Books / Chitramimamsa Appayya Dikshit Sudha Dharananda Sanskrit Hindi Bhashya Ed. Jagadisa Chandra Misra Chowkambha

1. Chitramimamsa Appayya Dikshit Sudha Dharananda Sanskrit Hindi Bhashya Ed. Jagadisa Chandra Misra Chowkambha

Page 1

Barcode : 99999990245053 Title - Citramimamsa of Appaya Diksita Author - Mishra, Jagdish Chandra Language - sanskrit Pages - 469 Publication Year - 0 Barcode EAN.UCC-13

9 999999 024505

Page 3

THE KASHI SANSKRIT SERIES 207

OF

APPAYA DĪKSITA

With the 'Sudha' Sanskrit Commentary

or

DHARĀNANDA

Edited unth the Erhaustive 'Bharati' Hindi Commentary

Bj

JAGADISA CHANDRA MIŚRA B A ( Hons ), M A ( Sanskrit-Hındi ), Dip In Ed Research Scholar, Salut yacharya

THE CHOWKHAMBA SANSKRIT SERIES OFFICE VARANASI-1

Page 4

(C, The Chowkhamba Sinsrit Serics Office Goml Mandir Lene P. O. ChoxFhamti, Post Rox S Varan-1 ( Indin )

First Edition

1971 Price Rs. 90.00

Also can te Int of THL CHOWKBAMDA VIDYABHAWAN

ChonL, Post Box 69, Varanist-I ( Indls ) Phone : 63976

Page 5

ज्योतिविदं व्याससमानकीर्ति श्रीकीत्तिनाथं विदुपा वरेण्यम्। यशोऽवशेपं 'पितरं' प्रणम्य श्रद्धानतोऽयं 'जगदीशचन्द्रः ॥ काव्यान्तस्तत्वसरसं भावकिज्जल्ककर्वुरम्। समर्पयति भाषाढ्य 'काव्यपुप्पा जलिं' मुदा ॥

Page 7

भूमिका

काव्य-स्वरूप-विमर्श

'चित्रमीमासा' मे यद्यपि काव्यसामान्य के लक्षण की आलोचना नही है, फिर भी प्रकृतोपकारक होने के नाते और अलद्वारो के भी उत्कर्षावायक होने के कारण इस संदर्भ मे इस पर विचार करना अप्रासंगिक प्रतीत नहीं होता। भारतीय विद्वानो के काव्यस्वरूप का अनुशीलन समृद्ध, प्रोढ, सूद्म और वैज्ञानिक है। इसके पीछे असंख्य मनीपियो की साधना छिपी है। विश्व के सर्वाधिक पुरातन ग्रन्थ वेद मे भी वेद को काव्य ही कहा गया है। निःसन्देह वहां यह 'काव्य' शब्द एक विशिष्ट अर्थ मे ही प्रयुक्त किया गया है-"पश्य देवस्य काव्यं न ममार न जीयंति।" यहाँ काव्य को अजर-अमर कहकर कला के तत्त्वो को एक स्थान में समाहित कर दिया गया है। 'काव्य' शब्द की इससे अधिक मौलिक एवं स्पष्ट व्यार्या मोर क्या हो सकती है। वेदो मे इतनी पुष्ट व्याख्या के साथ-साथ काव्य शब्द का प्रयोग असन्दिग्ध रूप से इस वात का ज्ञापक है कि वैदिक ऋषि काव्य के स्वरूप से पूणतः परिचित थे। इसके अ्तिरिक्त वैदिक ऋचाओ मे भी उत्कृष्ट कोटिका काव्यत्व प्राप्त होता है। फिर भी संस्कृत काव्यशास्त्र के अनुसार 'काव्य' अपने व्यापक अर्थ मे सजनात्मक साहित्य ( Creative Literature) का पर्याय है। किन्तु, आधुनिक युग मे वह मान् छन्दोबद्ध रचना का वाचक रह गया है। फिर भी, काव्य के स्वरूप-निर्धारण के लिए उसे पूर्वोक्त व्यापक अर्थ मे ग्रहण करना ही उचित होगा। मानव मन की रागात्मक चेतना को प्रभावित करने के कारण काव्य को अनादिकाल से ही महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त रहा है। क्योकि जगत मे जहं जीवन है, वहां किसी न किसी रूप में नैतिकता को प्रश्रय देने वाला काव्य भी है। जीवन की नैतिकता का यह सम्बन्ध किसी भी काव्य मे स्पष्ट रूप से परिलक्षित हो जाता है। फिर भी कोई काव्य अपने नैतिक आदर्श को महानता के कारण ही महत् नही हो जाता। जीवन की करियाएँ उसमे प्रधान हैं। जहां एक ओर जीवन की कमजोरिया रहती है, वहाँ दूसरी ओर शक्तिशालीनता भी। इसी अशक्ति और शक्ति के द्वन्द्व मे काव्य का विधान किया जाता है। काव्य के इसी स्वस्प को स्पष्ट करने के लिए मनीियो ने काव्य के विभिन्न वक्षण भी प्रस्तुत किये है। फिर भी कविता की स्थिति ऐसी सहज चिवान दिला के समान है, जिस पर परिभाषा जैसी ठोम वस्तु ठहर नही पाती। वस्तुत काव्य का न्वरप यद्यपि इन

Page 8

( = ) लक्षणो मे वँध नही पाता, किन्तु इनके परीक्षण से उसे विविध दृष्टिकोणो से परखने मे सहायता मिलती है। युग की सामाजिक चेतना का विशेष प्रभाव साहित्य शैली के विकास पर पडता है। अतः युग का वातावरण, सामाजिक रूढिया एवं तत्कालीन साहित्यिक मान्यताओ के परिप्रेक्ष्य मे काव्य की युगीन परिभाषाएँ परिलक्षित होती रही है। इस सन्दर्भ मे सर्वप्रथम उल्लेखनीय परिभाषा पांचवी-छठी शताब्दी मे आचार्य भामह की है-'शब्दार्थो सहिती काव्यम्' आचार्य भामह ने शब्द और अर्थ के सहभाव को काव्य माना है। किन्तु इससे परिभाषा मे अतिव्याप्ति का स्वरूप उभरता है। अपनी काव्यमीमासा मे राजशेखर ने 'सहित' शब्द की व्याख्या इस प्रकार की है-'शब्दार्थयो. यथावत् सहभावेन विद्या साहित्यविद्या।' अर्थात शब्द और अर्थ का सहभाव ही 'काव्य' है। इस परिभाषा मे 'यथावत्' शब्द के द्वारा काव्य के व्यावत्तंक धर्म को स्पष्ट किया गया है कि काव्य मे शब्द और अर्थ का ऐसा सहभाव रहता है जिसमे इन दोनो का महत्त्व समकक्ष हो। 'वक्रोक्तिजीवितकाव्यम्' का उदात्त उद्घोष कर कुन्तक ने भी यह सिद्ध कर दिया है कि कविप्रतिभा से प्रदीप्त, सहभाव से व्यवस्थित, वक्रोक्तिगभित फाव्य ही आास्वादक होता है। यद्यपि कुन्तक की इस परिभाषा मे भी शब्दार्थ को अधिक महत्त्व दिया गया है फिर भी उसे उसके रूप मे स्वतन्त्र नही छोड दिया गया है। प्रत्युद उसके लिये कहा गया है कि 'बन्ध मे व्यवस्थित' शब्दार्थ ही काव्य है। अर्थात् इनकी दृष्टि मे शब्द और अर्थ की अपेक्षा उक्ति-वैचित्र्य काव्य के लिए अधिक महत्त्वपूर्ण है। इसके बाद इस सन्दर्भ मे आचार्य वामन का नाम विशेषरूप से उल्लेखनीय है। इनका स्थितिकाल ७५० ई० से लेकर ८०० ई० तक के बीच माना जाता है। इन्होंने बड़े ही साहस के साथ अपने समय के प्रचलिन सिद्धान्त के विरुद्ध 'रीतिरात्मा काव्यस्य' की उदग्र उद्घोषणा की है। विशिष्ट पदरचना को ही इन्होंने 'रीति' कहा है। यहाँ पदरचना की विशेपता का तात्पर्य इनकी गुणमूलकता से है। अर्थात् ओज, माधुयं आदि गुण जिसकी प्रकृति हो ऐसी पदरचना को ही ये विशिष्ट पदरचना मानते हैं। तात्पयं यह है कि वामन प्रत्येक प्रकार के काव्य को ग्राह्य नही मानते। उनकी मान्यता के अनुसार गुण (Dction ) मौर अलद्वार (Embellishment) से सुशोभित शब्द और अर्थ ही वस्तुतः काव्य की पदवी प्राप्त करने योग्य है। यो इनसे पू्व शब्द और अर्थ को काव्य कहने की प्रथा प्रचलित थी। किन्तु, इनकी दृष्टि मे लोक मे व्यवहृत होने पर भी काव्यशास्त्र से स्वीकृति पाने योग्य नही समझकर ही अग्राह्य कहा-माना है। इसके वाद इस क्षेत्र मे महत्त्वपूर्ण प्रतिभा आचार्य रुद्रट की सामने माती है। इनका स्थितिकाल ८२५ से लेकर ८७५ के वीच मान्य है। यद्यपि डाक्टर व्यूलर ने अपनी कश्मीर रिपोट मे रुद्रट का समय ग्यारहवी शताब्दी का उत्तराद्ं माना है।

Page 9

( ६)

फिर भी यह मत सर्वमान्य नहीं है। इन्होने लक्ष्य और लक्षण निर्माण मे अपनी अम्वण्ड मौलिकता का परिचय दिया है। इनका काव्य-विवेचन पूर्वाचार्यों की अक्षा अधिक वैज्ञानिक है। इन्होने रस की महत्ता विदेपरप से स्वीकृन करते हुए लिया हे- 'तस्मात्तत्कतंव्यम् यत्नेन महीयसा रसभुंक्तम्'। नवी शताब्दी के उत्तराद्धं मे आनन्दवद्ंन के "ध्वन्यालोक' की रचना के कारण काव्यशास्त्र के इतिहास मे युगान्तर पैदा हो गया। अभिनवगुप्ताचार्य ने इम पर 'लोचन' नाम की टीका लिखकर ग्रन्थ के गौरव मे चार चाद लगा दिये। 'ध्वन्यालोफ' का रचनाकाल ६६० ई० से ८९० ई० के बीच स्थिर होता है। कुन्तक ने जिनकी चर्चा संदर्भ की दृष्टि से पहले एक बार की जा चुकी है तथा जिनका स्थितिकाल ९२४ ई० से १००० ई० तक कहा जाता है-ध्वनि या व्यङ्गय की स्वतत्र सत्ता को स्वीकार नही किया है। इन्होने ध्वनि को भी अपनी वकोक्ति की सर्वव्यापिनी सीमा मे बिठाने की चेष्टा की है। ध्वनि के परवर्ती माचार्यों मे आचार्य मम्मट भट्ट की काव्य-परिभाषा विनेषरूप मे उल्लेखनीय है :- "तददोषो शब्दार्थो सगुणावनलड्कृति. कवापि।" अर्थात् काव्य वह शब्दार्थ है जो दोपरहित मर गुणयुक्त हो तथा जिसमे कही-कही अलद्वारो की भी योजना हो। स्पष्ट है कि मम्मट ने काव्य मे गुणो को सवथा आवश्यक माना है। किन्तु अलद्धारो के विषय मे वे निरपेक्ष है। इनका काव्यस्वरूपनिरूपण अलद्धार शास्त्र की काव्यविषयक प्राचीन और नवीन धारणाओ का समन्वय है। कुछ आलोचको ने तो यहाँ तक कह दिया है-'Mammata's definition of poctry is a synthe- sIs of earher definition' तात्पय यह कि जहाँ मम्मट के पूर्ववर्ती आचाय काव्य- लक्षण का अन्त करते है, वही से मम्मट का काव्यलक्षण प्रारम्भ होता है। अस्तु, अब प्रश्न यह उठता है कि वे वस्तुतः काव्य मे दोपो के पूर्णं वहिष्कार के पक्षपाती थे? यदि उन्हे यह मत मान्य था तो इसका समर्थन नहीं किया जा सकता। विश्वनाथ ने इस पर टिप्पणी देते हुए यह मत व्यक्त किया है कि कोई भी कृति सवंथा दोपरहित ही हो, यह संभव नही। दोपाभाव को ही यदि काव्य का अनिवार्य लक्षग मान लिया जाय तो आज हम जिन रचनाओ को काव्य की परिधि मे रखते हैं, उनमे अनेक का गौरव क्षीण हो जायेगा। यदि उनका अभिप्राय यह था कि जिनरचना मे दोष रसाभिव्यक्ति मे वाधक है वहाँ वे त्याज है, और जहां उनकी विद्यमानता मे भी सहृदय रसग्रहण कर सके वहाँ वे अचिन्त्य है-तो उपयुक्त आक्षेप व्य्थ होते है। मम्मट की अदोपता काव्यालोचन की प्राचीनतम मान्यताओ मे मे एक है। आनार्य मम्मट के लक्षण मे प्रयुक्त 'दोष' शन्द माय गुण का विपयंय नहीं है प्रत्युत कविविवक्षिन अर्थ का अपकर्ष होने से भावरूप पदार्य है। इसी दृष्टि मे उन्होंने सर्वप्रथम काव्य मे 'अदोपता' का निरूपण किया है।

Page 10

(१० )

महापात्र विश्वनाथ ने इनके लक्षण मे प्रयुक्त 'सगुणी' शब्द पर भी आपत्ति प्रकट की है। उनका कथन है कि जव मम्मट ने 'ये रसस्याङ्िनो धर्म.' कहकर उन्हे रस का धर्म माना है तो फिर वे शब्दार्थ के विशेषण कैसे हो सकते है? मम्मट ने यदि इसका प्रयोग 'गुणाभिव्यन्जकौ' के अर्थ मे किया है तो फिर लक्षण मे इसका उल्लेख ही' निरर्थक है। क्योकि रस के अभाव मे गुणो मे साथकता रहती ही नही है। वस्तुतः मम्मट ने 'रसवत्ता' या 'सरसता' को शब्दार्थ साहित्य की विशेषता न बताकर सगुणता को जो उसका वैशिष्ट्य वताया है-वह इसी दृष्टि से कि रसादि रूप उत्तम काव्य के अतिरिक्त मध्यम और अवम काव्य भी इससे लक्षित हो सके। अतः इनके अनुसार शब्द और अर्थ की 'सगुणता' की विशेषता शब्द और अर्थ की रसाभिव्यन्जकता है। क्योकि अन्नतोगत्वा गुण अभिव्यङ्गय रस के ध्मरूप से सहुदय-हृदय मे अभिव्यङ्गय हुआ करता है।

मम्मट के 'अनलड्कृतिःक्वापि' की अलङ्कारवादी आचार्य जयदेव ने आलोचना करते हुए कहा है-यदि कोई काव्य को अलद्वारविहीन मानता है तो फिर वह आग को उष्णताविहीन क्यो नही मान लेता। जयदेव अलङ्कारो को काव्य का नित्य धर्म मानते हैं और विश्वनाथ उन्हे रसास्वादन मे सहायक धम मानते है। वस्तुतः यदि मम्मट अलकारो को वैकल्पिक मानते है तो उन्हे लक्षण मे स्थान नही देना चाहिए था। क्योकि लक्षण मे केवल भावात्मक विशेषताओ का उल्लेख ही अपेक्षित होता है। पण्डितराज जगन्नाथ ने इनके 'शब्दार्थों' पर भी आपत्ति की है। उनके अनुसार काव्य शब्दरूप होता है, अर्थरूप नही। इस प्रकार मम्मट की परिभाषा अनेक आक्षेपो के कारण आदर्श परिभाषा नही वन सकी। इनका समय ग्यारहवी शती का उत्तरार्द्ध माना गया है।

इनके परवर्ती आधार्यों मे महापात्र विश्वनाथ का नाम विशेषरूप से समादरणीय है। ये उत्कल के राजा के सान्धि-विग्रहिक थे। इनका समय १४ वी शती का मध्य भाग अर्थात् १३०० ई० से १४५० ई० तक माना जाता है। आनन्दवर्द्धन, मम्मट और जगन्नाथ के ही समान विश्वनाथ का भी स्थान काव्यशास्त्र के इतिहास मे महत्त्व- पूर्ण है। इन्होने अपने प्रसिद्ध ग्रन्थ साहित्यदर्पण मे रस को अधिक महत्त्व प्रदान करते हुए लिखा है-'वाक्यम् रसात्मक काव्यम्'। रससम्प्रदाय मे रस को पारि- भाषिक जर्य में गहण किया गया है। तात्पर्य यह कि विभाव और अनुभाव से परपक्व स्थावीभाव ही रस है। इस परिभाषा मे ध्वनि एवं अलंकारादि उपेक्षित ही रह जाते हैं। ऐमी स्थिति मे यह प्रश्न स्वाभाविक हो जाता है कि क्या काव्य मे रसपरिपाक अनिवार्य है ? बगर हा, तोयहस्थिति काव्य मे सव्र दुलंभ ही नहीं, असभव है। क्योकि अनेक स्थानो मे भाव उद्ीप्न होकर ही रह जाते हैं और ये उदीप्त भाव वाली रचनाएं

Page 11

(११ )

तो किसी भी दशा मे इस परिभाषा की कोटि मे आ नहीं सकती। अतः यह लक्षण भी सवमान्य घोषित नही हो सकता। हा, अगर विश्वनाथ महापात्र रस की अपेक्षा 'अनुभूति सौन्दर्य' पर चल दिये होे तो उनकी परिभाषा अन्य आचार्यों की परिभाषा की अपेक्षा अधिक ठोस, अधिक समर्थ और अधिक सराहनीय हो पाती।

संस्कृत साहित्याकाश के प्रभापुन्ज नक्षतमण्डलो के बीच अत्यन्त महत्त्वपूर्ण किन्तु अन्तिम प्रतिभा के रूप मे पण्डितराज जगन्नाथ का प्रादुर्भाव १६२० ई० से १६६० ई० तक हुआ। सुदूर प्रान्तवासी इस तैलङ्ग व्राह्मण ने अपनी प्रखर प्रतिभा के बल पर शाहजहाँ के वैभवशाली मुगल दरवार मे संस्कृत साहित्य के रस को प्रवाहित कर सम्राटू को चकित कर दिया था। विपरीत परिस्थितियों मे भी संस्कृत भाषा के माधुर्य की ध्वजा को फहराने वाले पण्डितराज अपनी तुलना मे अकेले है। 'रसगङ्गाधर' इनका प्रामाणिक ग्रन्थ है। इस ग्रन्थ मे इन्होने काव्यस्वरूप का निर्धारण इन शब्दों मे किया है ·- "रमणीयार्थः प्रतिपादक. शब्द काव्यम्" अर्थात् रमणीय नर्थ का प्रतिपादन करनेवाला शब्द काव्य है। इस लक्षण मे रस के स्थान पर 'रमणीय' शब्द का प्रयोग है, जो अधिक ग्राह्य है। क्योकि रमणीय रूप मे अभिव्यक्त होने पर भाव, ध्वनि और अलद्धार आदि भी काव्य की परिधि मे आ सकते हैं। पण्डितराज ने शब्दार्थ की जगह केवल शब्द का प्रयोग किया है, जिससे स्पष्ट हो जाता है कि उनके अनुसार काव्य मूलत. उक्तिरूप है, अथं तो शब्द का विशेषण है। History of Sanskrit Poetics मे श्री सुक्षील कुमार डे ने पण्डितराज की प्रतिभा की प्रशस्ति मे लिखा है- 'Jagannatha's style. is erudite and frightens the students by its involute language, its subtle reasoning and its unsparing Criticism of earlier writers ......... He shows himself conversant with the poetic theories of endeavours to harmonise with the new currents of Thought. Alongwith some other important writers of the new school, Jagannath marks a reaction in this respect, and the school of Mammata and Ruyyaka does not receive from him unqualified homage'. तात्पर्य यह कि अपनी पाण्डित्यपूर्ण बैली, जटिल भाषा और सूक्ष्म विवेचन के द्वारा प्राचीन लेखको की निमम आलोचना के कारण छाथो के लिए ये भय प्र द है। प्राचीन और नवीन मे सामन्जस्य स्थापित करते हुए प्राचीनो के विद्धान्तो मे अपनी निषुणता दिखाते है। मम्मद और य्यक के सम्प्रदाय ने इनमे विशिष्टता प्राप्त की है।

काव्य के सम्बन्ध मे इनका रपष्ट मत है कि सामान्य शब्द काव्यपद का वाचक नहीं हो सकना, उनके लिए निश्चिन रूप से रमणीयार्थप्रतिपादक होना शब्द के लिए लावस्यक है। वाङ्मय के अन्य भेदो की सापेक्षता मे इसका व्यावत्तक धर्म भी स्पष्ट

Page 12

( १२ )

हो जाता है। शास्त्रादि मे शब्द को प्रधानता नही दी जाती और अर्थ मे भी भावना की अपेक्षा मुख्यत ज्ञान का समावेश रहता है। इस प्रकार पण्डितराज की परिभाषा काव्य के स्वरूप को स्पष्ट करने मे पूर्णतया समर्थ है। समन्वितरूप मे हम कह सकते है कि सस्कृतसाहित्य के दृष्टिकोण के अनुसार काव्य सरस, रमणीय अर्थ के भावन मे सक्षम, कलासम्पन्न और दोषवहीन होना चाहिए। किन्तु दुर्भाग्य से संस्कृत भाषा मे काव्यविवेचन की यह परम्परा पण्डितराज के वाद चल नही सकी। अवतक हिन्दी और संस्कृत के विभेद की खाई काफी चौडी पड गयी थी। हिन्दी के आचार्यों पर भी साम्प्रदायिकता ने अपना रंग जमाना शुरू कर दिया। अत दृष्टिगत संकोच और भापागत सहानुभूति के अभाव मे इसके बाद सस्कृत मे किसी प्रभावशाली ग्रन्थ की रचना नही हो सकी। दूसरे युग की बढती हुई बौद्धिकता और दासता ने संस्कृत भाषा के क्षितिज को सकुचित कर दिया और जनता ऐसे विवेचन की अपेक्षा हिन्दी मे करने लगी। इस तरह संस्कृत साहित्य की यह शानदार विवेचन-परम्परा हिन्दी के आचार्यों के लिए स्थान रिक्त कर स्वयं लोकजीवन के रगमंच से तिरोहित हो गयी।

हिन्दी के विभिन्न आचार्यों ने इस परम्परा मे काव्य के स्वरूप का पर्याप्त विवेचन किया है, जिनमे आचार्य रामचन्द्रशुक्ल का नाम सर्वोपरि है। उन्होने व्यवस्थित रूप से इसपर प्रकाश डाला है-'जिस प्रकार आत्मा की मुक्तावस्था ज्ञानदशा कहलाती है, उसी प्रकार हृदय की यह मुक्तावस्था रसदशा कहलाती है। हृदय की मुक्ति की इसी साधना के लिए मनुष्य की वाणी जो शब्द विधान करती आई है, उसे कविता कहते है।' इत्यादि। हरिऔध जी ने 'भावुकता को कविता की रीढ और प्रसाद जी ने कविता को आत्मानुभूति की मौलिक अभिव्यक्ति माना है। दिनकर जी ने काव्यस्वरूप का विवेचन करते हुए लिखा है-'कविता न तो कोमल भाषा, न गेय छन्द और न कोरी भावुकता मे है। वह मन की एक विशिष्ट मनोदशा का प्रतिफलन है, वह मनुष्य की उस दृष्टि का नाम है जो वस्तुओं के उन आभ्यन्तर रूपो को देखती और दर्शाती है, जो रूप विज्ञान मे देखे नही जा सकते। इस सन्दर्भ मे कुछ पाश्चात्त्य आलोचको का दृष्टिकोण भी विचारणीय है। १७ वी १८ वी शती के उल्लेखनीय कवि ड्राइडन ने कविता को भावात्मक और छन्दो- बद्ध भाषा के माध्यम से प्रकृति का अनुकरण कहा है-'Poetry is an imitation of nature by pathetic and numerous Speech' ड्राइडन की इस परिभापा के 'भावात्मक और छन्दोवद्ध' विशेषण काव्य के सीमित रूप कविता के न्यावत्तंक धर्म को स्पष्ट करते ह किन्तु, साहित्य के पर्यायवाची 'काव्य के स्वरूप' पर कोई प्रकाश

Page 13

( १३ )

नही डालते। तत्कालीन अन्य माहित्यकारो मे मिल्टन ने काव्य मे प्रत्यक्षता औोर रागात्मकता को आवश्यक माना है और जानसन ने काव्य मे छन्द निर्वाह की आवश्यकता पर बल दिया है-'Poetry is a metrical composition.' किन्तु, छन्द को काव्य का व्यावर्त्तक धर्म नहीं होने के कारण यह परिभाषा भी चिन्तको के बीच चिन्त्य मानी जाती रही। रोमाटिक काव्यधारा के प्रवर्त्तक वर्डस्वर्थ की दृष्टि मे मुख्यत. काव्य मनःशान्ति की अवस्था मे स्मृतिरूप मे भावित विविध भावनाओ को कहा गया है-किन्तु, यह परिभाषा भी काव्य के स्वरूप-निर्देश में निदुष्ट नही कही जा सकती। क्योकि मनोवेगो की अभिव्यक्ति तो प्रसन्नता की तरह दुख और क्रोध के रूप मे भी हो सकती है और उस स्थिति को काव्य तो किसी भी दशा मे नही कहा जा सकता। 'Poetry is the spontaneous overflows of powerful feelings It takes its origin from emotions recollected in tranquility.' कॉलरिज ने काव्य मे शब्दविधान की चारुता अथवा उत्तम शब्दो के उत्तम क्म पर बल दिया है-'Best words in best order'. शेली ने काव्य मे कल्पना की अभिव्यक्ति को सत्य माना है-'Poetry in general is the expression of imagination' ली हण्ट ने भी शेली की भाति ही कविता को कल्पनात्मक मनोवेग की सज्ञा दी है-'Poetry 1s imaginative passion' एडगर एलेन पो के अनुसार कविता सौन्दर्य की लयात्मक अभिव्यक्ति हे-Poetry 1s a rhythmic crcation of beauty' लेकिन ये सारी परिभाषाएँ अव्याप्ति और अतिव्याप्ति दोप से दूपित है। क्योकि इन सवो मे किसी न किसी रूप से भावतत्त्वो की अवहेलना की गई है। जहां तक लय का प्रश्न है उसका माध्यम तो सगीत एव नृत्य आदि कलाओ मे पाना स्वाभाविक है। हाँ अग्रेजी साहित्य के प्रसिद्ध आलोचक मैध्यू मर्नाल्ड की इस परिभाषा मे जिन्दगी अवश्य मिलती है-'Poetry at bottom is a criticism of lIfe'. इसमे प्रकारान्तर से लोकमगल की भावना को स्वीकृति दी गयी है। किन्तु, यह निष्कर्ष भी 'आलोचना' शब्द की व्यास्या पर ही निर्भर करता है।

अन्ततः पीर्वात्य और पाव्चातत्य दष्टिकोणो की व्यारया के वाद हम इस निष्कपं पर पहुंचते हैं कि काव्य रसात्मक होता है। फलतः उसमे जीवन के नीरसपक्ष की भी सरस अभिव्यक्ति रहती ही है क्योकि इसमे अनुभूति का स्पष्टीकरण रहता है। पूरव और पश्चिम की विभाजक रेखा कविता को वाध नहीं सकी। अपनी संवेदनीयता मे काव्य चिरन्तन है। युग, भाषा या व्यक्तिविशेव के स्पर्श से उसकी वाहरी रूपरेवा मे चाहे कितना भी अन्तर कयो न हो, उसकी सचेदनीयता उसके भावपक्ष मे एकरव एवं समानरूप से अक्षर है। किसी भी जाति की विचार-चरणि, भाव-पद्त, जीवन के प्रति उसका दृष्टिकोण प्रभृति उसकी संस्कृति प्रसूत होते हैं। वतः किसी भी काव्य

Page 14

(१४ )

की बाहरी आकृति या भापागत भेद चाहे जो हो किन्तु मूलतत्त्व की दृष्टि से वह एक रस है। क्योकि कोई भी कवि जीवन की गहराई मे पठकर ही काव्य की रचना करता है। अन. किसी भी रचना मे मानव-व्यवहार के ही विविध रूपो की व्याख्या रहती है। जिस काव्य मे जीवन की जितनी ही उपेक्षा रहती है, वह काव्यं उतना ही अयथार्थ होता है। वस्तुतः काव्य जीवन का पर्यायवाची है। काव्यगत रस और सौन्दर्य के अभाव मे जीवन अगर नीरस है तो जीवन के मूल्यो से रहित होने पर काव्य भी महत्वहीन है। भारतीय दृष्टिकोण के अनुसार काव्य जीवन की व्याख्या है, भले ही पाशचात्त्य जगत मे इसका महत्त्व कला के लिए उद्घोषित क्यो न हो। सत्य तो यह है कि जो कवि जितनी स्पष्टता के साथ जीवन की वास्तविकता को अपने काव्य मे अभिव्यक्त करता है, कला का उतना ही सहज विकास उसके काव्य मे स्वतः सम्पन्न हो उठता है। टॉलस्टाय ने 'कला क्या है' नामक अपनी पुस्तक मे अपने पूर्ववर्ती सभी पाश्चात्य मतमतान्तरो की समीक्षा करते हुए लिखा है-'To evoke in our- self a feeling one has once experienced, and having looked it in oneself, then, by means of movements, lines, colours, sounds or forms expressed in words so to transmit that feeling that is the activity of art' -Tolstoy : What is art ? P. 50. इनके विचार से कला का उद्देश्य एक मनुष्य के हृदय मे उठे हुए भावो को क्रिया, रेखा, वर्ण, ध्वनि और शब्द के द्वारा दूसरे हृदय मे अनुभव कराना है। वस्तुतः यह मत भारतीय साहित्य की रसपद्धति से कुछ अधिक भिन्न नही है। विधि-निषेध दोनो का वर्णन करते हुए इन्होने अपनी स्थिति बडी साफ रखने की चेष्टा की है।

काव्य मे मामान्य लौकिक सत्य मे भिन्न बलीकिक सत्य की स्थिति रहती है। इसी सत्य का कवि जब आश्रय ग्रहण करता है तो जड प्रकृति क्या मील के पत्थर (mile stone), भी उससे बाते करने लगते हैं। काव्य का सत्य चिरन्तन होने के कारण अविनाशी है। हमारे व्यक्तित्व की सीमा का विस्तार करना अवश्य ही बुद्धि का काम है, किन्तु प्रत्येक भाव का नियन्त्रण बुद्धि ही नहीं करती। काव्य मे बहुत से स्थल ऐसे है, जहाँ दुद्धि की अग्राह्यता पर ही हमे आनन्द मिलता है। वैचित्र्य या चमत्कार की बाते कभी-कभी बुद्धि के लिए अग्राह्य होते हुए भी काव्य के लिए युक्तिसंगत होती हैं। यही युक्तिसगति काव्य का सत्य है और इसी सत्य पर आधारित रचनाओं मे युगीन परिस्थितियो का प्रतिविम्व झलकता है। इसी प्रतिबिम्ब से हम जीवनव्यापी प्रेरणा पाते है। इसी मे लोकहित तथा शिवम् का समावेश रहता है। फिर भी इसके प्रति प्रत्येक कवि की अलग-अलग धारणाएँ होती हैं। काव्य सत्य के प्रति प्रत्येक कवि की दृष्टि सापेक्ष रहती है। यद्यपि पश्चिमी काव्यक्षेत्र मे लोकहित की भावना को

Page 15

( १५ )

अधिक महत्त्व नही है, फिर भी भारतीय काव्यणान मे लोरुमगल की भावना को अधिक महत्त्व दिया गया है। काव्य मे प्रकृति-चित्रण का महत्त्व भी जनादि काल से सम्मान्य है। आदि रवि वाल्मीकि से लेकर आजतक के प्राय. सभी भारतीय कवियो ने प्रकृतिश्री को अपने काव्य मे यथास्थान अभिव्यक्ति प्रदान की है। हा, प्रकृति के भीतरी और बाहरी जगत के तारतम्य मे एक सौन्दयं है। यह सच है कि जो बाहरी है, वह भीतरी नहीं। किन्तु, वे दोनो एक दूसरे से प्रभावित रहते हैं। अन्ततः हम कह सकते है कि कविना संसार की विभिन्न भावधाराओ मे एकता स्थापित कर लोकभावना का प्रतिनितित्व करती है। यह मानवीय सत्य तथा सौन्दर्य की उपयुक्त उद्भावना कर सीमा मे निःसीम, और विशेष मे निर्विशेष के दर्शन करती है। मानव की विभिन्न भावनाओ के सम्यक विकास के लिए ही काव्य सृष्टि आवश्यक होती है। इसमे जीवन के मनोरम मत्य का उद्घाटन रहता है। इससे जहां स्वान्त सुखाय की तृप्ति होती है, वही सहृदयो को लोकोत्तरानन्द की मनुभूति भी मिलती है। यही किसी काव्य की सार्धकता है। श्री अप्पय दीक्षित और उनकी चित्रमीमांसा श्री अप्पय दीक्षित तमिल ब्राह्मण थे। इनका स्थितिकाल १५५४ ई० से १६२६ ई० के बीच माना जाता है। ये साहित्यशास्त्र के धुरन्धर विद्वान् थे। इन्होने शताधिक ग्रन्थो की रचना की है। उनमे 'वृत्तिवार्तिक', 'कुवलयानन्द' और 'चित्र- मीमासा' ये तीन ग्रन्थ काव्यशास्त्र से सम्बन्धित है। चित्रमीमासा' विशेपर्प मे आलोचनात्मक एवं गम्भीर शैली का ग्रन्थ है। पण्डितराज जगन्नाय दीक्षित जी के समसामयिक थे। इन दोनों मे बडी अनवन थी। इसका कारण इनका कुल-जातिगत वैमनस्य भी कहा जाता है। दीक्षित जी अपने समय मे काची के अलीकिक दार्शनिक तथा प्रतिभाशाली द्रविड कवि माने जाते थे। इनका पण्डितराज जगन्नाथ के साध विरोध के सम्वन्ध मे कई किंवदंतियाँ प्रचलित है :- "कहा जाता है कि पण्डितराज जगन्नाथ का दीक्षित जी के साथ व्यक्तिगत विरोध भी था। पण्डितराज ने तैलंग से आकर जयपुर मे एक पाठशाला सोली थी। नयोग- वश वहाँ उन्होने एक 'काजी' को विवाद मे परास्त किया था। दिल्ली लौटकर उन काजी ने वादशाह के सामने इनकी प्रशंसा की। बादशाह ने इन्हे दिल्ली बुनानार काफी सत्कार किया। वहाँ ये किसी यवन कन्या पर मासक् हो गये और उसमे इन्होने शादी भी कर ली। वृद्धावस्था मे जब ये उस यवनी के माथ काशी ाये तो अप्पय दीक्षित ने यह कहकर कि 'यह तो यवनी के ससषर्ग से दूषित है' इनका तिरम्कार कर इन्हे पण्डित-समाज से वहिष्कृत कर दिया। अत. पण्डितराज टसी दिन मे दीक्षित जी के विरोधी वन गये।"

Page 16

( १६ )

कुछ लोगो का कहना है कि-पण्डितराज वृद्ावस्था मे जब उस यवनी के साथ काशीवास कर रहे थे तो एक दिन अचानक एक घटना घटी। प्रभात-का समय था। पण्डितराज घाट पर ठंढ से मुँह ढक कर सो रहे थे। इनकी पत्नी युवती यवनी वगल मे बैठी थी। संयोगवश अप्पयदीक्षित गंगास्नान के निमित्त उधर से ही गुजरे। पण्डितराज की वह दशा देखकर दीक्षितजी के मुँह से सहसा ये शन्द निकल पड़े-"कि निश्शद्गं शेपे, शेपे वयसि त्वमागते मृत्यी"-अर्थात "अपने निकट आई हुई मीत को देखकर भी इस शेष अवस्था मे क्यो निःशद्ध होक्र सो रहे हो।" यह सुनते ही पण्डितराज ने ज्यो ही मुँह पर से कपडा हटा कर दीक्षित जी की ओर देसा तो दीक्षित जी ने उसका शेप अर्द्धांश भी सुना दिया-"अथवा सुख शयीया निकटे जागर्ति जाह्नवी भवत. ।" अर्था तुम सुख से सोओ, तुम्हारी रक्षा मे भगवती भागीरथी जगी है। यह तो हुई पण्डितराज के साथ व्यक्तिगत विरोध की किवदन्तियाँ। किन्तु, दोनो की समसामयिकता पर विचारणीय प्रश्न यह है कि कुछ लोगो का विचार है कि ये दोनो समसामयिक नहीं थे। क्योकि शाहजहां का राज्याभिपेक सन् १६२८ ई० मे हुआ और सन् १६५८ ई० मे औरङ्जेब ने उसे केद कर लिया। सन् १६६६ ई० मे उसकी मृत्यु हो गयी। पण्डितराज का यही समय है जो दीक्षित जी के साथ मेल नही साता है। किन्तु, इस सदभं मे जो नवीन तथ्य उपलब्ध हुए है, उसके आधार पर यह विचार टिक नही पाता। पण्डितराज ने स्वयं लिखा है- 'हप्यद्द्राविडदुग्रंहय्हवशानम्लिए्टं गुरुद्रोहिणा यन्म्लेच्ेति वचोऽविचिन्त्य सदसि प्रीढेऽपि भट्टोजिना। तत्सत्यापितमेव धैयनिधिना यत्स व्यमृदनात कुचं निर्वध्याऽस्य मनोरमामवशयन्नप्यप्पयाद्यान् 5स्थितान् ।।' अर्थात गर्वीले अप्पय दीक्षित के अत्यन्त दुराग्रह के कारण अत्यन्त आवेश मे आकर मेरे गुरुद्रोही भट्टोजि दीक्षित ने भरी सभा मे बिना कुछ विचार किये ही मुझे जो 'म्लेच्छ' कह दिया, उसे हमने अर्थात् पण्डितराज जगन्नाथ ने धैयपूर्वक सत्य कर दिखलाया कयोकि हमने भी उनके सहयोगी अप्पय दीक्षित प्रभृति विद्वानो की उपस्थिति मे ही उन्हें विचया कर उनकी मनोरमा का कुचमर्दन कर दिया है। तात्पयं यह कि भट्टोजि- दीक्षित ने वैयाकरणसिद्धान्तकीमुदी की 'मनोरमा' नामक व्यास्या लिखी है और पण्डित- राज नें उसका 'कुचमर्दिनी' नामक टीका लिखकर खण्डन किया है। कहने का निष्कर्ष यह कि जिसने मुझे 'म्लेच्छ' कहकर अपमानित किया, उसकी मनोरमा अर्थात पत्नी का फुचगदन ('स्तनमदन') कर सबो के सामने हमने भी अपनी दवङ्गता मषच म्लेच्छता का उमे परिचय दे दिया।

Page 17

( १७ )

'शब्दकोस्तुभशाणोत्तेजन' नामक ग्रन्थ का गह इयोकार्द भी इन मन्दर्भ मे दशंनीय है :- 'न्पय्य दुग्रह विचेतित चेतनानामायदुहामयमह् रमयेऽवलेवान्।' मै पण्डितराज जगन्नाथ उन गुरुद्रोहियो के भयदूर गवों को शान्त कर रहा हूँ, जिन (भट्टोजिदीक्षित) की बुद्धि अप्पय दीक्षित के दुराग्रह के कारण पना विवेक छोठ कर मूच्छित हो गई है। तीसरा इलोक वालकवि का है। इसी कलोक के आधार पर अप्पय दीक्षित के भ्रातृपौत्र ने इन्हे पण्डितराज का समकालिक सिद्ध करने के लिए अपने 'नलचरितम्' मे प्रीढ विवेचन उपस्थित किया है।

'यष्टुं विश्वजिता यता परिधरं सवे वुवा निजिता भट्टोजिप्रमुखाः, स पण्डितजगन्नायोऽपि निस्तारितः । पूर्वेडधे चरमे द्विसप्ततितमस्याव्दस्य सद् विश्वजिद् याजी यश्च चिदम्वरे स्वमभजज्ज्योतिः सता पश्यताम् ।'

'अप्पय दीक्षित ने अपनी मायु के ६२ वे वर्ष के पूर्वार्द्ध मे विश्वजित् यज्ञ करने के लिए, पृथ्वी के सब ओर घूमते हुए, भट्टोजि दीक्षित आदि सभी विद्वानो को पराजित किया और अन्त मे उस स्यातिप्राप्त पण्डितराज जगन्नाष का भी उद्धार कर दिया। फिर उसी वर्ष के उत्तरार्द्ध मे विश्वजित् नामक यज्ञ किया और चिदम्बरं क्षेत्र मे सभी सज्जनो के देखते हुए आप्तज्योति को प्राप्त हो गये।'

इन श्लोको से यह सिद्ध होता है कि अप्पय दीक्षित को पण्डितराज जगन्नाय के साथ जातिगत विरो ही नही था, प्रत्युत् उन दोनों के वीच यावज्जीवन विद्वेष की ज्वाला धधकती ही रही। यही कारण है कि पण्डितराज ने चिनमीमासा के सिद्धान्तो का स्थान-स्थान पर खण्डन ही नहीं किया, बल्कि विवेक छोडकर मनावश्यक रूप से यत्र तथ् दीक्षित जी की खिल्लियां भी उडाई हैं। अपने रसगगाधर नामक प्रतिद्ध ग्रन्थ मे 'चित्रमीमासा' की आलोचना करते-करते जव उनका मन नहीं भरा तो उन्होंने दीक्षित जी की इस प्रौढ कृति के मण्डनार्थ अलग मे 'चिन्र-मीमासाखण्डन' नामक एक सन्य ही लिख डाला।

ऐतिहासिक तथ्य की दृष्टि से यहां एक बात और विचारणीय है। दीक्षित जी के समकालीन पण्डित भट्टोजिदीक्षित के गुरु शेपकृष्ण थे। शेपकृष्ण के पुम का नाम ोपवीरेश्वर था। यही पेपवीरेश्वर पण्डितराज के गुरु थे। विद्याभिमानी भट्टोजि- दीक्षित से टोपवीरेव्वर जला करते थे। यही कारण है कि ये 'मनोरमा' का न्वय खण्डन न कर एस कार्य के लिए अपने सुयोग्य शिष्य को प्रेरित किया। इन सारी वातो २ चि० भू०

Page 18

( १८ )

से यह सिद्ध होता है कि अप्पय दीक्षित, भट्टोजिदीक्षित और पण्डितराज सभी समकालिक थे। किन्तु एक ऐसा भी तथ्य है जो पण्डितराज को अप्पय दीक्षित के समकालिक मानने मे ऐतिहासिको को भी भ्रमित कर देता है। वह यह है कि पूर्वॉक्त नीलकंठ दीक्षित ने जो अप्पय दीक्षित के भ्रानृपुत्र थे अपने 'नोलकठविजय' नामक चम्पू मे लिखा है :-

कलिवर्येपु गतेपु ग्रथित किल नीलकण्डविजयोऽ्यम् ॥' यह 'नीलकंठ विजय' कलियुग के ४७३८ वर्ष बीतने पर लिखा गया है।' ईमवी सन् के अनुसार यह समय १६३९ था जो शाहजहाँ का राज्यकाल पडता है। इससे यह सिद्ध होता है कि पण्डितराज का समकालिक जब अप्पय दीक्षित का भ्रातृपौत्र हो सकता है तब फिर उनका स्थितिकाल उपयुंक्त कैसे? दूसरी बात यह है कि नीलकंठ दीक्षित ने स्वनिर्मित 'त्यागराजस्तव' मे अप्पय दीक्षित के विषय मे लिखा है :-

'जिन अप्पय दीक्षित ने अपने छोटे भाई के पीत्र अर्थात् मुझको अनुग्रह करके, अपने समान ही प्रभावशाली वना दिया।' इस उक्ति से यह भी सिद्ध होता है कि नीलकण्ठ ने अप्पय दीक्षित से अध्ययन भी किया था। इतना ही नही, उनका जन्म इन्होंने १५५० ई० सिंद्ध किया है। इसका प्रमाण 'सिद्धान्वलेश' की अधोदवित भूमिका है :- 'ब्रह्मविद्यापतिकाकारास्तु-'नीलकण्ठविजयश्च कविना बिशे वर्षे प्राणायि। कविश्च द्वाददावय एव सप्ततिवयसा दीक्षितेनानुगृहीता. अतस्तेषामवतारकाल: कल्यन्दाः ४६५०, शकाव्दा. १४७१, सन् १५५०' इत्युदाजहु ।' सिद्धान्तलेशसग्रह की भूमिका मे अप्पय दीक्षित का एक क्लोक है :- 'वयासि मम सप्ततेरुपरि नैव भोगे स्पृहा, न किन्चिदहमर्थये शिवपदं दिदृक्षे परम्।' तात्पर्य यह कि-'मेरी उम्र ७० से अधिक वर्ष की हो रही है। अव मुझे सासारिक भोगविलासजन्य किसी वस्तु की कामना नहीं है। व तो मैं केवल शांकर की शरण चाहता हूँ।' इससे यह सिद्ध होता है कि अप्पय दीक्षित का जन्मकाल १५५० ई० या और मृत्युखर १६२२ ई०। किन्तु यह समय शाहजहां के राज्यकाल से पूर्व पडता है। यहीं नाकर उनके फालनिणय में ऐतिहासिक भ्रमित हो जाते हैं।

Page 19

(१६)

किन्तु, यह बात पूर्णत निर्णोत नहीं कही जा सकती। क्योकि अगर नीउइण् ने ३० वर्ष की उम्र मे ही 'नीलकण्ठविजय' की रचना की है तो उस समय भी अप्पय दीक्षित जीवित ही होगे। क्योकि कवि ने स्वय भी दीक्षित जी की वन्दना में वर्तमान काल का प्रयोग किया है- 'श्रीमानप्पयदीक्षित स जयति श्रीकण्ठविद्यागुरु.।' इससे इतना तो निष्कर्य अवश्य निकलता है कि अप्पय दीक्षित, भट्टोजि दीकित और पण्डितराज जगन्नाथ समसामयिक थे। इन तीनो की उम्र मे छोटाई-बडाई का अनुपात चाहे जो कुछ हो-कार्यकाल मे चाहे जितना भी अन्तर पडे, किन्तु तीनो एक दूसरे से परिचित थे। उस समय सामाजिक कट्टरता भी अपनी पराकाष्ट पर थी। परिणाम- स्वरूप दीक्षित जी ने पण्डितराज को समाज से वहिष्कृत कर दिया था। अप्पय दीक्षित द्रविड, भट्टोजिदीक्षित महाराष्ट्री और पण्डितराज तैलद् ब्राह्मण थे। अतः इन तीनो के बीच विद्वेप का प्रसार तात्कालिक सामाजिक कट्टरता की दृष्टि से कोई अस्वाभाविक प्रतीत नही होता। अप्पय दीक्षित वृद्धावस्था मे काशी आये थे। समाज मे उनका सम्मान था। विरोधी होते हुए भी पण्डितराज ने सुले हृदय से इस तथ्य को कई जगह स्वीकृत किया है। यथा-'द्रविडशिरोमणिभि' तथा 'द्रविडपुगचैं.' इत्यादि। महामहोपाध्याय P V. Kanc ने अपने प्रसिद्ध इतिहास ग्रन्थ History of Sanskrit Poctics मे यह स्पष्ट रूप से सिद्ध कर दिया है कि अप्पय दीक्षित, भट्टोजि- दीक्षित और पण्डितराज जगन्नाथ समकालिक थे। A MS of the चित्रमीमासा 1S dated Sambat 1709 ( I. C 1652-53 A. D ) Therefore both the रसगङ्गाधर and the चित्रमीमासाखण्डन were composed before 1650 and after 1641 A. D. and they are the product of a mature mind Therefore the hterary activity of Jagannath lies between 1620 and 1660 A. D. .. 1

उपर्युक्त कथन से सिद्ध होता है कि अप्पय दीक्षित अपनी अन्तिमावस्था मे काशी के विद्वत्समाज से सम्मानित होकर जीवन व्यतीत कर रहे वे और उन्होंने यवनी पत्नी के संसर्ग से दूपित पण्डितराज को अवश्य ही पण्डितो के तत्कालीन कट्टर समाज मे बहिष्कृत किया होगा। भट्टोजिदीक्षित इनके सम्पर्को एव समान विचार वाले - थे। फलत इन दोनों को पण्डितराज का कोपभाजन वनना पडा। यह लोकप्रसिद्ध है कि 'चियमीमासा' उप्पय दीक्षित की प्रौद कृति है। अपने मे पूर्व के अलकार वन्यो पर इनके नमय जित बयारयं बिमद की आवस्यकता थी, उमे बहुत अगो मे इन्होने पूरा किया। दीक्षितजी संग्राहक ही नही, प्रवीण विनेचक भी थे।

Page 20

( २० ) अगर सच पूछा जाय तो आनन्दवद्ंन की विचारशृङ्खला, मम्मटभट्ट की शैली और विश्वनाय की अभिव्यक्ति का समन्वय लेकर ही अप्पय दीक्षित अलकार शास्त्र के क्षितिज पर उदित हुए थे। दीक्षित जी विश्वनाथ से भी अधिक भावप्रवीण हैं तथा दण्डी या स्य्यक से किसी भी प्रकार कम पण्डित नही है। किन्तु जितने वे भावप्रवीण या पण्डित है, ठीक उसी अनुपात से पण्डितराज के विवाद मे पीछे है। रुद्रट और वामन से नि.सन्देह अप्यय दीक्षित मे विवेचन का पलडा भारी है। पर, मम्मट की स्वन्थ आलोचना के आगे दीक्षित जी की विवेचना नीचे दिखाई देती है। फिर भी मम्मटभट्ट, महापात्र विश्वनाथ और अप्पय दीक्षित मे दीक्षित का स्थान अधिक श्रेष्ठ है। दीक्षित जी ने मम्मट की चित्रसम्बन्धी अभिव्यक्ति को और अधिक प्रोढ़ एवं प्रान्जलरूप मे उपस्थित किया है। पण्डितराज की तरह इनकी विवेचना मे दार्श- निकता का पुट अधिक सशक्त रूप से भले ही न हो किन्तु, स्पष्ट अभिव्यक्ति की दृष्टि से अप्पय दीक्षित अपने क्षेत्र मे अकेले हैं।

अलद्धार के भावनापक्ष तथा उसके विवरणात्मक सीन्दर्य का सुन्दर उद्घाटन अप्पय दीक्षित ने जो किया है, वह उस युग की दृष्टि से बहुत कुछ अपूर्व ही था। समानधर्मी आउोचको के विवेचनो का इन्होने वडे ही चमत्कारपूर्ण ढंग से खण्डन किया है। इनकी खण्डनात्मक थौली की ओर अनेक विद्वानो का ध्यानाकृष्ट हुआ। पण्डितराज जगन्नाथ को भी अपने विवेचनो और आलोचनाओ को माँजने और सँभालने की प्रेरणा प्रायः इन्ही से मिली हे। इस दृष्टि से दीक्षित जी की चित्रमीमासा खण्डनात्मक आलोचना साहित्य के लिए भी कुछ कम उपादेय नही है। महामान्य अप्पय दीक्षित जी शैवदशन के महनीय आचार्य थे। इनका 'वरदराजस्तव' अपनी मंजुल भावना तथा उदात्त दार्शनिक विचारो के कारण नितान्त प्रसिद्ध है। इन्होने इस पुस्तक मे १०६ इलोको मे भगवान् के रूप का वर्णन बडी ही कमनीय भाषा मे किया है। ये नितान्त भक्त तथा उदात्त दाशनिक थे। इस स्तोम मे इनका दार्शनिक विचार औोर धारणाये तथा इनके ईश्वरवादी अभिनव दृष्टिकोण इनकी वैयक्तिक रुचि के परिचायक थे। आलंकारिक समीक्षा और स्तोनसाहित्य के बीच जिस अव्याहत दाशनिक विचार के संतुलन की आवश्यकता थी, उसके समत्वय का अभाव सटकता है। दीक्षित जो का खण्डनात्मक दृष्टिकोण भी अपने ढंग का अकेला है। लक्ष्य लक्षण गरन्थ में इनका प्रमुग ध्यान प्रतिपाद्य विषय (matter) की ओर अधिक है; अलद्वार विषेचन की अभिव्यक्तना प्रणाली (manner) की ओर कम। किस अलद्वार का मैसा प्रयोग होना चाहिए, इस सम्बन्ध मे दीक्षित जी उतने चिन्तित नही हैं, जितना एक्षन के सण्डन-मण्डन की ओर। इनके गन्यों मे साहित्य और दार्शनिक वस्तु

Page 21

( २१ )

(Theme) का ऐसा समन्वय है कि इनका विषय (matter) और विषय व्वञ्जना (manner) मे विचिन अममानता फूट पढी है। यही इनकी कमजोरी का वह स्थल है जिस पर पण्डितराज को बोलने या लिसने का अवमर उपलब् हुआ है। 'वरदराजस्तव' मे उनकी शैली स्वाभाविक और प्रभावोत्पादक है। माधुयं भीर प्रसाद गुणो से युक्त वरदराज की स्तुति धाराप्रवाह से प्रवाहित हुई है। रूपे-सूखे दाशनिक तत्व भी इस स्तोत्र मे अनायास ही हृदयङ्गम हो जाते है। युक्तियो की अपूर्वता, उपमाओ की अनुरूपता, उदाहरणो की अनुकूकता, भावो की सुन्दरता तथा भापा की मधुरता-इन सभी गुणो के कारण उनका यह स्तोयसाहित्य अधिक आकर्षक वन गया है।

'विश्वम् भूतम् भुवनम् चित्रम्' वैदिक साहित्य मे 'चित्र' शब्द का शताधिक वार प्रयोग अनेक अर्यों मे हुआ है। ऋग्वेदादि के अनुसार इसका अर्थ अद्भुत, आश्चर्य, विचित्न, अनेक, प्रभूत, उत्कृष्ट, नानावर्णयुक्त, दर्शनीय एव आलेस्यपरक है। इसी प्रकार लोकिक साहित्य मे भी चित्र पद से शवल, आलेस्य, चमत्कारजनक, उज्जवल, भास्वर, मधुर एवं उद्वेगपर अर्थ गृहीत है। इसका कोषगत अर्थ है-कागज, कपडे आदि पर बनाई हुई वस्तु की प्रतिमूति, तसवीर, आलेख्य, तिलक, चित्रगुप्त एव चित्रक। किन्तु, काव्यशास्त्र मे चिय शब्द का प्रयोग एक विलक्षण अर्थ मे है। काव्यशास्त्र मे इसके सर्वप्रथम प्रयोक्ता ध्वनि-

लिखा है '- मार्ग के आचार्य आनन्दवर्द्धन माने जाते हैं। उन्होने अपने प्रसिद्ध गत्थ ध्वन्यालोक मे

'प्रधानगुणभावाभ्या व्यङ्गघस्यैवं व्यवस्थिते। काव्ये उभे ततोऽन्यद् यत्तच्चित्रमभिवीयते।। नित्र शब्दार्थभेदेन द्विविधं च व्यवस्थितम्। तत्र किन्चिच् शब्दचित्र वाच्यचिनमतः परम् ॥'६व० ३-४२, ४३

अर्धात् काव्य के दो भेद-ध्वनि और गुणीभूतव्यस्जय-व्यज्गय मर्थ की प्रधानता औोर अप्रधानता के आधार पर तो पहले से ही तिद्ध है। अव काव्य के दन दोनो भेदो से भिन्न अर्थात् जो काव्य व्यङ्गघ अर्थ की विवक्षा से स्वथा सून्य हो, उने चिग- काव्य कहते है। पुन यह चिनकाव्य शब्द और अर्य के आधार पर दो प्रकार के होते है। शब्दचिाकाव्य और अर्थचितकाव्य। इस प्रकार के काव्य मे अन्तस्तत्व का अभाव रहता है। इससे किसी भी प्रकार के व्यसय वर्य की प्रतीति नहीं होती है। फलत आनन्दवर्द्न ने इस प्रकार के व्य्गवार्षशून्य काव्य का ही नाम चिनकाव्य रवखा है। क्योकि जिस प्रकार किसी वस्तु को प्रतिकृति में आत्मततत्व का भाव

Page 22

( २२ )

रहता है, उनी प्रकार इस तरह के काव्य मे भी आत्माभिव्यंब्जक तत्त्वो का अभाव रहता है। इसीलिए 'चिन्न' शब्द की व्याख्या करते हुए आचार्य आनन्दवर्दन ने स्पष्ट सब्दो मे लिखा है .-

चाच्यवाचकवै चिन्यमात्ाधयेणोपनिवद्धमालेख्यप्रस्यं यदाभासते तच्चित्रम्।' तात्पय यह कि चित्रकाव्य मे जहाँ एक ओर रसादितत्व का अभाव रहता है, वही दूसरी और व्यङ्जयार्थ की प्रकाशन शक्ति से भी यह काव्य शून्य रहता है। इसमे केवल शळ्ट और अर्थ की विचित्रता के आधार पर चित्र की तरह काव्य को मजाया जाता है।

आाचाय वानन्दवद्धंन की दृष्टि मे इस प्रकार का काव्य मात्र काव्यानुकरण है न कि काव्यम्-'न तन्मुख्य काव्यम्, काव्यानुकारो ह्यसी' अन्त मे इन्होने चित्रकाव्य का स्व्प अधोद्ित रूप मे निर्दिष्ट किया है :- 'रसभावादिविषयविवक्षावि रहे सति। अलद्वारनिबन्धो य स चित्रविषयो मत ॥ रसादिषु विवक्षा तु स्यात्तात्पर्यवती यदा। तदा नास्त्येव तत्काव्यं ध्वनेर्यतु न गोचर: ॥' 'चिनकाव्य का विषय वह मलद्वार निबन्ध है जिसकी विश्रान्ति किसी भी प्रकार से रसभाव मे नही होती है। किन्तु, अगर शब्द और अर्थ की विचित्रता मे किसी भी प्रकार मे रसादि भाव परिलक्षित हो तो निश्चय ही वह ध्वनि का विषय बन जाता है।' इतना ही नही चित्रकाव्य की विशेपता की व्याख्या करते हुए ध्वनिकार ने यहां तक कह दिया है'- एनतु चिनं कवीना विश्ख्लगिरा रसादितात्पर्यमनपेक्ष्यैव काव्यप्रवृत्तिदर्णना- दम्मानि. परिक्पितम् ।' ध्व० लो० अर्थात् चित्रकाव्य मे रसात्मकता का अभाव होने से केवल वागविकल्प की ही स्थिति मानी जाती है।

इस प्रवार साहित्यशात्त के लक्षण लक्ष्य गधो मे चिमवन्धकव्य का एक परम्परित पतिहास ही उपलब्ध होता है। भरतमुनि के नाट्यशान्त्र से लेकर अग्निपुराण, भामह के कर्पालकार, दण्डी के काव्यादर्श, वामन के काव्यालारसूनवृत्ति, स्द्रट के कावा- सम्पन, भेजराज के नरस्वतीवठाभरण तक से जपने-अपने हंग से चित और चित्रसाव्य दो र्यास्ता की गई है। आानार्य सम्मट ने अपने काव्यप्रकाश मे चिषकाव्य का विवेचन रचे हुए लिसा है,-

Page 23

( २३ )

'शन्दचियं वाच्यचियमव्यल्लय त्ववरं न्मृतम्' अर्थात् व्यङ्तपरहित अवर काव्य ही चित्रकाव्य है। यह पव्दचित्वकाव्य वोर अर्थचित्रकाव्य नाम से दो प्रकार का है। फिर 'चिन' की व्यास्या करते हुए लिया है .- 'चियमिति गुणालद्धारयुक्तम्। अव्यङ्गघमिति स्फुटप्रतीयमानारचरहितम्।' अर्थात् यहाँ 'चित्र' शव्द का अभिप्राय है-गुणाभिव्यन्जक शब्द और अर्य तथा अलकृत शब्द और अर्थवाली रचना। इस प्रकार के काव्य का अव्यस्न होने का अभिप्राय है :- व्यङ्गय अर्थ की स्फुट प्रतीति का अभाव। इने 'बवर' कहते है। क्योकि यह काव्य निकृष्ट कोटि का होता है। इसके वाद इस सन्दर्भ मे हेमचन्द्र के काव्यानुशासन मे, राजानक रुम्यक के अलद्वारसर्वस्व मे एव कविकणपूर के अलद्ार- कौस्तुभ मे 'चित्नकाव्य' के विविध प्रकार की व्यारुया उपलब्ध होती है। नाहित्यदर्पण- कार विश्वनाथ ने 'चिन्न' पद की व्यारया प्रस्तुत करते हुए लिगा है '- 'पद्माद्याकारहेतुत्वे वर्णाना चित्रमुच्यते' अर्थात् 'चिन' वह शब्दालकार है जिसे वर्णों के ऐसे शब्दविन्यास की विचित्रता मे देखा जाता है, जिसमे पद्च यादि की र्प- रेखा झलकती है। वस्तुत, विश्वनाथ की यह गरिभाषा गलंकारसवंस्व की इस परिभाषा से प्रभावित प्रतीत होती है-'वर्णाना सड्गाद्याकृतिहेतुत्वे चित्रम्' किन्नु इसकी विदाद व्यात्या प्राब्जल भापा मे हमे सरस्वतीकण्ठाभरण मे उपलब्ध होती है :- 'वर्णस्थानस्वराकारगतिवन्वान् प्रतीह य. । नियमस्तद्घुधै पोढा चित्रमित्यभिधीयते' अर्थात् 'चित्र' वह रचना है जो कि व्यन्जन, स्थान, स्वर, पद्मादि आकृति, गति मर बन्ध के नियम से आश्चर्यजनक हुआ करती है। इस व्यास्या के अनुसार 'चिन' ध्वनिरहित वह रचना नही सिद्ध होती जो आलेत्य की तरह निर्जीव लगे।

वस्तुत चिन्नमीमासाकार अप्पय दीक्षित का चित्रकाव्य मे यही तात्पयं है। इसे ही स्पष्ट करते हुए उन्होने चित्रमीमासा के ग्रन्थारम्भ प्रकरण मे लिम्ा है-'यदव्य- द्वयमपि चारु तच्चित्रम्'। यद्यपि इस ग्रन्थ मे दीक्षित जी ने 'कोई नवीन उदभायना नही की और न उस उद्भावना की आवश्यकता ही थी। किन्तु, प्रवीण विवेचक होने के कारण इन्होने प्रतिपाद्य विषय पर बडा ही विवेकपूर्ण विमयं उपस्थित किया है। चिनमीमासा मे केवल अधोदित १२ अलकारो पर ही विचार किया गया है :- (१) उपमा, (२), उपमेयोषमा ( ३ ) अन-वघ, (४) स्मर्ण, (५) रूपक, (६) परिणाम, (७) ससन्दंह (८) भान्तिमान्, (१) उत्ेन, (१० ) वकति, (११) उत्प्रेक्षा और (१२) अतिशयोकि। यो तो भारतीय चिन्तको ने दीक्षित जी से पूर्व ही वाच्य की वात्मा की ग्वोग करने के लिए भगोत्य प्रयात किया और इस प्रयास मे तफे-वितकं नीर ऊहाप्रक

Page 24

( २४ )

के परचात् उन्हें पर्याप्त सफलता भी मिली है-ऐसा समझा जाता है। किन्तु, दीक्षित जी से पूर्व चिन्तको का यह अन्वेपक-मण्डल कई सम्प्रदायो मे विभक्त हो चुका था। 'अलंकारतरवस्व' के टीकाकार समुद्रबन्ध ने इन सम्प्रदायो पर अधोद्धित रूप से अपना वभिमत व्यक्त किया है :- यह विशिष्टी शब्दार्थी काव्यम्। तयोश्च वैशिष्टयं धर्ममुखेन व्यापारमुखेन व्यज्जयमुेन वेति न्रय, पक्षाः । आद्योऽ्यलङ्कारतो गुणतो वेति द्वैविध्यम्। द्वितीयेऽपि भणिति-वैचित्येण भोगकृतत्वेन वेति द्वैविध्यम् इति पल्चसु पक्षेष्वाद्य उद्भटादिभिरङ्ी कृत., द्वितीयो वाभनेन, तृतीयो वक्ोक्तिजीवितकारेण, चतुर्थों भट्टनायकेन, पन्चम आनन्दवर्धनेन ।' अर्थात् विशिष्ट शब्द और अर्थ ही काव्य है। शब्द और अर्थ की यह विशिष्टता धर्म, व्यापार और व्यङ्य इन तीन प्रकारो की है। यही तीन प्रकार काव्यशास्त्र के सद्धान्तिक दृष्टि से तीन पक्ष हैं। इनमे अलद्वार और गुण के भेद से घममूलक वैशिष्टथ दो प्रकार के हैं। फलतः धर्ममूलक वैशिष्टय के प्रतिपादक दो सम्प्रदाय सत्ता मे आये-(१) अलंकार सम्प्रदाय और (२) गुण या रीति सम्प्रदाय। इसी प्रकार व्यापारमूलक वैशिष्टय भी वकोक्ति और भोजकत्व भेद से दो प्रकार का है। आचार्य फुन्तक ने 'वकोक्ति' द्वारा काव्य मे चमत्कांर का प्रतिपादन किया है। अतः उनका यह मत 'वफोक्तिसम्प्रदाय' के नाम से प्रसिद्ध हुआ। भोजकत्व का अन्तर्भाव भरतमुनि के रससिद्धान्त के अन्तगंत है। व्यङ्गयत्व विशिष्ट के समर्थक आचार्य आनन्दवर्धन है। उनका मत '्वनि सम्प्रदाय' के नाम सेप्रसिद्ध हुआ। फलत. ये सिद्धान्त या सम्प्रदाय ५ रूप मे हमारे सम्मुख आये-१-रससिद्धान्त, २-अलद्वारसिद्धान्त, ३-रीति- सिद्धान्त, ४-वकोक्तिसिद्धान्त और ५-ध्वनिसिद्धान्त। इनमे हमारा विवेच्य सिद्धान्त 'अलद्धारसम्प्रदाय' है। जव से साहित्य का निर्माण प्रारम्भ हुआ, मलंकार की सत्ता उसी दिन से उपलब्ध है। वैदिक साहित्य के सर्वाधिक प्राचीन गौर प्रामाणिक ग्रन्थ ऋग्वेद मे उपमा अलङ्कार का प्रयोग दर्शनीय है। यह सच है कि वैदिक साहित्य मे अलङ्धारान्त्र का उल्लेख नही है, किन्तु अलद्धार का निर्देश न्वष्टमप से है - उपमा- 'ननातेव पुत्त एति प्रतीची, गर्तारुगिय सनयेधनानाम्। पावेवपत्य उपती सुवासा, उपा हृस्रेव न रिणीते अप्सः ॥'-हृ० १-१२४ मतयोकि- 'दा सुपर्णा मयुजा सगाया, समान वृक्षं परिपस्वजाते। तयोरन्यः विष्पयं स्वाद्वत्त्यनरनस्नन्यो अभिचाकशीति।।' -फग्वे० १-१६४-२०

Page 25

( २५ )

रूपक- 'आत्मान रयिनं विद्वि शरीर रथमेव तु। वुद्धि तु सारर्यि विद्धि, मन प्रग्रहमेव च ।।'-कठोप० १ ३ ३ वैदिक साहित्य के पर्चात् निरुक्तो मे भी अलद्वारो का वर्णन मिलता है। निवक मे अलद्वार का पारिभाषिक अर्थ नहीं मिलता। किन्तु, गाग्यं ने उपमा का तक्षण अवश्य निरूपित किया है। आगे चलकर यास्क ने तो उपमा का भेद निरूपण भी किया है। ईसा से ५०० वर्ष पूर्व पाणिनि के समय तक तो उपमा का शास्त्रीय विवेचन भी प्रारम्भ हो गया था। पाणिनि ने अपनी अष्टाध्यायी मे उपमा, उपमान, उपमित और सामान्य जैसे पारिभाषिक शब्दो का प्रयोग किया है। उन्होंने अपने सूयो मे उपमान, उपमेय, सादृश्यवाचक एवं साधारण धमं उपमा के इन चारो अङ्गो का निर्देश किया है :- (१) तुल्यारथैरतुलोपमाभ्या तृतीयान्यतरस्याम्-२।३७२। (२) उपमानानि सामान्यवचनैः। २।१५५। उपमितं व्याघादिभिः सामान्याप्रयोगे २।१।५६।

इस विषय मे वार्तिककार कात्यायन मुनि भी पाणिनि के अनुयायी है। पतञ्जलि ने भी अपने महाभाष्य मे उपमान शब्द की व्याख्या की है। उन्होंने 'गौरिव गवय' का उदाहरण भी प्रस्तुत किया है। जो उपमा का श्रौती और आर्यो नाम से वर्गीकरण किया जाता है, उसका आधार भी पाणिनि के सूत्र ही है।

इसके पश्चात् सर्वप्रथम भरतमुनि ने नाट्यशास्त्र मे अलद्कारो का शात्त्रीय विवेचन किया है। किन्तु, शास्त्रीय विवेचनो मे भी वैज्ञानिक विश्लेपण सवंप्रथम आचार्य भामह के काव्यालद्कार मे ही उपलब्ध होता है। भामह के विवेचन मे यह स्पष्ट पता चलता है कि उनसे पूर्व भी रसपरम्परा की भाति अलद्वारो की भी कोई एक निश्चित परम्परा थी और उसी के क्रमिक विकास के फनस्वरूप भामह ऐसा वैज्ञानिक ग्रन्थ लिखने मे समर्थ हो सके। भामह ने स्वयं अपने पूर्ववर्ती आचायं मेधावित् प्रभृति का उल्लेख वडे आदर के साथ किया है। ऐसा जान पडता है कि उस परम्परा का विकास भाषा की सूक्ष्म परीक्षा के साथ ही साध होने लगा था।

भामह के समय मे यदयपि अलकार और अलकाय का भेद स्पष्ट नहीं हुआ था। मनेको संस्कृत विद्वानों ने भी अलकारो पर अनेक ग्रन्थ लिने, पर इस क्षेन मे उनकी अपनी कोई मौलिक देन नही प्रतीत होती। जयदेव और विद्याघर के बाद अप्पप दीक्षित ने एक बार पुन. अपनी सारी शक्ति एकनित कर कुवरायानन्द और मियमीमाठा की रचना की। किन्तु, इस दिशा मे उनका यह सत्प्रयत्न भी अलंकार-सम्प्रदाय का पुमरुत्थान करने मे सफल न हो सका।

Page 26

( २६ )

इसके उपरान्त इस प्रयास की दृष्टि से एकबार संस्कृत साहित्य का गत्यवरोध प्रतीत होता है। भाषाव रोध की दृष्टि से इसे अवरुद्ध माना जा सकता है, किन्तु अलंकार परम्परा की दृष्टि से इसके विकास मे किसी भी प्रकार की बाधा उपस्थित नही हुई। सस्कृत से छूटते ही इस परम्परा को हिन्दी साहित्य मे रीति-ग्रन्थकारो ने अपनाई। इन हिन्दी रीतिकारो ने सस्कृत काव्यशास्त्रो को ही अपने ग्रन्थो का आधार बनाया। यही कारण है कि हिन्दी रीतिग्रन्थो मे किसी भी नवीन या मोलिक उद्भावना का परिदर्शन नही होता। फलत हिन्दी के अलंकार ग्रन्थो मे नवीनता या मौलिकता का सर्वथा अभाव ही रहा। अलकार के लक्षणो और उदाहरणो मे भी अधिकतर स्थलो पर संगति और एकरूपता नही हो सकी। कई कवियो ने तो लक्षण और उदाहरणो की अभिव्यक्ति मे बडी शिथिलता दर्शायी है। अत' हम निश्चयपूर्वक कह सकते हैं कि जिस चित्रमीमासा या कुवलयानन्द का पंडितराज जगन्नाथ ने इतना विरोध किया है, उसका प्रभाव प्राय हिन्दी के सभी ग्रंथो पर परिलक्षित होता है। किसी न किसी रूप मे इन दोनो का आधार लेकर ही हिन्दी के अलकार ग्रन्थो की रचना हुई है। हिन्दी के कतिपय ग्रन्थ तो ऐसे लगते हैं कि मानो अप्पय दीक्षित के ग्रन्थो के भाषान्तर मात्र हो। हिन्दी अलंकार के लक्षण तो इनके गन्थो से प्रभावित है ही, कही-कही उदाहरण भी इस प्रभाव से वंचित नही रह पाए हैं। इससे हम इम निष्कर्ष पर पहुंचते है कि हिन्दी अलंकार ग्रन्थो मे आज भी दीक्षित जी जीवित हैं। दीक्षित जी के अलकार ग्रन्थो के द्वारा ही हिन्दी मे मुक्तक-काव्य की श्रीवृद्धि हुई है। इतना ही नही, हिन्दी के काव्यशास्त्र की समृद्धि भी इस प्रभाव से असम्पृक्त नही कही जा सकती। बहुत संभव था, इसके अभाव मे हमारे हिन्दी साहित्य का यह अग अधूरा किवा अपूर्ण ही रह जाता।

चित्रमीमांसा की महत्ता

इस ग्रन्थ के नामकरण के सम्बन्ध मे दीक्षित जी ने प्राय. 'चित्र' शब्द को उसके अर्यगीरव की दृष्टि से ग्रहण किया है। क्योकि यह शब्द ही ग्रन्थ की सम्पूर्ण उद्भाव- नाओ और सम्भावनाओो को प्रकट करता है। यो इस शब्द के कोषगत अर्थों मे विचिन्र, अनेक, प्रभूत एव उत्कृष्ट जैसे अर्थों का ध्यान भी दीक्षित जी को अवश्य होगा। किन्तु अवरकाव्य चित्रकाव्य का अर्थ कहने मे उनका लक्ष्य 'उत्कृष्ट' की ओर अवश्य होगा। क्योकि यह ग्रन्थ के आन्तरिक धर्म को प्रकट करनेवाला अर्थ है। उत्कृष्टता इसका साधनापक्ष एव अवरकाव्य इसका व्यवहारपक्ष है। अतः चित्रमीमासा नाम की सूपयुक्तता स्पष्ट है।

Page 27

( २७ ) परम्परा से संस्कृत-साहित्यालोचन मे 'चिन्न' और 'चिनमीमासा' की चर्षा वो रपटीले तौर पर चल चुकी है। किन्तु औसत दर्जे के विचारक और पाठक इनकी यथार्थ अर्थप्रतिपत्ति से परिचित नहीं है। चित्रकाव्य की परिभाषा, नर्यंव्याप्ति तीर व्यपदेश निर्धारण कुछ कठिन इसलिए भी है कि इसकी व्यापकता की सीमाएँ गंस् त साहित्य के कई सुप्रतिष्ठित ग्रन्थो मे निर्धारित हो चुकी है, यद्यवि मेरी छोटी बुद्धि मे अभी भी वह स्पष्ट नहीं है, दूसरे इस चित्र शब्द के अत्यन्त प्रचलन ने इसके प्रति हर- दर लोगो की जिज्ञासा कुण्ठित कर दी है। फिर भी 'चित्र' की परम आज के निरग- प्रिय युग मे आवश्यक है। 'चित्र' को समझे विना 'चिनमीमासा' की आलोचना करनेवादे श्रद्धालु मीमासक तो विधेयाविमर्श के चक्कर मे है ही। परीक्षापाव्व मे निर्धारित अश को परीक्षा की वैतरणी संतरणार्थ ग्रहण करनेवाले जिज्ञासु पाठक तो उसका म्मरण भर ही कर लेते है। अत. प्रस्तुत भूमिका के अंश मे चित्र और चित्रकाव्य के महत्व से कुछ सधे-वंधे ढङ्ग से समझने की कोशिश की गई है। चित्रकाव्य के ५ मूल तत्त्व है - कल्पना, विचार, भावना, शैली या अलद्वार और तोप। १. कल्पनातत्त्व- कल्पना 'सम' की अवस्था है। जब कोई काव्यकार संतुलन की तुला पर एक तार अनुस्यूत निवेदित यथार्थ को उपस्थित करता है, तव उसमे स्वाभाविक 'कल्पना' का आधान हो जाता है। काव्य सत्य के इस काल्पनिक स्तर को स्वायत करना प्रत्येक कवि के लिए स्पृहणीय है, क्योकि जागतिक जीवन की दैनन्दिन उच्चावच स्यितियो मे उच्छृह्गल राग-द्वेषो को अनुशासित कर कूटस्थ तटस्थता का निर्वाह करनेवाला व्यक्ति ही विष पीकर अमृत दे सकता है। कल्पना ही किसी कवि की अमोघ शक्ति है और किसी भी कविकर्म मे इसकी चरम सार्थकता है। चित्रवैली मे विम्बविधान इसका स्वाभाविक फल है, क्योकि कवि-कल्पना द्वारा दृश्य जगत को नवन्नवत्प प्राप्त हुआ करते है। इसके आधार पर कवि अमूर्त को मूर्तरूप मे और नीरम वातावरण को सरसरूप मे उपस्थित करने मे सफल होता है। इसी प्रकार कल्पना की सहायना से वह भूत अथवा सविष्य की घटनाओ को भी वर्त्तमानकालीन घटना की भानि चित्र रूप मे उपस्थित कर देता है। चित्रकाव्य मे उपमेय अधवा प्रसुत े ए उपमान अथवा अप्रस्तुत की खोज इसी कल्पना की देन है। जतः स्पष्ट है कि 'वित्ृष्टि' किसी भी काव्य का अनिवार्य धर्म है। इसके अभाव मे ही काव् की सरसना वाबिन होनी है। आमतोर पर भासित होनेवाली चतुदिकव्याप्त यथार्च के बीच एक जिपी हुई निरन्ता करपना है, जहाँ मानव हृदय की उन्मुक्त अन्तरनुभूतियों का एकान्तर निवान है। जो भी कलाकार इस वैयक्तिक अथवा वर्गीय परिचि से ऊपर एक व्यापक किविन दिसर

Page 28

( २८ )

के आलोक को अपनी कृतियो मे सन्निविष्ट कर सामान्य मानवता की भावभूमि मे विचरण करता है, वह प्रथम कोटि की चित्र-सृष्टि का नियन्ता होता है।

चित्रसृष्टि के कल्पना-तत्त्व का दूसरा छोर परम्परा से सम्बन्धित है, क्योकि प्रत्येक परम्परा के पास एक सुपरीक्षित और सुरक्षित पद्धति होती है, जिसके ग्रहण से चित्र की कल्पना सुलभ हो जाती है। किन्तु, इसी ग्रहण के साथ वर्जन का एक पहलू सटा है। जहाँ प्रत्येक चित्रस्रष्टा के लिए परम्परा से कुछ ग्रहण करना आवश्यक है, वहाँ कुछ अशो मे उसका परित्याग करना भी अत्यावश्यक है। वह इसलिए कि प्रत्येक परम्परा विगत युग की एक चित्रसृष्टि होती है। फलतः उसमे चिन्तन की नई विधाओ, देश और समाज की अत्याधुनिक आवश्यकताओ तथा जनमन की नवीन अभिरुचियो और प्रवृत्तियो का आकलन अथवा प्रतिफलन नही रहता है। चित्र-सृष्टि के लिए रूढि और गतानुगतिकता सवाधिक वाधक हैं, क्योकि किसी भी चित्र की सिसृक्षा सत्य के अनुद्घाटित क्षेत्रो का अन्वेषण है। उसके लिए चर्वितचर्वण के बल दे अनुसन्धित्सा की आवश्यकता है चित्र सृजन की प्रक्रिया ऋणात्मक और उधारशीला न होकर भावात्मक तथा निर्माण- त्मक है। यही कारण है कि तथाकथित अवरकाव्य के नखशिख वर्णन, सरापा, षड्ऋतुवणन, कवि समय और कवि प्रसिद्धियो की लीक पर चलनेवाले माहिर कवियो की वागुरा मे फँसकर कोई परम्पराचेतनाग्रस्त निम्नस्तरीय रसिक क्षणभर के लिए भले ही वाहवाह कह उठे, किन्तु, उससे किसी चित्र-क्षुत्क्षाम पाठक की अन्तर्वृत्तियो का उन्मेष कदापि नही हो सकता। इसलिए चित्रस्रष्टा शायर के लिए 'शूर' और 'सपूत' की तरह न्यूनाधिक मात्रा मे 'लीक छोडकर' चलना कदाचित् आवश्यक है। अतः जो आलोचक पुरानी परम्परा का एकान्त अनुसरण करता है, वह समाज के प्रगतिशील तत्त्वो का पक्षधर न रहकर प्रतिक्रियावादी और पुराणपन्थी हो जाता है। इस अभिशाप से बचने के लिए चित्रसृष्टि पर विचार के पूर्व आधार स्वरूप विचारतत्त्व का वारीक अध्ययन आवश्यक है।

२. विचारतत्व-

विचारतत्त्व से अभिप्राय चित्रकार की विशिष्ट चिन्तनधारा से है। इसके अभाव मे चित्रकाव्य मे स्थायित्व का समावेश संभव नही हो पाता। वस्तुत कल्पना और चित्रण की भाति चित्रकाव्य मे स्वस्थ चिन्तन का भी अनन्य महत्त्व है। चित्रकाव्य मे विचारो का जिस रूप मे समावेश किया जाता है, वह यथार्थ से किन्चित भिन्न होता है। जहां दर्शनशास्त्र मे यह प्रतिपादन जटिल सूत्र शैली मे होने के कारण प्राय दुर्वाध रहता है अथवा तथाकथित उत्तम या मध्यम कोटिक काव्य मे व्यन्जना या लक्षणा का माध्यम रहने से अर्थग्राह्यता दुरूह रहती है, वहां चित्रकाव्य मे बौद्धिक

Page 29

(२६)

चिन्तन का समावेश भी सरस चित्र मे किया जा सकता हे। इन विषय मे यह भी द्रष्टव्य है कि विचारों को जनता तक पहुँचाने का सर्वोत्कृष्ट माध्यम भी वही चिय लन्य है, क्योकि सरस चित्रकाव्य का सम्पर्क जटिल व्यन्नयप्रधान तथाकथित उत्तम काव्य की अपेक्षा जनसामान्य से अधिक रहता है। अतः यह स्पष्ट है कि काव्य के प्रभेदो मे चित्रकाव्य का निजी प्रभाव होता है. किन्तु इसे भी यदि लक्षणा-व्यन्जना के अनुस्बूत तारो से बोझिल बनाने का प्रयत्न किया जायगा तो स्वभावतः इसमे भी प्रेषणीयता का गुण कुछ अशो मे क्षीण पड जायगा। यहः सरल-स्वाभाविक प्रेपणीयता ही चिपसाच्य के शब्द और अर्थ को जोडने वाली शृद्धलाएँ है। एक सारंग के लिए दिशाज्ञान के निमित्त जो महत्त्व मेरीनर्स कम्पास का है, वही महत्त्व चित्रकाव्य के लिए कवि के समक्ष उपयुक्त शव्दार्थ सकलन का है। अन्ततोगत्वा प्रत्येक चिन्नव्रष्टा युगधर्म का प्रस्तीता होता है, अत एव युगानुरूप शब्दार्थ ज्ञान की उपेक्षा उसकी चिनसृष्टि को पतु और पाण्डुर कर देती है।

३. भावनातत्व-

कल्पना और विचार के वाद चित्रकाव्य मे भावनातत्त्व विशेपरूप से ध्यातव्य है। यही वह स्थल है जहाँ चित्रस्रप्टा की क्रान्तदशिता प्रार्थनीय है। क्योकि वह व्त्तमान युग का वैतालिक होने के साथ-साथ आगत युग का हरकारा है। भावनाओ के आस्फालन से आशा का आविर्भाव होता है जो जीवन की मूरि है। इस आशा को जगानेवाली भावनाओ के माध्यम से अतीत अभिन्न और वर्त्तमान सजग चिनन्प्टा आगत के लिए एक आदर्श प्रस्तुत करता है। इस दृष्टि से प्रत्येक चिनत्रष्टा कवि कुछ अशो मे 'यूटोपियन' होता है। भावनाओ के संकेत पर ही वह बाहर भीतर के मधुर, तिक्त यथार्थों को कुरेद कर संभावित सत्यादर्शों की ऐसी आाडी तिरछी रेसाएं गीचता है, जिनके स्पर्श मे अनुभूत सत्य का सम्पूर्ण सन्दर्भ ही बदल जाता है। तात्पयं यह है कि भावनाओ के द्वारा ही चित्रस्रष्टा कवि होन और जर्जर वास्तविकताओ का काया- कल्प करता है। तभी तो वह इस जीविकाविहीन युग मे भी घनीभूत निराधा को चीर कर मनुष्य के शुभाशो पर आधारित रामराज्य का प्रसन्न आलोक पैदा करता है। इस प्रकार आत्मवोध और समाजवोध के स्वर पर सतत विकासगील मनुष्य के चिए भावनाओ के निर्देशन का मधुर महत्त्व है। भावनाओ के समीपी आवलन द्वारा ही चितसष्टा कवि वह युगपय्र तैयार करता है, जिसपर मम्पूर्ण समाज की विहागमान प्रवृत्तिया अनुशासन की शृहला मे बँधकर चलनी है। इसनिये फोई भी वियवटा व तंमान का विधेयवान ही नही होता, बल्ति वह एक वाक्वघंस्व्री नेता की तरह भागत- युग का मन्तव्य पत्र (मेनिफेस्टो) भी तैयार करता है।

Page 30

( ३० )

४. शैली : अलङ्गार- चित्रकाव्य के प्रमुख पांच तत्त्वो मे शैली या अलद्धार का चौथा स्थान है। चित्र मे काव्यात्मक सवेग का महत्त्व तब घटता है, जब उसकी शैली या आलक्कारिता को हेतूद्देश्य का स्थान दे दिया जाता है। सचमुच चित्रकाव्य मे शैली या अलद्वार की केन्द्रीय सार्थकता नही, उसका पारिपाश्विक महत्त्व है। वह इसलिए कि शैली और आलक्कारिकता के अवलेप-आवेष्टन से चित्रकाव्य मे ग्रथित अन्त्वृत्तियो और राग रुचियो का उच्छ खल निदर्शन नही, यथायोग्य नियमन हो जाता है। किन्तु, जब नैतिकता ही काव्य का निकरष बन जाती है, तब सही चित्राङ्कन का मार्ग अवरुद्ध हो जाता है, और उग्रतर भावसत्यो के आवेग सवेग की मार्मिकता पकड मे नही आ सकती। जैसे युद्ध- वीर कर्ण के चरित्र पर लिखे गये काव्य पर विचार करते समय एक नैतिक विचारक कर्ण की कानीनता और युद्ध छलपर ही विचार करता रह जायेगा, जब कि युयुधान कर्ण की वंशगत आभिजात्य को चुनीती देने वाली ऐसी पौरुष समर्थ दर्पोकिति :- 'सूतो वा सूतपुत्रो वा यो वा को वा भवाम्यहम्। दैवायतं कुले जन्म मदायतं तु पौरुषम् ।' उसकी आखो से यो ही गुजर जायेगी।

५. तोष-

चित्रकाव्य का अन्तिम और अत्यन्त महत्त्वपूर्ण तत्व तोष है। तोष मे ही आनन्द का समावेश हो जाता है। इसी आनन्द तत्व के कारण चित्रकाव्य का माध्यम मधुर हुआ करता है। यहाँ ही 'कान्तासम्मित' उपदेश को सर्वाधिक महत्त्व मिलता है। चित्रकाव्य का उद्देश्य कभी कभी अलद्ारमूलक होने के कारण, किञ्चित् कटठु हो जाता है, किन्तु, उसका वाणी-विधान एवं आख्यान गठन सर्वदा रोचिष्णु और आकर्षक, अत सुखद हुआ करता है। भारतीय अध्यात्म-चिन्तन मे आनन्द तत्त्व का परम महत्त्व है और इसी तोष के सन्निवेश के कारण चित्रकाव्य के आच्छादन, प्रतीक-विधान अलद्धार- योजना, विन्यास कोशल, प्रेषणीयता और उदात्तीकृत भाव के समन्वित प्रभाव का आकलन पाठको के लिए अधिक रोचक होता है। काव्यात्मक चित्रसृष्टि के लिए सकेतित ततत्वो के उपर्युक्त उल्लेख से स्पष्ट है कि चित्रसृष्टि का अन्तर्गत सम्बन्ध कारयित्री प्रतिभा की सीन्दर्यानुभूति से है। जिस कवि की सौन्दर्यानुभूति जितनी गहनतर, अतलस्पर्शिनी और सानुपातिक समवाय होगी, उसकी चित्रसृष्टि उतनी ही महत्त्वपूर्ण एवं मूल्यबहुल होगी। पाठक अथवा आलोचक के साथ चित्रकाव्य का अब तक सापेक्षिक महत्त्व रहा है।

Page 31

( ३१ )

चियकाव्य के मूल्याद्धन मे निमस्रष्टा कलाकार की तग्ह मूल्यान्ननकर्ता के भी जनेर दायित्व है। वस्पुत. चित्र किसी वस्तु अबवा भाव के प्रति एक गमग्र दृष्टि है। वनः दृष्टि की इस समग्रता को समझने के लिए मूल्याकनकर्ता के पाम समुनित रगगवेदना, काव्यवस्तु का अनुवन्ध सन्दर्भज्ञान, आकलन-कौदल, और अवछवियो की उद्घाटन- क्षमता का रहना नितान्त आवश्यक है। इसकिए चितकाव्य के समुचित मूल्तारन के लिए चिय्रस्तरष्टा और मूल्याकनकर्त्ता की पट्ठता का तुत्य योग चाहिए। रो हविविध दायित्व के कारण चिनकाव्य का महत्त्व अब तक कालिक और परिवेशसापेक्ष रहा ने। परिवतित युगसत्य का पुरस्कर्ता पाठक उसी कृति के लिए एक नवीन प्रयित पय पर चित्रकाव्य का ग्रहण अभियान करता है। एक इतर सास्कृतिक स्तरस्थिति ण व्यक्ति तदर्थ नवीन चिश्रसरणियो का ऊहात्मक अन्वेपण करता है। साराण यह है कि चिनकाव्य के मूल्याकन का मानदण्ड सवथा कालातीत, दष्टिकोणनिरपेक्ष और स्थितिमीय (static) नही होता है। उन्ही कृतियो का मूल्य अपेक्षाकृत स्थायी महत्त्व रसता है, जिनमे आगत युगसत्यो का 'अग्रवादीमंगलस्तवन' रहता है अथवा मानव के मूठ मनोभावो का रागात्मक स्तर पर सफल अकन रहता है। यही कारण है कि वाल्मीकि की शिवैपणा और लोकभावना तथा रवीन्द्रनाथ ठाकुर की भाव-वर्णना मद्यावधि सम्पूज्य है और रहेगी।

यह मान्यता उचित प्रतीत होती है कि चित्रकाव्य सवथा और सवदा सोद्देश्य होता है। इतनी बात अवश्य है कि केवल सोद्देश्यता, उपयोगिता और सामाजिक परिषद् को दृष्टिगत रखते हुए ही चित्र की सीमा निर्धारित कर 'इदमित्थम्' नही कहा जा मकता है। चित्रकाव्य की सत्ता अवर काव्य के अतिरिक्त भी है। इनके कई आयाम आधुनिक दृष्टि मे मनोवैज्ञानिकता से सम्पृक्त है। क्योकि, कभी-कभी इसका सम्बन्ध अलंकारपरक किसी वहिरनिष्ठ वस्तु की अपेक्षा छायावेष्टित रहस्थलो की निगूडताओ से अविक रहना है। ऐसी अवस्था मे चित्र का आधार हमारी इस अन्तरचेतना का नि.श्रेयण है, जो हमारे मूल व्यक्तित्व की पीठिका वनी रहती है। किन्तु, कुछ आलोचक ऐमे है कि चिय -. काव्य के व्यावहारिक आलोचना के धरातल पर उतरते-उतरते अपने को कलापनगत सीछव, मर्थविशदता, शब्द-विस्तार, उक्ति-चमत्कार और नाद-सौन्दर्य की प्रेषणीवता तक ही सीमित कर लेते है। फलत चित्रकाव्य का मूल तत्व उपेक्षा-लुंठित हो जाता है। वास्तविकता यह है कि चिनकाव्य रुरपी सिक्के के लिए चियनृष्टि हो Gold deposit है। जब कि उसके कलापक्ष और भावपक्ष का कमश Cash Value और Intrinsic Valuc से अधिक महत्त्व नही है। यदि अलंकार नमवेदनाओ की भूमिका मे केशन कलापक्ष को महत्त्व दिया जाय, तो लोलिबराज के वैद्यक की जनेकपंतिया उत्टष्ट पाष्् कही जा सकती है। किन्तु असलियत यह है कि सुष्ठ वाणीविधान और प्रज्ु पट्ट उपमा

Page 32

( ३२ )

उत्प्रेक्षा योजना से परे मूल्यवान चित्रकाव्य की स्थिति जागर्तिक तत्त्वो, आध्यात्मिक निष्ठाओ एवं नवोन्मेपशाली प्रेरणा केन्द्रो मे निहित है। यही कारण है कि इन पक्तियो- 'यद्दक्ताना सुखमय' संसारोऽप्यपवर्गति। तं शंभुमभजन्मत्यंश्चञ्चेव स्वहिता कृते ॥' -तथा वामन के अलंकार ग्रंथ मे उद्धृत राजशेखर की 'काव्य-मीमासा' के निम्नाकित पद्य-

मा भे शशाङ्क मम सीधुनि नास्ति राहु: खे रोहिणी वसति कातर कि बिभेषि। प्रायो विदग्धवनिता नवसङ्गमेषु पुसा मन' प्रचलतीति किमत्र चित्रम् ।।' -की अपेक्षा कालिदास की ये पक्तियाँ चित्र-सृष्टि की दृष्टि से अधिक सम्पन्न है- 'उपाददे तस्य सहस्ररश्मिस्त्वष्ट्रा नवं निर्मितमातपत्रम् । स तद्दुकूलादविदूरमौलिरबभौ पतद्रङ्ग इवोत्तमाङ्गे। उपयुंक्त पंक्तियो की तुलना मे 'रघुवंश' के षष्ठसर्ग का प्रत्येक छन्द-बध अधिक चित्रगरिष्ठ और सशक्त है। क्योकि उसमे मन सवेदनाओ के कोमल-पोषण की सम्पीड्यता मात्र ही नही, बल्कि 'शिवेतरक्षति' का उदग्र उद्घोष भी है। आत्मनिष्ठता का आग्रह रखने वाले आलोचक पंडितराज जगलाथ, आनन्दवर्द्धन, मम्मट एव विश्वनाथ प्रभृति चित्रकाव्य का संबन्ध आलंकारिक अनुभूति से जोडते हैं, किन्तु, वास्तव मे उसका सम्बन्ध सौन्दर्यात्मक अनुभूति से है। चूँकि चित्र-साधन एक वस्तु सत्य है, इसलिए चित्र-सृष्टि 'अहम्' की अपेक्षा 'इदम्' से और 'स्वान्त" की अपेक्षा 'परान्त' से अधिक सम्पृक्त है। अत. वैयक्तिक कुण्ठाओ और अभिरुचियो से आयुक्त चित्रग्रहण की आतुरता व्यापक समाज-बोध के समक्ष परासूत और मद्धिम हो जाती है। प्रत्येक कवि चित्रस्रष्टा नही होता है। अधिकाश कवि अलकार की पृष्ठभूमि पर समवेदनाओ तथा अतर्वृत्तियो का द्रुति विस्तार तक ही कर सकते हैं। अत. चित्र-ग्रहण की अपेक्षा चित्रोद्भावन के लिए अधिक प्रातिभ-अर्हता, साधन और संश्लेषण शक्ति की आवश्यकता होती है। चित्र-सृष्टि एक ऐसी प्रक्रिया है जिसका 'अथ' विश्लेषण से निगत होता है और जिसकी 'इति' सश्लेषण मे अन्तर्भुक्त होती है। अतः केन्द्रगामिता उसका धर्म है और प्रेरणामूलक प्रभावान्विति उसका लक्ष्य। वैचारिक प्रौढ़ि के साथ वह समरूप वेगवती है। प्रत्येक कलाकृति पर 'चित्र' का ऋजु प्रभाव पडता है। 'चित्रो' का ग्रहण-वर्जन ही जीवन-रुचि की परिष्कृति का नियामक है। वह चिकित्सा

Page 33

( ३३ )

से ऊपर विवेक और अभिनिवेश से परे सवरण का संस्थापक है। चित्र के ही मम्पगं से कोई काव्य श्रेव्य और वरेण्य हो जाता है। और इन चित्र-सरणियो का भी अत्यधिक महत्त्व है, जिनमे सत्प्रेरणाओ की प्रोक्षित धारा हे, जिनके ग्रहण से मनुष्य मे शेष मृष्टि के साथ तादात्म्य स्थापित करने को विद्युन्निभ शक्ति जगती है। यही कारण हे कि मुमुक्षु कवियो की आमुष्मिकता से परिप्लुत मरणकामी कविताओ से अधिक वे कविताये आशसनीय है, जिनमे 'कुर्वनेवेह कर्माणि जिजीविपेत् शतं समा.' मे मिलती- जुलती क्रियाशील जिजीविपा की सवनतम अभिव्यक्ति है।

निष्कर्ष यह है कि चित्रकाव्य व्यापक महत्त्व-हष्टिकी एक प्रचलित मान्या है, जिसकी लब्धि के लिए संतुलित परिप्रेक्षित, प्रेरणामूलक त्वरा एवं पूर्वग्रहमुक्त ग्राहिका शक्ति 'परम लिप्सितव्य' है।

अप्पय दीक्षित का काव्यात्मक धरातल

आचार्य दीक्षित का जन्म एक सुशिक्षित ब्राह्मण परिवार मे हुआ था। अच्छे परि- वार मे जन्म ग्रहण करने के कारण ही उनकी शिक्षा-दीक्षा मे किसी प्रकार की कठिनाई नही हुई। उन्होने साहित्य और दर्शन का अध्ययन किया। दर्शन शास्त्र के गहन अध्ययन के पश्चात् वे काशी आकर साहित्य के गूढतम विषयो के सम्वन्ध मे चिन्तन करने लगे। इसके लिए उन्होने काशी को ही उपयुक्त चुना। यहाँ उनका मन्य लेखको तथा कवियो से सम्बन्ध जुटा। जैसा कि पहले कहा जा चुका है, वे निश्चित रूप से अपने से पूर्ववर्ती साहित्य से अधिक प्रभावित हुए। विशेषमप से वे तत्ववादी आलोचना से अंधिक प्रभावित थे। 'चित्रमीमासा' मे दीक्षित जी का लक्ष्य पाठक को आनन्द देना ही नही, बल्कि उनके समक्ष अपने युग की पृष्ठभूमि में चित्रकाव्य की शुप्क समस्याओ के रहस्य का उद्घाटन करना था। यहां दीक्षित जी चिनकाव्य की एकरूपता से विद्रोह करते दिखाई पडते है। एक ओर तो वे जिज्ञासु चित्रकार को तरह अपनी शक्ति का आयोजन करते है, दूनरी ओर अभिन्ञ की तरह अलंकार शान्त्र की दुरूह दुनियां मे विचरण करते दिखाई देते है। उनकी चिनमीमासा मे चिमकाव्य की विवेचना स्पष्ट रूप से अंकित है। एक ओर वे चिन की मीमाना करते है, दूनरी ओर चित्रविधान की योजना करते दीखते है। यह स्पष्ट म्प से कहा जा सकता है कि दीक्षित जी ने अपनी चित्रमीमासा मे चिय-तौन्दर्य का ध्यान छोड़कर कठोर यथावंवादी की तरह सारे चिनो को ठोस रूप मे रखने की ोशिश की है। चिनमीमांगा मे उन्होंने बहुत से ऐसे चिनो की योजना की है, जो सामान्यत पकउ मे नहीं आती। चिन-विधान के सम्बन्ध मे उनकी धारणा है कि एक चिन दूमरे चित से इन प्रकार नम्तृक रहे कि पाठको को उस कविता के विदेष स्वरूप की व्यवस्यित जवगति मिल सहे। 5 चि० भू०

Page 34

( ३४ )

चित्रमीमासा को पढते समय अलंकार के फलक पर उनके प्रत्येक चित्र-विधान को ध्यान मे रखना पडता है। कोई भी पाठक ऐसा तब तक करता रहता है, जब तक उसे सारी चीजे पकड मे नही आ जाती। इस तरह चित्रमीमासा की परीक्षा मे साधा- रणतः पाठक भूल नही करते और अपने मस्तिष्क के जोर से वे एक ऐसी कडी का निर्माण करते है जिसके सहारे चित्रमीमासा की गहराई तक पैठने मे उन्हे बडी आसानी होती है।

दीक्षित जो की दृष्टि मे चित्र-विधान उस रूप मे होना आवश्यक है, जिससे कवि की विशद भावनाओ को एक व्यवस्थित अभिव्यक्ति मिल सके। विशेपकर उस भावना का स्पष्टीकरण तो चित्रो के द्वारा ही होना आवश्यक है, जो कवि का विशेष लक्ष्य रहा है। यह निश्चित रूप से कह सकते हैं कि दीक्षित जी को चित्र-मीमासा के कार्य मे आशातीत सफलता मिली है। 'चित्र-मीमासा' की योजना मे कितनी गहराई तक चे जा सके है, इसे कोई भी तटस्थ आलोचक देख सकता है। प्रत्येक युग की परि- चर्तित भावनाओ, परिवर्त्तन की प्रक्रियाओ और बदलते हुए मापदण्डो का पूर्ण ज्ञान रख कर ही चित्रमीमासा की रचना की गई है। चित्रमीमासा मे चित्र की व्याख्या दीक्षित जी ने इसी अर्थ मे की है। उनकी विचारधारा विभिन्न फलक पर एक दूसरे के साथ इस तरह जुडे हुए हैं कि हम दीक्षित जी की मीमासा को तर्कपुष्ट कल्पना कह सकते हैं। इसी अर्थ मे सस्कृत साहित्य के अन्य आलोचको से वे भिन्न प्रतीत होते है, जो अपनी आलो- चनाओ मे बहुतेरी भावनाओ को कल्पना-शक्ति की नमनीय भीड के सहारे एक सीध मे बाँधने की कोशिश कर रहे हैं। वे अपनी कई प्रकार की संकर भावनाओ को चलपूर्वक एक साथ नियोजित करते थे।

Page 35

आत्म-निवेदन उपयुंक्त विवेचन मे विपयपरिवर्तन के साथ ही साथ यत् तम तैली भी बदउनी गई है उसका निदान-अवसर, स्यिति, मनोभावना एव व्यवस्थाएँ रही हैं। एक बार एक साध बैठकर यह भूमिकाखण्ड समाप्त नही किया जा सका-अवसर और परिन्यि- तियो के अनुकूल ही इमका निर्माण हुआ है। फलत मेरी परिवर्तित परिस्थिति का प्रभाव भूमिका मे परिलक्षित हो उठा है।

सुधा व्याख्या पण्डितराज जगन्नाथ ने अपने रसगगाधर मे चित्रालंकार को निम्नकोटि का अलंकार मानकर अप्पय दीक्षित विरचित 'चित्रमीमासा' को निष्प्रभ करने की अयक चेष्टा की है। उपयुंक्त समकालीन दोनो महाकवि सुरभारती के शिरोमुकुट कवि माने जाते है। भारतीय सस्कृत साहित्य दोनो से गर्वित है। दोनों मे परम्पर अमर्प होने का निदान अनेक सुनने मे आता है (द्र० भृ० पृ० १६)। वह स्वाभाविक भी हो सकता है। महाकवि भारवि ने भी इस स्वाभाविकता की पुष्टि की है- 'किमपेक्ष्य फलं पयोधरान् ध्वनत प्राथयते मृगाधिप.। प्रकृति. खलु सा महीयस. सहते नान्यसमुन्नति यया॥' -किरात जोधपुर के महामनीषी कवितार्किक श्री धरानन्द पण्डित ने चित्रमीमासा की अपनी 'सुधा' व्यास्या मे अप्पय दीक्षित के मनोगत भावो की विशद रूप मे व्यास्या करते हुए पण्डितराज के प्राय सभी आक्षेपो का ननु-नच से निराकरण कर दिया है, यही इस व्यारया की सबसे बडी विशेषता है। 'सुधा' व्यास्यायुत 'चित्रमीमासा' का सम्पादन सवप्रयम वाराणसेय सस्तृत विश्व- विद्यालय के प्रतिठिन विद्वान् श्ी पं० कालिकाप्रसाद जी शुक्ल ने भगीरय प्रयत्न से किया है। यह उनका प्रयास सवंथा स्नुत्य है। प्रस्तुव संस्करण की 'सुधा' व्याग्या की मूलभिति शुक्लजी सम्पादित संस्करण ही है। इस महोपकार के लिए में उनका असकृत् माभारी हैं। दिन्दी व्याख्या विश्न की भाषाओ मे संस्कृत ही एक ऐनी विशिष्ट भाषा है, जिसमे दाब्द-निर्माप की अपरिमित क्षमता और गाधारण योग्यता है। उपसरगं औौर प्रत्ययो का भेद कर

Page 36

(३६ ) वह एक मूल शब्द से सकडो शब्द बना सकती है और सबसे एकरूपता बरत सकती है। यह आज की सभी समुन्नत भाषा-गगाओ की गगोत्री है। अत इस भाषा मे लिखित लक्षण ग्रन्थो की व्याख्या हिन्दी मे करना कितना कठिन है, इसका कोई भुक्त- भोगी विद्वान् ही अनुभव कर सकता है। अनुवादक जिस ग्रन्थ का अनुवाद करता है, उसके सामने सबसे कठिन समस्या यह उपस्थित होती है कि वह जिस पाठकवर्ग के लिए अनुवाद करता है, उसके मानसिक, बौद्धिक और भावात्मक धरातलो के उत्कर्ष मे समन्वय स्थापित करे। 'कूपर' ने 'होमर' का अनुवाद करते समय कहा है- "My Chief boast is that I have adhered closely to the original." डॉ० माचवे के अनुसार-'अनुवाद एक कला है। वह निरा भाषान्तर नही। वैसा ही निरी भाव-छाया पर आधारित स्वतन्त्र रूपान्तर नही। वह तन्त्र विद्या के परकाय प्रवेश जैसा कठिन कार्य है। वह न निरा बहुरूपियापन और न निरा किसी अन्य भाषा का मुखीटा ओढ लेना ही है।' सस्कृत मे अप्पय दीक्षित के चित्रमीमासा जैसे अर्थ-गर्भ ग्रन्थ की हिन्दी व्याख्या करते समय अर्थवत्ता बोध के अवस्थान की समस्या ही सर्वप्रथम अनुवादक के सामने उपस्थित होती है। येनकेनोपायेन यदि इस समस्या का निराकरण भी हो जाता है, तो मूल रचना के सर्वाङ्ग बोध के लिये, उसके सम्प्रेषण की समस्या उपस्थित होती है। इस समस्या के समाधान मे शब्दो का पूर्णज्ञान, उनकी विशिष्ट-प्रवृत्तियाँ, रूढिर्या, परम्पराएँ और सशक्त सस्कार के ज्ञान की अपेक्षा होती है। रचना या रचनाकार के प्राणो को हृदयगम करने के लिए भाषा के हर शब्दविन्यास और ध्वनि-प्रतिमान के समग्र सपेषण की सफलता मानी जाती है। पता नही, इस कसीटी पर प्रस्तुत हिन्दी व्याख्या कहाँ तक खरी उतर सकी है।

भारती काशी मे रसगंगाधर अध्ययन के समय से ही दीक्षितजी की 'चित्रमीमासा' पर पण्डितराज के आक्षेपो को पढ़कर उभय महाकवियो के विचारो का हिन्दी भाषा मे तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत करने की भावना जामत थी। इसके लिए मैं सतत अध्ययनशील रहकर कुछ लिखता भी रहता था। एक समय श्रद्धेय डॉ० जयमन्त जी मिश्र, अध्यक्ष सस्कृत विभाग, बिहार विश्वविद्यालय के समक्ष मैंने अपनी एक रफं पाण्डुलिपि उपस्थित की। डॉ० साहब ने सर्वतोभावेन उसका समर्थन किया और कहा- 'इसके प्रकाशन के लिए 'काशी मिथिला ग्रन्थमलि' के सुप्रस्यात सम्पादक, सुरभारती के मटल वरर्ती श्री पं० रामचन्द्र जी झा से मिलिये। अर्थविमुख उन तपस्वी विद्वान् का स्वारा जीवन इसीमे व्यतीत' हो रहा है। 'चोखम्वा प्रकारशेन' के मााध्यमे से उन्होंने

Page 37

( ३७ )

सैकडो दुलंभ ग्रन्थों का प्रकादन किया मर करवाया है। तदनुमार मैंने भाजी से गम्पक स्थापित किया। साजी चियमीमासा की पाण्डुलिपि को देसते ही उत्स्त हो उठे और उन्होने अविलम्ब उस पाण्टुलिपि को प्रेस मे देकर बन्वस्व करवा दिया। काशी में अव्ययन के समय से ही जाजी का स्नेह और वात्सल्य मेरे ऊपर व्याप्न रहा है। न जाने क्या समझ कर उन्होंने मेरी इन प्रघम कृति का नाम 'भारती' (सरस्वती) रख दिया। चित्रमीमासा के माध्यम से मैं साजी के अधिक निकट होने लगा और उनके आदेशानुसार अनेको वार मुझे काशीपतत भगवान् पांकर के दशन करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ और हो रहा है। एक दिन झाजी का एक आकषंक छपा निमन्न्रण पत्र मिला, उसमे लिसा या-

'श्रीमोहनाशुल लिताजगदीशचन्द्रा- त्नियत्सुधासु वसुधा-सुपमासमृद्धौ। 'श्रीभारती' परिणयन् प्रियमैथिली न कल्याणमाकलयता 'मवधेश' एप: ।I'

X X X x 'वी एस-सी विस्यात वर तथा समधि समतूल। भेटत केकरहु पुण्य से वर वधूक ननुकूल॥ विना दहेजक पावि सुवर हर्षित मन हम सव। करव सुतक उपनयन सुता-परिणयन महोत्सव ।। माघमास सित पक्ष सुतिथि दशमी भृगुवासर। अपने आवि सवन्धु मुशोभित करी हमर घर ॥' मैंने मिथिलामही-मनीषी श्री साजी के मनोरव को अपना वरदान ही समझा। निमंत्रण पत्र के अनुसार ५ फरवरी १९७१ को मैं वाराणसी के प्रकण्ड विद्वन्मण्डली के समक्ष झाजी की द्वितीया दुहिता सौ० 'भारती' को अपनी प्रथम पुत्रवधू के रूप मे पाकर कृतकृत्य हो गया। आभार-प्रदर्शन काशी के लब्धप्रतिष्ट शाव्दिरुप्रवर पूज्यचरण श्री पं० शुकदेव जी क्षा, प्रधाना- चाय-डी० ए० वी० सस्कृत कालेज वाराणती, जिनके चरण-तल मे बैठकर मैंने शव्द- शास्त्र का वधावत् अध्ययन किया है तथा साहित्यद्पण, कादम्बरी लाटि अनेक महत्त्वपूर्ण चन्यो के सफल व्यास्याकार महामनीपी महर्षि गुरुवर श्री पं०कृप्णमोहन शान्त्री अध्यक्ष, रणवीर संस्कृत विद्यालय-कायी हिन्दू विश्वविद्याजय, का मेंअतिदाय सृतन हूँ, जिनके अमोघ आशीवंचन औीर दिग्ददांन से यह कार्य पूरा हुआ है।

Page 38

( ३ )

इस ग्रन्थ को सर्वाङ्गपूर्ण करने मे मुझे स्व० श्री पुरुषोत्तमवर्मा चतुर्चेदी तथा डॉ० 'हीरा' एवं डॉ० सत्यव्रत सिह आदि अनेक विद्वानों की कृतियो से प्रचुर सहायता प्राप्त हुई है, इसके लिये मैं उन मनीषियो का विशेष आभारी हूँ। 'भारती' व्याख्या की पाण्डुलिपि तथा संशोधित प्रेसकापी तैयार करने मे अपने ज्येष्ठ पुत्र चि० अवधेश कुमार (बी० एस-सी० के छात्र) ने जो सहयोग दिया है उसके लिए उसका भी आशिषाभिनन्दन करता हूँ। प्रस्तुत कृति के समापनपर मैं अपनी आत्मजा सी० अपराजिता (कक्षा ११) का भी अभिषेक करना नहीं भूलूंगा, जिसकी हस्तप्रज्वलित दीप-शिखा के आलोक मे तथा ईषद उद्ेलित व्यजन के सुखद समीरण मे एक माह के अन्दर ही इस कृति की 'अथ' से 'इति' हो गयी।, - प्रकाशक बन्धुओ की कृपा का जितना भी उल्लेख किया जाय थोडा ही होगा। चोखम्बा संस्कृत सीरीज आफिस तथा चौखम्बा विद्याभवन के प्रमुख संचालक बन्धुद्वय श्री बाबू मोहनदास जी गुप्त तथा श्री बाबू बिट्ठलदास जी गुप्त की कृपा इसी तरह चनी रही तो निकट भविष्य मे ही 'हिन्दी मुद्राराक्षस' और तदनु एक से एक दुलभ ग्रंथ प्रस्तुत करता रहूँगा। अन्त मे आज रक्षिकाबन्धन के इस पवित्र शवणी ब्राह्मण-पर्व पर मैं अपने विद्वान् पाठको के करकमलो मे रक्षासूत्ररूपी इस कृति को अर्पित कर शुभकामना प्रकट करता हूँ- 'येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबलः। तेन त्वा प्रतिबष्नामि रक्षे माचल मा चल ।' इत्यलम्।

'सन्त हंस-गुण गहहिं पय परिहरि वारि-विकार'

श्रावणी पूर्णिमा वि सं २०२८ विदुषां वशवद :- -जंगदीशचन्द्र मिश्र:

Page 39

विपय-प्रवेशः

: ग्रन्थारम्भप्रकरणम्

१ उपमानिरूपणम् ...

२ उपमेयोपमानिरुपणम् ... १५४

३ अनन्वयनिरूपणम्

४ स्मरणनिरूपणम् १८९

५ रूपकनिरूपणम्

६ परिणामनिरपणम् .. २३८

७ सन्देहनिरूपणम् ... २५९

भ्रान्तिम्निरुपणम् २७८

९ उल्लेख निरूपणम् २८६

१०. अपह्ुतिनिरूपणम् ... ३००

११ उत्प्रेक्षानिरूपणम् ३१३

१२. अतिशयोक्तिनिरपणम् .. ४०९

Page 40

विषय-सूची

विषया: पृष्ठांकाः

... ग्रन्थारम्भप्रकरणम् १-३२

मङ़लाचरणम् ...

काव्यसामान्यलक्षणम् ... द 0 ध्वनिकाव्यलक्षणम् .. १३

गुणी भूतव्यड्ग्यकाव्यलक्षणम् ... २३

चित्रकाव्यलक्षणम् ... २७

उपमानिरूपणम् .". ३३-१५२

उपमाया' सर्वालक्वाररूपताप्रतिपादनम् ... ३३

पराभिमतमुपमालक्षणम् ... ३३

विद्यानाथोक्तमुपमालक्षणम् ४२

विद्यानाथलक्षणप्रत्याख्यानम् ... ४४

स्वोक्तो चक्रवर्तिसम्मतिप्रद्शनम् ... ४४

रुद्रटमतस्यान्यथा व्याख्यानम् ... ५४

सरस्वतीकण्ठाभरणप्रतिपादितमुपमालक्षणम् ... ६६

तत्प्रत्या्यानम् ६७

... ६८

ग्रन्थकृदुपमालक्षणम् ... ६९

उपमाभेदनिरूपणम् ८६

काव्यप्रकाशकृतभेदप्रदर्शनम् १०९

उपमाया संक्षेपतस्त्रविध्यम् १३१

उपमादोषपरिगणनम् १३८

तदपवादप्रदशनम् ... १५०

उपमेयोपमानिरूपणम् ... १५४-१७६

प्राचीना भिमतोपमेयोप मालक्षणम् ... १५४

... १६४

अनन्वयनिरूपणम् .". १७७-१८८

प्रचीनाभिमतानन्वयलक्षणम् ... १७७

स्वाभिमितं तल्लक्षणम् ... १८२

Page 41

( ४१ )

स्मरणनिरूपणम् १८५-१९७

स्मरणालङ्वारलक्षणम् तदुदाहरणप्रतिपादनम् १८९

रपकनिरूपणभ् प्राचीनाभिमतर्प कलक्षणम् १९=

तत्खण्डनम् २००

भोजराजोक्तलक्षणखण्डनम् २०५

प्रकाशोक्तलक्षणखण्डनम् २१०

स्वमते रूपकलक्षणम् .. २११ प्राचीनाभिमतस्पकभेद प्रतिपादनम् २६७

उपमाभेद प्रतिपादनम् २२५

परिणामनिरूपणम् २३६-२५८

प्राचीनोक्त परिमाणलक्षणम् २३६

तत्प्रत्याख्यानम् २३६

स्वमते तल्लक्षणम् ... २४०

तद्भेदनिरुपणम् .. २४५ विद्याधरोक्तमुदाहरणम् २५०

तत्प्रत्याख्यानम् ... २५०

विद्यानाथकृतध्वन्युदाहरणप्रत्यास्यानम् . २५०

स्वमतप्रतिपादनम् .. २५२

चक्रव तिमतसण्डनम् ... २५४

ससन्देहनिरू पणभ् प्राचीनाभिमतं ससन्देहलक्षणम् २५९

तत्प्रत्यास्यानम् २६१

स्वमते तल्नक्षणम् २६१

भ्रान्तिम ननिरूपणम् २७८-२८५

भान्तिमल्लक्षणम्

उल्लख निरूपणम्

उल्लेसक्षणम् ... २८६

उल्लेसभेद प्रतिपादनम् ... २८६

Page 42

( ४२ )

अपह्नतिनिरूपणम् ... ३००-३१२

अपह्वतिलक्षणम् . ३००

प्राचीनोक्तलक्षण प्रत्याख्यानम् ३००

अपह्ुतिभेदप्रशंनम् .. ३०२

मतान्तरप्रदशनम् ३०६

उत्प्रेक्षानिरूपणम् .. ३१३-४०८

उत्पेक्षालक्षणम् ३१३

चक्रवर्तिदण्डिमतप्रमाणप्रदर्शनम् ... ३१५

स्वमते लक्षणव्यवस्थापनम् ... ३१७

दण्डयादिसम्मतप्रमाणप्रदशनम् ३३४

भेदप्रभेदप्रदर्शनम् ३३९

अलङ्कारसर्वस्वकृतभेदप्रदर्शनम् ... ३४९

विद्यानाथमते भेदप्रदर्शनम् ३५०

विभिन्नान्युदाहरणानि ... ३५१ उक्तोदाहरणेपु दोषप्रदर्शनम् ..

प्रकारान्तरेण भेदप्रदशंनम् 1 ३९०

अतिशयोक्तिनिरूपणम् ४०९-४२१:

अतिशयोक्तिलक्षणम् ... ४०९

तदुदाहरणम् ४१०

अव्याप्त्यतिव्याप्तिप्रदर्शनम् .. ४१२ चित्रमीमासा-श्लोकानुकमणिका ... ४२२ सुधाव्या ख्योद्वतरलोकानुक्रमणिका ... ४२३

Page 43

हिन्दो चित्रमीमांसा

Page 44

टीकाकर्त-मङ्गलम्

मन्दारहार-विगलन्मकरन्दमिश्र-

गीतामृतेन सह मोदकमाददानो मोदानवान् वितनुता गणनायको नः ॥। ( २ ) क्काप्पय्यदीक्षितवचो नितरा गभीर क्वाल्पश्रुतस्य मम दुर्ललितोऽभिलाषः। आहर्तुमिन्दुमवनीतलसस्थितस्य हस्तप्रसारणमिद निगदन्ति सन्तः॥ ( ३ ) दुर्बोधदीक्षितगिरो रुचिरार्थभाने भूयान् मनागपि नहि सवलन कदापि। इत्याकलय्य हृदि भारति ! सानुकम्प निष्कम्पमर्पय पद मतिमन्दिरे मे॥

निर्यद्-रसप्लवनपिच्छिलवर्त्म वाच- श्चिन्वन्ति येऽपि क्वतिनो निभृत प्रयातुम्।

वाधा विधूनयतु काचन मेघमाला ॥। (५ ) चन्द्रन्ति चेतसि कलां ललितानि सद्यो यत्पादपङ्गजरजासि रजोहराणि। अन्तःस्थितान्यपि तमासि वहिः क्षिपन्ति त 'कृष्णमोहन' गुरु सतत नमामि।।

Page 45

हिन्दी

चित्रमीमांसा

व्यास्याकार

श्री जगदीशचन्द्र मिश्र

Page 46

टीकाकर्तृमङ्गलम्

ॐ धीं घामप्रचेतिन्यै श्दव्रह्मस्वयंभुवे। भगवत्यै सरस्वत्यै भूयो भूयो नमो नमः ॥

( २ ) ज्ञान-विज्ञान-जीवन्ती सारिणी भयहारिणी। शरण से परं भूयादू मतिमाता सरस्वती।।

( ३ ) विद्याम्वुधिः क गम्भीरः क्वाय हीनप्रभो जनः । तरङ्गोत्तोलितस्य स्याः सहाया देवि मे सदा॥

(४) शिवाशिवतनूजोऽपि त्रिलोकीशिवकारकः । चक्रतुण्डोऽपि सुमुखो यस्तं वन्दे गणाधिपम्।।

( ५ ) चन्द्रन्ति चेतसि कला ललितानि सदयो यत्पादपङ्कजरजांसि रजोहराणि। अन्तःस्थितान्यपि तमांसि बहिः क्षिपन्ति त 'कृष्णमोहन' गुरु सततं नमामि॥।

Page 47

।। श्रीः ।। चित्रमीमांसा

विमलविमर्शोपेत 'भारती' हिन्दीव्याख्याविभूषित- 'सुधा' व्याख्यासमलङ्कता

अथ ग्रन्थारम्भप्रकरणम्

अभिवन्द चन्द्रशेखरमाद्य गौरीसख परं ज्योतिः। वितनोमि विपुलविपया विशदार्थामर्थचित्रमीमांसाम्॥ (भारती) सर्वप्रथम जिनये मन्तक पर चन्द्रमा ह तथा जो गारी के सखाह् ए्५ परम जयोनि स्वरूप , ऐसे भगवान गकर की वन्दना कार विपुल विषयों से सवल्ति विरतृन अर्भउन 'अर्थचित्रमीमासा' नामक ग्रन्थ की रचना करता हू। विमर्श-ग्रन्थ आरभ करने के पूर्व अ्रन्थकार ग्रन्थपरिसाप्ति-प्रनिवन्धक बिघ्नों का समूल उन्मूल्न करने के लिए अपने एकमात्र आराध्य नकर की रतुति कर रह ए, जो अ्रन्थकार्र और ऐसे काव्यात्मक ग्रन्थों की उपासना के नर्वथा योग्य।। कोई भी ग्रधकार वन्तु जथग भाव के सहारे काव्य-रचना करते देसे जाने ह। अभिया तो अभिव्यक्ति की सर्वसुन्भ होतीह एी, रक्षणा की पहुँच भी अलकारों को ही हनी है, भावों की मार्मिक अनिव्यकति याना की अनिवार्यना पर निर्भर है। यो तो यजना अभि यजनामान को अल्कार के आदर मे भग्स सुन्दर वना टेने की क्षमता ग्वा रसती हीह। अनकार उभयनिए है। अन उ आप वान्य-वम्नु अलकार कहे या व्यन्य-वस्तु अल्कार। दोनों हो न्धिति में अलकार की शक्ति प्नि की पृष्टभूनि पर अधिक वेधक सि होती। प्रन्तत मगनाचष्ण म इन तीनों का ममावेद किया गया है, जिस कारण ए्कतालीस अक्षरों का या हन्ट अरचमत्कार में अ्कार को पृष्टनृमि पर रनि- प्रतिपनियों ने परिपिर्ण नगीन समारोह ना आाकर्पक हो उटा है। नूदम्ध 'चन्द्रोकण' विवे मे यह अनित होता ह विभगसन पवर गा दगार स्वम्य i। सन रनोपयोगीवर्योंकि सजता का सगारी गव्पहो निर होता है। 'आदम'सष्द भी उपने तय पर्ववनानी नष्ो मे षिक मबषत्य है, त्योषि न्न कदने मे 'किय' या प्रयनिकत सनवानी, प्रातत्भ काये हे दिस्न विषानक दवों में बीच विस

Page 48

४ चित्रमीमांसा

विनाशक ही समझा जाता, किन्तु आदि शब्द से सर्वकार्यों के आदि कारण स्वरूप लहराते अर्थ से जैसे केवल मूत्तिमान विघ्न-विघातक स्वरूप ही आँखों में भासित हो जाता है। अर्थात् काव्य-स्वरूप के निरूपण में सभावित त्रुटि, ग्रथ-प्रतिपादन प्रकार में शिथिलता तथा सिद्धान्तस्थापन में असमर्थताजन्य विघ्नों का समूलोन्मूलन करने के लिए उन्हें आदेश किसी ने नही दिया, विवश नही किया, वल्कि, लोक-मगल की सहज इच्छा जैसे उनकी अपनी प्रकृति है, वैसे ही सभी कार्यों के आदि कारण होने के नाते ग्रन्थ परिसमाप्ति-स्वरूप कार्य में नियत्रक आदि कारण के रूप में यहाँ अभिव्यक्त हुए है। भगवान शकर के शृगारी-स्वरूप के पोषक दूसरा विशेषण 'गौरीसख' है। वैसे यह शब्द विशेष्य के समान जान पडता है। किंतु यहाँ यह विशेषण है। यह शब्द भगवान शकर के अनेक नामों में से एकनाम मात्र की भाँति प्रयोग में नहीं आया है। इसका कुछ विग्िष्ट तात्पर्य है। इसमें एक चमन्कारी ध्वनि है। काम देव का विध्वस करने के वाद ही गौरी के साथ भगवान शकर का पाणितग्रहण हुआ और उसके बाद ही गकर का नाम गौरीसखा पडा। इस प्रकार यह (गौरीसखा) नाम अपने चार अक्षरों में एक सम्पूर्ण इतिहास समेटे हुए है। यहॉ इसके प्रयोग से यह ध्वनित होता है कि लोक-मगल के लिए भगवान शकर ने महाशक्ति- स्वरूप गौरी को ग्रहण किया है। सखा कथन से दोनों के साथ अभेद सम्पर्क स्थापित होता है और साथ ही गोरी का स्वाधानपति का स्वरूप भी अभिव्यजित होता है। शिव-पुराण में गौरी को अखिल शव्दस्वरूप तथा भगवान शकर को अर्थस्वरूप माना गया है- शब्दस्वरूपमखिलं धत्ते शर्वस्य चल्लभा। अर्थस्वरूपमखिलं धत्ते वालेन्दुशेखर.॥ महामाहेश्वर आचार्य अभिनवगुप्त ने भगवती का स्वरूप वर्णन करते हुए लिखिा है- तव च का किल न स्तुतिरम्बिके सकल शब्दमयी किल ते तनु. । कविकुल गुरु कालिदास ने भी अपनी अमर कृति 'रघुवश महाकाव्य' के मगलाचरण में शिव- पार्वती के इसी रूप का चिन्तन किया है- वागर्थाविव सपृक्तौ वागर्थप्रतिपत्तये। जगतः पितरौ वन्दे पार्वतीपरमेश्वरौ॥ आचार्य मम्मट ने भी शब्द और अर्थ को ही काव्य का स्वरूप माना है। अत. इसी अभिप्राय की रक्षा या निर्वाह करने के लिए इस मगलाचरण में अ्थकार ने विघ्न विनाशार्थ शब्दार्थ- स्वरूप गोरीशकर का ध्यान किया है। पारिभाषिक शब्दों में इसे 'अर्थशक्ति मूलक अनुरणन- रूप म्वत मभवी वस्तु से वस्तुध्वनि' कहा जायगा। झकर के इस शृगारी रूप के अतिरिक्त बनके पारमार्थिक स्वरूप भी है, इसके लिए ग्रन्थकार ने अन्य विशेषण 'परम् ज्योति' का प्रयोग किया है। परम् अर्थात् दिव्य, ज्योति अर्यात् प्रकाश-स्वरूप भगवान शकर है। अर्थात् नित्य बोध-स्वरूप एक आत्मा की सत्ता से ही सम्पूर्ण जड-वर्ग प्रकाशित होता है। यहाँ 'पर ज्योनि' के प्रयोग से यह ध्वनिन होता है कि परम दिव्य स्वरूप होते हुए भी भगवान शकर ने लोक-मगल के लिए यह पहली बार शृगारी रूप धारण नहीं किया, प्रत्युत यह उनकी पुरातन प्रकृति है। सृष्टि सचालन के लिये युग के अनुरूप शृगारी रूप की अभिव्यक्ति में उन्हें अपनी

युगे-युगे।' महाशक्ति का विराट् प्रदर्शन करना पडता है। यह उनकी युग-युगकी कहानी है-'संभवामि

Page 49

ग्रन्थारम्भप्रकरणम

ग्रन्थ के नामकरण के मदर्भ में पाव्चिय का मराय नीग्स होने के काग्य स्रर म अर्थचिम का ही उन्हेब किया ह। आार्य गन्यट का ओर काय आनन्वर्नानार्य।च काव्य।। वन्यादोक में चिव्रकानव्य को परिभाषा वत प्रकार ह- प्रधानगुणभावाभ्यां व्यंग्यस्येव व्यवस्यिते। काव्ये उसे तनोऽन्यद यत्तनिवमभिधीयने। चित्रं शब्दार्थभेटेन द्विविधं च व्यवस्थितम। नत्र किचिच्दव्दचित्रं वाच्यचित्रमन परम॥ अर्थात, यग्य अर्थ की विवक्षा से शान्य जो का य है वहाँ निवकाययह। इ सहे हो मेै पहला नष्ट चित्र कान्ग, दसग अर्थ चित्रककान्य। एसका नियकान्य नाम इमलिए न्यागया है कि इस काव्य में अनन्तत्त्र काकान्न अभाव ही रता करता है। या काय नित की नरह निर्जीव कुआ कनता है। चिन किसी वग्त की प्रतिकृनि नात्र है न कि उसकी जाना को अभित्यक्ति। आचार्य आनन्वर्भन ने रपष्ट न्ष्ों में चित्रकान्य के नदभं मे निया

वाच्यवाचक्वेंचित्यमात्राश्नयेणोप निवद्ुमालेग्यम्नख्यं यदाभासते तचित्रम।' अर्थात, रस और माव के नात्पर्य मे रहिन तथा किसा प्रकार के न्यग्य विशेष क प्रकाशन में असमर्थ कान्य को ही चित्रकाय कहते ह। यह केवल शब्द और अर्थ की विचिननानान के लिए चित्र की तरए निर्मित ऐोना ह। आचार्य आनन्दवर्धन इस प्रकार के कान्य को का य का अनुकारण एी मानने है। 'न नन्मुख्यं काव्यम । काव्यानुकारो ह्ामी' अर्थचित्र काव्य के उदाहरण न्यन्द मानार्य मम्मट इस ्लोक को उद्धृन किया ह- विनिर्गतं मानदमात्ममन्दिरान्जवत्युपश्रुत्य यदच्छयाडपि यम। समंभ्रमेन्द्रद्भुतपातितार्गला निमीलितान्ीव भियाजमरावती॥ इम शोक मे कवि की उत्सुकता एकमात्र अमरावती को एक भयनिमीनितनयना नाविका के रूप में चित्रित करने नेंहै। इस शोक में इन्द्र के उत्साह की अपेक्षा उनयी मन हयनीय का उत्साए ही अभिव्यकत ुआ है। अन इमे वीरग्म की अपेक्षा वीर रसानान कहना एी उपसुक् प्रतीन होता है। इस शोक में कवि का हृदय एकमान उत्ग्रेक्षा में लगा है। इसमे या मनर्कार कहाँ, जो एक उत्प्रेक्षा में होता है? इमलिए तोना सहडय को इस इन्गेक में अर्भनिन की हो अनुभृति होनी है। च्रन्धान्तर की जपेक्षा इस त्रथ में अधिकना या न्यूनताजन्य दोष निवारण के लि 'विपुन विषया विशेषण का प्रयोग किया गया है। विपुल अगात महान् विष्यनन्पणाय उयह जिसका, ऐसषा यह ग्रथ है। यख्यातय्य विषय में वकीर्गना दोष निवारण के लिए ो किद शब्द का प्रयोग किया गयाह। पस ए्लोक के अर्थमदर्भ के नीनर मे ऐेकानुप्राम नरहार - धनिन होता र यथा- वर्णसाम्यमनुप्रामददेस्वृत्तिगनो हिंया। सोडनेक्स्य सकृन्स [पृ ] व.। 'ीरोत" इनने अभित्यक शिव पार्वनी के पति कविगन रविभाय की देवदिष्टक नान नि प्रनीन होतीए। इस न्ोक मे प्रसान तुणहै और बौनन गूि। प्रमासयर ने मा दिया ई- 'साधारण. समग्राणां स प्रसादो गुण. स्मन । कोमला परः वृत्ति ।

Page 50

६ चित्रमीमांसा

छन्द शास्त्र के अनुसार इस मागलिक ग्लोक का छन्द गीति है। यथा- आर्याप्रथमदलोक्तं यदि कथमपि लक्षणं भवेदुभयोः। दलयो. कृतयतिशोभां तां गीति गीतवान् भुजद्गेशः। यहाँ सुधा टीकाकार ने इसी मगल श्लोक में अर्थभिन्नता के द्वारा अर्थचमत्कार का वर्णन किया है। उन्होंने इसी श्लोक में शब्द-शक्ति की महिमा से अर्थान्तर की ध्वनि का प्रतिपादन किया है तथा 'परम अभिवन्ध' की व्याख्या करते हुए लिखा है कि पिपर्ति अर्थात् पालयतीति की व्युत्पत्ति से परम का अर्थ परमेश्वर हुआ। पुन ये परभेश्वर कैसे है १ ज्योति. अर्थात् सूर्यादिवत प्रकाश स्वरूप है। और ऐसे ही परमेश्वर की प्रकृति के उपयुक्त-'गौरीसख'-इस विशेषण की भी व्याख्या की है। गौर. वर्णो यस्या. सा गौरी, गौरादिपाठ से डीष प्रत्यय किया गया है। गौरी अर्थात् अत्यन्त गौरवर्ण। सुधाकार अप्पयदीक्षित ने चन्द्रशेखर की भी व्याख्या परमेश्वर के पक्ष में दूसरे ही ढग से की है। यथा- 'स्वर्णेऽपि भूरिचन्द्रौ दौ' अर्थात् चन्द्र के पर्यायवाची इब्द स्वर्ण को मानकर सुवर्णमय मस्तक का आभरण है जिनका, ऐसे दिव्य परमेश्वर की अभिवन्दना कर अर्थचित्रमीमासा की रचना करता हूं-ऐसा अर्थ दीक्षित ने प्रतिपादित किया है। दूसरे अर्थो में शृगार को रसों का प्रधान मानते हुए उसे ब्रह्मस्वरूप मानकर 'रसो वै सः, रसं ह्येवायं लब्ध्वाSSनन्दी भवति-' इस आधार पर शरृगार को ही कवि ने ब्रह्मस्वरूप में अभिवन्दना की है। इस पक्ष में 'आधम्' का अर्थ सभी रसों में प्रथम लिया गया है तथा परम का तात्पर्य प्रधान से है। गौरी को नायिका के रूप में चित्रित किया गया है। तथा उनके सखा भगवान अकर को आलवन-रूप में अभिव्यक्त किया गया है। चन्द्रशेखर विशेपण का प्रधान भूत अर्थ ही रखा गया है। ऐसे अकर अभिवादन के योग्य है, अत ज्योति विशेषण का प्रयोग हुआ है। ज्योति से तात्पर्य ब्रह्म का है। और ब्रह्म से सम्वन्ध रस का है। यद्यपि वाच्यार्थ की दृष्टि से शिव पक्ष ही अधिक प्रतिभासित होता है, फिर भी यहाँ न्यजना शक्ति को नहीं भुलाई जा सकती। आचार्य अप्पयदीक्षित ने अलकारशास्त्र के श्रीगणेश वाले इस अर्थ-चित्रकाव्य के प्रथम पद्य में ही, उपर्युक्त प्रकार से ग्रथ भर में निरूपित होने वाली ध्वनि के तीनों रूप वस्तु, अलकार और रस को प्रतिष्ठित कर दिया है। इस ग्रथ में निरूपणीय अलकारों के आश्रयभूत काव्य का भेद ग्रथकार ने लिखा है। किस विशिष्ट स्थिति में कोई वाक्य काव्य कहलाने का अधिकारी हो जाता है, इस पर पूर्ण विचार हो 한 육 雨 는 चुका है। कोरे वाक्य को कोई काव्य नहीं कहता। अलकृत वाक्य को काव्य मान लेने पर भी अलकार को लेकर चलने वाले वाद-विवाद की कोई कमी नहीं। क्योंकि अल्कार शास्त्र को ध्वनिशास्त्र की अपेक्षा है। अत. अल्कार, रीति, वक्रोक्ति आदि सम्प्रदायों की कथा-'हरि अनत हरि कथा अनन्ता' की तरह सर्वविठित है। यही कारण है कि अप्पयदीक्षित ने काव्य की लक्षण, परिभापा किए विना ही उसके भेद कथन पर उत्तर आए हैं। जवकि सुधा व्याख्या- कार ने अपनी न्याख्या में प्रसगवश मम्मटोक्त परिभाषा की काली व्याख्या उपस्थित की है। अन्तु, यहाँ काव्य-भेद निरूपित करते हुए मूल में दीक्षित आगे लिखते है- (सुधा) यदद्धव्गिं नारी विलसति परा कान्तिरुचिरा, परादं पुंरूपं जयति च जटाजूटरुचिरम्।

Page 51

मन्थारम्भप्रकरणम्

सदा शद्धारित्वं वहनि वपु्षवं त्रिभुचने, नमन्नम्मैं कम्मैचिटगलविवर्नान मासे॥ :॥ नत्वा गुरु कुपासिन्ुं पित्रोध चरणदवयम। क्रोमि चित्रमीमासाव्याग्यां विद्वन्सुढवे सुधाम ॥२॥ जञात्वा मया विरचिन स्फुटलपणाना मर्थ यथामति गभीरनर व्यवुद्धथा। व्याख्या कृता यदिह काउपि सदोपता न्यात् तन्नापि भृषणकृति. सुधिया विधेया॥३॥ तत्रार्थचित्रमीमांसां करिष्यमाणोऽप्पयटीक्षिन. प्रारिप्सित प्रतिबन्धव विम्नविघाताय- 'शब्दस्वर्पमसिलं धत्ते शर्वन्य बल्नभा। अर्थन्वरुपममिलं धत्ते वालेन्टुज्ेग्वर.'॥ इत्याटिनोकरूपं शिवयोरनुसन्धानात्मक महलाचरणं विरचयन भ्वकीयग्रन्थस्य नाम

मीत्यन्वय। चन्द्र शेसरे यश्य 'सप्तमीविनेषण बहुमीही' इति व्यधिकरण- बहुचीहेज्ञापनात समास। अत्र चन्द्रत्य शम्वारे उहीपनविभावतया तटाश्रयतया शिवस्य शद्धारित्वं ध्वन्यते। एतन्य पढन्यापि परभ्य्ततपर्यायेभ्यो निनरा रसोपयो- गित्वन्न व्यव्यते । तमुभिदन्य=स्वावधिकोतकर्पप्रकारवज्ञानानुकूल व्यापार विपयीकय। एतेन नसम्कारात्मकं मङ्गलं सृचितम। तत्वज् विघ्नभिननतवे सति विष्नव्वसप्रतिबन्ध- काभावभिन्नत्वे रुति प्रारिप्सितवित्नध्वंसासाधारणकारणत्वम। जन्यन्येव कार्यरूपतां प्रतिपेधयन कारणतां प्रतिपाठ्यति-आद्यमिति। सर्वकार्याणामाय कारणमित्यर्थः । शभ्वारित्वपोपव विशेष्णमारच्यति-गौरीससमिति। गौर्या सथा इनि विग्रहे 'राजाह सग्विभ्यष्टच्' इति टच्प्रत्ययः । सग्वित्वकथनेन द्वयोस्साहचर्यन्य सर्वदा सत्वाट सौर्या स्वाधीनपतिका्त्वं व्यज्यते। पारमाथिक्तद्वपकथनाय विशेषणान्तरमाठ- ज्योतिरिनि। घोतत हति ज्योतिस्त द्वृपमित्यर्थ। औपाधिक्भेटवन्यात्मन्यतिव्यासिवारणाब विशेषणम-परमिति। तद्राहिन्ये तु लक्षणगमन न दोषाय। चिकीपिनभ्य ग्रन्थस्य नाम निवष्नाति-अर्धचित्रमीमासामिति। मीमासितुमिन्ट्रा मीमासा. स्वार्थमन्नन्तात 'अ प्रत्ययात्' इत्यप्रत्यय. । शव्दचित्रस्य पायो नीरलत्या- दर्थचित्रन्य मीमामा। 'पष्टी' इनि सूत्रेण समास। अलकृन्युपमादिपाधान्वेन तस्य चमत्कारोपयोगित्वात। अत एव-'विनिर्गत मानदमात्ममन्दिराढ भवन्तपश्रुत्य यदच्छयापि यम। ससभ्रमेन्द्द्वुतपातितार्गल निमीरितातीय भियामगवती । दृत्यादावुद्येप्षाप्राधान्येनेवार्थचित्रत्वमिति प्रकाशकारा वदन्ति। रसगत्ाधरकतस्तु-उत्तमोत्तमोत्तममध्य माधमभेद्दा्त्ाता काव्यंचतिंधमत्रीकृ्य द्विनीय- तृतीयगोर्भे टयोजगिरकाजा गस्कगुणीभूतव्यम्रधयोरसिलालव्वारप्रधानकाव्यन्य प्रविष्टता-

बिपुलो महान विषयो निरूपणीयोडयी यस्या सेनि िग्रा। व्याग्यातव्यार्थानाससी तामाह-विशवेति। विशवोऽनिस्फुर्ट इर्थो वस्वामिनि वित्रह। वितनोनि= चित्तारयामि। तनोतेरेय विस्तार शनि, चिपठं घोतामेन, निपानानां माठीनाम-

Page 52

चित्रमीमांसा л

पसर्गाणां च द्योतकत्वाभ्युपगमात्। छ्ेकानुप्रासोन्र शब्दालद्कारः, 'वर्णसाम्यमनुप्रा- सशछ्ेकवृत्तिगतो द्विधा । सोऽनेकस्य सकृत्पूर्व.'। इति तल्लक्षणात् गौरीसखमित्य- नेनाभिव्यज्यमाना शिवयो रत. कविगतां रति पुप्णातीति देवताविषयकभावध्वनि.। प्रसादो गुण । 'अतिमात्रेण शव्दानां यत्रार्थप्रत्ययो भवेत्। साधारणः समग्राणा स प्रसादो गुण. स्मृत.'॥ इति ग्रकाशोक्े । कोमला वृत्ति., 'कोमला परः' इति लक्षणात्। गीतिरत्रच्छन्द । 'आर्याप्रथमदलोकतं यदि कथमपि लक्षणं भवेदुभयो.। दलयोः कृतयतिशोभां तां गीति गीतवान् भुजङ्गेश."॥ इति लक्षणात्। सगणस्य दुष्टफलत्वेऽपि भद्रवाचकत्वेन न दोप:। 'देवतावाचका शब्दा ये च भद्रादिवाचकाः। ते सर्वे नैव निन्द्या स्युर्लिपितो गणतोऽपि वा'॥ इत्युक्ते:। किञ्ज, अनेनैव श्लोकेन शव्दशक्तिमहिम्नार्थान्तरयोरपि ध्वनि प्रतिपाद्यते। तन्र शृद्गारस्य विष्णुदेवताकतया काव्यस्येव वा तत्स्वरूपतया तमपि नमस्करोति। परमभिवन्द्येत्यन्वय। पिपर्ति पालयतीति व्युत्पत्या परमेश्वरम्। कीदृशम् ? ज्योति = आदित्यादिम्रकाशकम्। तस्य प्रकृतोपयोगिविशेषणमाह-गौरीसखमिति। गौरो वर्णो- इस्त्यस्या, गौरादिपाठात् डीष्। रूढ्या पार्वतीपरत्वेऽपि ध्यानादौ लच्म्या गौरवर्णस्य प्रसिद्धत्वाद्योगेन श्रीपरत्वेऽपि दोपाभावात्। तस्या सखेति पूर्ववत्समास। शोभाप्रत्या- यक्विशेपणमाह-चन्द्रशेखरमिति । 'स्वर्णेऽपि भूरिचन्द्री द्ौ' इति चन्द्र स्वर्णः सुवर्ण- मय. शेखरो मस्तकाभरणं यस्य तं परमेश्वरमभिवन्द्य नमस्कृत्यार्थचित्रमीमांसा वितनो- मीत्यन्वय। किव्न शङ्गारस्थापि रसस्य रसेषु प्रधानतया तस्य ब्रह्मरूपतया तदभिवन्दनमप्याव- श्यकमित्यतस्तत्पनतं प्रतिपादयति-आद्यं सर्वेषु रसेषु प्रथमं परं प्रधानम्, शृङ्गं प्राधान्य- मियर्तीति व्युत्पच्या तस्य प्राधान्यात्। गौरी नायिका, तस्या सखा, तदालम्वनत्वेन तदुत्पत्या सखित्वाभिव्यक्ति। तथा चन्द्रः शेखर उद्दीपनतया प्रधानभूतो यस्येति। तस्याभिवन्दनयोग्यत्वद्योतकं विशेषणमाह-ज्योतिरिति व्रह्मरूपमित्यर्थः, अलौकिकानन्दरूपत्वात्, 'रसो वै स., रस ह्येवायं लब्धवाऽडनन्दी भवति' इति श्रुतेश्च। यद्यपि वाच्यार्थतया शिवपन. एव भासते तथापि व्यक्षनया तटुपस्थिति। 'अनेकार्थस्य शब्दुस्य वाचकत्वे नियन्त्रिते। सयोगाद्यरवाच्यार्थधीकृद्यापृतिरज्ञनम"॥ इति प्रकाशकृदुक्त्ेरिति ढिक्। (चित्रमीमांसा) त्रिविधं तावत्काव्यम्, ध्वनि-गुणीभूतव्यङ्गय-चित्रभेदात्। (भारती) प्रथम वाक्यालकार में काव्य तीन प्रकार के होते है। काव्य का पहल। भेद व्वनि दूसरा गूणीभूत न्यग्य तथा तीसरा चित्र काव्य है। विमर्श-रसी वनिकाव्य को मम्मट ने उत्तम काव्य के रूप में प्रतिपादित किया हे। क्योंकि यह वही काव्य है, जिसमें कवि की रसयोजना और सहृदय की रसभावना, दोनों का रहस्य न्पष्टनया संवेध हुआ है। शब्द और अर्थ के गुणीभाव ओर रसाङ्ग-भून व्यापार प्रवणता

Page 53

१० चित्रमीमांसा

(सुधा) अथ निरूपणीयानामलद्काराणामाश्रयभूतं यत्काव्यं तस्य विभागमाह-त्रिविधमिति। तावदिति प्राथम्येऽ्व्ययम्, वाक्यालङ्गारे वा। काव्यं लोकोत्तरवर्णनानिपुणस्य कवेरसा- धारणं वर्णनात्मकं कर्म। तद् ध्वनिगुणीभूतव्यङ्गचचित्रभेदात् त्रिविधमित्यनुपङ्ग। यद्यप्यन्न काव्यलैक्षणमन्यत्र ग्रसिद्धत्वान्न विचारविषयीकृतं तथापि सर्वोपकारकत्त्वात् प्रकृतोप-

वच्छिन्नान्यतसत्वविशिष्टोपनागरिकादिरीतिमरवे सति, उत्कर्षाधायकगुणालङ्गारविशिष्ट- शब्दार्थतवं काव्यत्वम्। 'घटं भिन्द्यात्, पटं छ्विन्द्यात्' इत्यादावतिव्थाप्तिवारणायोत्तर- दलम्, राधया कृष्ण. क्रीडतीत्यादावतिव्याप्तिवारणाय सत्यन्तोपादानमिति। प्रकाशकारस्तु-'तद्दोषौ शब्दार्थों सगुणावनलंकृती पुन. क्वापि' इत्याह। प्रागुक- वर्णनात्मकलच्यतावच्छेदकस्य शब्दार्थोभयाश्रितत्वाभावात् कविप्रौढो क्िकल्पितत्वादेरर्थ एव सन्भावादेकत्र विनिगमनाभावादुभयोरेव काव्यत्वम्। तत्राजाद्यदन्तत्वादर्थशब्दस्य पूर्वनिपाते प्राप्ते 'नामरूपे व्याकरवाणि' इति श्रुते., 'वागर्थाविव संपृत्तौ' इति लोकिकप्रयोगाच् शब्दस्येव प्राथम्यम्। रसोद्वोधजनकतावच्छेदकत्वस्थ दोषाभावगुणा- लङ्कारविशिष्टयो. शब्दार्थयोर्वृत्तित्वात्ताहशयोरेव तयोर्ज्ञान रसोत्पत्ते: । लोकेऽपि काण- त्वादिदोपाभावेन पाण्डित्यसौन्दर्यादिगुणैर्वखतालङ्गारादिपरिच्छेदेन च शिष्टस्यैव दर्शना- च्वित्तचमत्कार, न त्वेकदेशवैक ल्येन। अत एव विशेषणत्रयमपि सार्थकम्। यच्चागनिपुराणे व्यासैरुकम्- 'अदोष गुणवत्काव्यसलङ्कारैरलकृतम्। रस्गन्वित कवि कुर्वन् कीत्ति प्रीति च विन्दति'॥ इति। काव्यं शब्दार्थयुगलं यतोऽदोपादिविशेषणत्रयविशिष्टमतो रसान्वितम्। नातस्तद्- बलात् सढोषादेस्तत्वम्। एवं विशिष्टशब्दार्थयो. काव्यत्वे सिद्धे 'काव्यं पठति, शृणोति" इत्यादिव्यवहार: शब्दपरतया समर्थनीय। काव्यं बुद्धमिति तुअर्थस्य तत्वसमर्थकः। 'अदोषौ' इृत्यन्नापि दोषसामान्याभाव एव, तरय विरलविषयत्वे इष्टापत्े.। 'द्वित्राण्येव काव्यानि, द्वित्रा एव कवयः' इति ध्वनिकारोकके । 'तथाभूताम् इत्यादौ 'न्यक्कारो ह्ययमेव' इत्यादौ च निर्दोपे तदेकदेशे योजनादिघटिते वा ध्वनित्वमव्याहतम्, यदवच्छेदेन यावदोषाभावस्तद्वच्छेदेन काव्यत्वोपगमाद्। दुष्टं काव्यमिति व्यवहारस्तु दुष्टो हेत्तुरितिवत्। न चैकस्य काव्यत्वमकाव्यत्वम्, उपाधिसङ्करे दोषाभावाठ्, जातावेव तहोपात्। सगुणपदं गुणन्यअ्ञकवर्णपरम्, स्वव्यङ्गयास्वादसमवायेन परम्परया वा। तेन गुणानां रसनिष्ठत्वेऽपि नासम्भवः । अनलङ्कृतीति। अर्फुटत्वरूपमल्पत्वं नञर्थः । क्वापी- त्यनेन सर्वत्र सालद्वारत्वम्। 'सालक्वारौ' इति पदोपादानन्तु अलद्कारमान्नशून्यस्य न काव्य- ववमिति मतमिति प्रतिपादनार्थ न कृतम्। अस्फुटालद्कारस्थापि रसादिस्फुटत्व एव काव्यत्वं न तु सर्वत्र। नीरसे तु ताद्शे न तत्वम्, रसादेरलद्कारस्य च चमत्कृतिहेतुत्वात, काव्यस्य तत्सारत्वाच्च। तथा च स्फुटालद्काररसान्यतरवत्त्वं विशेपणमिति भाव। निरलद्कारे रसवति-"मुनिर्जयति योगीन्द्रो महात्मा कुस्भसम्भवः। येनकचुलुके दृष्टौ दिव्यौ तौ मत्स्यकच्छपौ" ॥ इत्यत्र काव्यत्वस्येष्टत्वात्। एकत्र चुलुके मत्स्यकूर्मदर्शनरूपस्य हेतोरुकर्पे सत्वेऽपि न काव्यलिङ्गम्, रसाननुगुणत्वात्तदभावे तद्दरशनरूपार्थस्य तद्रस-

Page 54

अन्थारम्भप्नकरणम

व्यक्षकत्वात 'अटावत्र प्रज्वलन्यभिरये प्राज्य' म्रोद्यान्नुल्सन्येष धम ।' इन्यादारो जोगुणानुमानालद्वार सत्वेऽपि न कात्यत्व विभावाघर्यानुपस्धापत्चान, तट्पन्थापन- शब्दार्थयोरेव त्त्वीचित्यात। तथा त रसप्रतिबन्धकतेप्यावच्छिता वन्नाभा व्जराव

कचित्त यथाशक्ति दोपव्यावृत्तये टोपपटम टोपाणसपरूर्षमात्राधायन वेन काव्यस्वरूपानुपघानकत्वात्, रत्नादी कीटवेधवत आन्वाटवनि दृष्टेऽपि तवभ्रीरागन। अन्यथा दोपनिरुपणप्रकरणे अन्यूनपदत्वेन दृषितस्य कानुाजूमाव ध्वनिता 'तथाभूताम' इत्यादेस्तृ तीयोलासे प्रतिपादिता विरुन्धेन। 'वनिकृनानपि अविमृष्टविधेयदोपदुष्टस्य 'न्यकारो हायम्' हत्यादर्ध्वनितवम, 'दुएं काव्यम' रति व्यवहारोडपीन्थं सम्च्छत इत्याहु। काणतचादिदोपंण पुर्पत्येव स्वरुपदानेरभावपि चमत्कृति जनकत्वायोग्यत्व नाकाव्यतापत्ते, तस्य तदेन्प्रधानत्वात। नवापि दोषाणा निग-

कविप्रति भातिरोधानाशक्यत्वम। अस्ति प्रतिभावता काव्ये कखन विशेषो वत सामानिकां क्षिनपितानिव कृत्वा दोपं न ग्राह्यतीत्याहु। नदप्यसत. विशेषपर वे प्रमाणाभावात। कव्यरगभान्यस्य प्रतिभाजन्यत्वंन वुननापि दोपग्हणानापत्ते । पवत 'न्यारो वयम' इत्यादीनामुत्तमनया प्रतिभाजन्यत्वेन दोपभिनान विरधमिति चेदन्र वटन्ति- अस्फुटाना तेपां रसोद्वोघाविरोधित्वेन तदभावत्य लक्षणावटक्तया रफुटानामेव तद्टियान- क्त्वंन तदभाव एव लक्षणघटकु इति दिक्।

ह्ययम' इत्यादावविधेयविमर्शसत्वेनाव्या्यापत्ते। फचिद दोपवत्त कचिवदीपवसे वाव्यत्वालव्यत्वाभ्यामाकप्यमाणं समिपि न स्यात, काव्यस्य विरलविषयत्वापतेय। सर्वथाऽटोपस्याभावेन निविषयत्वापत्तेक। नज ईपटरथे शकों दोपवति वाव्यत्ा नापने। सति सम्भवे 'ईपहोपी, हत्यपि न वात्यम, उपचारतया न्नानित्वरूपस्य कीटाटिवेधानामिच नत्स्वर्पस्य दोपेरव्याघातात। तयो. सगुणत्वविशेपणमप्यसत। 'ये रसस्याद्गिनो धर्मा शोर्यादय ्वात्मन' दत्याटिना तेपां रसनिष्टत्वप्रनिपादनान । रसाभिव्यक्ञक्तेन तत्सार्थवर्य न सम्भवतति, गुणेस्तवन्वयव्यनिततनियमेन 'सग्सी इत्यम्य' आवश्यक्त्वे तद्वयर्यत्वापते। 'प्राण्मिन्तो देशा' इनि व्चे शौर्याहिमन्तो देशा इति क्धनस्य व्यर्थत्वात। अलव्वाराणासुत्वरपंमव्राधायक्टेन स्वरपानृपर्वागात द्विनेपणस्थापि व्यर्थत्वाच्। तस्मात 'रमात्मक वाक्य काव्यम' हत्वेव तहपणमिति वदन्ति। तद्रम्त वस्वादिप्रधाने काव्येऽव्याप्यापत्ते. 1 न घेष्टापति, महरुविसप्रदाय-

कविवणितत्वात्। तत्रापि परम्परया स्यनितसावीवार नौअलनि उत्यादायनिया ज्यापत्ते।

दोपरहितन्यैय तत्वे 'नयहारी सयन' उ्यादी निवेदाचिमर्शसर्नेन तत्- न्याधान दृनि, तन, अन्येषा पराभवो ममारिनम्बन्ध एव न्यवार। बहुनचनेन वायीजग यत्तु

Page 55

१२ चित्रमीमांसा

सकलराक्सपरीतायां लङ्कायामेवेति तिरस्कारातिशय। रक्षन्ति परानिति यौगिकार्था- भावेऽपि स्वस्यापि रक्षणेऽसमर्थो जीवतीति सोत्ासकाक्का स्वनामसङ्कीर्तनं वीर- रससञ्चार्यतिशयं पुष्णातीति प्रतिपदव्यङ्गयसरवेन तत्सत्वात् स्वाधिक्यकीर्तनार्थ स्वसंज्ञो- च्चार एव दूषणसत्वात्। यत्तु-'क्चित ढोषवत्वे' इत्यादि, तदपि न; एकस्यापि ज्ञानस्य भ्रमत्वग्रमात्ववदेकस्याप्युभयत्वाङ्गीकारसत्वात् न च सङ्कर, उपाधौ तस्येष्ट- त्वात्, जातावेव तदनङ्गीकारात्। तद्विरलविषयत्वे त्विष्टापत्तेः, द्विन्नाण्येव काव्यानीति ध्वनिकारोक्ते । यत्त दोपेन स्वरूपव्याघात, तदपि न, तेषां रसापकर्षकत्वेन न्यूनत्वापत्तौ तत् सत्वात्, तत्रापि काव्यत्वे लक्षणस्य व्यर्थत्वापत्तेश्र। सगुणत्वविशेषणमपि आवश्यक्मू, तेपां रसाभिव्यञ्ञ- कवर्णपरत्वेन तेषामभावे स्वरूपव्याघातापत्तेः । अलङ्काराणामपि पृथक चमत्कृतिजनकत्वेन तद्विशेषणस्याप्यावश्यकत्वात्, दिक्। कविकर्म काव्यमिति यौगिकरूपसमाख्या वलाद्विभावादिद्योतकशब्दस्येव तत्त्वं नार्थस्य, तस्य तत्कृत्यसाध्यत्वात्। अत एवाभ्यहितस्य तस्य प्राड्निर्देशः। तथा चास्वादजीवातु. पदसन्दर्भ काव्यम्। अथवा योजनायामेव त्यापारेण 'इष्टार्थावच्छिन्न- तादशयोजनाविषयशब्दावल्येव वा काव्यम्' 'शरीरं तावदिष्टार्थव्यवच्छिन्ना पदावली' इति दण्ड्युक्ते। न चोभयपदार्थप्रधानकद्वन्द्वविरोध इति वाच्यम्, कार्व्यस्य व्यङ्गयापरामर्शणमृते चमत्कृत्यभावेन चित्तवशेऽहेत्तुत्वादुपदेशे पर्यवसानानुपपत्या व्यअ्ञनाधीनव्यङ्गयपरामर्शावश्यकत्वात्। व्यक्षनायाः शब्दार्थावाश्रयावित्येतावन्मान्रेण दयोः प्राधान्यमङ्गीकृत्य तत्करणादिति रसगङ्गाधरानुयायिनः, तदपि न, काव्यत्वप्रयोजक्स्या- स्वादव्यअ्जकत्वस्य शब्दार्थयोरविशेषात् । अर्थेष्वपि व्यञ्ञनावृत्त्यङ्गीकारात्। शब्दार्थयो- रुत्कर्षापकर्षाभ्यां तदुत्कर्षापकर्ाव्यवहारात्। विभावाद्यर्थाविशिष्टेषु तेषु वा तत्वे विनिग- सकाभावाच्च। न च समाख्यैव विनिगमकम्, कविप्रकाश्यत्वेनेतदुपपत्तेः। इदं काव्यम- मुकेन कृतसिति व्यवहारोऽपि तत्पर एव, अन्यथा तन्नित्यत्वे मौनिश्रोकादौ च तदसम्भ- वात्। विभावत्वादिव्यवहारस्य शब्दार्थयोजनरूपकविव्यापारावलम्वकत्वाच्च। रसगङ्गाघरकृतस्तु-शब्दार्थयो. काव्यश्दवाच्यत्वे प्रमाणाभाव. काव्यमुच्च. पठ्यते, काव्यादर्थोऽवगम्यते इत्यादिसर्वसिद्धव्यवहारात् शब्दविशेपस्य काव्यत्वप्रतिपत्ते। व्यवहा- रस्य शब्दमान्रे लक्षणयोपपादनीयतापि न, काव्यत्वेनाभिमतशब्दार्थयुगले तच्छक्ति- प्रमापक्दृढतरप्रमाणस्यासरवात्, विमतवाक्ये श्रद्धाया अभावाच्च। एवञ्च काव्यस्योभयत्र शक्तिग्राहकप्रमाणाभावे व्यवहाराच्छव्दवृत्तितच्छ्क्तेर्दुर्निवार्यतवाच्च। तथा च विनिगमका- भावकथनमप्यसद्धेतु। तथा च शब्दस्येव तत्वे तल्चक्षणकथनमेव योग्यम्, न तु स्वकल्पित- काय्यपदार्थस्य। आस्वादोद्वोधकत्वस्यैव तत्प्रयोजकत्वेन तस्य चोभयन्र सत्वाद्युगलमेव तदिति यदाहु, तन्न। रागस्यापि रसव्यञ्जक्तया सर्वसम्मतत्वेन काव्यत्वापन्ते.। एतेन रसोद्दोधसमर्थस्यैवात्र त्त्वमित्यपास्तम्। सर्वनाट्याङ्गेषु तदापते। किञ्वि काव्यत्व- मुभयत्र व्यासज्यवृत्ति, प्रत्येकपर्यासं वा। नाद्य, एको न द्वावितिवत् श्रोकवाक्यं न काव्यमिति व्यवहारापत्ते.। नान्त्य, एकस्मिन् पद्ये काव्यद्वयव्यवहारापत्ते। तस्मा-

Page 56

ग्रन्थारम्भप्रकरणम्

त्तस्य शव्दनिष्ठत्वमेव। लक्षणे गुणालह्ारादिनिवेशोि न सन, 'उदयमिनसन्य' 'गतोऽस्तमर्क.'इत्याढावव्यापे। चमत्कारभ्य तजीवितम्यात् सलन तवभावस्य बकमतो ग्यत्वात। अन्यथ तवाभिमनर्यापि नधवापत्तः, तयोस्नाननुगमाघ्च बुरा रविसयो गीनिवत काव्यत्वस्थाव्याप्यवृत्तिताया अभावात मूले मीन्हो विहस्ससयोगी न नाग्या यामिति प्रतीतेरिवेद पूर्वाद्ध काव्यं नोत्तमे इति प्रनीतेरप्रसिद्वरवाग, आमधर्माणा गुणानामुपस्कारका णमलक्काराणा च शरीरघटक्वानुपपत्तेश्र। नस्माद 'रभगयार्यं प्रतिपादक. शब्द, काव्यम्'। लोकोत्तरलवाद्जनवज्ञानगींचर व ग्मणीयत्वस। लोगोन- रत्वञ्च-आह्लादगतश्चमतकारत्वापर पर्यायोऽनुभवसालिको जातिविगेष एव। पुत्रस्ते जान, धन ते ढास्यामीति वाक्यार्थधीजन्याहाटस्य लोकोत्तर्याभावास काव्यवानिमर्साक्।

नात्व चमत्कारजनकतावच्छ्रंटरके तत्वम्, स्वविशिष्टजनकतावच्छेटका र्वप्रनिपाटक्तास सगोण चमत्कारवत्वमेव वा काव्यत्वमिति फलितमित्याहु.। नदपि न। ह्योरेय काव्यन्वन्येष्- त्वात्, कविव्यापारस्य तत्र सम्यात। तत्वद् चमत्कारत्वावच्छिनालाटजननज्ञानगोचर त्वमेव। मृगो धावतीत्यादी तादृशव्यापाराभावान काव्यत्वम। तस्य शव्दमात्रवुततिम्व- नियमे तु कविववतृमीढोक्तितननिवद्धवत्तमौढोकिरूपार्थशिमृल वाढेविलयापत.। काव्य श्रुतमित्याटे शव्दरक्तितिसाधकव्यवहारत्येव काव्य नुद्धमिति व्यवहारत्यार्ये काव्यन्वमत- पाढकर्वात्। पत्स्थेव शब्दशक्ती तन्नियमस्य प्रतिषंधकत्वान। अलल्गगरिविशिष्टम्य वर्णनाविशेपरय वा तत्य व्यासुव्यवृत्तित्वासम्भवात।दर्याप्तेतु उष्टापत्तिरव। न च काव्य- द्वयव्यहारापत्ति., विजातीयेंकचमत्कृतिजनकतया तब्यवहाराभाचात। गव्दत्य चमाकृनि- जनकत्वे तस्य, अर्थचमत्कृती अर्थस्य, उभयत्र चमत्कृनी ह्योरेव काव्यत्वव्यवरागन। शव्दानन्त्यन्तु विजातीयेवचमत्कृतिजनकतया न दोषाय। कित, शब्दार्थयोगे तपत्तिक नित्य सम्चनधरवात्तदन्वयव्यनिरकानुविदानाद दयोरेव तावमुचितम। जन्यजन- कभावस्तु न सम्भवति, 'वागर्थाविव' दृत्यादावनुगामिन्वानापत्त । नाप्यभेट, मुसदाहा द्यापत.। कल्पितत्वे सम्बन्धाना नियमाभाव एव, सर्वेपा कल्पितत्ेन समाननवात। भेदाभेदसय तु न सम्बन्धत्वम्, समवायत्तु गुणगुणिनरच। तम्मात्तय सम्वन्धन्य नित्यतया स्वाभाविकन्वेन पृथगक्स्यानुपत्यितिरवेति क्य शव्स्य वस्नमिनि तयो. सव्यंतर विपाणवत समानकालिकत्वप्रतिपत्तरिति ठिक। (चित्र०) यत्र वाच्यातिशायि व्यङ्गवं स ध्वनिः। यथा- स्थिताः क्षण पच्मसु ताडिताधरा पयोवरोत्सेधनिपातचृणिता। वलीपु तस्या: स्खलिता. प्रपेदिर चिरण नाभि प्रथमोदविन्दव ॥ (भान्ती)

वार, पा-न्धिना हर्वो।

Page 57

१४ चित्रमीमांसा

(तपस्यारत समाविस्थ पार्वती का यह वर्णन है) वर्षा की प्रथम बून्दें अर्धनिमीलित देवी की आँखों की पपनियों पर क्षण भर रुककर गालों पर दुलक गई। पुन. अधरोष्ठों को पार करती हुई, उनके ढोनों स्तनों पर टपक पडी। स्तनों की कठोरता के कारण चूर्णित ये वून्दें त्रिवली में समा गई और इस तरह त्रिवली से निकलकर वे वून्दें अपने इस उच्चावच्च मार्गों को पार करती हुई देवी की गभीर नाभि में प्रविष्ट हो गई। कुमारसभव काव्य के पार्वती-तपोवर्णन के प्रसग से यह श्रोक उद्धृत है। इसमें परिकर अलकार एव वशस्थ-वृत्त है। (सुधा) त्रिविधेऽपि काव्ये प्रथमभेदस्य ध्वनेलक्षणमाह-यन्रेति। यत्र काव्ये व्यङ्गयं व्यज्ञना- प्रतिपाद्यं वस्तु वाच्यातिशाय,वाच्यमित्युपलक्तणम्,वाच्यलच्यावतिशेतेतिका- सति एव रूपं भवेत् स ध्वनिः। सर्वनाम्नां विशेष्यगतलिङ्गसंख्योपादानात् पुंस्त्वम।

अगूढ स्फुटव्य ङ्ग्योर तिव्यास्तिवारणाय चमत्कृतीत्याद्यन्तम्। अपरवाच्चसिद्धचङ्गमध्यसेS- तिव्याप्तिवारणाय-वाच्येत्यादि। नव्यास्तु, शब्दार्थौं गुणीभावितात्मानी कमप्यर्थमभि- व्यक्तस्तदाद्यम्। एतस्यैव ध्वनिव्यवहार इत्याहु। अन्रायं विशेष :- शाब्दिक्मते स्फोट- व्यक्षकशब्दमात्रस्य ध्वनित्वम्। आलङ्कारिकमते तिरस्कृत वाच्यव्यङ्गयवोधकशब्दार्थयोस्त- स्वमिति। एतस्य ध्वनेरदाहरणसाह-यथेति। स्थिता इति। कुसारकाव्ये पार्वतीतपोवर्णनम्। उदकस्य विन्दव. । 'विन्दुपृषना पुमासो विप्ुष स्त्रियः' इत्यमरः । 'मन्थौदन ' इत्यादिनोदकस्योदादेश। प्रथमे उदबिन्दव। प्रथमपदकथनेन तेषां विरलता, बहुवचनेन स्वकार्यसामर्थ्यक्ज ध्वन्यते। तथा च चिरपदस्य नाभिप्राप्तेश्र निर्वाहः । तस्या देव्या. पच्मसु नेत्ररोमसु पच्म सूत्रादि सूच्मांशे किज्ल्के नेत्ररोमसु' इति शाश्वत. । क्षणं मसृणतया स्थिताः सान्द्रत्वेनेति भाव.। अनन्तरं ताडितो विद्धोऽघरो यैस्तथोक्ता। ताडनोक्त्याऽघरस्य कोमलता ध्वन्यते। पयोधरयो. स्तनयोरसेधे उपरि निपातेन चूर्णिता विशकलिता. काठिन्यादिति भावः। अथ वलीषु स्खलिता निम्नो- जतत्वादिति भावः। इत्थं चिरेण न तु शीघ्रं प्रतिबन्धकाधिक्यात्, नाभि प्रतिपेदिरे प्रविष्टा न तु ततो जग्सु। तेन नाभेर्गाम्भीर्यम्। अन्र परिकरालङ्गार, विशेषणैर्यत् साकृतेरुक्ति: परिकरस्तु स.' इति प्रकाशोक्ते। वंशस्थं वृत्तम्-'जतौ तु वंशस्थमुढीरितं जरौ' इति तल्लन्तणात्। (चित्र०) अत्र तपस्यन्त्या देव्या देहोपरि निपततां प्रथमवृष्टिबिन्दूनां क्रियास्वभाव- वर्णनेन देव्याः समाध्युचितावस्थानाभित्र्यक्तिद्वारा चिरनिदाघतप्रदेहोपरि निपतनेन सुखपारवश्यसम्भ्रमहेतौ प्रथमवृष्टावप्यविहता समाध्यवस्था व्यज्यते। तथा हि- 'नासाग्रन्यस्तनयन' संवृतास्यः सुनिश्चलः । ध्यायीत मनसा देवमुरो विष्टभ्य चाग्रतः ॥' इति समाधिमतामवस्थानमाहुः। तन्र पत्मसु स्थिता इत्यनेन नासा-

Page 58

१६ चित्नमीमांसा

नाभिदेश को प्राप्त कर सकी, इससे तपस्यानिरत देवी के देह की निश्चलता ही प्रतीत होती है। यदि देवी का मुख खुला होता, पिपनियाँ हिलती-दुलती रहतीं, नो इस क्रम में जल-बिन्दु का नाभि-प्रवेश कभी सभव नहीं या। चमत्कारार्थक गूढ व्यजना की अवतारणा करते हुए दीक्षित ने लिखा है कि ऊपर लिखित विशेषणों से देवी के लोकोत्तर सौंदर्य ही अभिव्यक्त होता है। वर्षा की वून्दें क्षणभर आँख की पिपनियों पर टिक गई, इस कथन से पिपनियों की सघनता, मसृणता ही अभिव्यक्त होती है। पिपनियों से फिसलकर शिथिल वेग से ये वर्षा की वून्दें अधरोष्ठों को पार करती हैं, इस उक्ति से देवी के अधर की अतिसुकुमारता अभिव्यक्त होती है। यहाँ से अपने शिथिल वेगों में चूणित ये वर्पा की वून्दें रसनदेश को प्राप्त करती है। इस चूर्णीभाव वर्णन से स्तन की कठोरता ही अभिव्यक्त होती है। स्तन से छूटकर त्रिवली भ्रमण त्रिवली की विस्पष्टता सूचक है। फिर यहा से छटी हुई मारी वून्दों का नाभि में प्रवेश पा जाना नाभि का अतिगाभीर्य सूचक वर्णन है। फलत हम कह सकते हैं जहाँ इस वर्णन में केवल एक सामान्य वर्पाविन्दु का ही वर्णन है वहाँ वाच्यार्य की अपेक्षा स्थितिक्रम से देवी-सौन्दर्य का ध्वन्यर्थक वर्णन ही प्रमुख है। इसी प्रकार वाच्यातिशायि व्यग्यजन्य व्वनि के कालिदास के इस श्लोक की व्याख्या करते हुए दीक्षित ने काव्यप्रकाश के इस छ्लाक की भी व्याख्या इस सदर्भ में की है- (सुधा) व्यड्ग्यव्यज्जनमवतारयति-अत्रेति। तपस्यन्त्या देव्याः प्रथमवृष्टिबिन्दूनां क्रियास्व- भाववर्णनेन समाध्यवस्था व्यज्यत इत्यन्वय। तपःशब्दात् क्यजन्ताच्छतरि कृते 'उगितश्च' इति डीपि, 'आच्छीनदयो.' इति नुम्। प्रथमे वृष्टिविन्दव. "विशेपणं विशेव्येण' इति समास। अन्यत्र तक्क्रियास्वभाववर्णनं निषेधयति-देव्या देहोपरि निपततामिति। देवीपदेन शोभावत्वम्, समाधिश्चित्तकाग्रीकरणभ्, तत्रोचित योग्यं यदवस्थानं स्थिति., तस्याभिव्यक्ति प्रक्टता तद्द्वारेत्यर्थ.। निदाघेन शष्मेण तप्तो देहस्तन्र यन्निपतनम्, तेन सुखपारवश्यरूपसम्भ्रमकारणप्रथमवृष्टावपि अविहता, अतिरस्कृतेति यावत्। विशेषोक्तिरलङ्कारः । 'विशेषोक्तिरखषढेषु कारणेषु फलवचःइत्युक्क। प्रत्येकपटव्यड्ग्यमवतारयति-तथा हीत्यारभ्यासम्भवादित्यन्तेन। नासाग्रेति । अग्रत उरो विष्टम्य स्तम्भयित्वा। शेषं स्पष्टम्। समाधिमतां योगिनां योगावस्थितिमाहुः। पार्वत्यास्तद्याथात्म्यवर्णनेन स्वाभावोक्तिरपि, 'स्वभावोक्तिस्तु डिम्भादेर्जात्यादिस्थस्य वर्णनम्' इत्युक्ते। एतदेव प्रतिपदं प्रतिपादयति-तन्नेति। पच्मरिथतिकथनेनेति यावत्। व्यज्यते व्यज्षनया प्रतिपाद्यते। तत्र हेतुमाह-सवंथे- त्यादि। तेपा पत््मणाम्, तेषु नेत्ररोससु। ताडितेत्या दिगम्यव्यङ्गयमवतारयति-पचमभ्य इत्यादिना। पतिताना सुखे प्रवेशाभावकथनेन ततोऽधरोष्ठात् पतनकथनेन पयोधरे- त्यादिव्यङ्गयसवतारयति। ततोऽघरोषाव पतितानां बिन्दूनाम्। आदिना चूर्णीभाव- वर्णनसुरो विष्टम्भपदेन कथ्यते। इतरपदव्यङ्गयमाह-तयोरिति। ताभ्यामित्यर्थ.। आदि- पदमितरावयवपरम्। निश्चलत्वाभावे तादशक्रमेण पतन न स्यादिति दिक। चमत्कारार्थ गूडव्यङ्गमवतारयति-किज्जेति। पूर्वोक्तरेवेत्यर्थ। अङ्गानामिति शेषः। अलौकिकिचमत्कृ- तिमरवं व्यज्यते प्रत्येकपदव्यक्जनया प्रतिपादयते। तदाह-स्थिता इत्यादि। अन्र पण्ठ्यन्तेपु अभिव्यञ्ञनादित्यस्य प्रत्येकमन्वयः । स्थिता इति पदं नेत्ररोम्णां सघन-

Page 59

अन्थारम्भप्रकरणम

हाभ्या पननेनानिशिविलानां तेपा सननवो उपरि पतनेन वर्णता गनिवाटिन्वम उरे विष्वम्भतपि वलितयः भरल्न व्लीनिग्पाताम, सर्वतिन्दना नानी प्रवेणोनिकवन- गग्भीरनाम, व्यवकीति निर्कर्पन्यय। न्याग्यानसुपसोगन-पवमिनि। वाच्यार्था दनिशय अधिक्यमन्ति यत्र ता्व्यदसम। अ्वत्र तद्म्चनेरिदमुव्तारण चशितममिति शेप। (नित्न०) यथा वा- 'निश्शेषच्युतचन्दरनं स्तनतट निर्मृष्टरागोऽधरो नेत्रे दूरमनखने पुलकिता तन्वी तवेय तनुः। मिध्याचादिनि दूति बान्धवजनस्यानातपीडागमे वापीं स्नातुमितो गतासि न पुनस्तस्याधमस्यान्तिकम् ।।' अत्र वापीं स्नातुं गतासि, नतु तत्सकाशमिति वाक्यार्थे स्थिते तत्सकाशमेव रन्तु गतासीत्यघमपदेन प्राधान्येन व्यव्यते। तथा हि-अधमत्वमपकृष्टत्वम्,तथ जात्या कर्मणा वा भवति। तत्र जात्याऽपकर्ष नोत्तमनायिका नायकस्य वदति, नापि स्वापराधपर्यवसायिदूतीसंभोगादिहीनकर्मातिरिक्तेन कर्मणा, ताहशं घ दूतीमंभोगात् प्राचीनं सर्वं सोढमेवेति नोद्धाटनार्हम् ; अन्यथा स्वय दृतीमप्रेप- णानुपपत्तेः तदनन्तरं च स्वप्रेपितदूतीसभोगरूपमेव स्वय संनिहितचितर्नातुं शक्यं हीनकर्म संभवतीति तत्पर्यवसायिनाऽघमपटेन तस्यान्तिकमेव रन्तुं गतासीति व्यव्यते । 'निःशेपच्युतचन्दन स्तनतटम्' इत्यादीनि वाच्यानि संभोगचिहोद्वाटनेन तत्र साहायकमाचरन्ति। कथम ? 'नि.शेपनयुतचन्दनं स्तनतटम' इत्यत्र तावद्वापी स्नातुमितो गतासीति वान्यार्थमुपपादयितुमिहो- त्तरीयकर्पणेन चन्दनच्युतिरित्यन्यथासिद्धिपरिहाराय 'निःशेष' विशेषण कृतम्। ततश्चन्दनच्युतेः स्नानसाधारण्यव्यावर्तनेन संभोगचिहोहाटनाय तटग्रहणम्। स्नाने हि सर्वत्र चन्दनच्युति: स्यात्, तव तु रतनयोस्तटे=उपरिभाग एव हश्यते. इयमाश्लेपकृतैवति। तथा 'निर्मट्टरागोऽघर, इत्यत्र ताम्वूलग्रहण-

रागस्त्र नि शेपमृष्टतोक्ता। पुन. सनानसाधारण्यत्र्यावर्तनेन सभोगचिद्ोद्ाट नायाघर टति विशिय बहणम्। उत्तरोपे सरागेज्घरोप्टमानरय निर्मपरगना चुम्बकृतैेति। 'नत्रे दूरमनखने इत्यत् प्रतर्दतमज्नं कालविलम्वेन सिद

तोर्थ। वालन, सानेन वा सर्वतो:अवलीप स्थान, नव तु लोचनयो: कनितवान्त एवानअनत्वमउं चुर्ब्हृनमेेति । पुलरिना तन्ती नर्वेषं तनुयवापानतस्तन्वीति नाजवानववीर्तनेन पुननेति नानचिोंप- = चित्र०

Page 60

१८ चित्रमीमांसा न्यास:। पुलकिताऽपि तन्वी वर्तत इति हृदि स्थितोऽन्वयः। तेन च स्नानेन पुलकिता तनुः किश्विदुच्छ्सिता भवति, इयं तु न तथेति रतिक्केशजनितावेव तौ नवपुलकोद्गमाविति मर्मोद्धाटनम्। एवमेभिर्वाक्यरुपस्कृतेनाघमपदेन तस्यान्तिकमेव रन्तुं गतासीति व्यव्य- माने प्राग्वाच्यार्थतादशायां वापी स्नातुं गतासीत्येतदनुगुणार्थतयाऽन्वितं मिथ्यावादिनीति सबोधनमपि व्यङ्गयानुगुण एवार्थे पर्यवस्यति। ततश्च न्यग्भावितवाच्यमस्यापि व्यङ्गयं वाच्यातिशायीतीदमपि ध्वनेरुदाहरणम्। (भारती) अथवा जैसे- अरी झूठ बोलने वाली दूती! तू अपने वाधव की पीडाओं को जानकर भी न जानने वाली छली सखी-तू तो यहाँ से नहाने गई थी न। ये तेरे स्तनों के किनारे, जिनका चन्दन हट गया है, यह तेरा अधर जिसमें पान की लाली धुल गई है, ये तेरी आँखों की कोरों, जो अजन- रहित हो गई है, यह तेरी दुबली-पतली देह जो रोमाचित हो रही है, बता, तू भला उस नीच के पास क्यों कर जाने लगी ? यहाँ वस्तुत जो वाच्यार्य है, वह है बावरी नहाने गई थी, न कि उसके पास। किंतु स्पष्ट अर्थ यह है कि तू तो उसी के साथ रति-कीडा करने गई थी। और यह अर्थ व्यग्य-अर्थ है न कि वाच्य-अर्थ, जिसमें अधम पद विशेषतया व्यजक है। इस पर दीक्षित जी का विवेचन इस प्रकार है- 'अधम' शब्द का अर्थ हीन है, और हीन दो प्रकार से हो सकना है-एक जाति से, दूसरे कर्म से। फिर उत्तम नायिका अपने नायक को जाति से हीन तो वता नही सकती। अव रही कर्म से हीनता, सो उसे भी दूती के सभोगादि जो अपने (नायिका के) अपराधरूप में परिणत हो सकते हैं, ऐसे कर्म के अतिरिक्त अन्य तो वता नहीं सकती। और वेसे कर्म भी जो दूती के भेजने के पहले हुए थे, वे तो सव सह ही लिए गए हैं, सो उनको उघारने की आव्यकता नहीं। तद अततोगत्वा सब वखेडे के हटने के बाद दूती का सभोग ही सिद्ध होता है। श्लोक की व्याख्या करते हुए दीक्षित जी ने लिखा है कि स्तनों का चन्दन साडी की भी रगड से हट सकता है। इस कारण नायिका ने निशेष कहा है, जिससे यह सिद्ध होता है कि सब चन्दन बिना मर्दन के साडी की रगड से नहीं हट सकता। पर नहाने से भी हट सकता है। इस कारण 'ऊपर के भाग का' कहा, जिससे यह सिद्ध होता है कि तू ने स्नान नही किया। क्योंकि यदि तू स्नान कर लिये होती तो सब स्थान का चन्दन उड जाता। पर तेरे तो केवल स्तन के ऊपर के भाग का ही चन्दन हटा है। यह स्थिति केवल आलिंगन से ही सभव हो सकती है। इसी प्रकार पान खाने में यदि कुछ देर हो जाती तो भोठों का रग थोडा फीका पढ सकता था। ऐसी वात नहीं है। इसे समझाने के लिए नायिका ने 'बिलकुल साफ हो गया' ऐसा कहा है। क्योंकि ऊपर के ओठ के रगे हुए रहने पर नीचे का होठ बिना चुम्वन एव अधरपान के किस तरह साफ हो सकता है। आँखों का काजल देर होने के कारण मलिन हो सकता है किन्तु विल्कुल मिट नहीं सकता। इस अन्यथासिद्धि दोष परिहार के लिए 'दूर' विशेषण का प्रयोग किया गया है। 'दूर' का अर्थ यहाँ अत्यर्थ या आपातत किया गया है। देर से या स्नान करने के कारण सब तरफ से

Page 61

२० चित्रमीमांसा

दियो द्वारा व्यग्य-व्यजक भाव का अनुमाष्य-अनुमापक भाव माना जाना कदापि युक्ति-सिद्ध नही। क्योंकि यहाँ जिन चन्दन क। मिटना, अधर की लाली का समाप्त होना आदि को सभोग के गमक अनुमापक हेतु रूप से माना जा सकता है, वे ऐसे हैं, जो वस्तुत अनकान्तिक व्यभिचरित सिद्ध हो रहे है। फिर इन्हें निश्चित रूप से सभोग का ज्ञापक कैसे मान लिया जाय, जब कि ये अन्य कारणों से भी सभव है। यहाँ तो अधम पद की महिमा से चन्दनच्युत आदि व्यजक रूप से परे प्रतीन हो रहे हैं, जैसी कि ध्वनिवादियों की मान्यता है। अनुमितिवादियों का यह कथन कि अधम पद की ही महिमा से चन्दनच्युति आदि अनुमापक लग रहे हैं, सरवथा अनुचित है। क्योंकि जब तक यहाँ नायक के अधम होने का निर्णय प्रत्यक्षत. अथवा अनुमानत. न हो जाय; क्रोध से आतुर नायिका के कथन मात्र का क्या विश्वास १ तव तक तो अधमत्वरूप यह हेतु सदिग्धासिद्ध ही हुआ और सदिग्धासिद्ध हेतु से अनुमान कैसा १ अस्तु, ये दोष तो प्राचीन ग्रंथों के विरोध से सबधित हैं। पण्डितराज जगन्नाथ ने इसका डटकर खडन किया है। उन्होंने लिखा है कि व्यजनावृत्ति वाली बात ऐसी होनी चाहिए, जो किसी विशेषवस्तु से सम्बन्धित हो। नैयायिकों के सिद्धान्त में व्याप्ति कहलाती हो तो वह निश्चय ही अनुमान के अनुकूल होगी ओर व्यजना के प्रतिकूल अर्थात् उससे व्यजना नहीं, अपितु अनुमान होता। जहाँ तक स्तननट का प्रश्न हे या समस्त चन्दन के हुट जाने वाला अर्थ है, वह तो कोई असाधारण अर्य है नहीं, क्योंकि गीले कपडे से चन्दन पुछ जाने पर भी यह बात हो सकती है, तो फिर वापीस्नान मात्र को हटा देने से क्या लाभ हुआ १ खीच-तानकर मात्र व्यग्यार्थ निकालना तो क्विष्टकल्पना भर ही है। विचारणीय प्रश्न तो यह है कि यह व्यग्य किन बातों पर निर्भर करना है ? व्यग्य-अर्थ की यहाँ प्रतीति मुख्यत दो वातों पर निर्भर करती है-एक तो उस अधम के पास ही तू गई थी और दूसरी वात वहाँ जाने का फल रमण। इस अर्थ के लिए विपरीत लक्षणा करनी पडेगी, तब उसका यह अर्थ सिद्ध होगा कि वापी में नहाने न गई थी, बल्कि उसके पास ही गई थी। अर्थात् वाच्यार्थ में जहाँ 'गई थी' कहा गया है, वहाँ 'नहीं गई थी' यह अर्थ करना पडेगा। अन्यया वात ही ठीक नही बैठेगी, अर्थात् 'वाच्यार्य के वाधित होने पर जो अर्थ प्रकट होता है, वह व्यजना से वोधित होता है' यह कहना सर्वथा उचित नही। क्योंकि यह लक्षणा का विषय है, व्यजना का नही। चित्रमीमासाकार, दीक्षित द्वारा ध्वनिकाव्य के उदाहरण में उद्धृत इस श्लोक के कथित अर्य का प्रत्याख्यान करते हुए पडितराज ने अर्य ही बदल दिया है, उन्होंने इसका अर्थ इस प्रकार लिखा है-'अरी वाधवजनों की पीडा से अज्ञात स्वार्थतत्पर दूती' स्नान का समय न चूक जाय, इसलिए तू नदी और मेरे प्रियतम के पास न जाकर यहाँ से सीधे वापीस्नान करने चली गई। मेरी पीडा से अनभिज्ञ, मुझे दुख देनेवाले, अत एव उस अधम नायक के पास तू नहीं गई। यह स्थिति तुझे देखकर ही प्रकट हो रही है, क्योंकि सरोवर में बद्ुत से युवक भी स्नान करने के लिए आया करते हैं। उनसे लब्जित होने के कारण तूने अपने हाथों को कधे पर रखकर आँचल के भीतर स्नान के समय स्तनों को साफ किया है। फलत अचलावृन होने के कारण ही स्तन के ऊपरी तटों का चन्दन धुला और छाती का चन्दन ज्यों का त्यों लगा रह गया। ठीक इसी प्रकार कुला करने के कारण और अगुली से दाँतों को साफ करने के कारण ऊपर के ओठ में पान का रग ज्यों का त्यों रह गया, और अधर का रग साफ हो गया। इसी तरह आँखों में पानी लगने के कारण योडा अञ्जन हटा। तू शरीर से दुवली तो है ही और इस समय ठढ भी पड रही है, फलत. स्नान से शरीर का रोमाचित हो जाना भी स्वाभाविक ही है।

Page 62

२२ वित्रमीमांसा

स्नानसाधारण्यं न। तत्संभोगव्यञ्जनार्थमधरपदोपादानम्। उत्तरोष्ठे सरागेऽघरोष्ठस्यव विशेष्यत्वम्। तत्र चुम्वनाधिक्यं व्यनक्ति। प्रातर्दत्ताञ्जनस्य कालविलम्बेन किल्ञिल्लु- सत्वे सिद्धे वापीस्नानप्रतिपादनाय दूरमित्युक्त्म। अतिविलुप्तमित्यर्थ.। तस्यापि कालस्ना- नाभ्यां सिद्धौ कचित्प्रान्त एवानअ्ञनता चुम्बनमेव व्यनक्ति। तनुस्तन्वीत्येताचदुक्ता स्वाभाविकतानवप्रतीत्या वाक्यार्थसुपपादयितुं पुलकितेति। तस्यापि तत्वनिषेधाय 'वर्तते' इति हृदि स्थितोऽन्वय । स्नानपुलकिततनोः किञ्विदुच्छूनता, अन्र तद्भावात्। तानव- पुलकोद्गमौ समभोगकेशजनितावेवेति व्यङ्यव्यज्जनम्। एतादशैवाक्येस्संस्कारवताऽघम- पदेन तदन्तिकगसने व्यक्के वापीस्ानगुणानुगुणतयाऽन्वितं मिथ्यावादिनीति सम्बोधनं पत्यन्तिकगमनव्यङ्गधानुगुण एवार्थे पर्यवसानं प्राप्तोति। ततो हेतो. तिरस्कृतवाच्यमस्य व्यङ्गथं वाच्यार्थादतिशययुक्तमिति हेतोरिदमपि उत्तमकाव्योदाहरणमस्तीति शेषः। अत्रान्यसम्भोगदुःखिता नायिका। शार्दूलविक्रीडितं वृत्तम्। 'सूर्याश्वेमसजस्तताः सगुरवः शार्दूलविक्रीडितम्" इति वृत्तरताकरोक्े.। रसगङ्गाघरकृतस्तु-'तटादिघटितवाक्यार्थानां स्नानव्यावृत्तिमुखेन सम्भोगाङ्गानामा- श्लेषादीनां परतिपादनेन प्रधानव्यङ्गयव्यक्षने साहाय्याचरणम्' इति। तदेतच्छ्रास्त्रानव-

'निश्शेषेत्यादी गमकतया यानि चन्दनच्यवनादीन्युपात्तानि, तानि कारणान्तरतोऽपि भवन्ति। यतश्रात्रैव स्नानकार्यत्वेनोपात्तानीति नोपभोग एव प्तिबद्धानीत्यनैकान्ति- कानि' इति अकाशकृतोक्तम्। तथा तत्रैव 'भस धम्मिअ वीसत्थ' इत्यादौ लिद्गजलिद्गिज्ञानरूपेणानुमानेन व्यक्ति गतार्थयती व्यक्किविचेककारस्य मतं प्रत्याचत्ाणेन व्यभिचारिणाऽसिद्धत्वेन च सन्दिह्यमानादपि लिद्गाद् व्यक्षनं प्रकाशकृताऽभ्युपगतम्। तथा च व्यज्जकानां साधारण्यं अतिपाद्यता प्रामाणिकग्रन्थेन तदसाधारण्यं प्रतिपाद- यतस्तव ग्रन्थस्य विरोध: स्यात्। किव्न निश्शेषेत्याद्यवान्तरवाक्यार्थेः स्नानव्यावृत्तिद्वारा व्यङ्ग यसाधारण्यसस्पादनं किसर्थस् ? व्यङ्गधव्यअ्षनायेति चेन्न, असाधारणत्वस्य व्यजनानु पात्तत्वात्, 'औण्णिद्म्' इत्यादी साधारणीनिश्वासादीनां वत्त्रादिवेशिष्टयवलेना- थविशेषव्यअ्जकत्वाङ्गीकारात्, व्याप्त्यपरपर्यायासाधारण्यस्यानुमानानुकूलतया व्यक्ति प्रतिकूलत्वाच्च। अथ तटादिघटितत्वेऽपि निश्शेषेत्यादिवाक्यार्थानामसाधारणत्वाभाव., सलिलारद्वसनप्रोन्छनादिना तत्सम्भवात्। तर्हि वापीस्नानव्यावर्तनेन कोऽर्थ.।

तदुन्तिकगमनं रमणफलञ् व्यङ्गचशरीरम्। तत्राद्यस्य व्यङ्गयत्वं न सम्भवति, पूर्ववाक्या- र्थानां वाच्थार्थे वापीस्नाने वाधितत्वाद्विधिनिषेधप्रतिपादकाभ्याम् 'गता' 'न गता' इति शब्दाभ्यां विरोधिलक्षणया निषेधविध्योः प्रतीतेरुपपत्तेः। न हि लक्षणीयेऽर्थे व्यक्तिवेद्य- तोचिता। न च तस्य तथात्वेऽपि रमणरमणांशस्य शब्दशक्तिमूलध्वनित्वम- व्याहतमिति वाच्यम्। अधमत्वमपकृष्टत्वम्, तच्व जात्या कर्मणा वेत्यादिसन्दर्भेणावमत्वा- न्वयानुपपत्तिवेद्यता प्रतिपादनात्, अन्यलच्यस्य शब्दार्थत्वानङ्गीकाराज्। किश्च तथात्वेऽपि वाच्यानां निश्शेपेत्यादि वाक्यार्थानामघमरवस्य च त्वदुक्कतरीत्या प्रकारान्तरेणानुपपद्यमा- नतया वाच्यसिद्धचङ्गत्वेन रमणरूपव्यङ्गधस्य गुणीभूतव्यङ्गयत्वप्रसङ्गात्। तस्साद् विदृग्धना- यिकाप्रयुक्त्तनिश्शेपेत्यादिवाक्यार्थानां वाच्यार्थसाधारण्यमेवोचितम्। अधमत्वोक्तिरपि प्राचीनानामेव सोढानामण्यपराधानामसत्यतया दूर्ती, परति, प्रतिपादयितुम्, न तु

Page 63

ग्रन्थारम्भप्रकरणम् २३

सम्भोगम्, विदग्धोत्तमनायिकायाः सखीसमदं तदुपभोगरूपस्य स्वनायकापराधस्य स्फुटं प्रकाशयितुमतितमामनौचित्यादित्याहुः। तदप्याशयानववोधात्, व्यङ्गयत- दितरकोटिसाधारणस्य वाक्यार्थस्य व्यङ्गथकोटौ भूयः सहचारग्रहस्य व्यञ्जनोपयो- गातू, प्रायशः सम्भावनासमशीलस्य व्यङ्गयवोधस्यापेत्तितोत्कटव्यङ्गचत्वस्य वक्तवैशिष्टया- दिवशेनापेक्षितत्वात्। प्रकृते च तटादिमान्रे चन्दनच्यवनादिकं सम्भोगेन भूय: सहचरित- मिति तेन तद्वयक्षनमिति तात्पर्यात्। सामान्यतश्चचन्दनच्यवनादिस्नानसाधारणं तटादि घटितं न स्नानेन सहचरितं किन्तु सम्भोगेनेत्येवं साधारण्यस्य व्यावृत्तिरभिप्रेता, न तु सर्वथा स्नानव्यावृत्ति:, सम्भोगकान्तिकता वा, येन प्रकाशमतविरोधः। व्याख्यान एव- कारोडपि सम्भावनार्थकः प्राचुर्यबोधको वा बहुधा, देवदत्त एवायसित्यादिवत्। अस्तु वा स्नानव्यावृत्तिः, तावतापि न संभोगासाधारण्यम्, आर्द्रवसनप्रोळ्छनादिनापि ताद्ृशच्य- वनादे: सम्भवात्, नानुमानगतार्थत्वम्, तथा सति वापीस्नानव्यावृत्या कोऽर्थः? इति चेदू, व्यङ्ग्यबोध इति ब्रमः। सम्भावितयो द्वयो रेकव्यावृत्तौ परोन्मेषहेतुताया अनुभवसिद्ध- त्वात्, वाच्यव्यङ्ग्योभयसाधारणो हेतुरेकत्र वाधितोऽन्यत्र पर्यवस्यतीत्येव ज्याय इति सुबुद्धिनाथोक्तेश्र। यत्त स्नानव्यावृत्ती विरुद्धलक्षणया तदन्तिकं गतासीत्यंशस्य व्यवहारताहानिरिति। तत्रोच्यते-यदि स्नानव्यावृत्तिर्वाक्यार्थदशायामेव तदैवं भवेत्। वाक्यार्थप्रतीत्यनन्तरन्तु प्रतीत तया तथा व्यङ्गधोन्मेषे लक्षणानवकाशात्। नहि तटमेव तथाविधमित प्राथमिकबोध: तस्य 'व्यर्थ सत् किञ्चिज्ज्ञापयति' इति न्यायालोचनोत्तरभावित्वादिति तवयुक्तस्नानव्या- वृत्तिबोध। अस्तु वा तदंशे लक्षणा, रन्तुमिति फलस्येव ध्वनित्वात्। यत्तु रमणफल- स्यापि ध्वनित्वाभाव., अधमत्वमपक्कष्टत्वमित्यादिना तस्याप्यर्थापत्तिवेद्यत्वप्रतिपादनादि- त्युक्तम्। तदप्यसत्। न हि तेन ग्रन्थेन सम्भोगमृतेऽघमत्वस्यानुपपत्तिः । किन्तु 'नोत्तमनायिकावनोद्धाटनार्हम्' इत्यादिना वक्तवैशिष्टयप्रतिपादनेन व्यङ्गधपर्यवसानमात्र-

निरस्तमिति सङ्क्षेपः। तस्माद् विदग्धाया गूढोक्त्या साधारणेष्वेतेषु व्यड्ग्येषु सम्भाव्य- मानासाधारण्येषु विद्ग्धत्वदुश्शीलत्वरूपवक्तवोद्धव्यवैशिष्ट्यवलाद् दु.खप्रयोजककर्मशील- त्वरूपोऽधमपदार्थो वाच्यार्थो व्यज्जनया दूतीसंभोगरूपतादशकर्मशीलत्वाकारेण पर्यंघ- स्यति। एवं झटिति व्यङ्ग्यबोधकत्वाद्धमपदस्य ग्राधान्यं चन्दनच्यवनादीनां स्नानकार्य- तया निवद्धानां योग्यतया सम्भोगभूताश्लेषचुम्बनादिकार्यताप्रतिसन्धाने तद्यज्जनद्वारा सम्भोगगमकत्वम्, न तु तदसाधारण्यप्रतिपादनम् । अन्र त्वय्यकृतज्ञायां यद्ान्धव- बुद्धयाविश्वासः, यच्त तत्रैवंविधेद्दशोऽनुरागस्तद्युक्कमेव। एवंविधविविधवेदनाजनितसन्ताप- पात्रत्वं ममेति ईर्ष्यातुकचिप्रलस्भसञ्चारिनिर्वेदध्वनिः, दूतीसंभोगस्य तत्रानुगुणत्वाद्। वाच्यानां चन्दनच्यवनादीनां व्यङ्गथानाञ्न परिरम्भचुम्वनाद्यनुभावानां संभोगोत्कर्पद्वारेणे- ष्योत्तेजकानां निर्वेदोत्कर्षकतेति दिक्। (चित्र०) यत्र व्यङ्गयं वाच्यानतिशायि तद् गुणीभूतव्यङ्गयम्। (भारती) जिस काव्य मे व्यग्य चमत्कारजनक तो हो, पर प्रधान न हो, उसे गुणीभूतव्यग्य कहते हैं अर्थात् जिस काव्य में व्यग्यार्थ वाच्यार्थ की अपेक्षा अधिक चमत्कारजनक न हो।

Page 64

२४ चित्रमीमांसा:

विमर्श-आचार्य मम्मट का जो मध्यम काव्य है तथा आनन्दवर्धन और आचार्य अभिनवगुप्त की परिभाषा में गुणीभूतव्यङ्गयकाव्य है, उसी तरह आचार्य दीक्षित की भी गुणीभूतव्यग्य की परिभापा है। मम्मट ने मी इसे मध्यम काव्य केवल इसलिए कहा है कि इसमें व्यग्यार्थ की अप्रधानता रहती है। ध्वनिमर्मशों की दृष्टि में गुर्णाभृतव्यग्यकाव्य -चमत्कारजनक नहीं, अत उन्होंने इसे ध्वनि का ही एक निष्पन्द रूप माना है 'ध्वनिनिष्पन्द- रूपो द्वितीयोऽपि महाकविविपयोऽतिरमणीयो लक्षणीयः सहृटयैः ।' रसगंगाधरकार ने चित्रकाव्य के गुणीभूतव्यग्य पर भी योडा विचार किया है। उन्होंने लिखा है कि काव्य- प्रकाश के टीकाकारों ने 'अतादशि गुणीभूतव्यड्ग्यं व्यड्ग्ये तु मध्यमम्' इस गुणीभूतव्यग्य के लक्षण की व्याख्या करते हुए लिखा है कि गुणीभूतव्यग्य उसी का नाम है जो चित्र अर्थात् अलकारप्रधान काव्य न हो। पर यह उनका कथन ठीक नहीं। क्योंकि पर्यायोक्ति, समासोक्ति आदि अल्कार जिनमें प्रधान हों, उन काव्यों में अव्याप्ति हो जायगी और होना चाहिए अवध्य। क्योंकि सभी अलकार शास्त्र के शञाताओं ने उनको गुणीभूतव्यग्य और चित्र ढोनों माना है। अत जो चित्रकाव्य होगा, वह गुणीभूत अवध्य होगा। दीक्षित ने गुणीभूतव्यग्य का अधोंडकित उदाहरण दिया है- (सुधा) गुणीभूतव्यङ्गवरूपमध्यमकाव्यस्य स्वरूपमाह-यन्रेति। यन्र काव्ये व्यञ्ञनावृत्ति- गम्यं वाच्यार्थ नातिशेते=नातिक्राम्यति, तद्गुणीभूतव्यङ्गयमित्यर्थः। तथा च वाच्यार्थ- निष्टचमत्कृतित्वावच्छ्िन्नप्रयु क्ततिरस्कारत्वावच्छिन्नाधिकरणव्यङ्गयत्वे सति शब्दार्थत्वं तत्व- मिति लक्षणम्। व्यङ्गवचमत्कृतिसमानाधिकरणत्वरहितवाच्यचमत्कारवत्त्वमेव मध्य- मत्वमिति गङ्गाधरकृतः । 'अतादृशि गुणीभूतव्यङ्गवं व्यङ्गये तु मध्यमम्' इति प्रकाश- लक्षणे तु व्यङ्गनयपदमस्फुटतरातिरिक्तव्यङ्गयपरम्। तेनास्फुटव्यङ्गये नाव्याप्त न वाधम- काव्येऽतिव्याप्ति., तत्रास्फुटतरव्यङ्गघसत्वादिति प्रदीपादयः। व्यङ्ग्यपदं स्फुटव्यङ्गथपरम्। तेनाधमकाव्ये नातिव्याप्तिरिति व्याख्यानन्तु भ्रममूलकमेव, अस्फुटव्यङ्गचस्यासंग्रहापत्तेः। केचित्पुन., यथाश्रुतकान्यप्रकाशीयलक्षणस्याधमेऽतिव्याप्िमाशङ्गय चित्रान्यत्वे सति चमत्कारानाधायकव्यङ्गयवत्वमिति व्याचक्र । यत्त गङ्गाधरकृता-'चित्रान्यत्वे सति' इत्युक्तौ पर्यायोक्तिसमासोक्त्यादिप्रधानकान्येऽव्यापि:, तेपां गुणीभूतन्यङ्गयतायाश्चित्र- तायाश्च सर्वालङ्कारिकसम्मतत्वादिति। तन्न, 'गुणालद्गारयुक्तस्यैव चित्रत्वम्' इति प्रकाश- कृता प्रतिपादितत्वात्, शव्दचित्रस्य प्रायो नीरसत्वेनार्थचित्रमीमांसाप्रस्तावस्थाप्पय- दीक्षितेना्र सूचितत्वेनालक्कारिकसम्मतत्वाभावादिति दिक।

(चिन्र० ) यथा-

गच्छ्राम्यच्युत दर्शनेन भवतः कि तृप्तिरुत्पद्यते कि त्वेव विजनस्थयोहेतजनः संभावयत्यन्यथा।

माश्िष्यन् पुलकोत्कराञ्च्विततनुं गोपीं हरिः पातु वः ॥

Page 65

ग्रन्थारम्भप्रकरणम् २५

(भारती) (यहाँ व्यग्यार्य के वैसा न होने का अभिप्राय है वाच्यार्थ से उसका अधिक चमत्कारजनक 'न हो जाना।) जैसे कि यहाँ नायिका का कथन है-"हे कृष्ण! मै अब जाती हूँ। क्योंकि मात्र तुम्हें देखने भर से क्या तृप्ति मुझे मिल जाती है ? अर्थात् नही। किंतु, इस निर्जन वन में अर्थात् इस एकात स्थान में हम दोनों को देखकर भला लोग क्या कहेंगे ? इस प्रकार आमत्रित करती हुई अर्थात् इतनी देर तक तुम्हारे साथ रमण की इच्छा से रुकी हुई व्यर्य ही समय विताने के खेद से अलसाई हुई अगडाई लेनी हुई गोपी का आलिंगन करने हुए रोमाचित शरीर वाले भगवान कृष्ण तुम लोगों की रक्षा करें। (यहॉ व्यग्यार्थ इस निर्जन वन मे मिलने का सकेत देकर भी वह अभीप्सित वस्तु नही प्राप्त कर सकी, यह व्यग्य गौण रूप से है। क्योंकि इसकी अपेक्षा जो वाच्यार्थ है 'मैं जा रही हूँ' वही अधिक सुन्दर प्रतीत हो रहा है।) (सुधा) तदुदाहरति-यथेति। तन्राप्यष्टधा सिन्ने मध्यमे वाच्यसिद्धयङ्गसुदाहरति-गच्छा- मीति। हे अच्युत ! अस्खलितधैर्य! अहं गच्छामि, भवतो दर्शनेनालोकनमात्रेण किं प्रीतिरुत्पद्यते' अपि तु नेति। किन्तु हतजनो नष्टो लोकः एवं विजनस्थयो जनसञ्चार- रहितवनस्थितयो. आवयोरन्यथा सम्भावयति । एवमामन्त्रणमच्युतेति सम्बोधनम्, तस्य भङ्गथा एतावत्कालं स्थितायां मयि त्वद्रमणाभाव एवेति विच्छित्या सूचितं वृथावस्थानम्, तस्य खेदेनालसामद्गादिकं मोटयन्तीं गोपीमाश्िप्यन् पुलकानासुत्करेण समूहेनाख्विता तनुर्यस्य स हरिः वः पातु इत्यन्वय। अन्र वक्रोक्तिरलङ्कार। वृथावस्था- नखेदे अच्युतेत्यस्य पदार्थस्य हेतुत्वात् काव्यलिङ्गमलद्कारः। 'काव्यलिङ्गं हेतोर्वाक्यपदा- थता' इति काव्यप्रकाशोक्ते। परकीया नायिका । शार्दूलविक्रीडितम् 'सूर्याश्वै ..... '

(चित्र०) अन्न गच्छाम्यच्युतेत्याद्यामन्त्रणेन त्वया रन्तुमेतावत्कालं स्थितम्, तन्न लब्धमिति व्यङ्गयम् । तत्तु 'इत्यामन्त्रणभद्गिसूचितवृथावस्थानखेदालसाम्' इत्येतद्वाच्यस्य सिद्धि करोतीति तदङ्गत्वान्न वाच्यातिशायि। अतो गुणीभूत- व्यङ्गयमिदम्। (भारती) यहाँ 'हे अच्युत ' मैं जाती हूँ' इस सबोधन से 'तुम्हारे साथ रमण की इच्छा से इतनी देर तक व्यर्थ रुकी रही' इस व्यग्य की अपेक्षा आमत्रणभगजन्य व्यर्थ प्रतीक्षाजन्य खेट से अलसाई हुई वाच्यार्थ की प्रतीति ही अधिक चमत्कारजनक है। अत यहाँ यह गुणीभतव्यग्य काव्य हुआ। (सुधा) अन्न वाच्यसिद्धयड्गत्वप्रतिपादनाय व्यड्गयमवतारयति-अत्रेति। 'गच्छाम्यच्युत' इत्यामन्त्रणेन त्वया रमणाय एतावत्कालं स्थितं न तल्लव्धस्, अस्खलनार्थत्वात्। एत- द्यङ्ग्यम् 'इत्यामन्त्रण' इत्यादिवाच्यस्य सिद्धिकृद् इति प्रकारेण तदङ्गत्वात् व्यङ्गथस्य वाच्याङ्गत्वान्न वाच्यात्तस्यातिशय आधिक्यम्, अत इदं काव्यं गुणीभूतव्यङ्गयम्।

Page 66

२६ चित्रमीमांसा

(चित्र०)

यथा वा- प्रहरविरतौ सध्ये वाऽह्स्ततोऽपिं परेऽथ वा किसुत सकले याते वाडहि प्रिय त्वमिहैष्यसि । इति दिनशतप्राप्यं देश प्रियस्थ यियासतो हरति गमनं बालालापः सवाष्पगलज्जलैः॥ अत्र सकलमहःपरमावधिः, ततः परं प्राणान् धारयितुं न शक्रोमीति व्यड्ग्यं प्रियगमननिवारणरूपस्य वाच्यस्य सिद्धि करोतीति तद्ङ्गत्वाद्वाच्यान- तिशायि। अत इदमपि गुणीभूतव्यड्ग्यम्। (भारती) उदाहरण देते है-हे प्रिय ' क्या तुम एक पहर के वाद लौट आओगे अथवा ढो पहर में या कि उसके भी वाद अथवा पूरा दिन विताकर ही लौटोगे ? आँसुओं की धारा वहाती हुई ऐसी बातों से वह नवोढा जहाँ सैकडों दिनों में वह पहुँचने वाला है, इतने दूर देग जाने वाले अपने प्रेमी के गमन का निषेध कर रही है अर्थात् उसे जाने से रोक रही है। इस पद्य में सारा दिन पूरी अवधि है। उसके वाद मैं न जी सकूँगी यह व्यग्य है और वाच्य है प्रिय के जाने का निवारण। अव सोचिए कि प्रिय का न जाना तभी सभव है जब कि वह यह समझ ले कि वह एक दिन के वाद न जी सकेगी और यह वाच्यार्थ पूर्वोक्त व्यग्य से ही सिद्ध होता है। अत यह काव्य गुणीभूत- व्यग्य है। विमर्श-गुणीभूतव्यग्य के इस उदाहरण पर पडितराज जगन्नाथ ने रसगगाघर में अपनी आपत्ति प्रकट की है। उन्होंने लिखा है-'साश्ुनयन उस वाला के इस कथन से, 'क्या तुम एक पहर के वाद लौट आओगे १' प्रिय का न जाना रूपी वाच्य सिद्ध हो जाता है, अतः व्यग्य के गोण होकर उसे सिद्ध करने की कोई आवश्यकता नही रह जाती। 'वातों से जाने का निवारण कर रही है' इस कथन में 'वातों से' यह तृतीया करण अर्थ में है। अतः स्पष्ट है कि वे 'वातें' जाने के निवारण के साधक है। यदि इसे यह कहें कि व्यग्य भी तो वाच्य को सिद्ध कर सकता है तो ऐसा कहने पर 'निश्शेषच्युतचन्दनम्' आदि में भी दूतीसभोग आदि व्यग्य भी नायक की अधमता को सिद्ध करते हैं। फिर उन्हें गुणीभूतव्यग्य मान लेने में क्या आपत्ति १ अत. व्यग्य सहित होने पर ही प्रिय के जाने का निवारण सिद्ध हो सकता है। पण्डितराज जगन्नाथ ने उसके वाद 'न जी सकूँगी' इस व्यग्य को वाच्यसिद्धि का अग मानकर गौण समझ लिया है। पर 'नायक' आदि विभाव, 'अश्रु' अनुभाव, चित्त के आवेग को सचारी भाव मानकर उनके सयोग से ध्वनित होने वाले विप्रलभ शृगार के कारण इसे ध्वनि-काव्य कहा है। किंतु, पण्डितराज के इस तर्क में कुछ अधिक तथ्य नहीं प्रतीत होता। क्योंकि वीच में प्रतीत होने वाले व्यग्य के द्वारा भी ध्वनि एव गुणीभूतन्यग्य का व्यवहार होना काव्य-प्रकाश आदि प्राचीन साहित्यिक ग्रन्थों को सम्मत है। अत. अत में पण्डितराज की दृष्टि में भी इस श्लोक में विप्रलभ शृगार की ध्वनि प्रतीत होती है, अत. इस काव्य को गुणीभूतव्यग्य न मानना कुछ भी अभिप्राय नहीं रखता।

Page 67

ग्रन्थारम्भप्रकरणम् २७,

(सुधा) मध्यमकाव्यस्योदाहरणान्तरमाह-यथा वेति। हे ग्रिय। प्रहरावसाने त्वमेप्यसि वा मध्याह्ने, अथवा मध्याह्वात् परत्र तृतीयग्रहरे, उत सकले यातेऽहि दिवसावसाने कि वा इह त्वमेष्यसि! इति सवा्पगलज्जलैरालापदिनानां श्तेन प्राप्तुं योग्यं देशं गन्तु- मिच्छत. प्रियस्य बाला मुग्धा गमनं हरतीत्यन्वयः । विरहासहिष्णुतायाः प्रवासविप्र- लम्भरसउत्कर्षे हेतुः। जातिरलङ्कारः। नवोडेयम्। हरिणीवृत्तम्, 'रसयुगहयैन्सौ श्र स्लौ गो यदा हरिणी तदा' इत्युक्ते। अन्रापि वाच्यसिद्धधङ्गतां प्रतिपादयितुं व्यङ्गधमाह-अत्रेति। परमावधि. सकल- दिवसः। तदनन्तरं प्राणधारणमशक्यमिति व्यंग्यं गमननिवृत्तिरूपवाच्यसिद्धिकृद इति वाच्यांगत्वाद् व्यंग्यं वाच्यार्थादतिशायि नेतीदमपि गुणीभूतव्यंग्यम्। यत्तु गंगाधरकृता सवाप्पगलज्जलानां प्रियालापानामेव प्रियगमननिवारणरूपवाच्य- सिद्धघंगतया व्यंगेय न गुणीभावत्वम्, आलापैरिति तृतीयया हरणक्कियां प्रति करण- त्वस्य प्रतिपत्तेः। तद्वाच्यसिद्धयङ्गतासम्भवमात्रेणोक्तौ 'निश्शेषच्युत' इत्यादावघमत्वरूप- वाच्यसिद्धचंगत्वस्य दूतीसम्भोगादौ सम्भवाद् मध्यमत्वापत्तेः । अस्तु वा प्रणधारणा- शक्यत्वरूपव्यंग्यस्य वाच्यसिद्धयंगतया गुणीभावस्तथापि नायकादेर्विभावस्य; वाष्पा- देरनुभावस्य, चिन्तावेगादेश्च सञ्जारिणः; संयोगादभिव्यज्यमानेन विप्रलम्भेन ध्वनित्वस्य निवारणासम्भवादिति प्रतिपादितम्। तदसव्। ताद्ृशालापाना तस्या मुग्धात्वद्योतन- तात्पर्यंतया वाच्यसिद्ध चङ्गत्वाभावाद। सुग्धोपलक्षणे तृतीयाविभक्त स्त्वाच्च, दूतीसम्भो- गरूपहीनकर्मत्वाकारेण तत्पर्यवसाने साधकत्वात्, वाच्याद्गत्वाभावान्च। तादशविग्रलम्भ- जन्यप्राणधारणाशक्यतायास्तन्निवारणे तात्पर्यस्य वक्तुं योग्यत्वाच्च। प्रथसोदाहरणे राज- विषयकभावध्वनेरुत्तरत्र स्पष्टतया सङ्कीणत्वम्। उत्तरस्य तु शुद्धवाच्याङ्गत्वमिति भेदः। (चित्र०) यदव्यङ्गयसपि चारु तच्चित्रम् । तत्न्रिविधम्-शब्दचित्रम्, अर्थचित्रम्, उभयचित्रमिति। शब्दचित्रं यथा- (भारती) क्रमप्राप्त काव्य के तृतीय भेद-चित्रकाव्य-का लक्षण करते हुए दीक्षित ने कहा है कि गुणाभिव्यजक शब्द और अर्थ तथा अलकृत शब्द वाले मनोहर अव्यग्य रचना को भी चित्रकाव्य कहते हैं। इस काव्य के अव्यग्य होने का अभिप्राय है-व्यग्यार्थ की स्फुट प्रतीति से रहित होना। फिर इसका विभाग करते हुए दीक्षित ने लिखा है- वह चित्रकान्य तीन प्रकार का होता है-(१) शब्दचित्र (२) अर्थचित्र और (३) उभयचित्र। इसमें सर्वपथम शब्दचित्र का उदाहरण प्रस्तुत करते हैं- (सुधा) क्रमप्राप्तस्य तृतीयभेदस्य चित्रस्य लक्षणमाह-यदिति । यत् काव्यमव्यङ्गथम्, अस्फुटत रातिरिक्तव्यङ्गचरहितं चारुगुणालङ्कारान्यतरचमत्कृतियुतं तच्चित्रमित्यर्थः । तथा

Page 68

२८ चित्रमीमांसा

केचित्त-अव्यङ्ग्यम् =अस्फुटव्यङ्गयम्। स्फुटत्वन्तु कवितात्पर्यविपयविशेषवत्वम्। तथा चविशेषतः कवितात्पर्यरहितत्वे सति गुणालङ्गारनिरूपितचमत्कारवत्वमित्याहुः। तद्विभागमाह-तदिति। तच्चित्रं काव्यं त्रिविधं त्रिप्रकार कमित्यर्थ। द्विविधमेव चित्र- मिति प्रकाशादयः । ततो विशेषप्रतिपादकं त्रिविधमिति विरोपणम्। तदाह-शब्दचित्र-

अर्थोपयोगिगुणालद्वारचमत्कारवत्वे सति ताहशव्यङ्गयवत्त्वं द्वितीयम्। उभयविपयकगुणा- लङ्कारचमत्कृतिमरवे सति तादगव्यङ्गथाश्रयत्वं तृतीयमिति समुदायार्थः। तत्राद्यमुदाहरति-शव्दचित्रं यथेति। माघकाव्ये वसन्तदर्शनं कृष्णस्येति। (चित्र०)

नवपलाशपलाशवनं पुरः स्फुटपरागपरागतपङ्कजम्। मृदुलतान्तलतान्तमलोकयत् स सुरभि सुरभि सुमनोभरः॥ (भारती) यह श्लोक 'शिशुपाल वध' के षष्ठ सर्ग में वसन्त वर्णन से उद्धृत है। भगवान श्रीकृष्ण ने -सर्वप्रथम वसन्त को देखा। उस वसन्त को जिसके कारण पलाशों के वन में नये नये पत्त निकल आये थे, पराग से भरे हुए कमल खिल गये थे। धृप की गर्मों से लताओं के कोमल पत्ते कुछ मुरझा गये थे और विविध प्रकार के फूलों से मनोहर सुगन्ध निकल रही थी। विमर्श-इस श्लोक को शब्दचित्र के उदाहरण में दीक्षित ने इसलिए रखा कि नव पलाशवन के वर्णन का चित्र 'प' शब्द की अधिकाधिक श्रुतियों में खींच रहा है, और पुष्प -समृद्धियों की मादकता की प्रतिकृति 'लता' के वाद 'सुरभि' की आवृत्त व्वनियों में दिखाता प्रतीत हो रहा है। यद्यपि यह कहा जा सकता है कि यहाँ कवि ने वसन्त-वर्णन के प्रति अपना चमत्कार प्रदर्शित किया है, किंतु इस चमत्कार-प्रदर्शन में कवि की उतनी तन्मयता नहीं प्रतीत होती, जितनी कि शब्द-चित्रण के अपने विचित्र कौशल के प्रदर्शन में है।

(सुधा) नवपलाशेति। स हरिः, पुरोऽ्रे प्रथमं वा नवानि पलाशानि पर्णानि 'पलाश किशुके पर्णे' इति विश्वः। येपां तानि। पलाशानां किंशुकाना वनानि यस्मिन् तम्। स्फुटानि विक- चानि,परागे रजोभि 'पराग सुमनोरजः' इत्यमर। परागतानि व्याप्तानि पङ्चजानि कम- लानि यस्मिन् तमित्यर्थ.। अत एव मृदुला कोमला तान्ता आतपसमये किञ्चिन्म्लाना लतान्ता पल्ञवा यस्मिन् तम्। सुमनोभरैः पुष्पसमृद्धिभि. सुरभिं सुगन्धं मनोज्ञं वा, सुरभि वसन्तम्, अलोकयत् अपश्यत्। 'सुरभिश्वम्पके स्वर्णे जातीफलवसन्तयोः, सुगन्धौ च मनोज्ञे' इति विश्व.। इह प्रतिपदमक्तरत्रयावृत्तिरूपो यमकालद्वारः। 'अर्थे सत्यर्थभिन्नानां चर्णानां सा पुनः श्रुतिः, यमकम्।' इति प्रकाशोकेः। वृ्त्यनुप्रासश्च, 'एकस्याप्यसकृत्परः' इत्युक्ते । सजातीययोरेतयो: संसृष्टि, 'सेष्टा संसृष्टिरेतेषां भेढेन यदिह स्थिति.' इति तब्जत्नणात्। द्रुतविलग्वितं वृत्तम्, 'दुतविलम्वितमाह-'नभौ भरौ' इति वृत्तर ताकरोक्केः। अत्र द्वयो. शब्दालद्वारयोश्चमत्कृतिहेतुत्वेन शब्दचित्रत्वन्यवहारः।

Page 69

ग्रन्थारम्भप्रकरणम् २६

अथचित्रं यथा- (चिन्न०)

स च्छिन्नसूल क्षतजेन रेणुस्तस्योपरिष्ठात् पवनावधूतः । अङ्गारशेषस्य हुताशनस्य पूर्वोत्थितो धूम इवाबभासे॥ (भारती) अर्थचित्र का उदाहरण प्रस्तुत करते हुए कवि ने लिखा है- यह इलोक रघुवश के सप्तम सर्ग से उद्धृत है। इसमें रघु के रण का वर्णन है। इसका अर्थ इस प्रकार है-घोडों की टापों से युद्ध में जो रजकण उडे थे, उसकी जड (पृथ्वी से सटा हुआ भाग) रुधिर ने काट दी और वह रजकण उस रुधिर के ऊपर ही ऊपर उडने लगे। वह धूलिकण ऐसे प्रतीत होने थे, मानो आग के केवल अगारे शेष रह गए हैं और उससे जो पहले निकल चुका था वह धुँआ ऊपर उड रहा है। विमर्श-यहाँ धूलिकण के बीच धूम की सभावना से उत्प्रेक्षालकार है। यथा-'भवेत्संभा -- वनोत्पेक्षा प्रकृतस्य परात्मनः।' इस श्लोक में अर्थचमत्कृति के कारण ही इसे अर्थ चित्र का उदाहरण माना गया है। (सुधा) अर्थचित्रमुदाहरति-अर्थचित्रं यथेति। स इति। रघुवंशेऽजसंग्रामवर्णनम्। क्षतजेन रुधिरेण च्छिन्नमूलो लनभूतलसम्बन्धः, तस्य प्षतजस्योपरिष्टात् पवनेनावधूतः कम्पितः स रेणुः। 'रेणुद्वयो: स्त्रियां धूलिः' इत्यमर। अद्गारशेषस्य हुताशनस्यागे: पूर्वोत्थितो धूम इवाबभासे दिदीपे। रेणुमध्ये धूमसम्भावनयोतप्रेत्तालङ्कारः। 'सम्भावनमथोत्प्रेक्षा प्रकृतस्य समेन यत्' इति प्रकाशोक्तेः। 'मन्ये शङ्के ध्रुवं प्रायो नूनमित्येवमादिभिः। उ्प्रेक्षा व्यज्यते शब्दैरिव शब्दोऽपि ताहशः ॥' इत्युत्प्रेक्षाव्यअ्जकशब्देषु सम्भावनार्थकेवशब्दस्य तद्वाचक- त्वग्रतिपादनात्। इन्द्रवज्राच्छन्दः। 'स्यादिन्द्रवज्रा यदि तौ जगी ग' इति तन्नक्षणात्।। अर्थालङ्कारभूताया उत्प्रेक्षायाश्रमत्कृति हेतुत्वेनार्थचित्रत्वव्यवहार इति बोद्धयम्। (चित्र०) उभयचित्रं यथा- वराहः कल्याणं वितरतु स वः कल्पविरमे विनिर्धुन्वन्नौदन्वतमुद कमुर्वीमुद वहत् 1 खुराघातन्रुख्यत्कुलशिखरिकूट प्रबिलुठ- च्छिलाकोटिस्फोटस्फुट घटितमङ्गल्यपटहः॥ (भारती) उभय चित्र का उदाहरण दीक्षित ने अधोंकित रूप से प्रस्तुत किया है- कल्पान्त में जव सागर अपनी मर्यांठा भग कर देता है और स्वतत्र रूप से प्रलयकर दृश्य करते हुए समुद्र के जल पृथ्वी को कपित करते है, वैसी प्रकम्पित धरती को धारण करने वाले भगवान वराह तुम लोगों को कल्याण प्रदान करे। भगवान वराह की विशेपता का वर्णन करते हुए कवि ने लिखा है-जिनके खुरों की चोट से वडे-वडे विशाल पर्वत के शिखर मे शिला-

Page 70

३० चित्रमीमांसा

-खंड टूटकर गिर रहे हैं और शिलाखड टूटने से जो ध्वनि उत्पन्न हो रही है वह मानो मांगलिक नगाडे वज रहे है। विमर्श-यहाँ शब्दालकार की दृष्टि से वृत्यनुप्रास है ओर अर्थालकार की दृष्टिसे रूपक है। अत अनुप्रास और रूपक दोनों की चमत्कृति के कारण उभय चित्र का यह उदाहरण दिया गया है। स्पष्ट है कि इस उलोक में शब्द और अर्थ दोनों का चमत्कार एक ही साथ सम्पन्न हुआ है। इलोक में पद-पद पर शब्दों से वृत्यनुप्रास की अधिकता ओर ओजगुण के प्रकाशित होने के कारण शब्द का चमत्कार है और प्रसादगुण युक्त होने के कारण शब्द सुनते ही ज्ञात हुए रूपक अथवा हेतु अलकार रूपी अर्थ का चमत्कार है। अत. इस श्लोक में दोनों शब्द और अर्थ के चमत्कारों के समान होने के कारण दोनों की प्रधानता समान ही है। इस कारण इसे शब्दार्थोभयचित्रकाव्य कहना ही उचित है। ग्रन्थ के आरभ में प्रकरण का उपसहार करते हुए ग्रथकार ने लिखा है- (सुधा) उभयचित्रमुदाहरति-वराह इति। कल्पविरमे कल्पावसाने, उदन्वत उदघेरिदम औदन्वतम् 'उदन्वानुद्धि: सिन्धुः' इत्यमरः। उदकं जलम्, विनिर्धुन्वन् कम्पयन्, उर्वी पृथिवीसुदवहत्। उदके प्रापयन् धारयन् वा स वराहो भगवान् वो युप्माकम् 'बहु- वचनस्य वस्सौ' इति वसादेश। क्ल्याणं मङ्गलं वितरतु ददात्वित्यर्थः । 'आगिपि लिड्लोटौ' इति लोट्। कीदृशो वराहः खुराणां तैर्वा आघातस्ताडनं तेन चुट्यन्तो ये कुलपर्वताना कूटा: शिखराणि तेभ्यः प्विलुठन्त्य' शिलाहपद:, तासां स्फोट स्फोटनम्, तदेव स्फुटं घटितो माङ्गल्यपटहो मङ्गलार्थ आनतो येन तादन इत्यर्थः। वृत्यनुग्रासोऽत्र शब्दालद्घार:, रूपकञ्चार्थालङ्गार। 'तद्रृपकमभेदो य उपमानोपमेययो.' इत्युक्ते । शिख- रिणीच्छन्द 'रसै रुदैश्छिन्ना यमनसभला ग शिखरिणी' इति तव्नत्णात्। अत्रोभयोर- लङ्कारयोश्चमत्कृति हेतुत्वादुभयचित्रत्वसिति वोध्यम्। (चित्र०) तदेवं त्रिविधे ध्वनिगुणीभूतव्यङ्गययोरन्यन्नास्माभिः प्रपळ्ः कृतः । शब्दचित्रस्य प्रायो नीरसत्वान्नात्यन्तं तदाद्रियन्ते कवयः, न वा तन्र विचार- णीयमतीवोपलभ्यत इति शब्दचित्रांशमपहायार्थचित्रमीमांसा प्रसन्नविस्तीर्णा प्स्तूयते। चिन्त्येऽत्र चित्रवर्गे प्रदर्श्ययोर्लकयलक्षणयोः। प्राचीनानामेव फोका: प्रायेण लिख्यन्ते॥ इति चिन्नमीमांसायां ग्रन्थारम्भप्रकरणम्

(भारती) इसलिए इस प्रकार ध्वनि, गुणीभूतव्यग्य एव चित्रमेद से त्रिविध काव्य में व्वनि और गुणीभूतव्यग्य का विस्तारपूर्वक वर्णन इस ग्रन्थ में अन्यन्न किया गया है। तीन प्रकार के चित्र- काव्य में प्रथम शब्दचित्र का नीरस होने के कारण व्यग्य रहने पर भी अनुप्रास मात्र की

Page 71

ग्रन्थारम्भप्रकरणम् ३१

विशेषता के कारण ध्वनि एव रस के मर्मज्ञ कविजन शब्द-चित्र कान्य को अत्यन्त आदर की दृष्टि से नहीं देखते। अत. शब्दचित्र को छोडकर अर्थचित्र काव्य की मीमासा अर्थात जिस काव्य में अर्थालकार का चमत्कार रहता है, उसका अत्यन्त विस्तारपूर्वक विचार इस ग्रन्थ में किया गया है। इस ग्रन्थ की प्रामाणिकता के सदर्भ में लेखक ने कहा है कि इसमें विचारणीय चित्रकाव्य के अलकार समूहों में लक्ष्य एव लक्षण के प्रदर्शन के लिए प्राचीन लोगों द्वारा लिखे गए प्रामाणिक श्लोकों को ही उद्धृत किया गया है। प्राय. शब्द से-अपने द्वारा भी रचित कही-कहीं श्लोकों का सन्निवेश भी किया गया है, यह मालूम पडता है। इति सविमल विमर्शोपेत 'भारती' हिन्दी व्याख्याया ग्रन्थारभप्रकरणम्

(सुधा) अथारम्भप्रकरणमुपसंहरति-तदेवमिति । ध्वनिगुणीभूतचित्रभेदेन त्रिविधे काव्ये ध्वनिगुणीभूतव्यङ्गथयोः प्रपञ्चो विस्तररचनाविशेषोऽन्यत्र ग्रन्थे कृतः । त्रिविधे चिन्रे आद्यस्य शब्दचिन्रस्य प्रायो नीरसत्वात्; तत्र व्यङ्ग्यसत्वेऽपि कविसंरम्भविषयत्वाभावात् आय इत्युक्ति, अनुप्रासमान्रे तत्संरम्भात् कवयः=ध्वनिरसाभिज्ञा, तत्=शब्दचित्रं नात्यन्तसाद्रियन्ते न तदादरनिरुपणे कुर्वन्ति। तत्र=शब्दचित्रे विचारणीयं विचारयितुं योग्यं वाऽतीव नोपलभ्यत इति शब्दचित्रमपहाय त्यकत्वा, अथचित्रेऽर्थालाङ्गरचसत्कृ- तियुते काव्ये मीमांसा=विचारणा, अत्यन्तं विस्तीर्णा विस्तृता पस्तूयते प्ारभ्यत इति समुदायार्थ.। प्रकाशकारस्तु-'शब्दचिन्नं वाच्यचित्रमव्यङ्गयं त्ववरं स्मृतम्' इति द्विवि- धमेव चित्रमाह। यत्त प्रकाशमतसुद्दिश्य दर्पणकारा :- 'अन्र केचिच्चिन्नाख्यं तृतीयं काव्य- भेदमिच्छन्ति। तदाहु 'शब्दचित्रं वाच्यचित्रमव्यङ्गयं त्ववरं स्मृतम्' इति, तन्न, किमिद- सव्यङ्गयत्वं नाम ? व्य्जयत्वाभाव इति चेत्? अनात्मवत्वेन काव्यत्वहानिः, यत्किञ्चिद्य- द्वयं शून्यत्वमिति चेत् ? किमिदं यत्किश्चिदिति ? आस्वाद्यव्यङ्गयत्वम्, नास्वाद्यव्यङ्गथ- त्वम् १ नादय; पूर्वत्रान्तर्भावापत्ते। नान्त्यः, दत्तसमाधानत्वात्। तदुक्तं ध्वनिकृता- 'प्रधानगुणभावाभ्यां व्यङ्गवस्यवं व्यवस्थिते । उसे काव्ये तदन्यद्यत्तच्वचन्नमभिधीयते। इति दूपगं व्याचक्रुः। तन्न, अर्थचिन्रप्रतिपादकोपसाद्यलङ्कारघटितकाव्यानां चित्रत्वेना- लङ्कारिकसम्मतत्वात् तेषां कान्यत्वाभावम्रसङ्गात्, अव्यङ्गयकाव्यस्य चित्रत्वेन ध्वनिकर्ततुर- भिमतत्वाच्च, अव्यङ्गधपदस्यारफुटतरातिरिक्तव्यङ्गयपरत्वस्य प्रदीपादिभिर्व्याख्यातत्वाच्; अकृतग्रन्थस्य सर्वथानुपपत्तेरिति दिक्। रसगङ्गाघरकृतस्तु-यन्रार्थचसत्कृत्युपस्कृता शब्दचसत्कृति प्रधानं तद्घसम्। यथा-'सिन्नात्त्रिपुन्ननेत्राय त्रयीशान्रवशत्रवे। गोनारि- गोन्रजन्नाय गोन्नात्रे ते नमो नम. ॥' अन्रार्थचमत्कृति शब्दचसत्कृती लीना। अर्थचसत्कृ- तिसामान्य शून्यशब्दचसत्कृतिमत्वाद् अघसाघममपि काव्यं वक्तु शक्यम्। यथा खड्गपझ्म- बन्धादि। तथापि रमणीयार्थप्रतिपादकशब्दत्वरूपकाव्यत्वलक्षणानाक्रान्ततया तन्न काव्यत्वाभावे तन्सध्ये गणनानीचित्यात्। केचित्तु-उत्तससध्यसाधमसेदेन त्रिविधमेव काव्यमाचक्षते। तत्रार्थचित्रशब्दचित्रयोरविशेषेणाघमत्वं वकुमयुक्तम, तारतम्यस्य स्फुट- सुपलब्धे:। को ह्येवं सहृदय: सन् 'विनिर्गतं मानदमात्ममन्दिरात', 'सच्छिन्नमूल कतजेन

Page 72

३२ चित्रमीमांसा

रेणु. इत्यादिभि. काव्येः 'स्वच्छन्दोच्छलदच्छ-'इत्याटीनां पामरश्लाव्यानामविशेष म्रयात। सत्यपि तारतम्ये यद्येकभेदत्वं कस्तर्हि ध्वनिगुणीभूतव्यङ्गचयोरीपदन्तरयोभिन्न भेढत्वे दुराग्रह इत्याहु। तदपि न । मिन्रेत्यादिपद्येपु शब्दोपयोग्यनुपासादेः सत्वाद- नन्तर्भावः। अत एवात्र च शब्दचिन्रत्वम्। सोऽलड् कृतिश्च काव्यचमत्कृतिहेतुरिति सिद्धा- न्तस्य प्रदीपादौ दष्टत्वात्, तयोरन्यतरसत्वे काव्यत्वं नास्तीति वक्तुमयोग्यत्वात्। यत्त शब्दचित्रार्थचित्रयोविशेषवत्वेनाघमत्वमयुक्तम्, तदपि न; न वयं तयोविशेषो नास्तीति बूम: किन्तु गुणालह्कारोपयोगित्वस्य चित्रत्वस्योभयत्र समानत्वादधमत्वमिति बूम:। चित्रत्वरूपेण विशेपाभावसत्वात्, शब्दचिन्नेष्वपि व्यङ्गचसरवात् पामरश्राव्यतवस्य त्वया वक्तुमयोग्यत्वात्। ध्वनिगुणीभूतव्यङ्ग्ययोर्व्यङ्गयवाच्यार्थचमत्कृतिरूपविशेषस्य महतः सच्वेन भिन्नभेदत्वमावश्यकमेव। न हि शब्दार्थालक्कारयोरेकस्याचारुत्वमपरस्य चारुतेति काव्यवित्सम्मतम्। चमत्कृतिजनकत्वावच्छेदकताया दयोस्तुल्यत्वात्। 'यद्यपि सर्वत्र काव्येऽन्ततो विभावादिरूपतया व्यङ्गचपर्यवसानम्' तथापि स्फुटव्यङ्गचतया तदनुपलम्भाद- व्यङ्गचमेतत् काव्यद्वयम् इति तयोरविशेपस्य पष्ठे काव्यप्रकाशकृता स्फुटं प्रतिपादित्वात्। अस्य च शब्दार्थालक्कारभेदाद् वहवो भेदाः। एतेन 'उत्तमगुणीभूतव्यङ्ग्ययोर्भेदयोर्जा- गरूकाजागरूकव्यङ्गययोनिखिलमलद्कारप्रधानं काव्यं निविष्टम्' इत्यप्यपास्तम्, अजाग- रूकव्यंग्येनाधमत्वस्येव वक्तव्यत्वात् । अयन्तु विशेषः, यमकवन्धादिरचनावति काव्ये दुष्टत्वम, शीघ्रमर्थानवचोधात्। शब्दचित्रादावर्थस्य शीघ्रं बोधादव्यंग्यत्वेनाधमत्वमात्रं न पुनर्दुष्टत्वम्, अलक्कारविपयनिवन्धस्य चित्रत्वेन काव्यताया ध्वनिकारादिसम्मत- त्वाच्चेत्यलम्। ग्रन्थस्य सग्रमाणता वक्तमाह-चिन्त्य इति। अन्र चिन्त्ये विचारयोग्ये चित्रवर्गेऽ- लङ्कारसमूहे प्रदर्शयितुं योग्ययोर्लच्यलक्षणयोः स्वरूपोदाहरणयो प्राचीनानामेव श्रोकाः प्रायेण लिख्यन्ते प्रतिपादन्ते। तथा चात्र ग्रन्थे लक्षणोदाहरणप्रतिपादक श्रोकानां प्राचीन- कृतत्वेन सम्रामाण्यमुपपादितम् । क्वचित् स्वकृतश्रोकानामपि लेखनेन प्राय इृत्युक्तम्। उपगीतिरत्र वृत्तम्-'आर्या द्वितीयकेऽर्द्धे यद् गदितं लक्षणं तत् स्यात्। यद्युभयोरपि दुलयोरुपगीतिं तां मुनिर्बूते ।।' धरानन्देन रचितो ग्रन्थारम्भो यथामति। व्याख्यायां चित्रमीमांसा-सुधायामाप पूर्णताम्।। इति चित्रमीमांसाव्याख्यायां सुधाभिधायां ग्रन्थारम्भ- प्रकरणं सम्पूर्णतामगमत्

Page 73

अथ उपमानिरूपणम् उपमैंका शैलूषी संप्राप्ता चित्रभूमिकाभेदान्। रञ्जयति काव्यरङ्गे नृत्यन्ती तद्विदां चेतः ॥ (भारती) उपमा एक ऐसी नर्त्तकी है, जो कान्य के रगमच पर अनेक भूमिका से विभिन्न रूपों में उप- स्थित होकर काव्य-रसिकों अर्थात् अलकारश्ञों के हृदयों का रजन करती है।

विमर्श-यहाँ उपमा अलद्कार में नटीत्व का आरोप किया गया है। अलकारों में भूमिका का आरोप तथा काव्यों में रगभूमि का आरोप होने के कारण इस श्लोक में परम्परित रूपक अलकार है। यथा-

'नियतारोपणोपायः स्यादारोपः परस्य थः। तत्परम्परितम्।'-काव्य-प्रकाश। इसमें आर्यावृत्त है। कोषगत 'उपमा' शब्द का पर्यायवाची अर्थ है-तुल्यता, समानता या सादृश्य। व्युत्पत्ति की दृष्टि से 'उप सामीप्यात् मानम् इत्युपमा अर्थात सान्निध्य या सामीप्य के कारण किए गए मान को उपमा कहते हैं। फलत उपमा शब्द 'उप' और 'मा' इन दो शब्दों के सयोग से वना है। 'उप' शब्द का सीधा अर्थ समीप या निकट है तथा 'मा' का अर्थ तुलना है। दोनों का सम्मिलित अर्थ है किसी एक वस्तु की दूसरी वस्तु के साथ तुलना। यही कारण है कि आलकारिकों ने उपमा को सादृश्यमूलक अलंकार माना है। फलतः इस अलकार में दो पदार्थों के बीच समानता के कारण सहृदयों के हृदय में जो सौंदर्यजनित आनन्दा- नुभूति होती है-उसी की प्रधानता है। अत उपमा का प्राण सादृश्य ही है। यद्यपि कुछ महत्त्व- पूर्ण अलकार महारथियों ने उपमा के इस सादृश्य के स्थान पर साधर्म्य का प्रयोग किया है और कुछ आलोचकों ने साधर्म्य को सादृश्य का पर्यायवाची शब्द मान लिया है। किंतु, सादृश्य और साधर्म्य दोनों भिन्नार्थक शब्द ही नहीं हैं, प्रत्युत उपमा में इनकी उपयोगिता भी अपना अलग अस्तित्व रखती है। उद्योतकार ने इसकी भिन्नता स्पष्ट रूप से स्वीकृत की है-'सादृश्य च साधारणधर्मप्रयोज्यो धर्मविशेषः' अर्थात् दो पदार्थो जैसे कि उपमान और उपमेय का परस्पर जो 'सादृश्य' है वह उनका एक विशेष धर्म है जो उनमें अनुगत उनके साधारण धर्म के कारण हुआ करता है। निष्कर्षस्वरूप हम कह सकते हैं कि इन्हीं दो वस्तुओं के वीच उनके गुण, धर्म या स्वरूप- योग्यता की दृष्टि से समानता दिखलाना ही उपमा है। शर्त्त यह है कि समानता में सहृदय-हृदय संवेध चमत्कार उत्पन्न करने की क्षमता हो। आचार्य क्षेमेन्द्र ने सौंदर्य को ही अलद्कार मान लिया है तथा उनकी इस दृष्टि को आचार्य वामन का भी समर्थन प्राप्त है। अतः शास्त्र एव व्यवहार दोनों दृष्टि से उपमा की महत्ता असन्दिग्ध है। क्योंकि यह मन की एक सूक्ष्म किन्तु सरल प्रक्रिया है। उपमा की सरलता या वेधक सहजता के कारण ही सादृश्यमूलक सभी अलंकारों ३ चित्र०

Page 74

३४ चित्रमीमांसा

में इसकी लोकप्रियता सर्वाधिक है। अपनी सरलता, सहजता एव वेधकता के कारण ही इसे साहिन्य में व्यापक क्षेत्र प्राप्त हुआ है। अत. दीक्षित जी का यह कथन सर्वथा युक्तिसगत प्रतीत होता है कि उपमा वह नहीं है, जो काव्य रूपी रगभूमि में चित्रभूमिका भेद से विभिन्न रूपों में सहृदयों के हृदयों का रजन करती है। (सुधा) तत्र- यद् किञ्चित्काव्यवन्धेषु सादृश्येनोपमीयते। उपमा नाम सा ज्ञेया गुणाकृतिसमाश्रया॥ इति भरतेनार्थालङ्कारेषूपमाया प्रथमकथनेन तदुक्त्या स्वयमपि तां वक्तुमुपमायाः सर्वालङ्कारबीजतां प्रतिपाद्यति-उपमेकेति। एकोपमा शैलूपी नटी, चिन्नभूमिकाभेदानू अलङ्काररूपस्थितिभेदान् संप्राप्ता तत्तद्रूपतां प्राप्ता काव्यमेव रङ्गभूमिः, तन्न नृत्यन्ती नृत्या- भिनयरूपतत्तदलङ्कारव्यापारं कुर्वन्ती, तद्विदामलद्वारविदां चेतश्चित्तं रक्जयति अनुरागि करोति। अन्नोपसायां नटीत्वारोप:, अलक्कारेषु भूमित्वारोप:, काव्ये रङ्गभूमित्वारोप: तद्विदां रक्षनाप्रतिपादनार्थमिति परम्परितरूपकमलद्वारः। 'नियतारोपणोपायः स्यादारोपः परस्य यः। तत्परम्परितम् .. इति प्रकाशोके। आर्यावृत्तम्। (चिन्र०) चन्द्र इव सुखमिति सादृश्यवर्णनं तावदुपमा। सैवोक्तिभद्गीभे देनानेका- लङ्कारभावं भजते। (भारती) मुख चन्द्र सा सुन्दर है-इसमें मुख और चन्द्रमा के वीच सादृश्य वर्णन ही 'उपमा' है। वही उपमा उक्तिभगी के भेद से अनेक अलकारों में दिखाई पडती है। विमर्श-आलकारिकों ने अपने-अपने ढग से उपमा का लक्षण निरूपित किया है। किन्तु, इसके स्वरूप-निर्माण में सवों ने साम्य, सादृश्य या साधम्यं इनमें से किसी एक का प्रयोग अवश्य ही किया है। साम्य या साधर्म्य घूम-फिर कर सादृश्य के ही चक्कर काटते है। और साहित्यशास्त्र में सादृश्य का लक्षण है-'तद्भिन्नत्वे सति तद्गतभूयो धर्मवत्वम् ।' अतः इसका प्रयोग अवयव, गुण या क्रिया के योग में होता है। (सुधा) उपमाया अलक्कारभेदेन स्थितिभेदं निरुपयितुं विच्छित्तिभेदेन सर्वालङ्गाररूपतां प्रति- पादयितुमारभते-चन्द्र इव सुखमितीति। सादृश्यसुपसानोपमेययोरिति शेष। तावत् स प्रथमसुपमालङ्कारो भवति। सा उपमैवोक्तिविच्छ्ित्तिेदेनानेकालद्कारस्वरूपता भजते अङ्गीकरोतीत्यर्थः । अलद्भारत्वञ्जरसादिभिन्नव्यङ्गयभिन्नत्वे सति शब्दार्थान्यतरनिष्ठा या विषयितासम्वन्धावच्छिन्ना चमत्कृतिजनकतावच्छेदकता तद्वच्छेद्कत्वम्। अनुआसादी तद्विशिष्टशब्दज्ञानादुपमादौ तद्विशिष्टार्थज्ञानात् चमत्कृतिजन्यतया द्योलक्षणसमन्दयः। शब्दार्थयोर्ज्ञाननिष्ठचमत्कृतिजनकताया विषयतयावच्छेदकतया तद्विशेषणीभूतानुग्रासो- पमादेस्तन्निष्ठावच्छेदकतावच्छेदकत्वात्। रसवदाद्यलङ्गारसद््ग्रहाय व्यह्गचोपमावारणाय च भेदह्वयगर्भंसत्यन्तोपादानमिति कुवलयानन्दव्याख्याकृतः ।

Page 75

उपमानिरूपणप्रकरणम् ३५

नव्यास्तु-शब्दार्थोपस्कृतिनिष्ठचमत्कृतिजनकतावच्छेदकत्वे सति व्यङ्गचभिन्नत्वे सति संयोगसम्बन्धेन रसोपकारकत्वं त्त्वमिति वदन्ति। प्रान्नस्तु-व्यङ्ग्योपमाया अलङ्गारत्वं वदन्ति। दीक्षितास्तु-तस्यास्तत्वं नाङ्गीकुवन्ति। परन्तु प्रधानभूतोपमायास्तत्वाङ्गीकारे किं चीजमिति न विद्यः। (चित्र०) तथा हि-'चन्द्र इव मुखं मुखमिव चन्द्रः' इत्युपमेयोपमा। 'मुख मुख- मिव' इत्यनन्वयः । 'मुखमिव चन्द्रः' इति प्रतीपम्। 'चन्द्रं द्ृष्ट्वा मुख स्मरामि' इति स्मरणम्। 'मुखमेव चन्द्रः' इति रूपकम्। 'मुखचन्द्रेण तापः शाम्यति' इति परिणामः । 'किमिदं मुखमुताहो चन्द्रः' इति सन्देहः। 'चन्द्र इति चकोरास्त्वन्मुखमनुधावन्ति' इति भ्रान्तिमान् । चन्द्र इति चकोराः कमलमिति चञ्च्रीकास्त्वन्मुखे रज्यन्ति' इत्युल्लेखः । 'चन्द्रोडयं न सुखम्' इत्यपह्नवः । 'नूनं चन्द्रः' इत्युत्प्रेक्षा। 'चन्द्रोडयम्' इत्यतिशयोक्तिः । 'मुखेन चन्द्रकमले निजिते' इति तुल्ययोगिता। 'निशि चन्द्रस्त्वन्मुख च हृष्यति' इति दीपकमृ। 'त्वन्मुख एवाहं रज्यामि चन्द्र एव चकोरो रज्यते' इति प्रतिवस्तूपमा। 'दिवि चन्द्रो भुवि त्वन्मुखम्' इति दष्टान्तः। 'मुखं चन्द्रथ्रियं बिभर्ति' इति निदर्शना। 'निष्कलङ्गं मुख चन्द्रादतिरिच्यते' इति व्यतिरेकः । 'त्वन्मुखेन सम चन्द्रो निशासु हृष्यति' इति सहोक्तिः । 'मुखं नेत्राङ्करुचिरं स्मितज्योत्स्नोपशोभितम्' इति समासोक्तिः। 'अब्जेन सहशं वक्त्रं हरिणाहित- सक्तिना' इति श्लेषः । 'मुखस्य पुरतश्न्द्रो निष्प्रभः' इत्यप्रस्तुतप्रशंसा । एवमुक्ताने कालङ्कारविवतवतीयमुपमा। तदिदं चित्रं विश्वं व्रह्मज्ञानादिवोपमाज्ञानात्। ज्ञातं भवतीत्यादौ निरुष्यते निखिलभेदसहिता सा।। 71 (भारती) मुख चन्द्र के समान है एव चन्द्र मुख के समान है-उपमेयोपमा। मुख मुख ही के समान है-अनन्वय। चन्द्रमा मुख के समान है-प्रतीप। चन्द्र को देखकर मुख की याद आती है-स्मरण। मुख ही चन्द्रमा है-रूपक। मुखचन्द्र से ताप शान्त हो रहा है-परिणाम। यह मुख है अथवा चन्द्रमा-सन्देह। चन्द्रमा समझकर चकोर तुम्हारे मुख की ओर दौड रहा है-भ्रान्तिमान्। तुम्हारे मुख को चकोर चन्द्रमा समझता है तथा भौरे उसे ही कमल मानते है अर्थात् मुख तुम्हारा एक ही है किन्तु चकोर उसे चन्द्रमा और भौरे कमल मानते हैं-उलेख। यह मुख नहीं, चन्द्रमा है-अपहुति। मुख मानो चन्द्रमा है-उत्प्रेक्षा। यह चन्द्रमा है-अतिश- योक्ति। मुख ने चन्द्र और कमल को जीत लिया-तुल्ययोगिता। रात मे तुम्हारा मुख एव कमल शोभते हैं-दीपक। तुम्हारे मुख को देखकर मै प्रसन्न हूं और चकोर चन्द्रमा को देखकर प्रसन्न है-प्रतिवस्तूपमा। आकाश में चन्द्रमा है तो पृथ्वी पर तुम्हारा मुख-दृष्टान्त। मुख में चन्द्रमा की श्री है-निदर्शना। निष्कलक सुख चन्द्रमा से वढकर है-व्यतिरेक। तुम्हारे मुख के साथ रात में चन्द्रमा मनोहर लगता है-सहोक्ति। मुख नेत्राक से रुचिर है तथा तुम्हारा स्मितहास

Page 76

३६ चित्रमीमांसा

ज्योत्स्ना से उपशोभित है-समासोकि। कमल के सदृश मुख है इत्यादि में-श्लेप। मुख के आगे चन्द्रमा निस्तेज है-अप्रस्तुतप्रगसा। इस प्रकार उपरोक्त अनेक अलकारों के विवर्त में उपमालकार ही है। इस प्रकार अप्पयदीक्षित ने अलकारों के बीच उपमा का महत्त्व स्थापित किया है। (सुधा) उपमाया अनेकालङ्काररूपतामुक्तिभेदेन दर्शयति-तथा हीति। चन्द्र इवेति। वाक्य- भेदेनो पमा नो पमेयत्वरूपो पमेयोपमा तृतीयसदशनिपेधात् पृथक्। मुखं मुखमिवेत्यनन्वयः। एकस्यवोपमानोपमेयतावच्छेदकत्वाद् द्वितीय सदृशव्यवच्छेदात् पृथगुक्तिः। 'मुखमिव चन्द्रः' इति प्रतीपम्, प्सिद्धोपमानप्रतिकूलधर्मवत्वस्य सत्चात्। प्रतिकूलत्वञ्ज तिरस्कारप्रयोज- कत्वमिति नव्याः। उपमानतिरस्कारादुपमाभेदः । 'चन्द्रं दृष्टा मुखं स्मरामि' इति स्मरणम् । स्मरामीत्यनुभवसात्ितया स्मृतित्वजातिस्तत्र । 'मुखमेव चन्द्रः' इति रूपकम्, उपमानोपमेययोरभेदस्यान्र सत्वात् । 'मुखचन्द्रेण ताप. शाम्यति' इति परिणामः। विपयनिष्ठाया. प्रकृतकार्योपयोगिताया अवच्छेदिका विषयात्मतापरिणतिः। तस्या अन्न सरवात् । 'किमिदम्' इत्यादि सन्देहः, निश्चयभिन्नत्वे सति सम्भावना- भिन्नज्ञानवत्वस्थ सच्चात्। चन्द्र इत्यादि भ्रान्तिमान्, विशेप्यावृत्तिप्रकार कज्ञानवत्वस्य सत्वाद्। 'चन्द्र इति' इत्यादिरुल्लेरः, ग्रहीतृविषयाद्यन्यतमानेकत्वप्रयुक्तस्यकस्योह्निख्य- मानानेकत्वप्रकारत्वस्य सत्वात् । 'चन्द्रोडयम्' इत्यपह्नतिः, अभेदप्रतिपत्तिनिरुपिताङ्गा- द्वित्वान्यतरवन्निषेघस्य सरवात्। 'नूनं चन्द्र' इत्यु्येक्षा, विपयिनिष्टधर्मसम्बन्धप्रयुक्त

निष्ठाह्लादकत्वादिधर्मसम्वन्धप्रयुक्ततत्संभावनस्याहार्यरूपस्य मुखे सर्वेन तत्समन्वयाच्च। 'चन्द्रोऽयम्' इत्यतिशयोक्ति, अनुपात्तविषयधर्मिकाहार्यनिश्चयविपयीभूतविषय्यभेदता- दृप्यान्यतरत्वस्य तल्नक्षणस्य तन्र सत्वात्। 'मुखेन' इत्यादि तुल्ययोगिता, अनेक-

चन्द्र.' इत्यादि दीपकम्, वर्ण्यावर्ष्यान्वितत्वैकचमत्कृतित्वावच्छिन्नवर्मवत्वस्य सत्वात्। 'तवन्मुख एवाहं रज्यामि' इत्यादि प्रतिवस्तूपमा, सकृद्धर्मोक्तिप्रङ्गेनासकृद्धर्मोकिगम्यवा- क्यार्थसादृश्यवल्लक्षणस्य समन्वयात्। 'दिवि चन्द्रस्त्वन्मुखं भुवि' इति द्ृष्ान्तः,

चन्द्रश्रियं विभर्ति' इति निदर्शना, उपमेयवाक्यार्थे उपमानवावयार्थेक्यारोपवत्त्वस्य सत्वात्। 'निप्कलङ्वं मुखम्' इत्यादि व्यतिरेकः, उपमानावधितदुपमेयाधिक्यवर्णनात्। 'तवन्मुखेन समम्' इत्यादि सहोफि, चमत्कृतिजनकतारूपसाहित्यवत्त्वसत्वात्। 'रम्यं नेत्रोत्पलं विना भृङ्गाअ्नं न सह्यम्' इति विनोक्ति, किञ्िद् व्यतिरेकेण अस्तु प्रस्तुतस्य रम्यत्वान्यतरधर्मवत्वस्वात्। 'मुखं नेत्राङ्गम्' इत्यादि समासोक्तिः, विशेषणमान्रसाम्यगभ्याप्रस्तुतवृत्तान्तस्य सत्वात् । 'अव्जेन सदशम्' इत्यादि श्लेषः, अनेकार्थाधिकरणशब्दसत्वात्। 'मुखस्य पुरतः' इत्याद्यप्रस्तुतप्रशंसा, प्रकृतार्थप्रतिपादका- प्रकृतार्थव्त्वस्य सत्वात्। प्रकरणभुपसंहरति-एवम् =पूर्वोक्तप्रकारेण, अलद्वाररूपो यो विवर्तः=उपादानविष- मसत्ताकोऽन्यथाभावः, तद्वती तदधिष्टानेति, तदाश्रया इत्यर्थ:।

Page 77

उपमानिरूपणप्रकरणम् २७

तदेवोपपादयन् प्रथमनिरूपणीयतां तस्था:प्रतिपादयति-तदिदमिति। तत्=तस्मातू, यतः सर्वालक्वारविवर्त्ताघिष्ठानवतीयमुपमा, तस्मादित्यर्थः । इदं चित्रमल्द्वारविषयं विश्वं जगद् ब्रह्मज्ञानादिवोपमाज्ञानाद ज्ञातं ज्ञानविषयीभूतं भवति। यथा ब्रह्मज्ञानाद् विश्वं ज्ञातं भवति तहदुपमाज्ञानादलङ्कारविषयमपीत्यर्थः। ब्रह्मव्यतिरेकेण विश्वमिवोपमा- व्यतिरेकात् तद्भाव इति यावत्। इति हेतोरादौ निखिलैेंदैः सहिता सोपमा निरुप्यते। उपमालङ्कारः, 'साधर्म्यमुपमा भेदे' इति तक्षक्षणात्। तस्याः, प्रथमनिरूपणहेतुत्वेन काव्य- लिद्वरूपवाक्यार्थतालङ्वारः, 'काव्यलिद्वं हेतोर्वा्यपदार्थता' इति प्रकाशोकेः। गीतिरत्र वृत्तम्-'आर्या प्रथमदलोकतं यदि कथमपि लक्षणं भवेदुभयोः। दलयोः कृतयतिशोभां तां गीति गीतवान् भुजङ्गशः ॥ इति तल्लक्षणात्। (चिन्न०) अस्यास्तावदेवं लक्षणमाहु :-

हृदं साधर्भ्यसुपमेत्युच्यते काव्यवेदिभिः। कविसमयप्रसिद्धचनुरोधेनोपमानोपमेयत्वयोग्ययोरेव साधर्म्यमुपमा, न त्वतथाभूतयोः । अत एव 'कुमुदमिव मुखं प्रसन्नम्' इत्यादिनोपमा। तथा- भूतयोरपि वस्तुत्वद्रव्यत्वादिकृतमहद्यं साधर्म्य न तथा । किन्तु हृद्यमेव कान्तिमत्त्वादिकम्। सर्वोपि ह्यलक्कारः कविससयप्रसिद्धयन रोधेन हृद्यतया काव्यशोभाकर एवालक्वारतां भजते। अतः 'गोसदशो गवयः' इति नोपमा, 'गौर्वाहीकः' इति न रूपकम्, 'स्थाणुर्वा पुरुषो वा' इति न सन्देहः 'इदं रजतम्' इति न भ्रान्तिमान्, 'नायं सर्पः' इति नापहुतिः 'पीनो देवदत्तो दिवा न भुङ्के इति न पर्यायोक्तम्, 'पर्वतो वह्निमान्' इति नानुमानम्, 'स देवदत्त'' इति न स्मरणम्, 'तस्थस्थमिपां तान्तन्तामः' इति न यथासङ्गयम्, 'पुत्रेण सहागतः पिता' इति न सहोक्तिः, 'तेन विना गतः' इति न विनोक्तिः, 'श्वेतो धावति' इति न श्लेष:, इत्याद्यहनीयम्। (भारती) सर्वप्रथम प्राचीन आचार्यों ने उपमा का लक्षण इस प्रकार कहा है-उपमानता और उप- मेयता के योग्य दो पदार्थो के सुन्दर साधर्म्य अर्थात् समान धर्म वाले होने को उपमा कहते हैं। कविप्रसिद्धि के अनुरोध से योग्य उपमानत्व एव उपमेयत्व के बीच साधर्म्य रहने पर ही उपमालकार होता है न कि अयोग्य एवं असाधर्म्य के वीच। इसीलिए 'कुमुद की तरह मुख प्रसन्न है' इत्यादि में उपमालकार नहीं है। वैसे रहने पर भी दोनों में वस्तुत्व द्रव्यत्वादिकृत असौदर्य के कारण उस प्रकार साधर्म्य का भी अभाव है। (यदि वैसा साधर्म्य वस्तुत्व-द्रव्य- न्वादि कृत मान भी लें तो 'गोसदृशो गवय' अर्थात् जैसा वैल होता है, वैसी ही गवय (नील गाय) होती है, ऐसे स्थलों में अतिव्याप्ति दोष हो जायगा।) अत., 'हृदम्' अर्थात् कान्तिमत्व विशेषण दिया गया है, आदि शब्द से यहाँ आह्लादकत्व का बोध होता है। इसी प्रकार सभी

Page 78

३८ चित्रमीमांसा

अलंकार कविसकेतप्रसिद्धि के अनुरोध से अपने क्रान्तिमत्नादि रूप से काव्य की शोभा वढाकर अलङ्कारत्व को प्राप्त करते हैं। यही कारण है कि 'वैल की तरह नीलगाय' में कविसकेतप्रसिद्धि के कारण चमत्कार के अभाव में उपमालकार नहीं हुआ। इसी प्रकार 'गौर्वाह्ीकः' में रूपक अलकार नहीं है। स्थाणु (हूँठ) है अथवा आदमी-यहॉ सदेह अलकार नहीं है। 'यह चाँदी है'-यहाँ भ्रान्तिमान अलकार नहीं है। 'यह सप नहीं है-यहॉ अपहुति अलकार नहीं है। 'देवदत्त मोटा है, किन्तु दिन मे खाता नहीं'-यहाँ पर्यायोक्तालकार नहीं है। 'इस पहाड में आग है'-इसमें अनुमान अलकार नहीं है। 'वही देवदत्त है' इसमें स्मरण अलकार नही है। 'तस्थस्थमिपा तान्तन्नाम :- इस सूत्र में यथासख्यालद्वार नही है। 'पुत्र के साथ पिता आया है', इसमें सहोकि नही है। 'उसके बिना गया'-इसमें विनोक्ति नही है। 'सफेद दौढता है'- यहाँ श्लेषालकार नहीं है। इसी प्रकार कल्पना करनी चाहिए। (सुधा) तत्रोपमायाः प्राचीनप्रतिपादितं लक्षणं खण्डयितुं सच्याख्यानं तक्षक्षणमुपन्यस्यति- अस्या इति। तावद्=प्रथमम्, अस्या उपमायाः, प्राचीना एवं लक्षणमाहु; कथयन्तीत्यर्थः।

वच्छेदकससानाधिक्रणत्वे सति लच््यतानच्छेदकसमानाधिकरणाभावप्रतियोगितावच्छेदक- धर्मवत्वम्। तेनासंभवादौ असाधारणधर्मे च नातिव्यापिः। लचयतावच्छेदकसमाना धिकरणत्वे सति तदविरुद्वधर्मसमानाधिकरणत्वमतिव्यास्तित्वम्। तेन नोकदोपः। लक्ष्य- तावच्छेदकीभूताभावप्रतियोगित्वमसम्भवत्वम्। तेनाव्याप्ती नातिव्याप्तिः। असाधारण- धर्मत्वन्न लच्यतावच्छेदकसमनियतत्वम्। दूषणत्रयरहितत्वस्य तदुक्तौ तत्तद्दूपणशरीर- घटिततत्तदभावकूटवत्वनिवेशे गौरवात्। तखयोजनं व्यवहारो व्यावृत्तिर्वा, 'व्यावृत्तिर्व्यव- हारो वा लक्षणस्य प्रयोजनम् इत्युक्ते । वस्तुतस्तु-इतरव्यावृत्तिरेव लक्षणस्य सुख्यं प्रयोजनम्, शब्दप्रयोगरूपव्यवहारस्य कण्ठताल्वादिव्यापारेणापि सम्भवात्। एतेपां दूष- णानां हेत्वाभासे भागासिद्धिसव्यभिचारविरोधत्वव्यवहार इति दिक्। लक्षणमाह-उपमानोपमेयत्वयोग्ययोरिति। उपमीयतेनेनेत्युपमानम्, 'करणाधिकर- णयोश्च' इति ल्युट्। उपसातुं योग्यमुपमेयम्। उपमानज्जोपमेयञ्जोपमानोपमेये, तयोर्भाव उपमानोपमेयत्वम् । त्वप्रत्ययस्थ द्वन्द्वान्ते श्रूयमाणत्वादुभयन्रान्वयः । व्युत्पत्तौ पदशव्दस्य शब्दपरत्वाव्, 'व्याप्तिविशिष्टपक्षधर्मता' इत्यादौ तथात्वस्य दष्टत्वात्, पट्वीमृद्यत इत्यादौ द्वन्द्वोत्तरं विद्यमानक्यड्प्रत्ययस्योभयन्रान्वयित्वस्य भाष्यादौ प्रतिपादितत्वादिति। तन्न उपमानोपमेयत्वेन योग्यौ, तथोद्वयोरथयोर्हंदं चारु साधर्म्यं काव्यचेदिभिरुपमेत्युच्यते, प्रतिपादयते इत्यर्थः। कचिसमयप्रसिद्धधनुरोधेन योग्ययोरेव साधर्म्यमुपमा, न तु तदप्रसि- द्धेति। अत एव 'कुमुदमिव मुखं प्रसन्नम्' इति नोपमालद्वार, कुसुदोपमानत्वस्थ कविस- मयाप्रसिद्धेः। तथाभूतयोरपि साधम्यं वस्तुत्वद्रव्यत्वादिकृतं चेद वच्यते, तदा गोसदशो गवय इत्यादावतिव्यापेः। अतो हृद्यमिति। हृदञ्व कान्तिमत्वादिकम्, आदिशब्देनाह्लाद कत्वादि। सहृदयाचारं प्रतिपाद्यन्नतिव्याप्ति निराकरोति-सर्वोऽपीति। अपिरेवार्थे, सर्व एवालङ्वार:, अलक्कारमान्रमित्यर्थः । कविसक्केतप्रसिद्धेरनुरोधेन हृद्यतया कान्तिमर्वादि- रूपया काव्यस्य शोभाकर एव अलद्वारभावं भजते। अतो हेतो. 'गोसहशो गवयः' इत्यत्र उपमा न, कविसक्केतप्रसिद्धया चमत्कृतेर भावात्। सर्वत्र कान्तिमत्वाभाव एव हेतुरलक्का-

Page 79

उपमानि रूपण प्रकर णम् ३६

(चित्र०) अत्रेदं विचार्यते-'दवयोः इति विशेषणमिह किमर्थम् 1 स्वस्य स्वेनैव साधर्म्यवर्णनात्मकस्यानन्वयस्य व्युदासार्थमिति चेत्, एवमप्युपमानस्योप- मेयत्वकल्पनात्मके प्रतीपे; द्वयोः पर्यायेणोपमेयत्वकल्पनात्मिकायामुपमेयोप- मायाम्, चातिव्याप्तिः। तयोः सादृश्यवर्णनसत्वादुपमात्वेन संगाह्यत्वे तथै- वानन्वयोऽपि संग्राह्यः स्यादिति व्यर्थ द्वयोरिति पदम । एतेन 'साधम्यमुपसा भेदे-' इति काव्यप्रकाशोक्तलक्षणेऽनन्वयव्युदासाय कृतं भेदग्रहणमपि प्रत्यु- क्म्। न हि संभवत्साधर्म्यवर्णन एवोपमात्वम्, येन स्वस्य स्वेन साधर्म्या- संभवादनन्वयस्य व्यवच्छेद्यत्वम्, इतरयोः सग्राह्यत्वं न स्यात्। तथात्वे 'हंसीव धवला कीर्तिः स्वर्गङ्गामवगाहते' इत्यादौ कविकल्पितसाधर्म्योपमाया अनुपमात्वप्रसङ्गात्। किश्त, सत्यामप्युपमानोपमेयत्वयोग्यतयां सत्यपि हद्यत्वे लिङ्गवचनभेदादिदुष्टायामुपमायाम् 'हंसीव धवलश्चन्द्रः सरांसीवामलं नभः' इत्यादिरूपाय्रामतिव्याप्तिः, उदाहरिष्यमाणे चोपसाध्वनावतिव्याप्तिः। न हि सोऽप्यलङ्वार अलक्कार्यत्वात्, ब्राह्मणश्रमणन्यायेन तत्रालक्कारध्वनिव्यपदेश इति सिद्धान्तात्। यदि च दुष्टादुष्टालक्कार्यालंकारसाधारणोपमासामान्यलक्षण- मिति नोक्तातिव्याप्तिः, तदोपमानोपसेयत्वयोग्ययोरिति हृद्यमिति च व्यर्थम्। कविसमयप्रसिद्ध चभावादिदुष्टोपमाया अपि संग्राह्यत्वात्। (भारती) प्राचीन आलकारिकों के इस लक्षण की प्रथम व्याख्या कर अव उस लक्षण के दोषों का उद्- घाटन करते हुए दीक्षितजी ने लिखा है-अन्नेदं विचार्यते-'अत्र अर्थात् इस लक्षण में 'इदम्' अर्थात् इस दोष पर विचार करते हैं-'उपमानोपमेयत्वादि' पूर्वकथित कारिका में 'दयोः' विशेषण पद व्यर्थ है। क्योंकि, 'अर्थयो' में द्विवचनान्त विभक्ति से ही 'द्योः' अर्थ की गतार्थता है, पुन यह विशेषण निरर्थक ही है। यदि आप कहें कि स्व का स्व के साथ साधर्म्य वर्ण- नात्मक अनन्वयालकार में अतिव्याप्ति दोष निवारण के लिए 'दयोः' पद की आवश्यकता है- अर्थात् चन्द्रमा का चन्द्रमा के साथ ही साधर्म्य वर्णन रूप में जैसे 'चन्द्र के समान चन्द्र ही श्रीमान है' इस अनन्वय में अतिव्याप्तिदोष निवारण के लिए 'दयो.' पद आवश्यक है तो हम कहेंगे कि इस अनन्वय में 'दयो.' पद देने से अतिव्याप्ति दोष का यत्किव्वित परिहार हो जाता है, किन्तु, उपमान का चन्द्रादि उपमेयता रूप कल्पना में जैसे 'मुख के समान चन्द्र है' इस प्रतीप में 'द्वयो.' अर्थात् उपमान और उपमेय का क्रमश उपमेय और उपमान रूप कल्पनात्मकता में-'धर्म अर्थ की तरह तुम में पूर्ण है और अर्थ धर्म की तरह पूर्ण है' इस उपमेय और उपमा में दोनों के सादृश्यवर्णन रहने के कारण 'दयो.' पद रहने पर भी अतिव्याप्ति दोष हो ही जाता है। इसी प्रकार अनन्वय में भी तद्रूपता ग्रहण करने पर भी 'द्यो' पद रहने पर अतिव्याप्ति दोष जब रह ही जाता है तो फिर 'दयो' विशेषण बिलकुल ही निरर्थक है। 'हयो' इस विशेषण का निरर्थकत्व सिद्ध करने के बाद प्रसगवश काव्यप्रकाशोकत अक्षण का मी खण्डन करते है-'साधर्म्यमुपमा भेदे' अर्थात 'उपमा' वह अलद्वार है, जिसे उपमान

Page 80

४० चित्रमीमांसा

और उपमेय का, उनमें भेद होने पर भी, परस्पर साधारण धर्म से सम्बद्ध होना कहा जाता है। काव्य-प्रकाश के इस लक्षण में-अनन्वय में अतिव्याप्ति दोष निवारण के लिए जो 'भेढे' शब्द ग्रहण किया गया है, वह भी निरर्थक ही है। क्योंकि इससे यदि अनन्वय में अतिव्याप्ति का निवारण हो भी जाता है तो प्रतीपादि में अतिव्याप्ति दोप दुर्निवार हो जाता है। यदि आप विद्यमान साधर्म्यवर्णन को ही उपमा का प्रयोजकत्व मान लेते हैं तो जिसके द्वारा-निज का निज के साथ साधर्म्य का होना असभव होने के कारण अनन्वय में तथाकथित अतिव्याप्ति दोष रह ही जाता है, साथ ही दूसरों के साथ इसका संग्राझयत्व भी नहीं हो पाता। इतना ही नहीं, जहाँ कवि के द्वारा कल्पित साधर्म्य का वर्णन है, जैसे 'इँसी की तरह धवल तुम्हारी कीति स्वर्ग रूपी गगा का अवगाहन कर रही है' इत्यादि। वहाँ उपमा में भी अनुपमात्व का प्रसग हो जायेगा, क्योंकि यहाँ भी विद्यमान साधम्यवर्णन के अभाव में अतिव्याप्त दोष हो की जायगा। दूसरी बात यह भी है कि उपमान और उपमेयत्व की योग्यता रहने पर भी तथा हृदयत्व के रहने पर भी जहाँ दुष्ट उपमा है वहाँ मी उपमा के लक्षण चले जाने के कारण अतिव्याप्ति दोष की सभावना है। जैसे 'इँसी की तरह शुभ्र चन्द्रमा सरोवर की तरह स्वच्छ नभ में विचरता है।' ऐसे स्थलों में भी अतिव्याप्ति होगी। उदाहरिष्यमाण उपमा ध्वनि में भी अतिव्याप्ति दोष होगा। जैसे-

वाहि वात यतः कान्ता तां स्पृष्टा मामपि स्पृश। त्वयि मे गान्रसंस्पर्शश्चन्द्रे दृष्टिसमागतः।-वाल्मीकि० इस श्लोक में जो उपमाध्वनि है अर्थात् व्यङोपमा है उसमें भी अतिव्याप्ति दोष हो जायगा। क्योंकि अलकार्यत्व होने के कारण यहाँ अलकार असभव है। दूसरी बात यह है कि ब्राह्मणश्रमण न्याय से यह ध्वनि व्यपदेश सिद्धान्तसम्मत भी है। यदि हम इसे सभी प्रकार के दुष्ट, अदुष्ट, अलकार, अलकार्य रूप साधारणत उपमा सामान्य लक्षण स्वीकार कर ले, तब तो कहीं अतिव्याप्ति दोष नहीं होगा। यदि ऐसा मान मी लेते हैं तो 'उपमानोपमेयत्व' इस श्लोक में 'हृधम्' इस शब्द का क्या होगा? क्योंकि सभी जगह यदि हम लक्षणसमन्वय को अद्गीकार कर लेते हैं तो दुष्ट उपमा का भी इसमें सग्रह हो जायगा; फिर 'हृधन्' तो असभव दोष से दूषित हो जायेगा। अत प्राचीन आचार्यो के ये सभी लक्षण दोषयुक्त ही हैं। विमर्श-प्रतीप में उपमेय और उपमा में उसके अभाव के कारण अतिव्याप्त दोष नहीं होगा। यदि प्रकृत में उत्कर्ष प्रयोजकत्व को अलकारमात्र में प्रयुक्त विशेषणों के रूप में हम इसे मान भी लें, तो भी प्रतीप में उपमान के तिरस्कार में प्रयुक्त मुखादि रूप उत्कर्ष ही सिद्ध होता है। उपमेय और उपमा में दोनों के परस्पर उपमान व्यवच्छेदक रूप में ही ये प्रयुक्त हैं; न कि सादृश्यरूप में। इस दृष्टि से भी उक्त लक्षण में किसी प्रकार का दोष नहीं रह जाता है। जहाँ तक काव्यप्रकाशोक्त लक्षण के प्रत्याख्यान का प्रश्न है, इसमें भी सवल युक्ति का अभाव ही है। यदपि मम्मट के लक्षण का खण्डन पण्डितराज जगन्नाथ ने भी किया है। इनकी दृष्टि में भेद होने पर समानधर्मता को, जो उपमा कहा गया है, वह विशेष सुन्दर नहीं। क्योंकि, इसकी भी व्यतिरेकालकार के निषेध किए जाने वाले सादृश्य में अतिव्याप्ति हो जाती है। यदि आप कहें कि हम 'साध्म्य' के साथ 'पर्यवसित' विशेषण और लगा देंगे, जिससे उसका अर्थ यह हो जायगा कि जिस साधर्म्य का साधर्म्य में ही पर्यवसान अर्थात समाप्ति हो जाय, निषेध आदि

Page 81

उपमानि रूपणप्र करणम् ४१

से नही, उस साधर्म्य को उपमा कहते हैं। तो यह कथन भी पूर्णत ठीक नही प्रतीत होता। क्योंकि अनन्वयालकार में जो सादृश्य होता है उसका साधर्म्य में पर्यवसान होने से- अनन्वयालकार के सादृश्य का पर्यवसान निषेध में जाकर होता है-ही निवारण हो जाने के कारण 'भेद होने पर' यह विशेषण व्यर्थ हो जाता है। एक तो उक्त लक्षण में यह दोष है, दूसरे यह भी कि काव्य के अलकारों के प्रकरण में ऐसे सामान्य लक्षण का बनाना भी अनुचित है जो लौकिक, अलौकिक, प्रधान, वाच्य और व्यह्गथ सभी प्रकार की उपमा में अतिव्याप्ति हो जाय। किन्तु, आलोचकों के ये दृष्टिकोण भी स्वस्थ नहीं प्रतीत होते हैं। क्योंकि यहाँ मम्मट के लक्षण में प्रयुक्त 'साध्म्य' ही क्षेपक मलोचकों के 'सादृश्य' से भिन्न है। स्वय काव्यप्रकाश के टीकाकारों के वीच भी इस 'साधर्म्य' और 'सादृश्य' को लेकर मतभिन्नताएँ हैं। कुछ टीकाकारों की दृष्टि में 'साधर्म्य' पद की उपयोगिता स्वतत्र रूप से है और कुछ की दृष्टि में 'साधर्म्य' का प्रयोग मात्र सादृश्यार्थक है। किन्तु, थोडा विचार करने पर यह स्पष्ट रूप से प्रनीत होता है कि मम्मट के लक्षण में प्रयुक्त 'साधर्म्य' सादृश्यार्थक पर्यायवाची शब्द नहीं है। उदाहरणस्वरूप हम कह सकते हैं-'यह इसके सदृश समान है।' किन्तु, कोई भी वक्ता जब इस तरह का प्रयोग करता है तो उसके मन में यह अवश्य रहता है कि दोनों में जो सादृश्य है, वह किन-किन कारणों से है। अर्थात् दो वस्तुओं के 'सादृश्य में उनका साधर्म्य उनका परस्पर समान अथवा साधारण धर्म से सम्बन्ध प्रयोजक रूप से ही दिखाई दिया करता है। दो वस्तुओं अर्थात् उपमान और उपमेय का परस्पर जो सादृश्य है, वह उनका एक विशेष धर्म है, जो उनमें अनुगत उनके साधारण धर्म के कारण हुआ करता है। यही कारण है कि लक्षण में मम्मट ने उपमान और उपमेय का उल्लेख नही किया है, फिर भी इसी उल्लिखित 'साधर्म्य' के द्वारा उपमान और उपमेय का आक्षेप स्वत. हो जाता है। क्योंकि, 'साधम्य' साधारण धर्मरूप सम्बन्ध जिन किन्हीं दो पदार्थों में होगा उनमें परस्पर 'उपमानोपमेय' भाव रहेगा ही। जहॉ तक 'भेदे' का प्रश्न है और इस सम्वन्ध में अनन्वय अलकार में अतिव्याप्ति दोष का प्रश्न उठाया गया है, उस सम्बन्ध में अनन्वय अलकार में उपमान और उपमेय में पारमार्थिक भेद का अभाव ही रहा करता है। जैसे कि 'राम-रावण का युद्ध राम रावण की तरह ही था' इत्यादि में एक ही वस्तु उपमान और उपमेय दोनों रूपों में वर्त्तमान है। यहाँ उपमान का अस्तित्व टिक नही सकता, क्योंकि यहॉ जो 'साधर्म्य' अभिप्रेत है, वह उतना चमत्कार- जनक नहीं, जितना कि वहाँ, जहाँ उपमान और उपमेय भिन्न-भिन्न हैं। जैसे, 'कमल के समान इसका मुख मनोज है' (सुधा) प्राचीनलक्षणं व्याख्याय तन्न दूषणसुपन्यस्यति-अन्रेति। अन्र लक्षणे इदं दूषणं विचायते। इह लक्षणे 'दयोः' इति पदं किमर्थम्१ अर्थयोरित्यनेनैव तल्लाभादित्याशयः । चन्द्रस्य चन्द्रेणैव साधर्म्यवर्णनरूपे चन्द्र इव चन्द्रः श्रीमान्' इत्यनन्वयेऽतिव्याप्तिनिपेधकतया इ्योरिति पदस्य साफल्येऽप्युपमानस्य चन्द्रादेरुपमेयतारूपकल्पनात्मके 'मुखमिव चन्द्रः' इति प्रतीपे, द्वयोरुपमानोषमेययोः क्रमेणोपमेयोपमानरूपक्लपनात्मिकायाम् 'धर्मोऽर्थ इव पूर्णश्रीरर्थो धर्म इव त्वयि' इत्युपमेयोपमायाव्न हयोः सादृश्यवर्णनसत्वादतिव्याप्िः। ननु तत्र लक्षणगमनं न दोषाय, तयोरुपमारूपत्वादिति समाधानं खण्डयति-उपमात्वेनेति।

Page 82

४२ चित्रमीमांसा

तयोस्तर्वेन ग्राह्यत्वे तेन प्रकारेणैवानन्वयेऽपि तद्रूपतया गृहीते द्योरिति पदं निरर्थकमेव स्यात्। प्रसङ्गात् प्रकाशोक्तलक्षणं खण्डयति-एतेनेति। द्वयोरिति पदस्य निरर्थकत्वकथनेन 'साधर्म्यमुपमाभेदे' इति तदुक्तलक्षणेऽनन्वयनिपेधाय कृतं भेदपद्मपि प्रत्युक्तम्=निरस्तम्,

कविना कल्पितं साधम्यं यस्यास्तथाभूता या 'हंसीव धवला कीर्तिस्स्वर्गङ्गामवगाहते' इत्यादिरूपा उपसा, तन्राव्याप्ति., विद्यमानसाधर्म्यवर्णनाभावादिति भावः। अस्तु वा तयोरुपमानत्वेन सङग्राह्यता, कविकल्पितोपमायास्त्त्वं च 'तुष्यतु दुर्जनन्यायेन', तथापि 'हंसीव धवलश्चन्द्रः सरांसीवासलं नभः' इति लिङ्गवचनभेददुष्टायां तस्यामतिव्यापिः, उपमानोपमेयत्वयोग्यत्वस्य हृद्यत्वसत्वात्। दूषणान्तरमाह, उदाहरिष्यमाणे- 'वाहि वात यतः कान्ता तां स्पृष्टवा मामपि स्पृश। त्वयि मे गान्रसंस्पर्शश्चन्द्रे दृष्टिसमागमः॥' इति रूपेण उपमाध्वनी व्यंग्योपसायाज्जातिव्याप्तिः अलक्कार्यत्वेन तत्वासम्भवात्। ब्राह्मणश्रमणन्यायेन तस्य ध्वनिव्यपदेशस्य सिद्धान्तसम्मतत्वाच्च। यदि तु सर्वोपमा- मात्रस्येदं लक्षणस्, अतो न कुत्रापि दोष इत्यंगीकरोपि तदा 'उपमानोपमेयत्वयोग्ययोः' इति पदस्य 'हृद्यम्' इत्यस्य च कथनासंभवापत्तेः। सर्वत्र लक्षणसमन्वयांगीकारेण दुष्टोप- माया अपि सग्राह्यत्वात्। अतो दूषणदुष्टमेवेदं लक्षणं प्राचीनानामिति अ्रन्थकर्तुरभिप्राय इति बोध्यम्। वस्तुतस्त्विदं व्याख्यानं प्रकृतग्रन्थानुरोधेन। प्राचीनलक्षणे तु दोपो नास्त्येव। 'उपमानोपसेयत्वयोग्ययोः' इत्यस्योपमानोपमेयतात्वेन प्रसिद्धयोरित्यर्थः। प्रतीपे उपमे- योपसायाञ्च प्रसिद्धयोस्तयोरभावान्नातिव्याप्तिः। यदा 'प्रकृतोत्कर्षप्रयोजकत्वे सति' इत्यस्यालद्वारमान्ने विशेषणता तदा प्रतीपे उपमानतिरस्कारप्रयुक्त एव उत्कर्षो मुखादे, उपमेयोपमायामुभयो: परस्परोपसानत्वेन तृतीयसधृशव्यच्छेदप्रयुक्त एवातिशयः, न तु सादृश्यप्रयुक्त इति दोषाभावात्। एतेन प्रकाशो क्तलक्षणेऽभिहितं दूपणमप्यपास्तम्। ननु भेदपद्मपि व्यर्थम्, स्वेतरोपमाननिषेधस्थेव उत्कर्षाधायकतया सादृश्यस्यातथात्वादिति चेन्न, व्यभिचारवारणमान्ने तत्पदतात्पर्यकथनादिति दिकु। (चित्र०) यन्तु विद्यानाथेन लक्षणमुक्तम्- स्वतःसिद्धेन भिन्नेन सम्सतेन च धर्मतः। साम्यमन्येन वर्ण्यस्य वाच्यं चेदेकदोपमा ॥। इति। अत्र 'स्वतःसिद्धेन' इत्युत्प्रेक्षाव्यावृत्तिः, तत्रोपमानस्य कविकल्पितत्वेम लोकसिद्धत्वाभावात्। 'भिन्नेन' इत्यनन्वयव्यावृत्तिः। 'सम्मतेन' इति सर्व- विधदुष्टोपमाव्यावृत्तिः । कविसमयप्रसिद्धचभावेन लिङ्गवचनभेदादिना वा यद्यदसम्मतम्, तस्य सर्वस्थापि सम्मतपदेन व्यावर्तनात । 'धर्मतः' इति श्लेषव्यावृत्तिः। श्लेषे हि-'सकलकलं पुरमेतज्जातं संप्रति सुधांशुबिम्बमिव' इत्यादौ शब्दसाम्यमान्नमिवशव्देनोच्यते, न गुणक्रियारूपधर्ससाम्यम्।'अन्येन वर्णस्य' इत्यनेन प्रतीप्यावृत्तिः, तत्र वर्ण्येन प्रकृतेन सहाप्रकृतस्य सादृश्य-

Page 83

उपमानिरूपणप्रकरणम् ४३

वर्णनात्। 'एकदा' इत्यनेनोपमेयोपमाव्यावृत्तिः। 'वाच्यम्' इत्यनेन 'व्यङ्गयो- पमाव्यावृत्तिः' इति। (भारती) आचार्य विद्यानाथ के द्वारा कथित उपमा के लक्षण का खण्डन करने के लिए दीक्षित ने परिष्कारपूर्वक उस लक्षण का स्वय प्रतिपादन किया है-'यत्तु' अर्थात् स्वतःसिद्ध एव उपमेय से भिन्न और कविसमयप्रसिद्ध-अर्थात् जिसमें लिंगभेद, वचनभेद आदि दोप न हो-ऐसी अप्रस्तुत वस्तु से वर्णनीय वस्तु का, समान धर्म के कारण एकबार सादृश्य, यदि वाच्य हो तो वह उपमा कहा जाता है। इस लक्षण में 'स्वत सिद्धेव' इस शब्द के प्रयोग के द्वारा उत्प्रेक्षा के ' .. सदो वसन्तेन समागतानां नखक्षतानीव वनस्थलीनाम्' इस रूप में उपमात्व का निषेध किया गया है। उक्त उदाहरण में उपमान का नखक्षतादि में कविकल्पना के द्वारा लोकसिद्धत्वाभाव है। इसी प्रकार 'गगनं गगनाकारम्' इत्यादि अनन्वय में उपमा की व्यावृत्ति अर्थात् निषेध के लिए पूर्वकथित लक्षण में 'भिन्नेन' इस विशेषण का प्रयोग किया गया है। सर्वविधदुष्ट उपमा में इस लक्षण की प्रवृत्ति रोकने के लिए 'सम्मतेन' विशेषण का इस लक्षण में समावेश किया गया। अन्यथा 'हंसीव धवलाकीर्तिः सरांसीवामलं नभः' इस उदाहरण में लिंग, वचनभेद से दुष्ट रहने पर भी उपमा की प्रवृत्ति हो जाती है। क्योंकि, कविसमय की प्रसिद्धि के अभाव से लिङ्गादि भेद के द्वारा जो कुछ भी असम्मत होता, उन सवों को भी 'सम्मतेन' पद के द्वारा व्यावर्तन किया गया। 'सकलकलं पुरमेतजातं सम्प्रति सुधांशुबिम्बमिव' श्लेषालकार के इस उदाहरण में उपमात्व निषेध के लिए 'धर्मत.' विशेषण का प्रयोग इस लक्षण में किया गया है। क्योंकि, श्लेष के उक्त उदाहरण में 'इव' शब्द के द्वारा शब्दसाम्य मात्र कथन से गुण क्रिया रूप धर्मसाम्य का उस कथन में अभाव है। 'अन्येन वर्णस्य' इस पद के द्वारा प्रतीप के 'त्वल्लोचन- समं पझ्मं त्वद् वक्त्रसदशो विधुः इस उदाहरण में उपमात्व का निषेध किया गया। क्योंकि प्रतीप के इस उदाहरण में प्रकृतमुखादि से अप्रकृत चन्द्रादि का सादृश्य वर्णन से उपमा में उसका विलोम हो जाता है। इसी प्रकार 'एकदा' इस पद के द्वारा 'उपमेयोपमा' के इस उदाहरण में-'खमिवं जलं जलमिव खम्' में उपमात्व का निषेध किया गया-एक वाक्य वाच्यत्वाभाव के कारण। 'वाच्यम्' इस विशेषण द्वारा व्यग्योपमा के इस उदाहरण में-'वाहि वात यत. कान्तां" तां स्पृष्टवा मामपि स्पृश त्वयि मे गान्रसंस्पर्शः चन्द्रे दृष्टिसमागमः ।'-उपमात्व का निषेध किया गया। यहाँ उपमा के व्यजनागम्यत्व से अभिधा प्रतिपाद्यत्व के अभाव से अतिव्याप्ति दोष का निराकरण किया गया। 'इति' शब्द लक्षण समाप्ति के अर्थ का सूचक है। इस प्रकार उक्त लक्षण का परिष्कार कर दीक्षितजी ने पुनः प्रत्येक का खण्डन प्रारंभ किया।

(सुधा) अथ विद्यानाथोक्तमुपमालक्षणं खण्डयितुं तदुक्तलक्षणपरिष्कारपूर्वकं स्वयं प्रतिपाद यति-यच्विति। विद्यानाथेन लक्षणसुपमाया इति शेप:। उत्त् = स्वग्रन्थे प्रति- पादितस्। स्वतःसिद्धेनेति। वर्ण्यस्य = उपमेयस्थ, स्वत. सिद्धेन, सिव्नेन, सम्मतेन= कविव्यवहारसम्मतेनेत्यर्थः। अन्येन = उपसानेन, एकस्मिन् वाक्ये धर्मत साधम्य वाच्यं चेत् =अभिधाशक्तिविषयश्चेत, उपमालक्कारः।

Page 84

४४ चित्रमीमांसा

लक्षणपदव्यावृत्तिमाह-अन्नेति । अन्र लक्षणे 'स्वतस्सिद्धेन' इत्यनेन उत्पेषायाः 'बालेन्दुवक्त्राण्यविकासभावाद् बभुः पलाशान्यतिलोहितानि। सदो वसन्तेन समाग- तानां नखक्षतानीव वनस्थलीनाम् ।I' इत्यादिरूपाया व्यावृत्तिः। तत्रोद्येक्षायामुपमानस्य= नखच्ततादे: कविकल्पितत्वेन लोकसिद्धत्वाभावात्। 'भिन्नेन' इति विशेषणेन अनन्वयस्य, 'गगनं गगनाकारं सागरः सागरोपमः। रामरावणयोर्युद्धं रामरावणयोरिव ॥' इति स्वरूपस्य व्यावृत्तिः। उपमात्वनिपेध इत्यर्थः । 'सम्मतेन' इति पदेन सर्वविधदुष्टोपमायाः 'हंसीव धवलश्चन्द्रः सरांसीवामलं नभः' इत्यादिलिङ्गवचनभेददुष्टाया व्यावृत्तिः। कविस- मयप्रसिद्धेरभावेन लिद्गादिभेदेन यद्यदसम्मतम्, तस्य सर्वस्थापि तेन पदेन व्यावर्त्तनात्। 'धर्सतः' इत्यनेन शलेषपदस्य 'सकलकलं पुरमेतज्जातं सम्प्रति सुधांशुविम्बमिव' इत्यादि- रुपस्य व्यावृत्ति.। इवशब्देन शब्दसाम्यमान्रकथनेन गुणक्रियारूपधर्मसाम्यस्थ तन्न कथनाभावात्। 'अन्येन वर्ण्यस्य' इत्यनेन पदेन प्रतीपस्य 'त्वल्लोचनसमं पभ त्वद्वक्त्र- सदशो विधुः' इत्यादिरूपस्य व्यावृत्तिः । तत्र =प्रतीपे, वर्ण्येन = प्रकृतेन मुखादिना, अग्रकृतस्य =चन्द्रादेः सादश्यवर्णनादुपमायां तद्विलोमत्वादित्यर्थः । 'एकदा' इति पदेन उपमेयोपमायाः 'खमिव जलं जलमिव खं हंस इव चन्द्रश्चन्द्र हव हंसः। निर्शर इव मद्धारा मद्धारेवास्य निर्शरस्त्रवति ॥' इत्यादिरूपाया व्यावृत्तिः, एकवाक्यवाच्यत्वा- भावादित्यर्थः । वाध्यमित्यनेन व्यड्ग्योपमायाः 'वाहि वात यतः कान्ता तां स्पृष्टा मामपि स्पृश। त्वयि मे गात्रसंस्पर्शः चन्द्रे दृष्टिसमागम ॥I' इत्यादिरूपाया व्यावृत्तिः। तन्नोप- माया व्यअ्नागम्यरवेन अभिधाप्रतिपाद्यत्वाभावादतिव्याप्तिनिरासः। 'इति' शब्दो लक्षण- समाप्त्यर्थ.। (चित्र०) तत्रोत्प्रेक्षाव्यावृत्तये 'स्वतःसिद्धेन' इत्युक्तमयुक्त्तम्, उत्प्रेक्षायामिवकारस्य विषयविषयिणोस्तादात्म्यादिसम्भावनावाचकत्वेन तत्र साम्यस्यावाच्यतया तत एव तद्वयाधृत्तेः। उक्तं हि चक्त्वर्तिना- यदायमुपमानांशो लोफतः सिद्धिमृच्छति। तदोपमैव येनेवशब्दः साधर्म्यसूचकः॥ यदा पुनरयं लोकादसिद्ध: कविकल्पितः । तदोत्प्रेक्षैव येनेवशब्द: सम्भावनापरः ॥ इति। दृष्टं च लोके सम्भावनापरत्वमिवशब्दस्य-'दूरे तिष्ठन् देवदत्त इव भाति' इति। कथं च 'स्वतःसिद्धेन' इत्यनेनोत्प्रेक्षाव्यावृत्ति: ? न नित्यमस्मिन् परिपूर्णतेति त्यत्तवा नमः क्षोणितलावतीर्णः । आनन्दयन्निन्दुरिव स्वधाम्ना विभाति लोके नवकाकतीन्द्रः ।। इति तदीयोत्प्रेक्षोदाहरण एवोपमानस्य स्वतःसिद्धत्वात्। इन्दुः क्षोणित- लावतीणत्वाकारेण कविकल्पित इति चेत्तर्हि, चन्द्रबिम्बादिव विष चन्दनादिव चानल: । परुषा वागितो वक्त्रादित्यसंभावितोपमा।।

Page 85

उपमानिरूपणप्रकरणम् ४X

इत्युक्तायामसंभावितोपमायामव्याप्ति: विषानलयोः स्वतःसिद्धत्वेऽपि चन्द्र चन्दनप्रभवत्वेन कविकल्पितत्वात्। उभौ यदि व्योम्नि पृथक्प्रवाहावाकाशगङ्गापयसः पतेताम्। तेनोपमीयेत तमालनीलमामुक्तमुक्तालतमस्य वक्षः॥ इति कविकल्पितोपमानायामुपमायां स्वथैवाव्याप्तिः। (भारती) विदयानाथ जी ने उपमा के लक्षण में, उत्प्रेक्षा निषेध के लिए जो 'स्वत. सिद्धेन' शब्दों का प्रयोग किया है, वह युक्तिसगत प्रतीत नहीं होता। क्योंकि उत्प्रेक्षालकार में एक ही आधार पर उपमान एव उपमेय का तादात्म्य सम्बन्ध संभावनावाचक 'इव' पद से सम्वन्धित रदता है। पुनः इस विषय में 'इव' पद से साम्य के अकथन से पुन. वह्दी साम्य अर्थ के अभाव के कारण उत्प्रक्षा का स्वत. निषेध हो ही जाता है। दीक्षित जी ने अपने इस मत की पुष्टि के लिए आचार्य चक्रवर्त्तीं की 'बाल बोधिनी' का एक श्लोक उद्धृत किया है-'यदायमि'ति। अर्थात्- जव यह उपमान अश लोकद्वारा सिद्धि प्राप्त करता है तब उपमा अलकार ही होता है, क्योंकि इसी कारण यहाँ 'इव' शब्द साम्य का बोधक होता है। फिर जब यही उपमान अश लोकसिद्ध न होकर केवल कविकल्पना पर आश्रित रहता है तव वहाँ उत्प्रेक्षालकार ही होता है, क्योंकि इसी कारण यहाँ 'इव' शब्द साम्यसूचक न होकर सभावना के अर्थ का प्रतिपादक हो जाता है। अर्थात् उत्प्रेक्षालकार में कविकल्पना उपमान पर ही टिकी रहती है। अत रचना में उसी का दृढीकरण होता है। कुछ आलकारिक तो उत्प्रेक्षा के लिए सभावनापरक कविकव्पना प्रसूत उपमान को आवश्यक भी मानते हैं। फिर 'दूर में ठहरा हुआ वह देवदत्त की तरह शोभता है' ऐसे वाक्य में सभावनापरक 'इव' शब्द लोक में सिद्ध दृष्टिगोचर होता है तो फिर इस उपमा के लक्षण में 'स्वतः सिद्धेन' के द्वारा उत्पेक्षा का निषेध कैसा ? इसपर उदाहरणान्तर प्रस्तुत करते हुए दीक्षित कहते हैं-'इस आकाश में सर्वदा परिपूर्णता नहीं रहती है।' कारण वताते हैं-'आकाश छोडकर पृथ्वीतल पर भवतीर्ण चन्द्रमा की तरह अपने तेज अर्थात् प्रकाश से पृथ्वी पर जनों को आनन्दित करते हुए नवकाकनी के राजा (काकती देश-विदेश है) शोभते हैं। इस श्लोक में उपमानभूत चन्द्रमा का लोक-सिद्धत्व होने के कारण स्वतः उत्प्रेक्षाभग हो जाता है। यदि आप भूतलावतीर्णत्वविशिष्ट चन्द्रमा की उपमानता में उसे कविकल्पित मानकर उत्प्रेक्षाभग को स्वीकृत करते हैं तव-'चन्द्रमा के बिम्ब से जहर की तरह, चन्दन से आग की तरह इसके मुख से कठोर बातें निकलती है।' अर्थात यहाँ असभावित उपमा दी गई है। ऐसी स्थिति में यहाँ चन्द्रमा और चन्दन के प्रभाव से विप और मनल का प्रति- पादन कविकल्पना के द्वारा लोकसिद्धत्वाभाव से अव्याप्तिदोष हो जाता है। इस प्रकार कविकल्पित उपमा में सर्वत्र अव्याप्तिदोष उत्पन्न हो जाता है। माघ-काव्य के कृष्णवर्णन का यह पद्य उद्धृत करते हुए दीक्षित जी ने लिखा है-तमाल की तरह नील वर्ण भगवान श्रीकृष्ण के वक्षस्थल मुक्ता की माला से सुशोभित, आकाश-गगा के जल के दोनो प्रवाह, जिसमें अलग-अलग प्रवाहित हो रहे हो, उस आकाश से समानता कर रहा था। कवि के कहने का तात्पर्य यह है कि भगवान भीकृष्ण के वक्षस्थल का कोई उपमान है ही नहीं। यहाँ उपमान के कुछ

Page 86

४६ चित्रमीमांसा

भी भाव प्रदशित नहीं होते। इससे केवल इतना ही अर्थ निकलता है कि मगवान श्रीकृष्ण केवल मुक्ताहार धारण किए हैं। यहाँ भी कविकल्पित दो प्रवाहों की उपमा में अव्याप्ति हो जाती है। फिर 'स्वत-सिद्धेन' शब्द का लक्षण में समावेश बिलकुल ही युक्तिसगत नहीं है। 'उतप्रेक्षा' शब्द का कोषगत अर्थ है (उत् +प्र+ईक्षा) बलपूर्वक देखना। किन्तु साहित्य रसिकों ने, जिस वर्णन के प्रस्तुत में अप्रस्तुत की सभावना की जाय-वहाँ उत्प्रेक्षालकार माना है। इस अलकार में-उपमा में उपमेय और उपमान में सादृश्य की संभावना की जाती है। सभावना सदेह और निश्चय के वीच की स्थिति है जैसे-

रासं स्न्िग्धतरश्यामं विलोक्थ वनमण्डले। प्रायोधारा धरोऽयं स्यादिति नृत्यन्ति केकिन:॥

अत्यन्त चिकने श्याम वर्णवाले राम को देखकर,-सभव है यह मेघ हो,-जगल में मोर नाच रहे हैं। इसमें मेघ और राम की श्यामता में सादृश्य की सभावना की गई है। अत उपमेय और उपमान की सभावना या कल्पना को आलकारिक जन उत्प्रेक्षा कहते हैं। यह सादृ्यमूलक अभेद अलकार है। पण्डितराज जगन्नाथ ने इस पर विचार करते हुए लिखा है कि सभी जगह अभेद सम्बन्ध से ही उत्प्रेक्षालकार होता है-इस नियम में कोई ठोस प्रमाण या सवल थुक्ति नहीं है। क्योंकि उत्प्रेक्षा के उदाहरणों में भेद-सम्बन्ध से भी उत्प्रेक्षा देखी जाती है। जैसे, 'अस्यां मुनीनामपि मोहमूहे' इत्यादि उदाहरण में 'मोह' की 'मुनि' में उत्प्रेक्षा है। लेकिन विचार करने पर स्पष्ट हो जाता है कि यहाँ मोह और मुनि में अभेद सम्बन्ध विलकुल ही नहीं है। प्राचीनों के सिद्धान्तानुसार इस पर यदि यह तर्क उठाया जाय कि इसमें मुनियों से सबध रखने वाले किसी धर्मविशेष में सुनि के मोह का अभेदसम्बन्ध है न कि मुनियों में मोह की, तो इसका सीधा उत्तर यह होगा कि जब भेद से उत्प्रेक्षा करने में कोई बाधक नहीं है तो फिर ऐसी क्लिष्ट कल्पना ही निरर्थक है। अस्तु, मेरी दृष्टि में 'अभेद' का तात्पर्य उच्च कोटि के पदार्थ की सभावना से है। जहाँ रूपक में उपमान और उपमेय की एकरूपता होती है, वहाँ उत्प्रेक्षा में केवल उक्त दोनों तत्त्वों में सादृश्य की सभावना की जाता है, अर्थात् उपमेय एव उपमान में साम्य-जन्य अभेद होता है। क्योंकि कोई भी कवि उपमेय में उपमान की कल्पना करते हुए दोनों में सादृश्य की ही तो कल्पना करता है। यही कारण है कि उत्ेक्षा में उपमेय गौण एव उपमान उत्कृष्ट या प्रधान दिखाई पडता है। उपमेय में तयाकथित गुणसमूह हो अथवा नहीं, इससे कवि को कुछ लेना- देना नहीं-वह तो बलपूर्वक उपमान के साथ उपमेय का साम्य स्थापित करता है। कवि इन सारे तथ्यों की सभावना उपमान के रूप में ही कर लेता है। यह निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि किसी भी अलंकार के प्राण उसके चमत्कार ही होत है। अत उत्प्रेक्षा में भी काल्पनिक उपमान का वर्णन यदि चमत्कारपूर्ण एव सवेध है तो कवि का आयास सफल माना जाना चाहिए। उत्प्रेक्षा शब्द स्वत. सभावनापरक है। अतः इसमें अकृत की जगह अप्रकृत की कल्पना की ओर ही कवि की मानसिक वृत्ति अधिक उन्मुख रहती है। कवि भावातिरेक की स्थिति में ही सौंदर्यपूर्ण चमत्कार के प्रति अपना आकर्षण अभिव्यक्त करता है। उसके सारे कवित्व का केन्द्रीय बिन्दु सभावना पर ही टिका होता है।

Page 87

उपमानिरूपणप्रकरणम् ४७

अतः इस अलकार में सशय कल्पित होता है और उसके समाव्य का पक्ष प्रवल रहता है। इस अलकार की खूबी यही है कि पाठकों को उपमेय का भी ज्ञान होता है, किन्तु गाण रूप से। क्योंकि, उसकी सभावना भी उपमान के रूप में ही की जाती है किन्तु, इसमें भी यह ध्यातव्य है कि उत्प्रेक्षा कवि की कोरी सभावना से समुद्भूत नहीं, बल्कि उसमें भी कविप्रतिभा से समुद्भूत चमत्कारजन्य सौन्दर्य या आकर्पण का होना आवश्यक है। इसके स्वरूप फल एवं हेतु की अन्य रूप में कवि द्वारा कल्पना की जाती है जरूर, पर उपमान और उपमेय की उप- स्थिति शब्दत. आवश्यक होती है। (सुधा) एवं तदुक्तं लक्षणं परिष्कृत्य खण्डयितुमुपक्रमते-तत्रेति। तत्र=उपमालक्षणे उत्प्रे- क्षानिषेधाय 'स्वतः सिद्धेन' इत्युक्तमयुक्तम्=अयोग्यमेव। उपमानोपमेययोस्तादात्या- दिसम्भावनावाचकस्य 'हव' पदस्योत्पेक्षायां सर्वेन तन्र विषये 'इव' पदेन साम्यस्या- कथनेन तत एव=साम्यार्थंकत्वाभावादेवोत्प्रेक्षाव्यावृत्तेः । साम्यार्थकतासत्वे तस्योपमा- प्रतिपादकता, न सम्भावनार्थकस्येति नियमात्। अन्न कल्पनायां प्राचीनोंकं प्रमाणयति- उकं हीति। हीति निश्चथेन। चक्रवर्तिना उक्तम्-यदेति। अयसुपमानांशः उपमानरूप उपमांशो लोकतः सिद्धिम् ऋच्छति=प्रामोति। तदा उपमेव येन हेतुना 'इव' शब्द: साम्यस्य सूचक := बोधक इत्यर्थः । यदा पुनरयं लोकसिद्धो न भवति किन्तु कवि- कल्पितः तदोखेक्षेव, येन 'दव' शब्द: सम्भावनापरः, सम्भावनार्थप्रतिपादक इत्यर्थ.। लोकेऽपि सम्भावनापरतां तस्य दर्शयति-'दूरे तिष्ठन्' इत्यादौ सम्भावनापरत्वं तस्य लोके दष्टमित्यन्वयः । तन्र साम्यसम्भावनयोः निर्णयाभावेऽतिव्याप्तिमाशङक्य दूषणा न्तरमाह-कथन्चेति। तेन पदेन उत्प्रेत्षाव्यावृत्तिः कथम्, विद्यानाथीयोत्प्रेक्षोदाहरण एवोपमानस्येन्दोः स्वतः सिद्धत्वात्=लोकप्रसिद्धत्वादित्यर्थः। उदाहरणमाह-न नित्य- मिति। अस्मिन्नभसि, नित्यं सर्वदा, परिपूर्णता नेति हेतोः नभस्त्यक्रवा भूमितलेऽवतीर्ण- श्रन्द्र इव स्वधाम्ना स्वप्रकाशेन लोके जने आनन्दयन् आनन्दं कुर्वन् नवकाकतीन्द्रो नाम राजा, काकती देशविशेषः। विभाति शोभते। नभस्तलोपरि पूर्णत्वाभावस्थिते- रैतुत्वेन पूर्वदले काव्यलिङ्गमलक्कारः। उत्प्रेक्षाया मुख्यत्वेनाद्वित्वम्। अन्र उपेन्द्रवज्रा वृत्तम्। 'उपेन्द्रवज्रा जतजास्ततो गौ' इत्युक्त। अन्नोपमानभूतचन्द्रस्य लोकसिद्धत्वा- दुत्प्रेन्ताभङ्ग इति भावः । भूतलावतीर्णत्वविशिष्टेन्दोरुपमानतायां तस्य कविकल्पित- रवादुयेत्तालक्कारो यद्यङ्गीक्रियते, तदा 'चन्द्रविम्बादिव विषम्' इत्युक्तरूपासम्भावितो- पमायामव्याप्ते. । पद्यार्थस्तु-चन्द्रबिम्बाद्विषमिव, चन्दनादझिरिव, अस्मान्सुखात् परुपा कठिना वाकू इति असम्भावितोपमा भवतीति शेषः। अन्र चन्द्रचन्दनप्रभवयोविषा- नलयोः कविकल्पितत्वेन लोकसिद्धत्वाभावादव्याप्ति. । उभाविति कविकल्पितोपमायां सर्वथेवाव्याप्तिः । साघकाव्ये कृष्णवर्णने पद्यम् । तमालवन्नीलम्, आमुक्ते आपपिते सुक्ालते मौत्तिकसत्जौ यस्मित् तत्, अस्य हरेर्वचः, आकाशगङ्गाया' पयसः उभौ प्रवाहौ व्योम्नि पृथक पतेतां यदि ग्वहेतां चेत्, सम्भावनायां लिङ्। तेन व्योन्ना उपसीयेत समीक्रियेत । नास्योपमानं किचिदिति भावः । मुक्ताहारं धृतवानित्यर्थ' । उपजाति- वृत्तम्-'अनन्तरोदीरितलच्सभाजौ पादी यदीयावुपजातयस्ता"' इत्युक्केः। तस्माचन्द्र- अभवविपादेरप्रसिद्धया असंभावितोपमायाम् उभावित्यादौ कविकल्पितोपसायाज्जान्याप्ेः "स्वतस्सिद्धेन' इति पदमयुक्तमेवेत्याशयः।

Page 88

चित्रमीमांसा

न्यायप्ाननाद्यस्तु-भूतलावतीर्णत्वविशिष्टचन्द्रस्य स्वतःसिद्धत्वाभावेनातिव्या- पेरभावः। द्वितीये चन्द्रप्रभवधिषादेरुपमेव तावन्नास्ति। किन्तु 'यथा चन्द्रबिम्वाद्विप- मसम्भावितं तथा त्वन्सुखात्परुषा वाक्' इस्युपमायास्तन्ाज्गीकाराव। असम्भावितः साधारणधर्मो यत्रोपमायां सा असम्भावितोपमेति तव्याख्यानसत्वाच्च। विषपरुषवचन- योरुपमायां चन्द्रादेर्वदनेन सह विम्बप्रतिबिम्बभावाच्चेति वदन्ति। उभावित्यादावप्य- सम्बन्धे सम्बन्धरूपातिशयोक्त्यङ्गीकारे कविकल्पितोपमायामव्याप्तेः स्ववासनामात्र- कल्पितत्वात् । 'अन्न व्योम्नो गङ्गाप्रवाहइयासभ्वन्धेऽपि सम्भावनया सम्बन्धकथनाद- तिशयोक्त्यलद्कारः। तदेतव् 'पुष्पं प्रवालोपहितं यदि स्यात्" इत्याधदाहत्यालङ्टारसर्वस्व- कारः स्पष्टीचकार, इति प्रतिपादनेन तद्याख्याने मक्निनाथादिभि: सर्वक्कषायां तथवाङ्गी काराच्चेति दिक्। (चित्र०) 'भिन्नेन' इत्यनन्वयव्यावृत्त्यर्थमुपात्तमप्ययुक्तम्। अनन्तरत्नप्रभवस्य यस्य हिमं न सौभाग्यविलोपि जातम्। एको हि दोषो गुणसंनिपाते निमज्जतीन्दोः किरणेष्विवाङ्क॥ इत्यस्यामुपपादकोपमायासव्यापेः, तत्रोपमेयदोषगुणसामान्यान्तर्गताना- मुपमानानां दोषगुणविशेषाणां कलंककिरणानां तद्भिन्त्वाभावात्।

न्नत्वम्-एतदपि न युक्तम,

भणितिरिव मतिर्मतिरिव चेष्टा चेष्टेव कीर्तिरतिविमला॥ इति रशनोपमायामव्याप्तेः मतित्वाद्युपमानतावच्छेदकानामुपमेयताव- च्छेदकभिन्नत्वाभावात्, उपमेयोपमायामुपमानतावच्छेदकयोद्वयोरपि तद्धिन्न- त्वाभावेनोक्तविशेषणेनैव तद्व्यावृत्तिसिद्धया 'एकदा' इत्यस्य वैयर्थ्यापत्तेश्र। रजोभि: स्यन्दनोद्धूतैगजैश्र घनसंनिभैः । भुवस्तलमिव व्योम कुर्वन् व्योमेव भूतलम्॥ इत्युपमे योपमाप्रकरणोदाहरिष्यमाणपरस्परोपमायामव्याप्तेश्व।

विवक्षितम् ? इदमपि न सम्यक्, उपाददे तस्य सहस्ररश्मिस्त्वष्ट्रा नवं निर्मितमातपत्रम्। स तद्दुकूलादविदूरमौलिरबभी पतद्ङ्ग इवोत्तमाङे।। द्वारं द्वारमटन् भिक्षु: शिक्षत्येवं न याचते। अदत्त्वा सादृशो मा भूर्दत्वा त्वं त्वादृशो भव।। इत्याद्यभिन्नधर्मिकोपमास्वव्याप्तेश्र्व, तन्न परमेश्वरत्वादेः स्वोपमेयतावच्छे- दकस्यैवोपमानतावच्छेदकत्वात्।

Page 89

उपमानिरूपणप्रकरणम् ४६

(भारती) उक्त लक्षण के 'भिन्नेन' इस विशेषण में भी दीक्षित जी को दोष प्रतीत होता है। प्राचीनों ने अनन्वय अलकार में अतिव्याप्ति दोष-निवारण के लिए जो 'मिन्नेन' विशेषण का लक्षण में समावेश किया, वह भी अयोग्य ही है। क्योंकि-'अनन्तरत' इस श्लोक की उपमा में ही इसके समावेश से अव्याप्तिदोष हो जाता है। यह श्लोक कुमार-काव्य में पर्वत-वर्णन के प्रसग में है। इस वर्णन की उपपादक उपमा में ही अव्याप्तिदोष हो जायगा। क्योंकि इसमें उपमेयभूत जो दोष-गुण सामान्य है, उसके अतर्गत उपमानस्वरूप दोष-गुण विशेषात्मक कलङ्क-किरणों को उपमेय से भिन्न नहीं कहा जा सकता। अवच्छेदकभेद से दोषाभाव की शका करते हुए कहते हैं-उपमेयतावच्छेदक अर्थात् दोषत्वादि से भिन्न जो उपमानतावच्छेदक रूप धर्म अर्थात कलक्क- त्वादि हैं, उनसे भिन्न प्रकृत में तो उपमालकार है ही फिर अव्याप्तिदोष कैसा? इसका भी समाधान करते हुए कहते हैं-अवच्छेदकभेद से आपका यह समाधान भी उचित नहीं। क्योंकि

इस ग्लोक में देखिए-'अनवरतेत्यादि'। निरन्तर स्वर्णदान के लिए हाथ में रखे संकल्पजल की वूँदों से याचकों को उद्रेलित, उच्छवसित करने वाले महादानी इस राजा की बुद्धि इसकी वाणी जैसी, चेष्टा इसकी बुद्धि जैसी और कीति इसकी चेष्टा जैसी विमल है। इस श्लोक में मालोपमा की तरह अभिन्न किंवा भिन्न- भिन्न साधारण धर्म का उपादान है किन्तु जिसमें पूर्व-पूर्ववर्त्ती उपमेय उत्तरोत्तर जैसे करधनी की एक किकिणी और दूसरी किंकिणी में क्रमश पूर्व-पर सम्बन्ध चलता रहता है; वैसे ही उपमान के रूप में जुडे दिखाई देते हैं। यही कारण है कि इसे रशना (करधनी) उपमा कहा गया है। इस रसनोपमा में मतित्वादि उपमानों के उपमेयतावच्छदेकमतित्वादि में भेदाभाव के कारण अव्याप्तिदोष हो जाता है। दूषणान्तर को प्रस्तुत करते हुए पुनः कहने हैं-उपमेयोपमा में; जैसे 'तुम में धर्म अर्थ की तरह और अर्थ धर्म की तरह पूर्ण है', उपमेयतावच्छेदक जो धर्म है तथा उसी में उपमानतावच्छेदक देवत्व भी है-इन दोनों में अभेद सम्बन्ध से पहले कही हुई भिन्नता के अभाव से 'भिन्नेन' इस विशेषण से ही पूर्वकथित उपमेयोपमा में अतिव्याप्ति का वारण हो ही जाता है। पुनः लक्षण में उल्लिखित 'एकदा' पद का व्यर्थत्व प्रसग उपस्थित हो जाता है। किन्तु,- 'रजोभिः' अर्थात् रथचक्रों के घर्षण से उडी हुई धूलियों से आकाश को भूतल की तरह और मेघों के समान हाथियों से भूतल को आकाश के समान वनाता हुआ (राजा रघु विजय के लिए गया)- उपमेयोपमा प्रकरण में उदाहरिष्यमाण इस परस्पर की उपमा में भी अव्याप्ति हो जायगी। प्रकरणान्तर से समाधान की आशका कर स्वय 'अथ' पद से उसका निराकरण करते हैं। यहाँ स्व पद उपमानपरक है, उससे निरूपित जो उपमेयतावच्छेदक है, उससे भिन्न जो धर्म-उपमानतावच्छेदक रूप है, उससे अभिन्न उपमान का उससे भिन्न पद से विवक्षा है। फलत. उसमें किसी प्रकार का दोष प्रतीत नहीं होता किन्तु, उनका यह कथन भी उचित नहीं है। क्योंकि-उस भगवान शकर का विश्वकर्मा निमित नवीन छत्र सहस्त्ररश्मि सूर्य ने स्वयं धारण किया है। उपवस्त् के उपान्त के सान्निध्य में वह आतपत्र उस महादेव के मस्तिष्क से गिरती हुई गगा की धारा की तरह शोमित है। यहाँ शिव के साथ ही उपमानोपमेय का अभिन्न सम्वन्ध होने के कारण अव्याप्ति दोष है। अगर आप यह कहें कि यहाँ दुकूलविशिष्ट परमेश्वर का उपमेय होने के कारण तथा गगाविशिष्ट का उपमान होने के कारण भेद है ही तो ऐसी स्थिति में उदाहरणान्तर प्रस्तुत करते हैं-'यह भिक्षुक द्वार-द्वार घूमते हुए शिक्षा देता है-न कि माँगता है-कि तुम दान न देकर मेरी तरह ४ चित्र०

Page 90

५० चित्रमीमांसा

मत वनो, किन्तु दान देकर अपने जैसे वनो।''द्वार-द्वार' पद ही अभिन्न धर्मवाचक है। फलतः वहाँ तो किसी प्रकार मुक्ति है, पर यहाँ तो अव्याप्तिदोष रह ही जाता है। निष्कर्पस्वरूप हम कह सकते हैं कि उपमानतावच्छेद निरूपित, उपमानतावच्छेदक परमेश्वर शिव का द्वितीय सदृश व्यवच्छेद रूप फल का बाध के द्वारा अनन्वय कहना उचित नहीं है। विमर्श-वस्तुत 'द्वार-द्वार' इन दो प्रतीतियों को भिन्न-भिन्न स्थान और काल में उत्पन्न होने के कारण पृथक-पृथक मानने में कोई बाघा नहीं, ऐसी स्थिति में इन प्रतीतियों का सादृश्य वाधित नहीं कहा जा सकता। यहाँ उपमेय एंव उपमान का तो आधार भिन्न है ही तुलना में भी सादृश्य वाधित है, फिर इसे अनन्वय कहकर अव्याप्तिदोष दिखाना ठीक नहीं लगता। (सुधा) 'भिन्नेन' इति विशेषणेऽपि दूषणमाह-भिन्नेनेत्यादि। अनन्वयव्यावृत्यर्थम्=तन्नाति- व्याप्तिनिवारणार्थम्, उपात्तं गृहीतम् 'भिन्नेन' इति विशेषणम्, अयोग्यमित्यर्थः। तन्न हेतुमाह-'अनन्तरत्प्रभवस्य' इत्युपमायामव्याप्ेः। कुमारकाव्ये पर्वतवर्णनम्। प्रभवत्य- स्मादिति प्रभव: कारणम्। अनन्तानामपरिमितानां रतानां श्रेष्टवस्तूनां प्रभवस्य कारणस्थ यस्य हिमाद्रेः हिमं कर्तृ, सुभगस्य भाव. सौभाग्यम्, 'गुणवचनब्राह्मणादिभ्यः कर्मणि च' इति ष्यजि 'हृद्दगसिन्ध्वन्ते पूर्वपदस्य च' इत्युभयपदवृद्धिः। तद्विलुम्पतीति सौन्दर्य- विघातकं न जातं नाभूत् । तथा हि-एको हि दोषो गुणसन्निपाते गुणसद्वाते इन्दोः किरणेप्वङ्क इव निमज्जति अन्तर्लीयत इत्यर्थ। नहि स्वल्पो दोषश्चित्र इवाभिमतगुणाभिभावक:, किन्तु कश्चिदिन्दुकलङ्कादिव गुणैरभि- भूयते। अन्यथा समस्तरम्यवस्तुहानिप्रसङ्गादिति भावः। उपेन्द्रवज्रावृत्तम्। 'उपेन्द्रवज्रा जतजास्ततो गौ' इत्युक्कः। अन्नाव्याप्तेरित्यर्थः। तन्र हेतुमाह-तन्नेत्यादि। उपमेयभूतं यद्दोषगुणसामान्यम्, तदन्त्गतानामुपमानरूपदोपगुणविशेषात्मककलङ्गकिर णानासुपमेय- भिन्नत्वाभावादित्यर्थः । अवच्छेदकभेदेन दोषाभावमाशङ्कते-अथेति। उपमेयतावच्छेदकम्=दोषत्वादि, तद्भिन्ो य उपमानतावच्छेदकरूपो धर्म .= कलद्गत्वादि, तद्वच्छ्िन्नत्वरूपं तद्विन्नत्वं प्रकृतोपमायामस्त्येव। अतो, नाव्याप्तिरित्यर्थ.। एतदृपि खण्डयति-तद्पीति। तदपि = अवच्छेदकभेदेन समाधानमपि, न युक्तम्=न योग्यमित्यर्थः। तन्न हेतुमाह-अनवरते- त्यादि। हे नृप, अनवरतं निरन्तरं यत् कनकस्य सुवर्णस्य वितरणं दानम्, तत्र ये जलकणास्तैमृंतो यः करः तेन तरङ्गवदाचरिता अर्थिततिः याचकसमूहो यस्य तस्य तव मतिर्भणतिरिव, चेष्टा मतिरिव, कीर्त्तिश्चेष्टेव; अतिविसला इत्यन्वयः। इत्युक्तायां पूर्वपूर्वोपमेयस्योत्तरोत्तरमुपमानत्वे रशनोपसेत्यु क्तरू पायामभिन्नसाधार णधमंव ्र श नो प मायां

स्येति शेष. । दूषणान्तरमाह-उपमेयेत्यादि । उपमेयोपमायामू 'धर्सोऽर्थ इव पूर्ण- श्रीरर्थो धर्म इव त्वयि।' इति रूपायासुपमेयतावच्छेदकं धर्मत्वम्, उपमानता- वच्छेदकमपि देयत्वमिति द्वयोरपि तद्भिन्नत्वाभावेन पूर्वोक्तरूपभिन्नत्वाभावेन भिन्नेनेति विशेषणेनैव उपमेयोपमाव्यावृत्तिसिद्धया=अतिव्याप्तिवारणसिद्धया 'एकदा' इति पदस्य तत्प्रयोजनकस्थ वैयर्थ्यापत्तेः। व्यर्थत्वप्रसङ्गादित्यर्थः। किन्व, रजोभिरिति। स्यन्दनों-

Page 91

उपमानिरूपणप्रकरणम् ५१

दभूतैः रजोभि: घनसन्निभैवर्णतः क्रियातः परिमाणतश्च मेघतुल्यगंजश्र यथाक्रमं व्योम आकाशं भुवस्तलमिव, भूतलं व्योमेव कुर्वन् ययावित्यन्वयः। इत्युपमेयोपमाप्रकरणे उदाहरिष्यमाणा या परस्परोपमा, तस्यामव्याप्तेश्र। प्रकारान्तरेण समाधानमाशद्क्य निराकरोति-अथेति। स्वपद्सुपमानपरम्, तन्निरूपितं यत् उपमेयतावच्छेदकम्, तस्माद्िन्नो यो धर्मः उपमानतावच्छेदकरूपस्त- दर्वच्छिन्नत्वमुपमानस्य तद्भिन्नत्वमिति पदेन विवत्तितम् । एवञ्च भणित्यादिनिरूपि- तोपमेथतावच्छेदकमतित्वाद्यन्यत्वं भणितित्वादीनामस्त्येवेति न दोषः। 'धर्मोडर्थ इव पूर्णंश्रीः' इत्यादावप्यर्थनिरूपितधर्मस्योपमेयतावच्छेदकस्य ततो भेदसरवेन लक्षणगमने 'एकदा'इत्यस्यापि सार्थकत्वात्। एवमेव परस्परोपमायामव्याप्तिनिरासः । भूतलनिरूपित- च्योमत्वरूपोपमेयतावच्छेदकस्य, भूतलत्वावच्छिन्नोपमाने भेदसर्वेन लक्षणसमन्वय- सत्वाच्चेति । एतदपि निराकरोति-इदमपीति। स्वोपमेयतावच्छेदकेत्यादिकथनमपि न सम्यक्। तत्र हेतुमाह-उपादद इति। तस्य हरस्य सहस्ररश्मिः सूर्यस्त्वष्टा विश्वकर्मणा निर्मितं नवमातपत्रम्, उपाददे धतवान्। तद्दुफूलान्तस्यातपत्रस्य प्रान्तविलम्विनो टुकूलादविदूरभौलि:, तद्दुकूलस्यासन्नमौलिरित्यर्थः । स हर उत्तमाङ्गे 'उत्तमाङ्गं शिरः शीर्पम्' इत्यमरः । पतन्ती गङ्गा यस्य, स. पतद्रङ्ग इव बभी। दुकूलादित्यन्र 'दूरान्तिकार्थेः षण्ठ्यन्यतरस्याम्' इति विकल्पेन पञ्चमी। अन्र शिवस्येवोपमानोपमेयतावच्छेदकत्वा- दव्याप्तेः। नन्वत्रापि दुकूलविशिष्टपरमेश्वरत्वस्योपमेयतावच्छेदकत्वाद् गङ्गाविशिष्टस्य तदुपमानतावच्छेदकत्वाद् भेदोस्त्येवेति चेन्न, 'द्वारं द्वारम्' इत्यादावभिन्नो धर्मो यासान्ता अभिन्नधर्मिकाः, ताश्च ता उपमाश्च तासु अव्याप्तेरित्यन्वयः । एष भिन्नुः द्वारं द्वारम् अटनू शिक्षति न तु याचते। कि शिक्षतीत्याह-त्वम् अदत्वा दानमदत्वा मत्सदशो मा भूः, किन्तु त्वं दत्वा त्वादशस्त्वत्सद्श एव भवेति पद्यार्थः । अन्र हेतुमाह- परमेश्वरत्वादेरिति उपामानतावच्छेदकनिरूपितोपमेयतावच्छेदकस्य परमेश्वरत्वादेरुप- मानतावच्छेदकत्वात्। द्वितीयसददशव्यवच्छेदरूपफलस्य वाधेनानन्वयस्य वक्तुमयोग्य- त्वाच्च। तस्मान्विन्नेनेति पदमसङ्गतमिति दीक्षिताशय । वस्तुतस्तु-उपमानतावच्छे दुकतापर्याप्त्यधिकरण स्योपमेयतावच्छेदकतापर्याप्त्यनधिकरणत्वस्यैव तद्िन्नपदेन विवत्ति- तत्वात् 'त्वं त्वादशो भव' इत्यत्र कालादिकृतभेदविवक्तया पूर्वोक्तभिन्नत्वस्य नतेरभावाद्। अन्यथोपमानताया एवासिद्धिप्रसद्गाच्च। 'एतत्कालो प्तरकालवृत्तित्वमेतत्कालीनत्वत्सदृशो भव' इत्यर्थस्य तन्न सत्वाच्च। एकस्मिन्नेव काले तद्विघाने तु सिद्धसाधनापत्तेरिति दिक्ं। (चित्र०)

श्लेषव्यावृत्त्यर्थम् 'धर्मतः' इति विशेषणमप्ययुक्तम्, तत्र न शव्दसाम्य- मात्रमिवेनोच्यते, किन्तु गुणसाम्यमपीति तद्व्यावृत्तेः। नतु पुरे सकलकलत्वं कलकलशब्दसाहित्यम्, सुधांशुनिम्बे कलासाकल्यम् इति नैकोऽनुगतो गुणो लभ्यते, मैवम् ; श्लेषभित्तिकाभेदाध्यवसायमूलया 'ेदेऽभेद:' इत्येव रूपयाऽतिशयोक्त्या धर्मसाधारण्यलाभात्। न ह्युपमानोप- मेंयंयोरनुगत्या धर्मस्य मुख्यसाधारण्य एवोपमालंकारः,

Page 92

५२ चित्रमीमांसा

पाण्ड्योऽयमंसार्पितलम्बहारः क्लृप्ताङ्गरागो हशचन्दनेन। आभाति बालातपरक्सानु: सनिर्भरोद्वार इवाद्रिराज: ॥ इत्यादौ हरिचन्दनवालातपहारनिर्भरादीनां बिम्बप्रतिबिम्बभावेन नि्दिष्टा- नामपि साधारणघर्मत्वाङ्गीकारात्। (भारती) 'सकलकलं पुरमेतज्ातं सम्प्रति सुधांश विम्बमिन' इत्यादि रूप श्लेप के निराकरण के लिए, पूर्वोक्त लक्षण में जो 'धर्मतः'-यह विशेषण प्रयुक्त हुआ है, वह भी निरर्थक है। क्योंकि यहाँ 'इव' शब्द से न केवल शव्दसाम्यमात्र का बोध होता है, प्रत्युत गुणसाम्य का भी बोध होता है। फिर श्लेषनिराकरण के अभाव में, लक्षण में प्रयुक्त 'धर्मत' विशेषण निरर्थक ही है। यहाँ पुर में कल-कल शब्द सहित सकल कलत्व का बोध होता है तथा चन्द्र-विम्व में कला साकल्य का वोध होता है। फलत. एकानुगत वर्म के अभाव के कारण यहाँ अतिव्याप्ति की आशंका निरर्थक है-ऐसा नहीं कह सकते। क्योंकि अभेद नियम का श्लेषाश्रय होने के कारण भेद में अभेद रूप अतिशयोक्ति से एकधर्मता का लाभ हो जाता है। पुनः उपमान एव उपमेय का अनुगतवृत्ति से धर्म का मुख्य साधारण्य ही उपमा अलकार है-ऐसा नियम आप नहीं कह सकते। क्योंकि- कधों से लटकते हुए हार को पहने हुए तथा हरिचन्दन का अगराग (अगों में लेप) लगाए हुए ये पाण्ड्य देश के राजा, प्रात काल की धूप से रक्तवर्ण युक्त शिखर वाले झरनों से जल वहाते हुए हिमालय की तरह शोभित हो रहे हैं। इस पद में हरिचन्दन, वालातप, हार, निर्झर प्रभृति में विम्वप्रतिविम्व भाव दिखाने पर भी साधारणधर्मवान यह पाण्ड्य ही है, ऐसा अगीकार करने पर मी अर्थात वैसी साधारण्य की उपस्थिति में भी उपमा का दर्शन नहीं होता है।

धर्मत इति पढं खण्डयितुमुपन्यस्यति-श्लेषव्यावृत्यर्थमिति। श्लेषस्य 'सकलकलं (सुधा)

पुरभेतज्जातं सम्प्रति सुधांशुचिम्वमिव' इत्यादिरूपस्य व्यावृत्यर्थम्-व्यावृत्तये धर्मत इति विशेषणमप्ययुक्तम्; शब्दसाम्यमान्नस्य इवपदेन कथननियमाभावात्, गुणसाभ्य- स्यापि डवपदेन प्तिपाद्यत्वात् । तत्वाङ्गीकारे च श्लेषस्य व्यावृत्तेरभावात् तत्कथनेऽपि तवातिव्यापि । आशक्कते-नन्विति। पुरे सकलकलत्वं कलकलशब्दसहितत्वम्, चन्द्र- बिम्बे कलासाक्ल्यम्; इति एकस्यानुगतधर्मस्याभावान्नातिव्याप्तिरित्याशङ्कार्थ.। उभया- नुगतकसाधारणधर्माभावे उपमाया वक्तुमयोग्यत्वादित्याशयः । समाधत्ते-मैचमिति। श्लेषो भित्तिराश्रयो यस्येति श्लेषभित्तिक. । स चासावभेदनियमश्च, तन्मूलया 'भेदे अभेदः' इत्येवंरूपाति शयोक्त्या धर्मसाधारण्यं धर्मैक्यं तस्य लाभात्। उपमानोपमेययोरनुगतवृश्या धर्मस्य मुख्यसाधारण्य एवोपमालङ्कार इति नियमस्तु न वक्तुं शक्यते, हरिचन्दनवालात- पहारनिर्झरादीनां विम्बप्रतिविम्वभावेन दर्शितानामपि साधारणधर्मत्वस्य पाण्ड्योऽय- मित्यादावङ्गीकारात्। अस्यार्थ :- अंसे अपितो लम्वो हारो यस्य; हरिचन्दनेन गोशीर्षेण; 'तैलपर्णिकगोशीर्षे हरिचन्दनमस्त्रियाम्' इत्यमरः । क्लृपाङ्गराग कृतानुलेपनः; अयं

Page 93

उपमानिरूपणप्रकरणम् ५३

पाण्ड्यः पाण्डूनां जनपदानां राजा पाण्ड्यः। 'पाण्डोर्जनपदशब्दात् क्षत्रियाद् उचण् वक्तव्यः' इति वचनात् ड्यणप्रत्ययः । वालातपेन रक्ता अरुणा: सानवो यस्य सनिर्झरोद्गार: झरोदकसहितः 'प्रवाहो निर्झरो झरः' इत्यमरः, अद्विराजो हिमवानिवाभाति शोभते। अत्र तथा साधारण्यसत्वे उपमादर्शनाच्च । (चित्र०)

ननु 'सकलकलम्' इत्यादावपि गुणसाम्यं चेदुपमैव स्यादिति चेत् , शब्द- साम्यमात्रं चेदपि किमित्युपमा न स्यात् ? न हि शब्दान्यगुणादिसाम्यमेवोप- साप्रयोजकं न शब्दसाम्यमिति कुलधर्मः, यथा प्रह्मादनाचन्द्रः प्रतापात्तपनो यथा। तथैव सोऽभूदन्वर्थो राजा प्रकृतिरञ्जनात्॥ इत्यत्रानुगतार्थना मरूपशब्दसाम्येऽप्युपमादर्शनात्। किन्तु श्लेषस्यालङ्का- रान्तरविविक्तविषयाभावेन निरवकाशतया बलवत्त्वेनालङ्कारान्तरबाधकत्वा- दुपमाप्रतिभानेऽपि तत्प्रतिभोत्पत्तिहेतुः श्लेष एव, नोपमेति मङ्गकादिभिरभ्यु- पेयते। तत्च यथा शब्दसाम्यमाधित्योपमाप्रतिभाने तद्वाधकत्वं श्लेषस्य,

डपि तद्वक्तुं शक्यमिति न तदतुरोघेन तत्र गुणसाम्यपरित्यागः । (भारती) यदि आप 'सकलकलम्' इत्यादि में गुणसाम्य होने के कारण 'उपमा' अलकार मानते हैं तो फिर शब्दसाम्य मात्र में उपमा अलकार क्यों न होगा? ऐसा कहने से तो वहाँ भी उपमा- पत्ति होगी ही; क्योंकि शब्दभिन्न गुणादिसाम्य का ही उपमाप्रयोजकत्व होगा न कि शब्दसाम्य का-इस प्रकार के नियम में किसी तरह के प्रमाण का भी अभाव है। औणादिक चन्द धातु से 'र' प्रत्यय लगाकर चन्द्र शब्द बनता है, जिसका अर्थ है चन्द्रयति आह्लादयति अर्थात् जैसे प्रह्लादन से अनुगतार्थक यह चन्द्र शब्द है एव प्रताप से तापजनन होने के कारण सूर्य के लिए अन्वर्थक तपन शब्द है, उसी प्रकार प्रकृतिरजन से राजा शब्द सार्थक हुआा। उक्त पद्य में जिस प्रकार अनुगतार्थ नाम रूप शब्दसाम्य मे भी उपमा परिलक्षित होती है, उसी प्रकार 'सकलकलम्' इत्यादि में इलेष अलकार ही है। क्योंकि अलकारान्तर से पृथग्भूतयो विषय है, उसके अभाव से निरवकाश होने के कारण श्लेष यहाँ वलवान वनकर अन्य अलकारों का वाधक है। (क्योंकि ऐसा नियम है कि सावकाश और निरवकाश के वीच निरवकाश विधि ही वलवान होती है।) इस प्रकार यहाँ उपमा प्रतिभासित होने पर भी उपमाप्रतिभोत्पत्तिक यहाँ श्लेष अलकार ही है न कि उपमा। ऐसा मडखुकादि आचार्य स्वीकृत करते हैं। उसके वाद जैसे यहाँ शब्दसाम्य मात्र पर आश्रित उपमा प्रतिभासित होने पर भी उपमावाधकत्व श्लेप का ही ग्रहण किया गया है, उसी प्रकार यहाँ श्लेषभित्तिक अभेद के अध्यवसाय से लब्ध साधारण धर्मसम्पत्ति के द्वारा श्लेष का वाधक उपमा है। इसी प्रकार गुणसाम्य का आश्रय ग्रहण कर

Page 94

चित्रमीमांसा

पतिभासित उपमा में मी पूर्वकथित बाधकत्व इम नहीं कह सकते, क्योंकि बाधकरव के अनुरोध से ही वहाँ उपमा में गुणसान्य का परित्याग किया गया है। (सुधा) आशद्कते-नन्विति । सकलकलमित्यादी गुणसाम्यञ्च्ेत् उपमैव भवेत्। दूपयति- शब्दसाभ्यमान्ने उपमा कथं न स्यात्? तथा च तत्राप्युपमापत्तेरित्यर्थः। शब्दभिन्नगुणा- दिसाम्यस्यवोपमाप्रयोजकत्वं न शब्दसाम्यस्येति नियसे प्रमाणाभावात्। शब्दसाम्येऽप्युपमां दर्शथति-यथेति। यथा चन्दयत्याह्लादयतीति चन्द्रः । चदि धातोरौणादिको रप्रत्ययः। ग्रह्मादनादाहादकरणादन्वर्थोडनुगतार्थनामकोडभूतू। यथा च तपतीति तपनः सूर्य., नन्दादित्वात् स्युप्नत्ययः। अतापात्तापजननादन्वर्थः तथैव स राजा प्रकृतिरअनादन्वर्थः सार्थकराजशब्दोऽभूदित्यर्थ.। यद्यपि राजशब्दो राजतेर्दीप्त्यर्थात्- कनिन्प्रत्ययान्तो न तु रन्जे., तथापि धातूनामनेकार्थत्वाद्रअ्नादपि राजा इति कवेरुफि:। अन्न पद्येऽनुगतार्थनामरूपशव्दसाम्येऽप्युपमादर्शनात्। तथा च 'सकलकलस्' इत्यादी श्लेषमेव प्रतिपा्यति-किन्त्विति । अलङ्गारान्तरेभ्यो विविक्त पृथम्भूतो यो विपयो देशः तस्याभावेन निरवकाशतया श्लेषस्य वल्वत्वेन अन्यालङ्गारवाधकत्वम्। सावका- शनिरवकाशयो: निरवकाशविधेरेव वलीयस्त्वादित्याशयः । एवञ्नोपमाप्रतिभासेऽप्युप- माप्रतिभोत्पत्तिहेतुः श्लेप एव, न तन्रोपमेति मङ्गकादिभिरङ्गीक्रियते। ततश्र यथा शब्द- साम्यमान्नमाश्रित्योपमाप्रतिभाने उपमावाधकत्वं श्लेपस्य तथा श्लेषभित्तिकाभेदाध्यव- सायलब्धसाधारणधर्मसम्पत्या श्लेषवाधकत्वसुपगाया अपीत्याशयः । एवं गुणसाम्यमा- श्वित्योपमाप्रतिभानेऽपि पूर्वोक्तबाधकत्वं वक्तुं शक्यमिति न तदनुरोधेन वाघकत्वानुरोधेन तन्नोपमायां गुणसाम्यस्य परित्याग इत्यर्थः । (चित्र०) यत्तु रुद्रटेन-'सकलकलम्' इत्यादावुपमां समर्थयमानेन- स्फुटमर्थालङ्कारावेतावुपमासमुच्चयौ किन्तु। आश्रित्य शब्दमात्रं सामान्यमिहापि सम्भव: ॥ (भारती) 'यत्तु' के द्वारा अपने अभिप्राय के साथ रुद्रट मत की योजना करते हुए ग्रथकार ने लिखा है कि 'सकलकलम्' इत्यादि में 'उपमा' का समर्थन करते हुए रुद्रट ने लिखा है-। ये उपमान और उपमेय समुच्चय अर्थालकार यद्यपि स्फुट हैं। किन्तु शब्दमात्र सामान्य का माशय ग्रहण करने के कारण यहाँ शब्द में अथवा श्लेष में मी उपमा समाव्य है। (सुधा) रुद्रटमतं स्वाभिप्रायेण योजयति-यत्वित्यादिना। 'सकलम्' इत्यादावुपमां समर्थ- यमानेन रुद्रटेन; एतावुपमासमुच्चयावर्थालङ्काराविति स्फुटम्, किन्तु शब्दमात्रं सामान्य- माश्रित्य इह शब्देऽपि वा श्लेषेऽपि सस्भवत इति शब्दसाम्यमात्रमिहोक्तम्। तत्कथनं परमार्थतः शब्दसाम्यमात्रमाश्रित्याप्युपमा समर्थनीयेत्यभिग्रायेण; अभेदाध्यवसायेनापि धर्मगुणसाम्यं न भवतीत्यभिप्रायेण न प्रतिपादितम् ्िष्टविशेषणेष्बभेदाध्यवसायेन

Page 95

उपमानिरूपणप्रकरणम् ५४

साधारणधर्मैक्यस्थालद्वारान्तरेषु सवैरालङ्कारिकः समाश्रयणात् सभ्यगङ्गीकारात। तस्मा चर्मत इत्यनेन न श्रेषो व्यावर्त्तयितुं=निषेधयितुं शवयत इति दिक। (चित्र०)

समर्थयितुं शक्येति भावेन, न त्वभेदाध्यवसायेनापि गुणसाम्यं न सम्भवतीति भावेन, शरिष्टविशेषणेष्वप्यभेदाध्यवसाये नैक्यर याल्क्कारान्तवेषु सवैर्रप रुमा्न यणात। तस्मात् 'धर्मतः' इत्यनेन नश्लेषो व्यावर्तयतु शक्यते। (भारती) पूर्वोक्त कारिका में शब्दसाम्य मात्र ही कहा गया है। यह कथन परमार्थत शब्दसाम्य मात्र का आश्रय ग्रहण करने पर भी उपमा समर्थक है, इस अभिप्राय से-अभेद के अध्यवसाय से भी धर्म और गुण का साम्य होना असभव समझ कर ही इसका प्रतिपादन नहीं किया गया है। श्लिष्ट विशेषणों में अमेदाध्यवसाय के द्वारा एक का साधारण धर्म अन्य अलकारों में भी सभी आलकारिकों के द्वारा अगीकृत है। फलतः 'धर्मत' इस विशेषण से यहाँ इलेष का निपेध नहीं किया जा सकता। विमश-रुद्रट अलकार सम्प्रदाय के एक मान्य अनुयायी हैं। इन्होंने ही सर्वप्रथम अल्कारों का वैज्ञानिक विश्लेषण किया है। इनकी दृष्टि में अलकारों के-वास्तव, औपम्य, अतिशय और श्लेष ये चार मूलतत्त्व हैं। अलकारसम्बन्धी इनका विचार भामह, दण्डी, आनन्द और अभिनवगुम के बीच की शृखला में है। काव्य के सिद्धान्त में जिन मौलिक तथ्यों का उन्मीलन- आनन्दवर्दन ने अपने ध्वन्यालोक में किया है, उनमें से अनेक तथ्यों का सकेत रुद्रट ने अपने अलकार ग्रन्थों में किया है। ये आनन्दवर्दन से कुछ ही प्राचीन थे। रस और अल्कार के परस्पर सम्बन्ध को इन्होंने खूब मार्मिक दृष्टि से देखा है। अत. रुद्रट के अनुसार उपमेय और उपमान में समान साधारणधर्म के कारण समता का दिखाई पडना ही उपमाल्कार है। इनके विचार में उपमा का मूल शब्द-साम्य ही है। इन्होंने प्रथम औपम्य का लक्षण प्रस्तुत कर पुन. उसके भेदों का निरुपण किया है। औपम्य की परिभाषा में इन्होंने स्पष्ट रूप से यह प्रतिपादित किया है कि इसमें वक्ता की प्रवृत्ति की ही छाया प्रतीत होती है। अपनी रुचि के अनुकूल प्रयोक्ता अप्रस्तुत का ग्रहण करता है तथा प्रस्तुत एवं अप्रस्तुत में अपनी इच्छा के अनुकूल गुणविशेष पर विचार करता है। उपमा के लक्षण में इन्होंने गुणादिसिद्ध समान को महत्त्व प्रदान किया है। समग्ररूप से विचार करने पर यह पता चलता है कि इन्होंने उपमा अलकार के स्वरूप को एक नवीन तथ्य जोडकर विशिष्टता प्रदान की है। क्योंकि इनकी दृष्टि में उपमा के लक्षण में गुणादि से अभिप्राय गुणसस्थानादि का है। रुद्रट के इस मत की समीक्षा हमें इस परिणाम पर पहुँचाती है कि उपमा में सवसे व्यापक तत्त्व शब्दसाम्य मात्र ही है। इसका अपकर्ष होने पर ही वे धर्म उपादेय गुण के रूप में परिवत्तित हो जाते हैं। उपमानोपमेयभाव पर अवस्थित धर्म गुण पर ही अवलवित है। धर्म के विवेचन में गुण की व्यापक समीक्षा ग्रन्थकार की महती देन है। (चिन्र०) वस्तुतस्तु 'सकलकलम्' इत्यादावुपमैवेति व्यर्थम् 'धर्मतः' इति विशेष- णम्। अलङ्कारान्तरविविक्तस्तु श्लेषस्थ विषयस्तत्प्रकरणे दर्शयिष्यते।

Page 96

५६ चित्रमीमांसा

विषयसद्भावमात्रेण निरवकाशत्वहानेर्विविक्त-विषयानपेक्षणात्। न ह्ययमलङ्गा- रगोचरो लोकन्यायो यद्विविक्तविषयो वक्तव्य इति, अरन्ध्ररत्नानां सुवर्णविवि- क्विषयाभावेऽपि सुवर्णाश्रितानामेव चारुताहेतुत्वेनालंकारान्तरत्वव्यवस्थितेः। अन्यथा निरवकाशैररन्ध्रप्रत्युप्तरत्नः सावकाशस्य तदाश्रयसुवर्णस्यालंकारता बाध्येत। नाप्ययं वाक्यवित्संमतः शास्त्रीयन्यायः पदे, जुहोतीत्यादीनामाह- वनीयशास्त्रादिविविक्तविषयाभावेऽपि सविषयत्वमात्रेण प्रतिष्ठितत्वात्। नाप्यसा-

तद्बाधेनालंकारान्तरत्वव्यवहारादविरोध इहाप्यविशिष्टः । तस्मादन्नोपमाप्रति- भोत्पत्तिहेतुः श्लेषालंकार इत्ययुक्तम्। प्रत्युतोपमवान्न श्लेषप्रतिभोत्पत्तिहेतुः। न हि पुरवर्णनप्रकरणे सकलकलमिति तद्विशेषणपदस्य सुधांशुबिम्बमिवेत्युप- माया अनिबन्धने कलासाकल्यलक्षणार्थान्तरप्रतिभा सम्भवति। प्रतीपव्या- वृत्त्यर्थम् 'अन्येन वर्ण्यस्य साम्यम्' इत्युक्तमयुक्तम्, तन्र अन्येनेत्यस्य भिन्नविशेषणेन पौनरुक्त्यात्। किं च, वर्ण्यात् प्रकृतादन्येनाप्रकृतेनेति यद्यर्थस्तदा- (भारती)

वस्तुतः के द्वारा सिद्धान्त स्थापित करते हुए ग्रन्थकार लिखते हैं कि 'सकलकलन्' इत्यादि में जब उपमा अलकार ही है तो फिर पूर्वोक्त लक्षण में उपमा रोकने के लिए 'धर्मत.' यह विशेषण व्यर्थ ही है। अन्य अलकारों में विवेचित श्लेष का विषय उसके प्रकरण-'सर्वदो माधवः पायाव् संयोगङ्गामधीरव्' (चन्द्रा० श्लो० ६२)-में दिखायेंगे। किन्तु; विविक्त विषय के अभाव से 'श्लेष' की अन्य अलकारों में बाधकता का कथन भी अयुक्तिकर है। क्योंकि उसकी उपस्थितिमात्र से भी निरवकाशत्व की हानि से उस प्रकार के विषय की यहाँ अनपेक्षा है। 'विविक्तविषयो वक्तव्यः' इस लोकप्रसिद्ध न्याय के द्वारा भी अलकार का गोचरत्व नहीं कह सकते। क्योंकि यहाँ छिद्ररहित रलों के सुवर्ण के विविक्त विषय के अमाव में भी सुवर्ण के आश्रित रलों की सुन्दरता ही अलकारान्तर के निश्चय कारण हैं। अन्यथा लोकप्रसिद्ध 'विविक्तविषयो वक्तव्य.' इस न्याय के मानने पर भी अवकाशरहित अछिद्र प्रत्युप्त रतों से अवकाशयुत सुवर्ण की अलकारता वाधित है। मीमासकों के मत से शास्त्रप्रसिद्ध होने पर भी यह न्याय नहीं होता। 'पदे जुहोति' इत्यादि वाक्यों के हवननिमित्तक असाधारणत्व होने पर भी उत्तरार्द्ध में 'जुहोति' इत्यादि के आह्वनीय शास्त्र से मिन्न विषय के अमाव में भी 'सविषयत्व' मात्र से ही उसकी प्रतिष्ठा हो जाती है। यहाँ अलक्कारशास्त्र में भी 'सहोक्ति' आदि अलकारों के भी विनोक्त्यादि से विविक्त विषय के अभाव में भी उसके अवाघ के द्वारा अलद्कारान्तर व्यवहार से विरोधाभास में कोई विशेषता नहीं है। फलत. यहाँ प्रकृति में उपमाप्रतिभा सेउत्पत्तिहेतुक श्लेषालकार का कथन युक्तिसगत नहीं है। प्रत्युद 'सकलकलम्' इत्यादि में श्लेष की प्रतिभा में उपमा ही, कारण है। व्यतिरेका- लकार में दोष दिखाते हुए कहते हैं-पुरवर्णन के प्रकरण में 'सकलकलम्' यह पुरविशेषण

Page 97

उपमानिरूपणप्रकरणम्

के पद का 'सुधांशुविम्वम्' की तरह उपमा के कथनाभाव में कलासाकल्य ही लक्षण है जिसका ऐेसे अर्थान्तर की प्रतिभा की समावना ही नहीं है। इसलिए शब्दसाम्य में भी वहाँ उपमा के रहने पर ही 'धर्म' पद का उपादान लक्षण में निरर्थकता ही है। उपमा में प्रतीप निराकरण के लिए 'अन्येन वर्ण्यस्थ साम्यम्' पद का जो उक्त लक्षण में समावेश किया गया है, वह भी युक्तिसगत नहीं है। क्योंकि भिन्नेन पद से ही 'अन्येन' पद की गतार्थता सिद्ध है फिर लक्षण में 'अन्येन' पद का समावेश पुनरक्ति ही तो है। किंतु वर्ण्यप्रकृति से 'अन्येन' पद के द्वारा यदि 'अप्रकृतेन' अर्थ ग्रहण किया जाय तो समुच्चित उपमा में अव्याप्तिंदोष हो जाता है। जैसे-

(सुधा)

सिद्धान्तयति-वस्तुतस्त्विति । 'सकलकलम्' इत्यादावुपमैव, तद्वारकं धर्मत इति विशेषणं निरर्थकमेव। अलद्कारान्तरविविक्तश्लेषदेशस्तु श्रेषप्रकरणे 'सर्वदो माधवः पायात् स यो गङ्गामदीघरत्' इत्यादिरूपो दर्शयिष्यते। किञ्ज विविक्तविषयाभावेनालङ्कारान्तर- चाधकता श्रेषस्येति वाचोयुक्तिरप्ययुक्ता। तस्य सव्भावमान्रेणापि निरवकाशत्वस्य हानि- सत्वेन तादृशदेशस्यानपेत्षणात् । 'विविक्तविषयो वक्तव्यः' इति लोकप्रसिद्धन्यायस्या- लक्कारगोचरत्वं न वक्तुं शक्यते। तन्र हेतुमाह-अरन्धरत्नानां सुवणतो विविक्तदेशा- भावेऽरपि सुवर्णमाश्रितानां रत्नानां चासुताहेतुता, अलङ्कारान्तरत्वस्य निश्चयात्। अन्यथा= न्यायसत्वे, अवकाशर हितैररन्ध्रप्रत्युप्तरत्नैः सावकाशसुवर्णस्यालद्भारता वाध्येत। वाक्य- चिदां सम्मतोऽयं शास्त्रीयोऽपि = शास्त्रप्रसिद्धोऽपि न्यायो न भवति, 'पदे जुहोति' इत्या- दिवाक्यानां हवनेन निमित्तेनासाधारणत्वेऽप्युत्तरार्धे जुहोतीत्यादीनामाहवनीयशास्त्रादितः पृथग देशाभावेऽपि सविषयत्वमात्रेण प्रतिष्ठानात। इहाप्यलङ्कारशास्त्रेऽपि सहोक्त्याद्य- लङ्काराणामपि विनोक्त्यादितो विविक्कदेशाभावेऽपि तद्वाधेन = विनोक्त्यादेरवाधेन, अलङ्कारान्तरत्वव्यवहाराव् विरोधाभावे विशेषो नास्ति। तस्मादन्न प्रकृते उपमाग्रतिभाया उत्पत्तेर्हैतुः श्रेषालद्वार इति कथनमयुक्तम्। प्रत्युत उपमेव 'सकलकलम्' इत्यादौ श्रेषस्य प्रतिभायां कारणम्। व्यतिरेके दूषणमाह-पुरवर्णनप्रकरणे 'सकलकलम्' इति पुर- विशेषणस्य पदस्य 'सुधांशुबिम्बम्' इवेत्युपमायाः कथनाभावे कलासाकल्यं लक्षणं थस्या एताद्श्यर्थान्तरप्रतिभा न सम्भवत्येवेत्यलम्। तस्माच्छव्दसाम्येऽपि तत्र उपमाया एव सत्वेन धर्मपदस्योपादानं व्यर्थमेवेत्याशयो ग्रन्थकर्तुरभिप्रेयते। परे तु धर्मपदस्य 'प्रसिद्धगुणादिसाम्य, एवोपमा, न त्वन्यन्नापि, 'चन्द्रवत् कलक्कि मुखम्' इतिकथनार्थ धर्मपदस्यावश्यकत्वात्। सम्मतपदेन च उपमानस्येवासम्मतस्य व्यावर्त्तनाव्=निषेधादित्यर्थः। शब्दाधिक्येनार्थाधिक्यस्थ कथने प्रामाण्यसत्वात्। 'तुप्यतु दुर्जनः' इति न्यायेन शब्देतरगुणादिसाम्यपरताया धर्मपदस्य विवतितुं शक्यत्वाच्चेति तत्पदमावश्यकमिति वदन्ति। 'अन्येन वर्ण्यस्य साम्यम्' इति पदं खण्डयितुं दूपण- सारचयति-प्रतीपव्यावृत्यर्थमिति। प्रतीपस्य 'त्वल्लोचनसमं पद्मम्' इत्यादिरूपस्य निषेधार्थम् 'अन्येन वर्ण्यस्थ साम्यम्' इति विशेषणमुक्तम्। तन्नान्येनेति पदमयोग्य- मित्यर्थ। तन्न हेतुमाह-अन्येनेत्यस्य भिन्नेनेत्यर्थकतया पूर्वेण पौनरुक्त्यापते.। अर्थान्तरं दूषयति-किव्जेति। वर्ण्यात्पकृतादन्येनाप्रकृतेनेति यद्यर्थ., तदा समुच्चितो- पयायामव्याप्तिः।

Page 98

चिन्रमीमासा

(चित्र०) - इतराण्यपि रक्षांसि पेतुर्वानरकोटिषु। रजांसि समरोत्थानि तच्छोणितनदीप्चिव।। इति समुच्ितोपमायासव्याप्ति: तत्र समराङत्वेन रजसां शोणितेषु पतन- स्यापि वर्ण्यत्वात्। यदि तु स्वयं वर्ण्येनावर्ण्येन वा कुतश्चिद्वर्ण्यादन्येनेत्यर्थः।

व्याप्तिः, यथा- अहमेव गुरुः सुदारुणानामिति हालाहल तात मा स्म हप्यः । ननु सन्ति भवाद्शानि भूयो भुवनेऽस्मिन्वचनानि दुर्जनानाम्॥ अत्र हि वर्ण्यानां दुर्जनवचसां हालाहलेनातिप्रकृष्टदोषत्वादुपमानभावम- प्यसहमानेन साम्यनिबन्धनं प्रतीपम्। (भारती) और भी बहुत से राक्षस, उनके रक्त की नदियों पर समर में उडी हुई धूलि के समान बानरों की सेना पर गिरे अर्थात गिर कर मरे। यहाँ समुच्चित उपमा के उदाहरण में-शोणितों में धूलिकणों के पतन का भी रणाङ्गत्वेन वर्ण्य होने के कारण प्रकृतत्वेन लक्षण समन्वय का अभाव है, प्रकारान्तर से तदर्य की आशका कर निराकरण करते हैं-स्वय स्वरूप से वर्ण्य के द्वारा या अवर्ण्य के द्वारा कही वर्ण्य से कहीं, अन्य से यदि तदर्थ का वोध हो तव अति उत्कृष्ट गुणत्व से उपमानभाव भी असह्मान के उपमा- नता कल्पनात्मक प्रतीप अलकार में अतिव्याप्ति दोष होगा। जैसे- अरे हालाहल (विष)। तेरा यह कैसा अभिमान कि ससार की दारुण वस्तुओं में तू ही महा-, दारुण है ! अरे इस ससार में तो तुझ सरीखे खलवचनों की कोई कमी ही नहीं है। इस उदाहरण में, प्रकृत दुष्टवचनों का अतिप्रकष्ट दोष से उपमानभाव असहमान के द्वारा विष से साम्य का कथन होने के कारण प्रतीप है। फलत. उपमालक्षण मेंअन्येन' पद का समावेश निरर्यक ही है। (सुधा) तत्र समुच्चितोपमोदाहरणे शोणितेषु रजसां पतनस्यापि रणाङ्गत्वेन वण्यतया. प्रकृतत्वेन लक्षणसमन्वयाभावादित्यर्थः। उदाहरणमाह-इतराणीति। इतराणि रतास्यपि धानरकोटिषु; समरोत्थानि रजांसि तेषां रक्षसां शोणितनदीषु रक्तप्रवाहेष्विव पेतु. निपत्य मृतानीत्यर्थः। प्रकारान्तरेण तदर्थमाशङ्क्य निराकरोति-यदि त्विति। स्वयं स्वरूपतो वर्ण्येनावर्ण्येन वा कुतश्चिद्वर््यादन्येनेत्यर्थः। तदा, अत्युत्कृष्टगुणत्वम -- सहने हेतु, तस्यवोपमानताकल्पनात्मके प्रतीपेऽतिव्याप्ति । तमुदाहरति-यथेति। अहमेव सुदारुणानाम् अतितीव्राणं गुरु: श्रेष्ठः। तातेति सानुकम्पसम्बोधनम्, हाला- हलेत्यपि सम्बोधनम्। मास्मदृप्य. दर्प मा कृथाः । अस्मिन् सुवने दुर्जनानां वचासि त्वत्सदृशानि, भूयो वा जल्पेन। 'ननु' एवार्थे, सन्त्येवेत्यर्थः । अन्रोदाहरणे वर्ण्यानां

Page 99

उपमानिरूपणप्रकरणम् ५६

प्कृतानां दुष्टवचसामतिप्रकृष्टदोषवत्तयोपमानभावमसहमानेन कालकूटेन साम्यस्य निबन्धनात् कथनादित्यर्थः। तस्मात् 'अन्येन' इतिपदकथनमयुक्तमेव। (चित्र०) अन्र वर्ण्यरयेत्यप्ययुक्तम; 'त्वत्कीर्तेः पुरतो भाति ज्योत्स्ा ध्वान्तमलीससा'- इत्यप्रस्सुतप्रशसासंकीर्णोपमायामव्याप्ेः। तत्र कीर्तेरेव वर्ण्यत्वेन ज्योत्स्ा- या अवर्ण्यत्वात्। अपि च, 'अन्येन वर्ण्यस्य साम्य वाच्यम्' इति कोऽर्थः ? किमन्यप्रतियोगिकत्वेन वर्ण्यगतं साम्यं वाच्यमिति ? किं वा यथाकथन्िद्वर्ण्या- वर्ण्योभयनिरूपितं साम्यं वाच्यम् ? अथवा वर्ण्यानुयोगिकत्वेन साम्यं वाच्यम् इति ? आदे, 'सरसिजमिद्मानन च तस्याः सममिति चेतसि संमदं विधत्ते' इत्युभयविश्रान्तसादश्योपमायामव्याप्तिः। द्वितीये, प्रसिद्धप्रतीपेऽव्य- तिव्याप्तिस्तद्वस्था। एवं तृतीये 'वर्ण्यस्य साम्यम्' इत्येतावता विवक्षितार्थ- लाभात् 'अन्येन' इत्यस्य वैयर्थ्यम्। उपमेयोपमाव्यावृत्त्यर्थम् 'एकदा' इति विशेषणमव्ययुक्तम्। तेन 'खमिव

सेऽपि, जल जलमिव खम्' इत्यादौ पर्यायेण प्रवृत्तायामुपमेयोपमायासतिव्याप्तिनिरा-

तद्वल्गुना युगपदुन्मिषितेन तावत्सद्यः परस्परतुलामधिरोहतां द्वे। प्रस्पन्दमानपरुषेतरतारमन्तश्चक्षुस्तव प्रचलितभ्रमरं च पद्मम्॥ इति युगपत्प्रवृत्तायां तस्यामतिव्याप्त्यनिरासात्। (भारती) अत्र अर्थात् उक्त उपमा के लक्षण में 'वर्ण्यस्य' यह पद भी अयोग्य ही है। क्योंकि 'त्वत्कीर्चेः पुरतो भाति ज्योत्स्नाध्वान्तमलीससा' अर्थात् तुम्हारी कीर्ति के आगे चन्द्रमा की ज्योति भी मलिन है। इस अप्रस्तुतप्रशसा से सकीर्ण उपमा में अन्याप्तिदोष हो जाता है। क्योंकि यहॉ कीतति ही प्रकृत है तथा ज्योत्स्ना से अप्रकृतत्व प्रसग उपस्थित है। इस प्रकार प्रत्येक का दोष दिखाकर अर्थान्तर से निराकरण करते हैं। 'अपिचेत्यादि' 'अन्येन वर्ण्यस्य साम्यं वाच्यम्' इसका क्या होगा? अर्थात् 'अन्य पद से वर्ण्य का साम्य कहना चाहिए', यहाँ 'अन्येन' इस तृतीया का प्रतियोगित्व अर्थ का लाभ होता है। क्या अन्य प्रतियोगिक वर्ण्यनिष्ठ साम्य कहना चाहिए? अर्थात् यहाँ तृतीया का निरूपित रूप दोनों अर्थ का लाभ होता है। अथवा यथाकथचित वर्ण्य और अवर्ण्य दोनों के द्वारा निरूपित साम्य कहना चाहिए, किवा वर्ण्य का अनुयोगिकत्व से साम्य कहना चाहिए। यही तीन पक्ष है। अव प्रथम पक्ष में दोष बताते हैं-'सरसिज' अर्थात् उस सुन्दरी का मुख एव कमल दोनों समान रूप से हृदय में आनन्द उत्पन्न करते हैं। यहाँ मुख एव कमल दोनों में विश्रान्त सादृश्य उपमा में साम्य होने के कारण दूसरी जगह प्रतियोगित्व के अभाव से दोनों में अनुयोगित्व होने के कारण अन्याप्ति दोष होगा ही। दूसरे पक्ष में भी, 'तवल्लोचनसमं पझं त्वह्गमत्र सदशो विधुः' अर्थात तुम्हारी आँख के

Page 100

६० चित्रमीमांसा

समान कमल एवं तुम्हारे मुख के समान चन्द्र है।' इस प्रसिद्ध प्रतीप में भी यथाकथचित् प्रकृत अनुयोगिकत्व से अथवा प्रकृत प्रतियोगिकत्व से साम्य का वाच्य होने के कारण अव्याप्तिदोष दुर्निवार होगा ही। तृतीय पक्ष में-वर्ण्य का अनुयोगिकत्व से सान्य कहना चाहिए। इस पक्ष में 'अन्येन' यह पद विलकुल ही निरर्थक हो जाता है। 'वर्ण्य का साम्य कहना चाहिए' इतना भर ही कहने से विवक्षित अर्थ का 'वर्ण्यानुयोगिकत्वेन' अर्थ का लाभ होता ही है। लक्षण में 'साम्यमन्येन वर्ण्यस्य वाच्यम्' पद का समावेश विलकुल निरर्धक है। 'चन्द्रइव सुखम्, सुखमिव चन्द्रम्' अर्थात् चन्द्रमा के समान मुख एव मुख के समान चन्द्रमा है। इस वाक्य में औपम्य का निर्वाह् चन्द्र और मुख तक ही सीमित है। अन्य पदार्थों का सादृध्य सम्बन्धी क्षेत्र उनके क्षेत्र से अलग हो जाता है। यहॉ उपमेय की उपमा उपमान से है और उपमान की उपमा उपमेय से है। औपम्य निर्वाह के लिए किसी तृतीय पदार्थ के अभाव में इस उपमेयोपमा में उपमा निषेध के लिए लक्षण में 'एकदा' विशेषण का समावेश भी निरर्थक ही है। क्योंकि उपमेयत्वाभिमत जो मुख है एव उसका प्रतियोगिक सादृध्य वर्णन 'मुख के समान चन्द्रमा है'; इस कथन में तत्समान कालीन ही 'चन्द्रमा के समान मुख है'; ऐसा कहने से किसी मी तरह अतिव्याप्ति दोप नहीं होता, फिर 'एकदा' विशेषण तो निरर्थक ही है। इसीलिए तादृशार्थक उसका विशेषण कहने से-'आकाश की तरह जल, जल की तरह आकाश, इस चन्द्रमा की तरह और इस की तरह चन्द्रमा, कुमुद के सदश तारे और तारे के सदृश कुमुद'-ऐसे स्थल में पर्याप्त व्यावृत्त उपमेयोपमा में अतिव्याप्ति निवारण करने पर भी उपमेयत्वाभिमुख जो आकाश उसके प्रतियोगिक समानधर्मी सादृश्य वर्णनकाल में ही 'जल की तरह आकाश' कथन से यद्यपि व्यभिचार निवारण हो जाता है फिर भी पर्यायव्यावृत्त 'तद्ल्गुना' इस स्थलगत उपमेयोपमा में अतिव्याप्ति का निराकरण असभव ही है। इस कारण सुन्दर, जो साथ ही साथ एक ही क्षण में आँखों का खुलना और कमल का खिलना ये दोनों व्यापार हैं, उनसे शीघ्र उसी क्षण में दोनों ही परस्पर एक दूसरी की वरावरी को प्राप्त करें, एक तो भीतर कुछ-कुछ चलती हुई चिकनी काली पुतलियों वाली तुम्हारी आँखें और दूसरे भीतर कुछ-कुछ चलते हुए भौरों से युक्त कमल अर्थात् साथ ही साथ खुलने और खिलने से आँखों की और कमलों की पूर्णरूप से समानता दी जायेगी, अर्थात् आप आँखें खोलें, कमल खिल रहा है। यहाँ युगपत् अर्थात् पर्यायप्रवृत्त उपमेयोपमा में सम्पूर्ण सादृश्य का लाम है। यहाँ 'एकदा' साम्यप्रतिपादन से अतिव्याप्ति का निराकरण असभव ही है। (सुधा) वर्ण्येनेतिपदं दूषयति-अन्रेति । अन्र लक्षणे वर्ण्यस्येति पदमप्ययोग्यमित्यर्थः । ज्योत्सा त्वत्कीर्त्तेरग्रतो ध्वान्तमलीमसा=मलिना, भाति=शोभते इृत्यप्रस्तुतपशंसया सङ्कीर्णायासुपमायामव्याप्ेः, तत्र कीत्तेरेव प्रकृतत्वेन ज्योत्साया अप्रकृतत्वात्। अ्रत्येकं दूपयित्वा अर्थान्तरमाश्रित्य निरावरोति-अपि चेत्यादि । 'अन्येन वर्ण्यस्य साम्यं वाच्यम्' इतीत्यस्थेत्यर्थः। अन्येनेत्यस्य तृतीयायाः प्रतियोगित्वमर्थः। किमन्यप्रतियोगिकं चण्यनिष्ठं साम्यं वाच्यम्, तृतीयाया निरूपितत्वमुभयन्नार्थः। 'वर्ण्यावर्ण्योभयनिरूपितं

Page 101

उपमानिरूपण प्रकर णम् ६१

साम्यम्' वा 'वर्ण्यानुयोगिकत्वेन साम्यं वाच्यम्' वेति पक्षत्रयम्। प्रथमपक्षे दूषणमाह-सरसिजमिति । तस्या मुखम्, इदं सरसिजब्, 'हलदन्तात् सपम्याः संज्ञायाम्' इत्यलुक्। समं तुल्यं चेतसि, एवं सम्मदं प्रमोदं विधत्ते धारयतीत्यत्रोभय- विश्रान्तसादश्योपमायाम् ; साभ्येऽन्यन्र प्रतियोगित्वाभावेनोभयोरेव तत्रानुयोगित्वाद- व्याप्तेः। द्वितीयपक्षं दूषयति-द्वितीये=वर्ण्यावर्ण्योभयनिरूपितं साम्यमिति पक्ते, प्रसिद्ध- अतीपेपि 'त्वल्लोचनसमं पद्मं त्वद्वक्त्रसदशो विधुः' इत्यत्र यथाकरथंचिदप्रकृतानुयोगि- कत्वेन प्रकृतप्रतियोगिकत्वेन साम्यस्य वाच्यतयाऽच्याप्ते: । तृतीये=वर्ण्यानुयोगिकत्वेन साम्यं वाच्यमिति पक्षे, अन्येनेति पदस्य व्यर्थत्वापत्तेः । 'वर्ण्यस्य साम्यं वाच्यम्', इत्येतावता कथनेन विव्ितार्थस्य वर्ण्यानुयोगिकत्वेनेत्यादेर्लाभात् लाभसत्वादिति ग्रन्थकर्तुराशय इत्यलम् । वस्तुतस्तु सादृश्यप्रयोजकतत्प्रतियोगित्वानुयोगित्वतद्वच्छेद- - दर्पाभावप्रकारकधीविशेष्यतयापि हालाहलत्वस्थ विवक्षितत्वात्। विवन्ोपादानात्तदन्य- धर्माणां द्रव्यत्वादिघर्माणां तत्र सत्वेऽपि नासङ्गतिरित्यर्थः । नापि समुन्नितोपमाया मव्याप्ति; रजसां वर्ण्यत्वेऽपि तादशान्यत्वस्य तत्रापायाभावात्। अन्येन वर्ण्यस्येत्य-

तु मुखप्रतियोगिकपझ्मानुयोगिकस्य पद्मप्रतियोगिकमुखानुयोगिकस्य च साम्यस्य प्रतीतिः। तन्न निरुक्तान्यत्वं पम्मेऽस्त्येव। तत्प्रतियोगिकसादृश्याधिकरणञ्च मुखमिति लक्षणसम- न्वयान्नाव्याप्तिः। प्रतीपे तु तादृशान्यत्वाभावान्नातिव्यासिः। अन्यादिपदेनैव तादशार्थ- लाभान्न तस्य वैयर्थ्यमिति प्राचामाशयः। एकदेति पदं खण्डयितुमुपन्यस्यति-उपमेयोपमाव्यावृ्त्यर्थमिति। उपमेयोपसायाः 'चन्द्र इव सुखं मुखमिव चन्द्रः' इतिरूपाया व्यावृत्यर्थ निषेधार्थमेकदेति विशेषणम्। उपमेथत्वाभिमत प्रतियोगिकसादृश्यवर्णनकालानवच्छिन्नमित्यर्थकम्, तेनोपमेयत्वाभिमतं यन्मुखम्, तत्प्रतियोगिकसादृश्यवर्णनम्, 'मुखमिव चन्द्रः' इति तत्समानकालीनमेव चन्द्र इच मुखम्, इति नातिव्यापिः। एतदर्थमुपात्तमपि अयुक्तमेव। तेन तादृशार्थकतहि शेषणकथनेन 'खमिव जलं जलमिव खम्, हंसश्चन्द्र इव हंस इव चन्द्रः । कुमुदाकारा- स्तारा ताराकाराणि कुमुदानि' इत्यत्र पर्यायप्रवृत्तायासुपमेयोपमायामतिव्यासिनिवारणे- जप्युपमेयत्वाभिमतं यत्खं, तत्पतियोगिकसादृश्य वर्णनकालावच्छिन्नत्वमेव 'जलमिव खम्' इत्यस्यास्तीति रीत्या निवारिते व्यभिचारे सत्यपि पर्यायप्रवृत्तायां तहल्युनेत्याद्युपमेयोप- मायामतिव्याप्तिनिरासासम्भवात्। उदाहरणव्याख्या तु तत् तस्माल्लक््मीपरिग्रहकरणात वल्गुना मनोज्ञेन 'वल्गु स्थाने मनोजे च' इति विश्वः। युगपत्तावदुन्मिषितेन युगपदेवो- न्मीलितेन सदो द्वे अपि परस्परतुलामन्योन्यसादश्यमधिरोहता प्राप्नुताम्। प्रार्थनायां लोटू। के द्वे, अन्तः प्रस्पन्दमाना चलन्ती परुषेतरा सििग्धा तारा कनीनिका यस्य, तथोक्तम् 'तारकाचण: कनीनिका' इत्यमरः। तव चन्ु अन्तः प्रचलियभ्रमरं चलदमृद्धं पद्मञ्ञ। युगपदुन्मेपे सति सम्पूर्णसादृश्यलाभ इति। अन्ैददा साभ्यप्रतिपादनाद् इति व्याप्ते: सत्वात्। (चित्र०) अपि चैवम् ,

Page 102

६२ चित्रमीमांसा

ज्योत्स्नेव नयनानन्दः सुरेव मदकारणम्। प्रसुतेव समाकृष्टसर्वलोका नितम्बिनी॥ इति भिन्नसाधारणधर्मायां सालोपमायामव्यापि तन्नानेकदा साम्यप्रति- पादनात्। न च बहूपमासेलनसेव मालोपमा नैका, तासु च प्रत्येकं लक्षणम- स्त्येवेति वाच्यम, तथा सत्युपमेयोपमाप्युपमापतीपमेलनमेवेति तद्वचा- वृत्त्यर्थ विशेषणान्तरकरणायोगात्। संसृष्टिसंकरात् पृथग्ग्रन्थकृतां लेखनमुभ- यत्रापि तुल्यम्। एवसुपसेयोपसाप्रकरण उदाहरिष्यमाणायाम् 'रजोभि: स्यन्द- नोद्धूतैः' इति परस्परोपमायामव्यापिः। (भारती) अन्य दोष दिखाते हुए निम्नलिखित उदाहरण में दीक्षित जी ने चताया है, इस नितन्ब्रिनी नारी ने, जो चन्द्रिका की तरह आनन्ददायिनी है तथा सुरा की तरह मद का कारण है, प्रभुता की तरह सारी दुनिया को वशीभूत कर लिया है।' यहाँ भिन्ना. अर्थात पृथग्भृत साधारणधर्म नयनानन्दादि हैं, जिसमें ऐसी मालोपमा में-जिसमें एक ही उपमेय का अनेक उपादान है- अव्याप्ति हो जायेगी। विमर्श-मालोपमा का अर्थ है उपमा की माला। जहाँ एक ही उपमेय को अनेक उपमानो के द्वारा समता दिखाई जाती है, उसे ही मालोपमा कहते हैं। इसमें उपमेय के प्रति अत्यधिक तीव्रता की अनुभृति परिलक्षित होती है। जव वक्का की वृत्ति एक उपमान से सतृप्त नही होती तव वह एक ही उपमेय की समता के लिए अनेक उपमानों की कल्पना करता है। इसमें अनेक उपमानों की कल्पना का आधार धर्मों की अनेकता, एकता या लोप है। भिन्न साधारणधर्मी मालोपमा में अव्याप्तिदोप होगा। अगर आप यह कहें कि अनेक उपमाओं का सम्मिश्रण ही मालोपमा है, न कि उसका पृथकीकरण। क्योंकि सवों में प्रत्येक का अलग-अलग लक्षण समन्वय है। अत यहाँ अव्याप्तिदोप नहीं कहा जा सकता। ऐसी स्थिति में समाधान करते हुए कहते हैं-ऐसी स्थिति में उपमेयोपमा का भी जो उपमा और प्रतीप के सम्मिश्रण से स्वरूप निर्माण हुआ है उसके निषेधार्य जो उक्त लक्षण में 'एकदा' विशेषण का समावेश किया गया है-वहाँ भी व्यर्थत्वापत्ति होगी। ससृष्टि-सकर के जो प्रकरण है, उससे पृथक् भिन्नता से ग्रयकार का 'उभयन्रापि' लिखना मालोपमा में तथा उपमेयोपमा में समान ही है। इस प्रकार उपमेयोपमा प्रकरण में उदाहरिष्यमाण 'रजोभि. स्यन्दनोद्घूतैः' इत्यादि रूप परस्परोपमा में अव्याप्तिदोष दुर्निवार ही है।

(सुधा) दूपणान्तरमाह-अपि चैवमिति। नितम्विनी नारी, चन्द्रिकेवानन्दभूता, सुरेव मदकारणम्, प्रभुता इच समाकृष्टो वशीकृत: सर्वलोको ययेत्यर्थः । भिन्नाः पृथग्भूताः साधारणधर्सा नयनानन्दृत्वादयो यस्यां मालोपमायामेकस्यवोपमेयस्य बहुपमानोपादा- नमितिस्वरूपायामव्याप्तिः। तन्र मालोपमाया अनेकदा साम्यप्रतिपादनात्। आशङ्कते- नचेति। मालोपमा बहुपमामेलनसेवास्तु, न तु पृथगेका, सर्वासु प्रत्येकं लक्षणसत्वा- न्नाव्याप्तिः? समाधते, उपमेयोपमाया अपि उपमाप्रतीपमेलनरूपत्वेन व्यावृत्तये एकदेति

Page 103

उपमानिरूपणप्रकरणम् ६३

पदस्य व्यर्थत्वापत्तेः। संसृष्टिसङ्करयोर्यठ्ाकरणम्, तस्मात्पृथक भिन्नतया ग्रन्थकर्तणां लेखनमुभयन्नापि मालोपमायामुपमेयोपमायाञ्ज तुल्यं समानमेवेत्यर्थः। एवसुपमेयोपमा- प्रकरणे उदाहरिष्यमाणपरस्परोपमायां रजोभिरित्यादिरूपायां चान्याप्तिरिति दिक। इदं प्रकृताभिप्रायेण। वस्तुतस्तद्वल्गुनेत्यादेः सरसिजमित्यादिरूपोभयविश्रान्तसादृश्योपमया -- समानशीलत्वेन, आद्ये उपमा, द्वितीये उपमेयोपमेति कल्पने प्रामाणाभावात् उभयवि- श्रान्तसाधश्योपमावत्पर्यायप्रवृत्तोपमेयोपमाया अपि लच्यत्वात्। किन्च उपमेयत्वाभि-

मानत्वेनाव्याप्तेरसम्भवाच। परस्परोपमायामपि नाव्यापिः, उपमाद्वयस्यव तन्र प्रतीतौ प्रत्येकं लक्षणसर्वेन तद्भावादिति तु प्राचामाशयः। (चित्र०)

न पद्मं मुखमेवेदं न भृङ्गौ चक्षुषी इमे। इति विस्पष्टसादृश्यात् तत्त्वाख्यानोपमैव सा। इत्युक्तरूपायां तत्त्वाख्यानोपमायां साम्यस्यावाच्यत्वेनाव्याप्त्यापत्तेः। त्वदाननमधीराक्षमाविर्दशनदीघिति 1 भ्रमदुभृङ्गमिवालदयकेसरं भाति पङ्कजम्॥

श्यामा' इत्यादिवाचकलुप्तोपमायाम् 'चन्द्रसुहृन्मुखम्' इत्यादिसाम्यलक्षकपदव- दुपमायां चाव्याप्त्यापत्तेश्च। (भारती) व्यग्योपमानिराकरणार्थ लक्षण में जो वाच्य पद का समावेश किया गया है, वह भी युक्ति- सगत नहीं है। यह कमल नही है, बल्कि मुख ही है, ये दोनों भृद्ग नहीं हैं, किन्तु नेत्र हैं। इस प्रकार स्पष्ट साम्य है जिसमें वह तत्त्वाख्यानक उपमा ही है। इस प्रकार कथित तत्त्वाख्यान रूप उपमा में अन्याप्तिदोष है। क्योंकि यहाँ साम्य का वाच्यत्वाभाव है। अन्य दोष कहते हैं- तुम्हारा मुख-जिसकी चचल आँखें घूमते हुए भौरे की तरह हैं तथा जिनकी दन्त-पक्तियों -से ज्योति प्रस्फुटित हो रही है तथा जिसका वर्ण किंघित केसर की तरह है-पकज अर्थात् कमल -की तरह शोभ रहा है। इस उदाहरण में विशिष्ट उपमाक्षिप्त विशेषण उपमा में साम्य का विशेपणों में अवाच्यता से अव्याप्तिदोष है। दूषणान्तर कहते हैं-'गसीश्यामा' इस वाचकलुप्त उपमा में तथा 'चन्द्र सुहृद मुखम्' इत्यादि साम्यलक्षण पद की तरह उपमा में अव्याप्तिदोष है। (सुधा) वाच्यमिति पदं खण्डयितुं प्रारभते-व्यङ्गयोपमेत्यादि। व्यङ्गयोपमायाः, 'वाहि वात यतः कान्ता तां स्पृष्टा मामपि स्पृश। त्वयि मे गात्रसंस्पर्शश्चन्द्े दृष्टिसमागमः ॥' इत्यादिरूपाया व्यावृत्तये वाच्यमिति यद्क्तं तदप्ययोग्यमेव । इदं पदमं न, अपि: तु

Page 104

६४ चित्रमीमांसा

मुखमेव। इमौ मृझ्गनै न, किन्तु नेत्रे। एवं विस्पष्ट साम्यं यस्याः सा तत्वास्यानोपमा एव इत्युक्तरूपायां तत्वाख्यानोपमायामव्याप्ते:, साम्यस्य वाच्यत्वाभावाद। दूषणान्तर- माह-अधीरे भक्षिणी यस्य तत्। आवि: प्रकटीभूता दशनानां दन्तानां दीघितयो यत्र तत्वदाननम्, भ्रमन्ती भृङ्गौ यत्र तत्। आ=ईपत्, लच्या: केसरा यस्य तत्। पङ्टज- मिव कमलमिच भाति शोभते, इत्याटी विशिष्टोपमात्तिप्तविशेपणोपमा्यां साम्यस्प विशेषणेष्ववाच्यतया अव्याप्त्यापत्ते:। दूपणान्तरमाह-शस्तरी श्यामेति। वाचकलुप्तायां चन्द्रसुहन्सुखमिति साम्यलक्षकपद्वदुपमायामव्यासे:। (चित्र०) किञ्त 'वाच्यम्' इत्यत्र विधेयतया वाच्यतोच्यते ? अनुवाद्यतया वा? आदये, स कर्षन्महतीं सेनां पूर्वसागरगामिनीम्। बभौ हरजटाभ्रष्टां गङ्गामिव भगीरथः ॥ इत्यादावेवेदं लक्षणं स्यात्, स ययौ प्रथमं प्राचीं तुल्यः प्राचीनवर्हिषा। अहिताननिलोद्धूतैस्तर्जयन्निव केतुभिः ॥ इत्यादौ न स्यात्। (भारती) प्रकारान्तर से वाच्य पद का खण्डन करते हुए लिखते है-'वाच्यम्' में विधेयत्वेन वाच्यता कहते हैं अथवा अनुवाद्यतया ? प्रथम में- बडी भारी सेना जो कि पूर्व समुद्र की तरफ जाने वाली थी, उसे ले जाते हुए वे रघु महाराज उसी भाँति सुशोभित हुए जैसे कि शकर की जटा से नीचे गिरी हुई पूर्व समुद्र की तरफ जाने वाली गगा जी को लिए जाते हुए भगीरय सुशोभित हुए थे। यहाँ दोनों साम्य का विधेयत्वेन उपमा लक्षण होता है। इन्द्र के तुल्य वे रघु महराज अनुकूल वायु से फहराती हुई पताकाओं से दुश्मनों को मानो डराते हुए पहले पूर्व दिशा की तरफ चले। यहॉ गमन के ही विधेयत्व से इन्द्र के समान इसका विशेषण कोटि में सन्निविष्ट होने के कारण अनुवाधत्व के द्वारा विधेयत्व का अभाव है। फलत. इसमें लक्षण घटित ही नहीं होता है। (सुधा) पकारान्तरेण वाच्यपढं खण्डयति-किव्चेति । वाच्यमित्यत्र विधेयत्वेन वाच्यता कथ्यते, अथवा अनुवाद्यतया इति विकल्पः। प्रथमं दूषयति-आद्ये वाच्यताया विधेयत्वे, महती सेनां पूर्वसागरगामिनीं कर्षन् स रघुः, हरस्य जटाभ्यो भ्रष्टा गङ्गां कर्षन्, सापि पूर्वसागरगामिनी, भगीरथ इव वभौ शुशुभे इत्यादावेव द्वयो: साम्यस्य विधेयत्वेन लक्षणम्=उपमालक्षणम्, स्याद्। स ययाविति । प्राचीनवर्हिरिन्द्रः, 'पर्जन्यो मधवा वृषा हरिहय: प्राचीनवर्हिस्तथा' इतीन्द्रपर्यायेषु हलायुधः। तेन तुल्यः स रघुः, अनिले

Page 105

उपमानिरूपणप्रकरणम् ६X नानुकूलवातेनोद्धूतैः केतुभि: अहितान् रिपून् तर्जयन्निव भ्त्सयन्निव। तर्जिभत्स्योरनु- दात्तत्वेपि आत्मनेपदस्यानित्यत्वम्, चच्िडो डित्करणाज्ज्ञापकात्। प्रथमं प्राचीं दिशं यथौ इत्यादौ गमनस्थेव विधेयत्वेन इन्द्रतुल्य इत्यस्य विशेपणकोटिनिविष्टतयानुवाद्यतवेन विधेयत्वाभावान्नक्षणं न स्यात्। (चित्र०) द्वितीये, यत्र व्यतिरेकालंकारे साम्यस्य निषेधायानुवाद्यता 'मुखेन निष्कलंकेन न समस्तव चन्द्रमाः' इत्यादौ, तत्रापीदं लक्षणं स्थात् । न च निपेधाप्रतियोगित्वेन वाच्यमिति विशेषणीयम्, असिमात्रसहायोऽपि प्रभूतारिपराभवे। नैवान्यतुच्छजनवत् सगर्वोडयं महाधृतिः॥ इति व्यतिरेके तथाप्यतिव्याप्तेः । न च निषेधप्रतियोगिकोट्यननुप्रवि ष्टतया वाच्यमिति विशेषणीयम्, (भारती) दूसरे दोष में, वाच्य का जहाँ व्यतिरेक अलकार में साम्य का निषेधार्थक अनुवाद्यता है; वहाँ भी अर्थात् व्यतिरेक अलकार में भी उपमा का लक्षण घटित है। फलत. अतिव्याप्ति दोष है। उस व्यतिरेक को दिखाते हैं-तुम्हारे निष्कलक मुख से चन्द्रमा तुल्य नही है। फिर आशका करते हैं-यदि हम निषेध का अप्रतियोगित्वेन अनुवाधता लें, तव तो पूर्वोदाहरण में साम्य का निषेध्यत्वेन निषेध प्रतियोगी ही होने के कारण पूर्व कथित अतिव्याप्त दोष नहीं है। बहुत दुग्मनों की पराजय में तलवार मात्र ही सहायक है, जिसका ऐसा यह महाधैर्यशाली राजा अन्य तुच्छ जनों की तरह घमण्डी नहीं है। यहॉ उपमान एव उपमेयगत अपकर्ष एव उत्कर्ष हेतुक तुच्छ और महाधृतित्व रूप अर्थोपम्य प्रतिपादक व्यतिरेक में फिर भी अतिव्याप्ताप्ति है। यदि यहॉ हम निषेध प्रतियोगि कोटि में अनुप्रविष्टवाच्य की अनुवाद्यता ग्रहण करते हैं तो कथित उदाहरण में सादृश्य निषेध के अभाव में भी अन्य तुच्छजन प्रतियोगिक सादृश्याधिकरणक गर्व का निषेध्यत्व से सादृश्य का निपेध प्रति- योगि कोटि में अनुप्रवेश के द्वारा अननुप्रवेश के अभाव से अतिव्याप्ति दोष नही है। इसका निराकरण करते हुए कहते हैं .-

द्वितीये दूषणमाह-द्वितीये वाच्यस्यानुवाद्यत्वे, यत्र व्यतिरेकालङ्कारे साम्यस्य निपे- (सुधा)

धार्थमनुवाद्यता, तन्नापि=व्यतिरेके, इदम्=उपमालक्षणं स्यात्। तथा च तन्रातिव्यापिः। तं व्यतिरेकं दर्शयति-सुखेनेति। तव निप्कलङ्गेन सुखेन चन्द्रमा समो नेत्यर्थ। ग्रतियोगिनो निपेधस्य कर्तुमशक्यतया साम्यरूपप्रतियोगिनो निषेधार्थमनुवाद्यतासर्वेन लक्षणसत्वात्। आशङ्कते, निषेधाप्रतियोगित्देनानुवाद्यतया वाच्यत्वमस्तु। पूर्वोदाहरणे तु साम्यस्य निषेध्य त्देन निपेधग्रतियोगित्वमेव तत्येति नातिव्यातिरित्याशङ्कार्थ.। एतदपि दूपयति-असीति। प्रभूतारिपराभवे असिमात्रसहायोडयं महाधती राजा अन्यतुच्छजनवत् सगवो नास्तीत्यन्वय

५ चित्र०

Page 106

६६ चित्रमीमांसा

पम्यप्रतिपादकोदाहरणे, तथापि=निषेधाप्रतियोगित्वेनेत्युक्तेऽपि अतिव्याप्ति. । अगर्वत्व- स्यैव निषेधप्रतियोगितया वत्यर्थसादृश्यस्य निषेधप्रतियोगित्वाभावेन लक्षणसमन्व- यादतिव्याप्तिरित्यर्थः । पुनराशङ्कते-न चेति। निपेधप्रतियोगिकोट्यननुप्रविष्टतया अनु- वाद्यतया वाच्यमिति विशेषणीयम्। निपेधप्रतियोगिकोव्यननुप्रविष्टस्य वाच्यस्य अनुवाद्यतेत्यर्थः । पूर्वोदाहरणे तु सादृश्यस्य निपेधाभावेऽपि अन्यतुच्छजनग्रतियोगि- कसादश्याधिकरणकसगर्वत्वस्य निषेध्यत्वेन सादृश्यस्य निषेधग्रतियोगिकोटावनुप्रवेशे- नानुप्रविष्टत्वाभावान्नातिव्याप्तिरिति समाधानस्य न चेत्यननन्वयः। (चिन्न०) वृथा चरसि किं भृद्ग तत्र तत्र वनान्तरे। मालत्याः सदृशी क्काषि भ्रमन्नपि न लप्स्यसे ॥ इत्युपमानलुप्तायामव्याप्तेः। तन्र सदशलाभनिषेधे साम्यस्यापि प्रतियो- गिकोटिनिविष्टत्वात् । तस्माद्विद्यानाथोक्तलक्षणमप्ययुक्तम्। यत्त सरस्वतीकण्ठाभरणोक्तं लक्षणम्- प्रसिद्धेरतुरोधेन यः परस्परमर्थयोः। भूयोऽवयवसामान्ययोग: सेहोपमा मता ॥ इति। (भारती) हे मौरे। व्यर्थ ही जगल-जगल में क्यों धूमते फिरने हो ? तुम्हें घूमने पर भी मालती फूल की तरह कोई अन्य नहीं उपलब्ध होगा। इस उपमान लुप्ता में अन्याप्तिदोष होगा। यहाँ सदृश के लाभ निषेध में साम्य का भी प्रयोगि कोटि में सन्निवेश है। इसलिए विद्यानाथ ने जो उपमा अलकार का 'स्वत सिद्धेन' लक्षण किया है, वह पूर्णत. सदोप है। मोजराज ने सरस्वती कण्ठाभरण में जो उपमा-लक्षण कहा है- दो पदार्थों में प्रसिद्धि के कारण परस्पर अवयव की समानता के योग अर्थात् सम्बन्ध का वर्णन ही उपमा है। घिमर्श-यहाँ भोजराज के अनुसार दो पदार्थो अर्थात उपमेय एव उपमान में आकृति के योग ही उपमा है। इन्होंने अपने लक्षण में उपमान की प्रसिद्धि का भी उल्लेख किया है, जो परम्परागत है। यद्यपि इनके लक्षण में किसी भी नवीन तथ्य का उद्घाटन नहीं है, फिर भी इन्होंने इस लक्षण में परम्परागत विचारों का सार प्रस्तुत कर दिया है। इस लक्षण का खण्डन करते हुए दीक्षित जी ने लिखा है- (सुधा) एतदपि निराकरोति-वृथेति। हे भृद्ग, तत्र तन्न वनान्तरे तेषु तेषु वनेपु वृथा किं चरसि ? भ्रमन्नपि त्वं मालत्या सदशीं क्वापि न लप्स्यसे न प्रप्स्यसे इत्युपमान- लुसायां वाक्यगायां धर्मोपमानलुप्तायामित्यर्थः । सौगन्ध्यादिधर्मस्यान्योत्कृष्टरूपोपमा- नस्यात्रानुपदानादिति भावः। एतस्यासुपमायामव्याप्ेहेतुमाह-तन्नेति। सददशीला-

Page 107

उपमानिरूपणप्रकरणम् ६७

भनिपेधे सादृश्यस्यापि प्रतियोगिकोटिनिविष्टरवेनाननुप्रविष्टर्वस्याभावादित्याशयः । उपसंहरति-तस्मादिति। विद्यानाथोक्तम 'स्वतः सिद्धेन' इत्याद्यपमालक्षणमयुक्मिति दिक। अयमत्र प्राघामाशयः 'न पभ्रमू' इत्यादौ तत्वासयानोपमायामव्याप्तिकथनं निष्फलमेव; भ्रान्तापह्नती तदन्तर्भावसर्वात्। सादृश्यस्य प्रतीयमानतामात्रेणोपमा- उ्यवहारस्य दृण्डिसम्मतर्वात् । अन्यथा 'चन्द्रारविन्दयोः कक्षामतिक्रम्य सुखं तव।

पृथवरवेनोक्त्तार्ना निमूलमेव । मृङनेश्रादीनां विम्धप्रतिबिम्बभावापन्नवेन तेषामभेदस्येद वक्व्यतया तेषासुपमारयां विवसाया अभावाद। 'शस्त्री श्यामा' इ्यादिदूषणठ्यकथनमप्ययुक्कतम्, व्यक्षनाभिन्नवृत्तिविषयत्वरूपवाध्यपद्स्य सत्वेन तयोरप्यसम्भवाद्। उपमानलुप्तायाम- - विशेषणत्वकथनात्, स्वपदस्य साहश्यपरतवात्। सदशीलाभनिषेघस्य सादश्याभावप्रयो- जकत्वं नास्तीत्यव्याप्तेरसम्भवाद्। सगर्वत्वनिषेधस्य तुच्छलादृश्याभावप्रयोनकतवमेवेति व्यतिरेकेऽपि नातिष्याप्तिः, धर्मनिषेधे तप्प्रयुकक्सादृश्यनिषेधस्यार्थसिद्धर्वादिति ज्ञायते। अतो न विद्यानाथलक्षणे कोऽपि दोष इति। एतेन 'स्वतस्सिद्वेन' इत्याधुकं विध्यानाथ- लक्षणमपास्तम; व्यतिरेके निषेधप्रतियोगिनि सादृश्येऽतिव्याप्तेः । एवम्-'उपमानोपमे- यत्वयोग्ययोरर्थयोद्दयोः । हृद्यं साधर्म्यमुपमेयु्यते ा्यवेििः॥ इति प्राचां लक्षणमपि प्रत्युक्तम्। हृद्यतामात्रेण निर्वाह विशेषणान्तरकथनस्य वैयर्थ्यास्। एवं प्रकाशोक्तम् 'साधर्म्यमुपमाभेदे' इति लक्षणं नातीव रमणीयम्। व्यतिरेके निषेधप्रतियोगिनि सादृश्येऽतिव्याप्तेः। पर्यवसितत्वेन साधम्यंस्य विशेषणीयतवेऽनन्वये सादृश्यस्यापर्यवसायित्वेनैव वारणे भेदग्रहस्य विछोपापतेः इति रसगङ्गाघरोकमप्यपा- स्तम, पूर्वोक्वाच्यविशेषणेनेव तद्व्यावृत्तेरुक्तरवात्। 'कुमुदमिव प्रसप्नमाननम' इत्यादी विशेषणान्तरकथनेनालक्कारत्वनिरासेन तत्सार्थकत्वास्। प्रकाशलक्षणेऽपि 'प्रकृतोत्कर्ष प्रयोजकत्वे सति' इति सत्यन्तस्य लक्षणे प्रवेशेन व्यतिरेके तादशसादृश्यस्य व्यतिरेको-

सरस्वतीकण्ठास्षरणप्रतिपादितसुपमालक्षणं खण्टयितुमुपन्यस्यति-यत्विति। लक्षण- मुपमालक्षणमुकं भोजराजेनेति शेषः। छक्षणमाह-प्रसिद्वेरिति। यः प्रसिद्धरतुरोधेन, अर्थयोरुपमानोपमेययोः, अन्योन्यं भूयोऽवयवस्ताधर्म्यस्य योग:, इह सा उपमा मतेति लक्षणान्वय: । (चिन्र०) तदपि गुणक्रियादीनां परस्परसाद्ृश्यवर्णनात्मिकायाम्- ससञ्जुरश्वक्षुण्णानामेलानामुत्पतिष्णवः। तुल्यगन्धिषु मत्तेभकटेषु फलरेणवः ॥ इत्याद्युपमायामव्याप्तम्, उद्गर्भहूणरमणीर मणोपमर्दभग्नोन्नतस्तननिवेशनिभं बिम्बं कठोरबिसकाण्डकडारमेतद्विष्णोः पदं प्रथममग्रकरर्व्यनक्ति॥ हिमांशोः।

Page 108

६८ चित्रमीमांसा

'सद्योमुण्डित मत्तहूणचि बुकप्रस्पर्धि नारङ्गकम्' इत्यादौ प्रसिद्धिरहि तो मा - नायां कल्पितोपमायां चाव्याप्तम्। यत्त्वलङ्कारसर्वस्वकृतो क्तम्-'उपमानोपमेययोः साधर्म्ये भेदाभेदतुल्यत्वे वोपमा। साधर्म्ये त्रयः प्रकारा, भेद्प्रधान्यम्-दीपकतुल्ययोगितादष्ान्तप्रति- वस्तूपमासहोक्तिव्यतिरेकादिषु। अभेदप्राधान्यं रूपकर्पारणामभ्रान्तिमटुल्लेखा- दिषु। द्वयोस्तुल्यत्वम्-यथास्यामुपमायाम् । अत्र ह्युपमानोपमेयासाधारण- रूपाभ्यां भेद: साधारणधर्मेणसेदश्चेति द्वयोरपि तुल्यतैव' इति। तद्प्युप- मानोपसेयाति व्याप्त्यादिदुष्टमिति स्पष्टसेव । तस्माद दुर्वचमस्था लक्षणममति। (भारती) ऐसा लक्षण करने पर भी गुण क्रियादि का परस्पर सादृश्य वर्णनात्मक उपमा के अधोक्कित उदाहरण में अव्याप्ति दोष होगा। घोडों के खुरों से खुदी हुई इलायची की लताओं की उढती हुई फल की धृलि अपने समान सुगन्धि वाले मतवाले हाथियों के मद वहने के स्थानों में चिपक गई। दूपणान्तर कहते हैं .- उद्गर्भा हूण जाति-विशेष की सुन्दर रमणियों के रमण एव उपमर्टन से भन्न होने के कारण समुन्नत स्तन निवेश के सदृश चन्द्रविम्व अपनी श्रेष्ठ किरणों से पूर्व कठोर विपकाणु की तरह कपिलवर्ण भगवान विष्णु के चरणों की शोभा प्रकट होता है। और भी- पूर्वश्लोक में उपमान-स्वरूप वैसे स्तन निवेश की प्रसिद्धि का अभाव है तथा तत्काल मुण्डित हूण की ठोढी (चिवुक) के सदृश नारङ्नक है। यहाँ वैसे चिबुक रूप उपमान का कल्पित होने के कारण प्रसिद्धि का अभाव है। फलत. दोनों उदाहरण में अव्याप्ति दोप है। अत. उपमा का यह लक्षण भी निर्दुष्ट नहीं कहा जा सकता है। अलद्कार सर्वस्वकार आचार्य रुय्यक ने साधर््य के कारण उपमेय एवं उपमान में भेदाभेद तुल्यत्व प्रदशित करने को उपमा कहा है। उन्होंने तीन प्रकार का साम्य वतलाकर उपमा में तीसरे प्रकार की साम्य की स्थिति को स्वीकार किया है। वे हैं-भेदप्रधान, जैसे दीपक, तुल्य- योगिता, दृष्टान्त, प्रतिवस्तूपमा, सहोक्ति एव व्यतिरेक आदि में, अभेदप्रधान साम्य जैसे रूपक, परिणाम, भ्रान्तिमान एव उल्लेखादि में और भेदाभेद तुल्यत्व उपमा में होता है। सर्वस्वकार ने अभेद हेतुक सामान्य एव भैद हेतुक विशेष दोनों को ही सादृय्य ज्ञान का विषय स्वीकार किया है। इस प्रकार आचार्य रुय्यक के सिद्धान्त की व्याख्याकर दीक्षित जी ने 'तदपि' से खण्डन किया है, अर्थात ऐसे सिद्धान्त के वावजृद यह लक्षण उपमेयोपमा में अतिव्याप्ति दोष से स्पष्टतः दूषित है। अत यह लक्षण भी दुर्वच ही है। (सुधा) तन्न दूषणमाह-तदपीत्यादि। तव्नक्षणमपीश्यर्थः। ससक्षरिति। अश्वैः तुष्णाना- मेलानामू एलालतानाम् उत्पतिष्णवः उत्पतनशीला, 'भलड्क्कज् निराकृज्' इत्यादिना इष्णुच्। फलरेणदः फलरजांसि, तुल्यगन्धिषु तत्समानगन्घिपु, सर्वधनीतिवदिदन्तो बहुन्नीहिः। मत्तेभानां कटेषु गण्डेषु ससकः सका इत्यन्वयः । इत्यत्र गुणक्रियादीनां परस्परसादृश्यवणनम् आतमास्वरूपं यस्यास्तस्यामुपमायामव्याप्तम्। दूषणान्तरमाह-

Page 109

उपमानिरूपणप्रकरणम् ६६

उद्गर्भेरयादिप्रसिद्धिरह्वितोपमायाम् 'सघ' इ्या विक्पतोपमायां चाव्याप्मित्यन्वयः । उद्गर्भेति। उद्गर्भाया हूणरसण्या रमणोपमर्दनेन भप्नश्वासावुन्नतः स्तननिवेशक्ष तस्य सद्शं हिमांशोश्रन्द्रबिम्बम, अग्रकरैः श्रेष्टकिरणैः पूर्व कठोरबिसकाण्डवत् कडारं कपिलं विष्णोः पदं वियद् व्यनक्ति प्रकटीकरोति। अन्नोपमानस्य तादृशस्तननिवेशस्य प्रसिद्धेरभावाद्, सधस्तत्कालं मुण्डितं यन्मत्तहूणस्य पिदुकं तत्सदशं नारङ्कमित्यादी तादृशघिबुकरूपोप- मानस्य कल्पिततवेन प्रसिद्धेरभावाघ। अन्न वदति-सामान्यपदस्य धर्ममाश्रपरत्वे गुणादि- परस्परसादृश्योपमायामव्याप्तेरभावः। प्रसिद्धेरनुरोधेनेत्यस्य यदुपमायां यस्य प्रतियोगि- त्वानुयोगित्वादिकं प्रसिद्धं तदनतिक्रमेणेत्यर्थः । अतो न प्रतीपादावतिव्याप्तिः। उद्गर्भेत्या- दावपि हूणरमणीस्तनादिकं प्रह्नद्धूमेव; तदुपमानताया एवाप्रसिद्धत्वम्। तत्कव्पनेपि प्रसिद्धधनतिक्रमस्य सरवेनाव्याप्तेरभावात्। तेषासुपमानरवाभावस्य प्रसिद्धत्वाभावेन तद्वि रोघाभावादिति भोजराजग्रन्थाशय इत्यलस्। अलद्धारसवंस्वमतं खण्डयति-यच्विति। अलङ्कारसर्वस्वककृता 'भेदाभेदतुव्यतवे उप मानोपमेययोः । साधर्म्यंसुपमा' इति तव्लक्षणसुकम्। तथा हि, साध्म्ये त्रयः प्रकारा :- भेदप्राधान्यम्, असेदप्राधान्यम्, उभयप्राधान्यं चेति। दीपकादी भेदस्य प्राधान्यं

साधारणधर्मेणाभेदस्य चेति रीत्या हयोस्तुष्यत्वादिति तन्मतम्। एवं तत्सिद्धान्तं व्याकृत्य खण्डयति-तदपीति। तदपि लक्षणसुपमेयोपमायामतिव्याप्श्यादिना दुष्टमिति स्पष्टमेव। तस्या अप्युपमारवेन लक्यत्वकर्पने तु न दोष:। अलचयतवे तु साधम्यमित्यत्रकरवस्य विवक्येकवाक्यपरत्वम्। तथा, चैकवाक्यवाध्यं तयोः साधर्स्यमित्यर्थः। तथा चोपमेथोप- मायामपि नातिव्याप्तिरिति तव्वक्षणं निर्दोषमेवेति सुधियो विभावयन्तु। उपसंहरति- तस्माद्वेतोरस्या उपमाया लक्षणं दोषरहितमिति शेष:। दुर्वधं वकुमशक्यमिति।

(चिन्र०)

अत्रोच्यते- व्यापार उपमानाख्यो भवेद्यदि विवक्षितः । क्रियानिष्पत्तिपर्यन्तमुपमालड्कृतिस्तु सा॥ उपमानव्यापार :- उपमितिक्रियानिष्पादको व्यापारः सादृश्यवर्णना। सोय- मुपमितिक्रियानिष्पत्तिपर्यन्तं विवक्षितश्व्ेदुपमालक्कार इत्यर्थः । तथा च व्यति- रेके नातिव्याप्तिः, तत्र सादश्यवर्णनासत्त्वेऽपि 'मुखेन निष्कलड्केन' इत्यादौ साक्षात्तस्यैव निषेधेन 'नैवान्यतुच्छजनवत्' इत्यादौ तत्प्रयोजकधर्मनिपेवेन चोपमितिक्रियाया अनिष्पत्तेः । नाप्यनन्वयेऽतिव्याप्तिः, तत्रापि स्वेन स्वस्य सादृश्यस्य सदशान्तरव्यवच्छेदे रुद्ररोदनवपोत्खननाद्यर्थवादेSसदर्थस्य निन्दा- स्तुत्योिव द्वारमात्रतया वर्ण्यमानत्वेनोपमितिक्रियाया अनिष्पत्तेः। अन्यथा स्वस्य स्वेनोपमितिक्रियानिष्पत्तौ सदशान्तरव्यवच्छेदेऽपि सर्वथानुपमत्व- द्योतनं फलं न स्यात्। आहुश् तस्य तदेव फलं भामहाद्य :-

Page 110

चित्रमीमांसा

(भारती) आचार्य दीक्षित जी ने 'अत्रोच्यते' से स्वय उपमा के लक्षण की रचना करते हुए लिखा है- जहॉ सादृश्य या समानता के वर्णन में उपमिति क्रिया की उत्पत्ति होती है, वहाँ उपमा अल- कार होता है। (उपमान व्यापार := उपमिति क्रिया निष्पादक व्यापार अर्थात सादृश्य वर्णनात्मक है। वह उपमिति क्रिया निष्पप्ति पर्यन्त यदि विवक्षित हो नो वहा उपमा अलकार होता है।) दोष निवारण करते हुए दीक्षित जी लिखते है-उक्त प्रकार से उपमा का लक्षण करने पर उत्पत्ति क्रिया निष्पन्ति कथन से व्यतिरेक अलकार में मतिव्याप्ति दोष नहीं होता है। उसे ही कहते हैं-व्यतिरेक में 'मुखेन निष्कलंकेन' इन्यादि में साक्षात सादृश्य वर्णन का ही एव 'नैवा- न्यतुच्छ जनवस्' इसमें सगर्वत्व निपेध से अर्थात सादृश्य के अभाव में पर्यवसान से सादृश्य प्रयोजक धर्म निषेध के द्वारा क्रिया निष्पत्ति के अभाव से अनन्वय में अतिव्याप्ति का निराकरण करते हुए 'नापीति' लिखते हैं। वहाँ भी अर्थात् अनन्वय में भी स्व का स्व के साथ सादृश्य का स्व से भिन्न उपमान का निषेध में द्वारतया वर्ण्यमानत्व से उस क्रिया की अनिष्पत्ति है। 'सोडरोदीव तद्ुद्रस्य रुद्रत्वं प्रजापति रात्मनोवपामुदच्छिनत्' इस अर्थवाद में असद् अर्थ का प्रमाण के अभाव में निन्दास्तुति द्वारता की तरह उसका कोई स्वार्य नहीं है। अन्यथा उसकी अनिष्पप्ति अस्वीकार करने में स्व का स्व के साथ उस निष्पत्ति में सदृशान्तर के निषेध में निश्चित रूप से अनुपमत्व द्योतन रूप फल नहीं है। अनुपमत्व के तात्पर्योश में भामह आदि आचार्यों की सम्मति में उस स्व का स्व के साथ सादृश्य वर्णन का अनुपमत्व धोतन ही है। (सुधा) स्वयं लक्षणमारचयति-अत्रोष्यते इति। उपमानाख्यो व्यापारः क्रियानिष्पत्तिपयंन्त यदि विवक्षितो भवेद्। तुरेषाथे। सा एवोपमालंकृतिरिति श्लोकान्वयः। स्वयमेव लक्षणं

स उपमितिक्रियानिष्पत्तिपर्यन्तं वियक्तितश्चेद उपमालद्वार इति तदर्थः। दोषं निवारयति- तथा चैवं लक्षणे सति उपमितिक्रियानिष्पत्तिकथनादु व्यतिरेके नातिग्यापिः। तदेवाह- तम्र =व्यतरेके 'मुखेन' इस्यादौ साक्षातसादृश्यवर्णनस्यैव, 'नैव' इत्यादौ सगर्वत्वनिषेधे नार्था् सादश्याभावे पर्यवसानात् सादृश्यप्रयोजकधर्मनिषेधेन च क्रियानिष्पत्तेरभावाद- नन्वयेऽतिष्याप्तिं निराकरोति-नापीति। तम्रापि अनन्वयेऽपि स्वस्य स्वेन सादश्यस्य स्वेतरोपमाननिषेधे द्वारतया वर्ण्यमानरवेन तत्कियाऽनिष्पतेः। 'सोऽरोदीस् तद्गुद्वस्य रुद्रर्वं प्रजापतिरास्मनो वपामुषच्छ्नत्' इत्यर्थवादेऽसदर्थस्य तेषां स्वार्थे प्रामाण्याभा- वाद निन्दास्तुतिद्वारतायत्। अन्यथा तद्निष्पच्यनङ्गीकारे स्वस्य स्वेन तन्षिष्पत्तौ सददशान्तरनिषेधे सवथानुपमत्वद्योतनरूपं फलं न स्याद्। अनुपमत्वतास्पर्यांशे प्राचीन- सम्मतिमाह-आहुश्चेति। तस्य स्वस्य स्वेन साहृश्यवर्णनस्य तदेवानुपमत्वद्योतनमेव। (चित्र०) यत्र तेनैव तस्य स्यादुपमानोपमेयता। असादृश्यविवक्षातो वदन्ति तमनन्वयम् ।। इति।

Page 111

उपमानि रूपणप्रकर णम् ७१

अत एव वर्ण्यमानमपि स्वस्य स्वस्मिन् साघर्म्य नान्वेतीत्यनन्वयपदव्यु- त्पत्तिमलङ्कारसर्वस्वकारादयो वदन्ति। (भारती) भामह के अनुसार अनन्वय अलकार वहाँ होता है जहाँ यह सिद्ध करने के लिए कि उपमेय के समान अन्य वस्तु नहीं है, अतः उपमेय की उसी के साथ उपमेयता एव उपमानना कही जाती है। विमश-इस लक्षण की दो विशेषताएँ हैं- (क) उपमेय में ही उपमेयता एव उपमानता का सन्निवेश। (ख) अन्य सदृश वस्तु या उपमान का निराकरण। अतएव अनुपमत्वरूप फल रहने पर ही, वर्ण्यमान भी अनन्वय पढ की व्युत्पत्ति है, ऐसा अलकार स्वस्वकार कह्ते हैं। अनुपमत्व रूप फल का समर्थन करते हुए लिखते हैं- उसके बाद जिस प्रकार जल में कतकरज (फिटकिरी) के सयोग से धूलिकण अर्थात् गन्द- लापन नष्ट हो जाता है और पीछे कतकरज का भी विशेष रूप से विलयन होने के पश्चात् जल का सर्वथा निर्मलत्व सिद्ध होता है, उसी प्रकार 'राम और रावण का युद्ध राम और रावण के युद्ध की तरह ही है' इस अनन्वय में भी स्व के साथ सादृश्य वर्णन से सादृश्यान्तर निषेध है। वस्तुत. स्व के साथ उपमा का होना भी असभव है। यहाँ युद्ध का अनुपमत्व ही कवि सरभ से अर्थात् सादृ्य वर्णन की निष्पत्ति के अभाव से अनन्वय में किसी भी प्रकार से अतिव्याप्ति दोष नहीं है। इसी प्रकार अनन्वय की तरह प्रतीप में भी- ओ कमल की तरह सुन्दर आँखों वाली ? मेरी इन वातों को तो जरा ध्यान से सुन लो। इस दुनियाँ में पामर लोग ही तुम्हारे मुख के साथ चन्द्रमा की उपमा देते हैं। यहाँ पामरपद से उपमिनि क्रिया निष्पत्ति के अभाव में अतिव्याप्ति दोष नहीं है। अब प्रउन यह उठता है कि जहाँ प्रतीप में उपमिति क्रिया की निष्पत्ति है या उस प्रतीय में उपमेयोपमा है, वहाँ दोनों में उपमात्वेन सग्राध है ही, इन दोनों के बीच लक्षण की उपस्थिति से किसी प्रकार का दोष नहीं है। उस प्रतीप को दिखाते हैं-

(सुधा) यत्रेति-यम्र वर्णनीयस्य वर्णनीयेनैव उपमानोपमेयता अनुपमत्वविवद्तया स्यात्, तमनन्वयं वद्न्तीश्यन्वयः। अत एवानुपमत्वरूपफलसत्वादेव, वर्ण्यमानसपीत्याद्यनन्वय- पदव्युत्पति वदन्त्यलद्गारसर्वस्वकृतः। (चिन्न०) ततश्च यथाम्भसि कतकरजःसंयोजनेन रजोऽन्तरव्यवच्छेदे सति कतकर- जसोऽपि विलयनात् सर्वथानाविलमम्भः सिध्यति, तथा 'रामरावणयोर्युद्धं रामरावणयोरिव' इत्यादौ स्वेन साद्ृश्यवर्णनया सदृशान्तरव्यवच्छेदे सति वस्तुतः स्वेनाप्युपमाया असंभवादनुपमं रामरावणयोर्युद्धमित्यत्रव कविसंरम्भ-

Page 112

७२ चित्नमीमांसा

इत्युपमितिक्रियाया अनिष्पत्तेर्नानन्वयेऽतिव्याप्तिशङ्कावकाशः । एवं प्रतीपेऽपि यत्रोपमित्यनिष्पत्ति :- आकर्णय सरोजाक्षि वचनीर्यामदं भुवि। शशाङ्कस्तव वक्त्रेण पामररुपमीयते॥ इत्यादौ, न तत्रातिव्याप्तिशङ्का, उपमितिक्रियानिष्पत्तिविरहात्। (भारती) हे भद्रे। अपनी ढोनों आँखों के सौन्दर्य पर यह असभाव्य घमड क्यों कर रही हो? दशो दिशाओं में, वापी सरोवरों में तो नील कमल खिल ही रहे हैं। इस प्रतीप एव उपमेयोपमा में दोनों जगह उपमानत्वेन सग्राह्य हे ही। अत पूर्वकथित किसी प्रकार का दोप नहीं है। दोनों के उपमानत्वेन ग्रहण करने में युक्ति देते हैं-'गर्वम्' इत्यादि प्रतीप भी उपमा विशेष ही है। क्योंकि सादृध्य वर्णन का प्रकृत विपय की तरह अप्रकृत विपयत्व में भी अलकारान्तरक हैं, यथा, स्मृति, रूपक, सन्देह, भ्रान्तिमान इत्यादि अनेक, ग्रहण तथा अपह्ुति, असभव एव संभावना, वस्तु के सम्वन्ध, निवन्धन, निर्दिष्ट, समर्थन आदि की तरह अलकारान्तरत्व की अयो- ग्यता होगी। क्योंकि स्मृति, रूपक आदि के अप्रकृत विषयत्व में भी उसकी उपस्थिति है। (सुधा) अनुपमत्वरूपं फलं तत्र समर्थयते-ततश्नेति। यथा जले कतकरजोयोननेन कतकरजो- भिन्नर जसोऽभावे नाशे इत्यर्थः। पश्चात् फतकरजसोऽपि विशेषतो लयात् सवंथा निर्मकरवं जलस्य सिद्ध्यति, तथानन्वयेऽपि स्वेन सादश्यवर्णनया साहश्यान्तरनिषेधे वस्तुतः स्वेनाप्युपमाया असम्भवात्, युद्धत्यानुपमत्व एव कविसंरम्भास साहृश्यवर्णननिष्पत्तेर- भावेनानन्वये नातिष्यासिः। एवमनन्वयवदुपमित्यनिष्पत्तिमति प्रतीपे 'आक्णय' इस्यदौ नातिष्याप्तिरित्यन्वयः । हे सरोजाक्ि, इदं वचनीयमाकर्णय, भुवि पामरैस्तव सुखेन चन्द्र उपमीयते। अन्न पामरपदेनोपमित्यनिष्पत्तिरुद्वाटिता। यम्र प्रतीपे उपमिति- क्रियानिप्पत्तिरस्ति, तत्प्रतीप उपमेयोपमा चेति दयमपि उपमार्वेन संग्रा्यमेवेति तयो- मध्ये व्यापनं लक्षणस्य वर्तनं न दोष इत्यर्थः। (चिन्र०) गर्वभसंभाव्यमिमं लोचनयुगलेन किं वहसि भद्रे। सन्तीदशानि दिशि दिशि सरःसु ननु नीलनलिनानि॥ इत्यादि प्रतीपमुपमेयोपमा चेत्युभयमपि संग्राह्यमेवेति न तद्व्यापनं लक्षणस्य दोष:। तथा हयुदाहृतं प्रतीपं तावदुपमाविशेष एव, सादृश्यवर्णनस्य प्रकृतविषयत्व- इवाप्रकृतविषयत्वेऽपि स्मृति रूपकसन्देहभ्रान्त्यने कधाग्रहणापह्नवसम्भावना-

अन्यथा तेषामपि प्रकृतविषयत्व एव स्मरणरूपकसन्देहभ्रान्तिमदुल्ले-

Page 113

उपमानिरूपणप्रकरणम् ७३

लङ्कारत्वमिति कल्पप्रसंगात्। स्मृत्याद्यश् प्रकृतविषया इवाप्रकृतविपया अप्य- लङ्कारभूतास्तत्र तन्रोदाहरिष्यन्ते। न चोपसायामय नियमो यदप्रकृतेन प्रकृत- सादृश्यवर्णनात्मनव तया भाव्यमिति, समुच्चयोपमादयुदाहरणेपु प्रकृतयोरेवा- प्रकृतयोरेव वा सादृश्यवर्णनस्याप्युपमात्वाङ्गीकारात्। तद्वत् प्रकृतेनाप्रकृतस्य साहृश्यवर्णनमप्युपमैवेति युक्तम्। (भारती) अन्यथा उनका भी प्रकृत विषयत्व ही स्मरण, रूपक, सन्देह, भ्रान्तिमान, उल्लेख, अपह्ुति, उत्प्रेक्षा, निदर्शना, अर्थान्तरन्यास आदि का अलकारत्व अप्रकृत विषयत्व में भी कला प्रमग से अनलङ्कारत्व होगा। स्मृति आदि प्रकृत विषय की तरह अप्रकृत विषय का भी अलकारत्व यथा- प्रसग उदाहृत होंगे। अगर आप यह कहें कि उपमा में यह नियम है कि अप्रकृत से प्रकृत सादृ्य वर्णनात्मक का ही उसमें ग्रहण होगा तो समुच्चय आदि उदाहरणों में प्रकृत के अथवा अप्रकृत के ही सादृश्य वर्णन का भी उपमात्व स्वीकार करने से, उसी प्रकार के ही सादृव्य वर्णन का भी उपमात्व स्वीकार करने से, उसी प्रकार प्रकृन के द्वारा अप्रकृत का सादृश्य वर्णन भी उपमा ही है। अर्थात् अप्रकृत के द्वारा प्रकृत सादृश्य वर्णन रूप से ही उपमा अलकार होगा-ऐसा नियम उपमा में सभव नही है। क्योंकि समुच्चय उपमा आदि से परस्पर उपमा आदि के ग्रहण उन उदाहरणों के प्रत्येक सादृश्य वर्णन में भी उपमा का होना ही योग्य है।

(सुधा) तत्म्रतीप दर्शयति-गर्वमिति। हे भद्रे, नेम्रयुगलेनासंभाव्यमिमं गर्व कि वहसि। दिशि दिशि सर्वत्रेत्यर्थः । सरस्सु नौलनलिनानि सन्त्येवेत्यन्वयः । द्वयोरुपमारवेन संग्राह्यत्वे युक्िमारचयति-तथा हीत्यादि । 'गर्वम्' इत्यादिप्रतीप उपमाविशेष एव सादृश्यवर्णनस्य प्रकृतविषयतायामिवा प्रकृत विषयरवेऽप्यलक्कारान्तरत्वस्यायोग्यत्वात्। स्मृतिरूप कादीनामप्रकृतविषयत्वेऽपि तद्दर्शनाव्। अन्यथाऽप्रकृतविषयत्वेऽलङ्कारान्तरत्व- कल्पनाप्रसङ्गास्। स्मृत्यादीनां प्रकृतविषयत्व इवाप्रकृतविषयत्वेऽपि तत्वस्यैव दर्शनाव् पृथगळङ्काराभावाच। अप्रकृतेन प्रकृतसाहश्यवर्णनरूपेणैव भाव्यमित्युपमार्या नियमो न सम्भवति। समुप्योपसादीत्यादिना परस्परोपमादिग्रहणं तद्षुदाहरणेषु प्रत्येकं सादृश्य- वर्णनेऽप्युपमास्वाङ्गीकारात। तथा च प्रकृतेनाप्रकृतस्य सादृश्यवर्णनेऽपि सैवेति योग्यमेव। (चित्र०) एवं चोपमेयोपमापि प्रकृताप्रकृतविषयोपमाद्वयरूपतया नालङ्कारान्तरतां भजते। अन्यथा तत्प्रकरणोदाहरिष्यमाणपरस्परोपमाया अप्यलङ्कारान्तरत्व- प्रसङ्गात्, परस्परभ्रमनिबन्धनादिष्वप्यलङ्कारान्तरतापत्तेश्र। न चानन्वय- प्रतीपोपमेयोपमासु सादृश्यवर्णनस्य पृथग् निरूपणस्य चाविशिष्टत्वेनानन्वय- स्यानुपमात्वभितरयोरुपमात्वं च वक्तुमयुक्तमिति वाच्यम्, यत्रोपमितिक्रि यानिष्पत्तिस्तत्रोपमाशब्दप्रवृत्तिनिमित्तसद्भावेन, यत्र तद्निष्पत्तिस्तत्र तद्भा-

Page 114

७४ चित्रमीमांसा

वेन, च वैषम्यस्य स्फुटत्वात्। इममेव विशेषमभिप्रेत्य काव्यप्रकाशिकादिल- क्षणेष्वनन्वयव्युदासार्थमेव यत्नः कृतो नोपमेयोपमादिव्युदासार्थम्। उपमे- योपमादेरुपमान्तर्गतत्वेऽपि व्यङयादिकृतवचि त्यविशेषेण पृथग्गणनं न विरुध्य- ते, रूपकपरिणामवत्। 'उभौ यदि व्योम्नि पृथक्प्रवाहौ' इत्यादौ लक्षणाभावो न दोपः, यदि तथाभूतौ प्रवाहौ स्यातां तह्यपमीयेत, न च तौ संभवतः, तस्मान्न केनाप्युपमीयत इत्युपमापरपर्यायोऽयमित्यनिष्पत्तावप्युपमात्वस्वीकारे तत्रोपमाशव्दस्य पारिभाषिकत्वापत्तेः। (भारती) इसी प्रकार उपमेयोपमा में प्रकृत एव अप्रकृत विपयक उपमा के दोनों रूप से अलक्कारान्त- रत्व सिद्ध नहीं होता। अन्यथा उस प्रकरण में उदाहरिष्यमान परस्पर उपमा से भी अल्कारा- न्तरत्व के प्रसग से परस्पर भ्रम, निवधन आदि में अलक्कारान्तरतापत्ति होगी। यदि आप कहें कि अनन्वय, प्रतीप एवं उपमेयोपमा में सादृश्य वर्णन का और पृथक निरूपण का अविशिष्टत्व के द्वारा अनन्वय का अनुपमात्व एव अन्य अलकारों का उपमात्व होगा, यह कथन अयुक्तिकर है, तो जहाँ उपमिति क्रिया निष्पत्ति है, वहाँ उपमाशब्द प्रवृत्ति निमित्तकर भाव से तथा जहाँ उपमिति क्रिया की अनिष्पत्ति है वहाँ उसके अभाव से उपमात्व होगा तो दोनों जगह की विप- मता स्पष्ट है। इसी भाव और अभाव रूप विशेपता के अभिप्राय से काव्य-प्रकाशकार ने अपने लक्षण 'साध्म्यमुपमाभेदे' में 'भेदे' तथा (आदिपदनेन विद्यानाथ का ग्रहण है) विद्यानाथ ने अपने लक्षण 'स्वतः सिद्धेन मिल्नेन' में भेद ग्रहण अनन्वय हटाने के लिए किया है न कि उपमे- योपमा के लिए। उपमेयोपमा आदि का उपमा के अन्तर्भूत होने पर भी व्यङ्गयादिकृत वैचित्र्य विशेपण से रूपक एव परिणाम अलकार की तरह पृथक गणना का विरोध नहीं करता। 'उभौ- यदि म्योम्नि पृथक प्रवाही' इत्यादि में लक्षणाभाव दोप नहीं है। यदि आकाश गंगा के जल की दो धाराएँ होतीं, तो उसकी उपमा भी दी जाती, अर्थात् 'उभौयदि' इस श्लोक में उक्त लक्षण से अतिव्याप्ति दोष नहीं है। यदि प्रभाव उस तरह होते तभी उपमा होती। यदि आप उसकी तथाकथित सभावना स्वीकृत कर भी लेते हैं तो उससे किसी के भी साथ उपमा नहीं होती। अगर इसे उपमा अपरपर्याय कहकर अनिष्पत्ति में भी उपमात्व स्वीकार करते हैं, तो वहा 'उपमा' शब्द की पारिभाषिकन्वापत्ति होगी। (सुधा) एवं प्रतीपस्योपमात्वं प्रतिपादयोप मेयोपमायास्त्त्वं प्रतिपादयति-पवमिति। प्रतीपद् प्रकृताप्रकृतविषयकं यदुपमाछ्ठूयं तद्रपतयोपमेयोपमाप्युपमातः पृथगलद्वारतां न भखते। अन्यथा=पृथग आावाङगीकारे, तत्प्रकरणमित्यत्र तत्पद्सुपमेयोपमापरम। तश्रोदाहरिष्य- साणायाः परस्परोपमायाः 'रजोभिः' इश्यादिरूपाया अलक्कारान्तरखवापत्तेः। तम्रापीष्टापतौ दोपमाह, परस्परभ्रान्तिरचनादिपु- पलाशकुसुमभ्रान्त्या शुकतुण्ढे पतत्यलि:। सोऽपि जम्बुफलभ्रान्त्या तमळिं धर्तुमिच्छति॥ इत्यादिष्वलद्टारान्तरर्वापत्तेश्र। परस्परभ्नान्तेरपि पृथकत्वापत्तिरित्यर्थः। आशक्कते-

Page 115

उपमानिरूपणप्रकरणम् ७५

अनन्वयादिषु व्रिप्ठु साहश्यवर्णनस्य पृथग निरूपणस्य च स्वे विशेषाभावादनन्वय- स्यानुपमात्वमितरयोस्तत्वम्म वक्तुं न योग्यमित्याशङ्कार्थः। उपमितिक्रियानिष्पत्तिरूपोप- माशव्यप्रवृत्तिनिमित्तस्य भावाभावाभ्यां वैषम्यस्योभयव् स्पष्टवास्। एवं प्रतिपादने प्राचीनसम्मति दर्शयति-इममेवेति। उपमितिक्रियानिष्पत्तिरूपतच्छ्दप्रवृत्तिनिमित्त सध्वासत्वरूपं विशेषमभिप्रेत्य काव्यप्रकाशकादीर्यादिना विद्यानाथलक्षणमनन्वयनिषेधाय यतः 'भेदे' इति पदकथनरूप: कृतः। न तयो्व्युंदासार्थम, नघतयोः पृथग्गणनविरोधः उपमान्तर्गतत्वेऽपि व्यक्ञयादिकृतवैचित्यविशेषस्य तम्र नियामकरवास्। रूपकपरिणामवद् रूपकेणैव सिद्धौ व्यक्षयवैचित्येण यथा परिणामस्य पृथग्गणनं तदूदित्यर्थः। उभावित्यादावपि नाध्याप्तिः। यदि प्रवाहयोस्तथाभूतत्वं तदोपमीयेत। न च तयोः संस्भवः । तरमानन केनाप्युपमेयतासत्वं तद्रपोपमित्यनिष्पत्तावपि ततस्वीकारे उपमा- शब्दस्य तत्रोदाहरणे पारिभाषिकर्वापत्तेः ।

(चित्र०) किन्तु तन्नातिशयोक्तिविशेषोऽलंकारः । अत एव काव्यप्रकाशिकायाम्- 'प्रस्तुतस्य यदन्यत्वं यद्यर्थोक्तौ च कल्पनम्' इत्यतिशयोक्तिषु परिगणय्य यद्यर्थोक्तो कल्पनस्य- 'राकायामकलङ्गं चेदमृतांशोर्भवेद् वपुः । तस्या मुखं तदा साम्यपराभवमवाप्नुयात्।। इत्युदाहतम्। (भारती) किन्तु 'शिशुपालवधम्' के उक्त उदाहरण में अतिशयोक्ति विशेष अलंकार है। इसीलिए काव्य प्रकाश में 'प्रस्तुतस्य यदन्यत्वं यद्यथोक्कौ च ककपनम्' अर्थात् वर्ण्य विपय का उससे भिन्न प्रकार से वर्णन किया जाय और यदि शब्द के अभिप्राय में किसी असभान्य अर्थ की कल्पना की जाय तो अतिशयोक्ति अलकार होता है। अत इसकी तीसरी अतिशयोक्ति में गणना कर 'यद्य- र्थोक्तो' की कल्पना का अर्थात तीसरी अतिशयोक्ति जिसमें 'यदि' अथवा 'चेत' शब्द के द्वारा किसी ऐसे अर्थ की कल्पना की जाय जिसकी सभावना न हो, जैसे कि- 'यदि पूर्णिमा की रात में ऐसा चन्द्र निकले जिसमें कोई कलङ्क न हो तव कहीं उससे अपनी समानता देख इस अद्भुत सुन्दरी का मुख अपना कोई अपमान समझे।' विमर्श-(यहाँ आकाश गगा से प्रवाहित दो जलधाराओं के सदृश पूर्वार्द्ध में जो पूर्णिमा के चन्द्र में कलद्ू के अभाव की कल्पना है, वह तो असम्बन्ध में सम्वन्ध की कल्पना है और उत्त- रार्द्ध में नायिका के मुख और चन्द्रमा के पूर्णविम्ब में साम्यरूप सम्वन्ध होने पर भी जो असम्बन्ध की कल्पना है, वह है संवध में असवध की कल्पना।) (सुधा) तर्हि तन्र को वालक्कार इत्याशङ्कां समाधन्ते-किन्त्विति। अतिशयोकिविशेगः। तन्न = उभावित्यम्रास्तीति शेषः। तब् तस्य प्रामाण्यार्थ प्रकाशादिसम्मतं तत्सरशोदा-

Page 116

७६ चित्रमीमांसा हरणं दर्शयति-अत एव। तब्र विशेषोक्तिस्वादेव 'प्रस्तुतस्य यदन्यत्वं यद्थोकी व कल्पनम् इत्यतिशयोक्किमध्ये परिगणय्य चद्यर्थोक्कावित्यस्य अमृतांशोक्षन्द्वस्य वपू राकायां पौर्णमास्यां कलक्करहितं भवेच्चेस, तदा तस्या मुखं सादृश्यपराभवं प्राप्नुया- दित्यर्थकं राकायासिति मम्मटेन काव्यप्रकाशिकायामुदाहतम्। (चिन्न०) पुष्पं प्रवालोपहितं यदि स्यान्मुक्ताफलं चा स्फुटविद्रुमस्थम्। ततोऽनुकुर्याद्विशदस्य तस्य ताम्रौप्ठपर्यस्तरुचः स्मितस्य ॥ इति तु कविकल्पितोपमानाया उत्पाद्योपमेति व्यवहताया उदाहरणम्। तत्र यद्युत्पाद्यस्योपमानस्य सभाविततया तेनोपमितिनिष्पत्तेर्लक्षणमस्त्येवेति नाव्याप्िः। न चैवं 'चन्द्रबिस्वादिव विपम्' इत्यसंभावितोपमायामव्यापिः, तत्रासंभा- वितेनैवोपमानेनोपमितिक्रियानिष्पत्तेः कविना विवक्षितत्वेन विवक्षानुसार्युप-

(भारती) 'यद्यर्थोक्तौ' का दूसरा उदाहरण प्रस्तुत करते हैं, जैसे- यदि नूतन पल्लव पर श्वेत पुष्प रखा जाय, अथवा मूगे पर मोती रखा जाय, तो दोनों में से एक, पार्वती के रक्त ओष्ठ पर होने वाले धवलस्मित की समानता कर सकता है। (यहाँ पुष्प और प्रनाल का, मुक्ता और विद्रम का असम्बन्ध में भी सम्वन्ध की उक्ति से 'यधर्थोक्तो' की कल्पना हुई।) इसमें कवि कल्पित उपमान और उत्पाद्य उपमा व्यवहार से उदाहरण दिया गया है। उक्त उदाहरण में उत्पाद्य उपमान की सभावना से उसके द्वारा उपमिति निष्पत्ति लक्षण रहने के कारण किसी भी प्रकार अतिव्याप्ति दोष नहीं है। अगर आप ऐसा कहें तो 'चन्द्र विश्घादिव विषम्' इत्यादि असभावित उपमा में अतिव्याप्ति दोष नहों होगा। वहा असभावित उपमान के द्वारा ही उपमिति क्रिया की निष्पत्ति से कवि के द्वारा विवक्षित होने से विवक्षानुसारित उपमिति क्रिया की निष्पत्ति है। (सुधा) अव्यापस्यन्तरं लक्षणस्य निराकरोति-पुष्पमित्यादि। यदि पुष्पं प्रवालस्थितं स्यादू, वा मुक्ताफलं स्फुटविद्गुमस्थं स्याद्, ततस्तदा तस्या विशदस्य निर्मलस्य ताम्रोष्ठव्याप्तरुचः स्मितस्य मन्दहसितस्य अनुकुर्याद् हत्यर्थिकायाः कविकविपतोपमानाया उत्पाद्योपमेति कविना व्यवहृतायास्तदुपमाया उदाहरणे यदि नोत्पाद्यस्योपमानस्य सम्भाविततवेनो- पमितिक्िमनिष्पत्या लक्षणसत्वालाव्यापिः। एवभ् 'चन्द्रषिम्बात्' इत्यसंभावितोपमावां 4 नाव्याप्ति:, असम्भावितेनैदोपमानेन तत्क्रियानिष्पत्तेः कविना विवक्षितरवेन विवक्षानु-

Page 117

उपमानिरूपणप्रकरणम् ७७

(चित्र०) न हि 'वस्तुसदर्थानिबन्धनोपमितिक्रियानिष्पत्तिरुपमा' इति लक्षणमुच्यते, किन्तु कविविवक्षानिबन्धना। अत एव शोके विर्वाक्षत इति विशेषणमर्थव- त्। अन्यथा 'चन्द्र इव मुखम्' इत्यादावपि लक्षणं न स्यात्, चन्द्रगत- कान्त्यतिशयस्य वस्तुतो मुखेऽभावेन विवक्षानुसरण विना गत्यभावात्। 'चन्द्र- धवला कीर्तिः' इत्यादौ च सर्वथैव लक्षण न स्यात्, कीर्तो धावल्यस्य लेशतोऽ- व्यभावात्। न चैवमनन्वयेऽपि कविविवक्षया स्वस्य स्वेनोपमितिक्रियानिष्पत्तिः संभवतीति वाच्यम्, सर्वथवानुपमत्वद्योतने कविसंरम्से सति तथाविवक्षानु- दयात्। 'वृथा चरसि कि भृङ्ग' इत्यादौ साहृश्याधिकरणस्यानुपलम्भोक्त्योपल-

भितिक्रियानिष्पत्तिरस्तीति नाव्याप्तिः। अत एव तस्य विशिष्यानुपादानादुप- मानलुप्तता। (भारती) वस्तु सदर्य निवन्धन के द्वारा उपमिति क्रिया की निष्पत्ति को उपमा का लक्षण स्वीकार करने से उस लक्षण में कवि विवक्षा निवधन से ही उपमिति क्रिया की निष्पत्ति है। अतएव उपमा के लक्षण वाले पद्य में विवक्षित विशेषण सार्थक है। अन्यथा कवि विवक्षा विशेषण के अभाव में 'चन्द्र इच मुखम्' उपमा के इस प्रसिद्ध उदाहरण में ही लक्षण का समन्वय नही होगा। क्योंकि चन्द्रमा में जो अतिशय काति है, उसका रमणी मुख में अभाव होने के कारण उपमा का लक्षण समन्वित नही होगा। यदि आप कहें कि सुन्दर नारी के मुख में भी आकर्पणजन्य यथाकथचित् कान्ति है ही तो दूषणान्तर उपस्थित करते हैं, 'चन्द्र धवला कीर्तिः' इस उदाहरणगत 'कीर्ति' में धावल्य का तो लेश मात्र भी नही है। फलत लक्षण में 'विवक्षित' विशेषण के विना सर्वथा लक्षणीयत्वापत्ति ही होगी। (सुधा) वस्तुसदर्थनिबन्धनाया उपमितिक्रियानिष्पत्तेरुपमालक्षणानङ्गीकराव्, कविविवक्षा- निबन्धनाया उपमितिक्रियानिष्पत्तेरेव लक्षणीयत्वाद्। अत एव लक्षणपद्ये विवच्षिस इति तदिशेषणं सार्थकम्। अन्यथा=कविविवत्ितेति विशेषणाभावे, 'चन्द्र इव सुखम्' इत्यादो प्रसिद्धोपमाया लक्षणं न स्यात्। चन्द्रगतकान्तावतिशयस्य वस्तुतो मुखेड भावेन कविविवत्तानुसरणं विना गतेरभावात्। न व मुखेडपि कान्तिसरवेन पश्यतो भावनया अतिशयस्य सत्वमेवेत्यस्वरसाद् दूषणान्तरमाह-'चन्द्रपवला कीर्तिः' इत्यादौ तु कीतो घावत्यस्य लेशतोऽप्यसावेन निवदितविशेषणं विना लर्वथा लक्षणीयर्वानापत्ते:। न चैवमिति। कविविनाितेति विशेषणादाने सति। अनन्वयेऽपि स्वस्थ स्वेनोपमितिक्रिया निष्प्षि: कविविवक्षया संभवतीति तत्रातिव्यापिरित्याशङ्कार्थः। समाधत्ते-सर्वंथैवानुप- मत्वद्योतने कविसंरम्भे सति तन्निष्पतती तहिवस्ोदयाभावाच्। दृथेत्याद्युपमानलुप्तायां नाव्याप्ति:, साहश्याधिकरणस्य वस्तुनोऽनुपलम्भोक्त्योपलभ्यमानेपु सादृश्य निषेधपर्य-

Page 118

चित्रमीमांसा

वसानेष्घनुपलभ्यमानं यदुपमानं तह्गतं यत्सादृश्यं तस्याभ्यनुज्ञानाद् तम्रोपमानलुप्ताया- सुपमितिक्रिया निष्पन्ेः सर्वात्। अत एव=तद्गतसादश्याभ्यनुज्ञानादेव, उपमानलुप्तता। (चिन्न०) एवम्, निरूप्यसाणं कविना सादृश्यं स्वात्मनो नचेत्। प्रतिपेधमुपादाय पर्यवस्यति सोपमा।। इत्यपि लक्षणमनुसंघेयम्। (भारती) लक्षण में कवि विवक्षा विशेषण देने पर अनन्वय में भी कवि विवक्षा से स्व का स्व के साथ उपमिति क्रिया निष्पत्ति की सभावना से अतिव्याप्ति दोप होगा। सर्वथा ही अनुपमत्व दोतन में कवि सरभ रहने पर वैसी विवक्षा का अभाव है। 'वृथा चरसि किं मृद्ग' इत्यादि में सादृश्या- धिकरण की अनुपलम्भाक्ति की प्राप्ति में-सादृश्य निषेध पर्यवसान रहने पर भी अनुपलभ्यमान, गत सादृश्य के अनुज्ञान से वहाँ उपमिति क्रिया की निष्पत्ति है ही, फिर अतिव्याप्त दोष नही है। अतएव उसका विशिष्य अनुपादान से उपमानलुप्ता है। इसी प्रकार, 'जहाँ कवि के द्वारा निरुष्यमाण सादृश्य, यदि अपनी आत्मा के साथ न हो तो प्रतिषेध ग्रहण कर उपमिति क्रिया निष्पत्ति से पर्यवसान प्राप्त करता है, वहाँ उपमा अलकार होता है।', यह लक्षण भी विचारणीय है। (सुधा) एवं लक्षणान्तरमपि व्याकरोति-एवमिति। कविना निरुष्यमाणं साधश्यं स्वात्मनश्चेव प्रतिषेधमनुपादाय पर्यंवस्यतीति उपमितिक्रियानिष्पत्तिपर्यवसानं प्रामोति, सा उपमा वेदितव्येत्यर्थः । इस्यपि लक्षणमुपमाया इति शेष:। (चिन्न०)

स्वनिषेधापर्यवसायि सादृश्यवर्णनमुपमा ॥ इति द्विविधमप्येतदुपमासामान्यलक्षणम्। अलङ्कारभूतोपमालक्षणं त्वेतदेवादुष्टाव्यङ्गत्वविशेषितम्, विशिष्टोपमादिस्थले विशेषणाद्युपसानां वाच्यभूतविशिष्टोपमादिसिद्ध चङ्गत्वात्। वाच्यसिद्ध यङ्गरूपगुणीभूतव्यङ्ग चतयैव तासां नालंकारतेति न तदव्यापन दोषः। 'न पद्मं मुखसेवेदम्' इत्यादौ नोप- मालंकारः, किन्तु प्रतिषेधाक्षिप्तप्सक्तितया भ्रान्तिमान्, तदुपपादकतयो- पमा चेत्युभयं व्यङ्गम्। तथापि भ्रान्तिमदादिकमपि साधर्म्यमूलत्वमात्रेणो- पमासध्ये परिगणयता दण्डिना तत्त्वाख्यानोपमेत्येतादृशव्यवहार: कृतः पर- मिति न तत्राष्यव्याप्तिर्दोष इति दिक।

Page 119

उपमानिरूपण प्रकरणम् ७ह

(भारती) (१) जो उपमिति क्रिया की सिद्धि से युक्त हो-अर्थात जिससे उपमिति क्रिया (तुलना) सिद्ध होती हो-ऐसे सादृश्य के वर्णन को उपमा अलकार कहते हैं। दीक्षित जी के अनुसार उपमा वहा होती है, जहाँ सादृश्य या समानता के वर्णन में उपमिति क्रिया की उत्पत्ति होती हे। (२) अपने (उपमा के) निपेध में जिसका पर्यवसान न होता हो अर्थात् जिसमें सादृच्य का वर्णन अपने निषेध में छिप नहीं सके। दीक्षित जी के मत में ये दोनों प्रकार के उपमा सामान्य के लक्षण हैं। इन्ही दो लक्षणों में अदुष्ट एव अव्यग्य शब्दों को जोडकर दीक्षित जी अलकार- भूत उपमा की परिभाषा बनाते हैं। 'त्वदाननम्' इत्यादि में विशिष्ट उपमाक्षिप्त विशेषण उपमा में अतिव्याप्तिदोष होगा। उसमें विशेषण उपमा का वाच्यभूत विशिष्ट उपमादि सिद्धयग है। वाच्य सिद्ध- यङ्ग रूप गुणीभूत व्यग्य से ही उसकी अलकारता नही है। ऐसी स्थिति में यदि लक्षण का समन्वय नहीं हो तो भी कुछ दोष नहीं है। 'न पझ्म मुखमेवेदम्' इत्यादि में उपमा अलकार है ही नही। किंतु, प्रतिषेध एव निषेध से उन्नीव जो प्रसक्ति है उसके भाव से भ्रान्तिमान अलकार है। भ्रान्ति की उपपादकता से दोनों उपमा व्यग्य ही है। भ्रान्तिमान आदि अलकारों को भी साधर्म्य- मूलता मात्र से उपमा के बीच में परिगणना करते हुए दण्डी ने तत्वाख्यान उपमा का केवल व्यवहार किया है। इस प्रकार 'त्वदाननम्' इसमें भी अव्याप्ति दोष नही है। इस प्रकार दीक्षित जी के विचार से वही सादृश्यवर्णन उपमा है जो दोषरहित हो, वाच्य हो तथा उपमिति की क्रिया से उत्पन्न हो। षिमर्श-अप्पय दीक्षित ने अपने चित्रमीमासा एव कुवलयानन्द दोनों ग्रथों में उपमा अलकार की परिभाषा दी है। कुवलयानन्द का उपमालद्वार का लक्षण जहाँ चलता एव चन्द्रालोक पर आधारित है, वहीं चित्रमीमासा का उपमा अलक्वार के लक्षण प्रौढ, परिष्कृत एव विस्तृत हैं। फिर भी पण्डितराज जगन्नाथ को चित्रमीमांसागत उपमा अलकार के लक्षणों पर कई आपत्तियाँ है। सर्वप्रथम उन्हें अव्यग्य विशेषण से आपत्ति है। उनका कथन है कि वर्णन दो प्रकार के हो सकते हैं, (१) वाह्य तथा (२) आभ्यन्तर। वाह्य वर्णन विशेष प्रकार के शब्दों के द्वारा होता है और आन्तरिक वर्णन विशेष प्रकार के ज्ञान के द्वारा सम्पादित होता है। अव विचारणीय प्रश्न यह है कि शब्दों के शब्द-वाच्य नहीं हो सकते। इसे यदि किसी तर ह वाच्य मान भी लें तो अनुभूतिजन्य ज्ञान तो सर्वथा शब्द-वाच्य हो ही नही सकता। फिर वर्णन की अर्थालकारता ही वाधित हो जाती है क्योंकि जो वस्तु शब्दों के द्वारा वाच्य होती है, वही अर्थ होता है। दूसरी वात यह भी है कि शब्द और ज्ञान रूप वर्णन किसी प्रकार व्यग्य नहीं हो सकता-फिर 'व्यग्य न हो' यह विशेषण ही निरर्यक है। यदि वर्णन को उपमालकार न कहकर वर्ण्न के विषय में आनेवाले तथाकथित विशेषणों से युक्त सादृश्य को उपमा कहें तो 'जैसा वैल उसी प्रकार नीलगाय' में उपमात्वापत्ति होगी। इसी प्रकार पाणिनि के सूत्र 'कालोपसर्जने व तुल्यम्' में भी उपमा अलकार होने लगेगा। क्योंकि यहाँ भी 'अनुशासन करने योग्य होने' इस अर्थ में समान धर्म द्वारा काल और उपसर्जन का 'प्रधान प्रत्ययार्थवचन' रूपी उपमान के साथ सादृश्य का प्रतिपादन है। दीक्षित जी के लक्षण में एक 'अदुष्ट' विशेषण भी है। अत उक्त सूत्र में वचनभेद दोप होने के कारण अतिव्याप्ति का स्वतः निराकरण भी नही कहा जा सकता है। क्योंकि 'कालोपसर्जने' का द्विवचन तथा 'तुल्यम्' का एक वचन व्याकरण की दृष्टि से शुद्ध होने पर भी साहित्य की दृष्टि से वचन भेद दोष से

Page 120

50 चित्रमीमांसा

दूषित है। फलतः 'अदुष्ट' विशेषण से ही उपमा का निवारण हो जायगा-ऐसा भी नहीं कहा जा सकता। क्योंकि सूत्रगत समग्रता को भिन्न कर 'कालः प्रधानप्रत्ययार्थवचनेन तुक्य.' तथा 'उपसर्जनम् प्रधान प्रत्ययार्थ वनेन तुल्यम' कहकर प्रत्येक उपमेय वाले दो वाक्य वना लेंगे। ऐसा करने से पुन. उन वाक्यों के निर्दोष सिद्ध हो जाने पर अतिव्याप्ति दोप वना ही रहेगा। तथाकथित ऊपर के उदाहरणों में सादृश्य वर्णन का अभाव कहकर भी लक्षण को निर्दुष्ट सिद्ध नहीं किया जा सकता है। माना, ऐसे उदाहरणों में उपमिति क्रिया के सिद्ध हो जाने पर भी उसे सादृश्य का वर्णन नही कहा जा सकता। क्योंकि उदाहृत कथ्य चमत्कारी नही है और 'वर्णन' का अर्थ ही है वर्णनीय वस्तु का चमत्कारी होना। अन. उपर्युक्त उदाहरणों में सादृश्य के रहते हुए भी सादृश्य वर्णन के अभाव में-लक्षण में कोई दोप नही आता। किन्तु; इस मान्यता की स्थापना के लिए लक्षण में चमत्कारित्व पद का समावेश अत्यावश्यक है। दूसरी बात यह भी है कि उपमा के प्रथम लक्षण में 'उपसिति क्रिया की सिद्धि से युक' विशेषण की व्यर्थत्वापत्ति भी होगी। क्योंकि सिद्धि के बिना केवल बाह्य प्रतीति वाला सादृश्य कभी चमत्कारजनक हो ही नही सकता और, जब उसे ही चमत्कारोत्पादक माना जाय तो फिर पूर्वोक्त विशेषण की कुछ आवश्यकता ही नहीं रह जाती है उपमा के द्वितीय लक्षण में समाविष्ट 'अपने निषेध में जिसका पर्यवसान न होता हो' यह विशेषण भी व्यर्थ है। क्योंकि कमलादि के सादृश्य निपेधात्मक व्यतिरेक अलकार में और अन- न्वय में भी 'सादृश्य के सर्वथा निषेध' के ही चमत्कारी होने के कारण वहाँ सादृश्य का निरूपण निषेध के लिए ही होता है। उसके निज की न तो प्रधानता होती है और न चमत्कारिता ही। अत उसे हटाने के लिए पूर्वोक्त विशेषण निरर्थक ही है। स्तनाभोगे पतनभाति कपोलात कुटिलोऽलक:। शशाङ्कविम्वतो से सैषम्बमान इवोरगः ॥ भरे-पूरे विशाल स्तनों पर कपोल से सरकता हुआ कुटिल केश, चन्द्र मण्डल से सुमेरु पर्वत पर लटकते हुए नाग की तरह शोभता है। इस श्लोक की उपमा प्रधानत वाक्यार्थ रूप है। अत. इसमें गौणत्वेन अलक्कार बाधित होने के कारण अतिव्याप्ति स्पष्ट है। क्योंकि यहाँ भी 'अदुष्ट' एव अव्यग्य' उपमिति क्रिया की सिद्धि से सादृश्य का वर्णन है। फिर वाधित अलकारत्व से प्रधान वाक्यार्थगृत उपमा के लिए अलग से तो लक्षण बनाये नहीं जा सकते। क्योंकि ऐसा करने पर भी 'व्यग्य उपमा' निवारणार्थ जो इतना प्रयास किया गया है, उसमें भी व्यर्थत्वापत्ति होगी। 'सादृश्य' की जगह् 'अभेद' की प्रधानता मानकर उपमा के स्थान पर उत्प्रेक्षा की भी यहाँ कल्पना नही की जा सकती। क्योंकि ऐसा करने से कर्पितोपमा के लिए कोई स्थान ही नहीं रह जाता, जिसे चित्रमीमासा में काफी महत्त्व दिया गया है। बाधित अलकारत्व वाली उपमा की परिभाषा बनाने में दीक्षित जी का अधोंकित लक्षण ही बाधक वन जाता है -

'व्यापार उपमानाख्यो भवेद्यदि विवकनितः। क्रियानिष्पत्तिपर्यन्तमुपमालंकृतिस्तसा ।।' यदि उपमान रूपी क्रिया का-क्रिया की निष्पत्ति पर्यन्त, कथन अमीष्ट हो तो उपमा अल-

Page 121

उपमानिरूपण प्रकरणम् ८१

कार होता है। इस लक्षण में उपमा का अलकारत्व स्वतः स्वीकृत है। इसके अतिरिक्त उपमा के पूर्वकथित दोनों लक्षणों में दीक्षित जी ने स्वय 'अव्यङ्गथम् एव अदुष्टम्' दो विशेषणों को जोड- कर उपमा की परिभापा दी है। इसके अनुसार वही सादृश्य वर्णन उपमा है जो दोपरहित हो, वाच्य हो एव उपमिति क्रिया से समुत्पन्न हो। पूर्वोक्त 'स्तनाभोगे पत्तन्' पद्य में ऊपर लिखित उपमा की परिभाा से अतिव्याप्ति दोप हो जाता है। क्योंकि यहाँ उपमान और उपमेय के सादृश्य रूपी उपमा के स्वरूप से अतिरिक्त अन्य कोई वाक्यार्थ है ही नहीं, जिसे उपमा अलकृत करे। ऐसी स्थिति में उपमा का उक्त परिभाषा से केवल अलकार्य उपमा में अतिव्याप्ति होगी ही। इसके अतिरिक्त पूर्वकथित उपमा के दोनो लक्षणों में वर्णन के साथ 'सादृश्य' का विशेषण भी निरर्थक है क्योंकि उपमिति क्रिया की निष्पत्ति से समन्वित वर्णन ही तो उपमा होती है-औौर मात्र इतना कहने से ही अभीष्टार्थ की सिद्धि भी हो जाती है। क्योंकि सादृश्य के अतिरिक्त अन्य किसी वर्णन से उपमिति क्रिया की निष्पत्ति नहीं हो सकती। पण्डितराज जगन्नाथ की ये सारी आपत्तियाँ दीक्षित जी की उपमा के लक्षण पर विचारणीय हैं। सर्वप्रथम पण्डितराज द्वारा उठाए गए वर्णन की वाधित अर्थालकारता एव वर्णन की अव्यग्यता विचारणीय है- अलंकार शास्त्र के उद्मव-काल में काव्य का अभिप्राय शब्द और अर्थ दोनों से था। अलकार- शास्त्रियों का एक दल शब्द को काव्य का सर्वस्व मान चुका था और दूसरा दल अर्थ-व्युत्पत्ति में काव्य का मर्म खोज चुका था। इन दोनों पक्षों में समन्वय की स्थापना के लिए सर्वप्रथम भामह ने सत्प्रयास किया है- 'शब्दार्थों सहिती काव्यम्' (काव्यालकार १,११-१६) अवविचारणीय प्रश्न यह है कि सादृश्यजन्य उपमा में शब्द और अर्थ के साथ क्रमश. वाचक- वाच्य भाव रूप सम्बन्ध मान लेना किष्ट कल्पना मात्र ही है या और कुछ? क्योंकि शब्दश्रवण से अर्थ संप्रत्यय के होने का विचार एक दार्शनिक विचार है। पडितराज के अनुसार शाब्द- वोध किंवा वाक्यार्थ ज्ञान को यदि वाच्य मान लिया जाय, तव वर्णन का वाह्य और अन्तर्वि- भाग कर वाह्य-वर्णन में शब्द को स्वतः शब्द मान कर भी आभ्यन्तरिक वर्णन में ज्ञान को सर्वथा अशब्द वाच्य कहकर आपत्ति उठाई है, उसका क्या होगा? क्योंकि ऐसी स्थिति में किसी भी शब्द का अर्थज्ञान फल मान लिया जाय तो शब्दज्ञान उसका असाधारण कारण तथा शब्दार्थ ज्ञान को शव्दज्ञान रूप असाधारण कारण का व्यापार एव विषयगत सकेतित अर्थ को सहकारी कारण मानना ही पडेगा। क्योंकि पडितराज के अनुसार अर्थाधिकृत यह सकेत शब्द और अर्थ में वाच्यवाचकभाव से सम्वन्धित है। किंतु, तथ्य इसके विपरीत है-वैशेषिकदर्शन का यह सूत्र 'सामयिकः शब्दादर्थसम्प्रत्ययः' इसी बात को प्रमाणित करता है कि किसी शब्द से उसकी जो अर्थप्रतीति है, वह 'सामयिक' एवं 'साकेतित' है। न्यायदर्शन का यह सूत्र 'न साम- यिकर्वात् शब्दार्थसउप्रत्ययस्य' भी इसी वात को पुष्ट करता है कि शब्द से अर्थज्ञान 'समय' अयवा 'सकेत' के ही अधीन है। यह सकेत मनुष्य-समाज की भाषासम्वन्धी सविदा है। पाश्चात्य आलोचक भी शब्द को एकप्रकार का प्रतीक (Symbol) मानते है- Symbols can serve as intellgible records for the Sohtary mdividual ६ चित्र०

Page 122

म२ चित्रमीमांसा

only if he remembers the meanings wlnch he has assigned to the Symbols he had used, and they can be vehioles for inter-persona! Commumcation only if Commumeator and Communicant can ngree, by speuii arrangem- ent or by a partioipation in n Common heritage, on the mennings of the symbols to be employed. ( Greene . The Arts & The Art of Craticism. ) इतना ही नहीं, 'अर्थ' जितने भी होते है-शब्द के एी। फलतः पाल और अभ्यंतर नही, अपितु एमारे ज्ञान के विपयों औौर शब्दों के गर्यों का देन ए्वा ही ऐ और पक गमान एी व्यापक है। किसी भी काव्य के लिए शच्द अगर साधन तो सर्थ उपकरण है। ऐसी स्थति में फेवल शब्दवाच्य को दी अर्थालकार मानना चुक्तिसगत प्रतीत नहीं होता। बयोकि अर्थोलद्ार के महत्त्व को ऑकनेवाले सहदयजन पण्ठितराज के उक्त तर्क में तथ्य नहीं मानने। निप्कर्षस्वरूप हम कह सकते है कि किसी भी काव्य का सौन्दर्य इसमें निद्दित होता है और रस विभावादि पर आश्रित होता है। वे विभावादि अर्प रूप में परणत होकर ननत्कारोत्पादय रोते है। अर्था- लक्गार में शब्द तो निष्किय ऐोता है। अतः पण्टिसरान का यह कथन कि जो वस्तु या वर्णन शब्द वाच्य नहीं ऐै-वह अर्थोरकार नहीं, बिलकुत हो एकपक्षीय तिचार प्रतीत हषोता है। इनकी दूसरी आपत्ति ऐ-शब्दरूप अथवा सानन्म वर्णन जन सर्वमा अव्यग्य ह नो चित्रमीमासा की उपमा के लक्षण में 'अव्यग्य' विशेषण बिलकुन्त ज्यर्थे है। ध्वनिवादियों ने अर्थ की विशेपताओं का विस्ेगण करते दुए अर्थ के दो रूप नाने ह- (१) वस्तुरूप और (२) अल्काररूप। वन्तुरूप अर्थ को व्यन्यपरक अथवा व्वकयाशविशिष्ट परक वनाने के लिए कवि सतत सचे रहता ह। समकारूपजये भी काव्य में रवतः चमत्कार- जनक नहीं होता, वल्कि उसे चगत्कारी बनाने के लिए मा व्यग्यपरता की दी आवस्यकता होती है, जिसकी पूर्ति कवि काव्य के शन्दचन्धविनेप से करता ह। क्योंकि बिना शब्दबन्ध एवं उसके इन उपकरणों का शब्द और अर्थ का सन्वन्ध व्यंग्य-्यंजक माव से अक्षुप्ण नहीं रह सकता। अत रसगगाधरकार का यद करकर चिननीमाता की उपमा के लक्षण से 'अव्यग्य' विशेषण का प्रत्याख्यान उचित नहीं लगता कि 'शब्दरूप अथवा मानरूप वर्णन सर्वथा ही अव्यंग्य है।' कुछ उदाहरण से शब्द एव ज्ञान रूप वर्णन का व्यन्यत्व स्पष्ट सिद हो जायेगा। वर्णनविशेप के शब्दों से फूटकर गएन व्यन्य निर्वद कैसे दन जाता है? दुख की कठोरता पिघलकर कैसे मुस्कुराती है? आँसों के आँसू चसे इँसते है? यह देखना हो तो मृच्छकटिक में चारुदत्त की यह उक्ति देखिए- 'दारिव्य शोघामि भवन्तमेवमस्मच्छरीरे सुदृदितयुपिरा। विपप्नदेहै मयि मन्दभाग्ये समेति चिन्ता व गमिष्यसि त्वमू ।।' 'रे माई दारिश्र' मुझे तेरा ही सोच साये रालता है कि तू इतने दिनों तक सच्चे टोस्त की तरह मेरे साथ रहा, कभी क्षण भर के लिए अकेला न छोडा, पर तब; ज मै न रहूँगा, तृ कहाँ जायेगा ? मुझे इसकी बटी चिन्ता है।' हृदय की वेदना आाँखों से उमढ पढती है। व्याकुलता भी व्याकुल हो उठती है। नियति की ज्वाला में जलती हुई मुस्कान। समाधि दीप की बुझती छुई लो सा रिसता हुआ वर्णन विशेष का शाब्दिक व्यग्य। इतना ही नहीं, 'मुद्राराक्षस' में इससे भी अधिक सधे हुए कट-मधु शब्दों में कसे गए व्यग्य-चित्र देखिए-

Page 123

उपमानिरूपणप्रकरणम्

'पृथिष्मां कि दग्घा: प्रथितकुलजा भूमिपतयः, पति पापे मौर्य यदसि कुलदीनं वृतवती? प्रकृत्या वा काशप्रभवकुसुमप्रान्तघपळा पुरन्ध्रीणां प्रज्ञा पुरुषगुणविज्ञानविमुक्नी।' यहाँ राक्षस की पराजित वुद्धि का आकोश अद्सुत है। आरभ की दो पक्तियों का कटु उपालभ क्रमशः घुलता हुआ उत्तराद्ध में द्रवित शाब्दिक व्यग्य वन गया है। सम्पूर्ण नारी जाति की प्रज्ञा की समीक्षा में करुण विनोद वृत्ति अत्यन्त मार्मिक है। अब एक दो शञानरूप व्यंग्य का वर्णन भी देखिए। विशेषतः सस्कृत के भाण और प्रहसन ज्ञानात्मक वर्णन से समुद्भूत व्यग्य से ही ओत-प्रोत हैं। यह सच है कि ड्राइडन, पोप या वाल्टेयर की तरह ये व्यग्य नहीं हैं। फिर भी क्षेमेन्द्र की 'समयमातृका' में व्यग्य के सभी संभव रूप मिलते हैं। कालिदास के- (१) 'एष ते अनुकूलो गलहस्तः' (२) 'अलं वामन्त:पुर विरहपर्युंरसुकेन राजर्षिणा उपकबेन' (३) 'मुष्टं प्रतिआ्राह्यता स्वमर्थ पाष्रीकृतो दस्युरिवासि येन' इत्यादि एक से एक बढ़कर वर्णनात्मक ज्ञानरूप व्यग्य के सवल सफल निदर्शन है। ज्ञानात्मक व्यग्य के ये निरुपम निदर्शन हैं, सक्षिप्त, सारगर्भ किन्तु चुटीला और नुकीला। इससे स्पष्ट है कि चित्रमीमासा के उपमा लक्षण में 'अव्यग्य' रूप सादृवयवर्णन की भावना तो सारगर्मित है ही; उपमा अलकार की चमत्कारी अर्थभावना भी सदथा अन्तर्व्याप्त है। आचार्य दीक्षित के लक्षण में इसी समीक्षा का स्वरूप झलकता है। जहाँ तक उपमान के साथ सादृश्यप्रतिपादन का प्रतिषेध करते हुए पण्डितराज ने पाणिनि के 'कालोपसजने व तुव्यम' सूत्र का उल्लेख किया है। वह भी अयुक्तिकर ही प्रतीत होता है। यहाँ विचारणीय प्रश्न यह है कि पाणिनि की अष्टाध्यायी के प्रथम अध्याय के द्वितीय पाद में सूत्र की अधोंकित क्रम सख्या है- ५३-तदशिष्यं संज्ञापमाणर्वाव ५६-प्रधान पत्ययार्थवचनम्थस्यान्यप्रमाणत्वास् ५७-कालोपसजने च तुस्यम् अब देखिए, ५३ वा सूत्र से ५६ वा सूत्र में 'अशिष्यम्' की अनुवृत्ति आती है। इसके अनुसार इस सूत्र का अर्थ होता है-'प्रकृति और प्रत्यय के अर्थो में से प्रत्यय की अर्थ प्रधानता होती है और मनुशासन करने योग्य नही है। क्योंकि यह बात लोकसिद्ध है। फिर इसी सदर्भ में ५७ वा सूत्र का अर्थ होता है 'काल और उपसर्जन के विषय में भी अनुशासन करने योग्य न होना समान है। तात्पर्य यह कि जिस प्रकार 'प्रत्यय का अर्थ प्रधान होता है' इस वात का अनुशासन करना लोकसिद्ध होने के कारण अनावश्यक है, उसी प्रकार काल अर्थात समय और उपसर्जन अप्रधान होता है। यह वात भी लोक-सिद्ध होने के कारण शास्त्र में लिखने की बात नहीं है। अत पण्डित- राज का यह कथन सर्वथा अयुक्तिकर है कि उक्त सूत्र में 'शास्त्र में न लिखने योग्य होना' समान धर्म है और 'प्रधान प्रत्यार्थवचन' उपमान है तथा काल और उपसर्जन उपमेय है अतः यहाँ उपमा होगी। ऐसा कहना मानो उनके लिए वदतोव्याघात ही है।

Page 124

चित्रमीमांसा

जहाँ तक वचनभेद दोप के सदर्भ में उक्त सूत को तोडकर-'काला प्रधानप्रत्ययार्थ- वचनेन तुक्यः तथा 'उपसजेन प्रधानपत्ययार्थवनेन तुक्यम्' सैसे एक-एक उपमेय वाल दो वाक्य बनाकर निर्दुष्ट सिद्ध करते हुए अतिव्याप्त दोप दिसाकर दीित जी के एक्षण मे उहिसित 'अदुष्ट' विशेषण का प्रत्याख्यान करने की चेष्टा की गयी है-वह और भी उपएासास्पट बन गया है। क्योंकि व्याकरणशास के शुष्क सुन के साथ रसात्मक साहित्य संदर्ग की कोई तुलना एी नहीं है क्योंकि साहित्य की विभिन्न विशेषताओं में रागात्मकता का प्रमुख न्यान ह। रागात्मकता से अचित्य, विशदता, स्थिरना, विविधता एवं प्रभावोत्पाठकता का तात्पर्य ससिहित है। औचित्य से यह अभिप्राय है कि साहित्य में भावों को तर्कसगत होना चाहिए अन्यथा उसमें गन्भीरता पर्वं स्थायित्व का सर्वथा अभाव ऐो जायेगा। विशद ए्व विविध मनोभार्वों को त्रहण करना भी सादित्य के लिए आवश्यक है। उसमें प्रभावोत्पादन की धगता की भी अपका रहती है। इसी रागात्मकता के कारण साहित्य में प्रभाव की तीव्रता और रसात्मकना का उपयुक्त समावेश होता है। साहित्य को रसमय एव आकर्पक रूप प्रदान करने के लिए या भी आवश्यक है कि मानव की रुचिभिन्नता को उसमें स्थान दिया जाय। ऐसी अवस्था में शुप्क व्याकरण के तथाकथित सूघ में दोप से मुक्ति कहा ? अतः लक्षण में 'अदोप' विशेषण भी तर्कसगत ही है। इतना ही नहीं चित्रकाव्य के शब्द और अर्थ चिन नामक दोनों भेदों में 'अदोपता' का तात्पर्थ पदादिगत दोषों के परिदार का दी तात्पर्थ दे न कि सूत्रगन वचन भेद से। आचार्य मम्मट ने अपने दोपनिरूपण में अर्थ चित्र काव्य के दोपों का जो निरीक्षण एव विवेचन किया है, वह पण्डितराज की अपेक्षा अधिक युक्तिसगत है। फिर भी उपगा के लक्षण से 'अदोपता' का वे मी प्रत्याख्यान करने में असमर्थ ही रहे। जहा तक 'मादृच्य' समन्वय के लिए दीक्षित जी के लक्षण में चमत्कारित्व विशेषण के समा- वेश का प्रश्न है-वह भी निरर्थक दी प्रतीत होता है, प्योंकि उपमा के लक्षण में 'चमत्कार' का उल्लेख न होने पर भी 'सादृश्य' का जी उन्लेस ह उसी के द्वारा चमत्कारित्व का आक्षेप स्वमावतः हो ही जाता है। क्योंकि 'सादृश्य साधारण धर्म रूप सम्वन्ध जिन किन्ही दो पदार्थों में ऐोगा, उस कथन में चमत्कारित्व रदेगा ही और आश्षिप्त चमत्कारित्व से 'सादृध्य' में किसी भी प्रकार के वैयर्थ्यापत्ति नहीं होती।

अव वची वात 'उपमिति क्रिया की निप्पत्ति' का प्रत्याख्यान-सो तो स्पष्ट ही है। वस्तुतः उपमिति क्रिया कवि की वह काव्य-दृष्टि है, जिसके द्वारा वह चराचर जगत की झाकी प्राप्त करता है। उपमिति क्रिया की साधना कवि की समदृष्टिसाधना है और इस साधना में कवि को जिसकी सिद्धि होती है, वह है सौदय। दीक्षित जी की उपमा के लक्षण का यदी महारहस्य है। (सुधा) अनुसन्धेयं विधारणीयमित्यर्थः। इयोः फलितार्थमाह-उपमितिक्रियेति। स्वनिपेधे स्यादि उपमासामान्यस्य लक्षणम्। अलद्कारभूतोपमालक्षणन्तु उपमितिक्रियानिष्पत्तिमद् दुषटाव्यम्षवं सादृश्यवर्णनमिति, स्वनिवेधापर्यवसायि अदुषव्यम्रयं सादश्यवर्णनमिति वा वोध्यम्। 'रदाननम्' इत्यादी विशिष्टोपमाष्षिप्तविशेषणोपमायामव्यासिं निवार्यति- विशिष्टेति। नस्यां विशेषणोपमानां वाध्यभूतविशिष्टोपमादिसिद्धेरस्रवाद्। वाच्यसिद्धय- शरूपगुणीभृतव्यक्लधरवेन तासामुपमानामलक्षारता नास्तीति तस्मिन् लक्षणस्याव्यापनं दोषो नास्तीति। 'न पद्मम्' इत्यादावुपमा नार्ति, किन्तु प्रतिषेधेन निषेधेन उद्नीता

Page 125

उपमानिरूपणप्रकरणम् या प्रसकिस्तन्वावेन भ्रान्तिमदलक्कारः। भ्रान्तेरुपपादकतयोपमा चेतयुभयं व्यङ्गयमेव। आ्रान्तिमदाविकमपि साधस्यंमूळतामान्नेणोपमामध्ये परिगणयता दण्डिना तश्वाख्यानो- पमेति केवलं व्यवहार: कृत इति। तम्रापि 'रवदाननम्' हत्यादावपि नाध्याप्तिर्दोप इति दिकू। भट्टाचार्यास्तु-'साधभ्यनिष्पततिरूपाया उपमितिक्रियाया अनन्वये सत्वादति- म्याप्िः। भेद्गर्भिततत्प्रतीती भेदनिवेशेन तद्वारणं किंमूलम्र ? भेदगरभितोपमितिक्किया- ज्ञानादेव विजातीयोपमितिक्रियानिष्पत्तिमूलमिति चेत् ! 'गोसडशो गवयः' इत्यादाव- तिव्यापिः। चिलक्षणसाधस्यज्ञानादिति चेत्? अनन्वयेऽप्यस्तु। न चानन्वये निरुपमर्व-

निरुपमत्वस्य स्वसाधर्म्यस्य च युगपत् प्रतीतौ विरोधाभावास। नघ तयोः युगपत् प्रतीतिसम्भवेऽप्याथस्यैव चमरकारजनकत्वं नान्त्यस्येति वाच्यम्; उपमितिक्रियावँ जाएये प्रमाणाभावात्, तद्टनात्यप्रयोजकाद्रसवैजात्यस्यैवोचितरवात्। रूपकादौ क्रियावैजातय-

विलष्षणज्ञानात्मकस्य वा वर्णनस्य शव्दवाच्यत्वाभावेनार्थालक्कारत्वस्य बाघाद। वर्णनस्य वाच्यायां व्यक्गयायाओ्रोपमायामव्यङ्गयतया तद्विशेषणवैयथ्याच। अथ यदि 'वर्णनविषयी भूतमुपमितिक्रियानिष्पत्तिमह्सादृश्यमुपमा' इस्युष्यते, तदा 'यथा गौस्तथा गवयः' इत्यम्रातिव्याप्ते: नापि च घमरकारिविषयकककविध्यापारस्येव वर्णनत्वेनोपमितिक्रियानिष्प- त्तावपि विषयस्याघमत्कारित्वेन सादश्यवर्णनाभावाजातिव्याप्तिरिति वाध्यम्; चमरकारि- त्वस्य निवेशे उपमितिक्रियानिष्पत्तिविशेषणस्य व्यर्थत्वापतेः। अनिष्पप्ेनापाततः प्रतीय- मानसाधश्येन चमत्कारानाधायकरवात्। एवं द्वितीयलप्षणेऽपि स्वनिषेधापर्यवसायित्वस्य व्यर्थत्वम्, व्यतिरेके कमलादिसादृश्यनिषेधस्यानन्वये च सर्वथा सा्षात् सादश्यनिषे- धस्य चमरकारितया तद्वारणाय सादश्याभिधानात्। किन्न, 'स्तनाभोगे पतन् भाति कपोलात् कुटिलोडलकः। शशाङ्टविम्वतो मेरौ लम्षमान हवोरगः।' इत्यादी मुख्यवाक्या-

वेति वाध्यम्, व्यत्चोपमानिवारणयतस्य व्यर्थत्वापत्तेः, अभेदप्राधान्ये उत्प्रेक्षाया वक्तु- मशक्यरवात्। अन्यथा कविकस्पतोपमाया निर्विषयर्वापस्तेस्तत्सूत्रेलट्गारभूतोपमाया

वाक्यार्थ:, येनोपमा तमलङ्ुर्यात्। किस्, सादृश्यविशेषणमनर्थकम्, 'उपमितिक्रिया- निष्पत्तिमद्वूर्णनमुपमा' इत्यनेनैवेर्ष्टससदे, इस्याहुः। अत्र ब्रमः उपमितिक्रियायाः साधर्म्य- निष्पत्तिरूपाया अनन्वये तावदसम्भवः, अनुपमत्वकथने कविघिवचतापर्यंचसानास, भेदगर्भितप्रतीतेर्लक्षणपदालाभाघ्व। 'गोसडशो गवयः' इश्यादौ नातिव्यापिः, साधर्म्य- ज्ञानसर्वेऽपि कविविवप्ताभावेन तस्याकिञ्जिस्करत्वास, ताह्शार्थे कवेरप्रवृध्या तमषिप्पत्तेः सुतरामभावाघ। कविविव त्तायामलौकिकसाघ्ग्यज्ञानस्य प्रयोजकरवा्, द्वयोः सर्वेऽपि निरुपमत्वप्रतीतावेव कविसंरम्भेण तस्या एव चमत्कारजनकतया साधम्यस्याप्रयोज- करवाथ। उपमितिक्रियाविजातीयता्या विवत्ितपदस्य बीजत्वाप्। ग्रधानीभूतरसवै-

लक्षणर्वेन कथनात्, घमत्कारजनकवर्णनविषयीभूतसाद्टश्यस्य वर्णनविषयीभृतस्व- निषेधापर्यवसायिसाहश्यश्य वा कथने तात्पर्यास्। सादृश्यस्य व शब्दवाच्यतासर्वेऽर्था-

Page 126

चित्रमीमांसा

सार्थकत्वास, विवक्षित इति पदेन चमरकारजनकरवस्य कथनादोसरशो गवय हस्या- दावतिष्याप्षेरभावाघ।ताहशविशेपस्यैव तहिपद्तार्या प्रयोजकरवात। अनन्ये चमरकार- जनकविषयसर्वेऽप्युपमिति क्रिया निष्पत्तेर भावस्य तव्वारकतया सफकतवेन तव्र्थरवशहायाः सर्वथासग्भवाप्। यत्तु 'स्तनाभोगे पतन्' इश्यादायप्यतिव्यासिकयनमशुद्दम, उद्-

तस्य प्रसिद्धी तदुपमानरक्ल्पनायुशस्य 'उद्धर्भ्हृणरमणी' इश्यादेः कविकतपतोपमो- दाहरणम्य सर्वेन त्िविपयत्वप्रसरस्याप्यभायान्त। यदपि, उपमानोपमेयसाहस्यो- पमास्वरूपाद तिरिक्वावयार्थस्थाभा वे नालवरणाश्यरवामावाव 'स्तनामोगे' इत्यादेरन- लक्कारभूतोपमात्वम्-इति, तदपि न, वाक्यार्थस्यवाकक्कर्यरे प्रमाणामाचाद, साद्येन सुसादेरुकर्पसम्पादनाप्, रसाऊभूतविभावादेदरफर्पाधायकरवे नालव्वाराणा तदुर्कर्पाधाय कताया नियमितत्वेन मुखादिरुपविभवादेरुकर्पाघायपरवेन परम्परासम्बन्धेन रसो- एकर्पाधायकरपसर्वास्। अङ्वोर्कर्पेण अदविन टरकर्पस्य सर्वसग्मतत्वाघ। 'उपकुर्वन्ति तं सन्तं येडम्द्वारेण जातुचिस्। हारादिवदलक्वारास्तेऽनुपासोपमादयः॥' इत्यादिना प्रामाणि फैस्तथैवासगीकाशचघ। अन्यथा घहुपमोदाहरणानामनुपपत्तेः। उपमितिक्रियानिप्पत्तिमद्ग- णंनस्योप्प्रेपादी सच्वेन तद्ारणाय सादश्यपदस्यावस्यकत्वेन तल्षिरर्थकताया अपि वकु मयोग्यत्वाद्। तस्मान्मूलों कं लक्षणं सभ्यगेवेति दिक। (चित्र०) सा चेयमुपमा द्विविधा-पूर्णा लुमा च। उपमानोपमेयसाधारणधर्मोपमावाचकानां चतुर्णामुपादाने पूर्णा। तेपा- मेकस्य द्वयोस्त्रयाणां वा लोपे सति लुप्ता। पूर्णायां क्कचित्साधारणघर्मरयानुगामितया निर्देशः । कचिद्वरतुप्रतिवरतु- भावेन। कवचिद् विम्बप्रतिबिम्वभावेन। कचिच्छलेपेण। क्कचिदुपचारेण। क्कचित्समासान्तराश्रयेण। क्वचिदेपां यथासंभव मिश्रणेन। लुप्तायां तु नैवं भेदाः। तरयां साधारणधर्मस्यानुगामित्वनियमात, किन्तु प्रकारान्तरेण भेदा वक््यन्ते। (भारती) सर्वप्रथम उपमा के दो भेद है-पूर्णोपमा और दुप्तोपमा। पूर्णोपमा वह है जहाँ उपमान, उपमेय, साधारणधर्म और उपमावाचक शब्द-उपमा के ये चारो अद् स्पष्टतया, निर्दिष्ट रद्दा करते हैं और लुप्तोपमा वह है जहाँ इनमें से एक अथवा दो अथवा तीन का लोप-अनिर्देश- रहा करता है। पूर्णोपमा में कहीं साधारण धर्म की अनुगामिता से निर्देश है, कहीं वस्तुप्रतिवस्तुभाव से, कहीं श्लेप से, कहीं उपचार से, कहीं समासान्तर के आश्रय से और कहीं इन सवों के यथासभव सम्मिश्रण से निर्देश है। साधारणधर्म की अनुगामिता के नियम से लुप्तोपमा में ये भेद नहीं हैं। किन्तु, प्रकारान्तर से भेद कहेंगे। (सुधा) उपमां विभजते-सा चेति। द्विविधेति सामान्यत इत्यर्थः । विशेषतो वषयमाणरवा-

Page 127

उपमानिरूपणप्रकरणम् 5७

दिति भाष: । इयोलंषणमाह-उपमानेत्यादि। उपमानादीनां चतुर्णामुपादाने पूर्णेशयर्थः। तेषामुपमादीनामेकस्य इयोख्त्रया्णां वा छोपे प्रतिपादकशव्दाभावे लुप्तेस्यर्थः। पूर्णोपमा- स्वञ्च विशेषत उपासशब्दशक्िपतिपादितोपमानोपमेयकरवे सति, विशेषतः शब्दोपास समानधर्मकरवे घ सति, विशेषतः स्वनिरूढशब्दगग्यरवम्। स्वपदमुपमापरम। उपमान- लुप्तायां लक्षणयोपमानप्रतिपत्तिसत्वे तद्वारणाय शक्तीति। समरवधूयन्तीत्यादावुपमेय-

विशेषणम्। एवमपि तन्वीत्यनेनाभ्नोपमेयस्य काव्यस्य सदशं न दश्यत ह्रयेवंचिध- लुप्लोपसानायासुपमानस्य च सदसपदोपात्ततवादतिव्याप्तिस्त द्वारणाय विशेषत इति । उपमेयोपमानतावच्छेदकरूपेणेत्यर्थः। धर्मलप्तायामप्युपमावाचकपदेन सामान्यतो धर्मस्योपातत्वाद्विशेषत इति। उपमाप्रयोजकतावच्छेदकरूपेणेति तदर्थ,। वाचकलुप्ताया- मपि लक्षणयोपमानादिपदेन तद्वगमादतिव्याप्िस्तद्वारणाय विशेषतः स्वनिरुढेति। तथा

प्रयोजकतावच्छेदकरूपभव्दोपापसमा नध्मकरवे घ सति विशेषत उपमानिरुदशव्दगम्यरवं तत्वमित्यलद्कारचन्द्रिकामतानुसारिणः। यथा 'चन्द्र इव मुखं रमणीयम्' इस्युदाहरणम्। अत्र इवपदमुपमावाचकम्। रमणीयत्व साधारणधर्म:, चन्द्र उपमानम, मुखमुपमेयमिति वतुर्णामुपादानादियं पूर्णा। उपमानतवं चोपमानिरूपकतया विर्वाकतत्वम, उपमाश्रयतया विवन्ितत्वसुपमेयरवम्। अन्रायं शान्दबोधप्रकार :- सादृश्यं पदार्थान्तरमिति पक्षे 'चन्द्र इव' इस्यादाविवार्थे सादृश्ये निरूपितत्वसम्बन्धेन चन्द्रस्यान्वयः, तस्य च प्रयोजकता- सम्बन्धेन रमणीयत्वेऽन्वयः । तद्विशिष्टस्याभेदेन मुखेऽन्वयः। तथा व चन्द्रनिरूपितसा- दृश्यप्रयोजकरमणीयरवावच्छ्िन्नं रमणीयचन्द्रभिन्नं मुखमिति बोध:। चन्द्ररमणीयं मुख- मिति समासे तु चन्द्रनिरूपितसाद्टश्यप्रयोजकं लचयते, तस्याभेदसम्बन्धेन रमणीयप- दार्थेकदेशे रमणीयत्वेऽन्वयः। तथा चन्द्रनिरूपितसादृश्यप्रयोजकाभिन्नरमणीय- त्ववदमिन्तं सुखममिति बोधः। निपातातिरिकनामार्थयोर्भेंदेनान्वयस्यान्युपसतया अभेदा नुसरणमेकदेशाऽन्वयस्य व्वन्नस्य गुरुकुलमिश्यादाविव न दोषः। समासस्यतादृशार्थे शकिरिति केचिव। चन्द्रपदस्येव लक्षणया सर्वार्थवोधकत्वे रमणीयपदस्य तात्पर्य- आइफता, इत्यपरे। चन्द्र इ भातीश्यत्र चन्द्रपदस्य चन्द्रनिरूपितसादृश्यस्य प्रकारता- सम्बन्धेन ज्ञानरूपे घातवर्थेऽन्वयस्तस्याभेदेन मुखादी। तथा व चन्द्रनिरूपितसादृश्य- प्रकारकज्ञान विषयाभिनं मुखमिति घी:। तत्रैव रमणीयतयेतिपदोपादाने प्रयोज्यत्वं तृतीयार्थः, तस्य घात्वर्थे इवार्थे सादृश्ये न्वयः। भाने तस्य व, तेन रमणीयताप्रयोज्यचन्द्रनिरूपितसादृश्यप्रकारकभानविषयो मुखमिति बोध:। चन्द्रवद्गमणीयमित्यन्र 'तेन तुष्यम्' इति विहितस्य वतेः सादृश्यव- दर्थकस्य साइश्ये लक्षणा, तस्य रमणीयपदार्थेकदेशे रमणीयरवेऽन्वयः। चन्द्र इव रमणी- यमित्यत्रेव घोधः। चन्द्रवन्मुखमित्यत्र चन्द्रनिरूपितसादृश्यवदभिन्नं मुखमिति धीः । धन्द्रषद्रमणीयमस्थेर्यम्र चन्द्रशब्दस्य चन्द्ररमणीयत्वे लाक्षणिकतया न्दरमणीयता निरूपितसाहश्याधिकरणमेतवुसम्बन्धि दमणीयरवम्। चन्द्रेण तुल्यमित्यत्र निरूपितत्वं तृतीयार्थ, तस्य सादश्येऽन्वयः, चन्द्रनिरूपितसादृश्याभिष्नमिति घीः । रमणीयतयेति ध्मानर्देशे प्रयोज्यतवं तृतीयार्थः। तेन चन्द्रनिरुपितरमणीयत्वप्रयोज्यसादृश्या दभिन्नमति योध । सादृश्यस्य समानधर्मत्वे तु चन्द्ररमणीय मुखमित्यम्र चन्द्रवृत्तिसमानधर्मप्रतीति

Page 128

चित्रमीमांसा בב

लंकणया, तस्य पाभेदेन रमणीयरवेऽन्वयः। चन्द्रवृत्तिसमानधर्मामिननरमणीयत्ववनमुल- मिति घीः। चन्द्र इव रमणीयमित्यत्र चन्द्रपदार्थस्य आधेयतासम्बन्धेन दवपदार्थ समान- धर्मेऽन्वयः। चन्द्राधेयसमानधर्माभिसनं रमणीयमिति मीः। रमणीयरवेन चन्द्रेण सम- मित्यन्र रमणीयत्वोप्तरतृतीयाया अभेदार्थकर्वम्। धान्येन पनीतिवत् चन्द्रोत्तरतृतीयाया: निरुपितत्वमर्थः । रमणीयरवाभिसं चन्द्रनिरूपितं यत्सादृवश्यं तदृदभिन्नमिति योधः । शेषं औत्यार्थीविभागे वच्यामः। तन्नेवादीनां दोतकर्वमेव न वाघकरवं निपातत्वादुप सर्गवत्। न घ तेषामपि वाघकरवमस्तिवति वाध्यम्; उपास्यते गुर, अनुभूयते सुस- मित्यादौ गुर्वादेर्लकारेणाभिधानानुपपत्तेः। उपसर्गवाध्योपासनस्य घात्वर्थताचिरहेण तज्जन्यफलशालित्वाभावाद। पवं साक्षात् कियते गुरुरित्यादौ, गुर्वाेरभिधानार्थ चोतक- ताया एव युकत्वाद। अन्यथा 'इरैरुसैरिवोदीर्यानुन्रिप्यन् रसानिव' हश्यादावुन्त्नादि- पदोत्तरं तृतीयादेरसक्कतित्वापत्तिः। उस्तादेरुवरणक्रियां प्रश्यकरणरवाद, दवार्थसारश्या- न्वयिरवेन करणीभूतशरविशेपणत्वाभावाघ। चोतकरये तूस्रादिपदस्योम्तसरशपरतयोख्र सदशैः शरैरिति विशेषणत्वसम्भचेन तृतीयादिसस्वसिः। ध्ोतकरवख्व स्वसमभिष्याहृतपदा न्तरेण शक्त्या लचणया वा तादशार्थयोधने तात्पर्यआ्रहकत्वेनोपयोगित्वमिति पैपाक- रणाः। नैयायिकास्तूपसर्गाणां धोतकरवेडपीवादीनी वाघफरये चाघकाभावः। निपातरवा- दिति हेतुस्तु अप्रयोजकरवान साधकः । अन्यथाऽव्ययत्वादिति घेतुता, अव्ययमाध्रस्येव पोतकतापत्तेरिति वदन्तीत्यन्यम्न विस्तर। पूर्णायां साधारणघर्मस्य कथने प्रकारमेदानाह-पूर्णाया मित्यारभ्य मिश्रणेनेर्यन्तेनेति। लुप्तायान्तु पवं भेदा न सभयन्ति। त्स्यां लुप्तोपमायां साधारणध्मस्यानुगामित्व- नियमात्। प्रकारान्तरेण=पकलुपरवादिरपेण, भेदा वचयन्ते इति। त्र तेपु भेदेपु साधारणध्म स्यानुगामिता यथा, तथोदाहियत दति शेप:। (चित्र०) तत्र पूर्णायां धर्मस्यानुगामिता यथा- वागर्थाविव संपृक्ती वागर्थप्रतिपत्तये। जगतः पितरी वन्दे पार्वतीपरमेश्वरी॥ औत्पत्तिकस्तु शव्दस्यार्थेन सबन्ध इति वागर्थयोर्नित्यसंबन्धित्वं प्रसिद्धम्। उमामहेश्ववरयोरप्यनयोर्न पृथग्भावः, चन्द्रचन्द्रिकयोरिवेति तत्प्रसिद्धम्। तथा च नित्यसंबन्धित्वरूपोऽन् साधारणघर्मोऽनुगामितया निर्दिष्टः ।

प्रेमशालित्वं महामहिमत्वमित्यादि व्यज्यते, तथापि न ध्वनिगुणीभूतव्यङ्ग्- व्यवहारः। न खलु व्यङ्गयसंस्पर्शप्रतिभासादेवात्र चारुताप्रतीति: किन्तु वाच्य- वैचित्रयप्रतिभासादपीति प्रायस्तन्न सम्भवद्रसादिरूपं व्यङ्गचमलंकारान्तरं चागणयित्वैव तत्तदलंकारा उदाहियन्ते। (भारती) पूर्णा में साधारण धर्म को अनुगामिता से जैसे-शब्द और अर्थ के समान नित्य मिले हुए,

Page 129

उपमानिरूपणप्रकरणम् दह

संसार के माता-पिता, उमा और महेश्वर को मै-कालिदास-शब्द और अर्थ का मलीभानि से ज्ञान होने के लिए नमस्कार करता हूँ। जहाँ तक नित्य सम्बन्ध का प्रघ्न है -- शब्द का अर्थ के साथ सम्वन्ध की तरह वाकू और अर्थ का सम्बन्धित्व प्रसिद्ध है। उसी प्रकार चॉद और चाँदनी की तरह उमा और महेश्वर का अपृथक् भाव भी प्रसिद्ध है। अत यहाँ नित्य सम्वन्धित्व रूप साधारणधर्म अनुगामिता से निदिंष्ट हे। यद्यपि उमा-महेश्वर का वाक और अर्थ की तरह नित्य सम्वन्धित्व के वर्णन से उन ढोनों के निरतिशय परस्पर प्रेम और महिमत्व की अभिव्यक्ति होती है। फिर भी ध्वनि गुणीभूत व्यग्य- परक व्यवहार नहीं है। यह भी नहीं कह सकते कि व्यग्य सस्पर्श के आभास से यहाँ चारुता की प्रतीति है, किन्तु, यहाँ उपमा वैचित्र्य के प्रकाश से भी चारुता है। जहॉ अलकार से चारुता है, वहाँ प्राय विद्यमान रसादिरूप व्यग्य प्रतिपादित कर अन्य अलकारों को बिना देखे ही अलकारों को उदाहृत करेंगे। (सुधा) 'वागर्थाविव' इस्येकपदम्। 'इवेन समासो विभकत्यलोपश्च' इति वार्तिकात् समासः। शब्दार्थाविव संपृक्ती नित्यसर्बद्धावित्यर्थः । 'नित्यः शब्दार्थसम्बन्घः' इति मीमांसका। जगतो लोकस्य, माता च पिता घ पितरी 'पिता मात्रा' इश्येकशेषः। पुतेन शिवयोः सर्वनगज्नकतया वैशिष्टयम्, इष्टार्थप्रदानशक्ति: कारुणिकत्वञ् व्यज्यते। पर्वतस्या- पत्यं स्त्री पार्वती 'तस्यापत्यम्' इत्यणि, 'टिडढाणज्' इति डीप। पावती च परमेश्वरश्घ तौ। परमशब्द: सर्वोत्तमत्वद्योतनार्थः। मातुरस्यर्हतत्वात् पूर्वनिपातः। वागर्थप्रतिपतये शब्दार्थयो: सम्यग ज्ञानार्थ वन्दे इत्यन्वयः। अन्रानुगामिता धर्मस्य समर्थयते- औत्पत्तिकस्विति। शब्दस्यार्थेन सम्बन्ध औरपत्तिकः स्वाभाविको नित्य इति वागर्थयो- नित्यसस्वन्धित्वं जैमिनिसुत्रे प्रसिन्दम् । शिवयोरप्यनयोः पार्वतीपरमेश्वरयोः चन्द्र चन्द्रिफयोरिच=इन्दुकौसुद्योरिव प्रथग्भावो न, इति पद्ये, तत्=नित्यसर्बन्धित्व मित्यर्थः। एवं चात्र पूर्णोपमायां नित्यसम्बन्घतवरूपो धर्मोऽनुगामितया=एकसम्बन्ध- रूपतया दर्शित हर्यर्थः। शक्ते-यथपीति। तथोः वागर्थवन्नित्यसम्बन्धत्वप्रतिपादनेन निरतिशयमिथःप्रेमशालित्वं महामहिमावं व्यङ्गयमस्तीति ध्वनित्वं सध्यमकाव्यर्वं वा,

देवान्र रमणीयताप्रतीतिर्नास्ति, किन्तु उपमावैचित्यप्रकाशादपि। यत्रालक्कारेण चारता, तम्र विद्यमानं रसादिरूपं व्यक्य प्रतिपाद्यातिरिक्कमलद्कारक्ा नालोक्येवालक्ाराणामु- दाहियमाणत्वमिति। यथा 'स्वच्छन्दोच्छलत्' इत्यादौ मन्दाकिनीविषयरति तीर्थान्त- रेभ्यो व्यति रेकश्वागणयितवैवानुपासमात्रवैचित्घेण शग्दचिम्रता, तद्दित्याशयः। (चिन्न०) एकस्यव धर्मस्य सम्बन्घिभेदेन द्विरुपादानं वस्तुप्रतिवस्तुभावः ।सच शुद्धो न सम्भवति, किन्तु विशेषणतया विशेष्यतया वा सर्वत्र बिन्बप्रतिविम्ब- भावकरम्बितः । वस्तुतो भिन्नयोर्धर्मयोः परस्परसादृश्यादभिन्नतयाध्यवसितयोद्विरुपादानं बिम्बप्रतिबिम्बभावः। तत्र वस्तुप्रतिवस्तुभावस्य विशेषणता यथा-

Page 130

चित्रमीमांसा

(भारती) एक ही धर्म का सम्वन्धिभेद से दो बार कथन वरतुप्नतिवसतु भाव है। वह शुद्ध रूप में असभव है। किन्तु विशेषण से अथवा विशेष्य से यह, विग्वप्रतिविम्वभाव सर्वत्र मिथ्रित है। वस्तुतः-परस्पर सारूप्य से परमार्थत भिन्न प्रतीत होने वाले एकत्व से मिश्रित साधारण धर्म का जहाँ शब्दभेद से प्रतिपादन ह, वहाँ विन्वप्रतिविम्वभाव है। उनके दोनों भेदों में विशेषण से उदाहरण देते है। जैसे- (सुधा) वस्तुमतिवस्तुभाषेन धर्म दर्शयितुं तक्लक्षणं पूर्वमाह-एकस्यैवेति। सम्बन्धिभेदेन= प्रतियोगिभेदेन द्विरुपादानस्य पौनरुक्त्यपरिदारार्थत्यम्। केवलस्य तस्यासत्वादाह- स चेति। वस्तुप्रतिचरतुभाव इत्यर्थः, शुन्तो घिम्घप्रतिविन्बभावादिरहित इत्यर्थ:। किन्सि्वति। विशेषणतया विम्वप्रतिविभ्वभावविशेपणतया विशेष्यतया तविरूपित यैवेश्यर्थः। परमार्थतस्तु दिभ्वप्रतिभिम्वभावस्येव शुद्धवमर्मान्तरविशिष्टरवाम्यां देविष्य- मिति अन्थकाराभिप्रायः। फरम्वितः, मिश्रित इत्यर्थ.। विम्पप्रतियिम्वभावलक्षणमाह- वस्तुत इति। परमार्थतो भिक्षयो: परस्परसारूप्याद एकरवेनाध्यवसितयोः= मिश्षितयोः साधारणधर्मयो: द्विरपादानं शव्दभेदेन प्रतिपादनमित्यर्थः। (चित्र० ) यान्त्या मुहुर्वलित कन्धरमाननं त-

दिग्घोऽमृतेन च विपेण च पन्मलाच्या वहन्त्या।

गाढं निखात इव मे हृदये कटाक्षः॥

मेक एव धर्मो विशेषगतया निर्दिष्टः । विशेष्यता यथा- सा तेन जगृहे साध्वी हठात् साध्वसकम्पिता। वानरेणातिलोलेन वाताधूतेव बह्लरी ॥

एव धर्मो विशेष्यतया निर्दिष्टः। (भारती) 'मालती के प्रथम दर्शन के वाद माधव अपने मिन्र मकरन्द से कद रहा है-मुझे वृन्तवाले कमल के समान वार-वार तिरछी गरदन वाले मुख को धारण करती हुई-अर्थात वार-वार लौटकर देखती हुई उस सुनयनीने, चलते-चलते मेरे हृदय में अमृत और विष से सना हुआ एक कटाक्ष तान कर मार दिया। क्या कहू, उसके मारे बेहाल हूं।' यहाँ 'गरदन' और 'वृन्त' में विम्वप्रतिविम्वभाव से 'झुकने' और 'तिरछे होने' रूप वस्तु- प्रतिवस्तुमाव से एक ही 'वक्रत्व रूप धर्म' विशेषण द्वारा दिखाया गया है। विशेषण से जैसे- 'अतिचचल वायु से कापती हुई लता की तरह भय से काँपती हुई वह साध्वी पतिन्रता

Page 131

उपमानिरूपण प्रकरणम् ६१

जानकी रावण के द्वारा पकडी गई।' यहाँ विम्वप्रतिविम्वभाव प्राप्त भय एव वायु से 'कम्पित एवं अवधूत' शब्द भिन्न रहने पर मी एक ही धर्म अर्थात् वस्तुप्रतिवस्तुभावरूप कम्पन धर्म विशेष्यत्वेन निर्दिष्ट है। (सुधा) तम्रोभयभेदे विशेषणतां तस्योदाहरति-यानत्येति । मालतीमाधवे पद्यम्। तया पदमलाचया माछत्या मम हृदये गाढं यथा स्यात् तथा कटाप्तो निखात इय दत्त इव, तदा तद्चलोकनं मे हृदयलपमिवेत्यर्थः। निखात इत्यनेन दुस्सहत्वमुक्तम्। कीदृश्या तदाननं वहन्त्येत्यर्थः। आननविशेषणं सुहुर्वळिता पक्रिता कन्वरा यत्न कणं कणं व्यावर्तमानमित्यर्थः, आवृत्तवृन्तम् आवजिंतनालं यच्छतपत्रं पझ्मं तन्निभं तत्तुव्यं वृन्ता- दारभ्यावर्तनेन पझ्मविवर्तनसिद्धिः कटाक्षविशेषणं पूर्वमानन्दहेतुतयाऽमृतेन दिग्धः उपचितः पश्चाद दर्शनानन्दविच्छेदाभ्विपेण दिग्ध इत्यर्थः। विशेषणतया वस्तुप्रतिवस्तु भावं दर्शयति-अन्नेति। विम्बप्रतिषिम्बभावेन दर्शितयोः कन्धरावृन्तयोः वलितावृत्त- शब्दभ्यामेक एव धर्मो वक्रत्वरूपो धर्मस्तद्विशेषणतया नि्दिष्टो दर्शित इत्यर्थः। वस्तुप्रतिवस्तुभावस्य विशेष्यतामाह-यथेति। साध्वसेन भयेन कम्पिता साध्वी पतिन्रता सा तेन रावणेन हठादू जगृहे। अतिचय्रलेन वानरेण वातेन अवधूता वल्लरीय। अत्र तद्विशेष्यतां निदिशति-अन्नेति। विग्वपतिबिम्बभावं प्राप्तयोः साध्वसवातयोः कम्पि- तावधूतशब्दाभ्यां भिग्नाभ्यामेक पव धर्मो वस्तुप्रतिवस्तुभावरूपः कम्पनताधर्मो विशेष्य- शवेन निदिष्ट इत्यर्थः। अम्र नव्या :- 'विमलं वदनं तस्या निष्कलङ्ं मृगाङ्कति' इत्यादौ

दकत्वं यद्यस्ति तदा शुद्धोऽपि वस्तुर्मातवस्तुभाष, न त्वन्न बिम्बप्नतिषिम्बभावः, वैमवयनि- ष्कलक्कत्वयोर्भेदाभावात्। न च सौन्दर्यादिनेवान्रोपमानसिदया न तस्य धर्मतेति वाध्यम्; 'यान्या मुहुः' इर्यादावपि तदभावापत्ेः। एवद्-'मुफाभिः सलिलरयास्तशुक्तिपेशी मुकाभि: कृतरुचिसेकतं नदीनाम्। सत्रीलोक परिकलयान्नकार तुल्यं पव्यङ्गेविगलितहार- चारुभि: रवैः॥' इत्यत्र मुकतारुचिरतवहारच्ारुत्वधर्मयोरपि भेदाभावाच्छुद्ध एव वस्तुप्रति- वस्तुभाव इति वदन्ति। (चित्र०) शुद्धबिम्बप्रतिबिम्बभावो यथा-'पाण्ड्योऽयमंसार्पितलम्बहारः इत्यादि। अत्र हरचन्दनबालातपौ हारनिर्भरौ च बिम्बप्रतिबिम्बभावेन निर्दिष्टौ। श्लेषो यथा- नरसिह महीपाल समस्तोऽपि रिपुस्तव। पारावारसमानत्वं दधाति स्वपद्च्युतः ॥ (भारती) शुद्ध विम्वप्रतिविम्वभाव के उदाहरण देते हैं। जैसे; 'यह पाण्डव गले में लम्बे हार लटकाए' इत्यादि। (पहले इस श्लोक की व्याख्या हो चुकी है।) यहाँ इरिचन्दन और चालातप तथा हार और निर्झर-विम्वप्रतिविम्वभाव से निर्दिष्ट है।

Page 132

हर चित्रमीमांसा

वस्तुतः पदार्थो के भिन्न रहने पर भी तद्गतभर्मों की अभिन्नता से जो ऐक्य प्रतिभासित होता है वही विम्ब-प्रतिविग्व भाव ह जहाँ आधारों की अभिघता से अर्थात् मिन्-भिन्न शव्द प्रतिपाद्यत्व रूप भेद से भिन्नत्वेन प्रतीत पदार्थों का ऐक्य प्रतीत हो, उसे वर्तुप्रतिवस्तुभाव कहते है। श्लेप, जैसे, हं नरसिंह। (यह सबोधन दोनों अर्थ में ह) तुग्हारे सी शत्रु समुद्र की समता धारण करते हैं। किस तरह, जो स्वपदात अर्थात् अपने स्धान से च्युत भर्थाव भ्रष्ट छोकर। दूसरे अर्थ में समुद्र भी सोये हुए अच्युत अर्थाद भगवान विष्णु को धारण करता है। यहाँ 'स्वपदच्यु- तरव' रूप धर्म दोनों जगह है ही। (सुधा) शुदूविम्सप्रतिविस्यभावं दर्शयति-पाण्टपोडयमित्यादि। पूर्व व्यासयातम्।

दृशित इति। यथा वा- उअणिशलणिप्पंदा भिसणीपत्तम्मि रेहहू चलाधा। णिम्मलमरगअभाअणपरिट्टिआा संससुत्ति व्व॥

रसगद्वाघरकृतस्तु अर्थगम्योऽप्ययं दृश्यते। 'मलय इव भाति पाण्दुर्वक्ष्मीक इयाघि- धरणि घृतराष्ट्रः' इत्यत्र चन्दनानो पाण्डयानां सर्पाणां दुर्योधनादीनां विम्बग्रतिबिम्य- भावस्य स्पष्टमुपछव्धेः। शव्दोपासस्य तन्त्नत्वे प्रमाणाभावाद्। तस्माद्वषिष्यमेव तस्यो- चितम्। प्रतिविम्वमाधस्योपादाने उपमाने धर्महानिर्दोप तत्र तत्स्थानीयधर्मानुक्के:। घिम्बसाम्रस्येधोपादाने घर्माधिक्यापतति:। तस्मापदापपयो: इयोरेव श्दावं इयोरेव वाच्यार्थत्वम्। न त्वेकस्य शाव्दृत्वम्, अन्यस्यार्थत्वमिति तर्वमिति वदन्ति। सेपेण तथ्र धर्ममाह-नरसिंहेति। नवसिंहेत्याद्ुभयं सग्योधनम। समस्तोऽपि सकलोऽपि तव रिपुः पारावारसमानत्वं समुद्रसमर्ता दधाति। कीदशः स्वपदाव प्युतः भ्रष्ट., समुद्ेणाऽपि स्वपन् अध्युतो पिस्मर्यंत इत्यर्थः। अन्र श्लेपेण स्वपदध्युत्ततवरूपो धर्म उभयत्रास्तीति। यथा या नेपधे-'उतकण्टका विलसदुज्ज्वलपप्रराजिरामोदभागनपराग- तराऽतिगौरी। रुद्रक्ुधस्तदरिकामधिया नले सा वासाथितामपृत काघन केतकीय।।' अम्र उत्कण्टकादीनां विशेषणानां दमयन्तीकेतकयो: लिष्टतेति। (चित्र०) उपचारो यथा- उद्भवन्तसुदितार्चिषं ततो भानुमन्तमिव हेमभूभृतः । पङ्कजैरिव कुमारमीक्षणैर्विस्मयेन विकचः पपुर्जनाः॥ अत्र विकास: पुष्पधर्म उपमेयेपु वीक्षणेपूपचरितः । समासभेदाश्रयणं यथा- तया प्रवृद्धाननचन्द्रकान्त्या प्रफुल्लचक्षुःकुमुदः कुमार्या। प्रसभ्चेत:सलिल: शिवोऽभूत् संसृज्यमानः, शरदेव लोक:।

Page 133

उपमानिरूपणप्रकरणम् ६३

अत्र प्रवृद्धाननचन्द्रकान्त्येति विशेषणं देव्यां शरदि च समासभेदेन प्रवर्तते। (भारती) उससे उत्पन्न उदित कान्ति को सुमेरु पर्वत से उदित सूर्य की तरह, विकसित कमलों की भाँति नेत्रों से आश्चर्यपूर्वक लोगों ने कुमार को देखा। यहाँ विकास रूपी पुष्पधर्म उपमेय आँखों में उपचार से युक्त है। समास भेद के द्वारा सामान्य धर्म दिखाते हैं; जैसे- 'शरदकाल के आगमन से लोक के समान पार्वती के चन्द्रानन की शोभा से शकर जी के नेत्र कुमुद खिल गए और मन सलिल की तरह निर्मल हो गया।' इस गलोक में 'परवृद्दाननचन्द्रकान्ति' इत्यादि विशेषण देवी और शरद् दोनों में समास भेद से साधारण धर्म है। (सुधा) उपघारं दर्शयति-उपचारो यथेति। स धान्यम्रान्यधर्मारोपरूपो बोध्य इति। उन्धवन्तमिति । जना मनुष्यास्ततः प्रादुर्भवन्तं उदितकान्ति हेमभूभृतः सुमेरोर्भानु- मन्तं सूर्यमिच, विकर्ष: विकसितैः पङ्मजैरुपलैरिव ईक्षणः नेत्रैविस्मयेनाश्वर्येण पपुः सादरं दद्दछरित्यन्वयः । उपचारमुपपाद्यति-विकास: पुष्पधर्मो मुख्यत्वेनेति शेष:, कोचनेपूपचरितः= उपचारेण युक इश्यर्थः। समासभेदेन सामान्यधमं दर्शयति-तयेति। आननं धन्द्र इवेत्युपमितिसमासः। आननमिव चन्द्र इति द्वितीयपक्षे, प्रवृद्धा आननवन्द्व्स्य कान्तियंस्यास्त या तथोकया शरदा लोक इव संसृज्यमान: संगच्छमान: शिवः, चत्तृंषि कुमुदानीव तानि प्रफुल्लानि यस्य, वनूंषीध कुमुदानीव तानि प्रफुक्लानि यस्मिन् चेतः सलिलमिव तत्प्रसम्नमस्य चेतोवत् सलिलं वा प्रफुल्लमस्येति वा तादृशोऽभूद्। अन्न श्रोके प्रवृद्धाननचन्द्रकान्त्येरयादि विशेषणं कुमार्यां शरदि च समासभेदेन साधारणधर्मडस्तीति। (चिन्र०) मिश्नणेष्वनुगामित्वबिम्बप्रति बिम्बभावयोमिश्रणं यथा- भीमकान्तैर्नृपगुणैः स बभूवोपजीविनाम्। अधृष्यश्चाभिगम्यश्च यादोरत्नैरिवार्णवः॥ अत्राधृष्यत्वमभिगम्यत्वं च नृपगुणानां यादोरत्नानां च बिम्बप्रतिबिम्ब- भावमपेक्य लब्धात्मकं साधारणो धर्मः । अनुगामित्वश्लेषयोर्मिश्रणं यथा- गते तव भ्रतरि वत्स पच्तां चिराय नश्चान्द्रमसं कुलं महत्। अदृष्टसन्तानतया न शोभते वनं हरे: प्राञ्थनादिवोद्घेः॥ अत्र सन्तानशब्दश्लेषमपेदय लव्घात्मकं शोभारहितत्वं साधारणो घर्मः।

Page 134

६४ चित्रमीमांसा

(भारती) मिश्रण भेदों में दोनों के मिश्रण दिसाते हुए अनुगामित्व रूप विम्बप्रतिविम्व भावों का मिश्रण के द्वारा धर्म दिखाते हैं। जैसे- 'भयानक और मनोरम राजगुणों (तेज, प्रनाप आदि ओर दया दाक्षिण्यादि) के कारण आश्रितों को वह राजा दिलीप, जल-्जन्तु और रतों के कारण समुद्र के समान दूर रहने योग्य और सेवा करने योग्य हुए। इस श्लोक में राजा के गुणों के और रलों के विम्वप्रतिचिन्वभाव की अपेक्षा 'सब्घस्वरूप- मषण्यत्व' और 'अधिगम्यत्व' दोनों का एक संबध से दोनों जगह उपस्थिति-अनुगामित्व रूप साधारण धर्म है। अनुगामित्व और श्लेप के सम्मिश्रण से, जैसे- 'हे वत्स' तुम्हारे भाई की मृत्यु हो जाने पर यह वहुत वढा चन्द्र कुल अद्ृष्ट संतानाभाव से समुद्रमन्थन से पूर्व इन्द्र के नन्दन वन की तरह नहीं शोमते है। इस श्लोक में सन्तान शब्द का असण्ड ब्लेप से पुत्रत्व और पारिजातत्व की अपेक्षा का 'गोभा- रहितत्व साधारण धर्म का एक के साथ सम्बन्ध कथन से अनुगामिता है।'

(सुधा) मिश्रणभेदेपु द्वयोमिश्रणं प्रशयन् अनुगामित्वविम्यप्रतिथिम्वभावयोर्मिश्रणेन धर्मसुपदि- छति-यथेति। सीमैः कान्तेस्व नृपगुणैः राजगुणेः तेजप्रतापादिभि: कुलशीलदाक्षिण्यादि भिन्व स दिलीप:, उपजीषिनाम् आश्नितानां यादोभि: जलग्राहैः। 'यादांसि जलजन्तव.' हरय- मरः। रत्नैश्चार्णय इषाषटप्योऽनभिभवनीयश्चाभिगम्यश्चाभिश्रयणीयश्च वभूवेत्यन्वयः। अन्न छोके नृपगुणानाद यादोरतानाय विम्बप्रतिविग्वभावापेष्या लब्घस्वरूपमषृप्य त्वाभिगम्यत्वयोरेकसग्वन्धेनोभयन्र सर्वादनुगामित्वरूपः साधारणघर्मो वर्तत इति तत्समन्वयः । अम्र अन्थक्ृतानुक्तमपि अनुगामित्ववस्तुप्रतिवस्तुभावयोरुवाहरण यथा- 'वैवस्वतो मनुर्नाम माननीयो मनीषिणाम्। आसीन्महीमृतामाद्यः प्रणवरछन्दस्तामिव।।' अन्न मनुप्रणवयोरुपमायां छन्दोमहीमृतां विम्वप्रतिचिम्मभावापननानां विशेषणतया आद्यत्वमुककं, मनीपिमान्यव्वमनुगतधर्मः। अनुगामित्वश्रेपयोरुदाहरणं दर्शयति-गते इति। हे वक्स तव भ्रातरि पञ्चतां नाशभावं गते सति नोडस्मार्कं चान्द्रमसं चन्द्रसम्वन्धि• महत्कुलम्, अदषसन्तानस्य भाघस्तया, उद्धेः समुदस्य मथनाछ् पूर्व हरेरिन्द्रस्य वनं नन्दनमिव न शोभते इत्यन्वयः। अत्र सन्तानशब्दस्याखण्डक्षेपेण पुम्रत्वपारिजातत्वमपेषय

(चित्र०) अनुगामित्वोपचारयोर्मिश्रणं यथा- तडिदुज्जवलहेतिमुत्तर: कुरुराजध्वजिनीं विलोकयन्। प्रिययेव भिया सकम्पया परिरेभे घृतघर्मपाथसा॥

Page 135

उपमानिरूपण प्रकरणम् EX

अत्र सकम्पत्वानुगामिधर्मापेक्षया लव्घचारुभावं परिरम्भकर्तृत्वं भीत्या- भुपचरितम्। (भारती) अनुगामिता और उपचार के सम्मिश्रण से जैसे- विजली की तरह चमकती श्वेत तलवार युत, विराट सुत उत्तर ने राजा दुर्योधन की सेना को देखते हुए, प्रस्वेद से श्लथ कम्पन युक्त प्रिया की तरह भय से धारण किया। यहाँ 'सकम्पत्व' अनुगामी धर्म है। एक सम्बन्ध के कारण उसका उभयवृत्तित्व से उसकी अपेक्षा प्राप्त चारुस्वरूप परिरंभकर्तृत्व मुख्य रूप से प्रियावृत्तिक भय उपचरित है। (सुधा) अनुगामितवोपचारयोरुदाहरणं दर्शयति-यथेति। तडिदुज्जवछखड्ग उत्तरो विराट् सुतः कुरुराजध्वजिनीं दुर्योधनसेनां विलोकयन् पश्यन् धतघर्मपाथः प्रस्वेदजलं यया तथाभूतया, सकम्पया प्रिययेव भिया परिरेभे परिरब्ध इत्यन्वयः। अम्र सकम्पत्वमनु- गामिधर्म:, एकसग्वन्धेन तस्योभयवृत्तित्वात्, तद्पेक्षया प्राप्तचारस्वरूपं परिरम्भकर्तृत्वं मुख्यत्वेन प्रियावृप्तिकं भीतावुपचरितमित्युदाहरणसक्गतिः। (चिन्न०) अनुगामित्वसमासभेदाश्रयणयोर्मिश्रणं यथा- श्येनपक्षपरिघूसरालकाः सान्ध्यसेघरुधिरार्द्रवाससः। अङ्गना इव रजस्वला दिशो नो बभूवुरवलोकनक्षमाः ॥I अत्र श्येनपक्षपरिधूसरेत्यादिविशेषणयोः समासभेदाश्रयणेन साधारण्यम- पेच्यानवलोकनक्षमत्वानुगाभिधर्मश्चारुतातिशयं पुष्णाति। (भारती) अनुगामित्व और समासभेदाश्रयण के सम्मिश्रण से जैसे- बाज नामक पक्षी के पखरूपी धूसर केश वाली तथा सायकाल के लाल मेघरूप रक्त से भीगे हुए वस्त्र वाली दिशाएँ, वाज के पखों के समान धूसर पखवाली तथा सायकाल के मेघ के समान रक्त से भीगे हुए वस्त्र वाली रजस्वला स्त्रियों के समान नहीं देखने योग्य हो गयों। इस उदाहरण में विशेषणगत समास भेदाश्रयण से साधारण्य की अपेक्षा कर दर्शन अनर्हत्वरूप एक सम्बन्धवृत्ति अनुगामि रूप धर्म, शोभा की अतिशयता स्पष्ट करता है। (सुधा) अनुगामित्वसमासभेदाभ्यां धर्मकथनमुदाहरति-यथेति-श्येनपषी इव परितो धूसरा अलका यासां ताः। पक्षे उपमितिससासः। सान्ध्यमेघा एव रुधिरार्ाणि वासांसि यासां ताः। पपे सैव समासः। रजोधूलिः, भस्ति यासां ता दिशोऽङना इव अवलोक- नक्षमा दर्शनारह नो वभूवुरित्यन्वयः। अम्रोदाहरणे विशेषणगतसमासभेदाश्नयणेन यद् साधारण्यं तद्पेचय दर्शनानहत्वरूप एकसम्पन्धवृत्तिरनुगामिधर्मः शोभातिशयं पुष्णातीत्युदाहरणसङ्गतिः।

Page 136

२६ चित्रमीमांसा

(चित्र०)

लिङ्गर्मुंद: संवृतविक्कियास्ते हनाः प्रसन्ना इव गूढनका । वैदर्भमामन्त्रय यजुस्तदीयां प्रत्यप्य पूजामुपदाच्छलेन ।। अत्र विम्बप्रतिबिम्बभावापन्नयोः क्रोधनक्रयोः संवृतगृढशन्दाभ्यामेक एव धर्म उक्त इति बिम्बप्रतिबिम्बभाववरतुप्नतिवस्तुभावः । सन्तोपचिह्नप्रसादयो-

(भारती) वस्तुप्रतिवस्तुभाव और विम्बप्रतिविम्बभाव के मिश्रण से जसे- चाहरी हर्ष के चिहों से छिपाए हुए विकार, भीतरी द्वेप वाले, अत एव जल में ढवकर छिपे हुए मगर से युक्त निर्मल नडाग के समान वे राजालोग विदर्म नरेश भोज के यहाँ से पूजा में आयी हुई मणि आदि सामग्रियों को भेंट के बहाने उन्हें लौटाकर और उनसे पूछकर यहाँ चले गए। इस उदाहरण में विम्वप्रतिविम्वभाव प्राप्त क्रोध और वक्र का सवृत गूढ शब्दों से भिन्न एक ही धर्म के उपात्त से वस्तुप्रतिवस्तुभाव का सतोपचिस और प्रसन्नता प्रमृति का विम्वप्रति- विम्वभाव के साथ लक्षण की अनुगति है। (सुधा) उभयमिश्रणे विम्वप्रतिविभ्वभाव वस्तुप्रतिवस्तुभावयोरुदाहरणं दरशयति-यथेति। मुदः सन्तोषस्य लिमेः कपटहासादिभि: संवृतविक्रिया निगूदाहद्वाराः प्रसभ्ना निमला गूढनक्रा अन्तर्लीनमाहा हदा इव स्थितास्ते नृपा वेदभंमामन्ध्यापृष्प तदीयां पूजामुपदाध्छ्लेन उपायनमिषेण समर्प्य प्रययुः गतयन्तः । अभ्नोदाहरणे विम्वप्रतिविम्वभावप्राप्तयोः क्रोधनक्रयोः संवृतगूढ शब्दाभ्यां भिन्नाभ्यामेकस्यव ध्मंस्योपाप्तत्वेन वस्तुम्तिवस्तुभावस्य

(चिन्न०) श्लेषबिम्बप्रतिबिम्बभावयोर्मिश्रण यथा- पार्थनाशमुदिता नृपात्मजा बाष्पमूहुरविनीतमन्यवः । आतपक्कथितपाथसो बहिः शीतगर्भसलिला इव हदाः॥ अत्र बाष्पशब्दे श्लेपस्य नृपात्मजहृदविशेपणाना बिम्बप्रतिनिम्बभाव- मपे्य चारुता। (भारती) श्रेप और विम्वप्रतिविम्बमाव के मिश्रण का उदाहरण, जैसे- पार्थ के नाश से प्रसन्न वह राजकुमारी वाहर धूप से गर्म तथा भीतर शीतल जल से युक्त सरोवर की तरह वाष्प अर्थात अश्रुपात करने लगी।

Page 137

उपमानिरूपणप्रकरणम्

इस शरोक में वाष्प शब्द में श्लेप है-नृपात्मजा और हद विशेषणों का विम्वप्रतिविम्वभाव की अपेक्षा से चारुता का अतिशय प्रकट होता है।

(सुधा) श्लेष विम्वप्रतिविम्बभावयोमिश्रणोदाहरणं दर्शयति-यथेति। पार्थेति। पार्थनाशेन मुदिता हष्टा अविनीतमन्यवो नृपात्मजा राजसुता वहिरातपेन कथितानि पार्थासि जलानि येषाम् 'कघन्घमुदकं पाथः' इत्यमरः, शीतानि गर्भे सलिलानि येषां ते ताहशा हदा इय वाष्प जलमश्रुपातञ्ज ऊहुरित्यन्वयः। अश्रोदाहरणे वाप्पशब्दे श्लेपो नृपात्मज- हदविशेषाणों विम्वप्रतिबिम्बभावापेष्षया चारुतातिशयं पुष्णातीति लक्षणसङ्गतिः। -- (चित्र०) उपचारबिम्बप्रतिबिम्बभावयोमिश्रण यथा- सा किलाश्वासिता घण्डी भर्त्रा तत्संश्रुतौ वरौ। भूर्बिलमग्नाविवोरगौ।।

नसुपमानोपमेययोद्वयोरप्युपचरितम्! मुख्यार्थस्य द्वयोरप्यसम्भवात, मुख्यार्थे तस्य ग्राम्यत्वाच्च। यदाहु :- (भारती) उपचार और विम्वप्रतिविम्वभाव के सम्मिश्रण से। जैसे- चण्डी (अतिक्रोधशील) उस कैकेयी ने पति के आश्वासन देने पर मेघ से सींची गई भूमि जिस प्रकार बिल में घुसे हुए दो सरपों को उगल देती है, उसी प्रकार पति के दिए हुए दो वरदानों को उगल दिया। इस उदाहरण में आश्वासित और इन्द्रसिक्त इन दोनों का वर और उरगों के विम्वप्रतिविम्ब- भाव की अपेक्षाकर उद्दमन का उपमान और उपमेय दोनों के साथ उपचरित सम्वन्ध है। क्योंकि उद्वमन रूप मुख्यार्थ का दोनों जगह होना असभव है। दूसरी बात मुख्यार्थ में उसकी ग्राम्यता मी है। यदि उपमेय में मुख्यार्थ का आदर है, तव वहाँ ग्राम्यदोष की प्रसक्ति है-ऐसा कहें तो प्राचीनों की सम्मति कहते हैं- (सुधा) इयोर्मिश्रणे बिम्बप्रतिविम्वभावोपचारयोरुवाहरणं दर्शयति-उपचारेत्यादि। सा किलेति। रघुकाव्ये कैकेयीवाक्यवर्णनं सेति। चण्डी अतिकोपना। 'चण्डसवत्यन्त- कोपनः' इत्यमरः । सा भर्त्ा दशरथेन आश्वासिता अनुनीता, तेन भर्त्रा संश्रुतौ प्रतिज्ञाती वरौ, इन्द्रेण सिक्ता अभिवृष्टा मूर्विले मग्नौ वद्मीकाड़ी मग्नी उरगाविव उद्दवाम उज्जगार । विम्बप्रतिबिम्वभावोपचारी रपष्ट्यति-अन्नोदाहरणे आश्वासिते- न्द्रसिद्ेत्यनयोः वरोरगाणाञ् विग्वप्रतिविग्वभाव उद्तमनस्य उपमानोपमेययोः इयोरेयोपधार उद्तमनरूपमुख्यार्थस्योभयभ्रासम्भवाद, सुर्यार्थे तस्य आम्यरवाक। यदि चोपमेये मुरार्थादरः, तदा तम्न आम्यदोषप्रसक्िः। तत्र प्राचीनसम्मतिमाह-यदा- हुरिति। ७ चित्र०

Page 138

चित्रमीमांसा

(चित्र०) निष्ठ्यृतोद्गीर्णवान्तादि गौणवृत्तिव्यपाश्रयम्। अतिसुन्दरमन्यत्र ग्राम्यकक्षां विगाहते॥ इति। एवमन्यत्रापि द्वयोमिश्रणमूद्यम्। (भारती) निष्ठथूतादिक गौणवृत्ति से आधारभृत होने के कारण अतिसुन्दर है। दूसरे मुख्यार्थपरक होने के कारण उस दोपकक्षा का भी अवगाएन करते हैं। इसी प्रकार अन्यत्र भी दोनों के मिश्रण की कल्पना करनी चाहिए। (सुधा) निष्ठय तादिकं गौणवृत्तित्य पाश्रयं गौणवृत्त्याधारभृतमतिसुन्दरम, अन्यत्त मुसयार्थ- परन्तु प्राम्यकर्ष्षा तद्दोपकर्था विगाहते अवगाहयतीत्यर्थ.। एवमन्यदपीति। तथा हि- समासभेदश्लेपयोरुदाहरणं सेतुकाव्ये-खुदिउप्पडिअमुणाल वट्टूण पिअ व सिढिलि अवलभं णलिणिम। महुअरिमहुरुव्लावं महुमअअम्व मुहं व घेप्पह कमलम् ॥' अन्र मधुकरीणां मधुरोज्लापमिति कमलपस्े, मधुकरीणामिव मधुर उद्लापो यन्रेति मुसपपे समासभेदः। पगगमदेन मदस्य मदेन चेति अखण्डश्लेपः। समासभेदविम्बप्रति- विम्वमावयोरपि तत्रैव। यथा-"वणदवमसिमदलागो रेहह विन्दोधणेहि घवले हि। खीरोदमन्थणुच्छ लिअदुद्ध सितो व्य महुमहणो ।I' अम्र विन्ध्यपसे वनदवमसीव तेन मलिनान्यद्ानि यस्य। विष्णुपक्षे वनद्घेन ममी तदत स्यामका# इति वृत्तिभेदः। श्वेतधनदुग्धयोः विम्बप्रतिविग्वभावः। वस्तुप्रनिवस्तुभावश्लेपयोरुदाहरणं श्रीषिश्वेश्वर- धरणानाम्-'सरसतरा इसितमुखी विभाति वरवणिनी नितराम। उन्मीलिनारविन्दा सरसीव विनिमिंतोकछिका ।I' अत्र विग्पम्तिविस्थभ वापसमुखकमलविषयक्स्येय धर्मस्य हसितोन्मीलितपदाभ्यां विशेषणतया निर्दिष्टरवाद्स्तुप्रतिवस्तुभावः। अतिशयेम सरसा रसवती अतिजला च विनिर्मिता रचिता उत्कृष्टा कामकला यया, यथा वा विनिर्मिता उर्कृष्टा कलिका कोरका ययेति श्लेष:। समासभेदोपचारयोरपि तेथामेव- 'मालतीमुकुळ कोमदन्सा मत्तवर्हिकुल केशकलापा। जीवयत्यसमसायकमेषा कामिनीव जलदागमलचमी: ॥' अत्र मालतीमुकुलाः कोमला दन्ता हव यस्या, मत्तं यह्र्हिकुलं तत्केशकलाप हव यस्या इति। कामिनीपपे मालतीमुकुला इव कोमला दन्ता यस्या:, मत्तबर्हिकुलमिव केशकळापो यस्या इति समासभेदः। जीवमत्यश्रोपचार, मुस्यजीवनस्य आत्मविशेषगुणजनक्रमनस्संयोगरुपस्य तम्राभावास्। समासभेदवस्तुप्रतिवस्तुभावयो- रपि तेषामेव-'धनप्रसवसस्कुलास्थगितशर्वरीघव्नभा विराजति बलाहकागमनकालिकी धौरियम। परं विहितगोचरीभवनपुण्टरीक्छटा तमालदुलमेचकावयवसननिवेशेव भूः॥' अब्र घनानां मेघानां प्रसव उत्पत्तिः। पछ्े, घनप्रसवो जलम, तेन सककुला १. खण्टितोश्पतितमृणालां टुष्टा प्रियामिव शिथिलितवलयां नलिनीम्। मधुकरीमधुरोल्लापं मधुमदताम्रं मुखमिय गृहाते कमछम॥ २. वनद्षमसीमषिनाक्ो राजति विन्ध्यो घनैघवलैः। वीरोदमन्थनोच्छलितदुग्धसिक्क इव मधुमथनः॥

Page 139

उपमानिरूपणप्रकरणम्

विहिसमनिषिदम, गोघरीभवनं यस्यास्ताटशी पुण्डरीकणछटा यस्या इति, अदृश्य- पुण्डरीकेत्यर्थः। समालद्लवत् रयामा; तमालद्लैः श्यामा; इति समासभेदः। षिम्थप्रति- विग्वभावापम्-चन्द्रपुण्डरीकयोः स्थगितत्वस्य विहितगोघरीभवनत्वस्यकस्यैय धर्मस्य

रुपेता भूय: पदस्खलननिह्नतिरप्रसक्ना। वाणीव कापि कुकवेर्मधुपानमत्ता गेहाव्जिपातपहुलेव विनिजंगाम ॥I' निरगमनस्य वाण्यामुपचारः। अन्यम्रापीति। अन्यद्पीत्यस्यार्थः। (चिन्न०) अनुगामित्वबिम्बप्रतिबिम्बभावसमासभेदाश्रयणानां मिश्रणं यथा- नृपं तमावर्तमनोज्ञनाभि: सा व्यत्यगादन्यवधूर्भवित्री। महीधरं मार्गवशादुपेतं स्रोतोवहा सागरगामिनीव। अत्र व्यत्यगादित्यनुगामिधर्मः । अन्यवधूर्भवित्रीसागरगामिनीत्यनयोर्वि- म्वप्रतिबिम्बभावः । आवर्तमनोज्ञनाभिरित्यत्र समासभेदाश्रयणमित्येतेपां मिश्रणम्। (भारती) अनुगामित्व विम्वप्रतिविम्वभाव समासभेद के आश्रयों के मिश्रण से। जैसे- पानी के आवर्त की तरह सुन्दर नाभि वाली तथा भविष्य में दूसरे अर्थात् अज की भार्या होनेवाली उस इन्दुमती ने रास्ने में आने से प्राप्त पर्वत को समुद्रगामिनी एव प्रवाह से बहने वाली नदी के समान (भावी पति अज के पास जाते समय) उन राजाओं को छोडकर आगे वढ गई। इस उदाहरण में 'आगे वढ गई', यहाँ अनुगामिधर्म है। अन्यवधूर्भवित्री' और 'सागर- गामिनी' इन दोनों में विम्वप्रतिविम्वभाव है। 'आवर्त' और 'मनोशनाभि' इसमें समास भेदाश्रय से सम्मिश्रण है। (सुधा) वहुनां मिश्रणेऽनुगामित्वविम्बप्रतिषिम्बभावसमासभेदानां मिश्रणमुदाहरति-यथेति। आवर्तवद् जलभ्रम इव मनोज्ञा नाभिर्यस्या, 'स्यादावर्तोडम्भसां भ्रमः' इत्पमरः। इदञ् नदीसाभ्यार्थमुक्तम्। अन्यवधूः अन्यस्य पत्नी भवित्री सा कुमारी तं नृपं सागर- गामिनी समुद्रगामिनी स्नोतोवहा नदी मार्गवशादुपेतं प्राप्तं महीधरं पर्वतमिव व्यत्यगाद ्यतीत्य गता। अन्रोकाहरणे व्यतीगायेति अनुगामिधमः। अन्यवधूर्भवित्रीसागरगामिनी त्यनयो: विम्वप्रतिबिम्बभावः । आवर्तमनोजञनाभिरित्यम्र समासभेदाश्वयणमिति त्रयार्णा सङ्तिः। (चित्र०) अनुगामित्वश्लेपोपचाराणां मिश्रणं यथा- असौ मरुच्चुम्बितचारुकेसरः प्रसन्नताराधिपमण्डलाग्रणीः । वियुक्तरामातुरदृष्टिवीक्षितो वसन्तकालो हनुमानिवागतः॥

Page 140

१०० चित्रमीमांसा

अन्रातुर दृष्टिवीक्षित इत्यादावनुगामिता; रामादिशव्दश्लेप: चुम्बितशब्दस्य वसन्तपच्चे उपचार; इत्येतेषां मिश्रणम्। एवमन्येऽपि मिश्रणोदाहरणभेदाः स्वयमेव द्रष्टव्याः । (भारती) अनुगामि ओर इलेप के मिश्रण से। जैसे- मरुच्चुम्वितचारुवेसर' मलयानिल के झोकों से मौलश्री को छृता (हनुमान के पक्ष में- पितृभूत पवन देव द्वारा चुम्वित शिखावाले) 'प्रसन्नताराधिपमण्टलायणी' कान्तिमान चन्द्रविन्ब को आगे किए (हनुमान पक्ष में-प्रसन्न सुग्रीव द्वारा अपने राष्टर में नायक रूप से नियुक्त) और 'वियुक्तरामातुरदृष्टिवीक्षित' वियोगिनी युवतियों द्वारा न्यानुता से देखा जाता हुआ (हनुमान के पक्षमें-सीतावियुक्त राम के द्वारा उत्सुकता से देखे गए) हनुमान की माँति स्पष्ट दीख पटता हुआ वसन्त आही पहुँचा। इस उदाहरण में 'आतुरद्ृष्टिवीक्षित' इत्यादि में अनुगामिता है, रामादि शब्द शलेप है, चुम्वित शब्द का वसन्त के पक्ष में उपचार है, और इन सवों का यहाँ मिश्रण है। इस प्रकार दूसरा भी मिश्रण का उदाहरणभेद स्वय देखना चाहिए।

(सुधा) अनुगामित्वश्लेपोपघारार्ण मिश्रणमुदाहरति-यथेति। मरुता चुम्यिताश्रेसर यस्य। प्रससनश्षासी ताराधिपश्र, तस्य मण्डलमग्रणीर्यंस्य। वियुफ्करामातुरदृष्टिभिः वीक्षितोऽसौ वसन्तकालो हनुमानिवागत इृत्यन्वयः। अग्रातुरद्ृष्टिवीचित इत्यादावनु- गामिता, ताराधिपरामशव्दयो :; चुन्धितशव्दस्य वसन्तपक्षे उपघार इति त्रयाणां मिश्रणम्। एवमन्यंर्डप मिशणभेदाः सोदाहरणा: स्वयमेव दष्टय्याः। तथया समास भेदानुगा मित्वोपघाराणसुदाहरणं सेतुकाथ्ये-'मुह्लघणपिप्पइण्णं जलणिवहं भरिभण- इमहीविअरम्। णईमुहपज्जहस्थ अप्पाण विणिगभं जसं व पिभतम्।' अम्र मुखरेत्यत्र मुखरेगंजोद्धिः घने. वृष्टम, पक्षे मुखरवन्थादिभिः घनं बहु ृत्वा वर्णितम्। भृततमो- महीविवरत्वमनुगामिधमंः। विनिगंतमित्यस्य यशस्युपचारः। निष्करमणाक्यस्य यहि :- संयोगजनककमेणो मूतमात्रधर्मतया यशस्यमावात्। उपचारसमासभेदश्लेयाणामुवा- हरणं तश्रैव-सरए सरम्मि पहिआा जलाइ कदोहसुरहिगन्बाइ। भवलच्छाइ सभद्ा पिभति दइभाण व मुहाईं॥'अश्र पियन्तीति सुखपक्षे उपघारः नीलोत्पलसुरभीति समास- भेद:, धवलानि च तानि अच्छानि च, धवलद्षाणि वेति खण्डश्लेप:। अनुगामित्वसमास- भेदश्लेषाणां यथा-'ताशामुक्काहारा समुदश्ितचन्द्ररुचिपवर्चा। विकसितकैरवहासा ज्योस्स्रीध वघूर्ज्वरं विधुनोति।' अन्र 'ज्वरं विधुनोति' इृत्यनुगामि, 'तारा' इत्यादो समासमेद:, चन्द्रपदे श्लेषः । उपचार विम्वप्रतिविम्बभावसमासभेदानां यथा-'विजम्भ-

१. मुखरघनविप्रकीर्ण जलनिवहं मृतसकलनभोमहीविवरम्। नदीमुखपर्यस्यमानमात्मनो विनिर्गत यश इव पिवन्तम्॥ २. शरदि सरसि पथिका जलानि नीलोस्पछसुरभिगन्धानि। धवलाक्षाण सतृष्णाः पिषन्ति दयितानामिव सुखानि॥

Page 141

उपमानि रूपणप्रकरणम् १०१

माणोघ्वतंकोरकस्तनी सरोजिनीं चुम्वति वासरेश्वरः। समुक्लमत् कुक्कुमपक्कलोहितो युवा नवीनां वरवर्णिनीमिव ॥' ह्रयत्र 'विजम्भमाण' इत्यत् 'समुझ्लसव्' इत्यादौ व समास भेदः। सरोजिनीवरवर्णिन्योर्िम्वप्रतिबिम्बभावः, 'चुम्बति' इति भानुपक्षे उपार हरयन्यत्र विस्तरः। (चित्र०) बिम्बप्रतिबिम्बभावोदाहरणेपु कश्चिद् विशेषः । क्वचित्प्रसिद्धसाधर्म्यतया प्रतीयमानसाधर्म्ययोर्विम्बप्रतिविम्बभावः । यथा-'पाण्ड्योऽयमंसापितलम्ब- हार:' इत्यादौ। कवचिदप्रसिद्धसाधर्म्यतया येन केनचित् प्रकारेणोपात्तसाधारण- धर्मर्योबिम्बप्रतिबिम्बभावः। यथा-'तया विवृद्धाननचन्द्रकान्त्या' इत्यादौ। अन्न हि शरदपर्णयोः स्वतोऽप्रसिद्धसाधर्म्ययोविवृद्धाननेत्यादिना समासभेदा- श्रयणेनोपात्तसाधरणधर्मयोरेव बिम्बप्रतिबिम्बभावः। यथाकथञ््चित् साधर्म्य- प्तीति विना बिम्बप्रतिबिम्बभावो न सम्भवत्येव। (भारती) विम्बप्रतिविम्वभाव के उदाहरणों में कुछ विशेषताएँ हैं। कहीं प्रसिद्ध साधर्म्य से प्रतीय मान साधर्म्य का विम्वप्रतिविम्वभाव है। जैसे-'पाण्ड्योयमंसार्पितलम्वहारः' (पूर्व व्याख्यात) में प्सिद्ध साधर्म्य से प्रतीयमान सामान्य धर्म का बिम्वप्रतिबिम्बभाव है। इसी प्रकार कहीं अप्रसिद्ध साधर्म्य से जिस किसी भी तरह से उपात्त साधारण धर्म का विम्वप्रतिविम्वभाव है। जैसे-'तया विवृद्धाननचन्द्रकानत्या' (पूर्व व्याख्यात) में 'शरदर्पण' का स्वतः अप्रसिद्ध साधर्म्य का 'विवृद्धानन' इत्यादि से समासभेद का आश्रय ग्रहण करने से उपात्त साधारण धर्म का ही विम्बप्रतिविम्वभाव है। क्योंकि यथाकर्थंचित साधर्म्यप्रतीति के विना विम्वप्रतिविम्वभाव असमव ही है। इस पर सदेह करते हैं, जैसे- (सुधा) क्वचिदुदाहरणे विशेषं दर्शयति-बिम्वप्रतिबिम्वभावोदाहरणेपु कश्चिद् विशेष इति। तमेव दर्शयति क्वचित्-'पाड्योऽयमंसापितलम्बहारः' इत्यादौ प्रसिद्धसाध्म्यंतया प्रतीय- मानसामान्यधर्मयोर्विम्बप्रतिविम्वभाव। क्वचित् 'तया विवृद्धाननचन्द्रकान्त्या' इत्यादाव-

अन्र हि शरदर्पणयोः स्वतोऽप्रसिद्धसाध्म्ययो विवृद्धाननेत्यादिना समासभेदस्याश्र- यणेनोपात्तसाधारणधर्मयोरेव विस्वप्रतिबिम्बभावः, यथाकथज्चित साधर्म्यप्रतीति विना तद्सम्भवात्। (चित्र०) ननु- यथा त्वं गुणवॉल्लोके तथा ते निर्गुणो रिपुः । इतीदमुपमानं तु विपरीन्मिति स्मृतम्॥ इत्युक्तरूपाया विपरीतोपमायाः कथं निर्वाहः। तत्र हि सगुणत्वनिगुणत्व-

Page 142

१०२ चित्रमीमांसा

योर्नोपात्तेन नवा प्रतीयमानेन धर्मेण साधर्म्यप्रतीतिररित। नैप दोष:, तत्रा- व्यात्यन्तिकत्वरवाभाविकत्वादिधर्मेण प्रतीयमानेन तथोः साधर््यप्रतीतेः। अन्यथा यथाशव्दोदितस्य सादृ्यरय सर्वथा निरालम्बनत्वप्रसद्भात्। एवं पूर्णाया दिगुदाहृता। (भारती) इस फोक में 'जैसे तुम गुणवान हो, वसे ही तुम्दारे शब्ु निर्मुण है।' यह उपमान तो विपरीत ही उदाहत है। इस प्रकार की विपरीत उपमा में तो अव्यापित दोप है। क्योंकि यहाँ समुणत्व और निर्गुणत्व की साधर्म्य प्रतीति उपात्त के द्वारा अथवा प्रतीयमान धर्म के द्वारा नही है। समाधान करते हुए कहते हैं, इसमें कोई दोप नहीं है। वहाँ विपरात उपमा में भी प्रतीयमानतन या ्वाभावाटिकत्व धर्म से उपमान और उपमेय की साधर्म्य प्रतीति ह। इसके अभाव में टोप बनाते ए-अन्यथा अर्थात निज स्वाभाविकत्वादि रूप, धर्म का प्रतीयमानत्य के अगाय में यथा शब्दोदित सादृदय का निरावलवनता प्रसग होगा। पूर्णा के प्रसग का उपसदार करते हुए दिखते है-ये पूर्णा के दिगमात्र उदाहत हैं। (सुधा) शककते-नन्विति। यधा लोके र्वं गुणवान् तथा ते रिपुनिर्गुण, इतीदमुपमानन्तु विपरीतं स्मृतमित्युक्तरूपायां विपरीतोपमायामव्यापिः। अन्र हि सगुणत्वनिर्सुणत्वयोः साधर्म्यप्रतीतेरुपात्तेन प्रतीयमानेन वा धर्मेणाभावात्। दति चेत्, समाधसे नैप दोप: तत्रापि विपरीतोपमाथामपि प्रतीयमानत्वस्वाभाविकत्वादिधमेंणोपमानोपमेययो: साधर्म्य- प्रतीते: सप्वाद्। तदभावे दोपमाह-अन्यथा=स्वस्थाभाविकतवादिरूपघर्मस्य प्रतीय- मानत्वाभावे, यथाशव्दोदितसादृश्यस्य सर्वया निरालम्बनताप्नसद्गाद्। पूर्णायाः प्रकरण- मुपसंहरति-एपा पूर्णाया दिग उदाहता, तेन श्रौत्यादयो भेदा वचयमाणा उपलक्षिता इति वोष्यम्। (चित्र०) लुप्ाष्ट्रविधा-वाचकलुप्ता, धर्मलुप्ता, उपमानलुप्ता. वाबकोपमानलुप्ता, धर्मोपमानलुप्ता, धर्मवाचकलुप्ता, वाचकोपमेयलुप्ता, धर्मोपमानवाचकलुप्ता चेति। क्रमेणोदाहरणानि- कैलासगौरं वृपमारुरूक्षो: पादार्पणानुग्रहपूतपृष्ठम्। अवेहि मां किद्करमष्टमूर्ते: कुम्भोदरं नाम निकुम्भतुल्यम्।। अत्र कैलासगौरमित्यत्र वाचकलोपः, निकुम्भतुल्यमित्यत्र धर्मलोपः। वाचकलोपः सर्वत्र समासविधायकशास्त्रकृतः, धर्मलोपस्त्वैच्छ्िक, प्रभावा- दिना निकुम्भतुल्यमित्यपि वक्तुं शक्यत्वात्।

Page 143

उपमानिरूपणप्रकरणम् १०३

(भारती) लुप्ता उपमा आठ प्रकार की है-वाचकलुपता, धर्मलुप्ता, उपमानलुप्ता, वाचकोपमानलुप्ता, धर्मोपमानलुप्ता, धर्मवाचकलुप्ता, वाचकोपमेयलुप्ता और धर्मोपमानवाचकलुप्ता। (१) वाचकलुप्ता-जहाँ केवल वाचक का लोप हो, उपमेय, उपमान एव धर्मे स्पष्ट रूप से वर्तमान हो, वहाँ वाचकलप्ता होती है। (२) धर्मलुप्ता-जहाँ उपमेय, उपमान एवं वाचक का कथन हो, किन्तु धर्म लुप्त रहे, वहाँ धर्मलुप्ता होती है। दण्डी इसे 'वस्तूपमा' कहते हैं। (३) उपमानलुप्ता-जहाँ उपमान को छोड कर उपमा के सभी अग प्रत्यक्ष रूप से दिखाई पडें, वहाँ उपमानलुप्ता होती है। (४) वाचकोपमानलुस्ता-जहाँ धर्म और उपभेय प्रन्यक्ष रूप से दिखाई पहें, किन्तु वाचक और उपमान का कथन न हो। (५) धर्मोपमानलुप्ता-जहाँ उपमेय और वाचक का कथन हो पर धर्म और उपमान न रहे, वहाँ धर्मोपमानलुप्ता होती है। (६) धर्मवाचकलुसा-जहाँ साधारण धर्म और वाचकलुप्त रहें, वहाँ धर्मवाचकदुप्ता होती है। (७) वाचकोपमेयलुप्ता-जहाँ वाचक और उपमेय लुप्त रहें, किन्तु धर्म औौर उपमान का कथन रहे, वहाँ वाचकोपमेयलप्ता होती है। (८) धर्मोपमानवाचकलुप्ता-जहाँ केवल उपमेय का कथन हो, वाचक, धर्म और उपमान लुप्त रहें, वहाँ धर्मोपमानवाचकलुप्ता होती है। क्रमशः इनके उदाहरण हैं- हे राजन्। कैलास पर्वत की तरह श्वेत वैल पर चढने की इच्छा करने वाले आठ (पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश, सूर्य, चन्द्र और सोमयाजी) मूर्त्ियाँ हैं, जिनकी ऐसे शिवजी के चरण रखने रूप अनुग्रह से पवित्र पीठ वाला, निकुम (शिव जी का प्रसिद्ध गण) का मित्र कुम्मोदर भाम से प्रसिद्ध 'शिवजी का नौकर' मुझे तुम जानो। इस उदाहरण में 'कैलास गौरम्' यहाँ वाचक लोप है, 'निकुंभतुल्यम्' इसमें धर्म लुप् है, उपमानानि सामान्यवचन.' इस सूत्र से 'कैलासवद्, 'गौरम्' इस अर्थ में वाचक दुप है। 'निकुभतुल्यम्' में ऐच्छिक धर्मलोप है। प्रभावादि से धर्म की कल्पना भी कह सकते हैं।

(सुधा) अथ लप्तोपमां चन्द्रालोकानुसारेण दर्शयति-लुप्ताष्टविधेति। एकलुप्ता त्रिविधा। वाघकध्मोपमानवाचकशव्दानां लोपाद दविलप्ता चतुविधा। वाचकोपमानयोः धर्मोप- मानयो: धर्मवाचकयोः वाचकोपमेययोश्चानुपादानात् म्रिलुप्ता एकविधा, धर्मोपमानवाच- कार्ना लोपात्। एतेषामुदाहरणानि क्रमेण दर्शयति-'कैकसगौर म्' इत्यम्र वाचकलोपः। कैकासवद्गौरमित्यर्थे 'उपमानानि सामान्यवचनेः' इति समासविधायकेन शास्त्रेण कृतः। मद्यपि समासानुशासनेन निरूलवणया तदर्थसम्भवेन वाचकलोपो न सम्म-

Page 144

१०४ चित्रमीमांसा

वति, तथापि आनुपूर्ष्यादिविशेषवत्तया शब्दविशेषेण तदबोधनाव तत्ूयवदार इति। 'निकुम्भतुषयम्' इस्यन्न धर्मलुप्ता। स स्वन्रैष्डिक इति दर्शयति-धर्मलोप इति। प्रभा- वादेधर्मस्य कक्पनाया वमतुं शक्पत्वात्। तदाह-प्रभायादिनेश्यादि। (चित्र०) यच्चौराणामस्य च समागमो यश तैर्वधोऽस्य कृतः । उपनतमेतदकस्मादासीद बत काकनालीयम् ॥ इति ॥। अन्न काकतालशब्दी वृत्तिचिपये काकतालसमवेतक्रियावर्तिनी। तेन काका- गमनमिव तालपतनमिव काकतालमिति इवार्थे 'समासाथ तद्विपयात्' इति ज्ञापकात् सुप्सुपेति समासः। उभयन्रोपमेय क्रमेण देवदत्तागमन दस्यूपनि- पातश्च। तेन देवदत्तदस्युसमागम. काकतालसमागमसदश इति फलति। नतः काकतालमिव काकतालीयमिति द्वितीये इवार्थे, "समासाच् तद्विपयात्' इति छप्रत्यय: ।

(भारती) एक पथिक के विषय में कहा जाता है-जो चोरों का और उस पधिक का एक साथ समा- गम छुआ और जो इन्शोने उसका वध पार दिया-यह घटना मधानक बन गई; अतः यह घटना 'काकतालीय' हुई। यहाँ 'काकतालीय' शब्द से 'काक' और 'ताल' शब्द लक्षणा द्वारा 'कौए के आने और 'ताड के गिरने' के वोधक हैं। उनका 'इव' (की तरह) के अर्थ में 'सामासाय तद्रिपयात्' (पा० सू० ५, ३, १०६) इस शापक द्वारा समास करने पर 'काक इच ताल इच काकतालम्' इस विग्रह के अनुसार 'काकतालम्' शब्द का अर्थ होता है-कौए और ताट के समागम के- अर्थाद कौप के आने और ताठ के गिरने के-समान इस चोरों का और पथिक का समागम। इस 'काक ताल' शब्द से 'काकतालमिव' इस तरह दूसरे 'इन' के अर्थ में पूर्वोक्त सूत (समासाच्च तद्विपयात्) से ही छ प्रत्यय (इय) करने पर 'काकतालीय' शब्द यनता है। (सुधा) उपमानलुप्तां द्विल प्ताभेदेप्वायं भेद इयं म्रिलुसान्ध दर्शयति-पध्चीराणमिति यमौराणाम, अस्य च समागमः, यधोरेरस्य धमः कृतः, एतदकर्मादुपनतं काकतालीयमासीठ्। अन्र भेदानू दर्शयितुं काकतालीयमिति पदस्य व्याख्यानमाह-अन्नेति। वृसिविषये=समासचिपये, तेन=तादशक्रियावृत्तित्वेनेशयर्थः। फाकममचेता करिया काकागमनरूपा, तालसमवेता क्रिया तत्पतनरूपा। एतदेव समासवावयेन मूले कथ्यते। समासविधायकाभावमाशकय समाधप्े-इवार्थे इत्यादि। तत्र समामाभावेन तद्विषयादिरयनेन हवार्थविषयसमासानुप- पत्तेस्तज्जापकतेश्यर्थ. । अश्रोपमेयं दर्शयति-उभपन्रेति। काकागमनतालपतनयोरित्यर्थः। क्रमेण देवदप्तागमनं दस्यूपनिपातश्चोपमेयमित्यन्वयः । तेन=तादृशक्रियापरयोः काक- ताळपदयोरिवार्थ समासेनेश्यर्थः । काकतालसमागम इति काकागमनतालपतनयोकपमा- नरवे तदुपमेयभूतदेवदत्तागमनदस्यूपनिपातयोः पृथगनुपात्तरये नोपमेयतयाऽन्वयायोगाव्

Page 145

उपमानिरूपणप्रकरणम् १०५

तस्यवोपमानस्वमित्यर्थः । ततः= ताटयासमासोत्तरमित्यर्थः । प्रत्ययार्थोपमायाम 'इवे प्रतिकृता' इृश्यधिकारस्य 'समासाध तद्िषयात्' इति छ्प्रयययः। (चित्र०) ततश्च पतता तालफलेन यथा काकस्य वध एवमुपनिपतितर्दस्युभिर्देवद- स्तस्य वध इत्यर्थः । यदाह भगवान् भाष्यकार :- 'एवं तर्हि द्वाविवाव्थी काकाग- मनमिव तालपतनमिव काकतालं काकतालमिव काकतालीयम्' इति। तच्ब विवृतं कैयटेन- 1 'तत्र काकागमनं देवत्तागमनस्योपमानम्। तालपतनं दस्यूपनिपातस्य। तालेन तु यः काकस्य वध:, स देवदत्तस्य दस्युना वधस्योपमानमिति' अक- स्मादुपनतत्वं च समानो धर्मः । तदाह वृत्तिकार :- 'तेन काकतालीयं नामाकस्मादुपनतं चित्रीकरणमुच्यते' इति ततश्चात्र काकागमनतालपतनसमागमनरूपस्य पतत्तालकृतकाकवधरूपस्य चोपमानस्यानुपादानात् प्रत्ययार्थोपमायामुपमानलोपः। समासार्थोपमायां वाच- कोपमानलोपः। अन्रैव 'किमिति ब्रमो वयमिदम्' इति तृतीयपादपाठे प्रत्यया- र्थोपमायां धर्मोपमानलोपः। समासार्थोपमायां धर्मोपमानवाचकलोपः। (भारती) अत उपर्युक्त पद का भर्थ हुआ-'तालपतनजन्यकाकवधसद्शश्चौरकर्तृको देवदत्तवधः' अर्थात चोरों द्वारा किया हुआ देवदत्त का वभ ताल के गिरने से उत्पन्न कौए के वध के समान हुआ। भगवान भाष्यकार ने जो कहा है- 'एवं तहिं द्राविवावर्थो काकागमनमिव सालपतनमिव काकतालं काकतालमिव काकतालीयम्' (भा० पा० सु० ५, ३, १०६ इति) इस पर कैयट द्वारा विवृत है- 'तत्र काकागमनम् देवदत्तागमनस्योपमानम्। तालपतनम् दस्यूपनिपातस्य। तालेन तुयः काकस्य वधः, सदेवदत्तस्य दस्युना वधस्योपमानमिति (पा०सू० ५,६,१०६) यहाँ अकस्मात् उपनतत्व ही समान धर्म है। फिर इसी पर वृत्तिकार ने लिखा है-'तेन काकतालीयम् नामाकस्मादुपनतं चित्री- - करणसुष्यते' (का० पा० सू. ५, ३, १०६) इस प्रकार 'काकनालीयम्' में दो उपमाएँ हुई-एक समासार्थी रूप, जो काकतालम्' में है और दूसरी प्रत्ययार्थ रूप जो काकताल शब्द से 'इय' प्रत्यय करने पर प्रतीत होती है। ऐसी दशा मे प्रत्ययार्थ रूप दूसरी उपमा के उपमान 'ताल के गिरने से उत्पन्न कौए के वध' का ग्रहण न होने से अर्थात, 'काकतालीय' पढ में वैसे 'वध' का प्रतिपादक कोई शब्द न होने से यह उपमा 'उपमानलुप्ता' हुई। समासार्थोपमा में-वाचकोपमानलुप्ता का जो, प्राचीन के भेदों में, नाम ही नहीं लिया गया, पर 'काकनालीयम्' की प्रकृति-अर्थाद काकतालम्-के अर्थ में वह भी दिखाई देती है।

Page 146

१०६ चित्रमीमांसा

क्त्योंकि उस उपमा का उपमान है 'काकताल-समागम' उस 'समागम' का वाचक यहाँ कोई शन्द नहीं और न सादृश्य का प्रतिपादक ही कोर्ई शन्द है। धर्मोपमानलुप्ता वाक्यगता और समासगता दो प्रकार की कही गई है, पर यदि पूर्वोक्त पद् 'यच्चौराणामस्य च' के तीसरे चरण में वणित समान धर्म को निकाल दें अर्थाव उत्तरार्ध को ऐसा कर दें-किमिति धूमो वयमिदमासीदवतकाकतालीयम' तो प्रत्ययार्थ वाली उपमा में धर्मोपमानलुप्ता भी यहाँ दिखाई पढती है, जो कि पदले वर्णन नही की गई है। अतः उसका भी एक भेद हो सकता है। समासार्थ उपमा में धर्मोपमानवाचकलपा उपमा होती है-इस प्रसग में रसगंगापरकार ने लिखा है कि वाचक धर्मलुप्ता क्विप्गता और समासगता दो प्रकार की दी वर्णित है। वह भी यदि 'चजता पुरुषः सोडयं' इसके आगे का चरण 'योऽयन्तं विषयवासनाधीनः' बना दिया जाय तो अपना हित न करने रूपी समानधर्म का ग्रहण न होने पर 'कन्' प्रत्यय के लोप में भी दिखाई देती है। क्योंकि विपयवासना के अधीन दोना केवल पुरप में रहने वाला धर्मे के होने के कारण 'चन्चा' और 'मनुप्य' का समान धर्म नहीं वन सकता। (सुधा)

रूपोपमेयेऽन्वयादिति भावः। सकदुषारितकाकतालपदादयंद्वयावगमे भाष्य प्रमाणपति- यदाहेति। माध्यव्पाख्यानकतुः कैयटस्य प्रामाण्यमाह-तख्चेति। भाव्यमिरयर्थः। विवृतं व्यारूपातम्। अकस्मादुपनवरवं समानो धर्मः। अम्र भामाण्यमाह-तदाहेति। भेदचतुष्टयं दशयति-सतश्चेति। पतिततालकृत का कवमरूपोपमानानुपाढानाव्ष् प्र्यमा रथोपमा यामुपमानलुप्ता। काकागमनतालपत न समा गमरूपोपमानानुपादानात्ष समासार्थो- पमायां वाचकोपमार्यां वाचकोपमानलुप्ता। 'किमिति यूमो वयम्' इति पाठे प्रत्ययार्मो- पमायां धर्मोपमानलुप्ता। समासाथो पमार्या धर्मोपमानवा चकलुप्ता। (चित्र० ) अत्र धर्मलोपमात्रमैच्छिकम्। यं त्वं पालयसे धर्म वृत्त्या च नियमेन घ। स वे राघवशार्दूल धर्मस्त्वामभिरक्षतु॥। अत्र 'राघवः शार्दूल इव' इत्यर्थे 'उपमितं व्याघ्रादिभिः सामान्याप्रयोगे' इति समासे धर्मवाचकयोरलोपः। अत्र वाचकलोपवद्धर्मलोपोऽपि शास्त्रीयः। सामान्यप्रयोग एवैतत्समासानुशासनात्। धर्मवाचकलुप्तायां धर्मलोपस्यैच्छ्िकत्वमपि सम्भवति। यथा- नृणां यं सेवमानानां ससारोऽप्यपवर्गति। त जगत्यभजन्मर्त्येश्चय्वा चन्द्रकलाघरम्॥ अत्रापवर्ग इवाचरतीत्यर्थेऽपवर्गतीत्यत्राचारार्थस्य किपो लोपाद वाचक- बद्धर्मस्यापि लोपः । चञ्वेत्यत्र चय्त्रा तृणपुरुप इवेत्यस्मिप्नर्थे 'इवे प्रतिकृतौ'

Page 147

उपमानिरूपण प्रकरणम् १०७

इति विहितस्य कनः 'लुम्मनुष्ये' इति लुब्विधानाद्वाचकलोपो धर्मलोपश्। अस्य शरोकस्य । यद्भकानां सुखमयः संसारोऽ्यपवर्गति।

इति पाठे नोभयत्रापि धर्मस्य श्रवणमपि सम्भवति। (भारती) यहाँ अर्थात द्विलुसता भेद में धर्मलोप मात्र ऐच्छिक है- हे राघवशार्दूल। तुम वृत्ति से अथवा नियम से जिस धर्म का पालन करते हो, वह धर्म तुम्हारी चारो ओर से रक्षा करे। इस उदहरण में 'राघव शार्दूल की तरह' इस अर्थ में 'उपमितं व्याघ्रादिभिः सामान्या- प्रयोगे' इस सूत्र से समास करने पर धर्म और वाचक का लोप होता है। यहाँ 'वाचक' लोप की तरह 'धर्म' लोप भी शास्त्रीय है। सामान्य प्रयोग ही इस समासके नियम से अनुशासित है। धर्मवाचकलुपा में धर्मलोपका ऐच्छिकत्व भी सभव है, जैसे-'जिसका सेवन करने वाले मनुष्यों का ससार भी मोक्ष के समान हो जाता है, उन चन्द्रकलाघर भगवान शंकर को न भजने वाला मनुष्य जगत में घास के बने पुतले के समान है।' इस पद्य में 'अपवर्ग की तरह आचरण करता है' इस अर्थ में अपवर्गति पद में आचारार्थक 'क्विप्' प्रत्यय का लोप है। अतः यहा वाचक की तरह धर्म का लोप है। इसी प्रकार 'चन्ना' इसमें 'चञ्ना' अर्थात् तृणपुरुष की तरह इस अर्थ में 'इचे प्रतिकृती' इस सूत्र से विहित 'कन् प्रत्यय का 'लुम्मनुष्ये' इस सूत्र के द्वारा लोपविधान होने के कारण 'कन्' प्रत्यय का लोप हो गया है। अत. यहाँ भी प्रत्येक उपमा में (अपवर्गति और चव्ना) दोनों में वाचक और धर्म दोनों का लोप हो जाता है। (अगर यह कहें कि 'शिव के भजन से रहित होना' यह उपमेय पुरुष के विशेषण रूप में लाया गया है, अत. सादृश्य के विशेषण बने हुए चचा में इसका अन्वय न हो सकने के कारण इसे साधारण धर्म नहीं कहा जा सकता-यह केवल पुरुष का धर्म है।) इस श्लोक का उत्तर- जिसके मक्तों का ससार मी सुखमय होकर मोक्ष के समान हो जाता है; उस शंभु को न मजने वाला मनुष्य, अपना हित न करने के कारण घास का पुतला ही है। इस तरह पाठ कर देने पर दोनों जगह धर्म भी सुनाई देने लगता है। (सुधा) मिलुप्ताेदे धर्मवाचकलुप्तां दशयति-यं स्वमिति-हे राघवशार्दूल! ं वृध्या नियमेन घ यं धर्म पालयसे स धर्मसवाम् अभिरचतु समन्तात् पालयतु। राघवः शार्दूल इवेति समास:, 'उपमिनं व्याघादिभि: सामान्याप्रयोगे' इति तदनुशासनास्। अम्र धर्मस्य घ वाघकस्य च लोप: शासतकृतः । धर्मतत्प्रयोगेऽनु- शासनप्रषृत्तेर्दुर्लभत्वात्। धर्मवाचकलुपतायां शास्त्रीय एव तयोर्लोप इति नियमस्तु नास्ती- स्याह-धर्मताचकलुप्तायामिति। तदुदाहरति-यथेति। यं सेममानानां नृणां संसारोऽपि अपवर्गति, जरगत चन्द्रकलाधरं तं शिवम अभजन्मर्त्यो मनुष्यक्ष चख्ा इत्यन्वयः। अपव- गंतीश्यत्र 'उपमानादाचारे' इति सूमविहिताारार्थकिप इवेन सह लोपाद धर्मवाघक सुप्ा। उत्तरव्ले तां दर्शयति-घक्षेति । 'घक्षा तृणमयः पुमान्' हरयमरः। चख्ा

Page 148

१०८ चित्रमीमांसा

धंवेश्यर्थे 'इवे प्रतिकृती' दृति कन्प्रत्ययः। 'लुम्मनुष्ये' इति सस्प लुपि धर्मकोपे म धर्मवाघकलुप्ता। धर्मलोपस्यैद्छ्रिकावमत् दर्शयतिअस्ेति। सुखरूपस्य आमह्दिताकर णस्य घ धर्मस्योमयत्राभिधानेन भर्मस्य शवणेन धर्मछोपस्येष्छ्रिकरवसम्भवादिति भावः। (चित्र०)

पुरतो हरिणाक्षीणामेष पुष्पायुधीयति॥ अत्र वाचकोपमेययोर्लोपः। रूपयौव नेत्यादिस्वविशेपणसामर्थ्यात् स्वात्मानं पुष्पायुधमिवाचरतीत्यस्यार्थस्य गम्यमानत्वात् स्वात्मन उपमेयस्य लोप: कवेरैच्छिकः। न चैप इत्युपमेयस्योपादानमस्तीत शङ््यम, तस्य कर्मविभ- क्त्यभावेन पुप्पायुधीयतीत्यत्रोपमेयासमर्पकत्वात्। अत्रैव हरिणस्याक्षिणी इवायते अक्षिणी आसामित्यस्मिन्नर्थेऽनुशिष्टे हरिणाक्षीणामिति पदे धर्मोपमान- वाचकानां लोपः । सर्वोऽप्यय 'सप्तम्युपमानपूर्वपदस्य' इत्यादिशास्त्रकृत एव लोपः । त्रिलोपे धर्मलोपस्त्वैच्छिकोऽपि संभवति। यथा- 'यच्चोराणामस्य च' इति श्लोकस्य द्वितीयपाठे समासार्थोपमायाम्। एवं लुप्ताया अष्टौ विधाः प्रदर्शिताः । (भारती) जिसका आकार रूप, यौवन और लावण्य के कारण अत्यन्त सपृद्टणीय है, ऐसा यह नायक मृगनयनियों के सामने अपने तई कामदेव सा व्यवत करता है। इस उदाहरण में वाचक और उपमेय का लोप ह। रूप, यौवन इत्यादि में 'स्व' विशेषण के सामर्थ्य से अपने को 'पुष्पायुध' की तरह आचरण करता है। इस अर्थ का गन्यमान होने से 'स्वात्मन' उपमेय का लोप कवि का ऐच्छिक है। यह उपमेय का उपादान कारण है, ऐसी आगका भी आप नहीं कर सकने, क्योंकि उसका कर्म विभक्ति के अभाव से 'पुन्पायुधीयति' में उपमेय का असमर्पकत्व है। यहाँ ही 'हरिणी की आँखों के समान आयत है इसकी आंखे' इस अर्थ में अनुशिष्ट 'हरिणा- क्षीणाम्' इस पद में धर्मोपमान वाचकों का लोप है। इन सवों में 'सप्तम्युपमानपूर्वपदस्य' इस सूत्र में समास का लोप है। इस त्रिलोप में धर्म का लोप तो ऐन्छिक है। जैसे, 'यच्चौराणामत्य च' इस इ्लोक के द्वितीय पाठ में समासार्थ उपमा में धर्म का लोप हुआ ह। इस प्रकार तुप्ता उपमा के आठ भेद दिखाए गए। (सुधा) वाचकोपमेयलुप्तां दर्शयत-रुपेति। रूपयौवनयोर्लावण्येन शोभाविशेषेण अतिरपृद्- णीया आकृतिर्यस्य एष हरिणाक्षीणां पुरतः 'स्यास् पुरः पुरतोऽम्रतः' इत्यमरः ।

उपमेयस्य साहश्यवाचकेवेन सह लोपादू वाघकोपमेथलुप्ता। स चोपमेयलोपः कवेरे- चिछ्दरक:, आरमानमित्यस्योपादातुं शक्यरवाद्। एप हत्यस्य तु प्रथमान्तस्य उपमेयता न सम्भवति, उपमानस्य कर्मविभवश्यन्तर्वेन तभिरूपितोपमेयत्वस्य प्रथमान्तर्वेनासमर्थ-

Page 149

उपमानिरूपणप्रकरणम् १०६

खवात्। अम्र म्रिलुप्तामपि दर्शयति-त्रैवेति। हरिणस्यापिणी इवायते अक्षिणी आमामिति वित्रहे 'सप्तम्युपमानपूर्वस्य' इति समासः । तेन आयतेति धर्मस्थ, इरिणेत्युपमानस्य, इेति वाचकस्य धानुपादानेन धर्मोपमानवाचकलुप्ता। अश्र सर्वेषां लोपस्य समासविधा यकेन विधानाच्छ्रासतीयत्वमित्याह-सर्वोडपीति। वस्तुतः त्रिलुप्ायां धर्मलोपस्य शास्त्री- यत्वमेघेति नियमो नास्तीत्याह-त्रिलोप हति। द्वितीयपाठे 'किमिति वमो वयमिषम' इति पाठे इत्यर्थः। समासेति = काकागमनमिव, तालपतनमिवेति, काकतालमित्यत्रेष्यर्थः। प्रकरणमुपसंहरति-एवमिति। यत्त, रसगह्ाधरे पतरपद्यनिर्माणसुददिश्य इदस पद्यमप- शव्ददुष्टमवैयाकरणतां कर्तुः प्रकाशयति। तथा हि-पुरत इति नगरवाचिनः पुरशब्दा- तसिलि, तासां नगरादित्यर्थासङ्गते। न हि पूर्ववाचक: पुरशब्दः कापि श्रयते। पूर्वशव्दास्त 'पूर्वाधरावराणामलि पुरघवरचैपाम्' इत्यसी पुरदेशे घ पुर इति वाच्यं न पुरत हति। अत एव 'अमुं पुरः पश्यसि' इति महाकवि: प्रायुरुक्त। एवमेव 'सुखस्य पुरतश्रन्द्रो निष्प्रभः' इति अप्रस्तुतप्रशंसोदाहरणे तेरपशब्दितम्। तथा चाहुदैयाकरणाः। 'पत्या पुरतः परतः' 'आत्मीयं चरणं दधाति पुरतो निम्नोष्नतायां भुवि' 'पुरतः सुदती समागतं माम्' इत्यादय: सर्वेऽपि व्याकरणाज्ञानमूला अपशब्दा.' इति प्रतिपादितम। तदप्ययुकमेव; पुरत इत्यस्यापशव्दरवं किमनुशासनाभावात् कल्प्यते अप्रयोगाद्वा? नाद, 'पुर अग्रगमने' इति धातो: घजर्थे कविधानमिति कप्रत्यये सार्वविभकिकतसा तरिसद्धावनुशासनसर्वा। किन्च 'दृष्विणोप्तराभ्यामतसुच्' इत्यत्रातिसुनैव पुवन्नावविधानेन सिद्धेरतसुचो विधान मन्यतोऽपि तद्वधानं ज्ञापयति। तेन क्विबन्तात् पुरधातोरतसुच। न रर 'वोरुपधाया दीर्घ इक: इति दीर्घापतिः, भसंज्ञासरवेन दीर्घाप्रवृत्तेः। चित्वप्राप्तमन्तोदानं वाधित्वा पाषि काघुदाप्तार्थ तद्विधानमिति व्यादयानापेक्षया तु यथोकज्ञापनस्येव युककत्वास्। न प विनि- गमकाभाव:, लक्ष्यानुरोधस्येव तत्सम्मवारघ। 'स्यात् पुरः पुरतोऽम्रत.' हत्यमरसिंहेन निपातान्तरतवस्य स्वीकारायनुश्ासनस्य सम्भवाण्घ। नान्त्य:, 'ह्यन्ध तेऽ्न्या पुरतो चिडम्वना' इत्यादेमहाकविकालिदासेनैव प्रयुककतवास्। 'पश्यामि तामित इतः पुरतश्द पश्चात्' इश्यादेभंवभूते: प्रयोगाव्। यत्त, दुर्घटवृत्तिकारेण 'पिपर्तेर्भावे कविधानोतरं तसिलूप्रत्ययेन तरिसद्दिः'इति तत्समर्थनं कृतम्। तत्प्रकृतार्थानुपयोगादयुक्क्कमेवेति दिकू। (चित्र०) काव्यप्रकाशिकाकारादिभिस्तु पूर्णाया: षड्विधा लुप्तायास्तु धर्मलुप्ता- दिष्ववान्तरभेदेन कैश्विदेकोनविशतिरन्यैर्विशतिविधाः प्रदशिताः । तत्रायं विभाग :- पूर्णा तावद् द्विविधा-श्ौती आर्थी च। साहश्यमात्रवाचकयथेवा- दिशब्दवती श्रौती। सादृश्यविशिष्टधमिपर्याप्ततुल्यसदशसङ्काशादिशब्दवती आर्थी। द्विविधापि वाक्ये समासे तद्धिते चेत्येवं षड्विधा पूर्णा। धर्मलुप्तापि पूर्णावदेव विभागवती। किन्तु श्रौती तद्धिते न सम्भवतीत्येव पञ्विधा। वाचकलुप्ता कर्मकर्तृणमुलो कर्माधिकरणक्यचोः क्यडि णिनौ समासे चेत्येव सप्नविधा। उपमानलुप्ता वाक्यसमासयोद्विविधा । धर्मवाचकलुप्ता किप्समासयोद्विविधा। धर्मोपमानलुप्ता वाक्यसमासयोद्विंविधा। उपमेयवाचक- लुप्ता क्यचि एकविधा। धर्मवाचकोपमानलुप्ता समास एवैकविधेति।

Page 150

११० चित्रमीमांसा

(भारती) चन्द्रालोक इत्यादि के मतानुसार उपमा के भेद प्रद्शित कर मम्मट प्रभृति आचार्यों द्वारा प्रतिपादित उपमा के भेद प्रदशित करते हैं। उनके अनुसार उपमा दो प्रकार की होती है- पूर्णा और लुप्ता। उनमें से पूर्णा उपमा श्रीती और आर्थीं दो भेदों में विभक्त है। श्रीती-श्रौती उपमा उसे कहते है, जहाँ 'तत्र तस्येव' इस सूघ से 'इव' के अर्थ में गर्थात् सादृश्यप्रयोजक साधारण धर्मसम्बन्ध रूप अर्थ में 'वत्ति' प्रत्यय प्रयुक्त रहा करता है। आर्थो-आर्थी उपमा उसे कहने हैं, जहाँ 'तेन तुश्यम् करिया चेदवति' इस सृत्र से तुल्य के अर्थात् सामान्य सादृव्य रूप अर्थ में विहित 'वति' प्रत्यय का प्रयोग रहा करता है। श्रीती और आर्थो उपमा की व्याख्या मम्मट ने इस प्रकार की ह- (१) श्रीती-इस उपमा को त्रौती' इसलिए कहा गया है कि इसमें उपमानोपमेयभाव 'यथा' 'इव' 'वा' आदि शब्दों के श्रुतिमात्र से ही प्रतीत हुआ करता है। इन शब्दों की अभिवा शक्ति ऐसी है कि इन्हीं के द्वारा, केवल इनके श्रवणमात्र से ही, उपमान और उपमेय के 'साध्म्य' रूप सन्बन्ध की भी उसी प्रकार प्रतीति कराई जाती जिस प्रकार पष्ठी विभक्ति के द्वारा स्व- स्वाभिभाव रूप सन्वन्ध की। (२) आर्थी-इस प्रकार की उपमा को 'आर्थी' इसलिए कहा गया है कि इस प्रकार की उपमा में 'तुल्य' आदि शब्दों का जो प्रयोग हुआा करता है उसमें साधर्म्य की प्रतीति आक्षेपगम्य हुआ करती है-(शब्दलभ्य अथवा साक्षातगन्य नहीं)। क्योंकि तुल्य आदि शब्द ऐसे हैं कि जव हम कहते है 'उसका कमल के तुल्य मुख है' तब केवल ये उपमेय सुख का ही निर्दश कर अपना अर्थ समाप्त कर देते है। जव दम कएते है 'वह कमल तुल्य है इस मुख के' तव ये उपमान 'कमल का ही निर्देश कर अपना सादृश्य अभिप्राय समाप्त करते दिसाई देते है। जव एम कहते है-'यह मुख और वह कमल तुल्य ह' तब वे दोनों अर्थात् उपमान ओर उपमेय का निर्देश कर अपना सादृय्य रूप अर्थ वताकर चुप हो जाते है। इस प्रकार होता यह है कि जब हम सान्य अथवा साधर्म्य अर्थात् साधारण धर्म रूप सम्बन्ध का अनुसंधान कर चुकते है, तभी तुल्यता अथवा सादृश्य की प्रतीति हुआ करती हैं, अर्थात् यहाँ साधर्म्य शब्द प्रतिपाध नहीं अर्वलभ्य हुआ करता है। वस्तुन-श्रीती में साधर्म्य की शब्दलभ्य प्रतीति ओर आर्थी में साधर्म्य की अर्थलभ्य प्रतीति का होना इस विभाग के मूल में है। ये दोनों (श्रौती और आर्थी) ही वाक्य, समास और तदवित के क्षेत्र में सभव है। अत. इनके छ भेद है-१. वाक्यगा श्रीती, २ वाक्यगा,आर्थी, ३.समासगा श्रीती,४. समासगा आर्थी, ५. तदि्घतगा औती और ६ दितघतगा आर्थी। धर्मलप्ता भी पूर्णा की ही तरह विभागवती है। किन्तु श्रौती उपमा तद्धित में सभव नही है, अतः यह पाँच प्रकार की है वाचकलुप्ता कर्म और कर्तृ से णमुल, कर्म और अधिकरण से वयच्, क्यड्, णिनि और समास में होकर सात प्रकार की है। उपमानलुप्ता-वाक्य और समासगत होकर दो प्रकार की है। धर्मवाचकलुप्ता-किपू और समास में दो प्रकार की है। धर्मोपमानलुप्ता-वाक्य और समासगत होकर दो प्रकार की है। उपमेयवाचकलुप्ता-क्यच् में केवल एक प्रकार की है। धर्मवाचकोपमानलुप्ता भी केवल समासगत होकर एक प्रकार की है। इस कथन की पुष्टि में दीक्षित जी प्रमाणस्वरूप कारिका १-५ उपस्थित करते हैं, (द्र० पृष्ठ ११३-११४) जिसके अर्थानुसार लुप्ता उपमा के अधोंकित भेद हैं (द्र० पृष्ठ ११४)-

Page 151

उद्भट-उपमा-निरूपण उपमा 1 -

पूर्णोपमा (पच्विधा) लुप्तोपमा (द्वादशविधा)

वाक्यावसेया समासावसेया तद्धितावसेया

1 उपमानिरूपणप्रकरणम्

1

१ श्रीती २ आर्थो ३ आर्थी ४ श्रौती ५ आर्थी

1- - -

१ वाक्यावसेया समासावसेया सुब्धातुप्रत्ययावसेया कृदवसेया १२. तद्धितावसेया

1 -6

  • एकलोपा ४ द्वितयलोपा ५. त्रितय लोपा १०. कर्मोप मानिका ११. कर्न्नुपमानिका 1

1 धर्मलुप्ता ३. वाचकलुप्ता 1 1 -

क्यजवसेया ८. क्यडवसेया (कर्त्रुपमानिका) 1 ९. किनवसेया

1 १११

७ अधिकरणोपमानिका 1

६ कर्मोपमानिका

Page 152

मम्मट-उपमा-विभागः ११२

उपमा

पूर्णोपमा (षड्विधा) लुप्तोपमा (एकोनविशतिविधा) 7

श्रौती मार्यी

१. वाक्यगा २. समासगा ३. तद्धितगा I ४. वाक्यगा ५. समासगा ६ तच्धितगा

एकलुप्ता द्विलुप्ता त्निलुप्ता चिन्नमीमांसा

धमेलुप्ता उपमानलुप्ता वाचकलुप्ता धर्मवाचकलुप्ता धर्मोपमानलुप्ता धर्मोपमेयलुप्ता धर्मोपमानवाचकलुप्ता 1 १८ क्यजगा १९. समासगा 1

वाक्यगा समासगा तद्धितगा १४. किपूगा (आर्धी) १५ समासगा (आधी)

1 1 (आर्थी) (आर्थी)

१. श्रीती २. आर्थी ३. श्रीती ४. आार्थी ५ आर्थी १६. वायगा (आर्यी) 7

  • १७. समासगा (आर्धी)

1

६. वाक्यगा (आर्थी) ७. समासगा (आर्थी) ८. समासगा (आर्धी) सु्धातुप्रत्ययगा

1 1

क्यजगा क्यढ्गा णमुलगा

r 111 ९. कर्मोपपदक्यजगा (आर्थो) १० अधिकरणोपपदक्यजगा (आती) ११ कर्पुनदस्यगा (आनो) १२. कर्मापनदगलुलूगा (आर्थो) १३. कर्पप दणसुलगा (आर्थी)

Page 153

उपमानिरूपण प्रकरणम् ११३

(सुधा) एवं चन्द्रालोकादिमतानुसारेणोपमाविभागं प्रदर्श्य मम्मटादिप्रतिपादितोपमाबिभागं प्रदर्शयितुं तन्मतं प्रतिपाठयति-काव्यप्रकाशिकाकारादिभिस्त्वत्यादिना। पूर्णायाः पडविघात्वम्, लुसाया धर्मलुप्ताविष्ववान्तरभेदेनैकोनविद्यतिभेदत्वम्, मतान्तरे विंशतिभेदरवं तैः प्रदुर्शितम्। तथा व तत्प्रतिपादकानि प्रकाशसूत्राणि- पूर्णा लुप्ता च सागिमा। श्रौत्यार्थी च भवेद्वाक्ये तथा। तद्द् धर्मस्य लोपे स्थान् श्रोती तद्धिते पुनः। उपमानानुपादाने वाक्यगाथ समासगा॥ चादेलोंपे समासे सा कर्माचारक्यचि क्यदि। कर्मकन्नोरणमुष्येतद द्विलोपे कविप्समासगा॥ धर्मोपमानयोलोंपे वृत्ती वाक्ये च दश्यते। क्यचि वाद्युपमेयासे त्रिलोपे घ समासगा ॥ इति॥" श्रीती, आर्थाति पूर्णाभेदयोः प्रत्येकं त्रिविघत्वम्, वास्यसमासतद्वितगतत्वात्। एवं षडविधा पूर्णा। धर्मलोपे पन्स, उपमानलोपे ड्ी, वाघकोपमेययोलोपे चैकः, त्रिलोपे त्वेक:, एवमूनविंशतिर्लुक्तेति तन्मतविभागः । एतद्रीत्या स्वयमपि तद्विभागमाह-तत्राय- मिति। तम्र प्रकाशादौ उपमार्या वेत्यर्थः । पूर्णेति श्रौत्यार्थी चेति भेदादू द्विविधेत्यर्थः। औतीस्वरूपमाह-सादृश्यस्थेव वाचका ये यथेवादिशव्दाः। तहतीत्यर्थः। आर्थी तु साहश्यविशिष्टो यो धर्मी, तत्पर्यवसाना ये तुक्यसदशादिशव्दास्तद्ृतीत्यर्थः। तयोः प्रत्येकं त्रिविघत्वमाह द्विविधापीति। एव पूर्णाभेदा: पट। लुप्ाविभागमाह-धर्मलुप्तापीति। पूर्णावदेव विभागयुता। तन्न विशेषमाह-किन्तिवति। तद्विते श्रत्यभावः। इार्थवतेस्तन्न तस्येवेत्यर्थकतया नित्यघर्मसाकाङ्गत्वात् तेन धर्मलुप्ताया भेदा: पञ्न। कर्मणमुलू, कर्तृणमुछ, कमक्यच अधिकरणक्यघ्। क्यङणिनूसमासभेदाद् वाचकळुपाभेदाः। सप्

वाक्यसमासभेदादू धर्मोपमानलोपेडपि हौ। उपमेयवाचकलुस्ता क्यच्येकैव। समासगतरवेन त्रिलुश्ापि तथा। (चित्र०) यदाहु :- (१) पूर्णा लुप्ता च सा द्वेधा श्रौत्यार्थी चेति ते पुनः। द्विविधे प्रथमा वाक्ये समासे तद्धिते भवेत्॥ (२ ) तद्वल्लुप्तापि धर्मस्य लोपे श्रौती न तद्धिते। इवादिलोपे द्विविधे णमुलि क्यचि च क्यडि॥ (३) तथा णिनौ समासे च सप्तधा परिकीर्तिता। उपमानस्य लोपे तु द्विधा वाक्यसमासयोः॥ (४ ) इवादिधर्मलोपेऽपि द्विविधा क्विप्समासयोः। धर्मोपमानयोर्लोपे वाक्यगा च समासगा॥ (५) इवादेरुपमेयस्य द्वयोरलोंपे भवेत् क्यचि। इवादिघर्मोपमानलोपे त्वेषा समासगा॥ इति। अत्रोदाहरणानि तन्मतरीत्या सगृह्यास्माभिलिख्यन्ते- ८ चित्र०

Page 154

११४ चित्रमीमांसा

(भारती) उपमा दो प्रकार की होती है-पूर्णा और लुप्ता। पूर्णा-श्रौती और आर्थी दो भेटों में विभक्त है और उन भेदों से प्रत्येक भेद वाक्यगामी, समासगामी और तद्धितगामी तीन प्रकार के हैं। अतः पूर्णोपमा छः प्रकार की होती है। अय रही लुप्तोपमा-वह उपमानलुप्ता, धर्मलुप्ता, वाचकलुप्ता, धर्मोपमानलुप्ता, वाचकधर्मलुप्ता, वाचकोपमेयलुप्ता, और धर्मापमानवाचकुलप्ता इस तरह सात प्रकार की है। उनमें उपमानलुप्ता वाक्यगता और समासगता इस तरह दो प्रकार की है। धर्गलुप्ता श्रौती समासगता, आर्थी समासगता, श्रीतीवास्यगता, आर्थोवाक्यगता ओर आर्थी तद्घगता रस तरह ५ प्रकार की है। यह उपमा श्रीती तद्वितगता नहीं होती। वाचकळप्ता समासगता, कर्म- फ्यङ्गता, आधारक्यजगता, क्यढ्गता, कर्मणुमुलगता ओर कर्तृणुमुलगता इस तरह छः प्रकार की है। धर्मोपमानलप्ता वाक्यगता और समासगता इस तरह दो प्रकार की है। वाचक- धर्मलुप्ता भी किव्गता और समासगता इस प्रकार दो ही प्रकार की ह। वाचकोपमेयलप्ता एक प्रकार की है। धर्मोपमानवाचकलुप्ता भी एक प्रकार की ही है-समासगता। इस तरह कुल मिलाकर लुप्ता उपमा के कोई २० तथा कुछ लोग २१ भेद मानते ऐं। यहाँ उदाहरण उनके मत की रीति से सग्रह कर लिसे गये है- (सुधा) अम्र विभागे प्रमाणमाह-यदाहुरिति। पूर्णेत्यारम्य समासषगेव्यन्तं श्लोकपत्रकं विभागव्यावययेव व्याख्यातम्। तम्न 'चन्द्र इव मुखम्' इति श्रौती, 'चन्द्रतुरयं मुक्म्' इत्यार्थीति वोष्यम्। विभागानुसारेणोदाहरणानि वक्ुमुपक्रमते-अन्नेति। उपमाविषय इत्यर्थः । तेनान्यम्र स्वकृतोदाहरणाभावेऽपि न पतिः। (चित्र०) 'यस्याज्ञा शिरमोहयने सुमनसां वृन्दर्यथा मालिका बद्ध्वा मुख्ति यः पशूव जनान् यस्याभ्रवद्वभवम्। हृद्यं शेर्वाधना सम दि भजन्त्यानन्द सारो म यं धन्याः शशिवत् प्रसन्नवपुपे तस्मै नमः शम्भवे॥। अत्र पड्विधापि पूर्णा दर्शिता। तत्र प्रथमवाक्ये वाक्यगा श्रीती, द्वितीय- वाक्ये समासगा शौती, 'इवेन नित्यसमासो विभक्त्यलोपः पूर्वपदप्रकृतिस्वरत्वं च' इति वार्तिककृद्वचनेन पशूनिवेत्यस्य समासपदत्वात्। तृतीयवाक्ये तद्वितगा शरौती। अभ्रवदिति पष्ठीसमर्थाद्वतेः 'तत्र तस्येव' इति सूत्रेणेवार्थे विहितत्वात्। 'हृद्यं शेवधिना समं हृदि भजन्ति' इत्यन्न वाक्यगा आर्थी, 'आनन्दसारोपमम्' इत्यत्र समासगा आर्थी। हृद्यमिति विशेषणमन्राष्यपेद्यते। अन्यथा धर्मलुप्तैव स्यान्न पूर्णा। शशिवदित्यत्र तद्धितगा आर्थी। तन्नत्यवतेः 'तेन तुल्यं क्रिया चेद्वतिः' इति तुल्यार्थे विहितत्वात्। (भारती) देवताओं के समूह अपने मस्तक पर जिसकी आजा माला की तरह ढोते हैं, जो मनुष्यों को पशु की तरह वाँधकर छोढते हैं, जिसके भ्रू-विलास में सारा ऐश्र्य है, शेवधि की तरह वह

Page 155

उपमानिरूपणप्रकरणम् ११५

हृदय धन्य है, जिससे लोग उसका भजन करते हैं, आनन्दस्वरूप चन्द्रमा की तरह प्रसन्न शरीर है जिसका, ऐसे शकर को मेरा प्रणाम है। इस उदाहरण में ६ प्रकार की पूर्णा उपमा प्रदर्शित है। प्रथम वाक्य में 'जिसकी आश्ञा' इत्यादि में श्रौती पूर्णा उपमा है। दूसरे वाक्य 'पशु की तरह' में 'ह्वेन नित्यममास.' इस वात्तिक के वल से समास के द्वारा एक पद होने के कारण समासगा शरौती हैं। तृतीय वाक्य में तद्धितगा औौती है। 'अभ्रवद् इति पष्टोसमर्थाद्वते' तथा 'तत्र तस्येव' इस सूत्र द्वय से 'इव' का अर्य विहित है। 'हृद शेवधिना समं हृदि भजन्ति' यहाँ वाक्यगा आर्थी है। 'आनन्दं सारोपमम' यहाँ समासगा आर्थी है। यहाँ मी 'हृद्य' इस विशेषण की अपेक्षा है। अन्यथा यहाँ भी धर्मलुप्ता उपमा हो जायेगी, न कि पूर्णा। 'शशिवस्' यहाँ तद्धितगा आर्थी है। क्योंकि यहाँ तत्रत्यवतेः तेन तुल्यम् क्रिया चेहुतिः' इस सूत्र से तुल्य का अर्थ विहित है। (सुधा) तन्र प्रथमं पूर्णाया: षडू भेदानेकेनेव श्लोकेन दर्शयति-यस्येति। सुमनसां वृन्दैः शिरसा यस्य आज्ञा माला यथा मालेव उह्यते। यो जनान् पशूनिच वद्ध्वा मुम्चति, यस्याभ्रवद्वैभवमस्ति, धन्याः शेवधिना समं हथ यं हृदि भजन्ति। कीहृशमानन्दसारोपमं शशिवत् प्रस्तन्नवपुपे तस्मे शम्भवे नमः । पूर्णायाः षट प्रकारन् दर्शयति-अन्नेति। अम्नोदाहरणे षडूविधापि पूर्णा दर्शिता। तन्र प्रथमवाक्ये यस्याज्ञेत्यादौ वाक्यगा श्रती, चतुर्णां पृथक पृथगुपात्तत्वाद्। द्वितीयवाक्ये समासगा श्रौती, 'इवेन नित्यसमासः' इत्यादिवार्तिकबलेन पशूनिवेत्यस्य समासेनेकपद- त्वास। तृतीयवाक्ये तद्धितगा श्रौती, पष्ठीसमर्थाद्वतेरभ्रवदित्यत्र 'तत्र तस्येव' इश्यनेन इवार्थे विहितत्वास्। 'हरद्यं शेवधिना समम्' इत्यत् वाक्यगा आर्थी, 'आनन्दसारोपमम्' इत्यत्र समासगा आर्थी। अन्नापि हृध्मिति विशेषणापेक्षा, अन्यथा धर्मलुप्ततवापत्ते। शशि- चदित्यन्न तद्धितगार्थी, 'तेन तुल्यम्' इत्यादिसूत्रेण तु्यार्थे वतेर्विधानात्। ननु यथादीनां सादृश्यार्थकरववत् समादेरपि सादृश्यार्थकतया वैषम्याभावास् 'यस्याज्ञा' इत्यादौ श्रीती; 'हथं शेवधिना समम्' इत्यन्र सवार्थीति विभागकरणमनुपपक्षमिति चेत्-अत्र केचित्-इवा- दीनामुपमानोपमेथयोः शक्या धर्मसम्बन्घप्रतिपादनम, तुल्यादिमिस्तु धर्ममाश्रमिति तद्विशेषं वदन्ति। तन; यथेवादीनामुपमानविशेषणवनियमेन तैरप्युपमान एव साधारण धर्मसम्बन्धस्य बोधयितुं शक्मरवात्। अन्यविशेषणस्यान्यत्र सम्बन्घवोधकरवाभावेनोप मेये तद्बोधनस्थाशक्यरवात्। चेन्रस्य धनमित्यत्र चैत्रपदोत्तरषष्ठया चेत्रस्य स्वामित्वम्, धनस्य स्वरवं शव्दशक्तिस्वाभाव्याद्यथा वोध्यते, तथा यथेवादिपदेनोभयन्न तद्वोध- नापानुपपत्तिः। नचवसुपमानोपमेययोभेदान्वयः कथमिति वाच्यम, प्रकारीभूतविभक्त्यर्थसम्बन्ध- स्यैव फलानुरोधाद् नामार्थयोरभेदान्वये प्रक्ारीभूतनिपातार्थसम्बन्धस्यापि हेतुताकषपनात् सदशधन्द्रीयं सुखमिति बोध। षष्ठवर्थस्वामितववादिनां प्राचा मते प्रकारीभूतविभक्कयर्थ- सम्बन्धेन पैत्रादेधनादावन्वयाद् 'स्वामिचैत्रीयं धनम' इतिवत् । एवज् 'मुसं पद्यज् तुष्ष्यम्' इत्यनेनोभयत्र सादृश्यप्रत्ययाषिविशेषे यथेवादिश्रुतिः साधारणध्मविशेपरूपाह्ा- दकत्वसम्बन्धमप्नाप्य न पर्यवस्यति। तुक्यादिपदश्रुतिस्तु धर्मविशेषसम्वन्धावगमं विनापि सामान्यतः साधर्म्यमात्रेण पर्यवस्यति। तथा हि-'पद्ममिव मुखम्' इत्यादावुपासस्या-

Page 156

११६ चिन्नमीमांसा

घिप्तस्य वा रमणीयत्वादे: सम्बन्धं विषयी कृत्य पर्यंवसानम्, इवादीनां धर्मविशेपसग्यन्पएव शकश्यङ्ीकारास। तुल्यादिषव्दास्तु नैवं 'पप्मेन तुषयम्' इस्ययोभयम्रापि सामान्यनस्तुल्य त्वं बोधयित्वा विश्रान्तेपु तेषु धर्मविश्ेषं विना कथ तुल्यतेति प्रतीत्यनुपपत्या धर्मविशेष. सम्बन्धप्रतीतेः। तस्माष पतीत्यनुपपत्या प्रतीतानुपपत्या च सम्वन्घयोधे विशेषाष्छूीतार्थ विभाग इति प्रदषीपादयः। महेश्वरादयस्तु-चन्द्रप्रतियोगिकसाहश्यमिवार्थ, 'घटो न' इत्यत्र घटपतियोगिकाभा वस्य नजर्थतावत सादश्यमात्रस्य इवाथंतवे चन्द्रसाहरय मित्यादिवबन्द्वस्येव मुखमित्यापते:। इचादे: सादृश्यमान्रवाचकतया ततः पछचर्थभूतस्बन्धालाभेन तह्वीघाय पष्ठीप्योगावश्य- कत्वात्। अस्मद्वीतया सादश्यप्रतियोगिताया इवादिपदवाच्यतया पप्ठयपेक्षाया अभावात्। अतो निपातस्थलेऽन्विताभिधानम्, न तुल्यादिपदेद्धिति तयोविशेषं वदन्ति। तक, दषान्त- स्यासम्भवात्, असमस्तनजोऽभावसाग्रपरत्वेन प्रतियोगिरवाशस्य समर्गमर्याद्येच प्रतीतेः, घटपदस्यव तत्प्रतियोगिकाभावपरत्वे नजस्तात्पर्यग्राहकताया सुवचत्वाघ।तस्मात् 'चन्द्र इच' इत्यानी प्रतियोगितायाः संसर्गतयेव लाभेन पप्ठ्यभावा्चन्द्रश्य साहश्य मित्यत्र संसर्गतया तद्भानसम्भवात् पष्टीत्यस्य सुस्थनया चन्द्रप्रतियोगिकसादृशयेन दव- पदस्य छाफि, घटप्रतियोगिकाभावे न वा नजादे: शफिरित्येव योग्यमिति घिक। चक्रवर्तिनस्तु-पन्द्र इव सुखमित्यादावुभयविशेग्यक एव नोध। 'यथा चन्द्रस्तथा मुखम्' इत्यत्र 'याहशघर्मवान् चन्द्रः' तादशधर्मचन्सुखमितिवत्। अत एव 'हंसीच धवल- शन्द्र.' इग्यादी यादृशधावव्यवती हसी तादपधाववयवाश्च्द् इति वोधे पुत्रिमधवलपदस्थ इंस्यामन्वयाभावाद दोषयोपपत्तिः। अन्यथा हसीसदशश्न्द्र, इत्यन्वपसम्भावाद दोप- रवानुपपत्तेः। एवन्वोपमानोपमेययोः दयोरपि साधर्म्यस्य शाव्दत्वाष्छ्रीतीरवम्।'चन्द्रेण तुल्य मुखं मनोज्षम्' इश्यादौ 'मुखस्य तुत्यश्रन्द्.' इस्यादी घ भिन्नविर्भाक्करवेन तयोः साधर्म्यस्य शव्दादपरतीतेरार्थीरवम्, पद्म 'मुखकष तुकष्यं मनोशम' इतयादी घोभयन्र सादृश्य प्रतीतावुपमानोपमेयभावसम्बन्घस्य प्रसिद्धिदश्ञादेव लाभ हत्यार्थरवात्ततव मिर्याहुः। तदपि न, साधम्यस्थार्थावेन तुक्यादिपदोपादाने स्वार्थीति काव्यप्रकाशविरोधापत्तेः। 'चन्द् इच मुख मनोज्ञम' इत्यादावपि दुष्टर्वापतेः। तम्न नपुंमकेक्शेपे तु 'कुवलयमित्र श्यामः कटापः' इश्यादीनां दुषत्वापतेः । 'दृष्टः पुनपुंसकयोः प्रायेण' इति वामनोकरुमयत्र समत्वास। अपरे तु-'चन्द्र इच मुखम' इत्यत्र चन्द्रप्रतियोगिकान्योन्याभावसमानाधि- करणचन्द्र वृत्तिधर्मवन्मुखमिति घीः। तम्र रमणीयपदोपादाने तादशचन्द्रवृत्ति यद्रमणीयरवं तदाश्रयो मुखमिति बोधः। साधारणघर्मस्य इवशव्देनोभयनिष्ठतायाः प्रतिपादनाष्छ्रीती. रम्। तत्र समानाषिकरणादुपमेयवृत्तित्व,वृध्यन्तेनोपमानवृत्तिस्वमिति विवेक:। साधा- रणधर्मप्रयोगस्थले तस्यैव इषपदेन रमणीयादिपदेन च बोधने एकस्य निराकाडूक्षत्वेनान्य- यानुपपत्तिस्तु, द्वाम्यामेक्स्येवोपस्थापनान्ष सम्भवति, 'चन्द् इव मुखमाह्ादयति' इत्यत्र तु आाह्लादकत्वमिवार्थ एव, घातोस्तात्पर्यग्राहकत्वस्य सुबचत्वास्। 'इंसीच घवलशधन्द्रः' इत्यादेर्दु्त्वन्तु लिद्गविश्योषस्योपमार्यां विशेषानुपपादकत्वेन तत्प्रयोगस्यानर्थकत्वादेव। तस्येघ सहदयहृदयोहुजकत्वात् नियतलिद्वेयु तदभावाक्ष दोष:। तेन 'कुवलयमिव श्यामः कटार' इत्यादौ न दुष्टतेति। 'चन्द्रेण तुल्यं मुखम्' इत्यम्र तुक्यपदस्य सादृश्यवानर्थः, केवलसाइश्ये तद्प्रयोगात, सादृश्याभिन्नं सुखमिति वोधापत्तेश्र, नामार्थयोरभेदान्वयस्य व्युत्पतिसिदत्याव। तदेकदेशसादृश्यस्य व चन्द्रप्रतियोगिकान्योन्याभावसमानाधिकरण-

Page 157

उपमानिरूपणप्रकरणम् ११७ धर्मश्चार्थः, आश्रयत्वं प्रत्ययार्थः। वृत्तित्वञ्र तृतीयार्थः 'तुष्यार्थरतुलोपमाभ्यां एृमीयाऽन्य- तरस्याम' इति सूत्ात्। अस पूव 'चन्द्र-इव मुख भाति' 'चन्द्रमिव मुखं पश्यामि' चन्द्रे- णेव सुखेन कृतम्' इत्यादावुभयो: समानविभकिकतानियमेऽपि 'वन्द्रेण तुक्ष्यं मुखं भाति' इत्यादो न नियम:, पूर्वसूत्रेण वाधात् चन्द्रधर्मयोर्नामार्थतया आश्रयतासम्पन्घेन धर्मे धन्द्रान्वयानुपपत्तेः। ततः समानाधिकरणत्वस्य चन्द्रवृत्तित्वस्थ च धर्मेऽन्य, तस् चाश्ये। तथा प चन्द्रान्योन्याभावसमानाधिकरणचन्द्रवृत्तिशर्माश्नयामिन्नं मुखमिति बोधः। अत्रोपमेयवृत्तित्वं धर्मोपस्थापकपदस्य उपमानवृत्तित्वं व तृतीयाया अर्थः। अत उभयं धर्मवाचकपदार्थो न भवतीत्यत आर्थीत्युच्यते, उभयन्र वोधसाम्येऽपि भिन्नपदप्रति- पाथत्वस्थेव विभागमूलत्वात्। नन्वेदमपि अव्ययविशेषणानां नपुमकता, भवतीत्यनु- शासनादिवार्थविशेषणचन्द्रादेनपुलकत्वापतिरिति चेतु, शस्त्रीव श्यामा शब्त्रीश्यामा, मृगीब चपला मृगीचपला इत्यादिभाष्यकारादिप्रयोगसामध्यंवलेनोपमानवृत्तिलिङ्गस्य विधानेन दोषामावात्। तस्मानूर्मोपस्थापकपदस्येवोभयत्र सम्बन्धयोघकत्वे श्रीती, अन्यन्न तु आर्थोति। उपसानादिवृत्तित्वविशिष्टनियतशाव्द्रबोधविषयरवस्य औतीखात्, इवादौ तथा नियमात्। तुल्यादौ तु 'चन्द्रेण तुत्यं मुखम्' इर्यन्र तथारवेऽपि 'धन्द्रो मुरूक तुक्यम्' इश्यम्र च शब्दवाच्येतरेतरयोगवलेन दयोर्युगपदन्वयावगमेन चन्द्रप्रतियोगि- वृत्तिघर्मवाँशन्द्रः इति दोध। अश्र प्रकृतत्वादिनैवोपमानोपमेयभायप्रतीतेः विक्वन्वादिति काव्यप्रकाशाशय इत्याहुः। इवादिभि: सादृश्यमनुयोगितासम्बन्धेन बोध्यते। सुर्यादि- भिस्तु सदृशाभेदेनेति विभाग इश्यपि केचित्। तुल्यादिपदेष्वपि पाप्ताप्राप्तविवेकेन सादृश्यस्येव विधेयत्वाननेदं सभ्यगित्यन्ये। सादृश्य मुख्यविशेष्यकज्ञानजनकपदप्रयोगे श्रीती, अन्यत्रार्थीति अन्थकाराभिप्राय इत्यलमतिप्रसङ्गेन। (चित्र०) मूर्तिर्यथा नवसुधा बलभिन्मणीव कण्ठप्रभा सुसदशश्च जटास्तडिद्धिः। शङ्गाक्षि काव्ननिभं पदमव्जदेश्यं यस्यैष मेऽस्तु हृदि देवतसार्वभौमः॥ अत्र पब्विधापि धर्मलुमा दशिता। तत्र मूर्तियेथा नवसुघेति वाक्यगा, EDETEECEE च्लभिन्मणीव कण्ठप्रभेति समासगा शरौती। उभयन्नापि भातीत्यादिक्रियाप्रयोगे सैव साधारणो धर्म इति धर्मलुप्ता न भवेत, अतस्तदप्रयोगः । श्रती तु धर्मलुप्ता तद्धिते न संभवति। षष्टीसमर्थात् सप्तमीसमर्थाद्वा इवार्थे विहितस्य वतेधर्मोपादानं विनान्वयसौकर्याभावात्। न च वाच्यम् 'इवे प्रतिकृतौ' इत्यधिकारे इवार्थे विहितस्य तद्धितस्य धर्मोपादानं बिना नैराकाड्डचमस्ति। 'कुशाग्रीया बुद्धिः', 'शैलेयं दधि', 'पौण्डरीकं मुखम्' इति दर्शनात्। अतस्तत्र श्रौती धर्मलुप्ता तद्धित उदाहर्तु शक्यत इति 'इबे प्रति- कृतौ' इत्यधिकारे विहितप्रत्ययाना तुल्यार्थे एव विधानात्। अन्यथा तेपां सादृश्यविशिष्टधर्मिपर्यन्तत्वाभावेन कुशाग्रीया बुद्धिरित्याद्युपमेयसमानाधि- करण्यासंभवात् सादृश्यविधानमपि सदशे पर्यवस्यति, सामानाधिकरण्य- दर्शनादिति सूत्रे इवग्रहणं न विरुध्यते।

Page 158

११८ चित्रमीमांसा

(भारती) जिसकी मूर्ति नई सुधा की तरह है, जिनके कण्ठ की छवि रन्द्रनील मणि की तरह है, जिनकी जटायें विजली की तरह सुन्दर हैं; जिनकी आँखें शख की तरह आयत एव सुन्दर है तथा जिनके चरण कमल के तुल्य हे और जिनसे स्वर्णाभा छिटक रद्दी है-ऐसे देवताओं के सार्वभौम मगवान शकर मेरे हृदय में हों। इस उदाहरण में पाँघों प्रकार की धर्मलुप्ता दिखाई गई है। इस श्लोक में 'मूतिर्यथा नव सुधेति' इस पदवाक्य में वाक्यगा धर्मलुप्ता है। 'वलिभिन्मणीव कण्ठप्रभेति' ग्लोकांश में धर्मलुपा समासगता श्ौती है। दोनों स्थानों में भी 'भाति' इस किया के प्रयोग में वही साधारण धर्मे है- अतः धर्मलुप्ता न होने के कारण ही उसका इसमें प्रयोग नहीं किया गया। धर्मलुप्ता श्रीती तो तद्धित में समव ही नही है, क्योंकि पष्ठी किंवा सप्तमी के सामर्थ्य से 'दव' के अर्थ में विदित वति' क्रिया का धर्मोपादान के बिना भी अन्वय की मुलमना का अमाव है। क्योंकि उपमेय में उपमान सवधवोधक का उसका साधारण धर्म प्रयोग के बिना उसकी अनुपपत्ि है। मान हे, यहाँ इवार्थक 'वति' के प्रयोग में त्रौती धर्मतुप्ता न हो, फिर मी हवार्थक तद्धितान्तर में तो वह दुनि- वार होगी; इस आशंका से 'नघ वाच्यम्' का प्रयोग किया है- 'हवे प्रतिकृती' इस अधिकार से 'कुशाभ्राष्छ्रः' इस सूत्र मे विधीयमान इवार्थक छ. प्रत्यय का धर्मोंपादान के विना नैराकाक्ष्य की प्रतीति है। 'कुशामीया बुद्धि', 'अॅलेयं दधि', 'पौण्ड- रिकं मुखम्' इत्यादि प्रयोग स्पष्टतः दिखाई पढते हैं। अत. वहाँ श्रीती धर्मलुप्ता तद्वित का उदाहरण कह सकते हैं। क्योंकि 'इवे प्रतिकृतौ' इस सूत्र के अधिकार में विहित प्रत्ययों के तुल्यार्य में ही विधान है। अन्यथा तुल्य अर्धपरता के अभाव में उनका सादृश्य विशिष्ट धर्मिपर्यन्तत्व के अभाव से समानाधिकरण्य के असभव होने के कारण वहाँ उसकी अनापत्ति होगी। अगर 'इव' के अर्थ में उसका विशेष माना जाय तो सादृव्य में विधान करने पर भी सादृव्यपर्यवसान से उसका विरोध होगा ही। (सुधा) अथ पश्चविधामपि धर्मलुप्तां कोकेन दर्शयति-मूर्तिरिति। यश्य मूर्तिर्नवसुधा यथा वर्तते, कण्ठस्य प्रभा वलभिन्मणीव=इन्द्रनीलमणिरिव, जटास्सरिद्िः सुसदशश्र वर्तन्ते। शद्धाषि=नृकरोटि: सुवर्णसदशम, पद घरणमव्जदेश्य कमलेन तुल्यम्, एप दैवतसारवं भौम: शिवो मम हृदि अस्त्वत्यन्वयः। अत्रोदाहरणे पञ्चविधानाह-'मूर्तिः' इत्यादि- पदवाक्ये वाक्यगा धर्मलुप्ता, मणीव कण्ठप्रभेति समासगा धर्मलुप्ता, भातीत्यादिक्रिया- प्रयोगे उभपत्र न धर्मलुप्तात्वविघातापत्तिः। एवं श्रौतीभेददयमेवोदाहृतम्।धमंलुप्ता श्रीती तद्िते तु न सम्भवति, पष्टीसमर्थात् सप्तमीसमर्थाद्वा विदितस्य=कृतस्य वतेधर्मंकथनं विनान्वयस्य सौकर्याभावास्। उपमेये उपमानसम्वन्धवोघकस्य तस्य् साधारणधर्म- प्रयोगमन्तरेणानुपपत्तेः। न हि मथुरायामिव यथुरावत् स्रुप्ने सम्भवति, सस्तम्यर्थाद्यनन्वया- पत्तेः, किन्तु मथुरावत् सुप्न इत्येव। यस्मात् पष्ठ्यर्थसम्वन्घविशेषणस्य सप्ष्यर्थाधारत्व विशेषणस्य वा साधारणधमरूपस्य प्रयोगं चिना इवार्थवतेरभावास्ष तद्तिते श्रीती धर्मलुसा। ननु मा भूदिवार्थकषतिप्रयोगे औती धर्मलुप्ता। तथापि इवार्थकतद्वितान्तरे सा दुर्वारेस्याशक्कते-न चेति। 'कुशाग्रीया घुद्धि' इत्यम्र तत्सम्भवः। 'इे प्रतिकृतौ" इ्त्यधिकारस्थेन 'कुशाग्राष्छः' इति सूत्रेण विधीयमानस्येवार्थछप्रत्ययस्य धर्मोपादानं

Page 159

उपमानिरूपणप्रकरणम् ११६

बिना नैरकाक्ृयप्रतीतेटंशवात्। समाधने-इवेश्यादि। तदषिकारविहिसाः प्रत्पया- स्तुश्यार्था पव, कुशापसुक्या बुदि: इस्यभेदान्वयदर्शनाद्। अन्यथा-तुश्मार्थपररभाभावे तेषां साहश्यविशिष्टधर्मिपर्यन्तरवाभावेन सामानाधिकरण्यासम्भवाल् तवनापतेः। न चेवार्थे तद्विधानविशेष:, सादश्ये विधानमपि सदशपर्यंवसानेन तद्विरोभादित्यादायः। (चित्र०) सुसदृशश्चेत्यादिवाक्यत्रये क्रमेणार्थी वाक्यगा, समासगा, तद्धितगा च। अब्जदेश्यमित्यत्रेषदसमाप्तौ विहितोऽपि देश्यप्रत्ययः सादश्ये प्रयुज्यते, सोऽपि सामानाधिकरण्यात् सदशपर्यवसायी। ननु सदशादिशब्दप्रयोगे सादृश्य- विशिष्टधर्मिपर्यन्तत्वादार्थीति युक्कम्। सादृश्यादिशब्दप्रयोगे कथं कि श्रौती, उतार्थी ? यथा-

मृगद्वन्द्वेषु पश्यन्तौ स्यन्दनाबद्धद्ाष्टपु।। इत्यादौ श्रौत्येवेति न्मः । तत्र तद्धितप्रकृत्या धर्मिपर्यन्ताभिधानेऽपि प्रधानप्रत्ययाभिहितस्य सादृश्यस्यैव वाक्यार्थान्वयित्वात् ।

(भारती) 'सुसद्दशश्चेति' इत्यादि वाक्यत्रय में क्रम से आर्थी वाक्यगा, धर्भलुप्ता, 'कांघननिभ' में आर्थी समासगा धर्मलुप्ता तथा 'अब्ज देश्यम्' में आर्थीं तद्धितगा धर्मलुप्ता है 'अव्जदेशयम्' में ईपद् समाप्ति में विहित देश्य प्रत्यय का भी सादृश्य में प्रयोग है। वह मी सामानाधिकरण्य से सदृशपर्यवसायी है। यहाँ एक आशंका करते हैं-क्या सदृश आदि शब्द के प्रयोग में सादृश्य विशिष्टधर्मपर्यन्त से आर्थी योग्य है। अथवा सादृध्यादि के प्रयोग में ही श्रौती है। उदाहरण देते हैं- 'समीप में रथ के मार्ग को छोडे हुए, रथ की ओर दृष्टि लगाए हुए, मृग के जोडों में परस्पर अर्थात एक दूसरे की आँखों की समानता को देखते हुए वे दोनों चले।' यहाँ श्रौती ही है। क्योंकि तद्धित प्रकृति से धर्मिपर्यन्त अभिधान रहने पर भी प्रधान प्रत्यय अभिहित सादृश्य का ही वाक्यार्थ के साथ अन्वय है। (सुधा) आर्थीधर्मंलुप्तायाः क्रमेण भेदत्रयमाह-सुसदृशश्रेरयादि। मरथमे वाक्यगा धर्मछप्ता आर्थी। 'काखन निभम्' इत्यत्र समासगा, 'अब्जदेश्यम्' इतयम्र तद्वधितगा, ईषद्समाप्तौ विद्तिदेश्यस्यापि सादृश्ये प्रयोगात्। सोऽपि सामानाधिकरण्यात् सादश्यवस् पयंवसा- यीति न कोऽपि दोषः। आशङ्ते-नन्विति। साधशादिशव्दप्रयोगे साहश्यादिविशिष्ट- धमिपर्यन्तत्वादार्थी योग्या। साहश्यादीनामेव प्रयोगे कतरेत्याशङ्का। असम्भवय्यावृत्त्यर्थ- मुदाहरणमाह-परस्परेति। विश्वासाददूरं=समीपं यथा भवति तथा उज्झितं वर्ष्म यैस्तेषु स्यन्दने = रथे आवद्ा आसन्जिता दृष्टिनेंत्रं येः तानि तेषु 'दग्ष्टिनेत्रोधनचपुर्न- यनाम्वकेक्षणापीणि' इति हलायुध। कौतुकवशाद्रथासकर्दर्टषु मृग्यक्ष मृगाश्च 'पुमानू

Page 160

१२० चित्रमीमांसा

ख्रिया' इत्येकशेषः। तेषां इन्द्रेवु मिथुनेधु परस्पराचणा साडश्यं पश्यन्तावित्यन्वयः। समाधते-और्येवेति। प्यमप्रकृतिभूतसदृशशब्देन साहश्यवदभिम्ानेऽपि प्रमानीभूतभाव-

तत्सत्वात्। सादृश्यादिपद् विशेषणे सु न नियमः चन्द्रसाहश्यमितयादौ तथारवेपि 'चन्द्र- मुखयो: सादृश्यम्' इत्यादौ उपभिचारात्। तस्मादार्थी पवेति पदन्ति। (चिन्न०) यं पश्यन् दीपदर्श सपदि मनसिजः कीटनाशं स नष्टः स्वान्ते योऽन्तःपुरीयत्यतिभजनकृतस्तं कुमारीयति द्राक्। मूलस्तम्भायते यस्त्रिभुवनभवने कोकिलालापिनी यं वामाङ्गे कल्पवल्ली श्रयति कुवलयश्यामला तं भुजानि॥। अन्न सप्तविधापि वाचकलुप्ता दर्शिता। तत्र दीपमिव पश्यन्नित्यर्थे दीप- दर्शमिति कर्मणमुलि, कीट इव नष्ट इत्यर्थे कीटनाश नष्ट इति कर्तृणसुलि, स्वान्तेऽन्तःपुर इवाचरतीत्यर्थेऽन्तःपुरीयतीत्यधिकरणक्यचि. कुमारं स्कन्दमि- वाचरतीति कर्मक्यचि, त्रिभुवनस्योत्पत्तौ मूलस्तम्भ इवाचरतीत्यर्थ मूलस्त- म्भायत इति कर्तृक्यङि, कोकिल इवालपतीत्यर्थे कोकिलालापिनीति णिनौ, कुवलयमिव श्यामलेत्यर्थे कुवलयश्यामलेति समासे च क्रमेण वाचकलुप्ता द्रष्टव्या।

(भारती) 'दीप की तरह जिसे देखते हुए काम रूपी कीडे शीघ्र ही भस्म हो जाते है, जो अत्यन्त भजन करने वाले अपने मक्तों को हृदय में घर की तरह स्थान देते हैं, जो भक्तों को स्कन्द कुमार की तरह मानते हैं तथा जो त्रिमुवन की उत्पत्ति में मूलस्तम की तरह आचरण करते हैं तथा जिनके वाम भाग में कोयल की नरह वोलने वाली कुवलय की तरह श्याम वर्णा पार्वती कल्पलता की तरह आाश्रित है, उन भगवान् शकर को मै भजता हूँ।' इस उदाहरण में सातो प्रकार की वाचकलुप्ता दिसाई गई है। 'दीपमिव पश्यन्' इस अर्थ में 'दीप दर्शम्' इस पद में 'उपमाने कर्मणि घ' इस सूत्र से कर्म में णमुल प्रत्यय है। 'कीट इव नष्टः= कीटनाश नष्ट' इस प्रयोग में भी पूर्व सूत्र से ही चकार बल से कर्त्ता में णमुल् प्रत्यय है। 'अन्त.पुरे इव आचरति' इस अर्थ में 'अधिकरणास' इस सूत्र से अधिकरण में क्यच् प्रत्यय है। 'कुमारं स्कन्दमिव आधरति' इस निग्रह में 'उपमानादाचारे' इस सूत्र से कर्म में क्यच् प्रत्यय है। 'त्रिभुवनस्य उत्पत्ती मूलस्तम्भ इव आघरतीत्यर्थे मूछ- सतम्भायत' इस प्रयोग में 'कर्तः क्यब सलोपश्र' इस सूत्र से कर्त्ता में क्यढ् प्रत्यय है। 'कोकिल इच अलापी' इस अर्थ में 'काकिलालापिनी' में 'कर्तर्युपमाने च' इस सूत्र से णिनि प्रत्यय है। "'कुवलयमित्र श्यामला' इस अर्थ में 'कुवळयश्यामला' इस समास में क्रमश वाचकलुप्ता देखना चाहिए।

Page 161

उपमानिरूपणप्रकरणम् १२१

(सुधा) अथ सप्तविर्धा वाचकलुप्तां द्शयति-यमिति शोकेन। यं दीपदशं पश्यन् आलोफयन् समनसिज: काम: कीटनाशं नष्टः, योऽतिभजनकृतः पुंसः स्वान्ते = हृदि अन्तःपुरीयति तं द्ाक कुमारीयति, यस्तिभुवनभवने मूलस्तम्भायते, कोकिलालापिनी कुवळयश्यामला कर्ष्पवल्लीयं श्रयति, तं शिवमहं भजामीत्यन्वयः। अन्नेति = उदाहरण इत्यथः। चाचक- लुप्ता सप्तविधापि अ्रन्थकारणे दशिता। दीपमिच पश्यन् दीपदर्शम् 'उपमाने कर्मणि घ' इति कर्मणि णमुलू। कीट इच नष्टः=कीटनाशं नष्टः, पूर्वसूत्रे चकारात् कतंरि णमुल। अन्तःपुरे इवाचरसीत्यर्थे 'अधिकरणाच्' इति सूत्रेण अधिकरणे क्यध्। कुमारं स्कन्दमि- वाचरति-'उपमानादाघारे' इति कर्मणि क्यघ, मूलस्तम्भ इवाघरति इत्यर्थ 'कर्तुः व्यट सलोपश्र' इति कर्तरि क्यड। कोकिल इवालपतीत्यर्थे 'क्तर्युंपमाने' इति सूत्रेण णिनिप्रथ्ययः। अम्र प्रकाशकारानुयायिनस्तु 'धपपदमतिष' इति सूत्रस्य तम्नापि वृत्तावेव क्रोढीकारेण पृथग्गणनीचित्यम्, बिभाजकतावद्छेव कधर्मा नर्वछ्न्नत्वैवाधिष्यस्योन््रािमुितत्वा दित्याहुः। कुवलयमिव श्यामका कुवलयश्यामलेति समासः। एवं क्रमेण वाचकलुप्ता, दष्म्या। (चिन्न०) पूजनं पुररिपोस्तनोतु मे चित्तमन्यदपहाय चापलम्। यत्समं प्रियहितं न दृश्यते येन नापि सदृशं निशम्यते।। अत्र यत्सममिति समासे येन सदशमिति वाक्ये चोपमानलुप्ता द्विविधापि दर्शिता। वृथा मम भ्रमत्यहो मनः स्थिते महेश्वरे श्रुतोऽस्ति तेन कि समः स्मृतोऽथवास्ति तत्समः । षडङघ्रयत्वदः सदा तद्ङ्घिपङ्गजद्वये चकोरकीयतु स्थिरं तदानने शशिप्रभे॥। अन्रावशिष्टाः षड्विधा अपि लुप्ताः प्रदर्शिताः। तन्र द्वितीयपादे वाक्य- समासयोधर्मोपमानलुप्ता द्विविधा, तृतीयपाढे किप्समासयोर्धर्मवाचकलुप्ता द्विविधा, चकोर कीयत्विति वाचकोपमेयलुप्ता, शशिप्रभ इति धर्मोपमानवाचक- लुप्ता च क्रमेण द्रष्टव्या। (भारती) 'मेरा हृदय अन्य चपलताओं को छोडकर पुररिपु भगवान् शकर की पूजा का विस्तार करे; जिसके सदृश प्रियहित न कही दिखाई पडता है और न कहीं सुनाई ही पडता है।' इस उदाहरण में 'यस्य समं यरसमम्' इस समास में समासगा एव 'येन सदशम्' इसमें चाक्यगा दोनों प्रकार की उपमानलुप्ता दिखाई गई है। 'रे मेरा मन। महेञ्वर भगवान् के रहते हुए भी क्यों तू इधर-उधर भटकता है? उनके समान

Page 162

१२२ चित्रमीमांसा

कोई अन्य देवता सुने हो अथवा याद करते हो? रे मन ! उनके चरणरूपी कमलों में अपने को भ्रमर वना लो। उनके मुख पर विराजमान चन्द्रकला में अपने को चकोर बना लो।' इस उदाहरण के द्वितीय पाद में वाक्यगता तथा समासगता धर्मोपमानलुप्ता 'कृपालुत्वधर्मोप- मान' के अनुपादान से दो प्रकार की है। तृतीय पाद में 'चकोरकीयतु' में वाचकोपमेयलप्ता है, 'षहसघ्रयुत्तु' में क्विप तथा समास में धर्मवाचक द्विविध लुप्ता है। इसी प्रकार 'अशिप्रभा' में धर्मो- पमानवाचक लुप्ता भी क्रमशः द्रष्टव्य है। विमर्श-इस प्रकार काव्यप्रकाशीय उपमा के भेदों की व्याख्या दीक्षित ने की है। मम्मट सम्मत अधोंकित उपमा भेद हैं- पूर्णोपमा के ६ प्रकार- १. तद्धितगा श्रौती पूर्णोपमा। २ समासगा श्रौती पूर्णोपमा। ३. वाक्यगा श्रौती पूर्णोपमा। ४. तद्धितगा आर्थी पूर्णोपमा। ५ समासगा आर्थी पूर्णोपमा। ६ वाक्यगा आर्थी पूर्णोपमा। लुप्ोपमा के २१ प्रकार- (मम्मट-्सम्मत १-१९ तथा विश्वनाथ-सम्मत १-'१ ) तद्धितगा श्रौती दप्तोपमा। २ समासगा श्रीती लुप्तोपमा। ३ वाक्यगा श्रौती लुप्तोपमा। ४ समासगा आर्थी लुप्तोपमा। ५ वाक्यगा आर्थी लुप्तोपमा। ६ आधार क्यच् निववना लुप्तोपमा। '७ कर्म क्यच् निवधना लुपोपमा। ८ कर्तृ उपपद क्यड निवधना लुप्तोपमा। ९ कर्मोपपद णमुल निवधना लुप्तोपमा। १० कर्तृ उपपद णमुल निवधना लुपतोपमा। ११. समासगा उपमान लुप्तोपमा। १२ वाक्यगा उपमान लुप्तोपमा। १३ समासगा वाचक लुप्तोपमा। १४ क्विपूगा वाचक लुप्तोपमा। १५ समासगा धर्मोपमान लुप्तोपमा। १६. वाक्यगा धर्मोपमान लुप्तोपमा। १७ समासगा धर्मोपम्य वाचक लुप्तोपमा। १८ किवप्गा धर्मोपम्य वाचक लुप्तोपमा। १९ उपमेय लुप्तोपमा। २० धर्मोपमेय लुप्तोपमा। २१ धर्मोपमान वाचक लुप्तोपमा।

Page 163

उपमानि रूपण प्रकर णम् १२३

इस प्रकार कुल मिलकर उपभा के २७ भेद हुए। मम्मट ने उपमा के केवल दो भेद स्वीकार किए हैं, पूर्णा और लुप्ता। फिर पूर्णा के आर्थी एव शती के रूप में दो मेद किए हैं। इस प्रकार के भेद 'इव', 'यथा', 'वा', 'तुल्य', 'सदृश' आदि उपमावाचक शब्दों के अर्थवोधन में अन्तर स्वीकार कर के ही प्रस्तुत किए गए हैं। 'इव', 'वा', 'यथा' आदि शब्द उपमान के विशेषण होते हैं। इनके श्रवणमात्र से ही साधारण धर्म के साथ सम्बन्ध का ज्ञान हो जाता है। अत. इनके प्रयोग के कारण श्रीती उपमा होती है। जहाँ समान, सदृश, तुल्य आदि उपमावाचक शब्दों का प्रयोग होना है-वहाँ आर्थी उपमा होती है। उपर्युक्त्त शब्द कभी उपमान के साथ और कभी उपमेय के साथ प्रयुक्त होते है। कभी कभी इनका अन्वय दोनों के साथ भी देखे जाते हैं। मम्मट के विभाग में- (१) ५ प्रकार की वर्मलुप्ता। (२) ६ प्रकार की वाचकलुप्ता । (३) २ प्रकार की उपमानलुप्ता । (४) २ प्रकार की धर्म तथा वाचकलुप्ता। (५) २ प्रकार की धर्म तथा उपमानलुप्ता । (६) १ प्रकार की वाचक तथा उपमेयलुप्ता। (७) १ प्रकार उपमान वाचक, तथा साधारण धर्म तीनों के लोप होने पर समासगा नामक लुप्ता। इस प्रकार लुपोपमा के १८ तथा पूर्णा के ६ भेद, कुल मिलाकर उपमा के २४ भेद प्रदर्शित किए हैं। मम्मट के इन उपमा भेदों का आधार व्याकरण सम्बन्धी व्युत्पत्ति तो है ही, साथ ही इन पर आचार्य उद्भट की उपमा-विभाजन प्रणाली का प्रभाव भी परिलक्षित होना है। क्योंकि सद्भट की भॉति ही आचार्य मम्मट ने भी उपमा के विभाग में व्याकरण-सम्बन्धी व्युत्पत्ति का प्रदर्शन किया है। यह विभाजन अलकारवादी होने के कारण आचार्य उद्मट के लिए तो गोभनीय है, किन्तु ध्वनिवाद के कट्टर समर्थक होने के नाते आचार्य मम्मट के ये विभाजन रहस्यपूर्ण है। उद्भट ने जो १७ या २१ प्रकार की उपमाओं का निरूपण किया है। सभवतः उसकी सख्या बढाकर मम्मट ने उसका परिप्कार कर दिया है। मम्मट के इस प्रयास से उपमानों के वर्गीकरणको जहाँ एक वैज्ञानिक विश्लेषण मिला है, वहीं सस्कृत काव्य साहित्य को अलकार की दृष्टि से भेद्- निरूपण का एक नया दृष्टिकोण भी मिला है। (सुधा) वाक्ये समासे च द्विविधामुपमानलुप्तां दर्शयति-पूजनमिति। मे चित्तमन्य्ापल- मपहाय पुररिपो: शिवस्य पूजनं तनोतु = विस्ताश्यत्वित्यर्थः। यत्समं प्रियहितं न दृश्यते, येन सदशमपि न निशम्यते इत्यन्वयः। भेदानाह-अन्नेति। उदाहरण इत्यर्थः। यस्य समं यत्सममिति समास, येन सदशमिति वाक्यगा उपमा न लप्ता। एवं द्विविधापि दर्शिता। एतशनियमकरणं प्राधीनातुसारेण। नव्यास्तु-तद्वितेऽप्येपा सम्भवति। यथा 'घन्धरकः बृहत्कः'। तथा घ केयटः-अचन्घन्नपि यः वन्घनिव लचयते, स चन्चतकः। यथा मणिः, स्वन्दमान: प्रभावत्वात्। अवृहसपि वृहत्निव प्रसृतप्रभारवाद्यो इश्यते स बृहर्कः। अम्र हि ञ्जत्व बृहत्वञ्ञ धर्मो मण्यादिरुपमेव। कन्पव्ययश्य वाचक: चज्तरवा

Page 164

१२४ चित्रमीमांसा

अयस्य चाप्रयोग:। न चेयमुत्येक्षा, मणौ चन्धरवांद्यभावाद्, साधारणघ्मस्य चोभय-

घाष्यम्, आरोपितेनापि चन्धरवेन साधारण्योपपत्तेः। वास्तववृत्तित्वस्यालंकारखेड, प्रयोजकत्वात्। वस्तुत उत्प्रेप्षाशङ्गेव न भघति। तथा हि-कम्प्रकरणे 'चन्घद्वृह्दतोरुप संख्यानम्' इति वार्तिकम्। 'इवे प्रतिफृत' इति कनू च सादृश्यार्थ एव भवति। अन्यथा वञ्चेत्यादी ना मप्यु पमात्वमसिद्धं स्याद्। नाप्यतिशयोक्ति, मण्यादेः प्रयोगल्याददि्याहुः वाक्ये समासे वर्मोपमानलुप्तां द्विविधाम्=किप्समासयोर्ह्विविधां धर्मवाघकलुपाब्ध चाचकोपमेयलुप्तां धर्मोपमानवाचकलुप्तान्व क्रमेणैकेन श्ोकेन दर्शयति-वृथेति। मम मनो महेश्वरे स्थिरे सति अहो! वृथा अ्रमति, तेन समः कि श्ुतोडस्ति, अथ वा तक्ष्य समस्ततसमो वा स्मृतोऽस्ति, अहो। मन तस्य अदत्निपक्कजयोरद्वयं तस्मिन् सदा सर्वदा षढड्घ्रयतु। स्थिते शशिप्रभे तस्याननं तस्मिन् घकोरकीयतु। अग्रोदाहरणे भेदानू दर्शयति-अन्नेति। द्वितीयपादे वाक्यगता, समासगता धर्मोपमानलुप्ा, कृपालुश्वधर्मस्यो- पमानस्य चानुपादानाव। तृतीयपादे पढडघ्यत्वित्यादी कियिपि समासे च धर्मवाचकलप्ता द्विविधा। पढडघिरिवाचरतु इत्यर्थे 'सर्वप्रातिपदिकेभ्यः कविव्चा वक्तव्य.' इति बिवप्। प्रीतिरूपधर्मस्य इ्ेति वाघकस्य व अडम्रि: पक्चजमिवेति समासे कान्तिरूपधर्मस्य इवेति वाचकस्य चानुपादानाद। चकोरमिवारमानमाघर त्वित्यथ 'उपमानादाघारे' इति कर्मणि क्यच्। अम्रात्मन उपमेयस्य इवेन सहानुपादानाब्ाघकापमेयलप्ता। चाशिनः प्रभा इव शोभना प्रभा यस्येत्यर्थे शोभनरूपधर्मस्य प्रभारूपोपमानस्य ह्वेति वाचकस्य चानुपादा- नात, धर्मोपमानवाचकलुप्ता चेति क्रमेण विशतिभेदा दष्टव्याः। (चित्र०) एकमयं पूर्णालुप्ताविभागो वाक्यसमासप्रत्ययविशेपगोचरतया शब्दशास्त्रव्यु- त्पत्तिकौशलप्रदर्शनमात्रप्रयोजनो नातीवालद्वारशास्त्रे व्युत्पाद्यतामर्हति, न वा लुप्ानामयं सामस्त्येन विभागः। तथा हि-धर्मलुप्ता वाक्यसमासतद्वितेषु दर्शिता, द्विर्भावेऽपि दृश्यते-'पटुपदुर्देवदत्तः' इति। अत्र हि 'प्रकारे गुणवच- नस्य' इति सादृश्ये द्विर्भावविधानात्। पटठुसदृश इत्यर्थः । यो हि शास्त्रादिष्वप- दुरेव पदुवदभिनयति स उच्यते पट्ठपदुरिति। न तावदिय वाक्ये धर्मलुप्ता। 'कर्मधारयवदुत्तरेपु' इतिसमासवद्धावविधानेनैकपद्यसिद्धे । अत एव न समा- सेऽपि धर्मलुप्तयम्। वाचक्लुप्ता णिनि बिना कैश्चित् पडविधा दर्शिता। णिनिना सहापरः सप्तविधा, क्विप-तद्धितयोरपि द्ृश्यते। यद् क्तानां सुखमयः संसारोऽप्यपवर्गति। त शंभुमभजन्मर्त्यश्चव्चैव स्वहिताकृतेः ॥ इति। विवृतमेतदधस्तात्। वाक्यसमासयोरुपमानलुप्तापि दर्शिता। 'उपनतमे- तदकस्मादासीदुबत काकतालीयम्' इति तद्धितेऽपि हश्यते। वाचकोपमानलुप्ता स्वरूपत एव नोदाहता। सापि काकतालीयमिति प्रकृर्तिभूते समासे दृश्यते। धर्मोपमानलुप्तापि तद्धिते काकतालीयमित्यत्र द्श्यते। धर्मवाचकलुप्ता किपू-

Page 165

उपमानिरूपणप्रकरणम् १२५ समासयोरिय तद्धितेऽपि दश्यते। 'तं जगत्यभजन्मर्त्यश्क्र्वा चन्द्रकलाधरम्' इति हि प्रागुदाहृतम्। तस्माल्लुप्ताविभागे दिख्ात्रप्रदर्शनमेवेद प्राचां न तु सामस्त्येन विभाग: । (भारती) इस प्रकार यह पूर्व व्याख्यात पूर्णा एव लुप्ता उपमा के २७ भेदों का वाक्य, समास तथा प्रत्ययविशेष से व्याकरण शास्त्र में जो व्युत्पति चातुर्य प्रदर्शनमात्र प्रयोजन के लिए प्रदर्गित है, उसका अलकारशास्त्र में अतियोग्य आवश्यकता नहीं होती। इतना ही नहीं तुप्ता के ये सम्पूर्ण प्रभेद भी नही कहे जा सकते। क्योंकि धर्मलुप्ता वाक्य, समास नया तद्ितों में दिखाई गयी- यह द्विर्भाव में भी दिखाई देती है। जैसे-'पटुप्टुर्देवदत्तः' अर्थात देवदत्त चतुर के सदृश है। कारण यहा 'प्रकारे गुणवचनस्य' इस सूत्र से दविरुक्ति का विधान सादृव्य अर्थ में है, अर्थात् यहाँ द्वित्व के कारण 'पट्-पट' शब्द का अर्य 'पट के सदृश' होता है। 'जो व्यक्ति' शास्त्रों में अपट्ठ होकर भी पट्ट की तरह अभिनय करता है, उसी सदृा अर्थ में 'पट्ट-पट्.' जैसे शब्द का प्रयोग है। 'पटपटुर्देवदत्त' में दविर्भाव अर्थात् 'पट' शब्द का दो वार प्रयोग ही सादृय का वाचक हे। यही कारण है कि यहाँ वाचक का लोप न कहकर केवल धर्म का लोप कहा गया है। अत यह धर्मलुप्ता हे। यहाँ 'कर्मधारयवदुत्तरेषु' इस सूत्र से एक पद्य विधान द्वारा वास्तव में समासत्व के अभाव से वाक्यगा एव समासगा लुप्ता असभव होने के कारण अलग ही धर्मलुप्ता है। वाचकलुप्ता 'णिनि' प्रत्यय के विना कोई ६ प्रकार से प्रदगित किए है। 'णिनि' प्रत्यय के साथ दूसरे लोग इसे ७ प्रकार के मानते हैं। इसमें क्विप और तद्ित प्रत्यय भी दिखाई देते हैं- 'जिसके भक्तों का ससार भी सुखमय होकर मोक्ष के समान हो जाता है, उन शभु को न भजने वाला मनुष्य, अपना हित न करने के कारण घास का पुतला ही है।' इस तरह पाठ कर देने पर दोनों जगह धर्म भी सुनाई देने लगता है। वाक्य और समास की उपमानलुप्ता भी दिखाई जा चुकी है। 'उपनतमेतदफस्माद् भासीद् व काकतालीयम्' इस तद्धित मे भी दिखाई देती है। वाचक उपमानलुप्ता स्वरूप से ही उदाहृत नही है। वह भी 'काक- तालीयम्' इस प्रकृतभृत समास मे ढिखारई देती है। धर्मोपमानलुप्ता भी नद्धित-'काकताली- यन्' में दिखाई देनी है। धर्मवाचक उुप्ता क्विप प्रत्यय तथा समास की तरह तद्धित में भी दिखाई देती है। 'उस शिव को न भजने वाला पुरुष, जगत में घास के वने पुतले के समान है, यह पहले ही उदाहृत हो चुका है। अत लुप्ता के भेद यहॉ प्राचीनों-ने दिल्मान ही प्रदशित किया है, न कि सम्पूर्ण रूप से भेदप्रदर्शन हैं। चिमर्श-अप्पय ठीक्षित की धर्मलुप्ता जो वाक्य, समास और तद्धित में दिखाई गई है। इसके सम्बन्ध में भी पण्डितराज जगन्नाथ ने अपने रसगगाधर में कुछ आपत्तियाँ की है। उनके अनुसार यह द्विरुक्ति में भी होती है। जैसे, 'पटुपट्र्देवदसः' अर्थात देवदत्त चतुर की तरह है। यहाँ पा० व्या० के 'प्रकारे गुणवचनस्य' इस सूत्र से सादृश्य के अर्थ में द्विरुक्ति का विधान है। द्विरुत्ति के कारण ही ऐसे स्थल में एक पट् का सदृश अर्थ है। किन्तु विचारणीय यह है कि यहाँ केवल 'धर्न' का ही लोप तो नहीं है, वल्कि वाचक का भी लोप है। अत इसे धर्मलुप्ता कहने की अपेक्षा वाचकलुपता कहना ही श्रेयस्कर होता। अन्यथा जहाँ एक लुपा है, वही द्विलुपा और तिनुसा का सन्निवेश हो जायेगा। पुन. उसका पृथक् ग्रहण ही निरर्थक हो जायेगा।

Page 166

१२६ चित्रमीमांसा

अगर 'पट' की द्विरुक्ति को ही सादृश्यवाचक मानकर केवल धर्मलोप मानते हुए इसे 'धर्म- लुप्ता कहे, तो भी ऐसी स्थिति में द्विर्भाव को सादृश्यवाचक कहना 'महाभाष्य' एव 'कैयट' के -विरुद्ध हो जाता है। क्योंकि कैयट ने 'प्रकारे गुणवचनस्य' इस सूत्र के भाष्य में-'सिद्धन्तु' इस प्रतीक को लेकर कहा है- 'द्विरवचनस्य प्रकृतिः स्थानी, इति तरदर्थो विशिष्यते, न तु प्रकारः। तत्र सर्वस्य गुण- वघनत्वाद् व्यभिचाराभावात्। तद्ग्रहणासू गुणवधनो या शब्दो निर्जञातस्तस्य साडश्ये घोत्ये द्वे भवत इति सूमार्थः।' इस सूत्र की उत्त व्याख्या से सिद्ध होता है कि 'द्विरुक्ति' 'सादृश्य' का धोतक है, वाचक नहीं। अत 'पटुपटुर्देवदत्त' में वाचक का भी लोप होने के कारण यह धर्मलुप्ता की अपेक्षा वाचक लुप्ता का उदाहरण होना चाहिए। 'गुरुमर्म प्रकाश' में पण्टितराज के इस विचार का डटकर खण्टन किया गया है। इस प्रसग में लिखा है कि उक्त प्रकरण में 'वाचक' शब्द का अर्थ अभिधावृत्ति द्वारा सादृव्य का वाचक नही है। किंतु सादृश्य अथवा सादृश्य से युक्त अर्थ का बोधक है। और यहाँ किसी ऐसे शब्द के न होने पर वाचक का लोप माना जाता है, अन्यथा जो लोग 'इव' आदि को सादृ्य का धोतक -मानते हैं, उनके मत में 'चन्द्र इव मुखम्' इस जगह और 'इव' आदि को वाचक माननेवालों की दृष्टि से 'चन्द्रसुहनमुखम' इस जगह भी वाचकलुप्ता का व्यवहार होने लगेगा। जव कि कही भी ऐसा नहीं देखा जाता है। अत. धोतक अर्थात द्वित्व को भी वोधक मानने में कोई वाधा न होने के कारण वाचक को विद्यमान मानकर अप्पय दीक्षित ने अपनी 'चित्र मीमासा' में जो यहाँ धर्मछप्ता माना है, वह सर्वथा युक्तिसगत है तथा पण्ढितराज का खण्डन असगत ही प्रतीत होता है। अप्पय दीक्षित ने अपनी चित्रमीमासा में इसी प्रमग में 'नृ्णा यं सेवमानानामित्यादि' (पूर्व व्याख्यात) उदाहरण में 'अपवर्गति' पद में स्विप् प्रत्यय का तथा 'चक्रा' पद में 'कन्' प्रत्यय का लोप कह कर दोनों उपमा में क्रमश वाचक और धर्म का लोप कहा है, पण्डितराज की दृष्टि में यह भी अयुक्तिकर ही है। क्योंकि उनके विचार से यहाँ वाचक 'कन्' प्रत्यय का लोप होने पर भी 'उन चन्द्रकलाघर को न भजने वाला' इस विशेषण के द्वारा सूचित 'शिव के भजन से रहित होना' रूपी धर्म, जो कि घास के पुतले और पुरुष दोनों में समान रूप से रहता है, जब इस पद्य में उक्त है तो धर्म का लोप कैसे कहा जा सकता है ? दूसरी वात यह है कि 'चन्द्रकलाधरं मजति' इस उपमेय को पुरुप के विशेषणरूप में मान- कर-सादृश्य विशेषण 'चञ्चा' में इसका अन्वय न हो सकने के कारण इसे साधारण धर्म नही कहकर केवल पुरुषधर्म की आशका से 'यद् भक्तानामित्यादि' पूर्व व्याख्यात श्लोक में तथाकथित पाठभेद कर देने पर दोनों जगह धर्मश्रवण की बातें जो चित्रमीमासा में उठाई गई है-उसमें स्वतः वदतोव्याघान होगा। क्योंकि यहाँ भी 'सुखमय' शब्द उपमेय-ससार के विशेषण के रूप में आया है। ऐसी दशा में 'सुखमय होने' रूपी धर्म का सादृश्य के विशेषण मोक्ष में अन्वय न होने के कारण इस धर्म को कैसे साधारण कहा जा सकता है। उपमेयगत और उपमानगत दोनों में से किसी रूप में ग्रहण करने के कारण धर्म का दोनों में -शब्द-सम्बन्धी अन्वय न होने पर भी वस्तुत दोनों में रहने का ज्ञान ही साधारण का नियामक है-ऐसा मान लेने पर-अर्थात् शाब्दिकरूप में धर्म का अन्वय दोनों में न होने पर भी यदि-

Page 167

उपमानिरूपणप्रकरणम् १२७ ययह समझ भी लिया जाय कि वह धर्म जो वास्तव में दोनों में रहनेवाला है-उसे साधारण धर्म मान लिया जाता है, तो 'शिव के भजन से रहित होने' वाले विशेषण का क्या होगा? क्योंकि यहाँ भी उपमेय का विशेपण होने पर भी वस्तुत उपमान और उपमेय दोनों में रहने वाला धर्म है। पण्डितराज के इस आक्षेप में भी कुछ अधिक तथ्य प्रतीत नहीं होता। क्योंकि धर्मलप्तोपमा को सरस्वतीकठामरणकार ने 'लुप्तपूर्णा' उपमा कहा है। 'लोपे सामान्यघर्मस्य लुप्तपूर्णेति गण्यते-स० क० ४।१७'। धर्मलुप्ता के चित्रमीमासा में तथाकथित भेद 'लुप्तपूर्णा' की कल्पना में अन्तर्भूत प्रतीत होते हैं। ऐसा लगता है कि विभाजन के आग्रह के कारण ही दीक्षित जी को लुप्तपूर्णा मान्य नहीं हुई, अन्यथा पण्डितराज का उक्त खण्डन स्वत इससे प्रत्याख्यात हो जाता। ऐसे भी लगता है, 'शिव के भजन से रहित होना' में दीक्षित जी का अभिप्राय केवल उपमेय पुरुषधर्म से सम्वधित है और उपमान उपमेय का साधारण धर्म 'आत्महित न करना है'-और वह स्वत. लुप्त' ही है। अतः यहाँ भी दीक्षित जी में कोई दोप प्रतीत नहीं होता। अप्पय दीक्षित के द्वारा वाचकोपमेयलुप्ता में उदाहृत पूर्व व्याख्यात श्लोक 'रूप यौवन लावण्येत्यादि' में पण्डितराज को सर्वत्र अशुद्धि दर्शन ही होता है। इस ग्लोक की आलोचना में तो पण्डितराज ने दीक्षित जी को व्याकरणज्ञानशून्य, मूर्ख तक की भी उपाधि दे डाली है। इनका कहना है कि उक्त श्लोक में जो 'पुरतः' शब्द आया है, उसकी व्युत्पत्ति क्या होगी? यदि 'पुर' शब्द से, जिसका अर्थ नगर होता है, 'तसिल' प्रत्यय करके इमे सिद्ध किया जाय तो अर्थ होगा- मृगनयनियों के नगर से'-जो यहा असंगत है। अव यदि 'पुर' शब्द का अर्थ 'पूर्व' मानकर 'पुरत.' का अर्थ आगे अथवा सामने किया जाय तो ऐसा हो ही नही सकता। क्योंकि पूर्ववाची 'पुर' शब्द कहीं सुना नहीं गया है। वचा पूर्व शब्द, उससे तो 'पूर्वाधरावराणामसि पुरषश्चैपाम्' इस सूत्र से 'असि' प्रत्यय करने पर 'पुरः' वन सकता है, पुरत नहीं। अत एव महाकवि कालिदास ने रघुवश में लिखा है- 'अमुं पुरः पश्यसि देवदारुं पुत्री हतोऽसी वृषभध्वजेन। यो हेमकुंभस्तननिःसृतानां स्कन्धस्य मातुः पयसां रसजः ॥-रघुवश, २३६ उक्त श्लोक में 'पुर' का प्रयोग किया गया है। इसी तरह दीक्षित जी ने चित्रमीमासा के दूसरे प्रकरण में 'मुखस्य पुरतश्न्द्रो निष्प्रभः इृत्यप्रस्तुतप्रशंसा' लिखा है। यह भी उसी प्रकार व्याकरण की दृष्टि से पूर्णत अशुद्ध है। अपने पक्ष में युक्ति उपस्थित करते हुए पण्डितराज ने लिखा है कि 'पुरत.' प्रयोग अशुद्ध होने के कारण ही वैयाकरणों का कहना है कि-'पत्या पुरतः परतः, 'आत्मीयं चरणं दधाति पुरतो निम्नोषनतायां भुवि', 'पुरतः सुदती समागतं माम्' इत्यादि के सभी शब्द अशुद्ध हैं। अतः 'पुरत' शब्द का प्रयोग चित्रमीमासाकार की व्याकरण सम्बन्धी अज्ञानता ही प्रकट करता है। पण्डितराज जगन्नाथ के इस आक्षेप का उत्तर नागेश भट्ट के शब्दों में दर्शनीय है। उन्होंने लिखा है कि पण्डितराज का यह आक्षेप विलकुल निर्मूल है। दीक्षित जी के पुरत. प्रयोग के खण्डन में कोई बल नही है। क्योंकि 'पुरत' शब्द का प्रयोग इसी अर्थ में कालिदास एव भवभूति जैसे महाकवियों ने भी किया है। देखिए- कालिदास-'इय च तेडन्या पुरतो विडम्घना'-कुमारसभव। भवभूति-'पशयामितामित इत पुरतश्ष पश्चास्'-उत्तररामचरित।

Page 168

१२८ चित्रमीमांसा

इतना ही नहीं, 'पुरत' शब्द की सिद्धि भी तीन प्रकार से होती है- (१) कुछ लोग उसे निपात मानते हैं। (२) कुछ लोग 'अच्' प्रत्ययान्त 'पुर' शब्द से 'अतसुच्' प्रत्यय करके सिद्ध करते है। (३) वस्तुत -यह पुरत. शब्द 'पुर अग्रगमने' धातु से 'हगुपपज्ञाप्रीफिर कः' इस सूत्र से 'क' प्रत्यय और उससे 'तसि' प्रत्यय करने पर 'पुरनः' शब्द सिद्ध होता है। अत. दीक्षित जी का यह प्रयोग भी शुद्ध ही है। (सुधा) एवं काव्यप्रकाशीयोपमाभेदं व्याख्याय तेपामनावश्यकतां प्रकाशयन् तत्कृतं भेहनिय- मद् दूषयति-एवमयमिति। एवमयम =पूर्व व्याख्यातः पूर्णालप्ताविभागः पढूविशति प्रकाररूपः। वाक्यञ्व समासक्ष प्रत्ययविशेपाश्च तेपां विषयतया शाव्दशास्त्रे यद्धुश्पत्ति- कौशळं व्युस्पत्तिचातुरय्यं तत्प्रदर्शनमेव प्रयोजनं यस्य तादशोऽलद्गारशासत्र व्युत्पाद्यतामतीव नाहति योग्यो न भवतीति। एतावन्त एवेति नियमोऽपि न सम्भवतीत्याह-न वेति। लुप्तानामयं पूर्दो विभाग: सामस्तयेन, न स्यन्येषामपि सम्मवादिति भाषः। तदेवाह- तथा हीति। पञ्चविधा धर्मलुप्ता वाययसमासतद्वितगर्वेन पश्रविधा वर्शिता, द्विर्भावेऽवि दृश्यवे विलोक्यते 'पटुपदुर्देवद्सः' अम्र 'प्रकारे गुणवचनस्य' इति सूत्रेण द्वित्वम्। यः पुरुपः शास्त्ादिषु अपटुरेव पटुवदभिनयति स पटसदश: पटुपटुरितयुध्यते। वस्तुतोऽपटा- वेवाय प्रयोग:। अम्र 'कर्मधारयवदुत्तरेपु' इति सूत्रेणेकपदविधानाद्वास्तवसमासत्वा- भावाष वाक्यगासमासगयोरसम्भवातू पृथगेध धर्मलुक्तेति। रसगङ्गाधरकृतस्तु-अम्र वाचकस्याप्यनुपादानाद् वाघफधर्मलुप्तायामेतवाधिक्यं क्थयितुसुचितम, न तु धर्म- लुप्तायाम्। ध्मंमान्रलुप्ताया एय ध्मलुप्ताशव्देन तेवियक्षणात्। अन्यथा एकलप्तारवेव द्विलुप्तानां त्रिलुप्तायाक्ष ग्रहणात् पृथगुपादानमसम्बद्ूमेव स्याद्। न चात्र द्वित्वस्यैव वाचकस्थ सत्वात् तथोिरिति वाच्यम्, हित्वस्य सादश्यवाघकतोक्ी साप्यकैयटादि- विरुद्धत्वास्। तथा च केयटः-'प्रकारे गुणवचनस्य' इति सूत्रे सिदधं स्विति प्रतीकसुपादाय द्विर्ववनस्य प्रकृति: स्थानी इति तदथों विशेष्यते, न तु प्रकारः। तत्र सर्वस्य गुणवधन- तया व्यभिचाराभावात्। तद्ग्रहणादू गुणवचनो यः शब्दो ज्ञातः, तस्य सादश्यें च्ोरये द्वे भवत इति सूत्रार्थाद् इति ववन्ति। तन्न, एवमपि द्विलप्ताया असम्भव एव, धोरये तदनक्गीकारात्। अन्यथा इवादीनामपि तत्वे 'चन्द्र इव' इस्यादावपि लुप्तोपमार्वप्रस- द्ञाच्, पदान्तरेण ताद्वशार्थबोधे सहकारित्वरूपस्य द्योतकरवस्थ सत्वे तद्वाचकरवस्य पदान्तरे स्वीकारावश्यकत्वाप्छ, तस्मादेकलप्तैवेयमिति दीपिताशयः। आतिदेशिकसमा- ससामानाधि करण्ये नवा त्रो पमाविभागकर णेनातिदेशिक कर्मधारयवन्भावेपि समासगायामे- वान्तर्भावः। अत एव तत्र पुंवन्नावान्तोदाप्तादमः सिध्यन्तीति तु प्रकाशकारमतानुया- यिनः। वाचकलुप्ता प्रकाशमते षढुविघा। णिनिना सहापरेः सप्तविधा उक्का। क्विप- तद्धितयोरधिका दृश्यते। तदेवाइ-यद्क्ानामिति। अपवर्गतीत्यत्र विवपि इवस्य, चञ्ज्े- स्यन्न सादश्यार्थकनो 'लुम्मनुष्ये' इति लोपेन तद्वितेऽ्रपि तत्सम्भवाद। भेदद्वयाधिक्यमेव। उपमानतुप्ता वाक्यसमासगतरवेन द्विधोकका तृतीया तद्ितेऽपि दृश्यते। काकतालमिवेति

कोपमानलुप्ता स्वरूपत एव नोदाहता। सा समासेऽपि रश्यते। धर्मोपमानलप्ता वाक्य-

Page 169

उपमानिरूपण प्रकरणम् १२६

समासयोरुक्ता तद्वितेऽपि इश्यते। कि म्रम इत्यादिपाठे काकागमनमिव तालपतनमिवेति समासार्थोंपमार्यां काकागमनतालपत नरूपोपमानस्य वाचकेन इचेन सहानुपादानाद् वाचकोपमानळुप्ताया: सम्भवात्। अन्रेंव पाठे काकतालमिव काकतालीयमिति प्रश्ययार्थो- पमायामाकस्मिकोपन तत्व रूपधर्मस्य पतिततालकृत काकवघरूपोपमा नस्यानुपादानेन धवर्मों - पमानलुप्तासर्वाद्। अम्र नव्या :- अम्रत्यसमासस्य स्वातन्त्र्येण प्रयोगाभावः, छप्रत्यय- विधानघलेन पसिद्धस्य तस्य तद्तिते तदसम्भवात्, स्वातन्त्र्येण विभागयोग्यानामेव विभाजकत्वाक्गीकारात्। अस्तु वा तद्वलेन समासस्तथापि नाम्र चाचकलोप:, स्वार्थविद्दित- समासस्येव वाघकस्य विदयमानत्वात्। अन्यथा तद्वितस्यापि साहश्यवाधकत्वप्रसम्गाद्। एवं धर्मोपमानलुप्तापि न सम्भवति। छप्रत्ययो्पत्तिकाले काकतालपदस्य तालकृतकाक- वधे उस्णया तदाश्यपदसत्वेनोपमानलोपस्याभावातू। न घ लक्षणार्यां प्रामाण्यमन्वेप- णीयम्, तत्पदस्योपमानपरत्वाभावेन तह्डुत्तरमिवार्थे तद्वितानु्पत्तेरेव प्रामाण्यसत्वादिति वदन्ति। क्विपसमासभेदेन धर्मवाचकलुप्ता द्विधोक्का, सा तद्धितेऽपि दृश्यते। कुत्रेत्या- शाष्टानिवृत्यर्थमुदाहरणमाह-तमिति। धन्द्रकलाघरं तं शिवं जगत्यसेवमानः पुरुष: चक्जा, तं कमित्याह-यं सेवमानानां नृर्णा संसारोपि अपवर्गति। अम्र सुखमयत्वधर्मस्य इवार्थविषपोऽघेतनादेर्घर्मस्य इवार्थविहितिकनक्ष लोपाद धर्मवाचकलप्तायाः सम्भवाव्। अत्र शिवभजनराहिश्यमेव सामान्यधर्मः, तत्सत्वे कथ धर्मलोपः ? न च तस्योमेयविशे- षणतयोपमाने सादृश्योपसर्जने वज्जारूपेऽन्वयाभावास साधारणघमतेति वाच्यम्, पाठा-

विशेषणतयोपाप्तसुखमयत्वादे: सादृश्योपसर्जनीभूतापचगंरूपेडप अन्वयाभावात्, उमय- वृत्तित्वज्ञानस्येव सामान्यधर्मप्रयोजकत्वाङ्गीकाराव, स्वात्महिताकरणमेव सामान्यधर्म इति नियमे प्रमाणाभावात्। 'चन्द्र इव मुखं रमणीयम्' इत्यम्रापि धर्मलप्ताप्रसङ्गायच। रमणीयत्वातिरिकाह्लादकत्वरूपधर्मस्यापि तथा विवस्या तवनुपादानस्यापि सम्भवाध्चे त्याहुः। प्रकरणसुपसंहरति-तस्मादिति। यतो लप्तायां पढविशतिभेदाः सम्भवन्ति तस्मात्तद्विभागे दिड्मान्रदर्शनमेव प्राध्ा सम्भवति, न तु सामसयेनेति भावः। सामसत्येन तु पूर्णालुप्तयोर्द्वाप्रिंशच्ेदा इति दीक्विताशयः। अम्र रसगद्गाघरकृतस्तु कर्माधारक्यचि क्यडि च वाघकलप्तोदाहरणं प्राचामसदतम्, ध्मस्यापि तत्र लोपाष। प्रत्ययार्थाचारस्य तु न धर्मत्वम, धर्ममात्राचारस्योपमायामप्रयोजकत्वात्। 'नारीयते सपतसेना' इत्यम्र घृश्यन्तरनिवेदित कातरत्वाद्यभेदाध्यव सिता घारस्योपमानिष्पादफ्तवाद्। प्ययार्थाचारस्यो- पमानिष्पादकरवे 'त्रिविष्टपं तत्खल भारतायते' इत्यादौ सुप्रसिद्धरवादिरूपाघारोपस्थिता- वपि तदनिष्पत्तेः, साधारणस्थापि क्यडाथर्यस्योपमाप्रयोजकरवाभावाद्। उपमाप्रयोजक- तावच्छेद करूपेण साधारणधमवाचकर हितत्वस्येंव धर्मलोपशब्देन कथनाएच। अन्यथा 'मुख रूपमिदं वस्तु प्रफुल्लमिव पङ्कजम्' इत्यादी पूर्णोपमापत्तेरिति वदन्ति।

(चित्र०)

ये चान्ये काव्यालोकादिषृपमायां प्रकारभेदा दर्शितास्ते सर्वे ते्वेव द्रष्टव्याः । दर्शिताश्चेहापि लेशतो लक्षणविचारप्रस्तावे। रूपकप्रकरणे चास्या: प्रकारभेदान् कांश्चित् प्रदर्शयिष्यामः। ६ चित्र०

Page 170

१३० चित्रमीमांसा

(भारती) जो कोई विद्वान् काव्यालोक प्रभृति अलकार ग्रथों में उपमा के अन्य भेद दिखाये है, उनको उन्ही ग्रंथों में देखना चाहिए। उन प्रदर्शित भेदों में से कुछ के लक्षण पर इस ग्रथ में विचार किया गंया है। उपमा के कुछ भेदों को रूपकप्रकरण में हम भी दिखायेंगे। (सुधा) अन्यभेदानामनुक्या न्यूनतां परिहरमाह-ये चान्ये काध्यालोकािषूपमार्या प्रकार- भेदा रसनोपमादयो दशितासते सर्वे अन्रैव द्रष्ट्याः। तथाहि-पूर्वपूर्वोपमेयस्योत्तरोस्षरो- पमानतववर्णनं रसनोपमा। सा द्विधा साधारणघर्मस्य भेदाभेदरूपरवात्। भेदे यथा श्रीविश्वेश्वरचरणानाम-'अधर इवोफिर्मधुरा तनुलमीरुत्तिवदिशदवर्णा। तनुरिघ मनो- हरा रग दगिव मृगाचया: सुदुरसहो विरहः॥'अत्र माधुयर्यादिभेदेन साधारणधर्मकयनम्। अभेदेऽपि तेषामेव यथा-'अतितारुण्य तिकासादनुदिवमविजम्भमाणमदनायाः। दृगिय गतिर्गतिरित गीर्गीरिव धीर्धीरिवातिवक्रा भूः ।I' अत्र वक्तृत्वं सर्वश्र एक एव साधारण- धर्मः। एकस्मिन् बहुपमानसन्धन्धो मालोपमा, सापि पूर्ववद देधा। आधा यथा- 'वाहिष्व वेज्झरहिओ धणरहिओो सुअणगेहवासोव्व। रिउरिद्रि दंसणं विभ दुसहणिजजो तुह बिभोऊ॥ (व्याधिरिव वैद्यरहितो धनरहित' सुजनगेहवास हतर। दुःसहस्तव वियोग: ॥) अम्र सर्वत्र दुःसहत्वमेक एव धर्मःडे धर्मभेदे यथा-'मातेव रक्षति पितेव हिते नियुक्के क्ान्तेव चाभिरमयत्यपनीय दु खम्। फरी्ति च दिक्ठ वितनोति तनोति लक्ष्मी किरकिन साध यति कक्पलतेव विद्या ॥I' अम्र रक्षणादयो धर्मा मिक्षाः। प्रशंसायासुपमा यथा-'आाळप्य ता विशालावी तुतोष मनुजाधिप। मुनिभिः साधितां कृत्वा सिद्धिं मूर्तिमतीमिव ॥ 'सा रवं सर्वगुणैर्शीनं स्रिता पुरुषाघमम्। वने कण्टकिनं वक्ली दषदग्धमिव द्ुमम ॥' इति दिक। किज लक्षणविचारप्रस्तावे इहापि=मूलेऽपि, उक्का, अस्या उपमाया: कांशिल्ेवान रूपके प्रदर्शयिष्यामः। तदनुसारेण इहैव ते भेदाः प्रकरणसाहित्येन व्यास्यायन्ते। रूपकवदुपमा अष्टविधा-केवलनिरवयवा, मालारूपनिश्वयवा, समस्तवस्तुविषयसावयया, एकदेशवि- वर्तिसावयवा, केवलश्लिष्टपरम्परिता, मालारूपमिळष्टपरम्परिता, केवलयुद्धपरम्परिता, माळारूपशुद्धपरम्परिता चेति भेदात्। केवलत्वं मालानन्तर्गतत्वम्, निशवयवत्वझ्चोपमा-

न्तलम्बी। आमृष्टगण्डतिलकानि मुखान्यचुम्बद्रागीव रेणुरवने: पुरसुन्दरीणाम्॥' यद्ा 'वागर्थाषिव सम्पृक्ती' इस्यादावाद्या। 'आह्रादिनी नयनयो रचिरैन्दवीव कण्ठे कृताति- शिशिराम्बुजमालिके। आनन्दिनी हृदि गता रसभावनेव सा नैव विस्मृतिपरथं मम जातु याति ॥'इति द्वितीया। मालारूपत्वं चैकोपमेयकानेकोपमासामानाधिकरण्यमेव। 'कमति वदनं यस्यामलयन्स्यळका मृणालतो बाहू। शैवालति रोमाविरद्भुतसरसीव सा बाला ।।' उपमानोपमेयानां शाउ्द्र्वात् सावयवा तृतीया। 'निश्वासा मलयानिला इव पिकालापानु- कारा गिरो रकाशोकलताप्रवालसदशं पाणिद्वयं वतते। हक्प्रोश्नासविजम्भितं सुतनु ते ऋक्प्रतानायते स प्राप्याऽसमसायकोऽपि भवर्ती लोकन्रयीनायक: ।' अत्र शाष्द्ीभिरुप- माभिः नायिकाया वसन्तकचमीसाइश्यसिद्देरार्थत्वादेकदेशविवर्तनी सावयवा चतुर्थी।

Page 171

उपमानिरूपण प्रकरणम्

'नगराग्तर्मदीन्द्ृश्य महेन्द्रमहितथ्चियः। सुशलये खल सीया देवा इव घिरेजिरे ॥'अत्रोप मेयस्यापि तेन सुमेरुणा मदिरागारस्योपमा प्षीयानां देवोपमाया उपाय इति श्लिष्टपरम्प- रिता पक्षमी। 'लेखेव या चान्द्रमसी कलाना रसस्य या पुष्करिणीव पूर्णा। निष्केतवस्था- नमियं रुचीनामानन्दवद्धाति सरोरुहाष्षी ॥'अश्र चतुष्पष्टिकलाशङ्गारकान्तीना पोडशकला- जलेद्छ्रासादृश्यात् पषी। 'राजा युधिष्ठिरो नाम्ना सर्वधर्मसमाश्रयः। द्रुमाणामिव छोकाना मधुमास इवाभवत् ॥' इयं सप्तमी। 'ज्योतस्नायन्ते तव गुणगणाः पूर्णचन्द्रायसे रवं धारायन्ते विशिखनिवहा वारिवाहायसे रवम्। एधायन्ते रिपुनृपतयो हष्यवाहायसे तव मृद्गायन्ते विवुधनिवहा वीर पद्मायसे रवम् ।' इत्यष्टमी। 'ततः प्रतस्थे कौबेरीम्' इत्यादौ साचयवो- पमाया विशिष्टोपमा। 'विश्वजित् सर्वपृष्ठोऽतिरात्र' इत्यम्न पृष्ठगतसर्वताविधिनेव तद्िशे- व्यपृष्टविधेर्विशेषणोपमया विशेप्योपमा, वैकृतप्रधानविधिनेव प्राककृततदङकलापविधौ विशेष्यया तया विशेषणोपमा, अङ्गप्रधानगोचरप्रत्येकविधिकलापेनेव सर्वाङ्गविशिष्टप्रधा- नगोघरप्रयोगविधी अवयवोपमया विशिष्टोपमा। 'हस्त इव भूतिमलिनो यथा यथा सह्यति खलः सुजनम्। दर्पणमिव तं कुरुते तथा तथा निर्मलच्छ्ायम् ॥' इत्यत्र वाक्य- भेदेन सेति भेदः । 'वदाननमधीराक्षम्' इत्यादी विशिष्टोपमया अवयवोपमा। एवम- संख्या उपमाभेदा बोध्या:। (चिन्न०) पुनश्चेयमुपमा सं्ेपतस्त्रिधा-कचित् स्ववैचित्रयमात्रविश्रान्ता, यथा-'स च्छिन्नमूल: क्षतजेन रेणुः इत्यादौ। क्वचिदुक्तार्थोपपादनपरा, यथा-'अनन्त- रत्नप्रभवस्य' इत्यादौ। यथा वा- विश्रब्धघातदोपः स्ववधाय खलस्य वीरकोपकरः । वनतरुभङ्गध्वनिरिव हरिनिद्रातस्करः करिणः॥ क्कचिद्वयङ्गचप्रधाना सा, व्यङ्गचस्य वस्त्वलङ्काररसरूपतया त्रैविध्यात् त्रिविधा। तत्र वस्तुध्वनिर्यथा- दर्पान्धगन्धगजकुम्भकपाटकूट- सक्रान्तिनिघ्नघनशोणितशोणरोचिः । वीरैर्व्यलोकि युधि कोपकपायकान्तिः कालीकटाक्ष इव यस्थ करे कृपाण: । (भारती) अत्र कृपाणस्य कुपित कालीकटाक्षसादृश्यवर्णनेन सकलरिपुबलक्षयः क्षणा- देव करिष्यत इति वस्तु व्यज्यते। अलक्कारध्वनिर्यथा- पुन. यह उपमा सक्षेपत. तीन प्रकार की है-(१) स्ववैचित्र्यमात्रविश्रान्ता (२) उक्तार्थो- पपादानपरा और (३) वयङ्गचप्रधाना। (१) स्वचैचित्र्यमात्रविश्रान्ता-जद उपमा का चमत्कार किसी दूसरे अर्थ को पुष्ट न करके अपने में ही समाप्त हो जाय, तो वहाँ स्ववैचिन्यमात्रविश्रान्ता होती है। जैसे- 'नीचे भूतल में रक्त से नष्ट की गई तथा उसके ऊपर में वा से कन्पित इधर-उधर उडाई

Page 172

१३२ चिन्रमीमांमा।-

जाती हुई-वह धूलि, अगार मात्र वची हुई अग्नि के पहले ऊपर उठे हुए धुएं के समान शोभित होती थी।' यहाँ स्ववैचित्र्यमात्रविश्रान्ता उपमा है। (२) उकार्थोपपादान परा-जव किसी उक्त या कथित अर्थ (प्रतिपादित विषय) में अधिक स्पष्टता लाने के लिए उपमा प्रयुक्त होती है, तो वहाँ उक्तार्थोपपादानपराउपमा है। जैसे- 'असख्य रलों के होने से हिमालय का वर्फ सौन्दर्य का नाशक नही हुआ, क्योंकि एक दोष गुण के समुदाय में चन्द्र की किरणों में कलक की तरह लीन हो जाता है। यहाँ उक्तार्थोंपपादान- परा उपमा है। इसी प्रकार 'विश्रव्धघातदोप.' इस गलोक में भी उक्तार्थोपपादानपरा उपमा ही है। (३) वयंग्यप्रधाना-जहाँ पर उपमा किसी अलकार या रस की सहायिका होती है, वहाँ व्यग्य प्रधाना होती है। जसे- 'सग्राम में आने पर योद्धाओं ने राजा के हाथ में मदान्ध गन्धगज (विजयावह हाथी) के मस्तकरूपी कपाट के अग्रभाग में प्रविष्ट एव दृढ सम्वद्ध सघन शोणितरक्तिमा के समान कान्ति- वाला अत एव क्रोव से रक्तवर्ण शोभा को धारण करनेवाली भगवती काली के कटाक्ष के समान उस कृपाण (तलवार) को देखा। यहाँ तलवार का काली कटाक्ष के साथ सादृश्य वर्णन के द्वारा ये राजा क्षण भर में ही सारे शत्रुओों का विनाश कर देंगे-यह वस्तु ध्वनित होती है। अल्कारध्वनि का उदाहरण जैसे- (सुधा) एवं रूपके प्रोकानू भेधन् कथयित्वा पुनः प्रकारान्तरेणोक्तानां भेदानां, व्याख्यानमुप- क्रमितुं मृलुमुत्थापयति-पुनश्नेति। इयमुपमा संक्षेपेण म्रिधा-स्वचैचित्यमात्रविश्रान्ता, उक्कार्थोपपादनपरा, व्यद्रयप्रधाना चेति भेदातू। उदाहरणान्याह-'स च्छिनमूरुः' इत्यत्र प्रथमा, 'अनन्तरत्प्रभवस्य' इत्यादी द्वितीया। पूर्वमेतप्छलोकहयं व्याख्यातम्। व्यङ्गथ- प्रधानां विभजते-व्यह्वस्थति। वरत्वलक्क्ारसरुपतया व्यङ्वस् न्ैवि्या् त्पानो पमापि त्रिविधेत्यर्थः । तम्राथ्यामुदाहरति-दर्पान्घ इति। यस्य राजः करे कृपाणः खड़पो युधि युद्धे, वीरे कालीकटाच इव व्यलोकि हसः। कीदशो दर्षेण मदेनान्धस्य गन्ध- गजस्य-'यस्य गन्धं समाघाय न तिष्ठन्ति प्रतिद्विपाः। तं गन्धहस्तिनं विद्यान्नृपते्विज- यावह्म ॥' इत्युक्लक्षणस्य कुम्भ एव विशालतया तन्मध्यभाग एव कपाटम्, तस्य फूटे अप्रभागे या सडक्रान्ति: प्रवेशस्तद्धीनं तेन वा निध्नं दृढसर्बन्धं घनं निबिडं यच्छोणि- तमू, तेन शोणा रक्त रोविर्दीप्तिर्यस्य ताटगः, कटाक्ष: कोहशः ? कोपेन कषाया लोहिता कान्तिर्यस्य तथाभूतः । वसन्ततिलकावृत्तम्-'प्रोका वमन्ततिलका तभजा जगौ गः इश्युक्क। अत्र वस्तुष्यन्न्यमपतार्यति-अन्रेति। खड्गस्य क्रुद्धकालीकटाक्षोपमया सकल- रिपुक्षय: क्षणात् करिष्यत इति वस्तुव्यङ्गथसवादाद्या। (चिन्न०) यशसि तव विकसिते नृप हिमकरकिरणच्छटाघवले! भ्रमर इव पुण्डरीके विराजते विष्णुपदमेतत्॥ अन्रोपमालद्कारेण यशसः पुण्डरीकवद्वपुल्यस्य गगनस्य च भ्रमरवदल्प- त्वस्य प्रतीतेराश्रयाश्रथिणोरनानुरूप्यलक्षणोऽधिकालङ्गारो व्यज्यते। रसध्वनिः 'चागर्थाविव' इत्यादावुदाहृतः ।

Page 173

उपमानिरूपणप्रकरणम् १३३

(भारती) 'चन्द्रमा की किरणों की छटाओं से भी अधिक धवल एव आकाश में विकसित तुम्हारे यग रूपी चाँदनी में यह विष्णु के काले चरणचिह्न कमल में काले भौरे की तरह शोमते है।' इस उदाहरण में भ्रमर और गगन का उपमा अलकार से यश का कमल की तरह, विस्तृत गगन का भ्रमर की तरह अल्पत्व प्रतीति, विस्तृत आधार से आधेयाधिक्य का वर्णन अधिक अल- कार का व्यग्यत्व से अलकारव्वनि की प्रतीति हू। इसी प्रकार रसव्वनि का रवुवश का प्रथम श्लोक 'वागर्थाविव' व्याख्यात ही है। (सुधा) द्वितीयासुदाहरति-यशसीति। हिमकरश्रनद्रः, तस्य किरणानां छुटाभि: धवले षिकसिते तव यशसि, पतद्विष्णुपदं वियत् पुण्डरीके भ्रमर इव विराजते। अलक्कारण्वनि- माह-अन्नेति। भ्रमरगगनयोरुपमालद्वारेण यशसा पुण्ढरीकवद् वैपुष्यस्य गगनस्य च भ्रमरवद्एपत्वस्य प्रतीतेः पृथुलावारादाधेयधिक्यवर्णनमित्युक्तल्ण ना नुरुप्य लप्तणा - धिकालद्वारस्य व्यञ्तयरवाद् हितीया। तृतीया तु 'वागयों' इस्यादो स्पष्टैव। (चिन्न०) क्वचिदेकत्रैव त्रिविधोऽपि ध्वनिर्दश्यते यथा- पश्यात्र नलिनीपत्रे बलाकापरिद्दश्यते। हरिन्मणिमये पात्रे शुक्तिकेव प्रतिष्ठिता ॥ किमावयो: सद्गेतस्थानं भविष्यतीति प्रष्टुमनसो जनसमक्षमपृच्छतश्र अच्छन्नकामुकस्याभिप्रायमिद्गितेन विदितवत्या विदग्धायाः सङ्केतस्थानसूच- नार्थमिदं वचनम्। अत्र पद्मपत्त्नस्थितबलाकाया मरकतपात्रप्रतिष्ठितशुक्तिका- सादृश्यवर्णनेन तस्यास्तद्वन्निश्चलत्वप्रतीतेराश्वस्तत्वं व्यज्यते। तेन तत्प्रदेशस्य निर्जनत्वं व्यज्यत इति वस्तुध्वनि. । तनश्च तदेव सङ्केतस्थानमावयोरिति प्रकाशनात् संलक्षितसूच्त्मार्थप्रकाशन-

एव तदभिप्रायानुरूपवर्णनात् परस्परं रतिभाशे व्यज्यत इति रसध्वनिश्च। ननु रसादिध्वनिरसंलक््यक्रम इति प्रसिद्धिः, कथमत्र तस्यानुरणनेन व्यङ्ग्तोच्यते ? मैघम् ; यत्र विभावानुभावादिवशादाशु भाविनी रसाभि- व्यक्ति:, तत्रासलच्यक्रमता। अन्यन्न तु रसादिध्वनिरपि संलच्यक्म एव। तदुक्तमभिनवगुप्तपादाचार्ये :- 'यद्यपि रसभावादिरर्थो ध्वन्यमान एव, न वाच्य: कदाचिदपि; तथापि न सर्वोऽसलक््यकमस्य विपयः इति। अत एव ध्वनिकारोडपि- एवंवादिनि देवर्पो पार्श्वे पितुरघोमुखी। लीलाकमलपत्न्नाणि गणयामास पार्वती। इत्यत्र व्ज्जाख्यं सच्चारिभावमनुरणनव्यङ्ग यमुदाजहार।

Page 174

१३४ चित्रमीमांसा

(भारती) कहीं कही एक ही जगह तीनों प्रकार की ध्वनि परिलक्षित होती है। जैसे- 'इस कमल के पत्र पर वलाका दिखाई पडती है, तुम देखो, केवल हरित मणि के पात्रपर शुक्ति की तरह यह प्रतिष्ठित प्रतीत होती है।' यहॉँ तीनों प्रकार की ध्वनि की एक साथ अवतारणा है। हम दोनों का एकान्त-मिलन स्थान कहाँ होगा? यह जानने के लिए आकुल हृदय-किन्तु अन्य लोगों के सामने बिना पूछे ही, कामुक प्रिय की गुप्त चेष्टा से ही अभिप्राय को समझती हुई उस विदग्धा नायिका के सकेत शापन के लिए यह श्लोक प्रयुक्त है। इस श्लोक में कमल के पत्ते पर स्थित वलाका से मरकत पात्र पर प्रतिष्ठित शुक्ति का सादृश्य वर्णन से उस नायिका का उस वलाका की तरह निश्चिन्तता से आश्वस्तता अभिव्यक्त होती है और उस वर्णन से ही उस प्रदेश की निर्जनता भी अभिव्यक्त होती है।- यह वस्तु-ध्वनि है। उसके बाद उसी तथाकथित सकेत-स्थान पर हम दोनों का मिलन होगा-इस अभिव्यक्ति से सलक्षित सूक्ष्म अर्थप्रकाशन रूप सूक्ष्मालकार ध्वनि है। इसी प्रकार उस अभिप्राय के अनुरूप वर्णन से परस्पर रतिभाव अभिव्यक्त होने के कारण रसध्वनि भी है। फलत. हम कह सकते है कि यहाँ एक साथ वस्तु, अलकार और रसध्वनि है।) सव शका करते हैं-रसादिध्वनि तो असलक्ष्यक्रम के रूप में प्रसिद्ध है, फिर यहाँ उसके अनुरणन से कसे व्यग्यता कही गई-ऐसा नहीं कह सकते?। क्योंकि विभाव एव अनुभाव आदि के वश से जहाँ शीघ्र उत्पन्न होने बाले रस की अभिव्यक्ति है-वहाँ स्पष्टत. असलक्ष्यक्रमता है। दूसरी जगह तो रसादि ध्वनि भी सलक्ष्यक्रमव्यग्य ही है। अपने इस कथन के समर्थन में अभिनवगुप्ताचार्य के मत प्रमाण-स्वरूप उपस्थित करते हैं- 'यद्यपि रसाभावादि रूप जो अर्थ है, वह ध्वन्यमान ही है-वह कभी भी वाच्य नहीं है- फिर भी सभी असलक्ष्यक्रम के ही विषय नही हैं।' इस प्रसग में अर्थात् रसादिध्वनि भी सलक्ष्यक्रम ही है, इसके प्रमाण स्वरूप ध्वनिकार के. मत भी प्रमाणस्वरूप उपस्थित करते है। जैसे- 'अगिरा ऋषि के वोलने के समय नम्रमुखी पार्वती अपने पिता के पास बैठकर लज्जावश लीला- कमलपत्रों को गिन रही थी।' यहाँ लीलाकमलपत्र की गणना से लज्जा नामक सचारिभाव की ध्वनि अनुरणन रूप से अभिव्यक्त है।

(सुधा) त्रयाणामपि एकत्र दर्शनमिश्याह-कवचिदिति। उदाहरणमाह-यथेति। अम्र नलिनीपत्रे बलाका विषकष्ठिका इश्यते, रवं पश्य, केव हरिन्मणिमये पात्रे प्रति- ष्ठिता शुक्तिकेव। अम्र त्रिविधमपि ध्वनिमवतारयति-किमिति। आवयोः सक्केतस्थानं भविष्यतीति प्रष्टुं चित्तस्य अपरसमक्षमपृष्छतश् गुप्तकामुकस्य चेष्टितेनाभिप्रायं ज्ञातवती या विदग्धा, तस्याः सकेतज्ञापनायेदं वाक्यम्। अन्न पभ्मपत्रस्थबलाकाया मरकतपात्रस्थ- शकिकोपमया तह्पनिश्चलत्वप्रतीतेराश्स्तरूपध्य्धेन प्रदेशस्य निर्जनतारूपवस्तुनो व्यअ्

Page 175

उपमानिरूपणप्रकरणम् १३५

नादूस्तुध्वनिः। अलक्कारध्वनिमाह-ततश्ेस्ति। आवयोः संकेतस्थानमित्यर्थस्य ततः प्रकाशनात् सम्यग कवितसूचमार्थप्रकाशनात्मकप्रतिभया ज्ञातार्थस्यान्यानवगमप्रक्रा रेण प्रकाशनळच्तणसूचमालङ्वारव्यअ्ञनादलक्गारध्वनिः। रस्वनिमाह-एवमिति। एवसुपना- थिकानुरोधेन वर्णभान्मियो रतेरभिव्यक्कक रस्वनिश्नेति समुदायार्थः। नमु व्वनिष्धयं प्रथमोक्तमस्तु, रसध्वनिस्तु न संभवति, तस्यालचयक्रमत्वात्, 'रसभावतदाभासभावशा- न्यादिरक्रमः इति सिद्धान्तादन् क्रमस्य लघयरवेन सदसम्भवादित्याशक्कते-नन्विति। मत्र विभावानुभावष्यभिचारिभिराश रसाभिग्यजनम्, तत्रालचयक्रम पुवेति। अन्यश्र सु नियमो नेति समाधत्ते-मैवमिति। तम्न प्रमाणमाह-तदुक्कमिति। अभिनवगुप्नपादाघा ्यैरुफ्तं दर्शयति-रसभावादिरूपो योऽर्थः स ध्वन्यमान एव, न कदाचिवृपि वाध्य:, तथापि सर्वोडसंलचयक्रमस्य न विषयः, विभावादीनां स्पष्टतयानभिष्यके, किन्वनुरणन- रूपस्यापि विषय इति तदर्थः। तम्र तद्ग्रन्थानुकूलध्वनिकारोक्तिमपि प्रमाणयति-अत एवेति। यतो रसादि्वनेरपि संलचयक्रमत्व तत एवेत्यर्थः। ध्वनिकारोऽपि लज्जाख्यसथ्रा-

एवंवादिनि सति पितुः पार्शे अधोमुखी, लज्जयेति शेयः। तदुरपन्नभावत्वाद अघोमुखीति भाव:। लीलाकमलपश्नणि गणयामास सम्मस्या। लीलाकमलपस्त्रगणनया लज्जास्यसख्ा रिभावध्वनिरिति, अवहित्याख्यसश्ववारिणो व्यक्तिरिति तु महिनाथादयः । रसगङ्गाधरकृत- स्तु-'स्ववैचित्यमात्रपरः' इत्यादिविभागनियमोऽयुक्त एव, 'नयने शिशिरीकरोतु मे शर- दिन्दुप्रतिमं मुखं तव।' इति वाध्यवस्तूपस्कारिकायाः शरदिन्दूपमाया अकोढीकरणाव्। अलक्कारभूतोपमासु स्ववैचित्र्यमान्रविश्रान्ताया उपमाया: संप्रहे व्यङ्योपमाव्यावर्तकाष्य- अघर्वविशेषणस्य दुराप्रहत्वाद्लप्षणीयासग्रहे छक्षणीयाया असंग्रहस्यान्याय्यरवास्। इयश्रोपमा सुख्यार्थस्य साक्षादुपस्कारिणी, क्वचित् परग्परया। आधोदाहता। द्वितीया यथा-'नदन्ति मददन्तिनः परिछसन्ति वाजिवजाः' पठन्ति विरुदावलीमहितमन्दिरे वन्दिनः। इदं तदवधि प्रभो यद्वधि प्रवृद्धा न ते 'युगान्सदहनोपमा नयनकोणशोण- धुतिः ॥'अत्न मुख्यार्थस्य राजविषयककविरतेरपस्कारस्य यदैव तव कोपोदयः तदैव रिपूर्ण सम्पदो भस्मसान्टविष्यन्तीति वस्तुन उपकारिका नयनकोणशोणयुतेर्युशान्तदह- नोपमा। व्यद्रयोऽप्ययमलद्कार :- 'अद्वितीयं रुचारमानं मत्वा कि चन्द्र हप्यसि। भूमण्डल- भिदं मूढ केन वा विनिभाषितम् ॥' कस्यचिद्विदेशस्थितस्य किरणैराश्मानं सन्तापयम्तं चन्द्रं प्रत्येषोकि:। अस्ति मम प्रियायाः कदापि बहिर निर्गतायाः, अस एव त्वयाप्यष्टाया आननं रवरसहशमिति प्रतीयमाना उपमा ध्वन्यमानार्या चन्द्रविपयासूयार्मा वक्तृगताया- मलक्कारः। एवं प्राचीनैवहुघोपमा निरूपिता। एषैध यदा सकलवाक्येन प्राधान्येन धवन्यते, तदालक्कारभावं परिहृत्य ग्वनिग्यपदेश- हेतुः1 क्वचिदियं शब्दषकिमूलानुरणनविषया, क्वचिवर्थशक्िमूलानुरणनविपया। आधा - सार्वभौमोऽयम ॥' इति। अनेकार्थशव्दानां प्रकरणेन कृतेऽपि शकतिसक्कोचे तन्मूलध्वननेन प्रतीयमानदिग्यजस्या प्रस्तुतस्याभिधानं मा भूदिति प्रकृताप्रकृतयोकपमा नोपमेयरूप प्रधान- वाक्यार्थतया कर्प्यते। द्वितीयो यथा-'अह्वितीयं रुचात्मानं हष्टरा कि चन्द्र हृप्पसि। भूमण्टलमिदं सर्व केन वा परिशोषितम् ।'अन्र मूढादिपदाप्रयोगादसूयादेर प्रत्ययान्सुरप- रयोपमेव व्यक्या, इति वदन्ति।

Page 176

१३६ चित्र मीमांसा

(चित्र० ) अथोपमाव्यङ्गचप्रसङ्गादुपमाध्वनयः प्रदर्श्यन्ते। तत्र शब्दशक्तिमूलोपमा- ध्वनिर्यथा- किरति प्रकर गवां प्रकामं सुमनःस्वच्छतरं निधौ कलानाम् । कतिचित् कलयन्ति यत्प्रबोधं कतिचिन्नेति स तत्स्वभाव एव ॥। एकस्माद् गुरोविद्यां-शिक्षमाणानां केचित्प्रगल्भन्ते, नान्य इतिविशेपो बोध- कस्य गुरोस्तेषु तेषु बोधनविशेपकृतो न भवति; किन्तु तत्स्वभावकृत इत्यस्मि- नर्थे प्रकृतेऽप्रकृतार्थस्योपमानत्वकल्पनयाऽत्रवमुपमा व्यज्यते। यथा चन्द्रे किर- णानां प्रकरमविशेपेण सर्वपुष्पेषु विकिरति कानिचिद्विकसन्ति नान्यानीत्वेष विशेषस्तत्तत्पुष्पस्वभावकृत एव, नतु चन्द्रस्य किरणविशेषकृतः। एव गुरौ सर्वशिष्येष्वविशेषेण वाङायं विकिरति, तेषु बोधाबोधविशेपोऽपि तत्तत्स्वभाव- कृत एवेत्यत्र शिष्टानां गोसुमन:कलानिधिशव्दानां वागादिपर्यायपरिवृत्त्य-

(भारती) इसके बाद उपमा व्यग्य के प्रसग से उपमाध्वनि भी प्रदशित करते हैं। उसमें सर्वप्रथम शब्द- शक्तिमूल उपमाध्वनि के उदाहरण देते हैं। जैसे- 'कलाओं के निधि चन्द्रमा एव गुरु पुष्पों में तथा शिष्यों में क्रमश किरण एवं क्ान रुपी किरणों का समान रूप से वितरण करते हैं। किन्तु उन किरणों से कुछपुष्प खिलते हैं, कुछ नहीं-इसी प्रकार गुरु-ज्ञान से कुछ शिष्य प्रवुद्ध होते हैं और कुछ नहीं। इसमें किरण का क्या दोष १ यह तो अपना-अपना स्वभाव ही है।' एक ही गुरु से अनेक शिष्य विद्याग्रहण एक ही साथ करते हैं। किन्तु गुरु से विद्याग्रहण करते हुए शिष्यों के वीच कुछ शिष्य प्रगल्भता प्राप्त करते हैं, कुछ नहीं। यह विशेपता गुरु के शुण के कारण नहीं होती, प्रत्युत शिष्यों के अपने-अपने स्वभाव से ही होती है। इस अर्थ में प्रकृंत से अप्रकृत अर्थ का उपमानत्व की कल्पना से शब्दशक्ति उपमा रूप से अभिव्यक्त होती है। जैसे-चन्द्रमा अपनी किरणें सभी पुष्पों पर समान रूप से वितरित करता है। उन पुष्पों में से कुछ विकसित होते हैं, सभी नहों। इसमें चन्द्रकिरण की कोई विशेपता नहीं होती, अपितु पुष्पों के अपने गुण होते हैं। इसी प्रकार गुरु सभी शिष्यों में समान रूप से अपनी वाणीविशेष का वितरर्ण करते हैं-किंतु, उनमें कुछ को अधिक वोध होता है और कुछ अवुद्ध ही रह जाते हैं। यह उनके अपने-अपने अलग अलग स्वभावकृत गुण-दोप ही है। इस उदाहरण में श्लिष्ट 'गवादि' शब्दों का 'वागादि' रूप पर्याय का परिवृत्ति असहिष्णुत्व से शब्दशक्तिमूलक जो अनुरणन है-इसी रूप में ध्वनि है।

(सुधा) उपमाध्वनीन् कथयिष्यमाणस्तद्वतरणिकामाह-अथेति। प्वनिर्द्विविधः शब्दशक्ति- मूलोऽथंशक्तिमूलश्र। आधमुदाहरसि-तत्रेति। कळानां निषी चन्द्रे गुरी घ सुमनर्सु

Page 177

उपमानिरूपणप्रकर णम् १३७

पुष्पेपु शिष्येपु च अच्छतरं स्वच्छं गर्वा किरणानाक्च समूहं प्रकरं किरति सति यत् कति- चित् शिष्या: पुष्पाणि प्रबोधं ज्ञानं विकसनं च कलयन्ति कतिचिन्न, तव् सतः पदार्थस्य स्वभाव एवेत्यन्वयः। अन्न शब्दशयत्या उपमाध्वनिं प्रतिपादयति-एकस्मादिति। गुरो- रविद्या शिक्षमाणानां शिष्याणं मध्ये केषाश्विदेव प्रागभ्यं नान्ेपामिति विशेषो गुरोरगुणे: शिष्येषु ज्ञापनविशेषेण कृतो न भवति, किन्तु शिप्यस्वभावकृत एव । अस्मिद्यर्थे प्रकृते अप्रकृतार्थस्थोपमानत्वकल्पनं शब्दशकयोपमारुपं व्यज्यते। अप्रकृतार्थ दर्शयति- यथेति। समूहम् अविशेषेण =विशेष्याभावेन पुष्पमात्रे किरति=विक्षिपति, तेपु केषाख्िद् विकसनं नान्येषामेव विशेष:, पुष्पस्वभावकृतश्ननद्रकिरणवित्तेपविशेषेण यथा न कृत. । एवं सर्वशिष्येषु विशेषाभावेन वाडयं विकिरति गुरी शिष्येपु वोधाबोधविशेषोऽपि शिष्य- स्वभावकृत एव। अत्र श्लिष्टाना गवादिशव्दानां वागादिरूपपर्य्यायस्य परिवृत्तेरसदिप्णु- श्वात् शब्दभाक्तिमूलं यदनुरणनं तद्रपो ध्वनिः। (चित्र०) अर्थशक्तिमूलो वस्तुनोपमाध्वनिर्यथा- वाहि वात यतः कान्ता तां स्पृष्टवा मामपि रपृश। त्वयि मे गात्रसंस्पर्शन्धन्द्रे दृष्टिसमागमः ॥। अत्रार्थशक्त्या चन्द्रे दृष्टिसमागम इत्यनेन चन्द्रे सीतामुखसादृश्यं व्यज्यते। (भारती) अर्थशक्तिमूलक वस्तु से उपमा ध्वनि के उदाहरण। जैसे- (राम की उक्ति है)-'हे वायु ! तुम-जहाँ मेरी कान्ता है-वहाँ जाओ। वहाँ कान्ता के शरीर का स्पर्शकर लौटने के वाद मेरे शरीर का भी स्पर्श करो। ऐसा करने से तुममें मेरे गात्र स्पर्श से चन्द्र-दृष्टि-समागम की अनुभूति होती है।' इस उदाहरण में अर्थशक्ति से 'चन्द्र दृष्टि समागम' के द्वारा चन्द्रमा में सीता के मुख सादृश्य की अभिव्यक्ति होती है। (सुधा) अर्थशक्िमूलमाह-वाहीति। रामोकिः, यत्र कान्ता, तन्र वाहि=गण्छ, तां कान्ता स्प्ृष्टा मामपि स्पृश। त्वयि मे गात्रसंस्पर्शः चन्द्रे दष्टेः समागमः। तं ध्वनि प्रकटीकरोति- चन्द्रे ष्टिसमागम इत्यर्थशक्त्या चन्द्रे सीतामुखसादृश्यं व्यज्यत इश्यर्थशक्तिमूलध्वनिः। (चित्र० ) अलङ्कारेणोपमाध्वनिर्यथा- यैर्दप्टोडसि तवा ललाटपतितप्रासप्रहारो युधि

तेषां स्फीतासृकस्तति पाटलीकृतपुरोभागः परान् दारयन्।

ज्वालालीभग्भासुरे पुररिपावस्तं गतं कौतुकम ॥ अत्रान्यतकार्य प्रकुर्वतोऽशक्यान्यवस्तुकरणात्मको विशेपालङ्कारः। उक्तरूपं

Page 178

१३८ चिन्रमीमांसा

त्वां पश्यतो यथो क्तविशेषणविशिष्टपुररिपुदर्शनमासीदिति निबन्धनात करण- स्य क्रियासामान्यात्मनो दर्शनेऽपि सद्भावाद्यद्यप्ययमर्थो न वाच्यस्तथापि तस्मिन् कौतुकास्तमयवर्णनाद व्यङ्गयः। तेन तदा त्व तथाभूतः पुररिपुरिव स्थितोऽसीत्युपमा व्यज्यते। एवमुपमादिगुदाहता। (भारती) अलकार से उपमाध्वनि। जैसे- 'हे राजन्' तुम जिन पुरुषों के द्वारा-उस युद्ध में ललाटपर प्रास (भाला) के प्रहार से रक्त प्रस्रवण के कारण आरक्त हुए अग्रभाग वाले दुश्मनों का सहार करते हुए पुररिप भगवान शंकर की तरह देखे गए, क्योंकि उन पुरुषों के तथा कामदेव के दु.सह देहों को जलाने के निमित्त नेत्र रूपी अग्नि की रक्ताभ ज्वाला भगवान शकर के स्वरप को भी आश्चर्यचकित कर रही थी।' इस उद्दाहरण में अन्य कार्य करते हुए अशञक्ति से अन्य वस्तु करणात्मक विशेषालद्कार है। पूर्व कथित रूप में तुम को देखते हुए तथाकथित विशेषणों से विशिष्ट भगवान शकर के दर्शन हुए। इस निवन्धन से करण का क्रिया सामान्यात्मक दर्शन में भी उसकी उपस्थिति से यदपि यह अर्थ वाच्य नहीं है, तथापि उसमें 'कौतुकास्तमय' वर्णन से व्यग्य है। उससे उस समय तुम उस प्रकारपुररिपु अर्थात भगवान शकर की तरह स्थित थे, यह उपमा अभिव्यक्त होती है। इस प्रकार दिमात्र उपमा उदाहृत हुई। (सुधा) कवचिदलक्षारेणोपमाध्वनिरपि दश्यते। तमुवाहरति-अलक्कारेणेति। यैरिति। हे राजन् रवं ये. पुरुषैः तदा युधि ललाटे पतितः प्रासप्रहारो यस्य, स्फीतस्य प्रवृद्धस्यासृजो रुधिरस्य स्रतिः प्रस्तवणं तेन पाटलीकृतोऽहणीकृतः पुरो भागो यस्य, परान् शत्रन् दारयन् रवं दष्टोऽसि, ते्षा पुरुषाणां दुस्सहश्रासी कामश्व तस्य देहस्तस्य दहननिमित्त प्रोद्भूतो यो नेन्नाभति: तस्य ज्वालास्तासां पक्गिमरेण भासुरे रकेपुररिपी शिवे आश्चर्यमस्तङ्कतमित्य- न्वयः। अत्र उदाहरण इश्यर्थः। राजदर्शनक्रियया ताप्ठशविशेषणविशिष्टशिवदर्शनवर्णना दन्यत् कर्तु प्रवृत्तस्य ततोऽन्यत्र कृतिश्व स इत्युक्तळक्षणोऽन्यत् कार्य कुर्वतः तदन्यवस्तु- करणरूपो विशेषालङ्कारः। क्रियाकरणाभाव दर्शने आशसय निराकरोति-करणस्येति। क्रियासामान्यरूपकृजर्थीभूतकरणस्य दर्शनेऽपि सत्वाद्न दोषः । अत्राशकते, यद्यप्ययमल- क्वारोऽर्थेन वांच्यो न व्यङ्ञय इति शेषः । तथापि कौतुकास्तमयरूपे न तद्ूर्णना्यक्यः। तेनोपमाध्वनिमाह-तेनेति। तदा सवं तथाभूतः पुररिपुरिव स्थितोऽसि इश्युपमा व्यज्यते। तथा चालङ्टारध्वनिः। प्रकरणमुपसंहरति-एवममिति । वस्तुतस्तु तन्नेदानामानन्त्य- मिति भावः। तथा च भरतः- 'एकस्येकेन साङ्क्य्यादेकस्य बहुमिस्तथा। अनेकेषां तथैकेन बहूनां बहुभिस्तथा॥' काष्यालोककार :- 'अपर्यन्तो विकल्पानां रूपकोपमयोर्यतः। दिष्मात्रं दर्शितं धीरैरनुक्तमनुमीयताम् ॥'इति। (चित्र०) अथोपमादोषाश्वचविन्त्यन्ते-न्यूनत्वमधिकत्वं लिङ्गभेदो वचनभेदोऽसादृश्य- मसंभव इत्यस्या: षडू दोषानाहुः।

Page 179

उपमानिरूपणप्रकरणम् १३६ तत्रोपमेयादुपमानस्यापकृष्टत्वं न्यूनत्वम् ; उत्कृष्टत्वमाधिक्यम्। द्वयमपि जात्या प्रमाणेन धमतो वेति प्रत्येक त्रिविधम्। तन्र जाति प्रमाणगतन्यूनत्वाधि- क्ये यथा- चण्डालैरिव. युष्माभि: साहसं परमं कृतम्। वह्निस्फुलिङ्ग इव भानुरयं चकास्ति। अयं पद्मासनासीनश्चक्वाको विराजते। युगादौ भगवान् वेधा विनिमित्सुरिव प्रजाः ॥ पातालमिव नाभिस्ते पर्वताविव च स्तनौ। वेणीदण्ड: पुनरयं कालिन्दीपातसंनिभः ॥ (भारती) इसके बाद उपमा के दोष पर विचार करते हैं, (१) न्यूनत्व, (२) अधिकत्व, (३) लिद्ग भेद, (४) वचनभेद, (५) असादृश्य एव (६) असमव। ये उपमा के ६ दोप हैं। उपमेय से जहाँ उपमान की अपकृष्टता दोतित होती है, वहाँ न्यूनत्व दोष होता है। उत्कृष्टत्व से आधिक्य का वोध होता है। दोनों ही जात्या प्रमाण से अथवा धर्म से होते हुए प्रत्येक तीन प्रकार के दोप हैं। उनमें जानि प्रमाणगत न्यूनत्वाधिक्य में उदाहरण जैमे- 'चाण्डालों की नरह तुमने अत्यधिक साहस किया। वह्नि स्फुरलिंग अर्थात् अग्निकण की तरह यह मूर्य शोभता है। पझमासनासीन अर्थात् कमल के आसन पर आसीन यह चक्रवाक युग के आदि में प्रजा का निर्माण करते हुए भगवान ब्रह्मा की तरह शोभ रहा है। तुम्हारी नाभि पाताल की तरह है और तुम्हारे स्तनद्वय पहाड की तरह हैं और तुम्हारी चोटी यमुना नदी की तरह, है।' जातिन्यूनता के उदाहरण, जैसे-'तुमने चाण्डालों की तरह परम साहस किए।' यहाँ जाति से उपमान की न्यूनता है। प्रमाण से न्यूनत्व के उदाहरण, जैसे-'वह्िस्फुलिंग की तरह यह सूर्य शोभता है।' यहाँ स्फुलिंग उपमान की अपेक्षा सूर्य उपमेय की न्यूनता है। जातित. आधिक्य के उदाहरण, जैसे-'कमलस्थित चक्रवाक शोभित है' 'युगादि में प्रजा का निर्माण करते हुए ब्रह्मा की तरह।' यहाँ चक्रवाक से ब्रह्मा का आधिक्य है। प्रमाणाधिक्य के उदाहरण देत है-'तुम्हारी नाभि पाताल की तरह है और तुम्हारे स्तनद्वय पहाड की तरह हैं।' यहाँ प्रमाण से नाभि एव स्तनद्वय रूपी उपमेय से क्रमश पाताल एव पहाड रूपी उपमान का आधिक्य है। (सुधा) उपमादोषान् वक्तमारभते-अथेति। न्यूनत्वादीनस्याः पढ दोपानाहुः। तथा च वामन :- 'हीनत्वाधिकत्वलिङ्वचनभेदासादृश्यासभवास्तद्दोषाः' इति। 'हीनत्वं जाति- प्रमाणधर्मन्यूनतोपमानस्य इति वामनोक्त्या हीनवमपि। त्रिधेति। तत्र न्यूनत्वादीनि यथा-न्यूनत्वमधिकरवं लिङ्गभेदो वचनभेदोऽसादृश्यमसम्भवर्चेति । उपमेयादुपमान- स्याप्रकृष्ट्वं न्यूनत्वम् तदाघिष्यमधिक्त्वम्। वामनोक्तमेतद्दयोविभागमाह- इयमपीति। जातिप्रमाणधर्मः प्रत्येक तद्दर्य त्रिविघमित्यर्थ। कमेणोदाहरति-तत्रेति। जातिन्यूनतोदाहरणमाह-चण्डालैरिति। 'युष्माभिश्वाण्डालैरिव परसं साहमं कृतम्' इत्यत्र जातया उपमानस्य न्यृनता। प्रमाणतो न्यूनतमाह-चह्निस्फुषिङ् इति। इह स्फुलिक उपमानं सूर्योपमेयापेदया न्यूनता। जातित आधिक्यं यथा-अयमिति।

Page 180

१४० चित्रमीमांसा

पभ्मस्थित्वक्रवाको विराजते। युगादौ पजा विनिर्मिरसुर्भगवान ब्रह्मेव। अध्र चक्रवाकादु ब्रह्मण आधिक्यम्। प्रमाणाघिक्यमुदाहरति-पातालमिति। अत्र प्रमाणतो नाम्यादे- रुपमेयात् पातालाधपमानस्याधिक्यम्। न व जातेरकर्षापकर्षानुपपत्तिः व्यकौ तत्सर्वेन सदभेदेन स्थिताया जातेरपि तत्सम्भवासू। (चिन्र०) अत्र चण्डालादिभिरुपमानैःप्रस्तुतोर्ऽर्थोऽन्यन्तमेव कदथित इत्यनुचितार्थ- तायामिमे न्यूनत्वाधिक्ये पर्यवस्यतः । धर्मतो न्यूनत्वाधिक्ये तुहीनाधिकपद- त्वरूपौ दोषौ। यथा- स मुनिर्लान्छितो मौन्ज्या कृष्णाजिनपट वहन्। व्यराजन्नील जीमूतभागाश्रिष्ट इवांशुमान्॥ स पीतवासा: प्रगृहीतशार्ङ्ो मनोज्ञभीमं वपुराप कृष्णः। शतहदेन्द्रायुधवान्निशायां संसृज्यमान: शशिनेव मेघः ॥ अन्राद उपमानस्य मौज्जीप्रतिबिम्बस्तडिल्लक्षणधर्मो न निबद्ध इति न्यूनत्वम्। द्वितीये उपमेयस्य शङ्गादेरनिर्देशेन शशिनो ग्रहणमतिरिच्यत इत्याधिक्यम्। (भारती) यहाँ पूर्व कथित चारो प्रकार के उदाहरणों में चाण्डाल प्रभृति उपमान से उपमेय अर्थ कदर्थित है। इस अनुचितार्थ दोष में उन दोनों का पर्यवसान है। धर्मसे न्यूनत्व और आधिक्य में हीन और अधिक पदत्व रूप दोष के उदाहरण देते हैं। जैसे- 'मेखला से चिह्नित काले मृगचर्म रूपी वस्त्र को धारण करते हुए वे सुनि नारद नील वर्ण मेघ से आष्विष्ट सूर्य की तरह शोभते है।' 'पीतवस्त्र पहने हुए वे भगवान श्रीकृष्ण हाथ में शख धारण कर अत्यन्त मनोहर भीम शरीर की शोभा प्राप्त की। वे रात के उस मेघ की तरह शोभ रहे थे-जो विजली, इन्द्रधनुष एव चन्द्रमा से सुशोभित हो।' यहाँ प्रथम उदाहरण में उपमान का मौजी प्रतिविम्व एव तडिल्वक्षण धर्म निवद्ध नहीं रहने के कारण न्यूनत्व है। दूसरे में उपमेय का शखादि के निर्देश से उससे प्रतिविम्बोपमानीभूत चन्द्रमा उपमान से आधिक्य है। (सुधा) अन्रेति। चतुर्षूदाहरणेष्वित्यर्थः। उपमानैश्चण्डालादिभिरुपमेयार्थः कदथित इत्यद्ग. चितार्थदोषे तयोः पर्यवसानमित्यर्थः। धर्मतो न्यूनर्वाधिक्ययोस्तु हीनाधिकपदत्वरूपपद- दोषयोरन्तर्भाव इत्याह-घर्मत इति। उपमेयापेक्षयोपमानस्य न्यूनधमंतामुदाहरति- स मुनिरिति। मौन्ज्या मेखलया लान्द्ित्श्रिह्ित: कृष्णाजिनपटं वहन् स मुनिर्नारद: नीलमेघमागेनाश्रिष्टो रविरिव व्यराजत। अब्र मौक्षीनिरुपितोपमानवाचकपद न्यूनता। आधिक्यमुदाहरति-स इति। प्रगृहीत शारङः पीतवासा स कृष्णः मनोजभीमं

Page 181

उपमानिरूपण प्रकर णम् १४१

बधुः प्राप। विद्युदिन्द्वायुधवान् रात्री शशिना संसज्यमानो मेघ इवेश्यन्वयः। अश्र शङ्ूरूपोपमेयानिर्देशेन तत्प्रतिविम्वोपमानीभूतशशिन उपमानादाधिक्यममिति। पत- देवाह-अत्राद्य इस्यादिना। (चित्र०) लिङ्गवचनभेदो यथा- भाग्याभावात् करस्थोऽपि चिन्तारत्नमिव च्युतः । सक्तवो भक्षिता देव शुद्धा कुलवधूरिय।। इमौ प्रक्रमभङ्गान्तर्भूतौ। कथं च्युतत्वादिरत्र साधारणधर्मो भवितुं नारहति। उपमानोपमेययोर्मध्ये यत्र लिङ्गवचनसारूप्य-तत्रवास्य समन्वयेनो- भयान्वयाभावात्। तथा चोपात्तविशेपणविशिष्टस्यैवोपमानत्वमुपसेयत्व वा भवेत्। प्रतीयमानेन तु धर्मान्तरेणोपमा निर्वाह्या स्यात्। ततश्रोपमानोपमेययोः कस्यचित् सविशेषणत्वमन्यस्य नेत्येव विशेषणप्रक्रमभङ्गरूपता। (भारती) लिंगवचन भेद के उदाहरण, जैसे- - 'भाग्य ठीक नही रहने पर हाथ में आए चिन्तामणि रल भी खो जाता है। जिस प्रकार शुद्धा कुल वधू सत्त ख़ाकर भी निर्वाह करती है।' यहॉ पूर्वाद्ध में लिन्ग-भेद है। उतरार्द में वचनभेद है। 'च्युत' इस पुहिंग का 'रत' नपुसक लिद्ग के साथ समन्वय है। इसी प्रकार कुलवधू इस एक वचन का 'सक्तवः' इस बहुवचन के साथ अन्वय है। इसीका समर्थन करते हुए लिखते हैं-'च्युतत्वादि' का यहाँ साधारण धर्म सभव नही है। क्योंकि जहाँ उपमान और उपमेय वृत्ति का लिन्गादि से सारूप्य है-वही इसका अन्वय मभव है। यहॉ दोनों में इस दृष्टि से अन्वय का अभाव है। फलस्वरूप उपात्त विशेषण से विशिष्ट का ही उपमानत्व अथवा उपमेयत्व होता है। प्रतीयमान से तो धर्मान्तर के द्वारा उपमा का निर्वाह होता है। उसके वाद उपमान और उपमेय का कही सविशेपणत्व और कही उसका न होना ही विशेषण प्रक्रमभङ्ग रूपता दोष है। (सुधा) लिङ्गभेदवधनभेवावुदाहरति-यथेति। पूर्वाद् लिङ्गभेद:, उत्तरार्द्े वचनभेदः। य्युत इति पुंछ्िक्षस्य ररने क्लीबेन, कुलवधूरित्येकवचनस्य सक्तव इति बहुषचनेन अन्वय- सत्वाद्। एतयोर्भझप्रक्रमान्तर्गतत्वमित्याह-इमाविति। तदेव समर्थयते-कथमित्यादि। न्युतर्वादीनां साधारण्यं न सम्भवति, यत्रोपमानोपमेयवृत्तिलिद्वादिसारुप्यं तत्रैव तवन्वयसत्वेन इहोभयत्रान्वयाभावाद्। तत्फलितमाह-तथा चेति। गृहीतविशेषणा- वचिछ्लस्योपमानोपमेयता स्याद्। प्रतीयमानधर्मेण तु तस्यानिर्वाद्मत्वम्। तयोरमध्ये एकस्य सविशेषणरवेऽन्यस्य तद्भावे अर्थविशेषत्य भङ्गाद् क्रममद्गरूपतैव। (चित्र० ) केचित्तु कालपुरुषलोडर्थादिभेदमपि दोपमाहुः। यथा- तस्यापनोदाय फलप्रवृत्तावुपस्थितायामपि निर्व्यपेक्षः ।

Page 182

१४२ चित्रमीमांसा

त्यद्यामि वैदेहसुतां पुरस्तात् समुद्रनेमि पितुराज्ञयेव ॥ अत्र समुद्रनेमिमत्यजमित्यन्वेति न तु त्यच्यामीति । पुरुषभेदो यथा- शरीरमात्रेण नरेन्द्र तिष्ठन्नाभासि तीर्थप्रतिपादितर्द्धिः। आरण्यकोपात्तफलप्रसूति: स्तम्बेन नीवार इवावशिष्ट: ।। नीवारे आभातीत्यन्वेति न त्वाभासीति। विध्यादिभेदो यथा- आशास्यमन्यत्पुनरुक्तभूत श्रेयांसि सर्वाण्यधिजग्मुषस्ते। पुत्रं लभस्वात्मगुणानुरूप भवन्तमीड्य भवतः पिनेव ॥ भवन्तमलभतेत्यन्वेति, न तु लभस्वेत्याशीः । असादृश्यासंभवावुपमाया- मनुचितार्थतायां पर्यवस्यतः। असादृश्यं यथा- ग्रथ्नामि काव्यशशिनं विततार्थरश्मिम्। काव्यस्य शशिना सादृश्यमप्रसिद्धम् । यद्यर्थानां रश्मीनां च सादृश्यं प्रसिद्धं स्या्तदा तदीयबिम्बप्रतिबिम्बभावेन काव्यशशिनोः सादृवश्यमप्रसिद्धम- प्यानीयेत, न च तदप्यस्ति। यथा वा- एप विन्ध्याचलः सान्द्रकुञ्जोल्लसितनिर्भरः । इवेश्वरः॥ (भारती)

कुछ लोग कालभेद, पुरुषमेद तथा विध्यादिभेद को भी दोष कहते हैं। जैसे- 'उस अपयश को दूर करने के लिए फल को मालूम करते हुए भी नि स्पृह होकर, सीता को पिता की आजा से सम्पूर्ण पृथ्वी के समान छोड दूँगा।' यहाँ उपमान में 'अत्यजम्' इसके साथ अन्वय है न कि 'त्यक्ष्यामि' के साथ। अतः यहाँ काल- भेद दोष है। पुरुष भेद का उदाहरण देते हैं, जैसे- 'हे राजन् ! सत्पात्रों को अपनी सारी सम्पत्ति दे डालने से बचे हुए शरीर से स्थित आप वनके रहने वाले मुनिजनों से फल तोड लिए जाने पर डडी मात्र से बचे हुए नीवार नामक मुनि- धान्य के समान सुशोभित हो रहे हैं।' यहाँ 'नीवार' में 'आभाति' के साथ अन्वय की जगह 'त्वम् आभासि' ऐसा अन्वय है। अतः यहाँ पुरुषभेद दोष है। विध्यादि भेद के दोष दिखाते हैं। जैसे- 'पुत्र के अतिरिक्त सभी प्रकार के श्रेय तुम्हें प्राप्त हैं। पुनरुक्तभूत सभी आशीर्वाद से सिद्ध वस्तुएँ भी तुम्हें उपलब्ध हैं। किन्तु तुम्हारे पिता की तरह स्तुत्य आत्मगुणानुरूप पुत्र तुम प्राप्त करो, यही आशीर्वाद है।' 'भवन्तम्' यहाँ 'अलभत' इसके साथ अन्वय है। न कि 'लभस्व' इसका आशीर्वाद के साथ। यही यहाँ विध्यादि दोष है। इन सवों का अनुचित अर्थ में पर्यवसान है। क्योंकि उपमा में असादृश्य असभव है। असादृश्य का उदाहरण, जैसे-

Page 183

उपमानिरूपणप्रकरणम् १४३

फैली हुई अर्थरशिमि वाले काव्यस्वरूप चन्द्रमा को गूथता हू। इस उदाहरण में काव्य का चन्द्रमा के साथ सादृश्य प्रसिद्ध नहीं है। यदि अर्थों का रश्मि के साथ सादृध्य प्रसिद्ध हो तो उसके द्वारा निरूपित विम्त्रप्रतिविन्वभाव से काव्य और चन्द्र के अप्रसिद्धि सादृश्य को भी लाया जा सकता है। न कि ऐसा कहें कि वह भी है ही। जैसे-'अत्यन्त निविट कुओं से प्रवा- दित निर्झर वाला यह विन्ध्यनामक पर्वत मस्तिष्क पर स्फुरित वहिशिसा वाले ईश्वर की तरह है। यहाँ विलकुल ही सादृश्य नही है। (सुधा) मतान्तरमाह-केिस्विति। कालभेदपुरुषभेदविध्यादिभेदानां दोषं वदन्ति। तम्र कालभेदमुदाहरति-तस्येति। तस्यावर्णस्यापनोदाय,फलप्रवृत्ती अपत्योत्पत्ती उपस्थितार्या सत्यामपि निर्ष्यपेक्ष निस्पृह: सन् वैदेहसुतां पुरस्ताव पूर्वं पितुराजया समुद्रनेमि भूमिमिव त्यच्यामि। उपमानेऽत्यजमित्यन्वेति, न तु व्यक्यामीति कालभेदः। पुरुषभेदमुदाहरति- शरीरमान्रेणेति। हे नरेन्द्र! तीर्थ सत्पात्रे प्रतिपादिता ऋद्धिर्येन 'तीर्थे शास्त्रेऽध्वरे पात्रे' इति विश्वः। 'पुण्यक्षेत्रे तथा पात्रे तीर्थ स्याद् दर्शनेप्वपि' इति हलायुधः। शरीरमात्रेण, अरण्ये भवा मनुष्या आरण्यका: सुन्यादय, 'अरण्यान्मनुष्ये' इति युज्। तैरुपात्ता फल- प्रसूतिर्यस्य, स्तम्बेन काण्डेनावशिष्टो नीवार इव, प्रकृत्यादित्वात्ततीया, आभासि शोभसे। नीवारे आभातीत्यस्यान्वयात; श्वम् आभासीत्यन्वयास्; पुरुषभेदः। विध्यादिभेद- मुदाहरति-आशास्यमिति। सर्वाणि श्रेयांसि शुभान्यधिजगमुपः प्राप्तवतः ते तव अन्यत् पुत्रातिरिक्तम, आशास्थम् आशी:साध्यम आशसनीयम, आशास्यं पुनरुकम्, सवं सिद्ध मित्यर्थः, किन्तु ईड्य स्तुश्य भवन्तं भवतः पितेव आष्मगुणानुरूपं स्वानुगुणमित्यर्थः। पुत्रं लभस्व प्राप्नुहीत्यन्वयः। भवन्तमित्यत्र, अलभतेत्यन्वयाल्लभस्वेस्यस्यानन्वयाद्विष्या- दिभेद:। पतेषामनुचितार्थे पर्यंवसानम्, उपमायां साहश्यासम्भवादिति तदाशयः। असादृश्यमुदाहरति-ग्रथ्नामीति। अम्रोदाहरणे काव्यस्य शशिना सादृश्यं प्रसिद्धं न भवति, अर्थानां रश्मिभि: सादृश्यप्रसिद्धौ तपषिरूपितविन्वप्रतिबिम्बभावेन तयोरप्रसिदधू- योरप्यानयनं घटेत। न चार्थरश्मिसादृश्यं प्रसिद्धमिति, न तयोः सादृश्यमित्याशयः। उदादरणान्तरमाह-यथा वेति। एप इति। सान्द्रा नििडाः कुन्जेभ्यः उच्वलिता निर्झरा: प्रवाहा यस्य तादश एष विन्धयः पर्वतः, भालेषणात् स्फुरन् वह्निशिखानामारोपो यस्प तादश ईश्वर इव वर्तते। अम्र सर्वथैव सादृश्यं नास्तीति पूर्वतो विशेष:। (चित्र०) असंभवो यथा- निपेतुरास्यादिव तस्य दीप्ाः शरा धनुर्मण्डलमध्यभाजः। जाज्वल्यमाना इव वारिधारा दिनार्धभाज: परिवेपिणोऽर्कात्॥ ज्वलन्त्योऽम्बुधारा: सूर्यमण्डलान्निष्पतन्त्यो न सभवन्तीत्यसंभवः । केचिदुपमानाप्रसिद्धि पृथग्दोपमाहुः। यथा- बाष्पदिग्धेक्षणं वक्त्रं तरुण्या: परिद्ृश्यते। तुपारसिक्तच्छदनं तरङ्गिण्या.इवोत्पलम् ॥

Page 184

१४४ चित्रमीमांसा :

अत्र बाष्पदिग्घेक्षणं तुषारसिक्तच्छदनमित्यनयोर्बिम्बप्रतिबिम्बभावेन f

(भारती) असभव दोष के उदाहरण देते है, जैसे- 'मण्डलाकार धनुष के बीच से प्रदीप्त वाण उसके मुख से उसी प्रकार गिरे जैसे प्रकाशित सूर्यं मडल से वारिधारा गिरती हो।' जल की धारा प्रकाशमान सूर्यमडल से कभी गिरती नही, अत यहाँ असभव दोप है। कोई उपमान की अप्रसिद्धि को अलग दोप मानते हैं, जैसे-अश्रु से आप्लावित ँखों से युत उस नायिका के मुख तुषारपात से कुम्हलाया नदी के कमल की तरह दिखाई पढ़ता है। इस उदाहरण मे 'वाष्पदिग्ध नेत्र' और 'तुपारसिक्तच्छदन' का विम्वप्रतिनिम्त्रभाव से सादृश्य रहने पर भी उत्पल का मुख के प्रति उपमानत्व की अप्रसिद्धि ही दोप है। (सुधा) असम्भवमुदाहरति-यथेति। धनुर्मण्डलमध्यभाजो दीप्ताः शराः, तस्य आस्यादिब निपेतुः। दिनार्धभाज: परिवेषिणोऽर्काद जाउव्यमाना वारिधारा इवेश्यन्वयः । अत्र दोषं व्याकरोति-जवलन्त्य इति। अम्बुधाराः प्रकाशमाना: अरकमण्डलाननिप्पतन्तयो न सम्भवन्तीश्यसम्भवः । क्वचिन्मतेऽयोऽपि दोष उपमाया भवतीति तन्मतमाह- केचिदिति। उपमानाप्रसिद्धमुदाहरति-यथेति। तरुण्या नायिकायाः वाप्पदिग्धे ईकणे यत्र तव्=आननं तरङ्विण्या नद्यास्तुपारेण सिक्तदलमुत्पलमिव परिदृश्यते इत्यन्वयः। अत्र दोपं प्रकटयति-अन्नेति। वाप्पदिब्धनेत्रतुपारसिक्कच्छदनयोर्षिम्बप्रतिबिम्बभावेन सादृश्यसत्वेऽपि उत्पलस्य मुखं प्रति उपमानत्वस्य प्रसिद्धेरभाव एव दोष:। (चित्र०) अथैपां दोषाणां यथासंभवमपवादाः प्रदर्श्यन्ते-कविसमयसम्मतेषु जात्या प्रमाणेन च न्यूनत्वाधिक्ये न दोपौ। यथा- तवाननसमश्चन्द्रश्चन्द्रतुल्यं त्वदाननम् । द्व्यणुकं सध्यसददशं मध्यं द्व्यणुकसंत्निभम्॥ अत्र कविसमयप्रसिद्धेरन किश्चिदनौचित्यम्। उपमेयोपसानगताधिकधर्मोपा- दानस्यैकैकधर्मकानेकोपमार्थत्वेन वा साधारणधर्मवत्तासपादनार्थत्वेन वा धर्मिस्वरूपविशेषलाभार्थत्वेन वा विधान्तरेण वा प्रस्तुतकार्यान्तरार्थत्वे धर्मतो न्यूनत्वाधिक्ये न दोषौ। यथा- क्षीरोद्वेलेव सफेनपुआ् पर्याप्तचन्द्रेव शरत्त्रियामा। नवं नवं क्षौमनिवासिनी सा भूयो बभौ दर्पणमादधाना। इत्यत्रोपसेयगताधिक विशेषणोपादानस्यैककविशेषणकानेकोपमा नार्थ्त्वात्। क्षीरोदवेला च सफेनपुआ पर्याप्तचन्द्रा च शरत्त्रिधामा। अनुव्यधात् क्षौमनिवासिनीं तामच्छप्रभं दर्पणमाद्धानाम्॥ 1

Page 185

उपमानिरूपणप्रकरणम् १४५

इत्यस्यैव शोकस्थ पाठे उपमानगतानेकधर्मोपादानमे कैकधर्मकोपमाद्वयार्थे- मित्युपमानस्य धमेत आधिक्यान्न दोप:। (भारती) पूर्वकथित यथामभव इन दोपों के अपवाद दिखाते है-कविसकेत सम्मतों में जाति और प्रमाण से न्यृनत्व और आधिक््य में दोप नहीं होता, जसे- 'तुन्हारे मुख के समान चन्द्रमा है और चन्द्रमा के सदृग तुन्हारा मुख है। द्युक मध्य के सदृश है और मध्य ह्यणुक के समान है।' इस उदाहरण में कविसमयप्रसिद्धि के कारण किसी भी प्रकार का अनोचित्य दोप नहीं है। उपमेय और उपमानगत अधिक धर्म के उपादान का एक एक धर्म के अथवा अनेक उपमा भर्थ से साधारण धर्मवत्ता अथवा सपादन अर्थ में अथवा धमिस्वरूप विशेष लाभ के अर्थ से अथवा विधान्तर से, अथवा प्रस्तुत कार्यान्तर अर्थ में धर्म से न्यूनत्व और आधिनय में दोप नहीं है। इसी श्षेक के पाठ में उपमानगत अनेक धर्म के उपादान में एक-एक धर्मक दोनों उपमा के अर्थ में उपमान का धर्म से आधिक्य होने पर दोप नही है।

(सुधा) अन्न कथितदोपापवादं दर्शयितुमारभते-अथेति।न्यूनत्वाधिवययोः दोपाभावमाह- कवीति। कविसङ्टेतसम्मतेषु जात्यादिना तौ न दोषाविति उदाहरति-तवेति। अन्नोपमे योपमालद्वारः। अस्मिन् कविसंकेतप्रसिख्वेरनीचित्याभवाल दोष:। प्रकारान्तरेण सयोर

नान्तरेण; उपमेयोपमानगताधिकधर्मोपादानस्य प्रस्तुतकाव्यान्तरार्थता चेस्, धर्मसो न्यू नत्वाधिकरवयोनें दोष इत्यन्वयः। आद्यहेतुना न्यृनत्वरूपदोपाभावमुद्दाहरति- यथेति। सफेनपुआ्ता धीरोदवेला इष पर्य्यासचन्द्रा शरस्त्रियामेव नवनीमवासिनी भूयो नवं दर्पणमादधती सा वभावित्यन्वयः। अम्न न्यूनत्वस्यादोपतामाह-अत्रेति। घेलाम्नि-

जनसर्वेन न्यूनत्व न दोपः। आधिक्यस्यादोपतां तेनेव हेतुनोदाहरति-फेनपुक्युता क्षीरोद्वेला परिपूर्णचन्द्रा शरस्त्रियामा घ क्षीमनिवासिनीम्छ्कान्ति दर्पणमावधतीं तामनुव्यादिति पाठान्तरेऽन्वयः। उपमानगतं यदनेकध्मोंपादानम, तस्यैफेंफधर्मको- पमाछ्वयप्रयोजकतयोपमानस्य धर्मत भाषिक्यं न दोष:। (चित्र०)

इति विज्ञापितो राजा ध्यानस्तिमितलोचनः। क्षणमात्रमृपिस्तस्थौ सुप्तमीन इव ह्दः। अन्र विज्ञापितविशेपण ध्यानस्तिमितलोचन इति साधारणधर्मवत्ता- संपादनार्थमिति न्यूनत्वं न दोपः। ज्यानिनादमभिगृहृती तयोः प्रादुरास बहुलक्षपाच्छविः। ताडका चलकपालकुण्डला कालिकेव निविडा बलाकिनी। १० चित्र०

Page 186

१४६ चित्रमीमांसा

अत्र निविडेति विशेषणं कालिकायां बहुलक्षपाच्छविरिति साधारणधर्म- वत्तासंपादनार्थमित्याधिक्यं न दोपः। (भारती) 'इस प्रकार राजा दिलीप से निवेदन किए गए चशिष्ठऋषि ध्यान से दोनों आँखें मुदे हुए क्षण मात्र, सुप्त मछलियों वाले अगाध जलाशय की तरह स्थिर हुए।' इस उदाहरण में विज्ञापित विशेषण को 'ध्यानस्तिमितलोचन' इस साधारण धर्मवत्ता को सम्पादनार्थ न्यूनत्व दोष नह्दी हुआ। इस प्रकार उन दोनों द्वारा किए गए धनुप टकार को सुनकर कृष्णपक्ष की रात्रि के समान शोमावाली अर्थात् काली और चचल कपालकुण्डलों वाली ताडका-वलाकायुक्त सघन मेघावली के समान वहाँ पहॅुँच गई। यहाँ निविड अर्थात् सघन विशेषण घनावली में काली रात की अधिक छषि रूपी साधारण धर्मवत्ता सम्पादन के अर्थ रहने पर भी आधिक्य दोष से मुक्त है।

(सुधा) साधारणधर्मवत्तासम्पादनार्थरवेन न्यूनत्वस्यादोपत्वमुदाहरति-इतीति। इति राज्ञा दिलीपेन विज्ञापितः ऋपिवसिष्ठो ध्यानेन स्तिमिते लोचने यस्य निश्चलाक्ष सन् चषणमात्रं सुपमीनो हद इच तस्थौ इत्यन्वयः। अन्न विज्ञापित इति विशेषणस्य ध्यानस्तिमितलोच- नरूपसाधारणधर्मवत्तासम्पादनप्रयोजनतयोपमाने तत्पति विम्वीभूतविशेषणानुपादानरू- पन्यून्वस्य न दोपर्वम् । तेनेवाधिक्यादोषतासुदाहरति-ज्यानिनादमिति। अथ तयो रामलघमणयो: ज्यानिनादमभिगृद्गती भृण्वतीत्यर्थः। बहुलक्षपाच्छविः कृष्णपक्षरात्निवर्णा 'बहुलः कृष्णपत्षे च सिते च बहुला गवि' इति विश्वः। चले कपाल एव कुण्डले यस्याः सा ताडका निविडा सान्द्रा वलाकावती 'ब्रीह्यादिभ्यश्च' दतीनिः, कालिकेव घनावलीव 'कालिका योगिनीभेदे काष्प्यें गौरयां घनावली' इति विच्वः। प्रादुरास प्रादुर्वभूचेत्यन्वयः। अम्र निषिदेति विशेषणं घनावल्यां बहुलक्षपाच्छवविरिति साधारणधर्मवत्तासम्पादनार्थ- मिति हेतोशाधिक्यं न दोष:। (चित्र०) अतिथि नाम काकुत्स्थात् पुत्रमाप कुमुद्वती। पश्चिमाद्यामिनीयामात् प्रसादमिव चेतना ॥ अत्रातिथि नामेति विशेषणं धर्मिस्वरूपविशेषलाभार्थमित्याधिक्यं न दोषः ।

(भारती) कुमुदनामक नाग की छोटी वहन कुमुद्वती ने कुश से 'अतिथि' नामक पुत्र को उस प्रकार प्राप्त किया, जिस प्रकार चेतना अर्थात् बुद्धि रात्रि के अन्तिम प्रहर से प्रसाद अर्थात् स्वन्छता प्राप्त करती है। इस उदाहरण में विज्ञापित अतिथि नाम विशेषण का धर्मिविशेष लाभार्थ से प्रसाद अर्थात स्वच्छता में उसके अभाव कथन रूप न्यूनत्व का दोष नहीं है।

Page 187

उपमानिरूपणप्रकरणम् १४७

(सुधा) धर्मिस्व रूपविशेष काभार्थरूपहेतुनाSन्यून तामुदाहरति-अतिथिमिति।कुमुद्वती का कुरस्थाद् कुशास् अतिथि नाम पुत्रं चेतना चुद्धि: पश्चिमादन्तिमाद् यामिन्या राश्रेर्यामाव् मरहरत् प्रसाद वैशथमिव प्राप। अन्न श्रोके अ्रतिथिनामविशेषणस्य धर्मिणो विशेषलाभा- थतया प्रसादे तदभावकथनरूपस्य न्यूनत्वश्य न दोरता। (चित्र०) रसान्त राण्येकरसं यथा दिव्य पयोऽश्नुते। देशे देशे गुणेष्वेवमवस्थास्त्वमविक्रियः ॥ अन्न दिव्यमिति विशेषणं धर्मिविशेषणं लाभाथमित्यधिकत्वं न दोषः। एवं प्रकृतकथासघटनचनत्कारादिकार्यान्तरत्वेऽपि द्रष्टव्यम्। एवं च प्रस्तुतकार्यान्तरोपयोगरहितानां विम्बप्रतिबिम्बभावेऽपि न साधारणधर्मतकप्रयोजनतया संभाव्यमानानामुपसेयोपमानविशेपणानां प्रति- विशेषणानिर्देश एव न्यूनत्वमधिकत्वं च दोपः । (भारती) एकरस अर्थात् सर्वदा मधुर रसवाला वर्पा का जल प्रत्येक स्थान में अन्य लवणादि रसों को जिस प्रकार प्राप्त करता है, उसी प्रकार विकाररहित तुम भी सत्वादि गुणों में (सृष्टिकर्ता, पालनकर्त्ता एव विनाशकर्ता रूप) विविध अवस्थाओं को प्राप्त करते हो। यहाँ 'दिन्यम्' यह विशेषण धर्मिविशेष लाभार्थ प्रयुक्त होने से दोपमुक्त है। इस प्रकार से प्रकृत अर्थसदृश जो चमत्कारादि अन्य कार्य है, उस अर्थ में भी वह्ा-वहा इन दोनों की अदोषता दर्शनीय है। इसी प्रकार प्रस्तुत जो कार्यान्तर है, उससे प्रयोजनशून्य विम्वप्रतिविम्ब भाव में साधारण- धर्मता नही है, तथा एक प्रयोजनत्व से समाव्यमान उपमेय एव उपमानों के विशेषणों का प्रति- विम्ब विशेषण के निर्देश में न्यूनत्व एव अधिकत्व दोष है। (सुधा) तेनवाषिक्यादोषतामुदाहरति-रसान्तराणीति। पकरसं मधुररसं हि विभवं दिव्यं पयः वर्षोदकं देशे देशे ऊपरादिनानादेशे अन्यान् रसान् रसान्तराणि छचणादीनि पथाऽ- श्नुते प्राप्नोति। एवमधिक्रियो निर्विकार एकरूप इत्यर्थः। त्वं गुणेषु सध्वादिपूपाधिपु स्थिते इत्यर्थः, अवस्थाः स्ष्टत्वादिरूपा अश्तुपे इत्यन्वयः। अन्र दिव्यमिति विशेषणस्य धर्मे विशेषलाभार्थतया अधिकरवं न दोषः। उपसंहरति-एवं प्रकारेण प्रकृतार्थंसदशं पच्चमतकारादि कार्यान्तरं तदर्थत्वेऽपि तन्र तम्नानयोरदोपरवं द्ष्टव्यम्। कुत्र तयोर्दोपरव- मत ह-एवन्चेति। प्रस्तुतं यरकार्यान्तरम तत्प्रयोजनशून्याना विम्वप्रतिविम्वभावे न साधारणघमता, तथा एकप्रयोजनरवेन सम्भाव्यमानानामुपमेयोपमानयोर्विशेपणानां प्रतिविम्चविशेषणस्य निर्देशे तयोर्शोषत्वमित्यर्थः।

Page 188

१४म चित्नमीमांसा

(चित्र०) कार्यान्तरार्थानामप्यनुगामिनामतया विशेषणनिर्देशेन वा साधारणीकरणे त्वधिको गुणः । यथा-'ज्यानिनादमभिगृह्नती' इति श्लोके ज्यानिनादमभ- गृह्लतीत्युपसेयविशेषणं ताडका स्वयमेव जिघांसया प्रादुर्भूय प्रथसमभिद्गुतवती। रासेण हृतेति स्त्रीवधानौचित्यपरिहारार्थत्वेऽप्युपमानसाघारणम्। कालिका- यामपि गर्जितशालिन्यामतिशयोक्त्या तद्विशेषणानुवृत्तेः। तथा-'नृपं तमावर्त- इति श्लोके 'अन्यवधूर्भवित्री' इत्यस्य व्यति- क्मणार्थत्वेऽपि सागरगामिनीति तत्प्रतिविशेपणनिर्देश कृतः। (भारती) कार्यान्तर प्रयोजन रूप विशेषणों के अनुगामित्व से अथवा विशेपण निर्देश से जहाँ साधारणी- करण होता है, वहाँ आधिक्य का गुणत्व दोष नहीं होता। उदाहरणस्वरूप पूर्वव्याख्यात श्रोक 'ज्यानिनाद 'उपमेय 'ज्यानिनाद' इत्यादि विशेपण का स्वय राम को मारने की इच्छा से प्रादुर्भूत ताडका प्रथम दौडने या उद्यत होने के कारण राम के द्वारा मारी जाने पर 'स्त्रीषध रूप जो अयोग्यता है' उसके परिहार में 'गजितशालिन्याम्' इस अतिशयोक्ति से उसके विशेषण की अनुवृत्ति के द्वारा उपमान साधारणत्व से उसका आधिक्य गुण ही है। तथा-'नृपं तमावर्तत' पूर्व व्याख्यात इस शेक में 'दूसरे की पत्नी होगी' इस व्यतिक्रमण अर्थ में भी 'सागरगामिनी' यह विशेषण उसके प्रति निर्देशित है।

(सुधा) विधान्तरं दर्शयत-कार्यान्तरार्थानामिति। कार्यान्तरप्रयोजनानां विशेषणानामनु- गामित्वेन विशेषणनिर्देशेन वा यत्र साधारणीकरणं तन्राधिक्यस्य गुणत्वं न दोषतेति तद्वावः। आद्यमुदाहरति-ज्यानिनादमिति। उपमेये ज्यानिनादमित्यादिविशेषणस्य स्वयमेव जिघासया रामं हन्तुमिच्छया प्रादुर्भूतताडका प्रथमाभिद्रवणेन हेतुना रामेण हतेति स्रीवधरूपं यद्योग्यत्वं त्परिहारार्थत्वे गर्जितशालिन्यां कालिकायामतिशयोकस्या तद्विशेषणस्यानुवृत्तेरुपमानसाधारणरवात्तदाधिक्यं गुण पवेति भावः। द्वितीयमुदाहरति- नृपमिति। 'अन्यवधूर्भित्री' इत्यस्थ व्यतिक्रमणार्थतायामपि सागरगामिनीति विशेष- णस्य साधारण्यादाविक्यस्य गुणत्वमिति तदर्थ। (चित्र०) यत्र लिङ्गवचनभेदेऽपि सामान्याभिधायि पदं स्वरूपभेदं नापद्यते, स तत्र न दोषः, उभयानुगतिक्षमत्वात्। यथा-'भीमकान्तर्नृपगुणः'।

दधते स्म परां शोभां तदीया विभ्रमा इव ॥ (भारती) जहाँ लिंग वचन भेद में भी सामान्याभिधायी पद का रूप भेदों की आपत्ति है, वहाँ उन दोनों की अदोषता है। क्योंकि यहाँ उपमेय और उपमान दोनों अनुगत समर्थ हैं। जैसे-भयानक

Page 189

उपमानिरूपणप्रकरणम् १४६

और मनोरम राजगुणों के कारण आश्रितों को वह राजा दिलीप, जलजतु और रतों के कारण समुद्र के समान दूर रहने योग्य और सेवा करने योग्य हुए। यह। नृप गुणों के और रतों के अर्थात् उपभेय और उपमान के पुल्लिंग एव नपुसक लिंगजन्य लिंगमेद रूप दोप नहीं है। अन्य ललनाओं से भिन्न उसके मधुर वेप उसी के विभ्रम की तरह अत्यन्त गोभाधायक है। यहाँ ऊपर ओभाधारण रूप साधारण धर्म, वाचक पद का रूपभेद के अभाव 'चेप' औौर 'विभ्रम' में एक वचन और बहुवचन रूप वचनभेद का दोप नहीं है। (सुधा) अथ लिङ्गभेदवचनभेद्योरदोषतामाह-यत्रेति। यत्र तयोर्भेदेऽपि सामान्याभिषनायि- पदस्य रूपभेदानापत्तिस्तत्र तयोरदोपरवम, उपसेयोपमानानुगती समथरवाद्। तन्न लिङ्ग- भेदस्यादोपत्वमुदाहरति यथा-भीमकान्तैरिति। अन्नाधटृप्यत्वाभिगम्यरवरुपसाधारण धर्मस्य रूपान्तरप्राप्तेरभावात्, नृपगुणानां यादोरत्नानां चोपमेयोपमानानां पुंछिक्रनपुंसक- रूपलिव्नभेदो न दोष हतयर्थः। वचनभेदस्थादोषतामुदाहरति-तद्वेष इति। /अन्याभिः स्रीभिरसदृशः तद्वेष: तस्याः वेषः मधुरतामृतः तदीया विभ्रमा इच परां शोभां दघते र्म, हश्यन्वयः । अपरशोभाधारणरपसाधारणधर्मवाचकस्य पदस्य रूपभेदाभावेन वेषिवित्र- मयो रेकवधनबहुवचनरूपवचनभेदस्य न दोष:। (चिन्र०)

प्रयोगेषु दृश्यते। सामान्याभिधायिपदस्य स्वरूपभेदापत्तावपि लिङ्गवचनभेदो महाकवि-

द्वेष्योऽपि संमत: शिष्टस्तस्यार्तस्य यथौषधम्। त्याज्यो दुष्टः प्रियोऽप्यासीद्ङ्गुलीवोरगक्षता ।। प्रवृद्धो हीयते चन्द्रः समुद्रोऽपि तथाविधः। स तु तत्समवृद्धिश्च न चाभूत्ताविच क्षयी॥ इत्यादौ। (भारती) कहीं साधारण धर्मवाचक पद का स्वरूप भेद आपत्ति में भी महाकवि के प्रयोगों में लिंग, वचन भेद दिखाई देते हैं। जैसे- जिस प्रकार रोगी को कडवी किन्तु हितकर औपधि भी प्यारी होती है, उसी प्रकार उस राजा दिलीप का द्वेष करने योग्य 'वरी' होता हुआ भी सज्जन प्यारा होता था और प्रिय होते हुए मी दुर्जन साप से काटी हुई अँगुली की भाँति त्याज्य होता था। बढे हुए चन्द्रमा और समुद्र भी समय पर क्षीण होते है। किन्तु उन चन्द्रमा एव समुद्र के समान सतत वढनेवाले वे 'अतिधि' नामक राजा हुए जो उक्त दोनों की तरह वर्षिष्णु तो थे, किन्तु क्षयी नहीं थे अर्थात् सर्वदा वे समृद्धिशाली ही वने रहे। इन दोनों उदाहरणों में महाकवि प्रयोग के कारण वचन भेद टोप नहीं है। (सुधा) क्चित् साधारणधर्मवाघकपदस्य स्वरूपभेदापत्तावपि महाकविप्रयोगेपु लिंगवधन-

Page 190

१५० चित्रमीमांसा

भेदसत्वमिश्याह-सामान्याभिघायीति। उदाहरति-द्वेप्योऽपीति । शिष्टो जनो द्वेप्प: शत्रुरपि आातस्य रोगिण औषघमिव तस्य संमतोऽनुमत आसीत। दृष्टो जनः प्रियोऽपि प्रेमास्पदीभृतोऽपि उरगेण दता सपेचताहुलिरिय श्यान्य आसीस। अत्र त्याज्यादे: स्वरूप- भेदापत्तावपि तदुपादानाललिद् भेदो न दोषः। वचनभेदमुदाहरति-प्रवृत-इति। प्रवृद्ध- शन्द्रो हीपते, समुद्रोऽपि तथाविधश्चन्द्ववदेव हीयते। स राजा ताभ्यां चन्द्रसमुद्राम्यां समा वृद्धियंस्य तत्समवृद्धिश्चाभूत्। तो चन्द्रसमुद्राषिव क्यी नाभूत्। (चित्र०) कालादिभेदेन तु भूयांस्युदाहरणानि। 'एतादृशीपु लोकसिद्धत्वाल्निङ्गादि- भेदो न दोषः' इति वामनः । एवं गुणदोपव्यवस्थायां सहदयानां हृदयमेव प्रमाणम्। उक्तं हि दण्डिना- न लिङ्गवचने भिन्ने न द्ीनाधिकते अपि। उपमादूषणायालं यत्रोद्वेगो न धीमताम्। स्त्रीव गच्छति षण्ढोऽयंवक्त्येपा स्त्री पुमानिव। प्राणा इव प्रियोऽयं मे विद्या धनमिवार्जिता॥ भवानिव महीपाल देवराजो विराजते। अलमंशुमतः कक्षामारोढुं तेजसा नृपः ॥ इत्येवमादि सौभाग्यं न जहात्येव जातुचित्। अस्ति च क्चिदुद्वेगः प्रयोगे वाग्विदां यथा॥। हंसीव धवलश्चन्द्रः सरासीवामल नभः। भर्तृभक्तो भटः श्वेव खद्योतो भाति भानुवत् ॥ ईदशं वर्ज्यंते सद्भि: कारणं तत्र चिन्त्यताम्। इति। कविसमयप्रसिद्धौ सत्यामसादृश्यं न दोषः । यथा-'चन्द्रधवला कीर्तिः' इत्यादौ। (भारती) काल आदि भेदों के तो अनेकों उदाहरण हैं। 'ऐसी उपमाओं में लोकसिद्धि के कारण लिद्गादि भेद दोष नहीं माने जाते हैं'-ऐसी मान्यता वामन की है। ऐसी गुण दोष की व्यवस्था में सह्दयों के हृदय ही प्रमाण हैं। उक्त कथन की प्रामाणिकता में दण्डी के द्वारा प्रतिपादित वचन देते हैं। जैसे- मिन्न लिङ्ग वचन में तथा-न्यूनता और अधिकता में भी जहा बुद्धिमान लोगों को उद्देग नहीं होता-उपमा के लिए दोष नहीं माना जाता है। इसका उदाहरण देते हैं-नारी की तरह यह षण्ढ (कीव) चलता है और यह स्त्री पुरुष की तरह चलती है। धन की तरह अजित यह मेरी विद्या प्राणों की तरह प्रिय है। आपकी तरह यह पृथ्वीपति देवराज की तरह विराज रहे हैं। यह राजा अपने तेज से सूर्यमडल पर भी आरोहण में समर्थ है। इस प्रकार ये सौभाग्य कही नही छोडते हैं। (जहाँ उद्वेग है-उसका उदाहरण प्रस्तुत करते हैं) वाग्विद् के प्रयोगों में कहीं-कहीं उद्देग भी है। जैसे-इसी की तरह, शुभ्र चन्द्र है और सरसी की भॉति निर्मल आकाश है। स्वामिभक्त

Page 191

उपमानिरूपणप्रकरणम् १४१

वीर कुत्ते की तरह हैं और सूर्य की तरह जुगन शोभते हैं। सन्नन लोग ऐसे प्रयोगों को वजित समझते हैं, इसका कारण विचारणीय है। कविसमय प्रसिद्धि में असादृद्य रहने पर भी दोष नहीं है। जैसे 'चन्द्रधवलाकीतिः' इत्यादि में। यहाँ कीति में धवलत्व की प्रसिद्धि के अभाव में तथा असादृव्य में भी कविसकेत प्रसिद्धि के कारण दोप नहीं है।

(सुधा) अम्र वनभेदो न दोषो महाकविप्रयोगात। उपसंहरति-कालादि भेदेनेति। बहुन्यु- दाहरणानि ज्ञातव्यानीति शेषः। अम्र वामनोकि प्रमाणयति-पतादृशीप्विति। उपमासु इश्यर्थः। उभयोः कथनयोः विनिगसकाभावमाशक्य परिहरति-एवमिति। सहृदया- नामिति। काथ्यवासनापरिपक्वुद्धीनामित्यर्थः। एतदेवार्थ दण्डयुक्त्तया प्रमाणयति- नेश्यादि। मिस्ने लिद्धवचने उपमादूषणायालं न, हीनाघिकते अपि तथा, तदर्थमलं नेश्यर्थः। कुन्नेत्याह-यत्र बुद्धिमतामुद्देगो नेत्यर्थः। तदुदाहरति-स्त्रीचेति। यश्रोद्वेगः, तदु- दाहरति-भस्ति चेति। अत्र कारणं सहृदयहृद्यमेव चिन्त्यतां विचार्यतामित्यर्थः। रचिसंकेतप्रसिद्धावसादृश्यस्य दोषतवं नास्तीत्याह-कविसमयेति। उदाहरति- यथेति। कीतौ धवलत्वस्य प्रसिद्धुर्वाभावेऽपि असादृश्येऽपि कविसंकेतप्रसिद्धे: सध्यास दोप:। (चिन्र०) उपसेयगतासंभावितत्वविवक्षायासुपमानस्यासंभवो न दोपाय। यथा- 'चन्द्रविम्बादिव विषम्' इत्यादौ। श्लिष्टसाधारणधर्मायामन्यत्रापि सहृद्य- हृदयाह्वादिन्यां कल्पितोपमानायामुपमायामप्रसिद्धत्वं न दोपः । यथा- कविमतिरिव बहुलोहा सुघटितचक्ा प्रभातवेलेव। हरमूर्तिरिव हसन्ती भाति विधूमानलोपेता।। 'सदो मुण्डितमत्तहूणचिवुकप्रस्पद्धि नारङ्गकम्'॥ इत्यादौ। एवमन्येऽवि दोपापवादप्रकारा विद्वद्धिश्चिन्तनीयाः। इति चित्रमीमांसायामुपमाप्रकरणम्।

(भारती) उपमेयगत असभावितत्व की विवक्षा में उपमान का अनभव दोप नहीं होता है। जैसे- 'चन्द्रविम्ध की तरह जहर' इत्यादि में। इसी प्रकार रिष् साधारण धर्म में दूसरी जगह भी सह्दय हृदय के लिए आलादक कविकल्पित उपमान और उपमा में अप्रसिद्धि दोप नहीं होता है। जैसे- बहुत वितकों से युक्त कवि की मति वी भाति सन्गिति्न च्क्रवाक, ग्ात वालीन समय की तरए धूमरहित अग्निरूप लोचन से युक्त भगवान शिव की मूर्तति की तरए आयातप्रचुरा

Page 192

१५२ चित्रमीमांसा

चक्राकारा रचना शोभती है। यहाँ अप्रसिद्ध रहने पर भी दोष नहीं है। पूर्व व्याख्यात दूसरा उदाहरण प्रस्तुत कर कहते हैं-ऐसे मत्तहूण के चिदुकरूपी उपमान का कविकल्पित होने के कारण अप्रसिद्ध रहने के कारण दोप नही है। उपमा के दोपों का उपसहार करते हुए दीक्षित जी लिखते हैं-इस प्रकार अन्य दोपों के अपवाद भी विद्वन्जन स्वय विचारें। इति चित्रमीमासाया 'भारती' हिन्दीव्याख्यायामुपमालद्कारप्रकरण समाप्तम्।

(सुधा) उपमेये भसम्भवत्वविवस्यायामुपमानासम्भवस्थापि कविसंकेतप्रसिद्धासम्भवस्यापि न ोषरमित्याह-उपमेयगतेति। तदुदाहरति-चन्द्रविम्वादिति। करिष्टसाधारणधर्मोप- मायां सहदयहृदयाह्लादिन्यां कविकव्पितोपमानोपमायां चाप्रसिद्धेन दोषत्वमित्याह- श्रिष्टेति। तन्नाद्यामुदाइरति-कविमतिरिति। बहुलवितकयुता कविमतिरिव मिलितचक्र- वाका प्रभातवेलेव धुमरहितामिरूपलोचनोपेता शिवमूर्तिरिव बहुलोहमयी आयसप्रचुरा रचित चक्राकारा धूमरहिताग्नयुपेता हसन्ती भाति शोभते इत्यन्वयः। अभ्नाप्रसिद्धेनं दोषत्वमित्यथंः। द्वितीयमुदाहरति-सद् इति। अम्न तादृशमत्तहूणचितु कस्योपमानस्य कविकल्पस- रवेनाप्रसिद्धेनं दोषत्वमित्यर्थः । उपमादोपापवादानुपसहरति-एवमन्येऽपीति। तथा हि- कौकिक्यां समासाभिधानारयां उपमाप्नपञ्जे च लिद् वचनभेदयोरदुष्टत्वमिति वामनाचार्यः। लौकिक्यां समासगन्यायां घोपमायासुपमाप्रपञ्जे प्रतिवस्तूपमादौ चेत्यर्थः । लौकिक्यां लिन्नभेदो यथा-'छायेव पुरुषस्तस्याः पुरुष इव स्त्री' इति। अन्र छायापदे पुंस्त्वस्य पुरुषपदे च स्त्रीत्वस्य बाधितत्वेऽपि लोकिकत्वाक्ष दोषः। तन्रैव वचनभेदो यथा-'पश्यामि कोधने तस्या: पुष्प पुष्पलिहो यथ।' इहोपमानोपमेययोर्भिन्रवघनत्वम्। समासाभि- हितायां यथा- अनुभवन्नवदोलमृतूर्लवं पटुरपि प्रियकण्ठजिघृप्षया। अनयदासनरज्जुपरिग्रहे भुजलर्ता जटतामबलाजनः । 'भुजलता' इत्यत्र लिङ्गभेदस्य न दोषः। तन्रैव वचनभेदो यथा-

चिम्लानो न विमर्दनेऽमृतरसपस्यन्दमाध्वीकभूः। ई शस्येष निवेशित: पदयुगे मृह्गायमाणं भ्रम. च्चेतो मे रमयत्वदिध्नमनधो न्यायप्रसूनाअ्जलिः॥ अम्र न्याय इव प्रसूनाक्षलिरञ्जलिस्थानि प्रसूनानीत्युपायति प्रकाशकारोक्केवंचनभेद:। एवं साधारणघर्मसमासेडपि लिङ्गभेदो न दोष: । यथा- मुकं सुकतागोरमिह क्षौर मिवाश्रैर्वापीष्वन्तर्लीनमहा नीलशिलासु। शस्त्रीश्यामैरंशुभिराशु दुतमम्भश्छायामच्छ्ामृच्छति नीळां सलिलस्य।। इत्यत्र साधारणधर्मसमासे मिथ्नाद्गतवं न दोषः। उपमाप्रपज्जो यथा- शुद्धान्तदुर्लभमिदं वपुरश्मवासिनो यदि जनस्य । दूरीकृता खल गुणैरुधानलता वनलताभि:

Page 193

उपमानिरूपणप्रकरणम् १५३

अम्नाश्रमवासिजनवनलतयोर्लिंद्गभेदो निन्दायामेव तात्पय्यें उपमानस्य जातिहीनता न दोप:। यथा- चाण्टालश्च दरिद्श्व समाविति मतिर्मम। चाण्डालस्य न गृहन्ति दरिद्रो न प्रयच्छति॥ एचमुपमानपदे तदूर्मविशिष्टोपमानवोधकतया तनूर्मप्रतिपादने उपमेये धर्मस्थाधिनयं न दोप:। अभिहन्ति हन्त कथमेप माधवं सुकुमारकायमनवग्रह्द: स्मरः। अचिरेण वैकृतविवर्तदारुणः कलभ कठोर इव कूटपाकलः॥ अत्र कलभपदेनेव सुकुमारकायताप्रतीत्या तदंशे न तछपेक्षा। पवं न्यूनपरिमाणता- प्रस्यायनतारपये उपमानस्य परिमाणहीनत्वं न दोष: । यथा-'दिव्यहरेमुखकुहरे चिस्तीर्णे पर्णति व्योम' अश्र पर्णस्थोपमानस्य गगनापेक्षया हीनपरिमाणतवेऽपि नृसिंहमुखपरिणाह- वर्णन एव तात्पर्याव तस्य न दोपशवमित्याद्यह्यम्। एतदन्तःकृत्याह-अन्येऽपीति। प्रकारभेदा विधारणीया इस्यलम्। धरानन्द विरचितोपमाव्यासयानसंग्र हे। टोकायां चिश्रमीमांसासुधायामाप पूर्णताम्॥ इति भरतपुर निवासिनो व सिष्ठगोत्रीयमिश्ररामवलस्य सुतेन धरानन्देन रचितायां चित्रमीमांसाटीकार्या सुधाख्यायामुपमालङ्कारप्रकरणं समाप्रमू।

Page 194

अथोपमेयोपमानिरूपणम्

उपमानोपमेयत्वं द्वयोः पर्यायतो यदि। उपमेयोपमा सा स्याद् द्विविधैषा प्रकीर्तिता॥ (भारती) यदि दोनों पदार्थ क्रमशः पर्याय से उपमान और उपमेय हों, तो वह उपमेयोपमा होती है और इसके दो भेद हैं। चिम्श-मुख्यतः इस अलकार में उपमेय से उपमान की और उपमान से उपमेय की समता दिखाई जाती है। उपमेय तथा उपमान को परस्पर उपमान तथा उपमेय इसलिए कहते हैं कि उसके लिए कवि को तीसरे पदार्थ की आवश्यकता नहीं पडती। इस अलद्वार में कवि की मानसिक स्थिति ऐसी हो जाती है कि वह उपमेय एव उपमान के अतिरिक्त अन्य को अपने भाव का आधार नहीं बना पाता। उसे उपमेय एव उपमान में इस प्रकार की समता दिखाई पडती है कि उपमेय को देखकर उसकी मानसिक तृप्ति उपमान से हो जाती है एव उपमान की मददत्ता का अनुभव होने पर, अन्य उपमान के अभाव में पुनः उपमेय पर ही अपने विचार को केन्द्रस्थ कर-उपमान का उपमान, उपमेय को ही बना देता है। इस अलद्वार का प्रमुख उद्देश्य उपमानान्तर तिरस्कार है। यहाँ उपमानान्तर से तात्पर्य है-उपमेय भिन्न अन्य उपमान अर्थात् इसका जो 'तिरस्कार' रहा करता है वह 'उपमा' से जहाँ दो भिन्न वस्तुओं में उपमानोपमेय माव विवक्षित है, वहाँ एक विलक्षण ही चमत्कार है। यही कारण है कि विभिन्न आलक्कारिकों ने उपमा से 'उपमेयोपमा' को एक पृथक् वाच्य और सौन्दर्य माना है तथा उसे एक अतिरिक्त अलक्कार के रूप में स्वीकृत किया है।

(सुधा) एवमुपमालक्वारं व्याकृत्य तर्वेन संग्राध्ामुपमेयोपमामनन्वयात् पूर्वं व्याकर्तुमुप्र मते-अथेति। अनन्वये उपमित्यनिष्पन्तेरुपमात्वेन संग्राह्मतवाभावास्। अत एव द्वितीय- सदशव्यवच्छेदफलमनन्वयमतिक्रम्य तृतीयसदशव्यवच्छेदफलिकाया पतस्या पूर्वमेधोप पादनम्। अत एव 'अस्या भेद उपमेयोपमा निरूप्यते' दति रसगम्गाधरेऽपि एततप्रारम्भे प्रतिपादितिम्। निरूपणमिति। निरूपणद्ञ परम्भजनकशब्दप्रयोगः। तम्र प्राधीनोक्त्मुप- मेयोपमालक्षणं सव्याख्यानं खण्डयितुमुपन्यस्थति-उपमानोपमेयत्वमिति। यदि इयोः पर्यायत उपमानोपमेयरवं चर्ण्यंते, सा उपमेयोपमा। एषा साधारण्यवस्तुप्रतिवस्तुभावा भ्यां द्विविधा प्रकीर्तिता इति लक्षणप्रतिपादककारिकान्वयः।

यदि द्वयोर्थंद् वर्ण्यते, सोपमेयोपमेत्युच्यते तदा तुल्ययोगिताया- (चित्र०)

मतिव्याप्तिः। तत्र-

Page 195

उपमे योपमानिरूपण प्रकरणम् १४५

जनस्य तस्मिन् समये त्रिगाढे वभृवतुर्द्वो सविशेपकान्तौ। तापापनोदक्षमपादसेवौ स चोदयस्थो नृपतिः शशी च ॥ इति द्वयोर्नृपशशिनोर्युगपदेक्तधर्मान्वयवर्णनात्। अतः पर्यायेणेत्युक्तम्। (भारती) यदि दोनों जो वर्णन है-वही उपमेयोपमा है-यह कहा जाय तो 'तुल्ययोगिता अलकार' में अतिव्याप्ति होती है। यहाँ जैसे- ताप चन्द्र पक्ष में-गमी तथा कुछ पक्ष में-सताप के अत्यन्त तीन्र होने पर लोगों के लिए (पूर्वकथित अर्थ में) तापों को दूर करने में समर्थ पादों-चन्द्र पक्षमें किरणों तथा कुद् पक्ष में चरणों की सेवा वाले उदय प्राप्त राजा कुश और चन्द्रमा-ये दोनों ही अत्यन्त ही प्रिय हुए। इस उदाहरण में दोनों-अर्थात् राजा रवु और चन्द्रमा में एक साथ एक धर्म में अन्वय वर्णन होने के कारण तुल्ययोगिना में उक्त लक्षण से अतिव्याप्ति दोप होता है। अत इस दोप को हटाने के लिए लक्षण में 'पर्यायेण' विशेपण का समावेश किया गया है। (सुधा) अन्र पदानां सार्थका्वं कथयितुमुपक्रमते-यदीति। द्वयोरचंद्वर्णनं सोपमेयोपमा इत्ये- तावन्मान्नोक्तौ तुल्ययोगितायामतिध्याप्तिः । अतिष्याप्तेः स्थलं दर्शयति-जनस्येति । तस्मिन् समये ग्रीष्मे विगाढे कठिने सति जनस्य हो सविशेषं यथा तथा कान्ती वभूवतुः। कौ दौ? तापापनोदे केशस्फोटने क्षमा योग्या पादयोरड्घयोः पादानां रश्मीनाज सेवा ययोस्ती उदयस्थो नृपतिः कुशः, शशी चन्द्रश्चेत्यन्वयः। अम्र नृपशशिनो: युगपदेकस्मिन् मनोहरतवरूपधर्मान्वयदर्शनाद इयोरपि वर्ण्यत्वेन वर्तमानयोधमेक्यरूपतप्नक्षणस्य सर्वे- नातिव्याप्ते: स्फुटत्वात। तद्वयावर्तकविशेपणमाह-अतः पर्यायेणेति। तथा च पर्यायेण

(चिन्न०) तथापि- तस्य द्विपानां मदवारिसेकात् खुराभिघाताच्च तुरङ्गमाणाम्। रेणुः प्रपेदे पथि पङ्कभावं पट्कोऽपि रेणुत्वमियाय भूयः ॥ इत्यत्रातिव्याप्तिः तन्र रेणुपङ्कयोः पर्यायेण पद्ढरेणुभाववर्णनात अत उपमानोपमेयत्वमित्युक्तम्। द्वयोर्यदुपमानोपमेयत्व वर्ण्यते, सोपमेयोपमे त्युक्तेऽपि- 'नयुष्टं प्रयाणं च वियोगवेदनाविदूननारीकमभूत्सम तदा'

सादश्याश्रयत्वरूपस्योपमेयत्वस्यैव प्रतिपाठनमरित, न साहश्यप्रतियोगि- त्वरूपस्योपमानत्वस्य, अतो नातिव्याप्तिरिति वाच्यम्? सुखतः प्रतिपादना भावेऽपि तयोः पररपरसुपमानत्वस्थार्थान प्रतीतः। न हुपमानोपमेयत्व यत्र वाच्यमिति लक्षणे विवक्षितम, व्यङ्गयोपमे योपमासग्रहाभावप्रसङ्गात्। अतः

Page 196

१५६ चित्रमीमांसा

पर्यायेणेत्युक्तम्। एवमपि-'भणितिरिव मतिमतिविर चेष्टा' इत्यादिरसनोप- मायां मतिचेष्टयोः पर्यायभेदेनोपमानत्वस्योपमेयत्वस्य च सत्वेनातिव्याप्िपरि हारयिकस्मिन् पर्याये यं प्रत्यूपमानत्वं तं प्रत्येव पर्यायान्तरे उपमेयत्वं विवक्षणीयम्। (भारती) लक्षण में 'पर्यायेण' विशेषण के समावेश से यदपि पूर्व उदाहरण में तो अतिव्याप्ति दोष मिट जाता है-फिर भी यहाँ- नायक कुश के हाथियों के मदजल के सिज्नन से और घोडों के खुरों के आघात से रास्ते में क्रमग धूलि, कीचड हो गयी और कीचड, धूलि वन गया। अतिव्याप्ति हो ही जाती है। क्योंकि यहॉ धूलि ओर कीचड में पर्याय से पङ्क और रेणु भाव का वर्णन है। इसीलिए लक्षण में 'उपमानोपमेयत्व' पद का समावेग है। अत. जहाँ ोनों अर्थात् उपमानत्व और उपमेयत्व का वर्णन है, वहीं उपमेयोपमालक्कार है-यदि ऐसा कहें, तो भी अर्थात ऐसा लक्षणार्थ कहने पर भी- शुक्ले: सतारैमुंकुलीकृत: स्थलैः कुमुद्धतीनां कुमुदाकरैरिव। वयुष्टं प्रयाणं च वियोगवेदनाविदूननारीकमभूद समं तदा। उस समय भगवान श्री कृष्ण के प्रयाण का अवसर एव प्रभात का आगमन-ये ढोनों ही एक दूसरे के समान हो गये। प्रभात के समय जलाशय के कुमुद श्वेत वर्ण के थे, कर्णिका से युक्त थे, मुकुलित हो गये थे, तथा रमणियों की विरह्वेदना से युक्त थे। इसी प्रकार श्री कृष्ण के प्रयाण के समय श्वेनवर्ण तम्वुओं से युक्त थे, जिनमें डोरिया लगी थीं और जो समेटे जाने के कारण विलासिनी रमणियों की विरह वेदना के सताप से युक्त ये। इस प्रकार ये दोनों ही स्थिति, उस कुमुदिनी भरे स्थल के लिए बरावर ही दु खदायी सिद्ध हुई। इस उभय विश्रान्त सादृश्य उपमा में अतिव्याप्ति निवारण के लिए ही लक्षण में उक्त विशेषण का समावेश किया गया। इस पर पुन दीक्षित जी 'नच' से शका करते हैं-यहाँ 'प्रभात' और 'प्रयाण' दोनों में सादृश्याधिकरणत्व रूप उपमेय मात्र का प्रतिपादन है-उसके प्रतियोगिता रूप उपमान का प्रतिपादन तो है ही नहीं, फिर यहाँ अतिव्याप्ति दोष कैसा ? इसका समाधान करते हुए कहते हैं कि 'इव' आदिशब्ठों से, उसके प्रतिपादन में भी 'प्रभात' और 'प्रयाण' उन दोनों के परस्पर, उपमानत्व के अर्थ में प्रतीति है। यदि आप शब्दवाच्यता के रहने से तत्त्व नियम मानते हैं, तो लक्षण में उन दोनों की शब्दवाच्यता के प्रवेश का अभाव है और उसकी विवक्षा में व्यङ्ष्य उपमा में अव्याप्ति दोष हो जाता है। अत उक्त अतिव्याप्ति के निवारण के लिए 'पर्यायेण' विशेषण का लक्षण में समावेश अति आवश्यक है। पुन शका करने है-ऐसा करने पर भी- -

विमल है। इस राजा की बुद्धि, इसकी वाणी जैसी, चेष्टा इसकी बुद्धि जैसी और कीति इसकी चेष्टा जेसी

'रसनोपमा' के इस उदाहरण में 'मति' और 'चेष्टा' का पर्यायभेद से उपमानत्व और उपमे- यत्व के रहने से अतिव्याप्ति दोष निवारण के लिए-एक ही पर्याय में-जिसके प्रति उपमानत्व है, उसके ही प्रति, पर्यायान्तर में उपमेयत्व की विवक्षा है।

Page 197

उपमेयोपमानिरूपणप्रकरणम् १५७

(सुधा) उपमानोपमेयरवमित्यस्य सार्थकतामाह-तथापीति। हयोः पर्यायेण यहूर्णनं सोपमे- योपमेत्युक्तेऽपीश्यर्थः। तस्य द्विपानां मदजलस्य सेकात् तुरद्रमाणां खुराभिघाताघ पथि रेणुः पक्कभावं प्रपेदे। पद्धोऽपि भूयो रेणुत्वमियाच, इ्श्यन्न रेणुपर्योः पर्यायेण पक्रेणु- भाववर्णनादतिव्यापिः। अत उपमानोपमेयत्वमिति। तथा प वेणुपस्ठ्योः पर्यायेण तन्ाव.

पमेति लक्षणे सति जनस्येत्यादी तुत्ययोगितायां द्वयोरेद व्ण्यतेनोपमानोपमेयरवायति व्याप्तिनिशासे पर्यायपद्ष्यर्थत्वाशक्काया तत्पयोजनसवतारयति-इयोरिग्याध्येि शुद्धः सतारे: मुकुलीकृतैः स्थुलैः कुमुद्वतीनां कुमुदाकारैरिव व्युष्ट प्रयाणं चेत्यादि। कुमुद्दतीनां सेनानां नकषीना वा शुक्ले: धवले: सतारेः सचन्द्रकः मुकुलीकृतं संवेष्टितैः मुकुलितैश्र कृसुदाकारेरिव स्थुलें: वस्गृहै. 'दूष्यं वस्त्रगृह स्थुलम्' इत्यतिकोशास्। उपलक्षितं व्युष्टं प्रभातं प्रयाणक्व वियोगवेदनया व्यथया विदूना दुःखिता नार्यो यग्र नसू तदा सम तुष्य- मभूत्। इत्युभयविश्रान्तसाहश्यायामुपमायामतिव्याप्तिवारणाथ पर्यायेणेति पदोपादानम्। अम्र शक्कते-न चेति। प्रभातप्रयाणगोरपि सादृश्याधिकरणत्वरूपोपमेयमा्रस्य प्रतिपाद नम्, तम्प्रतियोग्युपमानस्य प्रतिपादनं नास्तीति कुतोऽतिव्याप्तिरित्याशङ्कार्थ.।समा- धत्ते-मुखत इति। शव्दत इति। इवादिशव्देन तदप्रतिपादनेऽपि तयोव्युष्टप्रयाणयोः परस्परसुपमानत्वस्यार्थात् प्रतीतेः। न च शब्दवाध्यतायाः सरवेन तत्वनियम, रक्षणे तयो: शव्दवाच्यत्वस्य प्रवेशाभावात्। तद्विवक्षार्या व्यङ्गयोपमायामव्याप्ेश्रेति। तस्माद- तिथ्याप्तेर्वारिणाय पर्यायेणेति पदमावश्यकमिति भावः। शक्ते-एवमपीति। दयोः पर्या- येणोपमानोपमेय तावर्णनमुपमेयोपमेति लक्षणे कृतेऽपि "अनवरतकनकवितरणष्टतजललच- करतरदिताथिंततेः । भणितिरिव मतिर्मतिरिव चेष्टा चेष्टेव कीतिरतिविमला ॥"इति रश- नोपमार्यां पूर्वम्रोपमेयस्योप्तरत्रोपमानत्वकवपनरूपाया मतिचेष्टयो: पर्यायेणोपमानरवोप मेयत्वयो. सत्वादतिव्याप्तिः। यसुपमेयतावच्छेद कावच्छिन्न प्रति यस्योपमानत्व तं प्रश्ये- वोपमेयत्वचिवसायां दोषाभावात्, मतित्वावचिछनं प्रति भणितेरुपमानर्वम्,तां प्रत्येव भणितेरुपमेयरवाभा वादिश्याशयः । (चित्र०)

द्विविधैपेत्युक्तम्। द्वैविष्य धर्मस्य साधारण्यवस्तुप्रतिवरतुभावाभ्याम्। सुगन्धि नयनानन्दि मदिरामदपाटलम्। अम्भोजमिव ते वक्त्रं त्वद्वक्त्रमिव पङ्कजम्। सच्छायाम्भोजवदनाः सच्छायवदनाम्बुजाः । वाप्योऽङ्वना इवाभान्ति यत्र वाप्य इवाङनाः ॥ इति कमेणोदाहरणे। (भारती) यह उपमेयोपमा धर्म के साधारण्य एव वस्तुप्रतिवस्तु भाव रहने के कारण दो प्रकार की है। इसका क्रमश उदाहरण है-

Page 198

१५८ चित्रमीमांसा.

(१) सुगन्ध युक्त, नेत्रानन्दजनक, और मदिरा के मद से आरक्त तुम्हारा मुख कमल की तरह है और कमल तुम्हारे मुख की तरह है। यहाँ सुगन्ध आदि धर्मो का मुखादि वृत्तित्व में सम्वन्ध ऐक्य से अनुगामित्व रूप साधारण्य है। (२) शोभायुक्त कमल ही है मुख जिनके वही अङ्गना की तरह गोभती हैं अथवा शोभायुक्त कमल की तरह मुख हैं जिनके वे अद्गनायें शोभती है। यहाँ सुख और कमल में विम्बप्रतिविम्व भाव है। इन दोनों के 'सच्छायत्व' रूप वर्म एक ही है। अत. यहाँ विम्बप्रतिबिम्व भाव का वस्तु प्रतिवस्तुभावरूप विशेषण है। (सुधा) एनां विभजते-द्विविधेवेति। दैविध्ये हेतुमाह-धर्मस्येति। भेदयोरुदाहरणमाह- सुगन्धीति। सुगन्धयुतं नेम्राननदजनकं मदिरामद्दात्ता म्रं तं कमलमि, कमलं स्वद्- यश्रमिव । सुगन्धादेः धर्मस्य मुसादिवृत्षित्वे सम्बन्धक्यादनुगामित्वात्मकं धर्मसाधा- रण्यम्। द्वितीयमुदाहरति-सच्छायेति। सच्छायानि शोभायुतानि अम्भोजानि कमलानि तान्येय वदनानि यासां ता वाप्योऽङ्गना इवाभान्ति। सच्छायान्यम्भोजानीव वदनानि यासां ता वाप्य इव यत्राद्गना आभान्तीत्यन्वयः। अन्न वदनाम्भोजयोः विम्बप्रतिबिम्ब भावः। तयोश्च सच्छायत्वरूपो धर्म एक पवोपात्तोऽतः विम्वप्नतिबिम्वभावस्य वस्तुप्ति वस्तुभावो विशेषणमिति तद्विवेक:। (चित्र०) अत्रेद विचार्यते-लक्षणस्य 'त्वद्वल्गुना युगपदुन्मिषितेन तावत्' इति प्रागुदाहृतायां युगपदुपमेयोपमायामव्याप्तिः। न चेयमुपसेयोपमा न भवति, किन्तूभयविश्रान्तोपमामान्नमिति शङ्कनीयम्। परस्परतुलासित्यनेन द्वयोरपि- प्रतियोगित्वस्यापि प्रतिपाद्यमानतया उपमेयोपमेत्यवयवार्थस्याविशिष्टत्वात्। अर्थादपि सिद्धयतः परस्परप्रतियोगित्वस्य मुखतः प्रतिपादनेन तृतीय सदशव्यवच्छेदरूपफललाभाच। (भारती) यहाँ अब विचार करते हैं कि दोनों के पर्याय से उपमानोपमेयत्व वर्णन रूप लक्षण का पूर्व उदाहृत इस श्लोक में अव्याप्ति दोष होगा। जैसे- बन्दीजन प्रात काल राजकुमार रघु को जगाते हुए कहते हैं- हे राजकुमार! सौन्दर्यपूर्ण विकासयुक्त इस प्रभातवेला में ये दो वस्तुएँ परस्पर की तुलना प्राप्त करें-एकतो जिनके अन्दर कोमल पुतलिया चचल हो उठी हैं, वे आप की आँखें, और दूसरे भौरे जिनके भीतर चचल हो उठे हैं वे कमल। कालिदास के इस पद्य में प्रतिपादित उपमेयोपमा में जिसमें एक साथ उपमान की उपमेयता और उपमेय की उपमानता आ जाती है, वहाँ अव्याप्ति होगी। क्योंकि इस उपमेयोपमा में वाक्य- मेद नहीं है अर्थात् उपमान की उपमेयता और उपमेय की उपमानता-भिन्न भिन्न दो वाक्यों से नहीं वर्णित की गयी है-और पूर्व कथित लक्षण के अनुसार वैसा अवश्य होना चाहिए। यदि आप इसका निराकरण यह कह कर करना चाहें कि तथाकथित 'उपमेयोपमा' में ऊपर -से शब्दों के परस्पर एक होने पर भी अन्त में वाक्यभेद हो जाता है। अर्थात् 'परस्पर की तुलना को

Page 199

उपमे योपमानिरूपणप्र करणम्

प्राप्त करें' इस एक वाक्य में अन्तत विचार करने पर, 'आप की ऑँसें कमल की समानना को पाप्त करे और कमल आप की आँसों की समानना को'-इस तरह ये दो भिन्न भिन्न वाल्य दन जाने ह और इसके फलस्वरूप यहॉँ कोई दोप रह नहीं जाता है। (सुधा) एवं व्याख्यानं प्राचीनोंकं लक्षणमुपन्यस्य खण्डयितुसुपक्रमते-अत्रेति। प्राधीन- लक्षण इत्यर्थ:। इदं वदयमाणम्। लक्षणस्येति। इयो: पर्यायेणोपमानोपमेयत्ववर्णनरूप

मेयेति शंकनीयम्। तथा चोपमेयोपमाभावाल्ताव्यापिः। अश्रोध्यते-परस्परतुळामित्यनेन परस्परस्य सादृश्य प्रतियोगिशवेनोपमे योपमेत्यवयवार्थे विशेषाभावात्। न हि पृथक शव्यू- घाध्यपरस्परप्रतियोगिकस्यैव तृतीयसदशव्यवच्छेदः फरमिति नियमामावमाह-अर्थाद पीति। सिध्यतः इयोः प्रतियोगित्वस्य प्रधानतया प्रतिपादनेन तृतीयसदशनिपेघस्य फलस्य सत्वादिश्यर्थ:। (चित्र०) किञच, 'रजोभिः स्यन्दनोद्धूतैः' इति प्रागुदाहृतायां परस्परोपमा- यामतिव्याप्तिः, न च तन्नाप्युपमेयोपमा, तृतीयसदृशव्यवच्छेदाप्रतीनेः। 'द्विविधैपा प्रकीतिता' इति विभागासामञ्जस्यप्रसड्गाच।न ह्यन्र धर्मस्य साधारण्यं वस्तुप्रतिवस्तुभावो वास्ति, गगनस्य भूतलेन साहश्ये रजोव्याप्तत्वं साधारणधर्मः, भूतलस्य गगनेन सादृश्ये गजानां मेघानां च विम्बप्रतिबिम्बभाव इत्यत्यन्तविलक्षणत्वात् अत एवात्र तृतीयसब्रह्मचारिव्यवच्छेदरूप फलमपि- न सिद्धयति। (भारती)

किन्तु- 'रथों की उडी हुई धूलियों से आकाश को भूतल के समान और भेघों के सदृश हाथियों से भूतल को आकाश के समान वनाता हुआ।' इस पूर्वोदाहृत 'परस्परोपमा' में अतिव्याप्ति होगी। अगर आप यह कहें कि वहा भी उपमेयोपमा अन्य सदृश अर्थात तृतीय सदृश का निवारण रूप फल की सिद्धि का अभाव है और यह दो प्रकार की कही गयी है। इस प्रकार इसके जो विभाग किये गये हैं-उसके सामअ्जस्य का भी प्रमग है। इतना ही नहीं यहा धर्म का साधारण अथवा वस्तुप्रतिवस्तु भाव भी नही है। क्योंकि गगन का भूतल के साथ सादृग्य में रजोव्याप्तत्व साधारण धर्म है और भूतल का गज के साथ सादृश्य में गजों का और मेघों का विन्यप्रतिविम्ब भाव अन्त विलक्षणत्व से है। यही कारण है कि तृतीय सदृश निषेधरूप फल भी सिद्ध नहीं होता है। (सुधा) तमूल्पुनेश्यादावुभयविश्रान्तोपमेवेति वादिनां मतमनुसरन् दूपणान्तरमाह- किद्ेति। रजोभिरित्यादौ परस्परोपमायामतिव्याहति'। न च तम्राप्युपमेयोपमा, तत्फल स्याभावाद, तृतीयसदशव्यवच्छेदस्य फलत्वास्। न व तन्टेदोऽपि सम्भवतीश्याह-

Page 200

१६० चित्रमीमांसा

द्विषिधेति। द्विविधेति भेदकथनस्य व्यर्थत्वापत्तेरित्यर्थः। तव्ेदाभायमेव प्रतिपाषयति- न ह्यन्नेति। तन्न हेतुमाह-गगनस्येति। भूतलेन खस्य सादश्ये रजोष्याप्तत्वं साधारणवमः। भूतलस्य खेन सादृश्ये गजमेधयोबिम्बप्रतिविम्बभाव इति वेववक्षण्यात्। तृतीयसदशव्य वच्छेदरूपं तरफलमपि निषेधयति-अत एवेति। अन्नेति परस्परोपमायामित्यर्थः। तृतीय- सदक्व्यवच्छेदफलसिद्धेरभावः। उपमेयोपसाभावे चन्द्र इव सुखमित्यम्र सुखे चन्द्रसाम्ये वणिते पन्द्रेऽपि सुखसादृश्यमर्थतः सिज्धू सेव,पुनः मुखमिव चन्द्र इति कथनंतृतीयसरशनि- षेघलासार्थम्। प्रधानतया शब्देन तथाप्राप्तत्य पुनर्वचनं तदितरसख्यापरिहारार्थमिति न्यायप्रवृत्तेः। (चित्र०) एकधर्माश्रयेण परस्परसास्ये वर्ण्यमाने हयनयोरस्मिन् विषये तृतीयः सन्रहचारी नास्तीति फलति। कस्यचित् केनचित् सादृश्ये वणिते तस्याप्यन्येन सादृश्यसर्थससद्धमपि मुखतो वर्ण्यमानं तृतीयसदशव्यवच्छेदार्थ भवतीति हि तत्फलकत्वे बीजम्। न चैतद्धर्मसाधारण्य इव धर्मभेदेऽपि लभ्यते। रजोभिर्गगनस्य भूतलसादृश्यवर्णनेन भूतलस्य मेघाकारै्गजैर्गगनसादृश्यस्या र्थतः सिद्धचभावात्। (भारती) एक धर्म के आश्रय से अर्थात् जहाँ दोनों उपमा में एक धर्म है, वहाँ उसका फल उपमेयोपमा होता है। किसी धर्म और अर्थ के बीच में अन्वयार्थकसादृश्य की उपस्थिति आवश्यक है। क्योंकि किसी धर्म का किसी अर्थ के साथ अन्वय रहनेपर सादृश्य में व्णित अर्थ का भी धर्म के साथ सादृश्य स्थापित किया जाता है। अर्थात् सिद्ध रहने पर भी पुन उसका वर्णन किसी शब्द के द्वारा प्रतिपादन-तृतीय सादृश्य का निषेधक है। प्रकृत में 'नचतत' से उस अभाव का प्रतिपादन करते हे जो तृतीय सद्टशनिष्ठरूप व्यङ्गथ है। क्योंकि धर्म के साधारणत्व में इसकी जैसी उपलब्धि है, वैसी उपलब्धि धर्म के भेद में नही है। धूलियों से आकाश और धरती का सादृश्य वर्णन के द्वारा धरती का मेघतुल्य गजों से गगन सादृश्य के अर्थ में-सिद्धि का अभाव है। क्योंकि यहा रजों की व्याप्ति और मेघतुल्य गजों की व्याप्ति में-धर्म की भिन्नता के ही कारण पूर्वोक्त सिद्धि का अभाव है। और भी,-पूर्व उपमा से सिद्ध गगन के सादृश्य का ही उत्तर उपमा से प्रतिपादन होने के कारण परस्पर उपमात्व की ही वहाँ उपस्थिति होती है। फलतः इस पारस्परिक उपमा में पूर्वकथित अति- व्याप्ति रह् ही जाती है। (सुधा) एतरसवं मनसि निधाय-पकेति। यम्रोपमाइये एकधर्मसत्म, तम्र तस्फळमुपमेयो- पमा च भवतीति, तदेवाह-कस्यचिदिति। धर्मार्थयोमध्ये धर्मस्य केनचिद् अर्थादिना श्रीमख्वेन सादृश्ये वर्णितेऽर्थस्यापि धर्मेण साधश्यमर्थात् सिद्धमपि पुनस्तद्वूर्णनं शब्देन तत्प्रतिपादनं तृतीयसादटश्यनिषेधकम्। प्रकृते तदभावं प्रतिपादयति-न चैतदिति। एतत्ततीयसदश- निष्ठरूपं व्यङ्गय म्। धर्मस्य साधारणरवे यथा लभ्यते तथा धर्मभेदे सति न लभ्यते, रजो- भिर्गगनस्य भूतलस्य सादृश्यवर्णनेन भूतलस्य मेघतुव्यगजे: गगनसादृश्यस्थार्थाद् सिद्धेर- भावाद। रजोध्याप्तर्व मेधतुषयगजव्याप्त्वधर्मयोभिन्नत्वात्। तथा च पूर्वोपमया सिद्ध-

Page 201

उपमेयोपमानिरूपणप्रकरणम् १६१

गगनसादृशस्यघोप्तरोपमया प्रतिपादनाय परस्परोपमात्वस्येव तग्र सत्वादित्याशयः। तथा घ परस्परोपमायामतिव्याप्ति: स्यादेवेश्यभिप्रायः। ननु अलंकारसर्वस्वकारमते रजो भिरियादावुपमेयोपमंव, दयोः पर्यायेणोपमानोपमेयभाववर्णनमिति तलक्षणस्य तम्र समन्वयात्। वाक्यभेदो द्विधा-शाब्द, आर्थक्ष। आद्यः 'रजोभिः इस्यादे, द्वितीय: 'तहूषगुना' इत्यादाविति तद्व्याख्यानकृदुसक्ष। तथा च नातिव्यासिः। (चित्र० ) अपि च- पिता समाराधनतत्परेण पुत्रेण पुत्री स यथव तेन। पुत्रस्तथैवाधिकवत्सलेन स तेनपित्रा पितृमान् बभूव।।

(भारती) और भी- 'जिस प्रकार सेवा में तत्पर उस पुत्र से पिता सत्पुन्नवान हुए, उसी प्रकार पुत्रवत्सल उस पिना से वह पुत्र भी श्रेष्ठ पिता वाला हुआ। यहा व्यस्तधर्मि विम्वप्रतिविम्वक रूप उपमा में अतिव्याप्ति है। (सुधा) अतो दूषणान्तरमाह-अपि चेति। 'पिता समाराधन' इत्यादौ व्यश्यस्तघर्मिविन्व- प्रतिविम्वकोपमायामतिव्याप्तिः। स पिता क्षेमधन्वा समाराधनतत्परेण शुश्रपापरेण तेन पुत्रेण यथा पुत्री बभूव तर्थेव स पुत्रो देवानीक आत्मनि अतिवत्सलेन तेन पिन्ना पितृमानू वभूवेत्यन्वयः । (चित्र०) अन्न हि पुत्रः पिता चेत्युभावुपमेयोपमानभूतौ धर्मिणौ। तयोस्तावेव व्यत्यासेन पितृमत्त्वं पुत्नित्वमिति साधारणघर्मकोटिप्रविष्टतयोपात्तौ। तयोश् बिम्प्रतिबिम्बरूपसाधारण्यापादको धर्मो मतुबिनिप्रत्ययोपात्तं प्राशस्त्यम्। प्रशंसायां ह्मत्र तौ प्रत्ययी, पित्रा पितृमानिति संबन्धमान्रस्यावक्तव्यत्वात्-। एवं च पुत्रस्य तितुश् प्रशस्तपितृमत्त्वं प्रशस्तपुत्रवत्त्व च चिम्वप्रतिबिम्वकर म्बितेन वस्तुप्रतिवस्तुभावेन साधारणधर्मे इति लभ्यते। तयोश्र पितापुत्रयोः प्राशस्त्यप्रतिपाठके, अधिकवत्सलेन समाराधनतत्परेणेति च विशेषणे। (भारती) इस उदाहरण में, पुत्र और पिता दोनों में, उपमेय और उपमानता रूप धर्म की उपस्थिति है। अतः उन दोनों अर्थात् पुत्र और पिता का पुझ्र और पिता के साथ ही विपर्यास से पितृनत्व और पुत्रत्व रूपी साधारण धर्म विशेषण के रूपमें स्वीकृन है। अगर आप कहें, पूर्व कथित धर्मसाधारण के अभाव से यहाँ अतिव्याप्त नहीं है, तो इसका समाधान यह है कि धर्म विशेषता की स्वीकृति से विन्वप्रतिविन्वभाव रूप जो वहा साधारण्य है, ११ चित्र०

Page 202

१६२ चित्रमीमांसा

उसके प्रतिपादक पुत्र का प्रशस्त 'पितृमत्व' और पिता का प्रशस्त 'पुत्रवत्व' बिम्वप्रतिविम्वभाव से मिश्रित जो वस्तुप्रतिवस्तुभाव है, उसके द्वारा साधारण धर्म की उपलब्धि है। यहा प्रशसा के अर्थ में 'मतुप्' और 'इनि' प्रत्यय की स्वीकृति है। क्योंकि उक्त उदाहरण में पुत्र और पिता दोनों की प्रशसा स्वीकृत है। इस प्रशसा के प्रतिपादक-पिता की समाराधना में पुत्र की 'तत्परता' और पुत्र के प्रति पिता की अधिक 'वत्सलता' है। इसके द्वारा पिता की जिस प्रकार 'प्रशस्त पुत्निता' है, उसी प्रकार पुत्र की 'प्रशस्तपितृमत्ता' की भी स्वीकृति है। पिता के साथ 'पितृमान' इत्याकारक सम्बन्ध रहने के कारण तथा वाक्यार्थवलसे और साधारण धर्म के लाभ से भी उसका अभाव नही है। फलत प्राशस्त्य की उपपादकना विशेषण के रूप में तो उन दोनों में स्वीकृत है ही। (सुधा) अतिव्याप्तिमेव प्रकाशयति-अत्र हीति। पुत्रपित्रोरुपमेयोपमानता। तथोः पुत्रपित्रोः तावेव पुत्रपितरावेव विपर्यासेन पितृमत्वं पुत्रित्वमित्यत्र साधारणघर्मकोटौ प्रविष्टतया साधारणधर्मविशेषणतयेत्यर्थः। उपात्तौ =अङ्गीकृतावित्यर्थ। ननु तत्सरवे धर्मसाधारण्या- भावाद नातिव्यासतिरिति चेत्, अत्र समाघते-तयोक्चेति। धर्मविशेषणतयोपात्तयोश्च्वेयथः। बिम्बप्रतिबिभ्बभाघरूपं यत् साधरण्यम्, तदापादकः पुत्रस्य प्रशस्तपितृमर्वं पितुश्र प्रशस्तपुत्र वत्वञ् बिम्बप्नतिविम्बभावेन करम्वितो यो वस्तुप्रतिवस्तुभाव, तेन साधारण धर्म इति लभ्यते। प्राशस्त्यलाभमेवोपपादयति-भत्र प्राशसथ्यं मतुप्-इनिप्रत्ययाभ्या- सुपात्तम्, तयोः पशंसायां सध्वात्। तदुपपादकं समाराधनततपरत्वमधिकवरसलत्वव्व । तेन पितुः यथा प्रशस्तपुश्रिता तथा पुत्रस्य प्रशस्तपितृमत्तेति वाक्यार्थः, भवतीति शेषः। पित्रा पितृमानित्याकारकसन्बन्धस्य वक्तुमयोग्यत्वाद् इत्यस्य तन्द्ेतुत्वात्। तथा च वाक्यार्थवलेन साधारणघर्मस्य लाभास तदभाव इत्याजयः। प्राशसत्योपपादकाभावं निराकरोति-तयोश्चेति। प्राशस्त्यस्थोपपादकता च विशेषणयोरस््येवेति तद्वावः। (चिन्न०) ततश् धर्म्युपमायां यः पिता पुत्रस्योपमानं स एव तस्य तदुपपादके बिम्बप्रतिबिम्बनिर्देशे उपमेय इति लक्षणस्य वर्तनं तावत् स्पष्टम्। न चेयमुपमेयोपमा, पुत्रपित्रोर्धमिणोरुपसायां प्रशस्तपितृमत्त्वं प्रशस्त- पुत्रवत्त्वं वस्तुप्रतिवस्तुभावेन बिम्बप्रितिबिम्बभावकरम्बितेन साधारणो धर्मः। पितापुत्रयोस्तु धर्मकोटिनिविष्टयोर्वात्सल्यभक्त्यतिशयकृतं- आशस्त्यमनुगतसाधारणधर्म इति पूर्वोदाहरणसारूप्यात् ससुच्योपमया पुत्रोऽपि पितृभक्तया प्रशस्तः, पितापि पुत्रवात्सल्येन प्रशस्त इत्यर्थलाभेऽपि तृतीयसब्रह्मारिव्यवच्छेदालाभाच्व। न चात्र इवशब्दद्वयादियुक्तपर्यायद्वया भावात् पर्यायविशेपणेनैवातिव्याप्तिनिरासः स्यादिति वाच्यम् ? वाच्यकक्षायां पुत्रपित्रोरुपमाव्यङ्गङ््ग्यंकक्षायां पितापुत्रयोरिति पर्यायद्वयसत्त्वात्। न हि पर्यायद्वयस्यापि वाच्यत्वमत्र विवक्षितम्। येनेवशब्दद्वययुक्तपर्यायद्वयाभावाद- तिव्याप्तिर्निरस्येत। तथा सति हि व्यङ्ग्योपमेयोपमासाधारण्यं न- स्यादित्युक्तम्।

Page 203

उपमे योपमानिरपणप्रकर णम्

न चात्र धर्मिणोरेवोपमा धर्मयोस्तु उपमानोपमेयसाधारण्यार्थमभेद एव अतीयते नोपमेति वाच्यम्- नलिन्या इव तन्वड्ग्यास्तस्या पद्ममिवाननम्। मया मधुकरेणेव पायम्पायमतृप्यत ॥।

दर्शनेन धर्मयोः सादृश्येन साधारणीकरणरयाप्युपमाप्रयोजकत्वात्। त्स्मात्तन्नातिव्यामिशङ्का दुर्वारा। अतोऽनुपपन्नमेवेदं लक्षण लन्यते।

अत्र न्रम :- (भारती) धर्मी उपमा में-पुत्र का उपमानभृत पिता के धर्म-उपपादक विम्वप्रतिविम्वभाव के निदेश ने- पुत्र को प्रत्युपमेयत्व से स्वत. उपलब्ध है। अन लक्षण का समन्वय यहा स्पष्ट रूप से है ही। 'नच' शब्द से उदाहरण में लक्ष्यत्व का निराकरण करते हैं। 'इयन्' यह अर्थात् व्यत्यस्त धर्मि विम्वप्रतिविम्बक उपमा-उपमेयोपमा है। इसमें कारण बताते हैं कि धर्मी पुत्र और पिता रूप उपमा में विम्वप्रतिविन्व भाव मिश्रित वस्तु प्रतिवस्तु भाव से उक्त उदाहरण में प्रमन्त पितृमत्व और प्रशस्तपुत्रवत्वात्मक साधारण धर्म है। इस प्रकार की धर्मकोटि में प्रविष्ट पिता और पुत्र की वत्सलता और भक्ति रचित जो प्राशस्त्य रूपी साधारण धर्म है, वह कथित उदाहरण में समान रूप से समुच्चित उपमा के द्वारा-जैसे पुत्र की पितृभक्ति से प्रशस्तत्व और पिता की भी उसकी वत्सलता से जो प्राशस्ति अर्थ की उपलध्धि है-उस अर्थ की उपलब्धि होने पर भी, तृनीय साद्व्य निषेध के उस फल की अप्राप्ति से स्वत लक्ष्यत्व है ही नहीं।

पुन. नच से आशका करते है-इस उदाहरण में 'इव' द्वय के अभाव से उक्त उदाहरण में पर्याय द्वय का अभाव है। ऐसी स्थिति में फिर पर्याय पढ का लक्षण में समावेश नहीं करने से ही अतिव्याप्तिदोप का स्वत निराकरण हो ही जाता है। इसका समाधान 'व्याच्चन्' से करते हुए कहते है कि 'यथा' पदोपादान की कक्षा में पुत्र और पिता की उपमा है, वैसे ही व्यद्ञथ की कोटि में पिता और पुत्र रूपी पर्याय द्वय की विद्यमानता है। किन्तु, इवादि द्वय के अभान में भी अति- व्याप्ति असभव' ही है। क्योंकि पर्याय पद मे 'वाच्यत्व विशेपणीभृत' का लक्षण में समावेश नहीं है। आक्षेपादि के द्वारा वाच्यत्व की अवगति में तो लक्षण के व्यक्नय उपभेयोपमा को साधारण्य की अनापत्ति है। 'नच' से पुन. आशका करते है-धर्मीं पुत्र और पिता के ही उपमा धर्म के प्रशन्त पुत्रत्वादि रूप उपमानोपमेय साधारण्य के लिए अभेद की ही प्रतीति मे द्वितीय उपमा की अनभवता से किसी प्रकार की अतिव्याप्ति नहीं है। अधोहििन उदहरण से नमका समापान करते है- नलिनी की तरह इस तन्वद्री के कमल सद्गमुस, मधुकर अर्थात भौरे रूपी मुझसे पी-पी कर सतुष्ट है। इसमें विम्यप्रतिचिन्व भाव विशिष्ट तन्वी और नलिनी आदि उपना के भी दर्शन से धर्म की सादृश्यना के कारण जो साधारणीकरण है-उसका भी उपगा में प्रयोजकत्व है। अन्यथा 'तन्वी'

Page 204

१६४ चित्रमीमांसा

और नलिनी के उपमा-कथन की अनुपपत्ति होती है। इसलिए उक्त लक्षण के उदाहरण में अति- व्याप्ति के दुनिवारत्व से-प्राचीनों के उपमेयोपमा के लक्षण अयुक्त ही हैं। F इस प्रकार प्राचीनों के लक्षण का खण्डन कर दीक्षित जी स्वयकृत उपमेयोपमा के लक्षण का प्रतिपादन करते हैं- (सुधा) लक्षणसमन्वयं दर्शयति-ततश्चेति। धम्युंपमायां पुत्रस्योपमानभूतपितुर्धर्मोपपादके विम्घप्रतिबिम्बनिर्देशे पुत्रं प्रश्युपमेयत्ववर्णनेन लक्षणसमन्वयस्य स्पष्टत्वादित्यर्थः। उदा- हरणस्य लध्यत्वं निराकरोति-न चेति। इयमिति व्यत्यस्तधमिविम्बप्रतिविम्बकोप- मेत्यर्थः। तत्र हेतुमाह-पुन्नपित्नोरिति। धर्मिणोः पुन्नपिन्नोरुपमार्या बिम्बप्रतिविम्बभाव सिश्रितवस्तुप्रतिवस्तुभावेन प्रशस्तपितृमत्वप्रशस्तपुत्रवत्वात्मक' साधारणो धर्मः। एतद्ध- मकोटिप्रविष्टपित्रापुत्नयोर्वात्सव्यभपत्यतिशयाभ्या कृतं रचितं यत् प्राशस्त्यं तत्साधरणो धर्म इति पूर्वोदाहरणस्य सच्छायाम्भोजेत्यादिरूपस्य समानरूपत्वात् समुख्ितोपमया यथा पुत्रस्य पितृभक्त्या प्रशस्तत्व तथा पितुरपि तद्वारक्षल्येन प्रशस्ततेत्यर्थस्य लाभेऽपि तृतीय- सदशनिषेघस्य तत्फलस्य लाभासम्भवास् लचयत्वमित्याशयः। अत्राशंकते-न चेति। अत्रोदाहरणे इवद्वयाभावेन तद्गक्तपर्यायद्वयस्याभावात् पर्यायपदाकथनेनैवातिव्यासे निरास इत्याशङ्काथः। समाधानमाह-वाध्येति। यथापदोपादानवत्यां कक्षायां पुत्रपित्रो- रुपमा, तथा व्यङ्गयकस्षार्या पितृपुत्रयोरिति पर्यायह्वयस्य विद्यमानत्वादित्यर्थः। किस्, इचादिद्वयाभावेऽप्यतिव्याप्तेरसम्भव एव, पर्यायपदे वाध्यत्वस्य विशेषणीभूतस्य छक्षणकरणाभावात्। आक्षेपादिना वाच्यत्वावगती तु लक्षणस्य व्यङ्गचोपमेयोप- मासाधारण्यानापत्तेश्र। पुनराशङ्कते-न चेति। धर्मिणोः पुत्रपित्रोरेवोपमाधर्मयोः प्रशस्तपुन्नत्वादिरुपयोरुप मानोपमेययोः साधारण्यायाभेदस्येव प्रतीती दितीयोपमाया असम्भवेन नातिव्याप्ति रित्याशङ्टार्थः । अन्र समात्ते-नलिन्या इति। नलिन्या इद तस्याः तन्वङ्गयाः प्ममव सुख मधुकरेण मया पायम्पाय पीत्वा पीत्वा णमुलन्तमेतत्, अतृप्यतेत्यन्वयः। अन्न बिम्ब- प्रतिबिम्बभावविशिष्टयोस्तन्वीनलिन्याबिकयोरूपमाया अपि दर्शनेन धर्मयो: सादश्येन यत् साधरणीकरणभ, तस्याप्युमार्या प्रयोजकत्वात्। अन्यथा तन्दीनलिन्योकपमाकथनानु- पपत्तेः। तस्मात्तत्रोदाहरणे लक्षणातिव्याप्तेर्दुष्परिहरत्वादयुक्कमेवेदं प्राधासुपमेयोपमा- लक्षणमिति दिक। (चित्र०) अन्योन्येनोपमा बोध्या व्यक्त्या वृत्त्यन्तरेण वा। एकधर्माश्रया या स्यात् सोपमेयोपमा मता॥ अन्योन्येनेति विशेषणान्न रशनोपमायामतिव्याप्तिः। व्यक्त्या वृत्यन्तरेण वा बोध्येति विशेषणाच्च नोभयविश्रान्तसादश्योपमायामतिव्यापिः। परस्परप्रतिक्षेपक विकल्पार्थेन वाकारेण हि या परस्परप्रतियोगिकत्वविशिष्टो- पमा, तद्विषयवृत्त्यन्तर निरपेक्षव्यक्तिबोध्या, तद्विषयव्यक्तिनिरपेक्षवृत्त्यन्तरबोध्या वा भवति,सोपमेयोपमेति पर्यवस्यति। - '

Page 205

उपमेयोपमानि रूपणप्रकरणम् १६५.

(भारती) 'अन्योन्येन अर्थात् परस्पर की प्रतियोगिता सहित, जो उपमा, व्यक्ता अर्थात् व्ययनावृत्षि के द्वारा अथवा वृत्यन्तरेण अर्थात् अिवावृत्ति के द्वारा शात होती हो एव जो एक धर्म द्वारा मिळ् होती हो, उस उपमा अर्थात सादृश्य को उपमेयोपमा माना जाता ह।'

.' निष्कर्ष-जहाँ एक ही धर्म का आश्रय लेकर उपमेय और उपमान में परस्पर व्यलना वृत्ति से अथवा अभिधावृत्ति से उपमा का प्रतिपादन हो वहा उपमेयोपमा होती है। 'भणितिरिव मतिर्मतिरिच चेष्टा' (पृ १५६) अर्थात् कथन और युद्धि, बुद्धि और चेष्टा समान ह, इस रसनोपमा में अतिव्याप्ति दोप के निवारण के लिए लक्षण में 'अन्योन्येन' अर्थात् 'परस्पर की प्रति- योगिता सहित' इस विशेषण का समावेश किया गया है। यद्यपि इस प्रकार की उपमा में एक दूसरे के सादृश्य का प्रतियोगी है-अर्थात् इस वाक्य से 'भणिति' का 'सादृ्य' मति में और मति का सादृश्य भणिति में-इस तरह दोनों का साद्ध्य दोनों में सिद्ध हो जाता है। किसी एक का किसी एक में नहीं। फिर भी, यहाँ प्रतियोगिता, व्यअ्नावृत्ति के द्वारा शञात होती है और उपमा अभिधावृत्ति के द्वारा। ऐसी स्थिति में प्रतियोगिता सहित उपमा का अन्यवृत्ति की अपेक्षा से रहित अर्थ का एक वृत्ति के द्वारा वोध नही हो पाता। क्योंकि प्रतियोगिता ज्ञान के लिए अभिधा को व्यक्षना की अपेक्षा रहती है और उपमा ज्ञान के लिए व्यसना को अभिधा की सपेक्षा रहती है। किन्तु, यहाँ लक्षण के अनुसार होना चाहिए 'अन्यवृत्ति' की अपेक्षा से रहित एक वृत्ति द्वारा प्रतियोगिता सहित साद्ृश्य का वोध। अत. उभय विश्रान्त सादृश्य उपमा में अतिव्याप्ति के निवारण के लिए 'वृत्यन्तरेण वा बोध्या' विशेषण का लक्षण में समावेश किया गया है। अगर आप यह कहें कि लक्षण में 'अन्यवृत्ति की अपेक्षा से रहित' इसका समावेश तो है नहीं, तो इसका उत्तर यह है कि लक्षण में 'वा' अर्थात अथवा का समावेश है। इसी अथवा का अर्थ यह है। अर्यात अथवा कहने का यहाँ यही अभिप्राय है कि या तो 'पूर्वोक्त प्रतियोगिता सहित उपमा केवल व्यन्जनावृत्ति से ही प्रतिपादित होनी चाहिए अथवा अभिधावृत्ति से ही। एक वृत्ति में दूसरी वृत्ति की अपेक्षा नही रहनी चाहिए। ऐसे ही स्थल में उपमेयोपमा अलकार होता है। (सुधा) एवं प्रारघां लक्षणं खण्डयित्वा स्वयं कृतमुपमेयोपमालक्षणं प्रतिपाद्यति-अन्योन्येनेति। या अन्योन्येन व्यत्तया वृत्यन्तरेण बोष्या एकघर्माश्रया उपमा, सा उपमेयोपमेत्यन्वयः। अन्योन्येत्यत्र नतियोगित्वं तृतीयार्थ। तस्य विशेषणतयोपमायामन्वय। व्यक्तिश्वान्र व्यक्षना, वृत्यन्तरं शक्किरेव, आश्रयपर्द प्रयोज्यार्थकस्। तथा घ अन्योन्यप्रतियोगिश्व- विशिष्टा व्यक्षनाव्यापारिण शकत्या वा बोध्या। एकघर्मप्रयोज्या उपमा उपमेयोपमेति लक्षणार्थः । विशेषणकल विचारयति-अन्योन्येनेति। भणितिरिच मतिर्मतिरिव चेष्टेति रसनोपमायामतिव्याप्तिवारणाय विशिष्टान्तम्। भणितिनिरुपितसाहश्यप्रतियोगिरवं भणिता; अनुयोगितवं मतावस्ति, न तवन्योन्यप्रतियोगित्ववेशिष्टयमतो नानिव्यापिः। उभयविश्रान्तसादृश्योपमायामतिष्पाप्तिवारणाय वोध्यान्त विशेषणम्। एतदतिव्याप्ि वारणाय स्वयमपि लक्षण व्याकरोति-परस्परप्रतिक्षेपकविकष्पो वार्थ। या परस्परम्रति योगिरवेन विशिष्टा, तत्पद्मुपमापरम्, उपमाविषयं यद्तृत्यन्तरं शक्िरूपम, तद्पेषा-

Page 206

१६६ चित्रमीमांसा

रहितव्यअ्जना बोध्या। उपमाविषयव्यअ्जनानिरपेक्षशकिवोध्या वा भवति, सा उपमेयो- पमेति पर्यवसितोऽर्थः। (चित्र०)

रूपोपमाशे वृत्त्यन्तरमिति तयो: करम्बतत्वान्नातिव्याप्तिशङ्का। सामान्यलक्षण- सिध्यर्थ च व्यक्तिवृत्त्यन्तरयोरन्योन्यत्वेन क्रोडीकृतयोरग्रहणम्। एवं हि तया गृहीतं नु मृगाङनाभ्यः' इत्यन्र वृत्त्यन्तरापेक्षव्यक्तिवोध्यायामनलङ्कारभूतायां व्यक्ति निर पेक्षवृत्त्यन्तरबोध्यायामलङ्कारभूतायां चोपमाया लक्षणमनुगतं भवति। (भारती) इसके बाद 'न्युष्ट प्रयाणञ्न' इत्यादि में उभय विश्रान्त सादृश्य उपमा में, अन्योन्य प्रतियोगिता के अश में व्यव्जना है और समानार्थक सादृव्य उपमा में शक्ति है। ऐसी स्थिति में इन दोनों के एकत्र मिल जाने से यहाँ अतिव्याप्ति की आशका नही की जा सकती है। वृत्ति की भिन्न विषयता से ही यहाँ विलक्षणता की प्रतीति है। विकल्पार्थक 'वा' शब्द के द्वारा परस्पर निरपेक्षवृत्ति से वोध्यता के ही लाभ से भी ऐसी प्रतीति है। सामान्य लक्षण का सभी जगह व्यापक लक्षण की सिद्धि के लिए परस्पर एकीकृत वृत्ति के ग्रहण से भी 'उक्त 'अन्विति' सभव है। इसी प्रकार उक्त दोनों जगहों में लक्षण का समन्वय दिखाते हैं .- प्रवात नीलोश्पल निविशेषमधीर विश्रेक्षितसायताचया, तया गृहीत नु मृगाङनाभ्यस्ततो गृहीतं नु मृगाङ्नाभि.। मन्द पवन से हिलने वाले तील कमल की तरह सुन्दर कटाक्ष अवलोकन को पार्वती ने हरि- णियों से सीखा था ? अथवा हरिणियों ने पार्वती से सीखा था ? इस वात का विचार करने पर भी निश्चय नहीं होता था। इस उदाहरण में शक्ति निरपेक्ष व्यन्जना वृत्ति से बोधित अनलद्कार भूत उपमेयोपमा में अन्योन्य प्रतियोगित्व विशिष्ट शक्ति निरपेक्ष व्यन्जना वृत्ति बोधित एक धर्म प्रयोज्य उपमा की उपस्थिति रह्ने के कारण ही लक्षण का समन्वय है। इसी प्रकार 'सुगन्धि नयनानन्दि' इस उदाहरण में-अलङ्कारभूत उपमा में अन्योन्य प्रतियोगी विशिष्ट सादृश्य विषय से निरपेक्ष शक्ति द्वारा बोधित एक धर्म प्रयोज्य उपमा की उपस्थिति के कारण लक्षणानुगत है। चिमर्श-यहाँ प्रतियोगी का अर है निरूपण करने वाला और मुख है उसका आधार। जैसे-'कमल की भाँति मुख' यहाँ कमल का अर्थ है सादृश्य का निरूपण करने वाला ओर मुख है आधार। क्योंकि कथित वाक्य में कमल का सादृश्य मुख में बताया जा रहा है। सादृश्य समानना का पर्यायवाची शब्द है, जिसका सम्बन्ध सर्वदा दो पदार्थों के वीच पाया जाता है। इन्ही दो पदार्यो में से एक निरूपण करने वाला होता है और दूसरा आधार होता है। अर्थात जिससे तुलना की जाती है वह प्रतियोगी होता है और जिसकी तुलना की जाती है वह अनुयोगी होता है। (सुधा) 'उयुष्टं प्रयाणं च वियोगवेदनाविदूननारीकमभूस् समं तदा' इश्युभयविश्रान्तसादृश्यो- पमायामन्योन्यप्रतियोगितांशे व्यअ्ञना, सादशयोपमांशे शकिरिति तयोरेकत्र मिलित्वा-

Page 207

उपमे योपमनिरूपण प्रकरणम् १६७

प्रातिव्याप्तिः। वृध्योर्भिन्न विषयतया एव विलक्षणस्वात्, विकलपार्थकवाशव्देन परस्परनर- पेववृत्तिवोष्यत्वस्येय लाभान।सामान्यलक्षणस्य सर्वत्र व्यापकषपणस्य सिद्धये परस्पर- मेकी कृत्य गृहीतयोरवृत्योरग्हणाघ्। तर्थवोभयत्र लक्षणसमन्वय दर्शयति-एव हीति।"प्रवा- तनीलोप्पल निविशेषमधीर विभेछितमायताचया। तया गृह्दीतं नु मृगादनाभ्यस्ततो गृहीतं नु मृगाद्गनाभि: ॥"इति छ्ोकशेपः। प्रवाते प्रभूतवातस्थले यसीलोत्पल निर्विशेषं निर्भेदं तरमृशमित्यर्थ.। अधीरविम्रितं वक्तिचिलोकनम्, जायताचया विश्ञालनेन्रया तया पार्वर्या मृगाङ्नाभ्यो हरिणीभ्यो गृहीतमभ्यस्तम्, अथवा मृगाद्वनाभिस्ततः पार्व- त्याः। 'पञ्ञग्यास्तसित'। गृहीतनभ्यस्त नु दृशयन्वयः। अत्र शचिनिरपेक्षव्यअनावृत्ति

धर्मप्रयोज्याया उपमाया अन्न सत्वासष्षणसमन्वय । 'सुगन्धि नयनानन्दि' इत्वादाव- लषटारभू तोपमाया मन्योन्यप्रतिय। गिकरवचिशनिष्टसादृश्यविषयव्यअ्ञनानिरपेपशकिोध्येंक- धर्मप्रयोज्याया उपमाया: सत्वाव्नष्षणानुगतिरित्यरथं। (चित्र०) यद्यपि व्यड्ग्यायामप्युपमेयोपमायां शव्दस्य सहकारित्वेन तद्तशक्ते रप्यपेक्षितत्वात् 'खमिव जलं जलमिव खम्' इत्यादौ वाच्यायामपि गम्य- साधारणधर्मायां तस्यां धर्माशे व्यक्तेरपेक्षितत्वात् परस्परनरपेद्यमसभवि, तथाप्यन्योन्यप्रति योगिकत्वविशिष्टसादृश्यविपयवृत्त्यन्तरनिरपेक्षकत्व व्यक्तेस्त- द्विप यव्यक्तिनिर पेक्षत्वं वृत्त्यन्तरस्य चास्त्येव। (भारती) अव सन्देह करते हैं कि पूर्व कथित लक्षणानुगति की सभावना नहीं है। क्योंकि, अर्थ की व्यन्जना में गब्द की सहकारिता की उत्ति से व्यङ्गय उपमेयोपमा में शक्ति की सहकारिता अपेक्षित है। फिर वाच्य उपमेयोपमा के इस उदाहरण मे-'खमिव जल जलमिव खम्' मर्यात 'जल आकाश के समान हो रहा है और आकाश जल के समान' यहाँ आकाश और जल का जो साद्ध्य के साथ अन्वय होता है उनमें प्रतीत होने वाली प्रतियोगिता ससर्ग रूप है। अर्थात् यहाँ धर्म का गम्यत्व के द्वारा उस अश के कथन में व्यन्जना की अपेक्षा से वृत्ति की निरपेक्षता का यहाँ सर्वथा अभाव है। फिर भी परस्पर की प्रतियोगिता सहित जो सादृव्य है, उसका बोध यहाँ व्यन्जना वृत्ति के द्वारा मथवा अमिधा के द्वारा एक धर्माश्रय होने के कारण रूप कथन की आवश्यकता से किसी प्रकार का दोप नहीं रह जाता है।

(सुधा)

नन्वेतन्न संभवति, अर्थस्य व्यअ्षक्रवे तु शब्दस्य सहकारिता इत्युवत्या व्यक्नयोपमेयो- पमायां शककेः सहकारितया अपेक्षितत्वाव। वाष्योपमेयोपमायाम् 'स्रमिव जलं जलमिव खम्' इत्युपमेयोपमार्या धर्मस्य गम्यत्वेन तदंशक्थने व्यज्ञनाया अपेक्षितरवाद् घृत्योनिर पेतत्वस्य सर्वथाऽसम्भवादित्याशंकते-यद्यपीत्यादि। समाधते-तथापीति। अन्योन्य- प्रतियोगिकत्वविशि्टं यत् सादृश्यम, तद्विषयशकिनिरपेद्षकरव व्यज्ञनायाः, तादृशसाहश्य विषयव्यञ्ञनानिरपेष्षवं शाककेरिति कथनस्यावस्यकर्वास दोप इति समाधानाशयः।

Page 208

१६८ चित्रमीमांसा

(चिन्न०)

  • इदसेव च व्यक्तिपदानपेक्षयालङ्काररूपाया विशेषलक्षणमपि। तत्र व्यक्ति पद्परित्यागे वृत्त्यन्तरमात्रबोध्येत्येतद्विशेषणं पर्यवस्यति। ततश्चोभयविश्रान्त- सादृश्योपमाव्यावृत्तिः । न च तस्यामेकस्यैवोपमानत्वम्, न तु द्वयोरित्यन्यो- न्यपदेनव व्यावृत्ताविद व्यर्थमिति वाच्यम्, प्राकरणिकाप्राकरणिकयोः साृश्य- वर्णनेSप्राकरणिकस्यवोपमानत्वलाभेऽप्युभयोरपि प्राकरणिकत्वे विनिगमना- विरहेण परस्परोपमानत्वप्रतीतेः । एवं धर्माश्रयविशेषणात् 'रजोभिः स्यन्दनो- द्धूतैः' इति परस्परोपमायां नातिव्याप्तिः उक्तविशेषणबलादेव 'पिता समारा- धनतत्परेण' इत्युपमायामपि नातिव्याप्िः उभयन्नाप्युपमेययोभिन्नधर्माश्रय- त्वात्। एकधर्माश्रयेत्यस्य चायमर्थ :- कस्यचिदन्येनोपमायां यो धर्मः साधारणो वस्तुप्रतिवस्तुभावापन्नो वा, स एवान्यस्य तेनोपमायामपीति, न त्वनुगामिधर्मा- श्रयेत्यर्थः । बिम्बप्रतिबिम्बभावस्तुप्रतिवस्तुभावनिर्दशे तदभावादिति दिकू।

(भारती) 'हदम्' पद से यहा उपमेयोपमा के सामान्य लक्षण की व्याख्या कर विशेष लक्षण कहते हैं। उक्त लक्षण में व्यक्ति पद के परित्याग में वृन्यन्तर मात्र की वोध्यता होती है-यही उसका विशेष लक्षण हुआ। ऐसा करने से 'युष्टं प्रयाणम्' इत्यादि रूप उभय विश्रान्त सादृश्य के उदाहरण में उपमा की न्यावृत्ति होती है। अगर आप यह कहें कि उक्त उदाहरण में एक का ही उपमानत्व है न कि दोनों का। अतः अन्योन्य पद से ही व्यावृत्ति जव सभव है तो उक्त विशेषण व्यर्थ ही है तो उसका उत्तर यह है कि प्राकरणिक और अप्राकरणिक के सादृश्य वर्णन में अप्राकरणिक का ही यदि उपमानत्व लाभ हो तो उसमें दोनों के ही प्राकरणिकत्व में विनिगमन के अभाव से परस्पर उपमानत्व की प्रतीति होती है। 'एक धर्माश्रया अर्थात् जिसका अर्थ एक धर्म द्वारा सिद्ध होता हो' इस विशेषण का फल यह है कि 'रजों से आकाश पृथ्वी की तरह हो गया है।' और 'मेघों के समान गजों से धरती आकाश की तरह हो गयी है' इस उदाहरण में परस्पर की उपमा का वर्णन किया गया है। उसमें इस लक्षण की अतिव्याप्ति नहीं होगी। इसी प्रकार उक्त विशेषण के वल से ही 'पिता की समारा- धना सें तत्पर' इत्यादि रूप उपमा में भी अतिव्याप्ति दोष नहीं है। क्योंकि दोनों ही जगह उपमेय भिन्न धर्माश्रय है। अर्थात दोनों उपमाओं को सिद्ध करने वाला धर्म एक नहीं है। भूतल को उपमान मान कर जो उपमा दी गयी है उसमें 'रज' रूपी अनुगामी धर्म है और आकाश तल को उपमान मानकर जो उपमा दी गयी है उसमें 'मेघों के समान गज' रूपी बिम्बप्रति- बिम्वभावापन्नधर्म है। अत यहाँ दोनों ही धर्म भिन्न भिन्न हैं। एक धर्माश्रय का यह अर्थ हुआ-किसी अन्य के द्वारा उपमा में जो साधारण वर्म अथवा वस्तुप्रतिवस्तुभावापन्न हो उसका ही अन्य उपमा में उपस्थिति का वोध हो जाता है, न कि अनुगामी धर्माश्रय का। क्योंकि उसमें विम्बप्रतिविम्बभाव और वस्तुप्रतिवस्तु भाव का अभाव ही है।

Page 209

उपमेयोपमानिरूपणप्रकरणम्

(सुधा) एवं सामान्यलक्षण व्याकृत्य विशेषलवणमाह-इदमेवेरयादि। अन्योन्यप्रतियोगि- रवविशिष्टसादृश्यविषयशक्तिवोध्यत्वे सत्येकधर्मंप्रयोज्योपमात्वमेव तत्वम्' इति तस्या विशेषलक्षणभ्। शक्तियोध्यरवे सतीति विशेषणात 'व्युप्टं प्रयाणज्ञ वियोगवेदनाविदू न- नारीकमभूत समं तदा' इत्युभयविश्रान्तसादश्योपमायां नातिव्याप्तिः। 'रजोभि. न्यन्द नोद्धूतैः इति परस्परोपमायामतिप्याप्तिदारणाय-एकर्सप्रयोज्येति। आशकते-न चेति। उभय विश्रान्तसादृश्योपमायामेकस्येयोपमानताया वाध्यरवेन द्वयोस्तदभावादन्यो न्यपएकथनेनैव नद्यावृत्ती शक्तियोध्येति पदस्थ व्यर्थत्वापत्तिः। अत्र समाधते-प्रकृता- प्रकृतयो सादृश्यवर्णनेऽप्रकृतस्यैवोपमानत्वेऽपि इयोः प्रकृतत्वे विनिगमनाभावात परस्प- रोपमानत्वप्रतीती बाधाभावास्। पिता 'समाराधनतत्परेण' इत्यत्र व्यत्यस्तधर्मिप्रतिबिम्व- कोपमायाम तिग्याप्तिवारणाय एकधमंप्रयोज्येति विशेषणस। तत्र भिन्नधर्माश्रयत्वास्षाति- व्याप्तिः। एकधर्माश्रयेत्यस्य अनुगामिषर्माश्रयेति नार्थ, धिम्वप्रतिविम्ब भाववस्तुपति- वस्तुभावयोस्तद्षमावेनातिप्रमंगास्। किन्त्वेकस्यामुपमायां यः साधरणो धर्मो वस्तुप्रति वस्तुभावापन्नो वा, तस्यवान्योपमायां मध्वस्यैव तदर्थत्वादित्याह-एकधर्म इत्यादि।

भयम्रेक्यस्य विवष्ा आवश्यकी। अन्यथा सहृदयहृदयोट्ेजकतया अदोपत्वापततेः। क्रमेण यथा-"वदनं क्मलायते तदीयं शतपत्रं वदनायते सुदत्याः। असितोतपलमालिक नयपांगा नयनान्तन्त्यसितोत्पलस्य मालाः ॥' इत्यादि विशेषरूपो वोष्यः। (चित्र०) इदं तूपमेयोपमात्वप्रयोजकं लक्षणम्। अनुगतानतिप्रसक्तलक्षणं तु- सदशस्य तृतीयस्य व्यवच्छेदाय यद्भवेत्। अन्योन्येनोपमेयत्व सोपमेयोपमा मता ॥ इति द्रष्टव्यम्। अत्रान्योन्येनेति विशेषणम् 'अहमेव गुरुः सुदारुणानाम्' इति प्रतीपविशेष- व्यावृत्त्यर्थम्। (भारती) 'अन्योन्य अर्थात परस्पर की प्रतियोगिता सहित' इत्यादि पूर्वोक्त लक्षण तो उपनेयोप नात्व रूप जो सामान्य है उसका प्रयोजक है। अलकारता साधारण का विशेष लक्षण तो- तीसरे सदृश पदार्थ की निवृत्ति का बोध-अर्थात उन दोनों पदार्थों की परम्पर की तुल्ना हो सकती है, अन्य किसी से नहीं यह ज्ञान जिसका फल हैं उस वर्णन में आने वाला, परन्पर उपमान उपमेय वने पदार्थों का साद्व्य 'उपमेयोपमा' अलकार कलाता है। इसे भी देसना चाहिए। लक्षण में उपमेय एव उपमान की परस्पर तुलना एव दोनों के मुन्दर सादृध्च को 'उपमेयोपना' कहा गया है। इस विशेषण के फलस्वरूप प्रतीप अलक्वार के इस भेद के उदाहरण में 'अरे हालाटल। (जहर) नेरा यह कैसा अभिनान कि नसार की टारुण वस्तुओं मे नही

Page 210

१७० चित्रमीमांसा

महा दारुण है। अरे। इस ससार में तो तुम्हारे जैसे खलवचनों की कोई कमी ही नहीं है।' अति- व्याप्ति दोष का निवारण हो जाता है। विमर्श-यहा उपमेयोपमा की भ्रान्ति नहीं हो सकती है। क्योंकि जहा उपमेयोपमा में परस्पर उपमानोपमेयभाव की प्रतीति अपेक्षित है, वहा प्रतीप में उपमान की उपमेयरूप से कल्पना इसलिए है कि इसके द्वारा उपमान की अपकृष्टता का बोध हो। यहा दारुणता में निरुपम हालाहल का, खलवचनों के उपमान के रूप में कथन किया गया है, जिससे अनुपम वस्तु की उपमानता के उपन्यास में एक अन्य ही प्रतीप प्रकार स्पष्ट दिखाई दे रहा है। (सुधा) लक्षणसुपसंहरति-इन्दुनत्वति। अन्योन्येत्यादिपूर्वमुक्त लक्षणसुपमेयोपमार्वरूपं यत्सामान्यं तत्प्रयोजकमित्यर्थ.। अलंकारतासाधारणं तदिशेषलक्षणमवतारयति-अनुग- तेति। अलंकारवृत्तितदसाधारणलक्षणं तु इदं द्रष्टव्यमित्यन्वयः। तृतीयशदशव्यवच्छेदफल- कमुपमानोपमेययोरन्योन्यप्रतियोगित्वविशिष्टोपमारूपं यत्, सा उपमेयोपमेति लक्षण- स्वरूपं वोध्यम्। अन्नान्योन्यस्थेति पदस्य फल विचारयति-अन्नेयादि। "अहमेव' गुरु: सुदारूणानामिति हालाहल तात मास्म हप्यः । ननु सन्ति मवाहशानि भूयो भुवनेऽस्मिन्. वचनानि दुर्जनानाम् ॥" इति प्रतीपभेदेऽतिव्याप्तिवारणाय अन्योन्येति विशेषणम्। अग्र हालाहलस्य दुर्जनवचनसाम्यप्रतिपादने तेषामपि तेनार्थतः साम्यसिद्धी तत्सदशतृतीयस्य निषेधविषयतयोपमासरवेन लक्षणसमन्वयेऽपि यथा-'धर्मोऽ्थ इव पूर्णश्रीः' इत्यादौ सादृश्यप्रतियोगित्वमर्थस्थरेत्तरत्रसादृश्यप्रतियोगित्वम्, तथा वोपमानोपमेययोरन्योन्य- प्रतियोगित्व सिद्धम्। अन्न तथा प्रतियोगिकत्वाभावानतातिव्याप्तिरिति दिक। यत्वन्न पूर्वछक्षणमुदिश्य-"अहं लताया सदशीत्यखर्व गौराङ्गि गव न कदापि याया । गवेषणे- नालमिहापरेषामेषापि तुल्या तव तावदस्ति॥" इत्यम्रान्योन्यप्रतियोगिकरवविशिष्टाया उपमायास्तनुश्वादिरूपैकधर्मप्रयोज्याया. शकत्या बोधनादुपमेयोपमात्वापतेः। न चेदं लचयमेवेति वाध्यम्? उत्तरोपमाया गर्वमान्ननिरासरपतवेन तृतीयसहशव्यवच्छेदरूपक फलस्याभावात्, तस्येव तज्जीवितत्वाद। अन्यथा परस्परोपमानिवारणप्रयासवैयर्थ्यापते- रिति रसङ्गाघरकृता दूषणमभिहितम्। तन् विधेयेति विशेषणाध्याहा रेणात्र गवेषणनिषेध स्यैव विधेयतया एषापीत्याद्युपमाया विधेयत्वाभावेन दोषाभावात्।

अथोदाहरणानि। तन्र धर्मस्य साधारण्ये यथा- (चित्र०)

खमिव जल जलमिव ख हंसश्चन्द्र इव हंस इव चन्द्रः । कुमुदाका रास्तारास्ताराकाराणि कुमुदानि॥

नन्दि' इत्यादि। इयं प्रतीयमानसाधारणधर्मा। वाच्यसाधारणधर्मा यथा-'सुगन्धि नयना-

यथा वा- गिरिरिव गजराजोऽय गजराज इवोच्चकैविभाति गिरिः। निर्फर इव मद्धारा मद्धारेवास्य निर्भरः स्रवति॥

Page 211

उपमे योपमानि रूपणप्रकरणम् १७१

अत्रोवमे योपमाट्वयस्य पररपरानुगृनीतत्वेन विच्छत्तिविशेपोऽधिक:। वस्तुप्रतिचरतुभावो यथा-'सच्छायाम्भोजवदना' इत्यादि। इदं वस्तुप्रतिवरतुभावस्य विम्बग्रतिबिम्वविशेषणत्वे उदाहरणम्।

(भारती) उपमेयोपमा प्रथमत दो प्रकार की है। एक व्यक्तधर्मा-जिसमे समानधर्म व्यज्ना से श्ान हो अर्थाव लुप्त हो। दूसरी वाच्यधर्मा-जिसमे समानधर्म स्पष्ट अन्दों में लिसा हो। प्रथम व्यक्त- धर्मा का उदाहरण है - जल आकाश के समान हो रहा है और आकाश जल के समान हो रहा है। इस चन्टमा के समान हो रहा है और चन्द्रम। हस के सनान हो रहा है। कुमुद तारे की तरह हो रहे है और तारे कुमुद की तरह हो रहे है। इस उदाहरण में निर्मलत्वादिधर्म की व्यजना व्यङ्ञचतया व्यक्त है। अतः यहा व्यक्तधर्मा उपमेयोपमा अलद्वार है।

वाच्यसाधारण धर्म के सदाहरण। जैसे- 'सुगन्ध युत् नेत्रानन्दजनक और मदिरा के मद से नाम्रवण तुम्हारा मुख कमल की तरह है और कमल तुम्हारे मुख की तरह है।' यहाँ सुगन्धादि धर्म की मुखादि वृत्तित्व में सम्वन्ध ऐक्य से अनुगामित्वात्मक साधारण धर्ग वाच्य है। इसी प्रकार वाच्य साधारण धर्म का दूसरा उदाहरण। जसे-यह गजराज पर्वत की तरह अत्युच्च होने के कारण शोभ रहा है और यह पर्वत अत्युच्च होने के कारण गजराज की तरह शोभ रहा है। इसकी मदधारा निर्झर की तरह प्रवाहित है और पहाड का निर्दर गजराज की मद्धारा की तरह प्रस्त्रवित है। यहाँ सर्वनाम के परामर्ग से गज का प्रकृतत्व है। 'उच्चक.' और 'स्रवति' इन दोनों में साधारण धर्म रहने के कारण यह वाच्यधर्मा उपमेयोपमा का उदाहरण हुआ। यहाँ उपमेय और उपमान दोनों की परस्पर अनुग्राहकता से प्रथम विशेप के भेद से वस्तुप्रतिवस्तु भावकृत साधारण धर्म का उदाहरण देते है। वे दो प्रकार के हैं-(१) विशेषण रूप से और () विशेष्य रूप से। उनमें प्रथम वस्तु प्रतिवस्तु रूप विशेपण का उदाहरण देते है .- 'सच्छायाम्भोजवदना' अर्थात शोभा सम्पन्न कमल ही हे मुख जिस नारी का, उसी की तरह जोभनी है। यहाँ 'वटन' और 'कमल' में विम्बप्रतिविम्त माव है उसमें ओोमारूप जो एक धर्म है, वह बन्तु- प्रतिवस्तु भाव रूप विशेपण से निर्दिष्ट है।

(सुधा) अथोदाहरणानि-तम्रोपमेयोपमा द्िविधा-व्यक्तधर्मा, वाध्यधर्मा घ। तन्न व्यक्- धर्मा यथा-'खमिव' इति शरद्वर्णने पद्यमिदम्। जल समिव, ख जलमिव, चन्द्रो इस इव, हंसश्चन्द् इव, तारा कुमुदाकारा कुमुदानि ताराकाराणि-इत्यन्वय। ह निर्म्मल- स्वादिघर्मस्य व्यक्षनाव्यसयतया व्यक्तधर्मा। द्वितीया यथा-'सुगन्धि नयनानन्दि' इश्येव। अस्य एवोदाहरणम्-गिरिरिति। अयं गजराजो गिरिरिव उचवकेविभाति, गिरि-

Page 212

१७२ चित्रमीमांसा

गंजराज हष उप्बकैर्विभाति, अस्य मदधारा निर्झर इव स्रवति, निर्झरो मदधारेव स्रवती- त्यन्वयः। अश्र सर्वनामपरामर्शेन गजस्य प्रकृतावम्। अन्नोंचकेः स्रवतीश्युभयत्र धर्म सत्वाद् वाच्यधर्मा। उपमेयोपमाइवयस्य परस्परमनुप्राहकत्वात् पूर्वतो विष्छति, विशेषा चेद: वस्तुप्रतिवस्तुभावकृतं धर्मसाधारण्यमुदाहरति। तद् द्विविधम्-विशेषणतया, 1 विशेष्यतया वेति। आदा यथा-सच्छ्ायेत्यादि। अम्र वदनकमलयोः विम्बप्रतिबिम्व भावः। तस्य च सशोभतारूप एको धर्मो वस्तुप्रतिवस्तुभावरूपो विशेषणतया निर्दिष्टः। (चित्र०) तद्विशेष्यत्वे यथा- वक्त्र पद्ममिवैतस्या मेत्रं भृङ्गमनोहरम्। पद्मं वक्त्रमिवाभाति भृद्गलोच नभूषितम् ॥ एतानि पर्यायोपमेयोपमोदाहरणानि। (भारती) विशेष्य रूप से उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। जैसे- इसका मुख कमल के सदृश है और आँखें भौरों की तरह हैं और भौरे की तरह आँखों से युत इसका मनोहर मुख कमल की तरह शोभ रहा है। कमल भौरे की तरह कजरारी आँखों से युत मुख की तरह शोभ रहा है। पर्याय उपमेयोपमा के ये सभी उदाहरण हैं। (सुधा) विशेष्यतया यथा-वक्त्रमिति। एतस्या मुखं पर्द्मामव नेन्ने मृद्गाविव ताभ्यां मनोहरं वक कमलमिवाभाति। कमलं भृर्गाविव लोचने ताभ्यां मनोहरं मुखमिध आभातीत्यन्वयः। अम्र भृंगनेन्रादीनां विम्वप्रतिबिम्वभावः। तस्य घ भानरूप एक एव वर्मो विशेष्यतथा प्रोक। एतेषामुदाहरणानां पर्यायोपमेयोपमात्वं बोध्यम्। (चित्र०) युगपदुपमेयोपमोदाहरणं तु-'तद्वल्गुना युगपदुन्मिषितेन' इत्यादि। तत्रापि यथासम्भवं पूर्वोक्ता भेदा उन्नेयाः । इति चित्र मीमांसायामुपमेयोपमाप्रकरणम्।

(भारती) युगपद् उपमेयोपमा के उदाहरण। जैसे- इस लक्ष्मी के स्वीकार करने से जो सुन्दर-साथ ही साथ एक ही क्षण में आँखों का खुलना और कमलों का खिलना-ये दोनों व्यापार है। उनसे शीघ्र उसी क्षण में दोनों ही परस्पर एक दूसरे की बराबरी प्राप्त करें। वे दोनों कौन? एकतो भीतर कुछ कुछ चलती हुई चिकनी काली

Page 213

उपमेयोपमानिरूपणप्रकरणम् १७३

पुतलियों वाली तुन्हारी आँसें और दूसरे मीतर बुछ कुछ चलते हुए भौरों से शुक कगल, अर्थाव साथ ही ताय सुलने और सिलने से आँगों की और कनलों की पूर्ण रप मे समानता हो जायेगी। अर्थात ओखे सोलें-कगल खिल रहे ह। इत्यादि। इतना कहने के बाद भी यबा समब पूर्वाक्त भेदों को समझना चाहिए। चिमर्श-दीक्षित जी की 'चित्रगीमासा' में लिसित 'उपमेयोपमा का यह लक्षण तथा उनकी इतनी परिष्कृत व्यारया के वावजद पण्टितराज जगन्नाथ को क आपत्तिया है। सर्वप्रथम उन्होंने लिखा है कि दीक्षित जी के उत्त लक्षण के अनुसार तो- अहंलतायाः संदशीत्यसर्व गौरागि गर्वम् न कदापि याया। तावदुस्ति ॥ अर्थात् हे गौरादि। मैं लता के समान हू। इस तरह का महान गर्व तुम कभी न करना। क्योंकि इसके लिए किसी दूसरे को हॅटने की आवश्यकता नही है। यह लता ही तुन्दारे समान है। तात्पर्य यह है कि यह लता तो अनायास ही तुन्हारे सदृत निकल आयी और यदि इस तुल्ना को खोजा जाय तो पता नही कितनी ऐसी वन्तुऍ सामने उपस्थित हो जायें। इस उदाहरण में भी उपमेयोपमा अलद्वार होने लगेगा। क्योंकि यहा भी परन्पर की प्रति- योगिना सहित उपना 'कृमता' आदि एक धर्म से सिद्ध और अभिधारुपी एक वृत्ति से वोधित होती हैं। यदि यह कहा जाय कि उत्त उदाहरण में कथित 'लताया सदशी' तथा 'तुल्यातव' इन पर्टा से 'गौगादि' आदि शव्दों में ता आदि से सम्बन्ध रखने वाले सादृव्य का आश्रय होना ही प्रतीत होता है, प्रतियोगी होना नहीं। तो इसका उत्तर यह है कि-ऐसा कहने से लक्षण की- 'मुखस्य सदशश्चन्द्रश्नद्रस्य महयंमुसम'इस उपमेयोपमा में अतिव्याप्ति दोप होगा। क्यों कि पूर्व कथित बानों की यहा भी उपस्थिति के कारण उपमेयोपमान हो सकेगा। अत. ऐसे स्थलों के लिए विवश होकर यह स्वीकार करना पडेगा कि-गव्दत. प्रतियोगिता के प्रतीत न होने पर भी अर्थत उसकी प्रतीति हो जाती है। ऐसी दगा में दीक्षित जी के लक्षण के अनुसार उक्त उदाहरण में उपमेयोपमा का होना अनिवार्य हो जाना है। अगर यह कहा जाय कि उपर्युक्त उदाहरण में उपमेयोपमा मान लेने पर विवाद समाप्त हो जायेगा तो ऐसा भी नहीं कहा जा सकता है। क्यों कि उक्त उदाहरण के उतराज की उपमा में तो केवल गर्व हटा देने में है-इससे तो तीसरे सदृश की निवृत्ति का प्रनिपादन नहीं होता। अतण्व 'और भी तेरे समान है ही, पर-उनके खोजने से क्या फल ?' इस अर्थ का प्रतिपादक उत्तरार्य सगत होता है। अन्यथा वह असगत हो जायगा। इतना ही नही तृतीय सदृश पदार्थ की जव नक निवृत्ति नहीं हो जाती तव तक उपमेयोपमा भी तो नहीं हो सकती? यदि यह कहा जाय कि तृतीय सदृश की निवृत्ति जहा हो, वहीं उपमेयोपमा होती है तो इसका उत्तर यह है कि तृतीय सदृश पदार्थ की निवृत्ति ही उपमेयोपमा का जीवन है। जहाँ वह न हो, वहाँ उपमेयोपमा होती ही नीं-यह आल्क्वारिकों का सिद्धान्त है। स्वय दीक्षित जी ने भी 'भुवस्तलमिवष्यो मं कुर्वन्' इत्यादि रघुवश के शेक में उपमेयोपमा के निवारण का यत किया ह-वही यर्थ हो जायेगा। यदि आप 'अतलताया' इत्यदि पूर्वोक्त उदाएरण में अतिव्याप्ति टोप निवारण के लिए

Page 214

१७४ चित्रमीमांसा

तृतीय सदृश की निवृत्ति जिसका फल हो' यह विशेषण और लगा देगे तो आपकी उपमेयोपमा के लक्षण के सारे अन्य विशेषण व्यर्थ हो जायेंगे। क्यों कि अन्य विशेषणों के माध्यम से आप जिन सारी बातों को हटाना चाहते ये वे सभी केवल इसी एक विशेषण से हट जायेंगी। दूसरी बात यह भी है कि दीक्षित जी के लक्षण में जो यह कहा गया है कि-'परस्पर की प्रतियोगिता सहित उपमा एक वृत्तिमात्र से बोधित होनी चाहिए' यह कथन भी स्वत. अयुक्तिकर हो जायेगा। क्यों कि 'खमिव जलम् जलमिव खम' इस उपमेयोपमा में आकाश और जल का जो सादृध्य के साथ अन्वय होता है, उसमें प्रतीत होने वाली प्रतियोगिता ससर्ग रूप है। अतः वह किसी वृत्ति से प्रतिपादिन नहीं होती। क्यों कि वृत्ति द्वारा ज्ञात होने वाले पदार्थो का ससर्ग वृत्ति द्वारा ही ज्ञात नहीं होता-यह एक आलद्कारिक नियम है। अर्थात् पदार्थो का वोध ही वृत्ति द्वारा होता है, न कि पदार्थों के सम्बन्धों का। अन्यथा सम्वन्ध भी विशेषण रूप हो जायेंगे जो कि सवया सिद्धान्त के विरुद्ध होगा। अत यदि 'प्रतियोगिता सहित उपमा का एक वृत्ति मात्र से बोधित होना' आप स्वीकार करेगे तो 'खमिवजलमित्यादि स्थल में भी उपमेयोपमा न हो सकेगी। ये सारे आक्षेप हैं। अव विचारणीय प्रश्न यह है कि पण्डित जी के इन आक्षेपों में कितने तथ्य हैं ? सर्वप्रथम उपमेयोपमा अलद्कार का उल्लेख आचार्य भामह ने किया। दण्डी ने इसे स्वतत्र अलकार के रूप में स्वीकृत न कर उपमा का एक भेद के रूप में ही इसे माना। इसके बाद उद्भट, वामन, मम्मट, रुय्यक, शोभाकर, विद्याधर, विद्यानाथ, जयदेव, विश्वनाथ, दीक्षित तथा जगन्नाथ प्रभृति ने अपने-अपने ढग से इसका विवेचन किया, जिन विवेचनों के आधार पर उप- मेयोपमा की ये प्रमुख विशेषताऍ है .- इसका अर्थ है उपमेय के द्वारा उपमा। अर्थात उपमान के तिरस्कार को ही उपमेयोपमा का आधार माना गया है। उपमेय और उपमान का कथन जिन दो पदार्थो मे किया जाता है, उस की समानता के लिए तीसरी वस्तु उपयुक्त नही हो पाती। क्यों कि इसमें दो पदार्थो का पर्याय से उपमान और उपमेयत्व का वर्णन किया जाता है। फलत. इस अलकार में दो वाक्य होते हैं- प्रथम, उपमेय को द्वितीय वाक्य में उपमान एवं प्रथम उपमान को द्वितीय वाक्य में उपमेय बनाया जाता है। इसमें तृतीय सदृश की निवृत्ति होती है। क्यों कि इसमें उपमेय ही उपमान बनता है तथा उपमान ही उपमेय बन जाता है। इसमें उपमेय की उपमा उपमान से की जाती है, और उपमान की उपमा उपमेय से। क्यों कि औपम्य निर्वाह के लिए तृतीय पदार्थ की आवश्यकता पडती ही नहीं। मुख्यत. कवि जब किसी पदार्थ के गुण या धर्म को दूसरी जगह खोजते हुए अन्य अर्थात् उपमान में प्राप्त कर लेता है तव अन्य पदार्थो का 'सादृश्य सम्बन्धी क्षेत्र' इनके क्षेत्र से अलग हो जाता है। इस प्रकार पहली वस्तु का साम्य दूसरी वस्तु के साथ सहज ही स्थापित हो जाता है। किन्तु, जव उसे द्वितीय पदार्थ अर्थात उपमान के समान अन्य पदार्थ की खोज करनी पडती है तो निराश होकर अन्तत. उसे उपमेय या प्रथम पदार्थ की ही शरण लेनी पडती है। अत' कवि को ऐसी स्थिति में अगत्या यह उद्घोषित करना पढता है कि उपमेय के सद्दश उपमान है और उप- मान के समान उपमेय। कवि की इसी मान्यता से उपमेयोपमा की उत्पत्ति होती है। उदाहरण के लिए-'कमलेवमतिर्मतिरिव कमला' इस वाक्य को रक्खा जा सकना है। यहां

Page 215

उपमेयोपमानिरूपणप्रकरणम् १७४

कमल अर्थात् लध्मी और मति को एक दूसरे का उपमान और उपनेय बनाया गया है। क्या कि कवि का औपम्य निर्वाह 'कमला' और 'मनि' तक ही सीमित रहना है और इसमे जागे य बाी पाना। अतः यहा उपमेयोपमालकार होता हं। पण्टितराज ने 'अह लता या सटशीत्यादि' उदाहरण में परन्पर की प्रतियोगिता नन्नि उपमा 'कशता' आदि एक धर्म से सिद्व और अभिवान्पी एक वृत्ति से बोधित कहवार, वीक्षिन जी के लक्षण को जो अतिव्याप्ति दोप दुष्ट कहा है-उसमें तथ्य नहीं प्रनीत रोता। क्यों कि उक्त उदाहरण की दो वस्तुओं में उपमानोपमेय भाव का यथा कथचट पर्णायन परिवर्तन नान भी लिया जाय तो भी यह उपमेयोपमा का उदाहरण नहीं हो सकना। क्यों कि एसका उद्टेव्य उदमा- नान्तर तिररकार नहीं अपितु 'लता के समान' और 'तेरे समान' में सादट्य रूप सवेगों के कारग मन की भावना का प्रदर्शन है। उपमेयोपमा में भी माधारण धर्म की एवार्पना और विन्वप्रनि- विन्ब तथा वन्तुप्रतिवन्तु रूपता की सभावनायें मगत ह। साधारण धर्म की प्कारूपना नें उप- मेयोपमा का दीक्षित जी का यह उदाहरण एक सुन्दर निदर्शन हैं। 'रविरिबजलं जलमिवयम' (इस उदाहरण की व्याख्या हो चुकी हे) यहा यह स्पष्ट है कि सर्वत्र उपमेय और उपमान मे विमलता का धर्म एक रूप का ही प्रतीत हो रहा है। इसी प्रकार साधारण धर्म की वन्तुग्रतिवस्तुरूपता की अवस्था में उपमेयोपमा का दीक्षित जी का 'सच्छायान्भोज' इत्यादि उदाहरण नी दर्शनीय है। इतना ही नहीं पण्टित जी द्वारा ग्वय उदाहृत यह मूक्ति भी-'रमणीयस्तवकयुता' इत्यादि भी विशेप रूप से व्यातव्य है। या परस्पर वस्तुप्रतिवस्तु भावापन्न 'रमणीयता' और सुन्दरता रूपी विशरेषणों तथा युक्त्ता जोर शोभा रूपी विशेष्यों से सम्पुटित पुष्पों के सुच्छे और स्तनरूपी धर्म परस्पर विम्वप्रतिदिन्ब नाव पन्न है। यहा जो उपमेयोपमा का स्वरूप स्पष्ट रूप से झलक रहा है उसे कहा ले जायेंगे। इतना ही नही-पण्डितजी ने 'प्रतियोगिता सहित उपमा का एक वृत्ति मात्र मे वोवित होना' कह कर 'खमिव जलम्' इत्यादि में उण्मेयोपमा का खण्टन किया है-उस सण्टन का खण्डन नागेश भट्ट के शब्दों में भी दर्शनीय है-'एक वृत्ति से वोधिन होने का अर्थ ह्-अन्य किसी वृत्ति से वोधित न होना, अत इस उदाहरण मे किसी प्रकार का दोष नही है। छये कि ससर्गों का बोध अन्य किसी वृत्ति से नही होता। इति चित्रमीमासाया 'भारती' हिन्दीव्याख्यायामुपमेयोपमाप्रकरण समाप्तन्।

(सुधा) युगपदुपमेयोपमोदाहरणं तु 'तह्रगुना' इत्यादिरूपं वोध्यम। उदाहरणान्युप- संहरति-तत्रापीति। पूर्वोकका भेदा धर्महृताः, शर्यार्थीत्वकृतान्व। यथासम्भवमिति। ते य्यथा-तन्नानुगामितया यथा- "वन्नयनमुत्पलमिव रवन्नयनमिषोरपलं कान्ते। चिदुम हष खदरस्तवदघर इव विद्ुमः शोण:।" पूर्वा आर्थ, उत्तरार्धे शाव्द इति भेद:।

Page 216

१७६ चित्रमीमांसा

उपचारो यथा- "अचला हष विद्वांसो विद्वांस इव अघला गुरवः। शास्त्राणि तोयनिधिवत्तोयनिधि: शास्त्रवह्वहुगम्भीरः।।" इति। अम्र गुरुत्वगम्भीरत्वयोर्विह्वच्छ्ान्त्रेषूपचारः। समासभेदो यथा- "उल्लसितकुसुमहस्ता रमणीयस्तवकवक्षोजा। वविलिरिध वामनयना विभाति वल्ली च वामनयनेव।" श्लेषो यथा-

आकाश इव समुद्रः समुद्र इव सोऽयमाकाशः।" पूर्वपादे शव्पश्लेष:, द्वितीये त्वर्थश्लेष इति विशेषः। इयं द्दनिरूपापि- "संसार सिन्धावनुविम्बमात्रं -जागर्ति जाने तव वैरिसेनिः। विम्बानुबिम्बौ हि विधाय धातुनं जातु दष्टातिसरूपसृष्टिः।" दोषा अप्यत्र ये उपमाप्रोक्ाः ते सर्वे वोष्याः। अयमस्या विशेषो छोष :- एकम्र श्रौती, अपरत्नार्थीति। यथा- 'कमलेमिव वदनमस्या वदनेन समं तथाकमलस' इति। पूर्णालुप्तादयो भेदा यथायर्थ वोध्या:, लेशत उदाहरणमपीति दिक्। उपमेयोपमाध्ये कृतं व्याख्यानमुत्तम। धरानन्देन टीकायां सुधायामाप पूर्णताम्॥ इति भरतपुरनिवासिनो वसिष्टगोत्रीय-मिश्ररामबलस्य सुतेन घरानन्देन कृतार्यां चित्रमीमांसाव्याख्यायां सुधाख्यायाम् उपमेयोपमालंकार प्रकरणं समाप्तम्।

Page 217

अथ अनन्वयनिरूपणम्

एकस्यैवोपमानोपमेयत्वेऽनन्वयो मतः।

(भारती) अनन्वय वह अलक्वार है, जिसमें एक ही वस्तु एक ही औपम्यप्रतिपादक वा्य में उपमान और उपमेय दोनों रूपों में प्रतीन होती है। विमर्श-अनन्वय शब्द की व्युत्पत्ति है-'न विद्यतेऽन्वय. सम्वन्धः उपमानान्तरेण चन्र सोऽनन्वय. ।' अर्थात् किसी उपमेय का अपने से मिन्न किसी उपमान से साधारणघर्मत्व रूप सम्बन्ध का न रखना। साराश यह कि किसी प्रकार के भेद के अभाव में भी भेदमूलक सादृध्य का उपचार करके जहाँ एक ही वस्तु में उपमानोपमेयभाव प्रतिपादित किया नाय, जिससे यह प्रतीत हो कि उसके सदृश अन्य कोई वस्तु नहीं और न तो उसका कोई अन्यन्न साधर्म्य है, तो वहा जो अलद्वार होता है-वह अनन्वय है। अर्थात जहां उपमेय की किसी अन्य उपमान से समता नहीं प्रदर्शित की जाती तथा अपने से अनिरिक्त किसी अन्य उपमान का निषेध किया जाता है। निष्कर्पस्वरूप हम कह सकते हैं कि अपने से ही अपनी उपमा रसना अनन्वय है। इस अलद्वार में अनुभृति की सान्द्रता के कारण कवि कल्पना क्रियाशील नहीं हो पायी है। इसमें उपमेय के प्रति कवि की आस्था अत्यन्त दृढ होती है। अतः उपमेय के सदृश कवि अन्य किसी पदार्थ की कल्पना ही नही कर पाता है। फलत इसमें उपमेय स्वय उपमान वनकर अन्य उपमानों का निराकरण कर देता है। उपमा का सौन्दर्य तो साम्य की प्रतीति में है। किन्तु, अनन्वय का चमत्कार अन्य उपमानों से साधर्म्यसम्बन्ध के व्यवच्छेद में हैं। फलत उपमा में उपमान और उपमेय का वास्तविक भेद और अनन्वय में आहार्य भेद होने के कारण दोनों का चमत्कार अलग अलग हैं। (सुधा) एवमुपमितिक्रिया निप्पत्तिसरवेनोपमादिशेपरूपामुपमेयोपर्मा निरुष्य तदभाववत्वेनो- पमाति रिक्तमनन्वयं निरूपयितु प्रतिजानीते-अथेति। उपमाविशेषोपमेयोपमाक्थनानन्त- रमित्यर्थ। तस्य प्राचीनोंक्तं लक्षणं प्रथम प्रतिपाद्यति-एकस्येवेति। एकस्येघोपमानरव- मुपमेयत्वं चेन्नवति, सोऽनन्वय इत्यर्थ.। (चित्र०) एवकारबलादेकस्यामेवोपमितिक्रियायामिति गम्यते । तेनोपमेयोपामायां रसनोपमायां च नातिव्याप्तिः। उदाहरणम्-'गगनं गगनाकारं सागरः साग- रोपमः ।' अय प्रतीयमानधर्मः । निर्दिष्टधर्मो यथा- न केवलं भाति नितान्तकान्तिनितम्विनी सैव नितम्चिनीव। यावद्विलासायुघलास्यवासास्ते तद्विलासा इव तद्विलासाः ॥ १२ चित्र०

Page 218

१७= चित्रमीमांसा

(भारती) लक्षण में 'एव' पद के सन्निवेश से एक में ही उपमितिक्रिया में वैसा वर्णन होता है। फल- स्वरूप इससे उपमेयोपमा के 'खमिव जळं जलमिच खम' इस उदाहरण में तथा रसनोपमा के 'भणितिरिव मतिः सतिरिव चेष्टा' इस उदाहरण में अनिव्याप्ति दोष नहीं होता। क्योंकि एक ही उपमिति क्रिया का दोनों जगह अभाव है। उदाहरण कथन के द्वारा अनन्वय के दो भेद वताते हैं। प्रथम मेद है 'प्रतीयमानधर्म' और दूसरा भेद है 'निर्दिष्टधर्म'। प्रथम प्रतीयमानघर्म का उदाहरण देते हैं। जैसे- 'आकाश आकाश की तरह ही सुन्दर है और सागर की उपमा सागर ही है। इसी प्रकार राम और रावण का युद्ध राम और रावण के युद्ध की तरह ही है।' इस उदाहरण में एक ही गगन उपमानत्व और उपमेयत्व दोनों है। गम्भीरता और दारुणतारूपी धर्मों में वाच्यता के अभाव से प्रतीयमानधर्म की ही विवक्षा है। इसी प्रकार निर्दिष्टवर्म के उदाहरण। जैसे- 'परम सुन्दरी वह नितम्बिनी उसी नितम्बिनी की भाँति अर्थात् अपनी ही तरह सुन्दर ही नही लगती, बल्कि इसमें कामदेव थिरक रहा है, ऐसे उसके हावभाव भी उसी के विलास की भाँति है।' यहाँ 'वह नितम्बिनी अपने ही समान है और उसके हाव-भाव भी उसी के हाव-भाव के समान है' यह प्रतीति अनन्वय में उपमानान्तर सम्वन्धाभाव की प्रतीति है, जिसके कारण यहां अनन्वय अलकार है। यहा प्रकाशन रूप धर्म की शक्ति के द्वारा प्रतिपाद्यत्व से निदिष्ट धर्मता है। (सुधा) प्वेत्यस्य प्रयोजनमाह-एवकारवलाद्दिति। एकस्यामेवोपमितिक्रियायां तादशवर्णन- मित्यर्थः। तत्प्रयोजनमाह-तेनेति । उपसेयोपसायाम् 'खमिव जलं जलमिव खम' इत्यादिरूपार्या रसनोपमायाम 'भणितिरिव सतिर्मतिरिव चेष्ा' इतिरूपायाञ नाति- व्याप्तेः, एकस्या एचोपमितिक्रियाया उभयत्राप्यभावादित्याशयः। उदाहरणकथनद्वारा तहिभागमाह-उदाहरणमिति। 'गगनं गगनाकार सागरः सांगरोपमः। रामरावणयोर्युंदं वामरावणयोरिव ॥' इति पदयशेषः। अन्रैकस्येव गगनादेरुपमानत्वमुपमेपत्वव्। 'अश्र वैपुश्यगाम्भीर्यदारुण्वानां धर्माणां वाच्यतवाभावादस्य प्रतीयमानघर्मरवम्। निर्दिष्टधर्मो यथा-न केषलमिति। नितान्तकान्तिः सा नितम्बिनी एव केवलं नितग्विनीघ न भाति, यावद्विलासायुध: काम:, तस्थ कास्थं नृत्यं तव्निवासास्ते तस्या विलासास्तद्विलासा इष भान्तीत्यन्वयः । अन्र प्रकाशनरूपधर्मस्य शक्त्या प्रतिपाद्यतवात्तिर्दिष्टधर्मत्वम। अम्र धर्मस्यानुगामित्वमेव, न विम्वप्रतिषिम्बभावापपता। तथाघर्मोको किस्विद् धर्मावच्छिषेन सर्वेन धर्मानतरावच्छ्िसे स्वस्मिन् साहमान्वये बाधकाभावादुपमात्वापत्तावनन्वयस्य विलोपापतेः। अनन्वयोऽपि दविधा-पूर्णो लुप्तक्ष। पूर्णं उपमावदेव षढुविभः। यथा-'गङ्गा हद्ा यथा गङ्षा गङ्गा गाङ्गेव पाधिनी । हरिणा सदशो बन्धुर्हरितुल्यः परो हदिः॥ गुरुवद्गुरु राराध्यो गुरुवद्गौरवं गुरोः ।' इस्यत्र षड्विधोऽपि पूर्णोऽनन्वयो दर्श्षितः। लुप्तेऽपि पश्- विधो धर्मलोप., यथा-'गह्ा सुवि यथा गझ्मा गहा गङ्गेव दृश्यते। हरिणा सदशो लोके हरिसुष्यस्तथा हरिः ॥ गुरुचद् गुयरत्रास्ति गुरुवहृतते गुरो:।' वाधकलुसो यथा-'रामाय' 'माण: श्रीरामः सीता सीतामनोहरा।' इर्यत्र वाचकलोपः क्यड्समासयोः। 'छक्कपुरादति- --

Page 219

अनन्वयनिरूपणप्रकरणम् १७६

तर्श कुपितः फणीय निर्गत्य जातु पृतनापतिसम्परीतः। क्रुद्ं रणे सपदि दाशरथिं दशाम्यः संरधदाशरथिद शंमहो ददर्श॥' एतस् कर्मणमुलि। एवं कर्तृणमुलादावपि। 'अम्बरयरय- उवरं यद्स् समुद्रोऽपि समुद्रति। विक्रमार्कमहीपाल तथा रवं विक्रमार्कसि ॥' कत्र धर्म- वाचकयोलोंप:। 'पतावति प्रपख्ेस्मिन् सदेवासुरमानुपे। केनोपमीयर्ता तज्ज्ञ रामो राम- पराक्रमः ॥' अम्र वाचकधर्मोपमानानां लोपः उपमानलुप्ताद्षीनामसम्भवाद,नहय्यरवाच नोदाहरणसम्भव इरयलम्। (चित्र०) ननु- पितुर्नियोगाद्वनवासमेवं निस्तीर्य रामः प्रतिपन्नराज्यः । धर्मार्थकामेपु समां प्रपेदे यथा तथवावरजेषु वृत्तिम्॥ इत्यत्रैकस्यैव रघुपतेरुपमानत्वमुपमेयत्व च, न च तन्रानन्वयः । समुच्चयो- पमया तस्य धर्मार्थकामेप्वनुजेपु च समवृत्तिमात्रस्यैव प्रतिपाद्यतया सद्शान्त- रव्यवच्छेदे तात्पर्याभावात्। तथा 'त्यच््यामि वैदेहसुतां पुरस्तात् समुद्रनेमि पितुराजयेव' इत्यत्राप्यस्ति स्वस्यवोपमानत्वमुपमेयत्व च। तत्रापि नानन्वयः। पितृनियोगात् क्षितित्याग इवापवादात् सीतात्यागे स सद्दशान्तरप्रसक्त्यभावेन तद्व्यवच्छेदस्य फलत्वायोगाच्च। (भारती) प्राचीनोक्त इस अनन्वय में दोप दिखाते हुए दीक्षित जी स्वय अपने लक्षण को स्पष्ट करने के लिए 'ननु' से उपक्रमक स्थापित करते हुए कहते हैं- 'इस प्रकार पिता की भाशा से वनवास समाप्त कर राज्य को पाये हुए राम ने धर्म, अर्थ औौर काम में तथा अपने छोटे भाइयों में समान रूप से व्यवहार करना प्रारभ किया।' इस उदाहरण में एक ही राम का उपमानत्व और उपमेयत्व भी ह। किन्तु, यहा अनन्वय नहीं है। समुच्चयोपमा से धर्मादि में और छोटे भाईयों में राम की समवृत्तिता मात्र के ही प्रति- पादन से द्वितीय सदृश निपेध में तात्पर्य का अभाव है। फलतः समुचय उपमा में अतिव्याप्ति होगी। इसके अतिरिक्त अन्य दोप भी दिखाते हुए रघुवश के १४ वे सर्ग के ३९ वा श्लोक उद्धृत करते हैं। 'उस अपयश को दूर करने के लिए फल को मालूम करते हुए भी नि.स्पृह छोकर पिता की आश्ञा से सम्पूर्ण पृथ्वी की तरछ सीता को छोड दूँगा।' यहा भी राम का ही उपमानत्व एव उपमेयत्व दोनों ही है। फिर भी यहा अनन्वयालक्गार नहीं है। क्योंकि यहा भी दूसरे सदृश के निपेध के तात्पर्य का अभाव है। यहां द्वितीय सदृश की प्रसिद्धि भी नहीं है। पिता की आाजा से राज्यत्याग में और निन्दा के भय से सीता के त्याग में अन्य सदश पदार्थ के अमाव से उसके निषेध के फल की समावना भी यहा नहीं है। (सुधा) स्वयं लक्षणं कर्तु प्राथ्ीनोंकं पूर्व लष्षणमव्याणण्य तिष्याप्त्यादिना दूपयति-नन्विति। पितुरिति। राम एवं पितुर्नियोगात शासनाद् वनवासस्य पु.वं निस्तीर्य, अनन्तरं प्रति

Page 220

१८० चित्रमीमांसा

पश्तराज्य: सन् धर्मार्थकामेषु वृत्तिर्यथा तथैवावरजेष्वनुजेषु समां वृत्ति प्रपेदे। इरयत्रैकस्यैव रामस्योपमानत्वमुपमेयत्वञ्चास्ति। तस्य लध्यत्वं वार्यति-न चेति । अनन्वयसवन् नास्ति, समुख्चयोपमया धर्मादिषु आ्रतृषु च रामस्य समवृत्तित्वमात्रस्यव प्रतिपाधतया

दूषणान्तरमाह-यचयामीति। 'तस्यापनोदाय फलप्रवृत्तावुपस्थितायामपि निर्व्पपेष: इति पूर्वार्धम्। तस्य वर्ण्यस्यापवादस्येत्यर्थ। अपनोदाय'फछप्रवृत्ती अपत्योत्पत्तावुपस्थि- तायां सत्यामपि निर्व्यपेक्ष: निस्स्पृह्ः सन् वेंदेहसुतां पुरस्तात् पूर्व पितुराज्ञया समुद्रो नेमिरिव नेमिर्यस्याः सा, तां भूमिमिव स्यच्यामीत्यन्वयः। अन्र सामस्येवोपमानस्वम्, उपमेयत्वम्। न चात्रानन्वयोऽस्ति, द्वितीयसरशनिपेघतारपर्याभावास्। पित्राज्ञया च्ितित्याग इवापवादात् सीतात्यागेऽप्यहं भवता न निषेद्ग्य इत्येतावति श्लोकस्य तात्पर्यसध्यास्। द्वितीयप्ताद्टश्यप्रसिद्धिरपि नास्तीत्याह-पितृनियोगादिति। पित्राज्ञया राज्यत्यागे, निन्दाभयात् सीतात्यागे च, अन्यस्य सदशपदारथस्याभावेन तव्निपेधस्प फल- र्वासम्भवा घ। (चित्र०) एवम्- उपाददे तस्य सहस्ररशिमस्त्वष्ट्र नवं निर्मितमातपत्रम्। स तद्दुकूलादविदूरमौलिर्वभौ पतद्रङ्ग इवोत्तमाङ॥ इत्यादावप्येकस्यवोपमानोपमेयभावः स्पष्टः। न चैतेपु कवचिद्धर्मादिषु वृत्तेर- वरजेपु वृत्तेश्रोपमानोपसेयभावः । अन्यत्र क्षितित्यागस्य सीतात्यागस्य चापरत्न गङ्गापतनस्य दुकूलसनिधानस्य च, न तु क्वचिदप्येकस्यैव धर्मिण उपमानोप- मेयभावः। विशिष्टान्वयिनोऽपि विशेष्यबोधे विशेषणसक्रमौचित्यादिति वाच्यम्, यथा धर्मार्थकामेषु समवृत्ति प्रपेदे तथाऽवरजेप्वित्यादिप्रकारेणैक्कस्यवोपमानो- पमेयभावे निबद्धेऽपि तस्य विशेषणसंक्रान्तिकल्पने 'पाण्ड्योऽयमंसापितलम्ब- हारः' इत्यादीनामपि हारनिर्मरादीनामेवोपमानोपमेयभावः स्यादिति बिम्ब- प्रतिबिम्बोदाहरणमात्रविलोपप्रसङ्गात्। (भारती) इसी प्रकार- 'सूर्य ने विश्वकर्मा से बनाया गया विवाहार्थ शकर का नूतन छत्र धारण किया, शिर के समीप छत्र के लटकते हुए पट से मालूम होता था मानो गगा ही गिर रही हों।' इस उदाहरण में भी शिव का उपमानत्व और उपमेयत्व रहने के कारण अतिव्याप्ति दोष है। पूर्व उदाहरण पर विचार करते हैं कि इन सवों में कहीं धर्मादिकों में वृत्ति है और कहीं छोटे भाइयों में वृत्ति रहने के कारण ही उपमानोपमेय भाव है। तत्त्व तो क्षितित्याग का है न कि कहीं भी एक ही धर्मी रामादिका है। इसी प्रकार क्षितित्याग और सीतात्याग की तरह ऊपर के उदाहरण में भी गगापतन और दुकूलत्याग का तत्त्व है। न कि कहीं एक ही धर्मी में उपमानोपमेय भाव है। विशिष्टान्वय करने पर अर्थात् विशेषण से संक्रमण के औचित्य से विशेष्यबोध में विशेषण

Page 221

अनन्वयनिरूपणप्रकरणम्

का सक्रमण होता है। फलत यहा किसी प्रकार के अतिप्रसग की कम्पना नहीं की जा सकती। फिर इसका समाधान करते है कि जैसे धर्म, अर्थ और कामों में समानयृत्ति है उसी प्रकार भाष्यों मे भी प्रकार से एक दी में उपमानत्व एव उपगेयत्व का निवन्धन है। 'विशनेषण सक्रमीचित्य' न्यायके स्वीकार करने पर 'पाण्ळ्चो्यमशापिंतलन्वरार' इस पूर्व व्याख्यात उदाहरण में-उसी उक्त न्याय से हार और निर्मरादिका उपमानोपमेयत्वापत्ति से विन्त- प्रतिविम्वभाव की विलयापत्ि होगी। (सुधा) दूपणान्तरमाह-एवमिति। 'उपाद्दे तस्य' इत्यादौ शिवस्थैवोपमानोपमेयता- सत्वादतिव्यापिः। अन्नाशकते-न चेति। धर्मादिपु वृत्तेरवरजेपु वृत्तेश्वोपमानोपमे- यभावः। ्षितित्यागस्य घ तत्वमस्तु, न तु क्वविदप्येकस्येव धर्मिणो रामादेस्तध्वमू, विशिष्य बोधे विशिष्टान्वयिनो विशेषणसक्रमस्याचित्या। तथा नातिप्रसुद्गपक्ेति पूर्वपक्षाभिप्रायः। समाघते-यथेति। यथा धर्मार्थकामेपु समा वृत्ति प्रपेदे, तथा त्राहृप्घ- पीत्यादिप्रकारेणैकस्यैवोपमानोपमेयत्वस्य निवदुख्वात्। न्यायाग्गीकारे दोपमाह-तस्य विशेष्यस्येश्यर्थः । तत्वे 'पाण्टयोऽयम' इस्यादी पूर्वोक्त्यायेन हारनिर्सरादीनामुपमानो- पमेयरवापत्या निम्वप्रतिचिम्वभावस्य विलयापत्ते.। (चित्र०) 'रामरावणयोर्युद्धम्' इत्यादावभेदेऽप्युपमानोपमेयभावमभ्युपगच्छतामाल- क्वारिकाणां विशेष्यबाधस्यापरिहरणीयत्वाच्च। तस्मादत्र 'सविशेषणे हि' इति न्यायोपन्यासो वाक्यमीमांसकानां शोभते, नालङ्कारमीमांसकानाम्। वाक्य- मीमांसका ह्यभेदे उपमानोपमेयभावनिर्देश एव नास्तीति मन्यमानाः 'रामरा- वणयोर्युद्धम्' इत्यादावद्यतनस्य पूर्वेद्युस्तनं युद्धमुपमानम्, एतत्कल्पगगनस्य कल्पान्तरगगनमुपमानमित्यादि कल्पयन्ति। तस्मादालङ्कारिकमते एतेष्वेकस्ये- वोपमानोपमेयभाव इति लक्षणमतिव्याप्तमिति चेत् ? (भारती) 'रामरावणयोर्युद्धम्' इत्यादि पूर्व व्याख्यात उपमेयोपमा के उदाहरण में-अभेद में भी उप- मानोपमेयभाव कहने वाले आलक्वारिकों के विशेष्य पदवोध का अपरिद्वार असभव होगा। अतः 'सविशेपणेहि' इस न्याय की मान्यता वाक्यमीमासकों के मत में ही है न कि आल्कारिकों के मत में। वाक्यमीमासक अभेद में उपमानोपमेयभाव मानते ही नहीं हैं। अत. वे 'रामरावणयो- र्युद्धम्' इत्यादि में भी आज के युग का पूर्व युग में हुए राम रावण का युद्ध उपमान है। इसी प्रकार इस कल्प के आकाश का कल्पनान्तर के आकाश उपमान है ऐसी कल्पना करते हैं। ऐसी स्थिति में आलक्कारिकों के मत में इन सवों में एक ही उपमान और उपमेय की सम्भावना से प्राचीनों का पूर्वोक्त लक्षण पूर्णत अतिन्याप्ति दोप ग्रस्न है। (सुधा) रामरवणयोरित्यादावभेदेऽपि उपमानोपमेयमावं वदतामालक्वारिकार्णं विशेष्यपद बोध्यस्यापरिदारासम्मवाद। तस्माछ 'सविशेषणे हि' इति न्यायो वाक्यमीमासकानामेव

Page 222

१८२ चित्रमीमांसा

मते, न त्वालक्कारिकाणाम् । वाक्यमीमांसका अभेदे उपमानोपमेयभावो नास्तीति मन्यन्ते। 'रामरावणयोयुंदूम' इस्यादावप्यद्यतनस्य पूर्वेध्यस्तनं युद्धमुपमानम्। एत- तकत्पीयगगनस्थ करपान्तर गगनोपमानमिति करूपयन्ति। तस्मादाळक्कारिकमते पतेष्वे-

(चित्र०) अन्न न्रम :- स्वस्य स्वेनोपमा या स्यादनुगाम्येकधमिका। अन्वर्थनामघेयोऽयमनन्वय इतीरित:॥ स्वस्य स्वेनेति विशेषणादुपमेयोपमायां रसनोपमायां च नातिव्याप्तिः। अनुगाम्येकधमिंकेति विशेषणादुदाहृतोपमाविशेषेपु नातिव्याप्तिः। यद्यपि तेष्वपि समां वृत्ति प्रपेदे इत्याद्यंशेऽनुगामिधर्मप्रवेश:'तथाप्येको न भवति। धर्मार्थकामावरजादिबिम्बप्रतिनिम्बभावकरम्बितत्वात्। अत एवैकग्र- हणमप्यर्थवत्। (भारती) इस प्रकार प्राचीनों के पूर्वोक्त लक्षण में दोष दिखाकर दीक्षितजी अपना लक्षण कहते हैं- 'यदि अनुगामी धर्म के आधार पर एक वस्तु की उपमा उसी वस्तु के साथ दी जाय तो वहां अन्वर्थक अनन्वय अलद्कार होता है।' स्व का स्व के साथ विशेषण से-'धर्मोडर्थः हव पूर्णश्रीः' इत्यादि उपमेयोपमा के इस उदाहरण में तथा-'भणितिरिव मतिः मतिरिव' इत्यादि रसनोपमा के उदाहरण में अत्तिव्याप्ति दोष का निराकरण होता है। यद्यपि 'तेष्वपि समां वृत्ति प्रपेदे' इत्यादि अश में अनुगामी धर्म है, फिर भी-वही एक नहीं है। क्योंकि धर्म, अर्थ और काम तथा अनुज आदि अश में बिम्बप्रतिविम्ब भाव है तथा यहां अनुगामी पद उपलक्षण परक है। उसी से दूसरे धर्म का ग्रहण मी शुद्धतापूर्वक ही है न कि अन्य मिश्रित रूप में। इसी अर्थ की ज्ञापना के लिए ही लक्षण में 'एक पदम्' का समावेश है। विमर्श-अप्पय दीक्षित ने 'चित्रमीमांसा' और 'कुवलयानन्द' दोनों ग्रन्थों में ही- अनन्वय अलक्कार का विवेचन किया है। कुवलयानन्द में एक ही. पदार्थ के उपमानत्व और उपमेयत्व वर्णित करने को अनन्वय कहा गया-है। अपने इस विचार को पल्लवित करते हुए दीक्षित जी ने कहा है कि यदपि एक पदार्थ स्वय अपना उपमान नहीं हो सकता फिर भी, कवि इसका-प्रयोग करता है। इस प्रकार का वर्णन कर कवि उपमेय की अनुपमता सिद्ध कर उपमेय के समान अन्य वस्तु का निराकरण करता है। चित्रमीमांसा का लक्षण इससे अधिक परिष्कृत एवं परिपक्क है।

एवं तक्चक्षणं दूषयित्वा स्वयं लक्षणमाह-अन्नेति । या अनुगाग्येकधर्मतः स्वस्य' (सुधा)

स्वेनोवमा स्याद्, स अनन्वय इति योजना। कीहज्ञोऽन्वर्थनामधेय इत्यन्वयः। 'धर्मोड्थ इव पूर्णश्ीः' इस्याधुपमेयोपमायाम, 'णितिरिव मतिः' इति रसनोपमायामतिव्या्ि

Page 223

अनन्वयनिरूपणप्रकरणम् १८३

बारणाय स्वस्य स्वेनेति। पुर्वोदाहृतमाचि केपेष्वतित्यासियारणयानुगा्येव धर्म्त हति। यरधयपि 'तेप्वपि समा वृत्ति प्रपेदे' हतयाधशेनुगामिधर्मस्तया न स पूवक, धर्मार्थेकमायर-

धर्मस्य शुक्तुतेव आद्य, न रवन्यमिश्रा। एतदर्थज्ञापनायेबेंकपदम। (चिन्न०)

अन्वर्थनामघेय इति तुन लक्षणान्तर्गतम्। किन्तु स्वेन स्वस्थोपमाप्यनु- गाम्येक्धर्मा चेदेवानन्वयो नान्यथेत्यत्रोपपत्तिमात्रपरम। धम्यैक्ये हि स्वरय स्वेनोपमा नान्वेतीत्यनन्वय इत्यन्वर्थ नाम भर्वात। अनन्वय्यर्थनिवन्धनवशा- धानुपमत्वद्योतनफलपर्यन्तं धावेत्। धर्मभेदे तु एकधर्मावच्छिन्नेन स्वेनैव धर्मान्तरारवच्छन्नस्य स्वस्योपमान्वेतीति, न तन्रान्वर्थ नाम न वानन्वय्यर्थनि- बन्धनाधीनानुपमत्वफललाभः। (भारती) लक्षण में 'अन्वर्थनामधेयोऽ्यमिति' विश्रेषण के समावेश का प्रयोजन वताते हुए कहने ह कि यह यदपि लक्षण के अन्तर्गत नहीं है, फिर भी लक्षण का नियमार्शक ह।उस नियम का आकार वताते ह-'स्व के साथ स्व की उपमा यदि अनुगतैक धर्मवती हो तभी अनन्वय होगा-अन्यथा नही।' धर्म की एकता में र्व का रव के साथ उपमा का जहा अन्वय न हो, वहाँ अनन्वय ह- यह यौगिक नाम होता है और, वह नाम अनन्वय रहने पर भी अर्थ की जो निदन्धन रचना है. उसके वल से अनुपमत्व धोतन रूप जो फल है, वहाँ तक तात्पर्य जाता है। धर्म्भैद में तो, विम्वप्रतिविम्वादि में एक धर्मावच्छेद से स्व के साथ ही धर्मान्तरावच्छिन्न का रव की उपमा का अन्वय से उपमा ही होती है, वहाँ अन्वर्थक अनन्वय नहीं है। अनन्वय अर्थ का जो निदन्धन ह, उसके अर्धान अनुपमत्व फल के लाभ का अभाव है। (सुधा) अन्वर्थे त्यामिविशेगणय प्रयोजनमाह-अन्वर्थनामधेय दृति। अस्य न एषणान्तर्गत- स्वम, किन्तु नियमार्थरवम्। ततियमाकारमाह-'स्वेन स्वस्योप माप्यदुगतैकधर्मवती पेस्षषेवानन्वयो नान्य्थेति। वर्मस्तैकतवे न्वरय रवेनोपमा नान्वेतीत्यन्वय इति यौगिव नाम भर्वात। तष्घ नामान- न्वयिनोऽप्यर्थस्य यननिबन्धन रघना, तद्लेनानुपमत्वच्योतनरूपं पस् फलं तर्पर्यन्तं तार्पर्य भार्वति। धर्मभेे विम्वप्रतिविभ्बाद।वेक्धमविरद्देदेन स्वेनैव धर्मान्तरावरिषभस्य स्वश्योपमान्वयादुपमेव। न तम्रान्वर्थोऽनन्वयः, अनन्वयर्थस्य यव्िषन्घनं तद्भीनानु- पमत्वफलला भस्या सतत्वार्च। (चित्र०) इदमनन्वयत्वप्रयोजकं लक्षणम्। लक्षणमात्रं तु 'यत्र तेनैव तस्य स्यात्' इति ामहोक्तमतुसंघेयम्। 'उभीं यदि त्योस्नि पृथक्त्रवाही इत्यातशयोि

इति विशेपणम्।

Page 224

१८४ चित्रमीमांसा

(भारती) अनन्वयत्व प्रयोजक सामान्य यह (उपर्युक्त) लक्षण है। लक्षण मात्र तो भामह के द्वारा उक्, यह लक्षण विचारणीय है-यत्र तेनैव तस्य स्यात्' अर्थात् जिस वाक्य में यह सिद्ध करने के लिए कि उपमेय के समान अन्य वस्तु नहीं है-अतः उपमेय की उसी के साथ उपमेयता और उपमानता कही जाती है। विमर्श-भामह के इस लक्षण में 'असादृश्य विवक्षा' के द्वारा अन्य उपमान का निराकरण किया गया है। इस लक्षण की मुख्यतः दो विशेषताएँ-यह हैं कि इसमें अन्य सदृश वस्तु या उपमान का निराकरण है। दीक्षित जी का कहना है कि भामह के उक्त लक्षण में 'तेनैव तस्थ' विशेषण का समावेश इसलिये किया गया है कि-'उसौ यदि व्योग्नि पृथक प्रचाही' अर्थात् आकाश गगा के जल के दोनों प्रवाह जिसमें अलग-अलग प्रवाहित हो रहे हो' इत्यादि में अनुपमात्वद्योतनफल साम्य कल्पना वाली अतिशयोक्ति के इस उदाहरण में अतिव्याप्ति दोष का निराकरण हो। (सुधा) लक्षणसुपसंहरति-इदमिति। अनन्वयत्वप्रयोजकं सामान्यं लक्षणमिदम्। लक्षण- माम्रन्तु मामहोकं विचारणीयम्। तदुकं लक्षणमाह-वत्रेति। यम्र वाक्ये, तस्य=वर्ण- नीयस्य, तेनैव=वर्णनीयेनेंध उपमेयोपमानता स्यात्, असादृश्यविवद्षया तमनन्वयं वदन्तीति योजना। 'उभौ यदि व्यो्नि पृथक प्रवाही' इत्यादायनुपमत्वद्योतनफलसाम्य- कल्पनावति अतिशयोकिविशेषेऽतिव्याप्तिवारणाय 'तेनैव तस्य' इति विशेषण बोध्यम्। स्यादेतत्-उपमैवेयं भवितुमहति, भेदकाभावात्। इवार्थभेदस्य स्वस्मिप्नसम्भवत्वरूपभेव- कन्तु न सम्भवति, न्यासज्यवृत्तिधर्माद्यवचछ्न प्रतियोगिताकभेदस्य स्वस्मिअ्नपि सम्भवाव घटपटोभयर्वा पच्छप्नप्रतियोगिताकभेदस्य घटादी इछर्वाच्च देशकालाविभेदवतः स्वस्प स्वस्मिन् सत्वाद्छ। न व 'चन्द्र इव मुखम्' इत्यम्र मुखे चन्द्रगतधर्मप्रतीतेः फलत्वम्, अनन्वये त्वन्यस्मिन् चन्द्रगतसादश्यप्रतियोगिश्वासावस्य फलत्वम्। तथा च फलभेद- स्येष भेदुकतवमिति वाध्यम्, चन्द्रे चन्द्रगतधर्मप्रतीतौ बाधकाभावाद। चन्द्रो न चन्द्रभिन्न इति बाघज्ञानस्येतत्कालिकचन्द्रस्तत्कालीनचन्द्रभिन्न इति बोर्षं प्रति

अन्नोष्यते-यदा 'एताकालीनश्न्द्ध: तक्कालीनपन्द्रधर्मवान्' इति बोधे उपमात्वमेव। 'चन्द्रवृत्तिधर्मवाँध्चन्द्रः' इति बोधे रवनन्वय एव। एतद्वोघस्य भेवभानेऽसम्भव्। तरमा- चछान्दबोधभेदस्यैव ततो भेदकत्वमितयालङ्गारिकार्णा सिद्धान्तः । ननु 'चन्द्र इव चन्द्र' इत्यादावारोपितभेदमादायोपमेवास्तु प्रामाणिकसम्मतत्वाद्। तथा हि-उत्तरमीमांसार्यां प्रथमाध्यायतृतीयपादे 'दहर उत्तरेभ्यः' इति सूत्रम। 'अथ यदिदमस्मिन् ब्रह्मपुरे दहरं पुण्रीकं वेश्म दहरोडस्मिन्नन्तराकाइस्तस्मिन् यदन्तस्तदन्वेष्टव्यं तन्भरावं विजिज्ञासित- व्यम' इत्यादि वाक्यं श्रयते। तम्न दहरम् अल्पमित्यर्थः। पुण्टरीकं तत्सन्निवेश हृदय- मिति.। तस्मिन् यो दहराकाशः, स किं भूताकाशो विज्ञानात्मा वा परमात्मा वेति संशय। आकाशब्रह्मपुर शब्दाम्यामाकाशस्य भूताकाशे परस्मिंश्व प्रयोगात्। उभयो: संशये भूता- काशे तस्य प्रसिद्धत्वाव तस्यैव दहरत्वम्। तस्य च दहरापेक्षया दहरत्वम। याान् वा अयमाकाशस्तावान् वा एषोऽतहंदय आकाशः, बाद्याभ्यन्तरकृतभेदस्य उपमानोपमेय-

Page 225

अनन्वयनिरूपणप्रकरणम्

भावमस्वादिति पूर्वपद्िणा समथितम्। तत्र मिहान्तभाष्यम्-यद्यप्याकाशो भूनाकाशे रूढ:, तथानि तेनेय तस्योपमानतोपपथत इति भूताकाशाशक्ठा निवतिता भवति। ननु घाद्याभ्यान्तरत्वकव्पितभेदेनोपमा नोप्मेय सिद्विरिति चेननअगतिका ीय गतियका्प निकभेदाथवणम् । अम्र वाघन्पतिमिश्रा'-'तेन तम्योपमेयत्व रामरावणयुद्धवत्। अगय्या भेवमारोप्य गर्ता तस्या न विद्यते ।' इति। व्याल्यातं तत्कवपतरुकार :- घस्त. नादतनरवादिना वा युद्धभेद: क्रियते। एवं विधे स्थले भेदारोपणमूलिकोपर्मैंवेति भवतां भेदविवच्ाभावेन न तत्समत्वम । किज्, 'तेन तु्यम्' इति पद्माध्यायसूते भाप्यप्रदीपे 'पयितेन तुक्यं शयितव्यमित्यत्र नाम्श्यत्रोपमानोपसेयभाव, यथा-गौरिव सौ: इति। येनैव हेतुना पको गौ., तेनापरोऽपीत्युपमानोण्मेयमावः इति कैयटप्रतिपादनविरेषश्रेति

न्वय इश्यम्र तद्विरोधाभावात्। उपमानोपमेयभावो नास्तीति कैयटोक्कार्वप सादश्यपर्य- वसानं नास्तीत्यर्थस्येव लाभाव। 'उपमानानि सामान्ययचन.' इत्यन्र यद्यप्युपसानोप मेययोरेक्यं तदा 'गौरिव गौ इत्यमप्युमानोपमेयभावः प्राप्नोतीति भाप्यस्थाप्येतद्- भिप्रायकत्वाच्। आरोपणभेदविवप्ाया लक्षणालभ्यत्वेन तन्िरयवाकाशसाम्यस्य ददरा धिकरणे निशकरणा्छ। तह्धपदशाच्वेत्यधिकरणे 'श्येनेन यजेत हत्यम्र गुणविधिपन्षे श्येनशब्दस्य पक्षिविशेपे निरूदतया तस्येव विधेयत्वापतती 'यथा श्येनो निपत्यादत्त, एव मयं द्विपन्त भ्रातृव्यमावत्ते' इश्युपमानोपमेयभावस्यासद्गत्वापसेः। सूत्रस्य स्वसादश्या भावादिति पूर्वमीमांसायामुक्त्तेक्वे्यलम्। (चित्र०) अयमनन्वयो व्यङ्ग चोऽप्यस्ति। यथा- अद्य या मम गोविन्द जाता त्वयि गृहागते। कालेनैपा भवेत् प्रीतिस्तवैवागमनात् पुनः॥ अन्न गृहागतं श्रीकष्णं प्रति विदुरवाक्ये इयं त्वदागमनप्रभवा प्रीतिर्वहुकाल- व्यवहितेन पुनरपि त्वदागमनेनैव भवेत, नान्येनेत्युक्तभद्गया त्वदागमनप्रभ- वप्रीतेः सैव सदशी, न त्वितरप्रभवेति व्यज्यते। एतादशव्यावृत्त्यर्थमनन्वया- लङ्गारलक्षणेऽव्यङ्ग यत्वविशेषणं पूर्ववद् द्रष्टन्यम्।

इति चित्रमीमांसायामनन्वयालद्कारप्रकरणम् ।

(भारती) यह अनन्वय व्यसय भी है। जते- 'हे गोविन्द। आज मेरे घर आपके आने से मुगे जो प्रसनता हुई ह-वह प्रसनना-किसी समय जब आप ही पुनः पधारेंगे तब एी दो सकती है।'

Page 226

१८६ चित्रमीमांसा

यह, घर पर आये श्रीकृष्ण के प्रति विदुर का कथन है। इसमें-यह आपके आगमन से उत्पन्न प्रसन्नता, बहुत समय के वाद, फिर भी आपके आगमन से ही हो सकती है, अन्य किसी वस्तु से नहीं। इस कथन के ढग से यह अभिव्यक्त होता है कि-आप के मागमन की प्रसन्नता के समान वही प्रसन्नता है, अन्य किसी वस्तु से उत्पन्न प्रसन्नता वैसी नहीं हो सकती।' इस प्रकार व्यङ्गथ अनन्वय के निराकरण के लिए लक्षण में अव्यङ्गयत्व विशेषण आवश्यक है। इसे पहले की तरह देखना चाहिए। चिमर्श-पण्डितराज जगन्नाथ ने दीक्षित जी के अनन्वय व्यङ्गच के 'अद्य या मम गोविन्द' इत्यादि उदाहरण का खण्डन करते हुए लिखा है कि यहा श्रीकृष्ण के आगमन से उत्पन्न प्रसन्नता की तरह पुन. उन्हीं के भागमन से उत्पन्न प्रसन्नता की प्रतीति सर्वजनसुलम है। इस कथन में किसी को किसी प्रकार की वाधा नही होती। आगमन से उत्पन्न प्रसन्नता एक सामान्य वस्तु हे और समय-समय पर उत्पन्न होने वाली दो प्रसन्नताए इसके अद्ग हैं। इन दोनों प्रसन्नताओं को दो विभिन्न समयों में उत्पन्न होने के कारण इन्हें भिन्न-मिन्न मानने में किसी भी प्रकार की वाधा नहीं है अत ऐसी स्थिति में उक्त उदाहरण की दोनों प्रसन्नताओं का सादृश्य बाधित नही कहा जा सकता और सादृश्य के वाधित हुए विना 'अनन्वय' शब्द का व्युत्पत्तिजन्य अर्थ यहाँ घटित होगा ही नहीं। फिर यहा अनन्वय कहना उचित नहीं है। उपमा प्रकरण में दीक्षित जी ने स्वय लिखा है कि अपने सादृश्य का अन्वय अपने आप में नहीं हो सकता। अत. इसे अनन्वय कहते हैं।' फिर पूर्वोक्त ढग से इस उदाहरण में जव सादृश्य का अन्वय हो जाता है तो यहाँ अनन्वय कैसे? यहाँ उपमेय है एक विशेष प्रकार की प्रसन्नता-उसकी तुलना जव उसी की तरह दूसरी प्रसन्नता से की जा रही है, तव तो अन्य सदृश के निवारण स्वतः वाधित हो गया। अत. इस उदाहरण में अनन्वय लेशमात्र भी नहीं है। भव यदि इन दोनों प्रसन्नताओं के अद्गि रूप सामान्य प्रसन्नता की अनुपमता को लेकर यहाँ अनन्वय की अभिव्ययक्ति मानी जाय तो यह मी उचित नहीं है। क्योंकि, सामान्य प्रसन्नता- यहाँ उपमेय नहीं है। किन्तु, विशेष प्रसन्नता है। अत. वह उसका उपमान नहीं वन सकती विशेष प्रकार की प्रसन्नतारूपी उपमेय का उपमान भी विशेष प्रकार की प्रीति ही हो सकती है। सामान्य प्रीति नही। अत. हम कह सकते हैं कि पूर्वोदाहृत 'अनुहरति सुभग तस्या.' की तरह यह उदाहरण भी दूषित है।' यदि यह कहा जाय की कहीं कहीं अवयवों की उपमा भी अवयवी की ही तरह अनुगमता का व्यक्षक हुआ करती है। अत. इन दोनों अगरूप विशेष प्रसन्नताओं के द्वारा प्रतीत सामान्य प्रसन्नता को, कृष्ण के आगमन से उत्पन्न सामान्य प्रीति के सदृश मान लेंगे और इस प्रकार विशेष प्रसन्नताओं की समानता के वीच में सामान्य प्रसम्नता की सामान्य प्रसन्नता के साथ सदृशता की कल्पना कर लेंगे-तो यह बात सहृदयहृदयसवेद नहीं है। क्योंकि यह क्विष्ट कल्पना- मात्र है। यदि ऐसा कहा जाय कि रलाकर के द्वारा अनन्वय के व्याख्यात भेदों में से-'अनुहरसि सुभग तस्या.' वाले भेद को व्यङ्गय बता रहे हैं तो यह कथन भी युक्तिसंगत नहीं है। क्योंकि दोषपूर्ण होने के कारण यह अनन्वय का भेद है ही नहीं। अगर रलाकर के भेदों में से इसे अनन्वय का भेद स्वीकृत करना भी चाहें तो नहीं किया जा सकता। क्योंकि दीक्षित जी ने अनन्वय प्रकरण में कहीं इसका उल्लेख नहीं किया है।

Page 227

अनन्वयनिरूपणप्रकरणम्

अव विचारणीय यह ह कि सस्कृत काव्यशास्त्र के सभी प्रसिद्ध आएकारिकों ने 'अनन्वय' का विवेचन स्वतत्रस्प से किया है यह एक तथ्य ह। किन्तु, य मी एक सत्य ऐ कि सर्वों ने एक मत से उपमेय का उपमान उपमेय को ही स्वीकृत किया है। इस सदर्म में आलकारिकों के बौच केवल दो नथ्यों के मतभिन्नता प्रतीत होती है। वह है असादृव्य विवक्षा या उपमानान्नर व्यवच्छेट अर्थात् अनन्वय की परिभापा मे एक ही पदार्थे को उपमेय तथा उपमान मानने के सनि- रिक्त 'असादृग्य विवक्षा' का भी सन्निवेश होना चाहिए। अन्य सदृश वस्तु अमाव का प्रदर्शन ही अनन्वय के चमत्कार का हेतु है। अव विचारणीय प्रश्न यह ह कि उक्त दृष्टि मे पण्टित जी का खण्टन कहाँ तक युक्तिसगत है। जहाँ तक 'अद्य या मम गोविन्ट' इत्यादि उदाहरण में सादृव्य के अन्वय का प्रश्न है-कृष्ण के आगमन से उत्पन्न प्रसनतारूपी उपमेय का उपमान भी 'प्रसन्नता' ही है। वह चाहे इस आगमन से हो किवा उस आगमन से। यहाँ अन्य सदृश वन्तु के अभाव का प्रदर्शन तो स्पष्ट रूप से है ही। अत इसमें पण्डित जी का ठीक्षित जी के साथ दृषि- कोण की भिन्नता ही पार्थक्य का कारण प्रतीत होती है।

जहाँ तक अवयव और अवयवी की उपमा से अनुपमता की व्यश्ना की अभिव्यक्ति का प्रश्न है-अनन्वय का प्रयोजन ही 'द्वितीय समसचारि निवृत्ति' अथवा अपने अतिरिक्त अन्य उपमान का निषेध ही तो हुआ करता है। आचार्य भामह ने इसीतिये तो लिखा है 'यन्न तेनेव तस्य स्यात्' इत्यादि। अनन्वय में शब्दभेद क्षम्य है। क्योंकि इसमें अर्थपीनरुकत्य रहा करता है। इसी लिए 'अद्य या मम गोविन्द' इत्यादि उदाहरण में अनन्वय हो सकता है। वैसे अनन्वय को सर्वतोभद्र वनाने के लिए शव्दैक्य की अपेक्षा अवध्य है। तभी तो अवयव मौर अवयवीभाव सम्बन्ध से उक्त उदाहरण में प्रतिपादित श्रीकृष्ण के आगमनजन्य प्रसन्नता में उपमान और उपमेय की एकरूपता स्पष्टत अभिव्यक्त है। अवयवों की उपमा अवयवी की अनुपमता की अभिव्यक्ति से तात्पर्य यह है कि अनन्वय में शब्द की एकता उद्देश्य और प्रति निर्देग की एक- रूपता की रक्षा के लिए ही आवश्यक है। निष्कर्पस्वरूप हम कह सकते हैं कि उक्त उदाहरण में दीक्षित जी के अनन्वय की मान्यता भ्रम नहीं-उचित ही है। यहाँ भी केवल दृष्टिकोण की भिन्नता के कारण ही पण्टित जी को दोप- दर्शन होता है।

इति चित्रमीमासाया 'भारती' हिन्दी व्याख्यायामनन्वयप्रकरण समाप्तम्।

(सुधा) ग्यङ्वयमनन्वयमुवाहरति-यथेति। 'हे गोविन्द अद्य मम या प्रीतिसत्वयि गृहागसे सति जाता, एषा पुनः कालेन तवैवागमनद् भवेदिरयम्र गृद्दागतश्रीकृप्णोद्देश्पकविदुरवा- क्ये सवदागमानोपन्नेयं प्रीतिः बहुकालव्यवहितरवादागमनेनेंव भवेसान्येन दृर्युक्तिमअया स्वदागमनप्रभव प्रीते सतवदागमन प्रभवप्रीतिरेव सदशी नान्यप्रभवेति व्यज्यत इति समुठा- यार्थः। एतकषक्यानन्वयव्यावृत्यर्धमध्यङ्परवविशेषणमाव्यकमिति पूर्वषदेष द्वष्व्यम्।

Page 228

चित्रमीमांसा

दागमनप्रभवा प्रीतिः सदशीति प्रतीते: सवंजनसिद्धतया श्रीकृष्णागमनजन्यप्रीतिसामान्या वयवयोद्टयोः प्रीतिव्यक्योः सादृश्यस्याबाधितरवेन योगिकार्याभावेन तस्यासम्भवाद्। प्ीतिव्य किषिशेषरूपोपमेयस्थ सदशान्तरनिषेधे वाधा प्ाफल स्याप्यग्रासम्भवाच्चेति वषन्ति। रसगङ्वाधरमताश्रयणे तु इदसुवाहरणीयम्- रर्षा कृतयोपरतो मन्ये नूनं धाता स विश्वकृद्। न हि रूपोपमा स्वन्या तवास्ति जगतीतले। अन्नान्या त्वत्सदशी नास्ति इति भेदगर्भसादृश्यनिषेधात् त्वमेव स्वत्सदशीति व्यक्य

द्धोऽपि दीपकादावुपमेध पृथगलंकारव्यपदेशभाक। अन्यथा दीपकादावपि सादृश्यस्य व्यम्षयत्वाहुपमान्तर्गता्वापत्तेः। उदाहरणं चथा- भूमीनाथ शहाबदीन भवतस्तुल्यो गुणानां गणै- रेत्न्वूतभवप्रपञ्चविषये नास्तिीति किं बमहे। धाता नूतनकारणेर्यदि पुनः वृष्टि नवां भावये- स्न स्यादेव तथापि तावफतुलालेशं दधानो नरः॥ इति यदन्ति। तम्रानन्वयध्वनिनवोपपत्तौ पृथगाणनस्या योग्यतैव। 'आरोपे सति निमित्तानुसरणं न निसित्ते सथ्यारोपः हृति न्यायात्। अन्यथा व्यक्योपमादीनामपि

घरानन्देन रचिता व्याकयानान्वयसम्मता । टीकायां चित्रमीमांसासुधायामाप पूर्णताम् ॥। इति भरतपुरनिवासिनो मिश्ररामवालस्य सुतेन घरानन्देन रचिताया चित्रमीमांसा व्याख्यायां सुभाख्यायाम अनन्वयप्रकरण समाप्रम्।

Page 229

अथ स्मरणनिरूपणम् स्मृतिः सादृश्यमूला या वस्त्वन्तरसमाश्रया। स्मरणालङ्कृतिः सा स्यादव्यङ्गयत्वविशेपिता ॥ यथा- अपि तुरगसमीपादुत्पतन्त मयूरं न स रुचिरकलाप बाणल्यीचकार। सपदि गतमनस्कश्चित्रमाल्यानुकीर्णे रतिविगलित बन्धे केशपाशे प्रियाया.॥ यथा वा- दिव्यानामपि कृतविस्मयां पुरस्ता- दम्भस्तः स्फुरदरविन्दचारुहरताम्। उद्वीक्ष्य श्रियमिच काचिदुत्तरन्ती- मस्मार्पीज्जलनिधिमन्थनस्य शैरिः॥ (भारती) जिसका मूल सादृश्य हो और जो किसी भिन्न वस्तु अर्थात वह फिर सदृग हो अथवा असदृश-के विपय में हो, वह स्मृति 'अव्यद्वयत्व विशेषण से युक्त हो-मर्यात व्यह्वय न हो तो स्मरणालक्वार कहलाती है। निष्कर्पस्वरूप हम कह सकते है कि जब सादृव्य के आधार पर अन्य पदार्थ का स्मरण हो जाय और वह व्यद्रय न होकर वाच्य हो तो वहाँ स्मरणालक्वार होगा। जैसे- 'शिकार से निकले राजा दशरथ के घोडे के समीप से उडते हुए भी सुन्दर पूछों वाले मोर को, चित्र विचित्र मालाओं से व्याप्त अर्थात गूथे हुए तथा रतिकाल में वन्धन सुले हुए प्रिया के केश पाश अर्थात् सुसज्जित चोटी को स्मरण कर, वे राजा उसे अपने वाण का शिकार नही बनाये अर्थात् प्रिया की स्मृति के कारण उस पर वाण ही नहीं चलाये।' औौर भी जैसे- 'अपनी अद्भुत सुन्दरता से देवताओं को भी विस्मय में डालती हुई कोई सृन्टरी सामने के सरोवर से जब अपने दोनों सुन्दर हाथों में कमल लिए हुए वाहर निकली, तो उसे मथते हुए समुद्र के बीच से निकली हुई लक्ष्मी की भाँति देसकर भगवान् क्षीकृष्ण ने समुद्र मन्थन के दृश्य का स्मरण किया। (सुधा) •भेदज्ञानप्राधान्येन निरूपणीयावात तप्तक्षणं प्रतिपाद्यति-स्मृतिरिति। या साहरय- मूला वस्त्वन्तरसमाश्रया अव्यप्ञया स्नृति. सा रमरणालष्कृतिः त्यादिश्यन्वयः । स्मृति

Page 230

१६० चित्रमीमांसा

श्वक्ष स्मरामीत्ष्यनुभवसापिकजातिविशेष:। उदाहरति-अपीति। स नृपः सुरगसमीपा- दुत्पतन्तमपि सुप्रहारमपीत्यर्थः। रुचिरकलाएं भास्घरवहम, मध्यां रौतीति मयूरः। पृषो- वुरादिस्वात् साधुः। चित्रेण मात्येनानुकीणे रत्यां चिगलितबन्धे प्रियाया: केशपाशे सपदि गतमनस्कः प्रतृत्तचित्ः 'उरःप्रभृतिभ्यः कप्' न वाणलदयीवकार न प्रजहारेत्यन्वयः। उदाहरणान्तरमाह-यथा वेति। दिवि भवा दिव्यास्तेषामपि कृतविस्मर्यां सौन्दर्याधि- कयेन जनिताद्जुतरसां स्फुरदरविन्दाभ्यां चारुहस्ती यस्याः तां पद्महस्तामित्यथः। पुरस्ता- दग्रतः अम्भस्तो जलाब 'पञ्चम्यास्तसिल' उत्तरन्तीं निष्क्रामन्तीं काज्वित् स्त्रियं मथ्यमानातू समुद्रात सदो निस्वतां श्रियमिवोद्वीच्य शौरिः कृष्ण, जलनिधिमन्थनस्य 'अवीगर्थ- द्येशा कर्मणि' इति कर्मणि षष्ठी, तन्मन्थनमित्यर्थः । अस्मार्षीत् स्मृतवानिति रळेकान्वयः। (चित्र०) एकत्र सदशदर्शनात् तत्सद्शधर्मिका स्मृतिः, इतरत्र सद्शदर्शनात् तत्सदृश- लन्त्मीसम्बन्धिनो जलनिधिमन्थनस्य स्मृतिः; उभयत्रापि सादृश्यमूलकवस्त्व- न्तरस्मृतित्वमविशिष्टम्। अत एव सदशासदशसाधारण्यार्थतया लक्षणे वस्त्व- न्तरग्रहणमर्थवत्। सौमित्रे ननु सेव्यतां तरुतलं चण्डांशुरुज्जम्भते चण्डांशोर्निशि का कथा रघुपते चन्द्रोऽयमुन्मीलति। वत्सैतद् विदितं कथ नु भवता धत्ते कुरङ़ं यतः क्वासि प्रेयसि ? हा कुरङ्गनयने चन्द्रानने जानकि !॥ (भारती) इन दो उदाहरणों में से प्रथम उदाहरण में सदृश पदार्थ (मयूरपख) के देखने से उसके सदश प्रिया के विविध केशपाश की स्मृति हुई है और दूसरे उदाहरण में सदृश पदार्थ अर्थात् कमल हाथ में लिए नायिका को देखने से उसके सदृश लक्ष्मी से सम्बन्ध रखने वाले समुद्र-मन्थन की स्मृति हुई है। दोनों जगहों में सादृश्यमूलक और भिन्न वस्तु के विषय में होने वाली स्मृति समान ही है। मत एव लक्षण में सद्दश और असदृश दोनों को समान रूप से प्रतिपादित करने वाले 'भिन्नवस्तु' शब्द का ग्रहण सार्थक है। क्योंकि यह लक्षण सदृश की स्मृति में भी लगता है और सदृश के सम्वन्धी की स्मृति में भी समान रूप से लगता है। यदि ऐसा नहीं किया जाता तो केवल सदृशवस्तु के विषय की स्मृति का ही ग्रहण होता और इस तरह दूसरे उदाहरण में स्मरणाळद्कार के लक्षण की अतिव्याप्ति होती। यह श्लोक हनुमन्नाटक से उद्धृत है। इसमें राम और लक्ष्मण का कथोपकथन है। 'राम ने कहा-हे लक्ष्मण चलो, अब हम, लोग इस सामने के वृक्ष की छाया के नीचे चलें। क्योंकि यह प्रचण्ड किरण वाला सूर्य उदित हो रहा है। उत्तर में लक्ष्मण ने कहा-रघुपते । इस रात्रि के समय सूर्य कहा से आया? यह तो चन्द्रोदय हो रहा है। राम ने पुन कहा-वत्स ! यह तुमने कैसे समझ लिया कि यह सूर्य नहीं चन्द्रमा है। लक्ष्मण ने कद्दा-इसलिए कि यह मृगचिह्न धारण कर रहा है। यह सुनते ही राम ने कहा-हा! प्रियतमे! चन्द्रानने' कुरङनयने। जानकिं! तुम कहाँ हो ?'

Page 231

स्मरणनिरूपणप्रकरणम् १६१

पूर्वोदाहर णेन सिद्धावपरस्य व्यर्थत्वमाशक्तय दयोरपि प्रयोजनविशेषवत्तया मार्थकर्ता प्रतिपाकयति-एकत्रेति। आधोदाहरण इत्यर्थ। सदददर्शनाद् रुचिरवएदर्शनात्तमश- केशपाशस्मृतिः। इतरत्र= द्वितीय हत्यर्थः। मदशदर्शनादू लमीसरशस्त्रीदर्शनाल्रघमी- सम्बन्धिन: समुद्रमन्थनस्य स्मृति। लक्षणमुभयग्रानुगमयति-उभयम्रापीति। सादृटश्य मूछकवसन्तराश्रितम्मृतेर विशेषासक्षणससन्वयः। वस्त्वन्तरपट सपाससाारण्या र्थंम्। अत एव तस्य सार्थकत्यमिर्यर्थ। अग्यद्गवविशेपणस्य फलमुद्दाहरति-समित्रे इति। विरहातुररामस्योकि :- हे लचमण चण्डांशु सूर्यः, उज्जम्भते उद्यति, ननु तकतलं सेव्यताम। लचमणोकि :- हे रघुपते रात्रौ रवेः का वार्ता ? अयं चन्द्र उन्मीलति उदयं ग्छति। पुना रामस्योक्ति :- पतन्भवता कथल कथमिष ज्ञातम् ? गतः कुरहां मृगं धत्त इति लचमणोकि। हा प्रेयसि मृगाि चन्द्रमुखि हे जानकि तव फासीति रामोकि:। (चित्र०) अत्र श्रुतकुरङ्गसम्बन्धिनस्तन्नयनस्य स्मरणात् तत्सहशसीतानयनस्सृतिः, तत्सम्बन्धिसीतारमृतिश्च्वेति। किन्त्वेषा व्यङ्गया, अलङ्कार्यभूता च। तद्वया- वृत्त्यर्थमव्यद्ग चत्वविशेपणम्। अत्युच्ाः परितः स्फुरन्ति गिरयः स्फारास्तथाम्भोधय- स्तानेतानपि बिभ्रती किमपि न क्वान्तासि तुभ्यं नमः । आश्चर्येण मुहुर्मुहुः स्तुतिमिति प्रस्तौमि यावद भुव- स्तावद्विभ्रदिमां स्मृतस्तव भुजो वाचस्ततो मुद्रिताः ॥ · (भारती) इस उदाहरण में लक्ष्मण के मुख से 'मृग' शब्द सुनते ही मृग के नेत्रों की स्मृति आर्ई और फिर उस स्मृति से उन नेत्रों के सदृश सीता की आँखों की स्मृति जगी और फिर सीता की आँखों की स्मृति से और चन्द्रमा की स्मृति से चन्द्रानना सीता की स्मृति हुई है। फिर भी यह स्वृत्ति व्यज्ञथ और अलककार्य है। ऐसी स्मृति में लक्षण की अतिन्याप्ति वारण के लिये ही उक लक्षण में अव्यद्गथ विशेषण का समावेश किया गया है। राजन्। जैसे ही विस्मय विभोर में पृथ्वी की स्तुति प्रारभ करता हूँ-ऐे सर्वधात्री! चारों और इतने भारी भारी पदाड, इतने वडे-वडे समुद्र, और इन सवों को धारण करने वाली तू! लेशमात्र भी तुम्हें कष्ट नहीं? कि इतने में ही इस पृथ्वी को भी धारण करने वाली तुन्दारी भुजाओं का स्मरण हो जाता है। और तब ? तब तो पृथ्वी की स्तुति करने वाली मेरी वाणी सरसा स्तव्न होकर रुक जाती है।' (सुधा)

शेपणस्य सफळनेत्यर्थः । प्रेयोडंफारस्य चिन्तामूए स्मरणत्य चालंकार्नियेधतसाहस्य- मूलेति विशेषणस्यैतत्फलं प्रतिपादयति-अत्युप्धा इति। भावस्य माघाहताया प्रेयोडनद्वार इति दि सल्लप्वणम्। तमुदाहरणद्वारा दर्शयति-हे पृध्वि परित अत्युच्चा गिरयः स्फुरन्ति,

Page 232

१६२ चित्रमीमांसा

तथा स्फारा विशाला अम्भोधयः समुद्राः स्फुरन्ति, तानपि विञ्र्यपि किमपि श्रन्ता नासि, तादृश्ये तुभ्यं नम इत्याश्चर्येण मुहुर्मुहुर्यावद् भुषः स्तुतिं प्रस्तौमि, तावदिमां पृथ्वी िभ्रव तव भुजो बाहु स्मृतः, ततो वाचो मुद्धिता इत्यन्वयः । (चित्र०) स्तूयमानभूसम्बन्धिनो भूभृद्भुजस्य स्मृतिन सादृश्यमूलेति, नात्र स्मरणा- लक्कार:, किन्तु स्मृतेः सख्चारिभावस्य भूभृद्विषयरतिभावाङ्गत्वात् प्रेयोऽलङ्कारः। स तथेति प्रतिज्ञाय विसृव्य कथमप्युसाम्। ऋषीण््योतिमयान् सप्त सस्मार स्मरशासनः॥ (भारती) यहाँ जिसकी स्तुति की जा रही है, उस पृथ्वी से सम्वन्ध रखने वाले राजा की स्मृति सादृश्य मूलक नही है। अत. यहाँ स्मरणालद्वार नही है किन्तु, सचारीभावरूप स्मृति राजा के विषय में रतिरूपीभाव का अंग हो गयी है। अत. यहाँ प्रेयान् अलद्कार है। यहाँ अतिव्याप्ति न होने के लिए 'स्मृति' को 'सादृश्यमूलम्' विशेषण दिया गया। 'इस तरह सखी से सन्देश पाकर शङ्कर ने-'मैं हिमालय से इसके लिए प्रार्थना करूँगा' कह कर असहनीय विरह के कारण किसी तरह पार्वती के यहाँ से आकर मरीच्यादि सप्तर्षियों का मन से स्मरण किया।' (सुधा) अम्र स्तूयमाना या भूः, तत्सम्बन्धवतो भूमृद्भुजस्य यद्यवि स्मृतिरस्ति, तथापि तस्याः सादृश्यमूलत्वाभावाद नातिव्यासिः। किन्तु सज्षारिभावरूपस्मृते राजरतिभावाङ्ग त्वेन भावस्य सावाहृतया प्रेयोलद्टारो वोष्यः। स इति। शास्तीति शासनः, बाहुलकाू कर्तरि वयुट्, स्मरस्य शासनः सः शिवः, तथा इति तथा करिष्यामीति प्रतिज्ञाय उरमा कथमपि कृच्छ्रेण विसृज्य तन्र गाढानुरागरवादिति भावः। ज्योतिर्मयान् ज्योतिःस्वरूपान् अद्षिर:प्रमृतीन् सस्मार स्मृनवानित्यन्वयः। (चित्र०) अत्र चिन्तामूला स्मृतिः। विच्छित्तिविशेषाभावान्न कश्िदलद्वारः। एतदु भयव्यावृत्त्यर्थ साद्ृश्यमूलेति विशेषणम्। एवमेते भेदाभेदसाधारणसाधर्म्यमूला अलद्काराः प्दशिताः। इति चित्रमीमांसायां स्मरणालङ्कारप्रकरणम्।

(भारती) इस उदाहरण में चिन्तामूलक स्मृति है। यहाँ सादृश्य के अभाव से अतिव्याप्तिदोष नहीं है। विच्छित्ति विशेष के अभाव से यहाँ अलक्वारता भी वाधित है। इस प्रकार की दोनों अतिव्याप्ति के निवारण के लिए लक्षण में 'साटृश्यमूला' विशेषण का समावेश है।

Page 233

स्मरणनिरूपणप्रकरणम् ११३

इन सभी-उपमादिक भेद और अभेदप्रधान साधारण साधर्म्यमूलक अलद्वारों का प्रदर्शन किया गया ह। सर्थात् भेदसाधर्म्यमूलक उपमा का, अभेदताधर्म्यमृल्या अनन्यय का, उभय साधर्न्यमूलक स्मरण का,-सादृध्य के उभयघटित होने से उसके तक्षण में उससे गिसन पद की उपस्थिति और अनुपस्थिति के सिद्धन्तसम्मत होने के कारण अलकारों का वर्णन किया गया है। विमर्श-दीक्षित जी ने प्रथम दो उदाहरणों में सदृश और असदृश रूप प्रिया के केशपाश तथा 'समुद्रमन्थन' दोनों में दोपवारण के लिए जो अपने लक्षण में 'भिन्नवस्तु' विशेषण का समावेश किया है, उसे पण्टितराज जगन्नाथ निरर्थक मानते है। इनका कहना है कि साधध्य- मूलक स्मृति को स्मरणालक्वार कहते हैं। इतने कहने मात्र से ही केशपाश के स्मरण की तरह समुद्रमन्थन के स्मरण का भी सम्नह ही सकता है। अत. 'मिन्नवस्तु के सम्बन्ध मे छोने- वाला' यह विशेषणपदोपादान निरर्थक ही हे। प्रथम उदाहरण में सादृ्य देसने से उदयुद्ध सस्कार से उत्पन्न होने के कारण और दूसरे उदाहरण में सादृश्य देसने से उद्युद्ध सरकार से उत्पन्न लक्ष्मी के स्मरण से उदयुद्ध होने के कारण सादृध्यमूलकता समान ही है। अर्थाद एक जगद सादृध्य साक्षात् मूलक है और दूसरे उदाहरण में परम्परा से प्राप्त है। किन्तु, स्मृति का मूल सादृध्य होने में तो किसी प्रकार की वाधा ही नहीं है। लक्षण में 'साद्घ्यमूलक' कथन से 'सादृध्य पदार्थ के विषय में होनेवाली' यह अर्थ तो निकलता नहीं कि जिससे 'समुद्रमथन के स्मरण' का सग्रह न होगा। अत. भिन्न वस्तु के विषय में होनेवाली' यह विशेषण सर्वथा निरर्थक है। विचारणीय विषय यह है कि स्मरण अल्वार मतभिन्नताओं के बीच इतना सर्वमान्य है कि यह अलद्वार सादृश्यगर्भ भेदामेद प्रधान है। 'स्मरण' का अर्थ है-किसी सदृश वन्तु को देखकर तत्सदृश अन्यवस्तु का स्मरण होना। इसमें कभी उपमेय को देसकर उपमान की स्मृति का औौर कभी उपमान को देखकर उपमेय की स्मृति का वर्णन किया जाता है। इस अलक्वार में कहीं २ निकृष्ट वस्तु को देखकर भी उत्कृष्टवस्तु का स्मरण हो जाता है। अलक्वार की परिधि में आने के लिए इसका चमत्कारपूर्ण होना आव्यक है। केवल स्मरण के वर्णन से चमत्कार का आाना असभव है। क्योंकि ऐसे वर्णन में विच्छित्ति का अमाव रहता है। मुख्यतः यह अलकार कवि की उस मन.स्थिति पर निर्भर है जिसमें कवि के पूर्वानुभूत सस्कार प्रेरक वन जाता है। कवि अपनी मानसिक प्रक्रिया पर आधारित परिस्थितिवश पूर्वानुभव को जगाकर तत्सदृश परिस्थिति एव वातावरण का निर्माण कर इस अल्हार की रचना करता है। फलतः: सके विवेचन में आलक्वारिकों ने अपनी-अपनी रुचि के अनुसार कहीं दर्शन, कहों अनुभव ओर कही जान शब्द का प्रयोग किया है। कुछ अन्य आचार्यों का नत है कि-चह कोई आवध्यक नहीं कि प्रस्तुत वस्तु के सदृश ही अप्रस्तुत भी हो, वल्कि प्रस्तुन पदार्थ से असदश पदार्थ के स्मरण में भी स्मरणालक्वार हो सकता है। जहाँ तक पण्डितराज के सन्दर्भगत आक्षेप का प्रत्न है। इस अतकार का उनके स्वत लक्षण ही विचारणीय है। इनके लक्षण के अनुसार प्रथमत दो पदार्थों के सादृश्यधान होने पर उमके आधार पर प्रथम से द्वितीय पदार्थ का स्मरण होता है। समरण में दो वस्तुओं के साद्न्यकान को लिए दोनों की उपस्थिति आवश्यक होती है। स्मरण के द्वारा द्वितीय वस्तु की उपस्थिति होने पर ही दोनों वस्तुओं का सादृव्यदान होता है। प्रथम पदार्थ को देसने से एी द्वितीय पदार्थ की स्मृति स्वन हो जाती ए। अत' पण्टितराज की दृष्टि में-जहा दीक्षिन जी सादृद्य के आधार १३ चित्र०

Page 234

१६४ चित्रमीमांसा

पर ही अन्य पदार्थ की स्मृति को महत्त्व देते हैं, वहाँ इस स्मरण के लिए दोनों पदार्थों के सादृश्य ज्ञान को आवश्यक नहीं मानते। पण्डितराज के लक्षण में 'ज्ञान' शब्द का विरोध स्पष्ट रूप से 'सस्कृत साहित्य में सादृश्य- मूलक अलकारों का विकास' नामक पुस्तक में किया गया है। इस पुस्तक में कहा गया है कि इन्हें यदि अपनी परिभाषा में ज्ञान शब्द का समावेश आवश्यक ही प्रतीत हुआ तो पुन. इन्हें 'सादृश्य' की जगह 'सदृश वस्तु' शब्द भी रख देना चाहिए था। क्योंकि ऐसा करने से ही, दीक्षित जी के लक्षण में सन्निविष्ट 'वस्त्वन्तरसमश्रिंयाः' का खण्डन सभव है। क्योंकि हमें सर्वप्रथम इससे पहले सदृश वस्तु का ज्ञान और इससे इसके समान द्वितीय वस्तु का स्मरण हो जायेगा। उसके स्मरण के लिए दोनों वस्तुओं के सादृश्यज्ञान की आवश्यकता नहीं होगी। इतना ही नहीं नागेश भट्ट ने तो खुले शब्दों में पण्डितराज के इस आक्षेप का खण्डन कर दीक्षित जी का सवल समर्थन किया है। उनका कहना है कि 'सादृश्य' के सम्बन्धी नियत होते हैं। अतः सम्वन्धी की आकाक्षा होने पर नियमत उपस्थित 'स्मरण किये जाने वाले के सादृश्य' का ही उसके साथ अन्वय होगा न कि असदृश का। ऐसी दशा में 'सादृश्यमूलक' कहने से सद्ृश की स्मृति का ही सग्रह होगा, न कि सदृश के सम्वन्धी स्मृति का। अतः दीक्षित जी का 'भिन्न वस्तु के विषय में होने वाली' यह विशेषण पूर्णत सार्थक है। पण्डितराज का दूसरा विरोध है, दीक्षित जी के लक्षण में समाविष्ट 'अव्यङ्गथ' पद से- 'सौमिन्रे! ननु' इत्यादि उदाहरण में अतिव्याप्तिवारण के लिए लक्षण में जो 'अव्यद्गय' विशेषण दिया गया है-वह निरर्थक है। क्योंकि यहाँ स्मृति अलक्कार्य नहीं है। वल्कि, यहाँ 'स्मृति' 'अलद्कार' ही है। क्योंकि इस श्लोक में जानकीं आलम्बन हैं और रात्रि का समय उद्दीपन। इसी प्रकार सतापादि अनुभाव है और उन्मादरूपी व्यभिचारीभाव पोषक। अतः यहाँ विप्रलम्भ श्रृगार होने के कारण प्रकृत 'स्मृति'स्वतः अलंकार है। फलत. इसे हटाने के लिए लक्षण में अव्यङ्गय विशेषण अनावश्यक है। यहाँ यह भी नहीं कहा जा सकता कि व्यङ्गय होने और अलक्कार होने में परस्पर विरोध है-जो व्यङ्गय हो वह अलकार हो ही नहीं सकता। नित्य व्यङ्गय जो कभी वाच्य होते ही नहीं, 'उन रस, भाव आदि को भी दूसरे के अंगरूप होने पर अलकार माना जाता है। रही बात यह कि 'प्रधान व्यङ्गय अलकार रूप नही हो सकता'। यह बात ठीक है क्योंकि सभी अलकारों के लक्षणों में 'उपस्कारक' विशेषण आवश्यक होता है। किसी अन्य को उपस्कृत करने के कारण ही तो अलंकार नाम की सार्थकता है। किन्तु, उक्त उदाहरण में 'स्मृति प्रधान व्यङ्गय नहीं है। किन्तु, अङ्गरूप ही है। अतः दीक्षित जी की इस मान्यता में मी कुछ तथ्य नहीं है। अव विचारणीय प्रश्न यह है कि पण्डितराज के इस आक्षेप में ही कितना तथ्य है। इस पर कुछ अधिक नहीं कहकर केवल नागेश मट्ट का विचार व्यक्त करना ही पर्याप्त होगा। भट्ट जी का कहना है कि इस उदाहरण में 'हा' शब्द का तो कहीं उलेख ही नहीं है। इसमें तो मुख्यतः प्रिया- वियुक्त राम की प्रियाजन्य स्मृति ही अभिव्यक्त हुई है। अत. 'विवाह के लिए जाते हुए सेवकों के साथ चलने वाले राजा' की तरह अथवा 'शठेन विधिना दरिद्रीकृतः' इत्यादि में 'शठ' आदि पदों से अभिव्यक्त असूया की तरह स्मृति ही प्रधानहोने से वही अलकार्य है। वह किसी को अलकृत नहीं करती, प्रत्युत विप्रलम्भ ही उसे अलकृत करता है। अत उसे अलकार्य होने में किसी भी प्रकार की बाधा नहीं है।

Page 235

स्मरणनरूपणप्रकरणम्

वची वात-अत्युच्या. परित म्फुरन्नि गिरय.' इत्यादि उदाररण में स्वृनिरपी सचारीमार राजा के विषय में होनेवाली रति का अन है। अन यह प्रेयान् अलकार है। दोक्षिन नी का यह कथन भी पण्टितराज की दष्टि में अनर्गल ही है। क्योंकि इनके विचार में जन कोर्ई भाव किसी दृसरे भाव का अद् हो तभी 'प्रेयान' अलकार होता है। किन्तु, इस पथ में स्वृतिभाव रूप ही नहीं है। कारण स्मृति का वाचक 'स्मृ' धातु उक्त श्लोक में उलिसिन है। अत. यह नाच्य है और वाच्यव्यभिचारी को भाव काना उचित नहीं। क्योंकि ऐसा मानने पर 'व्यनिचार्यजिनो भाव.' अर्थात् व्यजथ व्यभिचारीभाव कहलाता है काव्य प्रकाश के इस निजान्न का विरोध होता है। इतना ही नही 'अलकारसर्वम्त्रकार ने भी प्रेयान् अलकार का विपय 'सादृशय' के अतिरिक किसी अन्य निमित्त से उद्बोधित 'स्मृति' को ही मानते है और वह भी विभावादि के द्वारा अभिव्यक्त होने पर ही। जैसे, 'अहो ' कोपेऽपि कान्तं मुग्म्' (आश्चर्य है कि उसका मुन क्रोध में भी सुन्दर था)। अपने वाचक शब्द से प्रतिपादित होने पर स्मृति भाव रूप नही होनी। जसे- अन्नानुगोदं मृगया निवृत्तस्तरंगवातेन विनीतखेदः। रहस्त्वदुस्संग निषण्णमूर्धा स्मरामि वानीरगृहेषु सुप्तम॥। सीता के प्रति यह राम की उक्ति है-'शिकार सेलकर गोदावरी नदी के किनारे जब मै थककर लौटता था तथा उस नदी की ठढी लहरियों से आप्लावित होकर, सेदरहित प्कान्न में तुम्हारी गोद में सिर रखकर जो मै इस वेत्लता के मण्टप में सो नाया करता था-उसकी स्वृति इस स्थान को देखते ही जग उठती है। इस उदाहरण में 'स्नृ' धातु द्वारा स्मरण का स्पष्टन प्रतिपादन है। अब यदि प्रयान् अलकार का लक्षण 'भावादि का अगरूप केवल सचारीभाव' मानकर 'भावादि का अगरूप भाव' का होना अस्वीकृत करते हैं, तो वाचक शब्द द्वारा प्रतिपादित होने के कारण 'स्मरण' के भाव रूप न होने पर भी सचारी होने में तो किसी प्रकार की वाधा होगी ही नहीं। अत' उत्त उदादरण नें प्रेयान सलकार कहना अनुचित नहीं है। तव ऐसी स्थिति में 'दूसरे का अन रूप' इत्यादि स्थायी- माव को ही रसालकार कहेंगे न कि अभिव्यक्त होने वाले को। इससे यह सिद्ध होता हे कि जिस प्रकार अभिव्यक्त स्थायोभाव जव अन्य का अग होना हँ, तव रसालंकार होता है। उसी प्रकार अभिव्यक्त ही सचारीभाव जव भावादि का अग होता है, तब 'प्रेयान्' अलकार होता है। ऐसी स्थिति में 'अत्युच्या परित' इत्यादि उदाहरण में वाच्य- स्मृति को लेकर 'प्रेयान्' अलकार नहीं कहा ज सकना। किन्तु, पूर्वार्उं द्वारा अभिन्यक्त पृथ्वा के विपय की रति, उत्तरार्द्ध द्वारा अभिव्यक्त राजा के विपय की रति का जग हो गयी है, इने नेकर यहाँ 'प्रेयान्' अलकार कहना उचित ह। जसा कि इस पद् के विषय में मम्मट का कथन है- 'यहाँ जो भाव अर्थात् पृथ्वी के प्रति कवि का भक्तिभाव निवद ऐ वह 'अपराऊ व्यग्य' रूप से निवद्ध है, क्योंकि वह वत्तुन कविनिष्ठ राजविपयक रनिभान का ही अन्त में परिपोषण करता प्रतीत हो रहा है।' इस प्रकार तो काव्यप्रकाश का विरोध हुआ। इसके अतिरिक्त 'कुकल्यानन्द' में दीक्षित जी ने रवय लिसा है-विभाव और अनुभाव से अभिव्वत्त 'निर्वेद' आदिका मात जहा किमी दूसरे का अग ऐो जाता है, वहाँ 'प्रेयान्' अलकार होता है।' इसमे स्वकथन का भी विरोध होता है। अत दीक्षित जी के इस सम्बन्ध में ये सारे प्रयास पण्टिनराज के प्रति विरोधप्रदर्शन नाथ है।

Page 236

१६६ चित्रमीमांसा

अव विचारणीय प्रश्न यह है कि 'अत्युच्याः परितः' इस श्रोक में 'प्रेयान्' अलकार है अथवा नही। 'प्रेयान्' अलकार जिसे आलकारिकों का अत्यधिक आवर्जक अथवा सहृदयों का अत्यधिक मनोरजक अलकार कहा करते हैं। 'अत्युच्याः परित.' इस उदाहरण में तो स्पष्टरूप से यह अल- कार है ही। 'यहाँ 'प्रेयान्' अलकार इसलिए है कि यहाँ जो 'पृथ्वी विषयक स्तुति उपनिबद्ध है वह राजा की स्तुतिजन्य 'स्मृति' रूप भाव का अधिकाधिक परिपोषक होने से अगरूप से ही उपनिबद्ध है। और यह 'स्मृति' रूप 'व्यभिचारीभाव' अन्ततोगत्वा, यहाँ के अगीरस 'राजस्तुतिरूप' वीररस के उत्कट रूप से उद्दीपक होने के कारण, अगरूप से ही उपनिवद्ध पडा है। अत. उक्त उदाहरण में 'प्रेयान्' अलकार स्पष्ट रूप से है। जिसकी अतिव्याप्ति कारण के लिए दीक्षित जी ने लक्षण में 'जिसका मूल सादृश्य हो' इस विशेषण का समावेश किया है। फलतः उक्त उदाहरण में सचारी- भाव रूप 'स्मृति' राजा के विषय में रतिरूपी भाव का अग वनने के कारण 'प्रेयान्' अलकार होने से लक्षण का समन्वय नही हो सका। क्योंकि यहाँ उस पृथ्वी से सम्वन्ध रखने वाले राजा की स्मृति सादृश्यमूलक नहीं है। अत यहाँ स्मरणालकार नहीं हुआ। बची मम्मट के विरोध की वारते-वह तो स्पष्ट ही है कि काव्यप्रकाश में 'प्रेयान्' अलकार की ही मान्यता नहीं है। क्योंकि उनकी दृष्टि में रसध्वनिवादी आनन्दवर्द्धनाचार्य की यह मान्यता ही स्वीकृत है कि 'रस, भाव' आदि सभी अलकार्य है-अलकार नही। रस, भाव आदि की अगरूप योजना 'गुणीभूतव्यग्य काव्य' का विषय है न कि अलकार अथवा वाच्य, वाचक, वैचित्र्य का। काव्य-प्रकाश के अनुसार 'प्रेयान्' अलकार अपराद् गुणीभूत व्यग्यकाव्य के रूप में है। महापात्र विश्वनाथ ने भी 'प्रेयान्' अलकार में 'इत्यस्य रसादेरस् रसादि व्यङ्ञधम्' कह कर रस में अन्तर्भूत करते हुए भी अलकार वर्णन में 'अलकार सर्वस्व' का ही अनुसरण किया है। फलत दीक्षित जी का इस दृष्टि से मम्मट के साथ कुछ विरोध नहीं दीखता। जहाँ तक उनके कुवलयानन्द की बात है-'न्यभिचारी मावो की 'अङता' में उनका 'प्रेयान्' अलकार होना स्वाभाचिक है। व्यभिचारीमावों की मुख्यत. तीन श्रेणियाँ हैं, जिनमें 'निर्वेद' आदि व्यमिचारी- भाव कहीं रसाभिव्यजन के साधनरूप से उपनिबद्ध दिखाई दिया करते हैं और कही व्यभिचारी भाव स्वय अभिव्यग्य रूप से प्रतीत हुआ करने हैं और कहीं वही 'निर्वेद' व्यमिचारीभाव वर्ण्य विषय के अङ्गरूप से व्यवस्थित होने के कारण प्रेयान् अलकार के रूप मे देखे जा सकते हैं। इस श्रेणी विभाग की व्यवस्था से उक्त उदाहरण में 'प्रेयान्' अलकार की मान्यता में कहीं स्वविरोध की छाया नही दीखती। इस दृष्टि से विचार करने पर दीक्षित जी का लक्षण निर्दुष्ट अथ च स्पष्ट प्रतीत होता है। इति चित्रमीमासाया 'भारती' हिन्दीव्याख्याया स्मरणनिरूपण समाप्तम्।

(सुधा) अम्र स्मृतेश्चिन्तामूलतया सादृश्यमूलवाभावान्नातिव्याप्तिः, विच्छित्तिविशेषाभावेना लह्वारताया बाघात। उभयत्र विशेषणफलमाह-एतदुभयेति। उभयत्रातिव्याद्ि- वारणाय-सादृश्यमूलेति विशेषणम्। अत्र रसगङ्गाघरकृत :- सडशासदशयोः केशपाश जलनिधिमन्थनयो: स्मरणसग्रहाय वसत्वन्तरग्रहणमर्थवदित्युक्त्तमयुक्क्कमू। साहश्यमूला

Page 237

स्मरणनिरूपणप्रकरणम्

स्मृति: स्मरणमिरयेततावता केशपाशस्येव जलनिधिमन्यनम्मरणस्यापि सम्रद्ेण तद्विशेप

लमीस्मरणोद्युद्धसंस्कारजन्यतवस्य घ साहश्यमूलताया विशेषाभावाद्। यदपि 'सौमिन्ने' इश्यादी व्यसयस्मृतिवारणाय अव्यन्वयमित्युक्तम, तदप्ययुक्तम; जानक्यालम्पनो निशासमयोद्वीपितः सन्तापाद्यनुभावित उन्मादादिसव्ारिपोपितो विप्ररन्भः प्रधानतया उयदथः। तम्र च स्मृतेरुकर्हेतुरवादलक्वारताया एव कथनौचित्यास, तद्थ तद्टुपादा नत्य सुतरां व्यर्थत्वाच्घ। यत्त-'अरयुष्वा' इत्यादी स्मृते: सव्ाग्भिावस्य राजविपयक- रतिभावस्याद्गत्वात् प्रेयोऽलक्कार, तद्वयावृत्तये सादृश्यमूलेति विशेषणम्, तदप्ययुक्तम् ; अत्र स्मृतेर्भवत्वाभावात, व्यज्यमानस्यंव सज्जारिणो भावत्वात। स्मरतिना चाचर्केन वाच्यस्य तस्य तस्य ?वे 'व्यभिघारिरसस्थायिभावाना शव्यवाध्यता' इत्युवा्या दोप अस्तत्वात् कथमस्य प्रेयोऽलद्टारता ? 'भूविषयकरते राजविषय करतिरुपभावाद्गतयय भूविषयो रत्याख्यो भावो राजविषयकर तिभावस्यान्न मित्यादिना तस्य काव्यप्रकाशकारा- दिभि: प्रतिपाितत्वात्' इति वदन्ति। तम्रोध्यते-'सादृश्यमूलख्व स्मृतित्वम्' इत्येतावदुक्की स्त्रीसादृश्येन श्रियः स्मरणस्यैव साप्षात सादृश्यमूलतया तत्सम्वन्धिनो जलनिधिमन्थनस्य म्मृतेर्वस्त्वन्तरसमाश्यणरूप- चिशेषणचलेनेव लाभात्। वस्त्वनतर लकमीरूपं तत्सम्बन्धेनेव तत्स्मृतेर्योग्यत्वाद। किस् 'सीमिन्रे' इत्यादावपि कुरद्सम्बन्घिनयनसरपजानकीनेत्रस्मरणस्य शव्दशवत्यप्रतिपाध त्वेन व्यक्षनागभ्यतया व्यद्यस्मृतेः प्रधानतया रामविषयकविप्रलम्भरूपन्यमयपोषफतया

रणेन वाघोमुद्रणस्य सप्वेन तस्य राजविषयकरतेः परिपोष्यतया स्वशब्दवात्यत्वे दोपा- भावास् दोष:, स्वपदेनोक्तावपि सक्वारिण इत्युकतत्वात्। शुद्ध भावस्य भावाल्गलेन प्रेयोऽलक्कारत्वसिद्ध ये मम्मटादिना तयोकति, न तु स्मृतेः सज्वारित्वव्यावर्तनपरा इत्यछम्। उपसंहरति-एवमिति। एते उपमादय इत्यर्थः। तत्र भेदसाघर्म्यमूलत्वमनन्वयस्य उभयस्ाधन्य मूलता स्मरणस्य, सादश्यस्योभयघटितत्वास, तप्क्षणे तन्विन्पदस्य सर्या- सध्वयोः सिद्धान्तसम्मतत्वाच्चेति दिक। स्मरणालड्कृतेव्या्या धरानन्देन निमिता। टीकाया चित्रमीमांसासुधायामाप पूर्णताम्॥ इति भरतपुरनिषासिनो मिश्ररामवलस्य सुतेन धरानन्देन रचितायां

मकरणव्याखया समाप्ता।

Page 238

अथ रूपकनिरूपणम्

अथाभेदप्रधानेषु प्रथमं रूपकं निरुप्यते- आरोपविषयस्य स्यादतिरोहितरूपिणः । उपरञ्जकमारोप्यमाणं तद्रूपकं मतम् ॥ (भारती) अमेदप्रधान अलकारों में सर्वप्रथम रूपकालकार का निरूपण करते हैं- 'आारोप्यमाण या उपमान का विरोधान-रहित होकर आरोप विषय या उपमेय को अपने रग में उपरजन या रंगना ही रूपक है। विमश-विद्यानाथ जी ने अपने प्रतापरुद्रिय में रूपक का ही लक्षण लिखा है। इनके अनुसार इसकी कतिपय महत्त्वपूर्ण विशेषताएँ हैं। यथा-'विषयी या उपमान को विषय का उपरजक होना से तात्पर्य है कि विषयी और विषय में अभेदत्व की स्थापना हो। इस अमेदत्व की स्थापना से उत्प्रेक्षा और अतिशयोक्ति की अतिव्याप्ति का स्वत. वारण हो जाता है। क्योंकि उत्प्रेक्षा में कोई भी विषय-आरोप क्रिया का विषय नहीं बनता और अतिशयोक्ति में विषयी के द्वारा विषय का निगरण हो जाता है। इन दोनों अलकारों में आरोपाभाव होता है। 'अतिरोहितरूपिण' पद के द्वारा रूपक से अपह्युति, भ्रान्तिमान् और सन्देह का पार्थक्य दिखलाया गया है या तीनों का एक साथ निवारण किया गया है। सन्देह में विषय के सत्यासत्य का निर्णय नहीं होता या विषय का सन्देह होता है तो अपहुति में विषय का निषेध होता है। इसी प्रकार आ्रन्तिमान में कविकल्पित मिथ्याज्ञान होता है। इसी प्रकार उक्त लक्षण में 'उपरंजक' पद के समावेश के कारण 'परिणाम' अलकार की व्या वृत्ति होती है। परिणाम में विषय का विषयी के रूप में उपरजन न होकर विषयी का विषय के रूप में परिणत होकर प्रकृतोपयोगी होने का वर्णन होता है। इतनी सूक्ष्मता के साथ निर्दुष्ट तत्वों के समावेश के बावजुद विद्यानाथ के लक्षण में दीक्षित जी ने 'चित्रमीमासा' में कतिपय दोषों की ओर स्पष्ट संकेत किया है, जिसका उलेख नीचे यथावसर किया गया है। (सुधा) एवमुपमाधलक्कारान् निरूप्य अभेदप्रधानालक्टारान् निरूपयितुकामस्तेषु प्रथमं रूपकं निरूपयितुमारभते-अथेति। तन्न प्राचीनं लक्षणं निशकतुँ पूर्व तदुपपादयति-आरोपवि- घयस्येति। आरोष्यं चन्द्रत्वादिकमर, तस्य अतिरोहितरूपिणोऽनिह्वतरूपवद् आरोपवि- षयस्य मुखादेर्यत्रोपरअकर्यम, िषये स्वताद्रृप्यापादकत्वं भवेस, तद्रपकं मतमिश्य- न्वयार्थः । ·(चित्र०)

Page 239

रूपकनिरूपण प्रकरणम् १६६

विषयत्वाभावात् अतिरोहितरूपिण इत्यनेन ससन्देहभ्रान्तिमदपहुतीनां व्यावृत्तिः। तेपु सन्देह्भ्रान्त्यपह्नवैपियस्य तिरोधानात। उपरस्जकमित्यनेन समासोक्तिपरिणामव्यावृत्तिः । तयोहि नोपरसकत्वं विपयेष्वताद्प्यापाद- कत्वलक्षणम्। समासोक्तौ व्यवहारमात्रसमारोपेण ताद्रप्यप्रतीतेरवाभावात्। परिणामे आरोप्यमाणस्यैव विपयताद्रूप्यापत्या विपयस्यारोप्यमाणता।द्रप्यापत्य- भावादित्याहुः । (भारती) विदयानाथ के उक्त लक्षण में 'आरोपन्य' पद के समावेश से 'धूमस्तोमं तमः शके' इस उदाहरण में उत्प्रेक्षा का निराकरण होता है। यहाँ प्रकृत की सभावना के विषयत्व से आरोपविपत्व का अभाव हे। अगर यह कहा जाय कि दोनों की उक्ति के अभेदप्रतिपत्ति से आरोपविपयर्व की यहाँ सत्ता है ही, तो 'नूनं मुखं चन्द्रः' ऐसे उदाहरण में वैसे आरोप की सत्ता रदने पर भी अतिशयोक्ति दोष नही है। इस शका को भ्यान में रसकर ही प्रयोजनान्तर वताते हैं कि 'नीलोस्पलद्लालनिस्सरन्ति शिताः शराः' अतिशयोक्ति के इस उदाहरण में अतिव्याप्ति वारण के लिए लक्षण में उक्त पद का समावेश किया गया है। क्योंकि यहाँ आरोपविषय का शम्दशक्ति से सर्वया ही अप्रतिपादन है। इसी प्रकार सन्देह, भ्रान्तिमान एव अपहुति में अतिव्याप्ति वारण के लिए 'अतिरोहित- रूपिणः' पद का लक्षण में समावेश किया गया है। 'रवन्मुखं कमळमुत चन्द्रः' सन्देर के इस उदाहरण में मुख का सन्देहास्पदत्व से 'तिरोधानवति' होने के कारण अतिव्यापि नही हुई। इसी प्रकार भ्रान्तिमान् के 'पलाशकुसुमत्रान्त्या शुफतुण्टे पतत्यलि' इस उदाहरण में अर्थात् तोते की चोंच को पलाश की कली समझ कर भारा उस पर झपटता ऐ और तोता भी उसे जामुन का फल समझ कर पकडना चाहता है। यहाँ शुकतुण्ड तथा पलाश मुकुल ए्व भौरा तथा जन्नू फल में सादृश्य के कारण दोनों ओर से भ्रान्ति हो रही हे, किन्तु मुस तथा शुकतुण्ट के तिरोधान से अतिव्याप्ति नहीं होती। इसी प्रकार अपहृति के 'नेहं नभोमण्टलमम्युराशिः अर्थात् यह नभोमण्डल नहीं सागर है। इस उदाहरण में तिरोधान की उपन्थिति से अतिव्याप्ति का निवारण हुआ है। इसी प्रकार 'अयमेनद्रीमुखं पश्य रक्त् इचुम्वति चन्द्रमा' समासोकि के इस उठाहरण में तथा 'अमरी-कवरी-भारत्रमरी-मुखरीकृतम' परिणामोकि के इस उदाहरण में अनिव्यापि दोप दारण के लिए लक्षण में 'अपरजकम्' विशेषण का समावेश किया गया है। यहाँ ममानोलि में व्यवहारमात्र के सगारोप से तद्रपता की प्रतीति के अभाव के कारण अतिन्याप्ति नाीं हुई। इसी प्रकार व्यवहारमात्र के समारोप से आगेष्यमाण पकज की चरण की तनपतापत्ति से विषय का विपयी के रूप में उपरजन न ऐोकर विपयी का विषय के रप में परिणत होकर प्रनोपयोगी होने के कारण अतिन्याप्ति का निराकरण है। अत एव, रूपक का यह लक्षण निर्द्ष है, यह प्राचीनों का मन हुआ। (सुधा) तत्र रक्षणपदानां सम्रयोजनता विधारयति-अन्नेति। आरोपविपयस्येरयनेन 'धूमस्तोमं तमः शङे' इश्युप्रेषाध्यावृतिः। सन्न प्रषृतस्य सम्माचनाविपयरचनारीपषि

Page 240

२०० चित्रमीमांसा

षयरवाभावाद्। उक्त्योस्तयोरभेदप्रतिपत्तेशारोपतंया 'नूनं मुखं चन्द्रः' इत्यादौ ताद- शारोपसर्वेनातिव्यापिरेवेत्याशक्क्य प्रयोजनान्तरमाह-अतिशयोककिरिति ।'नीलोत्पल- दला्निस्सरन्ति शिताः शराः इत्यत्रातिव्यापि: तम्रारोपविषयस्य शब्दशवत्या सवथ- वाप्रतिपादनादित्यर्थः। ससन्देह्भ्रान्तिमदपहनुतिष्वतिव्याप्तिवारणाय 'अतिरोहितरुपिणः हति। 'रवन्मुखं कसलसुत चन्द्रः' इति सन्देहे मुखस्य सन्देहास्पदरवेन तिरोधानव- र्वान्नातिव्याप्तिः । एवं 'पलाशकुसुमभ्रान्त्या शुकतुण्डे पतत्यलिः' इति भ्रान्तिमति, 'नेदं मुखं किन्तु चन्द्रः' इस्यपह्नतौ च पलाशकुसुमत्रमेण शुकतुस्डस्य नजा मुखस्य च तिरोधानसत्वाप्नातिव्याहिः। समासोफिपरिणामयोर तिव्यासिवादणाय 'उपरअ्कम्' इति विशेषणम। 'अयमेन्द्रीमुखं पश्य रक्श्चुम्वति चन्द्रमाः' इति समासोको। 'अमरीकब- रीभारभ्रमरीमुखरीकृतम्। दूरीकरोतु दुरितं गौरीघरणपङ्टजम ॥'इति परिणामे व विशे- षणबलाद् व्यावहारमान्रसमारोपेणारोप्यमाणस्य पङ्मजत्य चरणताद्प्यापत्या विषयस्य

लक्षणं निर्दोषमिति प्राचीना आहु :- । (चित्र०) अन्नेदं विचार्यते-आरोपध्यवसाययोः कीहंश भेदमभिसन्घायारोपविषय- स्येत्यनेनोत्प्रेक्षाव्यावृत्तिरुच्यते ? यदि विषयविषयिणोरभिहितयोरभेद प्रतिपत्ति- रारोप: ? विषयनिगरणेन विषयिणस्तदभेदप्रतिर्पात्तरध्यवसाय इति भेदमभि- सन्धाय, तदोत्प्रेक्षारोपमूलैव स्यात्। तत्र 'नूनं मुखं चन्द्रः' इति विषयस्य मुखस्याप्यभिधानेन तन्निगरणाभावात्। ततश्च तत्रातिव्याप्तिरनिवारितव स्यात् । ताद्रप्यप्रतिपत्तिरारोपस्तदभेदप्रतिपत्तिरध्यवसाय इति तयोर्भेदः। 'मुखं चन्द्रः' इत्यादिरूपके चन्द्रस्य यद्रूप चन्द्रत्वं तेन रूपवत्तामान्न मुखस्य प्रतीयते, न तु प्रसिद्धचन्द्राभेदः । मुखविषयायाम् 'चन्द्रः' इत्याद्यतिशयोक्तौ तु वद्भेद एव प्रतीयत इति चेत् ? न; वैपरीत्यस्यापि वक्तु शक्यत्वात्।, (भारती) प्राचीनों के पूर्वोक्त लक्षण में अब दोष का विचार करते हैं। उक्त लक्षण के निराकरण के लिए सर्वप्रथम अभेद और अध्यवसाय के भेद में विप्रत्तिपत्ति की व्यवस्था करते हैं। यहाँ आरोप और अध्यवसाय की विप्रतिपत्ति दो तरह से मानते हैं। कुछ लोगों के मत में-विषय और विषयी से अभिहित उन दोनों के अभेद की प्रतिपत्ति ही आरोप है तथा विषय अर्थात् उपमेय के-निगरण से विषयी के अभेद प्रतिपत्ति को अध्यवसाय मानते हैं तथा इसके अतिरिक्त अन्य आचार्यगण 'ताद्रूप्यप्रतिपत्ति' को आरोप मानते हैं और उसके अभेदप्रतिपत्ति को अध्यवसाय मानते हैं। अब यदि प्रथम मत स्वीकार कर आरोपविषय का इससे उत्प्रेक्षा की व्यावृत्ि स्वीकृत करते हैं, तव उत्प्रेक्षा के आरोपमूलत्व से वहाँ तो अतिव्याप्त है ही। 'नून मुख चन्द्र' यहाँ विषय मुख का भी अभिधान से-विषयनिगरण के अभाव से अतिव्याप्त दोष दु्निवार है। दूसरे मत को स्वीकृत कर 'मुख चन्द्रः' इत्यादि रूपक में चन्द्र का जो 'रूप-चन्द्रत्व' है, उसी के द्वारा सुख की रूपवत्ता की प्रतीति से प्रसिद्ध चन्द्रमा से अभेद के अभाव से लक्षण का समन्वय होगा। मुखविषय में 'चन्द्र' इत्यादि अतिशयोक्ति में उन दोनों के अभेदत्व से अतिव्याप्ति नहीं है। उत्प्रेक्षा में यद्यपि

Page 241

रूपकनिरूपणप्रकरणम् २०१

चन्द्रत्वेन मुख की रूपवत्ता की प्रतीति र, फिर भी समावना के विषयत्व से निश्वनामासक शग उसके अभाव से अतिव्यापित दोप न ऐोगा-ऐसी समावना है, ऐसा मी नदीं का मगने, क्योंकि यहाँ चैपरीत्य भी नहीं काा जा सकना। वपरीत्य से तात्पर्य रूपक में नमेट दी प्रतिपत्ति। अतिशयोक्ति में ताद्रप्य की प्रनिपत्ि भी कह सकने है। वहाँ मी उसकी कनना में विनिगमक का अभाव हे। (सुधा) एतल्लक्षणं खण्डयितुमारभते-अत्रेति। प्राधीनलक्षण इत्वर्थः। दृददमिति। दूपण- मित्यर्थः। तम्र लक्षणं निराकतुं पूर्वमभेदाध्यवसाययोरभेदे विप्रतिपत्ि व्यवस्थापयति- आरोपाष्यवसाययोरिति। तत्रेथं विप्रतिपत्ि :- स्वरपविपयविषपिणोरभिहितवोरभेद प्रतिपत्तिरारेप:, विपयनिगरणेन विपयिणस्तद्भेदप्रतिर्पत्तन्ध्यवसाय इति केिद मन्यन्ते। ताद्ृष्यप्रतिपत्तिरारोपस्तदभेप्रतिपत्तिरध्यवसाय इत्यन्ये मन्यन्ते। तन्र प्रथम

पमूलश्वेन तन्रातिव्याप्तिरेव स्यस। 'नूनं मुखं चन्द्रः' दृत्यन्न विपयस्य सुगस्याप्यमिधानेन

ननु द्वितीयमतमाश्रित्य 'मुखं चन्द्रः' दृश्यादिरूपके चम्द्रस्य यद्रप चन्द्रत्वं तेनव मुखस्य रूपवत्ताप्रतीत्या प्रसिद्धचन्द्राभेदाभावेन लक्षणसमन्वयः। मुरविपयायाम् 'चन्द्रः' हत्यादतिशयोकी तयोरभेदान्नातिव्यािः। उत्प्रतारया यदयपि चन्द्ररवेन मुखस्य रूपवत्ताप्रतीतिरस्ति; तथापि सम्भावनाविषयरवाभनिश्चयाभावेन तभावाक्षातिव्याक्ष रित्यपि न सम्भवतीत्याह-इति चेन्नेति। हेतुमाए-वैपरीत्यस्यापीति। रूपकेऽभेदप्र- तिपत्ति:, अतिशयोमौ ताद्रप्यप्रतिपत्तिरित्यपि वस्तुं शक्यत्वात्। तम्रैव तरकएपने विनि- चिनिगमकस्याप्यभावाघ। (चित्र०) न च वाच्यम्- इन्दोरपि मृगाक्षीणां मुखेन्दुरतिरिच्यने। निर्जर: पीयमानोऽपि यः कदाचित्र हीयते॥। इति मुखचन्द्रस्य प्रसिद्धचन्द्रादू व्यतिरेकवर्णन तदभेदप्रतिपत्ती न सन्भ- चतीति रूपके ताद्रूप्यप्रतिपत्तिरेवेति। तथा सति हि- सुधाबद्धयासैरुपचनचकोररनुम्ृतां किरञ्ज्योत्स्नामच्छां लवलिफलपाकप्रणयिनीम्। उपप्राकाराग्र प्रहिणु नयने तकय मना- गनाकाशे कोऽयं गलितहरिणः शीतकिरण ।। 'अपरः पाक्शासन' इत्याद्यतिशयोक्ती 'अपर इव पाकशाननः' इत्यायु- त्प्रेक्षाया च रूपकवदेव प्रसिद्धचन्द्राद्यभेप्रतिपत्त्त्रभावेन ताद्वप्यप्रतिपत्तिरेय स्यादिति तयोलेक्षणस्यातिव्यामिरनेनानिवारिता स्यान।

Page 242

२०२ चित्रमीमासा

(भारती) वहाँ विनिगमक दिखाते हुए रूपक में ताद्रूप्यप्रतिपत्ति की शका 'न च' से करते हैं- 'हिरणाक्षियों के मुखचन्द्र चन्द्रमा से भी अधिक सुन्दर होता है। क्योंकि वह देवताभ से पिए जाने पर भी कभी कान्तिरहित नहीं होता।' यहाँ मुखचन्द्र का प्रसिद्ध चन्द्र से व्यतिरेकवर्णन का अभेदप्रतिपत्ति में असंभव, कहीं विनि- गमकता से रूपक में ताद्रूप्य की प्रतिपत्ति उसके अनुरोध से आवश्यक हो जाता है। पूर्व कथित दोष का निराकरण करते हुए लिखते हैं-ऐसा होने पर विदग्धशालभजिका में,- सगमर्मरी राजभवन के कोठे पर बैठी हुई मृगाक-लेखा को देखकर विदूषक के प्रति राजा की इस उत्तिरूप उदाहरण में- 'ओ विदूषक । तुम जरा अपनी आँखों को सामने राजभवन की छतों पर तो डालो ? देखो, कोठे पर विना आकाश के ही यह कैसा चन्द्रोदय हुआ है। इस चन्द्रमा में मृगचिह्न नहीं रहने के कारण निष्कलक प्रतीत होता है। (इससे प्रसिद्ध चन्द्र से मुखचन्द्र का उत्कर्षाधिक्य वर्णित है।) इतना ही नही, सुधा में आवद्ध अभिलाषा है, जिसकी ऐसे उपवन चकोरों से यहॉ अनुसृत हो रहा है तथा फलपाक अर्थात् लवलीलताविशेष के प्रति स्नेह प्रकट करने वाली अपनी कान्ति रूपी स्वच्छ ज्योत्स्ना की किरणों में भी यह प्रसारित कर रही है।' 'अपर. पाकशासनः' इत्यादि अतिशयोक्ति में और 'अपर इव पाके शासनः' इत्यादि उत्प्रेक्षा में रूपक की ही तरह प्रसिद्ध चन्द्रादि के अभेद की प्रतिपत्ति के अभाव से ताद्रूप्य की प्रतिपत्ति ही यहाँ है। उन दोनों के लक्षणों का अतिव्याप्ति दोष इससे निवारित नहीं होता। (सुधा) तन्र विनिगमकं दर्शयन् रूपके ताद्रप्यप्रतिपत्तिरेवेति शक्कते-न चेति। इन्दोरपीति। मृगापीणां मुखचन्द्र इन्दोरपि अतिरिच्यतेधिको भवति, कुतः? यैदेवैः तरुणैश्च पीय- मानोऽपि कदाचित्र हीयते, न हीनो भवतीति व्यप्षिरेकवर्णनस्या भेदप्रतिपत्तावसम्भवस्येव विनिगमकतया रूपके ताद्रप्यप्रतिपसिरेव तदनुरोधादावश्यकीत्याशक्टार्थंः। तदपि निरा- करोति-तथा सति हीति। सुधेति। विदग्धशालभलिकायां स्फाटिकप्राकारशिखरस्थां मृगाक्कलेखां विलोक्य विदूषकं प्रति नृपस्योकि :- त्वम्, उपप्राकाराग्रं नयने प्रहिणु= परेशय मनागीषत््कय, अनाकाशे= अनन्तरिष्े अय शीतकिरणचन्द्रः क इति, प्राकार- समीपे अथ कीदृशो गलितश्प्युतो हरिणो यस्माषिष्कलछ्ततया उत्कर्षाभिक्यम्, पुनः कीहक? सुधायां बट्दो ग्रासोऽमिलाषो यैस्तरुपवनसम्बन्धिभिश्रकोरेरनुसृतां लवत्याः फलपाकस्य प्रणयिनी सदशीम अच्छां स्वच्छा ज्योत्ख्रां त्वेनाध्यवसिता कान्तिप्रभाख किरन् प्रसारयन् इत्यर्थः। लवली छताविशेष:, हरफारेवदीति प्रसिद्धः। 'प्राकारो वरणः शाल:' हत्यमरः। 'अपरः पाकशासन.' हत्यतिशयोकौ, आदिशन्दात्-'अनुच्छ्विष्टो देवैरप- रिदलितो राहुदपने:, कलंकैर्नाक्िष्टो न खलु परिभूतो दिनकृता। कुहुमिर्नोलिप्तो न च युवतिवषत्रेण विजित:, कलानाथः कोडयं कनकलतिकायामुदयते ॥।' इस्यादावित्यर्थः। 'अपर इच पाकशासनः इत्युश्प्रेपायाम्, आदिशब्देन-'बालेन्दुवक्त्राण्मविकासभावाद् वसुः पलाशान्यतिकोहितानि। सदो वसन्तेन समागतानां नखवतानीव वनस्थलीनाम्॥ इस्यादावित्यर्थः ।

Page 243

रूपकनिरूपणप्रकरणम् २०३

(चित्र०) अथ तन्न प्रसिद्धचन्द्राद्यभेद प्रतिपत्त्यभावेऽप्युपात्तकल्पित।पर चन्द्राद्भेद- प्रतिपत्ति: सम्भवतीति चेत् ? रूपकेऽप्येवं वक्तुं शक्यमित्यसम्भव एव लक्षण- स्य स्यात्। किश्, अतिरोहितस्ापण इत्यनेन ससन्देहभ्रान्तिमतोरतिव्वाप्ति- वारणेऽपि नापहवेऽतिव्याप्तिवारणम्। 'नेदं मुखं किन्तु चन्द्र:' इत्यत्र मुखे मुखत्वाभावारोपस्य चन्द्रत्वारोपस्य चाहार्यत्वेन विपयतिरोधायकत्वाभावात्। आहार्यारोपस्यापि तिरोधायकत्वे रूपकेऽपि लक्षणस्यासम्भवः स्थात्। उत्ग्रे- क्षाया अप्याहार्यसम्भावनारूपाया अतिरोहितरूपिण इत्यनेनैव व्यावृत्तिसिद्धा- वारोपविपयस्येति विशेपणस्य वैयर्थ्य च स्यात्। अतिशयोक्तों विपयस्थ निगीर्णस्य तिरोहितत्वेन तस्या अप्यनेनैव व्यावृत्तिः । (भारती) वहाँ प्रसिद्ध चन्द्रादि के अभेदप्रतिपत्ति के अभाव में भी उपा्तकल्पित जो अन्य चन्द्रादि है, उसकी अभेदप्रतिपत्ति तो यहाँ है। इस शका का समाधान करते है-कल्पित अपर चन्द्रादि के अभेदसिद्ध रूपक में भी यदि ऐसा कहेंगे तो लक्षण का असमव दोपी स्पष्ट होगा। इसलिए दोनों पक्षों में भी-'आरोपविपयस्य' यहविशेषण दोपदुष्ट ही है। इसके बाद अन्य विशेषण का खण्डन करते हुए कहते है-'अतिरोहितरूपिण' विशेषण भी लक्षण में निरर्थक ही है। क्योंकि सदेह और भ्रान्तिमान में इससे यद्यपि अतिव्याप्ति दोप का निराकरण हो भी जाता है, फिर भी, अपह्वति अलकार में इस विशेषण से अतिन्यापि दोप का निवरण असभव ही है। 'यह मुख नहीं किन्तु चन्द्रमा है' यहाँ मुख में मुखत्वाभाव का आरोप है, उसके चन्द्रत्वारोप का आहार्यत्व से विपयरूप उपमेय का तिरोधायकत्व का अभाव ह। उसे भी स्वीकार करने पर रूपक में भी उसी प्रकार के प्रतिरोधक रहने से अतिरोहितरूपत्व की असभवापत्ति है। विशेषण स्वीकृत करने पर भी अन्य दोप बताने ह-आहार्यसभावना रूप उत्प्रेक्षा की इस विशेषण से व्यावृत्ति सिद्ध रहने पर भी आरोपविषयक विशेषण की न्यर्थत्वापत्ि होगी। वहाँ भी निगीर्ण उपमान के तिरोहित रूपत्व से अतिशयोक्ति की भी इम विशेषण से व्यावृत्ति सिद्ध है।

(सुधा) रूपकवदेब प्रसिन्धचन्द्रादेव्भेक्ष्स्य प्रतिपत्तेरसम्भवेन ताद्रृप्यप्रतिपत्तिभावेन तयोः प्रप्ताति ज्या प्तेर्दुनिवाररवात्। ताद्प्य प्रतिपत्तिसरवेन तम्र लक्षणममन्वयमरवाघ् पुनराशकते अथ तब्र-अतिशयोक्त्यादावित्यर्थ। प्रसिन्दूचन्द्रा देरभेदस्य प्रतिपत्तेरभावे उपातं कपतं यदपर चन्द्रादि प, तम्पाभेदप्रतिपत्तिरत्रास्तीत्येवेति शक्टार्थ। समाधन्ते-करिपनापर- धन्द्रादेरभेदसिद्धे रूपकेऽपि वष्तुं पाफ्यरवेऽसन्भव एव लक्षणस्य न्यान। तस्माए पण्दूयेड- प्यारोपविपयस्येति विशेषणं दूषणदुष्टमेव। विशेषणान्तर खण्टयितमुपक्रमते-अनिरोदटिन- रूपिण इति। ससन्देहत्रान्तिमदपह्वतीरना व्यावृत्यय सद्विशेपणमितयुक्तम्। तय् हयोर तिव्याप्तिवारणेऽव्यपह्वतायतिव्यापिनिवारणं न सम्भवतीति। 'नेवं मुसं किन्तु वन्दः' हरयत्र मुखे मुखरनाभावस्य्र य आरोप., तत्य धन्द्ररवारोपस्य व आहार्यरचेनाहनुं योग्य-

Page 244

२०४ चित्रमीमांसा

रवेन विषयस्योपमेयस्य तिरोधायकत्वाभावात्। तस्यापि तदङ्गीकारे रूपकेऽपि ताइश- तिरोधायकत्वसत्वेनातिरोहित रूपर्वाभावादसम्भवापत्तेः । विशेषणाङ्गीकारे दूपणान्तर- माह-उत्पेछ्षाया इति। आहायसम्भावनारूपोतपेप्षाया अनेन विशेषणेन, व्यावृत्तिसिद्धा- धारोपविपयस्येति विशेषणस्य व्यर्थत्वापत्तेः। अतिशयोक्तिव्यावृति तद्विशेषणफलीभूता- मपि निराकरोति-अतिशयोक्काविति। तन्नापि निगीणस्योपमानस्य तिरोहितरूपस्वेना- तिशयोक्तेरप्यनेन विशेषणेन व्यावृत्ते: सिद्धेश्च। (चित्र०) अपि च, त्वत्पादनखरत्नानां यदलक्तकमाजैनम्। इद श्रीखण्डलेपेन पाण्डुरीकरणं विधो:॥ इति निदर्शनायामतिव्याप्तिः। तत्रोपमेयवाक्यार्थे उपमानवाक्यार्थताद्रू- ध्यारोपसद्भावात। यदि चारोपविषयस्य पदार्थस्येति विशेषणम्, तथाप्यलक्त- ककृतत्वत्पादनखमार्जनं श्रीखण्डलेपकृतविधुपाण्डुरीकरणमिति, निदर्शनायाम- तिव्याप्तिः, अङघ्िदण्डो हरेरूर्ध्वमुत्क्षिप्तो बलिनिग्रहे। विधिविष्टरपद्मस्य नालदण्डो मुदेऽस्तु वः ॥ इति रूपकेऽव्याप्तिश्च। (भारती) और मी- 'रल सदृश आपके चरण नखों का जो अलक्त (महावर) से साफ करन अर्थात् रगना है, यह चन्दन के लेप से चन्द्रमा का श्वेत वनाना है।' इस निदर्शना के उदाहरण में अतिव्याप्तिदोष है। यहाँ पूर्वार्द्ध प्रतिपाद् उपमेय वाक्यार्थ में उपमान वाक्यार्थ के ताद्रूप्य का जो आरोप है-उससे अतिव्याप्ति आवश्यक है। प्रकारान्तर से समाधान करते हुए कहते हैं कि यदि इस आरोप विषय का 'आक्षेप से प्राप्त पदार्थविशेषण से वाक्यार्थ निदर्शना में अतिव्याप्ति का निराकरण हो भी जाता है तो वहाँ पदार्थ आरोप विषय के असभवता से तथा महावर से तुम्हारे पद नख के मार्जन एव श्रीखण्डलेप से चन्द्रमा के पाण्डरी- करण रूप निदर्शना में अतिव्याप्ति दोष दुनिवार है। इसी प्रकार- 'वलि नामक दैत्यविशेष के वन्धन के लिए ऊपर की ओर उत्क्षित भगवान् विष्णु के-व्रक्मा के-आसन कमल के नाल दण्ड रूप अधरि(चरण)दण्ड हमें प्रसन्नता दे।' इस प्रकार से प्रसिद्ध विशिष्टरूपक में अतिव्याप्ति दोष है। यहाँ आरोपविषयीभूत पदार्थ की विद्यमानता है। अन. दोनों पक्षों में भी प्राचीनों के उक्त लक्षण दूपण दुष्ट ही है। (सुधा) अन्यदूषणान्तरमाह-त्वदिति। यत् त्वत्पादनखरत्ानामलक्कक्केन मार्जनम् , इदं पीखण्टलेपेन इन्दोः पाण्डुरीकरणम्, इति निदशनायामतिव्याप्तिः। यदिदंशब्दाम्यां सदश वाक्यार्थयो रेकरवारोपसप्वेन निरदर्शनालक्षणस्य सत्चात् त्त्वाप्रसिद्धे। अश्र पूर्वारध

Page 245

रूपकनिरूपण प्रकरणम् २०५

प्रतिपाद्योपमेयवाक्यारथे उपमानवाक्यार्थस्य यस्तादृप्यस्याशेप:, तस्य सन्ावादतिव्यासे रावश्यकर्वम। प्रकारन्तरेण समाधानमाशक्कय निराकरोति-यदि चेति। आरोपविषय

करणमित्युक्तरूप निदर्शनायामतिव्यासे: स्वात्। त्वरपादेश्यादी वाक्यार्थनिदर्शनाया ए्व प्रसिद्धिः। तथा च पदार्थस्येति चिषणेनातिव्याप्तिनिवारणमाशक्कय दूषणान्तरमाह- अडत्रिदण्ड इति। बलेदैत्यविश्येषस्य वन्घने कर्तग्ये अर्ध्वमुस्िप्तो हरेरहव्रिदण्डो वो मुदेऽस्तु। कीटशः विधे: ब्रह्मणो विष्टरः आसनं तद्रपस्य पम्मम्य नालदण्ट द्वर्यर्थः। पवं

तस्मात् पपतयेऽपि प्राचीनो क्र्मेत्तव्लक्षणं दूपणपुष्टमेवेति दिक।

(चित्र०) यत्तु सरस्वतीकण्ठाभरणोक्त लक्षणम्- यदोपमानशब्दानां गौणवृत्तिव्यपाश्रयात्। उपमेये भवेद् वृत्तिस्तदा तद्रूपक विदुः ॥ इति। तदप्यतिशयोक्तावतिव्यापम् ; 'मुखं चन्द्रः' इति रूपके चन्द्रशब्दस्य मुखे गौणसारोप्यलक्षणा, 'चन्द्रः' इत्यतिशयोक्तौ साध्यवसानलक्षणेत्यालङ्कारिक- सिद्धान्तात्। (भारती)

यत्त से भोजराज के 'सरस्वतीकण्ठाभरण' में कथित रूपक के लक्षण की अवतारणा करते हैं- 'जब उपमान के वाचक शब्दों का गौण वृत्ति या लक्षणा के आश्रयों से उपमेय के अर्थ में प्रयुक्त होता है, तव उसे रूपक कहते है।' इस परिभापा से भी अतिशयोक्ति में अतिव्याप्ति हो जाती है। अतिशयोकि अरकार में भी गौण वृत्ति के आश्रय को लेकर उपमान का प्रयोग उपमेय के अर्थ में होता है। 'मुस चन्द्र.' इस रूपक में गौणी सारोपा लक्षणा होती हे। और यदि मुख को देखकर कहा जाय तो गौणी साध्य- बसाना लक्षणा होगी। अत एव गौण वृत्ति के आश्रय के कारण रूपक मानने पर अतिशयोक्ति में भी रूपक की स्थिनि हो जायगी।

(सुधा) सरस्वतीकण्ठाभरणे भोजराजोंकं लक्षणं दूषयितुं पूर्व तस्प्रतिपादयति-यत्विति यदेति। उपमानवाघकशव्दानां गौणवृत्ते: मारोपलक्षणाया विशेषत आध्नयाद् उपमेये यदा वृनिर्भवेषदा रूपकमलद्वारं विदुरित्यन्वय । तद्दूपयति-तद्पीति। 'पश्य नीलो- स्पलदलासनिस्सरन्ति शिताः शराः इत्यादतिशयोकी साध्यवसानस्प्गीणवृत्तेराश्यणा- दारोपसध्वेनातिव्याप्तेटुनिवारवात्। न घ तमनातिशयोककी साध्यवसाना नास्तीति वाध्यम? रूपके गौणी सारोपा अतिशयोकी साध्यवसाना हरयादिप्रसिदे: सर्वावकारिक- सम्मतरवास्।

Page 246

२०६ चित्रमीमांसा,-

(चित्र०) वस्तुतस्त्वतिशयोक्तावेव लक्षणा, नतुरूपके इति शक्यं व्यवस्थापयि- तुम्। तथा हि-अतिशयोक्तौ विषयाभिधायिमुखादिपदाप्रयोगाच्चन्द्रादिपदेनैव तत्प्रत्यायन कार्यमिति तस्य तत्र लक्षणावश्यभास्थेया। रूपके विपयविषयिणोः स्वस्ववाचकाभिहितयोरभेदप्रतिपत्तिः ससर्गमर्यादयैव सम्भवतीति किमर्थ तत्र लक्षणा, अशक्या च तत्र लक्षणाभ्युपगन्तुम्, कथम् 'मुखं चन्द्रः' इत्यत्र लक्षणया मुखे प्रवर्तमान चन्द्रत्वं केन निमित्तेन प्रवर्तेत; मुखत्वेन वा मुखा- साधारणकान्तिविशेपेण वा, चन्द्रत्वेन वा, चन्द्रासाधारणकान्तिविशेपेण वा, मुखचन्द्रोभयानुगतकान्तिसामान्येन वा, सुखगतचन्द्रसादश्येन वा ? नादः मुखपदेन पौनरुक्त्यापत्ते :; मुखत्वस्य शक्यासम्बन्धित्वेन तेन निमित्तेन लक्षणायोगाच। अत एव न द्वितीयः, नापि तृतीयचतुर्था, मुखावृत्तिधर्मयो- स्तन्न अवृत्तिनिमित्तत्वायोगात् । न पञ्चमः, 'कान्तिमान्मुखचन्द्रः' इत्यत्र कान्तिमत्पदेन पौनरुक्त्यापत्तेः। नापि षष्ठः, साहश्यस्य शब्दप्रतिपाद्यत्वेना- व्यङ्गचत्वेन रूपकस्योपमापृथग्भावानुपपत्तेः। अभेदप्रधानं रूपकमिति सिद्धा- न्तविरोधाच्च । तस्माद्रूपके स्वस्वपदाभिहित योर्विषयविपयिणोरभेदप्रतिपत्तिः संसर्गमर्यादयेत्येव वक्तव्यमिति लक्षणस्यासम्भवोऽपि दोष: । यदा तु 'वक्त्रे- न्दौ तव सत्यय यदपरः शीतांशुरुज्जम्भते', 'द्ौ चन्द्रौ जगतो राजन् सं दिवि, त्वं महीतले' इत्यादौ विपयस्य प्रसिद्धचन्द्रामेदप्रतिपत्तिर्न सम्भवतीति कथश्ि- दिन्द्रादिपदस्य विषये लक्षणा कल्प्यते; तथापि 'कान्तिमान् मुखचन्द्र:' इत्यादौ काठकाध्यापकादिवत् संसर्गमर्याद्यवा भेदप्रति पत्तिसम्भवेनाति क्िष्टलक्षणाश्रय-

(भारती) वस्तुत से दीक्षित जी यहाँ स्वमत की स्थापना करते हुए लिखते हैं कि अतिशयोक्ति में ही लक्षणा स्वीकृत है, न कि रूपक में। अतिशयोक्ति में उपमेयवाचक मुखादि पद के प्रयोग के अभाव से चन्द्र पद कथन से ही मुख की प्रतीति करने के कारण वहाँ लक्षणा आवश्यक है। रूपक में तो स्ववाच्य और वाचक पद से अभिहित उपमेय और उपमान के नामार्थ के साथ अभेदान्वय है और वह अमेदान्वयससर्गमर्यादा से ही अभेदप्रतिपत्ति से लक्षणा का यहाँ अभ्युपगमन अशक्य है। क्योंकि, यहाँ गौणी लक्षणा है। मुख में प्रवर्त्तमान चन्द्रपद किस निमित्त से प्रवर्त्तित है? उत्तर में कहते हैं-इस विचार पर यहाँ छः पक्ष है-(१) मुखत्व से, (२) उस असाधारण में कान्ति विशेष से, (३) चन्द्रत्व से, (४.) उस असाधारण कान्तिविशेष से, (५) दोनों के अनुगत कान्ति साम्य से; अथवा (६) मुखगत चन्द्रमा के सादृश्य से। यहा प्रथम पक्ष नहीं है क्यों कि-यदि सुखत्व से चन्द्रादि का मुखादि में प्रवृत्ति स्वीकार करने में सुख पद में ही पौनरुक्त्यापत्ति होती है मुखत्व का चन्द्रादि के असम्वन्ध से उसके द्वारा मुखत्व के निमित्त से लक्षणा का अयोग है। मुख के असाधारण कान्तिविशेष का भी चन्द्र के असम्वन्धित्व से लक्षणा के अभाव से दूसरा पक्ष भी ठीक नहीं है।

Page 247

रूपकनिरूपण प्रकर णम् २०७

तृतीय, चतुर्थ पक्ष भी नहीं का सकने। क्योंकि चन्द्रत्वादि का मुस मे अमगन गमे के कारण उन दोनों के प्रवृत्ति-निवृनत्व का भी सयोग है। अन्य रहने पर नायपूतित्व में नपने से पृथक अनधिकरणत्व का प्रवृत्ति निवृनत्व है। अत. यहाँ चन्द्रवाठि का नुसादि में तत्वानान मे उस कथन की भी अयोग्यता हू। इसी प्रकार 'उभयानुगत' पचम पक्ष भी नहीं का सकने है। क्योंकि उभयानुगतत्व से ही कान्तिमत्वादि के लाभ से 'कान्तिमान् मुगचन्द्र' इत्यादि मे पीन- रुकत्यापत्ति है। इसी प्रकार 'मुखगतत्यादि' छठे पक्ष की भी सभावना नही है। क्योंकि 'नादव्य' का उस गब्द के द्वारा प्रतिपाध होने के कारण व्यग्यन्व के अभाव से रूपक का उपमा से प्रथग- भाव की अनुपपत्ति होगी। यदि इसे ही स्वीकृत करते है तो अभेदप्रधान रूपय जार भेद- प्रधान उपमा इस प्रसिद्व सिद्धान्त का विरोध होता है। अत स्ववाचक पद से कवित उपमान और उपमेय की अभेदप्रतिपत्ति का ससगंमर्यादा से ही लाभ होने के कारण वहाँ लक्षणा तो कह ही नही सकते और उसे स्वीकार करने पर पूर्वकथित दोपों से वसे लक्षण की असभावना भी है। समाधानान्तर की आशका से पुनः दोप देते हैं, जव-'वयसत्ेन्दी तव सत्ययं यदपरः शीतासु- रुजम्भते' इस उदाहरण मे तथा 'दो चन्द्रो जगतः राजन् स दिवि, त्वं महीतले" इत्यादि में मुख का प्रसिद्ध चन्द्रमा से अभेदप्रतिपत्ति की सभावना नहीं है। तो अन्यया अनुपपत्ति से चन्द्रादि पद का मुसादि में आवश्यक लक्षणा की यदि कपना करें भी तो काठकाध्यापकादि ए्ट में जैसे काठक से अभिन्न अध्यापक की अभेदप्रतिपत्ति ससर्गमर्यादा से होती है, मी प्रकार कान्तिमान् मुसचन्द्र' इत्यादि में मी ससर्गमर्यादा से ही अभेद की प्रतिपत्ति है। फिर :सकी मभावना से वाध की अपेक्षा से किष्ट लक्षणा की अनुपस्थिति में अव्यासतिदोप निश्चित रूप से यह। होगा ही। (सुधा) रुपके लक्षणा नास्त्येवेति स्वमतं व्यवस्थापयति-वस्तुत इति। अतिशयोफ्तावेव लक्षणाङ्गीकार:, न तु रूपके इति स्वमतव्यवस्था। अतिशयोक्कायुपमेयवाघक मुग्रा दि पशस्य प्रयोगाभावेन चन्द्रपदकथनेनेव मुखप्तीतेः कर्तव्यतया तत्र लक्षणा आवग्यफी, रूपके तु स्ववाच्यवाधकपदाभ्यामभिहितियोरुप मेयोपमा नयोर्नामार्थयोरभेदान्वय इनि ससर्ग- मर्यादया पवाभेदप्रतिपत्तिसम्भवेन तप्लक्षणाचा अभ्युपगन्तुमशक्यत्वात्। लक्षणायास्तग्रा- सम्भवं व्यवस्थापयति-कथमिति। 'मुख चन्द्रः' इत्यम्र लक्षणाया गौण्या हत्यथ.। मुखें प्रवर्तमानं चन्द्रपदं केन निमित्तेन प्रवर्तेत ? भघ्र पट् पक्षा .- ( १) मुखरदेन वा, (२) तदसाधारणे कान्तिविशेपेण वा, (३) चन्द्रत्वेन वा, (४) तदसाधारणकान्ति- विश्ेषेण वा, (५) उभयानुगतकान्तिस्ताग्येन वा, (६) मुसगतचन्द्रसाहइयेन या। यदि मुखत्वेन छन्द्रादेसुखादी प्रवृत्यम्रीकारे मुखपदे पीनरपत्यापत्ते, मुसत्वस्य चन्द्रा- देरसम्वन्घितया तेन मुखवेन निमितन लक्षणाया अयोगाद। मुखामाधारणकान्तिविशेष स्यापि चन्द्रासम्बन्धिरवेन लक्षणाया अभावाद द्वितीयोऽपि पक्षो नास्तीत्याशयः। तृतीय चतुर्थयोद्पणमाह-नापीति। चन्द्रत्वादर्सुखेसम्भवान्मुखे तयोः प्रवृत्तिनिमित्तत्वस्याप्य योगास्, शक्या्वे सति शक्यवृत्तिरवे घ सति रवभिवशक्यानधिकरणर्वम्य प्रतनृत्तिनिमित्त- रवात्। यथा गोपदपरवृत्तिनिमित्ते गोहादी गोपदशक्यावं गोपद्णक्यगवादिवृत्तितवं गोत्वभिननं यद्गोपद्शक्यम्, तदनधिकरणरवस्य म्वाद्वाक्षणममन्वय'। चन्द्ररवादेमुंगादी तथ्वा भावेन तरकथनस्यायोग्यर्वात्। उभयानुगतेत्यादिपझ्रमोऽपि न, उभयानुगत वादेव क्ान्तिमावादेळभसर्वेन कान्तिमान् मुखन्द इत्यादी पौनदर्यापत्ते। मुखगतेत्यादि

Page 248

२०८ चित्रमीमांसा

षषोऽपि न सम्भवति, साहश्यस्य तच्छब्दप्रतिपाद्यतया, व्यञ्यरवाभावेन रूपकस्यो- पमातः पृथगभावानुपपत्तेः। इषपती ्वभेदप्रधानं रूपक भेदप्रधानसुपमा इति सिद्धान्त- विरोधाच्। उपसंहरति-तस्मादिति। स्ववाचकपद्कथितयोरुमानोपमेययोरभेदप्रति पत्तेः संसर्गमर्यादयेव लाभेन तन्र लक्षणा वकुमशक्येव, तदङ्गीकारे पूर्वोक्तिदूषणादिना ताछशलक्षणस्यासम्भवाच। समाधानान्तरमाशङ्कय दूषयति-यदा खिति।'कि पद्मस्य रुचि न हन्ति नयनान्द विघने न किम, वृद्धिं वा वृषकेतनस्य कुरुते नालोकमात्रेण किम्। वयत्रेन्दी तव सत्ययं यदपर शीतांशुरुजम्भते, दर्पः स्यादमृतेन चेदिह तद्प्यसयेव बिम्बाधरे ॥' हत्यत्र, 'दौ चन्द्रो जगतो राजन् स दिवि त्वं महीतले' इत्यादी च सुखस्य प्रुसिद्ध धन्द्रादभेवस्य प्रतिपत्तिर्न सम्भवतीति तदन्यथानुपपत्या चन्द्रादिपदस्य मुखादौ लक्षणा आवश्यकीति करप्यते चेत? तथापि काठकाध्यापकादिपदे यथा काठकाभिस्नो ध्यापक इति संसगर्मादर्याऽभेदप्रतिपत्तिः, तथा 'कान्तिमान् सुखचन्द्रः' इत्यादावपि संसगमर्याद्यैवाभेदप्रतिपत्तिसम्भवेन वाघाद्यापेक्षत्वेनातिक्रिष्टाया' लक्षणाया असरवेना व्याप्तयापत्ते:। (चिन्न०) अपि च- सेतुः शलैस्त्वया बद्धः पूर्व जेतुं दशाननम्। कं जेतुमद्य बध्नासि यशश्चन्द्रोपलैः प्रभो॥। चिराद्यत्कौतुकाविष्ठं कल्पवृक्षमुदीक्षितुम्। तन्मे सफलमद्यासीन्नेत्र त्यय्यवलोकिते।। इत्यादौ व्यङ्गचरूपके चाव्याप्तिः। अत्र ह्वादे वण्य प्रभुं प्रति रावणवधाय त्वया सेतुर्बद्ध इति निदिश्यमानेन वस्तुना त्वमेव राम इति रूपकं व्यज्यते, न च तत्र विषये गौणं रामपदमस्ति। द्वितीये त्वामवलोकयता मम नेत्रेण चिरका- द्वित कल्पमृक्षावलोकनं लब्धमिति प्रतीयपानेन विशेषालङ्वारेण त्वमेव कल्पवृक्ष इति रूपकं व्यज्यते तन्र कल्पवृक्षपदं प्रसिद्धकल्पवृक्षपरमेव, न विषयलक्षक- मिति स्पष्टम्। (भारती) सरस्वतीकण्ठाभरण के लक्षण में और दोष बताते हैं- 'पहले दशानन रावण को जीतने के लिए हे राम! आपने पहाडों से सेतु का निर्माण किया था। आाज पुनः यशचन्द्र रूपी पत्थर से किसे जीतने के लिए सेतु वना रहे हैं।' इसी प्रकार- 'जिस कल्पवृक्ष को देखने के लिए मेरी आँखें बहुत दिनों से कौतुहलाविष्ट थीं-वही आखे , आज तुम्हें देखकर सफल हुईं।' व्यग्य रूपक के इन दोनों उदाहरणों में अव्याप्ति होगी। प्रथम श्रोक में वर्णित राजा के प्रति रावण वध के लिए सेतुवन्धन रूप निर्दिश्यमान वस्तु से तुम्हीं राम हो-इस व्यक्त रूपक में गौण वृत्ति से आश्रयीभूत राम पद के अभाव से अव्याप्ति दोष स्पष्ट है। इसी प्रकार दूसरे

Page 249

रूपकनिरूपणप्रकरणम् २०६

उदाहरण में भी-तुम्हें देसनेवाली आँसों से बहुन दिनों से समिपिन कस्पवृद्ष के अोवन रूपी लाभ के वर्णन से प्रतीयमान विशेष अल्कार से 'तुन्ही कल्पपृक्ष हो' इस प्रवार के रूपक में व्यज्नागन्य होने के कारण करपवृक्षपद का प्रसिद्ध कल्पवृक्षपरत्व से उपमेयन्क्ष्कत्तानाब से अव्याप्ति स्पष्ट है।

(सुधा) कण्ठाभरणोक्तषक्षणे दूषणान्तरमाह-अवि चेति। तक्लक्षणे व्यङ्ये रूपकेऽ्च्याहिरित्य पमन्वयशेपः। व्यह्षवरुपकस्योदाहरणङ्गय दर्शयति-सेतुरिति। पूर्व दशाननं रावणं जेतु त्वया रामेण शैलैः पर्वत सेतुर्वद्द आसीत, अघ्य यशशन्द्रपस्तरः कं जेतुं बप्नासीति प्रथमान्वयः। चिरादिति। यत् कल्पवृष दष्दुं मे नेत्र चिरात् कौतूहाविष वभृ, तम्जेत्र त्वयि अवलोकिते सफलमासीदिति परस्यान्वयः। तत्राव्याप्तिमाद-वर्णनीयं रजानं प्रति रावणवधाय सेतुन्तनरूपनिदिश्यमानवस्तुना त्वमेव राम हति रूपक-

'तवमेव करपवृक्षः' इति रूपके व्यअ्षनागग्ये, कव्पवृष्षपदस्य प्रसिद्ध करूपवृ वपररयादुपमेय-

(चित्र०) ततः कुमुदनाथेन कामिनीगण्डपाण्डुना। नेत्रानन्देन चन्द्रेण माहेन्द्री दिगलड कृता॥ इति शुद्धसारोपलक्षणामूलकरूपके चाव्याप्तिः। तत्र ह्यानन्दहेतुत्वादा- नन्दत्वरूपण न त्वौपम्यात्। (भारती) 'कामिनी के कपोल की तरह पाण्डु वर्ण वाले कुमुदिनी-नाथ तथा नेत्रों को आनन्दित करने वाले चन्द्रमा से पूरव की दिशा अलकृत है।' रूपक के इस उदाहरण में अव्याप्ति है। यहाँ नेत्रों को आनद देनेवाले तथा चन्द्रमा के वीच हेतुहेतुमद्भाव सम्वन्ध से शुद्धा सारोपा लक्षणा की उपस्थिति से गौणी सारोपा के अमाव से सरस्वतीकठाभरण के उक्त लक्षण में अव्याप्ति दुर्निवार है। क्योंकि आनन्दरेतुत्व अर्य ही विशेषण है न कि औपम्यार्थ, इस उत्ति मे हेतुहेतुमद्भाव की ही प्रतीति प्रतिपादित है। (सुधा) तयोरमंतान्तरे लचयत्वमाशकय दूषणान्तरमाह-तत हति। कामिनीगण्ट एव पाण्टु: तेन कुमुदनाथेन नेन्रानन्देन चन्द्रेण पूर्वा दिगलडकृता इत्यन्दय। अत्र र्पकेऽध्याप्ति.। अश्र नेत्रानन्दधन्द्रयोहॅतहेतुमन्नापसम्बन्धेन शुद्धसारेपलपणाया विद्यमानतया गौणसा- रोपाया अभावास्, कण्ठाभरणोफ्तलसणेडव्यापेटुंप्परि एरस्वाद्,आननद तुश्ार्थमेवविशेय पम, न रवोपम्यार्थमित्युकत्या हेतुहेतुमन्नाव्स्येव प्रतीते: स्फुटतया प्रतिपादनादिति दिक। (चित्र०) यत्तु 'आयुर्धृतम्' इत्यादौ विच्छित्तिविशेपादर्शनान्छुद्वमारोपलक्षणास्थले १४ चित्र०

Page 250

२१० चित्रमीमांसा

न कश्विदलद्कार इति। तदयुक्तम्; 'गौर्वाहीकः' इत्यादौ विच्छित्तिविशेषादर्शनेन गौणसारोपलक्षणास्थ लेऽप्यलङ्कारत्वाभावप्रसङ्गात्। क्वचिद्वैचि त्यादर्शनेऽप्यन्यत्र वैचितयवति स्थलेऽलङ्कारत्वमिहापि वक्तु युक्तम्। 'नेत्रानन्देन चन्द्रेण' इति। आयुर्दानमहोत्सवस्य विनतक्षोणीभृतां मूर्तिमान् विश्वासो नयनोत्सवो मृगद्शां कीर्तेः प्रकाश: परः । आनन्दः कलिताकृतिः सुमनसां बीरश्रियो जीवितं धर्मस्यैष निकेतनं विजयते वीरः कलिङ्गेश्वरः ॥ इत्यादौ शुद्धसारोपलक्षणास्थलेऽपि वैचितयदशनात्। यदि तु हेतुमता सह हेतोरसिधानमभेदतो हेतुरिति मतान्तराश्रयेण तन्र हेत्वलङ्कारो न रूपकमित्यभ्ष्युपगस्येत, तदा 'आरोपविषयस्य स्यात्' इति पूर्वोदाहृतलक्षणस्य तन्रव्याप्तिः। तत एव 'उपमैव तिरोभूतभेदारूपकसुच्यते' 'तद्रपकसभेदो थ उपमानोपमेययोः' इत्यादिलक्षणेष्वप्यतिव्याप्त्यादिदोषा यथासम्भवमुन्नेयाः। ' अत्र वदाम :- (भारती) यहाँ 'यत्तु' से मतान्तर का प्रतिपादन करते हैं-शुद्धा सारोपा लक्षणा के 'आयुर्घृतम्' इस उदाहरण में किसी भी अलकार की सभावना नहीं है। क्योंकि यहाँ किसी भी प्रकार के चमत्कार- विशेष का अभाव है। किसी वाक्य में चमत्कारविशेष के रहने पर ही अलकार होता है अन्यथा नही-ऐसा कुछ लोगों का मत है। किन्तु, यह मत युक्तिसगत नहीं है। क्योंकि गौणी सारोपा लक्षणा के 'गीर्वाहीक' इस उदाहरण में चमत्कारविशेष के अभाव से अलकार कथन की सर्वथा अयोग्यता है, वहा भी अलकाराभाव का प्रसग उपस्थित होगा। यदि 'गोर्वाह्ीक.' इत्यादि में अलकाराभाव रहने पर भी चमत्कारविशेष मान लेते हैं तो 'मुख चन्द्रः' इत्यादि उदाहरण में 'अलकार है ही' इसे भी स्वीकृत करते हैं तो 'आयुर्धृतं' इत्यादि में उसका अभाव रहने पर भी 'नेत्रानन्देन चन्द्रेण इत्यादि में चमत्कारविशेष के दर्शन से अलकार की भी स्वीकृति रहने पर दोषाभाव है। वहाँ है, वहाँ नहीं है, इस प्रकार की स्वीकृति का विनिगमक के अभाव से शपथ मात्र का ही निर्णय सभव है। 'नम्न राजाओं को जीवित दान देने रूप महान् उत्सव का शरीरधारी विश्वास, मृगनयनियों को नेत्नानन्दकीर्ति का श्रेष्ठ झलक, सुजनों (सहृदयों) के लिए मूर्तिमान आनन्द, वीर लक्ष्मी की जान, यह धर्म का गृह् ऐसा कलिंग देश का राजा सर्वोत्कृष्टरूप से अवस्थित है।' इसी प्रकार 'आयुर्दानमहोत्सवस्य' इत्यादिं शुद्धा सारोपा लक्षणा के स्थल में चमत्कारविशेष के दर्शन से रूपक में भी अव्याप्ति होगी। यदि 'हेतुहेतुमतोरक्यवर्णन हेतुरुच्यते' इस मतान्तर के आश्रय के पूर्वोदाहृत स्थल में हेतु अलकार ही है-न कि रूपक। इस तरह की स्वीकृति में तो 'आरोपविषयस्य स्यात्' इस विशेषण से पूर्वलक्षणद्वारा हेत्वलकार में भी अतिव्याप्ति जानना चाहिए। इसी प्रकार 'सरस्वतीकण्ठाभरण' के पूर्वोक्त लक्षण में दोष दिखाकर अन्य लक्षणों का भी 'तत एवेति' से खण्डन करते हैं। 'तिरोभूतमेदा उपमेव रूपकम्' यह लक्षण भी अशुद्ध ही है।

Page 251

रूपकनिरूपणप्रकरणम् २११

कयोंकि इस लक्षण से अतिशयोक्ति में अतिन्यासि है। न्योंकि भेवांगविनिर्मुक्तसावृटश्य कों चदा सत्ता है। इसी प्रकार काव्यप्रकाशकार के 'य उपमानोपमेययोरमेद:, तद्रृपकम्' इम लक्षण से मी अतिशयाक्ति में अतिव्याप्ति है और शुता सारोपा लक्षणामूला हेतु अन्यकार में भी अति यापति है। इसी प्रकार अन्य दोप भी दर्शनीय है। फिर दूसरों के लक्षणों मे तो दोपान्वेषण व्यर्थ दी है। इम प्रकार प्राचीनों के लक्षणों का सण्टन कर 'अत्र वादाम' से अपना लक्षग कहते है- (सुधा) मतान्तरं प्रतिपादयनि-यत्तु इति। 'आयुर्षृतम्' इश्यादो शुद्धसारोपलक्षणोदाहरणे कोडप्पलक्वारो न सम्भवति, चमाकारविशेषस्य तग्राभावाद। चमरकार विशेषस्यालक्व्र- प्रयोजकर्वेन तवभावेडलङ्भारस्य वक्तुमयोग्यरवादिति केचिददन्ति। तन्मतं निराकरोति- तद्युक्तमिति। गौणसारोपलप्षणोदाहरणे 'गोर्वाहीकः' इत्यादावपि घमरकारविशेषाभारेना- लक्कारकथनस्य सर्वथाऽयोग्यत्वाद्, तश्राप्यलद्वाराभावप्रसद्गाव। यदि तु 'तोर्वछीकः दस्या दावल क्वाराभावेऽपि चमत्कार विशेपवति 'मुख चन्द्रः' इत्यादितदुदाहरणेडलक्रोड स्येवेत्यक्रीकरोषि, तदा 'आयुरधृंतम्' इत्यादौ तदभावेऽपि 'नेत्रानन्देन चन्द्रेण' हत्यादी चमरकार विशेषदर्शनेनालक्वारस्यापि स्वीकारे दोपाभावास्। तन्र सत्वं तत्रामत्वमिरयद्री- कारस्य विनिगमक्ाभावेन शपयमात्रनिर्णयाज्। शुदसारोपलपतणास्थले उदाहरणान्तर- माह-आयुर्दानमहोत्सवस्थेति। चिनता नम्राक्र, ते छोणीभृतो राजानश्र, तेषामायुदान- महोत्सवस्य मूर्तिमान् विश्वास, मृगहशां नेप्रोतसवः, कीर्तः पर: श्रेष्ट प्रकाश, सुमन- सामङ्गीकृतवपुरानन्दः, वीरलधम्या जीवित धर्मस्येकं स्थानम, ताहणो वीर कलिद्वाधि पतिः विजयते सर्वोत्कर्पेण वर्ततामित्यन्वयः। इति शुद्धमारोपलप्णास्थले चमरकारविशेष- दर्शनादू रूपकेऽव्याप्ति: स्यादित्यर्थः। मतान्तरमाशककय दूपण लक्षणान्तरे प्रतिपादयति- यदीति। 'हेतुहेतुमतोरैक्यवर्णन हेतुरुच्यते' इति मतान्तरस्याध्रयणेन पूर्वत्र हेतुरलंकार एव, न तु रूपकमित्यङ्गीकारे तु 'आरोपविषयस्य स्यात्' इस्यादिपूर्वलम्णस्य हत्वलकारेड- तिष्यापतिरिति बोष्यम। एवं सरस्वतीकण्ठाभरणोंक्तं एष्षणं दूषयिर्वा लक्षणान्तरं खण्ड- यति-तत पवेति। यत एतप्वव्वण दूषणदूपितम्, तत एवेत्यर्थ। 'तिरोभूनभेदा उपमैव रूपकम्' हृत्यपि लक्षणमशुद्ूमेव, अतिशयोक्कतावतिव्याप्तेः, भेदाशविनिर्मुक्कमाहृश्यस्य तत्र सत्वास्। प्रकाशोक्तमपि लक्षणं सण्ठयति-'य उपमानोपमेययोरभेद', तद्रृपकम्'

दपि दूपणमूहनीयमित्यल परकीयलसणेपु दूपणगवेपणेन। एवं प्राधीनो कलप्षणानि दूपयित्वा अन्थकार सवकीयं लक्षणमाह-अन्रोच्यते इति। स्वयं लक्षणं मयोच्यत इरपर्य.। (चिन्र०) बिम्बावशिष्टे निर्दिष्टे विपये चय्यनितते। उपरस्जकतामेति विपयी रूपकं तदा।। विम्बाविशिष्ट इति विशेषणात 'त्वत्पाठनखरत्नानाम्' इति निदर्शनाया नातिव्याप्तिः। तत्र हि चन्द्रो यथा स्वतः शुभ्रत्वादनामख्जनीयघावल्यः, तथा नखा: स्वतोऽरुण त्वादनासञ्जनीयारुण्या इति साहचेन नसाना चन्द्ररय च

Page 252

२१२ चित्रमीमांसा

बिम्बप्रतिबिम्बभावः । अलक्तचन्दनयोरन्यत्र स्ववर्णासञ्जकत्वेन। ततञ् तत्र बिम्बभावान्नखालक्तकविशिष्टे एव रञ्जने तत्प्रतिबिम्बभूतचन्द्रचन्दनविशिष्ट- पाण्डुरीकरणमुपरञ्जकम्। एवमन्यन्रापि 'अरण्यरुदितं कृतम्' इत्यादित्ताद्रूप्या- रोपवन्निदर्शनोदाहरणे सर्वत्र बिम्बभावापन्नवस्तुविशिष्ट एवोपमेये तत्प्रति- बिम्बविशिष्टमुपमानसुपरञ्जकमिति न क्वाप्यतिव्याप्तिः। रूपके तु न क्वचिदपि बिम्बप्रतिबिम्बभावापन्नधर्मविशिष्टतया विषयविषचिणोरुपादानम्। सावयव- रूपकेऽपि विशेष्यरूपणात् पृथगेवावयवेषु रूपणं न त्ववयवविशिष्टरूपेण विशेष्ये। 'अड्घ्रिदण्डो हरेरुर्ध्वम्"इत्यत्राप्यडघ्रिदण्डनालदण्डयोन बिम्बप्रति- विम्बविशिष्टता, तथो: प्रतीयमानेन श्यामलत्वविधातृविष्ठरकमलश्लिष्टत्वाद्यनुगा- मिधर्मे णैवोपमानोपमेयभावात्ं। किन्तु विधातविष्टरक्तमलश्लिष्टत्वरूपसाधारण धर्मवत्तासम्पादनार्थ विशेषणविशिष्टतामात्रसुपमेयस्य। (भारती) 'जब विषयी अर्थात उपमान, विम्ब अर्थात् जिसके प्रतिविम्ब रूप से उपमान का विशेषण आवे ऐसे उपमेय के विशेषण से रहित विषयिबोधक से भिन्न शब्द के द्वारा बोधित और न छिपाए गए विषय अर्थात् उपमेय का उपरजक बनता है, तव रूपक होता है।' निष्कर्ष-जहाँ बिम्ब और प्रतिबिम्बभाव से रहित (विम्वाविशिष्ट) होकर, शब्दतः निदिंष् एव अनिहवुत अर्थात जिसका-जिसका निषेध नहीं किया गया हो, ऐसे विषय (उपमेय) को यदि विषयी (उपमान) अपने रग में रग दे तो वहाँ रूपकालकार होगा। उक्त लक्षण में 'बिम्वाविशिष्टे' का प्रयोग 'त्वत्पादनखरला' इत्यादि पूर्व व्याख्यात निदर्शना के उदाहरण में अतिन्याप्तिनिवारण के लिए किया गया है। यहाँ जैसे चन्द्रमा में स्वत. शुक्लतो रहने पर भी अनासज्जनीय धवलता है, उसी प्रकार नखों में भी स्वतः लालिमा रहने पर भी अनासञ्जनीय रक्तिमा है। अन. दोनों में सादृश्य रहने के कारण विम्वप्रतिविम्बभाव है। अलक्तक और चन्दन का स्ववर्णाअ्जकत्व से ऐसा है। उसके वाद विम्बभावापन्न नख और महावर विशिष्ट ही रजना में उसके प्रतिबिम्बभूत चन्द्रमा और चन्दन विशिष्ट पाण्डुरीकरण की उपरजकता है। इसी प्रकार दूसरी जगह भी तद्विशिष्ट निर्दशना में अतिव्याप्ति वताते हैं, 'अरण्यरुदितम्' इत्यादि में भी तद्रूपता का आरोप करते है। फलत. निर्दशना के उदाहरण में सभी जगह विम्व- भावापन्न वस्तु विशिष्ट ही उपमेय में, उसके प्रतिबिम्वविशिष्ट उपमान की उपरंजकता से कहीं अतिव्याप्ति दोष नही हैं। इस अतिव्याप्ति के वारक 'विम्वाविशिष्ट' पदग्रहण से सारे दोपों का निवारण हो जाता है। रूपक अलकार में तो विम्वप्रतिविम्वभावापन्न धर्म की विशिष्टता से उपमेय और उपमान के कहीं भी ग्रहण का अभाव है। 'ज्योरस्नाभस्मच्ट्वुरणघवला' इत्यादि सावयव रूपक के वक्ष्यमाण उदाहरण मे भी विशेष्य के निरूपण से अलग ही उसके अवयवों में निरूपण है, न कि अवयवविशिष्ट रूप से विशेष्य में, जिसके द्वारा विम्वप्रतिविम्वभावापन्न विशिष्टता होती। it इसी प्रकार 'अंत्रिदण्डो हरेरु्वंम्' यहाँ भी अभ्रिदण्ड और नालदण्ड की वह विशिष्टता नहीं है। प्रतीयमान के द्वारा श्यामलता के विधायक विष्र और कमल से रिलष्टत्वादिरूप जो अनुगामी

Page 253

रूपकनिरूपणप्रकरणम् २१३

धर्म है, उसी के द्वारा अधरिदण्ड और नालइण्ट की उपमान औीर उपनेयता है। विधारक निहर नीर कमल शिष्ट्त्व रूप साधारण धर्मबत्ता के सम्पादन के लिए ो विश्ेषण विशिष्टता नाम का हो उपमेन में प्रतिपादन है। इसी प्रकार सभी जगए र्पकमात्र मे विग्वप्रतिविन्नभान की विशिक्ना की सभावना नही है, यही दीक्ित जी के कहने का तात्पर्य है। (सुधा) विषयी=उपमानम्, विम्वप्रतिविम्वभावरूपविशेपर हितेऽ्पनिह्वने=तिरोधानरहिते निर्देशाहे उपमेये उपरज्जकताम्=आहार्यताद्प्यनिश्चयगोचरतां यपेति=तां प्रमोति, तदा रूपकमित्यन्वयः। विशेषणानां साफल्य विचारयितुमारमते-विम्वाविशिष्ट दति। 'तवस्पादनखरलार्ना चदल्ककमार्जनम्। इद श्रीसण्टलेपेन पाण्दुरीकरण विधोः ॥' दति। विश्व प्रतिघिम्भाव विशिष्टनिदर्शनालंकारेऽतिष्याप्तिवारणय चिम्नाविशिष्ट इति पदमु। तम्र हि स्वत एव शुक्कतवादनासज्ञनीयघावश्यं यथा चन्द्रे, तथा स्वत आरुण्यादनाम- अनीयारुण्यं नखेपु इति सादृश्यातयो चिम्वप्रतिषिम्यभाव। अलककचन्दनयोरन्यन्न स्ववर्णामञ्जकर्वेन सः। ततश्व विम्वभावापननसवालक्तकविशिष्ट एव रक्षने तत्प्रतिचिम्न- भूत चन्द्र चन्द नचिशिष्टपाण्दुरी क्वरणस्योपरअ्ञकरवात। अन्यत्रापि तद्विश्षिष्टनिदर्शनायाम- तिव्याप्तिमाह-एवमिति। अरण्यरुदितं कृतं शघशरीरमुद्दतिनं, स्थलेऽजमवरोपित सुचिरमूपरे वर्षितम्। श्रपुषछुमपनामितं चधिरकर्णजाप: कृतो धृतोऽन्धमुखदर्पणे यद्युधो जनः सेवित॥ हत्यत्र तादूप्यारोपवति निदर्शनोदाहरणे सर्वत्र विम्वभावापसवस्तुविशिष्ट एवोपमेये तत्प्रतिविम्धविशिष्टोपमानस्योपरअ्जकत्वेनातिव्याप्ती तद्वार्केण तेन पदेनैव तस्षिरामः । रूपकालंकारे तु विम्व प्रतिषिश्वभावापपधर्मेविशिष्टतयो मे योपमानयो: विि ण भावात्। 'ज्योत्सा भस्मच्छुरणधवला'इत्यादिवच्यमाणसावयवरुपकेऽपि विशेष्यरूपणात् पृथगेव तद्वयवेपु रूपणम्, नत्यवयवनिशिष्टरूपेण विशेप्ये, येन विन्चप्रतिविन्वमाचा पलविशिष्टता स्यात्। 'अह्िदण्डो हरेरु ्वम्'हत्यप्रापि अद्विदण्ठनाल्दण्डयोन सद्वि शिष्टता। प्रतीयमानेन; श्यामलत्वविधातृविष्टकरकमलल्िष्टत्वागिरूपो योऽनुगामिधर्म: तेनैषाद्ि दण्डनालदण्डयोरुप मानोपमेयतास्वात्। विधातृ विष्टरकमलश्षिषत्वरुपसाधारण

रूपकमान्ने विम्नप्रतिविम्बभाववैशिष्ट्य न सम्भवतीति अ्रन्थकाराभिग्राय'। (चित्र०) निर्दिष्ट इति विशेपणात्न निगीणविपयायामतिशयोक्त्वामतिव्यामि. ।व्य- डयरूपको दाहरणेपु विपयिवाचकाप्रयोगसम्भवेऽपि विपयनिर्देश, सार्वत्रिक इति न तत्राव्याप्ि।'नेत्रानन्देन इत्यादी हेत्वलद्वार इति मते विपय -त्यने- नोपसेय इत्वेतदर्थकेन तद्व्यावृत्तिः। तत्रापि रूपकमित्येकावलीकाराहिमते विपयपट् धर्मिमात्रपरं स्पष्टार्थम्। अनिहते निपेधास्परष्ट इति विशेषणादपहुती नातिव्यापिः।

Page 254

२१४ चित्रमीमांसा

(भारती) लक्षण में 'निर्दिष्टे' इस विशेषण के प्रयोग से 'नीलोरपलइन्द्वाभिस्सरन्ति शिताः शरा, इस निगीर्ण विपयक अतिशयोक्ति का व्यवच्छेद या पार्थक्य किया गया है। (रूपक में विपय का स्वशब्द से निर्देश आवश्यक है, अन्यथा वहाँ अतिशयोक्ति हो जायगी।) व्यङ्गथ रूपक के उदाहरणों में उपमानवाचक प्रयोग के अभाव में भी उपमेय निर्देश की सभी जगह उपस्थिति रहने के कारण अन्याप्ति का अभाव है,। 'विपये' इसका 'उपमेय में' यही अर्थ है। इससे 'नेत्रानदेन' इत्यादि में हेतु मलकार कहनेवालों के मत में 'हेतु में' अतिव्यापि का निराकरण है। एकावलीकार ने यहाँ भी रूपक अलकार ही कहा है। उनके मत से विषयपद धर्मिमात्रपरक ही है-यह तो स्पष्ट ही है। 'नून मुख चन्द्र.' पत्यादि रूप अपकुति अलकार में अतिव्याप्ित वारण के लिए लक्षण में 'अपसुते' इस विशेषण का समावेश किया गया है। फलतः इस विशेषण का सन्निवेग कर यह निर्दिष्ट किया गया है कि यहाँ विषम का निषेध नहीं होता है। (सुधा) विशेपणान्तरप्रयोजनं विचारयितुमारभते-निदिष्ट इति। 'नीलोत्पकवुलाननिस्सरन्ति शिताः शराः' इति निगीर्णघिषयातिशयो क्कावतिव्याप्तिवारणाय तद्विशेषणमिति भाव:। व्यक्य रूपको दाहर णेपूपमानवाचकस्य प्रयोगाभावेऽप्युपमेयनिर्देशस्य सर्वंत्र सध्वेना ग्यास्े रभावास। 'विपये' इत्यस्योपमेये इति तदर्थः। तेन 'नेत्रानन्देन' .. माहेन्द्री दिगलसकृता' इश्यादौ हेतोरछद्कारतेतिवादिनां मते हेतावतिव्याप्तिनिरासः। एकावलीकारास्तु-तत्रापि रूपकमेवेदछृन्ति। तम्र विषयपढं धर्मिमान्नपरमेवेति स्पष्टार्थ बोध्यम्। 'नूनं मुखं चन्द्रः' इस्यपह्नतावतिव्याप्तिवारणाय-अनिहुतेति। निषेघास्पृष्ट इत्यर्थः। (चित्र०)

वात्। समासोक्तौ परिणामे च तस्य तादूप्यागोघरत्वात। समासोक्तौ व्यवहारमान्रसमारोपात्। परिणामे आरोप्चमाणस्यैव विषयताद्रूष्यगोचरत्वात्। भ्रान्तिमति सतः कल्पितस्य वा प्रवृत्त्यादिपर्यन्तस्य रवारसिकस्यैव निबन्धने तस्यानाहार्यत्वात्। अन्यङ्गचविशेपणाच्चैतदेवालद्कारभूतस्य रपकस्य लक्षणमिति सर्व सुस्थम्। (भारती) उपरजकता विशेषण से सन्देह, उत्प्रेक्षा, समासोक्ति, परिणाम एवं भ्रान्तिमान अलकारों में अतिन्याप्ति दोप का निराकरण होता है। सदेह और उत्प्रेक्षा के वीच निश्चय का ही अभाव है। समासोक्ति और परिणाम में ताद्रूप्य विषयत्व का अभाव है। इसमें कारण वताते है 'समासोक््ता- विति' अर्थात् 'अयमैन्द्री मुखं पश्य रकत:श्चुम्वति चन्द्रमा' इत्यादि में यहाँ व्यवहारमात्र का समारोप है। 'हगव्जेन वीक्षते' इत्यादि में उपमान का ही उपमेय ताद्रप्य विषयत्व है। 'अयं अमत्तमधुपः खं मुखं वेप्ति पंकजम' यहाँ स्वत. और-'जटानेयं वेणीकृतकचकलापो

Page 255

रूपकनिरूपण प्रकरणम् २१४.

न गरलम्' इत्यादि कस्पित भान्तिमान में, प्रपृत्ि आदि पर्यन्त स्वाभाविक भ्रम का ही निदन्धन से भ्रम का आहार्यत्वाभाव हे अर्थारा आरोपितत्व नहीं है। इसी प्रकार अव्यग्य विशेषण से 'अयन्य विशेषणविशिष्ट ही प्रथम अलकारभृत रूपक का लक्षण है। निष्कर्ष स्वरूप रग क सनने है- दीक्षित जी के लक्षण में 'उपरजकता' पद यह सकेत करता है कि रूपक में, कवि, विषय प। विपयी (मुख तथा चन्द्रादि) को कल्पित तानूप्य का विषय बनानें। इससे भटेह, उत्प्रेक्षा ममोसि, परिणाम एव भ्रान्तिमान में अतिव्याप्ति नहीं होती। दीक्षित जी का उपर्युक्त लक्षण रूपक का ऐ, न कि रूपकालकार का। इसके साथ 'अव्यग्य' विशेषण लगा देने पर यह रूपक अलकार का लक्षण हो जाता है। विमर्श-दीक्षित जी के उपर्युक्त सिद्धान्त का भी पण्टितराज जगनाथ ने बटी कच्यीभाषा में सण्डन किया है। अपने रसगगाघर में इस प्रसग में इन्होंने लिसा ह कि 'अल्कारसग्रकार के धोसे में आकर ये दीर्घअ्रवा यशस्वी किवा गदे महाराज दीक्षित का यद कथन सवथा अयुक्तिकर है कि 'यह रूपक नहीं है और रूपक में विम्वप्रतिचिन्दमाव नहीं होता।'कारण कि जिन पदों में 'दव' शब्दों का प्रयोग करने पर उपमा होनी है, उनमें यदि एक का दूसरे पर आरोप हो तो रूपक होता है-यह नियम है। यदि आप इस उदादरण में रूपक नहीं मानते तो फिर इसी उदाहरण में 'इव' अथवा 'यथा' आदि शब्दों का प्रयोग करने पर उपमा भी न गानिए। इसी प्रकार यदि आप-'हे राजन्। आप में कोप, चन्द्रमा में आग की तरह है।'-माकषि कल्पित विशेपणशुक्त धर्मी अर्थात् अशनियुत चन्द्रमा के साथ कोपयुक्त राजा का सादृव्य प्रनीत ऐोसा है। इसीलिए इसे उपमा कहने है तो उसमें से जब आप 'इव' पद निकाल दे तब-'ऐ राजन ! आप मे क्रोध चन्द्रमा में आग है' यहाँ रूपक भी कहिए। यहाँ आपको सकोच क्यों होता है ? अतः यह सिद्ध हुआ कि रूपक में भी विम्वप्रतिविम्वमावापन्न समानधर्ग होता है। निष्कर्ष स्वरूप एम कह सकते है कि-दीक्षित जी ने रूपक में साधारण धर्म ण्व विन्वप्रति- विम्बभाव को नहीं माना। इनके अनुसार जहाँ 'साधारण धर्म के विम्वप्रतिविन्वभाव के साथ आरोप होगा, वहाँ निर्दशना होगी, रूपक नहीं।' पण्टितराज जगननाथ ने दीक्षित जी के उपर्युक भत का ही खण्टन किया है। विमर्णिनीकार जयरथ के आधार पर पटितराज ने वताया ऐै कि निर्दशना में भी विम्वप्रतिविम्बभाव होता है। अत दीक्षित जी का लक्षण निर्दुष् नही है। दीक्षित जी का खण्डन कर पण्टितराज ने स्वत रूपक अल्कार की जो परिभाषा की ऐ, उसमें 'चमत्कारत्व' पर विशेष वल दिया ह। इन्होंने साटव्यमूलक अभेद एव रूपक की उ्पन्कार- कता को अपने लक्षण में स्थान देकर पूर्ववर्त्ती 'आचार्यों की अपेक्षा नवीनता का सगिवेश किया है। इनके अनुसार 'मुखत्व' को आगे रसकर, गब्दद्वारा निश्चित की जाने वाली, उपमेय ने उपमान की ्करूपता ही रूपक है। यदि वह रूपक शोभाजनक दो तो रूपक अलकार ऐोगा। इस लक्षण का अपना वैनिध्च है, विचार में नवीनता न होने पर भी नवीन नव्ापती के द्वारा रपक अलकार के विवेचन में गति लाने की चेष्टा की गई है। (सुधा)

एतयोर्मध्ये निश्चयस्येवाभावादिरयर्थः। समासोदी परिणामे नाटप्यविषयरवाभाव इत्यम्र हेतुमाह-समासो क्त्काविति। 'अयमेन्द्रीमुख पश्य रकस्युम्यत चन्द्रमा ' ह्रयम्

Page 256

२१६ चित्रमीमांसा

न्यवहारमान्नस्य समारोपाठ। 'हगब्जेन वीकते' इत्यादावुपमानस्येवोपमेयताृप्यविष- यश्वाद्। 'अयं प्रमस्षमधुपरत्वनमुखं वेत्ति पक्कजम्' इत्यत्र स्वतः, 'जटा नेयं वेणीकृतकच कलापो न गरलम्' इत्यादौ कल्पितभ्रान्ती व प्रवृत्त्यादिपर्यन्तं स्वाभाविकभ्नमस्यैव निबन्धनेन भ्रमस्याहार्यरवाभावाद। भारोपितत्वाभावादित्यर्थः। अळङ्गारभूतं रूपकलक्षणं

कलक्षणमिति सव सुस्थम्।अध्यङ्गयस्वमिति विशेषणफलन्तु-'तिमिरं हरन्ति हरितां पुरः- स्थितं तिरयन्ति तापमथ तापशालिनाम्। वदनत्विषस्तव चकोरलोचने परिसुद्रयन्ति सरसीरुहश्रियः॥' इरयन्र 'वदनं चन्द्रः' इश्यस्य व्यज्यमानत्वेनातिव्याप्तिनिरास एवेति दिक। अश्र रसगद्गाघर कृतस्तु-'तवतपादनखरतनानाम्' इत्यादौ निदरशनायामतिव्याप्तिवार- णाय विम्बाविश्िष्टरवं विषयविशेषणमशुद्धम्। तन्र वाक्यार्थरूपकस्वीकारेण निदरशं- नार्वस्यैवाभावाव। यदपि रूपके सर्वथा विम्वप्रतिबिम्बभावो नास्तीति, तदप्ययुककमेव।

रतेः। व्योमानोकहपुष्पपुच्छमलिभिः सच्छाद्यमानोदरं 'पश्येतच्छशिनः सुधासद्दचरं विम्वं कलंकाडिकतम्॥' हत्यलंकारसर्वस्वटी का चिमर्शिन्युदाहृत विम्बप्रति विम्वभाव विशिष्टरूपके- जन्याप््यापत्तेः। कलंकस्य दानाम््वादिभि: प्रतिबिम्बनम, ल्छितत्वांकितत्वयो: युद- सामान्यरूपरवम् ।I' इत्युककतया शशिमण्डलरूपविषयस्य कलंकरूपचिम्वविशिष्टरवेन तत्र रूपकाङ्गीकारसत्वा्च। किस्, 'निर्दिष्टे' इति विशेषणं शव्देनाभिहिते इत्वर्थकमप्यशुद्धम, तस्य दुर्निरूप्यर्वात्। तथा हि येन केनचिद्रृपेण शव्द्ेनाभिहिते इत्यर्थ:, उपमेयतावच्छेद्- करूपेणाभिहिते इत्यर्थो वा ? नाथ :- 'सुन्दरं कमलं भाति लतायामिदमन्भुतम्' इत्यति- पयोक्तार्वतिव्याप्तेः, सुन्दरपदेन सुन्वरत्वेन रूपेण 'हदम्' पदेन च विपयस्याननस्य प्रति- पादनाद्। कमलपदेन कमलताद्ुप्येणाननस्येव लक्षणयोपस्थापनेन तत्रैव सुन्दरादिपदार्था- नामन्घययोग्यतया विशेषणीभूतकमले तदन्वयस्याशंकितुमप्यनुचितत्वान्। न द्वितीय :- अपहुतिव्यावर्तकानिहुत इति विशेषणस्य वैयर्थ्यापत्तेः। अपह्वतावुपमेयतावच्छेदकस्य निषिध्यमानतया तेन रूपेण विषयस्यानिर्देशादेव लक्षणव्यावृत्तिसत्वात्। भ्रान्तिमत्य- तिव्याप्तिवारणाय 'आहार्य' इति विशेषणवैयर्थ्याय्। तम्र दोषविशेषेणोपमेयतावच्छेदक प्रकारकप्रतीत्यभावादेव व्यभिचारानवकाशात्। किन्, 'नाय सुधाशुः, कि तर्दि? सुधांशुः प्रेयसीमुखम्' इति त्वदुकापहतावतिव्यापिः। सुधांशी सुधांशुत्वनिहनवेऽप्यारोपविषयस्य निह्नवाभावात्। अव्यङ्गवत्वचिशेषणमपि व्यर्थम्। व्यक्षपावालंकारत्योर्विरोषाभावादू। किद्द, 'तद्रृपकमभेदो य उपमानोपमेपयोः' इति प्राचीनलक्षणमप्यसव्। अपहत्या- दावुपमानोपमेययोरभेदस्य प्रतीतिसिद्धतया तम्नातिव्याप्तेरिति वदन्ति। अन्नापरे प्रत्यवतिष्ठन्ते-'त्पादनखरत्नानाम्' इत्यत्र वाक्यार्थरूपकसम्भवः। उपमेयतावच्छेदक- पुरस्कारेणोपसेये शब्दान्निश्चीयमानसुपमानतादात्यं रूपकमिति भवदीये लक्षणे 'चन्द्र इव चन्द्र' इत्यादावतिव्याप्तिवारणाय मदगभंस्थावश्यं वाच्यतया 'त्वत्पाद' इत्याघुदा हरणस्य नखाना स्वत एव नैमक्यादिगुणयोगात्। तम्र यावकसम्बन्धो निरर्थक हृत्यत्रैव ताप्पयें सत्यलक्तककरणकनखकर्सकमार्जनं चन्दनकरणकचन्द्रकर्मकपाण्दुरीकरणमिति भेदेन खोधे जाते तादशतात्पर्यस्यासिद्धेः। 1 तथा च, तम्र निदर्शनाया एव स्वाद तद्ारकविशेषणस्यावश्यकतैव। यइपि विम्ब- प्रतिषिम्वभाववैशिष्टय रूपकोदाहर णस्य सप्वेन प्रथमविशेषणे तव्रा्याप्तिरिति। तदपि न,

Page 257

रूपकनिरूपण प्रकरणम

अन्थकृता एच तत्परिहारम्य निद्शनायां कुवलयानन्दे प्रतिपादनान। नग दि विषयधिप- यिविशेपणानां परस्परसादश्येन विश्वप्रतिविम्वभावोऽरिति। यया 'चोरस्ाभन्म' इ्यादि सावयवरूपकोदाहरणे। तव्रापि विषयविषयिणो, तदविशोपणानां व प्रत्येकमेवंक्याशेप., न तु ज्योस्सादिविशिष्टरात्निरुपचिपयरय मम्मादिविरशिष्ट कापालिकी रूपविपयिणश्र तिशि एरुपेणक्यारोपोडस्ति। प्रकृते तु अक्गितत्वलान्द्ितावयोर्चस्तुप्रनिघसतु माचा पपरेन तदिये- पणतर्येव विम्वप्रतििम्बभावेन क्लट्टानजलयोरुपदानत्वेन विपयस्य शशिमण्टल्म्य विम्चाविशिष्टसध्वेनाव्या पयनव काशात् । न व् तद्विशेपणतयेव तत्पमिद्विरिति वाच्यम, उपमादौ तथात्वरेऽपि रूपकलक्षणे साक्षाद्विन्व प्रतिबिम्बसावापस नर्मविशिष्टत्वाभाव्न्येव तद्विशेपणवाच्यरवात्। 'तवश्पाद' इत्यादावव्यासिवारणस्य तावतेंत्र सत्वास्, तत्र मार्जन-

यत्त, अनिदिष्टपदे दूपणमुक्तम्, तदपि नः उपमेयतावच्छेदकरूपेणाभिद्टिते, हस्यम्य विवच्ितस्वात्। अपहती धोपमेयस्य निपेधेऽपि तद्पेणाभिधानसर्वादतिव्याप्तिसन्भवन तहारक विशेषणन्तरस्थावश्यकत्वात। यप्त, 'निश्चय आहार्चत्वविशेपणवेयर्व्यापत्ते' द्वायु- कम, तदपि न, तत्रेष्टपत्तेरेव सर्वाद। उपरख्षकतापदार्थस्य प्रकृते ततिमुंक्क्र्येंषामिधा- नेऽपि क्षतिविरद्ात्। यदपि 'नायं सुधांशु:, किन्तर्हि? सुधाशुः प्रेयसीमुसम्' इश्युकापह तावतिव्याप्ति: तत्र चन्द्रे सुधांशुत्वनिषेधेऽपि आरोपविषयस्यानपहतरवास्। न चेदं रूप कमेवेति वाध्यम्, 'स्वोकिविरोधापतेः इति तेरुकम्। तदपि न; तत्र प्रसिनूचन्दरे सुधांशुत्वनिषेधानमुखे प्रसिद्धचन्द्रभेदो नारोप्यते, वाघात्। किन्तु सुधांशुपद्वाच्यतवं धन्द्रे निषिध्य मुखमेव सुधांशपदवाच्यमित्येवोध्यत इति न तद्विरोधः। यत, अध्यद्नथ- स्वविशेषणमपि व्यर्थम्, अलक्गाराणां तदुत्कर्पप्रयोजकतया साधनरवेन ततो भेदस्यावश्य- कतया तद्ारकविशेपणस्थाप्यावश्यकत्वात्। आरोप्यमाणस्याभेदस्यापह् तावसध्वाप्गति व्यापितिः। वस्तुतस्तल्वक्षणस्यापि अ्षम्र अन्थकृता दूपितरवेन प्रकृते पतेरभावादिति दिक। (चिन्न०) तच्च रूपक त्रिविधम निरवयव सावयव परम्परितं च। निरवयम्-केच- लम्, माला चेति द्विविधम्। सावयवं तु-समस्तवस्तुविपयसे कदेशधवति चति द्विविधम् । परम्परित च फिष्टाश्लिप्ठश्दनिबन्धनत्वेन द्विविध सत् केवल माला चेति द्वैविध्यानतुविधम। एवमष्टविधो रूपकालद्वार। तन्न केवल निर- वयवं चथा- कुरङ्गीवाङ्गानि स्तिमितयति गीतध्वनिपु यत्- सखी कान्तोदन्त श्रुतमपि पुनः प्रश्नयति यन्। अनिद्र यच्चान्तः स्वपिति तदहो वेदम्यभिनया प्रवृत्तोऽस्या' सेकुं हृदि मननिजः प्रेमलतिवाम् ॥ (भारती) प्रथमत र्पक के तोन भेद ह- (१) नितवयय, (2) सावच्य, और (३) पर्परिन। नित्खयन रूपक भी दो प्रकार का [-(४) केवल रपका जर (2) नान रूपक। नार्दव र्या मा दो प्रकार का ऐ-(१) समस्तवस्तुविषय और (२) एकटेशनती। परन्परित रुपक चार पकार क है-

Page 258

२१८ चित्रमीमांसा

(१) केवल श्लिष्टपर म्परित, (२) मालारूप शलष्टपरम्परित। पुनः इसके दो भेद हैं-(१) केवल शुद्ध परम्परित, (२) मालारूप शुद्ध परम्परित। इस प्रकार कुल मिलाकर रूपक आठ प्रकार का कहा जाता है। ('सुधा' टीका में यथाक्रम से नाम अकित है) जहा अवयव से रहित उपमेय में उपमान का आरोप हो, वहा निरवयव या निरग रूपक होता है। इसमें एक उपमेय में एक उपमान का आरोप होता है। जहा एक उपमेय में एक उपमान का आरोप हो वहां केवल या शुद्ध निरवयव रूपक होता है जैसे-यहा किसी दासी के द्वारा किशोरी के वृत्तान्त का कथन है- 1 'यह वाला गीत की ध्वनि सुनते ही कुरगी की भाति अपने अङों को निश्चल बना देती है तथा पहले सुने हुये भी अपने प्रियतम के हाल वार-वार अपनी सहेली से पूछती रहती है। यह विना निद्रा के ही अर्थात पलकों के खुले रहने पर भी सोती रह्दा करती है। इससे पता चलता है कि निञ्चय ही कामदेव ने उसके हृदय में प्रेमलता का सिंघन आरम्भ कर दिया है।' (यहा 'प्रेमलतिकाम्' में केवल निरवयव रूपक है। लता पर प्रेम का आरोप होने से यह इलोक केवल निरवयव रूपक का उदाहरण हुआ। इसमें एक उपमेय में उपमान का आरोप है।)

(सुधा) रूपकस्य विभागमाह-तच्चेति। रूपकमित्यर्थः। त्रैविध्यमेवाह-निरवयवमित्यादि। तेषु निरवयवस्य भेदद्वयमाह-केवलं माला चेति। सावयवस्यापि भेदडयमाह-समस्त- वस्तुविषयमित्यादि। परम्परितस्य चतुरो भेदानाह-श्िष्टाश्रिष्टशव्दनिन्वधनतया द्विविधं सत् केवलमालारूपाम्यां द्विविधमिति चतुर्विधमित्यर्थः। तथा चाष्टौ भेदा रूपकस्य-(१) केवलं निरवयवम्, (२) मालानिरवयवम् , (३) समस्तवस्तुविषयं साघयवम्, (४) एकदेशविवर्ति सावयवम्, (५) केवलश्रिष्टशव्दनिबन्धनं परम्परितम्, (६) केवलाश्िष्ट- शब्द निधन्धनं परम्परितम, (७) मालाश्िष्टशब्दनिबन्धनं परम्परितम, (८) मालाऽकि- ष्टशब्दनिबन्धनं परम्परितम् ; एवं प्रकारेण बोद्धष्या इत्यर्थः । तन्न अभेदान्तरप्रयोज्यत्वाभाववद्भेदकावमेव निरवयवत्वम्, तस्य भेददवयमुदाहरन् शुदमुदाहरति-कुरह्गीवेति। मालतीमाधवे पद्यम्। सा मालती गीतध्वनिषु कुरस्रीव अङ्गानि स्तिमितयति निश्चलत.या स्थापयति, एवं कान्तोदन्तं सखीभ्यः श्रुतमपि पुनः प्रश्नयति, अनिद्रं यथा स्यात् तथान्तः स्वपिति मूष्छति, सखी वक्ि-इत्महं वेघयि-अस्या अभिनवां प्रेमलतिकां मनसिजः कामः सेकं प्रवृ्त इत्यर्थः। अन्र प्रेम्णि लतात्वारोपे साधा- रणधर्माभावाच्छुद्ध म, केवलमित्यर्थ: निरङ्गमत्र दष्टव्यम्। (चित्र०) मालानिरवयव यथा- सौन्दर्यस्य तरङ्गिणी तरुणिमोत्कर्षस्य हर्षोद्गमः कान्ते कार्मणकर्म नर्मवचसामुल्लासनावासभूः। विद्या वक्रगिरां विधेरनवधिप्रावीण्यसाक्षात्किया प्राणा: पञ्रशिलीमुखस्य ललनाचूडामणि: सा.प्रिया॥

Page 259

रूपकनिरूपणप्रकरणम्

(भारती ) (जहाँ एक उपभेय में अवयवरहित अनेक उपमानों का आरोप हो, वही गालमप निरवाय रूपक होता है।) मालात्प निरवयव रूपक, जैमे- 'यह मेरी प्रियतमा सौन्दर्य की तरगिणी है, यौवनोहम का आनद ह, कान्नि की वनोकरण किया है, रतिविलास को निवासभूमि ऐ, वकोक्तियों की विद्या है, विधाना की निम्मोग निर्माणकला की प्रत्यक्ष अनुभृति है, पञ्चनाण की शर-समष्टि॥ और है नारी जाति की मिरे- मणि।' (यहा एक उपमेयभृत प्रियतमा में अनेक उपमान आरोपित किए गए है। यह निरवयष इस लिए है कि यहा तरद्विणी आदि के रूपण के परिपोषक अन्य रूपण नहीं है।) (सुधा) मालारूपं निश्वयव यथा एकस्मिल्नेवोपमेये वहर्यारोपणं माला इति तह्मष्वणम्। सौन्दर्चस्येति-'सौन्दर्यस्य तरदिणी नदी, तरुणिमो्कर्पन्य हर्पोहमः, कान्तेः कार्मणक्म, नर्मरहसामुझ्लासनावासभू:, वक्रगिरां विद्याविधे. अनवषिप्राचीण्यसाछाक्किया, पज्पाणम्य कामस्य प्राणाः, ललनाचूडामणिः सा प्रिया वर्तत इृत्यन्वयः। पकर्स्या तरद्विणीसवादि- धर्माणामारोपणान्मालात्वम्। मुखाद्यवयवाभाषाप्तिवयवत्वमित्यर्थः। (चित्र०) समस्तवस्तुविपयं सावयवं यथा- ज्योत्स्नाभस्मच्ुरणधवला बिभ्रती तारकास्थी- न्यन्तर्धानव्यसनरसिका रात्रिकापालिकीयम्। द्वीपादु द्वीप भ्रमति दधती चन्द्रमुद्राकपाले न्यस्तं सिद्धास्जनपरिमल लाउद्नस्य च्छलेन ।। (भारती) (जहा अवयवों सहित उपमेय का आरोप हो, वहा सावयव त्पक होता ह ।) समस्त वस्तुविषय सावयव रूपक में मभी वत्तुओं या समस्न आरोष्यमाण (विपनी) का शब्दत. कथन किया जाता है। जैसे- 'चादनी का भत्म लपेटे, उजली वनी, तारों की अस्थिया सन्हाले, अपने अन्तर्धान के कौतुक में लगो यह रात की योगिनी अपने चन्दमा रूपी सुद्राकपाल अर्थात सप्पर नें लाहनके वहाने सिद्धाब्जन का चूर्ण घरे सर्वत्र स्वच्छन्द विचरती दिसाई दे रही है।' (यहा उपमान ण्व उपमेय दोनों की अवयव सित सभेदता का वर्णन बिया गया है। अन. सावयव रूपक हुआ। यह वर्णन शन्दों द्वारा कथित ह, अर्थदल से आक्षिप्त नही। जन यहा समन्त वस्तुतिपय नानक सावयव सूपक हुआ।) (सुधा) सावयवे भेददूयमुदाहरत-परस्परसापेक्षनिप्प्तिकारना रूपकार्ण समुदायः मादय चम। तत्र समस्तवरतुविषय सावयवभेदमुदाहरति-समस्तानि वरतून्यारोप्पमाणानि

Page 260

२२० चित्रमीमांसा

शब्दोपाप्तानि यम्र तव् समस्तवस्तुविषयमित्यर्थः। ज्योत्स्नेति। इयं रात्रिरेव कापालिकी योगिनी, दीपाद् द्वीपान्तरं भ्रमतीत्यन्वयः। एतत्सापेष्षरूपकाण्याह-डयोत्त्रैव, भस्म, तेन च्छुरणमङ्गलेप:, तेन धवलाः तारका एवास्थीनि बिभ्रती, अन्तर्धानमेव व्यसनं कौतुकं तन्र रसिका, चन्द्ररूपे मुद्राकपाले न्यस्तं लां्छनस्य मिषेण सिद्धाअनस्य परिमलं चूर्णं दधती धारयन्ती दीक्षाकालगृहीतोपकरणेपु मुद्दोपपदनास्ना पाखण्डाना व्यवहार इति चण्डीदास:, सुद्रापरिमली प्रशंसार्थावित्यन्ये। अन्न रूपकाणा परस्परसापेक्षोरपत्तीनां सत्वात् सावयवत्वम्, विषयविषयिणां ज्योत्स्नाभस्मादीनां शव्दोपात्तत्वाद् समस्तवस्तु- विषयत्वं बोध्यम। (चित्र०) एकदेशविवर्ति सावयवं यथा- प्रौढमौक्तिकरुचः पयोमुचां बिन्दुवः कुटजपुष्पबन्धवः । विद्युतां नभसि नाट्यमण्डपे कुर्वते स्म कुसुमाञ्जलिश्रियम्॥ अत्र नभसो नाट्यमण्डपत्वेन रूपणाद्विद्युतामर्थान्नर्तकीत्व गम्यत इत्येक- देशे रूपकस्य विशेषणवाच्यतया वर्तनादिदमेकदेशविवति। (भारती)- (जहा कुछ आरोप शब्द द्वारा कहा जाय और कुछ अर्थ हो अर्थात जिन्हें शब्द द्वारा कहा नहीं गया हो अपितु अर्थवल से आक्षिप्त हो, वहा एकदेशवर्ती नामक ेद होता है। इसमें कुछ उप- मान तो शब्द द्वारा ग्रहण किया जाता है तथा कुछ अर्थसामर्थ्य से जाना जाता हैं।) एक देशविवर्तति सावयष जैसे- 'कुटज पुष्पों के वन्धुरूप स्थूल मोती की कान्तिवाली मेधों की वून्दे, आकाशरूपी नाट्य मडप में विजली रूपी नर्तकी की पुष्पान्जलि की शोभा वढा रही है।' यहा प्रधानीभूत आकाश में नाट्य मडप के आरोप तथा शब्दोपात्त के सामर्थ्य से विजली में नर्तकी के आरोप रूप अर्थ का लाभ करते हैं। यहा शब्द के विवर्तन से एकदेशविवर्तित अर्थ की उपलब्धि है। अर्थात् इस श्लोक में-आकाश में नाट्य मडप का आरोप शब्दत किया गया है, पर बिजली में नटीत्व का ज्ञान तो अर्थ द्वारा ही होता है। अत. एकदेश अर्थात् नभो- मण्डल में नाट्य मडप के आरोप होने के कारण या रूपक के प्रकट होने से यहा एकदेशविर्ति रूपक हुआ। (सुधा) सावयवभेदमेकदेश विवर्ति उदाहरति-केषाशि्दर्थानामारोप्यमाणानां शब्दोपात्तत्वमू; केषाखिदर्थंतोऽचसेयत्वम, यम्र तदेकदेशविवर्ति इति प्रकाशादयः । सामर्थ्यादन्या- रोपाक्षेपकत्वं तत्वमित्यन्ये। प्रौढ़ इति। कुटजपुष्पाणां बन्घवः स्थूऊमौक्तिकरुचो मेघाना विन्दुवः नभोरुपे नाट्य- मण्ढपे विद्युतां पुष्पाअषिशोभां कुर्वते स्मेत्यन्वयः। अन्र प्रधानीभूतनभसि भाव्यमण्ड- पतवारोपस्य शब्दोपात्तस्य सामर्थ्यवशाद विद्यतां नतंकीरवारोपेडर्थलभ्ये शाव्दस्थ विवर्त- नादेकदेशविवर्तित्वमित्यर्थः। तदेवाह-अन्रेतयादि। यत्र आरोप एव आरोपान्तरनिमित्तं

Page 261

रूपकनिरूपणप्रकरणम् तत्परम्परितमिति रमगद्गाघरकृतः। पत्र यदारोपं विनान्यम्ान्यारोपो न सम्भयति तदिनि कौस्तुभकृत। (चित्र०) छिष्टशब्दनिबन्धनं केवलपरम्परित यथा- अलीकिकमहालोकप्रकाशित जगन्त्रयः । स्तूयते देव सद्वंशमुक्तारत्र न कैर्भवान्॥। अत्र त्वमेव मुक्तारत्नमित्यारोपणपूर्वकः सद्वंश उत्तमान्वय एव सद्वंश उत्कृष्टवेणुरित्यारोप इति रूपकद्वयमपि सभूतपरम्परमिति परम्परितम्। वशे श्लिष्टशव्दनिबन्धन च। (भारती) (जहा एक आरोप दूसरे आरोप का कारण हो, वहा परन्परित रुपक होता है। परम्परति शब्दपरम्परा से निर्मित है, जिसका अर्थ है शसला। कई आरोपों की शृंसला रहने के कारण यह परन्परित कहा जाता है। इसमें एक रूपक दूसरे रूपक का कारण ऐोता है तथा ए्क की सिद्धि से ही दूसरे की सिद्धि होती है।) ग्लिण्ट निवन्धित केवल परम्परित, जैसे- 'हे महाराज। अपने अलौकिक यश से तीनों लोकों को प्रशसित करने वाले, सद्वशमुक्ता- रत्न'-महान् राजवश के मौक्तिक मण-आपकी प्रशसा मला कौन नएीं किया करता है।' यहा ग्लिष्ट शब्दनिवन्धन केवल परम्परित रूपक ह क्योंकि आरोप विषय अर्थात उपमेय राजकुल तथा आरोप्यमाण अर्थात उपमान प्रशस्तवेणु दोनों एक ही टलप्ट 'सद्वश' शब्द द्वारा प्रतिपादय है। साथ ही साथ 'राजा' पर 'मौक्तिक के आरोप का निमित्त भी दिया गया है जो कि 'राजकुल' पर 'प्रशस्तवेणु' के आरोप में रपष्ट है। यहा एक उपसेय में अनेक रूपकों का गुम्फन नही, इसलिए इसे केवल परम्परित रूपक कहा जाता है। (सुधा) तस्य चतुर्पु भेदेपु क्रिष्टशव्दनिवन्धन केवलपरग्परितमुदाइरति-अछीकिकेति। अलौ- किकश्चासी महालोकश्च, तेन प्रकाशितं जगस्व्यं येन सः, सद्वंदास्य मुककारलं भवान् कर्न स्तूचते; अपि तु सर्वरपीत्यन्वयः। अग्र सद्वशोऽन्वय एव वशो वेणु तम्य मुकारवमिति श्नििष्टत्वम्। कुलस्य वेणुरवारोपो राज्ो मुकारतत्वारोपे निमित्तमिति केवलपरम्परितमिनि वोष्यम्। मूलकारस्तु-सक्षानपरम्पर तदिति व्याकृत्य खमेच मुक्कारजमित्यागेपणपूर्वक सदन्वये उत्कृष्टवेणुरवारोप इति। एवं रूपकह्यमपि सम्भूतपरम्परमिति व्याघवयावि- त्याह-अन्नेश्यादि। (चित्र०) तदेव मालापरम्परित यथा- दुर्गामार्गणनीललोहित समितस्वीकारवैन्वानर।

Page 262

२२२ चित्रमीमांसा

सत्यप्रीतिनिधानदक्ष विजयप्राग्भाव भीम प्रभो साम्राज्य वरवीर वत्सरशत वैरिश्वमुच्चैः क्रियाः ॥

(भारती) प्रधान रूपण के निमित्तभूत रूपण में आरोप्यमाण उपमान और आरोपविषय उपमेय के वाचक पदों के भिन्न रूप आ्िष्ट होने में मालापरम्परित रूपक होता है। जैसे- 'हे विद्वानों के मानस (मानस-सरोवर के) हस ! शत्रुओं की सम्पत्ति को सकुचित करने चाली उज्ज्वल तेज से देदीप्यमान। वैरिलक्ष्मी का सकोच ही कमलों का असकोच अर्थांत् विकास, उसमें सूर्यरूप। किलों या नगरों का अन्वेषण न करना ही पार्वती का अन्वेपण करना, उसमें शकररूप ! युद्धों का स्वीकार ही समिधाओं का स्वीकार, उसमें अशिरूप। तथ्य और प्रीति के स्थापन ही सती पर स्नेहाभाव के प्रकट करने में दक्षप्रजापति। विशिष्ट शत्ु जय का आरभ ही अर्जुन का अग्रज भीमसेनरूप! हे स्वामी श्रेष्ठिवर ! तुम न्रह्माजी की आयु सौ वर्ष तक चक्रवर्तित्व को ऊँचा वनाये रखो।'

(सुधा)

श्िष्टशब्दनिबन्धनं सालापरम्परितमुदाहरति-विद्वन्मानस इति। हे विठ्न् मानस- हंस विदुषां मानसं चित्तमेव मानस सरस्तत्र हंसरूप, वैरिणां लच्या: सडकोध एव कमलानामुत्पलानाम असंकोछः, तत्र सूर्यरूप, दुर्गाणां पत्तनानां निर्भयत्वादमार्गणम अनवलोकनमेव पार्वत्या अन्वेषणम्, तत्र महादेवरूप, समितां संग्रामाणं स्वीकार एव समिधां काषानां स्वीकार, तम्रागनिरूप, सत्ये प्रीतिविधानमेव सत्यां स्वपुत्याम् अप्रीति- विधानम्, तत्र दक्षप्रजापतिरूप, विजयस्य शत्ुजयस्य प्राग्भाव एवार्जुनस्य प्राम्भावस्तत्र भीमसेनरूप, हे प्रभो श्रेष्ठवीर एवं वैरिव्चं ब्राह्मीयं वत्सरशतमुन्चैरधिकं साम्राज्यं चक्रवर्ति- तवं क्वियाः। अन्र विदुर्षा चिते मानससरसत्वारोपो राज्ि हंसत्वारोपे निमित्तमित्यनेनैव क्रमेण परम्परितत्वस्य श्रिष्टत्व-शब्दनिबन्धनस्य मालारूपरवं बोध्यम्। यद्यपि विद्धन्मान- सहंस' इत्यश्र शब्दार्थोभयालंकारता मानसादिपदानां परिवृत्यसहृत्वं चित्तादिशब्दोपा- दानेनो कार्थस्याप्रत्यायनात्। इंसादिपदानां पर्यायान्तरोपादानेन प्रकृतार्थप्रतीतेः परिवृ ततिसहत्वाच्च कथमर्थालंकारता इति चेत्? न; प्राचीनानामलंकारसवस्वकारांदीनां प्रस्तिद्धि- मनुसृत्य तथोक्कमिति केचित। एकदेशविवर्त्तीद मित्युद्धटादयः नव्यास्तु-मानससरोवर- रवाधेयत्वं विना राजि हंसत्वारोपनिमिततसाघर््यान्तरविरहेण हृदये सरसवारोपं विना राजि इंसत्वारोपो न संभवतीति।/तस्मात्तननिमिसारोपसत्वाव् परम्परितमेवेदमित्याहुः।

('चिन्र० ) आश्लिष्टशब्दनिबन्धनं केवलं परम्परितं यथा- निरवधि च निराश्रयं च यस्य स्थितमनिवर्तित कौतुकप्रपञ्च्म्। प्रथममिह भवान् स कूर्मनाथो जयति चतुर्दशलोकवल्लिकन्दः ॥

Page 263

रूपकनिरूपणप्रकरणम्

(भारती) आद्ि षशव्दनिवन्धन केवल परम्परित रूपक के तृतीय भेव का उदाहरण देने है- 'सर्वप्रथम इस ससार में आप वह कमनाय गर्यात कूममृकि सिकी स्थिति बभिन मव आश्रयहीन है तथा जिसके आश्चर्यं का प्रपत्व अनिवर्तित है पव जो चौददो लोक र्वी रवानों को जट सवरूप है उमकी जय हो।' (यहाँ स्थिति में निरवधित्व ए्व निराश्यत्वारोप निमिन हपरा र् मवित्रे निमित्त है। पुनः कूर्म का कन्दत्वारोप में चौदहो लोकों का दहत्वारोप के तिमिरत ह भछ शब्दनिवन्धन केवल परम्परित है।) (सुधा) अश्लिष्टपच्व निबन्धनं केवलपरम्परितं तृतीयभेदमुदाहरति-निरवधीति। न निव तितः कौतुकस्य आश्चर्यस्य प्रपसनो येन तत, यस्य स्थितम्, निरवधि निराश्यं घान्ति, स इह संसारे प्रथमो भवान् फूममूर्तिः। चतुर्दशलोका एव वप्लयः, तासां कन्यः, स भवान् जयति। अत्र स्थिती निरयध्वित्व निराश्रयरवारोपो राजि फूर्ममूतित्वारेपे निमित्तम, ूर्मस्य कन्दरवारोपे लोकानां वल्लीर्वारोपस्य निमित्तत्वादश्लिष्टशव्दनियन्धनं केवलपरम्परित- मित्यथं:। (चिन्न०) तदेव मालापरम्परितं यथा- पर्यङ्को राजलच्म्या हरितमणिमयः पौरुपाव्धेस्तरद्ग:

खड्गन्त्मासीविदल्ल: समिति विजयते मालवाखत्रण्डलस्य ।। (भारती) वाचक का श्िष्टत्वाभाव से अदलिद्वशब्द निवन्धन मालपरन्परित का चतुर्थ उदाहरण मनेह- 'रणक्षेत्र में मालवेन्द्र की उस तलवार की विजय हो जो राजलक्ष्मी के दिए इरितमणिनिमिन पलग है, पौरूपरूपी सागर की तरद ए, सग्राम के भय से सतस्त प्रतिम्पर्षी नुरनति के शुम जशरूपी हस के लिए नील भेघ है। हिसभिनन शन्ुओं के विज्यहत्ती के मनातीभून नदगरि के पट्टरूप है नथा पृथ्वी के लिए जो कन्चुकि स्वर्प है।' (यहाँ खं्गरूप उपमेय में वहुत से रूपयों के सन्वन्ध से पीह्यादि में तहतादि के जानेप से खट्गादि में तरजवादि आरोप के निमित्तत्व मे वाचक के अहिल से भ रदनिदन्धन मालापरम्परित जानना चाहिए।) (सुधा) वाघकस्य श्लिष्टरवाभायादश्िष्टशव्दनियन्धनं मालापरग्परित धतुर्थ यथा तथो- दाहरति-पर्यकेति। राजलचम्या हरितमणिप्रचुर पर्यद्व सट्वासप, पौरपमेवाब्धि समुद्स्तस्य तरत्रूप', संग्रामभयेन ताम्यंश्घामी सुरछपतिस्च तस्य यक पव दमः तस्व नीलमेघरूप, भग्नस्चासौ प्रश्यर्थिवंदश्य स एप उरघणो विजयहरती तस्य महातीमूम-

Page 264

२२४ चित्रमीमांसा

दानाम्वुपट्रूप: पृथिव्या: कन्चुकरूप:, 'सौविदसला: कन्चुकिनः' इत्यमरः। संग्रामे माल- वेन्द्रस्य खडगो विजयते सर्वोष्कर्षेण व्तत इत्यन्वयः। अन्न खडगरूपोपमेये बहूनां रूपकाणां सम्बन्धास् पौरुपादौ समुद्राय्यारोपाणाज् खड़ गादौ तरङादयारोपे निमित्तर्वाद वाचकस्याश्रिष्टत्वाच्त अश्विष्टशष्दनिबन्धनं मालापरम्परितं वोध्यम। (चित्र०) इदं वैधर्म्येणापि दृश्यते, तत्केवलं यथा- आवृण्वतो लोचनमार्गमाजौ रजोऽन्धकारस्य विजम्भितस्य। शस्त्रक्षताश्वद्विपवीरजन्मा बालारुणोऽभूद रुधिरप्रवाहः ॥ मालारूपक यथा- सौजन्याम्बुमरुस्थली सुचरितालेख्यद्युभित्तिर्गुण- ज्योन्स्राकृष्णचतुर्दशी सरलतायोगश्पुच्छच्छटा। यैरेषापि दुराशया कलियुगे राजावली सेविता तेषां शूलिनि भक्तिमात्रसुलभे सेवा कियत् कौशलम्।। (भारती) वैधर्म्य से भी इस रूपक का उदाहरण जैसे- 'दृष्टिपथ को रोकते हुए तथा बढ़े हुए धूलिरूप अंधकार का, शस्त्रों से घायल घोडे, हाथियों तथा शूरवीरों के शरीर से उत्पन्न रक्त का प्रवाह वाल सूर्य हुआ। (जैसे रात्रि में अधकार से कुछ दिखाई नहीं पडता, दृष्टि मार्ग को रोकने वाले उस अधकार के वाद लाल रंग वाले प्रात.कालीन सूर्य का उदय होता है और कुछ समय के वाद ही वह अधकार भी नष्ट हो जाता है, वैसे ही युद्ध में आहृत अश्व, हाथी तथा वीरों से उत्पन्न रक्त प्रवाद् दृष्टिरोधक धूलिका लाल सूर्य मालूम पढती थी।) इससे उस धूलि का शीघ्र विनाश भी सूचित किया गया है, जैसा कि अग्रिम श्लोक में वर्णित है।' वैधर्म्य से मालारूपक का उदाहरण देते हैं। जैसे- 'इस कलियुग में जो लोग उस दुष्ट हृदयवाली राजावली (राजगण) की सेवा कर चुके हैं, जो कि सुजनता रूपी जलधारा के लिए मरुभूमि, सच्चरित्रता रूपी चित्रवीथी के लिए आकाशभित्ति, गुणावली रूपी चन्द्रिका के लिए अधेरी की चौदस तिथि और सरलता के सम्बन्ध के लिए कुत्ते की पृछ है, उनके लिए केवल भक्ति से सुलभ भगवान शकर की आराधना में कोई कौशल अपेक्षित नहीं। (यहाँ मरुभूमित्व आदि विरुद्धधर्मों में रूपक की अक्षुण्ण प्रतीति है) (सुधा) वैघर्म्येण रूपकमुदाहरति, तम्रापि केवलम् यथा-आवृण्वत इति। लोचनमार्ग- मावृण्वत उन्लद्धितवतः आजी स्यामे विजम्भितस्य व्याप्स्य रज एवान्धकारं तस्य

Page 265

रूपकनिरूपण प्रकरणम्

शास्त्रवतेभ्यो जन्म यश्य तथोक: रुधिरप्रवाद, पालारुण: वालसूर्याऽभूत। 'अरणो भाग्क- रेऽपि स्यात' इत्यमरः। रजस्पन्घकाररवारोपे व्यापत्व धर्म:, रुधिरप्रवादे ब्रएसूर्यग्ारो- पेऽरुणकान्तिमध्वं सामान्यधर्मः। अतो वैधम्य केवल रूपकमित्यर्थः। वधम्येण मालारूप कमुदाहरति-सौजन्यानुमस्थलीति। ये. पुरपरिया दुषाशया राजावद्यपि सेचिता, तेपां भक्तिमान्नसुलभे शिवे सेवा सेवन कियद कौशलम, न कियिदपीरयः। राजावज्य- सेव्यत्वे विशेषणान्याह-कीदशी राजसेवा सौजन्याम्वुन, मरस्थलीरूपा सौजन्यरूपनला भाववती, सुचरितमेवालेक्यं चित्रं तस्य धुमित्िरूपा, गुणा एव ज्योरत्रा=कौमुदी, तस्याः कृप्णतुदशीरूपा, सरछतासम्बन्धे श्रपुष्छच्छटारूपा। अत्र इयोवॅधर्स्यस्य मालायाक्ष सर्वेनोदाहरणं द्रष्टव्यम्। (चित्र०) एवमष्टौ भेव रूपकालद्वारस्य प्राचीनेः प्रदशिताः। एवं भेदा उपमाया अपि वत्तुं शक्था, एकत्र प्रदशितेन प्रकारेण सभवरथलेऽन्यत्राप्युन्नेतु शक्या इति न प्रदशिताः । तथाहि-'वागर्थाविव संपृक्ती' इत्यादी केवतनिरवयवोपमा। 'ज्योत्स्नेव नयनानन्ट:' इत्यादौ मालानिरवयवोपमा। (भारती) इस प्रकार रूपक अलकार के ये आठ भेद प्राचीनों ने प्रदर्शित किया है। ये सारे भेद उपमा के भी कर सकते हैं। एक ही जगह प्रदाशत करने से प्रकारान्तरण सभवस्थत में दूसरी जगह भी कहा जा सकता है। आ यहा नहीं दिसाया गया। उपमा में रूपक के भेदों को प्रदशित कर ते छुए कहते ह- 'शब्द और अर्थ के समान नित्य मिले हुए, ससार के माना-पिता, उमा और महश्वर को नें शब्द और अर्थ के सृष्ठु ज्ञान प्राप्त करने के लिए नमस्कार करता हू।' यहाँ शब्द और अर्थ में अवयवाभाव के कारण केवल निरवयव उपगा स्पष्ट । इसी प्रकार- 'यह नितन्बिनी चन्द्र-चन्द्रिका की भाँति नेवों को आनन्दित करने नाली, मदिरा की मोनि उन्मत्त वनाने वाली और प्रभुता की भाँति सबको वश में रगने वाली है।' यहॉँ मालानिसयवोपमा की स्पष्ट साकी मग्तुत है।

(सुधा) रुपकसुपसंहरति-पवमति। तत्र सग्मतिमाह-प्राघीनेरिति। एवां भेदानामुपमा- यामपि सम्भवमाह-पवमिति। तेपां अन्थकृतोपमायामलेन्वेन न्यूनतामापाञ्जय निरा- करोति-एकत्रेति। तथा प रुपकप्रददितप्रकारेणोपमायामुऐेतुं क्ययतु दाययरयाठ् तम्नाप्रदर्शनेऽपि न न्यूनतेत्याहु। उपमायां रूपकप्रकाशन दर्शयितुमारभते-तथा हीति। 'वागर्थाचिव सग्पृक्तौ' इश्यय केवलनिरवययोपमा स्पश्य,तयो्यवाभवा्दिति शेद। 'जयोश्सेव नयनानन्द: सुरेब मद्कारणम। प्रभुतेत समाकृष्टसर्वलोक्का नितग्धिनी ।I' दरयत्र मालानिरवययोपमा । १५ चित्र०

Page 266

२२६ चित्रमीमांसा

(चिन्न०) ततः प्रनस्थे कौबेरीं भास्वानिव रघुर्दिशम। शररुस्रैरिवोदीच्यानुद्धरिष्यन् रसानिव॥। इत्यत्र समस्तवस्तुविषयसावयवोपमा। नेत्रैरिवोत्पलैः पद्मैर्मुखैरिव सरःश्रियः। पदे पदे विभान्ति स्म चक्रवाकैः स्तनैरिव । इत्यत्रकदेशविवर्तिनी। (भारती) 'पश्चिमी देशों की विजय के बाद-उस राजा रघु ने सूर्य की तरह किरणों से जलों का शोषण करने के लिए उत्तरायण होते हैं, उसी प्रकार पश्चिम और उत्तर दिशा के देशाधिपतियों को अपने बाण से उखाड डालने के लिए कुवेर की ओर (जोउत्तर दिशा में है) प्रस्थान किया। इस उदाहरण में समस्त वस्तु विषय सावयवोपमा है। 'शरत् काल के सरोवर की उपमा, नेत्रों की भाँति उसको, मुखे की भाँति कमल और स्तनों की भाति चक्रवाक युगलों से सुशोभित लगती रही।' यहाँ एक देशवर्ततिनी उपमा में रूपक गतार्थ है। (सुधा) सावयवभेदे समस्तवस्तुविषयामाह-तत इति। ततो रघुः भास्वान् सूर्यं इव, शरैर्वाण: उस्नः किरणैरिव, उदग्भवान् नृपान् रसानिव उद्धरिष्यन् कुबेरसम्बन्धिनी- सुदीर्ची दिशं प्रतस्थे इत्यन्वयः। उपमानोपमेययोः शाब्दत्वात् समस्तवस्तुविषया द्रष्टव्या। सावयवभेदे एकदेशविव- तिनीमुपमामाह-नैन्रैरिति। नेत्रैरिव कमलैः, मुखैरिव पझैः, स्तनैरिव चक्रवाकेः सरसां प्रियः छ्षणे पणे विभान्ति रम। अश्र सरशशीषु स्त्रीत्वसादृश्यस्याथंलभ्यत्वादेकदेश- विवर्तिनी। (चित्र०) अत्यन्तरागिणमपि निपीतवसुसञ्वयम्। गणिकेवापरदिशा पूषाणं निरकासयत्॥ इत्यत्राप्येकदेशविवर्तिनी। पूर्वत्र विशेषणोपमायां विशेष्योपमा गम्यते, उत्तरत्र विशेष्योपमाया विशेषणोपमेति भेदः । (भारती) 'ऊपर दिशा अर्थात् पश्चिम दिशा वेश्या की तरह अत्यन्त अनुरागी रहने पर भी क्षीण द्रव्य सचय के कारण सूर्य को बाहर निकाल रह्दी है।' सूर्य में नायक सादृश्य के अर्थ लाभ से यहाँ एक देशवरत्तिनी उपमा है। उदाहरण की व्यर्थता की आशका से 'दयो.' विशेषण कहा गया है। अर्थात् विशेषण उपमा से विशेष्य उपमा में एक

Page 267

रूपकनिरूपणप्रकरणम् २२७

देशविवर्चिता है। उत्तरत्न विशेष्य उपना से गणिका रूप पक्षिम दिया के भाशय मे विशेषण उतमा में, रविनायक उपमा में एक देश विवर्तिता से 'हयो विशेष, ह।

(सुधा) अस्योदाहरणान्तरमाह-अध्यन्तरागिणमिति। अपरदिशा पश्रिमा दिग वस्येवारय न्तानुरगवन्तं कीणद्रव्यसयं सूर्य निरकासयदित्यन्वयः। पृष्णि नायकसाहस्यस्यार्थल भ्यरवादेकदेशविवतिनीश्यर्थः । उदाहरणस्य व्यर्थत्वमाशकय दयोविशेषमाह-पूर्वत्रेति। विशेषणोपमया विशेष्योप- मायामेकदेशविवतिस्वम, उत्तरत् विश्ोप्योपमया गणिकापरदिशाध्ररयया विशेषणोपमायां रविनायकोपमायामेकदेशविवर्ति्त्वमिति द्योविशेष इत्यर्थः । (चित्र०) दूरादयश्चक्निभस्य तन्वी तमालतालीवनराजिलीला। आभाति वेला लवणाम्बुराशोर्धारानिवद्धेव कलद्वरेखा ॥ इत्यत्राश्लिष्ठशब्दनिबन्धन केवलपरम्परितोपमा। अत्र ह्यम्घुराशेरयध्क्रेणोपमा। तद्धाराश्लिष्टकलद्वरेखया वेलाया उपमा चेति द्वयमपि सञ्जातपरम्परम् । (भारती) 'लोह चक्र के समान क्षार समुद्र की वेला दूर से छोटी मालम पउती हुई जीर तमाने तथा तालों की वनरा जिसे व्यामवर्ण वाली धारा से निवद्ध कल्फ रेसा के समान मालन पडती हं।' यहाँ अम्पुराराशि की लौह चक के साथ जो उपमा ऐै, उसके द्वारा आम्लिष्टि कल्क रेगग में वेला की उपमा है। अत यहाँ दोनों ही सजान परन्परित है।

(सुधा) परम्परितोपमाभेदेप्यश्लिष्टशव्द निवन्धनां केवलपरम्परितोपमामुदाहरति-दूगदिति। अयक्षकनिभस्य लवणाम्तुराशेदूरात्तन्वी अणुरेनावभासमाना नमालतालीवनराजिभि. नीला ेला तीरभूमि: घारानिवदा पक्राश्रिता कलछलेखेव माति। अग्राम्नुरापेश्यश्रम्रेण या उपमा, तद्दवाराड्लि्टकलप्वरेखत्रया चेलाया उपमा चेति। दयमपि सज्षातपरम्परमिनि

(चित्र०) यथा वा- अस्त्रज्वालावलीढ प्रतिवल जल घेरन्त रीर्बि य माणे सेनानाथे स्थितेऽस्मिन् मम पितरि गुराँ सर्वधन्दीश्वराणाम। कर्णालं सभ्रमेण म्रज कृप समरं मुख् हाटिक्यशकां ताते चापद्वितीचे वहति रणघुरां को भयस्यावकाशः॥

Page 268

२२६ चित्रमीमांसा

(भारती) इसका ही दूसरा उदाहरण बताते हैं, अथवा जैसे- 'अरे कर्ण। अपने महास्त्रों की अननि ज्वाला से प्रतिपक्ष सैन्य सागर में वडवानल सरीखे विरा- जमान् किंवा समस्त धनुर्धरों के परमाचार्य मेरे पूज्य पिता द्रोण जव सेनापति हैं तब घवराहट कैसी ? कृपा । सग्राम से क्यों भागना १ कृतवर्मा ! सन्देह किस वातका ? अरे, धनुर्मात्र सहाय मेरे पिता जव रण धुरा का वहन कर रहे है तो डरने का काम १' (सुधा) अस्यवोदाहरणान्तरमाह-यथा वेति। वेणिसंहारनाटके अश्वत्थामवचनम्। अस्ज्वा लाभिरवलीढं व्यासं यस् प्रतिबलं शत्रुसैन्यम, तदेव जलघिरिव समुद्र हव, तस्यान्तर्मध्ये वाडवसदशे, सर्वधन्वीश्वराणां गुरौ मम पितरि अस्मिन द्रोणे सेनानाथे स्थिते सति, हे कर्ण! सम्भ्रमेण भयेनालम, हे कृप समर संग्राम व्रज, हार्दिक्यशक्टां मुझ्। चापसहाये ताते द्ोणे रणभारं वहति सति, भयस्यावफाशः कव्व् ! न क्वापीत्यन्वयः। (चिन्र०) अन्र द्रोणस्यौर्वेणोपमा प्रतिबलजलघेरित्यत्रोपमाया. साधिकेत्युपमाद्वय- मपि सज्जातपरम्परम्। एवम् 'राजहंसायते राका विदुपामेष मानसे' इत्यत्र श्लिष्टशब्दनिबन्धनकेवलपरम्परितोपसा। उभयत्रापि सालापरम्परितमनयैव रीत्योन्नेयम्। 'रेणुध्वान्तस्य रक्तौघो बालघर्मकरायते' इति वैधर्म्येग रूपक- वदुपमेति सर्व समानम्। (भारती) यहाँ प्रोण की और्व से उपमा, प्रतिवल जलधि की उपमा की साधिका है, यह शलिष्ट शब्द निवधना केवल परम्परित उपमा है। पूर्व उदाहरण में विशेषण उपमा की विशेष्य उपमा में निमित्तत्व है, उत्तरत्र विशेष्य उपमा में विशेषण उपमा की निमित्तता-यही दोनों के भेद हैं। लष्ट शव्द निवन्धना केवल परम्परित उपमा कहते है-'यह राजा विद्रानों के हृदय मे राज- हंस बना है'-चित्त में मानसरोवर की उपमा तथा राजा में हस की उपमा निमित्तत्व है- फलत दोनों जगह श्लिष्टता रहने के कारण रिलष्ट गब्द निवन्धना केवल परम्परित उपमा है। शेष दोनों भेद का उभयत्र से उपसहार करते हुए कहते हैं-अश्लिष्ट ओर रलिष्ट तथा माला परम्परित इसी रीति से जानना चाहिए। वैधर्म्य से उपमा कहते हैं-'धूलिकण रक्त समूहों से मिलकर वालसूर्य वन गया' यहाँ अलग-अलग धर्म से उस धर्म के वहाँ अभाव से वैधर्म्य उपमा अर्थात रूपक के समान ही उपमा का वोध जानना चाहिए। (सुधा) अम्र द्रोणस्योर्वेणोपमा प्रतिबलस्य जलधेरुपमायाः साधिका इत्यश्लिष्टश्नबन्धना केवलपरम्परितोपमा। पूर्वोदा हरणे विशेषणोपमाया विशेप्योपमा्या निमित्तत्वम्, उत्तरत्न विशेष्योपमार्या विशेषणोपमाया निमित्तत्वमिति द्वयोर्भेदः । श्लिष्टशब्दनिबन्धना केवलपरग्परितोपमा- माह-एवर्ममात। एष राजा विदुषा मानसे राजहसायते इत्यन्वय। चित्ते मानससरस

Page 269

रपकनिरूपणप्रकरणम्

उपमा राजि हंसोपमाया निमित्तम्, उभयथ्र रिलिष्टावं वेति तरमावाष्दिलएशव्द- निबन्धना केवलपरम्परितोपमा। शे्षं भेदयसुपमंहरति-उमयत्रेति 1 अम्लयो- रित्यर्थ:, माकापरम्परितमनयव रीत्योहाम्। तथया-अ्लिएशव्दनिवन्धना मालापरम्प रितोपमा यथा-'ज्योरस्रायन्ते तव गुणगणाः पूर्णधन्द्रायसे सवं, धारायन्ते विधिम्निवदा वारिधाहायसे त्वम्। पधायन्ते रिपुनृपतयो हथ्यवाहायमे ववं, भक्कायन्ते विदुधनिवद्दा वीर पद्यायसे श्वम ॥I' इति। स्लिप्टशब्दनियन्धना मालापरम्परितोपमा यथा-'लेगेव या चान्दमसी कलानां रमस्थ या पुप्करिणीव पूर्णा। निष्केतवस्थानमियं रघीनामानन्द- वद्धाति सरोकहाक्षी ।I' हति द्ष्टव्या। वेधर्भ्येणोपमामाह-रेणुध्यान्तस्वेति। रमौघो रुधिरसमूहो रेण्घन्धफारस्य वालसूर्यायत दृश्यत्र पृथक पृथग धर्मरवेन तस्य धर्मस्य नम्रा- आावाद् वैधर्भ्योपमेति रूपकसमानतेंवोपमाया इति वोष्यम्। (चित्र०) अयं तु विशेप-समस्तवस्तुविषय रूपकं न विशिष्टरूपकं भवति, विपयधि- पयिणोबिम्बप्रतिबिम्वधर्मविशिष्टयोस्ताद्प्यारोपे निदर्शनाया एवावतरणान । सावयत्रोपमा तु विशिष्टोपमा गमयति। 'ततः प्रतस्थे काँवेरी भास्व्रानिव' इत्यत्र शररुदीच्यानुद्धर्तुमुत्तरां दिशं प्रस्थितस्य रघोर्विशिष्टस्य किरणै रसान् शोपयितु- मुत्तरां दिशं प्रास्थतेन विशिष्टेन रिणा साधर््यस्य फलितार्थतया लाभान। (भारती) 'अयम्' शब्द मे रूपक और उपमा का विशेष बताते हैं। समस्तवर्तु विपयक मानयन रूपक में विशिष्ट रूपकना की ममावना नही है। क्योंकि विन्तप्रतिविन्व भावापक विषय और विपयी के तानूप्य के आरोप में निदशना अलकार से वह वाधिन है। सावयन उपमा की चिशिषट्ट उपमात्म में गमकता है। उस विशिष्ट उपमा की गमता का उदाहरण देते ह-'उसके बाद रतु ने मूर्य ैसी किरणों से जलों का आापण करने के लिए उत्तरायण होते है, उसी भाँति अपने वाणों मे पश्षिम और उत्तर दिशा के राजाओं की विजय करने के लिए, कुबेर की जो उत्तर दिवाण है, उसकी और प्रस्थान किया। यहाँ वाणों में उत्तरी सीमान्त नृपत्तियों के उद्र के लिए उत्तर दिना की और प्रस्थित रघुकी विशिष्ट किरणों से रसों को गोपित करने के लिए उस दिया की ओर प्रम्थिन विनिष्ट सूर्य से साधर्न्य की फलितार्यता से ही लाभ है। (सुधा) रूपकोपमयोर्यो विशेषस्तमाह-अयनििवति। समस्तवस्तुविपयकसावयवर्पके विशिष्टरूपकता न सम्भवति, विन्वप्रतिवि्वभावापलविषय निपषिणोस्ताटृप्यारोपे निदर्शनालक्वरेण तद्वाधात्। साचयवोपमाया चिशिष्टोपमात्वे गमक्तास्तीत्याह-साघय- वोपमा ि्विति। तस्या विशिष्टोपमागमक्तामुदाहरति-तत हति। सम्न शररवीध्यान् नृपानुदतंमुत्तरां दिशं प्रस्थितत्य रघोविशिष्टस्प किरणं रसानू शोषयितु तद्विदं प्रस्थितेन विशिप्टेन रविणा साधर््यत्य फलितार्थतर्येव लाभादिरयार्मेतकृता न्पप्टीपृतवान्।

एव च कचिदुपमयाऽन्यत्रोपमाया गम्यत्व चतुर्धा पर्वचन्यति, फचिद्विशे- (चित्र०)

पणोपमया विशेष्योपमाया । 'विश्वजित्म र्प्ष्ठोऽतिरात्रः इत्यत्र पृष्ठगतसर्वतावि-

Page 270

२३० चित्रमीमांसा

धिनेव तद्विशेष्यपृष्ठविधे:, कवचिद्विशेष्योपमाया विशेषणोपमायाः, वैकृतप्रधान- विधिनेव प्राकृततदङ्गकलापविधेः। उभयमप्येकदेशविर्तित्वेनोदाहतम्। कचिद- वयवोपमया विशिष्टोपमाया गम्यत्वम् । अङ्गप्रधानगोचर प्रत्येकविधिकलापेनेव सर्वाङ्गविशिष्टप्रधानगोचरप्रयोगविधेः । तत्तु समस्तवरतुविषयोपमोदाहरणे दर्शितम्। एकवाक्यतायामवयवोपमा विशिष्टोपमाया गम्यत्वे इदमुदाहरणम्। (भारती) इसी प्रकार कहीं उपमा से अन्यत्र उपमा की गम्यता चार प्रकार की है .- (१) विशेषण उपमा से विशिष्ट उपमागमता (२) विशिष्ट उपमा से विशेषण उपमा की गतमा (३) अवयव उपमा से विशिष्ट उपमा की गमता, (४) विशिष्ट उपमा से अवयव उपमा की गमता। इन रूपों में शास्त्रीय उदाहरणपूर्वक प्रहृत्त उदाहरणों को दिखाते हैं। प्रथम का उदाहरण-'विश्वजिस् सर्व पुष्टोऽतिरान्रः।' यहाँ पृष्टगत सर्वता विधि से ही तद्विशेष्य पृष्ठ विधि का गमत्व है। इसी प्रकार दूसरे में-असमग्र अग के उपपद में शिव वैकृत विधि से समग्र अग के औपदेशिक प्राकृत तदग कलापविधि की गम्यता है। प्रहत में इसके उदाहरण हैं-पहले 'नेत्रोरपलैः' इत्यादि, दूसरे में 'अत्यत्नरगिणम्' इत्यादि दोनों के 'तथात्व' की स्पष्टता है। तीसरे में-अगप्रधान विषयक प्रत्येक विधि कलाप से सर्वांग विशिष्ट प्रधान विषयक प्रयोग विधि की गम्यता है। जैसे-'ततः प्रतस्थे' ·इत्यादि प्रकृत में उदाहरण है। ये समस्तवस्तु विषय उपमा से ही व्याख्यात है और यह उदाहरण एक वाक्यगत्व से है। (सुधा) तथा च फलितार्थमाह-एव्चेति। उपमयान्यत्रोपमागम्यरवं चतुर्धेति विशदतया विशद्यति-कचविदित्यादिना ।' (१) विशेषणोपमया विश्िष्टोपमागमकत्वम्। (२) विशिष्टोपमया विशेषणोपमागमकर्वम। (३) अवयवोपमया विशिष्टोपमागमकरबम्। (8) विशिष्टोपमाया अवयवोपमागमकत्वम्। तम्र शास्त्रीयोदाहरणपूर्वकं प्रकृतोदाहर- णानि दर्शयति-'विश्वजित् सर्वपृष्ठोऽतिरात्रः' इत्यन्न पृष्ठगतसवंतोविधिना तद्विशेष्यपृष्ठ- विधेगंग्यत्वम्, द्वितीये असमम्राङ्गोपपदे शिवचैकृतविधिना समग्राकगीपदेशिक प्राकृततदङ कलापविधेगंग्यत्वम्। प्रकृते उदाहरणन्वाद्े-'नेत्रोतपलेंः' इत्यादि, द्वितीये 'अत्यन्तरा- गिणम्' इति, इयोरपि तथास्वस्य स्पष्टत्वात्। तृतीये तु-अङगप्रधानविषयकप्ररयेकविधि- कलापेन सर्वाङ्गविशिष्टप्रधानविषयकप्रयोगविधेगग्यरवं यथ-'ततः प्रतस्थे' इति प्रकृते उदाहरणम, तत्तु समस्तवस्तुविषयोपमयेव व्याख्यातम। इदमुदाहरणमेकवाक्यगततवेन। (चिन्र०) वाक्यभेदेनापि दृश्यते- हस्त इव भूतिमलिनो यथा यथा लङ्गयति खलः सुजनम्। दर्पणमिव तं कुरुते तथा तथा निर्मलच्छायम्॥ अत्रावयवोपमा। यथा भूतिमलिनो हस्तो दर्पणसधिकमधिक घर्षयन्नुत्तरो- त्तरं निर्मलीकुरुते, तथा खलः सुजनमधिकंधर्पयन्त्तरोत्तरं निर्मलमेव कुरुते इति विशिष्टोपमा गभ्यते। कचिद्विशिष्टोपमया तदवयवोपमानां गम्यत्वम्।

Page 271

रूपकनिरूपणप्रकरणम् ३१

(भारती) वाक्यभेद से मी उदाहरण देते ह, जैसे- 'भूमितल वाले हाथ की तरह दुषजन जमे से तुजनों को रधिने है अर्भात निन्दा कर है, दर्पण की नरह वे सव्जन बैने ी वैसे उत्तरोत्तर निर्गल नोभा प्राप्त करते है।' यहाँ अवयव उपमा है। अर्थात भत्म से मलिन हाथ दर्पण को अधिक रगटते हुए सटरोसर निर्मल करते है-इस अवयव उपमा सम्पत्ति से मतिन चित दुछ स्नों को अ्त्यधिक पोटा पहुंचाने हुए अत्यन्त निर्मल करते है-यह विनिष्ट उपमा पृथपा मिया के द्वारा वाक्यगेद से अवगत होती है। कहीं अर्थात् चौथे में-विशिष्ट विधि से विशेषण रूप अयन विधियों की गम्यता है। जैसे-'दृष्टान्त'।

(सुधा) वाक्यभेदेनाप्युदाहरणं दर्शयति-इप्त ह्वेति। भूतिमलिनो हस्त इव सटो दुप्टो यथा यथा सुजनं लद्मयति, दर्पणमिच तं सुजनं तथा, तथोत्तरोस्तरं निर्मलशोभं कुरते इत्यन्चयः। अम्र मस्ममलिनो हस्तो दर्पणमधिकं वर्षयन्नुत्तरोत्तरं निर्मेछं कुरुत दश्ययय- वोपमया सम्पस्या मलिनचिसः खलः सुजनमत्यधिकं पीडयन् अतिनिर्मलं कुबते इति विशिष्टोपमा पृथक क्रियया वाक्यभेदाद्वगम्यत इति स्पष्टार्थः। चतुर्थ-विद्षिष्टविधिना विशेषण रुमावयव विधीनां गम्यत्वम, यथेति दष्टान्तः। (चित्र०) विशिष्टविधिनेव विशेषणविशेष्यविधीनाम्। यथा- त्वदाननमधीराक्षमाविर्दशनदीघिति । भ्रमद्भङ्गमिवालच्य केसरं भाति पङ्कजम्॥ अत्र विशिष्टस्योपमया तदवयवभूतानां भृङ्गलोचनानां केसरनखरदीघितीनां पङ्कजाननयोश्च्ोपमानोपमेयभावो गम्यते। (भारती) विशिष्ट विधि से ही विशेपणविशेष रूप अवयव विधियों की गम्यता का उदादरण देते है। जैसे- 'इसका मुस कमल के समान है और औँरों भौरों को तरए है और मौरे की तरए गाँसों से युद उसका मनोहर मुस कमल की तरए शोभ रहा है। कमल मेरि की तरह कजरारी आँगों में युव मुस की तरए शोभ रहा है।' यहाँ विशिष्ट मुस का विशिष्ट पकज की उपना से उमको अवयवभृत मोरे और कोंगों मे पेस्षर आदि उपमा की गन्यता है। (सुधा) प्रकुते तदुदाहरणं दर्शयति-ववदाननमिति। क्षत्र विशिष्टस्याननस्य विनिप्टेन पद्ट- जेनोपमया सद्वयचभूतम््ा्लोघनाना केसरादीनामुपमाया गन्यरवम्।

Page 272

२३२ चित्रमीमासा

(चिन्न०) एवमसंख्या उपमाविकल्पाः । तथा- किसलयकरलतानां करकमलैः कामिनां मनो जयति। नलिनीनां कमलकरमुखेन्दुभिर्योषितां मदनः ॥ इत्येवमाद्या रशनारूपकाद्या रूपकविकल्पा अप्यसंख्याः । उक्त्तं हि काव्यालोके- अपर्यन्तो विकल्पानां रूपकोपमयोर्यतः। दिआ्ञात्रं दर्शितं धीरैरनुक्तमनुमीयताम्।। इति। इति चिन्रमीमांसायां रूपकालङ्कारप्रकरणम्।

(भारती) इस प्रकार रूपकों की अनन्नता का प्रतिपादन करते हुए रसना रूपक का उदाहरण देते हैं। जैसे- 'कामदेव कामियों का मन जीतने लगा-लताओं के किसलयकरों से, रमणियों के कर- कमलों से, नलिनियों के कमल रूप हाथों से और युवतियों के मुखचन्द्रों से-सवको वशीभूत करने लगा।' यहाँ रसनारूपक उपमा की तरह रूपक के भेदों की असख्यता कही गयी है। काव्यालोक में दण्डी ने ऐसा ही कहा है- 'क्योंकि रूपक और उपमा के भेदों का अन्त नहीं है। अत. यहाँ उसका दिडमात्र ही दिखाया गया है। इसमें जो नहीं कहा गया है, उसका भी अनुमान इसी प्रकार बुद्धिमानों को करना चाहिए।

इति चित्रमीमासाया 'भारती' हिन्दीव्याख्याया रूपकनिरूपण समाप्तम्।

(सुधा) उपमामुपसंहरति-एवमिति। एवं रूपकाणामाननतयं प्रतिपाव्यन् रसनारूपकमुदा- हरति-तथेत्यादि। लतानां किसलयरूपैः करैः कामिनां हस्तरूपैः कमलैः जगद् नलि- नीनां कमलरूपैः करैः, योषितां मुखरूपैरिन्दुभिः मदनक्ष जयति। अम्र रसनारूपकमुपमावद्रृपकभेदानामप्यसंख्यतामाहुः। रूपकविकरपा इति। रूपक- भेदा इत्यर्थः। तब् प्रमाणमाह-उक्कं हीति। दण्डिनेति शेषः ।. यतो रूपकोपमयोर्भेदाना-

Page 273

रूपकनिरूपणप्रकरणम् =39

मन्तो नास्ति, अतो दिषमात्रमिद दश्ितम्। एवं धीरें रनुभ््मवि अनुमीयतामिग्यन्यय । तथा हि काचिद् दिक प्रदर्श्यते-धर्मभेदरपि रूपकभेदाः। उविदनुगामी, फचि विन्व प्रतिबिम्वभावा, कचिदुपचार:, कचिरकेवलशवदार्मा, पतेपामपि कषिष्छन्दोपानशवम्, कवचित् प्रतीयमानत्वम्। उपात्तोऽनुगामी यथा- 'जढानन्धान पडगून् प्रकृतिविधुरानुक्तिविकलान्

'निलिम्पंनिर्मुक्त्तानप व निरयान्तनिपततो जनानम्व म्रातुं र्वमिद परम भेपजमसि ।' अम्र भेपजभागीरय्योस्त्राणरूपोडनुगामी धर्मस्तुमुनन्तेन शव्देनोपासः । अनुपातो यथा- 'समृद्दं सौभाग्य सकलवसुधायाः किमपि तन् महचर्यं लीलाजनितजगतः सण्डपरशोः। श्रुतीनां सर्वस्वं सुकृतमथ मूर्त सुमनमा सुधासताम्राज्यं ते सलिलमशिव नः पमयतु ॥'

पास्तत्वम्। विन्वप्रतिबिम्वो यथा- 'आरमनोऽश्य तपोदानेनिर्मलीकरणं हि यत्। घालनं भास्करस्येदं सारसैः सलिलोत्करेंः।' अशात्मनि तपोदानेपु चारोपविषयविशेषणतया विन्भूतेपु भास्करत्य सलिलवाल नादीनां घ विपयिविशेषणरवेन प्रतिबिम्वानां रूपकं गम्यमानम्। उपघरितो यथा- 'अविरतं परकार्यकृता सतां मधुरिमातिशयेन वचोऽमृतम। अपि च मानसमन्ुनिधियेशो विमलशारद्चन्दिरघन्द्रिका ।।' अन्नामृतरूपके विपये वघस्युपचरितो मधुरिमातिशयः शव्देनोपात्तः। अग्रेवाग्तुनि- ध्यादिरूपके गाम्भीर्याध्यनुपासतम्। केवलशब्दात्मको यथा- 'अष्वितान्यक्षसंघातैः सरोगाणि सदैव हि। शरीरिणां शरीराणि कमलानि न मशयः॥' अश्र सरोगशव्दादिरुपात्त एव प्रतीयते, न तु लुप्ः। साधारणघर्मस्य यत्र युतििपेण कथनं तन्द्रेतुरूपकं यथा- पखशाखः प्रभो यस्ते शाखा सुरतरोरसौ। अन्थयानेन पूर्यन्ते कथ सर्वमनोरयाः ॥' गव्दश किमूल व्यम्ष चरूपकं यथा- 'विज्ञावं चिटुषा गणे सुकचितां मामाजिकानां कुलले माङ्गव्यं स्वजनेपु गौरवमयो लोकेपु सर्वेप्वपि। दुर्वत्ते शनिता तृलोकवलये राजग्वमव्याह्दतम् मित्रश्वज् वहसकिस्सनजने देव खमेो भुषि ॥' अत्र शक्तिनियन्त्रणेऽपि युधरवशुफरवादीनि वुघाययभेदरूवाणि शजनि व्यन्यन्ते। 'तिमिरं हरन्ति हरिता पुरः स्थित निस्यन्ति तापमय तापशामिनाम्। वदनत्विपस्तव चकोरलोघने परिमुट्यन्ति सरमीरदधियः॥'

Page 274

२३४ चित्रमीमांसा

इहापि वदनं चन्द्र इति गम्यते। एवं रीत्या रूपकानन्त्ये दिगियं प्रदर्शिता। अथ रूपके शाब्दबोधस्य रीति: प्रतिपाधते। तम्र प्राञ्त :- विषयवाचकपदेन विषयवृत्तिगुणवतो सारोपलस्षणयोपस्थितौ तस्याभेदसम्बन्धेन विशेषणतयान्वयः। तथा घ 'मुखं चन्द्रः' इश्यत्र चन्द्रवृत्तिगुणवद्भिन्नं मुखमिति बोधः। लाष्षणिकबोघोप्तरोपद्यमा नप्रयोजनीभूता ्भेद ोधेन चन्द्रश ुमिुपमतो ैलस प्योपपत्तिः। मुखचन्द्र इति विशेषणसमासे सुखाभिन्नं चन्द्रवृत्तिगुणवदिति घीः। 'कान्त्या मुखं चन्द्रः' इति साधारणधर्मोपादाने खवभेदस्तृतीयार्थः, तस्य चन्द्रवृत्तिगुणपदर्थिकदेशे- Sन्वयात् कान्त्यभिन्नचन्द्रवृत्तिगुणवदभिन्नं मुखमिति धीरित्याहुः। नग्यास्तु-नामार्थयो- रभेदसम्बन्धेनान्वयस्य व्युप्पत्तिसिदूतया फलस्य लक्षणां विनेवोपपत्तेस्तरकक्षपनाया अयोग्यतया चन्द्राभिन्नं मुखमिति बोधः। रूपके लव्णाद्गीकारे तु 'मुखचन्द्रः' इत्यादा- वुपमिति विशेषणसमासयोरुत्तरपदस्य लाक्षणिकत्वाचिशेषेणैकस्योपमात्वमन्यस्य रूपकरव- मित्यस्य व्याहतरवापतेः। तस्याप्यभेदस्याहार्यतवेन न बाघबुद्धे: प्रतिबन्धकरवम्। अथ 'गाम्भीर्येण समुद्रोऽयं सौन्दर्येण च मन्मथः' इत्यत्र कथ बोध :? शणु-प्राचीनमते लचयमाणकदेशे सादृश्येऽभेदस्य तृतीयार्थस्य अन्वयाद्गाम्भीर्याभिन्नसमुद्रवृत्तिमर्मवदभिओनो डयमिति धी:। नव्यमते तु कवेरिच्छ्ामात्रं कक्षिपतासन्द्रूतान्तःकरणपरिणामरूपमुखचन्द्राप्र्थोपनि घन्धननिर्मिते: साधारणधर्मदर्शनाधीनतया तस्य प्रयोजकतवसम्भवेन गाम्भीर्यादिप्रयोज्य- समुद्राभिन्नोऽयमिति बोधः। उभयमतेऽपि 'वह्निमान् धूमात्' इत्यत्र पश्चमीविभ केरिव तृतीयाविभक्केरपि ज्ञानजन्यज्ञानप्रकारतार्थतया गाम्भीर्यक्षानजन्यज्ञानप्रकारकसमुद्रा- भिन्नोऽयमिति बोधः । ननु 'सौजन्यचन्द्रिकाचन्द्रः' इृश्यत्र समासगतपरम्परितरूपके तरपुरुषावयवे कर्मधारये पूर्वपदार्थसौजन्यस्याभेदसम्बन्घेनोत्तर पदार्थभूतचन्द्िकार्यां विशे- षणतया चन्द्रिकागतसौजन्याभेदस्योपमेये राजनि उपमानस्य चन्द्रस्याभेदात्मकरूपक- समर्थनं न युक्त्म, यत्सम्बन्धिनि यत्सम्बन्ध्यभेद, तस्मिन् तदभेद इति व्युश्पत्या सौजन्यविषयकधन्द्रिकाभेदस्यैव समर्थनाद राजि चन्द्राभेदकथनस्य व्युत्पत्तिविरोघि- स्वाद। यथा 'सौजन्यं ते घराधीश चन्द्रिका रवं सुधानिधिः अन्र हि राजसम्बन्धिनि सौजन्ये चन्द्रसम्बन्धि चन्द्रिकातादात््य सिद्धया राजि चन्द्रतादात्योपपत्तिः । समानवित्ति- वेद्यतया चन्द्रिकार्या सौजन्याभेदवोधे सौजन्ये तदभेदभानं तु शाब्दबोधस्य ग्युत्पत्तिचे- चित्र्य नियन्त्रितत्वान्त वक्तुं शक्यम्। प्रात्यक्षिकसामग्रीतुल्यतयेव तवसत्वाद्। एवम्र 'मुख- चन्द्रः इति समासेऽपि कथ मुखविशेष्यकचन्द्रारोप इति चेद? अत्र रसगक्गाघरकृत :- कर्मधारये खभेदो विशेषणसंसर्गः। 'मुखं चन्द्रः' इत्यादी वाक्यगते रूपके स्वप्रतियोगिन- श्न्द्रस्य स्वानुयोगिनि मुखे यथाऽभेदस्य विशेषणतानिर्वाहकत्वम्, तथा समासगते रूपके स्वानुयोगिनो मुखस्य स्वप्रतियोगिनि चन्द्रे विशेषणतानिर्वाहकत्वम। पवद्ोभयन्रापि वस्तुतश्रन्द्राभेद एव संसर्गः। वाक्ये प्रतियोगित्वमुखः, समासे खनुयोगित्वमुखः, विशेष- णविशेष्यभाघवैचित्यात्। 'सुखधन्द्रः' इत्यन्र सुखाभेद्षस्तु न ससर्गः, चन्द्ररूपकानापत्ते: विशेषणप्रतियोगिक एवाभेदसंसर्ग, न तु तदनुयोगिक इति दुराग्रहस्य निर्मुछरवाद। 1 एवक्र सौजन्यनिष्ठाभेदप्रतियोगिनी चन्द्रिकेति भङ्गधन्तरेण सौजन्ये चन्द्रिकातादा- स्भ्यसिद्धौ राजि चन्द्राभेदसिद्धेर्न परम्परितरूपकेऽनुपपततिरित्याहुः। अन्र विशेशरचरणा :- 'नीलघट' इति कर्मधारये नीलप्रकारकाभेदसंसर्गकघटविशेष्य

Page 275

रूपकनिरूपण प्रकर णम

प्रतियोगिकोअभेशो न तु विशेप्यप्रतियोगिक इर्यस्य मसर्गाभावमात्रे नियमनाव। पर्वतानुयोगिकरवेन वा वह्निप्रतियोगिकाचेनानुमितयादी तन्भास्नात, दुरप्रद्माग्रत्यय दुराम्रहर्वास्। भासमानवेशिष्ट्यप्रतियोगिरं विशेषणश्वम्, तादशर्थ शिष्ठयानुयोगिरं विशेष्यवमिति सिद्धान्तात, ससर्गम्य विशेषणानु्योगिकवम्पीकारे तद्विरोधाय। सौजन्यविशेष्यकाभेदसंसरगव चन्द्रि काप्रकार कशाव्ययोभामावेपि का द्दानि ? येनात्

मानमिति घेस्, न; तदुत्तरकालसौजन्यविशेष्य काभेदमंसर्गकचन्द्वि काप्रकारकयोष एव तत्सम्भवात्। अभेद्ज्ञानस्य शाव्दस्येव तससमर्थकत्वं घेव? तथ् किं सौजन्यनिष्टाभेद- प्रतियोगिनी चन्द्रिका इति बोधस्थाद्गीकारे सौजन्य प्रकार, अभेद: सम्यन्तचन्द्रिका विशेष्यम्। ततः सौजन्यामिस्ता चन्द्रिकेति घोध:, प्रतियोगित्वानुयोगित्वयो पदार्थमम- गोभयभिल्नरवेन शन्दयोधाविषयत्वात्। तथा चैकसिमसंशे तदनुसरपनपरत्र वेंपरीश्यमाध्र- यनू ए्जा नाड्गीकृरुते। तथा घ सौजन्याभिस्ना चन्द्रिकेति शाब्दबोधे जाते तदुप्तरभाविना सौजन्यनिष्ठाभेदप्रतियोगिनी चन्द्रिकेति मानसवोधेन राज्षि चन्द्राभेदारोपः समर्व्यत इत्यवश्यं वक्तव्यरवात् तदपेक्षया तदुत्तरभाविना चन्द्रिकाप्रतियोगिकामेदानुर्योगिसौजन्य मिति बोधेनैव तत्समर्थ्यताम्, अलमसोडट्टिकार्थकपनया भग्गयन्तरेणोक्त्तार्थयुद्धिकपनया चेति वदन्ति। अन्नापि चमरकारापकर्षका लिन्नभेदादयो दोपाः, यधा- 'वुद्धिरव्धिमह्दीपाल यशस्ते सुरनिन्नगा। फृतयर्तु शररकालचारुघन्दिरचन्द्रिका ।।' अम्र विषयविषथिणोलिंद्गाविवैरुप्यं ताद्रप्यवुद्धौ प्रतिफूलम्, कविसमयसिदूतया प. कर्षकाभावेन दोषत्वम् । 'सन्तापशान्तिकारित्वाद्वदनं तव चन्द्रमाः ॥' द्ृश्यादिषद् । इस्पलम्। 'रूपकालड्कृतिष्याक्या परानन्देन निर्मिता। टीकापां चित्रमीमांसासुधायामापि पूर्णताम्।'

सुषाख्यायां रूपकालन्कारप्रकरणं समाप्तम्।

Page 276

अथ परिणामनिरूपणम्

'आरोप्यमाणस्य प्रकृतोपयोगिटवे परिणांमः' इति तल्लक्षणमुक्तम्। (भारती) आरोप्यमाण अर्थात् उपमान का प्रकृत अर्थ में उपयोगी होना ही परिणाम अलद्वार है- (अलङ्कारसर्वस्व, रूय्यक)। विमर्श, सस्कृत के अलद्कार शास्त्र में परिणाम अलद्कार का विवेचन दो भिन्न पद्धतियों पर हुआ है। एक का आधार है-सामानाधिकरण्य अर्थात् जव विषयी और विषय दोनों में परस्पर सामानाधिकरण्य हो तब उक्त भेद होता है। इसमें विषयी और विपय में विभक्तिभेद नहीं पाया जाता है। दूसरा है वैयधिकरण्य-अर्थात् जब विषय और विषयी में विभक्तिमेद हो तो वहाँ दूसरा भेद होता है। इस अलकार की प्रथम उद्धावना का श्रेय राजानक रूय्यक को है। इसके स्वतत्र अस्तित्व का खण्डन नागेश ने काव्यप्रकाश की उद्द्योत नामक टीका में तथा विश्वेश्वरने अलङ्कारकौस्तुम नामक अथ में करने की चेष्टा की है। फिर भी वे इसके अलक्कारत्व को मिटानैं में असमर्थ ही रहे हैं। (सुधा) एवं रूपकालद्वारं व्याख्याय ततो यत्किज्जिद्विच्छ्वित्तिभेदेन भिननं परिणामालङ्कारं निरूपयितुमारभते-अथेति। रूपकानन्तरमित्यर्थः। तम्र परिणामस्य प्राचीनोंकं लक्षण- माह-आरोप्यमाणस्येति। उपमानस्योपयोगित्वं परिणाम इति तल्लक्षणम।

तत्र शङ्गयते- (चिन्न०)

यामि मनोवाक्कायैः शरणं करुणात्मर्क जगन्नाथ। जन्मजरामरणार्णवतरणतरण्य तवाडिघयुगम् ॥ निरीक्ष्य विद्युन्नयनैः पयोदो मुखं निशायामभिसारिकायाः । धारानिपातैः सह कि नु वान्तञ्चन्द्रोऽयमित्यार्ततरं ररासे॥ एतान्यवन्तीश्वरपारिजातजातानि तारापतिपाण्डुराणि। संप्रत्यहं पश्यत दिग्वघूनां यशःप्रसूनान्यवतसयामि॥ (भारती) अव यहा सन्देह करते हैं- 'हे जगन्नाथ, तुम करुणास्वरूप हो, तुम्हारे चरणकमल जन्म, जरा और मरण रूपी सागर से उद्धार करने वाले हैं। अनः मन, वचन और शरीर से मैं तुम्हारी शरण में हूँ।' (यहा रूपक आरोप्यमाण 'तरण्य' की प्रकृति में 'तरण' उपयोगिता के कारण अतिव्याप्ति है।) 'रात में अभिसारिका के मुख को विजली रूपी आँर्खों से देखकर बादल ने-'क्या यह धारा

Page 277

परिणामनिरूपणप्रकरणम् २२७

निपान के साथ वान्त करता हुआ चन्हमा है? क समरकर नार्तना से गिरगिर के (आारा किया)। (यहॉँ आरोष्यमाण नयन की निरकण उपरोिय से पयमे भ ी है )

उम यशरपी प्रसून से नस समय मे विव्धुओं की सजाना ह- से स ल हैे। (यहाँ आरोप्यनाण प्रमूनों के अवनमन रप प्रद्नकार्वोपनोनिय मे की सति रोयहै।) (सुधा) तम्र यथाश्ुतार्थकलक्षणे परिप्कारविशेष कर्तुमाशरपते-यामीशयादिनाः ह जगसाय, करुणारूपं जन्मादीनां तरणतत्ण्य तव चरणयुगं मनोवादायरह परण यामीध्यन्वय। अग्र रूपक आरोप्यमाणस्य तरण्यर्य प्रकृते तरण उपयोगितयातिध्यापति। निराध्यति। पयोदो मेघः रात्री विद्यन्नयनेरमिसारिकाया मुख निरीघय धारानिपातः महाय चन्दो वान्तः किन्तु इति अरनतर रवसे ध्वनि चकार। अम्रारोप्यमाणनयनश्य निरीषणोपयो-

युतानि पतानि यरशास्येव म्रसूनानि सम्परत्यहं दिग्वधूनामवतसयामि=अवतसरतपाणि करोमि, यूयं पश्यत इत्यन्यः। अत्रारोष्यमाणप्रसूनानामचतसनरूपप्रकृतवार्योपयोगगि- सयातिव्यासि:। (चित्र०) इति श्लोकेष्वारोप्यमाणाना तरण्य-तयन-प्रसूनाना तरण-निरीक्षणावत- सनरूपप्रकृतकार्योपयोगे सत्यायुक्तलक्षणकृतालद्वारसर्वस्वकारणैव र्पकमक्गी- कृतम् । आत्मानं रथिन विद्धि शरीर रथमेव तु। वुद्धि तु सारथि विद्धि मनः प्रग्रह्मेव च।। इत्यादिश्रुतावारोप्यमाणाना राथरथादीनाम् 'सोऽध्वनः पारमाम्नोति तद्विष्णोः परमं पदम्' इति वद्त्यमाणाघ्वरपारगमनरूपप्रकृत कार्योपयोगे सत्यपि भगवता बाटरायणेन 'नानुमानिकमायेकेपामिति चत् ? न. शरीररूपकवित्य- स्तगृहीतेर्दशयति च' इति शारीरकसृत्र रपकमङ्गीकृतम। अतरतेपु लक्षणग्या- व्याप्तिः। एवम्- भिन्नेपु रत्किरणैः किरणेष्विह्ेन्दो- रुचावचैरुपगतपु सहस्रसख्याम्। दोपापि नूनमहिमाशुरसी किलति व्याकोशकोकनदत्ता दघते नलिन्य:। इति भ्रान्तिमति, (भारती) इन नोनो ब्लोफों ने, तमय 'तण्य', 'नवन सप्रदूना केर7, नरार क"न एप म्रहन कार्य के उपयोग मे रहने प नी उक व दवाे से स्कर से सन

Page 278

२३८ चित्रमीमांसा

ही रूपक स्वीकृत है। इस प्रकार प्राकृत रूपक में अतिव्याप्ति की आशका कर वेद में भी अति- व्याप्ति की आशका करते हैं- 'आत्मान आर्थात् जीव रथी है और शरीर ही रथ है तथा इस शरीर रूपी रथ का सारथी बुद्धि है और मन को प्रग्रह जानो।' 'जीव रथी है' इत्यादि रूप श्रुति में, आरोप्यमाण रथी एव रथादियों का 'विष्णु के परमपद रूप मार्ग का पगरप्राप्तिरूप कार्य की उपयोगिता से' अतिव्याप्ति दोष होता है। कहते हैं यदि यहाँ 'नानुमानिकमप्येकेषाम्' इस नियम से उक्त उदाहरण में परिणाम अलद्वार ही मान लें तो-ऐसा- नहीं कह सकते-क्योंकि 'शरीररूपकविन्यस्तगृहीतेदशयति च' इस सूत्र में भगवान बादरायण ने स्वय रूपक को अङ्गीकृत किया है। ऐसा नहीं करने से उसकी विरोधापत्ति अर्थात् अतिव्याप्ति हो जाती। इसी प्रकार- 'इस रैवतक गिरि पर चन्द्रमा की किरण के अनेक प्रकार के रत्नों की किरणों से मिश्रित होने के कारण सहस्रों की सख्या में हो जाने पर कमलनिया निश्चय ही यह सूर्य है-ऐसा मानकर वे भी विकसित-कमल-पुष्पों वाली वन जाती हैं।' (यहाँ आरोप्यमाण रवि के विकासात्मक प्रकृति की उपयोगिता से अतिशयोक्ति में भ्रान्तिमान की जो व्यज्ना है-उसमें अतिव्याप्ति होगी।)

(सुधा) न चैतेषां परिणामत्वमेवास्तु, लक्षणकृता=अलक्कारसर्वस्वकृतैव तेषु रूपकप्रतिपाद- नात्। एवं प्राकृतिक रूपकेष्वतिष्याप्तिमापाङ्य वेदेऽप्यतिव्यापिमा शङ्कते-आत्मानमिति। आत्मानं जीवं रथिनम्, शरीरन्तु रथमेव, विद्वि =जानीहि, बुद्धिन्तु सारथिम्, मनः प्रग्रहमेव विद्धीत्यादिश्ुतावारोप्यमाणरथिरथादीनां विष्णुपरमपदरूपाध्वनः पारप्रासिरुप- कार्योपयोगितयाऽतिव्यासि:। न च तत्र परिणाम एवास्तु 'नानुमानिकमप्येकेषामिति चेत्, न, शरीररुपकविन्यस्तगृहीतेदशयति घ' इति सूत्रे भगवद्वादरायणाङ्गीकृतरूपक- स्येव तम्र सत्ात्। अन्यथा तद्विरोधापत्ेश्व। एवं रूपकेऽतिव्याप्तमाशडक्य, अन्या- लक्षारेष्घतिव्याप्तिराशंक्यते-एवमिति। भिन्नेष्विति । हुछ रैवतके, इन्दोः किरणेषु उदसश्ाघाञ्जक्ष तैयचावचेः, अनेकविधैरित्यर्थः। 'उ्वावचं नैकभेदम्' इस्यमरः। रत्नकिरणः भिन्नेषु मिश्रेषु, अत एव सहस्रसंख्यामुपगतेषु सर्सु नलिन्यः पध्मिन्यः 'नलं पद्मे नलं तृणम्' इति शाशतः। असौ प्रफाशमानोऽहिमांथुः सूर्यः, किलेति। रात्राषपि, 'दोषा च नकञ्व रजनौ' इत्यमरः। व्याकोशकोकनदतां विकचपप्मतां दधते। 'व्याकोचविकचसफुटाः' इत्यमरः। 'रक्तोत्पलं कोकनदम्' इत्यपि च । अन्न आ्रन्तिमत्यतिव्याप्तिः। आरोष्यमाणरचे- र्विका सार्मकप्र कृत कार्यो पयोगिरवाद्। (चिन्र०) विकसदमरनारीनेत्रनीलाब्जषण्डा- न्यधिवसति सदा यः संयमाधःकृतानि। न तु रुचिरकलापे वतते यो मयूरे

इत्यपह्नतौ, वितरतु स कुमारो ब्रह्मचर्यश्रियं वः॥

Page 279

परिणामनिरूपणप्रकरणम्

उरोभुवा कुम्भयुगेन जुम्भित नवोपहरेण वय कृनेन किम्। त्रपासरिद्दुर्गमपि प्रतीर्य मा नलम्य तन्वी हृदयं विवेश यन्।। इत्यतिशयोक्तो. (भारती) इस अपरुनि के उदाहर्ण म देयावनानों की आँखों का मवर्य ननम्द कायों का सपयो गिता से अतिन्याप्ति है। 'पृशाङ्गी वह दमयन्नी अपनी ललारपी नवी के उच्यतन प्राकार को पाकर ने न कें ददय में प्रविष्ट हो गयी, वह नुवावस्था से किचे गये समीप ने नये मुकाहार में तुक वथक नये उपहारों से चुत वक्ष थल पर उत्पम्न ग्तनरूप दो कलशों का प्रनाव या ज्या: निष्कप न कि-जिस प्रकार कोई कमजीर आदमी छाती पर (नीचे)दो घटों को रसकर उनयी साायना से नदी को पारकर अपनी अभीष्ट जगह पहुच जाता है। उसी प्रकार कमजर हेरवाली दुदली-पती दमयन्ती भी जवानी वे द्वारा प्रदत्त उवहारस्वर्प दिशात न्तनस्पी दो घहों की गवत से अपनी या नल की लज्नारूपी नदी की प्रसर धारा को पार कर अपनी रछिन जगा सगा नन के हृदय में प्रवेश कर गयी।' (यहों आरोप्यमाण कुचकुम्भ चुगल के नदीसषचरण कार्यरप उपयोगिता से अतिमयोि े अतिव्याप्ति दोप होता है।) (सुधा) विकसदिति। स कुमारः, वो ब्रह्मवर्यश्रियं वितरतु वदाश्वित्यर्थ। यः मयमेन अध. कृतानि विकसन्ति यान्यमरनारीणां नेत्रनीलाव्जानि, तेपां सण्दानि 'उपान्यध्याटनम' इस्याघारस्य कर्मत्वम्, सर्वदाधिवसति, यो रुचिर कलापे तोभनवह्द्द मयृने न तु वर्तने ।

उरोभुवेति। सा दमयन्ती, यद् यस्मात् कारणापलस्य हृदयं विवेद, कि हृग्वैंव ? अ्रपेव या सरिसदी, सैव दुर्गः कोट, ताप्रतीर्य तीरा, उरोभुषा ठरस्थेन दुम्भदवूयेन विजुम्भित पेष्टितम्। तरकारणं किम! ककशयुगविशेषणम-नवोपहारेण नूननोपायनेन वय-कृतेन योवननिवेदितेन। अम्रातिषायोक्तावतिनयाप्तिक्व। आरोप्यमाणकुम्भयुगम्य सरिक्षरणकार्योपयोगितासत्याद्। (चित्र०) चक्रभ्रमणकरत्वात् कुष्टिभिर्दूरवव्यमानत्वान्। श्रुत्यन्त खेलन त्वान्मशक त्वामेव माधव मन्चे।। इत्यनुमाने चातिव्याप्ति., भ्रान्तिमत्वहिमाशोविकास, अपहनावमरनारी- नेत्राणा ब्रह्मचर्यवितरणे, अतिशयोक्तां कुम्भयुगस्य सरित्तरणेः अनुमाने माघ- वस्य चक्रे भ्रमणे च प्रकृतकार्चोपयोगित्वात्। अपसुती 'तं बथा ययोपासते तथैव भवति इति तत्कतुन्यायेन सवमाधः कृतामरनारीनेत्राधिष्ठानम्य म्रहमचर्व वितरणोपयोगित्वम्।

Page 280

२४० चित्रमीमांसा

(भारती) 'चक्र की तरह घूमते रहने के कारण अथवा भ्रमितचन्द्र को वारण करने के कारण, कुत्सित दृष्टियों से दूर ही वर्जित रहने के कारण किवा वक्र दृष्टियों से वर्जित होने के कारण, कानों के समीप मनभनाने के कारण किवा कीडापिय होने के कारण-हे मशक, मैं तुम्हें ही माधन अर्थात् श्रीकृष्ण मानता हूं।' अनुमान अलकार के इस उदाहरण में अतिव्याप्ति है। पूर्वोदाहृत चन्द्रकिरणों में सूर्यविकास रूप मान्तिमान में, अमरनारियों के नेत्रों का ब्रह्मचर्य वितरण रूप अपहुति में, कुच-कुम्भ युगल का नदीसतरण रूप अतिशयोक्ति में, माधव का चक्रभ्रमण रूप अनुमान में, प्रकृतकार्योपयोगिता से अतिव्याप्ति दोष है। अपह्ुति अलङ्कार में 'उसकी जैसी जैसी उपासना करते है वह वैसा ही वैसा होता है' इस 'तत्क्रतु' न्याय से सयम के द्वारा तिरस्कृत अमरनारियों के नेत्राधिष्ठान का ब्रह्मचर्यवितरण उपयोगिता से अतिव्याप्ति है। (सुधा) चक्रेति। हे मशक ? चक्रभ्रमणकरत्वात्, कुदृष्टिभिः दूरतो वर्ज्यमानत्वास्, अत्यन्तखेलनत्वात्, स्वां माधवमेव मन्ये, इति श्लेषसंकीर्णेडनुमानालंकारेऽतिग्यापिः। आरोप्यमाणमाधवस्य चक्रभ्रमणादी प्रकृतकार्योपयोगित्वात्। अपह्वती प्रकृतोप- योगित्वमाशंकधोपनिषदन्यायेन निराकरोति-अपहताषिति । 'तं यथा यथोपासते स तथैव भवति' इति तस्क्रतुन्यायेन सयमाध:कृतामरनारीनेम्राधिष्ठानस्य ब्रह्मचर्यदानोप योगित्वान कापि शंकेति तद्भावः। (चिन्र०) सुहृदालापेनैव प्रणश्यति स्थास्तुरान्तरः क्लेशः। कान्तामुखचन्द्रेण हि शाम्यति रुचिरेण विरह्जस्तापः।। इति दृष्टान्तसङ्कीर्णंपरिणामे चाव्याप्तिः। अन्नारोप्यमाणस्योपमानकोट्यन्त- गताप्रकृत कार्योपयोगित्वादिति। अत्राहु :- आरोप्यमाणस्य प्रकृतात्मनोपयोगित्वे परिणाम इति लक्षणार्थः। न चैवं सत्युदाहृत रूप कादिष्वति व्याप्तिः, तेष्वारोप्यमाणानां तरण्यनयनप्रसूनसूर्या- दीनां स्वात्मनैव तरणनिरीक्षणावतसनकमलविकासनादिकार्योपयोगित्वसम्भवेन

परिणामेऽसंभवः, यत्रारोप्यमाणं किश्चित्कार्योपयोगित्वेन निबध्यमानं स्वतस्त- स्य तदुपयोगित्वासम्भवात् प्रकृतात्मतापत्तिमपेक्षते, तत्रैव परिणामाङ्गीकारात्; यथा 'प्रसन्नेन हगब्जेन वीक्षते मदिरेक्षणा' इति। अन्न त्वब्जस्य वीक्षणो- पयोगित्वं निबध्यते। मयूरव्यंसकादिसमासेनोत्तरपदार्थप्राधान्यात्। न चोपमितिसमासाश्रयणेन पूर्वपदार्थप्राधान्याद दश एव तदुपयोगित्व निबध्यत इत्यस्त्विति वाच्यम् ; प्रसन्नेनेति सामान्यधर्मप्रयोगात्, 'उपमितं व्याघ्रादिभिः सामान्याप्रयोगे' इति तद्प्रयोग एवोपमितसमासानुशासनात्। अब्जस्थ च

Page 281

परिणामनिरूपणप्रकरणम् २४१

वीक्षणोपयोगित्वं न रवात्मना सम्भवति। अनः प्रकुतहणात्मनापत्त्वपेक्षणान परिणामालद्वार:। (भारती) 'लदय बहर मे किपे हुए दु.नों का विनाश जैसे मिसा के सात पगनी परे मे ही तोना हं। उसी प्रकार विरहन्य तापों का शमन कानता केस्तर बुर के टर्शन म ो। यहा नारोप्यनाण चन्त्र का उपमानकोटि के अन्नर्गंत विरवास उपनग्न क नमशन कार्य की उपयोगिना से दृष्ान्त सकीर्ण परिणाम मे यापि है। (उन परियान का क स्हान दाण नही ह)। अप एस पर विचारने है कि उसी लक्षण का अर्थान्नर कर देने से पूवाक अनि याति और अव्याप्ति दोपों का निराकरण हो जाता है। क्यांकि आरोप्यनाण का यहाँ मदनात्ता से उपयोगिता में परिणाम है। अर्थात् यहाँ आरोप्यमाण का अर्थ सुआ प्रवृत कार्य की उपयागिता। भगर सद यह कहें कि पूर्वोक्त उदाहरणों म आरोप्यमाणों के तरण्य, नयन, प्रसून प सूर्वादियों का स्वनतनन्द से ही निरीक्षणादि कार्यों की उपयोगिता है, न कि वहाँ अ्वियुणान्मसापतति की नपेश्षा है। अन वहाँ आरोप्यमाणों की प्रकृतात्मा के द्वारा उपयोगित्वाभाव से अतित्याप्ति नही है। इनो प्रकार भ्रान्तिमान में भी आरोप्यमाण सूर्य का स्व-स्वरूप से ही उस कायों की उपयोगिता है, न कि प्रकृन चन्द्रात्मा से-अत यहाँ भी अतिव्यापति नही है। अगर आप यह कह कि उत्तायय तक की सभावना नहीं है। क्योंकि जहा आरोप्यमाण वुछ् कार्यों की उपयोगिता से नियन होती है और स्व-स्वरूप के द्वारा ही आरोष्यमाण का कार्यापयोगित्व होता है, नया जाी जभारना से प्रकृत आत्मनापत्ति की अपेक्षा रहती ह-वही परिणान अटदार होता है। जैस- "द नारक नेत्रोंवाली नायिका प्रसन्न नेव्रकमलों से देखती ह।" रस उठाारण ने 'मयृरव्यसकादयश्र' इस सूत्र से उत्तरपदार्थप्रधान समास के अम्युपगमन से 'अव्ज' की वीक्षप उपयोगिना नियन है। 'दुगन्जनिव' यहा 'प्रसन्नेन' इस सामान्य धर्मप्रयोग की वाधयाता के कारण चिन्नी भी प्रकार पूर्वपदार्थप्रधान समास के प्राप्ति की सभावना नहीं की जा सकनी। निष्कर्पसप-ग पा सकगें ह कि इसमें दृग (विषय) पर कमल का आरोप है। पर देसना करिया कमल वाता म्भव नही ह। अत देसना कार्य में उपयोगी होने के लिए कमल को नेव के न्य जगेदन्व यापित करना पटा। तन वह इस कार्य में पू्णे समर्थ हुआ है। 'उपमितं व्याघ्राविभि सामान्याप्रयोंगे' इ सू से और समासानुणासन से भी उसका यहाँ अभाव ही है। क्योंकि उनपर्दा प्रान्ता मे स्वीऊृत अग्ज की वीक्षण उपयोगिता अपने से नभव नहीं ह। अन प्रनुनदटगात्मा के मग हे्व रुप्यापेक्षण मे परिणामानकार ह। (सुधा)

सुदमालापेनेति। स्थास्नुरान्तर पलेश हृदयष्ले सुहदूनेनेन प्रणस्यनि। विरहन- स्ताप. रविरेण मनोहरेण दान्तामुमचन्द्रेण शास्पति। धमारोप्यमाणधन्द्रस्योपमान- फोटरन्र्गत विम् छतापोपशमनसपामक तकार्यपयोगितया रशन्तमक्षीण परिणाने धापया सेख। तम्मान्नेद सम्यग एरण नम्यति प्तिपाथ मगाधने-जगाहरिति। सस्यष

१६ चित्र०

Page 282

२४२ चित्रमीमांसा आरोप्यमाणस्य प्रकृतात्मनोपयोगित्वे परिणामः। ननु प्रकृतकार्योपयोगिर्वमारोप्य- माणस्येत्यर्थः । पूर्योक्कातिव्यापिं परिहरति-न चैवमिति। तेषूदाहृतेष्वित्यर्थः। आरो- घ्यसाणानां तरण्यनयनप्रसूनसूर्यादीनां स्वस्वरूपेणेव निरीक्षणादिकार्य्योपयोगित्वम्, स्ातिष्यप्षिः। एवं आ्रन्तिसत्यप्यारोप्यमाणसूर्यस्थ स्वस्वरपेणेय तत्कार्योपयोगितवम्,न तु प्रकृतवनद्वातसनेति नातिव्यापिः। न चो कार्थकलक्षणस्यासम्भवः, यश्रारोप्यसाणं किञ्ि- र्कार्योपयोगितया निषद्धं स्वत्वरूपेणारोप्यमाणस्थ कार्योपयोगित्वासम्सवातू प्रकृतात्म तापत्तिमपेप्षते तन्नैव परिणामः । यथा हगब्जेनेतयन्र 'मयूर्यंसकायुयक्ष' इति सूत्रेणोत्तर- पदार्थप्रधानसमासाभ्युपगमेनाब्जस्य वीक्षणोपयोगित्वं निबद्म् । दगब्जमिवेति पूर्व- पदार्थप्रधानसमासस्य तु न प्राप्तिः सम्भाव्यते, प्रसन्नेनेति सामान्यधमंप्रयोगस्य बाधकर्वाध्। 'उपमितं व्याघ्रादिभिः सामान्याप्रयोगे' इति सूत्रेण तदभाव एव समासा- जुशासनाथ। उत्तरपदार्थप्रधानतया स्वीकृताब्जस्य वीक्षणोपयोगित्वं न स्वात्मना सम्भवति। अतः प्रकृतदगात्मना ऐक्यरूप्यापेवणास् परिणामालक्कारः। (चित्र०) नन्वेवं 'यामि मनोवाक्कायैः इत्यादिष्वपि तरणादिशब्दलक्षितजन्मनाशा- द्ुपयोगित्वं तरण्यादीनामङध्रियुगाद्यात्मनवेति तेष्वपि परिणामप्रसङ्गः । मैवम्; यस्य कार्यवाचिपदप्रथमप्रतीततन्सुख्यार्थनिवर्तनसामर्थ्य तदात्मनोपयोगित्वस्य ग्राह्यत्वात्। तरण्यादिपदमुख्यार्थनिवर्तनसामर्थ्यस्य च तरण्यादिष्वेव व्यवस्थि- तत्वात्। तस्मादुदाहृतेषु रूपकमेव। तेषु च नातिव्याप्तिरिवि। नन्वेवसुक्तातिव्याप्ति परिहारेऽपि- सोऽपूर्वो रसनाविपर्ययविधिस्तत्कर्णयोश्चापलं दृष्टिः सा सदविस्मृतस्वपरदिककिं भूयसोक्त्ेन वा। सर्व विस्मृतवानसि भ्रमर हे यद्वार णोऽद्याप्यसा- वन्तःशून्यकरोऽपि सेव्यत इति भ्रातः क एष ग्रह: ॥ इत्यप्रस्तुतप्रशंसायामतिव्याप्तिः । (भारती) इस तरह अर्थ करने पर भी फिर अतिव्याप्ति की आशक्का से कहते हैं कि 'यामि मनोवाक्कायैः' इत्यादि उदाहरण में तरणादि शब्द लक्षित जन्म और मरण आदि में उपयोगिता है। यहाँ अद्धि युगादि आत्मा। से ही तरण्यादि की सभावना में इन कथित उदाहरणों में परिणाम का प्रसग है अर्थात् अतिव्याप्ति है। इसका समाधान करते हैं कि ऐसा नही हो सकता। क्योंकि कार्यवाची पद से प्रथम प्रतीत अभिधागम्य जो उसका अर्थ है-उसके सम्पादन की शक्ति जिसकी है- उस आत्मा से उपयोगिता के द्वारा ही उक्त पद का ग्रहण है। तरणादि पद का जो सुख्य अर्थ है, उसके निवर्चन सामर्थ्य की तरण्यादि में व्यवस्था है न कि अघ्रचात्मा से। अत यहॉ किसी भी प्रकार की अतिव्याप्ति का प्रसङ्ग ही नहीं आता। क्योंकि इन उदाहरणों में सर्वत्र स्पष्टत रूपक के रुक्षण घटित है न कि परिणाम की कहीं प्राप्ति है।

Page 283

परिणामनिरूपणप्रकरणम् २४३

इस प्रकार कथित अतिव्याप्ति के परिहार करने पर भी-'अरे भ्रमर। क्या यह सब कुछ भूल गये कि जिसकी जिह्वा भी अपूर्व रूप से विपर्यस्त अर्थात् उल्टी-अग्नि के शाप से हाथी की जिक्ा है। दूसरे पक्ष में-जिसके कुछ बोलने का कोई भी ठिकाना नहीं है, जिसके कान सदा चचल रहा करते हैं। दूसरे पक्ष में-जो दूसरों के कुछ भी कहने पर अपना मन बदल डालता है, और वस्तुतः अधिक कुछ कहने सुनने से क्या। जिसकी ओखें निरन्तर मद-जल के गिरते रहने से अपने पराये का मार्ग नही देख पाती, दूसरे पक्ष में-जो मदावलेप के कारण अच्छे-वुरे की पहचान नहीं कर पाता। उसी अस्थि-मास रहित शुण्डादण्डवाले, दूसरे पक्ष में-निर्धन, वारण अर्थात् मत्तगजराज, दूसरे पक्ष में-सेवक के निरादर करने वाले स्वामी, की सेवा में अपने आप को खपाये जा रहे हो? यह सब तुम्हारा कैसा दुराग्रह है ?' अप्रस्तुतप्रशसा के इस उदाहरण में अतिव्याप्ति है। विमर्श-यहां गज और भ्रमर का वृतान्त,' जिसका यहाँ वर्णन हो रहा है अप्रस्तुत है और इसके सदृश निरादरकर्ता और भक्त स्वामी और सेवक का जो घृतान्त है, वह श्लेष की महिमा से आक्षिप्त है। कारिका में रसनाविपर्यय (जिह्वा के विपर्यस्त होने) तथा अन्त शून्यकरत्व (सूँड के भीतर से खोखले होने) को तो भ्रमर के लिए गजसेवा से सुह्द मोडने का हेतु कहा नहीं जा सकता (और इसलिए इस अश में वाच्य-गजभ्रमररूप अर्थ पर व्यशघ सेव्य-सेवक रूप अर्थ का आध्यारोप अपेक्षित है) किन्तु, 'कर्णचापल' (कानों का बार-बार फटफटाते रहना) तो इसका हेतु अवश्य है (जिससे इस अश में वाच्यार्थ पर व्यङ््यार्थ का आरोप आवश्यक नहीं है) अब मद के सम्वन्ध में तो यह ठीक ही है कि यह भ्रमर की गजसेवा का हेतु है (और ऐसा होने से यहाँ भी गजभ्रमण रूप वाच्यार्थ में सेव्य-सेवक रूप व्यङ्यार्थ का अध्यारोप उचित ही है (का० प्र०)।

एघसर्थे कृतेऽपि पुनरतिव्याप्तिमाशछ्ते-नन्वेषमिति। 'यामि मनोवाक्कायैः' इस्यादिषु (सुधा)

तरणादिशन्दुलक्षितजन्मनाशादावुपयोगिता, अबघ्रियुगाद्यात्मनैव तरण्यादीरना सम्भव- तीत्यतिध्याप्तिरेवेत्याशक्का। समाधते-मैवमिति। कार्यवाचिना पदेन प्रथमप्रसीतोऽमि धागम्यो यस्तस्यार्थ:, तत्सम्पादनसामर्थ्य यस्य, तदात्मनोपयोगित्वस्य तेन पदेन ग्राह्मत्वाद्। तरणादिपदस्य यो सुख्यार्थः, तव्षिवर्तनसामर्थ्यस्य तरण्यादिषु व्यवस्थि- तत्घाघ, न स्वळघ्रधात्मनेति नातिव्याप्िः। प्रकरणसुपसंहरति-तस्मादिति। उदाहृतेषु रूपकमेव, न तु परिणामपाप्तिरिति भाघः। दूषणान्तरमाशकक्य निराकतुंसुपयोगिर्व- मित्यस्थ परिष्का्र परतिपादयितुद्ध भूमिकामाह-नन्वेवमिति। सोऽपूर्व छति। हे भ्रातः, अमर, पुष ग्रह आग्रहः क ? एवं सर्व कि विस्मृतवानसि? सोडपूर्वो रसनाया जिह्लाया घिपरयंयो नाम घागस्थैयम, तस्य विधिः। अथ च रसना=शृङ्गला, तस्या चिपयंयो नाम वैलक्षण्येन वन्धनन, तस्य विधिः। अथ कर्णयोक्षापलं चस्चलता, राजपणे-असत्य- वाषश्रवणम्, अथ दृष्टि: सा; मद उन्माद:, तेन विस्मृता स्वद्षिक परदिग वा। राजपचे- स्वजनः परजनो वा। किं बहुना यद्यत्मादसी वारणोऽन्तःशून्यकरो निषेव्यते-हत्यप्रसतुत-

(चित्र०)

Page 284

२४४ चित्रमीमाँसा

तत्सेवात्यागलक्षणकार्योपयोगित्वात्। न हि यथा वारणस्य कर्णचापलं भ्रमरस्य तत्सेवात्यागे हेतु:, यथा तस्य रसनाविपर्ययः शून्यकरता च तत्र हेतुः मदः प्रत्युत तत्सेवायासेव हेतुरिति तस्य तत्त्यागहेतुत्वं दूरापास्तम् । एवमपि यत्तेषां त्यागहेतुत्वं निबध्यते तद्वारणादीनामप्रकृतानां दुष्प्रभुप्रभृतितादात्म्या- पत्त्यैव निर्वाह्यमिति। 'सुहदालापेनैव' इत्यत्रोदाहृतपरिणामेऽव्याप्तिश्च तद्वस्था। तत्र चन्द्रवन्मु- खस्याप्यप्रकृतत्वेन प्रकृतात्मनोपयोगित्वाभावात्। उच्यते; प्रकृतात्मनेत्यत्र प्रकृृतशब्दो विषयमात्रपर इति नोदाहृतपरिणामाव्याप्तिः। (भारती) यहाँ तत्र शब्द से अव्याप्ति के भेद वताते हैं। अप्रकृतवारण रसना विपर्यय आदि का प्रकृत दुष्प्रभु रसना विपर्यय की आत्मा से ही उस सेवा के त्यागलक्षणरूप कार्य की उपयोगिता है। वारण की कर्मचपलता, भ्रमर की गजसेवा त्याग में जैसे हेतु है, उसी प्रकार उसके रसनाविपर्यय- शून्य 'कर' की हेतुता नही है। मद का तो उल्टे उसकी सेवारूप हेतुत्व में त्यागरूप हेतुत्व का विलयन हो जाता है। इसी प्रकार रसनाविपर्ययादि का जो त्यागहेतुत्व निबन्धन है, उस अप्रकृत के वारणादि का दुष्प्रभु में तादात्म्यापत्ति का ही निर्वाह है। 'सुहादालापेन' यहाँ 'चन्द्रमा की तरह मुख का' भी अप्रकृतत्व से-प्रकृत आात्मा द्वारा उपयोगित्वाभाव से-अव्याप्ति है। इसी प्रकार अतिव्याप्ति आदि को दिखाकर 'प्रकृत आत्मना' इसका अर्थान्तरपरता से समाधान करते है कि 'प्रकृतात्मना' यहाँ प्रतकृतशब्द विषयमात्र परक है-इस व्याख्या से अतिव्याप्ति का निवारण हो जाता है। क्योंकि चन्द्रमा के विषयत्व का निर्वाधतव से यहाँ हेतु को देखना चाहिए।

(सुधा)

भ्रमरस्य गजसेवात्यागे यथा हेतुः, तथा तस्य रसनाविपर्ययशून्यकरत्वयोनं हेतुरम। मदस्य सु प्रत्युत तत्सेवायामेव हेतुत्वे त्यागहेतुत्वस्य दूरापास्ततवास्। एवमपि रसना- विपर्ययादीनां यत्यागहेतुत्वनिबन्धनम, तस्याप्राकृतानां वारणादीनां दुष्प्रभुतादाश्म्या पश्यैव निर्वाह्यरवात्। दोषान्तरमप्यन्यग्राह-'सुहृदालापेन' हत्यत्र चन्द्रवनमुखस्याप्य- प्रकृतरवेन प्रकृतात्मनोपयोगित्वाभावादव्याप्तिः। एवमतिव्याप्त्यादिकं दत्वा प्रकृतात्मनेत्य- स्यार्यान्तरपरतया समाघत्ते-उच्यते। प्रकृतात्मनेत्यत्र प्रकृतशब्दो विषयमान्रपर इति व्या्यानान्ाव्या सिरित्यर्थः। चन्द्रस्य विषयत्वस्य निर्षाधत्वादिति हेतुरत्र मृष्म्यः। (चिन्र०) उपयोगित्वं च प्रकृतागमकार्य प्रति विवक्षितम्। अप्रस्तुतप्रशंसोदाहरणे प्रकृतदुष्प्रभुसेवात्यागगमकवारणसेवात्यागं प्रत्युपयोगित्वमिति न तत्राति- व्याप्तिः। एवं च-

Page 285

परिणामनिरूपणप्रकरणम् २४५

आरोष्यमाणमारोपविषयात्मतया स्थितम्। प्रकृतस्योपयोगि स्यात्परिणाम उदाहृतः ॥ इति विद्यानाथलक्षणं प्रकृतस्येति पदस्य प्रकृतगमकस्येति व्याख्यानेन परिष्करणीयम् । (भारती) उक्त उदाहरण 'सोडपूर्व' इत्यादि में अतिव्याप्ति वारण के लिए 'उपयोगित्व की व्याख्या करते हुए कहते हैं कि प्रकृति के आगमक जो कार्य है, उसके अति उपयोगिता कहनी चाहिए। वहाँ तो दुष्ट प्रभु के सेवान्याग के गमक जो निवारण सेवा का त्याग है, उसके प्रति उपयोगिता है। यदि आप यहॉ प्रकृति आगमक कार्य की प्रतीति मानते हैं तो अतिव्याप्ति दोष मिट जाता है। तथा विषयी और विषय के आत्मत्व से प्रकृत आगमक कार्य की उपयोगिता- ही परिणाम है-ऐसी लक्षण की व्याख्या करने पर भी कोई दोष नहीं रह जाता है। प्रसङ्ग से प्राप्त विद्यानाथ के द्वारा कथित लक्षण का भी परिष्कार करते हुए 'एवञ्न' से व्याख्या करते हैं- "आरोप्यमाण (उपमान) का प्रकृत अर्थ में उपयोगी होना ही परिणाम है। अर्थात् जब आरोप्यमाण में प्रकृतार्थ सम्पादनक्षमता आ जाती है, तव वह उपयोगी बन जाता है। इस प्रकार परिणाम अलकार में भारोप्यमाण का कार्योपयोगित्व अपरिहार्य तत्त्व माना गया है।" इस प्रकार विद्यानाथ के लक्षण में 'प्रकृतकार्य' का-'प्रकृत आगमक कार्य' का-ऐसा परिष्कार करने पर अप्रस्तुत प्रशसा के उदाहरणों में कोई दोष नहीं रहता है। (सुधा) 'सोऽपूर्वः' 'इत्यत्राप्रस्तुतप्रशंसायामतिव्यासिं वारयति-उपयोगिर्वञ्चेति। प्रकृतस्या- गमकं यस् कार्यम्, तं प्रत्युपयोगिता वाच्या। तन्र तु दुष्प्रभुसेवात्यागस्य गमको यो वारणसेवात्यागः, तं प्रश्युपयोगित्वम्। ननु प्रक्ृतागमककार्य प्रतीति नातिव्याप्तिरित्यर्थः। तथा ध विषयिणो विषयात्मरवेन प्रककृतागमककतार्योपयोगित्वं परिणाम इति व्याख्याने न दोष इति भावः। प्रसक्गाद्विदयानाथोकलक्षणमपि परिष्कुर्वन् व्याचष्टे-एवं चेति। आरोप्य माणम्=विषयी, आरोपविषयात्मतया=विषयरूपतापत्या स्थितं प्रकृतकार्यस्य चेद्ुपयोगि स्याद, तम्र परिणाम, इति विद्यानाथलक्षणे प्रकृतकार्यस्येत्यस्य प्रकृताऽगमककार्यस्येति परिष्का रेऽप्रस्तुतप्रशंसोदाहरणेघु न दोष इति ध्येयम। (चिन्न०) अयं च परिणामो द्विविध :- सामानाधिकर ण्यवैयधिकरण्याभ्याम्। सामा- नाधिकरण्येन यथा-' तीर्त्वा भूतेशमौलिस्रजममरधुनीमात्मनासौ तृतीय- स्तस्मे सौमित्रिमैत्रीमयमुपकृतवानातरं नाविकाय। व्यामग्राह्यस्तनीभिः शबरयुवतिभिः कौतुकोदव्व्दक्षं कृच्छ्रादन्वीयमानः क्षणमचलमथो चित्रकूटं प्रतस्थे ।।

Page 286

२४६ चित्रमीमांसा

अत्रारो्यमाण आन्तरो विषयभूतसौमित्रिमैत्रीरूपतापत्या गुहोपकारलक्ष- णकार्योपयोगीति परिणामः । उभयोर्विभक्त्यैक्यात् सामानाधिकरण्यम्। वैयधिकरण्येन यथा- पुन्नागजालकर्हारान् काश्बी: केयूरदामभिः। कर्णिका: कर्णिकारैश्च विहर्तु विदघुर्वने।। अन्नारोप्यमाणा हारादयो विषयभूतपुन्नागजालकादिरूपतयैव वनक्रीडोप- योगिन इति परिणामः । विभक्तिभेदाद्वैयधिकरण्यम्। (भारती) परिणाम अलद्कार के दो भेद हैं-(१) सामानाधिकरण्य और (२) वैयधिकरण्य। प्रथम अर्थात सामानाधिकरण्य का उदाहरण देते हैं। जैसे- यह पद् अनर्घ राघव नाटक से उद्धृत है-"सीता और लक्षमण के साथ उस परम पराक्रमी राम ने भगवान शकर की मौलि मालारूप देवनदी गगा पारकर-उस गुह नामक नाविक के लिए पारिश्रमिक के रूप में लक्ष्मण की मैत्री देकर उसे उपकृत किया। इसके बाद वे व्याधाओं की युवती पत्नियों के द्वारा, जिन्होंने अपने-अपने वायें हाथ को थोडा तिरछा कर तथा दोनों हाथों के अन्तराल में अपने स्तनों को छिपाकर आश्चर्यचकित नेत्रों से देख रही थीं, उसे कष्टपूर्वक देखे जाते हुए चित्रकूट की ओर प्रस्थान किये।" यहाँ आरोप्यमाण आन्तर-आरोप के विषयभूत लक्षण की मैत्रीरूपता से गुह के उपकार रूप लक्षण कार्यं की उपयोगिता के कारण परिणामालद्कार है। एक ही विभक्ति के दोनों स्थान में उपस्थिति के कारण यहाँ सामानाधिकरण्य है। अब वैयधिकरण्य से उदाहरण देते हैं। जैसे- पुल्नाग जालकेर्हारान् काञ्जी: केयूरदाममिः। कर्णिका कर्णिकारैश् विहतु विदधुवने॥ यहाँ आरोप्यमाण हारादि का विषयभूत पुन्नागजालकादि आत्मा से वनक्रीडा की उपयोगिता रहने के कारण परिणाम अलक्वार है। यहाँ विभक्ति भेद से वैयधिकरण्य है। (सुधा) परिणामं विभजते-परिणाम इति। सामानाधिकरण्यवैयधिकरण्याभ्यां परिणाम- दैविष्यमित्यर्थः । आध्यमुदाहरति-सामानाधिकरण्येनेति। तीष्वेति। अनर्घंराघव नाटके पद्यम्। आत्मना तृतीय := सीतालचमणसहित इति यावस्। असौ प्रक्रान्तो रामः भूतेशस्य शम्मोरमो लिमालारूपाम् अमरधुनी गर्ङ्गां तीर्त्वा, तस्म नाविकाय गुहसंज्ञाथ सौमिश्रे- कंचमणस्य मैश्रीरूपमातरं तरणमूक्यमुपकृतवानू उपकाररूपतया दसतवान्। अथो अनन्तरं चित्रफूटं प्रति प्रतस्थे। कीदशो व्यामेन तिर्यक् प्रसारितवामभुजद्यान्तरालेन ग्राधी तावस्परिणाही स्तनौ यासां तथाभूतानां शधराणां व्याधानां युवतिभिः कौतुकेनोदअ्जन्ति विकसन्त्यपीणि यत्र क्रियायां कृष्छात् केशाद अन्वीयमान इत्यर्थः। असष लक्षणं गमयति-अन्नेति। आरोप्यमाण आन्तर आरोपविषयभूतसौमित्रिमैन्नीरूपतापध्या गुहोपकारलक्षणकार्योपयोगित्यात् सत्सत्वमित्यर्थः। सामानाधिकरण्यमाह-उभयोरिति विभवसयैम्यस्यैवान्र समानाधिकरणरवादित्यर्थः। द्वितीयमुदाहरति-यभेति। पुम्नागानां

Page 287

परिणामनिरूपणप्रकरणम् २४७

जालकैर्हारान् केसरदाममिः काञी:, कर्णिकारै: कर्णिका, ता वने विह्तु रचयन्ति स्मेत्यन्वयः। (चित्र०) इद च वैयधिकरण्यं रूपकेऽपि सम्भवति। यथा- तारानायकशेखराय जगदाधाराय धाराघर- च्छायाधारककन्धराय गिरिजासङ्गकश्पृङ्गारिणे। नद्या शेखरिणे दशा तिलकिने नारायणेनास्त्रिणे नागः ककणिने नगेन गृहिणे नाथाय सेयं नतिः। अत्र नदीदशोर्विषयोर्विभक्तिरारोव्यमाणयोः शेखरतिलकयोर्नस्ति। (भारती) यह वैयधिकरण्य रूपक में भी सभव है। जैसे- "चन्द्रमा जिनका शेखर (शिरोभूषण) है, जो जगत के आधार हैं, जिनकी गीवा मेध की कान्ति को धारण करती है, औौर पार्वती के साथ ही जिनका एक शृगार है-ऐसी गगा नदी द्वारा शिरोभूषण वाले मालनेत्र द्वारा तिलक वाले, नारायण द्वारा अस्त्रों वाले, सरपों द्वारा ककण वाले और पर्वत द्वारा घरवाले हमारे स्वामी भगवान शकर के लिए नमस्कार है।" यहाँ नदी और आँखरूपी विषयों की जो विभक्ति है, वह आरोप्यमाण शेखर और तिलक की विभक्ति नही है। मत यहाँ वयधिकरण्य से परिणाम मलकार है। (सुधा) आरोप्यमाणहारादीनां विषयमूतपुल्नलागजालकाध्यातमना विभक्िमेवास्त वैयधिकरण्येन परिणाम इत्यर्थः । प्रसङ्गादन्यत्राप्येतवतिदिश्वति-इदं चेति। वैयधिकरण्येन परिणामसत्वं रूपकेष्वस्तीति तदुदाहरति-तारानायकशेखरायेति। चन्द्रशेखराय, जगतामाश्रयाय, जलघरशोभाधारकग्रीवाय, पार्वतीसङ्गेनैकशृङ्गारिणे, गङ्या शेखरिणे, छक्षा=अग्निरूपनेत्रेण तिलकिने, भगवता नारायणेन अस्वते, सपैः कङकणिने, क्ेलासेन गृहवते; शिवाय सा इयं नतिरस्तु। अम्र नदीदशोर्विषययोय विभक्ति:, सा आरोप्यमाणशेखर तिलकयोर्नास्तीति वैयधिक्र्येन तत्सिद्धिरित्यथः। (चिन्र०) यथा वा- द्विर्भावः पुष्पकेतोर्विबुधविटपिनां पौनरुक्त्यं विकल्प- श्विन्तारत्नस्य वीप्सा तपनतनुभुवो वासवस्य द्विरुक्ति: । द्वैत देवस्य दैत्याधिपमथनकलाकेलिकारस्थ कुर्व- न्नानन्दं कोविदानां जगति विजयते श्रीनृसिहक्षितीन्द्रः । अन्र विषयस्य राज्ो विषयिणां पुष्पकेतुप्रभृतीनां च विभक्तिभेदः। (भारती) अथवा जैसे-"जो कामदेव की पुनरावृत्ति है, कल्पवृक्षों की पुनरुक्ति है-चिन्तामणि का दिकल्प

Page 288

२४८ चित्रमीमांसा

है, राजा कर्ण का वार-वार कथन है, इन्द्र की दुवारा उक्ति है और दैत्यराजों के नाश की लीला करने वाले भगवान विष्णु का द्वितीय रूप हैं-वे नृसिंह नरेश विद्वानों को आनन्द उपजाते हुए विश्व में उत्कर्ष प्राप्त कर रहे हैं।" यहाँ विषय रूप राजा का और विषयी स्वरूप पुष्पकेतु प्रमृतियों का विभक्ति-भेद है। विमर्श-दीक्षित जी के उपर्युक्त दोनों उद।हरणों पर पण्डितराज को आपत्ति है। उनका कहना है कि प्रथम पद्य में 'पार्वती के साथ जिनका एक शृगार है। उन भगवान शिव के विषय में कवि द्वारा नमस्कार उक्त है और यह शृगार शिरोभूषणरूप आभूषणों की अपेक्षा रखता है। अत यहाँ 'नही' का अरोप किये जाने वाले शेखर (शिरोभूपण) के रूप में ही उपयोग है, न कि नदी के रूप में। इसी तरह नेत्र का भी तिलक के रूप में ही उपयोग है। अत यहाँ तो शुद्ध रूपक ही होना चाहिए न कि परिणाम। यदि आप कहें 'परिणाम में उपमान उपमेय से अभिन्न होकर रहता है।' फलत इस पद्य में उपमेय वाचक नढी आदि शब्दों के आगे की तृतीया विभक्ति का अर्थ अमेद है। और उस अभेद के साथ 'शेख़रिणे' का अन्वय होता है। अत. 'नदी द्वारा शिर के भूषण' का अर्थ होगा 'नदी से अभिन्न भूषणवाले'-अर्थात् नदी रूपी शिर के भूषण वाले। ऐसी स्थिति में नदी का अभेद आभूषण में होता है न कि आभूषण का अभेद नदी में। फिर यहाँ परिणाम कसे नहीं? तो इसका उत्तर यह है-यद्यपि इस उदाहरण में उपमेय से अभिन्न उपमान (नदी रूप शिरोभूषण) की शब्दत प्रतीति होती है, तथापि प्रस्तुत विषय में उसका उपयोग उस रूप में नहीं होता, किन्तु- मानसिक रूप में प्रतीत 'शिरोभूषण रूपी नदी' के रूप में होना है। अत. दीक्षित जी का समाधान इस दृष्टि से समीचीन नहीं कहा जा सकता। वस्तुत :- पण्डितराज के इस खण्डन में भी कुछ अधिक या सबल सर्क प्रतीत नहीं होता। क्योंकि 'परिणाम' का अर्थ होता है परिणति या परिवर्तन। यह एक सादृश्यगर्भ अभेद- प्रधान आरोपमूलक अलक्कार है तथा इसका रूपक के साथ निकट का सम्बन्ध अवश्य है। यही कारण है कि पण्डितराज को इस उदाहरण में शुद्ध रूपक की भ्रान्ति हुई है। इसमें उपमान का कुछ उपयोग ही नहीं होता-उपमेय के साथ अभेदस्थापन के कारण उसमें उपयोगिता के तत्त्व का आधान हो जाता है और वह क्रियाकारित्व की शक्ति से सम्पन्न हो जाता है। तात्पर्य यह कि परिणाम अलकार में कवि की दृष्टि मूलत उपमेय और उसके कार्यकलाप में ही सीमित रहती है। उसकी दृष्टि उपमान की सवलता-दुर्वलता पर जाती ही नहीं-पर ज्यों ही उसे यह भान होता है कि उपमान में क्रियाकारित्व की क्षमता का अभाव है तो वह तत्क्षण उपभेय के साथ उसका अभेदत्व स्थापित कर उसमें कार्य करने की क्षमता भर देता है। फिर उपमेय के साथ असमर्य उपमान भी मिलकर पूर्ण हो जाता है-सभवत. इसी समिश्रण पर पण्डितराज का ध्यान न गया हो और इस पद्य को उन्होंने भावावेश में शुद्ध रूपक का उदाहरण के रूप में उद्घोषित कर दिया, जब कि बात इसके ठीक विपरीत है। क्योंकि इस उदाहरण में गंगा रूप उपमान और शिरोभूषण रूप उपमेय का अभेदत्व तो सर्वमान्य है ही, किन्तु नदी में आभूपित करने की क्षमता तव तक नहीं आती जब तक वह आभूषण के साथ अभेदत्व नहीं कर लेती। अत. यहाँ अभेदमूलक परिणाम अलद्कार ही है न कि शुद्धरूपक। जहाँ तक दूसरे उदाहरण का प्रश्न है-पण्डितराज उसमें भी आपत्ति प्रकट करते हैं। उनका कहना है कि इस पद्य में भी राजा नृसिंह के विषय में 'विद्ानों को आनन्द उत्पन्न करना'

Page 289

परिणामनिरूपणप्रकरणम् २४६

और 'विश्व में उत्कृष्ट होना' ये दो वातें कही गयी हैं। उनमें 'विद्वानों को आनंद उत्पन्न करना' भी जैसा आरोपित किये जाने वाले 'दूसरे कामदेव' आदि के रूप में वन सकता है वैसा केवल अपने रूप में नहीं वन सकता। राजा नृसिंह को देखकर जहाँ यह कहा जा रहा है कि 'अपर कामदेव को ही मैं देख रहा हूँ' वहाँ नेत्रानन्द का विषय काम ही है न कि राजा। इसी प्रकार यह कव्पवृक्ष या चिन्तामणि है दूसरा दानी कर्ण या धरती का इन्द्र ही है अर्थात् यह मेरी दरिद्रता हर लेगा। यह् हरि है-मुझे मुक्ति देगा। इस कथन से उत्पन्न आनन्द का मूल भी कल्पवृक्षादि ही है न कि राजा। अत यहाँ उपमान का उपयोग उपमेय के रूप में नहीं है। उपमान के रूप में ही उपयोग की अवस्थिति के कारण यहाँ भी परिणाम का अभाव ही है। किन्तु-पण्डितराज को यहाँ भी भ्रम ही रहा। क्योंकि रूपक और परिणाम में विषयी और विषय के भिन्न उद्दश्य रहते हैं। रूपक में विषयी विषय को अपने रूप में निगीर्ण कर लेता है और विषय अपने स्वरूप से च्युत हो जाता है। पर परिणाम में विषयी का उपयोग होता है और वह विषय के साहचर्य से ही क्रिया करने में उपयोगी होता है। अत परिणाम का मुख्य परिचय यही है कि इसमें 'आरोप्यमाण विषयी का उपयोग होता है। रूपक में आरोष्यमाण उपरजक होता है क्योंकि वहाँ उसके रूपमात्र का ही समारोप है। किन्तु, परिणाम में व्यवहार समारोप होने के कारण वह प्रकृत से अन्वित हो जाता है। तात्पर्य यह कि परिणाम में निष्क्रिय उपमान उपमेय के साथ मिलकर ही प्रकृत कार्योपयोगी होता है। फलत 'द्विर्भावः पुष्पकेतोः' इस पद्य में आरोप्यमाण का आरोप विषय के रूप में परिणत होकर क्रियाकारित्व से सम्पन्न है। यहाँ राजा नृसिंह के स्वरूप से ही उपयोगी उत्कर्ष की सिद्धि में विषय का तादात्म्य की अपेक्षा से आवश्यकता-परिणाम की परिपुष्टि है न कि रूपक की।

(सुधा) उदाहरणान्तरमाह-द्विर्भाव इति। कामस्य द्विघाभवनम्, देवकषषपवृक्षार्णा पौनरुक्यं पुनरुक्तिभावः, चिन्तारतस्य चिन्तामणेर्विकल्पो भेदरूपः, धर्मराजस्य कर्णस्य घा वीप्सा, दन्द्रस्य द्विरक्कि, दैश्याधिपनाशकलाक्रीडायाः कतुहैँरेः जगति कोविदानां चतुराणामानन्दं कुचन् श्रीनृसिंहनामा महीन्द्रो विजयते सर्वोत्कर्षेण वतते। अम्र विषयस्य दाजञो विषयिणां कामादीनां च विभक्किभेद्दातू तत्सन्वमित्यर्थः। अम्न गङ्गाधरकृत :- गिरजासङ्रकमह्गारिणि शिवे कविकर्तृकनतेः प्रक्रान्तर्वम्। शङ्गातित्वे शेखराषि््रिभूषणा- पेक्षायां नद्यादेः शेखरादिरूपतयवोपयोगाद्नुपयमेव शुद्धम, न तु परिणाम इति। न च विषयाभिन्नतया विषयिणोऽवस्थान रूपपरिणा मस्य विषयवाचकनद्या दिप दोत्तर वर्तितृतीयाया अभेदार्थंकतया शेखरादेस्तदन्वयित्वात् सत्वमैवेति वाच्यम्, विषयाभिप्नरवेन विषयिणो मानेऽपि विषयतादास्म्येन तस्य प्रकृतानुपयोगात्। एवम, 'द्विर्भावः पुष्पकेतोः' इत्यन्र कोविदानन्दजननजगदुर्कर्षयो: कथनीयरवम्। तम्र नृसिंहनृपस्य कोविदाननदजनकत्वम- प्यारोप्यमाणद्वितीयमन्मथादिताद्रृप्येण यथा सम्भवति, न तथा केवलरूपेणेति विषयिण: स्वात्मनैवोपयोग:, न तु विषयात्मना, अतस्तन्रापि न परिणामसम्भव इत्याहुः । तन्मन्दम। 'नारायणेनास्त्रिणे' इत्यंशस्य शद्धारितायामनुपयोगाव, तद्षुपादानवलेन प्रकृते शङ्गारित्वस्य नमस्कार्यत्वं प्रत्यप्रयोजकत्वाद। अन्यथा क्रमभङ्गापतेः, असस्य नारायणतादास््यापर्येव तद्गुणीभावेन शिवोत्कर्षपर्यवसानात् केवलशेखरदेव्न्यत्रापि सव्वेन नदादितादात्यापत्येव प्रकृतो्कर्षावगमात्तदावश्यकः। एवं द्वितीयेऽपि मन्मथादि-

Page 290

२५० चित्रमीमांसा

प्रत्येकसाध्यतप्तस्कार्येषु एकस्यैध राज्ो हेतुस्वेन चमरकारातिशयसमुह्लासाठ, राज स्वरूपेणैव तन्रोपयोगादेवोत्कर्पसिद्ौ विषयतादात्म्यापेवाया आवश्यकत्वे परिणामस्यैव योग्यत्वादिति दिक। (चित्र०) अथ परिणामस्य व्यङ्गचतायां किमुदाहरणम् ? नरसिंह धरानाथ के वयं तव वर्णने। अपि राजानमाक्रम्य यशो यस्य विज्ञुम्भते॥ इति विद्याधरेणोदाहृतम्। (भारती) विदाधर द्वारा कथित उदाहरण के खण्डनक्रम में कहते हैं कि परिणाम की व्यङ्थता में क्या उदाहरण है? 'हे भूमिपति नरसिंह। हम तुम्हारे वर्णन करने वाले कौन है? जिसका यश राजा ( वस्तुतः इन्द्र) का भी आाक्रमण करके विजंभित हो रहा है।' इसे विद्याघर ने उदाहृत किया है। (सुधा) अन्न परिणामस्य व्यङ्मयतायामुदाहरणं वरं प्राचीनोंक्कं तषुदाहरणं सण्डयितुमुपन्य- स्यति-अयेति। पूर्व विद्याघरो कमुदाहरणं खण्डयति-नरसिहेति। हे नरसिंह घरानाथ, तब वणने वयं के, यस्य यशो राजानमाक्र्यापि विजम्भत इत्यन्वयः । (चिन्न०) अत्र राजपदेन चन्द्रे विषये निर्दिष्टे तन्नारोप्यमाणस्य नृपस्याक्रमणरूप- कार्योपयोगिन: प्रतीतेः परिणामो व्यज्यत इति, तद्युक्तम्। अत्र ह्यारोप्यमाणस्थ नृपस्य नृपात्मनैवाक्रमणोपयोगः, न चन्द्रात्मना। विद्याघरेणापि विषयिणः स्वरूपेण कार्यानुपयोगे तद्ुपयोगाय विषयिणे विषयात्मना परिणत्यपेक्षायामेव परिणामोऽङ्गीकृतः । (भारती) इस पद्य में 'राजा' पद से 'चन्द्रमा' रूपी उपमेय शब्दत. वर्णित है। उसमें आरोपित किये जाने वाले 'राजा' शब्द के द्वितीय अर्थ 'नरेश' की जो आक्रमण करने रूपी कार्य में उपयोगी है, प्रतीति हो रही है। अतः यहाँ परिणाम ध्वनित हो रहा है-विद्याघर की यह मान्यता उचित नहीं है। क्योंकि माक्रमण में चन्द्रमा पर आरोपित किये जाने वाले नरेश का उपमान के रूप में ही उपयोग है। चन्द्रमा अर्थात् उपमेय के रूप में नहीं। अत. यहाँ उपमेय के रूप में उपमान के परिणत होने के कारण परिणाम की ध्वनि नहीं मानी जा सकती। विमर्श-पण्डितराज जगन्नाथ ने दीक्षित जी की इस मान्यता का भी खण्ठन किया है। उनका कहना है कि यहाँ विजुम्भित होने का सर्थ कवि को केवल 'वृष्टता से फैलना' मात्र अभीष्ट नहीं है कि जिसके लिए यश द्वारा किये जाने वाले आक्रमण में 'नरेश्' का 'नरेश' के रूप में

Page 291

परिणामनिरूपणप्रकरणम् २५१

ही-आक्रमण क्रिया का कर्म होना रूपी-उपयोग हो, किन्तु 'विजम्भित होने' का अर्थ कवि को अभीष्ट है-सर्वाधिक निर्मलता रूपी गुण से युक्त होने रूपी विषय में अपने अन्य सजातीय के अभाव द्वारा सिद्ध होने वाला 'एक प्रकार का उत्कर्ष' और आक्रमण का अर्थ तो नीचा करना है ही। इसलिए ऐसे 'विजम्मित होने' में वही 'आक्रमण' क्रिया उपयुक्त हो सकती है, जिसका कर्म चन्द्रमा हो, न कि नरेश। क्योंकि यश का सजातीय चन्द्रमा है नरेश नहीं। अत. यद्यपि 'राजा' शब्द से उपमान रूप में 'नरेश' अर्थ ध्वनित होता है, फिर भी आक्रमण में उसका उपयोग चन्द्र रूप से ही होता है। अतः विद्याघर द्वारा उदाहृत यह पद्य परिणाम ध्वनि का सुन्दर निदर्शन है। इसमें दीक्षित जी का दोषदर्शन अनुचित ही है। किन्तु-पण्डितराज के इस समर्थन का खण्डन कर नागेश भट्ट ने अपना समर्यन दीक्षित जी के पक्ष में ही दिया है। इनका कहना है कि 'राजा' और 'विजमित होना' शब्द अनेकार्थक हैं और यहाँ प्रकरण आदि को लेकर शक्ति का सकोच किसी भी प्रकार नहीं है। अत. यहाँ प्रथम तो श्लेष ही मानना उचित है। यदि उस स्थिति में 'राजा' शब्द में द्विवचन होने की आपत्ति और उसके उत्तर में क्लिष्ट कल्पना दिखाई दे नो आरोप मान लीजिए। पर तब भी 'नरेश' अर्थ को ही उपमान और चन्द्र अर्थ को ही उपमेय माना जाय इसमें कोई प्रमाण नहीं। इसी अभिप्राय से अप्पय दीक्षित ने इस उदाहरण का खण्डन भी किया है। इतने पर भी यदि पण्डितराज का यह दावा हो कि कवि का तात्पर्य जिस प्रकृत कार्य में है, उसमें उस प्रकार मानना अनुपयोगी सिद्ध होगा-तो हम कह सकते हैं कि-'प्रकृत कार्य वही है' इसमें क्या प्रमाण है ? अत. विद्याघर जी के इस उदाहरण का दीक्षित जी ने उचित ही खण्डन किया है। (सुधा) अस्य व्यअय्ता प्रतिपाक्यति-अन्नेति। राजपदेन चन्द्रे विषये निर्दिष्टे सम्रारोप्यमाण- स्प नृपस्थाक्मणरूपकार्योपयोगिनः प्रतीत्या परिणासस्य व्यङ्ञयत्वमिति विद्याघर आह, तद्युकतम्-अत्र दारोप्यमाणश्य नृपस्य नृपात्मनैवाक्रमणस्योपयोगोऽम्रास्ति, न चन्द्रतादाल्यापत्या, यतस्तेनापि विषयेण स्वरूपेण कार्य प्रत्यनुपयोगात्। कार्योपयोगार्थ तस्य विषयरूपेण परिणतेरपेक्षायामेव तदङ्गीकारत्। (चिन्र०)

यदाह- तं परिणामं द्विविधं कथयन्त्यारोप्यमाणविषयतया। परिणमति यत्र विषयः प्रस्तुतकार्योपयोगाय ॥ विद्यानाथेन तूदाहृतम्- एष शाम्यति वस्तापो राजपादनिषेवया। कण्टकद्रुममूलेषु वासस्तं शमयेत् कथम्॥ इति। (भारती) विद्याघर जी ने जो कहा है- 'जहाँ विषयी आरोप विषय से प्रस्तुत कार्योपयोग के लिए परिणत्ि प्राप्त करता है, वही परिणाम है। बुद्धिमान लोग उसे दो प्रकार के कहते हैं।2

Page 292

२५२ चित्रमीमांसा विद्यानाथ के द्वारा प्रतिपादित ध्वनि के उदाहरण का खण्डन करते हैं- 'तुम सबों का जो ताप राजा के चरणयुगल की सेवा से शान्त होता है, वह ताप इस कटीले पेड़ की जड में वास करने से कैसे शान्त होगा।' (सुधा) विद्याधरग्रन्थोकिि दर्शयति-यदाह इति। विद्याधर इति शेषः। यम्र विषयी आरोपविषयतया प्रस्सुतकार्योपयोगाय परिणति प्राप्नोति, स परिणामः। वुधास्तदुद्धिविधं कथयन्तीत्यन्वयः। विधयानाथप्रतिपादित ध्वनेरुदाहरणं खण्डयति-विद्यानाथेनेति। यो घस्तापो राजपादनिषेवया शाग्यति। कण्टकिद्रुममूलेपु एष वास: तं सन्तापं कथ शसये- दित्यन्वयः । (चित्र०) नास्त्यत्र प्रागुक्तदोषानुषङ्ग:, नृपचरणसेवायां प्रस्तुतायामारोप्यमाणायाः चन्द्रचरणसेवायाः नृपचरणसेवात्मतयैव तापशान्तिहेतुत्वात्, तापशब्दस्य सौरतापसाधारण्येऽपि प्रकृते राज्यभ्रंशजनिततापस्थेव विवक्षितत्वात्, तन्नि- वर्तने चन्द्रकिरणसेवायाः स्वतोऽसामर्थ्यात्। तथापि प्राचीनानां मत एवैत- दुदाहरणम्। ते हि 'राजपादनिषेवया' इत्यस्य प्रकरणनियन्त्रितत्वादप्रकृतायां चन्द्रकिरणसेवायां शब्दशक्तिमूलो व्यञ्जनाव्यापार इति मन्यन्ते। वस्तुतस्त्व- प्रकृतेऽप्यर्थे शब्दानामभिधैव व्यापार इत्यस्माभि: श्लेषप्रकरणे व्यवस्था- पयिष्यमाणत्वात्, इहापि 'राजपादनिपेवया' इत्यत्र चन्द्रकिरणसेवायामप्य- भिधव व्यापारः। अतः प्रस्तुताप्रस्तुतद्वयताद्रूव्यप्रतीतेः श्लेषभित्तिकातिशयो- क्त्यादिष्विव संसर्गविधयैव लाभात्तस्य प्रकृतकार्योपयोगितायास्तृतीयाया लाभाच्च न क्वापि व्यञ्जनाव्यापारापेक्षेति नेदं परिणामध्वनेरुदाहरणम्। इदं च दूषण पूर्वोदाहरणेऽपि तुल्यम्। (भारती) यहाँ पूर्वकथित दोषानुषङ्गता नहीं है। क्योंकि नृपचरण सेवा रूप प्रस्तुत में आरोप्यमाण चन्द्रचरणसेवा की नृपचरणसेवात्मा से ही तापशान्ति की हेतुता है। ताप शब्द का सौरताप साधारण्य प्रकृति में भी राजभ्रशजनित ताप की ही विवक्षा है। उसकी निवृत्ति में चन्द्रकिरण- सेवा के स्वत. सामर्थ्य का अभाव है। फिर भी प्राचीनों के मत में ही यह उदाहरण है। वे लोग 'राजपदनिषेधया' इसका प्रकरण नियन्त्रण से ही अप्रकृत चन्द्रकिरण की सेवा में शब्दशक्तिमूल व्यज्ना का व्यापार मानते हैं। लेकिन वस्तुतः प्रकृत अर्थ में भी शब्दों के अभिधा व्यापार ही हम लोग श्लेष प्रकरण में व्यवस्थापित करेंगे। यहाँ भी 'राजपादनिषेवया' इस पद में, चन्द्र- किरण सेवा में भी अभिधा व्यापार ही मानते हैं। इसलिए प्रस्तुत और अप्रस्तुत दोनों में ताद्रूप्यता की प्रतीति से श्लेषभित्तिक अतिशयोकत्यादि की तरह ससर्ग विधि से ही उसका लाभ है। इतना ही नहीं उसके प्रकृत कार्य की उपयोगिता की तृतीया विभक्ति से भी लाभ है। अतः इसमें कहीं भी व्य्जना व्यापार की अपेक्षा नहीं रहने के कारण व्यर्थ ही इसे परिणाम ध्वनि का उदाहरण कहा गया है। इस तरह के दोष पूर्व उदाहरण में भी समान रूप से ही हैं।

Page 293

परिणामनि रूपणप्रकरणम् २५३

(सुधा) अम्र पूर्वदूषणाभावमाह-नास्त्यन्नेति। तदेवाह-नृपचरणसेवायामिति। प्रस्तुतनृपघ- रणसेवायामारोप्यमाणचन्द्र किरणनिषेवाया राजचरणसेवारूपेणैव तापशान्तिहेतुत्वसत्वास, सौरतापसाधारणतापस्यान्न राजभ्रंशजनिते तस्मिन् वकुमिष्टत्वात, तत्तापशमने चन्द्रकिरण- निषेवाया: स्वस्वरूपेण सामर्थ्याभावाद। एतस्य व्यङ्गयोदाहरणस्य प्राचीनमतप्रतिपाधर्ता दशयति-तथापीति। तन्मतमाह-ते हीति। 'राजपद' इत्यादे: प्रकरणनियन्म्ितत्वेनाश्र- कृतचन्द्रकिरणसेवारूपार्थस्य शम्दशतमूलव्यअ्ञनाव्यापरविषयत्वेन व्यक््यतां प्राीना मन्यन्ते। अस्मन्मते नैवं सम्भवतीत्याह-वस्तुत इति। 'अप्रकृतेऽप्यर्थेडभिधाया एव प्रवृ- तिरित्यस्य श्लेषे व्यवस्थापयिष्यमाणत्वास्'। इदमुपलक्षणं वृत्िवार्तिके प्रतिपादितत्वादि- त्यर्थः। एवमिहापि राजकिरणनिषेवायामभिधैव व्यापारः। श्लेषाश्याभेदनिक्षयमूलातिश- योक्त्वादिषु ताद्रूप्यप्रतीतेः संसर्गिधया यथा लाभस्तन्रापि प्रस्तुताप्रस्तुतद्वयताद्रप्यप्रतीतेः संसर्गविधयैव लाभ इत्यर्थः। तृतीयाविभकत्या प्रकृतकार्योपयोगित्वस्यापि लाभाछ कुम्रापि विषये व्यअ्षनाव्यापारापेक्षेति व्यर्थमेवेदं परिणामध्यनेरुदाहरणम्। इद दूषण मन्यमतेऽप्यतिदिशति-इदं चेति। पूर्वोदाहरण इति। विद्याघरोक्कोदाहरणेऽपीत्यर्थः। (चिन्र०) इदं तूदाहरणम्- चिराद्विपहसे तापं चित्त चिन्तां परित्यज। नन्वस्ति शीतल: शौरेः पादाब्जनखचन्द्रमाः॥ अत्र चिरतापाते प्रति हरिपादाब्जनखचन्द्रसद्धावप्रदर्शनेन तमेव निषेवस्व, तन्निषेवणादयं तापः शान्तिमेष्यतीति परिणामो व्यज्यते। एव रूपकवैलक्षण्ये परिणामो निरूपितः । (भारती) इसका उदाहरण तो -- 'रे चित्त! तुम बहुत समय से सताप सह रहा है। अव तृ इसकी चिन्ता छोड दे। श्रीकृष्ण के चरण-कमल का नखरूपी शीतल चन्द्रमा निश्चय ही विद्यमान है। यहाँ बहुत समय से सताप-पीडित अपने चित्त के प्रति 'श्रीकृष्ण के चरणारविन्द का नख विद्यमान है' यह दिखाने से परिणाम ध्वनित होता है कि-'तू उसी का सेवन कर, उसके सेवन से ही तेरा ताप शान्त होगा।' विमर्श-दीक्षित जी के दिये गये-'परिणाम ध्वनि' के इस उदाहरण पर भी पण्डितराज को आपत्ति है। उन्होंने कहा है कि दीक्षित जी ने परिणाम के सम्बन्ध में स्वय लिखा है-'आरोप्य- माणस्य विषयात्मकरवेन प्रकृतकार्योपयोगे परिणामः'-इस लक्षण में केवल प्रस्तुत कार्य में उपयोग ही परिणाम का स्वरूप नहीं है-किन्तु, उपमान में रहने वाली प्रस्तुत कार्य की उपयोगिता का अवच्छेदक, अर्थात उपयोगिता को विलक्षण सिद्ध करने वाला, उपमेय का ताद्रूप्य ही परिणाम का स्वरूप है। निष्कर्ष यह कि परिणाम उपयोगिता का नाम नहीं, किन्तु उपयोगिता के अवच्छेदक ताद्रूप्य का नाम है। ऐसी स्थिति में इस पद में 'नखचन्द्र की विद्यमानता' दिखाने द्वारा 'उसके सेवन से

Page 294

२५४ चित्रमीमांसा

तेरा यह ताप शान्त हो जायगा' इस प्रकार उपमान का उपमेय के रूप से प्रस्तुत कार्य में उपयोगिता व्यङ्षय होने पर भी, उस उपयोगिता के अवच्छेदक रूप 'उपमान में उपमेय के ताद्रूप्य' के, जिसका नाम परिणाम है, वैयाकरणों के मत से वाक्य द्वारा वाच्य होने के कारण अथवा नैयायिकों के मत से शक्यार्थ के ससर्गरूप से भासित होने के कारण, यहाँ दीक्षित जी का परिणाम की व्यङ्गयता कहना सरवथा ही अनुचित है। घस्तुतः-परिणाम का अभिप्राय आरोप्यमाण अथवा उपमान की प्रकृत उपयोगिता है। रूपक में जो आरोप्यमाण अथवा उपमान हुआ करता है वह प्रकृतोपयोगी नही हुआ करता अपितु वह प्रकृतोपरअ्जक हुआ करता है किन्तु, परिणाम में आरोप्यमाण, प्रकृत का अङ्ग वनकर, प्रकृतोपयोगी हो जाया करता है। रसगगाधरकार ने आरोप्यमाण की प्रकृतोपयोगिता का तात्पर्य ही वैयाकरण एव नैयायिकों की व्याख्यापरक पृष्ठभूमि के आधार पर भिन्न लिया है। अन्यथा यहाँ परिणाम इसलिये है कि चिरसताप पीडित चित्त के प्रति 'चरणारविन्द-नख' की विद्यमानता दिखाने से स्पष्टत परिणाम ध्वनित होता है। क्योंकि 'इसी के सेवन से ताप की शान्ति होगी' यह व्यङ्गयार्थ आप से आप प्रतीत हो जाता है। अतः उपयोगिता का विश्लेषित अर्थ अवच्छेदकता के आधार पर अवस्थित कर दोष दिखाना क्विष्ट कल्पना ही प्रतीत होती है। नहीं तो दीक्षित जी का उक्त उदाहरण निर्दुष्ट है। (सुधा) एवं प्राचीनसुदाहरणं निराकृत्य स्वयमुदाहरणमाह-चिरादिति। हे चित्त, तवं चिराव् सन्तापं विषहसे, इदानीं चिन्तां परित्यन, शौरेः श्रीकृष्णस्य शीतलः पादान्जनखचन्द्रमाः अस्त्येवेश्यन्घयः। अम्र उद्यमवताश्यति-अन्नेति। चिरतापपीढितं प्रति हरिपादाब्ज- नखचन्द्रस्य सव्भावप्रदर्शनेन तमेव निषेवस्व। तत्सेवनादस्य तापस्य शान्तिमेष्यतीति परिणासो व्यज्यते। प्रकरणसुपसंहरति-एवमिति। (चित्र०) तत्न रूपके प्रकृतमप्रकृतरूपापन्नं सवति, परिणामे त्वप्रकृतं प्रकृतरूपा- पन्नं भवतीति वैलक्षण्ये स्थिते यत्तदुपजीव्य चक्रवर्तिनान्यथैव तयोवैंलक्षण्यं वर्णितम्। 'सुखचन्द्रः' इति रूपके मुखं महारजतरूपेण पटवदारोप्यमाण- चन्द्ररूपेण स्थगितस्वरूपं भवति। 'मुखचन्द्रेण तापः शाम्यति' इति परिणामे तु मुखमनाच्छादितस्वरूपमेव भवति। चन्द्रस्य मुखात्मनैव विरहतापशान्ति- हेतुत्वादिति। (भारती रूपक में प्रकृत का अप्रकृत के साथ तादात्म्य है। यहाँ तो अर्थात् परिणाम में अप्रकृत का प्रकृत के साथ तादात्म्य होता है-दोनों में इस विलक्षणता के रहते हुए विद्यानाथादि का उपजीव्य होकर चक्रवत्तीं महोदय ने व्यर्थ ही इन दोनों की विलक्षणता का वर्णन किया है। क्योंकि 'मुख- चन्द्र.' अर्थाव मुखरूपीचन्द्र इस रूपक में मुख महारजत रूप से पट का ही मुख का आरोप्यमाण चन्द्ररूप से स्थगित स्वरूप होता है। 'मुखचन्देण ताप शाम्यति' अर्थात मुखचन्द्र से ताप की

Page 295

परिणामनिरूपणप्रकरणम् २५५

शान्ति होती है। इस परिणाम अलक्कार में तो मुख का अनाच्छादित रूपता ही मुखरूप से ही चन्द्र का तापोपशमन में हेतुत्व है। (सुधा) रूपकाद्वैलक्षण्यं दर्शयति-तन्नेति। अयमर्थ :- रूपके प्रछ्ृतस्याप्रकृततादार्यसू। अन्न शवप्रकृतस्य प्रकृततादात््यमिति ततो विशेषः। वैलक्षण्यप्रतिपादने चक्रधर्तिमतं खप्टु यति-पदुपजीव्येति। विद्यानाथमुपजीव्येत्यर्थः । तन्मतानुवतिनेति यादत्। तयोः= रूपकपरिणामयोरित्यर्थः। अन्यथैव=प्रकारान्तरेणैव। प्रकारान्तरमेवाह-सुखं चन्द्र इति। रूपकालक्टारे महारजतरूपेण पटस्येव सुखस्यारोप्यमाणचन्द्ररूपेण स्थगितस्व- रूपत्वम । मुखचन्द्रेण ताप: शाम्यतीति परिणामालक्कारे तु मुखस्यानाण्छ्रादितरूपतैव मुख रूपेणेव चन्द्रस्य तापोपशमने हेतुरवास्। (चित्र०) उक्त्तं च- विषय्याकारमारोप्य विषयस्थगनं यथा। रूपकत्व तदा तत्र रञ्जनेन समन्वयः ॥ यदा तु विषयो रूपात् स्वस्मादप्रच्युतो भवेत्। उपयुक्त्ये तदाकार: परिणामस्तदा मतः ॥ इति। (भारती) उत्तक्न से चक्रवती के मत प्रदर्शित करते हैं-'जब दिषयी चन्द्रादि का आकार अपने में आरोप्य मुखादि रूप विषय का स्थगन अर्थात आच्छादन होता है तव वहाँ रखन द्वारा समान हेतुत्व से रूपक अलद्वार होता है।' जब अपने स्वरूप से अप्रच्युत ही विषयी कार्योपयोग के लिए विषयाकार अर्थात मुखाकार होता है तब वहाँ परिणाम अलकार होता है।' विमश-निष्कर्ष स्वरूप हम कह सकते हैं कि आरोप्यमाण या उपमान का तिरोधानरहित होकर आरोप विषय या उपमेय को अपने रग में उपरजन या रगना ही रूपक है और विषय का विषयी के रूप में उपरजन न होकर विषयी का विषय के रूप में परिणत होकर प्रकृतोपयोगी होने का वर्णन ही परिणाम अलकार है। (सुधा) चक्रवर्तिमतं दर्शयति-उक्तक्जेति। यदा विषयिणश्न्द्रादेशकार म्=स्वरूपं सवस्मि- स्ारोप्य विषयस्य=सुखादेः स्थगनमाच्छादनं भवेत्दा रक्षनेन तुश्यत्वात् हेतोः तन्न रूपकता भवेद। यदा तु स्वस्वरूपाप्रत्युतस्तदाकारविषय्याकारोऽपि कार्योपयोगार्थ विषय एव तत्तादास्ययुक्त एव भवेत्, तदा परिणाम इस्यन्वयः । पाठान्तरेतु स्वस्व- रूपादप्रच्युत एक विषयी कार्योपयोगाय विषयाकारो मुखाकारो भवेद, तन्न परिणाम हत्यन्वय: । (चित्र०) अत्रेदं विचारणीयम्-रूपके विषयस्य स्थगनं न तावत्तिरोहितरूपत्वम्, रजतभ्रमेण शुक्तिस्वरूपस्येवाहार्यारोपेण विषयस्य तिरोधानासंभवात्।

Page 296

२५६ चित्रमीमांसा

शारीरके च 'य एवासौ तपति तमुद्रीथमुपासीत' इत्यत्रोद्गीथस्यादित्यदृष्टि- विषयत्वाङ्गीकारे रजतदृष्टिविषयशुक्तिस्वरूपमिवोद्गीथक्रियास्वरूपं तिरोधीयेते- त्याशङ्चाहार्यदृष्टेरति रोधायकत्वस्योक्तत्वात्। नापि विषय्युपसर्जनत्वम्, उभय- त्राष्युत्तरपदार्थप्रधानस्य मयूरव्यंसकादिसमासस्याविशेषात्। अत एव विषयिविशेषितत्व स्थगनमित्यपि निरस्तम्, विषयिणो विशेष्यत्वात्। तस्मात् स्थगनास्थगनवैलक्षण्यवचो निरालम्बनमिति विषयात्मनोपयोगेनैव परिणा- मस्य रूपकाद्वैलक्षण्यं समर्थनीयमित्यलं विस्तरेण। इति चित्रमीमांसायां परिणामालङ्कारप्रकरणम्

(भारती) अब यहाँ विचार करते हैं-स्थगनत्व क्या है ? तिरोहितरूपत्व अथवा विषयी उपसर्जनत्व में भी विशेषितत्व। प्रथम अर्थ की स्वीकृति में रूपक में ही अतिव्याप्ति हो जाती है, शुक्ति रूप का रजत भ्रम से ही आहार्य चन्द्रादि के आरोप से मुखादि का तिरोधान असभव है। 'शारीर के च' इससे आहार्य आरोप के तिरोघायकत्व में वेदान्त भाष्य की सम्मति कहते हैं-'जो इस प्रकार उद्गीथ विद्या की उपासना में तपता है' यहाँ सूर्य की दृष्टिविषयता स्वीकार करने में उद्गीथ क्रिया रूप का-रजत दृष्टि विषय शुक्तिरूप का ही तिरोधान के सन्देह में आहार्य दृष्टि का तिरोधायकता नहीं है। इसका शारीरक भाष्य में प्रतिपादन है। दूसरे में, परिणाम के पृथक कथन में ही अनुपपत्ति है 'मयूरवशकादयश्च' इस सूत्र से उत्तर पदार्थ प्रधान रूप वृत्ति की दोनों जगह समानता है। विषयी का विशेष्यत्व से तृतीय पक्ष की भी असभवता ही है। अत एव चक्रवर्ती द्वारा प्रतिपादित स्थगन और अस्थगन रूपी विलक्षणता निरावलम्ब ही है। यह कहकर दीक्षित जी ने स्वय उन दोनों की विलक्षणता वतायी है। चन्द्रादि का मुखादि आत्मा से कार्य की उपयोगिता में परिणाम अलद्कार होता है और मुखांदि का चन्द्रादि आत्मा से कार्य की उपयोगिता में रूपक होता है। प्रामाणिकों के मत में इसी विलक्षणता का समर्थन है। इससे अधिक तो व्यर्थ ही है।

इति चित्रमीमासाया 'भारनी' हिन्दी व्याख्याया परिणामालङ्कारप्रकरण समाप्तम्।

(सुधा) तन्मतखण्डनप्रकारमाह-अन्नेदमिति। तत्रैवं विचार्यते-कि तावरस्थगनत्वम! तिरोहितरूपत्वं वा विषय्युपसर्जनतवेऽपि वा! आधे रूपकेऽ्व्यापि:, शुक्तिरूपस्य रजत- अ्रमेणेवाहार्यचन्द्रारोपेण मुखादेर्ति रोधानासम्भवाय्। आहार्यादोपस्य तिरोायतवे वेदान्तभाष्यस्य सम्मतिमाह-शारीरके चेति। य एवासौ तपतीत्यादयुद्वीथोपासनविद्यायां

Page 297

परिणामनिरूपणप्रकरणम् 2५७

शङ्टायामाहायंदष्टेरि्तिराधायकता नास्तीश्यस्य शारीरकभाष्ये प्रतिपादितर्वादिति तदर्थः। द्वितीये परिणामस्य पृथक्कथनानुपपत्तिः । 'मयूरष्यंसकादयश्र' इति सूत्रकृतोत्तरपदार्थ- प्रधानरूपवृत्तेरुभयन्न तुक्यत्वात्, विषयिणो विशेष्यत्वेन तृतीयपक्षस्याप्यसम्भवाघ्। उपसंहरति-तस्मादिति। चक्रवत्युक्तं स्थगनास्थगनवैलक्षपयं निरालम्बनसेवेति प्रकरणार्थः। स्वयं तयोवलक्षण्यमाह-विषयारमनेति। चन्द्रादेर्मुखाद्यातमना कार्योपयोगित्वे परिणामः। मुखादेश्रन्द्राद्यार्मना तरवे रूपकमित्यस्येव वैलक्षण्यस्य समर्थनीयत्वमित्येव प्रामाणिकानां सम्मतमिति बोध्यम्। रसगङ्गाघर फृतस्तु-विद्याघरो क्ध्वनेरुदाहरणम, विजम्भमाणस्य प्रागळभ्यमात्रत्व- कथने कवेर विवक्षया निरतिशयनैर्मक्ष्यगुणवत्तायां स्वसमानजातीयद्वितीयराहित्य रूपप्रौढि- विशेषस्य तस्य कथने कविविवक्षायां चन्द्रकर्मकाक्रमणस्येवोपयोगात्, नृपकर्मकस्य निषे- धान्त, विषयिताया व्यज्यमाननृपस्य चन्द्रात्मनेवाक्रमणस्योपयोगलर्वेन सम्यगेवेति। यदपि 'चिरादविषहसे' इत्यप्पय्य दीक्षितो कध्वन्युदाहर णमनूदयारोप्यमाणस्य चिषया त्मकतया प्रकृतकार्योंपयोगे परिणाम इरयत्र प्रकृतकार्योपयोगमान्रं न परिणामशरीरं किन्तु विषयिगतायाः प्रकृतकार्योपयोगिताया अवच्छेदकीभूतं विषयताद्प्यम। एवज्ात्र नखचन्द्रसद्भावप्रदशनेन तव्निषेवणादयं तघ तापशशान्तिमेष्यतीति प्रक्ृतकार्योपयोगिताया व्यर्यत्वेऽपि तदवच्छेषकीभूतविषयिणि विषयताद्रप्यरूपपरिणामस्य वाक्यवाच्यरवास् न सवथा व्यम्यत्वं वक्तुसुचितमिति दूषणमुक्त्वा, स्वथम-'इन्दुना परसौन्दर्यसिन्धुना बन्धुना बिना। ममायं विषमस्तापः केन वा शमयिष्यते ।' अत्र वक्तुर्विरहितया व्यज्यमानरमणीवदनाभिन्नरवेनेन्दुरभिप्रेतः, तेन रूपेणेव तस्य िरहसन्तापशमनहेतुत्वास मुखस्य चन्द्राभिश्नरवेन घोधे तेन विरहसापशमनरूपप्रकृतकार्यानुपपध्या चन्द्रस्थ विषयिणो सुखरूपविषयामिद्नत्वस्य व्यक्षयतायामेव सम्भवादरमदीयोदाहरणस्य निर्दोष- रम्। अयन् अर्थशक्तिमूलः । शब्दशक्तिमूलस्तु-'पान्थ मन्दमते कि वा सन्ताप- मनुविन्दसि। पयोधरं समाशास्व येन शान्तिमवाप्नुयाः ॥' अम्र शीघ्रं तापशमनहेतुत्वेनो- पस्थिते पक्चान्मन्दबोधनीयाविशेष्यकस्मरतापवत्ताविशिष्टबुद्धौ सत्यां सहदयस्य तादशता- पशामकरमणीस्तन रूपविषया द्रूष्यवुद्धिर्भवतीति वदन्ति। तम्न वदन्ति-विद्याधारोकोदाहरणे 'राजा प्रभी नृपे चन्द्रे' इति कोशादुभयोरर्थयो- र्वाच्यत्वेन ध्वन्युदाहरणस्य वक्तुमयोग्यत्वास। अन्यथा 'विद्ठन्मानस' इस्यादी वाच्यरूपक- स्वाङ्गीकारविरोधापततेश्ष। यदपि प्रफृतकार्योपयोगरूपपरिणाममनभ्युपगम्य सिषयिगतायाः प्रकृत कार्यो पयोगितावच्छेप कीभूत विषयताद्रप्यं परिणामशरीरमङ्गीकृत्य चिरादितयुदाहरणे दूषणदानम्, तदप्युकम; विशिष्टस्येव तथात्वे परिणामालक्काराम्युपगमेन विषयिणि विषयताद्रृप्यमात्रस्यापि परिणामशरीरत्वे मानाभावास्। यदपि तैरुदाहृतम्-इन्दुने- त्यादि। तदपि मन्दम्; तम्रातिशयोक्तेरद्गीकारातू। 'पान्थ मन्दमते' इति शब्दशकि मूलध्वनायुदाहृतम्, तद्षपि न, पयोधरपदवाध्ययो: मेघस्तनयोरभेदान्वयात् तम्र ध्वनि- सवानीचित्याख। परिणामे एवं शाष्दवोधप्रकार :- दगब्जेनेत्यम्र इगभिस्षमव्जमिति बोध:। 'वचःसुधाम्' इत्यत्र वचनाभिन्ना सुधेति बोधः। असमासस्थले तु आतराभिन्नं सौमिष्रि- मैन्रीमयमिति बोधः। रूपके तु द्दूनिष्ठाभेदप्रतियोगि अब्जमिति भेदः। अब्र रूपके प्रोक्का दोषा अन्नाष्युप्नेया इत्याह-अग्जमिति। १७ चित्र०

Page 298

२५६ चित्रमीमांसा

मम्मटभट्टानुयायिनस्तु-दगव्जेनेत्यग्रोपमैव। 'उपमितं व्याघ्ादिभिः सामान्याप्रयोगे' इति समासाङ्गीकारात्। न व प्रसववत्वरूपधर्मस्य तद्वाकत्वमिति वाच्यम्? प्रसग्नत्वा तिरिकरमणीयत्व रूपसामान्यधर्माप्रयोगस्य सत्वात्। न घ धर्मान्तरप्युक्तसाम्यस्या- विवनायामपि प्रससत्वरूपवर्मप्रयोगात् कथं समास इति वाच्यस्? उपसानिमितधर्मोंप- मितिसमासनिपेघस्य-'आप्यान्धि: क्वातिगम्भीरः क्वाहं मन्छमतिस्ततः। छात्राणामुप- हास्यत्वं यास्यामि पिछुनात्मनाम् ॥'इत्याद्यतुरोधेन स्वीकारात्। न हान्र साप्याष्धिरिति

विवश्या गाम्भीर्यस्य तत्मयोजकत्वमपहाय तत्सर्वेऽप्युपमितलसासान्युपगमादू। नच भाष्याब्घिरित्यत् परिणामाभ्युपगमेन भाष्यप्राधान्यसम्भवास कथं तदुपन्यासा, अतिरिक कक्ष्पनापेछया ताद्शार्थस्येव योग्यत्वात्; वचस्सुधामित्यम्राप्युपमितिसमाससर्वे बाधका- भावाद। 'वदनेन्दुना तन्वी स्मर्चापं विलुम्पति' इत्यत्र रूपकभेद एवं, इदो. स्वरूपेण स्मरतापानपवाघकतया वदनाभिन्नत्वेनावस्थानात्। विषयविषयितावच्छेदकान्यतर- रूपेण निश्चीयमानतदन्यतरकत्वस्येव रूपकत्वात। 'तद्रपकभेदो य उपमानोपमेययोः' इत्युकत्वाद। तस्मात् परिणामस्य पृथकत्वेन कथनमयुक्कमित्याहुः। धरानन्देन रचिता परिणामप्रकाशिनी। व्याख्यार्यां चिश्रमीमांसासुघायासाप पूर्णताम् ।।

दति वसिष्ठगोत्रीयमिश्ररामवळस्थात्मजेन रचितार्या चित्रमीमांसा व्याख्यायां सुधाभिधायां परिणामलङ्कारप्करणं समाप्तम्।

Page 299

अथ ससन्देहालङ्कार:

साम्यादप्रकृतार्थस्य या धीरनवधारणा। प्रकृतार्थाश्रया तज्ज्ञैः ससन्देहः स इष्यते। (भारती) अप्रकृत अर्थों की साम्यता से अनवधारित जो प्रकृत अर्थाश्रया बुद्धि है, उसे ही ससन्देह कहते हैं। अर्थात् सादृश्य के कारण होने वाले अप्रस्तुत अर्थ के अवधारणारहित बोध को ससन्देह अलक्कार कहते हैं।

चिम्श-अलंकार शास्त्र में इसके कई नाम मिलते हैं-सशय, सन्देह और ससन्देह। इसमें सशय का सादृश्यमूलक होना आवश्यक है। क्योंकि उपमेय में उपमान के संशय को ही तो सन्देह अलद्कार कहते हैं। यह सादृश्यगर्म अभेदप्रधान आरोपमूलक अर्थालद्कार है। कवि इसी सादृश्य के कारण एक ही वस्तु में अन्य अनेकों वस्तुओं के सशय का निवन्धन करता है। इसे अपनी प्रतिभा से प्रेरित कर कवि एक ही उपमेय में अनेकों उपमानों का सन्देह प्रकट करते हुए इस अलङ्कार की योजना करता है। उत्प्रेक्षा और सभावना भी एक तरह की सशयात्मक प्रतीति ही है। किन्तु, उत्प्रेक्षा में सभावना का एक पलडा अर्थात् उपमेय की उपमानरूपता प्रतीति में भारी रहा करता है। और 'ससन्देह' में उपमेय और उपमान की परस्पर तादात्म्य-प्रतीति के दोनों पलडे वराबर रहा करते हैं। अत. कहा गया है-प्रकृत और अप्रकृत में ऐक्य रूप की सदिग्ध प्रतीति कविप्रतिभोत्थित होने पर ही ससन्देहालद्वार होता है। (सुधा) अथेति। परिणामनिरूपणानन्तरमित्यर्थः। ससन्देह इति लचयनिर्देश:, सन्देहेन सह वर्तमानत्वादित्यथेः। एतस्येव सन्देह इति संज्ञान्तरम, चन्द्रालोकादी तथा दष्टत्वात्। तप्नक्षणं प्राधीनोंकं दर्शयति-साम्यादिति। अप्रकृतार्थस्य साम्यादनवधारणा या प्रकृतार्थाश्रया या बुद्धि:, ससन्देह इश्युच्यते। इति लक्षणान्वयः। (चित्न०) त्रिविधश्चायं ससन्देह :- शुद्धो निश्चयगर्भो निश्चयान्तञ्च। क्रमेण यथा- आनीय द्विषतां धनानि विपिने राजन्यचूडामणे तेष्वालोक्य विनिर्मलं हिमकलाखण्डं करण्डं पुनः। कि वादयं किमु पेषणं किमु धनं कि क्षेपणीयायुधं किं वा दैवतमित्यनिश्चितधियो मन्दाः पुलिन्दा जनाः॥।

Page 300

२६० चित्रमीमांसा

(भारती) प्राचीनोक्त यह ससन्देह तीन प्रकार के हैं-(१) शुद्ध, (२) निश्चयगर्भ और (३) निश्च- यान्न । क्रमश इनके ये उदाहरण हैं- 'हे राजाओं के चूडामणि, शत्रुओं को जीत कर जो धन आापके द्वारा लाये गये हैं, उनमें अत्यन्त शुभ्न हिमकलाखण्ड को और फिर करण्ड को देख कर मन्द वुद्धि पुलिन्दजन सदिग्ध स्थिति में कह रहे है-क्या यह वाद है? अथवा पेषण है ? किवा कोई धनविशेष है? अथवा फेक कर चलाने वाला कोई हथियार है? अथवा कोई दैवी वस्तु है ?' विमर्श-यहाँ शुद्ध ससन्दशालद्वार है। क्योंकि इसमें मध्य और अन्त में निश्चय का अभाव है। अप्रकृत अर्थ वाघादि की साम्यता से हिम करण्डादि आश्रय बुद्धि की अनवधारणा से यहाँ शुद्ध ससदेदालद्वार है। (सुधा) प्राचीनों कं ससन्देहविभागमाह-त्निविध इति। त्रैविष्यमेव दर्शयति-शद्ध इय्यादि। त्रीन् भेदानुदाहरिण्यन् शुद्धमुदाहरति-क्रमेण यथेति। आनीयेति। हे राजन्यचूडामणे, द्विपता शत्रणां धनान्यानीय तेषु धनेषु विनिर्मछं हिमकलाखण्डं पुनः करण्ठमालोक्य वार्घं, किम, पेपणं किसु, घनविशेष: किम्, प्ेपणीयस्यायुधं किम्, दैवतं कि वा ? इति अनिश्ि- तबुद्यो मन्दा: पुलिन्दाः जना: सन्तीश्यन्वयः। अत्र शुद्धः ससन्देहः, मध्यान्तयोर्निश्रया- भावादित्यर्थः। अप्रकृतार्थानां वाद्यादीनां साम्यात् हिमकरण्ठाद्याश्युद्धेरनवधारणी यत्वात् ससन्देह इति भाव:। (चित्र०) अयं मार्तण्डः किं स खलु तुरगैः सप्तभिरितः कृशानु: कि सर्वाः प्रसरति दिशो नैव नियतम्। कृतान्तः कि साक्षान्महिषवहनोऽसाविति चिरं समालोक्याजी त्वां विद्धति विकल्पान् प्रतिभटाः॥ (भारती) (किसी राजा को रण में देखकर उसके विषय में प्रतिपक्षियों की भावना का वर्णन है-) 'क्या यह सूर्य है? किन्तु वह तो सात घोडों के रथ से युक्त रहता है। तो क्या यह अझनि है ? किन्तु, आग तो सभी दिशाओं में नियमित रूप से प्रसरित नहीं होता। तो क्या यह साक्षात यम या काल तो नहीं है? पर यम तो भैसा पर चढता है। हे राजन् आपको रण में देखकर आपके वैरी इस प्रकार का सन्देह प्रकट करते हैं।' चिमर्श-इस श्लोक के मध्य में सूर्यादि का निश्चय अवश्य होता है, किन्तु पुन ज्ञात नहीं होता कि यह कौन व्यक्ति है। अत. यहाँ निश्चय मध्य सन्देह हुआ। यहाँ 'क्या यद सूर्य है या और कुछ१ यह है मशयात्मक प्रतीति का स्वरूप। प्रकृत अर्थोत् उपमेय राजा और सम उपमान सूर्य की इस सन्दिग्धतादात्म्य प्रतीति का जो मूल कारण है, वह स प्रताप की दुर्निरीक्ष्यता। इसी प्रकार क्या यह अगि है या अन्य कोई वस्तु? तथा यह यमरान है या औौर कोई ? इन सशयात्मक प्रतीतियों में जो मूलहेतु है वह है दुरावर्षता औौर

Page 301

ससन्देहनिरूपणप्रकरणम् २६१

सर्वसंहारिता। साथ ही साथ यहाँ भेद की उक्ति है। क्योंकि 'सात घोढ़ों के रथ का होना' इत्यादि उपमानभूत सूर्य की तो विशेषता है किन्तु, उपमेयभूत राजा की नहीं। (सुधा) निश्चयगभंमुदाहरति-अयमिति। अयं राजा, मार्तण्ड := रविः किम्! स रविः खलु सप्भिरश्वैरित:, कृष्ानुरसिः किम्! पुष क्ृशानुः सर्वा दिशो निश्ितं न प्रसरति, साक्षासू कृतान्तो यस: किम् ! अलौ यमस्तु महिषवाहन इति प्रतिभटा भानी युद्धे त्वां समालोक्य विकलपानू संशयान् विद्धति कुर्वन्तीत्यन्वयः। अन्र राजि 'अयं मार्तण्डो नवा' इति सन्देहे जाते सप्ततुरगगामित्वं रविधमं उक्तः, तेन रविसन्देहे निवृत्ेऽपि पुनरित्वादिना सन्देहासिश्चयगर्भता इति त्ावः । (चित्र०) कि तावत् सरसि सरोजमेतदारा- दाहोस्विन्मुखमवभासते तरुण्याः। संशय्य क्षणमिति निश्चकाय कश्चिदु बिब्बोकर्बकसहवासिनां परोक्षैः॥ इति वदन्ति। (भारती) 'सरोवर में दूर से यह सामने दिखाई पडने वाला पदार्थ क्या कमल है? अथवा किसी सुन्दरी युवती का मुख सुशोभित हो रहा है-क्षण भर के लिए ऐसा सन्देह करके किसी विलासी पुरुष ने वकुलों के सहवासी कमलों में अविदयमान विलासादि क्रियाओं के द्वारा-यह तो रमणी का मुख ही है'-ऐसा निश्चय किया। चिमर्श-यहाँ भावविशेष का इष्ट अर्थो की प्राप्ति में अभिमानगर्भ सम्भूत है। कमलों में उक्त गुणों की असम्भावना के कारण मुख में उसकी उपस्थिति से निश्चयान्त सन्देह है। क्योंकि प्रथम सारे सन्देहों का अन्त में निश्चय हो जाता है। अर्थात ये कमल नहीं रमणी के मुख ही है। (सुधा) निश्चयान्तमुदाहरति-किं तावदिति। माघे जलक्ीडावर्णनम-सरसि एतव् आरात तावरकमलं किम? भाहोस्विद् युषस्त्या मुखमषभासते ! इति क्षणं संशय्य घकसहपासिनां कमलानां परोक्षरप्रत्यक्षेः थिब्बोके: भावविशेषेः सुक्षमिति कश्ितिध्विकाय। अन्र बिब्वो- कस्य इषटानामर्थानां प्राप्तावभिमानगर्भसम्भूतः । 'स्त्रीणामनादरकृतो विब्बोको नास विज्ञेयः' इति भरतोकरूपस्य कमलेष्वसम्भवात् मुखे सर्वेन तष्विश्रयान्तत्वमिति भाषः। (चित्र०) अन्नेदं विचारणीयम्-साम्यादिति किमन्नाद्धेतोवसतीतिवत्फलत्वेन हेतुत्व- विक्षया पञ्चमी, उत स्वतो हेतुत्वविवक्षया। आद्येऽप्रकृतसाम्याभिव्यक्तिफल- कत्वमर्थः स्यात्।

Page 302

२६२ चित्रमीमांसा

तथा सति 'आनीय द्विषताम्' इत्याद्युदाहरणेऽव्याप्तिः। न हि तत्र हिम- करण्डस्य वाद्यादिसाहश्याभिव्यक्तौ कविसंरम्भ:, किन्तु द्विषत्पुरमीदशीमव- स्थामापन्नमिति राजः प्रतापातिशयाभिव्यक्तौ। (भारती) अव पूर्वोक्त ससन्देह के लक्षण पर विचार करते हैं कि लक्षण में दिये गये 'साम्यात' पद में जो पंचमी विभत्ति है उसमें 'अन्नाद्वेतोर्वसति' अर्थात् 'अन्न के कारण ही वह यहाँ रहता है' की तरह फलत्व से हेतुत्व की विवक्षा है अथवा स्वत हेतुत्व की विवक्षा है। यहाँ पूर्वपक्ष का खण्डन करते हुए कहते हैं कि यदि यहाँ फलत्व से हेतुत्व की विवक्षा में अप्रकृत साम्य की अभिव्यक्ति फलकत्व पञ्जमी का अर्थ मानते हैं तो अप्रकृत के साम्य की अभिव्यक्ति फलक पकृत अर्थ के आश्रयभृत अनवधारित युद्धि ही ससदेह है, ऐसा लक्षण का अर्थ होगा। और ऐसा अर्थ स्वीकृत करने पर 'अनीय द्विषता धनानि' इत्यादि पूर्वोक्त उदाहरण में प्रकृत बाधादि सादृश्य की अभिव्यक्ति में फलत्व के अभाव से शुद्ध ससन्देह में अतिव्याप्ति का प्रसद्ग है। क्योंकि इस शुद्ध ससन्देह के उदाहरण में हिमकरण्ड के साथ बाधादि सादृश्य के व्यक्तीकरण में कविकल्पना का अभाव है। किन्तु, शत्रुपुर की ऐसी शोचनीय अवस्था में राजा के प्रतापातिशय की अभिव्यक्ति में कविकल्पना का सरभ है। (सुधा) एवं तदुकं विभागं प्रतिपाद तदीयं पूर्वोकं छक्षणं खण्डयितुमारभते-अन्नेदमिति। अन्न लक्षणे इदं वश्यमाणं विचार्य दूषणम्। 'साम्यास' इति पञ्ञमी, फलतवेन हेतुत्ववि- वचया स्वतो हेतुत्वविवत्तया वा। फलत्वेन हेतुताप्रसिद्धौ दृष्टान्तमाह-अन्नाद्वेतोरिति। तत्र पूर्वपक्ष खण्डयति-आध्ये फलत्वेन हेतुत्वविवक्षायामित्यर्थः। अप्रकृतसाम्याभिव्यक्ति- फलत्व पज्ञम्यर्थ:। तथा च, अप्रकवृतसास्या भिष्य िफषिका प्रकृतार्थाश्रयाऽनवधारणा बुद्धि: ससन्देह इति लक्षणमित्यर्थः। तन्र दूषणमाह-तथ सतीति। 'आनीथ द्विपतां धनानि' हत्यादावप्रकृतवाद्यादिसा दृश्याभिव्यके फलत्वाभावेन शुद्धससन्देहेऽ्याप्तिप्रसस्गद्। तन्र हेतुमाह-नहीति। तम् शुद्धोदाहरणे हिमकरण्डस्य वाद्यादिसाहश्यस्य व्यक्कीकरणे कवेः संरम्भाभावाद। तव शत्रुपुरमीदृश्तीमवस्थामापपनमिति राजः प्रतापातिशयामिव्यककावेव कविसंरम्भाच।

(चिन्न०) द्वितीये साम्यादित्यनेन किमेकमेवाप्रकृतसाम्यं यावत्सन्देहकोट्युच्छित्ति- हेतुत्वेन विवक्षितम्, उत्तकमनेकं वेत्यनियम: ? आद्ये 'अयं मार्तण्डः किम्' इत्याद्ुदाहरणेऽव्याप्तिः। नहि तत्र 'कि लक्षमी रुर्वशी वेयं रम्भा वा मेनकाथ वा' इत्यत्र लक्ष्मीत्यादिविकल्पेष्वतिशयितसौ- न्दर्यसाम्यवदेकमेव साम्यमिह मार्तण्डत्वादिविकल्पेपु हेतुः, किन्तु प्रतापेन दुनिरीक्षन्वसाम्यं मार्तण्डत्वविकल्पे, दुराधर्पत्वसाम्य कृशानुत्वविकल्पे, क्षणेन सकलसंहर्त्वसाम्य कृतान्तविकल्पे च हेतुः।

Page 303

ससन्देहनिरूपणप्रकरणम् २६३

(भारती) द्वितीय से तात्पर्य है-स्वत. हेतुत्व की विवक्षा में जव तक सन्देहकोटिक विच्छित्तिहेतुत्व से एक का ही अप्रकृतसाम्य की विवक्षा है अथवा एक का अनेक के साथ अनियम की विवक्षा है। आधे से तात्पर्य है-प्रथम कोटि की स्वीकृति अर्थात् एक का ही अप्रकृत साम्य की विवक्षा पक्ष में 'अयन्् मार्तण्ठः किद' अर्थात्, क्या यह सूर्य है? इत्यादि पूर्व उदाहृत निश्चयगर्म के उदाहरण में अन्याप्ति दोष है। क्योंकि इस उदाहरण में सूर्यादि के विकव्पों में एक के सादृश्य- हेतुत्व की विवक्षा का सर्वथा अभाव है। इस पक्ष में असभव का वारण करते हुए कहते हैं- 'कि लक्ष्मीरुवशी वेयं रस्भा श मेनकाथ वा' अर्थात क्या यह लक्ष्मी है? अथवा उर्वशी, रम्भा या मेनका है ?' इस श्लोक में लक्ष्मीत्वादि विकल्पों में एक का ही अति सौन्दर्य के सादृश्य के कारण यहाँ असभव दोष नहीं है। एक के साम्य का अभाव प्रतिपादन करने के लिए 'किन्तु' से सन्देह करते हैं-अर्थात् 'अयम मार्तण्डः किम' यहाँ उपमेय राजा और उपमान सूर्य की इस संदिग्ध तादात्म्य की प्रवृत्ति का मूल हेतु है-प्रताप की दुर्निरीक्ष्यता। इसी प्रकार-क्या अनि है या अन्य कोई वस्तु ? इस सशयात्मक प्रतीति में जो मूल हतु है, वह है दुराधर्षता। यमराज है या और कोई ? इस संशयात्मक प्रतीति में मूल हेतु है सर्वसद्दारिता। फलत. यहाँ एक ही हेतुत्व के अभाव से अव्याप्ति दोष स्पष्ट हैं।

(सुधा) द्वितीये दूषणसाइ-द्वितीये इति । स्वतो हेतुत्वविवप्तायामित्यर्थः। यावत्सन्देह- कोट्युच्छि सिहेतुत्वेनैक स्येवाप्रफटृतसा्यस्य विवत्ता, उत, एकस्यानेकस्य वेत्यनियमस्य वा! आधे दूषणसाह-आधे इति। एकस्यवप्कृतसा्यस्य यावतसन्देहको्य्छनिहेतुरवेन विवक्णपक्ष इस्यर्थः। 'अयं मार्तण्ठः किस् !' इति निश्चयगर्सोदाहरणेडव्याप्ति:, मार्तण्ढत्वा- दिविकल्पेष्वेकस्य सास्पत्य हेतुत्वाभावाछ। अन्न पक्षेऽसस्सवं वारयति-किसिति। इयं लक्ष्मीर्चा, उघंशी वा; रस्भा वा, अथवा सेनका, इति श्रोके लघमीरमादिविकल्पेप्वेकस्थे पातिसौन्दर्यसाम्यस्य सत्वापलर्सव इति भावः। कस्य साश्यस्याभावं प्रतिपादयितु- मनेकसान्यसाह-किनस्विति। प्रतापेन दुर्निरीक्षत्वुराधर्षरलवणेन सकलसंहर्तृत्व- साम्यानां मार्तण्डत्वादिविकतपेपु हेतुत्वसरवेनेकस्य तस्याभावादव्याप्ते: स्फुटत्वाू। (चित्र०) द्वितीये 'इह नमय शिरः कलिङ्गवद्वा समरमुखे करहाटवद्धनुर्वा' इति विकल्पालङ्कारेऽतिव्याप्तिः । अत्र दिग्विजयप्रवृत्तेन बलवता राज्ञा समरे प्रसक्ते यथा कलिङ्गनृपतिः- समाक्रान्तो बलवता काहन्नभ्रंशिनी श्रियम्। श्रयेत वैतसीं वृत्ति न भौजङ्गीं कदाचन ।। इति नीतिमनुसृत्यासन्दिग्धं निजराज्यलक्ष्मीभ्रशपरिहारकामः शिरो नमि- तवान्, तथा वा शिरो नमय, यथा करहाटनपतिः 'जयेन लभ्यते लक्ष्मीर्मरणेन सुराङना इति नीतिमनुसृत्य युद्धकामो धनुर्नीमतवान्, तथा वा धनुर्नसयेति समयोचिताप्ोपदेशे तद्राजचरित दष्टान्तप्रापितानर्वारथतार्थधीसत्त्वात्।

Page 304

२६४ चित्रमीमांसा

न च तत्र श्लोके तादृग्धीनिबन्धनं नास्तीति नातिव्याप्तिरिति वाच्यम्; तन्निवन्धनस्यापि लक्षणान्तर्गत विवक्षायाम्- (भारती) दूसरे पक्ष में अर्थाद एक का अनेक के साथ अनियम के पक्ष में-इह नमय शिर: कलिम् वहा समरसुखे करहाटवदनुर्ा' अर्थात इस सग्राम में कलिङ्ग की तरह शिर झुकाओ, अथवा करहाट की तरह धनुप झुकाओ। यहाँ दिग्विजय के लिए प्रवृत्त वलशाली राजा की युद्ध प्रवृत्ति में जैसे कलिन राजा ने- 'वलवान् शत्रु से समाक्रान्त होने पर राजलक्ष्मी के विनाश को रोकने के लिए (कलिद्गराज ने) मौजङ्गी वृत्ति अर्थात् युद्ध करने की प्रवृत्ति छोडकर वैतसीवृत्ति (विपरीत हवा पाकर जैसे वेत झुक जाते हैं) उसी प्रकार शिर झुका कर सन्धि स्वीकृत की।' इस नीति के अनुसरण से नि.सदेह जिस प्रकार कलिङ्ग के राजा ने अपनी विनाशोन्मुख राज्यलक्ष्मी की रक्षा के लिए अपना शिर झुका लिया उसी प्रकार अपना शिर झुका लो अथवा जैसे-'जयेन लभ्यते लक्ष्मीमरणेन लुराऊना' अर्थात युद्ध में अगर विजयी हुआ तो राज्य- लक्ष्मी मिलेगी और अगर कहीं मारा गया तो स्वर्ग में देवाङना मिलेगी।' कटाहनृपति की इस नीति के अनुसार युद्धकामी वनकर रणाङण में धनुष की प्रत्यचा खींच कर उसे झुकाओ। इस प्रकार कालोचित हितकर उपदेश से कथित दोनों राजाओं के आाचरण से प्राप्त दृष्टान्त के आधार पर सदिग्ध बुद्धि में 'ससन्देह' अलक्वार के उक्त लक्षण के समन्वय हो जाने पर यहाँ स्पष्ट रूप से अतिव्याप्ति दोष है। यहाँ सन्देह करते हैं कि अनवस्थित बुद्धि में शब्दविषयत्व के अभाव से विकल्पालक्वार में अतित्याप्ति दोप नहीं हो सकता, तब इसका उत्तर देते हैं कि ऐसी स्थिति में 'अयं मार्तण्डः किम्?' इत्यादि उदाहरण में शव्दवाच्यत्व की उपस्थिति से लक्षणसमन्वय हो जाने पर भी शब्दनिवन्धन विवक्षा में गम्य ससन्देह अलद्वार में अतिन्याप्ति का प्रसद्न है। (सुधा) द्वितीयं दूषयति-द्वितीय इति। एफस्यानेफस्य वेत्यनियमपसे इत्पर्थः। विकसपालक्ारे- उतिष्याप्तिः। तब्ुदाहरणमाह-इहेति। इह संग्रामे कलिदवत् शिरो नमय, वा करहाटवद् धनुर्नमयेश्यन्वयः । अम्रातिव्याप्तिप्रकारं दर्शथितुं तल्पणसमन्वयं दर्शयति-अन्नेति। विग्विजयप्रवृत्तेन वलवता राज्ञा युद्धे प्रवृत्ते यथा कलिद्वराजो नीत्यनुसारेण निस्संशयं स्वीयराज्यलपमीनाश्ञनिवारणकामः शिरो नमितवान्। तह्सू शिरो नमय, वा करहाटनृपति- नीत्यन्तरानुसारेण युदकामो धनुनमपेति, काळोचितयथार्थवक्त्रुपदेशेन तद्राजाघरणरट्टा-

नीतिपद् व्याघऐटे-समाक्रान्त इति। बलवता शत्रुणा समाक्रान्तोऽभ्रंशिनी राज्यलचमी- मिच्छन् राजा वैतर्सी वृति श्रयेद। भौजहीं फदाचन नेत्यन्वयः। तथा जयेन सभमीर्लभ्पते, युद्धे मरणेन देवासना लम्यते इति परान्वयः । आशक्कते-अनवस्पितवुद्धेः शब्दविषय- स्वाभावेन विकवपालद्गारे नातिष्याप्तिरिति चेद, 'अयं मार्तण्डः किम! इस्यादी शब्द-

Page 305

ससन्देहनिरूपणप्रकरणम् २६४

(चित्र०) जीवनग्रहणे नम्रा गृहीत्वा पुनरुन्नताः। कि कनिष्ठाः किमु ज्येष्ठा घटीयन्त्रस्य दुर्जनाः।। इत्यादिषु सन्देहविषयनिबन्धनगम्यससन्देहालद्वारेष्वव्याप्तिप्रसङ्गात् - उत्प्रेक्षायां वाच्यगम्यभेदवदिहापि द्विविधोदाहरणदर्शनेन वाच्यगम्यभेदेन द्वैवि- ध्यस्याङ्गीकर्तव्यत्वात्। (भारती) गम्यससन्देह का उदाइरण देते हैं- 'जिस प्रकार जीवन ग्रहण काल में मनुष्य नीचे झुका रहता है। तथा जन्मग्रहण के बाद फिर उठता है एवं जलग्रहण करते समय भी मनुष्य अधोमुख रहता है औौर ग्रहण कर फिर ऊर्ध्वोन्सुख होता है। उसी प्रकार धनग्रहण करते समय भी मनुष्य नम्र रहता है औौर धन पा जाने के बाद उठ कर उसे धारण करता है-क्या कनिष्ठ और क्या ज्येष्ठ १ घटी यत्र की एक सूत्र से सम्बद्ध घटमाला की तरह दुर्जन भी उसी प्रकार होते हैं।' इत्यादि उदाहरण में सदह्विषय के निवन्धन से गम्य ससदेहालद्वारों में भी अव्याप्ति का प्रसङ्ग है। उसप्रेक्षा में वाच्यगम्य के भेद की तरद यहॉ ी दोनों प्रकार के उदाहरण देखने से वाच्यगम्य भेद के द्वारा दोनों प्रकार की स्वीकृति है। (सुधा) गभ्यससन्देषसुदाहरति-जीवनेति। तीवनं जलं धनञ्, तस्य ग्रहणे नम्रा अघोसुखा चिनीताश्ष, गृहीरवा पुनरस्थिता उर्ध्पसुखा उद्घताश्च किं कनिष्ठाः किसु उपेष्ठाः, घटी- यन्त्रस्य एकरज्जुसम्नन्धघटमालारूपस्य दुर्जना :; इत्यम्र ज्येष्ठकनिष्ठयोरप्रसिद्धेस्तस्थ गम्यत्वम्। न च गभ्यस्यानड्गीकार इति वाध्यम्। उत्पेक्षार्या वाच्यगम्पभेछवदत्रापि दयोरुदाहरणयो: सर्वात्, द्वैविध्यस्याप्यघश्यमक्गीकारास। (चित्र०) अपि च, अनवधारणेति किसुच्यते ? अनिश्रयात्मकत्वमिति चेत्, तथा सति 'बालेन्दुवक्त्राण्यविकाशभावात्' इत्यदावुदाहरिष्यमाणायामप्रकृतसाम्य- निमित्ततत्तादात्म्यसम्भावनारूपायासुत्प्रेक्षायामतिव्याप्तिः, सम्भावनाया उत्कट- कोटिसन्देहरूपत्वात्। विरुद्धानेककोट्यवगाहित्वं तदिति चेत्; तथापि 'मुख- चन्द्र:' इति रूपकेऽतिव्याप्तिः। विरोधेन परस्परप्रतिक्षेपकतया निबद्धानेक- कोट्यवगाहित्वं विवक्षितमति चेत्, तथापि 'अङ्कं केऽपि शशङ्किरे' इत्यादा- वुदाहरिष्यमाणायामपह्नतावतिव्याप्तिः । सन्देहविकल्पयोर्वाकारादिनेव तत्रापि तत्तन्मतत्वोपन्यासेन परस्परप्रतिक्षेपसिद्धेः। (भारती) और भी,-अनवधारणत्व क्या है? अनिश्चयात्मकता अथवा विरोध द्वारा पारस्परिक प्रति- क्षेपकता से निवद्ध अनेक कोटि अवगाहित्व १ प्रथम विशेषण की स्वीकृति में-

Page 306

२६६ चित्रमीमांसा

वालेन्दुवक्त्राण्य विकाशभावाद बभुः पलाशान्यतिलोहितानि। सधो वसन्वेन समागतानां नखपतानीय चनस्थलीनाम्।। इत्यादि जो आागे उदाहरण के रूप में प्रस्तुन करेंगे, उसमें अप्रकृतसाम्यनिमित्तक संभावना रूप उत्प्रेक्षा अल्फार में अतिव्याप्ति होगी। क्योंकि यहाँ सभावना में उत्कटकोटिका सदेह है। अगर दूसरा पक्ष स्वीकृत करते है, तो मी 'मुखचन्द्रः' इस रूपक में अतिव्याप्ति होगी। यहाँ यदि विरोध के द्वारा पारस्परिक प्रतिक्षेप से निबद्ध अनेक कोटिक अवगाहित्व विवक्षित हो तव,- फिर भी 'अङ्क केपि शशक्टिरे जलनिधेः पङ्मं परे मेनिरे' इत्यादि जो अपहुति प्रकरण में उदाहृन होंगे-उसमें अतिव्याप्ति होगी। क्योंकि यहाँ भी सदेह और विकल्प के स्वरूप से ही अपसुति में भी पूर्वकथित मतों से पारस्परिक प्रतिक्षेप की सिद्धि होती है और उस सिद्धि में अनेक कोटिक अवगाहित्व की उपस्थिति से ससदेह अलङ्कार के लक्षण का समन्वय हो जाता है। (सुधा) एवं प्रथमविशेषणं दूषयिरणा विशेषणान्तरं दूषथति-अपि चेति। किं नामानव- धारणत्वम, अनिश्चयात्मकत्वं वा, विरोधेन परस्परप्रतिक्षेपकतया निबद्धानेककोठ्यवगा हिरवं वा? आदयं दूपयति-तथेति 'वालेन्दुववत्राण्यविकासभावाद्वभुः पलाशान्यतिलो हितानि। सधो वसन्तेन समागतानां नखस्तानीव वनस्थलीनाम॥' इत्यादावुदाहरिष्य

पि-'अद्गं केऽपि शपाद्विरे जलनिधेः पङ्मंपरे मेनिरे, सारद्ं कति ापि संजगदि रे भूष्छाय- मैच्छन् परे। इन्दी यद्दलितेन्द्रनीलशकलश्यामं दरीदृश्यते, तत्सान्द्रं निशि पीतमन्घतमसं कुषिस्थमाचपमहे ॥' इन्दी दलितस्वेन्द्रनीलमणेः शकएवत् श्यामं दुरीदृवश्यते, तत्केऽपि कवयः, अकं कलकं शाफठिरे शद्ितवन्तः। पवेऽये जलनिधेः पंकं मेनिरे। कतिचिरपुनः सारहं संजगदिरे अबुचन्। परे हतरे भूषछायमेच्छन्। 'विभाषासेनासुरा' दत्यादिना कीवत्वम। वयन्तु घनं निधि रात्री पीतम्, अत एव कुद्िस्थमन्धतमसं गांढव्वान्त- माघपमहे, वमहे इत्यन्वयः। यन्राप्रह्वतावतिव्याप्तिः, सन्देहविकत्पयोर्दाकारादिने वापहु

समन्वयात्। किस 'अस्या: सर्गविधौ' इत्यादी ससन्देहे चन्द्रादीनां सन्देहधर्मिणामेवाने-

(चित्र०) अस्याः सर्गविधौ प्रजापतिरभूच्न्द्रो नु कान्तिप्रदः शृङ्गारैकरसः स्वयं तु मदनो मासो नु पुष्पाकरः। वेदाभ्यासजड: कथं स विषयव्यावृत्तकौतूहलो निर्मातुं प्रभवेन्सनोहरमिदं रूपं पुराणो सुनिः ॥ इति ससन्देहोदाहरणे चाव्याप्ति। तन्न चन्द्रादीनां सन्देहधर्मिणामेवानेक- त्वम्। प्रकारस्तु सर्वत्र वर्णनीयवनितास्त्रष्टृत्वमे कसे वे त्यने कको टिकत्वाभावात्। न च साम्यनिमित्तत्वाभावान्न तन्न ससन्देहः। 'इतो गता सा क्क गता न जाने गृहं गता मे हृदयं गता वा' इति सन्देहो न संग्राह्य इति वाच्यम्।

Page 307

ससन्देहनिरूपणप्रकरणम् र६७

वर्णनीयनायिकायाः कान्त्या चन्द्रसाम्यं सौरभसौकुमार्याभयां पुष्पसाम्यं च निमित्तीकृत्य किमस्यां कान्तिनिधानभूतश्रन्द्र: स्वकान्तिसम्पदा स्रष्ा, उत पुष्पमास: स्वकीयपुष्पसम्पदेति सन्देहनिबन्धनात् 'मृङ्गारैकरसः स्वयं नु मदन:' इत्यंशस्य शृङ्गारविभ्रसबाहुल्यमान्रपर्यवसायित्वेन किश्च्च्ित्साम्यनिमि- न्तत्वाभावेऽपि चन्द्रवसन्तधर्मिकांशयोस्तन्निमित्तत्वानिवारणात् । (भारती)

'क्या इस सुन्दरी (उर्वशी) की सृष्टि का स्ष्टा कान्तिदायक चन्द्रमा है? अथवा साक्षात शृगारमय कामदेव है? या मघुमास वसन्त है ? क्योंकि वेदाभ्यास के कारण कुण्ठित बुद्धि, ससार के सुन्दर विषयों में निरुत्सुक तथा एक मात्र मननरत वृद्ध ब्रह्मा का सामर्थ्य कहां जो इस मनोहर रूप को रच दें।' इस ससन्देह अलङ्कार के उदाहरण में अव्याप्ति है। क्योंकि इसमें चन्द्रादि सन्देहृधरमिंयों का ही एकत्व से वर्णनीय वनिता के रचना प्रकार के एकत्व में अनेक कोटि के अभाव से अतिव्यापि का प्रसङ्ग है। अव शका करते हैं कि जैसे-'यहाँ से गई तो कहाँ गयी जगल में अथवा मेरे हृदय में ? मुझे पता नहीं १ इस उदाहरण में साम्यनिमित्तत्त्व के अभाव से जिस प्रकार सन्देह नहीं है उसी प्रकार उक्त उदाहरण में भी साम्यनिमितत्व के अभाव से सन्देह नहीं है। तो इसका समाधान करते हैं- निष्कर्ष स्वरूप हम कह सकते हैं कि यहाँ केवल सदेह के आधार पर विधि ही अनेक हैं। कोटि तो है वर्णनीय कामिनी का उत्पन्न करना अर्थात 'प्रजापतित्व' जो एक ही है। अतः अनेक कोटियाँ न होने के कारण यहाँ सन्देह के लक्षण की अव्याप्ति है- वह यहाँ घटित नही होता। क्योंकि सदेह का लक्षण है-विरोध के कारण परस्पर हटाने के रूप में वर्णित अनेक कोटियों के विषय में होने वाला ज्ञान। अतः इस पद्य में ससन्देहालद्वार मानना उचित नही। तो इसका समाधान करते हैं- वर्णनीय नायिका की कान्ति से चन्द्रमा का साम्य अर्थात उपमेय प्रजापति का उपमान चन्द्रादि से साम्य प्रतिपादित है। यहाँ उपमेय की उपमानरूपना की प्रतीति में जो सशय है उसका स्वरूप है-स्रषा व्रह्मा तो वेदाभ्यास से जड हैं, तो भला इस सुन्दरी की सृष्टि कैसे कर सके? तव इसका सृष्टिकर्ता कौन ? क्या चन्द्रमा १ कया मदन १ अथवा क्या वसन्त? अत. यहाँ विभ्रम वाहुल्य के कारण निमित्तत्त्वाभाव में भी पूर्वोक्त दोनों स्थलों में निमित्तत्व की स्वीकृति के कारण दोषाभाव है। विमर्श-'अस्याः सर्गविधौ' में दीक्षित जी ने सदेहालद्वार का जो अतिन्याप्तिदोष बताया है, पण्डितराज जगन्नाथ ने उसका खण्डन करते हुए लिखा है कि सदेह का आकार यहाँ है-'इस नायिका की सृष्टि में जो स्नष्टा बना है वह चन्द्रमा है, किंवा मदन अथवा वसन्त है? इस सशय का आधार है 'ब्रह्मा'। उस आधार में चन्द्रत्व आदि अनेक कोटियाँ हैं ही। अत. सदेह के लक्षण की अव्याप्ति कहाँ है ? और जो आप 'चन्द्रादिक' को सन्देह का आधार और 'प्रजापतित्व' को सन्देह की कोटि मान रहे हैं, उस प्रकार का सदेह तो यहाँ कहा भी नही जा सकता। क्योंकि यदि ऐसा ही होता तो प्रजापति का प्रयोग पहले नहीं होता, किन्तु चन्द्र आदि का ही प्रथम

Page 308

२६८ चित्रमीमांसा

प्रयोग होता। प्रजापति शब्द का उल्ेख जब पहले है, तव तो अवश्य ही यह मानना पडेगा कि कवि प्रजापति में 'वह चन्द्रमा होना चाहिए या मदन' इत्यादि सन्देह कर रहा है, न कि चन्द्र आदि में प्रजापति होने का। सा० ट० में विश्वनाथ ने लिखा है कि सन्देह अलकार उस प्रकार के संशय में नहीं हुआ करता जिसमें कविप्रतिमा का सशयान्मक ज्ञान प्रकार मात्र है। कविप्रतिमोत्थापित भी 'सशय' तभी सन्देह अलक्वार हो सकता है जव कि वह प्रकृत में अप्रकृतविषयक सशयात्मक अनुभव रूप रहा करता है। इस दृष्टि से विचारने पर उक्त उदाहरण में सन्देह का आधार है प्रजापति और उसकी कोटि है प्रजापतित्व दोनों घुमा-फिरा कर एक ही है। अत इसमें अनेक कोटियों के अभाव से दीक्षित जी द्वारा कथित लक्षण की अव्याप्ति स्पष्ट है।

(सुधा) उदाहरणं व्याघष्टे-अस्या. सर्गविधी कान्तिप्रदश्न्द्रः कि प्रजापतिरभूद, किंवा शृद्गारैकरसः मदनो वाडभूत; पुष्पाकरो मासो वा, वेदाभ्यासजढः विषयपरावृत्तकौतुक: पुराणो मुनिष््छिं मनोहरं रूपं निर्मातुं कथं प्रभवेहित्यन्वयः। अन्नाशक्कते-नचेति। इतो गता सा क गता बनं गता वा ! में हृदयं गता वेत्यहं न जाने। इत्यत्र साम्यनिमित्तत्वा- भावेन यथा सन्देहो नास्ति तधाआरापि तप्निमित्तत्वाभावास सन्देह इस्यावाष्ट्रार्थः। समापत्ते-वर्णनीथेति। वर्ण्यनायिकायाः कान्त्या चन्द्रसाम्यं सौरभसौकुमार्याभ्यां पुष्पसान्यं घ निमितमझ्गीकृत्य सवकान्तिसम्पदा कान्त्याश्रयश्न्द्व: स्षा, उत, स्वकीय- पुष्पसम्पछा पुप्पसमयो वा इति सन्देहसत्वात्। 'मवन' इत्यंघास्य शम्मारवित्रमवाहुस्या

आवात्। (चित्र०) एवं च प्रकृतार्थाश्रयेत्येतदप्ययुक्त्म्, उदाहृतसन्देहस्य वर्णनीयनायिकाना-

(भारती) प्राचीनों के द्वारा कथित ससन्देह के 'साभ्याषप्रकृतार्थस्य या घीरनवधारणा' लक्षण में 'प्रकृतार्थाश्रया' विशेषण भी अशुद्ध ही है। क्योंकि 'अस्या सर्गविधौ' इस उदाहरण में सदेह का चन्द्रादि आश्रयत्व के कारण प्रकृतार्थनायिका के आश्रयत्व से अतिव्याप्ति का प्रसद्ग है। अत प्राचीनों के उक्त लक्षण उचित नहीं है। विमर्श-अप्पय दीक्षित ने प्राचीनोक्त 'साम्यादप्रकृतार्थस्य' इत्यादि सपदेह के लक्षण में अव्याप्ति एवं अतिव्याप्ति दोप दिखाकर दूषित सिद्ध किया है। किन्तु, पण्डितराज दीक्षित के मत से अपनी मसद्मति प्रकट करते हुए लिखते हैं कि उक्त लक्षण में 'अवधारणा' शब्द का सर्थ निश्चय और समावना ये दोनों मान लेने से दोप नहीं रहता। क्योंकि निश्चय मौर समावना दोर्नों में से किसी एक के रूप में न होने वाला सादृश्यमूलक बोध ही तो सदेहालद्वार है। वची चात अन्योन्याश्चय दोष की। क्योंकि सन्देह से भिन्न निश्चय और निश्चय से भिन्न सन्देह रूप मन्योन्याशम की संभावना है किन्तु, किसी भी प्रकार से एक का तो लक्षण बनाना ही है। फिर

Page 309

ससन्देहनिरूपण प्रकर णम् २६६

निश्चय का लक्षण इस प्रकार बनाया जाय कि उसमें सदेह का प्रवेश ही न हो। ऐसा करने से अन्योन्याश्रम दोष भी न होगा और उक्त प्राचीनों के लक्षण में भी दोष दर्शन न होगा। किन्तु, वस्तु स्थिति यह है कि किसी वस्तु के सम्बन्ध में अनेक वस्तुओं का जहाँ सन्देह होगा तथा सादृश्य के कारण अनिश्चयता बनी रहेगी वहीं तो सन्देहालक्कार होगा। इतना ही नही इस अलद्वार में तो दो वस्तुओं में सन्देह न रहने पर भी कविप्रतिभा द्वारा उसमें सन्देह का विवन्धन किया जाता है ऐसी स्थिति में 'अवधारणा' शब्द का अर्थ निश्चय और सभावना मान- कर प्राचीनों के उक्त लक्षण को दोषमुक्त किसी भी स्थिति में नहीं कहा जा सकता। (सुधा) किद्र प्रकृतार्थाश्रयेति विशेषणमप्यशुद्धम, 'अस्याः सर्गविधौ' हृत्यन्र सन्देहस्थ चन्द्राद्याशयत्वेन प्रकृतार्थनायिकानाश्रयत्वावृव्याप्तिप्रसद्वात्। तस्मात् प्राचीनोककं कक्षणं न सम्यक। (चित्र०) अत्र ब्रम :- बुद्धिः सर्वात्मनान्योन्याच्ेपिनानार्थसंश्रया। सादृश्यमूला वार्थस्पृक् सन्देहालड्कृतिर्मता॥ यद्यप्यन्योन्यप्रतिक्षेपकविरुद्धनानार्थावलम्बनत्वं विकल्पस्याप्यस्ति, तथापि तदर्थानां सर्वात्मना परस्परप्रतिच्षेपकत्वं नास्ति, किन्तु पक्षे तत्प्राप्तिमनिरुध्य स्वप्राप्तिपक्ष एव स्वपरिपन्थिपाप्तिप्रतिच्षेपकत्वम्। (भारती) दीक्षित जी 'अन्र ब्रूम से अर्थात् यहाँ अव अपना लक्षण बताते हैं- 'जिस सादृश्यमूलक बुद्धि में एक दूसरे को सव प्रकार से हटाते हुए अनेक पदार्यों का अनु- भव हो तथा जो बुद्धि 'वा' अर्थ का स्पर्श करती हो, उसे ही ससन्देह अलद्वार कहते हैं।' यधपि 'जिस सादृश्यमूलक बुद्धि में एक दूसरे को अनेक पदार्थो का अनुभव हो तथा जो नुद्धि 'वा' अर्थ का स्पर्ग करती हो, वही ससन्देहालद्वार है, इतना ही लक्षण करते हैं तो-'शिरांसि चापानू वा नमयन्तु महीभुजः' विकल्पालङ्वार के इस उदाहरण में अतिव्याप्ति दोष हो जाता है। इसीलिए उक्त लक्षण में 'सर्वा मना अर्थात् सब प्रकार से हटाने हुए' विशेषण का सन्निवेश किया गया है। ऐसा करने से स्वत अतिव्याप्ति का निवारण हो जाता है। क्योंकि पक्ष में उस प्राप्ति को बिना रोके ही स्वप्राप्तिपक्ष के ही कारण स्व के साथ अन्य प्राप्ति की प्रतिक्षेपकता से दूसरे को सभी प्रकार से हटाना-यहाँ नही है। (सुधा) अम्न स्वयं लक्षणमारचर्यतत-अन्न ब्ूम इति। सर्वात्मनान्योन्यापेपिनानार्थसंश्रया सादश्यमूला चार्थस्पृक या बुद्धि: सा सन्देहालंकृतिभवतीत्यन्वयः। लक्षणपदानां सफलर्ता प्रतिपाद्यति-यदपीति। तम्र सर्वात्मनेत्यस्य सफलत्वमाह-अन्योन्यप्रतिक्षे पकविरुद्धनानार्थावलम्बनबुद्धिरवं सन्देहत्वमित्युक्ती 'सध: शिर्रांसि चापान् वा नमयन्तु

Page 310

२७० चित्रमीमांसा

नहीभुजः' इति विकल्पाळक्कारेऽतिग्याप्तिः स्यादित्यतः सर्वात्मनेति विशेषणम्। तत्र हि पक्चे तत्माप्तिम निरुद्ध्धैव स्वप्राप्तिपद् एव स्वान्यप्राप्तिप्रतिक्षेपकतया सर्वात्मना प्रतिक्षेपकरवं नास्तीत्यतो नातिव्याप्ि:। (चित्र०) न हि 'त्रीहिसिर्यवैर्वा यष्टव्यम्' इति विकल्पोद्देशे ब्रीहयो यवान् यवाश्च त्रीहीन् सर्वात्मना यागात् प्रतिक्षिपन्ति। तथा सति शासस्यास्यानिर्णायक- त्वेनाननुप्यापकत्वेन चाप्रामाण्यप्रसङ्गात्, किन्तु स्वस्वानुष्ठानपक्ष एव। अत एव 'ब्रोहिसिर्यवैर्वा यष्टव्यम्' इति सन्देहेन पृष्टवन्तं प्रति 'व्रीहिभिर्यवैर्वा यष्ट व्यम' इति प्रश्नसमाकारमेव वाक्यं निर्णायकं प्रश्नसूल सन्देहनिवर्तकमनुष्ठापकं च हृश्यते। प्रश्नवाक्ये वाकार: सर्वात्मना पक्षान्तरप्रतिच्षेपार्थः, उत्तरवाक्ये पक्षे तत्प्रतिच्ेपार्थ इति विशेषसद्धावात्। एवं विकल्पालङ्कारोदाहरणेऽपि द्विविधस्यापि नीतिशास्त्रस्य प्रामाण्यात्तदुपदिष्टफलेच्छानुसारेणोभयमपि पक्षे- डनुष्ठातुं युक्तमिति शिरोधनुर्नमनयोरन सर्वात्मना परस्परप्रतिच्षेपकत्वमिति विकल्पालक्कारे नातिव्याप्तिः। अपह्ृवोदाहरणे सर्वात्मना परस्परप्रतिक्षेपसत्वे- Sपि वाकारार्थस्पर्शाभावन्नातिव्याप्तिः। तन्र हि केचिदन्य इति मतान्तरत्वो- पन्यासेन पक्षाणां परस्परप्रतिच्ेपलाभः, न तु वाकारार्थस्पर्शोडस्ति। (भारती) इसे ही शास्त्रान्तर वाक्य से दृढ करते हुए कहते हैं कि 'ब्रीहि से अथवा जौ से यश करना चाहिए'। इस विकल्प के उद्देश्य में न्रीहि जौ और जौ न्रीहि, में एक दूसरे को सभी प्रकार हटाते हुए यश से प्रतिक्षेप करते हैं। ऐसा करने पर इस शास्त्र के निर्णायक अननुष्ापकत्व से अग्रा- मारण्य का प्रसग होता है। किन्तु, यहाँ अपना अपना अनुषान पक्ष ही है। इसीलिए 'ब्रीहि से वा जो से यश करना चाहिए। इस सदेह से पूछने वालों के प्रति 'नीहि से अथवा जौ से यश करना चाहिए' प्रश्न के सदश आकारवाला उत्तर वाक्य ही निर्णायक होता है। इतना ही नहीं, प्रश्न मूल सन्देह की निवृत्तिपू्वक अनुष्ठान भी देखते हैं। प्रश्नवाक्य में वाकार जो है वह सव प्रकार से इटाते हुए पक्षान्तर का प्रतिक्षेप ही अर्थ स्पष्ट करता है। इसी प्रकार उत्तर वाक्य के पक्ष में उस प्रतिक्षेप का अर्थ विशेपरूप से उपलब्ध है। इस प्रकार विकल्पालद्वार के उदाहरण में भी दोनों प्रकार की नीति के प्रमाण से उसके द्वारा उपदिष्ट फल की इच्छा के अनुसार जैसे दोनों ही पक्षों में अनुष्ठान करना चाहिए, उसी प्रकार "चाहे शिर झुकाओ चाहे प्रत्यचा खीचकर युद्ध के लिए समुदत धनुष झुकाओ" पूर्व कथित चिकल्पालकार के उदाहरण में भी अतिव्याप्ति दोप नहीं होता है। इसी प्रकार यदि केवल ससदेह का इतना ही लक्षण करते हैं 'जिस सादृश्यमूलक वुद्धि में एक दूसरे को सव प्रकार से हटाते हुए अनेक पदार्थो का अनुभव हो, उसे ससन्देह अलद्गार करते है, तो पूर्व कथित 'अङ्ग केपि शशङ्विरे' अपह्ृति के इस उदाहरण में अतिव्याप्ति दोप हो जाता है। अत. लक्षण में इसी अतिव्याप्ति के निवारणार्थ 'वार्थस्पृग' युद्धिविशेषण का समावेश किया गया है। यहाँ कुछ लोगों के द्वारा मतान्तर के कथन से परस्पर प्रतिक्षेपक के लाभ होने पर भी 'वाकारार्थ स्पर्श' के अमाव में अतिव्याप्ति दोप नहीं होता है।

Page 311

ससन्देहनिरूपणप्रकरणम् २७१

(सुधा) एतदेव शास्त्रान्तरवाक्येन द्ढयति-न हीति। 'व्रीहिभियंवर्वा यष्टव्यम्' इत्यन्र नीहीणां स्वानुष्ठानपस एव यघप्रक्षेपकत्वादुभयत्र सन्देहेन पृष्टवतः तादृशप्रश्समाकार वाक्यस्येघ प्रश्नसूलसन्देहनिवर्तकरूपनिर्णायकरवस्यानुष्ठापकत्वस्य च दश्यत्वास्। अन्यथा उभयोस्लर्वात्सना यागात्प्रतिक्षेपे शास्त्रस्यानिर्णायकत्वाननुष्ठापकत्वाभ्यासप्रामाण्यप्रसङ्ग: स्यास्। सर्वात्मना तत्प्रतिक्षेपपपे ततप्रतिक्षेपयोनिर्णयसाह-प्रश्नवाक्य इति। प्रश्नवाक्यस्य वाकारस्य सर्वात्मना प्रतिक्षेपकरवमर्थः। उतरवाक्ये तु पक्षे तम्पतिक्षेपकत्वसर्थ इति तयो- रविशेष इति । 'इह नमय' इत्यादावतिव्यापतिं परिहरति-एचमिति। द्विविघनीतेः प्रामाण्य सर्वा ततवपदिष्टफलेद्छानुसा रेणोभय स्यप पक्ेुष्ठातुं योग्यतया शिरो धुम नयोः सर्वात्मना परस्परप्रतिक्षेपकत्वाभावान्न तम्रातिव्यात्विरिति भाद: । 'वार्थस्पृक'

वलश्वनसादृश्यमूला वृद्धि: सन्देह इत्युक्तो 'अंकं केऽपि शशह्किरे' हत्यपह्नतौ सर्वात्मना परस्परप्रतिक्षेपतादृशबुद्तिसत्वादतिव्याप्तिः। अतस्तद्वारणाय वार्थस्पृगिति बुद्धिविशेषण मुकम। तत्र केचिदित्या दिमतान्तरोपन्यासेन परस्परप्रतिक्षेपकरवलाभेऽपि वाकारार्थस्पर्शा- भावाषित्याशयः। (चित्र०) उत्प्रेक्षायामपि नातिव्याप्तिः तत्र ह्युत्कटकोटिके संशयकोट्योः समबलत्वा- सावेन वाकारार्थस्पर्शाभावात्। 'अस्या: सर्गविधौ' इत्युदाहरणे परस्परप्रतिक्षेपकनानाकोटिससाश्रयत्वा- भावेऽपि तथाभूतनानाधमिरूपार्थसमाश्रयत्वसत्त्वान्नाव्याप्तिरिति सर्वमव- दातम्। (भारती) इसी विशेषण के कारण 'वालेन्दुवक्त्राण्यविकाशभावात्' इत्यादि उत्प्रेक्षालद्कार के उदाहरण में भी अतिव्याप्ति दोष का परिद्दार हो जाता है क्योंकि यहाँ भी उत्कटकोटि के पलाशनखक्षत- सशयकोटि की समवलता के अभाव से वाकारार्थ स्पर्श के अभाव के द्वारा समबलता में ही उसकी उपस्थिति के कारण यहाँ अतिव्याप्ति नहीं है। 'अस्या. सर्गविधौ' इत्यादि पूर्वलिखित ससदेह के इस उदाहरण में एक दूसरे को सव प्रकार से हटाते हुए अनेक पदार्थो का आश्रय यद्यपि नहीं है, फिर भी वैसे एक दूसरे के प्रतिक्षेपक रूप अनेक धर्मीस्वरूप सादृश्य के आश्रयत्व की उपस्थिति से अन्याप्ति का परिहार स्वत हो जाता है। अत. यह लक्षण सर्वतोभावेन निर्दष्ट और सुन्दर है। (सुधा) अनेनैव विशेषणेनोतप्रेक्षायामतिव्यापि वारयति-उतप्रेक्षायामपीति। 'बालेन्दुवन्त्रा- ण्यविकासभावास्' इरयन्र उरकटकोटिके पलाशनखप्ततसंशये संशयकोट्योः समवलतवा भावेन वाकारार्थंस्पर्शाभावात् समबलतायामेव तत्सर्वात्तन् नातिव्याप्तिः। 'अस्याः सरग- विधौ' इत्यादायण्यासिं परिहरति-अस्या इति। अस्मिन् सन्देहोदाहरणेडन्योन्यप्रतिक्षेप-

Page 312

२७२ चित्रमीमांसा

कमानाको टिसमाश्रयरवं यद्यपि नास्ति, तथापि तथाभू तपर स्परप्रतिष्वेपकरूपनानाघमिरु- पार्थसमाध्नयर्वसत्वाज्जाव्याप्तिरिति सर्व लल्षणमनवर्धं दोपरहितमेवेति दिक। (चित्र०) सन्देहालद्कारध्वनिर्यथास्मत्कुलकूटस्थवक्ष:स्थलाचार्यकते वरदराजवसन्तो- त्सवे- काख्वित् काञ्चनगौराड़ीं वीच्य साक्षादिव श्रियम्। वरद: संशयापन्नो वक्षःस्थलमवैक्षत ।। अत्र संशयस्य शव्दोपात्तत्वेऽपि तावन्मान्रस्यानलङ्कारत्वात् । तदल- क्वारताप्रयोजकस्य वक्षःस्थले स्थितव लक्ष्मीस्ततोऽवतीर्य पुरतस्तिष्ठतीत्येवं संशयाकारस्य वक्षःस्थलमवैक्षतेत्यनेन व्यङ्गयत्वात् सन्देहालङ्कारध्वनिरत्रेति । यथा- दर्पणे च परिभोगदशिनी पृष्ठतः प्रणथिनो निषेदुषः । वीच्य विम्बमनुबिम्वमात्मनः कानि कान्यपि चकार लज्जया ॥। इत्यत्र कानि कान्यपीति सामान्यतो निर्दिष्टानुभावविशेषप्रतीत्यर्थलज्जाशब्द- प्रयोगेऽपि तस्याः स्वविभावानुभावाभ्यां रसानुगुणाभिव्यक्तिरूपो ध्वनिः । (भारती) सन्देहालद्वार ध्वनि के उदाहरण के प्रसग में दीक्षित जी ने लिखा है कि यह पद्य हमारे मूल पुरुप वक्षस्थलाचार्य के वनाये 'वरदराज-वसतोत्सव' का है। वरदराज (भगवान् विष्णु की मद्रासस्थित एक मूर्ति) मानो साक्षात लक्ष्मी हो। ऐसी सोने की तरह गौर शरीरवाली किसी कामिनी को देखकर सदेह्युक्त हुए और वक्ष स्थल देखने लगे। यद्यपि यहाँ 'सन्देह' का ग्रहण शब्द द्वारा हुआ है तथापि केवल उतने भाग के अलक्कार रूप न होने के कारण, किन्तु सदेहालद्वार को सिद्ध करने वाला 'वक्षस्थल में स्थित ही लक्ष्मी वहों से उतर कर सामने खढी है' यह सदेह का आकार 'वक्षस्थल को देखने लगे' इस उच्ि द्वारा व्यङ्रय होने के कारण यहाँ 'सन्देहालद्वार की ध्वनि' है। जैसे कि (कुमारसभव में पावती का सुरत वर्णन है-)। 'पार्वती दर्पण में सभोग के नखक्षतादि चिन्द देख रही थी। उसने, अपने पीछे बैठे प्रणयी शिव का प्रतिविम्ब अपने प्रतिविम्ब के पीछे देखा। फिर तो उसने लज्जा के मारे क्या क्या न किया।' यहाँ 'न्या क्या' इस तरह सामान्य रूप में 'वर्णित विशेष अनुभावो की प्रतीति के लिए 'रजा' शब्द का प्रयोग करने पर भी, अपने विमावों और अनुभावों द्वारा लज्जा के रस के शनुकृल अमिव्यक्ति रूपी ध्वनि है-अर्थात् यहाँ अनुभावो की पिशेपरूप से प्रतीति करवाने के दिए 'लब्ना' शब्द के आने पर भी रस का पोपण करनेवाली लब्ना रूप चित्तधृत्ति व्यडथ ही है।

Page 313

२७३

(सुधा) अस्य ध्वनिमुदाहरति-सन्देहालङ्कारेति। श्ोकस्य प्रामाणिकतादोतनाय, आह- अस्मतकुलेति। काखिदिति। साक्षात् श्रियमिय स्वर्णगौराङ्षीं काजिदुद्धीचय संशयापननो वरदो वसर्स्थलमवैप्यतेत्यन्वयः। अन्र सन्देहस्य संशयेत्यािविशेषणोक्त्या वाध्यत्वसर्वेन व्यम्गयस्वाभावमाशडक्य परिहरति-अन्रेति। शब्दोपात्तसंशयस्थानलद्कारत्वात,सन्देह- त्वप्रयोजकस्य वक्षःस्थितैव लक्मी: ततोऽवतीर्याये तिष्ठतीति सन्देहालप्वाररूपस्य वस् :- स्थलावेषणव्यद्गयजन्यत्वात् तस्य ध्वनित्वमव्याहतमेवेति तन्भावः । तादृशशब्दोपादान रहितशुद्ध सनदेहालङ्कारध्वनिमुदाहरति-दर्पणेरयादि। दर्पणे मुकुरे परिभोगो देह तदा लोचिनी स्वपृष्ठे निषेदुषः, प्रणयिन: पत्युबिम्बं वीच्य सत्मनोऽनुषिम्बं वीचय लज्जया कानि कानि चकार इत्यन्वयः। कानि कानीति सामान्यतया निर्दिष्टानुभाव विशेषप्रतीत्यर्थ लज्जाशव्दप्रयोगेऽपि लज्जायाः=स्वस्या विभावानुभाषौ ताभ्यां रसगुणाभिव्यक्तिरूप: पृष्ठत आलिङ्गनरूप उरससे गृहीरवा मुखचुम्यनरूपो वा सम्भोगशङ्गारध्वनिः। (चिन्न०) यद्यपि 'संशयापन्नः' इत्यनेन ल्ष्म्याः पुरो दृष्टायाश् मध्ये कस्या रूपम- धिकमिति संशयाविष्ट इति वा निःसमाधिकरूपवत्त्वाभिमानिनी लक्ष्मीः पुरत एनां दृष्टूवा कथ वर्तत इति संशयापन्न इति वा, इयं च वक्षसि कुत्र निवेश- नीयेति संशयापन्न इति वा, बह्वः सशयाकारा वक्षःस्थलमवैक्षतेत्यनेन व्यङ्गयाः संसवन्ति, तथापि सर्वेषामपि सन्देहानां सादृश्यमूलत्वाद्वयतिरेक- मूलसन्देहस्याप्यत्र सभवेऽपि कथञ्च्ित्सादृश्यमूलत्वात सन्देहालङ्वारध्वन्युदाह- रणत्वमिति युक्तमेव। इति चित्रमीमांसायां ससन्देहालङ्कारप्रकरणम्

(भारती) यद्यपि हृदय में रहनेवाली लक्ष्मी को आगे में देखकर बीच में किसका रूप अधिक है? इस सशय से आविष्ट अथवा दूसरी जगह समान और अधिक से रहित अपने स्वरूप की अभिमानिनी लक्ष्मी आगे इन्हें देखकर कैसी है ? इस तरह के सदेह से आविष्ट। अथवा इस दूसरी लक्ष्मी को हृदय में कहाँ रखना चाहिए ? ऐसी सन्देहापन्न स्थिति है। इस तरह बहुत प्रकार के सशय से आच्छन्न वक्षस्थल को देखते है और इस तरह के देखने में जो व्यङ्गय है, उन सवों में सादृश्यमूलत्व से विशेषाभाव है। इसी से हृदय में अवस्थित लक्ष्मी के द्वारा आधिक्यरूप व्यतिरेकमूल सन्देह रहने पर भी यथा कर चित् उसका भी सादृश्यमूलता से यहाँ सन्देह अलक्कार की ध्वनि तो अव्याहत ही है। अत सन्देहालक्वार ध्वनि का यह उदाहरण युक्तियुक्त है। चिमर्श-पण्डितराज जगन्नाथ ने दीक्षित जी द्वारा प्रतिपादित सन्देहध्वनि के इस उदाहरण का भी खण्डन किया है। उनका कहना है कि 'सन्देह युक्त होकर' इस वाक्य में 'सन्देह' पद द्वारा १८ चित्र०

Page 314

२०४ चित्रमीमास

'एक पदार्थ में, परस्पर विरोधी अनेक पदार्थों के सम्बन्ध में होनेवाला ज्ञान, जिसे दीक्षित जी ने व्यक्ष्य कहा है- साक्षाद ही निवेदन किया जा रहा है, इस वाक्य का अर्थ ही यह है कि-वरदराज को कोई ऐसा शन हुआ है जो एक पदार्थ में परस्पर विरोधी विविध कोटियों का ग्रहण कर रहा है। उसके बाद कोटि रूपक यह परस्पर विरोधी विविध पदार्थ 'कीन है' इस तरह विशेष की आकाक्षा होने पर 'वक्ष:स्थल देखने लगे' इस वाक्य द्वारा, व्यक्षनावृत्ति से, यह अर्थ समझ में आया कि 'वक्ष- स्थछ में अवस्थित लक्ष्मी ही वहाँ से उतरकर सामने आा खही हुई है।1 यह व्यह्य अर्थ, अन्ततो- गतवा, भमिधा द्वारा प्रतिपादित 'सन्देह' शब्द के अर्थ रूप पूर्वोक्त ज्ञान के विशेषण वने हुए 'पररपर विरोधी अनेक पदार्थ' रूपी सामान्य अर्थ से अभिन्न हो जाता है। अर्थात जिसे दीक्षित जी व्यक्थ सदेह कह रहे हैं वह अर्थ 'सन्देह' शब्द के वाच्य सामान्य अर्थ के एक अश का विवरण मात्र है, न कि उससे भिन्न कोई वस्तु। फलतः यह सिद्ध हुआ कि उक्त पद्य में सदेह मात्र का वोध अभिधा द्वारा हुआ है। अतः विरोधी अनेक पदार्थ रूप होने के कारण 'वक्षस्थल में अवस्थित ही लक्ष्मी वहाँ से उतरकर सामने खढी है' इस एक अश का विवरण भी अभिधा द्वारा ही प्रतिपाध है। ऐसी स्थिति में अभिधा से ग्राप इस अंश को स्वतत्र रूप से सामान्यतया ्यन्नय ध्वनि नहीं कहा जा सकता है। इसके व्यक्षयार्थ की समाप्ति भी वाच्य-अर्थ सदेह में ही जाकर होती है। फलतः इस शोक में ऐसे किसी भी तथ्य का प्रतिपादन नहीं है जो इसे उत्तमोत्तम ध्वनि की स्थिति में ला सके। ध्वनिवादियों का यह सिद्धान्त ह कि जिसमें अभिधाषृत्ति का विल्कुल स्पर्श न हो वही न्यङ्गथ काव्य को ध्वनि चना सकता है। आनन्दवर्द्धन ने लिखा है- शव्दार्थ शक्या पिसोऽपि व्यकयोर्थ: कविना पुनः। यत्राधिष्क्रियसे स्वोदत्या सान्येवालंककृतिर्ध्वनेः॥ इसको व्याख्याकार ने उदाहरण रूप में लिखा है- संकेतकालमनसं मिटं ज्ञास्वा विदग्धया। हमसेम्रार्पिताकृतं लीछापद्म निमीलितम्॥ यहाँ किसी नायिका की, लोलाकमल की पखुडियों के वन्द करने की चेष्टा से यही स्पष्ट प्रतीत हो रहा है कि वह सायकाल को अपने प्रेम मिलन का समय वताना चाह रही है। यहाँ जार का चित्त सकतज्ान में समझकर लीलापप को सूद दिया, यह कहते हुए कवि ने 'लीलाकमन के मूदने' का 'सायकाल' सकेतार्थ व्वनित कर दिया। यहाँ यदि सकेतार्थ शब्दों में अभिव्यक्त न होता तो व्यङ्गय कहा भी जा सकता यों तो यह गुणीभृत्यक्गय का ही मार्ग है। अत. यहाँ ध्वनि नहीं गुणीभूत न्यन्नथ ही कहा जाना है। इसी प्रकार- अन्घा शेतेऽन्न वृद्धा परिणतमयसामग्रणीरत्र तातो, निःशेपागारकमंश्रमशियिलतनुः कुम्भदासी तथात्र। अस्मिम् पापाहमेका कतिपय दिव सप्रोपित प्राणनाथा,- पान्यापेरथ तरुण्या कथितमवसरव्याककतिर्व्याजपूर्यम्।। मेरी मृद्धा माँ यहा सोती है। बूढ़ों के अगुआा मेरे पिताजी यहाँ नोने हं। सारे घर के कामों को करने से अति शय शरीरवाली दूढी गृहदासी वहाँ सोती है। देखो वहाँ अकेली में पापिन

Page 315

ससन्देहालद्वार निरूपणप्रकरणम् २७५

सोती हूँ। कुछ दिन हुए मेरे पति परदेश चले गये हैं। इस प्रकार अवसर कहने के व्याज से उस तरुणी ने पथिक से कहा। यदपि यहाँ 'नि शकभाव से रमण करने आओ' यह अर्थ श्रोक के तीन चरणों से व्यज्ञथ रूप में व्यक्त है। फिर भी कवि ने 'अवसर दिखाने को' कपट रूप कहते हुए व्यङ्ग कहते हुए इस अर्थ का अपनी उक्ति से स्पष्ट निवेदन कर दिया। अत यह भी ध्वनि का मार्ग नहीं है। इसी प्रकार आनन्दवर्द्धनाचार्य के मत का समर्थन करते हुए अभिनवगुप्ताचार्य ने भी लिखा है कि न्यङ्गयार्थ का यदि उक्ति द्वारा प्रकाशन हो गया हो तो उसका अप्रधान होना ही प्रति- पादित होता है। अर्थात् उक्ति द्वारा प्रकाशित होने पर व्यङ्गय को प्रधान कहना उचित नहीं। फलत दीक्षित जी के पूर्वोक्त उदाहरण 'काचित् काचनगौराङ्गीम्' में शब्दत उच्चारित होने के कारण ध्वनि की स्वीकृति उचित नहीं है। इसी प्रकार 'दर्पणे च परिभोगदर्शिनी' कुमार- सभव के इस श्रोक में भी दीक्षित जी ने ध्वनि बताया है। ध्वनिरूप का यह उदाहरण भी उचित नहीं है। यहाँ दीक्षित जी की व्यङ्गयध्वनि की कल्पना मुझे बडी ही सूक्ष्म प्रतीत होती है। उसी सूक्ष्मता को सकेतित करने के लिए ही प्राय इन्होंने इन दो उदाहरणों को प्रयोजित किया है। दीक्षित जी के उक्त दोनों उदाहरणों पर सूक्ष्मता से विचार करने पर तो मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि परवर्ती पण्डितराज जगनाथ ने आख मूद कर ही दीक्षित जी का विरोध किया है। मुझे तो साहस के साथ यहाँ यह कहना है कि दीक्षित जी 'न्यङ्गयार्यध्वनि' के पीछे छिपे 'हष्ट' का अभीप्सित अर्थ पण्डितराज को कदापि 'इष्ट' न था और न अर्थ' का 'अर्थ' पण्डितराज ने वाच्य, लक्ष्य और व्यग्य त्रिविध रूप में अन्वर्थक ही माना था। मेरी इस मान्यता को प्रमाणित करने के लिए 'चित्रमीमासा' के पृष्ठ सतत खुले हैं, जिसमें उन्होंने यों हीं जहाँ तहाँ च्यङ्गयार्थ ध्वनि को छूकर छोड दिया है। भामह की ही भाँति दीक्षित जी ने भी अलह्वार को उसके सम्पूर्ण ऐश्वर्य के साथ स्वीकृत किया था। ये दोनों ही उदाहरण सालद्वार शब्दार्थ रूप स्पष्ट व्यङ्गय ध्वनि के स्वरूप हैं। यों मेरी मान्यता तो इससे भी न्यारी है। मैं इस प्रकार के प्रयोगों को दीक्षित जी की अव्युत्पत्ति मानने से तो रहा, प्रत्युत् इन्हें शब्द और अर्य का एक ऐसा शिव्पी समझता हूँ जो ऐसे विशिष्ट मलद्कार शास्त्र के सर्वश्रेष्ठ ज्ञाता और प्रयोक्ता हैं। व्यङ्गयध्वनि के इस उदाहरण से तो प्रयोक्ता की कुशलता ही प्रतीत होती है उनका इस विषय में ज्ञान कितना सन्तुलित है इसका पता तो प्रसग बता देता है। प्रयोग की गद्दराई का पता तो विषय ही दे देता है और प्रयोजन का विवेचन उस उदाहरण की प्रयोगोन्मुखता या Communicatave का पता प्रसग से मिलता है। व्यङ्गय ध्वनि की गरिमा ही इन दोनों प्रयोग की इयत्ता को नहीं सूचित करती, प्रत्युत उदाहरण के विवेचन करने की दीक्षित जी की प्रौढ प्राजल प्रणाली तो इसकी दुरूहता को छूकर ही नहीं छोड देती, उसे गगाजलसा स्वच्छ या दर्पणसा पारदर्शी तक बनाकर छोड देने की क्षमता रखती है।

इति चित्रमीमांसायां 'भारती' हिन्दीव्याख्यायां ससन्देहालक्ट्ारप्रकरण समाप्तम्।

Page 316

२७६ :चित्रमीमांसा

(सुधा)

प्रथमपद्ये ध्वनित्वं पोषयितुं तम्रानेकधा व्यंग्यं प्रतिपादयति-यद्यपीति। हृदय- स्थलपम्याः पुरो दष्टायाक्ष मध्ये कस्या अधिकं रूपमिति संशयाविष्टः, उत, निस्समाधिक इति। अन्यन्न समस्वाधिकत्वरहितस्वस्वरूपाभिमानवती श्रीःपुर एनां द्ृष्टा कथं वतत इति संशयापजो वा, इयमपरा श्रीः वछसि कुम्र स्थापनीया इति संशयापओो वा! इति बहनां संशयाकाराणां वसःस्थलावेक्षण्यंव्यतायां सत्यामपि सर्वेषु सादश्यमूलतवेन

कथचित्तस्यापि सादृश्यमूछतासर्वेन सन्देहाळक्कारध्वनित्वमव्याहतमेवेति युक्तमेव तद्ुदा- हरणमिति विक। नध्यास्तु-रसानुफूले साहश्यज्ञानजन्या, तदन्यविषया=निश्चयभिखा या बुद्धि: स इश्यर्थः। भ्रान्तिमत्यतिष्याप्तिवारणाय निश्चयभिन इति। स्थाणुर्वा पुरुषो वा इत्यतिष्या- पितिवारणाय रसानुकूले इति। 'अमुष्य धीरस्य जयाय साहसी तदा खलु ज्या विशिखैंः सनाथयन्। निमज्जयामास यशांसि संशये स्मरख्तिलोकीविजयार्जितान्मपि ॥'इति संशय- निषेधाय साहश्यज्ञानमिति।स द्विधा, प्रकते उक्तधर्माडनुक्तधर्मा च । उक्कवर्मा द्विषा, निश्चयान्तनिश्वयगर्भमेदाद्। द्विविधमप्युदाहृतम्। अनुक्तघर्मा यथा-'अस्याः सर्गविध्ौ' इत्यादावित्याहु:। रसगङ्गाधरकृतस्तु-'अस्याः सगविधौ' इश्यम्र दीक्षितोक्तामव्यासिं प्राचीनो कलचणे दसास् (!) उद्दिश्य-अस्याः स्गविधी यः प्रजापतिरभूत, सकिन्तु चन्द्रः, मदनो वा, वसन्तो वा, इति संशयस्य प्रजापतिधमिकचन्द्रत्वादिनानाकोटिक एवेति नाव्याप्ि:। चन्द्रादिधामिकस्तु न संशयः, प्रजापतेः प्रथमोद्वेशाभावापसेः। किजु, प्राचीनो कलक्षण- स्थापि निर्दोपतैव, साम्यनिमित्ता निश्चयसम्भावनान्यतरमिज्ना या घी: इत्र्थसत्वे दोषा- सावात्। सन्देहस्य स्वशन्दवाच्यरवाहाध्यरवम्। लचयोऽप्ययं सभ्भवति-'साम्राज्यलचमी- रियसृष्यकेतोः सौन्दर्य्ररधिदेवता घा। रामस्य रामामघलोक्य लोकरिति स्म दोला रुरुहे तदानीम ॥' इत्यत्र पर्यायेणोभयकोट्यवलर्बनतथा दोलासाहश्यात् सन्देहो दोला- पदलच्यः। दीक्षितो कध्वन्युदाहरणमपि न सम्यक, 'संघयापत्नः' इत्यम्र संशयपदेनेक- स्मिन् पदार्थे विरुद्दनानापदार्थसम्बन्धाघगाहिज्ञानस्य सच्चेन विरुद्धनानार्थविशेषाका-

सहाभेदसर्वाव। तया च सशयमान्रशवत्या बोधनाव वक्षःस्थलस्थितैवेत्यादिविषयभाग- स्यापि विरुद्धनानार्थत्वसामान्याकारेणावलीढतया शकघैव कवलीकरणाद्वाच्यार्थसंशय पर्यवसायिरवेन ध्वनित्वाभावात, सर्वथा शकतवाऽचुन्धितस्यैव ध्वनित्वमित्यस्य सिद्धान्त- प्रतिपाद्यत्वात, आनन्दवर्धनाचायेः द्वितीयोद्योते-'शब्दार्थशकयासिस्तोऽपि व्यड्नयोऽर्थ: कषिना पुनः। यप्राषिष्क्रियते रघोकया सान्यवालस्कृतिर्ध्वनेः॥' इति सूत्रे 'सकेतकाल- मनसं विटं ज्ञार्वा विदग्या' इत्यादौ तथैव प्रतिपादनाद्। अभिनवगुप्तपादाचार्येरपि 'यम्रोकि विना व्यदग्योऽर्थस्तात्पर्येण प्रतीयते, तन्र तस्य प्राधान्यादु ध्वनित्वम्' इति व्यक्तिषिवेके प्रतिपादितर्वाद। पुतेन द्वितीयोदाहरणे लज्जाध्वनित्वमपि तबुक्क्मपास्तम। तस्मात 'तीरे तरुण्या वदनं सहासं नीरे सरोजय् मिछद्विकासम्। थालोक्य धाचरयुभयत्र

Page 317

ससन्देहालद्वार निरूपणप्रकरणम् २७७

प्रकारक: कमलमिद्मिदं वेति संशयो व्यङ्गथः। तस्मादिदमुदाहरणं सम्यक्। किञ्व सन्देहगतनानाकोटिषु एव धर्मः, कचित् पृथक्। सोऽपि क्वचिदनुगामी, कचिव बिम्बप्रति- बिम्भावापनः, क्चिप्निदिष्टः, कचित् प्रतीयमान:, कचिषनाहायंः। अनुगामिनो निर्दिष्टरवं यथा-'नेत्राभिरामं रामाया वदनं सीचय तर्क्णम्। सरोजं चन्द्रविम्वं वेरखिलाः समशेरत ॥' अम्र नेन्नाभिरामत्वरूपानुगामिनः म्रिधु निर्दिष्टत्वात्। स पृथक निर्द्िष्टो यथा-'सम्पश्यतां तामतिमात्रतन्वीं शोभाभिरामा सितसर्वलोका। सौदामिनी वा सित- यामिनी वेश्येवं जनानां हृदि संशयोऽभूत् ॥।' अत्रातिमात्रतनुत्वं सौदामिन्याः, शोभाभा- सितसर्वलोकरवं सितयामिन्याः, सहकान्ताया इति पृथकत्वात। 'तीरे तरण्या वदनं सहा- सम्' इत्यन्र विम्वप्रतिबिम्बभावापन। 'मरकतमणिर्मेदिनीघरो वा तरुणतरस्तरुरेष वा तमालः। रुपतिसमलोक्य तम्न दूरादृषिनिकरैरिति संशयः प्रपेदे॥' अत्र श्यामामिरा- मत्वरूपधर्मस्य प्रतीयमानत्वादनिर्दिष्टत्वस्र । यम्र कविना परनिष्ठः संशयो निबद तन्नानाहाय:। यथा 'तीरे तरुण्याः' इत्यादी। अन्र स्रमरादिसंशयानां ग्रह्यनिश्याभावाद्। यम्र स्वगत एव तंन्राहार्यः । 'अलिमृंगो वा नेत्रं वा यत्र किञ्विद्विभासते। अरविन्दं मृगाङ्टो वा मुख वेदं सृगीदृशः॥' अन्र कवेस्तत्वज्ञतया तयोराहार्यरवस्। 'विद्द्ैन्यत- मस्त्रिमूर्तिरथ वा वैरीन्द्रवंशाटवी-दावाभि: किमहो महोऽवलयशःशीतांशुदुग्धाम्बुधिः'। 'कि वानरूभुजङ्गवष्टवनिताजीवातुरेवं नृणाम्, केषामेष नराधिपो न जनयत्यल्पेतराः कक्पना: ॥' इत्यत्र परम्परित आहार्योऽपि सम्भवति। परनिष्ठोऽपि कविनिबष्यमान आहार्यो यथा-'गगनाद्लितो गभस्तिमावुत वायं शिशषिरो विभावसुः। मुनिरेवमरुन्ध- तीपतिः सकलज्ञः समशेत राघवे ॥' सर्वशञत्वेनोपात्तसंशयस्याहार्यत्वमित्याहुः, तव्विन्तयम्। 'चन्द्रो वा मदनो वा वसन्तो वास्याः सष्टा' इत्येककोटिकनानाधर्मिक्संशयस्यवान्र योग्य- त्वेनाव्यापेरावश्यकत्वात्। पुवञ्ञ प्राचीनलक्षणस्य सदोषतवमेव। किव् प्राकृतार्थाश्रयेति विशेषणस्य प्राचीनोक्तलक्षणे सर्वेन भवतकृतव्याख्यानेऽपि प्रजापतावेव सर्वेन नायिका- यत्वाभावादव्याप्े: दुष्परिहरत्वाच्। यदपि दीक्षितोकध्वनि खण्डयित्वा स्वयं तह्षुदा- हतम्, तद्प्यशुद्धम, मुग्धपदेनोभयत्र घावनसंस्कारेण संशयस्य वाच्यत्वात्। उभयम्र धावनेन भ्रमत्वनिवृत्या संशयवत्वपर्यवसानात्, 'सुग्धः सुन्दरमूढयोः' इश्यनुशासनेन तेन विपरीतज्ञानवत्वलाभाव्जेति दिक। 'सापादिव श्रियं वषय' इत्यन्तेन हेतूपन्यासेनेयं लचमीर्न वेति संकयापम इस्युकत्या संशयपद्वोघस्वैव नायिकोरकर्षकस्यालङ्कारत्वमिति जयरामभट्टाचार्याः । सन्देहालंकृतेर्व्याख्या धरानन्देन निर्मिता। टीक्षायां चिम्रमीमांसासुधायामि पूर्णताम्॥ छृति वसिष्ठगोत्रीयसिश्नरामबलस्यात्मजेन विरचितार्यां चिन्रमीमांसा- टीक्षार्यां सुधाख्यायां सन्देहालङ्कारप्रकरणं समाप्म।

Page 318

अथ भ्रान्तिमन्निरूपणम्

कविसंमतसाश्याद्विषये पिहितात्मनि। आरोप्यमाणानुभवो यत्र स भ्रान्तिमान् मतः ॥ पिहितात्मनीत्यनेनारोप्यमाणानुभवस्य स्वारसिक कविप्रतिभया कल्पनं विवक्षितम् , तस्यैव विषयपिघानसामर्थ्यात्। अतो रूपकादौ नातिव्याप्तिः। (भारती) कवियों के अभिमत सादृश्य द्वारा सिद्ध होने वाले उपमेय में उपमान का अनुभव जिस वाक्य सन्दर्भ में हो, वह वाक्यसदर्म 'भ्रान्तिमान्' माना गया है। घिमर्श-भ्रान्तिमान का अर्थ है भ्रान्तिपूर्ण ज्ञान। अत्यधिक सादृश्य के कारण ही उपमान में उपमेय की निश्चयात्मक भ्रान्ति को 'भ्रान्तिमान्' अलङ्कार कहा जाता है। डा० ब्रह्मानन्द शर्मा के अनुसार जहाँ एक ओर सादृश्य पर आधारित भ्रान्ति के कारण बाह्य होते है वहीं दूसरी ओर साम्य से अतिरिक्त भ्रान्ति के कारण आन्तरिक होते हैं। जब इसके कारण वाह्य होते हैं तव भ्रान्ति के विषय में इसकी उपस्थिति आवश्यक होती है। फलन ऐसी स्थिति में चमत्कार का कारण मूलत. भ्रान्ति होती है। किन्तु, जब इसके कारण आन्तरिक होते हैं तब ये भ्रान्ति के विषय में न रह कर दशकों या पाठकों की चित्तवृत्ति में अवस्थित होती है। निष्कर्ष रूपमें हम कह सकते हैं कि यह अलक्वार केवल भ्रान्ति में नहीं, अपितु सादृश्यप्रयुक्त आ्रान्ति में है। और सादृश्यप्रयुक्त भ्रान्ति भी यहॉ ऐसी होनी चाहिए जिसमें कविप्रतिभा का हाथ हो। इस अलङ्कार का सर्वप्रथम विवेचन रुद्रट ने किया है। किन्तु इसका स्रोत दण्डी से मान्य है। (सुधा) एवं सन्देहं निरूप्य यत्किखिद्धमंसादश्येन भ्रन्तिमदलड्कारः। प्राप्तावसरतया तस्यैव, स्वस्य विवक्षया वा निरूपणसुचितमित्याशयेनाह-अथेति। भ्रान्तिमतो लक्षणमाह- कविसम्मतसादश्यादिति। यत्र कविलम्मतसाहश्यात् पिहितात्मनि विषये आरोष्यमाण- स्यानुभवः, स आ्रन्तिमान् मत इति लक्षणान्वयः । अब्न कविसम्मतसादश्यप्रयोज्यो विषये आरोप्यमाणानुभवः भ्रान्तिमान् इत्युकके रूपकेऽतिव्यापि, अतः पिद्ितात्मनीति विशेषणम्। आरोप्यमाणानुभवस्य स्वारसिकस्य कविप्रतिभया कर्पनस्थ विषयपिधान- मर्थस्य तेन विवक्णासातिव्यापिः। स चातुभवो वर्ण्यो वा तज्जन्यो वेर्यत्र विशेषो अ्रन्थ- कृदाशयः। अत एव पिहितात्मनीति विशेषणसार्थकता।

उदाहरणम्- (चिन्न०)

कपाले मार्जार: पय इति करांल्लेढि शशिन- स्तरुच्छ्विद्रपोतान् बिसमिति करी सङ्कलयति।

Page 319

भ्रान्तिमदलङ्कारनिरूपणप्रकरणम् २७६

रतान्ते तल्पस्थान् हरति वनिताप्यंशुकमिति प्रभामत्तश्चन्द्रो जगदिदमहो विभ्रमयति॥ अन्र लेहनादिप्रवृत्तिपर्यन्ततोक्तेः स्वारसिक एव विभ्रमः कविप्रतिभया चन्द्रिकोत्कर्षद्योतनाय निबद्धः। (भारती) लक्षण में 'पिहितात्मनि' (जिसका स्वरूप छिपा दिया गया हो) यह विशेषण देकर रूपक में अतिव्याप्ति का निवारण किया गया गया है। इस विशेषण से यह सिद्ध होता है कि पूर्वोक्त अनुभव कवि की प्रतिभा से कल्पिरित होना चाहिए, क्योंकि वैसा न होने पर उपमेय के द्वारा छिपाया नहीं जा सकता है अर्थात् उपमेय को उपमान के रूप में मानने के लिए भ्रम नहीं हो सकता है। अत. उक्त विशेषण से ही रूपकादि में अतिव्याप्ति दोष नहीं है। उदाहरण जैसे- यहाँ कविने चन्द्रमा की चाँटनी विषयक अनेक व्यक्तियों के भ्रम का उल्लेख किया है। 'कितने आश्चर्य की बात है कि अपनी चाँदनी के अभिमान में चूर यह चन्द्रमा सारे ससार को भ्रान्त वनाते दिखाई दे रहा है-कहीं तो विल्वियाँ खप्परों में पडी चाँदनी को दूध मानकर चाट रही हैं, कहीं हाथी पेडों की झुरमुट में छनी चाँदनी को कमलनाल समझ रहे हैं और कहीं कोई रमणी पलग पर विखरती हुई चादनी को रतिक्रीडा के बाद अपना शुभ्रवस् जान उठाने को तैयार है। यहाँ चन्द्रमा की किरणों को देखकर बिल्ली, हाथी एव तरुणी को क्रमश दूध, कमल एव श्वेतवस्त्र का निश्चयात्मक भ्रम होने से 'भ्रान्तिमान' अलकार हुआ। (सुधा) तमुदाहरति-कपाले इति। मार्जारः कपाले पतितान् शशिनः करानू पम इति छेढि, करी तरुच्छििद्रप्रोतान् विसमिति=मृणालमिति आस्वाद्यति, वनिता रतान्ते तवपस्थान करान् अंशुकमिति हरति, प्रभामप्तशन्द्रः, इद जगत्, अहो विशेषेण भ्रमयति। अन्र कविप्रतिभया चन्द्रिकोत्कर्षद्योतनार्थ लेहनादिप्रवृत्तिपर्यन्त्रतोकके: सत्वाद् स्वारसिकअ्रम- स्येव घोत्यत्वात् भ्रान्तिमदलङ्ारः। (चिन्र०) क्वचिद् भ्रान्तेरुत्तरोत्तरं पल्लवेन चमत्कार :- बल्लाल क्षोणिपाल त्वदहितनगरे सख्जरन्ती किराती कीर्णान्यादाय रन्नान्युरुतरखदिराङ्गारशङ्काकुलाङ्गी। कृत्वा श्रीखण्डखण्डं तटुपरि मुकुलीभूतनेत्रा धमन्ती श्वासामोदानुधावन् मधुकरनिकरै्धूमशङ्कां करोति।। (भारती) कहीं कहीं 'भ्रान्ति' के उत्तरोत्तर विकास से चमत्कार होता है- 'हे वलाल, पृथ्वीपति' तुम्हारे शत्रुओं के नगर में धूमती हुई भीलनी यत्र तत्र फैले हुए रतनो को लेकर अत्यन्त कीमती खदिराद्गार की आशका से, वह व्याकुल शरीर वाली उसपर श्रीखण्ड

Page 320

₹50 चित्रमीमांसा५

के टुकडे रखकर, मुकुलित आखों से फुत्कार करती हुई श्वास रूपी परिमलों से प्रसक्त भ्रमर- समूहों में धूम की आगका व्यक्त करती है।' (सुधा) भ्रान्तेततत्तरोप्तरं क्वचिच्वमरकारो भवति। यथा उदाहरतीत्यर्थः। बल्ाल इति। हे बताळ भूमिपाल, त्वच्छत्रुनगरे सद्रमाणा मिल्ी प्रकीर्णानि रत्नान्यादाय उरतरा अतिमहती या खदिराङ्षारस्य शङ्टा तया व्याकुलाह्ी तदुपरि श्रीखण्डश्तकलं सषिप्त्वा कृत्वा, मुकुलीभूतनेत्रा फूरकारं कुवती सती घासपरिमलेन ग्रसकैरगतैः भ्रमरसमूहैः धूमशङां करोतीत्यन्वयः। (चित्र०) क्वचिद्धिन्नकर्तृ कोत्त रोत्तरभ्रान्तिनिबन्धनेन चमत्कार :- शिज्ञानैर्मञ्जरीति स्तनकलशयुगं चुम्बितं चञ्रीके- स्तत्त्नासोल्लासलीला: किसलयमनसा पाणयः कीरदष्टाः। तल्लोपायालपन्त्यः पिकनिनदधिया ताडिताः काकलोकै रित्थं चोलेन्द्रसिंह त्वदरिमृगद्दशां नाप्यरण्यं शरण्यम्।। (भारती) कहीं-कही भिन्न कर्त्ताओं वाली उत्तरोत्तर भ्रान्ति के निवन्धन से चमत्कार है। जैसे- गुजन करते हुए भौरों ने आम्रमजरी समझ कर कलग रूपी दोनों स्तनों पर मुद्द लगाया। भौरों से भयमीत होकर नायिकाओं ने उसे हटाने के लिए ज्यों ही हाथ उठाया, उसे पल्लव समझ कर तोतों ने काट खाया। तोतों से आक्रान्त नायिका ने उसे भगाने के लिए ज्यों ही वोलना प्रारभ किया, उसकी सुरीली आवाज को कोकिलालाप समझ कर कौओं ने चोंच मारना शुरू कर दिया। हे चोलनरेशों में सिह ! तुम्हारे शत्रुओं की ऐसी सुन्दर मृगनयनियों की रक्षा करने में वन मी उपकारक सिद्ध नहीं होते। (सुधा) अन्नोत्तरो त्तरभ्रान्त्या चसरकारोरकर्षाद् भ्रान्तिमत्वम्। भिन्नकर्तृकोप्तरो त्तरत्रान्तिनिय- न्घनेन कवचिष्वमतकारविशेष: । तमुदाहरति-शिक्षानैरिति । शिआ्षानैः सशब्दैश्वञ्वरीकैः अमरैः स्तन कलशयुगं मज्जरीति आान्त्या चुम्बितम, तस्त्रासोल्लासलीला: पाणयः कीरवष्टा जाताः, तवलोपाय आलपन्त्यस्ताः पिकशव्दधिया काकसमूहै: ताडिता 'आसन्। हे चोलेन्द्रसिंह, त्वच्छत्रुस्त्रीणं वनमपि शरण्यं नास्तीत्यन्वयः। अम्न नायिकायां मज्जरी प्रकारकज्ञानेन जन्यं चुम्बनं स्तनकलशावच्छेदेन पाणिविशेष्यककिसलयत्वप्रकारकज्ञाने दंशनसिद्धिः। नायिकास्वर चिशेष्यकफोकिलकूजित प्रकार कम्रान्त्या नायिका विशेष्य कको- फिल प्रकारक ज्ञानारोपेण ताढन कर्मतायाञ् मर्कारोदयः। (चिन्र०) क्वचिदन्योन्यविषयभ्रान्तिनिबन्धनेन। यथा- पलाशकुसुमभ्रान्त्या शुकतुण्डे पतत्यलिः । सोऽपि जम्बूफलभ्रान्त्या तमलि धर्तुमिच्छति॥

Page 321

भ्रान्तिमद् लट्ठारनिरूपणप्रकरणम् २८१

विस्फूर्तिमत्यां कीर्तों ते विधिवैकुण्ठशंकराः । आरोदुं शयितुं वस्तुमाकाद्न्ति सहीतले ॥। इत्यत्र भ्रान्तिमदलङ्गारो व्यङ्गयः। सादृश्यान्यमूलौ संदेहविभ्रमौ ससंदेहभ्रान्तिमदलक्कारप्रयोजकौ न भवतः । यथा- अमुष्य धीरस्य जयाय साहसी शरासनन्यां विशिखैः सनाथयन्। निमज्यामास यशांसि संशये स्मरस्त्रिलोकीविजयार्जितान्यपि।। (भारती) कहों पारस्परिक भ्रान्ति के वर्णन से भी चमत्कार है। जैसे- 'सुग्ने की चोंच को पलाश की कली समझ कर भौरा उसपर झपटता है और सुग्गा भी उसे जामुन का फल समझ कर पकडना चाहता है।' (यहाँ शुकतुण्ड तथा पलाशमुकुल एव भौंरा तथा जम्बू-फल में सादृश्य के कारण दोनों ओर से परस्पर भ्रान्ति हो रही है।) 'हे राजन्। धरती पर प्रकाशित तुम्हारी कीति पर न्रह्मा, विष्णु एव महेश क्रमशः आरोहन, शयन तथा निवास की आकाक्षा करते हैं।' अर्थात् धवल कीर्ति में ब्रह्मा को श्वेत राजहस की भ्रान्ति से आरोहण की इच्छा प्रकट करते हैं, विष्णु क्षीरसागर की भ्रान्ति से यशन- कामी हैं एव कैलाश के भ्रम में आकर शकर अधिनिवास चाहते हैं।' किन्तु यहाँ भ्रान्तिवाचक पद के अभाव से ही ध्वनि की प्रतीति है। यहा सशय और भ्रम के सादृश्य की भिन्नता में ससन्देह का भ्रान्तिमान् अलद्कार के प्रति हेतुता सभव नहीं है। और भी वक्ष्यमाण उदाहररणों में इस अलक्कार की विषयता सभव नहीं है। नैसे- 'उस समय इस धीर नल को जीतने के लिए प्रत्यक्षा को बाणों से युक्त करता हुआ अर्थात् प्रत्यञ्चापर वाणों को रखता हुआ साहसी कामदेव ने तीनों लोकों को जीतने से प्राप्त हुए अपने समस्त यग को सन्देह मे डाल दिया। (सुधा) अन्योन्यभ्रान्तिवर्णनादपि क्वचिष्तमत्कारमुदाहरति-यथेति । अलिर्भ्रसरः पलाश- कुसुमभ्रान्त्या वषतलोहित्यरूपसादृश्यात् शुकुतुण्डे पतति, सोडपि झुको जम्बूफलभ्रमेण तं भ्रमरं धत्तमिष्छतीत्यन्वयः। अन्नान्योन्यविषयभ्रान्तिनिरूपणापमत्कारेरकर्षः । आ्रान्तिसतो ध्वनिमुदाहरति- महीतले ते कीतों चिस्फूर्तिमत्यां प्रकाशवत्यां सत्यां ब्रह्मविष्णुरुदा आरोदुं शयितुं वस्तुमा काङ्कन्तीत्यन्वयः । 'अम्र भ्रन्तिवाचकपदाभावात् तस्य ध्वनित्वमिति तदाशयः। संशय- भ्रमयो: साहश्यान्यमूलतायां ससन्देदभ्रान्तिमदलक्कारं प्रति हेतुखवं न संभवति। तथा च वचयमाणोदाहरणयोर्न तद्लद्वारविषयतेति वोध्यम्। सादृश्यान्यमूलसंशयसुदाहरति- अमुष्येति। नैषधीय पथ्यम्। साइसी काम:, अमुष्य घीरस्य नलस्य विजयाय नलं जेतु-

Page 322

२६२ चित्रमीमांसा

मित्यर्थः, शरासनज्यां धनुर्श्या विशिखैः सनाथयन् तैस्सहकुवंनू त्निलोकस्य विजयेनार्जिता- न्यपि यशांसि संशये निमज्नयामास निमझानि चकार इत्यन्वयः । अग्राहु :- जयविजयो- दयोगसाह सस्य कीर्तिभ्रंश सन्देहे प्रयोजकतया नेदं ससन्देहालङ्गारोदाहरणम्। (चित्र०) दामोदरकराघात चूर्णिताशेषवक्षसा - दष्टं चाणूरमल्लेन शतचन्द्र नभस्तलम् ॥ आद्ये दुर्जयविजयोद्योगसाहसप्रयुक्त कीर्तिभ्रंशसंदेहः। द्वितीये गाढमर्म- प्रहारकृतचन्द्रविभ्रम इति। इति चित्रमीमांसायां भ्रन्तिमत्प्रकरणम्।

(भारती) 'भगवान् श्रीकृष्ण के कठोर इस्तताडन से चूणित अशेष वक्षवाले न्ाणूर के द्वारा आकाश में सैकडो चन्द्र देख गये।' प्रथम पद्य में कामदेव ने तीनों लोकों को जीतकर जो अशेष यश पाया है, वह नल को नहीं जीतने पर नष्ट हो जायेगा, अत एव ऐसे विशिष्ट एव महत्वपूर्ण कार्यसम्पादन के लिए उद्यत काम को साइसी कहा गया है। तथा महान् धीर नल को एक वाण से जीतना सर्वथा असभव होने से प्रत्यञ्वा पर अनेक वाणों का चढाना कहा गया है। अत यहाँ दुर्जय, विजय के लिए उद्योग को साइस कहा गया तथा सफलता नही मिलने पर कीर्ति नष्ट होने का मन्देह व्यक्त किया गया है। दूसरे पद् में गम्भीर मर्मप्रहार से चन्द्रमा की भ्रान्ति होने के कारण इसमें भ्रान्तिमान अलद्वार नहीं है। क्योंकि यहाँ भी वाचक पद के अभाव से उसकी प्रतीयमानता नही है। विमर्श-पण्डितराजने दीक्षित जी के 'कविसम्मतसहश्यात् विषये पिहितात्मनि' इस लक्षण का खण्डन करते हुए कहा है कि यह लक्षण भ्रन्तियुक्त वाक्य का है, अतः उसकी अतिव्याप्ति रूपक के ही वाक्य में सभव है, रूपक में नही। 'पिहितात्मनि' विशेषण उपमेय के लिए देकर रूपक की अनिव्याप्ति वारण का प्रसग जहाँ तक है, वह भी उचित नहीं होता। क्योंकि भ्रान्ति को अनुभव अर्थात बोध मानते हुए ही उन्होंने कहा है कि अनुभव में आने वाले अमेद को ही रूपक कहते हैं। अपनी परिभाषा में उन्होंने कहा है कि सादृश्य से युक्त आधार में अभेद सम्बन्ध के कारण अन्य किसी आधार अर्थात धर्मी का वास्तविक एव सादृश्य ज्ञान का कारण होने वाला निश्चयात्मक ज्ञान, चमत्कार मे युक्त होने पर भ्रान्ति कहा जाता है। यदि दीक्षित जी यहाँ रूपक पद से रूपक का वोध अर्थ लें, और उसके अनुभव होने में, लक्षण की अतिव्याप्ति न होने के लिए ही 'पिद्दितात्मनि' विशेषण की उपयुक्त्ता सिद्ध भी करना चाहें तो यह नहीं हो सकता। क्योंकि ऐसा करने पर भी 'मरकतमणिर्मेदनीघरो वा तरुण तस्तरुरेष वा तमालः' इत्यादि उदाहरण में विषयतावच्छेदक रामत्व आदि का अवगाह्न न करने वाले शुद्ध सदेह में भी अतिव्याप्ति होगी। क्योंकि यहाँ भी जिसका स्वरूप न छिपाया गया है ऐसे उपमेय में उपमान का अनुभव होता है।

Page 323

भ्रान्तिमदलक्कारनिरूपणप्रकरणम् २८३

दीक्षित जी यदि इसके लक्षण का अर्थ यह करें कि केवल उपमेय का स्वरूप ही जहाँ छिपाया गया हो, वहीं भ्रान्ति होती है। अत सन्देह में अतिव्याप्ति नहीं होती। क्योंकि वहाँ कोटियों को भी छिपाया. जाता है-उनमें से भी किसी एक का निश्चय नहीं किया जाता। किन्तु, ऐसा मानने पर भी-'तेरे मुख को भौरे कमल तथा चकोर चन्द्रमा समझ कर पीछे पीछे दौडते हैं।' इस भ्रान्तियों के समूह रूप उल्लेखालद्वार में अतिव्याप्ति रहेगी। यदि इसे उल्लेख- मिश्रित भ्रान्ति मानकर दोष परिहार करना चाहें तो वह मी सभव नहीं है। क्योंकि दूध का कोई ऐसा निर्दुष्ट लक्षण नहीं कहा जा सकता जिससे दूधमिश्रित जल में अतिव्याप्ति हो जाय। अत. दीक्षित जी का यह लक्षण भी निर्दुष्ट नहीं कहा जा सकता है। पण्डितराज के इस आक्षेप का खण्डन नागेश भट्ट के द्वारा ही दर्शनीय है। भट्ट जी इसके दो उत्तर देते हैं-प्रथम तो उक्त उदाहरण में उल्लेखत्व और भ्रान्तित्व की सकीर्णता हो जाने से ही लक्षण में कोई दोष उत्पन्न नहीं हो जाता है। जैसे भूतत्व और मूर्तत्व के लक्षण की सकीर्णता पृथ्वी, जल, तेज और वायु इन चार पदार्थो में रहती है। अत भूतत्व और मूर्त्तत्व के दोनों लक्षण यदि इन चारों में अतिव्याप्त हो जाय तो कोई दोष नहीं। क्योंकि 'नरेबरगछ़ितप्रदा०' इस उदाहरण में उल्लेखत्व और 'कनकद्रवकान्तिकान्तया' इस उदाहरण में भ्रान्तित्व सावकाश है-यह कुछ लोगों का मत है। दूसरे विद्वानों का मत है कि 'वनितेति वदन्त्येताम्' आपके इस उदाहरण में अपहुति सकीर्ण उल्लेख है, वहाँ उपमेयतावच्छेदक वनितात्व का निषेध के साथ होने से उठने योग्य अपह्वति के लक्षण की अतिव्याप्ति है ही। अत ऐसे दोषों से किसी भी प्रकार वचा नहीं जा सकता-तो फिर ऐसी स्थिति में दीक्षित जी के लक्षण पर ये सारे आरोप निरर्थक ही हैं। पण्डितराज का दूसरा आक्षेप दीक्षित जी के इस 'शिक्षानैर्मअ्रीति म्तनककशयुगं चुम्बितं चज्जरीकें:।' उदाहरण पर है। इनका कहना है कि 'कलशरूपी स्तनयुगल' में मजरी का सादृध्य कविसम्प्रदाय सिद्ध नहीं है। सादृश्यमूलक एक अलकार में सादृश्यान्तर अलकार की शोभा उपहासास्पद है। क्योंकि स्तनकलश के रूपक द्वारा मजरी के सादृश्य का तिरस्कार ही है। दूसरे चरण मे 'करिदष्टाः' पद में विधेयाविमर्श दोष है। तृतीय चरण में कोयलों के नाद कौओं के ताडन करने के योग्य नही। क्योंकि नाद की ताडना कोई नहीं करता। यदि किसी दोष के कारण ऐसा भ्रम मान भी लें तो वह सादृश्यमूल नहीं हो सकता। प्रतीतसिद्धि भी इसे नही माना जा सकता। क्यों कि 'चोर समझ कर साधु को मार डाला गया तथा 'दन्ति- युद्धया हत. शूरवराहो वनगोचर' की तरह यहाँ कार्यकारणभाव को भी नहीं समझा जा सकता है। दूसरी बात यह भी है कि कोयलों के शब्द कूजित होते हैं निनाद नहीं होता। फलत यहाँ दीक्षित जी ने भ्रान्ति अलद्कार के अश मात्र को लेकर इसे उदाहृत किया है। वस्तुत. यह इसका उदाहरण है नहीं। इसका उत्तर यही है कि भ्रान्तिमान अलद्कार के सम्बन्ध में पण्डितराज ने एक नयी व्यवस्था दी है कि जहाँ एकाधिक भ्रान्तिया होंगी वहाँ भ्रान्तिमान अलद्वार नहीं होगा। जहाँ तक परिभाषा का प्रश्न है पण्डितराज अपनी जगह ठीक हैं, किन्तु जहाँ दीक्षित जी के खण्डन का प्रश्न है-सभवत पडितराज का ध्यान उधर नहीं गया हो कि इस अलक्कार में यथार्थत कवि को भ्रान्ति नहीं होती, प्रत्युत अपनी प्रतिभा से वह अपने काव्य में जिन पात्रों को निबद्ध करता है- उनके भ्रम का ही वर्णन रह्ता है। स्वय कवि अभ्रात रूप से प्रस्तुत विषय का वर्णन करके ही

Page 324

२८४ चित्रमीमांसा

दो समान पदार्थो में अत्यधिक सादृश्य के कारण उनमें अन्य वस्तु के भ्रम का वर्णन करता है। इसमें चित्तवृत्ति का ज्ञान वर्णित भ्राति से अवश्य होता है, किन्तु हमारे चमत्कार का विषय भ्राति न होकर व्णित मानसिक दशा होती है। कवि भ्रात व्यक्ति की वास्तविक भ्राति का उल्लेख कर अपूर्व आानन्द की योजना करता है। इसमें एक ही वस्तु में एक ही व्यक्ति को अनेक पदार्थों के प्रसङ्ग में अनेक भ्रान्तियाँ भी होती है। फिर 'म्तनकलश' में मज्जरी की भ्रान्ति अस्वाभाविक क्यों ? आम की गदरायी मजरी के गुच्छे की शोभा क्या किसी कामिनी के कुच- कलश से कम आनन्ददायी है। किन्बा दोनों में सादृश्याभाव है? जहाँ तक विधेयाविमर्ग का प्रश्न है-वाक्यरचना के सामान्य सिद्धान्त विधेयाविमर्श से नियमित हैं- 'अनुवाद्यमनुक्त्यव न विधेयमुदीरयेत्। न हलब्घास्पदं किश्षित् कुन्नचित् प्रतितिष्ठति ।' द्वितीय चरण में इस नियम का स्पष्टत उल्लघन भी नहीं है। तृतीय चरण के नाद और ताडन का जहाँ तक प्रश्न है, वह नो आक्षेप लभ्यार्थ ही है। अत उक्त उदाहरण को इंतनी निकृष्ट कोटि का नहीं कहा जा सकता है।

इति चित्रमीमासाया 'भारती' हिन्दीव्याख्याया भ्रान्तिमदलङ्कारप्रकरण समाप्तभ् ।

(सुधा) तथा भ्रममुदाहरति-दामोदरकराघातेति। कृष्णस्य हस्तताडनेन चूर्णितमशेषं वक्षो यस्य तेन चाणूरेण सतचन्द्रं नभस्तलं दष्टमित्यन्वयः। अत्र गाढमर्मप्रहारकृतचन्द्रभ्रान्ति- सध्वाप् भ्रान्तिमतोऽलङ्कारतम्। त तह्वाचकपदाभावाद् प्रतीयमानता तस्य नेत्यर्थ इत्यलम्। कौस्तुभे विश्वेश्वरघरणास्तु-तद्भाववति तत्प्रकारिका मतिर्भ्रान्तिमान्। झुक्तिविशेष्य करजतत्वादिप्रकारकज्ञानं चसतकारि न सवति। अतो नातिव्याप्तिरिति लक्षणं यथाविधि व्याकृत्यैकस्यानेकप्रकारको यथा मम-'मन्दाकिन्यां वलसोहलकमलघिये केलिवाप्यां सराल-आानतये शम्भो: कपोले मुकुलित दलके स्वीयवकत्रमाय। हारागे हीरवुद्धये भुजग- पतिफणे दिव्यरतोपलब्धय, पार्वत्याः कल्प्यमाने प्रतिफलिततया पातु पीयूषररिमिः ॥' अन्रे- कस्मिन् चन्द्रे तत्तरस्थानभेदेनानेकप्रकारकं ज्ञानम । कचिद नेकेपामेकस्मिघ्ननेकप्रकारज्ञानं यथा-'सकेतकुक्भवनं प्रतिसक्षरन्तीमालोक्य सुभ्र भवर्ती गहनान्घकारे। चाम्पेयकोर- कसयी स्रगिति द्विरेफा: सौदामिनीति कलयन्ति मुदा मयूराः ॥' हृत्यप्युदाहरणमाहुः। रसगङ्गाघरकृतस्तु-'सदशे धर्मिणि तादाल्येन धर्म्यन्तरप्रकारः। सादृश्यप्रयोज्योऽनाहार्यो निश्यश्रमत्कारी भ्रान्ति: ॥'सा यत्रानूधते स भ्रान्तिमान्, मीछितसामान्य तद्गुणवारणाय धमिहणहयम्। रूपकचारणायानाहार्य इति, संशयवारणाय निश्चय इति। इदं रजतमित्य- सातिव्याप्तिदारणाय चसस्कारीति। 'अकरुणहृदय प्रियतस सुद्ामि स्वामितः परं नाहम। इत्यालपति करानवुजमादायालीजनस्य विकला सा ।' इत्युन्मादेऽतिव्याप्तिवारणाय साश्यप्रयोज्य इति। लक्षणे एुकत्वमपि विवचितम्। तेनोल्लेखे नातिव्याप्विरित्याङ्कः। तब्न

Page 325

भ्रान्तिमदलङ्गारनिरूपणप्रकरणम् २८५

तद् वृश्यने कध मंप्रकार का नेकस मवेतज्ञा न स्थले उेखसन्वावा् एकतवविबच्चार्यां 'मन्दाकिन्यां वलस' इर्यादावव्याप्तेश्व। यदपि दीक्षितो कलक्षणे रूपकव्यावृत्तये पिहितात्मनीत्युक्त्तम- युकम, आरोप्यमाणस्यानुभवस्य रूपके वर्ण्यत्वाभावात्। तदपि न, सुखादौ चन्द्राधारो- पसरवेन रूपके लक्षणान्वयसम्भवात्, आहायतदारोपानुभवस्य तत्राङ्गीकाराघ। प्राकरणिके तत्साम्याक् प्राकर णिकतया संवेदनं सभ्रान्तिमानिति तत् प्रकाशलक्षणस्य रूपके इतिध्याप्तिमाशंकय समाहितम। तत्र वस्तुतो अ्रमस्याभावात्। इह चार्थावगमनसंज्ञायाः प्रवृत्तेस्तस्य स्पष्टमेव प्रतिपन्नत्वात् इति मग्मटभट्टाः। भ्रमस्य स्वारसिकारोपस्येत्यर्थः। अर्थावगमेन=योगार्थपुरसकारेण, तस्य=स्वारसिकारोपस्य आ्रन्तिमतयावश्यकरवादिति तद्वयाख्यातारः।एवमम्रापि पिहितात्सनीति पदेन स्वारसिककविप्रतिभया कल्पनस्यारोप्य- माणानुभवे विवचितत्वात्। स चानुभवो वर्ण्यो वा तज्जन्यो वेत्यम्रानाग्रहाथ्च। यदपि 'शिक्षानैर्मज्जरी' इत्युदाहरणमुद्िश्य स्तनकलशयुगे मअरीसादृश्यं कविसमयाप्रसिद्धं येन चज्वरीकभ्रान्ति: स्यात्। दोषान्तरमूलतायामनलद्गारतवावगमास्, कलशरूपकेण मज्जरी- सादृश्यतिरस्काराच्। द्वितीयविशेषणे विधेयाविमर्शसत्वात्, तृतीयविशेषणेऽपिं पिक- निनदानां ताडनायोश्यत्वम्। तासु पिकबुद्ध धुश्पादनद्वारापि न तत्सम्भवः। तथा प्रतीतेर- सिद्ेः 'चौरबुद्धया हतः साधु.' इत्यन्र "दन्तिवुद्या हतः शूरेवराहो वनगोघरः इत्यादौ घ बुद्धिविशेषकर्तृकहननकर्मत्वस्येव विधेरित्युक्कम्। तदपि न सम्यक, मक्षरीसादृश्यस्य नायिकायां कविसमयप्रसिद्धरवास्, तज्जन्यचुम्बनस्य रतनकलशावच्छेदेन विधेयत्वाद्। नापि विधेयाविमशदोष:, द्वितीये 'कीरदष जाताः' इत्यम्र 'सविशेषणे' इति न्यायहंश- स्यैव विधेयता। तृतीयेऽपि नायिकास्वरविशेष्यकको किलकूजितप्रकार कभ्रान्तिसर्वेन नायि का विशेष्यकफोकिल प्रकार कज्ञानेन ताडनकर्मनाया विधानास दोष इत्यलं विस्तरेण। धरानन्देन रचिता ग्याख्या आ्रन्तिमतोऽखिला। टीक्ायां चित्रमीमांसासुधायामाप पूर्णताम्।। इति वसिष्ठगोभ्नीयमश्नरामवलस्य सुतेन धरानन्देन रचितायां चिश्रमीमांसा व्याख्यारयां सुधाभिधानायां भ्रान्तिमद्लङ्कारप्रकरणं समाप्तमू।

Page 326

अथ उल्लेखनिरूपणम्

निमित्तभेदादेकस्य वस्तुनो यदनेकधा। उल्लेखनमनेकेन तमुल्लेखं प्रचक्षते।। यत्र नानाविधधर्मयोग्येकं वस्तु तत्तद्ध्मयोगरूपनिमित्तभेदाद ने केन ग्रहीत्रानेकधोख्विख्यते स उल्लेखः ।

शत्रुसेनान्धिमन्थाद्रिगुणरत्नैकरोहणः ॥ (भारती) जब एक पदार्थ का अनेक व्यक्तियों द्वारा निमित्त भेद से, अनेक प्रकार का वर्णन हो, तो वहाँ उल्लेख अलक्कार होगा। निमित्त भेद से जहॉ एक ही व्यक्ति द्वारा एक पदार्थ का ही अनेक प्रकार से उल्लेख हो वहाँ 'उलेख' होता है। 'तुम्हारी कीत्तिरूपी गङ्गा के हिमाचलरूप, ओजरुपी सूर्य का उदयाचलरूप, शत्रुसेनारूपी समुद्र का मन्थाचलरूप नथा तुम्हारे गुण रूपी रल के अह्ुर स्वरूप है।' (सुधा) एवं भ्रन्तिमस्लद्वारं निरूप्य क्रमप्राप्तसुल्लेखाछङ्कारमाह-अथेति। भ्रान्तिमत्कथना- नन्तर मित्यर्थः। तन्नैफस्मिसेकधा भ्रान्तिवदनेकषा वर्णनसत्वादुल्लेखकथनस्यैव तद्षुत्तरमाव श्यकरवसिति भाव:। तम्वक्षणमारचयति-निसित्तमेदाषिति। अनेकेन अहीत्रा एकस्य वस्तुनो यलिमितभेदादनेकघोललेखनं तं बुधा उल्लेखं प्रवक्षत हृत्यन्वयः। स्वयमपि व्यापष्टे

ननेखनमुल्लेख इति तन्नक्षणम्। लक्षणे ग्रहीतु: विशेषणस्य अनेकेतिपदस्य फलं विचारयति- कीर्तिगक्षेति। कीतिरूपाया गङ्गाया हिमाचळरूपः, भोजोरुपस्सूर्यः, तस्योदयापलरूप शत्रुसेनारूप: समुद्रस्तस्य मन्थाचलरूप:, गुणरूपरत्स्याङ्कुररूपः इत्यन्वयः। (चित्र०) इति मालारूपके एकस्य राज्ञो यशस्वित्वादिधर्मयोगरूपनिमित्तभेदात्तु-

तत्र ग्रहीतृसेदनिबन्धनं न भवत्यनेकघोल्लेखनमिति नातिव्याप्तिः। विद्याविक्रमसौन्दर्यत पसां निधिमागतम्। पश्यन्ति विबुंधा: शूराः स्त्रियो वृद्धाश्र कौतुकात् ॥

Page 327

उल्लेखालङ्कारनिरूपणप्रकरणम् २८७

(भारती) इस माला रूपक के उदाहरण में एक ही राजा का यशस्वित्वादि धर्मयोगरूप निमित्त- भेद से तुषाराद्रित्वादि अनेक प्रकार से उल्लेखन है। यहाँ अतिव्याप्तिवारण के लिए लक्षण में 'अनेकेन' विशेषण दिया गया है। ऐसा करने से अनेक व्यक्तियों द्वारा एक सा अनुभव होने के कारण अर्थात् ग्रह्ीतृभेदनिवन्ध के अभाव से अतिव्याप्ति नही हुई। 'विद्वान् आई हुई विद्या को, शूर आये हुए पराक्रम को, स्त्रियाँ सौन्दर्य को तथा वृद्धजन तपस्या को आश्चर्य से निधि के रूप में देखते हैं।'

(सुधा) अत्र मालारूपके यशस्वित्वादिधमंयोगरूपनिमिस्तभेदास्ुपाराद्वित वाद्यनेकप्रका रेण राज्ञ उल्लेखनाृतिव्याप्ति: स्याव्, तद्टारणायानेकेनेति विशेषणम। गहीतृभेदस्य निषन्धनाभा- बाम्नातिष्याप्तिः। ठल्लेखनेऽनेकधेति विशेषणस्य प्रयोजनमाह-विद्याविक्रमेति। विबुषाः शूरा: ख्रि्रियो वृदाक्ष भगतं विध्याविक्रमसौन्दयंतपर्सा निधिमपश्यननित्यन्वपः। (चित्र०) इत्यत्रकस्य वर्ण्यस्य विद्यादनेकधसयोगरूपनिमित्तभेदादने केन ग्रहीत्रो- ल्लेखनमस्तीति तन्रातिव्याप्तिवारणायानेकधेत्युक्तम्। तत्र कौतुकात् स्वरूपा- वलोकनमात्रनिबन्धनं नानेकधोल्लेखनमिति तद्वयावृत्ति:। 'शिस्जानर्मजरीत स्तनकलशयुग चुम्बितं चख्रीकैः' इत्युदाहृतायामने- ककर्तृ कभ्रान्तिपरम्परायां स्तनादीनां सञ्जरीसादृश्यादिनिमित्तभेदादने केन चख्रीकादिना मश्जरीत्वाद्यनेकप्रकारेणोल्लेखनमस्तीति तत्रातिव्याप्वार- णायकस्य वस्तुन इत्युक्तम्। (भारती) यहाँ एक ही वर्णनीय विषय का विद्या प्रभृति अनेक धर्मयोगात्मक निमित्तभेद से, ग्रहीत्रा के उललेखन से प्राप्त अतिव्याप्ति दोष के निवारणर्थ लक्षण में 'अनेकधा' विशेषण का समावेश किया गया है। फलत उक्त उदाहरण में कौतुक से स्वरूपालोकन मात्र के निरूपण से अनेकवार उल्लेखनाभाव के कारण अतिव्याप्ति का स्वत निराकरण हो जाता है। 'हे चोल नरेशों में सिंह ! तुम्हारे शत्रुओं की पलियों की रक्षा करने में ये वन भी समर्थ नहीं हो सके। क्यों कि उस वेचारी के कलश रूप स्तनों को आम्रमजरी समझ कर जव मौरे उस पर आक्रमण करते हैं तो भयाक्रान्त वह अबला उन्हें हटाने के लिए ज्यों ही अपने हाथो को ऊपर की ओर उठाती है-उसे पह्व समझ कर उस पर सुग्गे आक्रमण कर देते हैं। इस आक्रमण से भाक्रात वह सुन्दरी ज्यों ही चीत्कार करती है, कि उसकी आवाज को काकली समझ कर कौए उस पर वार कर देते हैं। यह दुर्गति है जगल में उन शरणार्थी भी तुम्हारी शत्ुपलियों की।' इस उदाहरण के अनेक कर्तृक भ्रान्तिपरम्परा में मञ्जरी सादृश्यादि के निमित्तमेद से अनेक चश्चरीकादि से मअ्जरीत्वादि अनेक प्रकार का यहाँ उल्लेखन है। अतः यहाँ अतिव्याप्ति- वारण के लिए 'एकस्य वस्तुनः' यह विशेषण लक्षण में समाविष्ट किया गया है।

Page 328

२८८ चित्रमीमांसा

('सुधा) अत्रकस्य वर्णनीयस्थ विद्याथनेकममेंयोगात्मकनिमिस्तभेदेनानेकेन गरहीन्ना ठल्लेखनाद- सिव्याप्तिवारणाय अनेकधेति विशेषणम्। तन्न कौतुकाछ स्वरूपालोकनमात्रस्य निरूपण- दनेकधोलेखना भा वाज्ा तिव्याति'शिक्षानमक्षरिति पूर्वोकमाला रूपभ्रान्तिमत मअ्षरी

व्यापि: स्थात्, अत एकस्य वस्तुनः इत्युक्कम। तन्न नायिकादिवस्तूनामनेकरवाद्। (चित्र०)' कीतौं विस्फूर्तिमत्यां ते मृणालक्षीरशङ्किनः! द्वयेऽपि नागास्तन्वन्ति जिह्वान्तोल्लेखन मुह्गः ॥ इति भ्रान्तिमदुदाहरणे एकस्या एव कीर्तेरनेकेन कुञ्जरभुजङ्गरूपेण ग्रहीत्रा मृणालक्षीररूपत्वाद्यनेकप्रकारेणोल्लेखनमस्तीति तन्रातिव्याप्तिनि- रासाय निमित्तभेदादित्युक्तम्। तत्र कीर्तिगतं धावल्यमेकमुल्लेखद्वयेऽपि निमित्तम्। (भारती) 'तुम्हारी फैली हुई कीर्ति में कमलनाल और दूध की आशका से हाथी और साँप दोनों ही बार-वार अपनी जीभों को उसे पाने के लिए बढा रहे हैं।' भ्रान्तिमान के इस उदाहरण में एक ही कीर्ति का अनेक के साथ हाथी एव सर्प के रूप से ग्रहीत कमलनाल एव दूध के रूप में अनेक प्रकार से उल्लेख है। यहाँ अतिव्याप्ति निराकरण के लिए 'निमित्तमेदाद' विशेषण का समावेश लक्षण में किया है। वहाँ कीर्तिंगत एक ही धवलता ही दोनों उल्लेख में निमित्त है। (सुधा) कीर्ताविति। तव प्रकाशवत्यां कीरतौ मृणालपीरशद्गिनो द्वयेऽपि नागा गजा: सर्पाक्च मुहुर्जिद्वान्तोल्लेखन तन्वन्ति इत्यन्वयः। अम्र भ्रन्तिमति, एकस्थ वस्तुनः कीर्तिरूपस्य

निमित्नभेदादित्युक्तम्। (चिन्न०) यद्यपि गजभुजङ्गानां स्वस्वप्रियाहारलोभरूपनिमित्तभेदोऽप्यस्ति, तथापि निमित्तमेदादित्यनेनैकनिसित्तविरहो विवक्षित इति वद्वयावृत्तिः । तस्य संग्राह्यत्वे निमित्तसेदादिति स्वरूपकथनमात्रम्। एवमपि यदि- कान्त्या चन्द्रं विदु: केचित्सौरभेणाम्बुजं परे। वक्त्रं तव वय ब्रूमस्तपसैक्यं गतं छ्वयम्।। इत्यपह्नवोदाहरणविशेषेऽतिव्याप्तिः शङ्खया, तदानीमनेकधोल्लेखनं निषेधास्पृष्टत्वेन विशेषणीयम्। तत्राद्योल्लेखनद्वय परमतत्वोपन्याससामर्थ्या- द्वम्यमाननिषेधमिति नातिव्याप्तिः ।

Page 329

उल्लेखालङ्कारनिरूपणप्रकरणम् २६६

(भारती)

यद्यपि यहाँ हाथी और सांपों के अपने अपने प्रिय आहार के लोभ रूप निमित्त भेद भी है; फिर भी एक निमित्त विरह के निमित्त भेद से विवक्षा के कारण वहाँ उस तरह के लोभ का अभाव है। पूर्वकथित रूप से इसे ग्रहण करने पर भी उसके स्वरूपकथनमात्रत्व की आपन्ति होगी। एवमपि से दूसरी अतिव्याप्ति की आशका का निराकरण करते हैं- नायिका नायक से कहती है- तुम्हारे मुख को कुछ लोग कान्ति के कारण चन्द्रमा कहते हैं दूसरे लोग सुगन्ध के कारण कमल कहते हैं, पर हम तो कहते हैं कि तप करके दोनों एकता को प्राप्त कर लिये हैं। अतः तुम्हारा मुख उन दोनों का मिश्रित रूप है। अपहुति के इस उदाहरण में अतिव्याप्ति की का होती हो तो अनेक प्रकार के उल्लेख अर्थात् ज्ञान के साथ लक्षण में 'निषेध से स्पर्श न किया हुआ' यह विशेषण लगा देना चाहिए। इस पद्य में पहले दो उल्लेखों का दूसरे के मत के रूप में कथन के सामर्थ्य से निषेध अभिव्यक्त होता है। अत वैसा कर देने से यहाँ अतिव्याप्ति न होगी।

(सुधा) तत्र तूसलेखदूये एकस्येव भावल्यस्य निमित्ततासत्वाद धर्मान्तरमाश्रित्यातिष्यासिं

प्रकारान्तरेण समाधते-तथापीति। एकनिमितविरइस्य निमित्तभेदपदेन विर्व्ितर्वेन तत्र तादृशलोभत्वस्य तद्टत्ताभावात, तथात्वस्य आ्ह्यरवे तु तस्य स्वरूपकथनमात्र त्वापत्तेः। अतिव्याप्त्यन्तरमाशङ्य निराकरोति-एवमपीति। केचित् वक्त्रं कान्त्या चन्द्रं विदुः, परे सौगन्ध्येन क्मल विदुः, वयं तपसा एवरूपतां गतं तद्दयं मुखमिति बूम इत्यन्घयः। अन्रापह्वतावेकस्य वक्त्रस्यानेकेन ग्रहीम्रा कान्त्यादिनिमित्तभेदेन चन्द्ररवाधने- करूपेणोल्लेख नादतिव्याप्ति स्यादतस्त द्वारणयानेकधोहलेख ने निषेधास्पृष्टर्वसिति विशेष णमावश्यकम्। तम्न केचिदादिपदोपन्याससामर्थ्यात्तिषेघप्रतीयमानतया तादशनिषधेन स्पृष्टश्वाद नातिव्यापिरिति दिक। (चित्र०) स्त्रीसि: कामोऽर्थिभि: स्वर्द्रुः काल: शत्रुभिरैक्षि सः। अत्र चानेकधोल्लेखने रुच्य्थित्वभयादिकं यथायोगं प्रयोजकम्। रुचिर- भिरतिः । अर्थित्व लिप्सा। द्विविधश्चायमुल्लेखः-शुद्धोऽलङ्कारान्तरसङ्कीणश्च। तत्र शुद्धो यथा- गजन्रातेति वृद्धाभिः श्रीकान्त इति यौवतैः। यथास्थितश्र बालाभिर्द्ृष्टः शौरिः सकौतुकम् ।। अत्र यस्तथा भीतं भक्तं गजं त्वरया त्रायते स्म सोडयमादिपुरुष इति वृद्धाभि: संसाराद्गीत्या तदभयार्थिनीभि: कृष्ण: पुरः प्रविशन् दृष्टः, यस्तथा चञ्जलत्वेन प्रसिद्धाया लच्म्या अपि कामोपचारवैदग्वयेन नित्यवल्लभः १६ चित्र०

Page 330

२६० चित्रमीमांसा

सोऽयं दिव्ययुवेति युवतीभिः सोत्कण्ठाभिर्दट्, बालाभिर्वालस्वभावाद्यथा स्थितरूपवेषयुक्तो दृष्ट इति सर्वत्र वस्तुसता नानारूपेणोल्लेखादयं शुद्धः। (भारती) 'उस राजा को तरुणियों ने काम के रूप में, याचकों ने कल्पवृक्ष के रूप में तथा शत्रुओं ने साक्षात् काल के रूप में देखा।' यहाँ एक ही राजा के सोन्दर्य, उसका दान तथा उसके पराक्रम से स्त्री, याचक एव शत्ुओं की क्रमशः रुचि, याचना और भय के निमित्त भेद से काम, कल्पतरु और काल रूप अनेक प्रकार से दर्शन होने के कारण लक्षण का समन्वय है। यह उल्लेख दो प्रकार का है, शुद्ध और अन्य अलद्गारों से मिश्रित सक्कीर्ण। वहाँ शुद्ध उल्लेख जैसे-श्रीकृष्ण के मथुरा प्रवेश का यह वर्णन है- 'श्री कृष्ण को वृद्धाओं ने गजन्राता अर्थात् आदि पुरुष नारायण के रूप में वथा युवत्तियों के समूह ने लक्ष्मीकान्त के रूप में एव वालाओं ने जिस रूप में वे थे, उसी रूप में उन्हें कौतुक अर्थात् आश्चर्य के साथ देखा।' यहॉ जो उस प्रकार भयभीत भक्त गजराज की शीघ्रता से रक्षा किये हैं, वही ये आदिपुरुष भगवान नारायण है, ऐसा ससार से डरी हुए वृद्धाओं ने नगर में प्रवेश करते हुए श्रीकृष्ण को देखा। जो अपने कामोपचार वैदग्ध्य से चचला नाम से प्रसिद्ध लक्ष्मी के लिए नित्यवह्लम है; वही ये श्रीकृष्ण है-इस रूप में उन्हें युवतियों ने उत्कठा भाव से देखा। वालाओं ने उपने वाल- स्वभाव के करण श्रीकृष्ण को यथास्थित रूपवेष युक्त ही देखा। यहाँ सभी जगह एक ही वस्तु का अनेक रूप में उल्लेख से यह शुद्ध उल्लेख है। (सुधा) तमुदाहरति-स्त्ीभिरिति। अन्नैकस्यैव राजः सौन्दर्यवितरणपराक्रमशालितया स्थ्या-

दर्शनस्वाव्वप्वणसमन्वयः। तद्विभागमाह-द्विविध इति। शुद्धसङ्टीणभेदेन द्विषा इस्यर्थः । अलक्वारान्तरसक्कीर्णतारहित: शुद्ध इत्यर्थः। तमुदाहरति-गजन्रातेति। श्री कृष्णस्य मथुदाप्रवेशवर्णनमिदम। शौरिः कष्णो वृद्धाभि: गजन्रातेति सकोत्षुकं द्ृष्टः, युव- तिसमूहै: उचमीकान्त इति, बालाभिर्यंथावस्थितवेष एव दष्टः इत्यन्वयः। अन्न सकौतुक- मित्यस्य सवंत्र सम्बन्धः । स्वयमपि श्रोकं व्याकरोति-अत्रेति। तथा भीतगजस्य यरव- रया म्राता सोऽयमादिपुरुषा नारायण इति लसाराद्भयार्थिन्या वृद्धा: पश्यन्ति स्म। अतिचक्षलश्नियोऽपि कामोपचारचातुर्य्येण नित्यवन्नभो दिव्यतरुणरूप इति तं धुवतिसमूद्द: सोत्कण्ठः पश्यति स्म। बालास्तु यथास्थित स्वाभाविकरूपवेषयुक्त पश्यन्ति स्मेति सवत्र वस्तुतो विथमानेन नानारूपेणोछ्षलेखादयं शुद्धः। अयमिति कथनेव स्त्रीभिरित्यस्यारोपरू परूपकसंकीणतेति विशेष: प्रतिपाद्यते। (चिन्न०) यथा वा हर्षचरिते श्रीकण्ठजनपदवर्णने- 'यस्तपोवनमिति मुनिभिः, कासायतनमिति वेश्याभिः, लासकै, यमनगरमिति शत्रुभिः चिन्तामणिरित्यथिभि: वीरक्षेत्रमिति संगीतशालेति

Page 331

उल्लेखालङ्कारनिरूपणप्रकरणम् २६१ शस्त्रोपजीविभिः, गुरुकुलमिति विद्यार्थिभिः, गन्घर्वनगरमिति गायकैः, विश्वकर्ममन्दिरमिति विज्ञानिभिः, लाभभूमिरिति वैदेहकैः, धूर्तस्थानमिति वन्दिभिः, साघुसमागम इति सद्गि, वत्रपस्जरमिति शरणागतः, विटंगोष्ठीति विदग्धैः सुकृतपरिणाम इति पथिकः, असुरविवरमिति वाहिकः, शक्याश्रम इति शमिभिः, अप्सरःपुरमिति कामिभिः, महोत्सवसमाज इति चारणैः, वसुधारेति च विप्रैरगृह्यत।' अत्र तपोवनादिभूयिष्ठत्वात्तपोवनाघ्युल्लेखः शुद्धः। (भारती) और जैसे हर्षचरित में श्रीकठदेश के वर्णन प्रसग में- जिसे मुनिलोग तपोवन समझते थे, वेश्याएँ कामगृह समझती थीं, नर्त्तकलोग सगीतशाला समझते थे, शत्रुलोग यमराज का नगर समझते थे, याचकगण जिसे चिन्तामणि की भूमि समझते थे, शस्त्रोपजीवी लोग जिसे वीरक्षेत्र समझते ये, छात्रगण जिसे गुरुकुल समझते थे, गायक लोग जिसे गन्धर्व नगर समझते थे, विज्ञानवेत्ता जिसे विश्वकर्मा का मन्दिर समझते थे, वणिक् जन जिसे लाभ की भूमि मानते थे, वन्दीगण जिसे धूर्तस्थान (जुआ खेलने की जगह) समझते थे, सज्जन लोग जिसे साधुसमागम की भूमि मानते थे, शरणागत लोग जिसे वज्र का पिंज़रा समझते थे, चतुरलोग जिसे विटों की गोष्ठी मानते थे, पथिक जन जिसे अपने पूर्वजन्मार्जित पुण्य का फल मानते थे, वाहिक लोग जिसे असुरों की कन्दरा समझते थे, भिक्षुलोग जिसे बौद्ध विहार समझते थे, कामी जन जिसे अप्सराओं के नगर मानते थे, चारणगण जिसे महोत्सव समाज समझते थे तथा विप्रलोग जिसे वसुधारा (धन का प्रवाह) समझते थे-ऐसा वह श्रीकठ- देश था। यहाँ तपोवनादि के भूयिष्ठत्व से तपोवन से शुद्ध उल्लेख है। (सुधा) शुद्धान्तरमुदाहरति-यथा वेति। हर्षचरिते श्रीकृष्णजनपदवर्णने गद्यम्। यो देशो सुनिवेश्यानर्तकश त्रुया चकशस्त्रो पजी विविद्याथिगायकविज्ञानिवे देहकवन्दिसूतशरणागत-

एकस्मिन्ननेकेन सुन्यादिरूपेण ग्रहीन्ना तत्तक्िमित्तभेदेस्तपोवनत्वाद्यनेकरूपेणोइलेखसत्वा न्निषेधेनास्पृष्टत्वाप्चोल्लेखलक्षणसमन्वयः। अयमपि, शुद्धः, तपोवनादि भूयिष्ठत्वादुवलेख- सम्भवास्। (चित्र०) अत्रैव यमनगरत्वाद्युल्लेखः सङ्कीणः । तत्र यदि यमनगरत्वादीनामुपरञ्जक- तामात्रेणान्वयस्तदा रूपकसक्करः । यदि ताद्रूप्यानुभावगोचरतया, तदा भ्रान्ति- मत्सद्करः । अयं चोल्लेखो वर्ण्यगुणोत्कर्षख्यापनायाचेत नकर्तृ कोऽपि निबध्यते। यथा तत्रव हर्षवर्णने- 'निःस्नेह इति धनैः, अनाश्रयणीय इति दोषैः, निग्रहरुचिरितीन्द्रियैः, दुरु- पसप इति कलिना, नीरस इति व्यसनैः, भीरुरित्ययशसा, दुर्गह-चित्तवृत्तिरिति चित्तभुवा, स्त्रीपर इति सरस्वत्या, षण्ढ इति परकलत्रैः, काष्ठामुनिरिति

Page 332

२ह२ - चित्रमीमांसा

यतिभि:, धूर्त इति वेश्याभिः, विनय इति सुहृद्धि: कर्मकर इति विप्रः, असहाय इति शत्रुयोधैः, एकमप्यनेकधा गृह्यमाणम' इति। (भारती) यहाँ ही 'यमनगर' इत्यादि में सकीर्ण उल्लेख है। वहाँ यदि 'यमनगरत्वादि' का उपरजकता मात्र से अन्वय है तव तो रूपक मिश्रित शकर है और यदि ताद्रूप्य के अनुभव की गोचरता से अन्वय है तो भ्रान्तिमिश्रित सद्वर है। यह उल्लेख वर्णनीय विषय के गुणोत्कर्ष वतलाने के लिए अचेतन कर्त्ता के निवन्धन से भी चमत्कार उत्पन्न करते हैं। जैसे वहाँ ही हर्षवर्णन में- 'धन उन्हें समझना था कि इनमें हमारे प्रति स्नेह कुछ भी नहीं है, दोष कहते कि हमारे ये आश्रय के योग्य नहीं हैं, इन्द्रियाँ कहतीं कि सम्राट हमे निगृहीत रखना चाहते हैं, मयश चिछाता कि सम्राट डरपोक हैं, कामदेव समझता कि इनकी चित्तवृत्ति दुर्ग्ह है, सरस्वती कहती कि ये सैण्य हैं, परकीया स्त्रियां कहतीं कि ये नमुसक हैं, यतिगण कह्ते कि ये पहुँचे हुए तपस्वी हैं, वेश्याएँ इन्हें धूर्त्त कहतीं, सुहृद्ग कहता कि ये नेय हैं अर्थात् इनकी वुद्धि दूसरों पर निर्भर रहती है; ब्राह्मण कहते कि ये हमारे नोकर हैं। वरिष्ठ शच्ु लोग इन्हें कहते हैं कि बहुत से दूसरे इनके सहायक हैं, (यहॉ 'असह्दाय' एव 'सुसहाय' दो प्रकार के पाठ भेद है मैंने 'सुसहाय' को उचित समझा है। इस प्रकार एक ही सम्राट को लोग 'अनेक प्रकार से ग्रहण करते थे।'

(सुधा) अन्रैंव संकीर्णतां प्रतिपादयति-अत्रैवेति। यमनगरत्वादीनासुपरअक्तामात्रविवकणे रूपक्रेण संकीर्णता। यदि तु ताद्रप्यानुभवस्य गोघरत्व तदा भ्रान्तिमता संकीर्ण: । छचि- दूर्णनीयस्थ गुणानामुर्कर्षख्यापनायाचेतनक्तृकोतलेखव निवन्धनादृपि चमरकारमुदाहरति- यथा तन्रेवेति। धनदोषेन्द्रियकलिव्यसनायशःकामसरस्वतीपर कलत्रयतिवेश्या सुहृदविप शत्रुयोधैरेकमप्यनेकधा गृह्यमाण हर्ष नृपमित्य चेतनकर्तृक्ोवलेखक्षमरकारीति।, (चित्र०) भ्रान्तिमदलङ्कारादयोऽप्येवमचेतनकर्तृका निबध्यन्ते- भिन्नेषु रत्नकिरणैः किरणेष्विवेन्दो- रुचाव चैरुपगतेषु सहस्त्रसंख्याम् । दोषापि नूनमहिमांशुरसौ किलेति व्याकोशकोकनदतां दधते नलिन्यः ॥ इत्यादौ। मधुलुब्धा मधुकरास्तृषिताश्च चकोरकाः । सुगन्धि कान्तिसंपन्नमनुधावन्ति ते मुखम्॥ इत्यत्रोल्लेखो व्यङ्चः। 'विद्याविक्रमसौन्दर्य' इति श्लोके विद्यादीनां स्व- रूपावलोकनकौतुकमात्रे निमित्ततया यदि न विश्रान्ति:, किन्तु विद्वत्तादुल्लेख- वद्वलोकनकौतुकनिमित्ततारयां पर्यवसानं तदा तत्राप्युल्लेखनगतानेकधात्ववि- च्छित्तिविशेषस्य गम्यत्वादुल्लेखालद्वारो गम्यः ।

Page 333

उल्लेखालङ्कारनि रूपणप्रकरणम् २६३

(भारती) अचेतन कर्नृक भ्रान्ति का उदाहरण देते हैं- 'इस रैवतक गिरि पर चन्द्रमा की किरण के, अनेक प्रकार के रतों की किरणों से मिश्रित होने के कारण सस्रों की सख्या में हो जाने पर कमलिनियाँ निश्चय ही यह सूर्य है-ऐसा मानकर रात्रि में भी विकसित कमलपुष्पों वाली बन जाती हैं।' यहाँ अचेतन कर्तृक अतिशयोक्ति अलद्कार से भ्रान्तिमान् अलद्कार की व्यञ्जना है। 'मधु के लोमी भौरे तथा तृषायुत चकोर सुगन्धित एव कान्ति से युत तुम्हारे मुख की ओर दौड रहे हैं।' शब्दशक्ति द्वारा अप्रतिपादित रहने के कारण यहाँ उल्लेख की व्यङ्गता है 'विद्यार्विक्रम- सौन्दर्य' इत्यादि पूर्व उदाहृत श्रोक में स्वरूप देखने के कौतुक मात्र में विद्या प्रमृति की निमित्तता से विश्रान्ति के अभाव में विद्वत्ता आदि के उल्लेख की तरह अवलोकन कौतूहल निमित्तत्व के पर्यवसान में उल्लेखगत अनेक प्रकार की विच्छिति विशेष की गम्यता में वहाँ उल्लेख की न्यङ््यता जाननी चाहिए।

(सुधा) उक्तचमत्कारमन्पत्राप्यतिदिशति-आ्रन्ति मदित्यादि। अचेतनकर्तृका आ्रन्तिरुदा- हियते-भिन्नेष्विति। उप्नावचैः रत्किरणैः भिन्नेषु सहस्तसंख्यामुपगत्तेषु भिन्नेषु इन्दोः किरणेषु सत्सु रात्रावपि नूनं रविरसी विछुः किलेति नलिन्यो व्याकोशकोकनकदतां दघते हत्यन्वयः । अन्नाचेतनकर्तृका भ्रान्तिरित्यर्थः । व्यक्ष्यमुल्लेखसुदाहरति-मघुलुब्धा इति। मधुलोभिनो अ्रमरास्तृषायुताश्षकोराश्च सुगन्धि कान्तिचुतं ते सुखमनुधावन्तीत्यन्वयः। अन्नोहकखस्च व्यत्वत्वमू, शब्दधकस्याऽपतिपादिततवास। विद्याविक्रमेतिपूर्वो दाहरणे स्वरू पावलो कनकौतुकमात्रे विद्यादीनां निमित्ततया विश्रान्तेरसावे विद्वत्तादलेखवद्वलो- कनकौतूहकनिमित्तत्वे पर्यवसाने उल्लेखगतानेकप्रकार कविच्छिवित्तिविशेषस्य गग्यतायान्सु तन्नोतलेखस्य व्यङ्यत्वमिति बोष्यम्। (चित्र०) परिव्राट्कामुकशुनामेकस्थामेव योषिति। कुणपः कामिनी भत्त्यमिति तिस्रो विकल्पनाः ॥ इत्यत्राप्युल्लेख इष्यत इति लक्षणस्य नातिव्याप्िः। अथापर उल्लेखप्रकार :- ग्रहीतृ भेदाभावेऽपि विषयाश्रयभेदतः । एकस्याने कघोल्लेखमप्युल्लेखं प्रचक्षते ।। तत्र विषयभेदादनेकधोल्लेख:, शुद्धः सङ्कीणश्च। शुद्धो यथा- अकृशं कुचयो: कृशं विलसने विपुलं चक्षुषि विस्तृतं नितम्बे। अधरेऽरुणसाविरस्तु चित्ते करुणाशालिकपालिभागघेयम्।। 'गुरुर्वचसि, प्ृथुरुरसि, विशालो मनसि, जनकस्तपसि, सुमित्रस्तेजसि,

Page 334

२६४ चित्रमीमांसा

सुमन्त्रो रहसि, बुधः सदसि, अर्जुनो यशसि, भीष्मो धनुषि' इत्यादौ श्लेष- सङ्कीणः । (भारती)

अतिव्याप्ति की आशका का परिहार करते हैं-'सन्यासी' कामुक और कुत्ते का एक ही 'योषिति' में कुणप, कामिनी और भक्ष्य ये तीन विकल्प हैं। 3. यहाँ उल्लेख की स्वीकृति से अतिव्याप्ति का परिहार हो जाता है। अब दूसरे उल्लेख का भेद वताते हैं- 'जहाँ जञाताओं के अनेक न होने पर भी विषय अथवा आश्रय में से किसी की अनेकता के कारण एक वस्तु के अनेक प्रकार हों, वहाँ भी उल्लेख अलक्कार कहते हैं।' वहाँ विषय भेद से अनेकता के कारण उल्लेख भी दो प्रकार का है-शुद्ध औौर अन्य अलक्कार से मिश्रित। शुद्ध उल्लेख (स० २) जैसे- 'परम सौभाग्यशाली करुणानिधान भगवान् शकर के हृदय में, स्थूलस्तन, विशाल नेत्र, विस्तृत नितम्ब एव रक्तिम अधरवाली पार्वती प्रकट हों।' यहाँ ज्ञाता शिव के द्वारा कुचादि आश्रयभेद से एक का भागधेयत्व के सीथ अध्यवसित पार्वती रूप का अकृशत्व आदि अनेक रूप के उल्लेख से शुद्ध उल्लेख के लक्षण का समन्वय है। वचन में गुरु, वक्ष स्थल में स्थूल, मन में विशाल, तपस्या में जनक, तेज में सुमित्र, मन्त्रणा में सुमन्त्र, सभा में वुध, यश में अर्जुन, धनुष में भीष्म इत्यादि में शविष्ट संकीर्ण उल्लेख है। तात्पर्य यह कि यहाँ उपर्थुक्त सभी शब्द श्लेष अर्थात् द्वयर्यक है। जैसे-गुरु का अर्थ महान् और वृहस्पति दोनों है। इसी प्रकार पृथु=विस्तार और राजा पृथु। विशाल-उदार, शोमित अथवा विशाल नामक राजा, जनक=उत्पन्नकर्ता एव मिथिलानरेश, सुमित्र=सूर्य और राजा, सयत=योग्य और माननीय। वुध=विद्वान् और ग्रहविशेष, अर्जुन=धवल और पार्थ, भीष्म=मयानक और गाङ्गेय। इसप्रकार उक्त सभी शब्दों में अखण्ड श्लेष है।

(सुधा) अतिव्याप्तिमाशङ्कघेष्टपत्या परिहरति-परिवाडिति। यतिकामुककशनामेकन्र योषिति कुणप :; कामिनी; भधयम् ; इति तिसो विकल्पना जाता इत्यन्वयः । अन्रतु उश्लेखसथ्वा- स्रीकारेण नातिध्यासतिरिति दिक। द्वितीयमुसलेखं लक्षणभेदेन वकतं प्रतिजानीते-अथेति। तमक्षणमाह-ग्रहीत्रिति। प्रहीतृणां भेदाभावेप्येकस्यैव वस्तुनो विषयाश्रयमेदेनानेकधो- सलेसमप्युक्लेखं वितुधा: प्रचक्षते इत्यन्वयः । रहीतृभेदाभावेऽपि विष्यभेदादेकस्य बहुघोक्लेखनमिति तक्लक्षणमित्यर्थः। अयमपि द्विविध :- शुद्ध:, सक्कीर्णक्ष। शुद्धमुदाहरति अकृशमिति। कपालिनो हरस्य भागधेय भाग्यं त्त्वेनाध्यघसितं पार्य- तीस्वरूप चित्ते आविरस्तु प्रकटीभवत्विति सम्न्ध:। कीटशम् ? कुचयोः कुचविषयेऽकशं स्थूलम एवं विलसे छशम् 'विळमो मध्यळप्यो.' इति विश्वः। चक्ुषि घिपुलमायतम् नितम्बे विस्तृतम्. अधरेऽसणस, चित्ते इति मध्यमणिन्यायेनोभयत्र सम्बध्यते। तेन चित्ते

अयमेदेनैकस्य करुणाशालि इति पाठान्तरन्तु क्रमभह्गदोषादयुकमिति बोध्यम्। ग्रहीत्रा शिवेन कुचादया

Page 335

उल्लेखालङ्कार निरूपणप्रकरणम् २६४

समन्वयः । सक्कीर्णंमुदाहरति-गुरुवचसीति। ... उरःस्थलमनस्तपस्तेजोरहस्सदोथशोधमु- राश्रयीभूतदिषयभेदेनेकस्य राजो गुरुवादनेकमोहलेखनात्तम्र श्लेषसत्वाप्त सक्कीणरमू। अयमर्थ :- गुरुमहान् जीवश्च, पथुर्विस्तृतो नृपश्च, विशाल उदारः शोभितो वा नृप- विशेषो वा, जनक उत्पादयिता मेथिलश्च। सुमिश्रो रविनृपक्ष, संयतो योग्यो माननीयक्ष, सुधो दिद्वान् अहविशेषश्र, अर्जुनो धवल: पार्थश्र, भीष्मो भयानको गाङ्गेयक्षेत्यत्र सर्वत्रा- खण्ड ए श्लेष:। (चित्र०) 'हंसमयीव गतिषु, परपुष्टमयीवालापे, चक्रवाकमयीव पतिप्रेमणि, प्रावृण्म- यीव पयोधरोन्नतौ, कमलमयीव कोशएंग्रहेषु, कुसुममयीव फलदानेषु' इत्याद्यु- त्प्रेक्षासङ्कीर्णः । पयेधरोन्नतावित्यादौ विषयांशे श्लेषसङ्कीर्णश्र । 'युधिष्ठिर: सत्यवचसि' इत्यादौ रूपकसङ्कीणः । 'युधिष्ठिरसमः सत्यवचसि' इत्यादावुप- मासक्वीर्ण इत्याद्युन्नेयम्। (भारती) गतियों में इसी की तरह, आलाप में कोयल की तरह, पतिप्रेम में चक्रवाक की तरह, उन्नत पयोधरों मे प्रावृट् (वर्षा) की तरह, कोशसग्रहों में कमल की तरह, फल देने में फूल की तरह, इत्यादि में उत्प्रेक्षा सकीर्ण उल्लेख है। (क्यों कि यहाँ गति, आलाप, पतिप्रेम, पयोधर-उन्नति, कोशसग्रह और फलदान आदि विषयों में हसी आदि रूप से एक ही राजे की पतियों के वर्णन में सभावनार्थक 'इव' शब्द के प्रयोग से उत्प्रेक्षासकीर्ण उल्लेख है।) पयोधरोन्नत आदि विषय के अश में क्लेष सकीर्णता है। 'सत्यवचन में युधिष्ठिर के सदृश युधिष्ठिर है' इत्यादि में उपमा सकीर्ण उल्लेख कहना चाहिए। (सुधा)

दानादिविषयेषु हंस्यादिरूपेणैकस्या नृपस्तियो वर्णनाव संभावनार्थकेवश्दपयोगादुम्प्रेषा- संकीर्णत्वम्। पयोधरोन्नतादिविषयांशे श्लेषसंकीणेत्व सत्यवछसि युधिष्ठिरे एव युधिष्ठिर इति रूपकसंकीर्णरवम्। तन्नैव युधिष्टिरसम इत्युक्तावुपमासंकीर्णरवम्। (चित्र०) अधिकरणभेदेनानेकधोल्लेखो यथा- वर्धिष्णोरुपरि क्षणं रविरभूच्छत्रं बलिध्वंसिनो रत्नं मूध्नि ललाटसीम्नि तिलकं कर्णान्तिके कुण्डलम्। अंसे चक्रमुरःस्थले मणवरो नाभौ सरोजासनो यस्याङ्घ्रौ कटकस्त्रविक्रमगतेः पायादपायात् स वः॥ अन्र रूपकसङ्कीण। भगवल्ललाटमध्यकर्णान्तादितत्तदवयवाभिसुखस्थित- ग्रहीतृसेदनिसित्तोल्लेखसद्वीर्णश्च। एकस्यैव द्रष्टुर्ललाटसध्ये कर्णान्तिके च रविदर्शनासंभावत्।

Page 336

२६६ चित्रमीमांसा

(भारती) अधिकरण के भेद से भी अनेकवार उल्लेख का उदाहरण जैसे- 'तीनो लोकों में पराक्रमप्राप्त, वर्धिष्णु, वलिविध्वसक भगवान् वामन-जिनके ऊपर क्षणमात्र के लिए सूर्य छत्र रूप में थे, तथा माथे पर रत के रूप में, ललाट में तिलक के रूप में, कान के समीप कुण्डल के रूप में, कधे पर चक्र के रूप में, हृदय पर मणिश्रेष्ठ के रूप में, नाभि में कॅमलासन ब्रह्मा के रूप में, तथा अध्नि में कर रूप से शोभित थे-वे तुम्हारी विघ्नों से रक्षा करें।' यहाँ सूर्य में आरोप, आश्रयभेद के द्वारा अनेक प्रकार के वर्णन से रूपक सद्कीर्ण अधिकरण भेद से उल्लेख जानना चाहिए। विभिन्न अवयवाभिमुखस्थित अनेक ज्ञानों के वैसे अनुभव रहने के कारण ही यहाँ प्रथम सद्कीर्ण उल्लेख है। क्योंकि एक ही देखने वाले के लिए भगवान् वामन के विभिन्न अवयवों में वैसे सूर्य के दर्शन की सभावना नहीं है। (सुधा) अधिकरणभेदेनाप्यनेकधोक्लेखन मुदाहरति-वर्धिष्णोरिति। त्रिविक्रमगतेः वर्धिष्णो विध्वसिनो यस्योपरि रविस्सूर्य: छणमात्र छत्रम्, मूर्ण्नि रतम, छलाटदेशे तिलकमू, कर्णसमीपे कुण्डलम्, असे चक्रम, वसि मणिश्रेष्ठः, नाभौ सरोजासनः, अड्घ्रौ कटकः अभूस स घामनो वो युष्मान् अपायात् विघ्नात्, पायात रक्षतु इत्यर्थः । अन्र रवी तु सदा- रोपसत्वादाश्रयभेदेनानेका वर्णनाथ रूपकसंकीर्णाधिकरणभेदेनोतलेख इति बोध्यम्। प्रथमोक्लेख संकीर्णंतापि तत्तदवयवाभिमुखस्थितानासनेकप्रहीतृणामेव तथानुभवसतादू। एकस्य द्रष्टुः तत्तद्वयवेु तादृशरविदर्शनस्यासम्भवाच। (चित्र०) 'यस्य वह्िमयो हृदयेषु, जलमयो लोचनपुरेषु, मारुतमयः श्वसितेषु, क्षमा- मयोऽङ्गेपु, आकाशमयः शून्यतासु, पञ्महाभूतमयो मूर्त इवादृश्यत निहृतप्रति- सामन्तान्तःपुरेषु प्रताप: ।' अत्र वह्नि जलादिश्दगृहीततापबाषपादिरूपाणां प्रतापकार्याणां प्रतापस्य चाभेदकथनं हेत्वलङ्कार इति तत्सक्करः। मतान्तरे रूपकसक्करः । कस्तूरीतिलकादि भालफलके, देव्या मुखाम्भोरुहे रोलम्बन्ति तमाललोलमुकुलोत्तसन्ति मौलि प्रति। या कर्णे विकचोत्पलन्ति कुचयोरंशे च कालागुरु स्थास्यन्ति प्रथयन्तु तास्तव शिवं श्रीकण्ठकण्ठत्विष: ॥। (भारती) हर्षचरित में राजा हर्ष के प्रताप वर्णन का यह गद्याश है-"जिस राजा का प्रताप पञ्न- मद्दाभूतस्वरूप भरे हुए शत्रुओं के अन्त पुरों में मूर्त्तिमान की तरह दिखाई पडता है। उसके स्वरूप का प्रतिपादन करते हैं कि हृदयों में अगिरूप से, आख रूपी नगरों में जल रूप से, श्वासों में हवा रूप से, अङ्गों में क्षमा रूप से, शून्यताओं में आकाश रूप से ही राजा का प्रताप मू्चिमान की तरह दिखलायी पडता है।" यहाँ अभि आदि शब्दों से प्रतिपाध तापादि कार्यों के कारण स्वरूप प्रताप के अभेद कथन से

Page 337

उल्लेखालङ्कारनिरूपणप्रकरणम् २६७

हेतु अलद्वार सङ्गीर्ण उल्लेख है-यह चन्द्रालोक का मत है। काव्यप्रकाश आदिके मत में यहाँ रूपकसंकर है। 'भगवान् श्रीकण्ठ महादेव के कण्ठ की कान्ति तुम्हारे कल्याण का विस्तार करे। वह कण्ठ- च्छवि कैसी है तो-जो भगवती भवानी के ललाट पट्ट में कस्तूरी-तिलक की तरह शोभती है, सुख कमल में भौरे की तरह आचरण करती है, माथे पर तमाल के कोमल मुकुलोत्तस की तरह शोभती है, स्तनाग्र पर जो कालागुरु की छाया की तरह आचरण करती है' (सुधा) पुनरलंकारान्तरसंकीर्णर्वमुदाहरति-यस्येति। हषंचरिते तत्प्रतापवर्णनगद्यम। यस्य राज: प्रताप: पञ्जमहाभूतस्वरूपो निहतशत्रणामन्तपुरेषु सूतिमानिवादृश्यतेत्यन्वयः। पन्नमहाभूतरूपतां प्रतिपादयति-हृदषेप्वभिरूप इत्यादिना। अन्न वह्नयादिशब्दप्रति- पाद्यतापादिकार्याणां तरकारणीभूतप्रतापस्य घाभेदकथनादू हेतवलंकारसंकीणरवसिति चन्द्रालोकमतम्, 'हेतुहेतुमतो वे वयवर्णन हेतुरुष्यत' इति तल्नक्षणस्य तत्र प्रतिपादनाव्। काव्यप्रकाशादिमते रूपकसकरः, तेन तस्यानद्गीकारच्छ।उपमासंकीणसुपलेखमुदाहरति- कस्तूरीतिलकादीति। ताः श्रीकण्ठस्य शिवस्य कण्ठकान्तयः तव शिवं कल्याणं प्रथयन्तु विस्तारयन्तु। कास्ता इस्यत आह-या या देव्या पार्वत्या ललाटपट्टे कस्तूरीतिलकमि- वाचरन्ति, मुखकमले रोलम्बा भ्रमरा इवाचरन्ति, सौलि प्रति तमालवालसुकुलोत्तंसमिवा- रन्ति। कर्णयोर्विकघोरपलमिवाचरन्ति, कुधयोरंसे व कालागुरुच्छ्ायेवाचरन्तीति, तस्यान्वयः । अत्रोपमासंकीर्णत्वमिति। (चिन्न०) अन्रोपमासङ्वीर्णः। केचित्तु तत्तदधिकरणौचित्यात् कस्तूरीतिलकादितादा- त्म्यसंभावनायामुपमार्थे विहितोऽपि क्विवुत्प्रेक्षायां पर्यवस्यतीत्युपमोपक्रमोत्प्रेच्षे- यमित्याहुः। तन्मते उत्प्रेक्षासङ्गीर्णः । एवमलङ्कारान्तरसङ्करोऽप्युन्नेयः। इति चित्रमीमांसायामुल्लेखप्रकरणम्।

(भारती) यहाँ उपमा से मिश्रित उल्लेख है। उन उन अधिकरणों की सम्भावनाओं में औचित्य से कस्तूरी तिलक आदि की सभावना में उत्प्रेक्षा ही उपमा के अर्थ में विहित रहने पर भी यहाँ क्विप् प्रत्यय की उत्प्रेक्षा में पर्यवसान रहने के कारण कुछ लोग इसे उत्प्रेक्षा अलद्वार ही मानते हैं। उनके मत में उत्प्रेक्षा सक्कीर्ण उल्लेख है। इसी प्रकार अन्य अलद्कारों के समिश्रण की भी उद्- भावना करनी चाहिए। विमर्श-दीक्षित जी ने'कान्ताचन्द्र विदु केचित्' इत्यादि अपह्ुति के उदाहरण में अति- व्याप्ति वारण के लिए 'उल्लेख' के लक्षण में 'निषेध स्पर्शन किया हुआ' विशेषण का समावेश किया है। तथा श्रीकठ देग के वर्णन में 'जिसे मुनिलोग तपोवन समझते थे' इत्यादि में शुद्ध उल्लेख माना है, और 'शत्रुलोग यमराज का नगर समझते थे' इसमें भ्रान्ति, तथा 'शरणागत जन इसे वज्रपिज्जर मानते थे' इसमें रूपक आदि से मिश्रित उल्लेख माना है-पण्डितराज 1

Page 338

२६द चित्रमीमांसा

जगन्नाथ ने इन सवों का विरोध किया है। उनका कहना है कि यदि 'अपहुति' की अतिव्याप्ि निवारण के लिए आप लक्षण में 'निषेध से स्पर्श न किया हुआ' विशेषण लगाते हैं तो 'कपाले मार्जार: पय इति' इत्यादि आप ही के द्वारा उदाहृत भ्राति में उल्लेख की अतिव्याप्ति कैसे मिटायी जा सकती है? क्यों कि मार्जार आदि अनेक ज्ञाताओं द्वारा अनेक प्रकार का उल्लेख यहाँ भी तो है ही और अपने अपने प्रिय आहार आदि के लाभ की इच्छा रूप निमित्त का भेद भी है ही। अत उल्लेख जव मिश्रित होता ही है तो फिर उसे हटाने का वह दीक्षित जी का सारा प्रयास निरर्थक ही तो है। लेकिन वस्तुत उल्लेख साहृश्य गर्भ, अभेदप्रधान आरोपमूलक अलक्गार है। इसका अर्थ है लिखना किन्तु यहाँ इसका अभिप्राय वर्णन से है। इस अलकार में एक वस्तु का अनेक प्रकार से वर्णन होता है। इसमें अनुभविता को एक ही वस्तु का ध्यान अनेकधा होता है। इसका वर्ण्य विषय एक ही होता है, किन्तु, वर्णन विभिन्न प्रकार से व्यक्ति दृष्टिभेद के कारण अनेक प्रकार से करते हैं। इसके एक प्रकार का अनेकधा ज्ञान दो प्रकार से समव है-अहीतृभेद एवं विषय- भेद से यहीं समिश्रण या सकर की उत्पत्ति होती है। जब ग्रहीता या अनुभविता किसी विषय का अनेक प्रकार से वर्णन करता है तब यह आवश्यक नहीं कि वह उस वस्तु में निहित अनेक गुणों या धर्मों का उल्लेख करे ही। अत ऐसी स्थिति में सम्मिश्रण से उत्पन्न दोषों के निवारणार्थ - 'निषेध से असपृक्त' विशेषण की निरर्थकता कैसे सिद्ध होती है? जहाँ तक मिश्रित उल्लेख के निवारणार्थ लक्षण में प्रयुक्त विशेषण का प्रश्न है-उसकी उपयो- गिता तो इसी से सिद्ध होती है कि इन्हीं विशेषणों के माध्यम से तो कवि वस्तुसौन्दर्य की व्याप- कता का निदर्शन कर अपनी कल्पना शक्ति को विस्तृत पीठिका पर अधिष्ठित कर देता है। तभी तो इसके निरूपण में वस्तुसौन्दर्य का अनेक रूप में चित्रण करते हुए कवि को न केवल आत्मवल ही प्राप्त होता है प्रत्युत उसमें अप्रस्तुत योजना करने की शक्ति का ज्ञान भी होता है। इस अलकार में कवि एक विषय का वर्णन करने के लिए अनेक उपमानों का नियोजन करता है,- जिससे इसकी सादृश्यमूलकता प्रकट होती है। एक वस्तु के लिए जितने उपमान प्रस्तुत किये जाते है उनका उक्त वस्तु के साथ अभेद या अभिन्नता होती है तथा उस पर अन्य पदार्थो का आरोप भी होता है। यही उल्लेख का सौन्दर्य है, अत ऐसी स्थिति में दीक्षित जी का लक्षण सवथा निर्दुष्ट ही प्रतीत होता है। इति चित्रमीमासाया 'भारती' हिन्दीव्याख्यायामुल्लेखालद्कारप्रकारण समाप्तम्।

केचित्यन्रोत्श्रेघ्वास कीर्णतामाहुः। तन्मतमाह-तत्तदिति। तस्य तस्याधिकरणस्य (सुधा)

सम्भावनायामौचित्यारकस्तूरीतिलक्का दिसम्भावनाया मुतप्रेक्षैव उपमार्थे विहितस्याप्यत्र क्िप्प्रत्ययस्थोपेप्षार्यो पर्यवसाने वाधकाभवा्। वस्तुतसतु वाकमलुमस्कीर्ण त्वमेदावश्यकम 'कर्पूरन्ती दशोर्मम' इतिवत् सादृश्यप्रतियोगिन उपमानाद्विहितस्य किप उत्प्रेक्षायां पर्यवसाने प्रमाणाभावादित्यस्वरसः केचिदित्याहुरित्यनेन सूचित इत्यवधेयम्। प्रकरणमुपसंहरति-एवमिति। अलंकारान्तरसकरोऽपीति । 'भानुरभियमो वाऽयं बलिः कर्णोडथवा शिविः। प्रत्यर्थिनश्ार्थिनश्च विक्शपन्त इति स्वयि॥'अन्न सन्देहसंकीर्णता। 'उपरि कर वालधाराकारा: करा भुजङ्गमपुद्रवास।अन्तस्साक्षादु दाप्ादीक्षागुरवो जयन्ति केऽपि

Page 339

उल्लेखालङ्गार निरूपणप्रकरणम् २हह

जना: ॥' अन्नोपमा्यतिरेकयोः समुच्नयेनोल्लेखस्य सकीणतेत्यादिकमपि बोध्यमित्यलम्। रसगद्ाधरकृतस्तु-एकस्य वस्तुनो निमित्तवशा दनेकर्हीतृभिरनेकप्रकारकं ग्रहण तदुल्लेखः। 'अधरं विम्बमाज्ञाय मुखमब्जञ् तन्वि ते। कीराक्ष चञ्चरीकाश् विन्दन्ति परमां मुदम्॥'

अहीतृभिरिति। 'नृत्यत्वद्वाजिरा जिप्रकर खुर पुट प्रोज् तैर्धू लिज लै रालो कालो कभूमीध रमतुल- निरालोकभावं प्रयाते। चिश्रन्ति कामयन्ते रजनिरिति घिया भूतले सर्वलोकाः, कोका: क्रन्दुन्ति शोकानलविकलतया किव्व नन्दन्तयुलूकाः ॥' अन्नातिग्याप्तिवारणायानेकप्रकार- कमिति। यत्त-दीभ्षितैनिषेधास्पृष्टत्वमिति विशेषणस्। तन, सङ्गीर्णस्य तस्याङ्गीकारात्। अन्यथा 'कपाले मार्जारः' इत्यन्राअ्रन्तिमत्यतिव्याप्तिवारणाय अ्रमास्पृष्टतवमपि विश्वेषणीयं स्यादिति। असत्यपि अ्रहीव्रनेकरवे विषयाश्रयसमानाधिकरणादीनामन्यतमानेकप्रयुकमेकस्य वस्तुनोऽनेकप्रकारकतवं द्वितीयोल्लेखः । 'अनत्पतापा: कृतकोटिपापा गदैकशीर्णा भवदुः- खजीर्णाः । विलोक्य गङ्गां विचलत्रङ्गाममी समस्ता: सुखिनो भवन्ति ॥'अन्र पूर्वार्धोदीरि- तानों चतुर्णां चिलोकनकर्तणां सुखित्वोक्त्या तापपापरोगभवनाशकत्वप्रकारकाणि ग्रहण- न्याष्तिप्यन्ते। अयं शुद्धस्य ध्वनिः। सकीर्णस्य यथा-'स्मयमानाननां तत्र तां विलोक्य विलासिनीम्। चकोराश्ज्वरीकाश्च सुदं परतरां ययुः ॥' अन्र ध्वन्यमानयेकेकग्रहणरूपया आ्रान्त्या तदुभयसमुदायात्मा उल्लेखः। द्वितीयोक्लेखस्य ध्वनिर्यथा-'भासयति व्योमगता जगदखिवल कुमुदिनीर्विका सर्यात। कीतिस्तव धरणिगता सगरसुतायाससफलतां नयते।' अम्राधिकरणभेदप्रयुक्कमे- कस्यां कीर्तौ चन्द्रिकारवसागरत्वरूपानेकविवत्व रूपकसंकीणतवं ध्वन्यते। सम्बन्धिभेद- प्रयुक्वर्ण्यानेकविधतापि यथा-'यमः प्रतिमद्दीभृता हुतवहोसि तण्नीवृतां सतां खल युधिष्ठिरो धनपतिर्धनाकाह्किणाम्। गृहं भरणमिच्छतां कुलिशकोटिभिनिमितं, त्वमेक इह भूतले बहुविधो विधान्रा कृतः ॥' दति वर्णयन्ति। प्रकाशानुसारिणस्तु-एकस्येवार्थस्य स्थानमेदेन नानारूपतया भेदप्रतीतावतिशयोककिरेव। यथा- 'प्रत्यम्भो नवपुण्डरीकमुकुलश्रेणी प्रतिथमाधरं पुर्णेन्दो रुचयः, प्रतिक्षितिरुह मखी- प्रसूनोरकरः। किञ्व्ान्यस कथयामि वीर जगतीमालिस्ृति त्वद्यशःस्तोमौघः प्रतिदेशमेव दिविषत्स्रोतस्वतीनिर्झरः ॥'अन्र एकस्या एव छीरतेः स्थलविशेषेषु तत्तदोग्यरूपेणाध्यवसा- नावतिशयोकि:। एवमेकस्य बहुसिज्ञातृमितनेकप्रकरैज्ञतेऽप्यतिशयोकिरेव यथा- 'मल्लानाभशनिनृणां नरवरः स्त्रीर्णा स्सरो मूतिमान्, गोपनां स्वजनोऽसतां च्षितिभृतां शास्ता स्वपित्रोः शिशुः। सृत्यु्भोजपतेबिराडविदुषां त्त्वं पर योगिना, वृष्णीनां पर- देवतेति विद्ितो रहँ गतस्साग्रः ॥'पवज्ञातिशयोक्तयेंव सिद्धावुल्लेखस्य पृथगङ्गीकरण- मयोग्यमेव। एवं द्वितीयभेदस्यापि भेदेप्यभेदरूपातिशयोकावेवान्तर्भावात् कथनमध्य युक्कमिति वदन्ति। एतन्मते उल्लेखो नास्तयेवेत्यलम। उल्लेखालंकृतिव्याख्या धरनन्देन निर्मिता। टीकायां चित्रमीमांसासुधायामाप पूर्णताम्।। इति वाशिष्ठगोत्रीयवामबलस्य सुतेन धरानन्देन रचितायां चित्रमीमांसा टीकार्या सुधासिधानायामुल्लेखाल कात्प्रफरण समाप्तम्।

Page 340

अथ अपहुतिनिरूपणम् अकृतस्य निषेधेन यदन्यत्वप्रकल्पनस्। साम्यादपह्वतिर्वाक्यभेदाभेदवती द्विधा ॥ (भारती) 'उपमेय का निषेध करके, सादृश्य के कारण अन्य होने की कल्पना को 'अपहुति' कहते हैं। वह वाक्य के भिन्न होने और एक होने द्वारा दो प्रकार का है।' विमर्श-अपहृति का अर्थ है गोपन, छिपाना, वारण या निषेध। इस अलक्कार में प्रकृत अर्थात् उपमेय को छिपाकर अप्रकृत अर्थात् उपमान की स्थापना की जाती है। निष्कर्ष यह कि इस अलद्वार में यथार्थ को छिपा कर अयथार्थ को प्रकट किया जाता है। इस में गोपन क्रिया का महत्व ही विशेष रूप में दर्शनीय होता है। क्यों कि इसी के द्वारा सादृश्य भावना की इसमें सिद्धि निहित हैं। गोपन क्रिया का आधार मात्र ग्रहण कर सादृश्य की पुष्टि की जाती है। इसके मूल में सादृश्य को लेकर ही अलङ्कार शक्तियों में अनेक मतभिन्नताऍ परिदरशित होती हैं। आधुनिक विद्वानों ने इसकी सादृश्यमूलकता स्वीकृत की है। (सुधा) एचमुब्लेखालद्टारं व्याख्यायारोपमान्नसमतवेनापसुतिरपि निरुपणीयेति तबिरूपणं प्रतिजानीते-अथेति। अपहतिरिति। निरुप्यते इति शेष। अथ तल्वष्षणमारचयति- प्रकृतस्य निषेधेन साम्यात यदन्यत्वप्रकष्पनं साऽपहतिरिति लक्षणार्थः। त्वेदानाह- वा्यभेदाभेदाभ्यामपह्नतिर्ह्विधेत्यर्थः। साम्यादन्यत्व प्रक्लपनमपह्तिरिति लक्षणे 'मुखंचन्द्रः' इति रूपकेऽतिव्याप्ति. स्यादिति तह्वारणाय, निषेधेनेति। साम्यात् प्रकृतस्य निषेधमात्रम- पह्नतिरिति लक्षणे 'नाहं दूती वरतनोरद्गतापोऽतिभास्वरः' इत्यर्थके आक्षेपेऽतिव्यापि:

व्याप्िः। प्रकवृतनिषेधेनान्यत्वप्रकक्ष्पनमपह्वतिरित्युक्के 'कामः पञ्चषाणो न, किन्तवसंख्य- बाणः' इश्यत्रातिशयोक्तावतिव्याप्तिवारणाये साम्यादिति। (चिन्न०) अन्यत्वकल्पनमात्रं रूपके, विषयनिषेधमात्रम् 'नाहं दूती वरतनोरङ्गतापो- डतिभास्वरः' इत्याच्ेपे, उभयमपि साम्यविशेषणरहितम्। 'न पञ्चविशिखः काम: किन्त्वपञ्चशिलीमुखः' इत्यतिशयोक्तौ चातिव्याप्तमिति विशिष्टोपादानम्। न चैवम् 'न पद्मं सुखमेवेदम्' इति तत्वाख्यानोपमायां विषये पद्मत्वनिपेधस्य मुखत्वप्रकल्पनस्य च सच्वादतिव्याप्तिः। प्रकल्पनपदस्यारोपपरत्वात्। 'निपिध्य विषयं साम्यादन्यारोपः' इति तवाप्रत्ययेन लक्षणं नोक्तम्। वच्यमा- णोदाहरणे आरोपपूर्वकापह्नचेऽतिव्याप्तिप्रसङ्गात्।

Page 341

३०१ 50

(भारती)

साम्य के कारण अन्यत्वप्रकल्पनमात्र रूपक के 'मुख चन्द्र' इस उदादरण में अतिन्याप्ति वारण के लिए अपहुति के लक्षण में 'निषेधेन' विशेषण का समावेश किया गया है। 'नाह दूती वरतनोरङ्गतापोऽतिभास्वर' इत्यर्थक आक्षेप में अतिव्याप्ति वारण के लिए, साम्य से प्रकृत के निषेध- मात्र अपह्वति के लक्षण में 'अन्यत्वप्रकल्पनम्' विशेषण दिया है। इसी विशेषण के कारण उक्त उदाहरण में निषेध रहने पर भी अन्यत्वप्रकल्पनाभाव से अतिन्याप्ति नहीं होती है। प्रकृत के निषेध से अन्यत्व प्रकल्पन 'अपहुति' है ऐसा कहने पर 'काम पञ्नवाण नहीं है, अपितु असख्य वाणवाला है' इस अतिशयोक्ति के उदाहरण में अतिव्याप्ति दोष हो जाता है। इसके निवा- रणार्थ लक्षण में 'साम्यात्' विशेषण दिया गया है। प्रकृत का निषेध करके, असादृश्य के कारण अन्य होने की कल्पना को यदि 'अपह्ुति' कह्ते हैं तो-'यह कमल नही है, मुख ही है' इत्यादि तत्त्वाख्यानक उपमा में विषयत्व रूप पझ्मत्व के निषेध से मुखत्वप्रकल्पन के कारण अतित्याप्ति होती है। उसके निवारणार्थ प्रकल्पन शब्द का आरोपपरत्व अर्थ माना गया है। ऐसा मानने पर पझ् में मुखत्व के आरोपाभाव से अतिव्यापि नहीं होती है। इस के बाद प्राचीनोक्त लक्षण का खण्डन करते हैं-'निषिध्य विषयं साम्यादन्यारो- पोऽपह्नतिः' अर्थाव उपभेद का निषेध कर सादृश्य के कारण अन्यारोपको 'अपहुति' कहते हैं' यह वत्वा प्रत्ययपूर्वक लक्षण युक्तिसगत नहीं है। क्योंकि कत्वा प्रत्यय का विधान-'समान- कर्तृकयो धात्वर्थयो पूर्वकाले विद्यमानाद्ातो क्त्वा स्यात्' इत्यर्थक 'समानकतृकयोः पूर्वकाले' इस सूत्र से पूर्वकाल में ही क्त्वा प्रत्यय होता है। उसका उत्तरकालिक अन्यारोप के इस उक्त लक्षण से, आरोपपूर्वक अपहुति के-'विकसदमरनारी नेत्रनीलाव्जखण्डानि' इत्यादि में पूर्व निषेधाभाव से अतिव्याप्ति नहीं है। (सुधा)

प्रफृतस्य निषेधेन यदसाम्यादन्यत्वप्रकल्पनमपह्नतिरित्युक्ती 'न पझमं मुखमेवेदम'

व्याप्तिवारणाय प्रकसपनशब्दस्यारोपपरत्वमिति। तथा च पझमे सुखरवारोपाभावाक्षाति व्यापतिः। प्राचीनोंकं लक्षणं खण्डयति-'विषय निषिध्य साम्यादन्यारोपोऽपह्नतिः' इति वर्वाप्रत्ययपूर्वकं लक्षणत्त्वयुक्तमेव, पूर्वकाल: कत्वाप्रत्ययार्थः, तदुत्तरमन्यारोप इति लक्षणे 'विकसद्मरनारीनेत्रनीलाव्जखण्डानि' इत्यादावारोपपूर्दकापहती पूर्व निषेधाभावासा- व्याप्ति: स्यादिति तद्भावः। (चित्र०) इयं च साक्षान्निषेधकनवादिप्रयोगे परपक्षत्वाद्युपन्यासे निषेधसासर्थ्याद्ध म्यत्वे च वाक्यभेदेन प्रवर्तते। विषयासत्यत्वप्रतिपादकच्छद्दानिभकपटव्याजा- दिशन्दप्रयोगे विषयासत्यत्वपर्यवसायिरूपवपुर्नामभङ्गचादिशब्दप्रयोगे च तद- भेदेन।

Page 342

३०२ चित्रमीमांसा:

अत्र वाक्यसेदेऽपह्नवपूर्वक आरोप आरोपपूर्वकापह्नवश्चेति द्वैविध्यम्। क्रमे- णोदाहरणानि- अवाप्तः प्रागल्भ्यं परिणतरुचः शैलतनये कलङ्गो नैवायं विलसति शशाङ्कस्य वपुपि। अमुष्येयं मन्ये विगलदमृतस्यन्दशिशिरे रतिश्रान्ता शेते रजनिरमणी गाढमुरसि॥ (भारती) वह अपह्नुति कहीं वाक्यमेद से है और कहीं उसके अभेद से है। अपह्ुति में नञ् (नहीं) आदि के द्वारा साक्षात्, अथवा 'दूसरे के मत से सिद्ध होने' आदि के द्वारा कुछ व्यवधान से जब उपमेय का निषेष समझाया जाता है, तब प्राय वाक्यभेद होता है। अर्थात् एक वाक्य में उपमेय का निषेध रहता है, दूसरे वाक्य में उपमान का ताद्रूप्य। इस प्रकार वाक्यभेद की प्रवृत्ति में भी अपहुति दो प्रकार की होती है। और जव वही निषेध मिष, छल, छझ्, कपट, व्याज, वपु, आत्मा आदि शब्दों से समझाया जाता है, तब वाक्य के अमेद से होती है। इसके अतिरिक्त कहीं निषेध पहले रहता है और कहीं आरोप पहले। अर्थात् वाक्यभेद भी दो प्रकार के हैं-कहीं निषेधपूर्वक आरोप है और कही आरोपपूर्वक निषेध। क्रमशः इसके उदाहरण देते हैं (निषेधपूर्वक निरवयव आरोप के उदाहरण, जैसे)- 'गैलतनये। सकल कलापूर्ण इस चन्द्रमा के बिम्ब पर स्पष्ट रूप से प्रकट होने वाला यह कलद्क नहीं शोभ रहा है। यह तो वस्तुत निशानायिका है, जो सुधास्यन्द से शीतल उसके वक्षःस्थल पर रतिक्रीडा से शिथिल हुई गाढ निद्रा में पडी सो रही है।' (यहाँ उपमेयभूत 'कलक' की 'नैवायम्' इस नकारात्मक शब्द द्वारा निषेध से और उपमान- भूत 'रजनिरमणी' की कल्पना से वस्तुत उसके अवयवाभाव में वाक्यभेद की 'निरवयवा' निषेधपूर्वक अपहुति है।) (सुधा) तां विभजते-इयञ्चेति। अयसर्थ :- सा क्वचिद्वाक्यभेदेन प्रवर्तते, कचितदभेदेन। नजादि प्रयोगे वाध्ये, परपस्त्वाद्यपन्यासनिषेधस्यार्थतो गम्यत्वे चेति द्विछा वाक्यभेदप्रवृत्ति:, एवं वाक्यभेदप्रवृत्तावपि द्वैविष्यम। असत्यत्वप्रतिपादकच्छुलनिभादिशब्दानां प्रयोगे, तदसत्यत्वपर्यवसायिरूपवपुषा नामसह्गयादिशब्दानां प्रयोगे छ। तम्र वाक्यमेदे द्वैवि- ध्यमू-निषेधपूर्वक आरोप:, आरोपपूर्वको निषेधक्ष। सर्वेषामुदाहरणानि वक्तुं प्रतिजानीते-कमेणेति। तन्न निषेधपूर्वकमारोपसुदाहरन् निरवयवसावयघरूपतां तस्य श्लोकह्येनोदाहरति- अवाप्त इति। हे शैलतनये पर्णतकान्तेश्चन्द्रस्य वपुषि प्रागतम्यमवातोडयं कलङ्टो न प्रफाशते, घिगलदमृतस्य स्यन्देन शीतले चन्द्रस्योरसि गाढं रतिश्रान्ता रजनिरमणी शेते इत्यहं मन्ये इत्यन्वयः। प्रथमवाक्ये कलंकस्थ निषेधेन तर्सान्यादुत्तरवायये तन्न रजनिरमणीत्वप्रकरूपनेन पस्तुतस्तद्षयवाभावाह्वाक्यभेदेन निरवयवा निषेधपूर्वकापह्तिरिति भावः।

Page 343

अपहुतिनिरूपणप्रकरणम् ३०३

(चित्र०) यथा वा- नेदं नभोमण्डलमम्बुराशिर्नेमाश्च तारा नवफेनपुाः। नायं शशी कुण्डलितः फणीन्द्रो नायं कलङ्कः शयितो मुरारि:॥ पूर्वत्र निरवयवापह्नुतिरत्र सावयवेति भेद: । अङ्कं केऽपि शशङ्किरे जलनिघे: पङ्कं परे मेनिरे सारङ्गं कतिचिच्च सञ्जगदिरे भूच्छायमच्छन् परे। इन्दौ यद्दलितेन्द्रनीलशकलश्यामं दरीद्ृश्यते तत्सान्द्रं निशि पीतमन्धतमसं कुक्षिस्थमाचक्त्महे॥। इत्यत्राप्यपह्नवपूर्वक आरोपः । अपह्नवस्तु परपक्षोपन्यासादर्थसिद्धः । (भारती) अथवा जैसे- 'यह गगनमण्डल नहीं, यह तो क्षीरसागर है, ये तारागण नहीं, ये तो फेनखण्ड हैं, यह चन्द्रमा नहीं, यह तो कुण्डल वाँधे शेषनाग है और यह कलद्व नहीं, यह तो शयन करते भग- वान विष्णु हैं।' यहॉ वाक्यभेद से आकाश आदि का पूर्व निषेध से उसके बाद समुद्र आदि सावयवों का उन-उन स्थानों में कल्पना से वाक्यभेद मे 'सवयवा' निषेधपूर्विका अपहुति है। 'कुछ लोग चन्द्रमा के काले धव्बे को कलङ्क मानते हैं, कुछ समुद्र का कीचड मानते हैं, कुछ हिरण कहते हैं और दूसरे लोग पृथ्वी की छाया मानते हैं किन्तु, मेरी समझ में टूटे नीलमणि के समान जो कालिमा दिखाई पडती है वह चन्द्रमा के द्वारा रात में पिया गया अन्धतमस् (रात्रि का अधकार) है, जो (पीने से) पेट में बैठ गया है। यहाँ भी अपह्ववपूर्वक भारोप है। दूसरे के मत से अर्थसिद्ध अपह्वव यहाँ है। (सुधा) वाक्यभेदेन सावयवा निषेधपूर्विकामपहुतिसुदाहरति-यथा वेति-इंदं नभोमण्डलं नास्ति, अपि तु समुद्रोऽस्ति, इमाः तारा न सन्ति, अपि तु नवफेनसमूहा: अयं चन्द्रो न वर्तते, किन्तु फुतकुण्डलकः शेषः, अय कलफ्टो न, अपि तु मुरारिः कृतशयनोऽस्तीत्य- न्वयः। अम्र वाक्यभेदेन नभआदीनां पूर्व निषेधेन तदुत्तरं समुद्रादीनां सावयधानां तन्न ककपनाद वाक्यभेदे सावयवा निषेधपूर्विकापह्नतिरिति भावः। वाक्यभेदेन परपत्त्वाध पन्यासेन निषेधस्य गम्यत्वे निषेधपूर्विकामपह्नतिमुदाहरति-अङ्कमिति। इन्दौ यत् दलितेन्द्र नीलमणे खण्ढवत् श्यामं दरीदृश्पते, तरकेऽपि कवयः कलंक शशर्किरे, परे ससुद्र- स्य कर्दमं मेनिरे, कतिचित् सारद्ं सक्जगदिरे, परे भूमिच्छायमेच्छन्, वयन्तु सान्द्रं धनं रात्री पीतं कुषिस्थं गाढतमसं तसू इति ब्रमहे इत्यन्वयः । अत्र वाक्यभेदेन केऽपीत्यादिप-

(चित्र०) विकसद्मरनारीनेत्र लीलाव्जषण्डा- न्यधिवसति सदा यः संयमाध:कृतानि।।

Page 344

२०४ चित्रमीमांसा

न तु रुचिरकलापे वर्तते यो मयूरे वितरतु स कुमारो ब्रह्मचर्यश्रियं वः ॥ अत्रारोपपूर्वकोऽपह्नवः शाब्दः । मन्थानभूमिधरमूलशिलासहस्त्र- संघट्टनव्रणकिण: स्फुरतीन्दुमध्ये। छाया मृगः शशक इत्यपि पामराणां लोके गतानुगतिक: प्रथितः प्रवाद: ॥ (भारती) 'जिसने अपने सादृश्य से नील कमलों को भी तिरस्कृत कर दिया है-ऐसी देवाङ्गनाओं की विकसित आंखों में न कि रुचिर कलापी मयूर पृष्ठों पर अधिवास है जिनका ऐसे स्वामी कार्ति- केय तुम लोगों को ब्रह्मचर्य का श्रेय दें।' यहाँ अरोपपूर्वक शाब्दी अपह्ुति है। 'समुद्रमथन काल में मथनदण्ड स्वरूप मन्दराचल के मूल में अवस्थित हजारों शिलाखण्ड के सघर्ष से चोट लगने पर घाव के कारण जो चन्द्रमा के बीच में यह छेद दिखाई पढता है, उसके सम्बन्ध में यह भूमि की छाया है, मृग है अथवा शशक है-ऐसा अतिमूर्खों के प्रवाद इस दुनिया में गतानुगतिक रूप से फैला है।' (सुधा) अथ वाक्यभेदेमारोपपूर्विकां नजादिपद्वाध्यनिषेधरूपामुदाहरति-विकसदिति। यां साग्येनाघ: कृतानि विकसताममरनारीनीक्क्मलाना खण्डानि सदाधिवसन्ति 'उपा- न्वध्याअवसः' इरयाधारस्य कर्मत्वम्। रुचिरकलापे मयूरे तु यो न वर्तते स कुमारः स्वा मिकार्तिकेयो ब्रह्मचर्यश्नियं वितरतु ददारिवन्वयः। अन्न पूर्वमारोपः प्रश्वान्नजपद्वाच्यो निषेधः, वाक्यभेदश्व स्पष्ट एव। तथा च वाक्यभेदेनारोपपूर्विका शान्दनिषेधमृस्यरूपापड- - मन्थानो मथनदण्ड:, स घासी भूमिधरो मन्दर, तस्य मूलभागे यच्छ्रिलासहसत्ं तेन सडघट्टनात् मो व्णस्य किणश्छिद्म्, इन्दुमन्ये प्रकाशते, सूमे: छाया, मृगः, शशक इत्यतिपामदाणां मूर्खंतमाना प्रवादो लोके गतानुगतिकोऽस्तीत्यन्वयः । न्नारोपपूर्दक- निषेध: पामरवचनादर्थसिद्ध इति वाक्यमेदेनारोपपूर्विका पामरवचनार्थसिद्धनिषेधरूपा- पह्ुतिरिति बोष्यम्। (चित्र०) अत्राप्यारोपपूर्वकोऽपह्रवः। स च पामरवचनोपन्यासादर्थसिद्धः। एतानि वाक्यभेदेनोदाहरणानि। एकवाक्यतायां तु- बत सखि कियदेतत् पश्य वैरं स्मरस्य प्रियविरहकृशेऽस्मिन् कामिलोके तथा हि।

प्रतिविशिखमने नोट्टक्वितं कालकूटम्॥।

Page 345

अपहुतिनिरूपणप्रकरणम् ३०५

अमुष्मिह्ावण्यामृतसरसि नूनं मृगद्दशः स्मर: शर्वप्लुष्टः पृथुजघनभारे निपतितः। यदङ्गाङ्वाराणां प्रशमपिशुना नाभिकुहरे शिखा धूमस्येयं परिणमति रोमावलिवपुः॥ (भारती) यहाँ आरोपपूर्वक निषेध पामरवचन से अर्थिद्ध है। फलत. यहाँ आरोपपूर्वक निषेध मूर्खो के कथन से अर्थसिद्ध निषेध रूप अपहुति अलद्वार है। इस प्रकार वाक्यभेद के उदाहरणों की व्याख्या कर उसके अभेदत्वप्रतिपादक छलादि शब्द के प्रयोग में प्रतीत अपह्ुति का उदाहरण देते हैं- 'भरी सखी! कितने दु.ख की बात है कि प्रियविरह से खिन्न हम सरीखे प्रेमीजन पर कामदेव इतना द्वेष रख रहा है कि अपने वाणों-उपवनों की आम्र-मजरियों-को उन पर मँडराते मोरों के बहाने कालकूट में डुवा-डुवा कर सजा रहा है। यहाँ जो चमत्कार प्रनीत हो रहा है वह उपमेयस्वरूप भौरों से भरी सहकार मजरियों के निषेध द्वारा उपमानस्वरूप कालकूट में डुवाये काम-बाण की स्थापना में है। उपमेयभूत भौरों की सत्यता का 'छल' शब्द से आक्षिप्त निषेध और उपमानभूत कालकूट की सत्यता की स्थापना होने के कारण शब्द से भिन्न आर्थी अपह्ुति है। इसके अतिरिक्त और भी जैसे- 'अरे रसिक ! इस मृगनयनी के सौदर्न्य-सुधा सरोवर मासल जघन-भाग में, हो न हो, मदन ही, महादेव की नेत्रवह्नि से जला-झुलसा अपनी सताप शान्ति के लिए डुबकी लगा रहा है। क्योंकि उसके अङ्गों के अद्गारों के वुझने की सूचना देने वाली यह धूमशिखा ही है जो कि इस भृगनयनी के नाभिगह्वर में रोमावलि के रूप में प्रकट हो रही है।' (सुधा) एवं वाक्यभेदोदाहरणानि व्याख्याय तद भेदेऽसत्यत्वप्रतिपादकच्छलादिशब्द प्रयोगे प्रतीतासपह्नतिमुदाहरति-एकवाक्यतायान्वति। वाक्यस्याभेदे इत्यर्थः । बतेति। हे सखि, प्रियविरहेण कृशे दुर्बले, अस्मिन्कामिलोके स्मरस्य कियद्वैरं पश्य। वतेति दुःखे, तथा हि-उपवने ये सहकारा रसालाः 'रसाळोऽसी सहकारोऽतिसीरभः' इत्यमरः, तेषु उन्दासिनो ये मधुकराः, तेर्षा छुलेन अनेन कामेन प्रतिबाणं कालकूटम उद्टकितमित्यन्वयः। तथा हीति पदं वाक्याभेदद्योतकं न सभृङ्गा: सहकारा:, अपि तु सविषा बाणा इत्यसत्यत्वा- भिधायिना छुलपदेन प्रतीत्या वाक्यभेदेन्छलादिशब्दप्रतीयमाना कालफूटारोपरूपा

नामपहनुतिमुदाहरति-अमुष्मि्रिति। शर्वेण प्लुष्टो दग्घः काम: कुरकाचयाः पृथुजघन- भागेऽमुष्मिन्लावण्यामृतसरसि नूनं निपतितः, यस्य कामस्याङ्गाङ्गाराणं शमस्य पिशुना नाभिविवरे रोमाचलिचपुःस्वरूपा इयं धूमस्य शिखा परिणमतीत्यन्वयः। अन्नेयं रोमावली न, अपि तु धूमशिखा इत्यसत्यत्वपर्येवसायिवपुःशब्दनलाद प्रतीते: वाक्याभेदेन वपुःब्दप्रतीयमाना धरमशखारोपरूपा रोमावलीरूपोपमेयापहुतिरित्यर्थः। (चिन्र०) पूर्वत्र न सभृङ्गाणि सहकाराणि; अपि तु सकालकूटा: शरा इत्यसत्यत्वा- २० चित्र०

Page 346

३०६ चित्रमीमांसा

भिधायिच्छलशब्दवशात प्रतीयते। उत्तरत्र नेय रोमावलि: किन्तु धूमशिखेत्य- सत्यपर्यवसायिवपुःशब्दबलात् प्रतीयते। केचित्त सादृश्यव्यक्तयेSपह्नववद्पह्नवाय सादश्यमप्यपहुत्यलङ्कारं वदन्ति। यथाहु :- सादश्यव्यक्तये यत्रापह्नवोऽसावपह्तिः । अपह्रवाय साद्ृश्यं यत्रास्त्येऽषाप्यपहुतिः ॥ इति।- (भारती) प्रथम 'वतसखि' इत्यादि उदाहरण में ये समृद्ग सहकार नहीं है प्रत्युत सकालकूट बाण है' इस असत्य का अभिधान 'छल' शब्द से प्रतीत है। द्वितीय 'अमुर्ष्मिलावण्या' इत्यादि उदाहरण में, यह जो प्रतीति हो रही है कि यह रोमावलि नहीं है अपितु धूमशिखा है इसकी प्रतीति असत्यपर्यवसायिवपु शब्द के बल से है। कुछ लोग जैसे सादृश्य दिखाने के लिए अपह्ुति कहते हैं उसी प्रकार अपह्नति के लिए भी सादृश्य अपहुति कहते हैं। उनके मत से इसका लक्षण यह है- 'जहाँ सादृश्य की अभिव्यक्ति के लिए अपह्वव का कथन है, वहाँ अपहुति होती ही है एव जहाँ अपह्व के लिए सादृश्य का कथन है, वहाँ भी अपह्वति होती है।'' (सुधा) पूर्वन्रेत्यादि व्यास्यातमेव, मतान्तरं प्रतिपादयति-केचिच्विति। सादश्यप्रकटनाय अपह्ववो यथा तथापह्नवाय साहश्यमप्यपह्नतिरिति वदन्ति। तल्लक्षणं तेषां मतेन दर्श- यति-यथाहुरिति। सादश्याभिष्यक्त्यर्थमपह्नतिः। अपह्वयाय साहश्यक्रथनमसाव्यपह्- तिरिति लक्षणान्वयः।

उदाहरन्ति च- (चिन्न०)

आकृष्यादावमन्दग्रहमलकचयं वक्त्रमासज्य वक्त्रे कण्ठे लग्नः सुकण्ठः प्रसरति कुचयोर्दत्तगाढाङ्गसङ्ग: । बद्धासक्तिर्नितम्बे पतति चरणयोर्यः स ताहक प्रियो मे बाले लज्जा निरस्ता न हिन हि सरले चोलकः कि त्रपाकृत्॥

धर्मोपन्यासः । अत्र वीक्षितं प्रियमपहुत्य चोलकत्वारोपः। तदर्थ च प्राक् प्रियचोलसदश-

अन्रेदमपहुतिकथनं व्याजोक्त्यलद्कारं पृथगनङ्गीकुर्वतामुद्धटादीनां सतमनु- सृत्य। ये तु उद्धिन्नवस्तुनिगूहनं व्याजोक्तिरिति व्याजोक्त्यलद्वारं पृथगिच्छन्ति तेषासिहापि व्याजोक्तिरेव नापह्नुतिरिति रुचकादयः । दण्डी त्वपहुतेः साधर्म्य- मूलत्वनियममनाहत्य 'किश्चिदपह्नुत्य कस्यचित् प्रदर्शनमात्रमपहुतिः' इति लक्षयित्वोदाजहार- अपहुतिरपहुत्य किंचिदन्यार्थसूचनम्। न पद्वषुः स्मरस्तस्थ सहस्रं पत्रिणामिति॥

Page 347

३०७

(भारती) पहले जैसे अमन्दग्रह होता है उसी प्रकार केशपाशों को ्खींचकर मुख में मुख तथा गले में गले लगाकर शरीरसयोग के द्वारा जिसने गाढालिङ्गन दिया है, उसी प्रकार दोनों स्तनों तथा नितम्वों में आसक्तिवद्ध होकर, चरणों में जो गिरता है, उसी के सदृश यह मेरा प्रिय है-ऐसा किसी नायिका के कहने पर किसी ने कहा-हे वाले क्या तुमने विल्कुल ही लज्जा को तिलाअलि दे दी है ? अथवा नहीं नहीं, यह तो चोलक अर्थात् लज्जा ढकने वाला वस्त्रविशेष है क्या ? यहाँ प्रिय को छिपाने के लिए चोलक का आरोप है, इसके लिए पहले ही दोनों का सादृश्य कहा गया है। यहाँ केचित् पद से स्वारस्य व्यक्त किया गया है। विदग्धा की इस उ्ति में अपहुति ही चमत्कारोदय का कारण है। वहाँ सादृश्य में चमत्काराभाव से उसका विधेयत्व अनुचित ही है। यहाँ व्याजोक्ति अलद्वार को अलग स्वीकृत करते हुए उद्ट आदि आचार्य 'अपह्ुति' स्वीकृत किये हैं। उनके मतानुसार हम भी इसे वही स्वीकृत करते हैं। वस्तुत उनका भी व्याजोक्ति का अलग कथन आवश्यक है। क्योंकि व्याजोक्ति में दोनों साम्य का जहाँ अभाव है, वही अपह्ुति में उभयनिष्ठ साम्य है। उन्भट आदि के मत का यही सार है। रुचकादि तो 'उन्भिन्न वस्तु- रूप निगूहन को व्याजोक्ति कहकर उसे भिन्न अलद्कार की स्वीकृति चाहते हैं। उनके मत में अपह्वति की स्वीकृति नहीं है। वस्तुत उनके भी मत में अपह्ुति की अलग स्वीकृति युक्तिसगत ही है। क्योंकि रुचकादि पद से प्रथम कथित वैषम्य की स्फुट प्रतिपत्ति है। साम्यमूलता के नियम का अनादर कर 'कुछ छिपाकर किसी का प्रदर्शन ही अपह्ुति है' ऐसा मानने वालों का मत कहते हैं- 'किसी वस्तु का निषेध करके अन्य वस्तु का सूचित करना अपह्ुति कहलाता है। (जैसे-) काम पचवाण नहीं है, क्योंकि उसके हजारों बाण है।' (सुधा) तवलक्षणोदाहरणमाह-आकृष्येति। आदौ अमन्दग्रहं यथा भवति तथा अलकसमूह्षमाछ्वष्य वक्त्रे वषत्रमासज्य सुकण्ठस्सन् कण्ठे लग्नः, दत्तो गाढम् अङ्ग- संयोगो येन तादशः कुचयोः, प्रसरति नितम्बे बद्धासकि, चरणयोः पतति यः, स ताहक मे प्रियोऽस्ति, हे बाले किं लज्जा निरस्ता, त्यककेति कयाचिदुक्की हे सरले नहि नहि छोलको वस्त्रविशेष: त्रपाकृस् किमित्यन्वयः। अप्र प्रियापह्वाय चोलकर्वारोप:, तसुर्थ पूर्व छयो: सादृश्योपन्यासः। केचित्पदेनास्वरसः, विद्ग्धाया उक्कावपह्वतावेव चमत्कारोदयास्। तन्र सादृश्ये चमस्फारासावेन तस्य विधेयर्वानौचित्यात्, प्रकाशादिमते तद्षुपादा- नस्य सवथाविद्यमानत्वाच्च। अपहृतुती प्रमाणमाह-अन्नेदमिति। ष्याजोदत्य- लक्टारं पृथगनङ्गीकुर्वन्त उन्वादयोपहृतुतिमङ्गीचक्र, तन्मतानुसारा दस्सामिरकीकृतम्। वस्तुतस्तु तेषामपि व्याजोके: पृथक कषथनमाश्यकम्त्र, व्याजोकतावुभयसाम्यस्याभावासू, अपह्वतावुभयनिष्ठसाम्यसत्वाद एप एवोद्भटाष्षिमतेऽस्वरसो बोष्यः। रुचकादयस्तु-

नास्ति। वस्तुतस्तेषासपि मतेऽपह्नुतेः पृथक स्वीकारो युक:, वैषम्यस्थ पूर्वमुक्तस्य स्फुटं प्रतिपत्तेरित्यप्यस्वरसो रुचकादिपदेन सूचितः । दण्डिमतमाह-दण्डी स्विति। साम्यमूछ-

Page 348

३०८ चित्रमीमांसा

तानियममनादृस्य किश्िद पहुनुत्य कस्यचित् अदर्शनमपहनुतिरिति तक्छषणमुदाहृतवानिति तन्मतमाह-अपहुसुतिरिति। किञ्विदपहुत्यान्यार्थसूचनं साइति लवणान्वयः। स्मर:पखेपु न, अपि तु तस्य पत्रिणां सहस्रमित्यन्वयः। (चित्र०) चन्दनं चन्द्रिकां गन्धो गन्धवाहस् दक्षिणः । स्वयमग्निमयी सृष्टिः शीता किल परान् प्रति॥ अमृतस्यन्दिकिरणश्चन्द्रमा सम नो मतः। अन्य एवायमर्कात्मा विषनिष्यन्ददीधितिः॥ साधर्म्यमूला त्वपहुतिरिति तेन व्याहृता। त्वदालेख्ये कौतूहलतरलतन्वीविरचिते विधायैका चक्रं रचयति सुपर्णासुतमपि। अथ स्विद्यत् पाणिस्त्वरितमवमृत्यैतदपरा करे पौष्पं चापं मकरसुपरिष्टाच्च लिखति॥ (भारती) इसी प्रकार-'चदन, चाँदनी, चन्द्रमा और मलयानिल स्वय अभनिमयी सृष्टि होकर मी दूसरों के लिए शीतल हैं। यह चन्द्रमा जिसकी किरणों से अमृत चूता है ऐसा लोग कहते हैं, लेकिन मेरे मत में तो विषमयी किरण वाला यह दूसरा सूर्य रूप ही है।' जो सादृश्यमूला अपहुति है, वह उपमा अपह्वति है-यह उनके मत का अभिप्राय है। यह किसी नायक का वर्णन है। कवि कहता है- 'कौतूहल से चचल इस कृगाङ्गी नायिका ने आपका चित्र बनाया। उसपर दूसरी सखी चक्र वनाकर गरुड वना रही थी। ऐसे ही समय तीसरी सखी ने, जिसके हाथ में प्रस्वेद आ रहा था, झट से चक्र और गरुड को मिटाकर हाथ में पुष्पमय धनुष और ऊपर मकर लिख दिया।'

(सुधा) उदाहरणान्तरमाह-चन्दनं चन्द्रिका शीतलो मन्दः पवनश्च स्वयमग्निमयी सृष्टिः, परान् प्रति शीता किल। मम चन्द्रमा अमृतस्यन्दिनः किरणा चस्य तादशो नो मतः। विपनिष्यन्दिन्यो दीघितयो यस्य अयमर्कस्वरूपोऽन्य एवेत्यन्वयः । या सादृश्यमूलाS पह्नति:, सोपमापहनतिरिति तन्मताभिप्रायः। अन्नापि दृण्ढीतिपदोपन्यासेन तन्मतेऽप्य स्वरसः। तथा हि-सादृश्यमूलरहितापहवतेरतिपायोक्त्या गतार्थरवात्, 'प्रकृतस्य यदन्य- रवम्' इस्यतिशयोकिलप्षणचिशेषस्य प्रवृत्तेस्तत्र दुर्वारख्वाव, व्याजोक्तयैव गतार्थरवादपह्न- तिकथनानुपपत्तेश्व। उभयसाग्यत्वेनैव तद्विभागस्य प्रकाशकृतोक्कस्य व्यर्थतवापत्तेक्षेति बोध्पम्। अपहुतिध्वनिमुदाहरति-तवदालेख्य इति। पका कौतूहलेन तरलया तन्व्या रचिते स्वण्चित्रे चकरं विधाय गरुडं रचयति। अथ स्विद्यतपाणिरपरा शीघं मृ्य करे पौष्पं धनुर्ध्वजार्यां मकरञ्ज लिखतीत्यन्वयः।

Page 349

३०६

(चित्र०) . 1 इत्यादावपहुतिध्वनिरुदाहर्तव्यः। अन्र हि चक्रसुपर्णलेखनेन नायं साधा- रण: पुरुषः, किन्तु पुण्डरीकाक्ष इति कयाचिद् व्यस्ञितम्। अन्यया तु तस्या- ध्येतादशं रूपं न संभवतीत्याशयेन नायं पुण्डरीकाक्षोऽपि किन्तु मन्मथ इति त दुभयमुन्मृष्य पुष्पसायकमकरःवजलेखनेन व्यक्षितम्। इति चित्रमीमांसायामपहुतिप्रकरणम्।

(भारती) इत्यादि में अपह्नति की ध्वनि का उदाहरण देना चाहिए। क्योंकि, यहाँ किसी अन्य नायिका ने चक्र और गरुड लिखकर यह अभिव्यक्त किया कि 'यह साधारण पुरुष नहीं किन्तु विष्णु हैं।' पर तीसरी युवती ने 'विष्णु का भी ऐसा रूप नही हो सकता' इस अभिप्राय से चक्र और गरुड़ दोनों मिटाकर पुष्पमय धनुष और मकर रूपी ध्वजा लिखकर यह अभिव्यक्त किया कि 'यह विष्णु नहीं, यह तो साक्षात् मदन हैं।' विमर्श-दीक्षित जी के 'त्वदालेख्ये' इस उदाहरण का भी पण्डितराज जगन्नाथ ने खण्डन किया है। उनका कहना है कि-किसी ने चक्र और गरुड लिखकर यह अभिव्यक्त किया कि- 'यह साधारण पुरुष नहीं, किन्तु विष्णु हैं।' इस विषय में पण्डितराज की मान्यता है कि अपहुति के दो भाग हैं-उपमेय का निषेध और उपमान का आरोप। उनमें से उपमान रूपी भाग, जिसका आकार है 'यह विष्णु है' वह चक्र और गरुड के लिखने से अभिव्यक्त हो सकता है, क्योंकि चक्र और गरुड विष्णु से सम्बन्ध रखते है। किन्तु, 'यह साधारण पुरुष नहीं है' यह उपमेय के निषेधवाला भाग-इससे अभिव्यक्त नहीं होता। क्योंकि यहाँ व्यञ्जक अर्थात् चक्र और गरुड का लिखना केवल आरोप के अभिव्यक्त करने में समर्थ है। पूर्व कथित निषेध की अभिव्यक्ति में उसका सामर्थ नही है। और यह अभिव्यक्ति अनुभवसिद्ध मी नहीं है। पद में उपाय रूप शब्द का भी कहीं उल्लेख नहीं है-जिससे अनुभव के विषय में कुछ विवाद भी हो। साधारण पुरुष के निपेध किये विना विष्णु के ताद्रप्य का आरोप दुर्घर मान कर यदि अभिव्यक्ति स्वीकृत करते हैं तो इस मान्यता से रूपक का उच्छेद हो जाता है। कारण ऐसी स्थिति में 'मुख चन्द्रमस्ति' इत्यादि में मुख का निषेध किये बिना मुख में चन्द्रत्व का आरोप कठिन है- ्यह भी सहज में कहा जा सकेगा। यदि वहाँ भी मुख का निषेध मान लिया जाय तो एक ओर तो अपहुति की जीत होगी और दूसरी ओर रूपक समाप्त हो जायगा। - दूसरी वात, इस पध्य में यह कही गयी है कि 'यह विष्णु नहीं किन्तु कामदेव हैं' इसमें यद्यपि प्रथम वाक्य में निषेध तथा दूसरे में उपमान का आरोप है अत ये दोनों व्यक्ष हो सकते हैं। फिर भी यह अपह्ुति नहीं है क्योंकि आपका यह लक्षण-प्रकृतस्य निषेधेन यदन्यत्व- प्रककपनम्' यहाँ स्वय घटित नहीं होता, क्योंकि यहाँ जिनका निषेध किया जा रह्दा है वे भगवान्

Page 350

३१० चित्रमीमांसा

विष्णु वर्णनीय नहीं हैं, किन्तु राजा वर्णनीय है। अतः विष्णु के अप्रस्तुत होने के कारण यहाँ प्रस्तुत का निपेध ही नहीं है। अत एव चित्रमीमासा में स्वय दीक्षित जी ने 'निषिध्य विषय'- इत्यादि 'कत्वा' प्रत्यय का फल कहते हुए 'प्रकृत' पद का अर्थ-आरोप का विषय अर्थात् 'उपमेय' 'होता है-इस तरह स्पष्ट किया है। और काव्यप्रकाशकारने मी-प्रकृतं यन्निषिध्यान्यय् साध्यते सा त्वपह्ज्ुति' इसी मूल की व्याख्या करते हुए उपमेय अर्थ में ही प्रकृत पद की व्याख्या की है।

यदि इसे दण्डीप्रमृति प्राचीनों के मत से सिद्ध मान कर व्यञ्ञ, कहा जाय, तो भी यह डूवते को तिनके का सहारा मात्र ही कहा जा सकता है। कारण, 'प्रकृतस्य निषेधेन' इत्यादि पूर्वोक्त लक्षण बनाते हुए दीक्षित जी ने स्वय उस अपहुति का वहिष्कार कर दिया है। यदि इसे ध्वनि में व्यङ्ग मानते हैं तो फिर लक्षण भी उसी के अनुसार बनाना पडेगा। इतने पर भी यदि यह पूछा जाय कि उक्त पद्य में कौन-सा अलद्वार व्यङ्ग है तो इसका सीधा उत्तर यह है कि यदि इसमें अपह्युति के चमत्कार की अपेक्षा विलक्षण प्रकार का चमत्कार है तो अन्य अलद्कार माना जाय, नहीं तो अपहुति मान लिया जाय-तो ऐसी स्थिति में पुन. 'प्रकृतस्य निषेधेन' इत्यादि लक्षण का समन्वय ही नहीं होगा। इसका उत्तर यह है कि यदि अपहुति का यही लक्षण अभीष्ट है तो ढण्डी प्रभृति की तरह यद भी मान लिया जाना चाहिए था कि-'चाहे किसी भी वस्तु के निषेध के साथ किये जाने वाली अन्य वस्तु का आरोप अपहनति कहलाती है।' अतः इन सारी अनवस्थाओं के कारण दीक्षित जी का इस सदर्भ में कथन अशोभनीय ही है।

पण्डितराज के इस खण्डन का उत्तर देते हुए नागेशभट्ट ने लिखा है कि पण्डितराज का 1 यह आक्षेप भी विचारणीय है। क्योंकि दीक्षित जी ने दण्डी के अधोद्कित उदाहरणों का उल्लेख किया है। दण्डी ने अपह्ुति के सादृश्यमूलक होने के नियम का अनादर कर 'अपह्नतिरपह्वतय- किल्ञिषन्यार्थसूचनम्' यह लक्षण बनाकर उदाहरण दिया है-'न पञ्नेषु स्मरस्तस्य सइस्र पत्रिणा यत.' चन्दन चन्द्रिका चन्दो गन्धवाहश्च दक्षिण' इत्यादि से आरम्भ करके त्वदालेख्ये इत्यादि कहा है। अत यह ध्वनि उसी के अनुसार होने के कारण इसे 'अहृदयङ्गम' कहना ठीक नहीं है।

दूसरी बात जो 'प्रकाश' का विरोध वताया जा रहा है, वह भी नहीं है। मम्मट का उपमेय पद 'पदार्थ का उपलक्षण है। अर्यात् उपमेय शब्द से उन्हें कोई भी पदार्थ अर्थ का अग्रह अभीष्ट है। अन्यथा-

केसेसु घलामोडिअ तेण अ समरम्मि जअसिरी गहिआा। जह कन्दराहि विहुरा तम्स दढं कंठअ्ग्मि संठ विभा।

इस उदाहरण में वैरी भाग कर नहीं गये, किन्तु गुफाएँ उससे पराजय की समावना करके उन्हें नहीं छोडती-यह अपह्ुति व्यक्त होती है' यह अर्थ मम्मट का कैसे सगत होगा। क्योंकि यहाँ उपमेय का अपहब तो है ही नहीं। अत. यहाँ भी दीक्षित जी का लक्षण निर्दुष्ट ही है।

इति चित्रमीमासायां 'भारती' हिन्दीव्याख्यायामपह्ुतिप्रकरण समाप्तम्।

Page 351

अपहुतिनिरूपणप्रकरणम् ३११

(सुधा) अम्र ध्वनित्वं प्रतिपादयति-अत्र हीति। चक्रादिलेखनेन तन्रासाधारणपुरुषावं निषिध्य पुण्डरीकाचत्वे व्यञ्जितेऽन्यया तम्रापीदशरूपाभावाछ मकरध्वजलेखनेन मन्म-

अत्र गङ्गाधरकृत :- नारायणव्यअ्ञने हो भाग उपमेयनिपेधः, उपमानारोपश्च। सत्नो पमानारोपभाग: पुण्टरीकाक्षोऽयमित्याकारश्चक्रादिलेखनेन तयोस्तपसम्बन्धितया व्यडनतं शक्यः। उपमेयनिषेधभागस्तु न, आरोपमात्रव्यअ्जनसमर्थस्य व्यअकस्य तादृशनिषेधग्य- अनसामर्थ्याभावात् नाप्यनुभवसिद्ा, येन तद्ुयअ्ञनतायोगगवेषणं स्यात्। न च पुरुषता- दात्म्यनिषेधं घिना नारायणतादास््यानुपपर्या निषेधोऽपि व्यज्यत इति वाच्यम्, 'मुखं चन्द्रः इत्यादावपि सुखनिषेधमन्तरेण धन्द्रारोपानुपपत्या तत्र मुखनिषेधाभ्युपगमे रूपकोच्छेदापत्तेः । न व मुखत्वसामानाधिकरण्येन चन्द्रताद्प्यस्यारोप्यमाणतया न मुखनिषेध इति वाच्यम्, साधारणपुरुषतवसामानाधिकरण्येन पुण्डरीका सारोपसम्भवाद रूपकध्वनेरेव औचित्यात्। न च पूर्वारधे मास्त्वपहनुतिः, तथापि चक्रादिदूरीकरणेन 'नायं पुण्डरीकाक्षः' इति निषेघस्य पुष्पचापलिखनेन काम इत्यंशस्य च व्यअ्षयितुं शक्यर्वादु- सरार्ध एव मासिवति वाच्यम्, पुण्हरीकाक्षस्य वर्ण्यत्वाभावेन त्षिषेघस्यापह्वतावघटक- स्वात्, आरोपस्यारोपविषयत्वेन त्वया व्याख्यानात्, प्रसकतयत् किञ्विन्निषेध्यवरतुसामाना- धिकरण्येन क्रियमाणवसत्वन्तवारोपत्वसेव तत्वमिति लक्षणे तु तस्य योग्यरवातू। तरमादेस- दुदाहरणीयम्- 'दयिते रदनत्विषां मिषादयि तेऽमी विलसन्ति केसराः। अपि चालकवेषधारिणो मकरन्दस्पृहयालवोऽलयः॥' अन्र नैता रदनत्विषः, किन्तु किल्षल्कपरम्परा, न चेते अलकाः, अपि ख्वलयः, इति पूर्धोत्तरार्धाभ्यां द्वे अपह्नती, ताभ्याक्व 'न त्वं नारी, किन्तु कमलिनी' इति तृतीयापह-

श्याहुः। तत्र ब्रम :- अपहवतौ निपेधस्य दीक्षितसम्मततव । 'मुखं चन्द्रः' हत्यम्र मुखत्वं

व्याप्यचक्राद्यभावस्य साधारणपुरुषघर्सस्य चक्रादिनापसारणे साघारणपुरुषनिषेधं बिना तत्तादात््यस्य व्यक्षयितुमशक्यत्वाद्। तस्माद्दीक्षिताशयमविच्चार्य तदुकिरिति बोध्यम्।

'स्मितं नैततिकन्तु प्रकृतिरमणीयं विकसितं, मुखं ब्रृते मूढः कुसुममिदमुद्युश्परिमलम। स्तनदन्द्वं मिध्या कनकनिभमेतरत्तनयुगं, लता सेयं रम्या अ्रमरकुलनम्या न रमणी।' अम्र स्मितापह नुवस्य मुखापह्नुतावनुग्राहकत्वम्। मुखस्तनापह्नुतेर्नायिकापह्सुतौ तत्वम्। मालारूपा यथा- 'कापि क्षीरनिधिष्छ्ठुलातकचिद्पि प्रोत्फुल्कुन्दचछलात,

कुन्रापि रमरवैरिदेहमिषतः कुम्रापि शेषच्छणात्, श्रैषोक्यं हिमतुक्यकीतिरटति श्रीवाजिघन्द्रप्रभोः ॥'

Page 352

३१२ चित्रमीमांसा

इति योध्यम। यत्त गङ्ञाघरकृता कुवलयानन्दे दीक्वितव्यास्यातां पर्यंस्तापहन्तुतिमुदिरय नायमपहतुतिभेद:, सामान्यलर्तणानाक्रान्तरवाय्। उपमेयमसत्यं कृत्वोपमानस्य सत्यसमा स्थापनमित्यर्थकस्य 'अककृतं यन्निषिष्यान्यत्साध्यते सा त्वपह्तुतिः' इति प्रकाशोकळवणस्य स्फुटमप्रवृत्तेः। 'विषयापह्नवे वर्त्वन्तरप्रतीताचपह्य्नुतिः' इति सर्वस्वोक्कलवणस्यापि तन्न प्रसाराभावाघ्। किन्व चित्रमीमांसोकलक्षणस्य 'प्रकृतस्य निषेधेन' इत्यादिरुपस्यापि तम्राव्याह्ेक्ष। 'तस्माप्नायं सुधांधुः' इश्यादौ दढारोपरूपकमेव धकुं योग्यम, दयोस्सामानाधिकरण्य- स्य सशवादिति दूषणं प्रतिपादितम्। तम्रापि बूम :- काव्यप्रकाशादिल क्षणानुसारेण लचय- व्यवस्थानियमाभावास्। स्वलध्यानुसार्यन्यप्रतिपादितलक्षणस्थ व्यवस्थापादकत्वाद्।

पृथक कथनवैयर्थ्यापतेः। किव्व पर्यस्ता आरोपव्यधिकरणापह्नुतियंत्रेति यौगिकार्थाङ्ी कारेऽपि रूपकस्य तम्र वकसयोग्यतैष। अलङ्टाररत्नाकरो क्त्लप्षणानुस्तारेण यज्जेदस्य पृथछ्थने दूषणाभावादित्यलं अप्रकृतचिन्तया। धरानन्देन रचिता प्यासयापह् नुतिबोधिनी। टीकायां चिश्रमीमांसासुघायामाप पूर्णताम्॥ इति वासिष्ठगोत्रीयमिश्ररामवलस्य पुत्रेण धरानन्देन निर्मितायां

Page 353

अथ उत्प्रेक्षानिरूपणम्

अत्रान्यधर्मसम्बन्धादन्यत्वेनोपतर्कितम्। प्रकृतं हि भवेत्प्राज्ञास्तामुत्प्रेक्षां प्रचक्षते ।। (भारती) 'जहॉ प्रकृतभिन्न धर्मसम्बन्ध से, अन्यत्व द्वारा उपतर्कित हो, बुद्धिमान् जन उसे ही उत्प्रेक्षा अलद्कार कहते हैं।' अन्य सम्बन्ध से यहाँ तात्पर्य है-प्रकृत का भिन्न पदार्थ के रूप में की जाने वाली सभावना। विमर्श-यह एक सादृश्यमूलक अभेदप्रधान अलकार है। क्योंकि इस अलक्कार में उपमेय और उपमान में साम्य एव अमेद दोनों होता है। तात्पर्य यह है कि कवि इसके उपमेय में उपमान की कल्पना करते हुए दोनों में सादृश्य की ही स्थापना करता है। इस अलक्कार में उपमेय गौण एव उपमान उत्कृष्ट या प्रधान दिखायी पडता है। क्योंकि बलपूर्वक ही कवि उपमान के साथ उपमेय का साम्य दिखाता है। उपमेय में वे सारे गुण हों या नही, किन्तु, कवि उनकी सभावना उपमान के रूप ने करता ही है। किसी भी अलद्वार के प्राण हैं-उनके चमत्कार या सौन्दर्य। और इसी की पूत्त के लिए इस अलद्वार में उपमान का काल्पनिक वर्णन किया जाता है। क्योंकि यहाँ उपमा में उपमेय और उपमान मे सादृश्य दिखाया जाता है। जहाँ रूपक में इन दोनों की एक रूपता होनी है, वहाँ उत्प्रेक्षा में उनके सादृश्य की सभावना की जाती है। सभावना सन्देह और निश्चय के वीच की स्थिति है। (सुधा) एवसपह्नति व्याज्याय निश्चितषििषयतया सम्भावनाविषयिणीमुतप्रेक्षां बकुं प्रति- जानीते-अथेति। अत्र निरूप्यत इति शेषः। उत्प्रेक्षाछक्षणं प्रतिपाद्यति-अन्नेति। यन्न प्रक्कृतम् अन्यधर्मसम्बन्धादन्यत्वेनोपतर्कितं सवेस, प्राज्ञास्तामुपपरेक्षां प्रचक्षते कथयन्ती स्वन्वयः। अन्यसम्बन्धेन प्रफृतस्यान्योपतर्कणमुत्मेक्षेति तक्लक्षणम्। (चिन्न०)

यथा- बालेन्दुवक्राण्यविकाशिभावाद् बभुः पलाशान्यतिलोहितानि। सदो वसन्तेन समागतानां नखक्षतानीव वनस्थलीनाम्॥ अन्र प्रकृानि पलाशकुसुमान्यप्रकृतनखक्षतधर्मवक्रत्वलौहित्यसंबन्धान्न- खक्षतत्वेनोपकल्पितानि। तर्क: संभावनामात्र न त्ववधारणम् । तदीयधर्मो हि तत्तादात्म्यसंभावनामात्रहेतुर्न व्याप्तिपक्षधर्सतावल्निङ्गवद्वधारगहेतुः। न चात्रेवशब्दस्य सादश्यपरत्वमित्युपमाशङ्का कार्या।

Page 354

३१४ चित्रमीमांसा

उपमाया यत्र कचित्स्थितैरपि नखक्षतैः सह वक्तुं शक्यतया वसन्त- नायकसमागतवनस्थलीसंबन्धित्वविशेषणकल्पनानपेक्षत्वात्। पलाशमुक्कु- लानां नखक्षततादात्म्यसंभावनायामेव तथाविधविशेषणस्योपयुक्तत्वात्। एवमन्यत्रापि यत्र यत्राप्रकृततादात्म्यसंभावनोपयुक्तविशेषणकल्पना तत्र सर्वत्राप्युत्प्रेक्षावगन्तव्या। यथा- (भारती) जैसे-कलिका रूप होने से अर्द्धचन्द्र के सदृश टेढ़े अत्यन्त लाल वर्ण के पलाश के फूल 'वसन्तरूपी पुरुष के साथ मिली हुई वनस्थलीरूपी स्त्री के शरीर पर ताजे लगे हुए नखक्षतों के समान शोभित होते थे।' यहाँ प्रकृत पलाश के फूलों में अप्रकृत अर्थात् भिन्न धर्मी नखक्षतों की सभावना-दोनों पदार्थों में रहने वाले वक्तृत्व और लोहितत्व रूप धर्म को निमित्त मान कर की गयी है। अर्ध शब्द की अनेकार्यता की आशका कर उसका फलितार्थ कहते हैं कि यहाँ तर्कत्व रूप धर्म का उसके साथ तादात्म्य सभावना मात्र में हेतुता है, न कि व्याप्तिपक्षधर्मता की तरह अवधारणा, में हेतुता है। फलस्वरूप ऐसा अर्थ करने से अनुमान अलद्कार में अतिव्याप्ति का निराकरण होता है। 'इव' शब्द का सादृश्यार्थक प्रयोग में 'उपमा' की आशका का निराकरण करते हुए कहते हैं कि जहाँ कहीं भी स्थित नखक्षत के साथ उपमा कहने के कारण वसन्तरूपी नायक के आने पर वनस्थली के सम्बन्धित्व विशेषण रूप कल्पना की अपेक्षा का अभाव है। क्योंकि उसके विशेषण का उसके साथ तादात्म्य की सभावना में ही उपयोग है। इस प्रकार प्रतिपादित अर्थ का जहाँ जहाँ अप्रकृत तादात्म्य सभावना के उपयुक्त विशेषण की कल्पना है, वैसी सभी जगहों में उत्प्रेक्षा ही जाननी चाहिए। जैसे- (सुधा) तदुदाहरणसाह-यथेत्यादिना। अविकाशिभावाद् वालेन्डुवक्राणि अतिलोहितानि वसन्तेन समागतानां वनस्धलीनां सधो नसप्षतानीव बभुरित्यन्वयः। अन्न लक्षणसमन्वयं दर्शयति-अत्रेति। प्रकृतेपु पलाशसुकुलेष्वप्रक्ृतानां नखप्षतानां चक्रत्वलौहिश्यरूपधर्म- सम्बन्धानसप्षतत्वेन सम्भावितत्वात् लक्षणसमन्वयः। तर्फशव्वस्थानेकार्थतामाशकुक्यार्थ- माह-तर्क इति। अर्थस्य फलमाह-नरिवति। फलितार्थमाह-तर्कस्वरूपघर्मस्य तत्ता

तेनानुमानालह्वारे नातिष्याप्तिरित्यर्थः। इव शव्दस्य सादश्यार्थकस्य प्रयोग उपमामाशक्कय निराकरोति-न चेति। तन्न हेतुमाह-कचिदिति। यत्र कुत्रापि स्थितैनखक्षतैस्सहोपमाथा धकुं शक्यतर्या वसन्तनायकसमागतवनस्थलीसम्वन्धित्व विशेषणकरषप नस्यापेवणाभावास तद्विशेषस्य तत्तादात्यसम्भावनायामेवोपयोगाव्। एवं प्रतिपादितमर्थमन्यत्राप्यतिदि

(चिन्र०) उवाह या तनुलता भृङ्गालीरोमवल्लरीम् । पश्चाद्विसुक्तां वैमल्याद्विम्बितामिव वेणिकाम्॥

Page 355

उत्प्रेक्षानिरूपणप्रकरणम् ३१५

उपमा यत्र क्वचित्स्थितयापि वेणिकया वक्तुं शक्येति तन्रानुपयुक्ता, वैमल्यात् पुरोभागप्रतिबिम्बितत्वरूपविशेषणकल्पना तादात्म्यसंभावनार्था । यत्र तु संभावनोपयुक्तविशेषणकल्पनारहितमुपमानं निबध्यते तन्न परमिव- शब्द: साहृश्यपर इत्युपमालङ्कारः। अमुमेव विभागमभिप्रेत्य चक्रवर्तिनोक्तम्-'यदायमुपमानांशो लोकतः सिद्धिमृच्छति' इत्यादि। दण्डिनापीवशब्दस्योत्प्रेक्षाव्यञ्जकत्वमुक्तम्- (भारती) 'जो शरीररूपी लता काले भौंरों की पक्ति की तरह निर्मलता के कारण पीछे की ओर मुक्त एवं विम्वित रोमराजि स्वरूप वेणी का वहन कर रही है।' जहाँ कहीं अवस्थित अगर वेणी के कारण उपमा अलकार इस उदाहरण में कहना चाहें तो वह अनुचित ही होगा। क्योंकि निर्मलता के कारण आगे की ओर प्रतिबिम्बितत्वरूप विशेषण की कल्पना से तादात्म्य, यहाँ सभावनार्थक है। जहाँ पर सभावना उपयुक्त विशेषण की कल्पना से रहित उपमान को निवन्धित करती है वहॉ ही 'इव' शब्द का सादृश्यपरक होने के कारण उपमा अलकार होता है। इसी विभाग को लक्ष्य कर चक्रवत्तीं ने कहा था-'यदायमुपमानांशो लोकतः सिद्धि मृष्छति' इत्यादि, अर्थात् जव यह उपमानाश 'इव' शब्द से लोकप्रसिद्ध साधर्म्य की प्रतीति होती है तव उपमा अलद्कार होता है। एव जहाँ लोक में अप्रसिद्ध एव कविकल्पित साधर्म्य का वोध होता है-वहाँ उत्प्रेक्षा अलद्कार ही होता है। (क्योंकि उपमा में उपमेय की उपमान से तुलना की जाती है, जब कि उत्प्रेक्षा में उपमान की उपमेय में सभावना। उत्प्रेक्षा अभेदप्रधान या अध्यवसायमूलक अलकार है और उपमा मेदाभेदप्रधान साधर्म्यमूलक। 'इव' वाचक उपमा एव उत्प्रेक्षा दोनों में ही प्रयुक्त होता है।) दण्डीने मी 'इव' शब्द का उत्प्रेक्षाव्यअ्कत्व ही अर्थ कहा है। (सुधा) उदाहरणान्तरेप्वेतदेवाह-उवाहेति। या तनुलता मृझ्गालीरोमचदळरीं वैमल्याव नैमल्याव् पश्चाद्विसुक्कां बिस्बितां वेणिकासुवाहेत्यन्वयः। यम्र कुन्नापि स्थितवेण्योपसाया बक्तं शक्यतया वैमल्यात् पुरोभागे प्रतिबिम्बितरव रूप विशेषणस्यानुपयोगातू ततादात्म्य- संभावनायामेव तत्सार्थक्यादुत्प्रेक्षेव नोपमेत्वर्थः। इवशब्दस्योपमाप्रयोजकता यन्न तं दरशयति-यत्रेति। सम्भावनोपयोगिविशेषणर हितोपमाननिबन्धने इवस्य सादश्यपरत्वे- नोपमाप्रयोजकत्वमिति तद्भावः। अन्र चक्रवर्त्युक्त्तं प्रमाणयति-अमुमेवेति। तक्षुक्कविभाग- माह-यदैति। दण्टिन्युक्तं प्रमाणयति-दृण्ढिनापीति। (चिन्न०) मन्ये शङ्के ध्रुवं प्रायो नूनमित्येवमादिभिः। उत्प्रेक्षा व्यज्यते शब्दैरिवशब्दोऽपि तादृशः॥ इति। अत्रादिशब्देन तर्कयामि, संभावयामि, जाने, उत्प्रेक्षे, स्यात, इत्येवमा- दीनां संग्रहः। अत्र च-

Page 356

३१६ चित्रमीमांसा

कस्तूरिकामृगाणामण्डाद्गन्धगुणमखिलमादाय - यदि पुनरहं विधि: स्थां खलजिह्वायां निवेशयिष्यामि॥। (भारती) 'जहाँ उत्प्रेक्षाव्यअ्जक 'मन्ये' 'शंके' 'ध्रुवम्' 'प्राय.' 'नूनम्' इत्यादि एव 'इव' आदि शब्द चाच्य रहेंगे वहाँ वाच्योत्प्रेक्षा होगी।' यहाँ आदि शब्द से 'तर्क करता हू' 'सभावना करता हूँ' 'जानता हूँ' 'उत्प्रेक्षा करता हूँ' 'होता है' इस प्रकार के शब्दों का मग्रह है। यहाँ और- 'शायद यदि मैं पुन. व्रह्मा बनूँगा तो कस्तूरी मृगों के अण्डकोष से सारे सुगन्धादि रूप गुणों को दुष्टों की जिह्वा मे निवेशित कर दूँगा।' (यहाँ आत्मा में विधित्व रूप अप्रकृत की सभावना से अतिव्याप्ति है।)

(सुधा) तदुकिमप्याह-मन्ये इति। ताह इति। सम्भावनार्थकेवशब्दोप्युखेवा्यक्ञक इत्यर्थ:। आादिशब्दार्थमाह-अन्नादीति। दीष्वितोक्तावादिना-अवैमि, ऊहे कयडा चारक्वि· बादयो गृद्न्ते इत्यर्थः । उत्प्रेक्षालक्षणं व्याख्याय धर्मसम्वन्धादिति हेतोः फलं दर्शयति- अम्र चेति। उत्प्रेक्षालक्षण इत्यर्थः । कस्तूरिका इति। यदि चेत्पुनरहं ब्रह्मा भवामि, तदा कस्तूरी मृगाणामण्डाद खिलं सरव गुणं सुगन्धिरुपं दुष्टजिह्वायां निवेशयिष्यामि इश्यम्वयः। अन्रात्मनि विधित्वरूपाप्रकृतस्य संभावनयाऽतिध्यास्तिरित्यर्थः। (चित्र०) यद्यनुष्णो भवेद्वह्निर्यद्यशीतं भवेज्जलम् । मन्ये दढव्रतो रामस्तदा स्यादप्यसत्यवाक्। इत्यादिष्वतिव्याप्निवारणाय धर्ससम्बन्धादित्युक्तम्। तेषु हि 'यद्यर्थोक्तौ च कल्पनम्' इत्यतिशयोक्त्यलङ्कारविषयेषु, 'संभावनं यदीत्थं स्यादित्यू- होऽन्यस्य सिद्धये' इति संभावनालंकारविषयेषु वा निनिमितमेव तथा तथोपतर्कणम्।

(भारती) 'यदि आग अपने उष्णत्व धर्म छोड कर शीतलता ग्रह्दण करे और जल अपनी शीतलता छोड कर उष्णता को धारण कर ले तब मैं यह मानता हूं कि दृढनती राम भी असत्यवादी हो सकते हैं।' (यहाँ अग्न्यादि में अप्रकृत अनुष्णत्वादि रूप तर्कितत्व से अतिव्याप्ति है।) उक्त दोनों उदाहरणों में तथाकथित अतिव्याप्ति के निराकरणार्थ लक्षण में धर्मसम्बन्ध से हेतु का उपादान है। दोनों ही जगहों में उपतर्कण का हेतुरहित रहने के कारण अतिव्याप्ति दोप नहीं हुआ। अव प्रश्न उठता है कि तो वहाँ कौन अलक्वार है ? उत्तर देते हैं कि मम्मट के मतानुसार 'प्रस्तुतस्थ यदन्यरवं यद्यथोकौ व करपनम अर्थात् 'वर्ण्य विपय का उससे भिन्न प्रकार से वर्णन किया जाय' इस लक्षण के अनुसर यहाँ अतिशयोकि अलक्वार है। चन्द्रालोकादि

Page 357

उत्प्रेक्षानिरूपणप्रकरणम् ३१७

के मत में 'संभावनं यदीष्थं स्यादित्यूहोऽन्यस्य सिद्धये' अर्थात् जहाँ किसी कार्य की सिद्धि के विषय में असंभवता का वर्णन किया जाय उसे असभव अलकार कहते हैं। इस लक्षण के अनुसार सभावना अलद्वार है। इस प्रकार हेतु के उपादान वताने पर भी उस लक्षण में अतिव्याप्ति की आशका से 'धर्म- सम्बन्धात्' विशेषण की योजना लक्षण में की गयी है।

(सुधा) उदाहरणान्तरमाह-यदीति। वह्िरनुष्णो यदि भवेत्, जलमशीतं यदि भवेद, रढत्रतो रामस्तदाऽसत्यवागपि स्यादित्यह मन्ये इत्यन्रापि प्रकृतेऽन्यादावप्रकृतानुष्णत्वा देरुपतर्कितत्वादतिव्यापिः। सद्वारणाय धर्मसम्बन्धादिति हेतोरुपादानमित्यर्थः। उभयत्रा- प्युपतर्कणस्य हेतुरहितत्वाज्ातिव्याप्तिरिति तद्भावः । तर्हि तन्न को वाडलक्कार इत्याशंकां निवतयति-तेषु हीत्यादिना। तस्यायं भावः काव्यप्रकाशादिमते तम्नातिशयोकिविशेष:, 'यधर्थोकौ च कपनम्' इति तदुफलक्षणस्य तम्र सर्वाव। चन्द्रालोकादिसते तु सम्भा- चनालक्क रः 'सम्भाषनं यदीर्थं स्यात्' इत्यादेस्तत्राङ्गीकारावू। (चिन्र०)

तथापि- सर्वातिशायिसौन्दर्य शंके सत्यवतो मुखम्। येन सा मृगशावाक्षी सावित्री तरलीकृता। इत्यादिष्वतिव्याप्तिः स्यादिति तद्वारणायान्यधर्मसंबन्धादित्युक्तम्। तत्र सावित्रीहृदयतरलीभावकार कत्वादिना स्वधर्मेणैव वितर्कणमिति नातिव्याहिः। (भारती) फिर भी-'मैं सत्यवान के मुख में सर्वातिशायि सौन्दर्य की आशका करता हूँ। क्योंकि मृगशावक की आखों की तरह निर्दष्ट अथ च सुन्दर आखों वाली उस सावित्री का हृदय उसे देखते ही तरल हो उठा।' उक्त उदाहरण में प्राप्त अतिव्याप्ति दोष के निवारणार्थ ही लक्षण में 'धर्मसम्बन्धात्' विशेषण है। क्योंकि वहाँ सावित्री के हृदय का तरलीकरण स्वधर्म से वितर्कित होने के कारण अति- व्याप्ति नहीं है। (सुधा) हेतोरुपादानेऽपि तल्लक्षणेतिव्याप्िमाशड्क्य तम्र विशेषणान्तरेण निराकरोति- तथापीति। 'धर्मसम्बन्धात्' इत्युक्तकावपीत्यर्थः। सर्मातिशायीति। अहं सत्यवतो मुखं सर्वातिशायिसौन्दर्य शके, येन मृगशायापी सा सावित्री तरलीकृता इत्यन्वयः। अत्र

स्यात्। अतस्तद्वारणाय हेतावन्येति। तस्याप्रककृतत्वमर्थः । तस्य धर्मस्य सुखसम्व-

Page 358

३१८ चित्रमीमांसा

(चित्र०) विरक्तसंध्याकपिशं पुरस्ताद्यतो रजः पार्थिवसुज्जिहीते। शंके हनूमत्कथितप्रवृत्तिः प्रत्युद्धतो मां भरतः ससैन्यः ॥ इत्यत्रातिव्याप्तिवारणायान्यत्वेनेति विशेषणम्। तत्र ससन्ये प्रत्युद्गन्त- र्यन्यत्रापि हष्टस्थाय्े रजोगमनस्य सम्बन्घेन निमित्तेन भरतः प्रत्युद्गतत्वेन चस्तुसद्रूपेणवोपतर्कितो न त्वन्यत्वेनेति नातिव्याप्तिः। नरसिंहमहीपाल विदुस्त्वां मकरध्वजम्। मार्गणास्तव सज्जाता: कथं सुमनसोऽन्यथा॥ इत्यत्राव्याप्तिवारणायोपतर्कितमित्युक्तम्। तत्रानुमानालङ्गारविषये सुमनो- सार्गणत्वेन मन्मथत्वव्याप्तिलिङ्गेन राजि मन्मथत्वमवधृतम् न संभावना- मात्रम्। (भारती) 'अतिरिक्त सन्ध्या की तरह ताम्रवर्ण पृथ्वी के इन उडते धूलिकणों को आगे देखकर, हनुमान के कथनानुसार मैं यह सन्देह करता हूँ कि भरत जी सेना के साथ मुझ से मिलने आ रहे हैं।' यहाँ अतिव्याप्ति दोषनिवारण के लिए लक्षण में 'अन्यत्वेन' विशेषण की योजना है। क्योकि यहाँ भरत के आने की उपतर्कणा में रजोभरण उपगतत्व रूप अन्य धर्म के रहने के कारण प्राप्त अतिव्याप्ति के निवारणार्य अन्यत्वेन विशेषण से निराकरण किया गया है। ऐसा करने से सेना के साथ आते हुए अन्यत्र उस धर्म के देखने से, उसी निमित्त से भरत का वस्तुसद्रूप के ही द्वारा प्रत्युद्गमन से भरत का तर्कितत्व है न कि अन्य रूप से। अत यहाँ उक्त विशेष के कारण ही अतिव्याप्ति नहीं है। 'हे पृथ्वीपति नरश्रेष्ठ1 मैं तुम्हें साक्षात् मदन ही मानना हूँ अन्यथा तुम्हारे ये वाण पुष्प निर्मित कैसे होते ?' अनुमान अलङ्गार के इस उदाहरण में फूलों का वाणत्व से निमित्त होने के कारण राजा में मन्मथत्व वर्ण से अतिव्याप्ति दोष होता है। इसके निवारण के लिए लक्षण में उपतर्कित विशेषण का समावेश किया गया है। ऐसा करने पर फूलों का वाणत्व के हेतु से राजा में मन्मथत्व की अवधारणा है, न कि सभावना मात्र का। अत यहाँ अतिव्याप्ति का निराकरण हुआ।

(सुधा) 'अन्यत्वेन' इत्यस्य वैयर्थ्य निदाकरोति-विरकेति। विरका अतिरक्का या सन््या तहर्फपिशं ताम्रं पृथिव्या इदं पाथिवरजः पुरस्तापये यत उज्जिहीते उद्च्छति, तस्माद्- नुरस्चास्ति धनूमान् 'शरादीनाक्ष' इति दीर्घः। तेन कथिता प्रृत्तिरस्मागमनचार्ता यह्य स भरतः ससैन्यस्सन् मां प्रत्युद्धत इत्यहं शंके तफंयासीत्यन्वयः । अन्र भरते प्रत्युद्गता्व- स्योपतर्कणे रजोभरोद्गमनरवरूपान्यघर्मसत्वतयातिष्याप्ति: स्याद्, अतस्तद्राग्णाय- अन्यक्वेनेति। तथा क ससैन्ये प्रत्युद्गन्तरि अम्यन्न त्ूमेस्य हष्टतवेन तेन मिमिसेन भरतस्प वस्तुसनूपेणैव प्रत्युद्धतव्वेन भरतस्य तर्कितर्वं न ख्वन्परूपतपेति ना तिष्मास्तिः।

Page 359

उत्प्रेक्षानिरूपणप्रकरणम् ३१६

'उपतर्कित' इत्यस्य प्रयोजनमाह-प्रकृतमप्रकृतसम्बन्धादन्यरवेन वर्णितम उत्पेषा, इश्युक्के-हे नरर्सिहमहीपाछ, र्वां मकरध्वजं कामं विद्यः, अन्यथा मार्गणा बाणा: सुमनसः पुष्पाणि कथं स्जाता :? इस्यनुमानालक्कारे सुमनोमार्गणतवेन निमित्तत्वेन राजि मन्मथ- त्ववर्णनादतिष्याप्ति: स्यादत उपतर्कितमिति पदम्। तथा च सुमनोमार्यणतवहेतुना राजि मन्मथत्यावधारणं न तु सम्भावनामात्रमिति नातिष्यापिः। (चित्र०) इन्दुलिप्त इवाअ्जनेन जडिता दृष्टिर्मृगीणामिव प्रम्लानारुणिमेव विद्रुमलता श्यामेव हेमप्रसा। कार्कश्यं कलया च कोकिलवधूकण्ठेष्विव प्रस्तुतं सीतायाः पुरतश्च हन्त शिखिनां बर्शः सगर्हा इव ॥ इत्यत्रातिव्याप्तिवारणाय प्रकृतमित्युक्तम्। तत्र निरतिशयसौन्दर्यसीताव- दनादिसंनिधानेन तद्वदनाद्युपमानेष्वपि निकर्षापादकेन प्रशस्तोपमाने- ष्विन्द्वादिष्व प्रकृतेष्वञ्जनलेपादिनिकर्षसंभावना क्रियत इति नातिव्यामिः। (भारती) 'सीता के मुख के आगे चन्द्रमा ऐसा लगता है जैसे कालिख से पुता हो, नेत्रों के आगे हिर- णियों के नयन ऐसे लगते हैं जैसे जडीभूत हो रहे हों, ओठों की लाली के आगे मूगे के दाने ऐसे लगते हैं जैसे उनकी लाली फीकी पड गयी हो, अङ्गशोभा के आगे सोने की चमक ऐसी लगती है जैसे काली पड गयी हो, मीठी बोली के आगे कोयल की कूक ऐसी लगती है जैसे कर्क शता से भर उठी हो, और केशपाश के आगे मोर के पख ऐसे लगते हैं जैसे किसी भी काम के न हो।' यहाँ चन्द्रमा आदि में कालिख की पुताई रूप अप्रस्तुत कार्यों की जो सभावना की गयी है उसके द्वारा, उनके कारणभूत, सीता के मुख आदि के सौन्दर्यविशेष की जो कि यहॉ स्पष्ट रूप से प्रतीत है-इस अप्रस्तुत अलकार के उदाहरण में अतिन्याप्ति निवारण के लिए लक्षण में 'प्रकृतम्' विशेषण दिया गया है। ऐसा विशेषण देने से निरतिशय सौन्दर्यपूर्ण सीता के ुख सधान से अर्थात् अन्य उपमान के निर्ष्कापादक वैसे धर्मों के द्वारा अप्रकृत के प्रशस्त उपमान नेत्रादि में अञ्जन लेपनादि निष्कर्प की सभावना से प्रकृत में उसका अभाव है। फलत यहाँ अतिव्याप्ति दोष नहीं होता है।

(सुधा) प्रकृतपदस्य फलं निरुपयति-इन्दुरिति। सीताया: पुरतोऽअनेन इन्दुर्किस इव, मृगीणां जढितेव दृष्टिः विद्रुमलता प्रम्लानारुणिमा हष, हेमप्रभा श्यामेव, कोकिल- वधूकण्ठेषु कलया प्रस्तुतं कार्कश्यमि, हन्त! शिखिरनां सयूराणां वर्हाः सगर्हा हव भवन्तीत्यन्वयः । अम्र निरतिद्यसौन्पर्य सीतावदनसान्तिध्यनिसिततेनेन्दादिष्वक्जनलेप- नादितर्कणस्य सत्या् अप्रस्तुतप्रशंसायासतिष्णाप्तिस्स्यास। अतस्तद्वारणाय प्रक्कत- मित्युक्कम्। तथा चोपमानान्तव निष्कर्षापाछकताद्टशवर्मेणाप्रकृतेषु प्रशस्तोपमानचन्द्रादि- व्वअनलेपनादिनिष्कर्षंस्य सम्भावनतया प्रकृसे तवभावाभ्रातिव्यास्िः।

Page 360

३२० चित्रमीमांसा

(चित्र०) नन्वेवमपि- अस्मद्विकमचेष्टितानि निखिलत्रैलोक्यहेलाजय- प्रह्नीभूतसुरासुराणि भवतो भूमे: सुता शृण्वती। पत्यौ द्वेषकषायितेन मनसा स्त्निग्धा मयि स्थास्यति स्त्रीणां प्रेम यदुत्तरोत्तरगुणग्रामस्पृहाचञ्च्लम् ॥ । इत्यत्र चाञ्चल्यसहचरितत्वेनान्यत्र दष्टत्ीत्वस्य सबन्धेन निमित्तेन वस्तुतः प्रत्येकस्थिरचित्ता देवी सीता चञ्चलत्वेनोपतर्किता । न च तत्रोतमे क्षालक्कारः, रावणकृततदीप्सित संघटनानुकूलविचारमात्रस्य निबद्धत्वेन विच्छि- त्तिविशेषाभावात्। न चान्यधर्मसंबन्धादित्यत्र धर्म उपमायामिव सहृदय- हृदयाह्नादो विवक्षितः, न तु साधारणधर्ममात्रम्। तथा च नोक्तातिव्याप्तिः।

धर्माभावे नोपमालंकार प्रयोजकत्वाभावादिति वाच्यम्। (भारती) 'निखिल तैलोक्य की विजय के कारण नम्रीभूत देव और दानवों पर मेरे पराक्रमों की चर्चा आप से सुनती हुई, भूमिसुता जानकी, जिसका हृदय, उसके पति के साथ मेरा द्वेष रहने के कारण कषायित है, मन से मुझ पर स्नेह करेगी। क्योंकि स्त्रियों का प्रेम उत्तरोत्तर गुण- समूह की स्पृहा में चचल होता है।' इसी प्रकार-चचल चरित्र के कारण दूसरी जगह देखी गयी स्त्री के सम्बन्ध से यहाँ प्रकृत अर्थात् स्थिरचित्त सीता में दूसरे की चचलता आदि की उपतर्कणा से अतिव्याप्ति है। अगर यहाँ उत्प्रेक्षालप्वार ही मान लें, तो अपनी ईप्सित घटना के अनुकूल रावण के विचारमात्र के वर्णन में चमन्कार के अभाव से अन्य समाधान की आशका कर, निराकरण करते हैं कि अप्रकृत धर्म- सम्वन्ध से यहॉ धर्म शब्द का साधारण धर्म की विवक्षा है। किन्तु, उपमा में सहृदय-हृदय आह्लादक धर्म है। ऐसा करने से स्त्नीत्वादि का उसकी सभावना के प्रयोजकत्व में भी सहृदय हृदय के अह्लादकत्व के अभाव से यहाँ अलद्वार के प्रयोजकत्वाभाव से अतिव्याप्ति नहीं है। (सुधा) दोपान्तरमाशककय निराकरोति-नन्विति। एवमपि 'प्रकृतस्माप्रकृतधर्मसम्वन्धादन्य- त्वेन सम्भावनम्' हत्युकलक्षणेऽपीत्यर्थः । अस्मादिति। निखिलस्य सकलस्य त्रैछोक्यस्य हेळाजये नम्रीभूता: सुरासुरा येषु तानि अस्माकं विक्रमचेष्टितानि भवतः शृण्वती भूमे: सुता सीता रामे द्वेषकषायितेन मनसा सयि सिग्धा स्नेहवती म्यास्यति। यत् स्त्रीर्णां प्रेम उत्तरोप्तरगुणसमूहे स्पृहाचञ्लं भवति। अम्र घात्यचरितत्वेनान्यत्र दष्टस्त्रीरवसग्वन्धेन स्थिरचित्तसीतायां प्रकृताया- मन्यस्य चज्रहत्वादेरुपतर्कणादतिव्याप्ति: स्याद। तस्य लघयत वं निशाकरोति-न धेति। उयत्वाभावे हेतुमाह-रावणकृतेति। स्वेप्सितसद्वटनानुकूलरावणविच्वारमान्नस्य वर्णने चमरकाराभावास् समाधानान्तरमाशस्यय निराकरोति-न चेति। अप्रकृतधर्मसम्बन्भा-

Page 361

उत्प्रेक्षानिरूपणप्रकरणम् ३२१

दित्यत्र धर्मशब्दस्य न साधारणघर्मंमात्रे, किन्तूपमायामिव सहृदयहृदयाह्ादिनि धर्में। तथा च स्त्रीस्वादे: तत्सम्भावनाप्रयोजकतवेऽपि सहृद यहृदयाहादित्वा भावेनालक्र प्रयोजक-

(चित्र०) तथापि- स्तनाभिरामस्तबकां नून सीतेति वल्लरीम्। संभावयन् रघुपतिर्धावति स्म दिद्क्षया॥ इत्यत्रातिव्याप्तेरवारणात्। न चाहार्यत्वं तर्कविशेषणम्। इह त्वनाहार्या संभावनेति वाच्यम्, तथा सति 'शंके हनूमत्कथितप्रवृत्तिः' इति संभावनाया अप्यनाहार्यत्वेन तद्व्यावृत्त्यर्थस्यान्यत्वेनेत्यस्य वैयर्थ्यप्रसङ्गादिति चेत् ; मैवम्। अन्यत्वेनेत्यस्यान्यत्वेनावगतपरतया तस्यवाहार्यत्वविशेषणपर्यवसा- यित्वात्। (भारती)

फिर भी- 'स्तनों की तरह अभिराम गुच्छावाली, लतावल्लरी में सीता की सभावना करते हुए- रघुपति राम उसे देखने की इच्छा से दौडते थे।' यहाँ अभिरामत्वधर्म से बल्री में सीता की सभावना से अतिव्याप्ति है। अगर आप कहें कि समावना में आहार्यत्व के विशेषण से सीताविषयक सभावना में आह्ार्यत्व से अतिव्याप्ति नहीं है, तो ऐसा कहने से सभावना में आहार्यत्व विशेषण देने पर- 'विरक्े संध्याकपिश पुरस्तादेतद्रज पार्थिवमुज्िहीते। प्रत्युद्धतो मां भरत ससैन्य .... '। (इस श्रोक की व्याख्या हो चुकी है) इस श्रोक के प्रत्युद्गमन का अन्यत्र रहने के कारण आहार्यसभावना से उस अतिव्याप्ति की निवृत्ति होने पर भी 'अन्यत्वेन' विशेषण की व्यर्थत्वापत्ति होगी। समाधान करते हुए कहते हैं कि इसीलिए 'अन्यत्वेन' यहाँ ही आहार्यत्व की विशेषणीयता है न कि सभावना की। क्योंकि उसका 'अन्यत्वेन' के साथ अवगतपरता है। ऐसा करने से चञ्चलत्व और सीतात्व का आहार्यत्वाभाव से अतिव्याप्ति नहीं होती है। (सुधा) तथापीति। धर्मे सहृदयहृद माहा दित्य विषक्षणाद ति व्याप्तिनिघाइ णेडपीश्यर्थः। रघुपसी रामो मूमं वश्लरी स्तमाभिरामस्तवकवर्तीं सीतेति सम्भावयन्, दिष्वघ्षया घाघति स्नेष्य- न्वयः: अन्नाभिरामत्वधर्मेण वल्चर्यां सीताया सम्भावनसश्वासृतिष्यापिः। समाघानमा- शकुक्य निराकरोति-न चेति। लम्भावनायामाहार्यत्थस्य विशेषणाछ् सीताविषयकसंभा- सतीत्यर्थः। 'विरक्ेसनध्याकपियां पुरस्तादेतव्रजः पार्थिवमुग्निहीसे। प्रत्युद्धतो मां भरतः ससैन्य।I'इति छोकशेषः। अम्न प्रत्युद्धमनस्यान्यत्र सर्वसपाSSहायसम्भावमाभायेन

२१ चित्र०

Page 362

३२२ चित्रमीमांसा

अन्यरवेनेस्यत्नैवाहार्यत्वस्य विशेषणीयत्वं न तु सम्भावनाया, तस्यान्यरवेनावगतपरत्वाद्। तथा घ चञ्चलत्वस्य सीतात्वस्य चाहार्यरवाभावाजजातिव्याप्तिरिति समाधानार्थ:। (चित्र० ) ननु तथापि नैतल्लक्षणम्, अव्याप्तेः । तथा हि यत्र स्वमान्नधर्मादन्य- मात्रधर्माद्वा कि्चिदुत्प्रेदयते तत्रान्यधमसंबन्धादिति लक्षणांशाभावाद्व्यापिः। यथा- अङ्गुलीभिरिव केशसञ्चयं संनियम्य तिमिरं मरीचिभिः। कुड्मलीकृवसरोजलोचनं चुम्बतीव रजनीमुखं शशी।। भूयस्तराणि यदमूनि तमस्विनीपु ज्यौत्स्नीपु च प्रविरलानि ततः प्रतीमः । संध्यानलेन भृशमम्बरमूपिकाया- मावर्तितरुडुभिरेव कृतोऽयमिन्दु: ॥ (भारती) 'ननु' से पुन आशका करते हैं-तथापि अर्थात् फिर भी प्रकृत का अप्रकृतधर्मसम्बन्ध से आहार्यत्वावगत के द्वारा वैसा लक्षण करने पर भी सभावना है ही। यह लक्षण भी अतिव्यापि दोष से दूषित रहने के कारण प्रतिपादन के योग्य नहीं है। यहाँ अव्याप्तिप्रतिपादन के लिए हेतु में विकल्प बताते हैं। वसा करने पर-जहाँ स्वमात्र धर्म से कुछ उत्प्रेक्षण है अथवा जहाँ अन्यमात्र धर्म से ही कुछ उन्प्रेक्षण है-दोनों ही स्थिति में हेतु के अभाव से व्याप्ति होती है। दोनों को अलग-अलग उदाहरण देकर वताते हैं। जैसे- 'चन्द्रमा अङ्गुलियों की तरह किरणों से केशर-सक्चय की तरह अन्धकार को पकड कर, मुकुलित कमलरूपी आखोंवाली रातरूपी नायिका का मुख चूम रहा है।' 'ये तारे अन्धकाराच्छन्न रात में अविरलभाव से उपस्थित हैं। हमारी ऐसी प्रतीत है कि चन्द्रमाने इन नक्षत्रों को सन्ध्यारूपी आग से आकाशरूपी मूपिका (सोना गलाने की घरिया) में आवत्तित कर दिया है।' (सुधा) आशङते-नन्विति। तथापीति प्रकृतस्याप्रकृतधर्मंसम्वन्धादाहार्यान्यत्वावगतेन सम्भावितस्य तल्लक्षणत्वेऽपीत्यर्थः। एतव्लक्षणरयाव्याप्तिदूषितत्वात् प्रतिपादनमशक्य- मित्यर्थः । अध्यातिं प्रतिपाद्यितुं हेती घिकल्पमाह-तथा हीति। यन्न र्वमात्रधर्मादुर्मे- क्षण यम्र चान्यमान्रधर्माहा, तहुभयोर्हेत्वमावादव्याप्ति स्यादिति भावः।तदुभयं दर्शयति- अङ्लुलीभिरित्यादिना। शशी चन्द्र, अहुलीभिरिव नरीचिमिः केशस्यसिच तिमिरं सन्निगृह्ष मुकुलितकमललोघनं रान्रिमुखं चुम्घतीवेत्यन्वयः। भूय इति। अमूनि उडूनि समस्विनीषु यद्भूयस्तराणि ज्यौह्स्नीषु च प्रविरलानि सन्ति, ततस्सन्ध्याभिना आकाक्ष भूषिकायामावर्तितैनछत्रैरेवायं चन्द्रः, फृत इति घयं प्रतीम इत्यन्वयः। (चिन्न०) इत्यत्राद्योदाहरणेऽङुलीसदृशीभिर्मरीचिभिः केशसञ्च्वयसदृशस्य तिमि-

Page 363

उत्प्रेक्षानिरूपणप्रकरणम् ३२३

रस्य ग्रहणात् स्वमात्रधर्सादेव शशिनश्चुम्बनमुत्प्रेक्षितम्। द्वितीये ताराविरल- त्वाविरलत्वरूपेणान्यमात्रधर्मेण चन्द्रस्य सध्यानलसध्यगाम्बरमूषिकावर्तित- तारानिकरनिमित्तत्वसुत्प्रेक्षितम् । कि च हेतुफलधर्मस्वरूपोत्प्रेक्षास्वन्यत्वेनेति लक्षणांशाभावादव्याप्तिः। यथा- सेषा स्थली यत्र विचिन्वता त्वां भ्रष्टं सया नूपुरमेकमुर्व्याम्। अदृश्यत त्वच्चरणारविन्दविश्लेषदुःखादिव बद्धमौनम्॥ (भारती) इन दोनों उदाहरणों के वीच प्रथम उदाहरण में अद्डुली की तरह किरणों के द्वारा केश-सग्रह के सदृश अन्धकार के ग्रहण से स्वधर्ममात्र से चद्रमा का मुखचुम्बन ही उत्प्रेक्षा है, नकि अन्य मात्र- धर्म सम्बन्ध से। अत यहाँ अव्याप्ति है। दूसरे में, तारों के विरलत्व और अविरलत्व से अन्य धर्ममात्र से चन्द्रमा का सध्या-अन्नि के बीच आकाशमूषिकावर्तितित ताराओं के समूह से निमिंतत्व का उत्प्रेक्षण है। यहाँ चन्द्रमा में उसके धर्मसम्वन्ध के अभाव से अव्याप्ति है। यहाँ धर्म का दोनों वृत्ति में नियम है। किश्च से लक्षण में अन्य दोष बताते हैं। 'अन्यत्वेन' विशेषण का हेतु फलधर्मस्वरूप उत्प्रेक्षा के स्वमाव से वहाँ अव्याप्ति है। जैसे- 'यह वही वनभूमि है, जहाँ तुमको ढूढते हुए मैंने भूमिपर नूपुर को पाया था, जो मानो तुम्हारे चरण-कमल के विरहजन्य दुख से मौन दिखलाई पडता था।' (सुधा) प्रथमेऽव्याप्तिमाह-आद्योदाहरण इति। अब्ुलीसह्वशमरीचिक्कृत केशसऊय सर श् तिमिर- ग्रहणेन स्वभावधर्मेण चन्द्रस्य मुखचुन्बनोत्प्रेछ्षणं न त्वन्यमात्रघर्मसम्न्धादित्यव्यास्षिः। द्वितीये-तारादिर लत्वाघिरलसवरूपेणान्यमात्रघर्सेण चन्द्रस्य सन्ध्यानलमध्यगाम्वरमूषि- कावर्तितताश निकर निर्मितत्वस्योत्प्रेप्षणस्। अत्र चन्द्रे तवर्मसम्बन्धाभावादव्याप्त : धर् स्योभ्षयवृत्तित्वनियमसत्वादिति भावः। लक्षणे दूषणान्तरसाह-किव्वेति। अन्यतवेनेत्य

यथेति। सा पूर्वातुभूता स्थली एषा दृश्यत इत्वर्थः । यम्र स्थल्या तर्वा निचिन्वताऽन्दिष्यता मया, त्वप्चरणारविन्देन दो विश्लेषो वियोगस्तेन द्ुःखं तस्मादिच बद्धमौनं निश्शव्दसुर्ष्या भ्रष्टमेक नूपुरं मञीर: 'मज्जीरो नूपुरोऽस्त्रियाम' इत्यसरः। अदृश्यतेत्यन्वयः। (चित्र०) इति हेतूतप्रेक्षोदाहरणे नूपुरगतेन दुःखिसाधारणेन मौनित्वेन निमित्तेन नूपुरे तद्धेतुभूतदुःखसेव धर्सतयोत्प्रेद्यते, न तु दुःखितादात्म्यम्, दुःखशब्द- स्योपरि सतुवाद्यश्रवणात्। एवम्- चोलस्य यद्भीतिपलायितस्य भालत्वच कण्टकिनो वनान्ता:। अद्यापि कि वानुभविष्यतीति व्यपाटयन् द्रष्टुमिवाक्षराणि।। इति फलोत्प्रेक्षोदाहरणे द्रुमगतेन ललाटाक्षरदर्शनप्रवृत्तपुरुषसाधारणेन

Page 364

३२४ चित्रमीमांसा

ललाटपाटनेन निमित्तेन द्रुमाणां तत्फलं ललाटाक्षरदर्शनमुद्देश्यमिति धर्मतयो- प्रेक्ष्यते न तु ललाटाक्षरदर्शनप्रवृत्तधमितादात्म्यम्, द्रष्टुमित्यस्य धर्मि- पर्यन्ताभावात्। तथा- पिनष्टीव तरङ्गाग्रैः समुद्रः फेनचन्दनम्। तदादाय करैरिन्दुर्लिम्पतीव दिगङ्गनाः ।। (भारती) यहाँ नूपुरगत दुख साधारण मौनित्वधर्म से नूपुर में धर्मता से उसके हेतुभूत दु ख का ही उत्प्रेक्षण है, न कि अन्य का। अत. हतूत्प्रेक्षा के इस उदाहरण में अतिव्यापि है। दु खी का तादात्म्य सम्बन्ध से तो यहाँ उत्प्रेक्षा नहीं है। अत. आगे मतुप् आदि का श्रवणाभाव से वहाँ उसकी उपेक्षा है। इसी प्रकार फलोत्प्रेक्षा की अव्याप्ति बताते हैं। जैसे- इस श्रोक में राजा नृसिंहदेव का वर्णन है-'जिसके मय से मागे हुए चोल नरेश के ललाट की त्वचा को कटीले वन प्रदेशों ने, अब भी 'न जाने यह क्या अनुभव करेगा' इस कारण से, मानो विधाता की लिपि देखने के लिए, उघेड डाला है।' फलोत्प्रेक्षा के इस उदाहरण में कँटीले वनप्रदेशरूपी विपय में न केवल 'ललाट की चमढी उधेडना' जिसका निमित्त है उस 'विधाता की लिपि देखने' की उत्प्रेक्षा यहाँ की जा रही है। किन्तु, वह 'लिपि देखना' जिसका फल है उस 'ललाट की त्वचा उधेडने' आदि विषयी की काँटो द्वारा किये गये 'उधेडने' आदि विषय में अभेद सम्वन्ध द्वारा उत्प्रेक्षा की जा रही है। तात्पर्य यह कि इस पद्य में 'कँटीले वनप्रदेश' उत्प्रेक्षा का विषय और 'विधाता की लिपि देखना' विषयी नही है किन्तु, 'काँटों द्वारा किये गये उधेडना' विषय और 'अक्षर देखना जिसका फल है वह ललाट की चमडी उधेडना' विपयी है। निष्कर्प यह है कि-विषयी की उत्प्रेक्षा सर्वत्र धर्मोत्प्रेक्षाओं में और हेतूत्प्रेक्षा तथा फलो- त्प्रक्षा में भी अभेद सम्बन्ध से ही होती है। 'तथा' शब्द से धर्मस्वरूप उत्प्रेक्षा के उदाहरण में अव्याप्ति वतलाते है। जैसे- 'समुद्रतरङ्गों के अग्रभाग से फेनरूपी चन्दन को घिसते हुए की तरह चन्द्रमा ने मानो उस फेनरूपी चन्दन को लेकर किरणरूपी हाथों से दिशावधू के शरीर में लेप कर दिया है।

(सुघा) अन्र नूपुरगतदुःखिसाधारणमौनिष्वधर्मेण नूपुरे धर्मतया तद्तेतुभूतदुःसस्यैवोसपरेक्षणं नत्वन्घेनेश्यव्याप्तिः। दुःखिनस्तु तादारम्य नोत्प्रेपयते, ततोऽमे मतुयादेः श्रवणाभावाद, तम तस्यापेकणाप। फलोशप्रेप्षायामव्याप्तिसाह-चोलस्येति। कण्टकवन्तो वृष्षा भीति- पकायितस्य चोकस्य यद्धाळत्वं व्यपाटयन् सदधापि किं वानुभविष्यति इत्यप्षराणि वष्टमिवेत्यन्ययः। अन्न फलोप्रेमोदाहरणे दुमगततदर्शनप्रवृत्तपुरुषसाधारणळलाटपाटन- निमित्तेन तस्फलललाटापर दर्शनस्य वृक्षोद्वेश्यावेन सददर्शनफळकरवग्विपाटनमेव धर्मभावे- नोष्परे चयते। सथा चाम्रापि तद्षन्यतयोत्प्रेक्षणाभावादुव्याप्तिः। अम्र तददर्यनप्रवृतधर्मिणस्व ताछाल्यं नोप्रेचयम्, वष्टमित्यस्य तद्पर्यन्तरवाभावाद, स्वग्विपाटनफल पवान्वयसौ- कर्थादित्यर्थ:। अर्मस्वरूपोत्प्रेस्ठोदाहर णेडव्याप्तिमाह-तथेति। समुद्रः तरक्राणामप्रभाग:

Page 365

उत्प्रेक्षानिरूपणप्रकरणम्

फेनरूपं चन्दनं पिनष्टीच, इन्दुस्तव् फेनचन्दनमादाय करैः दिग्रपा अक्गना लिम्पतीवेत्य- न्वय: । (चित्र०) इति धर्मस्वरूपोत्प्रेक्षोदाहरणे समुद्रस्य चन्दनघर्षणशिलाप्रान्तस्थानीये तटे हस्तस्थानीयतरङ्गागैः फेनचन्दनपेषकत्वेन शशाङ्कस्य करैदिगङ्गनादि- धवलीकरणेन च प्रतीयमानेन निमित्तेन तत्कर्तृकं पेषणलेपनमात्र- सुत्प्रेक्षयते, न तु तयोः पेषणलेपनकर्तृतादात्म्यम् । पिनष्टि लिम्पतीत्या- ख्यातयोः कर्तृवाचकत्वेऽपि 'भावप्रधानमाख्यातम्' इति न्यायेन कर्तुः

तमोऽङ्वानि वर्पतीवाञ्जन नभः' इत्युत्प्रेक्षासुदाहृतवता दण्डिनोक्तोदाहरण-

(भारती) इस उदाहरण में चन्दन घिसने के लिए शिलाप्रान्त स्थानीय किनारे में, समुद्र के हाथ के स्थान में तरद्गों के अग्रभाग से फेनरूपी चन्दन के पेषकत्व से, और चन्दन का दिग्वघू के धवली करण से-प्रतीयमान दोनों निमित्तों के द्वारा तत्कर्तृक घेषण और लेपन मात्र की उत्प्रेक्षा से तथा उससे भिन्न तर्कणाभाव के कारण अव्याप्ति है। अगर आप यह कहें कि दोनों वाच्यों से डी पेषणत्व और लेपनत्व क्रिया से तत्कर्तृक तादात्म्य की उत्प्रेक्षा से अन्यत्व के द्वारा यहाँ सभावना है ही, तो इसका यह उत्तर है कि 'पिनष्टि' इत्यादि क्रिया का कर्तृवाचकत्व होने पर भी, 'आावप्रधानमाख्यातम्' 'सत्वप्रधानानि नामानि' इस क्रियारूप धातु के अर्थ में विशेषणी- भृत तिडर्थ के कर्त्ता की सम्भावना में अन्वय असम्भव है। निष्कर्ष. यहाँ 'सावप्रधानमाख्यातम्' से वाक्य-विरोध होगा, क्योंकि आख्यात में व्यापार प्रधान होता है, जब कि यहाँ प्रथमात पद प्रधान है। यह कुछ नहीं है। 'भावप्रधानमाख्यातम्' का अर्थ 'आख्यात' का 'प्रधनन' 'भाव' होता है। यहाँ आख्यात का अर्य तिङ प्रत्यय, प्रधान का वाच्य एव भाव का व्यापार करने पर उपर्युक्त बात की पुष्टि हो जाती है। अव प्रश्न यह उठता है कि 'प्रधान' का यहाँ 'वाच्य' अर्थ कैसे हुआ ? इसके अगले वाक्य 'सत्वप्रधानानि नामानि' का अर्थ 'प्रातिपदिक द्रव्यवाची होते हैं, में 'प्रधान' का अर्थ 'वाच्य' ही है। अत. उपर्युक्त अर्थ किया गया है। और भी-अन्य विशेषण का दूसरी अगह अन्वय की अयोग्यता मी है। इसीलिए इस उद्दाहरण में- लिम्पतीव तमोङ्गानि वर्षतीवाअ्नं नभः। असत् पुरुषसेवेष एष्टिविफलतां गता।। 'ऐसा प्रतीत हो रहा है कि जैसे अधेरा अग-अग में लेप रहा हो, आकाश का जल बरसा रह्दा हो और ऑखें दुष्ट सेवा की भाँति व्यर्थ हो गयी हो।' यहाँ दो अनुक्तविषया वस्तूत्प्रेक्षाए हैं। यहाँ पर अन्धकार का विना वर्णन किये ही काजल की वर्षा तथा अन्धेरा के लेपन कार्य के रूप में सभावना का कथन किया गया है। अत. यहाँ उत्प्रेक्षा का विषय है रात्रि का अन्धकार, जो अनुक्त हैं।

Page 366

३२६ चित्रमीमांसा

विमर्शं-'लिम्पतीव तमोङ्ानि वर्षतीवाक्जनं नभः' अर्थात् अन्धकार मांनो अगों को काले रग से पोत रहा है, आकाश मानो काजल वरसा रहा है। इस पद्य में प्रथमात कर्ता अधकार और आकाश में क्रमश 'पोतना' और 'बरसना' क्रियाओं के कर्त्ता होने की उत्प्रेक्षा नहीं है। इसका कारण यह है कि इसमें कर्तृत्व आख्यात के अर्य का विशेषण है, जिसके फलस्वरूप यह वाक्य के प्रधान अश की अपेक्षा एकदेश है। इसलिए मुख्य न होने से 'कर्नृत्व' की उत्प्रेक्षा नहीं कही जा सकती। तथा 'पोतने', 'अधकार' आदि में कर्त्ता के अभेद सम्बन्ध होने से यहाँ उत्प्रेक्षा ही है। क्योंकि (कर्त्ता) में क्रिया के विशेषण होने के कारण प्रधानत्व की कमी है। किन्तु यहाँ 'अन्धकार', 'अग' एव 'पोतने' रूपी क्रमश कर्त्ता, कर्म और क्रिया की उत्प्रेक्षा 'आकाश', 'काजल' एव 'वरसने' इत्यादि में हो रही है। इन दोनों उत्प्रेक्षित-पोतने और वरसने के द्वारा इस उत्प्रेक्षा का विषय 'व्याप्त होना' निगीर्ण कर लिया गया है। फलत. 'व्याप्त होने' का उल्लेख यहाँ नही किया गया है। इस प्रकार के व्यवहृत उत्प्रेक्षा को अनुपात्तविपया उत्प्रेक्षा कहते हैं। अपने निमित्त धर्म 'काले कर डालना' के कारण वह अनुपात्त है। यहाँ अन्धकार के व्यापनादि और लेपनादि रूप से सभावना के कारण उत्प्रेक्षा के रूप में इसे उदाहृत करते हुए दण्डी ने लेपन-वर्षणकर्तृक अन्धकार और नभ के शब्दश्रवण से उपमा की तरह आशङ्का कर कहा है- (सुधा) अम्रोदाहरणे चन्दनवर्षणशिलाप्रान्तस्थानीयतटे समुद्रस्य हस्तस्थानीयतरम्ाये फेन वन्दुनपेषकरवेन चन्दुनस्य दिगद्नाघवलीकरणेन चेत्येवं प्रतीयमानाभ्या दाभ्यां निमित्ता- भ्यां त्कर्तृकपेषणलेपनमान्नो प्रेक्षणेन तदन्यतयोतर्णाभावा्ाप्ति। न च वाच्याभ्या

वाध्यमू, पिनष्टीत्यादेराख्यातस्य कर्तृ वाचकरवेऽपि 'भावप्रधानमाख्यातम्, सत्वप्रधानानि नामानि' छ्वति क्रियारूपधात्वर्थ विशेषणीभूलतिडर्थस्य कर्तः सम्भावनायामन्वयासम्भ- वात्। अन्यविशेषणस्यान्यन्नान्वयायोगाघय। अन्न दुण्डिमतप्रमाणसुपन्यस्यति-अत एवेति। तमोऽद्गानि लिम्पतीव, नभोऽअ्जनं वर्षतीच। अम्र तमसो व्यापनादेलेपनादिरूपतया सम्भावितत्वादुत्प्रेप्षसुमाहृतवता दण्ठिना लेपनवर्षणकर्तृस्यां तमोनभलोरपमासिय शब्ब-

(चित्र०) कर्ता यद्युपमानं स्यान्न्यग्भूतोऽसौ क्रियापदे। स्वक्रियासाधने व्यग्रो नालमन्यद्व्यपेक्षितुम्॥ इति दूषितम्। वृत्तानुपूर्वे च न चातिदीघे जङ्गे शुभे सृष्टवतस्तदीये। शेषाङ्निर्माणविधौ विधातुर्लावण्य उत्पाद्य इवास यत्नः ॥ इत्यत्र निरतिशयलावण्यशालिजङ्गासृष्टयनुमितेन निःशेषलावण्यकोशव्य येन निमित्तेन विधातुः शेपाङ्गनिर्माणोपयुक्तलावण्योत्पादने यत्रमात्रसुत्प्रेद्यते, न तु तथाभूतयत्नवत्तादात्म्यमिति स्पष्टमेव।

Page 367

उत्प्रेक्षानिरूपणप्रकरणम् १२७

अपि चाप्रकृतधर्मिकोत्प्रेक्षायां प्रकृतमित्यंशाभावादव्याप्तिः। यथा- हृतसारसिवेन्दुमण्डलं दमयन्तीवदनाय वेधसा। कृतसध्यबिल विलोक्यते घृतगम्भीरखनीखनीलिम।। (भारती) अर्थात् यदि उपमान ही कर्त्ता हो, तव क्रिया पद में विशेषणीभूत यह अमनी क्रिया की साधनव्यग्रता से अन्वय अर्थात् सादृश्यान्वय की अपेक्षा के लिए समर्थ नहीं होती है।' इससे समाधान करते हुए दूषित कहा है। 'विधाता को पार्वती के शरीर-निर्माण के लिए, एकत्रीकृत सम्पूर्ण सौन्दर्य-द्रन्यों का व्यय, केवल उसके दोनों सुन्दर जघाओं के निर्माण में ही हो गया। अब शरीर के अन्य अवयवों के निर्माण के लिए उन्हें अतिरिक्त लावण्य द्रव्यों का प्रयत्नपूर्वक सग्रह करना पडा।' यहाँ अत्यन्त सौन्दर्यशाली जघाओं के निर्माण में सम्पूर्ण लावण्यकोश के व्यय हो जाने के निमित्त से विधाता का पार्वती के शेष अङ्गनिर्माणोपयुक्त लावण्य के उत्पादन में प्रयत्नमात्र की उत्प्रेक्षा है नकि तथाभूत यत्न की तरह तादात्म्य की उत्प्रेक्षा है। और भी 'प्रकृत' का कथन भी यहाँ उचत नहीं है। क्योंकि अप्रकृतधर्मिका उत्प्रेक्षा में उसके अभाव से अव्याप्ति है। जैसे- 'दमयन्ती के मुख का निर्माण करते समय विधाता ने चन्द्रमा के बीच से सौन्दर्यरूपी सार भाग ले लिया। फलत चन्द्रमा के वीच में ही छिद्र हो गया। आज भी चन्द्रमा के बीच के उस छेद से होकर उस पार के आकाश की नीलिमा साफ-साफ दिखाई दे रही है।' (सुधा) यदयपमानं कर्ता स्यात्, तदा क्रियापदे विशेषणीसूतोऽसी स्वक्कियासाधनण्यग्रत्वाद- न्यष्=सादश्यान्वयमपेपितुं ममर्थो न भवतीत्यादिना ससाहितम। किश्न, वृत्तेवतुले पूर्वम नुगते अनुपूर्दे, गोपुच्छाकार हत्यर्थः । दृत्ते घ ते अनुपूर्वे च दृत्तातुपूर्ये, नातिदीर्घे च, महाविभाषया समासासाय:। शुसे मसले, तस्या इसे तदीये जड्घे, सष्टवतो निर्मितचतो विधातु: स्नष्ः शेषाङ्गनिर्माण- विधौ विषये जड्घातिरिकावचवनिर्माणार्थम्, उत्पाद्ये पुनः सम्पाधे लाव्ये कान्ति- विशेषविपये सयक्ष इच आसेत्यन्वयः। अत्राप्युदाहरणे निरतिशयलावण्यशालिजङ्वासृ

त्पाद्नयत्माम्रस्थोत्प्रेक्षणं न सु यत्वत्तादात््योतप्रेक्षा। तथा व तद्यतस्यापि तद्मंतोड न्यरवाभावादव्याप्तेश्र। दूषणान्तरं लक्षणे पुनः प्रतिपाकयति-अपि चेति। प्रकृतमित्य- स्थापि कथनं न युज्यते, अप्रकृतधर्मिकोत्प्रेक्षायां तस्थाभावात्। तदेवाह-यथेति । इन्दुमण्डलं धन्द्रबिम्ब वेघसा ब्रह्मणा दमयन्तीवदनाय तन्निमातुं हृतसारमिव गृहीतश्रेष्ठ- भागमिव, कतं मध्ये बिलं छिद्रं वस्य छतो गम्भीरखन्या निम्नगर्ते उपरिस्थस्य खस्या- काशस्य नीलिमा येन ताडशं विलोक्यते हश्यते तकयंते इति यावदिश्यन्वयः। (चित्र०) अत्र कृतमध्यबिलमिति पदार्थहेतुकका:्यलिङ्गापेक्षयातिशयोक्त्या कृत- मध्यरन्ध्राकाशनैल्यत्वेनाध्यवसितो यः कलक्कस्तद्वत्वेन निमित्तेन कलक्काध्य-

Page 368

३२८ चित्रमीमांसा

चसितधृतमध्यरन्ध्राकाशनैल्यत्वनिमित्तोत्प्रेक्षितं कृतमध्यबिलत्वेन निमित्तेन वा चन्द्रमण्डल दमयन्तीवदननिर्माणाय हतसारत्वेनोत्प्रेक्षितम्, न तु प्रकृतं दमयन्तीवदनमेवो क्तप्र काराह्य तैनवसशनिर्मितत्वे्प््र क्षितम्। यद्वालेन्दुकलोच्चयादुपचितैः सारैरिवोत्पादितम्। तत्पश्येयमनङ्गमङ्गलगृहं भूयोऽपि तस्या मुखम् ॥' इत्यत्रेव तथाशब्दान्वयासावात्। (भारती) इस उदाहरण में कलक के निमित्त से अथवा वीच में छेद के निभित्त से चन्द्रमण्डल का दम- यन्ती के मुख-निर्माण के लिए 'हृतसारत्व' की उत्प्रेक्षा है नकि प्रकृत दमयन्ती वदन की उक्त प्रकार से आहृत चन्द्रमा के साराशत्व से उत्प्रेक्षा है। अत. यहाँ प्रकृत का उत्प्रेक्षणाभाव के कारण अप्रकृत चन्दमण्डल की उत्प्रेक्षा से ही अव्याप्ति है। यहाँ चन्द्र की कलछता और वीच के छेद की निमित्तता कैसे हुई ? यह सन्देह नहीं करना चाहिए। क्योंकि, 'बीच में छेद कर दिया' इस पदार्थहेतुक काव्यलिङ्ग की अपेक्षा अतिशयोक्ति के द्वारा छिद्र के वीच से प्रदशित आकाश की नीलिमा से कलङ्ग के अध्यवसित करने के कारण साध्यवसाना लक्षणा से उसी कलद्ू का निश्चयाभिधान के अभाव में भी उसकी विद्यमानता से, तथा कलक्कत्व के निश्चित होने पर जो चन्द्रमा के वीच के छिद्र से आकाश की नीलिमा की प्रतीति है, उसी निमित्त से बीच के छिद्र की भी उत्प्रेक्षा है। अगर यह कहें कि दमयन्ती के मुख का ही उसी प्रकार के चन्द्रमा के साराश से निर्मित होने के कारण उत्प्रेक्षा में प्रकृत की उत्प्रक्षा से किस प्रकार अव्याप्ति होगी, तो इसका यह उत्तर है कि- 'जिस मुखका निर्माण वालेन्दु की समस्त कलाओं के सग्रह का सार भाग लेकर किया गया है, उस अनङ्गमङ्गल गृह के सदृश (मालती के) मुख को बार-बार देखता है।' यहाँ यदादि शब्दों का सुख में अन्वय रहने पर भी जैसे प्रकृत की उत्प्रेक्षा है, उसी प्रकार दमयन्ती के मुख में उत्प्रेक्षणीय शब्द का अन्वयामाव है।

(सुधा ) अन्नोदाहरणे कलङ्वरवेन निमित्तेन वा सध्यबिषरवेन निमित्तेन चन्द्रमण्डलस्प दमयन्तीवदननिर्माणार्थ हतसारख्वेनोपेक्षणम, न त्ु प्रकृतस्य दमयन्तीवदनस्योक

शंक्यम्, कृतमध्यविलमिति पदार्थहेतुकक्ाष्यलिस्मपेपयातिशयोक्त्था कृतमध्यरन्ध्रा काश नैष्षयरेन कलङ्कस्याध्यवसिततवाठ्, साध्यवसानलक्षणया तेनैव कछकुस्य निश्चितरवे नाभिधानाभावेऽपि तस्य विदयमानर्वास, कलप्ुत्वेन निश्चिते यन्मध्यरन्त्राकाशनैक्यं तेन निमित्ेन मध्यविलस्याप्युप्प्रेक्ितत्वेन लाभान्घ। न प्र दमयन्तीवदनस्यैव ताद्ठशैन्दव- सारशनिर्मितव्वेनो सेप्षणे प्रकृतस्यो्प्रेक्षणसा् थम्यप्तिरिति वा्यम्। 'सम्भूे सुखामि चेतसि परं भूमानमातम्वते। पत्राछोकपथावतारिणि रति मसतौति नेग्रोरसमः।

Page 369

उत्प्रेक्षानिरूपणप्रकरणम् ३२६

मुखम् ॥'तत् तस्या मालत्या अनद्स्य मंगलार्थ गृहं सुवर्णगृहं वा 'कक्याण मंगलं विद्याव काअ्जनश्च तदक्षम्' इति विश्वोशोक्तेः, अनंगस्य मङ्गलानां सौकुमार्यादीनासुपचय- हेतूनां गृहं या मुखं पुनरपि पश्येयम्। आलोकमार्गावतारिणि सम्मुखीभूते यश्न मुखे सति सुखानि सम्भूयेव मिलित्वेव चेतसि परं वाहुल्यं विस्तारयन्ति नेत्रोत्सवो रतिमतु- रागं प्रस्तौति सर्वात। किस्व, यन्मुखं बालेन्दो: कलाना समूहादुपचितर्गृंहीतैरिव सारांशै

(चित्र०) ननु यथा शब्दतोऽन्वयालाभेऽवि 'ब्राह्मणशतं भोन्यताम्' इत्यत्र प्रधान- मतिलङ्गयोपसर्जने क्रियान्वयपर्यवसानम् , संख्याया भोजनान्वयायोग्यत्वात्, तथेहापि प्रधानमिन्दुमण्डलमतिलद्व्योपसर्जने दसयन्तीवदने इन्दुमण्ड- लाहृतसारांशनिर्मितत्वोत्प्रेक्षापर्यवसान स्यात्, अप्रकृतस्यावर्णनीयत्वादिति चेत्, न; अप्रकृतवर्णनस्याप्यप्रस्तुतप्रशसारूपेण प्रकृतातिशयाधानार्थतया- न्वेतुं योग्यत्वात्। (भारती) अव पुन 'ननु' से शका करते हैं कि 'ब्राह्मणशत भोज्यताम्' यहाँ 'शत' का भोजन की क्रिया में अन्वय नहीं रहने के कारण उसे छोडकर उसके उपसर्जनीभूत म्राह्मणों में भोजन-क्रिया के अन्वय का शब्द द्वारा अन्वय नहीं रहने पर भी जैसे पर्यवसान है, उसी प्रकार यहाँ भी प्रकृत वर्णनीय अनर्हता से अप्रकृत प्रधान इन्दुमण्डल का भी उल्लघन कर उपसर्जनीभूत दमयन्ती-वदन का इन्दुमण्डल से आकृत असार भाग के द्वारा निर्माण होने के कारण उत्प्रेक्षा से व्याप्ति नहीं है, तो इसका समाधान करते हैं कि यहाँ अप्रकृत वर्णन का भी अपनी ही प्रशसारूप से प्रकृत के अतिशय आधान में प्रयोजकना से वर्णन की योग्यता द्वारा अन्वय की दुर्निर्वारता है। (सुधा) अन्र यमादिशब्दानां मुखेऽन्वयमरवाघथा प्रृतस्योत्प्रेष्षणं तथा दमयन्तीघदने उत्प्रेक्ष णीयशन्दस्थान्वयाभावास। न व 'ब्राह्मणशतं भोज्यताम्' इत्यम्र शतस्य भोजनक्रिया- यामन्वयानहंतथा तमतिलछम तहुपसर्जनीभूतब्राह्मणेषु भोजनक्रियान्वयस्य शब्दद्वाराऽनव- यस्यालाभेऽपि पर्यवलानम्, तथात्राप्यप्रकृतस्य वर्णनीयानहतया प्रधानमपीन्दुमण्टलम-

व्याप्तिरिति वाच्यम, अम्रकुसघर्णनस्वापि स्वप्रशंसारूपेण प्रकृतातिशयाधाने प्रयोजकतया वर्णनयोग्यतवेनान्वयस्य हुर्चारताया वक्तु शक्यरवाद्। (चित्र०) न च वाच्यम् 'इन्दुर्लिप्त इव' इत्यप्ररतुतप्रशंसोदाहरणान्तर इवात्रापि संभावनामात्रमेव नोत्प्रेक्षेति । तत्र सहृदयहृदयाह्ादिनिमित्ताभावे नोतप्रेक्षा- सामग्रीपरिपूत्यभावादुत्प्रेक्षाया असभवेऽप्यत्र तत्संभवादप्रस्तुतप्रशसया सङ्करोपपत्तेः । तस्मावव्याप्तत्वान्नेद लक्षणं युक्तमिति चेत्? अत्र ब्रम :-

Page 370

३३० चित्रमीमांसा

न तावत् 'हृतसारम्' इत्यादावव्याप्ति, प्रकृतशब्दस्य विषयत्वाभिमतमात्र- परत्वात्। न चैव 'इन्दुलिप्त इव' इत्यादावतिव्याप्िः, तत्र सीतावदनसनिधाने

जकत्वात् , धर्सस्य सहृदयहृदयाह्लादिनो विवक्षितत्वाद्वा। अन्यत्वेनेत्यस्या- न्येत प्रकारेणेत्यर्थ इति न हेतुफलधर्मस्वरूपोत्प्रेक्षास्वव्याप्तिः, यत्र धर्मिणि धर्म्यन्तरं तादात्म्येनोत्प्रेक्षयते तत्र धर्म्यन्तरमन्यः प्रकारः, यत्र तु कश्चिद धर्म एव किव्च्ित्प्रति हेतुतया फलतया स्वरूपेण चोत्प्रेदयते, तत्र स एव धर्मोऽन्यः प्रकार इति सर्वत्राप्यनुगतेः। (भारती) प्रकारान्तर से समाधान की आशका कर उसका 'नच' से निराकरण करते हैं। 'इन्दुर्लिप्त इवाञ्ज- नेन' अर्थात् काजल से लिपा हुआ की तरह इत्यादि अप्रस्तुत प्रशसा के उदाहरण में जैसे समावना मात्र ही उत्प्रेक्षा नहीं है, उसी प्रकार यहाँ भी उत्प्रेक्षणाभाव है। तो इसका उत्तर यह है कि वहाँ सीता के मुखसान्निध्य रूप हेतु का सहृदय-हृदय के आह्लादक रूप निमितत्व के अभाव से अर्थोत् उत्प्रेक्षण सामग्री की पूर्ति के अभाव से वहाँ उसकी असभावना में भी 'वीच के छिद्र' का चमरकारक रहने के कारण अप्रस्तुत से सक्कर की उत्पत्ति है। अत अव्याप्तिग्रस्तरहने के कारण यह लक्षण उचित नहीं है। 'अत्र ब्रम' से समाधान करते हैं- यहाँ प्रकृत शब्द का विषय मात्रपरता का सम्वन्ध दोनों जगहों में समान रूप है। ऐसा करने के कारण ही 'हृतसारमिवेन्दुमण्डलम्' इस उदाहरण में इन्दुमण्डल का भी विषयत्व के अविशेष से उसके उत्प्रेक्षण में अव्याप्ति असभव है। 'इन्दुलिंप्त इव' इत्यादि में भी अतिव्याप्ति नहीं है। क्योंकि सीता के मुखसान्निध्य को सहृदय-हृदय के आह्लादकत्व का अभाव है। किन्तु 'अन्यत्वेन' इस विशेषण का भी दूसरे ढग से लक्षण में अन्यपरता व्याख्येय है। इससे पूर्व कथित हेतुफलधर्मस्वरूप उत्प्रेक्षा में भी अव्याप्ति नही है। उसे ही कहते हैं कि जहाँ धर्मो में दूसरे धर्म का तादात्म्य सम्बन्ध से उत्प्रक्षा है, वहाँ अन्य धर्म की ही अन्यप्रकारता है और जहाँ धर्म ही किसी के प्रति हेतुत्वादि से उत्प्रक्षित है, वहाँ धर्म की अन्यप्रकारता है (सुधा) प्रकारन्तरेण समाधानसाशडव््य निराकरोति-न चेति। 'इन्दुर्लिप्त इवाअनेन' हत्यादाचप्रस्सुतप्रशसोदाहरणे यथा सम्भावनामान्रं नोत्पेक्षणं तथे हाप्यु पेक्षणाभाव एवेति वाध्यम, तन्न सीतावषनसासिध्यरूपहेतोः सहृदयहदयाहादिरूपनिमित्ततवाभावादु- स्प्रेक्षणसामग्रीपूर्तेरभावास् तम्र तद्सम्भवेऽपि मध्यविलस्वस्य व तथवमरकारित्वसम्भवेना- प्रस्तुतसङ्गरोपपत्ते। सस्मादव्याप्तिग्रस्तत्वाद नेदं लक्षणं युक्कमिति पूर्षपक्षम्रन्थार्थः। अत्र समाधने अत्र-बम इत्यादिना। प्रकृतशब्दस्य विषयमात्रपरत्वम्, सस्य चोभयत्र समान- ववमू, तथा च 'हृतसारमिवेन्दुमण्डलमू' हृरयन्रेन्दुमण्सलस्यापि विषयरवाविशेपेण तदुस्प्रेक्षणेऽ्व्याप्ेरसर्भवात्। 'इन्दुर्दिस इव' इत्यादावपि नातिध्याप्िः, सीतावदन- साष्निध्यक्य सहद्यहृदयाह्वादित्वाभावाद। किश् तस्यान्यघ्मतवे सत्यपि इन्दुगताअ्न- छिसत्वलम्भावनार्यां तस्य प्रयोजकत्वाभावास्। किज्ान्यत्वेनेत्यस्यापि अन्येन प्रकारेणेत्यर्थ- परतं लक्षणे व्याख्येयम। तेन पूर्वोक्कासु हेतुफलधमंस्वरूपोपपेपासु नाव्यापि:। तदेवाह-

Page 371

उत्प्रेक्षानिरूपणप्रकरणम् यत्रेति। यत्र धर्मिणि धर्म्यन्तरस्य तादात्म्येनोतप्रेक्षणम्, तन्र धर्म्यन्तरस्येवान्यप्रकारक- श्वम्, यश्र धर्म एव किश्चित्प्रति हेतुव्वादिनोपेघयते, तम् धर्मस्यान्यप्रकारत्वस्। (चित्र०) यद्वा हेतुफलधर्मस्वरूपोत्प्रेक्षोदाहरणेष्वपि तादात्म्येनैवोत्प्रेक्षा। तथा हि-सैपा स्थली यत्र विचिन्वता त्वाम्', 'चोलस्य यद्गीतिपलायितस्य'

तया फलतया वा नोत्प्रेच्यते', किं तु नूपुरयुगादिधार्सिकं यन्निश्चलत्वकण्टक- संश्लेषादिनिमित्तकं मौनव्यापाटनादिक तदेव दुःखहेतुकमौनललाटाक्षरदर्श- नार्थव्यापाटनादितादात्म्येनोत्प्रेचयते। (भारती) वहॉ हेतूतप्रेक्षा में तादात्म्य सम्बन्ध से उत्प्रेक्षण वताते हैं। वैसा करने से 'सैषा स्थली यत्र विचिन्वता त्वाम्' इस उदाहरण में वियोगजन्य दु.खरूप धर्म की हेतुता से उत्प्रेक्षण नहीं है, किन्तु नूपुरधर्मिक जो निश्चलत्वनिमित्तक मौन है, उसका ही दु खहेतुक मौन की तादात्म्य सम्वन्ध से उत्प्रेक्षा है। 'चोलस्य यद् भीतिपलायितस्य' इत्यादि फलोत्प्रेक्षा के उदाहरण में भी ललाटाक्षर के दर्शनात्मक धर्म का फलत्व से उत्प्रेक्षण नहीं है, वल्कि द्रुमधमिक जो कण्टकश्लेष के निमित्त व्यापाटन है, उसका ही ललाटाक्षर देखने के लिए व्यापाटन का अभेद से उत्प्रेक्षण है।

(सुधा) प्रार्घा मतमनुसदन्भेदेनोश्प्रेक्षणं हेत्वादिशु प्रतिपाद्यति-यद्देति। तन्र हेतूतप्रेषार्या तादालयेनो प्रेक्षणमाह-तथा हीति । 'सेषा स्थली' इत्यन्न विश्लेषदुःरूपपर्मस्य हेतुतया नोतमेक्षणम्, किन्तु नूपुरघर्मिकं यविश्चलत्वनिसिसकं मौनमू, तश्यैव दुःखहेतुक- सौनतादात्वेनोप्रेक्षणात् । 'चोलस्य यव्' इत्यादिफलोप्रेक्षोवाहरपोडपि लखाटापर- दर्शनात्मकघर्मस्य फलत्वेन नोप्रेक्षणन, अपि तु द्ुमधर्मिकं यत् कण्टकश्लेषनिमित्तं व्यापाटनम, तत्येव ललाटाप्तरदर्शनार्थव्यापाटना भेदेनो ठोप्षणाच्च । (चित्र०) अवश्यं च द्विविधस्यापि मौनादेस्तादात्म्येनाध्यवसाय आस्थेयः । अन्यथा निश्चलत्वादिहेतुके स्वाभाविकमौनादौ दुःखादेर्हेतुत्वादिनोतप्रेक्षेणमसमञ्जसं स्यात्। अङ्गीकृतश्च 'सैषा स्थली' इत्यादौ दुःखादिर्धर्म एव मौनादिहेतुतया नू- पुरादिगतत्वेनोत्प्रेच््यत इति वदताप्यलक्कारसर्वस्वकृता द्विविघस्य मौनादेर- भेदाध्यवसायः । हेतूत्प्रेक्षायां यस्य प्रकृतसबन्धिनो धर्मस्य हेतुरुत्प्रेद्षयते स धर्मोऽध्यवसायवशादभिन्न उत्प्रेक्षानिमित्तत्वेनाशीयते' इत्यादितद्वचनात्। (भारती) व्यतिरेक में हेतुदोष 'अवश्यम्' से बताते हैं-दो प्रकार के मौनादि का अभेद से अध्यवसाय

Page 372

३३२ चित्रमीमांसा

के लिए आवश्यक है। अन्यथा निश्चलत्व आदिहेतुक स्वाभाविक मौनादि में दु.खादि का हेतु- त्वादि से उत्प्रेक्षण की असामअ्जस्यापत्ति होगी। दु खादि धर्म की ही मौनादिहेतुता से नूपुरादिगतत्व से उत्प्रेक्षण कहने वाले मलद्कारसर्वस्व- कार ने दो प्रकार के मौनादि का अभेदसम्बन्ध से अध्यवसाय की स्वीकृति दी है। अलद्कार- सर्वस्व में लिखा है-"हेतूत्प्रेक्षा में प्रकृतसम्वन्धी जो धर्महेतु का उत्प्रेक्षण है, वही धर्म अध्य- वसायवश अभिन्नमाव से उत्प्रेक्षा की हेतुता का आश्रय ग्रहण करता है।

(सुधा) व्यतिरेके हेतदूषणमाह-अवश्यमिति। द्विविधमौनादेरभेदेनाध्यवसाय आवश्यकः।

पत्तेः। अलङ्गारसवंस्नोकि प्रमाणयति-अक्षीकृत मित्यादिना। दुःखादिधर्मंस्यैव मौनादिहे-

वसानाझीकारस्व स्वीकाराठ्। तद्ग्रन्थोकिमप्याह-हेतूमप्रेपषायामिति। प्रकृतसम्बन्धिनो यस्य र्मस्य हेतोरुतम्रेक्कणम्, स धर्मोऽध्यवसायवशाद् अभिन्न उत्पप्षाहेतुतयाश्रीयत इति सद्ग्रन्थार्थ:। (चित्र०) आवश्यक चान्यत्रापि कचित्कचिद्धेतूत्प्रेक्षोदाहरणे निमित्तांशे तादात्म्या- ध्यवसायाश्रयणम्। तथा- उन्मेष यो मम न सहते जातिवैरी निशाया- मिन्दोरिन्दीवरदलद्ृशा तस्य सौन्दर्यदर्पः। नीतः शान्ति प्रसभमनया वक्त्रकान्त्येति हर्षा- ल्वग्ना मन्ये ललिततनु ते पादयोः पद्मलक््मीः॥ (भारती) इसी प्रकार काव्यप्रक्शादि के उदाहरणों में भी कहीं कहीं हेतृत्प्रेक्षा के उदाहरणों के निमि- त्ताश में भी तादात्म्य सम्बन्ध से अध्यवसाय आश्रित है। जैसे- 'अरी सुन्दरी! मालूम तो ऐसा पडता है कि कमल की सुन्दरता इसलिए प्रसन्नतापूर्वक तुम्हारे पैरों में आ विराजी है कि इन्दीवरनयनी तुम्ही एक ऐसी रही जिसने अपनी मुखशोभा से बलपूर्वक उस चन्द्रमा का सौन्दर्य-दर्प चूर कर दिया-जो रात में उस कमल की सुन्दरना का शत्रु वन गया, तथा उस कमल की शोभा के उल्लास को सहन न कर सका।'

('सुधा) एषमलक्टाइसयसछोक्िमुपन्यस्य प्रफाशोदाहरणेडपि तदाश्रथणं प्रतिपादयति- आवश्यकव्वान्यम्रापीतयादिना। उन्मेषमिति। 'जात्या स्वभावेनैव वैरी शत्रुर्य इन्दु मम निशायामू उन्मेपं विकास न सहते, तत्येन्दो: सौन्दर्यगर्वः इन्दीवरदलरशा अनया मुखकान्स्या प्रसभं वलारकारेण शान्ति नीत इति हर्षात् हे लषिततनु ते पाययो: पभछ- चमीलंझा इत्यहं मन्ये, इत्यवन्यः।

Page 373

उत्प्रेक्षानिरूपणप्रकरणम् ३३३

(चिन्न०) अत हेतुतया हर्षोत्प्रेक्षां प्रति तत्फलत्वाभिमतं पादयोः पद्मलदम्या लगनं निमित्तं वाच्यम्, तच्च सर्वथैवासिद्धम्। अतस्तत्र पादयोर्यः स्वाभाविकशोभा- संबन्ध: स एव पद्मलक््मीलग्नत्वेनाध्यवसितो निमित्तमिति समर्थनीयम्। (भारती) यहाँ नायिका के चरणों में स्वमावत लिपटी कमल की शोभा तो उपमेय रूप प्रकृत है और इसकी तादात्म्य सभावना जिससे की गयी है वह है उस नायिक के मुख की शोभा-जिससे चन्द्रमा के सौन्दर्यदर्ष के दमन किये जाने के कारण प्रसन्नतापूर्वक उस नायिका के पैरों में लिपटने वाली कमल की शोमा (इस सम्बन्ध में प्रदीपकार का विचार दर्शनीय है-"अन्र पघ्न- लचन्या: कासिनीघरणयोः स्वभावलग्नतवं यथो कहर्ष हेतुकलग्नत्वतादा््येन संभावित- मित्ति हेतू प्रेक्षेयस्"। तात्पर्य यह कि इस पद्य में जो हेतूत्प्रेक्षा है, उसमें भी गोभारूपी विषय में केवल हर्षरूपी हेतु की उत्प्रेक्षा नहीं की जा सकती है। किन्तु, 'हर्ष' जिसका हेतु है उस विषयी (चिपकना) का अभेदसवन्ध द्वारा स्वाभाविक 'चिपकना' आदि विषय में उत्प्रेक्षा की जा रही है। अर्थात् पद्म की गोभा जो पैरों में स्वभावत. लिपटी हुई है, न कि हर्ष के कारण, उस स्वाभाविक लिपटने में- हर्ष के कारण लिपटने की, कवि-कल्पना होने के कारण, उत्प्रेक्षा की जा रही है। (सुधा) अम्र निमिततस्य ताह्ाल्येनाध्यवसायं प्रतिपाद्यति-अन्ने्यादि। हर्षोतप्रेक्षणं प्रति

(चित्र०) एवं निमित्तांशे तादात्म्याध्यवसानावश्यभावे तत्रैवोत्प्रेक्षाविश्रान्तिरम्तु। न च तत्र निमित्तान्तरमन्वेष्य स्यादिति वाच्यम, निश्चलत्वहेतुकमौनत्वेनोत्प्रे- क्षायां चरणारविन्दविश्लेषकालभवत्वं निमित्तं कण्टकसश्लेषहेतुकव्यापाटनस्य ललाटलिपिदर्शनार्थव्यापाटनत्वेनोत्प्रेक्षायां महाराजोऽयेव कष्टमनुभवति, इतः परमपि कियदनुभाव्यमनेनेति जिज्ञासोत्थापकपलायनकालभवत्वमित्यादेः स्पष्टत्वात्। (भारती) इस प्रकार निमित्ताश के अवश्यम्भावी तादात्म्य-सभावना में उत्प्रेक्षा की विश्रान्ति है। अगर आप यह कहें कि वहाँ उत्प्रेक्षा में अन्य धर्म की अन्वेषणापत्ति है, तो इसका उत्तर यह है कि 'सैपा वनस्थली' इत्यादि अर्थात् 'यह वही वनभूमि है जहाँ तुमको ढूढते हुए मैने भूमि पर नूपुर को पाया था, जो तुम्हारे चरण कमल के विरहजन्य दुख से मौन दिखलाई पडता था।' इस उदाहरण में तुम्हारे चरण-कमल का विरह काल हो इसका तथा इस प्रकार महाराज के कष्टानुभव में मी इससे अधिक और क्या ? जिसका अनुमव किया जाय और इस जिज्वासा से उत्पन्न पलायन

Page 374

३३४ चित्रमीमांसा

काल हो इसका भी,-निश्चलत्वहेतुक मौन का दुःख हेतुक मौनत्व के साथ उत्प्रेक्षा में कण्टक- सश्लेषनिमित्तक चमडी उधेडने का-'ललाटलिपि देखने के लिए' व्यापाटनत्व से उत्प्रेक्षण में स्पष्ट रूप से प्रतिपादन है। घिमर्श-निष्कर्ष यह कि जिनकी दृष्टि में हर्ष के कारण लिपटनेरूपी कार्य जो चेतनकृत है, को उत्प्रेक्षा का निमित्त मानते हैं, तो उनके विषय में प्राचीनों का कहना है कि-उन्हें मी यह अवश्य कहना पडेगा कि हर्ष के कारण लिपटनेरूपी विषयी का विषय अर्थात पैरों में रहने वाले उसके सजातीय, अर्थात् स्वाभाविक लिपटने के साथ अभेद माना गया है। कारण, जव तक ये 'दोनों लिपटने' एक नही माने जायेगें तब तक लिपटना उत्प्रेक्षा का निमित्त कैसे बन सकता है? क्योंकि निमित्त वनने वाले धर्मविषय और विषयी दोनों में अभिन्न रूप से अवश्यमेव रहना चाहिए, अन्यथा हेतुरूपी विषयी धर्म शोभा के 'चिपकने' के साथ रहने वाले कार्य हर्ष के कारण चिपकने के विषय अर्थात पैरों में न रहने के कारण उत्प्रेक्षा ही न हो सकेगी अर्थात् उन्हें मी स्वाभाविक चिपकने को 'हर्प के कारण चिपकने' के अन्त प्रविष्ट (अभिन्न) माने बिना कोई गति नहीं है। अत पूर्वकथित प्रक्रिया ही इस दृष्टि से उचित है। (सुधा) फळितमाह-निमित्तांशे तादात्म्याध्यवसानस्यावश्यम्भावे निमिततांशे उत्प्रेक्षण- विश्रामः। न च तम्रोत्प्रेक्षणे धर्मान्तरान्वेषणापत्तिरिति वाच्यम्, 'सेषा स्थली' इत्यादौ चरणारषिन्दविक्षेषकालभवर्वस्य महाराजस्यापि एवं कष्टानुभवे, इतः परमनेन किं यदनुभाव्य इति जिज्ञासोत्थापकपलायनक्ालभवत्वस्य व निश्चलत्वहेतुकमौनस्य दुःख. हेतुकमीनत्वेनो प्रेक्षणे कण्टकसंक्ेपनिमित्तकव्यापाटनस्य ललाटलिपिदर्शनार्थव्यापाटन- वेनोप्प्रेष्षणे च स्पष्टत्वेन प्रतिपादनादित्याशयः। (चित्र०) अयमेव पक्षो दण्डिनोऽभिमतः। यदाह- अन्यथव स्थिता वृत्तिश्व्वेतनस्येतरस्य वा। अन्यथोत्प्रेचयते यत्र तामुत्प्रेक्षां प्रचक्षते ।। मध्यन्दिनार्कसन्तप्तः सरसीं गाहते गजः । मन्ये सार्तण्डगृह्याणि पद्मान्युद्धर्तुमुद्यतः।। स्नातु पातु बिसान्यत्तुं कोरणो जलगाहनम। तद्वैरनिष्कयायेति कविनोत्प्े्य वर्ण्यंते॥। इति। अत्र संतापतिवृत्त्यर्थत्वेनान्यथैव स्थिता करिणश्चेतनस्य जलगाहनरूपा वृत्ति:, अन्यथा तद्वरनिष्कयार्थजलावगाहनत्वेनोतप्रेदयत इति स्वकृतलक्षणा- नुसारेणैव योजितम्। (भारती यही पक्ष आचार्य दण्डी को भी अभिमत है। जैसे-'यदि चेतन या अचेनन की अन्य प्रकार से स्थित स्वाभाविक गुण-क्रिया आदि की अन्य प्रकार से सभावना की जाय तो वहाँ उत्प्रेक्षा होगी।'

Page 375

उत्प्रेक्षानिरूपणप्रकरणम् ३३५ (यहाँ दण्डी ने चेतन और अचेतन वस्तुओं की सभावना की परिधि में उत्प्रेक्षा को रखकर अपने लक्षण में नवीनता प्रदर्शित की है।) 'दोपहर के सूर्य से सतप्त हाथी सरोवर में बैठ कर कमलों को उखाड रहा है' यहाँ सूर्य से सतप्त हाथी उनसे अनुगृहीत कमलों को उखाड कर अपना ताप अर्थात सूर्य के प्रति क्रोध को शान्त कर रहा है। उक्त लक्षण का समन्वय करते हुए दण्डी ने लिखा है कि यहाँ स्नानादि कार्य के लिए हाथियों का जलावगाहन कवि के द्वारा उसके वैर निष्क्रियत्व से उत्प्रेक्षित है। यहाँ सतापनिवृत्ति फल से भिन्न चेतन की जलावगाहनरूप वृत्ति है। हाथियों के बैर साधने के लिए जलावगाहन से उत्प्रेक्षा का यहॉ प्रतिपादन है। (सुधा)

'चेतनाचेतनयोरन्यथास्थितवृत्तेर्यम्रान्यथोत्प्रेक्षणं सा उत्परक्षा इति दण्ठिनो लक्षणम्। तरसम्मतोदाहरणमाह-मध्यन्दिनेति। मध्याह्वाकसन्तप्तो गजः सरसीं गाहते। मातण्डे- नानुग्राह्याणि कमलानि उद्धर्तुम उत्कण्ठित इत्यह मन्ये, इत्यन्ययः। अम्र लक्षणसमन्वय- माह-स्नानादिकार्य क्तु हस्तिनो जलावगाहनं कविना तद्वैरनिष्क्रयत्वेनोसप्रेघयत इत्यन्न

रनिष्क्रयार्थजलाव गाहनतवेनोत्प्रेक्षणस्य प्रतिपानाद्। (चिन्न०) काव्यप्रकाशिकाकारस्याप्ययमेव पक्षोऽभिमतः । तेन हि 'संभावन- सथोत्प्रेक्षा प्रकृतस्य समेन यत्' इत्युपमानोपमेयस्य तादात्म्यसम्भावन- मु.प्रेक्षालक्षणससिधाय 'उन्मेषं यो मम न सहते' इति तत्रोदारण कृतम्। ततश्च स्वकृतलक्षणानुरोधेन स्व्ाभाविकी पादशोभैव स्ववैरिजयप्रभवहर्पलग्न- पद्मलक्ष्मीत्वेनोतप्रेचयत इत्यभिसतमिति स्फुटमेव। (भारती) काव्यप्रकाश कार मम्मट भट्ट को भी यही पक्ष अभिमत है। इसी से उन्होंने लिखा है- सम्भावनमधोत्प्रेक्षा प्रकृतस्य समेन यत्' अर्थात प्रस्तुत विषय की उसके सदृश के साथ सभावना को उत्प्रेक्षा कहते हैं।' इस तरह उपमानोपमेय के तादात्म्य-सभावना को उत्प्रेक्षा अलकार का लक्षण कहकर-'उन्सेषं यो मम न सहते' इत्यादि श्लोक को उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया है। उसके बाद अपने लक्षण के अनुरोध से इसे हेतूतप्रेक्षा का उदाहरण माना है क्योंकि यहाँ गोमारूपी विषय में केवल हर्परूपी हेतु की उत्प्रेक्षा नहीं की जा रही है। किन्तु, हर्ष जिसका हेतु है, उस लिपटने आदि विषयी की, अभेद सम्बन्ध द्वारा स्वाभानिक लिपटना आदि विषय में उत्प्रेक्षा की जा रही है-अर्थात् पद्म की शोभा जो पैरों में स्वभावत लिपटी है, न कि हर्ष के कारण, उस स्वभावत चिपकने में 'हर्ष के कारण चिपकने' (जो कल्पित है) की उत्प्रेक्षा स्पष्ट ही है। (सुधा) मम्मटस्याप्यस्मिन् पपेभिमत्ततवं प्रतिपाद्यति-काव्यप्रकाशिकाकारस्येत्यादिना।

Page 376

३३६ चित्रमीमांसा

तदुकलक्षणमाह-सम्भावनमिति। 'प्रकृस्योपमेयस्य समेनोपमानेन यत्तादार्यसम्भावनम, सोत्परेक्षा' इत्यभिषायोदाहृतम् 'उन्मेषम्' इत्यादि। अश्र प्रदीपकारः पद्मलचम्या: कामिनी चरणयो: स्वभावलपत्वं यथोतकर्षहेतुकलप्रतादात्म्येन सम्भावितमिति व्याकृतम्। अत्र अप्रस्य तादारम्येन सम्भावनोकि: फळतः पर्यवसानाभिप्राया, तस्य पदार्थेकदेशरवाद्। किन्तु स्वभावलप्नायां हर्षहेतुकलभ्नाया अभेदेन सम्भावनमिति प्रद्ीपव्यावयातारः। सथा चान्न तत्पक्षस्य स्पष्टतैव। (चित्र०) तथा 'पिनष्टीव तरङ्गाशैः' इत्यादिधर्मस्वरूपोत्प्रेक्षोदाहरणेष्वपि प्रेरणादिरेव पेपणादिरूपत्वेनोत्प्रेच्षयते। न च प्रेरणादेरविषयस्यातुपादानं दोषः, अतिशयो- क्ताविव तदुपपत्तेः । उत्प्रेक्षाया अध्यवसायगर्भतया तत्र विषयनिगरणस्योचि- तत्वाच्च।

(भारती) 'पिनष्टीव तरद्वाग्र.' इत्यादि धर्मस्वरूप उत्प्रेक्षा के इस उदाहरण में प्रतिपादित प्रेरणादि में पेषणादि का ही तादात्म्य से उत्प्रेक्षण है। यहाँ विषय का अनुपादान तो साध्यवसानलक्षणा की स्वीकृति के कारण अतिशयोक्ति की तरह दोष के लिए नही है। क्योंकि वहाँ विषय का निगरण औचित्यपूर्ण है। विमर्श :- यहाँ स्वरूपोत्प्रेक्षा में निमित्त धर्म उपात्त और अनुपात्त दोनों रूपों में रह सकता है। पर, हेतूत्प्रेक्षा और फलोत्प्रेक्षा में उसका उपात्त होना अनिवार्य है, क्योंकि वहाँ हेतु और फल उसी धर्म के सिद्ध करने के लिए वर्णन किये जाते हैं। उसके वर्णन के बिना हेतु और फल का वर्णन ही असम्बद्ध हो जायगा।

(सुधा) एवं हेतुफलोस्प्रेक्षणे तादासम्येनोत्प्रेक्षण व्यवस्थाप्य धर्मस्वरूपोत्प्रेव्षोदाहरणे तथ्व- स्थापयति-तथेति। 'पिनष्टीय' इरयादि धर्मस्वरूपोप्रेक्षणेऽपि प्रेरणादौ पेषणादेरेव ताकारपेनोशपेष्षणम्। विषयानुपादानन्तु साध्यवसानलक्षणङ्गीका रेणतिशयोक्काविय न दोषाघेति षोष्यमू, तन्र विपयस्य निगरणौचित्याप।

(चिन्र०) न च प्रेरणादेविषयत्वेन निमित्तत्वाभावे निमित्तान्तरमन्वेष्यं स्यादिति वाच्यम; प्रेरणस्य पेषणरूपतयोत्प्रेक्षायां प्रान्तगतफेनचन्दनपुश्जीभवनंनिमित्तम्, करव्यापनस्य दिगङ्गनालेपनत्वेनोत्प्रेक्षा यां तद्धवलीकरणं निमित्तमिति निमित्ता- न्तरस्य जागरूकत्वात्। 'लिम्पतीव तमोऽक्गानि वर्षतीवासनं नभः' इत्यादौ व्यापनादिलेपनादि- रूपसया सम्भावितमिति वद्ता काव्यप्रकाशिका कारेणापि धर्मस्वरूपोत्प्रेक्षो- दाहरणेषु तादात्म्योत्प्रेक्षणपक्ष एवाश्रित: ।

Page 377

उत्प्रेक्षानिरूपणप्रकरणम् ३३७

(भारती) अगर आप यह कहें कि उसके विषयत्व में निमित्तत्व के अभाव से दूसरे निमित्त की अन्वेषणा- पत्ति होगी। तो इसका उत्तर यह है कि प्रेरणा की पेषणता से उत्प्रेक्षालद्दार में तटगत फेनरूपी चन्दन का पूजीभवन ही निमित्त है। करव्यापन का दिशारूपी अङ्गना के लेपन से उत्प्रेक्षा में उसका जो धवलीकरण निमित्त है-इससे निमित्तान्तर की जागरूकता है। 'अधकार मानो अगों को काले रग से पोत रहा है और आकाश मानो काजल बरसा रहा है।' यहाँ अन्धकार कर्त्ता है और अग करमे है। यहाँ पोतनेरूपी क्रिया की तथा वरसनेरूपी क्रिया की उत्प्रक्षा की जा रही है। अर्थात् दोनों उत्प्रेक्षित किये जाने वाली क्रिया 'पोतने' और 'वरसने' द्वारा जिसका अन्धकार कर्त्ता है, व्याप्त होना रूपी क्रिया जो इस उत्प्रेक्षा का विषय है निगीर्ण कर लिया गया है। तात्पर्य यह है कि 'अन्धकार मानो काले रग से अगों को पोत रह्दा है' और आकाश मानो काजल बरसा रहा है। यह अन्धकार व्याप्त होने के स्थान पर कवि द्वारा निर्दिष्ट है। अत वास्तविक 'व्याप्त होने' को उत्प्रेक्षा का विषय और पोतने तथा बरसने को विषयी माना जाना चाहिए और वह व्याप्त होना इन्हीं शब्दों से सूचित हो जाता है। अतः उसे अलग नहीं लिखा गया है। अतएव ऐसे स्थलों में यह उत्प्रक्षा अनुपात्तविषया कहलाती है। यही मम्मटभट्ट का भी अभिमत है।

(सुधा) न च तस्य विषयतवे निमित्ततवाभावाधिमित्तान्तरस्यान्वेषणीयतापत्तिरिति वाच्यम्, प्रेरणस्य पेषणतयोप्रेक्षणे प्रान्तगतफेन न्दनपुल्तीभवनस्यैव सत्वात्। करव्यापनस्य दिगङनालेपनोतप्रेप्नणे तनूचलीकरणस्य निमित्तत्वसत्ान्न। अन्रापि तथोत्प्रेक्षणे प्रकाश- कारस्य सम्मतिमाह-लिम्पतीवेत्यादिना। व्यापनादेः लेपनादिरुपसया सम्भायनं वदत स्तस्यैष एव पक्षोडभिमतः। उत्प्रेछठाया अध्यवसानगर्भतया विषयानुपादानेऽपि न दोष:, तस्या व्यअ्जनया गभ्यत्वादिति तद्याख्यातारः। (चिन्न०) एवं 'चुम्बतीव रजनीमुखं शशी' इत्यादावपि रजन्या वदनत्वेनाध्यवसितं यदारम्भाखयं मुख तस्य शशिनश्च संबन्धश्चुम्बनत्वेनोत्प्रेचयते । 'वृत्तानुपूर्वे च' इत्यत्रायत्नपूर्वके शेषाङ्गनिर्माणे यत्नपूर्वकत्वतादात्म्योत्प्रेच्षेत्याद्यूह्यम्। अन्यधर्मोऽनुगामितयैव न विवक्षितः, किन्तूपमायां साधारणधर्म इव बिम्ब प्रतिबिम्बभावादिभिः सवेरपि प्रकारैविवक्षितः। तथा च यथा- आवर्जिता किचिदिव स्तनाभ्यां वासो वसाना तरुणार्करागम्। सुजातपुष्पस्तबकावनम्रा संचारिणी पन्लविता लतेव ॥ इत्यत्र बिम्बप्रतिबिम्बभावकृताभेदाध्यवसायेन।

(भारती) 'अड्डुलीभिरिवि केशसञ्ञयम' इत्यादि उदाहरण में रात के मुख से अध्यवसित, आरम्भा- त्मक मुख का चन्द्रमा के सम्बन्ध से चुम्वन क्रिया की उत्प्रेक्षा है। 'वृत्तानुपूर्वे च' इत्यादि में २२ चित्र०

Page 378

'३३८ चित्रमीमांसा®

बिना प्रयास के ही शेष अवयव के निर्माण में प्रयासपूर्वक तादात्म्य की उत्प्रेक्षा वहॉ जाननी चाहिए। आदि पद से 'भूयस्तराणि' पद का सम्बन्ध है। धर्म-निरूपण की विशेषता चतलाते हुए कहते ह कि यहाँ भी उपमाविपयक साधारण धर्म की तरह विम्व-प्रतिबिम्ब भाव आदि के सभी भेद विवक्षित हैं। उदाहरण जैसे- 'स्तन के वोझ से शरीर को कुछ झुकाई हुई, मान कालीन सूर्य की प्रभा के समान लाल साडी पहनी हुई, पार्वती को, फूलों से भरे हुए चुच्छो के भार से लटकाने वाली, नये पल्लवों को धारण करने वाली गमनशील अर्थात् चलने-फिरने वाली लता के समान अवस्थित देखा।' यहाँ 'पुष्पस्तवक' और 'रतन' दोनों का विग्व-प्रतिविभ्वभाव के द्वारा अमेदाव्यदसाय से उन दोनों की उत्पेक्षा हे। (सधा) दुवस 'अब्लुलीमिश्चि केशरुजयन' इत्यादी रजत्या पदननयाऽवदसितारमसात्मनो सुरात्य सच्न्द्लवत्य चुम्वनतवोवृक्षातुपूर्वे ' इता्ययलपूर्व शेपाङ्वनिर्माणे पलप्ुर्वक्तादातयोापाणस्व सत्राि सर्छसिि बोध्यय। आादिना 'सूयस्त हाजि' इत्यादि माहार। पर्सनिरूपणे दिशेष्साद-अन्दर्स हत्याहिना। उपमािपय- कसाधारणएर्स इुन गमादि विग्वप्रतिविस्वयादावया सर्वे प्रकार विययिता हृति। निम्व- पति विस्वमावसुदाहरति-तथा घ यथेत्यादि-स्वा््यां कि्वियावजिता् ईपदमिता तरुणाकंराण इच रायो यर्य तहारी दसाना आध्छादपन्ती सुपुपपस्तनकेरवन्ा पल्विनी किसलयिनी सक्षारिणी लतेव स्थिता। अन्न मुप्परतनकरतनय,विस्नप्तिमिस्त्रभावक्कता- भेदाष्यवम्ायेन तयोहत्प्रेक्षणम। (चित्र०) विलास कमलाकुलाम्। सूर्तामिव मनोजस्य त्रैलोक्यविजायश्रियम्॥ इत्यन्न समारुपेवाश्रयणक्वतामेदाध्यवसायेन व धर्मस्य प्रकृताप्रकृत- साधारण्यादन्यघससबन्धः । तथा-'अङ्गुलीभिरिव' इत्यत्रान्वयसेदक्ृता- सेदाध्यवसायेन धसस्य प्रक्ृताप्रकृतसाधारण्यादन्यधसंसंबन्धः सुसंपाद इति न तत्राव्याति:। नापि 'भूयस्तराणि' इत्वत्राव्याकि। तन्नोपात्तवर्साक्षिपधर्सान्तरमबन्धस्य निसित्तत्वात्। (भारती) 'युवावस्थारूपी हाथी पर सवार, विलास कमलों से आकुल तीनों लोको की विजयश्री नथा साक्षात् कामदेव की मूत्ति की तरह मै इसे मानता हू।' यहाँ समासकृन जो अमेदाध्यवसाय है उससे धर्म के वर्णनीय साधारण्य से अन्य धर्मके सम्बन्ध द्वारा सम्पादन से दूसरी जगह अर्थात 'अङ्गलीभिरिव' इस उदाहरण में रजनी के मुख को चॉद चूमता है इत्यादि में अतिव्याप्ति नही हुई। 'भूयस्तराणि' इत्यादि उदाहरण में भी उपात्त धर्म से आक्षिप्त अन्य धर्म सम्वन्ध के निमित्त होने से अव्याप्ति दोष का परिदार है।

Page 379

उत्प्रेक्षानिरूपणप्रकरणम् ३३६

(सुधा) तारुण्यं कुल्जरमिव, तमनारूढाम्, ताहण्यमेव कुअ्जरम, तम्रारूढा वा मिलास्ाः कमलानीव, तैदाकुलाम, विनासा एव कमलानि तैराटुलां वा सनोजरथ सूर्तिमतीं न्रेलोकनविजय श्रियमित तां मन्य इत्यन्वयः। अन् समासकनो योभेदाध्यवसायक्ष तेन वर्मर वर्णनीयसाधाण्यादन्यपर्स- सत्वनस्व सुसम्पापत्याद् अन्यनषि 'मुख गश्षी' इत्यादी नाव्यामिः। अन्वत्रा्णच्याप्ति

साव्याहि:। (चित्र०)

निमित्तेन धर्नस्य चन्द्रगतस्य तद्विरलत्वातिरतत्वानुविधारिवृद्धिह्ासशालि- त्वस्याक्षेप: । अय चापरोऽपि विशेष. । अन्यर्थर्ससंबन्धादिग्रन्यपवार्थो धर्म्युतप्रेक्षासु विननयेद धमोत्प्रेक्षातु तु विषयिणो वर्सस्याश्रय। एवं स्थिते यत्रानुपातो निमित्तभूतो वर्रास्तत्र रार्वत्रापि ये धर्मोऽन्यपदार्थस्य विषयस्य च सबन्धितया सम्भावनापदवीमारोहति तथासूतोऽन्वेव्य.। (भारती) उसका आक्षेप किस प्रकार हुआ, इने वताने है कि चन्द्ररूप विषयगन सध्या रूपी आग के बीच आकाल मूषिकावर्ततित ताराओं के समूह से निर्मितत्व की उत्प्रेक्षा मे राओं के द्वारा उन रात्रियों में विरल और अविरत रूप उपात्तधर्म के निमित्त से चन्द्रगत विरलत्व अनुविधायि दृद्धि और ह्ासगाली रूप का यहाँ आक्षेप है। यह इसकी दूसरी विशेषता है। उत्प्रेक्षा दो प्रकार की होती है-एक धर्मी उत्प्रेक्षा जिसमें किसी पदार्य की किसी अन्य पदार्थ के रूप में उत्प्रेक्षा की जाती है और दूसरी धर्म उत्प्रेक्षा, जिसमें किसी धर्म की किसी धर्मी में उत्प्रेक्षा की जाती है-जिस धर्मी का उस वर्म के साथ कोई सम्बन्ध न हो। धर्मी उत्प्रेक्षा नादात्म्य अर्थात् अभेद सम्बन्ध द्वारा होती है और धर्मात्प्रेक्षा अन्य मम्बन्ध अर्याद सामानाधिकरण्य के द्वारा। ऐसी सथति में उपात्त और अनुपात्त के निमित्तभून वर्मो के अन्य पदार्थ के विषय सम्बन्धित्व से जिमकी सभावना है नैमे ही धर्म का उत्प्रेक्षा में उपयोग जानना चाहिए। (सुधा) दथं तेन तस्यान्रेप इत्याछ-तत्र हीति। चन्दरूपविश्यगतम्ध्यनलगध्यगाव्वर- सूषिकावर्तितारनिर्मित वोतेवार्या तालगनेव तप्तद्रामिषु विर्तत्वाचित लस्वरूपेणोपास्त

तथा च तप्र तव्य सध्वेन नाव्याप्तिरित्याशयः । अन्यमपि विशेषं रचयति-अयञ्चेति। अयं वध्यसाणोऽपरो विशेष। अन्यधर्मसम्बन्धादित्यत्र समिण उप्रेक्षणे विषयिणोऽन्य-

Page 380

३४० चित्रमीमांसा

पदार्थतवम्। धर्मोतप्रेक्षणे विषयिणो धर्मस्याश्रयोऽन्यपदार्थः। एवं स्थिते उपाततानुपास पो्निमित्तभूतधर्मयोरन्यपदार्थस्य विषयसम्बन्धिरवेन यस्य सम्भावना मार्गावरोहस्तथा- भूतस्यैवोष्प्रछायासुपयोगो बोध्यः। (चित्र०) तन्न 'वर्षतीवाञ्जनं नभः' इत्यत्र नभोगतत्वेन वर्षणक्रियोत्प्रेक्षापच्े नभसो भूपर्यन्तगामिनीलिमव्याप्तत्वमञ्जनवर्षुकसाधारणनिमित्तम्। तमसो व्यापने नभ:कर्तृकाञ्जनवर्पण क्रियात्वोत्प्रेक्षेति पच्े तु सकलवस्तुसान्द्रमलिनीकरणादि। एवं 'वेलेव रागसागरस्य' इत्यादौ संक्षोभकारित्वादि गम्यं निमित्त- मूहनीयम्। यत्र तु निमित्ततया धर्मस्योपादाने सत्यपि तत्संबन्धो विषयस्यान्यपदा- र्थस्य वाञ्जसा न प्रतीयते, तत्र क्वचिन्निमित्तभूतधर्मादन्यस्य कस्यचिद्धर्मस्य ताद्रूप्यसंपादनेन तत्संबन्ध: समर्थनीयः । क्वचिद्विषयस्य चान्यपदार्थस्य वा तद्धर्माश्रयताद्रूव्यसपादनेन, क्वचिन्मिलितेन तेनोभयेन, क्कचिदुपात्तघर्मकृत- धर्मान्तराक्षेपेण। तन्न धर्मान्तरस्य निसित्तताद्रूप्यसंपादनसुपमायां धर्मस्य संपादनमिव बिम्बप्रतिबिम्बभावादिभि: प्रकारस्ते प्रदर्शिताः । (भारती) 'वर्षनीवाञ्ञन नभ' इस उदाहरण में जिमका अधकार कर्त्ता है और अग कर्म है उस पोतने- रूपी क्रिया की तथा जिसका आकाश कर्त्ता है और काजल कर्म है उस बरसनेरूपी क्रिया की उत्प्रेक्षा की जा रही है। एक में धरती से आकाश तक गाढ तमस का व्याप्तत्व निमित्त है और दूसरे में सारी वस्तुओं को कालिमा से पोतना निमित्त है। तात्पर्य यह कि इन दोनों का निमित्त धर्म है 'काले कर डालना' इसी प्रकार 'वेलेव रागसागरस्य' यहाँ सक्षोमकारित्व निमित्त है। जहाँ धर्म की निमित्तता से उपादान रहने पर भी विषय अथवा अन्य पदार्थ में धर्म सम्वन्ध का साक्षात अन्वय नहीं होता, वहाँ उत्प्रेक्षा कैसे होती है? तो इसका उत्तर है कि ऐसे स्थलों में प्रकारभेद से उत्प्रेक्षा होती है। जैसे कहीं निमित्तभूत धर्म से अन्य किसी धर्म का ताद्रूप्य सम्पादन से उसका सम्वन्ध है, कहीं विषय अथवा पदार्थ के उस धर्माश्रय का ताद्रूप्य-सम्पादन से सम्बन्ध है और कहीं उसके मिलने से सम्बन्ध है औौर कहीं दोनों से सम्वन्ध है, कहों उपात्त धर्म से धर्मान्तर के आक्षेप से सम्वन्ध है। वहाँ धर्मान्तर के निमित्त से ताद्रूप्य का सम्पादन, विम्वप्रतिबिम्वभावादि से उपमा की तरह साधारण्य का सम्पादन जानना चाहिये। (सुधा) तदेवाह-तन्रेति। 'वर्षतीवाअनं नभः इश्यम्र नभोगतत्वेन वर्षणक्रियोत्प्रेक्षणपसेऽभ- नवर्षुकसाधारणं नभसो भूपर्यन्तं गाढनीलिमव्याप्तव्वं निमितम्। तमसो व्यापने

पचम् 'वेलेव रागमागरस्य' इत्यम्र संघोमकारिरं निमित्तम्। नु यम् धर्मस्य निमित्ततयोपादाने सत्यपि विषयेऽन्यपदार्थे वा तत्सम्वन्धस्य साक्षादन्वयो न भवति, तत्र कथमुत्प्रेष्षा इति चेतू, न प्रकारमेदाना सत्वात्। तथा हि-कचिभिमित्तभूतादर्माद-

Page 381

उत्प्रेक्षा निरूपणप्रकरणम् ३४१

न्यस्य कस्यविद्धर्मस्य ताद्रप्यसम्पादनतया तत्सम्बन्धः, कचिद्विषयस्य वान्यपदार्थस्य वा तद्दर्माश्रयताद्रप्यसम्पादनेन सम्बन्धः, क्वचिन्मिलितेनोभयेन सम्बन्धः, क्वचिदुपात्तधर्म- कृत धर्मान्तराक्षेपेण सम्बन्धः। तम्र धर्मान्तरस्य निभिसताद्रृप्यसम्पादनं विम्वप्रतििम्ब- भावादिनोपमायामिव साधारण्यसम्पादनं बोध्यस्। (चित्र०) एवं विषयस्यान्यपदार्थस्य वा धर्माश्रयात्ताद्ूप्यसंपादनं श्लेषादिभङ्गया। तत्र विषयस्य श्लेषेण धर्माश्रयताद्रूप्यसपादनं यथा- अस्यां मुनीनामपि मोहमूहे भृगुर्महान् यत्कुचशैलशीली। नानारदाह्नादि मुखं भ्रितोरुर्व्यासो महाभारतसगयोग्यः ।। (भारती)

इस प्रकार विषय का अथवा अन्य पदार्थ का धर्म के आश्रय से ताद्रूप्य का सम्पादन श्लेपादि भङ्गी से। यहाँ श्लेष से विषय के धर्माश्रय ताद्रूप्य सम्पादन का उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। जैसे- इसमें दमयन्ती का वर्णन है। राजा नल कहता है कि 'मैं दमयन्ती के विषय में सुनियों के मोह की तर्कणा करता हू' क्योंकि बडा प्रपात (जल गिरने का तटरहित पर्वतीय स्थान-विशेष) स्तनरूपी पर्वत का परिशीलन करता है। दूसरे पक्ष में-वडे तपस्वी भृगु सुनि स्तनरूपी पर्वंत का परिशीलन करते हैं अर्थात् वहाँ निवास करते हैं, तप करते हैं। किंवा कामुक होकर इसके उन्नत स्तनों का म्दन करना चाहते हैं। अथवा अवट अर्थात् पर्वतीय प्रपात दमयन्ती के स्तन के शील स्वमाव का परिशीलन करता है, किन्तु वह आज तक भी इन स्तनों के स्वभाव को नही प्राप्त कर सका है। दमयन्ती का मुख अनेक अर्थात् बत्तीस दाँतों से आह्लादित करने वाला है। पक्षान्तर में सुख नारद मुनि को आह्लादित करने वाला नहीं हैं ऐसा नहीं, किन्तु आह्लादित करने वाला ही है अर्थात नारद मुनि भी इसको गान विद्या सिखाने या स्वय सीखने के लिए इसके मुख को प्राप्त कर आह्लादित होते हैं, अथवा नारद मुनि भी कामुक होकर मुख चूमने की इच्छा से इस दमयन्ती के मुख को देखकर आह्लादित होते हैं और अत्यन्त कान्तियुत तथा रति के योग्य ऊरु अर्थात् जघा का विस्तार आश्रय ग्रहण कर रहा है। अर्थात् ऊरुद्वय का विस्तार अतिशय कान्तियुक्त एव रति योग्य है। पक्ष में-महाभारत नामक इतिहास ग्रन्थ की रचना करने वाले व्यासमुनि (केले की छाया के भ्रम से इसके) अरुद्वय का आश्रय कर रहे हैं, या दमयन्ती का कामुक होकर भोग की इच्छा से इसके ऊरुद्वय का आश्रय कर रहे हैं। (सुधा) एतप्च 'आवर्जिता' इत्यादावुद्दाहृतम् । द्वितीयं तु श्लेषाविभक्गया। तन्न श्लेषेण निषयस्य धर्माश्नयताद्रप्यमम्पादनमुदाहरति-अस्यामिति। अस्यां भैम्यां सुनीनां मननशीलानामपि मोहम् आप्किमूहे तर्कयामि । का वार्ता विषयपराणाम्? यस्माद् महान् मृगु: प्रपातः कुचशैलं स्तनरूपं पर्वतं शीलयति सेवते तच्छीलो वतते। पक्षे भृगु- र्नाम ऋषिः 'भृगु: शक्रे प्रपाते च' इति विछवः। सुखं नानारदेः यथोचितसंख्येदन्तैः आह्ा दयति तथा वर्तते। न नारदोऽनारद: नारदभिन्नः, न अनारको नारदभिन्नभिननो नारद इति यावद्। महती भा कानितिर्यस्य, रतसर्गे सुरतसृष्टी योग्यः स चासौ स चेत्यर्थः। ग्यासो

Page 382

३४२ चित्रमीमासा

विस्तार, श्रितावूरू येन तादशो वतते। अथ सहाभारतस्य सर्गे योग्यः 'व्यासो सुनौ स्याद्विस्तारे' इति विध इत्यन्वयः। (चित्र०) अन्न भृग्वादिमुनिरूपविपयगतदमयन्तीगोचरसोहोत्प्रेक्षाया यदेव तत्कुच- परिशीलनादि निमित्तं न तदविषयगत कि तु तटादिगतम् । तस्य भृग्वादि- शब्दश्लेपेण विषयगततानिर्गहः। (भारती) भृग्वादि मुनि के रूप विषय मे दमयन्ती विषयक मोह की उत्प्रेक्षा में कुछ-परिनीलन आदि निमित्त का तटादिगनता से विषय में साक्षात् सम्वन्ध के अभाव से 'भृग्वादि' शब्दटलेप के द्वारा उस तादात्म्य के निश्चय से विषय की गतायता जाननी चाहिए। विरार्ण-उक्त पद्य में जो धर्मस्वरूपोत्प्रेक्षा सुनियों मे मोह की उत्प्रेक्षा ह, उसमें भी मुनियों से सम्वन्ध रखने वाले अन्य किसी धर्म देखने आदि रूपी विषय में दमयन्तीविषयक मोहरूपी विषयी की अभेद सन्वन्ध ही उत्पोक्षा है। फिर यहाँ विषय देखने आदि का वर्णन क्यों नहीं ? ऐसा पूछा जा सकता हे। किन्तु एसका उत्तर यह है कि यह उत्प्रेक्षा साध्यवसाना है-यहाँ विपय विपयी द्वारा निगीण है। अन उसका ग्रहण न करना हो युक्तिसगत है। इस उत्प्रेक्षा 'का निमित्त धर्म है-उन उन अङ्गों में मुनियों की चित्तवृत्ि का आसत हो जाना। - (सुधा) एक्षणान्वयं प्रतिपाद्यति-अन्नेति। मृम्वादिमुनिरुपविषये दुमयन्तीविषयक सोहोप्प्रेक्षाया कुपपनि शीलना दिनिमित्तस्य टादिगतरवेन विपये साप्ाद् सम्बन्धाभावाद भृग्धादिशब्दरले पेण तत्तादार्यनिश्चयाह्विपयगतत्व बोध्यम्। (चित्र० ) अपहुन्या यथा- किशुकव्यपदेशेन तरुमावह सर्वतः । दुग्धा दग्धामरण्यानीं पश्यतीव विभावसुः॥

रोहण निसित्तन्। तदपि न विपयगतं कि तु किशुकपुत्पगतम् । तन्नाषि यद्यप सुख्य समारोहण नारित तथापि तदीय तरुतमाश्यणमेव तदारोहण- त्वेनाध्यवसितम्, ततश्र तत्रापतुत्ण विपयस्य किशुकपुप्पताद्रूव्यसंपादनेन धर्मसंबन्वनिर्वाहः। (भारती) विषय का अपह्ृति से धर्माश्रयताद्रप्य-सम्पादन का उदाहरण देते है। जेसे- 'विभावसु अर्थात् दावाग्नि किशुक फूलों के वहाने से वृक्ष पर चढकर मानो चारो ओर से जलते हुए इस महाजगल को देख रही है।' यहाँ दावानलरूपी विषय में जगल का जलना या नही जलना देखने की क्रिया की उत्प्रेक्षा

Page 383

उत्प्रेक्षानिरूपणप्रकरणम् ३४३

में वृक्ष पर चढनेरूपी निमित्त का वृक्षसमाश्रयण का ही उस पर आरोहणत्व से अध्यवसित मुख्यारोह की उसमें सभावना नहीं है। किंशुक फूल के द्वारा दावानलरूप विपयगतत्वाभाव से 'यह किंशुक का वृक्ष नहीं है, अपितु दावानल है' इस अपह्वति से दावाग्नि के विषय में किंशुक फूल से अभिन्नत्व में वृक्ष पर चढनारूप निमित्त की नियमित उपस्थिति से ही यहाँ धर्मसम्बन्ध का निर्वाह है। (सुधा)

किशुरसिपेण वृक्षमास्ह्य सर्वतो दग्ा दग्वसरण्यानी महदरपर्म पश्यतीवेत्यल्यसः ।

तरुससारोदणनिमिहन्य नरुसम्ाश्रयणत्येव तदाोहण्वेना्ययसितस् सुन्रोहन्

अपि तु दादाशि:, इत्यपहतया दावनेर्निपयदिशकपुप्पाभिजरवे तरुसमावेहणस पनिमिन्त रय तन सखाच। (चिद्न०) अन्यपदार्थस्य श्लेषेण धर्साशयताद्वयसंपाठन यथा- अस्या दोहदशालित्या सुगमाणण्डुरपसम। सत्यं राजेति मन्येऽद्य यद्सुवं भोक्तुसिच्छति॥ अत्र सुखस्य चन्द्रत्वोतपोक्षाया तुवं ओोकुमभिलापो निमिचम् तद्विपय- गतसपि नान्यपदार्थभूनचन्द्रगतम्। अतरतत्र राजशव्श्तेपेण चन्द्रस्य धर्साश्रयताद्रुप्यसपाठनेत धर्मस्थ तदीयतानिर्वाह। (भारती) पूर्वोक्त प्रकार से धर्माश्रय-ताद्रव्य के सम्पादन से मन्दन्ध का प्रतिपादन कर अ अन्य पदार्थ का उलेप से धर्माश्रय तादरूप्य का प्रतिपादन करते है। जसे- 'इस दोहदशानिनी के प्रभा से आपीत अर्थात सर्वनोभावेन पाण्डर सुसगण्टत को नवार मे इसे सच्चे अर्थ में 'राजा' मानना हू। क्योंकि समस्त पृणी मण्टल के उपभोग की एच्छा चर त्ना कर रही है।' यहॉ मुख में चन्द्रमा की उत्पेक्षा है। यदपि (सुख में) समरद धरती मे उपभोग की भिशा रूपी निमित्त के रहने पर भी चन्द्र शब्द का अभाव हे। फिर भी पत से उपन्धित टिनानन र शब्द से 'चन्द्र' अर्थ की उपलब्धि है। अत इन दोनों के अभेठ-सम्पादन मे धरती के उमोग- जन्य अभिलापारूपी निमित्त का अन्य पदार्थीभूत चन्द्रमा में भी उपस्थिति से परॉ तक का समन्वय है। (सुधा) एवं विषये उकप्रकारेण धर्माश्रयततादृष्यस्पादनेव सम्बन्ध प्रतिपाचान्यपदार्थस्य तवं प्रतिपादयति-अत्या दति दोहदश्यालिन्या मस्या आपाण्हुरं मुखम, राजा हति सरयम्, यनो भुवं भोधतुस इष्छतीत्यन्वयः। लक्षणान्वयं प्रतिपाद्यति-अत्रेतयाडिना।

Page 384

३४४ चित्रमीमांसा

मुखे चन्द्रर्वोत्पेप्षणे भूभोगाभिलाषस्य निमित्तस्य मुखे सत्ेऽपि चन्द्रेSभावाद्राजशब्द- श्लेषेण तयोरभेदसम्पादने भूभोगाभिलापरूपनिमित्तस्यान्यपदार्थीभूतचन्द्र सम्भवाक्क घणसमन्घय: । (चित्र०) धर्मान्तरस्य निमित्तधर्मतादप्यसंपादन विषयस्य तद्धर्माश्रयताद्रप्यसंपादनं चेत्युभयमेलनं यथा- आकृष्टिवेगविवलद् भुजगेन्द्रभोग- निर्मोकपट्टपरिवेष्टनयाम्बुराशेः । मन्थव्यथाव्युपशमार्थमिवाशु यस्य मन्दाकिनी चिरमवेष्टत पादमूले।। (भारती) इस प्रकार अन्य पदार्थ का अमेदाध्यवसाय में धर्माश्रयता का प्रतिपाटन कर, निमित्तभूत धर्म में अन्य धर्म के ताद्रूप्य-सम्पादन और विषय का तादृश धर्माश्रय-ताद्रप्य का सम्पादन- अर्थात् इन दोनों से समिश्रित उत्प्रेक्षा का उदाहरण देते हैं। जैसे- 'यही वह समुद्र है, जिसकी मन्थन-व्यथा की शान्ति के लिए, मानो मन्दाकिनी गगा उसके पादमूल अर्थात एकदेश अथवा चरण पर पडी रहती है और मन्थन-काल में, देव और असुर वृन्द द्वारा, एक दूसरे की ओर खींचातानी के कारण छूट कर गिरी नागराज वासुकी की केंचुल के बहाने उसके व्रण के उपचार के लिए, वधी पट्टी सी दिखायी दिया करती है।' (सुधा) एवमन्यपदार्थस्थाभेदाध्यवसाये धर्माश्नयतां सम्पाद् निमित्तीभूतघर्मे धर्मान्तरताद्रू ज्यसम्पादनं विषयस्य तादृशघर्माश्चयताद्प्यसम्पादनं चेत्युभयेन मिछितेनोशप्रेक्षणसत्व

परिवेष्टनया यस्पास्वुराशे: मन्थव्यथाव्युपशमार्थमिव आछु पादमूले चिरमवेश्तेत्यन्वयः। (चित्र०) अन्न मन्दाकिनी रूपविपयगतपयोधिमन्थव्यथाव्युपशमरूपफलो त्प्रेक्षायां यन्निमित्तं चरणमूले वेष्टनं तत्तादात्म्यसंपादन पर्यन्तवेष्टनस्य श्लेषेण विषयस्य यत्ताद्रूप्यसंपादनमपह्नत्या वेति मिलितेनोभयेन विषयस्यान्यधर्मसबन्धनिर्वाह्ः। (भारती) यहाँ दोनों तरह के धर्म सम्वन्ध का प्रतिपादन करते हैं। मन्दाकिनीरूप विषय में समुद्र- मन्थन के श्रम से उत्पन्न व्यथा की शान्तिरूप फल की उत्प्रेक्षा में, चरणमूल-वेष्टनरूप 'निमित्त का खण्डश्लेष के द्वारा प्रत्यन्त पर्वत वेष्टन से ताद्रूप्य अभेद का प्रतिपादन कर-मन्दाकिनीरूप विषय का अपह्ुति से तादृश प्रथम विशेषण के द्वारा प्रतिपादित वेष्टन ही दूसरा ताद्रूप्य है और इन दोनों के सम्मिश्रण से मन्दाकिनीरूप विषय के साथ चरणवेष्टनरूप धर्मसम्बन्ध के निर्वाह से लक्षण का समन्वय है।

Page 385

उत्प्रेक्षानिरूपणप्रकरणम् ३४५

विमर्श-यहाँ वासुकी की केंचुल पर उसके अपह्वव या अपलाप के साथ, मन्दाकिनी के आारोप में अपह्ुति की रूपरेखा उभडी है। किन्तु, यह अपह्ुति भी यहाँ के 'श्लेष' की अङ्गभूत सी प्रतीत हो रही है क्योंकि इसीके द्वारा मन्दाकिनी के वास्तविक 'पादमूलवेष्टन' और 'पदमूलवेष्टन' की श्लिष्टता का अभिप्राय निकल रहा है। क्योंकि 'पादमूलशब्द' दोनों अर्थ का वाचक है। यह इलेष भी यहाँ अतिशयोक्ति का अङ्ग ही है। क्योंकि इसीके द्वारा 'पादमूलवेष्टन' के साथ 'पदमूल- चेष्टन' अभेदाध्यवसाय में कवि ने चमत्कार उत्पन्न किया है। यह अतिशयोक्ति भी यहाँ मन्थन वयथा की मानो शान्ति के लिए इस उत्प्रेक्षा का अग है और यह उत्प्रेक्षा भी यहाँ 'अम्बुराशि' और मन्दाकिनी में नायक-नायिका के व्यवहार-समारोप की प्रतीति कराती हुई दिखाई दे रही है।

(सुधा) अत्रोभयाभ्यां धर्मसम्बन्धं प्रतिपादयति-अन्नेति । मन्दाकिनीरूपे विषये समुद्र- मम्थनव्यथोपशमरूपफलो श्प्रेक्षणे चरणमूलवेष्टनस्य निमिसस्य खण्डश्लेषेण प्रत्यन्तपर्वत- वेष्टनेन, सादृप्यमभेदं प्रतिपाध मन्दाकिनीरूप-विषयस्यापह्नत्या तादृदशप्रथमविशेषण- प्रतिपादितवेष्टनताद्रप्यक्ष मिलिताम्यामुभान्यां विषयस्य मन्दाकिनीरूपस्य चरणमूल-

(चिन्न०) उपात्तधर्मेण धर्मान्तरा्षेपस्तु दर्शित एव । तस्मादन्यधर्मसंबन्धादित्ये- तदपि सर्वोत्प्रेक्षानुगतमिति न क्वाप्यव्याप्तमिति सर्वे समञ्जसम् । (भारती) इस तरह तीनों भेदों का उदाहरण देकर चौथा भेद पूर्व की तरह ही कहते हैं। उपात्त धर्म से धर्मान्तर का आक्षेप-'भूयस्तराणि यदमूनि' इस उदाहरण में पहले ही दिखा चुके हैं। इस प्रकार लक्षण की निर्दोषता का प्रतिपादन कर 'तस्मात' से उपसहार करते हैं। अर्थात धर्म का भी सभी प्रकार की उत्प्रेक्षाओं में अनुगत रहने के कारण ये सभी लक्षण समीचीन हैं। विमर्श-निष्कर्षम्वरूप हम कह सकते हैं कि अलकारसर्वस्वकार ने उत्प्रेक्षा अलकार के सम्वन्ध में एक नया दृष्टिकोण, नवीन विचार तथा स्वस्थ स्वरूप अभिव्यक्त किया है। इन्होंने सभावना एव अध्यवसाय के स्थान पर 'साध्य अध्यवसाय' पद का प्रयोग किया है। इनके अनुसार अध्यवसाय में व्यापार की प्रधानता होने पर उन्प्रेक्षा होती है। 'अध्यवसाय' का अर्थ है-विषय का निगरण कर उसके साथ अभेद की प्रतीति। यह दो प्रकार का होता है-साध्य और सिद्ध।"जब विषयी की असत्यतया प्रतीति हो तो साध्य तथा असत्य विषयी का भी जब सत्य रूप में बोध हो तो सिद्ध अध्यवसाय होगा। उत्प्रेक्षा अलकार में साध्य अध्यवसान होता है। इसमें विषय का पूर्णत. निगरण नहीं होता, वल्कि वह निगरण की प्रक्रिया की स्थिति में रहता है। इसे ही साध्य अध्यवसान कहते है। साध्य अध्यवसान में विषयी की प्रतीति सदा असत्य रूप में ही होती है। इस प्रकार अप्रकृत के गुण, क्रियादि के रूप में जब प्रकृत की सभावना की जाती है, तब वहाँ उत्प्रेक्षा अलद्कार होता है। रुय्यकने अलकारसर्वस्व में लिखा है- 'विषय निगर णेनाभेदप्रतिपत्तिरविषयिणोऽध्यवसायः। स च द्विविधः साध्यः सिद्धश्च।

Page 386

३४६ चित्रमीमांसा

साध्यो यत्र विषविणोऽसत्यतया प्रतीतिः। असत्यत्वं च विपयिगतस्य घर्मत्य विषय उपनिबन्धे, विषयिससविरवेन विषयासंभवित्वेन च प्रतीतेः। धर्मो गुणक्रियारूपः तस्य संभवसमवप्रतीती संसदाश्रयरय तन्नापरमार्थतया सत्यत्वम्। सस्यासत्छरवं, तस्य सत्यत्व- परतीतावध्यवसायः साध्यः। अतश्र व्यापारप्राघान्यसू। सिद्धो यन्न विपयिणो चस्तुतो सरयस्यापि सत्यताप्रतीतिः। सत्यस्वं च पूर्वकस्यासत्यत्वनिमित्तस्याभावाद्। अतश्राध्य- वक्षिताप्राधान्यन। तम्न साध्यत्वप्रतीती व्यापाद प्राधान्येग्यवसाय संभावनमभिमानस्तर्क

मशावन उसक्षा।'-रुय्यक नात्पर्य यह कि जहॉ विषयवाचक शव्द के पृथक होने पर भी विषय विषयी में प्रविष्ट होते दिखाई देता है, वहीं उत्प्रक्षा होती है। कय्यक की मान्यता है कि उत्प्रेक्ष केवल अभेद सम्बन्ध से हा होती है। फलत उन्होंने 'सपा स्थली यत्र' इम उदाहरण में नूपुर में रहने वाले मोनत्व को हेतु वनाकर दुखरूपी गुण की उत्प्रेक्षा की जा रही है। इस उत्प्रेक्षा का नूपुर में रहने वाले 'अष्डहीन होना' से अभिन्न माना हुआ ने नत्व ही निमित है। इसी प्रकार 'जहाँ धर्म ही वर्मो में रहने वाले के रूप में उत्प्रेक्षित हों' इत्यादि लिखकर धर्मो- त्प्रेक्षा के प्रसग मे कहा है-'लिम्पतीव नमोद्गानि' इस जगह 'लेपन' क्रिया के कर्तृत्व की उत्पेक्षा है और उसमें व्याप्त होना निमित्त हे। पण्डितराज जगन्नाथ की दृष्टि मे रुव्यक के ये सारे मत या सिद्वान्त परस्पर विरोधी है। उन्होंने इन मनों का खडन अपने दग से किया है। इनके अनुमार 'दुस' गुण की उत्प्रेक्षा, जो अभेदमि्रित हो, मे इम प्रकार का अव्यवसान असम्मव है। फलत कय्यक का लक्षण इस स्थान पर घटित नहीं हो सकता ह। इन्होंने 'मौन' मे अध्यवसान को माना है। इसमें 'नि्चलता के कारण शब्द रहित होने को 'मौनीपन' के अन्त-प्रविष्ट को मानकर अमेद समझ लिया गया है। लेकिन वह तो सिद्ध अध्यनसान है, जो अतिचयोक्ति होने का कारण हो सकता है-उत्प्रेक्षा का कारण नहीं, जब कि व्य्यक के अनुसार 'मान' की उत्म्रेक्षा के निमित रूप मे उत्प्रेक्षा भी नहीं की गड हे। ये ही वातें 'लिम्पतीव तमोद्वानि' के साथ भी लागू है। इसमे 'लेपन' को रुच्यक ने 'कर्नृत्व' की उत्प्रेक्षा का निमित्त बताया है। पण्डिनराज ने कथ्यक के इन दोनों विचारों की असनानता को दर्शांन हुए लिखा है कि एक ओर नो 'व्याप्त होने' आदि को उत्परेक्षा का विषय मान लेने पर अन्य निमित्त को ढेढने के कारण उत्प्रेक्षा का विषय उचित नहीं माना है और दूसरी ओर पूर्वाक्त लक्षण दिया है-यह अनवस्था है। पुन दूनरे प्रकार मे इस बात पर विचार करने से असम्बजता और स्पष्ट हो उठती है 'मुख मानो चन्द्रमा है' में अव्यवसान की कोई झलक नहीं मिलनी। क्योंकि यहाँ विषय सामने है, जब कि इसके विषयी के अतर्गन न होने पर अव्यवसान के होने का कोई गन ही नहीं उठता है। एक पश्न और उठता ह कि अव्यवसान की सिद्धि में विपय विपयी में लिप्त रहता है, पर साध्य अध्यवसान में वह अलग से प्राप्त होता है। पण्डितराज ने इसका भी खडन करते हुए लिखा है कि विषय की पृथकता को सानकर अध्यवसान की कल्पना रूपक अल्कार मे भी उसकी उत्पत्ति का वोवक है और अगर रूपक में अध्यवसान नहीं होता है तो उत्परेक्षा में विषय की पृथकता अव्यवसान का बोधक कैमे हैं? दूंसरी वात-'सारोपा' और- 'साध्यवसाना', जो लक्षणा के दो भेद हैं, अध्यवमान को भी एक प्रकार की लक्षणा ही सिद्ध करती हैं। परन्तु उत्प्रेक्षा के विधेय अश में लक्षणा का कोई प्रश्न ही नहीं है। यहाँ लक्षणा की अपेक्षा चिन्तकों ने

Page 387

उत्प्रेक्षानिरूपणप्रकरणम् ३४७

अमेदादि ससरगो से आहार्यबोध ही स्वीकार्य किया है। अत पण्डितराज की दृष्टि में रुय्यक का यह उत्प्रेक्षा दिमर्श अम्त-व्यस्त है। किन्तु, यथार्थत वात ऐसी नहीं है। दीक्षित जी ने इसकी स्वीकृति कुछ सोच-समझकर ही अपने ग्रय में दी है। दीक्षित जी ने धर्मोत्प्रेक्षा के दो उदाहरणों में से गुणरूप धर्म का उत्प्रेक्षा के उदाहरण 'अस्या मुनीनामपि मोहमूहे' आदि में भेद सम्बन्ध से उत्प्रेक्षा की व्याख्या स्पष्ट रूप से कर चुके हैं। रही वात क्रियारूपी धर्म की उत्प्रेक्षा 'लिम्पतीव तमोऽदानि आदि के विपय में मनभेट। इस पर भी वाद-विवाद कर दीक्षित जी ने यह सिद्ध कर दिया है कि वहाँ भी प्रथमान्त पद के अर्थ में प्रकृत क्रिया के 'कर्तृत्व' की आश्रयता सन्वन्व से अथवा कर्त्ता के अभेदसम्वन्ध से उत्प्रेक्षा मानना कोर् अनुचिन नहीं हे। जहॉ तक हेतुतोक्षा का प्रश्न है-'वियोग के दुस से' इम पद का अर-दीक्षिन जी ने किया है-वियोग के दुर से असिन्न हेतु। इस अर्ज की प्रयोज्यना सम्बन्न से उत्पेक्षा 'एव' आदि द्वारा समझायी गई है। जहाँ तक मौनत्व के अन्त प्रविष्ट को मान कर अभेठ के द्वारा लक्षण-समन्दय किया गया है। उसपर पण्डितराज ने इमे सिद्ध अवसान मानकर अतिशयेक्ति कहा हे। उमके सम्बन्ध में विचारणीय प्रश्न यही है कि रय्यक ने उन्प्रेक्षा और अनिशयोत्ति की तीमा का निर्धारण कर दिया है। अतिशयोक्ति में विषय या उपमेय का जहॉँ पूर्ण निगरण हो जाता है वहा उत्प्रेक्षा मे विपय-निगरण की प्रक्रिया की स्थिति में रहता है। अत हम कह सकने है कि 'मौनत्व' पूर्ण निगरित न होकर निगरण की स्थिति में है। धमी उत्प्रेक्षा के उदाहरण अर्थात 'मुख मानो चन्द्रमा है' इत्यादि में जो अमेद सम्बन्ध से उत्प्रेक्षा होती है पण्टितरज के अतिरिक्त और किसी का दस पर मतमेद है ही नहीं।

(सुधा) एवं प्रकावन्यसुदाहृत्य पतुर्थप्रक्ान परवंत्रश्ोपदिपति-उपारधर्मेणेति। दर्नित एवंति। 'सूय स्तदग यदमूनि' इत्यादावित्यर्थः। निर्दोधतां लक्षणस्थ प्रतितपादोपमंइदति-तस्मा- दिति। धर्मन्याति सर्वोत्मेक्षत्वनृगतत्वा् सर्वमधि लष्ण ससीचीनमरिति तदर्थः। रसद्ा पवकृतस्तु-तद्टिप्वतवेन तदभाववर्वेन वा प्रसितस्य पदार्थरय रमणीयतद्वृत्ति हूर्स समानाधिकरणान्यतर-तर्तूर्मस्बन्घनिमित्कं तखवेन तहत्वेन वा सरसादनसुलोक्षा। "लोकोत्तमप्रभावं त्वा सन्ये नारायण परष्" इति सम्मावनायासतिपएासारणाय तव्िर- र्वेल प्रमितस्वेति विशेषणस्। तूस्य व लम्भावनायासह्टायगसकत्वस्, तेव 'धारायर- घिया छ्ीम तृत्यन्ति स्म शिलावला.' इति ञ्रान्तिसति नातिव्यापिः। 'वदनकमलेन वाले स्मितसुषसालेशमाचहसि यदा।' 'जगदिह तर्दैव जाने दशार्धवाणेन विजितस्'॥इति सपभायनायानतिपमनर्णाय न्मणोगनभर्मनिमत्तकसिनि। 'दूरे तिव्वन देववस हद भाति' वृत्याद्ावतिव्याह्तिवारणाच वमे रमणीय्त्वविशेषणस। रूप्कववित्तावतिमसठ्नद- णाय सम्भावनमिनि। अनेकयोवत्या लक्षणा यविवक्षणं धर्स्तुतेव्षायां तादात््यसस्वन्धो धर्मोसेपषायां सम्बन्धान्तदमिति प्रतिपाठनार्थमिति। उत्पेत्षालक्षण विघायाऐेदेनेव रूर्चश्रो- सप्रेक्षणमिति प्राचीनमतं प्रदर्श्स तत्र विचार्यते-अभेदेनेव सवत्रोत्पेक्षणनियसे प्रसाणाभावः, 'अस्यां सुनीनामपि मोहमूहे' इत्यादौ भेदेनाप्युछोक्षणस्य सत्वाद्, न च सुनिसरनन्धि धर्मविदोषे सोहस्याभेदेनोदोक्षणम्। तादृशनियम एव प्रसाणाभावेनतस्य दुरमहत्य निर्मूलत्वात् 'लिम्पतीद' इत्याावपि लेपनकर्तृत्वस्य न तमभादिपूत्पेक्षणमेव युछन्। अनुकूलव्या पारात्मक्ाख्यातार्थस्य कर्तुराश्रयतासम्बन्धेनान्वयात् 'भातप्रधानसाख्यातसू'

Page 388

२४८ चित्रमीमांसा

इति स्मृतेर्व्यापारार्थकं तिडित्यर्थकरणाछ विरोधः । न च 'लः कर्म्मणि' इति सूत्र- चिरोध:, 'कतरि कृत्' इत्यत्र धर्मिपरस्यापि कर्तृपदस्य धर्मपरत्वेन व्याख्याने दोषाभावाद्।

त्वाभ्यां तत्सम्भवात्। यह्ा, अस्तु फलव्यापारयोः धास्वर्थता, आश्रयस्य तिडर्थंत्वम्। देवदसतः पचतीत्यादौ प्रथमान्ते तिडर्थस्याश्रयस्याभेदेनैव विशेष्यता युकका। देवदत्तः पचमान इत्यादाविव भेदेन घात्वर्थभावनार्या तुन विशेषणता, सर्वजनसिद्ध स्योद्देश्यविधेयभावस्य भङ्गापतेः।

इत्यादी भेदेनाभेदेन वा तिडर्थस्यैव प्रथमान्ते उत्प्रेक्षणस्, नतु घात्वर्थस्य लेपनस्य स्वनिमिते स्वनिगीर्णे व्यापनादौ सर्वजनसिद्धायाः इवार्थविधेयताया अनुपपत्तेः। एवम् 'सेषा स्थली यन्र विचिन्वता स्वाम्' इत्यादी निश्चलत्वनिमित्तकनिश्शब्दृत्वविषये विश्लेषदुःहेतुकमौनमभेदेनोठोचयते, किन्तु मौनहेतुत्वेन नूपुरे विश्रलेषदुःखमेव, वत्प्रेक्षायामिषशव्दान्वितस्योत्पेचयतायाः स्वभावसिद्धत्वात्, विषयस्य निगीर्णतया विषयिणो विधेयानुपपत्तेश्र, निःशब्दत्वमौनयोः सम्भावनानिमित्तकधर्मान्तरगचेषण- पत्तेश्र। एककालीनत्वादिघमस्य चसत्काशनाधायक त्वेन तम्रारयोजकत्वाद्। तर्हि भवन्म- तेऽपि तदुत्रेष्षायां को धर्मः। निश्चलत्वनिमित्तकं यनिश्शब्दत्वं तत्ताद्रृप्येणाध्यवसित- मौनस्यैव सत्याद, तस्य विश्लेषदु खसमानाधिकणत्वाद्, नूपुरवृत्तित्वाप्त। एवं फलो- तपेक्षायामपि बोध्यम्। एतेन हेत्वादयरक्षोदाहरणेषु तादात््येनैवोेप्षणमिति प्राधीन- मतमनुसरता द्विडपुङ्गवेन युकं तषप्यपास्तमिति प्रतिपाषयाश्रकः। तदपि प्राचीनार्वा- चीनसकलग्रन्थचिरुदूमेघ। तथा दि-'सम्भावनसथोत्य्रेष्षा प्रछृतस्य समेन यद'[काव्य. प्र. उ. १०, सू १३७] इति प्रकाशोकतलक्षणस्थ प्रकृतस्याप्रकृतेन तादात्म्यसम्भावनमुत्प्रेक्षेति परिष्कारेणाभेदेनैव सर्वश्रोद्येक्षणे तात्पर्यात्। अत एव 'उन्मेषम' इति तदुदाहरणस्यात्र पश्मलघम्या: कामिनीघरणयोः रवभावलप्नत्वं यथोत्कर्षहेतुलमतादात््येन सम्भाचितमिति- प्रदीपे व्याख्यातम। तथा च तद्विरोधः। पृतत्कथनातुरोघस्वाभेदेनोतप्रेक्षणनियमे प्रमाण- त्वेन 'अस्यां सुनीनामपि' इत्याद्ी सुनिसस्षन्धिनि विषयभूते धर्मान्तरे मोहस्यैवाभेदेनो- ेक्षणात्। यत्त, 'लिम्पतीव' इत्यादौ लेपनकर्तृत्वं तमस्युत्प्रेघयते इत्यादि तदपि न, वैयाकरणमते घात्वर्थंक्रिया प्राधान्येनाख्यातार्थक तृंरप्रकारकशाब्दबोधत्वावचछ्िन्नं प्रति चिश्रेष्यतया धातुजन्योपस्थितिरूपकार्यकारणभावात्, तद्विशेषणतयाऽन्वितस्य तस्य सम्भावनार्थके इत्यादी तदन्वयासम्भवात्। गग्यमानतमसो व्यापनादि लेपनादिरूप- तया सम्भावितमिति प्रदीपादिविरोघापत्ते। न च 'भावप्रधानमाख्यातस्' हत्यस्य व्यापारथिकं तिडित्यर्थः । सम्भवति नामलक्षणस्य सत्वप्रधानानि नामानीत्यग्रे प्रतिपाम्तितत्वेन तिङसाहचर्येणाख्यातपदस्य धातुपरतवावगमात्। किञ्व नामाख्यातोपसर्गनिपातानां कथने प्रवृत्तस्य त्रयाणा प्रक्कतिरुपतयाख्यातपदस्य तिङपरत्वे सन्दर्भंविरोधापत्तेः। आख्यायते सवप्रघानभूतोऽर्थोड नेनेति व्युत्पत्या घातुपरताया एव तस्य योग्यत्वाच। व्यापारप्रधानबोधजनकत्वमिति धातुल क्षणकथनस्पेव ताहशवघने इष्टर्वात्। किश्व व्यापारस्य प्रत्ययार्थत्वे 'ल: कर्मणि च' इत्यादिसूत्रविरोधः। तेन व्यापारस्य प्रत्ययार्थतयाऽप्रतिपादनाथ। पचति पक्कवानित्यादौ फूरकारादिप्रतीतयेऽनेकप्रत्ययानां कल्पनापेद्ययैकस्थ धातोरेव शक्तिकश्पने लाषवातू।

Page 389

उत्प्रेक्षानिरूपणप्रकरणम् किक्व फूरकारादे: प्रत्ययार्थतवे गच्छतीत्यादावपि ततप्रतीतिवारणाय तद्बोधे पचिसमभि- व्याहारस्यापि कारणत्वकरपने गौरवाघ। यत्त, आख्यातार्थव्यापारव्यधिकरणफलवाचक- रवादिना सकर्मकाकर्मकरवव्यवहार:, तम; अभिधानानभिधानव्यवस्थोष्छ्ेदापततेः। किञ् कर्तृपदस्थ 'लः कर्म्मणि च' इत्यम्र धर्मवृत्तिपररवे प्रमाणाभावः । 'कर्तरि फृत' इत्यादा- वपि तदापतेः, तन्नापि तत्करपने जअ्भ्यमानाधिकरणोष्छेदप्रसङ्गाप्त। यक्षु फल- व्यापारयोर्धातुवाच्यत्वेऽपि प्रथमान्तार्थे एव तिडर्थस्याश्रयस्याभेदेनान्वयः, पचमानो देववत्त इतिवव्, न तु भेदेनापीत्यादि। तदपि न, आख्यातार्थप्रकारकेश्यादिकार्यकारण- भावविरोधस्य वैयाकरणमते विरोधात्। न च तार्किकमतेन निर्वाहः, आख्यातार्थकर्तृं- प्रकारकबोधं प्रत्यन्याविशेषणीभूतप्रथसान्तपद्जन्योपस्थितेः कारणत्वकरूपनसरवेन

सम्भवेनोपमाया आवश्यकरवास् दण्टिमतस्व चिरोधापत्तेक्ष। तेन तम्नान्वयास्त्वेनोपमा नभावस्य निराकृतरवा्। तस्मादू व्यापनादी लेपनादिरूपतयेव सम्भावनम्र। न तु त रकर्तुस्तमसि विषये तरसम्भावनमिति बोष्यम्। 'सेषा स्थली' इत्यादावपि तादशसौन- स्याभेदेनेचोशप्रेप्षणमिति प्राचीनोक्तमेव सर्व समक्समित्यलम्। (चित्र०) अलङ्कारसर्वस्वकृतेत्थसस्य विभागः प्रदशितः। वाच्या प्रतीयमाना चेति तावदुत्प्रेक्षा द्विविधा। इवादिप्रयोगे वाच्या, तदप्रयोगे प्रतीयमाना। तत्र वाच्या जातिगुणक्रियाद्रव्याणामप्रकृतानामध्यवसेयत्वेन चतुविधा । तेषां च प्रत्येकं भावाभावाभिमानरूपतया द्वैविध्येनाष्टविधा। तेषु निमित्तगुणक्रियारूपत्वेन षोडशभेदा । निमित्तस्य पुनरुपादानानुपादानाभ्यां द्वान्रिशत्प्रकाराः। तेषु पुनः प्रत्येकं स्वरूपहेतुफलोत्प्रेक्षारूपत्वेन षण्णवतिर्भेदाः । (भारती) अलक्कार-सर्वस्वकार ने इसका अधोह्ित विभाग किया है। सर्वप्रथम उत्प्रेक्षा दो प्रकार की है-वाच्या और प्रतीयमाना। जहॉ उत्प्रेक्षा की सामग्री इव, मानो, निश्चय प्रभृति उत्प्रेक्षा- प्रतिपादक शब्दों सहित हो-वहाँ वाच्योत्प्रेक्षा होती है और जहाँ प्रतिपादक शब्द न हो किन्तु, वल सामग्रीमात्र हो वहाँ प्रतीयमाना उत्प्रेक्षा होती है। जाति, क्रिया, गुण एव द्रव्य के आधार पर वाच्य के चार भेद होते हैं तथा प्रत्येक के भाव और अभाव के कारण आठ प्रकार हुए। ये आठ भेद भी गुण और क्रिया के भेद से सोलह प्रकार के होते हैं और निमित्त के उपादान तथा अनुपादान के कारण ये बत्तीस प्रकार के हुए। इनमें प्रत्येक के हेतु, स्वरूप और फल रूप में ९६ भेद हुए। (सुधा) अथोत्प्रेक्षाविभागमलङ्गारसवस्वरीत्या स्वयं दर्शयतिअलक्कारसवंस्ृते्यदिनाके सत्प्रेश द्विविधा, वाच्या, प्रतीयमाना चेति। दाप्यालक्षणमाह-इवादीति । आदिना मन्ये, शङ्के ध्रवम्, नूनमित्याद्यः । तेषामेवाप्रयोगे प्रतीयमाना चेति योध्यम्। तन्न वाच्या, अप्रककृतानां जातिगुणक्रियाद्रव्याणामध्यवसेयत्वान्नतुविधा। जात्यादीनां कषि-

Page 390

३५२ चित्रमीमांसा

कपिश वर्ण भगवान शङ्कर के शिर पर चूती हुई मन्दाकिनी गगा के जल से प्रतिदिन सिक्त होने के कारण स्फटिक की तरह स्वच्छ ललाट से उन्मुक्त अङ्कर की तरह शोभता है।

(सुधा) अथतन्मतरीत्योदाहरणानि दर्शयितुं प्रतिजानीते-अथेत्यादि। तत्र स्वरूपोत्प्रेवा भेदानाह-स वः इति। नवबिसलताकोटिकुटिल: स इन्दुर्वः पायात्। रख्तु इत्यर्थः। यः शिवस्य ज्वलनकपिशे शिरसि स्रवन्मन्दाक्रिन्या गङ्गायाः पयसा प्रतिदिवसं सिकेन स्फटिकधवलेन कपालेनोनमुक्त अंकुर इव भातीत्यन्वयः।

(चिन्न०) अत्राङ्कुरशब्दस्य जातिशब्दत्वाज्जातिरुत्प्रेच्यते। उपात्तः कौटिल्यगुणो निमित्तम्। एवमुपात्तक्रियानिमित्तापि जातिभावस्वरूपोत्प्रेक्षोदाहतव्या। उपात्तक्रियानिमित्तगुणभावस्वरूपोत्प्रेक्षा यथा- निवेशितं यावकरागदीप्ये लग्नं तदीयाधरसीम्नि सिक्थकम्। रराज तत्रैव निवस्तुमुत्सुक मधूनि निर्धूय सुधासधममिण॥ अत्रौत्सुक्यं गुण उत्प्रेक्ष्यते। उपात्ता लगनक्रया निमित्तम्। एवमुपात्त गुणनिमित्तापि गुणभावस्वरूपोत्प्रेक्षोदाहर्तव्या। (भारती) यहाँ चन्द्रमा में अद्ठरत्व जाति की उत्प्रेक्षा में कौटिल्य गुण के रहदने के कारण उपात्तगुण निमित्ता जातिभावस्वरूपोत्प्रेक्षा है। इस प्रकार उपात्तक्रिया निमित्त रहने पर भी जातिभाव स्वरूप से उत्प्रेक्षा का उदाहरण हुआ। उपात्त क्रिया निमित्त गुण भाव स्वरूप उत्प्रेक्षा जैसे- 'यावक राग की कान्ति के लिए निवेशित दमयन्ती के अधरप्रान्त में सलग्न सिक्थ ठीक उसी प्रकार शोभता था जैसे मधु की उत्कण्ठा को छोडकर सुधा के समान धर्मवाली वह उसी अधर प्रान्त में निवास के लिए समुत्सुक हो।' यहाँ उपात्त से लझन आत्मकथा निमित्तभूत क्रिया से औत्सुक्य गुण के उत्प्रेक्षण से उपात्त गुण क्रिया के निमित्त से गुणस्वरूप उत्प्रेक्षा है। 'लगनम्' यहाँ औत्सुक्य गुण से उसके ही उत्प्रेक्षण से उपात्त गुण निभित्त भी जानना चाहिए। (सुधा) अत्र चन्द्रे अंकुरत्वजातेरुतेक्षणे कौटिक्यगुणस्य सध्वादुपापगुणनिमिसा जातिभावसव- रूपोखोक्षा। अन्रैव रचित इति पाठकरपने उपात्तक्रियानिमिस्ता सा घोध्या। निषेशितमिति। यावकरागदीक्षये निवेश्षित तदीयाधरसीम्नि लग्नं सिक्थकं मधूनि उरकण्ठा निधूय सुधासमानधर्मचति तत्रैय निवस्तुमुरसुफमिव रराजेरयन्वयः । अत्रोपासया लग्नेत्यातम- कथा निमित्तभूत क्रिय यौरसुक्यगुणस्योश्प्रेक्षणादुपातगुणक्कियानिमिसा गुणस्वरूपोप्पेष्षा। लग्नमिश्य म्रोककमिति पाठे औरसुक्यगुणेन तस्पवो्प्रेक्षणदुपासगुणनिमितपि ोष्या।

Page 391

उत्प्रेक्षानिरूपणप्रकरणम् ३५३

(चित्र०) उपात्तगुण निमित्तक्रियाभावस्वरूपोत्ग्रेक्षा- अथ सान्ध्यसान्द्रकिरणारुणितं हरिहेतिहूति मिथुनं पततोः। पृथगुत्पपात विरहार्तिगलद्घृदयस्त्रुतासृगनुलिप्तमिव॥ अत्र रुधिरानुलेपनक्रियोत्प्रेचयते। उपात्त आरुण्यगुणो निमित्तम्। एवमुपात्तक्रियानिमित्तापि क्रियाभावस्वरूपोत्प्रेक्षोदाहर्तव्या। (भारती) उपात्त गुण निमित्त क्रिया भाव स्वरूप उत्प्रेक्षा जैसे- 'सन्ध्या हो जाने के बाद सघन एव प्रगाढ सन्ध्या की लाल किरणों से रगे हुए लाल वर्ण के चक्रवाक दम्पति मानो विरह-वेदना से फटते हुए हृदय से निकले रुधिर से अनुलिप्त की भाँति, अलग अलग हो कर उड गये।' विमर्श-लोक-विश्वास के अनुसार रात में अर्थात् सध्या के बाद और प्रभात के पूर्व चक्र- वाक-दम्पत्ति साथ रह्द कर भी वियुक्त रहते हैं। इस पद् में 'हरिहेतिहूति' का अर्थ है भगवान विष्णु के अस्त्र अर्थात चक्र की सज्ञा धारण करने वाला 'चक्रवाक'। एक साधारण शब्द के लिए इतनी क्विष्ट कल्पना, इस पद्य में दर्शनीय है। अन्नेति। यहाँ रुधिर के अनुलेपन की क्रिया से उत्प्रेक्षा अलद्वार है। उपात्त रक्तिमगुण ही निमित्त है। इसी प्रकार उपात्त क्रिया निमित्त भी क्रियाभावस्वरूप उत्प्रेक्षा का उदाहरण जानना चाहिए। (सुधा) अथेति। सान्द्रा ये सन्ध्यायां भवाः किरणास्तैरूणितम अरुणीकृतम अत पुव विरहा्ध्या तहयापदा .. गलतो विदीर्यमाणादू हृदयात् स्नतेनासृना रुधिरेणानुििप्तमिघ स्थितं हरेदिष्णो: हेतिः चक्रं तद्धूतिराह्वानं यस्य तत् पतस्न्निणोरमिधुनं पवक्रवाकइन्दं पृथक् भागेनोस्पपातेत्यन्वयः। अश्रोपात्तेनारुण्यगुणेन निमित्तेन रुधिरातुलेपन क्रियाया उत्प्रेक्षणा द्रुपात्तगुणनिमित्ता क्रियाभावस्व रूपोश्पेक्षा। अत्रव किरणकर्तृकथा रक्कीकरणक्रकियया तसु ्प्रेक्षणे उपात्तक्रियानिमित्ताऽपि सा बोध्या इत्याह-पवमिति। (चित्र०) उपात्तक्रियानिमित्तद्रव्यभावस्वरूपोत्प्रेक्षा यथा- एककमुद्गतगुण च्युतदूषणं च हित्वाऽन्यमन्यमुपगम्य परित्यजन्तीम्। एतां जगाद जगदर्चितपादपझ्मां

अत्र पद्माया एकतया द्रव्यत्वाद द्रव्यमुत्प्रच्यते। उपात्ता उपगम्य- परित्यजनक्रिया निमित्तम्। एवमुपात्तगुणनिमित्तद्रव्यभावस्वरूपोत्प्रेक्षोदाह- तव्या। एवं भावाभिमानेषु जात्यादिषूपात्तनिमित्ता अष्टौ भेदा: संपन्नाः । २३ चित्र०

Page 392

३५४ चित्रमीमांसा

वर्षातपानावरणं चिराय काष्ठौघमालम्व्य समुक्षितेषु। वालेपु ताराकवकेष्विवैकं विकस्वरीभूतमवैमि चन्द्रम्।। (भारती) उपात्त क्रिया के निमित्त द्रव्यभाव स्वरूप उत्प्रेक्षा के उदाहरण। जैसे- 'अधिक गुणसम्पन्न दोषहीन राजाओं को एक-एक कर छोडती हुई आगे बढकर दूसरे राजा के पास पडडुचती और फिर उन्हें भी छोडकर वह दमयन्ती, भगवान विष्णु की वाँहों से छुटी हुई जगदाराध्या विश्वपूजिता भगवती लक्ष्मी की तरह बोली।' यहाँ पझ्मा की एकता से द्रव्यत्व के द्वारा द्रव्य की उत्प्रेक्षा में, उपात्त का उपगम्य परित्यजन क्रिया के निमित्तभूत, उपात्तक्रिया निमित्तक द्रव्यभाव स्वरूप उत्प्रेक्षा है। यहाँ ही विश्वपूजित अध्यवसित आविक्य गुण का गुणनिमित्तक द्रव्यभाव स्वरूप उत्प्रेक्षा जाननी चाहिए। इसी प्रकार भावाभिमानिनी जात्यादि में उपात्तनिमित्तक भाठो भेद सम्पन्न हैं। अनुपात्त निमित्त जातिमाव स्वरूप उत्प्रेक्षा। जैसे- 'अनाच्छादक रूप काषों के दारुण दिशाओं को बहुत दिनों के लिए अवलम्वन कर अनेकों ताराओं में विकसित इसे मैं चन्द्रमा मानता हू।'

(सुधा) 1

एफकमिति। अधिकगुणं दोषहीनम् एकैक नृपं हित्वा अन्यमन्यसुपगम्य तमपि श्यजन्तीमेता दमयन्तीं सा सरस्वती विपुलमक्षसः ध्युतां जगदाराध्यां पद्मामिव जगाद बभाणेत्यन्वयः। अम्र पम्माया एकतया दव्यत्वात् दव्यस्योत्प्रेक्षणं उपगम्य परित्थजन क्रियाया निमितभूताया: सर्वादुपात्तक्रियानिमित्ता द्रव्यभावस्वरूपोहेक्षा। चञ्चलरवाद् अन्रैव जगदर्चिताध्यवसिताधिक्यगुणस्य निमित्तभूतस्य सत्वादुपात्तपुणनिमित्ता द्रव्यभाव- स्वरूपोत्पेक्षा बोष्या। एवं भावाभिमानिनी जात्यादत्पेक्षा उपात्तनिमित्ता बोष्या। वर्षातपेति। वर्षातपानावरणम्=अनाच्छादकम्, काष्ठानां दारूणां दिशां वा, समूहं चिरायालम्व्य अनेकेषु ताराकषकेषु न पत्राख्यच्छ न्राक्ेषु चिकस्वरीभूतं विकसितं चन्द्रमवैमि जानामि इत्यन्वयः ।

(चिन्र०) अत्र कव कजाति रुत्प्रेक्षयते। अनुपात्तो घावल्यवर्तुलत्वादिर्गुणो निमित्तम्। अनुपात्तनिमित्तगुणभावस्वरूपोत्प्रेक्षा यथा- अयमाभाति राजेन्द्रो विजिताखिलशान्रवः । अनुजीविषु सर्वेपु प्रसाद इव मूर्तिमान्॥ अन्न प्रसादो गुण उत्प्रेद्यते। अनुपात्तो बहुप्रदत्वसुखनिषेव्य त्वादिर्निमित्तक्रियाभावोत्प्रेक्षा यथा- लिम्पतीव तमोऽङ्गानि वर्षतीवाञ्जनं नभः । असत्पुरुषसेवेव दृष्टिर्निष्फलतां गता॥

Page 393

उत्प्रेक्षानिरूपणप्रकरणम्

(भारती) यहाँ अनुपात धावल्यादिगुण के द्वारा कवक जाति की उत्प्रेक्षा से अनुपाते . स्वरूप उत्प्रेक्षा है। उपलक्षण क्रिया के अनुपादान में यही अनुपात्त क्रिया निमित्त जानना चाहिए। अनुपात निमित्तक गुण भाव स्वरूप उत्प्रेक्षा। जैसे- 'अपने समस्त शत्रुओं को जीत लिया है जिसने-ऐसा यह राजा अपने सभी सेवको साक्षात् प्रसन्नता की मूर्ति की तरह शोभ रहा है।' यहॉ प्रसाद गुण की उत्प्रेक्षा है। अनुपात वहुप्रदत्व, सुखनिषेव्यत्व आदि निमित्त क्रि भाव के उदाहरण, जैसे- अन्धकार मानो अगों को काले रगों से पोत रहा है, आकाश मानो काजल बरसा रहा है। आखे दुष्ट-सेवा की भाँति व्यर्थ हो गयी हैं।'

(सुधा)

प्रेक्षा। उपलक्षणक्रियानुपादाने इयमेवानुपात्तक्रियानिसित्तेत्यादिरूपा बोध्या। अय- मितीति। विनितमखिलं शात्रवं शत्रुसमूहो येन ताद्शोऽयं नृपतिः सर्वेषु सेवकेषु मूतिमान् प्रसाद इन आभातीत्यन्वयः। अत्र बहुप्रदरवाद्यनुपात्तेन निमित्तेन प्रसावगुण- स्य निसित्तस्यानुपादाने द्वितीया। औदार्यादिगुणस्य नृपे उत्प्रेक्षणादुपास्तनिमित्ता गुणस्व- रूपोत्पेक्षा। लिम्पतीति। तमोड्ङ्गानि लिम्पतीव, नभः अज्जनं वर्षतीव। दृष्टिरसपुरुष- सेवेव निष्फळत्वं गतेत्यन्वयः। (चिन्र०)

अत्र क्रियोत्प्रेच्यते। अनुपात्तं व्यापनादि निमित्तम् । अनुपात्तनिमित्तद्रव्य- भावोत्प्रेक्षा यथा- देहस्था दर्पणे यस्य पश्यति प्रतिमामुमा।

अन्रार्धान्त रोत्पन्नार्धनारीश्वरान्तरद्रव्यमुत्प्रेच्यते । प्रतिबिम्बव्यत्यस्तभाग- स्त्रीपुरुपाकारशालित्वमनुपात्तं निमित्तम्। अर्धनारीश्वरान्तरोत्प्रेक्षायामपि वस्तु- तोऽर्धनारीश्वरस्यकत्वाद् द्रव्योत्प्रेक्षात्वमविरुद्धम्। यथा वा-

(भारती)

यहाँ क्रिया की उत्प्रेक्षा है। अनुपात्त व्यापादनादि निमित्त है। अनुपात्त निमित्त द्रव्यभाव की उत्प्रेक्षा। जैसे- " 'आधे अन्य से उत्पन्न अर्डनारीश्वर की प्रतिमा को उमा अपने शरीरस्थ दर्पण में देखती है।' यहॉ अर्धान्तरोत्पन्न अर्थात् प्रतिबिम्वगत बिम्ब व्यत्यस्तभाग स्त्री और पुरुष के आकारशालित्व रूप अनुपात्तता के अर्धान्तर से उत्पन्न अर्द्धनारीश्वरान्तर जो द्रव्य है, उसकी उत्प्रेक्षा में दोनों के

. एकत्व से द्रव्यत्व रहने के कारण अनुपात्त निमित्ता द्रव्यभावोत्प्रेक्षा है। अथवा जैसे-

Page 394

चित्रमीमांसा

(सुधा) अन्न व्यापनादिनाऽनुपाचेन निमित्तेन लेपनादिक्रियोतप्रेक्षणादनुपात्तनिमित्ता क्रिया- भावोखेक्षा। सान्द्रादितजजिष्ठगुणादेरनुपादाने द्वितीया बोध्या। देहस्थेति। देहस्था उमा, यस्थ प्रतिमामन्यार्धाभ्यासुरपन्नमिय, अर्धनारीश्वरान्तरं पश्यतीत्यन्वयः। अन्न प्रतिबिम्बग

नारीश्वरान्तरं द्रव्यं तस्योत्प्रेक्षणे उभयोरेकरवेन द्रव्यत्वसत्वादनुपात्तनिमिता द्व्यभावो- रपेक्षा। अत्र विम्वप्रतिविम्बयोर्भिनवपक्षे जातेरेवोप्रेक्षणे प्राहेस्वरसमालोक्योदाहर- णान्तरमाह-यथा वेति। (चित्र० ) विललास जलाशयोदरे क्वचन द्यौरतुबिम्बितेव या। परिखाकपटस्फुटस्फुरत्प्रतिबिम्बानवलम्बिताम्बुनि ।। अत्र देवपुरीद्रव्यमुत्प्रेच्यते। सौभाग्यातिशयः कुण्डिनपुरीगतोऽनुपात्तो निमित्तम् । एवं चतुर्विधानुपात्तनिसित्तोदाहता। अस्या निमित्तस्य गुण- क्रिया रूपभेदमालोच्याष्टविधत्वमूद्दनीयम्। एवं जात्याद्युत्प्रेक्षा भावाभिमानवत्यः षोडश संपन्नाः ।

(भारती) 'जो कुण्डिन नगरी खाई के कपट से स्पष्ट स्फुरित होते हुए प्रतिविम्व से निराधार जलवाले कहीं जलाशय के बीच में प्रतिनिम्बित हुए स्वर्ग के समान शोभती थी। अर्थात् बडे भारी जलाशय के वीच में प्रतिविम्वित स्वर्गरूप छोटी वस्तु के समान खाई के जल में स्थित वह कुण्डिन पुरी शोभती यी।' यहाँ कुण्डिनपुरगत सौभाग्य के अतिशय से, अनुपात्त के द्वारा निमित्त से, कुण्डिन नगरी में देवपुरी रूपी द्रव्य की उत्प्रेक्षा से अनुपात्तनिमित्ता द्रव्यभाव की उत्प्रेक्षा है। यहाँ निरतिशय सौभाग्यमागित्व क्रिया रूप निमित से अनुपादान लेकर द्वितीया है। इसी प्रकार चार प्रकार के अनुपाप्त निमित्त के भेद का उदाहरण दिया जा चुका है। इसमें निमित्त का गुण, क्रिया रूप भेद की आलोचना कर आठ भेद की स्वय ऊह करनी चाहिए। इसी प्रकार भावात्मक सोलह भेद अलङ्कारसर्वस्व के मत से जानना चाहिए। (सुधा) या नगरी क्वचन कस्मिश्चिद् जलाशयोदरे जलाधारमण्चेऽनुविम्धिता प्रतिबिम्विता धौरिव विललास। मध्य एव प्रतिविश्धितेयमत्र हेतुमाह-प्रकारं परितो जलसहितो गर्तः परिस्ता, तस्या कपटं व्याजस्तेन स्फुटमव्यक्तं स्फुरता प्रतिबिभ्बेनानवलम्वितमसम्बद्मर्वु यत्रेत्यन्वयः। अत्र कुण्डिनपुरीगतसीभाग्या तिशयेनानुपात्तेन निमित्तेन कुण्डिननगर्या देव-

क्रिया रूपं निमित्तानुपादानमादाय द्वितीया। एवं भावात्मकाः षोडशभेदा अछक्वारसवश्व मते बोध्याः।

Page 395

उत्प्रेक्षानिरूपणप्रकरणम् ३५७

(चित्र०) अथ वा विद्यानाथोक्तप्रकारेणानुपात्तनिमित्तगुणक्रियाभेदो न चिन्त- नीयः । अनुपात्ते निसित्ते तद्व्यवस्थाया असंभवात्। यथा-'विललास जलाशयोदरे' इत्यत्र निरतिशयसौभाग्यवत्त्वं गुणो निमित्तमित्यपि वत्तुं शक्यम्। निरतिशयसौभाग्यभागित्वं क्रियानिमित्तमित्यपि। अतो द्वादशैव भेदा.। अथाभावासिमानवत्यः स्वरूपोतप्रेक्षाः। उपात्तगुण निमित्त जातिगुणक्रियाणामभावोत्प्रेक्षा यथा- ते। अनञ्जनोल्लेखमिवाक्षियुग्मं स्वाभाविकैरेव गुणैरुदीच्षे।। (भारती) अथवा विद्यानाथ के द्वारा उक्त प्रकार से अनुपात्त निमित्त गुणक्रिया मेद चिन्तनीय नहीं है। क्योंकि अनुपात्त निमित्त में उसकी व्यवस्था असभव है। जैसे पूर्वोक्त उदाहरण 'विललास जलाशयोदरे' में निरतिशय सौभाग्यवत्त्व को गुणनिमित्त भी कह सकते हैं और निरतिशय सौभाग्यभागित्व क्रियानिमित्त भी। अत. केवल १२ भेद ही उत्प्रेक्षा के सभव है। अभावाभिमानवती स्वरूपोत्प्रेक्षा अर्थात् उपात्तगुण निमित्त क्रियाओं के अभाव की उत्प्रेक्षा जैसे- 'स्वाभाविक गुणों से ही तुम्हारे अङ्ग बिना कुङ्डम रजलेप के ही गौरवर्ण की तरह, अधर बिना यावक के ही रक्तवर्ण की तरह, दोनों आँखें बिना अञ्जन की ही कजरारी वनी हुई की तरह मुझे दिखाई दे रही हैं।' (सुधा) विद्यानाथस्तु-अनुपाते गुणक्रिययोरविशेषतो ज्ञानाभावेनैकन्नोकौ विनिगमना- भावादुपात्तनिमित्तायामष्टौ, अनुपाते चर्वार पवेति द्वादशभेदा: सम्भवन्तीत्याहेत्यादि तन्मतमाह-अथवेति। अथाभावोत्प्रेप्षणे एकेन श्रोकेनोपात्तगुणनिमित्तां जातिगुणक्रिया- णामभावोत्प्रेक्षामुदाहरति-अकुह्कुमन्नोदमिति। अहं स्वाभाविकेरेव गुणैस्तेऽङ्गम अकु० ङुमसोदमिव; अधरम् अयावकारुण्यमिव, नेव्रयुग्मम् अनअ्जनोतलेखमिव; उदीक्षे इत्यन्वयः । (चिन्न०) अत्र कुङ्गमरजोयावकरागाङ्जनोल्लेखनरूपाणां जातिगुणक्रियाणामभावा उत्प्रेक्षयन्ते। उपात्ताः स्वाभाविकगौरारुणनीलवर्णा निमित्तम्। एतासु क्रियानिमित्तमप्युदाहार्यम्। उपात्तक्रियानिमित्तद्रव्याभावोत्प्रेक्षा यथा- भुवि त्वन्मुखमालोक्य पूर्णचन्द्रमिवोदितम्। अचन्द्रामिव पश्यामि दिवं शोभाविवर्जनात्।। (भारती) यहाँ स्वाभाविक शब्द से उपात्त गौर, रक्त और नीलवर्ण के निमित्त से अद्गादि विषयों में

Page 396

३५६ - चित्रमीमांसा

जाति, गुण और क्रियाओं के अभाव से उत्प्रेक्षा के तीन भेद हैं। उसी उपात्त से तद्गुण शोभन रूप क्रिया का वहाँ उसके उत्प्रेक्षण से अन्य ३ भेद हैं। इस प्रकार कुल मिलाकर ६ भेद हुए। शेष दो भेद के उदाहरण जैसे- 'पूर्णचन्द्र की तरह उदित धरती पर तुम्हारे मुख को देखकर, शोभाशून्य आकाश को चन्द्र रहित की तरह देखता हूँ।' (सुधा) अन्न स्वाभाविकशब्दोपात्तगौदार्यनीलवर्णातमकेन निमित्तेनाङ्ग दिवि जयेषु जातिगुण- क्रियाणामभावोस्प्रेक्षणात्त्रयो भेदाः। तेनैवोपाप्तततद् गुणशोसनरूपक्रियया तम् तदुत्प्रेक्षणा दन्यन्वेदप्रयस्। एवस् ६ भेदा:। शेषं ेदहयसुदाहरति-भुवीदि। पूर्णचन्द्रमिवोदितं भुवि खवनमुखम् आलोक्य शोभाविवर्जनाद दिवं चन्द्ररहितामिव पश्यामीत्यन्वयः। (चित्र०) अत्र चन्द्रस्य द्रव्यस्याभाव उत्प्रेकषयते। उपात्ता वर्जनक्रिया निमित्तम्। एवमुपात्तगुणनिमित्तापि द्रव्याभावोत्प्रेक्षोदाहार्या। एतावेव श्रोकौ 'इदं विशालाक्षि विभावयामि 'पदवीममृतान्धसाम्' चतुर्थपादयोः पाठेऽनुपात्तनिमित्तजात्याद्यभावोत्प्रेक्षोदाहरणे । एवमभावाभि- मानवत्योऽपि स्वरूपोत्प्रेक्षा: पूर्वोक्तरीत्या षोडश द्वादश वेति द्वान्रिंशचतुर्वि- शतिर्वा स्वरूपोत्प्रेक्षाभेदाः प्रदर्शितप्रायाः । (भारती) यहाँ शब्दोपात्त वर्जन करिया से निमित्तभूत आकाश के विषय में चन्द्ररूपद्रव्याभाव की उत्प्रेक्षा से उपात्तक्रियानिमित्ता द्रव्याभाव की उत्प्रेक्षा है। इस प्रकार उपमिति निमित्त में ७ भेद सम्पन्न हुए। पूवोक्त दोनों श्लोक के ही पाठान्तर कल्पना से अनुपात्त निमित्त के ८ भेदों को उदाहृत करते हैं। वहाँ प्रथम श्लोक में चतुर्थ पाद हटाकर 'इद विशालाक्षि विभावयामि' इतना जोड देने से पहले की तरह क्रिया गुणों से ६ भेद हैं। दूसरे श्लोक में भी 'दिवि' इत्यादि पद के स्थान में 'पदवीममृतान्धसाम्' यह पाठ कर देने पर दोनों भेदों के आठ भेद मिलकर १६ अथवा १२ भेद हैं। भाव और अभाव मिलकर आचार्य रुय्यक के मत से ३२ और विद्यानाथ के मत से २४ मेद होते हैं। (सुधा) अत्र शब्दोपाप्तवर्जनक्रियया निमितभूतया दिवि चन्द्ररूपद्या भा व्स्यो प्रेप्षणदुपा त्तक्रियानिमितता द्रव्याभावोसमेक्षा। अन्रैव शोभाविभागत इति पाठक्कपने उपातगुण- निमित्ता द्व्याभावोोक्षा। तथा उपात्ते निसित्ते सप्तभेदा: संपन्नाः। अनयोरेव पाठान्तर- कक्षपनयाऽनुपात्तनिमित्तस्याष्टी भेदानुदाहरति-एतावेवेति। तन्न प्रथमश्लोके चतु थंपदापनयने 'इदं विशााधि विभावयामि' इत्युपन्यस्ते पूर्ववत् क्रियागुणाभ्या- मनुपात्ताभ्यां षड् भेदाः। द्वितीयेऽपि द्विषमित्यादिपदस्थाने 'पदवीममृतान्घसाम' इति पाठकरपने ह्ी भेदावित्यष्टी भेदा मिलित्वा पोढन द्वादश वा भेदा:। भावाभाव योर्मिलित्ा सर्वस्वकारमते २२, विद्यानाथमते २४; सम्पध्यन्ते।

Page 397

उत्प्रेक्षानिरूपणप्रकरणम् ३५६ (चित्र० एतासु विषयिण: क्कचित्तादात्म्येनाध्यवसायः। यथा-'स वः पायादिन्दुः' इत्यत्र। क्वचित्तु संसर्गितया यथा-'निवेशितं यावकरागदीप्रये' इत्यत्रौत्सुक्य- स्येत्ययमपि भेदो बोद्धव्यः । अथ हेतूत्प्रेक्षा। उपात्तगुणनिमित्ता जाति हेतू त्प्रेक्षा यथा- तनुरेणशावकद्दशस्तनीयसी शनकैरवाप शरकाण्डपाण्डुताम्। उदरान्तरस्थितिमुपेयुषो हरे: करपाञ्जन्यकिरणैरिवोद्गतैः॥ (भारती) इस प्रकार स्वरूपोत्प्रेक्षा के भेदों का निरूपण कर उत्प्रेक्षा में सम्वन्धकृत विशेष का प्रतिपादन करते हैं 'स व. पायादिन्दु' यहाँ इन्दु में तादात्म्य सम्बन्ध के द्वारा अद्दरत्व के उत्प्रेक्षण से तादात्म्य का सम्वन्वत्व है 'निवेशितम्' इस नैषधीय पद्य में औत्सुक्य का सम्बन्धान्तर से अध्यवसाय रूप भेद है। अब हेतूत्प्रेक्षा कहते हैं। उपात्तगुण निमित्ता जाति हेतूत्प्रेक्षा-जैसे- 'उस मृगशावक नयनी ने अपने गर्भ में स्थित भगवान विष्णु को पाकर विकसिन शरीर वाली होती हुई उनके करस्थ पाञ्चजन्य की धीरे-धीरे उद्गत किरणों से शरकाण्ड की तरह पाण्डुरता को प्राप्त किया।' (सुधा) एवं स्वरूपोत्पेप्षाभेदानिरूप्य तम्रोेक्षणे सम्बन्धकृतं विशेषं प्रतिपाठयति- एतास्विति। 'स वः पायादिन्दुः' इत्यन्र इन्दौ तादात्यसम्बन्धेनाङ्कुरतवोत्प्रेक्षणात्ता- दात्म्यस्य सम्बन्घत्वसू। 'निवेशितस्' इति नैषधीयपथे औत्सुक्यस्य सम्बन्धान्तरे- णाध्यवसायरूपो भेद: । एवं स्वरूपोत्प्रेप्षासुभयमते मदाहायं हेतू प्रेप्षासेदाननिरुपयितुं प्रतिजानीते-अथेति। तनुरिति एणशावकदशस्तनीयसी तनुः उदरान्तरस्थिति- माप्तवतो हरेः शनैः उदगतैः करस्थपात्रजन्यकिरणैरिव शरकाण्डपाण्द्तामवाप प्रपेश्यन्वयः ।

(चित्र०) अत्र किरणजाति: पाण्डिमानं प्रति हेतुत्वेनोत्प्रेक्यते। स एव पाण्डिमा निमित्तम्। एवं क्रियानिसित्तापि जाति हेतूत्प्रेक्षोह नीया। क्रियानिमित्ता गुणहेतूत्प्रेक्षा यथा- वहंतो बहुशैवलक्ष्मतां घृतरुद्राक्षसधुव्रतं खगः । स नलस्य करं ययौ पुनः सरसः कोकनदभ्रसादिव॥ (भारती) यहाँ किरणरूपी जाति का पीलापन के प्रति हेतुत्व से उत्प्रेक्षण है। अत. पीतत्व ही उपात्तनि- मित्तता से उपात्तगुणनिमिता जाति हेतूतप्रेक्षा है। यहाँ ही पीतभागित्व का निमितत्त्व में उपात्त क्रियानिमित्ता जाति हेतूतप्रेक्षा भी जाननी चाहिए। क्रियानिमित्ता गुणहेतूत्प्रेक्षा से जैसे-

Page 398

३६० चित्रमीमांसा

'वह पक्षी अर्थात राजहस बहुत शैवालयुक्त भूमिवाले सरोवर से शिव सम्बन्धी या गिव भक्तों की बहुत से चिह्नों को धारण करते हुए नल के मानो भ्रमर सदृश रुद्राक्ष को धारण करते हुए, हाथ को रुद्राक्ष सदृश भ्रमरों वाले रक्त कमल के भ्रम से पुन प्राप्त किया। अर्थात् बहुत से शैवाल युक्त भूमि वाले तडाग के रुद्राक्ष तुल्य भ्रमरों से युक्त रक्तकमल के भ्रम से वह हस बहुत से शैव अर्थात् शिवभक्त या शिवसम्वन्धी या मङ्गलकारक सामुद्रिक शाम्त्रोक्त शुभ चिह्नों वाले रक्त वर्ण नल के हाथ को पुन. प्राप्त किया अर्थात नल के हाथ में पुन आया। अथवा रुद्राक्ष के मधुतुल्य श्रेष्ठ व्रतों को धारण करते हुए हाथ को-अथवा रुद्र को नहीं सहन करने वाले अर्थात शिवद्रोहियों को पराभूत करनेवाले व्रत अर्थात नियम या प्रतिज्ञा से युक्त, शिवद्रोही पराभवकारक नल कर को, अथवा गूजते हुए एव अग्नि तुल्य पिड्गल वर्ण नेत्र वाले भ्रमरों से युक्त रक्त कमल की भ्रान्ति से। (सुधा) अम्र किरणजाते: पाण्डिमानं प्रति हेतुत्वेनोत्प्रेक्षणे पाण्डिम्न एव उपात्तनिमित्ततया उपात्तगुणनिमित्ता जातिहेतूेक्षा। अत्रैव पाण्टिमभागित्वस्य निमित्तरवे उपात्तक्रि यानिमित्ता जातिहेतू प्रेक्षा बोध्या। यहत इति। स खगो हंस: सरसस्सकाशाज्लस्य करं कोकनदभ्रमादिव रक्तोत्पलभ्रान्तेरिव पुनर्ययौ। सरस इति षष्ठी वा । तत्सम्ब- न्धिनस्तद्भ्रमादिवेत्यर्थः। कथंभूतस्य नलस्य सरसक्ष बहुनि शिवसम्बन्धीनि लक्माणि यस्य तज्ञावतवं वहतः, शिवं कल्याणं तत्सम्बन्धीनि तरस्तबकानि लकष्माणि मरस्या- दीनि यस्येति वा। पक्षे बहूनि शैवलानि यस्यां तादशी चमा यम्र तद्दरत्तां वहतः, कथंभूतं करम् ? धृता रुद्राक्षा इव मघुवता अमरा येन, पस्े रुद्राचा इव मधुमता त्रमरा येनेत्यन्वयः ।

(चित्र०) अत्र नलकरप्राप्तिक्रियां प्रति कोकनदभ्रमो हेतुत्वेनोत्प्रेदयते। सैव प्रप्ति- क्रिया निमित्तम्। उत्तरत्रापि हेतूत्प्रेक्षायां सर्वत्र फलमेव निमित्तम्। एव गुण- निमित्तापि गुणहेतूत्प्रेक्षा द्रष्टव्या। गुणनिमित्ता क्रियाहेतूत्प्रेक्षा यथा- विवस्वतानायिषतेव मिश्राः स्वगोसहस्त्रेण समं जनानाम्। गावोऽपि नेत्रापरनामघेयास्तेनेदमान्ध्यं खतु नान्घकारः ॥ (भारती) यहाँ नल के हाथ में प्राप्ति क्रिया के प्रति कोकनदभ्रम के हेतुत्व से उत्प्रेक्षण में, उसी प्राप्त क्रिया रूप निमित्त का उपात्तत्व से उपात्तक्रिया निमित्ता गुण हेतूत्प्रेक्षा हुई। यहाँ ही करशालित्व

हेतूत्प्रेक्षा से जैसे- गुण का तदर्थभूत के रहने पर उपात्त गुणनिमित्ता उसे जाननी चाहिए। गुणनिमित्ता क्रिया

'सूर्य मानो अपनी हजारों गायों (किरणों) के साथ लोगों की नेत्र अपरनामवाली गायों (रश्मियों) को मी ले गये, इसीसे यह आध्य है, न कि अधकारों से।'

Page 399

उत्प्रेक्षानिरूपणप्रकरणम् ३६१

(सुधा) अम्र नलकरप्राप्तिक्रियां प्रति कोकनदभ्रमस्य हेतुरवेनोतरेक्षणे तस्यैव प्राप्तक्रिया- रुपस्य निमित्तस्योपात्तरवादुपात्तक्रियानिमित्ता गुणहेतूतपेष्षा। अन्रैव करशालिख- गुणस्य तदर्थंभूतस्य सत्वे उपात्तगुणनिमित्ता सा बोध्या। विवस्वतेति। विवस्वता सूर्येण स्वस्य गोसहत्त्रेण किरणसहस्त्रेण मिश्रा जनानां नेन्रापरनामधेया गावोऽपि अनायिषत इव, यथा गोपालेन परकीयेर्गोसि: मिश्राः स्वगावो नीयन्ते। गोपद- वाच्यतासाजात्येन मिश्रिता विवस्वतापि नीता इवेत्यर्थः। खलु सस्भावनायाम्, तेना- नयनेन इदमान्ध्यं न त्वन्घकारेरित्यन्वयः।

(चित्र०) अत्रान्ध्यगुणं प्रति नयनक्रिया हेतुत्वेनोत्प्रेक्ष्यते । एवं क्रियानिमित्तापि क्रियाहेतूत्प्रेक्षोदाहार्या। क्रियानिमित्ता द्रव्यहेतूत्प्रेक्षा यथा- हृदयं परिपूतमेव नित्यं विदुषस्तस्य विशुद्धकर्मभाजः। वियदापगयेव विश्वमूर्तेः प्रवहन्त्या वसतोऽन्तरड््रिपद्मात्॥ अत्र पवनक्रियां प्रति गङ्गाद्रव्यं हेतुत्वेनोत्प्रेदयते। एवं गुणनिमित्तापि हेतूत्प्रेक्षोदाहार्या। इत्थं भावाभिमानवत्यो हेतूत्प्रेक्षा उदाहताः। (भारती) यहाँ अन्ध गुण के प्रति गो की आनयन क्रिया से हेतुत्वेन उत्प्रेक्षा में आन्ध्य गुण का ही निमित्तत्व से ही उपात्त गुण निमित्ता क्रिया हेतूत्प्रेक्षा हुई। यहाँ ही अन्धीकरण क्रिया के प्रति उस क्रिया की हेतूत्प्रेक्षा में अन्धीकरण क्रिया के निमित्तभूत उपात्तत्व से उपात्त क्रिया निमिता उसे जाननी चाहिए। क्रियानिमित्ता द्रव्यहेतून्प्रेक्षा से जैसे- 'विशुद्ध कर्म के भागी उस विद्वान के हृदय में वसने वाले विश्वमूर्ति अर्थात् भगवान विष्णु के चरण-कमलों से प्रवाहित आकाश गगा की तरह गगा ही प्रतिदिन उसे पवित्र करती हैं।' यहाँ पावन क्रिया के प्रति गङ्गा रूप द्रव्य का हेतुत्व से उत्प्रेक्षा में उसी क्रिया का उपात्त निमि- त्तत्व से उपात्तक्रियानिमित्ता द्रव्यहेतूत्प्रेक्षा हुई। यहाँ ही पवित्रताशालित्व से निमित्त के उपादान में उपात्त गुण निमित्ता भी उसे जाननी चाहिए। इस प्रकार भावाभिमानवती हेतू तप्ोक्षा के आठ भेदों को जानना चाहिए। (सुधा) अम्रान्ध्यगुणं प्रति गवानयनक्रियाया हेतुत्वेनोशप्रेक्षणे आन्ध्यगुणस्यव निमित- त्चेनोपात्तत्वादुपाप्गुणनिमित्ता क्रियाहेतूतप्रेक्षा। अत्रैव अन्धीकरणक्रियां प्रति तवक्रिया- हेतू प्रेक्षणेऽन्धीकरणक्रियाया निमित्तभूताया उपात्तत्वेनोपाप्तक्रियानिमित्ता सा बोध्या। हृदयमिति। विशुद्धकर्मभाजस्तम्य विदुषो हृदयमनतर्वसतो विश्वमूर्तेश्चरणपभ्नाद् प्रवहन्स्या वियदापणयेव गङ्गयेव नित्यमेव परिपूतमित्यन्वयः। अम्र पावनक्रियां प्रति गङ्गारूपदव्यस्य हेतुरवेनो रेक्षणे तस्या एव क्रियाया उपात्तनिमित्ततवेनोपात्तक्रिया-

Page 400

३६२ चित्रमीमांसा

निमित्ता द्व्यहेतूरप्रेक्षा। अत्रैव पवित्रताशालित्वेन निमित्तस्योपादाने उपात्तगुणनि- मित्ताऽपि सा बोध्या। अष्टो भेदानुपसंहरति-इत्थमिति। (चित्र०) अथाभावाभिमानवत्य :- रात्रौ रवेर्दिवा चेन्दोरभावादिव स प्रभुः। भूमौ प्रतापयशसी सृष्टवान् सततोत्थिते। तास्मन्नस्त गते भानौ विधुस्तस्य पदे कियान्। इत्यनादरतो नूनं सीलत्यम्बुरुहाकरः॥ वीणावादनसंरम्साच्चकम्पे दक्षिणः स्तनः। अदृष्ट्वेवेतरं तस्यास्तम्भाभोगतिरोहितम्॥ अत्राद्यश्लोके रविचन्द्रयोर्जतिद्रव्ययोरभावौ हेतुत्वेनोत्प्रेच्येते। द्वितीय तृतीयश्लोक्तयोरादर दर्शनयोर्गुणक्रिययोरभावौ सृष्टिमीलनकम्पक्रियास्तु - निमित्तानि। एवं गुणनिमिता अप्यसावहेतूत्प्रेक्षा उदाहार्याः। एवं षोडशभेदा हेतूतप्रेक्षा दर्शिता। (भारती) अव भावाभिमानवती से जैसे- 'वह परम पराक्रमी राजा ने धरती पर रात में सूर्य के अभाव से तथा दिन में चन्द्रमा के अभाव से सर्वदा वर्द्धिष्णु अपने सूर्यचन्द्र रूपी प्रताप यश की सृष्टि की।' 'उस सूर्य के अस्त हो जाने पर उसके पद स्थान पर क्या यह चन्द्रमा है १ इस अनादर से मानो ये कमलों से भरे सरोवर निमीलित है।' 'इस सुन्दरी के दाहिने स्तन, वीणा वजाते समय वीणा की तुम्बी देह से बायें स्तन को छिपे देखकर ही मानो काँप उठे।' यहाँ प्रथम श्लोक में सूर्य और चन्द्रमा रूपी जाति और द्रव्य के अभावरूप हेतु से उत्प्रेक्षा है। द्वितीय और तृतीय श्लोक में क्रमश आदर के अभाव रूप गुणभाव के उत्प्रेक्षण में मीलन क्रिया के द्वारा निमित्तता से उपात्त क्रिया निमित्ता गुणाभावहेतूत्प्रेक्षा है। निमीलन का गुण के रूप में स्वीकृति में तो यही उपात्त गुणनिमित्ता जाननी चाहिए। तीसरे श्लोक में दर्शन क्रिया के अमावरूप उत्प्रक्षण में कम्पन क्रिया के द्वारा निमित्तत्व से, उपात्त क्रियानिमित्ता क्रियाभावरूप हेतूत्प्रेक्षा है। यहाँ कम्पन से उपात्त वादनात्मक यत के ग्रहण मे तुम्बी को ही उपात्त गुण निमिता जाननी चाहिए। भावरूप से ये उत्प्रेक्षा के १६ भेद प्रदशित है। (सुधा) जात्यादीनां हेत्वमावोत्प्रेप्षणेऽष्टौ भेानुदाहरति-अथेति रात्राविति। स प्रक्रान्तः प्रभुः सूसौ रत्री रवेरभावादिव दिवा विघोरभावादिव सततमुदिते प्रतापयशसी हत्य- नघयः । अम्र प्रतापयशःसृष्टिं प्रति जातिद्रव्यरूपत्वं रविचन्द्रयोरभावोतमेक्षणे सृष्टिक्रियाया निमित्तभूताया उपात्ततवेनोपाप्तक्रियानिमित्ता जातिद्रव्ययोरमावरूपरवेन तूखोषा। अन्रव

Page 401

उत्प्रेक्षानिरूपणप्रकरणम्

निरन्तर तच्छ्ा लिश्वोकेक्षणे तस्यैव तदर्थलभ्यतयोपात्तेन गुणेनोपात्तगुणनिमित्ता तदभाषहेतू- रप्रेक्षा। तस्मिक्विति। तस्मिन् भानी अस्तं गते सति तस्य पदे स्थाने विधुश्चन्द्रः किया- नित्यनापरादिद कमलाकरो मीछतीत्यन्वयः। अन्नादराभावस्य गुणाभावस्योेक्षणे मीलनक्रियाया निमित्ततयोपात्तक्रियानिमिता गुणाभावहेतूखेक्षा। निमीळनस्य गुणत्वा- नीकारे तूपात्तगुणनिमित्तेयमेव बोध्या। वीणेति। तस्या दक्षिणः स्तनो वीणावादनसंरम्भाव् तुम्बीदेहेन तिरोहितमितरमदट्ट्ेव धकम्पे इत्यन्वयः। अन्न दर्शनक्रियाऽमावोठोक्षणे कम्पन क्रिया या निमित्ततवेनोपात्तक्रिया निमित्ता क्रियाभावहेतूतेप्षा। कम्पनोपात्तस्य वदना- रमकयत्नस्य ग्रहणे विवियमेवोपात्तगुणनिमित्ता बोध्या। हेतूतप्रेक्षाभेदानुपसंहरति- एवमिति। षोडशभेदा भावरूपतवेन दर्शिता इत्यर्थ: । (चिन्न०) अथ फलोत्प्रेक्षा- सौधेषु यत्र सुखभासु मृगेक्षणानां ज्योत्सापहासचतुरासु विसृत्वरीषु। चन्द्रस्तदर्थमिव रात्रिषु बम्भ्रमीति कुर्वन् करप्रसरणान्यधिजालवर्गम्॥। तव निर्वर्ण्य यद्वर्ण स्वणं वर्णाय तादृशे। त्वत्कोशगेहान्निर्गम्य तीर्थेषु वसति ध्रुवम्॥। (भारती) इसके बाद फलोत्प्रेक्षा के उदाहरण जैसे- 'जहाँ महलों में चन्द्रज्योत्स्ना के उपहास में चतुर मृगनयनियों की मुखकान्ति है, वहाँ खिडकियों से अपनी किरणों को प्रसारित करते हुए रात में चन्द्रमा मानो घूम रहा है, ऐसा प्रतीत हो रहा है।' 'तुम्हारे वर्ण अर्थात् स्वरूप को अच्छी तरह देख कर सोना तुम्हारे ही तरह के स्वरूप पाने के लिए मानो तुम्हारे कोशगृह से निकल कर निश्चित रूप से तीर्यों में अगनियोगादि के लिए वास कर रह्दा है। अर्थात् तप कर रहा है।' ' सुधा ) हेतू प्रेक्षां निरुप्य फलो प्रेष्षां निरूपयति-अथेति। सौधेष्विति। यत्र सौधेषु मृगेक्षणानां जयोत्स्रोपहासचतुरासु विसृत्वरीषु सुखकान्तिषु सतीषु अधिजालवर्ग कर- प्रसरणानि कुर्वन् चन्द्रस्तदर्थमिव रान्रिषु वम्भ्रमीतीत्यन्वयः। अन्न मुखप्रभागौरखरूपायाः जातेः फलत्वेनोतप्रेक्षणे असणरूपक्कियाया निमित तयोपात्तक्रियानिमिता भावरूपा जाते: फलत्वेनोतोक्षा। अन्रैव चन्द्रस्य भ्रमणशालित्व- कथनेनोपात्तगुणनिमित्ता बोध्या। तवेति। तव वर्ण निर्वर्ण्य यत्कनकं तादशे वर्णाय तह्गरण प्राप्तमित्यर्थः । तब कोशगृहाष्निर्ग्य ध्रवं तीर्थेष्व्नियोगादिषु वसतीत्यन्वयः। अत्र गौरवर्णस्य फलत्वेनोतप्रेक्षणे तीर्थंवसनक्कियाया निमितसूताया उपादानादुपात्तक्रिया- निमित्ता भावरूपा गुणस्य फलत्वेनोखेथ्या। अन्रैव वासशालित्व कथने तूपात्तगुणनिमित्ता- पीयमेव बोध्या।

Page 402

३६४_ चित्रमीमांसा

(चित्र०) रथस्थितानां परिवर्तनाय पुरातनानामिव वाहनानाम्। उत्पत्तिभूमौ तुरगोत्तमानां दिशि प्रतस्थे रविरुत्तरस्याम् ॥ दुग्धार्णवसहस्राय कैलासाचलकोटये। नूनं प्रतापरुद्रेण यशो दिक्षु प्रसारितम् ॥ एपु श्लोकेषु क्रमेण मुखप्रभागौरवर्णपरिवर्तनदुग्घार्णवकलासरूपाणि जातिगुणक्रियाद्रव्याणि फलत्वेनोत्प्रेदयन्ते। भ्रमणतीथेवासप्रस्थानप्रसारण- क्रिया निमित्तानि। एवं गुणनिमित्ता अप्युदाहार्याः ।

(भारती) 'रथ में नियुक्त पुराने अश्वों को बदलने के लिए ही मानो उत्तम घोडों की उत्पत्तिभूमि उत्तर दिशा की ओर प्रस्थान किया।' 'राजा प्रतापरुद्र ने क्षीरसागर को हजारों की सख्या में तथा कैलाश पर्वत को करोडों की सस्या में बनाने के लिए मानो अपने धवल यश को दिशाओं में फैलाया।' इन श्लोकों में क्रमश सुखप्रभा, गौरवर्ण, परिवर्तन, क्षीरसागर तथा कैलाश पर्वत रूप जाति, गुण और क्रिया के फलत्व से उत्प्रेक्षा है। भ्रमण, तीर्यवास और प्रसारण की क्रिया निमित्त हैं। इसी प्रकार गुण निमित्त के भी उदाहरण देना चाहिए।

(सुधा)

रथस्थितानामिति। रथे स्थितानां नियुकानां पुरातनानां वा वाहनानामश्वानां परि- वर्तनायेव तुरगोत्तमानासुस्पत्तिभूमावुत्तरस्यां दिशि प्रतस्थे इत्यन्वयः। अन्र परिवर्तन- क्रियायाः फलरवेनो प्रेक्षणे निमित्तभूतप्रस्थानक्रियाया उपात्तत्वादुपात्तक्रियानिमित्ता भाव- रूपक्रियायाः फलत्वेनो्रेक्षा। प्रस्थानशालिरवेन तत्कथने तूपात्तगुणनिमित्ता बोध्या। दुग्धार्णवेत्यादि। प्रतापरुद्रेण राज्ञा यशो दुग्भसमुद्राणां सहसत्रं कर्तम्, कैलासपर्वतस्य कोटिसंख्यां कर्तु नूनं दिन्ु प्रसारितमित्यन्वयः। अन्नोपात्तया निमित्तभूत प्रसारणक्कियया दुग्धान्धिकेलासादिरूपद्रव्यस्य फलतवेनोपे क्षणादुपात्तक्रियानिमित्ता भावाभिमानवती दव्यस्य फलतवेनोतप्रेक्षा। दिड्ठु प्रसारणशालि- त्वस्य यशसति प्रतिपाधे तूपात्तगुणनिमित्ता दव्यस्थ फलोखरेपष।

(चिश्र०) अभावाभिमानवत्यः फलोत्प्रेक्षा यथा- त्वदाननेन सादृश्यं प्राप्तुकामो निशाकरः। कलङ्कपक्काभावाय नूनं मज्जति सागरे॥ अरण्यवासाज्जितबान्धवासु मृगीष्ववैरार्थमिवाशरण्याः । कलिन्ददेशेश्वरवैरिनार्यः पराड्मुखा लोचनविभ्रमेषु॥

Page 403

उत्प्रेक्षानिरूपण प्रकर णम्- ३६५ हेमाद्रिकुञ्जेषु विहारभाज: सिद्धाङ्गनाः कल्पित चन्द्रकार्थान्। श्रीवीररुद्रस्य यशोविलासान् गायन्त्यसंस्प्रष्टुमिवान्धकारम्॥ वीररुद्रनरेन्द्रस्य जयप्रस्थानसंभवम। रजःपिहितदिग्गोलं निराकाशमिवोत्थितम् । (भारती) अभावाभिमानवती फलोत्प्रेक्षा से जैसे- 'तुम्हारे मुख के साथ सादृश्य प्राप्ति की कामना से निशाकर चन्द्रमा कलङ्गरूपी पङ्क को हटाने के लिए निश्चय ही सागर में स्नान कर रहा है।' 'अरण्यवास से मजित किया है हरिणियों में बन्धुत्व जिसने, ऐसी अवैरार्थ की तरह शरण- रहित, कलिङ्गाधिपति के दुध्मनों की पत्निया आखों के विभ्रम में पराडमुख हुई।' 'हिमालय के कुक्जों में विहार करने वाली सिद्धाङ्गनाऍ कल्पित चन्द्रकिरणों को मानो अन्धकार को बिना स्पर्श किये हुए की तरह, श्री वीररुद्र के यशो-विलासों का गायन करती हैं।' 'वीर रुद्रनरेन्द्र के विजय-प्रस्थान से समुत्पन्न धूलिकणों से आच्छादित दिग्गोल आकाश- रहित की तरह प्रतीत हो रहा है।' (सुधा) एवं भावाभिसानवत्या: फलोतेप्षाया अष्टी भेदाननिरूप्याभावाभिमानवत्या अष्टी भेदानू निरूपयितुमाह-अभावाभिमानवत्य इति। त्वन्मुखेन सादृश्यं प्राप्तुकामो निशाकरद्रः कलङ्कपङ्गाभावाय नूनं सागरे मजजती- त्यन्वयः। अम्र मज्जनेन निमित्तेन पङ्कत्वरुपजातेरभावः फत्वेनोतोयते इत्युपातक्रिया निमित्ता जात्यभावफलोरेक्षा। (पङ्ठगुणश्यामः) अन्र मज्जनोपात्तशुद्धि रूपगुणकथने तु एषैव गुणनिमित्तापि बोध्या। अरण्येति। अरण्यवासेनाजितं बान्धवं याभिस्तासु मृगीषु अवैरार्थमिव अशरण्या: कलिद्गदेशेश्वरस्य वैरिनार्यो लोचनवित्रमेषु पराड्मुखा अभूचनू इत्यन्वय। अन्र पराछमुखत्वगुणेन वैराभावः फळतवेनोेघयते। तथा च गुणनिसिता

हेमाद्रीति-हेमादिकुन्जेषु विहारभाज सिद्धाङ्गना: कवपतचन्द्रकार्थान् श्रीवीररुद्रस्य यशोविलासान् अन्धकारमसंस्प्रष्दुमिच गायन्ति इत्यन्वयः। अन्न निमित्तभूतचन्द्रक्रियया संस्पर्शाभावस्य फलत्वेनोोक्षणात् क्रियानिमित्ता स्पर्शनाभावरुपफलोस्पेक्षा। चन्द्र- शब्दोपत्ताह्वादगुणेन तदुत्प्रेक्षायां गुणनिमित्ता बोध्या। एवं पूर्वछोकेऽपि पराङ्मुखत्वभा- गित्वक्रिय योत्प्रेक्षणे क्रियानिमित्तापि बोध्या। वीरेति-वीररुद्रनृपतेर्जय प्रस्थानसम्भव रजआच्छ्ा दित दिव्गोलं निराकाशमिवोत्थितमू। अश्रोत्यानक्रियया निमित्तभूतयाSकाशाभवस् फलत्वेनो पेक्षणे क्रियानिमित्ा फला- भावो सप्रेक्षा। आवरणशालिसुणत्वेनोतेप्षणे तु गुणनिमित्तपि बोध्या। (चित्र०) एपु क्रोकेपु पङ्कवैरस्पर्शनाकाशानामभावाः फलत्वेनोत्प्रेक्यन्ते। तेपु पराड्मुखत्वमेको गुणः / अन्याः क्रियाः । इत्थं गुणक्रियानिमित्तभेदा उदाहार्याः।

Page 404

३६६ चित्रमीमांसा

एवं फलोत्प्रेक्षा: पोडश दर्शिताः। इति वाच्योत्प्रेक्षावर्गः। अथ गम्योत्प्रेक्षा दिड़मात्रेणोदाहियते- नभसि महसा ध्वान्तध्वाङ्कप्रमापणपत्त्रिणा- मिह विहरणैः श्यैनम्पातां रवेरवलोकयन् । शशविशसनत्रासादाशामगाच्रमां शशी तदधिगमनात्तारापारावतैरुदडीयत (भारती) इन इलोकों में क्रमश पङ्क, वैर, स्पर्श एव आकाश के अभाव फलत्वेन उत्प्रेक्षित हैं। उनमें पराड्मुखत्व एक गुण ही है, तथा शेष सारी करियायें हैं। इस प्रकार गुण क्रिया निमित्त भेद से उदाहरण जानना चाहिए। इस प्रकार फलोत्प्रेक्षा के १६ भेद दिखाये गये। ये वाच्योत्प्रेक्षा के वर्ग है। गम्योत्प्रेक्षा के दिझ्ान उदाहरण यहाँ देते ह। जैसे- 'आकाश में महान तेजस्वी सूर्य के काको के हिंसन के लिए शयेनरूपी किरणों के विहरण रूप निमित्त से अर्थात् सूर्य की किरणरूपी वाज को आकाश में शिकार के लिये घूमते हुए देखकर, चन्द्रमा (अपनी गोद में स्थित) खरहे की हिंसा के भय से दूसरी दिना की ओर चल दिये और नन्द्रमा को दूसरी ओर जाते देखकर तारेरूपी कबूतर भी उड गये।'

(सुधा) फलो पेक्षासुपसंहरति-एवमिति। वाच्योत्पेप्तासुपसंहरति-इतीति। अथ संनेषेण

अथेति। सम्भावनावाचकपदाभावे गम्योठोक्षा भवति। सा व पूर्वोदाहतेषु इवाद्यभावे यद्यपि ज्ञातुं शक्यते, तथाप्युपलक्षणार्थसुदाहरणमाह-नभसीति। नभसि महसां तेजसां ध्वान्तध्वाङ्गप्रमापणपत्व्रिणां विहर्णः रवेः श्यैनम्पातां मृगयां विलोकयन् शशी शशहिंस नम्रासाघ्चरमां दिशमगात्। चन्द्रस्याधिगमनाप्ताराकपोतैरुदृद्ीयतेत्यन्वयः। (चिन्न०) अन्र सूर्येण विस्रष्टानां ध्वान्तकाकप्रसापणश्येनरूपाणां किरणानां विहर- णेन निमित्तेन सूर्यस्य श्येनपातवती मृगयाविहारक्रियोत्पेच्यत इति क्रिया- स्वरूपोत्प्रेक्षा तावदेका । तस्माच्छशिनस्रासः तस्य दिगन्तरगमनं प्रति हेतुत्वेनोत्प्रेच्यत इति हेतूत्प्रेक्षाऽन्या। ततस्तद्धिगमस्तारापारावतानां मुग्धत्वेनाध्यवसित: तत्तत्स्थानेऽस्फुरण प्रति हेतुत्वेनोतप्रेक्यत इत्यपरा च हेतू त्प्रेक्षा। सर्वाश्चैता गम्याः, इवाद्यभावात्। एवमन्या अपि स्वयमेव नूनमादिशब्दविरहेण पूर्वोक्तप्रकाराणामुन्नेतुं शक्यत्वात्।प्रागुदा- हतानामेव श्लोकानां नूनमादिशब्दाविधानेन गम्योत्प्रेक्षोदाहरणत्वसंभवाच्च गम्यो : ।: पृथक्साकल्येन नोदाहताः।

Page 405

उत्प्रेक्षानिरूपणप्रकरणम् ३६७

(भारती) यहॉ सूर्य के द्वारा विसृष्ट काक-हिसन श्येनरूप किरणों के विहरणरूप निमित्त से सूर्य के शिकार के लिए विहार करने की क्रिया के उत्प्रेक्षण से उपात्तनिमित्ता क्रियास्वरूपोत्प्रेक्षा हुई। उससे उत्पन्न डरके कारण चन्द्रमा का दिशान्तर की ओर गमन के प्रति हेतुत्व से उत्प्रेक्षण के कारण हेतूत्प्रेक्षा हुई। उसके बाद चन्द्रमा के अवगमन के कारण तारारूपी कवूतरों के उड्गीनत्व से निश्चित स्थान के लिए स्फुरण के प्रति हतुत्व के उत्प्रेक्षण से अन्या हेतूत्प्रेक्षा हुई। इवादि शब्द के अभगव से ये सभी गम्या उत्प्रेक्षा हुई। इसी प्रकार अन्य सवों को स्वय ही जानना चाहिए। 'नूनम्' आदि शब्द विरह से पूर्वोक्त सभी प्रकारों का उन्नयन सभव है। पूर्वोक्त उदाहरणों में ही 'नूनम्' आदि शब्द के अविधान से गम्योत्प्रेक्षा के उदाहरण सभव है। अत गम्योत्प्रेक्षा के सभी उदाहरण अलग-अलग नहीं दिये।

(सुधा ) छक्षणसमन्वयमाह-अत्रेति। सूर्यंविसृष्टानां काकहिंसनश्येनरूपायाः किरणार्ना विहरणरूपनिमित्तेन रवेः श्येनपातवत्या मृगयाविहाक्रियाया उत्प्रेक्षणादुपात्तक्रिया- निमित्ता क्रियास्वरूपोतप्रेक्षा, तज्जन्यशशिष्रासस्य दिगन्तरगमनं प्रति हेतुत्वेनोतपेक्ष- णाछू हेतूतप्रेक्षा। ततश्चन्द्रस्यावगमनं तारापाराजतत्वोड्डीनववेन निश्चिततत्स्थानास्फुरणं प्रति हेतुत्वेनोत्प्रेक्षणादन्या हेतूत्प्ेक्षा। आसाम् गम्यत्वमाह-सर्वा इति। उपसंह- रति-एमिति। न्यूनत्वशङ्कापरिहारायाह-नूनमित्यादि। (चिन्न०), इदं तु चिन्त्यते। गम्योत्प्रेक्षासु जातिद्रव्यस्वरूपोत्प्रेक्षे संभवतो न वेति। संभवत इति पच्षे- रुचयोऽस्तमितस्य भास्वतः स्खलिता यत्र निराश्रयाः खलु। अनुसायससुर्विलेपनापणकाश्मीरजपण्यवीथयः 11 परिखावलयच्छलेन या न परेषा ग्रहृणस्य गोचरः। फणिभापितभाष्यफककिका विषमा कुण्डलनासवापिता॥ (भारती) यहाँ विशेषता बतलाते हैं कि जाति और द्रव्य की स्वरूपोत्प्रेक्षा से गम्योत्प्रेक्षा सभव है अथवा नहीं! यहाँ कुछ लोग सभव पक्ष कहते हैं। उनके मत से उदाहरण देते हैं जसे- 'जिस कुण्डिन नगरी में प्रत्येक सायकाल में लेप-सामग्रियों के बाजार में विकने वाले कुड्ठम के मार्ग अस्तगत सूर्य की गिरी हुई निरवलम्ब किरणों के समान शोभती थीं। सायकाल में कुण्डिन पुरी के लेप बिकने वाले बाजार में कुकुम बिकने वाले मार्ग गिरे हुए कुद्ठुमों से रजित होने के कारण ऐसे प्रतीत होते थे कि अस्तङ्त सूर्य की लाल लाल किरणें निराश्रय होने से भूमि पर गिर गयी हैं'। 'खाई के घेरे के कपट से घिरी हुई, अत एव शेषनाग के अशावतार पतजलि से कथित 'महाभाष्यग्रथ की फक्किका के समान विषम अज्ञेय, पक्षान्तर में अप्रवेश्य-जिस कुण्डनपुरी को दूसरों ने नहीं जाना, पक्षान्तर में वश में नहीं किया। शेषनाग के अवतार श्री पतअ्जलि द्वारा

Page 406

३६८ चित्रमीमांसा

रचित भाष्य में कुछ ऐसे स्थल हैं, जिनके वास्तविक आशय का ज्ञानन होने के कारण उन्हें वररुचि ने घेर कर उनका दुर्शेयत्व, सूचित कर दिया है, इस प्रकार इस, कुण्डिन नगरी की चारो ओर ऐसी खाई है कि इसे कोई भी शत्रु अपने वश में नहीं कर सकता, अत एव यह नगरी उस भाष्य की फक्किका के समान दूसरों से अग्राह्य है।' (सुधा) अन्न विशेषमाह-इदन्त्वति। जातिद्रव्यस्वरूपोत्प्रेक्षयोर्गम्योेकाया सम्भवो न ा? अ केचित् सम्भनं वदन्ति, तन्मतरीत्योदाहियते-रुघय इति। यत्र नगर्यामनुसायं प्रतिसन्ध्याकालं चिलेपनापणे सुगन्धद्रव्यविक्रयहट्टे काश्मीरज पण्य विक्रेयं तस्य वीथयो मार्गा, अस्तमितस्य अस्तक्ृत- स्य भार्वतो रवेः रखलिताः च्युता निराश्रया सचय इव अभु: भान्ति स्मेयन्वयः। अब्र वीथित्वजातीनां रुचित्वजातिसम्भावनसर्वेन इवादेरभावाद गम्या जातिस्वरूपोतप्रेक्षेति भाव.। द्वितीयामुदाहरति-परिखेति। या नगरी परिखावलयच्छलेन परिखामण्डल- व्याजेन कुण्डलनां रेखावलयमचापिता पापिता सती परेषां शत्रुग्रहणस्य तरस्वाधीनत्वस्य गोपरो विषयो न शत्रुभिर्ग्रहीतु शक्येत्यर्थः। कि भूता फणिभाषिता शेषोका भाप्यफकि का, तदवद्विषमा दुग्रहा शेषव्यतिरिकेन जञातुमशक्या। यथा भाष्यफक्किका वररुचिना कुण्डलितेति प्रसिद्धिदिति। (चित्र०) इत्यादिनोदाहरणेन भाव्यम। अभिसतं च तथा केषांचित् । अलक्कार- सर्वस्वकारस्य तु न संभवत इति पक्षः। एतदभिप्रायेणैव तेनोक्तं गभ्योत्प्रेक्षा- विभागे 'प्रायश्ात्र स्वरूपोत्प्रेक्षा न संभवति' इति। कस्तर्ह्यनयोस्तस्य पचेऽलङ्कार: ? रूपकसेव। अत एव- पीयूपप्रसृतिर्नवा मखभुजा दात्रं तमोलूतये स्वर्गद्गाविमनस्ककोकवदनसत्ररता मृणालीलता। द्विर्भावः स्मरकार्मुकस्य किमपि प्राणेश्वरी सागसा- माशातन्तुरुदक्ति प्रतिपदि प्रालेयभानोस्तनुः॥ (भारती) यहाँ परिखावलय का रेखावनय से सम्मावना है। वहाँ इवादि शब्द के अभाव से गम्यता है। उससे नगरा का भाष्य की फककिका के स्वरूप से तत्त्व है। यहाँ छलपद के उपादान से अपह्वति सकीर्णा द्रव्यस्वरूपोत्प्रेक्षा है-यह उन लोगों के कहने का आशय है। 'न वा' इस उत्तर पक्ष में तो अलक्वारसर्वस्वकार की ही सम्मति है। क्योंकि अलकार सर्वस्वकार ने अपने ग्रन्थ में गम्योत्प्रेक्षा के भेद कहते समय लिखा है कि प्राय यहाँ गम्योत्प्रेक्षा में स्वरूपोत्प्रेक्षा की सभावना नही हैं। अगर आप यह कहें कि पूर्वोक्त दोनों उदाहरणों में कौन अलद्कार है, क्योंकि यहाँ रूपक भलक्कार ही है? तो रूपक की स्वीकृति में उक्त उदाहरण रूप सम्मति कहते है- 'क्योंकि यहाँ रूपक है अत एव उससे 'पीयूषप्रसृति.' इस उदाहरण में रूपक की व्या ख्या से उसके द्वारा 'स्वर्गङ्ा विमनस्का' इत्यादि उदाहरण मे भी रूपक की ही स्वीकृति है।'

Page 407

उत्प्रेक्षानिरूपणप्रकरणम् ३६६ प्रिया के सागस् (सापराध) पतियों की कोई अपूर्व आशातन्तु की तरह प्रतिपद् की रात में आकाश में उदित क्षीण चन्द्र को देखकर कवि ने उत्प्रेक्षा की है-मानो यह चाँद नहीं है, प्रत्युत देवताओं ने नये अमृत के लिए हाथ फैलाया है, अथवा अन्धकार को चीरने के लिए मानो यह आरा डै, किंवा स्वर्गद्गा से दुखी चक्रवाक के मुख से भ्रष्ट मृणाली-लता है अथवा काम के धनुष का द्विर्भाव हुआ है। (सुधा) अन्र परिखावलयस्य रेखावलयतवेन सम्भावना। तत्र चेवादेरभावास् गम्यत्वम्। तेन पुर्या भाष्यफक्िकास्वरूपेण तथ्वम्। अम्र च्छलपदोपादानादपह्नतिसंकीर्णा दृव्यस्वरूपो- तप्रेक्षेति तेषामाशयः। न वेत्युत्तरपसस्तु अलक्कारसवंस्वकारस्य सम्मतः। गम्योत्प्रेखा- विभागकथनावसरे प्रायत्रात्र गभ्योप्रेक्षार्य स्वरूपोत्प्रेक्षा न सम्भवतीति तद्ग्रन्थे प्रतिपा- वनादित्याह-अलङ्गारसर्वस्वकारस्येति। न च तत्पक्षे पूर्वोक्कोदाहरणयोः को वाडलङ्कारः स्यादिति वाध्यम्? रूपकस्यैव सत्वात्। रूपकाङ्गीकारे तद्ुदाहरणरूपा सम्मतिमाह- अत एवेति। यतोऽन् रूपकम्, अत एव तेन 'पीयूषप्रसृतिः' इत्युदाहरणे रूपक व्याचक्ाणेन तेन 'स्वर्गङ्गा विमनस्का' इत्यादयुदाहरणेष्वपि रूपकमेवाङ्गीकृतमित्य- न्वयः। उदाहरणव्यास्या तु-देवानां नवा पीयूषप्रसृतिः अमृतार्थे करप्रसृतिः, तमसो लूतये च्छेदनाय दान्रं, स्वर्गद्गाया विमनरकस्य कोकस्य चदनात् सस्ता मृणालीलता, स्मरधनुषो द्विर्भाव:, माणेश्वरी-सागसां किसप्यपूर्वमाशातन्तुरियं चन्द्रस्थ तनुः प्रतिपदि उदश्जति उदयतीत्यन्वयः। (चित्र०) इत्यत्र मालारूपकमुदाहरता 'स्वर्गङ्गा विमनस्का' इत्यादिष्वपि रूपकमेवोररीकृतम्। तस्माज्जातिद्रव्योत्प्रेच्षे परिहृत्यैव गम्योत्प्रेक्षावर्गः परिगणनीय: । इदं चान्यद् बोद्धव्यम्। धर्म्युत्प्रेक्षासु विषयिविषयानुगतो धर्मो धर्मो प्रेक्षासु विषयाश्रयविषयानुगतो धर्मश्च निमित्तम्। तेन 'उवाह या तनुलताम्' इत्यादौ वैमल्यं निमित्तमित्यादिपक्षो न युक्तः, तस्य तादात्म्यसंभावनोपयुक्तप्रतिबिम्बघटकस्य तनुधर्मस्य विषय- धर्मत्वाभावात्। 'यत्रान्यधर्मसंबन्धात्' इत्यादिलक्षणं वद्द्ि सर्वैरपि विषय- धमस्यैव निमित्तत्वस्य व्यवहृतत्वादित्यलमतिविस्तरेण। (भारती) यहाँ मालारूपक का उदाहरण देते हुए 'स्वर्गङ्गा विमनस्का' इत्यादि में भी रूपक ही स्वीकार किया है। अत जाति और द्रव्य की उत्प्रेक्षा में गम्योत्प्रेक्षावर्ग को छोडकर ही गणना करनी चाहिए। दूसरी विशेषता भी कहते हैं कि विषयी और विषय के अनुगत धर्म का धर्मी उत्प्रेक्षा नें निमित्तत्व है और विषयी का आश्रय ग्रहण कर जो विषय में अनुगत है उसकी वर्मोत्प्रेक्षा में निमित्तता है। २४ चित्र०

Page 408

३७० चित्रमीमांसा

इस कथन का फल बताते हैं कि इससे 'उवाह या तनुलताम्' इत्यादि में विमलता का निमित्तत्व कहना युक्तिमगन नहीं है। क्योंकि तादात्म्य सभावना के उपयुक्त्त प्रतिविम्वघटक तनु धर्म का विपय धर्मत्वाभाव है। इसमें सम्मति कहते हैं कि जहाँ सभी अलक्कारसर्वस्वकारादिगण ने 'यत्रान्यधर्मसम्वन्धात्' इत्यादि अपने ही लक्षण में विषयधर्म का ही निमित्तत्व से व्यवहार स्व्रीकृत किया है। विमर्श-इस प्रकार अलद्कारसर्वस्वकार के मत में स्वरूपोत्प्रेक्षा के ३२ मेदों को तथा हेतु और फलोत्प्रेक्षा के २४ मेदों को मिलाकर ५६ मेद वाच्योत्प्रेक्षा के हैं। इसी प्रकार गम्योत्प्रेक्षा में-स्वरूपोतप्रेक्षा के १६, हेतूत्प्रेक्षा के १२, फलोत्प्रेक्षा के १२, सम्मिलित के ४० और दोनों मेदों को मिलाकर ९६ मेदों को दिखाकर-विद्यानाथ के मत में वाच्योत्प्रेक्षा में स्वरूपोत्प्रेक्षा के २४ मेद, हेतूत्प्रेक्षा के १६, फलोत्प्रेक्षा के १६, कुल मिलाकर ५६ भेद हैं। गम्या में स्वरूप, हेतु और फलोत्प्रेक्षा में प्रत्येक १६, १६ भेदों को मिलाकर ४८ भेद और फिर इस पूर्वोक्त तीनों के भेदों को मिलाकर कुल १०४ भेद बताये है। मुख्यत सर्वप्रथम उत्प्रेक्षा के दो ही भेद है-वाच्योत्प्रेक्षा और प्रतीयमानोत्प्रेक्षा। पुन. वाच्योत्प्रेक्षा स्वरूप, हेतु और फल के भंद से तीन प्रकार की हैं। इन तीनों में स्वरूप- वाच्योत्प्रेक्षा के ३२ भेद है। जाति, द्रव्य, गुण और क्रिया के भेढ से प्रथम इसके ४ भेद हैं, फिर इन चारों के भावाभिमानवती और अभावाभिमानवती के रूप से ८ भेंद हुए। इन आठों का गुण और क्रिया रूप से द्विविध होने के कारण दो-दो प्रकार के होकर १६ भेद वन जाते हैं। इन १६ भेदों के उपादान और अनुपादान के भेद से ३२ प्रकार के भेद हुए। फलगतवाच्योत्प्रेक्षा में द्रव्य का फलोत्पेक्षा और उसके ४ भेद की कोई सभावना नहीं रहने के कारण १२ मेद ही सभव है। हेतुगतवाच्योतोक्षा भी १२ प्रकार की ही हुआ करती हैं। क्योंकि वाच्योत्प्रेक्षा के इस भेद में द्रव्य की हेतूत्प्रेक्षा और उसके ४ भेदों की सभावना नंहीं रहती है। इस प्रकार वाच्योत्म्रेक्षा के कुल ५६ भेद अर्थात स्वरूप, के ३२, फल के १२, और हेतु के १२ भेदों को प्रतिपादन और अप्रतिपादन के भेद से ११२ भेद सिद्ध होते हैं। इस प्रकार मतीयमानोतप्रेक्षा ६४ प्रकार की है। इसमें स्वरूपोत्प्रेक्षा के ३२ भेद असमव है। किन्तु फलगत १६ और हेतुगन १६ भेद आवश्यक है जोकि प्रस्तुत के प्रतिपादन और अप्रतिपादन की दृष्टि से कुल मिलाकर ६४ भेद हो जाते हैं। इस प्रकार उत्प्रेक्षा अलक्वार के कुल मिलाकर वाच्योत्प्रेक्षा ११२ और प्रतीयमानोत्प्रेक्षा के भेद ६४ अर्थात ११२+६४= १७६ हैं। किन्तु पण्डितराज जगन्नाथ ने इन भेदों को आलक्कारिकों की परम्परा मानी है।

(सुधा) अत्र मालारूपकरुक्कारः 'मालारूपकमाद्यव्वेद यथो त्रगुणावह्म् इति तक्क्षणो के उपसंहरति-तपमादिति। अन्यमपि विशेषमाह-इदमिति। विषयिविषययोरनुगतस्य धर्मस्य धर्म्युदेनार्यां निसित्तत्वं विषयिणमाश्रित्य यो विषयेऽनुगतस्तस्य धर्मोमेनषार्या निमित्तत्वम्। एतत्कथनस्व फलमाह-तेनेत्यादि । 'उवाह या तनुलताम' इत्यादी वैमल्यस्थ निमित्तत्वकथनमयुक्क्म। तादालयसंभावनायोग्यप्रतिविम्वसाघनभूतस्य तनु- धर्मस्य वैमश्यस्य वेणिकाधमंत्वाभावात्। तन्र सम्मतिमाह-पन्नेति। सरवैरल्कारसर्वस्व- काराद्रिमि: 'यम्रान्य .. ''इत्यादिस्वोक्तलक्षणे विषयधर्मस्येव निमित्तत्वेन व्यवहारोडद्रीकृत इति बिक।

Page 409

उत्प्रेक्षानिरूपणप्रकरणम् ३७१ (चित्र०) अत्र न्रम :- विषयिण उत्प्रेक्षायां जातिगुणाद्यात्सना विभागविधा। यादर्शि नैव शोभा तयोपमायामिवोपसेयस्य॥। तद्भावेऽलङ्कारा: सभवमात्रेण न अहन्तीतरथास्या विभागम्। विषयोऽप्येवं विभक्तव्यः ॥ धर्मस्यापि विभागो गुणक्रियात्मा न चारुताहेतुः। उपमायासिव सोऽपि न्यूनस्तदभावयोरसंकलनात्।। (भारती) 'अत्र ब्रूम' से दोनों पक्षों का दोष कहते हैं- आप लोगों ने उत्प्रेक्षा में जाति द्रव्य, गुण और क्रियाओं से जो विषयी के भेद दिखाये हैं, वे सारे भेट उपमा अलक्कार में उपमेय की ही गोमा नही देते। 'उसके अभाव में सम्भावना मात्र से अलङ्कारों के भेद नहीं हो सकते। अन्यथा सम्भावना मात्र से उसकी स्वीकृति में विषय भी इस प्रकार जाति आदि से विभाग करने योग्य होंगे।' अन्य दोष भी वताते हैं कि उत्प्रेक्षा निमित्त धर्म के भी गुण और क्रिया से ही भेद सुन्दरता के हेतु नहीं होते हैं। उपमा की तरह ही जाति, क्रिया और द्रव्य के अभाव में भी विभाजकता के मसम्भव होने के कारण तावन्मात्र का ही तत्त्व में न्यूनता के दोष का प्रसन्ग है। (सुधा) एवमलंकारसर्वस्वक्कन्मते स्वरूपोतपेत्षाया ३२ द्वाम्रिशद् भेदान ; हेतुफलोतेक्षयोश्चतु- विशति २४ भेदान् ; मिलित्वा षटूपश्चाशत् ५६ भेदानू घाच्योठोक्षायामू। गम्यायान्तु स्वरूपो- त्परेक्षणे १६; हेतूत्रेक्षणे १२; फलोस्प्रेक्षणे १२, मिलित्वा:४०; उभयोर्भेदानू ९६ षण्णव तिसंख्या- कानू प्रदुरश्यं विदयानाधससे वाच्योत्ेत्षार्यां स्वरूपोत्प्रेक्षणे २४ भेदा:, हेतूप्रेक्षणे १६, फलो- स्प्रेक्षणे १६, मिलित्वा ५६ षट्पश्चाशद्भेदानू, गम्यायास्व स्वरूपहेतुफलोलोक्षणेषु प्रत्येकं १६ षोढशभेदानू, मिलित्या ४८ अष्टचत्वारिंघ्त्संख्याकानू मिलित्वा १०४ चतुरुत्तरशतं भेदानू व्याव्याय तन्न तत्तद्विशेषवशा.दुकं व्याख्याय चोभयमते दूषणोपन्यासं चक्तुमारभते-अत्र ब्म हत्यादिना। भवज्िरुत्रप्रेक्षायां जातिम्व्यगुणक्रियाभिर्या विषयिणो विभागविधाऽदर्शि, तया विधयोपमालद्ठारे तैरुपमेयस्येव शोभा नैवेत्यन्वयः । तद्भावे योग्ये सम्भवमान्नेणा- लंकारा भेदं नार्हन्ति। इतरथा सम्भवमान्रेण तदङ्गीकारे विषयोऽप्येवं जात्यादिभिर्विभागं कर्तु योग्यः स्यादिति। किस दूषणान्तरम्-उत्प्रेक्षानिमित्तघर्मस्यापि गुणक्रियाभ्यामेव सेसो रमणीथताहेतुरन भवति। उपसायामिव जातिक्रियाद्वव्याभावयोरपि विभानकता- सर्सवेन तावन्मान्रस्य तत्वे न्यूनतादोषप्रसद्व इति। (चिन्न०) मनसि सन्तमिव प्रियमीक्षितुं नयनयो: स्पृहयान्तरूपेतयोः। अ्रहणशक्तिरभूदिदमीययोरपि न संमुखवास्तुनि वस्तुनि।।

Page 410

३७२ चित्रमीमांसा

वतंसनीलाम्बुरुहेण कि दशा विलोकमाने विमनीबभूवतुः। अपि श्रुती दर्शनसक्तचेतसां न तेन ते शुश्रुवतुर्मृगीद्दशाम् ।। इत्यादिषु पश्यामो गुणक्रियाभावयोरपि व्यक्तम् ! उज्जवलभावनिबन्धनमुत्प्रेक्षायां निमित्तत्वम् ॥।

(भारती)

'मन में स्थित प्रिय नल को देखने के लिए मानो भीतर को घुसी अर्थात् चिन्ता से भीतर की ओर धँसी हुई दमयन्ती की आँखों को, सामने पडी हुई वस्तुओं को भी देखने की शक्ति नहीं रही। तात्पर्य यह कि चिन्ता के कारण दमयन्ती की आँखें मीतर घॅस गई यीं तथा वे सामने भी पढी हुई वस्तुओं को नहीं देख सकती थीं।' 'मृगनयनी दमयन्ती के कान भी मानो आँखें बन गये। कवि उत्प्रेक्षा करता है कि कर्णावतस रूप नील कमल रूपी आँखों से ही देखती हुई दमयन्ती के दोनों कान क्या विमन (वहरे) हो गये? अर्थात अपने काम में मन नहीं लगाते। उसी विमन होने के कारण दमयन्ती के कान नल- दर्शन के लिए सलग्नचित्त रहने के कारण कुछ सुनते ही नहीं थे। तात्पर्य यह कि दमयन्ती के हृदयगत प्रिय राजा नल के दर्शनार्थ उसकी आँखे अन्तर्मुख हो गयीं। इससे वाहरी वस्तु देखने की उसकी शक्ति ही नष्ट हो गयी। फलत. एकाग्रता के कारण कान भी अपने सुनने के कार्यों को छोडकर दर्शन क्रिया में ही सलग्न हो गये।' 'हत्यादि उदाहरणों में हम देखते हैं कि गुण और क्रिया भाव भी व्यक्त हैं। इनमें उज्जवल भाव के निवन्धन रूप उत्प्रेक्षा में निमित्तता है।'

(सुधा) अप्रसिद्धिवारणायोदाहर णट्टयमाह-मनसीति। अस्या इमे इदमीये, तयोदमयन्ती- नयनयो: सममुखवास्तुनि वस्तुन्यपि ग्रहणशक्तिर्नाभूत् चिन्तया विषयान्तरशक्तिग्रहणे ज्ञानसामथ्यं नाभूद। किंभूतयोः? मनसि स्थितं नलं प्रियमीचषितुं वाल्छयेव हृदयदेशमुपे- तयोः। प्रविष्टयोः विरह्व्यथया नेत्रयोर्निम्नदेशव्वेन निस्सहत्वास् अग्रे स्थितमपि वस्तु अह्ीतुं न शक्यत इति भाव: ।वतंसेति। कर्णावतंसनीलोत्पलेनैव नेश्रेण विलोकमा ने पश्यन्त्मी श्रुती कर्णावपि विमनीबभूवतुः किमू। स्वकर्मणि मनो न दघतुः किमित्यर्थः। तेनैव विमनीभवनेन हेतुना नळदर्शनलप्चेतसां स्त्रीर्णां ते श्रुती न शशुवतुरित्यन्वयः।

चित्र०) अत्र ह्यादे उदाहरणे नयनयोर्हदयगत प्रियवीक्षणायान्तःप्रविष्ठत्वोत्प्रेक्षणायां बाह्यवस्तुग्रहणशक्त्यभावो निमित्तम् । द्वितीये श्रोत्रेन्द्रियगत विल्ोकनकाय्रत्वो- त्प्रेक्षायां श्रवणक्रियाभावो निमित्तम् । एवम्- वीरासनैर्ध्यानजुषामृषीणाममी समध्यासितवेदिमध्याः । निवातनिष्कम्पतया विभान्ति योगाधिरूढा इव शाखिनोडपि॥। इत्यादीन्यभावनिमित्तत्वे भूयांस्युदाहरणानि ।

Page 411

उत्प्रक्षानिरूपणप्रकरणम्

(भारती) यहाँ प्रथम उदाहरण में आँखों के हृदयगत प्रियदर्शन के लिए अन्त-प्रविष्ट होने की उत्प्रेक्षा है और इस उत्प्रेक्षा में बाहरी वस्तु ग्रहण करने की शक्ति का अभाव निमित्त है। दूसरे उदाहरण में कर्णगत देखना रूप एकाग्रता की उत्प्रेक्षा है, जिसमें सुनने की क्रिया का अभाव निमित्त है। इसी प्रकार दूसरा उदाहरण जैसे- 'वीरासन से वैठकर ध्यान करने वाले मुनियों के वेदिमध्य में स्थित ये वृक्ष भी वायु के अभाव से स्थिर होने के कारण ध्यान करते हुए के समान शोमते हैं।' यहाँ कम्पनाभाव का योगाधिरूढत्व की उत्प्रक्षा में निभित्तता है। इसी प्रकार अभावनिमि- त्तत्व में बहुत से उदाहरणों को जानना चाहिए।

(सुधा) अश्र प्रथमोदाहरणे नयनयोहदयगतं प्रियस्य वीक्षणं तषर्थमन्तःप्रविष्टत्वस्योघेक्षणे वाह्यवस्तुग्रहणसामर्थ्याभावस्य निमित्तत्वम्, द्वितीये श्रन्नेन्द्रियगतं यद विलोकनं तलिष्ठं यदेकाग्रत्वम्, तदुत्प्रेक्षायां श्रवणक्रियासावस्य निमित्तत्वम्। तथा च गुणक्रिया-

निमित्तत्वनियम इत्यर्थः। उदाहरणान्तरमाह-वीरासनैरिति। ध्यानभाज्ामृषीणां सम्च- न्धिनः समध्यासितं वेदिमध्यं यैस्तेऽमी शास्िनो वृक्ा निवातनिष्कम्पतयाऽघिरूठयोगा इव विभान्तीत्यन्घयः। वीरासनन्सु योगशास्त्रे-'एकपादमथैफस्मिम् विन्यस्थोरुणि संस्थितः । इतरस्सि- स्तथा चान्यं वीरासनसितीरितम् ॥' इत्युकम। अत्र कम्पनाभावस्य योगाधिरूढत्वोत्ेक्षणे निमित्तत्वम्। एवसेवाआवनिमित्तत्वे बहून्युदाहरणानि बोध्यानि। अन्नाद्िशब्देन- 'राज्याभिषेकमाश्जाय शम्वरासुरवैरिणः । सुधाभिर्जगतीमध्यं लिस्पतीष सुधाकरः ॥' . इत्यनुपात्तनिमित्तार्याँ शम्वरमिष्ठवर्तमानक्रियाभावस्य निमित्तत्वसपि ोध्यम् । तस्माद गुणक्रिययोरिव तदभावयोरपि निमित्तत्वस्य सम्भवेन तद्करणेन न्यूनत्वदोषो दुष्परिह्र एव। (चित्र०) अपि च समुच्चयभेद: परिगणनीयो निमित्तेषु। भावौ भावाभावौ समुख्वितावपि निमित्ततां भजतः ॥ अवैमि हंसावलयो वलक्षास्त्वत्कीर्तिमूर्तेश्चपलाः पुलाकाः । उड्डीय युक्तं पविता: स्रवन्तीवेशन्तपूरं परितः प्वन्ते॥ (भारती) 'और भी गुण और क्रिया की निमित्तता जैसे भाव और अभाव के रूप में कही गयी है वैसे ही उस समुच्चय के तत्व से निमित्तता की भी संभावना से न्यूनता कहते हैं। निमित्तों में समुच्चय भेद भी भाव के रूप में ही गिनना चाहिए। क्योंकि भाव और अभाव रूप समुच्चय भी निमित्त भाव को प्राप्त करते हैं।' जैसे- 'मैं श्वेत हस-समूह को आप की कान्ति कीर्तिका चख्रल पुभाल मानती हूँ। अत. उडकर

Page 412

३७४ चित्रमीमांसा

पुन. गिरे हुए वे नदी तथा छोटे छोटे गड्ढों के प्रवाह के चारो तरफ तरते हैं।' तात्पर्य यह कि जिस प्रकार धान का निःसार भाग भुत्सी उडकर गिरने पर नदियों तथा गड्ढों के पानी पर तैरती रहती है, उसी प्रकार नदियों तथा छोटे-छोटे जलाशयों के जल की सब ओर रहने वाले श्वेत हस समूह को भी मै आप की कान्ति कीर्ति का पुआल ही समझती हूँ। श्वेततम कान्ति-कीति का दवेत पुमाल से तुलना है। अर्थात् आप की कान्ति-कीर्ति हससमूद्द से भी अधिक धवल तथा गुणवती है। इस उदाहरण में नारीहृदय की कोमलता और पुरुष हृदय की कठोरता का वर्णन प्रभातवर्णन के माध्यम से हृदयहारी है। (सुधा) फिज्, गुणक्रिययोयंथा निमित्तता मावाभावरूपेणोक्का तथा तत्समुच्धयस्य तरेन निमित्तत्वस्यापि सम्भवेन न्यूनतेत्याह-अपि चेति। निमित्तेषु समुच्चयभेदोऽपि भावः परिगणनीयः। यतो भावासावी समु्चितावपि निमित्तभावं भजत इत्यन्वयः। समुशिचि तोदाहरणमप्नसिद्धिनिरासायाह-अवैमीति। वलका हंसानामावलयः पछक्यस्तव कान्तेः शोभायाः कीतेः प्रशंसायाश्चपळाः पुलाकासतुष्छ्रषान्यानीति अवैमि जाने 'पुलाकरतुच्छ्- धान्ये स्याघ्' इति विशवः । स्वन्त्यः नद्यः 'स्रवन्ती निम्नगापगा' इत्यमरः वेशन्ताः पस्वकानि व तेषां पूरानू परितः समन्ताव पतिताः सन्तः उड्डीय उद्गमनं कृत्वा प्नवन्ते तरन्वीति युकतम्। (चित्र०) उडुपरिषदः किं नार्हन्ती निशः किमनौचिती पतिरिह न यद्दष्टस्ताभ्यां गणेयरुचां गणः । स्फुट मुडुपतेराश्मं वक्ष: स्फुरन्मलिनाश्मन- शछविमदनयोर्विच्छेदेऽपि द्रुतं बत न द्रुतम्॥ एवमादिषु बह्नीपु निहोतुं केन शक्यते। समुश्चितनिमित्तत्वमुत्प्रेक्षासु निरीक्षितम्॥ (भारती) 'पतिरुप चन्द्र के सर्वथा अस्त होने के पहले नहीं, किन्तु उसके क्षीणकाय अर्थात् निष्प्रभ होने के पहले ही चन्द्र परिया ताराएँ और रात नष्ट हो गयीं। यह उन परम सती नारियों के लिए उचित ही है। किन्तु, अपनी ऐसी प्रियाओं के नष्ट हो जाने पर भी चन्द्रमा जो मलिन कान्ति होकर ही स्थित है-शीघ्र मरा नहीं, अत एव ज्ञात होता है कि इसका हृदय पत्थर का है।' 'इस प्रकार बहुतसी उत्प्रेक्षाओं में देखे गये-उत्प्रेक्षा के समुच्चित निमिन्तत्व को कैसे छिपाया जा सकता है ?' (सुधा) उद्ुपरिषद इति। तारासमूहस्य किमाहन्ती औषित्यं न निशो रात्रेरनौचिती किभ! दयोशौच्वित्यमेवेत्यर्थः। यतस्तार्भ्यां तारापरिषद्वाम्रिर्भ्यां गणेयोऽपो रुा कान्तीनां गण: समूदो यस्य ताइश: पतिशन्द्र इह न रंष्ः। चन्द्रस्य वघः अश्मनो विकार आरमम इति

Page 413

उत्प्रेक्षानिरूपणप्रकरणम् ३७५ स्फुटमेव। यदनयो रायुदुपरिषदोर्नाशेऽपि शीघ्रं वतेति खेदे न द्ुतं द्रवीभूतम्र। किभूतं वक्षः! स्फुरन् मलिनाश्मच्छविमत् कलद्टित्वादानीलशिलाश्यामलमित्यर्थः। (चिन्र०) आद्ये उदाहरणे हंसावलीनां कीतिपुलाकत्वोत्प्रेक्षायां घावल्यगुणो जलो- परि प्रवनक्रिया चेत्युभयं निमित्तम्। द्वितीये उड्ुपतिवक्षसोऽशमविकारत्वो्प्रेक्षयामश्मच्छविरूपो भावो द्रुत- त्वाभावाश्च्ेत्युभयं निमित्तम्। कि च- उत्प्रेक्षायां निमित्तत्वं यज्जातिद्रव्ययोरपि। तेनापि विकलां विन्नो निमित्तगणनामिसास्। द्रोण: स तन्न वितरिष्यति भाग्यलभ्य- सौभाग्यकार्मणमयीसुपदा गिरिस्ते। तद्द्वीपदीप इव दीप्िभिरोषधीनां चूडामिलज्जलदकज्जलदर्शनीयः 11 (भारती) प्रथम उदाहरण में इसावलियों की कीत्ि पुभाल की उत्प्रेक्षा में धावल्यगुण और पानीपर पुआलों के तैरने की क्रिया दोनों निमित्त हैं। दूसरे उदाहरण में चन्द्रमा के हृदय में पत्थर की उत्प्रेक्षा में काले पत्थर के छविरूपभाव और गोघ्रता के अभाव ये दो निमित्त हैं। किन्तु- 'जो उत्प्रेक्षा में जाति और द्रव्य के निमित्तत्व प्रसिद्ध है, उसके द्वारा प्रसिद्ध भाव से भी इस गणना को कम ही जाननी चाहिए।' 'उस द्वीप में वह द्रोण पर्वत, अपनी कान्ति से शिखर संलग्न दर्शनीय कब्जल जल्द की तरह-भाग्य से पूर्व जन्मार्जित पुण्य विशेष से प्राप्ति के योग्य अपने प्रति पति की आस- किरूप कर्मभूत शिखरोत्पन्न दीप की तरह औषधियों का उपहार तुम्हें भेंट करेगा।' (सुधा) अनयो: प्रथमोदाहरणे हंसावलीनां कीर्तिपुलाकत्वोतप्रेष्षायां घाघल्यगुणस्य जलतरण- क्रियायाश्च निमित्तत्वास् ससुषििचतयोरपि तत्दं स्पष्टमेव। द्वितीयोदाहरणे चन्द्रवक्षसोऽश्म- विकारत्वोत्प्रेपायामरम्छविरूपाभावस्य दवणाभावस्य व निमित्तववेन गुणक्रिया- भावयो: समुच्चयस्य स्पष्ट्यम्। एवमादिषु घह्लीपूरप्रेक्षासु रष्मुपेष्षायाः समुच्चित निमित्तत्वं केन निह्नोतुं शवयत इति भावः। य्त, गुणक्रिययोरेव तिमित्तत्वनियमः, तदपि तदा सम्भवेस, यदा जासिदृव्ययोनिमित्तत्वं न स्यात्, तस्य सम्भवे तु दोष एवेत्याह- किश्चेति। यदुतप्रेष्षार्यां जातिदष्योनिमित्तत्वं प्रसिद्धम्न, तेन प्रसिद्धभावेनापि इमा गणनां न्यूनां विद्य इत्यर्थः। तन्र जातेनिमित्तत्वसुदाहरति-द्रोण हति। तम्न द्वीपे द्रोणो नाम पर्वंतः, विगीर्णत्वाच् गिरय इति सात्स्ये व्युपत्तिदर्शनातू भाग्येन पूर्वभवीयपुण्यविशेषेण

Page 414

३७६. चित्रमीमांसा

सभ्यं प्राप्तुं योग्यं ताध्टशं सौभाग्यं पत्यु: स्वासवत्यादिरूपं कार्मणं कर्म, 'मूलकर्म तु कार्मणमू' इत्यमरः। तद्नपामुपदामुपहारं तव दास्यति, किभूतः, ओषधीर्ना वश्यादिकर्त्रीणां छीप्तिभि: कान्तिभि: घूटायां शिखरे मिलन्तः संयु्यमाना ये जलदा मेघा तट्ृपेण कज्लेनाअनेन दर्शनीयो रभ्य, स घासी द्वीपश्च, तस्य दीप इव, तत्र बशीकर- णाद्युपायभूता मणिमन्त्रीपपयो गमनकाल एव सुलभा:, अन्यम्र तु भाग्यलभ्या विळम्बेनेति लचमणः । (चित्न०) अत्र द्रोणाचलस्य दीपत्वोत्प्रेक्षायां तत्प्ररूढौषधिवृक्षदीपस्योपरि स्थितं जलदकज्जलं च निमित्तमिति जातेर्निमित्तत्व दृष्टम्। निशासु मूर्ध्नि स्फुरता यत्सौधो राजतीन्दुना। श्रीकण्ठो भक्तरक्षार्थ संनिधान भजन्निव। इत्यत्र वाणासुरसौधस्य शिवरूपोत्प्रेक्षायां मूर्ध्नि स्फुरन्निन्दुर्निमित्तम्। (भारती) यहाँ द्रोण पर्वत का दीपत्व की उत्प्रेक्षा में उस पर उत्पन्न औषधिवृक्ष रूपी दीप के ऊपर स्थित जलद कब्जल जो निमित है, उसी जाति का निमित्तत्व देखा जाता है। 'जिस वाणासुर के राजमहल के कगूरे पर, रात में प्रकाशमान चन्द्रमा शोभते हैं, उसकी उत्प्रेक्षा कवि करता है कि मानो वह महल नहीं है प्रत्युत साक्षात भगवान् शकर ने अपने भक्त चाणासुर की रक्षा के लिए उसकी निकटता प्राप्त की है।' यहां वाणासुर के राजमहल की शिवत्व की उत्प्रेक्षा में निमित्तता है। किन्तु, यहाँ न केवल जात्यादि चारों की ही निमित्तता है, प्रत्युत अल्द्वार आादि का जात्यादि समुच्चय को भी निमित्तत्व है। (सुधा) द्रोणस्य दीपत्वोतपेक्षायां सदुत्पतषधिृस्षकान्तेरुपरिस्यितजलद्क्सलस्य निमित्तरवेन जातेनिमित्तत्वं स्पष्टमेव। अथ वव्यस्य निमित्तत्वसुदाहरति-निशास्विति। यत्सौघो राजसदनं मूर्ध्नि प्रफाशमानेन चन्द्रेण शोभते, भक्करक्षया सव्विधानं नैकट्यं भजनू शिव इवेत्यन्वयः । अम्र षाणासुरगृहस्य शिवत्येनोत्मरेक्षणे चन्द्ररूपवव्यस्य निमित्तत्वम । किञ्, न केवल जात्यादिचतुर्णामेव निमित्तत्वम अपि तु अब्ङ्गाशादेः जात्यादिसमुध्चयस्यापि निमित्तत्वम्। (चिन्न०) एवम्- 'भास्वतालङ्कारेण, श्वेतरोचिषा स्मितेन, लोहितेनाधरेण, सौम्येन दर्शनेन, गुरुणा नितम्बेन, सितेन हारेण, शनैश्रेण पादेन, विकचेन लोचनोत्पलेन, त्रिभुवनविजयकेतुना रूपेण, ग्रहमयीमिव'। इत्यत्र वासवदत्तायः सक्लग्रहममत्वोत्प्रेक्षायां श्लेपेण तत्तद्ग्रहरूपापन्ना- लंकारादयो निमित्तमिति जातिक्रियागुणानां समुचितानां निमित्तत्वं दृष्टम्।

Page 415

उत्प्रेक्षानिरूपणप्रकरणम् ३७७

(भारती) इसी प्रकार वासवदप्ता के वर्णन में- 'भास्वत अर्थात् दीप्त अलद्वारों के द्वारा जैसे-शुभ्रकान्ति के द्वारा सूर्य से, स्मित अर्यात मन्दहास्य के द्वारा चन्द्रमा से, लोहित अर्थात रक्त अधर के द्वारा मङ्गल से, सौन्येन अर्थात शोभन दर्शन के द्वारा वुध से गुरुणा अर्थात विशाल नितम्ब के द्वारा गुरु वृहस्पति से, मन्द चारी चरणों के द्वारा शनिश्चर से, विकसित नेत्र कमलों के द्वारा केतु से, शुभह्ार के द्वारा शुक्र से, मानो ग्रहमयी की तरह उस वासवदत्ता को स्वप्न में देखा।' यहाँ वासवदत्ता की सकल ग्रहमयिता की उत्प्रेक्षा में श्लेष के द्वारा उन ग्रहों के रूपापन्न अलङ्कारों के निमित्तत्व से समुचितों का निमित्तत्व देखा जाता है।

(सुधा) दष्टमि त्याह-एवमिति। वासषदृत्तावर्णनम्। शनेश्ररेण मन्दचारिणा घरणेन शनिना च, सौम्येन शोभनेन दर्शनेन बुधेन च, गुरुणा महता नितम्बेन वृहस्पतिना च, लोहितेन र्केनाघरेण मङलेन च, विकचेन विकसितेन नेन्रकसळेन केतुना शुक्रेण वा, 'शुक्रे केतौ च चिकच उस्फुल्ले च निगधते' इति विश्वः। भास्वता दीप्यमानेनालक्करेण रविणा च खेतरोचिषा स्मितेनेन्दुना घ अहमयीमिव तां स्वपेऽपश्यदित्यन्वयः। अ्र वासवदसायाः सकलग्रहमयतयोप्रेक्षणे श्रेषेण तद्ग्रहरूपापनाळङ्काराणां निमित्तरवेन समुच्ितारनां निमित्तवं दृष्टम्। (चित्र०) न चोदाहृतेषु दीप्त्यादिसंबन्धो निमित्तं स च सर्वो गुण एवेति वाच्यम् ; तथा सति 'ईदृक्षां क्षामतां गतौ' इत्यादावपि गमनादिक्रियासंबन्ध एव निमित्त- मिति क्रियाया एव निमित्तत्वप्रसङ्गात्। न च तथापि 'भास्वतालंकारेण' इत्यादौ श्लेषेण सूर्यरूपताद्यापन्ना अलङ्कारादयो निमित्तं न त्वविशिष्टा जातिर्द्रव्यं वेति वाच्यम्। तथा सति 'कपालेनोन्मुक्त: स्फटिकधवलेनाङ्र इव' इत्यादावपि कपालो- न्मुक्ताङ्कुरत्वादिविशिष्टमे वोत्प्रेक्षणीयं न त्वविशिष्टं जात्यादिकमिति विषयिणोऽपि जात्यादिरूपेण विभागस्यासामञ्जस्यप्रसङ्गात्। तस्माद्विषयिण इव निमित्तस्यापि जात्यादिरूपेण चतुर्विधतया पुनः प्रत्येकं भावाभावाभ्यामष्टविधतया च विभागः कर्तव्य इति न्यून इवायं विभागः । (भारती) यहाँ शंका करते हैं कि उक्त उदाहरणों में दीप्त्यादि सम्बन्धों का निमित्तत्व दर्शन के द्वारा सभी जगह गुण का ही निमित्तत्व है। समाधान करते हैं कि ऐसा कहने से 'ईषसां चामरता गतौ' इत्यादि उदाहरण में भी गमनादि क्रिया के सम्बन्ध का ही निमित्तत्व से क्रिया का भी - निमितत्त्वाभाव प्रसङ्ग होगा। फिर शंका करते हैं कि 'भारवतालद्वारेण' इत्यादि में श्लेष के द्वारा सूर्यादि आत्मता आपन्न अलक्कारादिकों की निभित्तता से शुद्ध जात्यादि के निमित्तत्वाभाव होगा, तो समाधान

Page 416

३७८ चित्रमीमांसा

करने हैं कि 'कपोलेनोन्मुक्त्त' इत्यादि उदाहरण में कपोलोन्मुक्त अद्कुरत्वादि विशिष्ट की हो उत्प्रेक्षणीयता से केवल जात्यादि के सत्वाभाव से जात्यादिरूप विषयिविभाग के असामअ्जस्य का प्रसद् हो जायगा। इसलिए जैसे जात्यादि रूप से विषयी के हैं उसी प्रकार निमित के भी जाति, द्रन्य, गुण और क्रियाओं के प्रत्येक समुच्चितों के अथवा उनका भी भाव और अभावाभिमानता से आठ प्रकार के विभाग योग्य दोनों मतों से प्रतिपादित विभागों की न्यूनता ही है। (सुधा) अन्नाषङ्गते-न चेति। उदाहरणेषु दीप्यादिसव्यन्घस्य निमित्तत्वदर्शनेन सर्वत्र गुणस्यंव निमित्तत्वमित्याशङ्कार्थः। समाधीयते-एब सति 'ईएमां घामतां गतौ' इश्या- दावपि गमनादिक्रियासस्बन्धस्येव निसित्तव्वेन क्रियाया अपि निमिशत्वाभाव-

लक्गारादीनां निमित्ततया शुद्ध जात्यादेनिमित्तत्वासाय इति भावः। समाचीयते-तथेति। 'कपालेनोन्मुक इव' इत्यादी कपालोन्मुक्काछुरवादिविशिष्टस्येवोतप्रेप्षणीयतया केवल-

तस्मादिति। तस्माद् यथा जात्यादिरूपेण विषयिणो विभागस्तथा निमित्तस्यापि जाति- द्ृव्यमुणक्रियाणां प्रश्येकं समुच्ितानां वा तेषामपि भावाभावाभिमानतयाऽधा विभागे योग्ये उभयमतप्रतिपाद्ितचिभागस्य न्यूनत्वमेव। (चिन्न०') किं च यद्धेतू त्प्रेक्षायामनुपादानं निमित्तस्य क्वापि न संभव इति प्रतिश्रुतं तपि नो चारु। मग्ना सुघायां किमु तन्मुखेन्दोरलगा स्थिता तत्कुचयोः किमन्तः। चिरेण तन्मध्यममुख्तास्य दृष्टिः क्रशीयः स्खलनाद्गिया नु॥ इह हेतावुत्प्रेदये मज्जनलगने निमित्तमनुपात्तम्। तत्कार्य दाष्टिगत चिरेण यन्मुखकुचत्यजनम्। (भारती) किन्तु जो हेतु और फल के निमिचतोपादन की सभावना ही नही है-ऐसा कहते हैं तो यह, भी सुन्दर नहीं है। 'नल की दृष्टि दमयन्ती के मुख रूपी चन्द्रमा के अमृत में मग्न हुई थी क्या -? अथवा-दम- यन्ती के मृणाल सूत्र के लिये भी मध्य में अवकाश शून्य दोनों स्तनों के वीच में अँटक कर उलझ गयी थी क्या? अथवा-अत्यन्त पतला होने के कारण गिरने के भय से उस दमयन्ती के अत्यन्त क्षीण कटि प्रदेश को देर से छोडा क्या ? तात्पर्य यह कि जिस प्रकार कोई व्यक्ति कीचड में फसकर या सकीर्ण स्थानों में उलझ कर अथवा तार या रस्सी आदि पर चलते समय गिरने के भय से वडी सावधानी से चलकर उसे बहुत विलम्व से छोडता है। उसी प्रकार राजा नल दम- यन्ती के मुख और स्तनों को देखने के वाद कृशतम कटि भाग को वहुत देर तक देखते रहे।' 'यहाँ दृष्टिगत विलम्व से मुख और स्तन को छोडने रूप कार्य के प्रति मअनलग्न निमित्त के अनुपादन से अनुपात्तनिमित्ता हेतूत्प्रेक्षा हुई।'

Page 417

उत्प्रेक्षानिरूपणप्रकरणम् ३७६

(सुधा) यत्पूर्व जात्यादीनामपि हेतुफलोत्प्रेक्षयोर्निमित्तस्यानुपादानं न सम्भवतीति तद् दूषयति-किश्जेति। यत् हेतुफलयोर्निमित्तोपादानस्य सम्भव एव नास्तीति प्रतिज्ञातम्, तदपि न मनोहरम्। मझ्नेति। तस्या भैम्या मुखेन्दो: सुधायां मपा किमु ! कि वा तस्याः कुधयोहन्तमध्ये लमना सती स्थिता। सुधाया इव द्ृव्यरवेन तन्न मज्नम्, लभ्नत्वन्तु कठिने यत् किज्विदवलम््यावस्थानम्, तेन स्तनयोरदष्टितथातवचर्णनात पर्वत- प्रायत्वसूचनम्। प्रथमभैमीमुखावछोकनकृतावानन्दान्मम्नेति सुङकषितत्वं द्वष्टेष्यंङ्गचम्। 'प्रसन्नान्ता छ्िष्पुदा मुकुलोध्वंपुटान्यिता। सुखामीलिततारा च सुकुला दृष्टिरिष्यते।' ततश्च मुखदर्शनापेक्षया स्तनदर्शनस्थातिदुर्लभतया तद्र्शनकृतमप्यानम्द व तद्दर्शनेच्छया- डसिनीय तम्न स्थित्या चिस्मिता दृष्टिर्ध्वनिता। तथा प भरतः-'विस्मयोदुघृतारा या स्पृष्टोभयपुटान्विता । समा विकसिता दष्टिर्विस्मिता विस्मये समृता ॥2 अत एव स्तनरूपावलोकनान्भुतेन तम्रासकिरपि सम्गच्छतते। मस्य नलस्य दष्टिश्वरेण रखलनान्ीस्येव कृशतरं तस्या भैग्या मध्यमसुख्जत, कृशस्य परेषामनाश्रयणात् इत्यन्वयः। अन्न दृष्टिगत-

हेतू प्रेक्षा। (चित्र०) स्यादेतत्। इह मज्जनलगनोत्प्रेक्षयोश्चिरेण मुखकुचत्यागावतुपात्तौ निमित्ते, तयोश्ञ न मज्जनलगने हेतुत्वयोग्ये इति। सत्यस्। तरथापि हेतूत्प्रेक्षेव न हि हेतूभवनक्षमस्योत्प्रेक्षैव हेतूत्प्रेक्षा, किंतु हेतुत्वेनोत्पेक्षा। यथा-'सैषा स्थली यत्र विचिन्वता त्वाम्' इत्यत्र। अत्र हि पञ्मी हेतुत्वप्रतिपादिका। तथा- कपोलफलकावस्या: कथं भूत्वा तथाविधौ। अपश्यन्ताविवान्योन्यमीदृक्षां क्षामतां गतौ।। इत्यन्न क्षामतागमनं प्रति परस्परादर्शनस्य हेतुत्वोत्प्रेक्षायां शतृप्रत्ययो हेतुत्वप्रतिपादक: । (भारती) यहाँ सन्देह करते हैं कि हेतूत्प्रेक्षा में मअन और लगन के उत्प्रेक्षण में बहुत देर से मुख और कुचत्याग के अनुपात्त की निमित्तता में सज्जन और लगन की हेतुत्वयोग्यता में भी हेतूत्प्रेक्षा की सभावना नहीं है। क्योंकि यहाँ भी हेतुभवनक्षम का ही हेतुत्व के अनियम से हेतुत्व से ही तत्त्व में उसकी सभावना है। 'सैषास्थली' इत्यादि उदाहरण में हेतुत्व प्रतिपादक पञ्चमी से उस तत्त्व की स्पष्टता है। उसी प्रकार- 'इस सुन्दरी के ये दोनों कपोल फलक इस तरह कैसे हो गये ? कवि की यहाँ उत्प्रेक्षा है कि मानो ये दोनों एक दूसरे को नही देखते हुए ही इस तरह की कृशता प्राप्त किये हैं।' इस उदाहरण में कृशत्व गमन के प्रति एक दूसरे को नही देखने के हेतूतप्रेक्षण में हेतुत्व प्रति पादक शतृप्रत्यय दिखाई पडता है।

Page 418

३८० चित्रमीमांसा-

(सुधा) अन्राशक्ते-स्यादेतदिति। अत्र हेतृतप्रेष्षायां मजनलगनोतप्रेवणे चिरेण मुखकुच्- मज्जनलवनयोहेरतु्त्वयोग्यतायामपि हेतूछोप्ाया न सम्भवः। हेतुभवनपमस्येव हेतुत्वानियमात्, हेतुर्वेनैव तत्वे तत्सम्भवाद्। 'सैषा स्थली' इश्याददाहरणे हेतुत्वप्रतिपादिकाया: पञ्चम्चास्तत्सर्वस्य स्पष्टत्वाद्। तथा 'कपो- लफलकावस्य' इत्यादी कृशरवगमनं प्रति अपरादर्शनस्य हेतूतप्रेक्षणे हेतुत्वप्रतिपादकश सुपरत्ययदर्शनाच्च। (चिन्न०) सदनतापभरेण विदीर्य नो यदुदपाति हृदा दमनस्वसुः। निबिडपीनकुचद्वययन्त्रणा तमपराधसधात्प्रतिबघ्नती॥। इत्यत्र हृदयस्य मदनतापेन स्फुटितत्वोत्पतनाभावे कुचद्वययन्त्रणाया हेतुत्वोत्प्रेक्षायामुत्पतनप्रतिबन्धकत्वपरः प्रतिबभ्नतीशब्दः फलतोऽनुत्पतन- हेतुत्वप्रतिपादक: । (भारती) 'काम के सन्ताप की अधिकता के ही कारणं मानो दमयन्ती का हृदय फट कर जो वाहर निकल गया, उस अपराध को रोकने वाले सटे हुए वडे-चडे स्तनों के दवाव ने धारण किया। अर्थात् सघन एवं विताल स्तनों के बोझ के कारण ही विरह पीडा में भी दमयन्ती का हृदय फटकर भी टुकडा टुकडा न हो गया। तात्पर्य यह कि जिस प्रकार वल्लादि कोई हल्की वस्तु वजन दार बडे पत्थरों के दवाव से ऊपर को नहीं उडने पाती। अथवा-उस अपराध को रोकने वाले सटे हुए वडे बडे दोनों स्तनों ने पी लिया-यह भी अर्थान्तर हो सकता है।' इस उदाहरण में हृदय का मदन के सताप से फटकर निकलने के अभाव में स्तनद्ूय के नियत्रण की हेतुता के कारण उत्प्रेक्षा है। फट कर निकलने के प्रतिवन्धक फल से 'नहीं फटकर निकलना' रूप हेतुत्वप्रतिपादक के प्रति वन्धन है। (सुधा) मदनेति। दमनस्वसुदमयन्त्या हृदा हृदयेन मदनतापमरेण मदनजनितज्वरवाहु- रयेन विदीर्य स्फुटित्वा यनोदपादि उत्पतितम्, निधिडं निरन्तरम, पीनं पीवरं कुछ- इयं तेन यन्म्रणावन्धनं प्रतिबध्नती तमपराधमधात दधार। विरहसन्तापभारादू भैमी- हृदयमुद्गन्तुकामं जातं स्तनद्वयेन तमपराधं सोढवापि रवितम्। अन्यथा गतमेव स्यास्। स्तनद्यापराघोडयं न तु हृदषयस्येत्युदाहरणे हृदयस्य मदनसन्तापेन स्फुटिरवो-

हेतुत्वप्रतिपादकस्य प्रतिबध्नतीत्यस्य सदवात्। (चित्र०) एतादशेपु च फलस्य निमित्तस्योपादानं नियतमेव । अन्यथा पञ्चम्या- दीनामन्वयसंघटनाभावात्। यत्र हेतुत्वप्रतिपादकः शब्दो नास्ति तन्न हेतुभव- नक्षमस्यापि स्वरूपोत्प्रेक्षैव।

Page 419

उत्प्रेक्षानिरूपणप्रकरणम्

अत एवालद्कारसर्वस्वकृता- प्राप्याभिषेकमेतस्मिन् प्रतितिष्ठासति द्विषाम्। चकम्पे लोक्यमानार्थभयविह्वलितेव भूः॥ इत्यत्र विह्वलितत्वस्योत्प्रेच््यस्य हेतुत्वप्रतिपादकशब्दरहितस्य कम्पं प्रति हेतुभवनक्षमत्वेपि स्वरूपोत्प्रेक्षोदाहृतेति चेत्। मैवम्। (भारती) ऐसे उदाहरणों में निमित्त के फल का उपादान आवश्यक है। अन्यथा पञ्चम्यादि के अन्वय सघन की अयोग्यना से वैयर्थ्यापत्ति होगी। अतः हेतुत्व से सत्त्व की ही उत्प्रेक्षा है। न कि हेतु भवनक्षम के सत्व में भी। वैसे स्थलों में तो स्वरूपोत्प्रेक्षा का ही सत्त्व है। अलद्द।रसर्वस्वकार की सम्मति कहते हैं- 'राज्याभिषेक पाकर इस राजा में प्रतिष्ठा पाने की इच्छा देखकर लोक्यमानार्थ शत्रुओं की धरती भय से विह्वल होकर लता की तरह काँपने लगी।' यहाँ उत्प्रेक्षा की विह्वलता के हेतुत्वप्रतिपादक शब्द से रहित कम्पन के प्रति भवनक्षमत्व में भी स्वरूपोत्प्रेक्षा के ही उदाहरण दिये हैं। यहाँ समाधान करते हैं ऐसा नहीं है। (सुधा) एताहशोदाहरणेषु निमित्तस्य फलस्योपादानसावश्यकम। अन्यथा पञ्चम्यादीनामन्व- यसद्वटनायोग्यतया वैयर्थ्यापतेः। तम्माद्वेतुत्वेन सत्व एवोस्प्रेक्षा, न तु हेतुभवनक्षमस्य सत्वेऽपीति। ताष्शस्थले तु स्वरूपोतप्रेसषाया एव सत्वम्। अन्नालङ्कारसवंस्वकारसम्मति - माह-अत एवेति। राज्याभिषेकं प्राप्येतस्मिन राजि प्रतिष्ठातुमिच्छति सति लोक्यमानार्था शत्रणां पृथ्वी भयविह्वलितेव चकम्पे इर्यन्वयः । अन्नोतप्रेचयस्य विह्वलितत्वस्य हेतुश्वप्रति- पादकशब्दरहितस्य कम्पं प्रति भवनक्षमरवेऽपि स्वरूपोप्प्रेक्षेवोदाहता। तस्माव् 'मग्ना सुधायाम्' इतयन्र हेतूतप्रेषाया असर्वेन स्वरूपोत्प्रेष्षाया एव सत्वाद्ेतुतप्रेप्षणे निमित्तो- पादानस्यासम्भव पवेति मतं सम्यगेवेति पूर्वपप्ग्रन्थस्याभिप्रायः। अम्र समाधीयते- मैवमित्यादि। (चिन्र०) एवं हि- स्मरसि स्मर मेखलागुणरुत गोत्रस्खलितेषु बन्धनम्।

इत्यत्र हेतूत्प्रेक्षा लक्ष्या न स्यात्। स्मरणगत हेतुत्वप्रतिपादकशब्दाभा- वात्। न चेष्टापत्तिः। (भारती) क्योंकि- 'हे स्मर। किसी समय एकान्त में तुम्हारे मुख से धोखे से निकला हुआ सपत्नी का नाम सुनकर मैंने प्रणयकोप से तुम को काँची गुण से वाँधा था, और अपने कर्णभूषण कुवलय से

Page 420

1

३८२ चित्रमीमांसा

तुन्हारे मुख में ताडन किया था, जिसके पराग पड जाने से तुम्हारी आँखों में कुछ व्यथा भी हुई थी। इम प्रकार किये हुए मेरे अपराधों को याद करके ही मेरे सामने नहीं आा रहे हो कया ?' यहाँ स्मरणगत हेतुत्व के प्रतिपादक गव्दामाव से हेतूत्प्रेक्षात्व-भद्गापत्ति होगी। अगर इसे इषट।पत्ि मानते है तो- (सुधा) हे स्मर काम! गोन्नस्सलनेषु नामव्यत्यासेडु, 'गोत्रं नाम्नि कुले जने' इति विश्वः। मेखलागुणेवंन्धनं स्मरसि उत! प्युतकेसर अ्र्ं कििशत्केदूंपिते ईक्षणे येधु तान्यवतंसोत्पल ताडनानि सघूषिक्षेपताडनानि छ रमरसीत्यन्वयः। अन्र स्मरणगतहेतुत्वप्रतिपादकशब्दा

(चित्न०) कृतवानसि विप्रियं न से प्रतिकूलं न च ते सया कृतम्। किमकारणमेव दर्शन विल्पन्त्ये रतये न दीयते।। इत्युकत्यनन्तरं प्रवृत्तस्यास्य श्लोकस्य, अथ वा सत्पूर्वकृतापरास्मरणे- नैव दर्शनं न दीयते किमिति हेतुत्प्रेक्षापरत्व एव सामस्जस्यात्। यदि तु हेतुत्वप्रतिपाटकशब्दाभावेऽपि पूर्वापरानुगुण्येनापि हेतूत्प्रेक्षा भवेत् तर्हीहापि तृतीयोत्प्रेक्षासमभिव्यहारात्तस्यां चिरेण मव्यत्यजने शब्दोपात्ते रखलनभय- स्यैवाद्योत्पेक्षयोरपि निमित्ततया गम्यमाने चिरान्मुखकुचत्यजने मज्जनस्थ लगनस्य च हेतुत्वेनोत्प्रेक्षणमित्येव युक्तम्। (भारती) 'हे नाथ ! तुमने स्वप्न में भी कभी मेरी वुराई नहीं की और न मैंने ही कभी तुम्हारी कोई बुराई की है, तव बिना कारण ही क्यों विलखती हुई मुझे अपना दर्शन नहीं देते हो।' यहाँ पहले छ्लोक से 'क्यों विना कारण ही दर्शन नहीं देते' इस उक्ति के अनन्तर निवद्ध इ्लोक के हेतूत्प्रेक्षाभाव में असामअ्जस्यापत्ति होगी। तत्त्व रहने पर तो प्रथम कृत अपराध के स्मरण से ही दर्शनदेनाभाव रूप सामअ्स्य है ही। अगर यहाँ पूर्वापर श्लोक के द्वारा अनुगुणन से हेतुत्वप्रतिपादक शब्दाभाव में हेतृत्प्रक्षात्व हो तो 'मग्नासुधायाम्' इत्यादि में वैसे अभाव से न होगा, ऐसा नहीं कह सकते। क्योंकि 'मझासुधायाम्' यहाँ भी 'बहुत देर से बीच में छोटने' शब्द के उपात्त मे 'गिरने' रूपी भय का ही पूर्वोत्प्रेक्षा में भी निमितत्व से गन्यमान 'विलम्ब से मुस छोडने में' मज्जन और लगन का हेतुत्व से उन्प्रेक्षण की ही योग्यता से तृतीया द्वारा उत्प्रेक्षा समभिव्याहार का ही प्रमाणत्व है। (सुधा) कृतवानिति। रवं मे विप्रियं न कृतवानसि, तव प्रतिकूछं मचा न कतस्, अकारणमेव दर्शनं विलपन्त्ये रतये किन दीयते रवथेति शेपः। अन्न पूर्वश्लोकेन किमित्यकारणमेव दर्शनं न छीयते इत्युवत्यनन्तरनिबद्दस्य श्लोकस्य हेतूेष्यभावेडलामअसयापते.। तत्वे तु सस्पूर्वकृतापराधस्मरणादेव दर्शनदानाभाव इति तक्ष्य सामअ्जस्यमेवेति मावः। न चात् पूर्वापरश्लोकयोरानुगुण्येन हेतुत्वप्रतिपादकशव्डाभावे हेतू प्रे वा्वमस्तु। मग्नेत्यादौ

Page 421

उत्प्रेक्षानिरूपणप्रकरणम् ३८३

तु तथाभावान्नेति वाच्यम्, मग्नेस्यम्रापि चिरेण मध्यत्यजने शब्दोपासे र्खलनभयस्येव पूर्वोत्प्रेपयोरपि निमितत्वेन गम्थमानचिशन्मुखत्यजने मज्नस्य खगनस्य च हेतुखवेनोपे कषणस्येव योग्यत्वेन तृतीयोश्ेषा समभिव्याहारस्येव प्रमाणत्वलवादिति भावः। (चित्र०) यत्रापि हि फले फलत्वप्रतिपादकशब्दस्तन्राप्यौचित्येन फलोत्प्रेक्षासवधीर्य हेतूत्प्रेक्षाङ्गीकार्या दृश्यते। यथा- हत्तस्य यन्मन्त्रयते रहस्त्वां तद्व्यक्तमामन्त्रयते मुखं यत्। तद्वरिपुष्पायुधमित्रचन्द्रसख्यौचिती सा खलु तन्सुखस्य॥ (भारती) किन्तु, जहाँ फलत्वप्रतिपादक शब्द फल में दिखाई देता है, वहाँ भी औचित्य द्वारा फलोत्प्रेक्षा का तिरस्कार कर हेतूत्प्रेक्षा ही करने योग्य है। नैसे- 'जो उस नल के हृदय ने तुम्हारे साथ एकान्त में मत्रणा की, अर्थात् वैसी वार्त्ता मे उसी प्रकार के आमत्रण से एकान्त में चुम्वन, आलिदिन आदि व्यापार की इच्छा की है-उस रहस्य को जिस मुख ने स्पष्ट रूप में प्रकट कर दिया। अर्थात् उस दमयम्ती के हृदय के साथ नल के वैरी काम के मित्र चन्द्रमा ने मित्रोचित व्यवहार ही किया। क्योंकि अपने मित्र का दुश्मन भी अपना दुश्मन ही होता है इस परम्परा से हृदय की मुख के साथ दुश्मनी रहने के कारण उसका रहस्य- भेद कर दिया।' (सुधा) किस्, यत्र फलत्वप्रतिपादफशब्दः फले दश्पते तम्राप्यीचित्येन फछोतरर्सां तिरस्कृष्य हेतू प्रेक्षेव कर्तुं योग्या, तथेव दर्शनादित्याह-यत्रापीत्यादि। एतदेव प्रमाणयितुसुदाहरणं दर्शयितुमाह-हृत्तस्येर्यादि। यततस्य नलस्य हस् हृदयम, स्वां रहो मन्त्रयते, तादृश- वार्ततार्या तथैवासन्त्रणात्, भावनयोपानीय, तघ्र चुग्बनालिङ्नाविण्यापारमिच्छतीत्यर्थः। यनमुखं तद्रहस्यं व्यकं प्रकटमेवासन्त्रयते प्रकाशयति, सा तस्या समयन्त्या हृदयस्य नलस्य वेरी-कामः, तस्य सिन्नं चन्द्रस्तस्य सख्येनौचिती किसु! स्वमित्रचैरिणोऽपि स्ववै- रित्वमिति परम्परया हृदयस्य सुखवैरित्वात्तद्रहस्यभेद: क्रियत इति भाव:। (चिन्न०) अत्र हि हृदयकृंतरहस्यसन्त्रणोद्भेदनप्रत्यवमशकेन तच्छब्देन सख्यौचि- तीशब्दस्य, कर्मार्थकष्यवन्तस्य सामानाधिकरण्याच्छव्दतो रहस्योद्भेदनस्य सुखगतहृदयवैरिमन्मथसुहच्चन्द्रसख्यकार्यत्वं प्रतीयते। तथापि तत्र सख्यस्य रहस्योद्वेदनं प्रति हेतुत्वेनैवोत्प्रेक्षा, नतु रहस्योद्भेदनस्य सख्यफलत्वेन । रहस्योद् सेदनं फलमुद्दिश्य सख्यं कृतमित्युत्पेक्षाया असामञ्जस्यात्।हेतुत्वमात्रेण हेतूतप्रेक्षाया इब तदुद्देशं विना कार्यत्वमात्रेण फलोत्प्रेक्षाया अनिर्वाहात्।

Page 422

३८४ चित्रमीमांसा

(भारती) इस उदाहरण में जैसे 'तत्' शब्द का हृदयकृत रहस्य की मन्त्रणा के उद्भेदन के प्रति अव मर्श- कत्व है। उसी प्रकार उसके द्वारा कर्मार्यक व्यञ् प्रत्ययान्त का औचित्य शब्द के साथ सामाना- धिकरण्य है। उसके वाद मुखगत हृदय के शत्रु काम के सुहृद् चन्द्र के मित्रत्व का रहस्य- प्रकाशन कार्य यद्यपि प्रतीत होता है। फिर भी मित्रता का रहस्य प्रकाशन के प्रति हेतुत्व से ही उत्प्रेक्षा योग्य है। न कि रहस्योद्भेदन का मित्रता रूपी फल से। मैत्रीकरण का रहस्योद्- भेदन रूपी फल के उद्देश्यत्व में उत्प्रेक्षण की असामअस्यापत्ति होगी। हेतूत्वमात्र द्वारा हेतूतप्रेक्षा की तरह उसके उद्देश के विना कार्यत्वकथन मात्र से फलोत्प्रेक्षा के निर्वाह का अभाव है, यही यहाँ कहने का तात्पर्य है। (सुधा) अश्नोदाहरणे तच्छब्दस्य हृदयकृतरहस्यमन्त्रणोन्ेदनप्रत्ययमर्शकर्वम्। तथाविधेन तेन कर्मार्थकष्यजप्रत्ययान्तस्यौचितीशव्दस्य सामानाधिकरण्यम्। ततश्च मुखगतहृदय- वैरिसन्मथसुहृस्तन्द्रसख्वित्वस्य रहस्यप्रकाशनकार्य यद्यपि प्रतीयते, तथापि सख्यस्य रहस्यप्रकाशं प्रति हेतुत्वेनैयोश्प्रेक्षा योग्या, न तु रहस्योन्वेदनस्य सखित्वफलतया, सख्य- करणस्य रहस्योन्टेदनफलो द्वेश्यरवे उत्प्रेक्षणासामस्जस्यापत्तेः। हेतुत्वमात्रेण हेतूतप्ेक्षावस् तदुद्ेश विना कार्यत्वकथनमात्रेण फलोपप्रेप्षाया निर्वाहाभावादित्या शयः। (चित्र०) एव यत्र हेतौ हेतुत्वप्रतिपादक: शब्दस्तत्रापि कवचिदौचित्येन हेतूतप्रेक्षामवधीर्य फलोत्प्रेक्षाङ्गीकार्या दृश्यते। यथा- स्मराशुगीभूय विदर्भसुभ्रूवक्षो यदक्षोभि खतु प्रसूनैः । स्नज सृजन्त्या तद्शोभि तेषु यत्रैकया सूचिशिखां निखाय॥ (भारती) हेतु में हेतुत्वप्रतिपादक शब्द रहने पर भी हेतूत्प्रेक्षा को अस्वीकृत कर औचित्य से फलो- त्प्रेक्षा की स्वीकृति कही आवश्यक है। जैसे- 'जिस दमयन्ती की सभा में फूलों ने कामवाण वन कर जो विदर्भकुमारी दमयन्ती के हृदय को पीडित किया, उस वैरी की माला वनाती हुई, एक स्त्रीने उन फूलों में सूई की नोंक चुभाकर वदला ले लिया।' तात्पर्य यह कि कामवाण वनकर जिन फूलों ने दमयन्ती के हृदय में गडकर उसे पीडित किया था। उनके हृदय (वीच) में सूई चुभा कर ही वैर का वदला लिया जा सकता है। यह विचार कर दमयन्ती को पीडित करने वाले पुष्प से उसकी सखी ने वैसा ही किया। तात्पर्य यह कि दमयन्ती की सभा में सखीगण फूलों की माला गूंथ रही थी। (सुधा) अन्यमपि विशेषमाह-पवमिति। हेती हेतुर्वप्रतिपादफशव्दसर्वेपि हेतूत्ेक्षामन- सीकृत्यीचित्यात् फलोश्प्रेप्षाया कचिदङ्गोकार आवश्यक इत्याह-एवमिति। तद्विपयमुदा हरति-यथेति। खलूत्परेषायाम्। प्रसूनैः पुष्पेः स्मरस्य वाणभावं प्राप्याशुगौ वायुविशिसी

Page 423

उत्प्रेक्षानिरूपणप्रकरणम् ३८४

विदर्भंसुभ्र: दमयन्ती, तस्या पक्षो हृदयं यत् यस्मादपोमि भिन्नम, पत्र सभार्पा चर्द माछां सजन्त्या कुर्षाणया एकया सख्या तेषु पुष्पेषु सूचिशिखा सूष्यप्रं मिखायारोष्प तह्वरमशोधि निर्यातितम। (चिम्र०)

तद्वरशोधनं प्रति हेतुत्वेनोत्प्रेदयं कि तु वैरशोधनार्थ निखननमिति वैरशोधन- मेव फलत्वेनोत्प्रेच्यम्। सिद्धासिद्धयोरपि सिद्धस्योत्प्रेक्षणीयत्वात्। इह, तदु- द्देशोत्प्रेक्षण संभवाच्च। यथा वा- अस्यव सर्गाय भवत्करस्य सरोजसृष्टिर्मम हस्तलेखः। इत्याह धाता हरिणेक्षणायां कि हस्तलेखीकृतया तयाऽस्याम्॥ (भारती) उक्त उदाहरण में 'कत्वा' प्रत्यय का 'खनन' में पूर्वकालत्वरूप कारणत्व के प्रतिपादक की उपस्थिति में भी उसके वैरिशोधन के प्रति हेतुत्व से उसकी उत्प्रेक्षा नहीं है, बरिक फलोत्प्रेक्षा ही है। क्योंकि वैरशोधन के लिए 'निखननम्' इस उक्ति से वैरिशोधन का ही फलत्व से उत्प्रेक्षण है। सिद्ध और असिद्ध की उपस्थिति में असिद्ध की ही उत्प्रेक्षा में योग्यता होती है। और यहाँ वैरिशोधन रूप फलोद्देश्यता की उत्प्रेक्षा में सभावना भी है। अथवा जैसे- 'इसी तुम्हारे हाथ के बनाने के लिए ही कमल की रचना मेरा हस्तलेख अर्थात प्रथम रेखाभ्यास है। इस प्रकार ब्रह्मा, मृगनयनी दमयन्ती के-हाथ में रेखा की गयी या लिखी गयी- उस कमल-रचना द्वारा कहते हैं क्या ?' निष्कर्ष यह कि दमयन्ती के हाथ में कमल का चिह्न अद्नित है। अत मालूम पडता है कि ब्रह्मा इस दमयन्ती के हाथ में कमल की रेखा बनाकर 'हमने तुम्हारे हाथ की रचना करने के लिए ही अभ्यासार्थ रेखा रूप से हाथ में अक्कित कमल की सृष्टि की है' यह कह रहे हैं। दूसरा कोई भी शिल्पी किसी उत्तम वस्तु को वनाने के पूर्व रेखा आदि बनाकर अभ्यास कर लेता है। दमयन्ती के हाथ कमल से भी अधिक सुन्दर तथा कमल रेखाकित होने से शुभ लक्षण सम्पन्न हैं।' (सुधा) अन्रोदाहरणे वत्वाप्रत्ययस्य खनने पूर्वकालत्वरूपकारणत्यप्रतिपाद्कस्थ सरघेपि तद्वैरिशोधनं प्रति न तस्य हेसुरवेनोशप्रेक्षा, किन्तु फलोतप्रेन्ेव, वैरशोधनाय निखननमि- व्युयत्या चैरशोधनस्येव फकरवेनोतप्रेक्षणात्, सिद्धासिद्धयोवसिसस्येघोषप्रेक्षणस्वे योग्य वात्, अम्न वैरिशोधमरूपफलोद्वेश्यताया उपेार्या सम्भवा्। अस्येवोदाहरण्तर माह-यथा वेति। अस्येव भवत्याः करस्य सर्गाय निर्माणाय सरोजानां सृष्टि: रचना मम हस्तलेखो वर्तते। पद्मसृष्टिविधानेन इस्तनिर्माणेऽतिवैषग्ध्यं भविष्यतीति दृरवा पद्मसृष्ि: क्रियत इति भावः। घाता ब्रह्मा हस्तलेखीछृतया तया पद्मसृष्टयाऽस्या इरिणेक्षणार्या दमयन्त्यामिति इस्थमाह उक्कवान् इत्यर्थः । यसमात् पम्मानि भैम्या हस्तलेखीकृपानि, तेनायसर्थ: सूचित हत्यर्थः। 'इमानि तानि पभ्मानि हस्ततोये: कुलस्तिियः। राजराज्येऽभि- षेचयन्ते नरेन्द्रैभर्तृभिः सह ॥' इति लङ्काकाण्डे सीतोके। २५ चित्र०

Page 424

३५६ - चित्रमीमांसा 7

(चित्र०) अन्र हस्तलेखीकृतया सरोजसृष्टयेति करणविभक्तिसद्भावेऽपि न सा विघातृकर्त कसरोजसृष्टिगतहस्त लेखत्वप्रकाशनं प्रति हेतुत्वेनोतमे्यते, किन्तु तत्प्रकाशनार्थ सरोजसृष्टिर्हस्तलेखकरणमिति तत्प्रकाशनमेव फलत्वेनो- त्प्रेच्यम्। कि बहुना, यत्र हेतुत्वप्रतिपादकः शब्दस्तस्यैव फलत्वमौचित्येन क्वचिद- ड्रीकार्य दृश्यते। (भारती) यहाँ हस्तलेखीकृत से कमल की रचना द्वारा कारणविभक्ति के रहने पर भी विधाता के द्वारा कमल की रचना हाथ से लिखने के प्रति हेतुत्व से उत्प्रेक्षा नहीं है। वल्कि, उसके प्रकाशन के लिए कमल की रचना-हस्तलेसकरण-का प्रकाशन ही फलत्व से उत्प्रेक्षित है। अधिक क्या? हेतुत्वप्रतिपादक शब्द का ही मौचित्य से कहीं फलत्व त्वीकृत करना चाहिए। (सुधा)

एसष्टधेतिकरणविशेषसद्भावेपि न तस्या हेतुरवेनोतेक, किन्तु तत्प्रकाशनार्थ सरोनसृष्टे- हस्तलेखकरणमिति रीत्या तत्प्रकाशनस्येव फलत्वेनोमेप्षणीयत्वास। अन्यदपि विशेषाम्तर- माह-कि बहुनेति। हेतुत्वप्रतिपादकशव्दस्यैवोचित्येन क्वचिछ् फलतवमक्गीकार्यम्, तथोदाहरणे दृष्टत्वादित्याह-इश्यते यथेति। (चित्र०) यथा- स्तनावालोक्य तन्वङ्गयाः शिरः कम्पयते युवा। तयोरन्तरनिर्ममनां दृष्टिसुत्पाटयन्निव।। अत्र शतुर्हेतौ विधानेऽपि फलस्याप्युद्देश्यतया कथंचिद्धेतुत्वसित्युपपाद्य फलोत्प्रेक्षाङ्गीकरणीया ।

तदा किमु वक्तव्यं विरोधिशव्दाभावे औचित्यातुसरणं कार्यमिति। एवसनया दिशान्यत्रापि निभित्तानुपादानं संभवदूहनीयम्।

जैसे- (भारती)

'वह चुवक इस तन्वद्ी के दोनों विशाल स्तनों को देखकर अपना शिर कॅपाता है। मालूम पडता है जैसे उस युवती के दोनों स्तनों के वीच गडी हुई अपनी आँसों को उखाड रहा है।' यहाँ 'उत्पाटयन्' गत हेतु में अतृप्रत्यय विधान करने पर भी उसकी हेतुना अनिश्चित है। क्योंकि शिर कँपाने में उत्पाटन क्रिया का फलत्वेन उत्प्रेक्षण ही स्वीकृत करना चाहिए।

Page 425

उत्प्रेक्षानिरूपणप्रकरणम्

इसी प्रकार हेतुत्वप्रतिपादक शब्द रहने पर भी उसका अनादर कर, फलोत्प्रेक्षा ही- स्वीकृत करना चाहिए। जब फलत्वप्रतिपादक शब्द रहने पर भी औचित्य से हेतूत्प्रेक्षण का ही प्रति- पादन हो, तब विरोधी शब्द के अभाव में चित्यानुसरण को अस्वीकृत करना चाहिप, इस कथन में क्या दोष है? इसलिए 'मग्ना' इत्यादि में अनुपात्त निमित्त हेतूत्प्रेक्षा रहने से उस उत्प्रेक्षा में निमित्तानु- पादन कहीं भी सभव नहीं है। यह कथन असगत ही है। इसी प्रकार इससे उक्त निमित्त और अनुक्त निमित्त के जो भेद की स्वीकृति है, वह भी अयुक्त है, क्योंकि उन दोनों के समुच्चय का भी दृष्टत्व है। अतः उन दोनों की गणना का विरोध स्पष्ट है। (सुधा) यत्रैतसुदाहरणे प्रसिद्धं तमुषाहरति-स्तनाविति। युवा तन्वङ्याः कुचावालोकय शिरो मस्तकं कम्पयते। तयोः स्तनयोर्मध्ये निमग्नां दृष्टिसुत्पाटयन्निवेष्यन्वयः। अन्न उत्पाटयन्तित्यत्र हेती शतृप्रत्ययविधानेऽपि तस्य हेतुत्वमनिश्ित्य शिरःकम्पने उत्पाटनस्य

शब्दसत्वेऽपि तदनाहत्य फलोतोप्षाया एवाङगीकारे इत्यर्थ:। वक़ा फलत्वप्रतिपाठकशब्द- सत्वेऽप्योचित्येन हेतूतपेक्षणस्थेति प्रतिपादनम्, यदा विरोधिशब्दाभावे औचित्यामुसरण- मङ्गीकार्यमिति कथने को दोष इति। तस्मात् 'मग्ना' इत्यादावनुपाप्तनिमित्तहेतू तप्रेक्षा सच्वेन तद्टुत्प्रेषार्या निमित्तानुपादानं न क्वापि संभवतीति प्रतिपादनमल्ङ्गतमेवेति अन्थकृदमिपायः। उपसंहरति-एवमनयेति। यथोकनिमित्तानुकनिमित्तार्म्या यद्ेदाङ्गी- करणं तद्प्ययुक्तम, तयोः समुचयस्यापि दष्टत्वाद्। (चिन्न०) अपि च- यथोपात्तनिमित्तत्वमनुपास्तनिमित्तता । प्रत्येकं वर्तते तद्वत्समुच्चित्यापि दृश्यते॥ यथा- मुनिद्रुमः कोरकितोऽसितद्युतिर्वनेऽमुनामन्यत सिंहिकासुतः। तमिस्रपक्षत्रुटिकूटभक्षितं कलाकलापँ किल वैधवं वमन्।। अत्र कोरकनिर्गमनविशिष्टस्य सुनिद्रुमस्य विधुकलाकलापवमनवशिष्ट- राहुरूपत्वे उत्प्रेक्ष्यमाणे विशिष्योत्प्रेक्षानिमित्तमसितवर्णत्वमुपात्तम्, विशेष- णोत्प्रेक्षानिमित्तं तु केरकविधुकलासाधर्म्यादिरूप नोपात्तम्। (भारती) और भी-'उपात्त निमित्तत्व और अनुपात निमित्तत्व जैसे प्रत्येक देखे जाते हैं उसी प्रकार उन दोनों के समुच्चय भी देखे जाते हैं।' जैसे- 'इस नल ने वन में कोरकित कृष्ण वर्ण अगस्त्य को कृष्ण पक्ष में चन्द्रकलाक्षय के कपट से भक्षित चन्द्रकला को वमन करते अर्थात उगलते राङ्डु के समान माना। अथवा अन्धकार में कपट

Page 426

चित्रमीमांसा

पूर्वक साये गये पशु आदि को वमन करते हुए सिंह के वच्चे के समान माना। कहने का तात्पर्य यह कि प्रथम पक्ष के अर्थ में-यह राद्टु चन्द्रमा को खा गया था, अत एव मुझे संताप नहीं होता है किन्तु, अव पुनः यह चन्द्रमा को वमन कर रहा है-अत एव यह चन्द्रमा मुझे पुनः सतप्त करेगा, ऐसा समझकर वे डर गये। दूसरे अर्थ में-अन्धकार में किसी पशु को खाकर उसे उगलते हुए सिंह को जगल में देखने से भयभीत होना स्वाभाविक ही है। निष्कर्ष यह कि अगस्त्य को कलीयुत देखकर उसे कामोहीपक होने के कारण राजा नल डर गये।' इस उदाहरण में मुनिद्रुम का कोरकित विशेषण विगिष्ट का चन्द्रमा के कला-कलापविशिष्ट राहुरूपत्व की उत्प्रेक्षा मे राहुरूप विशेष्य उत्प्रेक्षा निमित्त का कालेरग के उपादान से और कोरक विधुकला साधर्म्यवाचक विशेषण उत्प्रेक्षा निमित्त अनुपादान से उपात्तनिमित्ता और अनुपात्तनिमित्ता के समुन्चितत्व से लक्षण का समन्वय है। (सुधा) तस्मान्ताभ्यामेव गणनं विपद्धमिति दूषण प्रतिपादयितुमारभते-अपि चेति। उपात्तनिमित्तत्वमनुपात्तनिमित्तवञ्व यथा प्रत्येकं दृश्यते तथा तथोः समुप्तयोऽपि दृश्यते इत्यन्वयः। उपात्तनिमित्तानुपात्तनिमित्तयोः समुचयमुद्दाहरति-यथेति। अमुना नलेन चने वाटिकायाम, असितद्यतिः कृष्णवर्णः 'सिती धवछमेचकौ' हरयमरः। कोरकिसः कुडसछितः, तारकादित्वादित्। मुनिद्गुमोऽगस्तिटृथ, तमितपकः कृष्णपत्षस्तस्मिन् या त्रुटि: सयः, तस्य कूटं छुलम। 'माया निश्चलयन्त्रेषु केतवानृतराशिषु। अयोघने शेछमक्धे सीराझे कूटमस्त्रियाम् ॥' इत्यमरः । तेन-भच्षितं निगीण वैधवं चान्द्म्, शैषिकोडण, कलानां कळापं समूहं किल निश्षयेन वमन्तुद्विरन् सिंहिकासुतो राहुरमन्यत मेन इत्यर्थः। अत्रोदाहरणे सुनिद्ुमस्य कोरकितविशेषणविशिष्टस्य विधुकलाकलापवमन-

निमित्तस्वयो: समुच्चितत्वस्य सध्वाव्वक्षणसमन्ययः।

यथा वा- (चित्र०)

त्वत्प्राङ्गणे सुन्दर पाण्ड्यदेव मतङ्गजाः मृङ्गलिनो विभान्ति। आवासदानादरिभूपतीनामाशान्तशैला इव सापराधाः॥ अत्र विशेषणभूतसापराधत्वोत्प्रेक्षानिमित्तं शङ्गलितत्वमुपात्तम्, विशेष्य- शैलरूपत्वोत्प्रेक्षानिमित्तमौन्नत्यादिकं नोपात्तम्। यथा वा- अजस्रभूमीतटकुट्टनोस्थितैरुपास्यमानं चरणेपु रेणुभिः । रयप्रकर्षाध्ययनार्थमागतर्जनस्य वेतोभिरिवाणिमादितः॥ (भारती) अधवा दूसरा उदाहरण जैसे-'हे सुन्दर पाण्ड्य देव। तुन्हारे प्राह्मण में जजीरों में बन्धे मद- मत्त हाथियों के समूह, दुश्मन राजाओं के निवासदान से अपराधयुत दिगन्त शैल की तरए नोम रहे हैं।'

Page 427

उत्प्रेक्षानिरूपणप्रकरणम् ३८६

यहाँ विशेषणभृत सापराध उत्प्रेक्षा निमित्त का शृङ्धलितत्व निमित के उपादान से और विशेष्यीभूत शैलरूपत्व की उत्प्रेक्षा में औन्नत्य रूप निमित्त के अनुपादान से, उन दोनों के समु- च्िचितत्व विशेष्य के उत्प्रेक्षण में निमित्तोपादन है। अर्थात् यहॉ विशेषण के उत्प्रेक्षण में निमित्तो- पादान है। अथवा जैमे- 'यह घोडे का वर्णन है, घोडा कैसा है? चरणेषु=पैरों में, रेणुभि .= धुलियों से, उपास्यमान= सेव्यमान है। वह धूलि कैसी है ? अजस्न=अनवरत अर्थात् लगातार, यत्=जो, भूमितटस्य=धरती का, कुट्टन=क्षोदन, तेन=उससे, उत्थित = उडे हुए, किसकी तरह? रय =वेग, तस्य प्रकर्ष=उसका अतिशय, तस्य अध्ययन =उसकी शिक्षा, तदर्थ=उसके लिए, आगते =प्राप्त, लोकस्य=मनुष्य के, चेतोभि. = मन की तरह, फिर वह कैसा है? अणुत्वेन=अणु से, अद्वितै =चिह्नित है।

(सुधा) उदाहरणाग्तरमाह-यथा वेति। हे सुन्दर पाण्ड्यदेव! सतमजा: हस्तिन: शङ्गला- युता: तथ प्राऊणे छत्रुनृपतीनां निवालछानासू सापराधा दिगन्तशैला इव, विभान्ति शोभन्ते इत्वन्वयः । अश्र विशेषणीभूतसापराधोत्प्रेक्षानिसित्तस्य शृङ्धलितत्वनिमित्तस्यो- पादानेन विशेष्यीभूतशलरूपत्वोत्प्रेक्षणे औसत्यरूपनिमित्तस्यानुपादानेन व तयोः समुच्ितत्वं पूर्वत्र विशेष्योत्प्रेक्षणे निमित्तोपादानम। इछ विशेषणोेक्षणे निमित्तो- पादानमिति विशेष: । अत्रैवोद्ाददरणान्तरमाह-घथा वेति। पुनः कीषशं हयं चरणेपु रेणुमि: धूषिभिः उपास्यमानं सेध्यमानं कीटशेः अजस्मनपरतं यत् भूमीतटस्य पृथ्वी- तलस्य कुट्टनं चोदनं तेनोत्यितैः कैरिच, रयो वेगस्तत्य प्रकर्षोडतिशयः, तस्याध्ययनं शिष्ता, तदर्थमागतैः प्राप्तैः लोफस्य चेतोसिरिघ कीदशैरणुत्वेनाद्टितैः चिह्नितैरित्यन्वयः। (चित्र०) अन्र विशेष्यभूतचेतोरूपत्वोत्प्रेक्षायामणिसाङ्कितैरिति निमित्तमुपात्तम्। अध्ययनार्थमागतैरिति तद्विशेषणोत्प्रेक्षायासपि चरणोपासनारूपं निमित्त- मुपात्तम्। रयप्रकर्षेत्यध्ययनविशेषणे निमित्तं चेतसां वर्णनीयादन्घादपकृष्टरयत्वं नोपात्तम् । एव मन्यत्रापि निभित्तोपादानानुपादानससुच्चये उदाहर्तव्यम्।

(भारती) इस उदाहरण में विशेष्यभूत धूलियों के मनरूपत्व से उत्प्रेक्षण है। वहाँ 'अणुत्वाञ्चितम्' इस निमित्त के इस उपादान से अध्ययनार्थ आगमन की उत्प्रेक्षा में भी चरण की उपासना रूप निमित्तोपादान से गुण और क्रिया के निमित्तभूत का भी समुच्चय है। वेग की विशेपता का अध्ययनविशेष की स्वीकृति में तो वर्णनीय घोडे से मन का अपकृष्ट वेगत्व निमित्त अनुपात्त है। इससे उपात्त और अनुपात्त निमित्त से ही समुच्चय है। इसी प्रकार दूसरी जगह भी निमित्त का उपादान और अनुपादान समुच्चय में उदाहरण मानना चाहिए।

Page 428

३६० चित्रमीमांसा

(सुधा) अम्रोदाहरणे विशेष्यभूतरेणूर्ना चेतोरुपत्वेनोोक्षणम्, तन्र अणुत्वाक्षितमिति

गुणक्रिययोनिमित्तभूतयोवपि समुक्षयः। सावाभावयो: ससुयोदाहरणे भाययोरेव

निसित्तसनुपात्तमित्यु पात्तानुपात्त निमित्तयोरेव tc9 समुच्चय इति। पतद्रीतिमन्यत्रातिदिशति-एवमन्यत्रापीति। यथा-'विचिन्वती पान्थपतङ्गहिंसनै- रपुण्य कर्साण्यलिकजह च्छलातू। व्यलोकय पम्पककोरकावली: स शम्बरा रेबलिदीपिका इच ॥' इत्यन्र कोरकावलीनां वलिदीपिकात्वोेपणेडलिकजलेप्वपुण्य कर्मत्वोक्रेक्षणे चानुपात्तनिमित्तयोरपि समुच्चय उदाहर्त्तव्य हति। (चित्र०) तस्मान्न्यून: सतृणाभ्यवहारञ्चायं विभागः । अतोऽत्र विषयिणो जात्यादि- रूपेणाष्टधा विभागम् , धर्मस्य गुणक्रियारूपेण विभागं चापहाय विभागान्तर- लभ्या यावन्तो भेदास्तावन्त एव चमत्कारिणः । स्वरूपहेतुफलोत्प्रेक्षासु तु विधान्तरेणाप्यवान्तरभेदाः संभवन्ति। यथा- स्वरूपोत्प्रेक्षा द्विविधा, अविशिष्टोत्प्रेक्षा विशिष्टोत्प्रेक्षा च। यत्र विषयिणो विशेषणसुपात्तमपि नोत्प्रेक्षणीयमवगम्यते तद्विषयरूपस्य तन्निमित्तरूपस्य वा विषयविशेषणस्याभावात्, कि तु तद्विशेषणं विषयिणि विधान्तरेणोपयुज्यते सा विशिष्टोत्पेक्षा। यत्र तु विषयिणो विशेषणमप्युत्प्रेक्षणीयमवगम्यते तद्विषयरूपस्य तन्नि- मित्तरूपस्य वा विषयविशेषणस्योपादानात् सा विशिष्ठोत्प्रेक्षा। (भारती) अतः उनके मत से उपपादिन दोनों मेदविभाग न्यून ही हैं। जिस तरह तृण और भूसे से सम्मिलित मोजन में स्वाद नहीं आता है, उसी प्रकार उक्त मतद्वय के भेद में किसी प्रकार का चमत्कार नहीं जानना चाहिए। इस लिए यहाँ विषयी के जात्यादिरूप से आठ प्रकार के भेद, गुण और क्रिया रूपों के भेदों को छोडकर विभागान्तर प्राप्त भेदों को चमत्कारी मानते हैं। स्वरूपोत्प्रेक्षा दो प्रकार की है-१ उक्त विषया और २ अनुक्त विषया। हेतु और फल की उत्प्रेक्षा में प्रत्येक दो प्रकार की है। असिद्ध और सिद्ध विषय के भेद से इन भेदों को ही चमत्कारजनक जानना चाहिए। प्रकारान्तर से उन भेदों को बताते हैं। स्वरूपोत्प्रेक्षा दो प्रकार की है १ अविशिष्ट उत्प्रक्षा और २ विशिष्ट उत्प्रेक्षा। उनमें पहली उत्प्रेक्षा का लक्षण बताते हैं-जहाँ उसके विषय रूपक अथवा उसके निमित्त रूप का विषय विशेषण के अभाव से उपात्त का भी विषयी के विशेषण की उत्प्रेक्षा का अवगमन न हो, किन्तु विषयी का प्रकारान्तर से उपयोग हो-वही अविशिष्टोत्प्रेक्षा कछलाती है।

Page 429

उत्प्रेक्षानिरूपणप्रकरणम् ३६१

दूसरी उत्प्रेक्षा का लक्षण कहते हैं-जहाँ विषयिरूप का अथवा विषयिनिमित्त रूपका विषयिविशेषण के उपादान से भी उत्प्रेक्षणीयत्व से अवगमन हो वहाँ विशिष्टोत्प्रेक्षा होती है।

(सुधा)

सतृणाभ्यवहारश्र=यथा तृणादिसहिताजभोजने नास्वाद: तथान्र मतदयभदे चमत्काराभाव इति बोध्यमू। स्वयं वच्यमाणरीत्या विसागसाह-अतोऽत्रेति। विपयिणो जात्यादिरपेणाष्टधा प्रकारं गुणक्रिया रूपाभ्यां धर्मभेदख्व परित्यज्य विभागान्तवलभ्या यावन्तो भेदा: स्वरूपोतप्ेका द्विधा-उक्तविषया, अनुक्कविषथा प, हेतुफलोतप्रेक्षे प्रत्येकं द्विषा असिद्धसिद्धचिषयभेदाद, एतेषानेव चमत्कारकारित्वम। प्रकाशन्तरेण तेषु भेवमाह-स्वरूप इत्यादि। स्वरूपो- तप्रेक्षा द्विविधा, अविशिष्टोत्प्रेप्ाविशिष्टोत्प्रेक्षाभेदात्। त्रादाया लक्षणमाह-यम्र चेति। तद्विषयरूपस्य तव्विमित्तरूपस्य वा विषयविशेषणस्याभावेनोपातस्थापि विर्षयविशेष णस्य नोतोक्षावगमः, किन्तु विषयिणि प्रकारान्तरेणोपयोगः, सा अविशिष्टोतप्रेक्षेति लक्षणार्थः। द्वितीयाया लक्षणमाह-यत्र त्विति। विषयिरूपस्य विषयिनिमित्तरुपस्य वा विषयि- विशेषणस्योपादानाव विषयिणो विशेषणस्याप्युत्प्रेक्षणीयत्वेनायगमनं द्वितीयेश्यर्थः। (चित्र०) तत्राद्या यथा- रतेर्गृहीतानुनयेन काम प्रत्यर्पिन स्वाङ्गमिवेश्ववरेण। काकुत्स्थमालोकयतां नृपाणां मनो बभूवेन्दुमतीनिराशम्। अत्र मद्नरूपत्वोत्प्रेक्षायां मदनाकृतिशालित्वमस्ति निमित्तम् । अतस्ता- वदुत्प्रेक्षणीयमवगम्यते तत्प्रत्यर्पणं रत्यनुनयप्रसन्नेन परमेश्वरेण कृतमिति विशेषणांशस्तु नोत्प्रेक्षणीयोऽवगम्यते, तदंशे विषयस्य वाच्यस्य गम्यस्य वा निमित्तस्य वा लाभात् । कि तु परमेश्वरद्ग्घस्य मदनदेहस्यासुरदग्धस्य कचदेहस्य शुक इव न कश्चिदन्यः प्रत्यर्पणं कतु शक्कोतीति विषयिणि प्रत्य- र्पणोपपादकतया तद्विशेषणमुपयुज्यते इत्यविशिष्टोत्प्रेच्षेयम्। (भारती) प्रथम का जैसे-'रति अर्थात् कामपली की प्रार्थना को स्वीकार कर शिवजी से फिर अपने शरीर को प्राप्त किये हुए काम के समान अज को देखते हुए राजाओं का मन इन्दुमती को पाने से निराश हो गया।' इस उदाहरण में अज का मदन रूप की उत्प्रेक्षा में मदन के आकृतिशालित्व रूप की उत्प्रेक्षणीयता में अवगमन रहने पर भी रति की प्रार्थना से प्रसन्न महादेव द्वारा प्रत्यर्पण रूप विशेषणाशविषय का अथवा वाच्य का प्रतीयमान के लाभत्व से उत्प्रेक्षणीयता का अवगम नहीं है। किन्तु महादेव के द्वारा जलाई गयी मदन की देह प्रत्यर्पण में, दैत्य के द्वारा जलाई गयी कच की देह के प्रत्यर्पण में शुक्र की तरह दूसरे के सामर्थ्य के अभाव से विषयी में प्रत्यर्पण की उपपादकता से उसके उपयोग द्वारा अविशिष्ट उत्प्रेक्षा ही यहाँ हुई।

Page 430

३६२ चित्रमीमांसा

(सुधा) तम्न प्रथमभेदस्योदाहरण कथयति-तत्रेति। रतेः स्मरप्रियायाः सकाशाद् गृहीता- नुनयेन र्वीकृतप्ार्थनेन, सापेक्षरचेन गमकतया समास, ईश्वरेण हरेण प्रत्यर्पितस्वाङ्ग प्रतिदत्तशरीरं काममिव स्थितं काकुतस्थसजमालोकयतां नृपाणां मनः कर्त्त इन्दुमत्याँ निःस्पृहं धभूव इत्यन्वयः। अन्रोदाहरणेजजस्य मदनरूपरवेनोप्रेक्षणे मदनाकृतिशालित्व-

शस्य विषयस्य वाध्यस्य वा प्रतीयमानस्य लाभत्वेन नोतेप्षणीयत्वावगमोडस्ति, किन्तु हरदग्धस्य सदषनतनोः प्रत्यर्पणे दैत्यदग्धकचदेहार्पणे काव्यस्येवान्यस्य सामर्थ्याभावाव्

(चिन्र०) विशिष्टोत्प्रेक्षायां 'मुनिद्रुमः कोरकितोऽसितद्युतिः' 'त्वत्प्राङ्गणे सुन्दर पाण्ड्यदेव' इत्याघुदाहरणे विषयोपादानाद्विषयिविशेषणस्योत्प्रेक्षतावगम्यते। द्वितीये निसित्तोपादानाद्वेतुफलोत्प्रेक्षे त्वसिद्धयोः सिद्धयोरवो हेतुफलभावेनो- त्प्रेक्षणीयतया प्रत्येक द्विविधे। 'सैपा स्थली यत्र विचिन्वता त्वाम्' 'चोलस्य

लिपिदर्शनादिकयोहेंतुफलाभावेनोत्प्रेक्षणीयता। (भारती) दूसरी उत्प्रेक्षा का उदाहरण देते हैं-'सुनिद्रुमः कोर किनोऽसितघति.', 'त्वतप्राङ्गणे सुन्दर पाण्सधदेव' इत्यादि पूर्व व्याख्यात उदाहरणों में विधुकलाकलाप विषय के उपादान से विषयी 'मुनिद्रुम' का जो विशेषण कोरकितत्व है उसका भी उत्प्रेक्षावगम से विशिष्टोत्प्रेक्षा है। दूसरे में जजीर रूप निमित्तोपादान से अपराध युक्त विशेषण के रहने पर दोनों में मेद है। असिद्ध अथवा सिद्ध के हेतुत्व से अथवा फलत्व से उत्प्रेक्षण में हेतु और फल की उत्प्रेक्षा से प्रत्येक दो प्रकार की हैं। उन दोनों के असिद्धास्पद हेतु फलोत्प्रेक्षा में उदाहरण देते हैं-'सपा स्थली यत्र विचिन्धता त्वाम्''वोहस्य यद्भीतिपलायितस्य' इत्यादि पूर्व व्याख्यात उदाहरणों में क्रमश नूपुर के मौनत्व की उत्प्रेक्षा में उसके जडत्व से असिद्ध के वियोग रूप दुख हेतुत्व की उत्प्रेक्षा से असिद्धास्पदा हेतूत्प्रेक्षा है। दूसरे में कण्टकित वृक्ष से माथे की चमडी उधेडने में ललाट- लिपि दर्शन की इच्छा से जडता में असभावना के कारण उसका फलत्वेन उत्प्रेक्षण में असिद्धा- स्पदा फलोत्प्रेक्षा जाननी चाहिए। सिद्धास्पदा हेतुफलोत्प्रेक्षा के उदाहरण जैसे-

(सुधा) द्वितीयासुदाहरति-मुनिद्रुम इति त्वत्प्राङ्गण इति च । पूर्वसेवोभौ व्याख्यातौ। दयोविषयमाह-िषयेति। विधुकलाकलापत्य विषयत्योपादानेन विपयिणो मुनिद्ुमस्य यद्विशेषणं कोरकितस्वं तस्याप्युत्प्रेवयतावगमाद विशिषटोखेक्षा। द्वतीये शृद्धलितत्वरुपनि मित्तोपादानात् लापराधस्य विशेषणरय तर्वेन सेति तयोरभेंद इत्यर्थः। असिद्चोर्वा हेतुरवेन वा फलरवेन वोतपेक्षणे हेतुफलोपप्रेक्षे प्रत्येकं द्विविधे। तयोरसिद्धास्पद हेतुफलो- सप्रेप्षे उदाहरति-सैषा स्थलीति। घोलस्येति पूर्व व्याख्यातम्। आधे नूपुरस्य मौनरवोले-

Page 431

उत्प्रेक्षानिरूपणप्रकरणम्

वृणे तस्य जडरवेनासिद्धस्य विश्लेषद्रःखस्य हेतुख्वेनोतप्रेकणात असिद्धास्पदा हेतूत्रेक्षा। द्वितीये कण्टकिद्गुमः भालखवोसपाटने ललाटलिपिदर्शनेछछाया जडेप्वसंभवास् तस्प फलत्वे- नो प्रेक्षणेऽसिद्धास्पदा फलोमपेक्षाऽवगन्तव्या। (चित्र०) आलोहित तलावेतौ क्षितौ विच्ेपणादिव। वर्णयेम कथं तन्व्या: पादौ पल्लवकोमलौ।। पूरं विघुर्वर्धयितुं पयोधे: शङ्केयमेणाङ्कसणि कियन्ति। पयांसि दोग्धि प्रियविप्रयोगात्सशोककोकीनयने कियन्ति॥ इत्यादिषु पादचन्द्रादौ स्वतःसिद्धयोरेव विक्षेपपयोवर्धनादिकयोर्हेतुफला- भावेनोत्प्रेक्षणीयता। प्रकारान्तरेणापि कतिचिदस्या भेदान् ससासोक्तिप्रकरणे दृशयिष्यामः। (भारती) 'इस कोमलाङ्गी नायिका के ये ढोनों पल्लव के सदृश कोमल चरण जो धरती पर पदक्षेप के कारण अत्यन्त आरक्त हैं-उनका वर्णन हम कैसे करें ?' 'यह चन्द्रमा इस समुद्र के प्रवाह को वढाने की इच्छा से मानो इस चन्द्रकान्तमणि से कितने अपरिमित पय अर्थात् जल दूहता है तथा अपने प्रिय के वियोग से सतप्त चक्रवाकी की आखों से कितना जल दूहता है।'- प्रथम उदाहरण में विशेषण का चरण के साथ हेतूत्प्रेक्षा है और दूसरे में चन्द्रकान्त मणि का पयदोहन में सागर के प्रवाह्वद्धनरूपी फल का वस्तुत सागर में ही रहने के कारण सिद्धाम्पदा फलोत्प्रेक्षा ही चमत्कारक है। प्रकारान्तर से भी इसके अन्य भेदों को समासोक्ति प्रकरण में दिखायेंगे। विमर्श-चित्रमीमासा में समासोक्ति नाम का कोई प्रकरण नहीं है किन्तु ग्रन्थकार ने यहाँ इस प्रकरण का उल्लेख किया है। इससे स्पष्ट रूप से यह पता चलता है कि यह ग्रथ अधूरा है। इतना ही नहीं यह ग्रन्थ अधूरा है इसके प्रमाण में ग्रन्थकार की स्वय स्वीकारोक्ति है- 'अप्यद्धचित्रमीमांसा न मुदे कस्य मांसला'। (सुधा) सिद्धास्पदे हेतुफलो प्रेक्षे उदाहरति-आलोहिततलाविति। तन्व्धा नायिकाया पुतौ पल्लकोमलौ पादौ, विती भूम्यां विक्षेपणाद् विन्यासादियालोहिततली व्य कथं वर्णयेमेत्यन्वयः । अम्र विक्षेपणस्य चरणयोः सर्वेन सिद्धास्पदा हेतृत्प्रेक्षा। पूरमिति। 1 अयं विधुश्नन्द्धः पयोधे ससुदस्य पूर वर्द्धयितुमेणाङ्गमणि चन्द्रकान्तम्ण करियन्त्परि मितानि पयांसि दोग्धीति शेष:। 'अकथितळ्ञ' इति सून्नेण पणाक्कमणेरित्यस्य कमसज्ञा- स्वेन द्वितीया। तथा प्रियैरवियोगे सति सशोकार्ना कोकाङगनाना नयने कियन्ति पयांसि दोग्धीत्यन्वयः । अत्रणाक्कमणेः पयसां दोहने पयोधेः प्रवाहषद्हुंनस्य फछरय वस्तुतः पयोधी सप्वेन सिद्धास्पदा फलोतपरेक्षा एव चसत्फारवती। अष्टी भेदानू प्रदुर्श्य प्रकारा- न्तरेण सम्भवतो भेदान् अतिदिशति-प्रकारान्तरेणापीति। यद्यपि समालोकिप्रकरणे

Page 432

३६४ चित्रमीमांसा

चिश्रमीमांसा नारिति तथाप्येवमभिप्रायो अन्थकारस्यानुमीयते। उत्प्रेक्षा प्रकारान्तरेण द्विविधा-शुद्धा, संकोर्णा च। आधा दर्शिता। द्वितीयायां रूपकसंकीणरवं यथा-'नयनेन्दि- न्दिरानन्दमन्दिरं मिलविन्दिरम। इदमिन्दीवरं मन्ये सुन्दराद्ि तवाननम्॥'अब्र प्रथमार्ध- गतः प्रथमो धर्मो रूपकेण विर्षायविषयसाधारणीकृतः, द्वितीय श्वाभेदाध्यवसायेन। श्ळेपसं- कीर्णोदाहता। अन्यापि यथा-'विभाति यस्या ललितालकार्या मनोहर वैश्रवणस्य लघसीः। कपोलपालि तव तन्वि सन्ये नरेन्द्रकन्ये दिशसुत्तराख्याम्॥' विषमचिषयिधर्म- विश्ेषणयोरलकालकयोः श्रवणनेश्रवणयोश्च श्लेपेणाभेदे उत्प्रेक्षाघर्सस्य साधारण्यात संकीर्णा।

मन्ये वल्लभमीपते॥' अन्न वल्कभेक्षणस्य मनस्युत्प्रेक्षाया तन्निमिनभन्तःप्रदेशाद वहि- रागमनमुत्प्रेचयम्। तन्र घहिःप्रदेशसम्बन्धरूपं माणिक्यमात्रवृत्ति मनसो न सम्भवतीति माणिक्यापह्नुत्या मनोशतं क्रियते। एथमन्यदप्यूद्यमिश्यलम्। (चिन्न०) यत्तु सर्वस्वकता वैचित्रयान्तरमस्या दशिंतम्। एषा क्वचिद्धर्मविषये श्लिष्टा, कचिच्छलादिशव्देन सापह्नवा, क्वचित्पदार्थान्वयवेलायां सादश्या-

णोत्प्रेक्षायां पर्यवस्यतीत्युपमोपक्रमा चेति। तत्र धर्मविषये श्लिष्टत्वं किमित्युपन्यस्तम्। किं धर्मस्य निमित्तानुगा- मितयेव श्लेषेणापि निर्वाह्यत इति, कि वा धर्माशेषु शुद्धतेव श्लेषेणालङ्कृतापि दृश्यत इति। आद्ये उपमायां साधारणधर्मस्यानुगामित्वाद्यो यावन्तो भेदा: साधारण्यनिर्वाहकास्ते सर्वेऽप्युत्प्रेक्षायां धर्मस्य निमित्ततानिर्वाहकाः संभव- न्तीति न्यूनो विभाग: । तथा हि 'बालेन्दुवक्राण्यविकाशभावात्' इत्यादौ तावदनुगामित्वं स्पष्टम्। (भारती) यहाँ यत्तु से अलकारसर्वस्वकार के मत का फिर खण्डन करते हैं। यह उत्प्रेक्षा कही धर्म- विषय में श्लिष्ट है, तो कहीं कपट आदि शब्द से अपहुति के साथ है और कहीं पदार्थान्वय समय में सादृश्य के अभिधान से उपमा के उपक्रान्तत्व रहने पर मी वाक्यार्थ तात्पर्य सामर्थ्य से अभिमान- वती व्यापार के औचित्य क्रम से उत्प्रेक्षा पर्यवसान द्वारा उपमोपक्रमा उत्प्रेक्षा में तीन प्रकार की विचित्रता अलकारसर्वस्वकार रुय्यक ने स्वीकृत की है। रुय्यक के उक्त लक्षण में दोष दिखाते हुए पूछते हैं कि वहॉ धर्मविषयश्लिष्टत्व का क्या अर्थ करते हैं ? धर्म की अनुगामिता से जैसी निमित्तता होती है वैसी ही निमित्तता श्लेष से भी होती है अथवा धर्म के अश में शुद्धा की नरह कपट व्याज से श्लेषालकार में भी निमित्तता होती है? प्रथम में दोष बताते हैं कि अनुगामित्व आदि भेदों का जब तक उपमा में साधारण धर्म के साधारण्य की निर्वाहकता है तभी तक उत्प्रेक्षा में धर्म की निमित्तता का निर्वाह सभव है। अन्यथा उक्त तीन भेदों के कथन में न्यूनत्वापत्ति है। 'घालेन्दुचक्राण्यविकाशभावात्' इत्यादि उदाहरण में अनुगामिता स्पष्टरूप से प्रतीत है। (इसकी व्याख्या पहले हो चुकी है)

Page 433

उत्प्रेक्षानिरूपणप्रकरणम् ३६५

(सुधा) पुनः सर्वस्वकारमतं खण्डयितुमुपक्रमते-यच्विति। पृषा कचितूर्मचिषये श्लिष्टा, नवचिच्छलादिशब्देन सापह्ववा, क्वचित्पदार्थान्वयसमये सादृश्याभिधानादुपमाया

पमोपक्रमा चेत्युश्प्रेक्षायां त्रैविध्यवंचित्यमलङ्गारसर्वस्वकृताङ्गीकृतम। तद् दूषयति- तत्रेति। घर्सविषयश्लिष्टत्वमित्यस्य कोडर्थः। धर्मन्यानुगामितया यथा निमित्तता तथा श्लेषेणापि। कि वा! धर्मांशे शुद्धतावच्छलेवेणालढ्टक्कृतापि। अघे दूषणमाह-आघ इति। आद्येऽलुगामित्वादीनां यावद्भेदानासुपमार्या साधारणघर्सस्य साधार्यनिर्वाह फ्कवं तावतामेवोत्परेछ्षायां वर्मस्य निमित्ततानिर्वाहृष्कत्वसम्भवे त्रैविध्यकथने न्यूनत्वापतेः। अनुगामित्वम् 'बालेन्दुचक्राणि' इति श्लोके पूर्वे व्याजयाते बोध्यम्।

(चित्र०) यथा- व्यराजत सखे तन्व्या वक्त्रं वलितकन्धरम्। लावण्यौघजलावृत्तनालदण्डमिवाम्बुजम् ॥। इत्यत्र वस्तुप्रतिवस्तुभावः । बिम्बप्रतिबिम्बभावादयस्तु प्रागेवोदाहृताः। द्वितीये निमित्तांशेन श्लेषेणेवालंकारान्तरेणाप्यलंकृतता दश्यते इति न्यूनो विभाग: । तथा हि 'अङ्गुलीभिरिव केशसंचयम्' इति निमित्तांशे उपमालक्कार: स्पष्ट: । (भारती) जैसे- 'हे मित्र ! इस सुन्दरी के कन्धे पर झुका हुआ इसका मुखकमल सौन्दर्यसमूह में उत्पन्न, जल के वीच नालदण्ड में खिले कमल के फुल की तरह शोभ रहा है।' इसी प्रकार वस्तुप्रतिवस्तुभाव से उदाहरण जैसे-यहाँ मुख का कमल से उत्प्रेक्षण में कन्धे पर झुके हुए अभिन्नवृत्त नालदण्ड के निमित्त के उपादान से लक्षण का समन्वय है। एक ही धर्म का सम्बन्धिभेद से दो बार कथन वस्तुप्रतिवस्तुभाव रूप से उपस्थित है। बिम्वप्रतिबिम्वभावादि तो 'आधर्जिता किश्विदिव स्तनाभ्याम्' इत्यादि रूप में पहले ही उदाहृत किया जा चुका है। द्वितीय पक्ष की स्वीकृति में दोष बताते हैं-साधारण धर्मरूप निमित्त के अश द्वारा श्लेषालक्कार का अन्य अलद्कार से भी अल्कृतता देखने से उसके कथन में ही न्यूनतापत्ति है। अन्य अलद्कार से अलकृतता निमित्ताश में जैसे-'अड्गुलीभिरिय केशसन्नयं सव्षिगृद्य तिमिरं मरीविभिः इत्यादि पूर्व व्याख्यात उदाहरण में रात्रिरूपी नायिका के मुखचुम्बन की उत्प्रेक्षा में किरणों का अङ्गुलियों से सादृश्य वर्णन रहने पर निमित्ताश में उपमालक्वार से अलकृत है। (सुधा) वस्तुप्रतियस्तुभावो यथा-है सखे ! तन्व्याः वलितकन्धरं मुखं शुशुभे, लाव. ण्यसमूहेन जलेन आवृत्तनालदण्डं कमलमिवेश्यन्वयः । अत्र मुखस्य कमलखवेनो-

Page 434

३६६ चित्रमीमांसा:

स्ेक्षणे चलितकन्धशामिद्वावृत्तनालदण्टस्य निमित्तस्योपादानाव् छक्षणसमन्वयः। एकस्पैव धर्मस्य सम्न्धिभेदेन द्विरुपादानं वरतुप्रतिवस्तुभाव इति तक्लक्षणात्। विम्बप्रतिबिम्ब- सावात्यस्तु 'आवजिता फिञ्विदिव रसणाभ्याम्' इत्यादावुदाहता एवेत्याह-विम्नप्रतिवि- स्वमावाषयस्त्यिति। द्वितीयपपाङ्गीकारे दूषणमाह-द्वितीये स्विति। साधारणघर्मरूपनि- मित्तांशेन श्लेपेणेवालट्कारान्तरेणापि अलड्कृतताएुर्शनाष् तेनवेति कथने न्यूनत्वापततेः। अलक्टारान्तरेणालठ्कृतता निसित्तांशै यथा 'अम्ुलीमिरिव केशसञ्चयं सविगृख तिमिरं सरीचिभि. इत्यादी रजनीमुखनुम्बनोतप्रेक्षणे मरीचीनामङ्गुलीभि: सारश्यस्य वर्णनस-

(चित्र०) उदरं परिमाति सुष्टिना कुतुकी कोऽपि दसस्वसु: किल। धृततच्चतुरङगुलीव यद्वलिसिर्भाति सहेमकाव्चिभि:॥ इत्यत्रोत्प्रेक्षा। अन्र दसयन्त्युदरस्य केनचत्कुतुकिना परिमीयमाणत्वोत्प्रे- क्षायां काञ्चिसहितासु वलीषु तदीयाङ्गुलित्वोत्प्रेक्षालब्धमुदरगतं तदीयाङ्गुलिचतु- ष्टयधारणं निमित्तम्। (भारती) 'कोई कौतुकी अर्थात् ब्रह्मा दमयन्ती के उदर को मुट्ठी से नापता है क्या? क्योंकि स्वर्ण की करधनी सहित त्रिवलियों से ऐसा शोभता है कि मानो उस कौतुकी की चारो अङ्गुलियों के वीच की तीन रेखाओं को धारण कर रहा हो। इस श्लोक में करधनी के सहित त्रिवलियों की चार अङ्गुलियों के वीच की रेखा से उत्प्रेक्षा की गई है।' इस उदाहरण में दमयन्ती के उदर का किसी कौतुकी द्वारा नापने की उत्प्रेक्षा में उत्प्रेक्षा- लद्कार द्वारा निमित्ताश में अलकृतत्व है। उदरगत उसकी चार अङ्गलियों के धारण रूप निमिनत का करधनी सहित त्रिवलियों में उसके अद्गुलित्व की उत्प्रेक्षा से प्राप्त वह भाव है। (सुधा) एव निमित्तांशे उत्प्रेक्षालक्कारेणापि अलदूकृततामुदाहरति-उदरमिति। कोऽपि कुतुकी दमस्वसु: दमस्वसुः दमयन्त्या उदर मुष्टिना इयत्तया परिमाति व्यवष्छिनतति। यद यस्मान्तदुदर सहेमका्चिि: सुवर्णमेखलासहिताभिर्विभिः कृत्वा छतास्तस्य सुष्टेक्षत- सोड्डुलयो येन एवंविधमिव भाति। तिस्रो वलयः, चतुर्थी हेमकाज्जीति चतसनोडहुलय- स्तस्य सुष्टेरित्यर्थः। अघोदाहरणे दमयन्त्युदवस्य कौतुकिकर्तृक्परिमीयमाणतवोत्प्रेक्षणे

काश्ीसहित वलीपु तद्ङुलित्वो्पेक्षया लब्घतद्भावत्वाद्। (चित्र०) अजस्रमारोहसि दूरदीर्घा संकल्पसोपानतति तदीयाम्। श्वासान् स वर्पत्यधिकं पुनर्यद्ध्यानादिव त्वन्मयतामवाव्य।। इत्यत्रासगतिः । यतोऽत नलस्य दसयन्तीरूपतावाप्त्युत्प्रेक्षायां दमयन्ती- कर्तृ केण सोपानारोहणेन नलस्य श्वासवर्षणं निमिचम्।

Page 435

उत्प्रेक्षानिरूपणप्रकरणम्

(भारती) इस श्लोक में नल की सकल्प दशा का वर्णन है-तुम नल की सकेल्प रूप सीढियों की श्रेणी पर बह्दुत दूर तक चढती हो, अर्थात् 'दमयन्ती सुझे कैसे मिलेगी, उसे पाकर मैं उसके साथ इस प्रकार वार्तालाप, क्रीडा तथा विद्दार आदि करूँगा' इत्यादि अनेक विध सकल्प तुम्हारे विषय में राजा नल किया करते हैं। वे जो वार-बार श्वासों की वृष्टि करते हैं अर्थात् अधिक श्वास लेते हैं, वह तुम्हारी चिन्ता में लीन होकर तुम्हारे ध्यान के कारण करते हैं। कहने का तात्पर्य यह कि जो बहुत दूर तक सीढियों पर चढता है, वही अधिक श्वास लेता है अर्थात् हाँफता है। किन्तु यहाँ पर जो तुम नल के सकल्प रूप सीढियों पर चढती हो-अतः नियमानुसार तुम्हें ही अधिक श्वास लेना चाहिए था, किन्तु इसके विपरीत तुम्हारी अपेक्षा नल ही अधिक श्वास लेते हैं। इसका कारण यह है कि राजा नल तुम्हारे चिन्तन के कारण 'त्वन्मय' हो गये हैं। अत' ऐसी स्थिति में ऐसा होना उचित ही है। क्योंकि अव राजा नल के साथ तुम्हारा कोई भेद रह ही नहीं गया है।' (सुधा)

न्धिनीं दूरसतिनीं धारावाहिक्त्वेनोत्पत्या दीर्घां संकल्पो आापनाविशेष: तस्या- रोहणपरम्पराम् 'आरोहणं स्यात् सोपानम' इत्यमदः। अजस्मनवरतमारोहसि, विषयता- सम्बन्धेनेत्यर्थः। स नलः पुनः श्वासानधिकं वर्षतीति यस् तत् तव ध्यानाव त्वन्मयरता आाप्येत्यन्वयः। अन्नोदाहरणेडन्येन सोपनारोहणमन्यत्र श्वासाघिक्यसित्यसङ्गत्या नलस्थ दमयन्तीरूपताप्राप्त्युत्पेघ्षार्या दमयन्तीकर्तृफ सोपानारोहणेन नलश्वासवर्षणस्य निमित्तत्वा- द्वीकारादिति भवति। तेन निमित्तांशेऽलड्कततेति भाष:। (चित्र०) प्रतीपभूपैरिव कि ततो भिया विरुद्धधमैरपि भेत्ततोज्मिता। अमिन्रजिन्मत्त्रजिदोजसा स यद्विचारहक् चारदगप्यवर्तत।। इत्यत्र विरोधाभासः । अत्र हि विरुद्धधर्मगतस्याश्रयभेदकत्वत्यागोत्प्रेक्षायां विरुद्धतयावभासमानधर्माणां नले सहवासो निमित्तम्। (भारती) इस उदाहरण में दूसरे के सीढी चढने पर दूसरे का श्वासाधिक्य रूप असगति है। नल का दमयन्ती की ताद्रप्यता की प्राप्तिरूप उत्प्रेक्षा में दमयन्ती कर्तृक सोपान आरोहण से नल के श्रास की वृष्टि रूप निमित्तत्व की स्वीकृति है। इसी से निमित्ताश में अलङ्कतता है। 'विरोधी राजाओं के समान परस्पर विरोधी स्वभावों ने भी उस नल के भय से भेदभाव को छोड दिया क्या? जो नल शत्रुओं को जीतने वाले होकर भी मित्रजित् अर्थात अपने मित्रों को जीतने वाले, विरोध परिदार के पक्ष में-अपने प्रताप से सूर्य को जीतने वाले थे तथा चार- दृकू अर्थात् गुप्तचरों के द्वारा कार्यकलाप को देखने वाले होकर भी विचार दक अर्थात् गुप्तचरों द्वारा नही देखने वाले, विरोध परिहार पक्ष में-विचार से देखने वाले अर्थात विचारपूर्वक कार्य करने वाले थे। तात्पर्य यह कि जो नल मित्रजित् ये, उनका अमित्रजित् होना तथा जो चारदक्

Page 436

चित्रमीमांसा

थे, उनंका विचारदृक होना अर्थ से विरोध की प्रतीति होती है अत 'उसका परिहार 'जो नल प्रभाव से सूर्य को जीतने वाले ये, वे शत्रुओं को भी जीतने वाले थे और जो चारटक् अर्थात् दूतों के द्वारा कार्य देखने वाले थे, वे विचारदृक अर्थात विचारपूर्वक कार्यों को देखने वाले थे- इस प्रकार अर्थ की सगति वैठती है।' इस उदाहरण में विरुद्ध वर्म समवेत स्वाश्रय भेदकत्व के त्याग की उत्प्रेक्षा में विरुद्ध रूप से प्रतीत होने वाले धर्मों का नल में सद्वासात्मक विरोधाभास की निमित्ताश में उपस्थिति है। (सुधा)

नलाद मिया विरुद्धा: परस्पराधिकरणावृत्तयो ये धर्मा वृत्तिमन्तस्तैरपि भेत्तता परस्प- राश्यव्यापकता उड्ज्ता त्यका, कैरिव, भ्रतीपा विरुद्धा थे राजानस्तैरिव, यद् यस्मा- दोजसा तेजसा मित्रजिदपि सूर्यजिदपि अमिव्रजित, शत्रुजिन्मित्रजिदन्यक्ष। चारः रपशो दग हिताहितगोचरज्ञानजनको यस्य सोऽपि 'चारः पश्यन्ति राजानः' इत्युकेः। विचारः सत्तर्को दकू निर्णयप्रयोजको यस्य सोऽवर्तंत भासीत, चारदगन्य इति वा। अन्रोदाहरणे विरुद््धर्मसमवेतस्थाश्रयभेद कत्वत्यागोत्प्रेप्षणे विरुद्ध तयावभासमानघर्माणं नले सहषा- सात्मकविरोघाभासस्य निमित्तांशे सत्वादिति भाष:। (चित्र०) ध्रवमधीतवतीयमधीरतां दथितदूतपतद्गतिवेगतः। स्थितिविरोधकरीं द्व्यणुकोदरी तदुदितः स हि यो यदनन्तरः ॥ इत्यत्रार्थान्तरन्यासः । यद्यप्यत्र दमयन्तीगतस्य चापलस्य नलदूतहंस- पक्षवेगो हेतुत्वेनोत्प्रेदयते, तथापि तन्रोत्प्रेक्षायामध्ययनफलमात्रं न निमित्तं कि त्वन्यवेगात्कथमन्यत्र चापलमिति शङ्कावारणाय निबद्धेन 'तदुदितः स हि यो यदनन्तरः' इत्यर्थान्तरन्यासेनोपस्कृतम्। (भारती) कशोदरी उस दमयन्ती ने प्रियदूत इस के पखों के वेग से नारियों की मर्यादा की विरोधिनी अधीरता को धारण किया, सीखा अर्थात् प्रिय नल के दूत हस के उडकर चले जाने पर अधीर हो गयीं। क्योंकि जिसके वाद जो होना है, वह उसी से उत्पन्न समझा जाता है। हंस का उडना स्थिरता विरुद्ध चचल अर्थात् अधर्य युक्त था। अतएव उसके जाने के वाढ दमयन्ती को जो अधीरता हो गयी है, वह मानो उसी हसगमन की शिक्षा से ही उत्पन्न हुई है। इस उदाहरण में दमयन्तीगत चपलता का राजा नल के दूत हस के पखों के हेतुत्व से उत्प्रेक्षा में चपलता की निमित्तता नहीं है किन्तु, दूसरे के वेग से दूसरी जगह चपलता कैसे होगी इस शका के निवारणार्थ इस न्याय का प्रमाण देते हैं- यत्माव् यो यछनन्तरः स तदुदितस्तस्मादेवोपपद्यते, यपनन्तरमेव यद् दृश्यते तत्तस्य कारणम्-गौतम। अर्थात यहाँ पूर्वोक्त रूप से उपनिबद्ध अर्थान्तरन्यास से उसके जिस अश में उपस्कृतत्व है, वहाँ अलकृतत्व है।

Page 437

उत्प्रेक्षानिरूपणप्रकरणम्

(सुधा)

अतिकृशोदरी भैमी दवितस्य दूतो यः पतङ्गस पक्षी, तस्य यो वेगस्तस्माव स्थिते: विरोध- करीम अधीरतां ध्रवमधीतवती स्वीच का रेत्यर्थ। अध्ययने न्यायं प्रमाणयति-हि यस्माद् चो यदनन्तरः स तदुदितस्तस्मादेवोत्पद्यते, 'यदनन्तरमेव यद दृश्यते तत्तस्य कारणम' इति गौतमोकेः। अन्रोदाहरणे दमयन्तीगतचापलस्य नलदूतहंसपप्तवेगस्य हेतुत्वेनोतप्रेक्षणे चापलस्थ न निमित्तत्वम्। किन्तवन्यवेगादन्यत्र कथ चापलं भवतीत्वाशङ्कावारणार्थ- सुपनिषद्धेनार्थान्तरन्यासेन तस्योपस्कृतत्वाछ् चस्य तम्रांशेऽल्ककतत्वमिति भावः। (चित्र०) एवम्- गौरीव पत्या सुसगा कदाचित्कर्तेयमत्यर्धतनूसमस्याम्। इतीव मध्ये विद्धे विधाता रोमावलीमेचकसूत्रमस्याम्।। इत्यत्र निमित्तांशे रूपकमित्याद्युहनीयम्। तस्मादुभयथापि तत्र श्लिष्टत्व- मात्रकीर्तनं न्यूनमितरेषामप्युपलक्षणं द्रष्टव्यम्। (भारती) इसी प्रकार सौभाग्यवती या सुन्दरी वह दमयन्ती पार्वती के समान किसी समय विवाह होने पर पति के साथ आधे शरीर को सङ्गटित करेगी, मानो इसीलिए न्रह्मा ने इस दमयन्ती के शरीर के वीच में रोमावली रूप नील एव चमकदार सूत्र के चिह्न को रख दिया है। जैसे कोई शिल्पी काष आदि को बीच में काले सूत्र से चिह्नित कर विभाग कर देता है, उसी प्रकार ब्रह्मा ने दमयन्ती के शरीर के बीच में रोमावली रूप काले सूत का चिह्न कर दिया है कि विवाह होने पर यह दमयन्ती भी पार्दती के समान पति की अर्द्ाङ्गिनी वनेगी। यहाँ रोमावली में मेचक सूत्रत्व के आरोप से रूपक है। इससे उपस्कृत उस दमयन्ती से गौरीत्व की उत्प्रेक्षा में निमित्तभूत रूप के उस अश में उपस्कृतत्व है। इसी प्रकार दूसरी जगहों में भी उत्प्रेक्षा के निमित्त अश मे श्लिष्टत्व है। इसलिए दोनों पक्ष में भी श्रिष्टता कहने से न्यूनता दोष जानना चाहिए। उपलक्षण में कोई दोष नही है। यधपि रुय्यक ने अलद्कार सर्वस्व में स्वरूपोत्प्रेक्षा में अपहति का उदाहरण दिया है, फिर भी हेतु और फल की उत्प्रेक्षा में भी उपलक्षणपरता से व्याख्या करनी चाहिए। (सुधा) रूपकालक्षा रेणोतप्रेप्षानिमित्तांशेडलडृततामुदा हारतएवमिति। गौरीवेति। गौरीव पा्वतीव इयमपि सुभगा दमयन्ती कदाचित्काले पत्या सह तन्वा अर्द्धमर्द्धतनूः 'अरदूं नपुसकम' इति समासः, तस्याः समस्याम संक्षेपं कर्त्ता करिष्यति। यथा गौर्या शरीराद भगवदेहे प्रवेशितं तथेयमपि करिष्यतीत्यर्थ.।अस्मात् कारणादिव विधाता ब्रह्मा अस्या मध्ये रोम्णामावली, तदेव मेचकसूत्रं कृष्णतन्तुं विद्धे स्थापयामास। 'मेचक शिख्वि- कण्ठाभ' इति दुर्गः। अत्र रोमावल्या सेचकसूत्रत्वारोपो रूपकम्। तेनोपस्कृतं तद्म- यन्त्या गौरीत्वोत्प्रेक्षणे निमित्तमिति रूपकस्य तदंशे उपस्कृतत्वमिति भावः। एव-

Page 438

४00 चित्रमीमांसा

मन्येपामपि उत्पेक्षानिमित्तांशे ्विष्टत्वमित्याह-इत्यादीति। दूषणमुपसंहरत्ि-तस्मा- दिति। उभयथापि पमस्येऽपि छिष्टत्वमात्रकीतने न्यूनतादोष इति बोध्यम्। इतरोप- लक्षणत्वे तु न दोष हत्याह-इतरेषामिति। .

(चित्र०) यत्तु सापह्नवत्वे- गतासु तीरं तिमिघट्टनेन ससंभ्रमं पौरविलासिनीषु। यत्रोल्लसत्फेनलवच्छ्लेन मुक्ताट्ृहासेव विभाति शिप्रा॥ इति स्वरूपोत्प्रेक्षायामुदाहृत तदाप हेतुफलोत्प्रेक्षयोरपि सापह्नवत्वे उप- लक्षणं बोद्धव्यम्। तत्र सापह्नवहेतूतप्रेक्षायाम्- मुग्धः स मोहात्सुभगात्तदेहाददद्भवद्भ्रूरचनाय चापम्। भ्रुभङ्गजेयस्तव मन्मनोभूरनेन रूपेण यदा तदासीत्॥ (भारती) आचार्य रुय्यक द्वारा उदाहृत उदाहरण है-नगरविलासिनियों का समूह शिप्रा नामक नदी में स्नानार्थ प्रवेश करने ही मछलियों के झुडो को देखते ही घवडाहट के मारे डर कर, किनारे लौट आया। उसकी इस भयाक्रान्त स्थिति पर कवि की उत्प्रेक्षा है कि शिप्रा की तीव्र धारा से समुत्थित फेन क्या है? मानो इस फेन के बहाने उक्त विलासिनियों की मयविह्वलता पर शिप्रा मुक्त अट्टददास करती हुई शोभ रह्दी है। इस उदाहरण में फेन पक्तियों में अट्टहास की उत्प्रेक्षा में अपहुति की निमित्तता है। यधपि यह स्वरूपोत्प्रेक्षा में ही उदाृत है फिर भी हेतु और फल की उत्प्रेक्षा में भी अपहुति उपलक्षण से जाननी चाहिए। उस उपलक्षणत्व की हेतूत्प्रेक्षा में अपह्वति का उदाहरण देते हैं- तुम्हारी दोनों भूकुटियों की रचना करने के लिए कामदेव ब्रह्मा को अपना चाप देते हुए मोह अर्थात् मूर्खता से मुग्ध अर्थात् मृढ हो गया। तुम्हारे सौन्दर्य से मुग्ध नही हुआ इस कारण वह कामदेव सर्वदा तुम्हारे भ्रूभङ्ग मात्र से इस रूप के द्वारा जीतने योग्य हो गया। तात्पर्य यह कि अपने चाप के साथ भी जव काम ने तुम्हें नही जीता तो मला अपने धनुप को तुम्हारी दोनों भौहों को वनाने के लिए देकर हथियारदीन होने से कैसे जीन सकता है अर्थाद इस स्थिति में तो वह कदापि जीत नहीं सकता है। वह एक क्षुद्रतम शत्रु की तरह मात्र मौहें टेढी करने पर ही जीतने योग्य हो गया है। अन्य भी कोई मूर्ख इसी प्रकार अपने शत्रु को अपना हथियार देकर फिर शस्रहीन होकर उसे कदापि जीत नहीं सकता है। अर्थात् तुम्हारी दोनों भौहें काम के धनुप के समान जगन्मोहक है। (सुधा) यतु, अलद्वारसवंस्वकृता स्वरूपोत्प्रेप्षायां सापह्ववत्वमुदाहृतम्, तपि हेतुफलोस्पोक्ष योरपि उपलक्षणपरतया व्याख्येयमित्याह-यश्विति। तदुदाहृतमुदाहरति-गतास्विति। पुरे भवाः पौराः, तासु विलासिनीपु तिमीनां मत्स्यानां सकहनेन सभयं यथा स्यातया तीरं गतासु चन्न नगर्यां शिप्रा नदी उक्लसन्तीनां फेनतलीनां छुलेन मुकः अट्डासो यथा तथाभू-

Page 439

उत्प्रेक्षानिरूपण प्रकरणम् ४०१

सेव भातीत्यन्वयः । अग्रोदाहरणे फेनततिषु अट्टहासोत्प्रेक्षणेऽपणुतेर्निमित्ततवमस्तीति भावः। तत्रोपलप्षणरवे हेतूतप्रेष्षार्या सापह्ववत्वमुदाहरति-मुग्धः स मोहादिति । स मनोभू: काम:, भवतो भ्रुवो रघनाय चायं ददद मोहादज्ञानात् सुग्धो मूढो देहादङ्गा- न्मुग्धो रमणीयो नास्ति। 'सुग्धः सुन्दरमूढयोः' इति विश्वः। कामस्य मुग्धत्वं तावद विवादम्। तथ्च त्वद्भ्रनिर्माणाय स्वकार्मुकद्षानान्न तु सौन्दर्यादिति भावः। यस्मादू कामोडनेन तव रूपेण लावण्यविशेषेण यदा तदा यब्र कुश्नापि काले सर्वदैव न स्ववस्था- विशेषेणेत्यर्थः। भ्रभङ्गो भ्रव्यापारस्तन्मात्रेण जेयो जेतुं शक्योऽभूदित्यन्वयः । (चित्र०) अत्र मदनगते मुग्धशब्दवाच्यत्वे वस्तुतोऽहेतोः सौन्दर्यस्य हेतुत्वमपह्ुत्य नलभ्रूरचनाय स्वचापदानप्रयुक्तस्य मौठ्यस्य हेतुत्वमुत्प्रेक्षितम् । सापह्नवफलोत्प्रेक्षा यथा- रवितप्तो गज: पद्मांस्तद्गृह्यान् बाधितुं ध्रुवम्। सरो विशति न स्नातुं गजस्ानं हि निष्फलम्॥। -

(भारती) इस उदाहरण में मदनगत सुग्ध शब्द द्वारा जो वाच्यता है, वह परमार्थत. हेतुरूप सौन्दर्य की हेतुता अपहुति से हेतु की भी भ्रू-रचना के लिए अपने चापदान प्रयुक्त मूढता का हेतुत्व से सापह्ववा हेतूत्प्रेक्षा हुई। फलोत्प्रेक्षा में सापह्ववत्व का उदाहरण देते हैं- 'सूर्य से संतप्त हाथी सरोवर में उसके प्रियवन्धु कमल को वाधित करने के लिए ही प्रवेश करता है, न कि स्नान करने के लिए। यही कारण है कि हाथी का स्नान निष्फल है।' (सुधा) अन्नोदाहरणे मदनगतं यन्सुग्धशब्देन वाच्यत्वं तन्न परमार्थतो हेतुरूपस्य सौन्दर्यस्य हेतुत्वमपह्त्तुत्या हेतोदपि अ्ररचनार्थ स्वचापदानप्रयुक्तमाद्यस्य हेतुत्वेन सापह्ववा हेतू पेक्षा। फलोत्प्रेप्षायां सापह्वत्वमुदाहरति-रवितप्त इति। रविणा तप्तो गजः तद्गृ- द्यान् गृहे भवान् बन्धून् पद्मान् बाधितुं प्रायः सरः प्रविशति न तु स्नातुम, हि यस्मात् गजस्य स्नानं निष्फलमित्यन्वयः। (चिन्न०) अत्र गजस्य सरप्रवेशं प्रति वस्तुतः फलस्य स्नानस्य फलत्वमपह्नत्य पद्मबाधनसत्र फलत्वेनोत्प्ेक्षितम्। न च स्वरूपोत्प्रेक्षाया वास्तवविषयस्वरूपापह्नव एव विच्छत्तिविशेषो न तु फलोत्प्रेक्षयो: प्रसिद्धहेतुफलापह्नव इत्यस्ति। प्रत्युतोदाहृतयोर्हेतुफलोत्प्रे- क्षयोः सिद्धहेतुफलापह्नवोऽपि सहेतुकः न तूदाहृतविषयः स्वरूपापह्नतोत्प्रेच्षे इत्युपलक्षणतैव युक्का । अन्यदत्र विचारणीय समासोक्तिप्रकरणे विचारयिष्यते। यत्ते 'कस्तूरीतिलकन्ति भालफलके' इत्यादावुपक्रान्ता उपमा औचित्या- २६ चित्र०

Page 440

४०२ चित्रमीमांसा

दुत्प्रेक्षायां पर्यवस्यतीत्युक्तं तत्र भालादिस्थानविशेषसबन्धस्य कस्तूरीतिल- कादितादात्म्यमात्रे औचित्य चेत् रूपके पर्यवसानं स्यादिति तस्य तादात्म्य- संभावनायामौचित्यमुपगम्योत्प्रेक्षायां पयवसानं वाच्यम्। (भारती) यहाँ गज का सरोवर में प्रवेश के प्रति वस्तुत फलरूप स्नान का फलत्व छिपा कर कमल- चाधनरूप फलत्व से उत्प्रेक्षित है। यहाँ कका करते हैं कि पारमार्थिक विषय के स्वरूप की जो अपहुति स्वरूपोत्प्ेक्षा में है, वहाँ ही शोभा विशेष के उपलम्भन से हेतुफलोत्प्रेक्षा की प्रसिद्ध हेतु फल की अपह्ुति में विच्छि- त्तिविशेष के अमाव से चमत्कार नहीं है-ऐसा नहीं कह सकते। क्योंकि यहाँ हेतु और फल का उपलक्षण है। इस शका का समाधान करते हैं कि हेतुफलोत्प्रेक्षण में भी प्रसिद्ध हेतु फल की अपह्ति में हेतु रहने के कारण चमत्कार दिखाई पडता है, और विषयस्वरूप की अपहुति में तो हेतु के अभाव से उसकी अपेक्षा उन दोनों के ही चमत्कारातिशय से उपलक्षणपरता स्पष्ट है ही। यही ग्रन्थकार का आशय है। अत. हेतुफलोत्प्रेक्षा में भी अपहुति है। इसके अतिरिकत अन्य जो कुछ विचारणीय है-उसे समासोक्ति प्रकरण में कहेंगे। 'यत्तु' से तनके मत में और दोष दिखाते हैं कि आचार्य रुय्यक ने अपने अलद्कार सर्वस्व में उपक्रान्तोपमा का उदाहरण 'कस्तूरीतिलकन्ति भालफलके' इत्यादि दिया है। उस उपमा की उत्प्रेक्षा में पर्यवसान से और उस उपक्रम से ही पर्यवसान होता है। फिर मी रूपकादि की उप- लक्षणपरता से व्याख्या करनी चाहिए। ललाट आदि स्थान विशेष के सम्बन्ध का कस्तूरी तिलक आदि तादात्म्य मात्र में औचित्य से रूपक में पर्यवसान की योग्यता से ललाटादि स्थान विशेष के सम्वन्ध का कस्तूरी तिलकादि मात्र की उचित सभावना की उत्प्रेक्षा में पर्यवसान के द्वारा उपक्रान्त रूपक से भी उत्प्रेक्षा है। (सुधा) अश्रोदाहरणे गजस्य सरप्रवेशं प्रति परमार्थतोऽफलस्य स्नानस्य फलत्वमपह्तुत्य पझ्मबाधनस्य फलत्वेनोटेक्षणाव् सापह्ववा फलोळोक्षा। आशंकते-न चेति। पारमा- र्थिकविषयस्य यत्स्वरूपस्यापह्ववः स्वरूपोत्ेप्षायामस्ति, तन्रैव शोभाविशेषोपलम्भावू हेतुफलोत्प्रेप्षयो: प्रसिद्धहेतुफलापह्ववे विच्छित्तिविशेषाभावात् न चमरकार इति न तयो रुपलक्षणत्वमिति शंकाभिप्रायः । समाधानन्तु हेतुफकोत्प्रेक्षणेऽपि प्रसिद्धस्य हेतोः फलस्य चापह्नवे हेतुसरवेन चमत्कारोदय:, विषयस्वरूपापहवे तु हेतोरभावेन तदपेक्या तयोरेव चमरकारातिशयेनो पलप्षणपरत्वमेवेत्येव सम्यगिति समाधानग्रन्थाभिप्रायः। उपसंहरति- तस्मादिति। हेतुफलोत्प्रेन्षे अपि सापह्नवे इति तन्वावः। यदन्यद् विचारणीयं तत्समा- सोवितिप्रकरणे विचारणीयमित्याह-अन्यक्विति। अन्यदृपि तन्मते दूषणमात्षिपति- यस्विति। अलंकारसवंस्वकृतोपक्रान्तोपमा यथा 'कस्तूरीतिलकन्ति भालफलके' इत्यादा- बुदाहता। तस्या उपसाया उत्प्रेषायां पर्यवसानेन तदुपक्रमाच्च ... पर्यवस्यति इत्युक्कम्। तददि रूपकादेरुपलक्षणपरतया व्याख्यातव्यमित्याह-तत्रेति। मालादिस्थानविशेषस- म्वन्घस्य कस्तूरीतिलकादितादात््यमात्रे औचित्यसप्वेन रूपके पर्यवसानस्य योग्यतथा भालादिस्थानविशेषसबन्धस्य कस्तूरीतिलका दिमाभ्रतादालयसंभा व ना या नपित्याभ्युपगमे उत्प्रेष्षार्या पर्यंवसानेनोपक्रान्तरूपफाया अप्यु्रेषामास्तत्र सष्मादिति भाष:।

Page 441

उत्प्रेक्षानिरूपणप्रकरणम् ४०३

(चित्र०) तथा च- रक्षन्तु त्वामसितजलजरञ्जलि: पादमृले मीना नाभीसरसि हृदये कौस्तुभाख्या मुरारे:। हारा: कण्ठे हरिमणिमया वक्त्रपद्मे द्विरेफाः पिच्छाचूडाश्िकुरनिकरे घोषयोषित्कटाक्षाः॥ इत्यादौ रूपकप्रतीतिस्थलेऽप्युत्प्रेक्षोपगन्तव्या। (भारती) और भी-आभीर योषित अर्थात् गोपाङ्गनाओं की वे कटाक्ष तुम्हारी रक्षा करें, जो पाद मूल में कृष्ण जल की अअ्ञलि रूप में हैं, नाभि रूपी सरोवर में मछली रूप से हैं, श्री कृष्ण के हृदय में कामबाण के रूप में हैं, कण्ठ में इन्द्रनील मणि के हाररूप में हैं, मुख कमल में भ्रमर रूप से हैं तथा केश समूहद में मयूरपुच्छ के समान हैं।' इस उदाहरण में कमलादि तादात्म्य का अञ्जलित्वादि से उत्प्रेक्षण में उपक्रान्त रूपक की उत्प्रेक्षा में पर्यवसान से उपक्रान्त रूप उत्प्रेक्षा है। उपमा की प्रतीति के स्थल में जैसे उत्प्रेक्षा है उसी प्रकार रूपकादि प्रतीति के स्थल में भी उसकी सभावना से तावन्मान्र कथन में न्यूनता दोष को स्पष्ट करने के लिए पहले ही उपमा की प्रतीति में उत्प्रेक्षा रहने पर दोनों से उदाहरण देकर रूपक की प्रतीति में भी उत्प्रेक्षा की सभावना दोनों से प्रकट करने के अभिप्राय से लिखते हैं। (सुधा) उपक्रानतरूपको पोक्षामुदाहरति-तथा चेति। रक्षन्तिवति। आमीरयोषितां कटाक्षा- सतर्वां वछन्तु इत्यर्थः। तान् वर्णयति-पादमूलेऽसितजलजैरअलिरूपा, नाभीसरसि मीनरूपा:, इष्णस्य हृदि कामबाणरूपा:, कण्ठे हन्द्रनीलमणिसयहाररूपाः, सुखकमले अ्रमररूपा:, केशसमूहे पिच्छाभरणरूपा इत्यन्वयः। अन्ोदाहरणे कटाक्षारण कमलादि

रूपोत्प्रक्षेति भाव:। (चित्र० ) तथा- 'पतत्रिणा तद्रुचिरेण वक्ितं भ्रियः प्रयान्त्याः प्रविहाय पल्वलम्। चलत्पदाम्भोरुहनूपुरोपमा चुकूज कूले कलहंसमण्डली।।'

'अथाजिनाषाढधरः प्रगल्भभाग्ज्वलन्निव ब्रह्ममयेन तेजसा। विवेश कश्िज्जटिलस्तपोवनं शरीरबद्ध: प्रथमाश्नमो यथा।।' इत्यदावुपमाप्रतीतिस्थले यथोत्प्रेक्षायां पर्यवसानम्।

1

Page 442

४०४ चित्रमीमांसा

(भारती) वैसे ही-'सुन्दर उस पक्षी अर्थांत् हस से रहित तडाग को छोडकर जाती हुई लक्ष्मी, पक्षान्तर में शोमा, के चलने से चज्चल चरण कमल के नूपुरों के समान राजहस समूह तीर पर कूजने लगा। तात्पर्य यह कि लोक में भी प्रिय से रहित स्थान को छोडकर जाती हुई नायिका के चरण के नूपुर शब्द करते हैं। जाती हुई से तात्पर्य यह है कि लक्ष्मी ने तत्क्षण उस स्थान को छोड दिया।' 'प्रथम सृष्टि और समस्त ब्रह्माण्ड ही लोकों के आश्रयभूत मण्डप के चारो ओर प्रत्येक काष्ठ अपनी कान्ति से शोभित थे।' एक दिन कृष्णाजिन तथा पलाशदण्डधारी जटायुक्त कोई अपरिचित ब्रह्मचारी पार्वती के आश्रम में उपस्थित हुआ। उसकी आवाज गभीर थी। वह ब्रह्मतेज से पूर्ण था। मालम होता था कि ब्रह्मचर्याश्रम ही मूर्त्तिमान होकर तपोवन में मानो आविर्भूत हुआ है।' यहाँ उपमा की प्रतीति की उत्प्रेक्ष। में पर्यवसान है। यह पर्यवसान रूपक में भी सभव है। इसे दो उदाहरणों से स्पष्ट करते हैं। (सुधा)

उपमाप्रतीतिस्थले यथोत्प्रेक्षा तथा रूपकादिप्रतीतिस्थलेऽपि तत्सम्भचेन तावन्माम्र- कथने न्यूनतादोषं स्पष्टयितुं पूर्वमुपमापतीतानु्ेप्षायाः सत्वं दाभ्यासुदाहरिष्यन् रूपक- प्रतीतावपि उतमेकष्षासम्भवं हाभ्यां प्रकटीकर्तसुपक्रमते-तथेत्याचिना। पतम्निणेति। रुचिरेण सुन्दरेण पतत्रिणा हंसेन वर्जितं रहितं तत् उद्यानसम्बन्धि परवलं प्रविहाय सर्वथा स्यवरवा प्रयान्त्या गच्छन्त्याः श्रिय शोभाचाश्चलयोः पछाम्भोत्हयोः पममसदशपाद्यो: नूपुराणां सदशी कलहंसानां मण्ढली कूले तटे चुकूजेश्यन्दयः। अन्नोदाहरणे कलहंसमण्डश्यका शब्दे नूपुर शब्दत्वो स्प्रेक्षणे कलहंसानां नूपुरोपमासादश्या दुपमाप्रतीतेः पर्यंवसानसत्वादुपफ्रान्तो- पमोखेक्का बोध्या। लोकाश्रय इति। अस्य श्लोकस्योत्तरार्सुन्तु-'रवकान्तिरेणूत्करवान्तिभानि घुण- त्रणह्वारनिभानि भान्ति।' पुराणसृष्टिः म्रह्माण्ढमेव लोकानासाश्रयभूतं मण्डपमस्यानुदिशं प्रतिकाष्टं प्रतिदारु च, रवकान्तिरेव रेणूत्कर, तक्ष्य वान्तिरुद्गिरणं निगमनक्ष तहन्ति मानि नक्षम्राणि घुणन्रणद्वारनिभानि कीटप्षतच्छिन्सुखसपठवज्षान्याान्तीरन्वयः। मूळे रवर्द्धश्लोकस्य पाठान्तरमेवेति ज्ञेयम्।

(चित्र०) एवम्- वरण: कनकस्य मानिनी दिवसङ्कादमराद्रिरागताम्। घनरत्नकवाटपक्षतिः परिरभ्यानुनयन्नवास याम्॥ स्वधाकृत यत्तनयः पितृभ्यः श्रद्धापवित्रं तिलमिश्रमम्भः । चन्द्रं पितृस्थानतयोपतस्थे तदङ्गरोचिःखचिता सुघैव। इत्यादिरूपकप्रतीतिस्थलेऽपि तस्यां पर्यवसानमुपगन्तव्यम् । तादात्म्य- सभावनोपयु क्तविशेषण निबन्धरूपन्यायसाम्यात्।

Page 443

उत्प्रेक्षानिरूपणप्रकरणम् ४०४

(भारती) जैसे-'मानिनी, अतएव रुष्ट होकर अङ्क अर्थात् क्रोड को छोडकर भूलोक पर आाई हुई दिव् अर्थात् स्वर्गरूपिणी जिस कुण्हिनपुरी नगरी को सघन रत्नों से वने हुए किवाड रूप दो पक्षों को धारण करता हुआ सुवर्ण से बने चहारदीवारी रूप सुमेरु पर्वत आलिद्गन कर प्रसन्न करता हुआ निवास कर रहा है। तात्पर्य यह कि स्वर्गपुरी पहले सुमेरु पर्वत के अङ्क में रहती थी, किन्तु किसी कारणवश मानिनी होने से रुष्ट होकर वह उसके अङ्क को छोडकर यहाँ पृथ्वी पर आ गयी है। वही कुण्डिनपुरी है। अत एव अपनी प्रेयसी को प्रसन्न करने के लिए सुवर्णमय चद्दार- दिवारी रूप होकर बहुरत्न रचित कपाट रूप पह्नों को धारण करता हुआ सुमेरु पर्वत भी पृथ्वी पर आकर अपनी प्रेयसी कुण्डिन नगरी रूपी स्वर्ग का आलिङ्गन कर उसे प्रसन्न करता हुआ यहाँ निवास कर रहा है। कुण्डिन पुरी के सुवर्णमय प्राकार सुमेरु तुल्य हैं। उसके विशाल रलमय फाटक उस सुमेरु के पङ्न तुल्य तथा कुण्डिन नगरी स्वर्ग तुल्य है।' 'जिस प्रकार लोक में पुत्रों द्वारा पितरों को स्वधाकारेण श्रद्धापूर्वक पवित्र तिलतोयाअ्जलि दी जाती है, उसी प्रकार पितर स्थानीय चन्द्रमा को अपनी अङ्गकान्ति से सवलित सुधा ही उसे प्राप्त हुई।' प्रथम उदाहरण में पर्वत के प्रकारतादात्म्य द्वारा स्वर्गपुरी के तादात्म्य से रूपक की प्रतीति की अनुनयार्थ उसके निवास की उत्प्रेक्षा में निमित्तता है। दूसरे उदाहरण में सुधा तादात्म्य से सिद्धा रूपक की प्रतीति में तिलों का उसकी अङ्गकान्ति की उत्प्रेक्षा में पर्यवसान है। दोनों जगह रूपक प्रतीति की उत्प्रेक्षा के पर्यवसान में हेतु कहते हैं। जैसे उपमा प्रतीति के पर्यवसान में विशेषण निवन्धन का सामर्थ्य है, उसी प्रकार यहॉ भी तादात्म्य सभावना के उपयोगी विशेषण के निवन्धन का सामर्थ्य दोनों जगहों में समान रूप से उक्त सामर्थ्य की प्रतीति है। (सुधा) अन्नोपमाप्नतीतेरुप्रेष्षायां पर्यवसानम्। पतत्पर्यवसानं रूपकस्थापि तन् सर्मवतीति दाभ्यां श्लोकाम्यां अतिपाव्यति-वरण इति। कनकस्य वरणः प्राकार एघामराद्रि: मानिनीं कोपनान, अत धुवाककं त्यकत्वा आगरता यां नगरीमेव दिवं परिरभ्यालिङ्गया- जुनयन् प्रप्ादयन्नुवास। कीषशो मेरु निविडरत्ने कपाटे एव पक्षती यस्येत्यन्वयः। अन्नोदाहरणे मेरोः आकारतादात्येन नगर्या दिव: तादात्येनावसिद्धाया रूपकप्रतीते- रनुनयार्थ तत्निवासोत्प्रेक्षणे निमित्तत्वसस्तीति सावः। द्वितीयसुदाहरणमाह-स्वधाकृ- तमिति। लोके पुत्रैः पितृस्यः स्वधाकतं स्वधाकारेण दत्तं श्रद्धया पवित्रं तिलैश्षित्रितं यत्निवापोदकं तदेवाङ्फान्तिसंचलिता सुधा सती पितृस्थानतया चन्द्रसुपतस्थे प्राप। अम्राम्मसि सुघातादालघेन सिद्धा रूपकप्रतीतिस्तिलानां तव्ङकान्तयुप्रेक्षणे पर्यवस्य- तीति। उभयन्र रूपकप्रतीतेरुमेष्षायां पर्यवसाने हेतुसाह-ता ्ति। यथोपमाप्रती तेरुप्रेक्षापर्यवसाने विशेषणनिबन्धनसामर्थ्य तथाप्नापि तादात््यसंम्भावनोपयोगिविशे- घणनिबन्ध नसर्वेनोभयन्र तुल्यत्वादिति भावः। (चित्र०). एवम्- पूर्णेन्दोः परिवेषकान्तिवपुषः स्फारप्रभासासुरं नेदं मण्डलमभ्युपैति गगनाभोगाज्जिगीषोजगत्।

Page 444

४०६ चित्रमीमांसा .-

मानोन्नद्धजनाभिमानकलनोद्योगे कहे वाकिन: 11 इत्यपहुत्युदाहरणे इत्यपि द्रष्टव्यम्। अधिकं निदर्शनालक्वारप्रकरणे चिन्त- यिष्यते। ननु गम्योत्प्रेक्षायाम् अलङ्कारतया परिगणनमयुक्तम् , तस्या अलङ्कारध्व- नित्वात् ; उच्यते विषयविषयिनिमित्तेषु केवलमिवादिवाचकाप्रयोगमात्रेण

तीति। यथोदाहतम्। यत्रोत्प्रेक्षणीयस्य विषयिणोऽव्यनुपादानं निबद्धेन वस्तु- नालद्कारेण वा गम्योत्प्रेक्षा गूढा तत्रवोत्प्रेक्षाध्वनिः। (भारती)

'परिवेश (चन्द्रमा के चारो ओर वन जाने वाली एक परिधि) की कान्ति रूपी शरीर वाले पूर्ण चन्द्र की फैली हुई प्रभा से प्रदीप्त यह आकाशमण्डल नही है। वल्कि दुनिया को जीतने की इच्छा रखने वाले उस कामदेव की प्रदोष कान्ति से पीतवर्ण वसन्त प्रदत्त छाता है, जो मानी व्यक्ति के अभिमान दलन के उद्योग के चिह्न की तरह एक लीला मात्र है।' यह अमक्षुति के उदाहरण में भी देखना चाहिए। इससे अधिक अर्थात् अन्य अलंक्वार की प्रतीति भी उत्प्रेक्षा में निमित्त है-यह निदर्शनालद्वार के प्रकरण में कहेंगे। यहाँ शका करते हैं कि उत्प्रेक्षाध्वनि की सभावना तो यहाँ है भी नहीं क्योंकि वाच्या और गम्या इत्यादि प्रकार के भेदों को देखने से गम्योत्प्रेक्षा में ही ध्वनि की गतार्थता सभव है। जब गम्यो- त्प्रेक्षा का कथन ही युक्तिसगत नहीं है तो फिर इसकी ध्वनि से ही गतार्थता है। उसी ध्वनि रूप की आ शका कर समाधान करते हैं। विषय और विषयी के निमित्तों के उपादान में केवल सभावना वाचक पद प्रयोग के अभाव से गम्योत्प्रेक्षा में वाच्यायमान अलद्वारता से ही वैसे उदा- हरणों में ध्वनि की स्फुटता नही है। जहाँ उदाहरण में उत्प्रेक्षणीय का विषयी भी अनुपादान में निबद्ध से अथवा वस्तु अलक्कार से प्रकाशित गूढ गम्योत्प्रेक्षा है, वहीं ध्वनित्व की स्वीकृति रहने के कारण किसी प्रकार की आशका नहीं रह जाती है।

(सुधा) एवसपह्वतिप्रतीतेरपि उत्प्रेक्षायां पर्यवसानसुदाहदरति-एवमिति। परिधेषस्य परिधेः कान्ति: वपुर्यत्य तस्य पूर्णचन्द्रस्य स्फारप्रभाभि: भासुरमिदं मण्डलसाकाशदे हाप्नोपैति। किन्तु जगज्विगीघोः कामस्य प्रदोषकान््या पाण्ड आतपत्रमधुनोपैति। कीद्शस्य कामस्य मानोप्रदजनस्य यदभिमान तस्य यो दलनोदोगस्तस्यैफा हेळा लीला तद्ङ्गषत इश्यन्वयः। अम्रोदहरणे नेदं मण्डल किन्स्वातपत्रामत्यपह्तिप्रतीतेशचन्द्रग-

भाव:। अन्र कथनीयमन्यन्नातिषविशति-शेषमिति। निदर्शनाप्रकरणे वचयते। अलक्का- रान्तरप्रतीतेरपि उत्प्रेक्षाचां निसिसत्वं वर्शोयप्यते इति तदभिप्रायः। न तूेप्ताध्वनिर्न सम्भवति, वाध्या, गम्या इति तद्विभागदर्शनेन गम्योत्पेपया गतार्थरवाव्। यदा गम्यो- स्प्रेछ्षाकथनमयुक्क्मिति तद्ध्वनिनैव गतार्थरवास्, तस्य एव तद्ध्वनिरुपरवास् इत्या-

Page 445

उत्प्रेक्षानिरूपणप्रकरणम् ४05

इसुक्य निराकारोति-उच्यत इति। विषयविषयिनिमित्तानामुपादाने केवलसम्भावना- वाचकपदप्रयोगाभावेन गभ्योतप्रेक्षार्या वाध्यायमानरवेनालङ्गारताया एव स्फुटरवं न वने- रिति तथोदाहृतम। यम्रोदाहरणे उत्प्रेक्षणीयस्य विषयिणोऽप्यनुपादाने निबदेन वस्तुना- डलक्कारेण वा प्रकाश्य गूढा गम्योस्प्रेका, तत्रैव ध्वनित्वाङ्कीकारस्वादिति न क्वाप्या- शंकेति। (चित्र०) यथा- वीररुद्रभटान् दृष्टवा जयलद््म्यावृतान्रणे। कर्षन्त्यरिवधूकेशान् कानने कण्टकिद्रुमाः॥ अत्र वस्तुना कचग्रहणरूपेण जयश्रीसमालिद्गितभटदर्शनोद्दीपितमन्मथा इवेत्युत्प्रेक्षा ध्वन्यते। वेलामतिक्रम्य पृथुर्मुखेन्दोरालोकपीयूषर सेन तस्याः । नलस्य रागाम्बुनिधौ विवृद्धे तुङ्गौ कुचावाश्रयति स्म दृष्टिः ॥ अत्रैकदेशविवतिरूपके मज्जनभयादिवेत्युत्प्रेक्षावगम्यते। एवमन्यन्नाप्यु- दाहार्यम्। इति चित्रमीमांसायामुत्प्रेक्षाप्रकरणम्।

जैसे-'युद्ध में वीर रुद्र के योद्ाओं को विजयलक्ष्मी द्वारा स्वीकृत देखकर जगल में उसके दुश्मनों की पत्ियों के केशों को कटीले वृक्ष भी खीचने लगे।' यहाँ केश ग्रहण रूप वस्तु से जयश्री द्वारा समालिद्वित भटदर्शनोद्दीपित-मदन से उद्दीपित मन्मयत्व वृक्षों में उत्प्रेक्षित है। अत यहाँ उत्प्रेक्षा ध्वनि हुई। राजा नल की दृष्टि ने उस दमयन्ती के मुखरूपी चन्द्र के दर्शनरूपी अमृत के रसपान या प्रेम से वढी मर्यादा का उल्लघन कर, पक्षान्तर में पत कर्मसम्वन्धी मर्यादा का उल्लघन कर, प्रेम- रूपी समुद्र के वढने पर ऊँचे दोनों स्तनों का अवलम्वन किया। तात्पर्य यह कि कोई भी व्यक्ति समुद्र के बढने पर उच्च स्थान का आश्रय ग्रहण करता है। नल दमयन्ती का मुख चन्द्र देख अपने दौत्य कर्तव्य को भूल गये और उसके विशाल स्तनों को सानुराग देखने लगे।' इस उदाहरण में मुखरूपी इन्दु के एक देशवर्त्ती रूपक द्वारा डूवने के भय की तरह हेतूतप्रेक्षा- की ध्वनि है-ऐसा दीक्षित जी मानते हैं। लेकिन दूसरे लोग मुख में चन्द्रत्व के आरोप को अनु- राग में समुद्र के आरोप की निमित्तता से परम्परिन रूपक से हेतूत्प्रेक्षा ध्वनि मानते हैं। इसी प्रकार अन्यत्र भी उदाहरण जानना चाहिए। इति चित्रमीमासाया 'भारती' हिन्दी व्याख्यायामुत्प्रेक्षालङ्कारप्रकरण समाप्तम्।

तम्र वस्तुना निबद्धेनोत्पेक्षाध्वनिमुदाहरति-वीरर्द्रभटानिति। रणे वीररूद्रभटानू जयलघम्या स्वीकृतान् दृष्टा वने कण्टकिनो वृक्षा अरिवधूकेशान् कर्षन्तीत्यन्वयः। अ्रो

Page 446

४०८ चित्रमीमांसा

दाहणे उत्प्रेक्षाध्वनिं प्रतिपादयति-अन्नेति। कचग्रहणरूपेण वस्तुना जयश्रीसमालिङ्ि- तभटदर्शनोद्दीपितमदनोद्दीपितमन्मथत्वं वृक्षेषूत्पेष्यत इति उप्रेक्षाध्यनिः। एवमलङ्कारे- णोध्पेक्षाध्यनिमुदा हरति-वेलामिति। तस्या भैम्या मुखमेवेन्दुश्नद्र:, तस्यालोको दशनमुद्द- घोतक्ष, तत्पीयूपरसेन सुपारसेन पृथुं महतीं वेलां मर्यादामतिक्रम्योल्लसध्य, रागास्बुनिधी अनुरागससुद्रे विवृद्धे स्ति नरय दृष्टिः तुद्गावु्ची कुधावाश्रयति स्स आलस्वितवती । जलवृद्धावुष्चस्थानाश्चयणस्य प्रसिद्धत्वादित्यन्वय। अम्र मुखेन्दोरिर्येकदेशविवर्तिना रूपकेण मज्जनभयादिवेति हेतूेक्षा ध्वन्यत इति दीक्षिताभिप्रायः। मुखे चन्द्रर्वारोप- स्यानुरागे ससुद्रर्वारोपे निमिततया परम्परितरूपकेण हेतूतप्रेक्षाध्वनिरिति परे वदन्ति। ध्वनिमुपसंहरति-एवमिति। अन्यत्रापीति। अन्यत्र तमुदाहरति - सहि विरहउण माणस्स मज्झ धीरत्तणेण आसासम्। पियदंसणविहलंखलखणम्मि सहसत्षि तेण ओसरिभम्॥ (सखि विरचय्य मानस्य मम धीरतेनाघासम्। प्रियदर्शनविशृङ्धलक्षणे सहसेति तेनापसृतम ॥) अन्र कविनिषद्धवक्तप्रौढोफिसिदेन धीरतवापसरणेन वस्तुना प्रियदर्शनसौभाग्यवलेन धीरतया सोहुं न धक्यत इश्युत्प्रेक्षा ध्वन्यते। इत्यादावन्यन्नेयनेन बोधितमिति सं स्वस्थम्।

धरानन्देन रचित साऽयोतप्रेक्षाप्रबोधिनी। टीकायां चिम्रमीमांसासुधायामप पूर्णताम्॥

इति षाशिष्ठगोत्रीयरामषलस्य सुतेन धरानन्देन रचितायां चित्रमीमांसाटीकार्या सुघाभिधाना यासुखेक्षालक्कारप्रकरणं समाप्तम।

Page 447

अथ अतिशयोक्तिनिरूपणम्

तस्यास्तावत्- विषयस्यानुपादानाद् विष्य्युपनिवध्यते। यत्र सातिशयोक्ति: स्यात् कविप्रौढोक्तिजीविता।। (भारती) जहाँ विषय (उपमेय) के अनुपादान से (उसके वाचक शब्दशक्ति के ग्रहणाभाव में) विषयी (उपमान मात्र में) चमत्कारकारिता से उपनिबन्धित (प्रतिपादित हो) वहाँ, कवि प्रौढोक्ति से अर्थात् विषय के स्ववाचक शब्दोल्लेख के बिना भी उपमानवाचक पद का ही उप- निबन्धन हो, तो अतिशयोक्ति अलक्कार होता है। विमर्श-अतिशयोक्ति सादृश्य गर्भ अभेद प्रधान अध्यवसानमूलक अर्थालक्कार है। कोषगत इसका अर्थ है अतिशय अर्थात् वढाचढ़ाकर उक्ति अर्थात कथन। तात्पर्य यह कि इस अलद्कार में कथ्य को इतना अधिक बढ़ाया जाता है कि वह लोकसीमा पार कर जाय। यही कारण है कि इस अलद्कार में उपमान के द्वारा ही उपमेय का ज्ञान होता है। तथ्य तो यह है कि उपमान इस में उपमेय को निगल जाता है। उपमान के साथ उपमेय का अभेदत्व या अभिन्नता ही अतिशय है। जिस प्रकार कोई निगली हुई वस्तु अदृशय रहती है और निगलने वाले का अस्तित्वही दिखाई पडता है, उसी प्रकार अतिशयोक्ति अलद्कार में उपमान तो उपमान की जगह सुरक्षित रहता ही है-उपमेय की सत्ता भी उसी में लीन हो जाती है। इसके वर्ण्य विषय का लोकातीत वर्णन में चमत्काराधान होता है। इस अलद्कार में कवि के मन का विस्तार निसीम हो जाता है। वह किन्हीं दो पदार्थो में साम्य प्रदशित करते हुए अपनी मानसी वृत्ति को एक पर ही इस प्रकार स्थिर कर देता है कि दूसरी उसके सामने से सर्वथा अन्तहिंत हो जाती है। खुलासा यह कि कवि की मन स्थिति उपमान पर ही स्थिर रह जाती है। उपमेय तो उसकी आँखों के आगे आता ही नहीं। ऐसी स्थिति में स्वभावत उसकी आखें उपमान पर ही टिक जाती हैं और उसी में उसे कल्पना की लोकातिक्रान्त चरम सीमा दिखाई पडने लगती है अठ. इसमे सम्मानता या उसके तत्त्व गौ0- पड़ जाते हैं और अतिशयता की प्रधानता हो जाती है। कवि ऐसी स्थिति में लोकिक सीमाओ का वन्धन तांडकर कल्पना का विस्तार कर कार्य की पूर्वभाविता या कारण की परभाविता का वर्णन कर लोकविरूद्ध कथन करता है। इसमें मुख्यत किसी भी कवि का मूल उद्देश्य पाठक के मन में कौतूहल जगाकर चमत्कारोत्पत्ति करना होता है। (सुधा) अथेति। उत्प्रेक्षानन्तवमित्यर्थः। अतिशयोकिरुध्यत इति शेषः। तस्या लक्षणपूर्वकं

ग्रहणाभावे विषयी उपमानमात्रं चमत्कारकारितयोपनिबध्यते प्रतिपादनविषयीक्रियते

Page 448

४१० चित्रमीमांसा

(सुधा) सातिशयोकिरित्यन्वयः। कीदशी =कविप्रौढोकिजी वितेति। विषयस्थ स्ववाचकशव्दोक्ष्ले सनं विनाप्युपमानवाचकपदस्येवोपनिबन्धनसतिशयो किरिति तक्षपणमू। (चित्र०) इति लक्षणमुक्त्वा चातुर्विध्यं वर्णयन्ति। भेदेऽ्भेदः, अभेदे भेद:, संबन्धे- Sसंवन्धः, असंबन्धे सबन्ध इति। (भारती) 'इस प्रकार अतिशयोक्ति अलद्कार का लक्षण कहकर उसके चार मेदों का वर्णन करते हैं। (') मेद में अमेद अर्थात उपमान औौर उपमेय के भेद में अभेद, इसमें उपमान के द्वारा ही उपमेव का उपादान होता है। (२) अमेद में भेद सर्थात् उपमान औौर उपमेय के अभेन्द्र में भी अन्य आदि शब्दों से भेद है। (३) सम्वन्ध में असम्बन्ध का वर्णन। (४) असम्बन्घ में सन्वन्ध का वर्णन।

(सुधा)

तदुपादानम। उपमानोपमेययोरभेदेऽपि अन्यादिशव्दर्भेंदो द्वितीय। सम्वन्धेऽसम्बन्घ- वर्णनं तृतीय । असर्वन्धे सम्बन्धनं पतुर्थः। प्रकाशकृतस्तु-'निगीर्याध्यचसानं तु प्रकृतस्य समेन यत्। प्रस्तुतस्य यदन्यरवं यद्यर्थोंको च कल्पनम् ॥' 'कार्यकारणयोश्चैव पौर्धापर्य- विपर्यय। विज्ञेयाडतिन्रायोकि सा ।'अयमर्थ प्रकृतस्योपमेयस्य समेनोपसानेन निगीर्याध्यवसानन् द्रढीमसी वुद्धि, सेका। यच्च तदेव वस्तु अन्येन चिविकाकारवरतव- न्तरसान्येनाध्यवसीयते सा द्वितीया। यच्छ चेद्दव्देन यदि शव्देन वा यदर्थोंकौ क्त्पनमर्थादसम्भविनोऽर्थस्य सा तृनीया। कार्यस्ारणयोः प्रसिदधूस्य पौर्दापर्यस्य विपर्ययो वेपरीत्य कारणत्य शीघ्कारितया प्रतीयते सा चतुर्थी इत्याहु.। (चिन्न०) - एतेषामुदाहरणानि। कमलमनम्भसि कमले कुवलयमेतानि कनकलतिकायाम्। सा च सुकुमारसुंभगेत्युत्पातपरम्परा केयम् ॥ अन्येयं रूपसंपत्तिरन्या वैद्ग्ध्यधोरणी। नैषा कमलपत्राक्षी सृष्टिः साधारणी विधे.॥। अस्या: सर्गविधौ प्रजापतिरभूचन्द्रो तु कान्तिप्रदः शृद्गारकरसः स्वयं नु सदनो मासो नु पुष्पाकरः । वेदाभ्यासजडः कथं स विषयव्यावृत्तकौतूहलो निर्मातु प्रभवेन्मनोहरमिदं रूपं पुराणो मुनिः॥

Page 449

अतिशयोक्तिनिरूपणप्रकरणम् ४११

दाहोऽम्भ:प्रसृतिम्पचः प्रचयवान् बाष्पः प्रणालोचितः श्वासाः प्रेङ्ितदीप्दीपकलिकाः पाण्डिम्नि मसं वपुः । किं चान्यत् कथयाभि रात्रिमखिलां त्वन्मार्गवातायने हस्तच्छत्रनिरुद्धचन्द्रमहसस्तस्याः स्थितिर्वर्तते॥

(भारती)

इन सबों के उदाहरण जैसे- 'विचवित्रता की यह बाढ कैसी। बिना जल के कमल अर्थात् नायिका का मुख खिल उठा, कमल पर दो नीलोत्पल अर्थाद नायिका के दोनों नेत्र निकल पडे, ये कमल और कुवलय- कनकलता अर्थात नायिका की अङ्गयष्टि पर आ विराजे, और यह कनकलता भी ऐसी वैसी नहीं अपितु सुन्दर और सुकुमार, कोमल और मनोहर।' 'इस सुन्दरी का रूप सौन्दर्य भिन्न सम्पत्ति है और इसकी चतुरता इससे अन्य सम्पत्ति है। यह कमलपत्राक्षी विधि की सामान्य सृष्टि से भिन्न अन्य असाधारण सृष्टि है।' 'क्या इस सुन्दर उर्वशी की सृष्टि का प्रजापति, समस्त प्रभा का पुज चन्द्रमा है? अथवा प्रेम का देवता कामदेव है? या फूलों का आकर वसन्त है? मला वेदाभ्यास से जडवुद्धि किवा विषयों से विरत हृदय वाले ब्रह्मा का क्या सामर्थ्य जो ऐसे मनोहर रूप का निर्माण कर सके।' 'पानी में जिस प्रकार फैलाव वाले वर्द्धिष्णु दाह से वाष्प सचय होता है, उसी प्रकार तुम्हारे वियोग से उत्पन्न जलन से वह बाला साश्ुनयना है, प्रदीप्त कम्पित दीपशिखा की तरह तुम्हारे वियोग में उर्ध्वश्वास लेती है, देह तो ऐसी पीली हो गयी है कि लगता है कि किसी ने उसे पाण्डु- रह्ग में डुवा दिया है इतना ही नही, और कहता हूँ सुनो-तुम्हारे मार्ग के वातायन अर्थात् खिडकी में हाथ से छिपाकर चन्द्रमा की किरणों को सारी रातें रोके रहती हैं, यह स्थिति है इन दिनों तुम्हारी वियोगिनी नायिका की।'

(सुका) ग्रन्थकार: पूर्वोक्कभेदप्रतिपादन द्वारा तानुदाहर्त्तमारभते-पुतेषामिति। तन्नापि भेदेभेदकरयनसुद्दाहरति-कमलमिति। अनम्मसि कमलस्, कमले घ कुषलये, सा कनकलतायाम्, सा व सुकुमारसुभगा, इतीयमुत्पातपरम्परा केत्यन्वयः। अन्र कमलकुवलयकनकलतानां सुखनेन्ननायिकाभ्योऽभेदवर्णनमादम्। अभेदेऽपि सेद- मुदाहरति-अन्येयमिति। रूपं सौन्द्य तस्येयमन्या सम्पत्तिः, वैदग्वयं घातुर्यम्, तस्य धोरणी, इयमन्या, पुषा नलिनपन्राक्षी विधे: साधारणी सृष्टिर्नेत्यन्वयः। अन्न सौन्दर्या- दीनामभेदेऽपि अन्यादिपदोपग्रहणेन भेदोदाहरणं विर्धायत इति द्वितीयम्। अस्या इति। अम्रोदाहरणे रुपस्य पुराणप्रजासृष्टिसम्बन्घेऽपि असम्बन्धवर्णनं दृतीयम। असम्बन्धे सम्बन्धमुदाहरति-दाह इति। अम्ससां प्रसृतिम्पघो दाह: वृद्धिमान् प्रणालोचितः बाष्प: प्रेद्ितदीपश्ीप्षिकलिका: शवासाः पाण्डिम्नि भग्नं वपुः, किञ्जान्यत कथयामि अखिलां राम्रिं स्वरात्रिपर्यन्तम् 'कालाध्वनोरस्यन्तसयोगे' द्वितीया, इस्तच्छन्रनिरुद्धचन्द्रमहस- स्तस्यास्त्वन्मार्गवातायने स्थितिवर्तत इत्यन्वयः। अम्रोदाहरणेडम्भप्रसृतिंपचत्वादीनाम- सम्बन्धेऽपि क्रमेण सम्धन्धो निबध्यत इति तुर्यम्।

Page 450

४१२ चित्रमीमांसा

(चिन्न०) अन्र कमलादीनां मुखादिभेदेऽप्यसेदः। रूपादीनां लोकसिद्धरूपाद्यभेदे- डपि भेदः। रूपस्य पुराणप्रजापतिसृष्टिसंबन्धेऽप्यसंबन्धः । विरहादीनामम्भ :- प्रसृतिपचत्वाद्यसंबन्धेऽपि संबन्धश्च क्रमेण निबद्ध: । अन्नेदं विचार्यते। विषयस्यानुपादानादित्यत्र किसनुपादानं सर्वथैव विषय- म्य प्रतिपादकाभावः, तद्वाचकाभावो वा। आद्ये 'कसलमनम्भसि' इत्यादावपि लक्षणं न स्थात्। कमलादिशब्दारना लक्षणया विपयभूतमुखादिप्रतिपादकत्वात्। द्वितीये 'चुम्बतीव रज़नीमुख शशी' इत्यादिषु मुखशब्दादिश्लेषमूलाति- शयोक्तावव्याप्ति:। (भारती) प्रथम उदाहरण में कमल, कुवलय और कनकलता के मुख, नेत्र और नायिका से भेद में भी अमेद का वर्णन है। दूसरे उदाहरण में सौन्दर्यादि के अभेद में मी अन्यादि पद के उपग्रह्दण से भेद के उदाहरण का विधान है। तीसरे उदाहरण में पुराण प्रजापति की सृष्टि के सम्वन्ध में भी असम्बन्ध का वर्णन है। चौथे उदाहरण में पानी का प्रसृतिम्पचत्वादि के असम्बन्ध में भी सवध का वर्णन है। अव यहाँ विचार करते हैं कि इस लक्षण में विषय के अनुपादान से यहाँ सर्वथा ही विषय 1 के प्रतिपादकाभाव का अनुपादान है अथवा उसके वाचकाभाव का अनुपादान है? प्रथम पक्ष में 4 दोष वताते हैं-कमलादि शब्दों के साध्यवसाना लक्षण के द्वारा विषयभूत अर्थात् उपमेयभून मुखादि की प्रतिपादकता से सर्वथा प्रतिपादकामाव के अभाव से 'कमलमनम्भसि' इत्यादि उदाहृत भेद में मी अभेद रूप अतिशयोक्ति में अव्याप्ति है। दूसरे पक्ष की स्वीकृति में दोष बताते है कि 'चुम्वतीव रजनीमुख शशी' इत्यादि में मुख शब्दादि श्लेषमूला अतिशयोक्ति में उपमेयवाचक - पद रहने से तद्वाचक पद के अभाव से अतिन्याप्त है। (सुधा) अथ लक्षणं विचारयितुमारसते-अन्नेति। अत्र लक्षणे इद विशर्यंते-विषयस्यानुपादा- नादित्यत्र सर्वथेव विषयस्य प्रतिपादकाभावोऽनुपादानम्, तद्वाचकाभावो वाडनुपाया- नम। प्रथमपन्े दूषणमाह-कमलादिशब्दानां साध्यवसानलप्षणया विषयभूतोपमेय- भृतेसुखादिप्रतिपादकतासध्वेन सर्वथा प्रतिपादकाभावस्यासत्वतया कमलमनम्भ- सीश्युद्दाह तसे देऽप्यभेदरूपायामतिथायो क्कावव्याप्तिरित्यर्थः। द्वितीयपन्े दूषणमाह-चुम्ब- तीचेशयादि। सुखशब्दादिश्लेषमूलाया मतिशयो क्कावु पमेय वा च कपद्स् वेन तद्ा चक पदा- भाषाभावतयाऽव्याि:। (चित्र०) विषयिवाचकातिरिक्तविषयप्रतिपादकाभावो विवक्षित इति चेत्, तथापि 'उन्मीलितानि नेत्राणि पद्मानीवोदिते रवौ' इत्यादावुन्मीलितशब्दवाच्यलच्या- र्थाध्यवसायरूपातिशयोक्तावतिव्याप्तिः, तत्रोन्मीलितशब्दस्य विषयीभूतवि-

Page 451

अतिशयोक्तिनि रूपणप्रकरणम् ४१३

कासलक्षकतया तट्वाचकातिरिक्तस्यैव विषयप्रतिपादकत्वात् । विरषयप्रतिपाद- कातिरिक्तविपयप्रतिपादकाभाव विवक्षायामपि- पल्लवतः कल्पतरोरेष विशेष: करस्य ते वीर ! भूषयति कर्णमेकः परस्तु कर्ण तिरस्कुरुते॥। इत्यत्र कणेशब्दश्लेषमूलातिशयोक्तावव्याप्तिः। (भारती)

  • अर्थान्तर की आशका से दोष बताते हैं-विषयिवाचक अर्थात् उपमानवाचक जो पद है उससे भिन्न जो उपमेय प्रतिपादक पद है-उसका अर्थ अभाव विषयानुपादान मात्र है। ऐसी स्थिति में पूर्वोदाहृत 'कमल मनम्भसि' इत्यादि अतिशयोक्ति में उपमानवाचक पद लक्षणा से उसके प्रतिपादन में भी उपमानवाचकता के अतिरिक्त पद का उस प्रतिपादकत्वाभाव से अति- व्याप्ति नही है-ऐसा नहीं कह सकते। क्योंकि 'उन्मीलितानि नेम्राणि पम्मानीवोदिते खौ' इत्यादि में उन्मीलित शब्दवाच्य जो लक्ष्यार्थ है उसके अध्यवसाय रूप अतिशयोक्ति में अव्याप्ति है। उन्मीलित शब्द का जो विषयीभूत विकास है, उसकी लक्षणता से उपमानवाचक जो पद्म पद है उससे भिन्न का ही उसके उपमेय भूत जो पद्म है-इस अर्थ की वहाँ प्रतिपादकता है। अगर आप यह कहें कि वाचक पद छोडकर विषयिप्रतिपादक से अतिरिक्त विषय प्रतिपादका- भाव ही यहाँ विवक्षा का विषय है, तो यहॉ उन्मीलित पद के विकास की लक्षकता से ठसके द्वारा उपमानभूत पझ्मादि पतिपादकता से उसके अतिरिक्त अभाव से सुखादि प्रतिपादक रहने पर भी अतिव्याप्ति दोष नहीं है तो- हे वीर। तुम्हारे हाथ की यह विशेषता है कि वह कल्पवृक्ष को पल्लवित कर देता है। फलतः एक पल्लव तो कर्ण अर्थात (कान) को कर्णावतस रूप में सुशोभित करता है और एक पलव कर्ण (अर्थात राजा कर्ण को भी अपने दान से) तिरस्कृत करता है। यहाँ 'कर्ण' शब्द से ग्लेषमूलक अतिशयोक्ति में न्याप्ति होगी। क्योंकि यहाँ विषय और विषयी का कर्ण पद से अलग प्रतिपादन है। 1 (सुधा)

अर्थान्तरमाशङ्कय दूषयति-विषयीति। विषयिवाचकमुपमानवाचकं यत्पदं तदति- रिक्कं यदुपमेयप्रतिपादकं पदं तदभावविषयानुपादानमित्यस्यार्थः। तथा च कमलमनम्भ- सीत्यतिशयो क्कावुपमानवाचकपदेन उक्षणया तम्प्रतिपादनेऽप्युपमानवाच का तिरिककपदस्य तत्प्रतिपाद्कत्वाभावसर्वेन नाष्याप्तिरिति चेव, 'उन्मीलितानि नेत्राणि पद्मानीवोदिते

वव्याकिः। उन्सीलितशव्दस्य विषयीभूतो यो विकासः, तव्लक्षकतयोपमानवाचक यतपन्म- पदं तष्टतिरिकस्यैव तस्योपमेयभूतं यत्पद्म तदर्थप्रतिपाकत्वातू। न च याचकपदं विहाय विषयिप्रतिपादकातिरिक्तविषयप्रतिपादकाभावो विवकाविषया, अन्र तूत्मीलितपदस्य

प्रतिपादकतवेऽपि नाव्यासतिरिति वाच्यम्। पल्लवत इति। ते करस्य कतपवृक्षपतलचत एष विशेषोडस्ति-हे वीर! एक: पक्लवः कर्ण श्रोन्रं विभूषयति=शोभयते, परस्तु कर्ण तिरस्कु-

Page 452

४१४ चित्रमीमांसा

रुते। अत्र कर्णशब्दश्लेषमूलकातिशयोक्त्तावव्यापिः, विषयविषयिणोः पृथक् कर्णपदेन प्रतिपादनस्य सरवास्। (चित्र०) तत्र विषयविषयिणोः पृथक्कर्णपदोपादानाद्विषथिप्रतिपादकविलक्षणविपय- अतिपादकाभावो वा विवक्षित इति चेत्, तथापि- उरोसुवा कुम्भयुगेन जुम्भितं नवोपहारेण वयस्कृतेन किम्। त्रपासरिद्दुर्गमपि प्रतीर्य सा नलस्य तन्वी हृदयं विवेश यत्॥ इत्यत्र कुचद्वये कुम्भयुगाभेदाध्यवसायरूपातिशयोक्तावव्याप्तिः। तत्रोरः- अभवत्वाकारेण विषयप्रतिपादकस्य विषयिप्रतिपादकविलक्षणस्य सद्भावात्। (भारती) दूसरे पक्ष की आशका का निराकरण करते हैं कि यहाँ उपमान की प्रतिपादकता से विलक्षण उपमेय प्रतिपादक पदाभाव की विवक्षा दृष्टिगत है। 'पल्लवत कल्पतरो' इत्यादि में तो एक ही कर्णपद का अलग से उपादान है। न कि विलक्षणता के वाचक पद के अनुपादान से अव्याप्ति नहीं है। फिर भी यहाँ दोष दिखाते हैं। 0

कृशाङ्गी वह दमयन्ती अपनी लज्जारूपी नदी के उच्चतम प्राकार को पार कर जो नल के हृदय में प्रवेश कर गई, वह युवावस्था से किये गये समीप में नये मुक्ताहार से युक्त अथवा नवीन उपहार से युक्त वक्ष स्थलपर उत्पन्न स्तनरूप दो कलशों का प्रभाव था क्या? तात्पर्य यह कि जिस प्रकार कोई दुर्वल व्यक्ति छाती पर दो कलशों को रखकर उसकी सहायता से नदी पार कर जाता है। उसी प्रकार कूशाङ्गी दमयन्ती भी युवावस्था से सम्पादित नये उपहार स्वरूप या नवीन मोतियों की मालावाले कलशाकार विशाल दोनों स्तनों की सहायता से अपनी लब्जा रूपिणी नदी के उच्चतम प्राकार को पार कर नल के हृदय में प्रविष्ट हुई।' इस उदाहरण में यहाँ दोनों विशाल स्तनों में दो घडों का अभेदाध्यवसायात्मक अतिशयोक्ति में, छाती पर समुत्पन्नरूप से उपमान प्रतिपादक विलक्षण 'उरोभुवा' इस उपमेय प्रतिपादक के रहने के कारण अव्याप्ति दोष इटाया नहीं जा सकता। (सुधा) पछ्ान्तरमापङ्य निराकरोति-तत्र विषयेति। उपमानप्रतिपाद्कादू विलक्षणसुपमेय अतिपादकपदाभावो विवसागोघर। पल्लवतः कल्पतरोरित्यादी सु एकस्येव कर्णपदस्य पृथफूरवेनोपादानम, न तु विलक्षणस्य तद्वाचकपषस्यानुपादानाप्नाव्यास्विरिति भाघ:। अम्र दूषणसाह-तथापीति। सा दमयन्ती यध् यस्मात् कारणाद, नलस्य नेषवस्य तृणस्य घ हृद्षयं मनो मध्यस विवेश। किं कृत्वा, त्रपेव या सरिवदी सैव दुर्ग कोट, दुःखेन गम्यतेऽस्सिन् दुर्गः 'सुदुरोरधिकरणे' इति उः 'घनं दुर्ग मही दुर्गमन्दुर्ग चार्तसेव वा' इति सनुस्मरणात् सरितोऽपि दुरगर्वमेव, तव् पतीर्य तीर्र्वा, उरोभुवा उरास्थेन कुम्महुपेन ङुम्भयुगेन कलशहयेन विजुम्भितं चेषितं तत्कारणं किसु इष्यर्थः। कोदशेन नवोपहारेण नूतनोपायेन, पुनः कीदशेन वयस्कृतेन यीवननिवेदितेनेत्यन्वयः। अन्रोदाहरणे कुचद्ये कुम्भयुगामेदाध्यवसाय। रिमका तिशयो कावुरःपरभ वत्मरू पेणोप मानमतिपादकविलक्षणस्यो

Page 453

अतिशयोक्तिनिरूपणप्रकरणम् ४१५

(चिन्र०) ननु विषयिप्रतिपादकविलक्षणस्य विषयतावच्छेदकप्रकारेण विषयप्रति- पादकस्याभावो विवक्षितः, उरःप्रभवत्वं तु न पयोधरयोविषयतावच्छेदकमनेक- साधारणत्वादिति चेत्, एवमपि- ध्वान्तस्य वामोरु विचारणायां वैशेषिकं चारु मतं मतं से। औलूकमाहु: खलु दर्शनं यत् क्षमं तमस्तत्त्वनिरूपणाय॥। इत्यादावुल्कदर्शनमिति वैशेषिकमते पक्षिविशेषदृष्टचभेदाध्यवसायरूपाति- शयोक्तवव्याप्तिदुर्वारा, तन्न वैशेषिकमतसिति विषयतावच्छेदकप्रकारेण विषय- प्रतिपादकस्य सम्भवात्। अपि चैवम् 'रामरावणयोर्युद्धम्' इत्यनन्वयालङकारे चातिव्याप्तिः। तन्र विषयप्र तिपादकविलक्षणविषयप्रतिपादकाभावात्। ननु यत्र कश्चिदभेदेनाध्यवसीयते स विषयः, यस्तु तथाध्यवसीयते स विषयीति विषयविषयिभावोऽ्र विवक्षित इति नोक्तातिव्याप्तिरिति चेत्, एवमपि 'विद्वन्मानसहंस' इत्यादिश्लिष्टरूपकेऽतिव्याप्तिर्दुवारा। रूपके ताद्रूप्यारोपमान्रम्, अतिशयोक्तवभेदाध्यवसाय इति कल्पना तु रूपकविचारलक्षण एव निरस्ता। (भारती) प्रकारान्तर से निवेश की आशका कर निराकरण करते हैं कि उपमान-प्रतिपादक विलक्षण का विषयतावच्छेदक प्रकार से उपमेयप्रतिपादक का अभाव विषयानुपादान है। इस उदाहरण में 'उर प्रभवत्व'रूप विषयतावच्छेदक का अनेक साधारण्य से स्तनों की ही उसकी प्रकारता से वृतित्व की सभावना नहीं रहने के कारण अव्याप्ति नहीं'है। ऐसा कहने में भी द्दरोष है। जैसे- हे दमयन्ति। अन्धकार के विचार में न्यायवैशेषिकों के मत अथवा कणाद के मत सुन्दर नहीं हैं। क्योंकि इन मतों में तमस्तत्त्व के निरूपण में 'तम' के द्रव्यत्व के विचार में उलूक विषय को समर्थ कहा है। इस उदाहरण में 'औलूकदर्शन' यह वैशेषिक मतविषयक पक्षिविशेष की दृष्टिविषयक अभेदाध्यवसाय रूप अतितयोक्ति में अव्याप्ति दोष है। वैशेषिक मत का विषयतावच्छेदक उलूक दर्शन प्रकारेण विषय का प्रतिपादक है। और भी स्थलान्तर में अतिव्याप्ति वताते हैं-गगनं गगनाछारं सागरः लागरोपसः। रास रावणयोर्युद्ध रामरवणयोरिव।' पूर्वव्याख्यात अनन्वय अलद्वार के इस उदाहरण में स्पष्ट रूप से अतिव्याप्ति दोष होगा। यहाँ उपमान-प्रतिपादक विलक्षण उपमेयप्रतिपादक के अभाव से दोनों की एकरूपता के कारण अतिव्याप्त है। यहाँ समाधान की आशका कर निराकरण करते हैं-जिसका जिसमें अमेद से अध्यवसाय है

Page 454

४१६ :चित्रमीमांसा

जैसे मुखका चन्द्रमा में। जो ऐसे अमेद से निश्चित किये जाते हैं वे विषयी हैं। जसे मुख का अभेद के अध्यवसाय से चन्द्रमा विषयी है। 'रामरावणयो' इस उदाहरण में अभेदा- ध्यवसाय का एक शब्द से दोनों की एक प्रकारता से विलक्षण विषय और विपयी भाव के द्वारा वहॉ अतिव्यापि नहीं है। यहॉ दोष वताते हैं। ऐसा कहने से 'विद्वन् मानसहस' इत्यादि रिलष्ट रुपक में अतिव्याप्ति है। वहाँ अभेद से विषय ओर विषयी के अभेदाध्यवसाय रहने के कारण विषयी का ही विषय के प्रतिपादन से लक्षण समन्वय है।, अगर आप यह कहें कि रूपक में अमेदाव्यवसान ही नहीं है, किन्तु वहाँ केवल ताद्रूप्य आरोप मात्र की कल्पना है तो यह रूपक के लक्षण के विचार करते समय ही विचार किया जा चुका है। किन्तु-सारूप्य निवन्धन अप्रस्तुत प्रशसा के इस उदाहरण में- भाबदु छत्रिमसटाजटिलांसभित्ति रारेपितो मृगपतेः पदवीं यदि श्वा। मत्तेभकुम्भतटपाटनलम्पटस्य नादं करिष्यति कथं हरिणाधिपस्य।' यहाँ 'शवा' पद के उपादान से भेदाध्यवसाय रहने पर अतिव्याप्ति है। अतः हमारा यह लक्षण उचित है- विषयोललेख नमृते विषमाध्यवसायाध्यवसानतः । तम्योक्िर्व्यङ्गयभिव्ना याऽतिशयोकिस्तु सा मता॥ -- (सुधा) प्रकारन्तरेण निवेशमाशक्कय निराकरोति-नन्विति। उपमानप्रतिपादकविलक्षणल्य विषयतावच्छ्रेदकप्रकारेणोपमेयप्रतिपादकस्याभादो विषयानुपादानमित्यस्यार्थः। अन्नो दाहरणे उप्रभवत्वरूपविषयतावच्छेद्कस्यानेकसाघारण्येन पयोघरयोरेव तत्प्रकारतया वृत्तित्वासम्भवान्नाव्याप्तिरिति । एतस्मितपि दूषणमाह-एवमपीति। हे दमयन्ति ! तमसो विचारणाया वैशेषिकमतं काणादमतं नश्चारु शोभनस् यत् तमस्तत्वनिरूपणायां तमोहण्यत्वविचारे उलूकविषयं समर्थसाहुरित्यन्वयः। अन्रोदाहरणे औलूकदर्शनमिति वैशेषिकमतविषय कपष्षिविशेषद्ष्ट्यभेदाध्यवसायरूपायासतिशयो ककाव्याक्षिः। वैशेषि मतस्य विषयतावच्छेदकसुलूकदर्शनत्वम, तत्पकारेण विषयस्य प्रतिपादकरवात्। स्थला- न्तरेऽतिव्याप्तिमाह-अपि चैवमिति। 'गगनं गगनाकारं सागरः सागरोपमः । रामरावण- योर्युद्धं रामरावणयोरिव ॥' हत्यनन्वये उपमानप्रतिपादकविलक्षणोपमेयप्रतिपादफस्या- भावेनोसयोरेकरूपरवेन सत्वादतिव्याप्ति: स्यादिति भावः। अम्र समाधानमाशक्कय निराकरोति-नन्विति। यस्मिन् यस्याभेदेनाध्यवसाथः, यथा मुखस्य चन्द्रे, यस्तु तथा तद्भेदेनाध्यवसीयते निश्चीयते स विषयीति। यथा मुखाभेदाध्यघसायेन चन्द्रो विषयी। रामरावणयोर्भेदाध्यवसायस्येकशब्देन इयोरेकप्रकारतया विलक्षणविषयविष- यित्दाभावेन तन्र नातिव्याप्तिरिति भावः। अन्न दूषणमाह-एवमपीति। 'विद्वन्मानस' इत्यादी श्लिष्टरूपकेऽतिव्याप्िः। तन्नाभेदेन विषयविषयिणोरभेदाध्यवसायस्त्वेन विष यिणेद विषयस्य प्रत्िपादनात् लक्षणसमन्वयसत्वाष्िति भावः। न च रूपकेऽभेदाध्यवक्षा नमेद नास्ति, किन्तु ताद्रूप्यारोपमान्नमिति कल्पनम, तत्त रूपकलक्षणविचार एव निर स्तम्। तन्र हि तादूव्यप्रतिपत्तिरारोपस्तदभेदप्रतिपत्तिरष्यवसाय इति भेदः। रूपके सुखे चन्द्रतादृप्यं प्रतीयते। अतिशयो कौ रूपके चन्द्राभेदोऽतिशयोकी तत्तादृप्यमिति चैपरीस्य स्य वफ्तु शक्यत्वादित्यादिना तादशकल्पनानिरसनं स्पष्टमेव प्रतिपादितम।

Page 455

अतिशयोक्तिनिरूपणप्रकरणम् ४१७

(चित्र०) सारूप्यनिबन्धनसमासोक्त्युदाहरणेषु चातिव्याप्िः। अप्यर्धचित्रमीमांसा न मुदे कस्य मांसला। अनूरुरिव धर्माशोरर्घेन्दुरिव धूर्जटेः॥ इति चित्रमीमांसायामतिशयोक्तिप्रकरणम्।

(भारती) उपमेयवाचक पद के विना ही लक्षण से उपमानवाचक पद का ही अध्यवसाय के व्यङ्गय से भिन्न जो उक्ति है-वही अतिशयोक्ति है। यहाँ रूपक में अतिन्याप्ति चरण के लिए उपमैय पद दिया गया है। अप्रस्तुत प्रशसा में अभेद रहने पर भी सारूप्य के द्वारा उसके विपरीत अध्य- वसाय से अतिव्याप्ति नहीं होती है। यहाँ विषय और विषयी के अभेद नहीं ताद्रूप्य है यह नियम सभव नही है। अर्द्धचन्द्र है जिनके माथे पर ऐसे भगवान शंकर की तरह, अरुण सारथी वाले भगवान सूर्य की तरह भला यह आधी चित्रमीमासा किसे प्रसम्नता न देगी ? अर्थात् सवों के लिए प्रसन्नता- दायक है। इति चित्रमीमासाया 'भारती' हिन्दीव्याख्यायामतिशयोकिप्रकरणं समाप्तम्।

(सुधा) किस्त, दूषणान्तरमाह-सारूप्येति।

शारोपितो मृगपतेः पदवीं यदि श्वा। मत्तेभकुम्भतटपाटनलम्पटस्य नादं करिष्यति कथ हरिणाधिपस्प ॥' इति सारूप्यनिबन्धनाप्रस्तुतप्रशंसायां मूर्खाभेदेन श्वपदोपांदानादभेदाध्यवसायसत्वे- इतिव्याप्तिः। तस्माद् विषयस्यानुपादानादिति पदमसम्भवदुक्किकमेवेति। एवं विषयिणो- डपि उपनिबन्धनमनेकविकल्पग्रस्तम्। अतोडस्मल्लक्षणम्- 'चिषयोष्लेखनमृते विषयाध्यवसायाध्यवसानतः। तस्थोक्तिर्ष्यङ्गवभिन्ना याऽतिशयोक्िस्तु सा मता।' अयमर्थः, उपमेयवाचकपदं विनेव लक्षणयोपमानवाचकपदस्येवाध्यवसितस्य व्यङ्गय- भिन्ना या उकि:, सा अतिशयोकिरित्यर्थः। रूपकेऽतिव्यापिवारणाय-उपमेयेत्यादि। अप्रस्तु- तप्रशंसायामभेदसरवेऽपि सारुप्येण तद्वैपरीत्याध्यवसनाव्नातिव्याप्िः अत्र विषयविषयिणो- रभेद एव न ताद्रप्यमिति नियमस्तु न सम्भवति। 'सुधाबळूग्रासैरुपवनचकोरेः' इत्यादा- वभेदासग्भवेन ताद्रप्यातिशयो केरङ्गीकारातू। अध्यवसानत्वारोपविषयस्थानाहा्यनिक्षय- युता, आ्ारोप्यमाणतादात्येन विवचेव। तादार्यशब्देन कचिद् भेदो ग्राद्यः, कचित्ताद्रूप्य- २५ चित्र०

Page 456

४१८ चित्रमीमांसा

क्षेति विशेष:, न तु रूपकेऽतिव्यापि, तत्रीपि उभयविधानस्य सत्वादिति चेतु, न; अ्र मुखादिपदस्यानुपादानेन मुखत्वादिवैध्म्यानुपपश्या भेदबुद्धेरनाहार्यत्वास। रूपके तु मुखादिपदप्रयोगदाहार्याभेदसत्वमिति तयोविशेषाद्। उत्प्रेप्षवारणाघ निश्चितेति। अत्र रूपकभेदप्रतिपादनं तदन्यत्रोक्कम। यत्त, चत्वार एव भेदा:, तदृपि न, भेदान्तराणामपि सत्यास्। कार्यकारणयो: पूर्वापरभावस्य वस्तुतः सरवेऽपि शीघ्रकारित्वविवक्या वैपरीस्ये- नोकिः। सा पख्मी, सा द्वेधा, पूर्व कार्यस्य पश्चात् कारणस्योकि, दयोस्तुल्यकाल त्वोककिश्च। आधा यथा- क वीन्द्राणामासन् प्रचुतरमेवाङ्गणभुव- श्रलद् गङ्गासङ्गाकुलकरिमदामोदमधुरा:। अमी पक्षात्तेषासुपरि पतिता रुद्रनृपतेः कटाक्षा: पीरोदप्रसरदुरुवीचीसहघरा:।' अन्र कारणास् कार्यस्य पूर्वसुकि:। द्वितीया यथा- 'मुझति मुखति कोश भजति भजति प्रकम्पमरिवर्गः। हम्मीरवीरखड़गे त्यजति त्यजति चमामाशु।।' अत्र कार्यकारणयो तुष्यत्वोकिः। अपह्नतिगर्भतवे सापह्ववापि यथा- 'मुक्काविद्गुममन्तरा मधुरसः पुष्पं परं धूर्वहं प्राळेयद्युतिमण्डले खलु तयोरेकासिका नाणवे। तथ्चोदञ्जति शङ्गमूष्नि न पुनः पूर्वाधलाभ्यन्तरे तानीमानि विकष्पयन्ति त इमे येषां न सा टकपथे।।' अब्राघर पव मधुरस इत्पतिशयोकि: पुष्परसो न मधुरस इत्यपह्नतिगर्भा। यत्तु रस- गङ्गाधरकृता विषयिवाचकविषये छक्षणाया: शक्यतावच्छेदक्कमात्रप्रकारकलचयविशेष्यक- बोधनं कार्यतावच्छेदकम्। पवञ्ज निगरणे सर्वत्रापि विषयितावच्छेदकघमंरूपेणैव विषयस्थ भानं न विषययभिनन- त्वेनेति स्थिति: 'रूपकातिशयोकि: स्यान्निगीर्याध्यवसानतः' इति चन्द्रालोकग्रन्थव्याख्याने- इतिशयोको रूपकविशेषणं रूपकप्रदर्शितभेदानामतिशयोकौ सम्भवातिदेशप्रदर्शनार्थम। तेनातिशयोक्केरप्यभेदताद्रप्याभ्यां द्वैविष्यं यस्कुवलयानन्दे दीप्षितैरुक्म, तस् निरस्तमिति नष्या इश्यु कम्। तदसव् ; शक्यघर्मस्य लचये पूर्वमविद्यमानतायामप्रतीतत्वेन तद्विशिष्ट- तथा लक्षणाया असम्भवास्, यद्यद्धर्मविशिष्टे शक्यसम्बन्धग्रहस्तत्तद्भर्मप्रकारकल- क्योपस्थिते: समानप्रकारकशाष्दबोधज्ञाने प्रयोजकत्वाव, लचणापरिहार्याया अनुपपत्ते- स्तद्वस्थत्वाच्च। मात्रपदेन विषयनावच्छेदकस्यैव व्यावर्तनाद्। तात्पर्यवशासादृशबोधा झ्रीकारे तद्वशादेव शक्याभेदप्रकार कबोधेऽपि वाघकाभावादिति तद्व्याख्यातारः। यदपि सापह्नवातिशयोक्तिमुद्दिश्य पर्यस्तापह्नतेनं प्रामाणिकसम्मतत्वमिति रसगङ्गाघरे प्रति- पादितम्। तम्र बमः-कि स्वस्येव प्रामाणिकत्वमङ्गीकृतम्, अन्यस्यापि चा। नाथः, इतरमताभिप्रायाज्ञानेन दूषणस्य कथने तदभावात्। अथ द्वितीये पर्यस्तापह्नतिगर्भामु- सप्रेक्ं 'जानेऽतिरागाद' इत्यादौ उदाहरता तदकीकारस्य स्पष्टप्रतिपादनात्। यदपि तन्र प्रकाशादिलक्षणानन्तर्गतत्वम्, तदपि न, अलद्काररत्नाकरोक्त्तलक्षणस्य तत्रस्वादित्या

Page 457

अतिशयोक्तिनिरूपण प्रकरणम् ४१६ स्पृशन्तीवेन्दुमण्डलम्' इति पाठे को वाडलक्कारः ? उत्प्रेष्षं चेदङ्गीकरोषि, तर्हीवादेरसरवे गम्योप्प्रेप्षेयमुचिता।, सम्भावनावाचकपदे वाध्योत्प्रेक्षा, तदसत्वे गम्योत्प्रेक्षेति नियमस्य सर्वसम्मतत्वाद्। 'रवत्कीर्तिर्अ्रमणश्रान्ता विवेश स्वर्गनिम्नगास्' इति स्वदुदाहृतगम्यो- सप्रेक्षातोऽ्र विशेषाभावास। अम्र यथा बहुदूरगमने स्वर्गगमने वा स्वर्गङ्गाकर्मकप्रचेशता-

त्वरूपहेतू ्प्रेक्षेति मते तु, ता हगा गमनता दात््याध्यवसितस्वर्गङ्गाप्रवेश रूपोपात्तघर्मनिमित्ता। एवं सौधाअणीत्यादावपि परमोध्वंदेशसंयोगे चन्द्रमण्डलस्पर्शतादात्योपपेप्षाया परमोर्ध्व

निमित्तैव। तथा च गम्योतेत्षोदाहरणतासिद्धी सम्बन्धातिशयोक्तयुदाहरणमसङ्गतमेवेति। तत्रोच्यते-सम्भावनावाचकपदानुपादाने गम्योप्रेक्षेति नियमश्यालद्कारान्तराविषय पवा- भ्युपगमात्। अन्यथा 'नुनं मृखं चन्द्रः' इत्यादावपि नूनपदानुपादाने गम्योखेप्षापत्तौ रूपकादेरतुपपत्ती महाहानिप्रसङः । एवञ्र प्रकृतेऽसम्बन्धे सम्बन्घरूपातिशयोकत्य - लंकारविषये न गम्योक्ष्ेक्षावसरः। 'त्वरकीतिः' इत्युदाहरणे तु भ्रमणशान्ततवरूपहेत्वंशे अवति गग्योदीपेत्युदाहता स्वर्गक्काप्रवेशांशे तु न तद्विषय इत्यलम्। अतिशयोकौ प्रतिपादिता भेदा न सम्भवनिति, पतादृशातिशस्य रूपकदीपकादिषु सत्ात्, यथास्थित- वस्तू की विच्छित्तिविशेषाभावाद। तस्मात्तावत् प्रभेदान्यतमत्वकथनेन सर्वभेदावगमादिति केचित्। अब्र नग्पा :- उपमानोपमेयस्य निगीर्याध्यवसानमेवातिशयोकिः। भेदास्तु तदनु-

वेन लक्षणाक्रान्तर्वेन तेषां सम्भव एचेति वाच्यम, अन्यत्वाविभिन्यवस्तुप्रतीतेरेव घम- रकारित्वेनानुभव सिद्धतयाऽन्यत्वादिभिर भेदप्रतीत्यङ्गी कारेऽनुभवासङ् तेः । न ान्यतमत्वस्य सर्वम्रानुगतत्वं वक्तुं शक्यते, वि्छित्तिवैलक्षण्ये सत्यन्यतमत्वस्याप्रयोजकश्वाद्, उपमा- दिसकलान्यतमतवस्य तव्लक्षणसत्वे उपमाधलक्कारपृथककथनवैयर्थ्यापते.। न चातिरिका- लङ्गारकरपने गौरवं स्यादिति वाच्यम, प्रधानोरकरषकत्वरूपस्यालङ्कारत्वस्य त्वन्मतेऽप्य- ङ्गीकारास्, अन्यतमत्वस्य चमत्काराप्रयोजकत्वेनालंकार विभाजकोपाधित्वाभावात्। न चाने कालंकार विभाजकोपाध्यक्रीकारे गौरवमिति वाध्यम्, अलंकारविभाजकोपाधिपरिगण- नस्य पौरुषेयरवेन तद्दोषाभावादिति वदन्ति। अम्र वदन्ति-रूपकमिन्नर्वे सति चमरकृति जनकाहार्यारोपनिश्चयविषयत्वमतशयोक्िलक्षणस्। रूपकवारणाय सत्यन्तोपादानेना- नाहार्यश्वस्य प्रयोजनसिद्धावाहार्यत्वनिवेशस्य आ्रन्तिवारणाय सार्थकरवेन न पूर्वापर- कथनविरोधः। लक्षणालम्यमुखादौ तद्धर्मस्य सर्वेन वैधर्म्यप्राप्त्याहायत्वाङ्गीकारे दोषा- भावास्। एतल्लक्षणस्य सर्वेषु भेदेष्वनुगतत्वम। अतिशयोक्कावभेदस्य द्वितीयेऽन्यर्वस्य तृतीये सम्बन्धस्य चतुर्थेऽसम्बन्घस्य प्चमे सहत्वस्य पष्ठे पूर्वापरधिपर्ययस्य चमत्कृति-

स्यारोपविषयस्थ सर्वालंकारे रूपकादिभिन्ने सत्वादतिप्रसंग इति वाच्यम्, इष्टापत्तेः, अलंकारभावस्य घमरकाराधीनतया चमरकारस्यैव तत्पराधान्यप्रतिपाद्करवेन तत्सर्वे तत्तत्प्राधान्ये तदंगरवेनावस्थिताया अतिशयोक्केत्रधानतया व्यपदेशायोग्यत्वास 'प्रधा- नतया व्यपदेशा भवन्ति' इति न्यायोन तत्तदलंकाराणामेव प्रधानतया व्यपदेशार्हत्वात्। सर्वत्रैवंविधे विषयेऽतिशयोक्तिरेव प्राणत्वेनावतिष्ठते। तां विना प्रायेणालंकारत्वाभादिति विशेषालंकारप्रकरणे मम्मटेनो क्त्वारच।

Page 458

४२० चित्रमीमांसा

'सैपा सर्वत्र वक्रोफिरनयार्डर्थो विभाष्यते। यत्नोऽस्यां कविना कार्य: कोडलंकारोऽनया विना॥' इत्यन्यैरुक्तवाच्चेत्यलम्। इयं व्यङ्गथा यथा- 'तद प्राष्तिमहादुःखविलीनाशेषपातका। तच्चिन्ताविपुलाह्वादप्षीणपुण्यचया तथा। चिन्तयन्ती जगत्सूति परब्रह्मस्वरूपिणम्। निरुच्छ्ासतया मु्कि गताऽन्या गोपकन्यका।।' अत्रोदाहरणे जन्मसहस्रोपभोग्यानि सुकृतदुष्कृतफलानि वियोगदुः्चिन्ताभ्यां क्ाप्य- नुभू तानीतयुक्त्ती दुष्कृतसुकृतफरराशितादास्येनाध्यवसितौ भगवद्वियोगदुःखचिन्ताह्वादौ प्रतीयेते इति निगीर्याध्यवसानरूपातिशयोक्तिह्यप्रतीतेव्यंङ्गयस्य सत्वात्। इयमतिश- योक्ि: श्रुतिस्मृत्योरपि- द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते। तयोरन्यः पिप्पलं स्वादृत्ति अनश्नजन्योऽमिचाकशीति। या निशा सवंभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी। यस्यां जाग्रति भूतानि सा निश्ा पश्यतो मुनेः॥ इत्यादौ स्पष्टर्वादिति सवं शिवम्।

धरानन्देन पूर्णताम्॥

वशिष्ठगोन्रजातस्य ठाकुरस्य सुतास््रयः। पूर्णदासो रामबलो देवीदासश्घ विश्रुताः॥

लब्धजन्मा रामबलो दयोरपि कवपायुतः। श्रीगुरोः परमानन्दावलब्घेष्टो भरते पुरे॥। आस्ते नाम्ना 'धरानन्दो' मारुतेः पदसंस्थितः। तेनेय 'चिश्रमीमांसासुघाव्याख्या' प्रकाशिता॥ यावद् वेदादिविद्या जगति विजयते सन्मनुष्यप्रचारा यावद् भागीरथीय त्रिपुरहरजटाजूटमध्ये चकास्ति। यावच्छेष: फणाग्रे वहति वसुमर्ती भारवरेन्दुप्रकाशां तावद् व्याख्या सुधाख्या चिलसतु भुवने प्रीतये सज्जनानाम्॥

हति श्रीचित्रमीमांसाव्याख्यासुधाख्या पूर्णतामगमद्।

Page 459

समाप्तिमङ्गलम्

( १ )

सारस्वते निशितकण्टककीर्णमार्गे सोत्साहसञ्रणसद्व्रतदीक्षितानाम्। विप्ान् हरन् परमकारुणिको गणेशः प्राङ्मङ्ग लानि ललितानि विजृम्भयेन्नः ॥।

( २ )

यस्याः सुवर्णघटनाहितकान्तिपूरा- चित्रोपमं स्फुरति सूक्ष्मपदार्थजातम्। मन्दस्मितद्युतिसुधाघवलीकृतश्रीः सा 'भारती' हरतु मानसतामस नः ॥

इति 'मुगेर' मण्ढलान्तर्गत 'अकबरपुर' गमवासि दैवज्ञ प्रचरश्रीमत्कीर्तिनाथमिश्राश्मज-

विसर्शोपेत 'भारती' हिन्दीव्याख्यायुतं चित्रमीमांसाग्रन्थस्य सुसंस्कृतं संस्करणं समाप्तमू।

समाप्तश्चाऽयं समुपलभ्यमानो ग्रन्थ:

O

Page 461

चित्रमीमांसोद्ृतक्षोकानुक्रमणिका

पृo पृo

अ अथं मार्तण्ड: कि स खलु २६०

अङ्कं केऽपि शशङ्धिरे ३०३ अरण्यवासाञ्जित बान्धवासु ३६४

अकुंकुम सोद मिवाङ्ग ३५७ अलौकिकमहालोक २२१

अकृशं कुचयो: कृशं २९३ अवाप्तः प्रागकभ्यं परिणत ३०२

अङ्गुलीभिरिव केशसञ्चयं ३२२ अवैमि हंसावळयो वलक्षा ३७३

अडत्रिदण्डो हरेरु्ध्वम २०४ असिमान्रसहायोऽपि ६५

३८८ असी मरुच्चुम्बित चारुकेसर: ९९

अजस्मारोहसि दूरदीर्घां ३९६ २२७

अतिथि नाम काकुत्स्थात् १४६ अस्मद्विक्रमचेष्टितानि ३२०

अत्यन्तरागिणसपि २२६ अस्या दौहदशालिन्या ३४३

अत्युच्चा: परितः स्फुरन्ति १९१ अस्या: सर्गविधी प्रजापति २६६

३१३ अस्या: सर्गविधी प्रजापति ४१०

अथाजिनाषाढघरः प्रगल्भ ४०३ अस्यां सुनीनामपि मोहमूहे ३४१

अथ सान्ध्यसान्द्र किरणा ३५३ अस्यैव सर्गाय भवत्करस्य ३८५

अद्य या मम गोविन्द १८५ अहमेव गुरु: सुदारुणाना ५८

अद्रावत्र प्रज्वलस्यग्नि ११ आ अनन्तरत्नप्रभवस्य यस्य ४८ अनवरतकनकवितरण आकर्णय सरोजादि ४८ ७२

अन्यथैव स्थिता वृत्तिः ३३४ आकृष्टिवेगविवलद्भुज ३४४

अन्येयं रूपसम्पत्तिरन्या ४१० आकृष्यादवमन्दग्रह ३०६

अन्योऽन्येनोपमा बोध्या १६४ आत्मानं रयिनं विद्धि २३७

अपर्यन्तो विकल्पानां २३२ आानीय द्विषतां धनानि २५९

३०६ आबद्धकृत्रिमसटा जटिलांसभित्ति ३२५

अपि च समुक्यभेद: ३७३ आयुर्द्धानमहोत्सवस्थ २१०

अपि तुरगसमीपादू १८९ आरोपविषयस्य स्याद १९८

अप्यधषित्रमीमांसा आरोप्यमाणमारोपविषया २४५ ४९७ अभिवन्द्य चन्द्रशेखरमाघ्यं लो हिततलावेती ३९३ भवर्जिता किञ्ञिदिव ३३७ ३०५ आवृण्वतो लोचनमार्गभाजी २२४ अमुष्य धीरस्य जयाय २८१ ३०८ १४२

अयमाभाति राजेन्द्रो ३५४ इ अयं पझमासनासीनक्षक्र १३९ इतराण्यपि रांसि ५८

Page 462

४२४ चित्रमीमांसा

पृo पृo

इति विज्ञापितो राज्ञा १४५ कपोलफलकावस्या: ३७९

इत्यादिषु पश्यामो गुणक्रिया ३७२ कमलमनम्भसि कमले ४१०

इत्येवमादि सौभाग्यं १५० कर्ता यद्यपमानं स्यास् ३२६

इन्दुलिंप्त इचाअनेन ३१९ कषिसतिरिव बहुलोहा ९५१

इन्दोरपि मृगाक्षीणं २०१ कविसंमतलादृश्यादू विषये २७८ इवादिघर्मलोपेऽपि ११३ क स्तूरीका मृगाणामण्डास् ३१६

इवादेरुपमेयस्य इयोलोंपे ११३ कस्तूरीतिलकादि भालफलके २९६

इह हेतावुखेपये म्षन ३७८ २७२ कान्त्या चन्दं विदु: केषित् २८८ उ कि तावत्सरसि सरोजमेतदारा २६१ उद्ुपरिषद: किं नाहन्ती ३७४ किंशु कव्यपदेशेन तरुमारूह्य ३४२ उम्रेक्षायां निमित्तत्वं ३७५ किरति पकरं गवां प्रकामं १३६ उदरं परिमाति मुष्टिना ३९६ किसलयक रैलंतानां करकमलैः २३२ उद्धभहूणरमणीरमणोपमर्द ६७ कीतिगङ्गा हिमपसामृदोज: २८६ ९२ कीर्तौ विस्फूतिमत्यां ते २८८ उन्मेषं यो मम न सहते ३३२ २१७ उपमानोपमेयत्वयोग्ययो कुरङ्गीवाङ्गानि स्तिमित ३७ उपमानोपमेयत्वं दयोः कृतवानसि विप्रियं न मे ३८२ १५४ १०२ उपमितक्रियानिष्पत्तिमव कैलासगौरं वृषमारुरतोः ७८ उपमैका शैलूषी संपाप्ता क्षीरोदवेला च सफेनपुआ 988 ३३ छीरोदवेलेव सफेन पुआ 988 उपाददे तस्य सहस्त्रश्मि: ४८ उपाददे तस्य सहसरश्मिः १८० ख उभौ यदि व्योग्नि पृथवप्रवाहा ४५ खमिव जलं जलमिव ख १७० उरोभुवा कुम्भयुगेन २३९ उशेभुवा कुम्भयुगेन ग ४9४ उवाह या तनुलता ३१४ गगनं गगनाकारं १७७

२४ ए गच्छान्यच्युत दर्शनेन गजन्रातेति वृद्धाभिः २८९ एकस्यैवोपमानोपमेयत्वे १७७ गतासु वीरं तिमिघट्टनेन ४०० एकेकमुद्ग तगुणं च्युतदूषणं च ३५३ गते तव भ्रातरि वत्स पक्चतां ९३ एतान्यवन्तीश्वरपारिजात २३६ गर्वमसम्भाध्यमिमं ७२

एवमादिषु बह्मीषु ३७४ गिरिरिव गजराजोडयं १७० एवंवादिनि देवर्षी पार्श्चे गौरीव पर्या सुभगा ३१९ पष विन्ध्याचलः सान्द्र १४२ प्रत्थ्नामि काव्यशशिनं १४२ एप शाभ्यति वस्तापो २५१ ग्रहीतृभेदाभावेपि २९३

क च

कपाले मार्जार: पय इति २७८ २३९

Page 463

चित्रमीमांसोद्घृतश्लोकानुक्रणिका

पृ० पृ० चण्डालैरिच युष्माभिः १३९ त्वदाननेन सादश्यं ३६४ चन्द्रनं चन्द्रिका गन्धो ३०८ त्वदालेखये कौतूहलतरक ३०८ चन्द्रविम्बादिव विषं ४४ त्वत्पादनखरतानां यदलक २०४ धिन्त्येऽन्र चित्रवर्गे ३० त्वतप्राङ्गणे सुन्दर पाण्डयदेव २८८ चिराधत् कौतुकाविष्टं २०८ चिराद्रिषहसे तापं २५३ द

३२३ दर्पणे च परिभोगदर्शिनी २७२ दर्पान्धगन्धगजकुम्भकपाटकूट ज १३१

जनस्य तस्मिन् समये विगाढे दामोदरकराघातचूर्णिता २८२ १५५ जीवनग्रह्णे नम्रा गृहीरवा २६५ ४११

ज्यानिनादमभिगृद्भती तथोः दिव्यानामपि कृतचिस्मयां पुरस्ता १८९ १४५ ज्योरस्नाभस्मच्छुरणधवला ३६४ २१९ ज्योत्स्नेव नयनानन्द: दूराष्यश्चक्रनिभस्य तन्वी २२७ ६२ देहस्था दर्पणे यस्य 1 ३५५ त द्रोण: स तत्र वितरिष्यति ३७५

तं परिणामं द्विविध २५१ द्वारं द्वारमटन भिन्नुः ४८

तडिदुज्ज्वळहेतिमुत्तर: ९४ द्विर्भाव: पुष्पकेतोविबुष २४७

ततः कुसुदनाथेन कामिनी २०९ द्वेष्योऽपि संमत: शिष्टः १४९

ततः प्रतस्थे कौबेरीं २२६ ध तया णिनौ समासे च ११३ तद्भावेडलङ्वारा: सभव ३७१ धर्मस्यादि विभागो गुण ३७१

तदिदं चित्रं विश्वं ३५ ध्रवमधीतवतीयसधीरतां ३९८

तहूलगुना युगपदुन्मिषितेन ५९ ध्वान्तस्य वामोरु ४१५

तद्वूषलुप्तापि भर्मस्य ११३ न

१४८ न केवलं भाति नितान्तकान्ति १७७ तनुरेणशञावकदशस्तनीयसी ३५९ न नित्यमस्मिन्परिपूर्णतेति ४४ तथा विवृद्धाननचन्द्रकान्त्या ९२ न पझमं मुखमेवेदं न ६३ तव निर्वण्य यद्दणं ३६३ नभसि महसां ध्वान्त ३६६ ९४४ नरसिंह धरानाथके वयं २५० तस्मिन्नस्तंगते भानी ३६२ नरसिह महीपाल विदुसत्वां ३१८ तस्य द्विपानां मद्वारिसेकात् १५५ न लिङ्गवचने भिन्ने १५० तस्यापनोदाय फलप्रवृत्ता १४१ नलिन्या इच तन्वडया: १६३ तारानायकशेखराय जगदा २४७ नव पलाशपलाशवनं पुरः २८ सारुण्य कुअरारूढां ३३८ नासाग्रन्यस्तनयन: १४ तीर्धर्वा भूतेशमोलिस्ज २४५ निपेतुरास्यादिव तस्य दीक्षा: १४३ त्वदाननमधीराक्षभविदर्शन ६३ निमित्तभेदादेकस्थ वस्तुनो २८६ स्वदाननमधीराप्षभावि २३१ निरवधि च निराश्रयं च २२२

Page 464

४२६ चित्रमीमांसा

पृ०

निरीधय विश्युन्नयनैः २३६ प्रसिद्धेरनुरोधेन यः ६६

निरुष्यमाणं कविना ७८ प्रहरवितती मध्ये वाडह्रः २१

निवेशितं यावकराग ३५२ प्राप्याभिषेकमेतस्मिन् ३८१

निशासु मू्ण्नि स्फुरता २७६ मौढमौकिकरुच: पयोमुर्चां २२०

निष्ठयतोद्गीणवान्तादि ९८ ब निःशेपच्युतचन्दनं स्तनतटं १७ नृणां यं सेवमानानां बल्लाल चोणिपाल र्वदहित २७९ १०६ नृपं तमावतमनोजनाभि: वाळेन्दुवक्त्राण्य विकासभावात् २१३ ९८ नेत्रैरिघोत्पलै: पद्मैमू बिम्बविशिष्टे निर्दिष्टे २११ २२६ नेदं नभोमण्डलमम्बु बुद्धिरब्धिमहीपाल यशस्ते ३०३ २३५ बुद्धि: सर्वात्मनान्योऽन्या २६९

प भ

पतत्व्रिणा तद्रुचिरेण ४०३ भदानिव महीपाल देवराजो १५०

परस्पराक्षिसादृश्यमदूरो ११९ भाग्याभावात्करस्थोऽपि १४१

पराग: सुमनोरज: २८ भिन्नेषु रत्नकिरणै: २९२

३६५ भिन्नेषु रत्नकिरणैः किरणेषु २३७ परिव्राटकामुकशुनामेकस्य २९३ भीमकान्तैर्नृपगुणैः ९३

पर्यक्गो राजलधम्या हरित २२३ भुवि स्वन्सुखमालोक्य ३५७

पलाशकुसुमभ्नान्त्या २८० भूयस्तराणि यदमूनि तपस्विनीषु ६२२

पल्लवतः कछषपतरो रेख ४१३ म पश्यात्र नलिनीपत्रे १३३ मभ्ना सुधायां किसु ३७८ ५२ पातालमिव नाभिस्ते १३९ मदनतापभरेण विदीयं नो ३८०

पार्थनाशसुदिता नृपात्मजा ९६ मधुलुब्धा मधुकराः २९२

पिता समाराघनतत्परेण मध्यन्दिनार्कसन्तप्तः ३३४ १६१ पितुर्नियोगाद्वनवासमेवं मनसि सन्तमिब प्रियमीष्षितुं ३७१ १७९ पिनष्टीव तरक्षात्रे: समुद्रः ३०४ ३२४ पीरूषप्रस्ृतिर्न वा मखभुजां ३६८ मन्ये शङ्के भ्रवं प्रायो ३१५

२४६ मुग्धः स मोहात् सुभगात ४८०

पुष्प प्रवालोपहितं यदि मुनिद्ुमः कोरकितोडसित ३८७ ७६ पूजनं पुररिपोस्तनोतु मे मूर्तिर्यंथा नवसुधा बलभिद् ११७ १२१ पूर विधुर्वर्धयितुं पयोधे: ३९३ य

पूर्णा लुप्ता च सा द्वेधा ११३ यं त्वं पालयसे धर्मे १०६ पूर्णेन्दोः परिपोषकान्तवपुष: ४०६ यं पश्यन् दीपदर्श सपदि १२०

प्रकृतस्य निषेधेन यदन्यत्व ३०० यच्चौराणामस्य च समागमो प्रतीपभूतैरिव किं ततो ३९७ यम्र व्यंग्यं वाध्यानतिशायि २३ प्रवृद्धो हीयते चन्द्रः , १४९ यत्र तेनैव तस्य स्यासू ७०

Page 465

चित्रमीमांसोद्धृतश्लोकानुक्रमणिका ४२७

पृ० पृ०

यथा त्वं गुणवाँक्धोके १९१ वरण: कनकस्य मानिनी ४०४ यथा प्रह्हादनाचन्द्र: ५३ वराहः कल्याणं वितरतु २९ यथोपात्तनिमित्तत्वमनु ३८७ वर्धिष्णोरुपरि सणं २९५ यदा तु विषयो रूपात् २५५ वर्षातपानावरणं चिराय ३५४ यदा पुनरयं लोकादसिद: ४8 वहतो बहुशैव लच्मतां ३५९ यवायमुपमानांशो बागर्थाविव संपृक्ती ८८ यदोपसानशब्दानां २०५ 88 वाहि वात यतः कान्ता १३७ यद्वालेन्दुकलोच्चयादुपचितः ३२८ विकसदमरनारीनेत्रनीला २३८ यन्द कानां सुखमय: १०७ विकसदमरनारीनेम्रलीला ३०३ यन्दकानां सुखमय १२४ विद्या विक्रम सौन्दर्यतपसां २८६ यद्यनुष्णो भवेद्ह्नि: ३१६ विद्वन्मानसहंस वैरिकमला २२१ यशमि तब चिकसिते नृप १३२ विरक्तसन्ध्याकपिशं ३१८ यस्याज्ञा शिरसोध्ते १९४ विललास जलाशयोदरे ३५६ यान्त्या मुहुर्वलितकन्घर माननं ९० विवस्वतानािषतेब मिश्राः ३६० यासि मनोवाक्काये: २३६ विश्रब्धघातदोष: स्ववधाय १३१ यैईंप्टोसि तदा ललाट १३७ विषयस्यानुपादानाद ४०६ विषयिण उत्प्रेक्षार्यां र ३७१ विषय्याकारमारोप्य २५५ रक्षन्तु त्वामसिजलजै: ४०३ रजोभि: स्यन्दनोद्धूतैः विस्फूरतिमत्यां कीर्तो ते २८१

रतेर्गृहीतानुनयेन कामं ३९१ वीणावादन संरम्माच्चकम्पे ३६२

रथस्थितानां परिवर्तनाय बीररुद्रनरेन्द्रस्य ३६५ ३६४ ४०७ रवितप्तो गज: पद्मान् वीरमूद्रभटान् डष्टा ४०१ रसान्तराण्येकरसं यथा चीरासनैर्ध्यानजुषामृषीणां ३७२ १४७ राकायामकलंकं चेत् वृत्तानुपूर्चे च न चाति ३२६ ८५ ६६ रात्री रवेर्दिवा चेन्दो वृथा चरसि कि भृद्ग ३६२ १२१ रुचयोऽस्तमितस्य भास्घतः ३६७ वृथा मन भ्रमत्यहो मनः

रूपयौवनलावण्यस्पृहणीच वेलामतिक्रम्य पृधुमुखेन्दो ४०७ १०८ व्यदानत सखे तन्व्या ३९५ ल व्यापार उपमानाख्यो ६९ लिङ्गिमु दःसंृतषिक्रियास्ते ९६ व्युष्टं प्रयाणं च वियोगवेदना १५५

लिम्बतीव तमोऽङ्गानि ३५४ लोकाश्यो मण्डपमादि श ४०३

व शरीरसात्रेण नरेन्द्र तिष्ठ १४२

वक्त्रं पभ्मिचैतस्या मेत्रं शिक्षानैर्मश्जरीति स्तनकलश २८० १७२ 4 ९५ वत सखि कियदेतत् श्येनपक्षपरिधूसरालकाः ३०४ ततंसनीलाम्बुरुहेण किं इशा ३७२ स

Page 466

चित्रमीमांसा

पृ०/ पृ स कर्षन् महतीं सेनां ६४ २२४

सच्छायाम्भोजवदनाः १५७ सोधेषु यम्र मुखमासु ३६३ स छितमूल; पतजेन रेणुः - २९ सौन्दर्यस्य तरङिणी तरुणिमो २१८

स तथेति प्रतिज्ञाय विसृज्य १९२ सौमित्रे ननु सेव्यतां तरुतछं १९०

सदशस्य तृतीयस्य १६९ स्तनाभिरामस्तबकां ३२१

१५१ स्तनावलोक्य तन्वङ्गयाः ३८६ स पीतवासा: प्रगृतीतशार्ङ्गो १४० स्त्रीभि: कामोऽर्थिभि: स्वर्द्ुः २८९

समाक्रान्तो बलवता २६३ स्त्रीव गच्छति षण्ढोयं -१५० स मुनिर्लान्दितो सौं्ज्या 980 स्थिता: क्षणं पचमसु १३

स ययी प्रथसं प्राघीं ६४ स्नातुं पातुं बिसान्यत्तुं ३३४

सरसतरा हस्तितसुखी ९८ १५४ सर्षातिशायि सौन्दर्य ३१६ स्मरसि स्मर मेखलागुणैरुत ३८१

स बः पायादिन्दुर्नव ३५१ स्मराशुगीभूय विदर्भक्तभ्र ३८४

६७ स्मृति: सादृश्यमूला या १८९

सा किलाशवासिता चण्डी ९७ स्वतः सिद्धेन भिक्षेन ४२ सा तेन जगृहे साध्वी ९० स्वधाकृतं यत्तनये: ४0४

लाधटश्यव्यकये यत्रापह्नव ३०६ स्वस्थ स्वेनोपमा या स्याद् १८२ साम्यादप्रकृतार्थस्य सा २५९ ह सुगन्धि नयनानन्दि हंसीब धवलश्न्द्रः सरासि १५० सुधाबद्धग्रासैरुपवन २०१ सुहदालापेनैव प्रणश्यति हस्त इ भूतिमलिनो २३० २४० ३२७ सेतुः शेलेस्वया बद्ध: हृतसार मिवेन्दुमण्डलं २०८ हृत्तस्य यन्मन्त्रयते सेषा स्थली यन्र विच्तिन्वता ३२२ हृदयं परिपूतमेघ नित्यं ३६१ सोऽपूर्वो रसनाविपर्ययविधि २४२ हेमाद्रिकुब्जेषु विहारभाज: २६५

Page 467

50 *

पृ० पृo

अ अहं लताया: सदशीत्यखव १७०

अकरूणहृदय प्रियतम २८४ आ अङ्गं केऽपि शशक्ठिरे २६६ आत्मनोऽस्य तपोदानैः २३३ २३३ अचला इव चिद्वांसो आवदूकृत्रिमसटा जटिलांसभित्ति ४१७ १७६ अतितारुण्य बिका सादिनु दिवस आर्या द्वितीयकेऽधे ३२ १३० अतिमात्रेण शब्दानां आर्याप्रथमदलोकं ८ ८ अदोपं गुणवत्काव्यं आर्याप्रयमद्शोकं यदिि ३७

अद्रादुन्न प्रज्वलत्यग्नि आलप्यतां विशालाक्षी १३०

अद्वितीयं रुचात्मानं १३५ इ अधर इवोक्तिमधुरा १३० १३५ अधरं विम्बमाज्ञाय इदन्तद्वधि प्रभो यद्षवधि २९९ इन्दुना परसौन्षर्यसिन्धुना २५७ अनरपतापा कृतकोटिपापा २९९ इमानि तानि पझ्मानि ३८५ अनवरतकनकवितरण १५७ अनुष्छष्टो देवेरपरिदषितो २०२ उ

अनुभवन्रवदोलमृतुत्सवं १५२ उभणिष्चलणिप्पदा १२

अनेकार्थस्य शब्दस्य उरकण्टका विलसदुज्ज्ल ९२

अपर्यन्तो विकल्पानां १३८ ३० 1 अभिहन्ति हन्त कथमेष १५३ उपकुर्वन्ति तं सन्तं ये ८६

२०० उपमानोपमेयत्वयोग्ययोरर्थ ६७

अमुष्य घीरस्य जयाय २७६ उपरि करवालधाराकारा: २९८

अम्बरयत्यम्बरं यद्टत् १७९ उज्ज सित कुसुमहस्ता १७६

अयमैन्द्रीमुखं पश्य २०० एं अरण्यरुद्षित कृतं शवशरीर २१३ अर्थ सत्यर्थमिल्ानां एकपादमथेक्कस्मिन् ३७३ २८ भलिमृंगो वा नेन्रं वा एकस्यकेन साङ्कर्यादेकस्य २७७ १३८

अविर्त परकार्यमृतां सतां २३३ एतावति प्रपञ्जेऽस्मनू १७९

अविरलविगलद्दानोद्कधारा १३५ क

९९ २१६ अस्यैव सर्गाय भवत्करस्य ३८५ कमलति वदनं यस्यामलय १३० अहमेव गुरु: सुदारुणा १७० कमलमिघ वदनमस्या: १७६

Page 468

४३० चित्रमीमांसा

पृo

कदीन्द्राणानासन् ४१८ दयिते रददनत्विषा दार्यकारणयोशेव पौर्वापर्यं ४१० देवतावाचका: शब्दा: ८ किं पद्मस्य रुचि न हन्ति १६८ द्वा सुपर्णा सयुजा . ४२० कि वाडन ऊभुजमदश्वनिता -२७७ ध 1 कापि कीरनिषिच्छमातू ३११ ख धर्मोपमानयोर्लोपे ११३

खमिव जलं जलमिव खं न

खुडि उप्पडि अमुणालं ९८ नगरान्तमहीन्द्रस्य १३१

ग नदन्ति मददन्तिनः ६३५

रागनाद्गछितो गभस्तिमानुत २७७ नयनेन्दिन्दिरानन्द ३९४

गगनं गगनाकार नरसिंह महीपाल समस्तोऽपि ४8 ९१

गगनं गगनाकारं १७८ निगीर्याध्यवसानं तु ४१०

गगनं गगनाकादं ४१६ नियतारोपणोपाय: ३४

गङ्गा भुचि यथा १७८ निश्वासा मलयानिला इव १३०

गङ्गा हृधा यथा गम्ता १७८ नृत्यश्वद्रा जिरा जिप्रखरखुर २९९

गुरुवद् गुरुराराध्यो १७८ नेश्राभिरामं रामाया २७७

च प चाण्डालक्ष दरिद्रश्र १५३ पञ्चशाखः प्रभो यस्ते २३३ चिन्तयन्ती जगत्सूर्ति ४१९

ज पान्थ मन्दुमते किं वा. २५७ जडानन्धान् पठगूनू २३३ पूर्णा लुसा च सागिमा ११३ ज्योरस्नायन्ते तव गुणगणा: प्रत्यम्भो नवपुटण्रीकमुकुल २९९ ज्योर्स्नायन्ते तव गुणगणा: २२९ प्रधानगुणभावाभ्यां ज्योत्स्नेव नयनानन्द: २२५ प्रवातनीलोत्पलनिर्विशेष १६७ त प्रसम्नान्ता शिष्टपुटा ३७९

तत्नानन्ववध्वनिनेवोपपततौ १८८ ब तदप्राप्तिमहादुःखविलीना ४१९ तारामुकाहारा समुदंचित 100 तिमिर इरन्ति हरितां बालेन्दु चय्षत्राण्यविकासभावात २०२ २१६ २६६ तिमिरं हरनिति हरितां चालेन्दुवषत्राण्यषिकासभायांतू २३३ तीरे तरुण्या वदन सहासं २७६ तेन तस्योपमेयत्वं १८५ भानुरग्निर्दमो वायं २९८

१७५ भाष्याव्घि: क्वातिगम्भीर: २५८ दवत्पादनखरजानां यद्लकत् २६३ भासयति व्योमगता २९९ त्वाँ कृत्वोपरतो मन्ये १८८ भूमीनाथ शहाषदीन १८८

द म