Books / Chandogya, Samavediya Chandogya with Dipika & Hindi Tika of Pitambara Sharma 1894

1. Chandogya, Samavediya Chandogya with Dipika & Hindi Tika of Pitambara Sharma 1894

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1/2 सामवेदीय श्रीछान्दोग्योपनिषत् अष्टध्यायीस्वरूप पंडित श्रीपीतांबरशर्मकृत समूल सटीक संपूर्ण शंकरभाष्यानुसार वेदांतदीपिका

नामक भाषा टीकासहित कर्त्तानैं सर्व मुमुक्षुनके हितार्थ

मुंबाईमैं जावजी दादाजी इनोंके "निर्णयसागर" छापखानेमैं छपवायके प्रकट करी.

"श्ोकार्धेन प्रवक्ष्यामि यदुक्तं अ्रंथकोटिभिः । ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या जीवो ब्रह्मैव नापरः" ॥ १ ॥

संवत् १९५०। शके १८१५ । सन १८९४. मौल्यमात्र रुपैया ६

(कर्त्तांनैं याके सर्व हक्क स्वाधीन रक्खे हैं)

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। ॐ तत्सद्धह्मणे नमः ॥ प्रस्तावना।

सकलशास्त्रनका मूलभूत प्रमाणशिरोमणि अपौरुषेय जो च्यारी वेदनका कदंब है सो शब्दस- she E Tho ty मूहरूप भूमिकामैं सरोवरकीन्यांई सरोवर है। तिसमैं सहस्रशाखारूप पंखुरिनकरि युक्त सा- मवेद जो है सो भगवद्रूप(भगवत्विभूति) हो- नेकरि उत्तम होनेतैं सरोवरगत कमलकीन्यांईं कमल है। तिस सामवेदके मध्य रहस्यरूप हो- नेतैं कमलगत केसरकीन्यांई केसर यह छांदो- ग्योपनिषद् है।। तामैं ज्ञानरूप मकरंदकीन्यांई मकरंद (सुगंध) है। छंदनके गायक जे सामग ब्राह्मण हैं वे छंदोग कहियेहैं। तिनकी संबं- घिनी जातैं यह उपनिषद्रूप ब्रह्मविद्याहै। यातैं यह छांदोग्योपनिषत् कहियेहै॥ ताके प्रपाठक नामवाले अध्याय दश हैं। तिनमैं पहिले दो अध्याय कर्मरूप विषयवाले हैं ताका जिज्ञासुज- नोंकू उपयोग नहीं है। यातैं तिनकी व्यावृत्ति

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२ प्रस्तावना। करिके पीछले अष्ट अध्यायनकूं उपनिषद्रूप जानिके सकलाचार्यमुकटमणि श्रीमच्छंकराचा- र्य। भाष्यरूप व्याख्यानकरि युक्त करतेभये। तिस भाष्यकी बी श्रीमत् आनंदगिरि स्वामीनैं संस्कृत व्याख्या करी है।। यामैं पंच अध्यायपर्यंत चित्तशुद्धिअर्थ अनेकविध उपासना निरूपण करी हैं। वे ज्ञानशेष हैं औ अंतिम षष्ठ सप्तम औ अष्टमरूप तीनि अध्यायनविषै क्रमतैं उत्तम मध्यम अरु कनिष्ठ अधिकारीनकूं तत्वज्ञानकी उत्पत्तिअर्थ तत्वका निरूपण कियाहै ॥ इस री- तिसैं संपूर्ण इस छांदोग्योपनिषत्का अद्वैतब्रह्मके निरूपणमैं तात्पर्य है॥ याके अद्वैतविषै तात्प- यके निर्णायक उपकमोपसंहारकी एकता आदि- क षट् लिंगनका कथन हमनैं श्री बृहदारण्यकोप- निषत्के तथा ईशाद्ष्टोपनिषत्के भाषाव्याख्या- नके आरंभमैं जो श्रुतिषड्लिंग संग्रहनामक ल- घु ग्रंथ धरिके छपवाया है तामैं कियाहै।।जैसैं हम- नैं ईशाआदिक अष्ट औ नवम वृहदारण्यक। इन नव उपनिषदनका भाषा व्याख्यान कियाहै। तैसैं दशोपनिषदनके व्याख्यानकी संपन्नताअर्थ याका

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प्रस्तावना। ३ व्याख्यान बी कर्तव्य है। यह जानिके हमनैं इस छांदोग्योपनिषत्रूप मूलका औ संपूर्ण शं- करभाष्यका औ संपूर्ण आनंदगिरि टीकाका हिंदुस्थानीभाषामैं यथामति व्यार्यान किया है। सो महज्नोंकूं प्रमोदका हेतु होहू औ जि- ज्ञासुजनोंकूं सर्व अनर्थकी निवृत्तिस्वरूप पर- मानंदकी प्राप्तिका कारण होहू॥ याका विषय याके पीछे धरी अनुक्रमणिकामैं औ प्रति अ- ध्यायके अरु प्रतिखंडके आरंभमैं अरु सम वि- षम पृष्ठनके उपरि क्रमसैं धरे अध्याय अरु खं- डनके प्रसंगनमैं स्पष्ट लिख्या है। यामैं प्रति अध्यायके आरंभमैं जो सारे अध्यायका विषय धर्या है ताके अंतमैं जो १३ आदिक अंक धरै हैं वे तिस तिस अध्यायके खंडनकी संख्याके सूचक हैं औ प्रतिखंडके आरंभमैं जो खंडका विषय धर्या है ताके अंतमैं जे अंक हैं वे खंड- नकी कंडिकाकी संख्याके सूचक हैं औ यामैं जे? प्रश्नचिन्ह औः-निर्देशचिन्ह आदिक चि- न्ह धरेहैं तिनके आकार हमारे किये अन्य ग्रं- थनकी प्रस्तावनामैं लिखे हैं। तहां देख लेनें।

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४ प्रस्तावना। इहां मूलविषै संधिभिन्न योग्य स्थलमैं निर्देश चि- न्हके ठिकाने-ऐसा चिन्ह। तथा? ऐसा प्रश्नचि- न्ह औ " " ऐसा अवतरणचिन्ह अरु! ऐसा उ- द्वारचिन्ह ये सुबोधके अर्थ धरेहैं॥ यामैं दृष्टि- दोषतैं कहूं अशुद्ध होवे तो महाशय ब्रह्मनिष्ठ सजनोंनैं सुधारिके वांचना। यह विनति है॥॥ पंडित पीतांबर पुरुषोत्तमजी।

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श्रीछान्दोग्योपनिषत्प्रथमप्रपाठकस्यानुक्रमणिका १

खंडांक. प्रपाठक-खंडविषय. खंड-कंडिका. पृष्ठांक. भाषाकर्ताकृत मंगलाचरण ४ ७

अथ प्रथमप्रपाठक १ सामावयव उद्गीथ (ऊकार)आदिकके उपासन .. .... .. १३ १ रसतमत्वादित्रिगुणविशिष्टऊकारका पर- मात्मबुद्धिसैं उपासन .. १० ७

२ प्राणदृष्टिसैं ऊँकारका उपासन .... १४ ६०

३ आदित्य औ प्राणआदिककी दृष्टिसैं उद्गी- थस्वरका उपासन .... .... .... १२ ९३

४ स्वरशब्दके वाच्य ॐँकारका उपासन .... ५ ११९ ५ वाक्आदिक मुख्यप्राण रश्मि औ आदित्य- की अभेददृष्टिसैं उद्धीथ उपासनकी निंदापूर्वक फेर तिनकी भेददृष्टिसैं उद्गीथका उपासन .... ५ १२९ .... ६ अंगप्रधानभेदसैं अपूर्वअधिदैवतरूप उ- द्रीथका उपासन १४० .... .... ७ अंगप्रधानभेदसैं अध्यात्मरूप अपूर्वउद्गी- थका उपासन १५७ .... .... .... ८ शिलक दाल्भ्य जैवलि-संवादपूर्वक-साम- सैं स्वर्ग औ स्वर्गसैं इसलोकपर्यत ग- तिके कथनकरि परोवरीयगुणक पर- मात्मदृष्टिसैं तत्फलक उद्गीथोपासन ८ १७२

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२ श्रीछान्दोग्योपनिषत्प्रथमप्रपाठकस्यानुक्रकमणिका १

९ इसलोककी गति (आकाश) औ फलके कथनकरि परोवरीयगुणकपरमात्म- दष्टिसैं तत्फलकउद्गीथोपासन .... ४ १९३ १० दुर्भिक्षकालमैं उपस्तिका देशांतरमैं गम- न । हस्तिपतिके उच्छिष्टभोजनआदि- कके प्रसंगपूर्वक राजयज्ञदर्शन औ ताका ऋत्विकनसैं संवाद .... .... .... ११ २०२ ११ राजा अरु उषस्तिके प्रसंगपूर्वक ऋत्विककर्मके प्रसंगकरि प्रस्ताव उद्गीथ औ प्रतिहार- के क्रमसैं प्राण आदित्य अरु अन्नरूप देवताका परिजान. ९ २२० १२ श्वानोंकरिउद्गीथके उपासनका उपदेश .... ५ २३३ १३ सामके अवयव स्तोभाक्षरविषयकउपासन २४४

श्रीछान्दोग्योप०द्वितीयप्रपाठकस्यानुकमणिका २ खंडांक. प्रपाठक-खंड-विषय. खंड-कंडिका. पृष्ठांक. अथ द्वितीयप्रपाठक २ समस्तसामके उपासन २४ २५३ १ साधुदृष्टिसैं समस्तसामकी उपासना .... २५३ २ लोकदृष्टिसैं पश्चविधसामोपासना ... २ २६१ ३ वृष्टिदृष्टिसें पश्चविधसामोपासना २ २७० ४ जलदृष्टिसैं पञ्चविधसामोपासना .... २ २७४ ५ ऋतुदृष्टिसैं पञ्चविधसामोपासना २ २७७ ६ पशुदृष्टिसैं पञ्चविधसामोपासना .... २ २७९ ७ प्राणादिदृष्टिसैं पञ्चविधसामोपासना .... २ २८२ ८ वाक्दृष्टिसैं सप्तविधसामोपासना ३ २८६ ९. आदित्यदृष्टिसं सप्तविधसामोपासना V .... २९०

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श्रीछान्दोग्योप० तृतीयप्रपाठकस्यानुक्मणिका २ ३

१० आदित्य (रूप मृत्यु)के जयकरि सप्तविध- सामोपासना .... ६ ३०२ ११ प्राणोविषै गायत्रसामोपासन .... ... २ ३१३ १४ आदित्यविषै बृहत्सामोपासना २ ३२४ १५ पर्जन्यविषै वैरूपसामोपासन ३२७ .... २ १६ ऋतुनविषै वैराजसामोपासन २ ३२९ १७ पृथिवी आदिककी दष्टिसैं शक्करीसामोपा- सन .... २ ३३२ १८ पशुदृष्टिसं रेवतीसामोपासन .. २ ३३४ १९ अङ्गदृष्टिसैं यज्ञायज्ञीयसामोपासन ... २ ३३६ २० देवतादृष्टिसैं राजनसामोपासन .... २ ३३९ २१ त्रयीविद्यादिद्ृष्टिसैं सामोपासन .... ३४३ २२ विनर्दिगुणविशिष्टसामोपासन .... .... ५ ३४८ २३ तीन धर्मस्कंध औ ब्रह्मसंस्थकूं अमृतकी प्राप्तिपूर्वक ॐँकारकी ब्रह्मरूपता .... ३ ३५९ २४ अज्ञकी निंदा औ ज्ञानार्थ साम होममंत्र अरु उत्थान .... .... .... .... १६ २९४

श्रीछान्दोग्योपनिषदस्तृतीयप्रपाठकस्यानुकमणिका ३ खंडांक. प्रपाठक-खंडविषय. खंड-कंडिका. पृष्ठांक. अथ तृतीयप्रपाठक ३ आदित्यादिपंचद्वारपाल गायत्री हृदयआ- दिक ब्रह्मके उपासन .... १९ १ आदित्यआदिकविषै मधुआदिककी दष्टियां ४ ४०९

२ दक्षिणदिशागतरश्मिआदिकविषै मधुनाडी- ४०९

आदिककी दष्टि .... ४२०

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४ श्रीछान्दोग्योपनि०तृतीयप्रपाठकस्यानुक्रमणिका ३

३ पश्चिमदिशागतरश्मिआदिविषै मधुनाडी- आदिककी दृष्टि .... .... ३ ४२३ ४ उत्तरदिशागतरश्मिआदिविषै मधुनाडी- आदिकी दृष्टि .... ३ ४२५ ५ ऊर्ध्वदिशागतरश्मिआदिविषै मधुनाडी- आदिकी दृष्टि .... ४ ४२८ ६ रोहितादि रूपवसूपजीवन प्रथमामृतोपासन ४ ४३२ ७ रुद्रोपजीवन-द्वितीयामृतोपासन ४ ४४० ८ आदित्योपजीवन-तृतीयामृतोपासन ४ ४४३ ९ मरुत्उपजीवन-चतुर्थामृतोपासन .... १० साध्योपजीवन पंचमामृतोपासन 888

४५७ ११ भोगके क्षयभये आत्मातैं सर्व संहृत हो- वैहै ऐसा उपासन .... ... ६ ४५९ १२ गायत्रीकरि ब्रह्मका उपासन ४७० १३ द्वारपालादि गौणोपासना। हृदयमैं मुख्यन्र- होपासन ७ ४८८ १४ सर्वदृष्टिसैं ब्रह्मोपासन औ मनोमयतादि आरोपसैं शांडिल्यविद्या. .... .... ५१८ १५ पुत्रदीर्घायुफलकविराटकोशोपासना .... ७ ५४१ १६ आत्मदीर्घायुफलक आत्मयज्ञोपासना .... ७ ५५४ १७ अक्षयादिफलकदेवकी पुत्रार्थ आंगिरसो- क्तआत्मयज्ञोपासना .... V .... .... ७ १८ मनआदिदृष्टिसैं अध्यात्माधिदैविकव्रह्मोपासना ६ ५८२ १९ आदित्यांडदृष्टिसैं अध्यात्माधिदैविक- व्रह्मोपासना .... ४ ५९२ ....

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श्रीछान्दोग्योपनिषच्चतुर्थप्रपाठकस्यानुक्रमणिका ४ .... अथ चतुर्थप्रपाठक ४ जानश्रुति सत्यकाम उपकोसलादिकके संवादसैं सगति वायुआदिकार्य व्र- होपासन .. १७ ६०४ १ जानश्रुतिका हंसोक्तिकरि रैक्ककेपास जाने- मैं क्षत्ताकूं प्रेरण ... ८ ६०४ २ रैक्ककेअर्थ जानश्रुतिकरि धनादिप्रदान ५ ६२४ ३ आख्यायिकासहित सर्वोपलब्धिफलकसं- वर्गविद्या V ६३५ ४ सत्यकामकरि ब्रह्मचर्यार्थ गौतमगुरुगोचा-

रण ५ ६५६ ५ बलीबर्द (वायु)करि सत्यकामके अर्थ ब्रह्मके प्रथमपादकी उक्ति .... .. ३ ६६८ ६ अग्निकरि सत्यकामके अर्थ ब्रह्मके द्विती- यपादकी उक्ति .... .... .... ६७४ ७ हंस (सूर्य)करि सत्यकामके अर्थ ब्रह्मके तृतीयपादकी उक्ति .. ६८० ८ मद्गु(प्राण)करि सत्यकामकेअर्थ ब्रह्मके च- तुर्थपादकी उक्ति .. .... ६८५ ac ९ सत्यकामका वनतैं गुरुकुलविषै पुनर्गमन ३ ६९० १० उपकोसलकेअर्थ अग्निउक्त आत्मा (३ ब्रह्म)की विद्या ... .... .... ५ ६९६ ११ उपकोसलअर्थ गार्हपत्याग्निविद्या .... २ ७१३ १२ उपकोसलअर्थ अन्वाहार्यपचनाग्निविद्या २ ७१८ १३ उपकोसलअर्थ आहवनीयाग्निविद्या २ ७२२

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६ श्रीछान्दोग्योपनि० पंचमप्रपाठकस्यानुक्रमणिका ५

१४ उपकोसलकेप्रति अग्निनकी उक्ति औ ताका गुरुसें प्रसंग .... .... .... ३ ७२५ १५ गुरुकरि उपकोसलअर्थ अक्षिपुरुषोपासन औ अर्चिरादि गतिकी उक्ति ५ ७३२ १६ यज्नकी उपासना ५ ७४८ १७ यश्ञकेक्षत (छिद्र)की निवृत्तिअर्थ भूरादि व्याहृतिनका विधान .... .... १० ७६१

अथ पंचमप्रपाठक ५ TUP प्राणके ज्येष्ठता श्रेष्ठतादि अन्न वस्त्र। पंचा- ग्निविद्या। गतित्रय। वैश्वानरोपास्ति । विद्वद्ग्निहोत्र ॥ २४ ॥ १ इंद्रियसंवादसैं प्राणकी ज्येष्ठता श्रेष्ठतादि १५ ७७६ २ प्राणके अन्न वस्त्रका उपासन .... ८ ८०७ ३ पंचान्निविद्यार्थ श्वेतकेतु-प्रवाहण संवाद (पंचप्रश्न) .... ७ ८३३ ४ पंचमप्रश्नके निर्णयमैं स्वर्गलोकरूपाग्निविद्या २ ८६२ ५ पंचमप्रश्नके निर्णयमें पर्जन्यरूपाग्निविद्या ८६४ ६ पंचमप्रश्नके निर्णयमैं पृथिवीरूपान्निविद्या २ ८६७ ७ पंचमप्रश्नके निर्णयमें पुरुषरूपाग्निविद्या २ ८६९ ८ पंचमप्रश्नके निर्णयमैं योषित्रूपाग्निविद्या २ ८७१

९ प्रथमप्रश्नोपक्रम-कर्मसैं गमनागमनवान् जीवके अग्निसंबंधी जन्म नाश २ ८७६ १० साधिकारी उत्तरमार्गदक्षिणमार्ग औ तृती- यस्थान .... १०

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११ उद्दालकसहित प्राचीनशालादिकसैं अ- श्वपति संवाद ७ ९५३ १२ प्राचीनशालअश्वपति संवाद-(स्वर्गाSSत्मा) .... २ ९६७

१३ सत्ययज्ञ-अश्वपतिसंवाद (सूर्याS5त्मा) ९७२

१४ इंद्रद्युम्न-अश्वपतिसंवाद-(वायुआत्मा) २ ९७६

१५ जन-अश्वपतिसंवाद (आकाशाSडत्मा) २ ९८०

१६ वुडिल-अश्वपतिसंवाद- (जलाऽडत्मा) २ ९८४

१७ उद्दालक-अश्वपतिसंवाद-(पृथ्वीआत्मा) २ ९८७

१८ सर्वसैं अश्वपतिका संवाद (समस्तवैश्वा नरविद्या) .... २ ९९० १९ विद्ान्के अग्निहोत्रकी सिद्धि अर्थ "प्रा- णाय स्वाहा" यह प्रथमाहुति २ ९९८ २० "व्यानाय स्वाहा" इस द्वितीयाहुतिका कथन .... .... २ १००३ २१ "अपानाय स्वाहा" इस तृतीयाहुतिका कथन २ १००४ .... २२ "समानाय स्वाहा" इस चतुर्थाहुतिका कथन २१००६ .... .. २३ "उदानाय स्वाहा" इस पंचमाहुतिका कथन .... २ १००७

२४ ऐसे ज्ञाताकूं इस अग्निहोत्रका फल .... ५ १००८ श्रीछान्दोग्योपनिषत् षष्ठप्रपाठकस्यानुकमणिका ६ अथ षष्ठप्रपाठक६ उद्दालक-श्वेतकेतुसंवादपूर्वक "तत्त्व- मसि" इस महावाक्यका नववारो- पदेश .... ... .... .... १६ १०१७

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१ उद्दालक-शवेतकेतुप्रसंगसैं एकके जञानकरि सर्व ज्ञानोपदेश .... ७१०१७ २ सृष्टितैं पूर्व एकहीं अद्वैतसत्था तातैं ते- जआदि ३ भूतसृष्टि .... ४ १०३२ ३ ब्रह्मतै ईक्षणकरि ३ भूतत्रिवृत्करणसैं ना- मरूपसृष्टि .... ... ४ १०७२ ४ त्रिवृत्करण प्रदर्शनकररि विकारमिथ्यात्व औ हेतुसत्यत्व .... ७ १०९० ५ भुक्त पीत अन्न जल तेज (घर्मवस्तु)की त्रिविधता .... .... .... ४ ११०८ ६ मन प्राण औ वाक्की क्रमसैं अन्न जल औ तेजोरूपता ... .... ५ १११८ ७ षोडशकलपुरुषोक्तिसैं मनआदिकी अन्न- मयताआदिका निश्चय .... ६ ११२३ ८ सुषुप्ति औ अन्न जलद्वारा जगन्मूल सद- द्वैतोपदेश .... .... .... ७ ११३५ ९ मधुदृष्टांतसैं सत्प्राप््यज्ञानोक्तिकरि सदु- पदेश .... . ... ४ ११७३ १० नदीसमुद्र द्ृष्टांतसैं सत्तैंआगमकनके अज्ञानकी उक्तिकरि सदुपदेश .... ३ ११८२ ११ वृक्षदृष्टांतसैं जीवकी अमरताकरि सदुपदेश ३ ११८७ १२ वटबीजद्ष्टांतसैं सूक्ष्मतैं स्थूलोत्पत्ति कहिके सदुपदेश .... .... .... ३ ११९६ १३ लवणद्दष्टांतसैं अप्रत्यक्षसत्की अस्तिताकरि सदुपदेश ... .. .... .. ३ १२०४ १४ गंधारदेशतैं आनीत पुरुषद्टष्टांतसैं सदद्वै- तोपदेश .... ३ १२१४

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१५ मुमूर्षुपुरुषोदाहरणसैं सत्संपत्तिक्रम कहिके सदुपदेश ३ १२३१ १६ चोर तप्तपरशुग्रहणटष्टांतसैं सत्प्रा प मुक्त मृतकी क्रमसैं अनावृत्ति आ- वृत्ति हेतूक्तिकरि सदुपदेश .... .... ३ १२३८

अथ सप्तमप्रपाठक ७ सनत्कुमार-नारदसंवादसैं नामादि नि- देशद्वारा भूमविद्या .... .... .... २६ १२५९ १ सनत्कुमार-नारदप्रसंगसैं नामव्रह्मोपासन ५ १२६९ २ नामतैं वाक्की अधिकतरता .... .... २ १२७८ ३ वाकूतैं मनकी अधिकतरता .... २ १२८५ ४ मनतैं संकल्पकी अधिकतरता ३ १२९१ ५ संकल्पतैं चित्तकी अधिकतरता ३ १३०४ ६ चित्ततैं ध्यानकी अधिकतरता .... २ १३११ .... ७ ध्यानतैं विज्ञानकी अधिकतरता .... २ १३१७ ८ विज्ञानतैं बलकी अधिकतरता .... २ १३२३ ९ बलतें अन्नकी अधिकतरता .... २ १३२८ १० अन्नतैं जलकी अधिकतरता .... २ १३३३ ११ जलतैं तेजकी अधिकतरता .... २ १३३८ १२ तेजतैं आकाशकी अधिकतरता .... .... २ १३४३ १३ आकाशतैं स्मरणकी अधिकतरता .... २ १३४८ १४ स्मरणतें आशाकी अधिकतरता २ १३५३ १५ आशातैं प्राणकी अधिकतरता .... २ १३५८ १६ सत्यहीं जाननेकूं योग्य है। यह उपदेश १ १३७२

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१० श्रीछान्दोग्योपनि०अष्टमप्रपाठकस्यानुक्मणिका ८

१७ विज्ञानहीं जाननेकूं योग्य है। यह उपदेश १ ३३७६ १८ मतिहीं जाननेकूं योग्य है। यह उपदेश १ १३८२ 4hơ 4hơ 4ho 4hơ Tho १९ श्रद्धाहीं जाननेकूं योग्य है। यह उपदेश १ १३८३ २० निष्ठाहीं जाननेकूं योग्य है। यह उपदेश १ १३८५ २१ कृतिहीं जाननेकूं योग्य है। यह उपदेश १ १३८६ २२ सुखहीं जाननेकूं योग्य है। यह उपदेश १३८८ २३ भूमाहीं जाननेकूं योग्य है। यह उपदेश १ १३९० २४ भूमाके लक्षणका कथन १३९३ २९ ताका सर्वत्र पूर्णत्व अहंकारादेश औ आ- त्मादेश २ १४०४ २६ ऐसें जाननेवालेकूं फलका कथन २ १४१२

श्रीछान्दोग्योपनिषदष्टमप्रपाठकस्यानुक्रसणिका ८ अथाष्टमप्पाठक ८ दहराद्युपासन। ब्रह्मा-विरोचनेंद्रसंवाद औ शेषोक्ति .... १५ १४२२ १ दहरपुंडरीकमैं ब्रह्मका उपासन ६ १४२२ २ दहरव्रह्मोपासनका फल .... १० १५३३ ३ उक्तव्रह्मध्यानांगरूप फल। संप्रसाद। ब्रह्मके सत्य नामाक्षरनकीस्तुति .... ५ १४६० ४ ब्रह्मचर्यसैं संबंध अर्थ उक्तसंप्रसादकीस्तुति ३ १४७८ ५ स्तुत आत्माकी प्राप्ति अर्थ ज्ञानसहकारि ब्रह्मचर्यका विधान .... .... .... ४ १४८० ६ उक्तव्रह्मोपासककी मस्तकगतनाडीसैं गति कहनेकूं नाडीखंड .... .... .... ६ १५०८ ७ ब्रह्मा पास गत इंद्रविरोचनकूं अक्षिपुरुषोपदेश४ १५२७

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श्रीछान्दोग्योपनि०अष्टमप्रपाठकस्यानुक्रमणिका ८ ११

८ इंद्रविरोचनकूं जलपात्रमैं आत्मप्रदर्शन औ देहात्मभावसैं विरोचनका गमन .... ३ १५६७ ९ देहछायात्मामैं दोषकरि इंद्रका पुनरागमन औ ३२ पर्व वास ३ १५६७ १० इंद्रार्थ स्वप्रपुरुषोपदेश । तामैं दोषसैं इं- द्रका ३२ वर्ष वास .. ४ १५८० ११ इंद्रार्थ सुषुप्तपुरुषोपदेश। तामैं दोषसें इं- द्रका ३५ वर्ष वास .... १५९२ १२ मर्त्यदेहतें आत्माकी भिन्नता औ द्रष्टता। आत्मो- पासकफल ६ १६०० १३ जपध्यानार्थ श्यामतैं शबलकीप्राप्तिकी प्रार्थ- नाका मंत्र .... ११ आकाशनामसैं ब्रह्मके लक्षणपूर्वक प्रार्थ- १ १६६९

नामंत्र .... .... .... .... १ १६६५ १५ उक्तात्मज्ञानकी परंपराप्राप्तता औ कर्मोप- योग .... .... .... .... .... १ १६६७ इति श्रीछांदोग्योपनिषदनुक्रमणिका समाप्ता ॥

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ॐ तत्सद्रह्मणे नमः श्री सामवेदीय छान्दोग्योपनिषत्

पंडित पीतांबरजीकृत समूल भाष्य-भाषादीपिका तथा आनंदगिरिकृत टीकाटिप्पणी-सहिता प्रारभ्यते॥ । भाषाकर्तृकृतमंगलाचरण- पूर्वकग्रंथारंभप्रतिज्ञा॥ ॥ शार्दूलविक्रीडितटृत्तम् ॥ या वै संवित्स्वरूपा तदवगतिमया

दीपिका प्रारभ्यते॥। प्रथमप्रपाठकगत-प्रथमः खंडः ॥ १॥ भाषाकर्त्ताकृत मंगलाचरणपूर्वकग्रंथारं- भकी प्रतिज्ञा॥४ ॥ टीका :- जो सरस्वती विद्वानोंके अनुभवकरि

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२ ॥ भाषाकर्ताकृत मंगलाचरण ॥ वाङ्मुखाक्षादिरूपा सर्व वै दृश्यजातं रजतमिव यतो बाधितत्वान्न भिन्नम्॥ त्रय्या गीता द्िजेंद्रैः स्वसुकृतिसमये

प्रसिद्ध संवित् जो चेतनरूप ज्ञान तिसस्वरूप है औ "घट है पट है" इसरीतिसैं अज्ञ तज्ज्ञ साधारण सामान्यतैं होनेवाली जो ता ब्रह्मकी अवगति कहिये वृन्तिज्ञान है औ "मैं चेतन आनंद नित्यशुद्ध नित्यमुक्त असंगादिरूप हूं" इस रीतिसैं विशेषतैं विद्वान्के चित्तविषै होने- वाली जो ताब्रह्मरूप संवित्की अवगति तिसमय है औ वाक् है मुख्य जिनविषै ऐसे जे अक्ष कहिये इंद्रिय अरु आदिशब्दकरि तिनके शब्दादि वि- षय तिसरूप है औ सर्व प्रसिद्ध दश्यका समूह शु- क्तिरजतकी न्यांई वाधित (नित्यनिवृत्त) होनेतैं जिसतैं भिन्न नहीं है औ जो सरस्वती ब्राह्म- णादि त्रिवर्णोकरि त्रयी जो ऋगादि चतुर्वेदरूप विद्या तिससैं गायन करी है औ जो सरस्वती शास्त्रकारोंकरि स्वकीय श्रेष्ठ काव्यरचनाके सम- यविषै स्मरण करियेहै। तिस स्वस्वरूपभूत औ स्वसाक्षात्कारद्वारा भव जो संसार ताके भयकूं

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। भाषाकर्ताकृत मंगलाचरण ॥ ३

स्तूयते शास्त्रकृद्धिर्वदे तां स्वस्वरूपां भ- वभयसुहरां भारतीं ब्रह्मरूपाम्॥ १॥ ग्लांगंबी जार्णवैर्य सुहृदयजनता सि- डिकामा प्रपेदे यो वै स्वैर्मनुष्यैः स- कलमुरपुरः पूज्यते सर्वकार्ये। चित्सं- विन्नागवक्रः सरतिकवरदः सिद्धिबुद्धि- प्रयुक्तो वंदे तं ब्रह्मरूपं गणपतिमभयं श्रीशिवासूनुमग्र्यम् ॥२॥

सुष्रुप्रकारसैं हरणकरनेहारी भारती (सरस्वती)कूं मैं अभेदभावकरि वंदन करूंदूं। १॥। टीका :- ग्लौ अरु गं आदिक बीजरूप वर्ण- वाले मंत्रोंकरि जाकूं सिद्धिकी कामनावाला शुद्धहृदयवाले जनोंका समूह प्राप्त होता भया औ जो प्रसिद्ध सर्वश्रेष्ठ मनुष्यनकरि सर्व कार्यविषै सकल देवनतैं पूर्व पूजित होवैहै औ जो चेतनरूप ज्ञान वृत्तिज्ञान अरु गजव- दनरूप है औ जो प्रीतिसहित जनोंकेअर्थ व- रदेनेहारा है औ सिद्धिबुद्धिरूप स्वशक्तिन- करि युक्त है। तिस स्वस्वरूपसैं अभिन्न भयर-

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४ । भाषाकर्ताकृत मंगलाचरण ॥ यो वै वेदप्रणेता ऋषिमुनिवपुषा स- र्वलोकोपदेष्टा यश्रेशो देशिकेशो सकल- जनहृदिस्थो हृषीकेशरूपः ॥ स्वं शि- षयं स्वस्वरूपं स्वयमुपदिशति स्वीय-

हित ब्रह्मरूप गणपतिके तांईं मैं अभेदभाव- करि वंदन करूंदूं॥ २ ॥ टीका :- जो परमेश्वर प्रसिद्ध वेदका कर्त्ता है औ जो सनकादिक वसिष्ठ व्यास शुकदेव औ भगवत्पूज्यपाद श्रीशंकराचार्यआदिक ऋषि अरु मुनिवरोंके स्वरूपसैं सर्वलोकनका उपदेष्टा भयाहै औ मुमुक्षुनके चित्तमैं जो उपासनाकालविषै ईश्वररूप औ उपदेशकालविषै गुरुरूप औ बोध- कालविषै सकल जनोंके हृदयविषै स्थित ह- षीक जे इंद्रिय तिनका ईश कहिये प्रकाशक आत्मा तिस रूप प्रतीत होवैहै औ जो स्वस्व- रूपभूत अपने शिष्यकूं अरूप कहिये स्थूलादि आकाररहित अपने रूपकूं आचार्यमूर्ततिविषै स्थित होयके आप प्रसिद्ध उपदेश करैहै। तिस

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।। भाषाकर्ताकृत मंगलाचरण ॥ रूपं ह्रूपं वंदे तं देशिकेंद्रं मुनिवरवपुषं रामबापुस्वरूपम् ॥ ३॥ जंतून भ्रांतान् भवाब्धौ नरवरव- पुषो दुष्टमार्गे प्रसक्तान् सन्मार्गे नेतुका- मः श्रुतिवचनगणं व्याचचक्षे मुनीशः॥ मंदानां बोधदात्रीं नृवचनरचनां तस्य

मुनिवररूप राम (अखंडानंदसरस्वती) अरु बापुसरस्वतीस्वरूप गुरुराजकूं मैं देहाभिमान छोडिके वंदन करूंदूं॥ ३॥ टीका :- भवसागरविषै भ्रमण करते हुये औ काकतालीय न्यायवत् श्रेष्ठ (ज्ञानाधिकारी) मनुष्यदेहकूं प्राप्तभये औ गूलिका प्रवाह न्या- यकरि दुष्ट मार्गविषै प्राप्त भये जंतुनकूं श्रेष्ठमार्ग- विषै ल्यावनेकी कामनावाले मुनीश जेश्रीशंकरा- चार्य। सो श्रुतिवचनोंके समूहकूं व्यार्यान करते भये॥ तिस संस्कृत वाणीरूप व्याख्यानविषै मं- दबुद्धिवाले मनुष्यनके मोह (भ्रम)की निवृत्तिअर्थ ता संस्कृत व्याख्यानकी प्राकृत भाषारूप रचना करनेकूं प्रवृत्त भया जो मैं। सो पूर्व ईशा केन क-

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। भाषाकर्ताकृत मंगलाचरण ॥ कर्तु प्रवृत्तश्छान्दोगाख्यश्रुतिं वै नृवच- नकृतया टीकयाऽऽढ्यां करोमि॥४॥ ठवल्ली प्रश्न मुण्डक माण्डूक्य तैत्तिरीय ऐतरेय औ वृहदारण्यक। इन नव उपनिषदनका भाष्य अरु टीका सहितका जैसैं-होवै तैसैं भाषारूप व्याख्यान करिके। अब सामवेदविषै प्रसिद्ध औ भाष्य अरु आनंदगिरिस्वामीकत टीका- रूप युगल व्याख्यानोंकरि युक्त श्रीछांदोग्य- नामक उपनिषद्कूं भाषारूप व्याख्याकरि युक्त करताहूं ।।४॥

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अथ सामवेदीय श्रीछान्दोग्योपनिषत् प्रथम प्रपाठकस्य प्रथमः खंडः प्रारभ्यते ॥ १ ॥ ॐमित्येतदक्षर मुद्गीथमुपासीतामि- अथ श्रीछान्दोग्योपनिषन्मूलमात्रभाषा दीपिकायाः प्रथमप्रपाठकस्य प्रथमः खंडः प्रारभ्यते ॥१॥ अर्थ :- "ॐ" ऐसे इस उद्गीथरूप अक्ष- अथ प्रथमप्रपाठकाऽडरंभः॥१॥ सामावयवउद्गीथ (ऊकार) आदिकके उपासन १३

दीपिकायाः प्रथमप्रपाठकस्य-प्रथमः खंड: ॥१॥ रसतमत्वादित्निगुणविशिष्ट ऊँकारका परमात्मबुद्धि- सैं उपासन १० ॥ भाष्यभूमिका भाषा। "ओमित्येतदुक्षरं ("ॐ" ऐसे इस अ- अथ श्रीछान्दोग्योपनिषदो भाष्यभाषादीपिकायाः प्रथम- प्रपाठकगतप्रथमखंडस्य टिप्पणं प्रारभ्यते ॥ १ ॥ १ छंदोग (छंदनके गायनकरनेवाले सामवेदी)नके उप-

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प्रथमप्रपाठक १ [छान्दोग्यो- V उद्गीथ आदिकके उपासन १२. ति हुद्गायति। तस्योपव्याख्यानम्॥१॥ रकूं उपासनकरै। "ॐ" ऐसैं जातैं उद्वा- क्षरकूं)" इहांसैं आरंभ करिके अष्ट अध्याय- वाली सामवेदकी छांदोग्यउपनिषद् है। ता- का संक्षेपतैं सरलविवरणरूप यह अल्पग्रंथ निषद्के भेदकूं व्याख्यान करनेकूं इच्छते हुये भगवान् भा- व्यकार। करनेकूं वांछित तिसग्रंथकी परिसमाप्ति अरु प्रच- यके विरोधि जे पाप तिनकी नाशकी सिद्धि अर्थ ॐ कारके उच्चारणरूप मंगलाचरणकूं संपादन करतेहुये व्याख्यान क- रनेयोग्य ग्रंथके स्वरूपकूं दिखावैहैं॥ २ प्रयोजनसहित व्याख्यानकूं प्रतिज्ञा करैहैं ॥ ३ ननु शारीरक (ब्रह्मसूत्रभाष्य)विषै बहुतस्थलोंमें वि- स्तरकरि व्याख्यान किया होनेतें या ग्रंथका भाष्य अबी क्यूं आरंभकरिये है? तहां कहैहैं॥ इहां यह अर्थ है :- विस्तरसें व्याख्यानके किये हुये वी संक्षेपतैं या उपनिषद्का व्याख्यान सम्यक करिये है। काहेतैं विस्तृत अर्थके संक्षेप करिके ग्र- हण हुये सुखसें ग्रहण होनेतैं॥ ४ किंवा :- यह उपनिषद् तहां पाठक्रमके अनुसार व्या- ख्यान करी नहीं। प्रकृतविषय तो पाठके क्रमकूं न उल्लं- घन करिके व्याख्यान करियेहै। तातैं यह भाष्य युक्त है। ऐसें कहैहैं। इहां ऋुजु कहिये पाठक्रमके अनुसारि औ विव- रण कहिये अर्थका स्पष्टीकरण। प्रकृत उपनिषद्का जिसभा- व्यविषै है सो भाष्य ऋजु विवरण है। यह अर्थ है।। ५ ननु पाठक्रमकूं आश्रय करिके बी द्राविड भाष्य किया है। तातैं इस भाष्यसैं क्या है? यह आशंकाकरिके कहैहैं॥

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पनिषत्] प्रथम खंड ? उद्गीथ. (ऊकार) का उपासन १० यनकरैहै। ताका उपव्याख्यान [प्रवत्त होवैहै]॥ १ ॥ अंर्थके जिज्ञासुनकेअर्थ आरंभ करियेहै ॥ तहां संबंध :- समस्त कर्म अधिगत (ज्ञात भया) ६ ननु तथापि विशिष्ट अधिकारीके अभावके हुये कैसैं यह आरंभ करिये है? तहां कहैहैं॥ इहां यह भावहैः-जे प्रसिद्ध मुमुक्षु या उपनिषद्के विवक्षित अर्थकूं जाननेकूं इ- चछते हैं तिनकेअर्थ यह भाष्य प्रस्तुत करियेहै। ऐसैं हुये विशिष्ट अधिकारीके संभवहुये ताका आरंभ संभवै है औ ता अधिकारीकूं प्रकृत उपनिषद्के अर्थका परिज्ञानरूप अवांतर (परम फलका साधनरूप) फल होवैहै अरु तिसद्वारा कै- वल्य (मोक्ष)रूप परम फल होवैहै॥ ७ ननु उपनिषद्कूं कर्म विधिकी शेष ( उपकारक) हो- नेतैं ता (कर्मविधि)के व्याख्यानकरिहीं कृतव्याख्यानवाली होनेतैं पिष्टपेषण न्यायके प्रसंगतैं ताके भाष्यसैं जो करनाथा सो किया? यह आशंका करिके। उपनिषद् अरु कर्मकांडके शेषशेषी (साधनसाध्य) भावविषै प्रमाणके अभावतैं ऐसैं मतिकहो। या अभिप्राय करिके वेदके पूर्वोत्तर कांडनके नि- यमित पूर्व अपर भावके किये संबंधकूं प्रतिज्ञा करैहैं ॥ इहां यह अर्थ है :- तिस व्याख्यान करनेकी योग्यताकरि प्रस्तुत उपनिषद्का कर्मकांडके साथि संबंध कहियेहै। ८ कौंन यह संबंध है? इस अपेक्षाके हुये। ताके कह- नेकी इच्छाकरि कर्मकांडके अर्थकूं अनुवाद करैहैं॥ इहां यह अर्थ है :- विहित औ प्रतिषिद्ध कर्म पूर्वकांडविषै सिद्धहै॥

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१० प्रथमप्रपाठक १ [छांदोग्यो- उद्गीथ आदिकके उपासन १२. है। सो प्राणादि देवताओंके विज्ञानसहित हुया अर्चिरादि मार्गसैं कार्यब्रह्मकी प्राप्तिका कारण है औ केवंल कर्म धूमादि मार्गसैं चंद्रलोककी प्राप्तिका कारण है औ स्वैभावसैं प्रवर्त्त उक्त ९ तहां प्रसिद्ध विहितकर्म समुच्चित अरु असमुच्चित इस भेदकरि द्विविधहै। ऐसें अंगीकार करिके समुच्चितके फलकूं अनुवाद करैहैं॥ इहां यह अर्थ है :- प्राण औ अग्नि इत्या- दिक देवता हैं तिनका विज्ञान कहिये उपासन। तिसकरि समुच्चित (मिलित)जो अग्निहोत्रादि कर्म। सो अर्चिआदि- ककरि उपलक्षित देवयान मार्गसैं कार्यब्रह्म (हिरण्यगर्भ) की प्राप्तिविषै कारण है। परंतु ब्रह्मकी प्राप्तिविषै नहीं। का- हेतैं ता ब्रह्मकूं गंतव्यताके अभावतैं औ कार्यब्रह्मकीहीं गं- तव्यता (गमनकरनेकी योग्यता)कूं वादरीअधिकरणविषै सिद्धान्तकूं प्राप्तकरी होनेतैं। तातैं समुच्चित विहित (शुभ) कर्म परम पुरुषार्थका हेतु नहीं है। १० तिसीहीं असमुच्चित कर्मके फलकूं कहैहैं॥ ११ विहितकी गतिकूं कहिके अव निषिद्धकी गतिकूं क- हैहैं। इहां ऐसें अन्वय है :- स्वभाव करि कहिये शास्त्रकी अपेक्षासैं विना प्रकृतिके वशतैंहीं प्रवृत्त जे यथेष्टचेष्टा (यथे- ष्टाचरण)विषै रसिक हैं तिन कर्मउपासनाके अभावतैं देव- यान अरु पितृयाण मार्गविषै अनधिकारीनकूं तिर्यक् अवस्था- वाली क्षुद्रजंतुरूप अधोगति "अनंतर इनदोनूं मार्गनमैंसैं किसीकरि बी नहीं जाते किंतु वे ये क्षुद्र वारंवार आवर्त्तन- वाले भूत होवैहें। जायस्व म्रियस्व (जन्ममरणकूं पाव) यह

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पनिषत्] प्रथम खंड १ ११ उद्गीथ (ॐकार) का उपासन १० दोनूं मार्गनतैं परिभ्रष्ट पुरुषनकी कष्टरूप अ- धोगति कही औ उक्त दोनूं मार्गनमैंसैं एक मार्गविषैबी आत्यंतिकी पुरुषार्थकी सिद्धि तृतीयस्थान है" इस वाक्यकरि कही है। अपुनरावृत्ति (मुक्ति ) दुर्लभ है। १२ ननु उक्त दोनूंमैंसैं एकहीं मार्गविषै अधिकारीनकूं परमपुरुषार्थ होवैगा। काहेतैं "प्रसिद्ध ये दो शुक्क कृष्णरूप जगत्की शाश्वत (नित्य) गतियां संमतहैं"इस गीता स्मृतिकरि तिन दोनूं मार्गनकी नित्य फलवान्ताके निश्चयतैं? यह- शंका भई। यातैं कहैहैं॥ इहां यह शंका है :- ननु उक्त दोनूं मार्गनतैं भ्रष्ट पुरुषनकूं पुरुषार्थके अभावहुये वी दोनूं मार्गनके मध्य एकके होते वा पुरुषार्थ होवैगा ? ऐसैं जो कहै। तहां प्रथम देवयान मार्गरूप निमित्तकेहुये निरतिशय पुरुषार्थकी सिद्धि नहींहै। काहेतैं "इस मानव आवर्त्तकूं जे आवर्त्तन नहीं करैहैं तिनकूं इहां पुनरावृत्ति नहीं होवैहै" इस वाक्यविषै "इमं (इसकूं)" औ "इह (इहां)" ऐसे विशेषणतैं औ "एक मार्गकरि अनावृत्तिकूं जाताहै"इसगी तास्मृतिविषै अनावृत्तिकूं इसकल्प विषयक होनेतैं अन्यक ल्पविषै बी अनावृत्तिके हुये बी विशेषणकी व्यर्थतातैं औ पि- तृयाण मार्गके हुये बी निरतिशय पुरुर्षार्थकी सिद्धि नहीं है काहेतें "इसीहीं मार्गकेतांई फेर निवर्त्त होतेहैं। अरु अन्य मार्गकरि पुनरावृत्तिकूं पावताहै "ऐसे चंद्रस्थलतैं स्खलन (पतन) के निश्चयतैं। तातैं कर्मके वशतैं आत्यंतिक पुरुषार्थ- की प्राप्ति नहींहै। यह अर्थ है।।

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१२ प्रथमप्रपाठक १ [छान्दोग्यो- उद्गीथ आदिकके उपासन १. नहीं होवैहै। ऐसें है यातें कर्मनिरपेक्ष (कर्मकी अपेक्षासैं रहित) अद्वैत आत्माका विज्ञान जो है सो उक्त संसारकी तीन गतिनके कारणके उपमद्दन (निराकरण) करि कहनेकूं योग्य है। यातैं उपनिषद् आरंभ करियेहै॥ ॥ 'औ अ- १३ ऐसें कर्मफलकूं अनुवाद करिके फलितभये संबंधकूं कहैहैं॥ इहां यह अर्थ है :- उक्तरीतिकरि कर्म जातैं निर- तिशय पुरुषार्थका हेतु नहीं है। यातैं साधनसहित कर्मतें औ ताके फलतैं विरक्त अरु निरतिशय पुरुषार्थकूं कांक्षाक- रनेवालेकूं ता (मोक्ष)का साधन केवल आत्मज्ञान है। सो संसारके अंतर्भूत पूर्वोक्त तीन गतिनके हेतु कर्मके अरु ताके हेतुनके निराकरणकरि कहनेकूं योग्य है। या अभिप्राय- करि यह उपनिषद् आरंभ करियेहै।। जातें कर्मके अनु- ष्टानतैं निरतिशय पुरुषार्थ नहीं प्राप्त होवैहै ताकी "सो जैसे इहां कर्म रचितलोक क्षीण होवैहै" इत्यादि स्थलविषै क्षयशीलफलवान् ताकी श्रुतितैं। तैसैं हुये ईश्वरार्पणवुद्धि- करि अनुष्ठित शुभकर्मके वशतैं उत्पन्न शुद्ध बुद्धिवाले वि- रक्त मुमुक्षुकूं मोक्षकेसाधन ज्ञानअर्थ यह उपनिषद्का आरंभ है। ऐसैं [दशमैंसैं पूर्व अतीत दो अध्यायरूप ] कर्मकांडका इसज्ञानकांडके साथि हेतुहेतुमन्भाव (श्रुतिउक्त मोक्षके साधन ज्ञानकी हेतु चित्तशुद्धिकी हेतुमान्ता)रूप संबंध है॥ १४ ननु "तिनमैं मोक्षार्थी काम्य अरु निषिद्धविषै प्र- वृत्त होवै नहीं। किंतु प्रत्यवायके त्यागकी इच्छाकरि नित्यनै- मित्तिककूं करै" ऐसे वृद्धोंकरि उक्त होनेतैं काम्य अरु नि-

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पनिषत्] ग्रथम खंड १ १३ उद्गीथ (ऊकार)का उपासन १०

द्वैत आत्माके विज्ञानतैं अन्य साधनके होते आत्यंतिकी मोक्षकी प्राप्ति नहीं होवैहै। सो यह उपनिषद् आगे कहैगी :- "अनंतर जे इस अद्वैततैं अन्यथा जानतेहैं वे अन्य हैं राजा (स्वामी) जिनका ऐसैं हुये क्षयशील लोक- षिद्ध वर्जनीय हैं औ नित्य नैमित्तिककूं करिके स्थित भये मुमुक्षुकूं वर्त्तमानदेहके पात हुये फेर अन्य देहके ग्रहणविषै हेतुके अभावतैं अनायासकरि सिद्ध ज्ञानतैविनाबी मुक्ति होवैगी। यातैं तिस अर्थवान्ताकरि कैसैं उपनिषद् आरंभ क- रियेहै? तहां कहैहैं॥ इहां यह भावहैः-हे एकभविकवादी! जातैं तुजकरि कल्पना किया मोक्षका उपाय प्रमाणविना कल्पना करियेहै औ पौरुषेयवाक्य मूल प्रमाणविना प्रमाण नहीं है औ इहां (तेरे वाक्यविषै) श्रुतिस्मृतिरूप वा प्रत्यक्षादिरूप मूल नहीं देखियेहै औ यथावर्णित आचरणवालेकूंबी कर्म- शेषकेवशतैं देहान्तर संभवैहै औ एकभविक (एक जन्मका हेतु) कर्माशय (कर्मका संस्कार) नहीं संभवैहै। काहेतैं "तहां जे इहां रमणीय आचरणवाले हैं वे तदनंतर कर्मके शेषकरि" इ-

होवैहै।। त्यादि श्रुति स्मृतिके विरोधतैं। तातैं आत्मज्ञानतैंहीं मुक्ति

१५ अद्वैत आत्माके ज्ञानसैं रहित भेदज्ञानवाले कर्मानु- ष्ठानके कर्त्ताओंकी क्षयफलकरि युक्तताविषै वाक्यशेषकूं प्रमाण करैहैं।। इहां अद्वैत आत्माके उपदेशके अनंतर अथशब्दका अर्थ है औ जे फेर नहीं उपासन किया है गुरु जिनोनैं अरु गुरु उपदेशकरि शून्य हुये यथावुद्धि उक्त अद्वैततैं अन्यथा द्वैतकूं २

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१४ प्रथमप्रपाठक १ [छान्दोग्यो- उद्गीथ आदिकके उपासन १२. वाले होवैहैं" 'औ विपर्ययके होते "सो (विद्वान्) स्वराद् (परमात्मा) होवैहै" ऐसैं ॥ तैसैं द्वैतकूं विषय करनेहारे अनृतकी प्रतिज्ञावाले पुरुषकूं चोरकूं तप्तपरशुके ग्रहण हुये बंध अरु दाहके सन्भावकी न्यांईं बंधन औ संसारदुःखकी प्राप्ति हीं तत्व जानतेहैं वे परतंत्र हुये रागादिकरि कर्मकूं अनुष्ठान करते हुये विनाशि फलवाले होवैहैं। यह श्रुतिका अर्थ है।। १६ अद्वैत आत्माके ज्ञानतैं आत्यंतिक पुरुषार्थकी सिद्धि होवैहै। इस अर्थविषैवी वाक्यशेषकूं अनुकूल करैहैं॥ इहां चकारतैं क्रियापद अनुकर्षण करियेहै औ सो प्रसिद्ध वि- द्वान् विद्याकरि निरस्त है अविद्या आदिक मल जिसका ऐसा हुया आपके परिज्ञानतैं आपहीं परमात्मा होवैहै। भे- दज्ञानके हेतुकूं उच्छिन्न होनेतैं। यह अर्थ है॥ १७ भेदनिष्ट कर्मिनकूं निरतिशय पुरुषार्थ नहीं सिद्ध होवैहै औ कर्मकूं त्याग करनेवाले अद्वैतनिष्ठनकूं तो पुरु- पार्थ होवैहै। इस अर्थमैं वाक्यशेषविषै स्थित लिंगकूं दि- खावैहैं॥ इहां द्वैतहीं विषय है। वाचारंअण श्रुतितैं। अनृत रूप तिस द्वैतविषै है अभिसंधा (सत्यताका अभिमान) जिसकूं ऐसा जो पुरुष ताकूं बंधन जो परमानंदके आवि- ्भावसैं रहितता औ संसाररूप दुःखकी प्राप्ति। सो होवैहै॥ जैसें वस्तुतैं तस्कर (चोर) जो "मैं तस्कर नहीं हूं"ऐसैं मि- श्याहीं अभिमान करताहै ताकूं परिशोधनअर्थ तप्तपरशुके ग्रहणह्डुये दाह बंधन औ दुःखकी प्राप्ति प्रतीत होवैहै। तैसैं हीं द्वैतके अभिनिवेशवालेकूंवी होवैहै॥ ऐसै प्रथमकूं कहिके

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पनिषत् ] प्रथम खंड १ १५ उद्गीथ (ॐकार)का उपासन १० होवैहै ऐसे कहिके। अद्वैत आत्माविषै सत्य प्र- तिज्ञावाले पुरुषकूं अचोरकूं तप्त परशुके ग्रहण हुये बंध अरु दाहके अभावकी न्यांई संसाररूप दुःखकी निवृत्ति औ मोक्ष होवैहै। ऐसैं कहैगी। याहीतैं अद्वैत आत्माका ज्ञान कर्मसहभावी [अब द्वितीयकूं कहैहैं ] वस्तुतैं अतस्कर औ अन्योंकरि आरो- पित तस्करभाववालेकूं परिशोधनकी इच्छाकररि तप्तपरशुके ग्रहण हुये दाह आदिकके (अभावकी न्यांई द्वैतके ) अभा- वकररि उपलक्षित परमार्थसत्य प्रत्यगात्माविषै अभिमानवाले अरु द्वैततैं निवृत्त चित्तवालेकूं अनर्थका ध्वंस औ निरतिशय आनंदका आविर्भाव होवैहै। ऐसैं उक्त अर्थके अनुसारकरि आगे श्रुति कहैगी। ऐसैं योजना है॥ १८ केवल आत्मज्ञान कैवल्यका हेतु है ताकी सिद्धि अर्थ उपनिषद्का आरंभ है। ऐसैं स्वपक्ष दिखाया। औ स्वयूथ्य (वे- दान्तके एकदेशी एकभविकवादी) तो कर्म समुच्चित आत्मज्ञान मोक्षका साधन है तिस अर्थवान्ताकरि उपनिषद्का आरंभ है। ऐसें कहते हैं। तिनके प्रति कहैहैं॥ इहां यह अर्थ है :- "जो कृतक (क्रियासाध्य) है सो अनित्य है" इस व्याप्ति- करि अनुगृहीत जो "सो जैसै इहां कर्मरचित लोक क्षयकूं पावता है" इत्यादिरूप श्रुति है। तिसकरि कर्मफलकी अ- नित्यताके निश्चयतैं औ "ब्रह्मवित्पर ब्रह्मकूं पावता है" इ- त्यादि श्रुतिकरि ज्ञानके फलकी नित्यताकी सिद्धितैं ज्ञान अरु कर्मकी विरुद्ध फलवान्ताके निश्चयतैं अद्वैत आत्माका ज्ञान कर्मके साथि होनेकूं उत्साह करता नहीं। जातैं विरुद्ध तम अरु प्रकाशका समुच्चय (मिलाप) नहीं संभवैहै। तातैं

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१६ प्रथमप्रपाठक १ [छान्दोग्यो- उद्गीथ आदिकके उपासन १३. (मोक्षविषै कर्मरूप सहकारीवाला) नहीं है। काहेतैं क्रिया कारक अरु फलके नाशकरि "सत् एकहीं अद्वितीय आत्माहीं यह सर्व है" इत्यादि वाक्यसैं जनित ज्ञानके वाधक प्रत्यय (अन्यज्ञान)के असंभवतैं॥ ॥ नतुं कर्म विधिका ज्ञान। उक्त ज्ञानका बाधक है? ऐसैं जो कहै। सो बनै नहीं :- काहेतैं कर्त्ता भोक्ता २१

कर्म समुच्चित ज्ञानरूप अर्थवान् होनेकरि उपनिषद्का आरंभ नहीं संभवै है। १९ किंवा :- अद्वैत आत्माका ज्ञान स्वसाध्य(मोक्ष)की सि- द्विअर्थ कर्मकूं अपेक्षा करताहै वा स्ववाधकके नाशअर्थ कर्मकूं आपेक्षा करताहै? ये दो विकल्प हैं। तिनमैं प्रथम पक्ष ब- नैनहीं :- काहेतैं ताज्ानकूं असाध्य (अजन्य) फलवाला हो- नेतें। ऐसैं हुये आचार्य द्वितीय पक्षकेप्रति कहैहैं॥ इहां वा- क्यजनित अद्वैतआत्मज्ञानके। यह शेष (अध्याहार) है॥ औ ताज्ञानके वाधकके अभावकरि ताके परिहारअर्थ सहकारीकी अपेक्षा नहीं है। यह अर्थ है।। २० वाधक प्रत्ययके अभावकी असिद्धिकूं पूर्ववादी आ- शंका करैहै॥ इहां यह अर्थ है :- ताकूं विषय करनेवाला विधिप्रत्यय जो "यजनकरै" इत्यादि विधिकरि जनित कर्त्तव्य- ताका बोधरूप है। सो आत्माविषै कर्त्ताभाव आदिककूं आकांक्षा करता हुया अकर्त्तादिरूप आत्माके ज्ञानका वाधक होवैहै॥ २१ कौनकूं यह कर्मका विधि है अज्ञकूं है। वा विद्वान्कूं

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पनिषत् ] ग्रथम खंड १ उद्गीथ (ऊकार) का उपासन १० १७

स्वभावके ज्ञानवाले औ तिसकरि जनित कर्म फलविषै राग द्वेषआदिक दोषवाले पुरुषकूंहीं कर्मके विधानतैं॥ ॥ नतु जान्या है सकल वेदका अर्थ जिसनैं ऐसे पुरुषकूं कर्मके विधा- नतैं अद्वैत ज्ञानवान्कूंबी कर्म [कर्त्तव्य] होवैगा? है ? ऐसें विकल्प करिके। आचार्य प्रथमपक्षके प्रति कहैहैं॥ इहां यह अर्थ है :- कर्त्ता आदिक आकारवाला प्रमाण निर- पेक्ष प्रकृति (स्वभाव)करि जनित जो मिथ्याज्ञान तिस- वालेकूं औ तिस मिथ्याज्ञानसैं जनित कर्मफलकूं विषय क- रनेवाला जो रागादि दोष। तिसवालेकूं कर्म विधान करिये है। यातैं "मैं करत्ताहूं" इत्यादि मिथ्याज्ञानके अरु रागादि दोषके अभाव हुये कर्म विधान करनेकूं शक्य नहीं है "जो जोई जंतु करता है सो सो कामका चेष्टित है" इस स्मृतितैं। यातैं अज्ञानीकूं कर्मविधिपक्षके हुये ता विधिका प्रत्यय (ज्ञान) आत्मज्ञानका वाधक नहीं है। ज्ञानीकूं विधिकी प्रा- सिके अभावतैं॥ २२ द्वितीय विकल्पके प्रति द्वितीय (अन्य)वादी शंका करैहै॥ इहां यह अर्थ है :- जातैं अध्ययन किया है स्वाध्याय (स्वशाखारूपवेद) जिसनैं सो वैदिक कर्मविषै अधिकारकूं पा- वताहै औ अध्ययन जो है सो अर्थके बोधरूप फलवाला है। यह मीमांसकोंकी मर्यादा है। तैसैं हुये अध्ययनवाले ज्ञातसर्व वेदार्थकूं "यजनकरै" इत्यादि वाक्यकरि कर्मके विधानतैं आत्मज्ञानकूंबी कर्मकी अंगता (साधनता) जानियेहै औ आत्मज्ञान बाधकूं पावता नहीं। अविरोधतैं॥

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१८ प्रथमप्रपाठक १ [छान्दोग्यो- उद्गीथ आदिकके उपासन १३.

ऐसें जो कहै। सो वनै नहीं :- काहेतैं केर्मके अ- २३

धिकारीकूं विषयकरनेवाले स्वाभाविक (अ- शास्त्रजनित)कर्त्ता भोक्ताआदिकके ज्ञानकूं "ए- कहीं अद्वितीय सत् (ब्रह्म)रूप आत्माहीं यह सर्व है" इस ज्ञानकरि वाधित होनेतैं॥ तौतैं अविद्याआदिक दोषवालेकूंहीं कर्म विधान क- रियेहैं। अद्वैत ज्ञानवानकूं नहीं॥ याहीतैंहीं २३ प्रथम अर्थके बोधरूप फलवाला अध्ययन नहीं है। किन्तु सो प्रामाणिक अरु अक्षरोंकी प्राप्तिरूप फलवाला है। ऐसें अध्येता (अध्ययनकर्त्ता)ओंविषै प्रसिद्ध है। तहां अध्ययनविधिके वशतैं आत्मज्ञानकूं कर्मविधिका संबंध नहीं संभवै है॥ ऐसैं सिद्धांती परिहार करैहें॥ २४ किंवा "मेरा यह कर्म है। ऐसैं कर्मविषै स्वामीपनैकूं पायके व्यवस्थित पुरुषकूं विषय करिके प्रवर्त अरु प्रमाणकी अपेक्षाविना स्वभावसैं प्राप्त कर्त्ता आदिक आकारवाले वि- ज्ञानकूं वाक्यजन्य सम्यकज्ञानसैं वाधित होनेतैं कर्मफलविषयक राग आदिकके अयोगतैं तिस निमित्तवाले कर्मकेबी दुःखसैं अनुष्ठानके होनेतैं आत्मज्ञानीकूं कर्मका संभव नहीं है। ऐसैं कहैहैं॥ २५ अद्वैत आत्मज्ञानकूं कर्मविषै प्रवृत्तिके विरोधीपनैके हुये फलितकूं उपसंहार करैहैं॥ २६ अज्ञानीकूं कर्मविधि है आत्मज्ञानीकूं नहीं। इस अर्थ- विषै श्रुतिकूं कहैहैं॥ इहां ये तीनवी आश्रमी कर्मके अधि- कारी हैं। यह अर्थ है।

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पनिषत्] ] प्रथम खंड १ १९ उद्गीथ (ऊकार)का उपासन १० यह श्रुति आगे कहैगी :- "सर्व ये पुण्यलोकवाले होवैहैं। ब्रैह्रविषै सम्यक् स्थित पुरुष अमृत- भावकूं पावताहै" ऐसैं ॥ तहां इस अद्वैतवि- द्याके प्रकरणविषै अभ्युदय (सांसारिक फल) के साधन औ कैवल्य (मोक्ष)की सन्निधिरूप फलवाले अद्वैततैं किंचित् विकत ब्रह्मकूं विषय करनेवाले "मनोमय प्राणरूप शरीरवाला है" इत्यादिक औ कर्मकी समृद्धिरूपफलवाले कर्मा- २७ जैसें ब्रह्मचारी गृहस्थ अरु वानप्रस्थ ये तीन कर्मी हैं। तैसें जब ब्रह्मवेत्ताबी कर्मी होवै तब प्रथक् नहीं करियेगा औ प्रथक्करणतैं ताकूं कर्मका विधि नहीं है। ऐसें मानिके "ब्रह्मविषै सम्यकूस्थित" ऐसैं कहा ॥ २८ जव समुच्चयके असंभवतैं केवलहीं आत्मज्ञान कैव- ल्यका साधनहै। यातैं तिस अर्थवान्ताकरि उपनिषद् आ- रंभ करियेहै। बडा खेद है कि :- इस उपनिषद्विषै त्रि- विध उपासन क्यूं उपन्यास करियेहैं? तहां कहैहैं ॥ इहां "तहां" इस शब्दका उक्त रीतिकरि उपनिषद्के आरंभके होते। यह अर्थ है औ "सो जो वायुकूं दिशाकूं वत्सकूं जा- नताहै। सो पुत्ररोदनके प्रति रुदन करता नहीं " इत्या- दिक अभ्युद्यरूप फलवाले उपासन हैं अरु कैवल्यकरि स- सीप फलवानता नाम क्रममुक्तिरूप फलवानूता। औ निष्प्र- पंच अद्वैततैं किंचित् विकारी सगुण ब्रह्म है औ कर्मकी समृद्धिरूप फलवाले अरु कर्मफलगत अतिशयरूप फलवाले उद्ीथ आदिकके उपासन हैं। यह अर्थ है॥

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20 प्रथमप्रपाठक १ [छान्दोग्यो- उद्गीथ आदिकके उपासन १३ गके संबंधी। ऐसे त्रिविध उपासन कहिये हैं। रहस्यके सामान्यतैं औ मनोवृत्तिके सामान्यतैं जैसैं अद्वैतज्ञान मनोवृत्तिमात्रहै। ऐसें अन्य उ- पासनवी मनोवृत्तिरूपहैं। यातैं वृत्तिरूपताकरि ज्ञान औ उपासनोंका प्रसिद्ध सामान्यहै।॥ नेनु तब अद्वैतज्ञानका औ उपासनोंका कौंन विशेष है? तहां कहिये :- स्वाभाविक औ अक्रिय आत्मा- २९ आत्मविद्याके प्रकरणविषै त्रिविध उपासनके उप- न्यासविपै हेतुकूं कहैहैं।। इहां यह अर्थ है :- आत्मविद्या- विषै औ उपासनोविषै उपनिषद्पदकरि जाननेकी योग्यता- के अविशेषतैं॥ ३० तहांहीं अन्य हेतुकूं उद्भव करिके विभाग करैहैं॥ ३१ आत्मज्ञानका औ उपासनोंका उक्त सामान्य जब अंगीकार करिये है। तब फलतैं वी विशेष नहीं होवैगा ? ऐसें मानता हुया पूर्ववादी शंका करैहै। ३२ अब सिद्धांती फलतें विशेषकूं दिखावते हुये उत्तरकूं कहै हैं।। ३३ तहां प्रथम आत्मज्ञानके उपासनोतैं विशेषकूं दिखावै हैं।। इहां यह अर्थ है :- क्रिया कारक अरु फलके विभागसैं रहित कूटस्थरूप प्रत्यगात्माविषै स्वभावशब्दकी वाच्य अ- विद्याका किया अध्यारोपित कर्त्ता आदिक आकारका विज्ञान है। ताका अद्वितीयता आदिलक्षणवाले अधिष्ठानके स्वरू- पका ज्ञान निवर्त्तक है। जैसै रजुआदिक अधिष्ठानविषै स- र्षआदिकके आरोपरूप मिथ्याज्ञानका प्रकाशादि कारणकरि-

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पनिषत् ] प्रथम खंड १ २१ उद्गीथ (ऊकार)का उपासन १० विषै अध्यारोपित कर्त्ताआदिक कारक क्रिया अरु फलके भेदके विज्ञानका निवर्त्तक अद्वैतका वि- ज्ञानहै। रजुआदिकविषै सर्प आदिकके अध्या- रोपरूप ज्ञानके निवर्त्तक प्रकाशरूप निमित्त- वाले रजु आदिकके स्वरूपके निश्चयकी न्यांई॥ डैपासना तो शास्त्रअनुसार प्रतिपादित किं चित् आलंबनकूं लेके तिसविषै समान चित्त- वृत्तिओंके संतानका करण जो तिसतैं विल- क्षणवृत्तिके अंतरायसैं रहितहै सो (उपासन) है। यंह ज्ञान औ उपासनोंका विशेष है॥ वे ये उ- जन्य रजुआदिक अधिष्ठानके स्वरूपका निश्चय निवर्त्तकहै। तैसैं॥ ३४ अब उपासनोंके अद्वैतज्ञानतैं विशेषकूं दिखावैहैं॥ इहां शास्त्र "मनोव्रह्म है ऐसैं उपासन करै" इत्यादि है औ किंचित् आलंबन मनआदिक विवक्षित है॥ ३५ समानजातिवाले प्रत्ययोंके संतानका करण विच्छेद क- रिके विच्छेद करिके ध्यानके कर्त्ताकूं बी सिद्ध होवैहै। यातैं विशेषण देते हैं॥ ३६ आत्मज्ञानके औ उपासनोंके अवांतर विशेषकूं समाप्त करैहैं। ३७ ननु विद्याके प्रकरणविषै उक्त उपासनोंके उपदेशके संभवके हुयेबी विद्याहीं प्रधान होनेतैं प्रथमताकरि कहनेकूं योग्य है। उपासन करै अप्रधान होनेतैं पश्चात्पनैकरि कह-

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२२ प्रथमप्रपाठक ? [छान्दोग्यो- उद्गीथ आदिकके उपासन १३ पासन चित्तशुद्धिकर होनेकरि वस्तुतत्व (ब्र- ह्मस्वरूप)के अवभासक होनेतैं अद्वैतज्ञानके उपकारक हैं औ आलंबनरूप विषयवाले हो- नेतैं सुखसैं साधनेकूं योग्य हैं। यातैं पूर्व उ- पन्यास करियेहैं॥ तहां कर्मके अभ्यासकूं दढ- किया होनेतैं कर्मके परित्यागकरि उपासनावि- षैहीं चित्तका समर्पण दुःख करनेकूं है। यातैं कर्मके अंगोंकू विषय करनेवालाहीं उपासन प्र- नेकूं योग्य हैं? यह आशंका करि कहै हैं॥ इहां यह अर्थ है :- उपासनोंकूं ईश्वरार्पणबुद्धिकरि अनुष्ठित नित्यादि- कर्मकीन्यांई चित्तशुद्धिद्वारा ज्ञानके कारण होनेतें औ कार्य (फल )तै कारण (साधन)की प्रथमताकी प्रसि- द्वितैं औ साकारवस्तुरूप विषयवाले होनेकरि सुसाध्य हो- नेतैं मंद पुरुषनकी तत्काल तिनोंविषै प्रवृत्तिके संभवतैं आ- दिविषै उपासनोंका उपदेश संभवैहै। ३८ तथापि बहुविध उपासनोविषै क्यूं अंग संबंधीहीं उपासन प्रथम कहिये है? तहां कहैहैं॥ इहां यह अर्थ है :- प्राकृत पुरुषविषै कर्मके अध्यासकूं अनादि वासनाकरि दृढ किया होनेतें अभ्यास किये तिसतिस कर्मके त्यागकेहुये तिस कर्मके असंवंधि केवल उपासनविपै चित्तका समर्पण दुःख करनेकूं होवै है। यातैं कर्मके अंगका संबंधीहीं उपा- सन प्रथम कहिये है। ऐसैं आदिविषै कहिके फेर अन्य उपासन क्रमसें कहनेकूं योग्य हैं।

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पनिषत् ] प्रथम खंड १ २३ उद्गीथ (ऊकार)का उपासन १० थम आदिविषै उपन्यास (कहनेकूं आरंभ) करियेहैः- अथ उपनिषद् भाष्यव्याख्याऽSरंभ:॥ "ॐ" ऐसे इस अक्षररूप उद्गीथकूं उ- पासन करै॥ "ॐ" ऐसा यह अक्षर पैरमा- त्माका सैमीपका नाम है। यातैं तिसके उच्चा- रण किये हुये सो (परमात्मा) प्रियनाम ग्रह- णके हुये लोककीन्यांईं प्रसन्न होवैहै ॥ सो ४३

३९ दोनूं कांडनके नियत पूर्व अपर भावके किये संबं- धकूं औ उपनिषद्के तात्पर्यकूं कहिके । अब प्रतिअक्षरकूं व्याख्यानकरनेकूं इच्छते हुये आचार्य। प्रथमपादरूप प्रती- ककूं ग्रहण करै हैं॥ · ४० तहां प्रथम ॐकारकी वाच्यताके पक्षकूंहीं आश्रय करैहैं। ४१ परमात्माके अन्य नामोंतैं ऊकारके-विशेषकूं दि- खावै हैं। इहां नेदिष्ट कहिये अत्यंत निकट। अर्थ यह जो :- अतिशयकरि प्रिय है। ४२ ऊकारकी नेदिष्टता (अतिसमीपता) कूं समर्थन करैहैं। ४२ ननु ॐँकारकूं अन्यठिकाने परमात्माकी नामताके हुयेबी प्रकृतविषै क्या विवक्षित है ? यह आशंका करिके कहै हैं।। इहां यह अर्थ है :- जातैं प्रकृत वाक्यविषै सो " ॐ" ऐसा पद। इतिशब्द है शिरविषै जिसके ऐसा प्र-

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२४ प्रथमप्रपाठक १ [छान्दोग्यो- उद्गीथ आदिकके उपासन १३

(ॐ अक्षर) इहां इति शब्द है पर जिसके ऐसा प्रयोग किया (उच्चारण किया) परमा- त्माका अभिधायक (वाचक) होनेतैं व्यावर्त्तित (वाच्यतैं भिन्न) शब्दस्वरूपमात्र प्रतीत होवै है।। तैसैं हुये मूर्तिआदिककीन्यांईं यह पर- मात्माका प्रतीक संभवैहै ।। ऐसैं नाम होने- करि औ प्रतीक होनेकरि यह परमात्माके उ-

योग (उच्चारण ) किया है ।। इति शब्दके सामर्थ्यतैंहीं वाचक होनेतें वाच्यतैं भिन्नकिया "ॐ" शब्दका स्वरूप- मात्र उपास्य जानिये है। जहांहीं इति है परजिसके ऐसा प्रयोग नहींहै। तहां वाच्यके कहनेकी इच्छा है॥ जैसे "गौ- रिति (गौ ऐसें) यह कहै है" यह प्रयोग है [ तहां शब्द- मात्र विवक्षित है। तैसें इहां "इति" है पर जिसके ऐसा होनेतैं ॐकारका स्वरूपमात्र उपास्य विवक्षित है। ४४ ताकी उपास्यताके अर्थ श्रेष्ठताकूं साधतेहैं॥ इहां यह अर्थ है :- "इति" है पर जिसके ऐसे प्रयोगके वशतै वाच्यताके अभावके होते अर्चाशब्दकी वाच्य प्रतिमाकूं भगवत्की प्रतीकताकीन्यांई ऊँकारकूंवी परमात्माकी प्रती- कताकरि श्रेष्ठ होनेतैं उपास्यताकी सिद्धि है॥ ४५ प्रमाणसहित ताकी श्रेष्टताकूं निगमन करैहैं॥ इहां सर्व वेदांतनविषै कहिये "यह आलंबन श्रेष्ठ है"इत्यादि श्रुति- वाक्यनविषै॥

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पनिषत् ] प्रथम खंड १ २५ उद्गीथ (ऊकार) का उपासन १० पासनका साधन श्रेष्ठ है। ऐसैं सर्वउपनिषद- नविषै निश्चित है औ जंप कर्म अरु स्वाध्यायके आदि अंतविषै बहुतवार याके प्रयोगतैं तिस ऊकारका श्रेष्ठपना प्रसिद्ध है। याँतैं तिस इस वैर्णात्मक अरु उद्वीथरूप भक्तिका अवयव हो-

४६ किंवा :- इसकी श्रेष्ठता समर्थन करने योग्य नहींहै प्रसिद्ध होनेतैं। ऐसें कहैहैं॥ इहां यह अर्थ है :- गायत्री आ- दिकके जपविषै यज्ञादि कर्मविषै औ स्वाध्यायके आदि अरु अंतविषै ऊँकारका प्रयोग देखियेहै औ "तातैं ॐ ऐसें उदा- हरण करिके वैदवादिनके विधानकरि उक्त यज्ञ दान तप अरु क्रिया निरंतर प्रवर्त्त होतेहैं औ ब्राह्मण। आदि अरु अंत- विषै सर्वदा प्रणवकूं करै। ऊँकाररहित पूर्व किया कर्म स्र- वताहै औ पीछे क्रियाकर्म विनाशकूं पावता है" इस स्मृ- तितैं औ "ब्राह्मण ॐ ऐसे कहनेकूं इच्छता हुया कहैहै" इत्यादि श्रुतितैं ॥ ४७ "ॐ इति" ऐसा यहभाग व्याख्यान किया। अब "यह अक्षर है" इस भागके अर्थकूं कहैहैं।। इहां श्रेष्ठपना उपा- स्यताके अर्थ अनुकर्षण करिये है। ४८ "औ व्याप्तितै समंजस है" इस न्यायकरि विशेष- णकी अर्थवान्ताकूं अभिप्रायकी विषय करिके "रूढि। योगकूं अपहार करैहै" इस न्यायकरि अक्षर शब्दके प्रकरणकूं अनु- सरिके प्रसिद्ध अर्थकूं कहै हैं।। ४९ ग्ाम दग्ध भया। पट दग्ध भया। याकी न्यांई एकदे- ३

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२६ प्रथमप्रपाठक १ [छान्दोग्यो- उद्गीथ आदिकके उपासन १३

नेतैं उद्गीथ शब्दके वाच्य ऐसे अक्षरकूं उपा- सन करै कहिये कैर्मके अंग (उद्गीथ)के अ- वयवभूत ॐँकाररूप परमात्माके प्रतीकविषै दृढ एकाग्रतारूप मतिकूं प्रवाहरूप करै॥ आ- पैहीं श्रुति ऊकारकूं उद्गीथशब्दकी वाच्यता- विषै हेतुकूं कहैहै :- "ॐ" ऐसैं उद्गायन करै- है कहिये "ॐ" ऐसैं आरंभ करिके जातैं [यज्ञादि कर्मविषै उद्वाता] उच्चस्वरसैं गायन करैहै। यातैं उद्ीथ ऊँकारहै। यह अर्थ है॥ ताका उपव्याख्यान कहिये तिस अक्षरका

शविषै समुदायकूं विषय करनेवाला पद प्रवृत्त भयाहै। ऐसें कहैहैं।। ५० उपासनाकूं विभाग करै हैं। ५१ ननु उद्गीथका अवयव होनेतें ॐकारविषै तिस उ- द्वीथशब्दकी प्रवृत्ति है। ऐसें उक्त होनेतें अनंतरका वाक्य अकिंचित्कर है? यह आशंका करिके। श्रुतिउक्त जो अ- स्मदुक्त हेतु है सो तिसकरि स्पष्ट करियेहै। तातें उत्कर्ष- करिके हमोनैं दिखाया है। इस अभिप्रायकरि कहै हैं॥ ५२ "ॐ ऐसा यह अक्षरहै" इस ठिकाने उपासनाकी उत्पत्तिका विधि कहा। अव गुणकूं कहनेकूं इच्छतेह्ठुये वा- क्यान्तरकूं लेके व्याख्यान करै हैं।

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पनिषत् ] प्रथम खंड १ २७ उद्गीथ (ॐकार) का उपासन १०

उपव्याख्यान। ऐसे उपासनवाला ऐसी वि- ५४

भूतिवाला ऐसे फलवाला। इत्यादि कथनरूप ५५

उपव्याख्यान प्रवर्त होवैहै। यह वाक्यशेष है ।। १ ॥

५३ इहां अत्यंत रसरूपताका प्राप्ति समृद्धि है। ऐसे गु- णवाला उपासन जिस अक्षरका है सो अक्षर तैसा (एवमुपा- सन) है। यह अर्थ है॥ ५४ इहां परम परा्ध्य तिसकरि यह त्रयी (वेदरूप) विद्या प्रवर्त्त होवै है। इत्यादि विभूति है स्तुति जिसकी सो- तैसा (एवं विभूति) है। यह अर्थहै॥। ५५ इहां "कामोंका निश्चयकरि प्रापक है" इत्यादि फल है जिस उपास्यके साक्षात् कारका सो तैसा (एवंफल) है। यह अर्थ है। औ गोदोहनकीन्यांई आश्रयकरिके विधा- नतैं अधिकारीके अधिकारवाला यह उपासन है। तथापि प्रथकूहीं है। काहेतैं "प्रथक्हीं प्रतिबंधरहित फल है" इस न्यायकरि फलवाला है। औ फल जो है सो यजमानका है। उद्गाताकूं यजमानकरि कर्मअर्थ क्रीत (मोललिया) होनेतैं ताके किये उपासनकाबी यजमानरूप स्वामीकूं फल होवैहै। यह वचन आदिशब्दका अर्थ है।। ५६ वाक्यकी आकांक्षा सहितताकरि व्यर्थताकूं निवा- रते हैं।।

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२८ प्रथमप्रपाठक १ [छान्दोग्यो- उद्गीथ आदिकके उपासन १३

एषां भूतानां पथिवी रसः एथिव्या आपो रसोऽपामोषधयो रस ओषधी- अर्थ :- इन भूतनका पथिवी रस है। पथिवीका जल रस है। जलनका ओषधि- टीका :- इन चराचर भूतनका पथिवी र- सहै कहिये गति परिणाम अवष्टंभ है। पथिवी का आप (जल) रसहै जैलविषै जातैं पृथि- वी ओत है अरु प्रोत है यातैं वे (आप) पृ- थिवीका रसहै। जलनका ओषधियां (अन्न) रसहै औषधिनकूं जलका परिणाम होनेतैं। ५७ इसीहीं उपव्याख्यानकूं अनुवर्त्तन करतेहुये ऊँका- रके रसतमतारूप गुणकूं विधान करनेकूं पातनिका (भू- मिका)कूं करैहैं॥ इहां "गति" यह उत्पत्तिकी कारणता औ "परायण" ऐसैं स्थितिकी हेतुता औ "अवषंभ" ऐसैं प्रलयकी कारणता कहियेहै। यह भेद है॥ वा विपरीतपनै- करि ये पद लगावनेकूं योग्य हैं॥ ५८ जलोंकूं पृथिवीकी रसता साधतेहैं॥ इहां इस अर्थकी अन्य श्रुतिविषै प्रसिद्धिकूं द्योतन करनेकूं "हि" शब्द है ॥ ५९ औषधिनकी जलके प्रति कारणताके अभावतैं कैसैं तहां रस शब्दहै? तहां कहैहैं॥ इहां कारणपरताकरि पूर्व

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पनिषत् ] प्रथम खंड १ २९ उद्गीथ (ऊँकार) का उपासन १० नां पुरुषो रसः पुरुषस्य वाग्रसो वाच ऋुग्रस ऋचः साम रसः साम्न उद्गीथो रसः ॥ २॥ यां रस है। ओषधिनका पुरुष रस है। पु- रुषका वाक् रस है। वाक्का ऋक् रस है। ऋकका साम रस है। सामका उद्गीथ रस है। २ ॥ तिन ओषधिनका पुरुषरस है पुरुषकूं अ- न्नका परिणाम होनेतैं। तिस पुरुषकाबी वाक् (वाणी) रस है पुरुषके अवयवनका जातैं वाक् अतिशय सार है यातैं वाक् पुरुषका रस क- हियेहै। तिस वाक्काबी ऋक्र (ऋग्वेदकी वाक्यविषै व्याख्यान किया बी रसशब्द "गोरस" याकी न्यांई उत्तर वाक्यविषै कार्यपरताकरि व्याख्यान करनेकूं योग्य है। यह अर्थ है॥ ६० ननु औषधिनका पुरुष रस कैसैं है। जातैं तिनकरि यह नहीं करियेहै? तहां कहै हैं॥ ६१ पुरुषकी रस ता वाकूकूं समर्थन करैहैं॥ इहां जातैं वाक्विहीन अन्यपुरुषके प्रति विशेषकर निंदतेहैं। यातैं वा- कूकी सारतमता प्रसिद्ध है। यह "हि " शब्दका अर्थ है

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३० प्रथमप्रपाठक १ [छान्दोग्यो- उद्गीथ आदिकके उपासन १३

स एष रसाना रसतमः परमः पराडर्योऽष्टमो यदुद्वीथः॥ ३॥ अर्थः-सो यह रसोंका रसतम। परम। पराधर्य। अष्टम है। जो उद्ीथ है॥ ३॥ वाक्यरूप ऋचा) रस (अत्यंत सार) है। ऋकका साम रस (अत्यंत सार) है। तिस- सामकावी उद्गीथ कहिये प्रसंगविषै प्राप्त हो- नेतैं ॐकार सारतर (अत्यंत सार) है॥ २॥ टीका :- ऐसैं सो यह उद्रीथ नामवाला ॐ औ ता वाक्की अत्यंत साररूपताकी प्रसिद्धि अतः (यातैं) शब्दका अर्थ है॥ ६२ वाक्करि निर्वाह करने योग्य होनेतैं ऋकूकूं ता वाकूकी रसताहै। या अभिप्राय करिके कहैहैं॥ ६३ ऋकूतें वी तिसकररि निर्वाह किया साम गीयमान- हुया वक्ता अरु श्रोताकूं सुखकर होवैहै। ऐसैं मानिके कहैहैं॥ ६४ "उद्गीथ" शब्दकूं अवयवविषै प्रकरणतैं नियमन करैहैं।। ६५ जातैं ऊँकाररहित किया साम फलअर्थ नहीं हो- वैहै। ऐसें मानते हुये कहै हैं॥ ६६ जिस अर्थ पृथिवी आदिकनकी रसरूपता कही। तिस प्रयोजनकूं अब दिखावै हैं॥

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पनिषत ] प्रथम खंड १ ३१ उद्गीथ (ऊकार) का उपासन १०

कार भूतआदिकनके उत्तर उत्तर रसोंका अ- तिशयकरि रसरूप ऐसा रसतमहै॥ औ पैं- रम है। परमात्माका प्रतीक होनेतैं॥ औ परार्ध्य है। पर (परमात्मा) ऐसा अर्ध जो स्थान सो परार्ध है ताके तांईं योग्य होवैहै यातैं परार्ध्य (परमात्मा रूप स्थानके योग्य) है पैरमात्मा- की न्यांई उपास्य होनेतैं। यह अभिप्राय है। औ अष्टम पृथिवी आदिक रसनकी संख्याविषै जो उद्गीथ है॥ ३॥ ६७ रसतमता (अत्यंत सारता) रूप गुणवाले ऊँकारकूं उपास्यताके अर्थ दो विशेषणोंकरि महान् करैहैं॥ ६८ तिसकी परमात्मस्थानकी योग्यताकूं समर्थन करै- हैं।। इहां जैसै परमात्मा स्वरूपताकरि अनुसंधान करियेहै। तैसैं इस (ॐँकार)कूंबी तिसरूपसैं अनुसंधान करनेयोग्य होनेतैं विष्णुबुद्धिकरि आलंबनके योग्य प्रतिमाकी न्यांई यह- वी परमात्मबुद्धिकरि आलंबनके योग्य हौवै है। यह अर्थ है। ६९ ऊकारतैं पराचीन रस नहीं है। यातैं ताकी रसत- मताके स्पष्ट करनेअर्थ परिगणनातैं सिद्ध अष्टमपनैकू अनु- वाद करैहैं॥ ७० ननु भूतोंकू आरंभकरिके नवमभावके प्रतीयमान हुये ऊकारकी अष्टमता कैसैं प्रतिज्ञा करियेहै? तहां कहैहैं॥ ७१ "सो यह" ऐसैं उक्त अर्थकूं स्पष्ट करनेकूं जो उद्गीथ

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३२ प्रथमग्रपाठक १ [छान्दोग्यो- उद्गीथ आदिकके उपासन १३ कतमा कतमर्क्कतमत्कतमत्साम। अर्थ :- कतमा कतमा (कौंनसी कौंनसी) ऋक है। कतमत् कतमत् (कौंनसा कौं- टीका :- "वौक्का ऋक रस है" ऐसैं पूर्व कहा। तहां कौनसी सो ऋक्र (ऋचा) है। कौंनसा सो साम है। वा कौंनसा सो उद्गी- थ है ।। [इहां कँतमा कतमा (कौंनसी कौंन- सी) ऐसी जो वीप्सा (मूलविषै दो वार क- थन) है। सो आदरअर्थ है]। ॥ नँतु "व- है। तिस पदकूं व्याख्यान करैहैं। इहां पूर्वकी न्यांई उद्गीथ शब्द अवयवपर जाननेकूं योग्य है। ७२ अब अन्य गुणके विधानअर्थ प्रश्नकूं प्रकटकरते हुये पूर्वउक्त अर्थकूं अनुवाद करै हैं ।। इहां ऋचाका साम रस है औ सामका उद्गीथ रस है। ऐसैं पूर्व कहा है। ऐसें देख- नेकूं योग्य है।। ७३ अव ऋकू आदिककी जातिकूं जाननेकूं इच्छताहुया पूर्ववादी पूंछताहै। ७४ प्रश्नविषै तीन वीप्सा जे हैं वे तिस तिस जातिके ज्ञानविषै श्रद्धाके अतिशयकूं दिखावनेकूं हैं। ऐसें कहै हैं॥ ७५ तीन प्रश्नोंके प्रति पूर्ववादी आक्षेप करै है॥। इहां अनेक जातिनकरि विशिष्टपदार्थनके मध्य जब एकजातिके

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पनिषत्]! प्रथम खंड १ ३३ उद्गीथ (ॐकार) का उपासन १०

कतमः कतम उद्गीथ इति विमृष्टं भ- वति॥४॥ नसा) साम है। कतमः कतमः (कौंनसा कौं- नसा) उद्गीथ है। ऐसैं विचार किया होवै है।। ४ ॥ हुतनकी जातिके परिप्रश्नविषै" वा "डतमचू शब्द होवैहै" यह नियम है । इहां प्रसिद्ध ऋचाओंकी जातिका बहुत्व नहींहै। कैसैं निर्द्धारण अर्थ प्रश्न होवैहै। तब तिस विषयविषै "डतमच्" प्रत्यय होवै। जैसैं बहुत कठ आदिकनकेमध्य कठ जातिके निर्णय अर्थ "कौंनसे कठ हैं" ऐसा प्रश्न देखिये है। तैसैं अन्य ठिकाने बी है। यह सूत्रका अर्थ है।। ७६ ननु बहुतनकी एकजातिके निर्द्धारणविषै "डत- मच्" प्रत्ययके विधानके हुये बी प्रकृत तीन प्रश्नोंके विषै कौंन असंभव है ? ॥ इधर "इहां" ऐसें अध्यापक अरु अध्येताके व्यवहारकी भूमि कही है औ ऋचाओंकी जातिका ग्रहण जो है सो। सामोंकी जातिका अरु तद्गीथोंकी जातिका उप- लक्षण है।। ७७ ननु तिनकी बहुताके अभाव हुये बी हमारा क्या छेदन होवैहै? ऐसा जो सिद्धांती कहै। तहां पूर्ववादी कहैहै। इहां यह अर्थ है :- ऋकू आदिककी जातियां जब बहुत होवैं

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३४ प्रथमप्रपाठक १ [छान्दोग्यो- उद्गीथ आदिकके उपासन १३ "डतमच्" शब्दका श्रुतिनैं प्रयोग किया? तहां यँह दोष नही है :- काहेतैं "जातिविषै जो परिप्रश्न सो जातिपरिप्रश्न है" ऐसैं इस विग्रहके हुये जातिविषै ऋचाओंकी व्यक्तिनकी बहुलताके संभवतैं॥ औ "जातिका परिप्रश्न है" ऐसें विग्रह नहीं करियेहै॥ ॥ ननु "जा- तव तिनके मध्य कौंनसी ऋचाओंकी जाति। वा कौंनसी सामोंकी जाति। वा कौंनसी उद्गीथकी जाति। इहां विवक्षित है। ऐसा प्रश्न घटित होवै अरु तहां जातिका बहुत्व नहीं है। प्रमाणके अभावतैं। यातैं तीन प्रश्न अघटित हैं। यह पूर्वपक्षीकी शंका है।। ७८ प्रश्नके असंभवकूं सिद्धांती दूषण देते हैं॥ इहां यह अर्थ है :- तिस तिस जातिकरि विशिष्ट बहुतनके सन्निधान- विषै जातिके होते व्यक्तिनकी बहुलताके संभवतैं अन्यतमके निर्द्धारणअर्थ प्रश्नविषै विकल्पकरि (भिन्न भिन्न) "डतमच्" प्रत्यय होवैहै। ऐसैं सूत्रार्थके अंगीकारतैं ॥ ऋक आदिककी जातिविषै ताकी व्यक्तिनकी बहुलतातैं कौंनसी ताकी व्यक्ति "वाक्ूका ऋक् रस है" इत्यादि वाक्यविषै विवक्षित है। ऐसैं' प्रश्नके पर्यवसानतैं तीन प्रश्न बनै हैं॥ ७९ औ जो अन्यविग्रहकूं ग्रहणकरिके प्रश्नका असंभव है ? ऐसैं पूर्ववादीनैं कहा। तहां कहैहैं॥ इधर "तहां" अनुपपत्तिकूं "जब जातिका" इस वाक्यविषै स्पष्ट करेंगे॥ ८० तब हमारेकूं इष्ट जो विग्रह है ताके अग्रहण हुये

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पनिषत् ] प्रथम खंड १ ३५ उद्गीथ (ऊकार) का उपासन १० तिका परिप्रश्न है" ऐसे इस विग्रहविषै "कौं- नसा कठ है" इत्यादि उदाहरण घटित है औ "जातिविषै परिप्रश्न है" इस विग्रहविषै तो नहीं घटताहै? तैहांबी कठ आदिककी जाति विषै हीं व्यक्तिनकी बहुलताके अभिप्रायसैं प- रिप्रश्न है। यातैं अदोष है॥ जब जातिका प- रिप्रश्न होवै तब कौंनसी कौंनसी ऋक् इत्या- दिकविषै उपसंख्यान कर्त्तव्य होवै॥ ऐसैं हहां विमृष्ट होवैहै कहिये विमर्श (विचार) किया होवैहै ॥ ४ ॥ वृत्तिकारका उदाहरण विरोधकूं पावैहै। काहैतैं कठशब्दके व्यक्तिविशेषताके अभावतैं। ऐसें पूर्ववादी शंका करैहै॥ ८१ उदाहरणके हुयेबी कठजातिके होते ताकी व्यक्तिकी बहुलतातैं तिन व्यक्तिनके मध्य अन्यतम (एकव्यक्ति)के नि- र्द्धारणके अभिप्रायसैं प्रश्नविषै "डतमच्" प्रत्यय है ऐसै अं- गीकारतैं परोक्त उदाहरणका विरोध हमारेपक्षविषै नहीं है। ऐसें सिद्धांती परिहार करैहैं। ८२ ननु दोनूं प्रकारसैं बी विग्रहके संभव हुये तुमारेकूं इष्ट जो विग्रह है सो क्यूं नियम करिये है ? तहां कहैहैं॥ इहां यह अर्थ है :- हे पूर्ववादी ! तेरेकूं इष्ट जो विग्रह है ताका ग्रहण जो होवै। तो ऋगादिजातिकी एकतातैं वा प्रत्येककी बहुलताके अयोगतैं "बहुतनकी" इत्यादि सूत्र-

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३६ प्रथमप्रपाठक १ [छान्दोग्यो- उद्गीथ आदिकके उपासन १३ वागेवर्क्। प्राणः सामोमित्येतदक्ष- अर्थ :- वाकहीं ऋक् है। प्राण साम है। टीका :- विमैर्श (विचार) के किये हुये प्रति- वचन (प्रत्युत्तर) की उक्ति उपपन्न होवैहैः- वींक हीं ऋक है। प्राण साम है ऐसैं। वीकू अरु ऋचाकी एकताके हुयेबी ताकी अष्टमताका व्याघात नहीं है काहेतैं आप्तिरूप गुणकी सिद्धि करि कौंनसी ऋकू है अरु कौंनसा साम है। यह उदाहरण नहीं सिद्ध होवैगा। तैसैं हुये तिस ( उदाहरण) की सि- द्विअर्थ पृथक् पृथक् विधान प्राप्त होवै। जातैं वैदिक उ- दाहरण प्रमत्तके गीतकी न्यांई त्यागनेकूं शक्य नहीं। तातैं ऋुक् आदिककी व्यक्तिहीं इहां पूंछनेकूं युक्त है।। ८३ ऐसें उक्त रीतिसैं क्यूं विचार करिये है। विवक्षित ऋक् आदिकका स्वरूपहीं आदिविषै उपन्यास करनेकूं योग्य है लाघवतें ! यह आशंका करिके कहै हैं॥ ८४ शिष्यभूत श्रुतिकररि प्रश्नके किये हुये। आचार्यभूत सोई श्रुति परिहार करै है।। ८५ ननु आद्य उत्तरविषै वाक् अरु ऋचाकी एकताके निश्चयतै ॐकारका रसतमवाक्यकरि उपदेश किया अष्टम- पना व्याघातकूं पावैगा? यह आशंका करिके कहै हैं। ८६ ननु फेर रसतमवाक्यतैं यह प्रश्न उत्तररूप वाक्य

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पनिषत्] ग्रथम खंड १ ३७ उद्गीथ (ऊकार) का उपासन १० रमुद्धीथस्तद्ा एतन्मिथुनम्। यद्वाक् च प्राणश्चर्क च साम च ॥ ५॥ "ॐ" ऐसा यह अक्षर उद्गीथ है। सो प्रसिद्ध यह मिथुन है जो वाक है औ प्राण है। औ ऋक है अरु साम है॥ ५॥ अर्थ पूर्व वाक्यतैं याकूं वाक्यान्तररूप होनेतैं।। औ "ॐ" ऐसा यह अक्षर उद्ीथ है॥ ऐसैं। वाँकू अरु प्राण। ऋक् अरुसामके कारण कैसैं भेदकूं पावता है। अर्थकी अधिकताके अभावतैं [भेद भासता नहीं ] ? तहां कहैहैं॥ इहां यह अर्थ है :- जातैं पूर्ववाक्य ऊँकारकी रसतमताकूं विधान करैहै। यह वाक्य तो ताहीके आप्तिरूप गुणकूं विधान करैहै। तैसैं हुये तैसे गुणकी विधि अर्थ होनेकरि याकूं वाक्यांतररूप होनेतैं इस वाक्यके वशतैं अष्टमताके अभावहुयेबी पूर्ववाक्यतैं ऊँकारकी अष्टमता अ- विरुद्ध है।। ८७ तथापि ऋकूआदिनकी जातिके पूंछे हुये "वाक्हीं ऋकूहै" इत्यादि उत्तर कैसैं उचित है। ताकी व्यक्तिविशे- षका वचनहीं प्रश्नानुसारि है ? यह आशंकाकरिके कहैहैं॥ इहां यह भाव है :- वाक् ऋचाकी योनि है ताकी निर्वाहक होनेतैं औ प्राण सामका हेतु है। जातैं प्राणके बलकरि गीति उत्पादन करिये है। तैसें हुये "वाक्हीं ऋकू है" इत्यादि ४

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३८ प्रथमप्रपाठक १ [छान्दोग्यो- उद्गीथ आदिकके उपासन १३ हैं। यह "वाकूहीं ऋकू है प्राण साम है" इस वाक्यकरि कहियेहै॥ यंथाक्रम ऋकू सामके कारण वाकू अरु प्राणके ग्रहण (निरोध) हुये जातैं सर्व ऋचाओंका औ सर्व सामोंका अव- रोध किया होवै है। औ सैर्व ऋकू अरु सामोंके अवरोध हुये ऋकू अरु सामकरि साध्य सर्व क- मौका अवरोध किया होवैहै औ तिन कर्मोंके चाक्यकरि कार्यकारणके अभेदके उपदेशतैं ऋचामात्र वा साममात्र तिस तिस कारण स्वरूप प्रतीत होवै है। तिस हेतुकरि पूर्वविषै वी व्यक्ति अविवक्षित है प्रश्नउत्तरकूं एक अर्थरूप होनेतें औ ऐसें ऋक आदिककी जातिकूं एक होनेतैं "डतमच् " प्रत्ययका असंभव नहीं है। काहेतैं तिस तिस जातिकरि विशिष्ट ऋक् सामअरु उद्गीथकी सन्निधिके हुये एक ऋकू आदिककी जातिके निर्द्धारण अर्थ प्रश्नके हुये तिस "डतमच्" प्रत्ययके प्रयोगके संभवतैं। ऋकू आदिकविषै एकएकके भेदकी विवक्षाकरि षष्ठीसमासविषै दूषण कहा। तहां एक एककी एकताकूं अंगीकार करिके उक्तरीतिकरि षष्टीसमासविषै तौ किंचित् वी दूषण होता नहीं॥ ८८ ऋक् स्वरूपता वाक्के अरु सामस्वरूप प्राणके ग्रहण हुये फलितकूंहीं दिखावते हुये उक्त अर्थकूंहीं स्पष्ट करैहैं॥ ८९ ननु ऋुकू अरु साममात्रके अवरोध हुयेबी सिद्ध होवैहै ? यह आशंका करिके कहैहैं॥

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पनिषत् ] प्रथम खंड १ ३९ उद्गीथ (ऊकार) का उपासन १० अवरोध किये हुये सैंर्व काम अवरोधकूं प्राप्त होवैहैं [ यातैं वाक् अरु प्राण ऋक् अरु सामके कारण हैं]।। ॥ "ॐ" ऐसा यह अक्षर उ- द्रीथ है ऐसैं ताकी भक्तिरूपताकी आशंका नि- वारण करियेहै॥ सो प्रसिद्ध यह ऐसैं मिथुन (युगल) निर्द्देश करियेहै ॥ ॥ क्या सो मि- थुनहै? यह कहै हैं :- जो वाक् अरु प्राण ९० तथापि क्या होवैगा ? ऐसैं जो कहै। तहां कहैहैं॥ इहां यह अर्थ है :- उक्त प्रत्रियाकरि सर्वकामोंकी प्राप्तिका हेतु ऊकार। विवक्षित प्राप्तिरूप गुणवाला सिद्ध होवैहै॥ ९१ तृतीय उत्तरविषै तात्पर्यकूं कहैहैं। इहां बी पूर्वकी न्यांई जातिके ग्रहण हुये ताकी व्यक्तिरूप होनेकरि भक्तिहीं कही। या शंकाकूं निवारनेकूं "ॐ ऐसा यह अक्षर है" यह विशेषण है।। तैसैं हुये इहां उद्गीथ। ता (उद्गीथ)का अवयव है। विशेषणतैं औ प्रकरणतैं। यह अर्थ है॥ ९२ परंपराकरि वाक् अरु प्राणके सर्व कामोंके साथि सं- बंधतैं उद्गीथका बी तथाभूत वाक्आदिकसैं संबंधतैं सर्व कामोंसें संबंध है ऐसें कहा। अब ऊँकारके वाकू अरु प्राण- द्वारा सर्व कामोंसैं संबंधविषै अन्य हेतुकूं कहैहैं। ९३ तत् (सो) अरु एतत् (यह) इनदोनूं पदनकी अ- क्षररूपविषयवान्ताकूं निषेधकरिके । वक्ष्यमाण विषयवान्- ताकूं दिखावैहैं।। इहां "वै" शब्द मिथुनकी प्रसिद्धि अर्थ है।।

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४० प्रथमप्रपाठक १ [छान्दोग्यो- उद्गीथ आदिकके उपासन १२. सर्व ऋकू अरु सामोंके कारणभूत हैं। सो मि- थुन है। ऋक् अरु साम इहां ऋैंकू अरु सा- मके कारण। ऋकू अरु सामकरि कहे। यह अर्थ है।। ऋक् अरु साम मिथुन है। पैरंतु स्व- तंत्र नहींहै। अँन्यथा प्रसिद्ध वाक् अरु प्राण यह एक मिथुन अरु ऋकू अरु साम अपर (द्वितीय) मिथुन। ऐसैं दो मिथुन होवैंगे। तैसे हुये "सो यह मिथुन है" ऐसें एकवचनका कीर्त्तन अघटित होवैगा। तोतैं ऋकू अरु सामके का- रणरूप वाक् अरु प्राणकूं हीं मिथुनपना है॥ ५॥ ९४ वाक् औ प्राण। ऐसैं यह उभय प्रतीत होवैहै। सो यह मिथुन है। ऐसी योजनाकूं अंगीकार करिके वाक्या- र्थकूं कहैहैं। ९५ वाक् अरु प्राणकूं ऋक्अरु सामकी कारणता है। ताकूं उत्तर वाक्यसैं स्पष्ट करैहैं॥ ९६ ननु जैसे वाकू अरु प्राण मिथुन है। ऐसें ऋकू अरु साम वी स्वतंत्रताकरि मिथुन है। निर्देशके सामान्यतैं ? यह आशंका करिके कहैहैं॥ ९७ विपक्षविषै दोपकूं कहैहैं।। ९८ ननु वांछित हीं दो मिथुन हैं ? ऐसें जो कहै। तहां नहीं ऐसैं कहैहैं। ९९ ननु दो मिथुनोविषै अनुगत मिथुनभावकूं लेके

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पनिषत् ] प्रथम खंड १ ४१ उद्गीथ (ऊकार) का उपासन १० तदेतन्मिथुनमोमित्येतस्मिन्नक्षरे स- रसज्यते ॥ यदा वै मिथुनौ समाग- अर्थ :- सो यह मिथुन "ॐ" ऐसे इस अक्षरविषै संबंधकूं पावताहै॥ जब प्रसिद्ध दो मिथुन (स्त्रीपुरुष) संयोगकूं पावते हैं टीका :- सो यह इस लक्षणवाला मिथुन "ॐ" इस अक्षरविषै संसर्ग (संबंध)- कूं पावताहै। ऐसें सर्वकामोंकी अवाप्तिरूप गुणकरि विशिष्ट मिथुन ॐकारविषै संसर्गवाला विद्यमान है। यातैं ऊँकारकी सर्वकामोंकी अ- वाप्तिरूप गुणवान्ता प्रसिद्ध है॥ ऊकारकी वा- णीमयता औप्राणतैंउत्पाद्यता औ मिथुनकेसाथि एकवचन संभवैहै१ ऐसें जो कहै। तहां नहीं ऐसें क- हैहैं।। इहां उपकरम (आरंभ)के भंगतैं स्वतंत्र दो मिथुन नहीं हैं। यह अर्थ है।। १०० ननु वाक् अरु प्राण नामक ऋकू साम स्वरूप वाकू अरु प्राणका रूप होहू। परंतु ऊकार अरु मिथुनके संबंधविषै क्या फल होवैहै? तहां कहैहैं॥ १०१ ननु फेर अक्षरका मिथुनके साथि संबंधवानूपना किसप्रकारकरि होवैगा? तहां कहैहैं॥

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४२ प्रथमप्रपाठक १ [छान्दोग्यो- उद्गीथ आदिकके उपासन १३ च्छत आपयतो वै तावन्योन्यस्य का- मम् ॥ ६ ॥ [तब]वे अन्योअन्यके कामकूं प्रसिद्ध प्राप्त करते हैं॥ ६॥

संसर्ग युक्तता है। औ मिथुनकूं कामोंकी प्रा- पकता प्रसिद्धहै यह दृष्टांत कहियेहैः-जैसैं लो- १०३

कविषै मिथुन (मिलित अवयवैवाले स्त्री पु- रुष) जब ग्राम्य धर्मवान्ताकरि संयोगकूं पा- वतेहैं तव वे परस्परके कामकूं प्राप्तकरते १०२ औ जो सर्वकामाप्तिरूपगुणकरि विशिष्ट मिथुन है ऐसें कहा। ताकूं उपपादन करैहैं। १०३ इहां "प्रसिद्ध ऐसै" तैसा अर्थ उक्त अक्षरकी सर्व कामोंकी प्रापकताविषै दृष्टांतरूप हुया अनंतरके वाक्य- करि कहिये है। १०४ दष्टांतकूंहीं विवरण करैहैं॥ १०५ ननु दो मिथुन नहीं हैं। ऐसें उक्त होनेतैं " मि- धुनौ (दो मिथुन)" ऐसा द्विवचन कैसें कहा ? तहां कहैहैं॥ इहां ग्राम्य (मैथुन) धर्मवान्ताकरि। याका तिसप्रकारके व्यापारवान्ताकरि। यह अर्थ है औ "वै" शब्द अवधारण- विषै है।।

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पनिषत् ] प्रथम खंड १ ४३ उद्गीथ (ॐकार) का उपासन १० आपयिता ह वै कामानां भवति। अर्थः-कामोंका आपयिता (प्रापक) नि-

हैं ॥। तिसप्रकारहुये स्वात्मा (स्वस्वरूप)विषै अनुप्रवेशकूं प्राप्त मिथुनकरि सर्व कामोंकी प्रा- परिरूप गुणवान्ता ऊँकारकूं सिद्ध भई। यह अभिप्राय है ॥ ६ ॥ टीका :- तौ (ऊकार) का उपासक उद्गाताबी तिसधर्मवाला होवैहै। ऐसैं कहैहैः-सो निश्र्- यकरि यजमानके कामोंका प्रापक होवैहै जो इस अक्षररूप ऐसे आप्तिरूपगुणवाले उद्गी १०६ कहनेकूं इच्छित दार्ष्टातिककू कहैहैं॥ १०७ ऐसें आप्तिगुण विशिष्ट ऊकारकूं विशेषण देके। अब ताकी उपासनाके फलकूं कथन करैहैं।। इहां तद्धर्मा (तिस धर्मवाला) ऐसे उपासककी आप्तिरूप गुणकरि वि- शिष्टताकी उक्ति है॥ १०८ ननु इहां आप्ता (प्राप्त होनेवाला) ऐसैं कहनेकूं योग्य हुये। आपयिता (प्रापक) यह कैसैं कहा ? तहां कहैहैं॥। इहां "ह वै" ऐसे दो निपात तो अवधारण (नि- श्चय) रूप अर्थवाले हैं॥ औ उद्गीथकूं। याका ताके अवयवभूत ऊकारकूं। यह अर्थ है।।

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४४ प्रथमप्रपाठक १ [छान्दोग्यो- उद्गीथ आदिकके उपासन १२. य एतदेवं विद्वानक्षरमुद्गीथमुपास्ते।७।। श्रित होवैहै जो इसकूं ऐसैं जानता हुया अक्षररूप उद्गीथकूं उपासताहै ॥ ७॥ थकूं उपासताहै ताकूं यह यथोक्त फल होवैहै। यह अर्थ है॥"ती (परमात्मा)कूं जैसैं जैसैं उपा- सताहै सोई (फल) होवैहै" इस श्रुतितैं ॥ ७॥ टीका :- "सैमृद्दिरूप गुणवाला ऊकार है"॥ कैसैं कि :- सो प्रसिद्ध यह प्ैकेत अक्षर अ- नुज्ञा है औ सा अनुज्ञा सो अक्षर है। अनुज्ञा- १०९ ननु आप्तिरूप गुणवाले ऊँकारके उपासनतैं कैसैं उपासक तिसगुणवाला होवैहै? यह आशंका करिके कहैहैं॥ ११० उत्तरग्रंथके अन्यगुणके विधानविषै तात्पर्यकूं दि- खावैहैं॥ १११ ननु ताकी समृद्धिरूप गुणवान्ता अप्रामाणिक है? यह आशंका करिके परिहार करैहैं॥ ११२ तत् (सो) अरु एतत् (यह)। इन दोपदोंका वि- षय होनेकरि ऊकारनामक अक्षरकूं निर्दश करैहैं॥ इहां ताकी स्मृतिअर्थ "चै" शब्द है॥ ११३ अनुज्ञा अक्षर है। इसपदकूं विग्रहकरिके विवक्षित अर्थसैं घटावतेहैं॥

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पनिषत् ] प्रथम खंड १ ४५ उद्गीथ (ऊकार) का उपासन १० तद्ा एतदनुज्ञाऽक्षरं। यद्ि किञ्चा नुजानात्योमित्येव ।। तदा हैषो एव समृद्धिर्यदनुज्ञा॥ समडयिता ह वै का- अर्थ :- सो प्रसिद्ध यह अक्षर अनुज्ञा है। जोई कछक अनुज्ञा (आज्ञा) करैहै "ॐ" ऐसैंहीं ताकूं कहैहै। यहहीं समृद्दिबी है जो अनुज्ञा है। कामोंका समरद्यिता कहिये अनुमति। अर्थ यह जोः-ऊँकार है॥ कैसैं सो अनुज्ञा है? यह श्रुति कहैहै :- जोई किं- चित् कहिये लोकविषै यत्किंचित् ज्ञानकूं वा धनकूं विद्वान् वा धनी अनुज्ञा (अंगीकार) करैहै। तहां अनुमतिकूं करता हुया "ॐ" ऐसैं हीं ताकूं कहैहै। औ तैसैं वेदविषै "तेंतीस(३३) ११४ ताके अनुज्ञापनैविषै प्रश्नपूर्वक प्रसिद्धिकूं उपन्यास करैहैं॥ इहां "तहां" ऐसैं ज्ञान अरु धनकी उक्ति है औ "तत् (सो)" ऐसैं अनुमंतव्य (अनुमतिका विषय) सा- धारणपनैकरि कहियेहै॥ ११५ ऊकारके अनुज्ञा अरु अक्षरभावविषै लोकप्रसि-

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४६ प्रथमप्रपाठक १ [छान्दोग्यो- उद्गीथ आदिकके उपासन १३ मानां भवति। य एतदेवं विद्दानक्षर- मुद्ीथसुपासे ॥८॥ निश्चित होवैहै जो ऐसैं इसकूं जानता हुया अक्षररूप उद्गीथकूं उपासताहै॥८॥ देव हैं" ऐसें [याज्ञवल्क्यकरि कहेहुये ] "ॐ" ऐसैं [ शाकल्य ] कहता भया। इत्यादि॥ अरु तैसैं लोकविषैबी "तेरे इस धनकूं मैं ग्रहण कर- ताहूं" ऐसें कहे हुये "ॐ" ऐसें कहै है॥ यातैं द्धिकी न्यांई वेदप्रसिद्धिकूं मिलावतेहैं॥ इहां यह अर्थ है :- "हे याज्ञवल्क्य ! कितनेहीं देव हैं" ऐसें साकल्यकरि पूंछे हुये "तें तीस (३३) हैं" ऐसें याजवल्क्यकरि कहे हुये। शाकल्य "ॐ" ऐसे अनुज्ञा (अंगीकार)कूं करताभया औ फेर "कितनैं हीं देव हैं" ऐसें प्रश्नके हुये "षट् हैं" ऐसें उत्तरके दिये हुये "ॐ" ऐसें कहता भया। इत्यादि वाक्य बृहदारण्य उपनिषद्विषै है। सो उक्त अर्थका अनु- सारि प्रसिद्ध है।। ११६ "जोई कछुक" इत्यादि वाक्यविषै कही लोकप्र- सिद्धिकूंहीं प्रकट करै हैं। ११७ ननु ऊँकारके लोक वेदकी प्रसिद्धिकरि अनुज्ञा- भावके हुये वी ताकूं समृद्धिरूप गुणवानूपना कैसें है? यह आशंकाकरिके कहैहैं॥ इहां "उ" शब्द "अपि (बी)" रूप अर्थवाला है। सो समृद्धि अर्थतैं उपरि संबंधकूं पावता है॥

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पनिषत् ] प्रथम खंड १ ४७ उद्गीथ (ऊकार) का उपासन १० यह अनुज्ञा हीं समृद्धि वी है। जो अनुज्ञा है कहिये जो अनुज्ञा है सो समृद्धि है। काहेतैं॥ अनुज्ञाकूं तिस समृद्धिरूप मूलवाली होनेतैं।। यातैं सैमृद्धिवाला पुरुष "ॐ" ऐसैं अनुज्ञा (आ- ज्ञा)कूं देताहै। तातैं समृद्धिरूप गुणवाला ॐ ११९

कारहै। यह अर्थ है।। समृद्धिरूप गुणका उपासक होनेतैं तिसधर्मवाला हुया निश्चयकरियजमानोंके कामोंकी समृद्धिका कर्ता होवैहै। जो ऐसैं जाननेवाला इस अक्षररूप उद्गीथकूं उपा- सताहै। इत्यादि पूर्वकी न्यांई है ॥ ८॥ ११८ ता अनुज्ञाकूं समृद्धिकी मूलता (कारणता) कूं साधते हैं। ११९ अनुज्ञाकी समृद्धिके प्रति कारणताकरि समृद्धिरू- पताके हुये। तिस अनुज्ञास्वरूप ऊकारकूं बी समृद्धिरूप गु- णवान्ता सिद्धभई। ऐसें उपसंहार करैहैं॥ १२० समर्द्धयिता (समृद्धिका कर्ता ) इत्यादि फलवाक्यकूं कहैहैं॥ १२१ इस वाक्यविषै "समर्द्धयिता" इत्यादि पदोंका स- मूह "आपयिता" इत्यादि रूप पूर्ववाक्यकी न्यांई व्याख्यान करनेकूं योग्य है। ऐसैं कहैहैं॥

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४८ प्रथमप्रपाठक १ [छान्दोग्यो- उद्गीथ आदिकके उपासन १३. तेनेयं त्रयी विद्या वर्तते। ओमित्या-

अर्थः-तिसकरि यह त्रयी विद्या वर्त्त- तीहै।"ॐ" ऐसैं आश्रवण करावैहै। "ॐ" ऐसैं प्रशंसन करैहै। "ॐ" ऐसैं उद्गायन टीका :- अैनंतर अब अक्षरकूं स्तुति करैहै। उपास्य होनेतैं प्ररोचनके अर्थ॥ ॥ कैसैं तिस १२४ प्रकत अक्षरकरि यह ऋग्वेदादिरूप त्रयी विद्या। अर्थ यह जो :- त्रयीविद्याविषै विहित कर्म। वर्त्तमान होवैहै। जातैं त्रयी विद्याहीं आश्रवणा- १२२ ननु तीन गुणवाले ऊँकारका सकल उपासन कहा। तैसैं हुये आगे कहनेके अभावतैं "तिसकरि यह त्रयी विद्या" इत्यादि वाक्य व्यर्थ है? यह आशंका करिके कहैहैं॥ १२३ स्तुतिकी व्यर्थताकूं आशंका करिके कहैहैं १२४ प्ररोचन (रुचि)कूं प्रश्नपूर्वक प्रकट करैहैं॥ इहां त्रयी विधा वर्तती है। ऐसैं संबंध है।। १२५ "त्रयी विद्या" इस वाक्यकी उपचाररूप अर्थवान्- ताकूं कथन करैहैं। १२६ ननु श्रुत अर्थकूं त्यागकरिके क्यूं ऐसें व्याख्यान

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पनिषत् ] प्रथम खंड १ ४९ उद्गीथ (ऊकार) का उपासन १० त्येतस्यैवाक्षरस्यापचित्यै महिस्रा र- सेन ॥ ९॥ करैहै। इसीहीं अक्षरकी अपचिति (पूजा) अर्थ। महिमाकरि औ रसकरि ॥ ९॥ दिकनकरि नहीं वर्त्तती है। कैर्म तो तैसैं प्रवृत्त होवैहै। यह प्रसिद्ध है॥ कैसैं किः- "ॐ" ऐसैं आश्रवण करावैहै। औ "ॐ" ऐसैं शंसन (प्रशंसा) करैहैऔ "ॐ" ऐसैं उद्गायन करैहै औ इस लिंगतैं [सो कर्म ] सोमयाग है। ऐसैं करिये है ? तहां कहैहैं॥ इहां यह अर्थ है :- ता विद्याके स्व- रूपलाभकूं अनादिताकरि कारणकी अपेक्षासैं रहित होनेतैं॥ १२७ ननु कर्म बी आश्रवण आदिककरि कैसें आत्मा (स्वरूप)कूं पावता है? तहां कहैहैं॥ १२८ प्रसिद्धिकूं हीं प्रपंचन करैहैं॥ १२९ आध्वर्यव (अध्वर्यु संबंधि कर्म) । हौत्र (होता संबंधि कर्म) अरु औद्गात्र (उद्गाता संबंधिकर्म) । इन तीनके समाहारके दर्श अरु पूर्णमासविषै असंभवतैं औ अ- ग्रिष्टोम आदिकनविषै संभवतैं तिनतीनके समाहाररूप लिंगतैं ऊकारकरि प्रवर्त्तमान जो वेदविहित कर्म सो सोमयाग है। ऐसैं भासताहै। यह कहैहैं॥ ५

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५० प्रथमप्रपाठक १ [छान्दोग्यो- उद्गीथ आदिकके उपासन १२ प्रतीत होवैहै। औ सो कर्म इसी हीं अक्षरकी १३०

अपचिति (पूजा) अर्थहै। जातैं सो परमा- १३१ त्माका प्रतीक है यातैं तोकी जो अपचिति सो परमात्माकीहीं है। "मौनिव स्वकर्मकरि ताकूं पू- जिके सिद्धिकूं पावताहै" इस स्मृतितैं॥ औ महिमाकरि अरु रसकरि। किंवाः-कहिये अ- १३० "ॐकाररहित किया कर्म स्रवता है" इस न्या- यतें ॐकारकरि वैदिककर्मकी स्थिति है। ऐसें स्तुतिकूं करिके अब अन्य स्तुतिकूं कहैहैं॥। १३१ ननु फेर अक्षर जो है सो कर्मकरि कैसैं पूज्य हो- वैहै? तहां कहैहैं॥ १३२ ननु तहां ऊँकारकूं तिस परमात्माकी प्रतीकताके हुये क्या होवैहै? ऐसें जो कहै। तहां सो कहैहैं॥ १३३ ननु कर्मकरि परमात्मा जब आराधन करियेहै तब ताका प्रतीक होनेतें अक्षरका बी तिसकरि आराधन होवै। औ ईश्वर तिसकर्मकरि आराधन करियेहै ऐसा प्रमाण नहीं है? तहां कहैहैं॥ इहां यह अर्थ है :- "वर्णाश्रमविहित क- र्मकरि ईश्वरकूं प्रसन्न करिके ताके प्रसादके वशतैं ताके फलकूं कर्त्ता पावता है"ऐसे श्रीकृष्ण भगवान्करि उक्त होनेतैं ईश्व- रकी पूजा अर्थ कर्म है। ऐसैं जानिये है। तिस प्रकार हुये ताका प्रतीक होनेतें ॐकारकी पूजा अर्थ सो कर्म है। यह युक्त है। १३४ वैदिक कर्म अक्षरकी पूजा अर्थ है। ऐसैं अक्षरकूं

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पनिषत् ] प्रथम खंड १ ५१ उद्गीथ (ऊकार) का उपासन १०

न्यस्तुति करियेहै किः-इसीहीं अक्षरके महिमा (महत्पनै) करि। अर्थ यह जो :- ऋत्विक औ यजमानआदिकके प्राणोंकरि ॥ तैसैंहीं इसी अ- १३५

क्षरके रसकरि। अर्थ यह जो :- व्रीहि अरु यव आ- दिक रसकरि निर्वाह किये हवि (हुतद्रव्य)करि कर्म वर्त्तताहै। याग होम आदिक।अक्षरकरिक- रियेहै। औ सो आदित्यके प्रति उपस्थित होवैहै। १३७

स्तुतिकरिके प्रकारांतरकरि स्तुति करैहैं। इहां यजमान आ- दिक। इस आदि पदकरि पत्नी ग्रहण करियेहै औ प्राणों- करि त्रयीविहित कर्म वर्त्तता है। ऐसैं संबंध है।। १३५ अन्य स्तुतिकूं कहैहैं॥ इहां जैसैं अक्षरके विकार यजमान आदिकके प्राणोंकरि वैदिक कर्म प्रवर्त्त होवैहै। तैसें॥ यह अर्थ है॥ औ "हविकरि" इहां बी पूर्वकी न्यांई अन्वय है।। १३६ ननु ऋत्विकआदिकके प्राणोंकूं औ हविकूं अक्ष- रका विकारपना कैसैं है ? यातैं कहैहैं॥ इहां आदिशब्द अ- नुक्त वैदिककर्मके ग्रहण अर्थ है। "तातैं ॐ ऐसें उदाहरण करिके" इत्यादि स्मृतितैं। यह अर्थ है॥ १३७ "अग्निविषै डाली जो आहुति सो सम्यक् आदि- त्यके प्रति स्थित होवैहै आदित्यतैं वृष्टि होवैहै वृष्टितैं अन्न औ तिसतैं प्रजा होवैहैं" इस स्मृतिकूं आश्रय करिके कहैहैं।

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५२ प्रथमप्रपाठक १ [छान्दोग्यो- उद्गीथ आदिकके उपासन १३ तेनोभौ कुरुतो यश्चैतदेवं वेद। यश्र न वेद॥ नाना तु विद्या चाविदया च॥ यदेव विद्यया करोति श्रद्धयोप- अर्थ :- [नतु] तिसकरि दोनूं करतेहैं जो याकूं ऐसैं जानताहै औ जो न जा- नताहै? नाना तो विद्या औ अविद्या है। जिसीहीं (कर्म)कूं विद्याकरि श्रद्धाकरि उ- तिसतैं वृष्टि आदिकके क्रमसैं प्राण औ अन्न उपजताहै औ प्रीणोंकरि अरु अन्नकरि यज्ञ क० रिये है। यातैं कहियेहैः-अक्षरके महिमाकरि अरु रसकरि कर्म प्रवृत्त होवैहै ऐसैं ॥ ९ ॥ टीका :- तहां अक्षरके विज्ञानवालेकूं कर्म कर्तव्यहै। ऐसैं स्थित भये अर्थकेप्रति श्रुति आ- १३८ ननु वृष्टि आदि। इहां आदिशब्दकरि अन्नकी औ प्रजाकी उत्पत्तिका उपकरण सर्व कहिये है। तथापि इसी हीं अक्षरके महिमाकरि कैसैं है ? तहां कहैहैं॥ १३९ ननु अक्षरकूं स्तुतिकरि महान् किया होनेतैं ताके उपासनके सिद्ध हुये उत्तर ग्रंथसैं क्या है ? यह आशंकाक- रिके कहैहैं। इहां यह अर्थ है :- पूर्व ग्रंथविषै स्तुतिके वशतैं

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पनिषत् ] प्रथम खंड १ ५३ उद्गीथ (ऊकार) का उपासन १० निषदा। तदेव वीर्यवत्तरं भवतीति खल्वेतस्यैवाक्षरस्योपव्याख्यानं भव- ति॥ १॥ इति श्रीछांदोग्योपनिषदि प्रथमप्रपाठकस्य प्रथम: खण्डः समाप्ः ॥ १ ॥ पनिषद्करि [युक्तहुया] करैहै सोई (कर्म) अत्यंत वीर्यवाला होवैहै॥ ऐसा निश्च्ित इसीहीं अक्षरका उपव्याख्यान होवैहै॥१॥ इति श्रीछांदोग्योपनिषन्मूलमात्रभाषादी- पिकायां प्रथमप्रपाठकस्य प्रथमः खंड: समाप्त: ॥ १ ॥

क्षेप (निषेध) करैहै :- तिस अक्षर करि दोनूं करते हैं। कहिये जो इस ऐसें व्याख्यान किये अक्षरकूं जानताहै औ जो कर्ममात्रका वेत्ता कर्त्तव्य अक्षरके विज्ञानके हुये तिसकरि साध्य कर्म। ताके विज्ञानवालेकूं अनुष्ठान करनेकूं योग्य है। ऐसें स्थितभया। ताकूँं आक्षेप करनेकूं उत्तर वाक्य है।। १४० श्रुति उक्त आक्षेपके अक्षरोंकूं व्याख्यान करैहैं॥

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५४ प्रथमप्रपाठक ? उद्गीथ आदिकके उपासन १३ [छान्दोग्यो-

अक्षरके याथात्म्य (यथार्थस्वरूप)कूं नहीं जा- नताहै वे दोनूं कर्मकूं करतेहैं॥ नेतु तिन दोनूंकूं कर्मके सामर्थ्यतैंहीं फल होवैहै। तहां अक्षरके याथात्म्य (स्वभाव)के विज्ञानसैं क्या प्रयोजनहै। ऐसैं आक्षेप करैहै। जातें लोक- विषै हरीतकी (हरडे)कूं भक्षण करनेवाले ति सके रसके अभिज्ञ अरु अनभिज्ञ दोनूंकूं विरे- चन देख्याहै? ऐसैं कहना वनै नहीं :- काहे तैं जातैं नाना तो विद्या औ अविद्या है। जातैं विद्या १४१ ननु कर्मके विद्वान अरु अविद्वान् दोनूंकूं कर्मके कर्त्तापनैके हुये विद्वानूहीं ताके फलकूं भोगताहै अविद्वान नहीं। यह कैसें है? यह आशंका करिके कहैहैं॥ इहां "इति " (ऐसैं) शब्द तो आक्षेप करैहै। याके साथि संबंधकूं पावताहै।। १४२ ननु विद्वान् अविद्वानकूं समान फल कैसैं है? यह आशंका करिके दष्टांतकूं कहैहैं॥ १४३ विवादका विषय जो उक्त गुणवाले अक्षरका ज्ञान। सो स्वतंत्र फलवाला नहीं है। अंगका ज्ञान होनेतैं आज्यके अवलोकनकी न्यांई ? ऐसें आक्षेपके प्राप्तहुये अब श्रुति। सि- द्धांतीरूपसैं प्रत्युत्तरकूं कहैहैं॥। १४४ हेतुताकरि अवतारित वाक्यकूं व्याख्यान करैहैं।

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पनिषत् ] प्रथम खंड १ ५५ उद्गीथ (ॐकार) का उपासन १०

अरु अविद्या भिन्नहैं [ इहां "तु" शब्द पक्षके निषेध अर्थ है ] ऊकारका कर्मागतामात्रका विज्ञानहीं रसतम आप्ति (प्राप्ति) अरु समृद्धि रूप गुणवाला विज्ञान नहीं। किंतु तिसतैं अ- धिक है। तातैं तिसके अंगकी अधिकतातैं फ- लकी अधिकता युक्त है। यह अभिप्राय है।। जातैं लोकविषै वणिक् (वैश्य) अरु शबर (भिल्) दोनूंके मध्य। पह्मरागआदिक मणिके विकरयके हुये वणिककूं विज्ञानकी अधिकतातैं फलकी अधिकता होवैहै। तातैं जोई विद्या इहां यह अर्थ है :- विद्या जो उपासना। कर्म जो अविद्या। इन दोनूंका भिन्नपना कहिये पृथकूफलवान्पना है। तातैं विद्याकी व्यर्थता नहीं है।। १४५ विद्याकूं स्वतंत्र फलवानूपना नहीं है। इसपक्षकी व्यावृत्ति (निषेध)के प्रकारकूंहीं प्रपंचन करैहैं॥ १४६ अंगके ज्ञानतैं गुणवाले अक्षरके ज्ञानकी अधिकता- विषै फलकूं कहैहैं।। इहां ताका अंग कहिये कर्मका अंग उद्गीथ मात्रका ज्ञान तातैं विशिष्ट अक्षरके ज्ञानकी अधिकतातैं। यह अर्थ है॥ १४७ औ जो फेर कहाकि :- तिन विद्वान् अविद्वान् दो- नूंकूं कर्मके सामर्थ्यतैं हीं फल होवैगा ऐसैं ? तहां कहैहैं॥ १४८ औ जो "अंगका ज्ञानरूप होनेतैं" ऐसें कहा था।

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५६ प्रथमप्रपाठक १ [छान्दोग्यो- उद्गीथ आदिकके उपासन १३

(विज्ञान) करि युक्त हुया औ श्रद्धाकरि क- हिये श्रद्धायुक्त हुया औ उपनिषद्करि । अर्थ यह जो :- योगकरि युक्त हुया कर्मकूं क- रताहै। सोई कर्म अत्यंतवीर्यवाला (अवि- द्वान्के कर्मतैं अधिक फलवाला) होवैहै। ऐसैं विद्वान्के कर्मके अत्यंत वीर्यवान्पनैके वचनतैं सो क्या :- अंग भावके होते ज्ञानभाव है। किंवाः-आश्रय करिके विहितपना है। अथवा यह हीं ज्ञानभावकरि विशे- षित है ? ये तीन विकल्प हैं। तीनमैं प्रथम पक्ष बनै नहीं :- काहेतैं ताके निर्द्धारणके अनियमरूप न्यायकरि असिद्धितैं॥ औ द्वितीय पक्ष वनै नहीं :- काहेतैं गोदोहनविषै विहितप- नैके व्यभिचारतं ॥ औ तृतीयपक्ष वनै नहीं :- काहेतैं आज्य अवलोकनरूप दष्टांतकूं साधनविकल (असिद्ध) होनेतैं। घृ- तके अवलोकनकूं आश्रय करिके विधिके उदाहरणतैं वहि- रभूत होनेतें अंग संबंधकी ज्ञानरूपतामात्रकरि दष्टांतभावके होते अंगतारूप उपाधिके संभवतैं। या अभिप्रायकरिके ज्ञा- नकी अधिकताविषै फलकी अधिकता है। इसअर्थविषै अ- नंतरके वाक्यकूं योजना करैहैं। इहां विज्ञान उद्गीथ आदिक अंगमात्रकूं विषय करनेवाला उपासनातैं भिन्न है तिसकरि युक्त हुया। यह अर्थ है। औ योग कहिये देवताआदिकनकूं विषय करनेवाला उपासन है। औ इति शब्द तिस अर्थकी समाप्तिअर्थ है।। १४९ तहां हीं अर्थतैं सिद्ध अर्थकूं कथन करैहैं॥

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पनिषत् ] प्रथम खंड १ ५७ उद्गीथ (ऊकार) का उपासन १०

अविद्वान्का बी कर्म वीर्यवालाहीं होवैहै। यह अभिप्राय है औ अविद्वान्कूं कर्मविषै अनधि- कार नहीं है काहेतैं औषस्त्यकांड (उषस्तिऋ्र- षिसंबंधी आगे कहनेके ग्रंथभागके समूह)विषै अविद्वानोंके अनंतर आर्तिविज्य (ऋत्विकसंबंधि- कर्म)के देखनेतैं॥ रैसैतम आप्ति (प्राप्ति) समृ-

१५० ननु "अर्थी समर्थ विद्वान् अरु अपर्युदस्त (अजाति बहिष्कृत) जो पुरुष है। सो कर्मविषै अधिकारी है" ऐसैं अं- गीकारतैं तिस लक्षणकरि अविशिष्ट अविद्वान्कूं कर्मविषै अ- नधिकारतैं सो (अविद्वान्का किया) कर्म वीर्यवान् है। यह कैसैं प्रतिज्ञा करियेहै? तहां कहैहैं॥ इहां औषस्त्यविषै क- हिये उषस्ति चाकरायण नामक जो ऋषि है तिससैं संबंध- वाले "कुरुनके (कुरुदेशके धान्य वृक्षनके) मचटी (पाषाण- नकी वृष्टि)नकरि हत हुये" इत्यादिरूप जो वक्ष्यमाण ग्रंथ है। तिस ग्रंथके समूहविषै। विद्याहीनोंकूं बी कर्मका अनु- छ्ान देखियेहै। काहेतैं "हे प्रस्तोतः ! जो देवता " इत्यादि स्थलविषै "ताकूं जब अविद्वान् हुया" इत्यादि लिंगतैं। तातैं अविद्वानकूं बी कर्मविषै अधिकार है औ अधिकारीके लक्षणविषै तो ज्ञानके अभाव हुयेबी द्रव्यआदिकके ज्ञानमा- त्रसैं विद्वान् इस विशेषणकी सिद्धि होवैहै। यह अर्थ है।। १५१ ननु गुणवाले अक्षरका ज्ञान स्वतंत्र फलवाला है ऐसैं कहा। सो तो रसतमरूपगुणवाले अक्षरकूं विषय क- रनेवाला एक उपासन है औ तहां विधिके उद्देशविषै फलके

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५८ प्रथमप्रपाठक १ [छान्दोग्यो- उद्गीथ आदिकके उपासन १३

द्विरूप गुणवाला अक्षर है। यह एक उपासन है। काहेतैं मध्यविषै अन्य प्रयत्नके अदर्शनतैं। जातैं अनेकविशेषणोंकरि अनेक प्रकारसैं उपास्य हो- १५२

अश्रवण हुयेबी वा विश्वजित् यज्ञके न्यायकरि सो (फल) कल्पना करियेहै। औ आपिरूप गुणवाले औ समृद्धिरूप गु- णवाले अक्षरके दो विज्ञान (उपासन) हैं। प्रत्येकके फलकी श्रुतितैं ॥ तैसैं हुये इहां भिन्न फलवाले तीन उपासन विव- क्षित हैं? ऐसें कहा। यातैं कहैहैं॥ इहां यह भाव है :- इहां प्रथम "उपासन करै" ऐसे विधिविना मध्यविषै अन्यविधि नहीं प्रतीत होवैहै औ "कामोंका आपयिता निश्चयकरि होवैहै" इत्यादि वाक्यविषै फलश्रुतिकरि विधि कल्पना करने योग्य नहीं है। काहेतैं फलाकांक्षि रसतमरूप गुणवाले अक्षरके वि- ज्ञानके विधिविषै अर्थवादविषै स्थित फलांशके अन्वयकरि अनेक गुणवाले एकके विज्ञानके विधिके संभवह्ठुये विधिभे- दकी कल्पनाके अयोगतैं औ निश्चयकरि अर्थवाद संबंधि फ- लवाले अनेक विशेषणयुक्त एकके उपासन विषयक विधिके अंगीकारकरि वाक्यकी एकताके संभवहुये वाक्य भेदन कर- नेकूं उचित नहीं है। इसकरि विश्वजित् न्याय निरस्त- किया औ रात्रिसत्र न्याय तो प्रकृतका अविरोधी है॥ १५२ ताका उपव्याख्यान। ऐसैं उक्त अर्थका उपसंहार वाक्य "निश्चित इसीहीं अक्षरका" इत्यादि है। तहां "ए- तत्" शब्दकर प्रकृत अक्षरके आकर्षणविषै कारण कहैहैं॥ इहां यह अर्थ है :- रसतम आपि अरु समृद्धिरूप अनेक विशेषण हैं तिनकरि विशिष्ट होनेकरि अक्षरकूं अनेकप्रकारसैं

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पनिषत्] प्रथम खंड १ ५९ उद्गीथ (ऊकार) का उपासन १०

नेतैं निश्र्चयकरि इसीहीं प्रकत उद्गीथनामवाले अक्षरका उपव्याख्यान होवैहै ॥ १ ॥ इति श्रीछांदोग्योपनिषद्भाष्यभाषादीपिकायां ग्रथम- प्रपाठकस्य प्रथम: खण्डः समाप्तः ॥ १ ॥

उपास्य होनेतें प्रकारके भेदविषैवी उपासनकी एकताकूं पूर्वहीं उक्त होनेतैं प्रकृतहीं अक्षरका यह उपव्याख्यान है। जो प्र- सिद्ध विहित है।।

इति श्रीछांदोग्योपनिषद्भाष्यभाषादीपिकायां प्रथमप्र- पाठकगत-प्रथमखंडस्य टिप्पणं समाप्रम् ॥१॥

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६० प्रथमप्रपाठक ? [छान्दोग्यो- उद्गीथ आदिकके उपासन १३ अथ श्री० प्रथमप्रपाठकस्य द्वितीयः खंडः ॥२॥ देवासुरा ह वै यत्र संयेतिरे। उभये अथ श्रीछान्दोग्योपनिषदो मूलमात्रभाषा दीपिकायाः प्रथमप्रपाठकस्य द्वितीयः खंडः प्रारभ्यते ॥ २॥ अर्थः-प्रसिद्ध देव असुर जिस निमि- अथ श्रीछान्दोग्योपनिषद्भाष्यभाषादीपिकायाः प्र- थमप्रपाठकस्य द्वितीयः खण्डः प्रारभ्यते ॥ २॥ प्राणदृष्टिसैं ॐकारका उपासन॥१४॥ टीका :- देवासुर कहिये देव औ असुर॥ अथ श्री० प्रथमप्रपाठकगतद्वितीयखंडस्य- टिप्पणं प्रारभ्यते ॥२॥ १५३ गुणत्रयविशिष्ट उद्गीथरूपकर्मका अवयवभूत ॐका रनामक अक्षर परमात्माका प्रतीक है सो तिस (परमात्मा) की बुद्धिकरि उपास्य है। ऐसै उपदेश किया॥ अब तिसीही अक्षरके अध्यात्म अधिदैव भेदकरि आदित्य अरु प्राणकी दृष्टिकरि उपासनकूं कहनेकूं इच्छते हुये आचार्य। अन्य कँ डिकाकूं अवतार देतेहैं॥ १५४ तहां अक्षरनकूं व्याख्यान करनेकूं इच्छते हुये अ-

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पनिषत् ] द्वितीय खंड २ ६१ प्राणदृष्टिसैं (ऊकार) का उपासन १४ प्राजापत्यास्तड देवा उद्गीथमाजहुर- नेनैनानभिभविष्याम इति॥१॥ त्तके होते संग्रामकूं करते भये। दोनूं प्र- जापतिके संतान हैं॥ तिस निमित्तके होते देव उद्गीथकूं ग्रहण करते भये॥ इसकरि इनोंकूं अभिभव करेंगें ऐसैं ॥ १ ॥

देन यह द्योतनरूप अर्थवाले "दिव्यति" धातुका १५५

रूप है। यातैं देव कहिये शासत्रकरि उद्धासित इं- प्रतिभा (अप्रकाशरूपता)के निषेधअर्थ विवक्षित समासकूं दिखावै हैं। १५५ देवशब्दकी सिद्धिके प्रकारकूं सूचन करैहैं॥ इहां यह अर्थ है :- "दिव्यति" शब्द द्योतनरूप अर्थवाला है। काहतैं "दिवु धातु जो है सो। करीडा। विजिगीषा। व्यवहार। द्युति। स्तुति। मोद। स्वप्न। कान्ति । गतिरूप अर्थनविषै है" ऐसें देखनेतैं औ "अच्" अंतवाले तिस "दिवु" धा- तुके गुणके होते कर्त्ताकेविषै [दिव्यतीति देवः] ऐसें उक्तरू- पकी सिद्धि होवैहै है॥ १५६ औ वे द्योतक (प्रकाशक) देव रूढिवृत्तितैं इंद्रा- दिक होवैंगे? यह आशंका करिके कहैहैं॥। इहां यह अर्थ है :- "ऐसे अध्यात्म है" इस उपसंहारके विरोधतैं प्रसि- ६

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६२ प्रथमप्रपाठक ? [छान्दोग्यो- उद्गीथ आदिकके उपासन १३

द्रियनकी वृत्तियां हैं औ असुर जे तिनतैं विपरीत १५७ १५८

कहिये अपनेहीं असुनविषै (चारीओर विषय- करनेवाली प्राणनरूप क्रियाओंविषै) रमणतैं स्वाभाविकी तमोगुण स्वरूप इंद्रियनकी वृत्ति-

द्धिकूंहीं त्याज्य होनेतें उपासकके शरीरविषै स्थित करण- रूप अवस्थावाले देव सत्वगुणरूप शास्त्रानुसारी देवशब्दके चाच्य हैं।। १५७ तैसैं अध्यात्मरूप विरोचन आदिक असुर होवैंगे? यह आशंका करिके। पूर्वकी न्यांई उपसंहारके विरोधकूं अ- भिप्रायका विषय करिके कहै हैं॥ इहां असुर इंद्रियनकी वृत्तियांहीं हैं। ऐसैं संबंध है॥ १५८ सात्विक इंद्रियनकी वृत्तिनतैं तिनकी विपरीतताकूं असुरभावकी सिद्धि अर्थ दिखावैहैं॥ १५९ तिनकी असुरशब्दकी वाच्यताविषै अन्य निमित्तकूं कहैहैं॥ इहां चारीओरतें विषयवालियां। याका चारीओरतैं नानागतिवाले हैं विषयजिनके तिनविषै। यह अर्थ है औ प्रा- णनरूपत्रियाओंविषै। याका जीवनके अनुकूल चेष्टाओंविषै। यह अर्थ है।। १६० ताहीकूं स्पष्ट करैहें॥ इहां यह अर्थ है :- शास्त्रकी अपेक्षा विनाहीं स्वभावके वशतैं प्रवर्त्तमानपना स्वाभाविक- पना है। तैसें हुये शास्त्रजनित इंद्रियवृत्तिनतैं इनका विपरी- तपना अतिस्पष्ट है। १६१ अन्य विपरीतताकूं कहैहैं॥

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पनिषत् ] द्वितीय खंड २ प्राणदृष्टिसैं (ऊकार) का उपासन १४ ६३

यांहीं हैं (इहां "ह वा" ये दो पूर्व वृत्तांतके प्र- काशक निपात हैं) वे जिस परस्परके विषयके अपहार (भराभव करने) रूप निमित्तके होते संयति करते भये। अर्थ यह जो :- [ "सं" पूर्व "यतति" धातुकूं संग्रामरूप अर्थवान्ता है। यातैं ] संग्रामकूं करते भये॥ अभिप्राय यह है किः-शैस्त्रिजनितप्रकाशरूप वृत्तिनके पराभव अर्थ प्रवृत्त स्वाभाविकी तमोरूप इंद्रियनकी वृत्तियां असुर हैं॥ तैसैं तिनतैं विपरीत शस्त्रिके अर्थ- रूपविषयके विवेककरि प्रकाश स्वरूप जे देव हैं वे स्वाभाविक तमोरूप असुरनके पराभवअर्थ प्रवृत्त हैं। ऐसें परस्परके अभिभव अरु उद्वरूप १६२ परस्पर विषयके दूरीकरनेकूं निमित्तकरिके देव- नका अरु असुरनका संग्राम कैसैं होताभया ? इस अपेक्षाके हुये। आसुरी वृत्तिकूं प्रकट करैहैं॥ १६३ दैवी वृत्तिकूं प्रसिद्ध करैहैं। १६४ देवनकी उक्त असुरनतैं विपरीतताकूं स्पष्ट करैहैं॥ इहां स्वाभाविक शास्त्रकी अपेक्षासैं रहित तमोरूप पापमय असुर परिच्छेदका अभिमान है ताके तिरस्करण अर्थ । यह अर्थ है।। १६५ उक्त आध्यात्मिक (देहके अंतर्गत) संग्रामकूं नि-

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६४ प्रथमप्रपाठक १ [छान्दोग्यो- उद्गीथ आदिकके उपासन १३

संग्रामकी न्यांईं सर्व प्राणिनविषै प्रतिदेह देव असुरनका संग्राम अनादिकालसैं प्रवृत्त है॥ सो इहां श्रुतिकरि आख्यायिकारूपसैं धर्म अध- र्मकी उत्पत्तिके विवेकविज्ञानअर्थ प्राण (इंद्रि- यन) की विशुद्धिके विज्ञानके विधिपर होनेकरि कथन करियेहै॥ यातैं दोनूं बी देव असुर प्र- जापतिके संतान हैं। यातैं प्राजापत्य हैं॥ इहां गम करैहैं॥ इहां उक्तरीतिकरि उक्तदेवनका अरु असुरनका परका अभिभव औ अपना उद्भव इसरूपवाला संग्राम प्रति- देह अनादिकालसैं प्रवृत्त अया है। जैसैं देव असुरनका सं- ग्राम है तैसें। ऐसें योजना है॥ १६६ ननु फेर अपुरुषार्थरूप देव असुरनका संग्राम कि- सअर्थ श्रुतिकरि श्रवण करीताहै? तहां कहैहैं॥ इहां सोई संग्राम। इसप्रकरणविषै प्राणकी विशुद्धिविषयकविज्ञानकूं वि- धान करनेकूं प्रवृत्त भयाहै। तैसैं श्रुतिकरि कथारूपसैं आ- ख्यान करियेहै औ इंद्रियनकी विषयनतैं विमुखताके हुये धर्म होवैहै अरु तिनकी विषयनकी अभिमुखताके हुये पा- पकी उत्पत्ति होवैहै। ऐसैं विवेकविज्ञानकी सिद्धिअर्थ आ- ख्यायिका रचिये है। तातैं इंद्रियनका प्रयत्नतैं विषयतत्पर- पना त्याग करनेकूं योग्य है औ तिनका विषयनतैं विमुख- पना मुमुक्षुनकरि यत्नतैं धारणकरनेकूं योग्य है। यह भाव है औ यजमानके प्राणन (इंद्रियन)काहीं देव असुरभावका उक्तपना अतः (यातैं) शब्दका अर्थ है।

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पनिषत्] द्वितीय खंड २ ६५ प्राणदृष्टिसैं (ऊकार) का उपासन १४

प्रेजापति कर्म अरु ज्ञानका अधिकारी पुरुष है। काहेतैं "पुरुषहीं उक्थ है। यहहीं महान्प्रजापति है" इस अन्य श्रुतितैं॥ ता (प्रजापति)केहीं शास्त्रीय अरु स्वाभाविकी इंद्रियवृत्तियां परस्पर विरुद्ध संतानोंकी न्यांई हैं तिसकरि उद्धवके हो- नेतैं। तिस उत्कर्ष अरु अपकर्षरूप निमित्तके होते प्रसिद्ध देवउँद्वीथ (उद्रीथरूप भक्तिकरि उपलक्षित उद्गाताके कर्म)कूं आहरण (ग्रहण) करते भये। अभिंप्रीय यह है किः-तिस के-

१६७ प्रजापति शब्दके रूढ अर्थकूं त्यागिके विवाक्षत अर्थकूं कहैहैं॥ १६८ उक्तरूपवाला पुरुष प्रजापति है। इस अर्थविषै प्रमाणकूं कहैंहैं॥ १६९ फेर उक्त देव असुरनकूं ता (पुरुष)का संतानपना कैसें हैं ? १७० जिसके होते। ऐसैं उक्त संग्रामके निमित्तकूं स्म- रण करैहैं॥ १७१ देवनका उत्कर्ष अरु असुरनका अपकर्ष। इस नि- मित्तके होते उद्गीथरूप भक्तिका ग्रहण कैसैं होवैहै? यह आशंका करिके कहैहैं॥ १७२ लक्षित लक्षणाके न्यायकूं सूचन करैहैं॥ इहां उ- द्वीथरूप भक्तिकी न्याँई। यह "अपि (बी)" शब्दका अर्थ है॥

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६६र प्रथमप्रपाठक १ [छान्दोग्यो- उद्गीथ आदिकके उपासन १३ ते ह नासिक्यं प्राणमुद्गीथमुपासा-

अर्थ :- वे (देव) नासिकागत प्राणरूप उद्गीथकूं उपासनकरतेभये। ता (प्राण)कूं

वल उद्गीथकेवी आहरणके असंभवतैं उद्गीथ- भक्तिकी न्यांईं ज्योतिष्टोमआदिक कर्मकूं आह- रण करते भये॥ ताँकू किसअर्थ आहरण करते भये ? यह कहियेहैः-इस कर्मकरि हम इन असुरनकूं पराभव करेंगे। इस अभिप्रायवाले हुये ॥ १ ॥ टीका :- औ जैवे तिस उद्गीथरूपकर्मकूं आ- हरण करनेकूं इच्छनेवाले हुये तव वे देव ना- सिकाविषै होनेवाले चेतनावाले घाण प्रा-

१७३ तिसके ग्रहणके प्रयोजनकूं प्रश्नपूर्वक कथन करैहैं। १७४ अब उद्धीथके आहारण (ग्रहण)के प्रकारकूं प्र- कट करैहैं। १७५ अचेतन करणकूं उद्गातापनैके असंभवतैं विशेषण देतेहैं॥ १७६ मुख्य प्राणकूं भिन्न करैहैं॥

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पनिषत्] द्वितीय खंड २ ६७ प्राणदृष्टिसैं (ॐकार) का उपासन १४ चक्रिरे। त हासुरा: पाप्मना विविधु- स्तस्मात्तेनोभयं जिघ्रति सुरभि च दु- गैधि च। पाप्मना ह्वेष विद्ः॥ २ ॥ हीं असुर पापकरि वेधन करते भये॥ तातैं तिसकरि-[लोक] सुगन्धि अरु दुर्गन्धि उभयकूं सूंघताहै। पापकरि जातैं यह (घ्राण) विद् है ॥ २ ॥

णमय उद्गीथके कर्त्तारूप उद्गाताकूं उद्गीथरूप १७७

भक्तिकरि उपासना करतेभये। अर्थ यह जो :- नांसिकागत प्राणकी दृष्टिकरि उद्गीथ १७७ "तूं हमारे प्रति उद्गायन कर" इस वाजसनेयक श्रुतिकूं आश्रय करिके कहैहैं॥ १७८ अब उद्गीथरूप भक्तिहीं सुनियेहै। उद्गाता तो नहीं सुनिये है। तातैं ताका उपासन कैसैं संभवै है ? यह आ- शंकाकरिके कहैहैं॥ इहां तिस (उद्गीथभक्ति)करि उपल- क्षित उद्गाताकूं उपासते हैं॥ यह अर्थ है। १७९ उपासन कैसैं होवै है? इस अपेक्षाके हुये उद्गी- थसैं कर्त्ताआावकी प्रार्थनासैं होवै है। ऐसैं कहैहैं॥ - १८० "वे प्रसिद्ध नासिकागत प्राणकूं" ऐसं अक्षर उक्त अर्थकूं कहिके। अब वाक्यार्थकूं कहैहैं॥

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६८ प्रथमप्रपाठक १ [छान्दोग्यो- उद्गीथ आदिकके उपासन १३

नामवाले अक्षररूप ॐकारकूं उपासनाकरते- भये । ऐसें हुये प्रकृतअर्थका परित्याग अरु अप्रकत अर्थका ग्रहण नहीं किया होवैगा। जाते "निश्चित इसीहीं अक्षरका" ऐसें ऊकार उपास्य होनेकरि प्रकत है॥ ॥ नेतु उद्गी- थकरि उपलक्षित कर्मकूं आहरण करतेभये। ऐसैं तुम पूर्व कहतेभये। अबी हीं कैसैं नासि- कागत प्राणकी दृष्टिकरि ऊकारकूं उपासन क- रतेभये। ऐसैं कहते हो ? यहं दोष नहीं है :- १८१ ननु क्यूं ऐसें इहां ॐकारनामक अक्षर उपास्य- पनैकरि व्याख्यान करियेहै? तहां कहैहैं॥ १८२ उक्त अर्थकूंहीं स्पष्ट करैहैं॥ इहां तिस प्रकारसैं प्राणके उद्गातादृष्टिकरि उपासनके हुये प्रकृतका परित्याग औ भक्तिके प्राणविषै प्राणदृष्टिकरि उपास्य होनेतैं अंगीकारके हुये अप्रकृतका ग्रहण होवैगा। यह शेष है॥ १८३ पूर्वापरके विरोधकूं पूर्ववादी आशंका करैहै॥ इहां यह अर्थ है :- उद्गीथकरि उपलक्षित जो उद्गाताका कर्म। तिसकरि उपलक्षित ज्योतिष्टोमादि कर्म ग्रहण किया ऐसे कहा औताका ग्रहण जो है सो ताका उपासनरूप है। तिसतैं वि- रुद्ध नासिकागत प्राणकी दृष्टिकरि अक्षरके उपासनका वचन है।। १८४ अपनी उक्तिके परस्परविरोधकूं सिद्धांती परिहार- करैहैं॥ इहां यह अर्थ है :- उद्गीथकरि उपलक्षित जो कर्म।

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पनिषत् ] द्वितीय खंड २ ६९ प्राणदृष्टिसैं (ऊकार) का उपासन १४

जातैं उद्वीथकर्मविषैहीं तिसके कर्त्ता प्राणदे- वताकी दृष्टिकरि उद्गीथरूप भक्तिका अवयव- रूप ऊकार उपास्य होनेकरि विवक्षित है स्व- तंत्र नहीं। यातैं तिस अर्थवान्ताकरि कर्मकूं आहरणकरते भये। यह हमनैं युक्त हीं कहा- है।। तिस ऐसैं देवनकरि स्वीकृत उद्गाताकूं स्वाभाविक तमोरूप प्रसिद्ध असुर ज्योतीरूप नासिकागत प्राणरूप देवकूं स्वजनित अधर्मके आसंगरूप पापकरि वेधन करते भये। अर्थ यह जो :- संसर्गकूं करतेभये॥ सोई नासिका- तिसकरि उपलक्षित ज्योतिष्टोमादिक कर्मके होतेहीं उद्गा- ताके प्राणकी दृष्टिकरि अक्षर (ऊकार) विवक्षित है औ उद्गीथका अवयवरूप ऊकार ध्येयपनैकरि इष्ट है। स्वतंत्र व्यापक नहीं। तिसप्रकार हुये अक्षरके उपासनरूप अर्थवाला होनेकरि कर्मका ग्रहण है। ध्येयभावकरि नहीं। ऐसैं अवि- रोध है।। १८५ आश्रयकरिके विधान अर्थ कर्मका ग्रहण है। ऐसैं कहिके अब "ताकूं" इत्यादि वाक्यकूं व्याख्यान करैहैं॥ इहां स्वजनित आसुर नासिकासैं संबद्ध। तिसकारि। यह अर्थ है। १८६ अधर्मतैं जो आसंग तिसरूपकरि। ऐसें इसके आ-

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७० प्रथमप्रपाठक १ [छान्दोग्यो- उद्गीथ आदिकके उपासन १३

गत प्राण कल्याणरूप गंधके ग्रहणके अभिमा- नरूप आसंगकरि अभिभूत विवेकविज्ञानवा- ला होता भया। कहिये सो तिस दोषकरि पापका संसर्गी होताभया॥ सो यहें कहा है किः-"असुर पापकरि वेधन करतेभये" ऐसैं॥ जातैं आसुरपापकरि विद्ध भया। तातैं तिसपा- पकरि प्रेरित घ्राणरूप प्राण प्राणिनकी दुर्ग- धिका ग्राहक भया। यांतैं तिसकरि लोक उ- भय सुरभि (सुगंधि) अरु दुर्गधिकूं सूंघता संगकरि वेधकूं साधतेहैं॥ इहां कल्याणगंध जो सुरभि क- हाहै ताका ग्रहण मुजकूंहीं होवै इस अभिमानरूप जो यह आसंग है तिसकरि अभिभूत है "गंधके सूंघनेका किया उप- कार सर्व कार्यकारणके संघातकूं तुल्य है" ऐसा विवेकज्ञान जिसका [ऐसा जो नासिकागत प्राण] सो तैसा है। ऐसैं विग्रह है॥। १८७ ननु नासिकागत प्राणकूं उक्त आसंगका स्पर्शीपना कैसै है ? यह आशंका करिके कहैहैं॥ १८८ उक्त अर्थविषै वाक्यकूं पतन करैहैं॥ १८९ व्राणगत प्राणके आसुर पापकरि विद्ध होनेविषै का- र्यरूपलिंगवाले अनुमानकूं सूचन करैहैं॥ १९० उक्त अनुमानके प्रकाशक वाक्यकूं व्याख्यान करैहैं॥

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पनिषत् ] द्वितीय खंड २ ७१ प्राणदृष्टिसैं (ऊकार) का उपासन १४ है। पीपकरि यह जातैं विद् है॥ इहां उभे यका ग्रहण अविवक्षित है। "जाका उभय हवि आर्तिकूं पावता है" इस वाक्यविषै। यह अर्थ है। काहेतैं "जिसीहीं इस अप्रतिरूप (अ- १९४

ननुकूल)कूं सूंघताहै" इस समान प्रकरणकी श्रुतितैं ॥२ ॥

१९१ अतः (यातैं) शब्दके अर्थकूंहीं स्पष्ट करैहैं॥ १९२ पापकरि विद्धहोनेतैं तिसकरि लोक दुर्गधकूं जा- नताहै ऐसेंहीं कहनेकूं योग्य है। काहेतैं सुगंधके ज्ञानकूं पा- पकर्मताके अभावतैं। तैसैं हुये "तिसकरि उभयकूं सूंघताहै" यह कैसे कहा ? तहां कहैहैं॥ १९३ द्रवात्मक वा पुरोडाशआदिक एकबी हविके काक आदिकके संबंधतैं अ्रंशके हुये प्रायश्चित्तके सद्भावके हुयेवी "जाका उभय हवि आर्ति (नाश)कूं पावताहै सो इंद्रसंबंधी पंचशराववाले ओदन (भात)कूं निर्वपनकरै" या वाक्यविषै उभयका ग्रहण अविवक्षित है। ऐसैं प्रथम तंत्रविषै स्थित है। तैसैं इहां बी होवैगा। ऐसैं कहैहैं॥ १९४ केवल "पापकरिहीं" इस वाक्यशेषतैं इहां उभय (सुगंध दुर्गध)का ग्रहण अविवक्षितहै ऐसै नहीं। किंतु वाजसनेयक (बृहदारण्यक)विषै उक्त उद्गीथ विद्याविषयक होनेकरि समान प्रकरणविषै "जोई इस अप्रतिरूप (दुर्गध)कूं सूंघता है सोई सो पाप है" इस श्रुतितैं इहां बी पापकरि

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७२ प्रथमप्रपाठक १ [छान्दोग्यो- उद्गीथ आदिकके उपासन १३ अथ ह वाचमुद्धीथमुपासाञ्चक्रिरे। ता हासुरा: पाप्मना विविधुस्तस्मात्त- योभयं वदति सत्यञ्चान्टतं च। पाप्मना ह्येषा विद्वा॥ ३ ॥ अर्थ :- अनन्तर प्रसिद्ध वाक्रूप उद्गी- थकूं उपासनकरतेभये। ताहीकूं असुर पा- पकारि वेधनकरतेभये। तातैं तिस (वाक्र) करि [लोक] सत्य अरु अन्ृत उभयकूं क हताहै। पापकरि जातें यह(वाक) विद् है।।३ टीका :- मुख्यप्राणके उपास्यभावअर्थ ताकी वेधके वशतैं दुर्गधकूं जानताहै ऐसैंहीं कहनेकूं योग्य होनेतैं उभयका ग्रहण अविवक्षित है। ऐसे कहैहैं॥ १९५ ननु नासिकागत प्राणकी पापकरि विद्ध होनेतैं अ- नुपास्यताके सिद्ध हुये न्याय (युक्ति)की समतातैं वाक् आदिकनकी बी अनुपास्यता है। तातैं उत्तरग्रंथसें क्या है? यातैं कहैहैं॥ इहां न्यायकी समताके हुयेबी मुखतें निराकर- णके अभाव हुये मुख्यप्राणकीहीं उपास्यता है ऐसे अनिश्च- यतैं ता (मुख्यप्राण)की उपास्यताकी दढता अर्थ मुखतैं वा- कूआदिकनकी उपास्यताकूं निषेध करनेकूं उत्तरग्रंथ है। यह अर्थ है औ विद्ध भये ऐसैं विचार करिके क्रमसैं कल्पना करियेहैं। ऐसैं संबंध है॥

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पनिषत् ] द्वितीय खंड २ ७३ प्राणदृष्टिसैं (ऊकार) का उपासन १४

तडासुराः पाप्मना विविधुस्तस्मात्तेनो- भयं पश्यति दर्शनीयं चादर्शनीयं च। पाप्मना ह्वेतदिडम्॥४॥ अथ ह श्रोतमुद्गीथमुपासाञ्चक्रिरे। अर्थ :- अनन्तरहीं चक्षुरूप उद्गीथकूंउ पासन करतेभये। ताहीकूं असुर पापकरि वे- धनकरतभये। तातैं तिसकरि दर्शनीय अरु अदर्शनीय उभयकूं देखताहै। पापकरि जातैं यह (चक्षु) विद् है।।४॥ अर्थ :- अनन्तरहीं श्रोत्ररूप उद्गीथकूं उ- विशुद्धताके अनुभवरूप अर्थवाला यह विचार श्रुतिनैं प्रवर्त्त किया। यातैं चक्षुआदिक देवता विचार करिके आसुरपापकरि विद्धभये। ऐसैं कल्पनासैं जानियेहै। अन्य समान है॥ अ- १९६ उत्तर वाक्यनविषै अक्षरोंका व्याख्यान अपेक्षित नहीं है। काहेतैं पूर्वस समान होनेतैं। ऐसैं कहैहैं॥ इहां अवशिष्ट वाक्यके एकदेशके त्रहणअर्थ आदि पद है।। ७

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७४ प्रथमप्रपाठक १ [छान्दोग्यो- उद्गीथ आदिकके उपासन १३ तडासुराः पाप्मना विविधुस्तस्मात्तेनो- भयशृणोति श्रवणीयच्चाश्रवणीयञ्च। पाप्मना ह्येतदिद्म् ॥ ५॥ अथ ह मन उद्गीथमुपासाच्चक्रिरे। तदामुरा: पाप्मना विविधुस्तस्मात्तेनो- पासनकरतेभये। ताहीकूं असुर पापकरि वेधनकरतेभये। तिसकरि श्रवणीय अरु अश्रवणीय उभयकूं मुनताहै। पापकरि जातैं यह (श्रोत्र) विद्द है॥ ५॥ अर्थ :- अनन्तरहीं मनरूप उद्गीथकूं उ- पासनकरतेभये। ताहीकूं असुर पापकरि वेधनकरतेभये। तातैं तिसकरि संकल्पनीय नन्तर वाक्कूं चक्षुकूं श्रोत्रकूं मनकूं इत्यादि। इहां अनुक्तवी अन्य त्वक् रसनाआदिक दे १९७ ननु व्राणादिकनकी पापकरि विद्ध होनेतें अनुपा- स्यताके हुये बी। त्वक्आदिकनकी तिस पापकरि सिद्ध हो- नेकरि अनुपास्यताके अकथनतैं मुख्यहीं प्राणकी उपास्यता निश्चित नहीं होवैहै? तहां कहैहैं॥

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पनिषत् ] द्वितीय खंड २ ७५ प्राणदृष्टिसैं (अकार) का उपासन १४ भय संकल्पयते संकल्पनीयञ्चासंक- ल्पनीयञ्च। पाप्मना ह्येतदिद्म् ॥६॥ अथ हय एवायं मुख्यः प्राणस्तमु- अरु असंकल्पनीय उभयकूं संकल्पकरता है। पापकरि जातैं यह (मन) विद् है ॥६॥ अर्थ :- अनन्तरहीं जोई यह मुख्य (मु-

वता देखनेकूं योग्य हैं। काहेतैं "ऐसैंहीं निश्र- १९८

यकरि ये देवता पापोंकरि विद्ध भये" इस अन्य- श्रुतितैं ॥ ३॥४ ॥ ५॥६॥ टीका :- औसुर पापकरि विद् होनेतैं प्रा- णादि देवताओंकूं कल्पनासैं जानिके अनंतर- जो यह प्रसिद्ध मुखविषै होनेवाला मुख्य १९८ उक्तनकूं अनुक्तनकी उपलक्षणता है तिसविषै बृ- हदारण्यक श्रुतिकूं कथन करैहैं॥ १९९ "अब प्रसिद्ध" इत्यादि मुख्यप्राणविषयक वा- क्यकूं उठायके व्याख्यान करैहैं। इहां पूर्वकी न्यांई। याका वाक् आदिकनविषै जैसैं कहा तैसैं। यह अर्थ है औ टंकन- करि। याका विदारण करनेहारे लोहविशेषनकरि। यह [आदिशब्दका] अर्थ है॥

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७६ प्रथमप्रपाठक १ [छान्दोग्यो उद्गीथ आदिकके उपासन १३ द्वीथमुपासाञ्चकरिरे। तर हामुरा ऋत्वा विदध्वंसुर्यथाऽशमानमाखणमृत्वा वि- ध्वरसेत ॥७॥ खगत) प्राण है तिसरूप उद्गीथकूं उपासन करतेभये। ताहीकूं असुर पायके विनाशकूं पावतेभये। जैसैं आखण (कठिन) पाषा- णकूं पायके [लोष्ट] विध्वंसकूं पावै ॥७॥ प्राण है ता उद्गीथकूं उपासन करते भये। ताकूं असुर पूर्वकी न्यांईं प्राप्तहोयके वि- ध्वंसकूं प्राप्त होते भये कहिये तिस प्राणके नाशके अभिप्रायमात्रकरि प्राणकूं किंचितबी न करिके वे असुर आप विनष्ट भये। ॥ कैसैं वि- नष्टभये ? इहां दष्टांतकूं कहैहैः-जैसें लोकविषै आखण (अभेद्य) पाषाणकूं [कुद्दालकआदिक करिबी खनन (भेदन) करनेकूं शक्य नहीं हो. वैहै ऐसा जो पाषाण सो अखण है। अखण हीं आखण है ऐसे ता पाषाणकूं] पायके सांम- २०० अश्रुत लोष्टके इहां ग्रहणविषै हेतुकूं कहैहैं॥ इटा

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पनिषत् ] द्वितीय खंड २ ७७ प्राणदृष्टिसैं (ॐकार) का उपासन १४

एवं। यथाऽशमानमाखणमृत्वा वि- ध्वसत एव हैव स विध्वरसते। अर्थ :- इसप्रकार जैसैं आखण पाषा- णकूं पायके [लोष्ट] विध्वंसकूं पावताहै। थ्यंतैं औ अन्य श्रुतितैं लोष्ट जो पांसुपिंड (धू- लीका ढींमा) सो पाषाणविषै पाषाणके भेदनके अभिप्रायसैं फेंक्या हुया तिस पाषाणकूं किं- चित्बी नकरिके आप विध्वंस (विदारण)कूं पावताहै। ऐसैं वे असुर विनाशकूं पावतेभये॥७॥ टीका :- ऐसैं असुरोंकरि अपराभूत होनेतैं २०२

सामर्थ्यतैं। याका ता (लोष्ट)की ध्वंसनकी योग्यतातैं औ व्वंसति क्रियाकूं कर्त्ताकी अपेक्षावाली होनेतैं। यह अर्थ है॥ २०१ ननु तब इसप्रकारके जिसी किसीके बी संभवतैं लोष्टके ग्रहणसैं अलंहै ? यह आशंकाकरिके "जैसै पाषा- णकूं पायके लोष्ट (धूलिका पिंड) विध्वंसकूं पावै" इस बृहदारण्यककी श्रुतितैं तिस लोष्टकाहीं इहां ग्रहण है। ऐसैं कहैहैं॥ २०२ दष्टांत अरु दार्प्टातिककरि सिद्ध अर्थकूं निगमन करैहैं॥ इहां प्राणकूं विशुद्ध होनेतैं ताका उपासन कर्त्तव्य है। यह शेष है॥

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७८ प्रथमप्रपाठक १ [छान्दोग्यो- उद्गीथ आदिकके उपासन १३ प्राण विशुद्ध है। यातैं ताका उपासन कर्त्तव्य है। यह कहा॥ अब ऐसैं जाननैंवाले प्राणा- २०३

त्मभूतकूं यह फल कहैहै :- "जैसैं पाषाणकूं" ऐसा यह हीं दृष्टांत है। ऐसैं हीं सो विनाशकूं पावताहै। ॥ कौंन यह?यह कहैहैः-जो ऐसैं जाननेवाले उक्त प्राणके वेत्ताविषै ताके अयोग्य पापकूं करनेकूं इच्छताहै औ जो बी या प्राणवेताके प्रति हिंसाकरैहै (आक्रोशता- डन आदिक करैहै)। सो बी ऐसैंहीं विनाशकूं पावताहै। यह अर्थ है।। जातैं सो यह प्राण- वित् प्राणभूत होनेतैं पाषाणरूप आखण (अ- भेद्य)कीन्यांई पाषाणरूप आषण है। अर्थ यह जो :- धर्षण (पराभव) करनेकूं अयोग्य- है।। ॥ नेतु नासिकागत प्राण बी वायुरूप २०३ फलवचनकूं अवतार देके व्याख्यात करैहैं॥ २०४ प्राणवेत्ताके प्रतिस्पर्धीके विनाशविषै हेतुकूं कहैहैं।। २०५ नासिकागत प्राणकी अरु मुख्यप्राणकी वायु वि- कारताकरि प्राणरूपताके अविशेषतैं दोनूंके पापकरि वेध अरु अवेध तुल्यहीं होवैंगे? ऐसें पूर्ववादी शंका करैहै॥

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पनिषत् ]] द्वितीय खंड २ ७९ प्राणदृष्टिसैं (ॐकार) का उपासन १४ य एवंविदि पापं कामयते। यश्चैन- मभिदासति। एषोऽश्माखणः॥८।। ऐसेंहीं सो विध्वंसकूं पावताहै जो ऐसैं जा- ननेवालेविषै पापकूं इच्छताहै अरु जो याकूं हननकरैहै। सो यह (विद्वान्) अइमाखण (अधर्षणीय) है॥ ८॥ है। जैसैं मुखगत प्राण है। तिनमैं नासिका- गत प्राण पापकरि विद्ध भया। प्राणहीं हुया मुखगतप्राण कैसैं पापकरि विद्ध न भया? येहैं दोष नहीं है :- काहेतैं नासिकागत प्राण तो स्थानरूप विशिष्ट करणविषै इंद्रियकी जो विगु- णता है तातैं विद्ध भया औ वायुरूप हुयाबी २०६ स्थानविशेषके संबंध अरु असंबंधकरि दोनूंकीबी पापकरि वेध अवेधकी व्यवस्था युक्त है। ऐसैं सिद्धांती परिहार करैहैं॥ इहां स्थान अवस्थाकरि अवच्छिन्न करणविषै विगुणता जो विषयविशेषविषै अशक्तता है। तिसतैं तिसरूप नासिकागतप्राणकी बी विद्धता होवैहै। यह अर्थ है औ ताके असंभवतैं। याका विशेष संबंधकी करी विगुणताके अ- योगतैं। यह अर्थ है। यातैं तिन दोनूंका भेद जो कहा सो घटित है।

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८० प्रथमप्रपाठक १ [छान्दोग्यो- उद्गीथ आदिकके उपासन १३ नैवैतेन सुरभि न दुर्गन्धि विजाना- त्यपहतपाप्मा ह्वेष तेन यदश्राति य- अर्थ :- इस (प्राण)करि न सुगन्धिकूं न दुर्गन्धिकूं [लोक] जानताहै। अपहत- मुखगतप्राण स्थानगत देवताकूं अत्यंतबलवान् होनेतैं विद्ध न भया। यह युक्त है॥ जैसैं वास्य (बढईके शस्त्रविशेष) जे हैं वे शिक्षावान् पुरुष (बढई) रूप आश्रयवाले हुये कार्यविशेषकू क- रतेहैं। अन्य हस्तगत नहीं। ताकी न्यांई दोष- वाले प्राणरूप सहाययुक्त होनेतैं प्राणदेवता विद्ध भई। मुख्य (मुखगतप्राण) नहीं ॥८।। टीका :- जतं मुख्यप्राण असुरोंकरि विद्ध भया २०७ स्थानसंबंधके विशेषतैं घ्राणगतप्राणकूं पापकरि विद्धपना है अरु ताके अभावतें मुख्य (मुखगत) प्राणकूं तिसपापकरि अविद्धपना है। यह टष्टांतकरि स्पष्ट करैहैं॥ इहां मुख्य प्राण विद्ध नहीं भया। काहेतैं दोषवाले घ्राण इं- द्वियरूप सहकारीके अभावतैं। यह शेष है॥ २०८ व्राणदेवताके विद्ध भये। प्राणदेवता तो विद्ध भई नहीं। इस अर्थविषै प्रमाण होनेकरि अनंतरके वाक्यकूं व्या- ख्यान करैहैं॥

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पनिषत्] द्वितीय खंड २ ८१ प्राणदृष्टिसैं (ॐकार) का उपासन १४

नहीं। तातैं इस मुखकरि सुगंधिकूं वा दुर्ग- धिकूं लोक जानता नहीं। प्राणकरि हीं तिन दोनूंकूं जानताहै।औ यौतैं पापके कार्यके अदर्श- नतैं जातैं यह अपहतपाप्मा है। अपहत कहिये विनाशित (दूरीकिया) है पाप जिसतैं सो यह अपहतपाप्मा है। अर्थ यह जो :- वि- शुद्ध है॥। औ जीतैं कल्याणआदिकके आ- संगवाले होनेतैं घ्राणआदिक आत्मंभर हैं। तैसैं मुख्यप्राण आत्मंभर नहीं है। किंतु सर्वार्थ है।। ॥ कैसैं है? यह कहियेहैः-तिस मुख- २१२

करि लोक जो खाताहै जो पीताहै। तिस

२०९ मुख्यप्राणके पापकरि वेधके अभावकूं उपसंहार करैहैं॥ इहां पापका कार्य जो आसंग ताके प्राणविषै अनुप- लंभतैं। यह अतः (यातैं) शब्दकाही अर्थ है॥ २१० "हि" शब्दकरि उक्तपापके अवेधकूं विशुद्धताविषै हेतुकरिके। मुख्यप्राणकी विशुद्धिकूं उपसंहार करैहै। २११ ताकी विशुद्धताविषै अन्य हेतुकूं कहैहैं॥ इहां। यातैं विशुद्ध है॥ ऐसैं उत्तर वाक्यविषै संबंध है।। २१२ प्राणकी सर्वार्थताकूं प्रश्नपूर्वक प्रतिपादन करैहैं॥ इहां ब्राणादि। इस आदिशब्दकरि कार्यवी कहिये है॥

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८२ प्रथमप्रपाठक १ [छान्दोग्यो- उद्गीथ आदिकके उपासन १३ त्पिवति तेनेतरान्प्राणानवति। एतमु पाप्मा जातैं यह (प्राण) है। तिसकरि जो खाताहै जो पीताहै तिसकरि इतर(घ्राणआ- भक्षित अरु पीतकरि इतर घ्राणादिक प्राण- नकूं पालन करैहै। अर्थ यह जो :- तिसक- रिहीं तिनकी स्थिति होवैहै। यातैं सर्वेभर प्राण है। यातैं विशुद्ध है॥ ॥ न्तुँ फेर मुख्य प्रा- णके भक्षित अरु पीतकरि इनकी स्थिति कैसैं जानिये है? यह कहिये है :- इस मुख्य प्राणकूंहीं कहिये सुख्यप्राणकी वृत्तिकूं। अर्थ यह जो :- अन्नपानकूं। अंततैं कहिये अंत जो मरणकाल २१३ "तिसकरि ये तृप्त होवैहैं।" इस अन्य श्रुतिकूं आश्रयकरिके कहैहैं॥ इहां प्राणवृत्तिके हेतु अन्नपानकरि संघातकी स्थिति प्रथम अतः (यातैं) शब्दका अर्थ है औ सर्वार्थता द्वितीय अतः (यातैं)शब्दका अर्थ है॥ २१४ अन्नपानोकूं मुख्य प्राणके उपयोगी होनेतैं संघा- तकी स्थितिकी हेतुता है इस अर्थविषै प्रश्नपूर्वक लिंगकूं दिखावै हैं।। २१५ वृत्तिकूंहीं विशेषण देतेहैं॥ इहां प्रतिदिन उप- योगी हुये अन्नपान प्राणकी स्थितिके हेतु हैं। यह अर्थ है॥

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पनिषत् ] द्वितीय खंड २ ८३ प्राणदृष्टिसैं (ॐकार) का उपासन १४ एवान्ततोऽवित्त्वोत्कामति व्याददा- त्येवान्तत इति ॥ ९॥ दिक) प्राणोंकूं रक्षण करैहै। इस (मुख्य प्राणकी वृत्ति)हींकू अन्ततैं न पायके उ- त्क्रमणकरैहै। अरु अन्ततैं व्यादान (मुख- का विदारण) करैहै। ऐसैं ॥ ९ ॥ तिसविषै। न पायके घ्राणादि प्राणोंका समु- दाय उत्क्रमण करैहै ( देहतैं निकसताहै) यह अर्थ है। जातैं प्राणरहित पुरुष खानेकूं वा पीनेकूं शक्त होता नहीं। तिसकरि तब घ्रा- णादिकके समूहकी उत्क्रांति प्रसिद्ध होवैहै। जौतैं उत्क्रांतिके हुये प्राणकी अशनकरनेकी २१६ ननु प्राणकूं उत्क्रमण करनेकी इच्छाके हुयेबी सं- घात आप भक्षण अरु पानकूं करिके स्थित होवैगा? यह आशंकाकरिके कहैहैं॥ इहां तदा (तब) याका प्राणके उ- त्क्रमण करनेकी इच्छाकी अवस्थाविषै। यह अर्थ है।। २१७ ननु उत्क्रान्तिअवस्थाविषै भोजन करनेकी इच्छा आदिकके अभावतैं हीं संघातकी उत्क्ान्ति होवैहै। परंतु अशन (भोजन)आदिकके अभावतैं नहीं। तिसविषै प्रमाणके अ-

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८४ प्रथमप्रपाठक ? [छान्दोग्यो- उद्गीथ आदिकके उपासन १३ तर हाद्विरा उद्गीथमुपासाञ्चक एतमु एवाङ्गिरसं मन्यन्तेऽद्गानां य- ट्रस: ॥90 ॥ अर्थ :- अङ्गिरा हुया ताही उद्गीथकूं उ- पासनकरताभया। इसीहींकूं आड़्गिरस मानतेहैं। जातैं अङ्गनका रस है॥ १०॥ अनिच्छा देखियेहै। जातैं व्यादान (मुखका विदारण) करता हीं है। यह अर्थ है। जातैं सो अन्नके अलाभहुये उत्क्रांतका लिंग है।९॥ टीका :- तिसकूं "अंगिरशी" कहिये तिसे मुख्यप्राणकूं "अंगिरा" इसगुणवाले उद्गीथकूं भावतैं? यह शंका अई। यातैं कहैहैं॥ इहां तत् (सो) ऐसें मुखका खोलना कहिये है औ अन्नका ग्रहण पानके उ- पलक्षणअर्थ है।। २१८ विशुद्धिगुणवाले मुख्यप्राणरूप उद्धाताकी दृष्टि- करि उद्गीथका अवयवभूत ओंकारनामक अक्षर उपास्य है। ऐसें कहा। अब तहांहीं आङ्गिरस बृहस्पति अरु आस्याय- रूप तीनगुणनके विधानअर्थ उत्तरग्रंथकूं उठावते हैं॥ २१९ तहां वृत्तिकारके अभिप्रेत संबन्धकूं दिखावै हैं॥

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पनिषत् ] द्वितीय खंड २ ८५ प्राणदृष्टिसैं उद्गीथ (ऊकार) का उपासन १४ वकदाल्भ्य मुनि उपासनकरताभया। ऐसैं वक्ष्यमाणके साथि संबंध करियेहै॥ तैसैं "तृ- हस्पति" ऐसैं। अरु "आयास्य" ऐसैं। बक- मुनि उपासन करताभया। ऐसैं केईक संबन्धकूं करतेभये "इसी हीं प्राणकूं आंगिरस । बृहस्पति। आयास्य। मानतेहैं" इस वचनतैं यैथाश्रुत अर्थके असंभव हुये ऐसैं संभवैहै। परंतु ऋषिनकी चोदना ( प्रेरणा)विषैबी यथा- श्रुत अर्थ संभवैहै अन्यश्रुतिकी न्यांईं। तातैं २२० पर (वृत्तिकार)के अभिप्रेत संबन्धविषै गमककूं कहैहैं। २२१ अव्यवहित (अन्तरायरहित ) संबन्धके संभव हुये व्यवहित (अन्तरायसहित) संबन्धकी कल्पना युक्त नहीं है। ऐसैं सिद्धान्ती परिहार करैहैं॥ इहां यह अर्थ है :- ऋषिनके अङ्गिरा बृहस्पतिआदिक शब्दनसैं उपदेशके हुये बी। तीन गुणोंकरि विशिष्ट प्राणका उपासन विरोधकूं पावता नहीं औ तातैं प्रधानोंके अबाध हुये प्राणके उपासक ऋषि- नका उपदेश त्याग करनेकूं योग्य नहीं है। काहेतैं बृहस्प- तिआदिक शब्दनतैं बी प्रथम प्रतीत भये ऋषिनकूं छोडिके यौगिकवृत्तिकरि जाननेयोग्य गुणमात्रकी प्रतिपत्तिके असंभवतैं।। २२२ प्राणके उपासक ऋषिनके अभिधान (नाम)कूं ऐतरेयक श्रतिकरि दृढ करैहैं। २२३ ताहीकूं स्पष्ट करैहैं॥ इहां शतर्चिनाम प्रथममंड- V

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८६ प्रथमप्रपाठक ? [छान्दोग्यो- उद्गीथ आदिकके उपासन १३

प्रथम मंडलकी दृष्टिवाले ऋषि ऐसैं कहतेहैं। इसीहीं प्राणरूप हुयेकूं ऋषि (शरीरविषै स्थित) वी [कहतेहैं ]। तैसैं मध्यम जे गृत्समद। विश्वा- २२४

लके देखनेवाले ऋषि हैं औ यह प्राण जातैं संघातनामक पुरुषकेप्रति शतवर्षपर्य्यन्त प्राप्त होता भया। तातै इसीहीं ऋ- पिनके शरीरविषै स्थित वी विद्यमान प्राणकूं "शतर्चि" श- व्दका वाच्य कहते हैं। ऐसैं योजना है॥ २२४ "शतर्चि" शब्दकी न्यांई दोनूंकूं विषय करनेवाले अन्य शब्दवी हैं। ऐसें कहैहैं॥ इहां यह अर्थ है :- आद्यमं- डलकूं छोडिके मध्यम मंडलोंके देखनेवाले जे ऋषि हैं वे म- ध्यम हैं। वे वी प्राण हैं। काहेतैं ताकूं स्वात्माके मध्य सर्व जगत्का विधारक होनेतैं औ गृत्समद तो द्वितीय मंडलका दर्शी है।। निद्राकालविषै वाकूआदिकनके गिलजानेतैं प्राण गृत्स है। रेतके विसर्गका कारण अरु मदका हेतु होनेतैं अपान मद है। प्राण अपानस्वरूप होनेतें प्राणवी ऐसा (गृ- त्समद) कहिये है औ तृतीय मंडलका दर्शी विश्वामित्र है। ग्राणवी तैसा कहिये है। काहेतैं ता प्राणका जातें भोग्यका समूह विश्वस्थिति हेतुताकरि स्न्निग्ध होता भया। औ वाम- देव तो चतुर्थ मंडलका द्रष्टा है। प्राणवी तिस शब्दका वा- च्यहै। काहेतैं ता प्राणकूं वाक्आदिक देवताओंकरि सम्यक् भजनेयोग्य होनेतैं। औ पंचममंडलका द्रष्टा अत्रि ऐसें कहि- येहै। प्राणवी तैसाही कहियेहै। काहेतैं ताकूं अनर्थरूप पा- पोंकेप्रति सर्वत्र अत्ता (अक्षक) होनेतैं। इहां आदिपदकरि भरद्वाजआदिक पद ग्रहण किये हैं॥

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पनिषत् ] द्वितीय खंड २ ८७ प्राणदृष्टिसैं उद्गीथ (ॐकार) का उपासन १४ मित्र। वामदेव। अरु अत्रि। इत्यादिक ऋषि हैं। तिनकूंहीं श्रुति प्राणरूप आपादनकरैहै। तैसैं २२५

इन प्राणके उपासक अंगिरा। बृहस्पति। आ- यास्य नामक ऋषिनकूं श्रुति प्राणरूप करैहै। अभेदके विज्ञानअर्थ॥ औ "प्रीण प्रसिद्ध पिता है। प्राण माताहै" इत्यादिककी न्यांई। तातैं अंगिरानाम ऋषि प्राणहीं हुया आत्मा (आप) आंगिरस प्राणरूप उद्गीथकूं उपासनकरता भया। यह अर्थहै॥ जीतैं सो अंगोंका प्राण हुया रस है तिसकरि यह आंगिरस है॥ १० ॥

कहै हैं॥ २२५ दष्टान्तकूं ऐसैं व्याख्यान करिके अब दार्ष्टान्तिककूं

२२६ ननु अङ्गिराआदिक ऋषिनकूं। श्रुति ऐसें प्राणरूप क्यूं करै है? यह शंका भई। यातैं कहैहैं॥ २२७ तैसें हुये सप्तमविषै प्राणका सर्वात्मभाव आगे क- हियेगा। तैसैं इहांवी ताकी तिस तिस ऋषिरूपता विवक्षित है। ऐसैं कहै हैं। २२८ अव्यवहित संबन्धके संभव हुये फलित वाक्यार्थकूं कथन करें हैं॥ २२९ प्राणके आङ्गिरसपनैंकूं व्युत्पादन करैहैं कहिये व्यु- त्पत्तियुक्त करैहैं॥

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प्रथमप्रपाठक १ [छान्दोग्यो- ८८ उद्गीथ आदिकके उपासन १३ तेन तरह वृहस्पतिरुद्वीथमुपासा- ञ्चक्र एतमु एव रृहस्पतिं मन्यन्ते। वाग्घि बृहती तस्या एप पतिः ॥११॥ तेन तः् हायास्य उद्धीथमुपासाञ्चक अर्थ :- जातैं वाक् बहती है। ताका पति है। तिसकरि बहस्पति [है। सो हुया] तिसींहीं उद्गीथकूं उपासन करताभया। तिसींहींकूं वहस्पति मानतेहैं॥ ११॥ अर्थ :- जातैं आस्य (मुख)तैं अयन (निर्गमन) कहैहै। तिसकरि आयास्य [है। टीका-तैसें वोकेरूप बृहतीका पति है तिस २३०

करि यह बहस्पति है। तैसें जातें आस्य २३० अङ्गिरसशब्दकी न्यांई बृहस्पति शब्दवी दोनूं ठिकाने लगावनेकूं योग्य है। ऐसैं कहै हैं॥ २३१ प्राणके बृहस्पतिपनैकूं साधतेहैं॥ २३२ अङ्गिरस अरु बृहस्पति शब्दकी न्यांई आयास्यशब्द वी दोनूं ठिकाने देखनेकूं योग्य है। ऐसें कहैहैं॥ २३३ ता आयास्यशब्दके उभय ठिकाने वर्तनेकूं स्पष्ट करैहैं॥ इहां जातैं आस्य (मुख)तैं अयन (गमन) करैहै

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पनिषत् ] द्वितीय खंड २ ८९ प्राणदृष्टिसैं उद्गीथ (ऊकार) का उपासन १४ एतमु एवायास्यं मन्यन्त आस्याद्यद- यते ॥१२॥ तेन तश्ह बको दाल्भ्यो विदान्चकार। सो हुया] तिसींहीं उद्गीथकूं उपासन कर- ताभया। याहीकूं आयास्य मानतेहैं ॥१२॥ अर्थ :- ताहींकूं बकदाल्म्य जानताभया। (मुख)तैं निर्गमन करैहै। तिसकरि आ- यास्य ऋषि प्राणहीं हुया है। यह अर्थ है।। तैसैं अन्य बी उपासक आपहीं आंगिरस आ- दिक गुणवाले प्राणरूप उद्गीथकूं उपासन करै। यह अर्थ है ॥ ११ ।। १२ ।। टीका :- केवले आंगिरसआदिकउपासनकर- तिसकरि आयास्य प्राण है। सोई इहां उपासक होनेतैं ऋ- षिवी तैसा कहियेहै। ऐसैं योजना है। २३४ ननु उक्तऋषिनकाहीं उक्तगुणवाला उपासन है अन्योंका नहीं। विशेष वचनतैं? यह आशंकाकरिके कहैहैं॥ इहां विशेषकूं शेषकी निवर्तकता नहीं है। काहेतें दिखावने- अर्थ होनेतैं। यह अर्थ है। २३५ उक्त उपासनके तीनोविषै नियमके अभावविषै प्र- माणकूं दिखावैहैं॥

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९० प्रथमप्रपाठक १ [छान्दोग्यो- उद्गीथ आदिकके उपासन १३ स ह नैमिषीयानामुद्गाता बभूव। स ह स्मैभ्यः कामानागायति॥ १३॥ सोई नैमिषीय ऋषिनका उद्गाता होता- भया। सोई इनोंके अर्थ कामोंकूं गायन करैहै। तिसकरि वकदाल्म्य [है। सो हुया] ताहीकूं जानताभया ॥ १३॥ तेभये। ऐसैं नहीं। किंतु ताकूं यथादर्शित प्राण प्रसिद्ध बक नाम दल्म्यका पुत्र दाल्म्य जानताभया औ जीनिके सोई नैमिषीय (नैमिषवनवासी) सत्रिनका उद्गाता होता- भया औ सो प्राणके उपासनके सामर्थ्यतैं इन नैमिषीय ऋषिनके अर्थ कामोंकू प्र- सिद्ध गायन करताभया। यह अर्थ है। तैसैं अन्य बी उद्गाता गायन करै ॥ १३॥ २३७

२३६ अब विहित उपासनके दष्ट फलकूं कहनेकूं पात- निका (भूमिका)कूं करैहैं॥ २३७ भूमिका (अवतरणिका) कूं करिके । कहनेकूं इ- च्छित उपासनाके फलकूं कथन करै हैं॥

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पनिषत् ] द्वितीय खंड २ ९१ प्राणदृष्टिसैं उद्गीथ (ऊकार) का उपासन १४ आगाता ह वै कामानां भवति। य एतदेवं विद्वानक्षरमुद्गीथमुपास्त इत्य- ध्यात्मम् ॥ १४॥ इति श्रीछान्दोग्योपनिषदि प्रथमप्रपाठकस्य द्वितीयः खण्डः समाप्ः ॥२॥ अर्थः-निश्चित कामोंका आगाता (गा- यक) होवैहै। जो ऐसैं विद्वानहुया अक्ष- ररूप उद्गीथकूं उपासताहै। ऐसैं अध्यात्म यह [उपासन कहा] है॥ १४॥ इति श्री०मूलमात्रभाषा० प्रथमप्रपाठकस्य द्वितीय: खंडः ॥२ ॥ निश्चियकरि कामोंका सो आगाता (गा- यक) हौवैहै। जो ऐसें जानता हुया उक्त गुणवाले प्राणरूप उद्गीथ अक्षरकूं उपासता है। ताकूं यह दृष्ट फल कहा। प्रीणका आत्म- २३८ "दष्ट" इस विशेषणतैं अभीष्ट (अदृष्ट) अन्यफ- लकूँ कहैहैं॥ आत्मविषय। याका शरीरवर्ती प्राणगोचर। यह अर्थ है।।

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९२ प्रथमप्रपाठक १ [छान्दोग्यो- उद्गीथ आदिकके उपासन १३ भाव तो अदृष्ट फल है। सो "देव होयके दे- वनके प्रति पावता है" इस अन्य श्रुतितैं सिद्ध हीं है। यह अभिप्राय है॥ ऐसैं अध्यात्म है कहिये यह आत्मविषयक उद्गीथका उपासन है। इति ऐसैं उक्त जो उपसंहार। सो वक्ष्यमाण २३९

अधिदैवतरूप उद्वीथके उपासनविषै बुद्धिके स- माधान (स्थित होने ) अर्थ है ।। १४॥। प्रपाठकस्य द्वितीयः खंडः समाप्ः ॥२ ॥

२३९ उपसंहार (समाप्ति)के प्रयोजनकूं कहैहैं॥ इति श्री० प्रथमप्रपाठकगत द्वितीयखंडस्य टिप्पणं॥ २॥

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पनिषत् ] तृतीय खंड २ ९३ आदित्य औ प्राण आदिककी दृष्टिसैं उद्गीथ स्वरका उपासन १२ अथ श्री० प्रथमप्रपाठकस्य तृतीयः खंडः ॥ ३ ॥ अथाधिदैवतं॥ य एवासौ तपति अथ श्री० मूलमात्रभाषा० प्रथमप्रपाठकस्य तृतीयः खंडः ॥ ३ ॥ अर्थ :- अनन्तर अधिदैवत है :- जोई

प्रथमप्रपाठकस्य तृतीयः खंडः प्रारभ्यते ॥३॥ आदित्य औ प्राण आदिककी दृष्टिसैं उद्गीथ स्वरका उपासन ॥ १२ ॥ टीका :- अनन्तर अधिदैवत है कहिये दे- वताकूं विषय करनेवाला उद्गीथका उपासन प्र- स्तुत है। यहे अर्थ है। उद्गीथकूं अनेक प्र- अथ श्री०प्रथमप्रपाठकगत-तृतीयखंडस्य टिप्पणं ॥ ३॥ २४० इहां अनन्तर। आध्यात्मिक प्राणकी दृष्टिकरि उ- द्रीथउपासनके वचनतैं। यह शेष है।। २४१ ननु ऐसैं देवतारूप विषयवाला उद्गीथका उपासन क्यूं प्रसङ्गविषै प्राप्तकरियेहै ? तहां कहैहैं॥ इहां प्राणरूपसैं

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९४ प्रथमप्रपाठक १ [छान्दोग्यो- उद्गीथ आदिकके उपासन १३

तमुद्ीथमुपासीतोदयन्वा एप प्रजाभ्य यह तपताहै तिस उद्गीथकूं उपासन करै। उदयकूं पाया हुयाहीं यह (सूर्य) प्रजाके- कारसैं उपास्य होनेतें॥ जोई यह आदित्य तपताहै तिस उद्गीथकूं उपासन करै। अ- र्थयह जो :- औदित्यदृष्टिकरि उद्रीथकूं उपासन करै।॥ ननु तिस उद्गीथकूं॥ यह उद्ीथशब्द अक्षरका वाची हुया आदित्यविषै कैसैं वर्तताहै? यहैं कहियेहैः-उदयकूं पाया हुया हीं यह प्र- औ आदित्यरूपसैं उद्गीथकूं उपास्य होनेतें देवतारूप विषयवाली ता (उद्गीथ) की उपासनाका प्रसङ्ग युक्तहीं है। यह अर्थ है॥ २४२ "आदित्य आदिककी मतिवाले" इत्यादि न्यायकरि वाक्यके अर्थकूं कथन करै हैं।। २४३ ननु "तिस आदित्यरूप उद्गीथकूं उपासन करै" ऐसैं आदित्यशब्दका औ उद्गीथशब्दका सामानाधिकरण्य (एक अर्थविषै स्थितपना) अयुक्त है। काहेतें उद्गीथश- ब्दकूं प्रकरणतैं अक्षरका वाची होनेतैं औ आदित्यशब्दकूं ज्योतिरूप विषयवाला होनेतैं औ भिन्न अर्थवाले दो शब्द- नके सामानाधिकरण्यके प्रयोगतैं? ऐसैं पूर्ववादी शंका करैहै॥ २४४ आदिविषै यद्यपि उद्गीथशब्द रूढिकरि वर्तनेकूं योग्य नहीं है। तथापि गौणीवृत्तिकरि तहां तहां वृत्तिके सामानाधिकरण्यकी सिद्धि है। ऐसें सिद्धान्ती उत्तरकूं कहैहैं।

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पनिषत् ] तृतीय खंड ३ ९५ आदित्य औ प्राण आदिककी दृष्टिसैं उद्गीथ स्वरका उपासन १२ उद्धायति। उद्यरसमो भयमपहन्त्य- पहन्ता ह वै भयस्य तमसो भवति। य एवं वेद॥ १ ॥ अर्थ उद्गायन करताहै। उदयकूं प्राप्त हुया तमकूं अरु भयकूं अपहनन करैहै। जो ऐसैं जानताहै [सो] निश्चित भयका अरु तमका अपहन्ता होवैहै ॥ १॥ जाकेअर्थ (प्रेजाओंके अन्नकी उत्पत्ति अर्थ) उद्गायन करैहै। जातैं तिसकी अनुदयके हुये ब्रीहिआदिककी पक्ति ( पाक) नहीं होवैगी। यातैं उदायन करते हुयेकि न्यांई उद्ायन करैहै। जैसैंहीं उद्ाता अन्नके अर्थ [ उद्ायन करैहै। २४८

२४५ प्रजाकेअर्थ उद्गायन करैहै। याहीकूं स्पष्ट करैहैं॥ इहां अन्नकी उत्पत्तिकेअर्थ उद्गायन करैहै। ऐसैं पूर्वसैं संबन्ध है। २४६ ताहीकूं व्यतिरेकद्वारा साधते हैं॥ इहां आदित्यका अन्नकेअर्थ आगान। अतः (यातैं) शब्दका अर्थ है॥ २४७ ता (आदित्य) का उद्धाताकी न्यांई प्रत्यक्ष उद्धान प्रतीत नहीं है ? यह आशंका करिके कहैहैं॥ २४८ उपमाकूंहीं उपपादन करैहैं॥ इहां यह अर्थ है :-

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९६ प्रथमप्रपाठक ? [छान्दोग्यो- उद्गीथ आदिकके उपासन १३ समान उ एवायञ्चासौ चोष्णोऽयमु- अर्थ :- समानहीं यह (प्राण) औ वह तैसै ] यांतैं उद्रीथ सविताहै। यह अर्थ है।। किवों :- उद्यहुया रात्रिके अन्धकारकूं अरु तिसकरिजन्य प्राणिनके भयकूं हननकरैहैं॥ तिस ऐसैं गुणवाले सविताकूं जो जानताहै सो निश्चित जन्म मरणादिरूप आत्माके भ- यका अरु ताके कारण अज्ञानरूप अन्धका- रका अपहन्ता (नाशयिता) होवैहै॥१॥ टीका :- यैद्यपि स्थानभेदतैं प्राण अरु आ- "अनन्तर आत्माके अर्थ अन्नआदिककू आगान करै" ऐसैं अन्य श्रुतिविषै जैसे अन्नकेअर्थ उद्गाता आगानकूं करै है। यह जान्या है। तैसे आदित्यवी प्रजाओंके अन्नकेअर्थ आगा- नकूं करै है।। २४९ उद्गीथशब्दके आदित्यविषै सम्भवकूं विचारिके फ- लितकूं कहैहैं॥ २५० आदित्यकी दृष्टिकरि उद्गीथके उपासनकूं उपपादन करिके। अब फलोक्तिकूं कहै हैं॥ इहां ऐसे गुणवाले। याका तम अरु तिसतैं जन्य भयके निवर्तकपनैरूप गुणसहित। यह अर्थ है।। २५१ ननु अध्यात्म अरु अधिदैवत। इस स्थानभेदतैं

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पनिषत् ] तृतीय खंड २ ९७ आदित्य औ प्राण आदिककी दृष्टिसैं उद्गीथ स्वरका उपासन १२

ष्णोऽसौ स्वर इतीममाचक्षते स्वर इति (सूर्य) है। उष्ण यह है। उष्ण वह है॥ "स्वर" ऐसैं इस (प्राण)कूं कहतेहैं औ

दित्य भिन्नकिन्यांई लखियेहैं। तथापि तिनके सतत्व (स्वरूप) का भेद नहीं है।। ॥। कैसैं २५२

किः-प्राण। गुणतैं सविताकरि समान (तुल्य) हीं है। औ सविता। प्राणकरि [तुल्य हीं है]॥ जीतैं उष्ण यह प्राण है औ उष्ण यह स- विता (सूर्य) है॥। । किंवा :- "स्वर" २५४

ऐसैं इस प्राणकूं कहते हैं। तैसैं "स्वर"

प्राण अरु आदित्यकूं भिन्न होनेतैं भिन्नहीं तिनका उपासन उपादेय है? यातैं कहैहैं॥ २५२ प्राण अरु आदित्यके स्वरूपके भेदके अभावकूं प्र- तिपादन करै हैं॥ इहां "उ" शब्द अपि (बी) अर्थ है। सो स्थानभेदतैं भेदकूं आज्ञा करैहै॥ २५३ गुणतैं समताकूं साधतेहैं॥ २५४ नामतैं समताकूं कहैहैं॥

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९८ प्रथमप्रपाठक १ [छान्दोग्यो- उद्गीथ आदिकके उपासन १३ प्रत्यास्वर इत्यमुं तस्मादा एतमिमम- मुन्नादीथमुपासीत ॥२॥ "स्वर" ऐसैं अरु "प्रत्यास्वर ऐसें उस (सूर्य)कूं [कहते हैं]। तातैंहीं इसरूप औ इस उसरूप उद्गीथकूं उपासनकरै ॥ २ ॥ ऐसें अरु "प्रत्यास्वर" ऐसैं इस सविताकूं कहतेहैं॥ जाँतैं प्राण स्वरता (चलता) हीं है अरु मृत हुया फेर प्रत्यागमन करता नहीं । सैविता तो अस्तकूं पायके फेर बी दि- नदिनविषै प्रत्यागमन करताहै। यातैं "प्र- त्यास्वर है। इसगुणतैं अरु नामतैं परस्पर स- २५५ सूर्यकीन्यांई प्राणविषै वी "प्रत्यास्वर" शब्दकी प्रवृत्तिकूं आशंका करिके कहै हैं॥ इहां स्वरताहीं है। याका गमन करताहीं है। यह अर्थ है। तिसींहीं स्थूलदेहविषै फेर आवता नहीं। तातैं प्राणविषै स्वरशब्दकी प्रवृत्तिहीं है। यह अर्थ है।। २५६ ननु सूर्यविषैबी तब तिस (स्वर) शब्दकी प्रवृ- त्तिहीं होवैगीः-यह आशंकाकरिके कहै हैं॥ इहां यह अर्थ है :- अस्तभये आदित्यके प्रतिदिन एकठिकानेहीं आगमनके दर्शनतैं इसविषै प्रत्यास्वर शब्दकीवी प्रवृत्ति है।। २५७ यातैं प्राण अरुआदित्यके उक्त साम्यकूं निगमनकरैहैं।

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पनिषत् ] तृतीय खंड ३ ९९ आदित्य औ प्राण आदिककी दृष्टिसैं उद्गीथ स्वरका उपासन १२

अथ खलु व्यानमेवोद्गीथमुपासीत। अर्थः-अब निश्र्यकरि व्यानरूप हीं उद्गीथकूं उपासन करै। जोई प्राणनकूं करैहै मान प्राण अरु आदित्य हैं। यैतं स्वरूपके अ- भेदतैं इस उस (आदित्य रूप) उद्गीथकूं उपासनकरै ॥ २ ॥ टीका :- अनन्तर खलु कहिये प्रकारान्तर- करि उद्गीथका उपासन कहियेहैः-वैक्ष्यमाण- लक्षणवाले प्राणकेहीं वृत्तिविशेष व्यानरूपहीं २५८ परस्परकी समताके किये फलकूं कहैहैं॥ इहां यह अर्थ है :- प्राण अरु आदित्यकूं एककरिके ताकी दृष्टिकरि उद्गीथका अवयवरूप ऊकार नामवाला अक्षर उपास्य है।। २५९ अबी आध्यात्मिक अरु आधिदैविकरूप उद्गीथके उपासनकूं प्रसङ्गविषै प्राप्त करिके सोई संक्षेप करिके एक- करिके कहा। तैसैं हुये आगे कहने योग्यके अभावतैं उत्तर- ग्रंथसैं क्या है ? यह आशंका करिके आध्यात्मिकरूपहीं उ- द्रीथके उपासनकूं अनुसरिके कहै हैं॥ २६० कौन यह व्यान है जाकी दृष्टिकरि उद्धीथका उपा- सन उपदेशकरनेकूं इच्छित है? यातैं कहैहैं॥ २६१ अन्यपक्षकूं निषेध करैहैं॥

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१०० प्रथमप्रपाठक ? [छान्दोग्यो- उद्गीथ आदिकके उपासन १३ यद्वै प्राणिति स प्राणो यदपानिति सो- डपानोऽथ यः प्राणापानयोः संधिः स सो प्राण है। जो अपाननकूं करैहै सो अ- पान है। औ जो प्राण अरु अपानका स- न्धि है सो व्यान है। जो व्यान है सा वाक् उद्गीथकूं उपासकरै॥ अवे ताका स्वरूप निरूपणकरियेहैः-जोई पुरुष प्राणन करैहै २६३

कहिये मुख अरु नासिकातैं वायुकूं बाहिरनिका- सताहै सो प्राण नामक वायुकी वृत्तिविशेष है। औ जो अपाननकरैहै (अपश्वासकूं लेताहै) कहिये तिन मुखनासिकाकरिहीं वायुकूं भीतर खींचताहै सो अपान है कहिये अपान नामवा- ली वायुकी वृत्ति है।॥ तिसतैं क्या भया? यह क- २६२ वक्ष्यमाणलक्षणवाले। ऐसे उक्तकूं स्पष्ट करै हैं॥ २६३ ता व्यानके निरूपणअर्थ आदिविषै प्राण अरु अपा- नकूं निरूपण करै हैं। इहां तिनोंकरिहीं। याका मुखना- सिकाकरि। यह अर्थ है।। २६४ ऐसैं प्राण अरु अपान होवै। इसकरि व्यानका तो क्या आया? ऐसैं शंकाकरिके ताके स्वरूपकूं दिखावैहैं॥

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पनिषत् ]] तृतीय खंड ३ १०१ आदित्य औ प्राण आदिककी दृष्टिसैं उद्गीथ स्वरका उपासन १२

व्यानो यो व्यान: सा वाक्। तस्मादप्रा णन्ननपानन्वाचमभिव्याहरति॥ ३॥ है। तातैं प्राणनकूं न करताहुया अपान- नकूं न करताहुया वाणीकूं उच्चारताहै ॥३॥ हियेहै :- अनन्तर जो उक्तलक्षणवाले प्राण अरु अपानका सन्धि कहिये तिन दोनूंके मध्य वृत्तिविशेष है। सो व्यानहै औ जो सांख्य २६६

आदिक शास्त्रविषै प्रसिद्ध है यह व्यान नहीं है काहेतैं श्रुतिकरि विशेष (विलक्षणता)के नि- रूपणतैं। यह अभिप्राय है।॥ फेर प्राण अपा- २६५ सन्धिकूंहीं स्पष्ट करै हैं॥ इहां यह अर्थ है :- प्राण अरु अपानरूप वृत्तिनके अभावकी अवस्थारूप मध्यविषै वा- युकी वृत्तिविशेष जो है। सो व्यानशब्दका अर्थ है॥ २६६ सन्धिके स्कंधरूप मर्मदेशविषै वर्तनेवाला व्यान है। ऐसैं सांख्य औ योग कहते हैं। तिनके प्रति जबाब दे- तहैं।। तहां सांख्योंके औ योगोंके शास्त्रविषै प्रसिद्ध जो वा- युकी वृत्तिविशेष स्कन्धादि देशगत है यह व्यान नहीं है। काहेतैं श्रुतिकरि विशेषके निरूपणतैं। ऐसैं योजना है॥ २६७ ननु व्यानकूं प्राण अपानकी अपेक्षासहित होनेतैं

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१०२ प्रथमप्रपाठक १ [छान्दोग्यो- उद्गीथ आदिकके उपासन १२ नकूं छोडिके बडे आयासकरि व्यानका हीं उ- पासन काहेतैं कहिये है ? [ तहां कहैहैं, ] वीर्य- चौले कर्मका हेतु होनेतैं व्यानकाहीं उपासन कहियेहै।॥ ताकूं वीर्यवाले कर्मकी हेतुता कैसें है? यह कहै है :- जो व्यानहै सा वाकहै। काहेतैं वाकूँकूँ व्यानका कार्य होनेतैं॥ जति व्यानकरि निर्वाह करनेकूं योग्य वाक् है तातैं प्राणनकूं न करता हुया अरु अपाननकूं न करता हुया कहिये प्राणअपानके व्यापारकूं न करता हुया लोक बाणीकूं उच्चारण करैहै॥ ३॥ तिन दोनूंमेंसैं अन्यतर (एक)का उपासनहीं उचित है। व्यानका उपासन नहीं ? ऐसें मानता हुया पूर्ववादी शंका करै है॥ इहां बडे आयासकरि। याका व्यानके स्वरूपके निरूपणकरि। यह अर्थ है। २६८ तिन प्राण अपानतैं तिसव्यानकी श्रेष्ठताकूं अङ्गी- कार करिके सिद्धान्ती परिहार करैहैं॥ इहां व्यानकाहीं उपासन। यह शेष है।। २६९ ताहीकूं प्रश्नद्वारा प्रपञ्चन करै हैं॥ २७० व्यानका वीर्यवाला कर्म प्रसिद्ध कैसें प्रतिज्ञा करि- येहै। कार्य कारणके अभावतैं? यह शंका भई। यातैं कहैहैं॥ २७१ वाणीकी व्यानकरि निर्वाहकरनेकी योग्यताविषै लिंगकूं दिखावैहैं॥

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पनिषत् ] तृतीय खंड ३ १०३ आदित्य औ प्राण आदिककी दृष्टिसैं उद्गीथ स्वरका उपासन १२

भिव्याहरति। यर्क्तत्साम। तस्मादप्राण- न्ननपानन् साम गायति। यत्साम स उ-

अर्थ :- जो वाक है सा ऋक (ऋचा) है। तातैं प्राणनकूं न करताहुया अपानकूं न करता हुया ऋचाकूं उच्चारण करैहै।। जो ऋचा है सो साम है। तातैं प्राणनकूं न करता हुया अपाननकूं न करता हुया सामकूं गायन करैहै॥ जो साम है सो उ- द्रीथ है। तातैं प्राणनकूं न करता हुया अ- पाननकूं न करता हुया उद्गानकूं करैहै॥४॥ टीका :- तैसैं वाक्विशेषरूप ऋचाकूं अरु ऋचाविषै स्थित सामकूं अरु सामके अवयव

पसैं कहैहैं॥ २७२ "जो वाक् है" इस आदिक वाक्यनके अर्थकूं संक्षे-

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१०४ प्रथमप्रपाठक १ [छान्दोग्यो- उद्गीथ आदिकके उपासन १३ अतो यान्यन्यानि वीर्य्यवन्ति क- म्माणि। यथाऽ्ग्नेर्मेथनमाजे: सरणं। अर्थ :- यातैं जे अन्य वीर्यवाले कर्म हैं। जैसैं :- अग्निका मन्थन है। आजिका सरण है। दृढ धनुषका आयमनहै। प्राणनकूं न रूप उद्धीथकूं प्राणनकूं न करता हुया अरु अपाननकूं न करता हुया व्यानकरि हीं नि- र्वाहकरैहै॥ यह अभिप्राय है ॥४॥ टीका :- केवैल वाक् आदिकका उच्चारण नहीं होवैहै किन्तु इस (व्यान) तैं अन्यबी जे वीर्यवाले कर्म प्रयत्नके आधिक्यतैं निर्वाह करने योग्य हैं॥ जैसैं अग्निका मन्थन है । २७३ "यातैं जे" इत्यादि वाक्यकूं व्याख्यान करै हैं॥ इहां व्यानसैं निर्वाह करैहै ? ऐसैं पूर्वके साथि संबंध है औ जे अन्यवी उक्तकर्म हैं तिनकूं लोक व्यानकरिहीं करैहै। ऐसें उत्तरवाक्यविषै संबंध है।। २७४ प्रयत्नकी अधिकताकरि निर्वाह करनेयोग्य कर्मन- कूंहीं उहाहरण करैहै॥ इहां जैसे वे कर्म हैं तैसे अन्यबी इसप्रकारके हैं ऐसैं योजना है।

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पनिषत् ] तृतीय खंड ३ १०५ आदित्य औ प्राण आदिककी दृष्टिसैं उद्गीथ स्वरका उपासन १२

दृढस्य धनुष आयमनमप्राणन्ननपान तानि करोत्येतस्य हेतोर्व्यानमेवोद्गीथ- मुपासीत॥ ५॥ करताहुया अपाननकूं न करताहुया तिनकूं करैहै। इस हेतुतैं व्यानरूपहीं उद्गीथकूं उ- पासन करै॥ ५ ॥ आजि (मर्यादा)का सरण (धावन) है। दृढ धनु- षका आयमन (आकर्षण) है। तिनकूं प्रा- णनकूं न करता हुया अरु अपाननकूं न क- रता हुया करैहै। याँतैं प्राणआदिक वृत्ति- नतैं विशिष्ट (श्रेष्ठ) व्यान है। विशिष्टका उ- पासन अतिउत्तम है। फलवान् होनेतैं। राजाके उपासनकीन्यांई। इँसी हेतुतैं कहिये इस २७५ व्यानकूं वीर्यवाले कर्मकी हेतुताके हुये फलितकूं कहै हैं।। २७६ श्रेष्ठताके हुये बी क्या होवैगा ? ऐसैं जो कहै। तब कहै हैं। २७७ श्रेष्ठताके फलकूं समाप्त करै हैं॥

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१०६ प्रथमप्रपाठक १ [छान्दोग्यो- उद्गीथ आदिकके उपासन १३

he इति।प्राण एवोत्प्राणेन ह्वुत्तिष्ठति। वा-

अर्थ :- अब निश्चयकरि उद्गीथके अ- क्षरनकूं उपासन करै। "उद्गीथ " ऐसैं॥ कारणतैं व्यानरूपहीं उद्गीथकूं उपासन करै। अन्य (अन्यवृत्ति) कूं नहीं। या कैर्मका। अतिशयवीर्यवान्पना फल है॥ ५ ॥ टीका :- अँब प्रसिद्ध उद्गीथके अक्षरनकूं उपासन करै।। भंक्तिके अक्षर मति होवैं। यातैं विशेषण देतेहैं :- उद्गीथ ऐसैं। उद्वीथना- २७८ फलवान् होनेतैं। ऐसें उक्त उपासनाके फलकूं स्पष्ट करै हैं॥ इहां व्यानदृष्टिकरि उद्गीथके उपासनकूं अंग- सम्बन्धि होनेतैं। यह शेष है।। २७९ उद्गीथके उपासनके प्रसङ्गसैं "उद्गीथ" इन तीन अक्षरोंकी उपासनाकूं प्रसङ्गविषै प्राप्त करैहैं॥ २८० विशेषणके तात्पर्यकूं दिखावैहैं ॥ इहां यह अर्थ है :- उद्गीथके "अक्षरोंकूं उपासन करै" ऐसें कहे हुये भ- क्तिके अक्षर उपास्य प्राप्त अये। वे मति होवें । ऐसैं जातैं श्रुति मानती है। तातैं विशेषणकूं करैहैं॥ २८१ विशेषणरूप श्रुतिकूं व्याख्यान करै हैं॥

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पनिषत् ] तृतीय खंड २ १०७ आदित्य औ प्राण आदिककी दृष्टिसैं उद्गीथ स्वरका उपासन १२ ग्गीर्वाचा ह गिर इत्याचक्षतेऽन्नं थमन्ने- हीद२ सर्वर स्थितम्॥६॥ प्राणहीं "उत्" है। प्राणकरि जातैं ऊ- ठता है॥। वाक "गी " है। वाक् हीं गीः है ऐसैं कहते हैं॥। अन्न "थं" है। अन्न- विषै जातैं यह सर्व स्थित है॥ ६ ॥ मके अक्षर हैं। यह अर्थहै॥ नमिके अक्षरोंके उपासनके हुयेबी नामवालेका हीं उपासन किया होवैहै॥ अमुकमिश्र ॥ ऐसैं। याकी न्यांई॥ प्रीणहीं "उत् है"। ऐसैं इस अ- क्षरविषै प्राणकी दृष्टि है। प्रीणका "उत्" पना २८२ ननु नामके अक्षरोंका उपासन उद्गीथके उपासनकूं अकिश्चित्करै है ? यह आशंका करिके कहै हैं। इहां यह अर्थ है :- जैसैं लोकविषै "कृष्णमिश्र" आदिकके वाचक शब्दके प्रयोगके हुये। वाच्य जो पुरुषविशेष ताका उपासन जानिये है। तैसैं इहां बी जानिलेना। २८३ नामके अक्षरोंके उपासनविषै नामकी न्यांई तिन (अक्षरन) के उपासनविषै बी तिन (प्राण आदिक)का उ- पासनहीं कैसैं होवैगा? यह आशंकाकरिके विभाग करैहैं॥ २८४ प्राण अरु उत् अक्षरके सादृश्यकूं प्रश्नपूर्वक कहैहैं॥

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१०८ प्रथमप्रपाठक १ [छान्दोग्यो- उद्गीथ आदिकके उपासन १३ दयौरेवोदन्तरिक्षं गीः एथिवी थमा- अर्थः-द्यौः (स्वर्ग) हीं "उत्" है। कैसैं है? यह कहैहैं :- प्राणकरि जातैं सर्व ऊ- ठताहै अरु अप्राणके (प्राणरहितके) नाशके दर्शनतैं। यातैं उत् अरु प्राणका सामान्य है॥ वाक "गीः" है " वाकहीं गिरा हैं" ऐसैं शिष्ट कहतेहैं॥ तैसें अन्न "थं" है। अंन्न- विषै जातैं यह सर्व स्थित है। यातैं अन्नका अरु थ अक्षरका सामान्य है ॥ ६ ॥ टीका :- तीनोके श्रुति उक्त जे सामान्य हैं २८९

२८५ "गीः" ऐसे इस अक्षरविषै वाकूकी दृष्टि कर्तव्य है। ऐसैं कहैहैं॥ २८६ वाक्के औ "गीः" इस अक्षरके सादृश्यकूं दिखावैहैं। २८७ "उत् " अरु "गीः" इन दो अक्षरनविषै क्रमतैं प्राण अरु वाक्की दृष्टिकी न्यांई "थं " इस अक्षरविषै अ- न्नकी दृष्टि करनेकूं योग्य है। ऐसें कहैहैं॥ २८८ थकार अरु अन्नके अपेक्षित सादृश्यकूं दिखावैहैं। २८९ "प्राणहीं उत् है" इत्यादि वाक्यविषै श्रुतिनैंहीं

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पनिषत्] तृतीय खंड २ १०९ आदित्य औ प्राण आदिककी दृष्टिसैं उद्गीथ स्वरका उपासन १२ दित्य एवोद्दायुर्गीरग्निस्थ सामवेद ए- वोद्यजुर्वेदो गीः ऋग्वेदस्थं॥ दुग्धेऽस्मै अन्तरिक्ष "गीः" है। पथिवी "थं" है॥ आदित्यहीं "उत्" है। वायु "गीः" है। अग्नि "थं" है।। सामवेद हीं "उत्" है। यजुर्वेद "गी" है। ऋग्वेद "थं" है।। इसके वे तिस अनुसारकरि शेषनविषै बी देखनेकूं यो- ग्यहैं :- घ्ौः (स्वर्गलोक) हीं "उत्" है उच्च- स्थानतैं। अन्तरिक्ष "गीः" है। लोकनके गि- लनेतैं। पथिवी "थं" है। प्राणिनके स्था- नतैं॥ आदित्यहीं "उत्" है। ऊर्ध्व होनेतैं।

सादृश्य कहा है। "द्यौः हीं उत् है" इत्यादि वाक्यविषै तो नहीं कहा। तैसैं हुये तहां सादश्यके अभावके होते द- ष्टिका करण कैसै होवैगा? यह आशंका करिके कहै है॥ २९० अन्तरिक्ष जो आकाश औ तिसके भीतर स्थित लोक। तिस (अन्तरिक्ष ) करि गिले हुयेकीन्यांई हैं। ऐसैं सानिके कहैहैं॥ इहां अग्निआदिकनके गिलनेतैं। यह संवर्ग- विद्याविषै देखनेकूं योग्य है।। १०

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११० प्रथमप्रपाठक १ [छान्दोग्यो- क उद्गीथ आदिकके उपासन १३ वाग्दोहं। यो वाचो दोहोऽन्नवानन्नादो अर्थ वाक् दोहकूं दोहन करैहै जो वाक्का दोह है।। अन्नवान् अन्नाद होवैहै जो ऐसैं वायु "गीः" है अभनि आदिकनके गिलनेतैं। अग्नि "थं" है। यज्ञसंबन्धि कर्मके अवस्था- नतें॥ सामवेद हीं "उत्" है स्वैर्गरूपकरि संस्तुत होनेतें। यजुर्वेद "गीः" है यजुष् (स्वाहा स्वधादि ) करि प्राप्त देवताओंके ह- विके गिलनेतैं। ऋग्वेद "थं" है ऋचाविषै सा मकूं स्थितहोनेतैं॥ उद्वीथके अक्षरोंके उपास- नका फल अब कहियेहैः दोहन करैहै इस साधकके अर्थ ॥ कौंन सा है? वाक् है॥॥ किस दोहकूं। कौंन यह दोह है ? यह कहैहै :- २९१ "सामवेद हीं स्वर्गलोक है" ऐसें स्वर्गलोकरूप- ताकरि सामवेदकूं सम्यक् स्तुत होनेतैं। इस हेतुकूं कहैहैं। २९२ अध्यात्म। अधिलोक। अधिदैव अरु अधिवेदरूप ना- मके अक्षरोंके उपासनकूं कहिके। अब ताके फलकी उक्तिकूं अवतार देके व्याख्यान करै हैं॥ इहां "जो वाक्का दोह है" या वाक्यविषै षष्ठी जो है सो कर्मविषै देखनेकूं योग्य है।।

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पनिषत्] तृतीय खंड ३ १११ आदित्य औ प्राण आदिककी दष्टिसैं उद्गीथ स्वरका उपासन १२

भवति। य एतान्येवं विद्वानुद्धीथाक्षरा- ण्युपास्त "उद्गीथ" इति॥७॥ विद्वान् हुया इन उद्गीथके अक्षरनकूं उपा- सताहै "उद्गीथ" ऐसैं ॥७॥ जो वाक्का (वाकूरूप) दोह है। अभिप्राय यह है कि: ऋगवेदआदिक शब्दकरि साध्य फल है। सो (फल) वाक्का दोह है। तिस आत्मा [ रूप दोह ] कूंहीं आपहीं वाक् दो- २९३ तिसीहीं वाक्रूप दोहकूं प्रगट करैहैं। इहां तिस- करि साध्य फल स्वाधीन उच्चारणविषै समर्थपनैरूप है। सो (फल) अनायासकरि इसकूं संभवै है। यह अर्थ है ॥ अरु इधर "तत् (सो)" ऐसें प्रकृत फलका स्मरण है औ षष्ठी पूर्वकीन्यांई [कर्मविषै] है औ "तं (ताकूं)" ऐसैं दो- हका कथन है।। २९४ वाक्काहीं दोह (दोहन) विषै कर्मपना (दोहन- रूप क्रियाका विषयपना) औ कर्तापना (दोहनरूप क्रियाका आश्रयपना) है। ऐसै कहैहैं॥ इहां जो दोग्धा (दोहनक- रनेवाला) है सो वाक्हीं है औ सो वाक् तिस (दोह)रूप आत्माकूंहीं दोहन करै है। ऐसैं योजना है औ यथोक्त। याका प्राण वाक् अन्न आदिरूपताकरि उक्त । यह अर्थ है

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११२ प्रथमप्रपाठक १ [छान्दोग्यो- उद्गीथ आदिकके उपासन १३

अथ खल्वाशीःसमृद्धिरुपसरणानी- अर्थ :- अनन्तर शेषभूत आशी (काम) की समद्धि [जैसें होवै सो कहियेहै] :- उ- हन करैहै॥ किंवा :- अन्नवान् (बहुत अन्न- वाला) औ अन्नाद (प्रदीप्जठरामिवाला) सो होवैहै। जो इन उक्त ऐसैं (उक्तगुण वाले) उद्गीथरूप तीन अक्षरोंकूं विद्वान् हुया उपासताहै "उद्गीथ" ऐसैं ॥ ७॥ टीका :- अनन्तर अँब आशी (काम) औ यथोक्त गुणवाले। याका उत्थान गिरण (गिलना) अरु स्थितिआदिक धर्मवाले। यह अर्थ है।। २९५ उद्गीथके अक्षर। ऐसें उक्त अर्थकूं विशेषणके अनु- वादकरि स्पष्ट करै हैं।। इहां "उद्गीथ" ऐसें इस रूपवाले नामके अक्षर हैं। यह अर्थ है।। २९६ वाक् आदिककी समृद्धिरूप फलवाले उपासनकूं उपदेश करिके। अब फलकी समृद्धि जिस प्रकारसैं होवैहै तिस प्रकारवाला सर्व काम्य उपासनोंका शेषभूत प्रसङ्गप्राप्त ज्ञान (उपासन) विधान करियेहै। ऐसैं कहैहैं। इहां वाक् आ- दिककी समृद्धिरूप फलवाले उपासनकी अनन्तरता अथशब्दका अर्थ है औ वक्ष्यमाण उपासनोंके सर्व काम्यरूप उपासनाके शेष (उपकारक) पनैके प्रकाशनअर्थ "खलु" ऐसें कहा है।। २९७ प्रसङ्गविषै प्राप्तपनैकूं दिखावैहैं ॥ इहां कामशब्द

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पनिषत् ] तृतीय खंड ३ ११३ आदित्य औ प्राण आदिककी दृष्टिसैं उद्गीथ स्वरका उपासन १२

त्युपासीत। येन साम्ना स्तोष्यन् स्या- त्तत्सामोपधावेत् ॥८।। पसरण (ध्यावनेयोग्य) हैं। ऐसैं उपासन करै। जिस सामकरि स्तुतिकूं करता हुया होवै तिस सामकूं चिन्तन करै ॥ ८ ॥ की समृद्धि [ जैसैं होवै सो कहियेहै। यह वा- क्यशेषहै ॥] उपसरण (उपगंतव्य)। अर्थ यह जो :- ध्येय है ऐसैं उपासन करै॥ ॥ ऐसें कैसैं उपासन करै तहां इसरीतिसैं उपासन करै। सो जैसैं जिस सामविशेषकरि उद्वाता स्तुतिकूं करता हुया होवै तिस सामकूं उ- त्पत्तिआदिककरि चिन्तन करै ॥८ ॥ फलरूप विषय (अर्थ)वाला है औ तत् (सो) शब्द प्रका- रके ज्ञानका स्मारक है औ कहिये है। याका विधान करि- येहै। यह अर्थ है॥ २९८ ध्यानके प्रकारकूं प्रश्नपूर्वक स्पष्ट करै हैं॥ २९९ उक्त प्रश्नगत इति (ऐसें) शब्दके अर्थकूं आकार- करि दिखावै हैं॥ ३०० "एवं" शब्दके अर्थकूं उदाहरणविषै स्थितपनै-

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११४ प्रथमप्रपाठक १ [छान्दोग्यो- गी उद्गीथ आदिकके उपासन १३ यस्यामृचि तामृचं यदार्षेयं तमृषिं यां देवतामभिष्टोष्यन् स्यात्तां देवता- मुपधावेत्॥ ९॥ अर्थ :- जिस ऋचाविषै ता ऋचाकूं। जिस ऋषिसंबन्धि [साम] है ता ऋषिकूं। जा देवताकूं चारि ओरतैं स्तुति करता हुया होवै ता देवताकूं चिंतन करै ॥ ९ ॥ टीका :- जिस ऋचाविषै सो साम है तिस ऋचाकूं देवताआदिककरि चिंतन करै। औ जिस ऋषिसंबंधि साम है तिस ऋषिकूं औ जिस देवताकूं स्तुति करता हुया होवै ता देवताकूं चिंतन करै॥ ९ ॥ करि स्पष्ट करैहैं॥ इहां उत्पत्ति आदिककरि। इस आदिश- व्दसैं छंदकी देवता आदिक ग्रहण करिये है औ देवता आ- दिककरि। इस आदिपदसैं आर्षेय (ऋषिसम्बन्धि) आदि- कका ग्रहण है औ गायत्री आदिककरि। यह आदिपद उ- ष्णिक्। अनुष्टुप् । अरु बृहती। आदिक छंदनके संग्रहअर्थ है औ त्रिवृत। पंचदश। सप्तदश अरु एकविंश। ऐसा प्र- सिद्ध सोमयागविषै स्तोम होवैहै॥

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पनिषत्] तृतीय खंड ३ ११५ आदित्य औ प्राण आदिककी दृष्टिसैं उद्गीथ स्वरका उपासन १२ येन छन्दसा स्तोष्यन् स्यात्तच्छन्द उपधावेद्येन स्तोमेन स्तोष्यमाण: स्यात् तY स्तोमुपधावेत् ॥१ ॥

अर्थः-जिस छन्दकरि स्तुति करता हुया होवै ता छन्दकूं चिंतन करै। जिस स्तोमकरि स्तोष्यमाण होवै ता स्तोमकूं चिंतन करै ॥ १० ॥ टीका :- जिस गायत्रीआदिक छन्दकरि स्तुति करता हुया होवै तिस छन्दकूं चि- न्तन करै। जिस स्तोम (स्तोत्र)करि स्तोष्यमाण (स्तुति करनेवाला) होवै ता स्तोमकूं चिंतन करै ।। [ स्तोमरूप अंगके फलकूं कर्ताविषै गामी होनेतैं। इहां स्तोष्यमा ण यह औत्मनेपद है]॥ १० ॥ ३०१ आत्मनेपदके प्रयोगकरि सिद्ध अर्थकूं कहैहैं॥ इहां यह अर्थ है :- जहां कर्ताविषै जानेवाला फल होवै तहा

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११६ प्रथमप्रपाठक १ [छान्दोग्यो- उद्गीथ आदिकके उपासन १३ यां दिशमभिष्टोष्यन् स्यात्तां दिश- मुपधावेत्॥११॥ अर्थ :- जा दिशाके प्रति चारिओरतैं स्तुति करता हुया होवै ता दिशाकूं चिंतन करै ॥११॥

टीका :- जिस दिशाके प्रति चारीऔ- रतैं स्तुति करता हुया होवै ता दिशाकूं अधिष्ठाताआदिककरि चिंतन करै ॥ ११ ॥

आत्मनेपद प्रयोगकरियेहै औ प्रकृतविषै "स्तोष्यमाण" यह आत्मनेपद देखिये है। तातैं इस फलका कर्ताविषै गामिपना जानियेहै। अन्यथा पूर्व उत्तरकीन्यांई परस्मैपदके प्रयोगके प्रसङ्गतैं औ "जिस दिशाकेप्रति अभि" इहां अभिशब्दका अभिव्याप्त होयके (चारि ओरतैं) यह अर्थ है औ स्तुति करता हुया। देवताविशेषकूं। यह शेष है औ अधिष्ठाताश- व्दकरि इंद्रआदिक ग्रहण करियेहै औ आदिपद तिस तिस दिशाविषै अवस्थित असाधारण धर्मके संग्रह अर्थ है औ आत्माकूं कहिये स्वरूपकूं गोत्र आदिककरि अनुसरिके उ- द्वाता स्तुति करै। ऐसें सम्बन्ध है औ गोत्र नाम आदिक- करि। इस आदि शब्दसैं वर्ण आश्रम आदिकका ग्रहण है॥

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पनिषत् ] तृतीय खंड ३ ११७ आदित्य औ प्राण आदिककी दृष्टिसैं उद्गीथ स्वरका उपासन १२

आत्मानमन्तत उपसृत्य स्तुवीत। कामं ध्यायन्नप्रमत्तोऽभ्यासो ह यदस्मै

अर्थः-अन्ततैं आत्मा (स्वरूप)कूं अनुसरिके कामकूं ध्यावता हुया अप्रमत्त- हुया स्तुतिकूं करै। तत्कालहीं जहां इसके

टीका :- साम आदिकनकूं क्रमसैं [ ध्यानक- रिके ] औ अन्ततैं (ताके अन्तविषै) आप आत्मा (स्वरूप) कूं गोत्र नाम अनुसरिके कामकूं ध्यावताहुया अप्रमत्त (स्वर ऊष्म अरु व्यंजनआदिकनतैं प्रमादकूं न करता) हुया उद्गाता स्तुति करै। तिसतैं शीघ्रहीं जहां ३०२ "अन्ततैं" या वाक्यके अर्थकूं कहैहैं॥ इहां पूर्व उक्त सामआदिक सर्वकूं उक्त क्रमसैं ध्यानकरिके ताके अन्तविषै स्वात्माकूं बी सम्यक चिन्तनकरिके अपेक्षित फलकूं अनुसं- धान करताहुया अरु स्वरआदिकतैं प्रमादकूं न करता हुया उद्गाता स्तुतिकूं करै। ऐसैं योजना है। औ जिस कर्मविषै यह उद्गाता यथोक्त रीतिसैं स्तोता (स्तुतिकर्ता) होवै है। तहां (तिस कर्मविषै) तत्कालहीं इसकेअर्थ सो सो काम

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११८ प्रथमप्रपाठक १ [छान्दोग्यो- 1 उद्गीथ आदिकके उपासन १३ स कामः समृद्धयेत। यत्कामः स्तुवी- तेति यत्कामः स्तुवीतिति ॥ १२॥ इति प्रथमप्रपाठकस्य तृतीयः खण्डः ।३। अर्थ सो काम समृद्धिकूं पावताहै। जिस कामवाला हुया स्तुतिकूं करै ऐसैं । जिस कामवाला हुया स्तुतिकूं करै ऐसैं ॥ १२॥ इति श्री० मूलमात्रभाषा० प्रथमप्रपाठकस्य तृतीयः खंडः समाप्ः ॥३॥ इस ऐसैं जाननेवालेके अर्थ सो काम समृ- द्विकू पावै। कौंन यह कामहैकि :- जो काम इसकूं है सो यह यत्काम है। ऐसा (जिस काम- वाला) हुया सम्यक स्तुति करै। यत्काम सम्यक स्तुति करै। ऐसैं दोवार कथन आद० रके अर्थ है ॥ १२ ॥। इति श्री०भाष्यभाषा० ग्रथमप्रपाठकस्य तृतीयः खंडः।।३॥ समृद्धिकूं पावै । यत्काम (जिस कामवाला) हुया जो स्तुतिकूं करै। ऐसैं अन्वय है औ "इति " शब्द प्रसङ्गप्राप्त उपासनकी समाप्तिअर्थ है। इति श्री० प्रथमप्रपाठकगत-तृतीयखंडस्य टिप्पणं ॥ ३ ॥

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पनिषत् ]] चतुर्थ खंड ४ ११९ स्वरशब्दके वाच्य ॐकारका उपासन ॥

अथ प्रथमप्रपाठकस्य चतुर्थः खंडः।।४।। ॐमित्येतदक्षरमुद्धीथमुपासीतोमि-

अथ श्री०मूलमात्रभाषा० प्रथमपाठकस्य चतुर्थःखण्डः। अर्थ :- "ॐ" ऐसे इस अक्षररूप उद्गी- IP अथ श्रीभाष्यभाषा०

प्रथमप्रपाठकस्य चतुर्थः खंडः ॥ ४ ॥

स्वरशब्दके वाच्य ऊँकारका उपासन ॥ ५॥

टीका-"ॐऐसैं इस" इत्यादि स्थलविषै २०३

प्रकत अक्षरका फेर ग्रहण उद्धीथके अक्षरआ- दिकके उपासनके अंतरित (अंतरायवाला) हो- नेतैं अन्यठिकाने प्रसङ्ग मति होवै। ऐसैं इस

अथ श्री० प्रथमप्रपाठकगत-चतुर्थखंडस्यटिप्पणं ४ ३०३ अब प्रसङ्गप्राप्त अर्थकूं छोडिके प्रकृतकूं अनुसंधान करैहैं॥ ३०४ फेर ग्रहणके तात्पर्यकूं कहैहैं ॥। इहां आदि शब्द- करि पूर्वउक्त उपसरण (ध्येय) ग्रहण करिये है औ उद्गीथकूं तिनोंकरि व्यवहित (अन्तरायवाला) होनेतैं प्रकरणके वि- च्छेदकी शंकाके हुये तिसतैं अन्य अर्थविषै प्रसङ्ग होवैगा।

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१२० प्रथमप्रपाठक १ [छान्दोग्यो- उद्गीथ आदिकके उपासन १३ ति हुद्गायति तस्योपव्याख्यानम्॥।१। देवा वै मृत्योर्विभ्यतस्त्रयीं विद्यां प्रा- थकूं उपासनकरै। "ॐ" ऐसें जातैं उद्गायन करैहै। ताका उपव्याख्यान है॥१॥ अर्थः-देवहीं मृत्युतैं भयकूं पावते हुये अर्थवाला है।। प्रकेत हीं अमृत अभय गुण- विशिष्ट अक्षरका उपासन करनेकूं योग्य है। यातैं आरंभ है।। "३ " इत्यादि वाक्य व्या- र्यान किया है॥ १ ॥ टीका :- देव प्रसिद्ध मृत्यु (मारक)तैं डरते हुये।। ॥ क्या करते भये ? यह कहि- येहै :- त्रयी विद्या (त्रयीविहित कर्म)के सो मति होवै। ऐसें इस प्रयोजनअर्थ उद्गीथका फेर ग्रहण है। यह अर्थ है।। ३०५ "देव हीं मृत्युतै" इत्यादि वाक्यके तात्पर्यकूं कहैहैं। ३०६ अक्षरके व्याख्यानकी प्राप्तिके हुये अनुवाद भागके प्रति कहैहैं ।। इहां "देव असुर प्रसिद्ध जहां ( जिस निमि- न्तके होते,"इसठिकाने व्याख्यानकिये देव आसुरपापरूप सा- रक (मृत्यु)तैं। यह अर्थ है।

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पनिषत् ] चतुर्थ खंड ४ आदित्य औ प्राण आदिककी दृष्टिसैं उद्गीथ १२१

स्वरका उपासन १२ विशस्ते छन्दोभिरच्छादयन्यदेभिर- च्छादय५स्तच्छन्दसां छन्दस्तम् ॥२।। त्रयी विद्याके प्रति प्रवेश करतेभये। वे छ- न्दनकरि छादन करतेभये। जातैं इन (छ- न्दन)करि छादन करतेभये तातैं छन्दनका छन्दपना है॥ २ ॥ प्रति प्रवेश करते भये । अर्थ यह जोः-ता (कर्म)कूं मृत्युका त्राण (रक्षण) मानते हुये वैदिक कर्मकूं प्रारम्भ करते भये॥ किर्वी: वे (देव) कर्मविषै अविनियुक्त छन्दन (मं-

३०७ कौंन यह कर्मविषै प्रवेश नाम है । तहां कहैहैं॥ इहां तत् (सो) ऐसें वैदिक कर्म कहिये है॥ ३०८ "वे छन्दनकरि " इत्यादिरूप वाक्यकूं व्याख्यान करैहैं॥ इहां यह अर्थ है :- जातैं सर्व मंत्र सर्वत्र विनियोग (उपयोग) नहीं करिये हैं। तैसें हुये अनुष्ठीयमान एक क- र्मविषै विनियोगकिये मत्रनकूं छोडिके कर्मान्तरोंविषै अवशेष रहै मत्रनकरि जप आदिनकूं करते हुये देव स्वात्माकूं आ- च्छादित (रक्षित) करतेभये। तातैं तिनकूं मृत्युकी वश्यता नहीं है।। ११

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१२२ प्रथमप्रपाठक १ [छान्दोग्यो- उद्गीथ आदिकके उपासन १३ तानु तत्र मृत्युर्यथा मत्स्यमुदके प- अर्थ :- तिनकूं बी तहां मृत्यु जैसैं म- त्स्यकूं उदकविषै देखे। ऐसैं देखताभया।

त्रन)करि जपहोमादिककूं करते हुये आत्मा- कूं कर्मान्तरोंविषै आच्छादन करते भये ॥ जातैं इन मन्त्रनकरि आच्छादन करते भये (ढांपते भये) तातैं छन्दों ( मन्त्रों)का छादनतैं छन्दपना प्रसिद्ध हीं है॥ २॥ टीका :- तिन कर्मपर देवनकूं तहां ( वै- दिक कर्मविषै) मृत्यु जैसैं लोकविषै मत्स्य- ३३१

घातक। मत्स्यकूं न अतिगम्भीर जलविषै ३०९ तिन छन्दोंकरि आच्छादितताके हुये छन्दोंके छ- न्दभावकी प्रसिद्धिके प्रकारकूं आकारकरि दिखावै हैं॥ २१० कर्मकूं अनुष्ठान करनेवाले देवनकूं मृत्युकी वश्यता नहीं निवृत्तभई। ऐसें कहैहैं॥ इहां "तहां" ऐसैं" वैदिक कर्मके प्रारम्भकी उक्ति है औ "उ " शब्द अपि (बी) अर्थ है औ यथोक्त कर्मपरवी तिन देवनकूं मृत्यु देखताभया। ऐसें सम्बन्ध है।। ३११ कर्मोंकी मृत्युपद गोचरताकूं दृष्टान्तसैं कहैहैं॥

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पनिषत् ] चतुर्थ खंड ४ १२३ आदित्य औ प्राण आदिककी दृष्टिसैं उद्गीथ स्वरका उपासन १२ रिपश्येदेवं पर्य्यपश्यदचि साम्नि य- जुषि। ते नु वित्त्वोर्ध्वा ऋचः साम्नो य- जुषः स्वरमेव प्राविशन्॥ ३ ॥

ऋचाविषै सामविषै यजुर्विषै॥ वे वितर्क- करि जानिके ऋचातैं सामतैं यजुषुतैं ऊर्ध्व (उत्थित) हुये स्वरके प्रतिहीं प्रवेश क- रतेभये॥ ३ ॥

बडिश (लोहकंटक) अरु उदकस्रावरूप उ- पायकरि साध्य मानना हुया देखै। ऐसैं मृत्यु देखता भया। अर्थ यह जो :- कर्मक्षयके उ- पायकरि साध्य देवनकूं मानताभया। कैहां यह देवनकूं देखता भया? यह कहियेहै :- ऋकविषै। सामविषै। यजुर्विषै। अर्थ यह

३१२ दार्ष्टान्तिक भागके विवक्षित अर्थकूं संग्रह करैहैं॥ ३१२ दार्ष्टान्तिकविषै क्षुद्रोदकस्थानीय क्या होवैगा ? ऐसैं प्रश्नपूर्वक दिखावै हैं॥

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१२४ प्रथमप्रपाठक १ [छान्दोग्यो- उद्गीथ आदिकके उपासन १३

जो :- ऋकू यजुर अरु साम सम्बन्धि कर्मविषै [ देखता भया ]।। ॥ वे देव वैदिक कर्म करि संस्कारयुक्त शुद्धचित्तवाले हुये मृत्युके करनेकूं इच्छितकूं जानते भये औ जानिके वे ऊर्ध्व (कर्मतैं व्यावृत्त) हुये ऋकूतैं सामतैं यजुरतैं। अर्थ यह जो :- ऋक यजुर अरु साम सम्बन्धि कर्मतैं अभ्युत्थान करिके। तिसे कर्म- करि मृत्युके भयके निवारणके प्रति निरास हुये ताकूं छोडिके अमृत अभय गुणवाले अक्षर रूप स्वर (स्वरशब्दके वाच्य) के प्रति प्रवेश

३१४ ऋुकूआदिकनकूं नित्य होनेकरि क्षयके अभावतैं क्षुद्रोदक स्थानीयता नहीं है ? यह आशङ्का करिके विवक्षित अर्थकूं कहैहैं॥ इहां यह भाव है :- कर्मकूं कृतक (क्रिया साध्य) होनेकरि फलतैं अरु स्वरूपतैं क्षयिता है। ३१५ मृत्युकी निवृत्तिके उपायकूं उपदेश करैहैं॥ इहां कर्मनतैं ऊर्ध्व कहिये व्यावृत्त (निवृत्त ) भये । यह अर्थ है औ सर्व कर्मनके संग्रहअर्थ "कर्मनतैं" यह बहुवचन है॥ ३१६ अवैदिक कर्मके त्यागकूं कर्मिनविषैबी सिद्ध हो- नेतैं वैदिक कर्मके त्यागअर्थ विशेषण देते हैं॥ ३१७ कर्मके त्यागमात्रतैं कृतकृत्यताकी शङ्काकूं निवा- रते हैं।।

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पनिषत् ] चतुर्थ खंड ४ १२५ आदित्य औ प्राण आदिककी दृष्टिसैं उद्गीथ स्वरका उपासन १२

यदा वा ऋचमाप्नोत्योमित्येवाति- अर्थ :- जबहीं ऋचाकूं पावताहै [तब] करते भये हीं। ॐ कैरिके उपासनविषै तत्पर होतेभये ॥ इहां (श्रुतिविषै) "एव (हीं)" श- ब्द जो है सो अवधारण (निश्चय) रूप अर्थ- वाला हुया समुच्चयके प्रतिषेध अर्थ है। अर्थ यह जो :- देवता ता(ओंकार) के उपासनके पर होते भये ॥ ३ ॥ टीका :- नैनु फेर अक्षरकूं स्वरशब्दकी वाच्य- ता कैसैं है? यह कहियेहैः- जबहीं ऋचाकूं

३१८ क्या सो अक्षर है ? सो कहैहैं॥ ३१९ अक्षरकूं उदात्तआदिक रूपके अभावतैं स्वर शब्दकी वाच्यता नहीं है ? यह आशङ्का करिके परिहार करैहैं॥ इहां ऋचाकूं पावता है। याका अध्ययनकरि स्वाधीन क- रताहै। यह अर्थ है औ अतिस्वरकूं करता है। याका आ- दरकी बुद्धिकरि उच्चारता है । यह अर्थ है औ ऋक् यजुर्- सामकी प्रत्येककी ऊँकारके उच्चारणद्वारा हीं प्राप्तिके देख- नेतैं। यह अति शब्दका अर्थ है औ "उ" शब्द अपिका प- र्याय है औ संप्रतिपन्न (प्रसिद्ध ) स्वरकी न्यांई । यह द-

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१२६ प्रथमप्रपाठक १ [छान्दोग्यो- उद्गीथ आदिकके उपासन १३ स्वरत्येव सामैवं यजुरेष उ स्वरो यदे- तदक्षरमेतदमृतमभयं तत्प्रविश्य देवा अमृता अभया अभवन् ॥४ ॥ "ॐ ऐसैंहीं अतिस्वरकूं करताहै॥ ऐसैं सामकूं ऐसैं यजुरकूं।। यहबी स्वर है जो यह अक्षर है यह अमृत अभय है। ताके प्रति प्रवेश करिके देव अमृत अभय होते भये॥ ४ ॥ पावताहै [ तव ] "ॐ" ऐसैं हीं अति स्वरकूं करताहै। ऐसैं सामकूं। ऐसैं य- जुरकूं।। यह बी स्वर है।। ॥ कौंन यहकि :- जो यह अक्षर है यह अमृत अभय है। ताके प्रति प्रवेश करिके देव यथागुण हीं अमृत औ अभय होतेभये ॥४ ॥ ष्टान्तके अर्थ है औ [अक्षर ] अमृत अभय है। काहेतैं तिस प्रकारके ब्रह्मका प्रतीक होनेतैं। यह अर्थ है औ ताके प्रति प्रवेश करिके। याका ब्रह्मवुद्धिकरि ता (अक्षर)के ध्यानकूं करिके। यह अर्थ है।।

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पनिषत् ] चतुर्थ खंड ४ १२७ आदित्य औ प्राण आदिककी दष्टिसैं उद्गीथ स्वरका उपासन १२ स य एतदेवं विद्वानक्षरं प्रणौत्येत- देवाक्षर स्वरममृतमभयं प्रविशति । अर्थ :- जो ऐसैं विद्वान् हुया इस अ- क्षरकूं स्तुति करैहै। सो इसी हीं अक्षरस्व- रूप अमृत अभयके प्रति प्रवेश करैहै। ताके

टीका :- सो जो अन्य बी देवकीन्यांई हीं ३२०

इस अक्षरकूं ऐसैं अमृत अभय गुणवाला जानता हुया स्तुति करैहै [ उपासनहीं इहां स्तुति अभिप्रेत है ] सो तैसैं हीं इसींहीं अ- क्षर स्वर अमृत अभयके प्रति प्रवेशकूं करैहै औ ताके प्रति प्रवेश करिके ३२१ राजकु- लके प्रति प्रविष्ट भये पुरुषनकीन्यांई राजाके अन्तरङ्ग बहिरङ्गपनैकीन्यांईं परब्रह्मके अंतरङ्ग बहिरङ्गपनैका विशेष (भेद) नहीं है। किन्तु ३२० ननु ऐसैं देवनकूं होहू। परन्तु इसकरि हम (म- नुष्यन) कूं क्या आया? यह आशङ्काकरिके कहैहैं॥ ३२१ राजगृहके प्रति प्रविष्टभये पुरुषके विशेषके दर्श-

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१२८ प्रथमप्रपाठक १ [छान्दोग्यो- उद्गीथ आदिकके उपासन १३ तत्प्रविश्य यदमृता देवास्तदमृतो भ- वति॥ ५॥ इति प्रथमप्रपाठकस्य चतुर्थः खण्डः ॥ ४ ॥ प्रति प्रवेश करिके जिस अमृतवाले देव होतेभये तिस अमृतवाला होवैहै ॥ ५॥

देव जिस अमृतभावकरि जिस अमृतरूप होतेभये तिस अमृतभावकरि विशिष्ट तिस अमृतरूप होवेहै। अर्थ यह जो :- अमृत भावविषै न्यूनता नहीं है अरु अधिकता बी नहीं है ॥ ५॥ इति श्री० भाष्यभाषा०प्रथमप्रपाठकस्य चतुर्थःखंडः।।४।।

नतें अक्षरके प्रति प्रविष्ट पुरुषकूंबी फलविषै विशेष (भेद) होवैगा ? यह आशङ्काकरिके कहैहैं ॥ इहां अमृतभावकरि वि- शिष्ट हुये। यह शेष है।

इति श्री० प्रथमप्रपाठकगत-चतुर्थखंडस्य टिप्पणम् ॥४ ॥

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पनिषत्] पंचम खंड ५ १२९ अभेददृष्टि निंदा औ भेददृष्टिसैं उद्गीथोपासन ५

अथ प्रथमप्रपाठकस्य पंचमः खंडः।।५। अथ खलु य उद्गीथः स प्रणवो य अथ श्री० मूलमात्रभा ० प्रथमपाठकस्य पंचमःखण्ड: ५ अर्थ :- अनन्तर प्रसिद्ध जो उद्गीथ है

अथ श्री०भाष्यभाषा• प्रथमप्रपाठकस्य पचमःखंड: ५ वाक् आदिक मुख्यप्राण रश्मि औ आदित्यकी अभे- ददृष्टिसैं उद्गीथोपासनकी निंदापूर्वक फेर तिनकी भेददृष्टिसैं उद्गीथका उपासन ५ टीका :- प्रीण अरुआदित्यकी दृष्टिकरिविशिष्ट

अथ श्री०प्रथमप्रपा०पंचमखण्डस्य टिप्पणम्॥५॥ ३२२ अन्य (पंचम) खण्डके तात्पर्यकूं कहैहैं॥ इहां यह अर्थ है :- प्रणवकी औ उद्गीथकी एकताकूं करिके। ति- सके होते प्राणदृष्टिकरि अध्यात्मरूप औ आदित्यदृष्टिकरि अ- धिदैवतरूप विशिष्ट उद्गीथका जो उपासन कहा। ताहीकूं अनुवाद करिके निंदा करिके। प्राणोंका औ रश्मिनका भेदहीं गुण है। तिसगुणविशिष्ट दृष्टिकरि तिसीहीं उद्गीथके अवय- वरूप अक्षरका अनेकपुत्ररूप फलवाला उपासन इस ग्रंथकरि कहनेकूं योग्य है। यातैं अब उत्तरग्रंथ प्रस्तुत करियेहै औ इहां अमृत अभयरूप गुणवाले अक्षरके उपासनकी अनन्त- रता अथशब्दका अर्थ है औ प्रणव अरु उद्गीथकी एकता- विषै वैदिक प्रसिद्धिके प्रदर्शनअर्थ "खलु" ऐसैं कहा॥

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१३० प्रथमप्रपाठक १ [छान्दोग्यो- उद्गीथ आदिकके उपासन १३ प्रणवः स उद्गीथ इत्यसौ वा आदित्य उद्गीथ एष प्रणव अमिति ह्वेष स्वर- न्नेति॥१॥

सो प्रणव है। जो प्रणव है सो उद्गीथ है। ऐसैं यह हीं आदित्य उद्गीथ है यह प्रणव है। "ॐ" ऐसैं जातैं यह स्वरता हुया जा- ताहै॥१॥ उद्वीथके उक्त उपासनकूं हीं अनुवाद करिके प्रणव अरु उद्गीथकी एकताकूं करिके तिसविषै प्राण अरु रश्मिके भेदरूप गुणविशिष्ट दृष्टिकरि अक्षरका उपासन अनेक पुत्ररूप फलवाला है। सो अब कहनेकूं योग्य है। यातैं यह ग्रंथ (पं- चम खंड) आरम्भ करियेहै ? अनन्तर प्र- सिद्ध जो उद्गीथ है सो ऋग्वेदीनका प्रणव The औ जो तिन (ऋग्वेदीन) का प्रणवहै सोई छान्दोग्यविषै उद्गीथ शब्दका वाच्य है।

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पनिषत् ] पंचम खंड ५ १३१ अमेददृष्टिनिंदा औ भेददृष्टिसैं उद्गीथोपासन ५ यह हीं आदित्य उद्गीथ है। यह प्रणव है। कहिये ऋग्वेदीनका प्रणवशब्दका वाच्यबी सोई है। अन्य नहीं ॥ ॥ उद्धीथ आदित्य कैसैं है ? [ तहां कहैहै ] उद्वीथ नामवाला अ- क्षर "ॐ" ऐसा यह है। यह (सूर्य) जातैं स्वरता (उच्चारता) हुया जाता है। [धा- तुनकूं अनेक अर्थवाले होनेतैं। यह अर्थ बी बनै है ]॥ अथवा स्वरता (गमन करता) हुया जाता है। यातैं यह उद्वीथ सविता (सूर्य) है ॥। १ ॥

३२३ तिनकी एकताकूं कहिके । आदित्यदृष्टिकरि उक्त उद्गीथकी उपासनाकूं अनुवाद करैहैं॥ ३२४ उद्गीथ अरु आदित्यकी एकताकूं प्रश्नपूर्वक उपपा- दन करैहैं। इहां उच्चारण करता हुया जाता है। ऐसैं सम्बन्ध है।। ३२५ ननु "स्वरति" धातुकूं गतिरूप अर्थवाला होनेतैं "उच्चार करता हुया" यह कैसैं कहिये है ? तहां कहैहैं॥ ३२६ गमन करताहुया सूर्य प्राणिनकी प्रवृत्तिअर्थ ॐ ऐसैं अनुज्ञाकूं करतेहुयेकी न्यांई गमन करैहै। तातैं सविताकूं ॐ कारपना है।।'

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१३२ प्रथमप्रपाठक १ [छान्दोग्यो- उद्गीथ आदिकके उपासन १२ एतमु एवाहमभ्यगासिषं। तस्मा- अर्थ :- इसी हीं मैं अभिमुखताकरि गा- यन (उपासन) करता भया। तातै तूं मे- टीका :- तिसे इसकूं हीं मैं आभिमुख्य- करि गायन करता भयाहूं। अर्थ यह जो :- आदित्य अरु रश्मिके अभेदकूं करिके ध्यानकूं करता भयाहूं। तिसकरि तिस कारणतैं मेरा तूं एक पुत्र हैं! ऐसैं हीं कौषीतकि (कुषी- तकका सन्तान जो कौषीतकि सो) पुत्रकूं कहता भया। यातैं रश्मिन (सूर्यके किरणों)- कूं औ आदित्यकूं भेदकरि तूं पर्यावर्तन कर (चिंतन कर)। यह अर्थ है। त्वंशब्दके यो- ३२७ आदित्यदृष्टिकरि उपदेश किये उद्गीथकूं अनुवाद करिके निंदते हैं॥ ३२८ निंदाके फलकूं दिखावै हैं॥ ३२९ ननु पर्यावर्तन करता भया। ऐसें प्रथम पुरुषके सुने हुये। क्यूं ऐसें मध्यम पुरुष व्याख्यान करिये है ? तहां कहैहैं॥ इहां युष्मद्रूप उपपद्विषै मध्यम पुरुषके विधानतैं। यह अर्थ है।।

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पनिषत्] पंचम खंड ५ १३३ अमेददृष्टिनिंदा औ भेददृष्टिसैं उद्गीथोपासन ५. न्मम लमेकोऽसीति ह कौषीतकि: पुत्र- मुवाच॥ रश्मीस्त्वं पर्य्यावर्त्तयाद्वह- वो वै ते भविष्यन्तीत्यधिदैवतम् ॥२॥ अथाध्यात्मं॥ य एवायं मुख्यः प्रा- रा एक हैं। ऐसैंहीं कौषीतकि पुत्रकूं क- हताभया। रश्मिनकूं तूं आवर्जनकर। ब- हुतहीं तेरे होवैंगे। यह अधिदैवत है॥२॥ अर्थ :- अनन्तर अध्यात्म है :- जोई यह गतैं [ इहां मध्यम पुरुष व्याख्यान करियेहै] ॥ ऐसैं कियेहुये निश्चयकरि तुजकूं बहुत पुत्र ३३०

होवैंगे। यह अधिदैवत है॥ २॥ टीका :- अनन्तर अध्यात्म कहिये है :- जोई यह मुख्य प्राण है। तिस उद्गीथकूं ३३० रश्मिनके भेदरूप गुणकी दष्टिकरि विशिष्ट उद्गी- थके उपासनके फलकूं कथन करैहैं। २३१ वक्ष्यमाण अध्यात्मविषै बुद्धिके समाधानअर्थ उक्त देवताविषयक दर्शनकूं उपसंहार करैहैं॥ ३३२ अध्यात्मरूप प्राणकी उक्त उद्गीथकी उपासनाकूं अनुवाद करैहें॥ १२

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१३४ प्रथमप्रपाठक १ [छान्दोग्यो- / उद्गीथ आदिकके उपासन १३ णस्तमुद्गीथमुपासीतोमिति ह्येष स्वर- न्नेति॥ ३ ॥ मुख्य प्राण है तिस उद्गीथकूं उपासन करै। "ॐ" ऐसें जातें यह स्वरता हुया जाता है।। ३ ॥ उपासनकरै। इत्यादि पूर्वकी न्यांईं है॥। तैसैं "ॐ " इसप्रकारसैं जातें यह प्राण बी ३३३

स्वरता हुया ॐ ऐसें जातैं अनुज्ञाकूं करते हुयेकी न्यांई वाकू आदिककी प्रवृत्ति अर्थ जाताहै जातैं मरणकालविषै मरनेवालेके समीपस्थित ३३३ प्राण अरु उद्गीथकी एकता कैसें है? यह आशङ्का करिके कहैहैं॥ इहां जैसें प्राणिनकी प्रवृत्तिअर्थ ॐ ऐसें अ- नुज्ञा (सम्मति)कूं करते हुयेकी न्यांई आदित्य गमन करैहै। ऐसें कहा। ताकी न्यांई। यह अर्थ है। ३३४ उक्तकूं हीं व्यतिरेकद्वारा स्पष्ट करैहैं । इहां मर- नेवालेके समीपवर्ती वन्धुजन मरणकालविषै प्राणके वाक्- आदिककी प्रवृत्तिअर्थ अनुज्ञाकरणकूं नहीं जानते हैं। तैसैं हुये जीवत्अवस्थाविषै ॐ ऐसें ताकी अनुज्ञाके वशतै हीं वाक्आदिकनकी प्रवृत्ति लखिये है। तातैं प्राणका अनुज्ञामात्र ऊकरण है। यह अर्थ है॥

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पनिषत् ] पंचम खंड ५ १३५ अभेददृष्टिनिंदा औ भेददृष्टिसैं उद्गीथोपासन ५. एतमु एवाहमभ्यगासिषं। तस्मा- न्मम त्वमेकोऽसीति ह कौषीतकि: पु- अर्थ :- इसीहींकूं मैं अभिमुखताकरि गायनकरताभया। तातैं मेरा तूं एक हैं। ऐसैंहीं कौषीतकि पुत्रकूं कहताभया। प्रा- पुरुष प्राणके ओङ्करणकूं नहीं सुनतेहैं यातैं इस सामान्यतैं आदित्यविषै बी ओक्करण अनुज्ञामात्र देखनेकूं योग्य है॥ ३ ॥ टीका :- इसीहींकूं मैं अभिमुखताकरि गायन करता भया हूं। इत्यादि पूर्वकी

३३५ अध्यात्म अरु अधिदैवतरूप प्राण अरु आदित्यकी उद्गीथताके अविशेषतैं (तुल्य होनेतैं) प्राणकी न्यांई आदित्य- विषै बी अनुज्ञामात्र ॐकरण निश्चय करनेकूं योग्य है। ऐसैं कहैहैं॥ ३३६ प्राणदृष्टिकरि उक्त उद्रीथकी उपासनाकूं निन्दा- करिके विवक्षित (कहनेकूं इच्छित) उपासनाकूं उपन्यास करैहैं॥ इहां भूमाकूं। याका बहुभाव (व्यापकता) करि युक्तकूं। यह अर्थ है।। ३३७ मध्यम पुरुषविषै तातङके आदेशकी विकल्पकरि होनेकी योग्यताके हुये बी प्रथम पुरुषकी शंकाकरि दुष्ट अ- न्वयकूं निषेध करैहैं॥

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१३६ प्रथमप्रपाठक १ [छान्दोग्यो- उद्गीथ आदिकके उपासन १३ त्रमुवाच। प्राणारस्त्वं भूमानमभिगा- यताद्हवो वै मे भविष्यन्तीति॥४॥

णनकूं तूं [देखता हुया] भूमाकूं अभि- गायनकर। बहुतहीं मेरे होवैं। ऐसैं ॥४॥ न्यांईं हीं है। यातैं वाक्आदिकनकूं औ मुख्य प्राणकूं भेदगुणविशिष्ट उद्गीथरूप देखता हुया भूमाकूं मनकरि अभिगायन कर। अर्थ यह जो :- पूर्वकी न्यांईं आवर्तन कर। "बहुत हीं मेरे पुत्रहोवैंगे " ऐसे अभिप्रायवाला हुया [आवर्तन कर]। यह अर्थ है॥ प्री कण अरु आदित्यकी एकताकरि उद्गीथकी दृष्टिकूं एक पुत्रवान्तामय फलरूप दोषकरि निन्दित होनेतैं रश्मि अरु प्राणकी भेददृष्टिकी कर्तव्य- ता बहुपुत्ररूप फलके होने अर्थ इस कांड (प्र- करण)विषै चोदना करियेहै॥४ ॥ ३३८ एकताकी दृष्टिकी निन्दाद्वारा सफल प्रधानके उपासनकूं उपसंहार करैहैं॥

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पनिषत् ] पंचम खंड ५ १३७ अभेददृष्टिनिंदा औ भेददृष्टिसैं उद्गीथोपासन ५. अथ खलु य उद्गीथः स प्रणवो य: अर्थ :- अनन्तर प्रसिद्ध जो उद्गीथ है सो प्रणव है। जो प्रणव है सो उद्गीथ है॥ टीका :- अनन्तर प्रसिद्ध जो उद्गीथ है। इत्यादि प्रणव अरु उद्गीथकी एकताका उपा- सन कहा। ताका यह फल कहियेहै :- होतष दुनतैं। होता जहां स्थित हुया शंसन करैहै सो स्थान होतृषदन है तिसतैं। अर्थ यह जो :- हौत्र (होता संबन्धि) कर्मतैं सम्यक् प्रयोग किये [प्रणव ] तैं।। जातैं देशमात्रतैं फल ग्रह- ण करनेकूं शक्य नहीं है।। क्या सो है कि :- ३३९ पूर्व उत्तर ग्रन्थनकी असङ्गतिकूं आशङ्का करिके। तात्पर्यके दिखावनेपूर्वक उत्तर ग्रन्थकूं अवतार देके व्याख्यान करैहें।। ३४० ननु यथाश्रुत स्थानहीं होतृषदन क्यूं नहीं अ- ड्गीकार करिये है? तहां कहैहैं॥ ३४१ हौतृकर्मका जो फल आदर करियेहै। ताकूं प्रश्न- पूर्वक अविशेषतैं दिखावैहैं॥ इहां "ह" अरु "एव" ये दो निपात अवधारण अरु अतिशयरूप फलवाले हैं। सो करि- यापदके साथि संबन्धकूं पावैहैं औ अपि शब्दतो निष्ठा (डुष्ट उद्गीत)के अनन्तरभावि होनेकरि लगानेकूं योग्य है॥

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१३८ प्रथमप्रपाठक १ [छान्दोग्यो- उद्गीथ आदिकके उपासन १३ प्रणवः स उद्धीथ इति होतृषदनाडैवा- पि दुरुद्वीतमनुसमाहरतीत्यनुसमाहर- तीति॥५॥ इति प्रथमप्रपाठकस्य पञ्चमः खण्डः ॥५॥ ऐसें होतषदनतें दुष्ट उद्गीतकूंबी निश्ित अतिशयकरि अनुसमाहरण करताहै ऐसैं। अनुसमाहरण करता है ऐसैं ॥ ५॥ इतिश्री०मूलभाषा०प्रथमप्रपा०पंचमः खण्ड: ५

दुष्ट ऐसा उद्गीत जो उद्वान सो बी कैहिये उद्गातानैं स्वकर्मविषै किया क्षत (छिद्र) बी। यह अर्थ है। ताकूं निश्चित अतिशयकरि अनुसमाहरण करैहै। अर्थ यह जो :- अनु- सन्धान करैहै। चिकित्सा (औषध) करि क- ३४२ दुष्ट उद्गानकूंहीं स्पष्ट करैहैं॥ २४३ ननु अन्यविषै स्थित कर्मका अन्य ठिकाने फल कैसैं ग्रहण करनेकूं शक्य होवै ? यह आशङ्का करिके कहैहैं॥ इहां उद्गाता। प्रणव अरु उद्गीथकी एकताके विज्ञानके मा-

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पनिषत्]] पंचम खंड ५ १३९ अमेददृष्टिनिंदा औ भेददृष्टिसैं उद्गीथोपासन ५

फादि धातुनकी विषमताके समीकरणकी न्यांई॥ ५॥

इति श्रीछान्दोग्योपनिषद्भाष्यभाषादीपिकायां प्रथम- 3: प्रपाठकस्य पंचमः खण्डः समाप्तः ॥५॥

FIRE DOWIE

हात्म्यतैं प्रमादजन्य स्वकर्मविषै प्राप्त क्षत (छिद्र)कूं हौ- तृकर्मतैं सम्यक् प्रयोग किये प्रणवतैं प्रतिसन्धान करैहै। यह अर्थ है।। इति श्री० प्रथमप्रपाठकगतपंचमखंडस्य टिप्पणम् ॥५॥

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१४० प्रथमप्रपाठक १ [छान्दोग्यो- उद्गीथ आदिकके उपासन १३ अथ प्रथमप्रपाठकस्य षष्ठःखंडः॥६।। इयमेवर्गग्नि: सामतदेतदेतस्यामृच्य-

अथ श्री०मूलमात्रभाषा०प्रथमप्रपाठकस्य षष्ठः खंड:६ अर्थ :- यह (प्थिवी) ऋक् है। अभ्नि साम है। सो यह साम इस ऋक्विषै अ- अथ श्री०भाष्यभाषा०प्रथमप्रपाठकस्य षष्ठः खंडः॥६। अंग प्रधानभेदसैं अपूर्व अधिदैवतरूप उद्वीथका उपासन ८ टीका :- अव सर्व फलकी संपत्तिअर्थ उ० द्वीथका अन्य उपासन विधान करियेहै :- अथ श्री० प्रथमप्रपाठक-गत षष्ठखण्डस्य टिप्पणम्६ ३४४ "यह हीं" इत्यादिग्रन्थरचनाके तात्पर्यकूं कहैहैं॥ इहां यह अर्थ है :- पुत्रादिरूप ऐश्वर्यके एकदेशरूप विषयवाले उपासनके उपदेशतैं अनन्तर अवसरके प्राप्तहुये ज्योतिष्टोम- आदिकविषै अधिकारीनकूं समग्र ऐश्वर्यकी प्राप्तिअर्थ अधिदैव अरु अध्यात्मके विभागकरि उद्गीथविषयकहीं अपूर्व उपासन इसग्रन्थविषै विधान करनेकूं इष्ट है।

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पनिषत् ] षष्ठ खंड ६ १४१ अंग प्रधानभेदसैं अपूर्व अधिदैवतरूप उद्गीथका उपासन ८

ध्यूढ५साम तस्माद्टच्यध्यूढ५साम गी- यते। इयमेव साऽग्निरमस्तत्साम॥१॥ ध्यूढ है। तातैं ऋक्विषै अध्यूढ साम गा- यन करिये है। यह (पथिवी)हीं सा है। अग्नि अम है। सो (युगल) साम है॥१॥ यहँ हीं पथिवी ऋक है कहिये ऋचाविषै पृथिवीकी दृष्टि करनेकूं योग्य है। तैसें अग्नि साम है कहिये सामविषै अभनिकी दृष्टि [ करनेकूं योग्य है]।। । नैर्नु पृथिवी अरु ३४५ तहां ताके अङ्गभूत उपासनकूं आदिविषै विधान करैहैं। ३४६ पृथिवीविषै ऋक्की दृष्टि इहां इष्ट नहीं है। का- हेतैं कर्मके अंगकूं संस्कार करने योग्य होनेतैं। या अभिप्राय करिके कहैहैं॥ ३४७ ऋ कविषै जैसें पृथिवीकी दृष्टि अनन्तरके वाक्य- विषै विहित है। तैसैं "अग्नि साम है" या वाक्यविषै अ- ग्निकी दृष्टि सामविषै विधान करिये है पूर्वकी न्यांई। ऐसैं कहैहैं॥ ३४८ ननु पृथिवीका ऋकूपना औ अग्निका सामपना अ- प्रसिद्ध है ? ऐसैं पूर्ववादी शङ्का करैहै॥

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१४२ प्रथमप्रपाठक १ [छान्दोग्यो- उद्गीथ आदिकके उपासन १३ अग्निका ऋक् अरु सामपना कैसैं है? यहं कहि- येहैः-सो यह अगनिनामवाला साम इस प- थिवीरूप ऋकविषै अध्यूढ (अधिगत) है। अर्थ यह जो :- उपरिभावकरि स्थित है। ऋचा विषै सामकी न्यांईं। तातें (इसीहीं कारणतैं) ऋचाविषै अध्यूढहीं साम। अबी बी सामके गायकोंकरि गायन करियेहै॥ औ1 जैसैं ऋकू अरु साम परस्परअत्यन्त भिन्न नहीं हैं। तैसैं ये पृथिवी अरु अध्नि हैं।। ॥ कैसैं कि :- यह ३५२

हीं पृथिवी "सा" है कहिये सामनामके अर्द्ध शब्दकी वाच्यहै औइतर अर्द्धशब्दका वाच्य अ- ग्नि "अम" है।। साम यह पृथिवी अरु अभनि- ३४९ ऋक् सामपनैकी सिद्धिविषै सिद्धान्ती ऐसें उत्त- रकूं कहैहैं।। ३५० तिनके आधार आधेयभावविषै गमककूं दिखावैहैं॥ ३५१ ऋक्विषै पृथिवीकी दृष्टि औ सामविषै अग्निकी दृष्टि है। इस अर्थविषै अन्य हेतुकूं कहैहैं॥ ३५२ पृथिवी अरु अग्निके अत्यन्त भेदके अभावकूं प्र- अ्पूर्वक प्रकट करैहैं॥ इहां यह अर्थ है :- कर्मके दो अङ्गनके साथिप्रयोगतैं ऋक् अरु सामका परस्पर अव्यभिचारतैं अत्यंत

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पनिषत् ] षष्ठ खंड ६ १४३ अंग प्रधानमेदसैं अपूर्व अधिदैवतरूप उद्गीथका उपासन ८ अन्तरिक्षमेवर्ग्वायुः साम। तदेत- अर्थ :- अन्तरिक्षहीं ऋक्र है। वायु साम

का युगल साम है। कहिये एक शब्दकी वाच्य- ताकूं प्राप्तहुया साम है। तातैं पृथिवी अरु अभनि- का युगल परस्पर भिन्न नहीं किन्तु ऋकू अरु सामकी न्याईं नित्य संश्लिष्ट (मिलित)है।। औ तातैं पृथिवी अरु अग्निका ऋकू अरु साम- पना है। यह अर्थ है। "सो" अरु "अम" इन दो अक्षरनविषै पृथिवी अरु असिकी ह- षटिके विधान अर्थ। यह हीं "सा" है अरु अग्नि "अम" है। ऐसै केइक [ व्याख्यान क- रते हैं ]।। १ ॥ टीका :- अन्तरिक्षहीं ऋक है वायु साम

भेद नहीं है। तैसैं पृथिवी अरु अग्निकूंबी एकशब्दके वाच्य होनेतैं तिनकी अत्यन्त भिन्नता नहीं है॥ ३५३ तिनके अत्यन्त भेदके अभावके हुये फलितकूं क- हैहैं। इहां पृथिवी "सा" शब्दकी वाच्य है स्त्री होनेतैं औ अग्नि "अम" है पुरुष होनेतैं। ऐसे देखनेकूं योग्य है॥ ३५४ अन्य पक्षकूं उठायके अङ्गीकार करैहैं॥

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१४४ प्रथमप्रपाठक १ [छान्दोग्यो- उद्गीथ आदिकके उपासन १३ देतस्यामृच्यध्यूढ साम। तस्मा- दच्यध्यूढ२साम गीयतेऽन्तरिक्षमेव सा वायुरमस्तत्साम ॥ २ ॥ द्यौरेवर्गादित्यः साम। तदेतदेत- स्यामृच्यध्यूढ२साम। तस्माद्ृच्यध्यू- ढ९ साम गीयते। धौरेव साऽडदित्यो- डमस्तत्साम॥३॥ है। सो यह साम इस ऋचाविषै अध्यूढ है। तातैं ऋचाविषै अध्यूढ साम गायन करियेहै। अन्तरिक्षहीं सा है। वायु अम है। सो (युगल) साम है ॥ २॥ अर्थः-स्वर्गहीं ऋक है। आदित्य साम है। सो यह साम इस ऋचाविषै अध्यूढ है। तातैं ऋचाविषै अध्यूढ साम गायन करिये है।। स्वर्गहीं सा है आदित्य अम है। सो (युगल) साम है॥ ३ ॥ । इत्यादि पूर्वकी न्यांईं है॥ २ ॥ ३ ॥

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पनिषत् ] षष्ठ खंड ६ १४५ अंग प्रधानभेदसैं अपूर्व अधिदैवतरूप उद्गीथका उपासन ८ नक्षत्राण्येर्वक् चंद्रमा: साम। तदेत-

ध्यूढ५साम गीयते। नक्षत्राण्येव सा चं- द्रमा अमस्तत्साम ॥। ४ ॥

अर्थ :- नक्षत्रहीं ऋक् है। चंद्रमा साम है। सो यह साम इस ऋचाविषै अध्यूढ है। तातैं ऋचाविषै अध्यूढ साम गायनकरिये है। नक्षत्रहीं सा है। चंद्रमा अम है। सो साम है॥। ४ ॥

टीका :- नैक्षेत्रनका अधिपति चंद्रमा है। यातैं सो साम है ॥४॥

३५५ ननु फेर नक्षत्रनके पर्यायविषै "सो यह इसविषै" इत्यादि वाक्य कैसै है। जातैं नक्षत्रनविषै चंद्रमाकी स्थिति नहीं है? यातैं कहैहैं। इहां नक्षत्रनके अधिपतिपनैतैं इनतैं उपरि भावकरि चंद्रमाकी स्थितितैं। यह अतः (यातैं) शब्दका अर्थ है औ नक्षत्रसहित चंद्रमाकूं ग्रहण करनेकूं स (सो) शब्द है। १३

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१४६ प्रथमप्रपाठक १ [छान्दोग्यो- उद्गीथ आदिकके उपासन १३ अथ यदेतदादित्यस्य शुक्क भाः सैवर्गथ यन्नीलं परः कृष्णं तत्साम। त- देतदेतस्यामृच्यध्यूढसाम। तस्मा- दृच्यध्यूढY साम गीयते॥ ५॥ अर्थ :- अनन्तर जो यह आदित्यकी शुक्क भा: है सोई ऋक है। औ जो नील पर कृष्ण है सो साम है। सो यह साम इस ऋचा- विषै अध्यूढ है। तातैं ऋचाविषै अध्यूढ साम गायन करिये है ॥ ५॥ टीका :- अनन्तर जो यह आदित्यकी शुक्क माँ: (शुक्ी दीप्ति) है सोई ऋक है औ जो आदित्यविषै नील पर है कृष्णपर क- ३५६ कितनैक अङ्गरूप उपासनोंकूं कहिके। अव तैसैंहीं अन्य उपासनकूं कहैहैं॥ इहां यह अर्थ है :- मंडलरूप आदित्यका जो शुक्क रूप देखिये है ऋचाविषै ताकी दृष्टि करनेकूंयोग्य है। ३५७ तिसींहीं रूपकू विशेषण देते हैं॥ ३५८ ताही भा(प्रभा)कूं व्याख्यान करैहें॥ ३५९ ऋचाविषै जैसैं पूर्वोक्त रूपकी दृष्टि है। तैसैं साम- विषै वक्ष्यमाणरूपकी दृष्टि अनुष्ठेय है। ऐसैं कहैहैं॥

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पनिषत् ]] षष्ठ खंड ६ १४७ अंग प्रधानभेदसैं अपूर्व अधिदैवतरूप उद्गीथका उपासन ८ अथ यदेवैतदादित्यस्य शुक्क भा: सैव साऽथ यन्नीलं परः कृष्णं तदमस्त

अर्थ :- अनन्तर जोई यह आदित्यकी शुक्क भाः है सोई सा है। औ जो नीलपर- कृष्ण है सो अम है। सो (युगल) साम

हिये अतिशयकरि कृष्णपना है सो साम है। सो (अतिशय कृष्णपना) एकान्तकरि स- ६०

माहित (एकाग्र) दष्टिवालेकूं देखियेहै ॥५॥ टीका :- वेई ये प्रभारूप शुक्क अरु कृष्ण- ३६१

पना सा औ अम रूप साम है।। अनन्तर

३६० ननु आदित्यविषै शुककताकी न्यांई सर्वसैं अधिक कृ- ष्णता हमोंकरि नहीं अनुभव करिये है ? तहां कहैहैं.।। इहां यह अर्थ है :- एकान्तकरि समाहित अरु शास्त्रसंस्कृत जाकी दष्टि है। ताकूं आदित्यविषै निरतिशय कृष्णपना देखिये है। तैसैं हुये ता (कृष्णपनै)की दृष्टि सामविषै युक्त है॥ ३६१ "अनन्तर जोई यह" इत्यादि वाक्यके तात्पर्यकू कहैहैं। ३६२ अङ्गरूप उपासनोंकूं समाप्त करिके अनन्तर आधि-

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१४८ प्रथमप्रपाठक १ [छान्दोग्यो- उद्गीथ आदिकके उपासन १३ त्सामाथ य एषोऽन्तरादित्ये हिरण्मयः है।। ॥ अनन्तर जो यह आदित्यके मध्य जो यह आदित्यके मध्य हिरण्मयकीन्यांईं हिरण्मय [ पुरुष देखियेहै]। जातें सुवर्णवि- कारता (सुवर्णकी कार्यता) देवकूं नहीं सम्भवै है। काहेतैं ऋक् साम गेष्णत्व अरु अप- हतपाप्मत्वके असम्भवतैं।। जाते तैं सुवर्णर- चित अचेतनविषै पाप्म (पाप) आदिककी प्राप्ति नहीं है जिसकरि प्रतिषेध करिये॥ औ चाक्षुषविषै अग्रहणतैं। यातैं लुप् उपमावाला दैवकी प्रधान उपासनाकूं कहनेकूं इच्छतेहुये उपास्यके स्वरूपकूं उपन्यास करैहैं। ३६३ ननु ऐसें हिरण्मयपद उपमारूप अर्थवाला क्यूं व्याख्यानकरियेहै। हिरण्यकी विकारताहीं इहां विवक्षित क्यूं नहीं होचैगी ? यह आशङ्का करिके कहैहैं॥ ३६४ अपहृत पाष्मपनैके असम्भवकूं साधतेहैं॥ इहां पाप्मादि। यह आदिपद ता (पाप)के कार्यके संग्रह अर्थ है।। ३६५ किवा :- चक्षुविषै उपास्य जो चाक्षुष पुरुष तिस- विषै सुवर्ण विकारताके अग्रहणतैं गौणहीं हिरण्मयपद है। ऐसैं कहैहैं॥ ३६६ औ तहां (चाक्षुष पुरुषविषै)बी अतिदेशका

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पनिषत्]] षष्ठ खंड ६ १४९ अंग प्रधानमेदसैं अपूर्व अधिदैवतरूप उद्गीथका उपासन ८ पुरुषो दृश्यते हिरण्यश्मश्रुर्हिरण्यकेश आप्रणखात् सर्व्व एव सुवर्णः ॥६॥ हिरण्मय पुरुष देखिये है। [जो] हिरण्य- शमश्रु हिरण्यकेश आप्रणखतैं (नखाग्रस- हित) सर्वहीं सुवर्ण है ॥ ६॥ हीं हिरण्मय शब्द है। अर्थ यह जो :- ज्योति- र्मय है॥ उत्तर (पीछले विशेषण)नविषै समान योजना है। पुरीविषै शयनतैं वा अ- पने स्वरूपकरि जगत्कूं पूरण करैहै यातैं पुरुष है। सो निवृत्त चक्षुवाले समाहित चित्त- वाले पुरुषनकरि ब्रैह्मचर्यादि साधनोंकी अपेक्षा- किया ता (सुवर्ण विकारता)का ग्रहण है। काहेतैं तैसैं ऋक् साम अरु गेष्णता आदिकके साथि विरोधतैं। तातैं गौणहीं हिरण्मयपद है। ऐसें उपसंहार करैहैं॥ ३६७ हिरण्यश्मश्रु है। इत्यादि विशेषणनविषै वी गौणता तुल्यहीं है। ऐसें कहैहैं॥ ३६८ ननु आदित्यादि मण्डलविषै जो पुरुष है सो ह- मोंकरि नहीं देखिये है ? तहां कहैहैं॥ २६९ विशिष्ट (श्रेष्ठ) अधिकारिनकूं आदित्य पुरुषके दर्शनके प्रति उपपादन करैहैं।

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१५० प्रथमप्रपाठक १ [छान्दोग्यो- उद्गीथ आदिकके उपासन ११ तस्य यथा कप्यासं पुंडरीकमेवम- क्षिणी। तस्योदिति नाम। स एष स अर्थ :- ताके जैसें कप्यास (कपिष्टष्ठा- न्तकी-न्यांई स्थित) पुंडरीक है ऐसें दो अक्षि हैं। ताका "उत्" ऐसा नाम है। सो यह वाला जैसें होवै तैसैं देखियेहै = ननु तेजस्वी पुरुष बी श्मश्रुकेश आदिक वाले कृष्ण होवैहैं? यातैं विशेषण देतेहैं :- हिरण्यइमश्रु अरु हिरण्यकेश है। ऐसैं । अर्थ यह जो :- ज्योतिर्मयहीं इस (आदित्य- गतपुरुष)के इमश्रु। (चिबुकगतकेश) औ के- श (शिरके बाल) हैं॥ औ आप्रणखतैं [प्र- णख नाम नखाग्र है। ] कहिये नखाग्रकरि स- हित सर्व सुवर्णकीन्यांईं है। अर्थ यह जो :- प्रभारूप है ॥ ६ ॥ टीका :- तिस ऐसे सर्व ओरतैं सुवर्णवर्णवा- २७०

३७० सर्वहीं सुवर्ण है। इस विशेषणतैं दो नेत्रनविषै बी सुवर्णभावके प्राप्तहुये प्रत्युत्तर कहैहैं॥

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पनिषत् ] षष्ठ खंड ६ १५१ अंग प्रधानभेदसैं अपूर्व अधिदैवतरूप उद्गीथका उपासन ८ र्वर्वेभ्यः पापेभ्य उदित उदेति ह वै स- र्व्वैभ्यः पापेभ्यो य एवं वेद ॥७॥ सर्व पापोंतैं उदित (उद्गत) है। जो ऐसैं जानताहै [सो] निश्चित सर्व पापोंतैं उ दयकूं पावता (ऊचें जाता) है॥ ७॥ लेबी पुरुषके दो अक्षिनविषै विशेष है॥।॥ कैसैंकि :- ताके जैसैं कपि जो मर्कट ताका। आस (आसन) रूप कप्यास। [ इहां उपवे- शन (बैठने) रूप अर्थवाले "आसि" धातुके करणविषै "घञ्" प्रत्यय है] कहिये कपिपृष्ठा न्त है जिसकरि बैठताहै। कप्यासकीन्यांई ३७१ विशेषणकूंहीं प्रश्नपूर्वक स्पष्ट करैहैं ॥ इहां जैसैं कप्यास (कपिपृष्ठके अन्त) की न्यांई स्थित पुण्डरीक है। तैसै ताके दो अक्षि हैं। ऐसैं योजना है।। ३७२ "आस" शब्दकी सिद्धिके प्रकारकूं सूचन करैहैं॥ ३७३ "घञ्" अन्तवाले शब्दके विवक्षित अर्थकूं कथन करैहैं॥ ३७४ ताकी करणताकूं स्पष्ट करैहैं॥ इहां कपिका आस जो कपिपृष्ठान्त सो कप्यास है। यह शेष है। ३७५ पदार्थकूं कहिके वाक्यार्थकूं कहैहैं॥

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१५२ प्रथमप्रपाठक १ [छान्दोग्यो- उद्गीथ आदिकके उपासन १३

पुंडरीक (कमल) अतितेजस्वि है। ऐसैं इस देवके दो अक्षि हैं।। इहां डँपेमित उपमानके होनेंतैं हीनउपमा नहीं है। तिस ऐसैं गुण- ३७७

विशिष्टका "उत्" ऐसा यह गौण नाम है। कै गौणपना है ? [तहां कहिये है:] सो यह सर्व पापनतैं। अर्थ यह जो :- पॉपेकरि स० हित ताके कार्यनतैं [ "जो आंत्मा अपहत पा- ३७६ ननु निहीन ( निकृष्टजातिवाले)की उपमाकरि दे- वकी चक्षुनकूं उपदेश करनेवाले तुहमोंकरि तिन दो चक्षुन- कीबी निहीनता उपदेश करी होवैगी? यह आशङ्का करिके कहैहैं। इहां यह अर्थ है :- कप्यासकरि उपमित जो पुण्ड- रीक। तिस उपमानकरि उपमित होनेतैं चक्षुनकूं निहीन उपमानका किया निहीनपना नहीं है।। ३७७ उक्त आदित्यपुरुषके क्षेत्रज्ञ (जीव)पनैकी श- ड्काकूं निषेध करनेकूं ताके नामकूं उपदेश करैहैं॥ ३७८ नामके गौणपनैकूं शंकाद्वारा व्युत्पादन करैहैं॥ ३७९ ननु ताका सर्व पापनतैं उदय (उद्गमन) नहीं है काहेतैं ताके कार्यकूं भजनेवाला होनेतैं? यह आशङ्काकरिके कहैहैं॥ ३८० ननु आदित्यके क्षेत्रज्ञ (जीव)विषैवी सर्व पापनतैं उद्य (उद्गमन) सम्भवैहै। काहेतैं "निश्चयकरि देवनके

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पनिषत् ] षष्ठ खंड ६ १५३ अंग प्रधानभेपसैं अपूर्व अधिदैवतरूप उद्गीथका उपासन ८ तस्यर्क च साम च गेष्णौ। तस्मादु- अर्थ :- ताके ऋक औ साम दो गेष्ण (पर्व) हैं। तातैं उद्गीथ है। तातैंहीं उद्गीता है प्मा है" इत्यादि आगे यह श्रुति कहैगी ] उ- दित है। कहिये उद्इत है। अर्थ यह जो :- उद्धत (निकस्या।) है॥ यातैं यह उत् नाम- वाला है। तिर्स ऐसैं गुण सम्पन्न उत् नाम- E E.hM वालेकूं यथोक्त प्रकारसैं जो जानताहै सो बी ऐसैं हीं सर्व पापोतैं उदित होवैहीं है कहिये उद्रमन करैहै। इहां "ह वा" ऐसे अ- वधारणरूप अर्थवाले दो निपात हैं। यातैं उ- दित होवैहीं है। यह अर्थ है ॥। ७॥ टीका :- आदित्यआदिकनकीन्यांईं विवक्षित प्रति पाप नहीं गमन करै है" इस श्रुतितैं? यह आशङ्का क- रिके [क्षेत्रज्ञरूप जीवतैं भिन्न] परमात्मविषयक वाक्यके शेषकूं उदाहरण करैहैं॥ इहां उक्त अर्थका योग अतः [यातैं] शब्दका यह अर्थ है।। ३८१ उपास्य परमात्माकूं उपन्यासकारके ताके उपास-

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१५४ प्रथमप्रपाठक १ [छान्दोग्यो- PHIPE उद्गीथ आदिकके उपासन १३

வு

जातैं इसका गाता है। सो यह [देव]है।। औ जे उस (आदित्य)तैं पराक् (ऊर्ध्व) होनेतैं तिस देवके उद्वीथपनैकूं कहैहैं :- ताके ऋकू अरु साम गेष्ण हैं कहिये प्ृथिवी आदिक उक्त लक्षणवाले दो पर्व हैं। जातैं स- र्वात्मा देव है [ तातैं ताकूं ] पर अपर लोकके

नकूं अब सफल जैसैं होवै तैसैं उपन्यास करैहैं॥ इहां य- थोक्त प्रकारकरि उत् नामवालेकूं। ऐसें संबन्ध है। ३८२ ननु परका उपासन कैसें होवैहै? इस अपेक्षाके हुये। उद्गीथविषै संपादन करिके होवैहै। ऐसैं दिखावैहैं॥ इहां यह अर्थ है :- जैसै आदित्य आदिकनका उद्गीथविषै स- म्पादनकरिके उपासन इहां विवक्षित होवैहै। तैसैं परमा- त्माकेबी तहां (उद्गीथविषै) संपादनकरिके उपासनकूं वि- वक्षित करिके सर्व ऋक् अरु सामकी स्वरूपताकूं "ताके" इत्यादि वाक्य कहैहै।। ३८३ मण्डलकरि अवच्छिन्न पुरुषका ऋकआदिक गेष्ण (पर्व)वानूपना कैसैं है? यह आशङ्काकरिके कहैहैं॥ परमा- त्माकूं स्वरसताकरि। सर्वात्मा होनेतैं चारिओरतैं ध्यानअर्थ मण्डलके अवच्छेदतें ऋक आदिरूप गेष्णवान्पना घटित है।। ३८४ तहांहीं अन्यहेतुकूं कहैहैं॥

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पनिषत् ] षष्ठ खंड ६ १५५ अंग प्रधानमेदसैं अपूर्व अधिदैवतरूप उद्गीथका उपासन ८ स एष ये चामुष्मात्पराञ्चो लोकास्तेषां चेष्टे देवकामानां चेत्यधिदैवतम्॥८॥ इति प्रथमप्रपाठकस्य षष्ठः खण्डः ॥६॥ लोक हैं तिनका औ देवनके कामोंका ई- शिता होवैहै॥ यह अधिदैवत है ॥ ८॥ इति श्री०मूलभाषा०प्रथमप्रपाठकस्य षष्टः खंड:६

कामका ईशिता होनेतैं औ सर्वका कारण होनेतैं पृथिवी अरु अभनिरूप ऋकू अरु साममय गेष्ण (पर्व)वानूपना सम्भवैहै॥ जातैं ऐसैं "उत्" नामवाला औ ऋकू सामरूप गेष्णवाला यह है। तातैं ऋक् सामरूप गेष्णवान्ताकरि प्राप्त उद्गीथपना परोक्षकरि कहियेहै। देवकूं परोक्ष ३८५ सर्वात्मभावकूं साधतेहैं॥ इहां यह अर्थ है :- स- र्वकी कारणताकरि सर्वात्मा होनेतैं ऋक्आदिक पर्ववान्पना युक्तहीं है।। ३८६ "तातैं उद्गीथ है" इसवाक्यकूं योजना करैहैं॥ इहां जातैं ऐसें प्राप्त हुये तात उद्गीथ है। इसवाक्यकरि उद्गीथपना परोक्षनामकरि देवका कहिये है। ऐसैं योजना है॥ ३८७ ननु ऐसैं परोक्षनामकरि देव क्यूं व्यपदेश करिये

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१५६ प्रथमप्रपाठक १ [छान्दोग्यो- उद्गीथ आदिकके उपासन १३ प्रिय होनेतैं। ततें "उद्गीथ है" ऐसैं। तिसी- हीं हेतुतैं उत्कूं गायन करैहै यातैं उद्गीता (उद्वाता) है। जीतैंहीं इस उक्त उत् ना- मवालेका गाता (गायक) यह है यातैं उ- द्वाताकी "उद्गाता" इस नामकी प्रसिद्धि युक्त है।। सो यह देव “उत्" नामवाला है औ है? यह आशङ्काकरिके। "परोक्ष प्रियकी न्यांई जातैं देव ह [यातैं वे]प्रत्यक्षके द्वेषी हैं"इस अन्यश्रुतिकूं आश्रयकरिके कहैहैं। ३८८ उत् नामवान्ताकेविषै देवरूप उद्गाताके उद्गाता- पनैकी प्रसिद्धिकूं प्रमाण करैहैं॥ ३८९ तत् (तातैं) शब्दके अर्थकूं स्पष्ट करैहैं॥ इहां प्र- कृत उत् नामवाले देवके आगानतैं। यह अतः (यातैं) श- ब्दका अर्थ है औ उद्गाताके "उद्गाता" इस नामकी प्रसिद्धि है। यह युक्त है। ऐसैं योजना है॥ ३९० सर्व पापके उदय (उल्लंघन)रूप लिङ्गतैं औ ताके अन्यत्र असंभवतें आदित्यके अन्तर्गत देव परमात्मा है। ऐसैं कहा। तहांहीं अन्य हेतुकूं कहैहैं॥ इहां देवनके कामोंके आदित्यतैं ऊपरके लोकनविषै अधिष्ठाता जे देव हैं । तिनके काम जे काम्यमान फलविशेष हैं। तिनका ईशिता है। यह अर्थ है। जातें निरङ्कश लोकनके कामोंका ईशितापना पर- मात्मातैं अन्यत्र नहीं सम्भवैहै "यह सर्वेश्वर है" इस श्रु- तितैं। यह भाव है॥ इति श्री० प्रथमप्रपाठकगतषष्ठखण्डस्य टिप्पणम् ॥ ६॥

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पनिषत् ] सप्तम खंड ७ १५७ अंग प्रधानभेदसैं अध्यात्मरूप अपूर्व उद्गीथका उपासन ९ अथ प्रथम प्रपाठ० सप्तमः खंडः॥७॥ अथाध्यात्मं ॥।वागेवर्क प्राणः साम। अथ श्री०मूलभाषाप्रथमप्रपाठकस्य सप्तमःखंडः ।७॥ व अध्यात्म [कहियेहैः-] वा- जे उस आदित्यतैं पराक्प्रकाशनतैं पराक् लोक हैं। तिन लोकनका ईशिता है। औ केवल ईशितापनाहीं नहीं किन्तु "च" शब्द- तैं तिनकूं धारण करैहै। "सो पृथिवीकूं अरु इस स्वर्गकूं धारण करैहै" इत्यादि मत्र वर्णतैं। किंवा :- देवनके कामोंका ईशिता होवैहै।। ऐसैं यह अधिदैवत कहिये देवतारूप विषय वाला उद्धीथरूप देवका स्वरूप कहा ॥ ८ ॥ इति श्री० भाष्यभाषा० प्रथमप्रपाठकस्य षछ्ठःखण्डः ॥६॥ अथ श्री०भाष्यभाषा० प्रथमप्रपाठकस्यसप्तमःखण्डः. अंग प्रधानभेदसैं अध्यात्मरूप अपूर्व उद्गीथका उपासन ९ टीका :- अब अध्यात्म कहियेहैः-वाकूहीं ऋक है। प्राण साम है। नीचे ऊँपर स्थानवान्- अथ श्रीपथमपपाठकगतसप्तमखण्डस्य टिप्पणम्।।७ ३९१ इहां आधिदैविक उपासनाकी अनन्तरता अथ श- १४

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१५८ प्रथमप्रपाठक १ [छान्दोग्यो- उद्गीथ आदिकके उपासन १३ तदेतदेतस्यामृच्यध्यूढ५ साम। तस्मा- दच्यघ्यूढY साम गीयते। वागेव सा प्राणोऽमस्तत्साम ॥१॥ - चक्षुरेवर्गात्मा साम। तदेतदेतस्यामृ- कहीं ऋकू है। प्राण साम है। सो यह साम इस ऋचाविषै अध्यूढ है। तातैं ऋचाविषै अध्यूढ साम गायन करियेहै॥ वाकूहीं सा है। प्राणहीं अम है। सो साम है ॥ १॥ अर्थ :- चक्षुहीं ऋक् है। आत्मा साम ताके सामान्यतैं ॥ इहां प्राण घ्राण कहियेहै वायुसहित॥ वाक्हीं सा है। प्राण अम है। इत्यादि पूर्वकीन्यांई है॥ १ ॥ टीका :- चक्षुहीं ऋकू है। आत्मा साम ब्दका अर्थ है औ ऋक्विषै वाक्की दृष्टि औ सामविषै प्राणकी दृष्टि कर्तव्य है। इस अर्थविषै हेतुकूं कहैहैं॥ ३९२ ननु ऋक अरु सामकी न्यांई वाक् अरु प्राणका अ- धर उपररि स्थानवान्पना कैसें है? तहां कहैहैं॥ ३९३ स्थानमात्रताकूं (प्राणशब्दकरि घ्राणइंद्रियरूप स्था- नमात्रके ग्रहणकूं) निषेध करैहैं॥

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पनिषत् ] सप्तम खंड ७ १५९ अंग प्रधानभेदसैं अध्यात्मरूप अपूर्व उद्गीथका उपासन ९ च्यध्यूढ२ साम। तस्मादृच्यघ्यूढ साम गीयते। चक्षुरेव साऽत्मामस्त- त्साम ॥२ ॥ श्रोत्रमेवर्ग्मनः साम। तदेतदेतस्या- । सो यह साम इस ऋचाविषै अध्यूढ है। तातैं ऋचाविषै अध्यूढ साम गायन करियेहै॥ चक्षुहीं सा है। आत्मा अम है। सो साम है॥ २ ॥ अर्थः-श्रोत्रहीं ऋकू है। मन साम है। सो यह साम इस ऋचाविषै अध्यूढ है। तातैं है। इहां "औत्मा " ऐसें छायारूप आत्मा कहियेहै काहेतैं ताकूं तिसे (चक्षु) विषै स्थित होनेतैं। सो साम है॥२॥ टीका :- श्रोत्रहीं ऋक है। मन साम है। ३९४ भोक्ताकूं निषेध करैहैं॥ ३९५ छायारूप आत्माकी सामरूपताविषै अन्यहेतुकूं क- हैहैं।। इहां यह अर्थ है :- चक्षुविषै छायारूप आत्माकूं स्थित होनेतैं। ऋचाविषै सामकी न्यांई॥

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१६० प्रथमप्रपाठक १ [छान्दोग्यो- उद्गीथ आदिकके उपासन १३ मृच्यध्यूढ५ साम। तस्माटृच्यध्यूढ साम गीयते। श्रोत्मेव सा मनोऽमस्त त्साम ॥ ३॥ अथ यदेतदक्ष्णः शुकं भा: सैवर्गथ यन्नीलं परः कृष्णं तत्साम। तदेतदेत- स्यामृच्यध्यूढ२ साम। तस्माद्ृच्यध्यू- ऋचाविषै अध्यूढसाम गायनकरियेहै। श्रो- त्रहीं सा है। मन अम है। सो साम है॥।३॥ अर्थ :- अनन्तर जो यह अक्षिकी शुक्क- भाः है सोई ऋकु है। औ जो नील पर कृष्ण है सो साम है। सो यह साम ऋचा- श्रोत्रका अधिष्ठाता होनेतैं मनकूं सामपनाहै॥३॥ टीका :- अैनन्तर जो यह अक्षिकी शुक्क ३९६ आध्यात्मिकरूप कितनैंक अङ्गरूप उपासनोंकूं क- हिके। अनन्तर प्रकारान्तरकरि अङ्गरूप उपासनकूंहीं कि- श्चित् उपदेश करैहैं॥ इहां यह अर्थ है :- अक्षिका जो यह शुक रूप देखियेहै। ऋक्विषै ताकी दृष्टि कर्तव्य है ॥

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पनिषत् ] सप्तम खंड ७ १६१ अंग प्रधानमेदसैं अध्यात्मरूप अपूर्व उद्धीथका उपासन ९ ढ५ साम गीयते॥ अथ यदेवैतदक्ष्णः शुककं भा: सैव साऽथ यन्नीलं परः कृ- ष्णं तदमस्तत्साम।४॥

विषै अध्यूढ है। तातें ऋचाविषै अध्यूढ साम गायन करिये है॥। औ जोई यह अ- क्षिकी शुक्क भा: है सोई सा है। अरु जो नील पर कृष्ण है सो अम है। सो (युगल) साम है॥ ४॥

प्रमा है सोई ऋक है। औ जो नील पर कृष्ण आदित्यकीन्यांईं दृष्टिकी शक्तिका अ- धिष्ठान है सो साम है ॥। ४ ॥

३९७ तिसींहीं रूपकूं विशेषण देतेहैं॥ ३९८ ऋकविषै पूर्वोक्त रूपकी दृष्टिकी न्यांई वक्ष्यमाणरू- पकी दृष्टिबी सामविषै कर्तव्य है। ऐसैं कहैहैं॥ इहां यह अर्थ है :- जैसें आदित्यमंडलविषै सम्यक् जाननेयोग्य अतिकृ- ष्णरूप कहा। तैसैं चक्षुविषैवी दकूशक्तिका अधिष्ठान तैसा रूप देखिये है। ताकी दृष्टि सामविषै कर्तव्य है॥

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१६२ प्रथमप्रपाठक १ [छान्दोग्यो- उद्गीथ आदिकके उपासन १२ अथ य एषोऽन्तरक्षिणि पुरुषो द- अर्थ :- अनन्तर जो यह अक्षिके अ- न्तर पुरुष देखियेहै सोई ऋकू है। सो साम है। सो उक्थ है। सो यजुर है। सो ब्रह्म (ऋगादि) है। तिस इस ( चाक्षु- T टीका: अनन्तर जो यह अक्षिके भी- तर पुरुष देखियेहै। 'पूर्वकीन्यांईं सोई- ऋके है। अध्यात्म वाकू आदिक है औ पृथिवी आदिक अधिदैवत है औ प्रसिद्ध ऋक् पाद- ३९९ आध्यात्मिकरूप प्रधान (मुख्य) उपासनके शेष (उप- पकारक) होनेकरि अनेक अङ्गरूप उपासनोंकूं कहिके। अन- न्तर प्रधान उपासनके विषयकूं दिखावैहैं॥ ४०० "देखियेहैं" इस प्रयोगतैं यह छायात्मा होवैगा? यह आशङ्काकरिके कहैहैं॥ इहां यह अर्थ है :- जैसे पूर्व आ- धिदैविक वाक्यविषै समाहित चित्तवाले पुरुषनकरि आदि- त्यपुरुषका दृश्यपना कहा। जैसे चाक्षुष पुरुषका बी विशिष्ट अधिकारिनकरिहीं दृश्यपना माननेयोग्य है। ४०१ छायात्माके पक्षविषै वाक्यशेषके विरोधकूं अभिप्रा- यका विषयकरिके कहैहैं॥ इहां यह अर्थ है :- जो यह ऋकू जैसें व्याख्यान करी सा सर्व सोई पुरुष है।।

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पनिषत् ]] सप्तम खंड ७ १६१ अंग प्रधानभेदसैं अध्यात्मरूप अपूर्व उद्गीथका उपासन ९ श्यते सैवर्क्तत्साम। तदुक्थं तद्यजुस्त-

ष पुरुष) का सोई रूप है जो उस (आ-

बद्धअक्षरात्मिका है। तैसैं साम है। वी उ- क्थके साहचर्यतैं स्तोत्र साम है। उक्थ शस्त्र है। उक्थतैं अन्य तैसैं (जैसैं) यजुर् है। स्वाहा स्वधा अरु वषट् आदिक सर्वहीं वाकू यजुर है सोई है सर्वात्मा होनेतैं औ सर्वका योनि होनेतैं। ऐसैं जातैं हम कहते भये ऋक् आदि प्रकरणतैं। सो ब्रह्म है। ऐसैं तीनवेद

४०२ ऋचाविषै उक्तन्यायकूं सामविषै अतिदेश करैहैं॥ इहां यह अर्थ है :- जो कछक साम है। सो सर्व सोई पुरुष है।। ४०३ ऋुकू अरु सामशब्दके अन्य अर्थकूं कहैहैं॥ इहां ऋकू साम जैसे है ऐसा दृष्टान्त तथाशब्दका अर्थ है। ४०४ ननु परकूं ऋकू आदिकरूपता कैसें है? यह आ- शङ्का करिके कहैहैं॥ इहां ब्रह्मशब्दकी परमात्मारूप विषय- वान्ताकूं व्यावर्तन करतेहुये "प्रकरणतैं" ऐसें उक्त न्याय- करि तीन वेद सोई पुरुष है। ऐसा उपसंहार है। सो जड- रूप छायात्माकी व्यावृत्ति अर्थ है।।

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१६४ प्रथमप्रपाठक १ [छान्दोग्यो- उद्गीथ आदिकके उपासन १३ ड्रह्र। तस्यैतस्य तदेव रूपं यदमुष्य दित्य पुरुष) का रूप है। जे दोनूं उ- [सोई पुरुष है ]॥ तिस इस चाक्षुष पुरुष- का सोईरूप अति देशकरियेहै॥ ॥क्यासो है ? जो उस आदित्य पुरुषका "हिरेण्मय" इत्यादि रूप जो अधिदैवत कहा है। जे उस (आदित्य पुरुष) के गेष्ण [दोपर्व ] हैं वेई इस चाक्षुष पुरुषके गेष्ण हैं। जो उसका नाम "उत्" ऐसा औ "उद्रीथ" ऐसा है सोई इसका नाम है।। ॥ ननु स्थानभेदतैं॥ औ ४०५ रूपके अतिदेशकूं दिखावै हैं॥ ४०६ क्या सो आदित्य पुरुषका रूप है? इस अपेक्षाके हुये कहैहैं॥ ४०७ इसतैंबी यह छायात्मा नहीं है। ऐसें कहैहैं॥ ऐसें कहैहैं॥ ४०८ नामका अतिदेश वी इस अर्थकूं बलावान् करैहै। ४०९ आदित्य अरु चाक्षुषरूप दो उपास्योंके भेदतैं उपा- सना बी भिन्न है? ऐसें पूर्ववादी शङ्का करैहै। इहां यह अर्थ है :- आदित्यमण्डल औ चक्षु। ऐसैं दो स्थान। भेदकूं पावतेहैं औ रूप हिरण्मय। हिरण्यश्मश्रु । इत्यादि है औ

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पनिषत्] सप्तम ख़ंड ७ १६५ अंगप्रधानभेदसैं अध्यात्मरूप अपूर्व उद्गीथका उपासन ९ रूपं। यावमुष्य गेष्णौ तौ गेष्णौ। य- न्नाम तन्नाम ॥ ५॥ सके गेष्ण (पर्व) हैं वे गेष्ण हैं। जो नाम है सो नाम है ॥ ५॥

रूप गुण नामके अतिदेशतैं औ ईशिता भाव- रूप विषयवाले भेदके व्यपदेशतैं आदित्य अरु चाक्षुषका भेद है? ऐसैं जो कहै। सो बैंनै

ऋुकूआदिक पर्ववान्पनाआदिक गुण है औ "उत्" इ- त्यादि नाम है। तिनका "तिस इसका सोई रूप है" इ- त्यादिरूप अतिदेश (कितनैक धर्मनका आक्षेप) है "औ जे उस (सूर्य) तैं पराक् लोक हैं तिनका अरु देवनके कामोंका ईशिता (स्वामी) होवैहै। यह अधिदैवत है। औ जे इस चाक्षुषतैं अर्वाक् लोक हैं तिनका औ मनुष्यनके कामोंका ईशिता है। यह अध्यात्म है" ऐसैं यह ईशितापनैरूप वि- षयवाला भेदका व्यपदेश है। यातैं इन दोनूंके भेदतैं उपा- सन वी भिन्नहीं है।। ४१० उपास्यके भेदतैं उपासनाका भेद नहीं है। ऐसैं सिद्धान्ती दूषण देतेहैं॥ इहां यह अर्थ है :- उपासक। प्रथम उस आदित्य रूपसैं पराक् (ऊर्ध्व) लोकनकूं औ देवनके कामोंकूं पावताहै। सोई इस चाक्षुषरूपकरि अर्वाचीन लोकनकूं औ मनुष्यनके कामोंकूं पावताहै। ऐसैं सुनियेहै औ एककूं

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१६६ प्रथमप्रपाठक १ [छान्दोग्यो- उद्गीथ आदिकके उपासन १३

नहीं :- काहेतैं उस रूपसैं अरु इसरूपसैंहीं ऐसैं एक उपासककूं उभय स्वरूपकी प्राप्तिके असम्भवतैं॥ ॥ नैतु द्विधाभावकरि सम्भवै है। जातैं यह श्रुति आगे कहैगी "सो एकधा होवैहै त्रिधा होवैहै" इत्यादि ? ऐसैं जो कहै। "सो बनै नहीं: काहेतें एक चेतनकूं निरवयव होनेतैं द्विधाभावके असम्भवतैं। जातैं अध्यात्म अरु अधिदैवतकी एकताहीं है। औ जो रूप ४१४

आदिकका अतिदेश भेदका कारण है ऐसैं

वस्तुतैं भिन्न उभयरूपताकी प्राप्ति नहीं सम्भवैहै। तातैं उपासनके भेदकी कल्पना युक्त नहीं है। ४११ ननु एककूंबी विद्याके माहात्म्यतैं द्विधाभावके निश्चयतैं उभयरूपता घटित है? ऐसैं पूर्ववादी शंका करैहै॥ ४१२ एककी विद्याके वशतै अनेकरूपताविषै वाक्यशे- षकूं पूर्ववादी प्रमाण करैहै। ४१३ एककूं अनेक शरीरनके परिग्रहके हुये बी स्वरू- पके भेदका सम्भव नहीं है। ऐसें सिद्धान्ती परिहार करैहैं। इहां एकताके साधकका सन्भाव तत् (तातैं) शब्दका अर्थ है।। ४१४ पर (पूर्ववादी)करि उक्त भेदककूं सिद्धान्ती अ- नुवाद करैहैं।। इहां भेदका कारण है। तिसतैं ऊपर इति (ऐसैं ) शब्द देखनेकूं योग्य है।

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पनिषत् ] सप्तम खंड ७ १६७ अंग प्रधानभेदसैं अध्यात्मरूप अपूर्व उद्गीथका उपासन ९ स एष ये चैतस्मादर्वाञ्चो लोका- स्तेषां चेष्टे मनुष्यकामाना्चेति तद्य इमे अर्थः-सो यह औ जे इसतैं अर्वाक् लोक हैं तिनका औ मनुष्यनके कामोंका

तुह्म कहते भये। सो भेदके ज्ञान अर्थ नहीं है किन्तु स्थानभेदतैं भेदकी आशङ्का मति होवै इस अर्थ है॥५॥ टीकाः सो यह चाक्षुष पुरुष है औ जे ४१६

इस आध्यात्मिक आत्मातैं अर्वाक्गत (नीचे) लोक हैं तिनका औ मनुष्य सम्बन्धी का- मोंका ईशिता होवैहै। ताँतैं जे ये गायक ४१५ अब सिद्धान्तीहीं दूषण देते हैं॥ इहां तत् (सो) ऐसैं अतिदेश किया रूपादि कहा है। ४१६ अधिदैविक पुरुषकी न्यांई आध्यात्मिक पुरुषवि- बैबी निरतिशय ऐश्वर्यके श्रवणतैंवी तिनकी एकता है। ऐसैं कहैहैं॥ ४१७ तिनदोनूंके भेदके अभावविषै अन्यहेतुकूं कहैहैं॥ इहां यह अर्थ है :- ईश्वरकूंहीं पूर्वोक्त हेतुतैं गायनके वि- षय होनेकूं योग्य होनेतैं॥

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१६८ प्रथमप्रपाठक १ [ छान्दोग्यो- उद्गीथ आदिकके उपासन १२ वीणायां गायन्त्येतं ते गायन्ति। त- स्मात्ते धनसनयः ॥ ६ ॥ अथ य एतदेवं विद्दान्साम गाय- ईशिता है ऐसें॥ तातें जे ये वीणाविषै गा- यन करतेहैं वे इसीकूं गायन करतेहैं। तातैं वे धनवान् होते हैं ॥ ६ ॥ अर्थ :- जो ऐसैं विद्वान् हुया अनन्तर इस सामकूं गायन करैहै। सो दोनूं (चा- वीणाविषै गायनकरैहैं वे याहीकूं गायन करै हैं। जातैं ईश्वरकूं गायन करैहैं तातैं वे धनके लाभकरि युक्त होवैहैं। अर्थ यह जो: धनवान् होवैहैं॥ ६ ॥ टीका :- जो इस यथोक्त देवरूप उद्वीथकूं ४२०

४१८ तत् (तातैं) शब्दके अर्थकूं स्पष्ट करैहैं॥ ४१९ स्थानभेदकरि उक्त उपासनावालेकूं फल कथनके अर्थ भूमिकाकूं करैहैं॥ इहां यह साम। ऐसैं सम्बन्ध है॥ ४२० ऐसें विद्वान् हुया। ऐसैं कहा। याहींकूं विभाग क- रैहैं। इहां विद्वान्। इसतैं ऊपर अथशब्द संबन्धकूं पाव-

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पनिषत् ] सप्तम खंड ७ १६९ अंग प्रधानमेदसैं अध्यात्मरूप अपूर्व उद्गीथका उपासन ९ त्युभौ स गायति। सोऽमुनैव सएष ये चामुष्मात्पराञ्चो लोकास्ताश्श्राSSप्रो- ति देवकामाश्श्र॥॥ क्षुष अरु आदित्य)कूं गायन करैहै। सो उसी (आदित्यरूप)सैंहीं सो यह औ जे उसतैं पराकू लोक हैं तिनकूं औ देवनके कामोंकूं पावताहै॥ ७॥ ऐसैं विद्वान् हुया अनंतर सामकूं गायन करैहै। सो चाक्षुष औ आदित्य दोनूंकूं गा- यन करैहै॥ ॥ तिस ऐसैं जाननेवालेकूं फल कहियेहैः सो आदित्यके अंतर्गत पुरुष रूप होयके उसींहीं आदित्यरूपसैं "सो यह औ जे उसतैं पराकू (ऊर्ध्व) लोक हैं। तिनकूं पावताहै। [औदित्यके अन्तर्गत जो ताहै औ सो उस (सूर्य) रूप करिहीं लोकनकूं औ कामोंकूं पावताहै। ऐसैं संबन्ध है॥ ४२१ प्राप्तिके प्रकारकूं विवरण करैहैं॥ ४२२ उपास्यकीन्यांई उपासककूंवी निरतिशय ऐश्वर्य क- १५

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१७० प्रथमप्रपाठक ? [छान्दोग्यो- उद्गीथ आदिकके उपासन १३ अथानेनैव ये चैतस्मादवाच्चो लो- कास्ता श्राSSप्नोति मनुष्यकामाश्क्र। तस्माडु हैवंविदुद्वाता बूयात् ॥८॥ कं ते काममागायानीत्येष ह्वेव का- अर्थः-तैसैं इसी (चाक्षुष पुरुपरूप ) करिहीं औ जे इसतैं अवार्क लोक हैं तिनकूं औ मनुष्यनके कामोंकूं पावताहै। ता- तैंहीं ऐसैं जाननेवाला उद्गाता [यजमानकूं] कहै :- ॥l ८ ।। अर्थ :- "किस तेरे कामकूं आगानकरूं" देव है तिसरूप होयके यह अर्थ है] औ देव- नके कामोंकूं पावता है॥७॥ टीका :- तब चाक्षुष पुरुषरूप होयके इसीं हांतैं होवैगा। जातें दोनूंकूं निरङ्कश ऐश्वर्य युक्त नहीं है? यह आशङ्काकरिके कहैहैं । इहां उसीहीं आदित्यकरि। ऐसैं उक्त जो अर्थ सोई इहां स्पष्ट किया है औ अष्टम कंडिकाके आरम्भमैं जो अथ शब्द है। सो तथाका पर्याय है औ चा- क्षुष होयके तिसींहीं चाक्षुषकरिहीं। ऐसें सम्बन्ध है।

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पनिषत् ] सप्तम खंड ७ १७१ अंग प्रधानमेदसैं अध्यात्मरूप अपूर्व उद्गीथका उपासन ९ मागानस्येष्टे। य एवं विद्दान्साम गाय- ति। साम गायति॥ ९॥ इति प्रथमप्रपाठकस्य सप्तमः खण्डः ॥ ७॥ ऐसैं॥ यह जातैंहीं कामके आगानका ई- शिता है जो ऐसैं विद्वान् हुया सामकू गा- यन करैहै। सामकूं गायन करैहै॥ ९ ॥ इति श्री०मूलभाषा०प्रथमप्रपा० सप्तम: खंड:७ हीं चाक्षुष रूपसैं हीं औ जे इसतैं अर्वाक् (नीचे) लोक हैं तिनकूं औ मनुष्यनके का- मोंकू पावताहै (चाक्षुषरूप होयके। यह अर्थ है) ॥ तातैंहीं ऐसैं जाननेवाला उद्गाता यजमानके प्रति कहै :- "इस तेरे इष्टकामकूं मैं गायन करूं" ऐसैं। यहें जातैं उद्गाता कामके आगानकरि कहिये उद्धानकरि कामके संपा- दन करनेकूं ईशिता (समर्थ) है। यह अर्थ है ॥ ॥ कौंन यह है किः-जो ऐसैं विद्वान् हुया ४२३ उक्त फलके यजमान सम्बन्धिपनैंकूं दिखावैहैं॥ ४२४ तत् (तातैं) शब्दके अर्थकूंहीं कथन करैहैं॥ ४२५ उद्गाताकूं विशेषण देते हैं॥

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१७२ प्रथमप्रपाठक १ [छान्दोग्यो- FHIPE उद्गीथ आदिकके उपासन १३

अथ प्रथमप्रपाठकस्याष्टमः खंडः ॥८। त्रयो होद्गीथे कुशला बभूवुः शिलकः

अथ श्री०मूलमात्रभाषा०प्रथमपाठकस्याष्टमः खण्ड: ८ अर्थ :- तीनहीं उद्गीथविषै कुशल होते

सामकूं गायन करै है। सामकूं गायन करैहै। इहां दोवीर कथन उपासनाकी समाप्ति अर्थ है। ८ ॥। ९ ॥ इति श्री० भाष्यभाषा०प्रथमप्रपाठकस्य सप्तमःखण्डः॥७।।

शिलक दाल्भ्य जैवलि संवादपूर्वक सामसैं स्वर्ग औ स्वर्गसैं इस लोकपर्यत गतिके कथनकरि

लके उद्गीथोपासन ॥ ८॥ टीका :- अक्षरकूं अनेक प्रकारसैं उपास्य ४२६ उद्गीथविषै परव्रह्मका सम्पादन करनेयोग्य उपा- सन विभागकरिके कहा। ताकूं उपसंहार करैहैं। इति श्रीप्रथमप्रपाठकगतसप्तमखण्डस्यटिप्पणम्।७॥ अथ श्री प्रथमप्रपाठकगताष्टमखण्डस्यटिप्पणम्।।।। ४२७ अध्यात्म अरु अधिदैवतरूप स्थानके भेदकरि अव-

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पनिषत् ] अष्टम खंड ८ १७३ शिलक दाल्म्य जैवलिका संवाद ८

शालावत्यश्चैकितायनो दाल्भ्यः प्र- भये॥ शालावत्य शिलक। चैकितायन दाल्म्य औ जैवलि प्रवाहण [ऐसैं ये ती-

होनेतैं प्रकारान्तरकरि परोवरीयस्त्व गु- णरूप फलवाले उपासनकूं आम्नाय (वेद) ल्पावता भया। इहां इतिहैसितो सुखसैं अ- बोधनअर्थ है। तीन कहिये तीनसंख्यावाले [ह (प्रसिद्ध ) ऐसा अक्षर ऐतिह्य (परम्परा प्रमाण)रूपअर्थवाला है] ।। तीन उद्गीथ- विषै (उद्गीथके ज्ञानके प्रति) कुशल (नि-

च्छिन्न परमात्माकी दृष्टिकरि उद्गीथका उपासन अखिलपा- पोंके नाशरूप फलवाला कहा। अब स्थानभेदके अवच्छे- दकूं छोडिके परोवरीयान् भावरूप गुणवाले परमात्माकी ह- ष्टिकरि परोवरीयान्भावकी प्राप्तिरूप फलवाले उद्गीथके उ- पासनकूं आस्नाय (वेद) आनयन करता भया। इस प्रकर- णके तात्पर्यकूं कहैहैं॥ ४२८ ननु तब विवक्षित उपासनहीं कहनेकूं योग्य है। आख्यायिकासैं क्या है? यह आशङ्का करिके कहैहैं॥ इहां इतिहास पूर्ववृत्त है। औ इतिहका जो भाव सो ऐतिह्य है औ मिलितनका। यह षष्ठी निर्धारणविषै है॥

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१७४ प्रथमप्रपाठक १ [छान्दोग्यो- उद्गीथ आदिकके उपासन १३ वाहणो जैवलिरिति॥ ते होचुरुद्रीथे वै न]।। वेई कहतेभयेः-उद्गीथविषैहीं [हम] पुण) होते भये। किसी बी देशविषै अरु काल- विषै वा निमित्तके होते इकट्ठे हुये पुरुषनका- हीं यह अभिप्राय है ।। जोतैं सर्व जगत्विषै उद्गीथआदिकके विज्ञानविषै तीनकाहीं कौशल नहीं है। जातैं उपस्ति जानश्रुति अरु कैकेय आदिक सर्वज्ञकल्प सुनियेहैं। ॥ कौंन वे तीन हैं? यह कहैहैं :- शिलावान्का अपत्य (पुत्र) शालावत्य ऐसा नामतैं शिलक औ चिकितायनका अपत्य चैकितायन ऐसा द- ल्भगोत्रवाला दाल्म्य। वा इन दोनूंका अपत्य ४२९ ननु सर्व जगत्विषै तीनकाहीं उद्गीथआदिकके ज्ञानविषै कौशल है। ऐसैं क्यूं नहीं कहियेहै। तिनकेमध्य तीनकाहीं सो नैपुण्य है। ऐसें क्यूं प्रतिज्ञा करिये है? तहां क- हैहैं॥ इहां उस प्रसिद्धका अपत्य जो है सो आमुष्यायण कहिये है औ दोनूंका जो आमुष्यायण सो द्यामुष्यायण (दो- नूंका अपत्य) है। अर्थ यहजो :- तेरा औ मेरा यह है। ऐसैं संकेतकरि धर्मतैं परिग्रहण किया है॥

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पनिषत्] अष्टम खंड ८ १७५ शिलक दाल्म्य जैवलिका संवाद ८ कुशलाः स्मो हन्तोद्गीथे कथा वदाम इति ॥१॥ कुशल हैं। जो संमति होवै तो उद्गीथविषै कथाकूं कहैं ऐसैं ॥ १ ॥

औ जीवलका अपत्य जैवलि ऐसा नामतैं प्र- वाहण। ऐसैं ये तीन थे॥ वे परस्पर कहते भये :- उद्गीथविषैहीं [ हम तीन ] कुशल हैं कहिये निपुण ऐसैं प्रसिद्ध हैं।। यातैं जो तुह्मारी अनुमति होवै तो उद्गीथविषै कहिये उद्गी- थके विज्ञानरूपनिमित्तवाली कथा (विचा- रणा)कूं पक्षप्रतिपक्षके उपन्यास( कहनेके आ- रंभ) करि कहैं। अर्थ यह जो :- वादकूं करैं॥ तैसें तिसकी विद्यावानोंके संवादके हुये विपरीत ४३० किसअर्थ वादका आरम्भ है? यातैं कहैहैं॥ इहां वादके प्रवृत्तभये तिस विवक्षित अर्थविषै है विद्या जिनकूं वे तद्विद्य हैं। तिनके साथि संवादके हुये हष्ट (प्रत्यक्ष) हीं फल है। यह अर्थ है। औ इतिशब्दका प्रयोजन इति (ऐसैं) इसके साथि सम्बन्ध है।।

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१७६ प्रथमप्रपाठक १ [छान्दोग्यो- उद्गीथ आदिकके उपासन १३ तथेति ह समुपविविशुः सह प्रवाहणो अर्थ :- तथाऽस्तु। ऐसैंहीं [कहिके ] सम्यकू बैठतेभये॥ ॥ सोई प्रवाहण जै- ग्रहणका नाश। अपूर्वविज्ञानकी उत्पत्ति औ संशयकी निवृत्ति होवैहै ऐसैं है। यातें तिसकी विद्यावानोंका संयोग कर्तव्य है। यह इतिहा- सका प्रयोजन है। जोतें शिलकआदिकनकूं दे- खियेहै ॥ १ ॥ टीका :- तथाऽस्तु ऐसैं कहिके वे सम्यक् बैठते भये। तहां [संवादके निर्धारणके हुये] राजाकी प्रगल्भताके सम्भवतैं सो प्रसिद्ध प्र- वाहण जैवलि[ राजा ] इतर दोनूंके प्रति ४३१ वादके आरम्भकी दष्टफलताके हुये फलितकूं क- हैहैं।। इहां इतिहास तो सुखसैं अवबोधन अर्थ है। ऐसैं पूर्व उक्तके साथि मिलावनेके अर्थ चकार है॥ ४३२ यथोक्तफल हष्ट कैसें है ? यह आशङ्काकरिके क- हैहैं।। इहां शिलकआदिकनकूं तद्विद्यके संयोगके हुये विप- रीत बुद्धिका ध्वंसआदिक फल। यह शेष है औ तहां यह निर्धारणअर्थ सप्तमी है।।

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पनिषत् ] अष्टम खंड ८ १७७ शिलक दाल्म्य जैवलिका संवाद ८ जैवलिरुवाच॥ भगवन्तावग्रे वदतां। ब्राह्मणयोर्वदतोर्वाच श्रोष्यामीति ॥२। वलि [राजा] कहताभया। जैवलिरुवाच :- भगवान् (आप दो) आगे कथन करो। कहनेवाले दो ब्राह्मणोंकी वाक्कूं [मैं ]श्र- वण करूंगा! ऐसैं ॥ २ ॥

कहताभया। जैवलिरुवाच :- भगवान् [ पू- जावान् ] आप दो आगे [ पूर्व ] कथन करो। [इहां "दो ब्राह्मणनके" इसलिंगतैं। राजा यह है। ऐसैं जानियेहै ] तुमदो ब्राह्मणरूप वा- दकरनेवालेकी वाक् (वाणी)कूं मैं सुनूंगा। अर्थरहित वाक्कूं सुनूंगा ऐसैं "वाक्" इस वि- शेषणतैं अपर कहतेहैं ॥ २ ॥ ४३३ ननु राजाकी प्रगल्भताके सम्भवतैं। यह जो कहा। सो अयुक्त है। काहेतैं ताके राजापनैंविषै हेतुके अभावतैं? यह आशङ्काकरिके कहैहैं॥ ४३४ विशेषणके सामर्थ्यतैं पक्षान्तरकूं उठायके अङ्गी- कार करैहैं॥ इहां राजाकरि यथोक्त प्रकारसैं उक्त दो ब्रा-

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१७८ प्रथमप्रपाठक १ [छान्दोग्यो- उद्गीथ आदिकके उपासन १३ स ह शिलकः शालावत्यश्रैकितायनं दाल्भ्यमुवाच ।हन्तत्वा एच्छानीति॥ पच्छेति होवाच॥ ३ ॥ अर्थ :- सोई शिलक शालावत्य। चैकि- तायन दाल्म्यकूं कहताभया ॥ शिलक उवाच :- जो सम्मति देताहै तो तुजकूं पूंछताहूं! ऐसैं॥ ॥ [दाल्भ्य] "पूंछ" ऐसैंहीं कहता भया॥ ३ ॥ टीका :- उक्त दोनूंके मध्य सो प्रसिद्ध शि- लक शालावत्य। चैकितायन दाल्म्यके प्र- ति कहताभया। शिलक उवाच :- जो अ- नुमति देताहै तो तुजकूं पूंछताहूं॥ ऐसैं उक्त इतर [दाल्म्य ] "पूंछ" ऐसैंहीं कहता भया॥ ३ ॥ ह्ाणोंकेमध्य शालावत्य दाल्भ्यके प्रति कहता भया। ऐसैं स- म्वन्ध है औ सामकी गति है। ऐसैं अन्वय है॥

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पनिषत् ] अष्टम खंड ८ १७९ शिलक दाल्म्य जैवलिका संवाद ८ का साम्नो गतिरिति? स्वर इति हो- वाच॥ स्वरस्य का गतिरिति ? प्राण अर्थः-शिलक उवाच :- कौंन सामकी ग- ति है ? ऐसैं॥ ॥ "स्वर है" ऐसैंहीं कहताभया॥ ॥ शिलक उवाच :- स्वरकी कौंन गति है? ऐसैं ॥ ॥"प्राण है" ऐसैं टीका :- प्राप्त भई है अनुमति (संमति ) जिसकूं ऐसा हुया शिलक कहैहै॥ शिलक उ- वाच :- कौंन प्केत होनेतैं उद्ीथरूप साम- की गति है? उद्भीथ जातैं इहां उपास्य होने करि प्रकृत है औ "परोवरीयान्रूप उद्धीथकूं ऐसैं आगे यह श्रुति कहैगी॥ गति कहिये आश्रय पैरायण। यह अर्थ है॥ ऐसैं पूंछ्या हुया ४३५ सामशब्दके अर्थकूं कहैहैं॥ ४३६ ता (उद्गीथ)के पूर्व उत्तरग्रन्थविषै प्रकृतपनैकूं प्रकट करैहैं॥ ४३७ गति शब्दके क्रियारूप विषय (अर्थ)वानूताकूं निषेध करैहैं॥ ४३८ औपचारिक (गौण) आश्रयकूं निरसन करैहैं।

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१८० प्रथमप्रपाठक १ [छान्दोग्यो- उद्गीथ आदिकके उपासन १३ इति होवाच॥ प्राणस्य का गतिरित्य- कहताभया। ॥ शिलक उवाचः-प्रा- णकी कौंन गति है? ऐसैं ॥ ॥ "अन्न है" ऐसैंहीं कहताभया॥ ॥ शिलक उवाच :- दाल्भ्य कहैहै ॥ दाल्भ्य उवाच :- "स्वर है ऐसैं ॥। सामकूं स्वरस्वरूप होनेतैं। जो जिसका स्वरूप है सो ताकी गति औ ताका आश्रय होवैहै। यह युक्त है। मृत्तिकारूप आश्रयवाले घटादिककीन्यांई॥ ॥ शिलक उवाच :- स्वरकी कौंन गति है? ऐसैं पूंछया हुया दाल्भ्य "प्राण है" ऐसैंहीं कहता भया। प्राणतैं उत्पाद्य जातैं स्वर है तातैं स्वरका प्राण गति है।। ॥ शिलक उवाच :- प्राणकी कौंन ४३९ ननु स्वर जो है सो ध्वनिका मेद है। सो उद्गी- थकी गतिरूप कैसैं होवैगा? यह आशङ्काकरिके कहैहैं॥ इहां यह अर्थ है :- ता सामका प्रकाशक होनेकरि ताका आश्रय होनैसैं ताके साथि तादात्म्यतैं स्वर ताकी गति होवैहै॥ ४४० सामकूं स्वररूपताके हुयेवी तिस (स्वर)की गति रूपवान्पना कैसे है? यह आशङ्काकरिके। दृष्टान्तकरि परिहार करैहैं॥

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पनिषत् ] अष्टम खंड ८ १८१ शिलक दाल्म्य जैवलिका संवाद ८ न्नमिति होवाचान्नस्य का गतिरित्याप इति होवाच ॥४॥

अन्नकी कौंन गति है? ऐसैं॥ ॥ "आप- (जल) हैं" ऐसैंहीं कहताभया॥४॥

गति है? ऐसैं पूंछ्या हुया दाल्भ्यः-"अन्न है" ऐसैंहीं कहता भया। अन्नरूप आश्रयवाला जातैं प्राण है "अन्नितैं विना प्राण सूकताहीं है" इसीहीं श्रुतितैं औ "अन्न दाम है" इस श्रुतिवचनतैं [तातैं प्राणका अन्न गति है]।।।। शिलक उवाच :- अन्नकी कौंन गति है? ऐसैं पूंछ्या हुया दाल्भ्यः-"आप (जल) हैं" ऐसैंहीं कहता भया। अन्नकूं जलतैं सम्भव- वाला होनेतैं॥ ४ ॥

४४१ प्राणकी अन्नरूप आश्रयवान्ताविषै वाजसनेय (बृ- हदारण्यक) श्रुतिकूं प्रमाण करैहैं॥ इहां "वत्सस्थानीयप्रा- णका अन्नरूपदाम बन्धन है" यह बी श्रुति है। यह अर्थ है औ "वे (आप) अन्नकूं सृजतीभई" इस श्रुतितैं अ- न्नकी जलतैं सम्भववानता देखनेकूं योग्य है॥ १६

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१८२ प्रथमप्रपाठक १ [छान्दोग्यो- उद्गीथ आदिकके उपासन १३ अपा का गतिरित्यसौ लोक इति होवाचामुष्य लोकस्य का गतिरिति! न स्वर्ग लोकमतिनयेदिति होवाच।। अर्थ :- शिलक उवाच :- आपकी कौंन गति है? ऐसैं॥ ॥ "वह (स्वर्ग) लोक है" ऐसैंहीं कहताभया॥ ॥ शिलक उवाच :- उस लोककी कौंन गति है? ऐसैं ॥ ॥ टीका :- शिलक उवाच :- जलोंकी कौंन गति है? ऐसें पूंछ्या हुया दाल्भ्यः-"वह लो- क है" ऐसैंहीं कहता भया। उसे (स्वर्ग) लोकतैं वृष्टि सम्भवै है। ॥ शिलक उवाच :- उस लोककी कौंन गति है? ऐसैं पूंछ्या हुया दाल्भ्य कहैहै॥ दाल्भ्य उवाच :- कोई बी स्वर्गरूप उस लोककूं अतिक्रमण क- रिके अन्य आश्रयके प्रति सामकूं नहीं ले ४४२ आप (जल) का वह (स्वर्ग) लोक गति कैसें है? तहां कहैहैं। इहां पूंछ्या हुया दाल्भ्य कहता भया। ऐसें सम्बन्ध है।।

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पनिषत् ] अष्टम खंड ८ १८३ शिलक दाल्म्य जैवलिका संवाद ८ स्वर्ग वयं लोकसामाभिसंस्थापयामः स्वर्गस-स्तावहि सामेति॥ ५॥

"स्वर्ग लोककूं" अति क्रमणकरिके [साम- कूं] नहीं लेजावै। यातैंहीं हम स्वर्ग लो- ककेप्रति सामकूं स्थापन करै हैं। स्वर्गसं- स्ताव जातैं साम है ऐसैं कहताभया ॥५॥।

जाताहै। ऐसैंहीं 'कहहै। यीतैं हम बी स्वर्ग- लोकके प्रति सामकूं चारिओरतैं संस्थापन करैहैं। अर्थ यह जो :- ववैर्ग लोकरूप प्रतिष्ठा- वाला सामकूँ जानतेहैं॥ स्वर्गसंस्ताव कहिये स्वर्गभावकरि संस्तवन (संस्ताव) है जिसका

४४३ तहां छन्द (वेद)विषै कालके नियमके अभावकूं अभिप्रेत करिके क्रियापदकूं व्याख्यान करैहै॥ ४४४ यद्यपि पर (अन्य)। सामके अन्यआश्रयकूं नहीं पावताहै (जानताहै) तथापि तुजकरि सो (अन्य आश्रय) कहनेकूं योग्यहीं है? यह आशङ्काकरिके कहैहै॥ ४४५ अतः (यातैं) शब्दके अर्थकूंहीं स्पष्ट करैहैं॥ इहां तातैं स्वर्गलोकरूप प्रतिष्ठावाला सामकूं। ऐसैं पूर्वसैं स- म्बन्ध है।।

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१८४ प्रथमप्रपाठक १ [छान्दोग्यो- उद्गीथ आदिकके उपासन १३ तश्ह शिलकः शालावत्यश्चैकिता- अर्थ :- तिसींहीं चैकितायनदाल्म्यकेप्र- ऐसा सो साम स्वर्गसंस्ताव जातें है "स्वैर्ग रूपहीं लोक सामवेद है" यह श्रुति है ॥५॥ टीका :- तिसचैकितायन दाल्भ्यके प्रति इतर शिलक शालावत्य कहताभया॥ शि- लक उवाच :- न्याय अरु आगमकरि अप्रति- छ्ठित (असंस्थित) कहिये परोवरीयान् भावकरि असमाप्तगतिवाला हे दलल्म्य! तेरा साम है। यह अर्थ है।। इहां "वै" ऐसैं आगमकूं स्मरण करावैहै औ "किल" ऐसें न्यायकूं सूचन करैहै॥ ४४६ स्वर्गसंस्ताव साम है। इस अर्थविषै प्रमाणकूं क- हैहैं॥।। इहां उपदेशका परंपरापना आगम है॥ ४४७ जो क्रियासाध्य है सो अनित्य है। ऐसें स्वर्गकूं अन्तवाला होनेतें परायणपना नहीं संभवै है। इस आशय- करि कहैहै।। इहां "किल" ऐसा अव्यय। उक्त न्यायकूं सूचन करैहै। यह शेष है।। ४४८ न्याय अरु आगमकरि अप्रतिष्ठित तेरा साम है। ऐसे उपसंहार करैहें॥

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पनिषत्] अष्टम खंड ८ १८५ शिलक दाल्भ्य जैवलिका संवाद ८ यनं दाल्भ्यमुवाचाप्रतिष्ठितं वै किल ते ति शिलक शालावत्य कहताभया ॥ शि- लक उवाच :- हे दाल्म्य ! न्याय अरु आ-

ठजो तो असहिष्णु (नहीं सहन करनेवाला ) हुया कोई वी सामका वेत्ता इस कालविषै अँप्रति- ष्ठित सामकूं "प्रतिष्ठित है" ऐसैं विपरीत ज्ञा- नवालेके प्रति कहै किः-ऐसें वादविषै अपरा- धीकेतांईं "मूर्धा (शिर) तेरा विस्पष्ट पतन होवैगा" ऐसैं। उक्त तुज अपराधीका तैसैंहीं ५२

४४९ स्वर्गविषै प्रतिष्ठित साम है। इस ज्ञानविषै दोषकूं दिखावै है। इहां असहिष्णु। याका मिथ्या वचनकूं असह- मान हुया। यह अर्थ है औ इसकालविषै। याका मिथ्याव- चनकी अवस्थाविषै। यह अर्थ है औ विपरीत है विज्ञान जिसकूं सो विपरीतविज्ञान है ताकेप्रति। ऐसैं विग्रह है॥ ४५० तिसींहीं विपरीतज्ञानकूं आकारकरि दिखावै हैं॥ इहां अप्रतिष्ठित सामकेप्रति "प्रतिष्ठित है"ऐसै विपरीतज्ञान- वालेकेप्रति कोइक कहै। ऐसें संबन्ध है॥ ४५१ ताहीके वचनकूंहीं दिखावै हैं॥ ४५२ सो तैसैं कथन करहू। तिसकरि मेरेकूं तो क्या

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१८६ प्रथमप्रपाठक १ [छान्दोग्यो- उद्गीथ आदिकके उपासन १३ दाल्भ्य! साम ॥ यस्त्वेतर्हि त्रूया- गमकरि अप्रतिष्ठित तेरा साम है॥ जो सो (शिर) विस्पष्ट पतन होवै। संशय नहीं है। परेन्तु मैं नहीं कहताहूं। यह अभिप्राय है।। ।। नर्तु मूर्धापातके योग्य अपराधकूं जब करताभया। यातैं परकरि अनुक्तका बी मूर्धा पडैगा। जब अपराधी न होवै तब उसका बी सूर्धा नहीं पडताहै। अन्यथा अकताभ्यागम औ कँतनाशरूप दो दोष होवैंगे? यहैँ दोष होवैगा? यह आशङ्काकरिके कहैहैं॥ इहां तैसैहीं। याका विद्वान्के शापरूप वाक्यके अनुसारकरि। यह अर्थ है औ "सो " ऐसें शिरकी उक्ति है॥ ४५३ शापदानके अर्थ यह (शिलक ) तो प्रवर्त भया?। इस शंकाकूं निवारते हैं॥ ४५४ मूर्धपातके कथनके आरम्भकी व्यर्थताकूं पूर्ववादी आशंका करैहै॥ ४५५ अपराधके अभाव हुयेवी परोक्तिके वशतैं मूर्धपात- विषै पूर्ववादी दोषकूं कहैहै॥ ४५६ औ अपराधके होते परोक्तिके राहित्यतैं मूर्धपातके अभ्ावविषै पूर्ववादी दोषकूं कथन करैहै। ४५७ मूर्धपातके हेतु अपराधकूंबी वचनरूप सहकारीकी

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पनिषत् ] अष्टम खंड ८ १८७ शिलक दाल्म्य जैवलिका संवाद < न्मूर्धा ते विपतिष्यतीति मूर्धा ते वि- पतेदिति ॥ ६॥

[कोइक ] तो इसकालविषै कहैः-मूर्धा तेरा विस्पष्ट पडैगा ऐसैं। [तौ] मूर्धा तेरा विस्पष्ट पतन होवै ऐसैं॥ ६ ॥

नहीं है :- काहेतैं किये शुभाशुभ कर्मके फ- लकी प्राप्तिकूं देश कालरूप निमित्तकी अपेक्षा- वाली होनेतैं। तहीं ऐसैं हुये मूर्धापातके नि- मित्तरूप अज्ञानकूं बी पर (अन्य)के वचनरूप निमित्तकी अपेक्षावान्पना है ऐसैं ॥ ६ ॥

अपेक्षावाला होनेतैं शापका वचन व्यर्थ नहीं है। ऐसें सिद्धान्ती उत्तरकूं कहैहैं॥ ४५८ शुभादि आचरितरूप कर्मकूं निमित्तकी अपेक्षाकरि फलहेतुताके हुयेबी प्रकृत अपराधिविषै वचनकी अपेक्षा काहेतैं है ? यह आशङ्काकरिके कहैहैं॥ इहां "तहां" याका शुभादिक कर्मकेहीं निमित्तकी अपेक्षाकरि फलप्रद हुये। यह अर्थ है। ऐसें परका वचन अर्थवाला है। यह शेष है॥

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१८८ प्रथमप्रपाठक १ [छान्दोग्यो- उद्गीथ आदिकके उपासन १३ हन्ताहमेतद्भगवतो वेदानीति? वि- द्धीति होवाचामुष्य लोकस्य का गति- अर्थः-दाल्भ्य उवाच :- अब मैं इसकूं भगवान् (आप)तैं जानूं? ऐसैं ॥ [शा- लावत्य] जान ऐसैंहीं कहताभया॥ ॥दा-

टीका :- ऐसैं उक्त हुया दाल्भ्य कहैहै॥ दा- ल्भ्य उवाच :- अब मैं भगवान् (आप) तैं इस (जिसविषै प्रतिष्ठावाला साम है तिस)कूं जानूं ? ऐसैं उक्त हुया शालावत्य। "जान" ऐसैं कहताभया॥ ॥ दाल्म्य उवाच :- उस (स्वर्ग) लोककी कौंन गति है? ऐसैं दाल्भ्य- करि पूंछयाह्डुया शालावत्य :- "यहं लोक है" ऐसैं कहताभया। जातैं यह लोक याग दान

करैहें॥ ४५९ "हन्त (अब)" इत्यादि वाक्यकूं व्याख्यान ४६० उस लोककूं इस लोकरूप प्रतिष्ठा (गति)वान्- पना कैसैं है? सो कहैहैं ॥ इहां आदिशब्द श्राद्धआदिकके संग्रहअर्थ है।।

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पनिषत् ] अष्टम खंड ८ १८९ शिलक दाल्म्य जैवलिका संवाद ८ रित्ययं लोक इति होवाचास्य लो- कस्य का गतिरिति? न प्रतिष्ठां लो- ल्भ्य उवाच :- उस (स्वर्ग) लोककी कौंन गति है ? ऐसैं॥ ॥ यह लोक है। ऐ- सैंहीं कहताभया॥ ॥ दाल्म्य उवाच :- इस लोककी कौंन गति है ऐसैं ॥ ॥ प्र- होम आदिककरि उस लोककूं पोषण करैहै। "याहीतैं प्रदानकप्रति देव उपजीवनकूं क- ४६१

रैहैं" ऐसी प्रसिद्ध श्रुतियां हैं। प्रत्यक्ष जातैं सर्व भ्रूतनकी धरणी प्रतिष्ठा (आधार) है ऐसैं है। यातैं सामका बी यह लोक प्रति- ४६१ तिसविषैहीं श्रुतिकूं प्रमाण करैहैं॥ इहां यह अर्थ है :- इस लोकतैं प्रदीयमान चरु पुरोडाश आदिकके तांई अ- सनिद्वारा देव उपजीवन करैहैं। ऐसी श्रुतिकी प्रसिद्धि है॥ ४६२ ननु परलोकके प्रति इसलोकका प्रतिष्ठापना होहु। तथापि यह लोक सामकी प्रतिष्ठा कैसैं है ? यह आशङ्काक- रिके कहैहैं॥ ४६३ पृथिवीके सर्व भूतनके प्रति प्रतिष्ठापनैके हुये फलितकूं कहैहैं।। इहां सामकेबी सर्वान्तरभावतैं। यह अर्थ है।।

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१९० प्रथमप्रपाठक १ [छान्दोग्यो- उद्गीथ आदिकके उपासन १३ कमतिनयेदिति होवाच॥ प्रतिष्ठां वयं तिष्ठारूप लोककूं अतिक्रमणकरिके [सा- मकूं] नहीं लेजावैं। यातैंहीं हम प्रतिष्ठा- रूप लोककेप्रति सामकूं स्थापन करैहें। शाहीं है। यह युक्त है॥ ॥ दाल्म्य उ- वाच :- इस लोककी कौंन गति है? ऐसैं उक्त हुया शालावत्य कहैहै॥ शालावत्य उ- वाच :- प्रतिष्ठारूप इस लोककूं अतिक्रमण करिके कोई वी सामकूं नहीं ले जाता है। यीतैं हम प्रतिष्ठारूप लोकके तांई सा- मकूं चारिओरतैं संस्थापन करैहैं। जातैं प्रतिष्ठासंस्ताव। अर्थ यह जो :- प्रतिष्ठाभाव- करि संस्तुत साम जातैं है। औ "यहं (पृ- ४६४ तथापि तुजकरि अन्य प्रतिष्ठा कहनेकूं योग्य है? यह आशङ्काकरिके कहैहै॥ इहां जातैं इसलोकरूप प्रतिष्ठा- वान् होनेकरि सम्यक् स्तुत साम है। तातैं इस सामकेप्रति इसीहीं लोककूं प्रतिष्ठा हम जानते हैं। ऐसैं योजना है॥ ४६५ प्रतिष्ठापनैंकरि सामपनैंके अविशेषतैं पृथिवीकरि

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पनिषत् ] अष्टम खंड ८ १९१ शिलक दाल्म्य जैवलिका संवाद ८ लोकरसामाभिसरस्थापयामः प्रतिष्ठा- सYस्तावरहि सामेति ॥७॥ तश्ह प्रवाहणो जैवलिरुवाचान्तवद्ै प्रतिष्ठासंस्ताव जातैं साम है। ऐसैं कहता- भया । ७॥ अर्थ :- ताहीकूं प्रवाहण जैवलि कहता- भया :- जैवलिरुवाचः-हे शालावत्य! न्याय थिवी)हीं रथन्तर (सामविशेष) है" यह श्रुति है॥ ७ ॥ टीका :- तिस ऐसैं कहनेवालेके प्रतिहीं प्रवाहण जैवलि [राजा] कहताभया।।जैवलि- रुवाच :- हे शालावत्य ! न्याय अरु आगम- करि अन्तवाला तेरा साम है। इत्यादि पू- साम कैसें संस्तुत है? यह आशङ्काकरिके कहैहैं॥ इहां यह अर्थ है :- यहहीं। ऐसें रथन्तर शब्दके वाच्य सामविशेषकूं पृथिवीभावकरि स्तुत होनेतैं उद्गीथकीबी सामभावके अवि- शेषतैं पृथिवीस्वरूपता संभवै है "अब मैं यह " इसवाक्य- विषै अनन्त साम "यह है" ऐसैं कहिये है॥ इति श्री० प्रथमप्नपाठकगताष्टमखण्डस्य टिप्पणम् ॥८॥

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१९२ प्रथमप्रपाठक १ [छान्दोग्यो- उद्गीथ आदिकके उपासन १३ किल ते शालावत्य! साम॥ यस्त्वेतर्हि ब्रूयान्मूर्दा ते विपतिष्यतीति मूर्दा ते विपतेदिति॥ हन्ताहमेतद्दगवतो वेदा- नीति? विद्वीति होवाच ॥ ८॥ इति प्रथमप्रपाठकस्याष्टमः खण्डः ॥८॥ अरु आगमकरि अन्तवाला तेरा साम है। जो [कोईक] तो अबी कहैः-मूर्धा तेरा विस्पष्ट पडैगा ऐसें [तौ] मूर्धा तेरा वि- स्पष्ट पतन होवै ऐसैं [कहताभया]।॥ शिलक उवाच :- अब मैं इसकूं भगवानू (आप) तैं जानूं? ऐसैं॥॥ [तब जैवलि :- ] "जान" ऐसैंहीं कहताभया॥ ८॥ इति श्री०मूल०भाषा०प्रथमप्र०अष्टमःखण्ड:८ र्वकी न्यांई है।। ॥I तदनन्तर शालावत्य क- हैहै॥ शालावत्य उवाचः-अब मैं इस अ- नन्तसाम)कूं भगवान् (आप)तैं जानूं? ऐसैं

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पनिषत् ] नवम खंड ९ १९३ इस लोककी गति औ परोवरीयगुणकपरदृष्टिसैं उद्गीथोपासन ४

अथ प्रथमप्रपाठकस्य नवमः खंडः॥९॥ अस्य लोकस्य का गतिरित्याकाश

अथ श्री०मूलभाषा०प्रथमप्रपा० नवमः खंडः ॥९॥ अर्थः-शिलक उवाच :- इस लोककी कौंन गति है ? ऐसैं॥ ॥। "आकाश है"

पूंछता भया ॥ तब जैवलिः-"जान" ऐसैहीं कहताभया॥ तब इतर (शालावत्य) अनु- ज्ञात (आज्ञाकूं प्राप्त) हुया कहैहै ॥ ८ ॥ इति श्री०भाष्यभाषा०प्रथमप्रपा०अष्टमः खण्डः ॥८॥ अथ०श्री०भाष्यभाषा०प्रथमप्रपा० नवमः खण्डः ॥९॥। इस लोककी गति (आकाश) औ फलके कथन- करि परोवरीयगुणकपरमात्मदृष्टिसैं तत्फ- लक उद्गीथोपासन ४ टीका :- शालावत्य उवाच :- इस लोककी कौंन गति है? ऐसैं [पूंछ्या हुयाः-] "अ-

अथ श्री० प्रथमप्रपाठकगतनघमख० टिप्प० ॥९॥ ४६६ आकाशशब्दकी भूताकाशरूप विषय(अर्थ)वान्- १७

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१९४ प्रथमप्रपाठक १ [छान्दोग्यो उद्गीथ आदिकके उपासन १३ इति होवाच॥ सर्वाणि ह वा इमानि भूतान्याकाशादेव समुत्पद्यन्त आ- ऐसैंहीं [प्रवाहण जैवलि ] कहताभया॥ सर्वहीं ये भरूत आकाशतैंहीं सम्यक उप- जतेहैं। आकाशकेप्रति अस्तकूं पावतेहैं। काश है" ऐसैंहीं प्रवाहण कहताभया॥औ इहां "आकाश" ऐसैं पर आत्मा कहियेहै। काहेतें "आकाश प्रसिद्ध [परमात्मा]का नाम है" इस श्रुतितैं। ताहींका कर्म सर्व भूतनका उत्पादकपना है औ तिसविषैहीं जातैं भूतनका ४६८

ताकूं निषेध करिके परमात्मारूप विषयवान्ताकूं वाक्यशेषके वशतैं दिखावैहैं॥ ४६७ किंवा :- परमात्माका सर्व भूतनका उत्पादकपना कर्म है। यह वेदांतकी मर्य्यादा है। सो (कर्म) इहां आ- काशविषै सुन्या है। तैसैं हुये परमात्माहीं आकाशशब्द (आकाशशब्दका वाच्य) है। ऐसें कहैहैं॥ ४६८ किंवा :- परमात्माविषैहीं भूतनका प्रलय होवैहै औ सो इहां (इसप्रसङ्गमैं) आकाशविषै सुन्या है। तातैं परमा- त्माहीं आकाश है। ऐसें कहैहैं।

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पनिषत् ] नवम खंड ९ १९५ इस लोककी गति औ परोवरीयगुणकपरदृष्टिसैं उद्गीथोपासन ४ काशं प्रत्यस्तं यन्त्याकाशो ह्वेवैभ्यो ज्यायानाकाशः परायणम्॥१॥

जातैं आकाश हीं इनतैं ज्यायान् (बडा) है [यातैं] आकाश परायण है॥ १ ॥

प्रलय होवैहै। जातैं "सो (ब्रह्म) तेजकूं सृ- ४६९

जताभया। तेज® परदेवताविषै" ऐसैं यह श्रुति आगे (षष्ठविषै) कहैगी ॥ सर्वहीं ये स्थावर जंगमरूप भूत आकाशतैंहीं तेज जल अरु अन्नआदिकके क्मसैं सम्यक उवजतेहैं सौ-

४६९ सर्वका उत्पादकपना परमात्माका कर्म है। इस अर्थविषै प्रमाणकूं कहैहैं॥ ४७० परमात्माविषैहीं भूतनका लय होवैहै। इस अर्थ- विषैबी प्रमाणकूं कहैहैं॥ ४७१ ननु परमात्माका सर्वोत्पादकपना कर्म होहू। तथापि तिसकरि आकाशकूं क्या आया? ऐसैं जो कहै। तहां कहैहैं। ४७२ ननु यह उत्पत्तिका क्रम कैसैं जानियेहै। अवि- शेष (अक्रम)सैहीं तिसतैं सर्वकी उत्पत्ति सुनी है? यह

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१९६ प्रथमप्रपाठक १ [छान्दोग्यो- उद्गीथ आदिकके उपासन १३ स एष परोवरीयानुद्वीथः स एषो- अर्थ :- [जातैं] सो यह परोवरीयान् उ- मर्थ्यतैं। औ ऑकाशके प्रति प्रलयकालविषै अस्तकूं पावतेहैं तिसींहीं विपरीत क्रमसैं । ४७४

जातैं आकाशहीं इन सर्व भूतनतैं ज्यायानू (महत्तर) है। यांतैं सो सर्व भूतनका पर अयन ऐसा परायण है। अर्थ यह जो :- तीन कालविषै प्रतिष्ठा (आश्रय) है॥ १ ॥ टीका :- जाँतें पर पर वरीयः कहिये वरी- आशङ्काकरिके कहैहैं॥ इहां सामर्थ्यतैं। याका "आत्मातैं आकाश भया। सो तेजकूं स्रजता अया" इत्यादि श्रुतिके बलतैं। यह अर्थ है।। ४७३ तथापि आकाशविषै सर्व भूतनका लय कैसैं हो- वैहै ? तहां कहैहैं॥ ४७४ "विपय्ययकरि तो क्रम है। यातैं " इस न्याय (अधिकरण) करि कहैहैं॥ ४७५ आकाशकी परमात्मारूपताविषै अन्यहेतुकूं कहैहैं॥ ४७६ परायणपनाबी तहांहीं (परमात्मभावविषैहीं) लिङ्ग हैं। ऐसैं कहैहैं। ४७७ "आकाशरूप है। तिस (परमात्मा)के लिङ्गतैं"

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पनिषत् ] नवम खंड ९ १९७ इस लोककी गति औ परोवरीयगुणकपरदृष्टिसैं उद्गीथोपासन ४ Sनन्तः परोवरीयो हास्य भवति। परो- द्रीथ है [यातैंहीं] सो यह अनन्त है॥ जो इसकूं ऐसैं जानताहुया परोवरीयानूरूप

यस (अतिश्रेष्ठ) तैंबी यह वर है। औ पर ऐसा जो वरीयान् सो परोवरीयान् है। अर्थ यह जो :- ऐसा उद्गीथरूप पैरमात्मा सिद्धभया। याँहीतैं सो यह अनन्त (अविद्यमान अन्त-

इस न्याय (अधिकरण)करि आकाशकी परमात्मरूपता कही। अब ताके उद्गीथविषै सम्पादित परोवरीयानूपनैंरूप गुणकूं उपदेश करैहैं॥ इहां उत्तर उत्तर श्रेष्ठतैंबी श्रेष्ठ यह है। यह अर्थ है॥ ४७८ साममात्रका यह गुण कैसें होवैगा ? यह आश- ड्ाकारके कहैहैं॥ ४७९ आकाशकी परमात्मरूपताविषै अन्य लिङ्गकूं कहैहैं। इहां याहीतैं। याका-परमात्मारूप सिद्ध होनेतैं। यह अर्थ है औ आकाशहीं प्रकृत उद्गीथविषै सम्पादित अनन्त सुन्या है औ अनन्तता ब्रह्मतै अन्य ठिकाने युक्त नहीं है। काहेतैं "सत्य ज्ञान अनन्त ब्रह्म है"। इस श्रुतितैं। तातैं आकाश व्रह्म है। यह अर्थ है॥

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१९८ प्रथमप्रपाठक १ [छान्दोग्यो- उद्गीथ आदिकके उपासन १३ वरीयसो ह लोकाञ्जयति। य एतदेवं विद्दान् परोवरीयासमुद्गीथमुपास्ते॥२॥ उद्गीथकूं उपासताहै परोवरीय हीं याका [जीवन] होवैहै औ परोवरीयान्रूप लो- कनकूं जय करैहै॥ २ ॥ वाला) है। तिस इसकूं परोवरीयान् परमा- त्मभूत अनन्त ऐसैं विद्वान हुया परोवरीयानू उद्गीथकूं उपासताहै। ताकूं यह फल कहैहैः- परोवरीयः कहिये पर पर वरीयः (विशिष्टतर) जीवनहीं इस विद्वानका होवैहै। यह दृष्ट फल है। औ अदृष्ट फल :- परोवरीयान् (उ- त्तर उत्तर विशिष्टतर) हीं ब्रह्म आकाशपर्य्यन्त लोकनकूं जय करैहै। जो इसकूं ऐसै जा- नताहुया उद्गीथकूं उपासताहै॥ २॥ ४८० अब आकाशशब्दित उद्गीथविषै सम्पादित परो- वरीयानूपनैंरूप गुणविशिष्ट परमात्माकी उपासनाकूं विधान करैहैं॥ इहां परंपरं (पर पर) याका उपरि उपरि (उत्तर उत्तर) यह अर्थ है। तातैं ऐसें उपासन करै। यह भाव है॥

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पनिषत् ]] नवम खंड ९ १९९ इस लोककी गति औ परोवरीयगुणकपरदृष्टिसैं उद्गीथोपासन ४ त५ हैतमतिधन्वा शौनक उदरशा- ण्डिल्यायोक्त्वोवाच। यावत्त एनं प्र. जायामुद्गीथं वेदिष्यन्ते । परोवरीयो -ीअर्थः-तिस इसकूं अतिधन्वा शौनक उदर शाण्डिल्यके अर्थ कहिके कहताभयाः- यावत् तेरी प्रजाविषै इस उद्गीथकूं जानेंगे

टीका :- किवी :- तिस इस उद्वीथकूं विद्वान् (जाननेवाला) नामतैं अतिधन्वा ऐसा शुन- कका अपत्य शौनक। उदरशांडिल्य शिष्य- केअर्थ इस उद्रीथके दर्शनकूं कहिके कहता- भया :- यावत् तेरी प्रजाविषै। अर्थ यह जो :- प्रजाकी सन्ततिविषै। इस उद्गीथकूं तेरीसन्तति-

४८१ विधिशेष (विधिके उपकारक) अर्थवादकूं दि- खावै हैं।। इहां किंच। याका इसतैंबी इहां विधि है। यह अर्थ है। औ तिनके अर्थ। याका तिसकी सन्ततिविषै जन्य जे यथोक्त उद्गीथविषै जाननेवाले हैं। तिनके अर्थ। यह अर्थ है। औ तथा (तैसैं) । याका दृष्टविशिष्टतर जीवनकी न्यांई। यह अर्थ है औ अदृष्टविषैबी। ऐसा पदच्छेद है।।

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२०० प्रथमप्रपाठक १ [छान्दोग्यो e E उद्गीथ आदिकके उपासन १३ हैभ्यस्तावदस्मिँलोके जीवनं भवि- ष्यति॥ ३॥ तथाऽमुष्मिँलोके लोक इति । स तावत् इस लोकविषै इनतैं परोवरीयान् जी- वन होवैगा॥ ३ ॥ अर्थ :- तैसैं उस लोकविषै लोक हो- वैगा। ऐसैं [कहताभया] । सो जो इ- विषै जन्य (तेरेवंशज) जानेंगे। तावत्काल इन प्रसिद्ध लौकिक जीवनोंतैं परोवरीयः क- हिये उत्तरोत्तरविशिष्टतर जीवन। तिनके अर्थ होवैगा॥ ३ ॥ टीका :- तैसैं अदृष्टरूपबी उस परलोक- विषै परोवरीयान् (उत्तर उत्तर श्रेष्ठतर) लोक होवैगा। ऐसैं शांडिल्यके अर्थ अतिध- न्वा शौनक कहताभया॥ ॥ नैतु यह फल ४८२ "सो जो इसकूं" इत्यादि उत्तरवाक्यकूं शङ्का अरु उत्तरवाला होनेकरि उठायके व्याख्यान करैहैं॥ इहां

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पनिषत् ] नवम खंड ९ २०१ इस लोककी गति औ परोवरीयगुणकपरदृष्टिसैं उद्गीथोपासन ४ य एतमेवं विहानुपास्ते परोवरीय एव हास्यास्मिलोके जीवनं भवति।तथाऽमु- षिमिँल्ोके लोक इति। लोके लोक इति४ इति प्रथमप्रपाठकस्य नवमः खण्डः ॥९॥ सककूं ऐसैं जानताहुया उपासताहै। परो- वरीयस्हीं इसका इस लोकविषै जीवन होवैहै। तैसैं उस लोकविषै लोक होवैहै ऐसैं। लोकविषै लोक होवैहै। ऐसैं [प्रवा- हण जैवलि कहताभया]।४॥ इतिश्री०मूलभाषा०प्रथमप्रपा०नवमःखंडः।।९।।

पूर्वके महाभाग्यनकूं हुवा होवैगा। इस युगविषै होनेवालेनकूं नहीं होवैगा? इस आशङ्काकी निवृत्तिअर्थ कहैहैं :- सो जो कोईकबी इसकूं इस युगविषै जे होवैहैं वे पदंयुगीन हैं। तिन पदंयुगीनकूं लोक परोवरीयान [नहीं होवैहै] यह शेष है औ पुनरुक्ति जो है सो उद्गीथकी उपासनाकी समाप्तिरूप अर्थवाली है। इति श्री० प्रथमप्रपाठकगत-नवमखंडस्य टिप्पणम् ॥ ९॥

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२०२ प्रथमप्रपाठक १ [छान्दोग्यो- उद्गीथ आदिकके उपासन १३ अथ प्रथमप्रपाठकस्य दशमः खंड: १० मटचीहतेषु कुरुष्वाटिक्या सह जा- अथ श्री०मूलभाषा०प्रथमप्रपा०दशमः खंडः ॥ १०॥ अर्थः-कुरूनके मटचीनकरि हतहुये ऐसैं जानताहुया उद्वीथकूं इस कालविषै उ- पासताहै ताकूंबी ऐसैंहीं फल होवेहै॥ क्या- कि :- परोपरीयहीं याका इस लोकविषै जी- वन होवैहै। तैसैं उसलोकविषे लोक होवैहै ऐसैं। लोकविषै लोक होवैहै ऐसैं ॥ ४ ॥ इति श्री०भाष्यभाषा० प्रथमप्रपा० नवमः खंडः ॥।९॥। अथ श्री०भाष्यभाषा०प्रथमप्रपा० दशमः खंडः॥१०॥ दुर्भिक्षुकालमैं उषस्तिका देशांतरमैं गमन। हस्तिपतिके उच्छिष्टभोजनआदिकके प्रसंगपूर्वक राजयज्ञद र्शन औ ऋत्विकनसैं संवाद ११ टीका :- उद्वीथ उपासनके प्रसङ्गसैं प्रस्ताव ४८३

अथ श्री०प्रथमप्रपाठकगत-दुशमखण्डस्य टिप्पणं१० ४८३ अब उद्गीथरूप अक्षरके उपासनकूं अनेकप्रकारकरि

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पनिषत् ] दशम खंड १० २०३ देशांतरगत उपस्तिका हस्तिपति राजयज्ञ औ ऋत्विकनसैं संवाद ११ ययोषसितिर्ह चाक्रायण इभ्यग्रामे प्रद्रा- णक उवास ॥ १॥

आटिकी जायाकरि सहित उषस्तिहीं चा- क्रायण। इभ्यके ग्रामविषै प्रद्राणक हुया वास करताभया॥ १॥ प्रतिहारकूं विषयकरनेवालावी उपासन कर्तव्य है। यातैं यह खण्ड आरम्भकरिये है :- आंख्या- उक्त होनेतें आगे कहने योग्यके अनवशेषतैं प्रपाठक (इस अध्याय)की परिसमाप्ति हीं युक्त है? यह आशङ्काकरिके क हैहैं॥। इहां "इदं" शब्दकरि अन्यखण्ड ग्रहण करिये है॥ ४८४ प्रस्ताव आदिकका उपासन जब विवक्षित है तब सोई कहनेकूं योग्य है। इस कथासैं क्या है? यह आशङ्का- करिके कहैहैं। इहां मटची कहिये मर्दनके हेतु अशनि (इं- द्रके वज्र) वा पाषाणकी वृष्टियां हैं। तिनकरि औ "तिसतैं" याका सस्य (धान्यवृक्ष)नके नाशतैं। यह अर्थ है औ सर्व ओरतैं स्वेच्छासैं संचारके हुयेबी व्यभिचारकी शङ्का नहीं है। ऐसैं दिखावनेकूं स्त्रीका "आटिकी" ऐसा विशेषण है औ "प्रद्राणक" पदका क्रियापदसैं सबन्ध है औ कुत्सितग- तिकी प्राप्तिविषै हेतु "अन्नके अलाभतैं" यह है॥

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२०४ प्रथमप्रपाठक १ [छान्दोग्यो- उद्गीथ आदिकके उपासन १३ यिकातो सुखसैं अवबोधनअर्थ है।। ॥ कुरु- नके। अर्थ यह जोः-कुरुदेशके। सस्य (धा- न्यवृक्ष)नके। मटची जे अशनि (पाषाणकी वृष्टियां)। तिनकरि हत (नाशित) हुये। तिस (सस्यके नाश)तैं दुर्भिक्ष (दुष्काल)के हुये। आटिकी (नहीं भये पयोधरआदिक स्त्रीके चिन्ह जिसके ऐसी) जायाकरि स- हित नामतैं उषस्ति ऐसा चक्रका अपत्य (पुत्र) चाक्रायणमुनि इभ जो हस्ती ताकूं योग्य होवै ऐसा इभ्य जो ईश्वर (राजा)। वा हस्तीविषै आरोहवाला। ताका जो ग्राम सो इभ्ययाम है तिसविषै अन्नके अलाभतैं प्रद्राणक हुया कहिये "द्रा" धातु 'कुत्सितग- तिविषै है। यातैं कुत्सितगतिकूं गत। अर्थ यह जो :- अंत्य अवस्थाकूं प्राप्त हुया। किसीकेबी गृहकूं आश्रयकरिके वास करतभया ॥ १ ॥ ४८५ प्रद्राणकशब्दके अर्थकूं धातुके उपन्यासद्वारा क- थन करैहैं॥ इहां यदच्छासैं। याका सहसा (विना विचार त- त्काल) यह अर्थ है।।

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पनिषत्] दशम खंड १० २०५ देशांतरगत उपस्तिका हस्तिपति राजयज्ञ औ ऋत्विकनसैं प्रसंग ११

स हेभ्यं कुल्माषान् खादन्तं बि-

अर्थः-सोई कुल्माषोंकूं खातेहुये इभ्यके प्रति याञ्चना करताभया॥ ताहीकूं [इभ्य] कहताभया॥ इभ्य उवाच :- इसतैं अन्य [कु- ल्माष] विद्यामान नहीं हैं औ जे जे मेरे

टीका :- सो (उक्तमुनि) अन्नकेअर्थ अटन करता हुया कुल्माष (कुत्सितउडद)नकूं खानैं (भक्षणकरनैं)वाले इभ्यकेप्रति यदृच्छासैं (तत्काल) देखिके याञ्चाकरताभया ॥ तिस उषस्तिकूंहीं इभ्य कहताभयाः-इस मुजकरि भक्ष्यमाण उच्छिष्टकी राशितैं अन्य कुल्माष विद्यमान नहीं हैं। औ जे राशिविषै हैं वे ४८६ "इसतैं अन्य नहीं हैं" या वाक्यका ग्रहण है। ताकूं व्याख्यान करैहैं॥ इहां यत् (जो) ऐसा अव्यय बहु- वचनान्त है औ उपनिंहित (समीपस्थित) कुल्माष हैं। यह शेष है औ तिनके मध्य प्रसिद्ध ये भाजन (भोजनपात्र) विषै राखे हैं। ऐसैं योजना है औ हन्त। याका कुल्माष जब भक्षण किये तब। यह अर्थ है।। १८

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२०६ प्रथमप्रपाठक १ [छान्दोग्यो- उद्गीथ आदिकके उपासन १३ भिक्षे॥ त९ होवाच। नेतोऽन्ये विद्यन्ते यच्च ये म इम उपनिहिता इति ॥२॥ एतेषां मे देहीति होवाच॥ तानस्मै उपनिहित [समीपस्थित कुल्माष] हैं ये [भोजनपात्रविषै डाले] हैं। ऐसैं [कहता- भया] ।। २।। अर्थ :- इनोमैंसैं (इनकू) मेरेअर्थ देदे। ऐसैंहीं [उघस्ति] कहताभया ॥ [इभ्य] मेरे उपनिहित (समीपस्थित) कुल्माष हैं। वे ये भाजनविषै राखे हैं। मैं क्या करों ! ऐसैं उक्तहुया उपस्ति प्रत्तत्युर कहैहै ॥ २ ॥ टीका :- उषस्ति इनोकेमध्य। अर्थ यह जो :- इन (पात्रविषै राखे हुये उडदन) कूं मेरेअर्थ दे दे? ऐसैंहीं कहताभया ॥ तिनकूं सो इम्य इस उषस्तिकेअर्थ देताभया॥ पीछे समीपस्थित उदकरूप अनुपानकूं जव कुल्माष भक्षित भये तब ग्रहण कर? ऐसैं इभ्यकरि उक्त

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पनिषत् ] दशम खंड १० २०७ देशांतरगत उषस्तिका हस्तिपति राजयज्ञ औऋत्विकनसैं प्रसंग ११ प्रददौ॥ हन्तानुपानमित्युच्छिष्टं वै मे पीत९ स्यादिति होवाच॥ ३॥ न स्विदेतेऽप्युच्छिष्टा इति॥ न वा तिनकूं इसकेअर्थ देताभया। औ जब ऐसैं किया। तब अनुपान (उदक)कूं [य्- हण कर]! ऐसैं [इभ्य कहताभया]।। ॥ तब उच्छिष्टहीं मेरा पीत होवैगा। ऐसैंहीं [उषस्ति] कहताभया ॥ ३॥ अर्थ :- इभ्य उवाच :- ये (कुल्माष)बी

हुया उषस्ति प्रत्युत्तर कहैहै॥ उषस्तिरुवाच :- उच्छिष्टहीं मेरा यह उदक पीत होवै जो पान करूं तो ॥ ३ ॥ टीका :- ऐसैं कहनेवालेके प्रति इतर (इभ्य)। ४८७ प्रत्युर कहैहै॥। इभ्य उवाच :- ये कुल्माषबी क्या उच्छिष्ट नहीं थे? ऐसैं उक्त हुया उषस्ति ४८७ क्या प्रत्युत्तर देताभया? यह आकांक्षापूर्वक कहैहैं॥

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२०८ प्रथमप्रपाठक १ [छान्दोग्यो- Tउद्गीथ आदिकके उपासन १गलक अजीविष्यमिमा न खादन्निति होवाच।। कामो म उदपानमिति॥४॥ उच्छिष्ट क्या नहीं थे? ऐसें [इभ्यकरि उक्तहुया उषस्ति ॥] इनोकूं न खाताहुया नहीं जीवूंगा। ऐसैंहीं कहताभया औ काम (इच्छातैं) मेरेकूं उदकपान [मि- लता] है। ऐसैं [कहताभया]।।४॥ कहै है।। उषस्तिरुवाच :- इन कुल्माषोंकूं न भक्षण- करता हुया मैं नहीं जीवूंगा। ऐसैं कहताभया। औ कीम कहिये इच्छातैं [ कूप आदिकद्वारा] मुजकूं उदकपान प्राप्त होवैहै। यह अर्थ है॥। औ यातैं इस अवस्थाकूं प्राप्त भये विद्या ४८८ ननु अनुपानके अभावके हुयेबी जीवनतें रहितपना तुल्यहीं है ? यह आशङ्का करिके कहैहैं॥ ४८९ ऋषिके अन्यके उच्छिष्ट कुल्माषोंके भक्षणकूं कहने- वाली श्रुतिके तात्पर्यकूं कहैहैं॥ इहां यातैं। याका चाक्रायण विद्वान्के अभक्ष्यके भक्षणके दर्शनतैं। यह अर्थ है औ इस अव- स्थाकूं प्राप्तभयेकूं। याका जीवितके संदेहकेताई प्राप्तभयेकूं। यह

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पनिषत् ] दशम खंड १० २०९ देशांतरगत उषस्तिका हस्तिपति राजयज्ञ औ ऋत्विकनसैं प्रसंग ११ धर्म अरु यशवाले स्वात्माके अरु परके उपकार- विषै समर्थ हुये इसींबी कर्मकूं करनेवाले मु- निकूं अघ (पाप) का स्पर्श नहीं भया। यह अभिप्राय है ।। तोंकूंबी जीवितके प्रति अन- न्दित अन्यउपायके होते निन्दित यह कर्म दो- षके अर्थ होवै। अभिप्राय यह है किः ज्ञौनके अवलेप (अभिमान) करि करनेवालेकूं नरक- पात होवैगाहीं। काहेतैं प्रैद्राणक शब्दके श्र- वणतैं ॥ ४॥

अर्थ है औ विद्या धर्म अरु यशवालेकूं। याका ज्ञानआदिककरि कृत ख्यातिकेतांई प्राप्तभयेकूं। यह अर्थ है औ स्वात्माके उ- पकारविषै अरु परोपकारविषै सामर्थ्य जो है सो निग्रह अरु अनुग्रहकी शक्तिमानपना है औ इस कर्मकूं। याका जीवन- मात्रके कारण कुत्सित चेष्टितकूं। यह अर्थ है।। ४९० उच्छिष्ट उदकपानके प्रतिषेधकी श्रुतिके अभिप्ायकूं कहैहैं॥ इहां यह कर्म। ऐसें अभक्ष्यके भक्षणकी उक्ति है॥ ४९१ ननु ज्ञानीकूं यथेष्टचेष्टा (यथेष्टाचरण) इहां अ- नुज्ञा करियेहै? ऐसें मति कहो। काहेतैं "औ सर्व पुरुष- नकूं अनुमत (अभक्ष्यके भक्षणकी संमति) नहीं है" इत्यादि न्याय (सूत्रविशेष)के विरोधतैं। ऐसैं कहैहैं॥ ४९२ तिस अभिप्रायविषै लिङ्गकूं दिखावैहैं॥ इहां यह अर्थ है :- चाक्रायणविषै प्रद्राणक शब्दके प्रयोगतैं परम आ-

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२१० प्रथमप्रपाठक १ [छान्दोग्यो- उद्गीथ आदिकके उपासन १३ सह खादित्वाऽतिशेषान् जायाया आजहार। साडग्र एव सुभिक्षा बभूव। तान् प्रतिगृह्य निदधौ॥५॥ अर्थ :- सोई खायके शेषरहेकूं जायाके- अर्थ देताभया। सो (जाया) आगेतैंहीं सुभिक्षा होतीभई [तथापि] तिनकूं ग्रहण करिके राखतीभई ॥ ५॥ टीकाः-औ तिनकूं सो खायके अवशेष रहेकूं जायाकेअर्थ करुणाभावतैं देताभया। सा आटिकी कुल्माषनकी प्राप्तितैं आगेहीं सुभिक्षा कहिये शोभनभिक्षावाली। अर्थ यह जो :- लब्ध अन्नवाली होतीभई। तथापि प- तिकी आज्ञाके कारणरूप स्त्रीस्वभावतैं अवज्ञा पत्कूं प्राप्त हुया उच्छिष्ट कुल्माषनकूं भक्षण करताभया। ऐसें भासताहै। तैसें हुये ज्ञानीके यथेष्टाचारविषै प्रमाणके अभावतैं अरु अनेक प्रमाणोंके विरोधतैं यह (यथेष्टाचार) इहां विवक्षित नहीं है औ स्त्रीका स्वभाव पतिकी आज्ञाका करण है औ ताका कर्म कुल्माषनका परिरक्षण है॥

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पनिषत् ] दशम खंड १० देशांतरगत उपस्तिका हस्तिपति राजयज्ञ औ ऋत्विकनसैं प्रसंग ११ २११

स ह प्रातः सजिहान उवाच॥य- द्ताऽन्नस्य लभेमहि। लभेमहि धन- अर्थ :- सोई [मुनि ] प्रातःकालविषै [निद्राकूं] परित्याग करताहुया जब खि- दयमान हुया तब कहताभयाः-[जो] अ- न्नके [अल्पकूं] प्राप्त होवैं। [तो] धनकी (अनादर) न करिके तिन कुल्माषनकूं पतिके हस्ततैं ग्रहणकरिके राखतीभई॥ ५॥ टीका :- सो उषस्ति ता (स्त्री)के कर्मकूंजा- नता हुया प्रातःकालविषै शयनकूं वा निद्राकूं परित्याग करता हुया खिद्यमान हुया पत्नीके सुनते हुये कहताभया :- जब अन्नके अल्पकूं प्राप्त होवैं तब। ता अन्नकूं भोजनकरिके स- मर्थ हुया जायके धनके अल्पकूं प्राप्त होवैं। तातैं हमारा जीवन होवैगा ऐसैं [कहताभया]।। औ धनके लाभविषै कारणकूं कहैहैः-राजा यह नातिदूर (समीप) स्थानविषै यजन क-

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२१२ प्रथमप्रपाठक १ [छान्दोग्यो- उद्गीथ आदिकके उपासन १३ मात्रा राजाऽसौ यक्ष्यते। स मा सर्वै- रार्त्विज्यैर्वृणीतेति॥६॥

मात्राकूं प्राप्त होवैं॥ राजा यह यजन क- रताहै। सो सुजकूं सर्व ऋत्विकनके कर्मों- करि वरैगा। ऐसैं [कहताभया]।६॥ रताहै। [इहां यैजमान होनेतें ताका आत्म- नेपद है] औ सो रीजा मुजकूं पात्र जानिके सर्व ऋत्विजोंके कर्मोकरि। अर्थ यह जो :- ऋत्विजनके प्रयोजनअर्थ । वरैगा (वरण क- रैगा) ऐसैं ॥ ६ ॥

४९३ ननु "यक्ष्यति" ऐसें परस्ैपद काहेतें नहीं कहा? तहां कहैहैं॥ इहां यह अर्थ है :- राजाकूं यजमान (यज्ञका कर्ता) होनेतैं यागके फलकूं आत्मगामी होनेतें "यक्ष्यते" ऐसैं आत्मनेपद प्रयोग किया है॥ ४९४ अन्योके उपद्रष्टापनैके संभवह्ठुये तेरेकूंहीं राजा कैसें मानेगा ? यह आशङ्का करिके कहैहै ॥ इहां "हन्त" याका अन्नलेशका लाभ जब ऐसें धनकी प्राप्तिद्वारा जीवनका हेतु है तब । यह अर्थ है औ राजाका यज्ञ "तहां" ऐसै क- हिये है।।

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पनिषत् ]1 दशम खंड १० देशांतरगत उषस्तिका हस्तिपति राजयज्ञ औ ऋत्विकनसैं प्रसंग ११ २१३

तं जायोवाच॥ हन्त पत इम एव कुल्माषा इति॥ तान् खादित्वाऽमुंयज्ञं विततमेयाय ॥७॥ तत्रोद्गातृनास्तावे स्तोष्यमाणानुपो-

अर्थ :- ताकूं जाया कहतीभई :- हे पते! जब [ऐसैं है तब ग्रहण कर] येहीं कुल्माष हैं।। ॥ ऐसैं [कहा। तब] तिनकूं खायके इस वितत यज्ञके प्रति जाताभया॥७॥ अर्थ :- तहां आस्तावविषै स्तोष्यमाण

टीका :- तिस ऐसैं कहनेवालेके प्रति जाया कहतीभई :- ग्रहण कर। हे पते! येई जे मेरे हस्तविषै तुहनैं रखेहुये कुल्माष हैं॥ ऐसैं तिनकूं खायके इस राजाके वितत कहिये ऋत्विजोंकरि विस्तारित यज्ञके प्रति जाता भया ॥७॥ टीका :- औ तहां जायके। आयके स्तुति

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२१४ प्रथमप्रपाठक १ [छान्दोग्यो- उद्गीथ आदिकके उपासन १३ पविवेश। स ह प्रस्तोतारमुवाच॥ ८॥। प्रस्तोतर्या देवता प्रस्तावमन्वायत्ता। उद्गाताओंके प्रति समीप बैठताभया। सोई प्रस्तोताकूं कहताभया॥८॥। अर्थः-उषस्तिरुवाच :- हे प्रस्तोतः ! करते हैं इस (संवादकेदेश)विषै सो आस्ताव है। तिस आस्तावविषै स्तोष्यमाण उद्गाता पुरुषनके समीप वैठताभया॥ वैठिके सोई प्रस्तोताकूं कहताभया॥८॥ टीका :- उषस्तिरुवाचः-हे प्रस्तोतः ! ऐसैं अभिमुखी करणके अर्थ आमन्त्रण करिके। जो देवता प्रस्ताव (प्रस्तावरूप भक्ति)के ४९५ ननु उद्गाताकी एकताके हुये बहुवचन किसकार- णतैं कहा? यह आशङ्काकरिके कहैहैं॥ इहां आस्ताव शब्दसैं स्तुति वा स्तुति करते हैं इसविषै। इस सप्तमीकरि संवादका देश (स्थान) कीर्तनकरियेहै। ४९६ आमंत्रण किसअर्थ है ? सो कहैहैं॥ इहां विद्वा- नूके समीपविषै देवताकूं अविद्वान् हुया जव प्रस्तुत करैगा तव मूर्द्धा तेरा विस्पष्ट पडेगा। ऐसैं आगे संबन्ध है॥

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पनिषत् ] दशम खंड १० दैशांतरगत उषस्तिका हस्तिपति राजयज्ञ औ ऋत्विकनसैं प्रसंग ११ २१५

ताञ्चेदविद्दान् प्रस्तोष्यसि । मूर्दा ते विपतिष्यतीति॥९॥ जो देवता प्रस्तावकेप्रति अनुगत है। ताकूं जब अविद्वान् हुया प्रस्तुत करैगा [तब] मूर्दा तेरा विस्पष्ट पतन होवैगा। ऐसैं ॥९॥

प्रति अनुगत है। ता देवताकूं जब प्रस्ताव- रूप भक्तिका अविद्वान्हुया मुज विद्वान्के समीप। स्तुति करताहैं॥ ॥ ताँ (विद्वा- न्)के परोक्षविषैबी जब ताका मूर्धा विस्पष्ट पडै। तब कर्ममात्रके वेत्ताओंका अनधिकारहीं कर्मविषै होवैगा औ सो अनिष्ट है। काहेतैं अ- ४९८

४९७ ननु अविद्वानकी निन्दाकूं विवक्षित होनेतैं विद्वा- नूके समीपका वचन अकिश्चित्कर है? ऐसैं जो कहै। सो बनै नहीं। ऐसें कहै हैं॥ इहां "ताका" ऐसें अविद्वान् प्र- स्तोता कहिये है।। ४९८ ननु कर्ममात्रके वेत्ताओंका कर्मविषै अधिकार मति होहू ? ऐसैं जो कहै। सो बनै नहीं। ऐसै कहैहैं॥ इहां "तिसकरि दोनूं (विद्वान् अरु अविद्वान्) कर्मकूं करते हैं" इत्यादि श्रुतिविषै। यह शेष है॥

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२१६ प्रथमप्रपाठक १ [छान्दोग्यो- उद्गीथ आदिकके उपासन १३ विद्वानोंकेबी कर्मके देखनेतैं औ दक्षिणमार्गकी श्रुतितैं औ अनधिकारके हुये अविद्वानोंका एक उत्तरमार्गहीं सुनियेथा औ स्मार्तकर्मरूप नि- ५०१

मित्तवाला हीं दक्षिणमार्ग नहीं है। काहेतैं "यैज्ञेकरि दानकरि" इत्यादि श्रुतितैं। तैसैं

कहैहैं॥ ४९९ अविद्वानोकेवी कर्मके अधिकारविषै अन्य हेतुकूं

५०० ताहीकूं व्यतिरेकद्वारा स्पष्ट करैहैं॥ इहां ताहीकूं समुच्चय फलवाला होनेतें। यह अर्थ है।। ५०१ ननु दक्षिणमार्गकूं वापी कूप तटाक आदिक स्मा- र्तकर्मका किया होनेतैं वैदिक कर्मविषै विद्वान्हीं अधिकारकूं पावता है? तहां नहीं ऐसें कहैहैं॥ ५०२ "यज्ञकरि दानकरि लोकनकूं जय करैहै" ऐसैं अज्ञानीहीं वैदिककर्मनिष्ठनके दक्षिणमार्गके श्रवणतैं। इस हे- तुकूं कहैहैं। ५०३ इस वक्ष्यमाण हेतुतैंवी अविद्वानोंकूं विद्धान्के समीपविषै कर्मका अधिकार नहीं है। ऐसें कहैहैं॥ इहां यह अर्थ है :- देवताके विज्ञानसैं शून्य जो तूं हैं। तिस तेरा मूर्द्धा विस्पष्ट पडेगा। इस प्रकारसैं मुजकरि उक्तका मूर्द्धा पडेगा। इस विशेषके श्रवणतैं। विद्वान्के समीपविषै ताकी अनुज्ञा- विना कर्म करनेवालेकूं अपराधी होनेतें ताका कर्मविषै अन- धिकार हीं है॥

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पनिषत् ] दशम खंड १० २१७ देशांतरगत उषस्तिका हस्तिपति राजयज्ञ औ ऋत्विकनसैं प्रसंग ११

"मुजकरि उक्तका" इस विशेषणतैं विद्वान्के समक्षहीं कर्मविषै अनधिकार है औ सर्वत्र अ- ५०४

शिहोत्र स्मार्तकर्म अरु अध्ययन आदिकनविषै नहीं। काहेतैं अनुज्ञाके तहां देखनेतैं। कर्म- मात्रके वेत्ताओंकाबी कर्मविषै अधिकार सिद्ध भया। इति "मूँर्धा तेरा विस्पष्ट पडैगा" ऐसैं ॥ ९ ॥ ५०४ विद्वान्के असमीपविषै फेर अविद्वान्कूं बी कर्म- विषै अधिकार है। ऐसैं कहैहैं।इहां यह अर्थ है :- अग्निहोत्रादिरूप श्रौतकर्मविषै औ वापी कूप तटाक आदिक स्मार्तकर्मनचिषै औ अध्ययन अरु जप आदिकनवषै विद्वान्की सन्निधिविना बी सर्वकालविषै कर्ममात्रके वेत्ता अविद्वान्कूं अधिकार नहीं है। ऐसैं कहनेकूं अशक्य है॥ ५०५ तहां हेतुकूं कहैहैं॥ इहां यह अर्थ है :- "भगवान् (आप)कूं हीं मैं जाननेकूं इच्छताहूं" इत्यादि वाक्यसैं राजा- करि स्वकीय कर्मके निर्वाह करनेविषै प्रार्थनाके दर्शनतैं औ "येहीं मुजकरि स्तुति करनेवालोंके मध्य सम्यक् अतिसृष्ट हैं" ऐसीं अनुज्ञाके उपलंभतैं अविद्वानोंकूंवी कर्मविषै अधि- कार है हीं॥ ५०६ उक्त अर्थकूं उपसंहार करैहैं ॥ इहां विद्वान्के स- मीपविषै ताकी अनुमतिकूं न पायके कर्मका अनुष्ठान नहीं है। यह निगमन करनेकूं इतिशब्द है॥ ५०७ "मूर्द्धा तेरा विस्पष्ट पडैगा " इस अन्तवाला १९

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२१८ प्रथमप्रपाठक ? [छान्दोग्यो- उद्गीथ आदिकके उपासन १३ एवमेवोद्गातारमुवाचोद्गातर्या देवतो द्वीथमन्वायत्ता। ताञ्चेदविद्वानुपास्य सि। मूर्दा ते विपतिष्यतीति ॥१० ॥ एवमेव प्रतिहर्त्तारमुवाच॥ प्रति- हर्त्तर्या देवता प्रतिहारमन्वायत्ता। ता- अर्थ :- ऐसैं हीं उद्गाताकूं कहता भया :- उषस्तिरुवाच :- हे उद्गातः! जो देवता उद्गी- थकेप्रति अनुगत है। ताकूं जब अविद्वान् हुया उद्गान करैगा [तब] तेरा मूर्दा विप- तन होवैगा ऐसैं ॥ १० ॥ अर्थ :- ऐसैहीं प्रतिहर्ताकूं कहताभया :- उषस्तिरुवाच :- हे प्रतिहर्तः! जो देवता प्र- तिहारकेप्रति अनुगत है। ताकूं जब अवि- टीका :- ऐसैंहीं उद्गाताकूं औ प्रतिहर्ताकूं कहताभया। इत्यादि अन्य समान है ॥ वे प्र० स्तोता आदिक कर्मनतैं उपरत हुये मूर्धपातके

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पनिषत् ]] दशम खंड १० २१९ देशांतरगत उपस्तिका हस्तिपति राजयज्ञ औ ऋत्विकनसैं प्रसंग ११ ञ्चेदविद्दान् प्रतिहरिष्यसि । मूर्दा ते विपतिष्यतीति॥ ते ह समारतास्तूष्णी- मासाञ्चक्रिरे॥११॥ इति प्रथमप्रपाठकस्य दशमः खंडः ॥ १० ॥

द्वान् हुया प्रतिहरण करैगा [तब] तेरा मूर्धा विपतन होवेगा ऐसैं ॥ वेहीं उपर- त हुये तूष्णीं होते भये॥११॥ इति श्रीमूलभाषा०प्रथमप्रपा०दशमःखंडः।।१०।।

भयतैं तूष्णीं होतेभये। अन्य कर्मकूं न करते- हुये। अर्थी होनेतैं ॥ १ ॥ ११ ॥ इति श्री०भाष्यभाषा०प्रथमप्रपाठकस्य दशमः खंड: ॥१० प्रस्तोताकूं विषयकरनेवाला वाक्य व्याख्यान किया। ऐसैं अनुवाद करैहैं।। ५०८ "तूष्णीं" ऐसें इस वाक्यके अर्थकूं कहैहैं॥ ५०९ तहां हेतुकूं कहैहैं॥। इहां यह अर्थ है :- तिस तिस देवतारूप विषयवाले विज्ञानके अर्थी होनेकरि अन्य कर्मकूं न करतेहुये चाक्रायणके अभिमुख स्थितभये॥ इति श्री० प्रथमप्रपाठकगत-दशमखंडस्य टिप्पणम् ॥१०॥

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२२० प्रथमप्रपाठक १ [छान्दोग्यो- उद्गीथ आदिकके उपासन १३ अथ प्रथमप्रपाठकस्यैकादशः खंड:११ अथ हैनं यजमान उवाच ॥ भग-

अथ श्री०मूलभाषा०प्रथमप्रपा०एकादशः खंडः॥।११। अर्थः-अनन्तर हीं इस (उपस्ति)कूं यजमान कहताभया॥ राजोवाच :- भग-

अथ श्री०भाष्यभाषा०प्रथमप्रपाठकस्यैकादशःखंड:११ राजा उपस्तिके प्रसंगपूर्वक ऋत्विककर्मके प्रसंगकरि प्रस्ताव उद्गीथ औ प्रतिहारके क्रमतैं प्राण आ- दित्य अरु अन्नरूप देवताका परिज्ञान ९ टीका :- अनन्तरहीं इस उपस्तिकूं यज- मान राजा कहताभया :- भगवान् (पूजावान् आप)कूंहीं मैं जाननेकूं इच्छताहूं? ऐसैं उक्तहुया उषस्ति चाक्रायण में हूं। तेरेबी

अथ श्री०प्रथमप्रपा०एकादशखण्डस्य टिप्पणम्११ ५१० "अनन्तरहीं इसकूं" इत्यादि वाक्यकूं व्याख्यान करैहैं॥ इहां प्रस्तोताआदिकनके तूष्णींभावतैं [ अनन्तर ] यह शेष है।

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पनिषत् ] एकादश खंड ११ २२१ राजा उषस्तिका प्रसंग औ प्रस्ताव उद्गीथ प्रतिहार देवता ज्ञान ९ वन्तं वा अहं विविदिषाणीत्युषस्तिरस्मि चाक्रायण इति होवाच॥ १॥ स होवाच॥। भगवन्तं वा अहमेभिः वानू (आप)कूं हीं मैं जाननेकूं इच्छताहूं! ऐसैं।। ॥ [मैं] उषस्ति चाक्रायण हूं। ऐसैं हीं कहताभया॥१॥ अर्थः-सोई (राजा) कहताभया॥ रा-

श्रोत्रके मार्गकेप्रति आयाहूं। जब। ऐसैंहीं कहताभया॥ १॥ टीका :- सोई यजमान कहताभयाः-सैत्य ऐसें हीं मैं भगवान्कूं बहुगुणवाला सुनता- भयाहूं। औ सर्व ऋत्विजोंके कर्मरूप आर्तिव- ज्यनकरि पर्य्येषण (खोजन) करताभयाहू ५११ चाक्रायणके वचनकूं राजा अङ्गीकार करैहै॥ ५१२ अङ्गीकारकूंहीं स्पष्ट करैहै ॥ इहां आर्त्विज्यनकरि। याका व्याख्यान :- ऋत्विजोंके कर्मोंकरि। यह है। अर्थ यह जो :- ता (कर्म)के अर्थ॥

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२२२ प्रथमप्रपाठक १ [छान्दोग्यो- FI W उद्गीथ आदिकके उपासन ११लीP5 1S सवैरार्त्विज्यैः पय्यैशिषं। भगवतो वा अहमवित्त्याऽन्यानवृषि ॥२॥ भगवारस्तेव मे सर्वैरार्त्विज्यैरि- जोवाच :- भगवान् (आप)कूं हीं मैं इन सर्व आर्त्विज्योंकरि खोजताभयाहूं। भग- वान्के हीं अलाभतैं मैं अन्योंकूं वरता- भया हूं । २ ॥ अर्थः-भगवान्हीं तो मेरे सर्व ऋत्वि- FE खोजिके भगवान् (पूजावान् आप)केहीं अ- ५१३

लाभतैं मैं इन अन्योंकूं वरताभया (वरण करताभया हूं॥२॥ टीका :- अद्यापि (अबीबी) भगवान् (आ- प)हीं तो मेरे सर्व ऋत्विजोंके कर्मअर्थ ५१३ जब मुजकूं आर्त्विज्यके अर्थ खोजताभया हैं। तब क्यूं इन अन्योंकूं वरताभया हैं? यह आशङ्का करिके कहैहैं॥ ५१४ ऐसे प्रापहुये अब क्या कर्तव्य है? यह आशंका करिके कहैहै॥

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पनिषत्] एकादश खंड ११ २२३ राजा उषस्तिका प्रसंग औ प्रस्ताव उद्गीथ प्रतिहार देवता ज्ञान ९ ति॥ तथेत्यथ तर्ह्येत एव समतिसृष्टाः स्तुवतां यावत्त्वेभ्यो धनं दद्यास्ताव- जनके कर्मोकरि (कर्मोकेअर्थ) [होहू] ऐसैं । । तथाऽस्तु ऐसेंउपस्ति कािके] अनन्तर तब येई अनुमत हुये स्तुतिकूं करहू। इनकेअर्थ जितना तो धन दे होहू॥ ऐसैं उक्त हुया उषस्ति "तथाऽस्तु" ऐसैं कहताभया॥ किंतु जैव ऐसैं है तैब येहीं तुजकरि पूर्व व्रत जे हैं वे सम्यक् प्रसन्नभये मुजकरि अनुज्ञातहुये स्तुँतिकूं करहू। तुर्ज- ५१५ चाकायणकी अनुमतिकूं सुनिके। यह क्या भया। ऐसैं प्रस्तोताआदिकनके व्याकुलित हुये उषस्ति कहैहै॥ इहां उभयकी अनुमतिकी अपेक्षासैं अनन्तरता अथशब्दका अर्थ है।। ५१६ मेरे अलाभकरि भये इनोंके वृतपनैकी निवृत्तिकी अवस्थाके हुये। ऐसैं कहैहै॥ ५१७ मेरेकरि अनुज्ञात हुये प्रस्तोताआदिक स्तुतिकूं करहूं। ऐसें उषस्ति कहैहै॥ ५१८ ऐसैं होहू। परन्तु तेरेअर्थ फेर मुजकरि क्या क- र्तव्य है? यह राजाकी आशङ्काकरिके उषस्ति कहैहै॥

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२२४ प्रथमप्रपाठक १ [छान्दोग्यो- उद्गीथ आदिकके उपासन १३ न्मम दद्या इति । तथेति ह यजमान उवाच॥ ३॥ अथ हैनं प्रस्तोतोपससाद॥"प्रस्तो- वैगा तितना मेरेकूं देना। ऐसैं [कहता- भया]।।।I तथाऽस्तु ऐसें हीं यजमान कहताभया॥ ३ ॥ अर्थ :- अनन्तर इसके प्रति प्रस्तोता करि तो यह करनेकूं योग्य है :- इन प्रस्तोता आदिक सर्वकेअर्थ जितना धन देवेगा ति- तना सुजकूं देना॥ ऐसैं उक्त हुया यजमान "तथाऽस्तु" ऐसैंहीं कहताभया ॥ ३॥ टीका :- अैनन्तरहीं उषस्तिके वचनकूंसुनिके या उषस्तिकेप्रति प्रस्तोता विनयकरि उप- सत्तिकूं करताभया (समीपजाताभया)। ५१९ यजमानकेप्रति उपस्तिकरि उक्तवचनकूं सुनिके अनन्तर इस उपस्तिकूं प्रस्तोता त्यक्तव्याकुलतावाला हुया शिष्यभावकरि उपसन्न (उपगत ) भया। ऐसें कहैहैं॥

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पनिषत् ] एकादश खंड ११ २२५ राजा उषस्तिका प्रसंग औ प्रस्ताव उद्गीथ प्रतिहार देवता ज्ञान ९ तर्या देवता प्रस्तावमन्वायत्ता। ताञ्चे- दविद्वान् प्रस्तोष्यसि। मूर्दा ते विपति- ष्यतीति" मा भगवानवोचत्कतमा सा देवतेति।४॥ उपगमन करताभयाः-प्रस्तोतोवाचः-"हे प्रस्तोत :! जो देवता प्रस्तावके प्रति अ- नुगत है। ताकूं जब अविद्वानूहुया प्रस्त- वन करैगा [तब] तेरा मूर्द्धा विपतन हो- वैगा" ऐसैं मुजकूं भगवान् (आप) कह- तेभये। कौंनसी सो देवता है ? ऐसैं [पूंछ्या हुया उषस्ति]॥४ ॥ "हे प्रस्तोतः ! जो देवता" इत्यादि मे- रेप्रति भगवान् पूर्व कहतेभये। कौंनसी सो देवता है। जो प्रस्तावरूप भक्तिके प्रति अनुगत है ? ऐसैं [पूंछताभया]॥४॥ ५२० उपगमनके प्रकारकूं आकारकरि दिखावैहैं॥

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२२६ प्रथमप्रपाठक १ [छान्दोग्यो- 9 FIF TFF उद्गीथ आदिकके उपासन १३ प्राण इति होवाच॥ सर्व्वाणि ह वा इमानि भूतानि प्राणमेवाभिसंविश- न्ति । प्राणमभ्युज्जिहते । सैपा देवता अर्थ :- "प्राण है" ऐसैं हीं कहताभया। सर्वहीं ये भूत प्राणके प्रति हीं च्यारीओ- रतैं प्रवेश करते हैं औ प्राणकूं लछित करिके उपजते हैं। सो यह देवता प्रस्ता- टीका :- ऐसें पूंछयाहुया उषस्ति "प्राण है" ऐसैंहीं कहताभया। प्रस्तावकी प्राणरूप दे- वता है। यह युक्त है ॥ ॥ कैसैंकि :- सर्व ५२१ प्रतिवचनकूं लेके प्रशव्दके सामान्यतैं ग्रहणकरिके तात्पर्यकूं कहैहैं।। ५२२ इहां प्राणशब्दका अर्थ कैसैं निश्चय करनेकूं योग्य है? यह आशङ्काकरिके "याहींतैं प्राण है" इस न्याय (अधि- करणसूत्र)करि कहैहैं। इहां प्राणरूपसैंहीं सम्यक् प्रवेश करते हैं। ऐसैं पूर्वसैं संबंध है औ प्राणशब्दके अर्थका परमात्मभाव- करि निर्णीतपना। यातैं शब्दका अर्थ है औ चेत् शब्दका अर्थ यदि (जब) ऐसें कहा औ मुजकरि तथोक्तका कहिये "मूर्द्धा तेरा विपतन होवैगा" ऐसें मेरेकरि उक्त भये तेरा तिसका-

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पनिषत् ] एकादश खंड ११ २२७ राजा उषस्तिका प्रसंग औ प्रस्ताव उद्गीथ प्रतिहार देवता ज्ञान ९ प्रस्तावमन्वायत्ता। ताञ्चेदविद्वान् प्रा- स्तोष्यो मूर्दा ते विपतिष्यत्तथोक्तस्य मयेति॥५॥

वके प्रति अनुगत है। ताकूं जब अविद्वान् हुया प्रस्तवन करता [तब] सुजकरि त- थोक्त (तैसैं कहे हुये) तेरा मूर्द्ा विपतित होता। ऐसैं ॥५॥

स्थावरजंगमरूप भूत प्रलयकालविषै प्राणके प्र- तिहीं प्राणरूपसैंहीं चारिओरतैं सम्यक् प्रवेश करतेहैं औ उत्पत्तिकालविषै प्राणकूं लखा- यके प्राणतैंहीं उपजते हैं। यातैं सो यह दे- वता प्रस्तावके प्रति अनुगत है। ताकूं जब अविद्वान्हुया तूं प्रस्तवन (प्रस्ताव- भक्ति)कूं करताहैं जब तेरा मूर्धा (शिर)

लविषै (स्वअपराध अवस्थाविषै) मूर्द्धा विपतन होताहीं। ऐसैं योजना है औ बडे प्रमादकूं तुजकरि परिहार किया हो- नेतैं। यह द्वितीय यातैं शब्दका अर्थ है॥

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२२८ प्रथमप्रपाठक १ [छान्दोग्यो- उद्गीथ आदिकके उपासन १३ अथ हैनमुद्गातोपससादोद्वातर्या दे- वतोद्गीथमन्वायत्ता। ताश्चेदविद्दानुद्गा- स्यसि। मूर्द्ा ते विपतिष्यतीति" मा भगवानवोचत्कतमा सा देवतेति ॥६॥ अर्थ :- अनन्तरहीं इसके प्रति उद्गाता उपगमन करताभया :- उद्गातोवाचः-"हे- उद्गातः ! जो देवता उद्गीथके प्रति अनुगत है। ताकूं जब अविद्वान्हुया उद्गान करैगा [तब] तेरा मूर्द्ा विपतित होवैगा" ऐसैं मुजकूं भगवान् कहतेभये। कौंनसी सो देवता है? [पूंछ्याहुया उषस्ति]॥६॥ विपतित होता कहिये मुजकरि तथोक्तका नाम "तेरा मूर्द्ा विपतन होवैगा" ऐसें मुजकरि उक्त भये तेरा तिसकालविषै (स्वअपराधकी अ- वस्थाविषै) मूर्द्धा पडताहीं॥ यातैं तुजनैं श्रेष्ठ- किया। अभिप्राय है किः-मुजकरि निषिद्ध हुया तूं कर्मतैं जो उपरमकूं करताभया॥ ५॥ टीका :- तैसैं उद्गाता पूंछताभयाः-कौं-

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पनिषत् ] एकादश खंड ११ २२९ राजा उषस्तिका प्रसंग औ प्रस्ताव उद्गीथ प्रतिहार देवता ज्ञान ९ आदित्य इति होवाच॥ सर्व्वाणि ह वा इमानि भूतान्यादित्यमुच्चैः सन्तं

अर्थः-"आदित्य है" ऐसैंहीं कहता- भया। सर्वहीं ये भूत उच्चहुये आदित्यकूं नसी सो उद्वीथभक्तिके प्रति अनुगत देवता है? ऐसैं ॥ ६ ॥ टीका :- पूंछ्या हुया "आदित्य है" ऐसैंहीं कहताभया। सर्वहीं ये भूत ऊर्ध्व हुये आदित्यकूं गावते हैं (शब्द करते हैं) अ- भिप्राय यह है किः-स्तुतिकरतेहैं ॥ "उतू" शब्दके सामान्यतैं। "प्र'' शब्दके सामान्यतैं

५२३ जैसैं प्रशब्दके सामान्यतैं प्राण प्रस्तावकी देवता है यह कहा। ऐसें आदित्य अरु उद्गीथविषै "उत्" शब्दके सामान्यतैं उद्गीथकी देवता आदित्य है। ऐसैं कहैहैं॥ इहां उक्त सामान्यके ग्रहणअर्थ अतः (यातैं) शब्द है औ ऐसैंहीं। याका प्रस्तोताकी न्याई अरु उद्गाताकी न्याई। यह अर्थ है औ दो ऋत्विजोंकरि प्रस्ताव अरु उद्गीथकी देवताओंके विज्ञा- नके अनन्तर अथशब्दका अर्थ है॥ २०

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२३० प्रथमप्रपाठक १ [छान्दोग्यो उद्गीथ आदिकके उपासन १३ गायन्ति। सैषा देवतोद्गीथमन्वायत्ता। ताञ्चेदविद्दानुदगास्यो मूर्दा ते व्यपति- ष्यत्तथोक्तस्य मयेति ॥७॥ अथ हैनं प्रतिहर्तोपससाद॥"प्रति- हर्तर्या देवता प्रतिहारमन्वायत्ता। ता- गायन करते । सो यह देवता उद्भीथके- प्रति अनुगत है। ताकूं जब अविद्वान्हुया उद्गानकरता [तब] सुजकरि तथोक्तभये तेरा मूर्द्ा विपतित होता। ऐसैं ॥ ७॥ अर्थः-अनन्तरहीं याके प्रति प्रतिहता उपगमन करताभयाः-प्रतिहर्त्तोवाच :- "हे प्रतिहर्त: ! जो देवता प्रतिहारकेप्रति अ- नुगत है। ताकूं जब अविद्वान्हुया प्रति- प्राणकीन्यांईं। यातैं सो यह देवता। इ- त्यादि पूर्वकी न्यांई है॥। ७॥ टीका :- ऐसैंहीं अनन्तर याकूं प्रतिहर्ता

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पनिषत् ] एकादश खंड ११ २३१ राजा उषस्तिका प्रसंग औ प्रस्ताव उद्गीथ प्रतिहार देवता ज्ञान ९ ञ्चेदविद्दान् प्रतिहरिष्यसि। मूर्द्धा ते वि- पतिष्यतीति" मा भगवानवोचत्कतमा सा देवतेति॥८॥ अन्नमिति होवाच॥ सर्वाणि ह वा- हरण करैगा [तब] तेरा मूर्द्ा विपतित होवैगा" ऐसैं मुजकूं भगवान् कहतेभये। कौंनसी सो देवता है? ऐसैं [पूंछ्याहुया उषस्ति ] ॥८॥ अर्थ :- "अन्न है" ऐसैंहीं कहताभया। (उद्गाताके हाथनीचे रहनेवाला ऋत्विक्) उप- सत्ति करताभया :- कौंनसी सो देवता प्र- तिहारकेप्रति अनुगत है? ऐसैं ॥८ ॥ टीका :- पूंछ्याहुया उषस्ति "अन्न है" ऐसैं- हीं कहताभया। सैरवहीं ये भूत अन्नरूप हीं ५२४ अन्नका प्रतिहारपना कैसैं है ? सो कहैहैं॥ इहां "ताकूं जब अविद्वान् हुया" इत्यादि "अन्य" ऐसें कहिये है अरु "मुजकरि तथोक्त (तैसैं कहनेके विषयभये) तेरा"इस- पर्य्यन्त। यह शेष है।।

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२३२ प्रथमप्रपाठक १ [छान्दोग्यो- उद्गीथ आदिकके उपासन १३ इमानि भूतान्यन्नमेव प्रतिहरमाणानि जीवन्ति। सैषा देवता प्रतिहारमन्वा- यत्ता। ताश्चेदविद्वान् प्रत्यहरिष्यो मूर्द्ा सर्वहीं ये भूत अन्नकूंहीं प्रतिहरण (ग्रहण) करतेहुये जीवते हैं। सो यह देवता प्रति- हारके प्रति अनुगत है। ताकूं जब अवि- द्वान्हुया प्रतिहरणकरता [तब] सुजकरि आत्माके प्रति सर्व ओरतें ग्रहण करते हुये जीवतेहैं। सो यह देवता। प्रतिशब्दके सा मान्यतैं प्रतिहाररूप भक्तिके प्रति अनुगत है "मुजकरि तैसैं उक्तका" इहांपर्य्यन्त अन्य स- मान है। प्रस्ताव उद्गीथ अरु प्रतिहाररूप भ- क्तिनकूं प्रीण आदित्य अरु अन्नकी दृष्टिकरि उपसनकरै। यह समुदायका अर्थ है औ प्रा- ५२५ कैसा उपासन इस प्रकरणविषै विवक्षित है? यह आशङ्काकरिके कहैहैं॥ ५२६ तीन उपासनाके फलकूं दिखावैहैं। इति श्री० प्रथमप्रपाठकगतैकादशखण्डस्य टिप्पणम्॥ १०॥

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पनिषत्] द्वादश खंड १२ २३३ श्वानोंकरि उद्गीथोपासनोपदेश ५ ते विपतिष्यत्तथोक्तस्य मयेति। तथो- क्तस्य मयेति॥९॥ इति प्रथमप्रपाठकस्यैकादशः खण्डः ॥। ११ । अथ प्रथमप्रपाठकस्य द्ादशः खंड:१२ अथातः शौव उद्गीथसद् बको दा- तथोक्त भये ऐसैं। मुजकरि तथोक्त भये ऐसैं तेरा मूर्द्धा विपतित होता ॥ ९॥ इति श्री०मूलभा०प्रथमप्र०एकादशः खण्ड: ११ अथ श्री०मूलमात्रभाषा०प्रथमप्रपा०द्वादशः खण्डः१२ अर्थ :- अनन्तर यातैं शौव उद्गीथ है :-

णआदिककी प्राप्ति वा कर्मकी समृद्धि फल है। इति ॥ ९॥

अथ श्री०भाष्यभाषा प्रथमप्रपा०द्वादशः खण्डः॥१२॥ श्वानोंकरि उद्गीथके उपासनका उपदेश ५ टीका :- अैतीत खंडविषै अन्नकी अप्राप्तिरूप अथ श्री० प्रथमप्रपाठकगत-द्वादशखंडस्य टिप्पणम् ५२७ पूर्व अरु उत्तर दोखण्डनकी संगति (संबध)कूं

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२३४ प्रथमप्रपाठक १ [छान्दोग्यो- उद्गीथ आदिकके उपासन १३ ल्भ्यो ग्लावो वा मैत्रेयः स्वाध्यायमुद्द- ब्राज॥१॥ तहां प्रसिद्ध बक दाल्म्य। वा ग्लाव मै- त्रेय। स्वाध्यायकूं [करनेकूं] उद्रमन कर- ताभया॥ १॥ निमित्तवाली उच्छिष्टके अरु उच्छिष्ट हुये पर्यु- षित (रात्रिवासी अन्न)का भक्षणरूप कष्टा- वस्था कही। सो मति होवै। यातैं अन्नके लाभअर्थ। अनन्तर शौव (थ्वानोंकरि दृष्ट) उद्गीथ (उद्वानरूप साम) यातैं प्रस्तुत करिये है :- तहां प्रसिद्ध नामतें बक ऐसा दल्भ्यका दिखावते हुये अन्य उपासनाकूं प्रस्तुत (प्रसङ्गविषै प्राप्त) करैहैं॥ इहां अन्नके लाभका अपेक्षितपना । यातैं शब्दका अर्थ है।। ५२८ अन्नकें कामवालेकूं प्रकारान्तरकरि उद्धाथके उपा- सनके प्रति प्रस्तुतकरिके ज्ञानकी सुकरताअर्थ आख्यायि- काकूं ग्रहण करैहैं॥ इहां केवल दल्भका अपत्य नहीं किंतु मित्राका वी है। यह चकारका अर्थ है औ सो (मित्रा) द- लभकी पत्नीथी यह कहना युक्त नहीं है । काहेतैं ऐसें हुये मैत्रेयपदकी व्यर्थतातैं॥। जो कहो अन्य पत्नीके अपत्यप-

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पनिषत् ]] द्वादश खंड १२ २३५. श्वानोंकरि उद्गीथोपासनोपदेश ५ अपत्य दाल्म्य। वा नामतैं ग्लाव औ मि- त्राका अपत्य मैत्रेय। [इहां वैशिब्द च के अर्थ है। जातैं द्व्यामु्यायण (दोनूं इनका यह) है। वैर्तुरूप विषयविषै क्रियाओंकी न्यांई वि कल्पके असंभवतैं औ जातैं "दो नैमिवाला दो गोत्रवाला है" इत्यादि स्मृति है औ दे-

नैकी व्यावृत्तिअर्थ मैत्रेयपद है? सो बनै नहीं :- काहेतैं प्रयो- जनके अभावतैं॥ ५२९ ननु इहां वा शब्दतैं दोऋषि विवक्षित हैं ? ऐसैं जो कहै। सो बनै नहीं। ऐसैं कहैहैं॥ ५३० ननु फेर दल्भका अपत्य जो बक सो ताकी अ- भार्या मित्राकाबी अपत्य होनेकूं कैसैं उत्साह करता है ? तहां कहैहैं।। इहां "चैकितायन दाल्भ्य" इस पूर्व उक्त वाक्यविषै यह (याका दोका पुत्रपना) कहा है। यह सूचन करनेकूं "हि" शब्द है॥ ५३१ ननु उदित (सूर्य उदयके अनन्तर किये) अरु अनुदित (सूर्यउदयतैं प्रथमकिये) होमकीन्यांई तिनोंकी द- ष्टिकरि यह बक है औ अन्योंकी दृष्टिकरि ग्लाव है। ऐसैं एक- विषैबी विकल्प होवैगा? तहां सो बनै नहीं। ऐसैं कहैहैं॥ ५३२ ननु फेर प्रमाणविना एकहींका दोनामवानूपना आदिक कैसैं अङ्गीकार करियेहै ? तहां कहैहैं॥ इहां इत्यादि वाक्य स्मृतिरूप है सो धर्मशास्त्रविषै प्रसिद्ध है। यह अर्थ है॥

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२२६ प्रथमप्रपाठक १ [छान्दोग्यो- उद्गीथ आदिकके उपासन १३ खियेहै उभयतैं पिंडका भजनेपना । वा उ- ५३४

द्वीथविषै बद्धचित्तवाला होनेतैं ऋषिविषै अ- ५३५

नादरतैं यह कहा है। औ वो शब्द। स्वा- ध्याय (पाठ)के अर्थ है]। स्वाध्यायकूं करनेकूं ग्रामतैं बाहिर उद्गमन करताभया कहिये विवि- क्त (एकान्त) देशविषै स्थित उदकके समीप प्रति

ऐसें कहैहैं॥। ५३३ एकका द्विगोत्रवानपना लोकविषैवी प्रसिद्ध है। ५३४ जिसतें सुत जन्मता है औ जिसकरि धर्मतें ग्रहण- करिये है तिन दोनूंका यह है। ऐसें कहैहैं॥ इहां यह अर्थ है :- "दोनूंकावी यह ऋक्थी (वडिलोपार्जित धनादिकका ग्राहकरूप वारस) औ धर्मतैं पिंडका दाता है" ऐसें स्मरण करतेहैं।। ५३५ दाल्भ्यतैं अन्य मैत्रेय है। ऐसें अङ्गीकार करिके कहै- हैं। इहां ताकी उपासनाविषै जो तात्पर्य है सो ऋषिविषै अ- नादरमैं हेतु है। तातैं ऋषिनका त्रय वा ऋषिनका द्वय विवक्षित है। यह अर्थ है औ अन्यपक्षके प्रकाशनअर्थ "चा" शब्द है॥ ५३६ ननु तब श्रुतिगत वाशब्द किस अर्थ है? यह आशङ्काकरिके। पाठ (उच्चारण)तैं अन्य ताका फल नहीं है। ऐसें कहैहैं।। ५३७ मैत्रेयपदपर्यन्त वाक्यकूं व्याख्यान करिके। अव "6स्वाध्यायकूं" इत्यादि वाक्यकूं व्याख्यान करैहैं॥

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पनिषत् ] द्वादश खंड १२ २३७ श्वानोंकरि उद्गीथोपासनोपदेश ५ तस्मै श्वाः श्वेतः प्रादुर्बभूव। तमन्ये अर्थ :- एक श्वेतश्वान तिसके अर्थ प्रा- पालन करताभया औ "उैर्द्रमन करता भया" ऐसैं एकवचनरूप लिङ्गतैं एक यह ऋषि था। औ धौनोंके उद्गीथके कालके प्रतिपालनतैं ऋषिका स्वाध्यायका करण जो है सो अन्नकी कामनासैं है।। इस अभिप्रायतैं है। ऐसैं लक्षणासैं जानियेहै॥१॥ टीका :- स्वोध्यायकरि तोषित (तुष्ट) देवता वा ऋषि। श्वानके रूपकूं ग्रहण करिके श्र्वेत श्ा (थान) हुया तिस ऋषिकेअर्थ (ताके अनुग्रहअर्थ) प्रादुर्भावकूं पावताभया। ता ५३८ जो कहा किः-ऋषि एक बकआदिक शब्दनकरि कहिये है ऐसैं। तिसविषै लिङ्गकूं कहैहैं॥ ५३९ श्वानोंका जो उद्गीथ सो शवोद्ीथ है तिसके का- लका प्रतिपालन जो प्रतीक्षण ऋषिका देखियेहै औ तिन (श्वानों) का उद्धान अन्नके अर्थ है। सो ऋषिकावी स्वाध्या- यका करण तिस अर्थ है। ऐसैं कहैहैं॥ ५४० उक्त अर्थके वाची शब्दके अभावके हुयेबी साम- थ्यतैं यह अर्थ भासता है [ वा होवैहै] ऐसैं कहैहैं॥ ५४१ "तिसके अर्थ" इत्यादि वाक्यकूं व्याख्यान करैहैं॥ इहां क्षुल्लक कहिये क्षुद्ध। अर्थ यह जो :- शिशु ऐसैं॥

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२३८ प्रथमप्रपाठक ? उद्गीथ आदिकके उपासन १३ [छान्दोग्यो-

श्वान उपसमेत्योचुरन्नं नो भगवाना- गायत्वशनायाम वा इति॥२ ॥ दुर्भावकूं पाया। ताकूं अन्यअनेकश्वान स- मीप आयके कहतेभयेः-हमारेअर्थ भगवान् अन्नकूं आगानकरहू। [हम ] भूंखेहीं हैं ऐसैं ॥ २ ॥ शुक्कश्वानके प्रति अन्य क्षुद्र (छोटे) श्वान समीप आयके कहतेभयेः हमारेअर्थ भ- गवान् अन्नकूं आगानकरहू। अर्थ यह जो :- आगानकरि संपादन करहू ॥ [इहां वा मुरेय प्राणके प्रति वाक्आदिक जे प्रीणके पीछे अन्नभुक हैं। वे स्वाध्यैर्यिकरि परितोषित ५४२ श्वेत श्वान कोइक ऋषि वा देवता था औ अन्य ख्ान देवता वा ऋषि थे। ऐसें कहा। अव विवक्षित पक्षकूं कहैहैं॥ इहां ताकूं कहतेभये। ऐसें संबन्ध है॥ ५४२ तिनहींकूं विशेषण देते हैं॥ ५४४ मुख्य प्राणसहित वाक् आदिकके ग्रहणविषै हेतुकूं कहैहैं॥ इहां अन्यथा वाक्य अनिर्द्धारित अर्थवाला होवैगा। यह भाव है।।

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पनिषत् ] द्वादश खंड १२ २३९ श्वानोंकरि उद्गीथोपासनोपदेश १ तान् होवाचेहैव मा प्रातरुपसमीया- अर्थः-[१श्वेतश्वान]तिनकूंकहताभयाः-

हुये इस थ्वानके रूपकूं ग्रहण करिके अनुग्रह करतेभये। यह ऐसैं जाननेकूं युक्त है] हम बुभुक्षित (भूंखे) हैं हीं ऐसैं ॥ २ ॥ टीका :- ऐसैं उक्त हुये तिन क्षुद्र (शिशुरूप) थ्वानोंकेप्रति श्वेतथा कहताभया :- इहां (इ- सींही देशविषै) मेरेप्रति प्रतःकालमैं समीप आना ऐसैं। [इहां "समीयात" यह दीर्घभाव छान्दस है। वा प्रमादपाठ है। औ प्रातःकाल- का करण जो है सो तिस प्रातःकालविषैहीं उ-

५४५ ननु ऐसें तुहारे अर्थ मुजकरर अन्न क्यूं संपादन करिये है। जातैं न भोजन करनेवाले तुहारा तिसकरि कार्य नहीं है ? यह आशङ्काकरिके। तुजविषै स्थित चेतनरूपद्वार- करि हमारेकूंबी भोगकी सिद्धितैं। ऐसैं मतिकहो। यह कहैहैं॥ ५४६ ननु ऐसैं प्रातःकालका प्रतीक्षण क्यूं किया? तहां कहैहैं॥ इहां उद्गानके। यह शेष है।

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२४० प्रथमप्रपाठक १ उद्गीथ आदिकके उपासन १२ [छान्दोग्यो-

तेति। तड बको दाल्भ्यो ग्लावो वा मैत्रेयः प्रतिपालयाञ्चकार॥ ३॥ ते ह यथैवेदं वहिष्पवमानेन स्तो- इहांहीं मेरेप्रति प्रातःकालविषे समीप आ- वना ऐसैं॥ तहांहीं वकदाल्म्य। वा ग्लाव मैत्रेय। प्रतिपालन करताभया॥ ३॥ अर्थ :- वेई (अन्यश्वान) जैसैंहीं बहि- द्वानके कर्तव्यअर्थ है। "वा अन्नके दाता सूर्य्यके अपराह्नकालविषै अभिमुखपनैंके अभावतैं है]। तहांहीं बक दाल्म्य वा ग्लाव मैत्रेय ऋषि प्रतिपालन करताभया। अर्थ यह जो :- प्रती- क्षणकूं करताभया॥ ३ ॥ टीका :- वे श्वान तहांहीं आयके ऋषिके स- ५४९

५४७ प्रातःकालमैं प्रतीक्षणके करणविपै अन्यकारणकूं कहैहैं।। इहां ता सूर्यका वृष्टिद्वारा अन्नका दातापना देखनेकूं योग्य है।। ५४८ "तहांहीं" इत्यादि वाक्यकूं व्याख्यान करैहैं॥ इहां ऋषिका अन्नकामवानपना इसतैं जान्या है।। ५४९ "वेई" इत्यांदि वाक्यकूं व्याख्यान करैहैं॥ इहां

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पनिषत् ] द्वादश खंड १२ २४१ श्वानोंकरि उद्गीथोपासनोपदेश ५ ष्यमाणाः सररब्धाः सर्पन्तीत्येवमा- ससृपुस्ते ह समुपविश्य हिन्नकुः॥४॥ ष्पवमानकरि स्तोष्यमाण संल्न हुये इस (यज्ञकर्म) के प्रति सर्पते हैं। ऐसैं सर्पते- भये। वेई सम्यक बैठिके हिङ्कारकूं करते- भये ॥ ४॥ मक्ष [परिभ्रमण करतेभये] जैसैं हीं इहां कर्म- विषै बहिष्पवमानस्तोत्रकरि स्तोष्यमाण उ- द्वाता [आदिक यजमानपर्यंत ] पुरुष परस्पर संलग्न हुये यज्ञकी क्रियाकूं करतेहैं। ऐसैं मु- खसैं परस्परके पुच्छकूं ग्रहण करिके परिभ्रम- णकूं करतेभये। यह अर्थ है। वेई ऐसैं परि- भ्रमणकरिके सम्यक बैठिके (बैठेहुये) हिं- कारकूं करतेभये ॥४ ॥ समक्ष (सन्मुख) भ्रमण करतेभये। ऐसैं संबन्ध है औ उद्गताके पुरुष। ऐसें अध्वर्युसैं आदिलेके यजमानपर्यन्त ग्रहण क- रियेहैं औ अन्योन्य (परस्पर ) संलग्न हुये सर्पते हैं (यज्ञकी क्रियाकूं करते हैं) यह शेष है।। २१

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२४२ प्रथमप्रपाठक १ उद्गीथ आदिकके उपासन १२ [छान्दोग्यो-

ओ ३ मदा ३ मों ३ पिवा ३ मों ३ देवो वरुणः प्रजापतिः सविता २Sन्-

अर्थः-शवान ऊचु :- ॐ खावेड्े। ॐ पीवेड़े। ॐ देव वरुण प्रजापतिरूप सवे-

टीका :- ॐ अँदनकरैं (खावें)। ऊपा- नकरैं (पीवैं)। ॐ द्योतनतें देव अरु जगत्के वर्षणतैं वरुण अरु प्रजाओंके पालनतैं प्रजा- पति अरु सर्वका प्रसविता (जनक) होनेतें सविता (आदित्य) कहियेहै ।। इन पर्य्या- योंकरि सो इसप्रकारका आदित्य। हमारेअर्थ इहां अन्नकूं आहरणकरहू (ल्यावहू) ! ऐसैं॥। वे इसप्रकारसैं हिंकारकूं करिके फेरवी कहते- भये :- सो तूं हे अन्नपते ! सो जातैं सर्व अन्नका प्रसविता (वृष्टिद्वारा जनक) होनेतैं पति है। -५५० हिंकारके स्वरूपकूं कहैहैं॥ इहां तीनवार ओंकार गानकेअर्थ उच्चारण किया है औ इतिशब्द हिंकारकी स- माप्तिअर्थ है।।

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पनिषत् ]] द्वादश खंड १२ २४३ श्वानोंकरि उद्गीथोपासनोपदेश ५ मिहा २ डहरदन्नपते! ३ Sन्नमिहा २ SSहरा २ऽडहरो ३ मिति ॥५॥ इति प्रथमप्रपाठकस्य द्वादशः खण्डः ॥१२॥ ता। इहां अन्नकूं ल्यावहू । हे अन्नपते! इहां अन्नकूं ल्याव। ल्याव ॐ इति ॥५॥

जौतैं ताके पाकविना उपज्या अन्न प्राणिनकूं अणुमात्रबी नहीं उपजताहै। यातैं यह अन्न- का पति है। हे अन्नपते ! हमारे अर्थ अन्नकूं इहां (इसदेशविषै) आहरणकर । आहर- णकर ऐसैं॥ इहां [अभ्यास (दोवार कथन) आदरकेअर्थ है] ॐ इति॥ ५॥ इति श्री० भाष्यभाषा० प्रथमप्रपा० द्वादशः खंड: ॥१२।।

५५१ सूर्यके अन्नके प्रसवितापनैंकूं साधते हैं॥ इधर "इहां" ऐसैं प्रकृतदेशकी डीक्त है औ अन्तविषै ओङ्कार जो है सो सूर्यकी प्रार्थनाके मंत्रकी समाप्तिअर्थ है औ भक्तिरूप विषयवाली उपासनाकी समाप्ति अर्थ "इति" पद है।। इति श्री०प्रथमप्रपाठकगत-द्वादशखण्डस्य टिप्पणम्॥ १२॥

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२४४ प्रथमप्रपाठक १ उद्गीथ आदिकके उपासन १३ [छान्दोग्यो-

अथ श्रीछान्दोग्योपनिषदस्त्रयोदशः खंडः प्रारभ्यते ॥ १३॥ अयं वाव लोको हाउकारो वायुर्हा- अथ श्रीछान्दोग्योपनिषन्मूलमात्रभाषादीपिकायाः प्रथमप्रपाठकस्य त्रयोदशःखंडः प्रारभ्यते ॥ १३॥ अर्थ :- यहहीं लोक हा उकार है॥ अथ श्रीछान्दोग्योपनिषद्भाष्यभाषादीपिकायाः प्र- थमप्रपाठकस्य त्रयोदशः खंडः प्रारभ्यते ॥१३॥ सामके अवयवस्तोभाक्षरविषयक उपासन ४ टीका :- भक्तिविषयक उपासन सामके अ- ५५२

वयवसैं संबद्ध है। यातैं सामके अन्य अवयव- रूप स्तोभ (अर्थरहित अरु गायनकी सिद्धि- अथ श्री०प्रथमप्रपाठ०त्योदशखण्डस्य दिप्पणं १३ ५५२ ननु भक्तिसें संबंधवाले उपासनोंकूं गृहीत होनेते "समस्तका" इत्यादि वक्तव्यके हुये। अनन्तरके खण्डसैं क्या है? यह आशंका करिके कहैहैं॥ इहां यातैं। याका इसप्रसङ्गतैं। यह अर्थ है औ ऋकूके अक्षर गायन करियेहैं अरु तिनतैं व्यतिरिक्त वाच्य अर्थकरि शून्य गीतिकी सिद्धिरूप अर्थवाले स्तोभरूप अक्षर परिभाषित करियेहैं अरु वे कर्मके अपूर्वकी निर्वृत्ति (सिद्धि)रूपद्वारकरि फलवाले होनेतैं उपास्य हैं। तिनकी उपासनाके विधिपर उत्तर वाक्य है। यह अर्थ है॥

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पनिषत् ] त्रयोदश खंड १३ सामके अवयवस्तोभाक्षरविषयकोपासन ४ २४५

इकारश्चंद्रमा अथकार आत्मेहकारो- डग्निरीकारः॥ १॥ वायु हाइकार है। चंद्रमा अथकार है। आत्मा इहकार है। अग्नि ईकार है ॥१॥ रूप अर्थवाले) अक्षरनकूं विषयकरनेवाले मि लित अन्य उपासन अनन्तर उपदेश करि- येहैं। काहेतैं सामके अवयवसैं संबद्धपनैंके अ- विशेषतैं॥ ॥ यहहीं लोक हाउकार स्तोभ है [सो] उैथन्तररूप सामविषै प्रसिद्धहै "यहं (पृथिवी) रथन्तर है" ऐसैं इस संबंधके सामान्यतैं ५५३ वक्ष्यमाण उपासनोंके मध्य एक एककी स्वतंत्रता नहीं है। ऐसैं कहैहैं॥ ५५४ तिनके अनन्तर उपदेशविषै हेतुकूं कहैहैं॥ ५५५ औ इस प्रकारका स्तोभ नहीं है। ऐसैं कहनेकूं योग्य नहीं है। ऐसैं कहैहैं॥ ५५६ तथापि पृथिवीकी दृष्टिकरि यथोक्त स्तोभकी उपा- स्यता कैसें है? सो कहैहैं॥ इहां यह अर्थ है :- "यह (पृ- थिवी)हीं रथन्तर [नामक साम ] है" इस वाक्यविषै पृ- थिवीका रथन्तरपना सुन्या है औ प्रस्तुत स्तोभ रथन्तर- विदै है ऐसें कहा है। तैसैं हुये यथोक्त संबन्धरूप सादृश्यतैं पृथिवीकी दष्टिकरि हाउकार उपास्य है॥

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२४६ प्रथमप्रपाठक १ उद्गीथ आदिकके उपासन ११ [छान्दोग्यो-

हाउकाररूप स्तोभ यह लोक है। ऐसें उपासन करै॥ वायु हाइकार है। वामदेवसंबन्धि सामविषै हाइकार प्रंसिद्ध है। औ वौयु अरु ज- लका संबन्ध वामदेवसम्बन्धि सामकी योनि है ऐसैं। इस सामान्यतैं हाइकारकूं वायुदृष्टि- करि उपासनकरै ।। चंद्रमा अथकार है। चंद्रदृष्टिकरि अथकारकूं उपासन करै। अन्नविषै जातैं यह स्थित है। अन्नस्वरूप चंद्र है। औ थैकारकीन्यांई आकारके सामान्यतैं [उक्त उपासन करै]॥ आत्मा इहकार है "इह" ५५७ ननु फेर वायुकी दृष्टिकरि हाइकारका उपास्यपना कैसें है ? तहां कहैहैं॥ इहां यह अर्थ है :- हाइकार वामदेव संबन्धि सामविषै प्रसिद्ध है औ ताका वायुका अरु जलोंका संम्बन्ध योनि है। काहेतैं "मैथुनकी इच्छावाली आप (जल)के पृष्ठविषै वायु प्रवर्त होताभया। तिसतैं वामदेवसंबंधि साम होताभया" इस श्रुतितैं। तातैं यथोक्त वामदेवसम्बन्धि सामके सम्बन्धरूप सामान्यतैं वायुदृष्टिकरि हाइकारकूं उपासन करै॥ ५५८ अथकारका चंद्रदृष्टिकरि उपासन कैसें है ? तहां कहैहैं। इहां तैसें हुये थकारके सामान्यतैं । यथोक्त उपास- नाकी सिद्धि है। यह शेष है।। ५५९ थकारकीन्यांई अकारके सामान्यतैंवी चंद्रदृष्टिकरि अथकारकूं उपासन करै। ऐसें कहैहैं ।। इहां अथकारविषै

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पनिषत्] त्रयोदश खंड १२ २४७ सामके अवयवस्तोभाक्षरविषयकोपासन ४ आदित्य ऊकारो निहव एकारो वि- अर्थ :- आदित्य ऊकार है। निहव (आ- ऐसा स्तोभ प्रत्यक्ष है। जातैं आत्मा "इह" ऐसैं व्यपदेश करियेहै औ इह ऐसा स्तोभ है। तोंके सामान्यतैं ॥ अग्नि ईकार है। औ ई- निधन (ईकारके आश्रय) अभनि सन्बन्धि सर्व साम हैं। यातैं तिस सामान्यतैं ॥ १ ॥ टीका :- आदित्य ऊकार है। ऊच्च (ऊर्ध्व) प्रथम स्पष्ट अकार है अरु अन्नस्वरूप चंद्रमाविषैबी सो (अ- कार) है। यातैं सो यथोक्त उपासन युक्त है। यह अर्थ है औ प्रथम अप्रत्यक्ष पीछे प्रत्यक्ष होताभया। यह शेष है॥ ५६० सो सामान्य इह ऐसें व्यपदिश्यमानपना है। तातैं आत्मदृष्टि इह ऐसे स्तोमविषै कर्तव्य है। ऐसैं कहैहैं॥ ५६१ अग्निकी दृष्टि ईकार नामक स्तोभरूप अक्षरविषै क- र्तव्य है। इस अर्थविषै हेतुकूं कहैहैं॥ इहां यह अर्थ है :- ईकार निधान (स्थापन) करियेहै जिन सामोंविषै वे साम आग्नेय (अग्निसम्बन्धि) प्रसिद्ध हैं। तैसैं हुये तिनोंविषै अग्नि अरु ईकार इन दोनूंके भावतैं इस सादृश्यतैं ईकारकूं अग्निदृष्टिकरि उपासन करै॥ ५६२ ऊकारकूं आदित्यदृष्टिकरि कैसैं उपासन करै ? यह आशङ्काकरिके कहैहैं॥

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२४८ प्रथमप्रपाठक १ [छान्दोग्यो- उद्गीथ आदिकके उपासन १३ श्वेदेवा औहोइकारः प्रजापतिर्हिद्कारः प्राणः स्वरोऽन्नं या वाग्विराद॥ २॥ ह्वान) एकार है। विश्वेदेव औहोयिकार है। प्रजापति हिङ्कार है। प्राण स्वर है। अ- न्नया है। वाक्र विराट् है॥ २॥ होते आदित्यकूं गायन करैहैं औ ऊकाररूप यह स्तोभ है। औदित्यरूप दैवत्यवाले सामविषै स्तोभ "ऊ" है। यातैं आदित्य ऊकार है॥ निहेव ऐसा आह्वान एकाररूप स्तोभ है औ एहि (आओ) ऐसैं आह्वानकूं करतेहैं यातैं तिस सामान्यतैं॥ विश्वेदेव औहोयिकार है। वि- श्वेदेवसम्बन्धि सामविषै स्तोभके देखनेतैं॥ ५६३ ऊकार अरु आदित्यके अन्य प्रकारसें सादृश्यकूँ कहैहैं।। ५६४ एकारके सामान्यतैं निवहकी दृष्टि एकाररूप स्तो- भविषै करनेकूं योग्य है। ऐसैं कहैहैं॥ ५६५ औहोयिकारकी विश्वेदेवनकी दृष्टिकरि उपासना- विषै हेतुकूं कहैहैं॥

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पनिषत् ] त्रयोदश खंड १३ २४९ सामके अवयवस्तोभाक्षरविषयकोपासन ४

प्रजापति हिङ्कार है। काहेतैं प्रजापतिकूं नि- रुक्तिका अविषय होनेतैं औ हिङ्कारकूं अव्यक्त ५६६

होनेतैं॥ प्राण स्वर है। कहिये "स्वर" ऐसा स्तोभ है। काहेतैं प्राणकूं औ (स्वरकूं) स्वरहेतुताके सामान्यतैं॥ अन्न या है। कहिये ""याँ" ऐसा स्तोभ अन्न है। अन्नकरि जातैं यह जाताहै। यातैं तिस सामान्यतैं ॥ वाक् ऐसा स्तोभ विराट् (अन्नरूप वा देवताविशेष) है। काहेतैं विराट संबंधि सामविषै स्तोभके देखनेतैं ॥ २ ॥

५६६ प्रजापतिकी दृष्टिकरि हिंकारकी उपास्यताविषै हे- तुकूं कहैहैं। इहां प्रजापतिकूं नील पीतादिरूपसैं निरुक्तिका अविषय होनेतैं। यह अर्थ है औ अव्यक्त होनेतैं। याका रू- पादिरहित होनेतैं। यह अथ है॥ अरु प्राणके। इस चकारतैं अरु सवरके। यह अर्थ है औ स्वरकी हेतुता कहिये ताकी निर्वाहकताकरि तदात्मकता है। ५६७ "अन्न या है" या वाक्यकूं व्याख्यान करैहैं॥ ५६८ अन्नकी दृष्टि "या" इस स्तोभविषै कर्तव्य है। इस अर्थविषै हेतुकूं कहैहैं। ५६९ विराट्की दृष्टि वाक् इस स्तोभविषै करनेकूं योग्य है। इस अर्थविषै हेतुकूं कहैहैं॥

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२५० प्रथमप्रपाठक १ [छान्दोग्यो- उद्गीथ आदिकके उपासन १३ अनिरुक्तस्त्रयोदशः सतोभ: सञ्चरो हुंकारः॥ ३ ॥ अर्थ :- अनिरुक्त सञ्चर त्रयोदश स्तोम हुंकार है॥ ३ ॥

टीका :- अनिरुक्त है अँव्यक्त होनेतैं। यह है अरु यह है ऐसें निर्वचन करनेकूं शक्य नहीं होवैहै यातैं सञ्चर है । अर्थ यह जो :- वि- कल्पमान स्वरूपवाला है। ॥ कौंन यह है? यह कहैहैं :- त्रयोदश स्तोभरूप हुंकार है। अव्यक्तरूप जातैं यह है। यातें अनिरुक्त- विशेषहीं उपास्य है। यह अभिप्राय है॥ ३॥ ५७० अनिरुक्त जो कारणात्मा है। ताके अनिरुक्तपनैकूं साधते हैं॥ इहां औ सो अनेकप्रकारकरि कार्यरूपसें सश्चरता है यातैं सश्चर है औ हुंकार वी है औ शाखाभेदकरि विक- लव्यमानस्वरूपवाला त्रयोदश है कहिये "यह हीं लोक" ऐस आरंभकरिके गण्यमान (परिगणित) है औ तातैं कारण छ- ष्टिकरि हुंकारकूं उपासन करै। यह अर्थ है। ५७१ उक्त अर्थकूंहीं उपपादन करै हैं॥ इधर तहां विक- ल्प्यमानका रूप हेतु है॥।

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पनिषत् ] त्रयोदश खंड १२ २५१ सामके अवयवस्तोभाक्षरविषयकोपासन ४ दुग्धेडस्मै वाग्दोहं। यो वाचो दो- होऽन्नवानन्नादो भवति। य एतामेव

अर्थ :- इसके अर्थ वाक् दोहकूं दोहन करैहै। जो वाक्का दोह है। अन्नदान् अ- न्नाद होवैहै। जो इस ऐसी सामोंकी उप-

टीका :- रतोभरूप अक्षरोंकी उपासनाके फ- लकूं कहैहै :- इसकेअर्थ वाक दोहकूं दोहन करैहै। यह वाक्य पूर्व उक्त अर्थवाला है॥ जो इस ऐसी उक्त लक्षणवाली सामोंकी सामके अवयवरूप स्तोभरूप अक्षरोंकूं विषय करनेवाली उपनिषत् (दर्शन)कूं जानताहै। ताकूं यह य- थोक्त (जैसा कहा तैसा) फल होवैहै। यह अर्थ है।। इहां दो अभ्यास अध्यायकी परिसमाप्ति ५७३

५७२ ये व्यस्त उपासन नहीं हैं। काहेतैं प्रत्येकके फ- लके अश्रवणतैं। किन्तु समस्तरूप फेर एक यह उपासन है। काहेतैं एक फलवाला होनेतैं। इस अभिप्रायकरिके कहैहैं॥ ५७३ उपनिषत्कूं जानताहै। उपनिषत्कूं जानताहै।

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२५२ प्रथमप्रपाठक १ [छान्दोग्यो- उद्गीथ आदिकके उपासन १३ साम्नामुपनिषदं वेदोपनिषदं वेद ॥४॥ इति श्रीछान्दोग्योपनिषदि प्रथमप्रपाठकस्य त्रयोदशः खण्डः समापः ॥ १३॥ समाप्तोडयं प्रथम: प्रपाठकः ॥१॥ निषत्कूं जानताहै। उपनिषत्कूं जानता है।। ४ । इति श्रीछांदोग्योपनिषन्मूलमात्रभाषादीपिकायां प्रथमप्रपाठकंस्य त्रयोदशः खण्डः समात्ः॥१३॥ अर्थ है। वा सामके अवयवविषयक उपसन वि- शेषकी परिसमाप्तिके अर्थ है। इति ॥ ४ ॥ इति श्री छान्दोग्योपनिषद्वाष्यभाषादीपिकायां प्रथम प्रपाठकस्य त्रयोदशः खंडः समाप्ः ॥१३॥ समाप्तेयं प्रथमप्रपाठकभाष्यभाषादीपिका ॥ १॥ इस आवृत्तिके तात्पर्यकूं कहैहैं॥ इहां प्रथमप्रपाठक (अ व्याय) के व्याख्यानकी समाप्तिविषै "इति" शब्द है॥ इति श्रीछान्दोग्योपनिषद्धाष्यभाषादीपिकायां प्रथमप्रपाठ- कगत-त्रयोदशखंडस्य टिप्पणं समाप्रम् ॥ १३।। समाप्तोयं प्रथमप्रपाठकस्य टिप्पणिका ॥१॥

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अथ श्रीद्वितीय प्रपाठकारंभ:२

समस्तसामके उपासन २४ अथ श्रीछान्दोग्योपनिषदो द्वितीयप्र- पाठकस्य प्रथम: खंड: प्रारभ्यते॥१॥ ॐ समस्तस्य खलु साम्र उपासन अथ श्रीछान्दोग्योपनिषन्मूलमात्रभाषादीपिकाया द्वि. तीयप्रपाठकस्य प्रथमः खंडः प्रारभ्यते ॥ १ ॥ अर्थ :- समस्त सामका उपासन साधु

द्वितीयप्रपाठकस्य प्रथम: खंडः प्रारभ्यते॥१॥ साधुदृष्टिसैं समस्त सामकी उपासना 8 टीका :- "ॐ ऐसा यह अक्षर है" इत्यादि वाक्यकरि सामके अवयवविषयक अनेकफल- वाला उपासन उपदेश किया औ अनन्तर स्तो- भके अक्षरोंकू विषयकरनेवाला उपासन कहा। सर्वथा बी सामके एकदेशसैं सम्बन्धवालाहीं सो अथ श्रीछान्दोग्योपनिषद्भाष्यभाषादीपिकायाः द्विती यप्रपाठकगतप्रथमखंडस्य टिप्पणं प्रारभ्यते ? १ पूर्व उत्तर प्रपाठक (अध्याय)नकी सङ्गतिकूं दिखावै- २२

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२५४ द्वितीयप्रपाठक २ [छान्दोग्यो- समस्तसामके उपासन २४ साधु। यत्खल साधु तत्सामेत्याचक्षते। यदसाधु तदसामेति॥9॥ है। जो साधु है सो साम है। ऐसैं कहते हैं :- जो असाधु है सो असाम है। ऐसैं ॥१॥ है इति॥ अनन्तर अब समस्त सामविषै सम- स्तसामकूं विषयकरनेवाले उपासनोंकू कहूंगी। ऐसैं श्रुति आरंभ करैहै॥ जातैं एकदेशके उ- पासनके अनन्तर एकदेशीकूं विषयकरनेवाला उपासन कहियेहै। यह युक्त है :- समस्तका कहिये सर्व अवयवोंकरि विशिष्ठका । अर्थ यह हैं।। इहां सर्वथाबी। याका सामके अवयवरूप विषयवान- ताके हुये अरु स्तोभके अक्षररूप विषयवान्ताके हुये। यह अर्थ है औ इति शब्द हेतुके अर्थ है ;- कहिये जातें एकदेश- विषयक उपासन कहे तातैं वे समस्तविषयक कहनेकूं योग्य हैं। यह इति शब्दका अर्थ है।। औ एकदेशके उपासनके व्या ख्यानकी अनन्तरता अथशब्दका अर्थ है।। २ उक्त अरु वक्ष्यमाण उपासनोंका यह पूर्व अपरपना कैसैं है ? तहां कहैहैं॥ ३ ननु समस्तका उपासन साधु (श्रेष्ठ) है। इस वच- नतें जो अवयवका उपासन है सो निन्दित होनेतें अनु- ष्वान करनेकूं योग्य नहीं है? यह आशङ्गाकरिके कहैहैं॥

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पनिषत् ] प्रथम खंड १ २५५ साधुदृष्टिसैं समस्त सामकी उपासना ४ जो :- पांच भक्तिवालेका अरु सात भक्तिवा- लेका। [इहां "खल" यह शब्द वाक्यके अल- ङ्वारअर्थ है] उक्तप्रकारके सामका उपासन साधु (शोभन) है। इहां समस्त सामविषै साधु दृष्टिके विधिपर होनेतैं साधुशब्दकूं पूर्वउक्त उ- पासनोंकी निंदारूप अर्थवान्ता नहीं है॥। ॥ नेंनु पूर्वत्र अविद्यमान जो साधुपना सो समस्त सामविषै कहियेहै [ यातैं अर्थात् निन्दा है] ? येह कथन बनै नहीं :- काहेतैं "साधु साम है। ऐसैं उपासताहै" ऐसैं उपसंहारतैं साधु शब्द शो- भनरूप अर्थका वाची है।। ॥ नतु यह कैसैं जानियेहै ? यह कहैहैं :- जो लोकविषै साधु क- हिये शोभन (अनवद्य) प्रसिद्ध है। सो साम ४ अर्थतैं साधु शब्दका अर्थ पूर्व उक्त उपासनकी निन्दा है? ऐसैं पूर्ववादी शंका करैहै॥ ५ पूर्वविषैबी विद्यमानहीं साधुपनैके विशेषणभावकारि अग्रहणतैं अर्थतैंबी निन्दा नहीं है। ऐसैं सिद्धान्ती परिहार करैहैं॥ ६ "जो खलु " इत्यादि वाक्यकूं व्याख्यान करनेकूं पा- तनिकाकूं कहैहैं। ७ वाक्यकूं अवतार देके व्याख्यान करैहैं॥

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२५६ द्वितीयप्रपाठक २ [छान्दोग्यो- समस्तसामके उपासन २४ तदुताप्याहुः साम्नैनमुपागादिति साधुनैनमुपागादित्येव तदाहुरसान्नैन अर्थ :- तहांहीं बी कहतेहैं :- सामकरि इसके प्रति उपगमन करताभया ऐसैं। साधुकरि इसके प्रति उपगमन करताभया है। ऐसें कुशल पुरुष कहतेहैं औ जो असा- धु कहिये विपरीत है। सो असाम है। ऐसैं [कहतेहैं]॥ १ ॥ टीका :- तहांहीं साधु अरु असाधुके वि- वेकके करणविषै उपायभेदके विकल्पअर्थ बी कहतेहैं :- सामकरि इस राजाके प्रति अरु सामन्तके प्रति उपगमन करताभया॥ कौंन यह किः-जिसतैं असाधुभावकी प्राप्तिकी आ- शंका है सो। यह अभिप्राय है॥ शोभेन अ- ८ फेर ऐसे विवेकके करणविषै कारण क्या है ? यह आ- शङ्काकरिके कहैहैं॥ इहां विवेककरणके उपायके भेदके विक- ल्पअर्थ "उत" ऐसा उभयत्र (दोनूं वाक्यनविषै) पद है॥ ९ "सामकरि इसके प्रति" इत्यादि वाक्यकरि "साधु-

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पनिषत् ] प्रथम खंड १ साधुदृष्टिसैं समस्त सामकी उपासना ४ २५७

मुपागादित्यसाधुनैनमुपागादित्येव त- दाहुः॥ २॥ ऐसैंहीं ताकूँ कहतेहैं ॥ औ असामकरि इ- सके प्रति उपगमन करताभया ऐसैं। अ- साधुकरि इसके प्रति उपगमन करताभया ऐसैंहीं ताकूं कहतेहैं॥ २ ॥

भिप्रायसैं साधुकरि इसके प्रति उपगमन करताभया। ऐसैंहीं है॥ तहां लौकिकजन वैन्धन आदिक असाधु कार्यकूं नहीं देखतेहुये कहतेहैं ॥ जैहां फेर विपर्यय है किः-बन्धन आदिक असाधुकार्यकूं देखतेहैं। तहां असा- मकरि इसके प्रति उपगमन करताभया।

करि" इत्यादि वाक्यकी पुनरुक्तिकूं आशङ्काकरिके। व्याख्यान अरु व्याख्यान करनेयोग्यके भावतैं ऐसें मति कहो। यह कहैहैं॥ इहां शोभनाभिप्रायकरि। याका शोभन कार्यके दर्शनके होते। यह अर्थ है॥ १० तहांहीं अन्य हेतुकूं कहैहैं॥ ११ "असामकरि" इत्यादि वाक्यकूं व्याख्यान करैहैं॥

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२५८ द्वितीयप्रपाठक २ [छान्दोग्यो समस्तसामके उपासन २४ अथोताप्याहुः साम नो वतेति य- त्साधु भवति साधु बतेत्येव तदाहुरसा- अर्थ :- अनन्तरहीं बी कहतेहैं :- साम हमारेकूं प्राप्तभया ऐसैं। जो साधु होवैहै। साधु है। ऐसैंहीं ताकूं कहतेहैं। असाम ऐसैं असाधुकरि इसके प्रति उमगमन क- रताभया। ऐसैंहीं ताकू कहतेहैं॥ २॥ टीका :- अनन्तर उपायभेदके विकल्प अर्थ बी कहते हैं :- सवैसंवेद साम हमारेकूं बत कहिये अनुकंपाकरनेवालेतैं प्रातभया है। ऐसैं कहते हैं॥ यैह तिनोंकरि उक्त होवैहैः-जो साधु १२ कार्यकरि गम्य साधुपनैकूं अरु असाधुपनैकूं कहिके। अव स्वानुभवकरि गम्य तिस उभयकूं उपन्यास करैहैं॥ इहां कार्यतैं तिसके साधुपनें आदिकके विवेककी अनन्तरता अथ शब्दका अर्थ है औ स्वसंवेद (स्वानुभवगस्य) । साधु" पना अरु असाधुपना। यह शेष है।। १३ तहां साधुपना स्वानुभवकरि सिद्ध है। इस अर्थकूं व्युत्पादन करैहैं॥ १४ "जो साधु" इत्यादि वाक्यकी पूर्ववाक्यसैं पुनर- क्तिकूं आशङ्काकरिके कहैहैं॥

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पनिषत् ] प्रथम खंड १ २५९ साधुदृष्टिसैं समस्त सामकी उपासना ४ मनो बतेति यदसाधु भवत्यसाधु बते- त्येव तदाहुः॥ ३॥ स य एतदेवं विद्वान् साधु सामेत्यु- हमारेकूं प्राप्तभया ऐसैं। जो असाधु हो- वैहै। असाधु है। ऐसैंहीं ताकूं कहते हैं॥।३॥ अर्थ :- सो जो इसकूं ऐसैं विद्वान् हुया होवैहै सो साधु है ऐसैंहीं ताकूं कहतेहैं॥ औ विपर्ययके भये असाम हमकूं भया ऐसैं। जो असाधु होवैहै असाधु भया ऐसैंहीं ताकूं कहते हैं। जाँतैं साम अरु साधु इन दो शब्दनकी एकार्थता सिद्ध है॥ ३॥ टीका :- यातैं सो जो कोई बी"साधु साम १५ "असाम" इत्यादि वाक्यकूं व्याख्यान करैहैं॥ इहां बत (खेद है) ऐसैं कहते हैं। इस रीतिसैं सम्बन्ध है। १६ तिनोंकरि क्या उक्त होवैहै ? सो कहैहैं॥ १७ साधु शब्द शोभनका वाची है। ऐसें उक्त अ- र्थकूं उपसंहार करैहैं। इहां तिन (साम अरु साधु) इन दो शब्दनकी एकअर्थवान्ता "यातैं" शब्दका अर्थ है॥।

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२६० द्वितीयप्रपाठक२ समस्तसामके उपासन २४ [छान्दोग्यो-

पास्तेऽभ्याशो ह यदेन साधवो धर्म्मा आ च गच्छेुरुप च नमेयुः ॥४॥ इति श्रीछान्दोग्योपनिषदि द्वितीयप्रपाठकस्य प्रथम: खंडः समापः ॥१॥ साधु साम है ऐसैं उपासताहै। इसकूं साधु धर्म आवतेहैं औ भोग्यभावकरि उ- पस्थित होतेहैं। ऐसा जो है सो अभ्यासहीं (शीघ्रहीं) होवैहै ॥ ४ ॥ इति श्रीछान्दोग्योपनिषन्मूलमात्रभाषादीपि- कायां द्वितीयप्रपाठकस्य प्रथमःखंडःसमाप्तः॥।१। है" ऐसें सामकूं साधुगुणवाला जानता हुया समस्त साधुगुणवाले सामकूं उपासताहै ताकूं यह फल होवैहै :- इस उपासकके प्रति साधु (शोभन) श्रुति स्मृतिसैं अविरुद्ध धर्म आवते-

१८ उपासककूंहीं विशेषण देते हैं। इहां आवते हैं ऐसा जो है सो क्षिप्र (शीघ्र) है। ऐसैं क्रियाका विशेषणपना यत् (जो) इस पदका देखनेकूं योग्य है। इति द्वितीयप्रपाठकगत-प्रथमखण्डस्य टिप्पणं। १ ॥

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पनिषत् ] द्वितीय खंड २ लोकदृष्टिसैं पञ्चविधसामोपासना २ २६१

अथ द्वितीयप्रपाठकस्य द्वितीय: खंड:।। लोकेषु पञ्चविधर सामोपासीत। अथ श्री०मूलभाषा० द्वि०प्रपाठकस्य द्वितीयः खंड:२ अर्थः-लोकनविषै पञ्चविध सामकूं उ- हैं। केवल आवतेहैं ऐसैं नहीं किन्तु भोग्यभा- वकरि उपस्थित होवैहैं। ऐसा जो (फल) है सो अभ्यास (शीघ्र) हीं होवैहै॥ यह अर्थ है॥४॥ इति श्रीछान्दोग्योपनिषद् भाष्यभाषादीपिकायां द्वितीय प्रपाठकस्य प्रथम: खंड: समासः॥१॥ अथ श्री०भाष्यभाषा·द्वितीयप्रपा० द्वितीयः खंड: २ लोकदृष्टिसैं पञ्चविधसामोपासना २ टीका :- कौंन फेर वे साधुदृष्टिकरि विशिष्ट समस्त साम उपास्य हैं? यातैं वे कहियेहैं :- लोकनविषै पञ्चविध सामकूं उपासन करै। इत्यादिक॥ ॥ नैनु लोक आदिककी दृष्टि अथ द्वितीयप्रपाठकगत-द्वितीयखण्डस्य टिप्पणम्? १९ ननु एककूं उभयदृष्टिकी विषयता अयुक्त है। जातैं घटदष्टिका गोचरहुया पटदृष्टिका वी गोचर नहीं होवैगा? ऐसैं पूर्ववादी शङ्का करैहै।।

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२६२ द्वितीयप्रपाठक २ [छान्दोग्यो- समस्तसामके उपासन २४ पृथिवी हिङ्कारोऽग्नि:प्रस्तावोऽन्तरिक्षमु- द्वीथ आदित्यः प्रतिहारो दयौर्निधन- मित्यूर्द्देषु॥ १ ॥ पासन करै। पथिवी हिङ्कार है। अभ्नि प्र- स्ताव है। अन्तरिक्ष उद्गीथ है। आदित्य प्र- तिहार है। दौः निधन है। ऐसैं ऊर्ध्वन- विषै ॥ १ ॥

करि वे (साम) उपास्य हैं औ साघुदृष्टिकरि [उपास्य हैं] यह विरुद्ध है ? यह कथन बनै नहीं :- काहे तैं लोकादि कार्यनविषै साधु शब्दके अर्थरूप कारणकूं अनुगत होनेतैं घटादि वि- कारनविषै मृतिकाआदिककीन्यांई॥ सौधु श- २० एकविषैवी प्रस्तुतदृष्टिकाद्वय अविरुद्ध है । ऐसैं सि- द्धान्ती समाधान करैहैं॥ इहां यह अर्थ है :- जैसै घटआदि- कनविषै मृत्तिकाआदिक अनुगत है। ऐसैं साधु शब्दके अर्थ- रूप कारणकूँं लोक आदिक कार्यनविषै अनुगत होनेतें ताकी दष्टिविषै साधुकी दृष्टिके अनुगमतैं एक ठिकानें दो दृष्टिका विरोध नहीं है॥ २१ ताहींकूं स्पष्ट करैहैं।। इहां साधु शब्दके अर्थकी

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पनिषत् ] द्वितीय खंड २ लोकदृष्टिसैं पञ्चविघसामोपासना २ २६३

व्दका वाच्यअर्थ धर्म है वा ब्रह्म है। सर्वथा बी लोकादिकार्यनविषै अनुगत है। यातैं जैसैं जहां घटादि दृष्टि है तहां सो (घटादि दृ्टि) मृतिकाआदिककी दृष्टिकरि अनुगत हीं है॥ ऐसैं लोकआदिककी जो दृष्टि है सो साधुदृ- ष्टिकरि अनुगतहीं है। काहेतैं लोकआदिकनकूं धर्मआदिकका कार्य होनेतैं ॥ ॥ यैद्यपि ब्रह्म अरु धर्मका कारणपना समान है। तथापि धर्महीं साघुशब्दका वाच्य है। ऐसैं युक्त है। लोकनविषै अनुगति अपि (बी) शब्दका अर्थ है औ "जहां" ऐसें देवदत्तकी उक्ति है औ सो घटादिककी दृष्टि है। तहां। यह शेष है।। २२ ननु साधु शब्दके अर्थरूप धर्म अरु व्रह्मका तुल्यका- रणपना है। तैसैं हुये इहां साधुशब्दका अर्थ व्यवस्थित नहीं होवैगा औ अनेक अर्थवान्तारूप अन्याय होवैगा ? यह आशङ्काकरिके कहैहैं॥ इहां धर्महीं। इसठिकाने तथापि ऐसैं कहनेकूं योग्य है। औ परमानंदरूप ब्रह्मविषैतौ साधुशब्द भ- क्तिकरि जाननेकूं योग्य है औ धर्मकी निमित्तकारण होनेतैं कार्यविषै अनुगति नहीं है ऐसें कहनेकूं योग्य नहीं है। का- हेतैं कर्मके अपूर्वसहित दधि दुग्धआदिकनके अवयवनके स- मुदायकूं धर्म होनेतैं औ कार्यकूं ताका परिणाम होनेतैं। तिस कार्यविषै ताकी अनुगतिकी सिद्धितैं। ऐसें देखनेकूं योग्य है।।

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२६४ द्वितीयप्रपाठक २ [छान्दोग्यो- समस्तसामके उपासन २४ काहेतैं "साधुकारी साधु होवैहै" ऐसें धर्मविषै साधुशब्दके प्रयोगतैं॥ ॥ नैतु लोकआदिक कार्यनविषै कारणकूं अनुगत होनेतें अर्थतैं प्रा- सहीं ता (साधु)की दृष्टि है। यातें "साधु साम है। ऐसैं उपासताहै" ऐसें कहनेकूं योग्य नहीं है? सो बनै नहीं :- काहेतें तो (साधु)की दृष्टिकूं शास्त्रगम्य होनेतैं। जातें सर्वत्र शास्त्रकरि प्रापितहीं धर्म उपास्य हैं। विद्यामान बी अ- शास्त्रीय [धर्म उपास्य] नहीं॥ ॥ पृथिवी आदिक लोकनविषै पञ्चविध कहिये पंचभ क्तिके भेदकरि पांचप्रकारके साधु समस्त सामकूँं उपासनकरै ।। ॥ कैसैं कि :- प- थिवी हिङ्गार है। इहां "लोकेनविषै" ऐसी २३ अपूर्वपनैके अभावकरि पूर्ववादी विधिके प्रति आक्षे- प करैहै। २४ कारणके अनुगमकी अनुमानकरि सिद्धताके हु- येबी ताकी दृष्टिका कर्तापना अपूर्व हीं है। ऐसें सिद्धान्ती परिहार करैहैं। २५ "औ जो अर्थतैं अर्थ है सो चोदना(विधि)रूप अर्थवाला नहीं है" इस न्यायकरि उक्तकूं विवरण करैहैं॥ २६ "लोकनविषै" इत्यादि वाक्यमैं पश्चविध सामकी

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पनिषत् ] द्वितीय खंड २ लोकदष्टिसैं पञ्चविधसामोपासना २ २६५

जो सप्तमी है ताकूं प्रथमापनैकरि पलटायके पृथिवीदृष्टिकरि हिङ्काररूप ध्येयके होते। पृ- थिवी हिङ्कार है। ऐसैं उपासनकरै॥ वा लो- केविषयक सप्तमीकी श्रुतिकूं पलटायके हिङ्कार आदिकनविषै प्ृथिवीआदिककी दृष्टिकूं क- रिके उपासनकरै ॥ तहां पृथिवी हिङ्कार है। दृष्टिकरि लोकनकी उपास्यताकी प्रतीतितैं इहांबी हिङ्कारकी दृष्टिकरि पृथिवीकी व्येयताके प्राप्तहुये प्रत्युत्तर कहैहैं। इहां यह अर्थ है :- लोक जे हैं सो पश्चविध साम है। ऐसैं उपा- सन करै। इस रीतिसैं विभक्तिके विपरिणामसैं प्रथमवाक्यके अर्थके पर्यवसानतैं ताके अनुसारकरि इहांवी पृथिवीकी द- ष्टिकरि हिङ्काररूप ध्येयके हुये । पृथिवी हिङ्कार है ऐसैं पृ- थिवीकी दृष्टिकूं आरोप करिके हिङ्कारकूं उपासन करै। ऐसैं द्वितीय वाक्य पर्यवसानकूं पावता है॥ २७ लोकनसैं सम्बन्धवाली सप्तमी हिङ्कार आदिकनविषै अरु तिनसैं सम्बधवाली द्वितीया लोकनविषै लगावनेकूं योग्य है। तैसैं हुये लोकविषयक सप्तमीकी श्रुति हिक्कार आदिक- नविषै औ तिनसैं सम्बधवाली द्वितीया लोकनविषै व्यत्यय (स्परस्परविषै परस्परका आरोप)करिके पृथिवी आदिककी दृष्टिकूं हिङ्कार आदिकनविषै करिके उपासन करै। ऐसैं अ- न्यपक्षकूं कहैहैं॥ २८ "ब्रह्मदृष्टि उत्कर्षतैं है" इस न्यायकरि पक्षद्वयकूं क- हिके। अब प्रतिवाक्यकूं व्याख्यान करैहें ॥ इहां "तहां" २३

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२६६ द्वितीयप्रपाठक २ समस्तसामके उपासन २४ [छान्दोग्यो-

प्रैथमताके सामान्यतैं॥ अनि प्रस्ताव है। अं- ग्निविषै जातैं कर्म प्रस्तुत करियेहै औ प्रस्ताव भक्ति है। अन्तरिक्ष उद्गीथ है। अैन्तरिक्ष जातैं गगन है औ गकारविशिष्ट उद्गीथ है॥ आदित्य प्रतिहार है। मेरे प्रति मेरे प्रति ऐसैं प्रति प्राणिनकूं अभिमुख होनेतैं ॥ दौः (स्वर्ग) निधन है। जातें इहांतें गये प्राणी इस सप्तमीका उक्त रीतिसैं अन्यउपासनके प्रस्तुत हुये। यह अर्थ है।। २९ अभ्यासकूं सादृश्यका कारण होनेतें स्पष्ट सादृश्यके अभाव हुयेबी जिस किस प्रकासैं सादृश्य कल्पना करनेकूं योग्य है ऐसें मानिके कहैहैं॥ इहां लोकनविषै पृथिवीकी औ सामोविषै हिङ्कारकी प्रथमता है। तिस सामान्यतैं। यह उक्त हेतुका अर्थ है।। ३० अग्निकी दृष्टिकरि प्रस्तावके उपासनविषै प्रस्तावपनैं- रूप सामान्यकूं कहैहैं॥ ३१ अन्तरिक्षकी दृष्टिकरि उद्गीथके उपासनविषै गकारसैं सम्बंधरूप सादृश्यकूं दिखावै हैं। ३२ आदित्यकी दृष्टिकरि प्रतिहारकी उपासनाविषै प्रति- शब्दके सामान्यरूप हेतुकूं कहैहैं॥ ३३ स्वर्गकी दृष्टिकरि निधनके उपासनविषै निधनतारूप सामान्यकूं कहैहैं॥

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पनिषत् ] ] द्वितीय खंड २ २६७ लोकदष्टिसैं पञ्चविधसामोपासना २

अथाSऽवृत्तेषु॥ दयौर्हिङ्कार आदित्य: अर्थः-अनन्तर आवत्तनविषै। धौः हि- द्वार है। आदित्य प्रस्ताव है। अन्तरिक्ष स्वर्गविषै निधान (स्थापन) करियेहैं॥ इस रीतिसैं ऊर्ध्वगत लोकनविषै लोकदृष्टिकरि सामका उपासन है ॥ १॥ टीका :- अनन्तर आवृत्तनविषै कहिये नीचे मुखवाले लोकनविषैपांच प्रकारका सामका उपासन कहियेहै। जातैं गति अरु आगति ३४ उक्त उपासनकूं उपसंहार करैहैं। ३५ "अनन्तर आवृत्तनविषै" या वाक्यकूं व्याख्यान क- रैहैं। इहां पृथिवीआदिक स्वर्गपर्यन्त लोकनविषै पञ्चविध- सामके उपासनके कथनतैं अनन्तरता अथशब्दका अर्थ है।। ३६ पूर्व उत्तर ग्रन्थनके परस्परतैं विरोधकूं शङ्काकरिके परिहार करैहें॥ इहां यह अर्थ है :- वा जैसैं वे लोक गति (गमन ) विशिष्ट हैं तैसी दृष्टिकरिहीं हिङ्कारआदिकका उपा- सन विधानकिया औ जैसें आगति (परलोकतैं आगमन) विशिष्ट वे लोक हैं तैसी दृष्टिकरिहीं तिनका उपासन विधान करिये है। तैसैंहुये शास्त्र अनुसारकरि क्रियमाण दो उपासनोंका विरोध नहीं है।।

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२६८ द्वितीयप्रपाठक २ समस्तसामके उपासन २४ [छान्दोग्यो-

प्रस्तावोऽन्तरिक्षमुद्धीथोऽग्रिः प्रतिहार: पथिवी निधनम् ॥२ ॥ उद्गीथ है। अन्नि प्रतिहार है। पृथिवी निधन है। २ ॥ (गमनागमन) करि विशिष्ट लोक हैं। जैसैं वे हैं तैसी दृष्टिकरिहीं सामका उपासन विधान करिये हैः-जातैं ऐसैं है यातें आवृत्त लोकन- विषै। द्यौः (स्वर्गलोक) हिङ्गार है। प्रैथम होनेतैं॥ आदित्य प्रस्ताव है। जातैं आदि- त्यके उदित हुये प्राणीनके कर्म प्रस्तुत करिये ३७ दो प्रकारकी उपासनारूप विषयवाले पूर्व अपररूप दोग्रन्थनके विरोधके अभावकूं अनुवादकरि फलित उपा- सनकूं दिखावैहैं॥ ३८ स्वर्गलोककी दष्टिकरि हिङ्कारकी उपास्यताविषै हे- तुकूं कहैहैं।। इहां आवृत्तिविषै औ स्वर्गलोकके आरम्भविषै हिङ्कारकी प्रथमता देखनेकूं योग्य है। ३९ आदित्यकी दृष्टिकरि प्रस्तावकी उपास्यताविषै हे- तुकूं कहैहैं। इहां पूर्ववत्। ऐसैं गकार अक्षरका सामान्य वि- वक्षित है।।

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पनिषत् ] द्वितीय खंड २ २६९ लोकदृष्टिसैं पञ्चविघसामोपासन २ कल्पन्ते हास्मै लोका ऊर्ध्वाश्राट- अर्थः-इसकेअर्थ ऊर्ध्व औ आवृत्त लोक समर्थ होतेहैं। जो इसकू ऐसैं विद्वान्

हैं। अन्तरिक्ष उद्गीथ है। पूर्ववत् [गका- रका सामान्य है]॥ अग्नि प्रतिहार है। प्रींणी- नकरि अभनिके प्रतिहरणतैं। पथिवी निधन है। तहां (स्वर्ग)तैं आगत प्राणीनके इहां (पृ- थिवीविषै) निधन (स्थापन)तैं।२॥ टीका :- उपासनका फल :- इसके अर्थ ऊ- धर्व औ आवृत्त गति आगति विशिष्ट लोक समर्थ होतेहैं। अर्थ यह जो :- भोग्यभावकरि व्यवस्थित होतेहैं। जो इसकूं ऐसैं विद्वान् हुया लोकनविषै "पञ्चविध समस्त साधु साम

४० अग्निकी दृष्टिकरि प्रतिहारकी उपासनाविषै हेतुकूं कहैहैं॥ इहां प्रतिहरण कहिये इहांतैं तहांतैं यज्ञसंबंधि वस्तुकूं लेजाना है। सोई प्रतिहार शब्दका अर्थ है। ताके कर्ताकूं प्रतिहर्ता कहैहैं ॥

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२७० द्वितीयप्रपाठक २ समस्तसामके उपासन २४ [छान्दोग्यो-

त्ताश्च। य एतदेवं विद्ाँलोकेषु पञ्चविध सामोपासते॥३॥ इति द्वितीयप्रपाठकस्य द्वितीयः खण्डः॥ २॥ अथ द्वितीयप्रपाठकस्य तृतीय: खंड:३ वृष्टौ पञ्चविध सामोपासीत॥ पुरो हुया लोकनविषै पञ्चविध सामकूं उपासता- है।। ३ ॥ ha अथ श्री०मूलभाषा०द्वितीयप्रपा०तृतीयः खण्डः ॥३॥ अर्थः-वृष्टिविषै पञ्चविधसामकूं उपा- है" ऐसैं उपसताहै॥ ऐसें सर्वत्र कहिये पश्च- विधविषै अरु सप्तविधविषै योजना है॥ ३॥ इति श्री० भाष्यभाषा०द्वितीयप्रपाठकस्य द्वितीय: खण्डः२ अथ श्री०भाष्यभाषाद्वितीयप्रपा० तृतीयः खण्डः ३ वृष्टिदृष्टिसैं पश्चविधसामोपासना २ टीका :- वृष्टिविषै पञ्चविध सामकूं उपा- ४१ साधु। यह पद सर्वत्र देखनेकूं योग्य है। ऐसें कहैहैं॥ ४२ यह सर्वत्र। इस पदकी व्याख्या है॥ इति द्वितीयप्रपाठकगत-द्वितीयखण्डस्य टिप्पणं ॥ २ ॥

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पनिषत्] तृतीय खंड ३ २७१ वृष्टिदृष्टिसैं पञ्चविघसामोपासना २ वातो हिक्कारो मेघो जायते स प्रस्तावो वर्षति स उद्गीथो विद्योतते स्तनयति स प्रतिहारः॥ १॥ सन करै :- पुरावात हिङ्कार है। मेघ उप- जताहै सो प्रस्ताव है । वर्षताहै सो उद्गीथ है। विद्योतन करैहै गजर्न करैहै सो प्रतिहार है॥ १ ॥ सन करैः-इहां लोकेनकी स्थितिकूं वृष्टिरूप निमित्तवाली होनेतैं या (तदुपयोगी वृष्टि)की अनन्तरता है। पुरोवात हिङ्कार है। जातैं पु- रोवातसैं आदिलेके उद्धहणपर्यन्त वृष्टि है। जैसैं साम हिङ्कारसैं आदिलेके निधनपर्यन्त है। अथ द्वितीयप्रपाठकगत तृतीयखण्डस्य टिप्पणम् ३ ४३ ननु लोकदृष्टिकरि सामकी उपासनाके अनन्तर वृ- ष्टिकी दृष्टिकरि ता सामकी उपासना क्यूं उपन्यास करियेहै? तहां कहैहैं॥ ४४ पुरोवातकी दृष्टिकरि हिङ्कारके उपासनविषै हेतुकूं कहैहैं॥। इहां उङ्गहण कहिये वर्षाका उपसंहरण (स- माप्ि) है।।

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२७२ द्वितीयप्रपाठक २ [छान्दोग्यो- समस्तसामके उपासन २४ उद्गह्राति तन्निधनं। वर्षति हास्मै अर्थ :- उद्ग्रहण करैहै सो निधन (अन्त) है।। इसके अर्थ वर्षताहै । वर्षावताहै। यातैं पुरोवात हिङ्कार है। प्रथम होनेतैं ॥ मेघ उपजताहै सो प्रस्ताव है। जातैं वर्षाकालविषै मेघके जननमैं वृष्टिका प्रस्ताव है ऐसी प्र- सिद्धि है ॥ वर्षताहै सो उद्गीथ है। श्रेष्ट हो- नेतैं। विद्योतन करैहै अरु गर्जन करैहै सो प्रतिहार है प्रतिहृत (विप्रकीर्ण) होनेतैं ॥१॥ टीका :- उद्धहण करैहै सो निधन है। सैमा ४५ अतः (यातैं) शब्दके अर्थकूं कहैहैं ॥ ४६ मेधके जन्मकी दृष्टिकरि प्रस्तावकी उपासनाविषै हे- तुकूं कहैहैं॥। ४७ वर्षणकी दृष्टिकरि उद्गीथके उपासनविषै हेतुकूं कहैहैं। ४८ विद्योतन (बीजली) अरु स्तनयित्नु (मेघशब्द)की दृष्टिकरि प्रतिहारके उपासनविषै कारणकूं कहैहैं॥ इहां यह अर्थ है :- विद्युतनका अरु स्तनयित्तुनका प्रतिहतपना कहिये विप्रकीर्णपना (फैलना) है। तिसकरि प्रतिशब्दके सादृश्यते विद्योतन आदिककी दृष्टिकरिप्रतिहारकी उपासना कर्तव्य है। ४९ उन्गहणकी दृष्टिकरि निधनके उपासनविषै कारणकूं कहैहैं॥

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पनिषत् ] तृतीय खंड ३ २७३ वृष्टिदृष्टिसैं पञ्चविधसामोपासना २ वर्षयति ह। य एतदेवं विद्वान् वृष्टौ प- ञ्ञविध सामोपासे ॥२॥ इति द्वितीयप्रपाठकस्य तृतीयः खण्डः ॥ ३ ॥ जो इसकूं ऐसैं विद्वान् हुया वृष्टिविषै पं- चविधसामकूं उपासताहै॥ २॥ इति श्री०मूलभा०द्वितीयप्रपा०तृतीयःखण्ड: ३ पनिके सामान्यतैं ।। उपासनका फलः-इसके अर्थ इच्छातैं ( इच्छाके अनुसार) वर्षताहै। तैसैं वृष्टिके नें होते बी आप वर्षावताहै। जो इसकूं। इत्यादि पूर्वकी न्यांई है॥ २ ॥ इति श्री० भाष्यभाषा०द्वि०प्रपाठकस्य तृतीय:खण्डः॥३॥ ५० ननु मेघके वर्षते हुये ताका अनुमन्तापना अकिश्चि- त्कर है ? यह आशङ्काकरिके कहैहैं॥ इति द्वितीयप्रपाठकंगत तृतीयखण्डस्य टिप्पणं ॥ ३ ॥

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२७४ द्वितीयप्रपाठक २ [छान्दोग्यो- समस्तसामके उपासन २४ अथ द्वितीयप्रपाठकस्य चतुर्थः खंडः४ सर्व्वास्वप्सु पञ्चविधसामोपासीत। मेघो यत् सम्पवते स हिङ्कारो यद्वर्षति अथ श्री०मूलभाषा० द्वितीयप्रपा०चतुर्थः खंडः ॥४।। अर्थ :- सर्व जलोंविषै पंचविध सामकूं उपासन करैः-मेघ जो संप्व करैंहै सो हिंकार है। जो वर्षताहै सो प्रस्ताव है। जे अथ श्री० भाष्यभाषाद्वितीयप्रपा० चतुर्थः खण्डः॥।४॥ जलदृष्टिसैं पञ्चविधसामोपासना २ टीका :- सर्व जलोंविषै पञ्चविध सामकूं उपासन करै :- धैष्टिपूर्वक होनेतैं सर्व जलोंकी अनन्तरता है॥ मेधै जो संफवन करैहै क- हिये मेघ जब उन्नत (उंचा) हुया एकीभाव- अथ द्वितीयप्रपाठकगत चतुर्थखंडस्य टिप्पणं।।४।। ५१ ननु वृष्टिकी दृष्टिके अनन्तर जलोंकी दाष्टि सामविषै क्यूं धारण करियेहै? तहां कहैहैं॥ ५२ मेघके संल्पवकी दृष्टिकरि हिंकारकूं आरंभके सामा- न्यतैं उपासन करै। ऐसें कहैहैं॥

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पनिषत् ] चतुर्थ खंड ४ २७५ जलदृष्टिसैं पञ्चविघसामोपासना २ स प्रस्तावो याः प्राच्यः स्यन्दन्ते स उद्गीथो या: प्रतीच्यः स प्रतीहारः स- मुद्रो निधनम् ॥ १ ॥

प्राची स्यंदन (वहन) करैहैं सो उद्गीथ है। जे प्रतीचीयां हैं सो प्रतिहार है। समुद्र निधन है ॥ १ ॥

वकरि परस्पर घनी होवैहै। तब संप्वन करैहै ऐसैं कहियेहै। मेघ [जब संल्लवन करैहै] तब जलोंका आरंभ होवैहै। सो हिंकार है॥ जो वर्षताहै सो प्रस्ताव है। आप (जल) सर्व ओरतैं व्याप्त होनेकूं प्रस्तुत हैं॥ जे प्राची न- दीयां वहन करैहैं सो उद्गीथ है। श्रेष्ठ हो- नेतैं॥ जे प्रतीची नदीयां हैं सो प्रतिहार ५३ वर्षणकी दृष्टिकरि प्रस्तावकी उपास्यताविषै हेतुकूं कहैहैं। इहां पूर्वदिशाके तरफ जानेवालीयां प्राचीरूप न. दियां गंगादिक हैं। पश्चिमदिशाके तरफ जानेवालियां प्रती- चीरूप नादीयां तो नर्मदा आदिक हैं। यह भेद है।।

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२७६ द्वितीयप्रपाठक २ [छान्दोग्यो- समस्तसामके उपासन २४ न हाप्सु प्रैत्यप्सुमान् भवति।यए- तदेवं विद्वान् सर्व्वास्वप्सु पञ्चविधसा- मोपास्ते ॥२ ॥ इति द्वितीयप्रपाठकस्य चतुर्थः खण्डः ॥४ ॥ अर्थ :- जलोंविषै मरता नहीं। जल- वानू होवैहै। जो इसकूं ऐसैं विद्वान् हुया सर्व जलोंविषै पंचविध सामकूं उपासता है। २ ॥ इति श्री०मूलभाषा०द्वितीयप्रपा०चतुर्थः खंड:४ । प्रतिशब्दके सामान्यतैं॥ समुद्र निधन । जलोंकू तिस निधनवाले होनेतैं ॥। १ ॥ टीका :- जलोंविषै मरता नहीं "जो नहीं इच्छताहै तो। जलवाला होवैहै। यह फल है।। २ । इति श्री०भाष्यभाषा०द्वितीयप्रपा०चतुर्थः खंडः ॥।४।। ५४ तब गंगाआदिकविषै अपेक्षितबी मरण नहीं हो चैगा ? ऐसें जो कहे। तहां कहैहैं॥ इहां यह अर्थ है :- यह उपासक मरुस्थलीनविषैबी यथा इच्छा उदकवान् होवैहै।। इति द्वितीयप्रपाठकगत चतुर्थखंडस्य टिप्पणं ॥ ४ ॥।

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पनिषत् ] पंचम खंड ५ २७७ ऋतु दृष्टिसैं पंचविधसामोपासना २ अथ द्वितीयप्रपाठकस्य पंचमः खंड: ५ ऋतुषु पञ्चविधसामोपासीत॥व- सन्तो हिङ्कारो ग्रीष्मः प्रस्तावो वर्षा अथ श्री०मूलभाषा०द्वितीयप्रपा०पंचमः खंडः ॥ ५॥ अर्थ :- ऋतुनविषै पंचविध सामकूं उ- पासन करै :- वसन्त हिंकार है। ग्रीष्म अथ श्री०भाष्यभाषा०द्वितीयप्रपा० पंचम:खण्डः ॥५॥ ऋतुदृष्टिसैं पञ्चविधसामोपासना २ टीका :- ऋतुनविषै पंचविध सामकूं उपा- सन करै :- ऋैतुनकी व्यवस्थाकूं यथोक्त निमित्त- वाली होनेतैं याकी अनन्तरता है। वसंत हिंकार है। प्रथम होनेतैं॥ ग्रीष्म प्रस्ताव है। यवादिकका संग्रह जातैं वर्षाके अर्थ प्रस्तुत करियेहै ॥ वर्षा उद्गीथ है। प्रधान होनेतैं॥

अथ द्वितीयप्रपाठकगत पंममखंडस्य टिप्पणं ।५।। ५५ जलकी दृष्टिके अनंतर ऋतुनकी दृष्टि सामविषै क्यूं आरोप करियेहै? तहां कहैहैं।। इहां ऋतुनकी व्यवस्थाके अनुसार तहां क्रियाका विशेषण है॥ २४

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२७८ द्वितीयप्रपाठक २ [छान्दोग्यो- समस्तसामके उपासन २४ उद्धीथः शरत्प्रतिहारो हेमन्तो निध- नम् ॥ १॥ कल्पन्ते हास्मा ऋतव ऋतुमान् भवति। य एतदेवं विद्वानृतुषु पञ्चविध® सामोपास्ते ॥२ ॥ इति द्वितीयप्रपाठकस्य पञ्चमः खण्डः ॥५॥ प्रस्ताव है। वर्षा उद्गीथ है। शरत् प्रति- हार है। हेमन्त निधन है ॥ १॥ अर्थ :- इसकेअर्थ ऋतुआं समर्थ हो- वैहैं। ऋतुमान् होवैहै। जो इसकूं ऐसैं विद्वानहुया ऋतुनविषै पंचविध सामकूं उपासताहै ॥२ ॥ इति श्री०मूलभाषा०द्वितीयप्रपा०पंचमःखंडः५ शरत् प्रतिहार है। रोगीनके अरु मृतनके प्रतिहरणतैं।। हेमंत निधन है। निवात (शी- तता)विषै प्राणिनके निधन (मरण) तैं॥ १॥ टीका :- फल कहियेहै :- इस उपासककेअर्थ ऋतुआं ऋतुव्यवस्थाके अनुसार भोग्य होनेकरि

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पनिषत् ] षष्ठ खंड ६ २७९ पशुद्दष्टिसैं पंचविघसामोपासना २ अथ द्वितीयप्रपाठकस्य षष्ठः खंडः।६।। पशुषु पञ्चविध सामोपासीताजा अथ श्री० मूलभाषा द्वितीयप्रपा०षष्ठः खंडः ॥ ६॥ अर्थ :- पशुनविषै पंचविध सामकूं उ- समर्थ होवैहैं औ ऋतुमान् होवैहै। अर्थ यह जो :- ऋतुनविषै होनेवाले भोगनकरि सं- पन्न होवैहै॥ २ ॥ इति श्री०भाष्यभाषा०द्वितीयप्रपा० पंचमः खंडः ॥५।। अथ श्री०भाष्यभाषा० द्वितीयप्रपा० षष्ठः खण्डः॥६॥ पशुदृष्टिसैं पश्चविधसामोपासना २ टीका :- पशुनविषै पंचविध सामकूं उपा- सन करै :- ऋँतुनके सम्यक् व्यतीत भये पशु- ५६ किसीबी नहीं उपासना करनेवालेकूंबी कमसैं तिस तिस ऋतुके फलके भोगके भागीपनैके संभवतैं यह उपास- नके अनुसार फल नहीं है ? यह आशंकाकरिके कहैहैं॥ इहां संपन्न। सर्वदा स्व इच्छाके वशतैं। यह शेष है॥ इति द्वितीप्रपाठकगतपंचमखंडस्य टिप्पणं ॥५।। अथ द्वितीयप्रपाठकगत षष्ठखंडस्य टिप्पणं ॥ ६ ॥ ५७ ऋतुदृष्टिके अनंतर सामविषै पशुद्ृष्टिके आरोपविषै कारणकूं कहैहैं।।

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२८० द्वितीयप्रपाठक २ [छान्दोग्यो- समस्तसामके उपासन २४ हिङ्कारोऽवयः प्रस्तावो गाव उद्गीथो- Sश्वाः प्रतिहारः पुरुषो निधनम् ॥१॥ पासन करै :- अजा हिंकार है। अवियां प्र- स्ताव है। गौआं उद्गीथ है। अश्व प्रतिहार है। पुरुष निधन है॥ १॥ नके योग्य संबंधि काल होवैहै। यातैं इनकी अनंतरता है।। अजा हिंकार है। प्रैधान हो- नेतैं वा प्रथम होनेतैं। "अैज पशुनके मध्य प्र- थम है" इस श्रुतितैं॥ अवियां (मेष) प्रस्ताव है। अजा अरु अविनके साहचर्यके देखनेतैं।। गौआं उद्गीथ है। श्रेष्ट होनेतैं॥ अश्व प्र- ५८ अजादृष्टिकरि हिंकारके उपासनविषै दो हेतुनकूं क हैहैं।। इहां अजाकी यज्षसें संबंधतैं प्रधानता है। प्रथमता तो प्रथमपाठतैं है। ऐसैं देखनेकूं योग्य है।। ५९ "मनुष्यनके मध्य ब्राह्मण। पशुनके मध्य अज। जातैं मुखतैं सजे हैं। तातैं वे मुख्य हैं" या श्रुतिकूं अजाकी प्रधान ताविषै प्रमाण करैहैं।। इहां "तातैं अजा अरु सवियां भये॥ इस श्रुतितैं अजाओंका अरु अविनका साहचर्य है औ हिंकार अरु प्रस्तावका साहचर्य प्रसिद्ध है।।

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पनिषत् ] पष्ठ खंड ६ २८१ पशुद्दष्टिसैं पंचविधसामोपासना २ भवन्ति हास्य पशवः पशुमान् भ- वति। य एतदेवं विद्वान् पशुषु पञ्च- विध सामोपासे॥२॥ इति द्वितीयप्रपाठकस्य षष्ठः खंडः ॥ ६॥ अर्थ :- इसकूं पशु होवैहैं। पशुमान् होवैहै। जो इसकूं ऐसैं विद्वान्हुया पशुन- विषै पंचविध सामकूं उपासताहै॥ २॥

तिहार है। पुरुषनके प्रतिहरणतैं॥ पुरुष नि- धन (आश्रय) है। पशुनकूं पुरुषरूप आश्रय- वाले होनेतैं ॥ १ ॥ टीका :- फल कहियेहैः-इसके पशु होवैहैं। पशुमान् होवैहै। अर्थ यह जो :- पैंशुनके फल रूप भोग अरु त्यागआदिकनकरि जुडताहै॥२॥ इति श्री०भाष्यभाषा०द्वितीयप्रपा० षष्ठः खंडः ॥६॥ ६० "पशुमान् होवैहै" इसका पूर्वसैं पुनरुक्तिपनैंकूं परि- हार करैहैं।। इति द्वितीयप्रपाठकगत-षष्ठखंडस्य टिपणम्॥ ६॥

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२८२ द्वितीयप्रपाठक २ [छान्दोग्यो- समस्तसामके उपासन २४ अथ द्वितीयप्रपाठकस्य सप्तमः खंड:७ प्राणेषु पञ्चविधं परोवरीयः सामो- पासीत॥ प्राणो हिङ्कारो वाक् प्रस्ता- अथ श्री०मूलभाषाद्वितीयप्रपा०सप्तमः खंडः॥ ७॥ अर्थ :- प्राणोंविषै पंचविध परोवरीयसा- मकूं उपासन करै :- प्राण (घ्राण) हिंकार है। अथ श्री० भाष्यभाषा· द्वितीयप्रपाठकस्य सप्तमःखंड:७ प्राणादिदृष्टिसैं पंचविधसामोपासना २ टीका :- प्राणोंविषै पंचविध परोवरीयः सामकूं उपासन करै। अर्थ यह जो :- पर पर वरीयसपनैरूप गुणवाले प्राणकी दृष्टिकरि वि- शिष्ट सामकूं उपासन करैः-प्राण (घ्रीण) अथ द्वितीयप्रपाठकगत सप्तमखंडस्य टिप्पणं॥७॥ ६१ प्राणोंकी स्थितिकूं पशुनतैं उत्पन्न दुग्ध घृतआदिक निमित्तवाली होनेतैं ताकी दृष्टिके अनन्तर प्राणदृष्टिकरि सा मकी उपासनाकूं प्रसङ्गविषै प्राप्त करैहैं॥ ६२ प्राणशब्दकी मुख्यप्राणरूप विषयवान्ताकूं व्यावृत्तन करैहैं॥ इहां यह अर्थ है :- मुख्यप्राणतें पीछलोंकी श्रेष्ठताके

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पनिषत ] सप्तम खंड ७ २८३ प्राणदृष्टिसैं पंचविघसामोपासना २ वश्चक्षुरुद्धीथः श्रोत्रं प्रतिहारो मनो नि- धनं। परोवरीयाएसि वा एतानि॥१॥ वाक् प्रस्ताव है। चक्षु उद्गीथ है। श्रोत्र प्रतिहार है। मन निधन है। ये परोवरीय हीं हैं॥ १॥ हिंकार है। उत्तर उत्तर अतिश्रेष्ठनके मध्य प्र० थम होनेतैं॥ वाक् प्रस्ताव है। वौक्करि जातैं सर्व प्रस्तुत करियेहै [यातैं] प्राण (घ्राण) तैं वाक् अतिशय श्रेष्ठ है। वाक्करि अप्राप्त बी कहियेहै। प्राप्तहीं गंधका तो ग्राहक घ्राण है।। चक्षु उद्गीथ है। चक्षु वोक्के अत्यन्त असंभवतैं ताकी सर्वतैं श्रेष्ठताकूं निर्धारित होनेतैं अतिशय श्रेष्ट वाक्आदिकनके मध्य प्रथम भावि होनेकरि उक्त होनेतैं ब्राणहीं इहां प्राणशब्दका वाच्य है।। ६३ प्राण (घ्राण)तैं वाकूका श्रेष्ठपना कैसे है? तहां कहैहैं॥ इहां अप्राप्तपना कहिये व्यवहितपना (अंतरायस- हित पना)॥ ६४ चक्षुकी श्रेष्ठताकूं साधतेहैं। इहां वाक्के। याका श- बद्ुके। यह अर्थ है। औ वाक्तैं। याका शब्दतैं। यह अर्थ है।

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२८४ द्वितीयप्रपाठक २ [छान्दोग्यो- समस्तसामके उपासन २४ परोवरीयो हास्य भवति परोवरी- अर्थ :- इसका परोवरीय [जीवन] हो- बहुत विषयकूं प्रकाशताहै यातैं वाकूतैं अति- शय श्रेष्ठ है अरु श्रेष्ठ होनेतैं उद्गीथ है। श्रोत्र प्रतिहार है प्रतिहृत होनेतैं। औ सर्वओरकरि श्रवणतैं श्रोत्र चक्षुतैं अ- तिशय श्रेष्ठ है। मन निधन है। मनविषै जातैं पुरुषके भोग्य होनेकरि सर्व इंद्रियनकरि ग्रहण किये विषय स्थापन करियेहैं। औ श्रो- त्रतैं मनका अतिशय श्रेष्ठपना है। काहेतैंसर्वइ- द्रियनके विषयनविषै मनकूं व्यापक होनेतैं। अैतीं- द्रिय (इंद्रिय अगोचर) विषय बी मनका गो- चर हीं होवैहै। यातैं मनका अतिशय श्रेष्ठपना है।। यथोक्त हेतुनतैं ये प्राण आदिक अति- शय श्रेष्ठ हीं हैं ॥१॥ टीका :- जो इस दृष्टिकरि विशिष्ट परोव- ६५ चक्षुकी उद्गीथताविषै हेतुकूं कहैहैं॥। ६ ६ मनकी अतिश्रेष्ठताविषै अन्य हेतुकूं कहैहैं।। इहाँ

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पनिषत् ] सप्तम खंड ७ २८५ प्राणदृष्टिसैं पंचविधसामोपासना २ यसो ह लोकाञ्जयति। य एतदेवं वि- द्वानु प्राणेषु पञ्चविधं परोवरीयः सामो- पास्त इति तु पञ्चविधस्य ॥२॥ इति द्वितीयप्रपाठकस्य सपमः खंडः॥७॥

वैहै। परोवरीय (अतिश्रेष्ठ) हीं लोकनकूं जय करैहै। जो इसकूं ऐसैं विद्वान्हुया प्राणोंविषै पंचविध परोवरीय (अतिश्रेष्ठ) सामकूं उपासताहै। ऐसैं तो पंचविधका [उपासन कहा] ॥ २ ॥ इति श्री०मूलभाषा०द्वितीयप्रपा०सप्तमःखंड: ७ रीयः सामकूं उपासताहै इसका परोवरीयः (सर्वतैं श्रेष्ठ) जीवन होवैहै। यह वाक्य उक्त अर्थवाला है। ऐसैं तो पंचविध सामका उपा- सन कहा॥ इस रीतिसैं सप्तविध वक्ष्यमाण विषयविषै बुद्धिके समाधान अर्थ है। जातैं पंच- यातैं अतिशय श्रेष्ठपना है। ऐसैं पूर्वसैं संबंध हैऔ वाक्करि अप्राप्त बी कहिये है। इत्यादि यथोक्त हेतु है।।

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२८६ द्वितीयप्रपाठक २ [छान्दोग्यो- समस्तसामके उपासन २४ अथ द्वितीयप्रपाठकस्याष्टमः खंडः।।८।। अथ सप्तविधस्य ॥ वाचि सप्तवि- धसामोपासीत॥ यत्किञ्च वाचो हु- अथ श्री०मूलभाषा० द्वितीयप्रपा० स्याष्टमःखंडः॥८॥ अर्थ :- अनंतर सप्तविधकाः-वाक्विषै सप्तविध सामकूं उपासनकरैः-जो कछक विधविषै निरपेक्ष हुया पुरुष वक्ष्यमाणविषै बुद्धिकूं समाधान (स्थापन) करताहै॥ २ ॥ इति श्री० भाष्यभाषा०द्वितीयप्रपाठकस्य सप्तमःखण्डः॥।७।।

वाकूदृष्टिसैं सप्तविधसामोपासना ३ टीका :- अनंतर सप्तविंध समस्त सामका ६७ उक्त उपसंहारके अभावके हुयेवी वक्ष्यमाण अर्थविषै बुद्धिका समाधान क्यूं नहीं होवैगा? यह आशंका करिके कहैहैं। इति द्वितीयप्रपाठकगत सप्तमखंडस्य टिप्पणं ॥ ७॥ अथ द्वितीयप्रपाठकगताष्टमखंडस्य टिप्पणम्॥८।। ६८ अधिक संख्याके ज्ञानकूं अल्पसंख्याके ज्ञानपूर्वक होनेतैं पंचविध उपासनाके अनंतर सप्तविध उपासनकूं प्र-

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पनिषत् ] अष्टम खंड ८ वाकूदृष्टिसैं सप्तविधसामोपासना ३ २८७

मिति स हिङ्कारो यत्प्रेति स प्रस्तावो यदेति स आदिः॥ १॥ वाक्का "हुं" ऐसें है सो हिंकार है। जो "प्र" ऐसैं है सो प्रस्ताव है। जो "आ" ऐसैं है सो आदि है॥। १ ॥

साधुरूप यह उपासन आरंभ करियेहैः-इहां "वाक्विषै" यह सप्तमी पूर्ववत् है। अर्थ यह जो :- वौक्दृष्टिकरि विशिष्ट सप्तविध सा- मकूं उपासन करै॥ जो कछ वाक् (शंब्द)का "हुं" ऐसा जो विशेष है सो हिंकार है। हकारके सामान्यतैं ॥ जो "प्र" ऐसा श- स्तुत करैहैं॥ इहां पूर्ववत्। याका लोकनविषै। याकी न्यांई सप्तमी लगानेकूं योग्य है। यह अर्थ है॥ ६९ वाक्शब्दकरि शब्दका सामान्य जाति कहियेहै ताकूं सप्तप्रकारसैं विभागकिये सामके अवयवोंविषै आरोप- करिके उपासन कर्तव्य है। ऐसें वाक्यके अर्थकूं कहैहैं॥ ७० "जो कछु वाक्का " या वाक्यका ग्रहण है। ताके अर्थकूं कहैहैं॥ इति द्वितीयप्रपाठकगताष्टमखंडस्य टिप्पणं॥ ८ ।।

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२८८ द्वितीयप्रपाठक २ [छान्दोग्यो- समस्तसामके उपासन २४ यदुदिति स उद्धीथो यत्प्रतीति स प्रतिहारो यदुपेति स उपद्रवो यन्नीति तन्निधनम् ॥ २ ॥ अर्थ :- जो "उत्" ऐसें है सो उद्गीथ है। जो "प्रति" ऐसैं है सो प्रतिहार है। जो "उप" ऐसैं है सो उपद्रव है। जो "नि" ऐसैं है सो निधन है ॥२॥ बदका रूप है सो प्रस्ताव है। प्रके सामान्यतैं जो "आ" ऐसैं है सो आदि है। आकारके सामान्यतैं ॥। इहां "आदि" ऐसैं ऊकार क- हियेहै। सर्वका आदि होनेतैं ॥ १ ॥ टीका :- जो "उत्" ऐसैं है सो उद्गीथ है। उद्गीथकूं उत् पूर्वक होनेतैं॥ जो "प्रति" ऐसैं है सो प्रतिहार है। प्रतिके सामान्यतैं।। जो "उप" ऐसें है सो उपद्रव है। उपद्रवकूं उपसैं आरंभवाला होनेतैं॥ जो "नि" ऐसैं है सो निधन है। नि-शब्दके सामान्यतैं॥२॥

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पनिषत् ] अष्ट खंड ८ २८९ वाक्दृष्टिसैं सप्तविधसामोपासना ३ दुग्धेऽस्मै वाग्दोहं। यो वाचो दो- होऽन्नवानन्नादो भवति। य एतदेवं वि- द्ान्वाचि सप्तविध सामोपास्ते ॥ ३॥ इति द्वितीयप्रपाठकस्याष्टमः खण्डः ॥८॥

अर्थ :- इसकेअर्थ वाक् दोहकूं दोहन करैहै। जो वाकका दोह है। अन्नवान् अन्नाद होवैहै। जो ऐसैं इसकूं विद्वान् हुया वाक्विषै सप्तविध सामकूं उपासता- है।। ३ ॥

टीका :- इसके अर्थ दोहन करैहै" इ- त्यादिरूप वाक्य पूर्वउक्तअर्थवाला है। ३ ॥ इति श्री०भाष्यभाषा०द्वितीयप्रपाठकस्याष्टमः खण्डः।।८।।

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२९० द्वितीयप्रपाठक २ [छान्दोग्यो- समस्तसामके उपासन २४ अथ द्वितीय प्रपाठकस्य नवमःखंडः।।९।। अथ खल्वमुमादित्यY सप्तविध सामोपासीत ॥सर्वदा समस्तेन साम। अथ श्री०मूलभाषा०द्वितीयप्रपाठ०नवमःखण्डः ॥९॥ अर्थ :- अनंतर प्रसिद्ध उस आदित्य- रूप सप्तविध सामकूं उपासन करैः-स- र्वदा सम है। तिस करि साम है। "मेरे अथ श्री०भाष्यभाषा० द्वितीयप्रपाठ०नवमःखण्डः।।९। आदित्यदृष्टिसैं सप्तविध सामोपासना ८ टीका :- औैवयवमात्र सामविषै आदित्य- दृष्टि पंचविधपदार्थनविषै प्रथम अध्यायमैं कही। अब प्रसिद्ध उस आदित्यकूं समस्त सामविषै अवयवनके विभागसैं आरोप करिके सप्तविध अथ द्वितीयप्रपाठकगत नवमखंडस्य टिप्पणं ।।९।। ७१ ननु वाक्दृष्टिके अनन्तर आदित्यकी दृष्टि विधान क- रियेहै ताकूं वाक्मय होनेतैं औ ताका विधान युक्त नहीं है। काहेतैं पूर्ववी आदित्यदृष्टिकरि विशिष्ट उपासनकूं उपदिष्ट होनेतैं ? यह आशंका करिके कहैहैं॥

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पनिषत् ] नवम खंड ९ २९१ आदित्यदृष्टिसैं सप्तविधसामोपासना ८ मा प्रति मा प्रतीति सर्वेण समस्तेन साम ॥ १॥ प्रति मेरेप्रति" ऐसैं सर्वकरि सम है। तिसकरि साम है ॥ १ ॥ सामकूं उपासन करै॥ ॥ फेर आदित्यकूं सामपना कैसैं है? यह कहियेहैः-उद्गीथपनैं- विषै हेतुकीन्यांई आदित्यके सामपनैंविषै हेतु है।। ॥ कौंन यह है किः-सर्वदा सम है। वृद्धि अरु क्षयके अभावतैं ॥ तिस हेतुकरि साम आदित्य है। सो मेरेप्रति मेरेप्रति ऐसैं तुल्य बुद्धिकूं उत्पादन करैहै यातैं सर्वसैं सम ७२ ताकी सामरूपताविषै हेतुकूं पूर्ववादी पूंछताहै। ७३ "सर्वदा" इत्यादि वाक्यकूं उत्तर होनेकरि सिद्धान्ती ग्रहण करैहैं॥ इहां यह अर्थ है :- "उच् हुये आदित्यकूं गा- वते हैं" यह आदित्यकी उद्गीथरूपताविषै हेतु श्रुतिमैं कहा है। तैसें ताकी सामरूपताविषैबी हेतु कहियेहै। ७४ ताहीकूं प्रश्नपूर्वक विवरण करैहैं ॥ इहां "न उदेता (न उदय होनेवाला) है। न अस्तमेता (न अस्तकूं पावने- वाला) है" इत्यादि देखनेतैं। यह अर्थ है।। ७५ "मेरे प्रति" इत्यादि वाक्यकूं व्याख्यान करैहैं॥

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२९२ द्वितीयप्रपाठक २ [छान्दोग्यो- समस्तसामके उपासन २४ है। यातैं।अर्थ यह जो :- सम होनेतें साम है। उद्ीथ भक्तिके सामान्य वचनतैं हीं लोक आ- दिकनविषै उक्त सामान्यतैं हिंकार आदिक- पना जानियेहै। यातैं हिंकार आदिकपनैविषै कारण नहीं कहा। साँमपनैविषै फेर सविताका अनुक्त कारण सुबोध नहीं है। यातें समपना कहा॥ १॥

७६ अन्य शब्दकी अन्यत्र वृत्ति किंचित् निमित्तविना नहीं होवैहै। यातैं आदित्यकी सामरूपताविषै हेतु जब क- हियेहै तब ताके भेदनकी हिंकारादिरूपताविषैवी काहेतैं श्रुतिनैं निमित्त नहीं कहा? यह आशंका करिके कहैहैं॥ इहां यह अर्थ है :- आदित्यका उद्गीथके साथि ऊर्ध्वभावरूप सामान्य श्रुतिनैं कहा। ताके अनुसारकरि अस्मदुक्त प्रथम- ताआदिक सामान्य है।। जैसे पृथिवीआदिकनविषै हिंकार- आदिकपना जानियेहै। तैसैं आदित्यके प्रभेदनकावी हिंका- रआदिकपना जाननेकूं शक्य है। यातैं श्रुतिनैं तिनके तिस भावविषै कारण नहीं कहा॥ ७७ तब सामभावविषैबी कारणकी कल्पनाके संभवतैं कारण कहनेकूं योग्य नहीं है? यह आशंका करिके कहैहैं।। इहां समपना। याका तहां निमित्त। यह अर्थ है।।

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पनिषत ] नवम खंड ९ आदित्यदृष्टिसैं सप्तविघसामोपासना ८ २९२.

तस्मिन्निमानि सर्व्वाणि भूतान्य- न्वायत्तानीति विद्यात्तस्य यत्पुरोदया- अर्थ :- तिसविषै ये सर्वभूत अनुगत हैं ऐसैं जानना। ताका जो उद्यतैं पूर्व टीका :- तिस आदित्यविषै अवयवनके वि- भागसैं ये वक्ष्यमाण सर्व भूत आदित्यके प्रति उपजीव्य (आश्रित) भावकरि अनुगत हैं। ऐसैं जानना।। ।। कैसैं कि :- तिस आदि- त्यका जो उद्यतैं पूर्व धर्मरूप है सो हिंकार भक्ति है। तहां यह सामान्य है :- जो ताका हिंकार भक्तिरूप है इस आदित्यरूप सामके तारूपके प्रति गाआदिक पशु अनुगत हैं। अर्थ यह जो :- तिस भक्तिरूपके प्रति उपजी- ७८ "सर्वसैं सम" ऐसें उक्तकूं स्पष्ट करैहैं॥ ७९ वेदन (ज्ञान)के प्रकारकूं प्रश्नपूर्वक प्रकट करैहैं॥ इहां धर्मरूप है। सुखकर होनेतैं । अर्थ यह जो :- धर्मका कार्यस्वरूप है। ताकी दष्टिकरि हिंकारके उपासनविषै प्रथमता हेतु है।।

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२९४ द्वितीयप्रपाठक २ [छान्दोग्यो- समस्तसामके उपासन २४ त्स हिङ्कारस्तदस्य पशवोऽन्वायत्तास्त- स्मात्ते हिंकुर्वन्ति हिंकारभाजिनो ह्येत- स्य साम्रः ॥२॥ [रूप] है सो हिंकार है। इसके ता (रूप) के प्रति पशु अनुगत हैं। तातैं वे हिंका- रकूं करतेहैं। जातैं इस सामके हिंकारके भाजी हैं॥ २ ॥ वन करैहैं॥ जातें ऐसैं है तातें उदयतैं पूर्व वे पशु हिंकार करतेहैं। तातैं इस आदित्य ना- मक सामके हिंकारके भजनेवाले हैं। तिस भक्तिरूप भजनशील होनेतैं हीं वे ऐसें वर्तते हैं॥ २ ॥ ८० पशु जे हैं वे यथोक्त आदित्यके रूपकेप्रति उपजीवन करैहैं। इस अर्थविषै क्या प्रमाण है? सो कहैहैं॥ ८१ तिन पशुनके हिंकरणकूं साधते हैं॥ इहां ताकी भ- क्तिरूप भजनशील होनेतें इसतैं पूर्वहीं तातैं याका संबंध है।। औ सविताके प्रथम उदित होते जो ताका रूप है ताकी दृष्टिकरि प्रस्तावकी उपास्यताविषै पूर्वतैं अनन्तरता हेतु है।।

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पनिषत् ] नवम खंड ९ आदित्यदृष्टिसैं सप्तविधसामोपासना ८ २९५

अथ यत्प्रथमोदिते स प्रस्तावस्त- दस्य मनुष्या अन्वायत्तास्तस्मात्ते अर्थ :- अनंतर जो प्रथम उदितके हुये है सो प्रस्ताव है। इसके ता (रूप)के प्रति मनुष्य अनुगत हैं। तातैं वे प्रस्तुतिकाम टीका :- अनंतर जो प्रथम उदित हुये सविताका रूप है सो इस आदित्य नामक सा- मका सो प्रस्ताव है। इसके ता रूपके प्रति मनुष्य अनुगत हैं। पूर्वकी न्यांईं। तातें वे ८२ जैसे उदयतैं प्राचीन (पूर्व)के रूपके प्रति पशुनकरि उपजीवन करिये है तैसें। यह कहैहैं॥ ८३ उदयतैं पराचीन (पीछेके) वा आदित्यके रूपके प्रति मनुष्य उपजीवन करैहैं। इस अर्थविषै लिंगकू कहैहैं॥ इहां प्रत्यक्ष अरु परोक्षभावकरि प्रस्तुति अरु प्रशंसाका भेद है औ गोशब्दके वाच्य सूर्यकी किरणोंका जगत्रूप मंडलके साथि संगमन कहिये संबंधका गमन। यह अर्थ है औ वत्सनके साथि संगमन ऐसे संबंध है औ संगवकालके आदित्यके रू- पकूं आरोपकरिके आदिभक्तिरूप ओंकारकी उपास्यताविषै दोनूंके आकारका सामान्य हेतु है।

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२९६ द्वितीयप्रपाठक २ [छान्दोग्यो- समस्तसामके उपासन २४ प्रस्तुतिकामा: प्रशभ्साकामाः प्रस्ता- वभाजिनो ह्येतस्य साम्नः॥३॥ अथ यत्संगववेलायाY स आदि- अरु प्रशंसाकाम हैं। जातैं इस सामके प्र- स्तावके भाजी हैं॥ ३ ॥ अर्थ :- अनंतर जो संगववेलाविषै प्रस्तुति अरु प्रशंसाकूं कामनाकरते हैं जातैं इस सामके प्रस्तावके भजनेवाले हैं ३॥ टीका :- अनंतर जो संगववेलाविषै। गौ जे सूर्यकी रश्मियां तिनका संगमन। गौव- नका वत्सनके साथि संगम जिसवेलाविषै हो- वैहै सो संगववेला है। तिस कालविषै जो सू- र्यका रूप है सो आदि भक्तिविशेष ओंकार है। इसके ता रूपके प्रति पक्षी अनुगत हैं। जातें ऐसें है तातैं वे पक्षी अंतरिक्षविषै अ- ८४ पक्षिनका यथोक्त आदित्यका रूप उपजीव्य है। तिस अर्थविषै हेतुकूं कहैहैं। इहां ऋजु मध्यन्दिनविषै जो आदित्यका रूप है ताकी दृष्टिकरि उद्गीथके उपासनविषैश्रेष्ठता हेतु है।।

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पनिषत् ] नवम खंड ९ २९७ आदित्यदृष्टिसैं सप्तविधसामोपासना ८ स्तदस्य वयाश्स्यन्वायत्तानि। तस्मा- त्तान्यन्तरिक्षेऽनारम्वणान्यादायाSS- त्मानं परिपतन्त्यादिभाजीनि ह्वेतस्य साम्र॥४॥ अथ यत्सम्प्रति मध्यन्दिने स उ- सो आदि है। इसके ता(रूप)के प्रति पक्षी अनुगत हैं। तातैं वे अंतरिक्षविषै आलंबन रहित हुये आत्मा (शरीर) कूं लेके परिप- तन करते (उडते) हैं। जातैं इस सामके आदिके भाजी हैं ॥४ ॥ अर्थः-अनन्तर जो अबी मध्यंदिन-

नारंबण (अनालंबन) हुये आत्माकूं हीं आ- लंबनपनैंकरि ग्रहण करिके गमन करतेहैं। [जातैं ऐसें है] यातैं आकारके सामान्यतैं इस सामकी आदि भक्तिके भजनेवाले हैं॥४॥ टीका :- अनंतर अब मध्यंदिनविषै। अर्थ यह जो :- ऋजु मध्यंदिनविषै है। सो उद्गीथ

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२९८ द्वितीयप्रपाठक २ [छान्दोग्यो- समस्तसामके उपासन २४ द्वीथस्तदस्य देवा अन्वायत्तास्तस्मात्ते सत्तमाः प्राजापत्यानामुद्गीथभाजिनो ह्येतस्य साम्नः ॥५॥ विषै है सो उद्गीथ है। इसके ता(रूप)के प्रति देव अनुगत हैं। तातैं वे प्राजापत्य- नके मध्य सत्तम हैं। जातें इस सामके उ- द्रीथके भाजी हैं ॥५॥

भक्ति है। इसके ता रूपके प्रति देव अतु- गत हैं। तिसें कालविषै द्योतन (प्रकाशन)के अतिशयतैं। तातैं वे प्रजापतिके संतानोंके मध्य सत्तम (विशिष्टतम) हैं। जातें इस सामके उद्गीथके भाजी हैं॥५॥ ८५ तिसकाल संबंधि आदित्यके रूपकी देवनकरि उपजी- व्यताविषै हेतुकूं कहैहैं।। ८६ तथापि ताकी देवनकरि उपजीव्यता (आश्रयता) कैसैं है? ऐसे जो कहै। तहां कहैहैं॥

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पनिषत् ] नवम खंड ९ २९९ आदित्यदृष्टिसैं सप्तविधसामोपासना ८ अथ यदूर्ध्व मध्यन्दिनात्प्रागपरा- ह्रात्स प्रतिहारस्तदस्य गर्भा अन्वाय-

अर्थ :- अनंतर जो मध्यन्दिनतैं ऊर्ध्व अरु अपराह्नतैं पूर्व है सो प्रतिहार है। इ- सके ता (रूप)के प्रति गर्भ अनुगत हैं।

टीका :- अनंतर मैँध्यंदिनतैं ऊर्ध्व अरु अपराह्नतैं पूर्व जो सविताका रूप है सो प्रति- हार है इसके ता रूपके प्रति गर्भ अनुगत हैं। यातैं वे सविताके प्रतिहार भक्तिरूपसैं ऊर्ध्व

८७ "अनंतर जो ऊर्ध्व" या वाक्यकूं लेके व्याख्यान करैहैं॥ इहां ताकी दृष्टिकरि प्रतिहारके उपासनविषै प्रति- शब्दका सामान्य हेतु है। काहेतैं तिस कालविषै सविताके अस्तगिरिके प्रति हरणतैं॥ ८८ यथोक्त आदित्यका रूप गर्भौकरि उपजीव्य है इस अर्थविषै गमककूं कहैहैं॥ इहां ऊर्ध्व । याका योनितैं उपर जठरके प्रति। यह अर्थ है औ यातैं। याका जातैं गर्भ पू- र्वोक्त विशेषणवाले हैं यातैं। यह अर्थ है औ तिसके द्वार कहिये पतनके द्वार।।

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३०० द्वितीयप्रपाठक २ [छान्दोग्यो- समस्तसामके उपासन २४ त्तास्तस्मात्ते प्रतिहता नावपद्यन्ते प्रति- हारभाजिनो ह्येतस्य साम्नः ॥ ६॥

उपद्रवस्तदस्यारण्या अन्वायत्तास्त- तातैं वे प्रतिहत हुये नीचे पडते नहीं जातैं इस सामके प्रतिहारके भाजी (भजने- वाले) हैं॥ ६॥ अर्थ :- अनंतर जो अपराह्नतैं ऊर्ध्व अरु अस्तमयतैं पूर्व [सूर्यका रूप] है सो उपद्रव है। इसके ता(रूप)के प्रति अर- प्रतिहृत हुये अधःपतन होते नहीं। अर्थ यह जो :- तिस द्वारके होते बी॥ जातें गर्भ इस सामके प्रतिहारके भाजी हैं ॥ ६॥ टीका :- अनन्तर अपराह्मतैं ऊर्ध्व अरु ८९ तहां इस कालसंबंधि आदित्यकी दृष्टिकरि उपद्रवकूं उपासन करै। काहेतैं ताके तब अस्ताचलके प्रति उपद्रव- णतैं। ऐसैं कहैहैं॥

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पनिषत्] नवम खंड ९ ३०१ आदित्यदृष्टिसैं सप्तविधसामोपासना ८ स्मात्ते पुरुषं दृष्टा कक्षर श्वभ्रमित्युपद्र- वन्त्युपद्रवभाजिनो ह्वेतस्य साम्रः।७ ण्यके पशु अतुगत हैं। तातैं वे पुरुषकूं दे- खिके कक्ष (वन) के प्रति श्वभ्र (गहा) के प्रति ऐसैं (भयशून्य जानिके) उपगमन करतेहैं। जातैं इस सामके उपद्रवके भाजी हैं । ७ । अस्तमयतैं पूर्व जो रूप है सो उपद्रव है। इसके ता रूपके प्रति अरण्यके पशु अनु- गत हैं। तातैं वे पुरुषकूं देखिके भयभीत होते हैं। कक्ष (अरण्य)के प्रति श्वभ्र (गुहा) के प्रति "भय शून्य है" ऐसैं जानिके उपद्रवण (उपगमन)करतेहैं। जातैं देखिके उपद्रवणतैं वे इस सामके उपद्रवके भाजी हैं ॥ ७॥ ९० अरण्यके पशुनके यथोक्तरूपमय उपजीवनकूं उपपा- दन करैहैं। इहां श्वभ्र कहिये गर्त (खट्टा) । अर्थ यह जो :- गुहा॥ औ सो सविताका रूप यह शेष है औ ताकी दृष्टिकरि निधनके उपासनविषै समाप्तिका सामान्य हेतु है।। २६

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३०२ द्वितीयप्रपाठक २ [छान्दोग्यो- समस्तसामके उपासन २४ अथ यत्प्रथमास्तमिते तन्निधनं। तदस्य पितरोऽन्वायत्तास्तस्मात्ताननि- द्धति निधनभाजिनो ह्वेतस्य साम्न अर्थ :- अनंतर जो प्रथम अस्तमितके हुये है सो निधन (अंत)है। इसके ता(रूप)के प्रति पितर अनुगत हैं। तातैं तिनकूं स्था- पन करतेहैं। जातें इस सामके निधनके टीका :- अनंतर प्रथम अस्तमित हुये कहिये सविताके अदर्शनके प्रति गमन कर- नेकी इच्छावान् हुये जो रूप है सो निधन The phe k है। इसके ता रूपके प्रति पितर अनुगत । तातैं तिनकूं पिता पितामह अरु प्रपिता- महरुपसैं वा तिनके अर्थ पिंडनकूं दर्भनविषै स्थापन करैहैं। जातैं निधनके सम्बंधतैं वे ९१ यथोक्त आदित्यका रूप पितरनकरि उपजीव्य है। इस अर्थविषै गमककूं कहैहैं॥ इधर तहां तहां जो अथशब्द है सो तिस तिस उपासनकी अनन्तरतारूप अर्थवाला व्याख्यान करनेकूं योग्य है।

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पनिषत् ] नवम खंड ९ ३०३ आदित्यदृष्टिसैं सप्तविधसामोपासना ८ एवं खल्वमुमादित्य सप्तविधश्सामो- पास्ते॥८ ॥ इति द्वितीयप्रपाठकस्य नवमः खण्डः । ९॥ भाजी हैं॥ ऐसैं प्रसिद्ध उस आदित्यरूप सप्तविध सामकूं उपासताहै॥८॥ इति श्री० मूलभाषा०द्वितीयप्रपा०नवमःखंड: ९ पितर इस सामके विधनके भाजी हैं। ऐसैं अवयवकरि सप्धा विभक्त प्रसिद्ध उस आदित्यरूप सत्विध सामकूं उपासताहै जो। ताकूं ताकी प्राप्तिरूप फल होवैहै। यह वा- क्यशेष है॥। ८ ।। इति श्री०भाष्यभाषा०द्वितीयप्रपा० नवमः खंडः ।९॥ ९२ "ऐसें खलु (प्रसिद्ध)" इत्यादि वाक्यकेप्रति अपेक्षि- तकूं पूरणकरते हुये व्याख्यान करैहैं॥ इति द्वितीयप्रपाठकगतनवमखंडस्य टिप्पणम् ॥ ९॥

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३०४ द्वितीय प्रपाठक २ [छान्दोग्यो- समस्तसामके उपासन २४ अथ द्वितीय प्रपा०दशमः खंडः ॥ १० ॥ अथ खल्वात्मसम्मितमतिमृत्यु स- अथ श्री०मूलभाषा · द्वितीयप्रपा० दशमःखंडः॥ १०॥ अर्थ :- अनंतर प्रसिद् अतिमृत्यरूप अथ श्री०भाष्यभाषा०द्वितीयप्रपा०दशमः खंडः॥१०॥ आदित्य(रूप मृत्यु) केजयकरि सप्तविधसामोपासना ६ टीका :- मृत्यु आदित्य है। काहेतें अहोरा- त्रादि कालकरि जगत्का प्रमापयिता होनेतैं। ताके अतितरण अर्थ यह सामका उपासन उपदेश करियेहैः- अनंतर प्रसिद्ध आदि- त्यरूप मृत्युविषयक सामके उपासनके आत्मसंमित कहिये अपने अवयवनकी तुल्य- अथ द्वितीयप्रपाठकगतद्शमखण्डस्य टिप्पणम्१० ९३ "अनंतर प्रसिद्ध आत्मसंमित" इत्यादि वाक्यके ता- त्पर्यकूं कहैहैं। ९४ अनंतर। इसपदके अपेक्षितकूं डालते हैं।। इहां स्व- (अपने ) शब्दकरि साम कहिये है। ताके अवयव जे हिं- कारआदिक हैं तिनके नामके अक्षरोंकी तीनपनैकरि तीनपनै- करि तुल्यतासैं मित (ज्ञात) साम है॥ यह अर्थ है।

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पनिषत् ] दशम खंड १० ३०५ आदित्यकेजयकरि सप्तविधसामोपासना ६ प्रविधसामोपासीत। हिंकार इति त्र्य- क्षरं प्रस्ताव इति त्र्यक्षरं तत्समम्॥१॥ सप्तविध सामकूं उपासन करैः-"हिंकार" यह तीन अक्षरवाला [नाम] है। "प्र- स्ताव" यह तीन अक्षरवाला है। सो सम है॥ १॥ ताकरि मित वा पैरमात्मासैं तुल्यताकरि सं- मित ऐसैं मृत्युके जयका हेतु होनेतैं अतिमृत्यु- रूप [जैसैं प्रथम अध्यायविषैउद्वीथ भक्तिके ना- ९५ जैसैं परमात्माका ज्ञान मृत्युतैं मोक्षण (छूटने)का हेतु है। तैसैं यह उपासन बी है। यातैं अन्य अर्थकूं कहैहैं॥ ९६ इहां कैसा उपासन विवक्षित है ? इस अपेक्षाके हुये दष्टांतसहित उत्तरकूं कहैहैं।। इहां उद्गीथ ऐसा उद्गीथरूप अक्ति (भाग)का नाम है ताके अक्षर। यह अर्थ है औ सा- मपनैकूं तिन नामके अक्षरोंके। ऐसें अध्याहार करनेकूं योग्य है औ ताका उपासन। याका तिन अक्षरनका आदित्यकी दष्टिकरि उपासन । यह अर्थ है औ मृत्युगोचर अक्षरनकी संख्याकरि एकविंशतिपनैरूप सो एक है। अनेक अक्षरनविषै तिनके सामान्यकरि तिन अक्षरनविषै आदित्यदृष्टिकरि मृ- त्युरूप आदित्यकूं। यह अर्थ है अरु अतिक्रमणकेअर्थ ताका साधन उपासन। यह शेष है।

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३०६ द्वितीयप्रपाठक २ [छान्दोग्यो- समस्तसामके उपासन २४ मके अक्षर “उद्गीथ" ऐसें उपास्यपनैंकरि कहे। तैसैं इहां सामके सप्तविध भक्तिवाले नामके अक्षर तिनकूं मिलायके तीन तीनकरि सम- तासैं सामपनैकूं परिकल्पना करिके उपास्यपनै- करि कहियेहैं। ताके उपासनकरि मृत्युगोचर अक्षरनकी संख्याके सामान्यकरि तिसमृत्युकूं पायके तिसतैं अतिरिक्त अक्षरसैं तिस आदि- त्यरूप मृत्युके अतिक्रमणअर्थहीं संक्रमणकूं कल्पताहै]। अतिमृत्युरूप सप्तविध सामकूं उपासन करै। मृत्युकूं अतिरिक्त अक्षरोंकी संख्याकरि अतिकांत है यातैं अतिमृत्यु साम है। ताकी प्रथम भक्ति (विभाग)के नामके अक्षर कहिये हैं ॥ "हिंकार" यह तीन अक्षर- वाला भक्तिका नाम है औ "प्रस्ताव" ऐसा ९७ अतिमृत्यु है मृत्युके अत्यय (नाश) का हेतु होनेतैं। ऐसे उक्तकूं हीं स्पष्ट करैहें॥ इहां नामके अक्षर कहियेहैं। यह शेष है औ आदिके अक्षरनविषै। याका आदिभक्तिके नामके दोअक्षरनविषै। यह अर्थ हैऔ तिस प्रक्षेप (डालने)करि सो आदिभक्तिका नाम प्रतिहारके नामसैं तुल्य हीं है। यह अर्थ है।।

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पनिषत ] दशम खंड १० ३०७ आदित्यकेजयकरि सप्तविधसामोपासना ६ आदिरिति दयक्षरं। प्रतिहार इति चतुरक्षरं। तत इहैकं तत्समम् ॥२॥

अर्थः-"आदि" यह दो अक्षरवाला है। "प्रतिहार" यह च्यारी अक्षरवाला है। जिनतैं इहां एककूं [मिलायके] सो सम है॥ २ ॥

इस भक्तिका तीन अक्षरवालाहीं नाम है। सो पूर्वसैं सम है ॥ १ ॥ टीका :- "आदि" यह दोअक्षरवाला नाम है। सप्तविध सामकी संख्याका पूरण ओंकार "आदि" ऐसैं कहियेहै॥"प्रतिहार" यह च्या- रीअक्षरवाला नाम है। तिसतैं इहां एक अक्षरकूं अवच्छेदकरिके आदि भक्तिके नामके दो अक्षरनविषै डालियेहै। तिसकरि सो समहीं होवैहै॥ २ ॥

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३०८ द्वितीयप्रपाठक २ [छान्दोग्यो- समस्तसामके उपासन २४ उद्धीथ इति त्र्यक्षरमुपद्रव इति च- तुक्षरं त्रिभिस्त्रिभिः समं भवत्यक्षरम- तिशिष्यते त्र्यक्षरं तत्समम् ॥ ३॥ निधनमिति त्र्यक्षरं तत्सममेव भ- अर्थः-"उद्गीथ" यह तीन अक्षरवाला है। "उपद्रव" यह च्यारी अक्षरवाला है। तीन तीनकरि सम होवैहै। अक्षर अधिक होवैहै। तीनअक्षरवाला है। सो सम है॥३॥ अर्थ :- "'निधन" यह तीन अक्षरवाला टीका :- "उद्गीथ" यह तीन अक्षरवाला। "उपद्रव" यह च्यारी अक्षरवाला नाम तीन तीनकरि सम होवैहै। एक अक्षर अधिक होवैंहै। तिसकरि विषमताके प्राप्तहुये सामकी समताके करणअर्थ कहैहैंः-सो एकबी हुया "अक्षर" ऐसैं तीन अक्षरवालाहीं। होवैहै यातैं सो सम है॥ ३ ॥ टीका :- "निधन" ऐसा तीन अक्षरवाला

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पनिषत् ] दशम खंड १० ३०९ आदित्यकेजयकरि सप्तविधसामोपासना ६ वति। तानि ह वा एतानि द्ाविश्शति- रक्षराणि ॥४॥

है। सो सम हीं होवैहै। वे प्रसिद्ध ये द्वा- विंशति अक्षर हैं ॥४॥ अर्थः-एकविंशतिकरि आदित्यकूं पा- नाम है सो समहीं होवैहै॥। ऐसें तीन अ- क्षरनकी समताकरि सामपनैंकू संपादनकरिके यथाप्राप्तहीं अक्षर संख्याके विषय करिये हैं (गिनियेहैं) :- वे प्रसिद्ध ये सप् भक्तिनके नामके अक्षर द्वाविंशति (बावीश) हैं॥४ ॥ टीका :- तहां एकविंशति अक्षरनकी सं- ख्याकरि आदित्यरूप मृत्युकूं पावताहै। जातैं एकविंश (एकवीशवां)इस लोकतैं संख्याकरि

९८ ननु उक्तरीतिकरि चतुर्विशति (चोवीश) अक्षर हैं। तातैं "वे प्रसिद्ध ये द्वाविशति (बावीश) अक्षर हैं यह कैसैं कहिये है ? तहां कहैहैं।

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३१० द्वितीयप्रपाठक २ [छान्दोग्यो- समस्तसामके उपासन २४ शो वा इतोऽसावादित्यो द्वाविरशेन परमादित्याज्जयति तन्नाकं तदविशो- कम् ॥ ५॥ वताहै। एकविंश हीं इसतैं यह आदित्य है।। द्राविंशकरि आदित्यतैं परकूं जय क- रैहै सो नाक है सो विशोक है ॥ ५॥ यह आदित्य है।।"दैदशमास। पांच ऋतुआं- तीन ये लोक हैं। यह आदित्य एकविंश है" इस श्रुतितैं अवशिष्ट बावीशवें एक अक्षरकरि मृत्युरूप आदित्यतें परकूं जय करैहै। अर्थ यह जो :- पावताहै॥ ॥औ जो आदित्यतैं पर है सो क्या है? सो नाक है। क जो सुख ताका जो प्रतिषेध सो अक (दुःख) है सो नहीं होवैहै ऐसा नाक है। अर्थ यह जो :- क ९९ आदित्यकी इसलोकतैं एकविंशताविषै अन्यश्रुतिकूं प्रमाण करैहैं।। इहां हेमंत अरु शिशिरकूं ऐककरिके पांचक- तुआं हैं यह कहा॥

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पनिषत्] दशम खंड १० ३११ आदित्यकेजयकरि सप्तविधसामोपासना ६ आप्रोतीहादित्यस्य जयं परो हा-

अर्थ :- आदित्यके जयकूं पावताहै। इ-

(सुखरूप) हीं है। दु:खकूं मृत्युका विषय होनेतैं औ फेर सो विशोक है कहिये विगत- शोक है। अर्थ यह जो :- मानस दुःखसैं रहित है। ताकूं पावताहै॥ ५॥ टीका :- डैक्तेके हीं मिलित अर्थकूं कहैहैं :- एकविंशति संख्याकरि आदित्यके जयकूं पा- वताहै। इस ऐसें जाननेवालेका मृत्युगोचर

१०० आदित्यकूं अहोरात्रकरि वारंवार मृत्युकी हेतुता इसलोकविषै देखियेहै। तातैं यह लोक मृत्युका विषय हो- नेतैं दुःखस्वरूप है औ ताके अभावतैं ब्रह्मलोक सुखस्वरूप है। ऐसैं मानिके कहैहैं॥ १०१ पूर्वग्रंथकरि उत्तरग्रंथकी पुनरुक्तिकूं आशंकाकरिके कहैहैं।। इहां व्याख्यान कियेहीं ग्रंथके समुदायकाअर्थ संक्षे- पकरिके वुद्धिकी सुकरताअर्थ अनंतर (उत्तर) ग्रंथसैं क- हियेहै। तातैं पुनरुक्तिपना नहीं है। यह अर्थ है औ जयके पीछे पर (उत्कृष्ट) जय होवैहै। ऐसें संबंध है।। १०२ "इसका पर" ऐसैं ग्रहणकिये वाक्यकूं व्याख्यान करैहैं। इहां फल यह शेष है। यह अर्थ है औ साप्तविध्य

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३१२ द्वितीयप्रपाठक २ [छान्दोग्यो- समस्तसामके उपासन २४ स्यादित्यजयाज्जयो भवति य एतदेवं विद्दानात्मसस्मितमतिमृत्यु सप्तविध सामोपास्ते सामोपास्ते॥ ६॥ इति द्वितीयप्रपाठकस्य दशमः खण्डः ॥ १०॥ सका आदित्यके जयतैं पर जय होवैहै। जो इसकूं ऐसैं विद्वान् हुया आत्मसंमित अतिमृत्युरूप सप्तविध सामकूं उपासताहै। सामकूं उपासताहै ॥ ६ ॥ इति श्री० मूलभाषा०द्वितीयप्रपा०दशमःखंड:१० आदित्यके जयतैं पर जय होवैहै बावीश अक्षरनकी संख्याकरि। यह अर्थ है ॥"जो इसकूं ऐसें विद्वान् हुया" इत्यादि वाक्य उक्तअर्थवाला है । ताकूं यह यथोक्त फल होवैहै। ऐसैं औ दोवार कथनरूप जो अभ्यास है। सो सप्तविधपनैकी समाप्ति अर्थ है॥ ६॥ इति श्री०भाष्यभाषा०द्वितीय प्रपा०दशमःखंडः ॥।१०॥ कहिये सप्तविधपना तिसकरि युक्त सामके उपासनकी समा- सिअर्थ अभ्यास (दोवार कथन) है। यह अर्थ है॥ इति द्वितीयप्रपाठकगतदशमखंडस्य टिप्पणम् ॥१०॥

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पनिषत् ] एकादश खंड ११ प्राणोंविषै गायत्रसामोपासना २ .३१३

अथ द्वितीयप्रपा०एकादशः खंड:॥११।। मनो हिंकारो वाक्प्रस्तावश्र्वक्षुरुद्वीथः अथ श्री०मूलभाषा· द्वितीयप्रपा०एकादशःखंडः।।११।। अर्थः-मन हिंकार है। वाक् प्रस्ताव है। चक्षु उद्गीथ है। श्रोत्र प्रतिहार है। प्राण अथ श्री० भाष्यभाषा०द्वितीयप्रपा०एकादशः खंडः११ प्राणोंविषै गायत्रसामोपासना २ टीका :- नामके ग्रहण विना पञ्चविध औ सप्तविध सामका उपासन कहा। अनंतर अब गायत्र आदिक नामके ग्रहणपूर्वक विशिष्ट फलवाले सामके अन्य उपासन कहियेहैं :- [इहां यंथाक्रम गायत्र आदिकनका कर्मविषै प्रयोग

अथ द्वितीयप्रपाठकगतैकादशखंडस्य टिप्पणम्११ १०३ ननु पंचविध अरु सप्तविध सामका ध्यान व्याख्या- न किया। ऐसैं हुथे ज्ञातविषयविषै वक्तव्यके अभावतैं अनन्तर ग्रंथसैं अलं (बहुत) भया ? यह आशंकाकरिके । पूर्व उत्तर दोग्रंथनके अर्थके भेदकूं कहैहैं ॥ इहां :- गायत्र। रथंतर। इत्यादि नामके ग्रहणकरि विशिष्ट औ विशिष्टफलवाले। यह अर्थ है॥। १०४ फेर वक्ष्यमाण उपासनोंविषै निर्देशके क्रमकी सिद्धि २७

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३१४ द्वितीयप्रपाठक २ समस्तसामके उपासन २४ [छान्दोग्यो-

श्रोत्रं प्रतिहारः प्राणो निधनमेतद्गायनं प्राणेषु प्रोतम् ॥१॥ निधन है। यह गायत्र प्राणोंविषै प्रोत है।। १ ॥ है। तैसैं हीं दिखावैहैं] मैन हिंकार है। का- हेतैं मनकूं सर्व करणरूप वृत्तिनके मध्य प्रथम होनेतैं।। तिसतैं अनंतर होनेतैं वाकु प्रस्ताव है। चक्षु उद्गीथ है श्रेष्ट होनेतैं। श्रोत्र प्रति- हार है प्रतिहत (फैल्या) होनेतैं। प्राण नि- धन है स्वापकालविषै यथोक्तनके प्राणविषै नि- कैसै है? तहां कहैहैं॥ इहां यह अर्थ है :- जैसें क्रमकूं आ- श्रयकरिके तिनका कर्मविषै प्रयोग कर्मिनकूं इष्ट है। इसीहीं क्रमसैं तिनके उपासनकी उक्ति है॥ १०५ तहां अप्राणकूं क्रिया अरु ज्ञानके असंभवतैं प्राणकूं प्रधान होनेतें ताकी दृष्टिकरि गायत्र नाम सामकी उपासनाकूं आदिविषै दिखावै हैं।। इहां "प्राणके प्रतिहीं वाक् लयकूं पावती है" इत्यादिश्रुतिकरि निद्राकालमैं प्राणविषै वाकूआ- दिकनका निधन (नाश) जाननेकूं योग्य है औ प्रोत क- हिये प्रगत। अर्थ यह जो प्रतिष्ठित ॥

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पनिषत ] एकादश खंड ११ ३१५ प्राणोंविषै गायत्रसामोपासना २ स य एवमेतदायतं प्राणेषु प्रोतं वेद प्राणी भवति सर्वमायुरेति ज्योग जी- अर्थ :- सो जो ऐसैं इस गायत्रकूं प्राणों विषै प्रोत जानताहै [सो] प्राणी होवैहै। सर्व आयुकूं पावताहै। ज्योक (उज्वल) जीवताहै। प्रजाकरि पशुनकरि महान् अरु धन (लयरूप नाश)तैं। यह गायत्र साम प्राणोंविषै प्रोत है। १।। टीका :- गायत्रीकू प्राणकरि संस्तुत होनेतैं सो जो ऐसैं इस गायत्र सामकूं प्राणोंविषै प्रोत जानताहै [सो] प्राणी(अैविकल करण- वाला) होवैहै। यह अर्थ है॥ सर्व आयुकूं पावताहै "शतवर्ष पुरुषका सर्व आयु है" १०६ गायत्रसामके प्राणोंविषै प्रतिष्ठितपनैमैं हेतुकूं क- हैहैं॥ इहां "प्राणहीं गायत्री है" ऐसी जातैं श्रुति है॥ १०७ अविद्वानकूंबी प्राणीपनैकी सिद्धितैं यह विद्याका फल नहीं है? यह आशंकाकरिके कहैहैं। १०८ फेर नानाजनसंबंधि सर्व आयुकूं एकध्याता पावनेकूं

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३१६ द्वितीयप्रपाठक २ समस्तसामके उपासन २४ [छान्दोग्यो-

वति महान् प्रजया पश्ञुभिर्भवति महान् कीर्त्या। महामनाः स्यात्तद्रतम्॥२॥ इति द्वितीय प्रपाठकस्यैकादशः खण्डः ॥ ११॥

कीर्तिकरि महान् होवैहै॥ महामना होवै सो व्रत है॥ २ ॥ इति श्री०मूलभाषा०द्वितीयप्रपा०एकादशः खंडः इस श्रुतितैं औ ज्योग् (उज्वल) जीवताहै औ प्रजा आदिककरि महान् होवैहै अरु कीर्तिकरि महान् होवैहै। गायत्र सामके उ- पासकका यह व्रत होवैहै :- जो बडे मन- वाला (अक्षुद्रचित्तवाला) होवै। यह अर्थ है॥ २ ॥ इति श्री०भाष्यभाषा० द्वितीयप्रपाठकस्यैकादशः खंड:११ कैसैं पूर्ण होवैहै ? यह आशंकाकरिके कहैहैं॥ इहां "शत आयुषवालाहीं पुरुष है" इस श्रुतितैं यह कहियेहै औ ज्योकू शब्द निपात है औ सो उज्वलनरूप अर्थवाला है औ उज्वल। याका स्वपरके उपकारविषै समर्थ । यह अर्थ है॥ इति द्वितीयप्रपाठकगतैकादशखंडस्य टिप्पणं ॥ ११ ॥

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पनिषत् ] द्वादश खंड १२ ३१७ अग्निविषै गायत्रसामोपासना २ अथ द्वितीयप्रपाठ· दादशः खंड: ॥१२। अभिमन्थति स हिङ्कारो धूमो जा- यते स प्रस्तावो ज्वलति स उद्गीथो-

अर्थ :- अभिमंथन करै है सो हिंकार है। धूम उपजाताहै सो प्रस्ताव है। जलताहै अथ श्री०भाष्यभाषा· द्वितीयप्रपा०द्वादशःखंडः।।१२।। अग्निविषै गायत्रसामोपासना २ टीका :- अभिमंथन करैहै सो हिंकार है प्रथम होनेतैं। अभितैं धूम उपजाताहै सो प्रस्ताव है अनंतर होनेतैं। जलताहै सो उद्गीथ है। हविके संबंधतैं जलनेकी श्रेष्ठता है।। अं- गार होवहैं सो प्रतिहार है अंगारनकूं प्र- तिहत (विखरे) होनेतैं डपशम जो अभनिकूं अथ द्वितीयप्रपाठकगतद्वादशखंडस्य टिप्पणं॥१२।। १०९ समग्र प्राणवालेकूं मंथनके कर्तापनैके संभवतैं प्रा- णदृष्टिके अनंतर मंथनादिककी दृष्टिकूं अवतार देते हैं॥ ११० उपशम अरु संशम ऐसें अर्थभेदके अभावतैं पुनरु-

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३१८ द्वितीयप्रपाठक २ [छान्दोग्यो- समस्तसामके उपासन २४ ड्द्गारा भवन्ति सप्रतिहार उपशाम्यति तन्निधनY सशाम्यति तन्निधनमेतद्र- थन्तरमग्नौ प्रोतम् ॥१॥ सो उद्गीथ है। अंगार होवैहैं सो प्रतिहार है। उपशम होवैहै सो निधन है। संशम होवैहै सो निधन है। यह रथंतर अग्नि- विषै प्रोत है॥ १ ॥ सावशेष होनेतें है औ संशम जो अनिका निःशेष उपशम है सो समाप्तिके सामान्यतैं निधन है॥ यह रथंतर नामक साम अग्नि- विषै प्रोत है। मोतैं अनिके मंथनविषै गायन करियेहै॥ १ ॥ क्तिकूं आशंकाकरिके। सावशेषता अरु निरवशेषताकरि विशेष (भेद) कूं कहैहैं॥ १११ फेर रथन्तर सामका अग्निविषै प्रतिष्ठितपना कैसैं है। जातैं तहां किंचित् निमित्त प्रतीत होता नहीं ? यातैं कहैहैं।। इहां यह अर्थ है :- मंथनकूं निमित्तकरिके अग्निकी उत्पत्तिविषै रथंतर सामकी गीयमानताके देखनेतें अग्निविषै ताके प्रतिष्ठितपनैकी सिद्धि है॥

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पनिषत्] द्वादश खंड १२ ३१९ अग्निविषै गायत्रसामोपासना २ स य एवमेतद्रथन्तरमग्नौ प्रोतं वेद ब्रह्मवर्चस्यन्नादो भवति सर्वमायुरेति ज्योग् जीवति महान् प्रजया पशुभिर्भ- अर्थः-सो जो ऐसैं इस रथन्तरकूं अ- न्निविषै प्रोत जानताहै। ब्रह्मवर्चसी अ- न्नाद होवैहै। सर्व आयुकूं पावताहै। ज्योक (उज्वल) जीवताहै। प्रजाकरि पशुनकरि टीका :- "सो जो" इत्यादि पूर्ववत् है॥ ब्रह्मवर्चसी होवैहै। धैत्ते अरु स्वाध्यायरूप नि- मित्तवाला जो तेज सो ब्रह्मवर्चस है। अरु ते- ज तो केवल कांतिभाव है। औ अन्नाद (दीप्ष अभनिवाला) होवैहै॥ अग्निके अभिमुख न आचमन करै न किंचित् भक्षण करै औ नि- ११२ ननु इहां "ब्रह्मवर्चसी" ऐसा फल कहा। बृहत्के उपासनविषै तो "तेजस्वी होवैहै" ऐसें आगे कहियेगा औ ब्रह्मवर्चस अरु तेजका भेद नहीं है। तैसें हुये बृहत् अरु रथंतरके उपासनविषै फलकी विषमता (विलक्षणता) नहीं है? यातैं कहैहैं॥ इति द्वितीयप्रपाठकगतद्वादशखंडस्य टिप्पणं॥ १२॥

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३२० द्वितीयप्रपाठक २ [छान्दोग्यो- समस्तसामके उपासन २४ वति महान् कीर्त्या।न प्रत्यङग्निमाचा- मेन्न निष्ठीवेत्तद्रतम् ॥२ ॥ इति द्वितीयप्रपाठकस्य द्वादशः खण्डः॥१२॥ अथ द्वितीय प्रपा०त्रयोदशः खंडः।।१३।। उपमन्त्रयते स हिङ्कारो ज्ञपयते स महान् अरु कीर्तिकरि महान् होवैहै॥ अ- ग्निके अभिमुख न आचमन करै। न नि- ष्ठीवन करै। यह व्रत है॥ २ ॥। इति श्री०मूलभा०द्वितीयप्रपा० द्वादशः खंड: १२ अर्थः-उपमंत्रण करैहै सो हिंकार है। ष्ठीवन (श्हेष्मके निरसन)कूं न करें। सो व्रत है॥ २ ॥ इति श्री० भाष्यभाषा० द्वितीयप्रपा० द्वादशः खंडः॥१२॥ मिथुनविषै वामदेव्य सामोपासना टीका :- पमंत्रण (संकेत)कूं करैहै प्रथम अथ द्वितीय प्रपाठकगत-त्रयोदशखण्डस्य टिप्पणं१३ ११३ उत्तर (ऊपरकी) अरु अधर (नीचेकी) अरणि

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पनिषत्] त्रयोदश खंड १३ ३२१ मिथुनविषै वामदेव्य सामोपासना ३ प्रस्तावः स्त्रिया सह शेते स उद्गीथः प्रति स्त्री सह शेते स प्रतिहार: कालं ग- च्छति तन्निधनं पारं गच्छति तत्निध- नमेतद्वामदेव्यं मिथुने प्रोतम् ॥१॥ ज्ञपन करैहै सो प्रस्ताव है। स्त्रीके साथि शयन करैहै सो उद्गीथ हे। स्त्रीके प्रति शयन करैहै सो प्रतिहार है। कालकूं- गमन करैहै सो निधन है। पारकूं ग- मन करैहै सो निधन है॥ यह वामदेव्य मिथुनविषै प्रोत है ॥ १ ॥ होनेतैं सो हिंकार है। इपन (तोषण)कूं करैहै सो प्रस्ताव है। साथि शयन (एक पर्यंकविषै गमन) है सो उद्गीथ है श्रेष्ठ हो- स्थानीय अरु अवाच्य कर्मविषै प्रवृत्त स्त्रीपुरुषके मंथनके सा- मान्यतैं मंथनादि दृष्टिके अनंतर मैथुनदृष्टिकूं विधान करैहैं॥ ११४ पुरुषहीं पशुकर्मकेअर्थ स्त्रीकूं वस्त्रआदिकसैं प्रीणन (प्रसन्न) करैहै। तिसविषै प्रारंभके सामान्यतैं प्रस्तावकी दृष्टि है। ऐसैं कहैहैं॥

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३२२ द्वितीयप्रपाठक २ [छान्दोग्यो- समस्तसामके उपासन २४ स य एवमेतद्ामदेव्यं मिथुने प्रोतं वेद मिथुनी भवति मिथुनान्मिथुना- अर्थः-सो जो ऐसैं इस वामदेव्यकूं मिथुनविषै प्रोत जानता है। मिथुनी हो- नेतैं। स्त्रीके प्रति शयन (स्त्रीका अभिमुखी- भाव) है सो प्रतिहार है। कालके प्रति (मैथुनकरि पार जो समाप्ति ताके प्रति) ग- मन करैहै सो निधन है।। यह वामदेव्य नामक साम मिथुनविषै प्रोत है। वीयु ज- लके मिथुनके संबंधतैं ॥ १ ॥ टीका :- "सो जो" इत्यादि पूर्ववत् है॥ इहां मिथुनी होवैहै। याका अविधुर (स्त्रीसैं अवियुक्त) होवैहै। यह अर्थ है औ मिथुनतैं मिथुनतैं उपजताहै। ऐसैं अमोघ रेतवान्- ११५ वामदेव्य नामक सामका मिथुनविषै प्रोतपना कैसैं है? तहां कहैहैं॥ इहां यह अर्थ है :- वायुके अरु जलके मि- थुनभावकरि संबंधतैं वामदेव्य सामकी उत्पत्तिकूं उक्त हो- नेतैं ताका मिथुनविषै प्रतिष्ठितपना युक्त है॥

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पनिषत् ] त्रयोदश खंड १३ ३२३ मिथुनविषै वामदेव्य सामोपासना ३ त्प्रजायते सर्वमायुरेति ज्योग् जीवति महान् प्रजया पशुभिर्भवति महान् कीर्त्या। न काञ्चन परिहरेत्तद्रतम् ॥२॥ इति द्वितीयप्रपाठकस्य त्रयोदशः खण्डः ॥१३ ॥ वैहै मिथुनतैं मिथुनतैं उपजताहै। सर्व आयुकूं पावताहै। ज्योक् जीवताहै। प्र- जाकर पशुनकरि महान् अरु कीर्तिकरि महान् होवैहै। किसी (स्त्री)कूंबी परिहार करै नहीं सो व्रत है॥ २ ॥ इतिश्री०मूलभा०द्वितीयप्र०त्रयोदशः खण्डः१३ पना कहियेहै औ किसीबी आपकी शय्याके ६१६

तांईं प्राप्त समागमकी अर्थिनी स्त्रीकूं परिहार (त्याग) करै नहीं। काहेतैं वीमदेव्य सामके उपासनके अंग होनेकरि विधानतैं। इसतैं अ- ११६ "किसीकूंबी नहीं" इस वाक्यकूं लेके व्याख्यान करैहैं। ११७ "परांगना (परस्त्री)कूं उपगमन करै नहीं" इस स्मृतिके विरोधकूं आशंकाकरिके कहैहैं।। इहां यह भाव है :- विधिनिषेधकी सामान्य अरु विशेषविषयवान्ताकरि व्य- वस्था प्रसिद्ध है।।

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३२४ द्वितीय प्रपाठक २ [छान्दोग्यो- समस्तसामके उपासन २४ अथ द्वितीयप्रपा० चतुर्दशः खंडः॥।१४॥ उदन्हिद्कार उदितः प्रस्तावो मध्य- अथ श्री०मूलभाषा• द्वि०प्रपा० चतुर्दशः खण्ड: १४ अर्थ :- उदयकूं पावता हुया हिंकार है। न्यत्र प्रतिषेधकी स्मृतियां हैं औ वैचनके प्रा- माण्यतैं इस धर्मके निश्चयका प्रतिषेध शास्त्रसैं विरोध नहीं है॥ २॥ इति श्री० भाष्यभाषाद्वितीय प्रपा०त्रयोदशः खण्ड: १३ अथ श्री०भाष्यभाषा० द्वितीय प्रपाठ०चतुर्दशःखंड:१४ आदित्यविषै वृहत्सामोपासना २ टीका :- उैद्यकूं पावता हुया सविता सो ११८ किंवा :- शास्त्रके प्रामाण्यतें इहां धर्म जानियेहै औ "किसीकूंबी परिहार करै नहीं" ऐसें इहां शास्त्रकरि निश्चित होनेतैं अवाच्यवी कर्म धर्म होनेकूं योग्य होवैहै। तैसैं हुये श्रौत अर्थविषै दुर्वलस्मृतिका प्रतिस्पर्द्ीपना नहीं है। ऐसैं क- हैहैं। इहां यह भाव है :- यथोक्त उपासनावालेकूं ब्रह्मचर्यके नियमका अभाव व्रत होनैंकरि विवक्षित है [ सर्वकूं नहीं] तातैं प्रतिषेधशास्त्रके विरोधकी आशंका नहीं है।। इति द्वितीयप्रपाठकगत त्रयोदशखंडस्य टिप्पणं। १३ ॥। अथ द्वितीय प्रपाठकगतचतुर्दशखंडस्य टिप्पणं॥१४।। ११९ आदित्यकूं प्रजाके प्रसव (जन्म)का हेतु होनेतैं

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पनिषत् ] चर्तुदश खंड १४ आदित्यविषै बृहत् सामोपासन २ ३२५

न्दिन उद्धीथोऽपराह: प्रतिहारोऽस्तं य- न्निधनमेतडृहदादित्ये प्रोतम् ॥ १॥ उदित प्रस्ताव है। मध्यंदिन उद्गीथ है। अपराह्न प्रतिहार है। अस्तकूं पावता हुया निधन है॥ यह बहत् [साम] आ- दित्यविषै प्रोत है ॥ १ ॥ हिंकार है दर्शनकूं प्रथम होनेतैं। उदित प्र- स्ताव है कर्मोंके प्रस्तवनका हेतु होनेतैं। मध्यन्दिन उद्गीथ है श्रेष्ठ होनेतैं। अपराह् प्रतिहार है पशु आदिकनके गृहोंकेतांईं प्रति- हरणतैं। जो अस्तकूं पावताहै सो निधन है रात्रिविषै गृहमैं प्राणिनके निधनतैं ॥ यह व- हत् साम आदित्यविषै प्रोत है काहेतैं वहत सामकूं आदित्यरूप दैवत्यवाला होनेतैं ॥ १ ॥ ता (प्रसव)के हेतु मैथुनकी दृष्टिके अनंतर आदित्यकी दृष्टिकूं उठावते हैं। इति द्वितीयप्रपाठकगतचतुर्दशखंडस्य टिप्पणम् ॥१४॥ २८

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३२६ द्वितीयप्रपाठक २ [छान्दोग्यो- समस्तसामके उपासन २४ स य एवमेतदूहदादित्ये प्रोतं वेद तेजस्व्यन्नादो भवति सर्वमायुरेति ज्यो- गू जीवति महान् प्रजया पशुभिर्भ- वति महान् कीर्त्या। तपन्तं न निन्दे- त्तद्रतम् ॥२॥ इति द्वितीयप्रपाठकस्य चतुर्दशः खण्डः । १४ ॥ अर्थ :- जो ऐसैं इस बहत्कूं आदित्य- विषै प्रोत जानताहै। सो तेजस्वी अन्नाद होवैहै। सर्व आयुकूं पावताहै। ज्योक जीवताहै। प्रजाकरि पशुनकरि महान् अरु कीर्तिकरि महान् होवैहै। तपनेवालेकूं निंदा करै नहीं सो व्रत है॥ २ ॥ इति श्री०मूलभाषा०द्वि०प्रपा०चतुर्दशः खंडः१४ टीकाः-"सो जो" इत्यादि पूर्ववत् है। तपनेवालेके प्रति निंदा करे नहीं। सो व्रत है॥ २ ॥ इति श्री० भाष्यभाषा०द्वितीयप्रपा० चतुर्दशः खण्डः॥१४॥

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पनिषत् ] पंचदश खंड १५ ३२७ पर्जन्यविषै वैरूप सामोपासन २ अथ द्वितीय प्रपाठ० पञ्चदश: खंड: १५ अभ्राणि सम्पवन्ते स हिङ्कारो मेघो जायते स प्रस्तावो वर्षति स उद्गीथो अथ श्री०मूलभाषा०द्वितीयप्रपा०पंचदशः खण्ड: १५ अर्थः-अभ्र (बादल) संवन करते (चलते) हैं सो हिंकार है। मेघ उपजता है सो प्रस्ताव है। वर्षताहै सो उद्गीथ है। अथ श्री०भाष्यभाषा द्वितीयप्रपाठपंचदशःखंड:१५ पर्जन्यविषै वैरूप सामोपासन २ टीका :- अभ्र अप् (जल)के भरणतैं हैं। मेघ उदकका सेचक होनेतैं है। अन्य वाक्य उक्त अर्थवाला है।।॥ यह वैरूप नाम साम पर्जन्य (मेघ) विषै प्रोत है। अनेकैरूप अथ द्वितीय प्रपाठकगतपंचद्शखंडस्य टिप्पणं॥।१५।। १२० "आदित्यतैं वृष्टि होवैहै" इस स्मृतितैं पर्जन्यकूं आ- दित्यका कार्य होनेतैं आदित्यकी दृष्टिके अनंतर पर्जन्यकी ह- ष्टिकूं दिखावै हैं॥ १२१ वैरूप साम तिसविषै कैसैं प्रतिष्ठित है? तहां कहैहैं। इति द्वितीयप्रपाठकगत-पंचदशखंडस्य टिप्पणम्॥१५॥

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३२८ द्वितीयप्रपाठक २ [छान्दोग्यो- समस्तसामके उपासन २४ विद्योतते स्तनयति स प्रतिहार उद्गहाति तन्निधनमेतद्वैरूपं पर्जन्ये प्रोतम्॥१॥ स य एवमेतद्वैरूपं पर्जन्ये प्रोतं वेद विरूपाशश्र सुरूपाएश्र पशूनव- रुन्धे सर्वमायुरेति ज्योग जीवति म- विद्योतन करैहै अरु गर्जताहै सो प्रति- हार है। उद्ग्रहण (वर्षाकी समाप्ति) करैहै सो निधन है॥ यह वैरूप [साम] पर्ज- न्यविषै प्रोत है॥ १ ॥ अर्थः-जो ऐसैं इस वैरूपकूं पर्जन्य- विषै प्रोत जानताहै। सो विरूप अरु सु- रूप पशुनकूं अवरोध करैहै। सर्व आयुकूं पावताहै। ज्योक् जीवताहै। प्रजाकरि होनेतैं अभ्र आदिकनकरि पर्जन्यका वैरुप्य (विपरीत रूपवान्पना) है॥ १ ॥ टीका :- विरूप औ सुरूप अज अवि आदिक पशुनकूं अवरोध करताहै। अर्थ

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पनिषत् ] ] षोडश खंड १६ ३२९ ऋतुनविषै वैराजसामोपासन २ हान् प्रजया पशुभिर्भवति महान् कीर्त्या। वर्षन्तं न निन्देत्तडतम्॥ २॥ इति द्वितीयप्रपाठकस्य पंचदशः खण्डः।१५॥ अथ द्वितीयप्रपाठ·षोडशः खंड:।१६।। वसन्तो हिङ्कारो ग्रीष्मः प्रस्तावो पशुनकरि महान् अरु कीर्तिकरि महान् होवैहै॥ वर्षनेवालेके प्रति निंदा करै नहीं सो व्रत है॥ २ ॥ इति श्री०मूलभा०द्वि०प्रपा० पंचदशः खंड: १५ अथ श्री०मूलभाषा० द्वितीयप्रपा०षोडशः खण्ड: १६॥ अर्थ :- वसंत हिंकार है। ग्रीष्म प्रस्ताव यह जो :- पावताहै॥ वर्षणेवालेके प्रति निंदा करै नहीं सो व्रत है। २ ।। इति श्री० भाष्यभाषा०द्वितीयप्रपाठकस्य पंचदशःखंड:१५

ऋतुनविषै वैराजसामोपासन २ टीका :- वसन्त हिंकार है प्रथम होनेतैं। अथ द्वितीयप्रपाठकगतषोडशखंडस्य टिप्पणम् १६ १२२ ऋतुनकी व्यवस्थाकूं पर्जन्य (वृष्टि)के अधीन हो-

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३३० द्वितीयप्रपाठक २ [छान्दोग्यो- समस्तसामके उपासन २४ वर्षा उद्धीथः शरत्प्रतिहारो हेमन्तो निधनमेतद्वैराजमृतुषु प्रोतम् ॥१॥ स य एवमेतद्वैराजमृतुषु प्रोतं वेद है। वर्षा उद्गीथ है। शरत् प्रतिहार है। हेमंत निधन है। यह वैराज [साम] ऋतु- नविषै प्रोत है॥ १ ॥ अर्थ :- जो ऐसैं इस वैराजकूं ऋतुनवि- ग्रीष्म प्रस्ताव है। इत्यादि पूर्ववत् है॥ १॥ टीका :- इस वैराज नाम सामकूं ऋतुन- विषै प्रोत जानताहै। ऋतुनकीन्यांई वि- नेतें ता पर्जन्यकी दृष्टिके अनंतर ऋतुनकी दृष्टिकूं कहैहैं। १२३ वैराज नाम सामका ऋतुनविषै प्रोतपना युक्त है। काहेतैं तिन ऋतुनकूं स्वधर्मौकरि विराजनेतें। ऐसें कहैहैं॥ इहां यह भाव है :- यद्वा ऋतुनकूं अन्नकी उत्पत्तिकी निमित्त होनेतें औ विराडात्माकूं अन्नरूप होनेतैं ता विराटकूं तिन ऋतुनविषै प्रतिष्ठित होनेतैं तिस विराद्द्वारा वैराज (विरा- ट्का संबंधि) साम बी तिन ऋतुनविषै प्रोत है। यह भाव है।। इति द्वितीयप्रपाठकगत-षोडशखंडस्य टिप्पणम ॥ १६॥

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पनिषत् ] पोडश खंड १६ ऋतुनविषै वैराजसामोपासन २ ३३१

विराजति प्रजया पशुभिर्व्रह्मवर्चसेन सर्वमायुरेति ज्योग जीवति महान्प्रज- या पशुभिर्भवति महान् कीर्त्यर्तून्न नि- न्देत्तड्तम्॥ २॥ इति द्वितीयप्रपाठकस्य षोडशः खण्डः॥ १६॥ वै प्रोत जानताहै। सो प्रजाकरि पशुन- करि ब्रह्मवर्चसकरि विराजताहै। सर्व आयुकू पावताहै। ज्योक जीवताहै। प्रजा- करि पशुनकरि महान् अरु कीर्तिकरि म- हानू होवैहै। ऋतुनकूं निंदा करै नहीं सो व्रत है ॥ २ ॥ इति श्री०मूलभाषा०द्वितीयप्रपा०षोडशःखंड:१६ राजताहै कहिये जैसैं ऋतुआं ऋतुनके धर्मो- करि विराजतियां हैं ऐसैं विद्वान् प्रजा आदिक- नकरि विराजताहै। अन्य अर्थ कहा है।। ऋतुनकूं निंदा करै नहीं सो व्रत है॥ २ ।। इति श्री० भाष्यभाषा०द्वितीयप्रपाठकस्य षोडशःखंड:१६

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३३२ द्वितीयप्रपाठक २ [छान्दोग्यो- समस्तसामके उपासन २४ अथ द्वितीयप्रपाठ·सप्रदशः खंड: १७ पथिवी हिङ्कारोऽन्तरिक्षं प्रस्तावो दयौरुद्वीथो दिशः प्रतिहारः समुद्रो नि धनमेताः शक्कर्यों लोकेषु प्रोताः ॥१॥

अर्थ :- प्थिवी हिंकार है। अंतरिक्ष प्र- स्ताव है। दौः उद्गीथ है। दिशा प्रतिहार है। समुद्र निधन है॥ ये शक्करीयां [नामक साम] लोकनविषै प्रोत हैं॥ १॥ अथ भाष्यभाषा०द्वितीयप्रपाठकस्य सप्तदशःखंड:१७ पृथिवीआदिककी दृष्टिसैं शक्करी सामोपासन २ टीका :- पथिवी हिंकार है। इत्यादि पूर्व- वत् है। इहां "शैकरी" यह नित्य बहुवचन अथ द्वितीयप्रपाठकगतसप्तद्शखंडस्य टिप्पणम्१७ १२४ ऋतुनके सम्यक् व्यतीत हुये लोकनकी स्थितिकूं प्रसिद्ध होनेतें ऋतुनकी दृष्टिके अनंतर लोकदृष्टिकूं कहैहैं॥ १२५ ननु "शक्करीयां " ऐसा एकहीं सामका नाम कैसें है। जातैं बहुवचनतैं बहुत साम प्रतीत होवैहैं ? तहां कहैहैं॥

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पनिषत् ] सप्तदश खंड १७ ३३३ पृथिवीआदिककी दृष्टिसैं शक्करी सामोपासन २ सय एवमेताः शक्कर्यों लोकेषु प्रोता वेद लोकी भवति सर्वमायुरेति ज्योग जीवति महान्प्रजया पशुभिर्भवति म- हान् कीर्त्या। लोकान्न निन्देत्तदतम्॥२।। इति द्वितीयप्रपाठकस्य सप्दशः खण्डः।१७।। अर्थ :- जो ऐसैं इन शक्करीनकूं लोकन- विषै प्रोत जानताहै। सो लोकी होवैहै। सर्व आयुकू पावताहै। ज्योक जीवताहै। प्रजाकरि पशुनकरि महान् अरु कीर्तिकरि महान् होवैहै॥ लोकनकूं निंदा करै नहीं सो व्रत है॥ २॥ इति श्री०मूलभाषा०द्वि०प्रपा०सप्तदशःखंड:१७ है। वे रेवतीनकी न्यांईं लोकनविषै प्रोतहै १ टीका :- लोकी होवैहै। अर्थ यह जो :- लो- १२६ नित्यबहुवचनपना दोनूंठिकाने तुल्य है। ऐसैं जना- वनेअर्थ वक्ष्यमाणकूं दष्टांत करैहैं॥ १२७ महानामवाली ऋचाओंविषै शक्करीयां (नामक साम) गायन करिये हैं औ तिनका "आपूहीं महानामवालीयां हैं"

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३३४ द्वितीयप्रपाठक २ [छान्दोग्यो- समस्तसामके उपासन २४ अथ द्वितीयप्रपाठ० अष्टादशःखंड: १८ अजा हिङ्कारोऽवयः प्रस्तावो गाव अथ श्री०मूलभाषा० द्वितीयप्रपाठ० अष्टादशःखंड:१७ अर्थ :- अजा (छेलीयां) हिंकार है। अवियां (मेषियां) प्रस्ताव है। गौवां उद्गीथ करूप फलसैं जुडताहै। लोकनकूं निंदा करै नहीं सो व्रत है॥ २ ।। इति श्री०भाष्यभाषा०द्वितीयप्रपा०सप्तदशः खंडः ॥१७।। अथ श्री० भाष्यभाषा० द्वितीय प्रपा०अष्टादशःखण्ड:१८ पशुदृष्टिसैं रेवती सामोपासन २ टीका :- अजा हिंकार है। इत्यादि पूर्ववत् ऐसैं आपके साथि संबंध स्मरण किया है अरु "आपविषै लोक प्रतिष्ठित हैं" ऐसें सुन्या है। ऐसें हुये इस संबंधतै लोकनविषै शक्करीयां प्रतिष्ठित हैं। ऐसें कहैहैं।। इति श्री० द्वितीयप्रपाठकगतसप्तदशखंडस्य टिप्पणम् ॥१७॥ अथ द्वितीयप्रपाठकगताष्टादशखंडस्य टिप्पणमू१८ १२८ पशुनकूं लोकनके कार्य होनेतें लोकदृष्टिके अनंतर पशुदृष्टिकूं उपन्यास करैहैं॥ इहां "रेवतीयां" ऐसा सामका नाम है। सो पूर्व(शक्करीन) कीन्यांई नित्यबहुवचनांत है॥

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पनिषत् ] अष्टादश खंड १८ ३३५ पशुद्ृष्टिसैं रेवती सामोपासन २ उद्गीथोऽश्वाः प्रतिहारः पुरुषो निधन- मेता रेवत्यः पश्चुषु प्रोताः॥१॥ स य एवमेता रेवत्यः पशुषु प्रोता वेद पशुमान् भवति सर्वमायुरेति ज्योग जीवति महान्प्रजया पश्चुभिर्भवति म- है। अश्व प्रतिहार है। पुरुष निधन है॥ ये रेवतीयां [नामक साम] पशुनविषै प्रोत हैं । १ ॥ अर्थ :- जो ऐसैं इन रेवतीनकूं पशुनविषै प्रोत जानताहै। सो पशुमान् होवैहै। सर्व आयुकरि महान् अरु कीर्तिकारि महान् है। [ वे रेवतीयां नामक सामविशेष) पर्शुन- विषै प्रोत हैं ॥ १॥

१२९ "पशुहीं रेवतीयां हैं" इस अन्य श्रुतिकूं आश्रय करिके कहैहैं॥ इति श्री० द्वितीयप्रपाठकगताष्टादशखंडस्य टिप्पणम् ॥१८॥

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३३६ द्वितीयप्रपाठक २ [छान्दोग्यो- समस्तसामके उपासन २४ हान् कीर्त्या पशून्न निन्देत्तद्तम् ॥२॥ इति द्वितीयप्रपाठ० अष्दशः खण्डः ॥१८।। अथ द्वितीय प्रपाठएकोनविंश: खण्डः लोम हिङ्कारस्त्वक् प्रस्तावो माएस होवैहै। पशुनकूं निंदा करै नहीं सो व्रत है। २ ॥ इति श्री०मूलभाषा०द्वितीयप्र०अष्टादशःखंड:१८ अथ श्री०मूलभाषा· द्वितीय प्रपा•एकोनविंश:खंड:१९ अर्थ :- लोम हिंकार है। त्वक् प्रस्ताव टीका :- पशुनकूं निंदा करै नहीं सो व्रत है॥ २ ॥ इति श्री०भाष्यभाषा० द्वितीयप्रपा०अष्टादशः खण्डः १८ अथ श्री०भाष्यभाषा० द्वितीयप्र० एकोनविंश: खंड:१९ अङ्गदृष्टिसैं यज्ञायज्ञीयसामोपासन २ टीका :- लोम हिंकार है। देहके अवय- अथ द्वितीयप्रपाठकगतैकोनविंशखंडस्यटिप्पणं१९ १३० पशुनके विकार दुग्ध दधिआदिककरि अंगनकी पुष्टि देखियेहै यातैं पशुदृष्टिके अनंतर अंगनकी दृष्टिकूं कहैहैं।

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पनिषत् ] एकोनविंश खंड १९ अंगदृष्टिसैं यज्ञायज्ञीय सामोपासन २ ३३७

मुद्गीथोऽस्थि प्रतिहारो मज्जा निधन- मेतद्यज्ञायज्ञीयमङ्गेषु प्रोतम्॥ १॥ सय एवमेतद्यज्ञायज्ञीयमङ्गेषु प्रोतं है। मांस उद्गीथ है। अस्थि प्रतिहार है॥ यह यज्ञायज्ञीय [साम] अंगनविषै प्रोत है।। १ ॥ VE अर्थः-जो ऐसैं इस यज्ञायज्ञीयकूं अंग- वनके मध्य प्रथम होनेतैं। त्वक् प्रस्ताव है लो- मके अनंतर होनेतैं। मांस उद्गीथ है श्रेष्ठ होनेतैं। अस्थि प्रतिहार है प्रतिहत (विखरे) होनेतैं। मज्जा निधन है अंतविषै होनेतैं॥ यैह यज्ञायज्ञीय नाम साम देहके अवयवनविषै प्रोत है॥ १ ॥ टीका :- अंगी होवैहै। अर्थ यह जोः-स- १३१ "रसहीं यज्ञायज्ञीय है" इस श्रुतितै अन्नरसके वि- कारसैं लोमआदिकनके संबंधतैं यज्ञायज्ञीयसाम अंगनविषै प्र- तिष्टित है। ऐसैं कहैहैं। इहां कुणि कहिये शमश्रुरहित॥ इति श्री०द्वितीयप्रपाठकगतैकोनविंशखंडस्य टिप्पणम् ॥१९॥ २९

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३३८ द्वितीयप्रपाठक २ [छान्दोग्यो- समस्तसामके उपासन २४ वेदाङ्गी भवति नाड्रेन विहूर्छति सर्व- मायुरेति ज्योग जीवति महान् प्रजया पशुभिर्भवति महान् कीर्त्या। संवत्सरं मज्जो नाश्रीयात्तद्रतं मज्जो नाश्रीया- दिति वा ॥ २ ॥ इति द्वितीयप्रपाठकस्यैकोनविंशः खण्डः ॥ १९।। नविषै प्रोत जानताहै। सो अंगी होवैहै। अंगसैं कुटिल होता नहीं। सर्व आयुकू पा- वताहै ज्योक् जीवताहै। प्रजाकरिपशुनकरि महान् अरु कीर्तिकरि महान् होवैहै॥ सं- वत्सर मांसनकूं भक्षण करै नहीं। मांस- नकूं भक्षण करै नहीं। ऐसा वा सो व्रत है॥ २ ॥ इति श्री०मूलभा०द्वि०प्र०एकोनविंशःखण्ड:१९ मग्र अंगवाला होवैहै। हस्तपादादि अंगकरि कुटिल (वक्) नहीं होवैहै। अर्थ यह जो :- पंगु वा कुणी (कुत्सितकरवाला अरु शमश्रुर'

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पनिषत्] विंश खंड २० ३३९ देवतादृष्टिसैं राजन सामोपासन २ अथ द्वितीयप्रपाठकस्य विंश: खंड:२० अग्निर्हिक्कारो वायुः प्रस्ताव आदि- अथ श्री०मूलभाषा० द्वितीयप्रपाठ·विंशः खण्डः॥२०॥ अर्थ :- अग्नि हिंकार है। वायु प्रस्ताव है। आदित्य उद्गीथ है। नक्षत्र प्रतिहार हित) नहीं होवैहै॥ संवत्सरमात्र मांसनकूं भक्षण करै नहीं। इहां बहुवचन मत्स्यनके उपलक्षणअर्थ है । मांसनकूं सर्वदाहीं भक्ष- ण करै नहीं ऐसा वा। सो व्रत है॥ २ ।। इति श्री०भाष्यभाषा०द्वितीयप्रपा० एकोनविंशःखण्ड:१९ अथ श्री०भाष्यभाषा०द्वितीयप्रपा० विंशःखण्डः॥२०।। देवतादृष्टिसैं राजन सामोपासन २ टीका :- अभनि हिंकार है। प्रथमस्थान- sho she वाला होनेतैं। वायु प्रस्ताव अनंतरताके सामान्यतैं। आदित्य उद्गीथ श्रेष्ठ होनेतैं। अथ द्वितीयप्रपाठकगत विंशखंडस्य टिप्पणम् २० १३२ अग्निआदिकनकूं अंगनविषै प्रतिष्ठित होनेतैं अंग- दृष्टिके अनंतर अग्निआदिककी दृष्टिकूं उठावते हैं॥

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३४० द्वितीयप्रपाठक २ [छान्दोग्यो समस्तसामके उपासन २४ त्य उद्गीथो नक्षत्राणि प्रतिहारश्चन्द्रमा निधनमेतद्राजनं देवतासु प्रोतम्॥१॥ स य एवमेतद्राजनं देवतासु प्रोतं है। चंद्रमा निधन है॥ यह राजन [नाम साम] देवताओंविषै प्रोत है।। १।। अर्थ :- जो ऐसें इस राजनकूं देवता ओंविषै प्रोत जानताहै। सो इनहीं देवता नक्षत्र प्रतिहार है प्रतिहृत (विखरे) होनेतैं। चंद्रमा निधन है कर्मिनके तिसविषै निधन (मरिके प्रवेश) तैं॥ यह राजन नाम साम देवताओंविषै प्रोत है देवताओंकूं दीप्तिमान् होनेतैं ॥ १ ॥ टीका :- विद्वान्कूं फलः-इनहीं अभनिआदिक देवताओंकी सलोकता (समानलोकता) कूं वा सार्ष्टिता (समानऋद्विमान्ता)कूं सायुज्य कहैहैं॥ १३२ राजन नामक सामके देवताओंविषै प्रोतपनैमैं हेतुकूं

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पनिषत् ] विंश खंड २० देवतादृष्टिसैं राजन सामोपासन २ ३४१

वेदैतासामेव देवतानार सलोकताएसा- र्ष्टितासायुज्यं गच्छति सर्वमायुरेति ज्योग जीवति महान प्रजया पशुभि- ओंकी सलोकताकूं वा सार्ष्टिताकूं वा सा- युज्यकूं पावताहै। सर्व आयुकू पावताहै। ज्योक जीवताहै। प्रजाकरि पशुनकरि म- (सयुग्भाव)कूं अर्थ यह जो :- एकदेहदेहीभा- वकूं [ वा शब्द इहां छत देखनेकूं योग्य है। सैलोकताकूं वा इत्यादि। भावनाके विशेष (भेद)तैं फल विशेषके संभवतैं ] पावताहै औ समुच्चयके असंभवतैं [ वा शब्दके अर्थरूप १३४ फलके विकल्पअर्थ वा शब्दके इहां असन्भावके हुये कैसैं वाक्य होवैगा ? यह आशंका करिके कहैहैं॥ १३५ फेर एकउपासनविषै फलत्रय कैसें विकल्प करिये है? तहां कहैहैं॥ १३६ ननु तीन फल इहां समुच्चित अंगीकार करनेकूं योग्य हैं। ऐसैं वा शब्दकूं ग्रहण करिके क्यूं विकल्प करिये है ? तहां कहैहैं॥ इहां यह अर्थ है :- जातैं परस्पर विरुद्ध फलत्रय एकत्र समुच्िचित (मिलित) करनेकूं शक्य नहीं है। यातैंबी विकल्पकी सिद्धि है॥

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३४२ द्वितीयप्रपाठक २ [छान्दोग्यो- समस्तसामके उपासन २४ र्भवति महान् कीर्त्या। ब्राह्मणान्न नि- न्देत्तद्रतम् ॥ २ ॥ इति द्वितीयप्रपाठकस् विंशः खण्डः ॥ २० ॥ हान् अरु कीर्तिकरि महान् होवैहै॥ ब्रा- ह्रणोंकूं निंदा करै नहीं सो व्रत है।। इति श्री०मूलभाषा०द्वितीयप्र०विंशःखंडः।।२०।। विकल्पकी सिद्धि है] ।I ब्राह्मणोंकूं निंदा करै नहीं सो व्रत है। "येई प्रत्यक्ष देव हैं जे ब्राह्मण हैं" इसश्रुतितैं ब्राह्मणोंकी जो निंदा सो देवताओंकी निंदाहीं है॥ २ ॥ इति श्री०भाष्यभाषा०द्वितीयप्रपाठ०विंशः खंडः॥२०। १३७ ननु देवताओंकी दृष्टिकरि राजननाम सामके ध्या- नतैं "देवताओंकू निंदा करै नहीं" ऐसें कहनेकूं योग्य हुये अन्यथा कैसें कहिये है ? तहां कहैहैं॥ इति श्री०द्वितीयप्रपाठकगतविंशखंडस्य टिप्पणम् ॥२०॥

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पनिषत् ] एकविंश खंड २१ ३४३ त्रयीविद्यादिद्ृष्टिसैं सामोपासन ४ अथ द्वितीयप्रपाठ०एकविंशः खंड: २१ तयी विद्या हिङ्कारस्त्रय इमे लोका: अथ श्री०मूलभाषा० द्वितीयप्रपा०एकविंशःखंडः॥२१।। अर्थः-त्रयी विद्या हिंकार है। तीन ये लोक सो प्रस्ताव है। अभ्नि वायु आदित्य

त्रयीविद्यादिदृष्टिसैं सामोपासन ४ टीका :- त्रयी विद्या हिंकार है। अभि आदिक सामतैं त्रयीविद्याकी अनंतरता त्रयी- विद्याकूं अभिआदिकके कार्यताकी श्रुतितैं घटे है। हिंकार सर्व कर्तव्योंके मध्य प्रथम होनेतैं अथ द्वितीयप्रपाठकगतैकविंशखंडस्य टिप्पणम्२१ १३८ अग्निआदिककी दृष्टिके अनंतर त्रयीविद्याकी दृष्टिके विधानविषै कारणकूं कहैहैं।। इहां जो अग्निआदिकस्वरूप साम उपास्य कहा। तिसतैं अनंतरता त्रयीविद्यारूप उपा- स्यकी घटती है। काहेतैं "अन्नितैं ऋग्वेद। वायुतैं यजुर्वेद। आदित्यतैं सामवेद होवैहै" इस श्रुतितें त्रयी ( वेदविद्या ) कूं तिनकी कार्यताके निश्चयतैं। यह अर्थ है :- औ ताका कार्य होनेतैं। याका त्रयाविद्याकरि साध्य कर्मका फल होनेतैं। यह अर्थ है।।

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३४४ द्वितीयप्रपाठक २ [छान्दोग्यो- समस्तसामके उपासन २४ स प्रस्तावोऽग्निर्वायुरादित्यः स उद्गी- थो नक्षत्राणि वयाएसि मरीचयः स सो उद्गीथ है। नक्षत्र पक्षी मरीचियां (किरण) सो प्रतिहार है। सर्प गंधर्व पितर है। तीन ये लोक ताके कार्य होनेतैं अनंतर हैं यातैं सो प्रस्ताव है। अभनि आदिका उ- द्रीथपना श्रेष्ठतातैं है। नक्षत्र आदिकनका प्र- तिहत होनेतैं प्रतिहारपना है। सर्प आदिक- नका धकारके सामान्यतैं निधनपना है॥ यह साम नामविशेषके अभावतैं सामका समूह (सामान्यरूप) सामशब्द सर्वविषै प्रोत है। भ्रैयीविद्या आदिक जातैं सर्व है [ यातैं] त्रैथी विद्या आदिककी दृष्टिकरि हिंकार आ- दिक सामकी भक्तियां (विभाग) उपास्य हैं। १३९ सर्वविषै प्रोत है यह कैसें कहा। त्रयीविद्या आ- दिकविषै प्रोत है ऐसें कहनेकूं योग्य होनेतें ! यातैं कहैहैं॥ १४० फेर इहां त्रयीविद्याकी दृष्टिकरि सामका ध्येयपना कैसें जानिये है? तहां कहैहैं।

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पनिषत् ] एकविंश खंड २१ ३४५ त्रयीविद्यादिद्ृष्टिसैं सामोपासन ४ प्रतिहारः सर्पा गन्धर्वाः पितरस्तन्निध- नमेतत्साम सर्वस्मिन्प्रोतम्॥१॥ स य एवमेतत्साम सर्वस्मिन् प्रोतं वेद सर्व५ह भवति॥२॥ सो निधन है। यह साम सर्वविषै प्रोत है ।। १ ॥ अर्थ :- जो ऐसैं इस सामकूं सर्वविषै प्रोत जानताहै। सो सर्वहीं होवैहै॥ २॥ अतीतसामोंके उपासनोंविषैबी जिन जिनविषै जो जो साम प्रोत है तिसकी दृष्टिकरि सो उ- पास्य है। काहेतैं कैर्मके अंगोंकूं दृष्टिरूप वि- शेषणवाले (दृष्टियुक्त) घृतकी न्यांई संस्कार- युक्त करनेकूं योग्य होनेतैं ॥ १ ॥ टीका :- सर्व विषयक सामके वेत्ताकूं फल १४१ औ इस प्रतिज्ञाके हुये पूर्वग्रंथसैं विरोध शंकाकूं योग्य होता नहीं ऐसैं कहैहैं॥ १४२ तहां हेतुकूं कहैहैं ॥ इहां यह अर्थ है :- दर्श पूर्ण- मासके अधिकारविषै पत्नीकरि अवेक्षित आज्य (घृत) हो- वैहै। ऐसें दृष्टिरूप विशेषणवाला आज्य संस्कारयुक्त करिये

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३४६ द्वितीयप्रपाठक २ [छान्दोग्यो- समस्तसामके उपासन २४ तदेष श्रोको यानि पञ्चधा त्रीणि तेभ्यो न ज्याय: परमन्यदस्ति॥ ३॥ अर्थ :- तिसविषै यह श्लोक है :- जे पं- चप्रकारसैं तीन तीन हैं तिनतैं ज्याय पर अन्य नहीं है॥ ३ ॥ कहिये हैः-सर्वहीं होवैहै। अर्थ यह जो :- सर्वेश्वर होवैहै। जातैं उपचार (आरोप) र- हित सर्व भावके हुये दिशाओंविषै स्थित प्रा- णीनतैं बलिदानकी प्राप्तिका असंभव है॥२॥ टीका :- तिस इस अर्थविषै यह श्रोक (मंत्र)बी है :- जे पंचप्रकारसैं हिंकारादि है ऐसैं सामके प्रभेदनके दृष्टिरूप विशेषणवान्ताके अविशेषत तिन कर्मके अंगनकूं तिस तिस अंगकी दृष्टिकरि संस्कारयुक्त करनेकूं योग्य होनेतैं।।

यातैं कहैहैं॥ १४३ अनंतर यथाश्रुत सर्वात्मभावहीं क्यूं नहीं होवैगा? १४४ सर्व विषयक सामके वेत्ताकूं सर्वेश्वरपना होवैहै। इस अर्थविषै मंत्रकूं कथन करैहैं।। इहां "पर" इसींहीं पदका व्याख्यान अन्यत् (अन्य) यह है।।

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पनिषत् ] एकविंश खंड २१ ३४७ त्रयीविद्यादिद्ृष्टिसैं सामोपासन 8 यस्तद्वेद स वेद सर्व सर्वा दिशो अर्थ :- जो तिसकूं जानताहै सो सर्वकूं जानताहै। सर्व दिशा इसकेअर्थ बलिकूं विभागोंकरि उक्त तीन तीन त्रयीविद्या आ- दिक हैं। तिन पांचत्रिकनतैं ज्याय (महत्तर) अरु पर (व्यतिरिक्त) कहिये अन्यवस्तु नहीं है। अर्थ यह जो :- विद्यमान नहीं है। जौतैं तिनविषैहीं सर्वका अंतर्भाव है॥ ३॥ टीका :- जो तिस यथोक्त सर्वात्मक सामकूं जानताहै। सो सर्वकूं जानताहै। अर्थ यह जो :- सो सर्वज्ञ होवैहै। सर्व दिशा क- हिये सर्व दिशाओंविषै स्थित। इस ऐसैं जा- ननेवालेके अर्थ बलि (भोग)कूं प्राप्त करै हैं। यह अर्थ है।। "सर्व मैं हूं" ऐसैं इस सामकूं उपासन करै ताका यहहीं व्रत है। १४५ अन्यवस्तुके अभावविषै हेतुकूं कहैहैं॥ इहां सर्वज्ञपना औ सर्वेश्वरपना तत् (ताका इस) शब्दका अर्थ है। इति श्री० द्वितीयप्रपाठकगतैकविंशखंडस्य टिप्पणम् ॥२१॥

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३४८ द्वितीयप्रपाठक २ [छान्दोग्यो- 5समस्तसामके उपासन २४ बलिमस्मै हरंति। सर्वमस्मीत्युपासीत तडतं तद्रतम् ॥४॥ इति द्वितीयप्रपाठ० एकविंश: खण्डः ॥ २१॥ अथ द्वितीय प्रपाठ० द्ाविंश: खंड: २२ विनर्दि साम्नो वृणे पशव्यमित्यग्रे- प्राप्त करैहैं॥। "सर्व हूं" ऐसें उपासन करै सो व्रत है। सो व्रत है।।४।। इति श्री०मूलभाषा०द्वितीयप्र०एकविंश:खंड:२१ अथ श्री०मूलभाषा०द्वितीयप्रपा०द्वाविंशः खंडः॥२२।। अर्थः-विनर्दि सामका [संबंधि] पशन्य इहां दोवार उक्ति जो है। सो सामके उपास- नकी समाप्ति अर्थ है ।। ४ ।। इति श्री०भाष्यभाषा०द्वितीयप्र० एकविंशः खंडः ॥।२१॥ अथ श्री०भाष्यभाषाद्वितीयप्र० द्ाविंशःखंडः ॥२२।। विनर्दिगुणविशिष्टसामोपासन ५ टीका :- सामके उपासनके प्रसंगसैं गानवि- अथ द्वितीयप्रपाठकगतद्वाविंशखंडस्य टिप्पणम्२२ १४६ ननु सामका उपासन जब समाप्त भया तब उत्तर

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पनिषत् ] द्ाविंश खंड २२ ३४९ विनर्दिगुणविशिष्टसामोपासन ५ रुद्गीथोऽनिरुक्तः प्रजापतेर्निरुक्त सोम- स्य मृदु श्रक्ष्णं वायोः श्क्ष्णं बलवदि- न्द्रस्य क्रौञ्चं रहस्पतेरपध्वान्तं वरु- (पशुनका हितरूप) अग्निका उद्गीथ है [ताकूं मैं] प्रार्थना करताहूं। ऐसैं [मान- ताहै]। अनिरुक्त प्रजापतिका है। निरुक्त सोमका है। मृदु श्रक्ष्ण वायुका है। श्क्ष्ण शेष आदिक संपत् उद्गाताकूं उपदेश करियेहै। फैलविशेषके संबंधतैंः-विशिष्ट नर्द (ऋषभके कूजितके सम स्वरविशेष) इसका है सो विनर्दि गान है। यह वाक्यशेष है औ सो सामका संबंधि पशुनकेअर्थ हितरूप पशव्य है अरु अग्निका (अशनिरूप दैवत्यवाला) उ- गंथसैं क्या है ? यह आशंका करिके कहैहैं।। इहां आदिशब्दकरि स्वर आदिक वर्ण ग्रहण करिये हैं। १४७ ऐसें उद्गाताकूं यथोक्त उपासना कैसे कहिये है ? तहां कहैहैं।। इहां मृत्युका परिहारआदिक फलविशेष है। ताके संबंधतैं अनुष्ठान करनेकूं योग्य है। यह अर्थ है औ पशुनकेअर्थ हितपना याके वचनतैं जाननेकूं योग्य है॥ ३०

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३५० द्वितीयप्रपाठक २ [छान्दोग्यो- समस्तसामके उपासन २४ णस्य तान्सर्वानेवोपसेवेत वारुणन्तेव वर्जयेत्॥१॥ बलवान् इंद्रका है। क्रौंच बहस्पतिका है। अपध्वांत वरुणका है। तिन सर्वकूंहीं उप- सेवन करै। वारुणहींकूंतो वर्जे ॥ १॥ द्रीथ (उद्गान) है। तिस ऐसे विशेषणवा- लेकूं में प्रार्थना करताहूं ऐसें कोईकबी यज- मान वा उद्गाता मानताहै औ अनिरुक्त क- हिये अमुकके सम है ऐसें अविशेषित प्रजाप- तिका (प्रजापतिरूप दैवत्यवाला सो गान वि शेष) है अनिरुक्त (निरुक्तिका अविषय हो- नेतैं) प्रजापतिका है॥ औ निरुक्त (स्पष्ट) सो- १४८ वाक्यविषै स्थित इति शब्दकूं व्याख्यान करैहैं॥ इहां ऐसें अविशेषित। याका इस प्रकारसैं यह है ऐसें विशेषित कहिये भिन्नताकरिके ज्ञात नहीं होवैहै। यह अर्थ है।। १४९ ताके प्राजापत्यपनैंविषै हेतुकूं कहैहैं॥ इहां अनिरुक्त होनेतैं। याका नील पीत आदिककरि निश्चयकरिके अवच- नतैं। यह अर्थ है।।

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पनिषत् ] द्वाविंश खंड २२ विनर्दिगुणविशिष्टसामोपासन ५ ३५१

अमृतत्वं देवेभ्य आगायानीत्यागा अर्थ :- "अमृतपनैकूं देवनकेअर्थ आगान करताहूं" ऐसैं आगान करै।"स्वधाकूं पितर- मका। अर्थ यह जो :- सोमदैवत्यवाला सो उ- द्रीथ है औ मृदु अरु श्र्क्ष्ण (सूक्ष्म) गान वायुका है कहिये सो वायु दैवत्यवाला है औ श्क्ष्ण अरु बलवान् प्रयत्नकी अधिकताकरि युक्त) इंद्रका है कहिये इंद्रसंबंधि सोगान है औ क्रौंच (क्रौंचपक्षीके नादके सम) बह- स्पतिका है कहिये बृहस्पतिसंबंधि सो गान है औ अपध्वांत (फूटेकांस्यके स्वरसम) व- रुणका यह गान है।। तिन सर्वकूंहीं उप- सेवन (उच्चारण) करै परंतु एक वारुण (व- रुणसंबंधि)कूंहीं तो वर्जना करै॥ १ ॥ टीका :- अंमृतभाव देवनकेअर्थ आगा- ४५० स्वरविशेषके ज्ञानपूर्वक उद्गानकालविषै ध्यानकरने योग्य अर्थकूं कहैहैं। इहां स्वर ऊष्म व्यंजनआदिकनतैं ॥

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३५२ द्वितीयप्रपाठक २ [छान्दोग्यो- समस्तसामके उपासन २४ येत्स्वधां पितृभ्य आशां मनुष्येभ्य- स्तृणोदकं पशुभ्यः स्वर्गै लोकं यज- मानायान्नमात्मन आगायानीत्येतानि मनसा ध्यायन्नप्रमत्तः स्तुवीत॥२॥ नकेअर्थ। आशाकूं मनुष्यनकेअर्थ। तृणो- दककूं पशुनकेअर्थ । स्वर्गलोककूं यजमा- नकेअर्थ। अन्नकूं आत्माकेअर्थ आगान करताहूं। ऐसैं इनकूं मनसैं ध्यावता हुया अप्रमत्त हुया स्तुतिकूं करै॥ २ ॥ नकरता (साधता)हूं। स्वधाकूं पितरनके अर्थ आगान करताहूं। आशा (प्रार्थना) कूं मनुष्यनकेअर्थ । अर्थ यह जो :- प्रार्थितकूं [आगान करता हूं]। तणोदककूं पशुनके अर्थ । स्वर्गलोककूं यजमानकेअर्थ। अ- न्नकूं आत्मा (मेरे)अर्थ आगानकरताहूं। या वाक्यविषै आदिशब्दकरि स्थान अरु प्रयत् आदिकका ग्रहण है।।

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पनिषत् ] द्वाविंश खंड २२ ३५३ विनर्दिगुणविशिष्टसामोपासन ५ सर्वे स्वरा इन्द्रस्यात्मान: सर्व ऊ- अर्थः-सर्व स्वर इंद्रके आत्मा हैं। सर्व ऊष्माण प्रजापतिके आत्मा हैं। सर्व स्पर्श ऐसैं इनकूं मनसैं चितवता (ध्यावता) हुया स्वर ऊष्म अरु व्यंजनआदिकनतैं अप्रमत्त हुया स्तुतिकूं करै ॥ २ ॥ टीका :- अकारादिक सर्व स्वर बलरूप कर्मवाले प्राणरूप इंद्रके आत्मा (देहकेअवय- वस्थानीय) हैं शषसह आदिक सर्व उष्माण विराट्रूप वा कश्यपरूप प्रजापतिके आत्मा हैं। क आदिक व्यंजनरूप सर्व स्पर्श मृत्युके आत्मा हैं। तिस ऐसैं जाननेवाले उद्गाताके प्रति जब कोईबी स्वरनविषै उपालंभ देवै १५१ तिसीकरिवी आक्षिप्त उद्गाताकूं उद्गानकालविषै प्रतीकारके ज्ञानअर्थ स्वरआदिककी देवताके ज्ञानकूं उपन्यास करैहैं॥ इहां शषसह आदिक। यह आदिशब्द तिनके अवा- न्तरभेदविषै अभिप्रायवाला है औ जो तुजकूं वक्तव्य है इसतैं ऊर्ध्च तत् (सो) शब्द देखनेकूं योग्य है औ तैसैंहीं। याका स्वरोविषै जैसे है तैसैं। यह अर्थ है॥

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३५४ द्वितीयप्रपाठक २ [छान्दोग्यो- समस्तसामके उपासन २४ ष्माण: प्रजापतेरात्मानः सर्वे स्पर्शा मृत्योरात्मानसतं यदि स्वरेपूपालभेते- न्द्र५ शरणं प्रपन्नोऽभूवं स ला प्रतिव- क्ष्यतीत्येनं ब्रूयात् ॥ ३॥ अथ यद्येनमूष्मसूपालभेत प्रजापति मृत्युके आत्मा हैं।। ताकूं जब स्वरोंविषै उपालंभ देवै [तब] इंद्रके प्रति शरण प्र- पन्न भयाहूं। सो तेरे प्रति कहैगा। ऐसैं इसकू कहै ॥ ३ ॥ अर्थः-अनंतर जब इसकूं ऊष्माणोंविषै कि :- "स्वर तैंनें दुष्ट प्रयोग किया"तब ऐसैं उपा- लब्ध हुया। इंद्र (प्राणरूप ईश्वर) स्वरूप श- रण (आश्रय)के प्रति में प्रपन्न भयाहूं। स्वरनकूं प्रयोगकरता भयाहूं। सो इंद्र जो तु- जकूं वक्तव्य है सो तेरे प्रति कहैगा कहिये सोई देव उत्तर देवैगा। ऐसैं इसकू कहै॥३॥ टीका :- अनंतर जब इसकूं उष्माणों-

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पनिषत् ] द्वाविंश खंड २२ ३५५ विनर्दिगुणविशिष्टसामोपासन ६ शरणं प्रपन्नोऽभूवं सला प्रति पेक्ष्यती- त्येनं ब्रूयादथ यद्येनस्पर्शेषूपालभेत मृत्यु शरणं प्रपन्नोऽभूवं स ला प्रति धक्ष्यतीत्येनं ब्रूयात् ॥४॥ उपालंभ देवै [तब] प्रजापतिके प्रति श- रण प्रपन्न भयाहूं। सो तेरे प्रति पेषण क- रैगा। ऐसैं इसकूं कहै॥ अनंतर जब इ- सकूं स्पर्शोविषै उपालंभ देवै। [तब] मृ- त्युके प्रति शरण प्रपन्न भयाहूं। सो तेरे प्रति धक्षण करैगा। ऐसैं इसकूं कहै ॥४॥ विषै तैसैंहीं उपालंभ देवै। तव प्रजापतिके प्रति शरण प्रपन्न (प्राप्त) भयाहूं। सो तेरे प्रति पेषण करैगा कहिये सम्यक् चूर्ण करैगा। ऐसैं इसकूं कहै।। अनंतर जब इसकूं स्पर्श- नविषै उपालंभ देवै। तब मृत्युकेप्रति श- रण प्रपन्न भयाहूं। सो तेरे प्रति धक्षण (भस्म) करैगा। ऐसैं इसकूं कहै ॥४॥

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३५६ द्वितीयप्रपाठक २ [छान्दोग्यो- समस्तसामके उपासन २४ सर्वें स्वरा घोषवन्तो बलवन्तो व- क्तव्या इन्द्रे बलं ददानीति सर्व ऊष्मा- णो अग्रस्ता निरस्ता विदृत्ता वक्तव्याः अर्थ :- सर्व स्वर घोषवाले अरु बलवाले कहनेकूं योग्य हैं। इंद्रविषै बलकूं देताहूं। ऐसैं [चिंतन करै]।। सर्व उष्माण अग्रस्त टीका :- जातैं इंद्र आदिकके आत्मा स्वर आदिक हैं। यातैं सर्व स्वर घोषवाले अरु बलवाले कहनेकूं योग्य हैं॥ तैसें मैं इंद्र- १५२ देवताके ज्ञानके बलसैं उद्गाताकरि प्रमत्त होनेकूं योग्य नहीं है। काहेतैं स्वर आदिकनके अन्यथा उच्चारण- विषै देवताभेदके प्रसंगतैं। यातैं स्वर आदिकके उच्चारण- विषै तात्पर्य करनेकूं योग्य है। ऐसें उद्गाताके प्रति शिक्षा देते हैं॥ १५३ प्रयोगकालविषै चिंतन करने योग्य अर्थकूं कथन करैहैं॥ इहां तथा (तैसैं)। याका उक्त रीतिकरि स्वरोंके प्रयोगकी अवस्थाविषै। यह अर्थ है औ आधान करताहूं ऐसें चिंतन करै। यह शेष है औ द्वितीय तथा (तैसैं) शब्दका ऊष्माणोंके प्रयो- गकी अवस्थाविषै। यह अर्थ है औ खुल्ले प्रयत्नकरि युक्त प्र योगकरनेकूं योग्य हैं। यह शेष है।।

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पनिषत् ] द्वाविंश खंड २२ ३५७ विनर्दिगुणविशिष्टसामोपासन ५ प्रजापतेरात्मानं परिददानीति सर्वे अनिरस्त अरु विवृत (खुल्ले) कहनेकूं योग्य हैं। प्रजापतिके आत्माकूं परिदान करताहूं ऐसैं [चिंतन करै]।। सर्व स्पर्श लेशकरि (धीरेसैं) अनभिनिहित कह- विषै बलकूं देताहूं कहिये बलकूं आधान कर- ताहूं ऐसैं॥ तैसैं सर्व ऊष्माण अग्रस्त (भी- तर अप्रवेशित) अनिरस्त (बाहिर अप्रक्षिप्त) अरु विृत (खुल्ले प्रयत्नकरि युक्त) प्रयोग करनेकूं योग्य हैं। प्रैजापतिके आत्माकूं दे- ताहूं ऐसैं॥। सर्व स्पर्श लेशकरि (शनैः) अनभिनिहित (अभिनिक्षेपसैं रहित) कह- नेकूं योग्य हैं। मृत्युके आत्माकूं परिहार करताहूं। कहिये शनैः परिहार करनेहारे पु- १५४ तहांबी ध्यान करने योग्यकूं दिखावै हैं। अतिशीघ्र उच्चारणसैं एक वर्ण अन्यवर्णविषै जैसै निक्षिप्त (स्थापित) नहीं होवै तैसैं प्रयोग करनेपना अभिनिक्षेपसैं रहितपना है॥

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३५८ द्वितीयप्रपाठक २ [छान्दोग्यो- समस्तसामके उपासन २४ स्पर्शा लेशेनानभिनिहिता वक्तव्या मृ- त्योरात्मानं परिहराणीति॥५॥ इति द्वितीयप्रपाठकस्य द्वाविंशः खंडः ॥ २२ ॥ नेकूं योग्य हैं। मृत्युके आत्माकूं परिहार करताहूं। ऐसैं [चिंतन करै] ॥ ५॥

रुषनकरि बालकनकी न्यांई मृत्युके आत्माकूं परिहार करताहूं ऐसैं ॥ ५ ॥ इति श्री०भाष्यभाषा०द्वितीयप्रपा० द्वाविंशः खंडः॥२२।। १५५ मृत्युके आत्माकूं। ऐसें वाक्यका ग्रहण है। ताके अर्थकूं कहैहैं॥ इहां यह अर्थ है :- जैसें लोक शनैः(धीरेसैं) जलआदिकनतें वालकनकूं परिहार करैहै (निकासता है)! तैसें मृत्युके आत्माकूं मैं परिहार करताहूं। ऐसें ध्यान करिके ककारादि स्पर्शनका प्रयोग कर्तव्य है। इति श्री०द्वितीयप्रपाठकगतद्वाविंशखंडस्य टिप्पणमू ॥२२॥

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पनिषत् ] त्रयोविंश खंड २३ ३५९ त्रिस्कंध ब्रह्मसंस्थकूं मृतत्व ॐकारकी ब्रह्मता ३

O त्रयो धर्मस्कन्धा यज्ञोऽध्ययनं दा-

अर्थः-तीन धर्मके स्कंध (विभाग) हैं :- यज्ञ अध्ययन अरु दान। यह प्रथम

अथश्री० भाष्यभाषा·द्वितीयप्रपा० त्रयोविंश:खण्ड:२३ तीन धर्मस्कंध औ ब्रह्मसंस्थकूं अमृतकी प्राप्तिपूर्वक ऊकारकी ब्रह्मरूपता २. टीका :- ऊकारके उपासनके विधिअर्थ तीन धर्मस्कंध हैं। इत्यादि आरंभ करियेहै। तहां ऐसैं नहीं मान्या चाहियेकि :- सामके अवयव- अथ श्री० द्वितीय प्रपाठकगतत्रयोविंशखंड०टि०२३ १५६ अधिकारीके अधिकाररूप अंगावबाद्ध (अंगसंबंधि) उतसन कहे। अब स्वतंत्र अधिकारी गोचर ओंकारके उपास- नकूं विधान करनेकूं आरंभ करैहैं॥ २५७ अंगावबद्ध उपासनके अधिकार (प्रकरण)विषै य- धोक्त स्वतंत्र उपासनके विधानविषै श्रुतिका कौंन अभिप्राय है? यह आशंकाकारिके कहैहैं॥ इहां स्वतंत्र तिसके उपास- नतें नहीं। यह एवकारका अर्थ है।।

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३६० द्वितीयप्रपाठक २ [छान्दोग्यो- समस्तसामके उपासन २४ नमिति प्रथमस्तप एव द्वितीयो ब्रह्म- चार्याचार्यकुलवासी तृतीयोऽत्यन्तमा- है। तपहीं द्वितीय है। आचार्य कुलवासी ब्रह्मचारी आचार्य कुलविषै आत्माकूं अ- त्यंत क्षपण करता हुया तृतीय है।। सर्व ये भूतहीं उद्गीथादिरूप ऊँकारके उपासनतैं फल प्राप्त होवैहै ऐसैं ॥ तर्व क्या मान्या चाहिये कि :- जो सर्ववी सामके उपासनोंकरि अरु क- मौकरि अप्राप्यफल अमृतभाव है। सो केवल ॐँकारके उपासनतैं प्राप्त होवैहै। यातैं ताकी स्तुतिअर्थ सामके प्रकरणविषै ताका उपन्यास है :- तीन संख्यावाले धर्मके स्कंध हैं। अर्थ यह जो :- धर्मके प्रविभाग हैं।॥ वे कौंन हैं ? यह कहैहैं :- अग्निहोत्रादिरूप यज्ञ है।। नियमस- १५८ तब कैसें माननेकूं योग्य है ? तिस अपेक्षाके हुये कहैहैं।। इहां सनियमकूं। याका पूर्वमुखताआदिक नियम- करि सहित पुरुषकूं। यह अर्थ है औ अभ्यास जो है सो स्त्रीकरण। विचार। जप । शिष्यनके अर्थ दान अरु आवृत्ति। इस भेदतैं पंचविध है।

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पनिषत्] त्रयोविंश खंड २३ ३६१ त्रिस्कंध ब्रह्मसंस्थकूंअमृतत्व ऊकारकीव्रह्मता ३ त्मानमाचार्यकुलेऽवसादयन्सर्व एते पु- ण्यलोका भवन्ति ब्रह्मसरस्थोऽमृततव- मेति॥ १॥ पुण्यलोक होवैहैं। ब्रह्मसंस्थ अमृतभावकूं पावताहै॥ १ ॥ हित पुरुषकूं ऋग्वेदआदिकका अभ्यासरूप अ- ध्ययन है। औ बहिर्वेदि कहिये यज्ञकी वे- १५९ दीतैं बाहिर जैसैं होवै तैसैं। भिक्षुकोंकेअर्थ य- थाशक्ति द्रव्यका सम्यक् विभागरूप दान है।। ऐसा यह प्रथम धर्मस्कंध है। काहेतैं गृहस्थसैं समवेत (संबद्ध) होनेतैं ताके निर्वाहक गृ- हस्थकरि प्रथम निर्देश करियेहै। अर्थ यह जो :- ऐके है। द्वितीय अरु तृतीयके श्रवणतैं १५९ वेदीविषै जो देईता है ताकूं यज्ञका अंग होनेतैं यज्ञतैं पृथक् फलवान्पना नहीं है। ऐसैं मानते हुये दानकूं विशेषण देते हैं॥ इहां गृहस्थकरि। याका तिस स्वरूपकरि। यह अर्थ है॥। १६० गृहस्थकूं प्रथमपना कैसैं है। ब्रह्मचारीकूं तैसा होनेतैं? यह आशंकाकरिके कहैहैं॥ १६१ उक्त व्याख्यानविषै वाक्यशेषकी प्रमाणताकूं कहैहैं॥ ३१

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३६२ द्वितीय प्रपाठक २ [छान्दोग्यो- समस्तसामके उपासन २४ आद अर्थवाला यह प्रथमशब्द नहीं है। तप हीं द्वितीय है। इहां "तप" ऐसें कच्छू अरु चांद्रायण आदिक कहियेहै। तिसवाला ता- पस (वानप्रस्थ) वा परिव्राट (संन्यासी) है। (सो संन्यासी) ब्रह्मसंस्थ नहीं [ किंतु ] आ- श्रमके धर्ममात्रविषै स्थित है। काहेतैं ब्रह्म- संस्थ (ब्रह्मनिष्ठ)कूं तो अमृतभावके श्रवणतैं।। यह द्वितीय धर्मस्कंध है॥ औ आचार्यके कुल- विषै वसनेकूं है शील(स्वभाव)इसकूं सो आचार्य कुलवासी है। ऐसा जो ब्रह्मचारी सो अत्यंत (जीवनपर्यत) आत्मा (देह)कूं नियमोंकरि आ- चार्यके कुल (गृह)विषै क्षपण करता हुया त- तीय धर्मस्कंध है । "अत्यंत" इत्यादिरूप विशे- १६२ प्रथमपनाहीं प्रथमशब्दका अर्थ नहीं है । काहेतैं ब्रह्मचारीकी प्रथमताकी प्रसिद्धिके विरोधतैं। ऐसें कहैहैं। १६३ इहां कैसा परिवाद् (संन्यासी) ग्रहण करिये है? तहां कहैहैं॥ १६४ इहां ब्रह्मसंस्थ संन्यासी किस कारणतें नहीं ग्रहण करिये है? तहां कहैहैं। तहां वानप्रस्थका ग्रहण जो है सो अमुख्य (गौण) संन्यासीकेबी दिखावनेअर्थ है।। १६५ "ब्रह्मचारी " इत्यादि वाक्यकी नैष्टिकव्रह्मचा- रीरूप अर्थवान्ताकूं विशेषणके साम्थ्यंतें दिखावै हैं॥

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पनिषत्] त्रयोविंश खंड २३ ३६३ त्रिस्कंध ब्रह्मसंस्थकूंअमृतत्व ऊकारकीब्रह्मता ३ षणतैं यह "नैष्ठिक ब्रह्मचारी है" ऐसैं जानिये है। काहेतैं उपकुर्वाण ब्रह्मचारीकूं स्वाध्याय (वेद- अध्ययन)के ग्रहणअर्थ होनेतैं [ ताकूं] ब्रह्मच- र्यकरि पुण्यलोकवानपना नहीं है। सैर्व ये ती- नबी आश्रमी यथोक्त धर्मोकरि पुण्यलोक हो- वैहैं। पुण्यरूप लोक होवैगा जिनकूं वे ये पुण्य लोक आश्रमी होवैहैं॥ अवशिष्ट तो अनुक्त जो परिव्राट् ब्रह्मसंस्थ (ब्रह्मविषै सम्यक् स्थित)है सो पुण्यलोकनतैं विलक्षण आत्यंतिक अमृ- तभाव (अमरणभाव)कूं पावताहै। देवआ- दिकके अमृतभावकीन्यांईं आपेक्षिक अमृत- १६६ अनंतर उपकुर्वाणका इहां ब्रह्मचारीपनैके अविशे- षतैं क्यूं ग्रहण नहीं होवैगा ? तहां कहैहैं॥ १६७ ननु ब्रह्मचारीकूं ब्रह्मचर्यकरि पुण्यलोक नहीं सुनिये है? तहां कहैहैं॥ १६८ ननु पुण्यलोकवान्तारूप विशेषवाले आश्रमीनकी तिसरूपता (पुण्यलोकवान्रूपता) कैसैं कहियेहै? तहां कहैहैं॥ १६९ ननु दिखाये हुये आश्रमीनविषै संन्यासी मुख्य क्यूं नहीं दिखायेहैं ? तहां कहैहैं। १७० अमृतभावका पुण्यलोकनतैं विलक्षणपना किस कारणतैंहीं है ? यह आशंकाकरिके कहैहैं॥

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३६४ द्वितीयप्रपाठक २ [छान्दोग्यो- समस्तसामके उपासन २४ भावकूं नहीं। काहेतैं पुणै्यलोकतैं पृथक् अमृत- भावके विभागके करनेतैं। औ जवे पुण्यलोकका अतिशयमात्र अमृतभाव होवै तब पुण्यलोक- रूप होनेतैं तिनतैं विभक्त श्रुति नहीं कहती औ विभक्तके उपदेशतैं आत्यंतिक (निरपेक्ष) अमृतभाव है ऐसैं जानियेहै ॥ "औ इहां आश्रमधर्मके फलका उपन्यास जो है सो 'प्रैं- १७१ ताके आपेक्षिकपनैके अभावविषै हेतुकूं कहैहैं। इहां अमृतभावकूं पुण्यलोकतैं पृथक् विभागके करनेतैं ति- सतैं अन्य होनेतैं आत्यंतिकताकी सिद्धि है। ऐसें योजना है॥ १७२ उक्त अर्थकूंहीं व्यतिरेकद्वारा साधतेहैं ॥ इहां ब्रह्मशब्दके यथाश्रुत मुख्य अर्थकूं ग्रहणकरिके परव्रह्मस्वरूपसैं साक्षात्कारवान्का निरंकुश अमृतभाव कहा । प्रकरणकी आलोचनासैं तो प्रणवरूप प्रतीकविषै ब्रह्मके उपासकका क्र- मसैं अमृतभाव भेदवुद्धिके अनाशतैं देखनेकूं योग्य है॥ १७३ कर्मिनकी अंतवाले फलवान्ताके कथनसैं तिनकी निंदाकरि ब्रह्मसंस्थताकी स्तुतिके देखनेतें औ ता स्तुतिकूं वि- धिअर्थ होनेतैं अमृतभावकी कामनावाला ब्रह्मसंस्थ होवै इस एक अर्थपर होनेतैं एक यह वाक्य है। ऐसें कहैहैं॥ १७४ ननु स्तुतिकेअर्थ औ फलविधिकेअर्थ यह वाक्य क्यूं नहीं होवैगा? यह आशंकाकरिके कहैहैं॥ इहां यह अर्थ है :- अर्थकी एकताके होनेतें सो एक वाक्य है। काहेतैं इस (अर्थ)के भेदके होते तिस (वाक्य)के भेदके नियमतैं॥

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पनिषत् ] त्रयोविंश खंड २३ ३६५ त्रिस्कंध ब्रह्मसंस्थकूंअमृतत्व ॐकारकीव्रह्मता ३ णवकी सेवा (उपासना) की स्तुतिअर्थ है। तिस फलके विधिअर्थ नहीं॥ औ प्रणवसेवाकी स्तुति अर्थ है अरु आश्रमधर्मके फलके विधि- अर्थ है। ऐसैं [ अर्थका भेद होवै तो ] जातैं वाक्य भेदकूं पावै [ अरु भेदकूं पावता नहीं ] कतातैं स्मृतिकरि सिद्ध आश्रमफलके अनुवाद- करि प्रणवसेवाके फल अमृतभावकूं कहता हुया प्रणवकी सेवाकूं यह वाक्य स्तुति करैहै।। जैसै पूर्णवर्म (पूरे कवच)की सेवा भक्तके परिधान (पहिरने) मात्र फलवाली है अरु राजवर्मकी सेवा तो राज्यतुल्य फलवाली है ऐसैं। ताकी न्यांई।औ प्रणव सो सत्य १७५ तब यह वाक्य किस अर्थपर है ? तहां कहैहैं॥ इहां श्रुतिकूं स्मृतिके अर्थकी अनुवादरूपताके हुये विपरीत होनेतैं तिसकरि अनुमित श्रुतिकरि सिद्ध यह स्तुति है। ऐसैं योजना करनेकूं योग्य है। १७६ स्तुतिकूंहीं दृष्टांतके आश्रयकरि स्पष्ट करैहैं ॥ इहां इतिशब्द अध्याहृत (बाहिरसैं ग्रहण किये). "स्तुतिअर्थ है" इस अर्थके साथि संबंधकूं पावताहै। १७७ ननु ब्रह्मतत्वकी सेवातैं अमृतभाव होवैहै। प्रण- चकी सेवातैं नहीं। तातैं ऐसें ताकी स्तुति क्यूं करिये है? यह आशंकाकरिके कहैहैं॥

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३६६ द्वितीयप्रपाठक २ [छान्दोग्यो- समस्तसामके उपासन २४ परब्रह्म है ताका प्रतीक होनेतैं। काहेतैं " येहै (प्रणवरूप ) हीं अक्षर ब्रह्म है। यह हीं अ- क्षर पर है" कठोपनिषद् विषै इत्यादि आम्नायतैं। ता (प्रणव) की सेवातैं अमृतभाव युक्त है।।॥ इहां केईक (वृत्तिकारके अनुसारी) कहतेहैं किः-ज्ञानवर्जित च्यारी आश्रमिनकूं अविशेष (तुल्यता) करि स्वकर्मके अनुष्ठानतैं सर्व ये पुण्यलोक (पुण्यलोकवान्) होवैहैं ऐसैं पुण्य- लोकता ( पुण्यलोकवान्ता ) हीं कही है। इहां परिव्राट् (संन्यासी) अवशेषित नहीं है। पैरिव्राजक (संन्यासी) का बी ज्ञान औ ताके १७८ तहां प्रमाणकूं दिखावते हुये फलितकूं कहैहैं॥ १७९ स्वव्याख्यानकूं दोषवर्जित कहिके। अब "ब्रह्मसं- स्थ अमृतभावकूं पावताहै" इस वाक्यविषै प्राचीनवृत्तिका- रके (भर्तृप्रपंचके) व्याख्यानकूं उठावतेहैं॥ इहां जे प्रसिद्ध च्यारी आश्रमी ज्ञानवर्जित हैं तिन सर्वकी वी समानताकरि स्वआश्रमविहित धर्मके अनुष्ठानसैं पुण्यलोककी भागिता "सवे ये पुण्यलोक होवैहैं" इस वाक्यविषै कही। परंतु पूर्वग्रंथविषै परिव्राट् अनुक्त हुया अवशेषित नहीं है। ऐसैं योजना है। १८० ननु पूर्व ग्रंथविषै परिव्राट्का वाचकपद नहीं प्र- तीत होवैहै। तैसैं हुये यह अवशेषित है? तहां कहैहै॥ इहां ज्ञान औ यम नियम 'याका उपायभूत' यह अर्थ है।।

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पनिषत् ] त्रयोविंश खंड २३ ३६७ त्रिस्कंध ब्रह्मसंस्थकूंअमृतत्व ॐकारकीव्रह्मता ३ उपायभूत यम अरु नियम तपहीं है। यातैं "तपहीं द्वितीय है" इस वाक्यविषै तपःशब्द- करि परिव्राट् (संन्यासी) अरु तापस (वा- नप्रस्थ) ये दो ग्रहण किये हैं। यीतैं तिन हीं च्यारी आश्रमिनके मध्य जो ब्रह्मसंस्थ प्रण- वका सेवक है सो अमृतभावकूं पावताहै। ऐसैं डैयारी आश्रमिनकूं अधिकारीपनैके अविशेषतैं औ ब्रह्मसंस्थताविषै अप्रतिषेधतैं औ स्वैकर्म- विषै छिद्र (अवकाश) के हुये ब्रह्मसंस्थताविषै सामर्थ्यके संभवतैं औ य्वे वराहआदिक श- १८१ ननु परिव्राट्वी पूर्वत्र (पूर्वविषै) जब कहाहै तब ब्रह्मसंस्थवाक्यका कौंन अर्थ होवैगा ॥ इहां परिव्राजककूं अनवशिष्ट (अनवशेषित ) होनेकरि च्यारीनके उपदिष्टपनैका अविशेष अतः (यातैं) शब्दका अर्थ है।। १८२ सामान्यनिर्देशविषै हेतुकूं कहैहै॥ इहां औ अप्र- तिषेधतैं। ऐसें पदच्छेद है॥ १८३ ननु अन्य आश्रमोंकूं कर्मअर्थ होनेतैं तिस कर्मवि- षैहीं व्यापारवाले होनेतें ब्रह्मसंस्थताविषै सामर्थ्य नहीं है औ व्यापाररहित परिव्राजककूं तो ब्रह्मसंस्थता सुकर (सु- लभ) है? यातैं कहैहै॥ १८४ ननु परिव्राजकविषै ब्रह्मसंस्थशब्द रूढ है। गो

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३६८ द्वितीयप्रपाठक २ [छान्दोग्यो- समस्तसामके उपासन २४ व्दनकीन्यांई ब्रह्मसंस्थशब्द परिव्राजकविषैरूढ नहीं है। काहेतैं ब्रह्मविषै सम्यक् स्थिति- रूप निमित्तकूं लेके प्रवर्त होनेतैं। जातें रूढि शब्द निमित्तकूं ग्रहण करते नहीं औ सैर्व आ- श्रमीनकी ब्रह्मविषै स्थिति संभवैहै। जहां जहां ब्रह्मविषै संस्थितिरूप निमित्त है तिस तिस नि- मित्तवालेके वाचकके होते परिव्रादरूप एक वि- षयमैं संकोचविषै कारणके अभावतैं ब्रह्मसंस्थ- आदिक शब्दकीन्यांई। तातैं यह शब्द अन्य आश्रमकूं विषय करता नहीं? तहां कहैहै॥ १८५ नतु निमित्तकूं लेके प्रवर्तपनैके हुये बी क्यूं ऐसैं रूढि नहीं होवैगी? यह आशंकाकरिके कहैहै॥ १८६ ननु यह शब्द नैमित्तिक हुया बी परिवाजकमात्रकूं आश्रय (विषय) करैहै। काहेतैं तिसविषैहीं निमित्तके स- द्ावतैं? तहां कहैहै। १८७ ननु पंकज आदिक शब्द निमित्त है इतनैकरि इंदी- वर (श्यामकमल) आदिकविषै वर्तते नहीं किंतु तामरस (साधारणकमल) आदिमात्रकूं विषय करते हैं। तैसें ब्रह्मसं- स्थशब्द निमित्तवाले गरृहस्थ आदिकविषै अनवस्थित (अ- वर्तमान) हुया केवल परिव्ाजककूंहीं विषय करैगा? यातैं कहैहै। इहां ब्रह्मसंस्थशब्द निरोध करनेकूं अयुक्त है। ऐसैं संबंध है।।

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पनिषत् ] त्रयोविंश खंड २३ ३६९ त्रिस्कंध ब्रह्मसंस्थकूंअमृतत्व ॐकारकीब्रह्मता ३ शब्द निरोध करनेकूं अयुक्त है।॥ औ संन्यास आश्रमके धर्ममात्रसैं अमृतभाव नहीं होवैहै। ज्ञानकी व्यर्थताके प्रसंगतैं। संन्यासके धर्म- करि युक्त हीं ज्ञान अमृतभावका साधन है? ऐसै जो सिद्धांती कहैं। सो बनै नहीं :- काहेतैं आश्रमधर्मताके अविशेषतैं। वो ज्ञानविशिष्ट धर्म अमृतभावका साधन है ! यह बी सर्व आश्रमके धर्मोंके मध्य समान है औ ब्रह्मसंस्थ १८८ रूढिपक्षविषै अन्य दोषकूं कहैहै॥ १८९ धर्मसहित ज्ञानकूं वा ज्ञानसहित धर्मकूं अमृतभा- वका साधन होनेतैं ज्ञानकी व्यर्थता नहीं है ? यह आशंका- करिके प्रथम पक्षकूं अनुवाद करैहै॥ १९० पारिवाज्य (संन्यास)के धर्मकरिहीं। ऐसा यह नियम नहीं है। काहेतैं गृहस्थआदिके धर्मनकूं बी आश्रमके धर्म होनेकरि तुल्य होनेतैं तिसकरि विशिष्ट ज्ञान अमृतभा- वका हेतु है। ऐसैं वी कहनेकूं सुलभहोनेतैं। ऐसैं कहैहै॥ १९१ द्वितीयपक्षकू दूषण देताहै॥ इहां यह अर्थ है :- जब परिव्राजकका धर्म ज्ञानविशिष्ट हुया मुक्तिका हेतु है ऐसैं कहियेहै। तब यह बी मुक्तिका हेतुपना ज्ञानविशिष्ट सर्व आश्रमोंकूं समान है। तैसैं हुये रूढिपक्षविषै बी परि- व्राजककूंहीं ज्ञानतैं मुक्ति नहीं होवैहै [किंतु सर्वकूं होवैहै] १९२ इस कहनेके हेतुतैं बी परिव्राजककूंहीं मुक्तिका भा- गीपना असिद्ध है। ऐसैं कहैहै॥

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३७० द्वितीयप्रपाठक २ [छान्दोग्यो- समस्तसामके उपासन २४ परित्राजककूं हीं मोक्ष होवैहै। अन्योंकूं नहीं। ऐसा शास्त्रका वचन नहीं है औ शानतैं मोक्ष होवैहै। ऐसा सर्व उपनिषदनका सिद्धान्त है। जातैं स्व आश्रमविहित कर्मवालोंके मध्य जोई ब्रह्मसंस्थ होवै सो अमृतभावकूं पावताहै? ऐसा भर्तृप्रपंचनामक वृत्तिकारका मत है। सो बनै नहीं :- काहेतैं कैर्मके निमित्तके अरु विद्याके प्रत्ययनके विरोधतैं। जातें कर्ताआ-

तहां कहैहै।। १९३ ननु तब किसीकूं बी मुक्ति मति होवै ? ऐसें कहैं। १९४ अब ब्रह्मसंस्थ वाक्यके अर्थकूं वृत्तिकार उपसंहार करैहै। इहां तातैं। याका परिवाजककूंहीं अमृतपना होवैहै इस अनियमतैं औ ज्ञानतैंहीं सो होवैहै इस नियमतैं। यह अर्थ है।। १९५ ब्रह्मसंस्थ (ब्रह्मनिष्ट) समुच्चय (मिलितज्ञान कर्म)- का अनुष्ठायी (अनुष्ठाता) है। ऐसे वृत्तिकार (भर्तृप्रपंच)के मतकूं आचार्य निराकरण करैहैं॥ इहां कर्मके निमित्त (का- रकादि कारण)के ज्ञानके औ शुद्धब्रह्मात्मभावके साक्षात्- कारके परस्पर विरोधतैं समुच्चयकी सिद्धि नहीं है। यह अर्थ है।। १९६ वस्तुके संग्रहरूप वाक्यकूं विवरण करैहैं॥ इहां कर्मविधियां औ प्रतिषेध। ऐसैं देखनेकूं योग्य है।

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पनिषत् ] त्रयोविंश खंड २३ ३७१ त्रिस्कंध ब्रह्मसंस्थकूंअमृतत्व ऊकारकीव्रह्मता ३ ढिक कारक क्रिया अरु फलकी भेदज्ञानवान- तारूप निमित्तकूं लेके "इसकूं कर इसकूं मति- कर" ऐसैं कर्मके विधियां प्रवर्त होवैहैं औ सो निमित्त शास्त्रका किया नहीं है। काहेतैं सर्व प्राणीनविषैदेखनेतैं॥औ "सत् है। एकहीं अदवि- तीय है। आत्माहीं यह सर्व है। ब्रह्म हीं यह सर्व है" इस शास्त्रकरि जन्य विद्यारूप प्रत्यय (ज्ञान) है सो स्वाभाविक क्रिया कारक अरु फलके भेदज्ञा- नरूप कर्मविधिके निमित्तकूं न बाध करिके उप- जता नहीं। का हे तैं भेदें अरु अभेदके ज्ञानोंके वि- रोधतैं। जांतैं तिमिरके दूरीभये तिमिर दोषजनित दोचंद्रआदिकके भेदके ज्ञानकूंन बाध करिके चंद्र- आदिककी एकताका ज्ञान नहीं उपजताहै। का- १९७ तथापि प्रत्यय (ज्ञान)पनैंके अविशेषतैं कारक अरु अकारकरूप विधिनिषेधका विरोध नहीं है? यह आशंकाक- रिके कहैहैं॥ इहां यह अर्थ है :- प्रत्ययपनैंके हुये बी शास्त्रीय अरु अशास्त्रीयपनैंकरि विद्या अविद्या भावसैं विरोध है॥ १९८ ननु विरोधके हुये क्या होवैगा ? इहां कहैहैं॥ इहां विद्यारूप प्रत्यय। ऐसैं पूर्वसैं संबंध है।। १९९ तहां उक्तहीं हेतुकूं स्मरण करावै हैं। २०० तिसविषै लोकप्रसिद्ध उदाहरणकूं कहैहैं॥

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३७२ द्वितीयप्रपाठक २ [छान्दोग्यो- समस्तसामके उपासन २४ हेतैं विद्या अरु अविद्याके ज्ञानोंके विरोधतैं॥ तेह। ऐसैं हुये जिस भेदज्ञानकूं लेके कर्मके विधियां प्रवर्त भयेहैं। सो भेदज्ञान "सत् एकहीं अ- द्वितीय है। सो सत्य है। विकाररूप भेद अनृत है" इस प्रकारके इस वाक्यरूप प्रमाणसैं जनित एकताके ज्ञानसैं जिसका उपमर्दित (बाधित) भया है सो सर्व कर्मौतें निमित्तकी निवृत्तितैं निवृत्त भया है औ सो निवृत्तकर्मा ब्रह्मसंस्थ क- हियेहै औ सो परिव्राद्हीं है। अन्यके असंभ- वतैं।। जातैं अन्य अनिवृत्तभेदज्ञानवाला है [यातैं] २०१ ननु विद्या अविद्यास्वरूप भेद अभेद ज्ञानोंके स- सुच्चयके असंभवतें ताका अनुष्ठायी जव ब्रह्मसंस्थ नहीं हो- वैहै। तब कौंन ब्रह्मसंस्थ होवैगा ? इहां कहैहैं॥ इधर तहां ऐसें हुये। याका उक्त रीतिकरि ज्ञानकर्मके समुच्चयके अथो- गके हुये। यह अर्थ है।। २०२ अन्य गृहस्थ आदिकके उक्त्त ब्रह्मसंस्थताके असंभ- चकूं साधते हैं। इहां वाणीका उच्चारणमात्र विकार अनृत- रूप शरीर आदिकविषै "मैं ब्राह्मण हूं" इत्यादि अभिसंधा- नरूप मिथ्या अभिनिवेशस्वरूप जो प्रत्यय (विपरीतज्ञान) है। तिसवाला होनेतैं। यह आष्यउक्त हेतुका अर्थ है। [इहां समुच्चयवादके खंडनअर्थ अरु वहिर्मुख गृहस्थ आदि- कनके ज्ञानविषै अनधिकारके सूचन अर्थ औ वरगोटकन्या-

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पनिषत् ] त्रयोविंश खंड २३ ३७३ त्रिस्कंध ब्रह्मसंस्थकूं अमृतत्व ॐकारकी ब्रह्मता ३ सो अन्यकूं देखता हुया सुनता हुया मानता हुया जानता हुया "इसकूं करिके इसकूं प्राप्त- होउंगा" ऐसैंहीं मानताहै। तिस ऐसैं करनेवा- लेकूं ब्रह्मसंस्थता नहीं है। काहेतैं वाणीका आ- रंभणमात्र विकाररूप अनृत (मिथ्या)की अ- भिसंधिके ज्ञानवाला होनेतैं ॥ २औ "असत्य यकरि प्रकृत संन्यासकी स्तुति अर्थ भाष्यकारनैं गृहस्थआ- दिक तीन आश्रमीनकूं ज्ञानका असंभव कहा है। स्वरसता- करि नहीं। अन्यथा "स्त्रीयां वैश्य तथा शूद्र वे वी पराग- तिकूं पावते हैं" इत्यादि अनेक शास्त्रके वचनोंकी व्यर्थता होवैगी औ वसिष्ठ राम कृष्ण जनक आदिक अनेक गृहस्थ ज्ञानी- नके विषयक अरु स्वप्रणीत मनीषापंचकविषै उक्त चांडालपर्यत ज्ञानीनके विषयक शास्त्रवाक्यनका विरोध होवैगा। यह अनेक अनुभवी पुरुषनका निश्चित अभिप्राय है । सो इहां उत्तम अधिकारी गृहस्थआदिकनकूं संदेहकी अनुत्पत्तिअर्थ प्रसंगसैं हमनैं सूचन कियाहै ]॥ २०३ ननु ब्रह्मवेत्ताकूं बी संस्कारके वशतै सत्यताकेअभि- निवेशपूर्वक कर्मविषै प्रवृत्तिके संभवतैं ब्रह्मसंस्थता सुष्टुप्रका- रसैं प्रतिपादनकरनेकूं योग्य नहीं है? यातें कहैहैं॥ इहां यह अर्थ है :- यह असत्य है ऐसैं विवेककरि सत्यताके अभिनि- वेश (आग्रह)के शिथिल किये हुये फेर सत्यताके अभिनि- वेशकरि प्रवृत्ति नहीं संभवै है। औ आभासरूप भेदबुद्धि तो कर्मविषै प्रवृत्तिकी हेतु नहीं है॥ ३२

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३७४ द्वितीयप्रपाठक २ [छान्दोग्यो- समस्तसामके उपासन २४ है" ऐसैं भेदज्ञानके उपमर्दित हुये "यह सत्य है। इससैं मुजकरि कर्तव्य है" ऐसी प्रमाणसैं जन्यरु प्रमेयकी बुद्धि आकाशविषै तलमलकी बु- द्विकीन्यांई विवेकीकूं नहीं संभवैहै॥ औ भेदज्ञानके उपमर्दित हुयेबी जव कर्मोतैं नहीं निवृत्त होवैहै। तब पूर्वकी न्यांईं भेदज्ञानकरि उपमर्दनतैं एकताके ज्ञानका विधायक वाक्य अ- प्रमाणीकृत होवैगा औ अभक्ष्यभक्षण आदि- कके प्रतिषेधरूप वाक्यनकी प्रमाणताकी न्यांई एकताके वाक्यकी बी प्रमाणता युक्त है। काहेतैं २०४ अद्वैतज्ञानवान्कूं निमित्त (कारकादि कर्मसामग्री) की निवृत्तिकरि कर्मतैं निवृत्ति अवश्य होनेहारी है। ऐसे कहा। अब विपक्षविषै दोषकूं कहैहैं॥ २०५ ननु एकताके ज्ञानका जनक शास्त्रप्रमाण नहीं होवैहै। काहेतैं पूर्व प्रवृत्त भेदज्ञानके विरोधतैं? इस मतकूं आशंकाकरिके कहैहैं॥ इहां यह अर्थ है :- जैसें "कलंज (वि. पलिप् बाणकरिहत मृगमांस)कूं भक्षण करै नहीं" इत्यादि शास्त्र पूर्व प्रवृत्त कलंज आदि भक्षणके ज्ञानसैं विरोधके हुये वी प्रमाण है। काहेतैं रागादिदोषकरि प्राप्त ज्ञानकूं अप्रमाण होनेतैं॥ तैसैंहीं भेदज्ञानकूं अविद्याकरि उत्पन्न होनेतें प्रमा- णताके असंभवतैं तिससैं विरोधके हुये बी अद्वैतशास्त्रकी प्रमाणता युक्त है।।

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पनिषत] त्रयोविंश खंड २३ ३७५ त्रिस्कंध ब्रह्मसंस्थकूं अमृतत्व ॐकारकी ब्रह्मता ३ सर्व उपनिषदनकूं तिसके परायण होनेतैं॥। ॥ ननु ऐसैं हुये कर्मविधिनकी अप्रमाणताका प्र- संग होवैगा? ऐसैं जो कहै। सो बने नहीं :- काहेतैं अनुपमर्दित (अवाधित) भेदज्ञानवाले पु- रुषविषै प्रबोधतैं पूर्व स्वन्न आदिकके ज्ञानकी- न्यांईं कर्मविधिनकी प्रमाणताके संभवतैं। ॥ नेंतु विवेकीनके अकरणतै कर्मविधिकी प्रमाण- २०६ ननु कार्य (कर्म)पर होनेतैं अद्वैतविषै तात्पर्यके अभावतैं तिस अद्वैत शास्त्रकी प्रमाणता कहांतैं होवैगी ? यह आशंका करिके कहैहैं॥ इहां यह अर्थ है :- उपक्रम अरु उ- पसंहारकी एकरूपताआदिक षड्विध तात्पर्यके लिंगके देख. नेतैं तिन उपनिषद्का अद्वैतविषै तात्पर्य निश्चित होवैहै। तातैं अद्वैत शास्त्रका स्वार्थविषै प्रमाणपना युक्त है।। २०७ ननु भेदके आलंबनवाले कर्मविधिके विरोधतैं अ- द्वैतशास्त्र स्वार्थविषै प्रमाण नहीं है ? इसरीतिसैं पूर्ववादी शंका करैहै। २०८ जैसे स्वप्नका प्रत्यय अरु गंधर्वनगर आदिकका प्र- त्यय तत्वज्ञानतैं पूर्व अज्ञपुरुषकूं विषयकरिके प्रमाण है। तैसैं कर्मविधिनके बी अविद्वान् पुरुषविषै प्रमाणपनैंके संभ- वतैं अद्वैतशास्त्रका तिससैं विरोध नहीं है। ऐसैं सिद्धांती परिहार करैहैं॥ २०९ "जिसजिसकूं श्रेष्ट (श्रवण अरु अध्ययनकरि सं- पन्न पुरुष) आचरता है तिस तिसकूं इतर (अपापिष्ट उदा-

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३७६ द्वितीयप्रपाठक २ [छान्दोग्यो- समस्तसामके उपासन २४ ताका उच्छेद होवैगा? ऐसैं जो कहै। सो वैनै नहीं :- काहेतैं काम्यविधिके अनुच्छेदके देख- नेतैं॥ जतैं "कामात्मता प्रशस्त (श्रेष्ठ) नहीं है" ऐसैं विज्ञानवानोंकरि काम्यकर्म नहीं अ- नुष्ठान करियेहैं। इसकरि काम्यकर्मकेविधि उ- च्छेदकूं पावते नहीं किंतु कामियोंकरि अनुष्ठान करियेहीं हैं यातैं उच्छेदकूं पावते नहीं॥ तैसैं ब्रह्मसंस्थ ब्रह्मवेत्ताओंकरि कर्म नहीं अनुष्ठान क- सीन) जन आचरता है" इस स्मृतितैं तत्वदर्शीनके कर्मतैं उपरमके हुये अन्य वी उपराम होवैंगे। तैसें हुये कर्मविधिके विरोधकी सुस्थिरता होवैगी? इस रीतिसैं पूर्ववादी शंका करैहै।। २१० लोककूं प्रकृति (वासनादिरूप पूर्वसंस्कार)के पर- वश होनेतैं यह लोक विवेकीकी प्रकृति (स्वभाव) के पीछे वर्तता नहीं। काहेतैं "भूत जे प्राणी वे प्रकृतिके प्रति जाते (वर्तते) हैं। निग्रह (निषेध) क्या करैगा " इस स्मृतितैं। तातैं ब्रह्मवेत्ताकी निष्कर्मताके हुये वी कर्मविधिनकूं अप्रमा- ताकी प्राप्ति नहीं है। ऐसें सिद्धांती उत्तरकूं कहैहैं। २११ ताहीकूं प्रपंचन करैहैं। इहां यातैं उच्छेदकूं पा- वते नहीं। यह शेष है।। २१२ अस्तु। प्रकृतविषै क्या आया? सो कहैहैं॥ इहां अनुष्ठान करियेहीं हैं। यातैं तिनके विधिनकी अनुच्छित्ति (उच्छेद नहीं) है। यह वाक्यशेष है।

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पनिषत् ] त्रयोविंश खंड २३ २७७ त्रिस्कंध ब्रह्मसंस्थकूं अमृतत्व ऊकारकी ब्रह्मता ३ रियेहैं इसकरि ताकेविधि उच्छेदकूं पावते नहीं किंतु अब्रह्मवेत्ताओंकरि अनुष्ठान करियेहीं हैं। यातैं उच्छेदकूं पावते नहीं॥ ॥ नेतु संन्यासि- योंके भिक्षाचरण आदिककी न्यांईं उत्पन्न ए- कताके ज्ञानवाले गृहस्थनकीबी अभनिहोत्रादि कर्मतैं अनिवृत्ति होवैगी? ऐसैं जो कहै। सो बनै नहीं :- काहेतैं प्रमाणताकी चिंताविषै आ- भासरूप भिक्षाचरणादि पुरुषकी प्रवृत्तिकूं अद- षांतरूप होनेतैं। जौतैं। "अभिचारकूं करै नहीं" २१३ अद्वैतवादीकूं अवश्य होनेहारी कर्मतैं निवृत्ति है ऐसें कहाथा। ताकूं पूर्ववादी विपरीतघटावताहुया आशंका करैहै॥ २१४ अद्वैतज्ञानके स्वभावके विचार कियेहुये भिक्षाट- नादि प्रवृत्ति वी अघटमानहीं है। ऐसैं मानतेहुये सिद्धांती समाधान करैहैं॥ इहां यह अर्थ है :- समुच्चयकी प्रामाणिक- ताके निरूपणविषै ज्ञानाभासरूप कारणवाले प्रवृत्तिके आभा- सकी उदाहरणता नहीं है औ अग्निहोत्रादि प्रवृत्तिकूं बी आभासताके हुये प्रामाणिक समुच्चयके सिद्धांतकी हानि हो- वैगी। यातैं यह प्रश्न बनता नहीं॥ २१५ याहींकूं दष्टांतकरि स्पष्ट करैहैं॥ इहां ताकी न्यांई अविवेकीकरि क्रियमाण कर्म देख्या। ऐसें जानिके विवेकी- नकरि बी सो नहीं करियेहै औ भिक्षाटनादिरूप प्रवृत्तिका

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३७८ द्वितीयप्रपाठक २ [छान्दोग्यो- समस्तसामके उपासन २४ गविी ऐसें निषिद्ध अभिचरणरूप कर्मविशेषकूं क- रता हुया कोईवी देख्या नहीं। ऐसैं जानिके शत्रुविषै द्वेषरहित विवेकीकरिबी अभिचरण (शत्रुनाशक श्येनयागादिकर्म) नहीं करियेहै औ कैर्मविधिविषै प्रवृत्तिके निमित्त भेदज्ञानके वाधित हुये संन्यासीकूं भिक्षाचरणादिकविषै भोजनकी इच्छादिरूप प्रवर्त्तककी न्यांईं। अभनि- होत्रादिकविषै प्रवर्तक निमित्त नहीं है॥।॥ नेनु इहां वी अकरणविषै प्रत्यवायका भय प्र. वर्तक है? ऐसैं जो कहै। सो बनै नहीं :- का- हेतैं भेदज्ञानवालेकूं कर्मविषै अधिकारी होनेतैं कहिये भेदप्रत्ययवान् जो विद्याकरि अबाधित भेदबुद्धिवाला ऐसा जो है सो कर्मविषै अधि- आभास तो अप्रमाणिक हुया अग्निहोत्रादि प्रवृत्तिका उदाह- रण नहीं है। यह शेष है॥ २१६ यातैं बी यह उदाहरण नहीं है। ऐसे कहैहैं॥ २१७ ननु अग्निहोत्रादिविषै वी प्रवर्तक है ? ऐसें पूर्व- वादी शंका करैहै। २१८ अब सिद्धांती अकरणका किया प्रत्यवायनामक अय अविवेकीकूं है वा विवेकीकूं है ? ऐसें विकल्पकरिके आद्यकूं अंगीकार करैहैं॥

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पनिषत ] त्रयोविंश खंड २३ ३७९ त्रिस्कंध ब्रह्मसंस्थकूं अमृतत्व ऊकारकी ब्रह्मता ३ कारी है। ऐसैं हम कहते भये। आतैं जो क- ्मविषै अधिकारी है ताकूं ता( कर्म)के अकर- णविषै प्रत्यवाय (पाप) होवैहै। निवृत्तअधि- कारवालेकूं नहीं। ब्रह्मचारीके विशेषधर्मके अ- ननुष्ठानविषै गृहस्थकीन्यांईं (गृहस्थकूं पाप नहीं है ताकी न्यांई) ॥। ॥ नेनु जब ऐसें है तब सर्व स्वाश्रमविषै स्थित उत्पन्न एकताके ज्ञानवाला हुया संन्यासी है? ऐसैं जो कहै। सो बनै नहीं :- काहेतैं तिनकूं स्वस्वामिभावके २२२

२१९ कर्मविषै भेदवुद्धिमान्कूं अधिकारीपनैंके हुये बी ताकूं तिसकर्मके अकरणके हुये क्या होवैगा ? यह आशंका- करिके कहैहैं॥ २२० द्वितीयकूं दूषण देते हैं॥ २२१ निवृत्त अधिकारवाले विवेकीकूं प्रत्यवायकी अप्रा- पिकरि कर्मविषै प्रवर्तकके अभावतैं कर्मोतें निवृत्तिरूप सं- न्यास जब है तब अतिप्रसंग (मर्यादाका उल्लंघन) होवैगा ? ऐसैं पूर्ववादी शंका करै है।। -TS २२२ कर्मका साधन स्वयज्ञोपवीतादि। त्यागकरियेहै। वा नहीं ? जब त्याग करियेहै तब सो स्वआश्रमका धर्म नहीं है। तातैं यज्ञोपवीतादि विना गृहस्थपनैंआदिकभावके असंभवतैं औ जब नहीं त्याग करियेहै तब संन्यासकी प्राप्ति

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३८० द्वितीयप्रपाठक २ [छान्दोग्यो- समस्तसामके उपासन २४ भेदकी बुद्धिकी अनिवृत्तितैं औ इतर आश्र- मोंकू कर्मअर्थ होनेतैं "अनंतर कर्मकूं करों" इस श्रुतितैं। ततैं स्वस्वामिभावके अभावतैं भिक्षु एकहीं परिव्राद् (संन्यासी) है। गृह- स्थादि नहीं ।। ॥ नेतुँ एकताके ज्ञानके विधि (उत्पादक महावाक्य)सैं जनित ज्ञान- करि विधिके निमित्त भेदज्ञानकूं उपमर्दित हो- नहीं है। काहेतें संग्रहके साध्यरूप अर्थके होनेतें। ऐसें सिद्धांती परिहार करैहैं॥ २२३ इस हेतुतै वी अन्य आश्रमोंविषै संन्यास नहीं है। ऐसे कहैहैं। इहां जाया पुत्र अरु वित्तरूप संपत्तिकी अनंत- रता श्रुतिविषै अथशब्दका अर्थ है। २२४ स्वआश्रमविषै स्थित गृहस्थआदिकनविषैहीं संन्या- सकी दुर्वचता (कहनेकी अयोग्यता)के हुये फलितकूं कहै हैं।। इहां तातैं। याका विवेकके वशतैं स्वशब्दके अर्थ यज्ञो- पवीतादिकविषै स्वामीपनैकी बुद्धिके अभावतैं। यह अर्थ है। २२५ औ जो निवृत्त अधिकारवाले संन्यासीकूं अकरणते प्रत्यवायकी अप्राप्ति है। ऐसें सिद्धांतीनें कहाथा। तिसविषै पूर्ववादी अनिष्टापत्तिकूं आशंका करैहै॥ इहां ता एकताकूं विषयकरनेवाले ज्ञानका विधि कहिये उत्पादक जो "तत्व- मसि" आदिकवाक्य। तिसकरि जनित एकताकूं विषयक- रनेवाले प्रत्यय (ज्ञान) करि। यह अर्थ है॥। तैसैं हुये यथे- ष्टचेष्टाकी प्राप्ति होवैगी। यह शेष है॥

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पनिषत् ] त्रयोविंश खंड २३ ३८१ त्रिस्कंध ब्रह्मसंस्थकूं अमृतत्व ॐकारकी ब्रह्मता ३ नेतैं संन्यासीकूं यम नियम आदिका असंभव होवैगा? ऐसैं जो कहै। सो बने नहीं :- काहेतैं भोजनकी इच्छाआदिककरि एकताके ज्ञानतैं गिरे संन्यासीकूं निवृत्तिका अर्थी होनेतैं यम नियम आदिकके संभवतैं औ प्रतिषिद्धकी से- वाकी प्राप्ति नहीं है। काहेतैं एकताके ज्ञानकी उत्पत्तितैं पूर्वहींताकूं निषिद्ध परित्यक्त होनेतैं जातैं रात्रिमैं कूपविषै वा कंटकविषै पतितभया पुरुष सूर्यके उदयहुये बी तिसविषैहीं नहीं प- २२६ ज्ञानीकूं विधिअधीन यमादिक नहीं है। तिसविषै प्रवृत्ति तो संस्कारके वशतैं होवैहै। इस आशयकरि सि- द्धांती कहैहैं॥ इहां यह अर्थ है :- जोई दृष्ट दोषकरि तत्व- ज्ञानतैं किसी प्रकारसैं वी प्रच्युतिकूं प्राप्तभया है ताकूं सं- स्कारके वशतैं यमनियमका अनुष्ठान संभवैहै। काहेतैं ता यमनियमकूं दोषकृत तत्वतैं प्रच्युतिकरि जनित अनियमित चेष्टाकी निवृत्तिअर्थ होनेकरि अवश्य अनुष्ठान करनेकूं योग्य होनेतैं। तैसैं हुये विद्वान्कूं यथेष्टचेष्टाकी प्राप्ति नहीं है।। २२७ इसतैं बी विद्वान्कूं विधिअधीन प्रवृत्तिके अभावके हुये वी यथेष्टचेष्टा नहीं है। ऐसैं कहैहैं॥ २२८ अविद्वान्कूं वी यथेष्टचेष्टा नहीं है तो विद्वान्कूं सो कहांतैं होवैगी। यह दष्टांतकरि स्पष्ट करैहैं।

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३८२ द्वितीय प्रपाठक २ [छान्दोग्यो- समस्तसामके उपासन २४ डताहै। तातैं निवृत्तकर्मवाला भिक्षुकहीं ब्रह्म- २२३. संस्थ है। ऐसैं सिद्धभया॥ ॥ जो फेर कहाथा कि :- सर्व ज्ञानवर्जितनकूं पुण्यलोकता है? ऐसैं यह सत्य है।।॥ औ जो कहाथाकिः-तपः श- ब्दकरि परिव्राट बी कहा? ऐसैं। येहं असत् है :- काहेतैं परिव्राजक (संन्यासी) कूं हीं ब्रह्मसं- स्थताके संभवतैं। सोई जातैं अवशेषित है। २३४ ऐसैं हम कहते भये औ एकेताके ज्ञानवालेकूं २२९ अन्योंकी ब्रह्मसंस्थताके असंभवके हुये फलितकूं उपसंहार करैहैं॥ २३० परोक्तकूं अनुवादकरिके अंगीकार करैहैं॥ २३१ उक्त अर्थातरकूं अनुवाद करैहैं॥ २३२ क्या ज्ञानहीन आश्रममात्रविषै स्थित संन्यासीका तपःशब्दकरि ग्रहण है। अथवा ज्ञानवान्का बी ? ऐसैं वि- कल्पकरिके। आद्यकूं अंगीकारकरिके द्वितीयकूं दूषण देतेहैं। २३३ ज्ञानवान्कूं बी तपस्वी होनेतें ताका तपःशब्दकरि ग्रहण उचित है? ऐसें शंका करिके प्रत्युत्तरकूं कहैहैं॥ इहां तपःशब्दकरि यह नहीं ग्रहणकिया। यह शेष है॥ २३४ औ तिस ज्ञानवान्का अवशिष्टपना पूर्वहीं उपदेश किया है। ऐसें कहै हैं॥ २३५ औ इसतैं परमहंस परिव्राजक तपःशब्दकरि नहीं ग्रहण कियाहै। ऐसैं कहैहैं॥

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पनिषत् ] त्रयोविंश खंड २३ ३८३ त्रिस्कंध ब्रह्मसंस्थकूं अमृतत्व ऊँकारकी ब्रह्मता अश्निहोत्रआदिककीन्यांईं तपकी निवृत्तितैं। जातैं भेदबुद्धिवालेकूंहीं तपकी कर्तव्यता होवै २३६

है। इसकरि कर्मविषै छिद्रके हुये ब्रह्मसंस्थ- ताका सामर्थ्य निरस्तकिया औ अप्रतिषेध नि- रस्तकिया॥ तैसैं ज्ञानवान्हीं निवृत्तकर्मवाला परिव्राट है ऐसैं [मानेहुये] ज्ञानकी व्यर्थता कही- थी सो निरस्तकरी॥ ॥ जो फेर कहाथा कि :- २३६ ताहींकूं स्पष्ट करैहैं॥ २३७ औ जो कर्मके छिद्रविषै गृहस्थ आदिककू बी व्र- ह्मसंस्थताका सामर्थ्य है ? ऐसें कहाथा। ताकू प्रतिषेध करैहैं॥ इहां इसकरि। याका अनिवृत्तभेदज्ञानवालेकूं ब्रह्म- संस्थताके असंभवकरि। यह अर्थ है औ सामर्थ्य निषेध किया ऐसैं संबंध है।। २३८ औ जो च्यारी अश्रमीनकूं वी ब्रह्मसंस्थताका अप्र- तिषेध है? ऐसें कहाथा। तहां कहैहैं॥ इहां यह अर्थ है :- एकताके उपदेशकरि भेदप्रत्ययके निरासतें अनिवृत्तभेदप्रत्यय- वालेकूं अर्थतें ब्रह्मसंस्थता निषिद्ध है॥ २३९ पारिव्राज्यमात्रकरि अमृतभावके हुये ज्ञानका व्यर्थ- पना पूर्ववादीनैं कहाथा ताकूं परिहार करैहैं॥ २४० अन्य प्रश्नकूं अनुवादकरिके पूर्ववादीकरि उक्त परिहारकूं स्मरण करावैहैं॥ इहां तिसविषै रूढ यह शब्द है। इस शेषकूं हेतुवाचक पंचमीकरि सूचन करैहैं॥

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३८४ द्वितीयप्रपाठक २ [छान्दोग्यो- समस्तसामके उपासन २४ यव वराह आदिक शब्दनकी न्यांईं संन्यासी- विषै रूढ ब्रह्मसंस्थशब्द नहीं है ? ऐसैं। सो प- रिहारकिया। काहेतैं तिसीहींकूँ ब्रह्मसंस्थताके संभवतैं। अन्यकूं नहीं ऐसैं।। ॥ जो फेर कहा- था किः-रूढशब्द निमित्तकूं ग्रहणकरते नहीं? ऐसैं। सो वनै नहीं :- काहेतैं गृहस्थ तक्ष(शिल्पी) परिव्राजक आदिक शब्दनविषै देखनेतैं। गृँहैं- विषै स्थिति पारिव्राज्य (संन्यास) तक्षण (टंकण)आदिक निमित्तकूं ग्रहण करनेवाले बी शब्द गृहस्थ अरु परिव्राजक आश्रमविशे- षविषैऔ तक्षाविशिष्ट जातिवालेविषै। ऐसैं रूढ देखियेहैं। औ जहां जहां वे निमित्त हैं तहां तहां नहीं वर्तते हैं प्रसिद्धिके अभावतैं। तैसै इहां (प्रकतवाक्यविषै) वी ब्रह्मसंस्थशब्द नि- वृत्त भये हैं सर्व कर्म अरु तिनके साधन जि- सतैं ऐसैं अति आश्रमी परमहंस नामक परि- २४१ अन्य प्रश्नकूं अनुवादकरिके दूषण देतेहैं ॥ इहां आदिपदकरि पंकज आदिक शब्द ग्रहण करियेहैं॥ २४२ उक्त अर्थकूं प्रपंचन करैहैं ॥ इधर "इहां बी" ऐसें प्रकृतवाक्यका ग्रहण है।।

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पनिषत् ] त्रयोविंश खंड २३ ३८५ त्रिस्कंध ब्रह्मसंस्थकूं अमृतत्व ॐकारकी ब्रह्मता ३ ब्राट एकविषै प्रवृत्त इहां होनेकूं योग्य है। का- हेतैं मुख्य अमृतभावरूप फलके श्रवणतैं। औ यातैं यह हीं एक वेदोक्त पारिव्राज्य (सं- न्यास) है। यज्ञोपवीत त्रिदंड अरु कमंडलु आदिकका परिग्रहरूप नहीं इति (ऐसैं) औ "मुंड अपरिग्रह असंग है" ऐसी ्रुति है औ २४३ प्रकृत परमहंसरूप संन्यासविषै ब्रह्मसंस्थपद है। इस अर्थविषै हेतुकूं कहैहैं॥ २४४ औ इसतैं परमहंस संन्यासहीं श्रुतिविहित है। ऐसें कहैहैं॥ २४५ एवकारके अर्थकूं कहैहैं॥ इहां इति शब्द जो है सो संन्यासके प्रकरणविषै तिस प्रकारकी (त्रिदंडीसंन्यासी- की प्रतिपादक) श्रुतिके अभावके दिखावनेअर्थ है॥। २४६ ब्रह्मसंस्थशब्दकी परमहंसरूप अर्थवान्ताविषै अन्य श्रुतिकूं कथन करैहैं । इहां अति आश्रमीनकेअर्थ। याका पूर्वके तीन आश्रमनकूं उल्लंघन करिके सर्व कर्मकूं त्याग क- रिके स्थित परमहंस परिवाजकोंके अर्थ । यह अर्थ है औ परमपवित्र। याका निरतिशय परिशुद्धिके कारण परम पुरु- षार्थके साधन सम्यक् ज्ञानकूं कहताभया। यह अर्थ है औ स्मृतिनतैं बी यथोक्त संन्यास सिद्ध होवैहै। यह शेष है औ "आशीर्वादरहित आरंभरहित" इत्यादि वाक्यके ग्रहण- अर्थ आदिपद है औ कर्मकी बंधहतुता तत् (तातैं) श- ३३

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३८६ द्वितीय प्रपाठक २ [छान्दोग्यो समस्तसामके उपासन २४ "अत्याश्रमीनकेअर्थ परम पवित्र [ज्ञानकूं कहताभया ]" इत्यादि श्वेताश्वतरीयविषै वा- क्य है औ "निस्तुति निर्नमस्कार है" इत्यादि स्मृतिनतैं यथोक्त संन्यास सिद्ध होवैहै। औ "तातैं पारदर्शी जे यति हैं वे कर्मकूं करते नहीं। तातैं अलिंग धर्मज्ञ अव्यक्त लिंग है" इत्यादि स्मृतिनतैं वी॥ ॥औ जो साख्यों- ब्दका अर्थ है औ लिंगकी धर्मकी कारणतासैं रहितता "तातैं" ऐसें कहा औ अलिंग कहिये धर्मध्वजिता (दंभीपनै)सें रहित औ धर्मज्ञ कहिये यथावत् धर्मका अनुष्ठाता। वा इधर अधर्मज्ञ ऐसा पाठ है कहिये धर्मके विचारकी निष्ठासैं रहित है। अर्थ यह जो :- तिसविषै असारताके प्रत्ययवाला है॥ २४७ "अलिंग" ऐसें कहेहुये अनाश्रमीपनैंकूं आशं- काकरिके कहैहैं॥ इहां नहीं व्यक्त कहिये दंअसैं गृहीत लिंग (आश्रमीपना) इसकूं है यातैं अव्यक्तलिंग है किंतु अदंभकरि श्रुति स्मृति उक्त प्रकारसैं सो लिंग इसकूं है। यह अर्थ है औ आदिपद "धर्मकूं अरु अधर्मकू त्याग कर" इत्यादि ग्रहण करनेकूं है औ इहांवी पूर्वकीन्यांई अन्वय है॥ २४८ ननु कर्मकी निवृत्तिकूं उपदश करनेवाले तुम सिद्धां तीनें सांख्यमतहीं आश्रित किया। काहेतें तिस सांख्यवादी करिबी शरीरआदिकके व्यापारकी निवृत्तिद्वारा ध्याननिष्ठाकूं स्वीकारकरी होनेतैं? तहां कहैहैं॥ इहां यह अर्थ है :- जातैं तिस सांख्यके मतविषै कूटस्थरूप आत्माके ज्ञानके बलसैं नै

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पनिषत् ] त्रयोविंश खंड २३ ३८७ त्रिस्कंध ब्रह्मसंस्थकूं अमृतत्व ॐकारकी बह्मता ३ करि कर्मका त्याग अंगीकार करियेहै। क्रिया- कारक अरु फलके भेदकी बुद्धिकी सत्यताके अंगीकारतैं। सो मृषा है औ जो बौद्धोंकरि २४९

शून्यताके अंगीकारतैं अकर्त्तापना अंगीकार करियेहै। सो बी असत् है :- काहेतैं ताके अंगी- २५० कारके कर्ताके सन्भावके अंगीकारतैं औ जो

षकर्म्य (कर्मराहित्य) युक्त नहीं है। काहेतें क्रिया अरु कार- ककी बुद्धिकूं औ अविवेककूं सत्यहोनैंकरि ज्ञानमात्रसैं नि- वृत्त होनैंकी योग्यताके अयोगतैं औ सर्व व्यापारोंकी निवृ- त्तिका संभव नहींहै। काहेतैं मन बुद्धि आदिकनकूं तिस (व्यापाररूप) स्वभाववाले होनेतैं अरु "कोईवी पुरुष क्षणवी कर्मरहित स्थित होता नहीं" इत्यादि गीतास्मृतितैं। यातैं सांख्यका वचन मिथ्याहीं है।। २४९ ननु निरात्मता (शून्यता)कूं इच्छनेवाले बौद्ध (बु- धके शिष्य माध्यमिक)नैंबी नैष्कर्म्य मान्या है। ऐसैं हुये क- मैके त्यागकूं उपदेश करनेवाल तुम सिद्धांतीनैंवी ताका म- तहीं अनुमोदन किया? ऐसैं जो कहै। सो बने नहीं। ऐसैं कहैहैं॥ इहां ताके अंगीकारकरनेवालेके। इस ठिकाने अकर्ता- पना तत् (ताके) शब्दका अर्थ है।। २५० "दुःख है ऐसैंहीं जो कर्म कायक्ेशके भयतैं त्यागे" इस गीता स्मृतितैं आलस्यकरि उपहृत अज्ञजनोंकरि अक- र्तापना अंगीकार करियेहै। कर्मके त्यागनेवाले तुज सिद्धां-

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३८८ द्वितीयप्रपाठक २ [छान्दोग्यो- समस्तसामके उपासन २४ अज्ञ जनोंकरि आलस्ययुक्ततासें अकर्तापनैका अंगीकार है। सो बी असत् है :- काहेतैं प्रमा- २५१ णकरि कारकबुद्धिकूं अनिवर्तकरी होनेतैं। तातैं वेदांतरूप प्रमाणसैं जनित एकताके ज्ञानवालेकूं हीं कर्मोंकी निवृत्तिरूप पारिव्राज्य औ ब्रह्मसंस्थता है। ऐसें सिद्धभया। इसकरि गृहस्थकूं एकताके तीकरिवी तिनका मत आदरयुक्त किया? यह आशंकाकरिके कहैहैं। इहां अकर्तापनैंका अंगीकार। ऐसें पदच्छेद है औ भाव यह है :- वे अज्ञजन जातैं मोहतैंहीं कर्मकूं त्यागतेहुये ताके फलकूं पावते नहीं "सो राजस त्यागकूं करिके ताके फ- लकूं पावता नहीं" इस स्मृतितैं। हम तो प्रमाणके वशतैहीं कर्मकूं त्यागते हुये मूढनके पक्षकूं आदर करते नहीं। तातैं श्रति स्मृति प्रसिद्ध नैष्कर्म्य (संन्यास) निषेध करनेकूं योग्य नहीं है॥ २५१ अन्य पक्षविषै नैष्कर्म्यकी उक्तिकी अप्रमाणताके स्थित हुये फलितकूं उपसंहार करैहैं॥ २५२ औ जो कितनैंक वादियोनें एक आश्रमता (ज्ञानकी सर्व आश्रमविषै समता) आश्रित करी है। ताकूं प्रत्यादेश (निराकरण) करैहैं॥ इहां इसकरि। याका ऐकताके विज्ञानकरि भेदज्ञानके उपमर्दितपनैंके उपपादनकरि। यह अर्थ है औ इधर (गृहस्थविषै) एकताका विज्ञान परोक्ष विवक्षित है काहे- तैं अपरोक्ष विज्ञानके संन्यासविना अयोगतैं औ उपरतिशब्दके वाच्य तिस संन्यासकी शमादिककी न्यांई साधनताकी श्रुतितैं। ऐसें देखनेकूं योग्य है।

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पनिषत् ] त्रयोविंश खंड २३ ३८९ त्रिस्कंध ब्रह्मसंस्थकूं अमृतत्व ॐकारकी ब्रह्मता २

विज्ञानके हुये पारिव्राज्य (मुख्य वा मानसिक- संन्यास) अर्थतै सिद्धभया॥ ॥ नेतु गृहस्थ संन्यासकूं करता हुया अग्निके उत्सादन (त्या- ग)रूप दोषका भागी होवैगा। काहेतैं "यह देवनके वीरका हंताहीं है जो अनिकूं उद्दासन (परित्याग) करताहै" इसश्रुतितैं? सो ब- २५४

नै नहीं :- काहेतैं दैवकरि उत्सादित (त्यक्त) होनेतैं। जातैं सो (अननि) एकताके ज्ञानके भये उत्सन्न (त्यक्त)हीं होवैहै। "अगनिका अगिनि- भाव जाताभया" इस श्रुतितैं। याँतैं गृहस्थ

२५३ गृहस्थके पारिव्राज्यविषै श्रृतिके विरोधकूं पूर्ववादी शंका करैहै। २५४ एकात्मताहीं सत्य है। द्वैत असत्य है। इस विवे- कके उत्पन्नभये अग्निआदिककी अवस्तुताके निश्चयतैं ताके अभिनिवेशकी शिथिलतातैं ताके त्यागविषै दोषकी प्राप्ति नहीं है। ऐसैं सिद्धांती दूषण देतेहैं॥ २५५ सम्यक् ज्ञानकेहुये अग्निआदिकके त्यागविषै प्रमा- णकूं कहैहैं॥ २५६ विवेकवाले गृहस्थकूंबी वैराग्यद्वारा संन्यासयुक्त है। ऐसैं कहैहैं॥ इहां इतिशब्द व्रह्मसंस्थवाक्यके व्याख्या- नकी समाप्ति अर्थ है।।

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३९० द्वितीयप्रपाठक २ [छान्दोग्यो- समस्तसामके उपासन २४ प्रजापतिर्लोकानभ्यतपत्तेभ्योऽभि- तप्तेभ्यस्त्रयी विद्या सम्प्रास्रवत्तामभ्य- अर्थः-प्रजापति लोकनके प्रति अभि- ताप करता भया। तिन अभितप्तनतैं त्रयी- विद्या सम्यक् स्रवतीभई॥ ताके प्रति अ- संन्यासकूं करता हुया दोषका भागी नहीं हो- वैहै इति ॥ १॥ टीका :- जिसविषै सम्यक् स्थितहुया अमृत- २५७ भावकूं पावताहै ताके निरूपणअर्थ कहैहैं :- विराट् वा कश्यपरूप प्रजापति लोकनकूं उ- देशकरिके तिनोंविषै सारके ग्रहणकी इच्छाकरि अभितापकूं करताभया। अर्थ यह जोः-ध्यान- रूप तपकूं करताभया। तिन अभितप्तनतैं सा- रभूत त्रयीविद्या सम्यक् प्रस्वतीभई। अर्थ यह जो :- प्रजापतिके मनविषैप्रतीत होतीभई। २५७ सो ब्रह्म क्या है? इस आकांक्षाके हुये कहैहैं॥ २५८ लोकनकूं च्यारी ओरतैं दग्ध होनेकरि अभितापके प्रतिभासकूं विभाग करैहैं॥ २५९ द्रवस्वरूपताके अभावहुये त्यीविद्याका प्रस्नवण

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पनिषत् ] त्रयोविंश खंड २३ ३९१ त्रिस्कंध ब्रह्मसंस्थकूं अमृतत्व ॐकारकी ब्रह्मता ३ तपत्तस्या अभितप्ताया एतान्यक्षराणि सम्प्रास्रवन्त भूर्भुवः स्वरिति ॥२॥ तान्यभ्यतपत्तेभ्योऽभितप्तेभ्य ॐ कारः सम्प्रास्रवत्तघथा शङ्डना सर्वाणि भिताप करता भया। तिस अभितप्ततैं ये भूर् भुवः स्वः। ऐसे अक्षर सम्यक् स्रवते- भये ॥ २ ॥ अर्थः-तिनके प्रति अभितापकरता- भया। तिन अभितप्तनतैं ॐकार सम्यक् स्त्रवताभया। सो जैसैं शंकु (वंत) करि ताकूं तपावताभया। पूर्वकी न्यांईं। तिस अ- भितप्त भयी विद्यातैं ये "भूर भुवः स्वः" ऐसे व्याहृतिरूप अक्षर प्रस्नवतेभये (प्रकट- होतेभये) ॥ २ ॥ टीका :- तिन अक्षरनकूं तपावताभया। तिन अभितप्तनतैं ऊकार प्रस्रवताभया। सो ब्रह्म कैसें होवैगा? यह आशंका करिके कहैहैं॥ इहां पूर्वकी न्याई ऐसें तयीविद्याके सारग्रहणकी इच्छाकरि आलोचन क- रताभया। यह अर्थ है।।

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[छन्दोग्यो ३९२ द्वितीयप्रपाठक २ समस्तसामके उपासन २४ पर्णानि सन्तृण्णान्येवमोङ्कारेण सर्वा वाक् सन्तृण्णोंकार एवेदY सर्वमोक्कार एवेदर सर्वम् ॥३॥ इति द्वितीयप्रपाठकस्य त्रयोविंश: खंडः॥।२३। सर्व पर्ण व्याप्त होते हैं। ऐसैं ऊकारकरि सर्व वाक व्याप्त है। ऊकारहीं यह सर्व है। ऊकारहीं यह सर्व है॥ ३॥ इति श्री०मूलभाद्वितीयप्र०त्रयोविंशःखंड: २३ है।। ॥ कैसा है? यह कहैहैंः-सो जैसें पर्णों- के नालरूप शंकुकरि सर्व पर्ण (पत्रके अवयवोंके समूह) निविद्ध हैं। अर्थ यह जो :- व्याप्त हैं। ऐसैं परमात्माके प्रतीकभूत ऊकाररूप ब्रह्मकरि सर्वा वाक् (शब्दका समूह) व्याप्त है "अंका- २६० ताकूं ब्रह्मशब्दकी वाच्यता कैसें है? यह आशंका करिके। अत्यंत महत् होनेतैं है। ऐसें कहैहैं॥ २६१ तहां ब्रह्मशब्दकी प्रवृत्तिविषै अन्य हेतुकूं सूचन करै हैं। २६२ ॐकारके अवयव अकारकी बी सर्व वाक्विषै व्याप्ति है। तब ऊँकारकी व्याप्ति है यामैं क्या कहना है।

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पनिषत् ] त्रयोविंश खंड २३ ३९३ त्रिस्कंध ब्रह्मसंस्थकूं अमृतत्व ऊँकारकी ब्रह्मता ३ रहीं सर्वा वाक् है" इत्यादि श्रुतितैं औ पैरमा- त्माका विकार (कार्य) नाममात्र है। यातैं ॐ कारहीं यह सर्व है। ऐसैं दोवार अभ्यास आ- दरके अर्थहै औ लोक आदिकके उत्पादनका क- थन ऊकारकी स्तुतिअर्थ है इति ॥ ३ ॥

ऐसैं मानते हुये अन्य श्रुतिकूं उदाहरण करै हैं॥ इहां "ॐ ऐसा यह सर्व है" इत्यादिवाक्य आदिपदका अर्थ है।। २६३ वाणीके समूहकूं ऊँकारकरि व्याप्तताके हुयेबी ता ऊकारकी सर्वात्मता नहीं है। काहेतैं आकाश आदिक पर- मात्माके कार्यकूं पृथकूहीं विद्यमान होनेतैं? यह आशंका करिके कहैहैं। इहां सकलबी जगत् परमात्माका कार्य हो- नेतैं तिसतैं अतिरिक्त नहीं है औ सो (परमात्मा) प्रकृत ॐ- कारतैं अतिरिक्त नहीं है "हे सत्यकाम! यह हीं पर अरु अपर ब्रह्म है जो ऊँकार है" इस श्रुतितैं तातैं ऊकारकी स- र्वात्मता युक्त है। यह अर्थ है औ सर्वात्मक ब्रह्मरूप 3०का- रकूं उपासन करै। इस विधिकी समाप्तिअर्थ इतिशब्द है।। २६४ ऊकारकी लोकादिद्वारा उत्पत्ति कैसें कहिये है? तहां कहैहैं।। इहां स्तुति जो है सो उपासनाकेअर्थ है। का- हेतैं जो स्तुति कररिये है सो विधान करियेहै इस स्थिति- तैं। तैसें हुये अमृतरूप फलवाला ऊँकारका उपासन सिद्ध भया। ऐसें कहनेकूं इति शब्द है। इति द्वितीयप्रपाठकगत त्रयोविंशखंडस्य टिप्पणं।। २३।।

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३९४ द्वितीयप्रपाठक २ [छान्दोग्यो- समस्तसामके उपासन २४ अथ श्रीछान्दोग्योपनिषदि द्वितीयप्र पाठकस्य चतुर्विश: खंडः प्रारभ्यते २४ ब्रह्मवादिनो वदन्ति यद्दसूनां प्रातः सवन रुद्राणां माध्यन्दिन सवनमा- अथ श्रीछान्दोग्योपनिषन्मूलमात्रभाषादीपिकाया द्वि- तीयप्रपाठकस्य चतुर्विशः खंडः प्रारभ्यते ॥ २४॥ अर्थ :- ब्रह्मवादी कहते हैं जो :- वसुनका प्रातःकाल है। सद्रनका माध्यंदिनकाल है अथ श्रीछान्दोग्योपनिषद्भाष्यभाषादीपिकाया द्विती यप्रपाठकस्य चतुर्विशः खंडः प्रारभ्यते ॥ २४॥ अज्ञकी निंदा औ ज्ञानार्थ साम होममंत्र अरु उत्थान १६ टीका :- सामके उपासनके प्रसंगसैं कर्मकी गुणभूततातैं निवर्तकरिके ॐँकारकूं परमात्माका अथ द्वितीयप्रपाठकगतचतुर्विशखंडस्य टिप्पणं २४ २६५ प्रसंगसैं प्राप्त अर्थकूं छोडिके अब प्रकृतकूं अनुसं- धान करतेहैं॥ इहां यह अर्थ है :- पंचविध अरु सप्तविध यज्ञका अंगभूत साम है ।। ताके उपासनके वचनतैं तिस गुणवाले ऊकारकूं निरंतर हीं कर्मगुणवान्पनैंके प्राप्त हुये। तिसतैं ताकूं निवर्तकरिके ब्रह्मका प्रतीक होनेतें कैवल्यका

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पनिषत्] चतुर्विश खंड २४ ३९५ अज्ञकी निंदा औ ज्ञानार्थ साम होममंत्र अरु उत्थान १६ दित्यानाञ्च विश्वेषाञ्च देवानां तृतीय- सवनम् ॥ १ ॥ औ आदित्यनका अरु विश्वेदेवनका तृ- तीय काल है॥ १ ॥ प्रतीक होनेतैं अमृतभावका हेतु होनेकरि महान् करिके प्रकतहीं यज्ञके अंगभूत साम होममंत्र अरु उत्थानकूं उपदेश करते हुये कहैहैं :- ब्रह्मवादी क- हते हैं :- जोप्रातःकाल प्रसिद्ध है सो वसुनका है औकालके ईशान तिनोंनैं प्रातःकाल संबंधी यह २६७

लोक वश किया है। तैसैं माध्यंदिन कालके ईशान

हेतु होनेकरि ताहींकूं महान् करिके। अब प्रस्तुत (प्रकृत) जे यज्ञके अंगभूत साम आदिकके विज्ञान (उपासन) हैं। तिनके विधानअर्थ उत्तर वाक्य है।। २६६ साम अरु होममंत्रकरिसहित उत्थान जो है सो साम आदिकके उपासनके विधान करनेकी इच्छासें है। ताके अ- परिज्ञानविषै दोषकूं कहैहैं। २६७ तिनकी प्रातःकालकी ईशानताके हुये बी यजमा- नकी कौंन हानि है? यह आशंकाकरिके कहैहैं॥ इहां जैसैं पृथिवीलोक वसुनकरि वश किया है। तैसैं। यह अर्थ है औ अंतरिक्षलोक वश किया है। ऐसैं पूर्वपदसैं संबंध है औ तृतीयलोक द्युलोक (स्वर्गलोक) नामक है।

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३९६ द्वितीयप्रपाठक २ [छान्दोग्यो- समस्तसामके उपासन २४ क्क तर्हि यजमानस्य लोक? इति।स अर्थ :- कहां तब यजमानका लोक हो- रुद्रोंनैं अंतरिक्ष लोक [वश किया है ]। औ तृतीयकालके ईशान आदित्य अरु विश्वेदेवोनैं तृतीय लोक वश किया है। ऐसें यजमानका अन्य लोक परिशिष्ट (अवशिष्ट) नहीं विद्या- मान है॥ १ ॥ टीका :- यातैं कहां तव यजमानका लोक है जिसअर्थ यजन करताहै ? कहींबी लोक नहीं है। यह अभिप्राय है। "जो यजनकरताहै सो लोकके अर्थहीं यजताहै" इस श्रुतितैं औ २६८ ननु तिन तिन देवनकूं तिस तिस लोकका वशी- कार है। तथापि यजमानके लोकीपनैंविषै क्या आया? यह आशंकाकरिके कहैहैं॥ इहां द्वितीयवाक्यके व्याख्यानविषै परिशिष्ट (अवशेष रहै ) लोकका अभाव अतः (यातैं) श- ब्दका अर्थ है औ तर्हि (तब)। याका देहपाततैं ऊर्ध्व। यह अर्थ है।। २६९ नतु लोककी अपेक्षा विनाबी विधिके वशतैं याग होवैगा? यह आशंका करिके कहैहैं॥

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पनिषत् ] चतुर्विश खंड २४ ३९७ अज्ञकी निंदा औ ज्ञानार्थ साम होममंत्र अरु उत्थान १६ यस्तं न विद्यात्कथं कुर्यादथ विद्वान् कुर्यात् ॥२॥ वैगा ! ऐसैं। जो तिसकूं न जानेगा सो कैसैं करैगा। अथ (तातैं) विद्वान् क- रैगा॥ २ ॥ लोकके अभाव हुये जो यजमान है सो। तिस २७०

साम होममंत्र अरु उत्थानरूप लोकस्वीकरणके उपायकूं नहीं जानै। सो अज्ञ यज्ञकूं कैसैं क- रैगा। अर्थ यह जो :- किसी प्रकारसैं बी ताकूं कर्तापना नहीं संभवैहै। सामादिकके विज्ञा- नकी स्तुतिपर होनेतैं कर्ममात्रके वेत्ता अविद्वा- नूका कर्तापना नहीं प्रतिषेध करिये है औ साम २७० तीन लोकनकूं वसु आदिकनके अधीन होनेकरि यजमानकी अनधीनताके हुये ता(लोकत्रय)की तिस यजमा- नकी अधीनताअर्थ यज्ञआदिकका अनुष्ठान होवैगा ? यह आशंकाकरिके कहैहैं॥ २७१ अज्ञ पुरुष स्वर्ग आदिकके साधनभूत यज्ञकूं कैसैं करैगा। इस आक्षेपतैं अविद्वान् के कर्मके अनुष्ठानकी निंदा- पर यह वाक्य है ? यह आशंकाकरिके कहैहैं॥ २७२ ननु "अथ (अनंतर)" ऐसा यह वाक्य स्तुतिकेअर्थ ३४

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३९८ द्वितीयप्रपाठक २ [छान्दोग्यो- समस्तसामके उपासन २४ पुरा प्रातरनुवाकस्योपाकरणाज्जघ- अर्थ :- प्रातरतुवाकके उपाकरणतैं पूर्व आदिकके विज्ञानकी स्तुतिअर्थ अरु अविद्वा- न्के कर्तापनैंके निषेधअर्थ जो यह वाक्य हो- वै तो सो भेदकूं पावैगा। प्रथम उपस्ति संबंधि- कांडविषै अविद्वानकूं वी कर्म है इस हेतुकूं ह- म कहते भये। तातैं इस वक्ष्यमाण सामादिक उपायकूं विद्वान् करै॥ २ ॥ टीका :- कैया सो वेद् है? यह कहैहैं :- प्रात- अरु निषेधकेअर्थ होवैगा? तहां दोनूंकेअर्थ नहीं। ऐसे कहैहैं॥ २७३ औ इसतें अविद्वान्का कर्तापना निषेधकरनेकूं अ- शक्य है। ऐसे कहैहैं॥ इहां यह अर्थ है :- "मटचीहत"(हि- मके पाषाणोंकी वृष्टिकरि धान्यवृक्षोंके हनन किये) हुये इ- त्यादि वाक्यविषै विद्वान्के सन्निधानविषै ताकी आज्ञाविना अविद्वान्का कर्म करनेकूं अयुक्त है प्रत्यवायके प्रसंगतैं औ ताकी असन्निधिविषै तो तिस अविद्वान्करिवी क्रियमाणकर्म दोषयुक्त होता नहीं। ऐसे उपपादन किया है औ इहां भा- ष्यविषै अथ शब्द जो है सो हेतुके अर्थ है। अर्थ यह जो :- साम आदिकके अविज्ञानके हुये जातैं यज्ञ आदिक कर्मका अकरणहीं प्राप्त है। तातैं।। २७४ ज्ञातव्य सामादिककू प्रश्नपूर्वक विचरण करैहैं॥

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पनिषत् ] चतुर्विश खंड २४ ३९९ अज्ञकी निंदा औ ज्ञानार्थ साम होममंत्र अरु उत्थान १६ नेन गार्हपत्यस्योदघ्ुख उपविश्य स वासव सामाभिगायति॥३॥ अरु गार्हपत्यके जघनकरि (पश्चात्) उत्तरा- भिमुख स्थित होयके सो वासव सामकूं अभिगायन करैहै॥ ३ ॥

रतुवाकरूप शस्त्र (अप्रगीत ऋचाओंके समूह)के उपाकरण (प्रारंभ)तैं पूर्व अरु गार्हपत्यके ज- घनकरि (पीछे) उत्तरदिशाके अभिमुख हुया २७६

इहां अप्रगीत ऋचाओंका समूह शस्त्र है जो प्रातःकालविषै कथन करियेहै ऐसा प्रातरनुवाक है ताके। यह अर्थ है।। २७५ उपाकरणतैं। याके अर्थकूं कहैहैं॥ २७६ जघनकरि। इसपदकूं व्याख्यान करैहैं॥ इहां सो गार्हपत्यनामक अग्निके पृष्ठतैं उत्तरभागविषै स्थित होयके वसुदेवतासंबंधि सामगानकूं करताभया। यह अर्थ है औ "सो वासव (वसुसंबंधि)" इस ठिकानैं स (सो) शब्द जो है सो यजमानकूं विषय करनेवाला है औ चतुर्थ वाक्यविषै राज्यकेअर्थ। याका तेरे दर्शनकरि तेरी आज्ञासैं पृथिवी प्र- युक्त भोगकेअर्थ। यह अर्थ है औ पंचमवाक्यविषै पृथिवी- विषै जो वसताहै सो पृथिवीक्षित् है। तिस तुज़ पृथिवी- क्षित् (पृथिवीनिवासी) केअर्थ। ऐसैं जानना॥

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द्वितीयप्रपाठक २ [छान्दोग्यो- ४०० समस्तसामके उपासन २४ लो ३ कद्दारमपावा ३र्णू३३ पश्येम ता वयशरा ३३३३३ हुं ३ आ ३३ जा ३ यो ३ आ ३१११ इति॥४ ॥ अथ जुहोति नमोऽग्ये पृथिवीक्षि- अर्थः-लोकके द्वारकूं खुल्लाकर। हम तु- जकूं राज्यकेअर्थ देखैं ॥४॥ अर्थः-अनंतर होमकूं करताहै :- प- थिवीक्षित् लोकक्षित् अग्निकेअर्थ नमस्कार बैठिके। सो वासव (वसुदैवत्यवाले) सामकूं अभिगायन करैहै ॥ ३॥ टीका :- हे अझे! लोकके द्वारकूं कहिये इस प्टथिवी लोककी प्राप्तिअर्थ द्वारकूं खोल । तिस द्वारकरि हम राज्यकेअर्थ तुजकूं देखैं। ऐसैं ॥४॥ टीका :- अनंतर इस मंत्रकरि होमकूं क रताहैः-तुज अग्निकेअर्थ नमः कहिये हम न- त्रीभूत हैं। पृथिवीरूप निवासकेअर्थ। लोक निवासकेअर्थ। अर्थ यह जो :- पृथिवीलोकरूप

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पनिषत् ] चतुर्विश खंड २४ ४०१ अज्ञकी निंदा औ ज्ञानार्थ साम होममंत्र अरु उत्थान १६ ते लोकक्षिते लोकं मे यजमानाय विन्दैष वै यजमानस्य लोक एताऽस्मि॥ ५॥ अत्र यजमान: परस्तादायुष: स्वा- है। सुज यजमानकेअर्थ लोककूं प्राप्त हो। यहहीं [मुज] यजमानका लोक है। [तिसविषै मैं] जानेवालाहूं॥५॥ अर्थ :- इहां यजमान "आयुषतैं परे निवासकेअर्थ ॥ मुज यजमानकेअर्थ लोककूं तूं प्राप्त होहू। यहँ हीं मुज यजमानका लोक है। [ तहां मैं] जानेवाला हूं॥५ ॥ टीका :- इस लोकविषै यजमान जो मैं सो आयुष्तैं परे (ऊर्ध्व)। अर्थ यह जोः-मृत हुया। "स्वाहा" ऐसैं होमकूं करताहै। लोकद्वारके अर्गल (प्रतिबंध) रूप परिघकूं दूरी कर। ऐसैं २७७ पृथिवीलोकके मुज(देव)करि प्राप्तहुये तुज (यज- मान)कूं क्या होवैगा? यह आशंकाकरिके कहैहैं॥ इहां स्वाहा शब्द मंत्रकी समाप्तिरूप अर्थवाला होमका प्रकाशक है औ सर्व मंत्रनविषै। इनकरि। याका साम होममंत्र अरु उत्थानकरि। यह अर्थ है।।

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४०२ द्वितीयप्रपाठक २ [छान्दोग्यो- समस्तसामके उपासन २४ हाऽपजहि परिघमित्युक्त्वोत्तिष्ठति तस्मै वसवः प्रातःसवन९ संप्रयच्छन्ति॥६॥ पुरा माध्यन्दिनस्य सवनस्योपाक- रणाज्जघनेनाग्रीध्रीयस्योदङ्मुख उप- स्वाहा [ऐसैं होमताहै] परिघकूं दूरीकर" ऐसैं कहिके ऊठताहै। तिसके अर्थ वसु प्रातःकालकूं देते हैं ॥ ६॥ अर्थः-माध्यंदिन कालके उपाकरण (प्रारंभ)तैं पूर्व अरु आन्नींधीयके जघनकरि इस मंत्रकूं कहिके ऊठता है। ऐसैं इनकरि व- सुनकेअर्थ प्रातःकाल संबंधि लोक निष्क्रीत (मोललिया) होवैहै। तातैं वे वसुनामक देव प्रातःकालकूं यजमानकेअर्थ देते हैं ॥ ६ ॥ टीका :- तैसैं आनींधसंबंधी दक्षिणासिके २७८ जैसें पृथिवीलोकके जयका उपाय दिखाया। तैसैं अंतरिक्षलोकके जयका उपाय बी दिखाइयेहै। ऐसें कहैहैं। इहां अंतरिक्षविषै वसताहै यातें अंतरिक्षक्षित् वायु है। इस वायुकेअर्थ नमस्कार है।।

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पनिषत्] चतुर्विश खंड २४ ४०३ अज्ञकी निंदा औ ज्ञानार्थ साम होममंत्र अरु उत्थान १६ विश्य स रौद्र सामाभिगायति॥७॥ लो ३ कद्ारमपावा ३ ्णू २३ पश्येम त्वा वयं वैरा ३३३३३ हुं ३ आ ३३ ज्या ३ यो ३ आ ३२१११ इति ॥८॥ अथ जुहोति नमोवायवेऽन्तरिक्षक्षि- ते लोकक्षिते लोकं मे यजमानाय दिन्दैष (पीछे) उद्ङमुख बैठिके सो रौद्र सामकूं अभिगायन करैहै॥ ७॥ अर्थ :- लोकके द्वारकूं खुल्लाकर। हम तुजकूं वैराज्यकेअर्थ देखैं ऐसैं ॥ ८॥ अर्थ :- अनंतर होमकूं करताहै :- अँ- तरिक्षक्षित् लोकक्षित् (अंतरिक्ष लोकके निवासी) वायुके अर्थ नमस्कार है। सुज जघनकरि (पीछे) उत्तराभिमुख हुया बैठिके सो यजमान वैराज्य(अंतरिक्ष लोककी प्राप्ति)के अर्थ रौद्र (रुद्रदैवत्यवाले ) सामकूं अभिगा- यन करैहै ॥ ७॥८॥ टीका :- अंतरिक्षक्षित् (अंतरिक्षविषै रहने-

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द्वितीयप्रपाठक २ [छान्दोग्यो- ४०४ समस्तसामके उपासन २४ वै यजमानस्य लोक एताऽस्मि॥ ९॥ अत्र यजमान: परस्तादायुष: स्वाहा Sपजहि परिघमित्युक्त्वोत्तिष्ठति तस्मै रुद्रा माध्यन्दिनY सवनY सम्प्रय- च्छन्ति॥ १०॥ पुरा तृतीयसवनस्योपाकरणाज्जघने- यजमानकेअर्थ प्राप्त हो। यहहीं यजमा- नका लोक है। [मैं] जानेवालाहूं॥ ९॥ अर्थ :- इहां यजमान "आयुष्तैं परे स्वाहा। परिघकूं दूरी कर" ऐसैं कहिके ऊठता है। तिसकेअर्थ रुद्र माध्यन्दिनका- लकूं देतेहैं॥ १० ॥ अर्थः-तृतीयकालके उपकरणातैं पूर्व वाले) वायुकेअर्थ [नमस्कार है] । इत्यादि समान है॥ ९ ॥ १० ॥ टीका :- तैसैं आहवनीय नामक अगनिके २७९ २७९ जैसें पृथिवी अरु अंतरिक्षकी प्राप्तिका उपाय कहा।

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पनिषत्] चतुर्विश खंड २४ ४०५ अज्ञकी निंदा औ ज्ञानार्थ साम होममंत्र अरु उत्थान १६ नाहवनीयस्योदख्मुख उपविश्य सआ-

लो ३ कद्दारमपावा ३ र्णू३३ पश्येम त्वा वय ५ स्वारा ३३३३३ हुं ३ आ३३ ज्या ३ यो ३ आ ३२१११ इति॥ १२॥ आदित्यमथ वैश्वदेवं लो ३ कद्दार- मपावा ३ ्णू ३३ पश्येम त्वा वय अरु आहवनीयके जघनकरि उत्तरमुख बैठिके सो आदित्य (सूर्यसंबंधि) सो वै- श्वदेव (विश्वेदेवसंबंधि) सामकूं अभिगायन करैहै॥ ११ ॥ अर्थः-लोकके द्वारकूं खुल्ला कर। हम तुजकूं स्वाराज्यके अर्थ देखें ऐसैं ॥१२॥ अर्थ :- अनंतर हे आदित्य! अरु हे वैश्व- [पीछे ] उत्तराभिमुख हुया बैठिके सो आदि- तैसैं स्वर्गलोककी प्राप्तिका उपाय बी कहियेहै। ऐसैं कहैहैं॥ इहां स्वाराज्य कहिये अंतरिक्षविषै आदित्यनकी स्वतंत्रताकी न्यांई स्वतंत्रता विवक्षित है।।

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४०६ द्वितीयप्रपाठक २ [छान्दोग्य- समस्तसामके उपासन २४ साम्रा ३३३३३ हुं ३ आ ३३ ज्या ३ यो ३ आ ३२१११ इति ॥ १३॥ अथ जुहोति नम आदित्येभ्यश्च वि- श्वे्यश्च देवेभ्यो दिविक्षिद्धयो लोक- क्षिद्द्यो लोकं मे यजमानाय विन्दत१४ देव! लोकके द्वारकूं खुल्ला कर। हम तुजकूं साम्राज्यकेअर्थ देखैं ऐसैं ॥ १३॥ अर्थ :- अनंतर होमकूं करताहै :- दिवि- क्षित् लोकक्षित्(स्वर्ग लोकके निवासी) आ- दित्यनकेअर्थऔ विश्वेदेवनकेअर्थ नमस्कार है। मुज यजमानकेअर्थ लोककूं प्राप्त होहू॥ १४॥ त्यदैवत्यवाले आदित्य अरु वैश्वदेव सामकूं क्र- मसैं स्वाराज्य अरु साम्राज्यकेअर्थ अभिगायन करैहै ॥ ११ ॥ १२॥१३॥ टीका :- दिविक्षित् देवनके अर्थ। इससैं आ- दिलेके अन्य समान है औ प्राप्त हो तो अरु प-

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पनिषत् ] चतुर्विश खंड २४ ४०७ अज्ञकी निंदा औ ज्ञानार्थ साम होममंत्र अरु उत्थान १६ एष वै यजमानस्य लोक एताऽस्म्यत्र यजमान: परस्तादायुष: स्वाहाऽपहत- परिघमित्युत्त्कोत्तिष्ठति॥१५॥ तस्मा आदित्याश्च विश्वे च देवास्तृ- तीयं सवनसम्प्रयच्छन्त्येष ह वै यज्ञ- अर्थ :- यहहीं यजमानका लोक है। इहां आनेवाला हूं। यजमान "आयुषूतैं परे स्वाहा। परिघकूं दूरी कर हू" ऐसैं कहिके ऊठता है ॥ १५ ॥ अर्थः-तिसकेअर्थ आदित्य औ विश्वे- देव ततीयकालकूं देते हैं। यह निश्चित रिघकूं दूरी करो। यह बहुवचनमात्र विशेष है औ यजमान संबंधि तो यह है। काहेतैं "जा- नेवालाहूं" इहां यजमान। इत्यादि लिंगतैं। २८० ननु यह साम आदिक क्या ऋत्विकनका संबंधि है अथवा यजमानका संबंधि है? ऐसैं विचारके हुये कहैहैं॥ इहां आदिपदकरि लोककूं सुज यजमानकेअर्थ। ऐसा नि- र्देश ग्रहण करियेहै॥

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४०८ द्वितीयप्रपाठक २ [छान्दोग्यो- समस्तसामके उपासन २४ स्य मात्रा वेद य एवं वेद य एवं वेद १६॥ इति श्रीछान्दोग्योपनिषदि द्वितीयप्रपाठकस्य चतुर्विशः खण्डः समापः ॥ २४॥ यज्ञकी मात्राकूं जानताहै। जो ऐसैं जा- नताहै। जो ऐसैं जानताहै ॥ १६ ॥ इतिश्रीछान्दोग्योपनिषन्मूलमात्रभाषादीपिकायां द्वितीयप्रपाठकस्य चतुर्विशः खंडः समाप्रः२४। येहे प्रसिद्ध यजमान ऐसें जाननेवाला कहिये धथोक्त साम आदिकका विद्वान् हुया यज्ञकी मात्राकूं कहिये यथोक्त यज्ञके स्वभावकूं जानताहै [ताके अर्थ तृतीयकालकूं देते हैं]।। जो ऐसैं जा- नताहै। जो ऐसें जानताहै। इहां यह दोवार उक्ति अध्यायकी परिसमाप्तिअर्थ है॥१४॥१५॥१६ इति श्रीछान्दोग्योपनिषद्धाष्यभाषादीपिकायां द्वितीय- प्रपाठकस्य चतुर्विशः खंडः समाप्ः॥२४॥ समाप्तेयं द्वितीयप्रपाठकस्य भाष्यभाषादीपिका ॥२॥ २८१ साम आदिकके विज्ञानके फलकूं कथन करैहैं। २८२ "जो ऐसें जानता है। याकी व्याख्या " कहियेहै॥ इहां यथोक्त। याका सामादि। यह अर्थ है औ ऐसें। यह उक्त प्रकारकी उत्ति है औ तिस यज्ञके स्वभावके वेत्ताकूं ताके अनुष्ठानद्वारा ताका फल संभवैहै। यह अर्थ है।। इति श्री०द्वितीयप्रपाठकगतचतुविशखंडस्य टिप्पणम् ॥२४॥ समाप्तेयं द्वितीयप्रपाठकस्य टिप्पणिका ॥२॥

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आदित्यादि पंचद्वारपालगायत्री हृदय आदिक ब्रह्मके उपासन १९ अथ श्रीछान्दोग्योपनिषदस्तृतीयप्रपा- ठकस्य प्रथम: खंडः प्रारभ्यते ॥१॥ ॐँ। असौ वा आदित्यो देवमधु। अथ श्रीछान्दोग्योपनिषन्मूलमात्रभाषादीपिकायां तृतीयप्रपाठकस्य प्रथमः खंडः प्रारभ्यते ॥१॥ अर्थ :- वह प्रसिद्ध आदित्य देवनका मधु

स्तृतीयप्रपाठकस्य प्रथमः खंडः प्रारभ्यते ॥ १ ॥ आदित्यआदिकविषै मधुआदिककी दष्टियां ४ टीका :- "वेह प्रसिद्ध आदित्य" इत्यादिरूप अथ श्रीछान्दोग्योपनिषद्स्तृतीयप्रपाठकगत प्रथमखंडस्य टिप्पणं प्रारभ्यते ॥१॥ १ कर्मागावबद्ध (कर्मके अंगसैं संबद्ध) विज्ञानकूं समाप्त- करिके। अब कर्मके फलरूप आदित्यकी स्वतंत्र उपासनाके विधिअर्थ अन्य (तृतीय) अध्यायकूं आरंभ करतेहुये आचार्य संबंधकूं प्रतिज्ञा करैहैं। ३५

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४१० तृतीयप्रपाठक ३ [छान्दोग्यो आदित्यादि पश्चद्वारपाल गायत्री हृदयादिक ब्रह्मके उपासन १९ तस्य द्यौरेव तिरश्रीनवYशोऽन्तरिक्षम- पूपो मरीचयः पुत्राः॥१॥ है। ताका स्वर्गलोकहीं तिरश्रीन (टेढा) वंश है। अंतरिक्ष अपूप है । मरीचियां पुत्र हैं॥ १॥। तृतीय अध्यायके आरंभविषै संबंध है॥ अतीत अनंतर द्वितीय अध्यायके अंतविषै कहाकि :- "य- ज्ञकी मात्राकूं जानताहै" ऐसैं यज्ञकूं विषय क- रनेवाले औ यज्ञके अंगभूत साम होममंत्र अरु उत्थान । विशिष्टफलकी प्राततिअर्थ उपदेश किये औ सर्व यज्ञोंके कार्यकी निर्वृति (सिद्धि) रूप सूर्य वैडी लक्ष्मीकरि प्रदीप्त होवैहै। सो यह सर्व प्राणीनके कर्मका फलभूत प्रत्यक्ष सर्व २ पूर्वउत्तरग्रंथके प्रतिज्ञात संबंधकूं प्रकटकरनेकूं वृत्तकूं कीर्तन करैहैं। इहां विशिष्टफल पृथिवी आदिक लोकत्रय है।। ३ समनंतर ग्रंथके तात्पर्यकूं कहनेकूं पातनिकाकूं करैहैं॥ ४ ताके प्रेक्षितपनैकूं सूचन करैहैं॥ ५ ननु फेर आदित्यकूं सर्व प्राणीनके कर्मका फलभूतपना कैसे है ? यह आशंकाकरिके। सर्वजनोंकरि उपजीव्यता (आश्रितता) के उपलंभतैं प्राप्ति है। ऐसें कहैहैं॥

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पनिषत् ] प्रथम खंड १ आदित्यादिविषै मधु आदिककी दृष्टियां ४ ४११

जनोंकरि आश्रय करियेहै। यातैं यज्ञके व्य- पदेशके अनंतर ताके कार्यभूत सूर्यविषयक सर्व पुरुषार्थनतैं श्रेष्ठतमफलवाले उपासनकूं विधान करतीहूं। ऐसैं श्रुति आरंभकरैहैः- "यह प्रसिद्ध आदित्य देवनका मधु है" इत्यादि। देवनका मोदनतैं मधुकीन्यांई मधु यह आदित्य है।। औ आदित्यके वसुआदिक- नके मोदनके हेतुपनैंकूं आगे कहैगी ता आदित्यकूं सर्व यज्ञोंका फलरूप होनेतैं॥ ॥ कैसैं मधुपना

६ पातनिकाकूं करिके अब उत्तरग्रंथकूं उठावतेहैं।। इहां यातैं। इसका आदित्यकूं कर्मका फलरूप होनेतैं। यह अर्थ है।। ७ ताके उपदेशविषै अन्य हेतुकूं कहैहैं॥ अत्यंत श्रेष्ठफल कमसैं मुक्तिरूप इसका है। सो श्रेष्ठतमफल (अत्यंत श्रेष्ठ- फलवाला) है। तैसैं उक्त उपासनकूं॥ ८ आदित्यविषै उक्तकर्मफलशब्दकी प्रवृत्तिके निमित्तकूं स्पष्टकरनेकूं कहैहैं॥ इहां चकार विद्वान्के ग्रहणअर्थ है औ आदित्यकी मोदनहेतुताकूं कहैगी। ऐसें संबंध है औ ता (आदित्य) कूं सर्वयज्ञोंका फलरूप होनेतें। यह हेतु है औ कर्मफलके भोक्ता वसुआदिक ता (कर्म)के फलरूप आदित्यकूं देखिके तृप्त होतेहैं यह युक्त है। यह अर्थ है।। ९ "आदित्यकूं मधुदृष्टिकरि उपासन करै" ऐसें कहा।

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४१२ तृतीयप्रपाठक ३ [छान्दोग्यो- आदित्यादि पञ्चद्वारपाल गायत्री हृदयादिक ब्रह्मके उपासन १९ है? यातैं कहैहैं :- तिस मधुका स्वर्गलोकहीं मधुके भ्रमरकीन्यांई [तिरश्चीन (तिरछा) ऐसा जो यह वंश सो] तिरश्षीन वंश है जातें तिर्यक् गतकीन्यांई स्वर्गलोक देखिये- है।। औ 'अंतरिक्ष मधुका अपूप (मधुपुडा) स्वर्गलोकरूप वंशवृक्षविषै लग्न हुया सम्यक् लंब- मान होनेकीन्यांईं है। यातैं मधु अपूपके सा- मान्यतैं औ मधुरूप सविताका आश्रय होनेतैं अंतरिक्ष मधुअपूप (मधुपुडा) है॥ औ मैं- रीचियां (सूर्यकी रश्मियां) कहिये सूर्यके किरणोंविषै स्थित सूर्यकरि आकर्षण किये भू- तहां आदित्यके श्रुतिउक्त प्रसिद्ध मधुसाम्यकूं आकांक्षापूर्वक दिखावैहैं। १० स्वर्गविषै तिरछे वंशवृक्षकी दृष्टिमैं निमित्तकूं क- हैहैं॥ इहां उपरि प्रसारित नयनोंवाले अंतरिक्षनिवासिन- करि। यह शेष है॥। ११ अंतरिक्षविषै मधुअपूप (मधुपुडे)की दृष्टिकूं कथन करैहैं॥ इहां मघुशब्दका उभयत्र संबंध है।। १२ "मरीचियां पुत्र हैं" इस वाक्यकूं व्याख्यान करैहैं॥

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पनिषत् ] प्रथम खंड १ ४१३ आदित्यादिविषै मधु आदिककी दष्टियां ४ तस्य ये प्रा्चो रश्मयस्ता एवास्य अर्थः-ताकी ये प्राक् रश्मियां है वेई मिके जल। "ये प्रसिद्ध जल स्वराट (सूर्य) की जे मरीचियां हैं" ऐसें जातैं जानियेहैं वे जल अंतरिक्षरूप मधुअपूपविषै स्थित सूर्यके रश्मिनके अंतर्गतहोनेतैं भ्रमरनके बीजभूत पुत्रनकीन्यांईं स्थित देखियेहैं यातैं पुत्रकी न्यांई पुत्र हैं। जातैं मधुपुडेकी नाडीनके अंतर्गत भ्रमरपुत्र (मक्षिकाविशेष) होवैहैं ॥। १ ॥ टीका :- तिसे सवितारूप मधुके आश्रय

१३ आप(जल) भूमितैं आकर्षितहुयी रश्मिविषै स्थित हैं। इस अर्थविषै प्रमाणकूं कहैहैं॥ इहां स्वराट्की। याका स्वतः भासमान सविताकी। यह अर्थ है। १४ तिन आप(जलों)के भ्रमरपुत्रपनैंकूं प्रकट करैहैं। इहां यह अर्थ है :- लोकविषै जातैं भ्रमरोंके बीजभूत पुत्र मधुअपू- पके छिद्रनविषै स्थित देखियेहैं औ ये आप अंतरिक्षरूप मधु- अपूपके अंतर्गत रश्मिनविषै स्थित होवैहैं। तातैं इन जलों- विषै भ्रमरबीजकी दृष्टि कर्तव्य है॥ १५ पूर्वदिशागत आदित्यके रश्मिनविषै प्राचीन (पूर्व-

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४१४ तृतीयप्रपाठक ३ [छान्दोग्यो- आदित्यादि पञ्चद्वारपाल गायत्री हृदयादिक ब्रह्मके उपासन १९ प्राच्यो मधुनाड्य ऋच एव मधुकृत ऋग्वेद एव पुष्पं ता अमृता आपस्ता वा एता ऋचः ॥ २॥ इसकी प्राची मधुनाडियां हैं। रुचाहीं म- धुकर हैं। ऋग्वेदहीं पुष्प है। वे अमृत- रूप आप हैं वे प्रसिद्ध ये ऋचा हैं॥२॥ मधुका जे प्राची दिशाविषै गत रश्मियां हैं। वेइ इसके प्राची (पूर्व) दिशाके तरफ प्रका- शनतैं मधुकी नाडीनकीन्यांई मधुकी नाडियां हैं। अर्थ यह जो :- मधुआधारके छिद्र हैं। तैहां ऋचाहीं मधुकृत् हैं। लोहितरूप स- वितारूप आश्रयवाले मधुकूं करतेहैं यातैं मधु- दिशागत) मधुनाडीनकी दृष्टि कर्तव्य है। ऐसें कहैहैं। इहां मधुके आश्रयकी। याका लोहितादिरूप मधु वक्ष्यमाण है ताके आधारकी। यह अर्थ है॥ १६ ऋचारूप मंत्रनविषै भ्रमरनकी दृष्टिकूं रैहैं।। इहां प्रकृतमधु "तहां" इस सप्तमीका अर्थ है॥ आरोप क- १७ तिन ऋचाओंके मधुकरपनैंकूं साधतेहैं॥

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पनिषत् ] प्रथम खंड १ ४१५ आदित्यादिविषै मधु आदिककी दष्टियां ४ कृत् हैं। भ्रमरनकीन्यांई जातें रसनकूं लेके मधुकूं करतेहैं॥। ताका पुष्पकीन्यांई पुष्प ऋग्वेदहीं है।। तहां ऋग्वेदके ब्राह्मणके समू- हकूं ऋग्वेद नामवाला होनेतैं औ शब्दमात्रतैं भोग्यरूप रसके स्त्रावके असंभवतैं ऋग्वेदशब्द- करि इहां ऋग्वेदविषै विहित कर्म लक्षित है। तिसतैं जातैं कर्मफलभूत मधुरूप रसके निस्रा- वके संभवतैं। मंधुकरोंकीन्यांई पुष्पस्थानीय

१८ ऋग्वेदविहित कर्मविषै पुष्पदृष्टिकूं संपादन करैहैं। १९ "ऋचा मधुकर हैं" इन मंत्रनकूं पृथक् किये होनेतैं "ऋग्वेद पुष्प है" ऐसें ऋग्वेद अब्दसैं ब्राह्मण समुदायकूं कहनेकूं योग्य होनेतैं किसी प्रकारसैंबी तिस शब्दकरि ल- क्षित वेदविहित कर्मविषै पुष्पदृष्टिकरि अध्यासके हुयेबी क- हांतैं तिसतैं मधुकी उत्पत्ति होवैगी? यह आशंकाक- रिके कहैहैं॥ २० ताहीकूं उपपादन करैहैं॥ इहां यह अर्थ है :- लोक- विषै प्रथम पुष्परूप आश्रयवाले जलोंकूं लेके मधुकरोंकरि मधु उत्पन्न करियेहै। तैसैं इहांबी मधुकरस्थानीय ऋग्वे- दके मंत्रनकरि तिस वेदविषै विहित पुष्पस्थानीय कर्मतैं ज- लनकूं ग्रहणकरिके मधु उत्पादन करियेहै। तातैं कर्मतैं स्व- फलभूत मधुकी उत्पत्तिके संभवतैं तिस कर्मविषै पुष्प- नकी दृष्टि है।।

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४१६ तृतीयप्रपाठक ३ [छान्दोग्यो आदित्यादि पञ्चद्वारपाल गायत्री हृदयादिक ब्रह्मके उपासन १९ ऋग्वेदविहित कर्मतैं जलोंकूं लेके ऋचाओंकरि मधु उत्पादन करियेहै॥ ॥ कौंनैसी वे आप (जल) हैं? यातैं कहैहैं :- वे कर्मविषै प्रयुक्त सोम घृत अरु क्षीररूप अगनिविषै प्रक्षिप्त ति- सके पाककरि उत्पन्न अरु अमृतअर्थ होनेतैं अमृतरूप ऐसी अत्यंत रसवालियां आप (जल) होवैहैं॥ तिसविषै स्थित रसोंकूं लेके वे ये प्रसिद्धऋचा पुष्पनतैं रसकूं ग्रहण क- रनेवाले भ्रमरनकीन्यांई भ्रमररूप ऋचा हैं ॥२॥ २१ "वे अमृतरूप आप हैं" या वाक्यकूं प्रश्नपूर्वक व्या- ख्यान करैहैं। २२ कर्मविषै प्रयुक्तपनैकूं आकारकरि दिखावैहैं॥ इहां अग्निके पाककरि अभिनिर्वृत्तपना जो है सो अपूर्वस्वरूपपना है औ परंपरासैं मुक्ति अर्थपना अमृतरूप अर्थवान्पना है। यद्वा रोहितरूप अमृतका उत्पादकपना तिस (अमृतरूप ) अर्थवान्पना है औ उत्कृष्ट फलवान्पना अत्यंत रसवा- नूपना है।। २३ "वे प्रसिद्ध ये ऋचा हैं" इत्यादिरूप वाक्यकूं व्या- ख्यान करैहैं।। इहां यह अर्थ है :- जैसैं प्रसिद्ध पुष्पनतैं भ्र- मर रसोंकूं ग्रहण करते हुये तिनके प्रति अभितापकूं कर- तेहैं। तैसैं ये मंत्र तिस कर्मविषै स्थित जलमय रसोंकूं लेके

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पनिषत् ] प्रथम खंड १ ४१७ आदित्यादिविषै मधु आदिककी दृष्टियां ४ एतमृग्वेदमभ्यतपरस्तस्याभितप्त- अर्थः-इस ऋग्वेदके प्रति अभिताप टीका :- ये कर्मविषै प्रयुक्त (संबद्ध) ऋचा पुष्पस्थानीय इस ऋग्वेदकूं कहिये ऋग्वेद- विहित कर्मकेप्रति अभिताप करतेहुयेकी- न्यांई करतीभई। जातैं शस्त्रआदिक अंग- भावकूं प्राप्तभये ऋचारूप मंत्रोंकरि क्रियमाण कर्मरूप भ्रमरोंकरि आचूष्यमाण (चूषै) पुष्प- नकीन्यांईं मधुके उत्पादक रसकूं छोडताहै यह संभव है।। सो यह कहैहै :- तिस अभितप्त ऋग्वेदका [ रस उपजता भया ] कौंने यह रस है जो ऋचारूप मधुकरोंके अभितापकरि नि- मधुकूं उत्पादन करते हुये यथोक्त अभिमत कर्मकूं सम्यक् आलोचन करते हैं॥ २४ ननु फेर पुष्पस्थानीय ऋग्वेदविहित कर्मके प्रति अभिताप करनेवाले भ्रमरस्थानीय मंत्रनकूं फलवानूपना कैसैं है? यह आशंकाकरिके कहैहैं॥ २५ तिन मंत्रनके कर्मविषै प्रयुक्त (योजित) पनैंके हु- येबी क्या आया? सो कहैहैं॥ इहां अभितप्तका रस उपजता भया। ऐसैं संबंध है॥ २६ ताकूं प्रश्नपूर्वक स्पष्ट करैहैं।

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४१८ तृतीयप्रपाठक ३ [छान्दोग्यो- आदित्यादि पञ्चद्वारपाल गायत्री हृदयादिक ब्रह्मके उपासन १९ स्य यशस्तेज इन्द्रियं वीर्यमन्नाद्य र- सोडजायत॥ ३॥ तद्यक्षरत्तदादित्यमभितोऽश्रयत्तद्वा करतेभये। तिस अभितप्तका यश तेज ईं- द्रिय वीर्य अन्नाद्यरूप रस उपजताभया ३ अर्थ :- सो विशेषकरि गमन करताभया। सो आदित्यके प्रति च्यारीओरतैं आश्रय कस्या है ? यह कहियेहैः-यश (विख्यातपनैंरूप विश्रुतपना)। तेज (देहगतदीप्ति)। इंद्रिय (सामर्थ्ययुक्त इंद्रियनकरि अविकलता)। वीर्य कहिये सामर्थ्य। अर्थ यह जोः-बल। औ अन्नाद्य कहिये अन्न अरु तिस आदिक वस्तु। उपयोगकिये जिसकरि दिन दिनविषै देवनकी स्थिति होवै सो अन्नाद्य है। यह रस यागा- दिरूप कर्मतैं उपजता भया ॥ ३ ॥ टीका :- येशसैं आदिलेके अन्नाद्यपर्यंत सो विशेषकरि गमन करता भया औ गमनक- २७ तत् (सो) शब्दके अर्थकूं कहैहैं॥

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पनिषत् ] प्रथम खंड १ ४१९ आदित्यादिविषै मधु आदिककी दष्टियां ४ 7 एतद्यदेतदादित्यस्य रोहित५ रूपम्॥४ इति श्रीछान्दोग्योपनिषदि तृतीयप्रपाठकस्य प्रथम: खंडः समापः ॥ १ ॥ करताभया। सोई यह है। जो यह आदि- त्यका रोहित रूप है॥। ४ ॥ इतिश्रीछान्दोग्योपनिषन्मूलमात्रभाषादीपिका- याँ तृतीयप्रपाठकस्य प्रथमः खंडः समाप्तः॥१॥ रिके सो आदित्यके प्रति च्यारीओरतैं क- हिये पार्श्व्वतैं (सविताके पूर्वभागकूं) आश्रय करताभया। यह अर्थ है।। उैस आदित्यविषै संचित कर्मफलनामक मधुकूं हम भोगेंगे ऐसें जातैं यशआदिरूप फलकी प्राप्तिअर्थ। कर्ष- कोंकरि केदार (क्यारे) के निष्पादनकीन्यांई मनुष्यनकरि कर्म करियेहैं। सो प्रत्यक्ष श्रद्धा- २८ अनंतर अनुष्ठित कर्मजनित फल आदित्यकूं कैसैं आश्रय करैहै ? यह आशंकाकरिके कहैहैं॥ इहां दष्टांतविषै भोगेंगे व्रीहि आदिककरि जनितफलकूं। इस अभिप्रायकरि व्रीहिआदिककी प्राप्तिअर्थ। यह शेष है॥ २९ क्या सो कर्मफल है जो आदित्यकूं आश्रयकरिके

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४२० तृतीयप्रपाठक ३ [छान्दोग्यो- आदित्यादि पञ्चद्वारपाल गायत्री हृदयादिक ब्रह्मके उपासन १९ अथ तृतीयप्रपाठकस्य द्वितीयःखंड:२ अथ येस्य दक्षिणा रश्मयस्ता ए- अथ श्री०मूलभाषा०तृतीयप्रपा०द्वितीयः खंडः ॥२॥ अर्थ :- अनंतर जे इसकी दक्षिण रश्मि- रूप हेतुतैं देखियेहै। सोई यह है॥ सो क्या है कि :- जो यह उदय होते आदित्यका रो- हित (रक्त) रूप देखियेहै ॥ ४ ॥ इति श्रीछान्दोग्योपनिषद् भाष्यभाषादीपिकायां तृतीयप्रपाठकस्य प्रथम: खण्डः समाप्तः॥१॥ अथ श्री०भाष्यभाषातृतीयप्रपा० द्वितीयःखण्डः॥२॥ दक्षिणदिशागत रश्मिआदिकविषै मधुनाडी आदिककी दृष्टि ३ टीका :- अनंतर जे इस (आदित्य)की स्थित होवैहै ? यह आशंकाकरिके कहैहैं ॥ इहां कर्मफलके प्रत्यक्ष हुये तिसके साधन कर्मविषै कर्मिनकी श्रद्धाकी सि- द्विअर्थ। यह श्रद्धारूप हेतुतैं इस शब्दका अर्थ है। ३० तिसींहीं फलकूं प्रश्नपूर्वक स्पष्ट करैहैं॥ इति श्री तृतीयप्रपाठकगतप्रथमखंडस्य टिप्पणम् ॥१॥ अथ तृतीयप्रपाठकगतद्वितीयखंडस्य टिप्पणमू॥।२ ३१ अन्य मधुकूं दिखावैहैं।

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पनिषत् ] द्वितीय खंड २ ४२१ दक्षिणदिशागत रश्मि आदिविषै मधुनाडी आदिकी दृष्टि ३ वास्य दक्षिणा मधुनाड्यो यजूश्येव मधुकृतो यजुर्वेद एव पुष्पं ता अमृता आपः॥१॥ यां हैं वेई इसकी दक्षिण मधु नाडियां हैं। यजुष् हीं मधुकर हैं। यजुर्वेदहीं पुष्प है। वे अमृत आप (जल) हैं। १॥ दक्षिण रश्मियां हैं। इत्याहि समान है॥ य- जुर (यजुर्वेदके मंत्र)हीं मधुकर हैं। वे मंत्र यजुर्वेदविहित कर्मविषै प्रयुक्त हुये पूर्ववत् मधु- वर (भ्रमर)कीन्यांई हैं॥। औ पुष्पस्थानीय यजुर्वेद-विहित कर्म "पुष्य" ऐसें कहिये है औ वेई सोम आदिक अमृतरूप आप हैं॥१॥ ३२ वक्तव्य विशेषकूं कथन करैहैं॥ ३३ तिनका मधुकरपना कैसैं है? सो कहैहैं॥ इहां यह अर्थ है :- ऋग्वेदविहित कर्मविषै ऋग्वेदके मंत्रनका जैसै पूर्व मधुकरपना कहा। तैसैं यजुर्वेदके मंत्रनका बी है॥ ३४ यजुर्वेदविहित कर्मविषै पुष्पदृष्टिकूं कहैहैं॥ ३५ "वे अमृतरूप आप हैं" इस वाक्यका पूर्वकी न्याई व्याख्यान है। ऐसें कहैहैं॥ ३६

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४२२ तृतीयप्रपाठक ३ [छान्दोग्यो- आदित्यादि पञ्चद्वारपाल गायत्री हृदयादिक ब्रह्मके उपासन १९ तानि वा एतानि यजूश्ष्येतं यजुर्वे- इन्द्रियं वीर्यमन्नाद्य रसोऽजायत॥२ तद््यक्षरत्तदादित्यमभितोऽश्रयत्तद्वा एतद्यदेतदादित्यस्य शुक्क- रूपम् ॥३॥ इति तृतीयप्रपाठकस्य द्वितीयः खंडः ॥ २ ॥ अर्थ :- वे प्रसिद्ध ये यजुष् इस यजुर्वेदकूं अभिताप करतेभये। तिस अभितप्तका यश तेज इंद्रिय वीर्य अन्नाद्यरूप रस उपजता- भया ॥ २ ॥ अर्थः-सो (यशआदि अन्नाद्यपर्यत)वि- शेषकरि गमन करताभया। सो आदित्यके- प्रति च्यारीओरतैं आश्रयकरताभया। सोई यह है जो यह आदित्यका शुक्क रूप है॥ ३॥ इति श्री०मूलभाषा०तृतीयप्रपा०द्वितीय:खंडः२।। टीका :- वे प्रसिद्ध ये यजुर इस यजुर्वे- दके प्रति अभिताप करते भये। इत्यादि

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पनिषत् ] तृतीय खंड ३ ४२३ पश्चिमदिशागत रश्मि आदिविषै मधुनाडी आदिकी दृष्टि ३ अथ तृतीयप्रपाठ० तृतीयः खंडः॥३॥ अथ येऽस्य प्रत्यञ्चो रश्मयस्ता ए- वास्य प्रतीच्यो मधुनाड्यः सामान्येव अथ श्री०मूलभाषा०तृतीयप्रपा०तृतीयःखंडः ॥ ३॥ अर्थ :- अनंतर जे इसके प्रत्यक रश्मि- यां हैं वेई इसकी प्रतीची मधुनाडियां हैं। सर्व समान है।। यह मधु आदित्यका शुक्- रूप देखियेहै॥ २॥३॥ इति श्री०भाष्यभाषातृतीयप्रपाठ० द्वितीय: खंडः॥२।। अथ श्री०भाष्यभाषातृतीयप्रपा०तृतीयःखंडः ॥ ३ ॥ पश्चिमदिशागत रश्मिआदिविषै मधुनाडी आदिकी दृष्टि ३ टीका :- अनंतर जे इस (आदित्य)के प्र- त्यक् (पश्चिमदिशागत) रश्मियां हैं। इ- ३६ यजुर्वेदके मंत्रनके आदित्यसंबंधि मधुकूं प्रत्यक्ष दि- खावैहैं।। इति श्री तृतीयप्रपाठकगतद्वितीयखंडस्य टिप्पणम् ॥ २ ॥ अथ तृतीयप्रपाठकगततृतीयखंडस्य टिप्पणमू।।३।। ३७ तृतीय मधुकूं कथन करैहैं। इहां ऋचाओंका औ यजुषनका मधु जैसैं कथनकिया। तैसैं। यह अर्थ है॥

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४२४ तृतीयप्रपाठक ३ [छान्दोग्यो- आदित्यादि पञ्चद्वारपाल गायत्री हृदयादिक ब्रह्मके उपासन १९ मधुकृतः सामवेद एव पुष्पं ता अमृता आपः॥ १॥ तानि वा एतानि सामान्येतर सा- स्तेज इन्द्रियं वीर्यमन्नाद्य रसोऽजा- 1 यत ॥ २ ॥ तद्दयक्षरत्तदादित्यमभितोऽश्रयत्तद्वा सामहीं मधुकर हैं। सामवेदहीं पुष्प है। वे अमृत आप हैं ॥ १॥ अर्थः-वे प्रसिद्ध ये साम इस सामवे- दुके प्रति अभितापकूं करतेभये। तिस अ- भितप्तका यश तेज इंद्रिय वीर्य अन्नाद्यरूप रस उपजताभया ॥ २ ॥ अर्थः-सो विशेषकरि गमन करताभया। सो आदित्यके प्रति च्यारीओरतैं आश्रय त्यादि समान है। तैसैं सामोंका मधु है। यह ३८ ताकी शास्त्रप्रत्यक्षताकूं दिखावैहैं॥ इति श्री० तृतीयप्रपाठकगततृतीयखंडस्य टिप्पणम् ॥ ३॥

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पनिषत्] चतुर्थ खंड ४ ४२५ उत्तरदिशागत रश्मि आदिविषै मधुनाडी आदिकी दृष्टि ३ एतद्यदेतदादित्यस्य कृष्ण रूपम्॥३॥ इति तृतीयप्रपाठकस्य तृतीयः खंडः॥३॥ अथ तृतीयप्रपाठ० चतुर्थः खंडः॥४॥ अथ येऽस्योदञ्चो रश्मयस्ता एवा- स्योदीच्यो मधुनाडयोऽथर्वाङ्गिरस एव करताभया। सोई यह है जो यह आदि- त्यका कृष्ण रूप है॥ ३ ॥ इति श्री०मूलभाषातृतीयप्रपाठ०तृतीय:खंड:३ अथ श्री०मूलभाषा०तृतीयप्रपा०चतुर्थःखंडः ॥।४।। अर्थ :- अनंतर जे इसके उदक रश्मियां हैं वेई इसकी उदीची मधुनाडियां हैं। अ- आदित्यका कृष्ण रूप है ॥ १ ॥ २॥ ३ ॥। इति श्री०भाष्यभाषा०तृतीयप्रपाठ०तृतीयः खंडः॥३॥ अथ श्री०भाष्यभाषातृतीयप्रपा० चतुर्थः खण्डः ॥४॥ उत्तरदिशागत रश्मिआदिविषै मधुनाडी आदिकी दृष्टिश टीका :- अनंतर जे इस (आदित्य)के अथ तृतीयप्रपाठकगतचतुर्थखंडस्य टिप्पणम् ।४।। ३९ चतुर्थ मधुकूं दिखावैहैं॥

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४२६ तृतीयप्रपाठक ३ [छान्दोग्यो- आदित्यादि पञ्चद्वारपाल गायत्री हृदयादिक ब्रह्मके उपासन १९ मधुकृत इतिहासपुराणं पुष्पं ता अमता आपः॥ १॥ ते वा एतेऽथर्वाङ्गिरस एतदितिहासपुरा- णमभ्यतपर्स्तस्याभितप्तस्य यशस्तेज इन्द्रियं वीर्यमन्नाद्य रसोऽजायत॥२॥ थर्वागिरस हीं मधुकर हैं। इतिहास पुराण पुष्प है। वे अमृत आप हैं ॥१॥ अर्थ :- वे प्रसिद्ध ये अथर्वीगिरस इस इतिहास पुराणके प्रति अभितापकूं करते- भये। तिस अभितप्तका यश तेज इंद्रिय वीर्य अन्नाद्यरूप रस उपजताभया॥ २ ॥ उद्कू (उत्तरदिशागत) रश्मिया हैं। इत्यादि समान है।। अथर्वाकरि अरु अंगिराकरि दृष्ट मंत्र अथर्वागिरस हैं वे कर्मविषै प्रयुक्त हुये मधुकर हैं। औ इतिहास पुराण पुष्प है। ४० क्या सो कर्म है? यह आशंकाकरिके कहैहैं॥ इहां

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पनिषत् ] चतुर्थ खंड ४ ४२७ उत्तरदिशागत रश्मि आदिविषै मधुनाडी आदिकी दृष्टि ३

एतद्यदेतदादित्यस्य परं कृष्ण२ रूपम्३ इति तृतीयप्रपाठकस्य चतुर्थः खंडः ॥४ ॥

अर्थः-सो विशेषकरि गमन करताभ- या। सो आदित्यके प्रति च्यारीओरतैं आ- श्रय करताभया। सोई यह है जो यह आ- दित्यका पर (अतिशय) कृष्ण रूप है॥ ३॥ इति श्री०मूलभाषा०तृतीयप्रपा०चतुर्थःखंड:४॥ औ तिने इतिहास अरु पुराणका अश्वमेधमैं यह अर्थ है :- तब आथर्वणोंका औ आंगिरसनका प्रसिद्ध जो ब्राह्मण है तिसविषै विहितकर्म पुष्प (पुष्पस्थानीय) है।। ४१ जब प्रसिद्ध इतिहास अरु पुराणका ग्रहण होवै त- बबी दूषण नहीं है। ऐसैं कहैहैं॥ इहां यह अर्थ है :- अश्व- मेधकर्मविषै जामिता(द्विरुक्तिपनैं)के परिहारअर्थ पारिष्व जो "नानाविध उपाख्यानका समुदाय जिसविषै है तिस पारि- पुवकूं कथन कर" इस विधिके वशतैं प्रयोग करिये हैं। तिन रात्रिनविषै तिसीहीं कर्मका अंगहोनेकरि "वैवस्वतमनु राजा" इस प्रकारके इतिहास अरु पुराणके विनियोगकूं पूर्व- कल्पविषै पारिशवरूप अर्थवाले अभिकरण(सूत्रविशेष)करिहीं सिद्धहोनेतैं तिस तिसका संबंधि कर्म पुष्प है।।

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४२८ तृतीयप्रपाठक ३ [छान्दोग्यो- आदित्यादि पञ्चद्वारपाल गायत्री हृदयादिक ब्रह्मके उपासन १९ अथ तृतीयप्रपाठकस्य पंचमः खंडः॥५ अथ येऽस्योर्ध्वा रश्मयस्ता एवा- स्योर्ध्वा मधुनाड्यो गहा एवादेशा अथ श्री०मूलभाषा०तृतीयप्रपाठकस्य पंचमःखंड:।।५।। अर्थ :- अनंतर जे इस (सूर्य) के ऊर्ध्व रश्मियांहैं वेई इसकी ऊर्ध्व मधुनाडियां हैं। पारिप्ठव रात्रिनविषै कर्मका अंग होनेकरि वि- नियोग (उपयोग) सिद्ध है॥ यंह मधु आ- दित्यका परकृष्ण रूप है। अर्थ यह जो :- अति- शयकरि कृष्ण रूप है ॥ १ ॥ २ ॥ ३ ॥ इति श्री० भाष्यभाषा० तृतीयप्रपाठ० चतुर्थः खंडः।।४। ऊर्ध्वदिशागत रश्मि आदिविषै मधुनाडीआदिकी दृष्टि४ टीका :- अनंतर जे इस (आदित्य)के ४२ इसीबी मधुकी शास्त्रप्रत्यक्षताकूं कहैहैं। इति श्री०तृतीयप्रपाठकगतचतुर्थखंडस्य टिप्पणम् ॥४ ॥ अथ तृतीयप्रपाठकगतपंचमखंडस्य टिप्पणं ॥५॥ ४३ पंचम मधुकूं दिखावैहैं। इहां लोकद्वारसंबंधिआदिक

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पनिषत्] पंचम खंड ५ ४२९ ऊर्ध्वदिशागत रश्मि आदिविषै मधुनाडी आदिकी दृष्टि ४ मधुकृतो ब्रह्मैव पुष्पं ता अमृता आप: १ ते वा एते गुह्या आदेशा एतद्रह्ा- भ्यतपरस्तस्याभितप्तस्य यशस्तेज इ- न्द्रियं वीर्यमन्नाद् रसोऽजायत॥२॥ ग्ुह्यहीं आदेश मधुकर हैं। ब्रह्महीं पुष्प है। वे अमृत आप हैं॥ १॥ अर्थ :- वे प्रसिद्ध ये गुह्य आदेश इस ब्र- ह्मकेप्रति अभितापकूं करतेभये। तिस अ- भितप्तका यश तेज इंद्रिय वीर्य अन्नाद्यरूप रस उपजताभया ॥२ ॥ उर्ध्व रश्मियां हैं। इत्यादि पूर्ववत् है॥ गुह्य कहिये गोप्य (रहस्य)हीं आदेश जे लोक- द्वार संबंधि आदिक विधियां अरु कर्मांगवि- षयक उपासन हैं वे मघुकर हैं। ब्रह्महीं जो शैब्दके अधिकारतैं प्रणव नामक है सो पुष्प विधियां "लोकके द्वारकूं खोलदे। हम तुजकूं देखैं"इत्यादिक हैं। ४४ ब्रह्मशब्दके अर्थकूं कहैहैं॥। इहां शब्दके अधिकारतैं याका ऋक्आदिक शब्दनकूं प्रकृत होनेतैं। यह अर्थ है॥

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४३० तृतीयप्रपाठक ३ [छन्दोग्यो- आदित्यादि पञ्चद्वारपाल गायत्री हृदयादिक ब्रह्मके उपासन १९

एतद्यदेतदादित्यस्य मध्ये क्षोभत इव ३ ते वा एते रसाना९ रसा वेदा हि अर्थ :- सो (रस) विशेषकरि जाताभया। सो आदित्यकेप्रति च्यारीओरतैं आश्रय करताभया। सोई यह है जो यह आदित्यके मध्य क्षोभितकी न्यांई है॥ ३॥ अर्थ :- वे प्रसिद्ध ये रसोंके रस हैं वेद है। अन्य समान है॥ मैंघु यह आदित्यके मध्य क्षोभकूं प्राप्तहुयेकीन्यांई (सम्यकू चलतेहुयेकी न्यांई) समाहित दृष्टिवालेकूं दे- खनेमैं आवताहै॥ १ ॥ २ ॥ ३ ॥ टीका :- वे प्रसिद्ध ये यथोक्त रोहितादि- ४५ इसीवी मधुकी शास्त्रके वशतैं प्रत्यक्षताकूं कहैहैं॥ इहां समाहितदृष्टिवालेकूं याका शास्त्रार्थविषै समाहितचि- त्तकूं। यह अर्थ है।। ४६ पंच मधुनकूं व्याख्यान करिके। अब तिन सर्वकी ध्येयताकी सिद्धिअर्थ स्तुतिकूं करैहैं॥ इहां तातैं तिनके।

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पनिषत् ] पंचम खंड ५ ४३१ ऊर्ध्वदिशागत रश्मि आदिविषै मधुनाडी आदिकी दृष्टि ४ रसास्तेषामेते रसास्तानि वा एतान्य- मृतानाममृतानि वेदा ह्वमृतास्तेषामे- तान्यमृतानि॥४ ॥ इति तृतीय प्रपाठकस्य पञ्चमः खंडः॥५॥ जातें रस हैं तिनके ये रस हैं। वे प्रसिद्ध ये अमृतोंके अमृत हैं। वेद जातैं अमृत हैं तिनके ये अमृत हैं ॥४॥ इति श्री०मूलभाषा०तृतीयप्र०पंचमःखंडः॥।५।। रूप विशेष जे हैं वे रसोंके रस हैं।।॥ किन रसोंके रस हैं? यह कहैहैं :- वेद जातैं लोक- नके निष्पादक (उत्पादक) होनेतैं सार हैं यातैं रस हैं तिन कर्मभावकूं प्राप्तभये रसनके बी ये रोहितादि विशेष रस हैं। अर्थ यह जो :- अत्यंत सारभूत हैं।। तैसैं अमृतोंके अमृत हैं। वेद जातैं अमृत हैं नित्य होनेतैं। ति- ऐसें संबंध है औ कर्मविषै विनियोग किये होनेतैं ताके अंग- होनेतैं वेदनकूं तिस (कर्म) भावकी प्राप्ति है औ वेदनकूं कार्यताके हुयेबी प्रयत्नपूर्वक ताके अभावतैं नित्यता है॥

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४३२ तृतीयप्रपाठक ३ [छान्दोग्यो- आदित्यादि पञ्चद्वारपाल गायत्री हृदयादिक ब्रह्मके उपासन १९ अथ तृतीयप्रपाठकस्य षष्ठः खंडः॥६। तद्यत्प्रथमममृतं तहसव उपजीव- अथ श्री०मूलभाषा० तृतीयप्रपा० षष्ठः खंडः ॥ ६ ॥ अर्थ :- सो जो प्रथम अमृत है ताके प्र- ति वसु अग्निरूप मुखकरि उपजीवन करते नके ये रोहितादिरूप अमृत हैं । "रैसोंके रस हैं" इत्यादि यह कर्मकी स्तुति है। जि- सके इस प्रकारके अमृत फल हैं इति ॥ ४ ॥ इति श्री० भाष्यभाषा० तृतीयप्रपाठ० पंचमः खंड ॥५॥ अथ श्री०भाष्यभाषा० तृतीयप्रपाठकस्य षष्ठः खंडः॥६ रोहितादिरूप वसूपजीवन प्रथमामृतोपासन ४ टीका :- तहां जो प्रथम अमृत रोहितरूप ४७ जो मधुविषै स्तुति है सो कर्मकी स्तुति है ऐसें कहैहैं॥ ४८ कर्मकी स्तुतिकूं आकारकरि दिखावैहैं ॥ इहां रसोंके रस अमृतोंके अमृत । इस विशेषणवाले अमृत जिसके क- र्मका फल है तिसका महाभाग्य क्या कहनेकूं योग्य है। ऐसें कर्म स्तुत करियेहै। यह अर्थ है। इति श्री०तृतीयप्रपाठकगतपंचमखंडस्य टिप्पणम् ॥५॥ अथ तृतीयप्रपाठकगत षष्ठखंडस्य दिप्पणं ।।६। ४९ ध्यावनेयोग्य अमृतनकूं कहिके अब ताके उपजीवी

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पनिषत्] षष्ठ खंड ६ ४३३ रोहितादिरूप वसूपजीवन प्रथमामृतोपासन ४ न्त्यग्निना मुखेन। न वै देवा अश्नन्ति न पिबन्त्येतदेवामृतं दृद्टा तृप्यन्ति ॥१॥ हैं। निश्रयकरि देव अशन करते नहीं पान करते नहीं। इसींहीं अमृतकूं देखिके तृप्त होते हैं॥१॥ लक्षणवाला है। ताकेताँई प्रातःकालके ईशान जे वसु वे अग्निरूप मुखकरि कहिये प्रधान- भूत अभनिकरि। अर्थ यह जो :- अभनि प्रधान हुये। उपजीवन करैहैं॥ ॥ "अन्न आदिक रस उपजता भया" इस वचनतैं कवलग्राहकूं अशन करतेहैं ऐसैं प्राप्तभया। सो प्रतिषेध क- रियेहै :- निश्चयकरि देव अशनकूं करते नहीं पानकूं करते नहीं ऐसैं॥ ॥ तैंब कैसैं उपजी- पीछे चिंतनकरनेकूं योग्य देवताओंके गणोंकूं उपदेश करैहैं। इहां कवलके ग्रहकूं। याका कवलकूं ग्रहणकरिके जैसै लोक भक्षण करैहै ताकी न्यांई। यह अर्थ है।। ५० ननु अशन अरु पानके अभाव हुये उपजीवनका व- चन युक्त नहीं है? ऐसे आशंकाकरिके परिहार करैहैं॥ ३७

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४३४ तृतीयप्रपाठक ३ [छान्दोग्यो- आदित्यादि पश्चद्वारपाल गायत्री हृदयादिक ब्रह्मके उपासन १९ वनकूंकरते हैं? यह कहिये है :- जातैं इसींहीं (य- थोक्त) रोहितरूप अमृतकूं देखिके कहिये सर्व क- रणोंसेंअनुभव करिके तृप्त होतेहैं। काहेतैं है- ष्टिकूं सर्व करणद्वारा उपलभ्यरूप अर्थवाली हो- नेतैं॥ ॥ नैतु रोहितरूपकूं देखिके। ऐसैं कहां। फेर रूपकूं अन्य इंद्रियनकी विषयता कैसैं है ? यह शंका बनै नहीं :- काहेतैं यशआदिककूं श्रोत्रआदिकरि गम्य होनेतैं॥ श्रोत्रकरि ग्राह्य यश है। तेज जो रूप सो चाक्षुष (चक्षुकरि ग्राह्य) है। इंद्रिय जो है सो विषयके ग्रहणरूप कार्यकरि अनुमेय करणका सामर्थ्य स्वरूप है। वीर्य जो बल सो देहगत उत्साह ( प्राणवा- नूता) स्वरूप है। अरु अन्नाद्य जो है सो प्र- तिदिन उपजीव्यमान (उपभुक्त) हुया शरी- ५१ चक्षुकरि ऐसें कहनेकूं योग्य हुये सर्व करणोंकरि ऐसा अधिक कैसैं कहियेहै? तहां कहैहैं॥ ५२ ननु चक्षुकरिहीं रूपका ग्रहण होवैहै। इस नियमकूं आश्रयकरिके पूर्ववादी शंका करैहै। ५३ कर्मके फलभूत लोहित अमृतस्वरूप रसकी चक्षुमा- त्करि ग्राह्यता नहीं है। ऐसें सिद्धांती परिहार करैहैं॥

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पनिषत् ] षष्ठ खंड ६ ४३५ रोहितादिरूप वसूपजीवन प्रथमामृतोपासन ४ त एतदेव रूपमभिसंविशन्त्येतस्मा- द्रूपादुदयन्ति ॥ २ ॥ अर्थ :- चे (वसु) इसींहीं रूपके तांई [अ- भिलक्षकरिके] उदासीन होतेहैं। [फेर] इसरूपतैं उद्यमवान् होतेहैं॥ २॥ रकी स्थितिका करनेवाला जो होवैहै सो है॥। जातैं ऐसैं स्वरूपवाला सर्व रस है। जिसकूं दे- खिके सर्व देव तृत् होवैहैं। अर्थ यह जो :- देवे देखिके (इस सर्वकूं स्वकरणोंसैं अनुभव करिके) तृप्त होवैहैं॥ आदित्यरूप आश्रयवाले हुये औ दुर्गंधियुक्तता आदिक देह अरु कर- णोंके दोषनसैं रहित हुये [ तृप्त होते हैं]॥।१।। टीका :- क्या वे निरुद्यम हुये अमृतकूं उप- जीवन करतेहैं? नहीं॥ ॥ तब कैसैं कि :- ५४ इतनैंकरि रसकूं क्या आया? सो कहैहैं॥ इहां यातैं ताकीबी श्रोत्रादिकरि ग्राह्यता है। यह शेष है॥ ५५ "इसीहीं रूपके तांई" इत्यादि वाक्यकूं उपसंहार करैहैं॥ ५६ क्या तिन स्वतंत्रनकूं तृप्ति होवैहै? तहां नहीं।

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४३६ तृतीयप्रपाठक ३ [छान्दोग्यो- आदित्यादि पञ्चद्वारपाल गायत्री हृदयादिक ब्रह्मके उपासन १९ सय एतदेवममृतं वेद वसूनामे- अर्थ :- जो इस ऐसें अमृतकूं जानता वे इसींहीं रूपकूं अभिलक्षकरिके कहिये अबी हमारा भोगका अवसर नहीं है ऐसैं जानिके उदासीन (उपराम) होतेहैं॥ जब हीं तिस अमृतके भोगका अवसर होवे। तब इस अमृ- ततैं। अर्थ यह जो :- अमृतके भोगनिमित्त इस रूपतैं उद्यमवाले (उत्साहवाले) होवैहैं। यह अर्थ है।। जातैं अनुत्साहवाले अनुष्ठानर- हित आलस्य युक्तनकूं भोगकी प्राप्ति लोकविषै देखी नहीं॥ २ ॥ टीका :- सो जो कोईकबी । इस ऐसैं ऐसें कहैहैं। इहां वैगंध्य नाम दुर्गधता है। आदिपदकरि सं- भावित सर्ववी देह अरु करणोंके दोष ग्रहण करियेहैं औ इसरूपतैं। यह व्याख्यान कियेका अनुवादमात्र है। ५७ उत्साहवाले देवनकूं यथोक्त अमृतका उपजीवीपना है इस अर्थविषै लोक प्रसिद्धिकूं अनुकूल करैहैं॥ ५८ पाठके कमसैं उक्त धेयके स्वरूपकूं अनुवाद करिके

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पनिषत् ] षष्ठ खंड ६ ४३७ रोहितादिरूप वसूपजीवन प्रथमामृतोपासन ४ वैको भूत्वाऽग्निनैव मुखेनैतदेवामृतं दृष्टा तृप्यति।सय एतदेव रूपमभिसंविश- त्येतस्मादूपादुदेति॥ ३॥ है। सो वसुनके मध्यहीं एक होयके अग्नि- रूपहीं मुखकरि इसींहीं अमृतकूं देखिके तृप्त होता है। सो इसींहीं रूपकूं [जानिके] उदासीनहो बैठताहै [फेर] इस रूपतैं उ- दमवान् होताहै ॥ ३ ॥ (यैंथोक्त) अमृतकूं कहिये ऋग्वेदविहितकर्मरूप पुष्पतैं ऋचारूप मधुकरोंके तापसैं रसके संक्ष- रण (संस्राव)कूं औ ताके आदित्यके प्रति आश्रय करनेकूं औ अमृतकी रोहितरूपताकूं अरु प्राचीदिशागत रश्मिरूप मधुनाडीनविषै स्थितताकूं अरु वसुरूप देवोंकरि भोग्यताकूं। अधिकारसहित ध्यानके विधिकूं दिखावैहैं॥ इहां वसुरूप देवनकरि भोग्यताकूं। याका वसुरूप देवनकरि उपजीव्यताकूं। यह अर्थ है।। औ इस। ऐसैं हमारे मधुकूं दिखावैहैं॥ ५९ एवं (ऐसैं) शब्दके अर्थकूं स्पष्ट करैहैं॥ इहां कै- सैंहीं। याका श्रुतिउक्त क्मसैंहीं। यह अर्थ है॥

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४३८ तृतीयप्रपाठक ३ [छान्दोग्यो- आदित्यादि पञ्चद्वारपाल गायत्री हृदयादिक ब्रह्मके उपासन १९ स यावदादित्यः पुरस्तादुदेता प- अर्थ :- सो यावत् आदित्य पूर्वदिशा- विषै उदय होताहै अरु पश्च्चिमदिशाविषै औ ताके वेत्ताके वसुनके साथि ऐकताकूं पायके अशनिरूप मुखकरि उपजीवनकूं अरु दर्शनमा- त्रकरि तृप्तिकूं अरु भोग अवसरविषै उद्यम करनेकूं औ तिस भोगकालके नाश हुये उदा- सीन होबैठनेकूं जानताहै। सो बी वसुनकी न्यांईं सर्वकूं तैसैंहीं अनुभव करैहै॥ ३॥ टीका :- कितनैं कालपर्यंत विद्वान् तिस अ- मृतकूं उपजीवन करैहै? यह कहियेहैः-सो विद्धान यावत् आदित्य प्राची (पूर्व) दि- शाविषै उदय होताहै अरु प्रतीची (पश्चिम) दिशाविषै अस्तकूं पावताहै। तावत् (ति. तना) वसुनका भोगकाल है। तितनैंहीं कालप- स्थंत वसुनकेहीं आधिपत्यकूंऔ स्वाराज्यकूं च्यारीओरतैं पावनेवाला होवैहै। यह अर्थ ६० भोगकालके परिमाणकूं प्रश्नपूर्वक निर्धार करैहैं॥

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पनिषत् ] षष्ठ खंड ६ ४३९ रोहितादिरूप वसूपजीवन प्रथमामृतोपासन ४ श्रादस्तमेता वसूनामेव तावदाधिप- त्य स्वाराज्यं पर्येता ॥४॥ इति तृतीयप्रपाठकस्य षष्ठः खण्डः॥६॥ अस्तकूं पावताहै तावत् वसुनकेहीं आ- धिपत्यकूं अरु स्वाराज्यकूं च्यारीओरतैं प्राप्त होताहै॥ ४ ॥ इति श्री०मूलभाषा०तृतीयप्रपा०षष्ठःखंडः ॥।६।। है।। जैसैं चंद्रमंडलविषै स्थित केवल कर्मी प- रतंत्र हुया देवनका अन्नभूत होवैहै। ऐसैं नहीं। किंतु यह अधिपतिपनैंकूं अरु स्वराटभावकूं पा- वताहै॥ ४ ॥ इति श्री०भाष्यभाषा०तृतीयप्रपाठकस्य षष्ठः खंडः ।६।। ६१ आधिपत्य अरु स्वाराज्य इन दो विशेषणोंके तात्प- र्यकूं कहैहैं।। इति श्री०तृतीयप्रपाठकगत षष्ठखंडस्य टिप्पणम् ॥ ६ ॥

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४४० तृतीयप्रपाठक ३ [छान्दोग्यो- आदित्यादि पञ्चद्वारपाल गायत्री हृदयादिक ब्रह्मके उपासन १९ अथ तृतीयप्रपाठकस्य सप्तमः खंड:७। अथ यद्दितीयममृतं तद्ठुद्रा उपजी- वन्तीन्द्रेण मुखेन। न वै देवा अश्नन्ति न पिवन्त्येतदेवामृतं दृष्ट्रा तृप्यन्ति॥१॥ अथ श्री०मूलभाषा० तृतीयप्रपा०सप्तमः खंडः॥ ७॥ अर्थ :- अनंतर जो द्वितीय अमृत है ता- के प्रति रुद्र इंद्ररूप सुखसैं उपजीवन क रते हैं। निश्चयकरि देव अशन करते नहीं पान करते नहीं। इसीहीं अमृतकूं देखिके तृप्त होतेहैं ॥ १ ॥

रुद्रोपजीवन द्वितीयामृतोपासन ४ टीका :- अनंतर जो द्वितीय अमृत है ताकूं रुद्र उपजीवनकरतेहैं। इत्यादि स. अथ श्रीतृतीयप्रपाठकगत सप्तमखंडस्य टिप्पणं।।७।। ६२ प्रथम अमृतकूं आश्रयकरिके चिंतनकरनेयोग्य क- हिके द्वितीय अमृतकूं आश्रयकरिके ताकूं दिखावैहैं॥

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पनिषत् ] सप्तम खंड ७ ४४१ रुद्रोपजीवन द्वितीयामृतोपासन ४ त एतदेव रूपमभिसंविशन्त्येतस्मा द्रूपादुदन्ति ॥ २ ॥ स य एतदेवममृतं वेद रुद्राणामेवै- को भूत्वेन्द्रेणैव मुखेनैतदेवामृतं दृष्टा अर्थ :- वे (रुद्र) इसींहीं रूपकेतांई [अ- भिलक्षकरिके] उदासीन होतेहैं [फेर] इ- सींहीं रूपतैं उद्यमवान् होतेहैं॥ २॥ अर्थ :- जो इस ऐसैं अमृतकूं जानता है। सो रुद्रनके मध्यहीं एक होयके इंद्ररू- पहीं मुखसैं इसींहीं अमृतकूं देखिके तृप्त मान है। सो यावत् आदित्य पूर्वदिशाविषै उदय होताहै अरु पश्चिमदिशाविषै अस्तकूं ६३ विद्याके फलकूं कथन करैहैं॥ इहां यह अर्थ है :- यावत् वसुनका भोगकाल है तिसतैं द्विगुण रुद्रनका भोग- काल है। औ जैसैं प्रथम अमृतके ध्यावनेवालोंका वसुनकरि तुल्य भोगकाल है। तैसैं द्वितीय अमृतके ध्यावनेवालोंकावी रुद्रनकरि तुल्य भोगकाल है॥ इति श्री०तृतीयप्रपाठकगत सप्तमखंडस्य टिप्पणम् ॥७॥

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४४२ तृतीयप्रपाठक ३ [छान्दोग्यो- आदित्यादि पञ्चद्वारपाल गायत्री हृदयादिक ब्रह्मके उपासन १९ तृप्यति।स एतदेव रूपमभिसंविशत्ये- तस्माद्रूपादुदेति॥३॥ स यावदादित्य: पुरस्तादुदेता पश्चा- दस्तमेता द्विस्तावद्दक्षिणत उदेतोत्तर- तोडस्तमेता रुद्राणामेव तावदाधिपत्य स्वाराज्यं पर्य्येता ॥४॥ इति तृतीयप्रपाठकस्य सप्तमः खण्डः ॥७॥ होताहै। सो इसींहीं रूपकूं [जानिके] उ- दासीन हो बैठताहै [फेर] इस रूपतैं उ- द्यमकूं करताहै॥ ३ ॥ अर्थः-सो यावत् आदित्य पूर्व दिशा- विषै उदय होताहै अरु पश्च्िम दिशाविषै अस्तकूं पावताहै। तिसतें द्विगुण काल द- क्षिणतैं उदय होताहै अरु उत्तरतैं अस्तकूं पावताहै तावत् रुद्रनकेहीं आधिपत्यकूं अरु स्वाराज्यकूं च्यारीओरतैं पावताहै॥४॥ इति श्री०मूलभाषा०तृतीयप्रपा०सप्तमःखंड:७।। पावताहै। तिसतैं द्विगणकालपर्यंत दक्षि-

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पनिषत् ] अष्टम खंड ८ ४४३ आदित्योपजीवन तृतीयामृतोपासन ४ अथ तृतीयप्रपाठकस्याष्टमः खंडः॥८। अथ यत्तृतीयममृतं तदादित्या उ- अथ श्री०मूलभाषा०तृतीयप्रपाठकस्याष्टमः खण्डः॥८॥ अर्थ :- अनंतर जो तृतीय अमृत है णतैं उदय होताहै उत्तरतैं अस्तकूं पावता है तितना रुद्रोंका भोगकाल है॥१॥२॥३॥४॥ इति श्री०भाष्यभाषा०तृतीयप्रपाठकस्य सप्तमः खंडः।।७। अथ श्री० भाष्यभाषा०तृतीयप्रपाठकस्याष्टमः खण्डः ८ आदित्योपजीवन तृतीयामृतोपासन ४ टीका :- तैसैं पश्चिमतैं अरु उत्तरतैं ऊर्ध्व उ- दयकूं पावताहै औ विपर्ययसैं अस्तकूं पावता है अथ श्री०तृतीयप्रपाठकगताष्टमखंडस्य टिप्पणम् ८ ६४ इतर अमृतोंके ध्यावनेवालेके फलोंकूं निर्देश करैहैं॥ इहां विपर्ययकरि। याका पूर्वतैं अरु दक्षिणतैं नीचे। यह अर्थ है।। औ जैसे पूर्वदिशाविषै उदयकूं पावताहै अरु प- श्विमदिशाविषै अस्तकूं पावताहै। तिसतैं दक्षिणतरफ द्विगु- णकालसैं उदयकूं पावताहै अरु उत्तरतरफ अस्तकूं पावताहै ऐसें कहा। तैसैं तिसतैं द्विगुणकालकरि पश्चिमविषै उदयकूं पावताहै अरु पूर्वविषै अस्तकूं पावताहै तितना आदित्योंका

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४४४ तृतीयप्रपाठक ३ [छान्दोग्यो- आदित्यादि पञ्चद्वारपाल गायत्री हृदयादिक ब्रह्मके उपासन १९ पजीवन्ति वरुणेन मुखेन । न वै देवा अश्नति न पिबन्त्येतदेवामृतं दृष्ट्वा तृ- प्यन्ति॥१॥ ताके प्रतिआदित्य वरुणरूप मुखकरि उ- पजीवन करतेहैं। निश्चयकरि देव खाते नहीं अरु पीते नहीं। इसींहीं अमृतकूं दे- खिके तृप्त होतेहैं ॥ १॥ ।। ॥ नतु पूर्व पूर्वतैं द्विगुण उत्तर उत्तरकालकरि। भोगकाल है औौ तृतीयअमृतके ध्यावनेवालोंकावी तितनाहीं भोगकाल है। इसतैं द्विगुणकालकरि जितना आदित्य उत्त- रतैं उदयकूं पावताहै अरु दक्षिणतैं अस्तकूं पावताहै तितना मख्तनका (वायुनका) भोगकाल है। चतुर्थ अमृतके ध्या- चनेवालोंकाबी तितनाहीं भोगकाल है॥ तिसतैं द्विगुणका लकरि ऊर्ध्वकूं उदय होताहै अरु अधः (नीचे)कूं अस्त हो ताहै तितना साध्योंका भोगकाल है अरु पंचम अमृतके चिं- तकोंकाबी तितनाही भोगकाल है। यह अर्थ है।। ६५ जो पूर्व पूर्व उदय अरु अस्तमयके कालकी अपे- क्षासैं द्विगुणकालकरि उत्तर उत्तर उदय अरु अस्तमय है ऐसें कहा। सो पुराणसैं विरुद्ध है? ऐसें पूर्ववादी शंका करैहै॥

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पनिषत्] अष्टम खंड ८ ४४५ 9 FF आदित्योपजीवन तृतीयामृतोपासन ४ त एतदेव रूपमभिसंविशन्त्येतस्मा- द्रूपादुदन्ति ॥ २ ॥ अर्थ :- वे (आदित्य) इसींहीं रूपके तांई [जानिके] उदासीन होतेहैं [फेर] इस रूपतैं उद्योगकूं करते हैं॥२॥ ऐसैं जो कहा। सो अपौराण दर्शन है काहेतैं सू- र्यके चतुर्दिशाविषै इंद्र यम वरुण अरु सोमकी पुरीनविषै उदय अरु अस्तमयके कालकी तु- ल्यता जातैं पौराणिकोनैं कही है। मानसोत्तर ६६ ननु श्रुतिउक्त अर्थकी पुराणसैं विरुद्धता कैसें है? यह आशंकाकरिके पूर्ववादी कहैहै॥ ६७ उक्त अर्थकूंहीं पूर्ववादी संक्षेपसैं कहैहै॥ इहां यह अर्थ है :- प्राकार (किल्ला)कीन्यांई च्यारीओरतैं स्थित म- हागिरिमेरुके मस्तकविषै संलग्न है रथचक्रका अक्ष (तैलयं- त्रके कीलककीन्यांई लंबमान कीलकविशेष) जिसका ऐसे स- विताकी मेरुके प्रदक्षिणाकी आवृत्तिकूं तुल्य होनेतैं औ का- लकी अधिकताविषै कारणके अभावतैं च्यारीबी पुरीनविषै उदय अरु अस्तमयके कालकी तुल्यता है। जातैं विष्णुपु- राणविषै कहा है :- "यह (सूर्य) इंद्रआदिकनके पुरविषै स्थित हुया पुरत्रयकूं स्पर्श करताहै औ विकर्णविषै स्थित- हुया दो विकणोंकूं तीनकोणनकूं औ तैसैं दो पुरनकूं ३८

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४४६ तृतीयप्रपाठक ३ [छान्दोग्यो- आदित्यादि पञ्चद्वारपाल गायत्री हृदयादिक ब्रह्मके उपासन १९ पर्वतके मस्तकविषै मेरुकी प्रदक्षिणाकी आवृ- स्पर्श करताहै" ऐसैं॥ औ लैंगपुराणविषै कहा है :- "मानस- पर्वतके उपरि मेरुतैं पूर्वदिशाविषै माहेंद्री पुरी स्थित है अरु दक्षिणविषै भानुपुत्र (यम)की अरु पश्चिमविषै तो वरु- णकी १ सौम्य (उत्तर) विषै सोमकी विपुलापुरी है। तिन- विषै दिशाओंके देवता स्थित हैं। वे पुरियां क्रमतैं अमरा- वती। संयमिनी। सुखा औ विभा हैं २ लोकपालोंके ऊपर तो सर्वओरतैं दक्षिणायनविषै दिशाकूं प्राप्त सूर्यकी जो गति है ताकूं श्रवणकर ३ जब दक्षिणदिशाकूं सूर्य चलताहै तब फेंकेहुये वाणकीन्यांई दौडताहै। जब भानु प्रभु (इंद्र) के पु- रके मध्यगत होवै तब ४ हे द्विज ! सर्व संयमिनीवासियों- करि सूर्यका उदयहीं देखियेहै। सो ऐसें सुखवतीविषै [ जब होवै तब ] तो ताकी निशा देखियेहै। ५ जब विश्वका द्रष्टा विभु सूर्य विभाविषै अस्तकूं पावताहै। मैंनें अमरावतीविषै जैसैं यह वारितस्कर (सूर्य) कहा। ६ तैसैं खग (सूर्य) संयमनीकूं सुखाकूं औ विभाकूं पायके होवैहै। हे द्विज! जब अपराह् तो अग्निकोणविषै है अरु पूर्वाह्न नैऋतविषै है ॥ ७॥ तब तो वायुभागविषै सुदारुण अपररात्र होवैहै औ पूर्वरात्र तो ईशानकोणविषै होवैहै। यह इसकी सर्वओरतैं गति है ८ इति ॥ ॥ तैसें हुये अमरावतीके ऊपर स्थित. हुया सूर्य मध्याह्नकूं करताहै। तहां ईशानकोणविषै स्थित प्राणीनके तृतीय यामकूं अरु आग्नेयकोणविषै स्थित प्राणीनके प्रथम यामकूं औ संयमिनीविषै उदयकू करताहै। ऐसैं जब यमपुरविषै मध्याह्मैं स्थित होवैहै तब इंद्रपुरविषै अस्तमय होवैहै। आग्नेयकोणविषै तृतीययाम अरु निततिकोणविषै

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पनिषत् ] अष्टम खंड ८F ४४७ आदित्योपजीवन तृतीयामृतोपासन ४ स य एतदेवममृतं वेदादित्यानामे वैको भूत्वा वरुणेनैव मुखेनैतदेवामृतं अर्थ :- जो इस ऐसैं अमृतकूं जानता है। सो आदित्यनके मध्यहीं एक होयके वरुणरूपहीं मुखसैं इसींहीं अमृतकूं देखिके

त्तिकूं तुल्य होनेतैं? इति॥ ॥ ईहां द्रविडा- प्रथमयाम अरु वरुणपुरविषै उदय होवैहै औ जब वरुणपुर- विषै मध्यान्ह होवै तब यमपुरविषै अस्तमय अरु निकति- कोणविषै तृतीय याम अरु वायव्यकोणविषै प्रथम याम अरु सौम्यपुरविषै उदय होवैहै औ जब सौम्यपुरविषै मध्यान्ह होवै तब वरुणपुरविषै अस्तमय। वायव्य कोणविषै तृतीय याम। ईशान कोणविषै प्रथम याम। ऐंद्रपुरविषै उदय हो- वैहै॥ तैसें आन्नेयकोणविषै वर्तमान हुया तहांके प्राणीनके मध्यंदिनकूं औ यम अरु इंद्रकी पुरीनविषै प्रथम अरु तृतीय यामोंकूं औ नैऋत अरु ईशान कोणनविषै उदय अरु अस्त- मयकूं करताहै। ऐसैं सर्व दिशाओंविषै अरु विदिशाओंविषै है। ऐसैं पौराणिकदर्शनके होते तिसतैं विरुद्ध यह श्रुतिनैं कहा है।। ६८ यद्यपि श्रुतिके विरोधहुये स्मृति (पुराण) अप्रमाण होवैहै। तथापि द्रविडाचार्यकरि उक्त जिस किस प्रकारसैंवी उपपादन करैहैं।

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४४८ तृतीयप्रपाठक ३ [छान्दोग्यो- आदित्यादि पञ्चद्वारपाल गायत्री हृदयादिक ब्रह्मके उपासन १९ दृष्ट्रा तृप्यति। स एतदेव रूपमभिसं- विशत्येतस्माद्रपादुदेति ॥३॥ तृप्त होताहै। सो तिसींहींरूपके तांई [जा- निके] उदासीन होताहै [फेर] इस रूपतैं उद्योगकूं करताहै॥ ३॥ चार्योंनैं परिहार कहा है :- अैमरावतीआदिक पुरीनका द्विगुण उत्तर उत्तर कालकरि उद्वास (नाश) होवैहै। औ सूर्यका उँदय नाम तिन पुरीनके निवासी प्राणीनके चक्षुगोचरविषैप्राप्ति ६९ जब अमरावती शून्य होवै तबहीं ताकेप्रति पूर्वदि- शाविषै उदय होवैहै। ऐसैं प्रयोगकूं शून्य होनेतें वसुनके भोगका अंत होवैहै। ऐसें उत्तर (पीछली) पुरीनके विना- शके हुये द्विगुणकालकरि रुद्रादिकनके भोगका भ्रंश होवैहै। यातैं इस वचन व्यक्तिकूं आश्रयकरिके परिहारकूं कहैहैं॥ ७० तथापि कैसे विरोधका समाधान है? तहां कहैहैं॥ इहां यह शास्त्रका वचन है :- "जिनोंकरि जहां सूर्य देखि- येहै सो तिनोंका उदय कहा है। औ जहां तिरोभावकूं पा- वताहै सोई रविका अस्तमन है १ सर्वदा विद्यमान अर्कका अस्तमन नहीं है अरु उदय नहीं है। उदय अरु अस्तमन नाम रविका दर्शन अरु अदर्शन है२" ऐसैं॥

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पनिषत्]] अष्टम खंड ८ ४४९ आदित्योपजीवन तृतीयामृतोपासन ४ की स यावदादित्यो दक्षिणत उदेतो- त्तरतोऽस्तमेता द्विस्तावत्पश्चादुदेता पुर- स्तादस्तमेताSSदित्यानामेव तावदाधि- पत्य स्वाराज्यं पर्य्येता॥४॥ इति तृतीयप्रपाठकस्याष्टमः खण्डः ॥ ८॥ अर्थ :- सो यावत् आदित्य दक्षिणतैं उ- दय होताहै उत्तरतैं अस्तकूं पावताहै तिसतैं द्विगुणकाल पश्च्िचिमतैं उदय होताहै अरु पू- वतैं अस्तकूं पावताहै। तावत् आदित्यनकेहीं आधिपत्यकूं अरु स्वाराज्यकूं पावताहै॥४॥ इतिश्री० मूलभाषा०तृतीयप्रपा०अष्टमःखंडः८।। अरु ताका नाश अस्तमन है। परमार्थतैं सूर्यके उदय अरु अस्तमन नहीं हैं। काहेतैं औ तिने- ७१ अमरावतीआदिक पुरीनविषै पूर्व पूर्वकी अपेक्षासैं उत्तर उत्तरविषै नाशके कालकी द्विगुणता होहू औ दर्शन अरु अदर्शनरूप सूर्यके उदय अरु अस्तमय होहू औ "सोई यह कदाचित् अस्तकूं पावता नहीं अरु उदय होता नहीं" इस श्रुतितैं वास्तव उदय अरु अस्तमय नहीं हैं। तैसैं हुये पुरीनविषै तुल्यताकरि गमनकरनेवाले सूर्यके उदय अरु अ-

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४५० तृतीयप्रपाठक ३ [छान्दोग्यो- आदित्यादि पञ्चद्वारपाल गायत्री हृदयादिक ब्रह्मके उपासन १९ के निवासी प्राणीनके अभाव हुये तिनके प्रति किसींहीं मार्गसैं गमन करता हुयाबी उदयकूं पावता नहीं अरु अस्तकूं पावता नहीं। ऐसैं चक्षुगोचरविषै प्राप्तिके औ ताके नाशके अभा- वतैं॥ तैसें अमरावतीतैं द्विगुणकाल संयमनी- स्तमय कालकी विषमता अयुक्त है? यह आशंकाकरिके कहैहैं॥ इहां यह आाव है :- भोगकालकी द्विगुणता जो है सो सूर्यकी गतिकी अधिकताकी अपेक्षासैं श्रुतिकरि नहीं कहि- येहै जिससैं पुराणका विरोध होवै। किंतु दैत्योंकरि उपहृत अमरावतीआदिक पुरीनके मध्य पूर्व पूर्वकी अपेक्षासैं उत्तर उत्तर पुरीके द्विगुणकालकरि उद्धास (नाश)तैं तिसकी अ० पेक्षाकरि उत्तर उत्तर स्थानोंविषै भोगकालकी द्विगुणता श्रु- तिनैं कही है॥ ७२ अनंतर उद्धासके कालकी अधिकतातैं भोगनाशके कालकी अधिकता है। भोगकालकी अधिकता नहीं है? यातें कहैहैं॥ इहां जैसे उद्वासके कालकी द्विगुणता कही ताकी न्यांई। यह अर्थ है औ अमरावतीके निवासी प्राणी- वर्गकी अपेक्षासैं संयमिनीके निवासी प्राणीनके प्रति द्विगुण कालकरि सूर्यके उदय अरु अस्तमय हैं। ऐसें कहनेकूं युक्त है। काहेतैं दर्शन अरु अदर्शनकूं द्विगुणकालकरि भावि हो- नेतें औ ताके निवासीनकी दृष्टिकी अपेक्षासें दक्षिण अर उत्तरविषै उदय अरु अस्तमय नहीं हैं॥ काहेतें तिन ति- नकी दृष्टिकरि पूर्व अरु पश्चिमविषैहीं तिन (उद्यअस्त)के

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पनिषत्] अष्टम खंड ८ ४५१ आदित्योपजीवन तृतीयामृतोपासन ४ पुरी वसती है। यातैं तिसके निवासी प्राणी- नके प्रति दक्षिणतैं होतेकी न्यांईं उदय होता है अरु अस्तकूं पावताहै ऐसैं कहियेहै औ ह- मारी बुद्धिकूं अपेक्षाकरिके तैसैं उत्तर पुरीनविषै बी योजना है औ सैर्व जीवनकूं मेरु उत्तरतैं

भावतैं औ हमारी बुद्धिकूं अपेक्षाकरिके तो दक्षिणतैं उदय होताहै अरु उत्तरतैं अस्तकूं पावताहै ऐसें कहियेहै। इहां इव (न्यांई) शब्द जो है सो तिसके निवासी जनोंकी अपेक्षासैं दक्षिण अरु उत्तरविषै स्थित तिन उदय अस्तमयके असद्भा- चकूं जनावताहै। यह अर्थ है। ७३ जैसें अमरावतीकी अपेक्षासैं संयमिनीविषै उद्धासके कालकी अधिकता कही। तैसैं ताकी अपेक्षासैं वारुणीविषै औ ताकी अपेक्षासैं विभाविषै तिस (उद्वास)के कालकी अधिकता निश्चय करनेकूं योग्य है। ऐसैं कहैहैं॥ इहां सं- यमिनीकूं अंतर्भावकरिके बहुवचन है॥ ७४ इसतैंबी हमारी वुद्धिकूं अपेक्षा करिके दक्षिणगति आदिकका कथन है। ऐसैं कहैहैं॥ इहां यह अर्थ है :- उदय हुये आदित्यकूं पूर्वविषै अवलोकन करनेवाले जनोंकूं वाम- आगविषै स्थित होनेतैं मेरु सर्वकूंहीं उत्तर तरफ होवैहै। तैसें हुये उदय अरु अस्तमयकरि पूर्व अपर दिशाओंके वि- भागतैं। तिन पुरवासीनकी दष्टिकी अपेक्षासैं दक्षिण तरफ है। इत्यादि कथन बनै नहीं। किंतु हमारी दृष्टिकी अपे- क्षासैं है। यह अर्थ है।।

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४५२ तृतीयप्रपाठक ३ [छान्दोग्यो- आदित्यादि पञ्चद्वारपाल गायत्री हृदयादिक ब्रह्मके उपासन १९ होवैहै। जब अमरावतीविषै मध्याह्नकूं प्राप्त सविताहै तब संयमनीविषै उदयहुया देखि- येहै। जब तहां(संयमनीविषै) मध्याह्रकूंप्राप्त है तब वारुणी( वरुणकीपुरी) विषैउदयहुया देखिये है। तैसैं उत्तरविषै। प्रदक्षिणाकीआवृ- तिकूं तुल्यहोनेतैं ॥ सर्व( उभय )औरतैं दो- ७५ उद्धास कालकी द्विगुणताकी अपेक्षासैं भोगकालकी द्विगुणता है ऐसे कहा। अब सूर्यकी गतिकी अधिकताकी अपेक्षासैंहीं भोगकालकी अधिकता क्यूं नहीं होवैगी? यह आशंकाकरिके। पुराणके विरोधके समाधानके असंभवतै ऐसैं मतिकहो। यह कहैहैं। ७६ जैसें संयमिनीविषै मध्यान्हकूं प्राप्त हुया अरु वारुणी- विषै उदयकूं प्राप्त होवैहै। तैसैं तिसविषै मध्यान्हकूं प्राप्त हुया विभाविषै उदय हुया देखियेहै। ऐसें कहैहैं॥ औ इहां यह वायुप्रोक्त पुराणविषै कहा है :- "यावत् सूर्य अमरावतीविषै मध्यगत होवैहै तावत् यमपुरविषै उदयह्डुया तहां देखियेहै औ सुखाविषै अर्धरात्र औ विभाविषै अस्तकूं पावताहै" ऐसैं॥ ७७ ननु फेर सो सूर्य यावत् उत्तरतैं उद्य होता अर दक्षिणतैं अस्तकूं पावताहै तिसतैं द्विगुणकालकरि ऊर्ध्वकूं उदय होताहै अरु अर्वाक् (नीचे)तैं अस्तकूं पावताहै। यह कैसैं कहियेहै। जातैं तहां वा उद्धासके कालकी अधिकता नहींहै जिसकरि उदयास्तमयकालकी अधिकतातैं भोगका लकी अधिकता होवै? यातैं कहैहैं॥। इहां यह अर्थ है :-

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पनिषत् ] अष्टम खंड ८ ४५३ आदित्योपजीवन तृतीयामृतोपासन ४ पर्वतरूप प्राकारोंकरि निवारित आदित्यकी र- श्मिनवाले इलावृतके निवासीनकूं सविता ऊर्ध्व- कीन्यांईं उदयहोता अरु अर्वाक् (नीचे)अस्तकूं- पावता देखियेहै। काहेतैं सविताके प्रकाशके पर्व- तके ऊर्ध्वछिद्रविषै प्रवेशतैं।तैसैं हुये ऋक्आदिक मेरुके चतुर्दिशाविषै इलावृतनाम वर्ष (खंड) प्रसिद्ध है दोनूं ओर मानसोत्तर अरु मेरुरूप प्राकारस्थानीय दो पर्व- तोंकरि उभयके ऊर्ध्वस्थित रथके चक्रकी नाभिविषै बहिर्भा- गमैं दोनूं ओर विद्यमान कीलकविशेषरूप तैलयंत्रके काष्ठकी- न्यांई महान् अक्षकरि विनिवारित आदित्यकी रश्मिवाले तिस इलावृतके निवासीनकूं सविता ऊर्ध्व उदय होता अरु अर्वाक् (अधः) अस्तकूं पावता देखियेहै॥ इहांइवशब्द तो उदय अरु अस्तमयके वस्तुतैं असन्भावके जनावनेअर्थहै॥ ७८ कैसें सविता ऊर्ध्वहुया उदय होताहै अर्वाक् अस्तकूं पावताहै? तहां कहैहैं॥ इहां यह अर्थ है :- सर्व आवृत प्र- काशके दोपर्वतोंके ऊपरके छिद्रविषै प्रवेशतैं ऊपर प्रसारित नेत्रवाले अरु सविताके प्रकाशकूं देखनेवाले अधोवर्तिप्राणी- नकूं तहां (ऊर्ध्वविषै) उदय हुयेकी न्यांई सविता प्रतीत होवैहै औ अन्यप्रदेशविषै दृश्यमान हुया अधःतैं अस्त हुयेकी न्यांई प्रतीत होवैहै। जैसे इहांके प्राणीयोंकरि ऊपरतैं प्रती- यमान मेघ है औ तिसतैं दूरीतैं दृष्टिवालेकूं भूतलविषै लग्न है ऐसैंहीं निश्चय करियेहै। तैसैं इहांबी है॥ ७९ भोगकालकी अविरोधसैं अधिकताकूं संपादनकरिके

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४५४ तृतीय प्रपाठक ३ [छान्दोग्यो आदित्यादि पञ्चद्वारपाल गायत्री हृदयादिक ब्रह्मके उपासन १९ अथ तृतीयप्रपाठकस्य नवमःखंड:।।९।। अथ यच्चतुर्थममृतं तन्मरुत उप- अथ श्री० मूलभाषा० तृतीयप्रपाठ०नवमः खंडः।९॥ अर्थ :- अनंतर जो चतुर्थ अमृत है ताके अमृतके उपजीविनका औ अमृतोंका द्विगुण उ- त्तरउत्तर वीर्यवान्पना भोगकालकी द्विगुणतारूप लिंगकरि अनुमान (कल्पना) करिये है॥ उद्यमन अरु संवेशन (उपरमण) आदिक रुद्रादिदेव- नका औ विद्वान्का समानहै ॥१॥२॥३॥४॥ इति श्री० भाष्यभाषा० तृतीयप्रपाठ० अष्टमः खंडः॥८।। भा०तृतीयप्रपाठकस्य नवमः खंडः ।।९।। मरुत् उपजीवन चतुर्थामृतोपासन ४ तिसीहीं लिंगसै अमृत आदिककीवी अतिशयवान्ताकूं कथन करैहैं॥ इहां तैसे हुये। याका भोगकालकी अधिकताके हुये। यह अर्थ है।। ८० औ जो भोगकालकूं आकलनकरिके (जानिके) उ- दयमन (उदमकरना) अरु ता ( भोगकाल) के अभावकूं जा- निके उपरमण (उदासीनहोना) औ अग्निआदिककी मुखता अरु दृष्टिमात्रकरि तृप्तिमान्ता है। सो सर्व विद्वानकूंबी दे- वनकरि सम कल्पना करियेहै। ऐसैं कहैहैं॥ इति श्री०तृतीयप्रपाठकगताष्टमखंडस्य टिप्पणम॥८॥

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पनिषत् ] नवम खंड ९ ४५५ मरुत्उपजीवन चतुर्थामृतोपासन ४ जीवन्ति सोमेन मुखेन।न वै देवा अ- श्रन्ति न पिवन्त्येतदेवामृतं दृद् तृ- प्यन्ति ॥ १॥ त एतदेव रूपमभिसंविशन्त्येतस्मा- द्रूपादुद्यन्ति ॥ २ ॥ 2 सय एतदेवममृतं वेद मरुतामे- चैको भूत्वा सोमेनैव मुखेनैतदेवामृतं प्रति मरुत् (वायु) सोमरूप मुखकरि उपजीवन करतेहैं। निश्र्चयकरि देव खाते नहीं पीते नहीं। इसींहीं अमृतकूं देखिके तृप्त होतेहैं ॥ १ ॥ अर्थ :- वे (मरुत्) इसींहीं रूपके तांई [जानिके] उदासीन होते हैं [फेर] इस- रूपतैं उद्यमकूं करते हैं ॥ २ ॥ अर्थः-जो इस ऐसैं अमृतकूं जानताहै। सो मरुतनमैंहीं एक होयके सोमरूपहीं मु- खसैं इसीहीं अम्ृतकूं देखिके तृप्तहोताहै।

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४५६ तृतीयप्रपाठक ३ [छान्दोग्यो- आदित्यादि पश्चद्वारपाल गायत्री हृदयादिक ब्रह्मके उपासन १९ दृष्ट्ा तृप्यति। सएतदेव रूपमभिसंवि- शत्येतस्मादूपादुदेति ॥ ३॥ स यावदादित्यः पश्चादुदेता पुर- स्तादस्तमेता द्विस्तावदुत्तरत उदेता द- क्षिणतोऽस्तमेता मरुतामेव तावदाधि पत्य स्वाराज्यं पय्येता॥४॥ इति तृतीयप्रपाठकस्य नवमः खण्डः ॥ ९॥ इसींहीं रूपके तांई [भोगकालका अभाव जानिके] उदासीन होता है [फेर] इसरूपतैं उद्यम (उत्साह) वान् होताहै।। ३ ॥ अर्थ :- सो यावत् आदित्य पश्चिचिमतैं उदयहोताहै पूर्वतैं अस्तकूं पावताहै तिसतैं द्विगुणकाल उत्तरतैं उदय होताहै दक्षिणतैं अस्तकूं पावताहै। तावत् मरुतनकेहीं आ- धिपत्यकूं अरु स्वाराज्यकूं पावताहै॥४॥ इति श्री०मूलभाषा०तृतीयप्रपाठ०नवमःखंड:९ ॥१॥२॥३॥४ ॥ इति श्री० भाष्यभाषा० तृतीय- प्रपाठकस्य नवमः खण्डः ॥ ९॥ इति श्री०तृतीयप्रपाठकगत नवमखंडस्य टिप्पणम् ॥ ९॥

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पनिषत ] दशम खंड १० ४५७ FRIPE साध्योपजीवन पंचमामृतोपासन ४ अथ ततीयप्रपाठकस्य दशमःखंड:१० अथ यत्पञ्चमममृतं तत्साध्या उ- पजीवन्ति ब्रह्मणा मुखेन। न वै देवा अश्नन्ति न पिवन्त्येतदेवामृतं दृष्टा तृप्यन्ति॥ १॥ त एतदेव रूपमभिसंविशन्त्येतस्मा- दरूपादुदन्ति ॥ २ ॥ अथ श्री०मूलभाषा०तृतीयप्रपाठ०दशमः खंडः॥१०॥ अर्थ :- अनंतर जो पंचम अमृतहै ताके तांई साध्य ब्रह्मारूपमुखसैं उपजीवनकरते- हैं। निश्रयकरि देव खाते नहीं पीते नहीं। इसींहीं अमृतकूं देखिके तृप्त होतेहैं ॥१॥ अर्थः-वे (साध्य) इसींहीं रूपकेतांई उदासीन होतेहैं [फेर] इसरूपतैं उत्सा- हकूं पावतेहैं॥ २॥

साध्योपजीवन पंचमामृतोपासन ४ ३९

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४५८ तृतीयप्रपाठक ३ [छन्दोग्यो- आदित्यादि पश्चद्वारपाल गायत्री हृदयादिक ब्रह्मके उपासन १९ स य एतदेवममृतं वेद साध्याना- मेवैको भूत्वा ब्रह्मणैव मुखेनैतदेवामृतं दृष्ट्ा तृप्यति।स एतदेव रूपमभिसंवि- शत्येतस्माद्रूपादुदेति॥३॥ स यावदादित्य उत्तरत उदेता द- क्षिणतोऽस्तमेता द्विस्तावदूर्ध्वमुदेता- ऽर्वागस्तमेता साध्यानामेव तावदा- अर्थ :- जो इस ऐसैं अमृतकूं जानता है। सो साध्योंमैंहीं एक होयके ब्रह्मारूपहीं मुखसैं इसींहीं अमृतकूं देखिके तृप्त होता है सो इसींहींरूपके तांई उदासीन होताहै [फेर] इसरूपतैं उत्साहवान् होताहै॥३॥ अर्थ :- सो यावत् आदित्य उत्तरतैं उ- दय होताहै दक्षिणतैं अस्तकूं पावताहै। तिसतैं द्विगुणकाल ऊर्ध्व हुया उदय होताहै अर्वाक् (नींचे) अस्तकूं पावताहै। तावत्

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पनिषत् ] एकादश खंड ११ ४५९ भोगके क्षय भये आत्मामैं सर्व संहृत होवैहै ऐसा उपासन ६ धिपत्य स्वाराज्यं पर्य्येता ।।४ ॥ इति तृतीयप्रपाठकस्य दशमः खंडः ॥१०॥ अथतृतीय प्रपाठकस्यैकादशःखंड:११ अथ तत ऊर्ध्व उदेत्य नैवोदेता ना- साध्योंकेहीं आधिपत्यकूं अरु स्वाराज्यकूं पावताहै। ४ ॥ इतिश्री०मूलभाषा०तृतीयप्रपा०दशमःखंड:१०

अर्थ :- तिसतैं अनंतर ऊर्ध्वहुया उदय होयके उदय होता नहीं। अस्तकूं पावता- ॥१॥२॥३॥४।। इति श्री० भाष्यभाषा० तृतीय- प्रपाठकस्य दशमः खंडः ॥ १० ॥ अथ श्री०भाष्यभा०तृतीयप्रपाठकस्यैकादशः खंड: ११ भोगके क्षय भये आत्मातैं सर्व संहृत होवैहै ऐसा उपासन ६ टीका :- ऐसैं उदय अस्तमनकरि प्राणीनके इति श्री०तृतीयप्रपाठकगत दशमखंडस्य टिप्पणम् ॥ १० ॥ अथ तृतीयप्रपाठकगतैकादशखंडस्य टिप्पणम्११॥ ८१ पंच पर्यायोंकरि मधुविद्या यथावत् कही। अब

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४६० तृतीयप्रपाठक ३ [छान्दोग्यो- आदित्यादि पञ्चद्वारपाल गायत्री हृदयादिक ब्रह्मके उपासन १९ स्तमेतैकल एव मध्ये स्थाता। तदेष श्ोकः ॥१॥ नहीं। एकल (अकेला) हीं मध्यविषै स्थित होवैगा। तिसविषै यह श्लोक है ॥ १ ॥ स्वकर्मफलके भोगरूप निमित्तवाले अनुग्रहकूं करिके तिस कर्मफलके उपभोगके क्षय हुये तिन प्राणीनके समूहोंकूं आत्मा(स्वस्वरूप)विषै सं- हारकरिके। तिस प्राणीनके अनुग्रहकालतैं अनंतर ऊर्ध्व हुया आत्माविषै उदय होयके जिनोंकेप्रति उदय होताहै तिन प्राणीनके अभा- वतैं स्वात्माविषै स्थितहुया उदय होता नहीं अरु अस्तकूं पावता नहीं किन्तु एकल कहिये अद्वितीय निरवयव हुयाहीं मध्यविषै ताकी कमसैं मुक्तिरूप फलविषै पर्यवसानताकूं दिखाव- नेकूं अनंतरके वाक्यकूं अवरोधकरिके कहैहैं॥ इहां "तातैं" इस तत् शब्दका अर्थ प्राणीनके अनुग्रहकालतैं अनंतर। यह है औ ऊर्ध्चहुया। याका ब्रह्मीभूत होयके वर्तमान हुया। यह अर्थ है औ आत्माविषै उदय होयके। याका स्वमहिमा- विषै प्रकाशकूं पायके, यह अर्थ है।

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पनिषत् ] एकादश खंड ११ ४६१ भोगके क्षय भये आत्मामैं सर्व संहृत होवैहै ऐसा उपासन ६ (स्वात्माविषैहीं) स्थित होताहै ॥ तहां क्र- ममुक्तिविषै वसुआदिकके समान आचरणवाला रोहितादि अमृतके भोगका भागी कोइकबी विद्वान् यथोक्त क्मसैं स्वात्मारूप सविताकूं आ- त्मभावकरि ग्रहण करिके समाहित हुया इस- मंत्रकूं देखिके उत्थित होयके अन्य पूंछनेवालेके अर्थ कहताभया॥ ॥ जातैं तूं ब्रह्मलोकतैं आयाहैं। क्या तहांबी दिन रात्रिकरि परिवर्त- मान सूर्य प्राणीनके आयुकूं क्षय करताहै। जैसैं ८२ स्थित होताहै। इस प्रयोगतैं क्रममुक्ति इहां विव- क्षित है। तिसविषै विद्वान्के अनुभवकूं प्रमाण करैहैं॥ इहां क्रममुक्ति "तहां" तिस सप्तमीका अर्थ है औ यथोक्त क्रमसैं याका "यह प्रसिद्ध आदित्य देवनका मधु है" इत्यादि पंच अमृतभावकरि स्थित है। यह अर्थ है औ स्वआत्माकूं, याका वेद्यताकरि विद्वान्के आत्मारूप हुये। यह अर्थ है औ आ- त्मभावकरि पायके। याका अहंग्रहकरि ग्रहणकरिके। यह अर्थ है ॥ ८३ तिस समाहित पुरुषके प्रति अन्य पुरुषका कैसा प्रश्न है ? इस आकांक्षाके हुये कहैहैं।। इहां यह अर्थ है :- प्राप्तव्रह्मउपदेशवाला पुरुष ब्रह्मविद्याकी उक्त अवस्थाविषै (ब्रह्मतै वियुक्त अवस्थाविषै) किसीकरिबी पूंछ्याहुया प्र- त्युत्तरकूं कहताभया॥

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५६२ तृतीयप्रपाठक ३ [छान्दोग्यो- आदित्यादि पञ्चद्वारपाल गायत्री हृदयादिक ब्रह्मके उपासन १९ न वै तत्र न निम्लोच नोदियाय अर्थ :- तहां नहीं है। न अस्तकूं पाव- इहां हमारे (मनुष्यनके आयुकूं क्षय करताहै तैसैं)? ऐसें अन्यकरि पूंछ्याहुया उक्तविद्वान् प्रत्युत्तरकूं कहैहै :- तैहां जैसें पूंछे अरु यथोक्त अर्थविषै तिसयोगीकरि उक्त यह श्रोक (मंत्र) होवैहै॥। ऐसा यह श्रुतिका वचन है ॥ १॥ टीका :- जिसे ब्रह्मलोकतैं मैं आयाहूं तिस- विषै निश्चयकरि यह नहीं हैं जो तूं पूंछताहैं। जातैं तहां सूर्य अस्तकूं पावता नहीं औ उ- दय होता नहीं किसीवी कारणतैं अरु कि- सीबी कालविषै इति ॥ ॥ उदय अरु अस्त- ८४ कैसा प्रत्युत्तर है? ऐसी शंकामयी। तहां कहैहैं॥ ८५ श्लोककूं ग्रहणकरिके व्याख्यान करैहैं॥ इहां "निमु- म्लोच" इस अर्थविषै "निम्लोच (अस्तकूं पावता)" ऐसा छांदस प्रयोग है औ इतिशब्द पूर्वार्द्धकी व्याख्याकी समा- सिअर्थ है।। ८६ उत्तरार्द्धकूं उठावतेहैं॥ इहां यह अर्थ है :- लोकपनैंके

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पनिषत् ] एकादश खंड ११ ४६३ भोगके क्षय भये आत्मामैं सर्व संहृत होवैहै ऐसा उपासन ६ कदाचन। देवास्तेनाहसत्येन मा वि- राधिषि ब्रह्मणेति॥२ ॥ ताहै न उदय होताहै कदाचित्। हे देव! तिस सत्यकरि मैं ब्रह्मसैं विरोधकूं मति- प्राप्त होऊं ॥ २ ॥ मयसैं वर्जित ब्रह्मलोक है यह अघटित है? ऐसैं उक्तहुया सो (ब्रह्मलोकतैं आगत योगी) शपथकरतेकी न्यांईं परिहार करैहैः-हे देवरूप साक्षी! तुम श्रवण करहू। जैसैं मुजकरि उक्त्व- चन सैत्य है। तिस सत्यकरि मैं ब्रह्मस्वरू- पसैं विरोधकूंमति प्राप्त होऊं। अर्थ यह जो :- मुजकूं ब्रह्मकी अप्राप्ति मतिहोहू ऐसैं ॥ २ ॥ अविशेषतैं इतर लोकनकी न्यांई ब्रह्मलोकबी उदय अस्तम- यसैं वर्जित नहीं है। ऐसैं उक्तहुया विद्वान् उत्तरार्द्धसैं शप- थकूं करताहुया परिहार करैहै॥ ८७ ऐसें मंत्रद्रष्टाके शपथद्वारा निर्णीत अर्थविषै "नहीं निश्चयकरि" इत्यादिरूप श्रुति (तृतीयवाक्य) किसअर्थ है? यह आशंकाकरिके कहैहैं॥

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४६४ तृतीयप्रपाठक ३ [छान्दोग्यो- आदित्यादि पश्चद्वारपाल गायत्री हृदयादिक ब्रह्मके उपासन १९ न ह वा अस्मा उदेति न निम्लो- चति सकृद्विवा हैवास्मै भवति य ए- तामेवं ब्रह्मोपनिषदं वेद ॥ ३ ॥ अर्थ :- इसकेअर्थ निश्चयकरि न उदयकूं पावताहै न अस्तकूं पावताहै। इसके अर्थ सदैव दिवस होवैहै। जो इस ब्रह्मकी उ- पनिषद्कूं जानताहै॥ ३ ॥ टीका :- तिस (योगी)नें सत्य कहा। ऐसैं श्रुति कहैहैः-निश्र्चयकरि इस यंथोक्त ब्रह्मवे- त्ताके (उक्तविध ब्रह्म उपासकके) अर्थ उदय होता नहीं अरु अस्तकूं पावता नहीं किंतु इस ब्रह्मवेत्ताकेअर्थ सदाही दिवस होवैहै ताकूं स्वयंज्योतिरूप होनेतें। जो इस यथोक्त ब्रह्मकी उपनिषद्कूं जानताहै। कहिये ैं- ८८ "नहीं निश्चयकरि" इत्यादि श्रुतिकूं लेके व्याख्यान करैहैं॥ ८९ "ब्रह्मकी उपनिषद्कूं" याके अर्थकूं कहैहैं।

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पनिषत् ]] एकादश खंड ११ ४६५ भोगके क्षय भये आत्मामैं सर्व संहृत होवैहै ऐसा उपासन ६ तद्वैतड्रह्मा प्रजापतय उवाच प्रजा- अर्थ :- तिस प्रसिद्ध इस (मधुज्ञान)कूं ब्रह्मा प्रजापतिकेअर्थ कहताभया। प्रजा- ह्यकूं जानताहै। [ऐसें तंत्रकरि वंशवृक्ष ति- नकूं औ प्रतिअमृतके संबंधकूं औ जो कछ अन्य कहतेभये ताकूं ऐसैं जानताहै। यह अ- र्थहै ] अर्थ यह जो :- विद्वान् उदय अरु अस्त- मय कालकरि अपरिच्छेद्य नित्य अज ब्रह्म होवैहै॥ ३ ॥ टीका :- तिसे प्रसिद्ध इस मधुज्ञानकूं ब्रह्मा जो हिरण्यगर्भ सो विराद प्रजापतिके ९० एवं (ऐसैं) शब्दकूं लेके व्याख्यान करैहैं॥ इहां वंशादि तीन। याका तिरश्चीन (टेढा) वंश मधुअपूप अरु मधुनाडियां ऐसैं रूपवाले तीनकूं। यह अर्थ है औ प्रतिअ- मृतके संबंधकूं। याका लोहितआदिक अमृतनविषै एक एक वसुआदिकनके संबंधकूं । यह अर्थ है औ अन्य ऐसैं उद्य- मन अरु संवेशन (उदासीनता) आदिक ग्रहण करियेहै॥ ९१ उक्त विद्याके फलकूं उपसंहार करैहैं॥ ९२ ननु विद्या जब सफल कही तब उत्तर (पीछले) ग्रंथसैं क्या है ? यह आशंकाकरिके कहैहैं॥

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४६६ तृतीयप्रपाठक ३ [छान्दोग्यो- आदित्यादि पञ्चद्वारपाल गायत्री हृदयादिक ब्रह्मके उपासन १९ पतिर्मनवे मनुः प्रजाभ्यस्तद्वैतदुद्दाल- कायारुणये ज्येष्ठाय पुत्राय पिता ब्रह्म प्रोवाच॥ ४ ॥ पति मनुकेअर्थ। मतु प्रजाकेअर्थ॥ तिस प्रसिद्ध इस ब्रह्मकूं आरुणि पिता उद्दालक- रूप ज्येष्ठपुत्रकेअर्थ कहताभया॥४ ॥ अर्थ कहताभया। सो वी मतुकेअर्थ कह ताभया। औ मनु इक्ष्वाकुआदिक प्रजाकेअर्थ कहताभया। ऐसैं ब्रह्माआदिक शिष्टोंके क्रमसैं आगत है। इस रीतिसैं श्रुति विद्याकूं स्तुति करैहै॥ किवा :- इस प्रसिद्ध इस मधुज्ञानरूप ब्रह्मविज्ञानकूं आरुणि पिता उद्दालक मुनि रूप ज्येष्ठपुत्रकेअर्थ कहताभया॥ ४॥ ९३ स्तुतिकूंहीं आकारकरि दिखावैहैं॥ "तिस प्रसिद्ध इसकूं उद्दालककेअर्थ" इत्यादि वाक्यकरि विद्याका योग्य पात्र दिखाईयेहै। ९४ ताकूं व्याख्यान करैहैं॥ इहां यातैंबी स्तुतिके योग्य यह विज्ञान है। यह अर्थ है।। ९५ मधुके विज्ञानकूं व्याख्यान करैहें।

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पनिषत् ]] एकादश खंड ११ ४६७ भोगके क्षय भये आत्मामैं सर्व संहृत होवैहै ऐसा उपासन ६ इदं वाव तज्ज्येष्ठाय पुत्राय पिता ब्रह्म प्रब्रूयात प्राणाय्याय वाऽन्तेवा- सिने ॥ ५॥ नान्यस्मै कस्मैचन। यद्यप्यस्मा इ- अर्थः-इस प्रसिद्ध तिस ब्रह्मकूं पिता ज्येष्ठ पुत्रकेअर्थ वा योग्य शिष्यकेअर्थ कहै॥ ५॥ अर्थः-अन्य किसीके अर्थ बी नहीं टीका :- इंस प्रसिद्ध तिस यथोक्त ब्रह्म (विज्ञान)कूं अन्यवी सर्व प्रियके योग्य ज्येष्ठ पुत्रकेअर्थ वा योग्य शिष्यकेअर्थ कहै ॥५॥ टीका :- अन्य किसीकेअर्थबी नहीं कहै। ९६ ताके परोक्षपनैंकूं निषेध करैहैं॥ ९७ अनंतर ज्येष्ठपुत्रकेअर्थ ब्रह्म कहनेकूं योग्य है। ऐसा यह पूर्वके महात्माओंका नियम है अबीके महात्माओंका नहीं ? यह शंका भयी। यातैं कहैहैं।। ९८ पुत्रतैं अन्यपात्रकूं आज्ञा करैहैं।। ९९ पुत्र अरु शिष्यतैं अन्य पात्रकूं निषेध करैहैं॥ इहां

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४६८ तृतीयप्रपाठक ३ [छन्दोग्यो- आदित्यादि पश्चद्वारपाल गायत्री हृदयादिक ब्रह्मके उपासन १९ मामद्भिः परिगृहीतां धनस्य पूर्णी द- द्यादेतदेव ततो भूय इत्येतदेव ततो भूय इति ॥६ ॥ इति तृतीय प्रपाठकस्यैकादशः खंडः ॥११॥ [कहै] ॥ यद्यपि इस (आचार्य) के अर्थ जलोंकरि परिवेष्टित धनकी पूर्ण इस (पथि- वी)कूं देवै। यहहीं तिसतैं अधिक है ऐसैं। यहहीं तिसतैं अधिक है ऐसैं॥ ६॥ इति श्री०मूलभाषा०तृतीयप्रपा०एकादशः खंड: अनेक प्राप्त आचार्य(विद्यादाता) आदिक तीर्थ (पात्र)नके निर्धारणके हुये दो तीर्थ अ- नुज्ञात(आज्ञाके विषयकिये)हैं॥ ॥ नेनुं फेर दो तीर्थ। याका विद्याके प्रदानविषै दो अधिकारी हैं। यह अर्थ है औ पष्ठी जो है सो निर्धारणरूप अर्थविषै है औ आ- चार्य विद्याका दाता है। आदिपदतैं धनदाता श्रोत्रिय अर मेधावी (बुद्धिमान्) ग्रहण करियेहै। १०० सर्व अर्थिनके इसविषै अधिकारकूं आशंकाकरिके दूषण देतेहैं॥ इहां "आचार्यकेअर्थ" इसपदका फेर ग्रहण क्रियापदसैं ताके अन्वयके जनावने अर्थ है। वा विद्याविषै

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पनिषत्] एकादश खंड ११ ४६९ भोगके क्षय भये आत्मामैं सर्व संहृत होवैहै ऐसा उपासन ६ विद्याके तीर्थ (पात्र) का संकोच किस कारणतैं किया है? यातैं कहैहैं :- यद्यपि इस आचार्यके अर्थ कोईकबी समुद्रकरि परिवेष्ठित (सम- स्तबी) अरु धनकी पूर्ण कहिये भोगके उप- करणोंकरि संपन्न इस पृथिवीकूं बिद्याके नि- षक्रय (विक्रय)अर्थ आचार्यके अर्थ देवै। यह इसका निष्क्रय नहीं है। जातैं तिस दानतैंबी यहहीं जो मधुविद्याका दान है सो अत्यंत बहुफलवाला है। यह अर्थ है॥ इहां दोवार कथन जो है। सो आदरकेअर्थ है ॥ ६ ॥ इति श्री० भाष्यभाषा० तृतीयप्रपाठकस्यैकादशः खंड: ११

आदर जो है सो मुख्य अधिकारका कारण हुया फलताहै [ इस अर्थके जनावनेकूं है] यह भाव है॥ इति श्री०तृतीयप्रपाठकस्यैकादशखंडस्य टिप्पणम् ॥११ ।।

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४७० तृतीयप्रपाठक ३ [छान्दोग्यो- आदित्यादि पञ्चद्वारपाल गायत्री हृदयादिक ब्रह्मके उपासन १९ अथ तृतीय प्रपाठकस्य द्ादशःखंड:१२ गायत्री वा इद५ सर्व भूतं यदिदं अथ श्री०मूलभाषा०तृतीयप्रपाठ० द्ादशः खंडः॥१२॥ अर्थ :- गायत्री हीं यह सर्व भूत है जो अथ श्री० भाष्यभाषा०तृतीयप्रपाठ० द्ादशः खंड: १२ गायत्रीकरि ब्रह्मका उपासन ९ टीका :- औौतैं ऐसें अतिशयफलवाली यह ब्रह्मविद्या है यातैं सो प्रकारांतरकरिबी कहनेकूं योग्य है। यातैं "गायत्रीहीं" इत्यादि आरंभ करिये है औ गायत्रीरूपद्वारकरि ब्रह्म कहियेहै। काहेतैं सर्वविशेषोंकरि रहित अरु "नेति नेति" इत्यादि विशेषोंके प्रतिषेधकरि गम्य ब्रह्मकूं ड अथ तृतीयप्रपाठकगत द्वादशखंडस्य टिप्पणं॥१२।। १०१ गतग्रंथसें उत्तरग्रंथकी गतार्थताकूं परिहार करैहैं।। इहां यह अर्थ है :- सूर्यरूप द्वारवाले ब्रह्मकी विद्याके अनन्तर तिस देवतारूप गायत्रीद्वारा ताकी विद्या उपदेश करियेहै॥ १०२ ननु ब्रह्मविद्याकी विवक्षितताके हुये ब्रह्महीं उप- देश किया चाहिये। गायत्रीके उपदेशसें क्या है? यह आ- शंकाकरिके कहैहैं।

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पनिषत्] द्वादश खंड १२ ४७१ गायत्रीकरि ब्रह्मका उपासन ९ किञ्च। वाग्वै गायत्री वाग्वा इदर सर्वे भूतं। गायति च त्रायते च ॥ १ ॥ यह कछुक है। वाक् हीं गायत्री है। वाक् हीं यह सर्व भूत है। गायन करैहै औ त्रा- यण (रक्षण) करैहै ॥ १ ॥ र्बोध होनेतैं औ अैनेक छंदोंके होते गायत्रीकाहीं ब्रह्मज्ञानकी द्वारताकरि जो ग्रहण है सो प्रधान होनेतैं है औ सोमके आहरण (आनयन)तैं १०३ तथापि अन्यछंदोंकूं छोडिके ऐसैं गायत्रीद्वाराहीं क्यूं ब्रह्म उपदेश करियेहै? तहां कहैहैं॥ इहां ब्रह्मज्ञानकी द्वारताकरि। याका ताकी उपायताकररि। यह अर्थ है।। १०४ प्रधानताविषै हेतुकूं कहैहैं। इहां सोमका आहरण जो आनयन। तहां गायत्री छंदवाली ऋचाओंकी साधनता याजकों( यजनकरनेवालों)करि अंगीकारकरियेहै। तातैं तिस गायत्रीकी यज्ञविषै प्रधानता युक्त ह। यह अर्थ है। यद्वा :- सोमके ल्यावनेकूं इच्छनेवाले देवनकरि गायत्री त्रिष्टप् अरु जगती छंदनके तिसअर्थतावान्करि नियोगके हुये जगती अरु त्रिष्टुप्के मध्य मार्गकूं अशक्तिकरि खोलनेविषै गायत्री सो- मकूं पायके ताके दक्षिणतैं जीतिके ताकूं देवनकेअर्थ ल्याव- तीभई। ऐसैं ऐतरेयक ब्राह्मणविषै "उसलोकविषै सोमहीं राजा होताभया" इस ठिकाने प्रसिद्ध है। यातैं ता( गायत्री) की प्रधानता है। यह अर्थ है।।

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४७२ तृतीयप्रपाठक ३ [छान्दोग्यो- आदित्यादि पञ्चद्वारपाल गायत्री हृदयादिक ब्रह्मके उपासन १९ अरु इतरछंदनके अक्षरोंके आहरणतै अरु इतैर छंदनविषै व्याप्तितैं अरु सर्वकालोंविषै व्या- १०५ तिसीहीं अर्थविषै अन्यहेतुकूं कहैहैं।। इहां यह अर्थ है :- उष्णिक् अरु अनुष्टुप् आदिक इतर छंद हैं तिनके पादकरि अक्षर सप्त अरु अष्ट आदिक संख्यावाले हैं तिनका आहरण (संपादन) गायत्रीके अक्षरवाले षटपादोंकरि करि- येहै। काहेतैं अधिक संख्याके न्यूनसंख्याविना असंभवतैं औ तातैं इतर छंदोंविषै गायत्रीकी व्याप्तितें गायत्रीकी प्रधा- नता है।। अथवा गायत्रीसैं व्यतिरिक्त अरु सोमके संपादन- विषै उद्यत अरु असक्त त्रिष्ठप् अरु जगती इन दो छंदोंके मार्गके मध्य जगतीनैं तीन अक्षर त्यागे हैं अरु त्रिष्टुपूनैं तो एक अक्षर [त्याग्या है]। तिसतैं वी अष्टच्यालीस अक्षर- वाली जगती जो है सो पंचच्यालीस अक्षरवाली स्वीकृत है औ चुमालीस अक्षरवाली त्रिष्ठुप् जो है सो त्रेच्यालीस अक्षर- वाली स्वीकार करी है। तहां गायत्री सोमकूं ल्यावतीहुई त्यक्त अक्षरोंके संपादनसैं तिन (उक्त दो छंदन)की पूर्ण- ताकूं संपादनकरिके तिन दोनूं छंदनविषै स्थित है। तिस- करि ताकी प्रधानता है। यह अर्थ है। १०६ तहांहीं अन्यहेतुकूं कहैहैं॥ इहां यह अर्थ है :- सर्व जे प्रातःकाल माध्यंदिनकाल अरु तृतीयकाल ये हैं। तिन- विषै गायत्रीका व्यापकभावरूप मिश्रण है। गायत्र (गायत्री- संबंधी) प्रातःकाल है। त्रिष्ठुप्संबंधी माध्यंदिनकाल है। ज- गतीसंबंधी तृतीयकाल है। ऐसें स्थित हुयेवी त्रिष्ठुप् अर जगतीविषै गायत्रीकी व्याप्तिकूं उक्तहोनेतैं औ ताके दो पा-

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पनिषत् ] द्वादश खंड १२ ४७३ गायत्रीकरि ब्रह्मका उपासन ९ पक होनेतैं यज्ञविषै गायत्रीकी प्रधानता है औ ब्राह्मणकूं गायत्रीरूप सारवाला होनेतैं मा- ताकीन्यांईं अतिशयकरि गुरुरूप गायत्रीकूं छोडिके तिसतैं अन्य गुरुतर यथोक्त ब्रह्म बी नहीं जानियेहै। काहेतैं तिर्से (गायत्री) विषै अत्यंत गौरवकूं प्रसिद्ध होनेतैं। यीतैं गा- यत्रीरूपद्वारसैंहीं ब्रह्म कहियेहै :- [ गांयत्रीहीं ऐसैं अवधारण अर्थ वै शब्द है ] येह सर्व भूत- दोसैं अरु मुखसैं सोमके आनयनरूपद्वारसैं तीनि कालनके साथि संबंधतैं। यातैंबी ताकी यज्ञविषै प्रधानता है।। १०७ ननु कर्मविषै ताकी प्रधानताके हुयेबी। ब्रह्मविद्या- विषै ताकी प्रधानता कहांतैं होवैगी? यह आशंकाकरिके कहैहैं॥ इहां ब्रह्मविद्याविषै ताकी प्रधानता है। यह शेष है॥ १०८ गायत्रीके तांईहीं आलंबनवान् होनेकरि ब्रह्म प्राप्त होवैहै। इस अर्थविषै लोकप्रसिद्धिकूं अनुकूल करैहैं॥ १०९ गायत्रीका ब्रह्मज्ञानकी द्वारताकरि ग्रहण उक्त हे- तुनतैं सिद्धभया। ऐसें उपसंहार करैहैं॥ ११० तैसें हुये "इस अर्पणके कथनतैं" इस न्यायकरि गायत्री उपाधिवाला ब्रह्म उपास्य है। ऐसैं प्रतिज्ञा करैहैं॥ १११ निपात (वै) अक्षरकूं लेके व्याख्यान करैहैं॥ ११२ अवधारणरूप हीं अर्थकूं स्पष्ट करतेहुये "यह"

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४७४ तृतीयप्रपाठक ३ [छान्दोग्यो- आदित्यादि पञ्चद्वारपाल गायत्री हृदयादिक ब्रह्मके उपासन १९ प्राणिनका समूह जो कछु स्थावर वा जंगम है सो सर्व गायत्रीहीं है।॥ तिसे छंदो- मात्ररूपकी सर्वभूतरूपता अघटित है। यातैं गायत्रीकी कारण शब्दरूप वाकूकूं गायत्रीरूप आपादनकरैहैंः-वाकहीं गायत्री है ऐसैं। चौंकहीं इस सर्वभूतकूं जातें शब्दरूपहुयी गायन करैहै कहिये "यह गौ है। यह अश्व है" ऐसे कथन करैहै औ रक्षण करैहै कहिये उसतैं मतिडर। क्या तुजकूं भय ऊठ्या है। इत्यादिकरि सर्व भयतैं निवृत्त हुया प्राणी त्रात (रक्षित) होवैहै॥ जो वाक् भूतकूं गायन क इत्यादि वाक्यकू व्याख्यान करैहैं॥ इहां सो यह सर्व गा- यत्रीहीं है। ऐसैं योजना है।। ११३ गायत्रीकूं सर्वात्मक होनेतें ताकी ब्रह्मदृष्टिसैं उपा- सना युक्त है ऐसे कहा। तहां असंभवकूं आशंकाकरिके अ- नंतरके वाक्यसैं उत्तरकूं कहैहैं॥ ११४ वाक्का गायत्रीपना कैसैहैः-यह आशंकाकरिके। ताके सर्वभूतनसैं संबंधकूं दिखावैहैं॥ ११५ किस कारणतैं ताका गायत्रीपना है ? तहां कहैहैं। ११६ ऐसें वाक्का स्वरूप होहू । गायत्रीका तो क्या आया ? सो कहैहैं॥

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पनिषत्] द्वादश खंड १२ ४७५ गायत्रीकरि ब्रह्मका उपासन ९ या वै सा गायत्री यं वाव सा येयं अर्थ :- जोई सो गायत्री है यहहीं सो रैहै औ त्रायण (रक्षण) करैहै। गायत्रीहीं सो गायन करैहै अरु त्रायण करैहै। काहेतैं वाकूकूं गायत्रीतैं अनन्य होनेतैं। गानतैं अरु त्राणतैं गायत्रीका गायत्रीपना है। १ ॥। टीका :- जोई सो ऐसे लक्षणवाली सैर्वभू- तरूप गायत्री है यहहीं सो है जो यह प- थिवी है। फेर यह पृथिवी कैसैं गायत्री है? यह कहियेहैः-सर्वभूतनके साथि संबंधतैं॥। ॥

११७ गायत्रीनामके निर्वचनतैं बी वाक्विषै उक्त जो रूप सो गायत्रीविषैहीं देखनेकूं योग्य है। ऐसैं कहैहैं॥ ११८ वाक्की सर्वभूतस्वरूपता प्रसिद्ध है। काहेतैं ताकी वाचक होनेतैं औ वाच्यके वाचकसैं भिन्नताकरि अनिरूप- णतैं। तैसें हुये वाक्रूप गायत्री सर्वभूत स्वरूप है ऐसें कहा। अब ताके अन्यप्रकारकूं कहैहैं॥ ११९ इस लक्षणवान्पनैकूं व्याख्यान करैहैं॥ १२० गायत्रीकूं अनुवादकरिके ताके विहित पृथिवीपनैकूं प्रश्नपूर्वक उपपादन करैहैं॥

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४७६ तृतीयप्रपाठक ३ [छान्दोग्यो- आदित्यादि पञ्चद्वारपाल गायत्री हृदयादिक ब्रह्मके उपासन १९ पथिव्यस्याY हीद सर्व भूतं प्रति- ष्ठितमेतामेव नातिशीयते ॥ २॥ है जो यह प्थिवी है इसीविषै हीं यह सर्व भ्ूत प्रतिष्ठित है। इसी (गायत्री) हींकूं अतिक्रमण करिके नहीं वर्त्तताहै॥२॥ कैसें सर्वभूतनसैं इसका संबंध है ? इस पृथि- वीविषै जातैं सर्व स्थावर औ जंगम भूत स्थित है। इसीहीं पृथिवीकूं अतिक्रमण करिके वर्तता नहीं। यह अर्थ है। जैसै गान अरु त्राणकरि गायत्रीका भूतनसैं संबंध है। ऐसैं भ्ूतनकी प्रतिष्ठा (स्थिति)तैं भूतनसैं सं- बंधवाली पृथिवी है। यातैं गायत्री पृथिवी है॥ २ ॥ १२१ गायत्रीके सर्वभूतनसैं संबंधकूं उक्त होनेतें पृथि- वीके तिनसैं संबंधकूं प्रश्नपूर्वक बोधन करैहैं॥ १२२ सर्वके पृथिवीविषै स्थितपनैंकूं साधतेहैं। १२३ तथापि पृथिवीका गायत्रीपता कैसैंहै? सो कहैहैं॥

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पनिषत्] द्वादश खंड १२ ४७७ गायत्रीकरि ब्रह्मका उपासन ९ या वै सा एथिवीयं वाव सा यदिद- मस्मिन्पुरुषे शरीरमस्मिन्हीमे प्राणाः प्रतिष्ठिता एतदेव नातिशीयन्ते॥ ३ ॥ अर्थ :- जोई सो पथिवी है यह हीं सो है। जो यह इस पुरुषविषै शरीर है। इस (शरीर) विषै जातैं ये प्राण प्रतिष्ठित हैं। याहीकूं अतिक्रमण करिके वर्त्तते नहीं॥३॥

टीका :- जोई सो पथिवी गायत्री है य- हहीं सो यह हीं है॥ सो क्याकि :- जो यह इस कार्य कारणके संघातरूप जीवते पुरुष विषै शरीर है शरीरकूं पार्थिव होनेतैं॥ ॥ शरीरकूं गायत्रीपना कैसें है ? यह कहिये है :- जातैं इस (शरीर) विषै ये भूतशब्दके वाच्य १२४ अब गायत्रीकी शरीररूपताकूं निरूपण करैहैं। १२५ गायत्रीस्वरूप पृथिवीकूं अनुवादकरिके ता पृथि- वीतैं गायत्री अरु शरीरके अभेदविषै हेतुकूं कहैहैं॥ १२६ अब गायत्री अरु शरीरकी एकताकूं प्रश्नपूर्वक क- थन करैहैं।

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४७८ तृतीयप्रपाठक ३ [छान्दोग्यो- आदित्यादि पञ्चद्वारपाल गायत्री हृदयादिक ब्रह्मके उपासन १९ यद्वैतत्पुरुषे शरीरमिदं वाव तद्यदि- दमस्मिन्नन्तः पुरुषे हृदयमस्मिन्हीमे प्राणाः प्रतिष्ठिता एतदेव नातिशी- यन्ते ॥ ४ ॥ अर्थ :- जोई सो पुरुषविषै शरीर है यह हीं सो है। जो यह इस पुरुषविषै भीतर हृदय है। इसविषै जातैं ये प्राण प्रति- ष्ठवित हैं। इसी (हृदय) हींकूं अतिक्रमण करिके वर्त्तते नहीं ॥ ४॥ प्राण प्रतिष्ठित हैं। यातैं पृथिवीकीन्यांईं भूतशब्दके वाच्य प्राणके प्रतिष्ठानतैं शरीर गा- यत्री है। जाँतैं प्राण इसींहीं शरीरकूं अति- क्रमण करिके वर्तते नहीं॥ ३॥ टीका :- जोई सो पुरुषविषै शरीर है य- १२७ प्राणोंके शरीरविषै स्थितपनैंकूं प्रकट करैहैं॥ १२८ अब गायत्रीके हृदयपनैंकूं जनावतेहैं॥

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पनिषत्] द्वादश खंड १२ ४७९ गायत्रीकरि ब्रह्मका उपासन ९11 हहीं सो गायत्री है। जो यह इस पुरुष- विषै भीतर (मध्य) हृदयपुंडरीक नामक है यह गायत्री है।। II कैसैं ? यह कहैहैं :- जातैं इसविषै ये प्राण प्रतिष्ठित हैं। यातैं शरीर- की न्यांई हृदय गायत्री है। औ इंसींहींकू प्राण अतिक्रमणकरिके वर्तते नहीं। औ "प्राण- हीं पिता है। प्राण माता है। सर्व भूतनके तांई न हिंसा करता हुया" इस श्रुतितैं भूतशब्दके वाच्य प्राण हैं । ४ ॥

१२९ हृदयकी अरु गायत्रीकी एकताकूं प्रश्नपूर्वक विव- रण करैहैं॥ १३० हृद्यविषै प्राणोंके स्थितपनैंकूं प्रकट करैहैं॥ १३१ प्राणोंकूं भूतशब्दकी वाच्यताके अरु तिनसैं संबं- धके हुये भूतसंबंधतैं गायत्रीका शरीरादिभाव संभवैहै। तिन प्राणोंकी भूतशब्दकी वाच्यताविषै तो क्या प्रमाण है ? यह आशंकाकरिके कहैहैं॥ १३२ अहिंसावाक्यविषै बी प्राणपर मारण निषेध करि- येहै। तैसैं हुये भूतशब्द तिसप्राणविषै प्रतीतिगोचर हो- चैहींहै। ऐसें कहैहैं॥

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४८० तृतीयप्रपाठक ३ [छान्दोग्यो- आदित्यादि पञ्चद्वारपाल गायत्री हृदयादिक ब्रह्मके उपासन १९ सैषा चतुष्पदा पड्विधा गायत्री त- देतटचाऽभ्यनूक्तम् ॥ ५॥ अर्थः-सो यह गायत्री चतुष्पदा अरु षड्विधा होवैहै। तिसविषै यह (ब्रह्म) ऋचा (मंत्र)नैं कहा है ॥५॥ टीका :- सो यह गायत्री षट्अक्षरयुक्त पदोंवाली छंदोरूप हुयी चतुष्पदा होवै है औ वाक् भूत पृथिवी शरीर हृदय अरु प्राण- रूप हुयी पड्विध होवैहै। अन्य अर्थ उपदेश- कियेबी वाकू अरु प्राणकूं गायत्रीकी प्रकारता १३३ च्यारीऔरतैं शेष ( उपकारक) होनेकरि गायत्रीका च्यारीपादवानूपना दिखावैहैं॥ १३४ ताके पड्विधपनैकूं लखायके अनुवादकरिके सा- धतेहैं॥ १३५ गायत्री अरु हृदयके सर्वभूतनसैं संबंधकी सिद्धि- अर्थ उपदेश किये वाक् अरु प्राणका गायत्रीके प्रभेदपनैकारि व्याख्यान कैसैहै ? यह आशंकाकरिके कहैहैं ॥ इहां विधि- पक्षविषै वाक्यशेषके योगतैं तिन वाक् अरु प्राणकूं बी गाय- त्रीकी प्रभेदता (प्रकारता) है । यह अर्थहै ॥ तिस इस

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पनिषत् ] द्वादश खंड १२ ४८१ गायत्रीकरि ब्रह्मका उपासन ९ तावानस्य महिमा ततो ज्यायारश्र अर्थ :- तितना इसका महिमा है औ (प्रभेदता) है। अन्यथा षड्डिधसंख्या पूरणके असंभवतैं ॥ तिस इस अर्थविषै यह गायत्री नामवाला गायत्रीविषै अनुगत ब्रह्म गायत्री- रूप मुखसैं कहा है सो ऋचा (मंत्र)नैंबी प्र- काश किया है॥५॥ टीका :- तितना इस गायत्रीनामक समस्त ब्रह्मका महिमा (विभूतिका विस्तार) है। जितना च्यारी पादवाला अरु षड्ध ब्रह्मका विकार पाद "गायत्री" ऐसैं व्याख्यान कि- याहै। यातैं तिस विकाररूप गायत्री नामवाले अर्थविषै वाक् भूत पृथिवी शरीर हृदय अरु प्राण इसभेदतैं षड्विध गायत्रीकूं अनुचिंतन करिके अजहत्लक्षणासैं तिस- करि अवच्छिन्न (भिन्नकिया) ब्रह्मभाव है। ताकूं अनुचिंत- नकरै। ऐसैं ताका शेषहोनेकरिहीं पूर्वउक्तके स्थित हुये। यह अर्थ है।। औ समस्तका। याका पादोंके विभागकरि विशिष्टका। यह अर्थहै। १३६ विभूतिके विस्तारकूं हीं विवरण करैहैं॥ ४१

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४८२ तृतीयप्रपाठक ३ [छान्दोग्यो- आदित्यादि पश्चद्वारपाल गायत्री हृदयादिक ब्रह्मके उपासन १९ पुरुष: पादोऽस्य सर्वाभूतानि त्रिपाद- स्यामृतं दिवीति॥ ६॥ तिसतैं अतिशय बडा पुरुष है। इसका स- र्वभूत [एक] पाद है। तीनपादवाला इ- सका अमृत [स्वरूप] प्रकाशस्वरूपविषै [स्थित] है इति ॥ ६ ॥ व।चारंभणमात्रतैं तिसतैं अत्यंत महान् प- रमार्थसत्यरूप अअविकार (विकार रहित) औ सर्वविषै पूरणतैं अरु पुरीनविषे शयन (रहनैं) तैं पुरुष है। तिस इसका पाद तेज जल अरु अ- न्नरूप स्थावर जंगममय सर्वभूत है औ तीन हैं पाद इसके सो यह त्रिपांत् है। सो त्रिपात १३७ "वाणीका आलंवन विकार नाममात्रहै" इस वा क्यशेषकूं आश्रयकरिके विशेषण देतेहैं॥ १३८ परमार्थ सत्यताविषै हेतुकूं कहैहैं॥ १३९ "तितना तिसका" इत्यादि वाक्यकूं स्पष्ट करैहैं॥ इहां आदिपदकरि वायु अरु आकाश ये दोनूं कहे।। १४० "तिसतें ज्यायान् (महत्तर)" इत्यादिवाक्यकू

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पनिषत्] द्वादश खंड १२ ४८३ गायत्रीकरि ब्रह्मका उपासन ९ यद्वैतद्ह्मेतीदं वाव तद्योऽयं बहिर्द्ा पुरुषादाकाशो यो वै स बहिद्धा पुरु- षादाकाशः॥७॥ अर्थ :- जोई सो ब्रह्म है ऐसैं [कहा] यहहीं सो है जो यह पुरुषतैं बाहिर आ- काश है।। जोई सो पुरुषतैं बाहिर आकाश है।। ७ ।। (तीनपादवाला ब्रह्म) पुरुष नामवाला अमृत इस समस्त (प्रपंचात्मक) गायत्रीस्वरूपके प्र- काशवाले स्वात्माविषै अवस्थित है। यह अर्थ है इति ॥ ६ ॥ टीका :- जोई सो त्रिपात् (तीनपादवाला) १४१

अमृत गायत्रीरूप मुखसैं ब्रह्म ऐसैं कहा है। स्पष्ट करैहें ॥। इहां समस्तका । याका प्रपंचस्वरूपका। यह अर्थ है औ श्रुतिविषै इतिशब्द जो है सो मंत्रकी समा- पिअर्थ है।। १४१ जो ब्रह्म गायत्रीकरि अवच्छिन्न (अन्योंसैं भिन्न कियाहुया) उपास्य कहा। सो हृदयाकाशविषै ध्यावनेकूं योग्य है। ऐसें कहनेकूं कमसैं हृदयाकाशकूं अवतार देतेहैं॥

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४८४ तृतीयप्रपाठक ३ [छान्दोग्यो- आदित्यादि पञ्चद्वारपाल गायत्री हृदयादिक ब्रह्मके उपासन १९ अयं वाव स योऽयमन्तः पुरुष आ- काशो यो वै सोऽन्तः पुरुष आकाशः८ अथं वाव सयोऽयमन्तर्हृदय आका- अर्थ :- यहहीं सो है जो यह पुरुषविषै भीतर आकाश है। जोई सो पुरुषविषै भीतर आकाश है ॥। ८ ॥ अर्थ :- यहहीं सो है जो यह हृदयविषै यहहीं सो है। जो यह प्रसिद्ध पुरुषतैं ब- हिर्द्धा (बाहिर) भौतिक आकाश है॥ जोई सो पुरुषतैं आकाश कहा है॥७॥ टीका :- यह हीं सो है। जो यह पुरुष (शरीर)विषै भीतर आकाश है।। जोई सो पुरुषविषै भीतर आकाश है॥८ ।। टीका :- यहहीं सो है। जो यह हृदयपुं- डरीकविषै भीतर आकाश है।। ॥ ऐके वि- १४२ ननु एक आकाशकी त्रिविधता कैसें कही ? ऐसैं पूर्ववादी शंकाकरैहै।

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पनिषत्] द्वादश खंड १२ ४८५ 2 FEWVE गायत्रीकरि ब्रह्मका उपासन ९ शस्तदेतत्पूर्णमप्रवर्ति पूर्णामप्रवर्तिनी श्रियं लभते य एवं वेद॥ ९॥ इति तृतीयप्रपाठकस्य द्वादशः खंडः॥१२॥ भीतर आकाश है।। सो यह (ब्रह्म) पूर्ण अरु अप्रवर्तति है। जो ऐसैं जानताहै [सो] पूर्ण अप्रवर्तिनी श्रीकूं पावताहै॥ ९॥ इति श्री०मूलभाषा०तृतीयप्रपा०द्वादशःखंड:१२ द्यमान आकाशका त्रिधा भेद कैसें है ? यहैं कहिये है :- बाह्य इंद्रियविषै जागरित स्थानरूप आकाशविषै दुःखकी बहुलता। देखियेहै ति- सतैं भीतर शरीरविषै स्वप्नस्थानभूत आकाश- विषै अत्यंत अल्प दुःख होवैहै। फेर स्वप्नोंकू दे- खनेवालेकूं हदयस्थ आकाशविषै "किसीबी का- १४३ औपाधिक त्रिविधता अविरुद्ध है । ऐसैं सिद्धांती परिहार करैहें। इहां बाह्य इंद्रियनकी विषयता जो है सो तिन इंद्रियनके विषयरूप शब्दआदिकनकी आश्रयतारूप है औ स्वप्नस्थानभूत आकाशविषै। ऐसें संबंध है औ "नकिसी बी कामकूं" इत्यादि वाक्यकरि दोनिषेधनसैं पूर्वप्रकारवाली दो(जाग्रत्स्वप्नरूप) अवस्था निषेध करियेहैं॥

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४८६ तृतीयप्रपाठक ३ [छान्दोग्यो- आदित्यादि पञ्चद्वारपाल गायत्री हृदयादिक ब्रह्मके उपासन १९ मकूं कामनाकरता नहीं। किसीबी स्वप्नकूं दे- खता नहीं" यीतैं सर्व दुःखकी निवृत्तिरूप आ- काश सुषुप्तिस्थान है।यातैं एककेबी त्रिधा भेद- का कथन युक्त है। "पुरुंषतैं वाहिर" ऐसैं आ- रंभ करिके आकाशका हृदयविषै संकोचका जो करण है। सो चित्तके समाधानके स्थानकी स्तुतिअर्थ है।। जैसें तीन लोकनमैं वी कुरुक्षेत्र विशिष्ट होवैहै। अर्धतैं तो कुरुक्षेत्र है अर्धतैं तो पृथूदक है ऐसें। ताकी न्यांई। सो यह प्रसिद्ध १४४ निषेधके फलकूं कहैहैं॥ इहां यह अर्थ है :- सर्व- दुःख जो स्थूल अरु वासनामय है ताकी निवृत्तिकरि नि- रूप्यमाण हृदयाकाश है॥ १४५ उपाधिकृत त्रिविधताकूं उपसंहारकरैहैं॥ १४६ तथापि इस क्रमसैं आकाशका संकोच हृदयविषै क्यूं करियेहै? तहां कहैहैं॥ १४७ स्थानकी स्तुतिकूं उदाहरणकरि स्पष्ट करैहैं॥ इहां यह अर्थ है :- इधर कुरुक्षेत्र अर्धतैं है अरु अर्धस्थानीय पृथूदकवी तैसें है। ऐसैं द्विदल (चनाआदिक)के युग- लकीन्यांई। सो दोनूं तीन लोकनकी अपेक्षाकरि अत्यंत विशिष्ट हैं। १४८ ननु हृदयाकाशविषै जव चित्त समाधान करियेहै

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पनिषत् ] द्वादश खंड १२ ४८७ गायत्रीकरि ब्रह्मका उपासन ९ हृदयाकाशनामक ब्रह्म पूर्ण (सर्वगत) है। ह- दयमात्रकरि परिच्छिन्न नहीं। ऐसैं माननेकूं योग्य है। यद्यपि हृदयाकाशविषै चित्त समा- धान करियेहै तथापि सो अप्रवर्तति है कहिये किसीतैं बी कहींबी प्रवर्त्त होनेकूं शील (स्वभाव) इसका नहीं है ऐसा अप्रवर्ति (उच्छेदरहित ध- र्मवाला) सो है। जैसैं अन्य भूत परिच्छिन्न अरु उच्छेदरूप धर्मवाले हैं। ऐसा हृदयाकाश नहीं है। ॥ जो ऐसैं यथोक्त पूर्ण अरु अ- प्रवर्त्तिरूप गुणवाले ब्रह्मकूं जानताहै। सो पूर्ण अप्रवर्त्तिनी (उच्छेदरहित स्वरूपवाली) श्री (विभूति)रूप दृष्ट शुणरूप फलकूं पावताहै। तब तातैं इहां परिच्छिन्न ब्रह्म प्राप्तभया? यह आशंकाक- रिके कहैंहैं॥ १४९ पूर्णताकरि जन्मनाशसैं शून्यता सिद्ध होवैहै। ऐसें कहैहैं॥ १५० मुख्यफलरूपताकूं निषेध करैहैं॥ इहां दष्टफल- चालेकेअर्थ स्वर्गकीप्राप्ति यह हष्ट है ऐसें कहा॥

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४८८ तृतीयप्रपाठक ३ [छान्दोग्यो- आदित्यादि पञ्चद्वारपाल गायत्री हृदयादिक ब्रह्मके उपासन १९ अथ तृतीयप्रपाठ० त्रयोदश: खंड: १३ तस्य ह वा एतस्य हृदयस्य पञ्च अथ श्री०मूलभाषा०तृतीयप्रपा०त्रयोदशः खंडः॥१३॥ अर्थ :- तिस प्रसिद्ध इस हृदयके पंच देव- अर्थ यह जो :- इहांहीं जीवता हुया तिसभावकूं पावताहै॥ ९ ॥ इति श्री०भाष्यभाषा०तृतीयप्रपा०द्वादशः खंडः ॥ १२॥ द्वारपालादिगौणोपासन। हृदयमैं मुख्यब्रह्मोपासन ७ टीका :- "तिसे प्रसिद्ध इसका" इत्यादिकरि गायत्रीनामक ब्रह्मकी उपासनाका अंग होने- १५१ ज्ञानकूं हीं विशेषणदेते हैं॥ इहां वर्त्तमानदेह स० प्रमीका अर्थ ऐसें (जानता) है औ जो विद्वान् है सो यथोक्त फलकूं पावताहै। ऐसैं संबंध है॥ इति श्री०तृतीयप्रपाठकगतद्वादशखंडस्य टिप्पणम्॥१२॥ अथ श्री०तृतीयप्रपाठकगतत्रयोदशखंडस्य टि०१३ १५२ वक्ष्यमाण ज्ञानकी स्वतंत्रताकूं परिहारकरिके प्रक- रणके भेदकूं निषेध करनेकूं उत्तरग्रंथके तात्पर्यकूं कहैहैं। इहां द्वारपालादि। इस आदिशब्दकरि तद्गतविशेष (इंद्रियआ- दिक) ग्रहण करियेहै॥

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पनिषत् ] त्रयोदश खंड १३ ४८९ द्वारपालादिगौणोपासन। हृदयमैं मुख्य ब्रह्मोपासन ७ देवसुषयः स योऽस्य प्राङ् सुषिः स प्राणस्तच्क्षुः स आदित्यस्तदेतत्तेजोऽ- सुषियां हैं।। सो जो इस (हृदय) का प्राक् (पू- र्वदिशागत) सुषि (छिद्र) है। सो प्राण है। सो चक्षु है। सो आदित्य है॥ तिस इसकूं करि द्वारपालादि गुणके विधानअर्थ आरंभ करियेहै॥। जैसें लोकविषै राजाके द्वारपाल जे हैं वे उपासनाकरि वशकिये हुये राजाकी प्राप्तिअर्थ होवैहैं। तैसैं इहांबी है :- इधर ताका। इस पदका प्रकत हृदयका। यह अर्थ है। तिस प्रसिद्ध इस अनंतर निर्देशकिये ह- द्यके पंचसंख्यावाले देवनके सुषियां ऐसे दे- वसुषियां हैं। जातैं प्राण अरु आदित्य आदिक १५३ ब्रह्मविषै उपासनकरि अप्रसिद्धितैं द्वारपालोंकी उ- पासना अयुक्तहै ? यह आशंकाकरिके कहैहैं॥ इहां यातैं तिन द्वारपालोंकी उपासना अर्थवाली है। यह शेष है औ स्वर्गलोकशब्द परमात्माकूं विषयकरनेवाला है। काहेतैं "इसतैं ऊर्ध्व विमुक्त हुये स्वर्गलोककूं पावतेहैं" इस अन्य श्रुतितैं॥

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४९० तृतीयप्रपाठक ३ [छान्दोग्यो- आदित्यादि पञ्चद्वारपाल गायत्री हृदयादिक ब्रह्मके उपासन १९ न्नाद्यमित्युपासीत।तेजस्व्यन्नादोभवति य एवं वेद ॥ १॥ "तेज अरु अन्नाद्य है"। ऐसैं उपासन करै।। जो ऐसैं जानताहै [सो] तेजस्वी अरुअ- न्नाद होवैहै ॥ १ ॥ देवनकरि रक्ष्यमाण स्वर्गलोककी प्राप्तिके द्वारके छिद्र हैं। यातैं देवसुषियां हैं। तिस स्वर्गलो- कके भवनरूप इस हृदयका जो प्राक् सुषि कहिये पूर्वाभिमुखके प्राक्गत जो छिद्ररूप द्वार है। औ जो तिसविषै स्थित है सो प्राण है। कहिये तिसहृदयरूपद्वारकरि जो वायुवि- शेष संचरताहै सो पूर्व चलताहै यातैं प्राण १५४ देवसुषिपनैकूं साधतेहैं॥ इहां स्वर्गलोकरूप पर- मात्माका भवन कहिये आयतन है ताका। यह अर्थ है।। १५५ ताके पूर्वपनैविषै अनवस्थाकूं आशंकाकरिके क- हाहै॥ इहां तिसविषै स्थित है। तिसद्वारकरि यह "तत्" शब्द हृदयरूप अर्थवाला है औ तिसकरिहीं यह "तत्"शब्द प्राणरूप अर्थवाला है औ तिसतैं अव्यतिरिक्तपना जो है सो स्वतंत्रताकरि चक्षुका अकिंचित्करपना है।

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पनिषत् ] त्रयोदश खंड १३ ४९१ द्वारपालादिगौणोपासन। हृदयमैं सुख्यब्रह्मोपासन ७ है।। तिस प्राणसैंहीं संबद्ध अरु अव्यतिरिक्त सो चँक्षु है। तैसैहीं सो आदित्य है "आदि- त्य बाह्यप्राण है" इसि श्रुतितैं। चक्षु अरु रू- पकी प्रतिष्ठाके क्रमसैं हृदयविषै स्थित है॥ "सो आदित्य किसविषै प्रतिष्ठित है ऐसैं? च- १५८

क्षुविषै" इत्यादि वाजसनेयक(बृहदारण्यक) विषै प्रीणवायुरूप देवताहीं एक आश्रयकरि स-

१५६ चक्षुसैं प्राणका संबंध नहीं है। जातैं बाह्यके ति- ससैं संबंधविषै कारण नहीं है ? तहां कहैहैं॥ इहां यह अर्थ है :- अधिष्ठाता होनेकरि आदित्य चक्षुविषै प्रतिष्ठित है औ चक्षु ग्राहक (प्रकाशक) होनेकरि रूपविषै प्रतिष्ठित हुया रूपके दर्शनविषै कारण होवैहै। तैसैंहीं प्राणकी च- स्षुरूपता है। १५७ प्राण अरु आदित्यकी एकताविषै प्रमाणकूं कहैहैं॥ इहाँ यथोक्त आदित्यकूं हृदयके सुषि (छिद्र)रूप द्वार स्था- नीपना कैसें है ? वासनारूपसैं प्रतिष्टित है तब इस क्रमसैं आदित्य हृदयविषै स्थित होवैहै। यह अर्थ है॥ १५८ तहां अन्य श्रुतिकूं प्रमाण करै हैं॥ १५९ एकदेवतासैं अभिन्न होनेतैं वी प्राणसैं अभेदकरि चक्षु अरु आदित्यका ध्यान युक्त है। ऐसैं कहैहैं॥ इहां आ- श्रयशब्दकरि रूप औ हृदय वा स्वर्गलोक कहियेहै।

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४९२ तृतीयप्रपाठक ३ [छान्दोग्यो- आदित्यादि पञ्चद्वारपाल गायत्री हृदयादिक ब्रह्मके उपासन १९, हित चक्षु अरु आदित्यरूप कहा है औ "प्रीण- केअर्थ स्वाहा" ऐसैं "अरु हुत जो हवि सो इस सर्वकूं तृप्त करैहै" ऐसैं आगे कहैगी॥ तिस इ- सकूं कहिये सो यह प्राणनामक स्वैर्गलोकका द्वारपाल होनेतैं ब्रह्म है ताकूं स्वर्गलोकके प्रति प्राप्त होनेकी इच्छावाला हुया पुरुष तेजरूप यह चक्षु आदित्यस्वरूपसैं है औ आदित्यकूं अन्नाद्य होनेतैं तेज अरु अन्नाद्य इन दोगुणों- करि उपासनकरै॥ तातैं तेरजस्वी अरु अ- १६० आदित्य दोचक्षुनका देव है तिसकरि अधिष्ठित (आश्रित) सर्वकी प्राणस्वरूपताविषै वाक्यशेषकूं अनुकूल क- रैहैं। इहां प्राणकेतृप्त हुये सर्वकी तृप्ति जो कही सो तादा त्म्यविना नहीं संभवैहै। यह आाव है॥ औ तिस इस प्रा- णनामक ब्रह्मकूं स्वर्गलोकके तांई प्राप्त होनेकूं इच्छता हुया पुरुष तेज अरु अन्नाद् ऐसे इन दो गुणोंकरि विशिष्ट उपा- सन करै। ऐसैं संबंध है। १६१ ऐसैं यथोक्त अधिकारी प्राणके उपासनविषै क्यूं उ- पयोगी होवैहै? तहां कहैहैं॥ १६२ तथापि यथोक्त दोगुणोंकरि विशिष्टपना प्राणनाम- चाले ब्रह्मकूं कैसें सिद्ध होवैहै? तहां तेजः शब्दकूं व्याख्यान करते हुये कहैहैं॥ इहां यह अर्थ है :- यह प्राणनामवाला ब्रह्म उभयरूपसैं तेजस्वी है। तैसें हुये तेजरूप गुणविशिष्ट

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पनिषत् ] त्रयोदश खंड १३ ४९३ द्वारपालादिगौणोपासन। हृदयमैं मुख्यब्रह्मोपासन ७ अथ योऽस्य दक्षिणः सुषिः सव्या- अर्थ :- अनंतर जो इसका दक्षिणसुषि न्नाद (रोगयुक्ततासैंरहित) होवैहै। जो ऐसैं जानताहै ताकूं यह गौणफल होवैहै औ उपा- सनसैं वशकिया द्वारपाल स्वर्गलोककी प्राप्तिका हेतु होवैहै। यह मुख्य फल है ॥ १ ॥ टीका :- अनंतर जो इस(हृदय)का द- होनेकरि सो उपासनाकूं योग्य होवैहै औ सूर्यका अन्नद (अ- न्नदाता)पना वृष्टिरूपसैं "आदित्यतैं वृष्टिहोवैहै" इत्यादिचा- क्यविषै देख्या है। यातैं अन्न अरु तिस आदिक। ऐसैं अन्य गुणकरि विशिष्टहोनेकरिबी सूर्यरूप प्राणनामवाला ब्रह्म ध्या- नके योग्य है।। १६३ तब मुख्यफल क्या है? सो कहैहैं॥ १६४ हृदयके पूर्वदिशाविषै स्थित छिद्रका संबंधी होने- करि प्राणकूं कहिके। व्यान। श्रोत्र अरु चंद्रमा ये तीन इ- तरसैं संबंधवाला उपास्य है। ऐसें कहैहैं॥ इहां वीर्यवाले कर्मकूं करता हुया चलताहै। ऐसें संबंधहै औ प्राण अपानके प्रति विरोधकरिके यह चलताहै यह अन्यपक्ष है अरु नाना कहिये स्कंधकी संधिरूप मर्मस्थलोंविषै विविध चलता है कहिये चेष्टा करताहै। यह अन्य विकल्प है ॥ तिसव्यानसैं श्रोत्रका संबंध श्रुतिउक्तहोनेतैं ध्यानअर्थ माननेकूं योग्य है॥ ४२

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४९४ तृतीयप्रपाठक ३ [छान्दोग्यो- आदित्यादि पञ्चद्वारपाल गायत्री हृदयादिक ब्रह्मके उपासन १९ नस्तच्छ्रोत स चन्द्रमास्तदेतच्छ्रीश्र यशश्चेत्युपासीत। श्रीमान्यशस्वी भव- ति य एवं वेद ॥ २ ॥ है। सो व्यान है। सो श्रोत्र है। सो चंद्रमा है।। तिस इसकूं "श्री अरु यश है" ऐसैं उपासन करै। जो ऐसैं जानता है [सो] श्रीमान् अरु यशस्वी होवैहै॥२॥ क्षिण सुषि (द्वाररूप छिद्र)है तिसविषै स्थित वायुविशेष सो वीर्यवाले कर्मकूं करताहुया प्राण अरु अपानकेप्रति विग्रह (विरोध) करिके वा नाना (विविध) चेष्टा करैहै यातैं व्यान है। तिससैं संबद्धहीं यह श्रोत्र इन्द्रिय है।9तैसैं सो चंद्रमा है"श्रोत्रसैं दिशा औ चंद्रमा सृजे हैं" १६५ जैसें श्रोत्रका व्यानसैं संबंध है तैसें चंद्रमाकेबी तिससैं संबंधकूं श्रुतिउक्तहोनेतैंहीं सो ध्यानअर्थ होनेकरि आ्रह्य है। ऐसें कहैहैं॥ १६६ श्रोत्र अरु चंद्रमाके संबंधविषै अन्य श्रुतिकूं अनु- कूल करैहैं॥ इहां जो "विराट्का श्रोत्र है तिसरूपसैं दिशा

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पनिषत् ] त्रयोदश खंड १३ ४९५ द्वारपालादिगौणोपासन। हृदयमैं मुख्यब्रह्मोपासन ७ इस श्रुतितैं। वे आश्रयसहित हैं। पूर्ववत् तिस इसकूं। श्री जो विभूति॥ श्रोत्र अरु चंद्रमाकूं ज्ञान अरु अन्नकीहेतुता है। यातैं तिन दोनूंकरि श्रीपना होवैहै औ ज्ान अरु अ- न्नवालेका यश (ख्याति) होवैहै ऐसैं यशके हेतु होनेतैं यशवान्पना है। यातैं तिन दोनूं गुणों- करि उपासन करै। इत्यादि समान है॥ २ ॥

अरु चंद्रमा ये स्रजे हैं" इस श्रुतितैं। यह अर्थ है। औ परस्पर संबंधविषैवी इन दोनूंकी व्यानरूपता कैसैं है ? "व्यानके तृप्त हुये" इत्यादि वाक्यशेषतैं सो निश्चय करनेकूं योग्य है।। तिस इस व्याननामवाले ब्रह्मकूं श्री अरु यश इन दो गुणोंकरि उपासनकरै। ऐसैं संबंध है॥ १६७ तिस दोगुणवालेका ध्यान कैसैं होवै है ? यह आ- शंकाकरिके। श्रोत्रकूं ज्ञानका हेतु होनेतैं अरु चंद्रमाकूं अ- न्नका हेतु होनेतैं तिन दोनूंकी आश्रयताके हुये। तिस स्व- रूप व्यानकूंबी तिसगुणवान्ताका संभव है। ऐसैं कहैहैं॥ १६८ व्याननामवाले ब्रह्मविषै अन्यगुणकूं साधते हैं। इहां उक्त ब्रह्मकूं दो गुणोंका संभव अतः (यातैं) शब्दका अर्थ है औ श्रीमान्। इत्यादि फलवाक्यआदिशब्दका अर्थ है औ समान है "तेजस्वी" इत्यादिवाक्यसैं। यह शेष है॥

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४९६ तृतीयप्रपाठक ३ [छान्दोग्यो- आदित्यादि पञ्चद्वारपाल गायत्री हृदयादिक ब्रह्मके उपासन १९ अथ योऽस्य प्रत्यङ् सुषिः सोऽ- पानः सा वाक् सोऽग्निस्तदेतद् ब्रह्मवर्च- अर्थ :- अनंतर जो इसका पश्िचमसुषि she she ह। सो अपान है। सो वाक् है। सो अग्नि । तिस इसकूं "ब्रह्मवर्चस अरु अन्नाद्य टीका :- अैनंतर जो इस हृदयका पश्च्िचिम सुषि है तिसविषै स्थित वायुविशेष सो मैलै- मूत्रादिककूं ले जाता हुया नीचे चलावताहै यातैं अपान है। सो (तैसी) वाक है। तिन- १६९ हृदयके पश्चिमदिशाविषै स्थित सुषिविषै संबंधवाला होनेकरि अपान वाक् अरु अग्नि ये तीन अन्योन्य संबंधवाले ध्यावनेकूं योग्य हैं। ऐसैं कहैहैं॥ १७० "सो अपान है" इस वाक्यके अर्थकूं कहैहैं॥ इहां सो अपान है। ऐसै संबंध है।। १७१ अपानशब्दकूं वायुविशेषविषै व्युत्पादनकरैहैं॥ इहां आदिशब्दकरि शुक (वीर्य) आदिक ग्रहणकरियेहै॥ १७२ जैसे चक्षुका अरु श्रोत्रका प्राणपना अरु व्यानपना कहा। तैसैं वाक् अपान होवैहै "अपानके तृप्त हुये" इत्यादि- श्रुतितैं। ऐसें कहैहैं। १७३ जैसे चक्षुआदिक द्वारकरि आदित्यआदिककी प्रा-

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पनिषत् ] त्रयोदश खंड १३ ४९७ द्वारपालादिगौणोपासन। हृदयमैं मुख्यब्रह्मोपासन ७ समन्नाद्यमित्युपासीत। ब्रह्मवर्चस्यान्ना- दो भवति य एवं वेद॥ ३ ॥

है" ऐसैं उपासन करै॥ जो ऐसैं जानता (उपासता)है [सो] ब्रह्मवर्चसी अरुअन्नाद होवैहै॥ ३ ॥

के संबंधतैं सो (तैसा) अग्नि है। तिस इसकूं ब्रह्मवर्चस होवैहै। वृत्त (सदाचार) अरु स्वा- ध्यायरूप निमित्तवाला जो तेज सो ब्रह्मवर्चस है। काहेतैं सँदाचार अरु स्वाध्यायके अग्निसैं

णादिरूपता कही। तैसैं वाणीके अधिष्ठातापनैंकरि संबंधतैं अग्नि तिसद्वारकरि अपान होवैहै। ऐसें कहैहैं॥ इहां तिस इस अपाननामवाले ब्रह्मकूं ब्रह्मवर्चस अरु अन्नाद्य इन दो गुणोंकरि विशिष्ट उपासनकरै। ऐसैं संबंध है।। १७४ ब्रह्मवर्चसकूं व्याख्यान करैहैं॥ १७५ अपाननामक ब्रह्मविषै कहा जो (ब्रह्मवर्चसरूप) गुण सो कैसैं सिद्ध होवैहै? यह आशंकाकरिके। अग्निद्वारा सिद्ध होवै है। ऐसैं कहैहैं॥

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४९८ तृतीयप्रपाठक ३ [छान्दोग्यो- आदित्यादि पञ्चद्वारपाल गायत्री हृदयादिक ब्रह्मके उपासन १९ अथ योऽस्योदङ् सुषिः स समान- अर्थ :- अनंतर जो इसका उत्तरसुषि है। संबंधतैं औ अन्नके ग्रसनका हेतु होनेतैं अपा- नकूं अन्नाद्यता है। अन्य समान है॥ ३ ॥ टीका :- अनंतर जो इस हृदयका उत्तर दिशागत सुषि है तिसविषै स्थित जो वायुवि- शेष सो भुँक्त पीतकूं सम लेजाताहै यातैं स- मान है। सो (तिसंसे संबद्द) मन (अन्तःक- १७६ तथापि ताका अन्नाद्यपना कैसें है? यह आशंका- करिके। अपानरूप द्वारसैं है। ऐसें कहैहैं॥ १७७ "ब्रह्मवर्चसी" इत्यादि जो फलवाक्य है सो। "श्रीमान्" इत्यादिवाक्यकरि तुल्यअर्थवाला होनेतें व्याख्या- नकी अपेक्षावाला नहीं है। ऐसें कहैहैं॥ १७८ पांचछिद्रवाले हृदयकमलके उत्तरदिशाके सुषि (छिद्र)सैं संबंधवाला होनेकरि समान मन अरु पर्जन्य (मेघ) ये तीन परस्पर संबंधवाले उपास्य हैं। ऐसें कहैहैं॥ इहां समान है। ऐसैं संबंध है। १७९ समान शब्दकूं वायुविशेषविषै व्युत्पादन करैहैं॥ १८० मनका समानवायुके साथि जो संबंध है सो "स- मानके तृप्त हुये" इत्यादि श्रुतितैं ग्राह्य है। ऐसें कहैहैं॥

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पनिषत् ] त्रयोदश खंड १३ ४९९ द्वारपालादिगौणोपासन। हृदयमैं मुख्यव्रह्मोपासन ७ स्तन्मनः स पर्जन्य: तदेतत्कीर्तिश्र व्यु- ष्टिश्चेत्युपासीत। कीर्तिमान् व्युष्टिमान् भवति य एवं वेद ॥४ ॥ सो समान है। सो मन है। सो पर्जन्य है।। तिस इसकूं "कीर्ति अरु व्युष्टि (कांति) है" ऐसैं उपासन करै।। जो ऐसैं जानताहै [सो]कीर्त्तिमान् अरु कांतिमान् होवैहै॥४॥ रण) है। सो पैर्जन्य (वृष्टिस्वरूप देव) है औ पर्जन्यरूप निमित्तवाली आप (जल) हैं "मैन- १८१ "मनके तृप्त हुये पर्जन्य तृप्त होवैहै" इस वाक्य- शेषकूं आश्रय करिके तिन दोनूंके संबंधकूं कहैहैं॥ १८२ अन्य श्रुतितैंबी तिनदोनूंके संबंधकूं कहनेकूं भूमि- काकूं कहैहैं॥ इहां शेष अर्थ जो है सो प्रसिद्धिके स्मरण अर्थ है।। १८३ तथापि पर्जन्य (वृष्टि) अरु मन इन दोनूंके संबं- धकी सिद्धि कैसैहै ? यह आशंका करिके। वायुकेबी कारण होनेकरि जलोंके साथि संबधतैं तिसद्वारा परस्परवी तिनके संबंधकी सिद्धि है।। ऐसैं कहैहैं॥ तिस इस समान नाम-

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५०० तृतीयप्रपाठक ३ [छन्दोग्यो- आदित्यादि पञ्चद्वारपाल गायत्री हृदयादिक ब्रह्मके उपासन १९ करि आप अरु वरुण स्नजे हैं" इस श्रुतितैं। तिस इसकूं कीर्त्ति कहिये मनेरूप ज्ञानकूं की- नतिरूप होनेतैं आपका परोक्ष विश्रुत (प्रख्यात)- पना कीर्तति (यश) है औ स्विंकरणोंकरि जानने योग्य विश्रुतपना जो है सो व्युष्टि कहिये काँ- न्ति (देहगत लावण्य) है औ तातैं कीर्ततिके संभवतैं कीर्ति होवैहै। अन्य समान है॥ ४॥ वाले ब्रह्मकूं कीर्ति औ व्युष्टि। इन दो गुणोंकरि उपासन करै। ऐसें संबंध है। १८४ इस ब्रह्मविषै कीर्त्तिरूप गुणकूं साधतेहैं॥ १८५ व्युष्टि शब्दतैं कीर्त्तिकी अन्य अर्थवान्ताकूं दि- खावै हैं॥ १८६ तिस कीर्तितैं [विलक्षण] व्युष्टिके [अर्थकूं] कहैहैं। १८७ तिसींहीं व्युष्टिकूं अनुभवविषै आरूढ़ होनेकरि क- थन करैहैं॥ १८८ननु फेर देहगतलावण्य(सुंदरता)की कीर्तिभावकरि स्तुति कैसैं शक्य हौवैहै? तहां कहैहैं ॥ इहां लावण्य ताते इस पंचमीका अर्थ है। ऐसें असंकीर्ण (परस्पर विलक्षण) दो गुणोंकरि विशिष्ट उपासन सिद्ध भया। यह अर्थ है। १८९ "कीर्ततिमान्" इत्यादि फलवाक्यकूं "ब्रह्मवर्चसी" इत्यादिवाक्यकरि तुल्यअर्थवाला होनेतें व्याख्यानकरनेकी अयोग्यताकूं कहैहैं।।

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पनिषत्] त्रयोदश खंड १३ ५०१ द्वारपालादिगौणोपासन। हृदयमैं मुख्यव्रह्मोपासन ७ अथ योऽस्योर्ध्वः सुषिः स उदानः स वायु: स आकाशस्तदेतदोजश्र मह- अर्थ :- अनंतर जो इसका ऊर्ध्वसुषि है। सो उदान है। सो वायु है। सो आकाश है।। तिस इसकूं "ओज अरु मह है" ऐसैं टीका :- अनन्तर जो इस हृदयका ऊर्ध्व सुषि है सो उदान है। पादतलसैं आरंभक- रिके ऊर्ध्व उक्रमणतैं औ उत्कर्षकेअर्थ कर्मकूं करता हुया चलताहै यातैं उदान है। सो वौयु अरु ताका आधार आकाश है।। तिस इसकूं १९० हृदयके ऊर्ध्वछिद्रकरि विशिष्ट होनेकरि उदान। वायु अरु आकाश। ये तीन परस्पर संबंधवाले उपास्य हैं। ऐसैं कहैहैं॥ इहां उक्रमणतैं उदान है॥ ऐसें संबंध है॥ १९१ "उदानके तृप्त हुये वायु तृप्त होवैहै" इस वाक्य- शेषकूं आश्रयकरिके कहैहैं॥ १९२ वायुकी आकाशरूपता। आधार आधेयरूप संबं- धतैं औ "वायुके तृप्त हुये आकाश तृप्त होवैहै ॥ इस श्रु- तितैं है। ऐसैं कहैहैं॥ तिस इस उदाननामवाले ब्रह्मकूं पू- र्वकीन्यांई ओज अरु मह। इन दोगुणोंकरि विशिष्ट उपासन करै। ऐसैं संबंध है।।

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५०२ तृतीयप्रपाठक ३ [छान्दोग्यो- आदित्यादि पञ्चद्वारपाल गायत्री हृदयादिक ब्रह्मके उपासन १९ श्चेत्युपासीतौजस्वी महस्वान्भवति य एवं वेद ॥ ५ ॥ ते वा एते पञ्च ब्रह्मपुरुषा: स्वर्गस्य उपासन करै।। जो ऐसैं जानता है [सो] ओजस्वी अरु महस्वान् (महत्तावान्) हो- वैहै ॥ ५ ॥ अर्थ :- वे प्रसिद्ध ये पंचब्रह्मपुरुष [हृद- ["ओज अरु मह है" ऐसैं उपासना करै] वीयु अरु आकाशकूं ओजके हेतु होनेतें ओज (बल) औ महत् (बडे) होनेतैं मह हैं। अन्य समान है ॥ ५ ॥ टीका :- वे ये यथोक्त पंच सुषिनके संबंधतैं १९५

पंच हृदयगत ब्रह्मके पुरुष हैं। वे द्वारविषै १९३ उक्त दोगुणोंकूं कीर्त्तन करैहैं॥ १९४ "ओजस्वी" इत्यादिवाक्यकी "कीर्तिमान्" इत्या- दिवाक्यकरि तुल्य अर्थताकूं कहैहैं॥ १९५ "तिसीहीं इस हृदयके" इत्यादिवाक्यकरि उक्त अ- र्थकूं अनुवाद करैहैं।

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पनिषत् ] त्रयोदश खंड १३ ५०३ द्वारपालादिगौणोपासन। हृदयमैं मुख्यब्रह्मोपासन ७ लोकस्य द्वारपाः सय एतानेवं पञ्च व्र- ह्मपुरुषान् स्वर्गस्य लोकस्य द्वारपान्वे- दास्य कुले वीरो जायते प्रतिपद्यते स्वर्ग यगत] स्वर्गलोकके द्वारपाल हैं॥ सो जो इन ऐसैं पंच ब्रह्मपुरुषरूप स्वर्गलोकके द्वारपालोंकूं जानताहै। इसके कुलविषै वीर जन्मताहै। स्वर्गलोककूं पावताहै। जो स्थित राजपुरुषनकीन्यांईं हृदयगत स्वर्गलो- कके द्वारपाल हैं। जाँतैं बहिर्मुख प्रवृत्तभये इन चक्षु श्रोत्र वाक् मन अरु प्राणकरि हृदयगत ब्रह्मकी प्राप्तिके द्वार निरुद्ध (रोके) होवै हैं। जातैं अजित करणवान्ताकरि बाह्य विषयविषै आ- संगरूप अनृतकरि आरूढ होनेतैं मन हृदय- स्थ ब्रह्मविषै स्थित होता नहीं यह प्रत्यक्ष है।

१९६ कैसें वे ब्रह्मके पुरुष हैं? तहां कहैहैं॥ इहां व्यप- देश (कीर्ति) करियेहै। यह अर्थ है॥ १९७ तिनकी द्वारपालताकूं प्रपंचन करैहैं॥ १९८ तहां स्वअनुभवकूं प्रमाण करैहैं॥ इहां यह अर्थ है :-

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५०४ तृतीयप्रपाठक ३ [छान्दोग्यो- आदित्यादि पश्चद्वारपाल गायत्री हृदयादिक ब्रह्मके उपासन १९ लोकं य एतानेवं पञ्च ब्रह्मपुरुषान्स्व र्गस्य लोकस्य द्वारपान्वेद॥ ६॥ इन ऐसें पंच ब्रह्मपुरुषरूप स्वर्गलोकके द्वा- रपालोंकूं जानताहै॥ ६ ॥ तातैं ये पंच ब्रह्मपुरुष स्वर्गलोकके द्वारपाल हैं। यह सत्य कहा ॥ थांतें सो जो इन ऐसैं य- थोक्त गुणविशिष्ट स्वर्गलोकके द्वारपालोंकूं उपासताहै कहिये उपासनाकरि वशकरता- विवेक अरु वैराग्यकरि वशीकृत श्रोतादि करणोंके ग्रामकरि युक्तताके अभावतैं परोक्ष शब्दादि विषयविषै आसंगरूप अनृतविशेषकरि आक्रांत (निरुद्ध) होनेतैं॥ १९९ विषयतैं विमुख इन करणोंकरिहीं ब्रह्मप्राप्तिके द्वार समाधि आदिककरि खुल्ले होते हैं। इस अभिप्रायकरि उप- संहार करैहैं॥ २०० उक्त ब्रह्मके पुरुषनकूं अनुवादकरिके सफल उपा- सनकूं दिखावैहें॥ इहां अनियमित चक्षु आदिकनकूं ब्रह्मक प्राप्तिकी प्रतिबंधकता है औ नियमित चक्षु आदिकनकूं तो तिसकी प्राप्तिकी हेतुता है। यह अतः (यातैं) शब्दका अथे है औ यथोक्त गुणोंकरि विशिष्टता जो है सो चक्षुआदिक- नकी आदित्यादिस्वरूपता है।।

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पनिषत्] त्रयोदश खंड १३ ५११ द्वारपालादिगौणोपासन। हृदयमैं मुख्यव्रह्मोपासन ७ होनेतैं औ भेदरहित होनेतैं [सर्व शब्दतैं ताकी प्रतीति नहीं है]। ॥ अनुत्तमोंविषै। इहां तैतपुरुष समासकी आशंकाकी निवृत्तिअर्थ श्रुति कहैहैः-"उत्तमलोकनविषै" ऐसैं॥ सत्यलोक- आदिकनविषै। हिरेण्यगर्भादि कार्यविषै स्थित परमेश्वरकूं समीप होनेतैं "उत्तमलोकनविषै"

यह अर्थ है :- सर्व शब्दकूं अनेक अर्थका वाच्य होनेतें औ आत्माविषै एकतातैं औ प्रकारभेदके नित्यमुक्त तिस आत्मा- विषै असंभवतैं ता आत्माकी सर्व शब्दतैं प्रतीति नहीं होवैहै॥ २१६ उत्तम जे नहीं होवैहैं वे अनुत्तम हैं। ऐसैं तत्पुरुष समासकी आशंकाके हुये। ताकी निवृत्तिद्वारा "नहीं हैं उत्तम जिनतैं वे अनुत्तम हैं। ऐसे जे उत्तम लोक तिनविषै" इसरीतिसैं बहुव्रीहि समासकी सिद्धि अर्थ "उत्तमोंविषै" यह श्रुतिउक्त विशेषण है। ऐसैं कहैहैं॥ २१७ क्यूं ऐसैं तिन लोकनविषै परब्रह्म निर्देशकरियेहै। ताकूं सर्वगत होनेतैं? यह आशंका करिके कहैहैं॥ इहां यह अर्थ है :- तिस कार्यरूपसैं स्थित परव्रह्म उत्तम लोकनविषै है ऐसें कहिये है। काहेतैं सर्वत्र विद्यमान जो परब्रह्म ताकूं सत्यलोक आदिकनविषै हिरण्यगर्भआदिकरूपसैं अतिशयकरि नित्य अभिव्यक्त (प्रकट) होनेतैं॥

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५१२ तृतीयप्रपाठक ३ [छान्दोग्यो- आदित्यादि पश्चद्वारपाल गायत्री हृदयादिक ब्रह्मके उपासन १९ ऐसें कहियेहै ॥ यहहीं सो है जो यह इस पुरुषविषै भीतर (मध्य)ज्योति चक्षु श्रोत्रकरि ग्राह्य लिंगसैं अरु उष्णिमा शब्दसैं जानियेहै औ जो त्वचाकरि स्पर्शरूपसैं ग्रहणकरियेहै सो चक्षुकरिहीं ग्रहणकरियेहै। काहेतैं तवैचाकूं दृढप्रतीतिकर होनेतैं औ रूपे अरु स्पर्शकूं अ- २१८ "जो" ऐसें सर्वनामकरि प्रकृत ब्रह्म ग्रहण करिये है ताकी उपास्यताअर्थ ताका संसारतैं उपररि अवस्थान कहा। अब कौक्षेय (कुक्षिरूप उदरगत) ज्योतिविषै ताकूं आरोप करैहैं।। २१९ कौक्षेय ज्योतिरूप प्रतीकविषै प्रमाणकूं दिखावै हैं॥ इहां "दर्शनीय (देखनेकूं योग्य) होवैहै" सो फल वचनके अनुसारकरि अध्यासकृत स्पर्श अरु रूपकी एकताकूं लेके उष्णिमा (उष्णस्पर्श)का चाक्षुष (चक्षुकरिग्राह्य)पना दे- खनेकूं योग्य है।। २२० रूप अरु स्पर्शकी एकताके अध्यासकूं स्पष्ट करैहैं। २२१ जो उष्ण तेज द्रव्यस्वरूप त्वक् इंद्रियकरि स्पर्शरू- पसें ग्रहणकरिये है। सो चक्षुकरिहीं ग्रहणकरियेहै। तहां हेतुकूं कहैहैं॥ इहां यह अर्थ है :- त्वचाकूं दृढ़ प्रतीतिविषै हेतु होनेतैं चक्षुके साथि तादात्म्यके आरोपतैं॥ २२२ जो रूपवाला होवैहै सो स्पर्शवाला है इस नियम- तैंबी रूप अरु स्पर्शके तादात्म्य अध्यासतैं ता स्पर्शकी चाश्ु- पताकी सिद्धि है। ऐसें कहैहैं॥

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पनिषत् ] त्रयोदश खंड १३ ५१३ द्वारपालादिगौणोपासन। हृदयमैं मुख्यव्रह्मोपासन ७ विनाभूत होनेतैं॥ ॥फेर तिस ज्योतिका लिंग जो है सो त्वचा अरु दृष्टिकी विषयताकूं कैसैं पावताहै? यह २कहैहैं :- जिस कालविषै यह [ऐसा ज्ञानरूप क्रियाविषै विशेषण है। यातैं यह ज्ञान जैसैं होवै तैसैं । इस शरीरविषै हस्तसैं स्पर्शकरिके स्पर्शसैं उष्णिमाकूं कहिये रूपैंके साथि होनेवाले उष्णस्पर्शके भावकूं जानता । सो उष्णिमा जातैं नामरूपके व्याकरण २२६

२२३ जिस ज्योतिका श्रुति गत शब्द अरु उष्णता लिंग है। तिस त्वक् इंद्रियकरि ग्राह्य ज्योतिके चाक्षुषपनैकूं उपपादन करनेकूं पूर्ववादी पूंछताहै॥ २२४ "ताकी यह दृष्टि" इत्यादि वाक्यकरि उत्तरकूं दि- खावते हुये सिद्धांती "जहां" इत्यादि वाक्यकूं व्याख्यान करैहैं॥ इहां यह अर्थ है :- जैसैं यह विज्ञान होवै तैसैं। इस रीतिसैं विज्ञानरूप क्रियाविषै विशेषण "एतत् (यह) " ऐसा पद है।। २२५ संस्पर्शकरि उष्णताकूं जब जानताहै तब ताका चाक्षुषपना कैसैं है ? यह आशंकाकरिके कहैहैं॥ २२६ ननु उपचारकरि (आरोपकरि ) किया उष्णताका चाक्षुषपना होहू। तथापि ताका लिंगपना कैसें है? यह आशंकाकरिके। जीवनरूपव्यवहारकी प्रतीति करावनेद्वारा

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५१४ तृतीयप्रपाठक ३ [छान्दोग्यो- आदित्यादि पश्चद्वारपाल गायत्री हृदयादिक ब्रह्मके उपासन १९ (स्पष्टीकरण)अर्थ अनुप्रविष्ट चैतन्यरूप आत्म- ज्योतिका लिंग है। अव्यभिचारतैं। जतैं जी- वते आत्माकूं उष्णिमा (उष्णता) व्यभिचारकूं नहीं पावैहै औ जातैं "उषणहीं जीवनेवाला होवैहै औ शीतलपुरुष मरनेवाला होवैहै" ऐसैं जानियेहै॥ औ मरेणकालविषै "तेज परदेव- ताविषै"ऐसैं परमात्माकेसाथि अभिन्नताके नि- श्चयतैं। यातैं अननिके धूमकीन्यांईं उष्णता अ- कौक्षेय (उदरगत) ज्योतिविषै तिस उष्णताकी लिंगरूप- ताकूं साधते हैं। २२७ जीवस्वरूपके साथि ता (उष्णता)के अव्यभिचार (सहभाविता)कूं स्पष्ट करैहैं॥ २२८ तहांही श्रुतिकूं कथन करैहैं॥ २२९ जब उष्णता जीवका लिंग है तव परमात्मज्योति- काबी सो लिंग होवैहै। काहेतैं जीव अरु परमात्माकी एक- ताके निश्चयतैं। ऐसें कहैहैं॥ इहां यह अर्थ है :- "चाक् आ- दिक मनविषै। मन प्राणविषै। प्राण तेजविषै। सो तेज परमात्मनामवाले अध्यक्षरूप परदेवताविषै प्राप्त होवैहै" इस याके षष्ठप्रपाठकगत श्रुतिवाक्यकरि जीवके तिस अर्थरूप परमात्माके साथि अभिन्नपनैके निश्चयतैं। जीवका जो लिंग है सो परमात्माका लिंग होवैहै॥

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पनिषत् ] त्रयोदश खंड १३ द्वारपालादिगौणोपासन। हृदयमैं मुख्यव्रह्मोपासन ७ ५१५

साधारण लिंग है। यांतैं तिसे परमात्माकी दृष्टि साक्षात्दर्शनकीन्यांईं है। अर्थ यह जो :- दर्शनका उपाय है। तैसैं तिस ज्योतिकी यह २३२

श्रुति (श्रवण) कहिये श्रवणका उपायबी उच्य- मान (कथनकिया) है। जब पुरुष ज्योतिके लिंगकूं सुननेकूं इच्छताहै। तब यह दोक-

२३० जब जीव अरु परव्रह्मकी यथोक्त लिंगतैं अवगति (ज्ञान) होवैहै। तब तहां ताके आश्रयरूप कौक्षेय ज्योतिकी निरंतर अवगति है। ऐसैं कहैहैं। २३१ उदरगत ज्योतिरूप प्रतीकविषै उष्णस्पर्शकी लिंग- ताके हुये जो लिंग है ताकूं कहैहैं। इहां यह अर्थ है :- प्र- तिमाविषै विष्णुके तादात्म्यकीन्यांई उदरगत ज्योतिकेसाथि परव्रह्मरूप ज्योतिके तादात्म्यतैं॥ २३२ प्रतीकद्वारा दृष्टि (दर्शन)के उपायकीन्यांई श्रवणके उपायरूप अन्य लिंगकू दिखावै हैं॥ इहां दो कणोंकूं ढांपिके सुनता है। ऐसैं संबंध है औ जैसे श्रवण यह होवैहै तैसैं सुनता है। इस रीतिसैं श्रवणरूप क्रियाका विशेषण "एतत् (यह)" शब्द है। ऐसैं योजना है औ निरोधकरिके याका ढांपिके। यह अर्थ है औ इधर सुननेमें आवता है जो शब्द ताके वाच्यार्थके भावके स्पृष्ट करनेअर्थ अनेक दष्टांतनका ग्रहण है।।

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५१६ तृतीयप्रपाठक ३ [छान्दोग्यो- आदित्यादि पञ्चद्वारपाल गायत्री हृदयादिक ब्रह्मके उपासन १९ णोंकूं ढांपिके [इधर "यह" ऐसा शब्द श्रवणरूप क्रियाका विषेशण है यातैं यह श्रवण जैसैं होवै तैसैं] यह अर्थ है। कहिये दो अंगुलिनसैं नि- रोधकरिके। निनदकीन्यांई कहिये रथकेघो- षकीन्यांई जो निनद(नाद) है ताकीन्यांई ब- लीवर्दके शब्दकीन्यांई जो शब्द है औ जैसैं बाहिर जलते अग्निका शब्द है [ताकीन्यां- ईू]। ऐसें शरीरकेभीतर सुनता है॥ तिस इस ज्योतिकूंदृष्टअरु श्रुतरूप लिंगवाला होनेतैं "दृष्ट अरु श्रुत है" ऐसें उपासनकरै। तैसैं उपा- २३४

सनतैं दर्शनीय अरु विश्रुत होवैहै॥ जो स्प- २३३ कौक्षेयज्योति विषै आरोपित ध्येयरूप ज्योतिके ध्यानके उपायके अंग होनेकरि दो गुणोंकूं उपदेश करैहैं॥ २३४ "दष्टकूं उपासन करै" ऐसें उक्त उपासनविषै फ- लकूं कहैहैं॥ २३५ "श्रुतकूं उपासन करै" ऐसें उक्त उपासनविषै फ- लकूं कहैहैं।। २३६ ननु फेर स्पर्शगुणवालेके उपासनविषै स्पर्श कर- नेकूं योग्य होवैहै ऐसें कहनेकूं योग्य हुये। दर्शनीय होवैहै। यह कैसैं कहिये है? तहां कहैहैं॥

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पनिषत् ] त्रयोदश खंड १३ ५१७ द्वारपालादिगौणोपासन। हृदयमैं मुख्यव्रह्मोपासन ७ ्गुणके उपासनरूप निमित्तवाला फल है ताकूं दर्शनीय होवैहै ऐसैं रूपविषै संपादन करैहै। काहेतैं रूपँ अरु स्पर्शकूं सहभावीहोनेतैं औ दैर्शनीयताकूं इष्ट होनेतैं॥ ऐसैं हुये विद्याका फल सिद्ध होवैहै परन्तु मृदुताआदिक स्पर्शवा- नताके हुये नहीं होवैहै॥ जो ऐसैं यथोक्त दो गुणोंकूं जानताहै। स्वर्गलोककी प्राप्ति तो उक्त

२३७ संपादनविषै निमित्तकूं कहैहैं॥ २३८ इसतैं "दर्शनीय होवैहै" यह फलवचन उचित है। ऐसैं कहैहैं। २३९ फलवचन विकल्पककूं नहि संपादन करैहै। ऐसें कहैहैं॥ इहां यह अर्थ है :- जब स्पर्श गुणवालेके उपासनरूप निमित्तवाला फल रूपविषै संपादन करियेहै। तब विद्याका सुन्या जो फल सो घटित होवैहै। ऐसे फलश्रुति अनुकूल- ताकूं प्राप्त होवै। काहेतें रूपविशेषवाले वस्तुविषै चक्षुष्य (दर्शनीय) शब्दकूं प्रसिद्ध होनेतैं। २४० जब फेर मृदुता आदिक स्पर्शगुणवालेके उपास- नरूप निमित्तका फल कल्पना करिये तब "दर्शनीय होवैहै" यह श्रवण किया फल घटित होवै नहीं औ तातैं फलश्रुति बाधित होवैगी। ऐसैं कहैहैं॥ २४१ तिसका यह फल है? इस अपेक्षाके हुये कहैहैं॥ २४२ ननु उदरगत ज्योतिविषै आरोपित उक्त गुणवाले ४४

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५१८ तृतीयप्रपाठक ३ [छान्दोग्यो- आदित्यादि पञ्चद्वारपाल गायत्री हृदयादिक ब्रह्मके उपासन १९ अथ तृतीयप्रपाठ०चतुर्दशः खंडः।।१४॥ सवे खल्विदं ब्रह्म तज्जलानिति शा- अथ श्री०मूलभाषा०तृतीयप्रपा०चतुर्दशः खंडः॥१४॥ अर्थ :- "सर्व यह ब्रह्म तज्जलान् है" ऐसैं अदृष्टफल है।। इहां दोवारकथन आदरकेअर्थ है।। ७ ।। इति श्री०भाष्यभाषा०तृतीयप्रपाठ०त्रयोदशः खंडः ॥१३॥। अथ श्री० भाष्यभाषा०तृतीयप्रपा० चतुर्दशः खण्ड:१४ सर्वदृष्टिसैं ब्रह्मोपासन औ मनोमयतादि आरोपसैं शांडिल्यविद्या ४ टीका :- फेर तिसीहीं तीनपादवाले अमृतरूप २४३

परमात्मज्योतिके ध्यानतैं यह अतिअल्प अननुसारी फल कैसैं उपदेश करियेहै? तहां कहैहैं ॥ इहां फलवाली विद्याविषै आदर विवक्षित है।। इति श्री०तृतीयप्रपाठकगतत्रयोदशखंडस्य टिप्पणम् ॥१३ ॥ अथ तृतीय प्रपाठकगतचतुर्दशखंडस्य टिप्पणम् १४ २४३ प्रतीक (प्रतिनिधि) द्वारा ब्रह्मके उपासनकूं कहिके प्रतीककूं छोडिके । अब सगुणब्रह्मके उपासनकूं उपन्यास करैहैं॥

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पनिषत् ] चतुर्दश खंड १४ सर्वदृष्टिसैं ब्रह्मोपासन औ मनोमयतादि आरोपसैं शांडिल्यविद्या ४ ५१९

न्त उपासीताथ खलु क्रतुमयः पुरुषो यथा क्रतुरस्मिँलोके पुरुषो भवति त- थेतः प्रेत्य भवति। स करतुं कुर्वीत॥१॥ शांत हुया उपासनकरै।। जातैं क्रतुमय पु- रुष है।। जैसे क्रतुवाला पुरुष इसलोकविषै होवैहै। तैसा इहांतैं मरिके होवैहै [यातैं] सो कतु (निश्र्चय)कूं करै ॥ १ ॥

अनंतगुणवाले अनंतशक्तिवाले अनेकभेदकरि उपास्य ब्रह्मके विशिष्ट गुण अरु शक्तिमानपनै- करि उपासनकूं विधानकरतीहुयी श्रुति कहै- है :- सर्व (समस्त) खलु [इहां "खल" ऐसा नि- २४४ ताके निरुपाधिकपनैकूं निषेध करैहैं॥ २४५ ननु एककूं अनेक गुणवान्पना कैसे है? तहां कहैहैं॥ २४६ ननु पूर्वहीं इस सगुणब्रह्मके उपासन कहे। तैसैं हुये कहनेकूं योग्य शेष नहीं है? यह आशंकाकरिके क- हैहैं॥ इहां यह अर्थ है :- गायत्रीआदिक उपाधिवाले अनेक भेदोंविषै उपास्यहुयेवी ब्रह्मके मनोमयता आदिक श्रेष्ठ गुण- वान्ताकरि औ श्रेष्ठ शक्तिमान्ताकरि अन्य उपासनके विधान- अर्थ उत्तरवाक्य है।

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५२० तृतीयप्रपाठक ३ [छान्दोग्यो- आदित्यादि पञ्चद्वारपाल गायत्री हृदयादिक ब्रह्मके उपासन १९ पातरूप शब्द जो है। सो वाक्यके अलंकार अर्थ है] यह नामरूपकरि विकारकूं पाया अरु प्रत्यक्षआदिक प्रमाणोंका विषय जो जगत् है सो ब्रह्म है कहिये कारणरूप है अत्यंतवृद्ध हो- नेतैं।। ॥ सैर्वकूं ब्रह्मपना कैसैं है? यह शंका- भई। यातैं कहैहैं :- तिसे ब्रह्मतैं तेज जल अरु अन्न (पृथ्वी) आदिकके कमसें सर्व उपज्या है २४७ तिस जगत्के इदंशब्दकरि ग्रहणविषै हेतुकूंकहैहैं। २४८ इस ब्रह्मशब्दकी निरुपाधिक अर्थरूप विषयवान्- ताकूं निषेध करैहें॥ २४९ ता जगत्का ब्रह्मपना कैसें है? तहां कहैहैं॥ इहां अत्यंत वृद्ध होनेतैं। याका निरतिशय महान् होनेतैं। यह अर्थ है।। २५० सर्वकूं अनुवादकरिके ताकी ब्रह्मरूपताके विधान- विषै प्रश्नपूर्वक युक्तिकूं कहैहैं॥ इहां तज् (तिसतैं जन्य) औ तल्ल (तिसविषै लीन होनेवाला) औ तदन (तिसविषै चेष्टा- करनेवाला) ऐसा जो यह सर्व जगत् सो "तजलान्" है इ- सविषै अंतके नकार अक्षरविषै अकार वर्णरूप अवयवका जो लोप है सो छांदस (वैदिकप्रयोग) है॥ २५१ तिनविषै जगत्के तज्ज (तिसतैं जन्य) पनैकूं व्युत्पा- दन करैहैं॥

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पनिषत् ] चतुर्दश खंड १४ ५२१ सर्वदृष्टिसैं व्रह्मोपासन औ मनोमयतादि आरोपसैं शांडिल्यविद्या ४

यातैं सो तज्ज (तिसतैं जन्य) है। तैसैं तिसीहीं २५२

जन्मके क्रमसैं प्रतिलोमताकरि (उलटे क्रमसैं) तिसीहीं ब्रह्मविषै लीन होवैहै कहिये तिसस्व- रूप होनेकरि मिलताहै यातैं सो तल् (ति- सविषै लीन होनेवाला) है। तैसैं तिसीहीं ब्रह्म- विषै स्थितिकालमैं अनता (चेष्टाकूं करता) है यातैं सो तदन् (तिसविषै स्थित) है॥ ऐसैं ज- २५५

गत् ब्रह्मस्वरूपताकरि तीनकालोंविषै समान है तिसतैं व्यतिरेककरि अग्रहणतैं। यातैं सो यह २५२ तल्ल (तिसविषै लीन) होनेकूं उपपादन करैहैं॥ इहां "विपर्ययकरि तो क्रम है यातैं" इसन्यायतैं प्रतिलोम- ताकरि जन्मके उलटे क्रमसैं तिस ब्रह्मविषैहीं जगत् लीन होवैहै। ऐसैं करिके जैसैं तज् है तैसैं। इसरीतिसैं योजना है॥ २५३ तहां लय नाम जगत्की शून्यता है? इस शंकाकूं निवर्त करैहैं॥ २५४ तदन (तिसविषै स्थित)पनैकूं प्रपिपादन करैहैं॥ इहां तैसैं। याका। जैसै तज अरु तल्ल है। तैसैं तदन ज- गत् है। यह अर्थ है औ यातैं सो तदन है। यह शेष है॥ २५५ युक्तिसिद्ध अर्थकूं निगमन करैहैं॥ इहां ब्रह्मसैं व्यतिरेककरि तीन कालोंविषैबी जगत्के अग्रहणतैं तिसरूप होनेकरि समान जो जगत् सोई होवैगा। ऐसैं योजना है॥

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५२२ तृतीयप्रपाठक ३ [छान्दोग्यो- आदित्यादि पञ्चद्वारपाल गायत्री हृदयादिक ब्रह्मके उपासन १९ जगत् है। औ जैसें यह है सोई एक अद्वितीय २५६

है। तैसैं षष्ठ प्रपाठकविषै विस्तारकरि हम क- हैंगे॥। औ जातें सर्व यह ब्रह्म है यातैं शांत कहिये रागद्वेषादि दोषनसैं रहित संयत (नि- यमित) हुया जो सो सर्व ब्रह्म है ताकूं वक्ष्य- माण गुणोंकरि उपासन करै॥ ॥ कैसैं उपा- सनकरै किः-कतुकूं करै। कहिये कतु जो नि- श्रय (अध्यवसाय) "ऐसैंहीं है अन्यथा नहीं" ऐसा अविचलप्रत्यय। तिस करतुकूं करै (उपासन करै) ऐसें अंतरायरहितपदसैं संबंध है।। = २५६ युक्तिसिद्ध बी जगत्का ब्रह्मभाव प्रत्यक्षादि प्रमा- णोंकरि विरुद्ध अंगीकारकूं योग्य होता नहीं। जातैं द्वैतस- हित वस्तु अद्वितीय होनेकूं युक्त नहीं है ? यह आशंका- करिके कहैहैं। २५७ सर्वके ब्रह्मभावके हुये फलितकूं कहैहैं॥ २५८ कितनैं कालपर्यत प्रत्यय (वृत्ति)कूं आवर्तन करै? इस आकांक्षापूर्वक। तत्वके निश्चयपर्यत उपास्याकारवृत्तिकूं आवर्तन करै। ऐसैं दिखावनेकूं अंतरायसहित वाक्यकूं प्रक- टकरिके व्याख्यान करैहैं। इहां "उपासनकूं करै" इस प- दका "ऋतुकूं करै" इस अंतरायवाले पद्सैं संबंध है। ऐसे योजना है।

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पनिषत् ] चतुर्दश खंड १४ ५२३ सर्वदृष्टिसैं ब्रह्मोपासन औ मनोमयतादि आरोपसैं शांडिल्यविद्या ४ फेर कतुके करनेसैं क्या प्रयोजन कर्त्तव्य है। वो सो क्रतु कैसैं कर्तव्य है। औ कतुका करण अभिप्रेत (वांछित) अर्थकी सिद्धिका साधन कैसैं होवैहै? इस अर्थके प्रतिपादन अर्थ "अथ" इत्यादि ग्रंथ है :- [ इहां "अथ खल" यह हेतुके अर्थ है] जातैं क्रतुमय कहिये ऋतुबहुल (निश्चयात्मक) पुरुष (जीव) है। यथाक्रतु क हिये जैसा क्रतु (निश्चय) उसका है सो यह

२५९ कतुके अनुष्ठानके फलकूं पूर्ववादी पूंछताहै॥ २६० तहां ऋतुका करण किसप्रकारसैं होवैहै? ऐसें अन्य प्रश्नकूं दिखावै हैं॥ २६१ ऋतुके करणकूं ब्रह्मभावका साधन होनेतें फलका प्रश्न नहीं है? यह आशंकाकरिके कहैहैं ॥ इहां यह भाव है :- जातैं स्थित वा नष्ट जीवका सद्ाव संभवै है॥ २६२ ऋतुके कारणका यह प्रयोजन है औ सो कतु ऐसैं करियेहै वा ताका करण इसरीतिसैं ब्रह्मके सन्भावकूं साधता है। इस अर्थके समूहके प्रतिपादनअर्थ खंडकी समाप्तिपर्यत "अथ खलु (यातैं)" इत्यादिरूप उत्तर ग्रंथ है। ऐसें सिद्धांती कहैहैं॥ २६३ "अथ खलु" इस ठिकाने पूर्वकीन्यांई [वाक्यके अलंकारअर्थ] "खलु" शब्द है अरु "अथ" शब्द तो हेतु अर्थ है। यातैं इहां हेतुरूप अर्थकूं विवरण करैहैं ॥

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५२४ तृतीयप्रपाठक ३ [छान्दोग्यो आदित्यादि पञ्चद्वारपाल गायत्री हृदयादिक ब्रह्मके उपासन १९ यथाक्रतु है कहिये जैसे निश्चयवाला इस लो- कविषै इहां (वर्त्तमान देहमें) जीवताहुया पु- रुष होवैहै। तैसीं इस देहतैंमरिके(वियोगकूं पायके)होवैहै। अर्थ यह जोः-कतु जो निश्चय तिसके अनुसारि फलस्वरूप होवैहै॥ ऐसें जातैं यह शास्त्रविषै देख्या है "जिस जिसबी भावकूं निश्रयकरि स्मरण करताहुया अंतविषै कलेवरकूं त्यागताहै तिसी तिसीहींकू पावताहै" इत्यादि। जीतैं ऐसी व्यवस्था शास्त्रविषै देखी है यातैं २६४ यद्वा "अथ" ऐसें आरंभकरिके "पुरुष" इहांपर्यत जो ग्रंथ है। सो हेतु अर्थ है ऐसें कहिके। तिसीहीं हेतुरूप अर्थकूं दिखावै हैं। इहां "जैसैंकतुवाला है" इस पदतैं नीचे "तातैं" शब्द देखनेकूं योग्य है। २६५ "इसलोकविषै" इसश्रुतिकूं लेके व्याख्यान करैहैं॥ इहां इसवर्त्तमान देहविषै जीवताहुया। यह अर्थ है।। २६६ ऋतुके करणसें क्या कर्त्तव्य फल है? या प्रश्नकूं व्याख्यान करैहैं॥ २६७ पुरुषकी ऋतुके अनुसारी फलस्वरूपताविषै स्म- तिकूं कथन करैहैं। २६८ गीतास्मृतिरूप शास्त्रकूंहीं उदाहरण करैहैं॥ २६९ वा कैसें ऋतु (निश्चय) कर्त्तव्य है! इस प्रश्नके तांई

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पनिषत् ] चतुर्दश खंड १४ ५२५ सर्वदृष्टिसैं ब्रह्मोपासन औ मनोमयतादि आरोपसैं शांडिल्यविद्या ४ मनोमयः प्राणशरीरो भारूपः स- त्यसङ्कल्प आकाशात्मा सर्वकर्मा सर्व-

अर्थः-मनोमय प्राणरूप शरीरवाला प्रभारूप सत्यसंकल्प आकाशकी न्यांई आ- त्मा(स्वरूप)वाला सर्वकर्मवाला सर्वकाम-

सो ऐसें जानताहुया जैसें करतु (निश्चय)कूं हम २७१

कहैंगे तिस क्रतुकूं करै। जातैं ऐसैं शास्त्रके प्रामाण्यतैं क्रतुसैं अनुसारि फल संभवैहै। यातें सो ऋतु करनेकूं योग्य है॥ १ ॥ टीका :- कैसैं किः-मनोमय कहिये मनःप्राय २७२

प्रत्युत्तरकूं कहैहैं।। इहां क्रतु अनुसारि फलस्वरूप पुरुष होवैहै। इसरूपवाली व्यवस्था है। यह अर्थ है औ ऐसैं जानताहुया। याका कतु अनुसारि फल होवैहै। ऐसैं शा- स्त्रतैं देखताहुया। यह अर्थ है।। २७० कौंन यह कतु है? यह आशंकाकरिके कहैहैं॥ २७१ "सो ऋतुकूं करै" या वाक्यके अर्थकूं निगमन करैहैं॥ २७२ ऋतुके करनेके प्रकारकूंहीं प्रश्नपूर्वक प्रकट करैहैं।

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५२६ तृतीयप्रपाठक ३ [छान्दोग्यो- आदित्यादि पञ्चद्वारपाल गायत्री हृदयादिक ब्रह्मके उपासन १९ कामः सर्वगन्ध: सर्वरसः सर्वमिदमभ्या- त्तोऽवाक्यनादरः ॥ २ ॥ वाला सर्वगंधोंवाला सर्वरसोंवाला औ सर्व इसकेप्रति अभिव्याप्त अवाकी अरु आद- ररहित है॥ २॥ (मनकी बहुलतावाला)। मैनैन करताहै इस- करि सो मन है। सो मन स्ववृत्तिकरि विषयन- विषै प्रवृत्त होवैहै। तिस मनकरि तन्मय (म- नोमय) है। तैसैं तिसप्राय (मनकी बहुलता- २७३ यह मनःप्रायपना कैसे है? इस अपेक्षाके हुये मनः- शब्दके अर्थके दिखावनेपूर्वक तिसप्रायता (मनकी बहुलता) कूं बोधन करैहैं॥ इहां यह अर्थ है :- मनद्वारा तिस उपा- धिवाला पुरुष विषयनविषै तत्पर होवैहै॥ २७४ तिसप्रायताके फलकूं कहैहैं॥ इहां जातैं पुरुष तिसप्राय (मनोबहुल) हुया मनके प्रवर्त्तमान हुये आप बी ताकीन्यांईहीं प्रवृत्तकीन्यांई देखियेहै। औ तैसें मनके नि- वर्त्तमान हुये निवृत्तकीन्यांई जानियेहै। वस्तुतैं तो पुरुष न प्रवृत्त है वा न निवृत्त है। काहेतैं "ध्यावतेहुयेकीन्यांई" इत्यादिश्रुतितैं। यह अर्थ है औ याहींतैं। याका मनोमय हो-

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पनिषत्] त्रयोदश खंड १३ द्वारपालादिगौणोपासन। हृदयमैं मुख्यव्रह्मोपासन ७ ५०५

है। सो राजद्वारपालोंकूं उपासनासैं वशकरिके राजाकीन्यांईं। तिनकरि अवारित हुया हद -. यगत ब्रह्मरूप स्वर्गलोककूं पावताहै॥ किवी :- इस विद्वानके कुलविषै वीर पुत्र उपजताहै वीर पुरुषनके सेवनतैं। औ ता(पुत्र)कूं ऋणके २०२

दूरि करनेकरि ब्रह्मकी उपासनाविषै प्रवृत्तिकी हेतुता है औ तातैं परंपरासैं स्वर्गलोककी प्रा- सिअर्थ होवैहै। यातैं स्वर्गलोककी प्राप्ति हीं एक फल है ॥ ६ ॥

२०१ अदष्ट फलकूं कहिके। अब दष्टफलकूं कहैहैं॥ २०२ यथोक्त पुत्रकी उत्पत्ति जो है सो विवक्षित व्र- ह्मकी प्राप्तिविषै उपयोगी नहीं है ? यह आशंकाकरिके क- हैहैं।। इहां पुत्रकूं ध्यानकी अनुसारिताकी हेतुता जो है सो ततः (तातैं) शब्दका अर्थ है औ परंपराकरि। याका उपास- नाद्वारा। यह अर्थ है।।

२०३ पुत्रकी ध्यानद्वारा ब्रह्मप्राप्तिविषै हेतुताके हुये फ- लितकूं कहैहैं॥ ४३

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५०६ तृतीयप्रपाठक ३ [छान्दोग्यो- आदित्यादि पश्चद्वारपाल गायत्री हृदयादिक ब्रह्मके उपासन १९ अथ यदतः परो दिवो ज्योतिर्दी- अर्थ :- यातैं जो उस स्वर्गलोकतें पर ज्यो- टीका :- अनंतर जो यह विद्वान् स्वर्गलो- ककूं वीर पुरुषके सेवनतैं पावताहै औ जो क- हाकि :- "तीन पादवाला इसका अमृत प्रका- शरूपविषै [स्थित] है" ऐसें सो यह लिंगकरि २०४ गायत्री उपाधिवाला ब्रह्म उपास्य है। तिस अर्थ होनेकरि द्वारपालोंकी उपासना कर्त्तव्य है। औ तातैं अंगो- विषै श्रुत फलोंकूं ग्रहणकरिके प्रधान उपासनतैंहीं ब्रह्मकी प्राप्ति होवैहै ऐसें कहा। अब अन्य विद्याकूं प्रसंगविषै प्राप्त करैहैं॥ २०५ स्वर्गतैं पर दीप्तिमान् ब्रह्मकूं कौक्षेय ज्योतिरूप प्र- तीकविषै आरोपकरिके दष्टपनैं अरु श्रुतपनैंकरि उपासन क- रनेकूं योग्य है। तिस श्रुतिउक्त अर्थकूं सिद्धकीन्यांई करिके। अब आर्थिक (अर्थतैं प्राप्त) अर्थकूं लेके तात्पर्यकू कहैहैं। इहां वीर्यवाले आदित्यादिक पुरुष तिनके सेवनतैं कहिये आध्यानतैं। यह अर्थ है औ लिंगसैं। याका स्पर्शविशेषसे अरु श्रवण विशेषसैं। यह अर्थ है औ चक्षुकूं श्रोत्र इंद्रियका गोचर। याका मेरी दृष्टिके प्रति मैंनें देख्या अरु सुन्या है ऐसें संपादन करनेकूं योग्य है। अन्यथा दृष्टपनैंकरि अर श्रुतपनैंकरि ब्रह्मविषै ध्यानकी प्रसिद्धितैं। यह अर्थ है॥

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पनिषत् ] त्रयोदश खंड १३ ५०७ द्वारपालादिगौणोपासन। हृदयमैं मुख्यब्रह्मोपासन ७ प्यते विश्वतः पृष्ठेषु सर्वतःषृष्ठेष्वनुत्तमे- घूत्तमेषु लोकेष्विदं वाव तद्यदिदमस्मि-

ति दीप्यमान है विश्वतो एष्ठ कहिये सर्वतैं पष्ठ औ अनुत्तम ऐसे उत्तम लोकनविषै है।

चक्षु अरु श्रोत्र इन्द्रियका विषय संपादन कर नेकूं योग्य ह। जैसैं धूमादिलिंगकरि अभनि आदिक है। तैसैं।। जातैं "ऐसैंहीं यह है" ऐसी २०७

२०६ परके अनिश्चयके हुये लिंगकरि प्रतीतिकरावनेविषै दृष्टांतकूं कहैहैं॥ इहां यह अर्थ है :- विवाद्युक्तके प्रति धूम- आदिक लिंगसैं अभ्निआदिक प्रतीति कराइये है। तैसैं स्पर्शादि लिंगकरि द्ष्टपनै आदिककररि विशिष्ट यह प्रतीति करावनेकूं योग्य है।। २०७ उक्त ज्योतिका लिंगकरि निश्चयकरावना क्यूं करि- येहै? तहां कहैहैं। इहां यह अर्थ है :- लिंगद्वारा ताकी प्रती- तिके हुये दोगुणोंकरि विशिष्टहीं यह ज्योति है अन्यथा नहीं। ऐसैं यथोक्त उपास्य ज्योतिरूप परब्रह्मविषै दृढ बुद्धि होवै। ताके अभानतैं तिस गुणवाले ज्योतिके अ- ध्यानतैं॥

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तृतीयप्रपाठक ३ [छान्दोग्यो- आदित्यादि पश्चद्वारपाल गायत्री हृदयादिक ब्रह्मके उपासन १९ न्नन्तः पुरुषे ज्योतिस्तस्यैषा दृष्टिर्यत्रै- तदस्मिञ्छरीरे सरस्पर्शो नोष्णिमानं विजानाति। तस्यैषा श्रुतिर्यत्रैतत्कर्णा- यहहीं सो है। जो यह इस पुरुषविषै ज्यो- ति है। तिसकी यह दृष्टि (दर्शन) है। जहां यह (ज्ञान) जैसैं होवे तैसैं इस शरीरविषै संस्पर्शकरि उष्णिमाकू जानताहै। तिस- की यह श्रुति (श्रवण) है। इहां यह (श्र- यथोक्त अर्थविषै दृढ प्रतीति होवै औ अनन्य- भावकरि निश्चय होवे ऐसें है। यातैं कहैहैं :- २०८ ननु यथोक्त गुणवाले परमात्मज्योतिका अशेष उपासन मति होहू ? यह आशंका करिके कहैहैं॥ इहां यह अर्थ है :- कौक्षेय (उदरगत) ज्योतिके संनिकर्ष (समीपता)तै जीवसें अभेद कल्पना करिके "जाठर (उद्रगत) ज्योति ब्रह्म है" ऐसें अनन्यभावकरि ध्यानके हुये जीव ब्रह्मका एकता- करि निश्चय अर्थतैं सिद्ध होवैहै॥ यातैं यथोक्तउपासना अर्थवाली है।। २०९ अथशब्दकी अन्यविद्याके आरंभरूप अर्थवान्ताकूं

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पनिषत् ] त्रयोदश खंड १३ ५०९ द्वारपालादिगौणोपासन। हृदयमैं मुख्यब्रह्मोपासन ७ वपि ग्ृह्य निनदमिव नदथुरिवाग्नेरिव ज्वलत उपशृणोति। तदेतद् दृष्टञ्च वण) जैसैं होवै तैसैं दो कणोंकूं ढांपिके नि- नद (रथके घोष)की न्यांई अरु बलीबईके शब्दकी न्यांई अरु जलते अग्निके [शब्द] की न्यांई सुनताहै। तिस इसकूं "दृष्ट अरु

जो उस स्वर्गलोकतैं पर [लिंगके पलटाव- नेकरि २पैरं ऐसा] ज्योति कहिये सदा प्रका- शरूप होनेतैं स्वैयंप्रभ जो है सो प्रकाश कर- तेहुयेकीन्यांईं प्रकाश करैहै ऐसैं कहियेहै। काहेतैं अभि आदिककीन्यांई जलनेके क्षणवा- अंगीकारकरिके अनंतरग्रंथके तात्पर्यकूं कहिके अवाशेष्ट अ- क्षरोंकूं अवतार देके व्याख्यान करैहैं॥ २१० "जो" ऐसें उपकमकरि "ज्योति" ऐसें उप- संहारतैं "पर" ऐसें पुल्लिंगके अप्रयोगकूं आशंकाकरिके कहैहैं।। २११ कदाचित् होनेवाली प्रकाशकताके अभावतैं "प्रदीश होताहै" ऐसा प्रयोग कैसे करियेहै! तहां कहैहैं॥ २१२ ननु प्रदीप होतेकीन्यांई ऐसैं काहैतैं प्रयोग करि-

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५१० तृतीयप्रपाठक ३ [छान्दोग्यो- आदित्यादि पञ्चद्वारपाल गायत्री हृदयादिक ब्रह्मके उपासन १९ श्रुतञ्चेत्युपासीत। चक्षुष्यः श्रुतो भवति य एवं वेद य एवं वेद ॥ ७॥ इति तृतीयप्रपाठकस्य त्रयोदशः खंडः॥ १३ ॥ श्रुत है" ऐसें उपासनकरै। दर्शनीय अरु विश्रुत (प्रख्यात) होवैहै। जो ऐसैं जानता है। जो ऐसैं जानताहै॥ ७॥ इतिश्री०मूलभा०तृतीयप्रपा०त्रयोदशःखंड: १३ ली दीप्तिके असंभवतैं ।। इहां विश्वतैं पृष्ठन- विषै। याका व्याख्यान :- सर्व ओरतैं पष्ठन- विषै ऐसें है। अर्थ यह जो :- संसारतैं उपरि है। संसारहीं जातें सर्व है। औ असंसारीकूं एक येहै। मुख्यहीं दीप्यमानता क्यूं नहीं होवैगी ? यह आशं- काकरिके कहैहैं॥ इहां हेतुका दोनूंओर संबंध है॥। २१३ सर्व शब्दकूं असंकुचित अर्थविषै वर्त्तनेवाला हो- नेतें आत्माकूंबी तिसकरि गृहीत होनेतें तिसतैं ऊर्ध्व ब्रह्म है यह कैसें घटित होवैगा? यह आशंकाकरिके कहैहैं॥ २१४ तिसीहीं (संसार)की सर्व शब्दकी वाच्यताकूं उप- पादन करैहैं॥ इहां तिसी (संसार) कूं अनेक होनेकरि सरव शब्दके योग्य होनेतैं। यह अर्थ है।। २१५ आत्माविषै सर्व शब्दके असंभवकूं कहैहैं। इहां

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पनिषत् ] चतुर्दश खंड १४ ५२७ सर्वदृष्टिसैं व्रह्मोपासन औ मनोमयतादि आरोपसैं शांडिल्यविद्या ४ वाला) हुया प्रवृत्तकीन्यांई अरु निवृत्तकी न्यांई होवैहै॥ याहींतैं प्राणशरीर है। प्राण जो लिंगस्वरूप विज्ञान अरु क्रियारूप दो श- क्तिनकरि मिलित है "जो प्रसिद्ध प्राण है सो प्रज्ञा है। वा जो प्रज्ञा है सो प्राण है" इस श्रुतितैं। सो प्राण है शरीर जिसका ऐसा जो ईश्वर सो प्राणशरीर है औ "मैनोमय प्राण- रूप शरीरका नेता (नायक) है" इस अन्य श्रुतितैं॥ औ भारूप है। भा जो चैतन्यल- क्षणवाली दीप्ति। सो है रूप जिसका सो भा- नेतैंहीं। यह अर्थ है औ संमूर्छितपना कहिये संपिंडित (मि- लित)पना। २७५ विज्ञानशक्तिके अरु क्रियाशक्तिके एकहीं लिंगात्मा- विषै मिलितपनैंमैं अन्यश्रुतिकूं प्रमाण करैहैं। २७६ यथोक्त दो विशेषणोंविषै अथर्वणवेदकी श्रुतिकूं प्र- माण करैहैं॥ इहां यह अर्थ है :- मनकी वृत्तिनकरि भासमान होनेतैं आत्मा मनोमय है। प्राणहीं प्रत्यगात्माका सूक्ष्मश- रीर है "औ तिसका यह स्थूलदेहतैं अन्यदेहकेप्रति ले जा- नेवाला है" इस अथर्वणवेदकी श्रुतितैं आत्माविषै दो वि- शेषणोंकी सिद्धि है॥ इहां यह अर्थ है :- इहां मनोमय अरु प्राणशरीर। ये दो विशेषण जीवगतबी तिसके अभेदकी वि- वक्षाकरि ब्रह्मविषै देखनेकूं योग्य हैं॥

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५२८ तृतीयप्रपाठक ३ [छन्दोग्यो- आदित्यादि पञ्चद्वारपाल गायत्री हृदयादिक ब्रह्मके उपासन १९ रूप है॥ औ सत्यसंकल्प है। सत्य (अवितथ) है संकल्प जिसके सो यह सत्यसंकल्प है। इहां यह अर्थ है :- जैसा संसारी (जीव)का संकल्प है तैसा अनैकांतिक (व्यभिचारी) फलवाला संकल्प ईश्वरका नहीं है। अनृतस्व- रूप मिथ्या फलवान्तारूप हेतुकरि हृत (हत) होनेतैं संकल्पकूं मिथ्या फलवान्ता है। यातैं "अनृतकरि हृत (स्वरूपतैं निकासे) हुये " ऐसैं आगे अष्टमविषै श्रुति कहैगी॥ औ आ- काशात्मा है। आकाशकी न्यांईं आत्मा (स्व- रूप) जिसका है सो आकाशात्मा है। ईश्वरकूं सर्वगतपना अत्यंतसूक्ष्मपना अरु रूपादिर- २७७ "सत्यसंकल्प है" इस वाक्यविषै विशेषणकरि ध्वनित (सूचित) अर्थकूं दिखावै हैं॥ इहां इव शब्द तथा (तैसैं) अर्थवाला है। २७८ संसारीके संकल्पकूं व्यभिचारी फलवानूपना कैसे है? तहां कहैहैं॥ २७९ संकल्पके अनृतकरि संसारीविषै हतपनैमें वाक्य शेषकूं प्रमाण करैहैं॥ २८०जड अजडरूप आकाश अरु इतर (परमात्मा)की तुल्यता नहीं है? यह आशंकाकरिके कहैहैं॥

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पनिषत्] चतुर्दश खंड १४ सर्वदृष्टिसैं ब्रह्मोपासन औ मनोमयतादिआरोपसैं शांडिल्यविद्या ४ ५२९

हितपना जो है सो आकाशकी तुल्यता है।। औ सर्वकर्मा है। सैर्व कहिये विश्व (संपूर्ण) तिस ईश्वरकरि करियेहै ऐसा जो जगत् सो सर्वकर्म है। सो सर्व कर्म इसका है ऐसा जो ई- श्वर सो सर्वकर्मा है "सोई सर्वका कर्त्ता है" इस श्रुतितैं॥। औ सर्वकाम है। सर्व काम दोर्षरे- हित जिसके हैं ऐसा जो ईश्वर सो सर्वकाम है "झूतनविषै धर्मसैं अविरुद्ध काम मैं हूं" इस गीतास्मृतितैं॥ ॥ नेतु काम मैं हूं"। इस व- चनतैं इहां "सर्वकाम (सर्वकामवाला)" ऐसैं बहुव्रीहि समास नहीं संभवैहै ? यहं कथन बने

२८१ ननु "सर्वकर्मा (सर्वकर्मवाला)" ऐसें ईश्वरकूं सर्व क्रियाकी आश्रयता कहियेहै। सो अयुक्त है । काहेतैं नि- ष्क्रियताकी श्रुतितैं? यह आशंकाकरिके व्याख्यान करैहैं॥ २८२ संसारीनतैं ईश्वरके विशेषकीसिद्धिअर्थविशेषण देते हैं॥ २८३ उदाहरणकरी स्मृतिकूं आश्रय करिके उक्त अर्थके- प्रति पूर्ववादी आक्षेप करैहै। २८४ परमात्मासैं कामके सामानाधिकरण्य (एकत्व)विषै वाधक (दोष)की प्रतीतितैं बहुव्रीहि समासहीं है। ऐसैं सि- द्धांती परिहार करैहैं। इहां यह अर्थ है :- ता कामकूं कार्य- ४५

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५३० तृतीयप्रपाठक ३ [छान्दोग्यो- आदित्यादि पञ्चद्वारपाल गायत्री हृदयादिक ब्रह्मके उपासन १९ नहीं :- काहेतैं कामकूं शब्द आदिककी न्यांई कर्त्तव्य होनेतैं औ [कर्मधारय समासकेहुये] देवकूं परार्थता (परतंत्रता) के प्रसंगतैं। तातैं जैसैं इहां( श्रुतिविषै) "सर्वकाम " ऐसैं बहुव्रीहि समास है। तैसैं "काम मैं हूं" इस स्मृतिका अर्थ कहनेकूं योग्य है॥ औ सर्वगंध है। सर्व गंध सुरखकर इसकूं हैं सो यह सर्वगंध है "पृथिवीविषै पुण्यगंध [मैं हूं]" इस स्मृ- रूप होनेतैं तिसकेसाथि एकताके हुये ब्रह्मकी अनादिता बा- धकूं पावैगी औ कामकूं चेतनरूपकरि शेष होनेतैं तिसके साथि एकताके हुये ब्रह्मकी स्वतंत्रता नष्ट होवैगी। ऐसैं हुये कर्मधारय समासके असंभवतैं इहां बहुव्रीहि समासहीं है॥ २८५ ननु तव "काम मैं हूं" यह तादात्म्य (काम अरु ईशवरकी एकता)की स्मृति (गीताकी उक्ति) कैसें है? यह आ- शंकाकरिके कहैहैं ।। इहां यह अर्थ है :- काम अरु ईश्वरके मुख्यसामानाधिकरण्य (बाधकिये-विना स्वरूपसैं एकता)के असंभवतैं प्रकृतश्रुतिविषै जैसैं बहुव्रीहि समास इष्ट है। तैसे स्मृतिविषैबी ब्रह्मकी परतंत्रता मात्र कामकूं विवक्षित है। काहेतैं श्रुतिअनुसारकरि स्मृतिकूं लगावनेकूं योग्य होनेतैं। २८६ सर्व शब्दतैं दुर्गधनकीबी ब्रह्मविषै प्राप्तिके हुये विशेषण देते हैं।। २८७ सर्व शब्दके संकोचविषै कारणकूं कहैहैं॥

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पनिषत् ] चतुर्दश खंड १४ ५३१ सर्वदृष्टिसैं ब्रह्मोपासन औ मनोमयतादिआरोपसैं शांडिल्यविद्या ४

तितैं॥ तैसैं रसबी जाननेकूं योग्य हैं। काहेतैं अपुण्यरूप गंध अरु रसके ग्रहणकी पापके सं- बंधरूप निमित्तवान्ताके श्रवणतैं। "तातैं ति- सकरि सुगंधि अरु दुर्गंधि दोनूंकूं सूंघताहै। जींतैं पापकरि यह (घ्राणगतप्राण) विद्ध है" इस श्रुतितैं औ इश्वैरकूं पापका संसर्ग नहीं है। काहेतैं अविद्याआदिक दोषके असंभवतैं। औ

२८८ जैसे "सर्व गंध हैं" इस ठिकाने सुखकरगंध व्र- हके संबंधी दिखाये। तैसैं "सर्व रस हैं" इस ठिकाने सुख- करहीं रस तिसके संबंधी ग्रहणकरनेकूं योग्य हैं। ऐसैं कहैहैं। २८९ इहांबी सर्वशब्दके संकोचविषै कारणकूं कहैहैं॥ इहां परमात्माविषै ताका ग्रहण नहीं। यह शेष है।। २९० तत् शब्दके अर्थकूंहीं उपपादन करैहैं॥ इहां उक्त श्रुतिविषै "यह" ऐसें घ्राणगत प्राणकी उक्ति है। २९१ ननु पापके संसर्गका किया अपुण्यरूप गंध आदि- कका ग्रहण होहू। तथापि सो सर्वज्ञ ईश्वरविषै कैसैं नहीं है? यह आशंकाकरिके कहैहैं ॥ इहां यह अर्थ है :- निमित्तके अभावतैं ईश्वरकूं स्वसंबंधी होनेकरि अपुण्यरूप गंध आदि- कका ग्रहण नहीं है॥। २९२ ता ईश्वरके पापसैं असंबंधविषै हेतुकूं कहैहैं॥ इहां आदिपदकरि अस्मिता राग द्वेष अरु अभिनिवेश आदिक ग्रहण करियेहैं॥

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५३२ तृतीयप्रपाठक ३ [छान्दोग्यो- आदित्यादि पश्चद्वारपाल गायत्री हृदयादिक ब्रह्मके उपासन १९ सर्व इस जगत्के प्रति अभ्यात्त (अभिव्याप्त) है [ इहां अभ्यात्तशब्दविषै वयाततिरूप अर्थवाले "अतति" धातुकी कर्त्ताविषै निष्ठा है]॥तैसैं अ- वाकी है। कहियेहै इसकरि ऐसी वाकू है वाकूहीं वाक है। यद्ा :- धैजे प्रत्यय है अंतविषै जिसके ऐसे वचिधातुके करणरूप अर्थविषै वाकशब्द है। सो वाक जिसकूं विद्यमान है ऐसा जो जीव सो वाकी है। नही जो वाकी ऐसा जो ईश्वर सो अवाकी है। इहां वाकू इंद्रियका जो नि- षेध है सो घ्राण आदिकके निषेधके उपलक्ष- णरूप अर्थवाला है। गंधे अरु रसआदिकके श्रवणतैं ईश्वरकूं गंधआदिकके ग्रहणअर्थ घ्राण २९३ "अभ्यात्त" ऐसें इसके रूपकूं औ ताके अर्थकूं दि- खावतेहुये कर्मविषै निष्ठाकूं ('क्त' ऐसा प्रत्यय है। ताकी कर्मरूप अर्थविषै वर्त्तनेकूं) निषेध करैहैं। २९४ वाक शब्दकी सिद्धिके प्रकारकूं रचते हैं। इधर "इहां" ऐसे श्रुतिकी अरु ईश्वरकी उक्ति है औ उपलक्षण अर्थ है। घ्राणादिकके निषेधके। यह शेष है॥ २९५ अब ईश्वरविषै घ्राण आदिककी प्राप्तिके अभावतै ताका निषेध उपलक्षित नहीं होवैगा? यातैं कहैहैं।। इदां आदिशब्दकरि कामआदिक कहा है।।

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पनिषत्] चतुर्दश खंड १४ ५३३ सर्वदृष्टिसैं ब्रह्मोपासन औ मनोमयतादिआरोपसैं शांडिल्यविद्या ४ एष म आत्माऽन्तर्हृदयेणीयान् अर्थ :- यह मेरा आत्मा हृदयके मध्य आदिक करण प्राप्त हैं। यातैं वाकूके निषेध- करि वे करण निषेध करियेहैं। "सो पाणिपां- दसैं रहित हुया वेगवान् अरु ग्रहणका कर्त्ता है औ चक्षुसैं रहितहुया देखताहै औ कर्णसैं र- हितहुया सुनताहै" इत्यादि मंत्ररूप वाक्यतैं। अरु अनादर कहिये संभ्रमसैं रहित है। जाँतैं अनाप्तकाम (अप्राप्त कामवाले) पुरुषकूं अप्राप्त वस्तुकी प्राप्तिविषै संभ्रम (आदर) होवैहै। परंतु नित्यतृप्त ईश्वरकूं आप्काम होनेतैं कहीं बी संभ्रम नहीं है [ यातैं सो आदररहित है]॥२॥ टीका :- येह यथोक्त गुणवाला मेरा आत्मा २९६ इहां अन्योंका जो उपलक्षण कहा सो युक्त है। काहेतैं अन्यठिकानें साक्षात्हीं तिनके निषेधके श्रवणतैं। ऐसें कहैहैं। इहां आदिपदकरि "सो वेद्य (ज्ञेय वस्तुके समूह) कूं जानता है औ ताका वेत्ता नहीं है" इत्यादि वाक्य ग्र- हण करियेहै।। २९७ ईश्वरके संभ्रम (आदर)के अभावकूं प्रतिपादन करैहैं॥ २९८ यथोक्त परमात्माके प्रत्यगात्मासैं अभेदकूं दिखावै हैं॥

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५३४ तृतीयप्रपाठक ३ [छान्दोग्यो- आदित्यादि पञ्चद्वारपाल गायत्री हृदयादिक ब्रह्मके उपासन १९ व्रीहेर्वा यवाद्दा सर्षपादा श्यामाकाद्दा श्यामाकतण्डुलाद्दा एष म आत्माऽन्त- अतिशयकरि अणु (सूक्ष्म) है व्रीहितैं वा यवतैं वा सर्षपतैं वा इयामाक (सांवा)तैं वा इयामाकके तंडुलतैं॥ यह मेरा आत्मा ह- हृदयकमलके मध्य अतिशयकरि अणु (सूक्ष्म)है। व्रीहितैं वा यवतैं इत्यादि॥ इहां अैत्यंत सूक्ष्मताके दिखावनेअर्थ। सर्ष पतैं वीं इ्यामाकतैं वा इयामाकके तंदुलतैं [अतिशयकरि अणु है ] ऐसैं कहा ॥ ॥ ननु परिच्छिन्न परिमाणतैं अतिशयकरि अणु है ऐसैं कहेहुये आत्माकूं अणुपरिमाणवान्पना प्राप्त होवैगा ? यह आशंकाकरिके। यातैं ताके नि- षेधअर्थ श्रुति आरंभ करैहै :- "यह मेरा आत्मा २९९ व्रीहि (तंडुल) आदिक अनेक हष्टांतनके ग्रहणके उपयोगकूं कहैहैं॥ ३०० अत्यंत अणुपनै अरु अत्यंत महत्पनैके व्यपदेशनके परस्पर विरोधकूं आशंका करिके। परिहार करैहैं॥

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पनिषत्] चतुर्दश खंड १४ ५३५ सर्वदृष्टिसैं व्रह्मोपासन औ मनोमयतादिआरोपसैं शांडिल्यविद्या ४ रहृदये ज्यायान् पृथिव्या ज्यायानन्त- रिक्षाज्यायान्दिवो ज्यायानेभ्यो लो- केभ्यः॥ ३॥

दयके मध्य प्थिवीतैं अतिशयकरि बडाहै। अंतरिक्षतैं अतिशयकरि बडा है। स्वर्ग- लोकतैं अतिशयकरि बडा है औ इन लो- कनतैं अतिशयकरि बडा है॥ ३ ॥

हृदयके मध्य पथिवीतैं अतिशयकरि बडा है"इत्यादि वाक्यकरि॥ औ वैडे परिमाणतैं बडेपनैकूं दिखावती हुयी श्रुति। अनंत-परि- माणवान्ताकूं दिखावैहै "मैनोमय" इससैं आदिलेके "इन लोकनतैं अतिशयकरि ब- डाहै" इहांपर्यंत जो वाक्य है तिसकरि॥३॥

३०१ पृथिवी अरु अंतरिक्ष आदिककी न्यांई ईश्वरका सा- तिशय (आपेक्षित) महत्पना विवक्षित है? इस शंकाकूं नि- वारते हैं॥ ३०२ पुनरुक्तिके उपयोगकूं कहैहैं॥ इहां जो तिन गुणों-

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५३६ तृतीयप्रपाठक ३ [छान्दोग्यो- आदित्यादि पश्चद्वारपाल गायत्री हृदयादिक ब्रह्मके उपासन १९ सर्वकर्मा सर्वकामः सर्वगन्धः सर्वर- अर्थ :- सर्व कर्मवाला है सर्वकामवाला टीका :- यैंथोक्त गुणोंकरि लक्ष्य ईश्वर ध्या- वनेकूं योग्य है परंतु तिनगुणोंकरि विशिष्टहीं नहीं। जैसें "राजपुरुषकूंल्याव। औ चित्रगु (वि- चित्र गौआंवाले गोपाल)कूं ल्याव" ऐसैं कहे- हुये विशेषणके वी ल्यावनेविषै ल्यावनेवाला पुरुष प्रवृत्त होता नहीं। ताकीन्यांईं इहां बी प्राप्तभया। यातैं ताकी निवृत्ति अर्थ "सर्वकर्मा है" इत्यादि फेर कथन है। तातैं मनोमयता आदिक गुणोंकरि विशिष्टहीं ईश्वर ध्यावनेकूं योग्य है। याँहीतैं षष अरु सप्तम प्रपाठकविषै करि लक्षित है सोई ईश्वर केवल व्यावनेकूं योग्य है। यह अर्थ है।। ३०३ "यथोक्त गुणवाला ईश्वर ध्यावनेकूं योग्य है" ऐसें कहेहुये गुणोंकीबी ध्यानकर्मता (ध्यानकी विषयता) दुर्वार (दुःखसैं निवारणकरनेकूं अशक्य) है!यह आशंकाकरिके कहैहैं॥ ३०४ पुनरुक्तिके फलकूं समाप्त करैहैं॥ ३०५ सगुण ईश्वरकी व्येयताविषै अन्य प्रमाणकूं कहैहैं।

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पनिषत् ] चतुर्दश खंड १४ ५३७ सर्वदृष्टिसैं ब्रह्मोपासन औ मनोमयतादिआरोपसैं शांडिल्यविद्या ४ सः सर्वमिदमभ्यात्तोऽवाक्यनादर एष म आत्माऽन्तर्हृदय एतद्रह्नैतमितः प्रे- त्याभिसम्भविताऽस्मीति यस्य स्या- है सर्वगंधोंवाला है सर्वरसोंवाला है औ सर्व इसकेप्रति अभिव्याप्त है अवाकी है अरु आदररहित है।। यह मेरा आत्मा ह- दयके मध्य है। यह ब्रह्म है। "इहातैं म- जैसैं :- "तत्त्वमसि (सो तूं हैं)। आत्माहीं यह सर्व है" ऐसैं कहा है। ताकीन्यांईं। इहां स्वाराज्यविषै अभिषेककूं पावतानहीं। काहेतैं "यह मेरा आत्मा है। यह ब्रह्म है। इसतैं मरिके मैं याकूं प्राप्त होऊंगा" इस लिंगतैं। परंतु आत्मशब्दकरि प्रत्यगात्माहीं नहीं कहि- येहे। काहेतैं "मेरा" इस षष्ठीविभक्तिकूं संबंधरूपअर्थकी निश्चायक होनेतैं औ "याकूं प्राप्तहोऊंगा" ऐसें कर्म अरु कर्त्तापनैंके इहां यह अर्थ है :- स्वरूपके वाचक आत्मशब्दकी श्रुतिके असं- भवतैं ताके बलतैं अद्वैतरूप वाक्यार्थकी सिद्धि नहीं है॥

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५३८ तृतीयप्रपाठक ३ [छान्दोग्यो- आदित्यादि पञ्चद्वारपाल गायत्री हृदयादिक ब्रह्मके उपासन १९ ददा न विचिकित्साऽस्तीति ह स्माहशा- ण्डिल्य: शाण्डिल्यः।।४।। इति तृतीयप्रपाठकस्य चतुर्दशः खण्डः॥ १४ ॥ रिके याकूं प्राप्त होऊंगा" ऐसा जिसकूं सा- क्षात् होवै। संशय नहीं है। ऐसैंहीं कह- ताभया शांडिल्य। शांडिल्य।।४।। इति श्री०मूलभा०तृतीयप्रपा०चतुर्दशःखंड: १४ निर्देशतैं ॥। ।। नतु षष्ठप्रपाठकविषै बी "प्रारब्धभोगके अनंतर सत्कूं पावताहै" ऐसैं सत्की संपत्ति (प्राप्ति)की कालांतरविषै भावीपनैकूं श्रुति दिखावैहै। ? ३सो कथन बनै नहीं :- काहेतैं आरंभकिया है संस्कार (सुखा- ३०६ अेदके लिंगतैं जव इहां भेद विवक्षित है तब षष्ठ- प्रपाठकविषैवी तिस लिंगके दर्शनतैं अखंडरूप वाक्यार्थकी सिद्धि नहीं होवैगी? ऐसैं पूर्ववादी शंका करैहै॥ ३०७ इहां (षष्टप्रपाठकविषै) जीव ब्रह्मका भेद विवक्षित नहीं है। काहेतैं आरंभ किया है संस्कार (सुखादिक) जिस कर्मनैं तिसकर्मके शेषकी स्थितिविषै श्रुतिके तात्पर्यतैं। ऐसे सिद्धांती परिहार करैहैं॥

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पीनषत् ] चतुर्दश खंड १४ ५३९ सर्वदृष्टिसैं ब्रह्मोपासन औ मनोमयतादिआरोपसैं शांडिल्यविद्या ४ दिक) जिस कर्मनैं सो कर्म आरब्धसंस्कार है। ता कर्मके शेषकी स्थितिरूप अर्थपर होनेतैं उक्त मोक्षकी श्रुतिकी कीलांतरभावीअर्थवा- नूता नहीं है। अन्यथा "तत्त्वमसि(सो तूं है)" इस अर्थके बाधके प्रसंगतैं ॥ ॥ यैद्यपि आ- त्मशब्दका प्रत्यगात्मारूप अर्थवान्पना औ "सर्व यह ब्रह्म है" ऐसैं यह जो प्रकत है। सोई "यह मेरा आत्मा हृदयके मध्य है यह ब्रह्म है" ऐसैं कहियेहै? तथापि किंचित् अंतर्धान (अंत-

३०८ ननु सत् (ब्रह्म)की प्राप्तिविषै कालके अंतरायकरि युक्तपनाहीं इहां विवक्षित क्यूं नहीं होवैगा? यह आशंका- करिके कहैहैं॥ ३०९ ब्रह्मकी प्राप्तिके कालांतरविषै भाविपनैके इष्टहुये "तत्वमसि (सो तूं हैं)" ऐसें ब्रह्मभावके वर्त्तमान उपदेशके असंभवतें। इस हेतुकूं कहैहैं॥ ३१० ननु प्रकरणकरि अनुगृहीत आत्मा अरु ब्रह्म शब्द- करि इहांवी ब्रह्म आत्माकी एकताहीं विवक्षित होवैगी? यातैं कहैहैं। इहां यह भाव है :- लिंगकरि अनुगृहीत षष्ठी विभ- क्तिवाली श्रुतिके वशतैं प्रकरणकररि अनुगृहीत दो श्रुतियां किसी प्रकारसैंबी लगानेकूं योग्य हैं। काहेतैं प्रकरणकी दो श्रुतिनतैं लिंगकी दो श्रुतिनकूं बलवती होनेतैं औ आत्माकी श्रुतिके अन्यप्रकारसैं संभवकूं उक्त होनेतैं॥

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५४० तृतीयप्रपाठक ३ [छान्दोग्यो- आदित्यादि पञ्चद्वारपाल गायत्री हृदयादिक ब्रह्मके उपासन १९ राय)कूं अपरित्याग करिकेहीं। इस आत्माकूं इस शरीरतैं मरिके मैं प्राप्तहोऊंगा। ऐसैं कहा॥ जैसैं ऋतु (निश्चय)रूप आत्माका मैं ३११.

प्राप्त होनेवाला हूं इस रीतिसैं जिस ऐसें जा- ननेवालेकूं "सत्य मैं मरिके ऐसैं होऊंगा" ऐसा साक्षात् निश्चय होवै। औ ऐसें नहीं होऊंगा? ऐसा कतुके फलसैं संबंधवाले इस अर्थविषै संशय नहीं है। सो विद्वान् तैसैं हीं ईश्वरभावकूं पावताहै। ऐसे इसकूं शांडिल्य- ३११ सगुणब्रह्मके उपासककूं एकवार तत्वके ज्ञानमा- ततें अदृष्ट फल नहीं सिद्ध होवैहै। किंतु देहपात कालवि- पैबी साक्षात्कारकी अनुवृत्ति (अनुवर्त्तन) करि युक्त होनेकूं योग्य है। इस अभिप्रायकरिके कहैहैं॥ इहां यह अर्थ है :- निश्चयके अनुसारी सगुण परमात्माका में प्राप्त होनेवाला हूँ ऐसें जाननेवाले जिसकों "मरिके मैं ऐसें होऊंगाहीं" ऐसा सत्य निश्चय होवै। परंतु "नहीं होऊंगा" ऐसा कतु फलके संबंधविषै संशय नहीं है। सो ऋतु (निश्चय)के अनुसार क रिहीं परमात्मभावकूं पावताहै। तैसैं हुये "अद्धा (साक्षात्)" इस वाक्यतैं मरणकालविषैवी साक्षात्कारकरि युक्त होना योग्य है। ऐसैं भासताहै। ३१२ यथोक्त अर्थके सांग्रदायिक (परंपराकरि प्राप्त) प-

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पनिषत्] पंचदश खंड १५ ५४१ पुत्रदीर्घायुफलक विराट्कोशोपासना ७ अथ तृतीय प्रपाठ·पंचदशः खंडः।।१५। अन्तरिक्षोदरः कोशो भूमिबुभ्नो न अथ श्री०मूलभाषा०तृतीयप्रपाठक० पंचदशः खंड:१५ अर्थ :- अंतरिक्षरूप उदरवाला अरु भू- नामा ऋषि कहताभया॥ इहां दो वार कथन आदरकेअर्थ है॥ ४ ॥ इति श्री०भाष्यभाषा०तृतीयप्रपाठकस्य चतुर्दशःखंडः॥१४ अथ श्री०भाष्यभाषातृतीयप्रपाठ० पंचदशःखंड:१५ पुत्रदीर्घायुफलक विराट् कोशोपासना ७ टीका :- "इैसके कुलविषै वीर जन्मताहै" ऐसैं कहा। पैरंतु वीरका जन्ममात्र पिताके र- नैकूं कथन करैहैं।। इहां आदर जो है सो कतुके फलसैं सं- बंधरूप विषय ( अर्थ) वाला है।। इति श्री० तृतीयप्रपाठकगतचतुर्दशखंडस्य टिप्पणम् ॥ १४ ॥ अथ तृती य प्रपाठकगतपंचद्शखंडस्य टिप्पणम् १५ ३१३ ननु उक्त शांडिल्यविद्यासैं समनंतर (पीछले) ग्रं- थका संबंध नहीं है! यह आशंकाकरिके। व्यवहित (अंतराय- सहित त्रयोदश खंडरूप पूर्वत्रंथ)सैं संबंधकूं दिखावनेकूं अ- नुवाद करैहैं॥ ३१४ अब उत्तरग्रंथके तात्पर्यकूं कहनेकूं भूमिकाकूं करैहैं॥ ४६

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५४२ तृतीयप्रपाठक ३ [छान्दोग्यो- आदित्यादि पञ्चद्वारपाल गायत्री हृदयादिक ब्रह्मके उपासन १९ जीर्यति। दिशो ह्यस्य स्क्तयो द्यौरस्यो- त्तरं बिल९ स एष कोशो वसुधानस्त- स्मिन्विश्वमिद५ श्रितम् ॥१॥ भिरूप मूल (तल)वाला कोश जीर्ण होता नहीं॥ दिशाहीं इसके कोण हैं। स्वर्गलोक इसका उत्तर (ऊपरका)बिल है॥ सो यह कोश वसुधान है। तिसविषै विश्व यह स्थि- त है ॥ १ ॥ क्षणअर्थ होता नहीं। काहेतें"तोतैं शिक्षित पुत्रकूं लोक्य (लोकका हेतु) कहतेहैं" इस अन्यश्रुतितैं। यातें सो दीर्घआयुषवान्पना कैसे होवै? इसअर्थ कोशके विज्ञानका आरंभ है। योग्य विज्ञानके व्यासंगतें अनंतरहीं नहीं ३१५ तहां बृहदारण्यक श्रुतिकूं प्रमाण करैहैं ॥ इहां प' त्रकूं लोक्य होनेतैं। यह "तातैं" शब्दका अर्थ है॥ ३१६ अनुशासनकरि विषयकिये पुत्रकूं लोकप्राप्तिका साधन होनेतैं अनुशासन (शिक्षा)कूं प्राप्तभये पुत्रकूं अध्ययन है।। पुत्रजन्मके कथनके अनंतरहीं यह वेदका विज्ञान

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पनिषत् ] पंचदश खंड १५ पुत्रदीर्घायुफलक विराट्कोशोपासना ७ ५४३

कहा। सो अबहीं आरंभ करियेहै :- अंतरिक्ष है उदर कहिये भीतरका छिद्र जिसका सो यह अंतरिक्षोदर ऐसा कोश है। कोशैकीन्यांईं अ- नेक कोशके धर्मोकरि सादृश्यतैं कोश है औ सो भूमिबुध्न है। भूमि है बुन्न कहिये मूल जि- सका सो भूमिबुन्न है। सो कोश जीर्ण होता नहीं कहिये विनाशकूं पावतानहीं। काहेतैं

क्यूं नहीं उपदेश किया? यह आशंकाकरिके कहैहैं॥ इहां यह अर्थ है :- गायत्री उपाधिवाले ब्रह्मके उपासनवालेकूं कौक्षेय (उदरगत) ज्योतिविषै आरोप करिके परब्रह्मका उपासन योग्य (श्रेष्ट) है औ ता उपासनका मनोमयताआदिक गुण- वाले ब्रह्मका उपासन अंतरंग (समीपका) साधन है। तैसैं हुये तिस वचनकरि तिसविषै संलग्न होनेतें अनंतरहीं को- शका विज्ञान नहीं कहा। औ तिस व्यासंगके निवृत्तभये ताकी दृष्टि अब यथोक्त फलकी सिद्धिअर्थ कहिये है। औ इधर कोश शब्दकरि सुवर्णआदिकके रखनेकी आधार मंजूषा (पेटी) कहिये है। ३१७ त्रैलोक्यके स्वरूपका कोशपना कैसैं है? यह आ- शंकाकरिके कहैहैं॥ ३१८ अनेक धर्मोकरि सादृश्यकूं स्पष्ट करैहैं।

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५४४ तृतीयप्रपाठक ३ [छान्दोग्यो- आदित्यादि पञ्चद्वारपाल गायत्री हृदयादिक ब्रह्मके उपासन १९ त्रैलोक्यस्वरूप होनेतैं। जोतैं सो सहस्रयुगरूप कालपर्यंत स्थायी है। सर्व दिशा हीं इसके कोण हैं। स्वैर्गलोक इस कोशका उत्तर (उर्ध्व) बिल (छिद्र) है। सो यह धैथोक्तगुण- वाला कोश वसुधान है। प्राणीनका कर्म- फलनामक वसु(धन) धरियेहै इसविषै यातैं यह वसुधान है॥ तिसके भीतर विश्व(स. मस्त) कर्मफल तिसके साधनोंकरि सहित यह जो प्रत्यक्षादि प्रमाणोंकरि ग्रहण करियेहै सो आश्रित है। अर्थ यह जोः-स्थित है॥ १॥ ३१९ तथापि याका अविनाशीपना कैसें है? तहां कहैहैं। ३२० त्रैलोक्यके स्वरूपविषै कोशकी दृष्टि है। तहांबी भूमिविषै बुध्न (मूल)की दृष्टि है। ऐसें कहा॥ औ कोशका सापेक्ष अविनाशीपना ध्येयहोनेकरि दिखाया। अब दिशाओं विषै कोशके कोणनकी दृष्टि कर्त्तव्य है। ऐसें कहैहैं॥ ३२१ स्वर्गलोकविषै कोशके ऊपरके छिद्रभावकी बुद्धिकू दिखावै हैं। ३२२ यथोक्त कोशविषै वसुधानपनैकी दृष्टिकूं दिखावै हैं। ३२३ ताहीकूं समर्थन करैहैं॥

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पनिषत् ]] पंचदश खंड १५ ५४५ पुत्रदीर्घायुफलक विराट्कोशोपासना ७ तस्य प्राची दिग्जुहूर्नाम सहमाना नाम दक्षिणा राज्ञी नाम प्रतीची सुभूता अर्थः-ताकी प्राचीदिशा जुहू नाम है। दक्षिणदिशा सहमाना नाम है। प्रतीची राज्ी नाम है। उदीची सुभूता नाम है।।

टीका :- तिस कोशकी प्राचीदिशा कहिये पूर्वदिशागत भाग जुहू नाम है। इस दिशा- विषै कर्मिष्ठलोक पूर्वाभिमुख हुये होमकूं कर- तेहैं यातैं जुहू नाम है॥ दक्षिणदिशा सह- माना नाम है। इस दिशाविषै पापकर्मके फ- लोंकूं यमपुरीविषै प्राणी सहारतेहैं यातैं सह- माना नाम दक्षिणदिशा है। तैसैं प्रतीची (पश्चिम) दिशा राजी नाम है। राजा जो वरुण तिसकरि अधिष्ठित(आश्रित) है। वा संध्याकालविषै राग(रंग)के योगतैं पश्चिम- ३२४ कोशके कोणपनैंकरि उक्त दिशाओंविषै बीचके वि- भागकूं कहैहैं॥

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५४६ तृतीयप्रपाठक ३ [छन्दोग्यो- आदित्यादि पञ्चद्वारपाल गायत्री हृदयादिक ब्रह्मके उपासन १९ नामोदीची। तासां वायुर्वत्सः सय ए- तमेवं वायुं दिशां वत्सं वेद न पुत्ररोद५ तिनका वायु वत्स है।। जो ऐसें इस वायुकूं दिशाओंका वत्स जानताहै सो पुत्रके रो- दिशा राज्ञीहै॥ उदीची (उत्तरदिशा) सुभूता नाम है। भूति (विभूति) वाले ईश्ववर अरु कु० बेरआदिककरि अधिष्ठित होनेतें उत्तरदिशा सु. भूता नाम है। ॥ तिन दिशाओंका वायु वत्स है। काहेतैं वायुकूं दिग्गजहोनेतैं। "पु' रोवात" इत्यादि वाक्यके देखनेतैं॥ सो जो कोईकबी पुत्रके दीर्घजीवितका अर्थी। ऐसैं य थोक्तगुणवाले वायुकूं दिशाओंका वत्स अरु ३२५ विशिष्टनामवाली दिशाओंकी अनुचिंतन करनेकी योग्यताकूं कहिके। अब तिनके संबंधी वायुकूं अमरणधमे वाला तिनका वत्स चिंतन करै। ऐसें कहैहैं।। इहां पुरों चात (पूर्ववात) आदिक। यह आदि शब्द तिसप्रकारके लो किक अरु वैदिक प्रयोगनके संग्रहअर्थ है।। ३२६ यथोक्त विज्ञानकी फलवान्ताकूं अब दिखावै हैं॥

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पनिषत् ] पंचदश खंड १५ ५४७ पुत्रदीर्घायुफलक विराट्कोशोपासना ७ रोदिति। सोऽहमेतमेवं वायुं दिशां वत्सं वेद मा पुत्ररोद५ रुदम् ॥२॥ दनकूं रोता नहीं॥ सो मैं ऐसें इस वायुकूं दिशाओंका वत्स जानताहूं। पुत्रके रोद- नकूं मतिरोऊं ॥ २ ॥

अमृत जानताहै। सो पुत्ररोदकूं कहिये पु- त्रनिमित्त रोदनकूं रुदन करता नहीं। अर्थ यह जो :- ताका पुत्र मरता नहीं॥ जाँतैं ऐसे विशेषणोंवाला कोश दिशा अरु वत्सकूं विषय करनेहारा विज्ञान है। यातैं सो मैं पुत्रके जीवितका अर्थी ऐसें इस वायुकूं दिशाओंका वत्स जानताहूं। यातैं पुत्ररोदकूं कहिये पु- त्रके मरणनिमित्त रोदनकूं मतिरोऊं। अर्थ यह जो :- पुत्रका रोदन मेरेकूं मतिहोहू ॥ २ ॥ इहां यथोक्त गुणवालेकूं ऐसें कहा। इस अर्थका प्रकट क- रना "अमृत" ऐसें है॥ ३२७ उपदेशकिये सफल उपासनकूं उपसंहार करैहैं॥

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५४८ तृतीयप्रपाठक ३ [छान्दोग्यो- आदित्यादि पञ्चद्वारपाल गायत्री हृदयादिक ब्रह्मके उपासन १९ अरिष्ट कोशं प्रपद्येऽमुनाऽमुनाऽमु- ना। प्राणं प्रपद्येऽमुनाऽमुनाऽमुना। भू: प्रपद्येऽमुनाऽमुनाऽमुना। भुवः प्रपद्येऽमु अर्थ :- अरिष्ठ (अविनाशी) कोशकेप्रति प्रपन्न (शरणागत) भयाहूं इसकरि इसक- रि इसकरि। प्राणकेप्रति प्रपन्न भयाहूं इसकरि इसकरि इसकरि। भूःके प्रति प्रपन्न भयाहूं इसकरि इसकरि इसकरि। भुवर्के प्रति प्रपन्न भयाहूं इसकरि इसकरि इसक- टीका :- धैथोक्त अरिष्ट (अविनाशी) को- शकेप्रति मैं पुत्रके आयुष्अर्थ प्रपन्न (शरणा- गत) हूं। इसकरि इसकरि इसकरि॥ ऐसैं तीनवार पुत्रके नामकूं ग्रहण करैहै।। तैसैं प्राणके प्रति प्रपन्न भयाहूं। इसकरि इसकरि इसकरि॥भू:केप्रति प्रपन्न भयाहूं।इसकरि ३२८ पुत्रके दीर्घ आयुष्वानूपनैकूं इच्छनेवाला पुरुष त्रे-

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पनिषत् ] पंचदश खंड १५ ५४९ पुत्रदीर्घायुफलक विराट्कोशोपासना ७ नाऽमुनाऽमुना। स्वः प्रपद्येऽमुनाऽमुना- डमुना ॥ ३ ॥ रि। स्वःके प्रति प्रपन्न भयाहूं इसकरि इ- सकरि इसकरि ॥ ३ ॥ इसकरि इसकरि॥ भुवर्के प्रति प्रपन्न भ- याहूं। इसकरि इसकरि इसकरि॥ स्वःके प्रति प्रपन्न भयाहूं। इसकरि इसकरि इ- सकरि॥ ॥ सर्वविषै "प्रपन्न भयाहूं" यह क्रियापद है औ फेरि मंत्रोंविषै पुत्रका तीनिवार नाम ग्रहण करैहै ॥ ३ ॥ लोक्यके स्वरूपकूं कोशाकार कल्पना करिके ताकी विशिष्ट नामवाली च्यारी दिशाओंकूं औ तिनके स्त्रीभावकूं औ ति- नके संबंधकरि अमरणधर्मवाले तिनके वत्सरूप वायुकूं चिं- तन करै। ऐसैं प्रधान (मुख्य) उपासना कही । अब ताके अंगरूप जपकूं दिखावै हैं॥ इहां इसकरि कहिये तिस नि- मित्तभूत पुत्रकरि। अर्थ यह जो :- पुत्रके दीर्घआयुषवान्प- नैकूं निमित्तकरिके औ सर्वत्र कहिये सर्व मंत्रोविषै "प्रपन्न- भयाहूं" ऐसा क्रियापद उपायकूं दिखावनेकूं फेर ग्रहण किया है :- औ निमित्तके निवेदनअर्थ फेरि फेरि मंत्रनविषै पु- त्रके तीनिवार नामकूं ग्रहण करैहै। ऐसैं योजना है॥

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५५० तृतीयप्रपाठक ३ [छान्दोग्यो- आदित्यादि पश्चद्वारपाल गायत्री हृदयादिक बह्मके उपासन १९ स यदवोचं प्राणं प्रपद्य इति। प्राणो वा इद५ सर्व भूतं यदिदं किञ्च। तमेव तत्प्रापत्सि॥४॥ अर्थः-सो जो कहताभयाहूं किः-प्रा- णके प्रति प्रपन्नभयाहूं। ऐसें प्राणहीं यह सर्वभूत है जो यह कछक है। ताहीकूं तिस करि प्रपन्नभयाहूं॥।४॥। टीका :- सो मैं जो कहताभयाकि :- "प्रा- णकेप्रति प्रपन्न भयाहूं" याके व्याख्यान- अर्थ अब यह उपन्यास है :- प्राणहीं यह स- र्वभूत है जो यह कछ जगत् है।। "जैसैं रथकी नाभिविषै अर होवैहैं" ऐसैं यह श्रुति आगे कहैगी॥ यातैं तिसीहीं सर्वकूं तिस ३२९ "अरिष्टकूं" इत्यादिमंत्रकूं पूर्वहीं व्याख्यान किया होनेतें "प्राणकेप्रति" इत्यादिमंत्रकूं लेके व्याख्यान करैहैं॥ इहां स (सो) शब्द वक्ताकूं विषय करनेवाला है॥ ३३० प्राणकी सर्वात्मताविषै वाक्यशेषकी अनुसारिताकु

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पनिषत् ] पंचदश खंड १५ ५५१ पुत्रदीर्घायुफलक विराट्कोशोपासना ७ अथ यदवोचं भूः प्रपद्य इति पथिवीं प्रपद्येऽन्तरिक्षं प्रपद्ये दिवं प्रपद्य इत्येव तदवोचम् ॥ ५॥ अर्थ :- अनंतर जो कहताभयाहूं कि :- भूःके प्रति प्रपन्नभयाहूं ऐसैं। पथिवीके प्र- ति प्रपन्नभयाहूं।अंतरिक्षकेप्रति प्रपन्नभया- हूं। स्वर्गलोककेप्रति प्रपन्नभयाहूं। ऐसैंहीं इसकरि कहताभयाहूं॥ ५॥ प्राणके प्रतिपादनकरि मैं प्राप्तभयाहूं॥ तैसें "भूःके प्रति प्रपन्नभयाहूं" ऐसैं भूरादिक तीनलोकनके प्रति प्रपन्नभयाहूं। ऐसैं ताकूं कहताभयाहूं॥४॥ टीका :- अनंतर मैं जो कहताभयाहूं कि :- "भुवरके प्रति प्रपन्नभयाहूं" ऐसें अग्नि आदिकनके प्रति प्रपन्नभयाहूं। ऐसैं दिखावै हैं। इहां ताकी सर्वात्मता अतः (यातैं) शब्दका अर्थ है।।

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५५२ तृतीयप्रपाठक ३ [छान्दोग्यो- आदित्यादि पश्चद्वारपाल गायत्री हृदयादिक ब्रह्मके उपासन १९ अथ यदवोचं सुवः प्रपद्य इत्यग्निंप्र- पद्ये वायुं प्रपद्य आदित्यं प्रपद्य इत्येव तदवोचम् ॥ ६ ॥ अथ यदवोच स्वः प्रपद्य इत्यृग्वेदं अर्थ :- अनंतर जो कहताभयाहूं कि :- भुवर्केप्रति प्रपन्नभयाहूं ऐसैं। अन्निकेप्रति प्रपन्नभयाहू। वायुकेप्रति प्रपन्नभयाहूं।आ- दित्यकेप्रति प्रपन्नभयाहूं। ऐसैंहीं तिसकरि कहताभयाहूं ॥ ६ ॥ अर्थः-अनंतर जो कहताभयाहूं कि :- स्वःकेप्रति प्रपन्नभयाहूं ऐसैं। ऋग्वेदके- ताकूं कहताभयाहूं॥ अनंतर मैं जो कह- ताभयाहूं किः-"स्वःके प्रति प्रपन्नभयाहूं" ऐसैं ऋग्वेद आदिकनकूं प्रपन्नभयाहूं। इू- सरीतिसैंहीं ताकूं कहताभयाहूं। ऐसैं ३३१ कब फेर इनमंत्रोंका जप करना? ? इस अपेक्षाके

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पनिषत् ] पंचदश खंड १५ ५५३ 91 FH पुत्रदीर्घायुफलक विराट्कोशोपासना ७ प्रपद्ये यजुर्वेदं प्रपद्े सामवेदं प्रपद्य इ- त्येव तदवोचं तदवोचम् ॥७॥ इति तृतीयप्रपाठकस्य पञ्चदशः खंडः ॥१५॥ प्रति प्रपन्नभयाहूं यजुर्वेदकेप्रति प्रपन्नभ- याहूं सामवेदकेप्रति प्रपन्नभयाहूं। ऐसैंहीं तिसकरि कहताभयाहूं। तिसकरि कहता- भयाहूं॥ ७॥ इतिश्री०मूलभाषा०तृतीयप्रपा०पंचदशःखंड:१५

परतैं मंत्रनकूं जपे। तातैं पूर्व उक्त अजरको- शकूं। दिशा अरु वत्ससहित यथावत् (ज्यों- कात्यों) ध्यावै॥ ॥ इहां दोवार कथन आ- दरकेअर्थ है। ५॥६॥७॥ इति श्री०भाष्यभाषा०तृतीयप्रपाठ०पंचदशः खंडः॥१५।।

हुये। पूर्व उक्त प्रधानविद्याके अनंतर। ऐसें कहैहैं।। इहां ऊपरतैं। याका ध्यानकरिके ऊपरतैं। ऐसैं संबंध है औ इधर यथोक्त विज्ञानविषै वा जपविषै आदर है।। इति श्री०तृतीयप्रपाठकगतपंचद्शखंडस्य टिप्पणम् ॥१५ ॥ ४७

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५५४ तृतीयप्रपाठक ३ [छान्दोग्यो- आदित्यादि पश्चद्वारपाल गायत्री हृदयादिक ब्रह्मके उपासन १९ अथ तृतीयप्रपाठ·षोडशः खंडः ॥१६। पुरुषो वाव यज्ञस्तस्य यानि चतुर्वि- ५शति वर्षाणि तत्प्रातःसवनं चतुर्विश- अथ श्री०मूलभाषा०तृतीयप्रपाठ· षोडशःखण्डः॥१६॥ अर्थ :- पुरुषहीं यज्ञ है। ताके जे चोवी- श वर्ष हैं। सो प्रातःकाल है। चोवीश अ-

आत्मदीर्घायुफलक आत्मयज्ञोपासना ७ टीका :- पुत्रेके आयुषूअर्थ उपासन कहा औ जप कहा। अनंतर अब आत्मा (आप)के दीर्घ- जीवनअर्थ इस उपासनकूं औ जपकूं विधान क रतीहुई श्रुति कहैहै। आतैं आप जीवताहुया पुत्रादिफलके साथि जुडताहै अन्यथा नहीं। थते अथ तृतीय प्रपाठकगतषोडशखंडस्य टिप्पणं॥१६।। ३३२ उक्त अर्थकूं अनुवादकरिके "पुरुषहीं" इत्यादि अन्यखंडकूं प्रकट करैहैं। तहां कहैहैं।। ३३३ ननु आपका दीर्घ जीवन क्यूं प्रार्थना करियेहै? ३३४ यथोक्त फलकी हेतुभूत विद्याकूं उठावते हैं॥

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पनिषत् ] षोडश खंड १६ ५५५ आत्मदीर्घायुफलक आत्मयज्ञोपासना ७ त्यक्षरा गायत्री गायत्रं प्रातःसवनं त- दस्य वसवोऽन्वायत्ता: प्राणा वाव वस- व एते हीद९ सर्व वासयन्ति॥१॥ क्षरवाली गायत्री है। गायत्र (गायत्रीसं- बंधी) प्रातःकाल है। याके तिस (प्रातःका- ल)केप्रति वसु अनुगत हैं। प्राणहीं वसु हैं। ये जातैं इस सर्वकूं वास करावते हैं ॥ १॥ पुरुष आत्मा(आप)कूं यज्ञरूप संपादनकरैहैः- जीवनविशिष्ट कार्यकरणका संघातरूप जैसा प्र- सिद्ध हीं है तैसा पुरुषहीं यज्ञ है। यह अर्थ है [ इहां "वाव" शब्द अवधारणरूपअर्थवाला है ] तैसैं हीं सामान्यों (यज्ञके सादृश्यों)करि यज्ञभावकूं संपादन करै है।। ३३७ । कैसैं कि :-

३३५ पूर्वले (स्थानविषै भये) आत्माका यज्ञपना (स्थान- विषै होनेपना) पुरुषका कैसैं संपादन करियेहै? तहां कहैहैं॥ ३३६ "वाव" शब्दके अवधारणरूप अर्थकूं प्रतिपादन करैहैं। ३३७ यज्ञके अवयवोंके सादृश्यतैं पुरुषविषै यज्ञकी दृष्टि

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५५६ तृतीयप्रपाठक ३ [छान्दोग्यो- आदित्यादि पञ्चद्वारपाल गायत्री हृदयादिक ब्रह्मके उपासन १९ तिसे पुरुषके जे आयुष्के चोवीश वर्ष हैं सो पुरुषनामवाले यज्ञका प्रातःकाल है॥। किस सामान्य (तुल्यता) करि है ? यह कहैहैं :- चोवीशअक्षरवाली गायत्री छंदरूप है। गौं- यत्र (गायत्रीसैं संबंधवाला) जातैं विधियज्ञका प्रातःकाल है। यांतैं प्रातःकाल रूपसैं संपन्न चोवीश वर्षके आयुष्करि युक्त पुरुष है थौतैं वि- कर्तव्य है ऐसैं कहा। अब सादृश्यतैं यज्ञका संपादन कैसैं है? यह पूर्ववादी पूंच्छता है॥ ३३८ तहां षोडश हैं अधिक जिसतें ऐसे वर्षोंका शत पुरुषका आयु फलभूत है। ताकूं तीनप्रकारसैं (बाल यौवन अरु जरा अेदसैं) विभागकरिके। चोवीश वर्षके आयुविषै प्रातःकालकी दृष्टि कर्त्तव्य है। ऐसें सिद्धांती कहैहैं॥ ३३९ गायत्री छंदके चोवीश अक्षरवान्पनैके हुयेबी । श' व्दविषै उक्त प्रातःकालकी दृष्टि कैसें है ? यह आशंकाकरिके कहैहैं।। इहां यह अर्थ है :- विधितैं अनुष्ठान किये बाह्य य जका प्रातःकालकरि उपलक्षित कर्म प्रातःकाल है। औ तहाँ "गायत्री छंदवाला स्तोत्रादिरूप गायत्र प्रातःकाल है" यह श्रुति है। औ यथोक्त पुरुषके आयुरूप प्रातःकालविषै चो वीश अक्षर हैं॥ ३४० फलित (सिद्धअर्थ)कूं कहैहैं। ३४१ तथापि पुरुषके आयुकूं यज्ञपना कैसें है? सो क

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पनिषत् ] षोडश खंड १६ ५५७ आत्मदीर्घायुफलक आत्मयज्ञोपासना ७

धियज्ञके सादृश्यतैं यज्ञ है। तैसैं उत्तर (यौवन अरु जरा) रूप दो आयुषनविषै बी दो (म- ध्याह्न अरु सायं) कालनकी संपत्ति त्रिएप्छंद अरु जगतीछंदके अक्षरोंके सामान्यतैं कहनेकूं योग्य है। किवी :- इस पुरुषरूप यज्ञके तिस हैहैं॥ इहां यह अर्थ है :- अतः (यातैं) शब्दकाहीं अर्थ विधि- यज्ञके सादृश्यतैं यह है। औ विधिकरि अनुष्ठीयमान जो यज्ञ सो विधियज्ञ है। तिसके साथि सादृश्य जो पुरुषका प्रातः- कालसैं संबंध है तिसतैं पुरुष यज्ञ है।। ३४२ जैसे यथोक्त (चोवीश वर्षरूप) पुरुषके आयुविषै प्रा- तःकालकी संपत्ति (संपादन) है। तैसैं आगे कहनेके पुरुषके दो आयुषनविषैबी माध्यंदिनकाल अरु तृतीयकाल है। ऐसैं दो कालोंकी संपत्ति देखनेकूं योग्य है। ऐसें कहैहैं। ३४३ चोवीश वर्षपरिमित पुरुषके आयुविषै प्रातःकाल है। यातैं संख्याके सामान्यतैं वक्ष्यमाण पुरुषके दो आयुषन- विषै दो कालोंकी संपत्तिमैं क्या कारण है? यह आशंकाक- रिके कहैहैं॥ इहां यह अर्थ है :- चुमालीश अक्षरवाली त्रि- ्ुप् प्रसिद्ध है औ त्रिष्ठप् छंदसैं संबंधवाला माध्यंदिनकाल है।। अरु अष्टच्यालीश अक्षरवाली जगती है औ जगती छं- दसैं संबंधवाला तृतीयकाल है। यातैं संख्याके सामान्यतैं पीछले पुरुषके दो आयुषनविषै दो कालोंकी संपत्ति युक्त है। ३४४ पुरुषकी यज्ञरूपताविषै विधियज्ञके साथि अन्य सा- दृश्यकूं कहैहैं।

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५५८ तृतीयप्रपाठक ३ [छान्दोग्यो- आदित्यादि पञ्चद्वारपाल गायत्री हृदयादिक ब्रह्मके उपासन १९ प्रातःकालके प्रति विधियज्ञके [प्रातःकाल]- कीन्यांई वसुरूप देव अनुगत हैं। अर्थ यह जो :- कालके देवता होनेकरि कालरूप सिद्धभये वयविषै स्वामी हैं।। ॥ पुरुषरूप यज्ञविषै बी विधियज्ञकी न्यांई अग्निआदिक वसुरूप देव प्राप्त हैं। यातैं विशेषण देतेहैं :- वाक्आदिकरूप औ वायुरूप प्राण हीं वसु हैं। वे ये जातें इस पुरुषआदिक प्राणीनके समूहकूं वासकरावते- हैं। जीतैं देहविषै प्राणोंके वसतेहुये सर्व यह वसताहै अन्यथा नहीं। याँतें वसनेतैं औ वसा वनेतैं ये प्राण वसु हैं॥ १ ॥

३४५ प्रातःकालविषै वसुनके तिनके देवताभावकरि सं बंधतैं तत्व (स्वरूप)कूंहीं संक्षेपसैं कहैहैं।। ३४६ वसुनका कालका स्वामीपना दोनूं ठिकानें (दो य ज्ञौविषै) तुल्य है ऐसैं कहेहुये पुरुषरूप यज्ञविषैवी प्राप्त प्र सिद्ध वसुनकूं निषेध करैहैं॥ ३४७ तिन प्राणोंविषै वसुशब्दकी प्रवृत्तिकूं साधते हैं॥ ३४८ अन्यनिमित्तकूं कहैहैं॥ ३४९ प्राणोंके उपपादनकिये वसुपनैकूं उपसंहार करैहैं।

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पनिषत् ] षोडश खंड १६ ५५९ आत्मदीर्घायुफलक आत्मयज्ञोपासना ७ तञ्चेदेतस्मिन्वयसि किश्चिदुपतपेत्स ब्रूयात्प्राणा वसव इदं मे प्रातःसवनं मा- अर्थः-ताकूं जब इस वयविषै किंचित् उपतापकरै [तब] सो कहैः-हे प्राणरूप वसु! इस मेरे प्रातःकालकूं माध्यंदिनका- टीका :- तों यज्ञके संपादनकरनेवालेकूं जब इस प्रातःकालरूप संपन्न वयविषै किंचित् मरणकी शंकाका कारण व्याधिआदिक उप- तापकरै कहिये दुःखकूं उत्पादनकरै। तब सो यज्ञका संपादक पुरुष आपकूं यज्ञरूप मान- ताहुया कहै। अर्थ यह जो :- इस मंत्रकूं जपे :- हे प्राणरूप वसु! यह मुजयज्ञका प्रातः- काल वर्तताहै ताकूं माध्यंदिन काल अतु- ३५० अब पुरुषयज्ञकी विद्याके अंगभूत आशीर्वादके प्र- योगकूं दिखावै हैं॥ इहां अनुसंतानकूं करो इस पद्विषै अनुपद जो है सो एकीभावविषै मंत्र जपके विधियज्ञकेसाथि संबंधीसहितपनैकूं जनावता है औ इधर समान है। याका "ताके जे चोवीश वर्ष हैं" इत्यादिवाक्यकरि। यह शेष है॥

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५६० तृतीयप्रपाठक ३ [छान्दोग्यो- आदित्यादि पञ्चद्वारपाल गायत्री हृदयादिक ब्रह्मके उपासन १९ ध्यन्दिन सवनमनुसन्तनुतेति माहं प्राणानां वसूनां मध्ये यज्ञो विलोप्सी- येत्युद्वैव तत एत्यगदो ह भवति॥२॥ ल अनुसंततकरो ऐसैं ॥ मैं यज्ञ प्राणरूप वसुनके मध्य विलोपकूं मति प्राप्त होऊ ऐसैं। तिस (उपताप)तैं ऊपर जाताहै। गदर- हित होवैहीं है ॥ २॥ संतत करो ऐसैं। अर्थ यह जो :- माध्यंदिन कालरूप आयुकरि सहित एकीभूत निरंतर करो॥ मैं यज्ञ प्रातःकालके ईशान (स्वामी) प्राणमय वसुरूप तुह्मारे मध्य विलोप (वि- च्छेद)कूं मति प्राप्त होऊं। यह अर्थ है।। इहां इति शब्द मंत्रकी समाप्तिअर्थ है। सो तिस जपकरि औ ध्यानकरि तिस उपतापतै ऊंचेगमनकरताहै। कहिये ऊंचेगमन करिके विमुक्तहुया। गद (अनुताप)सैं रहित हो- वैहीं है॥२ ॥।

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पनिषत्] षोडश खंड १६ ५६१ आत्मदीर्घायुफलक आत्मयज्ञोपासना ७ अथ यानि चतुश्चत्वारिःशदर्षाणि तन्माध्यन्दिनY सवनं चतुश्चत्वारि शदक्षरा त्रिष्टप त्रैष्टभं माध्यन्दिन२स- वनं तदस्य रुद्रा अन्वायत्ता: प्राणा वा- व रुद्रा एते हीद सर्व रोदयन्ति॥३।। तञ्चेदेतस्मिन्वयसि किश्चिदुपतपेत् अर्थ :- अनंतर जे चुमालीस वर्ष हैं सो माध्यंदिनकाल है। चुमालीस अक्षरवाली त्रिष्टुप् है। त्रिष्टुप्संबंधी माध्यंदिनकाल है। याके तिस (माध्यंदिनकाल)केप्रति रुद्र अ- नुगत हैं। प्राणहीं रुद्र हैं। ये जातैं इस स- र्वकूं रोदन करावते हैं॥ ३ ॥ अर्थः-ताकूं जब इस वयविषै किंचित् टीका :- "अनंतर जे चुमालीश वर्ष हैं" इत्यादि वाक्य समान है। प्रीण जातैं रुदन

३५१ प्राणोंविषै रुद्रशन्दकी प्रवृत्तिमैं निमित्तकूं कहैहैं।।

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५६२ तृतीयप्रपाठक ३ [छान्दोग्यो- आदित्यादि पश्चद्वारपाल गायत्री हृदयादिक ब्रह्मके उपासन १९ स ब्रूयात्प्राणा रुद्रा इदं मे माध्यन्दिन सवनं तृतीयसवनमनुसन्तनुतेति मा- Sहं प्राणानारुद्राणां मध्ये यज्ञो विलो- प्सीयेत्युद्वैव तत एत्यगदो ह भवति।।४॥ अथ यान्यष्टाचत्वारि ५शद्वर्षाणि तृ- उपताप करै [तब]सो कहैः-हे प्राणरूपरु- द्र! इस मेरे माध्यंदिनकालकूं तृतीयकाल अनुसंतत करो। मैं यज्ञ प्राणरूप रुद्रोंके मध्य विलोपकूं मति प्राप्त होऊं ऐसैं। तातैं ऊंचे जाता है। गदरहित होवैहीं है ॥४॥। अर्थ :- अनंतर जे अष्टच्यालीश वर्ष हैं करते हैं औ सर्वकूं रुदन करावते हैं यातैं सद्र हैं। जीतैं वे प्राण मध्यम वयविषै क्रूर होतेहैं यातै रुद्र हैं ॥ ३ ॥ ४॥ टीका :- तैसैं आदित्यरूप प्राण हैं। ३५२ जो कहाकि :- "रोदनकूं करावते हैं यातैं रुद्र हैं"

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पनिषत्] षोडश खंड १६ आत्मदीर्घायुफलक आत्मयज्ञोपासना ७ ५६३

तीय सवनमष्टाचत्वारि५शदक्षरा जगती जागतं तृतीयसवनं तदस्यादित्या अ- न्वायत्ता: प्राणा वावादित्या एते ही- द५ सर्वमाददते ॥ ५॥ तञ्चेदेतस्मिन्वयसि किश्चिदुपतपेत्स सो ततीयकाल है। अष्ठच्यालीस अक्षरों- वाली जगती है। जगतीसंबंधी तृतीयकाल है। याके तिस (तृतीयकाल)केप्रति आदि- त्य अनुगत हैं। प्राणहीं आदित्य हैं। ये जातें इस सर्वकूं आदान करते हैं ॥ ५॥ अर्थ :- ताकूं जब इस वयविषै किंचित् वे जातैं इस शब्दआदिकके समूहकूं आदान (ग्र- हण) करतेहैं। यातैं आदित्य हैं। वे तृतीय- ऐसैं। ताकूं उपपादन करैहैं॥ इहां जैसैं प्राण वसुरूप अरु रुद्ररूप कहे। तैसैं [आदित्यरूप हैं] यह अर्थ है।। ३५३ तिन प्राणोंविषै आदित्यशब्दकी प्रवृत्तिमैं निमि- नतकूं कहैहैं॥

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५६४ तृतीयप्रपाठक ३ [छान्दोग्यो- आदित्यादि पश्चद्वारपाल गायत्री हृदयादिक ब्रह्मके उपासन १९ ब्रूयात् प्राणा आदित्या इदं मे तृतीय सवनमायुरनुसन्तनुतेति माऽहं प्राणा- नामादित्यानां मध्ये यज्ञो विलोप्सी- येत्युद्वैव तत एत्यगदो हैव भवति॥६॥ उपतापकरै [तब] सो कहैः-हे प्राणरूप आदित्य! इस मेरे तृतीय कालरूप आयु- कूं अनुसंतत करो ऐसैं। मैं यज्ञ प्राणरूप आदित्यनके मध्य विलोपकूं मति प्राप्त होऊं ऐसैं। तातैं ऊंचे जाता है। कहिये गद (रो. ग) सैं रहित होवैहीं है ॥ ६ ॥ कालरूप आयुकूं षोडशोत्तर (शोला वर्ष हैं अ- धिक जिसतैं ऐसे) शत वर्षपर्यंत समाप्त करहू। अर्थ यह जो :- यज्ञकूं समाप्त करह। अन्य स मान है ॥ ५॥ ६ ॥ ३५४ "ताकूं जब" इत्यादि [द्वितीय अरु चतुर्थवाक्य

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पनिषत्] षोडश खंड १६ ५६५ 2: आत्मदीर्घायुफलक आत्मयज्ञोपासना ७ गकीर

एतद स्म वै तदिद्ानाह महीदास ऐतरेयः स किंम एतदुपतपसि योऽहम-

अर्थ :- इस प्रसिद्ध तिसकूं विद्वान्हुया महिदास ऐतरेय कहताभयाः-सो (तूं रो- ग) काहेतैं मेरेकूं यह (उपताप) जैसैं होवै

टीका :- निश्चित हीं विद्या फलकेअर्थ हो- वैहै यह दिखावतेहुये उदाहरणकूं देते हैं :- तिस इस यज्ञके दर्शनकूं विद्वान् नामतैं म- हिदास ऐसा इतरामा ताका पुत्र ऐतरेय क- हताभया :- हे रोग! सो तूं। काहेतैं मेरेकूं रूप] पूर्वग्रंथकरि "ताकूं जब इस वयविषै" इत्यादि वक्ष्य- माण [षष्ठ वाक्यरूप] ग्रंथकूं तुल्य अर्थवाला होनेतैं ताके व्याख्यानकी अपेक्षा नहीं है। ऐसैं कहैहैं। ३५५ महिदासके उदाहरणके तात्पर्यकूं कहैहें ॥ इहां तिस इस यज्ञके दर्शनकूं विद्वान् (जानता) हुया कहताभया। ऐसें संबंध है औ "ह वै" इन दो निपातरूप अक्षरोंका "किल" यह अर्थ है। औ सो उक्त उदाहरणकी प्रसिद्धिरूप अर्थवाला है औ हे रोग! काहेतें मुजकूं तूं उपताप करता हैं। ऐसें संबंध है। ४6

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५६६ तृतीयप्रपाठक ३ [छान्दोग्यो- आदित्यादि पश्चद्वारपाल गायत्री हृदयादिक ब्रह्मके उपासन १९ नेन न प्रेष्यामीति स ह षोडशं वर्षश- तमजीवत्प्र ह षोडशं वर्षशतं जीवति य एवं वेद ॥ ७॥ इति तृतीयप्रपाठकस्य षोडशः खण्डः ॥ १६॥ तैसैं उपताप करताहैं। जो मैं [हूंसो] इस- करि नहीं मरूंगा ऐसैं।। सो षोडश [अधिक वर्षोका शत जीवताभया। षोडश वर्षोंका शत प्रकर्षकरि जीवताहै जो ऐसैं [अधिक

जानताहै॥ ७॥ इति श्री०मूलभाषा०तृतीयप्रपा०षोडश:खंड: १६ यह उपतपन जैसें होवै तैसें उपताप करता हैं। जो मैं यज्ञ उस तेरे किये उपतापसैं नहीं जाऊंगा कहिये नहीं मरुंगा। यातैं तेरा श्रम वृथा है। यह अर्थ है। ऐसें कहताभया। ३५६ "काहेतैं" इस आक्षेपविषै हेतुकूं कहैहैं। इहां जो यज्ञ है सो मैं हूं। इसकरि। ऐसें योजना है॥ ३५७ इति शब्दके अन्वयकूं कहैहैं॥

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पनिषत् ] षोडश खंड १६ ५६७ आत्मदीर्घायुफलक आत्मयज्ञोपासना ७ इस रीतिसैं पूर्वले पदसैं संबंध है।। " सो ऐसैं निश्रयवाला हुया षोडशोत्तर वर्षशतपर्यंत जीवताभया। अन्य बी ऐसैं निश्रयवाला षो- डश अधिक शतवर्षपर्यंत प्रकर्षकरि जी- वताहै। जो ऐसैं यथोक्त यज्ञके संपादनकूं जानताहै सो। यह अर्थ है ।। ७॥ इति श्री०भाष्यभाषा०तृतीयप्रपाठ० षोडशः खंडः ।१६्।।

३५८ निश्चितविद्याके ध्यानकेप्रति फलकूं कथन करैहैं।। ३५९ यद्यपि यथोक्त निश्चयवाले महिदासकूं यथोक्त फल कहा। तथापि आधुनिक पुरुषकूं क्या आया? यह आशंका- करिके कहैहैं॥ प्रकर्षकरि जीवताहै। यह जीवनका प्रकर्ष रोगआदिक उपतापसैं रहिततारूप "प्र" शब्दकरि कहियेहै॥ ३६० ऐसे निश्चयवाला। ऐसें उक्त पुरुषकूं स्पृष्ट करैहैं।। इति श्री० तृतीयप्रपाठकगत षोडशखंडस्य टिप्पणम् ॥ १६ ॥

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५६८ तृतीयप्रपाठक ३ [छन्दोग्यो- आदित्यादि पञ्चद्वारपाल गायत्री हृदयादिक ब्रह्मके उपासन १९ अथ तृतीयप्रपाठ·सप्तदशःखंडः।१७॥ स यदशिशिपति यत्पिपासति यन्न रमते ता अस्य दीक्षाः॥१॥ अथ श्री०मूलभाषा• तृतीयप्रपाठकस्य सप्तदशःखंड:१७ अर्थः-सो जो अशनकरनेकूं इच्छता है। जो पानकरनेकूं इच्छताहै। जो नहीं रमता है। वे इसकी दीक्षा हैं॥ १॥ अथ श्री०भाष्यभाषा०तृतीयप्रपा० सप्तदशः खंडः।।१७।। अक्षयादिफलक देवकीपुत्रार्थ आंगिरसोक्तात्मयज्ञोपासन टीका :- "सो जो अशन (भोजन) करनेकूं इ" चछताहै" इत्यादि पुरुषके यज्ञके सादृश्यका निर्देश पूर्वग्रंथसैं संबंधकूं पावताहै॥ सो जो अथ श्री०तृतीयप्रपाठकगतसप्तद्शखंडस्य टि०।।१७ ३६१ ननु पूर्वले आशीर्वादके प्रयोगरूप उदाहरणकरिही पीछले अ्रंथका संबंध नहीं देखिये है? तहां कहहैं॥ इहां पू र्वकरि। याका "ताके जे चोवीश वर्ष हैं" इत्यादिवाक्यसे सादृश्यके निर्देशकरि। यह अर्थ है औ ऐसी जातिवाले याका क्षुधा आदिककेकिये। यह अर्थ है।।

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पनिषत् ] ] सप्तदश खंड १७ ५६९ 9अक्षयादिफलक देवकीपुत्रार्थ आंगिरसोक्तात्मयज्ञोपासना ७ अथ यदश्राति यत्पिवति यद्रमते तदुपसदैरेति॥२॥ अर्थ :- अनंतर जो अशन करताहै। जो पान करताहै। जो रमण करता है। सो उ- पसदोंकेसाथि [समानताकूं] पावताहै॥।२॥

अशन करनेकूं इच्छताहै। तैसैं पानकरनेकूं इच्छताहै। औ जो इष्ट आदिककी प्राप्तिके निमित्त नहीं रमताहै। जो ऐसी जातिवाले दुःखकूं अनुभव करताहै वे विधियज्ञकी न्यांईं दुःखके सामान्यतें इस (पुरुषरूप यज्ञ)की ३६२

दीक्षा हैं॥१॥ टीका :- अनंतर जो भोजनकूं करताहै

३६२ अशन करनेकी इच्छाआदिकनविषै दीक्षाकी ह- ष्टिमैं हेतुकूं कहैहैं।। ३६३ दीक्षावचनके सादृश्यतैं पुरुषका यज्ञपना कहा। अब उपसदूकरि युक्तपनैरूप सादृश्यतैंबी ताका यज्ञपना जा- ननेकूं योग्य है। ऐसैं कहैहैं॥

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५७० तृतीयप्रपाठक ३ [छन्दोग्यो- आदित्यादि पश्चद्वारपाल गायत्री हृदयादिक ब्रह्मके उपासन १९ अथ यद्सति यज्जक्षति यन्मैथुनं अर्थ :- अनंतर जो हसताहै। जो भक्ष- ण करताहै। जो मैथुनकूं आचरताहै। जो पानकूं करताहै औ जो इष्टआदिकके सं- योगतैं रतिकूं अनुभव करताहै। सो उप- सदोंकरि समानताकूं पावता है औ डपेसदोंका पयोत्रतवान्तारूप निमित्तवाला सुख है। औ अल्पभोजन करने योग्य दिवस समीप हैं ऐसैं प्रश्वास (स्वस्थताविशेष) है। यातैं अशन आदिकनका औ उपसदोंका समानपना है॥२॥ टीका :- अैनंतर जो हसताहै। जो भ- ३६४ भोजन करने आदिकनविषै उपसदूकी दृष्टि कैसैं है ? तहां कहैहैं॥ इहां पयोव्रतवान्ता कहिये पयके भक्षण करि युक्तपना औ यज्ञविषै जे अल्पभोजनके योग्य दिवस प्र सिद्ध हैं वे उपसदोविषै समीप करियेहैं। तिनोविषै प्रश्वास कहिये स्वस्थताविशेष है औ अशनआदिकनविषै सो है। यह प्रसिद्ध है यह भाव है औ सुखनिमित्ततारूप अरु के शकी निवृत्तिकी हेतुतारूप दोनूंका सामान्य है।। ३६५ स्तुत शस्त्रकरि विशिष्टताकी समतातैंवी पुरुषका यज्षपना है। ऐसें कहैहैं।

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पनिषत] सप्तदश खंड १७ ५७१ अक्षयादिफलक देवकीपुत्रार्थ आंगिरसोक्तात्मयज्ञोपासना ७ चरति स्तुतशस्त्रैरेव तदेति॥ ३॥ अथ यत्तपो दानमार्जवमहिरसा स- त्यवचनमिति ता अस्य दक्षिणाः॥४। सो स्तुत शस्त्रोंकेसाथि हीं [समानताकूं] पावताहै॥ ३ ॥ अर्थ-अनंतर जो तप दान आर्जव अ- हिंसा अरु सत्यवचन। ऐसैं वे इसकी द- क्षिणा हैं ॥ ४ ॥ क्षण करताहै। जो मैथुनकूं आचरताहै। सो स्तुतशस्त्रोंकरिहीं समानताकूं पावताहै शब्दवान्ताके सामान्यतैं ॥ ३॥ टीका :- ैनंतर जो तप दान आर्जव अहिंसा अरु सत्यवचन हैं। ऐसैं वे इसकी द- क्षिणा हैं। धर्मकी पुष्टिकरताके सामान्यतैं॥४॥ ३६६ हास आदिकनविषै स्तुत शस्त्रकी दृष्टिमैं हेतुकूं कहैहैं।। ३६७ दक्षिणावान्ताके समानपनैतैं बी पुरुषका यक्षपना निश्चय करनेकूं योग्य है। ऐसैं कहैहैं।

तुकूं कहैहैं।। ३६८ तप अरु दान आदिकनविषै दक्षिणाकी दृष्टिमैं हे-

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५७२ तृतीयप्रपाठक ३ [छन्दोग्यो आदित्यादि पश्चद्वारपाल गायत्री हृदयार्दिक ब्रह्मके उपासन १९ तस्मादाहु: सोष्यत्यसोष्टेति पुनरु- त्पादनमेवास्य तन्मरणमेवास्यावभृ- थः ॥ ॥ अर्थ :- तातैं कहते हैं किः-प्रसूत होवैगी। प्रसूत होतीभई ऐसैं। सो फेर उत्पादनहीं है। मरणहीं याका अवशृथ है॥ ५॥ टीका :- औ जातैं यज्ञरूप पुरुष है तातैं ताकूं जब माता प्रसूत होवैगी तब अन्य ताकी माताकूं कहतेहैं किः-"प्रसूत होवैगी" ऐसैं॥ औ जब प्रसूता होवैहै तब पूर्णिका॥ (मासोंकरि पूर्ण) हुयी प्रसूत होतीभई ऐसैं।। विधियज्ञविषै जैसैंः-देवदत्त सोमकूं प्रसूत क ३६९ अन्य प्रकारकरि पुरुषके यज्ञपनैकूं साधते हैं॥ इहा यह अर्थ है :- "पूङ् धातु प्राणीके प्रसव (जन्म)रूप अर्थविषै है औ षुज् धातु अभिषव (सोमवल्लीके कूटनैं)रूप अर्थविषै है" ऐसैं। दो धातुनके देखनेतैं प्रसवविषै औ कंडन (कूटनै) विषै साधारण सवन शब्द है। तातैं वा सवनशब्दवानूता करि सामान्यतैं पुरुषविषै यज्ञकी दृष्टि कर्तव्य है॥

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पनिषत् ] सप्तदश खंड १७ ५७३ अक्षयादिफलक देवकीपुत्रार्थ आंगिरसोक्तात्मयज्ञोपासना ७ तद्दैतद् घोर आद्गिरसः कृष्णाय दे- अर्थः-तिस प्रसिद्ध इसकूं घोर आंगि- रैगा औ। यज्ञदत्त सोमकूं प्रसूत करताभया ऐसैं। ताकीन्यांई शब्दका सामान्य है॥ यातैं॥ वा। शब्दके सामान्यतैं पुरुष यज्ञ है॥ फेर इस पुरुष नामवाले यज्ञका सो उत्पाद- ३७०

नहीं है जो प्रसूत होती है अरु जो प्रसूत हो- तीभई। इस शब्दका संबंधीपना विधियज्ञकी- न्याईं है। किवी :- सो मरणहीं इस पुरुषरूप यज्ञका अवभृथ (यज्ञके अंतका स्नान) है। स- माप्तिके सामान्यतैं॥ ५॥ टीका :- तिस प्रसिद्ध इस यज्ञके दर्शनकूं

३७० पुरुषगत शब्दके सामान्यकूं स्पष्ट करैहैं ॥ इहां जो फेर इस पुरुषनामवाले यज्ञका विधियज्ञकी न्यांई "प्रसूत होवैगी" इत्यादि शब्दसैं संबंधीपना है सो उत्पादनहीं है। ऐसैं योजना है।। ३७१ अवभृथ (अंतकेस्नान)का संबंधी होनेतैं बी पुरुषका यज्ञपना है। ऐसैं कहैहैं॥ ३७२ पुरुषविषै यज्ञकी दृष्टि कही। अब श्रेष्ठ पुरुषके सं-

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५७४ तृतीयप्रपाठक ३ [छान्दोग्यो- आदित्यादि पश्चद्वारपाल गायत्री हृदयादिक ब्रह्मके उपासन १९ वकीपुत्रायोक्तोवाचापिपास एव स बभू- व सोऽन्तवेलायामेतत्रयं प्रतिपद्येताक्षि- रस देवकीकेपुत्र कृष्णकेअर्थ कहिके कहता- भया। सो (कृष्ण) पिपासारहितहीं होता- भया॥ सो (यज्ञका वेत्ता) अंतवेलाविषै इनतीनकूं जपे :- अक्षित हैं। अच्युत हैं। नामतैं घोर ऐसा गोत्रतैं आंगिरस देवकीके पुत्र कृष्णरूप शिष्यकेअर्थ कहिके कहता- भया॥ "सो यह तीन" इत्यादि अंतरायस- हित वाक्यसैं संबंध है।। औ सो (कृष्ण) इस दर्शनकूं सुनिके अन्य विद्याओंकेअर्थ पिपासा रहितहीं होताभया॥ औ ऐसें विशिष्ट यह बंधकरि विद्याकूं स्तुतिकरनेकूं औ विद्याके अंगरूप जपक विधानकरनेकूं आरंभ करैहैं।। ३७३ देवकीके पुत्रकूं इस दर्शनके श्रवणका फल कहैहैं। ३७४ ननु यह गुरु शिष्यकी आख्ययिका किस अर्थवाली है? यह आशंकाकरिके कहैहैं॥

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पनिषत् ] सप्तदश खंड १७ ५७८ अक्षयादिफलक देवकीपुत्रार्थ आंगिरसोक्तात्मयज्ञोपासना ७ तमस्यच्युतमसि प्राणस शितमसीति तत्रैते द्े ऋचौ भवतः ॥६॥ प्राण अरु संशित (सूक्ष्म) हैं ऐसैं॥ तिसविषै ये दो ऋचा होवेहैं ॥ ६ ॥

विद्या है जो देवकीके पुत्र कृष्णकी अन्यविद्या- केप्रति तृष्णाके विच्छेदकी करनेवालीभई। ऐसैं पुरुषरूप यज्ञकी विद्याकूं स्तुति करैहै॥॥ घोर आंगिरस कृष्णकेअर्थ इस विद्याकूं कहिके क्या कहताभया? ऐसैं। सो कहैहैः-सो ऐसैं यथोक्त यज्ञका वेत्ता अंतकीवेला (मरणकाल) विषै इस मंत्रके त्रयकूं जपे। यह अर्थ है।। ॥ सो (मं- त्रका त्रय) क्या है किः-"अक्षित कहिये अक्षी- ण वा क्षतरहित हैं" यह एक यजुर् है। औ सामर्थ्यतैं आदित्यविषै स्थित प्राणकूं एककी-

३७५ "तूं अक्षित हैं" ऐसें किसप्रकारकी देवता कहिये है? तहां कहैहैं॥ इहां यह अर्थ है? निकृष्टकू स्तुति संबं- धके अयोगतैं औ पुरुष यज्ञविषै अन्य कालदेवताके असंभवतैं

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५७६ तृतीयप्रपाठक ३ [छान्दोग्यो- आदित्यादि पञ्चद्वारपाल गायत्री हृदयादिक ब्रह्मके उपासन १९

न्यांईं करिके कहैहै॥ तैसें ताहीकूं क हैहैः-"अ- ३७६

च्युत कहिये स्वरूपतैं प्रच्युतिरहित हैं" यह द्वि- तीय यजुर् है। औ "प्राणसंशित कहिये प्राण ऐसा सो संशित नाम सम्यक् तनूकृत (सूक्ष्म)। सो तूं हैं। यह तृतीय यजुर् है॥ तिस इसअ- रथविषै विद्याकी स्तुतिपर ये दो ऋचा (मंत्र) होवैहैं। जँरपकेअर्थ नहीं हैं। काहेतें "तीन मं त्रनकूं जपे" इहां श्रुतिविषै कही है जो तीनकी प्राणोकाहीं अधिदैविकरूप आदित्य नामक जो है सो जप्यमं- त्रका अर्थ होनेकरि संबंधकूं पावताहै॥ ३७६ द्वितीयमंत्रके अन्य अर्थकूं निवारते हैं ॥ इहां तैसे याका प्रथममंत्रवत्। यह अर्थ है औ दोनूंकी एक अर्थवान् ताके होते दोनूंमैंसैं एककी व्यर्थता नहीं है। काहेतें दोनूं कूंबी जपने योग्य होनेकरि उपयोगी होनेतें। ऐसें देखनेकू योग्य है॥ ३७७ तीनमंत्रोंकरि प्रतिपादन करनेकूं योग्य सूर्यका तत्व दो ऋचाओंकरि बी प्रतिपादन किया है। ऐसें प्रत्ययकी दढ ताअर्थ कहैहैं॥ ३७८ इन दो ऋचारूप मंत्रनकी विद्याकी स्तुतिकरता क्यूं अंगीकार करिये है। जपअर्थता हीं क्यूं नहीं होवैगी। तहां कहैहैं।।

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पनिषत् ] सप्तदश खंड १७ ५७७ अक्षयादिफलक देवकीपुत्रार्थ आंगिरसोक्तात्मयज्ञोपासना ७ आदित्प्रतस्य रेतसो उद्दयन्तम- सस्परि ज्योतिः पश्यन्त उत्तर स्वः अर्थ :- प्रत्न (पुरातन) रेतके [ज्योतिकूं] आ(च्यारीओरतैं देखतेहैं)। हम। तमतैं पर ज्योतिकूं उत्तर (सूर्यस्थ) देखतेहुये संख्या ताके बाध होनेतैं तबे पंचसंख्याहीं हो- वैगी॥ ६॥ टीका :- "औदित्" इस पदविषै आकारका ३७९ इन दोनूं ऋचाओंकी जपअर्थताके हुये बी नेडेहीं उक्त जपयोग्य मंत्रनकी तीनपनैकरि संख्याके सद्भावतैं सो तीनकी संख्या बाध करनेकूं योग्य नहीं है? यह आशंकाक- रिके कहैहैं॥ इहां यह अर्थ है :- इन दो ऋचाओंके जपकर- नेकी योग्यताके हुये "मंत्रोंके पंचककूं जपे" ऐसैं श्रुतिविषै पंचसंख्याकूं कहनेकूं योग्य होनेतें श्रुतिविषै कहा है जो जप- योग्य मंत्रनका तीनपना सो बाधित होवैगा॥ ३८० "प्रत्न (पुरातन) रेत (कारण)के ज्योतिकूं वासर (दि- वसकी न्यांई व्याप्त) सर्व ओरतैं देखते हैं। जो परप्रकाशरू- पविषै स्थित हुया प्रदीप् होवैहै" इस मंत्रका प्रतीक (आ- दिशब्द) "आदित्प्रत रेतके" यह है। ताकूं पदच्छेदपूर्वक व्याख्यान करैहैं॥ इहां औ "इत्" शब्द अर्थरहित है। ऐसैं पूर्वलेपदसैं संबंध है।। ४९

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५७८ तृतीयप्रपाठक ३ [छान्दोग्यो- आदित्यादि पश्चद्वारपाल गायत्री हृदयादिक ब्रह्मके उपासन १९ पश्यन्त उत्तरं देवं देवत्रा सूर्यमगन्म ज्योतिरुत्तममिति ज्योतिरुत्तममि- ति। ७। इति तृतीयप्रपाठकस्य सप्तदशः खंडः॥१७॥ अरु स्वः (हृदयगतज्योति)कूं उत्तर (उ- त्कृष्टतर) देखते हुये जाते भये ॥ देवन- विषै देव सूर्यरूप उत्तमज्योतिके तांई ऐसैं। उत्तमज्योतिके तांई ऐसैं ॥७॥ इतिश्री०मूलभाषातृतीयप्र०सप्तदशः खंड:१७ अनुबंध (संबंधी) जो तकार औ इत् शब्द है सो अर्थरहित हैं।। प्रत्न कहिये चिरंतन। अर्थ यह जो :- पुराण ऐसें कारणरूप बीजभूत सैंतुनामवाले जगतरूप रेतके ज्योति (प्रकाश) कूं ३८१ सो कारण क्या है? इस अपेक्षाके हुये "हे सोम्य! यह आगे सत्हींथा" इत्यादि श्रुतिकरि सिद्ध व्रह्म है। ऐसे कहै हैं॥। इहां "ब्रह्मके आनंदकूं विद्वान् (जानता) हुया" याकी न्यांई "प्रत्न (पुरातन)के ज्योतिकूं" ऐसें संबंध देखनेकूं योग्य

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पनिषत्] सप्तदश खंड १७ ५७९ अक्षयादिफलक देवकीपुत्रार्थ आंगिरसोक्तात्मयज्ञोपासना ७

देखते हैं।। [इहां त्याग किया है तत् [अरु इत्] का संबंध जिसनें ऐसा "आ" शब्द "देखते हैं" इस क्रियापदसैं संबंधकूं पावता है]।। ॥ किस तिस ज्योतिकूं देखते हैं? वासर जो दिवस तिसरू- पकूं। दिवसकीन्यांई सो ब्रह्मका ज्योति सर्व ओरतैं व्याप् है। अर्थ यह जो :- निर्वृत्तचक्षु- वाले अरु ब्रैह्मचर्यआदिक निवृत्तिके साधनोंकरि है औ उत्कृष्ट अनुबंधवाला है। याका लुप् तकारवाला सो (आशब्द) है। यह अर्थ है॥ ३८२ ननु ब्रह्मस्वरूपभूत इस ज्योतिकूं सर्व देखतेहुये नहीं देखियेहैं? तहां कहैहैं। इहां निवृत्त कहिये विषयनतैं विमुख किये हैं चक्षु (करण) जिनोंके वे तैसे (निवृत्त चक्षु) हैं। याहींतैं ब्रह्मवेत्ताकी "कोइकबी धीर आवृत्तचक्षुवाला अमृतभावकूं इच्छता हुया प्रत्यगात्माकूं देखताहै"? यह अन्य श्रुति है। ३८३ तहांहीं अन्य उपायकूं सूचन करैहैं॥ इहां "स्त्रीका स्मरण कीर्त्तन केलि (खेल) प्रेक्षण गुह्यभाषण संकल्प निश्चय औ क्रियानिर्वृत्ति (क्रियासैं आनंद) । इस मैथुनकूं मनीषी- जन अष्ट अंगवाला कहते हैं औ इसतैं विपरीत यहहीं अष्ट लक्षणवाला ब्रह्मचर्य है" सो ब्रह्मचर्य है अरु आदिपदकार अहिंसा अरु अचोरीआदिक ग्रहण करिये है। इन निवृत्तिप्र- धान साधनोंकरि शुद्ध कहिये प्रदीप् है अंतःकरण जिनोंका वे तैसे हैं॥

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५८० तृतीयप्रपाठक ३ [छान्दोग्यो आदित्यादि पञ्चद्वारपाल गायत्री हृदयादिक ब्रह्मके उपासन १९ शुद्ध अंतःकरणवाले ब्रह्मवेत्ता आ कहिये ्यारि ओरतैं ज्योतिकूं देखते हैं॥ सो कैसा है कि :- परः कहिये परं (उत्कष्ट) है ऐसें लिंगके पलटावने- करि कहा। काहेतैं परशब्दकूं ज्योतिपर होने- तैं। औ जो प्रकाशरूप परब्रह्मविषै वर्त्तमान हुः या प्रदीप होवैहै कहिये प्रकाशताहै। तिस ज्योतिकरि प्रकाशित हुया सूर्य तपता है। चं द्रमा प्रकाशताहै। विद्युत् विद्योतन (प्रकाशन) करैहै औ ग्रह अरु तारागण प्रकाशते हैं॥ किवी :- अन्य मंत्रका द्रष्टा (ऋषि) यथोक्त ज्योतिकूं दे- खता हुया कहैहै :- हैम जातेभये। कहिये अ- ज्ञानरूप तमतैं पर। वी तमके दूरिकरनेवाले। ३८४ व्यत्यय (लिंगके पलटावने)विषै हेतुकूं कहैहैं॥ इहां स्वमहिमाविषै स्थित हुया प्रदीप् होवैहै सो परज्योति है। ऐसें संबंध है।। ३८५ दी्यमानपनैकूं विवरण करैहैं॥ ३८६ अन्य मंत्रकूं अवतार देते हैं॥ इहां औ इसतैं। विद्याकी स्तुति अर्थ है। यह अर्थ है।। ३८७ अन्यमंत्रका द्रष्टा क्या कहताभया ? इस अपेक्षाके हुये। द्वितीयमंत्रकूं ग्रहण करैहैं॥ ३८८ ताकूं व्याख्यान करैहैं॥ इहां यह अर्थ है :- तिसीही ज्योतिके भानविषै अन्य ज्योति नहीं है।।

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पनिषत्] सप्तदश खंड १७ ५८१ अक्षयादिफलक देवकीपुत्रार्थ आंगिरसोक्तात्मयज्ञोपासना ७ जिस उत्तर कहिये आदित्यविषै स्थित ज्योति- कूं देखते हुये हम जातेभये। [ऐसैं अंतरा- यसहित पदसैं संबंध है] सो ज्योति स्वे कहिये आत्माका (हमारे हृदयविषै स्थित) है। कहिये औदित्यविषै स्थित अरु सो एक ज्योति है। जिसे उत्तर कहिये अतिशयकरि उत्कष्ट वा अ- पर ज्योतिकूं अपेक्षा करिके अतिशयकरि ऊर्ध्व ज्योतिकूं देखतेहुये हम जातेभये॥ ॥ कि- सैकेप्रति जातेभये? यह कहैहैः-सर्व देवनविषै द्योतनवाले देव औ रसनके रश्मिनके अरु ज- गत्के प्राणोंके ईरण (प्रेरण) तैं जो सूर्य है ता उत्तम (सर्व ज्योतिनतैं अतिशयकरि उत्कष्ट)

३८९ देवभावकरि प्रत्यगात्मभांवकूं कहैहैं। ३९० "सो जो यह" इत्यादि वाक्यनविषै अन्य श्रुतिकरि सिद्ध तिन दोनूंकी एकताकूं दिखावै हैं॥ ३९१ तत्पदके अर्थकूं औ त्वंपदके अर्थकूं कहिके तिनदो- नूंकी एकता कही। अब एकीभूत ज्योतिकूं विशेषण देतेहैं॥ ३९२ एकताके ज्ञानके फलकूं कथन करैहैं॥ ३९३ फलकूंहीं प्रश्नपूर्वक विवरण करैहैं।

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५८२ तृतीयप्रपाठक ३ [छान्दोग्यो- आदित्यादि पञ्चद्वारपाल गायत्री हृदयादिक ब्रह्मके उपासन १९ अथ तृतीयप्रपाठ· अष्टादशःखंड: १८ मनो ब्रह्मेत्युपासीतेत्यध्यात्ममथा अथ श्री०मूलभाषा०तृतीयप्रपाठकस्याष्टादशः खंड:१८ अर्थ :- "मन ब्रह्म है" ऐसें उपासन करै। ज्योतिकेप्रति हम जातेभये। अर्थ यह जो :- अहो (वडा हर्ष है कि) हम प्राप्तभये ॥ यहै सो ज्योति है जो दो ऋचाओंकरि स्तुत है अरु जो तीन यजुर्वेदके वाक्यनकरि प्रकाशित है॥ इहां दो अभ्यास जो है सो यज्ञकी कल्पनाकी परि- समाप्तिअर्थ है॥ ७॥ इति श्री०भाष्यभाषा० तृतीयप्रपाठकस्य सप्तदशःखंड:१७ अथ श्री०भाष्यभाषा०तृतीयप्रपाठ० अष्टादशःखंड:१८ मन आदिदृष्टिसैं अध्यात्माधिदैविक ब्रह्मोपासना ६ टीका :- मैनोमय औ आकाशात्मा। ऐसा ई- ३९४ फलकूं विषय करनेवाले स्वअनुभवकूं दिखावै हैं॥ ३९५ तीन मंत्रनकी अरु दो मंत्रनकी एकवाक्यताकूं उ- पसंहार करैहैं॥ इति श्री०तृतीयप्रपाठकगतसप्तदशखंडस्य टिप्पणम् ॥१७॥ अथ श्री तृतीयप्रपाठकगताष्टादशखंड० टिप्पणं १८ ३९६ ननु यज्ञके विज्ञानकेसाथि वक्ष्यमाण विज्ञानकी सं-

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पनिषत्] अष्टादश खंड १८ ५८३ मन आदिदृष्टिसैं अध्यात्माधिदैविकब्रह्मोपासना धिदैवतमाकाशो ब्रह्मेत्युभयमादिष्टं भ- वत्यध्यात्मं चाधिदैवतं च। १। F यह अध्यात्म है॥। अब अधिदैवत [काहे- येहै] :- "आकाश ब्रह्म है" ऐसैं। उभय आदेश किया होवैहै अध्यात्म अरु अधि- दैवत॥१॥

श्वर कहा। तहां ब्रह्मकूं दो गुणोंकी एकदेशता- करि [मन औ आकाश कहा]।। अैनंतर अब मन अरु आकाशविषै समस्त ब्रह्मकी दृष्टिके वि- धानअर्थ आरंभ है "मन ब्रह्म है" इत्यादि :- गति नहीं है। यातैं तिनका पूर्व अपरभाव कैसे होवैगा? यह आशंकाकरिके। पीछले खंडके पूर्वले अंतरायसहित (१४ चें) खंडसैं संबंधकूं कहैहैं॥ इहां औ ऐसें ईश्वर कहा। इस- रीतिसैं पूर्व (१४ वें) खंडसैं संबंध है।। ३९७ तहां ब्रह्मके दोगुणनकूं एकदेशरूप होनेंकरि मन औ आकाश कहा। ऐसैं कहैहैं॥ ३९८ यथोक्त गुणवाले ब्रह्मकी दृष्टिकरि समर्थकूं तिन दोनूंविषैहीं संपूर्ण ब्रह्मद्ृष्टिके कथनअर्थ उत्तर ग्ंथकूं अव- तार देते हैं। इहां ऐसे दोनूं उपदेश किये होवैहैं। ऐसै संबंध है।।

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५८४ तृतीयप्रपाठक ३ [छान्दोग्यो- आदित्यादि पश्चद्वारपाल गायत्री हृदयादिक ब्रह्मके उपासन १९ मनन करता है इसकरि ऐसा जो अंतःकरण सो मन है सो परब्रह्म है ऐसैं उपासन करै। यह आत्मविषयक दर्शन अध्यात्म है॥ अब देव- ताविषयक इस अधिदैवतकूं हम कहते हैं :- आकाश ब्रह्म है। ऐसैं उपासन करै॥ इ- सरीतिसैं अध्यात्म औ अधिदेवत उभय (दोनूं) ब्रह्मदृष्टिका विषय उपदेशकिया होवैहै। काहेतैं आकाश अरु मनकूं सूक्ष्म होनेतैं औ मैंनकरि ब्रह्मकूं उपलभ्य होनेतें मन ब्रह्मदृष्टिके योग्य है औ सर्वगत होनेतैं सूक्ष्म होनेतैं अरु उपाधिरहित होनेतैं औकाश ब्रह्मदृष्टिके योग्य है। १ ॥

३९९ तिसीहीं दोनूंकूं विभाग करैहैं॥ ४०० मनकी दृष्टिका विषय होनेकरि अध्यात्मरूप "मन ब्रह्म है" ऐसा उपासन कैसैं विधान करिये है? तहां कहैहैं। ४०१ तथापि आकाश कैसें ब्रह्मदृष्टिका विषय होवैहै। जातें ब्रह्म तिसकरि प्राप्त होता नहीं? यह आशंकाकरिके क हैहैं।। इहां ब्रह्मदृदष्टिके योग्य है। ऐसें पूर्वलेपदसैं संबंध है।

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पनिषत्] अष्टादश खंड १८ ५८५ मन आदिदृष्टिसैं अध्यात्माधिदैविकब्रह्मोपासना ६ तदेतचतुष्पाद् ब्रह्म। वाक् पाद: प्राणः पादश्रक्षु: पादः श्रोतं पाद इत्यध्या- त्ममथाधिदैवतमग्निः पादो वायुः पाद अर्थ :- सो यह चतुष्पाद ब्रह्म है। वाक् पाद है। प्राण पाद है। चक्षु पाद है। श्रो- त्र पाद है। यह अध्यात्म है। अब अधि- दैवतः-अग्नि पाद है। वायु पाद है। आ-

टीका :- सो यँहे मन नामवाला अरु च्या- रीपादवाला कहिये च्यारी हैं पाद इसके ऐसा ब्रह्म है।। मैनरूप ब्रह्मकूं च्यारीपादवान्पना कैसैं है? यह कहैहै :- वाक् प्राण चक्षु अरु श्रो- त्र। ये च्यारीपाद हैं। यह अध्यात्म है।।॥ ४०२ विहित उपासनके अध्यात्म अरु अधिदैवतरूप अं- गके अनुचिंतनकूं दिखावै हैं॥

करैहैं॥ ४०३ मनके च्यारी पादवान्पनैकूं प्रश्नपूर्वक व्युत्पादन

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५८६ तृतीयप्रपाठक ३ [छान्दोग्यो- आदित्यादि पञ्चद्वारपाल गायत्री हृदयादिक ब्रह्मके उपासन १९ आदित्यः पादो दिशः पादइत्युभयमे- वादिष्टं भवत्यध्यात्मं चैवाधिदैवतं च २ वागेव ब्रह्मणश्चतुर्थ: पाद: सोडग्निना दित्य पाद है। दिशा पाद हैं। ऐसैं उभयहीं आदेश किया होवैहै। अध्यात्म औ अधि- दैवत॥ २॥ अर्थ :- वाकहीं ब्रह्मका चतुर्थपाद है। अब अधिदैवत कहिये है :- आकाशरूप ब्रह्मके अग्नि वायु आदित्य अरुदिशा ये च्यारी पा- द हैं।। ऐसैं डभयहीं च्यारीपादवाला ब्रह्मा उपदेश किया होवैहै। अध्यात्म औ अधि- दैवत॥ २॥ टीका :- तहाँ वाकहीं मनरूप ब्रह्मका इतर ४०४ आधिदैविक आकाशके च्यारीपादवानपनैकूं प्र.

कट करैहैं। ४०५ मन अरु आकाशके उक्त च्यारीपादवानपनैकूं नि गमन करैहैं। ४०६ अध्यात्मरूप पादनकूं प्रपंचन करैहैं।

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पनिषत्] अष्टादश खंड १८ ५८७ मन आदिदृष्टिसैं अध्यात्माधिदैविकव्रह्मोपासना ज्योतिषा भाति च तपति चा भाति च तपति च कीर्त्या यशसा ब्रह्मवर्चसेन य एवं वेद ॥ ३ ॥

सो अग्नि ज्योतिकरि भासताहै अरु तप- ताहै। कीर्तिकरि यशकरि अरु ब्रह्मवर्च- सकरि भासताहै अरु तपताहै। जो ऐसैं जानताहै॥ ३ ॥

तीनपादोंकी अपेक्षाकरि चतुर्थ पाद है। जाँतें वाकूरूप पादकरिहीं गौ आदिककीन्यांई वक्तव्य विषयकेप्रति स्थित होवैहै। यातैं मनका पाद- कीन्यांई वाक् है।। तैसैं प्राण (घ्राण) पाद है तिसकरिवी गंधविषयकेप्रति जाता है। तैसैं च- क्षुपाद है। श्रोत्रपाद है। ऐसैं मनरूप ब्रह्मका

४०७ वाक्के पादपनैकूं व्युत्पादन करैहें॥ इहां यह अर्थ है :- जैसे गौआदिक गंतव्य पदार्थके प्रति पादकरिहीं पावता है। देवदत्त वी वाकूरूपहीं पादकरि वक्तव्य विषयकूं संपा- दन करैहै। तिसकरि ताका पादपना युक्त है। ४०८ वाक्कीन्यांई प्राणके पादपनैकूं दिखावै हैं॥

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५८८ तृतीयप्रपाठक ३ [छान्दोग्यो- आदित्यादि पञ्चद्वारपाल गायत्री हृदयादिक ब्रह्मके उपासन १९ अध्यात्मरूप चतुष्पादवान्पना है।। अनंतर अ- धिदैवत है :- अभनि वायु आदित्य अरु दिशा।आ- काशरूप ब्रह्मके गौ (बैल)के उदरविषै लग्न पा- दोंकीन्यांईं उदरविषै विलस्नकीन्यांई देखियेहैं। इसकरि तिस आकाशके अगनिआदिक पाद क हियेहैं॥ ऐसें उभय अध्यात्म औ अधिदैवत च्या ४१० रीपादवाला उपदेश किया होवैहै॥ तिनमैं वा- कूहीं मनरूप ब्रह्मका चतुर्थ पाद है। सो अधि- दैवतरूप अग्नि ज्योतिकरि भासता (प्रदीप् होता) है औ तपता है कहिये संतापकूं अरुउ- ष्णताकूं करताहै। अथवा :- तैल अरु घृत आ ४०९ आधिदैविक पादोंकूं विवरण करैहैं॥ जैसें गौके उ दरविषै पाद लग्न देखिये हैं। तैसें आकाशके उदरकीन्याद उद्रविषै अग्नि आदिक लग्न देखिये हैं। तातैं ताके वे पाद कीन्यांई होवैहैं॥ ४१० द्विविध पादके विवरणकूं उपसंहार करैहैं। ४११ अब आध्यात्मिक पादोंके आधिदैविक पादोंकेसाा अधिष्ठेयता (आधेयता)करि संबंध अनुचिंतन करनेकूं योग्य

है। ऐसैं दिखावनेकूं आरंभ करैहैं॥ ४१२ "सो अग्निकरि" इत्यादिवाक्यके अन्य अर्थकूं क

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पनिषत् ] अष्टादश खंड १८ ५८९ मन आदिदृष्टिसैं अध्यात्माधिदैविकव्रह्मोपासना ६ प्राण एव ब्रह्मणश्रतुर्थ:पादः स वा- युना ज्योतिषा भाति च तपति च। भा-

अर्थ :- प्राणहीं ब्रह्मका चतुर्थपाद है। सो वायुज्योतिकरि भासताहै अरु तपता

दिक घर्म पदार्थनके भक्षणकरि प्रदीप्त हुयी वा- क् भासती (प्रकाशती) है औ तपती है। अर्थ यह जो :- वचनके अर्थ उत्साहवाली होवैहै।। विद्दान्कूं फल :- भासता है अरु तपता है की- र्त्तिकरि यशकरि अरु ब्रह्मवर्चसकरि। जो ऐसैं यथोक्तकूं जानता है॥ ३॥ टीका :- तैसैं प्राण (घ्राण)हीं ब्रह्मका चतु- र्थपाद है। सो वायुकरि गंधरूपसैं वा गंधके अर्थ भासता है औ तपता है। तैसैं चक्षुआ- हैहैं॥ इहां कीर्तति अरु यशका प्रत्यक्षपनै अरु परोक्षपनैकरि भेद है औ सर्वत्र। याका दोनूं ओर संबंध है।। इति श्री० तृतीयप्रपाठकगताष्टादशखंडस्य टिप्पणम् ॥१८॥ ५०

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५९० तृतीय प्रपाठक ३ [छान्दोग्यो- आदित्यादि पञ्चद्वारपाल गायत्री हृदयादिक ब्रह्मके उपासन १९ ति च तपति च कीर्त्या यशसा ब्रह्मवर्च- सेन य एवं वेद॥ ४ ॥ चक्षुरेव ब्रह्मणश्चतुर्थः पादः स आ दित्येन ज्योतिषा भाति च तपति च। भाति चतपति च कीर्त्या यशसा ब्रह्म वर्चसेन य एवं वेद॥ ५॥ श्रोत्रमेव ब्रह्मणश्चतुर्थः पादः स दि है।। कीर्तिकरि यशकरि अरु ब्रह्मवर्चस करि भासताहै अरु तपताहै। जो ऐसैं जानताहै ॥४॥ अर्थ :- चक्षुहीं ब्रह्मका चतुर्थ पाद है। सो आदित्यज्योतिकरि भासताहै अरु त पताहै॥ कीर्तिकरि यशकरि अरु ब्रह्मवर्च- सकरि भासता है अरु तपताहै। जो ऐसैं जानताहै॥ ५॥ त्रहीं ब्रह्मका चतुर्थपाद है। दित्यकरि रूपग्रहणके अर्थ ।। औ श्रोत्र दिशा

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पनिषत् ] अष्टादश खंड १८ ५९१ मन आदिदृष्टिसैं अध्यात्माधिदैविकव्रह्मोपासना ६ ग्भिर्ज्योतिषा भाति च तपति च। भाति च तपति च कीर्त्या यशसा ब्रह्मवर्चसेन य एवं वेद ॥ ६ ॥ इति तृतीयप्रपाठकस्याष्टादशः खंडः ॥ १८॥

सो दिशाज्योतिकरि भासताहै अरु तप- ताहै।। कीर्तिकरि यशकरि अरु ब्रह्मवर्च- सकरि भासताहै अरु तपताहै। जो ऐसैं जानताहै ॥ ६॥ इति श्री०मूलभाषा०तृतीयप्रपा०अष्टादशःखंड:

ओंकरि शब्द ग्रहणकेअर्थ॥ विद्याका फल स- मान है। सर्वत्र ब्रह्मकी संपत्ति अदृष्ट फल है। जो ऐसैं जानता है।। इहां दो वार कथन द- र्शनकी समाप्ति अर्थ है ॥। ४ ॥ ५ ॥ ६ ॥ इति श्री०भाष्यभाषा०तृतीयप्रपा०अष्टादशः खंडः॥। १८।

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५९२ तृतीयप्रपाठक ३ [छान्दोग्यो- आदित्यादि पञ्चद्वारपाल गायत्री हृदयादिक ब्रह्मके उपासन १९

0 आदित्यो ब्रह्मेत्यादेशस्तस्योपव्या-

अथ श्री छांदोग्योपनिषन्मूलमात्रभाषादीपिकाया- स्तृतीय प्रपाठ कस्यैकोनविंश: खंडः प्रारभ्यते॥१९॥ अर्थः-"आदित्य ब्रह्म है" ऐसा आदेश अथ श्री० भाष्यभाषा०तृतीयप्रपा० एकोनविंशःखण्डः आदित्यांडदृष्टिसैं अध्यात्माधिदैविक ब्रह्मोपासना 8 टीका :- औदित्य ब्रह्मका पाद कहा। यातैं तिसविषै सकलब्रह्मकी दृष्टिअर्थ यह आरंभ क रियेहैः-आदित्य ब्रह्म है। ऐसा आदेश (उ- पदेश) है। ताका उपव्याख्यान स्तुतिअर्थ क- रियेहै :- असत् (प्रकटनामरूपरहित)हीं यह अ- शेष जगत् आगे कहिये उत्पत्तितैं पूर्व अवस्था विषै होताभया। परंतु असत् (शून्य)हीं नहीं- अथ तृतीयप्रपाठकगतैकोनविंशतितमखंडस्य टिप्पणं प्रारभ्यते ॥।१९॥ ४१३ अन्यखंडकी संगतिकूं कहैहैं।। इहां ताका । ऐसे आदित्य ग्रहण करियेहै।

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पनिषत् ] एकोनविंश खंड १९ ५९३ आदित्यांडदृष्टिसैं अध्यात्माधिदैविक ब्रह्मोपासना ४ ख्यानमसदेवेदमग्र आसीत् तत्सदासी- त्तत्समभवत्तदाण्डं निरवर्तत तत्संवत्स- है। ताका उपव्याख्यान :- असत्हीं यह आगे होताभया। सो सत् होताभया।सो सम्यक् होताभया। तिनतैं आंड होताभया। सो संवत्सरकी मात्राकेतांई (संवत्सरप-

था। काहेतैं "असत्तैं सत् कैसैं उपजै" ऐसैं श्रु- तिविषै असत्के कार्यभावके निषेधतैं॥ ॥ नैर्नु इहां "असतूहीं था" ऐसैं विधानतैं विकल्प (उ- भयपक्ष) होवैगा? सो "धैनै नहीं :- काहेतैं करि-

४१४ अप्रकटनामरूपवान्ताके अभिप्रायकरि असत् शब्द गौण व्याख्यान किया। तहां एवकारके आश्रयकरि पू- र्ववादी शंका करैहै॥। इहां यह अर्थ है :- "असत्तैं सत् कैसैं उपजेगा" ऐसैं असत्के कारणभावकूं षष्ठविषै निराकरण किया होनेतें तहां सत् कारण होहु। परंतु प्रकृत वाक्यविषै साधारण असत् शब्दतें असत्हीं कारण विवक्षित है। ऐसैं उदित अरु अनुदित होमकीन्यांई विकल्प होवैगा॥ ४१५ क्रियाकूं कर्त्ताके अधीन होनेतैं ताकी इच्छाकरि तहां क्रियाविषै विकल्पतैं। सिद्धवस्तुकूं तो ता कर्त्ताकी इ-

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५९४ तृतीयप्रपाठक ३ [छान्दोग्यो- आदित्यादि पञ्चद्वारपाल गायत्री हृदयादिक ब्रह्मके उपासन १९ रस्य मात्रामशयत तन्निरभिद्यत ते आ- ण्डकपाले रजतञ्च सुवर्णञ्चाभवताम् १ रयैत) स्थित होताभया। सो भेदनकूं प्रा तभया। वे दो अंडकपाल रजत अरु सुवर्ण होतेभये ॥ १ ॥ याओंविषै जैसें विकल्प होवैहै तैसैं वस्तुविषै विकल्पके असंभवतैं॥ ॥ नैतु तब "असत्हीं था" यह कैसैं कहा? [तहां जो सिद्धांती असत् शब्दकी गतिरूप प्रवृत्तिकूं कहैं कि :- ] नैतुँ (य- द्यपि) अव्याकुत (अप्रकट) नामरूपवाला हो- नेतैं असत्कीन्यांईं असत् है ऐसैं॥ ॥नर्तु (त- चछाका अननुसारी होनेतैं वस्तुविषै विकल्प नहीं संभवै है। जातैं स्थाणुहीं किसीकीवी अपेक्षाकरि पुरुष नहीं हो वैहै॥ ऐसें सिद्धांती परिहार करैहैं॥ ४१६ विकल्पके असंभवविषै उक्त श्रुतिवाक्यकी प्रवृत्ति रूप गति कहनेकूं योग्य है? ऐसें पूर्ववादी पूंछताहै॥ ४१७ असत् शब्दकी गति तेरेकरि पूंछिये है। वा अव- धारणकी गति पूंछिये है? तिनमैं प्रथम पक्षकेप्रति सि- द्ांती कहैहैं॥ ४१८ द्वितीयपक्षकूं पूर्ववादी शंका करैहै॥

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पनिषत् ] एकोनविंश खंड १९ ५९५ आदित्यांडदृष्टिसैं अध्यात्माधिदैविक ब्रह्मोपासना ४ थापि) श्रुतिगत एव शब्द अवधारणरूपअर्थ- वाला है [ताकी कौंन गति है]? [तहां सिद्धां- ती कहैहैं कि :- ] सैत्य ऐसें है। परंतु श्रुतिगत एव शब्द जो है सो सत्ताके अभावकूं निश्चय करावता नहीं किंतु नामरूप व्याकत विषयविषै सत् शब्दका प्रयोग देख्या है औ सो जगत्के नामरूपका व्याकरण (प्रकटपना) बहुतकरिके आदित्यके अधीन है। ताके अभाव हुये जातैं अंधतमरूप यह कछबी नहीं जानियेगा ऐसें है। यातैं ता आदित्यकी स्तुतिपरवाक्यविषै सत् (विद्यमान)बी यह जगत् उत्पत्तितैं पूर्व अ- सत्हीं था ऐसैं ब्रह्मदृष्टिकी योग्यताअर्थ श्रुति।

४१९ पूर्वकालसंबंधी सत्ताकेवाचक "आसीत् (होता- अया)" शब्दके वाक्यशेषविषै श्रवणतैं उपकरमविषै सत्ताके अभावका अवधारण (निश्चय) विवक्षित नहीं है किंतु जग- त्की अभिव्यक्ति (प्रकटता)के अभावका अवधारण आदित्यकी स्तुतिअर्थ है। ऐसैं सिद्धांती समाधान करैहैं॥ ४२० फेर यह आदित्यकी स्तुति कहां उपयोगकूं पावती है? तहां कहैहैं॥

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५९६ तृतीयप्रपाठक ३ [छान्दोग्यो- आदित्यादि पञ्चद्वारपाल गायत्री हृदयादिक ब्रह्मके उपासन १९ आदित्यकूं स्तुति करैहै॥। जीतैं लोकविषै आ- दित्यके निमित्त "सत्" ऐसा व्यवहार है। जैसैं ४२२

सर्वगुणसंपन्न पूर्णवर्मा राजाके असत् (अविद्य- मान) होते यह राजाका कुल असत्हीं होवैहै ऐसें। ताकीन्यांईं।। औ इहां जगत्की सत्ता वा असत्ता प्रतिपादन करनेकूं इच्छित नहीं है। काहेतें "ब्रह्म है" इस आदेशके पर होनेतैं॥ अंतविषै "आदित्य ब्रह्म है। ऐसैं उपासता है" ४२४

इसरीतिसैं उपसंहार करैगी॥ सो सत् होता- ४२१ जगत्के नामरूपका प्रकट करना आदित्यके अधीन है ऐसैं ताकूं उपपादन करैहैं॥ ४२२ तथापि आदित्यकी स्तुति कैसें है? यह आशंका- करिके। दष्टांतसैं दिखावै हैं॥ ४२३ किंवा :- उपक्रम अरु उपसंहारकी एकरूपताकरि आदित्यविषै ब्रह्मद्दष्टिपर यह वाक्य है ताका कारणके अस- द्भावविषै तात्पर्य कल्पना करनेकूं शक्य नहीं है। काहेते अनन्यथा सिद्ध (अन्यप्रकारसैं असिद्ध) कल्पकके अभावतैं। ऐसे कहैहैं।। ४२४ वाक्यका तिस अर्थविषै तात्पर्यवान्पना कैसैं जा- न्या? यह आशंकाकरिके। उपसंहारकूं उपक्रमता अनुसारी होनेतैं। ऐसें कहैहैं।

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पनिषत्] एकोनविंश खंड १९ ५९७ आदित्यांडदृष्टिसैं अध्यात्माधिदैविक ब्रह्मोपासना ४ भया कहिये सो उत्पत्तितैं पूर्व असत् शब्द- का वाच्य स्तिर्मिते® (निस्पंदरहित) असत्की- न्यांईं हुया। कार्यके अभिमुख किर्चित् उत्पन्न प्रवृत्तिवाला सत् होताभया॥ तातैं प्राप्त स्फुर- णवाला सो सम्यक होताभया कहिये अत्यंत अल्प नामरूपके व्याकरणकरि अंकुरीभूतकी- न्यांईं बीज होताभया॥ तीतैबी क्रमकरि स्थू- लकीन्यांईं होताभया। सो जलोंतैं आंड स-

४२५ ताकूं असत् शब्दका वाच्यपना कैसें है? सो कहैहैं॥ ४२६ तब सत्पना कैसैं है? सो कहैहैं॥ ४२७ बीजकी पुष्टताकी न्यांई कारणकी सजनेकी इछाकी अवस्थाकूं दिखावै हैं॥ इहां यह अर्थ है :- प्राप्तस्फुरणवाला हुया। याका प्राप्तपरिणामवाला हुया भूतसूक्ष्मोंके (अपंचीकृत भूतोंके) आकारकरि होताभया। ४२८ सूक्ष्मभूतनकी उत्पत्तिके अनंतर स्थूलभूतनकी उ- त्पत्तिकूं कहैहैं।। इहां यह अर्थ है :- भूतसूक्ष्मोंके आकारकी प्राप्तिके अनंतर पंचीकरणरूप क्रियाकरि परस्परके अवय- वोंके अनुप्रवेशसैं स्थूलभूतरूप अवस्थावाला होताभया। ४२९ स्थूलभूतनतैं ब्रह्मांडकी उत्पत्तिकूं प्रतिज्ञा करैहैं॥ इहां जलोंतैं। याका जलसहित पंच स्थूल भूतनतैं। यह अर्थ है औ अवश्याय शब्दकरि हिम कहियेहै॥ औ उलूलु। ऐसैं उत्सवकालके संबंधी शब्दविशेष देशविशेषविषै प्रसिद्ध

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५९८ तृतीयप्रपाठक ३ [छन्दोग्यो- आदित्यादि पञ्चद्वारपाल गायत्री हृदयादिक बह्मके उपासन १९ तद्यद्रजत सेयं पृथिवी यत्सुवर्ण सा दयौर्यज्जरायु ते पर्वता यदुल्बY स मे अर्थ :- तिनमैं जो रजतरूप था सो यह प्टथिवी भई औ जो सुवर्णरूप था सो स्व- र्गलोक है। औ जो जरायु भया वे पर्वत- भये। जो उल्ब भया सो मेघसहित नीवार म्यक् वर्त्तताभया [इहां आंड यह दीर्घभाव छांदस है]॥ सो अंड संवत्सररूप प्रसिद्धका- लकी परिमाणरूप मात्राकेतांई अभिन्नस्व रूप हुयाहीं स्थित होताभया। तिस संवत्सर- परिमाण कालतैं ऊर्ध्व पक्षीयोंके अंडकीन्यांईं निर्भिन्न (भेदनकूं प्राप्त) होताभया॥ वे तिस निर्भिन्न अंडके दो कपाल रजतरूप औ सु- वर्णरूप होतेभये ॥ १ ॥ टीका :- तिन दो कपालोंविषे जो रजत हैं औ स्त्री वस्त्र अरु अन्न आदिक उपजतेभये। ऐसैं पूर्वले पदसैं संबंध है।।

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पनिषत् ] एकोनविंश खंड १९ ५९९ आदित्यांडदृष्टिसैं अध्यात्माधिदैविक ब्रह्मोपासना ४ घो नीहारो या धमनयस्ता नद्यो यहा- स्तेयमुदकरस समुद्रः॥ २॥

(हिम)भया॥ जे नाडियांभई वे नदीयां- भई। जो बस्तिगत उदकभया सो समुद्र- भया॥ २ ॥

(रौप्य) रूप कपाल होताभया सो यह पथिवी है। अर्थ यह जो :- पृथिवीकरि उपलक्षित नी- चेका अंडकपाल है। औ जो सुवर्णरूप कपा- ल है सो स्वर्गलोक है। अर्थ यह जो :- स्वर्ग- लोककरि उपलक्षित ऊर्ध्व (ऊपरका) कपाल है।। जो जरायु कहिये स्थूल गर्भका परिवेष्टनरूप है सो अंडके दो टुकडेभावके कालविषै होताभया वे पर्वत होतेभये॥ जो उल्ब कहिये सूक्ष्म गर्भका परिवेष्टन भया। सो मेघोंकरि सहित नीहार। अर्थ यह जो :- अवश्याय (हिम) हो- ताभया॥ जे उत्पन्नभये गर्भके देहविषै धमनि

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६०० तृतीयप्रपाठक ३ [छान्दोग्यो आदित्यादि पञ्चद्वारपाल गायत्री हृदयादिक ब्रह्मके उपासन १९ अथ यत्तदजायत सोऽसावादित्यसं जायमानं घोषा उलूलवोऽनूदतिष्ठन्त्स र्वाणि च भूतानि सर्वे च कामास्तस्मा- अर्थ :- अनंतर जो सो उपजताभया [तिसविषै] सो यह आदित्य है। तिस जायमान (उपजे आदित्य) के प्रति घोष उलूलु उपजतेभये। औ सर्वभूत अरु काम [उपजतेभये]। तातैं ता (सूर्य) के उदयके कहिये शिरा (नाडियां) भई। वे नदीयां हो- तीभई।। जो ताकी वस्ति (मूत्राशय) विषै हो- नेवाला ऐसा वास्तेय कहिये उदकभया। सो समुद्र है॥ २ ॥ टीका :- अनंतर जो सो गर्भरूप उपजता- भया तिस अंडविषै सो यह आदित्य है। तिस जायमान आदित्यकेप्रति घोष (शब्द)रूप उलूलु (उरूरु) कहिके विस्तीर्ण शब्द उपज- तेभये। ईश्वरकीन्यांईं॥ इस प्रथम पुत्रज-

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पनिषत] एकोनविंश खंड १९ ६०१ आदित्यांडदृष्टिसैं अध्यात्माधिदैविक ब्रह्मोपासना ४ त्तस्योदयं प्रति प्रत्यायनं प्रति घोषा उलुलवोऽनुतिष्ठन्ति सर्वाणि च भूतानि सर्वे चैव कामाः॥३॥

प्रति अरु प्रत्यायनकेप्रति घोष उलूलु उ- पजते हैं औ सर्वभूत अरु सर्व काम [उप- जतेहैं] ॥। ३ ॥

न्मकेहुये सर्व स्थावर जंगम भूत औ तिन भूत- नके सर्व जे कामना करियेहै ऐसे स्त्री वस्त्र अरु अन्नआदिक विषयरूप काम वे उपजतेभये॥जातैं आदित्यके जन्मरूप निमित्तवाली भरूत अरु का- मोंकी उत्पत्ति है। तातैं अद्यापि (अबीबी) ति- स आदित्यके उद्यकेप्रति औ प्रत्यायनके- प्रति कहिये अस्तगमनकेप्रति । अथवा पुनः पुनः जो आगमन सो प्रत्यायन है ताकेप्रति। अर्थ यह जो :- ताकूं निमित्तकरिके। सर्वभूत औ सर्व काम घोषअरु उलूलु स्थित होतेहैं। ५१

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६०२ तृतीयप्रपाठक ३ [छान्दोग्यो- आदित्यादि पञ्चद्वारपाल गायत्री हृदयादिक ब्रह्मके उपासन १९ सय एतमेवं विद्दानादित्यं ब्रह्मेत्युपा- स्तेऽभ्यासो ह यदेनसाधवो घोषा आ अर्थ :- सो जो इस आदित्यकूं ऐसैं जा- नताहुया "ब्रह्म" ऐसैं उपासताहै । इसके जीतैं सूर्यके उदयआदिकविषै यह प्रसिद्ध है३॥ टीका :- सो जो कोइकबी इस आदित्यकूं ऐसैं (यथोक्त महिमावाला) जानताहुया "ब्र- ह्म है" ऐसैं उपासताहै। सो तिसभावकूं पा- वताहै। यह अर्थ है।। किवी :- तिसके वेत्ताकूं दृष्ट फल :- [इहां "जो" यह क्रियाका विशेषण है] ४३० इसविषै क्या प्रमाण है? यह आशंकाकरिके कहैहैं॥ इहां यह। ऐसें भूत आदिकनका उत्थान है॥ ४३१ अदृष्ट फलकूं मिलायके कहिके अब दृष्ट फलकूं क- हैहैं।। इहां तिसके वेत्ताकूं दष्टफल। ऐसें संबंध है औ क्रि- याका विशेषण है ऐसैं कहा ताका ऐसें जाननेवालेकूं साधु घोष आवेंगे ऐसा जो है सो शीघ्र (अप्रतिबंधकरिहीं) होवैहैं। यह अर्थ है औ आदित्यविषै ब्रह्मकी दृष्टि आदरका विषय है। इति श्रीछान्दोग्योपनिषद्स्तृतीय प्रपाठकगतैकोनविंश- तितमखंडस्य टिप्पणं समाप्रम् ॥१९॥ समाप्तेयं तृतीयप्रपाठकस्य टिप्पणिका ॥ ३॥

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पनिषत् ] एकोनविंश खंड १९ ६०३ आदित्यांडदृष्टिसैं अध्यात्माधिदैविक ब्रह्मोपासना ४ च गच्छेयुरुप च निम्रेडेरन्निम्रेडेर न्।।४।। इति श्रीछान्दोग्योपनिषदि तृतीयप्रपाठ कस्यैकोनविंशः खण्डः समाप्ः॥१९॥

प्रति साधु घोष आवते हैं अरु उपसुखकूं करते हैं। उपसुखकूं करते हैं॥४॥ इतिश्रीछांदोग्योपनिषदो मूलमात्रभाषादीपिका- यां तृतीयप्रपाठकस्यैकोनविंशः खंडः समाप:१९ इस ऐसैं जाननेवालेकूं साधु (शोभन) घोष प्राप्त होतेहैं। ऐसा जो है। सो शीघ्र हो- वैहै॥ इहां घोष आदिकनका साधुपना जो है सो उपभोगविषै पापकेसंबंधका अभाव है॥ के- वल घोषनका आगमन मात्र नहीं किंतु वे उ- पसुखकूं करते हैं। उपसुखकूं करते हैं।। इहां दो अभ्यास। अध्यायकी समाप्तिअर्थ औ आदरअर्थ है ।। ४ ।।

प्रपाठकस्यैकोनविंशः खंडः समाप्तः ॥ १९ ॥ समाप्तेयं तृतीयप्रपाठकस्य भाष्यभाषादीपिका॥ ३ ॥

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अथ चतुर्थप्रपाठकाऽडरंभ: ४ जानश्रुति सत्यकाम उपकोसलादिकके संवादसैं सगति वायुआदिकार्यब्रह्मोपासन १७

अथ श्रीछान्दोपनिषद्श्चतुर्थप्रपाठक- स्य प्रथम: खंडः प्रारभ्यते ॥१॥ ॐ ।। जानश्रुतिर्ह पौत्रायणः श्रद्धा- अथ श्रीछांदोग्योपनिषदो मूलमात्रभाषादीपिकाया- श्वतुर्थप्रपाठकस्य प्रथमः खंडः प्रारभ्यते ॥१॥ अर्थ-श्रद्धादेय बहुदायी बहुपाक्य ऐसा अथ श्रीछांदोग्योपनिषद्भाष्यभाषादीपिकायाश्वतुर्थ- प्रपाठकस्य प्रथम: खंडः प्रारभ्यते ॥ १॥ जानश्रुतिका हंसोक्तिकरि रैक्कके पास जानेमैं क्षत्ताकूं प्रेरण ८ टीका :- वायुं अरु प्राणका ब्रह्मके पादकी द अथ श्रीछांदोग्योपनिषद् भाष्यभाषादीपिकाया श्चतुर्थप्रपाठकगत प्रथमखंडस्य टिप्पणम् ॥ ?॥ १ आदित्यकूं सूत्रके अवछेद (व्यावर्त्तक)का भेद होनेते

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पनिषत् ] प्रथम खंड १ ६०५ जानश्रुतिका हंसोक्तिसैं रैक्वपासजानेमैं क्षत्ताकूं प्रेरण ८ देयो बहुदायी बहुपाक्य आस।स ह स- र्वत आवसथान् मापयाञ्चके सर्वत एव मेऽत्स्यन्तीति॥१॥ जानश्रुति पौत्रायण [राजा] होताभया। सो सर्वओरतैं आवसथों (धर्मस्थानों) कूं करावताभया। सर्वओरतैंहीं मेरे [अन्नकूं] भोजन करेंगे। ऐसैं ॥ १॥

ष्टिकरि अध्यास पूर्व वर्णन किया। अनंतर अब ताके उपासनके अनंतर सूत्रका उपासन उपन्यास करिये है।। ॥। ननु (तहां यह शंका होवैहैः-) सूत्रात्मारूप वायु अरु प्राणका अध्यात्म अरु अधिदैवतरूप उपासन पूर्व अध्या- यविषैबी व्याख्यान किया। तैसें हुये कौंन इहां विशेष है जिस करि ताका उपासन फेर आरंभ करिये है ? यातैं क- हैहैं॥ इहां साक्षात्। याका पादोंकी कल्पनाविना। यह अर्थ है औ ब्रह्मभावकरि। याका ब्रह्मके कार्यरूपसैं। यह अर्थ है औ विद्याके दान अरु ग्रहणके विधिके दिखाने अर्थ। याका "जहां धर्म अरु अर्थ नहीं होवैं वा तिस प्रकारकी शुश्रूषा (सेवा)बी नही होवै। तहां ऊषरविषै शुभ बीजकीन्याई विद्या कहनेकूं योग्य नहीं है" इस स्मृतिकूं अनुसंधान करिके पु- एकलधनकूं लेके रैक्क राजाकेअर्थ विद्याकूं देताभया औ

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६०६ चतुर्थप्रपाठक ४ [छान्दोग्यो- जानश्चुति सत्यकाम उपकोसलादिसंवादसैं वायुआदिव्रह्मोपासन १७ तिन दोनूंके साक्षात् ब्रह्मभावकरि उपास्यपनैके अर्थ उत्तरग्रंथ आरंभ करियेहै। आख्यायिका सुखसैं अवबोधअर्थ है औ विद्याके दान अरु ग्रहणके विधिके दिखावनेअर्थ है औ आख्या- यिकाकरि श्रेद्धासैं अन्नदानकरि उद्धतपनैकी र- हितताआदिकनका विद्याप्राप्तिका साधनपना दिखायेहै :- जनश्रुतका संतान जानश्रुति [इ- हां हकार। परंपरारूप ऐतिहयअर्थ है] औ पुँ- जानश्रुति शास्त्रके अर्थकूं जानिके पुष्कल धनकूं देकेहीं श्र- द्धाआदिककरि संपन्नह्ुया तिस रैक्कतें विद्याकूं ग्रहण करता- झया ॥ तैसैं अन्यवी विद्याका दाता वा गृहीता होवै। यातै ताके दान अरु ग्रहणके विधिके दिखावने अर्थ आख्यायिका है। यह अर्थ है॥ २ ननु "गौवनके षट्शतनकूं" इत्यादि देखनेतें धनदा- नहीं विद्याके ग्रहणविषै साधन इहां प्रतीत होवैहै। श्रद्धा- आदिक तो नहीं? यह आशंकाकरिके कहैहैं॥ इहां आदिप- दकरि तात्पर्य अरु प्रणिपात (दीर्घनमस्कार) आदिक ग्रहण करिये है औ आख्यायिकाकरि। याका "ताहीकूं फेरहीं जा- नश्रुति" इत्यादि द्वितीयखंडके तृतीय वाक्यसैं उक्तरूपवाली कथाकरि। यह अर्थ है॥। ३ जनश्रुतका पुत्र जो है ताका जो पौत्र सो पौत्रायण है औ सो प्रकृत जानश्रुतिहीं है। ऐसें कहैहैं।

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पनिषत् ] प्रथम खंड १ ६०७ जानश्रुतिका हंसोक्तिसैं रैक्कपासजानेमैं क्षत्ताकूं प्रेरण ८। त्रका जो पौत्र सो पौत्रायण ऐसा सोई। श्र- द्वापूर्वकहीं ब्राह्मणादिकनकेअर्थ देय (देने यो- ग्य दान) है इसका सो श्रद्धादेय है ऐसा औ बहुत देनेकूं शील (स्वभाव) है इसका सो बैहु- दायी ऐसा औ बहु पकानेयोग्य अन्न है दिन दिनविषै गृहमैं जिसके यह बहुपाक्यहै। अर्थ यह जो :- भोजनके अर्थिनकेअर्थ बहुत अन्न इ- सके गृहविषै पकायिताहै ऐसा। ऐसे गुणोंकरि संपन्न यह जानश्रुति पौत्रायण। श्रेष्ठ देशविषै औ किसीबी कालविषै होताभया॥ सोई सर्व ओरतैं कहिये सर्वदिशाओंविषै ग्रामोंविषै अरु नगरोंविषै। आयके वसतेहैं जिनविषै ऐसे जे धर्मशालादिरूप ग्रह वे आवसथ हैं। तिन ४ श्रद्धाकरि देने योग्यकी अल्पताकी शंकाकूं निवारते हैं॥ ५ बहुपाकके फलकूं कहैहैं।। ६ उक्त राजाकी वर्तमानताके अभावतैं असद्भावकू आ- शंकाकरिके कहा है।। ७ स्वसमीपकूं प्राप्तहीं अर्थिनकेअर्थ यह राजा अन्नकूं देता है? यह आशंकाकरिके कहैहैं॥

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६०८ चतुर्थप्रपाठक ४ [छान्दोग्यो- जानश्रुति सत्यकाम उपकोसलादिसंवादसैं वायुआदिब्रह्मोपासन १७ अथ ह हरसा निशायामतिपेतुस्त- अर्थ :- अनंतरहीं रात्रिविषै हंस पतन आवसथनकूं करावताभया। यह अर्थ है।। सर्वओरतैंहीं मेरे अन्नकूं तिन आवसथोंविषै वसतेहुये जन भोजन करेंगे। ऐसा अभिप्राय है।। १ ॥ टीका :- तहां ऐसैं होते तिस राजाके धर्म- कालविषै हर्म्य (अट्टालिकारूप गृहविशेष)के त- लमें स्थित हुये। अनंतरहीं रात्रिविषै हंस पक्षी पतन होतेभये॥ ऋैषि वा देवता रा० जाके अन्नदानके गुणोंकरि संतोषकूं प्राप्त हुये हंसरूप होयके राजाके दर्शनके गोचरविषै पतन होतेभये॥ तिसकालविषै पतनहोनेवाले हं- सोंके मध्य एक पृष्ठतैं (पीछे) पतन हुया हंस आगेतैं पतनहोनेवाले हंसकूं "हो हो अयि (भोः भोः)" ऐसैं संबोधन करिके भल्लाक्ष भ- ८ श्रेष्ठ अन्नदानके फलकूं दिखावनेकूं आरंभ करैहैं॥ ९ उक्त वाक्यके अर्थकूं दिखावै हैं।

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पनिषत्] प्रथम खंड १ ६०९ जानश्रुतिका हंसोक्तिसैं रक्कपासजानेमैं क्षत्ताकूं प्रेरण ८ द्वैव२ हश्सो हश्समभ्युवाद हो होऽयि भल्लाक्ष भल्लाक्ष। जानश्रुतेः पौत्रायणस्य होतेभये। तिसकालविषै हंसकूं [अन्य हंस] हो हो अयि भल्लाक्ष भल्लाक्ष! ऐसैं कहता- भया :- जानश्रुति पौत्रायणका दिवसकरि

ल्लाक्ष! ऐसैं आदरकूं दिखावता हुया कहता- भया :- जैसैंः-"आश्चर्यकूं देख देख" ऐसें कोउ कहै। ताकीन्यांई ॥ हे मलाक्ष? ऐसैं मंददृष्टि- वान्पनैकूं सूचन करताहुया कहैहै॥ अथवा ता 1 पृष्ठगामी हंसकूं सम्यक् ब्रह्मदर्शनका अभिमान- वाला होनेतैं तिसकरि अमर्षीपनैकरि पीड्यमा- न हुया सो अग्रगामी हंस वारंवार हे अल्लाक्ष ! १० दो संबोधनके अभ्यास (दोवार कथन)के विषय (अ- र्थ)कूं कहैहैं॥ ११ ताहीकूं दृष्टांतकरि स्पष्ट करैहैं॥ १२ "भल्लाक्ष" शब्दके अर्थकूं कहैहैं ।। इहां "भल्लाक्ष" शब्द मंददृष्टिकूं विषय करताहुया विरुद्ध लक्षणासैं मंददृष्टि- वान्ताका सूचक है।। १३ भल्लाक्ष शब्दके अन्य विषयकूं कहैहैं॥ इहां यह अर्थ

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६१० चतुर्थप्रपाठक ४ [छान्दोग्यो जानश्रुति सत्यकाम उपकोसलादिसंवादसैं वायुआदिव्रह्मोपासन १७ समं दिवा ज्योतिराततं तन्मा प्रसाङ् क्षीस्तत्त्वा मा प्रधाक्षीरिति॥२॥ समज्योति आतत (व्याप्त)है। ताकूं मतिस्प- शकर। सो तुजकूं मति दहनकरै। ऐसैं ॥२॥ ऐसें उपालंभकूं प्राप्तभया॥ हे भल्लाक्ष ! ऐसें ता उपालंभकूं सूचन करैहै॥ ॥ जानश्रुति पौ- त्रायणका दिवस (स्वर्गलोक) करि तुल्य अ न्नदानआदिकसैं जनित प्रभावसें जन्य प्रकर्ष- करि भास्वर ज्योति आतत कहिये व्याप्त है। अर्थ यह जो :- स्वर्गलोककेताई स्पर्श करनेवाला है :- तिस पृष्ठगामी हंसकूं "जाननेवालेकरि महात्मा अति- क्रमण करनेकूं योग्य नहीं है" ऐसें सम्यक् दर्शनके अभिमा नकरि युक्त होनेतें तिस पृष्ठगामी हंसकरि। जानश्रुति राजाकू अतिकमण करनेकूं इच्छनेवाला अरु अमर्षी (क्रोधी) पनैकरि पीड्यमान हुया अग्रगामी हंस। "तूं धर्मकूं नहीं जानता हैं। ज्ञानके अभिमानकूं तो उठावता हैं" ऐसें उपालंभकूं प्राप्त भया। तहां हे भल्लाक्ष? ऐसैं उपालंभके स्वरूपकूं सूचन करैहैं। १४ पृष्ठगामी हंस निंदापूर्वक अग्रगामी हंसकूं संबोधन करिके क्या कहताभया? इस अपेक्षाके हुये कहैहैं।

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पनिषत्]] प्रथम खंड १ e१ जानश्रुतिका हंसोक्तिसैं रैक्कपासजानेमैं क्षत्ताकूं प्रेरण ८ ६११

तमु ह परः प्रत्युवाच-कम्वर एनमे- तत्सन्त९ सयुग्वानमिव रैक्कमात्थेति। अर्थ :- ता (पृष्ठगामी हंस)कूं पर (अ- ग्रगामी हंस) कहताभया :- अरे ! किस (कुत्सित ) इस हुयेकूं यह (मानसहित वचन) सयुग्वा (गाडी सहित) रैक्ककी है।। अथवा दिवस (दिन)करि सम (तुल्य) ज्योति है। यह अर्थ है। ताकेप्रति संबंधकूं मतिकर। अर्थ यह जो :- तिस ज्योतिकेसाथि संबंधकूं मतिकर ॥ तिस संबंधकरि सो ज्योति तुजकूं मति दहनकरहु। यह अर्थ है। [इ- हां पुरुषके पलटावनेकरि "मतिदाह करै" ऐसैं कहा] ॥। २ ॥ टीका :- ऐसैं कहनेवाले तिस पीछले हंसके

१५ मति दग्ध हो। ऐसैं [मध्यम पुरुषरूप] पाठके होते। मति दहन करै। यूं [प्रथमपुरुष] कैसें कहिये है? तहां क- हैहैं।। इहां यह अर्थ है :- मध्यम पुरुषकूं प्रथमपुरुष करिके ऐसें व्याख्यान किया औ विद्यमान इस प्राणीमात्र राजाकूं

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६१२ चतुर्थप्रपाठक ४ [छान्दोग्यो- जानश्रुति सत्यकाम उपकोसलादिसंवादसैं वायुआदिव्रह्मोपासन १७ यो नु कथर सयुग्वा रैक्क इति॥ ३॥ न्यांई कहताहैं ऐसैं ॥। ॥[एष्ठगामी हंस कहताभया :- ] जो सयुग्वा रैक् [है सो] कैसा है? ऐसैं ॥ ३ ॥ प्रतिहीं पर कहिये इतर अग्रगामी जो हंस सो प्रत्युत्तर कहताभया :- अरे! अतिनिकृष्ट यह राजा वराक (तुच्छ) है। तिस इस कुत्सित हुयेकूं कहिये कुत्सित माहात्म्यकरि युक्त हुयेकूं [आश्रयकरिके] इस प्रकारके बहुमानसहित इस वचनकूं तूं कहताहैं। ऐसें कुत्सन करैहैः-स. युग्वा रैक्ककीन्यांई। युगवत् कहिये गंत्री (गा- आश्रयकरिके बहुमानसहित इसवचनकूं कहताहैं। ऐसे कुत्सन (निंदा) करैहै। ऐसैं संबंध है।। १६ तहां विपरीत धर्मवाले दष्टांतकूं कहैहैं।। इहां यह अर्थ है :- युग जो दो बलीवर्दनके कांधेपर धरनेयोग्य काछ विशेष। ताकूं जो वहन करैहै ऐसा जो बलीवर्द वा अश्व सो युग्य है। सो इसविषै है ऐसी जो शकटी (गाडी) सो युग्वा है। तिस गाडीकरि सहित जो वर्त्तता है ऐसा जो रैक्क सो

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पनिषत् ] प्रथम खंड १ ६१३ जानश्रुतिका हंसोक्तिसैं रैक्कपासजानेमैं क्षत्ताकूं प्रेरण ८ डी) तिसकरि सहित जो वर्त्तताहै सो सयुग्वा (गाडीसहितवर्त्तनेवाला) है ऐसा रैक्क है। ता- कीन्यांईं इस राजाकूं कहताहैं। अभिप्राय यह है कि :- इस वराक राजाविषै रैक्ककीन्यांईं ऐसा अननुसारि वचन कहनेकूं अयुक्त है।। ॥ इतर (एृष्ठगामी हंस) कहैहैः-जो सयुग्वा रैक्क तुज- करि कहिये है सो कैसा है? ऐसैं कहनेवालेके प्रति भल्लाक्ष (अग्रगामी हंस) कहैहैः-श्रवण कर! जैसा सो रैक्क है॥ ३ ॥

सयुग्वा है। [इधर वकार जो है सो मतु प्रत्ययरूप अर्थवाला है] ।l हे पृष्ठगामी हंस ! तूं ज्ञानके माहात्म्यकरि युक्त रैक्ककूं आश्रयकरिके जैसा प्रशंसाका वचन होवै तैसा इस कर्मिष्ट राजाकूं आश्रयकरिके ऐसें कैसें कहता हैं॥ १७ उक्तवाक्यके अर्थकूं मिलावते हैं॥ इहां इस वराक (तुच्छ) धर्ममात्रनिष्ठ राजाविषै यह वचन अनुसारि नहीं है औ फेर विज्ञानवाले रैक्कविषै यथोक्त वचन युक्तहीं है। ऐसैं अग्रगामी हंस कहताभया ॥ तब इतर जो पृष्ठगामी हंस सो कहताअया :- जो सयुग्वा (गाडीवान्) रैक्क तैनें कहा सो कैसा होवैगा। ऐसैं अन्वय है।। ५२

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६१४ चतुर्थप्रपाठक ४ [छन्दोग्यो- जानश्रुति सत्यकाम उपकोसलादि संवादसैं वायुआदिब्रह्मोपासन १७ यथा कृताय विजितायाधरेयाः सं- यन्त्येवमेन९ सर्व तदभिसमेति यत्कि- अर्थ :- [अग्रगामी हंस कहताभयाः-] जैसैं कृत नामक अय (भागविशेषरूप पाशा) विजितभया ताकेअर्थ अधरेय (नीचेके अंकवाले पाशे) अंतर्गत होवैहैं॥ ऐसैं इस (रैक्क)के प्रति सर्व सो अंतर्गत टीका :- "जैसैं लोकविषै कृताय कहिये क- १८ सो रैक् जिस प्रकारसैं होवैहै तिस प्रकारकूं सुन ऐसें प्रतिज्ञा करिके प्रकारके दिखावनेकी इच्छाकरि अग्रगामी हंस दष्टांतकूं कहैहै॥ इहां द्यूत जो जुगार ताका समय जो संकेतका दाता अनुष्ठानका काल जिसकरि द्यूतविद्याविषे चलता है ऐसा जो पाशा सो अक्ष है। ताका कोइक भाग "अय" शब्दका वाच्य है। तिनमैं जो च्यारीअंकवाला भाग कहिये च्यारी अंक जे चिह्न वे इसविषै हैं इस व्युत्पत्तितैं जो च्यारी अंकवाला भाग है। तिस कृत नामसैं व्यवहार किये भागसैं जब द्यूतविषै प्रवृत्तनके मध्य सो कोइबी जब जीतता है तब जीतता है। तिस जीते हुये कृतनामवाले अक्षभागक अर्थ अधरेय जे न्यूनअंक वे प्राप्त होते (अंतर्भूत होते) हैं। ऐसे संबंध है।।

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पनिषत्] प्रथम खंड १ ६१५ जानश्रुतिका हंसोक्तिसैं रैक्कपासजानेमैं क्षत्ताकूं प्रेरण ८ ञ्च प्रजाः साधु कुर्वन्ति। यस्तद्वेद यत्स वेद स मयैतदुक्त इति॥४॥ होवैहै जो कछ प्रजा साधु (शुभ) करैहैं। जो ताकूं जानताहै। सो जिसकूं जानताहै। सो मैनैं ऐसैं कहा ऐसैं ॥ ४ ॥ तनामक अय (अक्षका भाग)। जो द्यूतके स- मय (संकेतके देनेवाले काल)विषै प्रसिद्ध च्या- रीका अंक (चौका) है। सो जब जीतता है। तब द्यूतविषै प्रवृत्तनके मध्य तिस विजितके- अर्थ कहिये तिसे चोकेकेअर्थ इतर जे तीन दो अरु एक संख्यावाले अंक अधरेय कहिये त्रेतां

१९ ताके अर्थकूं व्याख्यान करैहैं। २० अधरेय जे तीन अंक तिनकूं व्याख्यान करैहैं। २१ तिनहींकूं स्पष्ट करैहैं॥ इहां यह विभाग है :- अक्ष (पाशा)के जिस आगविषै तीन अंक हैं सो त्रेतानामवाला अय (भाग) होवैहै। औ जिस भागविषै तो दो अंक हैं सो द्वापर नामक भाग है औ जिस भागविषै एक अंक है सो क- लिनामक भाग है। ये च्यारी अंकवाले कृत (सत्य) नाम- वाले भागतैं विलक्षण तीनि भाग अधरेय कहियेहैं॥

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६१६ चतुर्थप्रपाठक ४ [छान्दोग्यो- जानश्रुति सत्यकाम उपकोसलादि संवादसैं वायुआदिब्रह्मोपासन १७ द्वापर अरु कलिनामवाले तीन अंक हैं। वे अं- तर्भूत होवैहैं। अर्थ यह जो :- धैयारी अंकवाले कृतायनामवाले अक्षके भागविषै तीन दो अरु एक अंकोंकूं विद्यमान होनेतैं वे ताके भीतर हो- वैहैं॥ जैसैं यह दृष्टांत है। ऐसैं इस कताय- स्थानीय रैक्वकेप्रति त्रेताआदिक अय स्थानीय सर्व सो लीन होवैहै कहिये रैक्रेविषै अंतर्भूत होवैहै।। ॥ सो क्या है किः-जो कछ लोक- २२ तिस अर्थवाले होनेकरि इतर अंकोंके उक्त अन्तर्भा- वकूं स्पष्ट करैहैं॥ ताके अंतर्भूत होतेहैं। याका तिस कृत- नामवाले भागविषै वे त्रेता आदिक तीनिभाग अंतर्गत हो- तेहैं। यह अर्थ है। माहासंख्याविषै अवांतर (बीचकी) सं- ख्याका अंतर्भाव प्रसिद्धहीं है। यह अर्थ है।। २३ दष्टांतकूं अनुवाद करिके तिसकरि सिद्ध अर्थरूप दार्ष्टातकूं कहैहैं॥ २४ रैक्ककेप्रति अभिव्याप्त होयके सर्व जाता है। या वा क्यके अर्थकूं संक्षेपसैं कहैहैं। २५ रैक्कविषै सर्वके अंतर्भावकूं प्रश्नपूर्वक प्रकट करैहैं। इहां यह अर्थ है :- ताके धर्मकूं महान् होनेतें औ अन्योके ध- र्मके समूहकूं अल्प होनेतैं ता (अन्योंके धर्मके समूह)का इतर (रैक्कके धर्म)विषै अंतर्भाव संभवै है।

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पनिषत्] प्रथम खंड १ ६१७ जानश्रुतिका हंसोक्तिसैं रैक्कपासजानेमैं क्षत्ताकूं प्रेरण ८ विषै सर्व प्रजा शोभनधर्मके समूहकूं करैहैं सो सर्व रैक्कके धर्मविषै अंतर्भूत होवैहै। औ तो- के फलविषै सर्व प्राणीनके धर्मका फल अंत- र्भूत होवैहै। यह अर्थ है॥२ तैसैं अन्यबी को- इक जो तिस वेद्यकूं जानताहै॥ ॥ सो क्या है कि :- जिस वेद्यकूं सो रैक्व जानताहै। तिस वेद्यकूं अन्यबी जो जानताहै ताकूंबी सर्व प्राणीनके धर्मका समूह औ ताका फल रैक्ककी- न्यांईं प्राप्त होवैहै। ऐसें अनुवर्त्तताहै (पीछलेप- दसैं संबंध है)। सो एवंभूत विद्वान् मैनैं ऐसैं कहा। रैक्ककी न्यांईं सोई कतायस्थानीय क- हिये च्यारीअंकवाले अक्षके भाग (पार्थव) स्था- नीय होवैहै। यह अविप्राय है ॥। ४॥।

२६ किंवा :- सर्व प्राणीनके धर्मका फल अति अल्प हो- नेतैं अतिशय बडे रैक्कके धर्मके फलविषै अंतर्गत होवैहै। ऐसें कहैहैं॥ २७ केवल रैक्कका यह माहात्म्य नहीं है किंतु अन्य ज्ञा- नवान्काबी है। ऐसें जानश्रुति राजाके अनुग्रह अर्थ अग्र- गामी हंस कहैहै।।

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६१८ चतुर्थप्रपाठक ४ [छान्दोग्यो- जानश्रुति सत्यकाम उपकोसलादि संवादसैं वायुआदिब्रह्मोपासन १७ तहु ह जानश्रुतिः पौत्रायण उपशु- श्राव।सह सञ्जिहान एव क्षत्तारमुवा- अर्थ :- ता (हंसवचन) कूं जानश्रुति पौत्रायण सुनताभया। सो शयनकूं त्या- गता हुयाहीं क्षत्ताकूं कहताभयाः-हे अंग टीका :- हर्म्यतलविषै स्थित राजा जानश्रु- ति पौत्रायण। तिस इसहीं ऐसे आपकी कुः त्सा (निंदा)रूप अरु अन्य रैक्कआदिक विद्वा- न्की प्रशंसारूप हंसके वाक्यकूं सुनता भया।। औ तिस हंसके वाक्यकूं पुनः पुनः स्मरण क- रता हुयाहीं रात्रिके शेषकूं उल्लंघन करता भया।। तदनंतर सो राजा बंदिजनोंकरि स्तुतियुक्त वा णीनसैं प्रतिबोध्यमान हुया शयनकूं वा निद्राकूं परित्याग करता हुयाहीं क्षत्ताकूं क हता भया :- हे अंग(वत्स)! अरे! मुजकूं स युग्वारैक्ककीन्यांईं क्या कहता भया। अ- २८ प्राप्तभये हंसके वचनसैं खेदयुक्त जो इतर (राजा)।

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पनिषत् ] प्रथम खंड १ ६१९ जानश्रुतिका हंसोक्तिसैं रैक्वपासजानेमैं क्षत्ताकूं प्रेरण ८ FIP

चाङ्ारे! ह सयुग्वानमिव रैक्कमात्थेति। यो नु कथर सयुग्वा रैक्क इति॥५॥ अरे! सयुग्वा रैक्ककीन्यांई कहताहै ऐसैं ॥। जो सयुग्वा रैक्क [है सो] कैसा है? ऐसैं५ भिप्राय यह है किः-सोई स्तुतिके योग्य है मैं नहीं हूं। अथवा सयुग्वा रैक्ककूं कहता भया। जायके मुजकूं ताके दर्शनकी इच्छा है [ ऐसा अर्थ होवै तैब इव शब्द अवधारणअर्थ। वा अर्थरहित कहनेकूं योग्य है]॥ सो क्षत्ता रैक्क- के आनयनकी इच्छावाला अरु रौजाके अभि-

सो रात्रिके शेषकूं उल्लंघनकरिके शयनकूं त्यागताहुया आपके समीपमैं स्थित स्तुतिके कर्ता क्षत्ता (दासविशेष)कूं "हे अंग अरे!"इत्यादिरूप वाक्यकूं कहताभया। ताके अभिप्रायकू क हैहैं। २९ इवशब्द द्वितीय पक्षविषै किस प्रकारसैं घटता है ? तहां कहैहैं॥ ३० अवधारणकाबी उपयोग नहीं है? ऐसें जो कहै तहां कहैहैं॥ ३१ प्रश्नवाक्यकूं व्याख्यान करैहैं॥ इहां "जो रैक्क है सो कैसा है" इत्यादि वाक्य पूर्ववत् व्याख्यान करनेकूं योग्य है औ "ताका स्मरण करता हुया" यह जो भाष्यविषै षष्ठी है

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६२० चतुर्थप्रपाठक ४ [छान्दोग्यो- जानश्रुति सत्यकाम उपकोसलादि संवादसैं वायुआदिब्रह्मोपासन १७ यथा कृताय विजितायाधरेया: सं- यन्त्येवमेन९ सर्व तदभिसमेति यत्कि अर्थ :- जैसैं कृत (च्यारी अंकवाले) अय (अक्ष) विजितकेअर्थ अधरेय अंत- र्गत होवैहैं। ऐसैं इसके प्रति सर्व सो अं- प्रायका जाननेवाला हुया उत्तरकूं कहता भया :- जो सयुग्वा रैक्व है सो कैसा है! ऐसैं। कहिये राजाकरि ऐसें उक्त हुया क्षत्ता ताकूं ल्यावनेकूं ताके चिन्हकूं जाननेकूं इच्छता हुया "जो सयुग्वा रैक्व है सो कैसा है? ऐसे सो "ताकूं" ऐसे कर्मविषै है॥ औ जातें मुज (रैक्)करि ग हस्थाश्रम करनेकूं इच्छित है औ तिसअर्थ धन इछित क रिये है औ यह तिसअर्थवाला होनेकरि किचित् उपकार करनेकूं नहीं होवैगा। इस आशयकरि रैक्कके किये अनादरकू मैं क्षत्ता जनावताभयाहूं औ जो उक्तलक्षणवाले रैक्ककूं औौ ताके गृहस्थाश्रमके अभिप्रायकूं औ धर्मार्थीपनैकूं जानताभ याहूं। यह शेष है।। इति श्रीछांदोग्योपनिषद्धाष्यभाषादीपिकायां चतुर्थप्र- पाठकगत प्रथमखंडस्य टिप्पणं समाप्रम् ॥१॥

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पनिषत् ] प्रथम खंड १ ६२१ जानश्रुतिका हंसोक्तिसैं रैक्कपासजानेमैं क्षत्ताकूं प्रेरण ८ ञ्च प्रजाः साधु कुर्वन्ति। यस्तद्वेद यत्स वेद स मयैतदुक्त इति ॥६॥ स ह क्षत्ताऽन्विष्य नाविदमिति प्र- तर्गत होवैहै जो कछ प्रजा साधु करैहैं। जो ताकूं जानताहै। सो जिसकूं जानता है। सो मैनैं ऐसा कहा ऐसैं ॥ ६ ॥ अर्थ :- सो क्षत्ता खोजिके "नहीं जान- ताहूं" ऐसैं पीछे आवताभया। ॥ता (क्ष-

कहता भया। औ सो राजा भल्लाक्ष(अग्रगामी- हंस) के वचनकूंहीं कहता भया । ५॥६॥ टीका :- ताका (ताकूं) स्मरण करता हुया सोई क्षत्ता। नगरके प्रति वा ग्रामके प्रति जायके खोजिके रैक्ककूं "मैं नहीं जानताहूं" ऐसैं करिके पीछे आवता भया॥ ॥ ता क्षत्ताकूं राजा कहता भया :- अरे ! ब्राह्मण (ब्रह्मवेत्ता) की जहां अरण्यमैं नदीके पुलिन-

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६२२ चतुर्थप्रपाठक ४ [छान्दोग्यो- जानश्रुति सत्यकाम उपकोसलादि संवादसैं वायुआदिव्रह्मोपासन १७ त्येयाय। त९ होवाच-यत्रारे ! ब्राह्मण- स्यान्वेषणा तदेनमच्छेति॥७॥ सोऽधस्ताच्छकटस्य पामानं कर्ष- त्ता)कूं [राजा] कहताभयाः-अरे! जहां ब्राह्मणकी अन्वेषणा (खोजना) होवैहै तहां इसकूं खोजनाकर ऐसैं ॥ ७॥ अर्थः-सो (क्षत्ता) शकट (गाडी)के आदिक विविक्त (एकांत) देशविषै खोजना होवैहै तहां इस रैक्कके प्रति गमनकर। अर्थ यह जो :- तहां खोजकूं कर ॥ ७ ॥ टीका :- ऐसैं राजाकरि उक्त हुया सो क्षता खोजिके ताकूं जनरहित देशविषैशकट (गाडी) के नीचे पामा (खुजली)कूं संघर्षण करते (खुंजवालते) हुयेकूं देखिके "यह निश्चयकरि सयुग्वा (गाडीसहित) रैक्व है" ऐसें जानिके विनय करि ताके समीप बैठता भया औ ता रैक् कूं कहता भया :- "हे भगवन् ! सयुग्वा

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पनिषत् ] प्रथम खंड १ ६२३ जानश्रुतिका हंसोक्तिसैं रैक्कपासजानेमैं क्षत्ताकूं प्रेरण ८ माणमुपोपविवेश।तर हाभ्युवाद। तंनु भगवः! सयुग्वा रैक्क इत्यह ह्वरा ३ इति ह प्रतिजज्ञे। स ह क्षताऽविदमिति प्रत्येयाय ॥ ८॥ इति चतुर्थप्रपाठकस्य प्रथमः खण्डः॥ १॥ नीचेपामाकूं कंडूयमान [रैक्क ]के प्रति स- मीप बैठताभया। ताकूं कहताभया :- हे भ- गवन्! तूं सयुग्वारैक्कहैं? ऐसैं॥। ॥ अरे! मैंहींहूं। ऐसैं प्रतिज्ञा करताभया॥ सोक्षत्ता जानताभयाहूं ऐसैं पीछे आवताभया॥८॥ इति श्री०मूलभाषा०चतुर्थप्रपाठ०प्रथम:खंड:१ रैक्क तुम हो?" ऐसैं॥॥ इस प्रकारसैं पूंछ्या हुया "अरे ! मैंहीं हुं" ऐसै [इहां अरे! श- ब्द अनादर विषैहीं है] प्रतिज्ञा (अंगीकार) करता भया ॥ सो क्षत्ता ताकू जानिके "मैं जानताभया हूं" ऐसैं मानिके पीछे आ- वता भया। यह अर्थ है ॥ ८ ॥। इति श्री०भाष्यभाषा०चतुर्थप्रपा०प्रथमःखंडः समाप्तः॥।१॥

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६२४ चतुर्थप्रपाठक ४ [छान्दोग्यो- जानश्रुति सत्यकाम उपकोसलादि संवादसैं वायुआदिब्रह्मोपासन १७ अथ चतुर्थप्रपाठकस्य द्वितीयःखंड: २॥। तदुह जानश्रुतिः पौत्रायण: षट्श- तानि गवां निष्कमश्वतरीरथं तदादाय प्रतिचक्रमे तः हाभ्युवाद॥१॥ अथ श्री०मूलभाषा०चतुर्थप्रपा०द्वितीयः खंडः ॥ २॥ अर्थ :- तहांहीं जानश्रुति पौत्रायण। गौअनके षट् शतोंकूं निष्क (हार) कूं अश्वव- तरीयुक्त रथकूं तिस (धन)कूं लेके जाता- भया। ता (रैक्) कूं कहताभया॥ १॥ अथ श्री०भाष्यभाषा०चतुर्थप्रपाठ०द्वितीयः खंडः॥२॥ रैक्कके अर्थ जानश्रुतिकरि धनादिप्रदान ५ टीका :- तहां रेक्क ऋषिके गृहाश्रमके प्रति अभिप्रायकूं जानिके औ धनार्थिताकूंहीं जा निके जानश्रुति पौत्रायण गौअनके षट् शतनकूं अरु कंठके हाररूप निष्ककूं औ दो अश्वतरी (खेचरी)नकरि युक्त रथकूं। तिस धनकूं ग्रहण करिके रैक्कके प्रति गमन कर. ताभया औ ताकूं जायके कहताभया ॥१॥

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परिषत् ] द्वितीय खंड २ ६२५ e) FHT रैक्कअर्थ जानश्रुतिकरि धनादिप्रदान ९ रैक्केमानि षट् शतानि गवामयं निष्कोऽयमश्वतरीरथो तुम एतां। भ- गवो देवता शाधि यां देवतामुपास्से इति ॥२॥ अर्थ :- हे रैक्क! ये गौअनके षट् शत हैं। यह निष्क है। यह अश्वतरीयुक्त रथ है [इस धनकूं ग्रहण कर]। हे भगवन्! सु- जकूं इस देवताकेतांई शिक्षाकर जा देव- ताकूं उपासताहैं ऐसैं ॥ २ ॥

टीका :- हे रैक्क ! गौअनके षट् शत ये तुजअर्थ मुजकरि आनयनकिये हैं। यह नि- ष्क है अरु यह दो अश्वतरी (खेचरी)नक- रि युक्त रथ है। इस धनकूं ग्रहण कर। हे भगवन् ! मेरेतांई याकूं शिक्षा कर जा दे- वताकूं तूं उपासताहैं । अर्थ यह जोः-ता देवताके उपदेशकरि मुजकूं शिक्षा कर ॥२ ॥ ५३

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६२६ चतुर्थप्रपाठक ४ [छन्दोग्यो- जानश्रुति सत्यकाम उपकोसलादि संवादसैं वायुआदिव्रह्मोपासन १७ तमु हपर: प्रत्युवाचाह हारेत्वा शूद्र! तवैव सह गोभिरस्त्विति।तदुह पुनरेव अर्थ :- ताहीकूं पर (रैक्क) प्रत्युत्तर दे ताभयाः-हे शूद्र! हारकरि युक्त शकटी बैलोंकरि सहित तेरेकूंहीं होहू ऐसैं॥ ता टीका :- तिस ऐसैं कहनेवाले राजाके प्रति पर जो रैक्व सो प्रत्युत्तर देताभयाः-[इहां "अह" ऐसा जो यह निपात है सो अन्य ठिकाने विनिग्रहरूप अर्थवाला है परंतु इधर अर्थरहित है। काहेतैं। एव शब्दके पृथक् प्रयो अथ श्री०चतुर्थप्रपाठकगतद्वितीयखंडस्य टिप्पणं ३२ इहां क्षत्ताके वचनके सुने हुये यह "तहां" इस समीका अर्थ है औ धनार्थिताकूं जानिके। ऐसें पूर्वले पदस संबंध है औ "उह" शब्दका पूर्व (प्रथमखंडके द्वितीय अर पंचम वाक्यगत उह शब्द)की न्यांई इहांवी एवकार (निश्चय) रूप अर्थ है।। औ इहां इस द्वितीय खंडके तृतीय वाक्यविष जो "अह" शब्द है सो अर्थरहित है॥ तामैं यह शंका है :- ननु इहांवी विशेषकरि निग्रह (निषेध)रूप अर्थवान्ताके से-

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पनिषत् ] द्वितीय खंड २ ६२७ रैक्कअर्थ जानश्रुतिकरि धनादिप्रदानहF! जानश्रुतिः पौत्रायणः सहस्त्रं गवां नि- ष्कमश्वतरीरथं दुहितरं तदादाय प्रति- चक्रमे॥ ३॥

(रैक्कके मत)कूं हीं [जानिके] जानश्रुति पौत्रायण। गौअनके सहस्रकूं निष्ककूं अश्वतरीयुक्त रथकूं दुहिता (स्वकन्या)कूं ता (धन)कूं लेके जाताभया॥ ३॥ गतैं ] हारकरि युक्त जो इत्वा कहिये गंत्री (गाडी) है सो यह बलीवर्दोकरि सहित तु- जकूंहीं होहू। मुजकूं कर्मकेअर्थ अपरिपूर्ण (न्यून) इस धनसैं प्रयोजन नहीं है। यह अभिप्राय है। हे शूद्र ! ऐसैं [ कहता भया ]

भव हुये क्यूं ऐसे "अह" शब्दकी अर्थरहितता होवैगी? यह आशंकाकरिके। "तेरेकूंहीं" इस एवकारतैंहीं विनिग्रह (नि- षेध)की सिद्धि है। ऐसैं कहैहैं। ३३ ननु गृहाश्रमके अर्थी तुज रैक्ककूं कर्म अनुष्ठानकेअर्थ यह धन होहू? ऐसें जो राजा कहै। तहां रैक्व नहीं ऐसे कहैहै॥

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६२८ चतुर्थप्रपाठक ४ [छन्दोग्यो जानश्रुति सत्यकाम उपकोसलादि संवादसैं वायुआदिव्रह्मोपासन १७ । ॥ नैतु यह राजा क्षत्ताके संबंधतैं [ इहां आया है। यातैं] सो (रैक्व)। क्षत्ताकूं "हे शूद्र" ऐसैं कहता भया। ऐसें कहा औ विद्याके ग्रहण अर्थ ब्राह्मणके समीप उपगमनतैं औ शूद्रकूं अ नधिकारतैं "हे शूँद्र!" ऐसैं यह अननुसारि व चन रैक्ककरि कैसैं कहियेहै? तैहां आचार्य क हतेहैं :- हंसवचनके श्रवणतैं शुक् (शोक) इस राजाके प्रति प्रवेश करती भई। तिसकरि यह ३४ इहां शूद्र शब्दकरि जानश्ुति राजाका संबोधन अ- नुचित है? ऐसैं पूर्ववादी शंका करैहै। ३५ तिस राजाकी अशूद्रताविषै पूर्ववादी अन्य हेतुकूं कहैहै। ३६ तिस शूद्रकूं श्रुतिवाक्यद्वारा विद्याका अधिकार नहीं है। यह अर्थ शूद्राधिकरणविषै सुत्रकार श्रीवेदव्यासाचार्यने निर्धार किया है। इस आशयकरि पूर्ववादी कहैहै॥ ३७ जानश्रुतिकी क्षत्रियताके होते हे शूद्र? ऐसा संबो धन अयोग्य है? ऐसैं पूर्ववादी प्रश्नकी समाप्ति करैहै॥ ३८ जानश्रुति जो है सो जातिशूद्ध नहीं है किंतु क्षत्रिय है। इसविषै गौण शूद्र शब्द है। ऐसें एक आचार्यके मतक उपन्यासकरि सिद्धांती परिहार करैहैं॥ इहां यह अर्थ है :- तिस शोकसैं आविष्ट होनेकरि यह जानश्रुति शोकरूप हेतु करि रैक्ककेप्रति आद्रवण करैहै यातैं शुद्ध है। वा हंसके वा क्यकूं सुनिके रैक्ककेप्रति आद्रवण करैहै यातें शुद्र है। इस रीतिसैं तिसविषै नैमित्तिक (निमित्तका किया) शुद्रपद है।

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पनिषत् ] द्वितीय खंड २ ६२९ e/ FHIPT रैक्कअर्थ जानश्रुतिकरि धनादिप्रदान ५

राजा शोककरि वा रैक्कके महिमाकूं श्रवण क रिके द्रवताहै। यातैं ऋषि आपकी परोक्षज्ञ- ताकूं दिखावता हुया हे शूद्र! ऐसैं कहता भया इति॥ वीं शूद्रकीन्यांई धनकरिहीं याके प्रति विद्याग्रहणकेअर्थ उपगमन करता भया। शुश्रू- षाकरि नहीं। [ यातैं ताकूं शूद्र कहा ] परंतु जातिकरिहीं शूद्र नहींहै इति॥ दूसरे फिर कहतेहैं किः-इसनैं अल्पधन आनयन किया। यातैं रोषकरिहीं इस राजाकूं हे शूद्र! ऐसैं क- हता भया औ धैनके बहु आनयनविषै ग्रह-

३९ तथापि क्यूं ऐसैं शूद्रपदकरि राजाकेप्रति ऋषि सं- बोधन करैहै? यह आशंकाकरिके कहैहैं।। इहां कहे जे दो प्रकार तिनकी समाप्तिविषै इति शब्द है॥ ४० अन्यप्रकारसैं जानश्रुतिके गौण शूद्रपनैकूं व्युत्पादन करैहैं। इहां शुश्रूषाकरि नहीं । तिसकरि शूद्र है। यह शेष है।। ४१ राजाके मुख्य शूद्रपनैंकूं क्षत्ता (दासीपुत्र)के संबंध- करि निषेध करैहैं॥ ४२ क्षत्रियरूप जानश्रुतिविषै शूद्र शब्दकी प्रवृत्तिमैं अन्य निमित्तकूं कहैहैं॥ ४३ तहां गमक (लिंग)कूं दिखावै हैं॥ इहां जो ऋषिके मतकूं। याका अधिक धनार्थिपनैकूं। यह अर्थ है औ अ-

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६३० चतुर्थप्रपाठक ४ [छान्दोग्यो- जानश्रुति सत्यकाम उपकोसकादि संवादसैं वायुआदिब्रह्मोपासन १७ त हाभ्युवाद-रैक्केदं सहस्रं ग- अर्थ :- ताकूं कहताभयाः-हे रैक! यह णरूप लिंग है ऐसैं॥। ॥ तिस ऋषिके मतकूं जानिके फेरहीं जानश्रृति पौत्रायण । गौ- वनके अधिक सहस्रकूं अरु ऋषिकूं अभिमत आपकी दुहिता (कन्या)रूप जायाकूं तिस- धनकूं ग्रहण करिके गमन करताभया॥३॥ टीका :- हे रैक्क् ! यह गौअनका सहस्त्र। यह निष्क। यह अश्वतरीयुक्त रथ। यह जाया होनेअर्थ मेरी दुहिता (पुत्री) आनय नकरी है औ यह ग्राम है जिसविषै तूं स्थि त हैं सो तेरेअर्थ मैनें कल्पनाकिया है॥ तिस इस सर्वकूं लेके। हे भगवन् ! सुजकूं अतु घिक। षद्शतोंतैं। यह शेष है औ विद्यादानविषै ता (राज- कन्या)की द्वारताकूं औ ताके दाता राजाकी श्रेष्ठ ज्ञानदा नकी तीर्थता (पात्रता)कूं जानताहुया कहताभया। ऐसैं सं बंध है।।

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पनिषत् ] द्वितीय खंड २ ६३१ e EPIT रैक्कअर्थ जानश्रुतिकरि धनादिप्रदान ६ताना वामयं निष्कोऽयमश्वतरीरथ इयं जा- याडयं ग्रामो यस्मिन्नास्सेऽन्वेव माभ- गवः! शाधीति॥४॥

गौअनका सहस्र है। यह निष्क है। यह अश्वतरीयुक्त रथ है। यह जाया है। यह ग्राम है जिसविषै स्थित हैं। हे भगवन्! मुजकूं शिक्षाहीं कर ॥ ४ ॥

शिक्षाहीं कर ॥ ऐसैं उक्तहुया रैक्क। तिस जाया होनेअर्थ ल्यायी राजाकी दुहिताकेहीं मुख (विद्याके द्वारपनै)कूं औ राजाके विद्या- के दानविषै तीर्थपनैकूं उपग्रहण करता हु- या। अर्थ यह जो :- जानता हुया कहिये "ब्र- ह्ैचारी धनदायी मेधावी श्रोत्रिय (पंडित) प्रिय वा विद्याकरि विद्याकूं कहताहै। ये मेरे

४४ धनदाताके विद्यादानके तीर्थपनैविषै प्रमाणकूं कहैहैं।

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६३२ चतुर्थप्रपाठक ४ [छान्दोग्यो- जानश्रुति सत्यकाम उपकोसलादि संवादसैं वायुआदिब्रह्मोपासन १७ PP मा: शूद्रानेनैव मुखेनालापयिष्यथा इ- तिणते हैते रैक्कपर्णा नाम महावृषेषु य- अर्थ :- ता (राजकन्या)के हीं मुख (द्वा. रपनै)कूं ग्रहण करताहुया कहताभयाः-हे शूद्र ! इन (गौअन)कूं ल्यावताभयाहैं इसी (कन्यारूप)हीं सुख (विद्याके द्वार)सैं आलापकूं करताहैं ऐसैं॥ ये वे प्रसिद्ध ये रै- क्वपर्ण नाम हैं महावृष (पुण्यदेशरूप) जिन (विद्याके) षट् तीर्थ (पात्र) हैं" ऐसा वि- द्याका वचन प्रसिद्ध जानियेहै। ऐसैं जानताहुया कहताभया॥ हे शूद्र ! तूं 'जो इन गौव' ४५ विद्याके दानविषै तिस राजकन्याकी द्वारताकूं औ ताके दाता राजाकी तीर्थताकूं जानता हुया रैक्क कहताभया। ऐसें उक्त अर्थकूं अनुवाद करैहैं॥ ४६ रैक्कनें क्या कहा इस अपेक्षाके हुये कहैहैं।

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पनिषत् ] द्वितीय खंड २ ६३३ रैक्कअर्थ जानश्रुतिकरि घनादिप्रदान १ त्रास्मा उवास। तस्मै होवाच॥ ५॥ इति चतुर्थप्रपाठकस्य द्वितीयः खण्डः ॥ २ ॥ [ग्रामों]विषै वास करताभया । [तिनकूं] इसके अर्थ [देताभया] तिस (राजा)के अर्थहीं कहताभया॥ ५॥ इति श्री०मूलभाषा०चतुर्थप्रपा०द्वितीयः खंड:२

नकूं औ जो अन्य धनकूं ल्यावताभया हैं सो साधु (शोभन) है। यह वाक्यशेष है॥ इहां हे शूद्र! ऐसैं जो फेर कहा सो पूर्व उ- क्तका अनुकरणमात्र है परंतु अन्य कारणकी अपेक्षासैं नहीं॥ पूर्वकीन्यांईं इसीहीं मुख- (द्वार) रूप विद्याग्रहणके तीर्थकरि आलापन करताहैं। ऐसैं अर्थ यह जो :- मेरे प्रति क-

४७ तहां वैधर्म्य (विपरीतधर्मवाले) दष्टांतकूं कहैहैं। इहां यह अर्थ है :- अल्पधनके ग्रहणकी अनिच्छाविषै कारणकी अपेक्षाके हुये पूर्व कथन किये हे शूद्र! ऐसैं। संबोधनकी- न्यांई। यह पूर्ववत् शब्दका अर्थ है।।

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६३४ चतुर्थप्रपाठक ४ [छान्दोग्यो- जानश्रुति सत्यकाम उपकोसलादि संवादसैं वायुआदिब्रह्मोपासन १७ हताहैं॥ वे प्रसिद्ध ये ग्राम रैक्कपर्ण नाम विख्यात हैं महापुण्यदेशरूप जिनग्रामोंविषै रैक्त निवास करताभया तिन ग्रामोंकूं यह राजा इस रैक्केअर्थ देताभया। तिस ध- नकूं देनेवाले राजाकेअर्थ सो रैक्व विद्याकूं कहताभया॥४॥५॥ इति श्री०भाष्यभाषा०चतुर्थप्रपाठ०द्वितीयः खंडः॥२॥ ४८ रैक्कनैं ग्रामआदिककू ग्रहणकरिके जानश्रुतिकेअर्थ वि- द्या दयी। यह हमारेप्रति श्रुति जनावती है॥ इहां महावृष (नविषै) याका महापुण्यरूप (नविषै) यह अर्थ है।। [इहांसे आगे तृतीय खंडकरिके प्राणोपासक ब्रह्मचारी औ कापेय अरु अभिप्रतारी इन दो राजाओंके संवादपूर्वक रैक्कका जानश्रुतिके प्रतिसूत्रका उपदेश है। ऐसें जानना]॥ इति श्री० चतुर्थप्रपाठकगत द्वितीयखंडस्य टिप्पणम् ॥२॥

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पनिषत् ] तृतीय खंड ३ ६३५ आख्यायिकासहित संवर्गविद्या ८ अथ चतुर्थप्रपाठकस्य तृतीय:खंडः।।३। वायुर्वाव संवर्गो यदा वा अग्निरुद्वा-

अथ श्री०मूलभाषा०चतुर्थप्रपाठकस्य तृतीयः खंडः।३॥। अर्थ :- वायुहीं संवर्ग है।। जब अग्नि

अथ श्री०भाष्यभाषाचतुर्थप्रपा० तृतीयः खंडः॥३। आख्यायिकासहित सर्वोपलन्धिफल कसंवर्गविद्या ८ टीका :- वौयुहीं संवर्ग है कहिये। वांयु जो बाह्य [ इहां वाव। यह शब्द अवधारण अर्थ है ] संवर्ग है। संवर्जनतैं कहिये संग्रहणतैं वा सम्यक् अ्रसनतैं वायु संवर्ग है। वैक्ष्यमाण अग्निआदिक देवताओंके प्रति आत्मभावकूं सं अथ चतुर्थप्रपाठकगततृतीयखंडस्य टिप्पणम्॥ ३॥ ४९ रैक्क किस प्रकारसें विद्याकू कहताभया! यह आशंका- करिके। अधिदैवतरूप ताकी उक्तिके प्रकारकूंश्रुति दिखावैहै॥ ५० "प्राणहीं संवर्ग है" ऐसें आगे कहनेके वाक्यसैं अ- पुनरुक्तिके अर्थ वायुकूं व्याख्यान करैहैं॥ इहां संवर्जनतैं। इसपदकी व्याख्या संग्रहणतैं। यह है॥ ५१ सम्यक्ग्रहणरूप पक्षकूं प्रतिपादन करैहैं॥

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६३६ चतुर्थप्रपाठक ४ [छान्दोग्यो- जानश्रुति सत्यकाम उपकोसलादि संवादसैं वायुआदिब्रह्मोपासन १७ यति वायुमेवाप्येति। यदा सूर्योऽस्तमेति वायुमेवाप्येति। यदा चन्द्रोऽस्तमेति वा युमेवाप्येति॥१॥ उद्दासन (नाश) कूं पावताहै [तब] वायुके ताईहीं लय होवैहै। जब सूर्य अस्तकूं पावताहै [तब] वायुके तांईहीं लय होवै- है। जब चंद्र अस्तकूं पावताहै वायुके तां- ईहीं लय होवैहै ॥ १॥ पाढकरैहै यातैं संवर्ग है । संवर्जननामवाला जो गुणहै सो वायुकीन्यांई ध्यानकरनेकूं योग्य है। कैतनामक अय (अक्ष)विषै अन्य त्रेता आदिक नामवाले अक्षनके अंतर्भावके दृष्टांततें ॥ नैनु वायुकूं संवर्गपना कैसैंहै? यह क हैहैं :- जब (जिसकालविषै) प्रसिद्ध अग्नि उ ५२ ननु वायुकी संवर्गरूपता क्यूं उपदेश करिये है। तहां पूर्व उक्त दष्टांतरूप श्रुतिकूं आचार्य प्रमाण करैहैं॥ ५३ वा सम्यक् ग्रसणेतैं संवर्ग है। ऐसें उक्त द्वितीय पक्षकूं आकांक्षापूर्वक व्युत्पादन करैहैं।

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पनिषत् ] तृतीय खंड ३ ६३७ आख्यायिकासहित संवर्गविद्या ८F

द्ासन (उपशम)कूं पावताहै तब यह अभि वायुकेतांईहीं लीनहोवैहै कहिये वायुके स्वभा- वकूं पावताहै। ऐसैं जब सूर्य अस्तकूं पाव- ताहै तब वायुकेतांईहीं लीन होवैहै। जब चंद्र अस्तकूं पावताहै तबवायुकेतांईहीं ली- न होवैहै। ॥ नैतु स्वरूपकरि अवस्थित चंद्र- सूर्यका वायुविषै विलय कैसैं संभवैहै ? येह दोष नहीं है :- काहेतैं अस्तमनके हुये अदर्श- नकी प्राप्तिकूं वायुरूप निमित्तवाली होनेतैं। जौतें वायुकरि सूर्य अस्तकूं पावताहै। चलनकूं

५४ सूर्य अरु चंद्रके वायुविषै विलयकूं पूर्ववादी निषेध करैहै। इहां प्रलयपर्यत तिन सूर्य चंद्रकी अधिकाररूप पद- विषै स्थितिके अंगीकारतैं तिनका स्वरूपविषै अवस्थितपना देखनेकूं योग्य है।। ५५ सूर्यआदिकके स्वरूपविषै अवस्थानके होतेबी वायु- विषै लय संभवै है। ऐसें सिद्धांती समाधान करैहैं॥ ५६ अस्तकेहुये सूर्यआदिककी अदर्शनकी प्राप्तिके वायुके अधीनपनैकूं व्युत्पादन करैहैं॥ इहां सूर्यका ग्रहण जो है सो चंद्रकाबी उपलक्षण है।। ५४

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६३८ चतुर्थप्रपाठक ४ [छान्दोग्यो जानश्रुति सत्यकाम उपकोसलादि संवादसैं वायुआदि ब्रह्मोपासन १७ यदाऽऽप उच्छष्यन्ति वायुमेवापि यन्ति। वायुहेवैतान्सर्वान्संवृङ्क्त इत्य- धिदैवतम्॥ २ ॥ अर्थ :- जब जल सूकजातेहैं वायुके तांईहीं लय होवैहैं। जातें वायुहीं इन स र्वकूं सम्यक्र यसताहै [तातैं संवर्ग है]। यह अधिदैवत है॥ २ ॥ वायुका कार्यहोनेतैं ।। अँथवा प्रलयविषै सूर्य चंद्रके स्वरूपके नाशहुये तेजोरूप तिन दोनूंका वायुविषैहीं विलय होवैहै॥ १ ॥ टीका :- तैसैं जब जल शोषणकूं पावतेहैं (सूखजातेहैं) तब वायुकेतांईहीं विलीन हो तेहैं। वायु जातैंहीं इन महाबलवाले अि आदिकनकूं ग्रसन करैहै। यातैं वायु संवर्गयु णवाला उपास्य है। यह अर्थ है॥ ऐसैं अधि- ५७ तब सूर्यआदिकका वायुविषै लय (नाश) गौण हो वैगा? यह आशंकाकरिके। अन्यपक्षकूं कहैहैं॥ इहां यह अर्थ है :- वा संगति (अभेद)के समयचिषै संहार करैहै॥

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पनिषत् ] तृतीय खंड ३ ६३९ कंा आख्यायिकासहित संवर्गविद्या ८ अथाध्यात्मं-प्राणो वाव संवर्गः स यदा स्वपिति प्राणमेव वागप्येति प्राणं चक्षु: प्राण श्रोतं प्राणं मनः प्राणो हे- अर्थ :- अनंतर अध्यात्म है :- प्राणहीं संवर्ग है। सो (पुरुष) जब सोवताहै [तब] प्राणके तांईहीं वाकू लय होवैहै। प्राणके तांई चक्षु। प्राणके तांई श्रोत्र । प्राणके तांई मन [लय होवैहै]।। जातैं प्राणहीं दैवत कहिये देवताओंविषै संवर्गका दर्शन कहा॥ २ ॥ टीका :- अनंतर अध्यात्म कहिये आत्मा- विषै संवर्गका दर्शन यह कहियेहैः-मुख्य (मु- खगत) प्राणहीं संवर्ग है। सो पुरुष जब (जिसकालविषै) सोवताहै तब वायुकेतांई अग्निकीन्यांई प्राणके तांईहीं वाक लीनहोवै ५८ प्राणका संवर्गपना कैसें है? यह आशंकाकरिके क- हैहैं।। इहां तातैं संवर्ग है। यह अध्यात्म है। यह शेष है॥

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६४० चतुर्थप्रपाठक ४ [छान्दोग्यो- जानश्रुति सत्यकाम उपकोसलांदि संवादसैं वायुआदि ब्रह्मोपासन १७ वैतान्सर्वान् संवृङ्क्त इति॥ ३॥ तौ वा एतौ दौ संवर्गो वायुरेव देवेषु प्राणः प्राणेषु ॥ ४ ॥ इन सर्वकूं ग्रसताहै [तातैं संवर्ग है] यह [अध्यात्म है] ॥ ३ ॥ अर्थ :- वे प्रसिद्ध ये दोनूं संवर्ग हैं। वायुहीं देवनविषै। प्राण प्राणोंविषै॥४॥ है। प्राणके तांई चक्षु। प्राणके ताई श्रोत्र। प्राणकेताई मन [लीन होवैहै]।। प्राण जातैहीं इन वाक्आदिक सर्वकूं ग्रसन करैंह ऐसैं॥ ३ ॥ टीका :- वे प्रसिद्ध ये दो संवर्ग (संवर्जन १९ रूप गुणवाले) हैं। वायुहीं देवनविषै संवरगे है। मुख्य प्राण वाक्आदिक प्राणोंविषै सं

वर्ग है ॥ ४ ॥ ५९ वायु अरु प्राण अधिदैवत अरु अध्यात्म भेदकरि वर्गरूप गुणवाले कहे तिनकूं उपसंहार करैहैं॥

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पनिषत् ] तृतीय खंड ३ ६४१ आख्यायिकासहित संवर्गविद्या ८ अथ ह शौनकञ्च कापेयमभिप्रता- रिणं च काक्षसेनिं परिविष्यमाणौ ब्रह्म- चारी बिभिक्षे। तस्मा उ ह नददतुः॥।५॥ अर्थ :- अनंतर शौनक कापेय औ अ- भिप्नतारी काक्षसेनि परिविष्यमाण दोनूंके प्रति ब्रह्मचारी भिक्षाकूं मांगताभया। ति- सकेअर्थहीं नहीं देतेभये॥ ५॥

टीका :- अनंतर इन दोनूंकी स्तुतिअर्थ यह आख्यायिका आरंभकरियेहैः-[ इहां "ह" ऐसा शब्द परंपरारूप ऐतिह अर्थ है ] शुनकके अ- पत्य शौनक ऐसे कपिगोत्रवाले कापेयकूं औ नामतैं अभिप्रतारी ऐसैं कक्षसेनके अपत्य काक्षसेनिकूं भोजनकेअर्थ बैठे अरु सूपकारों ६० "अनंतरहीं" इत्यादि अनंतरके (पंचम)वाक्यकूं व्या- ख्यान करैहैं।। इहां ब्रह्मवित्शौंड। याका ब्रह्मवेत्ताओंके मध्य आपकूं शूर माननेवाला। यह अर्थ है औ जानिके लिंग- विशेषसैं। यह शेष है।।

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६४२ चतुर्थप्रपाठक ४ [छान्दोग्यो जानश्रुति सत्यकाम उपकोसलादि संवादसैं वायुआदि ब्रह्मोपासन १७ स होवाच-महात्मनश्चतुरो देव एक: कः स जगार भुवनस्य गोपास्तं कापेय! अर्थः-सो कहताभयाः-महात्मा (बडे स्वरूपवाले) च्यारीकूं देव एक क (प्रजा- पति) भुवनका गोपा है सो ग्रसतभाया॥ (पाचकों) करि परिविष्यमाण ( परिवेषणकूं प्राप्तभये) इन दोनूंके प्रति ब्रह्मचारी (ब्र ह्मवित्शौंड) भिक्षा मांगताभया॥ ब्रह्मचा रीकी ब्रह्मवित्पनैकी मानिताकूं लिंगविशेषसें जानिके ताकूं जाननेकूं इच्छते (परीक्षा करते) हुये तिसकेअर्थ भिक्षाकूं नहीं देते भये। कैया यह कहैगा ऐसैं ॥ ५ ॥ टीका :- सोई ब्रह्मचारी कहताभयाः-म हात्मा च्यारीनकूं [इहां यह द्वितीयोंका बहुव ६१ जाननेकूं इच्छते हुये। ऐसें उक्त अर्थकूंहीं स्पष्ट करैहैं॥ ६२ "चतुरः (च्यारीनकूं)" इस द्वितीया विभक्तिके बड

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पनिषत् ] तृतीय खंड ३ ६४३ आख्यायिकासहित संवर्गविद्या ८ नाभिपश्यन्ति मर्त्या अभिप्रतारिन्व- हुधा वसन्तं यस्मै वा एतदन्नं तस्मा ए- तन्न दत्तमिति॥ ६॥

हे कापेय! हे अभिप्रतारिन्! तिस बहुप्र- कारसैं वसतेवालेकूं मर्त्य (मनुष्य) नहीं देखतेहैं। जिसकेअर्थ यह अन्न है। तिस- केअर्थ यह (अन्न) नहीं दिया ऐसैं ॥ ६॥

चन है। याहीतैं ग्रसताभया] देव एक। अभि- आदिकनकूं वायु। औ वाकू आदिकनकूं प्राण।। सो कः(प्रजापति)गसताभया ॥ जो तिनकूं वचनके देखनैतैं "महात्मनः (बडेनकूं)" यह पदबी तैसा (द्वितीयाका बहुवचन)हीं है। ऐसें कहैहैं। ६३ यद्वा :- "महात्मनः" इसपदकी पंचमी आदिकविषै औ "चतुरः" इसपदके समीचीनरूप अर्थविषै प्रयोगके देख- नेतें। इहां तैसा प्रयोग मति होहू । ऐसैं मानिके कहैहैं। याहीतैं। ग्रसताभया। ऐसैं संबंध है॥ ६४ "कः" शब्द जो है सो प्रजापतिकूं विषयकरनेवाला व्याख्यान किया। अब अन्यपक्षकूं कहैहैं।। इहां यह अर्थ

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६४४ चतुर्थप्रपाठक ४ [छान्दोग्यो जानश्रुति सत्यकाम उपकोसलादि संवादसैं वायुआदि ब्रह्मोपासन १७ कहताभया सो कौंन होवैगा ? ऐसैं प्रश्नकूं केइक कहतेहैं॥ भूत (प्राणी) होवैहैं इसविषै ऐसा जो भूरादि सर्व लोक सो भुवन है। तिस भुवनका गोपा कहिये गोपायिता (रक्षिता)। अर्थ यह जो :- गोप्ता है। हे कापेय ! तिस प्रजापतिकूं मरणधर्मवाले वा अविवेकी ऐसे मर्त्य कहिये मनुष्य नहीं देखतेहैं कहिये नहीं जानतेहैं॥ हे अभिप्रतारिन् ! बहुधा कहिये अध्यात्म अधिदैव अरु अधिभृत इनप्रकारोंकरि वसनेवालेकूं [मर्त्य नहींदेखतेहैं] । जिसे अर्थ हीं दिन दिनविषै भक्षणअर्थ यह अन्न ल्यायियेहै औ संस्कारयुक्त (पक्क) करियेहै तिस प्रजापतिकेअर्थ यह अन्न तुमनैं नहीं दिया ऐसैं ॥ ६ ॥ है :- जो तिनकूं असताअया सो कौंन होवैगा? ऐसें केईक प्रश्नकूं कहते हैं। ६५ अत्ता (अक्षक) प्राणकूं औ आपकूं एकभावकरि दे खता हुया ब्रह्मचारी। तुह् दोनूं जो मेरेअर्थ भिक्षाकूं नहीं

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पनिषत्] तृतीय खंड ३ ६४५ आख्यायिकासहित संवर्गविद्या ८1F तदु ह शौनकः कापेयः प्रतिमन्वानः प्रत्येयायाऽडत्मा देवानां जनिता प्रजा-

अर्थः-ताहींकूं शौनक कापेय मानता- हुया आवताभया :- देवनका आत्मा प्रजा-

टीका :- तिस ब्रह्मचारीके वचनकूं शौनक कापेय मानताहुया (मनकरि आलोचन कर- ताहुया) ब्रह्मचारीके प्रति जाताभया औ जायके कहताभया :- जिसकूं तूं कहताभया कि- "मर्त्य नहीं देखतेहैं" ऐसैं ताकूं हम देखतेहैं॥ कैसैं देखतेहो किः-सर्व स्थावर जंगमनका आत्मा है। किंवा :- अनिआदिक देवनकूं आ- देतेभये सो तिस देवके अर्थहीं नहीं देतेभये। ऐसैं तिन दो- नूंके अज्ञानीपनैकूंहीं दिखावताहडुया कहैहै।। ६६ दर्शनकूंहीं प्रश्नद्वारा स्पष्ट करैहैं। इहां अधिदैवत अग्नि आदिकनका वायुरूपसैं जनिता है। ऐसैं संबंध है॥ ६७ ताकी प्रथमताकूं करिके दिखावै हैं॥ इहां अप्निआ- दिकनकूं प्रलयकालविषै देव स्वात्माविषै वायुरूपसैं ग्रसिके फेर उत्पत्ति अवस्थाविषै उत्पादयिता है। ऐसैं योजना है।।

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६४६ चतुर्थप्रपाठक ४ [छान्दोग्यो- जानश्रुति सत्यकाम उपकोसलादि संवादसैं वायुआदि ब्रह्मोपासन१७ ना: हिरण्यदरष्रो बभसोऽनसूरिर्महा न्तमस्य महिमानमाहुरनद्यमानो यद- ओंका जनिता हिरण्यदंष्ट भक्षणशील अ- नसूरि (पंडितकीन्यांई) है। इसके बड़े महिमाकूं कहतेहैं :- जातें अभक्ष्यमाणहुया अनन्न (अभक्षणीय अश्निआदिक देव)कूं त्मा (आप)विषै संहारकरिके (ग्रसण करिके) फेर वायुस्वरूपसैं अननिआदिक देवनका जनिता (उत्पादयिता) अधिदैवत है औ प्राणरूपसैं अध्यात्म है। अरु वाक्आदिक प्रजाओंकाज- निता(जनक) है॥ अथवा अभि वाक् आदि- ६८ अध्यात्म वाक् आदिकनकूंबी निद्रा अवस्थाविषै प्रा णरूप स्वात्माविषै संहारकरिके। फेर प्रबोध (जागरण) अव- स्थाविषै तिनका उत्पादयिता देव प्राणरूपसैं है। ऐसें कहैहैं। ६९ अग्निआदिक देवनका वाक्आदिक प्रजाओंका जनिता है। ऐसें कहा। अब अन्य व्याख्यानकूं कहैहैं॥ इहां यह अर्थे है :- अभन्नदंष्ट्रवाला है। इसकरि सर्वके संहारके कर्त्ताकूंबी कोईबी ग्लानि नहीं होवैहै॥

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पनिषत् ] तृतीय खंड ३ ६४७ eng pmआख्यायिकासहित संवर्गविद्या ८ नन्नमत्तीति वै वयं ब्रह्मचारिन्नेदमुपा- स्महे। दत्तास्मै भिक्षामिति॥७॥

भक्षण करैहै ऐसा है [तातैं] ॥ हे ब्रह्म- चारिन्! इसकूं हम च्यारी ओरतैं उपासते हैं।। इसकेअर्थ भिक्षाकूं देहू ऐसैं [कापेय भृत्यनकूं कहताभया]।।७॥

क देवनका आत्मा है। औ स्थावर जंगमरूप प्रजाओंका जनिता है औ हिरण्यदंष्ट कहिये अमृतदंष्टू है। अर्थ यह जो :- अभन्दंष्ट्र है औ बभस कहिये भक्षणशील है औ अनसूरि है। सूरि (मेधावी) नहीं होवै सो असूरि है। ताका जो प्रतिषेध सो अनसूरि है। अर्थ जो :- सूरि (पंडित) की न्यांईं है।। ब्रह्मवेत्ता जे हैं वे महान् कहिये अतिप्रमाणवाले अरु अप्रमेय इस प्र- जापतिके महिमा (विभूति)कूं कहतेहैं जातें ७० प्रजापतिके महिमाकी अतिप्रमाणताकूं प्रकट करैहैं॥ दहां इति शब्दतैं परे यत् शब्दका संबंध है औ ताका अर्थ :-

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६४८ चतुर्थप्रपाठक ४ [छान्दोग्यो जानश्रुति सत्यकाम उपकोसलादि संवादसैं वायुआदि ब्रह्मोपासन १७ आप अन्योंकरि अनद्यमान कहिये अभक्ष्य माण हुया अभि वाक्आदिक देवतारूप अन- न्न (अभक्ष्य)कूं भक्षण करैहै। ऐसा जातें है तातें प्रजापतिके महिमाकूं अतिप्रमाण कहतेहैं [इहां वै ऐसा शब्द अर्थरहित है]॥ हॅम हे ब्र. हचारिन्! इस (उक्तलक्षणवाले ब्रह्म)कूं च्या रीओरतैं उपासतेहैं [इहां हैम ऐसे अंतराय र हितपदसैं संबंध है]।। ॥ अैन्यः-हम इसकूं उपासते नहीं। किंतु परब्रह्मकूं हीं उपासतेहैं। ऐसें वर्णन करतेहैं॥ इँस (ब्रह्मच्यारी)केअर्थ जातें ऐसें कहा तातैं प्रजापतिके महिमाकूं अतिप्रमाणवाला कहते हैं। ऐसें पूर्वसें संबंध है। ७१ "वै वयं (हम)" इत्यादि वाक्यके भागकूं पदच्छेद पूर्वक लेके व्याख्यान करैहैं॥ ७२ उपासते हैं इस क्रियापदके साथि "हम" इसपदक उक्त संबंधकूं उपपादन करैहैं। ७३ हे ब्रह्मचारिन! इस ब्रह्मकूं हम च्यारीओरतैं उपा सते हैं। ऐसें कहिके। अब अन्य प्रकारसैं पदच्छेदपूर्वेक अन्य व्याख्यानकूं कहैहैं॥ ७४ शौनकके औ अभिप्रतारीके ज्ञानके अतिशयकूं दि"

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पनिषत् ] तृतीय खंड ३ ६४९ आख्यायिकासहित संवर्गविद्या ८ तस्मा उ ह ददुस्ते वा एते पञ्चान्ये पञ्चान्ये दश सन्तस्तत्कृतं तस्मात्सर्वा-

अर्थः-ताकेअर्थहीं [भिक्षाकूं] देतेभये।। वे ये अन्य पंच अन्य पंच दश हुये सो कृत

भिक्षाकूं देहू। ऐसें किंकरनकूं कापेय कहता- भया। ७।। टीका :- येई तिसकेअर्थ हीं भिक्षाकूं देते भये॥ वे जे ग्रहण करियेहैं अभिआदिक औ जो तिनका ग्रहणका कर्त्ता वायु है। वे ये वाकूआदिकनतैं अन्य पंच हैं। तैसैं तिनतें खायके। अब "यति (संन्यासी) औ ब्रह्मचारी दोनूं पक्कअन्नके स्वामी हैं" इत्यादि स्मृतिकूं अनुसरिके कहैहैं॥ ७५ आख्यायिकाद्वारा प्रकृत संसर्गविद्याविषै "आत्मा देवनका" इत्यादि गुणनके समूहकूं उपदेश करिके। अब अन्य गुणकूं उपदेश करनेकूं पीछले वाक्यकूं अवतार देते हैं॥ ७६ ता वाक्यकूं व्याख्यान करैहैं॥ इहां वे ये वाक् आ- दिकनतैं अन्य पंच हैं। ऐसैं संबंध है॥ ७७ अधिदैवतरूप वायुसहित अग्निआदिक पांचकूं क- ५५

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६५० चतुर्थप्रपाठक ४ [छान्दोग्यो- जानश्रुति सत्यकाम उपकोसलादि संवादसैं वायुआदिब्रह्मोपासन १७ सु दिक्ष्वन्नमेव दश कृत सैषा विराड न्नादी तयेदरसर्व दृष्ट सर्वमस्येदं दष्टं होवैहै। तातैं सर्व दिशाओंविषै अन्नहीं दश कृत है। सो यह विराट् अन्नादी है। तिसकरि यह सर्व दष्ट है। इसकूं यह सर्व दृष्ट होवैहै। अन्य वाकूआदिक पंच अध्यात्म हैं॥। वे सर्व संख्याकरि दश होवैहैं। दशहुये सो कृत [कुत नामक भागकरि उपलक्षित यूत] होवैहै। कैयारीअंकवाले एकाय (एकभाग) विषै ऐसे हिके। तिसीहीं प्रकारसैं अध्यात्मरूपवी तिन (अशनि आदि कन) तैं अन्य प्राणसहित वाक्आदिक पांच हैं। ऐसैं कहैहैं॥ ७८ अवांतरसंख्याके निवेश (प्रवेश)कूं कहिके । अब त हांहीं महासंख्याके निवेशकूं दिखावै हैं॥ इहां दशसंख्याक संबंधतैं तिनकी संख्याकरि ऐसें कृतनामक अय (अक्षकेभाग) करि उपलक्षित जो द्यूत (जुगार) सो "कृत" ऐसें कहिये है। तिसविषै दशसंख्यावानपनैंकूं कहनेकूं योग्य होनेतें। ऐस देखनेकूं योग्य है।। ७९ जो कहाकि :- अग्निआदिक औ वाकआदिक दशडुय सो कृत होवैहै ऐसैं। ताकूं उपपादन करैहैं॥। इहां यह अथ

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पनिषत्] तृतीय खंड ३ ६५१ आख्यायिकासहित संवर्गविद्या ८ भवत्यन्नादो भवति य एवं वेद य एवं वेद ॥८॥ इति चतुर्थप्रपाठकस्य तृतीयः खण्डः ॥ ३॥ अन्नाद होवेहै। जो ऐसैं जानताहै। जो ऐसैं जानताहै॥ ८॥ इति श्री०मूलभाषा०चतुर्थप्रपा०तृतीयःखंडः।।३।

च्यारी हैं। तीन अंकवाले भागविषै ऐसैं अन्य तीनि हैं। दो अंकवाले भागविषै ऐसैं दो अन्य हैं। एक अंकवाले भागविषै ऐसें एक अन्य है इति॥ ऐसैं दश हुये सो कत (द्यूत) होवैहै॥ है :- प्रथम द्यूतविषै च्यारीअंकवाला अक्षका एकभाग देखिये है। ताकीन्यांई अग्निआदिक अरु वाक् आदिक अ्रस्यमान हुये च्यारी होवैहैं॥ औ जैसैं द्यूतविषै त्रेतानामक अय (अक्षका भाग) तीन अंकवाला ग्रहण करिये है। तैसैं अग्निआदिक अरु वाक्आदिक एक एकसैं न्यून हुये तीनि हैं। औ तैसैं तहां (द्यूतविषै) द्वापर नामवाला अय दोअंकवाला होवैहै। ताकीन्यांई वाक्आदिकनविषै अरु अग्निआदिकनविषै दो दोकूं वर्जनाकरिके दो दो होवैहैं॥ औ तैसैं कलिसंज्ञक जो अय है सो एकअंकवाला होवैहै। जो अग्निआदिकनका ग्रसिता वायु है अरु वाक्आदिकनका असिता प्राण है सो एक है अरु

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६५२ चतुर्थप्रपाठक ४ [छान्दोग्यो- जानश्रुति सत्यकाम उपकोसलादि संवादसैं वायुआदिब्रह्मोपासन १७ जातैं ऐसैं है तातैं सर्व (दश) दिशाओवि- षैबी अग्निआदिक औ वाक्आदिक दशसंख्याके सामान्यतैं अन्नहीं है। जातैं दश अक्षरवाली विराट् है औ विराट् अन्न है" ऐसी श्रुति है। योतैं दश संख्याके होनेतें अन्नहीं है। ताहीतैं तिन ग्रस्यमानोंतैं अन्य है। ऐसें ग्रसिता होनैकरि औ ग्रस्य मान होनैकरि दशहुये वे पूर्वोक्त कृत (दूत) होवैहै। ८० दूतके सर्वअन्नके अत्तापनैकी प्रसिद्धिकरि दशसं ख्यावाले देवनका कृतपनैके संपादनकरि अत्तापना संपादन किया। अब दशसंख्यावानपनैंकरिहीं विराट्भावके संपादनसे तिन देवनके अन्नपनैकूं संपादन करैहैं। ८१ मिलित अग्निआदिकनविषै औ वाक्आदिकनविषै द शसंख्यावानूपनैंके हुयेबी इसकरि तिसवान्पना कैसें है औ तैसें संख्या सामान्यरूप तिनके अन्नसंख्याके सामान्यका स पादन कैसैं है। यह आशंकाकरिके कहैहैं। ८२ विराद्देवता दशसंख्यावाली प्रसिद्ध है औ सो अन्न है ऐसें सुनिये है। तैसैं हुये यथोक्त अग्निआदिकनविषै औ उक्त वाक्आदिकनविषै संख्याके सामान्यतें विराट्भावक संपादन करिके अन्नभावका संपादन सुखसैं शक्य है ऐसें कहैहैं॥ ८३ तिनविषै कृतपनैंकरि संपादन किये अन्नभावकूं उप संहार करैहैं। इहां यह अर्थ है :- दृतकूं आगोंके चतुष्टय सैं

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पनिषत्] तृतीय खंड ३ ६५३ S FPआख्यायिकासहित संवर्गविद्या ८ दश कृत है। काहेतैं चतुराय (च्यारीभाग) पनैंकरि कृतविषै तिन दशके अंतर्भावतैं। ऐसैं हम कहतेभये॥ सो यह विराट् देवता दश- संख्यावाली हुई अन्न है और कृतपनैकरि अन्नादी कहिये अन्नादिनी है। जातैं कृतविषै विशिष्ट होनैंकरि कृतनामक भागकरि उपलक्षित कृतरूप हो- नैंकरि तिस द्यूतविषै दशसंख्याके सन्भावतैं औ तातैंहीं क- हिये संख्याके सामान्यतैं अग्निआदिक कृत होवैहैं औ तातैं तिनका अत्तापना है। ऐसैं कहा॥ ८४ अब प्रकृत अग्निआदिकनविषै विराट्पना। अन्नपना। अत्तापना। इन तीनकूं उपसंहार करैहैं॥ इहां यह अर्थ है :- विराटकूं विधेय होनेतैं ताकूं स्त्रीलिंगवान्ताकरि "सो यह" ऐसें विधेय देवताके लिंगका भजना है। वे ये प्रकृत देव "विराट् है" ऐसे जाननेकूं योग्य है औ सो विराट् देवता दशदेवतास्वरूप दशसंख्यावाली हुई अन्न होवैहै। ऐसें देव- ताओंके अन्नभावकी सिद्धि है औ "अन्नादी" इस पदका वि- राट् देवताके साथि संबंधतैं "अन्नादिनी" ऐसा व्याख्यान है औ तातैं देवतास्वरूप विराट् कृत (द्यूत)रूप होनेकरि अन्ना- दिनी है। यातैं तिसस्वरूपवाले अग्निआदिक देवनकेबी अ- त्ताभावकी सिद्धि है।। ८५ विराट्भावकरि अन्नपना है औ कृत (द्यूत) भावकरि अत्तापना है। ऐसैं अग्निआदिक देवनविषै दिखाई दो संप- त्तिकूं उपसंहार करैहैं॥ इहां यह अर्थ है :- कृतकरि उपल-

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६५४ चतुर्थप्रपाठक ४ [छान्दोग्यो- जानश्रुति सत्यकाम उपकोसलादि संवादसैं वायुआदिव्रह्मोपासन १७ दशसंख्या अतर्भृत हैं। यातैं सो (विराट् दे- वता) अन्न अरु अन्नादिनी (अन्नकी भक्षक) है।। तैसैं विद्वान् दश देवताओंका आत्मभूत हुया विराट्भावकरि दश संख्यासैं अन्न होवे है औ कृतसंख्यासैं अन्नादी होवैहै। तिस कृ- क्षित द्यूतविषै दशसंख्या अंतर्भूत प्रसिद्ध है औ सो अग्नि- आदिकविषै दिखाई। ऐसें हुये संख्याके सामान्यतैं द्यूतगत जो अत्तापना है सो अग्निआदिकनविषै संपादन करिये है। तिसकरि यह दशक "अन्नादी" ऐसें कहिये है। वेदविषै विराट् दशसंख्यावाली है ऐसें कहा औ सो (विराट्) अन्न है। काहेतैं "विराट् अन्न है" ऐसें श्रुतिविषै उक्त होनेतैं औ तातैं विराट्की संपत्तिकरि प्रकृत दशक अन्न होवैहै॥ ८६ सगुणरूप संवर्गके उपासनकूं कहिके । अब ताके फलकूं कहनेकूं विद्वान्के स्वरूपकूं कहैहैं॥ इहां यह अथे है :- जैसैं अग्निआदिक देवनका विराट्भावकरि अन्नपना ह औ कृत (द्यूत) भावकरि अन्नाद (अत्ता)पना है। तैसैं अभि आदिकस्वरूप वायुकूं औ वाक्आदिकस्वरूप प्राणकूं आत्म भावकरि एकरूपकरिके विद्वान् दशदेवताओंका स्वरूपभू० हुया दशसंख्यासैं विराट्भावकरि अन्न होवैहै औ कृतशब्दका वाच्य जो कृतनामक भाग अरु तिसकरि उपलक्षित घयूतरूप युगल। तद्गत दशसंख्याकरि अवच्छिन्न होनैसें कृतभावकार अन्नादी होवैहै॥ ८७ फलकी उत्तिविषै उपयोगी होनेकरि अन्य अर्थकूं क

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पनिषत् ] तृतीय खंड ३ ६५५ आख्यायिकासहित संवर्गविद्या ८ तसंख्याभूत अन्नादिनीकरि यह सर्व दशदिशाओंविषै स्थित जगत् दष्ट (उपलब्ध) है।। इस कतसंख्याभूत ऐसें जाननेवालेकूं सर्व दशदिशाओंसैं संबधवाला यह जगत् दृष्ट (उ- पलब्ध) होवैहै। किंवा अन्नाद (अन्नका भो- क्ता) होवैहै जो ऐसैं जानता है कहिये य-

हैहैं॥ इहां यह अर्थ है :- कृतकरि उपलक्षित जो द्यूत तिस- विषै स्थितसंख्याकरि विशिष्ट होनेकरि अवस्थित अरु अन्न- आावकरि औ अन्नादिभावकरि व्यवस्थाकूं प्राप्त तिस दशदे- वतास्वरूप अन्नादिनीकरि सर्व यह दशदिशाओविषै स्थित जगत् दृष्ट (उपलब्ध) होवैहै। जातैं देवताके दशककूं छो- डिके जगत् नाम किंचित् नहीं है। ऐसैं हुये देवताके दश- कके देखेहुये सर्व जगत् दृष्टहीं होवैहै॥ ८८ ऐसैं भूमिकाकूं करिके। अब विद्याके फलकूं दिखावै हैं। इहां वायु अरु प्राणरूप अत्ताकूं आत्मभावकरि देखने- वाले अरु कृतकी संख्यासैं युक्त होनेकरि स्थित दशदेवता- भूत विद्वानकूं सर्व जगत् दष्ट होवैहै। काहेतैं दष्ट देवताओंतें भिन्न जगत्के अभावतैं। यह अर्थ है॥ औ जो यथोक्तका दर्शी है सो प्राणरूप होयके सर्वत्र अन्नाद होवैहै। यह अन्य फल है।। इति श्री०चतुर्थप्रपाठकगततृतीयखंडस्य टिप्पणम् ॥ ३॥

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६५६ चतुर्थप्रपाठक ४ [छान्दोग्यो जानश्रुति सत्यकाम उपकोसलादि संवादसैं वायुआदिब्रह्मोपासन १७ अथ चतुर्थप्रपाठकस्य चतुर्थःखंडः।।४।। सत्यकामो ह जावालो जबालां मा-

अथ श्री०मूलभाषा०चतुर्थप्रपाठ०चतुर्थः खण्डः॥४। अर्थ :- सत्यकाम जाबाल। जबाला मा- थोक्तका दर्शी है। इहां दो अभ्यास इस उ- पासनकी समाप्तिरूप अर्थवाला है॥८॥ इति श्री० भाष्यभाषा०चतुर्थप्रपाठकस्य तृतीयः खंडः॥३॥ अथ श्री०भाष्यभाषाचतुर्थप्रपाठकस्य चतुर्थः खंडः8 सत्यकामकरि ब्रह्मचर्यार्थ गौतमगुरुगोचारण ५ टीका :- सैर्व वाकू आदिक औ अभनिआदिक अन्न अरु अन्नादभावकरि संस्तुत जगत्कूं ए करूपकरिके (मिलायके) षोडशप्रकारसैं वि- भागकरिके तिसविषै ब्रह्मदृष्टि करनेकूं योग्य है अथ श्री०चतुर्थप्रपाठकगतचतुर्थखंडस्य टिप्प०।।४॥। ८९ पूर्व खंडके साथि संबंधकूं दिखावनेकूं तात्पर्यकूं कहैहैं। इहां एकरूप करिके। याका उत्तरखंडके कारणरूपसैं एकताकूं ग्रहण करिके। यह अर्थ है।

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पनिषत् ] चतुर्थ खंड ४ सत्यकामकरि ब्रह्मचर्यार्थ गौतमगुरुगोचारण ९ ६५७

तरमामन्त्रयाञ्चके-ब्रह्मचर्य भवति!वि- वत्स्यामि। किंगोत्रोऽहमस्मीति॥१॥ ताकूं आमंत्रण करताभया :- हे भवति! ब्र- ह्मचर्य जैसैं होवै तैसैं वास करूंगा। किस गोत्रवाला मैहूं? ऐसैं ॥ १ ॥

यातैं आरंभकरियेहै। श्रैंद्धा अरु तपकूं ब्रह्मके उपासनका अंगपना दिखावनेकेअर्थ आख्या- यिका हैः-नामतैं सत्यकाम [इहां "ह" शब्द परंपरारूप अर्थवाला है] ऐसा जबालाका अ- पत्य (पुत्र) जो जाबाल सो। जबाला नाम- वाली स्वमाताकूं आमंत्रण करताभया (बु- लावताभया)॥ इहां ब्रह्मचर्य जो कहा है सो रैवाध्यायके ग्रहणअर्थ है। हे भवति (पूज्य- माता)! मैं आचार्यके कुलविषै ब्रह्मचर्य जैसैं ९० ननु तब तिसविषै ब्रह्मदृष्टिहीं करनेकूं योग्य है। आख्यायिका क्यूं रचिये है? तहां कहैहैं॥ ९१ ब्रह्मचर्यपूर्वक वासके उद्देश्य (कहने योग्य) फलकूं दिखावै हैं॥

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६५८ चतुर्थप्रपाठक ४ [छान्दोग्यो जानश्रुति सत्यकाम उपकोसलादि संवादसैं वायुआदिव्रह्मोपासन १७ सा हैनमुवाच-नाहमेतद्वेद तात!य द्रोत्रस्त्वमसि। बहहं चरन्ती परिचारि णी यौवने त्वामलभे।साऽहमेतन्न वेद य अर्थ :- सो इसकूं कहतीभयी :- हे तात! मैं यह नहीं जानतीहूं किः-जिस गोत्र- वाला तूं हैं। मैं बहु परिचर्याकूं करतीहुयी परिचारिणीहूं। यौवनविषै तुजकूं प्राप्तभ- यीहूं। सो मैं यह नहीं जानतीहूं कि :- होवै तैसैं वासकरूंगा। मैं किंगोत्र हूं कहिये क्या है गोत्र इस मुजका सो मैं किंगोत्र (किस गोत्रवाला) हूं? ऐसैं ॥१ ॥ टीका :- ऐसैं पूंछी हुई जो जबाला सो इस पुत्रकूं कहतीभई। हे तात! मैं इस तेरे गो त्रकूं नहीं जानतीहूं। जिस गोत्रवाला तूं हैं।। ॥। काहेतैं नहीं जानती हैं? ऐसै ९२ आचार्य जातैं विज्ञात कुलगोत्रवालेहीं बालककूं उप- नयन करैहैं। ऐसें मानताहुया सत्यकाम माताकूं पूंछता है॥

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पनिषत् ] चतुर्थ खंड ४ ६५९ सत्यकामकरि ब्रह्मचर्यार्थ गौतमगुरुगोचारण १ द्वोतस्त्वमसि। जबाला तुनामाहमस्मि सत्यकामो नाम त्वमसि।स सत्यकाम एव जाबालो ब्रवीथा इति ॥२ ॥

जिस गोत्रवाला तूं हैं।। जबाला नाम तो मैं हूं। सत्यकाम नाम तूं हैं। सो [तूं] स- "त्यकामहीं जाबाल" कहना ऐसैं ॥ २ ॥

उक्त हुई। कहैहै :- जातैं बहु जैसैं होवै तैसैं अतिथि अभ्यागत आदिककूं आश्रयकरिके प- रिचर्या (सेवा) का समूह बहु जैसैं होवै तैसैं आचरतीहुयी भर्त्ताके ग्रहविषै जातैं मैं स्थि- तभयी हूं। तिसकारणकरि मैं परिचारिणी (परिचरणशीला) हुई परिचरण (सेवा) विषै चित्तवाली होनेकरि गोत्रआदिककूं नहीं पूंछती- भई। तैसैं हुये गोत्रआदिकके स्मरणविषै मेरा मन न होताभया। औ यौवनविषै (तिसका- ९३ गोत्रआदिकके प्रश्नके अभावविषै माता अन्य हेतुकूं कहैहै।।

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६६० चतुर्थप्रपाठक ४ [छान्दोग्यो- जानश्रुति सत्यकाम उपकोसलादि संवादसैं वायुआदिब्रह्मोपासन १७ लमैं) तुजकूं प्राप्तभयीहूं। तैबहीं तेरा पिता उपरामभया। याँतैं अनाथ हुयी जो मैं। सो ९६

मैं यह नहीं जानतीहूं कि :- जिसगोत्रवाला तूं हैं।। परंतु जँवाला नाम मैं हूं। सत्य- काम नाम तूं हैं। सो तूं "सत्यकामहीं मैं जाबाल हूं" ऐसें आचार्यकेतांईं कहना। जैंब आचार्यकरि पृष्ट होवैं तब। यह अभिप्राय है॥२॥ ९४ यद्यपि तिस अवस्थाविषै लजाकरि गोत्रआदिककूं तूं नहीं पूंछतीभयी। तथापि कालांतरविषै मेरे पिताकूं तूं क्यू नहीं पूंछतीअयी? यह आशंकाकरिके माता कहैहै॥ ९५ तथापि अन्य ज्ञाताकूं तूं क्यूं नहीं पूंछतीभयी। यह आशंकाकरिके माता कहैहै॥ ९६ प्रथम लजाकरि तेरे पिताकेप्रति नहीं पूंछ्या औ फेर ताकूं उपराम (मृत) होनेतैं पीछे दुःखकी बहुलतातें अन्यके प्रति प्रश्न नहीं किया। ऐसैं स्थितहुये प्रश्नके अभावरूप क लकूं माता कहैहै॥ ९७ तब तुजकूं क्या ज्ञान है? सो माता कहैहै॥ ९८ ऐसैं स्थितहुये आचार्यकेप्रति मुझकरि क्या कहनेकूं योग्य है? यह आशंकाकरिके माता कहैहै॥ ९९ "किसीकावी नहीं पूंछ्या हुया नहीं कहै" इस न्या यकूं सूचन करैहै॥

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पनिषत् ] चतुर्थ खंड ४ १ F सत्यकामकरि ब्रह्मचर्यार्थ गौतमगुरु गोचारण ९ ६६१

सह हारिद्रुमतं गौतममेत्योवाच- ब्रह्मचर्य भगवति वत्स्याम्युपेयां भगव- न्तमिति॥३॥ अर्थः-सो (सत्यकाम) हारिद्रुमान् गौ- तमके प्रति जायके कहताभयाः-ब्रह्मचर्य जैसैं होवै तैसैं भगवान्विषै वासकरूँगा। भगवान्के प्रति उपगमनकरताहूं। ऐसैं॥३ टीका :- सो सत्यकाम हरिद्ठुमान्के अपत्य १००

हारिद्रुमान् ऐसें गोन्रतैं गौतमके प्रति जा- यके कहताभया :- तुज भगवान् (पूजावान्) विषै मैं ब्रह्मचर्य जैसैं होवै तैसें वसूंगा । यौतैं शिष्यभावकरि भगवान् (आप)के प्रति उपगमनकरताहूं (शरणहोताहूं)। ऐसैं क- १०० माताके वचनके श्रवणके अनंतर सत्यकाम क्या करताभया? इस अपेक्षाके हुये कहैहैं। १०१ आचार्यके समीपमें ब्रह्मचर्यपूर्वक वास शिष्यभा- वतैं विना नहीं सिद्ध होवैहै ? ऐसे माननेवाले गौतमकेअर्थ सत्यकामनें कहा॥ ५६

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६६२ चतुर्थग्रपाठक ४ [छान्दोग्यो- जानश्रुति सत्यकाम उपकोसलादिसंवादसैं वायुआदिव्रह्मोपासन १७ त२ होवाच-किंगोत्रो नु सोम्यासी तिस होवाच-नाहमेतद्वेद भो यद्गोत्रोड हमस्म्यप्टच्छं मातर सा मा प्रत्यब्र वीद्वकहं चरन्ती परिचारिणी यौवने त्वा- अर्थः-ताकूं [गौतम] कहताभयाः-हे सोम्य ! किसगोत्रवाला हैं! ऐसैं॥ ॥सो (सत्यकाम) कहताभया :- भोः मैं यह नहीं जानताहूं जिसगोत्रवाला मैं हूं। माताकूं पूंछताभया। सो मेरे प्रति कहतीभयी :- मैं बहु परिचर्याकूं करतीहुयी परिचारिणी (परिचर्यारूप स्वभाववाली) हं। यौवनविषे हनेवाले तिस सत्यकामकेप्रति गौतम कह- ताभया :- हे सोम्य (प्रियदर्शन)! तूं किस- गोत्रवाला हैं ऐसें विशातकुलगोत्रवाला शिष्य १०२ ननु इस काकके दंतोंकी परीक्षाकरि क्या है आप करितो मैं उपनयन करनेकूं योग्य हूं? यह आशंकाक रिके गौतम कहैहै॥

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पनिषत्] चतुर्थ खंड ४ सत्यकामकरि ब्रह्मचर्यार्थ गौतमगुरु गोचारण ६६३

मलभेसाहमेतन्न वेद यद्गोत्रस्त्वमसि जबाला तु नामाऽहमस्मि सत्यकामो नाम त्वमसीति। सोऽ ह. सत्यकामो जाबालोऽस्मि भो इति॥४॥ तुजकूं प्राप्तभयी हूं। सो मैं यह नहीं जान- तीहूं कि :- जिसगोत्रवाला तूं हैं। जबाला नाम तो मैं हूं। सत्यकाम नाम तूं हैं ऐसैं।। भोः! "सो मैं सत्यकाम जाबालहूं"ऐसैं४ उपनयन करनेकूं योग्य है? ॥ ऐसैं पूंछ्या हुया सत्यकाम प्रत्युत्तर कहैहै :- सो (सत्यकाम) कहैहै :- भो भगवन्! मैं यह नहीं जानताहूं जिसगोत्रवाला मैंहूं। किंतु मौताकूं पूंछता- भयाहूं। सोमाता मुजकरि पष्ट (पूंछी) हुयी मेरेप्रति कहतीभयीः-"मैं बहु जैसैं होवै तैसैं परिचरण (अभ्यागतोंका सेवन) करती

१०३ माताकूं पूंछिके जानिके आवना? यह आशंका क- रिके (मनमैं लायके) सत्यकाम कहैहै॥

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६६४ चतुर्थप्रपाठक ४ [छान्दोग्यो- जानश्रुति सत्यकाम उपकोसलादिसंवादसैं वायुआदिबह्मोपासन १७ त५ होवाच-नैतदब्राह्मणो विवक्तुम रहति।समिध सोम्याहरोप त्वा नेष्ये।न अर्थः-ताकूं [गौतम] कहताभया :- यह (ऐसा वचन) अब्राह्मण विशेषकरि क- हनेकूं योग्य नहीं है। सत्यतैं रहितभया नहीं हैं। हे सोम्य! समिधकू ल्याव तुजकूं हुयी" इत्यादि पूर्ववत् है॥ भो भगवन् ! ता माताके वचनकूं स्मरण करताहूं। सो सत्यकाम। जाबालहूं। ऐसैं ॥ ३ ॥ ४ ॥ टीका :- ता सत्यकामकूं गौतम कहताभ या :- इस आर्जव अरु अर्थकरि संयुक्त वचनकूं अब्राह्मण विशेषकरि कहनेकूं योग्य नहीं है। जोते ब्राह्मण स्वभावतैं ऋजु (शरल) होते है १०४ ननु वा ब्राह्मणका अनृत (जूठ) विना आर्जव (स रलताकरि संयुक्त वचन कैसैं होवैगा ? यह आशंकाकरिक कहैहैं।

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पनिषत्] चतुर्थ खंड ४ ६६५ सत्यकामकरि ब्रह्मचर्यार्थ गौतमगुरु गोचारण ५ सत्यादगा इति तमुपनीय कृशानाम- बलानां चतुःशता गा निराकृत्योवाचे- मा: सोम्यानुसंव्रजेति।ता अभिप्रस्था-

उपनयन करूँगा। ऐसैं ताकूं उपनयनक- रिके कृश अरु बलरहितनके मध्य चतुः- शत गौअनकूं निकाशिके कहताभयाः-हे सोम्य! इनकेतांई पीछे जा ऐसैं ॥ ॥ [स- त्यकाम] तिनकूं अभिप्रस्थान करावताहु- इैंतेर नही। जीतैं सत्यरूप ब्राह्मणजातिके ध- ्मतैं तूं रहितभया नहीं यातैं तुज ब्राह्मणकूं मैं उपनयन (यज्ञोपवीत) करूंगा। यातैं हे सोम्य ! संस्कारकेअर्थ होमके वास्ते समि- धकूं ले आव। ऐसैं कहिके ताकूं उपनयनक-

१०५ केईक क्षत्रिय आदिकनकूंबी आर्जव है? यह आशं- काकरिके कहैहैं।। १०६ सरलवचनवान्ताकरि ब्राह्मणपनैकूं प्रतिज्ञा करैहैं॥ इहां उपनयनकरिके औ अध्यापन करिके। यह शेष है।।

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६६६ चतुर्थप्रपाठक ४ [छान्दोग्यो- जानश्रुति सत्यकाम उपकोसलादि संवादसैं वायुआदि ब्रह्मोपासन १७ पयत्नुवाच-नासहस्रेणावर्तयेति। स ह व- र्षगणं प्रोवास।ता यदा सहस्र रसम्पेदुः५ इति चतुर्थप्रपाठकस्य चतुर्थः खंडः ॥४॥ या कहताभयाः-असहस्त्रकरि पीछे आऊ- गा नहीं ऐसें॥ सो वर्षेंकि गणपर्येत पर- देशविषै रहताभया॥ वे (गौआं) जब सहस्र संपन्न होतीभयी॥५॥ इति श्री०मूलभाषा०चतुर्थप्रपा०चतुर्थःखंडः४।। रिके [अरु अध्यापन करायके]किश अरु नि० र्बल गौअनके मध्य गौअनके यूथरूप गौ अनके च्यारीशतनकूं निकासिके कहता- भया :- "हे सोम्य ! इन गौअनके पीछेजा" ऐसैं उक्त हुया सत्यकाम। तिन गौअनकूं अ - १०७ ताके अनुग्रहअर्थ सेवाकूं उपदेश करताभया ऐसें कहैहैं।। १०८ आचार्यका नियोग (आज्ञा) शिष्यकरि सफल कर नेकूं योग्य है॥ इस आशयकरि कहैहैं॥। जब संपन्न होती

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पनिषत् ] चतुर्थ खंड ४ ६६७ सत्यकामकरि ब्रह्मचर्यार्थ गौतमगुरु गोचारण ५ रण्य (वन) के प्रति अभिप्रस्थान करावता हुया कहताभयाः-मैं असहस्र (अपूर्णस- हस्र)करि पीछे नहीं आउंगा।।सो ऐसें कहिके गौअनकूं बहुत तृण उदकवाले द्वंद्व(व्याघ्रादि) रहित अरण्यके प्रति प्रवेश करायके वर्षगण (दीर्घकाल) पर्यंत परदेशविषै वासकरताभया। वे गौआं सम्यक् रक्षितहुई जब (जिसकाल- विषै) सहस्र संपन्न (सिद्ध) होतीभयी [तब इसकूं वृषभ कहताभया]।।५॥ इति श्री०भाष्यभाषा०चतुर्थप्रपाठकस्य चतुर्थःखंडः॥४॥ भयी तब इस सत्यकामकूं ऋषभ (प्रसन्न भई वायुदेवताके आवेशकरि युक्त बलीवर्द) कहताअया। ऐसैं आगिले खंडसैं संबंध है।। इति श्री०चतुर्थप्रपाठकगतचतुर्थखंडस्य टिप्पणम् ॥४ ॥

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६६८ चतुर्थप्रपाठक ४ [छान्दोग्यो- जानश्रुति सत्यकाम उपकोसलादिसंवादसैं वायुआदिव्रह्मोपासन १७ अथ चतुर्थप्रपाठकस्य पंचम: खंडः।५॥। अथ हैनमृषभोऽभ्युवाद-सत्यकाम३ इति॥ भगव!इति ह प्रतिशुश्राव।प्राप्ताः अथ श्री० मूलभाषा०चतुर्थप्रपाठकस्य पंचम:खण्डः५ अर्थ :- अनंतर इसकूं ऋषभ (बैल)। हे सत्यकाम! ऐसें कहताभया॥ ॥ हे भग- वन्! ऐसैं [सत्यकाम] प्रतिउत्तर देताभ-

बलीवर्द (वायु)करि सत्यकामकेअर्थ ब्रह्मके प्रथमपादकी उक्ति ३ टीका :- तिसेइस श्रद्धा अरु तपकरि सिद्ध अथ श्री०चतुर्थप्रपाठकगतपंचमखंडस्य टिप्पणम्५ १०९ ननु ऋषभ जो बैल सो तो सत्यकामकेप्रति उत्तर कहनेकूं कैसैं समर्थ भया। जातैं लोकविषै बलीवर्दका प्रतिब चन (उत्तर) देख्या नहीं? यातैं कहैहैं॥। इहां श्रद्ा आदिक करि संपन्न इस सत्यकामकेप्रति अनंतर कहिये तिस (वायु" देवताके आवेशयुक्त) अवस्थाविषै ऋषभ हताभया। ऐसें संबंध है॥ अनुग्रहकेअर्थ क

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पनिषत् ] पंचम खंड ५ ६६९ बैल (वायु) करि सत्यकामार्थ ब्रह्मके प्रथमपादकी उक्ति ३ सोम्य! सहस्र९ स्मः प्रापय न आचार्य- कुलम् ॥ १ ॥

या। ॥ [ऋषभ कहताभयाः-]हसोम्य! सहस्रकूं प्राप्तभये। हमकूं आचार्यके कुल- केप्रति प्राप्तकर ।। १॥

भये सत्यकामकेप्रति दिशांकी संबंधिनी वायु- देवता तुष्ट(प्रसन्न)हुयी ऋषभ( बलीवर्द) केतांई अनुप्रवेशकरिके ऋषभ (बलीवर्द)रूप संपन्नहुयी। अनंतरहीं इससत्यकामकूं अ- नुग्रहकेअर्थ हे सत्यकाम! ऐसैं संबोधनकरिके कहताभया ॥ ॥ ताकेप्रति यह सत्यकाम हे भगवन् ! ऐसैंहीं प्रतिवचन देताभ- या। ॥ हे सोम्य ! हम सहस्रकेप्रति प्रा-

११० ऋषभके स्वरूपकूं कहैहैं॥ १११ ननु अरण्यविषै तहां तहां गौअनकूं चरावनेवाले अरु श्रद्धापूर्वक तपकूं आचरनेवाले सत्यकामकूं वायु देवता कैसें तुष्ट भई ? यह आशंकाकरिके कहैहैं॥

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६७० चतुर्थप्रपाठक ४ [छान्दोग्यो- जानश्रुति सत्यकाम उपकोसलादि संवादसैं वायुआदि ब्रह्मोपासन १७ ब्रह्मणश्च ते पादं ब्रवाणीति॥ब्रवीत मे भगवानिति।तस्मै होवाच-प्राची दि क्कला प्रतीची दिक्कला दक्षिणा दिक्कलो अर्थ :- औ तेरेअर्थ ब्रह्मकेपादकूं कह ताहूं ऐसैं॥। ॥ भगवान् मेरेअर्थ कहहूं ऐसे [सत्यकाम कहताभया]।।। ताकेअर्थ [ऋ षभ] कहताभयाः-प्राचीदिशा कला है। प्रतीचीदिशा कला है। दक्षिणदिशा कला प्भये। तेरी प्रतिज्ञा पूर्णभयी। यातें हमकू आचार्यके कुल(गृह)केप्रति प्राप्तकर॥।१। टीका :- किंवा :- मैं परब्रह्मके पाद्केताई तेरेअर्थ कहताहूं।। ॥ ऐसैं उक्त हुया स त्यकाम प्रत्युत्तर कहताभया :- भगवान् (पूजी वान् आप) मेरेअर्थ कथन करह॥॥ऐसे ११२ औ मेरा अन्य वचन सुननेकूं योग्य है। ऐसे बैल कहैहै।

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पनिषत् ] पंचम खंड ५ ६७१ बैल (वायु) करि सत्यकामार्थ ब्रह्मके प्रथमपादकी उक्ति दीची दिक्कलैष वै सोम्य! चतुष्कल: पा- दो ब्रह्मणः प्रकाशवान्नाम ॥ २॥ है। उदीचीदिशा कला है॥ हे सोम्य! य- हहीं ब्रह्मका चतुष्कल पाद "प्रकाशवान्" नाम है॥ २ ॥ उक्त हुया ऋषभ तिस सत्यकामकेअर्थ कह- ताभया :- प्रीची (पूर्व) दिशा कला कहिये ब्रह्मके पादका चतुर्थ भाग है। तैसैं प्रतीची (पश्चिम) दिशा कला है। दक्षिणदिशा कला है। उदीची (उत्तर) दिशा कला है॥ हे सोम्य ! यहहीं ब्रह्मका चतुष्कल पाद है कहिये च्यारी हैं कला (अवयव) जिसके ऐसा है सो यह चतुष्कल ब्रह्मकापाद प्रकाशवान नाम है कहिये प्रकाशवान् ऐसाहीं है नाम -११३ वायुदेवता दिशाकी संबंधिनी। ऐसे उक्त होनेतें दिशागोचरहीं दर्शन (उपासन)कूं कहताभया। ऐसैं कहैहैं॥ इहां ब्रह्मके अरु पादका। ये दो षष्ठीविभक्ति व्यधिकरण (भिन्नअर्थवाली) हैं।

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६७२ चतुर्थप्रपाठक ४ जानश्रुति सत्यकाम उपकोसलादिसंवादसैं वायुआदिव्रह्मोपासन १७ [छान्दोग्यो-

सय एतमेवं विद्वारश्रतुष्कलं पादं ब्रह्मण: प्रकाशवानित्युपास्ते। प्रकाशवा नस्मिँलोके भवति॥ प्रकाशवतो ह लो अर्थ :- जो इसकूं ऐसे विद्वान् हुया ब्र. ह्मके चतुष्कल पादकूं "प्रकाशवान् है" ऐसैं उपासता है। सो इस लोकविषै प्रकाशवान् होवैहै। प्रकाशवालेहीं लोकनकूं जीतताहै (अभिधान) जिसका ऐसा है।। तैसे ब्रह्मके उत्तर (पीछले) तीनि पादवी चतुष्कल हैं॥२॥ टीका :- सो जो कोइकबी ऐसैं (यथोक्त) इस ब्रह्मके चतुष्कलपादकूं विद्वान् हुया "प्रकाशवान् है" ऐसें इस गुणकरि विशिष्ट उपासताहै। ताकूं यह फल है :- इस लोक विषै प्रकाशवान् होवेहै। अर्थ यह जो :- प्र ११४ एकपादवालाहीं ब्रह्म है। इस विभ्रमकूं दूरी करैहैं। ११५ प्रथमपादके उपासककूं दृष्ट अरु अदष्टरूप फल कहैहैं।

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पनिषत् ] पंचम खंड ५ ६७३ बैल (वायु)करि सत्यकामार्थ ब्रह्मके प्रथमपादकी उक्ति २ काञ्जयति य एतमेवं विद्याशश्रतुष्कलं पादं ब्रह्मणः प्रकाशवानित्युपास्ते॥ ३॥ इति चतुर्थप्रपाठकस्य पञ्चमः खंडः॥५॥

जो इसकूं ऐसैं विद्वान् हुया ब्रह्मके चतुष्कल पादकूं "प्रकाशवान्" ऐसैं उपासताहै ॥३॥ इति श्री० मूलभाषा०चतुर्थप्रपा०पंचमःखंडः।।५॥

ख्यात होवैहै॥ तैसैं अदृष्ट फल :- प्रकाशवा- लेहीं देवादिकनके संबंधी लोकनकूं मृतहुया जीतताहै (पावता है)। जो इसकूं ऐसैं ११६

जानताहुया ब्रह्मके चतुष्कल पादकूं "प्र- काशवान् है" ऐसैं उपासताहै॥ ३ ॥ इति श्री०भाष्यभाषा०चतुर्थप्रपाठकस्य पंचमः खंडः ।५।

११६ किसकूं यह फल होवैहै? ऐसें कहेहुये। पूर्व उ- क्तहीं उपासककूं अनुवाद करैहैं। इति श्री० चतुर्थप्रपाठकगत पंचमखंडस्य टिप्पणम् ॥५॥ ५७

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६७४ चतुर्थप्रपाठक ४ जानश्रुति सत्यकाम उपकोसलादि संवादसैं वायुआदिब्रह्मोपासन १७ [छान्दोग्यो

अथ चतुर्थप्रपाठकस्य षष्ठः खंडः ॥६॥ अग्निष्टे पादं वक्तेति।सह श्वोभूतेगा अभिप्रस्थापयाञ्चकार। ता यत्राभि सा अथ श्री०मूलभाषा०चतुर्थप्रपाठकस्य षष्ठः खण्डः॥६॥ अर्थ :- अग्नि तेरेअर्थ पादकूं कहैगा। ऐसें [ऋषभ कहताभया]। ॥सो (स- त्यकाम) अन्य दिवसविषे गौअनकूं अभि- प्रस्थान (अभिगमन) करावताभया। वे अथ श्री०भाष्यभाषा•चतुर्थप्रपाठकस्य षष्ठः खंडः॥।६। अग्निकरि सत्यकामके अर्थ ब्रह्मके द्वितीय पादकी उक्ति४ टीका :- सो ऋषभ। अभनि तेरेअर्थ पादकूं १९७ वक्ता (कहैगा)। ऐसैं कहिके उपराम होता भया। ॥ सो सैत्यकाम शवोभूत (अन्य- अथ चतुर्थप्रपाठकगतषष्टखंडस्य टिप्पणं ।६॥ ११७ अवशेष रहे तीनिपाद कैसें देखनेकूं योग्य हैं ऐसें जाननेकूं इच्छनेवाले सत्यकामकेप्रति ऋषभ कहैहै॥ ११८ अविद्वान् (अज्ञानी) कूं विद्याके अभिमानरूप निमि

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पनिषत् ] षष्ठ खंड ६ ६७५ अग्निकरि सत्यकामार्थ ब्रह्मके द्वितीयपादकी उक्ति ४

रुध्य समिधमाधाय पञ्चादग्रेःप्राङुपो- पविवेश ॥ १॥ जहां सायंकालकूं अभिमुख होती भई। तहां अग्निकूं उपसमाधानकरिके गौअनकूं उपरोध (बंधन)करिके समिधकूं लेके अग्निके पश्रात् पूर्वाभिमुख हुया समीप बैठता भया ॥ १॥

दिवस)विषै नित्यकर्मकूं करिके गौअनकूं आ- चार्यके गृहके प्रति अभिप्रस्थान करावताभ- या। वे गौआं शनैः (धीरेसैं) चरती आचार्यके गृहके अभिमुखी हुयी प्रस्थित (प्रस्थानकूं प्रा- त)भयी। जहां (जिसकालविषै जिसदेशविषै) सायंकालकूं अभिमुख होतीभई (प्राप्तभई)

त्तकरि कर्मका त्याग युक्त नहीं है। ऐसैं मानिके कहैहैं॥ इहां सायंकालकूं अभिमुख होती भई। याका सायंकालकूं प्राप्तभई। यह अर्थ है॥

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६७६ चतुर्थप्रपाठक ४ [छान्दोग्यो- जानश्रुति सत्यकाम उपकोसलादि संवादसैं वायुआदिव्रह्मोपासन १७

गव! इति प्रतिशुश्राव ॥२॥ अर्थ :- ताकूं अन्नि हे सत्यकाम! ऐसै कहता भया॥ ॥ [सत्यकाम :- ] हे भग- वन्! ऐसैं प्रत्युत्तर देता भया ॥ २ ॥ कहिये रात्रिविषै एकत्र अभिमुखी होतीभयी। तैहाँ अग्निकूं उपसमाधानकरिके गौअनकूं उपरोधकरिके समिधकूं ग्रहणकरिके। अ- ग्निंके पश्चात् (पश्चिमभागविषै) पूर्वाभिमुख हुया समीप बैठताभया॥ क्या करता हुया किः-ऋषभके वचनकूं ध्यावता हुया ॥ १॥ टीका :- ताकूं अनि। हे सत्यकाम!ऐसै ११९ ता सत्यकामका ब्रह्मचर्य खुल्ला है। ऐसें सूचन क रैहें। इहां दो उपशब्दोंकरि गौअनके अरु अगनिके समीप विषै इस सत्यकामका बैठना कहियेहै॥ १२० अर्थीके अर्थ विद्या कहनेकूं योग्य है। ऐसैं सूचन करैहैं॥ इहां आत्मगोचर। याका इस अझनिके विद्यमान यह अर्थ है। यद्वाः-पृथिवी आदिरूपसें अग्निके अवस्थानत अग्निकूं। विषयकरनेवाले। यह अर्थ है।।

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पनिषत् ] षछ्ठ खंड ६ ६७७ अग्निकरि सत्यकामार्थ ब्रह्मके द्वितीयपादकी उक्ति ४ ब्रह्मण: सोम्य!ते पादं ब्रवाणीति।व्र- वीतु मे भगवानिति।तस्मै होवाच- ए- थिवी कलाऽन्तरिक्षं कला द्यौः कला स-

  • अर्थ :- [अग्नि कहता भयाः-] हे सो- म्य! तेरेअर्थ ब्रह्मके पादकूं कहताहूं ऐ- सैं।। ॥ भगवान् मेरेअर्थ कहहू ऐसैं [स- त्यकाम कहता भया]।। । तिसकेअर्थ [अग्नि] कहता भया :- पथिवी कला है। अंतरिक्ष कला है। स्वर्गलोक कला है।

संबोधन करिके कहताभया॥ ॥ ताकूं यह सत्यकाम। हे भगवन् ! ऐसैं प्रतिवचन दे- ताभया॥२॥ टीका :- हे सोम्य! ब्रह्मके पादकूं तेरे अर्थ कहताहूं। ऐसैं [अभनि कहताभया]।।।।[स- त्यकाम :- ] भगवान् मेरेअर्थ कथन करहू। ऐसैं [कहताभया]।। ।। ताकेअर्थ [अभनि]

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६७८ चतुर्थप्रपाठक ४ [छान्दोग्यो जानश्चुति सत्यकाम उपकोसलादि संवादसैं वायुआदिव्रह्मोपासन १७ मुद्र: कलैष वै सोम्य! चतुष्कलः पादो ब्रह्मणोऽनन्तवान्नाम ॥ ३ ॥ स य एतमेवं विद्दाशश्रतुष्कलं पा्द समुद्र कला है॥ हे सोम्य! यह हीं ब्र- ह्रका चतुष्कल पाद "अनतवान्" नाम है। ३ ॥ अर्थ :- जो इसकूं ऐसें विद्वान् हुया कहताभया :- पथिवी कला है। अंतरिक्ष कला है। स्वर्गलोक कला है। समुद्र कला है। ऐसें आत्मगोचर (इस अशिकूं विद्य मान)हीं दर्शनकूं अभि कहताभया॥ हे सो १२१

म्य! यहहीं ब्रह्मका चतुष्कल पाद "अनंत- वानू" नाम है। ३। टीका :- सो जो कोईकबी यथोक्त पाद्कू १२२

१२१ यथोक्त पादविषै गुणविशेषकूं कीर्त्तन करैहैं। १२२ द्वितीयपादके उपासककूं द्विविध फल दिखावै हैं।

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पनिषत्] षष्ठ खंड ६ अग्निकरि सत्यकामार्थ ब्रह्मके द्वितीयपादकी उक्ति ४ ६७९

ब्रह्मणोऽनन्तवानित्युपास्तेऽनन्तवान- स्मिँलोके भवत्यनन्तवतो ह लोकाञ्जय- ति।य एतमेवं विद्वाशश्रतुष्कलं पादं ब्र-

इति चतुर्थप्रपाठकस्य षष्ठः खंडः ॥ ६ ॥ ब्रह्मके चतुष्कल पादकूं "अनंतवान् है" ऐसैं उपासताहै। सो इसलोकविषै अनं- तवान् होवैहै। अनंतवान्हीं लोकनकूं जीतताहै जो इसकूं ऐसैं विद्वान्हुया ब्र- ह्मके चतुष्कल पादकूं "अनंतवान् है" ऐसें उपासताहै॥ ४ ॥ इति श्री० मूलभाषा० चतुर्थप्रपा०षष्ठः खंडः॥६। अनंतवान्तारूपगुणकरि उपासताहै। सो इहां यथोक्त। याका चतुष्कल । यह अर्थ है औ तैसैंहीं। याका उपास्य गुणके अनुसारकरि। यह अर्थ है। औ तिस गुणवाला होवैहै। नाम तिस गुणकरि गुणवान् कहिये (अ- नंतवान्)। अर्थ यह जो :- विच्छेदरहित संतानवाला होवैहै। औ अनंतवान् लोकनकूं। याका अक्षय लोकनकूं।यह अर्थ है॥ इति श्री० चतुर्थप्रपाठकगतषष्टखंडस्य टिप्प्रणम्॥६ ॥

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६८० चतुर्थप्रपाठक ४ [छान्दोग्यो जानश्रुति सत्यकाम उपकोसकादि संवादसैं वायुआदिव्रह्मोपासन १७ अथ चतुर्थप्रपाठकस्य समप्तःखंडः।।७।। हशसस्ते पादं वक्तेति।स ह श्वोभूते गा अथ श्री०मूलभाषा० चतुर्थप्रपाठकस्य सप्तम:खंडः॥७ अर्थ :- हंस तेरेअर्थ पादकूं कहैगा ऐसैं तैसैंहीं इसलोकविषै तिसगुणवाला होवैहै औ मृतहुया अनंतवान् लोकनकूं सो जीतताहैं जो इसकूं ऐसैं जानताहुया। इत्यादि पूर्ववत् है।। ४ ।। इति श्री०भाष्यभाषा०चतुर्थप्रपाठकस्य षष्ठः खंडः ॥६॥ अथ श्री०भाष्यभाषा•चतुर्थप्रपाठकस्य सप्तमः खंड:७ हंस (सूर्य) करि सत्यकामकेअर्थ ब्रह्मके तृतीयपादकी उक्ति ४ टीका :- सो अननि। हंस तेरेअर्थ पाद कूं १२३

अथ श्री०चतुर्थप्रपाठकगतसप्मखंडस्य टिप्पणम्७ १२३ अवशेषरहे दो पाद कैसें जाननेकूं योग्य हैं? ऐसे जिज्ञासमान सत्यकामकेप्रति अग्नि कहैहै।

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पनिषत् ] सप्तम खंड 9 ६८१ हंस (सूर्य)करि सत्यकामार्थ ब्रह्मके तृतीयपादकी उक्ति ४ अभिप्रस्थापयाञ्चकार। ता यत्राभि सा- यं बभूवुस्तत्राग्निमुपसमाधाय गा उप- रुध्य समिधमाधाय पश्चादग्रेः प्राङुपो- पविवेश ॥ १॥ त ५हरस उपनिपत्याभ्युवाद- स-

[अन्नि कहता भया]। ॥ सो (सत्यकाम) अन्यदिनविषै गौअनकूं अभिगमन करा- वता भया। वे जहां सायंकालकूं प्राप्त होती भई तहां अझ्निकूं उपसमाधान (प्र- कट) करिके गौअनकूं उपरोध करिके स- मिधकूं लेके अग्निके पश्चात् पूर्वमुख हुया समीप बैठता भया ॥ १॥ अर्थ :- ताकूं हंस (समीप पतन होयके)

कहैगा। ऐसैं कहिके उपराम होताभया ॥ हंस १२४

१२४ हंस शब्दकी पक्षीविशेषकी विषयताकूं निषेध करैहैं॥

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६८२ चतुर्थप्रपाठक ४ [छान्दोग्यो- जानश्रुति सत्यकाम उपकोसलादि संवादसैं वायुआदिव्रह्मोपासन १७ त्यकाम ३ इति।भगव! इति ह प्रतिशु- श्राव॥२॥ ब्रह्मणः सोम्य! ते पादं व्रवाणीति॥ हे सत्यकाम! ऐसैं कहता भया॥ ॥ [स- त्यकाम :- ] हे भगवन्। ऐसैं प्रतिवचन देताभया॥२॥ अर्थ :- [हंस] सोम्य! तेरेअर्थ ब्रह्म- आदित्य है। काहेतैं शुक्के होनेतैं औ पतन (ऊ- डने)के सामान्यतैं ॥ सो (सत्यकाम)। शो- भूत (आगिले दिवस)विषै। इत्यादि समान है।। १ ॥ २ ॥ टीका :- अंग्नि कला है। सूर्य कला है। चंद्र कला है। विद्युत् (बीजली) कला है। १२५ तिस सूर्यविषै हंस शब्दकी प्रवृत्ति कैसें है? यह आशंकाकरिके कहैहैं॥ १२६ आदित्यबी आपकूं विषय करनेवालेहीं दर्शनकूं क हताभया। ऐसैं कहैहैं॥

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पनिषत् ] सप्तम खंड ७ ६८३ हंस (सूर्य)करि सत्यकामार्थ ब्रह्मके तृतीयपादकी उक्ति ४ ब्रवीतु मे भगवानिति।तस्मै होवाचाग्नि: कला सूर्य: कला चन्द्रः कलाविद्युत् क लैष वै सोम्य! चतुष्कल: पादो ब्रह्मणो ज्योतिष्मान्नाम॥ ३॥ सय एतमेवं विद्वाशश्रतुष्कलं पादं ब्रह्मणो ज्योतिष्मानित्युपास्ते ज्यो- के पादकूं कहताहूं ऐसैं [कहताभया]।॥ [सत्यकाम :- ] भगवान् मेरेअर्थ कहहू। ऐसैं [कहताभया]।।। ताकेअर्थ [हंस] कहताभया :- अग्नि कला है। सूर्य कला है। चंद्र कला है। विद्युत् कला है॥ हे सोम्य! यहहीं ब्रह्मका चतुष्कल पाद "ज्योतिष्मान्" नाम है॥ ३ ॥ अर्थ :- जो इसकू ऐसैं विद्वान् हुया ब्र- ह्मके चतुष्कलपादकूं "ज्योतिष्मान् है" हे सोम्य! यँहँहीं [ब्रह्मका पाद] है। ऐसैं॥। १२७ ब्रह्मके तृतीयपादविषैबी गुणविशेषकूं उपदेश करैहैं॥

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६८४ चतुर्थप्रपाठक ४ [छान्दोग्यो जानश्रुति सत्यकाम उपकोसलादि संवादसैं वायुआदिब्रह्मोपासन १७ तिष्मानस्मिँल्ोके भवति ज्योतिष्मतो ह लोकाञ्जयति य एतमेवं विद्दाश्श्रतु- ष्कलं पादं ब्रह्मणो ज्योतिष्मानित्यु पास्ते ॥४ ॥ इति चतुर्थप्रपाठकस्य ससमः खंडः॥७॥ ऐसैं उपासताहै। सो इसलोकविषै ज्यो- तिष्मान् होवैहै। ज्योतिवालेहीं लोकनकूं जीतताहै जो इसकूं ऐसैं विद्वान् डुया ब्रह्मके चतुष्कल पादकूं "ज्योतिष्मान् है ऐसैं उपासताहै॥ ४ ॥ इति श्री०मूलभाषा०चतुर्थप्रपाठ०सप्तमःखंडः७ जातैं ज्योतिकूं विषयकरनेवालेहीं दर्शनकूं सूये १२८ कहताभया। यातैं हंस (सूर्य) का आदित्यपना १२८ जिस हेतुतैं ज्योतिकूं विषय करनेवालेहीं दर्शनक कहताभया याहींतें ताका आदित्यपना आासता है। ऐसैं ह सके आदित्यपनैविषै अन्य गमक (लिंग)कूं कहैहैं। इहां"ज इसकूं ऐसैं विद्वान् हुया"। इत्यादि उत्तर वाक्य है।। इति श्री०चतुर्थप्रपाठकगतसप्तमखंडस्य टिप्पणम्॥७॥

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पनिषत् ] अष्टम खंड ८ ६८५ मद्गु(प्राण)करि सत्यकामार्थ ब्रह्मके चतुर्थपादकी उक्ति ४ अथ चतुर्थप्रपाठकस्याष्टमः खंडः।८। मदुष्टे पादं वक्तेति॥स ह श्वोभूते गा अय श्री० मूलभाषा०चतुर्थप्रपाठक० अष्टमः खंड:८ अर्थ :- मद्ठ (प्राण) तेरेअर्थ पादकूं क- हैगा ऐसैं [सूर्य कहता भया]।। ।। सो प्रतीत होवैहै॥ विद्वान्कूं फलः-इसलोकविषै ज्योतिष्मान् (दीप्तियुक्त) होवैहै। औ म- रिके चंद्रआदिकनके ज्योतिवालेहीं लोकनकूं जीतताहै। उत्तर वाक्य समान है ॥ ३॥४॥ इति श्री० भाष्यभाषा०चतुर्थप्रपाठकस्य सप्तमः खंडः।।श। अथ श्री०भाष्यभाषाचतुर्थप्रपाठकस्याष्टमः खंड: ८ मद्गु (प्राण)करि सत्यकामके अर्थ ब्रह्मके चतुर्थपादकी उक्ति ४ टीका :- हंस (सूर्य) बी। मद्रु (प्राण) १२९

तेरेअर्थ पादकूं कहैगा। ऐसैं कहिके उप- अथ श्री०चतुर्थप्रपाठकगताष्टमखंडस्य टिप्पणम् ८ १२९ तब अवशेष रहा जो अन्य (चतुर्थ) पाद सो कैसें जाननेकूं योग्य है? यह आशंकाकरिके सूर्य कहैहै॥ ५८

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६८६ चतुर्थप्रपाठक ४ [छान्दोग्यो जानश्रुति सत्यकाम उपकोसलादि संवादसैं वायुआदिव्रह्मोपासन १७ अभिप्रस्थापयाञ्चकार। ता यत्राभि सा- यं बभूवुस्तत्राग्निमुपसमाधाय गा उप रुध्य समिधमाधाय पश्चादग्नेः प्राङ्- पोपविवेश ॥१॥ (सत्यकाम) आगिले दिवसविषै गौअनकू प्रस्थान करावताभया (चलावताभया)। वे (गौआं) जहां सायंकालकूं प्राप्तभई तहां अग्निकूं उपसमाधान करिके गौअ- नकूं उपरोध करिके समिधकूं लेके अन्निके पश्चात् पूर्वाभिमुख हुया समीप बैठता- भया॥ १॥ राम होताभया॥ इहां मेंहुं नाम जलचर पक्षी है औ सो जलके संबंधतें प्राण है॥ सो (स' त्यकाम) अन्य दिवसविषै। इत्यादि पूर्व-

वत् है । १ ।। १३० मद्ड शब्दके वाच्यअर्थकूं कहैहैं॥ १३१ ता (जलचरपक्षी)का सत्यकामके प्रति उपदेष्टापना कैसैंहै? यातैं कहैहैं॥

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पनिषत् ] अष्टम खंड ८ ६८७ मद्ु(प्राण)करि सत्यकामार्थ ब्रह्मके चतुर्थपादकी उक्ति ४ तं महुरुपनिपत्याभ्युवाद-सत्यकाम ३इति॥ भगव! इति ह प्रतिशुश्राव ॥२॥ ब्रह्मणः सोम्य! ते पादं ब्रवाणीति॥ ब्रवीतु मे भगवानिति॥ तस्मै होवाच

अर्थ :- ताकूं मद्ठ (प्राण) समीप पतन- होयके हे सत्यकाम ! ऐसैं कहता भया।।।। [सत्यकाम] हे भगवन् ! ऐसैं प्रत्युत्तर देताभया॥२॥ अर्थ :- [मद्रुः-] हे सोम्य ! तेरेअर्थ ब्रह्मके पादकूं कहताहूं ऐसैं [कहताभ- या]।॥ [सत्यकामः-] भगवान् मेरे- अर्थ कहहू ऐसैं [कहताभया]।। तिस-

टीका :- औ सो मद्यु (प्राण)। "प्राण कला १३२

है" इससैं आदि लेके । "आयतनवान्" ऐसे

१३२ "ताके तांई मद्गु समीप पतन होयके (उडिके)" इस वाक्यविषै पूर्व उक्तहीं मह्ठु शब्दके अर्थकूं स्मरण करावै है॥

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६८८ चतुर्थेप्रपाठक ४ [छान्दोग्यो- जानश्रुति सत्यकाम उपकोसलादि संवादसैं वायुआदि ब्रह्मोपासन १७ प्राणः कला चक्षुः कला श्रोतं कला मनः कलैष वै सोम्य! चतष्कल: पादो ब्रह्मण आयतनवान्नाम॥ ३॥ केअर्थ [मद्रु] कहताभयाः-प्राण कला है। चक्षु कला है। श्रोत्र कला है। मन कला है।। हे सोम्य! यहहीं ब्रह्मका चतुष्कल पाद "आयतनवान्" नाम है॥ ३॥ नामवाले अपनेकूं विषय करनेवालेहीं दर्शनकूं कहताभया॥ सर्व कारणोंकरि ग्रहणकिये भो गोंका औयतन नाम मन है। सो जिस पाद- विषै विद्यमान है ऐसा जो पाद। सो "आय- तनवान्" नाम पाद है॥ २ ॥ ३॥ १३३ प्राण कला है॥ इससें आदिलेके आयतनवान् है। ऐसे यथोक्त गुणकूं समर्थन करैहैं॥ इहां सो आयतन जिस पादविषै वर्त्तता है सो यह आयतनवान् नाम पाद है। ऐसे देखनेकूं योग्य है। इसरीतिसैं योजना है॥

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पनिषत् ] अष्टम खंड ८ ६८९ मद्गु(प्राण)करि सत्यकामार्थ ब्रह्मके चतुर्थपादकी उक्ति ४ स य एतमेवं विद्वाथ्श्रतुष्कलं पादं ब्रह्मण आयतनवानित्युपास्त आयत- नवानस्मिँलोके भवत्यायतनवतो ह- ल्ोकाञ्जयति य एतमेवं विद्वाशश्रतुष्क- लं पादं ब्रह्मण आयतनवानित्युपास्ते४।। इति चतुर्थप्रपाठकस्याष्टमः खण्डः ॥८।। अर्थ :- जो इसकूं ऐसैं विद्वान्हुया ब्र- ह्मके चतुष्कलपादकूं "आयतनवान् है" ऐसैं उपासताहै। सो इस लोकविषै आ- यतनवान् होवैहै। आयतनवालेहीं लोक- नकूं जीतताहै जो इसकूं ऐसैं विद्वान् हुया ब्रह्मके चतुष्कलपादकूं "आयतवान् है" ऐसैं उपासताहै॥ ४ ॥

टीका :- तिसे पादकूं तैसैंहीं जो उपासता १३४ द्विविध (दृष्ट अदृष्टरूप) विद्याके फलकूं कथन क- रैहैं। इहां तैसैंहीं। याका आयतनवान्पनैरूप गुणकरि आ- क्ांत (विशिष्ट) होनेकरिहीं। यह अर्थ है। इति श्री०चतुर्थप्रपाठकगताष्टमखंडस्य टिप्पणम्॥८॥

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६९० चतुर्थप्रपाठक ४ जानश्रुति सत्यकाम उपकोसलादि संवादसैं वायुआदि ब्रह्मोपासन १७ [छान्दोग्यो

अथ चतुर्थप्रपाठकस्य नवमः खंडः।।९॥ प्राप हाचार्य्यकुलं॥ तमाचार्योऽभयु- वाद-सत्यकाम ३ इति॥भगव ! इति ह प्रतिशुश्राव॥ १ ॥ अथ श्री०मूलभाषा० चतुर्थप्रपाठक० नवमः खंड: ९ अर्थ :- [सो सत्यकाम] आचार्यके कु- लकेप्रति प्राप्तभया। ताकूं आचार्य हे सत्य- काम! ऐसैं कहताभया॥ ॥[सत्यकाम :- ] हे भगवन्! ऐसैं प्रतिवचन देताभया॥।१। है। सो इस लोकविषै आयतनवान् (आ श्रयवान्) होवैहै। तैसें आयतनवाले (अव काशसहित) लोकनकूं मृत हुया जीतता है। जो इसकूं ऐसैं जानताहुया। इत्यादि पूर्ववत् है ॥४ ॥ इति श्री० भाष्यभाषा० चतुर्थप्रपाठकस्याष्टमः खंडः॥। अथ श्री०भाष्यभाषा०चतुर्थप्रपाठकस्य नवमः खंडः 8 सत्यकामका वनतैं गुरुकुलविषै पुनर्गमन ३ टीका :- सो सत्यकाम ऐसें ब्रह्मवित् हुया

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पनिषत् ] नवम खंड ९ ६९१ सत्यकामकावनतैं गुरुकुलमैं पुनर्गमन ३ ब्रह्मविदिव वै सोम्य ! भासि को नु त्वाऽनुशशासेत्यन्ये मनुष्येभ्य इति ह अर्थ :- [आचार्यः-] हे सोम्य! ब्रह्म- वित्की न्यांईहीं भासता हैं। कौंन तुजकूं अनुशासन करताभया? ऐसैं [पूंछता- भया]।। ।"मनुष्यनतैं अन्य (देव)" आचार्यके कुलकेप्रति प्राप्त होताभया। ताकूं आचार्य हे सत्यकाम! ऐसैं कहता- भया॥ ॥I [सत्यकाम :- ]हे भगवन्! ऐसें प्रतिवचन देताभया ॥१॥ टीका :- हे सोम्य! ब्रह्मवित्कीन्यांईहीं तूं भासताहैं। प्रसेन्नइंद्रियवाला अरु प्रहसित वदनवाला निश्चिंत कृतार्थ ब्रह्मवित् होवैहै। यातैं अथ श्री०चतुर्थप्रपाठकगतनवमखंडस्य टिप्पणम्९ १३५ ब्रह्मवित् कीन्यांई भासता हैं। ऐसें कहेहुये किस प्रकारका ब्रह्मवित् होवैहै? इस अपेक्षाके हुये कहैहैं।। इहां सत्यकामकूंबी तिस लक्षणवानता है। यह अतः (यातैं) श- ब्दका अर्थ हैं।।

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६९२ चतुर्थप्रपाठक ४ [छान्दोग्यो जानश्रुति सत्यकाम उपकोसलादि संवादसैं वायुआदि ब्रह्मोपासन १७ प्रतिजज्ञे। भगवाश्स्त्वेव मे कामे ब्रू यात् ॥ २ ॥ ऐसैं [सत्यकाम] प्रतिज्ञा करता भया। भगवान् हीं तो मेरे काम (इच्छा)के होते कहहू ॥ २ ॥ आचार्य। ब्रह्मवित्कीन्यांई भासताहैं ऐसैं क हिके "कौंन" ऐसें वितर्क करताहुया कहताभ या :- कौंन तेरेकूं अनुशासन (उपदेश) कर ताभया ऐसैं॥। ॥ तब सो सत्यकाम कहैहै :- मनुष्यनतैं अन्य जे देवता वे मेरेकूं अनुशा सन करतीभई। कौंन अन्य मनुष्य हुया भग १३८ १३६ तेरे आचार्यरूप मुजकूं अवज्ञाकरिके मेरे शिष्यरूप तुजकूं कौंन अन्य मनुष्य मेरे शापतैं अभीत (भयरहित) हुय शिष्यभावकरि ग्रहणकरिके अनुशासन (उपदेश) करताभया किस अनुशासनतैं तुजकूं ब्रह्मविद्या उपजी है? ऐसें आचाये आक्षेपसहित सत्यकामकूं पूंछता है। १३७ मनुष्यनतैं अन्य मुजकूं अनुशासन करतेभये। ऐस सामान्य प्रतिज्ञाकूं सत्यकाम विभाग करैहै॥ १३८ देवताओंकेहीं उपदेष्टापनैंकूं व्यतिरेकद्वारा शिप्य स्पष्ट करैहै॥

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पनिषत्] नवम खंड ९ सत्यकामका वनतैं गुरुकुलमैं पुनर्गमन ३ ६९३

श्रुत्ह्ेव मे भगवदृशेभ्य आचार्या

अर्थ :- जातैं भगवत् सदशोंतैं श्रुतहीं

वान् (पूजावान् आप)के शिष्य मुजकूं अनुशा- सन करनेकूं उत्साह करैगा। कोईबी नहीं। यह अभिप्राय है। यौतैं "मनुष्यनतैं अन्य" ऐसैंहीं प्रतिज्ञा करताभया। भैंगवान् (आप) हींतो मेरी इच्छाके होते कहहू। अन्योंकरि उक्तसैं क्या है। मैं तिसकूं गणना करता नहीं। यह अभिप्राय है॥ २ ॥ टीका :- किवी :- जातैं इस अर्थविषै भग- वानू (आप) सदशनतैं कहिये भगवान्के सम ऋषिनतैं। श्रुत (शुन्या) मेरेकूं विद्यमान (या-

१३९ प्रतिज्ञाकूं निगमन करैहैं॥ १४० तब अब मेरेसाथि तेरा कछुबी कर्तव्य (कार्य) नहीं है? इस आशंकाकूं शिष्य निवारण करैहै॥ १४१ इस हेतुतैंबी भगवान् (पूज्य आप)हीं मेरेअर्थ वि- द्याकूं कहहू। ऐसें शिष्य कहैहै॥ १४२ तिसीहीं कारणकूं दिखावै है॥

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६९४ चतुर्थप्रपाठक ४ [छान्दोग्यो जानश्रुति सत्यकाम उपकोसलादि संवादसैं वायुआदि त्रह्मोपासन १७ द्वैव विद्या विदिता साधिष्ठं प्रापयती- ति॥तस्मै हैतदेवोवाचात्र ह न किञ्चन वीयायेति वीयायेति॥ ३॥ इति चतुर्थप्रपाठकस्य नवमः खण्डः ॥ ९॥ मेरेकूं [अविद्यमान] है :- आचार्यतैंहीं वि- दित विद्या श्रेष्ठताकूं (दढताकूं) पावती है। यातैं।। ॥ तिसकेअर्थ [आचार्य] याहींकूं कहताभया। इहां (इसविद्यातैं) कछुबी गया नहीं ऐसैं। गया नहीं ऐसैं॥ ३॥ इति श्री०मूलभाषा०चतुर्थप्रपाठ०नवमः खंड:९ द)हीं है किः-औचार्यतैहीं विदित (प्राप्त) जो विद्या सो साधिष्ठकूं कहिये अतिशयकरि १४३ आचार्यतैंहीं विद्या सुननेकूं योग्य है। ऐसे लक्ष- णवाले इस अर्थविषै श्रुत (सुने अर्थ)कुंहीं स्पष्ट करैहै।। इहां विदित। याका प्राप्त। यह अर्थ है औ आचार्यके अधीन बु- द्वि (विद्या)हीं फलवाली होवैहै। यह अतः (यातैं) शब्दका अर्थ है औ आचार्यनैं देवताओंकरि उक्तविद्यातैं अन्य विद्या कही? याशंकाकूं हीं शब्दकेपर्याय एवकारकरि निवारण करैहैं।

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पनिषत् ] नवम खंड ९ ६९५ सत्यकामका वनतैं गुरुकुलमैं पुनर्गमन ३ श्रेष्ठताकूं प्राप्त होवैहै ऐसें। यातें भगवान्हीं कहहू? ऐसैं उक्त हुया आचार्य ताके अर्थ ति- सींहीं दैवतोंकरि उक्त विद्याकूं कहताभया :- इहां षोडश कलावाले ब्रह्मकी विद्याका किंचि- तूबी कहिये एक देशमात्र बी। विगतभया (गया) नहीं। यह अर्थ है।। इहां दो अभ्यास विद्याकी परिसमाप्तिरूप अर्थवाला है॥ ३॥ इति श्री०भाष्यभाषा० चतुर्थग्रपाठकस्य नवमः खंडः।।९।। १४४ दैवतोंकरि अरु आचार्यकरि सत्यकामके अर्थ उक्त- विद्याकूं हमारे (आधुनिक मनुष्यनके)प्रति श्रुति जनावती है।। इहां विगत (गया) नहीं किंतु पूर्णहीं विद्या वायुआ- दिक दैवतोंकरि अरु आचार्यकरि उपदेशकरी ॥ यह शेष है औ इहां वी च्यारीपादोंके अनुध्यानकरि सहित एकहीं वि- ज्ञान अरु ताका फल एकत्रकरिके एक विज्ञानका फल होने- करि ग्रहण करनेकूं योग्य है। काहेतैं एकपादके उपासनकूं कवृतार्थताका अहेतु होनेतैं। यातैं आचार्यके उपदेशकीहीं सार्थकता (सफलता) है। ऐसैं देखनेकूं योग्य है॥ इति श्री०चतुर्थप्रपाठकगतनवमखंडस्य टिप्पणम्॥९॥

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६९६ चतुर्थप्रपाठक ४ [छान्दोग्यो- जानश्रुति सत्यकाम उपकोसलादि संवादसैं वायुआदि ब्रह्मोपासन१७ अथ चतुर्थप्रपाठकस्य दशमःखंडः१०॥ उपकोसलो ह वै कामलायनः सत्य- कामे जाबाले ब्रह्मचर्यमुवास। तस्य ह अथ श्री० मूलभाषा० चतुर्थप्रपाठक०दशमःखंड:१० अर्थ :- प्रसिद्ध उपकोसल ऐसा काम- लायन। सत्यकाम जाबालविषे ब्रह्मचर्य जैसैं होवै तैसें वास करताभया। द्वादश अथ श्री०भाष्यभाषा•चतुर्थप्रपाठकस्य दशमःखंड: १० उपकोसलके अर्थ अग्निउक्त आत्म (३ ब्रह्म) विद्या ५ टीका :- फेर" प्रकारांतरकरि ब्रह्मविद्याकूं औ अथ श्री०चतुर्थप्रपाठकगतद्शमखंडस्य टिप्पणं १० १४५ सविस्तर ब्रह्मके उपासनकूं कहिके। अब कार्यव्र- ह्मके उपासनकरि मिलित कारणब्रह्मके उपासनकूं कहनेकूं अन्य (दशम) खंडकूं अवतार देते हैं ॥ इहां केवल ब्रह्मवि- द्याकूं नहीं कह्तीहूं किंतु ब्रह्मविद्याकी शेष (उपकारक) हो- नेतें ताके वेत्ताकी गतिकूं अरु अ्निविद्याकूं कहतीहूं। यह अर्थ है। औ पूर्वकीन्यांई। याका जैसें पूर्वखंडविषै श्रद्धा अरु तपके ब्रह्मके उपासनके अंगभावके दिखावनेअर्थ आ- ख्यायिका है ऐसें कहा। ताकीन्यांई। यह अर्थ है।। औ

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पनिषत्] दशम खंड १० ६९७ FHIP उपकोसलअर्थ अग्निउक्तआत्मविद्या ९ द्वादशवर्षाण्यग्नीन् परिचचार। स ह स्मान्यानन्तेवासिनः समावर्तयरस् ह स्मैव न समावर्तयति॥१॥ वर्ष ता(आचार्य) के अभ्निनकूं परिचरण करताभया॥ सो (आचार्य) अन्य अंते- वासी (शिष्य) नकूं समावर्त्तन करताहुया तिसी (उपकोसल) कूं हीं नहीं समावर्त्तन करताभया ॥१॥

ताके वेत्ताकी गतिकूं अरु अभनिविद्याकूं कहती हूं। ऐसैं श्रुति आरंभ करैहै औ आख्यायिका पूर्वकी न्यांई श्रद्धा अरु तपकूं ब्रह्मविद्याकी सा- धनताके दिखावनेअर्थ है :- नामतैं उपकोसल ऐसा कमलका पुत्र कामलायन था।सो सत्य- काम जाबालविषै ब्रह्मचर्य जैसैं होवै तैसैं द्वितीय वाक्यविषै तप्त ऐसें कहा। ताका हे पते! तुह्मकूं अपे- क्षित शुश्रूषाकूं करताडुया बहुत कायक्लेशकूं करताभया। यह अर्थ है।। ५९

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६९८ चतुर्थप्रपाठक ४ [छान्दोग्यो- जानश्रुति सत्यकाम उपकोसलादि संवादसैं वायुआदिव्रह्मोपासन १७ तं जायोवाच-तप्तो ब्रह्मचारी कुशल- मग्नीन् परिचचारीन्मा त्वाऽग्रयः परि- अर्थ :- ताकूं जाया कहती भई :- तप्त ब्रह्मचारी कुशल (सम्यक्) अग्नियांकूं परिचर्या करताभया। तुजकूं अग्नियां प- रिप्रवचन (निंदा) मतिकरैं। इसकेअर्थ वासकरताभया [ इहां "ह" शब्द परंपरा अर्थ FFF

है] तिस आचार्यके अग्नियोंकूं (अगनियोंका) द्वादशवर्ष परिचरण (सेवन) करताभया। सो आचार्य अन्यब्रह्मचारीनकूं स्वाध्याय (स्व शाखारूप वेद)कूं ग्रहण करवायके समावर्त्तन करता हुया (गहजानेकी आज्ञा देता हुया) ताहीं उपकोसल एककूं नहीं समावर्त्तन क- रताभया ॥१॥ टीका :- ता आचार्यके प्रति जाया (ताकी धर्मपत्नी) कहतीभईः-तप्त (तपसंयुक्त) ब्र

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पनिषत् ]=1 दशम खंड १० ६९९ FHIPउपकोसलअर्थ अग्निउक्तआत्मविद्या९ प्रवोचन् प्रत्रूह्यस्मा इति॥ तस्मै हाप्रो- च्यैव प्रवासाञ्चके ॥२ ॥

कथनकर ॥ ऐसैं [ उक्त हुया आचार्य ] तिसकेअर्थ नहीं कहिकेहीं प्रवासकूं करता भया ॥ २ ॥

हचारी कुशल (सम्यक्) अग्निनकूं परि- चरण करताभया। औ भैंगवान (आप) अशनिनविषै भक्तकूं नहीं समावर्तन करते हो। यातैं "हमारे (अ्निनके) भक्तकूं नहीं समा- करैहै॥ १४६ कहनेकूं इच्छित शुभ्रूषाके करणकूंहीं जाया स्पष्ट १४७ ननु तुजपत्नीकरि मेरेप्रति अब यह कहो ऐसैं क्यूं कहिये है। जातैं मुजतैं अन्य ठिकाने तेरा अनुराग (प्रेम) युक्तिमान् नहीं है? यह आशंकाकरिके। भगवान् (आप)विषै इस शिष्यके स्नेह (भक्ति) तैं मुजकरि कहिये है। ऐसै पत्नी कहैहै॥ इहां अग्नियोंकूं सेवनकरनेवाले ब्रह्मचारीका असमा- वर्त्तन जो है सो। प्रथम "अतः (यातैं)" शब्दका अर्थ है औ गर्हा (निंदा)का परिहार (निवारण) द्वितीय अतः (यातैं) शब्दकरि ग्रहण करिये है॥p हा। पक सम्यला

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७०० चतुर्थप्रपाठक ४ [छान्दोग्यो जानश्रुति सत्यकाम उपकोसलादि संवादसैं वायुआदिव्रह्मोपासन १७ स ह व्याधिनाऽनशितुं दधे॥ तमा चार्यजायोवाच-ब्रह्मचारिन्नशान किन्ु अर्थ :- सो (शिष्य) व्याधिकरि अन- शन करनेकूं मन करताभया॥ ताकूं आ- चार्यकी जाया कहतीभई :- हे ब्रह्मचारिन् ! वर्त्तन करताहै ऐसें जानिके तुह्मारेकूं अग्नि- यां प्रवचन मतिकरैं कहिये तुह्मारी गर्हा (निंदा) कूं मतिकरैं। यातैं इस उपकोसलके अर्थ इष्ट (वांछित) विद्याकूं कथनकरो।। ऐसें जायाकरि उक्त हुयाबी सत्यकाम आचार्य। तिस (उपकोसल) के अर्थ कछबी नहीं क हिके हीं प्रवास करताभया (देशांतर विषै गया) ॥ २ ॥ टीका :- सो उपकोसल मानस व्याधिरूप दुःखकरि अनशन करनेकूं मन धारण कर- १४८ आचार्यकी सेवाविषै तत्पर शिष्यकेप्रति देवताही अनुग्रह करैहै। ऐसैं जनावनेकूं श्रुति आरंभ करैहै॥

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पनिषत् ] दशम खंड १० ७०१ er उपकोसलअर्थ अग्निउक्तआत्मविद्या १ नाश्रासीति॥स होवाच-बहव इमेऽस्मि- न्पुरुषे कामा नानाऽत्यया व्याधिभि: प्रतिपूर्णोऽस्मि नाशिष्यामीति॥ ३॥ भोजनकूं कर। क्यूं नहीं भोजन करताहैं? ऐसैं॥। ॥ सो कहताभयाः-इस पुरुषविषै बहुत ये कामरूप नानात्यय (व्याधियां) हैं। [ तिन ] व्याधिनकरि प्रतिपूर्णहूं [यातैं ] भोजनकूं करता नहींहूं ऐसैं ॥३॥ ताभया॥ अग्निके आगारविषै तूष्णी स्थितभ ये तिस उपकोसलकूं आचीर्यकी जाया कह- तीभई :- हे ब्रह्मचारीन् ! भोजनकूं कर। किस कारणतैं भोजनकूं नहीं करताहैं? ऐसैं ॥ ॥ सो उपकोसल कहताभया :- १४९ आचार्यके अभिप्रायकूं नहीं जाननेवाले शिष्यकूं दुःखकी प्राप्ति दिखावै है। इहां अतिगमन। याका वस्तुके स्वरूपकूं अतिक्रमणकरिके विषयनविषै प्रवेश। यह अर्थ है औ "नानाऽत्यय" यह कामोंका विशेषण है॥

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७०२ चतुर्थप्रपाठक ४ [छान्दोग्यो- जानश्रुति सत्यकाम उपकोसलादि संवादसैं वायुआदिब्रह्मोपासन १७ अथ हाग्रयः समुदिरे-तप्तो ब्रह्मचा- अर्थ :- अनंतरहीं अग्नियां मिलिके कहते- भयेः-तप्त ब्रह्मचारी हमारेकूं कुशल परि- इस अकतार्थ प्राकत पुरुषविषै बहुत(अनेक) कामरूप कहिये कर्त्तव्यके प्रति इच्छारूप नानाऽत्यय (नाना है प्रतिगमन जिन कर्त- व्यकी चिंतारूप व्याधिनका वे नानाऽत्यय व्या- घियां) हैं। अैर्थ यह जो :- कर्त्तव्यताकी प्राप्ति- रूप निमित्तवाले चित्तके दुःख हैं। तिन व्या- घिनकरि मैं प्रतिपूर्ण हूं। यातैं भोजनकूं नहीं करताहूं ऐसैं ॥ ३ ॥ टीका :- ऐसैं कहिके ब्रह्मचारीके तूष्णीभूत १५० तिसकरि व्याधियां कैसैं विशेषण युक्त करिये हैं? तहां शिष्य कहैहै।। इहां कामहीं व्याधियां हैं यह अर्थ है औ आचार्यके प्रवासतैं अरु ताकी जायाके ब्रह्मचारीविषै अ- नुग्रहतैं औ ता (शिष्य)के अनशन (अभक्षण)के निश्चयतैं अ- नंतर। यह अथ शब्दका अर्थ है औ इधर "हंत" शब्द जो है सो यदि (जब)केअर्थ है। यातैंः-जब हमारे (अग्निनके)

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पनिषत् ]] दशम खंड १० ७०३ ०/३ FHIPfie उपकोसलअर्थ अग्निउक्तआत्मविद्या १ री कुशलं नः पर्यचारीद्न्तास्मै प्रब्र- वामेति तस्मै होचुः॥४॥ चर्या करताभया। जव इसकेअर्थ कथन करैं। ऐसैं तिसकेअर्थ कहते भये :- ॥४॥ हुये। अनंतर शुश्रूषाकरि आवर्जित जे अग्नि- यां वे करुणाके आवेशकरि युक्त हुये तीनों- बी मिलिके कहतेभयेः-जब ऐसैं है तब अब इस हमारे भक्त दुःखित तैपैसवी श्रद्धालु ब्रह्मचारीकेअर्थ सर्व हम ब्रह्मविद्याकूं अनुशा- सनकरैं। ऐसैं धारण करिके तिसकेअर्थ क- हतेभये॥ ४ ॥ भक्त ब्रह्मचारीकूं उपेक्षाकरिके आचार्य देशांतरकेप्रति गया तब। यह अर्थ है॥ १५१ ननु अनंतर फेरि देशांतरतैं आयके आचार्य इस शिष्यके अर्थ विवक्षित ब्रह्मविद्याकूं कहैगा त्वरासें क्या है यह आशंकाकरिके कहैहैं॥ १५२ इस शिष्यकूं ब्रह्मविद्याके साधनोंकी संपत्ति दिखावै हैं।। इहां "प्राण ब्रह्म है" ऐसें आप (अग्नियों)नैं जो कहा ताकूं मैं जानताहूं। ऐसैं संबंध है।।

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७०४ चतुर्थप्रपाठक ४ [छान्दोग्यो जानश्रुति सत्यकाम उपकोसलादि संवादसैं वायुआदिव्रह्मोपासन १७ प्राणो ब्रह्म। कं ब्रह्म। खं ब्रह्मेति॥स होवाच-विजानाम्यहं यत्प्राणो ब्रह्म।क- ञ्चतु खञ्च न विजानामीति॥ ते होचुर्य- अर्थ :- प्राण ब्रह्म है। कं (सुख) ब्रह्म है। खं (आकाश) ब्रह्म है। ऐसैं॥। ॥ सो कहता भया :- जो प्राण ब्रह्म है। [ऐसैं क- हा सो]मैं जानता हूं। औ कं (सुख)कूं तो औ खं (आकाश) कूं नहीं जानताहूं ऐसैं।।॥ टीका :- प्राण ब्रह्महै। क (सुख) ब्रह्महै। आकाश ब्रह्महै। ऐसैं [कहतेभये] ॥॥ तब सो ब्रह्मचारी कहता भयाः-आपनें कहा जो :- "प्राण ब्रह्म है" ऐसें। सो मैं जानताहूं। प्रसिद्ध पदार्थके होनेतैं॥ जिसके होते जीवन होवैहै औ जिसके दूरीभये नहीं होवैहै। ऐसे १५३ तहां हेतुकूं कहैहै॥ १५४ प्राणपदकी प्रसिद्धअर्थवान्ताकूंहीं समर्थ न करैहै। इहां इस प्रकारका प्राण शब्द है। यह शेष है।।

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पनिषत्] दशम खंड १० ७०५ उपकोसलअर्थ अग्निउक्तआत्मविद्या ५ द्वाव कं तदेव खं। यदेव खं तदेव कमिति प्राणञ्च हास्मै तदाकाशञ्चोचुः॥५॥ इति चतुर्थप्रपाठकस्य दशमः खण्डः ॥ १० ॥ वे अग्नियां) कहते भये :- जोई कं (सुख) सोई खं (आकाश) है। जोई खं है सोई कं है। ऐसैं प्राणकूं औ ताके आकाशकूं इसकेअर्थ कहतेभये ॥५॥ इति श्री०मूलभाषा०चतुर्थप्रपा०दशमः खंड:१० तिस वायुविशेषविषै लोकमैं रूढ प्राणशब्द है। यातैं ताका ब्रह्मभाव युक्त है॥ तिसकरि प्रसि- द्वपदार्थके होनेतें मैं जानताहूं जो :- प्राण ब्रह्महै ऐसैं। 'पैरंतु सुख औ आकाशकूं नहीं जा- १५५ प्राणशब्दकूं प्रसिद्धअर्थवान्ताके हुयेबी किसकार- णतैं तिसविषै ब्रह्मभाव प्रसिद्ध है? यह आशंकाकरिके क- हैहै॥ इहां कार्य कारणके संघातके नष्टहुये अग्रहणतैं। यह अतः (यातैं) शब्दका अर्थ है औ स्वकीय ज्ञानके मिलावने- अर्थ चकार है। १५६ मैं जानताहूं। ऐसैं उक्त अर्थकूं उपसंहार करैहै॥ १५७ आपकरि अज्ञातकूं ब्रह्मचारी दिखावै है।

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७१६ चतुर्थप्रपाठक ४ [छान्दोग्यो- जानश्रुति सत्यकाम उपकोसलादि संवादसैं वायुआदिव्रह्मोपासन १७ स य एतमेवं विद्वानुपास्तेऽपहते पा- पकृत्यां लोकी भवति सर्वमायुरेति ज्यो- ग्जीवति नास्यावरपुरुषाः क्षीयन्त उप अर्थ :- जो इसकूं ऐसैं विद्वान् हुया उ- पासताहै सो पापकृत्या (पापरूप क्रिया) कूं नाश करैहै। लोकी होवैहै। सर्व आ- युकूं पावताहै। उज्जवल जीवताहै॥ इसके अवर (पीछले) पुरुष क्षयकूं पावते नहीं। टीका :- सो जो कोइकबी ऐसैं इस यथो- क्त अन्न अरु अन्नादभावकरि च्यारीप्रकारसैं विभक्त गार्हपत्य अभनिकूं उपासताहै सो पाप कर्मकूं विनाशकरैहै औ लोकी (लोकवान्) कहिये हमारे आन्नेय (अग्निसंबंधी)लोककरि तिसवाला (लोकवाला) होवैहै। जैसैं हम (अननि)हैं।। औ इस लोकविषै सर्व (शत १८४ उक्त गार्हपत्य अग्निविषयक विद्याके द्विविधफलकूं दिखावै हैं।

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पनिषत् ] एकादश खंड ११ ७१७ गार्हपत्याग्निविद्या २ FITE JS वयं तं भुञ्जामोऽस्मिशश्र लोकेडमुष्मि श्र य एतमेवं विद्दानुपास्ते॥२॥ इति चतुर्थप्रपाठकस्यैकादशः खण्डः ॥११॥ हम (अग्नियां) ताकूं इस औ उस लो- कविषै पालनकरते हैं। जो इसकूं ऐसैं वि- द्वानू हुया उपासताहै॥ २ ॥ इति श्री०मूलभाषा०चतुर्थप्रपा०एकादशःखंड:११ वर्षके) आयुकूं पावताहै अरु उज्वल जीव- ताहै। अर्थ यह जो :- अप्रख्यात नहीं होवैहै औ इस विद्दानके अवर। अर्थ यह जो :- सं- ततिविषै जनित। पुरुष क्षयकूं पावतेनहीं। अर्थ यह जो :- याकी संततिका उच्छेद नहींहो- वैहै॥ किंवा :- इस लोकविषै जीवते अरु प- रलोकविषै ताकूं हम (अभनियां) पालन क- रतेहैं। जो इसकूं ऐसैं विद्वान् हुया उपा- १८५ किसकूं यह फल होवैहै? इस अपेक्षाके हुये उक्त अर्थकूंहीं संक्षेपसैं कहैहैं॥ इति श्री० चतुर्थप्रपाठकस्यैकादशखंडस्य टिप्पणम् ॥११॥

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७१८ चतुर्थप्रपाठक ४॥ [छान्दोग्यो- जानश्रुति सत्यकाम उपकोसलादि संवादसैं वायुआदिव्रह्मोपासन १७ अथ चतुर्थप्रपाठकस्य द्वादशः खंड: १२ अथहैनमन्वाहार्यपचनोऽनुशशा- साऽडपो दिशो नक्षत्राणि चन्द्रमा इति। अथ श्री०मूलभाषा•चतुर्थप्रपा०द्ादशः खंडः ॥ १२॥ अर्थ :- अनंतर इसकूं अन्वाहार्य पचन (दक्षिणान्नि) अनुशासन करताभया :- जल दिशा नक्षत्र अरु चंद्रमा हैं ऐसैं। सताहै ताकूं यह यथोक्त फल होवैहै। यह अर्थ है।। २ ।। इति श्री० भाष्यभाषा०चतुर्थप्रपाठकस्यैकादशः खंडः११ अथ श्री० भाष्यभाषा० चतुर्थप्रपा० द्वादशःखंडः॥।१२।। उपकोसल अर्थ अन्वाहार्यपचनास्निविद्या २ टीका :- अनंतर इस ब्रह्मचारीकूं अन्वा- हार्यपचन ऐसा दक्षिणाि अनुशासन क रताभया :- आप (जल) दिशा नक्षत्र औ चंद्रमा ये च्यारी मेरे तनुहैं। मैं अन्वाहार्यप- चन आपकूं च्यारी प्रकारसैं विभागकरिके अ.

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पनिषत्] द्वादश खंड १२ ७१९

य एष चन्द्रमसि पुरुषो दृश्यते सोऽहम- स्मि स एवाहमस्मीति ॥ १॥ स य एतमेवं विद्वानुपास्तेऽपहते पा- पकृत्यां लोकी भवति सर्वमायुरेति ज्यो- ग्जीवति नास्यावरपुरुषाः क्षीयन्त उप जो यह चंद्रमाविषै पुरुष देखियेहै। सो मैं हूं। सोई मैं हूं इति ॥१॥ अर्थ :- जो इसकूं ऐसें विद्वान् हुया उ- पासताहै सो पापकृत्याकूं नाश करैहै। लोकी होवैहै। सर्व आयुकूं पावताहै। उ- ज्ज्वल जीवताहै॥ इसके अवर पुरुष क्ष- वस्थित हूं॥ तैहीं जो यह चंद्रमाविषै पुरुष देखियेहै सौ मैं हूं। "सोई मैं हूं। यह पू- अथ श्री०चतुर्थप्रपा०द्वादशखंडस्य टिप्पणम् ॥१२।। १८६ इहां गार्हपत्यनामक अशनिके उपदेशके अनंतर। अथ शब्दका अर्थ है।। अब जलआदिक च्यारीकूं अनुवाद- करिके दक्षिणाग्निविषै औ चंद्रविषै विशेषकूं दिखावै हैं॥ १८७ अन्वाहार्यपचन (दक्षिणान्नि) अरु चंद्रमाके ता-

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७२० चतुर्थप्रपाठक ४ [छान्दोग्यो- जानश्रुति सत्यकाम उपकोसलादि संवादसैं वायुआदिब्रह्मोपासन १७ वयं तं भुञ्जामोऽस्मिश्श्र लोकेऽमु- ष्मिश्श्र य एतमेवं विद्यानुपासते॥२॥ इति चतुर्थप्रपाठकस्य दादशः खण्डः॥ १२॥ यकूं पावते नहीं। हम ताकूं इस अरु उस लोकविषै पालन करतेहैं। जो इसकूं ऐसैं विद्वान्हुया उपासताहै॥ २॥ इति श्री०मूलभाषा०चतुर्थप्रपा०द्वादशःखंड:१२ र्वकीन्यांईं है। अन्नके संबंधतैं अरु ज्योतिभीं- वके सामान्यतैं अन्वाहार्यपचन अरु चंद्रमाकी दात्म्यकरि औ अन्नरूप जल अरु नक्षत्रोंका तिन दोनूंके साथि भोज्यभावकरि संबंध है। ऐसें कहनेकूं पुनर्वचन है। ऐसे कहैहैं।। १८८ ननु फेर दक्षिणान्नि अरु चंद्रमाका तादात्म्य कैस है? तहां कहैहैं। इहां यह अर्थ है :- जातैं दर्श अरु पूर्ण- मासविषै अन्वाहार्यपचन (दक्षिणाजि) मैं हविका रांधना प्र. सिद्ध है औ "वे चंद्रकूं पायके अन्नरूप होवैहैं" इत्यादि वा- क्यविषै चंद्रमामैं अन्नका संबंध प्रसिद्ध है। तातैं तिन दो- नूंका तादात्म्य है।। १८९ तिन दोनूंकी एकताविषै अन्य हेतुकूं कहैहैं।

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पनिषत् ] द्वादश खंड १२ ७२१

एकता है अरु दक्षिणदिशाके संबंधतैं [बी ति- नकी एकताहै] ॥ औ जैलोंका अरु नक्षत्रोंका पूर्वकी न्यांईं अन्नभावका हीं संबंध है। काहेतैं नैक्षत्रोंकू चंद्रमाके भोग्यभावकी प्रसिद्धितैं अरु जैलोंकू अन्नके उत्पादक होनेतैं दक्षिणाग्निका अन्नपना है। गार्हपत्यके अन्न पृथिवीकी न्यांई॥ अन्य समान है॥१॥॥ २ ॥ इति श्री०भाष्यभाषा०चतुर्थप्रपाठ०द्वादशः खंडः ॥ १२॥ १९० तहांहीं अन्य हेतुकूं कहैहैं। इहां यह अर्थ है :- जातैं अन्वाहार्यवचन दक्षिणाग्नि कहिये है औ चंद्रमा दक्षि- णमार्गकरि प्राप्यमाण हुया दक्षिणदिशाविषै होवैहै। ऐसैं जानिये है। काहेतैं उत्तरदिशाके अधिष्ठाता हुयेबी तिस चं- द्रके तिस (दक्षिणदिशा)सैं संबंधके अनिवारणतैं। तातैं तिन दोनूंकी एकता युक्त है।। १९१ ननु जलोंका अरु नक्षत्रोंका चंद्रकीन्यांई अन्वा- हार्यपचन (दक्षिणाग्नि)सैं तादात्म्य है ? यह आशंकाकरिके कहैहैं॥ इहां पूर्वकी न्यांई। याका पृथिवी अरु अन्नरूप तिन दोनूंका गार्हपत्य अग्नि अरु आदित्यके साथि अन्नभावकरि संबंधकीन्यांई। यह अर्थ है औ संबंध अन्वाहार्यपचन अरु चंद्रमाकेसाथि। यह शेष है॥ १९२ नक्षत्रोंका अन्नभाव कैसै है? तहां कहैहैं॥ १९३ फेर जलोंका अन्नभाव कैसैं है ? सो कहैहैं॥ इहां दक्षिणाग्निका। याका दक्षिणाग्निकेप्रति। यह अर्थ है औ पृ- ६१

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७२२ चतुर्थप्रपाठक ४ [छान्दोग्यो- जानश्रुति सत्यकाम उपकोसलादिसंवादसैं वायुआदिव्रह्मोपासन १७ अथ चतुर्थप्रपाठत्रयोदशःखंडः।।१३॥ अथ हैनमाहवनीयोऽनुशशास-प्राण अथ श्री०मूलभाषा०चतुर्थप्रपा०त्रयोदशः खंडः ॥१३॥ अर्थ :- अनंतर इसकूं आहवनीय अभनि अतुशासन करताभया :- प्राण आकाश स्व- अथ श्री०भाष्यभाषाचतुर्थप्रपाठ०त्रयोदशः खंड:१३ उपकोसल अर्थ आहवनीयाशनिविद्या २ टीका :- अनंतर इस उपकोसलकूं आहव- नीय नामक अभि। अनुशासन करताभया :- प्राण आकाश स्वर्गलोक अरु विद्युत्। ये च्यारी मेरी तनु हैं। "जो यह विद्युत्- थिवीके गार्हपत्य अग्निकेप्रति अन्नभावकी न्यांई। यह उदाह- रणका अर्थ है औ "सो जो इसकूं ऐसें विद्वान् हुया" इत्या- दिवाक्य इधर अन्य ऐसे कहा॥ इति श्री० चतुर्थप्रपाठकगत द्वादशखंडस्य टिप्पणम्॥ १२॥ अथ श्री०चतुर्थप्रपा०त्रयोदशखंडस्य टिप्पणम् १३ १९४ गार्हपत्य अग्निके अरु दक्षिणाझनिके उपासनतैं अनंतर। इहां अथ शब्दका अर्थ है। तहां अवांतर भेदकूं दिखावै हैं। इहां "सो मैं हूं" इत्यादि अन्य समान है। ऐसे संबंध है।

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पनिषत्] त्रयोदश खंड १३ ७२३ आहवनीयाग्निविद्या २ आकाशो द्यौर्विद्युदिति।य एष विद्युति पुरुषो दृश्यते सोऽहमस्मि।स एवाहम- स्मीति॥ १॥ स य एतमेवं विद्वानुपास्तेऽपहते STP

पापकृत्यां लोकी भवति सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति नास्यावरपुरुषा: क्षीयन्त उपवयं तं.भुआ्मोऽस्मिYश्र लोकेऽमु- र्गलोक अरु विद्युत् [मेरे तनु] हैं ऐसैं। जो यह विद्युत्विषै पुरुष देखियेहै सो मैं हूं। सोई मैं हूं इति ॥ १॥ अर्थ :- जो इसकूं ऐसैं विद्वान् हुया उ- पासताहै सो पाप कृत्याकूं नाश करैहै। लोकी होवैहै। सर्व आयुकूं पावताहै। उ- ज्ज्वल जीवताहै। इसके अवर पुरुष क्ष- यकूं पावते नहीं। हम ताकूं इस अरु उस विषै पुरुष देखियेहै सो मैं हूं। इत्यादि पू-

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७२४ चतुर्थप्रपाठक ४ [छान्दोग्यो- जानश्रुति सत्यकाम उपकोसलादिसंवादसैं वायुआदिव्रह्मोपासन १७ ष्मिशश्र य एतमेवं विद्वानुपास्ते ॥२। इति चतुर्थप्रपाठकस्य त्रयोदशः खण्डः ॥ १३ ॥ लोकविषै पालन करतेहैं। जो इसकूं ऐसैं विद्वान् हुया उपासताहै ॥। २॥ इति श्री०मूलभाषा०चतुर्थप्र०त्रयोदशःखंड: १३ वैवते है। सामान्यतैं ॥ स्वर्गलोके अरुआकाश- का तो तिनकूं आश्रय होनेतें विद्युत् अरु आह- वनीय अझनिके भोग्यभावकरिहीं तिनसैं संबंध है। अन्य समान है ॥ १॥ ॥ २ ॥ इति श्री•भाष्यभाषा०चतुर्थप्रपाठकस्य त्रयोदशः खंड: १३ १९५ जैसैं पूर्व ज्योतिर्भावके अविशेषतैं गार्हपत्य अन्नि अरु आदित्यका औ दक्षिणाग्नि अरु चंद्रमाका साम्य कहा। तैसें ज्योतिर्भावके सामान्यतैं विद्युत् अरु आहवनीय अग्निका तादात्म्य अंगीकार करनेकूं योग्य है। ऐसें कहैहैं॥ १९६ ननु तब तिन दोनूंका साथि स्वर्गलोक अरु आ- काशका संबंध कैसें है? तहां कहैहैं॥ इहां यह अर्थ है :- आहवनीय (होमके योग्य) अग्निका फलरूप होनेतैं स्वर्गलो- ककूं विषयता (ताकी आश्रयता) है। काहेतैं तिस आहवनी- यअग्निविषै होमादिद्वारा उत्पन्न अपूर्वकूं स्वर्गलोकरूप फल- वान् ताके अंगीकारतैं औ बीजलीकं तो आकाशकी आश्रयता

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पनिषत्] चतुर्दश खंड १४ ७२५ उपकोसलके प्रति अग्निउक्ति औ ताका गुरुसैं प्रसंग ३ अथ चतुर्थप्रपाठ० चतुर्दशः खंड: १४ ते होचुरुपकोसलैषा सोम्य! तेऽस्म- द्विद्याSSत्मविद्या चाचार्यस्तु ते गति व- अथ श्री०मूलभाषा०चतुर्थप्रपा० चतुर्दशः खंडः ॥१४॥ अर्थ :- वे (अग्नि) कहतेभयेः-हे उप- कोसल सोम्य! यह तेरी अग्निविद्याहै औ आत्मविद्या है। आचार्यतो तेरेकूं गति अथ श्री०भाष्यभाषा० चतुर्थप्रपा० चतुर्दशः खंड: १४ उपकोसलके प्रति अग्निनकी उक्ति औ ताका गुरुसैं प्रसंग ३ टीका :- वे अग्नियां फेर मिलिके कहते भये :- १९७

प्रसिद्ध है। यातैं बीजली अरु आहवनीय अग्निकी भोग्यता- करिहीं तिन दोनूंके साथि स्वर्गलोक अरु आकाशका संबंध है औ "सो जो इसकूं ऐसैं" इत्यादिवाक्य इधर "अन्य" ऐसैं कहा॥ इति श्री० चतुर्थप्रपाठकगत त्रयोदशखंडस्य टिप्पणम् ॥ १३ ॥ अथ श्री०चतुर्थप्रपा० चतुर्दशखंडस्य टिप्पणम् १४ १९७ अग्नियोंके परस्पर विसंवादकूं निषेध करैहैं॥

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७२६ चतुर्थप्रपाठक ४ [छान्दोग्यो- जानश्रुति सत्यकाम उपकोसलादि संवादसैं वायुआदि ब्रह्मोपासन १७ क्त्ेत्याजगाम हास्याचार्यस्तमाचार्यो- Sयुवादोपकोसल ३ इति॥ १ ॥ कहैगा ऐसैं [ कहिके उपरामभये ]॥ इ- सका आचार्य आवताभया। ताकूं आचार्य हे उपकोसल! ऐसैं कहताभया॥ १॥ हे उपकोसल सोम्य! यह तेरी अस्मद्वि- द्या है। अर्थ यह जो :- अभिविद्या कही है औ "प्राण ब्रह्म है। कं ब्रह्महै। खं ब्रह्महै" ऐसें पूर्व उक्त औत्मविद्या है। औचार्यतो तेरेकूं विद्या- के फलकी प्राप्तिअर्थ गतिकूं कहैगा। ऐसैं क- हिके अन्नि उपराम होतेभये॥ इसका आचार्य कालकरि आवताभया। ता शिष्यकू आचार्य हे उपकोसल ! ऐसैं कहताभया॥ १॥ १९८ तथापि आत्मविद्या सुननेकूं योग्य है ? यह आशं- काकरिके कहैहैं॥ १९९ आचार्यके उपदेशविना तुह्मारे उपदेशके वशतैहीं मेरेकूं विद्या कैसें फलवती होवैगी। जाते "आचार्यतैहीं वि- दित विद्या श्रेष्ठताकूं पावती है" इत्यादि पूर्व कहाहै? यातै अग्नि कहैहैं॥

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पनिषत् ] चतुर्दश खड १४ ७२७ उपकोसलके प्रति अग्निउक्ति औ ताका गुरुसैं प्रसंग ३ भगव! इति ह प्रतिशुश्राव।ब्रह्मविद इव सोम्य! ते मुखं भाति को नु त्वाऽनु- शशासेति?॥ को नु माऽनुशिष्याद्ो अर्थ :- [ उपकोसलः-] हे भगवन् ! ऐसैं प्रतिवचन देताभया। ॥ [आचा- -F

र्य :- ] हे सोम्य! ब्रह्मवेत्ताकीन्यांई तेरा मुख भासता है। कौंन तेरेकूं अनुशासन करताभया? ऐसैं [पूंछताभया]।। ॥[उ- पकोसल :- ] भोः भगवन् ! कौन मुजकूं अनुशासन करैगा। ऐसैं इहां अस्तव्यस्त टीका :- [ उपकोसलः-] हे भगवन्! ऐसैं प्रतिवचन देताभया॥ ॥हे सोम्य! ब्र- ह्मवेत्ताकीन्यांई तेरा मुख प्रसन्न भासताहै। कौंन तुजकूं अनुशासन (उपदेश) करता- भया? ऐसैं आचार्यकरि उक्त हुया उपको- सल प्रत्युत्तर कहैहै :- हे भगवन्! तुहारे प्रो-

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७२८ चतुर्थप्रपाठक ४ [छान्दोग्यो- जानश्रुति सत्यकाम उपकोसलादिसंवादसैं वायुआदिब्रह्मोपासन १७ इतिहापेव निन्हुत इमे नूनमीदृशा अ- न्यादृशा इतीहाग्रीनभ्यूदे। किं नु सो- म्य! किल तेऽवोचन्निति!॥ २॥ हुयेकीन्यांई भया। ये (अग्नियां) निश्र्चय- करि अन्य सदशहुये ईदश (ऐसे) भये। ऐसें इहां अन्निनकूं [दिखावताहुया] क- हताभया।॥ [आचार्य :- ] हे सोम्य! क्या तेरेअर्थ कहतेभये? ऐसैं [पूंछताभया] २ षित (प्रवासित) हुये कौंन मुजकूं अनुशा- सन करैगा। ऐसैं इहां अस्त व्यस्त हुये- कीन्यांई भया। ऐसैं अंतरायरहित पदसैं सं- बंधहै औ अस्त व्यस्त भया नहीं औ अंियों करि उक्तकूं यथावत् नहीं कहैहै। यह अभिप्राय है।। ॥। कैसैं कि" :- ये अत्नियां मुजकरि से- २०० अस्त व्यस्त हुयेकीन्यांई भया । इस वाक्यविषै जो इव (न्यांई) शब्द है ताके तात्पर्यकूं दिखावैहैं॥ २०१ उक्त अभिप्रायकूं आकांक्षापूर्वक विवरण करैहैं।

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पनिषत् ] चतुर्दश खंड १४ ७२९ उपकोसलके प्रति अग्निउक्ति औ ताका गुरुसैं प्रसंग ३ इदमिति ह प्रतिजज्ञे॥ लोकान्वाव किल सोम्य! तेऽवोचन्नहन्तु ते तद्व- क्ष्यामि-यथा पुष्करपलाश आपो न अर्थः-[शिष्यः-] "यह" [कहतेभये] ऐसैंहीं प्रतिज्ञा करताभया॥ ॥ [आ- चार्य :- ] हे सोम्य! वे (अग्नियां) लोकन- कूंहीं कहतेभये। मैं तो तेरेअर्थ ता (ब्रह्म) कूं कहूंगा। जैसैं पुष्करके पलाशविषै ज- ल संबंधकूं पावतेनहीं। ऐसैं इस प्रकारसैं वित हुये निश्र्चयकरि कहतेभये। जातैं तुह्नकूं देखिके पूर्व अन्यप्रकारके हुये वेपमान (कंपमान)की न्यांईं इस प्रकारके देखियेहैं ऐसैं इहां अग्निनकूं दिखवता हुया काकु (स्वर- भंग) करि कहताभया। ॥ हे सोम्ये! इहां काकुकरि। याका स्वरभंगकरि भीत (भयकूं प्राप्त) हुया अस्पष्ट कहता अया। यह अर्थ है। २०२ शिष्यकी भीति (भय)कूं दूरि करता हुया आचार्य कहैहै।।

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७३० चतुर्थप्रपाठक ४ [छान्दोग्यो- जानश्चुति सत्यकाम उपकोसलादि संवादसैं वायुआदि ब्रह्मोपासन १७ श्लिष्यन्त एवमेवंविदि पापं कर्म न श्िष्यत इति। ब्रवीतु मे भगवानिति। तस्मै होवाच॥ ३॥ इति चतुर्थप्रपाठकस्य चतुर्दशः खण्डः ॥ १४ ॥ जाननेवालेविषै पापकर्म संबंधकूं पावता नहीं। ऐसैं [कहताभया]।।[शिष्यः-] हे भगवान् ! मेरेअर्थ कहहूं ऐसें [कहताभ- या] ।l ॥ तिसकेअर्थ [आचार्य] कहता भया॥ ३ ॥ इति श्री०मूलभाषा०चतुर्थप्रपा०चतुर्दशःखंड:१४ वे अझ्नियां तुजकूं क्या कहतेभये? ऐसैं आ- चार्यकरि पूंछ्याहुया शिष्यः- येहै हवै कहतेभये ऐसैं प्रतीकमात्र किंचित् प्रतिज्ञा करताभया अग्नियोंकरि उक्त सर्वकूं नहीं कहताभया 1

२०३ आचार्यके वाक्यविषै स्थित इति शब्दकूं अनुवाद करिके व्याख्यान करैहैं॥ इहां पूंछ्या हुया। ऐसैं पूर्वपदसैं संबंधहै।

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पनिषत् ]] चतुर्दश खंड १४ ७३१ उपकोसलके प्रति अ्निउक्ति औ ताका गुरुसैं प्रसंग ३ जीतैं [तातैं] आचार्य कहताभयाः-हे सोम्य! वे अन्नियां पृथिवी आदिक लोकनकूं तेरेअर्थ कहतेभये। ब्रह्मकूं शाकल्य (संपूर्णता)करि नहीं कहतेभये। मैं तो तेरे अर्थ जिसकूं तूं सुननेकूं इच्छताहैं तिस ब्रह्मकूं कहूंगा। तिसे मुजकरि कथन करीते ब्रेझ्मके ज्ञानके माहात्म्य- कूं प्रथम श्रवणकर :- जैसैं पुष्करपलाश जो प- झ्पत्र (कमलपत्र) ताकेविषै जल संबंधकूं पावते नहीं। ऐसैं जैसैं मैं ब्रह्मकूं कहताहूं इस प्रकारसैं जाननेवाले पुरुषविषै पापकर्म सं- २०४ जातैं अग्नियोंकरि उक्त अर्थकूं आचार्यकेअर्थ प्रती- कद्वारा शिष्य निवेदन करता अया। तातैं आचार्य साव- काशकूं प्राप्त भया। ऐसैं कहैहैं॥ २०५ ननु "कं खं ब्रह्म है" इत्यादि वाक्यकरि ब्रह्मबी तिन अग्नियोंनैं कहा है ? यह आशंका करिके कहैहैं॥ २०६ तब संपूर्णताकरि ब्रह्म कैसें जाननेकूं योग्य है? यह शंका भई। यातैं कहैहैं।। २०७ ब्रह्मज्ञानकेहुये क्या होवैगा ? यह आशंकाकरिके कहैहैं॥ इति श्री० चतुर्थप्रपाठकगतचतुर्दशखंडस्य टिप्पणम् ॥१४॥

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७३२ चतुर्थप्रपाठक ४ [छान्दोग्यो- जानश्रुति सत्यकाम उपकोसलादिसंवादसैं वायुआदिव्रह्मोपासन १७ अथ चतुर्थप्रपाठक०पञ्चदशःखण्डः१५ य एषोऽक्षिणि पुरुषो दृश्यत एष अथ श्री०मूलभाषा० चतुर्थप्रपाठ० पंचदशः खंडः॥१५॥ अर्थ :- अक्षिविषै जो यह पुरुष देखिये- बंधकूं पावता नहीं ॥ ॥ ऐसैं आचार्यके कथन करते हुये उपकोसल कहैहै :- हे भगवान्! (आप) मेरेअर्थ कहहू ऐसैं॥। ॥ ताकेअर्थ आचार्य कहताभया॥ २॥॥३॥ इति श्री०भाष्यभाषा० चतुर्थप्रपाठकस्य चतुर्दशःखंड: १४ अथ श्री०भाष्यभाषा०चतुर्थप्रपाठ०पंचदशः खंड: १५ गुरुकरि उपकोसल अर्थ अक्षिपुरुषोपासन औ अ- चिरादिगतिकी उक्ति ५ टीका :- अक्षिविषै जो यह पुरुष देखिये अथ श्री० चतुर्थप्रपाठकगतपंचद्शखंडस्य टिप्प०१५ २०८ उपसत्तिकूं प्राप्त भये ब्रह्मचारीकेअर्थ आचार्य कैसैं ब्रह्मविद्याकूं कहता भया? यह शंका अई। यातै कहैहैं। इहां अक्षिरूप स्थानविषै तिसकरि उपलक्षित द्रष्टारूप जो यह पुरुष देखिये है। ऐसें संबंध है।।

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पनिषत् ] पंचदश खंड १५ ७३३ गुरुकरि उपकोसलअर्थ अक्षिपुरुषोपासन औ गतिउक्ति ९ आत्मेति होवाचैतदमृतमभयमेतद्रह्े- है यह आत्मा है। ऐसैं कहताभया॥ यह अमृत है। अभय है। यह ब्रह्म है इति॥ है विषयनतैं निवृत्तचक्षुवाले ब्रैह्मचर्यादिसाध- नोंकरि संपन्न शांत विवेकी जनोंकरि ॥ "दृ- ष्टिका द्रष्टा चैक्षुका चक्षु" इत्यादि अन्यश्रुतितैं ।। नैतु अभनियोंनैं जो कहा सो मिथ्या हो- २०९ छायारूप आत्मातैं अतिरिक्त यह पुरुष सर्वकी द- ष्टिगोचरताकूं आचरता नहीं? यह आशंकाकरिके। देखनेके अधिकारीनकूं विशेषण देते हैं॥ इहां निवृत्तचक्षु। या पदका निवृत्त हैं कहिये विषयनतैं विमुख हैं। चक्षु कहिये बाह्यक- रण जिनके तिनकरि। यह अर्थ है।। २१० बाह्यकरणोंकी स्ववशताके अधीन करनेवाले अन्य- विशेषणकूं ग्रहण करैहैं॥ २११ मनके विषयपरवशतासैं रहितपनैविषै अन्यविशे- षणकूं कहैहैं॥ २१२ तिन अधिनकारिनके निवृत्तचक्षुवान्पनैविषै हे- तुकूं कहैहैं॥ २१३ "पुरुष अक्षिविषै दृष्टा है" इस अर्थविषै बृहदार- ण्यक श्रुतिकूं प्रमाण करैहैं। २१४ ननु आचार्यकरि अपूर्व (अग्निउक्तविद्यातैं विल- ६२

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७३४ चतुर्थप्रपाठक ४ [छान्दोग्यो- जानश्रुति सत्यकाम उपकोसलादि संवादसैं वायुआदिव्रह्मोपासन १७ ति। तद्यदयप्यस्मिन्सर्पिर्वोदकं वा सि- ञ्चन्ति वर्त्मनी एव गच्छति॥१॥

तिस इस (अक्षि)विषै यद्यपि घृतकूं वा P

जलकूं सिंचन करै है। दो पक्ष्म (पमणी) के तांईहीं जाता है॥ १॥ वैगा। जातें "आचार्य तो तेरेअर्थ गतिकूं क हैगा" ऐसें गतिमात्रका वक्ता है। इसरीतिसैं अन्नि कहतेभये [ सो मिथ्याभया ] औ अ्नि- योंकूं भविष्येत् विषयका अज्ञान होवैगा? यैहें क्षण) विद्याके उपदेशतैं अग्नियोंकी उक्ति मिथ्या प्राप्तभई? ऐसें पूर्ववादी शंका करैहै॥ २१५ अग्नियोंके वचनकी अन्यगतिकूं पूर्ववादी कहैहै। २१६ अग्नियोंकी उक्ति मिथ्या नहीं है औ तिनकूं भवि- व्यत् विषयका अज्ञानवी नहीं है। ऐसें सिद्धांती पूर्ववा- दीकी उक्तिकूं दूषण देते हैं॥ इहां यह अर्थ है :- जो सुख- रूप गुणवाला आकाशस्वरूप उपास्य अग्नियोंनें उपदेश किया तिसीहीं द्रष्टारूप कारणब्रह्मका "अक्षिविषै देखिये है" ऐसा अनुवाद गतिके व्याख्यान अर्थ आचार्यकरि करि- ये है। तातैं पूर्ववादीकरि उक्त दो दूषण नहीं हैं।

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पनिषत् ] पंचदश खंड १५ ७३५ गुरुकरि उपकोसलअर्थ अक्षिपुरुषोपासन औ गतिउक्ति दोष नहीं है :- काहेतैं सुखरूप गुणवाले आ- काशस्वरूपहीं दृष्टाके "अक्षिविषै देखियेहै" ऐसें अनुवादतैं [आचार्यनैं अपूर्वविद्याका उप- देश नहीं किया]। यँहँ प्राणियोंका आत्मा है ऐसैं कहताभया॥ यह कहिये जिसीहीं आ- त्मतत्वकूं हम कहतेभये यैह अमृत कहिये आ मरणधर्मि (अविनाशि)है। याहींतैं अभयहै। जातैं जाकूं विनाशकी आशंका है ताकूं भयक- संभव है ताके अभावतैं अभयहै। याहींतैं यह ब्रह्म (बृहत्) कहिये अनंत है इति॥ किंवा :- २१७ ननु "अक्षिविषै देखिये है" ऐसें प्रयोगतैं आचार्य- करि छाया (नेत्रगतरूपकाप्रतिबिंब)रूप आत्मा विवक्षित है ? यह आशंकाकरिके कहैहैं॥ २१८ इसतैंबी यह पुरुष छायात्मा (छायास्वरूप) नहीं है। ऐसें अनंतरके वाक्यकूं अवतार देके व्याख्यान करैहैं॥ इहां इति शब्द जो है सो यथोक्तगुणोंकरि उपास्य जो पु- रुष सो छायात्मा होनेकूं योग्य नहीं है। इस अर्थ- वाला है।। २१९ असंग होनेतैंबी यह छायात्मा नहीं है। ऐसैं क- हैहैं।। इहां माहात्म्य स्थानरूप द्वारकरि कहियेहै। यह शेष है।।

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७२६ चतुर्थप्रपाठक ४ [छान्दोग्यो- जानश्रुति सत्यकाम उपकोसलादि संवादसैं वायुआदि ब्रह्मोपासन १७ एत५ संयद्दाम इत्याचक्षत एतर अर्थ :- इस (पुरुष)कूं "संयद्दाम (शो- भनकी प्राप्तिवाला)है" ऐसैं कहते हैं। जातैं इस ब्रह्मरूप अक्षिगत पुरुषका माहात्म्य कहि- येहै :- तिस इस पुरुषके स्थानरूप अक्षिविषै यद्यपि सर्पि (घृत) वा उदककू सिंचन क- रैहै। सो वर्त्म (नेत्रकी पमणी)न विषैहीं गमन करैहै। पद्मपत्रके साथि उदककी न्यांई चक्षुके साथि संबंधकूं पावता नहीं॥ जब स्था- नकका वी यह माहात्म्य है। तब फिर अक्षि- पुरुषरूप स्थानी (स्थानवाले) का निरंजनपना क्या कहनेकूं योग्य है। यह अभिप्रायहै॥ १॥ टीका :- इस यथोक्त पुरुषकूं "संयद्वाम" २२० इतनेकरि पुरुषका क्या आया ? यह आशंकाक रिके कहै हैं।। २२१ तिसीहीं पुरुषकी उपास्यताकेअर्थ अन्यगुणकुं दि- खावै हैं।।

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पनिषत् ] पंचदश खंड १५ ७३७ गुरुकरि उपकोसलअर्थ अक्षिपुरुषोपासन औ गतिउक्ति १ हि सर्वाणि वामान्यभिसंयन्ति। सर्वा ण्येनंवामान्यभिसंयन्ति य एवं वेद॥।२।। इसके प्रति सर्व वाम (शोभन) प्राप्त होते- हैं [ तातैं संयद्दाम है]।। इसकूं सर्व वाम प्राप्त होतेहैं। जो ऐसैं जानताहै॥ २॥ ऐसैं कहते हैं। काहेतैं जातें इसके तांई सर्व वाम कहिये वननीय (भजनीय) नाम शोभन च्यारीऔरतैं प्राप्त होतेहैं। यातैं यह संय- द्ाम है। तैसें इस ऐसैं जाननेवालेकूं सर्व वाम २२४

(शोभन) च्यारीओरतैं प्राप्त होतेहैं जो ऐसैं जानताहै॥ २ ॥ २२२ ननु पुरुषका संयद्वामपना ब्रह्मवेत्ताकी उक्तिकरि सिद्ध हुयाबी अन्वर्थ (योग्य अर्थ)विना स्पष्ट नहीं होवैहै ? ऐसें पूर्ववादी शंका करैहैं॥ २२३ अवयवोंके अर्थके उपन्यासकरि सिद्धांती परि- हार करैहैं। २२४ गुणकी उपासनाके फलकूं कहैहैं॥ इहां तैसैं। याका उपास्यके गुणके अनुसारकरि। यह अर्थ है औ ऐसें

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७३८ चतुर्थप्रपाठक ४ [छान्दोग्यो- जानश्रुति सत्यकाम उपकोसलादि संवादसैं वायुआदि ब्रह्मोपासन १७ एष उ एव वामनीरेष हि सर्वाणि वा- मानि नयति। सर्वाणि वामानि नयति य एवं वेद॥ ३ ॥ अर्थ :- यह हीं वामनी है। जातैं यह सर्व वामोंकूं नयन करै है [तातैं वामनी है]।। सर्व वामोंकूं नयन करे है। जो ऐसैं जानता है॥ ३॥ टीका :- चहहीं वामनी है। जातैं यहहीं सर्व वामोंकूं कहिये पुण्यकर्मके फलोंकूं पु- णयके अनुसार प्राणिनकेअर्थ नयन करैहै क- हिये प्राप्त करैहै औ आत्मधर्मताकरि वहन करैहै [ यातैं वामनी है ]। विद्वान्कूं फल :- सर्व वामोंकूं नयन करैहै जो ऐसें जान- ताहै॥ ३ ॥ जाननेवालेकूं। याका संयद्वामरूप गुणकरि विशिष्ट पुरुष में हं ऐसैं जाननेवालेकूं। यह अर्थ है।। २२५ अन्य गुणकूं उपास्यताकेअर्थ दिखावै हैं॥ २२६ ताकूं व्युत्पादन करैहैं॥

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पनिषत् ] पंचदश खंड १५ ७३९ गुरुकरि उपकोसलअर्थ अक्षिपुरुषोपासन औ गतिउक्ति ९ एष उ एव भामनीरेष हि सर्वेषु लो- केषु भाति। सर्वेषु लोकेषु भाति य एवं वेद॥४॥ अर्थ :- यहहीं भामनी है। जातैं यह सर्व लोकनविषै भासताहै [तातैं भामनी है :- ]। सर्व लोकनविषै भासताहै। जो ऐसैं जानताहै॥ ४ ॥ टीका :- यहँहीं भामनी है। यह जातैं सर्व लोकनविषै आदित्य चंद्र अरु अगि आदिक- रूपोंकरि भासताहै (प्रदीप होताहै) "तीकी भा (प्रकाश) करि सर्व यह भासताहै" इस श्रुतितैं। यातैं भामोंकूं (प्रकाशोंकूं) नयन क- रैहै इस कारणतैं भामनी है। जो२२९ ऐसैं जा- करैहैं॥ २२७ अन्य गुणकूं ध्यानअर्थ कहिके ताकूं व्युत्पादन २२८ आदित्यादिरूपसैं याही पुरुषकी दीप्यमानताविषै अन्यश्रुतिकूं अनुकूल करैहैं। २२९ गुणकी उपासनाके फलकूं कहैहैं।

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७४० चतुर्थग्रपाठक ४ [छान्दोग्यो- जानश्रुति सत्यकाम उपकोसलादि संवादसैं वायुआदि ब्रह्मोपासन १७ अथ यदु चैवास्मिच्छव्यं कुर्वन्ति यदि च नार्चिषमेवाभिसम्भवन्त्यर्चि-

अर्थ :- अबबीहीं इस (ज्ञानी) विषै शव्य (शवकर्म)कूं करते हैं औ जब नहीं [क- रतेहैं तोबी ब्रह्मकूं पावता है]।। ॥ [ वे उपासक] अर्चिकूंहीं पावते हैं। अर्चितैं नताहै। यहबी सर्व लोकनविषै भासता है। ४ ॥ टीका :- अब यथोक्तब्रह्मवेत्ताकी गति कहिये- है :- यैद्यपि(जबीबी) हीं इसऐसें जाननेवालेके मृतहुये ऋत्विक् शव्य (शवकर्म)कूं करते हैं औ जब नहीं करतेहैं। सर्वथा (सर्व प्रकारसैं) बी ऐसैं जाननेवाला तिस नहीं कियेबी शव २३० गतिकूं कहनेकूं पूर्वउक्त ब्रह्मविद्याविषै अधिक गु- णनकूंहीं आचार्य अनुवाद करता भया। अब ताही गतिकूं प्रकट करैहैं।। २३१ ता गतिकूं कहनेकूं भूमिकाकूं करैहैं।

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पनिषत्] पंचदश खंड १५ ७४१ गुरुकरि उपकोसलअर्थ अक्षिपुरुषोपासन औ गतिउक्ति ९ षोडहरह् आपूर्यमाणपक्षमापूर्यमाणप- क्षाद्यान् षडुदङेति मासास्तान्मासे- दिवसकूं। दिवसतैं आपूर्यमाण (शुक्क)प- क्षकूं। आपूर्यमाण पक्षतैं जिन षट् मास- नकूं उत्तरदिशाकेप्रति [सूर्य] जाता है कर्मकरि प्रतिबद्ध नहीं होवैहै अरु ब्रह्मकूं पाव- ताहै औ किये शवकर्मकरि इसकूं कोइबी अ- धिक लोक नहीं होवैहै। काहेतैं? "कैर्मसैं ब- ढता नहीं अरु कनिष्ट (न्यून) होता नहीं" इस अन्यश्रुतितैं॥ अब शवकर्मविषै अनाद- रकूं दिखावतेहुये विद्याकूं स्तुत करैहैं :- फेर6 ऐसैं जाननेवालेका शवकर्म करनेकूं योग्य २३२ मृतक्रियाके करण अरु अकरणकरि विद्वान्कूं वृद्धि नहीं है अरु हानिबी नहीं है। इस अर्थविषै अन्यश्रुतिकूं प्र- माण करैहैं॥ २३३ "अब यद्यपि हीं" इत्यादि पंचमवाक्यके तात्पर्यकूं दिखावै हैं॥ २३४ अन्य तात्पर्यकूं दिखावै हैं।

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७४२ चतुर्थप्रपाठक ४ [छान्दोग्यो- जानश्रुति सत्यकाम उपकोसलादि संवादसैं वायुआदि ब्रह्मोपासन १७ भ्यः संवत्सर९ संवत्सरादादित्यमादि तिनकूं। मासोंतैं संवत्सरकूं। संवत्सरतैं नहीं ऐसें नहीं है। जातैं शवकर्मके नहीं किये हुये कमोंके फलके आरंभविषै कोईबी प्रतिबंध अन्यत्र (अज्ञानीविषै) अनुमान करियेहै। जातैं इहां विद्याफलके आरंभ काल विषै शवकर्म (मर- णोत्तरक्किया) होवे वा न होवै [ तोवी प्रतिबंध नहींहै ] यातैं विद्वान्के अप्रतिबंधकरि फल- के आरंभकू दिखावैहैं :- जे सुखरूप गुणवाले आ- काशस्वरूप अक्षिविषै स्थित पुरुषकूं संयद्ाम। २३५ जब विद्धान्कावी शवकर्म (प्रेतक्रिया) कर्त्तव्य है तब ताका अविद्वान्तैं क्या विशेषहै? तहां कहैहैं। इहां अन्यत्र। ऐसें अविद्यावान् कहिये है औ इहां। ऐसैं प्रस्तुत वाक्यकी वा विद्यावान्की उक्ति है औ ऐसें शवकर्मविषै अना- दरपूर्वक। यह शेष है औ भाव यह है कि :- विद्यावानकूं शवकर्मके भाव वा अभावके होते प्रतिबंधरहित फल सिद्ध होवैहै। अविद्यावान्कूंतो शवकर्मके अकरणके हुये कर्म फल- दायक नहीं है। ऐसी विद्याकी स्तुति इहां अभिप्रेत है। २३६ "चे अर्चिकूंहीं पावते हैं" इस वाक्यविषै जो तत् (वे) शब्द है ताके अर्थकूं व्याख्यान करैहैं॥

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पनिषत् ] पंचदश खंड १५ ७४३ गुरुकरि उपकोसलअर्थ अक्षिपुरुषोपासन औ गतिउक्ति त्याचन्द्रमसं चन्द्रमसो विद्युतं तत्पुरु- षोऽमानवः॥५॥ आदित्यकूं। आदित्यतैं चंद्रमाकूं। चंद्रमातैं विद्युत्कूं। तहां स्थित तिनकेप्रति अमानव पुरुष [ब्रह्मलोकतैं आयके] ॥ ५॥ वामनी अरु भामनी। ऐसैं गुणवाला उपासते हैं औ प्राणसहित अभनिविद्याकूं उपासतेहैं ति- नकूं अन्यकर्म होवै वा मति होवै सर्वथा बी वे अर्चिकूंहीं कहिके अर्चिकी अभिमानिनी देव- ताकूं पावतेहैं। यह अर्थ है। अर्चितैं कहिये अर्चिदेवतातैं दिवसकूं कहिये दिवसकी अभि- मानिनी देवताकूं। दिवसतैं आपूर्यमाणप- क्षकूं कहिये शुक्कपक्षकी देवताकूं। आपूर्य- माणपक्षतैं जिन षट् मासोंकूं उत्तर दिशाके प्रति सूर्य जाताहै तिन मासोंकूं कहिये उत्त- रायणकी देवताकूं। तिन मासनतैं संवत्सरकूं कहिये संवत्सरकी देवताकूं। तिस संवत्सरतैं

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७४४ चतुर्थप्रपाठक ४ [छान्दोग्यो- जानश्रुति सत्यकाम उपकोसलादि संवादसैं वायुआदि व्रह्मोपासन१७ स एनान् ब्रह्म गमयत्येष देवपथो अर्थः-सो इनकूं [सत्यलोकस्थ] ब्रह्म- केतांई प्राप्त करैहै। यह देवपथ है ब्रह्म- आदित्यकूं। आदित्यतैं चंद्रमाकूं। चंद्रमातैं विद्युत्कूं। तहां विद्युत्के लोकविषै स्थित तिन ब्रह्मके उपासकनके प्रति। मानवी सृष्टि- विषै जो होवै सो मानव है। नहीं जो मानव ऐसा जो दिव्य पुरुष । सो अमानवहै॥५॥ टीका :- ऐसा सो कोइकबी अमानव पुरुष ब्रह्मलो कतैं आयके इनकू सत्यलोकविषै स्थित व्र ह्मकेतांई प्राप्त करैहै। गंताँ गंतव्य अरुगमयिता के व्यपदेशनतैं। सैन्मात्रब्रह्मकी प्राप्तिविषै तिनके २३७ ननु सत्यलोकविषै स्थित ब्रह्मकूं। ऐसें देशके अं तरायकरि क्यूं ऐसैं व्याख्यान करिये है। मुख्यहीं ब्रह्मश ब्दका आलंबन (अर्थ) क्यूं नहीं कहिये है? तहां कहैहैं॥ इहां इन हेतुनतैं सत्यलोकविषै स्थित ब्रह्मकूं प्राप्त करैहै मुख्य ब्रह्मकूं नहीं। ऐसें संबंध है।। २३८ ननु मुख्य ब्रह्मकी प्राप्तिविषैबी यथोक्त व्यपदेश

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पनिषत्] पंचदश खंड १५ ७४५ गुरुकरि उपकोसलअर्थ अक्षिपुरुषोपासन औ गतिउक्ति ९ ब्रह्मपथ एतेन प्रतिपद्यमाना इमं मान- वमावर्तै नावर्तन्ते नावर्तन्ते॥ ६॥ इति चतुर्थप्रपाठकस्य पंचदशः खण्डः ॥१५॥ पथ है। इसकरि जाते हुये इस मानव आवर्तके तांई आवर्त्तन करते नहीं आवर्त्त- न करते नहीं॥ ६ ॥ इति श्री०मूलभाषाचतुर्थप्र०पंचदशः खंडः१५ असंभवतैं। जातैं "ब्रह्महीं हुया ब्रह्मकूं पावता है" ऐसैं तहां कहनेकूं योग्यहै। यातैं सर्व भे- दके निरासकरि सन्मात्रब्रह्मकी प्राप्तिकूं यह श्रुति आगे(षष्ठ प्रपाठकविषै) कहैगी औ अ- ष्ैमार्ग अगमनकेअर्थ उपस्थित होता नहीं। (गंता आदिकव्यवहार) होवैंगे? यह आशंकाकरिके कहैहैं।इहां तिनके असंभवतैं तैसा ब्रह्म (ब्रह्मशब्द) नहींहै। यह शेष है॥ २३९ गंताआदिकव्यवहारोंके ब्रह्मविषै असंभवकूंहीं स्पष्ट करैहैं॥ इधर "तहां" ऐसें मुख्यव्रह्मकी प्राप्ति कहिये है॥ २४० ननु तब किसीकूंबी सन्मात्र ब्रह्मकी प्राप्ति इहां (श्रुतिविषै) नहीं कही है ? यह आशंकाकरिके कहैहैं॥ इहां कहैगी श्रुति षष्ठ अध्यायविषै। यह शेष है।। २४१ ननु जीवका सन्मात्रज्रह्म जब पारमार्थिकरूप है। ६३

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७४६ चतुर्थप्रपाठक ४ [छान्दोग्यो- जानश्रुति सत्यकाम उपकोसलादि संवादसैं वायुआदिब्रह्मोपासन १७

"सो अविदित हुया इसकूं नहीं भोगता( पा- २४२

लन करता) है" इस अन्य श्रुतितैं॥ यह दे- वपथ कहिये गमयिता (प्रापयिता) करि अधि- कारी ऐसे अर्चि आदिक देवनकरि उपल- क्षित पंथा (मार्ग) कहियेहै औ गंतव्य जो ब्रह्म तिसकरि उपलक्षित है यातैं यह ब्रह्म- पथ है। इसकरि ब्रह्मकूं जाते हुये पुरुष तब उपासककूंबी गति (ब्रह्मलोकविषै गमन) उचित नहीं है। काहेतैं ता उपासककेबी ब्रह्मतै भिन्नस्वरूपके अभावतैं? यह आशंकाकरिके कहैहैं।। इहां एकतारूपमार्ग जब नहीं देख्या है तब अगमनकेअर्थ उपस्थित होता नहीं। जाते ध्याननिष्ठकूं अदृष्ट जो एकत्व सो ब्रह्मलोकविषै गमनकूं नि. वारणकरनेकूं समर्थ होता नहीं। काहेतें अज्ञानरूप प्रतिबं धतैं ता उपासककूं गमनकी भ्र्रांतिके संभवतैं। यह अर्थ है॥ यद्वा :- एकत्वरूप मार्ग नहीं अवगत हुया नगमन (मोक्ष)के अर्थ उपस्थित नहीं होवैहै। यह अर्थ है।। २४२ तहां प्रमाणकूं कहैहैं।। इहां इस श्रुतिका यह अर्थ है :- सो परमात्मा प्रत्यक् (अंतरात्मा) ावकरि अज्ञातहुया इस अधिकारीकूं मुक्तिके प्रदानकरि पालन करता नहीं। २४३ प्रकृत गतिकूं उपसंहार करैहैं।। २४४ गतिरूप फलकूं निगमन करैहैं॥ इहां "इस (वर्त-

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पनिषत् ] पंचदश खंड १५ ७४७ गुरुकरि उपकोसलअर्थ अक्षिपुरुषोपासन औ गतिउक्ति ५ इस मानव (मनुसंबंधी मनुकी सृष्टिरूप ) आर्त्तवकेतांई आवर्त्तन करते नहीं। कहिये आवर्त्तन करतेहैं जनन मरणरूप प्रतिबंधके चक्रविषै आरूढ हुये घटीयंत्रकी न्यांईं पुनः पुनः इसविषै ऐसा जो संसार सो आवर्त है ताकूं नहीं पावतेहैं। आवर्त्तन करते नहीं। ऐसी दोवार जो उक्ति है सो सफलविद्याकी परिसमाप्तिके दिखावनेअर्थ है॥ ६ ॥ इति श्री०भाष्यभाषा०चतुर्थप्रपाठक० पंचदशः खंडः।।१५।। मान)कूं"इस विशेषणतैं इस कल्पविषै अनावृत्ति औ अन्यक- ल्पविषै तो आवृत्ति (पुनरागमन) उपासककूं हौवै है। ऐसैं सूचन करिये है॥। २४५ आवर्त्तशब्दकूं व्याख्यान करैहैं॥ इहां सफलाकी। याका यथोक्तगतिपूर्वक फलकरि सहित विद्याकी । यह अर्थ है औ कार्यब्रह्मके उपासनकरि मिलित कारण ब्रह्मकी उपा- सना जो यथोक्त है। सो विवक्षित है। विद्यासहित अविद्या (उपासनासहित कर्म) इहां विवक्षित नहीं है ता (विद्या)की। यह अर्थ है।। इति श्री० चतुर्थप्रपाठकगतपंचदशखंडस्य टिप्पणम्॥१५॥

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७४८ चतुर्थप्रपाठक ४ [छान्दोग्यो- जानश्रुति सत्यकाम उपकोसलादि संवादसैं वायुआदिव्रह्मोपासन १७ अथ चतुर्थप्रपाठकस्य षोडशः खंड:१६ एष ह वै यज्ञो योऽयं पवत एष ह यन्निद सर्वै पुनाति॥ यदेष यन्निद अथ श्री० मूलभाषा० चतुर्थप्रपाठ०षोडशः खंडः॥१६॥ अर्थ :- यह प्रसिद्ध जो पवता(चलता) है यह यज्ञ है। यह (वायु) चलताहुया इस सर्वकूं पावन करैहै। जातैं यह चलता- अथ श्री०भाष्यभाषा०चतुर्थप्रपा०षोडशः खंडः॥१६।। यज्ञकी उपासना ५ टीका :- रहैस्य (उपासन)के प्रकरणविषै प्रसंगतैं औ औरण्यकभावके सामान्यतैं येज- अथ श्री० चतुर्थप्रपाठ०षोडशखंडस्य टिप्प०।१६॥ २४६ पूर्वउत्तरग्रंथकी असंगतिकूं आशंकाकरिके । प्र संगविषै प्राप्त संगतिकूं कहैहैं ।। इहां यह अर्थ है :- रहस्य जो उपासन ताके प्रकरणविषै विद्वानोंकूं फलकी प्राप्तिअर्थ मार्गों- पदेशके प्रसंगसैं यक्षकी समाप्तिविषै गमनअर्थ पीछले ग्रंथकरि मार्गके उपदेशतैं संगति (पूर्व उत्तरग्रंथका संबंध) है।। २४७ किंवा :- पूर्व उत्तरग्रंथकूं आरण्यक (वनविषै कथित) होनैकरि समान होनेतैंबी दोनूंकी संगति है। ऐसैं कहैहैं। २४८ किंवा :- अग्नियोंकूं विषयकरनेवाली विद्या प्रकृत

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पनिषत् ] षोडश खंड १६ ७४९ यज्ञकी उपासना ५ सर्वै पुनाति। तस्मादेष एव यज्ञस्तस्य मनश्र वाक् च वर्तनी ॥ १॥ हुया इस सर्वकूं पावन करैहै तातैं यह (वायु)हीं यज्ञ है। ताकी मन औ वाक् व- र्त्तनी (मार्ग) हैं॥ १॥ विषै छिद्रके उत्पन्नहुये प्रायश्चित्तकेअर्थ व्याह- तियां करनेकूं योग्यहैं औ ता (प्रायश्चित्त)के अभिसें ब्रह्मा नामक ऋत्विक्कूं मौन करनेकूं योग्य है। यातैं यह आरंभ करियेहैः-येहं प्रसिद्ध है औ यज्ञविषै अग्निके संबंधके सिद्ध अये जब कछुबी छिद्र (न्यूनता) उत्पन्न होवैहै। तब प्रायश्चित्तके अर्थ व्याहृतियां करनेकूं योग्य हैं। यातैं पीछले ग्रंथकी प्रवृत्ति है। ऐसे अन्य संगतिकूं कहैहैं॥ २४९ प्रकृत उपासनाविषै मौन अंगीकार करिये है। काहेतैं वाणीके व्यापारके हुये विक्षिप्त चित्तवान्ताकरि ध्या- नके अनुष्ठानकी असिद्धितैं औ इहां (इसखंडविषै) प्रायश्चि- त्तके जाननेवाले ऋत्विक् विशेष (ब्रह्मा)कूं मौन विधान क- रियेहै। तिस हेतुकरि पूर्व उत्तरखंडकी परस्पर संगति है। ऐसें कहैहैं॥ २५० ननु यज्ञकूं देवताके उद्देशकरि द्रव्यका त्यागस्व-

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७५० चतुर्थप्रपाठक ४ [छान्दोग्यो- जानश्रुति सत्यकाम उपकोसलादि संवादसैं वायुआदिब्रह्मोपासन १७ वायु जो यह पवता (चलता) है यह यज्ञ है [ इहां "ह वा" ऐसे प्रसिद्ध अर्थके प्रकाशक दो निपात हैं] जततै वायुविषै स्थित यज्ञ श्रुतिन- विषै प्रसिद्ध है "स्वाहा जो है सो वातेधाः (यज्ञ) है। येहै हीं यज्ञ है जो यह पवता (चलता)है" इत्यादि श्रुतिनतैं। वौयुहीं क्रियासमवायी (यज्ञ रूप होनेतैं औौ क्षणभंगिनी क्रियाकूं गतिमानूपनैके अयोगतैं मार्गके उपदेशके असंभवतैं मार्गका उपदेशरूप जो प्रथम संगति (पूर्व उत्तरग्रंथका संबंध) सो कैसें बनैगा? यह आशं- काकरिके। यज्ञरूप क्रियाकी गतिमान्ताकूं संपादन करनेकूं यज्षकी वायुरूपताकूं कहैहैं।। २५१ यज्ञ वायुरूप आश्रयवाला अरु वायुस्वरूप है ऐसी श्रुतिगत प्रसिद्धि है। ताहीकूं प्रकट करैहैं। २५२ श्रुतिनकूं उदाहरण करैहैं॥ इहां स्वाहाकारकूं उ च्चारकरिके वात जो वायु तिसविषै धा कहिये धारण क रियेहै (डालियेहै) ऐसा जो यज्ञ सो वातेधा है॥ २५३ अन्य श्रुतिकूं कहैहैं॥ इहां आदिशब्दकरि "वात (वायु)तैं यज्ञ योजना करनेकूं योग्य है" यह श्रुति ग्रहण करियेहै॥ २५४ दिखाई जे श्रुतियां तिनके अर्थकूं संक्षेपसैं कहैहैं। इहां यह अर्थ है :- जो यज्ञ क्रियासमवायी कहिये क्रियासम दायस्वरूप है सो वायुहीं है। काहेतें यज्ञ अरु वायु इन

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पनिषत्] षोडश खंड १६ ७५१ १ Ffयज्ञकी उपासना ९ हैं चलनात्मक होनेतैं। औ "वातहीं यज्ञका आरंभक है। वैाति प्रतिष्ठा(आश्रय)है" ऐसैं श्रवणतैं॥। यहैं(वायु)हीं चलता हुया इस सर्व जगत्कूं पावनकरैहै (शोधनकरैहै) जातें नहीं चलनेवालेकूं (शुभक्रियाकेनकरनेवालेकूं) शुद्धि (दोषेका निरास)नहीं है। औ जातैं दोषका निरास चलनें (शुभक्रियाकरनें) वालेकूं दोनूंकी चलनस्वरूपताके अविशेषतैं। तातैं वायुविषै प्रतिष्ठा (स्थिति)वाला अरु वायुस्वरूप यज्ञ है।। २५५ वायुविषै प्रतिष्ठावाला यज्ञ है इस अर्थविषै अन्य श्रुतिकूं कहैहैं।। २५६ पवन (चलन) भावकी श्रुतिकरि बी वायु अरु य- ज्ञकी एकताकूं कहैहैं॥ २५७ ननु वायु विनाबी शुद्धि सिद्ध होवैहै ? यह आ- शंकाकरिके कहैहैं।। इहां नहीं चलनेवालेकूं। याका विहि- तक्रियाकूं नहीं अनुष्ठान करनेवालेकूं। यह अर्थ है॥ औ शुद्धि नाम दोषका निरास है। औ सो निषिद्धके तांई त्या- गनेकूं प्रयत करनेवालेकूं सिद्ध होवैहै। परंतु निषिद्धक्रियाके त्यागविषै उदासीनकूं दोषकी निरासस्वरूप शुद्धि नहीं सं- भवैहै। २५८ औ चलनरूप वायु है। तातैं वायुहीं चलनद्वारा सर्व जगत्कूं पावन करैहै। ऐसैं कहैहैं॥

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७५२ चतुर्थप्रपाठक ४ [छान्दोग्यो- जानश्रुति सत्यकाम उपकोसलादि संवादसैं वायुआदिव्रह्मोपासन १७ हीं देख्या है स्थिरकूं नहीं औ जौतें चलता हुया यह वायु इस सर्वकूं पवित्रकरैहैं। तातैं यहहीं यज्ञ है। जातैं पवित्र करैहै यातैं तिसं इस ऐसैं गुणकरि विशिष्ट यज्ञकी मंत्रके उच्चारणविषै प्रवृत्त वाक औ यथाभूत अर्थके ज्ञानविषै प्रवृत्त मन वे ये वाक् अरु मन व- र्त्तनी (मार्ग) हैं। जिन दोनूंकरि यज्ञ ताय- मान (विस्तारित) हुया प्रवर्त्त होवैहै वे दो वर्त्तनी हैं। "प्राण अरु अपानकरि चलनेवाली २५९ ननु वायुकूं पावनता होह। तिसकररि प्रकृत (प्र- संग)विषै क्या आया ? यह आशंकाकरिके कहैहैं॥ २६० वायुस्वरूपसैं गतिविशिष्ट यज्ञके वाकू अरु मनरूप दोमार्गनकूं उपदेश करैहैं॥ इहां एवंविशिष्ट (ऐसैं गुणकरि विशिष्ट) यज्ञके। याका पावन वायुरूप यज्ञके। यह अर्थ है॥ २६१ यज्ञकी उक्त दोमार्गनकरि युक्तताविषै उपस्कार (सामग्री) सहित ऐत्तरेय श्रुतिके वाक्यकूं उदाहरण करैहैं॥ इहां यह अर्थ है :- प्राण अपानरूप जे उच्छास अरु निश्वास तिन दोनूंकरि परिचलन विद्यमानहै जिसका ऐसी जो वाक् तिस वाक्के औ चित्त (मन)के पूर्व अपरभावके क्रमसैं यज्ञ संपादन करियेहै। जातैं मनकरि व्यावताहुया वाकूकूं उच्चा- रताहुया पूर्व अपरभावकरि यज्ञकूं संपादन करैहै॥

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पनिषत्] षोडश खंड १६ ७५३ यज्ञकी उपासना ५ तयोरन्यतरां मनसा सस्करोति ब्रह्मा ाचा होताऽध्वर्युरुद्वाताऽन्यतरा अर्थ :- तिन दोनूंके मध्य अन्यतर (ए- कवर्त्तनी)कूं ब्रह्मा मनकरि संस्कार करैहै। अन्यतर (एकवर्त्तनी)कूं होता अध्वर्यु अरु उद्गाता वाक्करि [संस्कार करैहैं] ॥। सो प्रसिद्ध वाक्का औ चित्तका उत्तर उत्तर (पूर्व- अपरभाव) करि कम है जो यज्ञ है" ऐसी जातैं अन्य श्रुति है। यातैं वाकू अरु मनकरि यज्ञ वर्त्तताहै। यातैं वाक् अरु मन यज्ञके वर्त्तनी (मार्ग) कहियेहैं॥ १ ॥ टीका :- तिन दो वर्त्तनीयोंके मध्य अन्य- तर (एक) वर्त्तनीकूं विवेकज्ञानवाले मनकरि ब्रह्मा नामक ऋत्विक् संस्कारयुक्त करैहै। २६२ यज्ञकी दो मार्गौकरि युक्तताकूं उपसंहार करैहैं॥ २६३ तिन मन अरु वाक्के परस्पर उपकार्य अरु उपका- रकभावकूं दिखावैहैं॥ इहां सम्यक् उच्चारणकरी वाक्करि। यह शेषहै॥

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७५४ चतुर्थप्रपाठक ४ [छान्दोग्यो- जानश्रुति सत्यकाम उपकोसलादि संवादसैं वायुआदिब्रह्मोपासन १७ स यत्रोपाकृते प्रातरतुवाके पुरा परि- धानीयाया ब्रह्मा व्यववदति॥२॥ ब्रह्मा जिसकालविषै प्रातरतुवाकके प्रारं- भकिये हुये पुरा परिधानीया (पूर्व धारण करते योग्य ऋचा)तैं बोलताहै॥ २॥ वाकूरूप वर्त्तनीकरि होता अध्वर्यु अरु उद्गा- ता ये तीनबी ऋत्विक् अन्यतर (एक) वाकू- रूप वर्त्तनीकूं वौक्करिहीं संस्कारयुक्त करैहैं! तैहां ऐसैं हुये यज्ञविषै वाकू अरु मनरूप वर्तनी संस्कार युक्त करनेकूं योग्यहैं॥ अनंतर सो २६४ वाकूरूप वर्त्तनी (मार्ग)के संस्कारयुक्त कियेहुये तिसीहीं वाक्करि यज्ञ सिद्ध होवैहै ऐसे कहैहैं॥ २६५ ननु तब मनरूप वर्तनीकरि क्या संस्कारयुक्त करियेहैं? यह आशंकाकरिके कहेहैं॥ इहां ऐसें हुये। याका दो मागोंकरि यज्ञकी निर्वाह करनेकी योग्यताके पूर्वोक्त री- तिकरि स्थित हुये। यह अर्थ है॥ २६६ मनरूप वर्त्तनी (मार्ग)के संस्कारके अभावविषै प्र त्यवाय (पाप)कूं दिखावैहैं॥ इहां यह अर्थ है :- मनरूप व र्तनी। ब्रह्मा नामक ऋत्विक्करि औ वाकुरूप वर्तनी। होता

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पनिषत् ] पोडश खंड १६ ७५५ यज्ञकी उपासना ९ अन्यतरामेव वर्तनीY सरस्करोति हीयतेऽन्यतरा॥ स यथैकपाद्रजन्रथो वैकेन चक्रेण वर्तमानो रिष्यत्येवमस्य अर्थ :- [तब]अन्यतर (वाक्रूप)हीं व- र्त्तनीकूं संस्कार करैहै। अन्यतर (मनरूप वर्त्तनी)नाशकूं पावैहै॥ सो जैसैं एक पादवाला चलता हुया वा एकचक्रकरि व- ब्रह्मा जिस कालविषै प्रातः अनुवाक्रूप शस्त्रके प्रारंभ किये हुये पुरा परिधानीया (पूर्व पढने योग्य ऋचा) तैं ब्रेह्म इस अंतर (मध्य) कालविषै जब बोलताहै कहिये मौ- आदिक ऋत्विकोंकरि संस्कारयुक्त करनेकूं योग्य है। ऐसी अन्य व्यवस्था है।। २६७ सो ब्रह्मा। इस अन्वयकूं सूचन करैहैं॥ इहां पुन- रुक्ति जो है सो ता ब्रह्मा शब्दके क्रियापदके साथि संबंधके प्रकाशनअर्थ है औ इस अंतरकालविषै याका प्रातः अनुवा- करूप शस्त्रकूं आरंभ करिके ताकी परिसमाप्तिके अंतरकी अ- वस्थाविषै। यह अर्थ है।।

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७५६ चतुर्थप्रपाठक ४ [छान्दोग्यो जानश्रुति सत्यकाम उपकोसलादि संवादसैं वायुआदिव्रह्मोपासन १७ यज्ञो रिष्यति। यज्ञ रिष्यन्तं यजमा- नोऽनुरिष्यति। स इश् पापीयान् भ- वति॥३॥ र्त्मान रथ नाशकूं पावता है। ऐसैं इसका यज्ञ नाशकूं पावता है। नाशहुये यज्ञके पीछे यजमान नाशकूं पावता है। सो यज- नकरिके पापीयान् होवैहै॥ ३॥ नकूं त्यागताहै॥२॥ ॥ तब अन्यतर (वाकूरूप) हीं वर्त्तनीकूं संस्कारयुक्त करैहै। औ ब्रह्मा करि संस्कारयुक्त नहीं करी जो मनरूप अन्य तर (एक) वर्त्तनी सो विनाशकूं पावतीहै (च्छिद्रयुक्त होवैहै) ॥ २६सो यज्ञ अन्यतर (एक) वाकूरूप वर्त्तनीकरि हीं वर्त्तनेकूं अ २६८ ननु वाक्की होता आदिककरि संस्कार करनेकी योग्यता होहू। औ मनकी ब्रह्माकरि संस्कार करनेकी यो ग्यता नहीं होतीभई। इतनेकरि यज्ञकूं क्या आया? यह आशंका करिके कहैहैं।

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पनिषत् ] षोडश खंड १६ ७५७ यज्ञकी उपासना ५ शक्य हुया नाशकूं पावताहै। [२ ]॥ किसकी न्यांईं ? यह कहैहैः-सो जैसैं एक पादवाला पुरुष मार्गके प्रति चलताहुया नाशकूं पावता है। वा एकचक्रकरि वर्त्तमान रथ चलता हुया नाशकूं पावताहै। ऐसैं इस यजमानका कुत्सित ब्रह्माकरि यज्ञ नाशकूं पावताहै। ना शकूं पावते यज्ञके पीछे यजमान नाशकूं पावताहै। जाँतैं यज्ञरूप प्राणवाला यजमान है। यातैं यज्ञके भ्रंशके हुये ता (यजमान)का अ्रंश युक्त है। सो (यजमान) तिस तैसे यज्ञकूं यजन करिके पापीयान् (अत्यंत पापी) हो- वैहै॥ २॥ ॥३॥ २६९ यज्ञके भ्रंशकूंहीं आकांक्षाद्वारा व्युत्पादन करैहैं॥ २७० ननु यज्ञके नाशके हुयेबी यजमानकूं क्या आया? यह आशंका करिके कहैहैं॥ इहां वाकूरूप वर्त्तनीके संस्का- रके अभावविषै बी तुल्य दोष है।।

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७५८ चतुर्थप्रपाठक ४ [छान्दोग्यो- जानश्रुति सत्यकाम उपकोसलादि संवादसैं वायुआदिव्रह्मोपासन १७ अथ यत्रोपाकृते प्रातरनुवाके न पुरा परिधानीयाया ब्रह्मा व्यववदत्युभे एव वर्तनी सभ्स्कुर्वन्ति न हीयतेऽन्यत- रा ।। ४ ।। अर्थ :- औ जिसकालविषै ब्रह्मा प्रातरतु- वाकके प्रारंभकियेहुये[यावत् ] पुरा परि- धानीया (ऋचाविशेष)तैं नहीं बोलता है [तावत् ब्रह्मासहित सर्व ऋत्विक ]दोनूंहीं वर्त्तनीकूं संस्कार करतेहैं। [तैसैं हुये ] अ- न्यतर(एकवर्त्तनी) नाशकूं पावतीनहीं॥४॥ टीका :- अनंतर फेर जिस कालविषै ब्रह्मा विद्दान्हुया मौनकूं ग्रहण करिके वाक्के वि: सर्ग (उच्चारण) कूं नकरताहुया वर्त्तताहै। सो जहांलगि पुरा परिधानीया (पूर्वपढने योग्य ऋचा) तैं बोलता नहीं [ तहांलगि]। तैसैंहीं २७१ मौनरूप गुणकूं दिखावैहैं॥ इहां तैसैंहीं। याका सम्यक्अनुष्ठानके करनेवाले। यह अर्थ है।।

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पनिषत् ] षोडश खंड १६ ७५९ यज्ञकी उपासना ५ स यथोभयपाद्रजन्नथो वोभाभ्यां चक्राभ्यां वर्तमान: प्रतितिष्ठत्येवमस्य यज्ञ: प्रतिष्ठिति।यजञं प्रतितिष्ठन्तं यज- अर्थः-सो जैसैं दोपादवाला चलता हुया वा दोचक्रोंकरि वर्त्तमान रथ प्रति- छ्ठित (स्थित) होवैहै। ऐसैं इसका यज्ञ प्र- तिष्ठित होवैहै। प्रतिष्ठित हुये यज्ञके पीछे (सम्यक् अनुष्ठान करनेवाले) । सर्व (ब्रह्मा आदिक) ऋत्विक दोनूंहीं वर्त्तनीकूं संस्कार- युक्त करैहैं। [ तैसैं हुये ] अन्यतर (मनरूप वर्त्तनी)बी नाशकूं पावती नहीं।[४]।। किसकीन्यांईं ? यह कहैहैं :- पूर्व उक्ततैं विप- रीत दो दृष्टांत हैं। २ऐसैं इस यजमानका २७२ तैसैं हुये ब्रह्मा अरु अन्य ऋत्विक् दो वर्त्तनीकूं (मार्गौकूं) संस्कार युक्त करतेहीं हैं। ऐसैं कहैहैं॥ २७३ दोवर्त्तनीके संस्कारके हुये क्या होवैहै? इस जा- नकेकी अपेक्षाके हुये कहैहैं।। इति श्री०चतुर्थप्रपाठकगत षोडशखंडस्य टिप्पणम् ॥ १६ ॥

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७६० चतुर्थप्रपाठक ४ [छान्दोग्यो- जानश्रुति सत्यकाम उपकोसलादि संवादसैं वायुआदिव्रह्मोपासन १७ मानोऽनुप्रतितिष्ठति। स इष्टा श्रेयान् भवति॥५॥ इति चतुर्थप्रपाठकस्य पोडशः खंडः ॥ १६॥ यजमान प्रतिष्ठित होवैहै। सो यजनकरिके श्रेयान् होवेहै ॥ ५ ॥ इति श्री०मूलभाषा०चतुर्थप्रपा०षोडशः खंड:१६

यज्ञ स्वकीय दो वर्त्तनी (मार्गो)करि वर्त्तमान हुया प्रतिष्ठित होवैहै। अर्थ यह जो :- अपने स्वरूपकरि अविनाशकूं पावताहुया वर्त्तताहै। प्रतिष्ठित हुये यज्ञके पीछे यजमान प्रति- छ्ठितहोवैहै॥ सो यजमान ऐसें मौनके वि- ज्ञानवाले ब्रह्माकरियुक्त यज्ञकूं यजनकरिकेश्रे यान् होवैहै। अर्थ यह जो :- श्रेष्ठ होवैहै॥४॥५॥ इति श्री०भाष्यभाषा०चतुर्थप्रपा०षोडशः खंडः ॥१६॥

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पनिषत् ] सप्तदश खंड १७ ७६१ यज्ञक्षतनिवृत्तिअर्थ ३ व्याहृतिविधान १० अथ चतुर्थप्रपाठ०सप्तदशः खंडः॥१७। प्रजापतिर्लोकानभ्यतपत्तेषां तप्य- मानानाY रसान् प्राबृहदग्निं प्टथिव्या वायुमन्तरिक्षादादित्यं दिवः ॥ १॥ अथ श्री०छांदोग्योपनिषदोसूलमात्रभाषादीपिकायाश्र- तुर्थप्रपाठकस्य सप्तदशः खंडः प्रारभ्यते॥ १७॥ अर्थः-प्रजापति लोकनकूं तपावताभ- या। तिन तप्यमानोंके रसोंकूं उद्धार कर- ताभया। पटथिवीतैं अग्निकूं। अंतरिक्षतैं वायुकूं। स्वर्गतैं आदित्यकूं ॥ १ ॥ अथ श्री०भाष्यभाषा०चतुर्थप्रपा०सप्तदशः खंड:॥१७॥ यज्ञक्षत निवृत्तिअर्थ भूरादि ३ व्याहतिनका विधान १० टीका :- इहां ब्रह्माकूं मौन विहित है औ ब्र- ह्माभावरूप कर्मविषै ता (ब्रह्माके मौन)के अथ श्री०चतुर्थप्रपाठक०सप्द्शखंडस्य टिप्पणं१७ २७४ नित्यकर्मके अनुष्ठानकूं कहिके अब नैमित्तिक प्राय- श्चित्तके विधानअर्थ आरंभ करैहैं॥ इहां ताके भ्रंशहुये। याका ब्रह्माके मौनके भंशके हुये। यह अर्थ है।।

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७६२ चतुर्थप्रपाठक ४ [छान्दोग्यो जानश्रुति सत्यकाम उपकोसलादि संवादसैं वायुआदिब्रह्मोपासन १७ स एतास्तिस्रो देवता अभ्यतपत्तासां अर्थ :- सो इन तीन देवताओंकूं तपाव- ध्रंशके हुये औ अन्य होताआदिकके कर्मके भ्रं- शके हुये व्याहृतिकरि होमरूप प्रायश्चित्त है। यातैं ता(प्रायश्चित्त )केअर्थ व्याहृतियां कर- नेकूं योग्य हैं। ऐसैं कहैहैः-प्रजापति लोक- नकूं तपावताभया कहिये लोकनकूं उद्देशकरि- के तिनविषै सारके ग्रहणकरनेकी इच्छाकरि ध्यानरूप तपकूं करताभया॥ तिन तप्यमान लोकनके साररूप रसोंकूं उद्दार करताभया। अर्थ यह जो :- ग्रहणकरताभया ॥ ॥ किन रसोंकूं? तहां कहैहै :- पटथिवीतैं अ्निरूप रसकूं अंतरिक्षतैं वायुकूं। स्वर्गलोकतैं आदि- त्यकूं॥१॥ टीका :- फेरवी ऐसैंहीं सो अभनि आदिक इन २७५ रसोंकूं विशेषकरि जाननेकूं पूर्ववादी पूंछताहै॥ इहां ऐसें। याका जैसें लोकनकूं तपावताअया तैसैं। यह अर्थ है औ ग्रहण करताभया। ऐसें संबंध है।।

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पनिषत्] सप्दश खंड १७ ७६३ यज्ञक्षतनिवृत्तिअर्थ ३ व्याहृतिविधान १० तप्यमानाना रसान् प्राबृहदग्नेर्नचो वायोर्यजूशषि सामान्यादित्यात्॥२॥ स एतां त्रयीं विद्यामभ्यतपत्तस्या-

ताभया। तिन तप्यमानोंके रसोंकूं उद्धार करताभया॥ अग्नितैं ऋचाओंकूं। वायुतैं यजुषनकूं। आदित्यतैं सामोंकूं॥ २ ॥ अर्थ :- सो इस त्रयी विद्याकूं तपावता- भया (ताके ध्यानकूं करताभया) ता त-

तीन देवताओंकूं तपावताभया। तिनतैं बी त्रयीविद्यामय साररूप रसकूं ग्रहण कर- ताभया॥ २ ॥ टीका :- फेर सो इस त्रयीविद्याकूं तपाव- ताभया। तिस तप्यमानके रसरूप"अूंः" २७६ ताही प्रायश्चित्तकूं विवरण करैहैं।। इहां प्रथम अतः (यातैं) शब्द। जातैं। इस अर्थविषै है। जब ऋचातैं। यह ऋकू शब्द तिसविषै है॥

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[छान्दोग्यो- जानश्रुति सत्यकाम उपकोसलादि संवादसैं वायुआदिव्रह्मोपासन १७ ७६४ चतुर्थप्रपाठक ४

स्तप्यमानाया रसान् प्राबृहद्धूरित्यृग भ्यो भुवरिति यजुर्भ्यः स्वरिति साम- भ्यः॥ ३ ॥ तद्यदृक्तो रिष्येद्रःस्वाहेति गार्ह-

प्यमानके रसोंकूं उद्दार करताभया॥ भूः ऐसी [व्याहतिकूं] ऋचाओंतैं। भुवः ऐसी यजुषनतैं। स्वः ऐसी सामोंतैं ॥ ३ ॥ अर्थ :- तहां जब ऋचातैं नाशकूं पावै [तब] “भू: स्वाहा" ऐसैं गार्हपत्यविषै इस व्याहृतिकूं ऋचाओंतैं। "भुवर्" इस व्याहृतिकूं यजुषनतैं औ "स्वः" इस व्या- हृतिकूं सामोंतैं ग्रहण करताभया ।। [ ३ ]। जाहीतैं लोक देव अरु वेदनकी रसरूप महा- व्याहतियां हैं। यातैं तहां यज्ञविषै जब ऋ- चातैं कहिये ऋचाके संबंधतैं (ऋचाके निमित्त) नाशकूं पावै कहिये यज्ञ क्षत (छिद्र)कूं पावै।

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पनिषत् ] सप्तदश खंड १७ ७६५ यज्ञक्षतनिवृत्तिअर्थ ३ व्याहृतिविधान १० पत्ये जुहुयाट्ृचामेव तद्रसेनची वी्य्ये- णर्ची यज्ञस्य विरिष्टर सन्दधाति॥४॥ होमकूं करै। ऋचाओंके संबंधी यज्ञके विरिष्ट (क्षत)कूं संधान करैहै। सो ऋ- चाओंकेहीं रसकरि अरु ऋचाओंके वीर्य- करि [संधान करैहै]॥। ४ ॥

तब "भूः स्वाहा" ऐसैं गार्हपत्य अभिनिविषै होमकूं करै। सो तहां प्रायश्चित्त है। ॥ कै- सैंकि"? ऋचाओंके संबंधी यज्ञके उत्पन्न क्षतरूप विशिष्ट (अंतराय)कूं ब्रह्मा संधान करैहै। ऐसा जो है। सो ऋचाओंकेहीं [इहां

२७७ उक्त प्रायश्चित्तकूंहीं आकांक्षापूर्वक विवरण करैहैं॥ इहां तत् (सो) यह क्रियाका विशेषण है। यातैं यज्ञके क्षतकूं संधान करताहै ऐसा जो है सो ऋचाओंकेहीं रसकरि सं- धान करताहै। यह अर्थ है औ ओज (बल)करि संधान क- रताहै। ऐसैं संबंध है।। इहां तैसें हुये। याका यथोक्त सा- धनके होते। यह अर्थ है।।

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७६६ चतुर्थप्रपाठक ४ [छान्दोग्यो जानश्रुति सत्यकाम उपकोसलादि संवादसैं वायुआदिव्रह्मोपासन १७ अथ यदि यजुष्टो रिष्येद्धुवः स्वा हेति दक्षिणाग्रौ जुदुयाद्यजुषामेव तद्र सेन यजुषां वीर्येण यजुषां यज्ञस्य विरि- षसन्दधाति॥५॥ अर्थ :- औ जब यजुपतैं नाशकूं पावे [तब] "भुवः स्वाहा" ऐसैं दक्षिणाग्नि- विषै होमकूं करै॥ यजुषनके संबंधी यज्ञके विरिष्ठ (क्षत)कूं संधान करैहै। सो यजुष- नकेहीं रसकरि अरु यजुषनके वीर्यकरि [संधान करैहै] ॥ ५॥ "सो" यह क्रियाका विशेषण है ]॥ रसकरि अरु ऋचाओंके वीर्य (ओज) करि संधान करैहै॥ ३ ॥ ४ ॥ टीका :- औ जब यजुष्तैं कहिये यजुषूके निमित्त यज्ञ नाशकूंपावै तब "भुवः स्वाहा" ऐसें दक्षिणाग्निविषै होमकूं करैं॥। तैसैं सा

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पनिषत् ] सप्तदश खंड १७ ७६७ । यज्ञक्षतनिवृत्तिअर्थ ३ व्याहृतिविधान १० अथ यदि सामतो रिष्येत्स्वः स्वा- हेत्याहवनीये जुहुयात्साम्नामेव तद्रसेन अर्थः-औ जब सामतैं नाशकूं पावै [तब] "स्वः स्वाहा" ऐसैं आहवनीयविषै होमकूं करै॥ सामोके संबंधी यज्ञके विरि- मके कहिये सामके निमित्त यज्ञके अंशके हुये "स्वः स्वाहा"ऐसैं आहवनीय नामक अभि- विषै होमकूं करै। तैसें हुये पूर्ववर्त् यज्ञ (यज्ञके छिद्र)कूं संधानकरैहै॥ ॥ परंतु ब्रह्माके निमित्त यज्ञके भ्रंश हुये तीन अन्नियोंविषै तीन २७८ जैसें पूर्व प्रायश्चित्तविषै यज्ञके क्षतकी न्यांई रस- करि होता संधान करैहै। तैसें द्वितीय अरु तृतीय प्रायश्चि- त्तोंविषै वी यजुषनके अरु सामोके रसकरि अध्वर्यु अरु उद्गाता ता यज्ञके क्षतकूं संधान करैहै। ऐसें कहैहैं॥ २७९ होताआदिकके अपराधके अधीन यज्ञके (ध्वंस) विषै प्रायश्चित्तकूं कहिके। अब ब्रह्माके अपराधके किये भ्रंश यज्ञके नाशविषै क्या प्रायश्चित्त है? यह आशंका करिके कहैहैं।

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७६८ चतुर्थप्रपाठक ४ [छान्दोग्यो- जानश्रुति सत्यकाम उपकोसलादि संवादसैं वायुआदिव्रह्मोपासन १७ साम्ना वीर्येण साम्नां यज्ञस्य विरिष्ट सन्दधाति॥६॥ ष्टकूं संधान करैहै। सो सामोंकेहीं रसकारे अरु सामोंके वीर्यकरि [संधान करैहै]।६॥ व्याहृतियोंकरि होमकूं करै। जांतैं त्रयीविद्याका सो भ्रंश है। काहेतैं "अव किसकरि ब्रह्माभाव है? ऐसैं [पूंछेहुये] इसी हीं त्रयी (ऋक् यजुर अरु साममय च्यारी वेदरूप) विद्याकरि" इस श्रुतितैं [यह एक न्याय है]। वो ब्रह्माभावके निमित्त यज्ञके भ्रंशके हुये अन्य न्याय खोज नेकूं योग्य है ॥ ५॥६॥ २८० यथोक्त प्रायश्चित्तविषै लिंगकूं दिखावैहैं॥ २८१ ब्रह्माकी त्रयी (वेद) विद्यारूप सारवान्ताविषै 2- माणकूं कहैहैं॥ २८२ साधारण कार्यकी साधारण सामग्रीकरि जन्यताक नियमतैं तीन वेदनके साधारण ब्रह्माभावविषै तीन वेदनका साधारणहीं प्रायश्चित्त कहनेकूं योग्य है। यह एक न्याय दिखाया। अव इसीहीं सर्व वेदोंके अर्थके अभिज्ञ ब्रह्माक वेदक (ज्ञाता)पनैकी प्रसिद्धितैं ज्ञानके माहात्म्यकरिहीं दोषक निरासतैं अन्य प्रायश्चित कर्त्तव्य नहीं है । इस अन्य न्यायकू कहैहैं॥

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पनिषत् ] सप्तदश खंड १७ ७६९ यज्ञक्षतनिवृत्तिअर्थ ३ व्याहृतिविधान १० तदथा लवणेन सुवर्ण सन्दध्या- त्सुवर्णेन रजतर रजतेन त्रपु त्रपुणा सीस सीसेन लोहं लोहेन दारु दारु चर्मणा ॥७॥

अर्थः-सो जैसैंः-लवण (क्षार) करि सु- वर्णकूं संधान करै। सुवर्णकरि रजतकूं। रजतकरि त्रपु (कल्ी)कूं। त्रपुकरि सी- सेकूं। सीसाकरि लोहकूं लोहकरि काष्ठकूं। चर्मकरि काष्ठकूं ॥ ७॥ टीका :- "सो जैसैं लवणकरि सुवर्णकूं संधानकरै। जातैं टंकणआदिक क्षीरकरि सो २८३ वस्तुनके स्वभावकी विचित्रतातैं उत्पन्न अये बी क्षत (छिद्र)का किसकरि बी संधान होवैहै। इस अर्थविषै अनेक दष्टांतनकूं कहैहैं॥ २८४ तहां क्या साधन है? ताकूं दिखावैहैं॥ इहां यह अर्थ है :- अग्निसंयुक्त कठिन सुवर्णके द्रवीभूत हुये टंकणआ- दिक क्षारके डालनेकरि मृदुकरण अरु परस्पर आवयवोंका सम्यक् जोडनेरूप संधान प्रसिद्ध है॥ ६५

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७७० चतुर्थप्रपाठक ४ [छान्दोग्यो- जानश्रुति सत्यकाम उपकोसलादिसंवादसैं वायुआदिव्रह्मोपासन १७ एवमेषां लोकानामासां देवतानाम- स्यास्त्रय्या विद्याया वीर्येण यज्ञस्य वि- अर्थ :- ऐसैं इन लोकनके। इन देवता- ओंके। इस त्रयीविद्याके वीर्यकरि यज्ञके (लवण) कठिनधातुओंविषै मृदुभावका करने- वाला है। सुवर्णकरि अशक्यसंधानवाले रजत (रौप्य)कूं संधानकरै। तैसैं रजतकरि त्रपु (कल्ली)कूं। त्रपुकरि सीसेकूं। सीसाकरि लोहकूं लोहकरि काष्ठकूं अरु चर्मरूप बंधनकरि [बी] काष्ठकूं [लोक संधानकरै है]।। ७ ॥ टीका :- ऐसैं इन लोकनके इन देवता- ओंके इस त्रयीविद्याके रसनामक ओजरूप २८५ रजतकूं सुवर्णकरि संधान करै। यद्यपि रजत स्व रसकरि प्रथम अशक्य संधानवाला है तथापि अग्निके संयो गपूर्वक पूर्वकी न्यांईहीं तिसविषै वी संधान प्रसिद्ध है। ऐसे कहैहैं। इहां रजतकरि। इत्यादिकविषै बी यथोक्त (संधा' नकूँ करै। यह कथन) देखनेकूं योग्य है औ संधानकूं करैट ब्रह्मा । यह शेष है औ भेषजकरि कियेकी न्यांई किया। याका संस्कृत (संस्कारयुक्त किया)। यह अर्थ है।।

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पनिषत् ] सप्तदश खंड १७ ७७१ यज्ञक्षतनिवृत्तिअर्थ ३ व्याहृतिविधान १० रिष्ट संदधाति। भेषजकृतो हवा एष यज्ञो यत्रैवंविद्ह्मा भवति ॥८॥

क्षतकूं संधान करैहै। भेषजकरि कियेकी न्यांई किया प्रसिद्ध यह यज्ञ है। जिसविषै एवंवित् (ऐसा ज्ञाता) ब्रह्मा होवैहै॥l ८॥

वीर्यकरि यज्ञके विरिष्ठ (छिद्र)कूं ब्रह्मा संधान करैहै। जैसैं सुष्टुप्रकरसैं शिक्षाकूं प्राप्त। चिकि- त्सक (वैद्य)के भेषज(औषध)सैं नीरोगकिये रो- गैकैरि पीडत (रोगी) पुरुषकीन्यांईं संस्कृत हो- वैहै।।॥ कौंन यह यज्ञहै कि? जहां कहिये जिस ज्ञविषै एवंवित् कहिये यथोक्त व्याहतिन- करि होमरूप प्रायश्चित्तका वेत्ता ब्रह्मारूप ऋ- त्विक होवैहै। सो यज्ञ है। यह अर्थ है ॥। ८।। २८६ ताहीकूं स्पष्ट करैहैं॥ इहां होवैहै संस्कृत। यह शेष है।।

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७७२ चतुर्थप्रपाठक ४ [छान्दोग्यो- जानश्रुति सत्यकाम उपकोसलादि संवादसैं वायुआदि ब्रह्मोपासन १७ एष ह वा उदकप्रवणो यज्ञो यत्रैवं- विद्रह्मा भवत्येवंविदरह वा एषा ब्रह्मा- णमनु गाथा यतो यत आवर्त्तते तत्त- दच्छति॥९॥ अर्थ :- यह प्रसिद्ध उदकूप्रवण यज्ञ है। जिसविषै एवंवित् ब्रह्मा होवैहै। एवं- वित् ब्रह्माकेप्रति प्रसिद्ध यह अनुगाथा है :- जिस जिसतैं आवर्त्तन करैहै तिस तिसकूं [संधान करताहुया] पालन क- रैहै॥ ९ ॥ टीका :- किवीं :- यह प्रसिद्ध उद्क्प्रवण कहिये उत्तरप्रदेश है निन्न (नीचे) जिसका अरु दक्षिणप्रदेश है उच्छाय (उच्च) जिसका ऐसा यज्ञ होवैहै। अर्थ यह जो :- उत्तरमार्गकी प्रा- प्रिका हेतु है।। जहां (जिस यज्ञविषै) एवंवित् २८७ यातैं बी ऐसैं जाननेवाले ब्रह्माकरि [युक्त] होनेकू योग्य है। ऐसैं कहैहैं॥ इहां गाथाशब्द जो है सो गायत्री आदिक छंदनतैं व्यतिरिक्त छंदनकूं विषय करनेवाला है।

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पनिषत्] सप्तदश खंड १७ ७७३ 8/१FBIPR यज्ञक्षतनिवृत्तिअर्थ ३ व्याहृतिविधान १० मानवो ब्रह्मैवैक ऋत्विकुरूनश्वा- Sभिरक्षत्येवंविद्ध वै ब्रह्मा यजं यजमान अर्थ :- मानव ब्रह्मारूपहीं एक ऋत्विक कर्त्ताओंकूं [पालन करैहै] ॥ [जैसैंः-] अश्वा (घोडी) अभिरक्षण करैहै। [तैसैं :- ] एवंवित् ब्रह्मा यज्ञकूं यजमानकूं औ सर्व (ऐसैं जाननेवाला) ब्रह्मा होवैहै॥ ऐसैं जा- ननेवाले प्रसिद्ध ब्रह्मारूप ऋत्विक्केप्रति यह ब्रह्माकी स्तुतिरूप अनुगाथा है :- जिस जिस प्रदेशतैं कर्मकूं आवर्त्तन करैहै कहिये त्विजोंका यज्ञ क्षतकूं पावताहै तिस तिस यज्ञके क्षतरूपकूं प्रायश्चित्तकरि संधान करता- हुया ब्रह्मा परिपालन करैहै। यह अर्थ है[९] २८८ जिस जिस प्रदेशतैं कर्मकूं आवर्त्तन करैहै। ऐसें उक्त अर्थकूं विवरण करैहैं॥ इहां जिस जिस प्रदेश (स्थल) विषै यज्ञकी क्षति (हानि) अध्वर्युआदिकनकी होतीभई तहां तहां यज्ञके क्षतरूपकूं प्रायश्वचित्तकरि संधान करताहुया ब्रह्मा कर्त्ताओंकूं परिपालन करैहै। ऐसैं संबंध है॥

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७७४ चतुर्थप्रपाठक ४ [छान्दोग्यो- जानश्रुति सत्यकाम उपकोसलादिसंवादसैं वायुआदिव्रह्मोपासन १७ सर्व्वा श्रर्त्विजोऽभिरक्षति। तस्मादेवं- विदमेव ब्रह्माणं कुर्वीत नानेवंविदं नानेवंविदम्॥१०॥ इति छांदोग्योपनिषद् चतुर्थप्रपाठकस्य सप्तदशः खंडः समापः ॥१७॥ ऋत्विजोंकूं निश्र्चयकरि अभिरक्षण करैहै। तातैं एवंवित्कूंहीं ब्रह्मा करें। अनेवंवित्कूं (ऐसैं नहीं जाननेवालेकूं) नहीं। अने- वंवित्कूं नहीं ॥ १०॥ इति श्रीछांदोग्योपनिषदो मूलमात्रभाषादीपि- कायां चतुर्थप्रपाठकस्य सप्तदशः खंडः॥१७॥। मौनके आचरणतैं वा मनतैं ज्ञानवान् होनेतैं २८९

मानव ब्रह्मा है। ता (ज्ञानके य)तैं ब्रह्मारूपहीं एक ऋत्विक कर्ताओंकूं अतिश-

२८९ ब्रह्मारूप ऋत्विक्विषै मानवशब्दकी प्रवृत्तिमैं दो निमित्तकूं कहैहैं॥। इहां ज्ञानका अतिशय तत् (तातैं) श ब्दका अर्थ है औ कर्त्ताओंकूं अभिरक्षण करैहै। ऐसें सं- बंध है।।

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पनिषत्] सप्तदश खंड १७ ७७५ यज्ञक्षतनिवृत्तिअर्थ ३ व्याहृतिविधान १०

[अभिरक्षण करैहै] जैसें अपनेपर आरूढ योद्दा- ओंकूं अश्वा (वडवा) अभिरक्षण करैहै। तैसैं एवंवित् प्रसिद्ध ब्रह्मा यज्ञकूं यजमानकूं स- र्वऋत्विजोंकू तिनके किये दोषके दूरी करनेतैं अभिरक्षण करैहै। जातैं ऐसे गुणकरि विशिष्ट ब्रह्मा विद्वान् है तातैं एवंवितकूंहीं कहिये यथोक्त व्याहृति आदिकके वेत्ताकूं [ यजमान ] ब्रह्मा करै। ऐसैं नहीं जाननेवालेकूं कदाचित् नहीं करै। इति॥ इहां दो अभ्यास अध्यायकी परि- समाप्तिरूप अर्थवाला है ॥ ९॥ १० ॥ इति श्रीछान्दोग्योपनिषद्-भाष्यभाषादीपिकायां चतुर्थ- प्रपाठकस्य सप्तदशः खंड: समाप्रः ॥१७॥ समाप्तेयं चतुर्थप्रपाठकस्य भाष्यभाषादीपिका ॥ ४ ॥

२९० उक्त अर्थकूं दृष्टांतकरि प्रकट करैहैं। २९१ प्रकरणके अर्थकूं उपसंहार करैहैं। इति श्रीछांदोग्योपनिषद्भाष्यभाषादीपिकायां चतुर्थप्रपा- ठकगतसप्तदशखंडस्य टिप्पणं समाप्रम् ॥१७॥ समाप्तेयं चतुर्थप्रपाठकस्य टिप्पणिका॥४॥

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अथ पंचमप्रपाठकाडडरंभ: ५

प्राणके ज्येष्ठताश्रेष्ठतादि अन्नवस्त्र। पंचाशनिविद्या। गतित्रय। वैश्वानरोपास्ति। विद्वदग्निहोत्र २४ अथ श्रीछान्दोग्योपनिषदः पंचमप्रपा- ठकस्य प्रथम: खंडः प्रारभ्यते॥१॥ ॐँ।। यो ह वै ज्येष्ठञ्न श्रेष्ठञ्च वेद अथ श्रीछांदोग्योपनिषदो मूलमात्रभाषादीपिकायाः पंचमप्रपाठकस्य प्रथमः खंडः प्रारभ्यते ॥ १॥ अर्थ :- जोई ज्येष्ठकूं औ श्रेष्ठकूं जानता अथ श्रीछांदोग्योपनिषद्भाष्यभाषादीपिकायाः पंच- मप्रपाठकस्य प्रथम: खंडः प्रारभ्यते ॥ १ ॥ इंद्रियसंवादसैं प्राणकी ज्येष्ठता श्रेष्ठतादि १५ टीका :- सगुण ब्रह्मकी विद्याकी उत्तरा (उ- त्तरायणमार्गरूप) गति कही। अनंतर अब पं.

पंचमप्रपाठकगतप्रथमखंडस्य टिप्पणम् ॥१॥ . १ वृत्त (पूर्व अध्यायके अर्थ)कूं अनुवादकरिके । ताके

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पनिषत् ] प्रथम खंड १ ७७७ इंद्रियसंवादसैं प्राणकी ज्येष्ठता श्रेष्ठतादि ११ ज्येष्ठश्च ह वै श्रेष्ठश्र भवति। प्राणो वाव ज्येष्ठुश्र श्रेषठश्च॥१॥ है [सो] ज्येष्ठ औ श्रेष्ठहीं होवैहै। प्राणहीं ज्येष्ठ औ श्रेष्ठ है॥ १ ॥ चम अध्यायविषै पंचासनिके वेत्ता गृहस्थकी औ श्रद्धालु अरु पंचान्निविद्यातैं अन्य (सगुण) वि- द्याविषै निष्ठावाले ऊर्ध्वरेता (ब्रह्मचारीआदिक) नकी गतिकूं अनुवाद करिके अन्य दक्षिणदि- शाकी संबंधिनी केवल कर्मिनकी धूमादि लक्षण- वाली पुनरावृत्तिरूप गति औ तृतीय तिन (उक्त- दोगतिन)तैं अत्यंत केष्ठरूप संसारकी गति वै- साथि इस पंचम अध्यायकी संगतिकूं कहतेहैं॥ इहां अ- न्यविद्या कहिये पंचाग्निविद्यातैं अतिरक्त सगुणविद्या है औ तिस शीलवाले। याका तिसविषै निष्ठावाले। यह अर्थ है औ तिसीहीं गतिकूं। याका अर्चिआदिलक्षणवाली ग- तिकूं। यह अर्थ है औ तिनतैं कहिये दो गतिनतैं तृतीय (तीसरी) विद्या अरु कर्मसैं रहित पुरुषनकी । यह शेष है॥ २ अनंतर क्रमकरि मुक्तिके संभवतैं उत्तरा (उत्तरायण- मार्गरूप) गति कहनेकूं योग्य है। ऐसैं दक्षिणा (दक्षिणायन-

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७७८ पंचमप्रपाठक ५ [छान्दोग्यो- प्राणज्येष्ठतादिपंचान्निविद्या ३ गति वैश्वानरोपास्ति ज्ञातागनिहोत्र २४ राग्यरूप हेतुतैं कहनेकूं योग्य है। यातैं यह पंचम अध्याय आरंभ करियेहै॥ प्राण वाक्- आदिकनतैं श्रेष्ठ है औ "प्राणहीं संवर्ग है" इत्यादि बहुत करिके अतीत (गत) ग्रंथविषै प्राणका ग्रहण किया। सर्वके साथि मिलिके कार्यकारिताके अविशेष (तुल्यता)के हुये सो मार्गरूप) गति औ तीसरी अतिनिकृष्ट संसाररूपगति क्यूं उ- पदेशकरिये है ? तहां कहैहैं॥ इहां यह अर्थ है :- सगुणब्र- ह्रकी विद्यावाले पुरुषनकी अर्चिआदिरूप गतिकूं कहिके। अव समुच्चित अरु असमुच्चित करमोंके संसाररूप गतिके भे- दरूप फलकूं कहनेकूं यह आरंभ है। ३ कर्मका विधिवी धनसंपत्तिके होते होवैहै औ तिस धनकी संपत्ति ब्राह्मणकूं श्रेष्टताके होतेहीं संभवै है। यातें श्रेष्ठताकी सिद्धिअर्थ पूर्वत्रंथविषै अनुक्तप्राणका उपासन क- हनेकूं योग्य है। इसरीतिसैं अनंतरके (पीछले) ग्रंथकी सं- गतिकूं कहतेहुये प्रसंगकूं करैहैं॥ इहां "प्राण ब्रह्म है" इ- त्यादिवाक्य आदिशब्दका अर्थ है औ उदाहरणकरी अरु नहीं उदाहरणकरी अन्य श्रुतिनके ग्रहण अर्थ चकार (औ शब्द) है। ४ वाक्आदिकनतैं उक्त प्राणकी श्रेष्ठताके तांई पूर्ववादी आक्षेप करै है।। इहां यह अर्थ है :- सर्व वाकुआदिकनके साथि मिलिके प्राणकी कार्यकरताके प्रसिद्ध हुये सोई कैसे

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पनिषत् ] प्रथम खंड १ ७७९ इंद्रियसंवादसैं प्राणकी ज्येष्ठता श्रेष्ठतादि १९ प्राण वाक्आदिकनविषै कैसैं श्रेष्ठ है? औ ताका उपासन कैसैं होवैहै? ऐसी शंकाभई। यातैं ताके श्रेष्ठताआदिक गुणके विधान कर- नेकी इच्छाकरि अनंतर यह आरंभ करियेहैः- जो कोईकबीहीं ज्येष्ठकूं कहिये वयकरि प्र- थमकूं औ श्रेष्ठकूं कहिये गुणोंकरि अधिक- कूं जानताहै। सोई ज्येष्ठ औ श्रेष्ठ हो-

श्रेष्ठ निर्धार करियेहै। तिनके मध्य अन्यतम (एक)कीहीं श्रेष्ठता क्यूं नहीं होवैगी॥ ५ तिस प्राणकीहीं उपास्यताकरि श्रेष्ठताकूं आशंकाक- रिके। वाक्आदिकनके मध्य अन्यतम (एक)की उपास्यताकूं दूरीकरिके प्राणकीहीं उपास्यता नहीं होवैगी हेतुके अभा- वतैं? ऐसैं पूर्ववादी अन्य आक्षेपकूं कहैहै॥ ६ प्राणके श्रेष्ठता औ ज्येष्ठता इत्यादि गुणके विधान अ- रथहीं प्रथम आरंभ करिये है।। ७ प्रथम प्रश्नकूं सिद्धांती परिहार करै हैं॥ इहां प्राण- काहीं उपासन है वाक्आदिकनका नहीं। यह अनंतर आ- रंभ करिये है "अनंतर प्राण उक्रमण करनेकूं इच्छता हुया" इत्यादि याके द्वादश आदिक वाक्यसैं। यह प्रथम पदके कह- नेका अभिप्राय है।। ८ द्वितीय प्रश्नकूं सिद्धांती उद्धार करै हैं॥

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७८० पंचमप्रपाठक ५ [छान्दोग्यो- प्राणज्येष्ठतादिपंचान्निविद्या ३ गति वैश्वानरोपास्ति ज्ञाताग्निहोत्र २४ वैहै।। ऐसैं फेलकरि पुरुषकूं प्रलोभन करिके (लोभ दिखायके) अभिमुखकरिके श्रुति क- हैहैः-प्राणहीं वाकूआदिकनतैं वयकरि ज्येष्ठ (बडा)है। जातैं गर्भमैं स्थित पुरुषविषै वाकू- आदिकनतैं पूर्व लब्धात्मिका (प्राप्तस्वरूप- वाली) प्राणकी वृत्ति होवैहै। जिसकरि गर्भ बढताहै।औ चैक्षुआदिकके स्थानरूप अवयवन- की उत्पत्तिके हुये पीछे वाकूआदिकनकी वृत्तिका लाभ होवेहै। यातैं प्राण वयकरि ज्येष्ठ होवैहै। याकी श्रेष्ठता तो "सुह्य" इत्यादि दृष्टांतकरि ९ कौंन यह ज्येष्टता अरु श्रेष्टतारूप गुणवाला जाननेकूं योग्य है ? यह शंका भई। यातैं कहैहैं। १० वाक्आदिकनतैं प्राणकी ज्येष्ठता काहेतें प्रतीत होवै है। जातैं प्राणसहित सर्व वाक् आदिक साथिहीं गर्भमें स्थित पुरुषविषै स्वतः (आपतैं) वृत्तिके भागी होवै हैं? तहां कहैहैं। ११ तिसविषै गर्भकी विशेषवृद्धिके दर्शनकूं प्रमाण करैहैं। १२ तब वाक्आदिकनकूं वृत्तिका लाभ कब होवै है? तहां कहैहैं॥ १३ प्राणकी प्रतिपादनकरी ज्येष्ठताकूं निगमन करैहैं।

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पनिषत्] प्रथम खंड १ ७८१ इंद्रियसंवादसैं प्राणकी ज्येष्ठता श्रेष्ठतादि ११ यो ह वैवसिष्ठं वेद वसिष्ठो ह स्वा- नां भवति। वाग्वाव वसिष्ठः ॥२ ॥ अर्थः-जोई वसिष्ठकूं जानताहै [सो] स्वजनोंके मध्य वसिष्ठहीं होवैहै। वाक्हीं वसिष्ठ है॥ २ ॥ यह श्रुति आगे प्रतिपादनकरैगी। यातैं इस कार्य कारणके संघातविषै प्राणहीं ज्येष्ठ औ श्रेष्ठ है। १ ॥ टीका :- जोई वसिष्ठकूं कहिये अत्यंत वस- नेवालेकूं (अत्यंत आच्छादन करनेवालेकूं) वा अत्यंतवसुमान्(धनवान)कूं जो जानताहै। सो तैसैंहीं अपनी ज्ञातिनके मध्य वसिष्ठ हो- १४ उपास्यभावकेअर्थ दिखाए दो गुणोंकूं निगमन करैहैं। १५ तिस (उपास्यता)के अर्थ होनेकरिहीं अन्यगुणकूं दिखावै हैं।। इहां वसुमत्तमकूं (अतिशयकरि धनवान्कूं)। याका धनवान होनेतैं अन्योंके निवासके कारणकूं। यह अर्थ है॥ औ तैसैंहीं। याका उपासनाके अनुसारकरि। यह अर्थ है। औ वसिष्ठहीं होवैहै। याका वासयिता (वासक- रावनेवाला) होवै है। यह अर्थ है।। ६६

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७८२ पंचमप्रपाठक ५ [छान्दोग्यो- प्राणज्येष्ठतादिपंचान्निविद्या शगति वैश्वानरोपास्ति ज्ञाताग्निहोत्र २४ यो ह वै प्रतिष्ठां वेद प्रति ह तिष्ठ- त्यस्मिशश्र लोकेऽमुष्मिशश्र। चक्षुर्वा- व प्रतिष्ठा॥ ३ ॥ अर्थ :- जोई प्रतिष्ठाकूं जानता है [सो] इस औ उस लोकविषै प्रतिष्ठितहीं होवैहै। चक्षुहीं प्रतिष्ठा है॥ ३॥ वैहै॥। ॥ कौंन तव वसिष्ठ है? यह कहैहैः- वाक्हीं वसिष्ठ है। आतें वाग्मी (वाचाल) पुरुष वसतेहैं कहिये अन्योंकूं अभिभव (तिर- स्कार) करतेहैं। औ वसुमत्तम हुये [तिसकरि अन्योंकूं वासकरावतेहैं]। यातैं वाक् वसिष्ठ है॥ २ ॥ टीका :- जोई प्रतिष्ठाकूं जानताहै सो इस १७

लोकविषै औ उस (पर) लोकविषै प्रतिष्ठित १६ वाक्के प्रतिष्ठापनैकूं उपपादन (निरूपण) करै हैं। इहां औ वसुमत्तम हुये (अत्यंत धनवान् हुये) तिस धन करि अन्योंकूं निवास करावते हैं। यह शेष है।। १७ चारी ओरतैं ध्यानअर्थ अन्य गुणकूं उपदेश करैहै।

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पनिषत् ] प्रथम खंड १ ७८३ इंद्रियसंवादसैं प्राणकी ज्येष्ठता श्रेष्ठतादि १५ यो ह वै सम्पदं वेद सश्हास्मै का- मा: पद्यन्ते दैवाश्च मानुषाश्च। श्रोत्रं वाव सम्पत्॥४॥ अर्थ :- जोई संपत्कूं जानताहै। इसके अर्थ दैव अरु मानुष काम(भोग) स- म्यक प्राप्त होतेहीं हैं। श्रोत्रहीं संपत् है।।४॥ होवैहै कहिये प्रतिष्ठाकूं पावताहै॥ ॥ कौंन तब प्रतिष्ठा है? यह कहैहैः-चक्षुहीं प्रतिष्ठा है। जातैं चक्षुकरि देखता हुया सम औ दुर्ग (विषम देशकाल)विषै प्रतिष्ठित होवैहै। यातैं चक्षु प्रतिष्ठा है॥ ३॥ टीका :- जोई संपत्कूं जानताहै तिस इ- सकेअर्थ दैव मानुष काम प्राप्त होतेहैं॥॥ कौंन तब संपत् है? यह कहैहैः-श्रोत्रहीं सं- १८ चक्षुके प्रतिष्ठापनैंकूं स्पष्ट करैहैं॥ १९ अन्य गुणकूं कहैहैं।। इहां दैव (देवनकेसंबंधी) काम स्वर्गआदिक हैं वा मानुष्य (मनुष्यनके संबंधी) काम पशु- आदिक हैं॥

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७८४ पंचमग्रपाठक ५ [छान्दोग्यो- प्राणज्येष्ठतादिपंचान्निविद्या श्गति वैश्वानरोपास्ति ज्ञाताग्निहोत्र २४ यो ह वा आयतनं वेदाऽडयतनYह स्वानां भवति। मनो ह वा आयतन- म्॥ ५ ॥ F

अर्थ :- जोई आयतन (आश्रय)कूं जान- 红

ताहै [सो] स्वजनोंका आयतनहीं होवैहै। मनहीं आयतन है ।। ५॥ पत् है। जातें श्रोत्रकरि वेद ग्रहण करियेहैं औ तिनके अर्थका विज्ञान ग्रहण करियेहै। तिसतैं कर्म करिये है। तिसतैं कामोंकी संपत् होवैहै। ऐसैं जातैं है तातैं कामोंकी संपत्तिका हेतु हो नेतैं श्रोत्रहीं संपत् है ।।४ ॥ टीका :- जोई आयतनकूं जानताहै। सो अपने जनोंका आयतन होवैहै। अर्थ यह जो :- आश्रय होवैहै॥ ॥ क्या सो आयतन है? यह कहैहैः-मनहीं आयतन है। काहेतें २० श्रोत्रके संपत्पनैकूं साधते हैं॥ इहां ऐसें जातै है तातैं। ऐसें योजना है। २१ अब अन्य गुणकूं कहैहैं॥

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पनिषत् ] प्रथम खंड ? ७८५ इंद्रियसंवादसैं प्राणकी ज्येष्ठता श्रेष्ठतादि १९ अथ ह प्राणा अहश्श्रेयसि व्यूदि-

अर्थः-अब प्राण (वाक्आदिक) मैं श्रेयविषै हूं। कहिये "मैं श्रेष्ठतर हूं। मैं श्रे- छ्ठतर हूं" ऐसैं विवादकूं करतेभये॥ ६॥

इंद्रियनकरि ग्रहण किये भोक्ताके अर्थवाले प्र- त्ययरूप विषयनका जातैं मन आयतन (आ- श्रय) है। यातैं मनहीं आयतन है। ऐसैं कहा॥ ५ ॥ टीका :- अनंतर प्राण ऐसैं यथोक्त गुणवाले २२ ननु फेर मनका आयतपना (आश्रयपना) कैसैं सिद्ध भया? यातैं कहैहैं॥ २३ यथोक्त गुण मुख्यप्राणगामी है। एक एक वाक् आ- दिकनविषै नहीं होवैहै। ऐसैं कहनेकूं आख्यायिकाकूं प्र- माण करैहैं॥ इहां किसीकूंबी। याका विराट्रूप वा कश्यप आदिकनके मध्य अन्यतम (एक) प्रजापतिकूं। यह अर्थ है औ शरीरका जो पापिष्ठपना है सो पापके कार्यका प्रधान- पना है औ इव (न्यांईके ठिकाने हीं) शब्द जो है सो अवधा- रण (निश्चय)के अर्थ है।

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७८६ पंचमप्रपाठक ५ [छान्दोग्यो- प्राणज्येष्ठतादिपंचान्निविद्या शगति वैश्वानरोपास्ति ज्ञाताग्निहोत्र २४ ते ह प्राणाः प्रजापति पितरमेत्यो- चुर्भगवन्! को नः श्रेष्ठ इति ? तान् हो- वाच यस्मिन् व उक्कान्ते शरीरं पापिष्ठ अर्थ :- वे प्राण प्रजापति पिताके प्रति आयके कहतेभयेः-हे भगवन्! "हमारे मध्य कौंन श्रेष्ठ है" ऐसैं ॥ ॥ तिनकूं [पिता] कहताभयाः-तुहमलारे मध्य जिसके उत्क्रांतहुये शरीर अतिशय पापिष्ठकीन्यांई हुये मैं श्रेयविषै हूं कहिये मैं अत्यंत श्रेष्ठ हूं। मैं अत्यंत श्रेष्ठ हूं। इस प्रयोजनविषै नाना विरुद्ध कहतेभये ॥ ६॥ टीका :- वे प्राण (करण) ऐसैं विवदमान (विवाद करते) हुये आपकी श्रेष्ठताके विज्ञानअर्थ प्रजापतिरूप किसी बी पिता (जनक)के तांई आयके कहतेभयेः-हे भगवन् ! हमारे मध्य कौंन श्रेष्ठ है कहिये गुणोंकरि अधिक है? ऐसैं पूंछतेभये॥ ॥ तिनकूं पिता कह-

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पनिषत् ] प्रथम खंड १ ७८७ इंद्रियसंवादसैं प्राणकी ज्येष्ठता श्रेष्ठतादि १५ तरमिव दृश्येत स वःश्रेष्ठ इति॥७॥ साह वागुचकाम। सा संवत्सरं प्रोष्य दीखै सो तुहारे मध्य श्रेष्ठ है ऐसैं ॥७॥ अर्थः-सो वाक् उत्क्रमण करतीभई। ताभया :- तुह्मारे मध्य जिसके उक्रांत (श- रीरतैं निकसते) हुये यह शरीर जीवतेकाहीं अतिशयकरि पापिष्ठहीं है औ सम्यक् निर्गत प्राणवाला हुया तिसतैं बी अतिशयकरि पा- पिष्ठ हीं देखनेंमैं आवै कहिये शंबरूप अ- स्पृश्य अशुचि देखनेमैं आवै। सो तुहमारे मध्य श्रेष्ठ है। ऐसैं तिनके दुःखकूं हरण करनेकूं इ- च्छताहुया पिता काकु (स्वरभंग)करि कहता- भया । ७॥ टीका :- प्राणोंके पिताकरि तिस प्रकारसैं उक्त २४ उक्तहीं अर्थकूं संक्षेप करिके कहैहैं॥ इहां कुणप। याका त्यक्तप्राण ऐसा शबरूप। यह अर्थ है।। २५ ननु प्रजापति सर्वज्ञ हुया मुख्य प्राणकूंहीं क्यूं श्रेष्ट नहीं कहताहै? तहां कहैहैं॥ इहां यह अर्थ है :- "यह श्रेष्ठ

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७८८ पंचमप्रपाठक ५ [छान्दोग्यो- प्राणज्येष्ठतादिपंचाग्निविद्या शगति वैश्वातरोपास्ति ज्ञाताग्निहोत्र २४ पर्य्येत्योवाच-कथमशकतर्त्ते मज्जीवितु- मिति? यथा कला अवदन्तः प्राणन्तः सो संवत्सर प्रवासकरिके पीछे आयके क- हतीभई :- मुजविना कैसैं जीवनेकूं शक्त होतेभये? ऐसैं ॥ ॥ जैसैंः-कल (मूक) नहीं बोलतेहुये प्राणकरि प्राणनकूं करतेहुये हुये सो वाक उक्कमण करतीभई कहिये श- रीरतैं निकसतीभई। औ सो उक्रमण करिके संवत्सर मात्र परदेशविषै स्थितिरूप प्रवास करिके कहिये स्वव्यापारतैं निवृत्त हुयी। फेर पीछे आयके इतर प्राणोंकूं कहतीभई :- तुह्न मेरेविना जीवनेकूं (अपनेकूं धारण करनेकूं) कैसैं (किस प्रकारसैं) समर्थ होतेभये? ऐसैं ।। ।। तव वे (इतर प्राण) कहतेभयेः-" जैसैं है" ऐसें कहे हुये जो तिन वाकू आदिकनकूं दुःख होवैहे ताकूं परिहार करनेकूं इच्छताहुया प्रजापति स्वरभंगरूप उपायविशेषकरि श्रेष्टकूं कहता भया। स्पष्ट नहीं ॥

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पनिषत् ] प्रथम खंड १ ७८९ इंद्रियसंवादसैं प्राणकी ज्येष्ठता श्रेष्ठतादि १९ प्राणेन पश्यन्तश्रक्षुषा शृण्वन्तः श्रो- त्रेण ध्यायन्तो मनसैवमिति प्रविवेश ह वाक्॥ ८॥ चक्षुकरि देखतेहुये श्रोत्रकरि सुनते हुये मनकरि ध्यावतेहुये [जीवते हैं] [ऐसैं हम जीवतेरहे]।l ॥ ऐसैं [जानिके] वाक प्र- वेशकूं करतीभई ॥८॥ कल" इत्यादि। कहिये कल जे मूक वे जैसैं लोकविषै वाणीकरि नहीं बोलतेहुये जीवते हैं।। ॥ कैसैं किः-प्राणकरि प्राणनकूं क- रतेहुये चक्षुकरि देखतेहुये श्रोत्रकरि सु- नतेहुये मनकरि ध्यावतेहुये। अर्थ यह जो :- ऐसैं सर्व करणोंकी चेष्टाकूं करतेहुये ऐसैं हम जीवते रहे। यह अर्थ है। प्राणोंविषै आ- पकी अश्रेष्ठताकूं जानिके वाक् फेर प्रवेश क- रतीभई। अर्थ यह जो :- स्वव्यापारविषै प्रवृत्त होतीभई ॥८॥

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७९० पंचमप्रपाठक ५ [छान्दोग्यो प्राणज्येष्ठतादिपंचाग्निविद्या शगति वैश्वानरोपास्ति ज्ञाता्निहोत्र २४ चक्षुर्होच्चक्राम। तत्संवत्सरं प्रोष्य प- यर्येत्योवाच-कथमशकतर्त्ते मज्जीवितु- मिति यथाऽन्धा अपश्यन्तः प्राणन्तः प्राणेन वदन्तो वाचा शृण्वन्तः श्रोत्रे- ण ध्यायन्तो मनसैवमिति प्रविवेश ह चक्षु:।९॥ अर्थ :- चक्षु उत्क्रमण करताभया। सो संवत्सर प्रवासकरिके पीछेआयके कहता- भयाः-मुजविना कैसैं जीवनेकूं शक्त होते- भये ? ऐसैं॥ ॥ जैसैं अंध नहीं देख- तेहुये प्राणकरि प्राणनकूं करतेहुये वाक़् करि बोलतेहुये श्रोत्रकरि सुनतेहये मन- करि ध्यावतेहुये [जीवते हैं] ऐसैं [हम जीवतेरहे]।। ॥ ऐसैं [जानिके] चक्षु प्रवेश करताभया॥ ९॥ टीका :- अन्य समान है। चक्षु उक्कमण २६ अन्य। इस पदके विषय(अर्थ)कूं कहैहैं।

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पनिषत् ] प्रथम खंड १ ७९१ इंद्रियसंवादसैं प्राणकी ज्येष्ठता श्रेष्ठतादि ११ श्रोत्र होचक्राम। तत्संवत्सरं प्रोष्य परय्येत्योवाच-कथमशकतर्त्ते मज्जीवितु मिति! यथा बधिरा अशृण्वन्तः प्रा- णन्तः प्राणेन वदन्तो वाचा पश्यन्त- श्रक्षुषा ध्यायन्तो मनसैवमिति प्रवि- वेश ह श्रोत्म् ॥ १०॥ Heen: अर्थ :- श्रोत्र उत्क्रमणकूं करताभया। सो संवत्सर प्रवासकरिके पीछे आयके क- हताभया :- मुजविना कैसैं जीवनेकूं शक्त (समर्थ) होतेभये? ऐसैं॥ ॥जैसैं बधिर नहीं सुनतेहुये प्राणकरि प्राणनकूं करते- हुये वाककरि बोलतेहुये चक्षुकरि देखते- हुये मनकरि ध्यावतेहुये [जीवते हैं] ऐसैं हम [जीवतेरहे]।॥ ऐसैं [जानिके] श्रोत्र प्रवेश करताभया ॥ १ ॥ करताभया। श्रोत्र उक्कमण करताभया। मन उक्रमण करताभया इत्यादि जैसैं बा-

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७९२ पंचमप्रपाठक ५ [छान्दोग्यो- प्राणज्येष्ठतादिपंचाग्निविद्या शगति वैश्वानरोपास्ति ज्ञातागिहोत्र २४ मनो होचक्राम। तत्संवत्सरं प्रोष्य पर्येत्योवाच-कथमशकतर्त्ते मज्जीवितु- मिति? यथा वाला अमनसः प्राणन्तः प्राणेन वदन्तो वाचा पश्यन्तश्रक्षुषा शृण्वन्तः श्रोत्ेणैवमिति प्रविवेश ह मनः ॥११॥ अर्थः-मन उत्क्रमण करताभयाः-सो संवत्सर प्रवासकरिके पीछे आयके कहता- भया :- मुजविना कैसैं जीवनेकूं शक्त होते- भये? ऐसैं॥॥ जैसैं बाल अमन (दृढ म- नसैं रहित) हुये प्राणकरि प्राणनकूं क- रतेहुये वाककरि बोलतेहुये चक्षुकरि दे- खतेहुये श्रोत्रकरि सुनतेहुये [जीवते हैं]। ऐसैं [हम जीवतेरहे]।।॥ ऐसे [जानिके] मन प्रवेश करताभया ॥११॥ लक अमन हुये। याका अँप्ररूढ (अदृढ) मं २७ बालकनकूंबी बाहिर भीतरके इंद्रियवानपनैके अवि-

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पनिषत् ] प्रथम खंड १ ७९३ इंद्रियसंवादसैं प्राणकी ज्येष्ठता श्रेष्ठतादि १५ अथ ह प्राण उचिक्रमिषन् स य- था सुहय: पड्डीशशंकून् संखिदेदेवमि- अर्थः-अनंतर सो प्राण उत्क्रमण क- रनेकूं इच्छताहुया। जैसैं सुहय (श्रेष्ठ अश्व) पादबंधनके कीलोंकूं उखाडे। ऐसैं इतर प्राणोंकूं उखाडताभया।। ॥

नवाले हुये। यह अर्थ है ॥ ९ ॥ १० ॥ ११ ॥ टीका :- ऐसैं वाक् आदिकनके परीक्षित हुये अनंतर सो मुख्य प्राण उत्क्रमण करनेकूं इ- च्छता हुया क्या करताभया? यह कहियेहैः- शेष (तुल्यता)तैं वालक मनरहित हैं ऐसा बालकनका विशे- षण कैसैं संभवै? यातैं कहैहैं॥ इहां परीक्षित हुये। याका श्रेष्ठतारहित निरूपण करिके निश्चित हुये। यह अर्थ है।। २८ पदन (गमन करनेरूप) स्वभाववाले पाद हैं ति- नक़ी जो संहति (समूह) सो पड्टि कहियेहै ताके ईश कहिये नियामक (रोधक) ऐसे जे शंकु कहिये पादबंधनके कीलक (खूंटे) वे पड़ीशशंकु कहियेहैं। इहां वर्णलोप जो है सो छांदस है।। तिन यथोक्त कीलनकूं अश्व एकदम जैसैं उखा- डता है। ऐसें ृष्टांतकूं कहिके दार्ष्टीतिककूं कहैहैं॥ ६७

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७९४ पंचमप्रपाठक ५ [ छान्दोग्यो- प्राणज्येष्ठतादि पंचाग्निविद्या शगति वैश्वानरोपास्ति ज्ञाताग्निहोत्र २४ तरान् प्राणान् समखिदत्त हाभिसमे- त्योचुर्भगवन्नेधि त्वन्नः श्रेष्ठोऽसि मोत्क- मीरिति॥१२॥ [तब वे वाक् आदिक] आयके ता (मुख्य प्राण)केप्रति कहतेभयेः-हे भगवन्! वृद्धि- कूं पाव। तूं हमारे मध्य श्रेष्ठ हैं। उत्क्र- मणकूं मतिकर ऐसैं ॥ १२ ॥ जैसैं लोकविषै सुह्य कहिये शोभन अश्व प- रीक्षा करनेअर्थ आरूढ (ऊपर चढे पुरुष) करि चाबुकसैं हत हुया पादबंधनके कीलन (खूं- टन)कूं सम्यक उखाडताहै। ऐसैं इतर वाक् आदिक प्राणोंकूं सम्यक् उखाडताभया। वे प्राण सम्यक् चलित हुये स्वस्थानविषै स्थित होनेकूं उत्साहरहित हुये इकट्ठे होयके तिस मुख्य प्राणकूं कहतेभयेः-हे भगवन्! ट द्विकूं प्राप्त हो। जातें हमारा स्वामी तूं हमारे

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पनिषत् ] प्रथम खंड १ ७९५ इंद्रियसंवादसैं प्राणकी ज्येष्ठता श्रेष्ठतादि १९ अथ हैनं वागुवाच-यदहं वसिष्ठो- डस्मि त्वं तद्सिष्ठोऽसीत्यथ हैनं चक्षुरु वाच-यदहं प्रतिष्ठाऽस्मि त्वं तत्प्रति- ष्ठोऽसीति॥१३ ॥ अर्थ :- अनंतर इसकूं वाक् कहतीभ- ई :- मैं वसिष्ठ हूं जो सो तूं वसिष्ठ (वसि- ष्ठतारूप गुणवाला) हैं ऐसैं ॥ ॥ अनं- तर इसकूं चक्षु कहताभया :- मैं प्रतिष्ठाहूं जो सो तूं प्रतिष्ठा (प्रतिष्ठारूप गुणवाला) हैं ऐसैं ॥ १३ ॥ मध्य श्रेष्ठ हैं यातैं इस देहतैं उत्क्रमणकूं म- तिकर ऐसैं ॥ १२ ॥ टीका :- अैनंतर वाक्आदिक प्राणकी श्रे छताकूं कार्यकरि संपादन करतेहुये राजाकेअर्थ २९ मुज प्राणविषै तुम वाक्आदिकनकूं श्रेष्ठताकी वुद्धि है। यह कैसैं जाननेकूं शक्य है? यह आशंकाकरिके कहैहैं॥

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७९६ पंचमप्रपाठक ५ [छान्दोग्यो- प्राणज्येष्ठतादि पंचान्निविद्या शगति वैश्वानरोपास्ति ज्ञातान्निहोत्र २४ अथहैन श्रोत्रमुवाच-यदह स- म्पदस्मि त्वं तत्सम्पदसीत्यथ हैनं मन अर्थ :- अनंतर इसकूं श्रोत्र कहताभ- या :- मैं संपत् हूं जो सो तूं संपत् (संपत्रूप गुणवाला) हैं ऐसैं ॥ ॥ अनंतर इसकूं बलि (कर)कूं देनेवाले वैश्यन (प्रजाओं)की- न्यांईं इस मुख्य प्राणकूं कहतेभये ॥ ॥ कै- ३०

सैंकि :- चाक् प्रथम कहतीभई :- जो मैं व- सिष्ठ हूं [इहां यत् कहिये जो। यह जो पद है। सो क्रियाका विशेषण है] अर्थ यह जो :- जो मैं वसिष्ठेपनैरूप गुणवालीहूं। तूं तद्रसिष्ठ ३१

हैं कहिये तिस वसिष्ठपनैरूपगुणकरि तूं तद्व

३० वचनकूं प्रश्नपूर्वक प्रकट करैहैं। ३१ क्रियाकी विशेषणताकूंहीं स्पष्ट करैहैं ॥ इहां वसिष्ठ- तारूप गुणकरि मैं वाक् गुणवाली हूं। ऐसा जो है सो तूंही हैं। ऐसें योजना है।। ३२ अनंतरके वाक्यकूं ग्रहणकरिके व्याख्यान करैहैं॥

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पनिषत्] प्रथम खंड १ ७९७ इंद्रियसंवादसैं प्राणकी ज्येष्ठता श्रेष्ठतादि १९

उवाच-यदहमायतनमस्मि त्वं तदाय- यतनमसीति॥१४॥ मन कहताभयाः-मैं आयतन हूं जो सो तूं आयतन (आयतनरूप गुणवाला) हैं ऐसैं ॥ १४॥ सिष्ठ हैं। अर्थ यह जो :- तिस गुणवाला हैं॥. अथवा तत् (सो) शब्द बी [यत् (जो) श- ब्दकीन्यांईं] क्रियाका विशेषणहीं है। अर्थ यह जो :- तेरौकिया तेरा यह वसिष्ठतारूप गुण अ- ज्ञानतैं "मेरा है" ऐसैं मैनैं मान्या है। तैसैं ३५

३३ "तद्वसिष्ठ हैं" ऐसैं समस्त (तृतीयातत्पुरुष समास- करियुक्त) पदकूं ग्रहणकरिके ताका व्याख्यानकरिके। अब अन्यपक्ष (तत्पदके अन्यअर्थ)कूं कहैहैं॥ इहां यत् (जो) श- ब्दकी न्यांई। ऐसा अपि (बी) शब्दका अर्थ है।। ३४ मैं वसिष्ठपनैरूप गुणवाली हूं। ऐसा जो है सो तूंहीं वसिष्ठपनैरूप गुणवाला हैं। ऐसैं अबी तुजकरि क्यूं कहिये है। जातैं पूर्व तेरा अन्यथा अभिधान (कथन) होता- अया ! यह आशंकाकरिके वाक् इंद्रिय कहैहै।। ३५ वाक्विषै दिखाये न्यायकूं चक्षुआदिकनविषै अ- तिदेश (जाननेकी आज्ञाका विषय(करैहैं॥

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७९८ पंचमप्रपाठक ५ [छान्दोग्यो- प्राणज्येष्ठतादि पंचाग्निविद्या ३ गति वैश्वानरोपास्ति ज्ञाताग्निहोत्र २४ न वै वाचो न चक्षुषि न श्रोत्राणि अर्थ :- नहीं वाक्। न चक्षु। न श्रोत्र। पीछले चक्षु श्रोत्र अरु मनविषै जोडनेकूं योग्य है। १३ ॥ १४ ॥ टीका :- श्रुंतिका यह वचन है :- वाक्आदि- कोंनें मुख्य प्राणके प्रति जो कहा यह युँक्त -T ३६ वाक्आदिकके वचनतैं उत्थान करिके वाक्आदि- ककी प्राण अधीनताकूं श्रुतिहीं कथन करैहै। ऐसैं "नहीं वाक् [ऐसे कहते हैं]" इत्यादि वाक्यरूप उत्तरवाक्यके ता- त्पर्यकूं कहैहैं॥ ३७ तिसीहीं वाक्यकूं सामग्रीसहित व्याख्यान करैहैं। इहां यह अर्थ है :- जब सर्वहीं करण (इंद्रिय) वाक्के अधीन होवें तब "वाक्" ऐसैंहीं तिन इंद्रियनकूं जन कहैं॥ औ जब चक्षुके अधीन होवें तव सर्वकूंहीं "चक्षु" ऐसें कहैं। औ ऐसैं कहते नहीं किंतु "प्राण" ऐसें तिन सर्व करणोंकूं प्राणनामकरि कहते हैं। तातैं करणोंकी प्राणपरतंत्रता (प्रा- णपराधीनता) सिद्ध है। औ वाकूआदिकोंनें कहा कि :- "तूं तद्वसिष्ठ (तिस वसिष्टपनैरूप गुणकरि युक्त) हैं" इ- त्यादि यथोक्त गुणवाले प्राणकाहीं ध्येयपना है। यह प्रकरण का अर्थ है।। औ इहां साक्षात् उपसंहारके अदर्शनतैं भा- व्यकारनैं श्रुति तिस प्रकरणके अर्थकूं उपसंहारकरनेकूं इ्- चछती है। ऐसें कहा॥

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पनिषत् ] प्रथम खंड १ ७९९ इंद्रियसंवादसैं प्राणकी ज्येष्ठता श्रेष्ठतादि १५ न मना श्सीत्याचक्षते। प्राणा इत्येवाच- क्षते। प्राणो ह्येवैतानि सर्वाणि भवति १५ इति श्रीछान्दोग्योपनिषदि पंचमप्रपाठकस्य प्रथमः खण्डः समाप्ः ॥१॥ न मन। ऐसैं [इन इंद्रियनकूं लोक] कह- तेहैं [किंतु]।"प्राण" ऐसैंहीं कहतेहैं। जातैं प्राणहीं इन सर्वके तांई होवैहै॥१५॥ इति श्री०मूलभाषा०पंचमप्रपा०प्रथमःखंड:।।१।। है।। जातैं लोकविषै लौकिकजन वा शास्त्रज्ञ- जन वाक्आदिक करणोंकूं वाणियां नहीं। [कहते] चक्षु नहीं। मन ऐसैं नहीं कहते हैं किंतु। "प्राणहीं हैं" ऐसैं कहतेहैं। जातैं प्राणहीं इन सर्व वाक्आदिककरणोंके समूहोंकेप्रति होवैहै। यातैं मुख्य प्राणके प्रति वाक्आदिकोंनैं अनुरूप हीं कहा। ऐसैं श्रुति प्रकरणके अर्थकूं उपसंहार करनेकूं इच्छती है

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८०० पंचमप्रपाठक ५ [छान्दोग्यो प्राणज्येष्ठतादि पंचाग्निविद्या शगति वैश्वानरोपास्ति ज्ञातामनिहोत्र २४ ।। ॥ नैतु चेतनवाले पुरुषनकीन्यांईं "मैं श्रे- ष्ठताकेअर्थ हूं" ऐसें विवादकूं करतेहुये करण प- रस्पर स्पर्द्धांकूं करतेभये। यह कैसें युक्त होवै। जातैं चक्षुआदिकनका वाकूकूं निषेध करिके (छोडिके) प्रत्येकका वदन (संभाषण) नहीं संभवै है। तैसें देहतें निर्गमन फेर प्रवेश वा ब्रह्माके प्रति गमन अरु प्राणोंकी स्तुति नहीं संभवैहै? तहां सिद्धांती कहैहैं किः-वाकूआ- ३८ आख्यायिकाके यथाश्रुत अर्थके तांई पूर्ववादी आ-१ क्षेप करैहै। इहां यह अर्थ है :- जैसे चेतनावाले पुरुष वि- वादकूं करतेहुये स्पर्धाकूं करते हैं। तैसें अचेतन जे वाकू आदिक वे अपनी श्रेष्टताकी सिद्धिअर्थ विवादकूं करतेडुये परस्पर स्पर्धाकूं करतेभये। यह कथन युक्त नहीं है। का हेतैं अचेतनोंविषै स्पर्धाआदिकके अदर्शनतैं॥ ३९ किंवा :- वाणीतें भिन्न इंद्रियनका परस्पर वचनही अनुचित है। काहेतैं वचनकूं वाकूका व्यापार होनेतें। ऐसे पूर्ववादी कहैहै॥। ४० किंवा :- वाक्आदिकनका देहतैं अपसर्पण (निकस- जाना) आदिक अयुक्त है। काहेतैं तिनकूं अचेतन (जड) होनेतें ? ऐसें पूर्ववादी कहैहै॥ इहां वा शब्द "नहीं" इस पूर्व उक्तपदके अनुकर्षण (खीचनैं) अर्थ है।। ४१ अग्नि आदिक चेतनावालियां जे देवता हैं तिनकार

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पनिषत्] प्रथम खंड १ ८०१ इंद्रियसंवादसैं प्राणकी ज्येष्ठता श्रेष्ठतादि ११ दिकनकूं अननिआदिक चेतनावाले देवताओं करि अधिष्ठित होनेतैं वाकूआदिकनका चेतना- वान्पना प्रथम आगम (श्रुति)तैं सिद्ध है।।।। ननु एक देहविषै अनेक चेतनावान्ताके हुये तो- र्किकोंके मतका विरोध होवैगा? ऐसें जो कहै। सो बनै नहीं :- काहेतैं॥ ईश्वरकी निमित्तकार- ४३

अधिष्ठित होनेतैं तादात्म्यके अभिप्रायकरि वाक्आदिकनके चेतनावानूपनैके संभवतैं तिनका वदन (वचन) आदिक व्य- वहार संभवै है। यातैं "अभ्नि वाक् होयके मुखकेप्रति प्रवेश करता भया" इत्यादि श्रुतिकूं अनुसरिके सिद्धांती उत्तरकूं कहैहैं॥ ४२ ननु एक देहविषै अनेक चेतनावानोंके बलात्कार- करि विरुद्ध अनेक अभिप्रायोंका अनुसारी होनेकरि देहके उन्मथनके प्रसंगतैं वा क्रियारहितताके प्रसंगतैं एक देहका अनेक चेतनोंकरि अधिष्ठित (आश्रित)पना नहीं संभवै है? ऐसें पूर्ववादी शंका करैहै।। ४३ क्या एक शरीर अनेक चेतनोंकरि अधिष्ठित नहीं होवै है ? किंवाः-तिन अनेक चेतनोंकरि निर्णीत कर्त्ता भो- क्ताकरि अधिष्ठित नहीं होवै है ? ऐसैं विकल्पकरिके प्रथम विकल्पिके प्रति सिद्धांती दूषण देते हैं॥ इहां यह अर्थ है :- जातैं पर (तार्तिक)के मतविषै जीवकररि अधिष्ठितहीं श- रीरका [जीवनकीन्यांई सर्व अल्प पदार्थनके साथि संयोगी

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पंचमप्रपाठक ५ [छान्दोग्यो- प्राणज्येष्ठतादि पंचाशनिविद्या ३ गति वैश्वानरोपास्ति ज्ञाताननिहोत्र २४ णताके अंगीकारतैं॥ जे तार्किक प्रथम ईश्व- रकूं अंगीकार करतेहैं वे ईश्वरकरि अधिष्ठितहीं आध्यात्मिक मनआदिक कार्य करणोंकी औ बाह्य पृथिवीआदिकनकी नियमकरि प्रवृत्तिकूं इच्छते (मानते) हैं। रथेआदिककीन्यांई। औ हैमोंकरि अगनिआदिक चेतनावाली बी दे- वता अध्यात्मरूप भोक्री (भोगकी करनेवाली) नहीं अंगीकारकरिये हैं॥ तैब क्या कि ? कार्य होनेकरि व्यापक] ईश्वरकरि अधिष्ठितपना है॥ तैसैं माने हुये एक शरीर अनेक चेतनोंकरि अधिष्ठित (आश्रित) नहीं होवैहै। ऐसी सेश्वरवादीनकी शंका नहीं है।। ४४ संग्रहरूप (संक्षिप्त) वाक्यकूं सिद्धांती विवरण करैहें। ४५ चेतनकरि अधिष्टित अचेतनोंकीहीं प्रवृत्ति होवैहै। इस अर्थविषै सिद्धांती दष्टांतकूं कहैहैं। ४६ द्वितीय विकल्पकेप्रति सिद्धांती कहैहैं॥ ४७ ननु तब कार्य (देह) अरु करण (इंद्रिय आदिक) नकी अधिष्ठातादेवता जे हैं। तिन देवताओंके कार्य अरु कर- णोंकी क्या अन्य अधिष्ठाता देवता हैं? ऐसें पूर्ववादी पूं- छता है।। ४८ देवताके कार्य अरु करणोंकी अन्य अधिष्ठाता देवता

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पनिषत् ] प्रथम खंड १ ८०३ इंद्रियसंवादसैं प्राणकी ज्येष्ठता श्रेष्ठतादि १५ करणवाली अरु प्रीणरूप एक देवताके भेदस्व- रूप अरु अध्यात्म अधिभूत अधिदैवतके भे- दनकी कोटिनकरि विकल्पवाली तिन देवता- ओंका अैध्यक्षतामात्रकरि नियंता ईश्वर अंगी- कार करियेहै। सो ईश्वर जातैं करणरहित है। २

"सो पौणिपादरहित हुया वेगवान् अरु ग्रहण- जब इष्ट होवैं तब अनवस्था होवैगी? ऐसैं माननेवाले पूर्व- वादीके प्रति सिद्धांती प्रत्युत्तर कहते हैं। ४९ शाकल्यब्राह्मणकूं अनुसरिके कहैहैं।। ५० ननु बहुत देवता हैं। तिनकूं प्राणरूप एक देवताके भेदरूपवान्पना कैसैं है? यातैं कहैहैं॥ इहां अध्यात्म अधि- भूत अरु अधिदैवनके भेदनकी कोटिनकरि विकल्प है जि- नका ऐसें विग्रह है।। ५१ ईश्वरके नियंतापनैकरि किये व्यापारवानपनैकूं नि- वारण करनेकूं विशेषण देते हैं॥ ५२ अब ईश्वरकूंबी नियंता होनेतैं देवताओंकी न्यांई कार्यकारणवानूपना होवैगा ? ऐसें जो कहै। सो बनै नहीं। ऐसें कहैहैं।। इहां ईश्वरका अकरणपना (इंद्रियरूप करणोंसें रहितपना) जो है। सो अकार्यपनैका (देहरूपकार्यरहितप- नैका) उपलक्षण है। ५३ तहां श्रुतिकूं प्रमाण करैहैं॥ इहां आदिपदकरि "ताका कार्य औ करण नहीं है" इत्यादि मंत्ररूप वाक्य ग्रहण किया॥

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८०४ पंचमप्रपाठक ५ [छान्दोग्यो- प्राणज्येष्ठतादि पंचान्निविद्या श्गति वैश्वानरोपास्ति ज्ञाताग्निहोत्र २४ का कर्ता है। चक्षुरहित हुया देखताहै। कर्ण- रहितहुया सुनता है" इत्यादिमंत्ररूप वाक्यतैं औ "जायमान हिरेण्यगर्भकूं देखो। पूर्व हिर- णयगर्भकूं उपजावताभया" इत्यादि श्वेताश्व- तरशाखावाले पठन करतेहैं। यातैं देहविषै कर्मफलका संबंधी तिन (देवता अरु ईश्वर)तैं विलक्षण जीव भोक्ता है। ऐसैं हम कहतेहैं॥ औ इहां वौंक् आदिकनका संवाद जो है। सो विद्वानकूं अन्वय अरु व्यतिरेककरि प्राणकी श्रे- ५४ सूत्रात्मा हिरण्यगर्भ है औ सो एक समष्टिरूप दे- चता है। ताकी अवस्थाके मेदरूप अनेकदेवताओंका ईश्वर नियंता है। ऐसें कहा। इसविषै प्रमाणकूं कहैहैं॥ इहां आदिपदकरि "आगे हिरण्यगर्भ सम्यक् वर्त्तताभया" इत्या- दिवाक्य ग्रहण करिये है॥ ५५ देवताओंके औ ईश्वरके इस देहविषै भोक्तापनैके अ- भावके हुये किसका भोक्तापना है? यातैं कहैहैं॥इहां तिनतैं वि- लक्षण। याका देवता अरुईश्वरतैं व्यावृत्त (भिन्न)। यह अर्थ है॥ ५६ वाक्आदिक शब्दनके वाच्य चेतनावाली देवता हैं। ऐसें स्वीकारकरिके आख्यायिकाके स्वार्थ (वाच्यार्थ)की सिद्धि अर्थ कहा। अब ता (आख्यायिका)के तात्पर्यकूं कहैहैं। ५७ कल्पनाके प्रयोजनकूं कहैहैं॥

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पनिषत् ] प्रथम खंड १ ८०५ इंद्रियसंवादसैं प्राणकी ज्येष्ठता श्रेष्ठतादि ११

छ्ठताके निर्धारण अर्थ कल्पित है॥ जैसैं लोक- विषै पुरुष आपकी श्रेष्ठताकेअर्थ परस्पर विवा- दकूं करते हुये। किसीबी गुणविशेषके अभि- ज्ञकूं पूंछते हैं :- हमारे मध्य गुणोंकरि कौंन श्रेष्ठ है? ऐसैं॥ तिसकरि उक्त हुये कहिये अनुक्र- मसैं होयके जैसैं होवै तैसैं इस कार्यकूं साधनेकूं उद्योग करहू। जिसकरि यह कार्य साधियेहै सो तुहारे मध्य श्रेष्ठ है। ऐसैं उक्त हुये। तैसैंहीं उद्योग करतेहुये आपकी वा अन्य- की श्रेष्ठताकूं निर्धार करतेहैं॥ तैसैं श्रुति वाक्- आदिकनविषै इस संव्यवहारकूं कल्पना करती- भई। ॥ विद्वान प्राणकी श्रेषठताकूं कैसैं नि श्रय करैगा किः-वौक्आदिकनके मध्य एक ए- कके अभावके हुयेबी जीवन देख्या है। परंतु ५८ यथोक्त कल्पनाकूं दृष्टांतकरि स्पष्ट करैहैं॥ ५९ तिसकरि उक्त हुये। ऐसैं उक्तकूंहीं स्पष्ट करैहैं॥ ६० विद्वान्कूं। इत्यादिकरि उक्त प्रयोजनकूं प्रकट करैहैं॥ इहां विद्वान् प्राणकी श्रेष्ठताकू कैसैं निश्चय करैगा। ऐसें संबंध है।। ६१ प्रतिपत्ति (निश्चय)के प्रकारकूं संक्षेपकरि कहैहैं॥ इहां फलवती कल्पना है। यह शेष है।। ६८

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८०६ पंचमप्रपाठक ५ [छान्दोग्यो- प्राणज्येष्ठतादि पंचान्निविद्या शगति वैश्वानरोपास्ति ज्ञातागिहोत्र२४ प्राणके अभाव हुये जीवन देख्या नहीं। ऐसैं [विद्वान् प्राणकी श्रेष्ठताकूं निश्रय करैगा॥ यातैं यह कल्पना फलवती है]। तिसप्रकारसैं कौ- षीतकि शाखावाले ब्राह्मणोंकी श्रुति है :- "वाकू- रहित जीवताहै जातें हम मूकनकूं देखतेहैं। चक्षुरहित हुया जीवता है जातैं अंधनकूं दे- खतेहैं। श्रोत्ररहित हुया जीवताहै जातैं ब- धिरनकूं देखतेहैं। मनरहित हुया जीवताहै जातैं बालकनकूं देखतेहैं बाहुछिन्न (हूंठा) जी- वताहै। उरच्छिन्न (पंगु) जीवताहै" इत्यादि- रूप ॥ १५॥ इति श्रीछान्दोग्योपनिषद् भाष्यभाषादीपिकायां पंचमप्रपाठकस्य प्रथमः खंडः समाप्तः ॥१॥ ६२ दृष्ट अर्थविषैवी अनुग्राहक होनेकरि श्रुतिकूं दि खावै हैं।। इति श्री० भाष्यभाषा०पंचमप्रपाठ०प्रथमखंडस्य टिप्पणम्१

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पनिषत् ] द्वितीय खंड २ ८०७ प्राणके अन्नवस्त्रका उपासन ८ अथ पंचमप्रपाठकस्य द्वितीय: खंड: २ स होवाच-किं मेऽन्नं भविष्यतीति!

अथ श्री०मूलभाषा०पंचमप्रपाठ० द्वितीयः खंडः॥ २॥ अर्थ :- सो (मुख्य प्राण) कहताभयाः- मेरा क्या अन्न होवैगा? ऐसैं॥ ॥ जो

अथ श्री०भाष्यभाषा०पंचमप्रपा०द्वितीयः खंडः ॥ २ ॥ प्राणके अन्नवस्त्रका उपासन ८ टीका :- सो मुख्यप्राण कहताभयाः-"क्या मेरा अन्न होवैगा"? ऐसैं ॥ ॥I इहां श्रुति मुख्य प्राणकूं प्रष्टा (पूंछनेवाले)की न्यांईं क-

अथ श्री० पंचमप्रपाठ० द्वितीयखंडस्य टिप्पणम्२ ६३ वाकूआदिकनका स्वामी श्रेष्ठताआदिक गुणवाला प्राण मैं हूं। ऐसैं जान॥ इसरीतिसैं प्रधान विद्याकूं उपदेश करिके तिस दर्शनकी अंगभूत जो प्राणके अन्न अरु वस्त्रकी दृष्टि है ताके विधानअर्थ आरंभविषै प्रथम अन्नकी दृष्टिकूं विधान करनेकूं प्रसंगकूं करते हैं॥ ६४ इहां मुख्य प्राणका प्रष्ठापना औ वाक्आदिकनका प्रतिवक्तापना काल्पनिक (कल्पनाकरि किया) है। ऐसैं क- हैहैं। इहां "जो यह" ऐसैं उक्तहीं जो यत् (जो) पद है सो

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८०८ पंचमप्रपाठक ५ [छान्दोग्यो- प्राणज्येष्ठतादि पंचास्निविद्या शगति वैश्वानरोपास्ति ज्ञाताग्निहोत्र २४ यत्किश्चिदिदमाश्वभ्य आशकुनिभ्य इति होचुस्तद्ा एतदनस्यान्नमनो ह कछक यह श्वानोंकरि सहित अरु पक्षि- योंकरि सहित है [सो तेरा अन्न है]। ऐसैं कहतेभये॥ ॥ सो यह अन (प्राण) का अन्न है। अन्नहीं प्रत्यक्ष नाम है। ऐसैं ल्पना करिके वाकूआदिकनकूं प्रतिवक्ता (उत्त- रके देनेवाले)की न्यांईं कल्पती हुयी कहैहै :- जो यह किंचित् लोकविषै प्रसिद्ध अन्नका समूह श्वानोंकरि सहित अरु शकुनीओं (पक्षियों)करि सहित सर्व प्राणिनका जो अन्न है सो तेरा (प्राणका) अन्न है। ऐसैं वाक्आ- दिक कहतेभये॥ । प्रीणका सर्व अन्न है। प्राण सर्व अन्नका अत्ता (भोक्ता) है। इस प्र- वाक्यार्थकी कल्पना अर्थ "जो अन्न है" इस ठिकानें अ. नुवाद करिये है।। ६५ "सोई यह" इत्यादि उत्तरवाक्यके पूर्ववाक्यतैं अर्थ- भेदके अभावकूं आशंकाकरिके कहैहैं।

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पनिषत् ] द्वितीय खंड २ ८०९ प्राणके अन्नवस्त्रका उपासन८णा वै नाम प्रत्यक्षं। न ह वा एवंविदि किश्च- नानन्नं भवतीति॥१॥ जाननेवालेविषै कछुबी अनन्न (अभक्ष्य) नहीं होवैहै ऐसैं [श्रुति कहतीभई]॥१॥ कारके निश्चयअर्थ कल्पितआखव्यायिकारूपतैं निवृत्त होयके अपनें श्रुतिरूपसैं कहैहैः-सो प्रसिद्ध यह जो कछक अन्न लोकविषै प्राणि- नकरि भक्षण करियेहै सो प्राणका अन्न है। अर्थ यह जो :- सो प्राणकरिहीं भक्षण करिये है।। सर्व प्रकारकी चेष्टाकरि प्राणके व्याप्तिरूप गुणके दिखावनेअर्थ प्राणका "अन" ऐसा प्र- त्यक्ष नाम है। जातैं प्रआदिक उपसर्ग पूर्व- ६६ इहां प्राणशब्दकूं छोडिके "अन" शब्दके प्रयोगविषै तात्पर्यकूं कहैहैं॥ इहां यह अर्थ है :- "अन । चेष्टाविषै है" ऐसें धातुतैं जन्य अन शब्दका ग्रहण जो है सो सर्व प्रका- रकी चेष्टाकरि प्राणके व्याप्तिरूप गुणके दिखावनेअर्थ है। तैसैं हुये जो कोइबी दहन करताहै शोषण करताहै वा प- वन (कूदन) करता है सो सर्वबी प्राणहीं है। ऐसैं प्राणका "अन" ऐसा नाम युक्त है औ इधर जो प्रत्यक्ष शब्द है। ताका पूर्वउक्त धातुतैं जन्मवाला नाम है। यह अर्थ है॥ ६७ उक्त अर्थकूंहीं समर्थन करै हैं॥ इहां अन शब्दका।

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८१० पंचमप्रपाठक ५ [छान्दोग्यो- प्राणज्येष्ठतादि पंचास्निविद्या श्गति वैश्वानरोपास्ति ज्ञाताग्निहोत्र २४ कताके हुये अन शब्दकी विशेषगतिहीं (प्राण ऐसा-रूप) होवैहै॥ तैसैं हुये "अन" ऐसा यह प्रत्यक्ष नाम जो है। सो सैर्व अन्नोंके अ- त्ताके नामका ग्रहण है।।कहिये यह सर्व अन्नोंके अत्ताका साक्षात् अभिधान (नाम) है॥ ऐसैं जाननेवालेविषै कहिये "सर्व भूतनविषै स्थित अरु सर्व अन्नोंका अत्ता प्राण मैं हूं" ऐसैं जा- ननेवाले तिस यथोक्त प्राणके वेत्ताविषै। कछु बी सर्व प्राणिनकरि भक्ष्य जो है सो अनन्न (अभक्ष्य) नहीं होवैहै। अर्थ यह जो :- ऐसैं जा- ननेवालेविषै सर्व अन्न होवैहै। काहेतैं विद्वान्कूं यह शेष है। औ प्राणकूं सर्वचेष्टाकी प्राप्ति। यह एवकारका अर्थ नहीं है। औ तैसैं हुये याका प्राणआदिक शब्दके ग्रह- णविषै विशेषव्याप्तिहीं है ऐसें स्थित हुये। यह अर्थ है औ "अन" ऐसा प्रत्यक्ष यह नाम सर्व अन्नोंके अत्ताके नामका ग्रहण है। ऐसें संबंध है।। ६८ ताहींकूं व्याख्यान करैहैं। ६९ ननु तातैं प्राण शब्दकेअर्थ प्राणके वेत्ताका जब सरवे अन्न है तव ताके वेत्ताकूं भक्ष्य अभक्ष्यके विभागकी असि- द्धिकेहुये तिस (उक्तविभागरूप) विषयवाला शास्त्र विरोधकू पावैगा? यह आशंकाकरिके। विद्धान्के आध्यात्मिक (व्यष्टि-

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पनिषत् ] द्वितीय खंड २ ८११ प्राणके अन्नवस्त्रका उपासन ८ स होवाच-किं मे वासो भविष्यती- अर्थः-सो (प्राण) कहताभयाः-मेरा क्या वस्त्र होवैगा? ऐसैं॥ ॥जल" ऐसैं प्राणभूत होनेतैं औ "प्राणतैंहीं यह (सूर्य) उ- दित होवैहै अरु प्राणविषै अस्तकूं पावताहै" ऐसैं उपक्रम करिके "ऐसैं जाननेवालेतैंहीं सूर्य उदित होवैहै अरु ऐसैं जाननेवालेविषै अस्तकूं पावताहै" इस अन्य श्रुतितैं॥ १ ॥ टीका :- सो प्राण फेर कहताभयाः-पूर्वकी ७१

स्वरूप परिच्छिन्न) रूपकूं छोडिके आधिदैविक (समष्टिस्वरूप व्यापक) रूपकरि तिस प्राणवेत्ताके सर्व अन्नवान्ताके हुये भक्ष्यअभक्ष्यके विभागका शास्त्र आध्यात्मिक परिच्छेदरूप विषयवाला होनेकरि अविरुद्ध है। ऐसैं कहैहैं॥ ७० प्राणभूत विद्वान् है । इस अर्थविषै अन्य श्रुतिकूं कथन करैहैं॥ ७१ ऐसें प्राणविद्याका अंग होनेकरि प्राणके अंगकी दृष्टि उपदेशकरी। अब तिस (प्राणविद्या)का अंग होनेकरि प्राणके वस्त्रकी दृष्टिकूं प्रसंगविषै प्राप्त करैहैं॥ ७२ इहांबी प्राणका प्रष्टापना औ वाक्आदिकनका प्रति- चक्तापना कल्पितहीं है। ऐसैं कहैहैं॥

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८१२ पंचमप्रपाठक ५ [छान्दोग्यो- प्राणज्येष्ठतादि पंचान्निविद्या शगति वैश्वानरोपास्ति ज्ञाताग्निहोत्र २४ त्याप इति होचुस्तस्माद्वा एतदशि- ष्यन्तः पुरस्ताच्चोपरिष्टाचाद्धिः परिद-

कहतेभये॥। तातैंहीं अशन(भोजन)करतेहुये आगेतैं औ पीछेतें जलोंकरि इस (आच- मनरूप) परिधान (वस्त्र) कूं करते हैं॥ लंभुक न्यांईंहीं कल्पना है। क्या मेरा वस्त्र होवैगा? ऐसैं॥। "आप (जल)" ऐसैं वाक्आदिक कहतेभये।। जातैं प्राणका वस्त्र आप हैं ता- तैंहीं भोजन करनेवाले औ भोजन करचूके विद्वान् ब्राह्मण इसकूं करते हैं।। ॥। क्याकि :- वस्त्रस्थानीय जलोंकरि भोजनतैं पूर्व अरु भो जनतैं ऊर्ध्व (पीछे) मुख्य प्राणके परिधानकूं ७३ जलोंकी प्राणके प्रति वस्त्ररूपताविषै गमक (लिंग) कूं कहैहैं॥

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पनिषत् ] द्वितीय खंड २ ८१३ SRB प्राणके अन्नवस्त्रका उपासन गिनणार धति। लंभुको ह वासो भवत्यनग्नोहभ- वति॥२॥

(मिलजानेवाला) हीं वस्त्र होवैहै [यातैं] अनग्नहीं होवैहै॥ २॥

करते हैं। लंभुक कहिये लंभनशील (प्राप्त होनेके स्वभाववाला) वस्त्र होवैहै। अर्थ यह जो :- वस्त्रका लब्धा (प्रापक) हीं होवैहै।। अनग्न (ढांप्या)हीं होवैहै। कहिये वस्त्रकूं लंभुक (अन्यके साथि मिलजानेवाला) होने- करि अर्थतैं सिद्धहीं अनसता है। ऐसैं अनस्हीं होवैहै। अर्थ यह जो :- उत्तरीय (अंगवस्त्र) वान् होवैहै॥ भोरजन करनेवालेकूं औ भोजन

७४ वस्त्रकी दृष्टिके फलकूं कहैहैं।। ७५ "अनग्न (ननंगा) होवैहै" इसवाक्यके पुनरुक्तिपनैकूं आशंकाकरिके अर्थविशेष (अर्थके भेद)कूं कहैहैं। ७६ ननु प्राणके वेत्ताकूं मुखशुद्धिअर्थ किये आचमनतैं अन्य आचमन विधानकरियेहै। काहेतैं "ऐसैं जाननेवाला भोजनकूं करता हुया आचमनकूं करै" इस श्रुतितैं ? यह

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८१४ पंचमग्रपाठक ५ [छान्दोग्यो प्राणज्येष्ठतादि पंचाश्निविद्या शगति वैश्वानरोपास्ति ज्ञातामिहोत्र२४ करचूकेकूं जो आचमन शुद्धिअर्थ विज्ञात है। : तिसविषै "प्राणका वस्त्र है" ऐसा दर्शनमात्र इहां विधान करिये है। जलोंकरि परिधान क- रता है ऐसैं अन्य आचमन नहीं विधान क- रिये है। जैसैं "लौकिक प्राणियोंकरि भक्ष्यमाण अन्न प्राणका है" ऐसा दर्शनमात्र है। ताकी न्यांई। क्या मेरा (प्राणका) अन्न है? क्या मेरा वस्र है? इत्यादि प्रश्न अरु उत्तरकूं तुल्य हो- नेतैं॥ जँब अपूर्व (अन्य अधिक) आचमन तिस (अनन्नता) अर्थ होनेकरि करिये तब क- मिआदिकका अन्न बी प्राणका भक्ष्य होनेकरि विहित होवै॥ परंतु तुल्यविज्ञानरूपअर्थवाले आशंकाकरिके कहैहैं ॥। इहां आदिपदकरि दो प्रतिवचन (प्रतिउत्तर) ग्रहण करिये हैं। ७७ सर्व प्राणिनकरि भोग्य अन्नविषै "ता (प्राण)का अन्न है" इस दृष्टिकीन्यांई आचमन करनेकूं योग्य जलोंविषै ता (प्राण)के वस्त्रकी हृष्टि विधान करिये है। ऐसैं कहा ता- कूं व्यतिरेकद्वारा विवरण कहैहैं॥ इहां तिस अर्थ होनेकरि। याका प्राणकी अनस्नता अर्थ होनेकरि। यह अर्थ है॥ ७८ अब पूर्व अन्नकी दृष्टिहीं विधान करियेहै काहेतैं सर्व अन्नके अक्षणकूं प्रमाणविरुद्ध होनेतैं। इहां तो अपूर्व

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पनिषत् ] द्वितीय खंड २ प्राणके अन्नवस्त्रका उपासन ८१५

प्रश्न उत्तरके प्रकरणकूं विज्ञानरूप अर्थवाला होनेतैं अर्धजरतीय (आधि जलाई मुर्गीका) . न्याय (दृष्टांत) कल्पना करनेकूं युक्त नहीं है। औ "जो प्रसिद्ध आचमन पवित्रता अर्थ है औ प्राणकी अनसताअर्थ है। यह नहीं होवैहै। ऐसैं तुह्मकरि कहियेहै। तैसैं हम आचमनकूं उभ- यअर्थ नहीं कहतेहैं। किंतु पैवित्रतारूप अर्थ- वाले आचमनकी साधनभूत आप (जल) प्रा- णका वस्त्र है। ऐसा दर्शन (उपासन) विधा-

(अलौकिक अन्य) आचमन अविरोधतैं विधान करनेकूं यो- ग्य है ? यह आशंकाकरिके कहैहैं॥ ७९ ननु एक आचमनकूं शुद्धिरूप अर्थवान्ता औ प्रा- णकी अभग्नतारूप अर्थवानता ये दोनूं कहनेकूं अशक्य हैं विरोधतैं? यह आशंकाकरिके कहैहैं॥ इहां औ जो याका विरोध जैसें होवै तैसें। यह अर्थ है॥ ८० तब किस प्रकारका आचमन विवक्षित है? यह कहैहैं॥ ८१ प्रयत जो पवित्र ताका जो भाव कहिये होना ऐसी जो शुद्धि सो प्रायत्य कहियेहै। ताकेअर्थ जो आचमन किया है तिनके साधनभूत जलोंविषै वस्त्रकी संकल्पन (चिं- तन)रूप अन्यक्रिया इहां श्रुतिविषै विधान करनेकूं इच्छित है। ऐसें कहैहैं।

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८१६ पंचमप्रपाठक ५ [छन्दोग्यो- प्राणज्येष्ठतादि पंचाग्निविद्या श्गति वैश्वानरोपास्ति ज्ञाताग्निहोत्र २४ नकरियेहै। ऐसैं हम कहते हैं । तहां आच- मनकी उभयअर्थताके प्रसंगरूप दोषकी चो- दना (विधि) अघटित है।।॥। नतु वस्त्रके अर्थहीं जो आचमन है ताकेविषै ताका दर्शन होवैगा? ऐसैं जो कहै। सो बनै नहीं :- जातैं वस्त्रके ज्ञानरूप अर्थवाले वाक्यविषै वस्त्रकेअर्थ अपूर्व आचमनके विधानके हुये औ तहां अन- अ्नताअर्थ होनेकी दृष्टिके विधानके हुये वाक्यका भेद होवैहै। काहेतैं आचमनकी तिस (वस्त्र- रूप) अर्थता है औ अन्य (दृष्टि) अर्थता है। इस कथनविषै प्रमाणके अभावतैं ॥ २ ॥ ८२ क्रियाके भेदके हुये फलितकूं कहैहैं॥ ८३ अन्य अर्थवाले जलोंविषै अन्य अर्थवान्ताके चिंतन- विषै प्रमाणके विरोधतैं विधिके योगकरि वस्त्रकेअर्थ अन्य आचमनहीं कर्त्तव्य है औ तिस वस्त्रअर्थ किये आचमनविषे अनग्नतारूप अर्थवान्ताका चिंतन उचित है ? यह भाष्य (टीका)विषै वक्ष्यमाण उत्तरतैं समीप पूर्व कही शंकाका अथे है।। तहां आचार्य :- वस्त्रअर्थ अपूर्व (नवीन) आचमनके वि धानके हुये औ तिस (वस्त्रअर्थ किये आचमन)विषै अनग्नता अर्थवान्ताकी दृष्टिके विधानके हुये वाक्यभेदके प्रसंगतैं! प्रसिद्ध आचमनके साधनभूत जलोंविषै वस्त्रकी दृष्टिके परही

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पनिषत् ] द्वितीय खंड २ ८१७ प्राणके अन्नवस्त्रका उपासन ८ तद्धैतत्सत्यकामो जाबालो गोश्रुतये वैयाघ्रपद्यायोत्त्कोवाच-यद्यप्येनच्छ ष्काय स्थाणवे ब्रूयाज्जायेरन्नेवास्मि- ञ्छाखाः प्ररोहेयुः पलाशानीति॥३॥ अर्थः-तिस इस (प्राणोपासन) कूंस- त्यकाम जाबाल गोश्रुति वैयाघ्रपद्यकेअर्थ कहिके कहताभयाः-यद्यपि इस (प्राणोपा- सन)कूं शुष्कस्थाणुके अर्थ कहै। इसविषै शाखा उपजें अरु पलाश प्ररोहकूं पावैं ऐसैं॥। ३ ॥

टीका :- सो यह प्राणका दर्शन स्तुतिका वि-

यह श्रुतिवाक्य है। ऐसैं उत्तरकूं कहैहैं॥ इहां तिस अर्थ- वानूता है कहिये वस्त्ररूप अर्थवान्ता है औ अन्य अर्थवान्- ताहै कहिये दृष्टिरूप अर्थवानता है। ऐसें कहे हुये प्रमाण- रूप एक वाक्यकी अप्रमाणताके प्रसंगतैं। यह अर्थ है।। ८४ "तिस इसकूं" इत्यादि तृतीय वाक्य विधानअर्थ नहीं है औ फलवचनरूपवी नहीं है। तैसैं हुये व्यर्थ है ? यह आशंकाकरिके कहैहैं॥ ६९

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८१८ पंचमप्रपाठक ५ [छान्दोग्यो- प्राणज्येष्ठतादि पंचाग्निविद्या ३ गति वैश्वानरोपास्ति ज्ञातानिहोत्र २४ षय करियेहै॥ ॥ कैसें किः-तिस इस प्रा- णके दर्शनकूं सत्यकाम जाबाल। नामकरि गोश्रुति ऐसा जो व्याघ्रपत्का पुत्र वैयाघ्रपद्य था तिस गोश्रुतिनामक शिष्यकेअर्थ कहिके अन्यबी वक्ष्यमाण वचनकूं कहताभया॥ क्या सो (वचन) कहताभया? यह कहैहै :- यद्यपि शुष्क (सूके) स्थाणु (शुष्कवृक्ष)केअर्थ इस दर्शनकूं प्राणका वेत्ता कहै। तो इस स्थाणुविषै शाखा उत्पन्न होवैं हीं औ पलाश (पत्र) प्ररोहकूं पावैं। तब जीवतें पुरुषकेअर्थ कहै अरु इसविषै महाफल होवैहै यामें क्या क- हना है ऐसैं॥ ३॥ ८५ स्तुतिकूंहीं प्रश्नपूर्वक विवरण करै हैं॥ इहां जीवत् पुरुषकेअर्थ प्राणविद्याकीन्याई इस दर्शनकूं कहै तब इस- विषै महाफल होवैहै। यामैं क्या कहना है। ऐसैं यो- जना है।।

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पनिषत् ] द्वितीय खंड २ ८१९ प्राणके अन्नवस्त्रका उपासन ८3ण अथ यदि महज्जिगमिषेदमावस्या- यां दीक्षिला पौर्णमास्याYरात्रौ स्व्वौ- अर्थ :- अनंतर जब महत्कूं प्राप्त हो- नेकूं इच्छे [तब] अमावस्याविषै दीक्षाकूं करिके पौर्णमासीविषै रात्रिमैं सर्वोषधिके

टीका :- यंथोक्त प्राणदर्शनके वेत्ताका यह मंथ नामवाला कर्म आरंभ करियेहैः-अनं- तर जब महत्पनैकूं प्राप्त होनेकूं इच्छे अर्थ यह जो :- कामना करै। ताकूं यह कर्म विधान करियेहै॥ जातैं महत्पनैके होते श्री ८६ गोदोहनकीन्यांई अधिकारीका अधिकाररूप यह कर्म है। इसविषै प्राणवेत्ताकूं अधिकार है। ऐसैं कहैहैं ॥ इहां अनंतर प्राणविद्याकी सिद्धितैं। यह शेष है॥ ८७ वाक्यशेषकूं पूरण करैहैं। ८८ ननु महत्पनैंद्वारा विषयनके उपभोगकी कामनावा- लेकूं कर्मका विधायक जो शास्त्र है। सो श्येनआदिक शा- सतनकी न्यांई अनर्थरूप फलवालाहीं होवैगा? यह आशंका- करिके कहैहैं॥ इहां "ताका" ऐसे प्रकृत मंथनामक कर्मकी उत्ति है औ कालआदिकका। यह आदिशब्द द्रव्यआदिकके

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८२० पंचमप्रपाठक ५ [छान्दोग्यो- प्राणज्येष्ठतादि पंचान्निविद्या श्गति वैश्वानरोपास्ति ज्ञातासिहोत्र २४ षधस्य मन्थं दधिमधुनोरुपमथ्य ज्ये- ष्ठाय श्रेष्ठाय स्वाहेत्यग्रावाज्यस्य हु- त्ा मन्थे सम्पातमवनयेत्॥४ ॥ दधि मधुके संबंधि मंथकूं उपमंथन करिके "ज्येष्ठकेअर्थ श्रेष्ठके अर्थ स्वाहा" ऐसैं घृ- तका होमकरिके मंथविषै नीचें डाले॥४॥

(लक्ष्मी) जुकती है। श्रीमान्कूंहीं अर्थतैं प्राप्त धन होवैहै। तिसतैं कर्मका अनुषठान होवैहै। औ तिसतैं देवयान वा पितृयाण मार्गकूं पाव- ताहै। ऐसैं इस प्रयोजनकूं अंगीकार करिके महत्पनैकूं इच्छनेवालेका यह कर्म है। विषय- संग्रहरूपअर्थवाला है औ दैक्ष कहिये दीक्षाविषै होनेवाला मौंजी (मुंजनामक तृणरचित कमरपट्टा) अरु अभ्यंजन (सुगं- धितैलादिककरि स्नान) आदिक। सर्वकूंहीं यह नहीं अनु- ष्ठानकरता है। जातैं प्रकृति (अग्निहोत्र)के धर्म विकृति (दर्श- आदिक) विषै वर्त्ततेहैं। काहेतैं "प्रकृतिकी न्यांई विकृति कर्त्तव्य है" इस न्यायतैं औ यह मंथकर्म किसीकाबी वि- कृति नहीं है। यातैं यथोक्त धर्मवान्ताहीं इहां विवक्षित है। यह अर्थ है॥।

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पनिषत्] द्वितीय खंड २ प्राणके अन्नवस्त्रका उपासन ८ ८२१

नके उपभोगकी कामनावालेका नहीं॥ ता (मंथ नामक कर्म)का यह कालादिकका विधि कहियेहैः-अमावस्याविषै दीक्षाकूं करिके दीक्षितकीन्यांईं भूमिशयनआदिक नियमकूं करिके। अर्थ यह जो :- तपोरूप सत्यवचन अरु ब्रह्मचर्य। इत्यादि धर्मवान् होयके। फेर दीक्षा- विषै होनेवालेहीं सर्व कर्मके समूहकूं नहीं ग्र- हण करताहै। काहेतैं मंथनामक कर्मकूं ताका अविकार होनेतैं॥ औ "उपसद्व्रती होयके" ऐसी अन्य (बृहदारण्यक) श्रुतितैं पयके भ-

८९ दीक्षाकरिके। इसकरि विवक्षित अन्यधर्मकूं॥ कहैहैं इहां उपसद् नाम इष्टियां प्रवर्ग्यनामक कर्मके दिनोंविषै प्र- सिद्ध हैं। तिनोंविषै व्रत जो पयोमात्रका भक्षण तिसकरि युक्त हुया मंथकूं संपादन करिके होमकूं करता है। ऐसैं वाजसनेयकमैं समानप्रकरणविषै श्रवणतैं। यह अर्थ है औ पिष्ठकूं करिके तिस आम (अपक्क)कूंहीं दधिमधुके संबंधी पा- त्रविषै डालिके। ऐसैं संबंध है औ इधर पात्रकी उदंवरवृ- क्षके काष्ठकरि रचिताविषै नियम है पात्रके आकारविषै तो विकल्प है।। ९० ननु नहीं सुन्या पात्र इहां कैसें कल्पना करिये है? तहां कहैहैं।। इहां औदुंबर ऐसें कंसके आकारवाले वा च-

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८२२ पंचमप्रपाठक ५ [छान्दोग्यो- प्राणज्येष्ठतादि पंचान्निविद्या ३ गति वैश्वानरोपास्ति ज्ञातागनिहोत्र २४ क्षणरूप शुद्धिके कारण तपकूं ग्रहण करताहै॥ पौर्णमासीविषै रात्रिमैं कर्मकूं आरंभ करैहै॥ सर्व औषधके कहिये ग्रामकी अरु अरण्यकी औषधिनके यथाशक्ति अल्पकू अल्पकूं ग्रहण क- रिके ताकूं त्वचारहित करिके मंथकूं कहिये कच्चेहीं पिष्ट (धान्यचूर्ण)कूं दधि अरु मधुके संबंधी औदुंबर (उदंबरके काष्ठसें रचित) ऐसैं कंसके आकारवाले वा चमसके आकारवाले पात्र- विषै अन्यश्रुतितैं डालिके उपमंथन करिके आगे स्थापन करिके "ज्येष्ठकेअर्थ श्रेष्ठके- अर्थ स्वाहा" इस मंत्रकरि आवसथ्य अग्नि- विषै आहुति डालनेके स्थान (प्रदेश)मैं घृ- मसके आकारवाले पात्रविषै। याका "कंसविषै वा चमस- विषै" ऐसें वाजसनेयविषै श्रवणतं सर्व शाखाके प्रत्ययके न्यायकरि अपेक्षितपात्र इहां ग्रहण किया है। यह अर्थ है।। औ आवसथ (गृह)का संबंधी जो लौकिक अग्नि सो आव- सथ्य विवक्षित है। जिसविषै औपासन नामक कर्म करिये है।। औ आज्यका होम करिके। ऐसें संबंध है औ आवा- पस्थान जो है सो आहुतिके डालनेका प्रदेश गृह्यसूत्रविषै कहा है।।

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पनिषत्]] द्वितीय खंड २ ८२३ प्राणके अन्नवस्त्रका उपासन ८ वसिष्ठाय स्वाहेत्यग्नावाज्यस्य हु- त्ा मन्थे सम्पातमवनयेत्प्रतिष्ठायै सवा- हेत्यग्नावाज्यस्य हुला मन्थे सम्पात- मवनयेत्सम्पदे स्वाहेत्यग्नावाज्यस्य हु- अर्थ :- "वसिष्ठके अर्थ स्वाहा" ऐसैं अग्निविषै घृतका होम करिके मंथविषै नींचे डाले॥ "प्रतिष्ठाके अर्थ स्वाहा" ऐसैं अ- न्निविषै घृतका होम करिके मंथविषै नींचे डाले।। "संपत्के अर्थ स्वाहा" ऐसैं अग्नि-

तका होमकरिके [पात्रमैं धरे] मंथ [नामक द्रव्य]विषै स्त्रुवमैं जो संलग्न है ताकूं संपातकूं करै कहिये संस्रव (घृतके स्राव) कूं नींचे डाले ॥ ४ ॥ टीका :- अैन्य समान है।। वैसिष्ठकेअर्थ। ९१ "वसिष्ठकेअर्थ स्वाहा" इत्यादिवाक्य पूर्ववाक्य- करि तुल्यअर्थवाला है॥ ९२ तुल्यताकूंहीं स्पष्ट करैहैं॥ इहां "स्वाहा" इसमंत्रकू

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८२४ पंचमप्रपाठक ५ [छान्दोग्यो- प्राणज्येष्ठतादि पंचान्निविद्या शगति वैश्वानरोपास्ति ज्ञाताग्निहोत्र २४ त्वा मन्थे सम्पातमवनयेदायतनाय स्वाहेत्यग्नावाज्यस्य हुला मन्थे सम्पा- तमवनयेत्॥ ५॥ अथ प्रतिसृप्याञ्जलौ मन्थमाधाय विषै घृतका होम करिके मंथविषै नींचे डाले।। ॥ "आयतनकेअर्थ स्वाहा" ऐसैं अग्निविषै घृतका होम करिके मंथविषै नींचे डाले ॥ ५ ॥ अर्थ :- अनंतर अस्नितैं किंचित् लेके प्रतिष्ठाकेअर्थ। संपत्केअर्थ। आयतनके- अर्थ। स्वाहा। ऐसैं प्रत्येककेतांईं मंत्रकूं उ- च्चारकरिके होमकरिके। तैसैंहीं संपातकूं करै ॥ ५ ॥ टीका :- अनंतर अशनितैं किंचित् दूरी जा- यके अंजलिविषै मंथ [नामक द्रव्य]कूं धा- उच्चारणकरिके होमकरिके। ऐसें संबंध है औ तैसैंहीं। याका प्रथम होमके अनंतर। यह अर्थ है औ आहुतिके अनं- तर। यह अथ शब्दका अर्थ है।।

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पनिषत् ] द्वितीय खंड २ ८२५ प्राणके अन्नवस्त्रका उपासन ८ जपत्यमो नामास्यमा हि ते सर्वमिद स हि ज्येष्ठः श्रेष्ठो राजाऽधिपतिः समा ज्यैष्ठय श्रैष्ठय राज्यमाधिपत्यं ग- अंजलिविषै मंथकूं धारणकरिके जपताहै :- "अम नाम हैं। अमकरि सहित जातैं तेरा सर्व यह है। सोई (प्राणभूत मंथ) ज्येष्ठ श्रेष्ठ राजा अधिपति है। सो मेरेकूं ज्येष्ठ- ताकूं श्रेष्ठताकूं राज्यकूं आधिपत्यकूं प्राप्त रण करिके इसमंत्रकूं जपता है :- अम नाम हैं। जातैं अमकरि सहित तेरा प्राणका अम ऐसा नाम है। जातैं अन्नकरि प्राण देहविषै प्राणनरूप क्रियाकूं करैहै। यातैं मंथरूप द्रव्य प्राणका अन्न होनेतैं प्राणभावकरि स्तुत करिये है "अम नाम हैं" ऐसैं॥ ॥ काहैतैं जातैं अम-

९३ ननु प्राणका यह नाम होहू। परंतु मंथकी मंत्रा- र्थता कैसे है ? यह आशंकाकरिके कहैहैं॥ ९४ प्रतिज्ञा किये अर्थविषै प्रश्नपूर्वक हेतुकूं कहैहैं॥ इहां यातैं तूं अम नाम हैं। ऐसैं पूर्वले पदसैं संबंध है।।

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८२६ पंचमप्रपाठक ५ [छान्दोग्यो- प्राणज्येष्ठतादि पंचान्निविद्या शगति वैश्वानरोपास्ति ज्ञातान्निहोत्र २४ मयत्वहमेवेद९ सर्वमसानीति॥६॥ अथ खल्वेतयर्चा पच्छ आचामति करहू। मैंहीं यह सर्व होऊं" ऐसैं ॥ ६ ॥ अर्थ :- अनंतर इस ऋचाकरि पादसैं सहित हैं यातैं अम नाम हैं। जौतैं तुज प्रा- णभूतका सर्व (समस्त) यह जगत् है यातैं।। जातैं सो प्राणभूत मंथ। ज्येष्ठ औ श्रेष्ठ है औ याहीतैं राजा (दीप्तिमान्) औ अधिपति कहिये अधिष्ठान होयके सर्वका पालक है। सो मंथरूप प्राण। मेरे प्रति बी आयके ज्ये- छुपनै आदिक गुणनके समूहकूं प्राप्त करहू। मैंहीं प्राणकीन्यांईं यह सर्व जगत् होऊं इ- ति।। इहां इतिशब्द मंत्रकी परिसमाप्तिअर्थ है। ६ । टीका :- अनंतर इस वक्ष्यमाण ऋचाकरि ९५ हेतुकूं व्याख्यान करैहैं ।। इहां अनंतर जपकर्मतैं । यह शेष है।।

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प्पनिषत् ] द्वितीय खंड २ ८२७ प्राणके अन्नवस्त्रका उपासन ८ तत्सवितुर्दृणीमह इत्याचामति। वयं दे- वस्य भोजनमित्याचामति। श्रेष्ठ सर्व-

आचमनकूं करताहै :- सविताके तिस (भो- जन)कूं मांगते हैं। ऐसैं [कहिके] आच- मनकूं करताहै। देवके भोजनकूं [मांगते हैं]ऐसैं आचमनकूं करताहै॥ श्रेष्ठ सर्वधा- पादसैं आचमन (भक्षण)कूं करता है क- हिये मंत्रेके एक एक पादकरि मंथके एक ग्रा- सकूं भक्षण करताहै॥ सर्वके प्रसविता (उ- त्पादक)सूर्यके तिस मंथरूप भोजनकूं। प्रा- णैंकूं औ आदित्यकूं एककी न्यांईं करिके सो [सू- र्यका भोजन कहियेहै]॥ आदित्यके मंथरूप ९६ ताहीकूं स्पष्ट करैहैं॥ इहां मंत्रके एक एक पादकरि मंथके एक एक ग्सकूं भक्षणकरैहै। ऐसैं योजना है औ भोजन मंथरूप। ऐसैं संबंध है।। ९७ ननु सो भोजन सूर्यका कैसैं होवैगा। जातैं प्राणका मंथद्रव्य अन्न है ऐसे कहा है ? तहां कहैहैं॥ इहां कहियेहै सूर्यका भोजन। यह शेष है।। ९८ प्राण अरु आदित्यकी एकताकेहुये फलित वाक्या-

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८२८ पंचमप्रपाठक ५ [छान्दोग्यो- प्राणज्येष्ठतादि पंचान्निविद्या श्गति वैश्वानरोपास्ति ज्ञातागिहोत्र २४ धातममित्याचामति। तुरं भगस्य धीम- हीति सर्वै पिबति॥७॥

तम [भोजन]कूंऐसैं आचमनकूं करताहै॥ भग(सूर्यदेव) के [स्वरूप]कूं शीघ्र ध्यावते हैं।। ऐसैं कंसकूं वा चमसकूं धोयके सर्व (मं- थके लेप)कूं पीवताहै ॥७॥

तिसभोजनकूं हम प्रार्थना करते हैं॥ सो भो- जन कैसा है कि :- डपभुक्तकिये जिस सूर्यके संबंधी अन्नरूप भोजनकरि हम सविताके स्व- रूपकूं आ्राप्त होनेवाले होवैं। यह अभिप्राय है। सविता (सूर्यरूप) देवके [तिस भोजनकूं हम मांगते हैं] ऐसैं पूर्वले पदसैं संबंध है॥ ॥l फिर कैसा सो भोजन है किः-श्रेष्ठ है कहिये र्थकूं कहैहैं॥ इहां मंथरूप तिस भोजनकूं। ऐसैं पूर्वके प- दसैं संबंध है।। ९९ प्रार्थनाकेविषय भोजनकूंहीं विशेषण देते हैं॥ इहां तिसींहीं भोजनका अन्य विशेषण "श्रेष्ठ" इत्यादि है॥

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पनिषत्] द्वितीय खंड २ ८२९ प्राणके अन्नवस्त्रका उपासन ८

सर्व अन्नोंतैं अतिशय प्रशंसा करनेकूं योग्य है अरु सर्वधातम है कहिये सर्व जगत्का अत्यं- तधारयिता (धारणकरनेवाला) है वीं अति- शायकरि अत्यंतविधाता (जनक) है। सर्वथा (उभयप्रकारसैं) यह भोजनका विशेषण है॥ फिर तुर (त्वर) कहिये तूर्ण। अर्थ यह जो :- शीघ्र। भग जो सूर्यदेव ताके [स्वरूपकूं] हम ध्यावते हैं (चिंतन करते हैं)। कैसे हुये कि :- श्रेष्वैभोजनकरि संस्कारयुक्त शुद्धचित्तवाले हुये। यह अभिप्राय है। अथवा भग जो लक्ष्मी ता- के कारण महत्पनैकूं प्राप्त करनेकूं कर्मकूं करते हुये हम तिस उक्त सूर्यके रूपकूं ध्यावते हैं (चितवते हैं) ॥। ७॥

१०० अन्नकी स्थितिकी कारणताकूं कहिके। अब जनकतारूप अन्यपक्षकूं कहैहैं॥ इहां जगत्विषै व्याप्तिमैं औ फलदानमैं ध्याताकी शीघ्रता है। १०१ ननु भोजनके कथ्यमान हुये क्यूं ध्यान कहिये है? तहां कहैहैं।। १०२ शुद्धबुद्धिपनैरूप ध्यानके कारणकूं कहिके प्रकृत- कर्मकीन्यांई वांछित महत्पनैविषै हेतु होनेतैंबी ध्यान अ- ७०

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८३० पंचमप्रपाठक ५ [छान्दोग्यो- प्राणज्येष्ठतादि पंचान्निविद्या ३्गति वैश्वनरोपास्ति ज्ञाताग्निहोत्र २४ निर्णिज्य करसं चमसं वा। पश्चा- अर्थ :- अग्निके पीछे चर्मविषै वा स्थं- डिलविषै वाककूं नियमन करनेवाला अरु टीका :- ऐसैं कहिके सर्व मंथके लेपकूं कंस (कंसपात्रके आकारवाले) वा चमस (च- मसके आकारवाले) औदुंबर (उदंबरवृक्षके काष्ठतैं रचित) पात्रकूं प्रक्षालन करिके (धो- यके) पीवताहै। पीन करिके आचमन करिके अ्निके पश्चात् कहिये पश्चिमभागविषै पूर्व- दिशाके तर्फ शिरवाला हुया चर्मविषै कहिये नुष्ठान करनेकूं योग्य है। ऐसें कहैहैं॥ इहां उक्त सावित्र (सूर्यसंबंधी)रूपकूं [हम व्यावतेहैं] ऐसें अन्वय है।। औ नियमकरि औदुंबर पात्र है औ ताके विकल्पकिये आकार- विषै विशेष (भेद) है औ पात्रकूं प्रक्षालनकरिके पीवता है। ऐेसें संबंध है।। १०३ मंथके लेपवाले पात्रकूं प्रक्षालनकरिके पानकरिके आचमनपूर्वक अग्निके पश्चिमभागविषै कृष्ण अजिनकरि व्य वहित (अंतरायवाली) वा केवल भूमिविषै पूर्व दिशाके त- रफ मस्तकवाला होयके शयन करै। ऐसें कहैहैं।।

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पनिषत्] द्वितीय खंड २ ८३१ प्राणके अन्नवस्त्रका उपासन < दग्नेः संविशति चर्मणि वा स्थण्डिलेवा। वाचं यमोऽप्रसाह: सयदि स्त्रियं पश्येत् समृद्धं कर्मेति विद्यात्॥ ८॥ संयमितचित्तवाला हुया शयनकूं करैहै। सो जब स्त्रीकूं देखे [तब] कर्म समृद्भ- या ऐसैं जानै ॥८॥

कृष्णमृगके अजिनरूप बिछानेकरि युक्त भूमि- विषै वा स्थंडिलविषै कहिये केवलभूमिविषै शयनकूं करताहै। क्या करताहुया कि :- वीकिकूं नियममैं राखता हुया। अर्थ यह जो :- वाग्यत (मौनी) हुया औ अप्रसाह हुया क- हिये स्त्रीआदिक अनिष्ट रवप्नके दर्शनकरि जैसैं नहीं अभिभवकूं पावैहै तैसा हुया। अर्थ यह जो :- संयत (नियमित ) चित्तवाला हुयासो- वताहै ॥ सो एवंभूत (इस प्रकारका) हुया १०५

१०४ शयन करनेवालेके कर्त्तव्यकूं दिखावैहैं॥ १०५ ताकूं स्वन्नविषै किसी प्रकारसैं बी उत्तम स्त्रीके द-

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८३२ पंचमप्रपाठक ५ [छान्दोग्यो- प्राणज्येष्ठतादि पंचान्निविद्या शगति वैश्वानरोपास्ति ज्ञाता्निहोत्र २४ तदेष श्रोको-यदा कर्मसु काम्येषु स्त्रिय स्वप्नेषु पश्यति। समृद्धिं तत्र जा- नीयात्तस्मिन्स्व प्रनिदर्शने। तस्मिन्स्व- प्रनिदर्शने ॥ ९॥ इति पंचमप्रपाठकस्य द्वितीय: खण्डः ॥ २ ॥ अर्थः-तहां यह श्लोक है :- जब काम्य- कर्मौविषै स्वन्नोंमैं स्त्रीकूं देखै तहां (तब) समृद्धिकूं जानै। तिस स्वन्नदर्शनके हुये। तिस स्वन्नदर्शनके हुये ॥ ९॥ इति श्री०मूलभाषा०पंचमप्रपा०द्वितीय:खंडः॥।२। जब स्वप्नविषै स्त्रीकूं देखे तब जानेकि :- मेरा यह कर्म समृद्ध (समृद्धियुक्त)भया ऐसैं॥८ टीका :- तिस इस अर्थविषै यह श्रोक (मंत्र) बी होवैहै :- जब काम्य (कामरूप अर्थवाले) कर्मोविषे स्वप्नोंमैं कहिये स्वप्नके द- रशनके हुये शुभका आगम (प्राप्ति) सूचित होवैहै। ऐसें कहैहैं।। इति श्री० पंचमप्रपाठकगतद्वितीयखंडस्य टिप्पणम्॥२॥

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पनिषत्] तृतीय खंड ३ ८३३ पंचान्निविद्यार्थ श्वेतकेतु प्रवाहणसंवाद (पंचप्रश्ष) ७ अथ पंचमप्रपाठकस्य तृतीयःखंडः।३। श्वेतकेतुर्हारुणेयः पञ्चालानासमि- अथ श्री०मूलभाषा•पंचमप्रपाठकस्य तृतीयः खंडः।।३॥। अर्थ :- शवेतकेतु आरुणेय पंचालोंकि स-

र्शनोंमैं वा स्वप्नके कालनमैं स्त्रीकूं देखताहै। तहां समृद्धिकूं जानै। अर्थ यह जो :- कर्मोके फलकी सिद्धि होवैगी ऐसैं जानै। तिस स्त्री- आदिक श्रेष्ठ स्वप्नके दर्शनके हुये। यह अ- भिप्राय है।। इहां दो वार उक्ति जो है। सो कर्मकी समाप्तिरूप अर्थवाली है॥ ९ ॥ इति श्री०भाष्यभाषा०पंचमप्रपाठकस्य द्वितीयः खंडः।२। अथ श्री०भाष्यभाषा०पंचमप्रपा०तृतीयः खंडः ॥ ३ ॥ पंचाग्निविद्यार्थ श्र्वेतकेतु प्रवाहणसंवाद (पंचप्रश्न) ७ टीका :- ब्रह्मासैं आदिलेके स्तंब (तृणगुच्छ) अथ श्री०पंचमप्रपाठगततृतीयखंडस्य टिप्पणम् ३ १०६ प्राणविद्या औ ताका अंगरूप कर्म ये दो कहे। अब अग्निविद्याकूं कहनेकूं इच्छतेहुये आचार्य प्रथम आख्या- ययिकाके तात्पर्यकूं कहैहैं॥

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८३४ पंचमप्रपाठक ५ [छान्दोग्यो प्राणज्येष्ठतादि पंचान्निविद्या श गति वैश्वानरोपास्ति ज्ञातामिहोत्र २४ तिमेयाय। तरह प्रवाहणो जैवलिरुवाच भाकेप्रति आवताभया॥ ताकूं प्रवाहण जैवलि कहताभया :- हे कुमार! तुजकूं पिता अनुशासन करताभया [क्या]? ऐसैं।।॥। पर्यंत संसारकी गतियां कहनेकूं योग्य हैं। मु- मुक्षुनकूं वैराग्यके हेतुतैं। यातैं आखव्यायिका आरंभ करियेहैः-नामतें श्वेतकेतु ऐसा [इहां "ह" ऐसा निपात परंपराके अर्थ है] अरुणका पुत्र जो आरुि (उद्दालक) ताका पुत्र आ- रुणेय था। सो पंचाल नामक देशनकी स- भाकेप्रति आवताभया॥ तिस आवनेवाले- केप्रति नामतैं प्रवाहण ऐसा जीवलका पुत्र जैवलि राजा कहताभयाः-हे कुमार! तु. जकूं पिता अनुशासन करताभयाहै [क्या]? १०७ औ तिन संसाररूप गतिनकी कहनेकी योग्यता- विषै हेतुकूं कहैहैं। इहां राजा हे कुमार ! ऐसें संबोधन करता हुया श्वेतकेतुके विद्याभिमानकूं दूरी करनेकूं इच्छ- ताहै।।

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पनिषत् ] तृतीय खंड ३ ८३५ पंचाग्निविद्यार्थ श्वेतकेतु प्रवाहणसंवाद (पंचप्रश्न) ७ कुमारानु त्वाऽशिषत्पितेत्यनुहिभगव! इति॥१॥ वेत्थ यदितोऽधि प्रजाः प्रयन्तीति

हे भगवन्! अनुशिष्ट हूं। ऐसैं [श्रवेतकेतु क- हताभया]॥१॥ अर्थ :- [जैवलि :- ] इसतैं ऊर्ध्व प्रजा- जिसके प्रति जावैहैं? [सो क्या] जानताहैं

अर्थ यह जो :- तूं पिताकरि अनुशिष्ट (अनुशासन प्राप्तभया) हैं क्या? ऐसैं उक्त हुया सो श्वेत- केतु कहताभया :- हे भगवन्! अनुशिष्ट (अ- नुशासनकूं प्राप्तभया) हूँ ऐसें सूचन करता- हुया कहताभया॥ १॥ टीका :- ता (श्वेतकेतु)कूं जैवलि कहताभया जैवलिरुवाच :- जब तूं अनुशिष्ट हैं तब इस लोकतैं ऊर्ध्व प्रजा जिसकेप्रति गमन क- रैहैं ताकूं क्या जानताहैं? यह अर्थ है॥।।

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८३६ पंचमप्रपाठक ५ प्राणज्येष्ठतादि पंचान्निविद्या श्गति वैश्वानरोपास्ति ज्ञातास्निहोत्र २४ [छान्दोग्यो-

न भगव! इति।वित्थ यथा पुनरावर्त्तन्त ३ इति! न भगव!इति।वेत्थ पथोर्देवया- ऐसैं [पूंछताभया]।। । [श्वेतकेतुः-] हे भगवन्! नहीं। ऐसैं [कहताभया]।।।। [जैवलि :- ] जैसैं फेर आवर्त्तन करैहैं [सो क्या] जानताहैं? ऐसैं [पूंछताभया]।।। [श्वेतकेतुः-] हे भगवन्! नहीं। ऐसे श्वेतकेतुरुवाच :- हे भगवन्! जिसकूं आप पूंछतेहो जिसकूं मैं नहीं जानताहूं। ऐसैं इतर (श्वेतकेतु) कहताभया॥॥जैवलिरुवाच :- जब ऐसैं है तब जैसै (जिसप्रकारसैं प्रजा) फेर आवर्तन करैहैं सो क्या जानताहैं? ऐ सैं।। ॥ श्वेतकेतुरुवाचः-हे भगवन्! १०८ जैसें। इसके अर्थकूं कहैहैं॥ इहां तुल्यमार्गवाले विद्यमान हुये (साथि जानेवाले) विद्वान् अरु अविद्वान्के दो मार्ग हैं। तिनके मध्य देवयानकी। इत्यादि वाक्ययोजना क रनेकूं योग्य है।।

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पनिषत्] तृतीय खंड ३ ८३७ पंचाग्निविद्यार्थ श्वेतकेतु प्रवाहणसंवाद (पंचप्रश्न) ७ नस्य पितृयाणस्य च व्यावर्त्तना ३ इति? न भगव! इति॥२॥ [कहताभया]। ॥ [जैवलि :- ]दो मा- र्गनके मध्य देवयानकी अरु पितृयाणकी व्यावर्तना (परस्परके वियोगकास्थान) है [ताकूं क्या] जानता हैं? ऐसैं [पूंछता- भया]।। ॥ [श्वेतकेतुः-] हे भगवन्! नहीं। ऐसैं [कहताभया]॥२॥ नहीं [जानताहूं] ऐसैं प्रत्युत्तर देताभया॥ ॥ जैवलिरुवाच :- साथि प्रयाणवाले विद्वान् अ- विद्वानके दो मार्गनके मध्य देवयानकी औ पितृयाणकी व्यावर्तना कहिये व्यावर्त्तन है। अर्थ यह जो :- साथि गमन करनेवालोंका परे १०९ उक्त वाक्यार्थकूं संक्षेपसैं कहैहैं॥ इहां यह अर्थ है :- दो मार्गोकूं आश्रय करिके (भिन्न भिन्न मार्गके तांई जा- निके निश्चयकरि) साथि प्रयाणवाले विद्वानोंका (उपासकोंका) औ कर्मिओंका जहां परस्पर वियोग होवैहै सो क्या जानताहैं।

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८३८ पंचमप्रपाठक ५ [छान्दोग्यो- प्राणज्येष्ठतादि पंचाग्निविद्या श्गति वैश्वानरोपास्ति ज्ञाताग्निहोत्र २४ वेत्थ यथाऽसौ लोको न सम्पूर्यत अर्थ :- [जैवलि :- ]जैसैं यह (पितसं- बंधी) लोक [म्ियमाणोंकरि] नहीं संपूर्ण होवैहै [सो क्या] जानता हैं? ऐसैं [पूं- स्परके वियोगका स्थान है। ताकूं क्या जान- ता हैं?॥ ॥ श्र्वेतकेतु रुवाचः-हे भगव- न्! नहीं [जानताहूं] ऐसैं ॥ २ ॥ टीका :- जैवलिरुवाच :- जैसैं यह पितृसं- बंधी लोक है। आींकू पायके फेर आवर्त्तन करते हैं ११० पितृलोकसंबंधी लोककूंहीं व्याख्यान करैहैं॥ इहां आहुतिकार सिद्ध। याका व्याख्यान आहुतिरूप साधनवाले। यह है औ अपूर्व (अदृष्ट)रूप जलोंके मध्य अन्य आकाशादि भूतनके मिलावनेअर्थ चकार (औ शब्द) है ॥ अथवा पय अरु घृत आदिरूपसैं आहुतिकूं साधते हैं औ फेर आहुतितै अपूर्वरूपकरि सिद्ध। यह अर्थ है औ कमसैं याका श्रद्धा सोम वृष्टि अन्न अरु रेतके हवनरूप द्वारकरि। यह अर्थ है औ षष्ठ आहुतिभूत। याका अंत्य इष्टिके विधानकरि शरीर- संबंधी आहुतिद्वारा सूक्ष्मताकूं प्राप्त । इन जलोंका। यह अर्थ है।।

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पनिषत्] तृतीय खंड ३ ८३९ पंचान्निविद्यार्थ श्वेतकेतु प्रवाहणसंवाद (पंचप्रश्न) ७ ३ इति? न भगव ! इति॥ वेत्थ यथा छताभया]। ॥[श्वेतकेतुः-] हे भग- वन्! नहीं। ऐसैं [कहताभया]।।।। [जैवलि :- ]जैसैं पंचमी आहुतिके हुत- हुये आप (जल) पुरुष ऐसे वचन (नाम) (पुनर्जन्मकूं पावते हैं) सो लोक बहुत मर- नेवालोंकरि बी जिस कारणसैं। संपूर्ण हो- ता नहीं। सो क्या जानता हैं? ऐसैं [उक्त हुया]।। ॥श्वेतकेतुरुवाचः-हे भगवन्! नहीं [जानताहूं] ऐसैं प्रत्युत्तर देताभया॥॥ जैवलिरुवाच :- जैसैं (जिस क्रमसैं) पंचमी कहिये पंचसंख्यावाली आहुतिके हुत (होम- किये) हुये आहुतिकरि सिद्ध कहिये आहुति- रूप साधनवाले औ (अन्यभूत अरु) जल जे हैं वे पुरुष वचन कहिये पुरुष ऐसा वचन (अ- भिधानका पर्याय नाम) है हूयमान (होमकूं प्राप्तकरी) अरु क्रमकरि षष्ठ आहुतिभूत जिन-

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८४० पंचमप्रपाठक ५ [छान्दोग्यो प्राणज्येष्ठतादि पंचान्निविद्या शगति वैश्वानरोपास्ति ज्ञाताग्निहोत्र २४ पञ्चम्यामाहुतावापः पुरुषवचसो भव न्तीति? नैव भगव ! इति॥ ३॥ अथानु किमनुशिष्टोऽवोचथा यो

वालीयां होवेहैं [सो क्या] जानता हैं? ऐसे [पूंछताभया]। ॥[श्वेतकेतुः-] हे भ- गवन् ! नहीं [जानताहूं]ऐसैं [कहता- भया]।३॥ अर्थ :- अनंतर [जैवलि :- ] "अनुशि-

का। वे जल (अपूर्व) पुरुषवचन कहिये पु- रुष शब्दके वाच्य होवैहैं। अर्थ यह जोः-पु- रुषनामकूं पावैहैं। सो क्या जानता है?॥॥ ऐसैं उक्तहुया कहैहै। श्वेतकेतुरुवाचः-हे भ गवन् ! नहीं [जानताहूं]। अर्थ यह जो :- मैं इनविषै कछबी नहीं जानताहूं। ऐसैं कहता- भया॥ ३॥ टीका :- अनंतर राजा कहताभया। जैवलि-

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पनिषत् ]] तृतीय खंड ३ ८४१ gपंचाग्निविद्यार्थ श्वेतकेतु-प्रवाहणसंवाद (पंचप्रश्न) ७ हीमानि न विद्यात कथ९ सोऽनुशिष्टो ब्रुवीतेति॥ स हाऽडयस्तः पितुरर्ड्मेया- य। तए होवाचाऽननुशिष्य वाव किल मा भगवानत्रवीदनु त्वाऽशिषमिति ४

छहूं" क्यूं कहताभया हैं। जातैं जो इनकूं नहीं जानै सो "अनुशिष्ट हूं" कैसें कहैगा। ऐसैं [कहताभया]।। । सो (श्र्वेतकेतु) खेदयुक्त हुया पिताके स्थानके प्रति आव- ताभया। ताकूं कहताभयाः-अतुशासन नकरिकेहीं भगवान् मुजकूं "तेरेकूं अनु- शासन करताभयाहूं" ऐसैं कहतेभये॥४॥

रुवाच :- इस प्रकारसैं अज्ञानी हुया तूं क्या (किस कारणतैं) "मैं अनुशिष्टहूं" ऐसें क-

१११ ननु तुज (राजा)करि पूंछे अर्थके समूहतैं भिन्न विषयवाला अनुशासन (शिक्षण) मेरेकूं है। यातैं "मैं अनु- शिष्ट हूं" ऐसे मैंनें कहा? यह आशंकाकरिके राजा कहैहै। . ७१

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८४२ पंचमप्रपाठक ५ [छान्दोग्यो- प्राणज्येष्ठतादि पंचाग्निविद्या श्गति वैश्वानरोपास्ति ज्ञाताग्निहोत्र २४ पञ्च मा राजन्यबन्धुः प्रश्नानप्राक्षी- अर्थ :- राजन्यबंधु मेरेप्रति पांच प्रश्नोंकूं हताभयाहैं॥ जोई इन मेरेकरि पूंछे अर्थके समूहोंकूं नहीं जानै सो विद्वानोंविषै "मैं अ- नुशिष्ट्हूं" यह कैसैं कहै।। ॥इस रीतिसैं सो श्वेतकेतु राजाकरि आयास (खेद)कूं प्राप्त हुया पिताके स्थानकेतांई आवताभया औ ता पिताकूं कहताभयाः-अनुशासनकूं न- करिकेहीं मुजकूं भगवान् (पूजावान् आप) समावर्त्तन कालविषै "तुजकूं मैं अतुशासन करताभयाहूं" ऐसैं [क्यों] कहतेभये॥४॥ टीका :- श्वेतकेतुरुवाच :- हे तात! जी

११२ अनुशासन न करिके मैं पिता "तुजकूं अनुशासन करताअयाहूं" इसप्रकार कैसे कहताअयाहूं। [अर्थात् नहीं कहताभया हूं]? यह आशंका करिके श्वेतकेतु कहैहै॥ "क- छुबी नहीं" ऐसैं कहाहीं जो नञू पद सो "शक्त न भया" ऐसें संबंधकूं दिखावनेकूं फेर ग्रहण किया है। यातैं मेरेप्रति तुह्मारी मिथ्यावादिता सिद्धभई। यह शेष है।।

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पनिषत्] तृतीय खंड ३ ८४३ पंचाग्निविद्यार्थ श्वेतकेतु-प्रवाहणसंवाद (पंचप्रश्न) ७ त्तेषा नैकञ्च नाशकं विवक्तुमिति॥स होवाच-यथा मा त्वंतदैतानवदो यथा- पूंछताभया। तिनके मध्य एककूं बी क- हनेकूं शक्तभया नहीं हूं ऐसैं॥।॥ सो (पिता) कहताभयाः-जैसैं मेरेकूं तूं तब इन (प्र- श्रों)कूं कहताभया हैं। जैसैं :- "मैं इनके पंचसंख्यावाले प्रश्नोंकूं राजन्य हैं बधु इसके ऐसा जो राजन्यबंधु। अर्थ यह जो :- आप दुराचारी। सो सुजकूं पूंछताभया। तिन प्रश्नोंके मध्य एककूं बी मैं कहनेकूं। अर्थ यह जो :- विशेषकरि अर्थतैं निर्णय करनेकूं शक्तभया नहीं हूं ऐसैं॥ ॥ सो पिता कहता- भया ॥ उद्दालक उवाच :- हे वत्स! जैसैं। तूं तब कहिये आगतमात्रहीं। इन प्रश्नोंकूं "तिनके मध्य एककूं बी कहनेकूं शक्त भया

करैहैं। ११३ अपनैविषै मिथ्यावादीपनैकी शंकाकूं पिता परिहार

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८४४ पंचमप्रपाठक ५ [ छन्दोग्यो- प्राणज्येष्ठतादि पंचान्निविद्या श्गति वैशवानरोपास्ति ज्ञाताग्िहोत्र २४ हमेषा नैकञ्च न वेद। यद्यहमिमानवे- दिष्यं कथं तेनावक्ष्यमिति॥५॥ मध्य एककूं बी नहीं जानताहूं। [तैसैं सु- जकूं जान] जब मैं इन (प्रश्नों)कूं जान- ताभयाहूं [तब] कैसैं तेरे अर्थ नहीं कह- ताभयाहूं। ऐसैं कहिके॥ ५॥ नहीं" ऐसें मेरेप्रति कहताभया हैं। तैसैं मुजकूं जान। अर्थ यह जो :- तेरे अज्ञानरूप लिंगकरि मेरे तिस विषयवाले अज्ञानकूं जान। कैसैं कि ?- जैसैं :- मैं इन प्रश्नोंके मध्य ऐ- ककूंबी नहीं जानताहूं। अर्थ यैहं जो :- हे अंग! जैसैं तूं हीं इन प्रश्नोंकू नहीं जानताहैं। तैसैं :- मैं बी इनकूं नहीं जानताहूं। यातैं मेरे विषै तेरेकरि अन्यथाभाव करनेकूं योग्य नहीं ११४ "जैसै मेरेकूं तूं" इत्यादि वाक्यकूं पूरण करिके व्याख्यान करिके अनंतरके वाक्यकूं आकांक्षापूर्वक उठावतेहैं। ११५ ताकूं व्याख्यान करैहैं॥ इहां अज्ञानका अविशेष

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पनिषत् ] तृतीय खंड ३ ८४५ पंचान्निविद्यार्थ श्वेतकेतु-प्रवाहणसंवाद (पंचप्रश्) ७ स ह गौतमो राजोऽर्द्मेयाय। तस्मै ह प्राप्तायार्हा्चकार। स ह प्राप्तः सभाग

अर्थः-सो गौतम राजाके स्थानकूं जा- ताभया। सो प्रातःकालमैं [राजाके] स- भागत हुये सभाग (पूज्यमान) गमन

है।। ॥ काहेतैं यह ऐसैं है [यह कहो] जातैं मैं नहीं जानताहूं? [तहां पिता कहैहैः-] जब मैं इन प्रश्नोंकूं जानता होऊं तब तुज प्रिय पु- (तुल्यपना) अतः (यातैं) शब्दका अर्थ है औ अन्यथाभाव। याका मुजकरि विषयके जाने हुयेबी तेरेकूं अनुक्ति। यह अर्थ है। ११६ तुहारा अज्ञान किस हेतुतैं मुजकरि जाननेकूं योग्य है? इस पुत्रकी आशंकाकूं उन्भवकरिके अनंतरके वा- क्यकरि पिता उत्तरकूं कहैहैं॥ इहां यातैं तुज पात्रभूतकूं अनुपदेशतैं मेरा अज्ञान जाननेकूं योग्य है। यह शेष है औ अर्हणा। याका योग्यपूजा। यह अर्थ है औ इधर सभागपद जो है सो सप्तमी विभक्तिरूप अंतवाला हुया राजाकूं विषय करनेवाला है अरु प्रथमा विभक्तिरूप अंतवाला हुया गौत- भकूं विषय करनेवाला है। यह भेद है॥

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८४६ पंचमप्रपाठक ५ [छान्दोग्यो- प्राणज्येष्ठतादि पंचाग्निविद्या श्गति वैश्वानरोपास्ति ज्ञाताग्निहोत्र २४ उदेयाय॥ तः होवाच-मानुषस्य भग- वन्! गौतम! वित्तस्य वरं वृणीथा इति। करताभया।।॥(राजा) तिस प्राप्तकेअर्थ पू- जाकूं करताभया॥ ताकूं (राजा) कहता- भयाः-हे भगवन् गौतम ! मानुषवित्तके वरकूं मांग ऐसैं।। ॥ सो (गौतम) कह- त्रकेअर्थ समावर्ततनकालविषे पूर्व कैसैं नहीं क- हताभयाहूं॥I॥ऐसैं कहिके सो गोत्रतैं गौतम ऐसा उद्दालक मुनि। जैवलि राजाके स्थानके- प्रति जाताभया॥ तिस प्राप्त गौतमकेअर्थ राजा योग्य पूजाकूं करताभया औ सो गौ- तम कृतातिथ्य (भोजनकूं प्राप्त) हुया निवा सकरिके अन्यदिनविषै प्रातःकालमें राजाके सभाकेप्रति प्राप्त हुये जाताभया॥ वा भ- जन जो भाग कहिये पूजा (सेवा) तिस भा- गकरि सहित वर्तमान ऐसा जो अन्योंकरि पू- ज्यमान आप गौतम सो सभाग है। सो राजा-

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पनिषत् ] तृतीय खंड ३ ८४७ पंचान्निविद्यार्थ श्वेतकेतु-प्रवाहणसंवाद (पंचप्रश्न) ७ स होवाच-तवैव राजन्! मानुषं वित्तं।या- मेव कुमारस्यान्ते वाचमभाषथास्ता- मेव मे ब्रूहीति ॥ ६ ॥ ताभया :- हे राजन्! मानुष वित्त तेरेपा- सहीं रहहू। कुमारके समीपमैं जिसीहीं वाक्कूं कहताभया हैं ताहीकूं मेरेअर्थ क- थन कर॥ ॥ ऐसैं [उक्त हुया] सो (राजा) दुःखी होताभया॥ ६॥ केप्रति जाताभया ॥ तिस गौतमकेप्रति राजा कहताभया॥ जैवलिरुवाच :- हे भग- वन् गौतम! मनुष्यनके संबंधि ग्रामादि वित्तके वरकूं कहिये वरणीय (मंगनेकूं योग्य काम)कूं मांग कहिये प्रार्थना कर॥ ॥सो गौतम कहताभया॥ उद्दालक उवाचः-हे राजन् ! मानुष (मनुष्यसंबंधि) वित्त (य्रा- ११७ आये गौतमकूं योग क्षेमका अर्थी जानिके राजा प्रसन्न हुया कहताभया। ऐसैं कहैहैं॥

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८४८ पंचमप्रपाठक ५ [छान्दोग्यो- प्राणज्येष्ठतादि पंचान्निविद्या श्गति वैश्वानरोपास्ति ज्ञातान्निहोत्र २४ स ह कृच्छ्री बभूव । तश हचिरं वसेत्याज्ञापयाच्चकर। तश होवाच-यथा अर्थः-ता (गौतम)कूं "चिर वासकर" ऐसैं (राजा) आज्ञा करताभया॥ ता (गौ- मादि धन) तेरे पासहीं स्थित होहू। परंतु मेरी कुमार जो पुत्र। ताके समीप जिस पं- चलक्षणवाली वाणीकूं तूं कहताभया हैं। तिसीहीं वाणीकूं मेरेअर्थ कथन कर॥ ऐसैं गौतमकरि उक्त हुया सो राजा दुःखी हो ताभया॥ यैहै तो कैसैं होवैगा ऐसैं ॥ ५॥६॥ टीका :- सो दुःखीभूत हुया नहीं निषेध १२०

११८ तब कृतकृत्य भये तुज गौतमका क्यूं आगमन भया है ? यह आशंका करिके गौतम कहैहै॥ ११९ कृछी (दुःखी) भावकूं आकारकरि दिखावैहैं॥ १२० गौतमका वचन जब राजाके दुःखीभावका कारण है तब ता गौतमकूं प्रत्याख्यान (नहीं कहुंगा ऐसें निषेध) किया चाहिये ?- यह आशंकाकरिके राजा कहैहै॥

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पनिषत् ]] तृतीय खंड ३ ८४९ पंचान्निविद्यार्थ श्वेतकेतु-प्रवाहणसंवाद (पंचप्रश्न) ७ मा तं गौतमाऽवदो यथेयं न प्राक्त्व- त्तः पुरा विद्या ब्राह्मणान् गच्छति।त-

तम)कूं कहताभयाः-हे गौतम! जैसैं यह 5णण

तूं मेरेप्रति कहता भया हैं जैसैं यह विद्या तुजतैं पूर्व ब्राह्मणोंकेप्रति नहीं जा -FF करनेकूं योग्य ब्राह्मणकूं मानता हुया न्यायकरि विद्या कहनेकूं योग्य है। ऐसैं मानिके तिस गौ- तमकेप्रति "चिर (दीर्घकालपर्यंत) वासकर" ऐसैं आज्ञा करताभया॥ राजा जो पूर्व वि- व्याकूं निषेध (नांहीं) करताभया औ जो पीछे "चिर वासकर" ऐसैं आज्ञा करताभया। तिस १२१ तब "चिर वस" ऐसैं राजा क्यूं कहताभया? यातैं कहैहैं। इहां चिर वस। याका संवत्सरपर्यत वासकर। यह अर्थ है॥ औ कहनेकूं योग्य है विद्या। यह शेष है॥ १२२ ब्राह्मणकेप्रति आज्ञाकूं करनेवाले राजाकूं कैसैं प्रत्य- वाय नहीं होवैगा? यह आशंका करिके कहैहैं॥ इहां प्रत्या- ख्यान (निषेध) आदिककूं विषय करनेवाला हेतु वचन है औ केवल विद्याके वशतैंहीं तेरा श्रेष्ठपना नहीं किंतु जातितैं बी है। यह अपि (बी) शब्दका अर्थ है।।

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८५० पंचमप्रपाठक ५ [छान्दोग्यो- प्राणज्येष्ठतादि पंचान्निविद्या श्गति वैश्वातरोपास्ति ज्ञाताग्निहोत्र २४ स्मादु सर्वेषु लोकेषु क्षत्रस्यैव प्रशास- नमभूदिति तस्मै होवाच।७॥ इति पंचमप्रपाठकस्य तृतीयः खण्डः॥३॥ तीभई। जातें पूर्व सर्व लोकनविषै क्षत्रि- यकाहीं प्रशासन होताभया। ऐसैं (कहिके) तिस (गौतम)केअर्थ [विद्याकूं] कहताभ- या॥ ७॥ इति श्री०मूलभाषा०पंचमप्रपा०तृतीयः खंड: ३ निमित्त हेतु वचनकी उक्तिकरि ब्राह्मणकूं क्ष- मापन करावै है॥ ता गौतमकूं राजा कहता- भया॥ जैवलिरुवाच :- हे गौतम ! सर्व वि- द्यावान् ब्राह्मण बी हुया तूं जैसैं (जिस प्र; कारसैं) मेरेप्रति "तिसीहीं विद्यारूप वाणीकूं मेरेअर्थ कथनकर" ऐसैं अज्ञानतें कहताभया हैं। तिसकरि तूं जान। तहां कहनेकूं योग्य १२३ तब तिस वाणीकूं कथन कर ? यह आशंका क- रिके राजा कहैहै॥ इहां तहां याका विद्याके कथनके प्रस्तु- तहुये। यह अर्थ है।।

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पनिषत् ] तृतीय खंड ३ ८५१ पंचान्निविद्यार्थ श्वेतकेतु-प्रवाहणसंवाद (पंचप्रश्न)७ है :- जिसप्रकारसैं यह विद्या तुजतैं पूर्व ब्रा- ह्मणोंकेप्रति नहीं गमन करतीभई औ बरा- ह्रण इसविद्याकरि नहीं अनुशासनकूं करते- भये। तैसैं यह लोकविषै जातैं प्रसिद्ध है। १२४

तातैं पूर्व सर्वलोकनविषै क्षत्रियजातिकाहीं इस विद्याकरि प्रशासन कहिये शिष्यनका प्र- शास्तापना होताभया। यातैं क्षत्रियनकी प- रंपरासैंहीं यह विद्या इतने कालपर्यंत आइ है। तथापि मैं इस विद्याकूं तेरेअर्थकहूंगा। तेरेअर्थ संप्रदानतैं ऊर्ध्व (पीछे) यह विद्या ब्राह्मणोंके प्रति धावैगी। यातैं मैंनैं जो कहा सो क्षमा करनेकूं योग्य हैं। ऐसें कहिके राजा तिस गौ- तमकेअर्थ विद्याकूं कहताभया॥ ७॥ इति श्री०भाष्यभाषापंचमप्रपाठकस्य तृतीय: खंड:३ १२४ "जैसैं" इसवाक्यके अपेक्षितकूं पूरण करैहैं॥ १२५ प्रसिद्ध कूंहीं राजा स्पष्ट करैहै।। इहां तातैं। याका ब्राह्मणोंके इस विद्याकरि प्रशास्तापनैके पूर्व अभावतैं। यह अर्थ है।। १२६ इतिशब्दकरि ग्रहण किये अर्थकूं राजा कथन क-

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८५२ पंचमप्रपाठक ५ [ छान्दोग्यो- प्राणज्येष्ठतादि पंचाग्निविद्या श्गति वैश्वानरोपास्ति ज्ञातान्निहोत्र २४ अथ पंचमप्रपाठकस्य चतुर्थः खंड:।४। असौ वाव लोको गौतमाग्निस्तस्या अथ श्री०मूलभाषापंचमप्रपाठ०चतुर्थः खंडः ॥ ४ ॥ अर्थ :- हे गौतम ! वह (स्वर्गरूप) हीं अथ श्रीभाष्यभाषापंचमप्रपाठ०चतुर्थः खंड:॥४॥ स्वर्गलोकरूपाग्निविद्या २ टीका :- "पंचैमी आहुतिके हुत हुये आप (जल)" ऐसा यह पंचम प्रश्न प्रथम होनेकरि अपाकरणकरियेहै। ताके अपाकरणके पीछे इतर प्रश्नोंका अपाकरण (निराकरण) अनुकूल होवै। यातैं अभिहोत्रकी दो आहतिनके का- रैहै ॥ इहां उक्त प्रत्याख्यान (नांहीं करने)आदिकका कारण अतः (यातैं) शब्दका अर्थ है। इति श्री० पंचमप्रपाठकगततृतीयखंडस्य टिप्पणम्॥ ३॥ अथ श्री०पंचमप्रपाठकगतचतुर्थखंडस्य टिप्पणम्४ १२७ ननु यथाप्रश्नहीं कहिये जिस क्रमसैं प्रश्न है तिस कमसैहीं प्रतिवचन (उत्तर) उचित है। परंतु पंचम प्रश्नके प्रति प्रथमपनैंकरि प्रतिउत्तर देनेवाले तुह्यनैं क्रम निराकरण किया। तहां क्या कारण है? यातें कहैहैं॥ इहां यह अथे दै :- अर्थके क्रमकूं अनुसरिके पाठका क्रम कहनेकूं योग्य है॥ १२८ ननु वाजसनेयकविषै अग्निहोत्रके प्रकरणमैं अभनि-

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पनिषत्] चतुर्थ खंड ४ ८५३ पंचमप्रश्ननिर्णयमैं स्वर्गलोकरूपाग्निविद्या २ दित्य एव समिद्रश्मयो धूमोऽहरर्चि श्चन्द्रमा अङ्गारा नक्षत्राणि विस्फु- लिङ्गाः ॥। १ ॥

लोक अग्नि है। ताका आदित्यहीं समित् है। रश्मियां (किरण) धूम है। दिवस अर्चि है। चंद्रमा अंगार हैं। नक्षत्र विस्फुलिंग हैं॥१॥

र्यका आरंभ जो है सो वाजसनेयक (बृहदार- पयक) विषै कहा है। तो (कार्यके आरंभ)के प्रति

होत्रकी दोआहुतिनतैं अपूर्वका परिणाम (अदष्टद्वारा होनेवाला) जगत् है। ऐसैं कहा। सोई इहां बी कहियेगा। ऐसैं जब है तब इस पिष्टपेषण (पीसे हुयेके पीसनेके) न्यायकरि क्या होवैगा? यह आशंका करिके। तिसतैं अर्थके भेदकूं कहनेकूं अग्निहोत्रके प्रकरणविषै स्थित अर्थकूं अनुवाद करैहैं॥ १२९ उक्तप्रकारकूंहीं दिखावते हुये प्रथम याज्ञवल्क्यके जनककेप्रति षट् प्रश्नोंकूं उठावतेहैं ॥ इहां कार्यका आरंभ तत् (ताके प्रति) शब्दका अर्थ है औ अग्निहोत्रकी आहुति अन्न अरु अपूर्वका परिणाम जगत् अंगीकार करियेहै। तहां अग्निहोत्रविषै सायंकालमैं अरु प्रातःकालमैं हवनकरी दो ७२

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८५४ पंचमप्रपाठक ५ [छान्दोग्यो- प्राणज्येष्ठतादि पंचाग्निविद्या ३ गति वैश्वानरोपास्ति ज्ञातानिहोत्र २४

षट् प्रश्न हैं :- दो आहुतिनकी उत्कांति। गति। प्रतिष्ठा। तृप्ति। इस लोककेप्रति फेरि आवृत्ति अरु लोकेप्रति उत्थायी अरु कहिये (स्वर्ग) लोकके प्रति उत्थायी पुरुष [कैसैं होवैहै] :- ऐसैं॥ औ तिनका अपाकरण। तहां ( वाजसनेयकविषै)

आहुतिनकी इस लोकतैं उत्क्रांति (निर्गमन) होवैहै। औ उ- त्कांतभई तिन दो आहुतिनकी परलोककेप्रति गति होवैहै औ गत (गई तिन दो आहुतिन)की तहां प्रतिष्ठा होवैहै औ प्रतिष्ठितभई तिन दो आहुतिनकी अपनें आश्रयविषै प्राप्तभई नृप्ति होवैहै औ तृप्तिकूं संपादन करिके अवस्थित तिन दोनूं- की फेर इस लोककेप्रति आवृत्ति (आगमन) होवैहै औ आ- वृतभई तिन दो आहुतिनका आश्रय जो पुरुष सो उस (स्वर्ग) लोककेप्रति उत्थानशील कैसे होवैहै? ऐसें कार्यके आरंभकूं आश्रयकरिके याज्ञवल्क्यके षट् प्रश्न प्रवृत्तभये हैं। यह अर्थ है।। १३० तहां हीं वाजसनेयकविषै याज्ञवल्क्यके जनकके प्रतिवचन (उत्तर)कूं दिखावैहैं॥ इहां यह अर्थ है :- अपूर्वरूप हुयी दो आहुतियां उत्क्मण करनेवाले यजमानकूं परिवेष्टन करिके उक्रमणकूं करैहैं औ वे दो आहुतियां धूमादिकरि य- जमानके अंतरिक्षकेप्रति प्रवेश करतीहुयी ताके आश्रित हो- नेतें ता (अंतरिक्ष)केप्रति प्रवेश करैहैं॥ वे दो आहुतियां फेर अंतरिक्षविषै स्थित यजमानकी अनुकूलताकरि आप अंतरि- क्षरूप अधिकरणविषै स्थित हुयी ता (अंतरिक्ष)कूं आहवनीय

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पनिषत् ] चतुर्थ खंड ४ ८५५ पंचमप्रश्ननिर्णयमैं स्वर्गलोकरूपान्निविद्या २ हीं कहा है :- "वे प्रसिद्ध ये दो आहुतियां हु- तहुयी उक्रमण करै हैं। वे अंतरिक्षकेप्रति प्र-

अग्निकी न्यांई करैहैं। काहेतैं आहुतिके अधिकरणकूं आहव- नीयरूप अग्नि होनेतैं॥ तहां (अंतरिक्षविषै) वायुकूं समिधकी न्यांई करैहैं। काहेतैं वायुकरि अंतरिक्षकूं प्रदीप् हुया होनेतें। वे शुक (शुद्ध) आहुतिकी न्यांई मरीचिन (सूर्यके किरणन)कूं हीं धारण करैहैं। मरीचिनकूं अंतरिक्षविषै व्याप्त होनेतैं॥ औ वे दो आहुतियां अंतरिक्षविषै स्थित हुयी तिस (अंतरि- क्ष)विषै स्थित यजमानकूं फलके सन्मुख धारण करैहैं। वे फेर अंतरिक्षतैं उत्क्मणकूं करतेहुये यजमानके साथि उत्क्रमण करैहैं औ यजमानके स्वर्ग लोककेप्रति प्रवेश करतेहुये साथि प्रवेश करैहैं औ ता (स्वर्गलोक)केप्रति प्रवेश करिके ताहीकूं आहवनीयरूप अग्नि करैहैं। आदित्यकूं समिध करैहैं। इ- त्यादि अंतरिक्षकी न्यांईहीं कहा है। वा जैसै दो आहुतियां पूर्व अंतरिक्षके तांई तर्पण करैहैं ऐसें कहा। तैसैंहीं स्वर्ग- लोकविषै स्थित यजमानकूं फलदानकरि सुखी करैहैं औ वे आहुतियां प्रारब्धके क्षय हुये तिस स्वर्गलोकतैं यजमानके पृथिवीके प्रति प्रवेश करतेहुये जलरूप हुयी साथिहीं आव- र्तन (आगमन) करैहैं औ पृथिवीके प्रति प्रवेश करिके व्रीहि आदिकके साथि अपने आश्रयकूं मिलायके रेतके सिंचन क- रनेवाले पुरुषकेप्रति आश्रयरूप द्वारकरि प्रवेश करैहैं औ पु- रुषतैं रेतद्वारा द्वितीय प्रकृति (उपादान)के प्रति प्रवेश करिके गर्भरूप हुये अपने आश्रयकूं कर्म अनुष्ठानके योग्य देहका भागी संपादन करैहैं। तिसतें यह पुरुष पारलौकिक कर्मकूं

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८५६ पंचमप्रपाठक ५ [छान्दोग्यो- प्राणज्येष्ठतादि पंचाग्निविद्या शगति वैश्वानरोपास्ति ज्ञाताग्निहोत्र २४ वेश करैहैं। वे अंतरिक्षकूंहीं आहवनीय [ना- मक अनि] करे हैं। वायुकूं समिध [करै हैं]। मरीचिनकूं शुद्ध आहुति [करै हैं]। वे अंतरि- क्षके तांईं [स्थित हुयी यजमानकूं] तर्पण करै हैं (फलके सन्मुख करै हैं)। वे तिस (अंतरि- क्ष)तैं [यजमानके साथि] उक्रमणकरै हैं" इ- त्यादि। ऐसैंहीं पूर्वकीन्यांई स्वर्गलोकके तांईं [स्थित यजमानकूं] तर्पण (तृप्त) करैहैं वे तहां- तैं आवर्तन करै हैं। या (पृथिवी)केतांईं प्रवेश- करिके तर्पणकरिके पुरुषकेप्रति प्रवेश करैहैं। तिसतैं स्त्रीके प्रति प्रवेश करिके उस लोकके प्रति उत्थायी पुरुष होवैहै। ऐसें॥ तहीं (वा- जसनेयक)विषै अभनिहोत्रकी दोआहुतिनके का- र्यका आरंभमात्र इस (उक्त) प्रकारवाला हो- अनुष्ठान करिके अंतविषै लोककेप्रति उत्थानशील (जाने- वाला) होवैहै। ऐसैं सर्व जनक राजानें याज्ञवल्क्यके प्रति कहा॥ १३१ तथापि बृहदारण्यकविषै उक्त अरु इहां उक्त पं- चाग्निके प्रकरणके भेदकी सिद्धि कैसे है ? यह आशंका क रिके। उक्त अर्थकूंहीं संक्षेप करिके कहैहैं ॥ इहां वाजसने- यक ब्राह्मण "तहां" इस सप्तमीका अर्थ है।।

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पनिषत् ] चतुर्थ खंड ४ ८५७ पंचमप्रश्ननिर्णयमैं स्वर्गलोकरूपाग्निविद्या २ वैहै। ऐसैं कहा है॥ इहां तो अभिहोत्रके अ- पूर्वके विपरिणामरूप तिसकार्यके आरंभकूं पां- चप्रकारसैं विभागकरिके असिभावकरि उत्तर- मार्गकी प्राप्िकेसाधन उपासनकूं विधानकर- नेकूं इच्छतीहुयी श्रुति राजाके वचनद्वारा क- हैहै :- "हे गौतम! वह (स्वर्गरूप)हीं लोक अग्नि हैइत्यादि ॥ इहां दुग्धआदिक साधन- वाली श्रद्धापूर्वक आहवनीयरूप अभनि समिध धूम अर्चि (ज्वाला) अंगार अरु विस्फलिंगकरि १३२ प्रकृत श्रुतिके अर्थविशेषकूं दिखावैहैं॥ इहां पांच प्रकारसैं। याका स्वर्गलोक पर्जन्य पृथिवी पुरुष अरु स्त्रीरूप प्रकारोंकरि। यह अर्थ है। १३३ पंचाग्निके संबंधकूं अवतारदेके प्रथम पर्यायके ता- त्पर्यकूं कहैहैं॥ इहां यह लोक कहिये भूलोक तिसविषै। यह अर्थ है।। १३४ दो आहुतिनके जलसैं संबंधिपनैकी सिद्धिअर्थ वि- शेषण देतेहैं॥ इहां तिन दो आहुतिनके श्रद्धाभावकी सि- द्विअर्थ "श्रद्धापूर्वक ऐसें कहा॥ १३५ तिन दो आहुतिनका अधिकरण अग्नि है। इत्यादि कल्पनाविषै उपयोगी होनेकरि अन्य विशेषणकूं ग्रहण करैहैं॥

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८५८ पंचमप्रपाठक ५ [ छान्दोग्यो- प्राणज्येष्ठतादि पंचान्निविद्या श्गति वैश्वानरोपास्ति ज्ञातागिहोत्र २४ भावित (भावनाकरी) औ कैत्ताआदिक कार- कोंकरि भावित अरु अंतरिक्षके क्रमसैं उक्रम- णकरिके स्वर्गलोककेतांई प्रवेश करनेवाली सू- क्ष्मभूत अरु जलसमवायी होनेतैं जलशब्दकी वाच्य औ श्रद्दारूप हेतुवाली होनेतैं श्रद्धाश- ब्दकी वाच्य जे सायंकालविषै अरु प्रातःकाल- विषै अन्निहोत्रकी दो आहुतियां हुत (हवन- करी) होवैहैं तिनका अधिकरण अभनि औ तिस- संबंधी अन्य समिधआदिक है। ऐसैं कहिये है औ जो यह दो आहुतिनके अभनिआदिककी भावना है सोबी तैसेंहीं निर्देश करियेहै :- है गौतम ! वह (स्वर्गरूप) हीं लोक अभनि १३६ तिन दो आहुतिनकी स्वतंत्रताकूं परिहार करैहैं॥ इहां अधिकरण शब्द भावप्रधान होनेतें धर्मी (आश्रय) पर है औ स्वर्गलोक नामवाला जो अशनि है सो काल्पनिक (क- लपनाकरि किया) है औ तिस संबंधी। इहां तत् (तिस) शब्द अग्निकूं विषय करनेवाला है॥ १३७ औ अन्य। ऐसें उक्तकूं स्पष्ट करैहें ॥ इहा आदि शब्द धूम अर्चि अरु अंगार आदिककूं विषय करनेवाला है॥ १३८ पर्यायके तात्पर्यकूं कहिके ताके अक्षरनकूं व्याख्यान करैहैं॥ इधर "इहां" ऐसें इस लोकका कथन है सो पूर्वले

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पनिषत्] चतुर्थ खंड ४ ८५९ पंचमप्रश्ननिर्णयमैं स्वर्गलोकरूपाग्निविद्या २ है। जैसैं इहां (इसलोकविषै) अभिहोत्रका अ- धिकरण आहवनीय नामक अभि है तैसैं ॥ तिस स्वर्गलोकनामक अभनिका आदित्यहीं समित् है। जातैं तिस (आदित्य)करि प्रका- शित हुया वह लोक प्रदीप्त होवैहै। यातैं स- म्यकू इंधनतैं (प्रदीप्नकरनेतैं) आदित्य समित् है।। रश्मियां (सूर्यकेकिरण) धूम हैं तिस (सूर्य)तैं उत्थानतैं। जातैं समिधतैं धूम ऊठता है।। दिवस अर्चि (ज्वाला)है प्रकाशके सा- मान्यतैं औ दिवसकूं आदित्यका कार्य होनेतैं॥। चंद्रमा अंगार हैं। दिवसके उपशमके हुये अभिव्यक्ति (चंद्रमाके आविर्भाव)तैं। जातैं अ- चिके उपशम हुये अंगार अभिव्यक्त होवैहैं॥ नक्षत्र विस्फुलिंग हैं। चंद्रमाके अवयवनकी- न्यांई विप्रकीर्ण (विखरनें)पनैंके सामान्य- तैं।।१ । पदके साथि संबंधकूं पावताहै औ तिसतैं उत्थानतैं। इहां "तिस" शब्दकरि आदित्य ग्रहण किया है।

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५६० पंचमप्रपाठक ५ [छान्दोग्यो- प्राणज्येष्ठतादि पंचाग्निविद्या शगति वैश्वानरोपास्ति ज्ञाताग्निहोत्र २४ तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवाः श्रद्धां जु- अर्थ :- तिस इस अग्निविषै देव श्रद्धाकूं टीका :- तिस इस उक्तलक्षणवाले अग्नि- विषै देव कहिये अिआदिरूप अधिदैवतस्व- रूप यैजमानके प्राण। श्रद्धाकूं कहिये 'अभि- होत्रकी आहुतिनकी परिणामअवस्थारूप श्र- द्वाकरिभावित सूक्ष्मजल श्रद्धा कहिये हैं। का हेतैं "पचमी आहुतिके हुत हुये जल पुरुषव- चन होवैहैं" ऐसैं जलोंकूं होमनेकूं योग्य होने १३९ अध्यात्म अरु अधिदैवके विभागकरि देवनकूं वि- भाग करैहैं॥ १४० प्रत्ययविशेष (वृत्तिनका भेद) होनेकरि श्रद्धाकू होम करनेकी योग्यताका असंभव है ? यह आशंका करिके। श्रद्धाकूं व्याख्यान करैहैं। १४१ किंवा :- प्रश्न अरु उत्तरकूं एक अर्थवाले होनेतें औ प्रश्नविषै जलोंकूं होम करने योग्य होनेकरि सुने होनेतैं। उत्तरविषै वी श्रद्धा शब्दके वाच्य वे (जल) होम करनेकूं योग्य होनेकरि विवक्षित हैं। ऐसैं कहैहैं॥

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८६१ पनिषत् ] चतुर्थ खंड ४ पंचमप्रश्ननिर्णयमैं स्वर्गलोकरूपाग्निविद्या २ व्हति। तस्या आहुतेः सोमो राजा स- म्भवति॥२॥ इति पंचमप्रपाठकस्य चतुर्थः खण्डः ॥४॥ होमते हैं। तिस आहुतितैं सोम राजा सं- भवैहै॥ २ ॥ इति श्री०मूलभाषा• पंचमप्रपाठ०चतुर्थः खंड:४ करि प्रश्नविषै सुने होनेतैं श्रेंद्धाहीं आप (जल) हैं। औ श्रैद्वाकूंहीं आरंभ करिके संपादन क- रिके प्रवृत्त होतेहैं। ऐसैं जानियेहै। ता जल- १४२ ननु जलोंविषै श्रद्धाशब्दके वृद्धोंके व्यवहारकरि प्रयोगके अभावतैं ऐसें (श्रद्धाशब्दका अर्थ जल) बनैं नहीं ? यह आशंका करिके कहैहैं। १४३ ननु जल श्रद्धाशब्दकरि प्रसिद्धकी न्यांई कैसैं क- हियेहैं? तहां कहैहैं॥ इहां यह अर्थ है :- "श्रद्धापूर्वक हो- मकूं उद्देश करिके दुग्ध सोम अरु घृतआदिक होमके साध- नकूं संपादन करिके होमकूं करताहै" ऐसें तैत्तिरीयशाखा- वाले ब्राह्मण पठन करैहैं। तिसप्रकार हुये जलोंविषै श्रद्धा शब्द संभवैहै॥

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८६२ पंचमग्रपाठक ५ [छान्दोग्यो- प्राणज्येष्ठतादि पंचान्निविद्या श्गति वैश्वानरोपास्ति ज्ञातानिहोत्र २४ रूप श्रद्धाकूं होमते हैं। तिस आहुतितैं सोमराजा कहिये श्रद्धाशब्दके वाच्य अरु स्व- र्गलोकरूप अगनिविषै होम किये जलोंका परि- णामरूप सोमराजा (चंद्रमा) उपजता है। जैसे ऋग्वेदादिपुष्पका रस ऋक् आदिक भ्रम- रोंकरि गृहीत हुये वे आदित्यविषै रोहित (रक्त) आदिकरूपमय यशआदिक कार्यकूं आरंभ क- रतेहैं। ऐसैं पूर्व तृतीय अध्यायविषै कहा है। ऐसैं ये अनिहोत्रकी दो आहुतिनके संबंधि सूक्ष्म अरु श्रद्धाशब्दकेवाच्य जल स्वर्गलोकके- प्रति अनुप्रवेशकरिके अभनिहोत्रकी दो आहुति- नके फलरूप चांद्र कार्यकूं आरंभ करै हैं। औ तौके कर्त्ता यजमान आहुतिमय अरु आहुतिकी १४४ उक्त अर्थकूं दृष्टांतकरि स्पष्ट करैहैं॥ इहां कहाहै मधुविद्याविषै। यह शेष है औ चांद्र कार्यकूं। याका चंद्रके समीपस्थित तिसके सदृश शरीरकूं। यह अर्थ है।। १४५ तथापि यजमानोंका फलितपना कैसे है? यातैं कहैहैं। इहां "ताके कर्त्ता" इस शब्दविषै दो आहुतियां "तत् (ताके)" शब्दके वाच्य हैं॥ औ प्रधानपना आहुति मय। इस शब्दगत "मयट्" प्रत्ययका अर्थ है॥ १४६ तांहींकूं स्पष्ट करैहैं। इहां आहुतिकी भावनाकरि

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पनिषत्] चतुर्थ खंड ४ ८६३ पंचमप्रश्ननिर्णयमैं स्वर्गलोकरूपान्निविद्या २

भावनाकरि भावित अरु आहुतिरूप कर्मकरि आकर्षित अरु श्रद्धारूप जलकेसाथि संबंधवाले- हुये स्वर्गलोककेतांई अनुप्रवेश करिके सोम- भ्ूत (चंद्र सदृशरूपवाले) होवै हैं। जीतैं ति- सकेअर्थ तिनोंनैं अभिहोत्र होम किया है। इहां तो (आहवनीय अभनिविषै) आहुतिका प- रिणामहीं पंचाननिके संबंधके क्रमसैं मुख्यता- भावित। याका तिन (आहुतिन)करि सम्यक् स्तुत कहिये तिनके अनुसारि। अर्थ यह जो तिनके आश्रय।। १४७ तिसकरि भावितपनैके फलकूं कहैहैं॥ इहां तिस- करि आकृष्ट (आकर्षित)पना कहिये वशीकृतपना ।। १४८ आहुतिनकरि भावित। ऐसें उक्त अर्थकूं स्पष्ट क- रैहैं॥ इहां श्रद्धारूप जलके समवायी। याका तिस श्रद्धा- पूर्वक पय अरु सोम आदिककरि साध्य जो कर्म है ताके आश्रय। यह अर्थ है औ सोमभूत होवैहैं। याका तिस सोम शब्दके वाच्य चंद्रके समीपस्थित शरीरकूं पायके तिसके स्वरूपवाले होवैहैं। यह अर्थ है॥ १४९ ननु चंद्रका सारूप्य (समानरूपता) धर्मियोंकूं (श्र- द्धाके आश्रयभूत पुरुषनकूं) कैसैं फल होवैहै? यह आशंका करिके कहैहैं। १५० ननु यजमानोंका चंद्रभाव गतिविना नहीं सिद्ध होवै- है। तैसैं हुये गति कहनेकूं योग्य है? यह आशंका करिके कहै- हैं।। इधर आहवनीय अग्नि "इहां" इस सप्तमीका अर्थ है॥

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८६४ पंचमप्रपाठक ५ [छान्दोग्यो- प्राणज्येष्ठतादि पंचाग्निविद्या ३ गति वैश्वानरोपास्ति ज्ञाताभिहोत्र २४ अथ पंचमप्रपाठकस्य पंचमः खंडः।५॥ पर्जन्यो वाव गौतमाग्निस्तस्य वायु- अथ श्री०मूलभाषा० पंचमप्रपाठ०पंचमः खंडः॥ ५॥ अर्थ :- हे गौतम ! पर्जन्यहीं अग्नि है।

करि उपासनके अर्थ कहनेकूं वांछित है। यज- मानोंकी गति नहीं॥ अविद्वानोकि ता (गति) कूं तो धूमआदिकके कमसैं आगे यह श्रुति क- हैगी औ विद्वानोंकी विद्याकृत (उपासनाकि फलरूप) उत्तरा (उत्तरायणमार्गरूप गति)कूं क- हैगी॥ २ ॥ इति श्री०भाष्यभाषापंचमप्रपा०चतुर्थःखंड:४ अथ श्री०भाष्यभाषा०पंचमप्रपाठकस्य पंचमः खंड: ५ पंचमप्रश्ननिर्णयमैं पर्जन्यरूपाग्निविद्या २ टीकाः-द्वितीय होमपर्यायके अर्थकूं कहैहै :- १५२

१५१ सो (गति) तब कहां कहियेहै। जातैं ताके कथन- विना यथोक्त फल नहीं सिद्ध होवैहै। यातैं कहैहैं॥ इति श्री० पंचमप्रपाठकगतचतुर्थ खंडस्य टिप्पणम् ॥४ ॥ अथ श्री०पंचमप्रपाठकगत पंचम खंडस्य टिप्पणम्५ १५२ इहां द्वितीय होमके पर्यायके अर्थकूं कहैहैं। याका

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पनिषत् ] पंचम खंड ५ ८६५ पंचमप्रश्ननिर्णयमैं पर्जन्यरूपाग्निविद्या २ रेव समिदभ्रं धूमो विद्युदर्चिरशनिरङ्गा- रा ड्रादनयो विस्फुलिङ्गा:॥ १।।

ताका वायुहीं समित् है। अभ्र (बादल) धूम है। विद्युत् अर्चि है। अशनि अंगार हैं। व्हादिनि विस्फुलिङ्ग हैं ॥ १ ॥ हे गौतम ! पर्जन्य हीं अग्नि है। पर्जन्य नाम वृष्टिकी सामग्रीका अभिमानी देवतावि- शेष है॥ ताका वायुहीं समित् है। जातैं वायुकरि पर्जन्यरूप अभनि सम्यक् प्रदीप् हो- वैहै। पुरोवात (पूर्ववायु) आदिकके प्रबलप- द्वितीय होमका संबंधि जो द्वितीय पर्याय ताके अर्थकूं जना- वनेकूं तिसीहीं पर्यायकूं श्रुति ग्रहण करैहै। यह अर्थ है औ पुरोवातआदिक। इस आदिशब्दकरि वर्षाका हेतु वायुका भेद ग्रहणकरियेहै॥ औ बादलोंकी धूमकार्यता पौराणिकोंनैं कही है :- "यज्ञके धूमकरि उद्भववाला बादल तो द्विजोंका सदा हितरूप है औ दावाति (वनके अग्नि)के धूमकरि उप- ज्या बादल वनका हितरूप कहा है औ मृतकके धूमतैं उद्भ- ववाला बादल तो अशुभके अर्थ होवैगा औ हे द्विज! अभि- चार (शत्रुके मारण अर्थ कियेश्येनयागादिकर्म)के अग्निके धूमतैं उत्पन्न हुया [बादल] भूतनके नाशअर्थहीं कहाहै"॥ ७३

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८६६ पंचमप्रपाठक ५ [छान्दोग्यो- प्राणज्येष्ठतादि पंचान्निविद्या श्गति वैश्वानरोपास्ति ज्ञाताग्निहोत्र २४ तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवाः सोम९रा- जानं जु्कति। तस्या आहुतेर्वर्षश सम्भ- वति॥२॥ इति पंचमप्रपाठकस्य पञ्चमः खण्डः ॥५॥ अर्थः-तिस इस अग्निविषै देव सोम- राजाकूं होमते हैं। तिस आहुतितैं वर्षा सं- भवै है॥ २ ॥ इति श्री०मूलभाषा०पंचमप्रपाठ०पंचमः खंड:५ नैके हुये वृष्टिके दर्शनतैं॥ अभ्र (बादल) धूम है। धूमका कार्य होनेतैं औ धूमकीन्यांई लक्ष्यमाण (दृश्य) होनेतैं॥ विद्युत् अर्चि है। प्रकाशके सामान्यतैं॥ अशनि (वञ्र) अं- गार हैं। कठिन होनेतैं वा विद्युत्के साथि संबंधतैं॥। ्हादनि विस्फुलिंग हैं। व्हादनि गर्जितरूप शब्द हैं। मेघोंके मध्य विप्रकीर्ण- पनै(फैलते)के सामान्यतैं ॥ १॥ टीका :- तिस इस अग्निविषै देव पूर्वकी १५३ अध्यात्मरूप यजमानके प्राण (इंद्रिय) हैं। इंद्र आदिक तो अधिदैवतरूप देव हैं। ऐसैं कहैहैं।

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पनिषत् ] षष्ठ खंड ६ ८६७ पंचमप्रश्नके निर्णयमैं पृथिवीरूपाग्निविद्या २

अथ पंचमप्रपाठकस्य षष्ठः खंडः ।६। प्टथिवी वाव गौतमाग्निस्तस्याः सं-

अर्थः-हे गौतम ! पथिवीहीं अग्नि है।

न्यांईं सोमराजाकूं होमते हैं। तिस आहु- तितैं वर्षा संभवैहै। कहिये श्रद्धानामवाली जे आप वे सोमआकारसैं परिणामकूं प्राप्त हुयी द्वितीयपर्यायविषै पर्जन्यरूप अभनिकूं पा- यके वृष्टिपनैकरि परिणामकूं पावै हैं॥ इति०श्री०भाष्यभाषा०्पंचमप्रपाठकस्य पंचमःखंडः ॥५।। अथ श्री०भाष्यभाषा०पंचमप्रपाठकस्य षष्ठः खंडः ॥६॥ पंचमप्रश्नके निर्णयमैं पृथिवीरूपाग्निविद्या २ टीका :- हे गौतम ! प्टथिवीहीं अग्नि है। इत्यादि पूर्वकीन्यांईं है। तिस प्टथिवी नामक अग्निका संवत्सरहीं समित् (इंधन)है।

१५४ "सोम राजाकूं" इत्यादि वाक्यकूं व्याख्यान करैहैं। इति श्री० पंचमप्रपाठकगतपंचमखंडस्य टिप्पणम् ॥५॥

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८६८ पंचमप्रपाठक ५ [छान्दोग्यो- प्राणज्येष्ठतादि पंचान्निविद्या श्गति वैश्वानरोपास्ति ज्ञाताग्निहोत्र २४ वत्सर एव समिदाकाशो धूमो रात्रि- रचिर्दिशोऽद्वारा अवान्तरदिशो विस्फु- लिङ्गा: ।। १ ॥

ताका संवत्सरहीं समित् है। आकाश धू- म है। रात्रि अर्चि है। दिशा अंगार हैं। अवांतरदिशा विस्फुलिंग हैं॥१ ॥

जातैं संवत्सररूप कालकरि प्रदीप्तहुयी पृथिवी व्रीहिआदिककी सिद्धिअर्थ होवैहै॥ आकाश धूम है। पृथिवीतैं उत्थितकीन्यांईं आकाश देखियेहै। जैसैं अभ्नितैं धूम ॥I रात्रि अर्चि है। जातैं अप्रकाशरूप पृथिवीके अनुरूप (अ- नुसारिणी) रात्रि है। अंधकाररूप होनेतैं अ- िके अनुरूप अर्चिकीन्यांई॥दिशा अंगारहैं। उपशांतपनैके सामान्यतैं।अवांतर दिशा विस्फु लिंग हैं। क्षुद्र (तुच्छ)पनैके सामान्यतैं ॥ १॥

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पनिषत् ] सप्तम खंड ७ ८६९ पंचमप्रश्नके निर्णयमैं पुरुषरूपान्निविद्या २ तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवा वर्ष जक्कति तस्या आहुतेरन्न सम्भवति॥२॥ इति पंचमप्रपाठकस्य षष्ठः खण्डः ॥६॥ अथ पंचमप्रपाठकस्य सप्तमः खंडः॥७। पुरुषो वाव गौतमाग्निस्तस्य वागेव अर्थ :- तिसइसअग्निविषै देव वर्षाकूं होमतेहैं। तिस आहुतितैं अन्न संभवैहै॥२॥ इति श्री०मूलभाषा०पंचमप्रपा०षष्ठः खंडः ।।६।। अथ श्री०मूलभाषा०पंचमप्रपाठ० सप्तमः खंड:७॥ अर्थः-हे गौतम ! पुरुषहीं अग्नि है। टीका :- "तिसविषै" इत्यादि समान है॥ तिसआहुतितैं ब्रीहि यवादि अन्न उप- जताहै॥ २ ॥ इति श्री०भाष्यभाषा०पंचमप्रपाठकस्य षष्ठः खंडः ॥६॥ अथ श्री०भाष्यभाषा०पंचमप्रपाठकस्य सप्तमःखंडः।७।। पंचम प्रश्नके निर्णयमैं पुरुषरूपाग्निविद्या २ टीका :- हे गौतम ! पुरुषहीं अग्नि है। ताका वाकहीं समित् है। जातैं वाकूकरि मु-

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८७० पंचमप्रपाठक ५ [छान्दोग्यो- प्राणज्येष्ठतादि पंचाग्निविद्या श्गति वैश्वानरोपास्ति ज्ञातागनिहोत्र२४ समित्प्राणो धूमो जिव्हाऽर्चिश्रक्षुरङ्गा- राः श्रोत्रं विस्फुलिङ्गाः ॥ १ ॥ तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवा अन्नं जुव्हति। तस्या आहुते रेतः सम्भवति ॥ २॥ इति पंचमप्रपाठकस्य सप्तमः खण्डः ॥७॥ ताका वाक्हीं समित् है। प्राण धूम है। जिह्का अर्चि है। चक्षु अंगार हैं। श्रोत्र विस्फुलिंग हैं॥ १॥ अर्थ :- तिसइसअग्निविषै देव अन्नकूं होमतेहैं। तिस आहुतितैं रेत संभवैहै ॥२॥ इति श्री०मूलभाषा०पंचमप्र०सप्तमः खंड:।७। खसैं पुरुष सम्यक् प्रकाशित होवैहै मूकनहीं ॥ प्राण धूम है। धूमकीन्यांईं मुखतैं निर्गमन- तैं। जिझ्ा अर्चिहै। रक्त होनेतैं॥ चक्षु अंगार हैं। प्रभाका आश्रयहोनेतैं॥ श्रोत्र विस्फुलिंग हैं। विप्रकीर्णपनैं( फैलनैं) के सामान्यतैं ॥ १॥ टीका :- अन्य समान है। व्रीहिआदिक

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पनिषत् ] अष्टम खंड ८ ८७१ पंचमप्रश्नके निर्णयमैं योषित् रूपाग्निविद्या २ अथ पंचमप्रपाठकस्याष्टमः खंडः ॥८।। योषा वाव गौतमाग्निस्तस्या उपस्थ एव समिद्यदुपमन्त्रयते स धूमो योनि- रर्चिर्यदन्तः करोति तेऽद्गारा अभिनन्दा विस्फुलिङ्गा:॥ १ ॥

अर्थः-हे गौतम! योषाहीं अग्नि है। ताका उपस्थहीं समित् है। जो उपमंत्रण करियेहै सो धूम है। योनि अर्चि है। जो भीतर करताहै वे अंगार हैं। अि- नंद विस्फुलिंग हैं॥। १॥

संस्कारयुक्त (पाचित) अन्नकूं होमतेहैं। तिस आहुतितैं रेत(वीर्य) उपजताहै॥२॥

अथ श्री०भाष्यभाषा०पंचमप्रपाठकस्याष्टमः खंडः।।८।। पंचमप्रश्नके निर्णयमैं योषित्रूपाग्निविद्या २ टीका :- हे गौतम! योषा (स्त्री) हीं अभि

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८७२ पंचमप्रपाठक ५ [छान्दोग्यो- प्राणज्येष्ठतादि पंचान्निविद्या श्गति वैश्वानरोपास्ति ज्ञातागिहोत्र २४ तस्मिन्नेतस्मिन्नग्रौ देवा रेतो जुव्हति। अर्थ :- तिस इस अग्निविषै देव रेतकूं है।। ताका उपस्थहीं समित् है। जातैं ति- सकरि सो पुत्र आदिकके उत्पादनअर्थ प्रदीप्त होवैहै॥ जो उपमंत्रण (गुह्यभाषण) करिये- है सो धूम है। उपमंत्रणके स्त्रीकेसाथि संभ- वतैं ॥ योनि अर्चि है। रक्त होनेतैं ॥ जो भी- तर करताहै कहिये भीतर करता जो मैथुन- रूप व्यापार वे अंगार हैं। अधनिके साथि सं- बंधतैं॥ अभिनंद (सुखके लव) विस्फुलिंग हैं। क्षुद्र होनेतैं ॥ १ ॥ टीका :- तिस इस अभ्निविषै देव रेतकूं होमतेहैं। तिस आहुतितैं गर्भ संभवैहै (उपजताहै)॥ इसैरीतिसैं श्रद्धा सोम वर्षा अन्न अथ श्री.पंचमप्रपाठकगताष्टम खंडस्य टिप्पणम्4। १५५ "तिस आहुतितैं गर्भ संभवैहै" ऐसें कहा ताकूं स्पष्ट करैहैं॥ इहां श्रद्धा सोम वर्षा अन्न अरु रेतरूप हव-

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पीनषत ] अष्टम खंड ८ ८७३ पंचमप्रश्नके निर्णयमैं योषित्रूपाग्निविद्या २ तस्या आहुतेर्गर्भः सम्भवति ॥२॥ इति पंचमप्रपाठकस्याष्टमः खण्डः॥८।।

होमते हैं। तिस आहुतितैं गर्भ संभवै है॥ २ ॥

अरु रेतरूप पांच हवनोंके पर्यायविषै जो क्रम है तिसकरि वे आप (उक्तजल)हीं गर्भीभूत (गर्भरूप) होवैहैं। तहां जलोंके दो आहुतिनके समवायी(संबंधी)पनैतैं प्रधानभावकी विवक्षा है।। वे आप पंचमी आहुतिके हुत हुये पुरुष नामवाली होवैहैं ऐसैं है। पैरंतु केवल आ- नोंके पर्यायविषै जो क्रम है तिसकरि। याका यथोक्त रीति- करि श्रद्धासैं आदिलेके रेतपर्यत जे स्वर्गलोकसैं आदिलेके स्त्रीपर्यत पंचअग्नियोंविषै हवन हैं। तिनके एक एक पर्याय- विषै जो क्रम व्याख्यान किया तिसकरि। यह अर्थ है॥ १५६ ननु फेर जल कैसें गर्भरूप होवैहैं। अन्य भूतोंका वी गर्भभाव तुल्य है। काहैतैं ता (गर्भभाव)कूं पंचभूतनका कार्य होनेतें? यातैं कहैहैं॥ १५७ भूतनके मध्य [अमुख्यतासें अन्य च्यारी भूतनकूं

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८७४ पंचमप्रपाठक ५ [छान्दोग्यो प्राणज्येष्ठतादि पंचान्निविद्या शगति वैश्वानरोपास्ति ज्ञाताग्निहोत्र २४ पहीं सोमादिकार्यकूं नहीं आरंभ करैहैं औ आँप त्रिवृत्करणसैं रहित नहीं हैं ऐसें है।। त्रिवृत्कृतताके हुयेबी विशेषसंज्ञाका लाभ "यह पृथिवी है यह जल है यह अग्नि है"। ऐसैं अन्यतम (बहुतनकेमध्य एक)की बहुलतारूप निमित्तवाला देख्या है॥ तांतैं कथन कियेहीं कार्यकी आरंभकताके होते वी] जलोंका प्रधानभावसैं वि- वक्षाकरिहीं निर्देश क्यूं है। औ केवल तिन जलोंकी हीं का- यंके आरंभकताकी विवक्षा (कहनेकीइच्छा) क्यूं नहीं हो- वैगी? तहां कहैहैं॥ इहां यह अर्थ है :- अन्यभूतनकी सहा- यकतासैं रहित केवल जलोंकूंआरंभकताके हुये जो आरंभ किया कार्य सो भोगकास्थान नहीं होवैगा। काहैतैं ता (केवल जलतैं किये कार्य)कूं जलबुद्ुदकी न्यांई अत्यंत चंचल होनेतें ॥ १५८ केवल जलोंके जलपनैकूं अंगीकारकरिके कहा। अब सोई (जलकी केवलता) नहीं है। ऐसें कहैहै। ऐसें कहैहैं॥ इहां इति शब्द जो है सो "तिन (तेज जल अरु पृथिवीरूप तीनभूतन)के मध्य एक एककूं त्रिवृत् (तीनप्रकारकी) करताअया" इस श्रुतितैं। इस हेतुरूप अर्थवाला है। १५९ सर्वकी त्रिवृत् करणकरि युक्तताके हुये देख्या जो विशेषकथन सो कैसें घटेगा? यह आशंका करिके कहैहैं॥ १६० जलोंके प्रधानभावकी विवक्षाकरि प्रश्न उत्तर दो- नूंविषै अपू (जल) शब्द है। ऐसें उक्त अर्थकूं उपसंहार क-

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पनिषत् ] अष्टम खंड ८ ८७५ पंचमप्रश्नके निर्णयमैं योषित्रूपाग्निविद्या २ भूत जलकी बहुलतातैं कर्मसैं संबंधि हुये सोम- आदिक कार्यके आरंभक "आप (जल)" ऐसैं कहियेहैं औ सोम' वृष्टि अन्न रेत अरु देह इनविषै द्रव (द्रवीभाव)की बहुलता देखियेहै औ शरीर यद्यपि पार्थिव है [तथापि] बहुद्रव (बहुत आर्द्र) है।तहां (योषारूप अग्निविषै)पंचमी आहुतिके हुत (हवनकिये) हुये रेतरूप हुयी आप गर्भीभूत (पुरुषनामवाली) होवैहैं॥ २ ॥ इति श्री०भाष्यभाषा० पंचमप्पाठकस्याष्टमःखंडः।।८।। रैहैं॥ इहां तातैं। याका केवल जलोंके असद्भावतैं। यह अर्थ है। १६१ आरंभक भूतनविषै जलोंका बहुलपना कैसैं जान्या है? यह आशंका करिके। कार्यद्वारा ताका ज्ञान होवैहै। ऐसें कहैहैं॥ १६२ सोम (चंद्र) आदिकनके मध्य जलकी बहुलता (अधिकता)के हुये बी पृथिवीके कार्य शरीरकूं ता (जल)की बहुलता कैसैं है? यह आशंका करिके कहैहैं॥ १६३ पंचम प्रश्नके निर्णयकूं उपसंहार करनेकूं अवतरणि- काकूं करैहैं॥ इहां "तहां" याका योषारूप अग्निविषै। यह अर्थ है औ गर्भरूप हुये पुरुषवचन (पुरुषशब्दके वाच्य) होवैहैं। ऐसैं संबंध है॥ इति श्री०पंचमप्रपाठकगताष्टसखंडस्य टिप्पणम् ॥८।।

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८७६ पंचमप्रपाठक ५ [छान्दोग्यो- प्राणज्येष्ठतादि पंचाग्निविद्या श्गति वैश्वानरोपास्ति ज्ञाताग्निहोत्र २४ अथ पंचमप्रपाठकस्य नवमः खंडः।।९। इति तु पञ्चम्यामाहुतावापः पुरुष- अथ श्री० मूलभाषापंचमप्रपाठकस्य नवमः खंड: ९ अर्थ :- इस रीतिसैं तो पंचमी आहु- तिके हुत हुये आप (जल) पुरुषवचन अथ श्री०भाष्यभाषा०पंचमप्रपाठकस्य नवमःखंड:।।९।। प्रथम प्रश्नोपकम-कर्मसैं गमनागमनवान् जीवके अग्निसंबंधी जन्मनाश २ टीका :- इसरीतिसैं तो पंचम आहुतिके होम किये हुये आप (जल) पुरुषवचन (पु- रुष नामवाली) होवैहैं। ऐसैं एक (पंचम) प्रश्न व्याख्यान किया॥ औ जो स्वर्गलोकतैं इस पृ- १६५

अथ श्री० पंचमप्रपाठकगतनवमखंडस्य टिप्पणम् ९ १६४ उक्त अर्थविषै वाक्यकूं जोडतेहैं॥ १६५ ननु जलोंके गर्भभावकी उत्तिमात्रकरि पुरुष नाम- चानूपनैकूं निर्णीत होनेतैं उत्तर ग्रंथकरि बहुतभया ? यह आशंका करिके। ता (उत्तर ग्रंथ)के तात्पर्यकूं कहैहैं॥ इहां दो आहुतिनका संबंधी। यह शेष है औ प्रासंगिक। याका

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पनिषत्] नवम खंड ९ ८७७ कर्मसैं गमनागमनवान् जीवके अग्निसंबंधी जन्मनाश २ वचसो भवन्तीति स उल्बाSडटतो गर्भो दश वा नव मासानन्तः शयित्वा यावद्ाऽथ जायते ॥ १॥ होवैहैं ऐसैं [व्याख्यानकिया]॥ सो गर्भ उल्बकररि आवत हुया दश वा नव मास भीतर शयनकरिके वा जितनेकाल- करि अनंतर जन्मता है ॥१॥

थिवीके प्रति पुनरागमनकूं प्राप्तभई दो आहु- तिनका संबंधी जीव । पुरुषके प्रति अरु स्त्रीके प्रति क्रमसैं प्रवेश करिके लोकके प्रति उत्था- यी होवैहै। ऐसैं वाजसनेयकविषै कहा है। सो प्रसंगसैं प्राप्तअर्थ इहां कहियेहै औ इहां गर्भभावकी उक्तिके प्रसंगतैं आगत। यह अर्थ है औ "इहां', ऐसें प्रकृत श्रुतिकी उक्ति है।। १६६ प्रसंगप्राप्त संगतिकूं त्यागिके साक्षात्हीं पूर्व उ- त्तर ग्रंथनकी संगतिहै। ऐसैं अन्य तात्पर्यकूं कहैहैं॥ इहां यह अर्थ है :- प्रजाओंका ऊर्ध्वगमन उत्तरग्रंथविषै (आगे) निरूपण करियेगा। तिसअर्थ होनेकरि तिन प्रजाओंकी उत्पत्ति जो है सो आदिविषै कहियेहै॥ ७४

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८७८ पंचमग्रपाठक ५ [छान्दोग्यो- प्राणज्येष्ठतादि पंचान्निविद्या श्गति वैश्वानरोपास्ति ज्ञातान्निहोत्र २४ प्रथम प्रश्नविषै "इस [लोक]तैं ऊपर प्रजा जा- वैहैं। सो क्या जानता हैं"? ऐसैं कहा। ताका यह उपक्रम (आरंभ)है। सो आहुतिरूपकर्मकी संबंधिनी अरु श्रद्धाशब्दकी वाच्य आप (जल)का पंचम परिणामविशेष गर्भ उल्ब (जरायु) करि आवृत (वेष्टित) हुया दश वा नव मासपर्यंत माताकी कुक्षिके भीतर शयन करिके जितनैं न्यून वा अधिक कालकरि अनंतर जन्मकूं पावताहै। इहां "उर्ल्व-

१६७ दो प्रकारसैं संगतिकूं कहिके । अव वाक्यके अ- क्षरनकूं योजना करैहैं॥ इहां सोम वृष्टि अन्न अरु रेतकूं अपेक्षाकरिके गर्भनामवाले परिणामका पंचमपना देखनेकूं योग्य है औ जलोंके प्रकृतपनैके प्रकाशकरनेअर्थ "आहुति" इत्यादि जलके दो विशेषण[ भाष्यविषै]हैं। अथवा पूर्वोक्त कालतैं न्यून वा अधिक जितने कालकरि जंतु समग्रअंगवाला होवैहै तितने कालकरि कुक्षिविषै शयनकरिके। ऐसैं संबं- धहै। अनंतर योनितैं निर्गमनके कारणभूत कर्मके आविर्भा- वतैं। यह शेष है। १६८ ननु उल्बकरि आवृतपना । कुक्षिविषै चिरकाल शयन अरु योनितैं निःसरण (निकसना)। यह संपूर्ण अति प्रसिद्ध है। सो श्रुतिकरि क्यूं कथनकरियेहै? तहां कहैहैं॥

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पनिषत्] नवम खंड ९ ८७९ कर्मसैं गमनागमनवान् जीवके अग्निसंबंधी जन्मनाश २

करि आवृत" इत्यादि यह वैराग्यके हेतुतैं क- हियेहै। जातैं मूत्र पुरीष (विष्ठा) वात पित्त अरु श्लेष्म (कफ)आदिककरि पूर्ण माताके उदरविषै तिन (उक्तमलों)करि अनुलिप् अरु उल्बरूप अशुचि पटकरि आवृत अरु रजवी- र्यरूप अशुचिबीजवाले अरु माताकरि भक्षण- किये अन्न अरु पान किये वस्तुनके रसके अ- नुप्रवेशकरि बढनेवाले अरु निरुद्ध शक्ति बल वीर्य तेज बुद्धि अरु चेष्टावाले गर्भका शयन कष्ट है। तिसतैं योनिरूप द्वारकरि पीडितका

१६९ याकी वैराग्यरूप अर्थवान्ताकूं स्पष्ट करैहैं॥ इहां श्लेष्मआदि। इस आदि शब्दकरि रुधिर पूय स्नायु अरु मजाआ- दिक ग्रहण करियेहैं औ तिनकरि अनुलिप्त [ का ]। यह तत् (तिन ) शब्द। मूत्र अरु पुरीष आदिक विषय (अर्थ) वा- लाहै औ शक्ति कहिये बुद्धिका सामर्थ्य औ बल कहिये दे- हका सामर्थ्य औ वीर्य कहिये इंद्रियनका सामर्थ्य औ तेज कहिये शरीरगत कांति औ प्रज्ञा कहिये चेतनारूप जीवन- धर्म औ चेष्टा कहिये प्राणका धर्म। वे निरुद्ध (रोके) हैं जिसके तिस गर्भका। ऐसैं विग्रह है।। १७० माताके उदरविषै शयन करनेवालेकूं कष्टवान्ताके- हुयेबी ताके उदरतैं योनिद्वारा निकसना सुखकर होवैगा ? ऐसें जो कहै। सो बनै नहीं। ऐसैं कहैहैं॥

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८८० पंचमप्रपाठक ५ [छान्दोग्यो- प्राणज्येष्ठतादि पंचाग्निविद्या शगति वैश्वानरोपास्ति ज्ञाताग्निहोत्र २४ स जातो यावदायुषं जीवति। तं प्रेतं अर्थः-सो जन्म्या हुया यावत् आ- युष जीवताहै॥ तिस प्रेत अरु दिष्टकूं निःसरणरूप जन्म अतिशयकरि कष्ट है। ऐसैं श्रुति वैराग्यकूं ग्रहण करावै है॥ औ जो मुँहूर्त्त- पर्यंत वी दुःसह है। सो दश वा नव मासप- र्यंत अतिदीर्घकाल भीतर (माताके उदरविषै) शयनकरिके [बाहिर निकसना अति दुःसह है। ऐसैं श्रुति वैराग्यकूं ग्रहण करावैहै] ॥ १॥ टीका :- सो ऐसैं जन्मकूं पायाहुया यावत् १७१ ताकी ग्राहकताके प्रकारकूंहीं आकारकरि दिखा- वैहैं॥ इहां यह अर्थ है :- जो माताके भीतर (उदरविषै) शयन मुहर्त्त (दो घटिका) पर्यत बी दुःसह है। सो दीर्घ- काल शयन करनेकूं कैसैं शक्य होवै औ दश वा नव मास- पर्यत भीतर शयनकरिके फेर योनिद्वारा दुष्कर निःसरण जो दुःसह्य (सहनकरनेकूं अशक्य) है सो कैसें होवै । इसप्र- कारसें श्रुति वैराग्यकूं ग्रहण करावैहै। १७२ ननु जन्मकूं प्राप्तभये जंतुकूं फेर अनर्थ नहींहै? यह आशंकाकरिके कहैहैं॥

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पनिषत्] नवम खंड ९ ८८१ कर्मसैं गमनागमनवान् जीवके अग्निसंबंधी जन्मनाश २ दिष्टमितोऽग्रय एव हरन्ति।यत एवेतो यतः सम्भूतो भवति ॥ २ ॥ इति पंचमप्रपाठकस्य नवमः खण्डः॥९॥ इस (ग्राम) तैं अभनिकेअर्थहीं लेजातेहैं। जाहींतैं इसतैं [आया] है औ जातैं सं- भूत होवैहै॥ २ ॥ इति श्री०मूलभाषा०पंचमप्रपाठ०नवमः खंड:९ आयु कहिये पुनः पुनः घटीयंत्रकीन्यांईं गम- नागमनकेअर्थ वा कुलालचक्रकीन्यांई तिर्यक् (टेढे) भ्रमणकेअर्थ कर्मकूं करता हुया यावत् कर्मकरि संपादित आयु है तावत् जीवताहै। तिस इस क्षीण आयुष्वाले प्रेत (मृत) १७३ यावत् आयुष। इसपदकूं व्याख्यान करैहैं॥ इहां यह अर्थ है :- घटीयंत्रकीन्यांई ऊर्ध्वगमनअर्थवा निषिद्ध कर्मकूं पुनः पुनः आचरताहुया जहां लगि कर्मकरि संपादनकिया आयु है तहांलगि इस देहविषै जीवताहै। तदनंतर मरताहै। तैसैं हुये जन्मकेतांई प्राप्तभयेकूं मृत्युके निश्चयतें सम्यक् ज्ञानविना कल्याणकी प्राप्ति नहींहै।। १७४ ननु तब मृतभये जंतुकी कृतकृत्यता (कृतार्थता) होवैगी? यह आशंकाकरिके कहैहैं॥

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८८२ पंचमप्रपाठक ५ [छान्दोग्यो- प्राणज्येष्ठतादि पंचाग्निविद्या श्गति वैश्वानरोपास्ति ज्ञाताग्निहोत्र २४ अरु दिष्टकूं कहिये परलोककेप्रति कर्मकरि निर्देशकिये जंतुकूं [ जँवे जीवता हुया वैदिकक- र्मविषै वा ज्ञानविषै अधिकारी होवै। तब तिस इस मृतकूं] इस आ्मतैं ऋत्विक् वा पुत्र अग्निकेअर्थ (अंत्यकर्मकेअर्थ) लेजातेहैं। जाँहींतैं इस अभनितैं श्रद्धा आदिक आहुति- नके क्रमसैं आया है औ जातैं पंचअभिनतैं संभूत (क्मतैं उत्पन्न) होवैहै [ यातैं ] तिसीं- हीं अभनिकेअर्थ लेजाते हैं। अर्थ यह जो :- अ- पनीहीं योनि (कारण) अगनिके प्रति प्राप्त क- रैहैं। यह अर्थ है ॥ २ ॥ इति श्री०भाष्यभावा०पंचमप्रपाठकस्य नवमः खंडः।९।। १७५ ननु तव सर्व मृत (मरेजंतु) कूं परलोकीपना होवैगा? ऐसे जो कहै। सो बनै नहीं। ऐसे कहैहैं॥. इहां तव परलोककेप्रति कर्मकरि निर्देशकियेकूं। ऐसें पूर्वकेसाथि संबंध है।। १७६ औ सो मृतका अग्निकेअर्थ लेजाना युक्त है। ऐसें कहैहैं।। इति श्री०पंचमप्रपाठकगतनवमखंडस्यटिप्पणम् ॥ ९॥

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पनिषत्] दशम खंड १० ८८३ साधिकारी उत्तरमार्ग दक्षिणमार्ग औ तृतीयस्थान १० अथ पंचमप्रपाठकस्य दशमः खंड: १० तद्य इत्थं विदुर्ये चेमेऽरण्ये "श्रद्धा त- प" इत्युपासते तेऽर्चिषमभिसम्भवन्त्य-

अथ श्री०मूलभाषा०पंचमप्रपाठकस्य दशमः खंड:१० अर्थ :- तहां जे इस प्रकारसैं जानते हैं औ जे ये अरण्यविषै"श्रद्धा अरु तप"ऐसैं (इस आदिककू) उपासतेहैं। वे अर्चिकूं पावतेहैं। अ्चितैं दिवसकूं। दिवसतैं

अथ श्री०भाष्यभाषापंचमप्रपाठ०दशमः खंड: १० १-४ प्रश्ननिर्णय-साधिकारी उत्तरमार्ग दक्षिणमार्ग औ तृतीयस्थान १० टीका :- ८.३७७ इस[ लोक ] तैं ऊर्ध्व प्रजा जिसकेप्रति प्रयाण करैहैं [ सो क्या] जान- ताहैं" यह प्रथम प्रश्न निराकरण करनेकी यो-

अथ श्री०पंचमप्रपाठ०दशमखंडस्य टिप्पणम्॥१०॥ १७७ "सो उल्बकरि आवृत" इत्याहि वाक्यकरि उक्त अर्थकूं अनुवाद करैहैं॥ इहां प्रत्युपस्थित। याका प्रजाकी उत्पत्तिके दिखावनेकरि प्रसंगतैं प्राप्त है। यह अर्थ है॥

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८८४ पंचमप्रपाठक ५ [छान्दोग्यो- प्राणज्येष्ठतादि पंचाग्निविद्या श्गति वैश्वानरोपास्ति ज्ञाताग्निहोत्र २४ चिषोऽहरह्वआपूर्य माणपक्षमापूर्यमाण- पक्षाद्यान् षडुदङ्गेति मासा एस्तान्॥१॥

शुकपक्षकूं। शुक्ठपक्षतैं जिन षट्मासनकूं [सूर्य] उत्तरदिशाकेतांई जाता है तिन (मासन) कूं॥१॥

ग्यताकरि स्थित है। तहां लोकके प्रति उत्थित १७९

(उत्पन्न ) अधिकारी गृहस्थनके मध्य जे "स्वर्गलोकआदिक अग्नियोंतैं हम क्रमकरि उ- पजेहुये अभिस्वरूप अरु पंचाशिरूप आत्मावाले हैं" ऐसें यथोक्त पंचाम्निके दर्शनकूं जानते

१७८ "तहां जे ऐसैं जानतेहैं" इस वाक्यकूं व्याख्यान करैहैं॥ १७९"तहां" इस सप्तमीके अर्थकूंहीं स्पष्टकरैहैं ॥ इहां पष्ठी जो है सो निर्धारणरूप अर्थवाली है॥ १८० जाननेके प्रकारकूंहीं अनुवाद करैहैं॥ इहां वे अ- र्चिकूं प्राप्त होतेहैं। ऐसैं उत्तर (अनंतरके वाक्यकेपद) विषै संबंध है।।

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पनिषत्] दशम खंड १० ८८५ साधिकारी उत्तरमार्ग दक्षिणमार्ग औ तृतीयस्थान १०

हैं।। ॥ ननु इस प्रकारसैं जानते ऐसें गृहस्थ- हीं कहिये हैं अन्य नहीं। यह कैसैं जानिये है? [तहां कहैहैं :- ]म्रहस्थनके मध्य "जे तो ऐसैं नहीं जाननेवाले केवल इष्ट पूर्त अरु दत्तके प- रायण हैं वे धूमआदिककरि चंद्रकेतांईं जातैं हैं" ऐसैं यह श्रुति आगे कहैगी॥ औ जे अ- १८३

रण्यकरि उपलक्षित वैखानस (वानप्रस्थ) औ परिब्राजक (संन्यासी) हुये "श्रद्धा अरु तप" ऐसैं उपासतेहैं। तिनके ऐसैं (उक्तप्रकारसैं) जान- नेवालोंकेसाथि अर्चिआदिककरि गमनकूं आगे कहैगी । पीरिशिष्यतैं औ 'असिहोत्रकी दो १८१ ननु साधारण उक्तिका विशेषविषै संकोच जो है सो हेतुविना नहीं सिद्ध होवैहै ? ऐसैं पूर्ववादी शंका करैहै॥ १८२ पारिशेष्य संकोचका करनेवालाहै। ऐसैं सिद्धांती परिहार करैहैं॥ इहां षष्ठी निर्धारणविषै है औ यातैं केवल कर्मी गृहस्थ "नहीं जानतेहैं" ऐसें ग्रहणकरनेकूं योग्यहैं। यह शेष है।। १८३ ननु परिव्राजक औ वानप्रस्थ ग्रहणकिये चाहिये? ऐसें जो कहै। सो बनै नहीं॥ १८४ तब किनोंका इहां ग्रहण है? यातैं कहैहैं॥ १८५ गृहस्थविषैहीं अन्यहेतुकूं करैहैं। इहां यह अर्थ

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८८६ पंचमप्रपाठक ५ [छान्दोग्यो- प्राणज्येष्ठतादि पंचाग्निविद्या शगति वैश्वानरोपास्ति ज्ञाताग्निहोत्र २४ आहुतिनकेसाथि संबंधतैं "इसप्रकारसैं जान- तेहैं" ऐसैं गृहस्थहीं ग्रहण करियेहैं॥॥नैतु ग्रामकी श्रुतिकरि ग्रहण किये अरु अरण्यकी श्रुतिकरि अनुपलक्षित ब्रह्मचारी बी विद्यमान हैं। पारिशेष्यकी सिद्धि कैसैं होवैगी? यहँ

है :- तिन दो आहुतिनके अपूर्वके परिणामस्वरूप जगत्कूं इहां पांच प्रकारसें विभाग करिके अग्निभावकरि दर्शन उ- त्तरमार्गकी प्राप्तिका साधन विधान करियेहै। यातैं विद्याके तिन (गृहस्थन) सैं संबंधतै गृहस्थनकूंबी तिस (विद्या) सैं संबंधकूं प्राप्तहोनेतैं तिन गृहस्थनकाहीं इहां ग्रहण उचित है।। १८६ पारिशेष्यकेप्रति पूर्ववादी आक्षेप करैहै।। इहां यह अर्थहैः-ग्रामविषै पत्नीसहित वास होवैहै औ ब्रह्मचारी- नका पत्नीसैं संबंध नहींहै। तातैं ब्रह्मचारी ग्रामश्रुतिकरि ग्रहणकिये नहीं औ गुरुकुलविषै निवासी होनेतैं अरण्य श्रुतिकरि उपलक्षित नहींहैं। तातैं इहां तिन(ब्रह्मचारीन)के ग्रहणके संभवतैं पारिशेष्य नहीं है। १८७ क्या नैष्टिक ब्रह्मचारी इहां "ऐसें जानतेहैं" इस प्रकारसें ग्रहणकरियेहैं किंवा उपकुर्वाणक ब्रह्मचारी? ऐसैं वि- कल्पकरिके सिद्धांती प्रथमपक्षकूं दूषणदेतेहैं ॥। इहां यह अर्थ है :- "उर्ध्वरेता यतिनके अष्टाशीति सहस्र (८८०००) हैं जो तिनका स्थान कहा है सोई गुरुवासिनका है" इ- त्यादि पुराणरूप स्मृतिकी श्रुतिमूलकताकरि प्रमाणतातैं

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पनिषत्] दशम खंड १० ८८७ साधिकारी उत्तरमार्ग दक्षिणमार्ग औ तृतीयस्थान १०

दोष बनै नहीं :- पुराणरूप स्सृतिके प्रामाण्यतैं ऊर्ध्वरेता नैष्ठिक ब्रह्मचारीनका अर्यमातैं उत्त- रकरि मार्ग प्रसिद्ध है। यातैं वे (नैष्ठिक ब्र- ह्मचारी)बी अरण्यवासिनकेसाथि गमनकरैंगे। उपकुर्वाणक (गुरुकुलतैं समावर्त्तनकरनेवाले ब्र- ह्मचारी) तो स्वाध्याय (वेदाध्ययन)के ग्रहण- रूप अर्थवाले हैं यातैं विशेषनिर्दशके योग्य

ऊ्ध्वरेता नैष्टिकव्रह्मचारीयोंका आदित्यसैं संबंधवाले उत्तरा- यणकरि उपलक्षित देवयान नामक मार्ग जितनेकरि प्रसिद्ध है। तातैं तिनकूं अरण्यवासियोंके साथि अखंडव्रह्मचर्यक- रिहीं अर्चिरादिगतिके लाभतैं पंचान्निवित्पनैसैं प्रयोजन नहीं है। यातैं पारिशेष्यकी सिद्धि है। १८८ द्वितीय विकल्पके प्रति कहैहैं ।। इहां यह अर्थ है :- जातैं वे उपकुर्वाणक ब्रह्मचारी स्वाध्यायके ग्रहणरूप अर्थवालेहैं। वे तिस (स्वाध्याय) के ग्रहण किये हुये स्वइ- च्छाके वशतैं अन्य आश्रमकूं ग्रहणकरतेहुये ता (अन्य आ- श्रम) के फलकरिहीं फलवाले होवैहैं। यातैं वे गृहस्थ आदिकनतैं विभागकरिके "ऐसें जानतेहैं" इसरातिसैं निर्दे- शकूं योग्य नहींहैं॥ औ क्या नैष्ठिक ब्रह्मचारीनकूं उत्तरमार्ग- की प्राप्तिके संभवतैं "ऐसें जाननेवानूपना" व्यर्थ प्राप्तभया। ऐसें श्रुतिके विरोधतैं द्वितीयपक्षविषैतो पारिशेष्यकी अ- सिद्धिकी तुल्य अवस्था है? यह उक्त समाधानके पीछे"ननु" इत्यादिवाक्यकरि भाष्य (टीका)विषै कही शंकाका अर्थ है॥

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८८८ पंचमप्रपाठक ५ [छान्दोग्यो- प्राणज्येष्ठतादि पंचान्निविद्या शगति वैश्वानरोपास्ति ज्ञाताग्निहोत्र २४ नहीं हैं।।॥ ननु ऊर्ध्वरेतापना जब पुराणरूप स्मृतिके प्रामाण्यतैं उत्तरमार्गकी प्राप्तिका का- रण अंगीकार करियेहै। तब इसप्रकारसैं जा- ननेवालेपना व्यर्थ प्राप्तहुवा? सो कथनबनै नहीं :- काहेतैं गृहस्थनके प्रति अर्थवान् होनेतैं। जे गृहस्थ ऐसैं नहीं जाननेवाले हैं तिनका स्व- भावतैं दक्षिणरूप धूमादिमार्ग प्रसिद्ध है। तिन (गृहस्थन)के मध्य जे इस प्रकारसैं [पं- चाभिके दर्शनकूं] जानते हैं। वा अन्य सगुण- ब्रह्मकूं जानतेहैं "अनंतर जोईबी इस (वि-

१८९ क्या ऐसें जाननेवानूपना नैष्ठिकब्रह्मचारीयोंकेप्रति व्यर्थ है ऐसें कहियेहै किंवा सर्वके हीं प्रति व्यर्थहै ऐसें क- हियेहै ? इसरीतिसैं विकल्परिके सिद्धांती प्रथमपक्षकूं अंगी- कारकरिके द्वितीयपक्षकूं दूषणदेतेहैं॥ १९० तिन गृहस्थनके प्रति ऐसें जाननेवान्पनैके अर्थ- वानूपनैकूं विभागकरिके समर्थनकरैहैं ॥ इहां स्वभावतैं। याका तिनकरि अनुष्ठित इष्ट अरु पूर्त्तरूप कर्मके बलतैं । यह अर्थ है औ तिनहीं गृहस्थनके मध्य जे केईक उक्तप्र- कारसैं ऐसे पंचाग्निके दर्शनकूं जानतेहैं वा अग्नियोंतैं अन्य सगुणब्रह्मकूं जानतेहैं वे देवयानरूप उत्तरमार्गकरि गमन करतेहैं। ऐसें संबंध है।। १९१ गृहस्थनकूं केवल पंचासनिका वेत्तापनाहीं नहीं

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पनिषत् ] दशम खंड १० ८८९ साधिकारी उत्तरमार्ग दक्षिणमार्ग औ तृतीयस्थान १० 1

मासेभ्यः संवत्सर संवत्सरादादि अर्थः-मासनतैं संवत्सरकूं। संवत्स-

द्वान्) विषै शव्य (शवसंबंधी दाहादिकर्म)कूं करते हैं औ जब नहीं करते हैं। [तौबी] अ- र्चिकूंहीं जाते हैं" इस लिंगतैं वे (सगुणब्रह्मके उपासक) उत्तरमार्गकरि जाते हैं।। ॥ नतु ऊर्ध्वरेताओंके औ गृहस्थोंके आश्रमीपनैके स- मान हुये [गृहस्थनकूं] अभिहोत्र आदिक वै- दिक कर्मकी बहुलताके होते। ऊर्ध्वरेताओंका है किंतु सगुण ब्रह्मका वेत्तापनाबी तिनकूं है। ऐसैं प्रमाणकूं कहैहैं ॥। इहां यह अर्थ है :- अंत्य इष्टिके करण अरु अकरणके अविशेष (तुल्यता)करि ब्रह्मवेत्ता ( सगुणव्रह्मके उपासक) नकूं अर्चिरादि गतिके श्र- वणतैं गृहस्थनकूंबी ब्रह्मवेत्तापना होवैहै। ऐसें जानिये है औ परिव्ाजक आदिकनविषै अंत्यइष्टिके असंभवकरि वि- द्याकी स्तुतिकूंबी दुःखसैं कहनेकूं योग्य होनेतैं।। १९२ विहितपनैकी तुल्यतातैं आश्रमोंकी तुल्यताकूं आश्रयकरिके पूर्ववादी शंकाकरैहै। १९३ आश्रमोंकी समताकूं कहिके गृहस्थनविषै विशे- पकूं पूर्ववादी दिखावैहै॥ इहां यह अर्थहैः-वैदिक कर्म ब- हुत हैं औ [ गृहस्थनकूं] तिनकी बहुलताके हुये। अवि- ७५

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८९० पंचमप्रपाठक ५ [छन्दोग्यो- प्राणज्येष्ठतादि पंचान्निविद्या शगति वैश्वानरोपास्ति ज्ञाताग्निहोत्र २४ त्यमादित्याचन्द्रमसं चन्द्रमसो विद्युतं

रतैं आदित्यकूं। आदित्यतैं चंद्रमाकूं। चंद्रमातैं विद्युत्कूं। तहां अमानव पुरुष

हीं उत्तरमार्गकरि गमन होवैहै गृहस्थनका नहीं। यह युक्त नहीं है ? यहैं दोष बनै न- हीं :- जातैं वे (गृहस्थ) अपूत (अशुद्ध) हैं। जातैं शत्रुमित्रके संयोगनिमित्त तिन (गृहस्थ- न)कूं राग द्वेष होवैहैं। तैसैं हिंसा अरु अनु- ग्रहरूप निमित्तवाले धर्म अधर्म होवैहैं औ

द्वान् ऊर्ध्वरेताओंकाहीं देवयान मार्गकरि गमन होवैहै। गृहस्थनका नहीं। यह कथन अयुक्त है। काहेतैं साधनोंकी बहुलताके हुये फलकी बहुलताका न्याय है ताके विरोधतैं॥ १९४ आश्रमीपनैकी तुल्यताके हुयेवी धर्मविशेषतैं वि- शुद्धिके तारतम्य (अधिक न्यूनभाव)के संभवतैं तिन आ- श्रमोंकी एकरूपता नहींहै। ऐसे सिद्धांती परिहारकरैहैं॥ १९५ ननु अग्निहोत्रादि अधिक धर्मवाले विद्याहीनबी गृहस्थनका अपूत (अपवित्र)पना कैसैंहै ? तहां कहैहैं॥ इहां अब्रह्मचर्यआदिक इस आदिपदकरि परिग्रहीपना (सं- ग्रहीपना) आदिक ग्रहण करियेहै औ अशुद्धिकी बहुलताका कारण अतः (यातैं) शब्दका अर्थ है॥

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पनिषत्]] दशम खंड १० ८९१ साधिकारी उत्तरमार्ग दक्षिणमार्ग औ तृतीयस्थान १० तत्पुरुषो मानवः स एनान् ब्रह्म गमय- त्येष देवयानः पन्था इति ॥२॥ सो इनकूं ब्रह्मकेतांई प्राप्त करेैहै। यह देवयान मार्ग है इति ॥२ ॥

हिंसी जूठ माया(छल) अरु अब्रह्मचर्य (मैथुन) आदिक बहु अशुद्धिका कारण तिन (गृहस्थ- न)कूं अनिवार्य है। यातैं वे अपूत (अशुद्ध) हैं। अपूत होनेतैं तिनका उत्तरमार्गकरि गमन नहीं होवै है॥ औ हिंसा जूठ माया अरु अ- ब्रह्मचर्यआदिकके परिहारतैं शुद्धचित्तवाले औ शत्रुमित्र [रूप निमित्तवाले] राग द्वेषआदिकके परिहारतैं विरज (निर्मल) जातैं इतर (ऊर्ध्व- रेता) हैं यातैं तिनकूं उत्तरमार्ग युक्त है। तिसप्र-

१९६ ननु ऊर्ध्वरेताओंकाबी अशुद्धिके कारणोंकी बहुलतातैं अपूतपना तुल्य है ? यह आशंका करिके कहैहैं॥ १९७ ऊर्ध्वरेताओंकी पूतताके सिद्धभये फलितकूं क- हैहैं। १९८ ऊध्वरेताओंके देवयान मार्गविषै अनुप्रवेशमैं प्रमा- णकूं कहैहैं। इहां पौराणिक कहतेहैं। ऐसें संबंध है॥

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८९२ पंचमप्रपाठक ५ [छान्दोग्यो- प्राणज्येष्ठतादि पंचान्निविद्या शगति वैश्वानरोपास्ति ज्ञाताग्निहोत्र २४ कारसैं पौराणिक :- "जे अधीर प्रजाकूं इच्छते भये वे इमशानोंकूं पावते भये औ जे धीर प्रजाकूं नहीं इच्छते भये वे अमृतभावकूं पावते भये"ऐसैं कहते हैं।। ॥ नैनु ऐसैं जाननेवाले गृहस्थनकूं औ अरण्यवासिनकूं समानमार्गवान्ताके हुये औ अमृतभावरूप फलके हुये अरण्यवासिनकूं वि- द्याकी व्यर्थता प्राप्त भई। तैसैं हुये? तहां। "दक्षिण (दक्षिणमार्ग)सैं जानेवाले नहीं जा- ते हैं अरु अविद्वान् तपस्वी नहीं जाते हैं" इस श्रुतिका विरोध होवैगा औ "सो अविदित हुया याकूं नहीं पालन करै है" यह वाक्यबी विरुद्ध है? सो कैथन बनै नहीं :- काहेतैं सर्व

१९९ ऊर्ध्वरेताओंके उक्त आश्रमधर्ममात्रमयमार्गरूप द्वार- करि अमृतपनैकूं पूर्ववादी आक्षेपकरैहै। २०० ननु तिनकूं विद्याकी व्यर्थता इष्टहीं है? यह सिद्धांतीकी आशंका करिके पूर्ववादी कहैहै ॥ इहां यह अर्थ है :- सो परमात्मा आप अज्ञात हुया इस अधिकारीकूं अपवर्ग (मोक्ष) के प्रदानकरि पालन करता नहीं। ऐसा श्रुतिवाक्य विद्याविना अमृतभावके प्रति कहनेवालेकूं वि- रुद्द होवैगा । २०१ ऊर्ध्वरेताओंके अमृतभावकूं आपेक्षिक होनेतैं ति-

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पनिषत् ] दशम खंड १० ८९३ साधिकारी उत्तरमार्ग दक्षिणमार्ग औ तृतीयस्थान १० ओरतैं भ्रूतनके प्रलयरूप स्थानकूं इहां अमृत- भावकरि विवक्षित होनेतैं॥ तैहांहीं पौराणि- कोंनैं कहा है :- "आभूतसंप्लव (महाप्रलय) रूप स्थान जातैं अमृतभाव कहियेहै" ऐसैं ॥ औ जो तिस (महाप्रलयरूप आपेक्षिक अमृ- २०३

तभाव) की अपेक्षासैं आत्यंतिक (निरपेक्ष) अमृतभाव है "तहां दक्षिण [ मार्गकेगामी] नहीं जाते हैं। सो अविदित हुया याकूं नहीं पालन करैहै" इत्यादिक श्रुतियां हैं। यातैं विरोध नहीं है।। ॥ ननु "फेर आवर्त्तन क- सविषै विद्याकी व्यर्थता हीं है। ऐसे सिद्धांती परिहार- करैहैं॥ २०२ आपेक्षिक अमृतभाव है । इस अर्थविषै प्रमाणकूं कहैहैं॥ इहां जहां प्रजा कामनाकरती हुयी मुक्तिकेभागी नहीं होवैहैं। ऐसें कहा ॥ तहांहीं (ताकी संनिधिविषै) यह अर्थहै।। २०३ ननु तब यथोक्त श्रुतिके विरोधका समाधान कैसें होवेहै ? यह आशंकाकरिके कहैहैं॥ इहां आदिशब्द "ताकूं ऐसें जानताहुया इहां अमृत होवैहै" इत्यादि श्रुतिके सं- ग्रह अर्थ है।। २०४ ननु आपेक्षिक अमृतभावके हुये श्रुतिका विरोध परिहार करनेकूं शक्य नहीं होवैहै ? ऐसें पूर्ववादी शंका

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८९४ पचमप्रपाठक ५ [छान्दोग्यो- प्राणज्येष्ठतादि पंचान्निविद्या श्गति वैश्वानरोपास्ति ज्ञाताग्निहोत्र २४ रता नहीं" ऐसैं औ "इस मानव आवर्त्तके तांईं आवर्तन करता नहीं" इत्यादि श्रुतिनका विरोध होवैगा? ऐसैं जो कहै। सो बनै नहीं :- का- २०५ हेतैं "इस मानव [कूं]" इस विशेषणतैं "तिनकूं इहां (इस कल्पविषै) पुनरावृत्ति नहीं है" ऐसैं [जानियेहै]। जंब निश्चयकरि नियमसैंहीं आ- वृत्तिकूं करै नहीं तव "इस मानव [कूं]" औ "इहां" ये दो विशेषण व्यर्थ होवैंगे॥ ॥ ननु "इसकूं औ इहां" ऐसैं आकृतिमात्र कहियेहै ? ऐसैं जो कहै। सो बनै नहीं :- काहेतैं अनावृ- त्तिशब्दकरि हीं नित्य अनावृत्तिरूप अर्थकूं प्र- करैहै। इहां आदिशब्द "तिनकूं इहां पुनरावृत्ति नहीं हो- वैहै" इत्यादि वाक्यके संग्रह अर्थ है।। २०५ "इस [ मानव आवर्त]कूं औ इहां" इन दो विशेषणोंके आश्रयकरि सिद्धांती निराकरण करैहैं॥ २०६ ताहीकूं व्यतिरेकरूप मुख (द्वार)करि स्पष्ट करैहैं॥ २०७ सर्व कल्पोंविषै श्रुतिकूं एतादृश (इसप्रकारकी) होनेतैं "इसकूं औ इहां" इन दो पदोंके सामान्यकरि सर्व- कल्पोंविषै विशेषणकी व्यर्थता दुर्वार (अनिवार्य) है। ऐसें सिद्धांती उक्तशंकाके उत्तरकूं कहैहैं॥

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पनिषत् ] दशम खंड १० ८९५ साधिकारी उत्तरमार्ग दक्षिणमार्ग औ तृतीयस्थान १० तीतहोनेतैं आकतिकी कल्पना व्यर्थ है। यातें "इसकूं औ इहां" इन दो विशेषणोंके अर्थवान् होनेअर्थ अन्यत्र (अन्यकल्पविषै) आवृत्ति कल्पना करनेकूं योग्य है औ "सत् एकहीं अ- द्वितीय है" ऐसैं प्रत्ययवानोंका मस्तकगत सु- षु्णा नाडीकरि अर्चिरादिमार्गसैं गमन नहीं संभवैहै। काहेतैं "ब्रैह्र हीं हुया ब्रह्मकूं पावताहै। तातैं सो सर्व होताभया। ताके प्राण उत्क्रमण करते नहीं इहां हीं विलीनहोतेहैं" इत्यादि सैंकडों श्रुतिनतैं॥ नैतु "उत्क्रमण करनेकूं इ- २०८ अन्यप्रकारसैं विशेषणोंके अर्थके संभवहुये फलि- तकूं कहैहैं॥। इहां जिसकल्पविषै ब्रह्मलोककी प्राप्तिहोवैहै तिसतैं अन्यकल्प "अन्यत्न" ऐसें कहा ॥ २०९ आश्रमधर्ममात्रविषै निष्ठावाले ऊर्ध्वरेताओंकूं आपे- क्षिक अमृतभाव कहा। अब साक्षात् कियाहै ब्रह्मतत्व जिनोंनें ऐसे तिनहीं ऊर्ध्वरेताओंकूं आत्यंतिक अमृतभाव गतिकी अपेक्षासे रहित सिद्ध होवैहै। ऐसैं कहैहैं॥ २१० तिनकूं गति (गमन) आदिककी अपेक्षासैं रहित आत्यंतिक अमृतभाव होवैहै। इस अर्थविषै प्रमाणकूं क- हैहैं।। २११ ननु "तिसतैं प्राण उत्क्रमण करतेनहीं" इस मा- ध्यंदिन शाखावालोंकी श्रुतिकूं अनुसरिके "तिस (ज्ञानी)

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८९६ पंचमग्रपाठक ५ [छान्दोग्यो- प्राणज्येष्ठतादि पंचाग्निविद्या शगति वैश्वानरोपास्ति ज्ञाताग्निहोत्र २४ चछनेवाले तिस जीवतैं प्राण उत्क्रमण करते नहीं किंतुसाथिहीं गमनकरतेहैं" ऐसा यह अर्थ कल्पना करिये है? ऐसैं जो कहै। सो बनै नहीं :- काहेतैं "इहां हीं विलीन होतेहैं" इस विशेष- णकूं व्यर्थ होनेतैं औ सर्व प्राण (इंद्रिय) पीछे उत्क्रमण करतेहैं। ऐसैं प्राणोंके साथि जी- वके गमनकूं प्राप्त होनेतैं। तातैं उत्क्मण कर- तेहैं। यामैं यह शंका हीं नहीं है।। जैव बी मोक्षकूं संसाररूप गतितैं विलक्षण होनेतैं प्रा-

के प्राण उत्क्रमण करतेनहीं" इत्यादि काण्व शाखा वा- वालोंकी श्रुति वी लगानेकूं योग्य है ? ऐसें पूर्ववादी शंका करैहै॥ २१२ वाक्यशेषके विरोधतैं इस प्रकार बनै नहीं। ऐसें सिद्धांती दूषण देतेहैं॥ २१३ अन्य श्रुतिकी आलोचना (विचार) के हुथेबी स्वयूथ्य (वेदांतके एकदेशी) की कल्पना बनै नहीं। ऐसे कहैहैं॥ इहां प्राणोंकरि सहित जीवके। यह शेष है॥ २१४ ननु संसारदशाविषै प्राणोंकरि सहित विज्ञाना- त्मा (जीव)के गमनके हुयेबी मोक्षविषै प्राणोंका जीव- करि सहित गमन नहींहै? इस आशंकाके हुये "तिसतैं प्राण उत्कमण करतेनहीं" इत्यादिवाक्य है ? यह आशंका- करिके कहैहैं॥

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पनिषत् ]] दमश खंड १० ८९७ साधिकारी उत्तरमार्ग दक्षिणमार्ग औ तृतीयस्थान १० णोंके जीवके साथि अगमनकूं आशंकाकरिके "तातैं उत्क्रमण करते नहीं" ऐसैं कहिये है? तब बी "इहां हीं विलीन होतेहैं" यह विशेषण व्यर्थ होवैगा ॥ औ त्राणोंकरि वियुक्तकूं गति वो जीवभाव नहीं संभवैहै। काहेतैं सैतूँ रूप आत्माकूं सर्वगत होनेतैं अरु निरवयव होनेतैं अरु जातैं अशनितैं विस्फुलिंगकी न्यांई जीव- २१५ ननु प्राणोंका इहांहीं विलय होहू। तथापि जीवके गमनके अधीन अमृतभाव है ? यह आशंकाकरिके कहैहैं॥ इहां "किसके उत्कांतहुये मैं उत्क्रांत होवों :- वा किसके प्रति- ष्ठितहुये मैं प्रतिष्ठित होवों। ऐसें सो प्राणकूं स्नजताभया" इस श्रुतितैं। यह शेष है॥ २१६ किंवा प्राणोंसैं वियुक्त चिदात्माकूं जीवभाव नहीं संभवैहै। काहेतैं प्राण उपाधिवालेहीं तिसकूं जीवशब्दका वाच्य होनेतें। ऐसें कहैहैं॥ २१७ उक्त अर्थकूं समर्थनकरैहैं ।। इहां चिदात्मा प्र- सिद्ध कल्पनाविषै अधिष्ठानके होते जातैं निर्भाग (विभाग- रहित) सर्वका आत्मा है तातें अगनितैं विस्फुलिंगकीन्यांई जीवभाव नाम भेदकासंपादन ताकूं प्राणका संबंधमात्रहींहै। यह वैदिकोंकूं प्रसिद्ध है। तैसैं हुये प्राणोंके वियोगके होते चिदात्माकूं जीवभाव वा गति कल्पना करनेकूं शक्य नहीं है।। औ यातैं (तातैं) याका पूर्णता आदिककी प्रतिपादक श्रुतिनकूं प्रमाण होनेतैं। यह अर्थ है॥माक

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८९८ पंचमप्रपाठक ५ [छन्दोग्यो- प्राणज्येष्ठतादि पंचाग्निविद्या शगति वैश्वानरोपास्ति ज्ञाताग्निहोत्र २४ भाव नामक भेदका कारण प्राणोंसैं संबंधमात्र- हीं है। जातैं ता (प्राणसंबंध) के वियोगके हुये जीवभाव वा गति (गमन) कल्पना क- रनेकूं शक्य नहींहै औ श्रुतियां जब प्रमाणहैं तब सैतूतैं जीवनामक अणु अवयव स्फुटित (फ्रूट्या) हुया सत् रूपके प्रति छिद्र करता- हुया गमन करैहै। ऐसैं कल्पना करनेकूं शक्य नहीं है। तातैं "तिस ( नाडी) करि ऊर्ध्वके तांईं गमन करता हुया अमृतभावकूं पावता है" ऐसैं सगुणब्रह्मके उपासकका प्राणोंके साथि नाडीकरि गमन औ सापेक्ष हीं अमृतभाव होवैहै। साक्षात् मोक्ष नहीं। ऐसैं जानिये है

२१८ ननु सर्वगत सदात्माके जीवनामक भेदका क- रना प्राणउपाधिका किया नहीं किंतु स्वताहीं ताका अंश जीव है। तैसैं हुये अग्नितैं विस्फुलिंगकीन्यांई ताकी गतिका संभव है? यह आशंका करिके कहैहैं ॥ इहां "निष्कल नि- षिक्रिय शांत है" इत्यादि श्रुतितैं। यह शेष है॥ २१९ प्रकरणके अर्थकूं उपसंहार करैहैं॥ इहां तातैं। याका निर्गुण ब्रह्मके वेत्ताओंके आत्यंतिक अमृतभावकूं गमन आदिककी अपेक्षासैं रहित होनेतैं। यह अर्थ है।गगीर

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पनिषत् ] दशम खंड १० ८९९ साधिकारी उत्तरमार्ग दक्षिणमार्ग औ तृतीयस्थान १० "तहां अपराजिता पुरी है। तहां ऐर (रसवि- शेषकरि पूर्ण) अरु मदीय (हर्षका उत्पादक होनेकरि मदकर) सर है" इत्यादि कहिके "तिनहींकू यह ब्रह्मलोक होवैहै" इसविशेषणतैं। यीतैं पंचास्निके वेत्ता गृहस्थ औ जे ये अ-

२२० सगुण ब्रह्मके उपासककूं सापेक्ष (गतिआदिककी अपेक्षावाला) अमृतभाव होवैहै। इस अर्थविषै विशेषणकी श्रुतिकूं अनुकूल करैहैं। इहां आदिपदकरि? "तहां अश्व- त्थ (पिप्पलवृक्ष) सोमसवन (अमृतके स्ाववाला) है" इ- त्यादि ग्रहण करियेहै औ "तिनहीं ब्रह्मवेत्ताओंकूं यह पूर्व उक्त विशेषगुणवाला सत्यनामक ब्रह्मका लोक होवैहै अन्य अकृतात्माओंकूं (पुण्यरहित चित्तवालोंकूं) नहीं" ऐसें विशे- पके दर्शनतैं अमृतभाव तिनकूं तिस लोकके निवासिनकरि सम सापेक्षहीं होवैहै। ऐसें निर्धारित है। यह अर्थ है॥ २२१ आश्रममान्रविषै निष्ठावाले ऊर्ध्वरेताओंकूं बी ब्रह्म- लोक प्राप्त होवैहै। फेर विद्वान् (पंचाग्निके वेत्ता वा सगुण व्र- ह्मके उपासक)हीं गृहस्थनकूं [ब्रह्मलोक प्राप्त होवैहै] ऐसें उ- पपादन करिके। प्रकृत श्रुतिके व्याख्यानकूं अनुसरतेहैं॥ इहां यातैं। याका पूर्व उक्त पारिशेष्यआदिकके वशतैं। यह अर्थहै औ परिव्राजक। ऐसें अमुख्य संन्यासी त्रिदंडी ग्रहण करियेहैं। काहेतैं मुख्य संन्यासिनकूं "ब्रह्मसंस्थ (ब्रह्मनिष्ठ) अमृतभावकूं पावताहै" ऐसैं पृथक् किया होनेतैं औ "श्रद्धाकूं सत्यकूं ऐसें उपासतेहैं" यह अन्य श्रुति है। औ पंचाग्निके

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९०० पंचमप्रपाठक ५ [छान्दोग्यो- प्राणज्येष्ठतादि पंचाग्निविद्या श्गति वैश्वानरोपास्ति ज्ञातागनिहोत्र २४ रण्य (वन) विषै वानप्रस्थ अरु परिव्राजक नैष्ठिकब्रह्मचारिनकरि सहित "श्रद्दा अरु तप" ऐसें इस श्रद्धाआदिककूं उपासतेहैं॥ अर्थ यह जो :- श्रद्धालु औ तपस्वी हैं" [ इहां उपासनशब्द तात्पर्यरूप अर्थवाला है ] जैसैं "इष्ट पूर्त अरु दत्त" ऐसैं उपासतेहैं यह है औ अ- न्यश्रुतितैं जे हिरण्यगर्भनामक सत्यब्रह्मकूं उपा- सतेहैं। वे सर्व अर्चिकूं कहिये अर्चिकी अभि- मानिनी देवताकूं पावतेहैं।अन्य [अर्थ] चतुर्थ अध्याय उक्त गतिके व्याख्यानकरि समान है। येहैं देवयानमार्ग व्याख्यान किया सो सत्यलो- करूप अवसानवाला है। बह्मांडतैं बाहिर नहीं।

वेत्ता गृहस्थ अरु स्वआश्रममात्रविषै तत्पर ऊर्ध्वरेता सत्य व्र- ह्मके उपासक। ये दोनूं सर्व शब्दकरि कहियेहैं॥ २२२ चतुर्थ अध्यायविषै जो उपकोसलकी विद्याविषै गतिका व्याख्यान व्यतीत भया। तिसकरि समान "अर्चितैं दिवसकूं" इत्यादि वाक्यका व्याख्यान है। ऐसैं हुये सो पृ- धक् कर्तव्य नहींहै। ऐसें कहैहैं॥ २२३ उत्तरमार्गके व्याख्यानकूं उपसंहार करैहैं॥ २२४ देवयान मार्गकरि ब्रह्मांडतैं बाहिर स्थित ब्रह्म गं-

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पनिषत्] दशम खंड १० ९०१ साधिकारी उत्तरमार्ग दक्षिणमार्ग औ तृतीयस्थान १० अथ य इमे ग्राम इष्टापूर्ते दत्तमि

अर्थ :- औ जे ये ग्रामविषै इष्ट पूर्त

काहेतैं "जो पिता (स्वर्गलोक)के प्रति औ माता (पृथिवी)के प्रति मध्यविषै" इस मंत्र- वर्णतैं ॥१॥२॥ टीका :- इहां अथशब्द अन्य अर्थकी प्रस्ता- वनाकेअर्थ है। औ जे ये गृहस्थ ग्रामविषै [इहां]"यीमविषै" यह गृहस्थनका असाधारण

तव्य (प्राप्य) है। ऐसैं केईक पूर्ववादी (भर्तृ प्रपंचके अनुसा- री) मानतेहैं। तिनके प्रति कहैहैं॥ २२५ तिसविषै हेतुकूं कहैहैं॥ इहां यह अर्थहैः-पिताके प्रति कहिये स्वर्गलोकके प्रति औ माताके प्रति कहिये पृथिवीके प्रति मध्यविषै इन दो मार्गनकूं मैं सुनताभयाहूं तिन दो मार्गोकरि इस कर्म ज्ञानके आश्रित विश्वके प्रति गमन क- रताहै औ ब्रह्मांडतैं बाहिर दो गतियां नहीं हैं। २२६ "इस [लोक]तैं ऊपर जिसके प्रति प्रजा जावैहैं सो [क्या] जानताहैं" इस प्रश्नका प्रति वचन । देवयान मा- गके उपदेशकरि व्याख्यान किया॥ अब पितृयाण मार्गके उ- पदेशकरिवी ग्राम निवासीपनैके अविशेषतैं [सर्व आश्रमोंके निमित्त व्याख्यान करियेहै ] यह आशंका करिके कहैहैं।। ७६

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९०२ पंचमप्रपाठक ५ [छान्दोग्यो- प्राणज्येष्ठतादि पंचान्निविद्या ३ गति वैश्वानरोपास्ति ज्ञाताग्निहोत्र २४ त्युपासते ते धूममभिसम्भवन्ति धूमा- द्रातरिं रात्रेरपरपक्षमपरपक्षाद्यान्पइद- अरु दत्तकूं ऐसैं उपासते हैं। वे धूमकूं पावतेहैं। धूमतैं रात्रिकूं। रात्रितैं कृष्ण- पक्षकूं। कृष्णपक्षतैं जिन षट मासोंकूँ (इसएकविषैहीं वर्त्तनेवाला) विशेषण अरण्य- वासीनतैं व्यावृत्ति (गृहस्थनके भेदज्ञान)अर्थ है। जैसैं वानप्रस्थनका अरु परिव्राजकोंका अरण्य विशेषण गृहस्थनतैं व्यावृत्तिअर्थ है। ताकी- न्यांईं] इष्ट जो अश्निहोत्रादिवैदिक कर्म औ

इहां यह अर्थहैः-जातैं पत्नी सहित जो वास सो ग्राम ऐसैं कहिये है औ पत्नीसहितपना ऊर्ध्वरेताओंकूं उक्त नहींहै। तैसें हुये गृहस्थनका हीं ग्रामरूप विशेषण असाधारणहै औ सोव्यर्थ नहीं है। काहेतैं ऊर्ध्वरेताओंतैं तिन गृहस्थनकी व्यावृत्तिरूप अर्थवाला करैहें॥ २२७ ताहींकूं दृष्टांतकरि स्पष्ट कहैहैं ॥ इहां वेदी विषै अंतर्भावके निषेधतैं "बहिर्वेदि" ऐसा विशेषणहै औ आदि- विषै "दत्त" ऐसें प्रतीकका ग्रहणहै सो फेर व्याख्यानकियेका अनुवादहै। यातैं अपुनरुक्ति (पुनरुक्तिरूप दोषका अभाव) हैं।।

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पनिषत् ] दशम खंड १० ९०३ साधिकारी उत्तरमार्ग दक्षिणमार्ग औ तृतीयस्थान १० क्षिणैति मासा सतान्नैते संवत्सरमभि- प्राभुवन्ति॥ ३॥

[सूर्य] दक्षिणदिशाकेतांई जाता है तिन (मासन)कूं ॥ ये संवत्सरकूं पावते न- हीं॥ ३ ॥

पूर्त जो वापी कूप तडाग अरु आराम (बगी- चा) आदिकका करना औ दत्त जो यज्ञकी वे- दितैं बाहिर जैसैं होवै तैसैं यथाशक्ति योग्य पात्रोंकेअर्थ द्रव्यका सम्यक् विभागरूप दान। ऐसैं इस प्रकारके परिचरण (सेवन) अरु प- रित्राण (रक्षण) आदिककू उपासते हैं।। इति शब्दकूं प्रकारके दिखावनेरूप अर्थवाला २२९

२२८ इति शब्दके अर्थकूं कहैहैं॥ इहां परिचरण गुरु- आदिककी श्रुश्रूषा है औ परित्राण रक्षण है औ आदिपद नित्यस्वाध्यायआदिकके ग्रहण अर्थ है औ उपासतेहैं। याका तात्पर्यकरि अनुष्ठान करतेहैं। यह अर्थ है।। २२९ ननु इतिशब्दकूं यथोक्त अर्थवान्पना कैसैं होवैगा।

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९०४ पंचमप्रपाठक ५ [छान्दोग्यो- प्राणज्येष्ठतादि पंचान्निविद्या ३ गति वैश्वानरोपास्ति ज्ञातागनिहोत्र २४ होनेतैं [इहां (इसप्रकारके) ऐसैं कहा]। वे गृहस्थ दर्शन (उपासन) करि रहित होनेतैं धूमकूं कहिये धूमकी अभिमानिनी देवताकूं पावते हैं। तिसदेवताकरि अतिवाहित (चला- यमान) हुये धूमतैं रात्रिकूं कहिये रात्रिकी देवताकूं। रात्रितैं अपरपक्ष ( कृष्णपक्ष)की अभिमानिनी देवताकूं। अपरपक्षतैं जिन ष- टमासोंकेतांई सूर्य दक्षिण कहिये दक्षिण दिशाकेतांई जाताहै तिन मासोंकूं॥ अर्थ यह जो :- दक्षिणायनरूप षट्मासोंकी अभिमा- निनी देवताओंकूँ पावते हैं॥ तहांतैं संगचा- रिणी (साथिचलनेवाली) षट्मासनकी देवता हैं। यातैं तिनविषै "मासोंकूं" ऐसैं बहुवचन- का प्रयोग है ।। ये प्रकतकर्मी संवत्सरकूं क-

काहेतैं "ऐसैहीं उपाध्याय कथन करैहै" याकीन्यांई इति श- ब्दकूं प्रकृत (प्रसंगतैं प्राप्त अर्थ) मात्रविषै गामी होनेतैं ? यह आशंकाकरिके कहैहैं। २३० वेवयानके अधिकारीनतैं पितृयाणके अधिकारीन- विषै अन्यविशेषकूं कहैहैं॥

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पनिषत् ] दशम खंड १० ९०५ साधिकारी उत्तरमार्ग दक्षिणमार्ग औ तृतीयस्थान १० हिये संवत्सरकी अभिमानिनी देवताकूं पावते नहीं॥। ॥ नैनु फेर संवत्सरकी प्राप्तिका प्र- संग काहेतैं भया। जातैं निषेध करियेहै ? [त हां कहैहैं :- ]प्रसिद्ध प्रसंग है। जातैं एक संव- त्सरके अवयवभूत दक्षिणायन अरु उत्तरायण हैं। तिन दोनूंमैंसैं अर्चिरादिमार्गकरि प्रवृत्त भये पुरुषनकूं उत्तरायणरूप मासोंतैं अवयवी संवत्सरकी प्राप्ति कहीहै। यातैं इहांबी ता (संवत्सर) के अवयवभूत दक्षिणायनरूप मा- सोंकी प्राप्तिकूं सुनिके तिनके अवयवी संवत्सर- कीबी पूर्वकीन्यांईं प्राप्ति प्राप्त भई। यातैं तिस (संवत्सर) की प्राप्ति प्रतिषेध करियेहै "ये संव- त्सरकूं पावते नहीं" ऐसैं ॥ ३ ॥

२३१ ननु यह अप्राप्तका प्रतिषेध है? ऐसैं पूर्ववादी शंका करैहै। २३२ प्राप्तिकूं दिखावतेह्ठुये सिद्धांती उत्तरकूं कहैहैं॥ इहां पूर्ववत् (पूर्वकीन्यांई)। याका जैसे पूर्व देवयानमार्गकरि मासरूप अचयवनतैं अवयवी संवत्सरकी प्राप्ति होवैहै। तैसें। यह अर्थ है।।

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९०६ पंचमप्रपाठक ५ [छान्दोग्यो- प्राणज्येष्ठतादि पंचाग्निविद्या श्गति वैश्वानरोपास्ति ज्ञाताग्निहोत्र २४ मासेभ्यः पितृलोकं पितृलोकादा- अर्थः-मासनतैं पितृलोककूं। पितृलो-

टीका :- मासोंतैं पितलोककूं पितलोकतैं आकाशकूं। आकाशतैं चंद्रमाकूं। ॥ कौंन यह चंद्रमाहै जो तिन (कर्मिन) करि प्राप्त करियेहै? जो यह अंतरिक्षविषै सोमरूप ब्राह्मणोंका राजा देखियेहै। सो देवनका अ- न्न है। तिस चंद्रमारूप अन्नकूं इंद्रादिक देव भक्षणकरतेहैं। यातैं वे कर्मी धूमआदिक मार्गकरि जायके चंद्रभूत हुये देवनकरि भक्ष- णकरियेहैं॥ ॥ नतु जब अन्नरूप हुये वे कर्मी देवनकरि भक्षण करियेहैं तब इष्टआदिक क र्मका करना अनर्थके अर्थहींहै? यहं दोष नहीं है :- काहेतैं "अन्न" इस शब्दकरि उपकरण

२३३ अन्य शब्दके यथाश्रुत अर्थकूं ग्रहणकरिके पूर्व- चादी शंका करैहै। २३४ अब सिद्धांती औपरिचारिक (आरोपकरि किये कथनमात्र) अर्थकूं ग्रहणकरिके परिहार करैहैं॥

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पनिषत् ] दशम खंड १० १०७ साधिकारी उत्तरमार्ग दक्षिणमार्ग औ तृतीयस्थान १० काशमाकाशाचन्द्रमसमेष सोमो राजा तद्देवानामन्नं तं देवा भक्षयन्ति ॥४॥

कतैं आकाशकूं। आकाशतैं चंद्रमाकूं। यह सोमराजा। सो देवनका अन्न है। ता (चंद्रमारूप अन्न)कूं देव भक्षण क- रते हैं ।।४ ॥

(भोगके साधन) मात्रकूं विवक्षित होनेतैं। जातैं वे कर्मी कवल (ग्रास)नके मुखमैं डा- लनैसैं देवनकरि नहीं भक्षण करियेहैं किंतु वे स्त्री पशु भृत्य (किंकर) आदिककीन्यांईं दे- वनका उपकरण मात्र होवैहैं॥ औ उपकरणों विषै अन्नशब्द देख्याहै "राजाओंका स्त्रियां अन्नहैं पशु अन्न हैं प्रजा अन्न हैं" इत्यादि॥ औ तिन स्त्री आदिकनकूं पुरुषकरि उपभो- २३५ ननु वृद्धोंके प्रयोगविना उपकरणरूप विषय (अ- र्थ)वाला अन्नशब्द कैसें व्याख्यान करियेहै? तहां कहैहैं॥ २३६ ननु कर्मीनका देवनकेप्रति उपकरण (भोगका सा० धन)पना होहू। तथापि आप (करि) उपभोगके अभावतै

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९०८ पंचमप्रपाठक ५ [छान्दोग्यो- प्राणज्येष्ठतादि पंचान्निविद्या शगति वैश्वानरोपास्ति ज्ञातान्निहोत्र २४ ग्यता (भोग्यकी साधनता)के हुये बी उपभोग नहीं है ऐसैं नहीं। तातैं कर्मीजन देवनके उ- पभोग्य वी हुये सुखी हुये देवनके साथि क्री- डाकूं करतेहैं औ तिनका शरीर सुखके उप- भोगके योग्य चंद्रमंडलविषै आप्य (जलरचि- त) आरंभ करियेहै॥ सो पूर्व कहा है :- "श्र- द्ाशब्दके वाच्य जे जलहैं वे स्वर्गलोकरूप अभनिविषै हुत हुये सोमराजा संभवैहै" ऐसैं ॥ वे जैले कर्मसंबंधी हुये अरु इतर भूतोंकरि अ- नुगत (व्याप्) हुये स्वर्गलोककूं पायके चंद्रभा- वकूं प्राप्त हुये इष्टआदिकके उपासकोंके शरीर इष्ट (अग्निहोत्रादि) आदिककर्मका करना अनर्थकर होवैगा? यह आशंकाकरिके कहैहैं॥ २३७ इहां अन्योकरि उपभोग्य (भोगनेकूँ योग्य)नकूंबी आपके भोगका सन्भराव "तातैं" ऐसें कहियेहै। तथापि मृत भये अरु शरीररहित तिनकूं मुख्य उपभोग कैसैं संभवै है ? यह आशंकाकरिके कहैहैं॥ २३८ ननु जलोंकूं चंद्रलोकविषै तिनके देहकी आरंभ- कता कैसैं है? सो कहैहैं? २३९ ननु अब जलोंकी सोम (चंद्र)रूपताहीं इहां प्र- तीत होवैहै परंतु कर्मीनके देहकी आरंभकता नहीं? यह आशंकाकरिके कहैहैं॥

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पनिषत् ] दशम खंड १० ९०९ साधिकारी उत्तरमार्ग दक्षिणमार्ग औ तृतीयस्थान १०

अर्थ :- तिस (चंद्रमंडल)विषै यावत्सं- पात (कर्मके क्षयपर्यत) निवासकरिके अ-

आदिकके आरंभक होवैहैं औ अभनिविषै अंत- संबंधी शरीररूप आहुतिके हुत हुये अभनिकरि शरीरके दह्यमान हुये तिसतैं उत्पन्न जल धू- मके साथि यजमानकूं वेष्टन करिके ऊर्ध्व चंद्र- मंडलके प्रति प्राप्त होयके कुश (दर्भ) अरु मृत्तिका स्थानीय (उपकरणभूत) बाह्य श- रीरके आरंभक होवैहैं औ तिनकरि आरंभ किये शरीरसैं इष्ट आदिक कर्मके फलकूं भो- गते हुये वे कर्मी स्थितहोवैहैं॥ ४ ॥ टीका :- जैहांलगि तिस उपभोगके निमित्त २४० ननु कर्मसमवायी (कर्मसैं संबंधी) अरु कर्मके अ- पूर्व (तज्जन्यसंस्कार) द्वारा यजमानके देहविषै स्थित जलोंका स्वर्गलाक आदिकविषै प्रवेश आदिक कैसें संभवैहै? यह आशंकाकरिके कहैहैं॥ २४१ जलोंकरि आरंभ किये शरीरकी भोगायतनता (भोगके योग्य स्थानरूपता)कूं दिखावैहैं॥ २४२ "सो देवनका अन्न हैं" इत्यादिवाक्यकूं व्याख्यान

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९१० पंचमप्रपाठक ५ [छान्दोग्यो- प्राणज्येष्ठतादि पंचान्निविद्या शगति वैश्वानरोपास्ति ज्ञाताग्निहोत्र २४ वाध्वानं पुनर्निवर्त्तन्ते। यथेतमाकाश- नंतर इसी (वक्ष्यमाण) मार्गकेतांई जैसैं आये तैसैं फेर निवर्त्त होते हैं (पीछे लौ- टते हैं)॥। [इस चंद्रलोकतैं] आकाशकूं। कर्मका क्षयहोवै [सैम्यक पतन होतेहैं जिस करि सो संपात है ऐसा जो संपात कहिये क- र्मका क्षय सो यावत् संपात है। अर्थ यहजो जहांलगि कर्मका क्षय होवै ] तहांलगि तिस चंद्रमंडलविषै निवास करिके अनंतर इसीं हीं (वक्ष्यमाण) मार्गकेतांई फेर निवर्त्त होतेहैं॥ इहां "फेरे' निवर्त्तहोतेहैं" इस प्र-

करिके। अब "तिसविषै" इत्यादि पंचमवाक्यकूं व्याख्यान करैहैं॥ इहां तिस उपभोगतैं। इस पदविषै जो तत् (तिस) शब्द है ताका अर्थ चंद्रलोक है। २४३ ननु "यावत् संपात होवै तावत् निवासकरिके" ऐसें इसवाक्यविषै सुनिये है। आपकरि अन्यथा (अन्यप्रका- रसैं) कैसैं व्याख्यान करियेहै? तहां कहैहैं॥ २४४ पुनः (फेर)शब्दके प्रयोगके तात्पर्यकूं कहैहैं॥

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पनिषत् ] दशम खंड १० ९११ साधिकारी उत्तरमार्ग दक्षिणमार्ग औ तृतीयस्थान १० माकाशाद्वायुं वायुर्भृत्वा धूमो भवति धूमो भूत्वाऽभ्रं भवति ॥५॥ आकाशतैं वायुकूं। वायु होयके धूम होवै- है। धूम होयके अभ्र (बादल) होवै- है।। ५ ॥

योगतैं पूर्व बी वारंवार चंद्रमंडलकेतांई प्राप्त औ तिसतैं निवृत्त होतेभये ऐसैं जानियेहै। तौतैं इस लोकविषै इष्टआदिक कर्मकूं जमा करिके चंद्रलोककूं जातेहैं औ तिस (कर्म)के क्षयभये आवर्तनकूं करतेहैं (इस लोकके तांई पीछे आतेहैं)। क्षणमात्र बी तहां स्थित होनेकूं प्राप्तहोता नहीं। काहेतैं स्थितिके निमिन्त कर्म- २४६

२४५ "अथ (औ)" इत्यादि (तृतीयआदिक) वाक्यनके अर्थकूं उपसंहार करैहैं॥ २४६ तत् (तातैं) शब्दकरि स्मरण किये हेतुकूं स्पष्ट क- रैहैं॥ इहां यह अर्थ है :- जैसै दीपकी स्नेह (तैल)के क्षयभये स्थितिनिमित्तके अभावतैं अस्थिति होवैहै। तैसैं चंद्रलोक- विषै स्थितिके निमित्त इष्टआदिकके भोगकरि क्षयतैं तहां स्थितिके असंभवतैं आवृत्तिहीं होवैहै॥

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९१२ पंचमप्रपाठक ५ [ छान्दोग्यो- प्राणज्येष्ठतादि पंचाननिविद्या श्गति वैश्वानरोपास्ति ज्ञाताग्निहोत्र २४. के क्षयतैं। स्नेह (तैल)के क्षयतैं प्रदीपकी न्यांई।। ॥ नैतु जिस कर्मकरि चंद्रमंडलके तांईं आरूढ भयाहै तिस सर्वके क्षय हुये क्या तिस (चंद्रमंडल) तैं अवरोहण (उतरणा) होवैहै किंवा सावशेष (अवशेष रहै कर्मकरि सहित) हुया [अवरोहणकूं करताहै ] ऐसैं दो पक्ष हैं। तिनतें क्या होवैहै। जैव सर्वहीं क- र्मका क्षय होवे तव चंद्रमंडलविषै स्थित पुरु- षकूंहीं मोक्ष प्राप्त होवैहै॥ किंवा :- प्रथम तहां २४७ "इसविषै यावत् संपात (पतन) होवै तावत् नि- वास करिके" इस वाक्यविषै विचारकूं करैहैं ॥ इधर "तहां" याका तिस चंद्रमंडलके प्रापक औ अतिरिक्त सर्व कर्मके क्षयके हुये। यह अर्थ है औ सावशेष। याका भुक्तकर्मतैं अतिरिक्त (भिन्न) किसीबी कर्मकरि सहित हुया। यह अर्थ है।। २४८ उभयपक्षविषैबी पूर्ववादी फलकूं पूंछता है। २४९ तिनमैं प्रथम पक्षकूं पूर्ववादी पूर्वपक्षद्वारा निषेध करताहुया ताके फलकूं कहैहै।। २५० तिस (प्रथमपक्ष) विषैहीं पूर्ववादी अन्य दूषणकूं कहैहै॥ इहां "तहांहीं" इस सप्मीका अर्थ चंद्रमंडल है औ तातैं। याका चंद्रमंडलतैं। यह अर्थ है औ "इहां" ऐसे इसलोककी उक्ति है औ शरीर अरु उपभोगआदि।

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पनिषत् ] दशम खंड १० ९१३ साधिकारी उत्तरमार्ग दक्षिणमार्ग औ तृतीयस्थान १० (चंद्रमंडलविषै) हीं मोक्ष होवै वा नहोवै यह रहो। परंतु तिसे (चंद्रमंडल) तैं आगत (आये पुरुष)कूं [शेषकर्मके अभावतैं ] इसलोकविषै शरीर अरु उपभोगआदिक नहीं संभवैहै। औ तातैं "शेषकरि" इत्यादि स्मृतिका विरोध हो- वेगा? नेतु (निश्चयकरि) इष्ट पूर्त अरु दत्तरूप कर्म विनावी सनुष्य लोकविषै शरीर अरु उप- भोगके निमित्त अनेक कर्म संभवै हैं औ ति- नॅकर्मोंका चंद्रमंडलविषै उपभोग नहीं होवैहै।

यह आदिपद शुभ अशुभके अनुसारी सर्व व्यापारके संग्रह अर्थ है।। २५१ सर्व कर्मके क्षयरूप प्रथम पक्षविषै केवल युक्तिहीं विरोधकूं पावती है ऐसें नहीं किंतु स्मृतिबी विरोधकूं पा- वती है। ऐसैं पूर्ववादी कहैहै। इहां यह अर्थ है :- "चंद्रलो- कविषै भोगनेयोग्य कर्मके भोगकरि क्षयतैं पीछे शेष अभुक्त कर्मकरि जन्मकूं पावते हैं" इत्यादि स्मृति है सो सर्व क- मेके क्षयरूप प्रथमपक्षके हुये विरोधकूं पावैहै॥ २५२ सर्व कर्मके क्षयरूप प्रथमपक्षके अन्यथावादी पूर्वप- क्षीकरि निषेध कियेहुये सावशेष (भुक्तकर्मतैं भिन्न कर्मकरि सहितता) रूप द्वितीयपक्षकूं उत्तरवादी (सिद्धांती) ग्रहण करैहैं॥ २५३ ननु वे (भिन्नकर्म)बी चंद्रमंडलविषै भोगेहींहैं। ७७

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९१४ पंचमप्रपाठक ५ [छान्दोग्यो- प्राणज्येष्ठतादि पंचाग्निविद्या शगति वैश्वानरोपास्ति ज्ञातागनिहोत्र २४ जातैं वे कर्म अक्षीण हैं। औ जिसे निमित्त चंद्रमंडलकेतांई आरूढ (आरोहकूं प्राप्त) भया है वे कर्महीं क्षीणभये। ऐसैं अविरोध है औ शेषशब्द जो है सो सर्वकर्मोंके कर्मत्वरूप सा- मान्य (जाति)तैं अविरुद्ध है। औ याहींतैं तहां (चंद्रमंडलविषै)हीं मोक्ष होवैगा। इस दोषका

यातें अवशेष नहींहैं? यह आशंकाकरिके कहैहैं॥ इहां यह भाव है :- जातैं सर्व कर्मोंके वशतै चंद्रमंडलकी प्राप्ति नहीं होवैहै॥ २५४ ननु तब चंद्रमंडलविषै कर्मफलके उपभोगके अ- भावतैं ताके तांई आरोहण (चढने)करि अलं (पूर्ण) भया? यह आशंकाकरिके कहैहैं॥ इहां अविरोध है चंद्रमंडलविषै भोगका अरु शेषकर्मके सद्भावका। यह शेष है॥ २५५ औ जो "तिसतैं शेषकरि" इत्यादि स्मृतिका वि- रोध है? ऐसें कहा। तहां कहैहैं॥। इहां यह अर्थ है :- निः- शेषबी भुक्त कर्मौविषै अरु अभुक्त कर्मोविषै शेषशब्द विरो- धकूं पावता नहीं। काहेतैं अभुक्त कर्मोंके कर्मभावकूं तुल्य होनेतैं। इहां सावशेष पक्षविषै स्मृतिका विरोध नहीं है।। २५६ जो कहाकि :- चंद्रमंडलविषै स्थितकाहीं मोक्ष हो- वैगा ? ऐसें। तहां कहैहैं॥ इहां याहींतें। याका शेष कर्मके सन्भ्ावतैंहीं। यह अर्थ है।।

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पनिषत्]] दशम खंड १० ९१५ साधिकारी उत्तरमार्ग दक्षिणमार्ग औ तृतीयस्थान १० अभाव है। औ विरुद्ध अनेक योनिनके उप- भोगरूप फलवाले कर्मोंकूं एक एक जंतु (शरीर) की आरंभकताके संभवतैं [कर्मशेषकी सिद्धि है]॥l औ ऐके जन्म (शरीर)के हुये सर्व कर्मों- का क्षय नहीं संभवैहै औ ब्रैह्महत्याआदिक एक एक कर्मकूं अनेक जन्मोंकी आरंभकताके स्मरणतैं औ उत्कर्षके हेतु कर्मकूं स्थावरआदि- भावकूं प्रात अत्यंत मूढोंकी आरंभकताके अ- संभवतैं औ गर्भभूत मूर्च्छित जंतुनकूं कर्मके

२५७ यातैंबी कर्मशेषकी सिद्धि है। ऐसैं कहैहैं॥ इहां आरंभकर्ताके संभवतैं एक जाति (जन्म)करि उपभोग क- रनेयोग्य कर्मके क्षयहुयेवी कर्मशेष संभवैहै। यह शेष है। २५८ औ एक जन्मविषै सर्व क्षीण होवैहैं कर्मके आश- यकूं एक भविक (एक जन्मका हेतु) होनेतैं ? यह आशंका- करिके कहैहैं। इहां यह अर्थ है :- एक भविक (एक जन्म होनेके) न्यायकूं ऊपरके ग्रंथकरि निराकरण किया होनेतैं॥ २५९ इसतैंबी शेषकर्मकी सिद्धि है॥ इहां "श्वान शू- कर खर अरु उष्ट्नके [जन्मकूं ब्रह्महत्यावाला पावता है]" इत्यादि स्मरण (स्मृतिवाक्य) है।। २६० ननु घृतभांडके स्नेहके शेषकीन्यांई भुक्तकर्मकेहीं शेषतैं पुनरावृत्ति होवैगी? यातैं कहैहैं॥ २६१ कर्मशेषकी सिद्धिविषै अन्य हेतुकूं कहैहैं॥

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९१६ पंचमप्रपाठक ५ [छान्दोग्यो- प्राणज्येष्ठतादि पंचान्निविद्या श्गति वैश्वानरोपास्ति ज्ञातागनिहोत्र २४ २६२ असंभव हुये संसारका असंभव है। तातैं एक- जन्मविषै सर्व कर्मोंका उपभोग नहीं होवैहै।। औ जो किनोंकरि कहियेहै किः-मरणकाल- विषै सर्व कमोंके आश्रयके उपमर्दकरि कर्मोकूं जन्मका आरंभकपना है। तैसें हुये केईककर्म अनारंभकपनैकरिहीं स्थित होवैहैं औ केईक अन्य जन्मकूं आरंभकरते हैं। ऐसैं नहीं संभवै है। काहेतैं मरणकूं सर्वकर्मका अभिव्यंजक २६२ कर्मशेषके सभ्भावकूं उपसंहार करैहैं॥ इहां ए- ककर्मकूंबी अनेक जन्मकी हेतुता तत् (तातैं) शब्दका अर्थ है।। २६३ अन्य मतकूं उठावतेहैं॥ इहां यह अर्थ है :- जहां लगि प्रवृत्त (प्रारब्ध) फलवाला कर्म नहीं क्षीण होवैहै तहां- लगि प्रवृत्तिके प्रतिबंधतैं अन्य कर्म स्वफलकूं आरंभ करते नहीं॥ मरणकालविषै तो प्रतिबंधकके अभावतैं सर्व कर्मोंके आश्रयरूप संघातके नाशकरि तिन (अन्यकर्मौं)कूं उत्तर (चंद्रमंडलगत) शरीरकी आरंभकता अविरुद्ध है। २६४ तथापि शेषकर्मके सन्भ्रावकी असिद्धि कैसे है? यह सिद्धांतीकी शंका भई। यातैं पूर्ववादी कहैहै॥ इहां "तहां" याका सर्व अनारब्ध कर्मोंकूं उत्तर शरीरकी आरंभ- कताके होते। यह अर्थ है।।

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पनिषत् ] दशम खंड १० ९१७ साधिकारी उत्तरमार्ग दक्षिणमार्ग औ तृतीयस्थान १० (प्रकाशक) होनेतैं। स्वगोचरप्रकाशक प्रदी- पकी न्यांई? ऐसैं ॥ सो असत् है :- काहेतैं स- २६५

वैके सर्वात्मकपनैके अंगीकारतैं। जातैं सर्वके सर्वात्मकपनैके स्थितहुये देश कालरूप निमित्त करि कृत होनेतैं किसीकाबी कहूं बी सर्वरूपसैं उपमर्द (नाश) वा सर्वरूपकरि आविर्भाव नहीं संभवैहै। तैसैं आश्रयसहित कर्मोका बी हो-

२६५ मरणकालविषै जे कर्म अभिव्यक्त (उद्दूत) भयेहैं। चेई उत्तरशरीरके आरंभक हैं। इतर (अनुद्भूत कर्म)नकूं तो शरीरकी आरंभकता नहीं है। इस रीतिसैं सिद्धांती उक्तम. तकूं दूषण देते हैं। इहां यह अर्थ है :- मधुव्राह्मण उक्तन्या- यकरि सर्वकी सर्वात्मताके अंगीकारतैं देहकूंबी तिसप्रका- रका (सर्वात्मा) होनेतैं सर्वस्वरूपकरि उपमर्द (नाश)का संभव नहींहै।। २६६ उक्तअर्थकूं उपपादन करनेअर्थ सामान्यन्यायकूं कहैहैं।। इहां यह अर्थ है :- "सर्वका कारण है अरु कार्य है" इस न्यायकरि सर्वकी सर्वात्मताके स्थित हुये किसीकाबी कहूंबी सर्वरूपसैं नाश वा तैसैं आविर्भाव नहीं संभवै है। काहेतैं प्रतीयमान नाशआदिककूं देशविशेष आदिकका किया होनेतें।। २६७ उक्तन्यायकूं प्रकृतविषै जोडतेहैं॥

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९१८ पंचमप्रपाठक ५ [छान्दोग्यो- प्राणज्येष्ठतादि पंचाग्निविद्या श्गति वैश्वानरोपास्ति ज्ञातागनिहोत्र २४ वैगा ॥ औ जैसैं पूर्व अनुभूत मनुष्य मयूर (मोर) अरु मर्कटआदिक जन्मोंकरि संपादित जे विरुद्ध अनेक वासना हैं वे मर्कट (बंदर) भा- वके प्रापक मर्कट जन्मके आरंभकरनेवाले क- र्मकरि नहीं उपमर्दन करियेहैं। तैसैं अन्य ज- न्मकी प्राप्तिके निमिन्त कर्म बी नहीं उपमर्दन करिये हैं। यह युक्त है। जँवहीं सर्व पूर्वज- न्मोंके अनुभवकी वासना उपमर्दित (नष्ट) होवैं तब मर्कटजन्मके निमित्तरूप कर्मकरि मर्कट- जन्मके आरंभ किये हुये माताके एक शाखातैं अन्यशाखाके प्रति गमनके हुये जातमात्र (शी घ्रजन्मवाले) मर्कटकूं माताके उदरविषै संल- अ्रता (चिपटणां) आदिककौशल नहीं प्राप्त २६८ इसतैंबी कर्मशेष संभवैहै ऐसें क्रमवान्ताविषै द- ष्टांतकूं कहैहैं॥ इहां यह अर्थ है :- पूर्वक्रमकरि अनुभूत जे मनुष्यादि जन्म तिनकरि अभिसंस्कृत कहिये संपादित अरु परस्परविरुद्ध जे बहुत वासना हैं वे। तिस (मर्कट) जाति- विशेषके प्रापककर्मकरि तिस (मर्कट जन्म)के आरंभ किये हुये निरोधकूं पावतियां नहीं॥ २६९ दार्ष्टातिककूं कहैहैं॥ २७० दार्ष्टीतिककूं विवरण करैहैं॥

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पनिषत् ] दशम खंड १० ९१९ साधिकारी उत्तरमार्ग दक्षिणमार्ग औ तृतीयस्थान १० होवैहै। काहेतैं इसजन्मविषै तिस कौशलकूं नहीं अभ्यास किया होनेतैं औ अँतीत अनंतर (भूतपूर्वले) जन्मविषै ताका मर्कट भावहीं हो- ताभया। ऐसैं कहनेकूं शक्य नहीं है। काहेतैं "ता (जीव)कूं विद्या (शुभाशुभध्यान) अरुकर्म- आरंभकरतेहैं (पीछेजाते हैं) औ पूर्वप्रज्ञा (पूर्वजन्मोंविषै संपादित वासना)" इसश्रुतितैं। तौतैं वासनाकी न्यांईं अशेष कर्मका उपमर्द नहीं होवैहै॥ इसरीतिसैं शेषकर्मका संभव है

२७१ ननु अंतरायसहित वासनाओंके उच्छेदके हुयेबी अंतरायरहित देशवाली वासना उच्छेदकूं पावती नहीं। तैसें हुये अंतरायरहित (समीपके पूर्वले) जन्मतैं उत्पन्नवास- नाके सामर्थ्यतैं मर्कट शिशुका यथोक्त कौशल अविरुद्ध है ? यह आशंकाकरिके कहैहैं॥ २७२ किंवा :- "औ पूर्वप्रज्ञा [आरंभ करैहैं]" ऐसैं अवि- शेष (सामान्यभाव)करि पूर्वजन्मविषै संपादित वासना जीव- केप्रति अनुगमन करैहैं (पीछे जावैहैं)। ऐसैं श्रवणतैं अंतरा- यरहित (समीपके) पूर्वजन्मकी वासनाहीं ता (जीव)केप्रति पीछे जाती है। ऐसें विशेषकरि कहनेकूं शक्य नहीं है। [किंतु अंतरायसहित वासनाबी जातीहै] ऐसैं कहैहैं॥ २७३ ष्टांतकूं उपपादनकरिके अब दार्टीतिककूं निग- मन करैहैं।

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९२० पंचमग्रपाठक ५ [छान्दोग्यो- प्राणज्येष्ठतादि पंचाग्निविद्या श्गति वैश्वानरोपास्ति ज्ञाताग्निहोत्र २४ जाते ऐसें है तातैं उपभुक्त कर्मतैं जो शेष कर्म है तिसकरि संसार संभवैहै। ऐसें कोई बी विरोध नहीं है।।। कौंन यह मार्ग है जाके प्रति निवर्त्त होतेहैं (चंद्रमंडलतैं पीछे लौटते हैं)? यह कहियेहैः-जैसैं आये तैसैं निवर्न्त होतेहैं।॥ नतु "मासोंतें पितृलोककूं पितृलो- कतैं आकाशकूं। आकाशतैं चंद्रमाकूं" ऐसैं ग- मनका क्रम कहा है। तैसैं निवृत्ति नहीं कही है।। तब क्या (निवृत्ति कैसैं कहीहै) कि :- "आकाशतैं वायुकूं" इत्यादि [कहीहै। यातैं] जैसैं आये तैसैं निवर्त्त होतेहैं। यह कैसैं कहि- येहै? यहै दोष नहीं है :- काहेतैं आकाशकी २७४ शेषकर्मके सद्भावके हुये फलितकूं कहैहैं॥ इहां उपभुक्तकर्मके शेषकरि। ऐसें संबंध है औ कोईबी। याका ध्रौत वा स्मार्त वा यौक्तिक वा लौकिक [विरोध नहीं है] यह अर्थ है।। २७५ "इसीहीं मार्गकूं" ऐसें प्रकृत मार्गकूं प्रश्नपूर्वक स्पष्ट करैहैं। २७६ "जैसे आये तैसैं" इसप्रकारसें उक्तअर्थके तांई पूर्ववादी आक्षेप करैहै। २७७ क्या "जैसै आयेहें तैसें" यहहीं नहीं संभवैहै।

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पनिषत् ] दशम खंड १० ९२१ साधिकारी उत्तरमार्ग दक्षिणमार्ग औ तृतीयस्थान १०

प्राप्तिकूं औ पृथिवीकी प्राप्तिकूं तुल्य होनेतैं।। औ इहाँ जैसैं आयेहैं तैसें निवर्त्त होवैहैं ऐसा नियम नहीं है किंतु अन्यप्रकारसैं बी फेर नि- वर्त्त होवैहैं ऐसा तो नियम है। यातै "जैसैं आये तैसैं" यह कथन उपलक्षण (अन्यप्रका- रके ग्रहण) अर्थ है।। यीतैं भौतिक आकाश-

किंवा "जैसैं आयेहैं तैसैहीं" ऐसा नियम नहीं संभवैहै? ये दो विकल्पकरिके। तिनमैं प्रथमपक्षकूं सिद्धांती दूषण देतेहैं॥ २७८ द्वितीय पक्षकेप्रति कहैहैं ॥ इधर "इहां" ऐसैं नि- वृत्ति कहीहै। औ अनेवंविध (अन्यप्रकारसैं)बी। ऐसै कहा। याका जैसैं गतिका क्रम दिखाया तैसें नियमित निवृत्ति नहीं होवैहै किंतु अन्यप्रकारसैंबी संभवै है। यह अर्थ है।। २७९ ननु निवृत्तिके कमके नियमके अभावके हुये किस प्रकारका नियम कहनेकूं वांछित है? यह आशंकाकरिके कहैहैं॥ २८० तब किस अभिप्रायकरि "जैसै आये तैसैं" यह श्रुतिनैं कहा १ यातैं कहैहैं॥ इहां गतिके क्रमकीन्यांई निवृ- त्तिके क्रमविषै नियमका अभाव अतः (यातैं) शब्दका अर्थ है। औ जैसें आये तैसैं निवर्त्त होते हैं। अरु अन्यप्रका- रसैं निवर्त्त होते हैं। ऐसें उक्त (श्रुतिनैं कहा) है [यह शेष है]।। २८१ निवृत्तिके नियमके हुये फलितकूं कहैहैं ॥। इहां

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९२२ पंचमप्रपाठक ५ [छान्दोग्यो- प्राणज्येष्ठतादि पंचाग्निविद्या शगति वैश्वानरोपास्ति ज्ञाताग्निहोत्र २४ कूं प्रथम पावते हैं [आकाशतैं वायुकूं] ।l औ जे चंद्रमंडलविषै तिनके शरीरके आरं- भक जल होतेभये वे तिनके तहां उपभोगके निमित्त कमोंके क्षयभये अग्निके संयोगके हुये घृतके काठिन्यकी न्यांईं विलीन (गलित) होवै हैं।। वे विलीनहुयी अंतरिक्षविषै स्थित आ- काशभूत हुयेकी न्यांईं सूक्ष्म होवैहैं ॥ वे अंत- परमात्मारूप चिदाकाशकूं भिन्न जनावनेकूं भौतिक आकाशकूं ऐसे कहा। २८२ ननु पूर्वसिद्ध आकाशकेसाथि तादात्म्यकी प्राप्ति अवरोह करने (चंद्रमंडलतैं उतरनैं) वालोंकूं सिद्ध होवैहै? यह आशंका करिके। ता (आकाश)के समताकी प्राप्तिहीं ता (आकाश)के भावकी प्राप्ति है। ऐसैं उपचारकरियेहैं "स्वभाव- की प्राप्ति होवैहै" इस न्यायतैं। ऐसैं कहैहैं। इहां घृतका सं- स्थान कहिये काठिन्य॥ औ इधर यह भावार्थ है :- तिन जलोंके आकाशभूत हुये तिनकरि परिवेष्टित जे कर्मी वे चंद्रमंडलतैं ऊतरते हुये तिस आकाशरूप हुयेकी न्यांई होवैहैं॥ २८३ "आकाशतैं वायुकूं" इस वाक्यके अर्थकूं साधते हैं। इहां उन्नत (ऊंचे) प्रदेशनविषै। याका समुद्रआदिकनतैं व्यतिरिक्त प्रदेशन (स्थलों) विषै यह अर्थ है औ "वे" ऐसैं अनुशयी (चंद्रलोकतैं ऊतरे जीव) निर्देश करियेहैं औ "इहां" ऐसैं पृथिवी कहिये है॥

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पनिषत् ] दशम खंड १० ९२३ साधिकारी उत्तरमार्ग दक्षिणमार्ग औ तृतीयस्थान १० अभ्रं भूत्वा मेघो भवति मेघो भू-

अर्थ :- अभ्र होयके मेघ होवैहै। मेघ

रिक्षतैं वायुरूप होवैहैं॥ वायुविषै स्थित वायु- अूतहुये इहांतैं अरु उहांतैं वहमान (चलित) होवैहैं। तिनकेसाथि क्षीणकर्मवाला पुरुष वा- युभूत होवैहै॥ वायुरूप होयके तिनजलोंके साथिहीं धूम होवैहै॥ धूम होयके अभ्र कहिये अप् (जल)के भरणमात्र रूपवाला (बा- दल) होवैहै ॥ ५ ॥ टीका :- अभ्र होयके तिसतैं सेचनविषै स- मर्थ मेघ (अभ्रमंडलरूप) होवैहै॥ मेघ हो- यके उन्नत (समुद्रादिकसैं भिन्न) प्रदेशोंविषै अनंतर वर्षताहै। अर्थ यह जो :- वर्षाकी धा- रारूपसैं शेषकर्मवाला जीव पतन होताहै॥ वे (जीव) इहां (पृथिवीविषै) व्रीहि (तंडुल) यव ओषधि वनस्पति तिल अरु माष (उडद)

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९२४ पंचमप्रपाठक ५ [छन्दोग्यो- प्राणज्येष्ठतादि पंचाग्निविद्या श्गति वैश्वानरोपास्ति ज्ञाताग्निहोत्र २४ त्वा प्रवर्षति। त इह ब्रीहियवा ओषधि- वनस्पतयस्तिलमाषा इति जायन्तेऽतो होयके वर्षता है।। वे (जीव) इहां व्रीहि यव ओषधि वनस्पति तिल माष इस प्र- कारके उपजतेहैं। यातैं प्रसिद्ध अत्यंत

इस प्रकारके उपजते हैं॥। [इहाँ क्षीणकर्म- वाले जीवनकूं अनेक होनेतैं बहुवचनका निर्दे- शहै औ पूर्वले मेघआदिकनविषै एकरूप होनेतैं २८५

एकवचनका निर्देश है]।। जातैं वर्षाकी धारा-

२८४ इस वाक्यविषै बहुवचनसैं अनुशयी जीवनक बहू- क्तिकरि निर्देश कैसें किया ? तहां कहैहैं॥ २८५ तब "मेघरूप होयके वर्षता है" इत्यादिरूप वा- क्यविषै एकवचनका निर्देश (कीर्त्तन) कैसें है? तहां कहैहैं।। इहां यह अर्थ है :- जे पूर्व मेघसैं आदिलेके आकाशपर्यत पदार्थ हैं तिनविषै एक एकके अभिमानी देवताओंकूं एकरूप होनेतें तिनसैं मिलित अनुशयी जीवनका बी एकवचनकरि निर्देश युक्त है। २८६ "इसतैं प्रसिद्ध" इत्यादि वाक्यकूं व्याख्यान करैहैं॥

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पनिषत्] दशम खंड १० ९२५ साधिकारी उत्तरमार्ग दक्षिणमार्ग औ तृतीयस्थान १० वै खलु दुर्निष्प्रपतरं यो यो ह्यन्नमत्ति यो रेतः सिञ्चति तद्रूय एव भवति ॥ ६॥

दुःखकरि निकसना है। जातैं जो जो अन्नकूं भक्षण करैहै। जो रेतकूं सिंचन करैहै। ताकी अधिकतावाला (ताकी आ- कृतिवाला)हीं होवैहै ॥ ६ ॥

ओंकेसाथि गिरेहुये जीवनके गिरितट (पर्वतप्रांत) दुर्ग (किल्े वा दुर्गमदेश) नदीयां समुद्र वन अरु मरुदेशआदिक स्थानोंके सहस्र हैं। यातैं तिस हेतुतैं दुःखसैं तिनका निःसरण होवैहै॥ जाँतैं गिरिके तटतैं जलके प्रवाहसैं वहते हुये जीव नदीनकेतांई प्राप्त होवैहैं। तिनतैं समुद्र- कूं। तिसतैं मकरआदिकनकरि भक्षणकरिये हैं। वे (मकरआदिक) बी अन्यकरि भक्षणकरिये- २८८

२८७ अनुशयी जीवनका निःसरण (निकसना) दुःशक (डुःखसैं होने योग्य) है। ऐसैं उक्त अर्थकूं विस्तारते हैं॥ २८८ मकरआदिकरि भक्षित अनुशयी जीवनका तिनतैं ७८

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९२६ पंचमप्रपाठक ५ [छान्दोग्यो- प्राणज्येष्ठतादि पंचान्निविद्या श्गति वैश्वानरोपास्ति ज्ञातान्निहोत्र २४ हैं॥ औ तहां समुद्रविषैहीं मकरके साथि वि- लीनभये जीव जैलधरों (बादलों) करि समु- द्रके जलोंके साथि आकर्षित (खींचे) हुये फेर वर्षाकी धाराओंकेसाथि अगम्य मरुदेशविषै वा शिलातटविषै पतित (गिरे) हुये स्थित हो- वैहैं॥। कदाचित् व्याल अरु मृगआदिककरि पीत (पानकिये) औ अन्योंकरि भक्षित होवैहैं। वे वी अन्योंकरि। इस प्रकारके हुये वर्त्ततेहैं ॥ तिनके समानजातिवान्पनैकरि समुद्भव (जन्म ) होवैगा? ऐसें जो कहै। सो बनै नहीं। ऐसैं कहैहैं॥ इहां यह अर्थ है :- मकरआदिकबी अन्य (बडे मकरआदिक) जलचारीनकरि भक्षित होवैहैं। तैसैं हुये समुद्रविषै पतित (गिरे) अनुशा- यिनका तहांहीं लय होवैहै॥ २८९ ननु ऐसें अनुशयी जीव समुद्रविषै लीन होवैहैं औ तिसतैं फेरि उद्धारकरनेकूं शक्य होते नहीं। तैसैं हुये कृतविनाश (किये कर्मका फलभोगविना नाशरूप दोष) हो- वैगा? यह आशंकाकरिके कहैहैं॥ इहां समुद्रके जलोंकरि। यह तृतीया विभक्ति सह (साथि) अर्थविषै है। २९० तब सर्प अरु व्याघ्रकरि उपभुक्त (भक्षित) अनु- शायी जीवनकूं तिन (सर्पादिकन)के समान जातिवाले देहका भोग होवैगा? ऐसैं जो कहै। सो बनै नहीं। ऐसैं कहैहैं।। २९१ तब जनोंकरि सर्पादिक अक्षण करियेहैं तिनतैं

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पनिषत् ] दशम खंड १० ९२७ साधिकारी उत्तरमार्ग दक्षिणमार्ग औ तृतीयस्थान १० कैदाचित् अभक्ष्य स्थावरोंविषै जन्मकूं पाये हुये तहांहीं सूकजाते हैं॥। अैक्ष्य स्थावरोंविषै बी जन्मकूं प्राप्तभये तिनकूं रेतके सिंचिनकरनेवाले (पिता)के देहसैं संबंध दुर्लभ हीं है। स्थावरों- कूं बहु होनेतैं। जातैं ऐसैंहै यातैं तिनका दु :- खसैं निकसना है।। अथवा इस व्रीहि अरु यव आदिकभावतैं अत्यंत दुःखसैं निर्गम (निक- सना) जिसतैं होवैहै ऐसा है, [ इहां मूलविषै जो "दुर्निष्प्रपतर" ऐसा शब्द है तिसविषै एक तकार छुप देखनेकूं योग्य है]। अर्थ यह जो :-

तिनके समान जातिवान्पनैकरि अनुशायी जीवनका उद्भव होवैगा? ऐसैं जो कहै। सो बनै नहीं। ऐसैं कहैहैं॥ २९२ तथापि यथोक्तरीतिकरि परिवर्त्तनतैं वे जीव रेतके सिंचक (पिता)के साथि योगकूंबी जबकदाचित् पावैंगे? ऐसें जो कहै। सो बनै नहीं। ऐसैं कहैहैं॥ २९३ तथापि भक्ष्य जे स्थावर तिनविषै जन्मकूं पाये जीवनकूं रेतके सिंचकके साथि योग सुलभ होवैगा ? ऐसैं जो कहै। सो बनै नहीं। ऐसें कहैहैं॥ इहां इति (ऐसैं) शब्द पूर्वले यत् (जातैं) शब्दके साथि संबंधकूं पावता है। २९४ पूर्व अतः (यातैं) ऐसा शब्द हेतुपर होनेकरि व्या- ख्यान किया। अब व्रीहिआदिक अवधिवाले वस्तुनका वा- चक होनेकरि ताकूं व्याख्यान करैहैं।

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९२८ पंचमप्रपाठक ५ [छान्दोग्यो- प्राणज्येष्ठतादि पंचाग्निविद्या श्गति वैश्वानरोपास्ति ज्ञाताग्निहोत्र २४ ब्रीहि यवादिभाव अत्यंत दुःखसैं निर्गम जि- सतैं होवैहै ऐसा है। तिस दुर्निर्गमतरतैं बी रेत- के सिंचिन करनेवाले (पिता)के देहसैं संबंध दुर्निर्गमतर (अत्यंतदुःखसैं निर्गमन जिसतैं हो- वैहै ऐसा) है। जातै ऊर्ध्वरेता वा बालक वा नपुंसक वा वृद्ध इनकरि भक्षित हुये अंतराल- विषै (बीचमैं) विशीर्ण होतेहैं (विनाशकूं पा- वते हैं)। काहेतैं अन्नके भक्षकोंकूं अनेक होनेतैं।। कैदाचित् काकतालीयन्यायकरि रेतके सिंचन- करनेवाले पुरुषनकरि जब भक्षण करिये हैं तब रेतके सिंचनकरनेवालेके भावकूं प्राप्तभये ति- नकूं कर्मतैं वृत्तिका लाभ होवैहै॥॥ कैसैं कि :- २९५ दुर्निष्प्रपतर। ऐसैं तकारसहित पाठके होते विव- क्षित अर्थकूं कहैहैं॥ २९६ तहां हेतुकूं कहैहैं। २९७ तब बीचमैं विनष्ट भये तिन जीवनकूं देहभागी होनेके अभावतैं अनुशयकी व्यर्थता होवैगी ? यह आशंकाक- रिके कहैहैं।। इहां काकतालीय वृत्तिकरि। याका याद- च्छिक न्यायकरि (दैवगतिसैं)। यह अर्थ है।। २९८ अनुशयनामवाले कर्मकूं भाविदेहके आरंभरूप अ- र्थवाला होनेतैं मुख्य अर्थकूं प्रश्नपूर्वक विवरण करैहैं॥

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पनिषत्] दशम खंड १० ९२९ साधिकारी उत्तरमार्ग दक्षिणमार्ग औ तृतीयस्थान १० जो जो रेतःसिक् (वीर्यका सिंचक पुरुष) प्र- सिद्ध अनुशायी (जीव) नकरि संयुक्त अन्नकूं भक्षण करैहै औ जो ऋतुकालमैं स्त्रीविषै रेत- कूं सिंचन करैहै। ताकी अधिकतावाला- हीं कहिये तिसकी आकतिवालाहीं होवैहै॥ इहां ताके अवयव अरु आऊतिकी बहुलता (अधिकता) "भूयः" ऐसैं कहियेहै॥ अर्थ यह जो :- रेतरूपसैं स्त्रीके गर्भाशय (गर्भस्थान) विषै भीतर प्रविष्ट हुया जो अनुशयी (जीव)है। ता- रेतकूं रेतके सिंचन करनेवाले पुरुषकी आकृति (अंश) करि भावित होनेतैं औ "सैर्व अंगनतैं

२९९ अनुशयी जीवके रेतके सिंचकके आकारके भागी होनेविषै हेतुकूं कहैहैं॥ इहां यह अर्थ है :- ताकूं रेतके सिं- चककी आकृतिकरि (ताके अंशकरि) भावित होनेतैं (सं- स्कृत होनेतैं) कहिये ताके अंगकरि संभूत होनेतें ताके रू- पसैं गर्भाशयके प्रति अनुप्रविष्ट हुया अनुशयी जीव रेतके सिंचककी आकृतिवाला होवैहै॥ ३०० रेतके सिंचकके अंगके उत्पन्न होनेविषै ऐतरेयक श्रुति प्रमाण है। ऐसें कहैहैं।

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९३० पंचमप्रपाठक ५ [छान्दोग्यो- प्राणज्येष्ठतादि पंचान्निविद्या शगति वैश्वानरोपास्ति ज्ञातागनिहोत्र २४ तेज उपज्या है" इस प्रसिद्ध श्रुतितैं। थीतैं [सो जीव] रेतके सिंचक (पिता) की आकतिवाला हीं होवैहै॥ तैसैं दिखायियेहैः-पुरुषतैं पुरुष उपजता है। गौतैं गौकी आकतिवाला हीं उ- पजताहै अन्यजातिकी आकृतिवाला नहीं। तातैं "ताकी अधिकतावालाहीं होवैहै" यह युक्त है॥ औ जे अनुशायी जीवनतैं अन्यजी- वहैं वे चंद्रमंडलकेतांईं अनारोह करिके (नजा- यके) इहांहीं घोर पापकर्मोकरि व्रीहि अरु यव- आदिभावकूं पावते हैं फेर मनुष्यभावकूं पावते २०१ रेतरूपसैं गर्भाशयकेप्रति प्रविष्ट भये जीवकी उक्त रेत सिंचककीआकारताकूं निगमन करैहैं। ३०२ अनुशयी जीवकी रेतसिंचककी आकारवान्ता- विषै लौकिक अनुभवकूं अनुकूल करैहैं॥ ३०३ चंद्रके स्थलतैं रखलितभये (गिरे)अरु अवरोह करने- वाले (ऊतरनेवाले) अरु व्रीहि आदिक देहसैं संयोगवाले जी- वनकूं जव दीर्घकालकरि देहांतरका लाभ होवै तब व्रीहिआ दिक देहके अभिमानियोंकावी निष्क्रमण (निकसना) दुःशक होवैगा। काहेतैं व्रीहिआदिक देहके साथि संबंधकी (अनुशायी जीवनके देहके संबंधकी) तुल्यतातैं ? यह शंका भई। यातैं कहैहैं॥

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पनिषत् ] दशम खंड १० साधिकारी उत्तरमार्ग दक्षिणमार्ग औ तृतीयस्थान १० ९३१

हैं। तिनकूं अनुशायी जीवनकी न्यांईं अत्यंत दुःखसैं निकसना नहीं है। काहितैं? जातैं कर्म करि तिनोंनैं व्रीहि अरु यवआदिकका देह ग्र- हण किया है। यातैं तिस देहके उपभोगके निमिन्तके क्षयभये व्रीहिआदिक स्तंबरूप देहके विनाशके होते विज्ञानसहितहीं हुये कर्मके अ- नुसार संपादित नये नये अन्य देहकूं जलूका (तृणजंतुविशेष) की न्यांई क्रमसैं पावते हैं॥ काहेतैं "विज्ञानसहित होवैहै। विज्ञान सहित

३०४ व्रीहिआदिक देहसैं संबंधकी तुल्यताके हुये तिस (व्रीहिआदिक) देहके भाजीनका काहेतैं तिनतैं निःसरण अशक्य नहीं होवैहै? यह आशंकाकरिके तिनतैं तिनकी विलक्षणताकूं कहैहैं॥। इहां यह अर्थ है :- "शरीरतैं जन्यकर्म रूप दोषनकरि नर स्थावरभावकूं पावताहै" इत्यादि श्रुति स्मृतिनविषै जनोंका कर्मरूप निमित्तवाला स्थावर जन्म है। तिनोंका कर्मका क्षयहीं अवधि है॥ परंतु अवरोहकरनेवाले (लोकांतरतैं ऊतरनेवाले) जीवनकी कर्मके असंकीर्त्तनतैं वि- षमता (अन्य जीवनतैं विलक्षणता) है। २०५ जैसें जलूका (घासका घोडानामक लघुजंतुवि- शेष) तृणतें अन्यतृणकेतांई दीर्घभूत (लंबी) हुयी संक्रमण (गमन) करैहै। तैसैं अनुशयी जीव व्रीहिआदिक देहके भ- जनेवाले हुयेबी ताके त्यागकरि अन्य देहकेप्रति गमन करते

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९३२ पंचमप्रपाठक ५ [छान्दोग्यो प्राणज्येष्ठतादि पंचान्निविद्या श्गति वैश्वानरोपास्ति ज्ञाताग्निहोत्र २४ जैसैं होवै तैसैं पीछेगमन करैहै" इस अन्यश्रु- तितैं ॥ यंधपि उपसंहार किये (निरुद्ध) करण- वाले हुये अन्य देहके तांईं गमन करैहैं तथापि स्वप्नकी न्यांईं अन्यदेहकी प्राप्तिके निमित्त क- र्मकरि उद्भावित (उद्ुद्ध) वासनारूप ज्ञानकरि विज्ञानसहितहीं हुये अन्य देहकेतांई गमन करैहैं। श्रुतिके प्रामाण्यतैं॥ तैसैं अर्चिरादि- नहीं। किंतु तिस विषयके विज्ञानवाले हुयेहीं गमन करैहैं। इस अर्थविषै वृहदारण्यककी श्रुतिकूं प्रमाण करैहैं॥ ३०६ औ उपसंहारकिये करणोंवाले जीवनकूं विज्ञान- विषै कारणके असंभवतैं विज्ञानसहितपना कैसें होवैहै? तहां कहैहैं॥ ३०७ दष्टकारणके अभाव हुयेबी अदष्टरूपहीं एक वास- नास्वरूप ज्ञानकी उत्पत्तिविषै निमित्तहै। यातैं इस निमित्तकरि विज्ञानसहित हुयेहीं देहांतरकेप्रति जातेहैं। इस अर्थविषै हेतुकूं कहैहैं। इहां श्रुति जो कही सो बृहदारण्यककी श्रुति जाननी ।I ३०८ जैसैं विज्ञानसहित जीवनका हीं वीहिआदिक अ- न्यदेहके प्रति गमन होवैहै। तैसैं ज्ञानीनका (उपासकोंका) अर्चिरादि मार्गकरि औ कर्मीनका धूमादिमार्गकरि गमन जो है सो स्वप्नकीन्यांई उद्धूतवासनास्वरूप विज्ञानकरि विज्ञान- सहितनकाहीं होवैहै। ऐसैं कहैहैं॥

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पनिषत्] दशम खंड १० साधिकारी उत्तरमार्ग दक्षिणमार्ग औ तृतीयस्थान १० ९३३

मार्गकरि औ धूमादिमार्गकरि जो गमन है सो स्वप्नकी न्यांईं उद्धूतविज्ञानकरि होवैहै। काहेतैं गमनकूं लब्धवृत्तिवालेके कर्मरूप निमित्तवाला होनेतैं। तैसैं व्रीहिआदिभावकरि जन्मकूं प्रा- सभये अनुशायी जीवनकूं विज्ञानसहितहीं जैसैं होवै तैसैं रेतके सिंचक पुरुष अरु स्त्रीके देहसैं संबंध नहीं संभवैहै औ जातैं व्रीहिसैं आदिलेके लवन (छेदन) कंडन अरु पेषण आदिकविषै विज्ञानसहितनकी स्थिति नहीं है।॥ नैतु चं- ३०९ तिनकी विज्ञानसहितताविषै हेतुकूं कहैहैं॥ ३१० तब व्रीहिआदिकविषै मिलित अनुशायिनकाबी रेतके सिंचकआदिक देहसैं संबंध विज्ञानसहितनकाहीं होवैगा ? ऐसैं जो कहै। सो बनै नहीं। ऐसैं कहैहैं॥ २११ असंभवविषै हेतुकूं कहैहैं॥ इहां यह अर्थ है :- ब्रीहिआदिकसैं मिलित अनुशयिनकूं विज्ञानसहितताके हुये तिन व्रीहिआदिकनके छेदनआदिकनविषै तिनके (व्रीहि आदि- कनके) जीवनकीन्यांई तिन अनुशायी जीवनकूंबी प्रवास (अन्यदेशविषै स्थिति)के प्रसंगतैं रेतके सिंचकके देहसैं संबंध नहीं सिद्ध होवैगा॥ ३१२ देहांतरकेप्रति जानेवाले व्रीहिआदिकनविषै विज्ञा- नवान्ताकी प्रतीतितें अनुशयी जीवनविषैबी देहांतरकी प्रा- तिके अविशेषतैं विज्ञानसहितपना युक्त है? ऐसैं पूर्ववादी

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९३४ पंचमप्रपाठक ५ [छान्दोग्यो- प्राणज्येष्ठतादि पंचान्निविद्या श्गति वैश्वानरोपास्ति ज्ञाताग्निहोत्र २४ द्रमंडलतैं बी अवरोहवाले (उतरनेवाले) पुरुष- नकूं देहांतरविषै गमनकूं तुल्यहोनेतैं जलूकाकी न्यांई विज्ञानसहितताहीं युक्त है। तैसैं हुये इष्ट अरु पूर्तआदिकके कर्त्ताओंकूं चंद्रमंडलतैं आरंभकरिके घोर नरकका अनुभव यावत् त्रा- ह्मणआदिकका जन्म होवै तावत् प्राप्तभया॥ तैसैं हुये इष्ट अरु पूर्त्तआदिकका उपासन (अनु- ३१३

ष्ठान) अनर्थके अर्थहीं विहित होवैगा औ श्रुतिकूं अप्रमाणता प्राप्त होवैगी। काहेतैं वैदिककर्मों- शंका करैहै॥ इहां ऐसें योजना है :- तृणतैं [प्रथम अन्य तृणकूं पकरिके] अन्य तृणकेप्रति जलूकाके गमनकीन्यांई चंद्रमंडलतैं [ प्रथम अन्यदेहका अभिमान करिके ] ऊतरनेवाले अनुशयी जीवनकेवी देहांतरकेप्रति गमनकूं तुल्यहोनेतैं व्रीहिआदि- कनकीन्यांई तिन अनुशयी जीवनकी विज्ञानसहितता युक्त है।। ३१३ तिन अनुशयिनकी विज्ञानसहितता होहू। कौंन हानि है? यातैं पूर्ववादी कहैहै॥ ३१४ इष्ट पूर्त्तआदिकके कर्त्ताओंकूं बीचमैं नरकअनु- भवके होते। औ तैसैं हुये ताके अनुष्ठानकी अनर्थके अर्थ विहितताके हुये श्रेयके साधनकूं विषयकरनेवाला कर्मकांड विरोधकूं पावैगा। ऐसैं पूर्ववादी कहैहै॥

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पनिषत्] दशम खंड १० ९३५ साधिकारी उत्तरमार्ग दक्षिणमार्ग औ तृतीयस्थान १०

कूं अनर्थके अनुबंधी (संबंधी) होनेतैं? सो बनै ३१५

नहीं :- काहेतैं वृक्षके आरोहण अरु तातैं पतनकी न्यांईं विशेष (भेद) के संभवतैं। देहतैं देहांत- रके तांई प्राप्तहोनेवालेके कर्मकूं लब्धवृत्तिवाला (उद्भूतकर्मवाला) होनेतैं कर्मसैं उद्भवकूं प्रा- प्रभये विज्ञानकरि फलकूं ग्रहण करनेकूं इच्छ- नेवाले वृक्षके अग्रकेतांई चढनेवालेकी न्यांईं विज्ञानसहितता युक्त है। तैसैं अर्चिआदिमा- ्गकरि गमनकरनेवालोंकूं औ धूमआदिक मा- र्गकरि चंद्रमंडलकेतांईं चढनेकूं इच्छनेवालोंकूं

३१५ जैसैं बुद्धिपूर्वक (ज्ञानपूर्वक) वृक्षकेप्रति आरोह- करनेवालोंकी विज्ञानसहितताके हुयेवी तिस (वृक्ष)तैं अवु- द्विपूर्वक (अजानतैं) गिरनेवालोंकी विज्ञानसहितता नहीं जानिये है। तैसैं चंद्रमंडलकेप्रति आरोहकरनेवालोंकी वि- ज्ञानसहितताके हुयेबी तिसतैं अवरोहकरनेवालोंकूं सो नहीं है उद्भूत कर्मके अभावतैं। ऐसें आरोह अरु अवरोहविषै ज्ञानविशेषके संभवतैं। ऐसें बनै नहीं। इसरीतिसैं सिद्धांती परिहार करैहैं। ३१६ संग्रह (संक्षिप्त) वाक्यकूं विवरण करैहैं॥ चकार (औ शब्द) तैं गमन करनेवालोंकूं विज्ञानसहितता होवैगी । ऐसें संबंध है।।

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९३६ पंचमप्रपाठक ५ [छान्दोग्यो- प्राणज्येष्ठतादि पंचान्निविद्या शगति वैश्वानरोपास्ति ज्ञाताग्निहोत्र २४ औ गमन करनेवालोंकूं विज्ञान सहितता होवैहै। तैसैं चंद्रमंडलतैं पतनहोनेवालोंकूं वृक्षके अग्रतैं पतनहोनेवालोंकी न्यांईं सचेतनता (विज्ञानस- हितता) नहीं होवैहै॥ औ जैसैं मुद्रआदिक- करि अभिहतहुये औ तिसकरि किये अभिघात- करि भई वेदनारूप निमित्तक सम्यक् मू- र्च्छित वा प्रतिबद्ध करणवाले ऐसैं स्वदेहकरिहीं देशतैं देशांतरके प्रतिलिये जवानेवाले पुरुषनकी विज्ञानकरि शून्यता देखी है। तैसैं चंद्रमंडलतें मानुषआदिक देहांतरके प्रतिउतरनेवाले अरु स्वर्गभोगके निमित्त कर्मके क्षयतैं नष्ट जलमय देहवाले अरु प्रतिबद्ध करणवाले पुरुषनकूं [वि-

३१७ अवरोहकरनेवाले जीवनकूं सर्वथा विज्ञानशून्यता अयुक्त है। काहेतैं तिनके चैतन्यस्वभावतैं। वृक्षतैं गिरने- वालोंकूंबी विज्ञानमात्र है हीं? यह आशंकाकरिके अन्यउ- दाहरणकूं कहैहैं। इहां तिस मुद्धरआदिककरि जो अभिघात (प्रहार) है तिस हेतुकरि जो वेदना नामक निमित्त है ति- सकरि मूर्च्छित कहिये नष्ट भये वा प्रतिबद्ध भये हैं करण जिनोंके तिनोंकी। यह अर्थ है औ मृदित कहिये नष्ट भया है जलमय स्थूलदेह जिनोंका तिनोंकी। ताहींतैं प्रतिबद्ध करणेवालोंकी विज्ञानशून्यता युक्त है। ऐसे संबंध है।।

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पनिषत् ] दशम खंड १० ९३७ साधिकारी उत्तरमार्ग दक्षिणमार्ग औ तृतीयस्थान १० ज्ञानशून्यता युक्त है]।। थातैं वे अपरित्यक्त- देहभावके बीजभूतकर्मवाले जलोंकरि मूर्च्छि- तकीन्यांई आकाशआदिकके क्रमसैं या (पृ- थिवी)केतांईं पायके प्रतिबद्धकरणवाले होने- ३२०

करि अनुद्भूत विज्ञानवाले हुये हीं कर्मरूपनि- मित्तवाले जाति अरु स्थावर देहोंके साथि सं-

३१८ यथोक्त दृष्टांतके वशतै चंद्रमंडलतैं ऊतरनेवाले विज्ञानशून्य सिद्ध होवैहैं। ऐसें निगमन करैहैं॥ ३१९ तथापि मूर्च्छितपुरुषनका स्थूलदेहके सद्भावतैं दे- शांतरकेप्रति गमन युक्त है। औ चंद्रमंडलतैं ऊतरनेवालोंकूं तो ता (स्थूलदेह)के अभावके हुये व्रीहिआदिभाव कैसै सं- भवैहै ? यातैं कहैहैं॥ इहां नहीं परित्याग कियाहै देहभाव- का बीजरूप कर्मका अपूर्व जिनोंनैं तिन जलोंकरि युक्त जीव मूर्च्छितकीन्यांई विज्ञानशून्य हुये गगनआदिकके क्रमसैं पृथि- वीकूं पायके कर्मके फलभूत जाति अरु स्थावर शरीरनके साथि संबंधकूं पावतेहैं। ऐसे संबंध है।। ३२० स्थावरदेहका संबंधी होनेतैं तद्गत जीवकीन्यांई तब विज्ञानसहितपना संभवै? यह आशंकाकरिके कहैहैं॥ इहां यह अर्थ है :- व्रीहिआदिकसैं मिलनेकी अवस्थाविषै अनुशयी जीवनके कर्मकूं अनुद्भूत वृत्तिवाला होनेतैं औ क- रणोंकूं तहां वृत्तिलाभके अभावतैं तिनकूं अनुद्भूत विज्ञान- वानूपना युक्त है।।

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९३८ पंचमप्रपाठक ५ [छान्दोग्यो- प्राणज्येष्ठतादि पंचाग्निविद्या ३ गति वैश्वानरोपास्ति ज्ञाताग्निहोत्र २४

बंधकूं पावतेहैं ।। तैसैं लवन(छेदन)कंडन पे- षण संस्कार (रंधन) भक्षण अरु रसआदि- कके परिणामरूप रेतके सेचनके कालोंविषै मू- र्च्छितकीन्यांईहीं होवैहैं। काहेतैं अन्य देहके आरंभककर्मकूं अलब्धवृत्तिवाला (अनुङ्ूत) होनेतैं। देहके बीजभूत जलोंके संबंधके अपरि- ३२३

३२१ केवल व्रीहिआदिकसैं संयोगकालविषै अनुद्जूत विज्ञानवानपना नहीं है किंतु व्रीहिआदिकके छेदनादि का- लविषैवी है। ऐसें कहैहैं॥ इहां पाक (रसोई)रूप संस्कार है औौ रसादि। इस आदिशब्दकरि शोणित (रक्त) मांस मेद अस्थि मजा अरु रेतरूप षट्धातु ग्रहण करियेहैं॥ ३२२ तिस कालविषै मूर्च्छितकीन्यांई अनुद्ूत विज्ञानवा- नूताके हुये देहतैं बाहिर निर्गत जीवनकूं अन्यदेहकी प्रा- प्रितैं पूर्व सो है हीं। इस हेतुकूं कहैहैं।। इहां अलन्धवृ- त्तिवाला होनेतें। ऐसे पदच्छेद है।। ३२३ फेर अनुशायी जीवनकूं विज्ञानशून्यताके हुये "सो जैसें तृणजलायुका तृणके अंतकेप्रति गमनकरिके अन्य आक्रम (आश्रय)कूं आक्रमण (ग्रहण) करिके आपकूं उपसंहार (संकोच) करैहै" इत्यादि वाक्यविषै सचेतन जलूका दष्टांत- पनैकरि कैसें ग्रहण करियेहै? तहां कहैहैं॥ इहां तिन सर्व- अवस्थाओंविषै बीहिआदिकसैं संयोग अरु तिनके छेदनआ- दिकके वशतैं। यह अर्थ है औ जलूकाके दष्टांतविषै चेतना-

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पनिषत् ] दशम खंड १० ९३९ साधिकारी उत्तरमार्ग दक्षिणमार्ग औ तृतीयस्थान १० त्यागकरिहीं सर्वअवस्थाओंविषै वर्न्तते हैं। यातैं जलूकाकीन्यांईं चेतनावान्पना विरो- धकूं पावता नहीं। अंतराल (मध्य)विषै तो ३२४

अविज्ञान मूर्च्छितकी न्यांई हीं होवैहै। याँतैं अदोष है॥ औ वैदिककर्मोंकूं हिंसायुक्त होने- वानूपना कहनेकूं वांछित नहींहै किंतु सातत्य (जन्मोंकी निरंतरता) मात्र कहनेकूं वांछित है। यह भाव है औ जलू- कावानूपना याका अनुशायी जीवनकूं जलूकाका सादृश्य है। यह अर्थ है॥ ३२४ आरोह करनेवालोंकूं विज्ञानसहितता है औ अ- वरोह करनेवालोंकूं विज्ञानरहितता है। ऐसैं उपपादन क- रिके। आरोह करनेवालोंका बी यावत् स्वस्थानोंतैं करणोंकूं उपसंहार करिके हृदयविषै अवस्थान है। तावत्हीं विज्ञान- सहितपना है औ देहतैं बाहिर निर्गत अये तिनकूं अन्य दे- हकी प्राप्तितैं पूर्व सो नहीं है औ चंद्रमंडलतैं उतरनेवालेबी अनुशयी जीवनकूं तो भाविदेहपर्यत दीर्घवासना नहीं हो- वैहै। प्रमाणके अभावतैं। ऐसैं कहैहैं॥ ३२५ चंद्रमंडलतैं अवरोहवालोंके देहांतरकेप्रति गम- नकी तुल्यताके हुयेबी विज्ञानशून्यता अदुष्ट (निर्दोष) है ऐसें उपसंहार करैहैं। ३२६ औ जो इष्टादि कर्मोंकूं हिंसा अरु अनुग्रहरूप हो- नेतैं स्थावरता वी तिनका फल हीं है। तैसैं हुये वैदिक क- मौकूं अनर्थके संबंधी होनेतैं तिनकी प्रतिपादक श्रुतिकूं अ-

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९४० पंचमप्रपाठक ५ [छान्दोग्यो- प्राणज्येष्ठतादि पंचान्निविद्या श गति वैश्वानरोपास्ति ज्ञाताग्निहोत्र २४ करि उभय (अर्थअनर्थ)की हेतुता अनुमानकर- नेकूं शक्य है।। औ हिंसाकूं शास्त्रविहित होनेतैं "तीर्थ (यज्ञआदिक)नतैं अन्यठिकानें सर्वभू- तनकूं न हिंसाकरताहुया" इस श्रुतितैं शास्त्रवि- हित हिंसाकूं अधर्मकी हेतुता नहीं अंगीकार क- रियेहै औ अधर्मकी हेतुताके अंगीकारकिये बी मंत्रोंकरि विषआदिककीन्यांईं ताकी निवृत्तिके प्रमाणता होवैगी ? ऐसें पूर्ववादीनैं कहा था। तहां सिद्धांती कहैहैं॥ इहां उभयहेतुता। याका अर्थ अरु अनर्थकी हेतुता। यह अर्थ है।। ३२७ "अहिंसा करता हुया" इत्यादि श्रुतितैं शास्त्रवि- हित वैदिक कर्मोविषै जो हिंसा है सो अनर्थकी हेतु नहीं है। ऐसें कहैहैं। इहां यह अर्थ है :- यद्यपि स्वरूपसैं हिंसा अनर्थकी हेतु अंगीकार करिये है तथापि तिस (हिंसा)करि युक्त वैदिक कर्मोंकूं अनर्थकी आरंभकता नहीं है। जैसैं स्वरूपसैं विष अरु दधिआदिककूं मरण अरु ज्वरआदिककी हेतुताके हुयेबी मंत्र अरु शर्करा (मिसरी) आदिककरि स- हित उपयोग किया हुया विषआदिक तिस मरणादिकार्यका आरंभक नहीं है। तैसें हिंसाकूं स्वरूपसैं अधर्मकी हेतुताके हुयेबी वैदिक कर्मविषै स्थित हिंसाकूं ता (अधर्म)की हेतुता नहीं है। काहेतैं वैदिक कर्मौकरिहीं ताके किये दोषके दूरी- करनेकी सिद्धितैं॥

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पनिषत्] दशम खंड १० ९४१ साधिकारी उत्तरमार्ग दक्षिणमार्ग औ तृतीयस्थान १० तद्य इह रमणीयचरणा अभ्याशो ह यत्ते रमणीयां योनिमापद्येरन्ब्रा-

अर्थः-तिनविषै जे इहां रमणीयचरण हैं वे रमणीय योनिकूं पावतेहैं। ब्राह्मण-

संभवतैं मंत्रकरिहीं विषभक्षणकीन्यांईं वैदिक कर्मोंकू दुःखरूप कार्यकी आरंभकताका संभव नहीं है ॥ ६ ॥ टीका :- तैहां (तिन व्रीहिआदिकनविषै)

३२८ पूर्वोक्तहीं दष्टांतकूं स्पष्ट करेंहैं॥ इहां यह अर्थ है :- तिसकरि सहित भक्षणकिये विषकूं अनर्थकी अहेतुता- करि पुष्टिकी हेतुताकीन्यांई वैदिक कर्मके अनुप्रवेशयुक्त हिं- साकूं पुरुषार्थपना हीं है। औ अशुद्ध है ? ऐसैं जो कहै। सो बनै नहीं। काहेतैं "शब्द (श्रुतिरूप प्रमाण) तैं" इस- न्यायतैं ॥ ३२९ "अधिकतावालाहीं होवैहै" इस प्रसंगतैं प्राप्त अ- र्थकूं परिसमाप्त करिके। प्रकृत श्रुतिके व्याख्यानकूं अनुस- रतेहैं।। इहां "अन्यकरि अधिष्ठित (आश्रित) विषै पूर्वकीन्यांई अभिलाप (संभाषण)तैं" इस न्यायकरि तिन व्रीहिआदिकन- विषै मिले जे अनुशयी जीव तिनके मध्य जे केईक इस लोकविषै चंद्रमंडलकी प्राप्तितै पूर्व अवस्थाविषै अनुष्ठित अ-

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९४२ पंचमप्रपाठक ५ [छान्दोग्यो- प्राणज्येष्ठतादि पंचाग्निविद्या श्गति वैश्वानरोपास्ति ज्ञाता्निहोत्र २४ ह्मणयोनिं वा क्षत्रिययोनिं वा वैश्य- योनिं वाऽथ य इह कपूयचरणा अभ्या- योनिकूं वा क्षत्रिययोनिकूं वा वैश्ययोनि- कूं। ऐसा जो है सो शीघ्रहीं होवैहै॥ औ जे इहां कपूयचरण (निंदितकर्मवाले)हैं वे अनुशायी जीवनके मध्य जे इहां (इस लोक- विषै) रमणीय कहिये शोभन है चरण कहिये शील जिनोंका वे रमणीयचरण हैं। कहिये रमणीयचरणकरि उपलक्षित ऐसा शोभन है अनुशय नाम पुण्य कर्म जिनोंका वे रमणीय- चरण कहियेहैं॥l जीतैं कूरता जूठ अरु माया

भुक्त रमणीय (शुभ) आचरणवाले हैं वे रमणीय योनिकूं पावतेहैं। ऐसें संबंध है॥ २३० उक्त अर्थकूंहीं स्पष्ट करैहैं॥ ३३१ रमणीय चरणके अनुसारकरि शोभन अनुशय (पु- ण्यकर्म) कैसें लखियेहैं? तहां कहैहैं। इहां ऐसें योजना है :- वे प्रसिद्ध अनुशयी जीव रेतः सिंचकसैं योगके अनंतर तिस कर्मकरि रमणीय योनिकूं पावते हैं। ऐसा जो (फल) है सो क्षित्र (शीघ्र)हीं होवैहै॥

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पनिषत् ] दशम खंड १० ९४३ साधिकारी उत्तरमार्ग दक्षिणमार्ग औ तृतीयस्थान १० शोह यत्ते कपूयां योनिमापद्येरञ्श्र- योनिं वा सूकरयोनिं वा चण्डालयोनिं वा॥ ७।। कपूय (निंदित) योनिकूं पावतेहैं। कूकर- योनिकूं वा सूकरयोनिकूं वा चंडालयोनिकूं। ऐसा जो है सो शीघ्रहीं होवैहै ॥। ७॥ (छल) सैं वर्जित पुरुषनका शुभ अनुशयका स- द्वाव उपलक्षित करनेकूं शक्य है। तिस चंद्र- मंडलविषै भुक्त कर्मके शेष ऐसे पुण्य कर्मरूप अनुशयकरि वे रमणीय कहिये कूरताआदि- कसैं रहित योनिकूं कहिये ब्राह्मणयोनिकूं वा क्षत्रिययोनिकूं वा वैश्ययोनिकूं स्वकर्मके अनुसारकरि पावतेहैं। ऐसा जो है सो अ- भ्यास (क्षिप्र) हीं होवैहै [इहां "जो" यह "पावतेहैं" इस क्रियाका विशेषण है]॥ औ फेर जे तिनतैं विपरीत कपूयचरण(अशुभ ३३२ तहांबी हेतुकूं कहैहैं। ३३३ अब "अथ (औ)" इस प्रतीतकूं लेके व्याख्यान

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९४४ पंचमप्रपाठक ५ [छान्दोग्यो- प्राणज्येष्ठतादि पंचाग्निविद्या श्गति वैश्वानरोपास्ति ज्ञाताननिहोत्र २४ आचरण)करि उपलक्षित कर्मतैं अशुभ अनु- शय (अशुभकर्मवाले) हैं। वे यथाकर्म क- पूय कहिये धर्मके संबंधसैं रहित योनिकूं क- हिये अश्वयोनिकूं वा शूकरयोनिकूं वा चं- डालयोनिकूं स्वैंकर्मके अनुसारकरिहीं पावते हैं।। ऐसा जो है सो क्षिप्र (शीघ्र) हीं हो- वैहै॥ परंतु जे रमणीयचरण द्विजाति (त्रि- करैहैं॥ इहां तिनतैं विपरीत। याका तिनतें विलक्षण। यह अर्थ है। वे कपूय (निंदित) योनिकूं अशुभ अनुशय (कर्म)- के वशतैं रेतः सिंचकसैं योगके अनंतर पावतेहैं। ऐसा जो (फल) है सोबी क्षिप्रहीं होवैहै। ऐसैं योजना है॥ ३३४ तहांबी विकल्प (भेद)विषै कारणकूं कहैहैं॥ ३३५ योनिके विकल्पविषै तृतीय (जायस्व म्रियस्वरूप) मार्गकूं प्रकट करनेकूं पूर्व उक्त दो मार्गोकूं संक्षेप करिके अनुवाद करैहैं॥ इहां यह अर्थ है :- शुभ अनुशय (शुभकर्म)- के वशतैं जे केईक ब्राह्मण आदिक योनिकूं प्राप्त होवैहैं वे स्व वर्ण आश्रमके विहित कर्मविषै स्थित हुये जब इष्ट आ- दिक कर्मकूं करतेहैं तब दक्षिण मार्गकरि चंद्रके तांई जातेहैं औ तहां भोगने योग्य कर्मके भोगकरि क्षीणभये फेर अव- शिष्ट कर्मकरि पृथिवीके तांई आवतेहैं। ऐसें घटीयंत्रकी- न्यांई पुनः पुनः आरोह करते हुये अरु अवरोह करते हुये केवल कर्मी देखियेहैं॥ औ जब द्विजाति (त्रिवर्ण) स्वकर्म-

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पनिषत् ] दशम खंड १० ९४५ साधिकारी उत्तरमार्ग दक्षिणमार्ग औ तृतीयस्थान १० अथैतयोः पथोर्न कतरेणचन ता- अर्थ :- औ इन दोनूं मार्गनके मध्य कि- वर्ण) हैं वे जब स्वकर्मविषै स्थित हुये इष्ट- आदिक कर्मके करनेवाले होवैं तब वे धूमआ- दिकमार्गकरि पुनः पुनः घटीयंत्रकी न्यांईं जा- तेहैं औ आतेहैं औ जब विद्या (उपासना)कूं पावतेहैं तब अर्चिआदिक मार्गकरि जातेहैं॥७॥ टीका :- जैब तो विद्याके सेवी नहीं होवैहैं औ इष्टआदिक कर्मकूं बी सेवन करते नहीं तब अनंतर इन कथनकिये अर्चि अरु धूम आदि रूप दोनूं मार्गनके मध्य किसीकरि बी (अ- न्यतरकरि बी) नहीं जातेहैं॥ वे ये दंश (मक्षिका) मशक अरु कीटआदिक वारंवार आवर्तनकरनेवाले क्षुद्र (तुच्छ) भूत (जंतु) होवैहैं। अर्थ यह जो :- यातैं उभयमार्गनतैं विषै स्थित हुये ध्यान (उपासन)कूं प्राप्त होवैं तब उत्तरा- यणमार्गकरि इहांतैं ब्रह्मलोककूं जातेहैं॥ ३३६ अब तृतीयस्थानकूं उपदेश करैहैं।

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९४६ पंचमप्रपाठक ५ [छान्दोग्यो- प्राणज्येष्ठतादि पंचाग्निविद्या ३ गति वैश्वानरोपास्ति ज्ञाताग्निहोत्र २४ नीमानि क्षुद्राण्यसक्कृदावर्त्तीनि भूतानि भवन्ति जायस्व म्रियस्वेत्येतत्तृतीय सीकरिबी नहीं [जातेहैं]। वे ये वारंवार आवर्त्तनवाले क्षुद्रभूत होवैहैं। "जायस्व म्ियस्व (जन्मकूं पाव। मरणकूं पाव)" ऐसा यह तृतीयस्थान है। तिसकरि वह ्रष्ट हुये वारंवार जन्मतेहैं अरु मरतेहैं॥ तिनके जन्म मरणकी संततिका अनुकरण यह कहियेहै॥ [ अथवा ] जायस्व म्रियस्व (ज- न्मकूं पाव अरु मरणकूं पाव) ऐसैं ईश्वर निमि- त्तचेष्टा कहियेहै। जन्म मरणके क्षणकरिहीं कालकी यापना (क्रमण) होवैहै। परंतु क्रिया- ३३७ पुनः पुनः लोट्लकारके मध्यम पुरुषके एक वच- नतैं तिन दोनूं क्रियापदोंके सर्व आख्यातनविषै विधानतैं पुनः पुनः जन्मते हैं औ मरते हैं। इस अर्थविषै "जायस्व म्रियस्व" ऐसा प्रयोग है। ऐेसैं कहैहैं ॥ इहां यद्वाः-सर्वे- शवर जो है सो दोनूं मार्गोतें भ्रष्ट देखिके ताकूं "जायस्व म्रियस्व (जन्मकूं पाव । मरणकूं पाव)" ऐसें प्रेरण करैहै। यह इहां कहिये है। ऐसैं देखनेकूं योग्य है।।

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पनिषत्] दशम खंड १० साधिकारी उत्तरमार्ग दक्षिणमार्ग औ तृतीयस्थान १० ९४७

स्थानं। तेनासौ लोको न सम्पूर्यते। तस्माज्जुगुप्सेत। तदेष श्रोकः॥८।। लोक नहीं संपूर्ण होवैहै। तातैं निंदाकूं करै॥ तिसविषै यह श्रोक है ॥ ८॥ ओंविषै वा भोगोंविषै काल नहीं है। यह अर्थ है॥ ऐसा यह क्षुद्रजंतुरूप जो कहा सो पूर्व उक्त दो स्थानोंकूं अपेक्षाकरिके संसरणेवालोंका तृतीय स्थान है।। जिसकरि ऐसैं दक्षिणमा- र्गकरि गये लोकबी फेर आगमन करतेहैं। ज्ञान अरु कर्मके अनधिकारिनका दक्षिणमार्गकरि अगमन हीं है। ऐसैं तिसकरि यह लोक नहीं संपूर्ण करियेहै। ॥ पंचमप्रश्न तो पं-

करैहैं॥ ३३८ "तिस करि यह लोक" इत्यादिवाक्यकूं व्याख्यान

३३९ उक्तरीतिकरि निर्णीत प्रश्नोंकूं विवेचन करिके नि- श्चयकी सुगमताअर्थ कथन करैहैं॥ इहां व्यावर्त्तनाबी व्या- ख्यानकरी। ऐसें उत्तर (आगेके) वाक्यविषै संबंध है औ मृतनका। याका मरणकूं पाये अविद्वानोंका अरु विद्वानोंका। यह अर्थ है। औ ता विद्वानोंकी अरु कारमिनकी अंत्य इष्टितैं

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९४८ पंचमप्रपाठक ५ [छान्दोग्यो- प्राणज्येष्ठतादि पंचाग्निविद्या श्गति वैश्वानरोपास्ति ज्ञातान्निहोत्र २४ चाभिविद्याकरि व्याख्यानकिया ॥ प्रथमप्रश्न। दक्षिण उत्तर मार्गोकरि दूरीकिया॥ दक्षिण अरु उत्तर दोनूं मार्गोकी व्यावर्त्तना वी व्या- ख्यानकरी। मृतपुरुषनका अभ्निविषै डालना समान है। तातैं (तदनंतर) व्यावर्त्तना है जो :- अन्य अर्चिआदि मार्गकरि जातेहैं। अन्य धूमआदिककरि। फिर उत्तर अरु दक्षिण अय- नरूप मासोंकूं प्राप्तहुये सम्यक् योजनाकूं पा- यके फेर व्यावर्त्तन (पुनरावृत्ति)कूं करतेहैं। अन्य संवत्सरकूं। अन्य मासोंतैं पितृलोककूं। ऐसी [व्यावर्त्तना जो है सो] व्याख्यानकरी॥ क्षीण अनुशयवाले जीवनकी पुनरावृत्ति बी चंद्रमंडलतैं आकाशआदिकके क्रमकरि कही॥ उस (स्वर्गरूप) लोकका अपूरण स्वशब्दक- रिहीं कहा। तिसकरि यह लोक नहीं संपूर्ण अनंतर। "संवत्सरकूं" ऐसें ज्ञानी (उपासनाकरि युक्त विद्वा- न्) ग्रहण करियेहैं औ "अन्य पितृलोककूं" ऐसें केवल कर्मी ग्रहण करियेहैं। यह विभाग है। औ क्षीण अनुशयवालोंकूं। याका चंद्रलोकविषै भोगनेयोग्य कर्मकूं भोगकरि क्षय करनेवा- लोंकूं। यह अर्थ है।। ३४० स्वशब्दकूंहीं अनुवाद करैहैं॥

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पनिषत् ] दशम खंड १० ९४९ साधिकारी उत्तरमार्ग दक्षिणमार्ग औ तृतीयस्थान १० करियेहै ऐसैं॥। जीतै इस प्रकारकी कष्टरूप संसारकी गति है तातैं ताकी निंदाकूं करै औ जीतैं जन्ममरणकरि जनित वेदनाके अनुभव- विषै कृतक्षण (प्राप्तअवसर)वाले क्षुद्र जंतु। घोर अरु दुस्तर अंधकारविषै। अगाध अरु नौकारहित सागरविषै उत्तरणके प्रति निराश हुये पुरुषनकीन्यांईं प्रवेशकूं प्राप्तभये हैं। तातैं इस प्रकारकी संसारकी गतिकूं निंदितकरै क- हिये दोषदृष्टिरूप बीभत्साकी विषयकरै नाम इस प्रकारके घोर संसाररूप महोदधिविषै पात मति होवै। ऐसा घृणी (दोषदृष्टि वा करुणर-

३४१ इनकूं महान् आयासवाली तीव्र संसारकी गति किस अर्थ कही ? यह आशंकाकरिके कहैहैं। ३४२ तृतीय स्थानकी कष्टरूपताकूं स्पष्ट करैहैं॥ इहां जन्मआदिककररि जनित जो वेदना ताके अनुभवविषै किया है क्षण (अवसर) [अन्यठिकानैं नहीं] जिनोंका तैसै [ऐसैं विग्रह है] औ अष्व(नौकारहित)विषै। ऐसें पदच्छेद है॥ ३४३ तृतीयस्थानकीन्यांई इतर दो मार्गनकूं आवृत्ति- वाले होनेतैं तिनकी कष्टरूपता तुल्य है। इस अभिप्रायक- रिके कहैहैं॥ ८०

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९५० पंचमप्रपाठक ५ [छान्दोग्यो- प्राणज्येष्ठतादि पंचान्निविद्या शगति वैश्वानरोपास्ति ज्ञाताग्निहोत्र २४ स्तेनो हिरण्यस्य सुरां पिवश्श् गुरो- स्तल्पमावसन् ब्रह्महा चैते पतन्ति च- तारः पञ्चमश्राऽऽचर सैरिति॥९॥

अर्थः-सुवर्णका चोर। अरु सुराकूं पानकरता हुया। गुरुके तल्पके तांई बैठ- ता हुया औ ब्रह्महा (ब्राह्मणका हंता)। ये च्यारी पतित होते हैं। औ पंचम तिनके साथि आचरता हुया है [सो]। ९॥

सकरि युक्त) होवै॥ तिस इस अर्थविषै पं- चाग्निविद्याकी स्तुतिअर्थ यह श्लोक है॥। ८।। टीका :- हिरण्य (ब्राह्मणके सुवर्ण) का स्तेन कहिये हर्ता (चोर)। औ ब्राह्मणहुवा सु-

३४४ संसारगतिके उपवर्णनके तात्पर्यकूं कहिके पंचा- ग्निविद्याविषै अनुष्ठानकी सिद्धिअर्थ ताके स्तावक श्ोक (मंत्र)कूं उदाहरणकरिके व्याख्यान करैहें॥ इहां पंचाग्निवि- द्याका माहात्म्य जो है सो। "तिस इस अर्थविषै" इस स- तमी विभक्तिका अर्थ है।।

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पनिषत् ] दशम खंड १० ९५१ साधिकारी उत्तरमार्ग दक्षिणमार्ग औ तृतीयस्थान १० अथ ह य एतानेवं पञ्चाग्रीन् वेद न स ह तैरप्याचरन् पाप्मना लिप्यते शु-

अर्थ :- औ जो इन ऐसे पंच अग्नियोंकूं जानताहै सो तिन (पातकियों)के साथिबी आचरता हुया पापकरि लिप् होता नहीं।

राकूं पानकरता हुया औ गुरुके तल्प(दारा) के प्रति वसता (भोगता) हुया औ ब्रह्महा कहिये ब्राह्मणका हंता। ऐसैं ये च्यारी पति- त होतेहैं औ पंचम तिनोंकेसाथि आचरता (संगकरता) हुया है सो इति ॥ ९॥ टीका :- औ फेर जो यथोक्त पांच अग्नि- योंकूं जानताहै सो तिन महापातकियोंके साथि आचरता हुया बी पापकरि लिप्त

३४५ ननु पांच महापातकी श्लोकविषै निर्देश करिये हैं। परंतु पंचान्निविद्याकी स्तुति इहां प्रतीत होती नहीं? यह आशंकाकरिके कहैहैं॥

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९५२ पंचमग्रपाठक ५ [छान्दोग्यो- प्राणज्येष्ठतादि पंचान्निविद्या शगति वैश्वानरोपास्ति ज्ञाताग्निहोत्र २४ ड्वः पूतः पुण्यलोको भवति य एवं वेद य एवं वेद॥ १० ॥ इति पंचमप्रपाठकस्य दशमः खंडः ॥१० ॥ शुद्ध पूत पुण्यलोकवाला होवैहै। जो ऐसैं जानता (तुपासता)है। जो ऐसैं जानताहै१०

होता नहीं किंतु शुद्धहीं है कहिये ति्से पं- चाभिके दर्शनकरि पावित (पावन भया) है। जातैं पूत (पवित्र) है अरु पुण्यरूप है प्राजा- पत्य (प्रजापतिसंबंधी) आदिकलोक जिसका सो यह पुण्यलोक है। ऐसा होवैहै ॥ जो ऐसें यथोक्त समस्त पांचप्रश्नोंकरि पूंछे अर्थके समूहकूं जानताहै॥ इहां दोवार उक्ति जो

२४६ शुद्धताविषै हेतुकूं कहैहैं। ३४७ कौंनकूं यह फल होवैहै ? इस अपेक्षाके हुये पूर्व उक्त विद्वान् (उपासक)कूं अनुवाद करैहैं॥ इति श्री० पंचमप्रपाठकगत दशमखंडस्य टिप्पणम् ॥१०॥

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पनिषत्] एकादश खंड ११ ९५३ उद्दालक सह प्राचीनशालादिकसैं अश्वपतिसंवाद ७ अथ पंचमप्रपाठकस्यैकादशः खंड: ११ प्राचीनशाल औपमन्यवःसत्ययज्ञः

अर्थ :- १ प्राचीनशाल औपमन्यव २

है सो समस्तप्रश्नोंके निर्णयके दिखावनेअर्थ है।। १० ॥ इति श्री० भाष्यभाषापंचमग्रपाठकस्य दशमःखंड: १० अथ श्री०भाष्यभाषा०पंचमप्रपा०एकादशःखंड: १५ उद्दालक सह प्राचीनशालादिकसैं अश्वपतिसंवाद ७ टीका :- दक्षिणमार्गकरि जानेवालोंका "सो देवनका अन्न है। ताकूं देव भक्षण करैहैं" ऐसैं अन्नभाव कहा औ क्षुद्रजंतुस्वरूप कष्टरूप संसारकी गति कही। तिन दोनूं दोषनके नि- वारण करनेकी इच्छाकरि वैश्वानरनामक अत्ता- भावकी प्राप्तिअर्थ उत्तरग्रंथ आरंभ करिये है

अथ श्री०पंचमप्रपा०गतैकादशखंडस्य टिप्पणम् ११ ३४८ पूर्व उत्तर ग्रंथनके संबंधकूं दिखावते हुये उत्तर अंथकूं अवतार देते हैं॥

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९५४ पंचमप्रपाठक ५ [छान्दोग्यो- प्राणज्येष्ठतादि पंचान्निविद्या शगति वैश्वानरोपास्ति ज्ञाताग्निहोत्र २४ पौलषिरिन्द्रद्युन्नो भाल्लवेयो जनः शार्क- राक्ष्यो बुडिल आश्वतराश्चिस्ते हैते महा- सत्ययज्ञ पौलुषि ३ इंद्रद्युन्न भाल्लवेय ४ जन शार्कराक्ष्य औ ५ बुडिल आश्वतरा- श्। वे ये महाशालावाले महाश्रोत्रिय

"अन्निकूं भक्षण करताहैं। प्रियकूं देखताहैं" इत्यादि लिंगतैं॥ आर्यायिका तो सुखसैं अ- वबोधअर्थ औ विद्याके संप्रदानके (देनेके अ- ३५०

धिकारीके) न्यायके दिखावनेरूप अर्थवाली है :- १ नामतैं प्राचीनशाल ऐसा उपमन्युका पुत्र औपमन्यव औ २ नामतैं सत्ययज्ञ ऐसा पु- लुषका पुत्र पौलुषि। तैसैं ३ नामतैं इंद्रद्युन्न

३४९ उत्तरग्रंथकी वैश्वानरनामक अत्ताभाव (भोक्ता- भाव) की प्राप्तिरूप अर्थवान्ताविषै गमक (लिंग)कूं कहैहैं॥ ३५० औ विद्याका संप्रदान (देनेका पात्र) जो शिष्य। ताका न्याय (रीति) जो विनयआदिककी संपत्ति। ताके दि- खावनेअर्थ आख्यायिका है औ इहां प्राचीनशालआदिक शिष्यनकूं तिनकी संपत्ति देखियेहै। ऐसैं कहैहैं॥

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पनिषत् ] एकादश खंड ११ ९५५ उद्दालक सह प्राचीनशालादिकसैं अश्वपतिसंवाद ७ शाला महाश्रोत्रियाःसमेत्य मीमाYसां- चक्रु: को नुआत्माकिं ब्रह्मेति [!]।१। हुये मिलिके मीमांसा (विचार)कूं करते- भये :- कौंन हमारा आत्मा है? कौंन ब्रह्म है ? ऐसैं ॥ १ ॥ ऐसा भल्लविका पुत्र भाल्लवि ताकापुत्र भाल्- वेय औ ४ नामतैं जन ऐसा शर्कराक्षका पुत्र शार्कराक्ष्य औ ५ नामतैं बुडिल ऐसा अश्व- तराश्वका पुत्र आश्वतराश्वि। पांच बी वे ये महाशाल कहिये महागृहस्थ । अर्थ यह जो :- विस्तीर्णशालाओंकरि युक्त (संपन्न) औ म- हाश्रोत्रिय। अर्थ यह जो :- श्रवण अध्ययन अरु वृत्त (सदाचार) करि संपन्न थे। वे इस प्रकारके हुये मिलिके कहींक मीमांसा (विचारणा)कूं करतेभये। यह अर्थ है।।। कैसैं किः-कौंन हमारा आत्मा है ? कौंन ब्रह्म है? ऐसे आत्मा अरु ब्रह्म इन दो शब्दनके परस्पर वि-

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९५६ पंचमप्रपाठक ५ [छान्दोग्यो- प्राणज्येष्ठतादि पंचान्निविद्या ३ गति वैश्वानरोपास्ति ज्ञातागिहोत्र २४ शेषण-विशेष्यभावकूं [विचारते भये]।इहां बैह्ै" ऐसा शब्द अध्यात्मरूप परिच्छिन्न आत्माकूं निवर्न करैहै औ "आत्मा" ऐसा शब्द आत्मातैं व्यतिरिक्त आदित्यादिब्रह्मकी उपास्यताकूं नि- वृत्त करैहै॥ अभेदकरि आत्मा हीं ब्रह्म है। ब्रह्महीं आत्मा है। इस प्रकारसैं सर्वात्मा वै- श्वानररूप जो ब्रह्म है सो आत्मा है। ऐसा यह सिद्ध होवैहै "मूद्द्ा तेरा पतन होता। अंध होता" इत्यादि लिंगतैं ॥ १ ॥

३५१ ननु आत्मा अरु ब्रह्मशब्दका परस्पर विशेषणवि- शेष्यभाव कैसें संभवै। काहेतैं व्यावर्त्य (भिन्न करनेकूं योग्य पदार्थ)नके अभावतैं ? यह आशंकाकरिके कहैहैं॥ ३५२ उक्तरीतिकरि परस्पर विशेषणविशेष्यभावके हुये फलितकूं कहैहैं। ३५३ इस कहनेके हेतुतैबी उपास्य (वैश्वानर)की सर्वा- त्मता जानियेहै। काहेतें परिच्छिन्नवस्तुके उपासनकूं निं- दित होनेतैं भूमा (ब्रह्मरूप अंगी)कूं ऋतु (यज्ञरूप अंगी)की न्यांई ज्यायपना (अंगनतैं बडेपना) है। इस न्यायतैं। ऐसैं कहैहैं॥ इहां भगवान् (पूजावान्) हुये संपादन करते भये। ऐसें पूर्वसैं संबंध है॥। औ "अश्वपति" इत्यादिरूप वाक्य- विषै हे भगवन् ! ऐसें राजाकरि प्राचीनशाल आदिक ब्रा- ह्मण संबोधन [केविषय] करियेहैं।।

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पनिषत् ] एकादश खंड ११ ९५७ उद्दालक सह प्राचीनशालादिकसैं अश्वपतिसंवाद ७ ते ह सम्पादयाञ्चकुरुद्दालको वै भ- गवन्तोऽयमारुणिः सम्प्रतीममात्मानं वैश्वानरमध्येति। तY हन्ताभ्यागच्छा- मेति। तर हाम्याजग्मुः॥२॥

अर्थ :- वे भगवान् (पूजावान्) हुये [उपदेष्टाकूं] संपादनकरते भये ॥ प्रसिद्ध उद्दालक यह आरुणि अबी इस आत्माकूं वैश्वानर स्मरण करताहै। ताकेप्रति अब जावैं ऐसैं [निश्रवयकरिके] ता (उद्दालक) के प्रति आवते भये ॥ २ ॥

टीका :- वे विचारकूं करते हुयेबी निश्चयकूं अप्राप्त होयके भगवान् (पूजावान्) हुये आ- पके उपदेष्टाकूं संपादन करतेभये॥ उद्दा- लक ऐसा नामतैं प्रसिद्ध यह अरुणका पुत्र आरुणि अबी सम्यक् इस अस्मत्अभिप्रेत वैश्वानररूप आत्माकूं स्मरण करताहै ताके

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९५८ पंचमप्रपाठक ५ [छान्दोग्यो- प्राणज्येष्ठतादि पंचाग्निविद्या ३ गति वैश्वानरोपास्ति ज्ञाताग्निहोत्र २४ स ह सम्पादयाञ्चकार-प्रक्ष्यंति मा- मिमे महाशाला महाश्रोत्रियास्तेभ्यो न सर्व्वमिव प्रतिपत्स्ये। हन्ताहमन्यम- भ्यनुशासानीति॥३॥ अर्थ :- सो (उद्दालक) संपादन करता भया :- ये महाशालावाले महाश्रोत्रिय मे- रेप्रति पूंछतेहैं। तिनकेअर्थ सर्वकीन्यांई कहनेकूं उत्साह करता नहींहूं। अब मैं अन्य [उपदेष्ा]कूं अनुशासनकरों (कहों) ऐसैं॥ ३ ॥

प्रति अब हम गमनकरैं। इस प्रकारसैं नि- श्रय करिके ता आरुणिके प्रति गमन करते- भये ॥ २ ॥ टीका :- सो (उददालक) तिनकूं देखिकेहीं तिनके आगमनके प्रयोजनकूं जानिके संपा- दन करताभया। ॥ कैसैंकि :- ये बडे गह-

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पनिषत्] एकादश खंड ११ ९५९ उद्दालक सह प्राचीनशालादिकसैं अश्वपतिसंवाद ७ तान् होवाचाश्वपतिर्वैं भगवन्तोऽयं कैकेयः सम्प्रतीममात्मानं वैश्वानरम- ध्येति। तर हन्ताभ्यागच्छामेति।तY हाभ्याजग्मुः॥४॥ अर्थः-तिनकेप्रति [उद्दालक] कहता- भया :- हे भगवन् ! प्रसिद्ध अश्वपति यह कैकेय अबी इस आत्माकूं वैश्वानर स्मरण करताहै। अबी ताकेप्रति जावैं। ऐसैं[नि- श्र्वय करिके] ताके प्रति आवतेभये॥४॥ स्थ महाश्रोत्रिय मेरेप्रति पूंछेंगे। तिनके अर्थ मैं पूंछे हुये अर्थकूं सर्वकीन्यांई (संपूर्ण- कीन्यांईं) कहनेकूं उत्साहकरता नहीं। यातैं अब मै इनोंके अन्य उपदेष्ठाकूं अतुशासन- करों (कथनकरों) ऐसैं ॥ ३ ॥ टीका :- ऐसैं संपादन (सिद्ध) करिके ति- नकूं कहताभयाः-हे भगवन् (पूजावाले)! नामतैं अश्वपति ऐसा यह केकयका पुत्र कै-

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९६० पंचमप्रपाठक ५ [ छान्दोग्यो- प्राणज्येष्ठतादि पंचाग्निविद्या श्गति वैश्वानरोपास्ति ज्ञाताग्निहोत्र २४ तेभ्यो ह प्राप्तेभ्यः पथगर्हाणि का- रयाञ्चकार।स ह प्रातः सजिहान उवाच न मे स्तेनो जनपदे न कदर्य्यो न म-

अर्थ :- प्राप्तभये तिनकेअर्थ पथक् पू- जनोंकूं करावताभया॥ सो (राजा) प्रातः- कालमैं शयनकूं त्यागता हुया कहताभया :- मेरे देशविषै चोर नहीं है। कदर्य (अति-

केय। अबी सम्यक इस वैश्वानररूप आत्मा- कूं स्मरण करताहै। इत्यादि समानहै॥४ ॥ टीका :- सो अश्वपतिनामक राजा तिन प्राप्तभये अतिथिनकेअर्थ पुरोहितनकरि अरु भृत्य (किंकर) नकरि पथक् पथक् पूजनों- कूं करावताभया॥ सो राजा अन्य दिनविषै

३५४ "सो (राजा)" इत्यादि वाक्यकूं उपस्कार (सा- मग्री) सहित व्याख्यान करैहैं॥ इहां यथोक्त। याका शास्त्र- प्रसिद्ध। यह अर्थ है।।

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पनिषत्] एकादश खंड ११ ९६१ उद्दालक सह प्राचीनशालादिकसैं अश्वपतिसंवाद ७ द्यपो नानाहिताग्निर्नाविद्दान्न सवैरी स्वै- रिणी कुतो यक्ष्यमाणो वै भगवन्तो-

कृपण) नहीं है। मद्यपानका कर्त्ता नहीं है। अनाहितान्नि नहीं है। अविद्वान् नहीं है। स्वैरी (व्यभिचारी पुरुष) नहीं है [तब] स्वैरिणी कहांतैं होवैगी॥ हे भगवन्!

प्रातःकालमैं शयनकूं त्यागताहुया समीप आयके विनयकरि कहताभयाः-मुजतैं इसध- नकूं ग्रहण करहू ऐसैं ॥। तिनोंकरि प्रत्याख्यात कहिये हम नहीं ग्रहण करते ऐसैं निषेधकूं प्रा- तहुया राजा। मुजविषै निश्चयकरि दोषकूं दे- खतेहैं। जातैं मुजतैं धनकूं ग्रहण करते नहीं। ऐसैं मानताहुया आपकी सदाचारवान्ताकूं प्रतिपादन करनेकूं इच्छता हुया कहताभ- या :- मेरे जनपद (देश) विषै स्तेन क- हिये परधनका हर्त्ता चोर विद्यमान नहीं है। विभव (ऐश्वर्य)के होते कदर्य (अदाता) न- ८१

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९६२ पंचमप्रपाठक ५ [छान्दोग्यो- प्राणज्येष्ठतादि पंचाग्निविद्या शगति वैश्वानरोपास्ति ज्ञाताग्निहोत्र २४ Sहमस्मि यावदेकैकस्मा ऋत्विजे धनं दास्यामि तावद्धगवद्यो दास्यामि व- सन्तु मे भगवन्त इति ॥५॥ मैं यक्ष्यमाण (यजन करनेवाला) हीं हूं। जितना एक एक ऋत्विककेअर्थ धन घौं- गा तितना भगवानोंकेअर्थ द्यौंगा। हे भ- गवन् ! वासकूं करहू ऐसैं ॥ ५॥ हीं है। द्विजोत्तम (ब्राह्मण) हुया मद्यप (म- दिराकूं पान करनेवाला) नहीं है। शतगु (सो गौआंवाला) हुया अनाहिताभनि कहिये नित्य अभिहोत्रके आधान किये अभनिसैं रहित नहीं- है। अधिकारके अनुसार विद्यासैं रहित ऐसा अविद्वान् नहीं है। परदारन (परस्त्रियों)- विषै गमन करनेवाला स्वैरी (व्यभिचारी) पु- रुष नहीं है। तब स्वैरिणी कहिये दुष्टचारिणी स्त्री कहांतैं होवैगी।अर्थ यह जोः-नहीं संभवै- है।। ॥औ तिनोंकरि "हम धनसैं अर्थी (अर्थ-

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पनिषत्] एकादश खंड ११ ९६३ उद्दालक सह प्राचीनशालादिकसैं अश्वपतिसंवाद ७ ते होचुर्येन हैवार्थेन पुरुषश्चरेत्त अर्थः-वे प्रसिद्ध कहते भये :- जिसीहीं अर्थकरि पुरुष विचरै ताहींकूं कहै। आत्मा-

वाले) नहींहैं" ऐसैं॥। ॥ उक्त हुया राजा "ये अतिथि अल्पधनकूं मानिके नहीं ग्रहण करते हैं" ऐसैं मानता हुया कहताभयाः-हे भगवन्! मैं कितनैक दिनोंकरि यजन करनेवाला हूं। ता(यज्ञ)केअर्थ मैनैं धन कल्प्या है। जितना यथोक्त (शास्त्रप्रसिद्ध) धन एक एक ऋ- त्विककेअर्थ दयौंगा। तितना एक एक भग- वान्के (पूजावान् तुहमारे) अर्थ बी द्यौंगा। हे भगवन् [आप]! वास करहू औ मेरे या- गकूं देखहू॥ [५]॥ ऐसैं राजाकरि उक्तहुये वे अतिथि कहतेभयेः-जिसींहींअर्थ (प्रयो- जन)करि पुरुष जाके प्रति गमनकरै ति- सींहींअर्थकूं कहै॥ यह हीं आगमनका प्रयो- जन है। ऐसा यह सत्पुरुषनका न्याय है औ

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९६४ पंचमप्रपाठक ५ [छान्दोग्यो- प्राणज्येष्ठतादि पंचान्निविद्या शगति वैश्वानरोपास्ति ज्ञातागनिहोत्र २४ हैव वदेदात्मानमेवेमं वैश्वानर सम्प्र- त्यध्येषि तमेव नो ब्रूहीति ॥ ६ ॥ रूपहीं इस वैश्वानरकूं अबी सम्यक् जान- ताहैं ताहीकूं हमारेअर्थ कथनकर! ऐसैं।।६॥

हैमे वैश्वानरके ज्ञानके अर्थीहैं। इस वैश्वानर रूप आत्माकूंहीं अबी तूं सम्यक् जानताहैं। यातैं ताहीकूं हमारेअर्थ कथनकर!।[६]। ऐसैं उक्तहुया अश्वपति-राजा तिनकूं कह- ताभया :- प्रातःकालमैं तुह्मारेअर्थ प्रतिव- क्ता कहिये प्रतिवाक्यके प्रति दाता होऊंगा॥ ऐसें उक्तहुये वे राजाके अभिप्रायकूं जानने-

३५५ तब आपके आगमनका प्रयोजन क्या है ? सो कहैहैं। ३५६ सो मेरेपासवी नहीं है। या शंकाकूं निरास करै- हैं। इहां शिष्यभावकरि उपसन्न (शरणागत होनेरूप उप- सत्तिकूं प्राप्त) इन ब्राह्मणोंकेअर्थ किसी प्रकारसैंबी विद्या नहीं देनेकूं योग्य है। यह राजाका अभिप्राय है॥

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पनिषत्] एकादश खंड ११ ९६५ उद्दालक सह प्राचीनशालादिकसैं अश्वपतिसंवाद ७ तान् होवाच-प्रातर्वः प्रतिवक्ताऽस्मी- ति॥ ते ह समित्पाणयः पूर्व्वाह्ने प्रतिच- अर्थः-तिनकेप्रति [सो राजा] कह- ताभया :- प्रातःकालमैं तुह्मारेअर्थ उत्तर- का दाता होउंगा॥ ॥ [ऐसैं उक्त हुये] वे समित्पाणि [होयके] पूर्वान्हविषै समीप

वाले समित्पाणि हुये कहिये समिधोंका भार है हस्तविषै जिनोंके ऐसैं हुये अन्यदिनविषै पूर्वाह्नमैं (मध्यान्नतैं पूर्व) राजाके प्रति ग- मन करतेभये॥ जाँतैं ऐसैं महाशालावाले महाश्रोत्रिय ब्राह्मणहुये महाशालावान्पनैआ- दिकके अभिमानकूं छोडिके समिधोंका भार है हस्तविषै जिनोंके ऐसैं विद्यार्थी हुये जातितैं ३५७ "वे (ब्राह्मण)" इत्यादि षष्ठ वाक्यके तात्पर्यकूं दिखावै हैं।। ३५८ योगक्षेमकेअर्थ राजाकेप्रति ब्राह्मणोंका उपगमन इष्ट हीं है ? ऐसैं मानते हुये विशेषण देते हैं॥ इहां तथा (तैसैं) इस ठिकानें अतः (यातैं) शब्द देखनेकूं योग्य है औ

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९६६ पंचमप्रपाठक ५ [छान्दोग्यो- प्राणज्येष्ठतादि पंचान्निविद्या श्गति वैश्वानरोपास्ति ज्ञातान्निहोत्र २४ क्रमिरे॥ तान् हानुपनीयैवैतदुवाच७।। इति पंचमप्रपाठकस्यैकादशः खण्डः ॥११॥ जाते भये॥ ॥ [राजा] तिनकूं पादवंदन नकरवायकेहीं यह कहताभया ॥७॥ इति श्री०मूलभाषा०पंचमप्र०एकादशः खंड:११ हीन (क्षत्रिय) राजाके प्रति विनयकरि (नम्र- भावकरि) उपगमन करतेभये कहिये शिष्यकी रीतिसैं शरणागत होतेभये। तैसैं यातैं अन्य विद्याके ग्रहण करनेकी इच्छावालोंकरि होनेकूं योग्य है॥ औ [राजा] तिनकूं उपनयन (दोपा- दनविषै निपतन) नकरवायकेहीं तिन यथा- योग्यनके अर्थ विद्याकूं देताभया। तैसैं अन्य विद्वान्करिवी विद्या देनेकूं योग्य है। यह आ-

उपनयन कहिये दो पादनविषै निपतन (गिरना) औ वक्ष्य- माण जो वैश्वानरका विज्ञान है तिसकेसाथि "इस" या प- दका संबंध है। यह अर्थ है।। ३५९ आख्यायिकाके तात्पर्यकूं उपसंहार करैहैं॥ इति श्री०पंचमप्रपाठकगतैकादशखंडस्य टिप्पणम् ॥११॥

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पनिषत्] द्वादश खंड १२ ९६७ प्राचीनशाल-अश्वपतिसंवाद (स्वर्गाsडत्मा) २ अथ पंचमप्रपाठकस्य द्वादशः खंड: १२ औपमन्यव!कं लमात्मानमुपास्स

अथ श्री०मूलभाषा०पंचमप्रपाठकस्य द्वादशःखंड:१२ अर्थ :- राजोवाच :- १ हे औपमन्यव! तूं किस आत्माकूं उपासताहैं?॥ ॥ ऐसैं ख्यायिकाका अर्थ है। इस वैश्वानर संबंधी विज्ञानकूं कहताभया। ऐसैं वक्ष्यमाण (आ- गे कहनेके) ग्रंथसैं संबंध है ॥ ५॥६॥७॥ इति श्री०भाष्यभाषा०पंचमप्रपाठकस्यैकादशः खंडः॥११।। अथ श्री०भाष्यभाषा०पंचमप्रपाठ०द्वादशः खंडः।१२॥ प्राचीनशाल-अश्वपतिसंवाद (स्वर्गाऽडत्मा) २ टीका :- सो राजा कैसैं कहताभया? यह श्रुति कहैहै :- १ राजोवाचः-हे औपमन्यव ! तूं किस आत्मारूप (वैश्वानर)कूं उपासता- हैं? ऐसैं एक विद्यार्थीकूं पूंछताभया॥ ॥ नैनु यह अन्याय है किः-आचार्य हुया शि- अथ श्री०पंचमप्रपाठ०द्वादशखंडस्य टिप्पणम् १२ ३६० शिष्य प्रसिद्ध प्रष्टा (पूंछनेवाला) औ आचार्य तो

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९६८ पंचमप्रपाठक ५ [छान्दोग्यो- प्राणज्येष्ठतादि पंचान्निविद्या श्गति वैश्वानरोपास्ति ज्ञातान्निहोत्र २४ इति॥ दिवमेव भगवो राजन्निति होवा- चैष वै सुतेजा आत्मा वैश्वानरो यं उक्तहुया [प्राचीनशाल :- ] हे भगवन्! हे राजन् ! स्वर्गलोककूंहीं [उपासताहूं]। ऐसैं कहताभया॥ ॥ [राजाः-] यह प्र- सिद्ध सुतेजा (सुंदर तेजवाला) आत्मा ष्यके प्रति पूंछताहै ऐसैं? यहं दोष बनै नहीं: काहेतैं "जो जानताहै तिसकरि मेरेप्रति शर- णागत हो। तातैं ऊर्ध्व तेरेअर्थ कहूंगा" इस न्यायके देखनेतैं ॥ अन्यत्र वी आचार्य (अ- जातशत्रु राजा) का अप्रतिभानवाले शिष्यविषै प्रतिभानके उत्पादनअर्थ प्रश्न देख्या है :- "यह तब (सुषुप्तिकालमैं) कहांथा। कहांतैं यह जैसैं प्रतिवक्ता होवैहै? इस न्यायकरि पूर्ववादी शंका करैहै॥ ३६१ वाक्यशेषके आश्रयकरि सिद्धांती दूषण देतेहैं॥ ३६२ वृहदारण्यककी श्रुतिकी आलोचना (विचार)के हु- येबी यह अन्याय नहीं। ऐसें कहैहैं॥ इहां आचार्य [के] अ- जातशत्रुके। ऐसैं संबंध है॥

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पनिषत्] द्वादश खंड १२ प्राचीनशाल-अश्वपतिसंवाद (स्वर्गाडडत्मा) २ ९६९

त्वमात्मानमुपास्से। तस्मात्तव सुतं प्र- सुतमासुतं कुले दृश्यते॥ १ ॥ वैश्वानर है। जिस आत्माकूं तूं उपासता हैं। तिसतैं तेरे कुलविषै सुत (सोम) प्रसुत अरु आसुत देखियेहै॥१ ॥ होवै तैसैं आवता भया" ऐसैं॥।॥ प्राचीनशाल उवाच :- हेभगवन्! हे राजन्! "स्वर्गलोक रूपहीं वैश्वानरकूं मैं उपासताहूं"। ऐसैं कह- ताभया॥॥ राजोवाचः-यह प्रसिद्ध सुतेजा कहिये शोभन है तेज जिसका सो यह सुतेजा कहियेहै। ऐसा प्रसिद्ध वैश्वानररूप आत्मा है। काहेतैं आत्माका अवयवभूत होनेतैं॥ तूं जिस ३६३ ता (स्वर्गलोक)के आत्मभावविषै प्राचीनशाल हे- तुकूं कहैहै। इहां एकाह (एकदिवस) आदिरूप ज्योतिष्टोम आदिक यज्ञ अहर्गण कहिये है। तिसविषै सुत जो सोमरूप लतामय द्रव्य अहीन (उत्तम शुद्ध ब्राह्मणादि वर्ण)के होते प्रसुत होवैहै। औ सत्रनामक यागविषै तो आसुत होवैहै। यह भेद है औ तेरे। ऐसा फेर कथन अन्वयके दिखावने अर्थ है।।

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९७० पंचमप्रपाठक ५ [छान्दोग्यो- प्राणज्येष्ठतादि पंचागनिविद्या शगति वैश्वानरोपास्ति ज्ञातान्निहोत्र २४ अत्स्यन्नं पश्यसि प्रियमत्त्यन्नं प- शयति प्रियं भवत्यस्य ब्रह्मवर्चसं कुले अर्थ :- अन्नकूं खाता हैं। प्रियकूं देख- ताहैं।। अन्नकूं खाताहै। प्रियकूं देखता है। इसके कुलविषै ब्रह्मवर्चस (ब्रह्मतेज) आत्माकूं (आत्माके एकदेशकूं)उपासताहैं। तिस सुतेजा वैश्वानरके उपासनतैं तेरे कुल- विषै सुत जो सोमरूप अभिषुत। सो कर्मविषै प्रसुत कहिये प्रकर्षकरि सुत औ अहर्गण आ- दिकनविषै आसुत देखियेहै। अर्थ यह जो :- तेरेकुलविषै उत्पन्न जे पुरुष वे अतीव (अति- शयकरि हीं) कर्मी हैं। [१]॥ तूं प्रदीप् अ- झिवाला हुया अन्नकूं भक्षण करताहैं औ पुत्र पौत्रादिरूप प्रिय (इष्ट)कूं देखताहैं॥१॥ टीका :- अन्यबी अन्नकूं भक्षण करताहै ३६४ केवल प्राचीनशालविषै स्थित। यह फल नहीं किंतु अन्यकूंवी होवैहै। ऐसैं कहैहैं॥

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पनिषत्] द्वादश खंड १२ प्राचीनशाल-अश्वपतिसंवाद (स्वर्गाsडत्मा) २ ९७१

य एतमेवमात्मानं वैश्वानरमुपास्ते। मूर्दा लेष आत्मन इति होवाच। मूर्डा ते व्यपतिष्यद्यन्मां नागमिष्य इति॥२।। इति पंचम्रपाठकस्य द्वादशः खंडः ॥ १२ ॥ होवैहै। जो इस वैश्वानररूप आत्माकूं he E sho Fe ऐसैं उपासताहै॥ यह आत्माका मूर्धातो है। ऐसैं कहताभया। मूर्धा तेरा पतन हो- ता जो मेरेप्रति नहीं आवता ऐसैं ॥ २ ॥ इति श्री०मूलभाषा०पंचमप्रपा०द्वादशः खंड:१२ औ प्रियकूं देखताहै। इसके कुलविषै सुत जो है सो। प्रसुत अरु आसुत इत्यादि कर्मी- पनारूप ब्रह्मवर्चस होवैहै॥ जो कोइकबी ऐसैं इस यथोक्त आत्मारूप वैश्वानरकूं उपा- सताहै॥ परंतु आत्मारूप वैश्वानरका मूर्धा (मस्तक) तो यह है। समस्त वैश्वानर न- ३६५ तब यथोक्त वैश्वानरके ज्ञानतैंहीं कृतकृत्यता हो- वैगी ? यह आशंकाकरिके कहैहैं॥

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९७२ पंचमप्रपाठक ५ [छान्दोग्यो- प्राणज्येष्ठतादि पंचाग्निविद्या श्गति वैश्वानरोपास्ति ज्ञाताग्निहोत्र २४ अथपंचम प्रपाठक०त्रयोदशः खंड: १३ अथ होवाच-सत्ययज्ञं पौलुषिं। प्रा- अथ श्री० ूलभाषा० पंचमप्रपाठकस्य त्रयोदशःखंड:१३ अर्थ :- अनंतर [राजा] २ सत्ययज्ञ पौलुषिकूं कहताभया :- हे प्राचीनयोग्य! हीं। यातैं [इस असमस्तविषै ]. समस्तबुद्धि- करि वैश्वानरके उपासनतैं तुज विपरीतग्रा- हीका मूर्धा (शिर) विपतित होता (गिर- जाता) जो मेरे प्रति तूं नहीं आवता तो। श्रेष्ठ करताभयाहैं :- जो तूं मेरेप्रति आयाहैं। यह अभिप्राय है॥ २ ॥ इति श्री० भाष्यभाषा०पंचमप्रपाठकस्य द्वादश: खंड: १२।। अथ श्री०भाष्यभाषा० पंचमप्र०त्रयोदशः खण्डः।१३॥ सत्ययज्ञ-अश्वपतिसंवाद (सूर्याऽडतमा) २ टीका :- अनंतर २ सत्ययज्ञ पौलुषिकूं कहताभया॥ राजोवाचः-हे प्राचीनयो- २६६ अक्षरार्थकूं कहिके विवक्षित अर्थकूं कहैहैं॥ इति श्री० पंचमप्रपाठकगतद्वादृशखंडस्य टिप्पणम् ॥ १२॥

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पनिषत् ] त्रयोदश खंड १३ ९७३ सत्ययज्ञ-अश्वपतिसंवाद (सूर्याऽडत्मा) २ चीनयोग्य! कं तमात्मानमुपास्स इत्यादित्यमेव भगवो राजन्निति होवा- चैष वै विश्वरूप आत्मा वैश्वानरो यं त्मात्मानमुपास्से । तस्मात्तव बहु विश्वरूपं कुले दृश्यते॥ १ ॥ किस आत्माकूं उपासताहैं? ॥ ॥ऐ- [उक्तहुया सत्ययज्ञ :- ] हे भगवन् ! हे राजन् ! आदित्यकूंहीं। ऐसैं कहताभ- या॥ ॥ [राजा :- ] यह प्रसिद्ध विश्वरूप आत्मा वैश्वानर है। जिस आत्माकूं तूं उ- पासता हैं। तिसतैं तेरेकुलविषै बहु वि- श्वरूप (साधन) देखियेहै॥ १॥ ग्य ! तूं किस आत्माकूं उपासताहैं? ऐसैं ॥। ॥ सत्ययज्ञ उवाच :- हे भगवन् ! हे राजन् ! "आदित्यकूंहीं" ऐसैं कहता भया। ॥ राजोवाच :- आदित्यकूं शुक् नील आदिकरूपवाला होनेतैं। वा सर्वरूप होनेतैं ८२

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९७४ पंचमप्रपाठक ५ [ छान्दोग्यो- प्राणज्येष्ठतादि पंचान्निविद्या श्गति वैश्वानरोपास्ति ज्ञाताग्निहोत्र २४ प्रटत्तोऽश्वतरीरथो दासीनिष्कोऽत्स्य- न्नं पश्यसि प्रियमत्त्यन्नं पश्यति प्रियं अर्थः-[तेरेप्रति] अश्वतरीरथ अरु दासीनकरि युक्त हार प्रवृत्त भया है। अन्नकूं खाताहैं। प्रियकूं देखताहैं ॥ अन्नकूं खाता है। प्रियकूं देखता है। इ- विश्वरूपपना है। वा जातैं सर्वरूप त्वष्टा (सूर्य) के हैं। यातैं यहहीं आदित्य विश्वरूप है॥ ताके उपासनतैं तेरे कुलविषै बहु विश्व- रूप (इसलोक अरु परलोककेअर्थ उपकरण) देखियेहै॥ १॥ टीका :- किंवा :- तेरे पीछे दो अश्वतरी(खे-

अथ श्री०पंचमप्रपाठत्योदशखंडस्य टिप्पणम्१३ ३६७ इहां अथ शब्दका प्राचीनशालके तूष्णीभूत अरु जिज्ञासावान् हुये अनंतर। यह अर्थ है औ आदित्यका शु- कताआदिरूपवान्पना अष्टम अध्यायविषै स्पष्ट होवैगा। ता (आदित्य)की सर्वरूपताकरि उक्त विश्वरूपताकूं उपपादन करैहैं॥ इहां "अन्नकूं खाता हैं" इत्यादि वाक्य "चक्षुतो यह है" या वाक्यतैं पूर्वका है। यह शेष है।।

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पनिषत् ]] त्रयोदश खंड १३ ९७५ 39 सत्ययज्ञ-अश्वपतिसंवाद (सूर्याऽडत्मा)२ भवत्यस्य ब्रह्मवर्चसं कुले य एतमेवमा- त्मानं वैश्वानरमुपास्ते। चक्षुष्टेदतात्मन इति होवाचान्धोऽभविष्यद्यन्मां नाग- मिष्य इति॥२ ॥ Fe इति पंचमप्रपाठकस्य त्रयोदशः खण्डः । १३।। सके कुलविषै ब्रह्मवर्चस होवैहै। जो इस आत्मारूप वैश्वानरकूं ऐसैं उपासताहै॥ यह आत्माका चक्षु तो है। ऐसैं कहताभया। अंध होता जो मेरे प्रति नहीं आवता [तो] ऐसैं ॥ २ ॥

चरी) नकरि युक्त जो रथ सो अश्वतरीरथ कहियेहै। सो प्रवृत्तभया (चलता)है औ दासियोंकरि युक्त ऐसा निष्क जो हार सो दासीनिष्क कहियेहै सो [ तेरेकूं प्राप्तभयाहै]। अन्नकूं खाताहैं। इत्यादि समान है॥ परंतु

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९७६ पंचमप्रपाठक ५ [ छान्दोग्यो- प्राणज्येष्ठतादि पंचाग्निविद्या श्गति वैश्वानरोपास्ति ज्ञाताग्निहोत्र २४ अथ पंचमप्रपाठकस्य चतुर्दशःखंड:१४ अथ होवाचेन्द्रद्युम्नं भाल्लवेयं। वै-

अर्थ :- अनंतर [राजा] ३ इंद्रद्युन्न भा- ल्लवेयकूं कहताभयाः-हे वैयाघ्रपद्य! तूं आत्मारूप वैश्वानरका चक्षु यह सविता (सूर्य) है [ समस्त वैश्वानर नहीं ]। ताके समस्तबु- द्विकरि उपासनतैं तूं अंध होता कहिये चक्षु- हीन होता। जो मेरेप्रति नहीं आवतातो। यह पूर्वकी न्यांईं है॥ २ ॥ इति श्री० भाष्यभाषा०पंचमप्रपाठकस्य त्रयोदश:खण्ड:१३ अथ श्री०भाष्यभाषापंचमप्रपाठ०चतुर्दशःखंडः।।१४।। इंद्रद्युन्न-अश्वपतिसंवाद (वायुआत्मा) २ टीका :- अनंतर ३ इंद्रद्युम्न भाल्लवेयकूं ३६८ "चक्षुतो यह है" इत्यादि वाक्यकूं व्याख्यान करैहैं॥ ३६९ तिसविषैबी पूर्वके अनुसार तात्पर्य देखनेकूं योग्य है। ऐसें कहैहैं॥ इति श्री० पंचमप्रपाठकगतत्रयोदशखंडस्य टिप्पणम्।। १३॥

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पनिषत् ] चतुर्दश खंड १४ ९७७ इंद्रद्युम्न-अश्वपतिसंवाद (वायुआत्मा) २ याघ्रपद्य! कं लमात्मानमुपास्स इति ? वायुमेव भगवो राजन्निति होवाचैष वै पथग्वर्त्माऽडत्मा वैश्वानरो यं त- किस आत्माकूं उपासताहैं? ऐसैं॥ ॥ [इंद्रद्युम्न ] हे भगवन् ! हे राजन्! वायु- कूंहीं। ऐसैं कहताभया। ॥। [राजा :- ] यह प्रसिद्ध पृथग्वर्त्मा (नानामार्गवाला चायुरूप) आत्मा वैश्वानर है जिस आ- कहताभया ॥ राजोवाच :- हे वैयाघ्रपद्य (व्याघ्रके लक्षणकरि श्लाघायुक्त)! तूं किस आत्माकूं उपासताहैं? इत्यादि समान है॥ राजोवाच :- पृथक् (नाँना) हैं वर्त्म (मार्ग) अथ श्री०पंचमप्रपाठ० चतुर्दशखंडस्य टिप्पणम्१४ ३७० इहां सत्ययज्ञके उपरम (तूष्णीभाव)के अनंतर। यह अथशब्दका अर्थ है औ इत्यादि। इस आदिपदकरि "पृथक्" इसपदतैं पूर्वका वाक्य ग्रहण किया है। अब पृथग्वर्त्मा। इस प्रतीककूं लेके व्याख्यान करैहैं॥ इहां अभिमुख होने-

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९७८ पंचमप्रपाठक ५ [छान्दोग्यो- प्राणज्येष्ठतादि पंचाग्निविद्या श्गति वैश्वानरोपास्ति ज्ञातान्निहोत्र २४ मात्मानमुपास्से। तस्मात्त्वां एथग्बलय आयन्ति पथग्रथश्रेणयोऽनुयन्ति।१।। त्माकूं तूं उपासताहैं। तातें तेरे प्रति प- थक् बलि आवतेहैं। पथक् रथनकी पं- क्तियां पीछे चलतियां हैं॥ १॥ जिस आवह अरु उद्दह आदिक भेदनकरि व- र्र्तमान वायुके। सो यह पथग्वर्त्मा वायु है।। तिस पृथग्वर्त्मा आत्मारूप वैश्वानरके उपास- नतैं तेरेप्रति पथक् (नाना दिशाओंविषै होनेवाले) वस्त्रअन्न आदिकरूप बलि (भेट) आवतेहैं औ पृथक् (नाना) रथनकी पं- क्तियांबी तेरे पीछे गमन करैहैं ॥ १॥ करि आगमन करता हुया वायु आवह कहियेहै औ ऊर्ध्व करि वहताहै यातैं उद्धह कहियेहै॥ ३७१ "तातैं तेरेप्रति" इत्यादि वाक्यकूं व्याख्यान करै- हैं।। इहां नाना दिक्का। याका (नानादिशाओंविषै होनेवाले) यह अर्थ है औ "अन्नकूं खाता हैं" इत्यादि समान है। इस वाक्यविषै जो आदिपद है सो "उपासताहै" इहां प- र्यंतके वाक्यके ग्रहणअर्थ है।

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पनिषत् ] चतुर्दश खंड १४ ९७९ इंद्रद्युम्न-अश्वपतिसंवाद (वायुआत्मा)२ अत्स्यन्नं पश्यसि प्रियमत्त्यन्नं प- यति प्रियं भवत्यस्य ब्रह्मवर्चसं कुले य एतमेवमात्मानं वैश्वानरमुपास्ते। प्रा- णस्तेष आत्मन इति होवाच। प्राणस्त अर्थ :- अन्नकूं खाताहैं। प्रियकूं देखता हैं।। अन्नकूं खाताहै। प्रियकूं देखताहै। इसके कुलविषै ब्रह्मवर्चस होवैहै। जो इस आत्मारूप वैश्वानरकूं ऐसैं उपासता है।। यह आत्माका प्राण तो है। ऐसैं क- हताभया॥ तेरा प्राण उत्क्रमण करता जो टीका :- अन्नकूं खाताहैं। इत्यादि समान है। परंतु आत्माका प्राण यह (वायु) है। ऐसैं कहताभया॥ तेरा प्राण उत्क्रमण क- रता कहिये उत्क्रांत होता (देहतैं निकस जाता) ३७२ उत्तर (पीछले) वाक्यविषैवी अभिप्रायकी समताकूं मानिके कहैहैं। इति श्री० पंचमप्रपाठकगतचतुर्दशखंडस्य टिप्पणम् ॥१४॥

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९८० पेचमप्रपाठक ५ [छान्दोग्यो- प्राणज्येष्ठतादि पंचाग्निविद्या श्गति वैश्वानरोपास्ति ज्ञातागनिहोत्र २४ उदक्रमिष्यद्यन्मां नागमिष्य इति॥२। इति पंचमप्रपाठकस्य चतुर्दशः खंडः॥ १४ ॥ अथ पंचमप्रपाठकस्य पञ्चदशःखंड:१५ अथ होवाच-जनर शार्कराक्ष्य! कं

मेरेप्रति नहीं आवता [तो] ऐसैं ॥ २ ॥ इति श्री०मूलभाषा०पंचमप्रपा०चतुर्दशःखंड:१४ अथ श्री०मूलभाषापंचमप्रपा०पंचदशः खंडः ॥१५।। अर्थ :- अनंतर [राजा ] ४ जनकूं क- हताभया :- हे शार्कराक्ष्य! तूं किस आ- जो मेरेप्रति तूं नहीं आवता तो ऐसैं ॥ २ ॥ इति श्री०भाष्यभाषा०पंचमप्रपाठ० चतुर्दशःखण्डः।।१४।। अथ श्री०भाष्यभाषा०पंचमप्रपा०पंचदशः खण्डः॥१५॥। जन-अश्वपतिसंवाद (आकाशाSडत्मा) २ टीका :- अनंतर४जन नामक शिष्यकूं क- हताभया॥ राजोवाच :- इत्यादि समान है।॥ [ राजा कहैहैः-] यह (आकाशरूप) प्रसिद्ध बहुल आत्मा वैश्वानर है। आकाशकूं सर्व-

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पनिषत् ] पंचदश खंड १५ ९८१ जन-अश्वपतिसंवाद (आकाशाऽडत्मा) २ तमात्मानमुपास्स इत्याकाशमेव भग- वो राजन्निति होवाचैष वै बहुल आत्मा वैश्वानरो यं त्वमात्मानमुपास्से। तस्मा- त्त्वं बहुलोऽसि प्रजया च धनेन च।१।। त्माकूं उपासताहै? ॥ ॥ ऐसैं [ उक्त- हुया जन :- ] हे भगवन् ! हे राजन् ! आकाशकूं हीं। ऐसैं कहताभया॥ ॥ [राजा :- ] यह प्रसिद्ध बहुल आत्मा वै- श्वानर है। जिस आत्माकूं तूं उपासताहैं। तातैं तूं प्रजाकरि औ धनकरि बहुल हैं॥१॥ गत होनेतैं औ बहुलगुणकरि बैहुलपनाहै॥ ताके उपासनतैं तूं पुत्र पौत्रादि प्रजाकरि औ हिरण्यआदिक धनकरि बहुलहैं ॥ १ ॥ अथ श्री०पंचमप्रपाठ०पंचदशखंडस्य टिप्पणम्१५ ३७३ इहां इंद्रद्युम्नके उपरमकी अनंतरता। अथ शब्दका अर्थ है औ इहां जो आदिपद है सो "यह" इस वाक्यतैं पूर्वले वाक्यके संग्रहअर्थ है।। अव आकाशकी बहुलता कैसैं है ? यह शंका भई। यातैं कहैहैं॥

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९८२ पंचमप्रपाठक ५ [छान्दोग्यो- प्राणज्येष्ठतादि पंचान्निविद्या शगति वैश्वानरोपास्ति ज्ञाताग्निहोत्र २४ अत्स्यन्नं पश्यसि प्रियमत्त्यन्नं प- शयति प्रियं भवत्यस्य ब्रह्मवर्चसं कुले य एतमेवमात्मानं वैश्वानरमुपास्ते। स-

अर्थ :- अन्नकूं खाताहैं। प्रियकूं देख- ताहैं।। अन्नकूं खाताहै। प्रियकूं देखताहै इसके कुलविषै ब्रह्मवर्चस होवैहै। जो इस आत्मारूप वैश्वानरकूंऐसैं उपासताहै।

टीका :- ॥ परंतु यह (आकाश) वैश्वानर (विराट्रूप आत्मा)का संदेह कहिये मध्यम शरीर (शरीरका मध्यमभागरूप उदर) है [स- मस्त नहीं]॥ "दिहि" धातुकूं उपचय (वृद्धि) ३७४

रूप अर्थवाला होनेतैं माँसँ रुधिर अरु अस्थि

२७४ शरीरके मध्यमभागविषै संशयका वाची "संदेह" शब्द कैसें वर्त्तता है? तहां कहैहैं॥ ३७५ आकाशकूं सर्वगत होनेकरि बहुल होनेतैं औ दे- हकूं परिच्छिन्न होनेकरि ता (बहुलता)के अभावतैं आकाश

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पनिषत्] पंचदश खंड १५ ९८३ जन-अश्वपतिसंवाद (आकाशाSडत्मा) २ न्देहस्तेष आत्मन इति होवाच। सन्देह- स्ते व्यशीर्य्यद्यन्मां नागमिष्य इति॥२।। इति पंचमप्रपाठकस्य पंचदशः खंडः ॥१५॥

यह आत्माका संदेह (शरीर) तो है। ऐसैं कहताभया॥ तेरा संदेह (शरीर) विशीर्ण (नष्ट) होता जो मेरे प्रति नहीं आवता ऐसैं ॥ २ ॥

आदिकनकरि बहुल (बढ्या) जो शरीर सो संदेह है। तेरा शरीर विशीर्ण (नष्ट) होता जो तूं मेरेप्रति नहीं आवता तो ऐसैं॥। २॥ इतिश्री०भाष्यभाषा०पंचमप्रपाठ०पंचदशः खण्डः॥१५।।

वैश्वानरका शरीर कैसें होवैगा ? यह आशंकाकरिके कहैहैं॥ इहां सो शरीर [संदेह] है ऐसें संबंध है।। इति श्री० पंचमप्रपाठकगतपंचदशखंडस्य टिप्पणम् ॥१५॥

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९८४ पंचमप्रपाठक ५ [छान्दोग्यो- प्राणज्येष्ठतादि पंचान्निविद्या श्गति वैश्वानरोपास्ति ज्ञाताग्निहोत्र २४ अथ पंचमप्रपा०षोडशः खंडः॥ १६॥ अथ होवाच-बुडिलमाश्वतराश्चि। वैयाघ्रपद्य!कं त्मात्मानमुपास्स इत्यप- अथ श्री०मूलभाषा• पंचमप्रपा० षोडशः खंडः ॥१६।। अर्थ :- अनंतर [राजा] ५ बुडिल आ- श्वतराश्िकूं कहताभयाः-हे वैयाघ्रपद्य ! तूं किस आत्माकूं उपासताहैं?॥ ॥ अथ श्री०भाष्यभाषा०पंचमप्रपा०षोडशः खण्डः॥१६॥ बुडिल-अश्वपतिसंवाद (जलाऽडत्मा) २ टीका :- अनंतर५ बुडिल आश्वतराश्विकूं राजा कहताभया। इत्यादि समान है।। [ राजा कहैहैः-] यह प्रसिद्ध रयि (धनरूप) आत्मा वैश्वानर है॥ जलोतैं अन्न होवैहै। अथ श्री०पंचमप्रपाठक०षोडशखंडस्य टिप्पणम्१६ ३७६ इहां जननामक शिष्यके उपरमके अनंतर। अथ शब्दका अर्थ है।। जलस्वरूप जो वैश्वानर सो "रयि" ऐसें धनकरि कैसें निर्देश करियेहै ? तहां कहैहैं॥ इहां "आ- युहीं घृत है" याकी न्यांई कार्यके वाचक रयि (धन) शब्द

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पनिषत् ] षोडश खंड १६ ९८५ बुडिल-अश्वपतिसंवाद (जलाSडत्मा) २ एव भगवो राजन्निति होवाचैष वै रथि- रात्मा वैश्वानरो यं तमात्मानमुपास्से। तस्मात्त्व रयिमान् पुष्टिमानसि॥१॥ ऐसैं [उक्त हुया बुडिल :- ] हे भगवन् ! हे राजन्! जलहींकूं। ऐसैं कहताभया॥ [राजा :- ] यह प्रसिद्ध रयि (धनरूप जल) आत्मा वैश्वानर है। जिस आत्माकूं तूं उपासताहैं। तातैं तूं रयिमान् ( धन- वान्) पुष्टिमान् हैं॥ १ ॥ तिसतैं धन होवैहै ऐसैंहै। तातैं तूं रयिमान् (धनवान्) हैं औ शरीरकरि पुष्टिमान् हैं। पुष्टिकूं अन्नरूप निमित्तवाली होनेतैं ॥ १ ॥ ३७७

करि कारण (जलरूप वैश्वानर) लखिये है (लक्षणसैं जानि- येहै)। यह अर्थ है औ तातैं। याका यथोक्त वैश्वानरके उ- पासनतैं। यह अर्थ है।। ३७७ धनरूप वैश्वानरके उपासनतैं धनवान् हैं ऐसैंहीं कहनेकी योग्यताके हुये पुष्टिमान् हैं ऐसें अधिकका मिश्रण कैसैं किया? तहां कहैहैं॥ ८३

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९८६ पंचमग्रपाठक ५ [छान्दोग्यो- प्राणज्येष्ठतादि पंचाग्निविद्या ३ गति वैश्वानरोपास्ति ज्ञाताग्निहोत्र २४ अत्स्यन्नं पश्यसि प्रियमत्त्यन्नं प- श्यति प्रियं भवत्यस्य ब्रह्मवर्चसं कुले य एतमेवमात्मानं वैश्वानरमुपास्ते। व- स्तिस्त्ेष आत्मन इति होवाच। बस्तिस्ते व्यभेत्स्यद्यन्मां नागमिष्य इति ॥२॥ इति पंचमप्रपाठकस्य षोडशः खंडः ॥ १६ ॥ अर्थ :- अन्नकूं खाताहैं। प्रियकूं देखताहैं अन्नकूं खाताहै। प्रियकूं देखताहै। इसके कुलविषै ब्रह्मवर्चस होवैहै। जो इस आ- त्मारूप वैश्वानरकूं ऐसैं उपासताहै॥ यह आत्माका बस्ति (मूत्रस्थान) तो है। ऐसैं कहताभया ॥ तेरा बस्ति फटता जो मेरेप्रति नहीं आवता [तो] ऐसैं ॥ २ ॥

टीका :- परंतु यह आत्मारूप वैश्वानरका वस्ति कहिये मूत्रके संग्रहका स्थान है॥ तेरा ३७८ धनुष जैसा वक्र जो मूत्राशय सो "वस्ति" ऐसैं क- हियेहै। इस आशयकरि कहैहैं॥ इति श्री० पंचमप्रपाठकगतषोडशखंडस्य टिप्पणम् ॥ १६॥

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पनिषत् ] सप्तदश खंड १७ ९८७ उद्दालक-अश्वपतिसंवाद (पृथ्वी आत्मा) २ अथ पंचमप्रपा०सप्तदशः खंडः ।१७।। अथ होवाचोद्दालकमारुणिं गौतम! कं लमात्मानमुपास्स इति? पृथिवीमेव

अथ श्री०मूलभाषा०पंचमप्रपा०सप्तदशः खंडः ॥१७॥ अर्थ :- अनंतर [राजा]६ उद्दालक आ- रुणिकूं कहताभयाः-हे गौतम! तूं किस आत्माकूं उपासताहैं?॥ ॥ ऐसैं [उक्त हुया उद्दालक :- ] हे भगवन्! हे राजन्!

बस्ति भिन्न (भेदकूं प्राप्त) होता जो तूं मे- रेप्रति नहीं आवता तो ऐसैं ॥ २ ॥

अथ श्री०भाष्यभाषा०पंचमप्र०सप्तदशःखंडः ॥ १७ ॥ उद्दालक-अश्वपतिसंवाद (पृथ्वी आत्मा) २ टीका :- अनंतर ६उद्दालक मुनिकूं राजा

अथ श्री०पंचमप्रपाठ० सप्तदशखंडस्य पिप्पणम् १७ ३७९ इहां प्राचीनशालआदिक पांचके मौन स्थित हुयेके अनंतर। यह अथ शब्दका अर्थ है।। इति श्री० पंचमप्रपाठकगतसप्तदशखंडस्य टिप्पणम् ॥१७॥

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९८८ पंचमप्रपाठक ५ [छान्दोग्यो- प्राणज्येष्ठतादि पंचान्निविद्या श्गति वैश्वानरोपास्ति ज्ञातागिहोत्र २४ भगवो राजन्निति होवाचैष वै प्रति- ष्ठाऽडत्मा वैश्वानरो यं तमात्मानमु- पास्से। तस्मात्त्वं प्रतिष्ठितोऽसि प्रजया च पशुभिश्च॥ १॥ अत्स्यन्नं पश्यसि प्रियमत्त्यन्नं प- श्यति प्रियं भवत्यस्य ब्रह्मवर्चसं कुले य एतमेवमात्मानं वैश्वानरमुपास्ते।पा- पृथिवीकूंहीं। ऐसैं कहताभया ।। ॥ [रा- जा :- ] यह प्रसिद्ध प्रतिष्ठारूप आत्मा वैश्वानर है। जिस आत्माकूं तूं उपास- ताहैं। तातैं तूं प्रजाकरि अरु पशुनकरि प्रतिष्ठित हैं॥ १ ॥ अर्थ :- अन्नकूं खाताहैं। प्रियकूं देख- ताहैं।। अन्नकूं खाताहै। प्रियकूं देखता- है। इसके कुलविषै ब्रह्मवर्चस होवैहै। जो इस आत्मारूप वैश्वानरकूं ऐसैं उपा- कहताभया। इत्यादि समान है॥ ॥ उद्दा-

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पनिषत्] सप्तदश खंड १७ ९८९ उद्दालक-अश्वपतिसंवाद (पृथ्वी आत्मा) २ दौ लेतावात्मन इति होवाच॥ पादौ ते व्यम्लास्येतां यन्मां नागमिष्य इति २ इति पंचमप्रपाठकस्य सप्दशः खण्डः ॥१७॥ सताहै॥ ये आत्माके दो पाद तो हैं। ऐसैं कहताभया॥ तेरे दो पाद विम्लान होते जो मेरेप्रति नहीं आवता ऐसैं ॥२॥ इति श्री०मूलभाषा०पंचमप्र०सप्रदशःखंड: १७ लक उवाच :- हे भगवन् ! हे राजन्! "पृ- थिवीकूंहीं" ऐसैं कहताभया॥ ॥ [रा- जोवाच :- ] यह वैश्वानर आत्माकी प्रसिद्ध प्रतिष्ठा (पादका युगल) है॥ तेरे दो पाद विम्लान (शिथिलरूप)होते जो तूं मेरेप्रति नहीं आवता तो ऐसैं ॥ १॥ २ ॥ इति श्री० भाष्यभाषा०पंचमप्रपा०सप्रदशःखण्डः ॥ १७।

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९९० पंचमप्रपाठक ५ [छान्दोग्यो- प्राणज्येष्ठतादि पंचाग्निविद्या श्गति वैश्वानरोपास्ति ज्ञाताग्निहोत्र २४ अथ पंचमप्रपाठकस्याष्टादशः खंडः१८ तान् होवाचैते वै खलु यूयं पृथगि- अथ श्री० मूलभाषा•पंचमप्रपाठकस्याष्टादशः खंड:१८ अर्थ :- तिनकूं [राजा] कहताभयाः-ये

सर्वसैं अश्वपतिका संवाद (समस्तवैश्वानरविद्या) २ टीका :- तिन® यथोक्त वैश्वानरके दर्शनवाले

३८० उद्दालकपर्यत विद्यार्थिनके उपसन्न (शरणागत) हुये समस्तभावकरि वैश्वानरकी विद्याकूं कहनेकूं इच्छता हुया अश्वपति नामक राजा। तिनके मिथ्याज्ञानकूं अनुवाद करैहै॥ इहां "े। खलु" ये दो निपातरूप शब्द अर्थरहि- तकीन्यांई अर्थरहित हैं। परंतु अर्थरहितहीं नहीं। काहेतैं तिन शिष्यनके मिथ्याज्ञानीपनैकी प्रसिद्धिके स्मारक होनेतें औ "तुह्म" यह पद पाठके क्रमसैं पूर्व उक्तवी अन्वयकेअर्थ फेरि अनुवाद करिके कहा है औ पृथक्कीन्यांई जानते हुये। ऐसें संबंध है। जैसें जन्मांधपुरुष हस्तीके दर्शनविषै भिन्न- दृष्टिवाले होवैहैं। तैसैं तुह्म एक सर्वात्मक हुयेबी वैश्वानर- रूप आत्माकूं भिन्नकीन्यांई जानते हुये कहिये परिच्छिन्न अत्तारूपकरि आत्माकूं जानते हुये ॥ तैसैं हुये मिथ्यादर्शी तुह्म प्रत्यवायतैं पूर्वहीं मेरेप्रति आवते भये। यह श्रेष्ठकाम- करतेभये। यह अर्थ है।।

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पनिषत् ] अष्टादश खंड १८ सर्वसैं अश्वपतिका संवाद (सभस्तवैश्वानरविद्या) २ ९९१

वेममात्मानं वैश्वानरं विद्वाश्सोऽन्नम- त्थ। यस्त्ेतमेवं प्रादेशमात्रमभिविमा- तुह्म इस वैश्वानररूप आत्माकूं पृथक्की- न्यांई जानतेहुये अन्नकूं खाते हैं॥ जो तो इसकूं ऐसैं प्रादेशमात्र अभिविमान ब्राह्मणनकूं राजा कहताभया॥ राजोवाच :- ह- स्तिदर्शनविषै जन्मांध पुरुषनकीन्यांई ये तुम [ इहां वै। खल। ये दो निपात अर्थरहित हैं] अपृथक् हुये इस एक वैश्वानररूप आत्माकूं पथक्की न्यांई जानतेभये। अर्थ यह जो :- परिच्छिन्न आत्माकी बुद्धिकरि अन्नकूं खातेहो । परंतु जो इसकूं ऐसैं कहिये स्वर्ग- ३८१ प्रधानविद्याकूं कहनेकूं पातनिका (अवतरणिका)कूं करिके ताकूं अब उपदेश करैहै॥ इहां इसकूं कहिये एवंभू- तकूं (इस प्रकारके वैश्वानरकूं) जो उपासता है सो सर्वविषै अन्नकूं भक्षण करता है। ऐसैं संबंध है॥ ३८२ एवं शब्दके अर्थकूं कहैहैं॥ इहां एक। याका स- AL मस्त त्ैलोक्यस्वरूप। यह अर्थ है"

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१९२ पंचमप्रपाठक ५ [छान्दोग्यो- प्राणज्येष्ठतादि पंचान्निविद्या श्गति वैश्वानरोपास्ति ज्ञातागिहोत्र २४ नमात्मानं वैश्वानरमुपास्ते स सर्वेषु लोकेषु सर्वेषु भूतेषु सर्वेष्वात्मखवन्न- मत्ति॥१॥ आत्मारूप वैश्वानर[कूं] उपासताहै। सो सर्व लोकनविषै सर्वभूतनविषै सर्व आत्मा- ओंविषै [स्थित होयके] अन्नकूं खाताहै॥१॥ लोकरूप मूर्धासैं आदिलेके पृथिवीरूप पादपर्यंत यथोक्त अवयवोंकरि विशिष्ट एक अरु प्रादेशमात्र जो स्वर्गलोकरूप मूर्धासैं आदिलेके पृथिवीरूप पादपर्यत जे प्रादेश (प्रदेशरूपअवयव) हैं ति- नोंकरि अध्यात्म (प्रत्यगात्माविषै ) हीं जानि- येहै सो प्रादेशमात्र है। वा जो मुखआदिक क ३८३ प्रादेशमात्र। इस अर्थकूं विभाग करैहैं॥ इहां य- थोक्त अधिदैविक अवयवोंकरि अध्यात्म कहिये प्रत्यगात्मा- विषैहीं यह प्रमाण करियेहै कहिये जानियेहै। इस व्युत्प- त्तिकरि प्रादेशमात्र है ताकूं। यह अर्थ है।। ३८४ प्रकारांतरकरि व्याख्यान करैहैं॥ इहां यह अर्थ है :- जातैं तिन प्रदेशनविषै यह अत्ताभावकरि साक्षी हो- नेकरि जानियेहै। इस व्युत्पत्तिकरि तैसा (प्रादेशमात्र) कहिये है।।

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पनिषत् ] अष्टादश खंड १८ सर्वसैं अश्वपतिका संवाद (समस्तवैश्वानरविद्या) २ ९९३

रणोंविषै अत्ता (भोक्ता)भावकरि जानियेहै सो प्रादेशमात्र है। वा स्वर्गलोकसैंआदिलेके पृथि- वीपर्यंत प्रदेशनके परिमाणवाला प्रादेशमात्र है। वा प्रकर्षकरि शास्त्रसैं आदेश करियेहैं ऐसें प्रदे- श स्वर्गलोकआदिकहीहैं तितनैं परिमाणवाला प्रादेशमात्र है। अन्यशाखाविषै तो मस्तकादिक जो चिबुक (हनुवटी)विषै प्रतिष्ठित प्रदेश है सो प्रादेशमात्र है। ऐसैं प्रादेशमात्रकूं कल्पतेहैं॥ इहांतो तैसैं अभिप्रेत नहींहै। काहेतैं "तिस वा इस आत्माका" इत्यादि याके द्वितीयवाक्यविषै उपसंहारतैं॥ ऐसा प्रादेशमात्र अरु प्रत्यगात्म- ३८५ अन्यप्रकारसैं व्याख्यान करैहैं॥ ३८६ अन्य अर्थकूं कहैहैं॥ ३८७ "औ याकूं तिसविषै मानते हैं" इस न्यायकरि अन्यपक्षकूं कहैहैं॥ ३८८ ननु तब जाबाल श्रुतिके अनुसारकरि मस्तककूं आरंभ करिके अधरफलक (चिबुक)पर्यत देहके अवयवविषै संपादन किया जो वैश्वानर सो प्रादेशमात्र होहू? यह क- थन बनै नहीं। ऐसैं कहैहैं॥ इहां यह अर्थ है :- सर्वात्मभाव- करि वैश्वानरके उपसंहारके देखनेतैं इहां जावालश्रुति अनु- सरनेकूं योग्य नहीं है। ३८९ अब अन्यविशेषणकूं व्याख्यान करैहैं॥

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९९४ पंचमप्रपाठक ५ [छान्दोग्यो- प्राणज्येष्ठतादि पंचान्निविद्या ३ गति वैश्वानरोपास्ति ज्ञातामनिहोत्र २४ भावकरि "मैं हूं" ऐसैंजानियेहै सो अभिविमान है। ऐसा अभिविमान। तिस इस आत्मारूप वैश्वानरकूं कहिये विश्वें (सर्व) नरनकूं पुण्य- पापके अनुसार गतिकेतांई लेजाताहै ऐसा जो सर्वात्मा यह ईश्वर सो वैश्वानर है। वा सर्वात्मा होनेतैं विश्वनररूपहीं वैश्वानर है। वा विश्व नरोंकरि प्रत्यगात्मभावसैं विभागकरिके ग्रहण करियेहै यातैं वैश्वानर है। तिस वैश्वानरकूं जो ऐसें उपासताहै। सो (वैश्वानरका वेत्ता) अदन (भक्षण) करनेवाला अन्नादी हुया स्व- र्गलोकआदिक सर्वलोकनविषै अरु चराचर- रूप सर्वभूतनविषै अरु शरीरइंद्रियमनबु- द्विआदिक सर्व आत्माओंविषै स्थित होयके ३९० सर्वेश्वरताकूं वा सर्वात्मताकूं वा सर्वप्रत्यक्षताकूं हेतुकरिके वैश्वानर शब्दकूं अनेक प्रकारसैं व्याख्यान करैहैं। इहां ईश्वर वैश्वानर है [वा विश्वनरहीं वैश्वानर है] इस ठिकानैं वैश्वानरपद देहली दीपकन्यायकरि उभयत्र (दोनूं- विषै) संबंधकूं पावता है औ सो वैश्वानरका वेत्ता अन्नकूं भक्षण करता हुया सर्व लोकनविषै स्थित होयके अन्नकूं भ- क्षण करैहै। ऐसैं संबंध है।

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पनिषत्] अष्टादश खंड १८ ९९५. सर्वसैं अश्वपतिका संवाद (समस्तवैश्वानरविद्या) २ तस्य ह वा एतस्यात्मनो वैश्वानर- स्य मूर्द्ेव सुतेजाश्चक्षुर्विश्वरूपः प्राणः अर्थ :- तिस इस आत्मारूप वैश्वान- रका मूर्धाहीं सुतेजा (स्वर्ग) है। चक्षु वि- श्वरूप (सूर्य) है। प्राण पृथग्वर्त्मा (वा-

अन्नकूं [भक्षण करैहै]॥ तिनविषै जातैं प्राणि- ३९९

नके आत्माकी कल्पनाका व्यपदेश (व्यवहार) होवैहै यातैं वे आत्मा कहिये हैं वैश्वीनरका वेत्ता सर्वात्मा हुया अन्नकूं भक्षण करताहै। परंतु जैसैं अज्ञानी पिंडमात्रका अभिमानी हुया अन्नकूं भक्षण करताहै। तैसैं नहीं। यह अर्थ है ॥ १॥ टीका :- किसे हेतुतैं ऐसैं [निश्रय किया] ३९१ आत्मशब्दकरि शरीर आदिक कैसै ग्रहण करिये हैं ? तहां कहैहैं॥ ३९२ "सर्व लोकनविषै" इत्यादि वाक्यके तात्पर्यरूप अर्थकूं दिखावै हैं।। ३९३ ननु वैश्वानरका उपासक सर्वात्माहुया अन्नकूं खा- ताहै ऐसैं किस हेतुतैं निश्चितभया? इस आशंकाकूं अनुवाद करिके हेतुके दिखावनेपर होनेकरि उत्तररूपताकरि उत्तर

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९९६ पंचमग्रपाठक ५ [छान्दोग्यो- प्राणज्येष्ठतादि पंचाग्निविद्या श्गति वैश्वानरोपास्ति ज्ञातािहोत्र २४ एथग्वर्त्माऽSत्मा सन्देहो बहुलो बस्तिरेव रयि: प्टथिव्येव पादावुर एव वेदिलो- यु) है। आत्मारूप संदेह बहुल (नभ) है। बस्तिहीं रयि (जल) है। पथिवीहीं दो पाद हैं।। उरहीं वेदि है। लोम बर्हि है? तहां कहैहैं :- जातैं तिस प्रकतहीं इस आत्मारूप वैश्वानरका मूर्धाहीं सुतेजा (स्व- ्गलोक) है। चक्षु विश्वरूप (सूर्य) है। प्राण पृथग्वर्त्मा (वायु) है। आत्मा जो संदेह (देहका मध्यभाग) सो बहुल (आ- काश) है। बस्ति (मूत्राशय) हीं रयि (ध- नकरि लक्षित जल) है। पथिवीहीं दो पाद । अथवा विधिरूप अर्थवाला यह वचन (पीछले) वाक्यकूं ग्रहणकरैहें॥ इहां यह अर्थ है :- वैश्वानरकूं सर्वात्मा होनेतें ताके उपासककूं वी इस रूपताकरि सर्वात्मा होनेतैं यह (ताका उपासक) सर्वात्महोयके सर्वत्र अन्नकूं खाताहै। यह युक्त है॥

कहैहैं॥ ३९४ "तिस इसका" इत्यादि वाक्यके अन्य तात्पर्यकूं

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पनिषत्]] अष्टादश खंड १८ ९९७ सर्वसैं अश्वपतिका संवाद (समस्तवैश्वानरविद्या) २ मानि बर्हिर्हृदयं गार्हपत्यो मनोऽन्वा- हार्य्यपचन आस्यमाहवनीयः॥२॥ इति पंचमप्रपाठकस्याष्टादशः खण्डः॥१८॥ (दर्भ) है। हृदय गार्हपत्य है। मन अ- न्वाहार्यपचन (दक्षिणाग्नि) है। मुख आ- हवनीय है ॥ २ ॥ इति श्री०मूलभा०पंचमप्रपा०अष्टादशः खंड: १८ ऐसैं उपास्य है इसरीतिसैं [बोधन करै] है।॥ अैवे वैश्वानरवेत्ताके भोजनविषै अभिहोत्रकूं संपादन करता हुया अश्वपति कहैहैः-इस वै- श्वानररूप भोक्ताका उर (वक्षस्थल)हीं वेदि ३९५ प्रधानविद्या (मुख्य विद्या) कूं कहिके अब ताके अंगभूत प्राणाग्निहोत्रकूं दिखावनेकूं इच्छते हुये आचार्य भू- मिकाकूं करैहैं। इहां संपादन करनेकूं इच्छताहुया अश्वपति आदिविषै ताके अंगनकूं कहैहै। इहां "वेदि" ऐसे स्थंडिल- मात्र ग्रहणकरिये है। काहेतैं अग्निहोत्रविषै तितनें मात्रकूं उपयोगी होनेतैं अरु इतर वेदिके भागकूं दर्श पूर्णमास आ- दिकका अंगहोनेतैं। औ इधरवेदिविषै बिछायिते हैं जे दर्भ वे वर्हि शब्दकरि कहिये हैं औ हृदयकूं गार्हपत्य अग्निपना जो है सो मनके प्रणयन (उत्पत्ति)का हेतु होनेतें है औ प्रणी- तकी न्यांई। याका उत्पन्न हुयेकी न्यांई। यह अर्थ है।। ८४

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१९८ पंचमप्रपाठक ५ [छान्दोग्यो- प्राणज्येष्ठतादि पंचान्निविद्या श्गति वैश्वानरोपास्ति ज्ञातागिहोत्र २४ अथ पंचमप्रपा०एकोनविंश: खंड: १९ तद्यन्क्तं प्रथममागच्छेत्तडोमीय अथ श्री०मूलभा • पंचमप्रपाठकस्यैकोनविंशः खंड:१९ अर्थ :- तहां जो भक्त (रंधित अन्न) (स्थंडिल)है आकारके सामान्यतैं। लोम वेदिविषै बिछाये दर्भनकी न्यांईं उरविषै बिछाये देखिये हैं यातैं वे बर्हि (दर्भ) है। हृदय गार्हपत्य ना- मक अभनि है। जातैं मन हृदयतैं प्रणीतकी न्यांईं अंतरायरहित होवैहै यातैं अन्वाहार्य- पचन नामक अभनि मन है॥ आस्य (सुख) आहवनीय अभ्निकी न्यांई आहवनीय है। इस- विषै अन्न होम करियेहै यातैं ॥ २ ॥ इति श्री० भाष्यभाषा०पंचमप्रपाठकस्याष्टादशःखंडः।।१८।। अथ श्री०भाष्यभाषा०पंचमप्रपाठकस्यैकोनविंशः खंड: विद्वान्के अग्निहोत्रकी सिद्धिअर्थ "प्राणाय स्वाहा यह प्रथमाहुति" २ टीका :- तहां ऐसैं हुये जो भक्त (रंधित ३९६ औ आहवनीय अग्निका सादृश्य मुखकूं दिखावै हैं। इति श्री०पंचमप्रपाठकगताष्टादशखंडस्य टिप्पणम् ॥१८॥

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पनिषत् ] एकोनविंश खंड १९ ९९९ ज्ञाताग्निहोत्रसिद्धर्थ "प्राणाय स्वाहा" यह १ आहुति २ स या प्रथमामाहुतिं जुहुयात्तां जुहुया- त्प्राणाय स्वाहेति प्राणस्तृप्यति॥१॥

प्रथम होवै सो होम करनेकूं योग्य है। सो जिस प्रथम आहुतिकूं होम करै ताकूं "प्राणाय स्वाहा" ऐसैं होम करै। प्राण तृप्त होता है।।१।

अन्न) भोजनकालविषै भोजनकेअर्थ प्रथम आवै सो होम करनेकूं योग्य है। अँमिहो- त्रकी संपत्मात्रकूं विवक्षित होनेतैं इहां (वैश्वा- नरके वेत्ताके भोजनविषै) अभनिहोत्रके अंगन-

अथ श्री०पंचमप्रपा०एकोनविंशखंडस्य टि० १९ ३९७ इहां ऐसैं हुये। याका उक्तन्यायकरि अग्निहोत्रके संपादित (सिद्ध) हुये। यह अर्थ है। संपादनकिये अग्निहोत्र भावके सामान्यतैं अग्निके उद्धारआदिक ताके अंग अन्य ठि- काने (प्रसिद्ध अग्निहोत्रविषै) होवैहैं? यह आशंकाकरिके तिन अंगोंकी बुद्धिमात्रकूं इहां कहनेकूं इच्छित होनेतैं ऐसें मतिकहो। इसरीतिसैं कहैहैं।। इधर "इहां ऐसैं वैश्वानरके वेत्ताका भोजन कहिये है॥

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१००० पंचमप्रपाठक ५ [छान्दोग्यो- प्राणज्येष्ठतादि पंचान्निविद्या श्गति वैश्वानरोपास्ति ज्ञातामिहोत्र २४ प्राणे तृप्यति चक्षुस्तृप्यति चक्षुषि अर्थ :- प्राणके तत्त हुये चक्षु तृप्त हो-

की इतिकर्त्तव्यता (न्यूनता) की प्राप्ति नहीं है॥ सो भोक्ता जिस प्रथम आहुतिकूं होम करै। ताकूं कैसैं होम करै? तहां कहैहै :- "प्रीणाय स्वाहा" इस मंत्रकरि आंहुति श- ब्दतैं अवदान (एक आहुतिके पूर्णहोनेयोग्य द्रव्य) प्रमाण अन्नकूं मुखमैं डालै। यह अर्थ है। तिसैकरि प्राण तृप्त होवैहै॥ १॥ टीका :- प्राणके तृप्त हुये चक्षु तृप्त हो- वैहै। चक्षु आदित्य औ स्वर्गलोक। इत्या- ३९८ प्रकृत होमगत बीचके विभागकूं कहैहैं॥ ३९९ इहां "कैसै" इस रीतिसें मंत्र वा हुतद्रव्यका प- रिमाण वा फल पूंछियेहै। तिनमैं प्रथम (मंत्र)के प्रति कहैहैं॥ ४०० जब द्वितीय पक्षहै तब तहां कहैहैं॥ इहां अवदा- नका प्रमाण कहिये परिमाण याका कर्मीनकूं प्रसिद्ध जो आ- हुतिका प्रमाण है तिसकरि परिमित । यह अर्थ है॥ ४०१ जब तृतीय विकल्प होवै तब तहां कहैहैं ॥

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पनिषत्] एकोनविंश खंड १९ १००१ ज्ञातान्निहोत्रसिद्धर्थ "प्राणाय स्वाहा" यह १ आहुति २ तृप्यत्यादित्यस्तृप्यत्यादित्ये तृप्यति द्यौस्तृप्यति दिवि तृप्यत्यां यत्किश्च दयौरादित्यश्चाधितिष्ठतस्तत्ृप्यति त- स्यानुतृप्तिं तृप्यति प्रजया पशुभिर- न्नाद्येन तेजसा ब्रह्मवर्चसेनेति॥२॥ इति पंचमप्रपाठकस्यैकोनविंशः खण्डः ॥ १९॥ ता है। चक्षुके तृप्त होते आदित्य तृप्त होता है। आदित्यके तप्त होते स्वर्गलोक तृप्त होता है। स्वर्गलोकके तृप्त होते जिस किसीकेतांई स्वर्गलोक अरु आदित्य दो अधिष्ठित होवैहैं सो तृप्त होता है। ताकी तृप्तिके अनंतर प्रजाकरि पशुनकरि अन्न- आदिककरि तेजकरि ब्रह्मवर्चसकरि [भो- क्ता] तप्त होता है ऐसैं ॥ २ ॥ इति श्री०मूलभा०पंचमप्र०एकोनविंशः खंड:१९ दिकके तप्त हुये जिस किसीकेतांई स्वर्गलोक अरु आदित्य स्वामिभावकरि अधिष्ठित होवैहैं

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१००२ पंचमप्रपाठक ५ [छान्दोग्यो- प्राणज्येष्ठतादि पंचाग्निविद्या शगति वैश्वानरोपास्ति ज्ञाताग्निहोत्र २४ सो वी तृप्त होवैहै। ताकी तृप्तिके पीछे आप भोजन करनेवाला तृप्त होवैहै। यह प्रत्यक्ष है।। किंवा :- प्रजाआदिकनकरि [ भोक्ता तृप्त होवैहै] ॥l इहां तेज जो है सो शरीरविषै स्थित दीप्ति (उज्वलता) है वा प्रगल्भपना (अन्योकूं दबावनेवालेपना)है औ ब्रह्मवर्चस जो है सो वृत्त अरु स्वाध्याय (आचार अरु वेदाध्ययन) रूप निमित्तवाला तेज है॥ २ ॥ इति श्री०पंचमप्रपाठकस्यैकोनविंशः खंडः ॥ १९॥

४०२ भोजन करनेवालेकी तृप्तिविषै प्रत्यक्ष प्रमाण है औ प्राण आदिककी तृप्तिविषै शास्त्र प्रमाण है। इस विभागकूं अभिप्रायका विषय करिके कहैहैं॥ इहां प्रजाआदिकनकरि भोक्ता तृप्त होवैहै। ऐसैं संबंध है"

त्रयोविंश-खण्डनां टिप्पणम् ॥१९॥२०॥२१॥२२॥२३॥

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पनिषत् ] विंश खंड २० १००३ "व्यानाय स्वाहा" इस द्वितीयाहुतिका कथन २ अथ पंचमप्रपाठकस्य विंशः खण्डः२० अथ यां द्वितीयां जुहुयात्तां जुहुया- दयानाय स्वाहेति व्यानस्तृप्यति॥१॥। व्याने तृप्यति श्रोतं तृप्यति श्रोने तृप्यति चन्द्रमास्तृप्यति चन्द्रमसि तृ- प्यति दिशस्तृप्यन्ति दिक्षु तृप्यतीषु अथ श्री०मूलभाषा ० पंचमप्रपाठकस्य विंशः खंड: २० अर्थः-अनंतर जिस द्वितीय [आहुति] कूं होम करै ताकूं "व्यानाय स्वाहा" ऐसैं होम करै। व्यान तृप्त होताहै॥ १॥ अर्थः-व्यानके तृप्त हुये श्रोत्र तृप्त हो- ताहै। श्रोत्रके तृप्त हुये चंद्रमा तृप्त होताहै। चंद्रमाके तप्त हुये दिशा तृप्त होतियां हैं। दिशाओंके तप्त हुये जिस किसीकेतांई दि- अथ श्री० भाष्यभाषा०पंचमप्रपाठकस्यविंशः खंड: २० "व्यानाय स्वाहा" इस द्वितीयाहुतिका कथन २ टीका :- अनंतर जिस द्वितीयाकूं तती-

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१००४ पंचमप्रपाठक ५ [छान्दोग्यो- प्राणज्येष्ठतादि पंचाग्निविद्या ३ गति वैश्वानरोपास्ति ज्ञातान्निहोत्र २४ यत्किश्च दिशश्र चन्द्रमाश्चाधितिष्ठन्ति तत्तृप्यति तस्यानुतृप्तिं तृप्यति प्रजया पशचुभिरन्नाद्येन तेजसा ब्रह्मवर्चसेनेतिर इति पंचमप्रपाठकस्य विंशः खण्डः ॥ २० ॥ अथ पंचमप्रपाठकस्यैकविंशः खंड: २१ अथ यां तृतीयां जहुयात्तां जुहुया- दपानाय स्वाहेत्यपानस्तृप्यति॥१॥ शा अरु चंद्रमा अधिष्ठित होवैहैं सो तृप्त होताहै। ताकी तृप्तिके पीछे प्रजाकरि पशु- नकरि अन्नआदिककरि तेजकरि ब्रह्मवर्च- सकरि [भोक्ता] तप्त होवैहै ऐसैं ॥ २ ॥ इति श्री०मूलभाषा• पंचमप्रपा०विंशः खंड: २० अथ श्री०मूलभाषा•पंचमप्रपाठकस्यैकविंशः खंड:२१ अर्थ :- अनंतर जिस तृतीय [आहुति] कूं होमकरै ताकूं "अपानाय स्वाहा" ऐसैं याकूं चतुर्थीकूं पंचमीकूं। यह समानहै १॥२ इति श्री०भाष्यभाषा०पंचमप्रपाठकस्य विंशः खंडः ।।२०।। अथ श्रीभाष्यभाषापंचमप्रपा०एकविंशः खंडः ॥२१॥ "अपानाय स्वाहा" इस तृतीयाहुतिका कथन २

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पनिषत् ] एकविंश खंड २१ १००५ "समानाय स्वाहा" इस चतुर्थाहुतिका कथन २ अपाने तृप्यति वाक्तृप्यति वाचि तृप्यत्यामग्निस्तृप्यत्यग्नौ तृप्यति ए थिवी तृप्यति प्टथिव्यां तृप्यत्यां य- त्किञ्च प्टथिवी चाग्निश्चाधितिष्ठतस्तत्तृ- प्यति तस्यानुतृप्तिं तृप्यति प्रजया पशु- भिरन्नाद्येन तेजसा ब्रह्मवर्चसेनेति॥२॥ इति पंचमप्रपाठकस्यैकविंशः खण्डः ॥ २१॥ होमकरै। अपान तृप्त होताहै॥ १॥ अर्थ :- अपानके तृप्तहुये वाक् तृप्त हो- तीहै। वाक्के तप्तहुये अभ्नि तृप्त होताहै। अग्निके तृप्तहुये पृथिवी तृप्त होतीहै। प. थिवीके तृप्तहुये जिस किसीकेतांई पथिवी अरु अग्नि अधिष्ठित होवैहैं सो तप्त हो- वैहै। ताकी तृप्तिके पीछे प्रजाकार पशुन- करि अन्नआदिककरि तेजकरि ब्रह्मवर्चस- करि [भोक्ता]तृप्त होताहै ऐसैं ॥ २ ॥ इति श्री०मूलभा०पंचमप्रपा०एकविंश:खंड:२१

इति श्री०भाष्यभाषापंचमप्रपाठकस्यैकविशः खंडः।।२१।।

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१००६ पंचमग्रपाठक ५ [छान्दोग्यो- प्राणज्येष्ठतादि पंचान्निविद्या ३ गति वैश्वानरोपारिति ज्ञाताग्निहोत्र २४ अथपंचमप्रपाठकस्य हाविंश: खंड:२२ अथ यां चतुर्थी जुहुयात्तां जुहुयात् समानाय स्वाहेति समानस्तृप्यति॥।१। समाने तृप्यति मनस्तृप्यति मनसि तृप्यति पर्जन्यस्तृप्यति पर्जन्ये तृप्य- ति विद्युत्तृप्यति विद्युति तृप्यत्यां य- अथ श्री०मूलभाषा• पंचमप्रपाठकस्य द्ाविंशः खंड:२२ अर्थ :- अनंतर जिस चतुर्थी [आहुति] कूं होमकरै ताकूं "समानाय स्वाहा" ऐसैं होमकरै। समान तृप्त होताहै ॥१॥ अर्थ :- समानके तृप्त हुये मन तृप्त हो- ताहै। मनके तृप्त हुये पर्जन्य (वृष्टिकी सा- मग्रीका अभिमानी देव) तृप्त होताहै। पर्जन्यके तृप्तहुये विद्युत् तृप्त होतीहै। वि- द्युत्के तृप्त हुये जिस किसीकेतांई विद्युत् अथ श्री० भाष्यभाषा०पंचमप्रपाठ· द्ाविंशःखंड:।।२२।। "समानाय स्वाहा" इस चतुर्थाहुतिका कथन २

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पनिषत्] त्रयोविंश खंड २३ १००७ "उदानाय स्वाहा" इस पंचमाहुतिका कथन २ त्किञ्च विद्युच्च पर्जन्यश्चाधितिष्ठतस्ततृ- प्यति तस्यानुतृप्तिं तृप्यति प्रजया प- शुभिरन्नाद्येन तेजसा ब्रह्मवर्चसेनेति॥२॥ इति पंचमप्रपाठकस्य द्वाविंश: खंडः ॥ २२ ॥ अथ पंचमप्रपाठ०त्रयोविंशः खंड: २३ अथ यां पञ्चमीं जुहुयात्तां जुहुयादु- अरु पर्जन्य अधिष्ठित होवैहैं सो तप्त हो- ताहै। ताकी तृप्तिके पीछे प्रजाकरि पशुन- करि अन्नआदिककरि तेजकरि ब्रह्मवर्चस- करि [भोक्ता] तृप्त होताहै ऐसैं ॥ २ ॥ इति श्री०मूलभा०पंचमप्रपाठ०द्वाविंशःखंड:२२

अर्थः-अनंतर जिस पंचमी [आहुति] कूं होमकरै ताकूं "उदानाय स्वाहा" ऐसैं

इति श्री० भाष्यभाषा०पंचमप्रपाठ०द्वाविंशः खंडः।२२।। अथ श्री० पंचमप्रपा० त्रयोविंशः खंडः ॥ २३ ॥। "उदानाय स्वाहा" इस पंचमाहुतिका कथन २

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१००८ पंचमप्रपाठक ५ [ छान्दोग्यो- प्राणज्येष्ठतादि पंचान्निविद्या श्गति वैश्वानरोपास्ति ज्ञातासिहोत्र २४ दानाय स्वाहेत्युदानस्तृप्यति॥१॥ उदाने तृप्यति वायुस्तृप्यति वायौ तृप्यत्याकाशस्तृप्यत्याकाशे तृप्यति यत्किञ्च वायुश्राकाशश्राधितिष्ठतस्ततृ- प्यति तस्यानुतृप्तिं तृप्यति प्रजया प- शुभिरन्नाद्येन तेजसाब्रह्मवर्चसेनेति॥२।। इति पंचमप्रपाठकस्य त्रयोविंशः खण्डः ॥२३।। होमकरै। उदान तृप्त होताहै॥ १॥ अर्थ :- उदानके तृप्त हुये त्वक तृप्त हो- तीहै। त्वकके तृप्त हुये वायु तृप्त होताहै। वायुके तप्त हुये आकाश तप्त होताहै। आ- काशके तृप्त हुये जिस किसीकेतांई आका- श अरु वायु अधिष्ठित होवैहैं सो तृप्त हो- ताहै। ताकी तृप्तिके पीछे प्रजाकरि पशु- नकरि अन्नआदिककरि तेजकरि ब्रह्मवर्च- सकरि [भोक्ता] तृप्त होताहै ऐसैं ॥ २ ॥ इति श्री०मूलभा०पंचमप्र०त्रयोविंशः खंड: २३

इति श्री०भाष्यभाषापंचमप्रपाठकस्य त्रयोविंशःखंड:२३

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पनिषत्] चतुर्विश खंड २४ १००९ ऐसैं ज्ञाताकूं इस अग्निहोत्रका फल ९ अथ श्रीछान्दोग्योपनिषद: पंचमप्रपा- ठकस्य चतुर्विशः खंड: प्रारभ्यते॥२४॥ स य इदमविद्दानग्निहोतं जुहोति य-

अथ श्रीछांदोग्योपनिषदो मूलमात्रभाषादीपिकायाः पं- चमप्रपाठकस्य चतुर्विशः खंडः प्रारभ्यते ॥ २४ ॥ अर्थः-सो जो अविद्वान् हुया इस अ- ग्निहोत्रकूं हवन करताहै। जैसैं अंगारनकूं

अथ श्रीछांदोग्योपनिषद् भाष्यभाषादीपिकायाः पंचम प्रपाठकस्य चतुर्विशः खंडः प्रारभ्यते ॥ २४॥ ऐसैं ज्ञाताकूं इस अग्निहोत्रका फल ५ टीका :- सो जो कोइकबी इस यथोक्त वै- श्वानरके दर्शनकूं अविद्वान् हुया प्रसिद्ध अं- ग्निहोत्रकूं होमताहै। जैसैं आहुतिके योग्य अंगारनकूं दूरी करिके आहुतिके स्थानविषै

अथश्री०पंचमप्र०गतचतुर्चिशखंडस् टिप्पणम् २४ ४०३ प्रसिद्ध अग्निहोत्रकी निंदारूप द्वारकरि वैश्वानरके वेत्ताके यथोक्त अग्निहोत्रकूं अवश्य कर्त्तव्यताकेअर्थ स्तुत करैहैं॥ ८५

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१०१० पंचमप्रपाठक ५ [छान्दोग्यो- प्राणज्येष्ठतादि पंचान्निविद्या श्गति वैश्वानरोपास्त्ि ज्ञातासिहोत्र २४ थाऽङ्गारानपोह्य भस्मनि जुहुयात्ताटकू तत्स्यात्॥१॥ अथ य एतदेवं विद्वानग्निहोत्रं जहो- दूरीकरिके भस्मविषै हवनकूं करै तैसा [ताका]सो (हवन) होवैहै॥ १ ॥ अर्थ :- अनंतर जो इसकूं ऐसैं जानता- हुया अग्निहोत्रकूं हवनकरताहै। ताका सर्व

भस्ममैं होमकूं करै ताके तुल्य वैश्वानरके वेत्ताके अभनिहोत्रकूं अपेक्षा करिके ताका सो अभनिहोत्रका हवन होवैहै॥ इस रीतिसैं प्रसिद्ध अभनिहोत्रकी निंदाकरि वैश्वानरके वेत्ताका अभनि- होत्र स्तुत करियेहै॥ १॥ टीका :- यातैंबी यह श्रेष्ठ अभिहोत्र है॥। ॥ कैसैंकि ? अनंतर जो इसकूं ऐसैं जानता-

४०४ प्राणाग्निहोत्रकी श्रेष्ठताविषै यातैं शब्दकरि ग्रहण किये अन्यहेतुकूं प्रश्नपूर्वक प्रकट करैहैं।। इहां नियमसंबंधी अग्निहोत्रकी निंदाद्वारा प्राणाम्निहोत्रकी स्तुतिके अनंतर प्र-

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पनिषत् ] चतुर्विश खंड २४ १०११ ऐसें ज्ञाताकूं इस अग्निहोत्रका फल ९ ति तस्य सर्व्वेषु लोकेषु सर्व्वेषु भूतेषु सर्व्वेष्वात्मसु हुतं भवति ॥ २ ॥

लोकनविषै। सर्वभूतनविषै। सर्व (देहेंद्रि- यादि) आत्माओंविषै हुत (हवन किया) होवैहै ॥ २ ॥

हुया अग्निहोत्रकूं होमताहै। तिस यथोक्त वैश्वानरके विज्ञानवालेका सर्व लोकनविषै। इत्यादि वाक्य पूर्व उक्त अर्थवाला है। काहेतैं हुँते होवैहै अरु अन्नकूं भक्षण करताहै। इन दोनूं शब्दनकूं एक अर्थवाले होनेतैं ॥ २ ॥

कारांतकरि ताहीकी निर्दोषता कीर्तन करियेहै। यह अथ शब्दका अर्थ है औ "यह" ऐसैं वैश्वानरका उपासन कहा औ "ऐसै" याका वैश्वानरके उक्त सर्वात्मभाव आदिक प्रकारकरि। यह अर्थ है औ अग्निहोत्रकूं। ऐसें संपादित अ- सिहोत्र ग्रहण करियेहै। ४०५ ननु "सर्व लोकनविषै अन्नकूं खाताहै" यह वाक्य उक्त अर्थवाला है। इसप्रकारसैं कैसैं व्याख्यान किया। का- हेतैं ताका सर्व लोक आदिकनविषै हुत होवैहै। ऐसा यह वाक्य अन्य प्रकारका है? तहां कहैहैं।

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१०१२ पंचमप्रपाठक ५ [छान्दोग्यो- प्राणज्येष्ठतादि पंचान्निविद्या शगति वैश्वानरोपास्ति ज्ञाताननिहोत्र २४ तद्यथेषीकातूलमग्नौ प्रोतं प्रदूयेतैवः हास्य सर्व्वे पाप्मानः प्रदूयन्ते य एत- देवं विद्वानग्निहोत्रं जुहोति॥ ३॥

अर्थ :- तहां जैसैं इषीकाका तूल (क- पास) अग्निविषै डाल्या हुया दग्ध होवै। ऐसैंहीं इसके सर्वपाप (पुण्यापुण्य) दग्ध होते हैं। जो इसकूं ऐसैं जानता हुया अग्नि- होत्रकूं हवनकरताहै॥ ३ ॥

टीका :- किवी :- सो जैसैं इषीका (तृण- विशेष )का तूल (कार्पासयुक्त अग्र) असनि- विषै डाल्या हुया शीघ्रहीं दग्धहोवै। ऐसैं हीं इस सर्वात्मभूत अरु सर्व अन्नोंकेभोक्ता विद्वान्के सर्व (अवशेषरहित) अनेक जन्मों-

४०६ इसतैं वी वैश्वानरविद्यावालेका अग्निहोत्र श्रेष्ठ है। ऐसें कहनेकूं वैश्वानरविद्याकूं स्तुत करैहैं॥ इहां "तहां" याका वैश्वानरविद्याके माहात्म्यविषै दष्टांत है। यह अर्थ है औ इषीकाका। याका मुंजके मध्यवर्ति तृणका। यह अर्थ है।।

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पनिषत् ] चतुर्विश खंड २४ १०१३ ऐसैं ज्ञाताकूं इस अग्निहोत्रका फल ९ तस्मादु हैवंविद्यदयपि चण्डालायो-

अर्थ :- तातैंहीं ऐसैं जाननेवाला यद्यपि

विषै संचित औ इहां (वर्त्तमान शरीरविषै) ज्ञानकी उत्पत्तितैं पूर्व होनेवाले अरु ज्ञानके सहभावि ऐसे धर्म अधर्म नामवाले पाप दुग्ध होतेहैं वर्त्तमानशरीरके आरंभक (प्रारब्धक- र्मरूप) पापसैं वर्जित॥ लक्ष्य (वेधनकरने योग्य निशान)के प्रति छूटे बाणकीन्यांई प्रवृत्त फलवाला होनेतैं ता (प्रारब्धकर्म)का दाह (नाश) नहीं होवैहै। जो इसकूं ऐसैं जान- ता हुया अग्निहोत्रकूं होम करताहै (भो- जन करताहै) ॥ ३ ॥ टीका :- सो (विद्वान्)यद्यपि उच्छिष्ट (जू-

४०७ सर्व शब्दतैं प्रारब्ध कर्मकेबी दाहकूं आशंका क- रिके कहैहैं।। ४०८ वैश्वानरविद्याके महाफलवान्ताके सिद्धहुये इस विद्यावालेका अग्निहोत्र श्रेष्ट है। ऐसैं ताके कर्त्ताकी सर्व

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१०१४ पंचमप्रपाठक ५ [छान्दोग्यो- प्राणज्येष्ठतादि पंचाननिविद्या श्गति वैश्वानरोपास्ति ज्ञातान्निहोत्र २४ च्छिष्टं प्रयच्छेदात्मनि हैवास्य तद्दैश्वा- नरे हुत स्यादिति तदेष श्रोकः॥४॥

चंडालकेअर्थ उच्छिष्टकूं देवै। इसका सो आत्मारूपहीं वैश्वानरविषै हुत होवैहै इति॥ तहां यह श्लोक है ।। ४ ।।

ठे अन्न)के अयोग्य चंडालकेअर्थ उच्छिष्टकूं देवै कहिये निषिद्ध उच्छिष्टके दानकूं यद्यपि करै। तथापि आत्मारूपहीं चंडालके देहमैं स्थित वैश्वानरविषै इसका सो हुत (होम- किया) होवैहै। अधर्मका निमित्त नहीं। ऐसैं विद्याकूं हीं स्तुतकरैहै॥ तिस इस स्तुतिरूप अर्थविषै श्रलोक (मंत्र) बी यह होवैहै॥४॥ दोषनकरि अस्पर्शिता है। इस आशयकरि कहैहैं।। इहां वि- द्याकूंहीं। याका विद्याकी स्तुतिद्वारा असनिहोत्रकूं। यह अर्थ है औ स्तुतिरूप अर्थविषै। याका अग्निहोन्नकी स्तुतिरूप जो अर्थ है तिसविषै। यह अर्थ है।।

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पनिषत्] चतुर्विश खंड २४ १०१५ ऐसैं ज्ञाताकूं इस अग्निहोत्रका फल १ यथेह क्षुधिता बाला मातरं पर्य्युपा- सत एवर सर्व्वाणि भूतान्यग्निहोत्रमुपा

अर्थ :- जैसैं क्षुधित बाल माताकूं उपा- सतेहैं। ऐसैं सर्वभूत अग्निहोत्रकूं (याके

टीका :- जैसैं इस लोकविषै क्षुधित क- हिये बुभुक्षित (भूंखे) बालक माताकूं "कब हमारेअर्थ माता अन्नदेवैगी" ऐसैं उपासतेहैं। ऐसैं अन्नके भोक्ता सर्वभूत ऐसैं जाननेवालेके अभनिहोत्र (भोजन)कूं "कब यह भोजनकूं करैगा" ऐसैं उपासतेहैं। अर्थ यह जो :- 'सैर्व जगत् विद्वान्के भोजनकरि तृप्त होवैहै॥ इहां

४०९ मंत्रके तात्पर्यरूप अर्थकूं दिखावै हैं। इहां यह अर्थ है :- वैश्वानररूप विद्वान्कूं सर्वात्मा होनेतैं। यह अर्थ है। इति श्रीछांदोग्योपनिषद् भाष्यभाषादीपिकायां पंचमप्र- पाठकगतचतुर्विशखंडस्य टिप्पणं समाप्तम् ॥ २४॥ समाप्तेयं पंचमप्रपाठकस्य टिप्पणिका ॥५॥

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१०१६ पंचमग्रपाठक ५ [छान्दोग्यो प्राणज्येष्ठतादि पंचान्निविद्या शगति वैश्वानरोपास्ति ज्ञाताननिहोत्र २४ सत इत्यग्निहोत्रमुपासत इति॥ ५॥ इति श्रीछान्दोग्योपनिषदि पञ्चमप्रपाठकस्य चतुर्विशः खंडः समाप्तः ॥ २४ ॥

भोजनकूं) उपासतेहैं इति। अभनिहोत्रकूं उपासतेहैं इति ॥ ५॥ इति श्रीछांदोग्योपनिषदो मूलमात्रभाषादीपि- कायां पंचमप्रपाठ०चतुर्विशःखंडः समाप्ः॥२४॥ दोवार उक्ति जो है सो अध्यायकी परिसमाप्ति- रूप अर्थवाली है।। ५॥ इति श्रीछांदोग्योपनिषद्भाष्यभाषादीपिकायां पंचम- प्रपाठकस्य चतुर्विशः खंड: समाप्रः ॥ २४॥ समाप्तेयं पंचमप्रपाठकस्य भाष्यभाषादीपिका ५

इतितानोपासनप्रतिपादनपरो भागः समाप्तिमगमत् ॥