1. Dakshinamurti Upanishad
Dakshinamurti Upanishad
[ Sutra 1 ]
ब्रह्मावर्ते महाभाण्डीरवटमूले महासत्राय समेता महर्षयः शौनकादयस्ते ह समित्पाणयस्तत्त्वजिज्ञासवो मार्कण्डेयं चिरंजीविनमुपसमेत्य पप्रच्छुः केन त्वं चिरं जीवसि केन वानन्दमनुभवसीति ॥1॥
brahmāvarte mahābhāṇḍīravaṭamūle mahāsatrāya sametā maharṣayaḥ śaunakādayaste ha samitpāṇayastattvajijñāsavo mārkaṇḍeyaṃ ciraṃjīvinamupasametya papracchuḥ kena tvaṃ ciraṃ jīvasi kena vānandamanubhavasīti ॥1॥
— Translation from Aurovindo (Hindi) — एक बार ब्रह्मावत देश में महाभाण्डीर नाम के वट वृक्ष के नीचे शौनकादि महर्षियों ने दीर्घकाल तक चलने वाला यज्ञ प्रारम्भ किया । (उस समय) शौनकादि ऋषियों ने तत्व-ज्ञान प्राप्त करने के लिए समित्पाणि होकार चिरंजीवी मार्कण्डेय ऋषि के सम्मुख आकर प्रश्न किया । हे महर्षे! आप चिरंजीवी कैसे हुए एवं (दीर्घायु के साथ) कैसे अपार आनन्द की अनुभूति करते हैं ? ॥1॥
— Translation from P. R. Ramachander — Om. In Brahma Vartha (Land of Brahma), under a banyan tree called Maha Bandira, many sages including Sounaka had assembled to perform a Sathra fire sacrifice. They approached sage Markandeya wearing samiths (dried twigs of banyan tree) as gloves and asked him, "How do you manage to be a Chiram Jeevi (One who does not have death) and how are you always in the happy state?" ॥1॥
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[ Sutra 2 ]
परमरहस्यशिवतत्त्वज्ञानेनेति स होवाच ॥2॥
paramarahasyaśivatattvajñāneneti sa hovāca ॥2॥
— Translation from Aurovindo (Hindi) — उन्होंने कहा कि मेरे चिरंजीवी होने का कारण परमगुप्त शिव तत्त्व का ज्ञान है । ऋषियों ने पूछा-वह परम रहस्यमय शिव तत्व का ज्ञान क्या है ? उसका देवता कौन है ? उसके मन्त्र कौन से हैं? (उसका) जप (मन्त्र) क्या है? (उसके लिए) मुद्रा कौन सी है? उसकी निष्ठा क्या है ? क्या-क्या उस ज्ञान के साधन हैं ? उसका परिकर क्या है ? उसमें बलि क्या है ? उसका समय क्या है ? उसका स्थान क्या है ? ॥2॥
— Translation from P. R. Ramachander — He replied, "This is because of the knowledge of the most secret philosophy of Shiva. This very secret Shiva philosophy by which Shiva who is the Dakshinamurthy, becomes some thing which is not visible to others. He is that God who at the time of final deluge, who keeps every thing else within himself and shines because of the pleasure of his own spirit. The secret mantras about him are as follows: Brahma is the sage, the meter is Gayathri and the god is Dakshinamurhy for this mantra.
First Mantra of 24 letters: After telling "om", tell "Namo" and then "Bhagavathe Dakshinamurthaye", then the fourth form of "asmad" viz "Mahyam", then "medham Pragnam", then the root of wind "ya", added with "chcha", followed by the name of wife of fire God "swaha". This is the mantra with 24 letters. That is "Om Namo Bhagwathe Dakshinamurthaye Mahyam, Medham Pragnam Prayacha Swaha!" ॥2॥
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[ Sutra 3 ]
किं तत्परमरहस्यशिवतत्वज्ञानम् । तत्र को देवः । के मन्त्राः । को जपः । का मुद्रा। का निष्ठा । किं तज्ज्ञानसाधनम् । कः परिकरः । को बलिः । कः कालः । किं तत्स्थानमिति ॥3॥
kiṃ tatparamarahasyaśivatatvajñānam । tatra ko devaḥ । ke mantrāḥ । ko japaḥ । kā mudrā। kā niṣṭhā । kiṃ tajjñānasādhanam । kaḥ parikaraḥ । ko baliḥ । kaḥ kālaḥ । kiṃ tatsthānamiti ॥3॥
— Translation from Aurovindo (Hindi) — उन्होंने कहा कि मेरे चिरंजीवी होने का कारण परमगुप्त शिव तत्त्व का ज्ञान है । ऋषियों ने पूछा-वह परम रहस्यमय शिव तत्व का ज्ञान क्या है ? उसका देवता कौन है ? उसके मन्त्र कौन से हैं? (उसका) जप (मन्त्र) क्या है? (उसके लिए) मुद्रा कौन सी है? उसकी निष्ठा क्या है ? क्या-क्या उस ज्ञान के साधन हैं ? उसका परिकर क्या है ? उसमें बलि क्या है ? उसका समय क्या है ? उसका स्थान क्या है ? ॥3॥
— Translation from P. R. Ramachander — Then Dhyanam (thinking abut the form in the mind, when mantra is chanted). I salute him who is white like a crystal, who holds in his hands, a chain of pearl beads, the pot of nectar which is the form of knowledge, and the mudhra (symbol) of wisdom, who ties himself with a snake, who wears the moon on his head and who wears different type of ornaments. ॥3॥
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[ Sutra 4 ]
स होवाच । येन दक्षिणामुखः शिवोऽपरोक्षीकृतो भवति तत्परमरहस्यशिवतत्त्वज्ञानम् ॥4॥
sa hovāca । yena dakṣiṇāmukhaḥ śivo'parokṣīkṛto bhavati tatparamarahasyaśivatattvajñānam ॥4॥
— Translation from Aurovindo (Hindi) — उन मार्कण्डेय ऋषि ने कहा जिसके द्वारा दक्षिणामुख शिव का प्राकट्य होता है. वही परम रहस्यमय शिव तत्त्व का ज्ञान है । जो सृष्टि के अन्त में सम्पूर्ण विश्व को अपने भीतर समेट करके अपनी आत्मा में ही आनन्दित रहते एवं स्वप्रकाशित रहते हैं, वे ही इस ज्ञान तत्व के देवता हैं ॥4॥
— Translation from P. R. Ramachander — Second Mantra of nine letters: First Say "Om", then the first vowel with the visarga and in the end ell Panchakshari with visarga in the end, and this gives the Navakshari mantra (nine letters mantra). That is "Om Aam Aa Sivaya Nama Om ॥4॥
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[ Sutra 5 ]
यः सर्वोपरमे काले सर्वानात्मन्युपसंहृत्य स्वात्मानन्दसुखे मोदते प्रकाशते वा स देवः ॥5॥
yaḥ sarvoparame kāle sarvānātmanyupasaṃhṛtya svātmānandasukhe modate prakāśate vā sa devaḥ ॥5॥
— Translation from Aurovindo (Hindi) — उन मार्कण्डेय ऋषि ने कहा जिसके द्वारा दक्षिणामुख शिव का प्राकट्य होता है. वही परम रहस्यमय शिव तत्त्व का ज्ञान है । जो सृष्टि के अन्त में सम्पूर्ण विश्व को अपने भीतर समेट करके अपनी आत्मा में ही आनन्दित रहते एवं स्वप्रकाशित रहते हैं, वे ही इस ज्ञान तत्व के देवता हैं ॥5॥
— Translation from P. R. Ramachander — Then Dhyanam. Let the three eyed god who does only good, who has in his three hands, the sign of protection, deer and axe in three hands and fourth hand kept on his knee, who has tied a snake on his body, who shines white like milk, who sits below a banyan tree and who is surrounded by sages like Shuka, gives us pure thoughts. ॥5॥
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[ Sutra 6 ]
अत्रेते मन्त्ररहस्यश्लोका भवन्ति । मेधा दक्षिणामूर्तिमन्त्रस्य ब्रह्मा ऋषिः । गायत्री छन्दः । देवता दक्षिणास्यः । मन्त्रेणाङ्गन्यासः ॥6॥
atrete mantrarahasyaślokā bhavanti । medhā dakṣiṇāmūrtimantrasya brahmā ṛṣiḥ । gāyatrī chandaḥ । devatā dakṣiṇāsyaḥ । mantreṇāṅganyāsaḥ ॥6॥
— Translation from Aurovindo (Hindi) — अब मन्त्र के रहस्य को प्रकट करने वाले शलोक कहे जा रहे हैं । इस मेधा दक्षिणामूर्ति मन्त्र के ब्रह्मा ऋषि हैं, गायत्री छन्द हैं और दक्षिणामुख देवता हैं । मन्त्र के द्वारा अंग न्यास करना चाहिए ॥6॥
— Translation from P. R. Ramachander — [Slokas 6 is not available.]
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[ Sutra 7 ]
ॐ आदौ नम उच्चार्य ततो भगवते पदम् । दक्षिणेति पदं पश्चान्मूर्तये पदमुद्धरेत् । अस्मच्छब्दं चतुर्थ्यन्तं मेधा प्रज्ञां पदं वदेत् । प्रमुच्चार्य ततो वायुबीजं च्छं च ततः पठेत् । अग्निजायां ततस्त्वेष चतुर्विंशाक्षरो मनुः ॥7॥
oṃ ādau nama uccārya tato bhagavate padam । dakṣiṇeti padaṃ paścānmūrtaye padamuddharet । asmacchabdaṃ caturthyantaṃ medhā prajñāṃ padaṃ vadet । pramuccārya tato vāyubījaṃ cchaṃ ca tataḥ paṭhet । agnijāyāṃ tatastveṣa caturviṃśākṣaro manuḥ ॥7॥
— Translation from Aurovindo (Hindi) — सबसे पहले 'ॐ नम:' शब्द का उच्चारण करके फिर 'भगवते' पद का उच्चारण करे, पुन: 'दक्षिणा' यह पद कहे, फिर 'मूर्तये' पद को कहे, बाद में अस्मद् शब्द के चतुर्थी का एकवचन अर्थात् 'मह्य' पद कहे तथा बाद में 'मेधां प्रज्ञां' पदों का उच्चारण करें । पूनः ‘प्र' का उच्चारण करके तब वायु बीज 'य' का उच्चारण कर आगे 'च्छ' पद चोले, सबसे बाद में अग्नि की स्त्री अर्थात् 'स्वाहा' पद कहे । इस प्रकार चौबीस अक्षर का यह मनु मन्त्र है ॥ [इस प्रकार यह मन्त्र 'ॐ नमो भगवते दक्षिणामूर्तये मह्यं मेधां प्रज्ञां प्रयच्छ स्वाहा' बनता है। ] ॥7॥
— Translation from P. R. Ramachander — Third Mantra: Add Broom Nama, Maya Bheeja, Vagbhava Bheeja, Dakshinamurthaye and Jnanam dehi Swaha to Om. The mantra would be "Om Broom, Namo Hreem Im Dakshinamurthaye Jnanam Dehi Swaha!" ॥7॥
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[ Sutra 8 ]
ध्यानम्। स्फटिकरजतवर्णं मौक्तिकीमक्षमालाममृतकलशविद्यां ज्ञानमुद्रां कराग्रे । दधतमुरगकक्ष्यं चन्द्रचूडं त्रिनेत्रं विधृतविविधभूषं दक्षिणामूर्तिमीडे ॥8॥
dhyānam। sphaṭikarajatavarṇaṃ mauktikīmakṣamālāmamṛtakalaśavidyāṃ jñānamudrāṃ karāgre । dadhatamuragakakṣyaṃ candracūḍaṃ trinetraṃ vidhṛtavividhabhūṣaṃ dakṣiṇāmūrtimīḍe ॥8॥
— Translation from Aurovindo (Hindi) — ध्यान—— मैं स्फटिक मणि एवं रजत सदृश शुभ्र वर्ण वाले दक्षिणामूर्ति (भगवान् शिव) की स्तुति करता हैं, जिनके हाथ में क्रमशः ज्ञान मुद्रा, अमृततत्वदायिनीविद्या तथा मोतियों की अक्षमाला है, जो त्रिनेत्र धारी हैं, जिनके उन्नत भाल पर चन्द्रमा का निवास है तथा जिनके कटिभाग पर सर्प लिपटे हुए हैं एवं जो विविध प्रकार के वेष धारण करने वाले हैं । (इस प्रकार की दक्षिणामूर्ति का में ध्यान करता हूँ। ) ॥8॥
— Translation from P. R. Ramachander — Then Dhyanam: Let the God Dakshinamurthy, who has a white body due to application of holy ash, who wears the crescent moon on his head, who holds in his hands, Jnana mudra (symbol of wisdom), beaded chain, Veena and books, who wears all ornaments, who wears the elephant hide, who resembles the meditating Rama, who sits on the throne of explanation and who is being served by great sages protect us always ॥8॥
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[ Sutra 9 ]
मन्त्रेण न्यासः । आदौ वेदादिमुच्चार्य स्वराद्यं सविसर्गकम् । पाञ्चर्णं तत उद्धत्य अतरं सविसर्गकम् । अन्ते समुद्धरेत्तारं मनुरेष नवाक्षरः ॥9॥
mantreṇa nyāsaḥ । ādau vedādimuccārya svarādyaṃ savisargakam । pāñcarṇaṃ tata uddhatya ataraṃ savisargakam । ante samuddharettāraṃ manureṣa navākṣaraḥ ॥9॥
— Translation from Aurovindo (Hindi) — प्रारम्भ में वेद का आदि अक्षर ॐ का उच्चारण करके स्वर के आदि अक्षर को विसर्ग के साथ बोले, पुनः पंचार्ण अर्थात् 'दक्षिणामूति: ' पद का उच्चारण करे । इसके बाद विसर्ग के साथ 'अतर' इस पद का उच्चारण करे तथा अन्त में 'तार' अर्थात् ॐ शब्द का उच्चारण करे । यह नवाक्षरी मनु मंत्र है, ( मन्त्र इस प्रकार है- ॐ दक्षिणामूर्तिरतरों ) ॥9॥
— Translation from P. R. Ramachander — We have to see that lamp of wisdom, which burns with renunciation as oil, devotion as wick and which shines in the full vessel of wake up state ॥9॥
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[ Sutra 10 ]
मुद्रां भद्रार्धदात्रीं सपरशुहरिणं बाहुभिर्बाहुमेकं जान्वासक्तं दधानो भुजगवरसमाबद्ध- कक्ष्यो वटाधः । आसीनश्चन्द्रखण्डप्रतिघटित जटाक्षीरगौरस्त्रिनेत्रो दद्यादाद्यः शुकाद्यैर्मुनिभिर- भिवृतो भावशुद्धिं भवो नः ॥10॥
mudrāṃ bhadrārdhadātrīṃ saparaśuhariṇaṃ bāhubhirbāhumekaṃ jānvāsaktaṃ dadhāno bhujagavarasamābaddha- kakṣyo vaṭādhaḥ । āsīnaścandrakhaṇḍapratighaṭita jaṭākṣīragaurastrinetro dadyādādyaḥ śukādyairmunibhira- bhivṛto bhāvaśuddhiṃ bhavo naḥ ॥10॥
— Translation from Aurovindo (Hindi) — (ध्यान) जो एक हाथ में अभय मुद्रा तथा दो हाथों में परशु एवं हरिण (मृगीमुद्रा), एक हाथ को अपनी जंघा पर रखे हुए जो वट वृक्ष के नीचे विराजे हुए हैं एवं जिन्होंने कटिभाग पर नागराज लिपटा रखा है तथा द्वितीया का चन्द्रमा जिनकी जटाओं में सुशोभित है । दुग्ध के समान गौर वर्ण, त्रिनेत्रधारी तथा शुकादि मुनियों से आवृत भगवान् शंकर का हम ध्यान करते हैं । वे हमारी भावनाओं को शुद्ध करके सद्बुद्धि प्रदान करें ॥10॥
— Translation from P. R. Ramachander — In the beginning of creation, Lord Brahma prayed this Dakshinamurthy, and obtained the capacity of creating beings and became very happy. He became blessed after getting what he desired. That Brahma therefore has become a devotee as well as somebody who deserves our devotion. ॥10॥
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[ Sutra 11 ]
मन्त्रेण न्यासः ब्रह्मर्षिन्यासः-तारं ब्लूं नम उच्चार्य मायां वाग्भवमेव च । दक्षिणपदमुच्चार्य ततः स्यान्मूर्तये पदम् ॥11॥
mantreṇa nyāsaḥ brahmarṣinyāsaḥ-tāraṃ blūṃ nama uccārya māyāṃ vāgbhavameva ca । dakṣiṇapadamuccārya tataḥ syānmūrtaye padam ॥11॥
— Translation from Aurovindo (Hindi) — सर्वप्रथम तारं अर्थात् ॐ का उच्चारण करे, पुन: 'ब्लूं नमः' कहकर माया बीज अर्थात् 'ह्री' बोले, फिर वाग्बीज 'ये' तथा 'दक्षिणा' इस पद का उच्चारण करके, बाद में 'भूर्तये' एवं 'ज्ञानं देहि' पद कहे । उसके बाद अग्नि की स्त्री अर्थात् 'स्वाहा' पद बोले (इस प्रकार 'ॐ ब्लूं नमो ह्रीं ऐं दक्षिणामूर्तये ज्ञानं देहि स्वाहा') यह अट्ठारह अक्षर का मनु मन्त्र है, इसका जप करे । सभी मन्त्रों में यह अति गोपनीय मन्त्र है ॥11॥
— Translation from P. R. Ramachander — The one who reads this philosophy of Shiva with understanding, would get rid of all his sins. The ones who know this truly will attain salvation. ॥11॥
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[ Sutra 12 ]
ज्ञानं देहि पदं पश्चाद्वह्निजायां ततो न्यसेत । मनुरष्टादशार्णोऽयं सर्वमन्त्रेषु गोपितः ॥12॥
jñānaṃ dehi padaṃ paścādvahnijāyāṃ tato nyaseta । manuraṣṭādaśārṇo'yaṃ sarvamantreṣu gopitaḥ ॥12॥
— Translation from Aurovindo (Hindi) — सर्वप्रथम तारं अर्थात् ॐ का उच्चारण करे, पुन: 'ब्लूं नमः' कहकर माया बीज अर्थात् 'ह्री' बोले, फिर वाग्बीज 'ये' तथा 'दक्षिणा' इस पद का उच्चारण करके, बाद में 'भूर्तये' एवं 'ज्ञानं देहि' पद कहे । उसके बाद अग्नि की स्त्री अर्थात् 'स्वाहा' पद बोले (इस प्रकार 'ॐ ब्लूं नमो ह्रीं ऐं दक्षिणामूर्तये ज्ञानं देहि स्वाहा') यह अट्ठारह अक्षर का मनु मन्त्र है, इसका जप करे । सभी मन्त्रों में यह अति गोपनीय मन्त्र है ॥12॥
— Translation from P. R. Ramachander — unavailable
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[ Sutra 13 ]
भस्मव्यापाण्डराङ्गः शशिशकलधरो ज्ञानमुद्राक्षमालावीणापुस्तैर्विराजकरकमलधरो योगपट्टाभिरामः । व्याख्यापीठे निषण्णो मुनिवरनिकरैः सेव्यमानः प्रसन्नः सव्याल: कृत्तिवासाः सततमवतु नो दक्षिणामूर्तिरीशः ॥13॥
bhasmavyāpāṇḍarāṅgaḥ śaśiśakaladharo jñānamudrākṣamālāvīṇāpustairvirājakarakamaladharo yogapaṭṭābhirāmaḥ । vyākhyāpīṭhe niṣaṇṇo munivaranikaraiḥ sevyamānaḥ prasannaḥ savyāla: kṛttivāsāḥ satatamavatu no dakṣiṇāmūrtirīśaḥ ॥13॥
— Translation from Aurovindo (Hindi) — (ध्यान) भस्म के लेपन से जिसका पूरा शरीर श्वेत हो रहा है, जिन्होंने चन्द्रकला को (मस्तक पर) धारण कर रखा है, जो अपने कर कमलों में रुद्राक्ष माला, वीणा, पुस्तक तथा ज्ञानमुद्रा धारण किये हुए हैं, जो योगियों के पास रहने वाले पट्ट से सुशोभित हैं, जो व्यास पीठ पर विराजित श्रेष्ठ मुनियों द्वारा सेवित प्रसन्न मुद्राभारी, सर्पों से सुशोभित, व्याघ्रचर्मधारी भगवान् दक्षिणामूर्ति हैं, वे भगवान् सदैव हमारी रक्षा करें ॥13॥
— Translation from P. R. Ramachander — unavailable
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[ Sutra 14 ]
मन्त्रेण न्यासः । (ब्रह्मर्षिन्यासः )। तारं परां रमाबीजं वदेत्साम्यशिवाय च। तुभ्यं चानलजायां च मनुदर्वादशवर्णकः ॥14॥
mantreṇa nyāsaḥ। (brahmarṣinyāsaḥ )। tāraṃ parāṃ ramābījaṃ vadetsāmyaśivāya ca। tubhyaṃ cānalajāyāṃ ca manudarvādaśavarṇakaḥ ॥14॥
— Translation from Aurovindo (Hindi) — मन्त्र के द्वारा न्यास करें —— सर्वप्रथम तारं अर्थात् 'ॐ' फिर परा बीज 'ह्री' पुनः रमाबीज 'श्रीं' कहे, इसके बाद साम्बशिवाय' पुनः ‘तुभ्यं' और अन्त में स्वाहा' का उच्चारण करे। इस प्रकार यह द्वादश अक्षर वाला मनु मंत्र है। (मन्त्र इस प्रकार बनता है- 'ॐ ह्रीं श्रीं साम्बशिवाय तुभ्यं स्वाहा')। (ध्यान) जिन भगवान् शंकर ने अपने हाथों में वीणा, पुस्तक एवं अक्षमाला धारण कर रखी है, एक हाथ जिनका अभय मुद्रा में है तथा श्यामवर्ण के घनघोर बादल की तरह जिनका कण्ठ प्रदेश सुशोभित है, जो श्रेष्ठ से भी श्रेष्ठ हैं, जिनके कटिभाग पर नागराज शोभित हैं, जो वट वृक्ष के नीचे विराजमान हैं तथा शुकादि मुनियों से सेवित हैं, उन भगवान् (शंकर) को मैं प्रार्थना करता हूँ ॥14॥
— Translation from P. R. Ramachander — unavailable
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[ Sutra 15 ]
वीणां करै: पुस्तकमक्षमालां बिभ्राणमभ्राभगलं वराढयम् । फणीन्द्रकक्ष्यं मुनिभिः शुकाद्यैः सेव्यं वटाधः कृतनीडमीडे ॥15॥
vīṇāṃ karai: pustakamakṣamālāṃ bibhrāṇamabhrābhagalaṃ varāḍhayam । phaṇīndrakakṣyaṃ munibhiḥ śukādyaiḥ sevyaṃ vaṭādhaḥ kṛtanīḍamīḍe ॥15॥
— Translation from Aurovindo (Hindi) — मन्त्र के द्वारा न्यास करें —— सर्वप्रथम तारं अर्थात् 'ॐ' फिर परा बीज 'ह्री' पुनः रमाबीज 'श्रीं' कहे, इसके बाद साम्बशिवाय' पुनः ‘तुभ्यं' और अन्त में स्वाहा' का उच्चारण करे। इस प्रकार यह द्वादश अक्षर वाला मनु मंत्र है । (मन्त्र इस प्रकार बनता है- 'ॐ ह्रीं श्रीं साम्बशिवाय तुभ्यं स्वाहा') । (ध्यान) जिन भगवान् शंकर ने अपने हाथों में वीणा, पुस्तक एवं अक्षमाला धारण कर रखी है, एक हाथ जिनका अभय मुद्रा में है तथा श्यामवर्ण के घनघोर बादल की तरह जिनका कण्ठ प्रदेश सुशोभित है, जो श्रेष्ठ से भी श्रेष्ठ हैं, जिनके कटिभाग पर नागराज शोभित हैं, जो वट वृक्ष के नीचे विराजमान हैं तथा शुकादि मुनियों से सेवित हैं, उन भगवान् (शंकर) को मैं प्रार्थना करता हूँ ॥15॥
— Translation from P. R. Ramachander — unavailable
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[ Sutra 16 ]
विष्णु ऋषिरनुष्टुप् छन्दः । देवता दक्षिणास्यः । मन्त्रेण न्यासः । तारं नमो भगवते तुभ्यं वटपदं ततः । मृलेति पदमुच्चार्य वासिने पदमुद्धरेत् ॥16॥
viṣṇu ṛṣiranuṣṭup chandaḥ । devatā dakṣiṇāsyaḥ । mantreṇa nyāsaḥ । tāraṃ namo bhagavate tubhyaṃ vaṭapadaṃ tataḥ । mṛleti padamuccārya vāsine padamuddharet ॥16॥
— Translation from Aurovindo (Hindi) — इस मन्त्र के विष्णु ऋषि, अनुष्टुप् छन्द, दक्षिणा मुख (मूर्ति) देवता हैं, इससे न्यास करे । सर्वप्रथम तार अर्थात् 'ॐ' पुनः ‘नमो भगवते तुभ्यं फिर ‘वटमूल’ पद उच्चारण करे, इसके बाद वासिने’ पद कहकर 'वागीशाय' कहे, फिर 'महाज्ञान' एवं 'दायिने मायिने' पद को कहते हुए 'नम:' शब्द का उच्चारण करे । (मन्त्र इस प्रकार हुआ ॐ नमो भगवते तुभ्यं वटमूलवासिने वागीशाय महाज्ञानदायिने मायिने नमः) ॥16॥
— Translation from P. R. Ramachander — unavailable
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[ Sutra 17 ]
वागीशाय ततः पाश्चान्महाज्ञानपदं ततः । दायिने पदमुच्चार्य मायिने नम उद्धरेत् ॥17॥
vāgīśāya tataḥ pāścānmahājñānapadaṃ tataḥ । dāyine padamuccārya māyine nama uddharet ॥17॥
— Translation from Aurovindo (Hindi) — इस मन्त्र के विष्णु ऋषि, अनुष्टुप् छन्द, दक्षिणा मुख (मूर्ति) देवता हैं, इससे न्यास करे । सर्वप्रथम तार अर्थात् 'ॐ' पुनः ‘नमो भगवते तुभ्यं फिर ‘वटमूल’ पद उच्चारण करे, इसके बाद वासिने’ पद कहकर 'वागीशाय' कहे, फिर 'महाज्ञान' एवं 'दायिने मायिने' पद को कहते हुए 'नम:' शब्द का उच्चारण करे । (मन्त्र इस प्रकार हुआ ॐ नमो भगवते तुभ्यं वटमूलवासिने वागीशाय महाज्ञानदायिने मायिने नमः) ॥17॥
— Translation from P. R. Ramachander — unavailable
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[ Sutra 18 ]
आनुष्टुभो मन्त्रराजः सर्वमन्त्रोत्तमोत्तमः ॥18॥
ānuṣṭubho mantrarājaḥ sarvamantrottamottamaḥ ॥18॥
— Translation from Aurovindo (Hindi) — सभी श्रेष्ठ मन्त्रों में उत्तम यह आनुष्टुभमन्त्रराज है । ध्यान—जिनके हाथ अभय मुद्रा, पुस्तक एवं अग्नि तुल्य महाभयंकर सर्पों से सुशोभित हैं,प्रसन्न मुख वाले हैं,मोतियों के हार से सुशोभित हैं,चन्द्रमा की कला से मुकुट अधिक शोभा पा रहा है,जो अज्ञानान्धकार को समाप्त करने वाले हैं, जिन्हें वाणी से नहीं जाना जा सकता,जो आदि पुरुष है,सबके हैं,वटवृक्ष के नीचे निवास करने वाले भगवान् शिव का अभीष्टप्राप्ति के लिए हम ध्यान तरते है । मौन मुद्रा- वह परमात्मा में ही हूँ, इस भाव की पूर्ण स्थिरता मृत्युपर्यन बनी रहे, वही निष्ठा है ॥18॥
— Translation from P. R. Ramachander — unavailable
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[ Sutra 19 ]
ध्यानम् । मुद्रापुस्तकवह्निनागविलसद्बाहुं प्रसन्नाननं मुक्ताहारविभूषणं शशिकलाभास्वत्किरीटोज्जवलम् । अज्ञानापहमादिमादिमगिरामर्थं भवानीपतिं न्यग्रोधान्तनिवासिनं परगुरुं ध्यायाम्यभीष्टाप्तये ॥19॥
dhyānam । mudrāpustakavahnināgavilasadbāhuṃ prasannānanaṃ muktāhāravibhūṣaṇaṃ śaśikalābhāsvatkirīṭojjavalam । ajñānāpahamādimādimagirāmarthaṃ bhavānīpatiṃ nyagrodhāntanivāsinaṃ paraguruṃ dhyāyāmyabhīṣṭāptaye ॥19॥
— Translation from Aurovindo (Hindi) — सभी श्रेष्ठ मन्त्रों में उत्तम यह आनुष्टुभमन्त्रराज है । ध्यान—जिनके हाथ अभय मुद्रा, पुस्तक एवं अग्नि तुल्य महाभयंकर सर्पों से सुशोभित हैं,प्रसन्न मुख वाले हैं,मोतियों के हार से सुशोभित हैं,चन्द्रमा की कला से मुकुट अधिक शोभा पा रहा है,जो अज्ञानान्धकार को समाप्त करने वाले हैं, जिन्हें वाणी से नहीं जाना जा सकता,जो आदि पुरुष है,सबके हैं,वटवृक्ष के नीचे निवास करने वाले भगवान् शिव का अभीष्टप्राप्ति के लिए हम ध्यान तरते है । मौन मुद्रा- वह परमात्मा में ही हूँ, इस भाव की पूर्ण स्थिरता मृत्युपर्यन बनी रहे, वही निष्ठा है ॥19॥
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[ Sutra 20 ]
मौनमुद्रा। सोऽहमिति यावदास्थितिः सा निष्ठा भवति ॥20॥
maunamudrā। so'hamiti yāvadāsthitiḥ sā niṣṭhā bhavati ॥20॥
— Translation from Aurovindo (Hindi) — सभी श्रेष्ठ मन्त्रों में उत्तम यह आनुष्टुभमन्त्रराज है। ध्यान—जिनके हाथ अभय मुद्रा, पुस्तक एवं अग्नि तुल्य महाभयंकर सर्पों से सुशोभित हैं,प्रसन्न मुख वाले हैं,मोतियों के हार से सुशोभित हैं,चन्द्रमा की कला से मुकुट अधिक शोभा पा रहा है,जो अज्ञानान्धकार को समाप्त करने वाले हैं, जिन्हें वाणी से नहीं जाना जा सकता,जो आदि पुरुष है,सबके हैं,वटवृक्ष के नीचे निवास करने वाले भगवान् शिव का अभीष्टप्राप्ति के लिए हम ध्यान तरते है । मौन मुद्रा- वह परमात्मा में ही हूँ, इस भाव की पूर्ण स्थिरता मृत्युपर्यन बनी रहे, वही निष्ठा है ॥20॥
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[ Sutra 21 ]
तदभेदेन मन्त्राम्रेडनं ज्ञानसाधनम् ॥21॥
tadabhedena mantrāmreḍanaṃ jñānasādhanam ॥21॥
— Translation from Aurovindo (Hindi) — मनु मन्त्रों को परब्रह्म से अभिन्न मान कर बार-बार उच्चारण अर्थात् निरन्तर जप करना ही ज्ञान का साधन है । उस परमात्मा में एकाग्रचित होकर ध्यान लगाना हो' उपकरण' सामग्री है । शरीर के अंगों अर्थात् इन्द्रियों की चेष्टाओं को बार-बार रोकना एवं उन्हें भगवत्कार्य में नियोजित करना ही 'बलि' है । (स्व अविद्या पद, स्थूल तथा सूक्ष्म बीज के रूप में ये) तीनों धाम ही काल हैं । (परमात्मा को प्राप्त करने का स्थान हृदय या सहस्त्रार है, इसलिए यह) द्वादशान्त पद ही स्थान है ॥21॥
— Translation from P. R. Ramachander — unavailable
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[ Sutra 22 ]
चित्ते तदेकतानता परिकरः ॥22॥
citte tadekatānatā parikaraḥ ॥22॥
— Translation from Aurovindo (Hindi) — मनु मन्त्रों को परब्रह्म से अभिन्न मान कर बार-बार उच्चारण अर्थात् निरन्तर जप करना ही ज्ञान का साधन है । उस परमात्मा में एकाग्रचित होकर ध्यान लगाना हो' उपकरण' सामग्री है । शरीर के अंगों अर्थात् इन्द्रियों की चेष्टाओं को बार-बार रोकना एवं उन्हें भगवत्कार्य में नियोजित करना ही 'बलि' है । (स्व अविद्या पद, स्थूल तथा सूक्ष्म बीज के रूप में ये) तीनों धाम ही काल हैं । (परमात्मा को प्राप्त करने का स्थान हृदय या सहस्त्रार है, इसलिए यह) द्वादशान्त पद ही स्थान है ॥22॥
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[ Sutra 23 ]
अड़गचेष्टार्पणं बलिः ॥23॥
aḍa़gaceṣṭārpaṇaṃ baliḥ ॥23॥
— Translation from Aurovindo (Hindi) — मनु मन्त्रों को परब्रह्म से अभिन्न मान कर बार-बार उच्चारण अर्थात् निरन्तर जप करना ही ज्ञान का साधन है । उस परमात्मा में एकाग्रचित होकर ध्यान लगाना हो' उपकरण' सामग्री है । शरीर के अंगों अर्थात् इन्द्रियों की चेष्टाओं को बार-बार रोकना एवं उन्हें भगवत्कार्य में नियोजित करना ही 'बलि' है । (स्व अविद्या पद, स्थूल तथा सूक्ष्म बीज के रूप में ये) तीनों धाम ही काल हैं । (परमात्मा को प्राप्त करने का स्थान हृदय या सहस्त्रार है, इसलिए यह) द्वादशान्त पद ही स्थान है ॥23॥
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[ Sutra 24 ]
त्रीणि प्रामानि कालः ॥24॥
trīṇi prāmāni kālaḥ ॥24॥
— Translation from Aurovindo (Hindi) — मनु मन्त्रों को परब्रह्म से अभिन्न मान कर बार-बार उच्चारण अर्थात् निरन्तर जप करना ही ज्ञान का साधन है। उस परमात्मा में एकाग्रचित होकर ध्यान लगाना हो' उपकरण' सामग्री है। शरीर के अंगों अर्थात् इन्द्रियों की चेष्टाओं को बार-बार रोकना एवं उन्हें भगवत्कार्य में नियोजित करना ही 'बलि' है। (स्व अविद्या पद, स्थूल तथा सूक्ष्म बीज के रूप में ये) तीनों धाम ही काल हैं। (परमात्मा को प्राप्त करने का स्थान हृदय या सहस्त्रार है, इसलिए यह) द्वादशान्त पद ही स्थान है ॥24॥
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[ Sutra 25 ]
द्वादशान्तपदं स्थानमिति ॥25॥
dvādaśāntapadaṃ sthānamiti ॥25॥
— Translation from Aurovindo (Hindi) — मनु मन्त्रों को परब्रह्म से अभिन्न मान कर बार-बार उच्चारण अर्थात् निरन्तर जप करना ही ज्ञान का साधन है । उस परमात्मा में एकाग्रचित होकर ध्यान लगाना हो' उपकरण' सामग्री है । शरीर के अंगों अर्थात् इन्द्रियों की चेष्टाओं को बार-बार रोकना एवं उन्हें भगवत्कार्य में नियोजित करना ही 'बलि' है । (स्व अविद्या पद, स्थूल तथा सूक्ष्म बीज के रूप में ये) तीनों धाम ही काल हैं । (परमात्मा को प्राप्त करने का स्थान हृदय या सहस्त्रार है, इसलिए यह) द्वादशान्त पद ही स्थान है ॥25॥
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[ Sutra 26 ]
ते ह पुनः श्रद्दधानास्तं प्रत्यूचुः । कथं वाऽस्योदयः । किं स्वरूपम् । को वाऽस्योपासक इति ॥26॥
te ha punaḥ śraddadhānāstaṃ pratyūcuḥ । kathaṃ vā'syodayaḥ । kiṃ svarūpam । ko vā'syopāsaka iti ॥26॥
— Translation from Aurovindo (Hindi) — उन श्रद्धावान् ऋषियों ने मार्कण्डेय ऋषि से पुनः प्रश्न किया- किस प्रकार इसका उदय होता है? क्या स्वरूप है? इसका उपासक कौन है? उन्होंने कहा-वैराग्य रूपी तेल से परिपूर्ण, भक्ति रूपी वर्तिका से युक्त ज्ञानरूपी पात्र में ज्ञप्ति(ज्ञान का विषय )रूपी दीपिका अर्थात् सर्वत्र समान रूप से व्याप्त ईश सत्ता को अपनी आत्मा के रूप में दर्शन होता है ॥26॥
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[ Sutra 27 ]
स होवाच । वैराग्यतैलसंपूर्णे भक्तिवर्तिसमन्विते । प्रबोधपूर्णपात्रे तु ज्ञप्तिदीपं विलोकयेत् ॥27॥
sa hovāca । vairāgyatailasaṃpūrṇe bhaktivartisamanvite । prabodhapūrṇapātre tu jñaptidīpaṃ vilokayet ॥27॥
— Translation from Aurovindo (Hindi) — उन श्रद्धावान् ऋषियों ने मार्कण्डेय ऋषि से पुनः प्रश्न किया- किस प्रकार इसका उदय होता है? क्या स्वरूप है? इसका उपासक कौन है? उन्होंने कहा-वैराग्य रूपी तेल से परिपूर्ण, भक्ति रूपी वर्तिका से युक्त ज्ञानरूपी पात्र में ज्ञप्ति(ज्ञान का विषय )रूपी दीपिका अर्थात् सर्वत्र समान रूप से व्याप्त ईश सत्ता को अपनी आत्मा के रूप में दर्शन होता है ॥27॥
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[ Sutra 28 ]
मोहान्धकारे नि:सारे उदेति स्वयमेव हि । वैराग्यमरणिं कृत्वा ज्ञानं कृत्वा तु चित्रगुम् ॥28॥
mohāndhakāre ni:sāre udeti svayameva hi । vairāgyamaraṇiṃ kṛtvā jñānaṃ kṛtvā tu citragum ॥28॥
— Translation from Aurovindo (Hindi) — भगवद् दर्शन के लिए ज्ञान-भक्ति एवं वैराग्य की आवश्यकता है। इसके आते ही अज्ञानान्धकार समाप्त होकर आत्मारूपी दीपक स्वयं प्रचलित हो उठता है। अपने ज्ञानरूपी दण्ड से वैराग्य रूपी अरणी में मन्थन (चिन्तन) करके अज्ञानान्धकार के समापन के लिए गूढ़ अर्थ अर्थात् परमतत्त्व को जानने का प्रयास करना चाहिए । उस परमतत्त्व का दर्शन, निरन्तर ज्ञान और वैराग्य के परिपालन एवं चिन्तन से ही सम्भव है । परमतत्त्व के बारे में चिन्तन न करना ही पाश है, उक्त पाश से बँधे हुए द्वैतवाद से भयभीत व्याकुल, मोहरूपी शनि अर्थात् मृत्यु के मुँह में गये हुए विवेक रूप मार्कण्डेय को परमतत्त्व का चिन्तन फिर से जीवन दान करते हुए अर्थात् आत्म-तत्त्व का बोध कराते हुए परमात्मा के परम आनन्द (अपने स्वरूप) में स्थित कर देता है ॥28॥
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[ Sutra 29 ]
गाढतामिस्रसंशान्त्यै गूढमर्थं निवेदयेत् । मोहभानुजसंक्रान्तं विवेकाख्यं मृकण्डुजम् ॥29॥
gāḍhatāmisrasaṃśāntyai gūḍhamarthaṃ nivedayet । mohabhānujasaṃkrāntaṃ vivekākhyaṃ mṛkaṇḍujam ॥29॥
— Translation from Aurovindo (Hindi) — भगवद् दर्शन के लिए ज्ञान-भक्ति एवं वैराग्य की आवश्यकता है । इसके आते ही अज्ञानान्धकार समाप्त होकर आत्मारूपी दीपक स्वयं प्रचलित हो उठता है । अपने ज्ञानरूपी दण्ड से वैराग्य रूपी अरणी में मन्थन (चिन्तन) करके अज्ञानान्धकार के समापन के लिए गूढ़ अर्थ अर्थात् परमतत्त्व को जानने का प्रयास करना चाहिए । उस परमतत्त्व का दर्शन, निरन्तर ज्ञान और वैराग्य के परिपालन एवं चिन्तन से ही सम्भव है । परमतत्त्व के बारे में चिन्तन न करना ही पाश है, उक्त पाश से बँधे हुए द्वैतवाद से भयभीत व्याकुल, मोहरूपी शनि अर्थात् मृत्यु के मुँह में गये हुए विवेक रूप मार्कण्डेय को परमतत्त्व का चिन्तन फिर से जीवन दान करते हुए अर्थात् आत्म-तत्त्व का बोध कराते हुए परमात्मा के परम आनन्द (अपने स्वरूप) में स्थित कर देता है ॥29॥
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[ Sutra 30 ]
तत्त्वाविचारपाशेन बद्धं द्वैतभयातुरम् । उज्जीवयन्निजानन्दे स्वस्वरूपेण संस्थितः ॥30॥
tattvāvicārapāśena baddhaṃ dvaitabhayāturam । ujjīvayannijānande svasvarūpeṇa saṃsthitaḥ ॥30॥
— Translation from Aurovindo (Hindi) — भगवद् दर्शन के लिए ज्ञान-भक्ति एवं वैराग्य की आवश्यकता है । इसके आते ही अज्ञानान्धकार समाप्त होकर आत्मारूपी दीपक स्वयं प्रचलित हो उठता है । अपने ज्ञानरूपी दण्ड से वैराग्य रूपी अरणी में मन्थन (चिन्तन) करके अज्ञानान्धकार के समापन के लिए गूढ़ अर्थ अर्थात् परमतत्त्व को जानने का प्रयास करना चाहिए । उस परमतत्त्व का दर्शन, निरन्तर ज्ञान और वैराग्य के परिपालन एवं चिन्तन से ही सम्भव है । परमतत्त्व के बारे में चिन्तन न करना ही पाश है, उक्त पाश से बँधे हुए द्वैतवाद से भयभीत व्याकुल, मोहरूपी शनि अर्थात् मृत्यु के मुँह में गये हुए विवेक रूप मार्कण्डेय को परमतत्त्व का चिन्तन फिर से जीवन दान करते हुए अर्थात् आत्म-तत्त्व का बोध कराते हुए परमात्मा के परम आनन्द (अपने स्वरूप) में स्थित कर देता है ॥30॥
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[ Sutra 31 ]
शेमुषी दक्षिणा प्रोक्ता सा यस्याभीक्षणे मुखम् । दक्षिणाभिमुखः प्रोक्तः शिवोऽसौ ब्रह्मवादिभिः ॥31॥
śemuṣī dakṣiṇā proktā sā yasyābhīkṣaṇe mukham । dakṣiṇābhimukhaḥ proktaḥ śivo'sau brahmavādibhiḥ ॥31॥
— Translation from Aurovindo (Hindi) — ब्रह्म को प्रकाशित करने वाली तत्त्वज्ञान रूपिणी बुद्धि को ही दक्षिणा कहा है, वही ब्रह्म साक्षात्कार के लिए द्वार अर्थात् मुँह है । इसलिए ब्रह्म-ज्ञानियों ने उसी को दक्षिणामुख' नामक शिव कहा है । सृष्टि के आदि में प्रजापति ब्रह्माजी ने इनकी ही उपासना की । उसी से शक्ति प्राप्त करके सृष्टि की रचना रूपी अपने मनोरथ को पूर्ण किया और प्रसन्न हुए, इसलिए प्रजापति ब्रह्मा ही इनके उपासक हैं ॥31॥
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[ Sutra 32 ]
सर्गादिकाले भगवान्विरिञ्चिरुपास्यैनं सर्गसामर्थ्यमाप्य। तुतोष चित्ते वाञ्छितार्थाश्च लब्ध्वा धन्यः सोऽस्योपासको भवति धाता ॥32॥
sargādikāle bhagavānviriñcirupāsyainaṃ sargasāmarthyamāpya । tutoṣa citte vāñchitārthāśca l abdhvā dhanyaḥ so'syopāsako bhavati dhātā ॥32॥
— Translation from Aurovindo (Hindi) — ब्रह्म को प्रकाशित करने वाली तत्त्वज्ञान रूपिणी बुद्धि को ही दक्षिणा कहा है, वही ब्रह्म साक्षात्कार के लिए द्वार अर्थात् मुँह है । इसलिए ब्रह्म-ज्ञानियों ने उसी को दक्षिणामुख' नामक शिव कहा है । सृष्टि के आदि में प्रजापति ब्रह्माजी ने इनकी ही उपासना की । उसी से शक्ति प्राप्त करके सृष्टि की रचना रूपी अपने मनोरथ को पूर्ण किया और प्रसन्न हुए, इसलिए प्रजापति ब्रह्मा ही इनके उपासक हैं ॥32॥
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[ Sutra 33 ]
य इमां परमरहस्यशिवतत्त्वविद्यामधीते स सर्वपापेभ्यो मुक्तो भवति । य एवं वेद स कैवल्यमनुभवतीत्युपनिषत् ॥33॥
ya imāṃ paramarahasyaśivatattvavidyāmadhīte sa sarvapāpebhyo mukto bhavati । ya evaṃ veda sa kaivalyamanubhavatītyupaniṣat ॥33॥
— Translation from Aurovindo (Hindi) — इस शिवतत्त्वरूपी गुप्त विद्या का जो पाठ करता है, वह समस्त कल्मषों से छूट जाता है एवं इसको अच्छी तरह से जानने तथा मनन, चिन्तन करने वाला मोक्ष को प्राप्त हो जाता है । ऐसी यह उपनिषद् है ॥33॥
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