ॥१०॥ मारण, स्तम्भन, जुम्मण, शोषण और उन्मादन, इन्हीं पांचों वाणों को वह सदैव अपनाये रहता है॥११।। कामदेव ने अपने बाणों की परीक्षा करने के लिए सभी बाण चला दिये। फिर तो ईश्वर की इच्छा से उसी समय सब लोग कामुक हो गये। (यहाँ तक कि) रति को देखकर ब्रह्मा का वीर्यपात हो गया किन्तु महायोगी ब्रह्मा लज्जा वश उसे वस्त्र से आच्छादित कर वहीं खड़े रहे॥१२-१३॥ पश्चात् उस वस्त्र को जलाते हुए सुरेश्वर अग्निदेव बड़ी-बड़ी लपटें उठाते हुए करोड़ों ताड़ों के समान विशाल रूप धारण करके प्रज्वलित होने लगे॥१४॥ भगवान् कृष्ण ने उस बढ़ते हुए अग्निको देखकर अपनी लीला से जल उत्पन्न किया-अपने निःश्वास वायु के साथ मुख से जल की एक-एक बूँद गिराने लगे ॥१५॥ द्विज! उसी मुखबिंदु के जल १ क. वह्मयोनि स०। २ ख. ०ने चाऽडस्य प०। ३ क. ०ष्णस्तं दहन।
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ब्रह्मववतंपुराण म् २१
विश्वौघं प्लावयामास मुखबिन्दुजलं द्विज। तत्र किचिज्जलक्णं (णो) र्वाह्नि शान्तं चकार ह॥१६।। ततःप्रभूति तेनाग्निस्तोयान्निर्वाणतां व्रजेत्। आविर्भूतः पुमानकस्ततस्तदधिदेवता।।१७।। उत्तस्थौ तज्जलादेकः पुमान्स वरुणः स्मृतः। जलाधिष्ठातृदेवोऽसौ सर्वेषां यादसां पतिः॥१८॥ आविर्बभूव कन्यैका तद्वह नेर्वामपाश्वतः। सा स्वाहा वह निपत्नीं तां प्रवदन्ति मनीषिणः॥१९॥ जलेशस्य वामपाश्वा्किन्या चैका बभूव सा। वरुणानीति विख्याता वरुणस्य प्रिया सती॥२०॥ बभूव पवनः श्रीमान्विभोनिःश्वासवायुना। सच प्राणरच सर्वेषां निःश्वासस्तत्कलो.द्रवः॥२१।। तस्य वायोर्वामपारश्वात्कन्या चैका बभूव ह। वायोः पत्नी च सा देवी वायवी परिकीतिता॥२२॥ कृष्णस्य कामबाणेन रेतः पातो बभूव ह। जले 'तद्रेचनं चकरे लज्जया सुरसंसदि॥२३॥ सहस्रवत्सरान्ते रतड्डिम्भरूपं बभूव है। ततो महान्विराड्जज्ञे विश्वोघाधार एव सः॥२४॥ यस्यैकलोमविवरे विश्वैकस्य व्यवस्थितिः। स्थूलात्स्थूलतरः सोऽपि महान्नान्यस्ततः परः॥२५॥ स एव षोडशांशोऽपि कृष्णस्य परमात्मनः। महाविष्णुः स विज्ञेयः सर्वाधारः सनातनः॥२६॥ महार्णवे शयानः स पद्मपत्रं यथा जले। बभूवतुस्तौ द्वौ देत्यौ तस्य कर्णमलोनदवौ।।२७॥ तौ जलाच्च समुत्थाय ब्रह्माणं हन्तुमुद्यतौ। नारायणश्च भगदाञ्जघने तौ जघान ह।।२८।।
से समस्त विश्व आप्लावित (जलमग्न) हो गया। और उसी जल के कुछ कणों ने उस अग्नि को शान्त कर दिया। उसी समय से अग्नि जल से शान्त होने लगा। पश्चात् उसी जल से उसका अधिदेवता एक पुरुष रूप में प्रकट हुआ जिसे 'वरुण' कहा गया है। वह जल का अधिष्ठाता देव समस्त जल जीवों का अधिपति है॥१६-१८॥ अनन्तर अग्नि के वाम पारश्व से एक कन्या प्रकट हुई, जो अग्नि की पत्नी हुई और मनीषी लोग उसे 'स्वाहा' कहते हैं ॥१९॥ जलेश्वर (वरुण) के वाम पार्श्व से भी एक कन्या उत्पन्न हुई, जो वरुण की प्रेयसी स्त्री वरुणानी कही जाती है॥२०॥ पुनः उस प्रभु के निःश्वास वायु से श्रीमान् पवन देव की उत्पत्ति हुई, जो सभी के प्राण हैं। श्वास-प्रश्वास के रूप में उसी की कला प्रकट हुई है।।२१॥ उस वायु के भी वाम पारश्व से एक कन्या उत्पन्न हुई, जो वायु की पत्नी हुई और उस देवी को 'दायवी' कहा जाता है।।२२। पश्चात् काम-बाण द्वारा भगवान् कृष्ण का वीर्यपात हुआ किन्तु उस देवसभा में लज्जावश उन्होंने उसे जल में डाल दिया।।२३।। सहस्र वर्ष के उपरान्त वह एक अंडे के रूप में प्रकट हुआ। उसी से महान् विराट् उत्पन्न हुआ, जो समस्त विश्व का आधार है॥२४॥ जिसके एक लोम के विवर (छिद्र) में एक विश्व सुव्यवस्थित रहता है। वह स्थूल से अत्यन्त स्थूल है और उससे बड़ा दूसरा कोई नहीं है।।२५॥ वह परमात्मा श्रीकृष्ण का सोलहवाँ अंश है। उसी को 'महाविष्णु' जानना चाहिए, जो सब के आधार और सनातन है।२६।। जल में कमल के पत्ते की भाँति वे महासागर में शयन किये हुए हैं। जिनके कान के मल से दो दैत्य उत्पन्न हुए।।२७।। उन दैत्यों ने जल से उठकर ब्रह्मा की हत्या करनी चाही किन्तु नारायण भगवान् ने अपने जघन पर (उनकी इच्छा से) उनका वध किया॥२८।। और उन्हीं दोनों के मेद (चर्बी) से समस्त पृथ्वी निर्मित हुई। इसी
१ क. तत्प्रेरणं च०। २ क. तद्विन्दुरू०।
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२२ पञ्चमोष््ध्याय:
बभूव मेदिनी कृत्स्ना' कात्स्न्येन मेदसा तयोः । तत्रव सन्ति विश्वानि साच देवी वसुंधरा॥२९॥ इति श्रीब्रह्मववर्ते महापुराणे ब्रह्मखण्डे सौतिशौनकसंवादे सृष्टिनिरूपणं नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥४।।
अथ पञ्चमोऽध्यायः
शौनक उवाच
गोगोपगोप्यो गोलोके किं नित्याः किं नु कल्पिताः । ममसंदेहभेदार्थ तन्मे व्याख्यातुमर्हसि॥१॥ सौतिरुवाच सर्वादिसृष्टौ ता: क्लृप्ता: प्रलये कृष्णसंस्थिताः। सर्वादिसृष्टिकयनं यन्मया कथितं द्विज ॥२॥ सर्वादिसृष्टौ क्लृप्तौ च नारायणमहेश्वरौ। प्रलये प्रलये व्यवतौ स्थितौ तौ प्रकृतिश्च सा।।३।।
लिये इसे 'मेदिनी' कहा जाता है। उसी पर समस्त विश्व टिका हुआ है। उसकी अधिष्ठात्री देवी का नाम वसुन्धरा है।२९।। श्रीब्रह्मववर्तमहापुराण के ब्रह्मखण्ड में सौति-शौनक-संवाद प्रकरण में चौथा अध्याय समाप्त ॥४।।
अध्याय ५
गोलोक आदि के नित्यानित्यत्व की व्यवस्था तथा राधा से गोपांगनाओं का प्रादुर्भाव
शौनक बोले-गोलोक में गायें, गोप और गोपियाँ क्या नित्य (सदेव) रहती हैं या कल्पित हैं? मेरे सन्देह के निवारणार्थ आप इसको बताने की कृपा करें॥१॥ सौति बोले-द्विज ! सब की आदि सृष्टि में, जिसका वर्णन मैं कर चुका हूँ, वे गायें, गोप तथा गोपियाँ प्रकट रूप से रहती हैं और प्रलयकाल में वे कृष्ण में अवस्थित हो जाती हैं। सबकी आदि सुष्टि में नारायण और महेश्वर प्रकट रूप से रहते हैं। प्रलयकाल में भी ये दोनों तथा प्रकृति व्यक्त रूप से रहती हैं ।।२-३।। हे द्विज !
१ क. कृष्णा कार्ष्ण्यन मे०। २ ख. ०ये प्रलये स्थि० ।
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ब्रह्मवैवर्तपुराणम् २३
।1 सर्वादौ ब्रह्मकल्पस्य चरितं कथितं द्विज। वाराहपाझ्मकल्पौ द्वौ कर्थयिष्यामि श्रोष्यसि॥४॥ ब्राह्मवाराहपाझ्ाश्च कल्पाश्च त्रिविधा मुने। यथा युगानि चत्वारि क्रमेण कथितानि च॥५॥ सत्यं त्रेता द्वापरं च कलिश्चेति चतुर्युगम्। त्रिशतश्च षष्टयधिकैर्युगैर्दिव्यं युगं स्मृतम् ।६॥ मन्वन्तरं तु दिव्यानां युगानामेकसप्ततिः। चतुर्दशेषु मनुषु गतेषु ब्रह्मणो दिनम्।७॥ त्रिशतैश्च षष्टयधिकर्दिनैर्वषं च ब्रह्मणः। अष्टोत्तरं वर्षशतं दिधेरायुर्निरूपितम्॥८॥ एतन्निमेषकालस्तु कृष्णस्य परमात्मनः। ब्रह्मणरचाऽडयुषा कल्पः कालविन्भिनिरुपित: ।।९।। क्षुद्रकल्पा बहुतरास्ते संवर्तादयः स्मृताः। सप्तकल्पान्तजीवी च मार्कण्डेयश्च तन्मतः॥१०॥ ब्रह्मणश्च दिनेनैव स कल्पः परिकीतितः। विधेश्च सप्तदिवसैर्मुनेरायुर्निरुपितम्॥११॥ ब्राह्मवाराहपाद्याशच त्रयः कल्पा निरूपिताः। कल्पत्रये यथा सृष्टिः कथयामि निशामय॥१२॥ ब्राह्मे च मेदिनीं सृष्टवा स्रष्टा सृष्टिं चकार सः। मधुकेटभयोश्चंव मेदसा चाऽऽज्ञया प्रभोः॥१३॥ वाराह तां समुद्धत्य लुप्तां मग्नां रसातलात्। विष्णोर्वराहरूपस्य द्वारा चातिप्रयत्नतः॥१४॥। पादे विष्णोर्नाभिषद्मे स्रष्टा सृष्टिं विनिर्ममे। त्रिलोकों ब्रह्मलोकान्तां नित्यलोकत्रयं बिना॥१५। एतत्तु कालसंख्यानमुक्तं सृष्टिनिरूपणे। किंचिन्निरूपणं सृष्टेः किं भूयः श्रोतुमिच्छसि॥१६॥
(इस पुराण में) मैंने सब से पहले ब्रह्मकल्प के चरित्र का वर्णन किया है। अब वाराह कल्प और पादकल्प इन दोनों का वर्णन करूँगा, सुनिए।।४।। हे मुने ! ब्राह्म, वाराह, पाद के भेद से कल्प तीन प्रकार के होते हैं। जैसे सत्य, त्रेता, द्वापर और कलि-ये चारों युग कम से कहे गए हैं, वैसे ही वे कल्प भी हैं। तीन सौ साठ युगों का एक 'दिव्य युग' होता है ॥५-६।। एकहत्तर दिव्य युगों का एक मन्वन्तर होता है और चौदह मनुओं के व्यतीत हो जाने पर ब्रह्मा का एक दिन होता है।।७।। ऐसे तीन सौ साठ दिनों के बीतने पर ब्रह्मा का एक वर्ष पूरा होता है। इस तरह के एक सौ आठ वर्षों की ब्रह्मा की आयु बतायी गयी है। परमात्मा कृष्ण का यही निमेष-काल कहा गया है। काल- वेत्ताओं ने ब्रह्मा की आयु के बराबर 'कल्प' का मान निश्चित किया है।८-९। संवर्त आदि छोटे-छोटे कल्प तो अनेक हैं। मार्कण्डेय जी सात कल्पों तक जीने वाले बताये गए हैं॥१०॥ किन्तु वह कल्प ब्रह्मा के एक दिन के बराबर ही बताया गया है। अतः ब्रह्मा के सात दिनों में मुनि (मार्कण्डेय) की आयु पूरी हो जाती है॥११॥ ब्राह्म, वाराह और पाद यही तीन कल्प हैं और इन तीनों कल्पों में जिस प्रकार सृष्टि होती है, वह बताता हूँ, सुनो! ॥१२॥ ब्राह्म कल्प में मधु और कैटभ नामक देत्यों के मेद (चर्बी) से पृथिवी का निर्माण करके स्रष्टा ने प्रभु श्रीकृष्ण की आज्ञा से सृष्टि-रचना की ॥१३॥ वाराह कल्प में जलमग्न एवं लुप्त हुई पृथिवी को वाराह रूपधारी भगवान् विष्णु के द्वारा अत्यन्त प्रयत्नपूर्वक रसातल से उसका उद्धार करवाया और सृष्टि-रचना की ॥१४॥ पश्चात् पाद कल्प में भगवान् विष्णु की नाभि-कमल पर स्रष्टा ने सृष्टि का निर्माण किया। ब्रह्मलोकपर्यन्त जो त्रिलोकी है, उसी की रचना की, ऊपर के जो नित्य तीन लोक हैं, उनकी नहीं ॥१५॥ सृष्टि-निरूपण के प्रसंग में मैंने यह कालगणना बतायी है और अंशतः सृष्टि का निरूपण किया है। अब और क्या सुनना चाहते हो?॥१६॥
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२४ पञ्चमोऽध्यायः
शौनक उवाच अतः परं किं चकार भगवान्सात्वतां पतिः। एतान्सृष्टवा कि चकार तन्मे व्याख्यातुमहंसि ॥१७॥ सौतिरुवाच अतः परं तु गोलोके गोलोकेशो महान्प्रभुः। एतान्सृष्ट्वा जगामासौ रम्यं रासमण्डलम्। एतैः समेतंर्भगवानतीव कमनीयकम् ।।१८॥ रम्याणां कल्पवृक्षाणां मध्येऽतीवमनोहरम्। सुविस्तीणं च सुसमं सुस्निग्धं मण्डलाकृति॥१९॥ सुसंस्कृतम्। पट्टसूत्रग्रन्थियुक्तं नवचन्दनपल्लवः। संयुक्तरम्भास्तम्भानां समूहै: परिवेष्टितम्॥२१॥ सद्र त्नसारनिर्माणमण्डपानां त्रिकोटिभिः। रत्नप्रदीपज्वलितैः पुष्पधूपाधिवासितै: ॥२२॥। शृङ्गारारहभोगवस्तुसमूहपरिवेष्टितम्। अतीवललिताकल्पतल्पयुक्तैः सुशोितम ॥२३॥ तत्र गत्वा च तैः सार्धं समुवास जगत्पतिः। दृष्ट्वा रासं विस्मितास्ते बभवुर्मुनिरत्तम ॥२४॥ आविर्बभूव कन्यंका कृष्णस्य वामपाश्वतः। धावित्वा पुष्पमानीय ददावर्ध्य प्रभो: पढे॥२५॥ रासे संभूय गोलोके सा दवाव हरे पुरः। तेन राधा समाख्याता पुरादिद्िटविजोस्म॥२६॥ प्राणाधिष्ठातृदेवी सा कृष्णस्य परमात्मनः। आविर्बभूव प्राणेभ्यः प्राणेभ्योऽपि गरीयसी॥२७॥ देवी षोडशवर्षीया नवयौवनसंयुता। वह निशुद्धांशुकाधाना [सस्मिता सुमनोहरा॥२८॥
शौनक बोल-इसके उपरान्त भगवान् श्रीकृष्ण ने क्या किया-किसकी सृष्टि की-बताने की कृपा करें॥१७॥ सौति बोल-इसके उपरान्त गोलोकेश भगवान् श्रीकृष्ण गोलोक में इन सब की सृष्टि करके अत्यन्त सुन्दर एवं मनोहर रासमण्डल में गए। वह रमणीय कल्पवृक्षों के मध्य मण्डलाकार रासमण्डल अत्यन्त मनोहर दिखायी देता था।१८-१९।। चन्दन, अगुरु, कस्तूरी, कुंकुम से उसको सजाया गया था। उस पर दि, लावा, सत्तू, धान्य और दूर्वादल बिखेरे गये थे। रेशमी सूत में गुंथे हुए नूतन चन्दन-पल्लवों की बन्दनवारों और केले के स्तम्भों से वह घिरा हुआ था। उत्तम रत्नों के सार भाग से सुरचित तीन करोड़ मंडप उस भूमि की शोभा बढ़ा रहे थे। उनके भीतर रत्नमय प्रदीप जल रहे थे। वे पुष्प और धूप से वासित थे॥२०-२२॥ उनके भीतर अत्यन्त ललित प्रसाधन-सामग्री रखी हुई थी॥२३॥ उन सब को साथ लिए भगवान् जगतीपति कृष्णचन्द्र वहाँ जाकर ठहरे। मुनिश्रेष्ठ ! उस रास को देखकर वे सब अत्यन्त आश्चर्यचकित हो उठे॥२४॥ उसी समय भगवान् श्रीकृष्ण के वाम पाश्व से एक कन्या उत्पन्न हुई। वह दौड़ कर तुरन्त पुष्प ले आई और प्रभु कृष्ण को पग-पग पर अर्ध्य प्रदान करने लगी॥२५॥ द्विजोत्तम ! रास में उत्पन्न होकर गोलोक में भगवान् के सामने दौड़ने के कारण विद्वानों ने उसे 'राधा' कहा है।।२६।। वह परमात्मा कृष्ण के प्राणों की अधिष्ठात्री देवी उनके प्राणों से प्रकट होने के कारण उन्हें प्राणों से भी अधिक प्रिय हुई॥२७॥ वह देवी सोलह वर्ष की अवस्था एवं नवीन यौवन से सम्पन्न थी। अग्नि में तपाये हुए सुवर्ण की भाँति वस्त्रों को पहने हुए वह अत्यन्त रूपवती देवी मुसकरा रही थी॥२८ उसके अंग
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सुकोमलाङ्गी ललिता सुन्दरीषु च सुन्दरी। बृहन्नितम्बभारार्ता पीनश्रोणिपयोधरा॥२९॥ बन्धुजीवजितारक्तसुन्दरोष्ठाधरानना । शरत्पार्वणकोटीन्दुशोभामृष्टशुभानना। चारुसीमन्तिनी चारुशरत्प ङ्चलोचना।।३१।। खगेन्द्रचञ्चुविजितचारुनासामनोहरा। स्वर्णगण्डकविजिते गण्डयुग्मे बिभ्रती॥३२॥ दधती चारुकर्णे च रत्नाभरणभूषिते। चन्दनागरुकस्तूरीयुक्तक्ङ् कुमबिन्दुभिः ॥३३॥ सिन्दूरबिन्दुसंयुक्तसुकपोला मनोहरा। सुसंस्कृतं केशपाशं मालतीमाल्यभूषितम् ॥३४।। सुगन्धकबरीभारं सुन्दरं दधती सती। स्थलपद्मप्रभामुष्टं पादयुग्मं च बिभ्रती॥३५॥ गमनं कुर्वती सा च हंसखञ्जनगञ्जनम्। सद्रत्नसारनिर्माणां वनमालां मनोहराम्॥३६॥ हारं हरिकनिर्माणं रत्नकेयूरकङ्टणम्। सद्रत्नसारनिर्माणं पाशकं सुमनोहरम्।३७॥ अमूल्यरत्ननिर्माणं क्वणन्मञ्जीररञ्जितम्। नानाप्रकारचित्राढयं सुन्दरं परिबिभ्रती॥३८।। सा च संभाष्य गोविन्दं रत्नसिंहासने बरे। उवास सस्मिता भर्तुः पश्यन्ती मुखप ड्जम् ॥३९॥ तस्याश्च लोमकूपभ्यः सद्यो गोपाङ्गनागणः। आविर्बभव रूपेण वेषेणैव च तत्समः ॥४०॥ लक्षकोटोपरिमितः शश्वत्सुस्थिरयौवनः । संख्याविद्दिश्च संख्यातो गोलोके गोपिकागण:।।४१।।
अत्यन्त कोमल थे। वह सुन्दरियों में भी सुन्दरी थी। वह विशाल नितम्ब के भार से थकी और स्थूल श्रोणी तथा स्तनों से शोभित थी। उसके बन्धूक (दुपहरिये) के पुष्प की भाँति रक्ताभ और सुन्दर ओष्ठ थे, मोतियों की पंक्ति के समान अत्यन्त मनोहर दाँतों की पंक्ति थी और शरत्कालीन कोटि चन्द्रों की शोभा को तिरस्कृत करने वाला मुख था। सीमन्त भाग बड़ा मनोहर था। शारदीय सुन्दर कमल की भाँति नेत्र दिखाई देते थे। उसकी मनोहर नासिका के सामने पक्षिराज गरुड़ की चोंच हार मान चुकी थी। वह बाला अपने दोनों कपोलों द्वारा सुनहरे दर्पण की शोभा को तिरस्कृत कर रही थी। रत्नों के आभूषणों से विभूषित दोनों कान बड़े सुन्दर लगते थे। सुन्दर कपोलों पर चन्दन, अगुरु, कस्तूरी, कुंकुम और सिन्दूर की बूंदों से पत्र-रचना की गई थी, जिससे वह बड़ी सुन्दरी जान पड़ती थी। उसके सँवारे हुए केशपाश मालती की सुन्दर माला से अलंकृत थे। वह सती-साध्वी बाला अपने सिर पर सुन्दर एवं सुगन्धित वेणी धारण किये हुई थी। उसके दोनों चरण स्थल-कमलों की प्रभा को चुरा रहे थे। उसकी चाल हंस तथा खंजन के गर्व को चूर करने वाली थी। वह उत्तम रत्नों के सारभाग से बनी हुई मनोहर वनमाला, हीरे का बना हुआ हार, रत्न-निर्मित केयूर, कंगन, सुन्दर रत्नों के सारभाग से निर्मित अत्यन्त मनोहर पाशक (गले की जंजीर या कान का पासा), बहुमूल्य रत्नों का बना झनकारता हुआ मंजीर तथा अन्य नाना प्रकार के चित्रांकित सुन्दर जड़ाऊ आभूषण धारण किये हुई थी। वह श्रीकृष्ण से वार्तालाप करके उनकी आज्ञा पा मुसकराती हुई तथा स्वामी के मुखारविन्द को देखती हुई श्रेष्ठ रत्नमय सिंहासन पर बैठ गई॥२९-३९॥ उसी समय उसके लोम-कूपों से गोपांगनाओं का आविर्भाव हुआ, जो रूप और वेश में उसी के समान थीं॥४०॥ एक लाख करोड़ उनकी संख्या थी और वे नित्य सुस्थिरयौवना थीं। विद्वानों ने गोलोक में गोपियों की उक्त संख्या ही बतायी हैं।४१॥ मुने ! उसी प्रकार भगवान् कृष्ण के लोम
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२६ पंचमोध्यायः
कृष्णस्ध लोमकपभ्यः सद्यो गोपगणो मुने। आविर्बभूव रूपेण वेषेणैव च तत्समः॥४२॥ त्रिशत्कोटिपरिमितः कमनीयो मनोहरः। संख्याविन्द्िश्च संख्यातो बल्लवानां गण: श्रुतौ॥४३॥ कष्णस्थ लोमकपेभ्यः सद्यश्चाऽडविर्बभूव ह। नानावर्णो गोगणश्च शश्वत्सुस्थिरयौवनः॥४४।। बलीबर्दा: सुरभ्यश्च वत्सा नानाविधाः शुभाः। अतीवललिताः श्यामा बह वयो वै कामधेनवः॥४५॥ लेषामेकं बलीवर्द कोटिसिंहसमं बले। शिवाय प्रददौ कृष्णो वाहनाय मनोहरम्॥४६॥ कृष्णाङधिनखरन्ध्रेभ्यो हंसपङक्तिर्मनोहरा। आविर्बभूव सहसा स्त्रीपुंवत्ससमन्विता ॥४७। तेषामेकं राजहंसं महाबलपराक्रमम्। वाहनाय ददौ कृष्णो ब्रह्मणे च तपस्विने ॥४८॥ वाहकर्णल्य विवरात्कृष्णस्य परमात्मनः। गणः श्वेततुरङ्गाणामाविर्भूतो मनोहरः॥४९॥ तधामेकं च श्वेताइवं धर्मार्थं वाहनाय च। ददौ गोपाङ्गनेशशच संप्रीत्या सुरसंसदि ॥५०॥ दक्षकर्णस्य विवदात्पुंसश्च सुरसंसदि। आविर्भूता सिंहपङक्तिर्महाबलपराक्रमा॥५१॥ तेषामेकं ददौ कृष्णः प्रकृत्ये परमादरम्। अमूल्यरत्नमाल्यं च दरं यदभिताञ्छितम्॥५२॥ कृष्णो योगन योगीन्द्रश्चकार रथपञ्चकम्। शुद्धरत्नेन्द्रनिर्माणं भनोयायि मनोहरम्॥५३।। लक्षयोजनमरध्वे च प्रस्थे च शतयोजनम्। लक्षचक्रं वायुरहं लक्षकोडागृहान्वितम् ॥५४॥ शृङ्गाराहं भोगवस्तुतत्पासंख्यसमन्वितम्। रत्नप्रदीपलक्षाणां राजिभिश्च विराजितम्॥५५॥
विवर से भी तुरन्त गोपगण प्रकट हुए, जो रूप और वेश में उन्हीं के समान थे॥४२॥ विद्वानों का कहना है कि श्रुति में गोलोक के कमनीय एवं मनोहर रूप वाले गोपों की संख्या तीस करोड़ बतायी गई है।४३॥ उसी प्रकार तत्काल हो भगवान् कृष्ण के लोम-कूप से नित्य सुस्थिर यौवन वाली अनेक वर्ण की गौएँ प्रकट हुईं॥४४॥ उनमें बलीवर्द (साँड़), सुरभी जाति की गौएँ और अनेक भाँति के सुन्दर बछड़े थे तथा अत्यन्त ललित अनेकों श्यामा कामधेनु गीएँ थीं॥४५॥ भगवान् कृष्ण ने उन्हीं में से एक मनोहर बैल को, जो करोड़ों सिंह के समान बलवान् था, शंकर को सवारी के लिए दे दिया॥४६। पुनः भगवान् श्रीकृष्ण के चरण-नख के छिद्रों से सहसा सुन्दर हंसों की पंक्ति उत्पन्न हुई, जिसमें स्त्री-पुरुष (नर-मादा) सभी थे। उनमें से एक महापराक्रमी राजहंस को भगवान् कृष्ण ने तपस्वी ब्रह्मा को वाहनार्थ प्रदान किया॥४७-४८। परमात्मा कृष्ण के बायें कर्ण विवर से श्वेत वर्ण के अश्वों का समूह उत्पन्न हुआ।।४९। गोपांगनाओं के अधिपति भगवान् कृष्ण ने उस सभा के भीतर बड़ी प्रसन्नता से एक श्वेत अश्व देवसभा में विराजमान धर्म को वाहन के लिए प्रदान किया॥५०॥ पुनः उस पुरुष के दाहिने कर्ण-विवर से उस सुर-सभा के भीतर ही महाबली और पराक्रमी सिंहों की श्रेणी उत्पन्न हुई॥५१॥ उनमें से एक को कृष्ण ने प्रसन्नता वश प्रकृति (दुर्गा) को सौंप दिया और अमूल्य रत्नों की माला एवं इच्छित वरदान भी दिया ॥५२॥ अनन्तर योगीन्द्र कृष्ण ने, योगबल से पाँच रथ उत्पन्न किए, जो शुद्ध रत्नों के बने, मनोहर और मन के समान चलने वाले थे ॥५३। उनकी ऊँचाई एक लाख योजन की थी और विस्तार सौ योजन का था। उनमें एक लाख चक्के थे जो वायु के समान चलने वाले थे और उनमें एक-एक लाख क्रीड़ा-गृह, शृंगारोचित भोग-वस्तुएँ और असंख्य शय्यायें थीं। लाखों रत्नमय प्रदीपों और अश्वों से वे (रथ) सुसज्जित थे॥५४-५५॥। अनेक भाँति के विचित्र चित्र उनमें अंकित
१ ख. णां वाजि०।
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ब्रह्मववर्तपुराणम् २७
नानाचित्रविचित्राढयं सद्रत्नकलशोज्ज्वलम् । रत्नदर्पणभूषाढयं शोभितं श्वेतचामरैः ॥५६॥ वहि नशुद्धांशुकैश्चित्रर्मुक्ताजालैविभूषितम्। मणीन्द्रमुक्तामाणिक्यहीरहारविराजितम् ॥५७॥ आरक्तवर्णरत्नेन्द्रसारनिर्माणकृत्रिमैः । पङ्गजानामसंख्यैश्च सुन्दर्रश्च सुशोभितम्।५८।। ददौ नारायणायकं तेषां मध्ये द्विजोत्तम। एकं दत्त्वा राधिकाय ररक्ष शेषमात्मने॥५९॥ आविर्बभूव कृष्णस्य गुहदेशात्ततः परम्। पिङ्गलशच पुमानेकः पिङ्गलैश्च गणैः सह॥६०॥ आविर्भूता यतो गुहयात्तेन ते गुहयकाः स्मृताः। यः पुमान्स कुबेरश्च धनेशो गुहकेश्वरः॥६१॥ बभूव कन्यका चका कुबेरवामपाश्वंतः। कुबेरपत्नी सा देवी सुन्दरीणां मनोरमा॥६२॥ भूतप्रेतपिशाचाशच कृष्माण्डब्रह्मराक्षसाः। वेताला विकृतास्तस्याऽडविर्भूता गुहयदेशतः ॥६३।। शङ्गचऋरगदापद्मधारिणो वनमालिनः । पीतवस्त्रपरीधानाः सर्वे श्यामचतुर्भुजा: ॥६४।। किरीटिन: कुण्डलिनो रत्नभूषणभूषिताः । आविर्भूताः पार्षदाश्च कृष्णस्य मुखतो मुने ॥६५॥ चतुर्भुजान्पार्षदांश्च ददौ नारायणाय च। गुहयकान्गुहयकशाय भूतादीञ्छंकराय च ॥ ६६।। द्विभुजाः श्यामवर्णाश्च जपमालाकरा वराः। ध्यायन्तश्चरणाम्भोजं कृष्णस्य सततं मुदा ॥६७॥ वास्ये नियुक्ता दासाश्चैवार्ध्यमादाय यत्नतः। आविर्भूता वैष्णवाश्च सर्वे कृष्णपरायणाः॥६८॥
थे। वे उत्तम रत्नों के कलशों से उज्जवल तथा रत्न के दर्पणों एवं आभूषणों और श्वेत चामरों से सुशोभित थे॥५६।। अग्नि में तपाये गये (सुवर्ण) की भाँति वस्त्रों, चित्र-विचित्र मुक्तामालाओं तथा मणियों, मोतियों और हीरों के हारों से विभूषित थे।५७॥। रक्तवर्ण के उत्तम रत्नों के तत्त्वों से सुरचित, असंख्य एवं सुन्दर कमलों से बे अलंकृत थे ॥५८। द्विजोत्तम! भगवान् कृष्ण ने उनमें से एक नारायण को और एक श्रीराधा जी को देकर शेष अपने लिए सुरक्षित रख लिए॥५९॥ अनन्तर भगवान् कृष्ण के गुह्य स्थान से एक पिंगल वर्ण का पुरुष पिंगलगणों के साथ उत्पन्न हुआ ।।६०।। गुप्त स्थान से प्रकट होने के कारण वे सब 'गुह्यक' कहलाये। उनमें वह पुरुष धन का ईश और गुह्यकों का अधिपति हुआ।।६१।। कुबेर के वाम पाश्वं से एक कन्या उत्पन्न हुई। वह अत्यन्त सुन्दरी देवी कुबेर की पत्नी हुई।६२॥ भूत, प्रेत, पिशाच, कुष्माण्ड, ब्रह्मराक्षस और वेताल भी उन्हीं के गुह्य स्थान से प्रकट हुए॥६३। मुने ! तदनन्तर श्रीकृष्ण के मुख से कुछ पाषंदों का प्राकट्य हुआ। वे सब शंख, चक्र्क, गदा, पद्म, वनमाला और पीताम्बर धारण किए हुए श्यामवर्ण और चतुर्भुज थे॥६४॥ किरीट, कुण्डल और रत्नों के आभूषण उनकी शोभा बढ़ा रहे थे।६५॥ भगवान् ने चार भुजाधारी पार्षद नारायण को दे दिए। उसी प्रकार गुह्य कुबेर को और मूत, प्रेत आदि शंकर को समर्पित किए॥६६।। तदुपरान्त श्रीकृष्ण के चरणारविन्द से द्विभुज पार्षद प्रकट हुए, जो श्याम वर्ण के थे और हाथों में जपमाला लिये हुए थे। वे श्रेष्ठ पार्षद निरन्तर आनन्दपूर्वक भगवान् के चरणकमलों का ही चिन्तन करते थे। श्रीकृष्ण ने उन्हें दास्यकर्म में निमुक्त किया। वे दास यत्नपूर्वक अर्ध्य लिए प्रकट हुए थे। वे सभी श्रीकृष्णपरायण वैष्णव थे। उनके सारे अंग पुलकित थे, नेत्रों से आँसू झर रहे थे और वाणी गद्गद थी। उनका
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षष्ठोऽ्ध्याय:
पुलकाङ्गितसर्वाङ्गाः साश्रुनेत्राः सगद्गदाः । आविर्भूताः पादपद्मात्पादपरझ्मैकमानसाः॥६९॥ आविबभवुः कृष्णस्य दक्षनेत्रा,्ड्गयङकराः। त्रिशूलपट्टिशधरास्त्रिनेत्राश्चन्द्रशेखराः।७०।। दिगम्बरा महाकाया ज्वलदग्निशिखोपमाः । ते भैरवा महाभागाः शिवतुल्याश्च तेजसा॥७१॥ रुरुसंहारकालाख्या असितक्रोधभीषणाः। महाभैरवखट्वाङ्गावित्यष्टौ भैरवाः स्मृताः॥७२॥ आविर्बभूव कृष्णस्य वामनेत्राङ्ङ्गयंकरः। त्रिशूलपट्टिशव्याघ्चर्माम्बरगदाधरः॥७३॥ दिगम्बरो महाकायस्त्रिनेत्रश्चन्द्रशेखरः । स ईशानो महाभागो दिक्पालानामधीश्वरः॥७४। डाकिन्यश्चैव योगिन्यः क्षेत्रपाला: सहस्रशः । आविर्बभवुः कृष्णस्य नासिकाविवरोदरात् ॥७५॥ सुरास्त्रिकोटिसंख्याता दिव्यमूर्तिधरा वराः। आविर्बभूवुः सहसा पुंसो वै पृष्ठदेशतः॥७६॥ इति श्रीब्रह्मवैवर्ते महापुराणे सौतिशौनकसंवादे ब्रह्मखण्डे सृष्टिनिरूपणं नाम पञ्चमोऽध्यायः ।५॥।
अथ षष्ठोऽध्याय:
सौतिरुवाच अथ कृष्णो महालक्ष्मीं सादरं च सरस्वतीम्। नारायणाय प्रददौ रत्नेन्द्रं मालया सह ॥१॥
चित्त केवल भगवच्चरणारविन्दों के चिन्तन में ही संलग्न था।६७-६९।। भगवान् कृष्ण के दाहिने नेत्र से ऐसे भीषण लोगों की उत्पत्ति हुई, जो हाथों में त्रिशूल और पट्टिश लिए हुए थे। उन सब के तीन नेत्र थे और वे सिर पर चन्द्राकार मुकुट धारण किये हुए थे। वे सब के सब महाकाय, दिगम्बर और प्रज्वलित अग्नि के समान (तेजस्वी) थे। वे महाभाग भैरव कहलाये। वे तेज में शिव के समान ही थे ॥७०-७१॥ रुद्र, संहार, काल, असित, क्रोध, भीषण, महाभैरव और खट्वांग, ये आठ भैरव बताये गए हैं।७२।। भगवान् कृष्ण के बायें नेत्र से एक भयंकर पुरुषकी उत्पत्ति हुई, जो त्रिशूल, पटिट्श, बाघम्बर और गदा धारण किए हुए था। वह दिगम्बर, महाकाय, त्रिनेत्र और चन्द्राकार मुकुट धारण करने वाला था। उस महाभाग को ईशान कहा गया है। वही दिकपालों का अधिनायक भी है।७३-७४।। भगवान् कृष्ण के नासिका छिद्र से डाकिनियाँ, योगिनियाँ और सहस्रों क्षेत्रपाल प्रकट हुए।।७५।। उसी भाँति उनके पृष्ठदेश से तीन करोड़ की संख्या में देवगण उत्पन्न हुए, जो दिव्य मूर्ति एवं श्रेष्ठ थे॥७६॥ श्री ब्रह्मवैवर्त महापुराण के ब्रह्मखण्ड में सृष्टि-निरूपण नामक पाँचवाँ अध्याय समाप्त ॥।५।।
अध्याय ६ श्रीकृष्ण द्वारा नारायण आदि को लक्ष्मी आदि का पत्नीरूप में दान सौति बोले-पश्चात् भगवान् कृष्ण ने नारायण को सादर महालक्ष्मी सरस्वती एवं परमोत्तमरत्नों की
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ब्रह्मवं वर्तपुराणम् २९
सावित्रीं ब्रह्मणे प्रादान्मूतिं धर्माय सादरम्।। रतिं कामाय रूपाढयां कुबेराय मनोरमाम्॥२॥ अन्याश्च या या अन्येभ्यो याश्च येभ्यः समुद्द्वाः। तस्मै तस्म ददौ कृष्णस्तां तां रूपवतों सतीम् ॥३॥ ततः शंकरमाहूय सर्वेशो योगिनां गुरुम्। उवाच प्रियमित्येवं गृहणीयाः सिंहवाहिनीम्॥४॥ श्रीकृष्णस्य वचः श्रुत्वा प्रहसन्नीललोहितः। उवाच भीतः प्रणतः प्राणेशं प्रभुमच्युतम्॥५॥ श्रीमहेश्वर उवाच अधुनाऽहं च गृहणामि प्रकृतिं प्राकृतो यथा। त्वद्दक्त्यकव्यवहितां वास्यमार्गविरोधिनीम् ॥६॥। तत्त्वज्ञानसमाच्छन्नां योगद्वारकपाटिकाम्। मुक्तीच्छाध्वंसरूपां च सकामां कामवधिनीम्।।७।। तपस्याच्छन्नरूपां च महामोहकरण्डिकाम्। भवकारागृहे घोरे दृढां निगडरूपिणीम्।।८।। शश्वद्विबुद्धिजननीं सद्बुद्धिच्छेदकारिणीम् । शश्वद्विभोगसारां' च विषयेच्छाविव्द्धिनीम् ।।९।। नॅच्छामि गृहिणीं नाथ वरं देहि मदीप्सितम्। यस्य यद्वाञ्छितं तस्मै तद्ददाति तदीश्वरः॥१०॥ त्वद्धक्तिविषये दास्ये लालसा वर्धतेऽनिशम् । सृप्तिर्न जायते नामजपने पादसेवने॥११॥ त्वन्नाम पञ्चवक्त्रेण गुणं सन्मङ्गलालयम् । स्वप्ने जागरणे शश्वद्गायन्गायन्भ्रमाम्यहम् ॥१२।। आकल्पकोटि कोटिं च त्वदूपध्यानतत्परम् । भोगेच्छाविषये नैव योगे तपसि मन्मनः ॥१३॥
माला भी सौंप दी। उसी भाँति ब्रह्मा को सावित्री, धर्म को मूर्ति, काम को रति, कुबेर को रूपवती मनोरमा सादर समापत की। और इसी प्रकार भगवान् कृष्ण ने अन्य स्त्रियों को भी पतियों के हाथ में दिया। जो जिससे उत्पन्न हुई थी, उस रूपवती सती को उसी पति को सौंप दिया। अनन्तर सर्वाधीश्वर कृष्ण ने योगियों के गुरु शंकर जी को बुला कर अत्यन्त प्रेम से कहा-'आप इस सिंहवाहिनी को ग्रहण कीजिए'॥१-४।। भगवान् श्रीकृष्ण की बात सुन- कर नीललोहित शिव हँसे और डरते हुए विनीत भाव से उन प्राणेश, प्रभु, अच्युत भगवान् से बोले ॥५॥ श्री महेश्वर ने कहा-साधारण पुरुष की भाँति मैं भी इस समय इस प्रकृति का ग्रहण करने में असमर्थ हूँ। क्योंकि यह आपकी भक्ति को दूर करने वाली, सेवा मार्ग की विरोधिनी, तत्त्वज्ञान को आच्छन्न करने वाली, योगरूपी द्वार का किवाड़, मुक्ति की इच्छा का ध्वंस करने वाली, कामुकी तथा काम (भोग) को बढ़ाने वाली है।६-७।। यह तपस्या का लोप करने वाली, महामोह की टोकी, संसार रूपी भयंकर कारागार की सुदृढ़ बेड़ी, निरन्तर दुर्बुद्धि की जननी, सद्बुद्धि का नाश करने वाली, निरन्तर भोगतत्त्व से हीन और विषयेच्छा को बढ़ाने वाली है।।८-९।। नाथ ! इसलिए मुझे गृहिणी की इच्छा नहीं है। मैं कुछ मनइच्छित वरदान चाहता हूँ उसे देने की कृपा करें। क्योंकि जिसकी जो वस्तु अभिलषित होती है, ईश्वर उसे वही प्रदान करता है।८-१०।। आपकी भवति के विषय में मेरी लालसा दिनरात बढ़ती रहती है, एवं आपके चरण की सेवा और नाम जपने से मुझे कभी तृप्ति नहीं होती है।११। शयन करते और जागते-हर समय मैं अपने पाँचों मुखों से सन्मंगलों के धाम आपके नाम-गुण का गान गाते हुए चारों ओर घूमता रहता हूँ॥१२॥ कोटि-कोटि कल्पों तक मैं आपके रूप के ध्यान में तल्लीन रहता हूँ, इसलिए मुझे विषय-भोग की इच्छा नहीं है। योग और तप में मेरा मन लगा रहता है॥१३। आपकी सेवा,
१ क. ०साध्यां च वि।
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३० षष्ठोऽध्याय: त्वत्सेवने पूजने च वन्दने नामकीर्तने। सदोल्लसितमेषा च विरतौ विरतिं लभेत्॥१४॥ स्मरणं कीर्तनं नामगुणयो: श्रवणं जपः। त्वच्चारुरूपध्यानं त्वत्पादसेवाभिवन्दनम्॥१५॥ समर्पणं चाऽऽत्मनश्च नित्यं नैवेद्यभोजनम्। वरं वरेश देहीदं नवधाभक्तिलक्षणम्॥१६॥ साष्टिसालोक्यसारूप्यसामीप्यं साम्यलीनताम्। वदन्ति षड्विधां मुक्तिं मुक्ता मुक्तिविदो विभो॥१७॥ अणिमा लघिमा प्राप्तिः प्राकाम्यं महिमा तथा। ईशित्वं च वशित्वं च सर्वकामावसायिता॥१८। सार्वज्ञं दूरश्रवणं परकायप्रवेशनम्। वाक्सिद्धिः कल्पवृक्षत्वं स्रष्टुं! संहर्तुमीशता॥११॥ अमरत्वं च सर्वाग्र्यं सिद्धयोऽष्टादश स्मृताः। योगास्तपांसि सर्वाणि दानानि च व्रतानि च ॥२०॥ यशः कीतिर्वचः सत्यं धर्माण्यनशनानि घ। भ्रमणं सर्वतीर्थेषु स्नानमन्यसुरार्चनम् ॥२१॥ सुरार्चादर्शनं: सप्तद्वीपसप्तप्रदक्षिणम्। स्नानं सर्वसमुद्रेषु सर्वस्वर्गप्रदर्शनम्॥२२।। ब्रह्मत्वं चैव रुद्रत्वं विष्णुत्वं च परं पदम्। अतोऽनिर्वचनीयानि वाञ्छनीयानि सन्ति वा ॥२३॥ सर्वाण्येतानि सर्वेश कथितानि च यानि च। तव भक्तिकलांश्स्य कलां नार्हन्ति बोडशीम् ॥२४॥ शर्वस्य वचनं श्रुत्वा कृष्णस्तं योगिनां गुरुम्। प्रहस्योवाच वचनं सत्यं सर्वसुखप्रदम् ।।२५।। श्रीभगवानुवाच मत्सेवां कुरु सर्वेश शर्व सर्वविदां वर। कल्पकोटिशतं यावत्पूर्णं शश्वदहर्निशम्॥२६॥ पूजा, वन्दना और नाम-कीर्तन में मेरा मन सदैव उल्लसित रहता है। इनसे विरत होने पर यह उद्विग्न हो उठता है।१४॥। वरों के ईश्वर! आपके नाम और गुण का स्मरण करना, कीतन, श्रवण, जप, आपके सुन्दर रूप का ध्यान, आपके चरणों की सेवा, वन्दना, आत्म-समर्पण, नित्य नैवेद्य का भोजन-यही नव प्रकार की भक्ति मुझे प्रदान करने की कृपा करें॥१५-१६॥ विभो ! मोक्ष और अमोक्ष के वेत्ताओं ने साष्टि (ईश्वर के समान सृष्टि करने को शकिति) सालोक्य (ईश्वर के समान लोक में रहना), सामीप्य (ईश्वर के समीप रहना), सारूप्य (ईश्वर के समान स्वरूप प्राप्त करना) साम्य (आपकी समता की प्राप्ति) और लीन होना-यही छह प्रकार की मुक्ति दतायी है॥६॥ अणिमा (सूक्ष्म रूप), लघिमा (लघु होना), प्राप्ति (किसी भी वस्तु को प्राप्त कर लेना), प्राकाम्य (इच्छा का अभिघात न होना), महिम (महान् बब जाना), ईशित्व (अधीश्वर होना), वशित्व (वश में करना), र्वका- मावसायिता (समस्त कामनाओं को नष्ट करना), सर्वज्ञता, दूर श्रवण (अत्यन्त दूर से भी सभी बातें सुनना), रकाय- प्रवेश (दूसरे के शरीर में प्रवेश करना), वाक् सिद्धि (सभी बातें सत्य होना), कल्पवृक्षत्व (कल्पवृक्ष की भाँति मनइच्छित फल प्रदान करना), सृष्टि और संहार की क्षमता, अमर होना और सब का अग्रणी या सर्वेश्रेष हीना, ये अठारह प्रकार की सिद्धियाँ हैं। योग, सप, सब प्रकार के दान, व्रत, यश, कीति, सत्यवाणी, उपवास, समस्त तीथों में भ्रमण और स्नान, अन्य देवों की अर्चना, देव-पूजा, दर्शन, सातों द्वीपों की सात प्रदक्षिणा, सभी समुद्रों के स्नान, सभी स्वर्गों के दर्शन, ब्रह्मपद, रुद्रपद, विष्णुपद एवं परम पद तथा सभी अनिर्वचनीय अभिलषित पदार्थ जापकी भक्ति के कलांश की सोलहवीं कला के बराबर भी नहीं हैं॥१८-२४॥ योगियों के गुरु (महादेव) की बातें सुन कर उनसे भगवान् कृष्ण हँसते हुए समस्त सुख्दायक सत्य वचन बोले ॥२५॥ श्री भगवान् बोले-निखिल ज्ञाताओं में श्रेष्ठ सर्वेश्वर शिव ! तुम सौ करोड़ कल्पों तक दिनरात निरन्तर
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ब्रह्मवैवर्तपुराणम् ३१
वरस्तपस्विनां त्वं च सिद्धानां योगिनां तथा। ज्ञानिनां वैष्णवानां च सुराणां च सुरेश्वर।२७। अमरत्वं लभ भव भव मृत्युंजयो महान्। सर्वसिद्धिं च वेदांश्च सर्वज्ञत्वं व मद्वरात् ॥२८।। असंख्यं ब्रह्मणां पात्रं लीलया वत्स पश्यसि। अद्यप्रभृति ज्ञानेन तेजसा वचसा शिव॥२९॥ पराक्रमेण यशसा महता मत्समो भत्र। प्राणानामधिकस्त्वं च न भक्तस्त्वपरो मम ॥३०॥ त्वत्परो नास्ति मे प्रयांहत्वं मदीयात्मनः परः। ये त्वां निन्दन्ति पापिष्ठा ज्ञानहीना विचेतनाः॥३१॥ पच्यन्ते ते कालसत्रे वावच्चन्द्रदिवाकरौ। कल्पकोटिशतान्ते च ग्रहोष्यसि शिवां शिव॥३२।। ममाव्यर्थ व वसनं पालनं कर्तुमर्हसि। त्वन्मुखान्निर्गतं वाक्यं न करोम्यधुनेति च॥३३॥ मद्ाक्यं च स्वधाक्यं व पालनं तत्करिष्यसि। गृहीत्वा प्रकृतिं शंभो दिव्यं वर्षसहल्तकम् ॥३४॥ सुखं महन्व शक्कारं करिष्यसि न संशयः। न केवलं तपस्वी त्वमीश्वरो मत्समों महान्।३५॥ काले गृहो तगस्तो च योगी स्वेच्छामयो हि यः। दुःखं च दारसंयोगे यत्त्वया कथितं शिव ॥३६।। कुस्त्री ददाति दुःखं व स्वामिने न पतिव्रता। कुले महति या जाता कुलजा कुलपालिका।३७। करोति पालन ्नेहात्सत्पुन्नर्य समं पतिम्। पतिर्बन्धुर्गतिर्भरता दैवतं कुलयोषिताम्॥३८॥ पतितोऽपतितो वाऽ कृपणश्चेश्वरोथवा। असत्कुलप्रसूता याः पित्रोर्दुःशीलमिश्चिताः॥३१।।
मेरी सेवा करो ॥२६॥ सुरेश्वर! तुम तपस्वियों, सिद्धों, योगियों, ज्ञानियों, वैष्णवों और देवों में सर्वश्रेष्ठ हो।२७॥ भव! अमरत्व प्राप्त करो और महान् मृत्युजेता बनो। उसी भाँति हमारे वरदान द्वारा समस्त सिढ्धियाँ, चारों वेद (का ज्ञान) तथा सर्वज्ञता प्राप्त करो। वत्स ! उससे असंख्य ब्रह्माओं का पतन अनायास ही देखते रहोगे। शिव ! आज से ही तुम मेरे समान ज्ञान, तेज, अवस्था, पराक्रम, यश तथा तेज प्राप्त करो। क्योंकि तुम मेरे प्राण से भी अधिक प्रिय हो, अतः तुमसे बढ़ कर मेरा कोई भक्त नहीं है॥२८-३०।। तुम मेरे आत्मा से भी बढ़ कर हो। (इस- लिए) तुमसे अधिक प्रिय मेरा कोई नहीं है। जो पापिष्ठ, अज्ञानी और चेतनाहीन मनुष्य तुम्हारी निन्दा करते हैं, वे तब तक कालसूत्र में पकाये जाते हैं जब तक सूर्य और चन्द्रमा की स्थिति रहती है। शिव ! सौ करोड़ कल्पों के उपरांत तुम शिवा (प्रकृति) का ग्रहण करोगे ॥३१-३२॥ अतः मेरे इन सार्थक वचनों का पालन करो। मैं तुम्हारी इस समय की बात मानने को तैयार नहीं हूँ। शम्भो ! मेरी बात और अपनी उस बात का पालन उस समय करोगे, जब प्रकृति को अपनाकर दिव्य सहस्र वर्षों तक महान् सुख और शृंगार रस का आस्वादन करोगे, इसमें संशय नहीं। तुम केवल तपस्वी ही नहीं हो प्रत्युत मेरे समान महान् ईश्वर भी हो॥३३-३५॥ जो स्वेच्छामय ईश्वर है वह समय पर गृही, तपस्वी और योगी हुआ करता है। शिव! स्त्री के साथ रहने में जो दुःख आपने बताया है उसमें निन्दित स्त्रियाँ ही अपने पति को दुःख देती हैं न कि पतिव्रता। जो प्रतिष्ठित कुल में उत्पन्न हुई है, कुलीना और कुल-मर्यादा का पालन करने वाली है, वह अच्छे पुत्र की भाँति अधिक स्नेह से पति का पालन करती है। क्योंकि सत्कुल में उत्पन्न होनेवाली स्त्रियों का पति ही बन्धु, पति ही भर्त्ता और पति ही देवता है चाहे वह पतित, अपतित, दीन-हीन अथवा ऐश्वर्यशाली क्यों न हो। और असत्कुल में उत्पन्न होने वाली स्त्रियाँ, जिनमें उनके माँ-बाप का बुरा
१ क. ०भत्वं च भ०। २ क. मो भवान्।
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३२ षष्ठोऽ्ध्याय:
ध्रुवं ताः परभोग्याश्च पति निन्दन्ति संततम्। आवयोरतिरिक्तं च या पश्यति पर्ति सती।४०।। गोलोके स्वामिना सार्द्धं कोटिकल्पं प्रमोदते। भविता सा शिवा शैवी प्रकृतिर्वैष्णवी शिव।।४१॥ मदाज्ञया च तां साध्वीं ग्रहीष्यसि भवाय च। प्रकृत्या योनिसंयुक्तं त्वल्लिङ्गं तीर्थमृत्कृतम्॥४२।। तीर्थे सहस्त्रं संपूज्य भक्त्या पञ्चोपचारतः । सदक्षिणं संयतो यः पवित्रश्च जितेन्द्रियः॥४३॥ कोटिकल्पं च गोलोके मोदते च मया सह। लक्षं तीर्थे पूजयेद्यो विधिवत्साधुदक्षिणम्।४४॥ न च्युतिस्तस्य गोलोकात्स भवेदावयोः समः। मृन्द्रस्मगोशकृत्पिण्डस्तीर्थवालुकयाऽपि वा॥४५॥ कृत्वा लिङ्गं सकृत्पूज्य वसेत्कल्पायुतं दिवि। प्रजावान्भूमिमान्विद्वान्पुत्रवान्धनवांस्तथा ।४६।। ज्ञानवान्मुक्तिमान्साधुः शिवलिङ्गार्चना्द्गवेत्। शिर्वलिङ्गार्चनस्थानमतीर्थ तीर्थमेव तत्। भवेत्तत्र मृतः पापी शिवलोकं स गच्छति ।।४७। महादेव महादेव महादेवेति वादिनः। पश्चाद्यामि महास्तोत्रनामश्रवणलोभतः ॥४८।। शिवेति शब्दमुच्चार्य प्राणांस्त्यजति यो नरः। कोटिजन्माजितात्पापान्मुक्तो मुक्ति प्रयाति सः॥४९॥ शिवकल्याणवचनं कल्याणं मुक्तिवाचकम्। यतस्तत्प्रभवेत्तेन स शिवः परिकीतितः।।५०।। विच्छेदे धनबन्धूनां निमग्नः शोकसागरे। शिवेति शब्दमुच्चार्य लभेत्सर्वशिवं नरः॥५१॥
स्वभाव मिश्रित रहता है, निश्चित ही परभोग्या (व्यभिचारिणी) होती हैं तथा वे ही सदैव पति की निन्दा भी करती हैं। जो सती स्त्री हम दोनों से भी बढ़कर पति को देखती है, वह गोलोक में अपने पति समेत कोटिकल्प तक सुख प्राप्त करती है। शिव ! वह वैष्णवी प्रकृति शिवप्रिया होकर तुम्हारे लिए कल्याणमयी होगी ॥३६-४१॥' मेरी आज्ञा से तुम लोक-कल्याण के निमित्त उस पतिव्रता को पत्नीरूप में ग्रहण करो। तीर्थों की मिट्टियों से प्रकृति के साथ योनि युक्त तुम्हारे लिंग का निर्माण कर जो संयमी जितेन्द्रिय पुरुष तीर्थ-स्थानों में उसकी एक सहस्र संख्या का पंचोपचार से विधिपूर्वक दक्षिणा समेत पूजन करता है वह गोलोक में मेरे साथ एक करोड़ कल्प तक आनन्द करता है। इसी भाँति जो तीर्थ में सविधान और उचित दक्षिणा समेत एक लक्ष शिवलिंग (पार्थिव) का पूजन करता है, उसकी च्युति गोलोक से कभी नहीं होती है और वह हम लोगों के समान हो जाता है। इसलिए मिट्टी, भस्म, गोबर अथवा तीर्थ की बालुका से लिंग बना कर एक बार पूजन करने से दश सहस्र कल्प तक स्वर्ग में निवास प्राप्त होता है। सज्जन पुरुष शिवलिंग की अर्चना करने से प्रजा, भूमि, विद्या, पुत्र, धन, ज्ञान और मुक्ति प्राप्त करता है। शिवलिंग की पूजा होने से अतीर्थ भी तीर्थ हो जाता है और वहाँ पापी की मृत्यु होने पर शिवलोक को जाता है।४२-४७।। 'महादेव, महादेव, महादेव' ऐसा कहने वाले के पीछे महान् स्तोत्र रूप नाम सुनने के लोभ से मैं जाता हूँ॥४८॥ 'शिव-शिव' शब्द का उच्चारण करते हुए जो मनुष्य प्राण त्याग करता है वह कोटि जन्मों के संचित पापों से मुक्त होकर मोक्ष प्राप्त करता है ॥४९॥ 'शिव' शब्द कल्याण का वाचक है और 'कल्याण' शब्द मोक्ष का। शिव के उच्चारण से मोक्ष या कल्याण की प्राप्ति होती है, इसीलिए महादेव को शिव कहा गया है।।५०। धन और बन्धुओं के नाश हो जाने पर शोकसागर में निमग्न होने वाला मनुष्य 'शिव' शब्द के उच्चारण करने से कल्याण का भागी होता है।५१॥ (शिव शब्द में) 'शि' वर्ण पापनाशक और 'व' मुक्तिप्रदायक है।
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ब्रह्मवैवर्तपुराणम् ३३
पापघ्ने वर्तते शिश्च वश्च मुक्तिप्रदे तथा। पापघ्नो मोक्षदो नगां शिवस्तेन प्रकीतितः ॥५२। शिवेति च शिवं नाम यस्य वाचि प्रवर्तते। कोटिजन्माजितं पापं तस्य नश्यति निश्वितम्।५३।। इत्युक्त्वा शूलिन कृष्णो दत्त्वा कल्पतरुं भनुम्। तत्त्वज्ञानं मृत्युजयमवोचत्सिहवाहिनीम् ॥५४॥
श्रीभगवान्वाच
अधुना तिष्ठ वत्से त्वं गोलोके मम संनिधौ। काले भजिष्यसि शिर्व शिवदं च शिवायनम्॥५५॥। तेज:सु' सर्वदेवानामाविर्भूय वरानने। संहृत्य दैत्यान्सर्वांश्च भविता सर्वपूजिता ॥५६।। ततः कल्पविशेषे च सत्यं सत्ययुगे सति। भविता दक्षकन्या त्वं सुजीला शंभुगेहिनी ॥५७॥ ततः शरीरं संत्यज्य यज्ञे भर्तुश्च निन्दया। मेनायां शैलभार्यायां भविता पार्वतीति व॥५८।। विष्यं वर्षसहस्त्रं च विहरिष्यसि शंभुना। पूर्ण ततः सर्वकालमभेदं त्वं लभिव्यसि॥५९॥ काले सर्वेषु विश्वेषु महापूजा सुपूजिते। भविता प्रतिवर्ष च शारदीया सुरेश्वरि।६।। ग्रामेषु नगरेष्वेव पूजिता ग्रामदेवता। भवती भवितत्येवं नानभेदेन शारणा॥६१।। मवाज्ञया शिवकृतस्तन्त्रैर्नााविधैरपि। पूजाविधि विधास्यामि कवचं स्तोत्रसंयुतम्॥६२।। भविष्यन्ति महान्तश्च तवैव परिचारकाः। धर्मार्थकाममोक्षाणां सिद्धाशच फलभागिनः।६३।।
इसलिए मनुष्यों के पापनाशक एवं मोक्षदाता होने के कारण वे 'शिव' कहे गये हैं ॥५२॥ शिव का यह 'शिव' नाम जिसकी वाणी में (सदैव) वर्तमान रहता है, उसका कोटिजन्मों का अर्जित पाप निश्चित रूप से नष्ट हो जाता है ॥५३॥ इस प्रकार भगवान् कृष्ण ने शूलधारी शंकर से कहकर उन्हें कल्पवृक्ष के समान मंत्र और मृत्युञ्जय तत्त्वज्ञान प्रदान किया। पश्चात् सिंहवाहिनी प्रकृति से वे बोले॥५४॥ श्री भगवान् बोल-वत्से ! इस समय तुम मेरे साथ गोलोक में रहो। फिर समय आने पर तुम कल्याण- प्रद और कल्याण-निधि शंकर की सेवा करोगी॥५५॥ समस्त देवों की तेजोराशि से प्रकट होकर समस्त दैत्यों का वध करके तुम सबकी पूजनीया होगी॥५६॥ पश्चात् किसी विशेष कल्प में सत्य युग के आने पर तुम दक्ष की कन्या होकर शिव की मार्या बनोगी।५७॥अनन्तर दक्ष के यज्ञ में पति की निन्दा से तुम शरीर का त्याग करके हिमालयपत्नी मेना की पार्वती नामक पुत्री होगी।५८।। शिव के साथ एक सहस्त्र दिव्य वर्षों तक विहार करने के उपरान्त तुम सर्वदा के लिए पति के साथ पूर्णतः अभिन्नता प्राप्त कर लोगी।५९॥ सुरेश्वरी! प्रतिवर्ष प्रशस्त समय में समस्त लोकों में तुम्हारी शरत्कालिक पूजा होगी। ग्रामों और नगरों में तुम ग्रामदेवता के रूप में पूजित होगी तथा विभिन्न स्थानों में तुम्हारे पृथक्-पृथक् मनोहर नाम होंगे।६०-६१॥ मेरी आज्ञा से शिव द्वारा रचित अनेक भांति के तन्त्रों से तुम्हारी पूजा की जाएगी। मैं तुम्हारे लिए स्तोत्र और कवच का विधान करूँगा ॥६२॥ जिससे तुम्हारी ही सेवा करने वाले सेवकगण महत्ता प्राप्त करेंगे तथा धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष रूप फल के भागी होंगे ।६३॥
१ ख.० तेजसा स०। २ क. पूर्णा ततः सर्वकालं ममैव त्वं भविष्यसि। का०। ५
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३४ षष्ठोऽध्याय:
ये त्वां मातर्भजिष्यन्ति पुण्यक्षेत्रे च भारते। तेषां यशश्च कीतिश्च धर्मैश्वर्यं च वर्द्धते॥६४॥ इत्युक्त्वा प्रकृति तस्ये मन्त्रमेकादशाक्षरम्। दत्त्वा सकामबीजं च मन्त्रराजमनुत्तमम्॥६५॥ चकार विधिना ध्यानं भक्तं भक्तानुकम्पया। श्रीमायाकामबीजाढ्यं ददौ मन्त्रं दशाक्षरम्।६६।। सृष्ट्यौपयौगिकीं शक्ति सर्वसिद्धि च कामदाम्। तद्विशिष्टोत्कृष्टतत्त्वं ज्ञानं तस्यै ददौ विभुः॥६७॥ त्रयोदशाक्षरं मन्त्रं दत्त्वा तस्मै जगत्पतिः। कवचं स्तोत्रसहितं शंकराय तथा द्विज॥६८॥ दत्त्वा धर्माय तं मन्त्रं सिद्धिज्ञानं तदेव च। कामाय वह नये चैव कुबेराय च वायवे॥६९॥ एवं कुबेरादिभ्यस्तु दत्त्वा मन्त्रादिकं परम्। विधि प्रोवाच सृष्टयर्थं विधातुविधिरेव सः॥७०॥ श्रीभगवानुवाच मदीयं च तपः कृत्वा दिव्यं वर्षसहस्त्रकम्। सृष्टि कुरु महाभाग विधे नानाविधां पराम्।७१॥ इत्युक्त्वा ब्रह्मणे कृष्णो ददौ मार्लां मनोरमाम्। जगाम सार्ध गोपीभिर्गोपर्वृन्दावनं वनम् ॥७२॥
इति श्रीब्रह्मवैवर्ते महापुराणे सौतिशौनकसंवादे ब्रह्मखण्डे सृष्टिनिरूपणं नाम षष्ठोऽध्यायः।।६।।
मातः! पुण्य क्षेत्र भारतवर्ष में जो लोग तुम्हारी सेवा करेंगे, उनके यश, कीर्ति, धर्म और ऐश्वर्य की वृद्धि होगी ॥६४॥ इतना कह कर भगवान् कृष्ण ने उसे कामबीज (क्लीं) सहित एकादशाक्षर मन्त्र प्रदान किया, जो परमोत्तम एवं मन्त्रराज है।६५। पुनः विधिपूर्वक ध्यान का उपदेश दिया तथा भक्तों पर अनुग्रह करने के लिए श्री (श्रीं) माया (हीं) तथा काम (क्लीं) बीज सहित दशाक्षर मन्त्र का उपदेश दिया। साथ ही सृष्टि की उपयोगी शक्ति, काम- नाओं को सफल करने वाली समस्त सिद्धियाँ और उत्कृष्ट तत्त्वज्ञान भी उसे प्रदान किये ॥६६-६७॥ द्विजो, उसी प्रकार विभु जगदीश्वर ने शंकर जी को त्रयोदशाक्षर मंत्र और स्तोत्रसमेत कवच प्रदान किया ।६८।। पुनः धर्म को वही मन्त्र एवं सिद्धि-ज्ञान देकर उन्होंने कामदेव, अग्नि, कुबेर और वायु को भी मन्त्र आदि प्रदान किये ॥६९॥ इस प्रकार कुबेरादिकों को मन्त्रादि प्रदान करने के उपरान्त विघाता के मी विधाता भगवान् श्रीकृष्ण ने सृष्टि करने के लिए ब्रह्मा से कहा॥७०॥ श्री भगवान् बोल -महाभाग ! विघे ! सहस्त्र दिव्य वर्षों तक मेरा तप करके तुम अनेक भाँति की सृष्टि करो॥७१॥ इतना कहकर भगवान् कृष्ण ने उन्हें एक मनोरम माला प्रदान की। पश्चात् गोप-गोपियों को साथ लेकर वे (दिव्य) वृन्दावन में चले गये ॥७२॥ श्रीब्रह्मवैवर्तमहापुराण के ब्रह्मखण्ड में सृष्टिनिरूपण नामक छठा अध्याय समाप्त ॥६।।
१ ख.० र्तिः श्रीर्धनैश्च०।
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ब्रह्मववर्तपुराणम् ३५
अथ सप्तमोऽध्यायः सौतिरुवाच एम ब्रह्मा तपः कृत्वा सिद्धि प्राप्य यथेप्सिताम्। ससृजे पृर्थिवीमादौ मधुकैटभमेदसा ॥१॥ पृजे पर्वतानष्टौ प्रधानान्सुमनोहरान्। क्षुद्रानसंख्यान्कि ब्रूमः प्रधानाख्यां निशामय॥२॥ शुमेरं चैंव कैलासं मलयं च हिमालयम्। उदयं च तथाऽस्तं च सुवेलं गन्धमादनम्॥३॥ समुद्रान्ससृजे सप्त नदान्कतिविधा नदीः। वृक्षांश्च ग्रामनगरं समुद्राख्या निशामय।४॥ जवणेक्षु सुरारसापिर्दधिदुग्ध जलार्णवान्। लक्षयोजनमानेन द्विगुणांश्च परात्परान् ।।५।। सप्तद्वीपांश्च त्द् मिमण्डले कमलाकृते। उपद्वीपांस्तथा सप्त सीमाशैलांश्च सप्त च।।६।। निबोध विप्र द्वीपाख्यां पुरा या विधिना कृता। जम्बूशाककुशप्लक्षत्रौञचन्यग्रोधपौष्करान्।७॥ मेरोरष्टस् शृङ्गेषु ससजेऽष्टौ पुरीः प्रभुः। अष्टानां लोकपालानां विहाराय मनोहराः।८।। मूलेनन्तस्य नगरीं निर्माय जगतां पतिः। ऊर्ध्वे स्वर्गाश्च सप्तैव तेषामाख्यां निशामय।।९॥ भूर्लोकं च भुवलोकं स्वर्लोकं सुमनोहरम्। जनोलोकं तपोलोकं सत्यलोकं च शौनक।।१०।
अध्याय ७ ब्रह्मा द्वारा पृथ्वी, पर्वत, समुद्र आदि का निर्माण सौति बोले-पश्चात् ब्रह्मा ने तप करके मन अभिलषित सिद्धि प्राप्त की और सर्वप्रथम मधुकैटभ दैत्य के मेद (चर्बी) से मेदिनी (पृथिवी) का निर्माण किया।१॥ अनन्तर आठ प्रधान और मनोहर पर्वतों एवं उनसे असंख्य छोटे-छोटे पर्वतों की रचना की। उनके नाम क्या बताऊँ? प्रधानों की नामावली सुनिए।।२।। सुमेरु, फैलास, मलय, हिमालय, उदयाचल, अस्ताचल, सुवेल और गन्घमादन ये आठ प्रधान पर्वत हैं। फिर ब्रह्मा ने सात समुद्रों, अनेक नदों, कई नदियों, वृक्षों, ग्रामों और नगरों की सृष्टि की। लवण (खार), ईख, सुरा, घी, दही, दूध और (शुद्ध) जल के सात समुद्र हैं। उनमें से पहले की लम्बाई-चौड़ाई एक लक्ष योजन की है। बाद वाले उत्तरोत्तर दुगुने होते गये हैं ।३-५।। इन समुद्रों से घिरे हुए सात द्वीप हैं। उनके भूमण्डल कमलपत्र जैसे हैं। उनमें उपद्वीप और मर्यादापर्वत ी सात-सात ही हैं। हे विप्र! उन द्वीपों का नाम बता रह हूँ, सुनिए-जम्बू, शाक कुश, प्लक्ष, क्रोञ्च, न्यग्रोध और पुष्कर यही द्वीपों के नाम हैं।।६-७।। अनन्तर ब्रह्मा ने आठों लोकपालों के विहार करने के लिए मेरु पर्वत के आठों शिखरों पर मनोहर आठ पुरियों का निर्माण किया।८॥ जगत्पति ने उसके मूल भाग (पाताल) में अनन्त (शेषनाग) की नगरी का निर्माण करके ऊपर सातों स्वर्गों की रचना की, जिन्हें बता रहा हूँ, सुनिए -- ।।९।। शौनक! भूलोक, मुवलोक, अत्यन्त मनोहर स्वर्ग लोक, जनोलोक, तपोलोक और
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३६ सप्तमोऽध्यायः शृङ्गमूधिनि ब्रह्मलोकं जरादिपरिवजितम्। तदूर्ध्वे ध्रुवलोकं च सर्वतः सुमनोहरम्॥११॥ तदध: सप्त पातालान्निर्ममे जगदीश्वरः। स्वर्गातिरिक्तभोगाढ्यानधोऽधः क्रमतो मुने॥१२॥ अतलं वितलं चैव सुतलं च तलातलम्। महातलं च पातालं रसातलमधस्ततः ॥१३॥ सप्तद्वीपैः सप्तनाकेः सप्तपातालसंज्ञकैः। एभिर्लोकेश्च ब्रह्माण्डं ब्रह्माधिकृतमेव च॥१४॥ एवं चासंख्यब्रह्माण्डं सर्व कुत्रिममेव च। महाविष्णोश्च लोम्नां च विवरेषु च शौनक।।१५। प्रतिञिधव्रेष दिक्याला ब्रह्मविष्णुमहेर््सवराः। सुरा' नरादयः सर्वे सन्ति कृष्णस्य मायया॥१६॥ ब्रह्माण्डगणनां कर्तु न क्षमो जगतां पतिः। न शंकरो न धर्मश्च न च विष्णुश्च के सुराः॥१७॥ संख्यातुमीश्वरः शक्तो न संख्यात्ं तथाऽपि सः। विश्वाकाशदिशां चैव सर्वतो यद्यपि क्षमः॥१८।। कृत्रिमाणि च विश्वानि विश्वस्थानि च यानि च। अनित्यानि च विप्रेन्द्र स्वप्नवन्नश्वराणि च ॥१९॥ वैकुष्ठः शिवलोकश्च गोलोकश्च तयोः परः। नित्यो विश्वबहिर्भूतश्चाऽऽत्माकाशदिशो यथा॥२०॥ इति श्रीब्रह्मवैवर्ते महापुराणे सौतिशौनकसंवादे ब्रह्मखण्डे सृष्टिनिरूपणं नाम सप्तमोऽध्यायः ॥७।।
सत्य लोक का निर्माण करके ब्रह्मा ने मेरु के शिखर के शिरोभाग में जरा-मृत्यु से रहित ब्रह्मलोक की रचना की। उसके ऊपर चारों ओर अत्यन्त मनोहर ध्रुव लोक बनाया और नीचे जगदीश्वर ने सात पाताल लोकों की रचना की। मने! वे स्वर्गलोक की अपेक्षा अधिक सोग-सामग्रियों से सम्पन्न हैं॥१०-१२॥ (उनके नाम ये हैं-) अतल, वितल, सुनल, तलातल, महातल, पाताल और रसातल॥१३।। सात द्वीप, सात स्वर्ग और सात पाताल लोकों से युक्त यह ब्रह्माण्ड ब्रह्मा के अधिकार में है॥१४॥ शौनक ! इस प्रकार के असंख्य ब्रह्माण्ड, जो कृत्रिम हैं, भगवान महानिष्ण के लोम-विवरों में स्थित हैं॥१५॥ भगवान् श्रीकृष्ण की माया द्वारा प्रत्येक विश्व में दिकपाल, ब्रह्मा, विष्णु, महेश्वर, देवगण और मनुष्य आदि स्थित हैं॥१६।। जगत्पति ब्रह्मा ब्रह्माण्ड की गणना करने में असमर्थ हैं। (इतना ही नहीं) शंकर, धर्म, विष्णु और देवगण भी (उसकी गणना करने में) असमर्थ हैं।१७। यद्यपि ईश्वर उसकी गणना करने में समर्थ हैं, तथापि विश्व, आकाश और दिशाओं का सर्वथा संख्यान तो उनके लिए भी कठित है।१८। विग्रेन्द्र ! कृत्रिम विश्व और उनके भीतर रहने वाली जो वस्तुएँ हैं, वे सब अनित्य और स्वग्न की भाँति नश्र हैं॥१९।। वैकुण्ठ और शिवलोक तथा इन दोनों से परे जो गोलोक है-ये सब नित्य धाग हैं। आत्मा, आकाश और दिशा की भाँति ये सब कृत्रिम विश्व से बाहर तथा नित्य हैं ॥२०॥ श्रीब्रह्मवैवतमहापुराण के ब्रह्मखण्ड में सृष्टिनिरूपण नामक सातवाँ अध्याय समाप्त ।।७।।
१ क. ० राडसुराद०।
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ब्रह्मववतपुराणम् ३७
अथाष्टमोऽध्यायः
सौतिरुवाच ब्रह्मा विश्वं विनिर्माय सावित्र्यां वरयोषिति। चकार वीर्याधानं च कामुक्यां कामुको यथा।१॥ सा दिव्यं शतवर्ष च धृत्वा गर्भ सुदुःसहम्। सुप्रसूता च सुषुवे चतुर्वेदान्मनोहरान् ।२।। विविधाञशास्त्रसंघांश्च तर्कव्याकरणादिकान्। षटत्रिशत्संख्यका दिव्या रागिणी: सुमनोहराः ॥३। षड् रागान्सुन्दरांश्चैव नानातालसमन्वितान्। सत्यत्रेताद्वापरांश्च कािं च कलहप्रियम्।।४। वर्ष मासमृतुं चैव तिरथि दण्डक्षणादिकम्। दिनं रात्रि च वारांश्च संध्यासुषसमेव च।।५। पुष्टि च देवसेनां च मेधां च विजयां जयाम्। षट् कृत्िकाश्च योगांश्च करणं च तपोधन।।६।। देवसेनां महाषष्टीं कार्तिकेयप्रियां सतीम्। मातृकासु प्रधाना सा बालानाभिष्टदेवता।।७। ब्राह्मं पादं च वाराहं कल्पत्रयमिदं स्मृतम्। नित्यं नैमित्िकं चैत द्विपरार्ध च प्राकृतम्।।८।। चतुविधं च प्रलयं कालं वै मृत्युकन्यकाम्। सर्वान्व्याधिगणांश्चैव सा प्रसूध स्तनं ददौ । अथ धातुः पृष्ठदेशादधर्मः
अध्याय द
वेद, मनु आदि की सृष्टि का वर्णन सौति बोल-ब्रह्मा ने विश्व की रचना करके परम सुन्दरी सावित्री में उसी तरह वीर्याधान किया जैसे कोई कामुक पुरुष कामुकी स्त्री में करता है। अनन्तर उस सावित्री ने उस वीर्य को दिव्य सौ वर्षों तक धारणकर चार मनोहर वेदों को प्रकट किया। साथ ही न्याय, व्याकरण आदि शास्त्र समूह और छत्तीस प्रकार की दिव्य एवं अत्यन्त मनोहर रागिनियों को उत्पन्न किया। फिर अनेक प्रकार के तालों से युक्त छह सुन्दर राग प्रकट किये। सत्य, त्रेता, द्वापर और कलहप्रिय कलियुग को भी सावित्री ने उत्पन्न किया।१-४॥ तपोधन ! वर्ष, मास, ऋतु, तिथि, दण्ड, क्षण आदि, दिन, रात्रि, वार, सन्ध्या, उषाकाल, पुष्टि, देवसेना, मेधा, विजया, जया, छह कृत्तिका, योग और करण को भी उन्होंने उत्पन्न किया॥५-६॥ कार्तिकेय की प्रिया सती महाषष्ठी देवसेना-जो मातृकाओं में प्रधान और बालकों की इष्टदेवी हैं, इन सब को भी सावित्री ने उत्पन्न किया।।७।। ब्ाह्म, पाद, और वाराह ये तीन कल्प, नित्य, नैमित्तिक, द्विपरार्द्ध और प्राकृत ये चार प्रकार के प्रलय-काल, मृत्यु-कन्या और समस्त व्याधियों को उत्पन्न करके सावित्री ने उन्हें अपना स्तन पान कराया।८-९।। अनन्तर ब्रह्मा के पृष्ठभाग से अधर्म और उनके वाम पार्श्व से अत्यन्त कामिनी अलक्ष्मी (दरिद्रा) उत्पन्न हुई॥१०॥ उनके नाभिप्रदेश से शिल्पियों के गुरु विश्व-
१ क. ०भूव तस्य का०।
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३८ अष्टमोष्ध्याय:
नाभिदेशाद्विश्वकर्मा जातो वे शिल्पिनां गुरुः। महान्तो वसवोऽष्टौ च महाबलपराक्र्माः॥११॥ अथ धातुश्च मनस आविर्भूता कुमारकाः। चत्वारः पञ्चवर्षोया ज्वलन्तो ब्रह्मतेजसा॥१२॥ सनकश्च सनन्वश्च तृतीयश्च सनातनः। सनत्कुमारो भगवांश्चतुर्थो ज्ञानिनां वरः॥१३॥ आविर्बभूव मुखतः कुमारः कनकप्रभः। विव्यरूपधरः श्रीमान्सस्त्रीकः सुन्दरो युवा॥१४॥ क्षत्रियाणां बीजरूपो नाम्ना स्वायंभुवो मनुः। या स्त्री सा शतरूपा च रूपाढया कमलाकला॥१५॥ सस्त्रीकश्च मनुस्तस्थौ धात्राज्ञापरिपालकः। स्वयं विधाता पुत्रांश्च तानुवाच प्रहर्षितान्॥१६॥ सृष्टि कर्तु महाभागो महाभागवतान्द्विजः । जग्मुस्ते च नहीत्युक्त्वा तप्तुं कृष्णपरायणाः।१७।। चुकोप हेतुना तेन विधाता जगतां पतिः। कोपासक्तस्य च विधेर्ज्वलतो ब्रह्मतेजसा॥१८॥ आविर्भूता ललाटाच्च रुद्रा एकादश प्रभो। कालाग्निरुद्रः संहर्ता तेषामेकः प्रकीरतितः ॥१९॥ सर्वेषामेव विश्वानां स तामस इति स्मृतः । राजसश्च स्वयं ब्रह्मा शिवो विष्णुश्च सात्त्विकौ ॥२०॥ गोलोकनाथः कृष्णरच निर्गुणः प्रकृतेः परः। परमज्ञानिनो मूर्खा वदन्ति तामसं शिवम् ॥२१॥ शुद्धसत्त्वस्वरूपं च निर्मलं वैष्णवाग्रणीम्।शृणु नामानि रुद्राणां वेदोक्तानि च यानि च ॥२२॥ महान्महात्मा मतिमान्भीषणशच भयंकर:'। ऋतुध्वजश्चोर्ध्वकेशः पिङ्गलाक्षो रुचिः शुचिः॥२३॥
कर्मा और महान् बल-पराक्रम से उत्पन्न महान् आठ वसु उत्पन्न हुए।११॥ पश्चात् ब्रह्मा के मन द्वारा चार कुमार उत्पन्न हुए, जो पाँच वर्ष की अवस्था वाले एवं ब्रह्मतेज से देदीप्यमान थे॥१२॥ उनमें से प्रथम सनक, दूसरे सनन्दन, तीसरे सनातन और चौथे ज्ञानिश्रेष्ठ भगवान् सनत्कुमार हैं॥१३। उनके मुख से एक कुमार उत्पन्न हुआ, जिसकी प्रभा सुवर्ण की भाँति थी। वह दिव्य रूप धारण किये, श्रीमान्, स्त्री समेत, सुन्दर, युवा और क्षत्रियों का बीज रूप था। उसका नाम स्वायम्भुव मनु था और उस स्त्री का नाम शतरूपा था, जो परम रूपवती तथा लक्ष्मी की कलास्वरूपा थी॥१४-१५॥ स्त्री समेत मनु ने ब्रह्मा की आज्ञा को शिरोधार्य किया। अनन्तर ब्रह्मा ने स्वयं अत्यन्त हर्षित उन महाभागवत कुमारों से भी सृष्टि करने के लिए गृहस्थ होने को कहा। द्विज ! किन्तु उन कुमारों ने महाभाग ब्रह्मा की आज्ञा का 'नहीं' कहकर उल्लंघन कर दिया और कृष्णपरायण वे कुमार तप करने के लिए चले गये ॥१६-१७।। उस कारण जगत्पति ब्रह्मा अत्यन्त कुद्ध हुए। प्रभो! ब्रह्मतेज से देदीप्यमान विधाता के कुपित होने पर उनके ललाट से एकादश रुद्र उत्पन्न हुए। उनमें से एक को संहर्ता कालाग्निरुद्र कहा गया है। सम्पूर्ण लोकों में केवल वे ही, तामस या तमोगुणी, माने गये हैं। स्वयं ब्रह्मा 'राजस' तथा शिव और विष्णु 'सात्त्विक' कहे जाते हैं। गोलोकनाथ भगवान् कृष्ण निर्गुण और प्रकृति से परे हैं। परम अज्ञानी मूर्ख लोग शिवजी को तामस कहते हैं किन्तु वे शुद्ध सत्त्वस्वरूप, निर्मल, तथा वैष्णवों में अग्रणी हैं। अब रुद्रों के वेदोक्त नाम सुनो ।१८-२२।। महान्, महात्मा, मतिमान्, भीषण, भयंकर, ऋतुध्वज, उर्ध्वकेश, पिंगलाक्ष, रुचि और शुचि यही उनके नाम हैं।२३। ब्रह्मा के दाहिने कान से पुलस्त्य, बायें से पुलह, दाहिने नेत्र से अत्रि, बाँयें नेत्र से स्वयंक्रतु
१ क. ०र। कष्बंतेजोष्वंके०।
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ब्रह्मवैवर्तपुराणम् ३९
पुलस्त्यो दक्षकर्णाच्च पुलहो वामकर्णतः। दक्षनेत्रात्तथाऽत्रिश्च वामनेत्रात्कतुः स्वयम्॥२४॥ अरणिर्नासिकारन्ध्रादङ्गिराश्च मुखाद्रुचिः। भृगुश्च वामपाश्वाच्च दक्षो दक्षिणपाश्वतः॥२५। छायायाः कर्दमो जातो नाभे: पञ्चशिखस्तथा। वक्षसश्चव वोढुश्च कण्ठदेशाच्च नारदः॥२६॥ मरीचिः स्कन्धदेशाच्चैवापान्तरतमा' गलात्। वसिष्ठो रसनादेशात्प्रचेता अधरोष्ठतः।२७॥ हंसश्च वामकुक्षेश्च दक्षकुक्षयंतिः स्वयम्। सृष्टि विधातुं स विधिश्चकाराऽडज्ञां सुतान्प्रति । पितुर्वाक्यं समाकर्ण्य तवमुवाच स नारदः ।।२८॥
नारद उवाच पूर्वमानय मज्ज्येष्ठान्सनकादीन्पितामह। कारयित्वा दारयुक्तानस्मान्वद जगत्पते ॥२९॥ पित्रा ते तपसे युक्ताः संसाराय वयं कथम्। अहो हन्त प्रभोर्बुद्धिविपरीताय कल्पते ॥३०॥ कस्मं पुत्राय पीयूषात्परं दत्तं तपोऽधुना। कस्मै ददासि विषयं विषमं च विषाधिकम्॥३१॥ अतीव निम्ने घोरे च भवाब्धौ यः पतेत्पितः । निष्कृतिस्तस्य नास्तीति कोटिकल्पे गतेऽपि च ॥३२॥ निस्तारबीजं सर्वेषां बीजं च पुरुषोत्तमम्। सर्वदं भक्तिदं दास्यप्रदं सत्यं कृपामयम्॥३३॥ भक्तकशरणं भक्तवत्सलं स्वच्छमेव च। भक्तप्रियं भक्तनाथं भक्तानुग्रहकारकम्॥३४॥ भक्ताराध्यं भक्तसाध्यं विहाय परमेश्वरम्। मनो दधाति को मूढो विषये नाशकारणे॥३५॥
(यज्ञ), नासाछिद्र से अरणि और अंगिरा, मुख से रुचि, बाँये पारश्व से भुगु और दाहिने पार्श्व से दक्ष उत्पन्न हुए।।२४-२५।। छाया से कर्दम, नाभि से पञ्चशिख, वक्षःस्थल से वोढु, कण्ठ देश से नारद, स्कन्ध प्रदेश से मरीचि, गले से अपान्तरतमा, जिह वा से वशिष्ठ, अधरोष्ठ से प्रचेता, वाम कुक्षि से हंस, दक्षिण कुक्षि से यति प्रकट हुए। ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना करने के लिए अपने पुत्रों को आज्ञा दी। (इस पर) पिता की बात सुनकर नारद ने उनसे कहा ॥२६-२८।।
नारद बोल-पितामह, जगत्पते ! सर्वप्रथम आप हमारे ज्येष्ठ भाई सनकादिकों को यहां लाइये और उनका विवाह कीजिए। तत्पश्चात् हमें आज्ञा दीजिये॥२९॥ जब पिता के ही द्वारा वे सब तप करने के लिए नियुक्त किये गये तो हमें संसार में क्यों फंसाया जा रहा है। आश्चर्य और खेद की बात है कि प्रभु की बुद्धि विपरीत भाव को प्राप्त हो रही है।३०। क्योंकि किसी पुत्र को तो अमृत से भी उत्तम तप इस समय प्रदान किया जा रहा है और किसी को विष से भी अधिक विषम होने वाला विषय प्रदान किया जा रहा है।३१।। पिता जी! अत्यन्त निम्न कोटि के घोर भव-सागर में जो गिर जायगा उसकी कोटि कल्पों में भी कोई निष्कृति (उद्धार होने का उपाय) नहीं है।।३२।। क्योंकि सभी प्राणियों के निस्तार करने का कारण एकमात्र भगवान् पुरुषोत्तम ही हैं, जो समस्त वस्तुओं के दाता, भक्तिप्रद, दास्यप्रद, सत्य, कृपामय, भक्तों के एकमात्र शरणप्रद, भक्तवत्सल, स्वच्छ, भक्तों के प्रिय, भक्तनाथ, भक्त के ऊपर अनुग्रह करने वाले, भक्तों के आराध्य देव और भक्तसाध्य हैं। भला! ऐसे परमेश्वर को छोड़कर कौन मुढ़ जन अपने मन को विनाशजनक विषय में लगायेगा॥३३-३५॥ कौन मूढ़ प्राणी अमृत से भी अधिक
१ क. तमो ग०।
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४० अष्टमोऽध्यायः
तरिहाय कृष्णसेवां च पीयूषादधिकां प्रियाम। को मूढो विषमश्नाति विषमं विषयाभिधम् ॥३६॥ स्वप्नवन्नरवरं तुच्छमसत्वं सृत्युकारणम्। यथा दोपशिखाग्रं च कीटानां सुमनोहरम्।३७॥ यथा अडिशमांसं च मत्स्यापातसुखप्रदम्। तथा विषयिणां तात विषयो मृत्युकारणम्।।३८।। इत्युकत्वा नारदस्तत्र विरराम विधे: पुरः। तस्थौ तातं नमस्कृत्य ज्वलदग्निशिखोपमः॥३९॥ ब्रह्मा कोपपरीतश्च शशाप तनयं द्विज। उवाच कम्पिताङगश्च रक्तास्यः स्फुरिताधरः॥४०॥
ब्रह्मोवाच भविता ज्ञानलोपस्ते मच्छापेन च नारद। क्रोडामृगरच त्वं साध्यो योषिल्लुब्धश्च लम्पटः॥४१। स्थिरयौवनयुक्तानां रूपाढयानां मनोहरः। पञ्चाशत्कामिनीनां च भर्ता व प्रागवल्लभः ॥४२॥ सुरोर्गुरु:॥४३॥ गन्धर्वार्णा च सुवरः सुस्वरश्च सुगायनः। वीणावादनसंदर्भनिष्णातः स्थिरयौवनः ॥४४।। प्राज्ञो मधुरवावशान्तः सुशीलः सुन्दरः सुधीः। भविष्यशि न संदेहो नामतश्चोपबहणः।४५।। ताभिदिव्यं लक्षयुगं विहृत्य नि्जने बने। पुनर्मदीयशापेन दासीपुत्रश्च तत्परः॥४६।। वत्स वैष्णवसंसगद्विष्णवोच्छिष्टभोजनात्। पुनः कृष्णप्रसादेन भविष्यसि ममाऽत्मजः।४७॥।
मधुर भगवान् कृष्ण की सेवा को छोड़कर विषय नामक विषम विष का भक्षण करेगा॥३६॥। जिस प्रकार दीपक की शिखा का अन्नभाग अत्यन्त मनोहर होते हुए भी पर्तिगों के लिए मृत्युकारक है उसी प्रकार यह विषय भी स्वप्न की भाँति नश्वर, तुच्छ, असत्य और बिनाशकारी है।३७॥ हे तात ! जिस प्रकार बंसी में गुंथा हुआ मांस मछ- लियों को आपाततः सुखद जान पड़ता है, उसी प्रकार विषयी पुरुषों को विषय में सुख की प्रतीति होती है। किन्तु वास्तव में वह मृत्यु का कारण है।।३८।। प्रज्वलित अग्निशिखा की भाँति प्रदीप्त होने वाले नारद जी ब्रह्मा के सामने इस प्रकार कहकर चुप हो गये और उन्हें प्रणाम करके चपचाप खड़े रहे॥३९॥ द्विज ! इस पर ब्रह्मा ने अत्यन्त कुपित होकर पुत्र नारद को शाप दे दिया। उस समय ब्रह्मा कोध से काँप रहे थे, उनका मुख लाल हो गया था और ओठ फड़क रहे थे॥४०॥ ब्रह्मा बोल -- नारद ! मेरे शाप से तुम्हारा ज्ञान लुप्त हो जायगा। तुम कामिनियों के क्रीड़ामृग, स्त्री- लोभी और लम्पट बन जाओगे।।८१। तुम स्थिर यौवन वाली अत्यन्त सुन्दरी पचास कामिनियों के प्राणप्रिय एवं सुन्दर पति बनोगे। तुम शृंगारशास्त्र के वेत्ता, महाशृंगारी, लोलुप, अनेक भाँति के शृंगारों में निपुण व्यक्तियों के गुरुओं के गुरु, गन्धर्दों में श्रेष्ठ, अच्छे स्वर वाले गायक तथा वीणा बजाने में सबसे निपुण होगे। तुम्हारा यौवन निरन्तर स्थिर रहेगा॥४२-४४॥ उसी भाँति विद्वान्, मधुरभाषी, शान्त, सुशील, सुन्दर और सुबुद्धि होगे। इसमे सन्देह नहीं। उस समय उपबर्हण नाम से तुम्हारी प्रसिद्धि होगी। उन कामिनियों के साथ निर्जन बन में एक लक्ष युग तक बिहार करने के अनन्तर मेरे शाप से दासीपुत्र होगे।४५-४६।। वत्स ! तदनन्तर वैष्णव महा- त्माओं के संसर्ग से और उनके उच्छिष्ट भोजन करने से तुम पुनः भगवान् श्रीकृष्ण की कृपा प्राप्त करके मेरे पुत्र रूप में प्रतिष्ठित होगे॥।४७। उस समय मैं तुम्हें पुरातन दिव्य ज्ञान प्रदान करूँगा। किन्तु इस समय मेरा पुत्र
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ज्ञानं दास्यामि ते दिव्यं पुनरेव पुरातनम्। अधुना भव नष्टस्त्वं मत्सुतो निपत ध्रुवम् ॥४८ - ब्रह्मेत्युक्त्वा सुतं विप्र विरराम जगत्पतिः। रुरोद नारदस्तातमवोचत्संपुटाञ्जलि:॥४९॥ नारद उवाच क्रोधं संहर संहर्तस्तात तात जगद्गुरो। स्रष्टुस्तपस्वीशस्याहो क्रोधोऽयं मय्यनाकरः॥५०॥ शपेत्परित्यजेद्विद्वान्पुत्रमुत्पथगामिनम्। तपस्विनं सुतं शप्तुं कथमर्हसि पण्डित ॥५६॥ जनिर्भवतु मे ब्रह्मन्यासु यासु च योनिषु। न जहातु हरेर्भक्तिर्मामेवं देहि मे वरम् ॥५२॥ पुत्रश्चज्जगतां धातुर्नास्ति भक्तिर्हरे: पदे। सूकरादतिरिक्तश्च सोऽधमो भारते भुवि ॥५३॥ जातिस्मरो हररभक्तियुक्तः सूकरयोनिषु। जनिर्लभेत्स प्रवरो गोलोकं याति कर्मणा ॥५४॥ गोविन्दचरणाम्भोजभक्तिमाध्वीकमीप्सितम्। पिबतां वैष्णवादीनां स्पर्शपूता वसुंधरा॥५५॥ तोर्थानि स्पर्शमिच्छन्ति वैष्णवानां पितामह। पापानां पापितत्त्वानां क्षालनायाऽऽत्मनामपि॥५६॥ मन्त्रोपदेशमात्रेण नरा मुक्ताश्च भारते। परेश्च कोटिपुरुषैः पूर्वैः सारधं हरेरहो॥५७॥ कोटिजन्माजितात्पापान्मन्त्रग्रहणमात्रतः। मुक्ताः शुध्यन्ति यत्पूर्व कर्म निर्मूलयन्ति च॥५८॥ पुत्रान्दारांश्च शिष्यांश्च सेवकान्बान्धवांस्तथा। यो दर्शयति सन्मार्गं सद्गतिस्तं लभेद्ध्रुवम् ॥५९॥ यो दर्शयत्यसन्मागं शिष्यैविश्वासितो गुरुः। कुम्भीपाके स्थितिस्तस्य यावच्चन्द्रदिवाकरौ॥६०॥
होते हुए भी तुम नष्ट हो जाओ और अवश्य ही नीचे गिरो॥४८॥ विप्र! जगत्पति ब्रह्मा इस प्रकार अपने पुत्र से कहकर चुप हो गये और नारद जी रुदन करते हुए हाथ जोड़कर अपने पिता से बोले॥४९॥ नारद बोल-हे तात ! हे जगद्गुरो! आप क्रोध को शान्त करें। आप स्रष्टा हैं। तपस्वियों के स्वामी हैं। अहो ! मुझ पर आपका यह कोध अकारण ही हुआ है। ।५०॥। हे पण्डित ! विद्वान् पुरुष दुराचारी पुत्र को शाप देते हैं और उसका त्याग करते हैं। अतः आप अपने तपस्वी पुत्र को शाप देना कैसे उचित मानते हैं।।५१।। ब्रह्मन् ! जिन-जिन योनियों में मेरा जन्म हो, भगवान् की भक्ति मुझे कदापि न छोड़े, यह वरदान भी मुझे देने की कृपा करें॥५२॥ क्योंकि कोई जगत् के रचयिता का ही पुत्र क्यों न हो, यदि उसमें भगवच्चरण की भक्ति नहीं है तो वह भारत के भूमण्डल में सूकर से भी अधिक अधम है ॥५३।। पूर्वजन्म के स्मरण और भगवान् की भक्ति से युक्त रहने पर यदि उसका जन्म सूकर योनि में भी हो जाये तो वह श्रेष्ठ पुरुष अपने कर्म से गोलोक को प्राप्त कर लेता है।।५४।। क्योंकि गोविन्द के चरणकमल की मक्तिरूप मनोवांछित मकरन्द का पान करने वाले वैष्णवों के स्पर्श से ही यह वसुन्धरा पृथ्वी पवित्र होती है ।५५।। पितामह! तीर्थ-समूह पापियों के पाप से अपने को शुद्ध करने के लिए वैष्णवों का स्पर्श चाहते हैं। भारत में भगवान् के मन्त्रोपदेश मात्र से मनुष्य करोड़ों पूर्वजों तथा वंशजों के साथ मुक्त हो जाते हैं ॥५६-५७।। मन्त्र ग्रहण मात्र से मनुष्य करोड़ों जन्म के संचित पाप से मुक्त होकर शुद्ध हो जाता है क्योंकि वह (मंत्र) पूर्व के पापों को निर्मुल कर देता है॥५८॥ इस प्रकार पुत्र, स्त्री, शिष्य, सेवक और बान्धवगणों को जो सन्मार्ग प्रदर्शित कराता है उसकी निश्चित सद्गति होती है ॥५९॥ और जो शिष्य का विश्वास पात्र गुरु (शिष्य को) असन्मार्ग बताता है, वह कुम्भीपाक नरक में तब तक पड़ा रहता है जब तक सूर्य ६
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४२ नवमोध्याय:
स किंगुरुः स किंतात स किंस्वामी स किसुतः। यः श्रीकृष्णपदाम्भोजे भक्ति दातुमनीश्वरः॥६१॥ शप्तो निरपराधेन त्वयाऽहं चतुरानन। मया शप्तुं त्वमुचितो घ्नन्तं घ्नन्त्यपि पण्डिताः ॥६२॥ कवचस्तोत्रपूजाभि: सहितस्ते मनुर्मनोः। लुप्तो भवतु मच्छापात्प्रतिविश्वेषु निश्चितम्॥६३॥ अपूज्यो भव विश्वेषु यावत्कल्पत्रयं पितः। गतेषु त्रिषु कत्पेषु पूज्य पूज्यो भविष्यसि॥६४॥ अधुना यज्ञभागस्ते व्रतादिष्वपि सुव्त। पूजनं चास्तु नामैकं बन्द्ो भव सुरादिभिः ॥६५॥ इत्युवत्वा नारदस्तन्न विरराम पितुः पुरः। तस्थौ सभायां रु विद्हदर्येन विद्यता॥६६।। उपबर्हणगन्धर्वो नारदस्तेन हेतुना। दासीपुत्रश्च शापेन पितुरेव च शौनक ।६७।। ततः पुनर्नररदृश्च स बभूव महानृषिः। ज्ञानं प्राप्य पितुः पश्चात्कथयिष्यामि चाधुना।६८।। इति श्रीब्रह्मवैवर्तमहाधुराणे सौतिशौनकसंवादे ब्रह्मखण्डे ब्रह्मनारद- शापोपलम्भनं नामाष्टमोऽध्यायः।।८।।
अथ नवमोऽध्यायः
सौतिरुवाच अथ ब्रह्मा स्वपुत्रांस्तानादिदेश च सृष्टये। सृष्टिं प्रचकुस्ते सर्वे विप्रेन्द्र नारदं विना।१।।
और चन्द्रमा का अस्तित्व रहता है।६०।। वे गुरु, भाई, पिता, स्वामी और पुत्र निन्दनीय हैं जो भगवान् श्री कृष्ण के चरण कमल की भक्ति प्रदान करने में असमर्थ हैं ॥६१।। चतुरानन ! तुमने मुझे बिना अपराध के ही शाप दिया है, अतः उचित है कि मैं भी तुम्हें शाप दूं; क्योंकि मारने वाले को पण्डितगण भी मारते हैं॥६२॥ मेरे शाप से प्रत्येक विश्व में तुम्हारे कवच, स्तोत्र, पूजा और मन्त्र लुप्त रहेंगे।६३।। और हे पिता। तुम सभी विश्वों में तीनों कल्पों तक अपूजनीय रहोगे (अर्थात् तुम्हारी पूजा कोई नहीं करेगा)। हाँ, तीनों कल्पों के व्यतीत होने पर तुम पूज्य के भी पूज्य हो जाओगे ।।६४।। हे सुद्रत ! इस समय तुम्हारा यज्ञभाग बंद हो और व्रतदिकों में भी तुम्हारा पूजन न हो केवल तुम देवों के वन्दनीय बने रहोगे ।६५॥ ऐसा कह कर नारद जी अपने पिता के सामने चुप हो गए और ब्रह्मा भी सन्तप्त हृदय से उस सभा में सुस्थिर भाव से बैठे रहे॥६६॥ शौनक ! पिता के शाप से ही नारद उपबर्हण नामक गन्धर्व हुए और पुनः दासी-पुत्र हुए। इसके पश्चात् पिता (ब्रह्मा) से ज्ञान प्राप्त करके वे महर्षि नारद हुए। इसका वर्णन मैं अभी करूँगा ।६७-६८।। श्री ब्रह्मव वर्तमहापुराण के ब्रह्मखण्ड में ब्रह्म-नारद-शाप-प्राप्ति नामक आठवाँ अध्याय समाप्त ॥८॥
अध्याय ६ दक्ष कन्याओं की संतति आदि का वर्णन सौति बोले-हे विप्रेन्द्र! इसके उपरान्त ब्रह्मा ने अपने पुत्रों को सृष्टि करने की आज्ञा प्रदान की और
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ब्रह्मवैवर्तपुराणम् ४३
मरोचर्मनसो जातः कश्यपश्च प्रजापतिः। अत्रेर्नेत्रमलाच्चन्द्रः क्षीरोदे च बभूव ह॥२॥ प्रचेतसोऽपि मनसो गौतमश्च बभूव ह। पुलस्त्यमनसः पुत्रो मैत्रावरुण एव च॥३।। मनोश्च शतरूपायां तिस्रः कन्याः प्रजज्ञिरे। आकूतिर्देवहूतिश्च प्रसूतिस्ताः पतिव्रताः॥४।। प्रियव्रतोत्तानपादौ द्वौ च पुत्रौ मनोहरौ। उत्तानपादतनयो ध्रुवः परमधार्मिक:।५।। आकूति रुचये प्रादाद्दक्षायाथ प्रसूतिकाम्। देवहूतिं कर्दमाय यत्पुत्रः कपिलः स्वयम्॥६॥ प्रसूत्यां दक्षबीजेन षष्टिकन्याः प्रजज्ञिरे। अष्टौ धर्माय स ददौ रुद्रायकादश स्मृताः॥७॥ शिवायकां सतीं प्रादात्कश्यपाय त्रयोदश। सप्तविशतिकन्याशच दक्षश्चन्द्राय दत्तवान्।८।। नामानि धर्मपत्नीनां मत्तो विप्र निशामय। शान्तिः पुष्टिर्धृतिस्तुष्टिः क्षमा श्रद्धा मतिः स्मृतिः ॥९॥ शान्ते: पुत्रश्च संतोषः पुष्टेः पुत्रो महानभूत्। धृतेधैर्यं च तुष्टेश्च हर्षदपौं सुतौ स्मृतौ॥१०॥ क्षमापुत्र: सहिष्णुश्च श्रद्धापुत्रश्च धार्मिक। मतेर्ज्ञानाभिधः पुत्रः स्मृतेर्जातिस्मरो महान् ॥११॥ पूर्वपत्यां च मूर्त्यां च नरनारायणावृषी। बभूबुरेते धर्मिष्ठा धर्मपुत्राश्च शौनक॥१२॥ नामानि रुद्रपत्नीनां सावधानं निबोध मे। कला कलावती काष्ठा कालिका कलहप्रिया।१३। कन्दली भीषणा रास्ना प्रमोचा भूषणा शुकी। एतासां बहवः पुत्रा बभूवुः शिवपार्षदाः॥१४।। सा सती स्वामिनिन्दायां तन्ं तत्याज्य यज्ञतः। पुनर्भूत्वा शैलपुत्री लेभे सा शंकरं पतिम् ॥१५॥ कश्यपस्य प्रियाणां च नामानि शृणु धार्मिक। अदितिर्देवमाता वै दैत्यभाता दितिस्तथा॥१६॥ नारद को छोड़कर सभी पुत्रों ने सृष्टि करना आरम्भ भी किया।१॥ मरीचि के मन से कश्यप प्रजापति प्रकट हुए। अत्रि महर्षि के नेत्र के मल से क्षीरसागर में चन्द्रमा का आविर्भाव हुआ॥२॥ प्रचेता के मन से गौतम और पुलस्त्य के मन से मैत्रावरुण उत्पन्न हुए।३॥ मनु-शतरूपा से आकति, देवहति और प्रसूति नामक तीन कन्यायें तथा प्रियव्रत एवं उत्तानपाद नामक दो मनोहर पुत्र उत्पन्न हुए। उत्तानपाद के पुत्र परम धार्मिक ध्रुव हुए।।४-५।। आकूति रुचि को, प्रसूति दक्ष को तथा देवहति कर्दम प्रजापति को प्रदान की गई। देवहूति से स्वयं कपिल उत्पन्न हुए।।६।। दक्ष के वीर्य और प्रसूति के गर्भ से साठ कन्याओं की उत्पत्ति हुई, जिनमें से उन्होंने आठ कन्यायें धर्म को, ग्यारह रुद्र को, एक सती शिव को, तेरह कश्यप को तथा सत्ताईस कन्याएँ चन्द्रमा को प्रदान कीं ।।७-८॥ विप्र! धर्म की पत्नियों के नाम मैं कह रहा हूँ, सुनो-शान्ति, पृष्टि, धृति, तुष्टि, क्षमा, श्रद्धा, मति और स्मृति उनके नाम हैं।।९। शान्ति का पुत्र सन्तोष और पुष्टि का महान् हुआ। धृति के धैर्य और तुष्टि के हर्ष तथा दर्प नामक पुत्र हुए।।१०।। इसी प्रकार क्षमा के सहिष्णु, श्रद्धा के धार्मिक, मति के ज्ञान और स्मृति के महान् जाति- स्मर नामक पुत्र हुआ।।११।। शौनक ! धर्म की पहली पत्नी मूर्ति में नर-नारायण नामक दो ऋषि और अन्य भी धार्मिक पुत्र हुए।।१२।। अब मैं रुद्र की पत्नियों के नाम बता रहा हूँ, सावधान होकर सुनो ! कला, कलावती, काष्ठा, कालिका, कलहप्रिया, कन्दली, भीषणा, रास्ना, प्रमोचा, भूषणा और शुकी-ये उनके नाम हैं। उनके अनेक पुत्र उत्पन्न हुए, जो शिव के पार्षद हैं।।१४॥ सती ने (अपने पिता के) यज्ञ में स्वामी (शंकर) की निन्दा होने के कारण अपना शरीर छोड़ दिया और पुनः हिमालय के यहाँ उत्पन्न होकर शंकर को पति के रूप में वरण किया॥१५॥ घार्मिक! अब कश्यप की पत्नियों के नाम सुनो ! देवमाता अरदिति, दैत्यमाता दिति, सपों की माता कद्रू, पक्षियों
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४४ नवमोध्याय: सर्पमाता तथा कद्रूरविनता पक्षिसूस्तथा। सुरभिश्च गवां माता महिषाणां च निश्चित्तम्॥१७॥ सारमेयादिजन्तूनां सरमा सूश्चतुष्पदाम्। दनुः प्रसूर्दनिवानामन्याश्चेत्येवमादिकाः ॥१८॥ इन्द्रश्च द्वादशादित्या उपेन्द्राद्याः सुरा मुने। कथिताश्चादितेः पुत्रा महाबलपराक्रमाः॥१९॥ इन्द्रपुत्रो जयन्तश्च ब्रह्म्शच्यामजायत। आदित्यस्य सवर्णायां कन्यायां विश्वकर्मणः ॥२०॥ शनैश्चरयमौ पुत्रौ कालिन्दी कन्यका तथा। उपेन्द्रवीर्यात्पृथ्व्यां तु मङ्गलः समजायत॥२१॥ शौनक उवाच कथं सौते स चोपेन्द्रान्मङ्गलः समजायत। वसुंधरायां बलवान्तन्मे व्याख्यातुमर्हसि ॥२२॥ सौतिरुवाच उपेन्द्ररूपमालोक्य कामार्ता च वसुंधरा। विधाय सुन्दरीवेषमक्षता प्रौढयौवना ॥२३। मलये निर्जने रम्ये चारुचन्दनपल्लवे। चन्दनोक्षितसर्वाङ्गं रत्नभूषणभूषितम्॥२४॥ तं सुशीलं शयानं च शान्तं सस्मितमीप्सितम्। सस्मिता तस्य तल्पे च सहसा समुपस्थिता ॥२५॥ सुरम्यां मालतीमालां ददौ तस्मै वरानना। सुगन्धि चन्दनं चारु कस्तूरीकुङकुमान्वितम्॥२६॥ उपेन्द्रस्तन्मनो ज्ञात्वा कामिनीं कामपीडिताम्। नानाप्रकारशृङ्गारं चकार च तया सह ॥२७॥ तदङ्गसङ्गसंसक्ता मूर्छां प्राप सती तदा। मृतेव निद्रितेवासौ बीजाधाने कृते हरौ॥२८॥
की माता विनता, गौओं और महिषों की माता सुरभि, कुत्ते आदि चार पैर वाले जन्तु की माता सरमा, दानवों की माता बन और अन्य पत्नियाँ भी इसी प्रकार अन्यान्य सन्तानों की जननी थीं॥१६-१८॥ मुने ! इन्द्र द्वादश आदित्य और उेद्ट्र (विष्णु) आदि देवगण अदिति के पुत्र कहे गये हैं, जो महापराक्रमी एवं महाबली हैं॥१९॥ ब्रह्मन् ! इन्द्र-पत्नी अची से जयन्त उत्पन्न हुआ। विश्वकर्मा की पुत्री सवर्णा में सूर्य द्वारा शनि, यम ये दो पुत्र और (यमुना) नाम की एक कन्या उत्पन्न हुई। उसी भाँति उपेन्द्र के वीर्य से पृथ्वी में मंगल नामक (ग्रह) उत्पन्न हुआ॥२०-२१॥ शौनक बोल-सूतपुत्र ! उपेन्द्र के वीर्य से वसुँधरा में बलवान् मंगल कैसे उत्पन्न हुआ? हमें बताने की कृपा करें ! ॥२२। सौति बोल-एक बार उपेन्द्र के रूप को देख कर पृथ्वी अत्यन्त काम-पीड़ित हुई। उसने अक्षुण्ण प्रौढ़ यौवन वाली एक सुन्दरी स्त्री का वेष बना कर मलयाचल के निर्जन स्थान में, जो रमणीक एवं चन्दन के सुन्दर पल्लवों मे विभूषित था, सम्पूर्ण शरीर में चन्दन का लेप लगाए हुए, रत्नों के आभूषणों से विभूषित, सुशील, शान्त और मन्द मुसकान से युक्त अपने हृदयवल्लभ (उपेन्द्र) को सोते हुए देख कर स्वयं भी मुसकराती हुई पृथ्वी सहसा उनकी शय्या पर पहुँच गयी। उस सुन्दरी ने उन्हें अत्यन्त रमणीक एक मालती-माला तथा कस्तूरी और केसर से युक्त सुमन्धित चन्दन प्रदान किया॥२३-२६।। उपेन्द्र ने काम-पीड़ित उस कामिनी के मनोभाव को समझ कर उसके साथ माना प्रकार की कामक्रीड़ायें कीं ।२७॥ उनके अंगों में अपने अंग मिलाने से ही वह सती मूर्च्छित-सी होने लगी और उपेन्द्र (विष्णु) के वीर्याधान करने पर तो वह निद्रित अथवा मृतक की भाँति हो गयी।।२८।। अनन्तर विशाल
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तां विलग्नां च सुश्रोणों सुखसंभोगमूर्छिताम्। बृहन्मुक्तनितम्बां च सस्मितां विपुलस्तनीम् ॥२९॥ क्षणं वक्षसि कृत्वा तां तदोष्ठं च चुचुम्ब ह। विहाय तत्र रहसि जगाम पुरुषोत्तमः॥३०॥ =
उर्वशी पथि गच्छन्ती बोधयामास तां मुने। सा च पप्रच्छ वृत्तान्तं कथयामास भूश्च ताम् ॥३१॥ वीर्यसंवरणं कर्तु सा चाशक्ता च दुर्बला। प्रवालस्याऽडकरे त्रस्ता वीर्यन्यासं चकार सा ॥३२॥ तेन प्रवालवर्णश्च कुमारः समपद्य। तेजसा सूर्यसदृशो नारायणसुतो महान्॥३३॥ मङ्गलस्य प्रिया मेधा तस्य घण्टेश्वरो महान्। व्रणदाताऽतितेजस्वी विष्णुतुल्यो बभूव ह॥३४॥ दितेहिरण्यकशिपुहिरण्याक्षौ महाबलौ।। कन्या च सिंहिका विप्र सैहिकेयश्च तत्सुतः॥३५॥ निॠतिः सिंहिका सा च तेन राहुश्च नैर्ऋतः। सूकरेण हिरण्याक्षोऽप्यनपत्यो मृतो युवा॥३६॥ हिरण्यकशिपोः पुत्रः प्रह्लादो वैष्णवाग्रणीः। विरोचनश्च तत्पुत्रस्तत्पुत्रश्च बलि: स्वयम् ॥३७॥ बले: पुत्रो महायोगी ज्ञानी शंकरकिंकरः। दितवंशश्च कथितः कद्रूवंशं निबोध मे॥३८॥ अनन्तं वासुकिं चैव कालीयं च धनंजयम्। कर्कोटकं तक्षकं च पद्ममैरावतं तथा॥३९॥ महापद्मं च शङकुं च शङ्ङ्गं च संवरणं तथा। धृतराष्ट्रं च दुर्धर्षं दुर्जयं दुर्मुखं बलम्।४०॥ मोक्षं गोकामुकं चैव विरूपादींश्च शौनक। एतेषां प्रवरांश्चैव यावत्यः सर्पजातयः॥४१॥
नितम्बों एवं स्तनों वाली धरा को, जो संभोग-सुख से मूर्च्छित होने के उपरान्त मुसकरा रही थी, उपेन्द्र ने अपनी छाती से लगा कर उसका अधर-पान किया। पश्चात् वहीं एकान्त में उसे छोड़कर पुरुषोत्तम चले गये ॥२९-३०॥ मुने! उसी मार्ग से उर्वशी जा रही थी। उसने उसे सचेत किया और वृत्तान्त पूछा। पृथ्वी ने उससे समस्त वृत्तान्त कह सुनाया।।३१। पश्चात् उस दुर्बला पृथ्वी उस वीर्य को धारण करने में असमर्थ हो गयी। तब उसने भयभीत प्रवालों (मूंगों) की खान में उस वीर्य को रख दिया। उससे प्रवाल के रंग का कुमार (मंगल) उत्पन्न हुआ। वह नारायण का पुत्र महान् और सूर्य के समान तेजस्वी हुआ।३३। मंगल की प्रिया का नाम मेधा था, जिसके पुत्र महान् घंटेश्वर तथा विष्णु के समान अति तेजस्वी व्रणदाता हुए।।३४॥। विप्र ! दिति के महाबली हिरण्यकशञिपु और हिरण्याक्ष नामक दो पुत्र एवं सिंहिका नाम की एक कन्या उत्पन्न हुई। सिंहिका के सैंहिकेय (राहु) नामक पुत्र हुआ।।३५।। सिंहिका का नाम निऋति भी था। इसीलिए राहु को नैऋंत कहा गया है। हिरण्याक्ष को कोई संतान नहीं थी। वह युवावस्था में ही वराहावतार के द्वारा मारा गया।३६॥ हिरण्यकशिपु का पुत्र प्रहलाद वैष्णवों में सर्वश्रेष्ठ था। विरोचन उनके पुत्र हुए और विरोचन का पुत्र स्वयं बलि हुआ।३७॥ बलि का पुत्र (बाणासुर) हुआ, जो महायोगी, ज्ञानी और शंकर का बहुत बड़ा सेवक था। इस प्रकार दिति के वंश का वर्णन मैंने कर दिया और कद्रू के वंश का वर्णन कर रहा हूँ, सुनो॥३८॥ अनन्त, वासुकि, कालीय, धनञ्जय, कर्कोटक, तक्षक, पद्म, ऐरावत, महापद्म, शंकु शंख, संवरण, धृतराष्ट्र, दुद्वर्ष, दुर्जय, दुर्मुख, बल, गोक्ष, गोकार्मुक और विरूप आदि नाम हैं। शौनक! जितनी सर्पजातियाँ हैं, उन सब में प्रधान ये ही हैं॥३९-४१॥। लक्ष्मी के अंश से
१ क. तस्यां खङ्गश्व०। २ ख. ०क। न ते०।
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४६ नवमोध्यायः
कन्यका मनसा देवी कमलांशसमुदवा। तप्विनीनां प्रवरा महातेजस्विनी शुभा॥४२॥ यत्पतिश्च जरत्कारुर्नारायणबलोद्रवः। आस्तीकस्तनयो यस्या विष्णुतुल्यश्च तेजसा॥४३॥ एतेषां नाममात्रेण नास्ति नागभयं नृणाम्। कद्रूवंशो निगदितो विनतायाः शृणुष्व मे॥४४॥ वैनतेयारुणौ पुत्रौ विष्णुतुल्यपराक्रमौ। तौ बभूवुः क्र्मेणैव यावत्यः पक्षिजातयः॥४५॥ गावश्च महिषाश्चैव सुरभिप्रवरा इमे। सर्वे वै सारमेयाश्च बभूवुः सरमासुताः॥४६॥ दानवाशच दनोर्वश्या अन्याः सामान्यजातयः। उक्तः कश्यपवंशश्च चन्द्राख्यानं निबोध मे ॥४७॥ नामानि चन्द्रपत्नीनां सावधानं निशामय। अत्यपूर्व च चरितं पुराणेषु पुरातनम्॥४८। अश्विनी भरणी चैव कृत्तिका रोहिणी तथा। मृगशीर्षा तथाऽडर्द्रा च पूज्या साध्वी पुनर्वसुः॥४९॥ पुष्याऽडश्लेषा मघा पूर्वफल्गुन्युत्तरफल्गुनी। हस्ता चित्रा तथा स्वाती विशाखा चानुराधिका ॥५०॥ ज्येष्ठा मूला तथा पूर्वाषाढा चैवोत्तरा स्मृता। श्रवणा च धनिष्ठा च तथा शतभिषकुछुभा ॥।५१॥ पूर्वा भाद्रोत्तरा भाद्रा रेवत्यन्ता विधुप्रियाः। तासां मध्ये च सुभगा रोहिणी रसिका वरा ॥५२॥ संततं रसभावेन चकार शशिनं वशम्। रोहिण्युपगतश्चन्द्रो न यात्यन्यां च कामिनीम् ॥५३॥ सर्वा भगिन्यः पितरं कथयामासुरादृताः। सपत्नीकृतसंतापं प्राणनाशकरं परम्॥५४॥
उत्पन्न होने वाली कन्या का नाम 'मनसा देवी' है, जो तपस्विनियों में अतिश्रेष्ठ, महातेजस्विनी और शुभमूर्ति है।४२। नारायण की कला से उत्पन्न जरत्कारु मुनि उसके पति हैं, और उसके पुत्र का नाम आस्तीक है, जो विष्णु के समान तेजस्वी है।४३।। इन सब के नाममात्र (उच्चारण करने) से मनुष्यों को नाग-भय नहीं होता है। कद्र के वंश का परिचय दे दिया, अब वनिता का वंश-वर्णन सुनिए।४४। वनिता के दो पुत्र हुए-अरुण और गरुड़। दोनों ही विष्णु के समान परात्रमी थे। उन्हीं से सभी पक्षि-जातियों का प्रादुर्भाव हुआ है।४५॥ गौ और महिष (भैसे) सुरभी से उत्पन्न हुए। एवं सभी सारमय (कुत्ते) सरमा के पुत्र हैं। दन के वश में दानव हुए और अन्य स्त्रियों के वंशज अन्यान्य जातियाँ। इस प्रकार कश्यप वंश का वर्णन कर के अब चन्द्र वंश का आख्यान कर रहा हूँ, सुनो! ॥४६॥-४७। सर्वप्रथम चन्द्रमा की पत्नियों के नाम और पुराणों में वणित उनका अपूर्व पुरातन चरित्र भी सावधान होकर सुनो॥४८॥ अश्विनी, भरणी, कृत्तिका, रोहिणी, मृगशिरा, आर्द्रा, पूज्या साध्वी पुनर्वसु, पुप्या, आश्लेषा, मघा, पूर्वाफाल्गुनी, उत्तरा-फाल्गुनी, हस्ता, चित्रा, स्वाती, विशाखा, अनुराधा, ज्येष्टा, मूला, पूर्वाषाढ़ा, उत्तराषाढ़ा, श्रवणा, धनिष्ठा, शुभा शतभिषा, पूर्वा भाद्रपदा, उत्तरा भाद्रपदा और रेवती-ये सताईस चन्द्र की प्रेथसी पत्नियाँ हैं। किन्तु इनके मध्य सुन्दरी और रसिकशिरोमणि रोहिणी चन्द्रमा को अति प्रिय है; क्योंकि उसने अपने अनुराग-रस से चन्द्रमा को निरन्तर अपने वश में कर लिया। तब चन्द्रमा ने अन्य पत्नियों की बड़ी अवहेलना की॥४९-५३॥ अनन्तर सभी बहिनों ने आपस में मिल कर अपने पिता से अपना वह दुःख प्रकट किया, जो सपत्नी (सौन) के द्वारा उत्पन्न किया गया था और अत्यन्त प्राणनाशक था।५४॥ (पिता) दक्ष ने ऋृद्ध होकर चन्द्रमा
१ ख. ०णकुलो.। २ क. पूर्वोत्तराभाद्रपदा रे०।
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रक्ष: प्रकुपितश्चन्द्रमशपन्मन्त्रपूर्वकम्। द्रुतं श्वशुरशापेन यक्ष्मग्रस्तो बभूव सः॥५५॥ दिने दिने यक्ष्मणा स क्षीयमाणश्च दुःखितः। वपुष्यर्धं क्षीयमाणे शंकरं शरणं ययौ ॥५६॥ पष्टवा चन्द्रं शंकरश्च क्लेशितं शरणागतम्। करुणासागरस्तस्मै कृपया चाभयं ददौ ।५७॥ निर्मुक्तं यक्ष्मणा कृत्वा स्वकपाले स्थलं ददौ। अपरो निर्भयो भूत्वा स तस्थौ शिवशेखरे॥५८॥ तं शिवः शेखरे कृत्वा चाभवच्चन्द्रशेखरः। नास्ति लोकेषु देवेषु शिवाच्छरणपञजरः॥५९॥ बक्षकन्याः पति मुक्तं दृष्टवा च रुरुदुः पुनः। आजग्मुः शरणं तातं दक्षं तेजस्विनां वरम्॥६०॥ उच्चश्च रुरुदुर्गत्वा निहत्याङ्गं पुनः पुनः। तमूचुः कातरं दीना दीनानाथं विधेः सुतम् ॥६१॥ दक्षकन्या ऊचु: स्वामिसौभाग्यलाभाय त्वमुक्तोऽस्माभिरेव च। सौभाग्यमस्तु नस्तात गतः स्वामी गुणान्वितः॥६२।। स्थिते चक्षुषि हे तात दृष्टं ध्वान्तमयं जगत्। विज्ञातमधुना स्त्रीणां पतिरेव हि लोचनम्॥६३॥ पतिरेव गतिः स्त्रीणां पतिः प्राणाश्च संपदः। धर्मार्थकाममोक्षाणां हेतुः सेतुर्भवार्णवे॥६४॥ पतिर्नारायण: स्त्रीणां व्रतं धर्मः सनातनः। सवं कर्म वृथा तासां स्वामिनो विमुखाश्च या: ॥६५॥ स्नानं च सर्वतीर्थेषु सर्वयज्ञेषु दक्षिणा। सर्वदानानि पुण्यानि व्रतानि नियमाश्च ये॥६६॥ देवार्चनं चानशनं सर्वाणि च तपांसि च। स्वामिनः पादसेवायाः कलां नाहन्ति षोडशीम् ॥६७।।
को मन्त्रपूर्वक शाप दे दिया। शवशुर के शाप देने से चन्द्रमा अत्यन्त शीघ्र यक्ष्मा रोग से पीड़ित हो गए॥५५॥ दिन-प्रतिदिन यक्ष्मा रोग से दुःखी और क्षीण काय होते हुए चन्द्रमा ने आधे शरीर के क्षीण हो जाने पर शंकर की शरण प्राप्त की ॥५६।। करुणासागर शंकर ने शरण में आये हुए चन्द्रमा को दुःखी देख कर कृपा कर उन्हें अभयदान दिया ॥५७॥ और यक्ष्मा रोग से मुक्त करके उन्हें अपने मस्तक पर स्थान दिया। जिससे चन्द्रमा भी अमर और निर्भय होकर शिव के शिखर पर विराजमान हो गए ।५८।। तब से शंकर भी उन्हें अपने शिखर पर रख लेने के कारण चन्द्रशेखर कहलाने लगे। देवों तथा अन्य लोगों में शिव से बढ़ कर शरणागत-पालक दूसरा कोई नहीं है ।५९।। पश्चात् दक्ष की कन्याएँ अपने पति (चन्द्रमा) को रोग-मुक्त देखकर पुनः रोने लगीं और तेजस्वियों में श्रेष्ठ पिता दक्ष की शरण पहुँचीं। वहाँ जाकर बार-बार अपने (शिर आदि) अंगों को पीटती हुई वे उच्च स्वर से रोने लगीं और दीन होकर कातर भाव से दीनानाथ ब्रह्मपुत्र दक्ष से कहने लगीं।६०-६१।। दक्ष-कन्याओं ने कहा-तात ! हम लोगों ने स्वामी की प्राप्ति रूप सौमाग्य पाने के लिए आपसे निवेदन किया था। किन्तु सौभाग्य तो दूर रहा हमारे गुणवान् स्वामी ही हमें छोड़कर चले गए ।६२॥ तात ! नेत्रों के रहते हुए भी हमें सारा जगत् अन्धकारपूर्ण दिखायी पड़ रहा है। इस समय यह बात भलीभाँति समझ में आ रही है कि पति ही स्त्रियों का नेत्र है।।६३।। (इतना ही नहीं) प्रत्युत स्त्रियों की गति, पाण और सम्पत्ति भी पति ही है। उनके धर्म अर्थ काम और मोक्ष का हेतु तथा भवसागर को पार करने का सेतु पति ही है॥६४॥। पति ही स्त्रियों के नारायण, व्रत और सनातनधर्म है। इसलिए पति से विमुख रहने वाली स्त्रियों के सभी धर्म-कर्म व्यर्थ हैं।६५॥ सभी तीर्थों के स्नान, समस्त यज्ञों की दक्षिणा, सब भाँति के दान, पुण्य, व्रत, नियम, देव-पूजा, व्रतोपवास, सभी तप पति की चरण-सेवा की सोलहवीं कला के भी बराबर नहीं है।६६-६७।। समस्त बन्धुओं और स्त्रियों का प्रिय
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४८ नवमोध्याय:
सर्वेषां बान्धवानां च प्रियः पुत्रश्च योषिताम्। स एव स्वामिनोंऽशश्च शतपुत्रात्परः पतिः ॥६८॥ असद्वंशप्रसूता या सा द्वेष्टि स्वामिनं सदा। यस्या मनश्चलं दुष्टं सततं परपूरुषे ॥६९॥ पतितं रोगिणं दुष्टं निर्धनं गुणहीनकम्। युवानं चंव वृद्धं वा भजेत्तं न त्यजेत्सती।।७०।। सगुणं निर्गुणं वाडपि द्वेष्टि या संत्यजेत्पतिम्। पच्यते कालसूत्रे सा यावच्चन्द्रदिवाकरौ।७१॥ कोट: शुनकतुल्यश्च भक्षिता सा दिवानिशम्। 'भुङक्ते मृतवसामांसे पिबेन्मूत्रं च तृष्णया ।७२॥ गृध्ः कोटिसहस्त्राणि शतजन्मानि सूकरः। श्वापदः शतजन्मानि सा भवेद्बन्धुहा ततः।७३॥ ततो मानवजन्मानि लभेच्चेत्पूर्वकर्मणः। विधवा धनहीना च रोगयुक्ता भवेद्ध्रुवम्॥७४॥ देहि नः कान्तदानं च कामपूरं विधेः सुत। विधात्रा सद्शस्त्वं च पुनः स्रष्टुं क्षमो जगत्।७५॥ कन्यानां वचनं श्रुत्वा दक्षः शंकरसंनिधिम्। जगाम शंभुस्तं दृष्टवा समुत्थाय ननाम च ॥७६।। दक्षस्तस्याऽडशिषं कृत्वा समुवाच कृपानिधिम्। तत्याज कोपं दुर्ध्ष दृष्टवा च प्रणतं शिवम्॥७७॥ दक्ष उवाच देहि जामातरं शंभो मदीयं प्राणवल्लभम्। मत्सुतानां च प्राणानां परमेव प्रियं पतिम्॥७८।। न चेदुददासि जामातर्मम जामातरं विधुम्। दास्यामि दारुणं शापं तुभ्यं त्वं केन मुच्यसे ॥७९॥ दक्षस्य वचनं श्रुत्वा तमुवाच कृपानिधिः। सुधाधिकं च वचनं ब्रह्मञरणपञ्जरः॥८0॥ पुत्र होता है किन्तु वह पुत्र स्वामी का अंश मात्र रहता है। इसलिए (स्त्रियों के लिए) पति सैकड़ों पुत्रों से भी बढ़ कर है।६८।। असत्कुल में उत्पन्न होने वाली स्त्री अपने पति से सदा वैरभाव ही रखती है क्योंकि उसका मन सदैव चलायमान, दुष्ट और पर पुरुष में लगा रहता है ।६९।। किन्तु सती स्त्रियाँ पतित, रोगी, दुष्ट, निर्धन, गुणहीन, युवा या वृद्ध कैसा भी पति क्यों न हो उसकी भी सेवा करती हैं ॥७०॥ जो स्त्री गुणी अथवा निर्गुण पति से द्वेष या उनका त्याग करती हैं वे कालसूत्र में तब तक पकायी जाती हैं जब तक सूर्य-चन्द्रमा की सत्ता रहती है ।७१। वहाँ कुत्ते के समान कीड़े उसे दिनरात खाया करते हैं। क्षुवा लगने पर वह स्त्री मृतक का मांस खाती है और प्यास लगने पर मूत्र पान करती है।७२।। अनन्तर करोड़ जन्मों तक गीध, सौ जन्मों तक सूकरी, सौ जन्मों तक हिंसक जीव होकर अन्त में बन्धु का नाश करती है ॥७३।। पुनः पूर्व कर्मों के अनुसार यदि मानव-जन्म प्राप्त किया तो विधवा, दरिद्रा, और रोगिणी होती है, यह निश्चित है।।७४।। अतः हे ब्रह्मपुत्र ! हमें पति-दान देने की कृपा करें ! क्योंकि आप ब्रह्मा के समान ही समस्त जगत् की सृष्टि करने मे समर्य हैं॥७५॥। कन्याओं की ऐसी बातें सुनकर दक्ष शंकर के पास गए और शिव ने उन्हें देखते ही उठ कर प्रणाम किया॥७६॥ कृपानिधान शंकर को दक्ष ने आशीर्वाद प्रदान किया और (साथ ही) शिव को प्रणत देख कर अपना क्रोध भी त्याग दिया॥७७॥ वक्ष बोले-शम्भो! आप मेरे प्राणप्रिय जामाता को लौटा दें, जो मेरी कन्याओं के परम प्राणप्रिय पति हैं॥७८। आप भी मेरे जामाता हैं। तथापि यदि मेरे जामाता चन्द्रमा को नहीं लौटाते हैं तो मैं आपको दारुण शाप दे दूंगा, फिर तो उससे मुक्त नहीं हो सकेंगे॥७९॥ ब्रह्मन् ! दक्ष की बातें सुनकर कृपानिधि एवं शरणागत १ क. ०ङक्ते मूत्ररसं मां०। २ ख. धर्षो दृ०।
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ब्रह्मवैवर्तपुराणम् ४९
शिव उवाच करोषि भस्मसाच्चेन्मां दत्त्वा वा आपमेव च। नाहं दातुं समर्थश्च चन्द्रं च शरणागतम्॥८१॥ शिवस्य वचनं श्रृत्वा दक्षस्तं शप्तुमुद्यतः । शिवः सस्मार गोविन्दं विपन्मोक्षणकारकम्॥८२॥ एतस्मिन्नन्तर कृष्णो वृद्धब्राह्मणरूपधृक्। समाययौ तयोर्मूलं तौ तं च नमतुः क्मात्।८३॥ दत्त्वा शुभाशिषं तौ स ब्रह्मज्योतिः सनातनः। उवाच शंकरं पूर्व परिपूर्णतमो ह्विज ॥८४॥ श्रीभगवानुवाच न चाउत्मनः प्रियः कश्चिच्छर्व सर्वेषु बन्धुषु। आत्मानं रक्ष दक्षाय देहि चन्द्रं सुरेश्वर॥८५॥ तपस्विनां वरः शान्तस्त्वमेव्रं वैष्णवाग्रणीः। समः सर्वेजु जीवेषु हिंसाक्रोधविर्वजितः।८६।। दक्ष: क्रोधी च दुर्धर्षस्तेजस्वी ब्रह्मणःसुतः। शिष्टो बिभेति दुर्धर्ष न दुर्धर्षश्च कचन ।८७।। नारायणवचः श्रुत्वा हसित्वा शंकर: स्वयम्। उवाच नीतिसारं च नीतिबीजं परात्परम्।८८।। शंकर उवाच तपो दास्यामि तेजश्च' सर्वसिद्धिं च संपदम्। प्राणांश्च न समर्थोहं प्रदातुं शरणागतम्।८९॥ यो ददाति भयनैव प्रपन्नं शरणागतम्। तं च धर्मः परित्यज्य याति शप्त्वा सुदारुणम्।९०॥ सवं त्यक्तुं समर्थोऽहं न स्वधर्म जगत्प्रभो। यः स्वधर्मविहीनश्च स च सर्वबहिष्कृतः॥९१॥
पालक शिव से अमृत से भी बढ़कर (मधुर) वचन उनसे कहा- शिव बोले-मुझे भस्म कीजिए या शाप प्रदान कीजिए, किन्तु शरणागत चन्द्रमा को मैं देने में असमर्थ हूँ। शिव की बात सुनकर दक्ष उन्हें शाप देने को तैयार हो गये। उस समय शिव विपत्ति से मुक्त कराने वाले गोविन्द का स्मरण करने लगे।८१-८२।। उसी समय भगवान् श्रीकृष्ण एक वृद्ध ब्राह्मण का रूप धारण कर वहाँ आ गये, जो उन दोनों के भी मुल कार्ण हैं। उन दोनों ने उन्हें क्रमशः नमस्कार किया ॥८३॥ द्विज ! उन सनातन एवं परिपूर्णतम ब्रह्मज्याति ने उन दोनों को शुभाशीर्वदि दिया और पहले शंकर से कहा॥८४॥ श्री भगवान् बोल-शिव! समस्त बन्धुओं में भी आत्मा से बढ़कर कोई प्रिय नहीं होता है, अतः हे सुरेश्वर! दक्ष को चन्द्रमा प्रदान कर अपनी रक्षा कीजिये ।८५॥ तुम तपस्वियों में श्रेष्ठ, शान्त, वैष्णवों में प्रमुख और सभी जीवों में ससभाव रखने वाले एवं हिसा नथा कोध से हीन हो॥८६॥ दक्ष करोधी, दुर्द्धर्ष (उद्धत) तथा तेजस्वी ब्रह्मपुत्र हैं.। शिष्ट व्यक्ति दुर्द्धर्ष प्राणी से भयभीत होता है और दुर्दर्ष किसी से भी भयभीत नहीं होता है।८७॥ नारायण की ऐसी बातें सुनकर स्वयं शंकर ने हँसकर नीतिशास्त्र का निचोड़ तथा बीजरूप परमोत्तम वचन कहा ॥८८। शंकर बोले-मैं तप, तेज, समन्त सिद्धियाँ, सम्पत्ति और प्राण भी दे सकता हूँ किन्तु शरणागत का त्याग करने में अममर्थ हूँ ॥८९॥ क्योंकि जो भयवश शरणागत का त्याग करता है, उसे भी धर्म त्याग देता है और ोर ज्ञाप देकर चला जाता है।९०। इसलिए हे जगत्प्रभो ! मैं सब का त्याग कर सकता हूँ किन्तु धर्म का नहीं।
१ क. ०रच ब्रह्मसि०। ७
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५० दशमोऽध्याय:
यश्च धर्म सदा रक्षेद्धर्मस्तं परिरक्षति। धर्म वेदेश्वर त्वं च किं मां ब्रूहि स्वमायया ॥९२॥ ्वं सर्वमाता स्रष्टा च हन्ता च परिणामतः । त्वयि भक्तिर्दृ ढा यस्य तस्य कस्माडूयं भवेत् ॥९३। शंकरस्य वचः श्रुत्वा भगवान्सर्वभाववित् । चन्द्रं चन्द्राद्विनिष्कृष्य दक्षाय प्रददौ हरिः॥९४॥ प्रतस्थावर्धचन्द्रशच निर्व्याधि: शिवशेखरे। निजग्राह परं चन्द्रं विष्णुदत्तं प्रजापतिः।९५॥ यक्ष्मग्रस्तं च तं दृष्टवा दक्षस्तुष्टाव माधवम् । पक्षे पूर्ण क्षतं पक्षे तं चकार हरि: स्वयम् ॥९६॥ कृष्ण एवं वरं दत्त्वा जगाम स्वालयं द्विज । दक्षश्चन्द्रं गृहीत्वा च कन्याभ्यः प्रददौ पुनः।९७॥ चन्द्रस्ताश्च परिप्राप्य विजहार दिवानिशम् । समं ददर्श ताः सर्वास्तत्प्रभृत्येव कम्पितः।।९८।। इत्येवं कथितं सर्व किंचित्सृष्टिक्मं मुने । श्रुतं च गुरुववत्रेण पुष्करे मुनिसंसदि॥९९॥ इति श्रीब्रह्मवैवर्ते महापुराणे सौतिशौनकसंवादे ब्रह्मखण्डे प्रसूतिवंशवर्णनं नाम नवमोऽध्याय:।।९॥ अथ दशमोऽध्यायः सौतिरुवाच भृगोः पुत्रश्च च्यवनः शुकच ज्ञानिनां वर। कऋतोरपि क्रिया भार्या बालखिल्यानसूयत।१॥ क्योंकि जो अपने धर्म से हीन है, वह समस्त धर्मों से बहिष्कृत है॥९१॥। और जो सदैव धर्म की रक्षा करता है, धर्म भी उसकी रक्षा करता है। ईश्वर! तुम धर्म को जानते हो। अतः अपनी माया से मोहित करते हुए मुझे यह क्यों कह रहे हो?॥९२॥ तुम्हीं सबकी माता, स्रष्टा और परिणामतः (अन्त में) हन्ता भी हो। तुममें जिसकी दृढ़ भक्ति होती है, उसे विसते भय हो सकता है॥९३॥ समस्त भावों के जानने वाले भगवान् ने शंकर की बातें सुनकर(सर्वांगपूर्ण) चन्द्रमा से (आधे) चन्द्रमाको निकाल कर दक्ष को सौंप दिया।९४॥ चन्द्रमा का अर्धभाग रोगहीन होकर शिव के शिखर पर स्थित हुआ और विष्णु द्वारा दिये गये दूसरे भाग को प्रजापति दक्ष ने ग्रहण किया॥९५॥ दक्ष ने उस चन्द्रमा को यक्ष्मा रोग से पीड़ित जानकर श्रीकृष्ण की स्तुति की। इस पर भगवान् ने चन्द्रमा को एक पक्ष में पूर्ण और दूसरे पक्ष में क्षीण (काय) बना दिया। द्विज! इस प्रकार भगवान् कृष्ण उन्हें वर देकर अपने घर चले गये और दक्ष ने उस चन्द्रमा को लेकर पुनः अपनी कन्याओं को सौंप दिया॥९६-९७।। चन्द्रमा भी अपनी पत्नियों को पाकर दिन-रात विहार करने लगे और उसी दिन से उन सबको समभाव से देखने लगे ॥९८॥ मुने ! इस प्रकार मैंने पुष्कर- तीर्थ में मुनियों की सभा में गुरु के मुख से सृष्टिक्रम के संबंध में जो कुछ सुना था, वह तुम्हें बता दिया।।९९॥ श्री ब्रह्मवैवर्तमहापुराण के ब्रह्मखण्ड में नवाँ अध्याय समाप्त ॥।९।। अध्याय १० जाति और संबंध का निर्णय सौति बोले-ज्ञानियों में श्रेष्ठ भृगु के पुत्र च्यवन और शुक्र हुए। ऋतु की क्रिया नामक भार्या ने बालखिल्य १ ख. ०ष्णस्तेभ्यो व ०।
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ब्रह्मववर्तपुराणम् ५१
न्रयः पुत्राश्चाङ्गिरसो बभूवुर्मुनिसत्तमाः । बृहस्पतिरुतथ्यशच' शम्बरश्चापि शौनक ॥२॥ वसिष्ठस्य सुतः शक्तिः शक्तेः पुत्रः पराशरः । पराशरसुतः श्रीमान्कृष्णद्वपायनो हरिः॥३॥ व्यासपुत्र: शिवांशश्च शुऋ्च ज्ञानिनां वरः । विश्वश्रवाः पुलस्त्यस्य यस्य पुत्रो धनेश्वरः॥४॥ शौनक उवाच अहो पुराणविदुषामत्यन्तं दुर्गमं वचः । न बुद्धं वचनं किचिद्धनेशोत्पत्तिपूर्वकम् ॥५॥ अधुना कथितं जन्म धनेशस्येश्वरादिदम् । पुनर्भिन्नकमं जन्म ब्रवीषि कथमेव माम् ॥६॥।
सौतिरुवाच बभूवुरेते दिक्पालाः पुरा च परमेश्वरात् । पुनश्च ब्रह्मशापेन स च विश्रवसः सुतः॥७॥ गुरवे दक्षिणां दातुमुतथ्यश्च धनेश्वरम् । ययाचे कोटिसौवर्ण यत्नतश्च प्रचेतसे ॥८॥ धनेशो विरसो भूत्वा तस्मै तद्दातुमुद्यतः । चकार भस्मसाद्विप्र पुनर्जन्म ललाभ सः॥९॥ तेन विश्रवसः पुत्रः कुबेरश्च धनाधिपः । रावणः कुम्भकर्णश्च धार्मिकश्च विभीषणः ॥१०॥ पुलहस्य सुतो वात्स्यः शाण्डिल्यश्च रुचेः सुतः । सार्वणिगौं तमाज्जज्ञे मुनिप्रवर एव सः॥११॥ काश्यप: कश्यपाज्जातो भरद्वाजो बृहस्पतेः । (स्वयं वात्स्यश्च पुलहात्सार्वणिगौ तमात्तथा ॥१२।। शाण्डिल्यश्च रुचे: पुत्रो मुनिस्तेजस्विनां वरः ।) बभूवुः पञ्चगोत्राश्च एतेषां प्रवरा भवे ॥१३॥
नामक ऋषियों को उत्पन्न किया॥१॥ शौनक ! अंगिरा से मुनिश्रेष्ठ बृहस्पति, उतथ्य और शम्बर नामक तीन पुत्र हुए ।।२।। बशिष्ठ के पुत्र शक्ति, शक्ति के पुत्र पराशर और पराशर के श्रीमान् कृष्ण द्वैपायन (व्यास) पुत्र हुए, जो विष्णु के अंशावतार माने जाते हैं॥३॥ व्यास के ज्ञानिप्रवर शुक पुत्र हुए, जो शिव के अंश माने जाते हैं। पुलस्त्य के विश्वश्रवा और विश्वश्रवा के धनेश्वर (कुबेर) पुत्र हुए॥४॥ शौनक बोल-आश्चर्य है कि पुराणवेत्ताओं की बातें अत्यन्त दुर्बोध होती हैं। धनेश कुबेर की उत्पत्ति आदि की बातें मैं कुछ समझ नहीं सका। क्योंकि अभी आपने कुबेर की उत्पत्ति ईश्वर (श्रीकृष्ण) से बतायी है, तो फिर उनके जन्म के बारे में दूसरा क्रम आप मुझसे कैसे बता रहे हैं (अर्थात् कुबेर विश्वश्रवा के पुत्र कैसे हुए) ? ॥५-६।। सौति बोले-प्राचीन काल में ये सब परमेश्वर द्वारा उत्पन्न होकर दिक्पाल हुए थे, किन्तु पुनः ब्रह्मा के शाप से विश्वश्रवा के पुत्र हुए।।७।। (एक बार) उतथ्य ने अपने गुरु प्रचेता को दक्षिणा देने के लिए कुबेर से एक करोड़ सुवर्ण-मुद्रायें माँगीं। कुबेर ने उनके साथ निष्ठुरतापूर्ण व्यवहार किया। विप्र! इस पर उतथ्य ने उन्हें भस्म कर दिया, जिससे कुबेर को पुनर्जन्म ग्रहण करना पड़ा।।८-९।। इस प्रकार विश्वश्रवा के घनाधीश्वर कुबेर, रावण, कुम्भकर्ण और धार्मिक विभीषण पुत्र हुए॥१०॥ पुलह के वात्स्य, रुचि के शाण्डिल्य और गौतम के मुनिश्रेष्ठ सार्वण पुत्र हुए।।११।। कश्यप के काश्यप और बृहस्पति के भारद्वाज, पुत्र हुए। स्वयं वात्स्य पुलह से उत्पन्न हुए, गौतम से सार्वण और रुचि से महातेजस्वी मुनि शाण्डिल्य आविर्भूत हुए ॥१२-१३॥ इन मुनियों के
१ क. ०इच संवर्तश्चा०।
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५२ दशमोऽध्यायः
बभूवुर्ब्रह्मणो वक्त्रादन्या ब्राह्मणजातयः । ताः स्थिता देशभेदेषु गोत्रशून्याश्च शौनक॥१४॥ चन्द्रादित्यमनूनां च प्रवरा: क्षत्रियाः स्मृताः । ब्रह्मणो बाहुदेशाच्चैवान्याः क्षत्रियजातयः॥१५॥ ऊरुदेशाच्च वैश्याश्च पादतः शूद्रजातयः । तासां संकरजातेन बभुवुर्वर्णसंकराः ॥१६॥ गोपनापितभिल्लाइ्च तथा मोदककबरौ। ताम्बूलिस्वर्णकारौ च वणिग्जातय एव च॥१७॥ इत्येवमाद्या विप्रेन्द्र सच्छूद्राः परिकीतिताः । शूद्राविशोस्तु करणोडम्वष्ठो वैश्यादि्द्वजन्मनोः ॥१८॥ विश्वकर्मा च विद्यायां वीर्याधानं चकार सः । ततो बभवुः पुत्राश्व नवैते शिल्पकारिणः ॥१९॥ मालाकार: कर्मकार: शङखकारः कुविन्दकः । कुम्भकारः कांस्यकारः षडेते शिल्पिनां वराः॥२०॥ सूत्रधारश्चित्रकार: स्वर्णकारस्तथैव च। पतितास्त ब्रह्मशाादयाज्या वर्णसंकराः॥२१।
शौनक उवाच कथं देवो विश्वकर्मा वीर्याधानं चकार सः । शृद्रायामधमायां च क्थं ते पतितास्त्रयः॥२२॥ कथं तेबु ब्रह्मशापो हयभवत्केन हेतुना। हे पुराणविदां श्रेष्ठ तन्नः शंसितुमर्हसि॥२३॥ सौतिरुवाच घृताची कामतः कामं वेषं चक्रे मनोहरम्। तामपश्यद्विश्वकर्मा गच्छन्तीं पुष्करे पथि ॥२४॥ आगच्छत द्विलोकाच्च प्रसादोत्फुल्लमानसः । तां ययाचे स शृङ्गारं कामेन हृतचेतनः ॥२५॥
पाँच गोत्र परम प्रसिद्ध हुए। शौनक! फि व्रह्मा के मुख से अन्य ब्राह्मण-जातियाँ उत्पन्न हुई। वे विभिन्न देशों में अवस्थित हुइँ और वे गोत्रशुन्य हैं।१४। उर्मी प्रकार चन्द्र, सूर्य और मनु द्वारा उत्पन्न क्षनरिय-गण श्रेष्ठ हैं और पल क्षमिय जाति के लोग ब्रह्मा के बाहु से उत्पन्न हुए।१५। उनके ऊरु देश से वैश्य और चरण से शूद्रों की उत्पत्ति हुई-इन शूद्र जातियों के संकर्य से (अर्थान एक जाति की स्त्री में दूयरी जाति के पुश्प द्वारा) वर्ण- संकर उत्पन्न हुए ।।१६।। विप्रवर! गोप, नापित (नाई), भील, हलवाई, कूबर (रुस?), तमोली, सोनार और बनिया-पे सब सत् शूद्र कहलाते हैं। शूद्र में वैश्य से उत्पन्न जाति को करण औ वैज्य से द्विजाति की स्त्री में उत्पन्न जाति को अम्बष्ठ कहते हैं ॥१७-१८। विश्वकर्मा ने विद्या में वीर्याधान किया। उससे नव पुत्रों की उत्पत्ति हुई, जो शिल्पी कहे जाते हैं॥१९। जैसे-माली, बढ़ई, शंख बनाने दाला, जुलाहा, कुम्हार और ठठेरा- रहों, शिल्पियों में श्रेष्ठ कहे गये हैं॥२०। गूत्रधार (बढ़ई), चित्रकार (मूर्ति बनाने ताला) और सोनार, ये तीनों ब्रह्मा के शाप से पतित, वर्णसंकर एवम् अयाज्य (यज्ञ आदि न कराने योग्य) माने गए हैं ।२१।। शौनक बोले-विश्वकर्मा ने देव होकर अधम शूद्र-स्त्री में वीर्याधान कैसे किया? वे नीनों (सूत्रधार आदि) पतित कैसे हो गये? ब्रह्मा ने उन्हें गाप क्यों दिया? पुरणवेत्ताओं मे शेष्ठ! यह पब हमें बताने की कपा करें ॥२२-२३। सौति बोले-(एक बार) घृताची (नामक अप्सरा) कामवश कमनीय वेश बनावार कामदेव के पास जा रही थी। पुष्कर के पास मार्ग में विश्वकर्मा ने उसे देख लिया॥२४॥ देखते ही विश्वकर्मा का मन आनन्द से खिल उठा और कामासफ्त होकर उन्होंने उससे सहवास की याचना की ॥२५॥ उस समय वह समस्त अलंकारों
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ब्रह्मवैवर्तपुराणम् ५३
रत्नाल ड्ारभूषाढयां सर्वावयवकोमलाम् । यथा षोडशवर्षीयां शश्वत्सुस्थिरयौवनाम् ॥२६॥। बृहन्नितम्बभारार्तां मुनिमानसमोहिनीम्। अतिवेगकटाक्षेण लोलां कामातिपीडिताम् ॥२७॥ तच्छोणों कठिनां दृष्टवा वायुनाऽपहृताञ्शुकाम् । अतीवोच्चैः स्तनयुगं कठिनं वर्तुलं परम् ॥२८।। सुस्मितं चारु वक्त्रं च शरच्चन्द्रविनिन्दकम्। पक्वबिम्बफलारक्तस्वोष्ठाधरमनोहरम् ॥२९॥ सिन्दूरबिन्दुसंयुक्तं कस्तूरीबिन्दुसंयुतम्। कपोलमुज्ज्वलं शश्वन्महार्हमणिकुण्डलम् ॥३०॥ तामुवाच प्रियां शान्तां कामशास्त्रविशारदः। कामाग्निवर्धनोद्योगि वचनं श्रुतिसुन्दरम्॥३१॥ विश्वकर्मोवाच अयि क्व यासि ललिते मम प्राणाधिके प्रिये। मम प्राणांश्चापहृत्य तिष्ठ कान्ते क्षणं शुभे॥३२॥ तवैवान्वेषणं कृत्वा भ्रमामि जगतीतलम्। स्वप्राणांस्त्यक्तुमिष्टोऽहं त्वां न दृष्ट्वा हुताशने ॥३३॥ त्वं कामलोकं यासीति श्रुत्वा रम्भामुखान्मया। आगच्छमहमदाद्य अहो सरस्वतीतीरे पुष्पोद्याने मनोहरे। सुगन्धिमन्दशीतेन वायुना सुरभीकृते।३५॥ रम' कान्ते मया सार्द्धं यूना कान्तेन शोभने। विदग्धाया विदग्धेन संगमो गुणवान्भवेत् ॥३६॥। स्थिरयौवनसंयुक्ता त्वमेव चिरजीविनी। कामुकी कोमलाङ्गी न सुन्दरीष व सन्दरी॥३७॥ मृत्युंजयवरेणैव मृत्युकन्या जिता मया। कुबेरभवनं गत्वा धनं लब्धं कुबेरतः॥३८।।
से विभूषित थी। उसके सभी अंग कोमल थे। नित्य सुस्थिर यौवन वाली वह सोलह वर्ष की बाला दीख रही थी। उसके नितम्ब विशाल थे। वह मुनियों के भी मन को मोहित करने दाली थी। दह अत्यन्त वेग से कटाक्ष करने के कारण चंचल तथा अत्यन्त कामपीड़ित मालूम हो रही थी। उसका नितम्ब कठोर था। वायु उसके वस्त्र को उड़ा देता था। उसके दोनों कुच उन्नत, गोले और कठोर थे। शारदीय चन्द्रमा को लज्जित करने वाला उसका मुख मधुर मुसकान से युक्त था। उसके मनोहर ओठ पके बिम्बफल के समान लाल थे। करतूरी मिश्रित मिन्द्वरबिन्दु उसके ललाट पर शोभित हो रहा था। उसके उज्जवल कपोलों पर बहुमूल्यक मणियों के बने कुण्डल चमक रहे थे। उस शान्त प्रिया से कामशास्त्र के पंडित विश्वकर्मा ने कामाग्निवर्धक तथा सुनने में सुन्दर (यह) वचन कहा-॥२६-३१॥ विश्वकर्मा बोले-सुन्दरी! प्राणप्रिये! मेरे प्राणों का अपहरण करके कहाँ जा रही हो? कान्ते! क्षण- मर ठहरो॥३२॥ मैं तुम्हें खोजने के लिए सारे भूमण्डल में घूम रहा हूँ और तुम्हारे न मिलने पर सोच लिया है कि अग्नि में (कूद कर) मर जाऊँगा।३३॥ मैंने रम्भा के मुख से सुना कि तुम काम के पास जा रही हो। इसीलिए आज मैं इस मार्ग में आकर ठहर गया हूँ ॥३४॥ सुन्दरी ! सरस्वती के तट पर मनोहर पुष्पवाटिका में, जो शीतल, मंद, सुगंध, वायु से सुगंधित हो उठी है, मुझ सुन्दर एवं युवक कान्त के साथ सहवास करो; क्योंकि चतुर पुरुष के साथ चतुर स्त्री का समागम अत्यन्त सुखप्रद होता है।३५-३६॥। तुम चिरजीविनी एवं नित्ययौवना हो। तुम कामुकी, कोमलांगी और सुन्दरियों में भी सुन्दरी हो॥३७॥ मैंने मृत्युञ्जय (शिव) के वर्दान से मृत्यु की कन्या को जीत लिया है। कुबेर के घर जाकर उनसे धन प्राप्त किया है। उसी प्रकार वरुण से रत्न की माला, वायु से १ ख. यभ०।
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५४ दशमोऽध्याय:
रत्नमाला च वरुणाद्वायोः स्त्रीरत्नभूषणम् । वह्निशुद्धं वस्त्रयुगं वह्नेः प्राप्तं महौजसः ॥३९॥ कामशास्त्रं कामदेवाद्योषिद्रञ्जनकारणम्। शृङ्गारशिल्पं यत्किंचिल्ल्धं चन्द्राच्च दुर्लभम्॥४०॥ रत्नमालां वस्त्रयुग्मं सर्वाण्याभरणानि च। तुम्यं दातुं हृदि कृतं प्राप्तं तत्क्षणमेव च।४१।। गृहे तानि च संस्थाप्य चाऽडगतोऽन्वेषणे भवे । विरामे सुखसंभोगे तुभ्यं दास्यामि सांप्रतम् ॥४२॥ कामुकस्य वचः श्रुत्वा घृताची सस्मिता मुने। ददौ प्रत्युत्तरं शोघ्रं नीतियुक्तं मनोहरम्।४३॥ घृताच्युवाच त्वया यदुक्तं भद्रं तत्स्वीकरोभ्यधुना परम् । किंतु सामयिकं वाक्यं ब्रवीष्यामि स्मरातुर॥४४॥ कामदेवालयं यामि कृतवेषा च तत्कृते । यदिने यत्कृते यामो वयं तेषां च योषितः ॥४५॥ अद्याहं कामपत्नी च गुरुपत्नी तवाधुना। त्वयोक्तमधुनेदं च पठितं 'कामदेवतः ॥४६॥ विद्यादाता मन्त्रदाता गुरुर्लक्षगुणः पितुः । मातुः सहस्रगुणवान्नास्त्यन्यस्तत्समो गुरुः॥४७॥ गुरो: शतगुणैः पूज्या गुरुपत्नी श्रुतौ श्रुता। पितुः शतगुणं पूज्या गथा माता विचक्षणः ॥।४८।। मात्रा समागमे सूनोर्यावान्दोषः श्रुतौ श्रुता । ततो लक्षगुणो दोषो गुरुपत्नीसनागमे ॥४९॥ मातरित्येव शब्देन यां च संभाषते नरः । सामातृतुल्या सत्येन धर्मः साक्षी सतामपि॥५०॥ तया हि संगतो यः स्यात्कालसूत्रं प्रयाति सः । तत्र घोरे वसत्येव यावच्चन्द्रदिवाकरौ ॥५१॥
स्त्री समुचित रत्नों के भूषण, महान् ओजस्वी अग्नि से शुद्ध किये दो वस्त्र और कामदेव से कामशास्त्र प्राप्त किया है जो स्त्रियों के लिए मनोरञ्जन की वस्तु है। चन्द्रमा से दुर्लभ शृंगारकला प्राप्त की है॥३७-४०। वह रत्नमाला, दोनों वस्त्र और समस्त आभूषण तुम्हें देने के लिए मैंने उसी समय मन में सोच लिया था।४१॥ उन वस्तुओं को घर में रखकर तुम्हें खोजने के लिए मैं यहाँ आया। इस समय तुम्हारे साथ सुख-सम्भोग करके पश्चात् तुम्हें वह सब सौंप दूंगा ॥४२॥ मुने ! कामुक की बातें सुनकर मुसकुराती हुई घृताची उसे नीतियुवत सुन्दर उत्तर तुरन्त देने लगी।४३॥ घृताची बोली-हे कामातुर! तुमने जो सुन्दर बात कही है, उसे मैं स्वीकार कारती हूँ; किन्तु इस समय मैं तुमसे कुछ सामयिक बातें कहना चाहती हूँ॥४४॥ मैं कामदेव के लिए सुन्दर वेश बनाकर उसी के घर जा रही हूँ; क्योंकि हम लोग जिस दिन जिसके लिए (वेष बनाकर) जाती हैं, उस दिन उसी की स्त्रियाँ हो जातीा हैं। आज मैं काम की पत्नी और तुम्हारी गुरुपत्नी हूँ। क्योंकि तुमने अभी कहा है कि मैंने कामदेव से पढ़ा है।'॥४५-४६॥ विद्यादाता और मन्त्रदाता गुरु पिता से लाख गुना और माता से सहस्र गुना अधिक (मान्य) है। दूमरा उसके समान गुरु नहीं है।४७।। विद्वन् ! वेद में यह बात सुनी गयी है कि गुरु से गुरुपतनी उसी तरह सौगुना अधिक पूज्य है जैसे पिता से सौगुना अधिक माता॥४८।। माता के साथ समागम करने पर पुत्र के लिए जितने दोष वेद में सुने गये हैं, उससे लाख गुना अधिक दोष गुरुपत्नी के समागम से प्राप्त होता है॥४९॥ मनुष्य जिसको 'माता' शब्द से संबोधित करके बात-चीत करता है, वह यथार्थ में उसकी माता के तुल्य है; क्योंकि सज्जनों का भी साक्षी धर्म ही है॥५०॥ इसलिए उसके साथ जो समागम करता है, वह कालसूत्र (नरक) को प्राप्त होकार वहाँ घोर यातना
१ क. ०मवेतदः।
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ब्रह्मवैव्तपुराणम् ५५
मात्रा सह समायोगे ततो दोषश्चतुर्गुणः । सार्द्ध च गुरुपत्न्या च तल्लक्षगुण एव च ॥५२। = कुम्भीपाके पतत्येव यावद्वँ ब्रह्मणो वयः। प्रायश्चित्तं पापिनश्च तस्य नैव श्रुतौ श्रुतम् ।५३। चक्राकारं कुलालस्य तीक्ष्णधारं च खड्गवत्। वसामूत्पुरीषैश्च परिपूर्ण सुदुस्तरम्।५४॥ शूलवत्कृमिसंयुक्तं तप्तमग्निसमं द्रवत्। पापिनां तद्विहारं च कुम्भीपाक प्रकीतितम् ॥५५॥ यावान्दोषो हि पुंसां च गुरुपत्नीसमागमे। तावांश्च गुरुपत््या वै तत्र चेत्कामुकी यदि ॥५६॥ अद्य यास्यामि कामस्य मन्दिरं तस्य कामिनी। वेषं कृत्वाऽऽगमिष्यामि त्वत्कृतेऽहं दिनान्तरे॥५७। घृताचीवचनं श्रुत्वा विश्वकर्मा रुरोष ताम्। शशाप शूद्रयोनिं च व्रजेति जगतीतले ॥५८॥ घृताची तद्वचः श्रृत्वा तं शशाप सुदारुणम् । लभ जन्म भवे त्वं च स्वर्गभष्टो भवेति च ॥५९॥ घृताची कारुमुक्त्वा न साऽगच्छत्काममन्दिरम्। कामेन सुरतं कृत्वा कथयामास तां कथाम् ॥६०॥ साभारते च कामोक्त्या गोपस्य मदनस्य च। पत्न्यां प्रयागे नगरे लेभे जन्म च शौनक ।।६१।। जातिस्मरा तत्प्रसूता बभूव च तपस्विनी। वरं न वव्रे धर्मिष्ठा तपस्यायां मनो दधौ ॥६२॥ तपश्चकार तपसा हतप्तकाञ्चनसंनिभा। दिव्यं च शतवर्ष सा गङ्गातीरे मनोरमे ॥६३॥ वीर्यण सुरकारोश्च नव पुत्रान्प्रसूय सा। पुनः स्वलोकं गत्वा च सा घृताची बभूव ह॥६४।।
.तब तक भोगता है जब तक सूर्य और चन्द्रमा का अस्तित्व रहता है।५१। माता के साथ समागम करने से उससे चौगुना और गुरुपत्नी के साथ समागम करने से उससे लाख गुना अधिक दोष लगता है॥५२। और वह ब्रह्मा की आयु की अवधि तक कुम्भीपाक नरक में पड़ा रहता है। ऐसे पापियों का प्रायश्चित्त वेद में सुना ही नहीं गया है।५३। कुम्हार के चक्के के समान गोलाकार, खङ्ग के समान तीक्ष्ण धार वाला, मांस, मूत्र और मल से भरा हुआ अत्यन्त दुस्तर, शूल के समान कीड़ों से युक्त और प्रज्वलित अग्नि के समान तपता एवं पिघलता हुआ वह कुम्भीपाक नरक पापियों के लिए कर्मभोग का स्थान बताया गया है।५४-५५॥। गुरुपत्नी के साथ समागम करने पर पुरुषों को जितना दोष लगता है उतना ही दोष गुरुपत्नी को भी लगता है, यदि वह कामुकी होकर उस पुरुष के साथ सहवास करती है॥५६। आज मैं कामदेव की कामिनी हूँ, अतः उसी के यहाँ जा रही हूँ। तुम्हारे लिए भी दूसरे दिन (उत्तम) वेष बनाकर आऊँगी।५७। घृताची की ऐसी बातें सुनकर विश्वकर्मा ने उस पर क्रोध किया और उसे शाप दिया कि-तुम भूतल पर शूद्र-योनि में उत्पन्न हो।५८।। घृताचीं ने भी उनकी बात सुनकर उन्हें दारुण शाप दिया कि तुम भी स्वर्ग से भ्रष्ट होकर पृथ्वी पर जन्म ग्रहण करो।५९॥ विश्वकर्मा से इस प्रकार कहकर घृताची काम के भवन में पहुँची। उससे सम्भोग करने के उपरान्त वह घटना बता दी।।६०।। काम को बताने के अनन्तर घृताची ने भारत में तीर्थराज प्रयाग नगर में मदन नामक गोप के यहाँ जन्म ग्रहण किया। शौनक! वहाँ उत्पन्न होने पर उसे पूर्व जन्म का स्मरण बना रहा। अतः उसने किसी वर का वरण न करके तपस्या करने की ही मन में ठान ली॥६१- ६२। गंगा के मनोहर तट पर तपाये हुए सुवर्ण के समान वर्ण वाली उस घृताची ने दिव्य सौ वर्षों तक तप किया ।६३॥। पश्चात् देवों के शिल्पी (विश्वकर्मा) के वीर्य द्वारा नौ पुत्रों को उत्पन्न कर घृताची स्वर्ग को चली गयी।६४।।
१ क. ०रच चाष्टौ पु०।
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२६ दशमोऽध्याय:
शौनक उवाच कयं वीयं सा दधार सुरकारोस्तपस्विनी। पुत्रान्नव प्रसूता च कुत्र वा कति वासरान् ।६५।। सौतिरुवाच विश्वकर्मा तु तच्छापं समाकर्ण्य रुषाऽन्वितः । जगाम ब्रह्मणः स्थानं शोकेन हृतचेतनः ॥६६।। नत्वा स्तुत्वा च ब्रह्माणं कथयामास तां कथाम् । ललाभ जन्म ब्राह्मण्यां पृथिव्यामाज्ञया विधे:॥६७॥ स एव ब्राह्मणो भूत्वा भुवि कारुर्बभूव ह। नृपाणा च गृहस्थानां नानाशिल्पं चकार ह।६८।। शिल्पं च कारयामास सर्वेभ्यः सर्वतः सदा । विचित्रं विविधं शिल्पमाश्चर्य सुमनोहरम्।६९।। एकदा तु प्रयागे च शिल्पं कृत्वा नृपस्य च। स्नातुं जगाम गङ्गां स चापश्यत्तत्र कामिनीम् ।७०॥ घृताचों नवरूपां च युर्वाततां तपस्विनीम्। जातिस्मरां तां बुबुधे स च जातिस्मरो ्विजः ॥७१॥ दृष्टवा सकामः सहसा बभूव हृतचेतनः । उवाच मधुरं शान्तः शान्तां तां च तपस्विनीम् ॥७२॥
ब्राह्मण उवाच अहोडधुना त्वमत्रैत्र वृताचि सुमनोहरे। मा मां स्मरसि रम्भोरु विश्वकर्माहमेव च ॥७३॥ शापमोक्षं करिष्यामि भज मां तव सुन्दरि । त्वत्कृतेऽतिदहत्येव मनो मे सच मन्मथः ॥७४॥
शौनक बोल-उम तपस्चिनी ने विश्वकर्मा का वीर्य कैसे धारण किया? नौ पुत्रों को कहाँ जन्म दिया ? और कितने दिनों तक पृथ्वी पर रहो ? ॥६५॥ सौति बोले -- विष्वकर्मा उसको शाप सनकर कुद्ध हुए और शोक करते हुए ब्रह्मा के यहाँ चले गये॥।६६॥ ब्रह्मा को प्रणास कर के उन्होंने उस घटता को ह सुनाया। पश्चात् ब्रह्मा की आज्ञा से पृथ्वी पर एक ब्राह्मणी के गर्भ से उत्पन्न हुए।।६।। ब्राह्मण-वरंश में उत्पन्न होकर भी वे शिल्पी का ही कार्य करते थे जिसके परिणामस्वरूप उन्होंने राजाओं और अन्य गृहस्थों के यहाँ अनेक प्रकार के शिल्प-कार्य किये।६८॥ वे सदा सब लोगों से घिल्प का ही कार्य करात थे। उनका शिल्प विविध, विचित्र, आश्चर्यंजनक तथा अत्यन्त मनोहर होता था॥६९॥ एक बार वे प्रयाग में राजा के यहाँ कुछ कारोगरो का काम करके स्नान करने के लिए गंगाजी गए। वहाँ उन्हें एक सुन्दरी तपस्व्रिनी दिखायी पड़ी।७०।। ह्विज ! (पूर्वजन्म का स्मरणकर्ता) जातिस्मर होने के कारण उन्होंने उस नव- युवती घृताची को, जिसे अपने पूर्व जन्मों का स्मरण था, पहचान लिया।७१। अतः उसे देखते है। वे सहमा काम- विह्वल ही गये। पुनः शान्त होकर उन्हने उस शान्त तपस्विनी से मधुर वाणी में कहा॥७२॥ ब्राह्मण बोल-अहा! अत्यन्त मनोहर रूप धारण करने वाली घृतार्ची! तुम इस समय यही हो। हे कदलीस्तम्भ के समान ऊरु वाली ! मैं भी विश्वकर्मा हूँ। क्या तुम मुझे पहचान रही हो॥७३। सुन्दरी! मैं तुम्हें शापमुक्त कर दूंगा, मेरे साथ समागम करो। तुम्हारे ही लिए (कामदेव) मेरे मन को अत्यन्त जला रहा
१ क. ०त्रानष्टौ प्र०। २ ख. ०थिमां साऽडज्ञ०। ३ क. ०रे मां संस्म० ।
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ब्रह्मवैवर्तपुराणम् ५७
द्विजस्य वचनं श्रुत्वा घृताची नवरूपिणी। उवाच मधुरं शान्ता नीतियुक्तं परं वचः॥७५॥ गोपिकोवाच तहिने कामकान्ताऽहमधुना च तपस्विनी। कथं त्वया संगता स्यां गङ्गातीरे च भारते॥७६॥ विश्वकर्मन्निदं पुण्यं कर्मक्षेत्रं च भारतम्। अत्र यत्किरियते कर्म भोगोऽन्यत्र शुभाशुभम् ॥७७॥ धर्मो मोक्षकृते जन्म प्रलभ्य तपसः फलात्। निबद्धः कुरुते कर्म मोहितो विष्णुमायया ॥७८॥ माया नारायणीशाना परितुष्टा च यं भवेत्। तस्मै,ददाति श्रीकृषणो भक्तिं तन्मन्त्रमीप्सितम् ॥७९॥ यो मूढो विषयासक्तो लब्धजन्मा च भारते। विहाय कृष्णं सर्वेशं स सुग्धो विष्णुमायया ॥८०। सर्व' स्मरामि देवाहमहो जातिस्मरा पुरा। घृताची सुरवेश्याऽहमधुना गोपकन्यका॥८१॥ तपः करोमि मोक्षार्थ गङ्गातीरे सुपुण्यदे। नात्र स्थलं च करीडायाः स्थिरस्त्वं भव कामुक ।८२॥ अन्यत्र च कृतं पापं गङ्गायां च विनश्यति। गङ्गातीरे कृतं पापं सद्यो लक्षगुणं भवेत्।८३।। तत्तु नारायणक्षेत्रे तपसा त् विनश्यति। सद्यो दा कामतः कृत्वा निवृत्तश्च भवेत्पुनः॥८४।। घृताचीवचनं श्रुत्वा विश्वकमाऽनिलाकृतिः। जगाम तां गृहीत्वा च मलयं चन्दनालयम्॥८५॥ रम्यायां मलयद्रोण्यां पुष्पतल्प मनोरमे। पुष्पचन्दनवातेन संततं सुरभीकृते।८६॥
है।।७४।। ब्राह्मण की बात सुनकर नवीन रूप धारण करने वाली शान्त घृताची ने मधुर एवं नीतियुक्त वचन कहा॥७५॥ गोपिका बोली-उस दिन मैं काम की पत्नी थी और आज तपस्विनी हूँ और फिर इस भारत में गंगा के तट पर तुम्हारे साथ कैसे समागम कर सकती हूँ ॥७६॥ क्योंकि हे विश्वकर्मन् ! यह भारत पुण्य कर्मक्षेत्र है। यहाँ जो कुछ शुभाशुभ कर्म किया जाता है उसका भोग अन्यत्र प्राप्त होता है।७७।। धर्मात्मा पुरुष तपोबल से मोक्ष के लिए यहाँ (भारत में) जन्म लेता है और विष्णु की माया से मोहित एवं बद्ध होकर कर्म करता है ॥७८॥ क्योंकि सर्वसमर्थ नारायणी माया जिस पर प्रसन्न होती है उसी को भगवान् श्रीकृष्ण अपनी भक्ति और उसका अभि- लषित मन्त्र प्रदान करते हैं॥७९॥ भारत में जन्म ग्रहण कर जो मूर्ख सर्वेश भगवान् श्रीकृष्ण को छोड़कर विषयं- वासना में ही आसक्त रहता है, उसे भगवान् विष्णु की माया से मोहित ही जानना चाहिए।८०॥। देव ! मैं पूर्वजन्म की सब बातों का स्मरण कर रही हूँ। मैं पहले की देववेश्या घृताची हूँ और इस समय गोप की कन्या हूँ ॥८१॥ अत्यन्त पुण्यप्रद गंगा-तट पर मैं मोक्ष के लिए तप कर रही हूँ। अतः हे कामुक! तुम इस समय शान्तचित्त रहो, क्योंकि यह कीड़ा करने का स्थान नहीं है।।८२।। अन्यत्र जो पाप किया जाता है वह गंगा में नष्ट होता है और गंगा के तट पर किया हुआ पाप तुरन्त लाख गुना बढ़ जाता है।।८३।। वह पाप नारायण क्षेत्र (गंगा के किनारे चार हाथ तक की भूमि) में तप के द्वारा ही विनष्ट होता है। आपाततः या कामना वश किया गया भी वह पाप निवृत्त हो जाता है।।८४।। वायु के आकार वाले विश्वकर्मा ने घृताची की बात सुनकर उसे साथ लेकर चन्दनों के आलय मलयाचल पर चले गये।८५॥ मलय की उपत्यका में पुष्पों की मनोहर शय्या लगायी, जो पुष्पों और चन्दनों से सम्पृक्त वायु से अत्यन्त सुगन्धित हो रही थी। निर्जन वन में उसी शय्या पर उन्होंने उसके साथ सुख-सम्भोग ८
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५८ दशमोऽध्याय:
चकार सुखसंभोगं तया स विजने वने। पूर्ण द्वादशवर्ष च बुबुधे न दिवानिशम्॥८७ बभूव गर्भ: कामिन्याः परिपूर्णः सुदुर्वहः। सा सुषाव च तत्रैव पुत्रान्नव मनोहरान॥८८ कृतशिक्षितशिल्पांश्च ज्ञानयुक्तांश्च शौनक। पूर्वप्राक्तनतो योग्यान्बलयुक्तान्विचक्षणान् ।८९ मालाकारान्कर्मकाराञ्छङ्गकारान्कुविन्दकान्। कुम्भकारान्सूत्रकारान्स्वर्णचित्रकरांस्तथा ।।९० तौ च तभ्यो वरं दत्त्वा तान्संस्थाव्य महीतले। मानवीं तनुमुत्सृज्य जग्मतुर्निजमन्दिरम्॥९१ स्वर्णकारः स्वर्णचीर्याद्ब्राह्मणानां द्विजोत्तम। बभव पतितः सद्यो ब्रह्मशापेन कर्मणा॥९२ सूत्रकारो द्विजानां तु शापेन पतितो भुवि। शोघ्रं च यज्ञकाष्ठानि न ददौ तेन हेतुना ॥९३ व्यतिक्रमेण चित्राणां सद्यश्चित्रकरस्तथा। पतितो ब्रह्मशापेन ब्राह्मणानां च कोपतः।९४ कश्चिद्वणिग्विशेषशच संसर्गात्स्वर्णकारिणः । स्वर्णचौर्यादिदोषेण पतितो ब्रह्मशापतः।।९५ कुलटायां च शूद्रायां चित्रकारस्य वीर्यतः । बभूवाट्टालिकाकारः पतितो जारदोषतः॥९६ अट्टालिकाकारबीजात्कुम्भकारस्य योषिति। बभूव कोटकः सद्यः पतितो गृहकारक:॥९७ कुम्भकारस्य बीजेन सद्यः कोटकयोषिति। बभूव तैलकारश्च कुटिल: पतितो भुवि ॥९८ सद्यः क्षत्रियबीजेन राजपुत्रस्य योषिति। बभूव तीवरश्चैव पतितो जारदोषत:॥९९ तीवरस्य तु बीजेन तैलकारस्य योषिति। बभूव पतितो दस्युर्लेटश्च परिकीर्तितः॥१००
किया। पूरे बारह वर्ष तक (सुखसम्भोग में लीन रहने के कारण) उन्हें दिन-रात का कुछ भी ज्ञान न रह पश्चात् उस कामिनी को परिपूर्ण और अत्यन्त दुर्वह गर्भ रह गया। उसने उसी स्थान पर नौ सुन्दर पुत्रों को उत्प किया। शौनक ! उन बालकों को भलीभाँति शिल्प की शिक्षा देकर उन्हें ज्ञानी, योग्य, बलवान् और बुद्धिमान् बनाय पश्चात् उन्हें माली, बढ़ई, शंख बनाने वाले, जुलाहा, कुम्हार, सूत्रकार, स्वर्णकार और चित्रकार का काम सौंप वरदान दिया। अन्त में उन लोगों को भूतल पर स्थापित करके वे दोनों अपने मानवीय शरीर का त्याग कर अप लोक को चले गये ।८६-९१॥ द्विजोत्तम ! स्वर्णकार ब्राह्मणों के सोने की चोरी करने के कारण उसी समय ब्रह्मश से पतित हो गया।९२। सूत्रकार भी यज्ञ के निमित्त ब्राह्मणों को तत्क्षण लकड़ी न देने से उनके शाप से उसी सम पतित हो गया।९३। इसी प्रकार चित्रकार भी चित्रों के उलटफेर कर देने से ब्राह्मणों के शाप से पतित गया।।९४॥ एक विशेष प्रकार का बनिया भी सोनारों के साथ रहकर सोने की चोरी में साथ देने के कार ब्राह्मण-शाप से पतित हो गया।९५॥ चित्रकार के वीर्य से कुलटा शूद्रा स्त्री में राजगीर उत्पन्न हुआ। जार-क (व्यभिचारदोष) से उत्पन्न होने के कारण वह भी पतित हो गया ॥९६। राजगीर से कुम्हार की स्त्री में उत्प कोटक भी, जो घर बनाता है, पतित हो गया।।९७।। कुम्हार के वीर्य से कोटक की स्त्री में कुटिल तेली उत्प हुआ। वह भी पतित कहलाया।९८।। क्षत्रिय के बीज से राजपुत्र की स्त्री में तीवर उत्पन्न हुआ। वह भी व्यरि चार दोष के कारण पतित कहलाया।९९॥ तीवर के वीर्य से तेली की स्त्री में पतित दस्यु उत्पन्न हुआ जिसक संज्ञा लेट भी हुई॥१००॥ तीवर की कन्या में लेट ने छह पुत्रों को उत्पन्न किया जिनके नाम ये हैं-माल्ल, मन्त्र
१ क. ०त्रानष्टौ म०। २ छ. ख. ०त्रधारो०।
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ब्रह्मवैवर्तपुराणम् ५९
लेटस्तीवरकन्यायां जनयामास षट् सुतान्। माल्लं मन्त्रं मातरं च भण्डं कोलं कलंदरम् ॥१०१॥ ब्राह्मण्यां शूद्रवीर्येण पतितो जारदोषतः। सद्यो बभूव चाण्डालः सर्वस्मादधमोऽशुचिः॥१०२॥ तीवरेण च चण्डाल्यां चर्मकारो बभव ह। चर्मकार्यां च चण्डालान्मांसच्छेदो बभूव ह॥१०३॥ मांसच्छेद्यां तीवरेण कोंचश्च परिकीतितः। कोंचस्त्रियां तु कैवर्तात्कर्तारः परिकीतितः ॥१०४॥ सद्यश्चाण्डालकन्यायां लेटवीर्येण शौनक। बभूवतुस्तौ द्वौ पुत्रौ दुष्टौ हड्डडमौ तथा॥१०५॥ क्रमेण हडिडकन्यायां सद्यश्चाण्डालवीर्यतः बभूवुः पञ्च पुत्राश्च दुष्टा वनचराश्च ते ॥१०६॥ लेटात्तीवरकन्यायां गङ्गातीरे च शौनक। बभूव सद्यो यो बालो गङ्गापुत्रः प्रकीतितः॥१०७॥ गङ्गापुत्रस्य कन्यायां वीर्याद्व वेषधारिणः। बभूव वेषधारी च पुत्रो युङ्गी प्रकीरतितः ॥१०८।। वैश्यात्तीवरकन्यायां सद्यः शुण्डी बभूव ह। शुण्डियोषिति वैश्यात्तु पौण्ड्कश्च बभूव ह॥१०९॥ क्षत्रात्करणकन्यायां राजपुत्रो बभूव ह। राजपुत्रयां तु करणादागरीति प्रकीतितः॥११०।। क्षत्रवीर्येण वैश्यायां कैवर्तः परिकीतितः। कलौ तीवरसंसर्गाद्धीवरः पतितो भुवि ॥१११॥ तीवर्यां धीवरात्पुत्रो बभूव रजकः स्मृतः। रजक्यां तीवराच्चव कोयालीति बभूब ह॥११२॥ नापिताद्गोपकन्यायां सर्वस्वी तस्य योषिति। क्षत्राद्बभूव व्याधशच बलवान्मृर्गाहंसकः॥११३॥ तीवराच्छुण्डिकन्यायां बभूवुः सप्त पुत्रकाः। ते कलौ हड्डसंसर्गाद्वभूवुर्दस्यवः सदा॥११४॥ ब्राह्मण्यामृषिवीर्येण ऋतो: प्रथमवासरे। कुत्सितश्चोदरे जातः कूदरस्तेन कीर्तितः॥११५॥
मातर, भण्ड, कोल और कलन्दर। ॥१०१।। जार कर्म के द्वारा शूद्र-वीर्य से ब्राह्मण में उत्पन्न पुरुष सबसे अधम एवं अपवित्र चाण्डाल हुआ। ॥१०२॥ तीवर से चाण्डाल की कन्या में चर्मकार उत्पन्न हुआ। चर्मकार की स्त्री में चाण्डाल द्वारा मांसच्छेद (बहेलिया) उत्पन्न हुआ।।१०३। मांसच्छेद की स्त्री में तीवर से 'कोंच' की उत्पत्ति हुई और कोञ्च की स्त्री में कैवर्त से कर्त्तार की उत्पत्ति हुई॥१०४॥ शौनक! चाण्डाल की कन्या में लेट के वीर्य से 'हडि्ड और 'डम' नामक दो दुष्ट पुत्र उत्पन्न हुए।१०५। कमशः हडिड की कन्या में चाण्डाल के वीर्य से पांच दुष्ट पुत्रों की उत्पत्ति हुई, जो वनचर कहे जाते हैं॥१०६॥ शौनक ! गंगा के किनारे लेट द्वारा तीवर की कन्या में जो बालक उत्पन्न हुआ वह गंगापुत्र कहलाया।१०७। और गंगापुत्र की कन्या में वेषधारी के वीर्य से वेषधारी पुत्र उत्पन्न हुआ जो 'युंगी' कहलाता है॥१०८।। वैश्य से तीवर की कन्या में शुण्डी की उत्पत्ति हुई और शुण्डी की स्त्री में वैश्य से 'पौण्ड्रक' उत्पन्न हुआ।१०९॥ क्षत्रिय से करण-कन्या में राजपुत्र और राजपुत्र की कन्या में करण द्वारा 'आगरी' उत्पन्न हुआ।११०॥ क्षत्रिय के वीर्य से वैश्य की स्त्री में कैवर्त्त उत्पन्न हुआ। कलि में तीवर के संसर्ग से पतित धीवर पृथ्वी पर उत्पन्न हुआ॥१११॥ धीवर से तीवर की स्त्री में उत्पन्न पुत्र रजक (धोबी) कह- लाया। तीवर से धोबिन में कोयालि की उत्पत्ति हुई॥११२॥ नापित से गोप की कन्या में उत्पन्न पुत्र 'सर्वस्वी' और उसकी स्त्री में क्षत्रिय से व्याध की उत्पत्ति हुई, जो बलवान् और पशुहिंसक हुआ॥११३॥ तीवर से शुण्डि की कन्या में सात पुत्र उत्पन्न हुए, जो कलियुग में हडि्ड का साथ करने से सदा के लिए दस्यु हो गए॥११४॥ ऋतुकाल के प्रथम दिन ब्राह्मणी में ऋषि के वीर्य से जो कुत्सित गर्भ रह गया वह उत्पन्न होने पर 'कूदर' कहलाया
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६० दशमोऽध्यायः
तदशौचं विप्रतुल्यं पतितो ऋतुदोषतः। सद्यः कोटकसंसर्गादधमो जगतीतले ॥११६॥ क्षत्रवीर्येण वैश्यायामृतोः प्रथमवासरे। जातः पुत्रो महादस्युर्बलवांश्च धनुर्धरः॥११७॥ चकार वागतीतं च क्षत्रियेणापि वारितः। तेन जात्या स पुत्रश्च वागतीतः प्रकीतितः॥११८। क्षत्रवीर्येण शूद्रायामृतुदोषेण पापतः । बलवन्तो दुरन्ताशच बभूवुम्लेच्छजातयः॥११९॥ अविद्धकर्णाः क्ूराश्च निर्भया रणदुर्जयाः। शौचाचारविहीनाश्च दुर्धर्षा धर्मवजिताः॥१२०॥ म्लेच्छात्कुविन्दकन्यायां जोलाजातिर्बभूव। जोलात्कुविन्दकन्यायां शराङ्क: परिकीरतितः ॥१२१।। वर्णसंक्रदोषेण 'बह वयश्चाश्रुतजातयः। तासां नामानि संख्याश्च को वा वक्तुं क्षमो द्विज ॥१२२॥ वैद्योऽश्वनीकुमारेण जातो विप्रस्य योषिति। वैद्यवीर्येण शूद्रायां बभूबुर्बहवो जनाः॥१२३॥ ते च ग्राम्यगुणज्ञाश्च मन्त्रौषधिपरायणाः। तेभ्यश्च जाताः शूद्रायां ये व्यालग्राहिणो भुवि ॥१२४॥ शौनक उवाच कथं ब्राह्मणपत्न्यां तु सूर्यपुत्रोऽश्विनीसुतः । अहो केनाविवेकेन वीर्याधानं चकार है॥१२५॥ सौतिरुवाच गच्छन्तीं तीर्थयात्रायां ब्राह्मणों रविनन्दनः। ददर्श कामुकः शान्तः पुष्पोद्याने च निर्जने ॥१२६॥
।११५। उसका अशौच ब्राह्मण के समान ही होता है। वह (माता के) ऋतुदोष के कारण पतित हुआ और सद्ः कोटक के संसर्ग से वह भूतल पर अधम भी हुआ॥११६॥ उसी प्रकार वैश्य की स्त्री में ऋतुकाल के प्रथम दिन में ही क्षत्रिय के वीर्य से उत्पन्न पुत्र 'महादस्यु' बलवान् और धनुर्धारी हुआ। उसने क्षत्रिय के मना करने पर भी उसके वचन के विरुद्ध कार्य किया, अतः जन्म से वह वागतीत कहलाया॥११७-११८। क्षत्रिय के वीर्य से शूद्र स्त्री मं ऋतुदोष के पाप से बलवान् एवं प्रचंड म्लेच्छ जातियाँ उत्पन्न हुईं ॥११९॥ वे म्लेच्छ अविद्धकर्ण (कान न छेदाने- वाले), कूर, निर्भय, रण में कठिनाई से जीते जाने वाले, पवित्रता एवं आचार से हीन दुर्द्धर्ष और धर्मरहित हुए॥१२०॥ म्लेच्छ से कुविन्द की कन्या में 'जोला' जाति उत्पन्न हुई और जोला से कुविन्द की कन्या में 'शरांक' उत्पन्न हुआ ॥१२१। द्विज ! इस प्रकार वर्णसंकर दोष से अनेक अश्रुत (न सुनी हुई) जातियाँ उत्पन्न हुईं। उनके नाम और संख्या बताने में भला कौन समर्थ है? ॥१२२॥ अश्विनीकुमार द्वारा ब्राह्मण-स्त्री में वैद्य उत्पन्न हुआ और वैद्य द्वारा शूद्र स्त्रियों से अनेक जनों की उत्पत्ति हुई। वे लोग ग्राम्य गुणों के जानकार और मन्त्र, औषध के प्रयोग में परायण हुए। पुनः उनके द्वारा शूद्र स्त्री से सँपेरों की उत्पत्ति हुई॥१२३-१२४॥ शौनक बोल-ब्राह्मण-पत्नी में सूर्यपुत्र अश्विनी-कुमार ने यह दुस्साहस कैसे किया? उन्होंने किस अवि- वेक वश उसमें वीर्याधान किया॥१२५॥ सौति बोले-कोई ब्राह्मणी तीर्थयात्रा कर रही थी। किसी निर्जन पुष्पवाटिका में उसके पहुँचने पर शान्त अश्विनी-कुमार उसे देख कर कामपीड़ित हो गए। प्रयत्नपूर्वक उसके द्वारा रोके जाने पर भी बलवान् अश्विनीकुमार
१ क. ०हव्यश्च शठजा०।
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ब्रह्मवैवर्तपुराणम् ६१
तया निवारितो यत्नाद्बलेन बलवान्सुरः । अतीव सुन्दरीं दृष्टवा वोर्याधानं चकार सः॥१२७॥ द्रुतं तत्याज गर्भं सा पुष्पोद्याने मनोहरे। सद्यो बभूव पुत्रश्च तप्तकाञ्चनसंनिभः ॥१२८॥ सपुत्रा स्वामिनो गेहं जगाम व्रीडिता सदा। स्वामिनं कथयामास यन्मार्गे दैवसंकटम् ॥१२९॥ विप्रो रोषेण तत्याज तं च पुत्रं स्वकामिनीम्। सरिद्बभूव योगेन सा च गोदावरी स्मृता॥१३०॥ पुत्रं चिकित्साशास्त्रं च पाठयामास यत्नतः। नानाशिल्पं च मन्त्रं च स्वयं स रविनन्दनः ॥१३१।। विप्रश्च वेतनाज्ज्योतिर्गणनाच्च निरन्तरम् । वेदधर्मपरित्यक्तो बभूव गणको भुवि ॥१३२॥ लोभी विप्रश्च शूद्राणामग्रे दानं गृहीतवान्। ग्रहणे मृतदानानामग्रदानी बभूव सः॥१३३॥ कश्चित्पुमान्ब्रह्मयज्ञे यज्ञकुण्डात्समुत्थितः । स सूतो धर्मवक्ता च मत्पूर्वपुरुषः स्मृतः॥१३४॥ पुराणं पाठयामास तं च ब्रह्मा कृपानिधिः । पुराणवक्ता सूतश्च यज्ञकुण्डसमुद्वः ॥१३५॥ वैश्यायां सूतवीर्येण पुमानेको बभूध ह। स भट्टो वावदूकश्च सर्वेषां स्तुतिपाठकः॥१३६॥ एवं ते कथितः किंचित्पृथिव्यां जातिनिर्णयः । वर्णसंकरदोषेण बह्वघोऽन्याः सन्ति जातयः॥१३७॥ संबन्धो येषु येषां यः सर्वजातिषु' सर्वतः। तत्त्वं ब्रवीमि वेदोक्तं ब्रह्मणा कथितं पुरा॥१३८॥ पिता तातस्तु जनको जन्मदाता प्रकीतितः अम्बा माता च जननी जनयित्री प्रसूरपिं॥१३९॥
ने उसे अत्यन्त सुन्दरी देखकर (उसमें) वीर्याधान कर ही डाला। उसने तुरन्त उस गर्भ को उसी मनोहर पुष्पोद्यान में त्याग दिया, किन्तु उससे एक तप्त सुवर्ण की भाँति कान्तिमान् पुत्र उत्पन्न हो गया॥१२६-१२८।। पश्चात् लज्जित होकर वह स्त्री उस पुत्र को साथ लिये अपने पति के घर लौट गयी। वहाँ उसने अपने पति से मार्ग की घटना बता दी। ब्राह्मण ने कुद्ध होकर पुत्र और स्त्री दोनों का त्याग कर दिया। अनन्तर वह स्त्री योग द्वारा 'गोदावरी' नामक नदी में परिणत हो गयी और उस पुत्र को स्वयं रविनन्दन अ्विनीकुमार ने बड़े प्रयत्न से चिकित्साशास्त्र, नाना प्रकार के शिल्प तथा मंत्र पढ़ाये ॥१२९-१३१। किन्तु वह ब्राह्मण निरन्तर नक्षत्रों की गणना करने और वेतन लेने से वैदिक धर्म से भ्रष्ट हो इस भूतल पर गणक हो गया। उस लोभी ब्राह्मण ने ग्रहण के समय तथा मृतकों के दान लेने के समय शूद्रों से भी अग्रदान ग्रहण किया था; इसलिए अग्रदानी हुआ॥१३२-१३३॥ एक पुरुष ब्राह्मणों के यज्ञ में यज्ञ-कुण्ड से उत्पन्न हुआ। वह धर्मवक्ता 'सूत' कहलाया। वही धर्मवक्ता सूत हमारा पूर्वज है।१३४।। कृपानिधान ब्रह्मा ने उसे पुराण का अध्ययन कराया। इस प्रकार वही यज्ञकुण्ड से उत्पन्न सूत पुराणों का वक्ता हुआ॥१३५॥ सूत के वीर्य द्वारा वैश्य की स्त्री से एक पुरुष उत्पन्न हुआ, जो अत्यन्त वक्ता था। लोक में उसकी भट्ट (भाट) संज्ञा हुई। वह सभी के लिए स्तुतिपाठ करता है। इस प्रकार मैंने पृथिवी पर स्थित कुछ जातियों का निर्णय बताया। वर्णसंकर दोष से उत्पन्न होने वाली अभी अनेक जातियाँ शेष हैं ।१३६-१३७।। अब मैं जिन जातियों का जिन जातियों से जो सम्बन्ध है उसके विषय में वेदोक्त तत्त्व का वर्णन करता हूँ, जैसा कि पहले ब्रह्मा ने कहा था॥१३८। पिता को तात, जनक, तथा जन्मदाता भी कहते हैं। उसी भाँति माता को अम्बा, माता, जननी, जनयित्री तथा प्रसू (प्रसव करने वाली) कहा जाता है। बाबा को पितामह, पिता का पिता और उनके पिता को प्रपितामह
१ क. ०षु संमत :• । त्वां तं ब्र०।
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६२ दशमोऽध्यायः
पितामहः पितृपिता तत्पिता प्रपितामहः। अत ऊर्ध्व ज्ञातयश्च सगोत्राः परिकीतिताः॥१४०॥ मातामहः पिता मातुः प्रमातामह एव च। मातामहस्य जनकस्तत्पिता वृद्धपूर्वकः॥१४१॥ पितामही पितुर्माता तच्छ्वश्रूः प्रपितामही। तच्छ्वश्रूश्च परिज्ञेया सा वृद्धप्रपितामही॥१४२॥ मातामही मातृमाता मातृतुल्या च पूजिता। प्रमातामहीति ज्ञेया प्रमातामहकामिनी ॥१४३॥ वृद्धमातामही ज्ञेया तत्पितुः कामिनी तथा। पितृभ्ाता पितृव्यश्च मातृभ्ाता च मातुलः ॥१४४॥ पितृष्वसा पितुर्मातृष्वसा मातु: स्वसा स्मृता। सूनुश्च तनयः पुत्रो दायादश्चाऽत्मजस्तथा॥१४५॥ धनभाग्वीर्यजश्चैव पुंसि जन्ये च वर्तते। जन्यायां दुहिता कन्या चाऽऽत्मजा परिकीतिता॥१४६॥ पुत्रपत्नी वधूर्ज्ञेया जामाता दुहितुः पतिः। पतिः प्रियश्च भर्ता च स्वामी कान्ते च वर्तते॥१४७॥ देवरः स्वामिनो भाता ननान्दा स्वामिनः स्वसा। श्वशुरः स्वामिनस्तातः श्वश्रश्च स्वामिनः प्रसूः ।।१४८॥ भार्या जाया प्रिया कान्ता स्त्री च पत्नी प्रकीर्तिता। पत्नीभ्ाता श्यालकश्च स्वसा पत्न्याश्च श्यालिका॥१४९॥ पत्नीमाता तथा श्वश्रूस्तत्पिता शवशुरः स्मृतः। सगर्भः सोदरो भाता सगर्भा भगिनी स्मृता ॥१५०॥ भगिनीजो भागिनेयो भातृजो भातृपुत्रकः । आवुत्तो भगिनीकान्तो भगिनीपतिरेव च ॥१५१॥
कहा जाता है। उनसे ऊपर के लोग ज्ञाति और सगोत्र कहलाते हैं॥१३९-१४०॥ माता के पिता को मातामह तथा उनके पिता को प्रमातामह और उनके पिता को वृद्धप्रमातामह कहा जाता है। उसी भाँति पिता की माता पितामही, उसकी सास प्रपितामही और उसकी सास वृद्धप्रपितामही कही जाती है॥१४१-१४२॥ माता की माता मातामही कही जाती है, जो माता के समान ही पूज्य है। प्रमातामह की स्त्री प्रमातामही और उनके पिता की स्त्री वृद्धप्रमातामही कही गयी है।।।१४३।। पिता का भाई 'पितृव्य (चाचा) एवं माता का भाई मातुल (मामा) कहा जाता है।१४४॥। पिता की भगिनी 'पितृष्वसा' (बुआ) माता की भगिनी 'मातृष्वसा' (मौसी) कही जाती है। सून, तनय पुत्र, दायाद और आत्मज-ये पुत्र के अर्थ में पर्यायवाची शब्द हैं। अपने से उत्पन्न हुए पुरुष (पुत्र) के अर्थ में धनभाक और वीर्यज शब्द भी प्रयुक्त होते हैं। उत्पन्न की गई पुत्री के अर्थ में दुहिता, कन्या तथा आत्मजा शब्द प्रचलित हैं॥१४५-१४६। पुत्र की पत्नी को 'वधू' (बह) और कन्या के पति को जामाता (जमाई) कहते हैं। स्त्री के स्वामी को पति, प्रिय, भर्ता, स्वामी और कान्त, स्व्रामी के भाई को देवर और स्वामी की भगिनी को 'ननांदा' (ननद) कहते हैं। उसी भाँति स्वामी के पिता को 'शवशुर' एवं उनकी माता को 'शवश्रू' (सास) कहते हैं। स्त्री को भार्या, जाया, प्रिया, कान्ता, स्त्री तथा पत्नी, स्त्री के भाई को 'श्यालक' (साला) स्त्री के भगिनी को 'श्यालिका' (साली) तथा पत्नी की माता को 'श्वश्रू' (सास) और उसके पिता को 'शवशुर' कहते हैं। सगे भाई को सोदर और मगी बहन 'को सोदरा' कहते हैं॥१४७-१५०। भगिनी के पुत्र को 'भागिनेय' 'भानजा', भाई के पुत्र को 'भातृज'
१ क. ०सि जीवे च०।
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ब्रह्मवैवर्तपुराणम् ६३
श्यालीपतिस्तु भ्राता च श्वशुरैकत्वहेतुना। श्वशुरस्तु पिता ज्ञेयो जन्मदातुः समो मुने ॥१५२॥ अन्नदाता भयत्राता पत्नीतातस्तर्थैव च। विद्यादाता जन्मदाता पञ्चैते पितरो नृणाम्॥१५३॥ अन्नदातुश्च या पत्नी भगिनी गुरुकामिनी। माता च तत्सपत्नी च कन्या पुत्रप्रिया तथा॥१५४॥ मातुर्माता पितुर्माता श्वश्रूःपित्रो: स्वसा तथा। पितृव्यस्त्री मातुलानी मातरश्च चतुर्दश ॥१५५॥ पौत्रस्तु पुत्रपुत्रे च प्रपौत्रस्तत्सुतेऽपि च। तत्पुत्राद्याशच ये वंश्याः कुलजाशच प्रकीर्तिता: ॥१५६॥ कन्यापुत्रश्च दौहित्रस्तत्पुत्राद्याशच बान्धवाः। भागिनेयसुताद्याशच पुरुषा बान्धवाः स्मृताः ॥१५७॥ भरातृपुत्रस्य पुत्राद्यास्ते पुनर्ज्ञातयः स्मृताः । गुरुपुत्रस्तथा भाता पोष्यः परमबान्धवः ॥१५८।। गुरुकन्या च भगिनी पोष्या मातृसमा मुने। पुत्रस्य च गुरुर्भ्राता पोष्यः सुस्निग्धबान्धवः ॥१५९॥ पुत्रस्य श्वशुरो भाता बन्धुवैवाहिकः स्मृतः । कन्यायाः इवशुरे चैव तत्संबन्धः प्रकीतितः ॥१६०॥ गुरुश्च कन्यकायाश्च भाता सुस्निग्धबान्धवाः। गुरुश्वशुरभ्ातणां गुरुतुल्यः प्रकीतितः॥१६१।। बन्धुता येन सार्ध च तन्मित्रं परिकीर्तितम्। ित्रं सुखप्रदं ज्ञेयं दुःखदो रिपुरुच्यते॥१६२॥ बान्धवो दुःखदो दैवान्निःसंबन्धोऽसुखप्रदः। संबन्धास्त्रिविधाः पुंसां विप्रेन्द्र जगतीतले ॥१६३॥ विद्याजो योनिजशचैव प्रीतिजश्च प्रकीर्तितः । मित्रं तु प्रीतिजं ज्ञेयं स संबन्धः सुदुर्लभः ॥१६४॥ मित्रमाता मित्रभार्या मातृतुल्या न संशयः । मित्रभ्ाता मित्रपिता भातृतातसमौ नृणाम् ॥१६५॥
(मतीजा) और भगिनी के पति को आवुत्त, भगिनीकान्त तथा भगिनीपति कहा जाता है। साली का पति (साढू) भी अपना भाई ह। है; दोनों के श्वशुर को जन्म देने वाले पिता के समान जानना चाहिए॥१५१-१५२॥ अन्न- दाता, भयत्राता, पत्नी का पिता, विद्यादाता, जन्मदाता-ये पाँच मनुष्यों के पिता कहलाते हैं॥१५३। अन्नदाता की पत्नी, भगिनी, गुरु की स्त्री, माता, सौतेली माँ, कन्या, पुत्रवधू, नानी, दादी, सास, माता की बहन, पिता की बहन, चाची और मामी-ये चौदह माताएँ हैं॥१५४-१५५।। पुत्र के पुत्र को पौत्र, उसके पुत्र को प्रपौत्र तथा उसके पुत्र आदि को 'वंशज' और 'कुलज' कहते हैं॥१५६॥ कन्या के पुत्र को दौहित्र और उसके पुत्रादि तथा भानजे के पुत्रादि को 'बान्धव' कहते हैं॥१५७॥ भाई के पुत्र के पुत्र आदि को 'ज्ञाति' कहा जाता है। गुरुपुत्र और भाई परम बन्धु होने के नाते पोषण के योग्य हैं॥१५८॥ मुने ! गुरु की कन्या और भगिनी माता के समान पोषण के योग्य हैं। पुत्र के गुरु को भी भाई मानना चाहिए। वह पोष्य तथा सुस्निग्ध बान्धव कहा गया है॥१५९॥ पुत्र के श्वशुर को वैवाहिक सम्बन्ध से भाई समझना चाहिए। कन्या के श्वशुर के साथ भी वही सम्बन्ध होता है ॥१६०॥ कन्या का गुरु भी अत्यन्त स्नेही बान्धव है। गुरु और श्वशुर के भाई गुरु के समान होते हैं जिसके साथ 'बन्धुता' (भाईचारे) का सम्बन्ध होता है, उसे मित्र कहा जाता है; क्योंकि सुख देने वाले को 'मित्र' और दुःख देने वाले को शत्रु समझना चाहिए॥१६१-१६२॥ विप्रेन्द्र! दैववश कभी बान्धव भी दुःख देने वाला हो जाता है और जिससे कोई भी सम्बन्ध नहीं है, वह सुखदायक बन जाता है। इस भूमण्डल में मनुष्यों के तीन प्रकार के सम्बन्ध कहे गये हैं-जो विद्याजन्य, योनिजन्य और प्रीतिजन्य होते हैं। उसमें मित्र के साथ प्रीतिजन्य सम्बन्ध होता है, वह अत्यन्त दुर्लभ है॥१६३-१६४॥ मित्र की माता और मित्र की पत्नी माता के समान होती है, इसमें
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६४ एकाद्शोऽध्यायः
चतुर्थ नामसंबन्धमित्याह कमलो.दवः। जारश्चोपपतिर्बन्धुर्दुष्टसंभोगकर्तरि ॥१६६॥ उपपल्यां नवज्ञा च प्रेयसी चित्तहारिणी। स्वामितुल्यश्च जारश्च नवज्ञा गृहिणीसमा॥१६७॥ संबन्धो देशभेदे च सर्वदेशे विर्गहितः । अवैदिको निन्दितस्तु विश्वामित्रेण निर्मितः॥१६८।। दुस्त्यजश्च महन्द्रिस्तु देशभेदे विधीयते। अकीतिजनकः पुंसां योषितां च विशेषतः ॥१६९॥ तेजीयसां न दोषाय विद्यमाने युगे युगे ।।१७०॥ इति श्रीब्रह्मवैवर्ते महापुराणे सौतिशौनकसंवादे ब्रह्मखण्डे जातिसंबन्धनिर्णयो नाम दशमोऽध्यायः ॥१०॥
अथकादशोऽध्यायः
शौनक उवाच द्विजः स भार्या संत्यज्य किं चकार विशेषतः। अश्विनोर्वा महाभाग किं नाम कस्य वंशजौ॥१॥ सौतिरुवाच द्विजश्च सुतपा नाम भारद्वाजो महामुनिः। तपश्चकार कृष्णस्य लक्षवर्ष हिमालये।॥।२॥
संशय नहीं। मित्र का भाई और उसका पिता मनुष्यों के लिए भाई और पिता के समान होते हैं॥१६५॥ कमलोत्पन्न ब्रह्मा ने चौथा नाम-सम्बन्ध भी बताया है। दुष्ट संभोग करने वाला जार पुरुष सम्बन्ध में उपपति कहलाता है॥१६६॥ चित्त का हरण करने वाली प्रेमिका उपपत्नी तथा नवज्ञा कहलाती है। जार पति के तुल्य और नवज्ञा पत्नी के तुल्य कही गई है॥१६७॥ यह मम्बन्ध देश विशेष में या सभी देशों में निन्दित माना गया है। इस अवै- दिक सम्बन्ध का निर्माण विश्वामित्र ने किया था॥१६८॥ महान् व्यक्तियों के लिए भी दुस्त्यज यह सम्बन्ध देश- विशेष में विहित है। किन्तु यह सम्बन्ध पुरुषों और विशेषकर स्त्रियों के लिए अकीर्तिकर है। फिर भी किसी भी युग में अतिशय तेजस्वी व्यक्तियों के लिए यह सम्बन्ध दोषजनक नहीं भी है॥१६९-१७०॥ श्री ब्रह्मवैवर्तमहापुराण के ब्रह्मखण्ड में जाति-सम्बन्ध- निर्णय नामक दसवाँ अध्याय समाप्त ॥१०॥
अध्याय ११
अश्विनीकुमारों का शापमोक्ष तथा वैष्णव ब्राह्मणों की प्रशंसा शौनक बोले-महाभाग! उस ब्राह्मण ने अपनी पत्नी को त्यागकर आगे क्या किया? और अश्विनी- कुमारों से उत्फन्न हुए का क्या नाम है? वे किसके वंशज हैं? सौति बोल -- उस तपस्वी ब्राह्मण का नाम सुतपा था। वे भरद्वाज-कुल में उत्पन्न बहुत बड़े मुनि थे। उन्होंने हिमालय पर्वत पर जाकर एक लाख वर्ष तक भगवान् श्रीकृष्ण की आराधना की। उन महातपस्वी एवं
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ब्रह्मवैवर्तपुराणम् ६५
महातपस्वी तेजस्वी प्रज्वलन्ब्रह्मतेजसा। ज्योतिर्ददर्श कृष्णस्य गगने सहसा क्षणम्॥३।। वरं स वव्रे निलिप्तमात्मानं प्रकृतेः परम्। न च नोक्षं ययाचे तं दास्यं भक्तिं च निश्चलाम्॥४॥ बभूवाऽडकाशवाणोति कुरु दारपरिग्रहम्। पश्चाद्दास्यं प्रदास्यामि भक्तिं भोगक्षये द्विज ॥५॥ पितणां मानसीं कन्यां ददौ तस्मै विधि: स्वयम्। तस्यां कल्याणमित्रश्च बभूव मुनिषुंगवः।।६।। यस्य स्मरणमात्रेण न भवेत्वुलिशाद्गयम्। न द्रष्टव्यं बन्धुमात्रं नूनं तत्स्नरणाल्लभेतृ।।७।। कल्याणमित्रजननीं परित्यज्य महामुनिः। शशाप सूर्यपुत्रं च यज्ञभार्वजितो भव।।८।। ससोदरश्च वा पूज्यो भवेति च सुराधम। व्याविग्रस्तो जडाङ्गर्व भयातेडकीतिमानिति॥?॥ इत्युक्त्वा सुतया रहं प्रतस्थे सूनुना सह। अश्विम्यां सहितः पूर्यः प्रयदौ च तदस्तिकस् ॥१०॥ पुत्राभ्यां व्यावियुदताभ्यां सूर्यस्त्रिजगतां पतिः । मुनीन्त्रं वै सुतपसं स तुष्टान वशौनक।११।।
सूर्य उवाच क्षमस्व भगवन्विप्र विष्णुरूप युगे युगे। मम पुत्रापराधं च भारद्वाज मुनोश्वर॥१२॥ ब्रह्मविष्णुमहशाद्याः सुराः सर्वे च संततम्। भुं्जते विप्रदत्तं तु फलपुष्पजलादिकम्॥१३॥ ब्राह्मणा वाहिता देवाः शश्वद्विश्वेषु पूजिताः । न च विप्रात्परो देवो विप्ररूवी स्वयं हरिः॥१४॥
तेजस्वी ने, जो अपने ब्रह्मतेज से उदीप्त हो रहे थे, एक दिन सहसा आकाश में क्षण भर के लिए भगवान् श्रीकृष्ण की ज्योति का दर्शन किया और प्रकृति से परे सर्वथा निलिप्त रहने एवं निश्चल दास्य-भकत का वरदान मांगा। उन्होंने मोक्ष की याचना नहीं की॥१-४॥ तब आकाशवाणी हुई-त्रह्मन! विवाह करो, अनन्तर भोग सम्बन्धी प्रारब्ध के क्षीण हो जाने पर मैं तुम्हें अपनी दास्य भक्ति प्रदान करूँगा।।५॥ पश्चात् ब्रह्मा ने स्वयं उन्हें पितरों को मानसी नामक कन्या प्रदान की। मुनिपुंशव ! उनके संयोग से उस स्त्री में कल्याणमित्र नामक पुत्र उत्पन्न हुआ।।६।। जिसके स्मरण मात्र से मनुष्य को अपने ऊपर वज्तर या बिजली गिरने का भय नहीं होता। कल्याणमित्र के स्मरण से निश्चय ही उन बन्धुजनों को भी प्राप्ति हो जाती है, जिनका दर्शन असंभव होता है।।७।। अनन्तर महामुनि सुतपा ने कल्याणमित्र की माता को त्यागकर सूर्यपुत्र (अश्विनींकुमार) को भी शाप दिया कि 'तू अपने भाई के साथ यज्ञभाग से वंचित और अपूज्य हो जा। तेरा अंग रोगग्रस्त और जड़ हो जाय। तू कलंकयुक्त हो जाय' ।।८-९।। इतना कह कर सुतपा बालक को लेकर अपने घर चले गये और सूर्य भी अपने अश्विनीकुमारों को लेकर उन ऋषि के निकट पहुँचे॥१०॥ शौनक! तीनों लोकों के पति सूर्य ने अपने रोगी पुत्रों समेत मुनिश्रेष्ठ सुतपा का दर्शन करके उनकी स्तुति करना प्रारम्भ किया॥११॥ सूर्य बोले-विप्र! क्षमा करें। भगवन् ! आप प्रत्येक युग में विष्णुस्वरूप हैं। हे भारद्वाज मुनीश्वर! मेरे पुत्रों का अपराध क्षमा कीजिए।१२। ब्रह्मा, विष्णु और शंकर आवि सभी देवगण सदैव ब्राह्मण के दिये हुए फल, पुष्प एवं जल आदि का उपभोग करते हैं। लोकों में ब्राह्मण द्वारा आवाहित हुए देवगण वहाँ निरन्तर पूजित होते हैं। विप्र से बढ़कर कोई अन्य देवगण नहीं हैं; क्योंकि वे ब्राह्मण के रूप में स्वयं भगवान् हैं ॥१३-१४॥ ९
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६६ एकादशोऽध्यायः
ब्राह्मणे परितुष्टे च तुष्डो नाराथण: स्वयम्। नारायणे च संतुष्टे संतुष्टाः सर्वदेवताः॥१५॥ नास्ति गङ्गासमं तीर्थ न च कृष्णात्परः सुरः । न शंकराद्वैष्णतशच न सहिष्णुर्धरापरा॥१६॥ न च सत्यात्परो धर्मो न साध्वी पार्वतीपरा। न दैवाद्बलवान्कश्चिन् च पुत्रात्परः प्रिय:॥१७॥ न च व्याविसमः शत्रुर्न च पूज्यो गुरोः परः। नारिति मातृसभो बन्धुर्न च मित्रं पितु: परम्।१८॥ एकादशीव्रतान्नान्यतपो नानशनात्परम्। परं सर्वधनं रत्नं विद्यारत्नं परं ततः॥१९॥ तर्ववर्णात्परे वित्रो नास्ति विप्रसमो गुरुः। वेदवेदाङ्गतत्वज्ञ इत्याह कमलोदवः॥२०॥ सूर्यस्य वचनं श्रुत्वा भारद्वाजो ननाम तम्। नीरुजौ चापि तत्पुत्रौ चकार तपसः फलात् ॥२१॥ पश्चाच्च तव पुत्रो च यज्ञभाजी भविष्यतः । इत्युक्त्वा तं च सुतपाः प्रणम्थाहस्करं मुनिः ॥२२॥ जगाम गङ्गं संत्रस्तो हरिसेवनतत्परः । पुत्राभ्यां सहितः सूर्यो जगाम निजमन्दिरम्॥२३॥ बजूततुस्तौ मूज्यो व यज्ञभाजौ द्विजाशिषा। एतत्सूर्यकृतं विप्र स्तोत्रं यो मानवः पठेतु वित्रपावत्रसादेन सर्वत्र विजयी भवेत्। ॥।२४। ब्राह्मणेभ्यो नम इति प्रातरुत्थाव यः पठेत्। स स्नातः सर्वतीर्थेषु सर्वयज्ञेषु दीक्षितः।।२५।। पुथिव्यां यानि तीर्थानि तानि तीर्थानि सागरे। सागरे यानि तीर्थानि विप्रपादेषु तानि च ॥२६॥।
ब्राह्मण के सन्तुष्ट होने पर स्वयं नारायण सन्तुष्ट होते हैं और नारायण के सन्तुष्ट होने पर समस्त देवता सन्तुष्ट हो जाते हैं॥१५॥ गंगा से बढ़कर कोई तीर्थ नहीं है, कृष्ण से बढ़कर उत्तम देवता नहीं; शंकर से बढ़कर वैष्णव नहीं और पृथिव्ी से बढ़कार कोई सहनशील नहीं है॥१६॥ सत्य से बढ़कर कोई धर्म नहीं, पार्वती से बढ़कर कोई पतिव्रता नहीं, दैध से जड़कर कोई बलवान् नहीं और पुत्र से बढ़कर कोई प्रिय नहीं है॥१७।। रोग के समान शत्रु, गुरु से बढ़कर पूज्य, माता के रमान बन्धु, और पिता से बढ़कर दूसरा कोई मित्र नहीं है॥१८। व्रतों में एकादशी उत्तम है और उपवास से बढ़कर अन्य कोई ता नहीं है। सब धनों में रत्न और रत्नों में विद्यारत्न उत्तम है ॥१९॥ सभी वर्णों में ब्राह्मण उत्तम है। विप्र के समान कोई गुरु नहीं है। यह बात वेद-वेदांग के तत्त्व-ज्ञाता कमलोत्पन्न ब्रह्मा ने कही है॥२०॥ सूर्य की बातें सुनकर भारद्वाज सुतपा ने उन्हें नमस्कार किया और तप फल द्वारा उनके दोनों पुत्रों को नीरोग कर दिया।२१। पश्चात् सुतपा मुनि ने यह भी कहा कि तुम्हारे ये दोनों पुत्र यज्ञ-भाग के अधिकारी भी होंगे। उपरान्त सूर्य को नमस्कार करके तपस्या के क्षीण होने के भय से भयभीत हो श्रीहरि की सेवा में मन लगाकर गंगा-तट को प्रस्थान किया। तत्पश्चात् सूर्य दोनों सुपुन्र को साथ लिए अपने धाम को चले गये। ब्राह्मण के आशीर्वाद से वे दोनों उसी दिन से यज्ञ में पूज्य और उसके भाग के अधिकारी हो गये। विप्र! जो मनुष्य सूर्यरचित इस स्तोत्र का पाठ करता है, वह विप्रचरण के प्रसाद से सर्वत्र विजयी होता है।२२-२४।। प्रातः- काल उठकार जो 'ब्राह्मणेभ्योनमः' ऐसा पाठ करता है, वह समस्त तीर्थों में स्नान करने और समस्त यज्ञों में दीक्षा लेने का फल प्राप्त करता है।।२५।। पृथिवी-मण्डल में जितने तीर्थ हैं, वे सागर में भी हैं और सागर में जितने तीर्थ हैं, वे ब्राह्मण के चरणों में भी वर्तमान रहते हैं। इसलिए जो ब्राह्मण का चरणोदक पान करता है, उसके
१ ख. ०सर्वाश्रमैः प०। २ क. ०जाज्ञया०। ए।
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ब्रह्मवैवर्तपुराणम् ६७
विप्रपादोदकं पीत्वा यावत्तिष्ठति मेदिनी। तावत्पुष्करपात्रेषु पिबन्ति पितरो जलम् ।२७॥ विप्रपादोदकं पुण्यं भक्तियुक्तश्च यः पिबेत्। स स्नातः सर्वतीर्थेषु सर्वयज्ञेषु दीक्षितः।२८।। महारोगी यदि पिबेद्विप्रपादोदकं द्विज। मुच्यते सर्वरोगाच्च मासमेकं तु भक्तितः ।२९। अविद्यो वा सविद्यो वा संध्यापूतो हि यो द्विजः। स एव विष्णुसदृशो न हरौ विमुखो यदि॥३०॥ घ्नन्तं विप्रं शपन्तं वा न हन्यान्न च तं शपेत्। गोभ्यः शतनुणं पूज्यो हरिभक्तश्च स स्मृतः ॥३१॥ पादोदकं च नैवेद्यं भुङक्ते विप्रस्य यो द्विजः। नित्यं नैवेद्यभोजी च राजसूयफलं लभेत् ॥३२॥ एकादश्यां न भुङक्ते यो नित्यं कृष्णं समर्चयेत्। तस्य पादोदकं प्राप्य स्थलं तीर्थ भवेद् ध्रुवम्।।३३॥ यो भुङक्ते भोजनोच्छिष्टं नित्यं नैवेद्यभोजनम्। कृष्णदेवस्य पूतोऽसौ जीवन्मुवतो महीतले॥३४॥ अन्नं विष्ठा पयो मूत्रं यद्विष्णोरनिवेदितम्। द्विजानां कुलजातानामित्याह कमलो.द्धव:॥३५॥ ब्रह्मा च ब्रह्मपुत्राश्च सर्व विष्णुपरायणाः। ब्राह्मणस्तत्कुले जातो विमुखश्च हरौ कथम् ॥३६॥ पित्रोर्मातामहादीनां संसर्गस्य गुरोश्च वा। दोषेण विमृखाः कृष्णे दिप्रा जीवन्मृताश्च ते ॥३७॥ स किंगुरु: स किंतातः स किंपुत्रः स किसखा। स किराजा स किंबन्धुर्न दद्यादो हरौ मतिम् ।३८॥ अर्वैष्णवाद्द्विजाद्विप्र चण्डालो वैष्णवो वरः । सगणः श्वपचो सुवतो ब्राह्मणो नरकं द्रजेत् ॥३९॥ संध्याहीनोऽशुचि्नित्यं कृष्णे वा विमुखो द्विजः। स एव ब्राह्मणाभासो विषहीनो यथोरगः।४०।। पितर पृथिवी के स्थिति-काल तक पुष्करपात्रों (कमल के पत्तों?) में जल पीते हैं।२६-२७॥ जो भक्तिपूर्वक ब्राह्मण का पुण्य चरणोदक पान करता है उसे समस्त तीर्थों में स्नान और सभी यज्ञों की दीक्षा प्राप्त करने का फल मिलता है।।२८।। द्विज ! यदि महारोगी भी एक मास तक भक्तिपूर्वक ब्राह्मण का चरणोदक पान करे तो वह समस्त रोगों से मुक्त हो जाता है।२९॥ विद्वान् हो चाहे विद्याहीन, जो ब्राह्मण प्रतिदिन संध्यावंदन करके पवित्र होता है तथा भगवद्भक्ति करता है, वह विष्ण के समान है। मारते हुए या शाप देते हुए ब्राह्मण को न मारना चाहिए और न शाप ही देना चाहिए। हरिभक्त ब्राह्मण गौओं से भी सौ गुना अधिक पूज्य है॥३०-३१॥ द्विज ! ब्राह्मण का चरणोदक और नैवेद्य का नित्य भक्षण करने वाला पुरुष राजसूय नामक यज्ञ का फल प्राप्त करता है॥३२॥ जो एकादशी के दिन भोजन नहीं करता है और नित्य भगवान् कृष्ण की अर्चना करता है उसके चरणोदक को प्राप्त करने पर स्थल भी निश्चित रूप से तीर्थ बन जाता है॥३३।। जो नित्य भगवान् कृष्ण का उच्छिप्ट या नैवेद्य भोजन करता है वह पवित्रात्मा भूतल पर जीवन्मुक्त होकर रहता है॥।३४॥ कमलोद्भव ब्रह्मा ने यह भी बताया है कि कुलीन ब्राह्मणों का भी अन्न, जो भगवान् कृष्ण को अर्पित नहीं किया गया है, विष्ठा के समान है और उनको अनिवेदित दुग्ध मूत्र के समान है ॥३५।। ब्रह्मा और ब्रह्मा के पुत्र सभी विष्णु के भक्त हैं और उन्हीं के कुल में ब्राह्मण की उत्पत्ति हुई है तो वह भला भगवान् से विमुख कैसे हो सकता है?॥३६॥ माता-पिता अथवा मातामह आदि या गुरु के संसर्ग के दोष से भगवान् कृष्ण के विमुख रहने वाले ब्राह्मण जीवित होते हुए भी मृतक के समान हैं ॥३७॥ जो भगवान् श्रीकृष्ण के सम्मुख रहने की बुद्धि नहीं प्रदान करता है, वह गुरु, पिता, पुत्र, सखा, राजा या बन्धु आदि कोई मो हो, निन्दा का पात्र है।।३८।। विप्र! अवैष्णव ब्राह्मण से वैष्णव चाण्डाल उत्तम होता है। इसलिए वैष्णव चांडाल परिवार समेत मुक्त हो जाता है और अवैष्णव ब्राह्मण नरकगामी होता है। जो ब्राह्मण संध्या से हीन, नित्य अपवित्र और भगवान् कृष्ण से विमुख रहता है, वह विषहीन साँप की भाँति नाममात्र का ब्राह्मण है॥३९-४०॥
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६८ द्वादशोऽध्यायः
गुरुवक्त्राद्विष्णुमन्त्रो यस्य कर्णे प्रविश्यति। तं वैष्णवं महादूतं जीवन्मुक्तं वदेद्विधि:॥४१।। पुंसां मातामहादीनां शतैः सार्धं हरे: पदम्। प्रयाति वैष्णवः पुंसामात्मनः कुलकोटिभिः॥४२॥ ब्रह्मक्षत्रियविट्शूद्राश्चतत्त्री जातयो यथा। स्वतन्त्रा जातिरेका च 'विश्वस्मिन्वैष्णवाभिधा॥४३॥ ध्यायन्ति वैष्णवाः शश्बद्गोविन्दपवपकुजन्। ध्यायते तांश्च गोविन्दः शश्वत्तेषां च संनिधौ॥४४॥ सुदर्शनं संनियोज्य भवतानां रक्षणाय च। तथापि नहि निश्चिन्तोऽवतिष्ठेंदक्तसंतिधौ।।४५॥ इति श्रीव्रह्ममैवर्ते महापुराणे सौतिशौनकसंवादे ब्रह्मखण्डे विष्णुवैष्णव- ब्राह्मणप्रशंसा नामैकादशोऽध्यायः।११।
अथ द्वादशोऽध्याय: शैनक उवाच ऋषिवंशप्रसंगेन बभूयुविदिया कथाः। उपालग्भेन प्रस्तावारकौतुकेन श्रुता मया।१ ।। प्रजा वा ससृनुः के वा ऊर्ध्वरेताश्य करचन। पित्रा सह विरोधेन नारदः किं चकार सः॥२॥
गुरु के मुख से निकला हुआ विष्णु-मंत्र जिसके कान में प्रविष्ट होता है, उस वैष्णव को ब्रह्मा ने महापवित्र एवं जीव- न्मुक्त कहा है। वह वैष्णद मातामह (नाना) आदि की सैकड़ों पीढ़ियों और अपने कुल की करोड़ों पीढ़ियों को साथ लेकर भगवान् के लोक को जाता है।४१-४२।। यद्यपि ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र ये चार जातियाँ हैं किन्तु सम्पूर्ण विश्व में वैष्णव नाम की एक जाति स्वतन्त्र है।४३।। वैप्णन लोग निरन्तर भगवान् श्रीकृष्ण के चरण-कमल का ध्यान करते हैं और भगवान् श्रीकृष्ण उनके समीप रहकर निरन्तर उन लोगों का ध्यान करते हैं॥४४॥ भक्तों के रक्षार्थ सुदर्शनचक्र को नियुक्त करके भी भगवान् निश्चिन्त नहीं रहते; प्रत्युत भक्तों के समीप जाकर रहते हैं॥४५॥ श्री ब्रह्मनैवर्त महापुराण के ब्रह्मखण्ड में वैष्णव ब्राह्मणों की प्रशंसा नामक ग्यारहवाँ अध्याय समाप्त ।।११।।
अध्याय १२ नारद का वृत्तान्त शौनक बोले-ऋषियों के वंश-वर्णन के प्रसंग में बहुत-सी कथाएँ हुईं। उनको मैं उपालंभ के द्वारा, प्रस्ताव से तथा कौतुक से सुन चुका। (अब यह बताने की कृपा करें कि) ब्रह्मा के पुत्रों में किन लोगों ने सृष्टि करना आरम्भ किया और कौन उर्ध्वरेता (महर्षि) हुए? पिता (ब्रह्मा) से विरोध करके नारद ने क्या किया?
१ क. विश्वेषु।
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पितुः शापेन पुत्रस्य किं बभूव विरोधतः। पितुर्वा पुत्रशापेन सौते तत्कथ्यतां शुभम्॥३॥ सौतिरुवाच हंसो यतिश्चारणिश्च बोढ: पञ्चशिखस्तथा। अपान्तरतमाश्चैव सनकादाश्व शौनक।।४। एतैविनाऽन्ये बहवो ब्रह्मपुत्राश्च संततम्। सांसारिकाः प्रजावन्तो गुर्वाज्ञापरिपालकाः॥५॥ अपूज्यः पुत्रशापन स्वयं ब्रह्मा प्रजापतिः। तेनैव ब्रह्मणो मन्त्रं नोपासन्ते विपश्चितः॥६॥। नारदो गुरुशापेन गन्धर्वश्च बभूव सः। कथवानि सुविस्तीर्णे तद्बृत्तानतं निशानय।।७।। गन्वर्वराजः सर्वेषां गन्धर्वाणां वरो महान्। परमैश्वर्यसंयुवतः पुत्रहोनो हि कर्मणा॥८॥ गुर्वाज्ञया पुष्करे स परनेण सनाधिना। तपश्चकार शंभोश्व कृपणो दीनमानस:॥।९।। शिवस्य कवचं स्तोत्रं मन्त्रं च द्वादशाक्षरह् । ददौ गन्वर्वराजाय वतिष्ठरद कृपानिधि:॥०॥ जजाप परमं मन्त्रं दिव्यं वर्षशतं जुगे। घुप्करे स निराहारः पुत्रदुःखेन सापितः ॥११।। विरामे शतवर्षस्य ददर्श पुरतः शियम्। भालयन्तं दश दियो ज्वलन्तं ब्रह्मतेजसा॥१२॥ महत्तजः स्वरूपं च भगवन्तं सनातनन्। ईषद्धासं प्रसन्नास्यं भवतानुग्रहकारकम्॥१३॥ तपोरुपं तपोबीजं तपस्याफलदं फलम्। शरणागतभवताय दातारं सर्वसंपदाम्॥१४॥
विरोध वश पिता के शाप से पुत्र का क्या हुआ? और पुत्र के शाप से पिता का क्या हुआ? सूतपुत्र ! यह पवित्र वृत्तान्त बताइए।१-३।। सौति बोले-शौनक! हंस, यति, अरणि, वोढ, पञ्चशिख, अपान्तरतमा और सनकादि चारों पुत्रों के अतिरिक्त अन्य सभी ब्रह्मा के पुत्रों ने संसार-वृद्धि के लिए प्रजाओं की सृष्टि की। वे सदैव गुरु ब्रह्मा की आज्ञा का पालन करते रहे॥४-५॥ पुत्र (नारद) के शाप द्वारा स्वयं प्रजापति ब्रह्मा अपूज्य हुए। इसीलिए विद्वान् लोग ब्रह्मा के मंत्र की उपासना नहीं करते।६॥ नारद भी ब्रह्मा के शाप से गन्धर्व हुए। उनके विस्तृत वृत्तान्त को मैं कह रहा हूँ, सुनो ।।७।। उन दिनों जो गन्धर्वराज थे वे सब गन्धर्वों में श्रेष्ठ और महान् थे, उच्च कोटि के ऐश्वर्य से सम्पन्न थे, परन्तु किसी कर्म वश पुत्रहीन थे। कृपण एवं दीन चित्त वाले उस गन्धर्वराज ने गुरु की आज्ञा से पुष्कर तीर्थ में परम समाधिस्थ होकर (या एकाग्रतापूर्वक) भगचान् शंकर की आराधना करना आरम्भ किया।८-९॥ कृपानिधान वशिष्ठ ने शिव का कवच, स्तोत्र और द्वादशाक्षर मन्त्र गन्धर्वराज को प्रदान किया। मुने! पुत्र-दुःख से सन्तप्त गन्धर्वराज ने निराहार रहकर दिव्य सौ वर्षों तक पुष्कर में उस परम मन्त्र का जप किया॥१०-११॥ तब सौ वर्षों के अन्त में उन्होंने अपने सामने स्थित शिव का प्रत्यक्ष दर्शन किया जो दशों दिशाओं को प्रकाशित करते हुए अपने तेज से प्रदीप्त हो रहे हैं॥१२॥ उनके प्रसन्न गुख पर मन्द हास्य को छटा छा रही थी। भक्तों पर अनुग्रह करने वाले वे भगवान् तपोरूप हैं, तपस्या के बीज हैं, तपस्या के फल देने वाले हैं और स्त्रयं ही तपस्या के फल हैं। वे शरण में आये हुए भक्तों को समस्त सम्पत्ति प्रदान कर देते हैं॥१३-१४॥ उस समय वे त्रिशूल, पट्टिश, धारण किये
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७० द्वादशोऽध्याय:
त्रिशूलपट्टशधरं वृषभस्थं दिगम्बरम्। शुद्धस्फटिकसंकाशं त्रिनेत्रं चन्द्रशेखरम् ॥१५॥ तप्तस्वर्णप्रभाजुष्टजटाजालधरं वरम्। नीलकण्ठं च सर्वज्ञं नागयज्ञोपवीतकम् ॥१६।। संहर्तारं च सर्वेषां कालं मृत्युंजयं परम्। ग्रीष्ममध्याह्नमार्तण्डकोटिसंकाशमीश्वरम् ।१७॥ तत्त्वज्ञानप्रदं शान्तं मुक्तिदं हरिभक्तिदम्। दृष्टवा ननाम सहसा गन्धर्वो दण्डवद्द्ध वि ॥१८॥ वसिष्ठदतस्तोत्रेण तुष्टाव परमेश्वरम्। वरं वृणुष्वेति शिवस्तमुवाच कृपानिधिः॥ स ययाचे हरर्भकित पुत्रं परमवैष्णवम् ॥।१९॥ गन्धर्वस्य वचः श्रुत्वा चाहसीच्चन्द्रशेखरः। उवाच दीनं दीनेशो दीनबन्धुः सनातनः॥२०॥ महादेव उवाच कृतार्थस्त्वं वरादेकादन्यच्चवितचर्वणम्। गन्धर्वराज वृमुषे को वा तृप्तोऽतिमङ्गले॥२१॥ यस्य भक्तिर्हरौ वत्स सुडृढा सर्वनङ्गला। स समर्थः सर्वविश्वं पातुं कर्तु च लीलया।।२२॥ आत्मनः कुलकोटिं च शतं मातागहस्य च। पुरुषाणां समुद्ध त्य गोलोकं याति निश्चितम् ॥२३॥ त्रिविधानि च पापानि कोटिजन्साजितानि च। निहत्य पुण्यभोगं च हरिदास्यं लभेद् ध्रुवम् ॥२४॥ तावत्पत्नी सुतस्तावत्तावदैश्वर्यमीप्सितम्। सुखं दुःखं नृणां तावद्यावत्कृष्णे न मानसम् ।२५।। कृष्णे मनसि संजाते भक्तिखड्गो दुरत्ययः। नराणां कर्मवृक्षाणां मूलच्छेदं करोत्यहो॥२६॥
हुए, बैल पर विराजमान, नग्न, शुद्ध स्फटिक के समान निर्मलकान्ति, त्रिनेत्र, मस्तक पर चन्द्रमा तथा तपाये हुए सुवर्ण को प्रभा से भूषित जटा-जूट को धारण किये हुए थे। कंठ में नील चिह्न और कंधे पर नाग का यज्ञोपवीत शोभा दे रहा था। इस प्रकार सर्वज्ञ, सर्वसंहारक, कालरूप, मृत्युञ्जय, ग्रीष्मऋतु की दोपहरी के करोड़ों सूर्यों के समान तेज- स्वी, शान्तस्वरूप और तत्त्वज्ञान, मोक्ष तथा हरिभक्ति प्रदान करने वाले शिव को देखकर उस गन्धर्व ने सहसा दंड को भाँति पृथिवी पर पड़कर प्रणाम किया और वशिष्ठ के दिये हुए स्तोत्र द्वारा उन परमेश्वर की स्तुति की। अनन्तर कृपानिधान शिव ने उससे कहा-'वरदान मांगो।' उन्होंने भगवान् को भक्ति समेत परम वैष्णव पुत्र की याचना की॥१५-१९॥ दीनों के ईश, दीनबन्धु एवं सनातन भगवान् चन्द्रशेखर ने उस गन्धर्व की बात सुनकर हँसते हुए उस दीन से कहा॥२०॥ श्री महादेव बोल-गन्धर्वराज ! तुम तो एक ही वरदान से कृतार्थ हो गये, अतः दूसरा वरदान तुम्हारे लिए चबाये हुए को चबाना मात्र है। अथवा जो तुमने दूसरा वरदान माँगा, वह भी ठीक है। भला कल्याण से कौन तृप्त होता है? (अर्थात् जिसको जितना कल्याण मिलता है, वह उससे अधिकाधिक कल्याण चाहता है) ।२१॥ वत्स! जिसकी श्रीहरि में सर्वमांगलिक भक्ति अत्यन्त दृढ़ है वह समस्त विश्व की रक्षा एवं सर्जन खेल-खेल में ही करने में समर्थ है।२२॥ वह अपनी करोड़ पीढ़ियों और मातामह के सौ कुलों का उद्धार करके निश्चित रूप से गोलोक को जाता है॥२३। वह कोटि जन्मों के किये हुए त्रिविध (कायिक, वाचिक और मानसिक) पापों को नष्ट करके पुण्य भोग समेत भगवान् की सेवा का सौभाग्य पाता है॥२४॥ मनुष्यों को पत्नी, पुत्र और ऐश्वर्य की प्राप्ति तभी तक अभीष्ट होती है और तभी तक सुख-दुःख होते हैं जब तक उसका मन भगवान् कृष्ण में नहीं लगता है।२५।। क्योंकि भगवान् कृष्ण में मन लगाने पर भक्तिरूपी खङ्ग मनुष्यों के कर्म रूपी वृक्षों का मूलोच्छेद कर डालता
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ब्रह्मवैवर्तपुराणम् ७१
भवेद्येषां सुकृतिनां पुत्रा: परमवैष्णवाः। कुलकोटिं च तेषां त उद्धरत्त्येव लीलया।२७॥ चरितार्थः पुमानेकद्वारमिच्छुर्वरादहो। कि वरेण द्वितीयेन पुंसां तृप्तिर्न मङ्गले॥२८॥ धनं संचितमस्साकं वैष्णवानां सुदुर्लभम्। श्रीकृष्णे भक्तिदास्यं च न वयं दातुमुत्सुकाः ॥२९ । वरयान्यं वरं वत्स यत्ते मनसि वाञ्छितम्। इन्द्रत्वममरत्वं वा ब्रह्मत्वं लभ दुर्लभम्॥३०॥ सर्वसिद्धि महायोगं ज्ञानं मृत्युंजयादिकं। सुखेन सर्व दास्यामि हरिदाश्यं त्यज ध्रुवम्।३१॥ शंकरस्य वचः श्रुत्वा शुष्ककण्ठोष्ठतालुकः। उवाच दीनो दीनेशं दातारं सर्वसंपदाम्॥३२॥ गन्धव उवाच यत्पक्ष्मचालनेनैव ब्रह्मणः पतनं भवेत्। तद्ब्रह्मत्वं स्वप्नतुत्यं कृष्णभवतो न चेच्छति ॥३३॥ इन्द्रत्वममरत्वं वा सिद्धयोगादिकं शिव। ज्ञानं मृत्युंजयाद्यं वा नहि भक्तस्य वाञ्छितम्॥३४॥ सालोक्यसा्टिसामोप्यसायुज्यं श्रीहरेरपि। तत्र निर्वाणमोक्षं च नहि वाञ्छन्ति वैष्गवाः॥३५॥ शश्वत्तत्र दृढा भक्तिर्हरिदास्यं सुदुर्लभम्। स्वप्ने जागरणे भक्ता वाञ्छन्त्येवं वरं वरम् ॥३६॥ तद्दास्यं वैष्णवसुतं देहि कल्पतरो वरम्। त्वां प्राप्य लभते तुष्टं वरं सर्ववरोऽवरः॥३७॥
है; यह आश्चर्य की बात है। जिन पुण्यकर्मियों के अत्यन्त वैष्णव पुत्र उत्पन्न होते हैं, उनके वे पुत्र लीलापूर्वक कुल की बहुसंख्यक पीढ़ियों का उद्धार कर देते हैं।२६-२७॥ यद्यपि मनुष्य एक ही वरदान से कृतार्थ हो जाता है, फिर भी वह दूसरा वरदान चाहता है, यह आश्चर्य की बात है। दूसरे वरदान की क्या आवश्यकता है? लोगों को मंगल की प्राप्ति से तृप्ति नहीं होती है॥२८।। हमारे पास वैष्णवों के लिए परम दुर्लभ धन संचित है। भगवान् श्रीकृष्ण की भक्ति और दास्य हम लोग दूसरों को देने के लिए उत्सुक नहीं होते। कोई अन्य अभीष्ट वरदान माँगो। मैं इन्द्रत्व, अमरत्व और दुर्लभ ब्रह्मत्व भी दे सकता हूँ तथा समस्त सिद्धियाँ, महायोग एवं मृत्यु को जीतने आदि का ज्ञान भी सहर्ष प्रदान करने को तैयार हूँ; किन्तु श्रीहरि का दासत्व माँगना छोड़ दो।।२९-३१॥ शंकर की ऐसी बातें सुन कर उस दीन के कण्ठ, ओठ और तालु सब सूख गये। उसने समस्त सम्पत्तियों के प्रदाता एवं दीनानाथ से पुनः कहा। गन्धर्व बोले-जिसका ब्रह्मा की दृष्टि पड़ते ही पतन हो जाता है, वह ब्रह्मपद स्वप्न के समान मिथ्या एवं क्षणभंगुर है। उसे कोई कृष्ण-भक्त नहीं चाहता है।३२-३३। हे शिव ! इन्द्रत्व, अमरत्व, सिद्धि अथवा योगादिक और मृत्युञ्जयादिक ज्ञान भी भक्त को प्रिय नहीं होता है। यहाँ तक कि भगवान् के सालोक्य, सारूप्य, सामीप्य और सायुज्य नामक चार प्रकार के मोक्ष और निर्वाणमोक्ष को भी वैष्णवगण नहीं चाहते हैं। भगवान् की निरन्तर सुदृढ़ रहने वाली भक्ति और उनके अत्यन्त दुर्लभ दास्य को ही भक्तगण सोते-जागते समय चाहते हैं। अतः हमारे लिए यही वरदान उत्तम है। ॥३४-३६॥ हे कल्पवृक्ष! इसलिए मुझे हरिदास्य और विष्णुभक्त पुत्र प्रदान करने की कृपा करें क्योंकि आपको सन्तुष्ट पाकर जो कोई दूसरा वर माँगता है, वह बर्बर है। ॥३७॥ शम्भो ! यदि आप
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७२ द्वादशोऽध्याय:
न दास्यसीदं चेच्छंभो वरं दुष्कृतिनं च माम्। तृत्वा हि स्वशिरशछेदं प्रदास्यामि हुताशने ॥३८॥ गन्धर्ववचनं श्रुत्वा तमुवाच कृपानिधिः। भवतं दीनं च भक्तेशो भक्तानुग्रहकारकः ॥३९॥ शंकर उवाव हरिभवित हरेर्दास्यं पुत्रं परमवैष्णवम्। चिरायुषं च गुणिनं शश्वत्सुस्थिरयौवनम्॥४०॥ ज्ञानिनं सुन्दरवरं गुरुभकतं जितेन्द्रियम्। गन्धर्वराजप्रतरं वरेमं लभ मा शुचः।४१।। इत्युक्त्वा शंकरस्तस्माज्जगाम स्वालयं मुने। गन्धर्वराजः संतुष्ट आजगाय स्वमन्दिरम्॥४२।। प्रफुल्लमानसाः सर्वे मानवाः सिद्धकर्मणः । नारदस्तत्य भार्याा लेभे जन्म च भारते ॥४३॥ सुषाव पुत्रं सा वृद्धा पर्वते गन्धमादने। गुरुर्वसिष्ठो भगवालाम चक्रे यथोचितम्॥४४॥ वालकस्य व तत्रदर मङ्गलं मङगले दिने। उपशद्दोऽधिकार्थरच पूज्ये च बरहणः पुमान्॥ पूज्यानामधिको बालस्तेनोपबर्हणासिध: ।४५ ।
इति श्रीब्रह्मवैवर्ते महापुराणे सौतिशौनकसंवादे ब्रह्मखण्डे नारदजन्मकथनं नाम द्वादशोडध्याय: ॥१२॥
मुझ पापी को यह वरदान नहीं देंगे तो मैं अपना शिर काट कर अग्नि में होम दंगा॥३८। अनन्तर भक्तों के ईश और उन पर कृपा रखने वाले कृपानिधान भगवान् शंकर ने गन्धर्व की बातें सुनकर उससे कहा ॥३९॥ श्रीशंकर बोले-पपन् की भक्ति, भगवान् का दासण और पामवैष्णव पुव्र की प्राप्ति-इस श्रेष्ठ वर को उपलब् करो, खिल्नन होओ। तुम्हारा पुत्र वैष्णव होने के साथ ही दीघयु, सवनुणशाली, नित्य सुस्थिर यौवन से सम्पन्न, ज्ञानी, परम सुन्दर, गुरुभक्त तथा जितेन्द्रिय होगा।४०-४१।। मुने! इतना कहकर शंकर जी अपने धाम को चले गये और गन्धर्वराज भी सन्तुष्ट होकर अपने घर को लौटे॥४२॥ अपने कार्य में सफलता प्राप्त होने पर सभी मानवों के मानस-कमल खिल उठते हैं। उस गन्धर्वराज की पत्नी से नारद जी ने भारतवर्ष में जन्म ग्रहण किया।४३। गन्धमादन पर्वत पर गन्धर्वराज की वृद्धा पत्नी ने पुत्रत्न उत्वन्न किया और गुरुदेव भगवान् वशिष्ठ ने उस पुत्र का यथोचित नामकरण संस्कार किया।।४४। उपशब्द का अर्थ अधिक है और पुंलिंग बर्हण का अर्थ पूज्य है। यह बालक पूज्य पुरुषों में सबसे अधिक है। इसलिए इसका नाम 'उपबर्हण' होगा ऐसा वशिष्ठ जी ने कहा॥४५॥ श्री ब्रह्मवैवर्तमहापुराण के ब्रह्मखण्ड में नारवजन्मकथन नामक बारहवाँ अध्याय समाप्त ।१२।।
१ क. ०वा सर्वकामिनः। ना०। २ स. तस्यैव।
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ब्रह्मवैवर्तपुराणम् ७३
अथ त्रयोदशोऽध्यायः
सौतिरुवाच
पुत्रोत्सवे च रत्नानि धनानि विविधानि व। गन्धर्वराजः प्रददौ ब्राह्मणेभ्यो मुदाऽन्वितः॥।१।। उपबर्हणस्तु कालेन हरर्मन्त्रं सुदुर्लभम्। वसिष्ठेन तु संप्राप्य स चक्रे दुष्करं तगः ॥२॥ एकदा गण्डकीतीरे तं च संप्राप्तयौवनम्। गन्धर्वपत्न्यो ददृशुर्मूच्छामापुश्च तत्क्षणम्।३।। ताश्च तीव्रं तपः कृत्वा प्राणान्संत्यज्य योगतः। पञ्चाशत्ता बभ्वुश्च कन्याश्चित्ररथस्य च ।।४। उपबर्हणगन्धर्वे ताश्च तं वतरिरे पतिम्। मुदा माला ददुस्तस्म कामुक्यः पितुराज्ञया।५॥ गृहोत्वा ताश्च गन्धर्वो युवा सुस्थिरयौवनः । दिव्यं त्रिलक्षवर्ष च रेमे रहसि कामुकः ॥६॥ ततोऽपि सुचिरं राज्यं कृत्वा ताभि: सहानिशम् । जगाम ब्रह्मणः स्थानं हरिगाथां जगौ मुने ॥।७।। दृष्टवा स रम्भारम्भोरुं नर्तने कठिनं स्तनम्। बभूव स्खलनं तस्य गन्धर्वस्य महात्मनः।।८।। ब्रुतं तत्याज संगीतं मूच्छां प्राप सभातले। उच्चैः प्रजहसुर्देवा ब्रह्मा कोपाच्छशाप तम् ॥९॥ व्रज त्वं शूद्रयोनि च गान्धर्वीं तनुमुत्सृज। काले वैष्णवसंसर्गान्मत्पुत्रस्त्वं भविष्यसि॥१०॥
अध्याय १३ ब्रह्मा के शाप से उपबर्हण का शरीर-त्याग, मालावती का विलाप आदि
सौति बोले-गन्धर्वराज ने उस पुत्रोत्सव के उपलक्ष में अत्यन्त प्रसन्न होकर ब्राह्मणों को अनेक भाँति के रत्न, धन समर्पित किये॥१॥ समयानुसार बड़े होने पर उपबर्हण ने गुरु वशिष्ठ के द्वारा अत्यन्त दुर्लभ भगवान् का मन्त्र प्राप्त कर अति कठिन तप करना आरम्भ किया॥२॥ एक बार गण्डकी नदी के तीर पर युवावस्था प्राप्त उस गन्धर्व को गन्धर्व की पत्नियों ने देखा। देखते ही वे उसी क्षण मूर््छित हो गइ॥३॥ अनन्तर उन पचास स्त्रियों ने धोर तप करके योग मार्ग द्वारा अपने प्राणों को त्याग किया और चित्ररथ (गन्धर्व) की कन्या होकर पुनः जन्म ग्रहण किया।४।। उपरान्त उन कन्याओं ने उसी उपबर्हण नामक गन्धर्व को अपना पति बनाया। उन्होंने अपने पिता की आज्ञा से गन्धर्व को माला पहनाई॥५॥ वह कामुक गन्धर्व भी उन्हें अपनाकर एकान्त स्थान में निवास करते हुए दिव्य तीन लाख वर्षों तक चिरस्थायी यौवन का आनन्द लूटता रहा।।६।। मुने ! अनन्तर राज्य- सिहासन पर सुखासीन होकर उन ललनाओं के साथ राज्य का उपभोग करते हुए एक दिन ब्रह्मा के यहाँ जाकर भगवान् के यशोगान में सम्मिलित हुआ। नृत्य के समय नाचती हुई रम्भा के कदली-स्तम्भ के समान ऊरु और कठोर स्तन को देखते ही उस महात्मा गन्धर्व का वीर्यपात हो गया।७-८।। इससे उसका संगीत तो छूट ही गया, वह मूच्छित भी हो गया। देवता लोग ठहाका मारकर हँसने लगे। तब ब्रह्मा ने उसे शाप देते हुए कहा-'इस गन्धर्व- शरीर को त्याग कर तुम शूद्र योनि में जन्म ग्रहण करो। फिर समयानुसार वैष्णवों का संसर्ग प्राप्त कर तुम पुनः मेरे पुत्र के रूप में प्रतिष्ठित हो जाओगे ॥९-१०॥ पुत्र! बिना विपत्ति को सहन किये पुरुषों की महिमा प्रकट नहीं १०
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७४ त्रयोदशोऽध्यायः विना विपत्तर्महिमा पुंसां नैव भवेत्सुत। सुखं दुःखं च सर्वेषां क्रमेण प्रभवेदिति ॥११।। इत्येवमुक्त्वा स विधिरगच्छत्पुष्कराद्गृहम्। उपबर्हणगन्धर्वः स जहौ तां तनुं तदा॥१२॥ मूलाधारं स्वाधिष्ठानं मणिपूरमनाहतम्। विशुद्धमाज्ञास्यं चेति भित्त्वा षट्चक्रमेव च।१३।। इडां सुषुम्नां मेधां च पिङ्गलां 'प्राणधारिणीम्। सर्वज्ञानप्रदां चैव मनःसंयमिनीं तथा॥१४॥ विशुद्धां च निरुद्धां च वायुसंचारिणों तथा। तेजः शुष्ककरीं चैव बलपुष्टिकरों तथा॥१५॥ बुद्धिसंचारिणीं चैव ज्ञानजुम्भणकारिणीम्। सर्वप्राणहरा चैव पुनर्जीवनकारिणीम्॥१६॥ एताः षोडशधा नाडीभित्त्वा वै हंसमेव च। मनसा सहितं ब्रह्मरन्ध्रमानीय योगतः॥१७॥ स्थित्वा मुहर्तमात्मानमात्मन्येव युयोज ह। जातिस्मरश्च योगीन्द्रः संप्राप ब्रह्म शौनक।१८॥ वीणां त्रितन्त्रीं दुष्प्राप्यां वाभस्कन्धे निधाय च। शुद्धस्फटिकमालां च विधृत्वा दक्षिणे करे॥१॥ संजल्पन्परमं ब्रह्म वेदसारं परात्परम्। परं निस्तारबीजं च कृष्ण इत्यक्षरद्वयम्॥२०॥ प्राच्यां कृत्वा शिरःस्थानं पश्चिमे चरणद्वयम्। विधाय दर्भशयनं शयानः पुरुषो यथा।२१॥ गन्धर्वराजस्तं दृष्टवा भार्यया सह तत्क्षणम्। योगेन ब्रह्म संप्राप श्रीकृष्णं मनसा स्मरन् ॥२२॥ पत्न्यश्च बान्धवाः सर्वे विलप्य रुरुदुर्भृ शम। जग्मुः क्रमेण शोकार्ता मोहिता विष्णुमायया।२३। पञ्चाशद्योषितां मध्ये प्रधाना महिषी च या। साध्वी मालावती नाम्ना परमा प्रेयसी वरा ॥२४॥
होती। संसार में सभी को क्रमशः सुख और दुःख प्राप्त होते हैं॥११। इतना कहकर ब्रह्मा पुष्कर स्थान से अपने धाम को चले गये और उपबर्हण नामक गन्धर्व ने उसी समय अपने शरीर को त्याग दिया॥१२॥ उन्होंने सर्वप्रथम मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपूर, अनाहत, विशुद्ध और आज्ञा नामक षट्चक्र् का भेदन करके इडा, सुषुम्ना, मेधा, पिंगला, प्राणहारिणीं, सर्वज्ञानप्रदा, मनःसंयमिनी, विशुद्धा, निरुद्धा, वायु-संचारिणी, तेज को सुखाने वाली, बल-पुष्टि करने वाली, बुद्धि-संचारिणी, ज्ञान को विकसित करने वाली, सर्वप्राणहरा और पुनर्जीवन करने वाली इन सोलह प्रकार की नाड़ियों का भेदन किया। अनन्तर मन समेत प्राणवायु को योग द्वारा ब्रह्मरन्ध्र में लाकर वे योगासन से बैठ गए और दो घड़ी तक उन्होंने मन को आत्मा में ही लगाया। तत्पश्चात् वह जातिस्मर (पूर्वजन्म की बात को याद रखने वाले) योगिराज उपबर्हण ब्रह्मभाव को प्राप्त हो गए।१३-१८। शौनक! तीन तार वाली दुर्लभ वीणा को बायें कंधे पर रख कर दाहिने हाथ में शुद्ध स्फटिक की माला लिये वे वेद के सारतत्त्व तथा उद्धार के उत्तम बीज रूप परात्पर परब्रह्ममय 'कृष्ण' इन दो अक्षरों का जप करने लगे। उन्होंने कुश की चटाई पर पूर्व की ओर सिरहाना करके पश्चिम दिशा की ओर दोनों चरण फैला दिये और इस तरह सो गए, मानो कोई पुरुष सो रहा हो। उनके पिता गन्धर्वराज ने उन्हें इस प्रकार देहत्याग करते देख कर स्वयं भी अपनी पत्नी के साथ मन ही मन श्रीकृष्ण का स्मरण करते हुए योगधारण द्वारा प्राण त्याग दिये और परब्रह्म परमात्मा को प्राप्त कर लिया। उस समय उपबर्हण के सभी भाई बन्धु और पत्नियाँ बार बार विलाप करते हुए जोर-जोर से रोने लगे। विष्णु की माया से मोहित होने के कारण शोक से पीड़ित हो वे उनके शरीर के पास गए। उपबर्हण की पचास स्त्रियों में मालावती नामक प्रधान रानी,
१ ख. ०णहारि०।
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उच्चे रुरोद सा तीव्रं कान्तं कृत्वा च वक्षसि। इत्युवाच च शोकार्ता कान्तं संबोध्य चैव हि।२५॥ मालावत्युवाच हे नाथ रमण श्रेष्ठ विदग्ध रसिकेश्वर। दर्शनं देहि मां बन्धो निमग्नां शोकसागरे॥२६॥ विस्त्रम्भके सुवसने रम्ये चन्दनकानने। पुष्पभद्रानदीतीर पुष्पोद्याने मनोहरे ॥२७॥ चन्दनाचलसांनिध्ये चारुचन्दनकानने। पुष्पचन्दनतल्पे च चन्दनानिलवासिते॥२८॥ गन्धमादनशैलैकदेशे रम्ये नदीतटे। पुंस्कोकिलनिनादे च मालतीजलशालिनि ॥२९॥ श्रीशले श्रीवने दिव्ये श्रीनिवासनिषेविते। श्रीयुक्ते श्रीपदाम्भोजे पूतेऽच्युतकृते शुभे॥३०॥ पुरा या या कृता क्रडा वसन्ते रहसि त्वया। मया च दुरहृदा सार्धं तया वै दूयते मनः॥३१॥ सुधातुल्येन वचसा सिक्ताऽहं च पुरा त्वया। दूयते सततं तेन परमात्माऽतिदारुणः ॥३२॥ साधुना सह संसर्गो वैकुण्ठादपि दुर्लभः। अहो ततोऽतिविच्छेदो मरणादपि दुष्करः॥३३॥ तस्मात्तेषां च विच्छेद: साधुशोककरः परः। ततोऽपि बन्धुविच्छेदः शोकः परमदारुणः॥३४॥ ततोऽपत्यवियोगो हि मरणादतिरिच्यते। सर्वस्मात्पतिभेदो हि तत्परं नास्ति संकटम्॥३५॥ शयने भोजने स्नाने स्वप्ने जागरणेऽपि च। स्वामिविच्छेददुःखं च नूतनं च दिने दिने॥३६॥ सर्वशोकं विस्मरेत्स्त्री स्वामिसंयोगमात्रतः। बन्धुमन्यं न पश्यमि यं दृष्टवा विस्मरेत्पतिम् ॥३७॥
जो पतिव्रता श्रेष्ठ एवं पति की परम प्रेयसी थी, अपने पतिको छाती से लगाकर अत्यन्त उच्च स्वर से रोदन करने लगी॥१ ९ -२५॥ मालावती ने कहा-नाथ! रमण! उत्तम! चतुर! रसिकेश्वर! बन्धो! मैं शोकसागर में डूब रही हूँ, मुझे दर्शन देने की कृपा करो॥२६॥ विश्वस्त गृह में, रमणीय चन्दनवन में, पुष्प भद्रानदी के तट पर मनोहर पुष्प- वारटिका में, मलयपर्वत के समीप सुन्दर चन्दनवन में चन्दन-वायु से सुवासित, पुष्पचन्दन की शय्या पर, गन्धमादनपर्वत के एकदेश में, रमणीय नदी-तट पर, नर कोकिलों से निनादित तथा मालतीपुष्पसम्पृक्त जल से युक्त श्रीपर्वत पर, लक्ष्मीरमण (विष्णु) से सेवित, श्रीयुक्त, श्रीचरणकमल से पूत तथा श्री विष्णु से पवित्र किये हुए दिव्य जीवन में पहले वसन्त ऋतु में एकान्त में मुझ दुष्टहृदया के साथ आपने जो-जो क्रीड़ायें कीं, उन (का स्मरण होने ) से मेरा मन परितप्त हो रहा है। पहले आप अपनी अमृतोपम वाणी से मुझे सिंचित करते थे, उस (के स्मरण) से भी मेरा अत्यन्त कठोर आत्मा परम दुःखी हो रहा है। साधु पुरुष का संग वैकुंठ-सुख से भी बढ़कर है। हाय, उस (साधु- संग) से वंचित होना मृत्यु से भी अधिक दुःखदायी है।२७-३३। इसलिये उन लोगों का नाश होना सज्जनों के लिए अत्यन्त दुःखप्रद है। उससे भी परम दारुण शोक बन्धुवियोग में होता है और सन्तान का वियोग तो मरण से मा बढ़कर होता है। किन्तु सभी दुःखों से पतिवियोग अत्यन्त दुःखदायी होता है। उससे अधिक संकट कोई है ही नहीं॥३४-३५॥ क्योंकि शयन, भोजन, स्नान और सोते-जागते सभी समय पति का वियोग-दुःख दिन-दिन नवीन होता जाता है।।३६।। स्त्री पति के संयोग मात्र से समस्त दुःखों को भुला देती है। किन्तु मुझे ऐसा अन्य कोई
१ क. ०स्रस्तके। २ क. ०म्ये नन्द०।
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नातो विशिष्टं पश्यामि बान्धवं स्वामिना विना। साध्वीनां कुलजातानामित्याह कमलोद्रवः ॥३८।। हे दिगीशाश्च दिक्पाला हे धर्म त्वं प्रजापते। गिरीश कमलाकान्त पतिदानं च देहि मे॥३९॥ इत्युक्त्वा विरहार्ता सा कन्या चित्ररथस्य च। मूच्छां संप्राप तत्रव दुर्गमे गहने वने॥४०॥ विचेतना तत्र तस्थो कान्तं कृत्वा स्ववक्षसि। परिपूर्णे दिवानक्तं सवैर्देवैश्च रक्षिता।।४१।। प्रभाते चेतनां प्राप्य विललाप भृशं मुहुः । इत्युवाच पुनस्तत्र हरि संबोध्य सा सती॥४२॥ मालवत्युवाच हे कृष्ण जगतां नाथ नाथ नाहं जगद्बहिः। त्वमेव जगता पाता मां न पासि कथं प्रभो॥४३॥ अयं भर्ताऽस्य भार्याऽहं ममेति तव मायया। त्वमेव संभवो भर्ता सर्वेषां सर्वकारणः॥४४।। गन्धर्वः कर्मणा कान्तः कान्ताऽहं चास्य कर्मणा। कव गतः कर्मभोगान्ते कुत्र संस्थाप्य मां प्रियाम्॥४५॥ को वा कस्या: पतिः पुत्रः का वा कस्य प्रिया प्रभो। संयुनक्ति विधाता च वियुनक्ति च कर्मणा ॥४६॥ संयोगे परमानन्दो वियोगे प्राणसंकटम्। शश्वज्जगति मूर्खस्य नाऽऽत्मारामस्य निश्चितम् ॥४७॥ नश्वरो विषयः सत्यं भुवि भोगश्च बान्धवः। स्वयं त्यक्तः सुखायव दुःखाय त्याजितः परः॥४८॥ तस्मात्सन्तः स्वयं त्यक्त्वा परमश्वर्यंमीप्सितम्। ध्यायन्ते सततं कृष्णपादपझ्मं निरापदम्॥४९॥
बन्धु नहीं दिखायी पड़ता है, जिसे देखकर पति को मुला सकूं॥३७॥ इस बात को स्वयं ब्रह्मा ने मी कहा है कि- कुलीन पतिव्रताओं के लिए पति के अतिरिक्त उससे उत्तम अन्य कोई बन्धु नहीं है।।३८।। हे दिशाओं के अधीश्वर, दिकपाल! हे धर्म ! हे प्रजापते, हे शिव, हे लक्ष्मीरमण! मुझे पतिदान देने की कृपा करो॥३९॥ उस दुर्गम एवं घोर वन में चित्ररथ की वह कन्या इतना कह कर मु्च्छित हो गयी॥४०॥ परति को अपनी छाती से लगाये वह पूरे एक दिन और एक रात चेतनाहीन रही। उस समय सकल देवों ने उसकी रक्षा की॥४१॥ प्रातःकाल चेतना मिलने पर वह बार-बार अत्यन्त विलाप करने लगी। वहाँ उस भती ने भगनान् को सम्बोधित करके (अपने विलाप में) इस प्रकार कहा॥४२॥ मालावती बोलो-हे कृष्ण! आप सम्पूर्ण जगत् के नाथ हैं। हे नाथ ! मै भा जगत् से बाहर नहीं हूँ। प्रभो! आप जगत् की रक्षा करते हैं, तो मेरी रक्षा क्यों नहीं कर रहे हैं?॥४३॥ यह मेरा पति है और मैं इसकी पत्नी हूँ, यह 'मेरा-तेरा' का भाव आपकी माया है। आप ही सबके स्वामी है और ऐसा होना ही अधिक संभव है; क्योंकि आप हो सबके कारण हैं।४४।। कर्मवश गन्धर्व मेरे पति हुए और कर्मवश हो मैं उनकी पत्नी हुई। किन्तु कर्मभोग के अन्त में वे मुझ प्रिया को छोड़कर कहाँ चले गये ? ॥४५॥ अथवा प्रभो ! कौन किसका पति या पुत्र है तथा कौन किसको पेयसी ? विधाता ही कर्म के अनुसार प्राणियों को संयुक्त और वियुक्त करता रहता है॥४६।। किन्तु सदा संसार में मूर्खों को हो संयोग में परमानन्द की प्राप्ति और वियोग में प्राणसंकट उपस्थित हो जाता है। आत्मा में रमण करने वाले महात्माओं को निश्चित हो यह दुःख प्राप्त नहीं होता है।४७।। यह सत्य है कि भूतल के सभी विषय, उनके भोग और बान्धव आदि नश्वर हैं। इनका स्वयं त्याग करना सुखकर होता है और दूसरे के द्वारा त्याग करवाने पर ये दुःखप्रद प्रतीत होते हैं॥४८॥ इसीलिए सन्त लोग अपने अभिलषित परम ऐश्वर्य का भी स्वयं त्याग करके भगवान् श्रीकृष्ण के निरापद चरणकमल का ही निरन्तर ध्यान करते रहते
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सर्वत्र ज्ञानिनः सन्तः का स्त्री ज्ञानवती भुवि। ततो महयं विमूढाय दातुमर्हसि वाञ्छितम्॥५०॥ न मे वाञ्छाऽमरत्वे च शऋत्वे मोक्षवर्त्मनि। इमं कान्तं वरं देहि चतुर्वर्गकरं परम्॥५१॥ यावती कामिनीजातिर्जगत्यां जगदीश्वर। कस्यंचिन्नहि दत्तरच तेन धात्रेदृशः पतिः॥५२॥ तस्मै दत्ता: गुणाः सर्वे रूपाणि विविधानि च। सुशीलानि च सर्वाणि चामरत्वं विना हरे॥५३॥ रूपेण च गुणेनैव तेजसा विक्रमेण च। ज्ञानेन शान्त्या संतुष्टया हरितुल्यः प्रभुर्मम॥५४॥ हरिभक्तो हरिसमो गाम्भीयें सागरो यथा। दीप्तिमान्सूर्यतुल्यश्च शुद्धो वह्निसमस्तथा॥५५॥ चन्द्रतुल्यः सुदृश्यश्चुकन्दपसमसुन्दरः। बुद्धया बृहस्पतिसमः काव्ये कविसमस्तथा ॥५६॥ वाणी च सर्वशास्त्रज्ञा प्रतिभायां भूगोरिव। कुबेरतुल्यो धनवान्महान्दाता मनोरिव ॥५७॥ धर्मे धर्मसमो धर्मो सत्ये सत्यव्रताधिकः। कुमारतुल्यतपसा स्वाचारे ब्रह्मणा समः॥५८॥ ऐश्वरये शकरतुल्यश्च सहिष्णुः पृथिवीसमः । एवंभूतो मृतः कान्तः प्राणा यान्ति न मे कथम् ॥५९॥ अहो' सुरा यज्ञभाजो घृतं भोक्तुं क्षमा भुवि। क्षणेनायज्ञभाजशच करिष्यामि स्वलीलया।६०।। नारायण जगत्कान्त नाहमेव जगद्बहिः। शीघ्रं जीवय मत्कान्तमन्यथा त्वां शपाम्यहम्।६१।।
हैं।४९। पृथ्वी पर ज्ञानी महात्मा सब जगह हैं, किन्तु ज्ञानवती स्त्री कौन है? अतः आप मुझ मूढ़ अबला को मेरी अभिलषित वस्तु प्रदान करने की कृपा करें॥५०॥ मुझे अमरत्व, इन्द्रत्व अथवा मोक्ष की इच्छा नहीं है। अतः चारों वर्ग (धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष) के परम साधक मेरे इस पति को मुझे दे दें॥५१॥ हे जगदीश्वर! इस जगत् में जितनी स्त्री जातियाँ हैं, उनमें से किसी को भी ब्रह्मा ने ऐसा पति नहीं दिया है॥५२। हरे ! ब्रह्मा ने केवल अमरत्व को छोड़ कर सभी गुण, विविध भाँति के समस्त रूप तथा सब प्रकार के सुन्दर स्वभाव उन्हें (मेरे पति को) प्रदान किए हैं॥५३॥ मेरे स्वामी रूप, गुण, तेज, पराक्रम, ज्ञान, शान्ति और सन्तुष्टि में भगवान् के समान हैं॥५४॥। वे (मेरे पति), हरि के भक्तों में हर के समान तथा गम्भीरता में सागर के समान हैं। वे सूर्य के समान देदीप्यमान, अग्नि के समान शुद्ध, चन्द्रमा के समान अत्यन्त दर्शनीय, काम की भाँति सुन्दर, बुद्धि में बृहस्पति के समान और काव्य में कवि (शुकाचार्य) के तुल्य हैं॥५५-५६॥ उनकी वाणी सकल शास्त्रों को जानने वाली है। वे प्रतिभा में भृगु के समान तथा धन में कुबेर के तुल्य हैं। वे मनु की भाँति महान् दाता हैं। वे धर्म में धर्म के समान धर्मी, सत्य में सत्यव्रत से भी अधिक, (सनकादि) कुमारों के समान तपस्वी, ब्रह्मा के समान आचारी, इन्द्र के तुल्य ऐश्वर्यशाली और पृथ्वी के समान सहिष्णु (सहनशील) हैं। ऐसे मेरे पति जब मृत हो गए तब ये मेरे प्राण क्यों नहीं निकल कर जा रहे हैं? ॥५७-५९।। अरे देवताओ ! तुम लोग पृथ्वी पर यज्ञ में भाग ले कर घृत के पान करने में ही समर्थ हो। (देखो) मैं तुम्हें अभी क्षण मात्र में अपनी लीला द्वारा यज्ञ भाग से अलग कर देती हूँ॥६०॥ हे नारायण ! आप समस्त जगत् के नाथ हैं। मैं भी जगत् के बाहर नहीं हूँ। अतः मेरे कान्त को शीघ्र जीवित कीजिए; श्रहीं तो आपको शाप दे रही हूँ॥६१।। प्रजापते ! पुत्र के शाप से तुम इस भूतल पर अपूज्य हो गए हो। अब
१ ख. अरे सु०।
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७८ त्रयोदशोऽध्यायः प्रजापते पुत्रशापात्त्वमपूज्यो महीतले। तवैवानधिकारित्वं करिष्याम्यधुना भवे॥६२॥ हे शंभो ज्ञानलोपं ते करिष्यामि शपेन च। धर्मलोपं च धर्मस्य करिष्याम्येव लीलया॥६३। यमाधिकारं दूरे च करिष्यामि न संशयः। सत्यं कालं शपिष्यामि मृत्युकन्यां सुनिष्ठुराम्॥६४॥ शपामि सर्वानत्रैव जरां व्याधि विनाऽधुना। व्याधिना जरया मृत्युर्न हृयभूच्च तेर्मम॥६५॥ इत्युक्त्वा कौशिकीतीरे चागच्छच्छप्तुमेव तान्। मालावती महासाध्वी शवं कृत्वा स्ववक्षसि ॥६६।। तां शप्तुमुद्यतां दृष्ट्वा ब्रह्मा देवपुरोगमः। जगाम शरणं विष्णुं तीरं क्षीरपयोनिधेः६७॥ तत्र स्नात्वा च तुष्टाव परमात्मानमीश्वरम्। विष्णुं ब्रह्मा जगत्कान्तमित्युवाच ह भीतवत् ।६८।। ब्रह्मोवाच उपबर्हणपत्नी सा कन्या चित्ररथस्य च। कान्तहेतोश्च मां देवाञ्छपेत्वं रक्ष माधव ॥६९॥। स्मरन्ति साधवः सन्तो जपन्ति मुनयो मुदा। स्वप्ने जागरणे चैव सर्वकार्येषु माधवम् ॥७०॥ शरणागतदीनार्तपरित्राणपरायण। रक्ष रक्ष हृषीकेश व्रजामः श्रणं वयम्॥७१॥ पूजा मे पुत्रशापेन विहता सांप्रतं प्रभो। अधिकारहतं मां च कुरुते मालती सती॥७२॥ सर्वाधिकारो ब्रह्माण्डे त्वया दत्तः पुरा प्रभो। संपदेतादृशी नाथ यास्यत्येवाधुना मन ॥७३॥
मैं तुम्हें अधिकार से भी च्युत कर दूंगी।६२॥ शम्भो ! मैं शाप द्वारा तुम्हारे ज्ञान का लोप कर दूंगी और इसी भाँति धर्म के धर्म को मैं लीला द्वारा उड़ा दूंगी॥६३। यम को भी उनके अधिकार से पृथक् कर दूंगी, इसमें संशय नहीं। इसी भाँति मैं काल तथा अत्यन्त निष्ठुर मृत्यु-कन्या को भी शाप देने जा रही हूँ॥६४॥ बुढ़ापे और व्याधि से हमारे पति की मृत्यु नहीं हुई है। अतः इन दोनों को छोड़ कर अन्य सभी को मैं अभी शाप देने जा रही हूँ। ॥६५।। इतना कह कर महापतिव्रता मालावती पति के शव को गोद में लेकर उन लोगों को शाप देने के लिए कौशिकी नदी के तट पर चली गयी। उसे शाप देने के लिए उद्यत देख कर ब्रह्मा आदि सभी देवगण क्षीरसागर के तट पर भगवान् विष्णु की शरण में गए।६६-६७।। वहाँ स्नान करके ब्रह्मा भयभीत की भाँति उन जगत्पति विष्णु की, जो परमात्मा और ईश्वर कहे जाते हैं, स्तुति करने लगे॥६८॥ ब्रह्मा बोल-माधव ! उपबर्हण की पत्नी और चित्ररथ की कन्या मालावती अपने पति के कारण मुझे और देवों को शाप देने जा रही है, उससे हमारी रक्षा कीजिए।६९॥ सोते-जागते सभी कार्यों में साधु लोग भगवान् कृष्ण का स्मरण करते हैं और मुनि लोग उनका जप करते हैं ॥७०॥ शरण में आए हुए दीन-दुखियों की रक्षा करने में तत्पर ! हृषीकेश (इन्द्रियों के स्वामी) ! रक्षा कीजिए, रक्षा कीजिए। हम लोग आपकी शरण में आए हैं॥७१॥ प्रभो! पुत्र के शाप द्वारा हमारी पूजा तो नष्ट ही हो गयी है, अब सती मालावती मुझे अधिकार से भी च्युत कर रही है।७२।। प्रभो! पूर्व समय में आपने सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में मुझे अधिकार प्रदान किया था। किन्तु नाथ ! इस समय हमारी इस भाँति की सम्पत्ति भी हमसे पृथक् हो जायगी।।७३।। १ क. देवाः ब्रह्मपुरोगमाः। प्रजष्मुः श०।
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ब्रह्मवैवर्तपुराणम् ७९
महादेव उवाच त्वया दत्तं महाज्ञानं गुप्तं सर्वेषु दुर्लभम्। शतमत्वन्तरतपःफलेन' पुष्करे पुरा।७४॥ ऐश्वर्ये वा धनं वाडपि विद्या वा विकमोऽथवा। ज्ञानस्य परमार्थस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम्॥७५॥ सर्वज्ञातं सर्वगुप्तमत्यन्तं दुर्लभं परम्। मम तत्त्वज्ञानरत्नं शापान्निर्याति योषितः॥७६। अहो पतिव्रतातेजः सर्वेषां तेजसां परम्। तेजोऽनलेन दग्धं मां रक्ष रक्ष हरे हरे॥७७॥ धर्म उवाच सर्वरत्नात्परं रत्नं धर्म एव सनातनः। यास्यत्येवंविधो धर्मस्त्वया दत्तः पुरा प्रभो॥७८॥ सप्तमन्वन्तरतपः फलेन परमेश्वर। प्राप्तो धर्मोऽधुना याति शापेन योषितः प्रभो॥७९॥ देवा ऊचु: यज्ञभाजो घृतभुजो वयनेव त्वया कुताः। योषिच्छापेन तत्सर्वमधुना याति माधव॥८०॥ इत्युक्त्वा संयता: सर्वे तस्थुस्तन्र भयार्दिताः। एतस्मिन्नन्तरेऽकस्माद्वाग्बभ्वाशरीरिणी॥८१॥ यूयं गच्छत तन्मूलं विप्ररूपी जनार्दनः। पश्चाद्यास्यति शान्त्यर्थमिति वो रक्षणाय च॥८२॥ श्रुत्वा तद्वचनं देवाः प्रहृष्टमनसोन्मुखाः। जग्मुर्मालावतीस्थानं कौशिकीतीरमीश्वराः॥८३॥
महादेव बोल-पूर्व समय में पुष्कर क्षेत्र में सौ मन्वन्तर-काल तक तप करने के फलस्वरूप आपने मुझे महाज्ञान प्रदान किया था, जो गुप्त एवं सब के लिए दुर्लभ है।७४। ऐश्वर्य, धन, विद्या तथा विक्रम उस परमार्थ ज्ञान की सोलहवीं कला के समान भी नहीं हैं।७५।। सब से अज्ञात, सब से गुप्त एवं अत्यन्त दुर्लभ और उत्कृष्ट वह मेरा तत्त्वज्ञानरत्न स्त्री के शाप द्वारा नष्ट हो रहा है।७६।। अहो! (आश्चर्य है) पतिव्रता का तेज सभी तेजों से श्रेष्ठ है। इसीलिए, हे हरे, उस तेज रूप अग्नि से मैं दग्ध हो रहा हूँ, मेरी रक्षा करें॥७७॥ धर्म बोले-प्रभो! आपने प्राचीन काल में मुझे धर्म प्रदान किया था, जो सभी रत्नों से अत्युत्तम और सनातन है। वह अब मुझसे पृथक् होकर जा रहा है ।७८।। परमेश्वर! सात मन्वन्तरों के समय तक तप करने के परिणामस्वरूप वह मुझे प्राप्त हुआ था। किन्तु प्रभो ! वह धर्म स्त्री के शाप द्वारा (मुझसे अलग होने) जा रहा है॥७९॥। देवों ने कहा-माधव ! हमें यज्ञों में भाग लेने और घृत भक्षण करने के लिए आपने नियुक्त किया था। स्त्री के शाप वश यह सब इस समय नष्ट होने जा रहा है।८०॥ भयभीत देवगण इतना कह कर संयम के साथ उसी स्थान पर खड़े रहे। उसी बीच अकस्मात् आकाशवाणी हुई कि तुम लोग उस (मालावती) के पास चलो। पीछे से उसको शान्त करने और तुम लोगों की रक्षा करने के लिए भगवान् जनार्दन ब्राह्मण-वेष में वहाँ पहुँच रहे हैं।।८१-८२। उस वाणी को सुन कर देवताओं का मन प्रसन्नता से खिल उठा और वे कौशिकी-तट पर पहुँच कर पतिव्रता मालावती के स्थान में गए।।८३॥ वह रत्नों के सारभूत इन्द्रनील आदि मणियों के आभूषणों
१ क. ०न प्रतिपादितम्०। ७४। ऐ।
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८० त्रयोदशोऽध्यायः
तामेव ददृशुर्देवा देवीं मालावतीं सतीम्। रत्नसारेन्द्रभूषाभिरुज्ज्वलां कमलाकलाम्।।८४।। वह निशुद्धांशुकाधानां सिन्दूरबिन्दुभूषिताम्। शरच्चन्द्रप्रभां शान्तां द्योतयन्तीं दिशस्त्विषा॥८५॥ पतिसेवामहाधर्मचिरसंचिततेजसा। प्रज्वलन्तीं सुप्रदीप्तशिखां वह नेरिवोत्तमाम् ।।८६।। योगालनं कुर्वतीं च शववक्षःस्थलस्थिताम्। सुरन्यां स्वामिनो वीणां बिभ्रती दक्षिणे करे॥८७॥ तर्जन्य ङ्ग ष्ठकोटिभ्यां शुद्धस्फटिकमालिकाम्। भक्त्या स्नेहेन कान्तस्य बिभ्रती योगमुद्रया।८८।। चारुचम्पकवर्णाभां बिम्बोष्ठीं रत्नमालिनीम्। यथा षोडशवर्षोयां शश्वत्सुस्थिरयौदनाम्।।८९।। बृहन्नितम्बभारारतां पोनश्रोणिपयोधराम्। पश्यन्तीं शदमीशस्य शुभदृष्ट्या पुनः पुनः॥९०॥ एवंभूतां च तां दृष्टवा देवास्ते विस्मयं ययुः। स्थगितां च क्षणं तत्र धार्मिका धर्मभीरवः ॥९१॥ इति श्रीब्रह्मवैवते महापुराणे सौतिशौनकसंवादे ब्रह्मखण्डे मालावतीविलापो नाम त्रयोदशोऽध्यायः।१३।।
से भूषित हो भगवती लक्ष्मी की कला-सी जान पड़ती थी।८४॥ उसके अंगों को अग्नि में तपा कर शुद्ध की हुई सुनहरी साड़ी सुशोभित कर रही थी। भाल देश में सिन्दूर की बेंदी शोभा दे रही थी। वह शरत्काल के चन्द्रमा की शान्त प्रभा-सी प्रकाशित होती और अपनी दीप्ति से सम्पूर्ण दिशाओं को उद्भासित करती थी। वह पतिसेवा रूप महान् धर्म का अनुष्ठान कर के चिरकाल से संचित किए हुए तेज से अग्नि की उत्तम एवं प्रज्वलितशिखा-सी उद्दीप्त हो रही थी। पति के शव को छाती से लगा कर योगासन लगाये बैठी थी और स्वामी की सुरम्य वीणा को दाहिने हाथ में लिये हुई थी। प्राणवल्लभ के प्रति भक्ति तथा स्नेह के कारण योगमुद्रापूर्वक तर्जनी और अंगुष्ठ अंगुलियों के अग्रभाग से शुद्ध स्फटिक मणि की माला धारण किए थी। मनोहर चम्पा की-सी अंगकान्ति, बिम्बफल के सदृश अरुण ओष्ठ, गले में रत्नों की माला शोभा पाती थी। वह सुन्दरी सोलह वर्ष की-सी अवस्था से युक्त तथा नित्य सुस्थिर यौवन से सम्पन्न थी। उसके नितम्ब विशाल थे और स्तन स्थूल थे। वह सती अपने स्वामी के शव को बारंबार शुभ दृष्टि से देख रही थी॥८५९०॥ इस रूप में मालावती को देख कर उन सब देवताओं को बड़ा विस्मय हुआ। वे सभी धर्मात्मा और धर्मभीरु थे। अतः क्षण भर वहाँ अपने को छिपाये खड़े रहे॥९१॥
श्रीब्रह्मवैवर्तमहापुराण के ब्रह्मखण्ड में मालावती-विलाप नामक तेरहवाँ अध्याय समाप्त ॥१३॥
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अथ चतुर्दशोऽध्यायः
सौतिरुवाच तत्र स्थित्वा क्षणं देवा ब्रह्मेशानपुरोगमाः। ययुर्मालावतीमूलं परं मङ्गलदायकाः॥१॥ मालावती सुरान्दृष्टवा प्रणनाम पतिव्रता। रुरोद कान्तं संस्थाप्य देवानां संनिधौ मुने॥२॥ एतस्मिन्नन्तरे तत्र कश्चिद्ब्राह्मणबालकः। आजगाम सुराणां च सभामतिमनोहरः॥३॥ दण्डी छत्री शुक्लवासा बिभ्रत्तिलकमुज्ज्वलम्। दीघपुस्तकहस्तश्च सुप्रशान्तश्च सुस्मितः ॥४।। चन्दनोक्षितसर्वाङ्ग: प्रज्वलन्ब्रह्मतेजसा। सुरान्संभाष्य तत्रैव विस्मितान्विष्णुमायया॥५॥ तत्रोवास सभामध्ये तारामध्ये यथा शशी। उवाच देवान्सर्वाश्च मालतीं च विचक्षण:।।६।।
ब्राह्मण उवाच कथमत्र सुराः सर्वे ब्रह्मेशानपुरोगमाः। स्वयं विधाता जगता स्त्रष्टा वै केन कर्मणा॥७॥ सर्व्रह्माण्डसंहर्ता शम्भुरत्र स्वयं विभुः। अहो त्रिजगतां साक्षी धर्मो वै सर्वकर्मणाम्।।८।। कथं रविः कथं चन्द्रः कथमत्र हुताशनः। कथं कालो मृत्युकन्या कथं वाऽत्र यमादयः।।९।। हे मालावति ते क्रोडे कोडतिशुषकः शवोऽनघे। जीविकायाः कथं मूले योषितश्च पुमाञ्छवैः॥१०॥
अध्याय १४ विप्रबालक के रूप में विष्णु का मालावती से साथ संवाद सौति बोले-ब्रह्मा और शिव को आगे किए परम मंगल प्रदान करने वाले देवगण क्षण मात्र वहाँ ठहर कर मालावती के निकट पहुँचे॥१॥ मुने! पतिव्रता मालावती ने देवों को देख कर उन्हें प्रणाम किया और देवों के समीप अपने पति को रख कर वह रोदन करने लगी।२। उसी बीच उस देव-सभा में एक अति मनोहर ब्राह्मण- बालक आ गया, जो दण्ड और छत्र लिए, शुक्ल वस्त्र पहने, उज्जवल तिलक लगाए एक बड़ी-सी पुस्तक हाथ में लिए अत्यन्त शान्त एवं मन्द मुसकान कर रहा था।३-४॥ उसके सम्पूर्ण अंग चन्दन से चर्चित थे। ब्रह्म-तेज से प्रज्वलित उस बालक ने बहाँ पहुँच कर देवों से बातचीत की जो भगवान् विष्णु की माया से ठगे-से दिखायी दे रहे थे। उस समामध्य में, ताराओं के बीच चन्द्रमा की भाँति विराजमान उस चतुर बालक ने सभी देवों और मालावती से कहा ॥५-६॥ ब्राह्मण बोल-यहाँ ब्रह्मा और शिव को आगे किए देवगण और जगत् के स्रष्टा स्वयं विधाता भी किस कार्य से उपस्थित हैं? ॥७।। समस्त ब्रह्माण्ड का संहार करने वाले साक्षात् शिव भी यहाँ उपस्थित हैं और आश्चर्य है कि तीनों लोकों में सभी कर्मों के साक्षी धर्म भी यहाँ उपस्थित हैं।८। सूर्य, चन्द्रमा, अग्नि, काल, मृत्युकन्या और यम आदि ये सभी लोग यहाँ क्यों आए हैं ? हे मालावती ! हे निष्पाप! तुम्हारी गोद में यह सूखा हुआ शव किसका दिखायी दे रहा है ? जीवित स्त्री के पास यह पुरुष-शव क्यों है? ॥९-१०॥ इस प्रकार वह ब्राह्मण सभा में देवों तथा ११
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८२ चतुर्दशोऽध्याय:
इत्युक्त्वा तांश्च तां विप्रो विरराम सभातले। मालावती तं प्रणम्य समुवाच विचक्षणम्॥११॥ मालावत्युवाच आनन्दपूर्वकं वन्दे विप्ररूपं जनार्दनम्। तुष्टा देवा हरिस्तुष्टो यस्य पुष्पजलेन च॥१२॥ अवधानं कुरु विभो शोकार्ताया निवेदने। समा कृपा सतां शश्वद्योग्यायोग्ये कृपावताम्॥१३॥ उपबर्हणभार्याऽहं कन्या चित्ररथस्य च। सर्वे मालावतीं कृत्वा वदन्ते विप्रपुंगव।।१४।। दिव्यं लक्षयुगं रम्ये स्थाने स्थाने मनोहरे। कृता स्वच्छन्दतः क्रीडा चानेन स्वामिना सह ॥१५॥ प्रिये स्नेहो हि साध्वीनां यावान्विप्रेन्द्र योषिताम्। सर्वं शास्त्रानुसारेण जानासि त्वं विचक्षण॥१६।। अकस्माद्ब्रह्मणः शापात्प्राणांस्तत्याज मत्पतिः। देवानुद्दिश्य विलपे यथा जीवति मत्पतिः ॥१७॥ स्वकार्यसाधने सर्वे व्यग्राश्च जगतीतले। भावाभावं न जानन्ति केवलं स्वार्थतत्पराः॥१८॥ सुखं दुःखं भयं शोक: संताप: कर्मणां नृणाम्। ऐश्वर्यं परमानन्दो जन्म मृत्युश्च मोक्षणम्॥१९॥ देवाश्च' सर्वजनका दातारः कर्मणां फलम्। कर्तारः कर्मवृक्षाणां मूलच्छेदं च लोलया॥२०॥ नहि देवात्परो बन्धुर्नहि देवात्परो बली। दयावान्नहि देवाच्च न च दाता ततः परः॥२१॥
मालावती से कह कर चुप हो गया। अनन्तर मालावती उस बुद्धिमान् ब्राह्मण को प्रणाम करके उससे बोली ॥ ११॥ मालावती बोली -- मैं विप्र रूपी जनार्दन को प्रसन्नता पूर्वक प्रणाम करती हूँ, जिनके दिए हुए पुष्प और जल से देवगण और विष्णु भी सन्तुष्ट होते हैं॥१२।। प्रभो ! आप सावधान होकर मुझ शोक-पीड़िता का निवेदन सुनने की कृपा करें; क्योंकि कृपाशील सज्जनों की कृपा योग्य और अयोग्य सब पर सदा समान रूप से प्रकट होती है॥१३॥ विप्रपुंगव ! मैं उपबर्हण की भार्या चित्ररथ की कन्या हूँ। मुझे सब मालावती कहते हैं॥१४॥ रमणीक और मनोहर प्रत्येक स्थान में मैंने अपने इस स्वामी के साथ लक्ष दिव्य वर्षों तक स्वतन्त्र विहार किया है। विप्रेन्द्र! विद्वान् ! साध्वी स्त्रियों का अपने प्रियतम के प्रति कितना स्नेह होता है। वह सब आपको शास्त्रानुसार विदित है।१५-१६।ब्रह्मा के आकस्मिक शाप द्वारा मेरे पतिदेव ने अपने प्राणों का त्यागकर दिया है। देवों के सम्मुख मैं इसलिए विलाप कर रही हूँ कि मेरे पति जीवित हो जायँ ॥१७॥ क्योंकि संसार में सभी लोग अपने कार्यों की सिद्धि में व्यग्र रहते हैं। वे लाभ-हानि को नहीं जानते। केवल अपने स्वार्थ में ही लीन रहते हैं॥१८। मनुष्यों के सुख, दुःख, भय, शोक, सन्ताप, ऐश्वर्य, परमानन्द, जन्म, मृत्यु, और मोक्ष कर्मों के फल हैं। देवता सबके जनक हैं। वे ही कर्मों का फल देते हैं। साथ ही वे लीलापूर्वक कर्मवृक्ष का मूलोच्छेदन करने में भी समर्थ हैं॥१९-२०॥ क्योंकि देवों से बढ़कर बन्धु, देवों से बढ़कर वलवान् तथा दयावान् और देवों से बढ़कर कोई दाता नहीं है। इसीलिए धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष के फल देने वाले कल्पवृक्ष रूप देवों से मैं याचना करती हूँ कि वे मुझे अभिलषित पति-दान
१ क. ०इच कर्मज० ।
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सर्वान्देवानहं याचे पतिदानं ममेप्सितम्। धर्मार्थकाममोक्षाणां फलदांश्च सुरद्रुमान्॥२२॥ यदि दास्यन्ति देवा मे कान्तदानं यथेप्सितम्। भद्रं तदाऽन्यथा तेभ्यो दास्यामि स्त्रीवधं ध्रुवम् ॥२३॥ जञपिष्यामि च सर्वांश्च दारुणं दुर्निवारकम्। दुर्निवार्यः सतोशापस्तपसा केन वार्यते॥२४॥ इत्युक्त्वा मालती साध्वी शोकार्ता सुरसंसदि। विरराम द्विजश्रेष्ठस्तामुवाच च शौनक ।।२५॥
कर्मणां फलदातारो देवाः सत्यं च मालति। न सद्यः सुचिरेणव धान्यं कृषकवन्नृणाम्॥२६॥ ब्राह्मण उवाच
मुही च कृषकद्वारा क्षेत्रे धान्यं वपेप्सति। तदङकुरो भवेत्काले काले वृक्षः फलत्यपि॥२७॥ काले सुपक्वं भवति काले प्राप्नोति तद्गृही। एवं सर्वं समुन्नेयं चिरेण कर्मणः फलम् ॥२८॥ अष्ठीं वपति संसारे गृहस्थो विष्णुमायया। काले तदङकुरो वृक्षः काले प्राप्नोति तत्फलम् ॥२९॥ पुण्यवान्पुण्यभूमौ च करोति सुचिरं तपः। तेषां च फलदातारो देवाः सत्यं न संशयः॥३०॥ ब्राह्मणानां मुखे क्षेत्रे श्रेष्ठेऽनूषर एव च। यो यज्जुहोति भक्त्या च स तत्प्राप्नोति निश्चितम्॥३१॥ न बलं न च सौन्दर्य नैश्वयं न धनं सुतः। नैव स्त्री न च सत्कान्तः किं भवेत्तपसा विना॥३२॥ सेवते प्रकृतिं यो हि भक्त्या जन्मनि जन्मनि। स लभेत्सुन्दरों कान्तां विनीतां च गुणान्विताम्॥३३॥ श्रियं च निश्चलां पुत्रं पौत्रं भूमिं धनं प्रजाम्। प्रकृतेश्च१ वरेणैव लभेद्द्गक्तोऽवलीलया॥३४॥ देने की कृपा करें॥२१-२२॥ देवगण! यदि आप लोग मुझे अभीष्ट पतिदान देंगे तब तो कुशल है; नहीं तो मैं निश्चित ही स्त्रीवध का पाप इन्हें दूंगी। और सभी देवों को कठोर एवं दुर्निवार शाप प्रदान करूँगी। सती का शाप दुनिवार होता ही है। किस तपस्या से उसका निवारण किया जाएगा? ।२३-२४॥ हे शौनक ! इतना कहकर शोक-सन्तप्त मालावती उस देवसभा में चुप हो गई। तत्पश्चात् उस द्विज-श्रेष्ठ ने उससे कहा ॥२५॥ ब्राह्मण बोल-हे मालावति! यह सत्य है कि देवलोग मनुष्यों को उनके कर्मों के फल प्रदान करते हैं, किन्तु तत्काल नहीं। ठीक वैसे ही, जैसे किसान बोये हुए अनाज का फल तुरन्त नहीं, देर से पाता है॥२६। गृहस्थ हलवाहे केद्वारा खेतों में बीज बोता है। उसका अंकुर समय पर प्रकट होता है। फिर समय आने पर वह वृक्ष होता हे और फलता भी है॥२७॥ समय पाकर वह भलीभाँति पकता है तथा समय पर वह गृही उसे प्राप्त करता है। इसी प्रकार कर्म का फल भी देर में प्राप्त होता है।।२८।। भगवान् विष्णु की माया से मोहित होकर गृही संसार में बीज बोता है, समय पर उसमें अंकुर निकलता है और समय प्राप्त होने पर वही वृक्ष होकर फलता है जो गृही को प्राप्त होता है।।२९।। पुण्यात्मा पुरुष पुण्यभूमि में अति चिरकाल तक जो तप करता है उसका फल देने वाले सचमुच देवता ही हैं, इसमें संशय नहीं है।३०॥ ब्राह्मणों के मुख में तथा उत्तम उर्वरा भूमि में मनुष्य भक्तिपूर्वक जो आहुति डालता है, उसका फल उसे निश्चित रूप से प्राप्त होता है।३१।। बिना तप किये बल, सौन्दर्यं, ऐश्वर्य, धन, पुत्र, स्त्री और मनोहर पति की प्राप्ति नहीं होती (अर्थात् तप के बिना कुछ भी नहीं होता)। जो जन्मजन्मान्तर तक भक्तिपूर्वक प्रकृति (दुर्गा देवी) की सेवा करते हैं, उन्हें गुणवती, विनीत और सुन्दरी स्त्री की प्राप्ति होती है॥३२- ३३।। प्रकृति के वरदान द्वारा भक्त पुरुष लीलापूर्वक निश्चल लक्ष्मी, पुत्र, पौत्र, भूमि, धन एवं प्रजा को प्राप्त
१ क. ०रच प्रियेणै०।
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८४ चतुर्दशोऽध्यायः
शिवं शिवस्वरूपं च शिवदं शिवकारणम्। ज्ञानानन्दं महात्मानं परं मृत्युंजयं वरम्॥३५॥ तमीशं सेवते यो हि भक्त्या जन्मनि जन्मनि। पुमान्प्राप्नोति सत्कान्तां कामिनी चापि सत्पतिम् ॥३६॥ विद्यां ज्ञानं सुकवितां पुत्रं पौत्रं परां श्रियम्'। बलं धनं विक्रमं च लभेद्धरवरेण सः॥३७॥ ब्रह्माणं भजते यो हि लभेत्सोऽपि प्रजां श्रियम्। विद्यामैश्वर्यमानन्दं वरेण ब्रह्मणो नरः॥३८॥ यो नरो भजते भक्त्या दीननाथं दिनेश्वरम्। विद्यामारोग्यमानन्दं धनं पुत्रं लभेद्ध्रुवम्।।३९॥ गणेश्वरं यो भजते देवदेवं सनातनम्। सर्वाग्रपूज्यं सर्वेशं भक्त्या जन्मनि जन्मनि॥४०॥ विघ्ननाशो भवेत्तस्य त्वप्ने जागरणेऽनिशम्। परमानन्दमैश्वर्यं पुत्रं पौत्रं धनं प्रजाः।४१।। ज्ञानं विद्यां सुकवितां लभते तद्वरेण च। भजते यो हि विष्णुं च लक्ष्मीकान्तं सुरेश्वरम्॥४२॥ वरार्थी चेल्लभेत्सवं निर्वाणमन्यथा ध्रुवम्। शान्तं निषेव्य पातारं सत्यं सत्यं लभेन्नरः॥४३॥ सवं तपः सर्वधम यशः कीरतिमनुत्तमाम्। विष्णुं निषेव्य सर्वेशं यो मूढो लभते वरम्॥४४॥ विडम्बितो विधात्राऽसौ मोहितो विष्णुमायया। माया नारायणीशाना सर्वप्रकृतिरीश्वरी॥४५॥ सा कृपां कुरुते यं च विष्णुमन्त्रं ददाति तम्। धर्म यो भजते धर्मो सर्वधम लभेद्ध्रुवम्॥४६॥
करता है॥३४॥ जो प्रत्येक जन्म में भक्तिपूर्वक कल्याणस्वरूप, कल्याणप्रद, कल्याण के कारण, ज्ञानानन्द की मूर्ति, श्रेष्ठ महात्मा और मृत्यु के विजेता शिव की सेवा करता है, वह पुरुष प्रत्येक जन्म में सुन्दरी स्त्री प्राप्त करता है, और शंकर की आराधना करने वाली स्त्री प्रत्येक जन्म में उत्तम पति पाती है। शिव के वर से मनुष्य को विद्या, ज्ञान, उत्तम कविता, पुत्र, पौत्र, उत्तम स्त्री, बल, धन एवं विक्रम की प्राप्ति होती है॥३५-३७॥ ब्रह्मा की सेवा करने वाले भी ब्रह्मा के वरदान द्वारा प्रजा (सन्तान) लक्ष्मी, विद्या, ऐश्वर्य और आनन्द की प्राप्ति करते हैं।।३८।। जो मनुष्य भक्तिपूर्वक दीनों के नाथ दिनेश्वर सूर्य की सेवा करता है, उसे भी विद्या, आरोग्य, आनन्द, धन और पुत्र की निश्चित प्राप्ति होती है।३९। प्रत्येक जन्म में जो भक्तिपूर्वक सबसे प्रथम पूजने योग्य, सर्वेश्वर, सनातन, देवाधिदेव गणेश्वर की पूजा करता है, उसके सोते-जागते सभी समय के विघ्नों का नाश होता है और परमानन्द, ऐश्वर्य, पुत्र, पौत्र, धन, प्रजा, ज्ञान, विद्या एवं सुन्दर कविता उसे उनके वरदान द्वारा प्राप्त होती है। जो देवों के अधीश्वर एवं लक्ष्मी के कान्त भगवान् विष्णु की सेवा करता है, वह यदि वरदान चाहता है तो उसे वह सम्पूर्ण वर प्राप्त हो जाता है; अन्यथा उसे निर्वाण की प्राप्ति तो निश्चित ही होती है। उस शान्त एवं रक्षक विष्णु की सेवा करके मनुष्य निश्चित रूप से समस्त तप, सम्पूर्ण धर्म, यश और परमोत्तम कीर्ति को प्राप्त कर लेता है। जो मूढ़ सर्वेश्वर भगवान् विष्ण का सेवन करके उसके बदले में कोई वर लेना चाहता है, उसे विधाता ने ठग लिया और विष्णु की माया ने मोह में डाल दिया (ऐसा समझना चाहिए)। नारायण की माया सब कुछ करने में समर्थ, सबकी कारणभूता और परमेश्वरी है। वह जिस पर कृपा करती है, उसे विष्णुमंत्र देती है। जो धर्मात्मा धर्म की सेवा करता है उसे निश्चित ही सब धर्मों की प्राप्ति होती है॥४०-४६॥ वह इस लोक में सुखानुभव करने के उपरान्त
१ क ०म्। वरं ध०।
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इह लोके सुखं भुक्त्वा याति विष्णोः परं पदम्। यो यं देनं भजेदक्त्या स चाऽडदौ लभते च तम् ।४७।। काले पश्चात्तेन सार्ध परं विष्णोः पदं लभेत्। श्रीकृष्णं भजते यो हि निर्गुणं प्रकृते: परम्॥४८॥ ब्रह्मविष्णुशिवादीनां सेव्यं बीजं परात्परम्। अक्षरं परमं ब्रह्म भगवन्तं सनातनम्॥४९॥ साकारं च निराकारं ज्योतिः स्वेच्छामयं विभुम्। सर्वाधारं च' सर्वेशं परमानन्दमीश्वरम्।५०॥ निलिप्तं साक्षिरूपं च भक्तानुग्रहविग्रहम्। जीवन्मुक्तः स सत्यं हि न वरं लभते सुधीः ॥५१॥ स सर्वं मन्यते तुच्छं सालोक्यादिचतुष्टयम्। ब्रह्मत्वममरत्वं वा मोक्षं यत्तुच्छवत्सति॥५२॥ ऐश्वयं लोष्टतुल्यं च नश्वरं चैव मन्यते। इन्द्रत्वं च मनुत्वं च चिरजीवित्वमेव वा॥५३। जलबुद्बुदवद्बुद्धया चातितुच्छं न गण्यते। स्वप्ने जागरणे वाऽपि शश्वत्सेवां च वाञ्छति॥५४॥ दास्यं विना न याचेत श्रीकृष्णस्य पदं परम्। तत्पादाब्जे दृढां भक्ति लब्ध्वा पूर्णो निरन्तरम् ।५५॥ परिपूर्णतमं ब्रह्म निषेव्यं सुस्थिरः सदा। आत्मनः कुलकोटिं च शतं मातामहस्य च ॥५६॥। श्वशुरस्य शतं पूर्वमुद्धृत्य चावलीलया। दासं दासी प्रसूं भार्या पुत्रादपि परं शतम् ।५७॥ उद्धरेत्कृष्णभक्तश्च गोलोकं यात निश्चितम्। तावद्गर्भे वसेत्कामी तावती यमयातना ।५८।।
भगवान् विष्णु का परम पद प्राप्त करता है। जो जिस देव की भक्ति-भावना से उपासना करता है, वह पहले उसी देव को पाता है और पश्चात् समय पाकर उस देवता के साथ वह भगवान् विष्णु के परम धाम में चला जाता हैं।। भगवान् श्रीकृष्ण प्रकृति से परे तथा तीनों गुणों से अतीत-निर्गुण हैं। ब्रह्मा, विष्णु एवं शिव आदि देवों के सेव्य, उनके आदि कारण, परात्पर, अविनाशी, परब्रह्म एवं सनातन भगवान् हैं। साकार, निराकार, ज्योतिःस्वरूप, स्वेच्छामय, व्यापक, सबके आधार, सबके अधीश्वर परमानन्दमय, ईश्वर, निलिप्त तथा साक्षीरूप हैं। वे भक्तों के ऊपर कृपा करने के लिए शरीर धारण करते हैं। जो उनकी आराधना करता है, वह सचमुच जीवन्मुक्त है। शह विद्वान् अन्य वरदान कभी नहीं चाहता है।४७-५१।। वह सालोक्य आदि चार प्रकार के मोक्ष को भी तुच्छ सम- झता है और ब्रह्मत्व, अमरत्व तथा मोक्ष भी उसे तुच्छ लगता है। वह ऐश्वर्य को मृत्तिका के समान नश्वर समझता हैFउसी प्रकार इन्द्रत्व, मनुत्व और चिरजीवित्व को भी जल के बुलबुले की भाँति क्षणभंगुर समझकर अत्यन्त सु्छ गिनने लगता है। वह सोते-जागते सभी समय निरन्तर (श्रीकृष्ण की) सेवा ही चाहता है॥५२-५४॥ दास्य तक्ति के बिना वह भगवान् श्रीकृष्ण का परमपद भी नहीं चाहता है। श्रीकृष्ण के चरणकमल की निरन्तर एवं दृढ़ मिक्ति प्राप्त कर वह पूर्णकाम हो जाता है। भगवान् का भक्त अत्यन्त स्थिर होकर सुसेव्य एवं परिपूर्णतम ब्रह्म की निरन्तर सेवा करता है। वह अपने कुल की करोड़ों, मातामह की सैकड़ों तथा शवशुर की सकड़ों पूर्व पीढ़ियों का लीलापूर्वक उद्धार करके दास, दासी, माता, स्त्री और पुत्र के बाद की सैकड़ों पीढ़ियों का उद्धार कर देता है और स्वयं निश्चय ही गोलोक में चला जाता है। कामासक्त पुरुष तभी तक गर्भ में निवास करता है, तभी तक यम-यातनाओं को भोगता है एवं गृही तभी तक भोगों को चाहता है, जब तक भगवान् श्रीकृष्ण की सेवा नहीं करता
१ क. च सर्वेषां परमात्मानमी०।
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८६ चतुर्दशोऽध्यायः
तावद्गृही' च भोगार्थी यावत्कृष्णं न सेवते। गुरुवक्त्राद्विष्णुमन्त्रो यस्य कर्णे प्रविश्यति ॥।५९। यमस्तल्लिखनं दूरं करोति तत्क्षणं भिया। मधुपर्कादिकं ब्रह्मा पुरैव तन्नियोजयेत्॥६०॥ अहो विलङध्य मल्लोकं मार्गेणानेन यास्यति। तस्य वै निष्कृतिर्नास्ति कल्पकोटिशतैरपि॥६१॥ दुरितानि च भीतानि कोटिजन्मकृतानि च। तं विहाय पलायन्ते वैनतेयं यथोरगाः ॥६२॥ पुरातनं कृतं कर्म यद्यत्तस्य शुभाशुभम्। छिनतति कृष्णशचक्र्रेण तीक्ष्णधारेण संततम् ॥६३॥ तं विहाय जरा मृत्युर्याति चक्र्भिया सति। अन्यथा शतखण्डं तां कुरुते च सुदर्शनः।६४।। निःशङ्को याति गोलोकं विहाय मानवीं तनुम्। गत्वा दिव्यां तनुं धृत्वा श्रीकृष्णं सेवते सदा ।६५॥। यावत्कृष्णो हि गोलोके तावन्द्गक्तो वसेत्सदा। निमेषं मन्यते दासो नश्वरं ब्रह्मणो वयः॥६६॥
इति श्रीब्रह्मवैवर्ते महापुराणे ब्रह्मखण्डे सौतिशौनकसंवादे विष्णुमालावतीसंवादो नाम चतुर्दशोऽध्यायः॥१४।।
है। गुरु के मुख से निकला हुआ विष्णुमन्त्र जिस (व्यक्ति) के कान में प्रविष्ट होता है, उसी क्षण यमराज, भयभीत होकर उसके कर्म-लेख को अपने यहाँ से हटा देते हैं और ब्रह्मा पहले से ही उसके स्वागत के लिए मधुपर्क आदि तैयार करके रखते हैं और सोचते हैं कि अहो! वह मेरे.लोक को भी लांघ कर इसी मार्ग से यात्रा करेगा और सौ कोटि कल्पों में भी उसका वहाँ से निष्काशन नहीं होगा॥५५-६१।। जैसे गरुड़ को देखकर साँप भाग जाते हैं, उसी तरह करोड़ों जन्मों के किए हुए पाप भी कृष्ण-भक्त को देखकर भाग जाते हैं॥६२।। उसके पहले के किये हुए सभी अच्छे बुरे कर्मों को भगवान् श्रीकृष्ण अपने तीक्ष्ण धार वाले चक्र् से काट देते हैं ॥६३॥ जरा (बुढ़ापा) और मृत्यु भी चक्र के भय से उसे छोड़कर भाग जाते हैं, अन्यथा सुदर्शन (चक्र) उसके सैकड़ों टुकड़े कर देता है। वह (भक्त) अपने मनुष्य-शरीर का त्यागकर निःशंक होकर गोलोक में पहुँचता है और वहाँ दिव्य शरीर धारण कर सदा भगवान् श्रीकृष्ण की सेवा करता है ॥६४-६५॥। श्रीकृष्ण जब तक गोलोक में निवास करते हैं तब तक भक्त पुरुष भी वहाँ नित्य निवास करता है। श्रीकृष्ण का दास ब्रह्मा की नश्वर आयु को एक निमेष भर का मानता है ।६६।।
श्रीब्रह्मवैवर्तमहापुराण के ब्रह्मखण्ड में विष्णु और मालावती के संवाद नामक चौदहवाँ अध्याय समाप्त ॥१४॥
१ क. द्गृहं च भोगोऽपि या०। २ क. पुनरेव नियो०।
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ब्रह्मवैवर्तपुराणम् ८७
अथ पञ्चदशोऽध्यायः
ब्राह्मण उवाच फेन रोगेण हि मृतोऽधुना साध्वि तव प्रियः। सर्वरोगचिकित्सां च जानामि च चिकित्सकः॥१॥ मृततुल्यं मृतं रोगात्सप्ताहाभ्यन्तरे सति। महाज्ञानेन तं जीवं जीवयाम्यवलीलया॥।२।। राजमृत्युं यमं कालं व्याधिमानीय त्वत्पुरः। निबध्य दातुं शक्तोऽहं व्याधो बध्वा पशुं यथा॥३॥ बतो न संचरेद्वयाधिर्देहेषु देहधारिणाम्। व्याधीनां कारणं यद्यत्सर्व जानामि सुन्दरि॥४। बतो न संचरेद्वयाधिबीजं दुष्टममङ्गलम्। तदुपायं विजानामि शास्त्रतत्त्वानुसारतः।।५।। मो वा योगेन खेदेन देहत्यागं करोति च। तस्य तं जीवनोपायं जानामि योगधर्मतः॥६॥। महणस्य वचः श्रुत्वा स्फीता मालावती सती। सस्मिता स्निग्धचित्ता सा तमुवाच प्रहषिता॥७॥ मालावत्युवाच अहो श्रुतं किमाश्चर्य वचनं बालवक्त्रतः । वयसाऽतिशिशुर्दूष्टो ज्ञानं योगविदां परम्।८।।
अध्याय १५
ब्राह्मण द्वारा अपनी शक्ति का परिचय ब्राह्मण बोल-पतिव्रते! यह तुम्हारा पति इस समय किस रोग से मृत्यु को प्राप्त हुआ है? मैं चिकित्सक हूँ, समी रोगों की चिकित्सा मैं जानता हूँ॥१॥ सती ! यदि कोई रोग से मृतक के समान हो गया हो अथवा मृतक ही हो गया हो, किन्तु यदि यह सात दिन के भीतर की ही घटना हो तो उस जीव को मैं चिकित्सा सम्बन्धी महाज्ञान के द्वारा चुटकी बजाते हुए ही जीवित कर सकता हूँ ॥२॥ मैं जरा, मृत्यु, यम, काल और व्याधियों को तुम्हारे सामने बीघकर उसी प्रकार तुम्हें सौंप सकता हूँ, जैसे व्याध पशु को बांधकर सामने ला देता है॥३॥ सुन्दरि! देहघारी प्राणियों के शरीर में जिससे कोई व्याधि उत्पन्न न हो सके, वह उपाय तथा रोगों के सभी कारणों को मैं भली- भाति जानता हूँ॥४॥ शास्त्र के तत्त्वज्ञान के अनुसार मैं उस उपाय को भी जानता हूँ जिससे व्याघियों का दुष्ट और अमंगलकारी बीज अंकुरित ही न हो।।५। जिसने योग द्वारा अथवा खेदवश अपने शरीर का त्याग किया है, उसके जीवित होने का उपाय भी योग-धर्म के प्रभाव से मैं जानता हूँ॥६। ब्राह्मण की बातें सुनकर मालावती को बड़ी प्रसन्नता हुई। मन्द मुसकान और स्नेहपूर्ण मन से उसने अत्यन्त हर्षित होकर उनसे कहा।७॥ मालावती बोली-अहो! बालक के मुख से मैं कैसी आश्चर्यजनक बात सुन रही हूँ !! अवस्था से तो यह अत्यन्त शिशु दिखायी दे रहा है, किन्तु इसका ज्ञान योगवेत्ताओं से भी बढ़कर है॥८। मगवन्! आपने
१ क. ०त्सकान्। २ क. तं लोकात्स०। ३ क या।।२। जरामृत्युं जराका०।
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८८ पञ्चदशोऽध्यायः त्वया कृता प्रतिज्ञा च कान्तं जीवयितुं मम। विपरीतं न सद्वाक्यं तत्क्षणं जीवितः पतिः॥।९॥ जीवयिष्यति मत्कान्तं पश्चाद्वदविदां वरः । यद्यत्पृच्छामि संदेहात्तःद्गवान्वक्तुमर्हति॥१०॥ सभायां जीविते कान्ते तस्य तीव्रस्य संनिधौ। त्दां हि प्रष्टुं न शक्ताऽहं विद्यमाने मदीश्वरे॥११॥ एते ब्रह्मादयो देवा विद्यमानाइच संसदि। त्वं च वेदविदां श्रेष्ठो न च कश्चिन्मदीश्वरः॥१२॥ नारीं रक्षति भर्ता चेन्न कोऽपि खण्डितुं क्षमः। शास्ति करोति यदि स न कोऽपि रक्षिता भुवि॥१३। एवं वेदेषु नो शक्तिः शक्रे वा ब्रह्मरुद्रयोः। स्त्रीपुंभावश्च' बोद्धव्यः स्वामी कर्ता चयोषिताम्॥१४॥ स्वामी कर्ता च हर्ता च शास्ता पोष्टा च रक्षिता। अभीष्टदेवः पूज्यश्च न गुरुः स्वामिनः परः ॥१५॥ कन्या सत्कुलजाता या सा कान्तवशर्वातनी। या स्वतन्त्रा च सा दुष्टा स्वभावात्कुटिला ध्रुवम्॥१६॥ दुष्टा परपुमांसं च सेवते या नराधमा। सा निन्दति पतिं शश्वदसद्वंशप्रसूतिका।१७॥ उपबर्हणभार्याऽहं कन्या चित्ररथस्य च। वधूर्गन्धर्वराजस्य कान्तभक्ता सदा द्विज॥१८॥ सर्व कालयितुं शक्तस्त्वं च वेदविदां वर। कालं यमं मृत्युकन्यां मदभ्याशं समानय॥१९॥ मालावतीवचः श्रुत्वा विप्रो वेदविदां वरः। सभामध्ये समाहूय तान्प्रत्यक्षं चकार ह॥२०॥
मेरे कान्त को जीवित करने के लिए जो प्रतिज्ञा की है, वह सद्वाक्य कभी बदल नहीं सकता। अतः उसी क्षण मुझे विश्वास हो गया कि मेरे पति जीवित हो गए।९॥ आप वेदज्ञों में श्रेष्ठ हैं। आप मेरे पति को जीवित तो कर ही देंगे, किन्तु सन्देहवश जो-जो बातें मैं अभी आपसे पूछ रही हूं, उन सबको बताने की कृपा करें॥१०॥ क्योंकि पति के जीवित हो जाने पर उनकी उपस्थिति में मैं आपसे कोई बात पूछ नहीं सकूंगी; क्योंकि वे तीक्ष्ण स्वभाव के हैं। यद्यपि इस सभा में ब्रह्मादि देवगण और वेदविदों में श्रेष्ठ आप भी विद्यमान हैं, पर कोई भी मेरा (स्वामी) नहीं है। पति यदि नारी की रक्षा करता है, तो कोई उसका खंडन नहीं कर सकता है। और यदि वह अनुशासन करता या दंड देता है तो भूतल पर उस (स्त्री) की कोई रक्षा भी नहीं कर सकता है॥११- १३।। इसी प्रकार वेदों इन्द्र, ब्रह्मा और रुद्र में भी (उसके रोकने की) शक्ति नहीं है। स्वामी और स्त्री में, पति- पत्नी-भाव-सम्बन्ध जानना चाहिए। स्वामी ही स्त्रियों का कर्ता, हर्त्ता, शास्ता, पोषक, रक्षक, इष्टदेव तथा पूज्य है। स्त्री के लिए पति से बढ़कर कोई गुरु नहीं है। ॥१४-१५॥ उत्तम कुल में उत्पन्न होने वाली कन्या सदैव अपने पति के अवीन रहती है और जो स्वतन्त्रा है, दह दुष्टा तथा स्वभाव से निश्चित ही कुटिल होती है ॥१६॥ जो दुष्टा परपुरुष में रत तथा अधम है, वही अपने पति की निन्दा किया करती है। वह अवश्य ही नीचकुल की कन्या होती है।।१७।। मैं उपबर्हण की पत्नी और चित्ररथ की कन्या हूँ और हे द्विज ! मैं सदा पतिभकता एवं गन्वर्वराज की वधू हूँ॥१८॥ हे वेदविदांवर! आप सबको यहाँ बुलाने में समर्थ हैं, अतः यम और मृत्यु-कन्या को मेरे समीप बुलाने की कृपा करें॥१९॥ वेदवेत्ताओं में श्रेष् उस विप्र ने मालावती की बात सुनकर सभा के भीतर ही उन सब को बुलाकर उसके सामने प्रत्यक्ष खड़ा कर दिया। सती मालावती ने सर्वप्रथम मृत्युकन्या को
१ क. ०इच यो ब्रह्मन्स्वा०।
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ब्रह्मवैवतंपुराणम् ८९ ददर्श मृत्युकन्यां च प्रथमं मालती सती। कृष्णवर्णां घोररूपां रक्ताम्बरधरां वराम् ॥२१॥ सस्मितां षड्भुजां शान्तां दयायुक्तां महासतीम्। कालस्य स्वामिनो वामे चतुःषष्टिसुतान्विताम्॥२२॥ कालं नारायणांशं च ददर्श पुरतः सती। महोग्ररूपं विकटं ग्रीष्मसूर्यसमप्रभम् ॥२३॥ षड्वक्त्रं षोडशभुजं चतुविशतिलोचनम्। षट्पादं कृष्णवर्ण च रक्ताम्बरधरं परम्॥२४॥ = वेवस्य देवं विकृतं सर्वसंहाररूपिणम्। कालाधिदेवं सर्वेशं भगवन्तं सनातनम् ॥२५॥ इंषद्धास्यप्रसन्नास्यमक्षमालाकरं वरम्। जपन्तं परमं ब्रह्म कृष्णमात्मानमीश्वरम्॥२६॥ सती ददर्श पुरतो व्याधिसंघान्सुदुर्जयान् । वयसातिमहावृद्धान्स्तनंधान्मातृसंनिधौ ।।२७।। स्थूलपादं कृष्णवर्ण धर्मिष्ठं रविनन्दनम्। जपन्तं परमं ब्रह्म भगवन्तं सनातनम्॥२८॥ धर्माधर्मविचारज्ञं परं धर्मस्वरूपिणम् । पापिनामपि शास्तारं ददर्श पुरतो यमम्॥२९॥ तांश्च दृष्ट्वा च निःशङ्का पप्रच्छ प्रथमं यमम् । मालावती महासाध्वी प्रहृष्टवदनेक्षणा॥३०॥ मालावत्युवाच हे धर्मराज धर्मिष्ठ धर्मशास्त्रविशारद । कालव्यतिक्रमे कान्तं कथं हरसि मे विभो॥३१॥ यम उवाच अप्राप्तकालो म्रियते न कश्चिज्जगतीतले। ईश्वराज्ञां बिना साध्वि नामृतं चालयाम्यहम् ॥३२।। देखा। उसका रंग काला था। वह देखने में भयानक थी। उसने लाल रंग के वस्त्र पहन रखे थे। वह मंद-मंद मुसकरा रही थी। उसके छह भुजायें थीं। वह शान्त, दयालु और महासती थी। वह अपने स्वामी काल के बाँयें भाग में चौंसठ पुत्रों को साथ लिये खड़ी थी॥२०-२२॥ तदनन्तर मालावती ने अपने सामने स्थित नारायण के अंगभूत काल को भी देखा। वह महान् उग्ररूप, विकट तथा ग्रीष्म ऋतु के सूर्य के समान चमक रहा था। उसके छह मुख, सोलह मुजाएँ, चौबीस नेत्र, और छह चरण थे। उसका रंग काला था और उसने लाल वस्त्र धारण कर रखे थे। वह देवताओं का भी देवता, विकराल आकृति वाला, सर्वसंहाररूपी, काल का अधिदेवता, सर्वेश्वर एवं सनातन भगवान् है। उसके मुख पर प्रसन्नता तथा मंद मुसकान दिखाई पड़ रही थी। वह हाथ में अक्षमाला धारण करके भगवान् कृष्ण का (नाम) जप रहा था।।२३-२६।। अनन्तर उस सती (मालावती) ने अपने सम्मुख अत्यन्त दुर्जेय व्याधि-समूहों को देखा, जो अवस्था में अत्यन्त महावृद्ध, किन्तु माता के समीप स्तनपान करने वाले बच्चे की भाँति दिख रहे थे। फिर मालावती ने सूर्यपुत्र यम को देखा, जो कृष्ण वर्ण तथा स्थूलपाद थे। वे धर्मनिष्ठ सूर्य- पुत्र परब्रह्म स्वरूप सनातन भगवान् श्रीकृष्ण का नाम-जप कर रहे थे। वे धर्माधर्म के विचार के ज्ञाता, श्रेष्ठ धर्म- स्वरूप तथा पापियों के शासक हैं। उन्हें देखकर महासती मालावती ने अपने मुख और नेत्रों से अत्यन्त हर्ष सूचित करती हुई निःशंक होकर सर्वप्रथम यम से पूछा॥२७-३०॥ मालावती बोली-धर्मशास्त्र-विशारद! धर्मनिष्ठ! धर्मराज ! प्रभो! आप समय का उल्लंघन करके मेरे प्रियतम को कैसे लिये जा रहे हैं? ।३१॥ यम बोल-पतिव्रते! इस भूतल पर बिना समय पूरा हुए तथा ईश्वर की आज्ञा मिले बिना कोई भी मरता नहीं है। और बिना मरे मैं किसी को ले नहीं जाता हूँ ॥३२॥ मैं, काल, मृत्यु-कन्या और समस्त दुर्जेय व्याधि- १२
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९० पञ्चदशोऽध्यायः
अहं कालो मृत्युकन्या व्याधयश्च सुदुर्जयाः। निषेकेण प्राप्तकालं कालयन्तीश्वराज्ञया॥३३॥ मृत्युकन्या विचारज्ञा यं प्राप्नोति निषेकतः । तमहं कालयाम्येव पृच्छतां केन हेतुना।।३४।। मालावत्युवाच त्वमपि स्त्री मृत्युकन्या जानासि स्वामिवेदनम् । कथं हरसि मत्कान्तं जीवितायां मयि प्रिये ।३५॥ मृत्युकन्योवाच पुरा विश्वसृजा सृष्टाऽप्यहमेवात्र कर्मणि। न च क्षमा परित्यक्तुं बहुना तपसा सति॥३६॥। सती सतीनां मध्ये च काचित्तेजस्विनी वरा। मामेव भस्मसात्कर्तु क्षमा यदि भवेन्दरवे ॥३७॥ सर्वापच्छान्तिरेवेह तदा भर्वत सुन्दरि। पुत्राणां स्वामिनः पश्चाद्द्विता यद्द्गविष्यति॥३८। कालेन प्रेरिताऽहं च मत्पुत्रा व्याधयश्च वै। न मत्सु तानां दोषश्च न च मे शृणु निश्चितम् ॥३९॥ पृच्छ कालं महात्मानं धर्मज्ञं धर्मसंसदि। तदा यदुचितं भद्रे तत्करिष्यसि निश्चितम्॥४०॥ मालावत्युवाच हे कालकर्मणां साक्षिन्कर्मरूप सनातन। नारायणांश भगवन्नमस्तुभ्यं पराय च॥४१॥ कथं हरसि मत्कान्तं जीवितायां मयि प्रभो। जानासि सर्वदुःखं च सर्वज्ञस्त्वं कृपानिधे॥४२। गण जन्म के बाद समय आने पर ही जीव को ईश्वर की आज्ञा से ले जाते हैं॥३३॥ विवेकशील मृत्युकन्या जन्मकाल के बाद जिसके पास पहुँच जाती है, उसे ही मैं ले जाता हूँ। (अतएव उसी से) पूछो कि वह किस कारण जीव के पास जाती है।।३४॥ मालावती बोली-प्रिय (सखी) मृत्युकन्या! तुम भी स्त्री हो और पति-वियोग की वेदना को जानती हो। तब जीवित रहते हुए मेरे कान्त का अपहरण क्यों कर रही हो? ॥३५॥ मृत्युकन्या बोली-प्राचीन काल में ही विश्वस्रष्टा ब्रह्मा ने मेरी सृष्टि करके इस कर्म में मुझे नियुक्त कर दिया था। पतिव्रते! बहुत तप करने पर भी मैं इस कर्म को छोड़ने में असमर्थ हूँ। यदि संसार में सती स्त्रियों के बीच कोई परमतेजस्विनी स्त्री मुझे भस्म करने में समर्थ हो जाये, तो हे सुन्दरि ! इस लोक की समस्त आपत्तियाँ शान्त हो जातीं। पश्चात् मेरे स्वामी और पुत्रों की जो दशा होने को होती, वह हो जाती॥३६-३८। काल से प्रेरित होने पर ही मैं और मेरे पुत्र व्याधिगण यह कार्य करते हैं। इसलिए यह निश्चित है कि इसमें मेरा और मेरे पुत्रों का कोई दोष नहीं है।।३९।। भद्रे! इस धर्मसभा में धर्मज्ञाता एवं महात्मा काल से इस विषय में पूछो। फिर जो उचित होगा वह सुनिश्चित रूप से करना॥४०॥ मालावती बोली-काल और कर्मों के साक्षी, कर्मरूप, सनातन! भगवन् ! आप नारायण के अंश हैं। अतः आप परमश्वर को नमस्कार है॥४१॥ प्रभो, कृपानिधे ! आप सर्वज्ञ हैं। समस्त दुःखों को जानते हैं। इसलिए मेरे जीवित काल में मेरे कान्त का अपहरण आप क्यों कर रहे हैं? ।४२।
१ क. क्षिन्धर्मरू०। २ क ०निधिः।
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ब्रह्मववर्तपुराणम् ९१
कालपुरुष उवाच को वाऽहं को यमः का च मृत्युकन्या च व्याधयः। वयं भरमामः सततमीशाज्ञापरिपालकाः ॥४३॥ यस्य सृष्टा च प्रकृतिर्ब्रह्मविष्णुशिवादयः। सुरा मुनीन्द्रा मनवो मानवाः सर्वजन्तवः॥४४॥ ध्यायन्ते तत्पदाम्भोजं योगिनश्च विचक्षणाः। जपन्ति शश्वन्नामानि पुण्यानि परमात्मनः।।४५।। य्द्गयाद्वाति वातोडयं सूर्यस्तपति य्यात्। स्रष्टा म्रह्माऽडज्ञया यस्य पाता विष्णुर्यदाज्ञया॥४६॥ संहर्ता शंकरः सर्वजगतां यस्य शासनात्। धर्मश्च कर्मणां साक्षी यस्याऽऽज्ञापरिपालकः॥४७॥ राशिचक्रं ग्रहाः सर्वे भ्मन्ति यस्य शासनात् । दिगीशाश्चव दिक्पाला यस्याऽडज्ञापरिपालकाः॥।४८॥ यस्याऽऽज्ञया च तरवः पुष्पाणि च फलानि च । बिभ्रत्येव ददत्येव काले मालावति सति॥४९॥ यस्याऽडज्ञया जलाधारा सर्वाधारा वसुंधरा। क्षमावती च पृथिवी कम्पिता न भयेन च॥५०॥। सहसा मोहिता माया मायया यस्य संततम् । सर्वप्रसूर्या प्रकृतिः सा भीता यन्द्रयादहो ॥५१॥ यस्यान्तं न विदुर्वेदा वस्तूनां भावगा अपि। पुराणानि चसर्वाणि यस्येव स्तुतिपाठकाः ॥५२॥ यस्य नाम विधिर्विष्णुः सेवते सुमहान्विराट्। षोडशांशो भगवतः सएव तेजसो विभो:॥५३॥ सर्वेश्वरः कालकालो मृत्योर्मुत्युः परात्परः । सर्वविघ्नविनाशाय तं कृष्णं परिचिन्तय ॥५४॥।
कालपुरुष बोले-मैं क्या हूँ? तथा यम, मृत्युकन्या और समस्त व्याधिगण भी किस गिनती में हैं? हम लोग निरन्तर ईश्वर की आज्ञा का पालन करने के लिये भ्रमण करते हैं॥४३॥ जिनसे प्रकृति, ब्रह्मा, विष्णु और शिवादि देवगण, मुनिगण, मनुगण, मानवसमूह और समस्त जीवगण उत्पन्न हुए हैं। जिनके चरणकमल का योगी- गण सदैव ध्यान करते हैं और बुद्धिमान् पुरुष जिन परमात्मा के पवित्र नामों का निरन्तर जप करते हैं॥४४-४५॥ जिनके भय से वायु चलता है, सूर्य तपता है और जिनकी आज्ञा से ब्रह्मा सृष्टि करते तथा विष्णु पालन करते हैं। ॥४६॥। जिनके शासन में शंकर समस्त जगत् का संहार करते हैं। जिनकी आज्ञा का पालन करने के नाते धर्म कर्मों के साक्षी कहे जाते हैं। जिनके शासन से राशि-समूह और समस्त ग्रहगण म्रमण करते हैं। दिशाओं के अधी- श्वर दिकपाल जिनकी आज्ञा का सतत पालन करते हैं।४७-४८।। हे सती मालावती! जिनकी आज्ञा से वृक्ष समय पर फूल और फल धारण करते तथा देते हैं॥४९॥ जिनकी आज्ञा से यह वसुन्धरा जल और सभी चराचरों का आधार बनी हुई है। जिनके भय से पृथ्वी कभी-कभी सहसा कम्पित हो उठती है ॥५०॥ जिनकी माया से सहसा माया भी मोहित हो जाती है और जिनके भय से सबको जन्म देने वाली प्रकृति भीत होकर कार्य करती रहती है।५१।। समस्त वस्तुओं की सत्ता को बताने वाले वेद भी जिनका अन्त नहीं जानते तथा समस्त पुराण जिनकी स्तुति किया करते हैं॥५२।। जिनके नाम का सेवन तेजोमय सर्वव्यापी भगवान् की सोलहवीं कला स्वरूप ब्रह्मा, विष्णु और महान् विराट् किया करते हैं।५३॥। वे ही सबके अधीश्वर, काल के काल, मृत्यु के मृत्यु और श्रेष्ठ से भी श्रेष्ठ हैं। अतः समस्त विप्रों के विनाशार्थ उन्हीं भगगान् श्रीकृष्ण का तुम चिन्तन करो॥५४॥ वही कृपानिधान तुम्हें सम्पूर्ण अभीष्ट वस्तु तथा पति को भी प्रदान
१ क. ०रः सर्वका०।
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९२ षोडशोऽध्याय: सर्वाभीष्टं च भर्तारं प्रदास्यति कृपानिधिः । इमे यत्प्रेरिताः सर्वे स दाता सर्वसंपदाम् ।।५५।। इत्युक्त्वा कालपुरुषो विरराम च शौनक। कथां कथितुमारेभे पुनरेव तु ब्राह्मणः।५६।। इति श्रीब्रह्मवैवर्ते महापुराणे सौतिशौनकसंवादे ब्रह्मखण्डे मालावतीकालपुरुषसंवादे पञ्चदशोऽध्यायः॥१५॥
अथ षोडशोऽध्यायः ब्राह्मण उवाच इष्टः कालो यमो मृत्युकन्या व्याधिगणा अहो। कस्तेऽधुना च संदेहस्तं पृच्छ कन्यके शुभे।१॥ ब्राह्मणस्य वचः श्रुत्वा हृष्टा मालावती सती। यन्मनोनिहितं प्रश्नं चकार जगदीश्वरम्॥२॥ मालावत्युवाच त्वया यः कथितो व्याधि: प्राणिनां प्राणहारकः । तत्कारणं च विविधं सव वेदे निरूपितम् ॥।३।। यतो न संचरेद्वय्ाधिर्दुनिवारोऽशुभावहः । तमुपायं च साकल्यं भवान्वक्तुमिहार्हति॥४॥
करेंगे। ये सब देवगण उन्हीं के द्वारा प्रेरित होते हैं। इसलिए वही समस्त सम्पत्तियों के दाता हैं ॥५५॥ शौनक! काल पुरुष इतना कहकर चुप हो गए। अनन्तर ब्राह्मण ने पुनः कथा कहना आरम्भ किया ॥५६॥ श्रीब्रह्मववर्तमहापुराण के ब्रह्मखण्ड में मालावती और कालपुरुष का संवाद नामक पन्द्रहवाँ अध्याय समाप्त ॥१६॥
अध्याय १६ ब्राह्मण द्वारा चिकित्सा का वर्णन ब्राह्मण बोले-बालिके! भद्रे! काल, यम, मृत्युकन्या और समस्त व्याधिगण को तुमने देख लिया। अब इस समय तुम्हें क्या सन्देह है, उसे पूछो॥१॥ ब्राह्मण की बात सुनकर सती मालावती प्रसन्न हुई और उसने अपना अभीष्ट प्रश्न भगवान् जगदीश्वर से पूछा।२॥ मालावती बोली-आपने बताया कि व्याघियाँ प्राणियों के प्राणों का अपहरण करती हैं और उसके अनेक प्रकार के कारण भी वेद में बताये गये हैं॥३॥ अतः जिस (उपाय) से यह दुर्निवार और अशुभकारी रोगसमूह शरीर में न फैले, उस उपाय को आप विस्तार से बताने की कृपा करें॥४॥ आप गुरु और दीनों पर दया करने वाले
१ ख. ०र्वं देवनि०।
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ब्रह्मवैवर्तपुराणम् ९३
यद्यत्पृष्टमपृष्टं वा ज्ञातमज्ञातमेव वा। सर्वं कथय त्द्गद्वं त्वं गुरुर्दीनवत्सलः।५॥ मालावतीवचः श्रुत्वा विप्ररूपी जनार्दनः । संहितां वक्तुमारेभे संहितार्थं च वैद्यकीम्॥६॥। ब्राह्मण उवाच वन्दे तं सर्वतत्त्वज्ञं सर्वकारणकारणम्। वेदवेदाङ्गबीजस्य बीजं श्रीकृष्णमीश्वरम्।७॥ स ईशश्चतुरो वेदान्ससजे मङ्गलालयान्। सर्वमङ्गलमङ्गल्यबीजरूपः सनातनः।।८।। ऋग्यजुः सामाथर्वाख्यान्दृष्टवा वेदान्प्रजापतिः । विचिन्त्य तेषामर्थं चैवाऽडयुर्वेदं चकारसः॥९॥ कृत्वा तु पञ्चमं वेदं भास्कराय ददौ विभुः । स्वतन्त्रसंहितां तस्मा्ङ्गास्करश्च चकार सः॥१०॥ भास्करश्च स्वशिष्येभ्य आयुर्वेदं स्वसंहिताम् । प्रददौ पाठयामास ते चक्रुः संहितास्ततः ॥११।। तेषां नामानि विदुषां तन्त्राणि तत्कृतानि च । व्याधिप्रणाशबीजानि साध्विमत्तो निशामय॥१२। धन्वन्तरिर्दिवोदासः काशीराजोऽश्विनीसुतौ। नकुल: सहदेवोडकिश्च्यवनो जनको बुधः ॥१३॥ जाबालो जाजलि: पैल: करथोऽगस्त्य एव च । एते वेदाङ्गवेदज्ञाः षोडश व्याधिनाशकाः॥१४॥ चिकित्सातत्त्वविज्ञानं नामतन्त्रं मनोहरम् । धन्वन्तरिश्च भगवांश्चकार प्रथमे सति ॥१५॥ चिकित्सादर्पणं नाम दिवोदासश्चकार सः। चिकित्साकौमुदीं दिव्यां काशीराजशचकार सः॥१६॥ हैं, अतः जो बात मैंने पूछी है या नहीं पूछी है तथा जो ज्ञात है अथवा अज्ञात है, वह सब कल्याण की बात आप मुझे बताइए।।५।। ब्राह्मणवेषधारी भगवान् जनार्दन ने मालावती की बात सुनकर 'वैद्यकसंहिता' का वर्णन आरम्भ किया ॥६ ॥ ब्राह्मण बोल-मैं भगवान् श्रीकृष्ण की वन्दना करता हूँ, जो समस्त तत्त्वों के ज्ञाता, समस्त कारणों के कारण तथा वेद-वेदांगों के बीज के भी बीज हैं।७ समस्त मंगलों के भी मंगलकारी बीजस्वरूप उन सनातन परमेश्वर ने मंगल के आधारभूत चार वेदों को प्रकट किया।८। उनके नाम हैं-ऋग्, यजु, साम और अथर्व। उन वेदों को देखकर और उनके अर्थों का विचार करके प्रजापति ने आयुर्वेद की रचना की॥९॥ इस प्रकार पाँचवें वेद की रचना करके परमेश्वर ने सूर्य को प्रदान किया और भास्कर ने उससे एक स्वतन्त्र संहिता की रचना की। अनन्तर उन्होंने अपनी आयुर्वेदसंहिता अपने शिष्यों को पढ़ायी और उन्हें सौंप दी। पश्चात् उन शिष्यों ने भी अनेक संहिताओं का निर्माण किया॥१०-११।। साध्वी! उन विद्वानों तथा उनके बनाये हुए तन्त्रों के नाम, जो रोग- नाशक बीजरूप हैं, मुझसे सुनो ॥१२॥ धन्वन्तरि, दिवोदास, काशिराज, दोनों अश्विनीकुमार, नकुल, सहदेव, यमराज, च्यवन, जनक, बुध, जाबाल, जाजलि, पैल, करथ और अगस्त्य-ये सोलह व्यक्ति वेद-वेदांग के तत्त्वों के ज्ञाता तथा रोगों के नाश करने में दक्ष हैं।।१३-१४।। सर्वप्रथम भगवान् धन्वन्तरि ने चिकित्सातत्त्वविज्ञान नामक एक मनोहर तन्त्र की रचना की। फिर दिवोदास ने 'चिकित्सादर्पण', काशिराज ने 'चिकित्साकौमुदी' और दोनों अश्विनीकुमारों ने 'चिकित्सासारतन्त्र'
१ ख. वैदिकीम्।
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९४ षोडशोऽध्याय:
चिकित्सासारतन्त्रं च भ्रमघ्नं चाश्विनीसुतौ। तन्त्रं वैद्यकसर्वस्वं नकुलश्च चकार सः॥१७॥ चकार सहदेवश्च व्याधिसिन्धुदिमर्दनम्। ज्ञानार्णवं महातन्त्रं यमराजशचकार ह॥१८॥ च्यवनो जीवदानं च चकार भगवानृषिः । चकार जनको योगी वैद्यसंदेहभञ्जनम्॥१९॥ सर्वसारं चन्द्रसुतो जाबालस्तन्त्रसारकम् । वेदाङ्गसारं तन्त्रं च चकार जाजलिर्मुनिः॥२०॥ पैलो निदानं करथस्तन्त्रं सर्वधरं परम्। द्वैधनिर्णयतन्त्रं च चकार कुम्भसंभवः॥२१॥ चिकित्साशास्त्रबीजानि तन्त्राण्येतानि षोडश। व्याधिप्रणाशबीजानि बलाधानकराणि च ॥२२॥
एतानि कमशो दृष्ट्वा दिव्यां भास्करसंहिताम्। आयुर्वेदं सर्वबीजं सर्व जानामि सुन्दरि॥२४॥ व्याधेस्तत्त्वपरिज्ञानं वेदनायाश्च निग्रहः । एतद्वैद्यस्य वैद्यत्वं न वैद्यः प्रभुरायुषः॥२५॥ आयुर्वेदस्य विज्ञाता चिकित्सासु यथार्थवित् । धर्मिष्ठशच दयालुश्च तेन वैद्यः प्रकीतितः ॥२६॥ जनकः सर्वरोगाणां दुर्वारो दारुणो ज्वरः । शिवभक्तश्च योगी च निष्ठुरो विकृताकृतिः॥२७॥ भीमस्त्रिपादस्त्रिशिरा: षड्भुजो नवलोचनः । भस्मप्रहरणो रौद्रः कालान्तकयमोपमः ॥२८॥ मन्दाग्निस्तस्य जनको मन्दाग्नेर्जनकास्त्रयः । पित्तश्लेष्मसमीराश्च प्राणिनां दुःखदायकाः ॥२९॥ वायुजः पित्तजरचैव श्लेष्मजश्च तर्थव च । ज्वरभेदाश्च त्रिविधाश्चतुर्थश्च त्रिदोषजः॥३०॥
की रचना की, जो भ्रम का निवारक है। उसी भाँति नकुल ने 'वैद्यकसर्वस्व', सहदेव ने 'व्याघिसिन्धुविमर्दन' और यमराज ने 'ज्ञानार्णव' नामक महातन्त्र को बनाया।॥१५-१८।। भगवान् च्यवन ऋषि ने 'जीवदान' नामक तन्त्र, योगी जनक ने 'वैद्यसन्देहभञ्जन', चन्द्र-पुत्र बुध ने 'सर्वसार,' जाबाल ने 'तन्त्रसार' और जाजलि मुनि ने 'वेदांगसार' का निर्माण किया। पैल ने 'निदानतन्त्र', करथ ने उत्तम सर्वधर-तंत्र' और अगस्त्य ने 'द्वैधनिर्णयतन्त्र' की रचना की। ये सोलह तन्त्र, चिकित्सा शास्त्र के बीज, व्याधिनाशक हेतु तथा बलवृद्धिकारक हैं॥१९-२२॥ विद्वानों ने आयुर्वेद-सागर को अपने ज्ञानरूपी मथानी से मथ कर उक्त तन्त्रों को नदनीत (मक्खन) के रूप में निकाला है ॥२३॥ सुन्दरि! इनको क्रमशः देखकर तुम भास्कर की दिव्य संहिता और सर्वबीजस्वरूप आयुर्वेद को भलीभाँति जान लोगी॥२४॥ व्याधियों के तत्त्वों का भलीभाँति ज्ञान करना और वेदनाओं का निग्रह करना, यही वैद्यों का वैद्यत्व है। वैद्य आयु प्रदान करने में समर्थ नहीं हैं॥२५।। आयुर्वेद के विशेष ज्ञाता, चिकित्साओं के यथार्थवेत्ता, धर्मात्मा और दयालु होने के नाते उन्हें वैद्य कहा जाता है ।२६।। दारुण ज्वर समस्त रोगों का जनक और दुर्वार (बड़ी कठिनाई से रोका जानेवाला) होता है। वह शिवभक्त, योगी, निष्ठुर और विकृत आकृति का होता है। ।।२७।। उसके तीन चरण, तीन शिर, छह भुजाएँ और नौ नेत्र हैं। वह भयंकर ज्वर काल, अन्तक और यमराज की भाँति विनाशकारी होता है। उसका अस्त्र भस्म है और देवता रुद्र॥२८॥ वह मन्दाग्नि से उत्पन्न होता है। उस मन्दाग्नि को उत्पन्न करने वाले पित्त, कफ एवं वायु ये तीन हैं, जो प्राणियों को सदैव दुःखी करते रहते हैं॥२९॥ वायु, पित्त और कफ से उत्पन्न होने के नाते ज्वर के तीन भेद हैं-वातज, पित्तज और कफज। एक चौथा ज्वर भी है,
१ क. ०मन्थेनैवा०। २ ख. ०नासि सु० ।
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पाण्डुश्च कामल: कुष्ठः शोथ: प्लीहा च शूलकः। ज्वरातिसारग्रहणी कासव्रणहलीमकाः॥३१॥ मूत्रकृच्छश्च गुल्मश्च रक्तदोषविकारजः । विषमेहश्च कुब्जरच गोदश्च गलगण्डकः ॥३२॥ भ्रमरी संनिपातश्च विषूची दारुणी सति। एषां भेदप्रभेदेन चतुःषष्टी रुजः स्मृताः॥३३॥ मृत्युकन्यासुताश्चत जरा तस्याश्च कन्यका। जरा च भ्रातृभिः सार्ध शश्वद्भ्मत भूतले॥३४॥ एते चोपायवेत्तारं न गच्छन्ति च संयतम् । पलायन्ते च तं दृष्ट्वा वैनतेयमिवोरगाः॥३५॥ चक्षुर्जलं च व्यायामः पादाधस्तैलमर्दनम् । कर्णयोर्मूध्नि तैलं च जराव्याधिविनाशनम्॥३६॥ वसन्ते भ्रमणं वह्निसेवां स्वल्पां करोति यः । बालां च सेवते काले जरा तं नोपगच्छति ॥३७॥ खातशीतोदकस्नायी सेवते चन्दनद्रवम्। नोपयाति जरा तं च निदाघेऽनिलसेवकम् ॥३८॥ प्रावृष्युष्णोदकस्नायी घनतोयं न सेवते। समये च समाहारी जरा तं नोपगच्छति ॥३९॥ शरद्रौद्रं न गृहणाति भ्रमणं तत्र वर्जयेत्। खातस्नायी समाहारी जरा तं नोपगच्छति॥४०॥ खातस्नायी च हेमन्ते काले वह्निं च सेवते। भुङक्ते नवान्नमुष्णं च जरा तं नोपगच्छति॥४१॥ शिशिरेंड्शुकवह्निं च न (क) वोष्णान्नं च सेवते। यः कवोष्णोदकस्नायी जरा तं नोपगच्छति ॥४२॥ सद्योमांसं नवान्नं च बाला स्त्री क्षीरभोजनम् । घृतं च सेवते यो हि जरा तं नोपगच्छति ॥४३॥
जिसे त्रिदोषज कहते हैं॥३०॥ पाण्ड, कामल, कुष्ठ, शोथ, प्लीहा, शूल, ज्वरातिसार, ग्रहणी, कास (खाँसी), व्रण (फोड़ा), हलीमक, मूत्रकृच्छ, रक्तविकार या रक्तदोष से उत्पन्न होनेवाला गुल्म, विषमेह, कुब्ज, गोद, गलगण्ड (घेघा), भ्रमरी, सन्निपात, विषूची (हैजा) और दारुणी रोगों के नाम हैं। इन्हीं के भेद और प्रभेदों से रोग के चौंसठ भेद कहे गये हैं।३१-३३।। ये सभी मृत्युकन्या के पुत्र हैं और जरा उसकी कन्या है। जरा अपने भाइयों के साथ निरन्तर भूतल पर भ्रमण किया करती है।।३४।। संयमी और उपायवेत्ता जन के समीप ये रोग नहीं जाते हैं। उसे देखते ही उसी प्रकार भाग जाते हैं जैसे गरुड को देखकर साँप।३५॥ नेत्र को जल से साफ करना, व्यायाम, चरणतल में तेल मलना दोनों कान और शिर पर तेल डालना-यह प्रयोग जरा-व्याधि का नाशक है।।३६।। वसन्त काल में म्रमण, स्वल्प अग्निसेवन और समय पर बालास्त्री-सेवन करने वाले के समीप जरा कभी नहीं जाती है।३७॥ ग्रीष्म काल में तालाब आदि के शीतोदक से स्नान, चन्दन-लेप और वायुसेवन करने वाले के समीप जरा नहीं जाती है।३८। वर्षाकाल में उष्णोदक (गरमजल) से स्नान, वर्षाजल का असेवन, और समय पर परिमित आहार करने वाले के समीप जरा नहीं जाती है। शरत् काल में धूप-सेवन न करने, भ्रमण न करने, तालाब आदि में स्नान करने और परिमित भोजन करने से जरा पास नहीं फटकती है।।३९-४०॥ हेमन्त काल में प्रातः स्नान, समय पर अग्निसेवन तथा किंचित् गरम और नवान्न भोजन करने वाले के समीप जरा नहीं जाती है।४१॥ शिशिरकाल में गरम कपड़े, प्रज्वलित अग्नि तथा गरम अन्न का सेवन और उष्णोदक से स्नान करने वाले के पास जरा नहीं पहुँचती है॥४२॥ तुरन्त का मांस, नवान्न, षोडशी स्त्री, क्षीर भोजन और घृत के सेवन करने वाले को जरा नहीं होती है।४३।। क्षुधा लगने पर उत्तम अन्न का भक्षण, प्यास लगने पर जलपान और नित्य
१ ख. प्रातः शी० ।२ ख. प्रातः स्ना० ।
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९६ षोडशोऽध्याय:
भुङकते सदन्नं क्षुत्काले तृष्णायां पीयते जलम् । नित्यं भुङक्ते च ताम्बूलं जरा तं नोपगच्छति ॥४४॥ दधि हैयङ्गवीनं च नवनीतं तथा गुडम्। नित्यं भुङक्ते संयमी यो जरा तं नोपगच्छति ॥४५॥ शुष्कमांसं स्त्रियं वृद्धां बालार्क तरुणं दधि। संसेवन्तं जरा याति प्रहृष्टा भ्रातृभिः सह॥४६॥ रात्रौ ये दधि सेवन्ते पुंश्चलीश्च रजस्वलाः । तानुपैति जरा हृष्टा भ्रातृभिः सह सुन्दरि॥४७। रजस्वला च कुलटा चावीरा जारदूतिका। शूद्रयाजकपत्नी या ऋतुहीना च या सति॥४८।। यो हि तासामन्नभोजी ब्रह्महत्यां लभेत्तु सः । तेन पापेन सार्धं सा जरा तमुपगच्छति॥४९॥ पापानां व्याधिभिः सार्ध मित्रता संततं ध्रुवम् । पापं व्याधिजराबीजं विघ्नबीजं च निश्चितम् ॥५०॥ पापेन जायते व्याधि: पापेन जायते जरा। पापेन जायते दैन्यं दुःखं शोको भयं कलिः॥५१॥ तस्मात्पापं महावैरं दोषबीजममङ्गलम्। भारते सततं सन्तो नाऽऽचरन्ति भयातुराः ॥५२॥ स्वधर्माचारयुक्तं च दीक्षितं हरिसेवकम्। गुरुदेवातिथीनां च भक्तं सक्तं तपःसु च ।५३। व्रतोपवासयुक्तं च सदा तीर्थनिषेवकम्। रोगा द्रवन्ति तं दृष्टवा वैनतेयमिवोरगाः ॥५४॥ एताञ्जरा न सवेत व्याधिसंघश्च दुर्जयः । सर्व बोध्यमसमये काले सव ग्रसिष्यति॥५५॥ ज्वरश्च सर्वरोगाणां जनकः कथितः सति । पित्तश्लेष्मसमीराश्च ज्वरस्य जनकास्त्रयः ॥५६।।
ताम्बूल सेवन करने वाले को जरा नहीं होती है।४४।। जो व्यक्ति संयमपूर्वक नित्य दही, मक्खन, घी और गुड़ का सेवन करता है उसके समीप जरा नहीं जाती है॥४५॥ शुष्क मांस, वृद्धा स्त्री, कन्याराशिगत सूर्य की रश्मि (अर्थात् क्वार-कार्तिक मास की धूप) तथा कई दिन का पुराना दही सेवन करने वाले को जरा प्रसन्नता से अपने भाइयों समेत पहुँच कर अपने अधीन कर लेती है।।४६।। सुन्दरि ! रात्रि में दही, व्यभिचारिणी और रजस्वला स्त्री का सेवन करने वाले के समीप जरा, अत्यन्त प्रसन्न होकर भाइयों समेत पहुँच जाती है।।४७।। रजस्वला, कुलटा, (पति- पुत्र रहित) विधवा, जार के लिए दूती का काम करने वाली, शूद्रों को यज्ञ कराने वाले की पत्नी तथा मासिकधर्म से रहित स्त्रियों के अन्न का भोजन करने से ब्रह्महत्या का भागी होना पड़ता है और उस पाप के साथ उसे जरा भी प्राप्त होती है।।४८-४९।। पापों की व्याधियों के साथ सदा अटूट मित्रता होती है। पाप ही रोग, वृद्धावस्था तथा नाना प्रकार के विघ्नों का बीज है ।५०॥ पाप से रोग होता है, पाप से बुढ़ापा आता है और पाप से ही दीनता, दुःख और भयंकर शोक की उत्पत्ति होती है।।५१।। इसलिए पाप महावैरी, दोषों का कारण और अमंगल रूप है। इस कारण भारत में सन्त लोग सदा भयभीत हो कभी पाप का आचरण नहीं करते हैं।५२।। अपने धर्म का आच- रण करने वाले, दीक्षायुक्त, भगवान् के सेवक, गुरु, देव और अतिथियों के भक्त, तप में लीन रहने लाले, व्रत और उपवास करने वाले तथा निरन्तर तीर्थ सेवन करने वाले को देखकर रोगगण उसी तरह भाग जाते हैं जैसे गरुड़ को देखकर साँप (भाग जाते हैं) ॥५३-५४।। उस पर जरा और दुर्जेय व्याधियाँ भी आक्रमण नहीं करती हैं। अतः ये सब जानने के योग्य हैं। न जानने से असमय में ही ये ग्रसित कर लेते हैं॥५५॥ पतिव्रते! ज्वर समस्त रोगों का जनक है-यह बताया जा चुका है। और उस ज्वर को उत्पन्न करने वाले वात, पित्त और कफ-
क. ०र्वं गमिष्य०।
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एते यथा संचरन्ति स्वयं यान्ति च देहिषु। तमेव विविधोपायं साध्वि मत्तो निशामय ॥५७॥ क्षुधि जाज्वल्यमानायामाहाराभाव एव च । प्राणिनां जायते पित्तं चक्रे च मणिपूरके ।५८॥ तालबिल्वफलं भुक्त्वा जलपानं च तत्क्षणम् । तदेव तु भवेत्पित्तं सद्यः प्राणहर परम्॥५९॥ तप्तोदकं च शिरससि (शिशिरे) भाद्रे तिक्तं विशेषतः। देवग्रस्तरच यो भुङक्ते पित्तं तस्य प्रजायते ॥६०॥ सशर्करं च धान्याकं पिष्टं शीतोदकान्वितम्। चणकं सर्वगव्यं च दधितक्र्कविवजितम् ॥६१।। बिल्वतालफलं पक्वं सर्वभैक्षवमेव च । आर्द्रकं मुद्गसूपं च तिलपिष्टं सशर्करम्॥६२॥ पित्तक्षयकरं सद्यो बलपुष्टिप्रदं परम्। पित्तनाशं च तद्बीजमुक्तमन्यन्निबोध मे॥६३॥ भोजनानन्तरं स्नानं जलपानं विना तृषा। तिलतैलं स्निग्धतैलं स्निग्धमामलकीद्रवम् ॥६४॥ पर्युषितान्नं तकं च पक्वं रम्भाफलं दधि। मेघाम्बु शर्करातोयं सुस्निग्धजलसेवनम् ॥६५॥ नारिकेलोदकं रूक्षस्नानं पर्युषितं जलम्। तरुमुञ्जापक्वफलं सुपक्वं कर्कटीफलम् ।६६॥ खातस्नानं च वर्षासु मूलकं श्लेष्मकारकम्। ब्रह्मरन्ध्रे च तज्जन्म महद्वीर्यविनाशनम् ॥६७॥ र्वह्निस्वेदं भ्रष्टभङ्गं पक्वतलविशेषकम्। भ्रमणं शुष्कभक्षं च शुष्कपववहरीतकी ।६८।।
ये तीन हैं ॥५६।। ये जिस प्रकार देहधारियों में संचार करते और स्वयं पहुँचते हैं, उसके अनेक कारणों तथा उपायों को मुझसे सुनो। ॥५७॥ अत्यन्त क्षुधा लगने पर भोजन न करने से प्राणियों के मणिपूरक चक्र्क में पित्त की उत्पत्ति होती है ॥५८॥ ताड़ और बेल खाकर तुरन्त जल पी लेने से वह उसी क्षण प्राणहारी पित्त हो जाता है ।५९॥ जो दैव का मारा हुआ पुरुष भादों में तपा हुआ जल सिर पर डालता है तथा विशेष रूप से तिक्त भोजन करता है उसका पित्त बढ़ जाता है ॥६०।। अतः धनियाँ पीसकर शक्कर समेत शीतल जल में पीने से पित्त की शान्ति होती है। चना, गव्य पदार्थ (दूध, दही, घृत गोबर और मूत्र) तक्रहित दही, पके हुए बेल और ताड़ के फल, ईख के रस से बनी हुई सब वस्तुएँ, अदरक, मूली, मूंग की दाल, शक्कर समेत तिल का चूर्ण-इन वस्तुओं के भक्षण करने से उसी क्षण पित्त नष्ट हो जाता है और अत्यन्त बल एवं पुष्टि प्राप्त होती है। इस प्रकार पित्त का कारण और उसके नाश का उपाय बता दिया। अब अन्य बातें बता रहा हूँ, सुनो ! भोजन के अनन्तर (तुरंत) स्नान करना, बिना प्यास के जल पीना, तिल का तेल, स्निग्ध तेल, आँवले का रस, बासी अन्न, मट्ठा, पका केला, दही, वर्षा का जल, शवकर का शर्बत, अत्यन्त स्निग्ध जल का सेवन, नारियल का जल, वासी जल, रूखा स्नान, तरबूज के पके फल, पकी हुई ककड़ी और वर्षा ऋतु में तालाब में नहाना और मूली खाना- इन सबसे कफ उत्पन्न हो जाता है। वह ब्रह्मरन्ध्र में उत्पन्न होकर वीर्य का महान् विनाश करता है ॥६१-६७॥ गन्धर्वपुत्री ! अग्नि ताप कर स्वेद (पसीना), भूनी हुई भांग का सेवन करना, पका तेल, भ्रमण, शुष्क भोजन, सूखी और पकी हर्रे, कच्चा पिण्डारक (कच्चा लोहबान), कच्चा केला, वेसवार (मसाला) सिंधुवार (निर्गुडी),
१ ख. वद्ूयूष च। १३
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९८ षोडशोऽध्यायः
पिण्डारकमपक्वं च रम्भाफलमपक्वकम् । वेसवारः सिन्धुवार अनाहारमपानकम्॥६९॥ सघृतं रोचनाचूर्ण सघृतं शुष्कशर्करम्। मरोचं पिप्पलं शुष्कमार्द्रकं जीवकं मधु ॥७०॥ द्रव्याण्येतानि गान्धवि सद्यः श्लेष्महराणिच । बलपुष्टिकराण्येव वायुबीजं निशामय ॥७१॥ भोजनानन्तरं सदो गमनं धावनं तथा। छेदनं वह्नितापशच शश्वद्भ्रमणमैथुनम्(ने)॥७२॥ वृद्धस्त्रीगमनं चैव मनःसंताप एव च। अतिरूक्षमनाहारं युद्धं कलहमेव च।७३। कटुवाक्यं भयं शोक: केवलं वायुकारणम्। आज्ञाख्यचकरे तज्जन्म निशामय तदौषधम्।७४। पक्वं रम्भाफलं चैव सबीजं शर्करोदकम्। नारिकेलोदकं चैव सद्यस्तकं सुपिष्टकम् ॥७५॥ माहिषं दधि मिष्टं च केवलं वा सशर्करम्। सद्यः पर्युषितान्नं च सौवीरं शीतलोदकम् ॥७६॥ पक्वतैलविशेषं च तिलतैलं च केवलम्। लाङ्गली तालखर्जूरमुष्णमामलकीद्रवम् ॥७७॥ शीतलोष्णोदकस्नानं सुस्निग्धं चन्दनद्रवम् । स्निग्धपद्मपत्रतल्पं सुस्निग्धव्यजनानि च । ७८ ।। एतत्ते कथितं वत्से सद्यो वायुप्रणाशनम् । वायवस्त्रिविधाः पुंसां क्लेशसंतापकामजाः ॥७९॥ व्याधिसंघश्च कथितस्तन्त्राणि विविधानि च। तानि व्याधिप्रणाशाय कृतानि सन्िरेव च ।८०।। तन्त्राण्येतानि सर्वाणि व्याधिक्षयकराणि च । रसायनादयो येषु चोपायाश्च सुदुर्लभाः ॥८१॥ न शक्त: कथितं साध्वि यथार्थ वत्सरेण च। तेषां च सर्वतन्त्राणां कृतानां च विचक्षणैः॥८२॥
उपवास, जल न पीना, घी मिला रोचनाचूर्ण, घी मिला सूखा शक्कर, मरिच, पीपर, सूखा अदरक, जीवक (अष्टवर्ग में से एक औषव) और मधु-इतने पदार्थ तुरन्त कफ का नाश करते हैं और निश्चित रूप से बल- पुष्टि प्रदान करते हैं। अब वायु का कारण सुनी ।।६८-७१।। भोजनान्तर तुरन्त चलना, दौड़ना, काटना, अग्नि- सेवन, निरन्तर भ्रमण और मैथुन, वृद्धा स्त्री का उपभोग, मन में सन्ताप रहना, अत्यन्त रूखा खाना, अनाहार, युद्ध करना, कलह करना, कटुवाक्य बोलना भय और शोक से अभिभूत होना-ये सब वायु की उत्पत्ति के कारण हैं। इसकी उत्पत्ति आज्ञा नामक चक्र में होती है। उसके औषध को भी बता रहा हूँ, सुनो।॥७२-७४॥ केले का पका फल, विजौरा नीबू के साथ चीनी का शर्वत, नारियल का जल, तुरन्त का मट्ठा, उत्तम पीठी (पूआ), कचौरी आदि, भैंस का मीठा दही या उसमें शक्कर मिला हो, तुरंत का बासी अन्न जौ की काँजी, शीतल जल, पका तेल, अथवा केवल तिल का तेल, नारियल, ताड़, खजूर, आँवले का उष्ण द्रव, ठंडे-गरम जल का स्नान, अत्यन्त स्निग्ध चन्दन-रस तथा चिकने कमल पतों की शय्या, -- ये सब वस्तुएँ एवं अत्यन्त स्निग्ध व्यजन उसी क्षण वायु का नाश कर देती है। वत्से! इस प्रकार मैंने वायुनाशक वस्तुओं का वर्णन कर दिया। मनुष्यों में क्लेश, सन्ताप और काम से उत्पन्न होने वाले वायु-दोष तीन प्रकार के होते हैं ॥७५-७९॥। इस प्रकार मैंने व्याधि-समूह और उनके नाश के लिए विद्वानों द्वारा बनाये गये नाना प्रकार के तन्त्र भी बता दिये हैं॥८०॥ ये सभी तन्त्र व्याधिनाशक हैं, जिनमें रसायन आदि अत्यन्त दुर्लभ उपाय बताये गये हैं।८१॥ पतिव्रते ! विद्वानों द्वारा सुरचित उन तन्त्रों
१ क. ०रमना०। २ क. जीरक म० ३ क. ०मुस्तमा० ।
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ब्रह्मवैवर्तपुराणम् ९९
केन रोगेण त्वत्कान्तो मृतः कथय शोभने। तदुपायं करिष्यामि येन जीवेदयं सति ॥८३॥
सौतिरुनाच ब्राह्मण स्य वचः श्रुत्वा कन्या चित्ररथस्य च। कथां कथितुमारभे सा गान्धर्वी प्रहर्षिता॥८४॥
मालावत्युवाच योगेन प्राणांस्तत्याज ब्रह्मणः शापहेतुना। सभायां लज्जितः कान्तो मम विप्र निशामय ॥८५॥ सर्व श्रुतमपूर्व' च शुभा्यानं मनोहरम् । भवेःद्वे कुतः केषां महल्लभ्यं विपद्विना ॥८६।। अधुना मत्प्राणकान्तं देहि देहि विचक्षण। नत्वा दः स्वामिना सार्ध वास्यामि स्वगृहं प्रति॥८७॥ मालावतीवचः श्रुत्वा विप्ररूपी जनार्दनः । सभां जगाम देवानां शीघ्रं विप्रस्तदन्तिकात् ॥८८॥
इति श्रीब्रह्मदैवर्ते महापुराणे सौतिशौनकसंवादे ब्रह्मखण्डे चिकित्साप्रणयने षोडशोऽध्यायः॥१६॥
का यथावत् वर्णन एक वर्ष में भी नहीं किया जा सकता।।८२।। अतः हे शोभने ! तुम्हारा कान्त किस रोग से मृतक हुआ है वह बताओ। मैं उसका उपाय करूँगा, जिससे यह जीवित हो जायेगा ॥८३। सौति बोले-ब्राह्मण की बातें सुनकर चित्ररथ की कन्या गान्वर्वी (मालावती) ने अत्यन्त हर्षित होकर कथा कहना आरम्भ किया॥८४॥ मालावती बोली-हे विप्र! सुनिए। मेरे कान्त ने सभा में लज्जित होकर ब्रह्मा के शापवश योग द्वारा अपने प्राण का परित्याग किया है। मैंने आपके मुख से मनोहर, अपूर्व एवं शुभ आख्यान को सुना है। इस जगत् में बिना विपत्ति के कब किसको, कहाँ आप जैसे महात्माओं का संग प्राप्त हुआ है ? ।८५-८६।। विद्वन् ! इस समय मेरे प्राणपति को मुझे देने की कृपा करें, जिससे मैं अपने स्वामी के साथ आप सबको नमस्कार करके अपने घर को चली जाऊँ।।८७।। मालावती की यह बात सुनकर ब्राह्मणवेषधारी भगवान् जनार्दन उसके समीप से उठ- कर शीघ्र देवों की सभा में चले गये ।।८८॥
श्रीब्रह्मवैवर्तमहापुराण के ब्रह्मखण्ड में मालावती-विष्णु-संवाद-विषयक चिकित्सा-प्रणयन नामक सोलहवाँ अध्याय समाप्त ॥१६॥
१ क. मत्प्रभो: प्राणदानं देहि बि०।
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१०० सप्तदशोऽध्यायः
अथ सप्तदशोऽध्यायः सौतिरुवाच दृष्ट्वा द्विजं देवसंघः प्रत्युत्थानं चकार च । परस्परं च संभाषा बभूत्र तत्र संसदि॥१॥ मा तं बुबुघिरे देवाः श्रीहरिं विप्ररूपिणम् । पौर्वापर्य विस्मृताश्च मोहिता विष्णुमायया ॥२॥ सुरान्संबोध्य विप्रश्च वाचा मधुरया द्विज। उवाच सत्यं परमं प्राणिनां यच्छुभावहम्।।३। ब्राह्मण उवाच उपबर्हणभार्येयं कन्या चित्ररथस्य च । ययाचे जीवदानं च स्वामिनः शोककर्षिता॥४॥ अधुना किमनुष्ठानमस्य कार्यस्य निश्चितम् । तन्मां ब्रूत सुराः सर्वे नित्यं यत्समयोचितम् ।।५॥ शप्तुकामा सुरान्सर्वान्साध्वी तेजस्विनी वरा। अहं क्षेमाय युष्माकमागतो बोधिता सती॥६।। स्तुतिः कृता च युष्मामिः श्वेतद्वीपे हरेरपि। युष्माकमीशो विष्णुश्च कथमेवात्र नाऽडगतः।।७।। बभूवाऽडकाशवाणीति पश्चाद्यास्यति केशवः । विपरीतं कथं भूतं वाणीवाक्यमचञ्चलम्॥८। ब्राह्मणस्य वचः श्रुत्वा स्वयं ब्रह्मा जगद्गुरुः । उवाच वचनं सत्यं हितं परममङ्गलम्॥९॥
अध्याय १७
विप्र-बालक के साथ ब्रह्मा आदि का वार्तालाप सौति बोले-देवसमूह ने ब्राह्मण को देख कर उठकर स्वागत किया और सभा में उन सब की परस्पर बात- चीत हुई।१॥ विष्णु की माया से मोहित होने के नाते देवगण पूर्वापर की सारी बातें भूल गये थे, इसीलिए विप्र- वेषधारी भगवान् श्रीहरि को वे उस समय पहचान न सके ॥।२॥ द्विज ! उस समय ब्राह्मण ने देवताओं को सम्बो- धित करके मधुर वाणी में कहना आरम्भ किया, जो परम सत्य और प्राणियों के लिए कल्याणकारक था।३॥ ब्राह्मण बोल-उपबर्हण की यह भार्या, जो चित्ररथ की कन्या है, शोकाकुल होकर अपने स्वामी के जीव- दान की याचना कर रही है।।४।। आप सब देववृन्द मुझे बतायें कि इस कार्य के लिए निश्चित रूप से किस उपाय को अपनाया जाय, जो सदा काम में लाने योग्य और समयोचित हो ॥५॥ वह तेजस्विनी एवं श्रेष्ठ साध्वी सभी देवों को शाप देने के लिए तैयार थी किन्तु आप लोगों के कल्याणार्थ मैंने यहाँ आकर उसे समझा-बुझा दिया है ॥६॥ आप लोगों ने श्वेत द्वीप में जाकर भगवान् विष्णु की स्तुति की थी, किन्तु वे आप के ईश विष्णु यहाँ क्यों नहीं आये? ॥७॥ आकाशवाणी हुई थी कि 'पश्चात् भगवान् केशव भी जायेंगे'। आकाशवाणी का वह अटल वाक्य विपरीत (मिथ्या) कैसे हो गया ? ।८। ब्राह्मण की बात सुनकर जगद्गुरु ब्रह्मा ने सत्य, हितकर एवं परममंगलमय बात कही ॥९॥
१ क. ति निश्चितम्।