Books / Dasarupaka Dhanika Avaloka Dhanika Srinivasa Shastri (Hindi Translation)

1. Dasarupaka Dhanika Avaloka Dhanika Srinivasa Shastri (Hindi Translation)

Page 1

अ्थ श्रीघनञ्जय विरचितं दशरूपकम् धनिककृतयाऽवलोकव्याख्यया समेतम् [समीक्षात्म कभूमिका-भाषानुवाद-व्याख्यात्मकटिप्पणीसहितम् ]

डॉ० श्रीनिवास शास्त्री

Page 2

अ्रथ श्रीधनजयविरचितं

दशरूपकम्

धनिककृतयाऽवलोकव्याख्यया समेतम् [ समीक्षात्मकभूमिका-भाषानुवाद-व्याख्यात्मकटिप्पणीसहितम् ]

कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय प्राध्मापकेन डॉ० श्रीनिवासशास्त्रिणा सम्पादितम्

प्रकाशक- रतिराम शास्त्री, साहित्य भण्डार, सुभाष बाजार, मेरठ ।

प्रथय संसकरण, वसन्त पञ्चमी वि० सं० २०२५, १६६६ ई० मूल्य ८.०० रुाये

Page 3

प्रकाशक :- हहै रतिराम शास्त्री, हि अध्यक्ष- ॐह साहित्य भण्डार, सुभाष बाजार, मेरठ।

[ofpsonsyvepign.in mgawwth

TOPITREEIPAS

प्रथम संस्करण १६६६ ई० मूल्य द.०० रुपये मात्र

ॐह मुद्रक- ॐह राजकिशोर शर्मा 5 सर्वोदय प्रेस, अ २६४ जत्तीवाड़ा, मेरठ। डट दूरभाष ४३५२

Page 4

पूज्य माता-पिता को

जिनकी प्रेरणा एवं प्रयास से विविध शास्त्रों के अध्ययन का सौभाग् प्राप्त हुआ

तथा

स्मरणीय गुरुजनों

को जिनके चरणों में बैठकर

शास्त्रों का अध्ययन एवं विवेचन किया वसन्त पञ्चमी सं० २०२५ की

यह विनम्र भेंट

सादर समर्पित

Page 6

( ii )

प्राक्कथन fi कुड् क । दशरूपक की यह हिन्दी व्याख्या पाठकों की सेवा में प्रस्तुत की जा रही है। यहाँ भूमिका में नाट्यशास्त्र का संक्षित परिचय देते हुए धनञ्जय एवं धनिक का समय-निर्धारण, दशरूपक के प्रतिपाद्य विषय, महत्त्व तथा रस-सिद्धान्त आदि पर विचार किया गया है। विस्तार-भय से कई अंश छोड़ दिये गये हैं। हिन्दी व्याख्या का क्रम यह रक्खा गया है :- प्रथमतः कारिका, वृत्ति तथा उदाहरणों का हिन्दी में अनुवाद किया गया है। अनुवाद में स्पष्टता के लिये कहीं-कहीं आवश्यक शब्द या किसी शब्द की व्युत्पत्ति तथा विग्रह आदि कोष्ठक में रख दिये गये हैं, कहीं किसी अंश का भावानुवाद भी कर दिया गया है। संस्कृत के जो शब्द हिन्दी में उसी रूप में प्रचलित हैं, उनका ज्यों का त्यों प्रयोग किया गया है; किन्तु जो शब्द अपने रूप में प्रचलित नहीं हैं, उनका प्रचलित शब्दों द्वारा अनुवाद किया गया है। इस प्रकार अनुवाद की अविकलता एवं स्पष्टता दोनों का ध्यान रक्खा गया है। फलतः कहीं अविकलता की दृष्टि से अथवा कहीं स्पष्टता की दृष्टि से कमी भी दिखलाई दे सकती है। कारिका, वृत्ति तथा उदाहरणों को स्पष्ट करने के लिए आवश्यकतानुसार व्याख्यात्मक टिप्पणियां दी गई हैं। इनमें कठिन शब्दों, समासों आदि के अर्थ तथा व्याख्या दिखलाई गई है, गहन विषय के स्पष्टीकरण का प्रयास किया गया है, विवादास्पद विषयों के पूर्व पक्ष तथा उत्तर पक्ष को सरल शब्दों में प्रस्तुत किया गया है और यथासम्भव किसी लक्षणा को उसके उदाहरणों में घटित करके दिख- लाया गया है। साथ ही यथावसर अन्य ग्रन्थों के साथ तुलनात्मक अनुशीलन भी किया गया है। अधिकांश प्रसङ्गों में यह दिखलाया गया है कि दशरूपक का कोई विषय अन्य प्रमुख नाट्य सम्बन्धी ग्रन्थों में कहां मिलता है। इसके सन्दर्भ मात्र दे दिये गये हैं, जहां विशेष अन्तर है उसे स्पष्ट कर दिया गया है। संक्षेपतः अनुवाद तथा टिप्परी के द्वारा मूल ग्रन्थ के अभिप्राय को स्पष्ट करने एवं इसकी विषय- वस्तु का तुलनात्मक अनुशीलन करने का प्रयास किया गया है। प्रश्न उठ सकता है कि दशरूपक के कई एक अनुवाद तथा व्याख्याओं के होते हुए इस नवीन व्याख्या की क्या आवश्यकता है। इस विषय में यही नम्र निवेदन है कि सरस्वती की पूजा विविध जन अपने २ भाव से किया करते हैं, उनकी दृष्टि तथा शैली में भी भेद हुआ करता है। अतः यह सम्भावना है कि यह नवीन व्यारुया दशरूपक के लिये अवश्य उपयोगी सिद्ध हो सकेगी। इस व्याख्या में आवश्यकतानुसार साहित्य शास्त्र, नाट्य शास्त्र, काव्य एवं नाटक आदि के ब्रनेक खूल ग्रन्थों का आधार लिया गया है। निविध सन्थों की

Page 7

( ii )

भूमिकाओं, अंग्रेजी तथा हिन्दी में लिखे गये संस्कृत साहित्य के इतिहास एवं समा- लोचना सम्बन्धी ग्रन्थों से भी पर्याप्त सहायता ली गई है। उनमें से अधिकांश का यथास्थान उल्लेख किया गया है, जिनका उल्लेख नहीं किया गया उनका भी यह लेखक ऋणी तो है ही। इसलिये उन सभी ग्रन्थों के प्रणोता विद्वानों का यह लेखक हृदय से आभार स्वीकार करता है। वस्तुतः दशरूपक के तथ्यों की अभिव्यञ्जना में उन सभी विद्वानों की कृतियों ने प्रकाश-स्तम्भ का कार्य किया है। उनके कृपा-प्रसाद से ही यह ग्रन्थ पूर्ण किया जा सका है, इसमें जो भी ग्राह्य है वह उनका ही है जो अग्राह्य है वह लेखक का असफल प्रयास मात्र है। हi अन्त में साहित्य भण्डार के अध्यक्ष रतिराम शास्त्री को भी धन्यवाद एवं साधुवाद देना लेखक अपना परम कर्तव्य समझता है, जिनके अनुरोध से ही इस कार्य का समापन हो सका है। साथ ही प्रिय वत्स राजकिशोर शर्मा को भी साधुवाद देना आवश्यक है, जिन्होंने मुद्रणा के कार्य में अथक परिश्रम किया है। ग्रन्थ को शुद्ध एवं उपयोगी बनाने का पूर्ण ध्यान रक्खा गया है तथापि साधनाभाव अथवा दृष्टि-दोष के कारण कुछ कमियाँ रह जाना सम्भव ही है। स्नेहशील विद्वज्जनों के सत्परामर्श से उन कमियों को दूर करने का प्रयत्न किया जायेगा। यदि इससे पाठक जन का कुछ भी उपकार हो सका तो लेखक अपने प्रयास को सफल समभेगा।

-लेखक

HOUE FIUE SP FEN IPFINTE

Page 8

विषय-सूचि

प्रमुख सहायक ग्रन्थों के संकेत तथा विवरण 1P भूमिका १. संस्कृत नाट्यशास्त्र का परिचय; भरत के पूर्ववर्ती आ्चार्य, भरत का नाट्यशास्त्र, नाट्यशास्त्र के कर्ता तथा समय, भरत के परवर्ती आचार्य, नाट्यशास्त्र के व्याख्याकार, नाटयशास्त्र के आधार पर लिखे गये स्वतन्त्र ग्रन्थ, काव्यशास्त्र के ग्रन्थ जिनमें नाटयसम्बन्धी विवेचन है। २. धनञ्जय और उनका दशरूपक; धनञ्जय का समय, दशरूपक का आधार, दशरूपक की शैली, दशरूपक की टीकाएँ और धनिक का दशरूपावलोक, धनिक का समय तथा कृतियाँ आदि। ३. दशरूपक के प्रतिपाद्य विषय पर एक दृष्टि। ४. रस-सिद्धान्त और दशरूपक का मन्तव्य; आचार्य भरत, अलङ्कारवादी आचार्यों का रसविषयक दृष्टिकोण, ध्वनिवादी आचार्य तथा रससिद्धान्त, ध्वनि- विरोधी किन्तु रसवादी आचार्य, भरत के रससूत्र की विविध व्याख्यायें [भट्टलोल्लट, श्रीशङ्कुक, भट्टनायक, अरभिनवगुप्त], दशरूपक का रसविषयक मन्तव्य। ५. संस्कृत साहित्यशास्त्र विशेषकर नाटयशास्त्र को दशरूपक की देन। प्रथम प्रकाश वस्तु-निरुपण

मङ्गलाचरण १, ग्रन्थ का प्रयोजन ३, नाटय का स्वरूप ६, रूपकों के भेद 5, नाटय, नृत्त एवं नृत्य का अन्तर 5, रूपकों के भेदक तत्त्व १२, वस्तु के भेद-प्रभेद १२, प्रासङ्गिक कथावस्तु के भेद १३, इतिवृत्त का फल १७, अर्थ- प्रकृतियाँ १८, कार्यावस्थायें २१, सन्धियाँ २४, मुख सन्धि तथा उसके अ्ङ्ग २६, प्रतिमुख सन्धि तथा उसके अङ्ग ३८, गर्भसन्धि तथा उसके अङ्ग ५०, अवमर्श सन्धि तथा उसके अङ्ग ६३, निर्वहण सन्धि तथा उसके अङ्ग ८१, सन्ध्यङ्गों का प्रयोजन ६५, वस्तुनिबन्धन की दृष्टि से वस्तु-विभाजन ६६, विष्कम्भक आदि अर्थोपक्षेपक ६०, नाटयोक्ति की दृष्टि से वस्तु के भेद (जनान्तिक इत्यादि १०२। द्वितीय प्रकाश-नायक-नायिका भेद नायक के गुण १०६, नायक के प्रकार (धीरोदात्त इत्यादि) ११३, नायक की शृङ्गाररस सम्बन्श्ी अवस्थायें (दाक्षिण्य आदि) १२२, नायक के सहायक १२७, नायक के सास्विक गुण १२६, नायिका-भेद (स्वकीया इत्यादि) १३४, नायिका के अ्रन्य भेद (स्वाधीनपतिका आदि अवस्थायें) १५०, नायिका की सहायिकायें १६०,

Page 9

( ii )

नायिकाओं के अलङ्कार १६१, नायक के अन्य सहायक १७६, भारती आदि वृत्तियाँ १८२, (वृत्तियों के विषय में) उद्भट के अनुयायियों के मत का निराकरण १६७, नाठय-प्रवृत्तियाँ (भाषा आदि) १६६। तृतीय प्रकाश-रूपकों के प्रकार नाटक २०६, भारती वृत्ति २१०, भारती वृत्ति के अङ्ग (प्रस्तावना तथा उसके अङ्ग कथोद्घात, वीथ्यङ्ग आदि) २१०, नाटक की वस्तु-योजना २३० (सन्धियाँ, अङ्कविभाजन, अनुचित इतिवृत्तांश का त्याग, रस-योजना, अङ्क-संख्या), प्रकरण २३७, नाटिका २३६, भारग २४३, प्रहसन २४६, डिम २४८, व्यायोग २४६, समवकार २५०, वीथी २५३, अङ्क (उत्सृष्टिकाङ्क) २५४, ईहामृग २५४। चतुर्थ प्रकाश-रस-विवेचन रस-लक्षणा २५७, विभाव २५८, अनुभाव २६१,सात्त्विक भाव २६४, व्यभिचारी भाव २६७, स्थायी भाव (भावों के विरोधाविरोध पर विचार) ३०१, स्थायी भावों की संख्या ३१३, नाटय में शान्त रस का निषेध ३१३, स्थायी भाव तथा रस का काव्य से सम्बन्ध ३१७, ध्वनिवादी का (व्यङ्गयव्यञ्जक भाव) पूर्व पक्ष ३१८, दशरूपक का सिद्धान्त (भाव्यभावक सम्बन्ध) ३३२, रसास्वाद रसिक को होता है (रस का आश्रय) ३४२, रस की प्रक्रिया तथा स्वरूप ३४८, रसास्वाद में चित्त की विकास आदि चार अवस्थायें ३४८, सभी रसों की आनन्दरूपता ३५०, शान्त रस का भी विकास आदि चार अवसाओं में अन्तर्भाव ३५२, रस-प्रक्रिया तथा रस-स्वरूप का उपसंहार ३५४, रसों के लक्षणा, भेद तथा उदाहरण ३५७, शृङ्गार- रस ३५८, शृङ्गार के भेद (अयोग, विप्रयोग, सम्भोग) ३६५, वीर रस ३८५, बीभत्स रस ३८७, रौद्र रस ३८६, हास्य रस (६ प्रकार का हास) ३६१, अद्भुत रस ३६४, भयानक रस ३६५, करुण रस ३६६, उक्त रसों में भक्ति आदि अ्रन्य रसों का अन्तर्भाव ३६७, नाटयलक्षण तथा नाट्यालद्वारों का अन्तर्भाव २६८, ग्रन्थ का उपसंहार ३६६। परिशिष्ट १. दशरूपकावलोके समुपन्यस्तानां ग्रन्थानां ग्रन्थकाराणां चानुकमणिका परिशिष्ट २. उदाहृतपद्यानुकमणिगका


तकसीह सवभास

Page 10

प्रमुख सहायक ग्रन्थों के संकेत तथा विवरण

अभिज्ञानशाकुन्तलम् (अभि० शा०), कालिदास; साहित्य भण्डार, मेरठ. अभिनव भारती (अभि० भा०), अभिनवगुप्त; गायकवाड़ ओरियन्टल सीरीज़, बड़ौदा. अ्रमरुशतक (अमरु०), अमरु; मित्र प्रकाशन, इलाहाबाद १६६१. उत्तररामचरित (उत्तर०), भवभूति; चौखम्बा संस्कृत सीरीज़, बनारस १६५३. कर्बूरमञ्जरी, राजशेखर; रूपरेल कालेज, बम्बई १६. काबम्बरी, बाणभट्ट; साहित्य भण्डार, मेरठ, कामसूत्र, वात्स्यायन; निर्यसागर प्रेस बम्बई १८६१. काव्यप्रकाश (का० प्र०), मम्मट; साहित्य भण्डार, मेरठ १६६७. काव्यादर्श, दण्डी; जीवानन्दविद्यासागरव्याख्यासहित, चेन्नपुरी १६५२. काव्यानुशासन (काव्यानु०), हेमचन्द्र; महावीर जैनविद्यालय, बम्बई १६३८. काव्यालङ्कार, भामह; विहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना. काव्यालङ्कार, रुद्रट; वासुदेव प्रकाशन दिल्ली, १६६५. काव्यालङ्कारसंग्रह, उद्भट; निर्एयसागर, बम्बई, १६२८. काव्यालङ्कारसूत्रवृत्ति, वामन; आत्माराम एण्ड सन्स, दिल्ली १६५४. किरातार्जुनीय (किरात०), भारवि; चौखम्बा संस्कृत पुस्तकालय, बनारस, १६५२. कुमारसम्भव (कुमार०), कालिदास; निर्रायसागर १६५५. गाथासप्तशती (गाथा०), हाल; प्रसाद प्रकाशन, पूना १६५६. कशरूपक (दश०), धनञ्जय तथा धनिक; (i) निर्णयसागर प्रेस, बम्बई १६४१. (अरवलोकसहित) 11 (ii) प्रभा (सं०) व्याख्यासहित; गुजराती प्रेस, बम्बई १६२७. (iii) अंग्रेजी अनुवाद (हॉस); मोतीलाल बनारसीदास, दिल्ली १६६२. " (iv) हिन्दी दशरूपक; साहित्य निकेतन, कानपुर १६६६. (v) चन्द्रकला हिन्दी व्याख्याः चौखम्बा विद्याभवन वाराणसी, १६६७ (vi) भारतीय नाटयशास्त्र की परम्परा और दशरूपक; राजकमल प्रकाशन दिल्ली. ध्वभ्यालोक (ध्वन्या०), आनन्दव्द्धन; गौतम बुक डिपो, दिल्ली १६५२. ध्वन्यालोकलोचन (लोचन), अभिनवगुप्त; मोतीलाल बनारसीदास, दिल्ली १६६३. नाणानन्द, हर्ष; चौखम्बा संस्कृत सीरीज, बनारस १६५६. नाटयदपण (ना० द०), रामचन्द्र गुणचन्द्र; (हिन्दी व्याख्या) दिल्ली विश्वविद्यालय, १६६१.

Page 11

( iv )

नाटयशास्त्र (ना० शा०), भरत मुनि, गायकवाड़ ऑरियन्टल सीरीज़, बड़ौदा नाटयशास्त्र, भाग १ (अनुवाद तथा व्याख्या सहित), मोतीलाल बनारसीदास, दिल्ली १६६३. प्रतापरुद्रयशोभूषण (प्रता०), विद्यानाथ; बालमनोरमा प्रेस, मद्रास १६५०. भतृ हरिशतक, भतृ हरि; भावप्रकाशन (भा० प्र०), शारदातनय; ऑरियन्टल इन्स्टीटयू ट, बड़ौदा १६३०. भोजप्रबन्ध, बल्लाल; साहित्य भण्डार, मेरठ महावीरचरित (वीरचरित), भवभूति; चौखम्बा विद्याभवन, बनारस १६५५, माघकाव्य (माघ), माघ; निर्रयसागर १६५७. मालतीमाधव (मालती०), भवभूति, निर्रयसागर १६३६. मालविकाग्निमित्र, कालिदास; निर्णयसागर १६५०. मुद्राराक्षस, विशाखदत्त; साहित्य भण्डार, मेरठ. मृच्छकटिक, शूद्रक; साहित्य भण्डार, मेरठ १६६८. मेघदूत (मेघ०), कालिदास; साहित्य भण्डार, मेरठ. रघुवंश (रघु०), कालिदास; निर्ायसागर १६४८. रत्नावली, हर्ष; साहित्य भण्डार, मेरठ. रसगङ्गाधर, पण्डितराज जगन्नाथ; चौखम्बा विद्याभवन, बनारस १६५५.मल रसतरङ्गिणी, भानुदत्त; वेङ्कटेश्वर प्रेस प्रकाशन. रसारणवसुधाकर, शिङ्गभूपाल; वक्रोक्तिजीवित, (वक्रोक्ति०), कुन्तक; के० एल० मुखोपाध्याय, कलकत्ता १६६१. विक्रमोर्वशीय (विक्रमोवशी), कालिदास; चौखम्बा संस्कृत सीरीज़ १६५३. वेरीसंहार (वेरगी०), भट्टनारायणः साहित्य भण्डार, मेरठ १६६०. व्यक्तिविवेक, महिमभट्ट; चौखम्बा संस्कृत सीरीज़, बनारस. सरस्वतीकण्ठाभरण (सर० क०), भोजराज; निर्णयसागर प्रेस बम्बई. साहित्यदर्पण (सा० द०), विश्वनाथ; चौखम्बा विद्याभवन वाराणसी १६५७. संगीतरत्नाकर, शाङ्गदेव, अड्यार लाइब्र री १६४४. संस्कृत-नाटक, ए० बी० कीथ; मोतीलाल बनारसीदास, दिल्ली १६६५. संस्कृत पोयटिक्स, एस० के० डे०; के० एल० मुखोपाध्याय, कलकत्ता १६६०. हनुमन्नाटक(महानाटक),(दामोदर मिश्र ?); जीवानन्द विद्यासागर, कलकत्ता१८६०. हिस्ट्री आफ संस्कृत पोयटिक्स (HSP.), पी० वी० कारो; मोतोलाल बनारसीदास, दिल्ली.

Page 12

भूमिका १ संस्कृत नाट्यशास्त्र का परिचय

लक्ष्यग्रन्थों की श्रीवृद्धि के उपरान्त ही लक्षण-ग्रन्थों की रचना हुआ करती है। उन लक्षण-ग्रन्यों में लक्ष्य-ग्रन्थों का आश्रय लिया जाता है और उनकी विशेषताओं को ध्यान में रखकर कुछ ऐसे नियमों का अन्वेष किया जाता है जो भावी कलाकृतियों के लिये मानदण्ड निर्धारित किया करते हैं। फलतः जिस प्रकार रामायण, महाभारत तथा कालिदास आदि के काव्यों का आश्रय लेकर अलङ्कार शास्त्र का उद्भव तथा विकास हुआ होगा उसी प्रकार किसी समृद्ध रूपक-परम्परा के आधार पर ही प्रथमतः नाट्यशास्त्र-विषयक ग्रन्थों की रचना हुई होगी। यह कहना कठिन है कि भारतीय रूपक की प्राचीनतम रचनाएँ कौन सी थीं और उनके आधार पर सर्वप्रथम कौन सा नाट्य सम्बन्धी ग्रन्थ लिखा गया। भारतीय परम्परा के अनुसार त्रेता युग में ब्रह्मा द्वारा नाटक की उत्पत्ति हुई। ब्रह्मा ने ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद तथा अथर्ववेद के आधार पर नाट्यवेद की रचना की। यह नाटयवेद पञ्चम वेद है, जिसमें पाठ्य, गीत, अभिनय तथा रस इन चारों तत्त्वों को क्रमशःऋक, साम, यजुष तथा अथर्ववेद से लिया गया है। ब्रह्मा की प्रेरणा से विश्वकर्मा ने नाटयगृह की रचना की और भरतमुनि ने अभिनय की व्यवस्था की। भरत ने अपने सौ शिष्यों तथा अप्सराओं को नाट्यकला की शिक्षा दी। नाट्यकला को पूर्ण बनाने के लिये शिव ने नाट्य के साथ ताण्डव का और पार्वती ने लास्य का समावेश कर दिया।

आधुनिक दृष्टि से यह समझा जाता है कि सम्भवतः भरत के नाट्यशास्त्र की प्रामाशिकता सिद्ध करने के लिये एवं इसके माहात्म्य की वृद्धि के लिये ही इस आख्यान की कल्पना की गई होगी। फिर भी इससे कतिपय तथ्यों पर अवश्य प्रकाश पड़ता है। इससे प्रकट होता है कि भारत में अति प्राचीन काल में नाट्य काव्यों का विकास हो चुका था, जिनके आधार पर नाट्यकाव्य का शास्त्रीय विवेचन करने की आवश्यकता का अनुभव किया जाने लगा था। किन्तु प्रश्न यह है, इस आवश्यकता का सर्वप्रथम किस आचार्य ने अनुभव किया, क्या भरतमुनि का नाव्यशास्त्र ही नाट्यविद्या का प्रथम शास्त्रीय विवेचन है अथवा इससे पूर्व भी कोई नास्यशास्त्र सम्बन्धी ग्रन्थ रहे होंगे ? इस प्रश्न का उत्तर निश्चित रूप से तो देना कठिन है, क्योंकि भारत के प्राचीन राजनैतिक और सामाजिक इतिहास के समान साहित्यिक इतिहास का भी बहुत धुधला सा आभास ही मिलता है। फिर भी नाट्य-साहित्य के विवेचन में इसके कुछ संकेत उपलब्ध हो सकते हैं।

Page 13

दशरूपकम्

नाटय सम्बन्धी साहित्य के आचार्यों का निम्न प्रकार से वर्गीकरण किया जा सकता है (मि०, ना० द० भूमिका पृo ८८) :- (१) भरत के पूर्ववर्ती आचार्य जिनके यत्र-तत्र उल्लेख मिलते हैं, किन्तु रचनाएँ अप्राप्य हैं। (२) भरत का नाट्यशास्त्र । (३) भरत के परवर्ती आचार्य जिनकी सम्पूर्ण रचनाएँ अनुपलब्ध हैं, किन्तु अन्य आचार्यों ने उनका उल्लेख किया है अथवा कहीं-कहीं उनके उद्धरर भी दिये हैं ; जैसे कोहल आदि । (४) नाटयशास्त्र के व्याख्याकार कीतिधर, भट्टोद्भट, भट्टलोल्लट तथा अभिनवगुप्त आदि। (५) नाटयशास्त्र के आधार पर स्वतन्त्र ग्रन्थ लिखने वाले धनञ्जय आदि। (६) काव्यशास्त्र पर ग्रन्थ लिखने वाले आ्र्प्रचार्य, जिन्होने कुछ अध्यायों में नाटयशास्त्र का भी विवेचन किया है, जैसे भोजराज, विश्वनाथ इत्यादि । (१) भारत मुनि के पूर्ववर्ती आचार्य- पाशिनि (४.३. ११०-१११) ने शिलालिन् और कृशाश्व के नटसूत्रों का उल्लेख किया है। प्रो० हिलब्रान्ड का सुझाव है कि ये कृतियाँ भारतीय नाट्य की प्राचीनतम पुस्तकें मानी जानी चाहिएं। किन्तु वेबर तथा कोनो के अनुसार ये नर्तकों तथा नट का काम करने वालों के लिये लिखे गये ग्रन्थ थे कीथ का भी यही मत है (सं० नाटक पृ० ३०६)। दूसरी ओर मनमोहन घोष (ना० शा०भूमिका पृo LXIV) का विचार है कि यहाँ 'तट' का अर्थ अभि- नेता ही है। इस प्रकार पशिनि के समय (चौथी शताब्दी ई० पू०) में नात्य सम्बन्धी ग्रन्थों का होना विवादास्पद ही है। पतञ्जलिकृत महाभाष्य (लगभग १४० ई० पू०) में नाट्य कला के अधिक विकसित रूप के संकेत अवश्य मिलते हैं। फिर भी उनके अधार पर यह नहीं कहा जा सकता कि उस समय कोई नाट्यशास्त्र सम्बन्धी ग्रन्थ रचा जा चुका था। अभिनवगुप्त ने एक स्थान पर संग्रह और दूसरे स्थान पर संग्रहकार का उल्लेख किया है। भरत ने भी संग्रह श्लोकों के नाम से कुछ श्लोक उद्धृत किये हैं (६. ३, १०)। ऐसा प्रतीत होता है कि नाट्यविषयक संग्रह ग्रन्थ भरत से पूर्व ही प्रचलित रहा होगा और अभिनव गुप्त भी उससे परिचित रहे होंगे। भरत ने पूर्वा- चार्यों की अन्य करिकाएँ भी 'भवन्ति चात्र इलोकाः' अथवा 'अार्ये भवतः' इत्यादि प्रकार से उद्धृत की हैं। ऐसे लगभग १०० पद्य नाट्यशास्त्र में हैं। इनसे भी यह प्रकट होता है कि भरत से पहिले भी नाट्यविषयक ग्रन्थ लिखे गये थे। यद्यपि कुछ उल्लेखों से यह विदित होता है कि भरत ने अग्निपुराण के आधार पर नाट्यशास्त्र की रचना की थी तथापि युक्ति और प्रमाणों के आधार पर यह सिद्ध किया जा

Page 14

भूमिका ३०

चुका है कि अग्निपुराण का सहित्यशास्त्र सम्बन्धी विवेचन बहुत बाद का है वह नाट्यशास्त्र का आधार नहीं हो सकता (HSP पृ० ३-६)। इस प्रकार वर्तमान काल में उपलब्ध नाट्य-विषयक ग्रन्थों में भरत का नाट्यशास्त्र ही सबसे प्रचीन माना जाता है। (२) भरत का नाटयशास्त्र-यह संस्कृत काव्यशास्त्र एवं नाट्यशास्त्र का प्राचीनतम उपलब्ध ग्रन्थ है। इसमें नाटय, नृत्य, संगीत तथा अलङ्धार आदि सभी विषयों का विवेचन किया गया है, नाट्य तथा रस का अत्यन्त विस्तृत विवेचन है। इसमें ३७ अध्याय हैं। विद्वानों का विचार है कि ३६ अध्याय प्राचीन हैं और ३७ वां अध्याय बाद में जोड़ा गया है। यहाँ प्रथम अध्याय में नाटक तथा नाट्यवेद की उत्पत्ति का वर्णन है। द्वितीय अध्याय में नाट्यगृह की रचना आदि का वर्णन है तृतीय अध्याय में महादेव, ब्रह्मा, विष्णु, वृहस्पति, गुह की पूजा का वर्णन है। चतुर्थ अध्याय में देवों के समक्ष अमृत-मन्थन और महादेव के समक्ष त्रिपुरदाह नामक रूपकों के अभिनय की कथा है तथा ताण्डव नृत्य के उद्भव एवं शिक्षण का निरूपण है। पञ्चम अध्याय में पूर्वरङ्ग, नान्दी, प्रस्तावना आदि का वर्णन है। षष्ठ अध्याय में स्थायी भाव, रस आदि का विशद वर्णन है तथा सप्तम में भाव, विभाव, अनुभाव सात्विक भाव और व्यभिचारी भावों का निरूपण किया गया है। अप्टम में सा- त्विक, आङ्गिक वाचिक और आ्हार्य चार प्रकार के अभिनयों का स्वरूप दिखलाया गया है। आगे e से १२ तक के अध्यायों में आ्र्रङ्गिक अ्रभिनय का विस्तृत वणन है। अग्रिम अध्यायों के विषय निम्न प्रकार हैं :- १३ भारती आदि वृत्तियों तथा प्रवृत्तियों का निरुपण। १४-१५. वाचिक अभिनय। १६. छन्द, नाट्यलक्षण, अलङ्कार, काव्य के दोष तथा गुरा आदि। १७- भाषाओं के लक्षण। १८. दशरूपकों के लक्षगा। १६. २०-वस्तु, सन्धि, सन्ध्यङ्ग, भारती आदि वृत्तियों के अङ्ग। २१. आहार्य अभिनय। २२. युवतियों के अलङ्कार, नायिका की अवस्थाएँ। २३. नारी की प्रकृति। २४. नायक-नायिका के प्रकार। २५. अभिनय सम्बन्धी निर्देश, नाट्योक्ति। २६-२७. नाट्य-प्रयोग। २८. आतोद्य-प्रयोग। २६. आतोद्य-विधान। ३० सुषिर आतोद्य का स्वरूप। ३१-३२ ताल लय आदि। ३३. गायक, वादक का गुरदोष-विचार। ३४. मृदङ्गों का वर्णन। ३५. पात्रों की भूमिका की व्यवस्था। ३६. पूर्वरङ्गविधान- कथा। ६७ नाट्यावतार, नाट्य-माहात्म्य। गायकवाड़ ओरियन्टल सीरीज़ बड़ौदा के संस्करण के अनुसार उपयुक्त विषय-सूची दी गई है। भिन्न-भिन्न संस्करणों में अध्यायों की श्लोक संख्या तथा विषय-प्रतिपादन में अन्तर है। 161 नाट्यशास्त्र के कर्त्ता तथा समय-नाट्यशास्त्र के उपलब्ध स्वरूप में कई पाठ-भेद मिलते हैं। अतः यह कहना कठिन है कि नाट्यशास्त्र का असल रूप क्या था, क्या यह समस्त नाट्यशास्त्र एक ही भरत नामक आचार्य की रचना है तथा

Page 15

४ दशरूपकम्

इसकी रचना का कोई एक निश्चित समय भी है। विद्वानों का विचार है कि वर्तमान नाट्यशास्त्र एक काल की रचना नहीं अपितु शताब्दियों के साहित्यिक प्रयास का फल है। नाट्यशास्त्र में तीन अंश हैं-(१) गद्य भाग-यह सूत्र तथा भाष्य के रूप में है। इसकी शैली यास्क के निरुक्त की शैली से मिलती है। जैसे- विभावानु- भावव्यभिचारिसंयोगाद् रसनिष्पत्तिः । को वा दृष्टान्त इति चेद् उच्यते। ... रस इति क: पदार्थ: ? उच्यते-आस्वाद्यत्वात् (ना० शा०६ इलो० ३१ से आगे गद्य)। कुछ विद्वानों का विचार है यही अंश इस ग्रन्थ का मूल भाग है अन्य अंश कालान्तर में जोड़े गए हैं। (२) सूत्रविवरणस्वभावा कारिकायें-सूत्र तथा भाष्य के अभिप्राय को विस्तार पूर्वक समझाने के लिये ५००० से ऊपर कारिकायें हैं, जिनमें विविध शङ्काओं का समाधान भी किया गया है। (३) अन्य श्लोक, जो तीन प्रकार के हैं (क) आनुवंश्य-भरत के नाट्यशास्त्र में १५ अनुष्टुभ् और १६ आर्या 'छन्द ऐसे हैं जिनका इस नाम से निर्देश किया गया है। अभिनव भारती (६·३५) से ऐसा प्रतीत होता है कि नाट्य-विषयक कुछ मन्तव्य गुरुशिष्यपरम्परा से प्रचलित थे, 'उनका ही अत्रानुवंश्यौ भवतः' इत्यादि रूप से नाट्यशास्त्र में संग्रह कर दिया गया है (ख) सूत्रानुविद्ध (अनुबद्ध) इ्लोक-अ््नेक पद्यों को 'सूत्रानुविद्धे आरयें भवता'इत्यादि प्रकार से उद्धृत किया गया है। इनमें सूत्र का भाव सरल रूप में प्रकट किया गया है। अभिनव भारती के अनुशीलन से प्रतीत होता है कि ये पद्य भरत-रचित ही हैं। (ग) पूर्वाचार्यों की कारिकायें-'भवन्ति चात्र श्लोकाः' अथवा 'अन्नार्ये भवतः' इत्यादि कहकर भी लगभग १०० पद्य उद्धृत किये गए हैं। अभिनव भारती के अनुसार ये पद्य प्राचीन आचार्यों के हैं जिन्हें भरत मुनि ने यथास्थान रख दिया है- 'ता एता हयार्था एकप्रघट्टकतया पूर्वाचार्यर्लक्षणत्वेन पठिता मुनिना तु सुखसंग्रहाय यथास्थानं निवेशिताः' । (ना० शा० पृ० ३२७-३२८)। इस विबेचन से यह प्रकट होता है कि नाट्यशास्त्र का वर्तमान रूप अ्रनेक परम्परा- प्राप्त विद्याओं का समन्वित रूप है तथा इसका मूल रूप भरत मुनि द्वारा रचा गया है। किन्तु अभिनवगुप्त के समय से ही यह शङ्का की जाने लगी थी (जो आज भी की जाती है)कि भरत के किसी शिष्य ने नाट्यशास्त्र की रचना की थी। अभिनवगुप्त ने इस शङ्का का निराकरण किया है (अ० १.७ पृ० ६)। भावप्रकाशन (दशम अधि- कार पृ० २८७) में यह भी बतलाया गया है कि नाट्यशास्त्र के दो रूप थे। एक द्वादशा सहस्र(१२०००) श्लोकों का था जो 'द्वादशसहस्री' कहलाता है और दूसरा षट् सहस्र (६०००) श्लोकों के द्वारा संग्रहीत किया गया था जो 'षट्सहस्त्री' कहलाता है। धनिक ने 'षट्सहस्त्रीकृत्' के नाम से भरत का एक उद्धरण दिया है (अव- लोक ४·२) ।

Page 16

भूमिका नाट्यशास्त्र के समय के विषय में विविध मत हैं। म० हरप्रसाद शास्त्री ने इसका समय ई० पू० द्वितीय शती माना है। प्रो० लेवी के अनुसार नाट्यशास्त्र का रचना-काल क्षत्रपों के शासन का समय है। पी० वी० काणो ने लेवी के मत का खण्डन किया है (HSP, पृ० ४०-४१)। कीथ कावि चार है कि इसका रचनाकाल तीसरी शताब्दी से पूर्व नहीं हो सकता। उनके अनुसार बाह्य तथा आभ्यन्तर प्रमाणों के आधार पर भी इसी मत की पुष्टि होती है :- (१)'संस्कृत के रूपकों में पूर्वरंग का एक प्रकार से अस्तित्व ही नहीं है; किन्तु नाट्यशास्त्र में उसका विस्तृत विवरण दिया गया है; इस तथ्य से कम परिष्कृत रुचि वाले युग का संकेत मिलता है। (२) 'जिन प्राकृतों से नाट्यशास्त्र परिचित है, वे स्पष्टतया अश्वघोष की प्राकृतों के बाद की हैं और भास के नाटकों में उपलब्ध प्राकृतों के साथ उनका अधिक सादृश्य है। किञ्च नाट्यशास्त्र ने अर्धमागधी को मान्यता दी है जो इन दोनों नाटककारों की रचनाओं में पायी जाती है, किन्तु पश्चात्कालीन नाटककारों में नहीं' (३) भास ने एक नाट्यशास्त्र का स्पष्ट रूप में निर्देश किया है, और बहुत सम्भाव्य है कि वे और कालिदास दोनों वर्तमान ग्रन्थ के किसी पूर्व रूप से परिचित थे'। (४) 'भास ने अपने नाटकों के उपसंहार के आकार-प्रकार में अथवा रङ्गमञ्च से मृत्यु के दृश्यों के बहिष्कार में नाट्यशास्त्र के नियमों का आंख मूंद कर पालन नही किया है. इससे इतना ही सूचित होता है कि जिस समय उन्होंने अपने नाटकों की रचना की थी उस समय तक शास्त्र की नियामक शक्ति प्रतिष्ठित नहीं हुई थी (संस्कृत नाटक पृ० ३११) । डा० डी० सी० सरकार ने वर्तमान नाट्यशास्त्र में महाराष्ट्र और नैपाल के उल्लेख के आधार पर इसका समय दूसरी शती के बाद माना है, क्योंकि नैपाल का प्रथम उल्लेख समुद्रगुप्त-प्रशस्ति में चतुर्थ शताब्दी के पूवाद्ध में हुआ है और महाराष्ट्र का प्रथम उल्लेख 'महावंश' (पञ्चम शताब्दी) तथा ऐहोल अभिलेख (६३४ ई०) में हुआ है। काणो महोदय ने इस मत के आधार को युक्ति-युक्त नहीं स्वीकार किया (HSP. पृ० ४२) । मनमोहन घोष ने भरत के भाषावैज्ञानिक तथा छन्द सम्बन्धी विवेचन, केवल चार अलङ्ारों का वर्णन, उपाख्यान और भोगोलिक विवरण के आधार पर नाटयशास्त्र का समय १००ई०पू० तथा २०० ई० के मध्य निर्धारित किया है (वही पृ० ४१)। पी० वी० काो ने इन सभी मतों की परीक्षा करके अनेक युक्तियों तथा प्रमाणों के आधार पर यह सिद्ध किया है कि नाटयशास्त्र का समय तीसरी शताब्दी से बाद का नहीं हो सकता (वही पृ० ४७) । उनका विचार है कि वर्तमान नाटयशास्त्र के षष्ठ, सप्तम अध्याय, अभिनय-विषयक ८ से १४ तक के अध्याय तथा १७ से ३५ तक के अध्याय किसी एक समय ग्रथित किये गये होंगे। षष्ठ और सप्तम अध्याय के गद्य-अंश और आर्याएँ, जिन्हें अभिनव गुप्त ने प्राचीन आचार्यों से लिया गया बतलाया है, लगभग २०० ई० पू० में

Page 17

६ दशरूपकम्

लिखी गई होंगी और जब अन्य अध्याय लिखे गये तब उनमें जोड़ी गई होंगी। (वही पृ० १८) । क(३) भरत के परवर्ती आचार्य-(जिनके उल्लेख या उद्धरण तो मिलते हैं किन्तु, रचनाएँ उपलब्ध नहीं)। इस युग में अ्नेक आचार्य हुए हैं, उदाहरणार्थ कोहल, दत्तिल शालिकर्ण (शातकरं), बादरायण (बादरि), नखकुट्ट और अश्मकुट्ट आदि का नाम बाद के नाट्य-विषयक ग्रन्थों में नाट्यशास्त्र के प्रामाशिक आचार्यों के रूप में आता है। पी० वी० काणे ने वामन की काव्यालद्कार सूत्रवृत्ति (१.३.७) कुट्टनीमत (५. १२३), तथा अभि० भा० (अ० ४) के साक्ष्य पर विशाखिल नामक एक पूर्ववर्ती नाट्याचार्य का भी उल्लेख किया है। उनका कथन है कि सम्भवतः अभिनव के विचार में भरत भी विशाखिल से परिचित थे (HSP. पृ० ५६)। निश्चित रूप से कहना कठिन है कि विशाखिल भरत के पूर्ववर्ती हैं, समकालीन हैं अथवा परवर्तीं। ना० शा० (३६.६३) में कोहल का उल्लेख भी मिलता है। अभिनव गुप्त ने भी अनेकशः कोहल का उल्लेख किया है और कोहल को उद्धृत भो किया है। भावप्रकाक्ष में अ्नेक बार कोहल के मत उद्धृत किये गये हैं। अभि० भा०, रसाणंव सुधाकर कामशास्त्र और कुट्टनीमत में दत्तिल या दत्तकाचार्य का उल्लेख मिलता है। रामकृष्ण कवि (J. Andhra H.RS. Vol. iii p.24) ने उनके ग्रन्थ गन्धर्ववेदसार' का भी उल्लेख किया गया है (मि० HSP पृ० ५७) सागरनन्दी तथा विश्वनाथ ने अश्मकुट्ट एवं नखकुट्ट का भी नाट्याचार्य के रूप में उल्लेख किया है। सागरनन्दी के अनुसार बादरायण या बादरि भी कोई नाट्याचार्य हैं (वही पृ० ६२)। इसी प्रकार अण्य भी कुछ आचार्यों का उल्लेख मिलता है। उनकी कृतियां कौनसी थीं तथा उनका समय क्या था ? यह कहना कठिन है। क (४) नाव्यशास्त्र के व्याख्याकार-समय-समय पर नाट्यशास्त्र की अनेक व्याख्याएँ की गई, जिनमें आज किन्हीं के केवल नाम या संकेत ही मिलते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि नाट्यशास्त्र पर कोई वार्तिक था, जिसके कर्त्ता श्रीहर्ष या हर्ष थे। उनका वार्तिककृत या श्रीहर्ष के नाम से अनेक बार उल्लेख मिलता है (HSP. पृ० ५६)। भावप्रकाशन (पृ० २३८) में सुबन्धु का भी नाट्य-विषय के आचार्य के रूप में उल्लेख है (सुबन्धुर्नाटकस्यापि लक्षएं प्राह पञरवधा)। नान्यपति या नान्यदेव को भरत-भाष्य के कर्त्ता के रूप में स्मरण किया जाता है। शाङ्गदेव के सङ्गीतरत्नाकर में नाट्यशास्त्र के व्याख्याकारों में लोल्लट, उद्भट, शंकुक, अभिनवगुप्त और कीतिघर का उल्लेख है। अभिनवगुप्त ने भट्टयन्त्र तथा भट्टनायक का भी उल्लेख किया है। म० मो० घोष के अनुसार अभिनवगुप्त ने भट्ट उद्भट के मत को तीन बार, भट्ट लोल्लट को ग्यारह बार और शंकुरु को पन्द्रह बार उद्धुत किया है। उद्भट के मत की

Page 18

भूमिका ७

भट्टलोल्लट ने आलोचना की है अतः उनका समय सप्तम-अष्टम श ताब्दा होगा, क्योंकि भट्टलोल्लट का समय अष्टम शती माना जाता है। शंकुक का समय नवम शताब्दी का प्रारम्भ माना जाता है। भट्टनायक का अभिनव भारती में कई बार (म० मो० घोष के अनुसार ६ बार) उल्लेख किया गया है, विशेष रूप से रस के प्रसङ्ग में। इनका समय नवम-दशम शताब्दी माना जाता है। इनका 'हृदयदर्पण' नामक ग्रन्थ था जो उपलब्ध नहीं है। परवर्ती ग्रन्थों के उल्लेखों से यह प्रतीत होता है कि नाठ्यशास्त्र के अन्य भी टोकाकार हुए होंगे। भाज तो अभिनवगुप्त की अअभिनव-भारती, नामक टीका ही उपलब्ध है। इसे 'नाट्यवेदविवृति' भी कहा जाता है। इसका समय दशम शताब्दी का अन्तिम तथा एकादश शताब्दी का प्रारम्भिक काल माना जाता है। (मि० HSP पृ० ४७ तथा आगे; डा० रघुवंश ना० शा० भू०, पृ० XVII)। अभिनव भारती में नाट्यशास्त्र के अन्य सभी विषयों के साथ-साथ रूपक एवं नाट्य सम्बन्धी मन्तव्यों को भी विशद विवेचन है। भारतीय काव्यशास्त्र एवं नाट्यशास्त्र के अध्ययन में अभिनव भारती का अत्यन्त महत्त्वपूर्ण स्थान है। (५) नाटयशास्त्र के आधार पर लिखे गये स्वतन्त्र ग्रन्थः-भरत के नाट्य- शास्त्र की जटिल एवं विस्तृत सामग्री के सरल-संक्षिप्त विवेचन के लिये कुछ स्वतन्त्र ग्रन्थों की रचना भी की गई। धनञ्जय का दशरूपक उनमें से ही अन्यतम है, जिसका विशद विवेचन आगे किया जा रहा है। यहां इस प्रकार के अन्य ग्रन्थों का संक्षिप्त परिचय देना आवश्यक प्रतीत होता है। नन्दिकेश्वर का अ्रभिनयवर्पण-संगीतरत्नाकर (१.४६) में मतङ्ग के साथ नन्दिकेश्वर के मत का भी उल्लेख किया गया है। इसी प्रकार नन्दिमत या नन्दि- केश्वर के अन्य भी उल्लेख मिलते हैं (HSP., पृ० ५८, ६१)। नन्दिकेश्वर के समय आदि के विषय में विवाद है। रामकृष्ण कवि के अनुसार नन्दीश्वरसंहिता के लेखक और अभिनयदर्पगा के कर्त्ता नन्दिकेश्वर एक ही व्यक्ति हैं। नन्दिकेश्वर को संगीत के विषय में आचार्य मतङ्ग ने उद्धृत किया है। मतङ्ग का समय चतुर्थ शताब्दी के लगभग है। इस प्रकार नन्दिकेश्वर का समय तृतीय शताब्दी के लगभग हो सकता है। दूसरे विद्वान् नन्दीश्वरसंहिता के कर्त्ता को अभिनयदर्पण के कर्त्ता नन्दिकेश्वर से भिन्न मानते हैं। म० मो० घोष ने अभिनयदर्पण के समय की परीक्षा करते हुए युक्ति तथा प्रमाणों के आधार पर यह निर्धारित किया है कि अभिनय- द्पण १३ वीं शती के आरम्भ में विद्यमान था, यह तो निश्चित है, किन्तु ५ वीं शती से पूर्व इसकी विद्यमानता में सन्देह है। (अभि० द० इन्ट्रोडक्शन) ला डा० मनमोहन घोष ने अभिनयदर्पण (प्रथम संस्करण १६३४, द्वितीय संस्करण १६५७, प्रकाशक के० एल० मुखोपाध्याय (कलकत्ता) का सम्पादन किया है। कुछ समय पूर्व (१९५७) नन्दिकेश्वर का एक श्ररव्य ग्रन्थ 'भरतार्णव' भी अंग्रेजी

Page 19

दशरूपकम्

एवं तामिल के अनुवाद सहित तन्जोर सरस्वती महल सीरीज से प्रकाशित हुआ है जिसमें नर्तन (नृत्य) का विवेचन है। (HSP. पृ० ५८) अभिनयदर्पण में कुल ३८४ इलोक हैं। ग्रन्थ का विभाजन अध्यायों आदि में नहीं किया गया। आरम्भ में शिव को नमस्कार करके नाट्य की उत्पत्ति का वर्णन है फिर नाट्य-प्रशंसा की गई है। तदनन्तर ना्य, नृत्य, नृत्त, सभा, पात्र आदि का लक्षण करके पूर्वरङ्ग का संक्षिप्त निरूपण किया गया है। फिर आङ्िक अभिनय का विशद विवेचन है। यही अभिनयदर्पण का मुख्य विषय है। इस ग्रन्थ का प्रतिपाद्य विषय ना० शा० के अष्टम तथा नवम अध्याय के समान है। यह निश्चित रूप से कहना कठिन है कि नाट्यशास्त्र के इस विवेचन पर अभिनयदर्पण का प्रभाव है अथवा अभिनयदर्पण का विवेचन नाट्यशास्त्र से प्रभावित है (विशेष द्र० अभि० द० इन्ट्रोडकशन)। क fi2 (ii) सागरनन्दी का नाटकलक्षणरत्नकोश-इसका समय क्या है? यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता। सम्भवतः इसका समय धनञ्जय के आस-पास ही है। इस ग्रन्थ में दशरूपक के समान ही नाटयसम्बन्धी विवेचन है, कहीं-कहीं अभिनय-सम्बन्धी चर्चा भी है। अनेक स्थलों पर नाटयशास्त्र को सामग्री को ज्यों का त्यों प्रस्तुत कर दिया गया है। इस ग्रन्थ का विशेष महत्त्व यह है कि इसमें हर्षवार्तिक, मातृगुप्त, गर्ग, अश्मकुट्ट, नखकुट्ट तथा बादरि नामक नाटयाचार्यों का उल्लेख किया गया है (म०मो० घोष नाटयशास्त्र का अनुवाद, भू० पृ० LXV III) मि०, रघुवंश, ना० शा० भू० पृ० XV)। आचार्य विश्वेश्वर का अनुमान है कि रामचन्द्र गुशचन्द्र के नाटयदर्पण में नाटकलक्षण रत्नकोश के कुछ मतों की ओर संकेत किया गया है। नाटकलक्षण रत्नकोश को सर्वप्रथम सिलवॉ लेवी ने (१६२२) प्रकाशित कराया था। (iii) रामचन्द्र-गुणचन्द्र का नाट्यदर्पण-रामचन्द्र गुणचन्द्र दोनों हेमचन्द्र के शिष्य माने जाते हैं। इनका समय १३वीं शताब्दी है। नाटयदर्पण में मुख्यतः नाटयशास्त्र के १८ वें अध्याय के आधार पर रूपकों का वर्णन किया गया है। यह भी कहा जाता है कि धनञ्जय के दशरूपक की प्रतिद्वन्द्विता में यह ग्रन्थ लिखा गया है। यह ग्रन्थ कारिका तथा वृत्ति के रूप में है। समस्त ग्रन्थ चार विवेकों में विभक्त किया गया है। इसमें नाटयसम्बन्धी विषयों का विशद वर्णन है। नाटयशास्त्र के साथ-साथ अभिनव भारती का भी पूरा उपयोग किया गया है। नाटय-विषय के अन्य लेखकों के मतों की आलोचना भी की गई है। विशेषकर दशरूपककार के मतों की अनेक स्थलों पर आलोचना की गई है। आचार्य विश्वेश्वर के अनुसार यहाँ १३ बार अन्ये' केचित्' आदि शब्दों से धनञ्जय के मतों का उल्लेख किया गया है। 'इनमें से दो स्थानों पर तो उनके मत की आलोचना करते हुए उन्हें 'न मुनिसमया- ध्यवसायितः'और 'वृद्धसम्प्रदायबन्ध्यः' अर्थात् भरत मुनि के अभिप्राय को न समभने वाला' कहा है (ना० द० भूमिका पृ० २१)। यत्र-तत्र भरत मुनि के मतों का भी परिष्कार किया गया है, उदाहरणार्थ भारती वृत्ति के विवेचन में उनका मत भरत

Page 20

तुमिका से भिन्न है। संक्षेप में संस्कृत नाटयशास्त्र को उनकी विशेष देन इस प्रकार हैं :- (क) नाटिका तथा प्रकरणिका को जोड़कर १२ रूपक मानना। (ख) कैशिकी आदि वृत्तियों के आधार पर रूपकों का वर्गीकरण। (ग) रसों का सुखात्मक तथा दुःखा- त्मक दो वर्गों में विभाजन, शृङ्गार, हास्य, वीर, अद्भुत और शान्त सुखात्मक हैं; किन्तु करुा, रौद्र, बीभत्स और भयानक दुःखात्मक हैं। (घ) नौ रसों के अतिरिक्त स्नेह रस, व्यसन रस आदि की कल्पना। (ङ) नाट्य-सम्बन्धी लक्षणों में नवीन दृष्टि; जैसे उनका 'अङ्क' का लक्षण भरत तथा धनञ्जय आदि से अधिक परिष्कृत है। (च) 'देवीचन्द्रगुप्त' इत्यादि के उद्धरण ऐतिहासिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण हैं। वस्तुतः रामचन्द्र गुणचन्द्र की संस्कृत नाट्यशास्त्र को अपूर्व देन हैं। उन्होंने अनेक अलभ्य रूपकों के उद्धरण दिये हैं। नाट्य-सम्बन्घी विषय का नवीन ढंग से चिन्तन किया है। विरक्ति-प्रधान जैन समाज में शृङ्गार-प्रधान नाट्य साहित्य का आदर बढ़ाया है। पूर्वाचार्यों द्वारा निर्णीत लक्षणों की आलोचना तथा उनमें संशोधन करके नाट्यशास्त्र में स्वतन्त्र विचार का मार्ग प्रशस्त किया है (मि० ना० द० भूमिका)। सम्भवतः इसीलिये वे गर्व के साथ अपनी रचना को सर्वथा मौलिक मानते हैं। महाकविनिबद्धानि दष्ट्रा रूपाणि भूरिशः । स्वयं च कृत्वा, स्वोपज्ञं नाट्यलक्ष्म प्रचक्ष्महे । (१'२) (IV) शारदातनय का भावप्रकाशन-पी० वी० काणे (पृ० ४२७) के अनुसार इसका समय ११७५ तथा १२५० के मध्य है। यह अलङ्कार शास्त्र और नाट्यशास्त्र का महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ है। इसमें दशरूपक की अपेक्षा अधिक विस्तार से नाटय सम्बन्धी विषयों का निरूपणा किया गया है। शारदातनय ने अपने पूर्ववर्ती आचार्यों का आधार लिया है और अपनी मौलिक दृष्टि भी रक्खी है। यहाँ भरत के अतिरिक्त कोहल, मातृगुप्त, हर्ष, सुबन्धु आदि के मतों का भी उल्लेख किया गया है। साथ ही ध्वनि- कार, रुद्रट, धनञ्जय-धनिक, अभिनवगुप्त, भोज और मम्मट आादि के मत भी दिये गये हैं। यहां दशरूपक कारिका तथा अवलोक टीका के अनेक उद्धरण दिये गये हैं कहीं कहीं उन्हें स्पष्ट करने का भी प्रयास परिलक्षित होता है। एक स्थल पर सदाशिव का नामोल्लेख करके धनञ्जय की कारिका उद्धृत की गई है (पृ० १५२), जो चिन्तनीय है। भावप्रकाशन में नाट्य की रचना, नायक नायिका तथा रसों का ही विशेष रूप से विवेचन किया गया है। अभिनय आदि का भी संक्षिप्त वर्णन है। यहाँ रूपकों तथा उपरूपकों का विस्तार पूर्वक वर्णन है। यत्र तत्र दार्शनिक विषयों की झलक भी दृष्टिगोचर होती है (जैसे सप्तम अधिकार पृ० १८१ ... )। भारत के विविध प्रदेशों का भी वर्णन किया गया है। यह एक विशाल ग्रन्थ है जिसका

Page 21

१० दशरूपकम्

दस अधिकारों(अध्यायों)में विभाजन किया गया है। इन अधिकारों में क्रमशः निम्न विषयों का निरूपण है :- (१)भावनिर्णय(२)रस-स्वरूप, रस का आश्रय, संक्षिप्त रस- प्रक्रिया(३) रस के प्रकार तथा रसों का स्वरूप। (४) शृङ्गार के आलम्बन नायक- नायिका का स्वरूप निर्णय। (५)नायिका की अवस्थाएँ, नायिकाओं के अवान्तर भेद आदि। (६) शब्द तथा अर्थ का सम्बन्ध, शब्द-वृत्तियों के भेद, वाच्य आदि अर्थ का स्वरूप, संकेतित अर्थ के भेद, दशरूपक की रस-प्रक्रिया (पृ० १५२-१५४) इत्यादि। (७)नाट्य का लक्षण, नाट्य, नृत्य तथा नृत्त का भेद, रङ्ग-पूर्वरङ्ग तथा सङ्गीत का संक्षिप्त परिचय, कथावस्तु, वस्तु-विभाजन आदि। (८) रूपकों के प्रकार, उनके लक्षणा तथा उदाहरणा आदि (दशरूपकलक्षणा)। (६) बीस उपरूपकों का वगंन, पात्रों की भाषा-सम्बोधन के प्रकार तथा कतिपय काव्य-परम्पराओं (कवि- समयों) का निर्देश। (१०) नाटक की उत्पत्ति तथा भरत के नाट्यशास्त्र की रचना का संक्षिप्त निरूपणा, अभिनय की संक्षिप्त प्रक्रिया, नृत्त के मार्ग तथा देशी भेदों का प्रयोग, विविध प्रदेशों के आकार वेष आदि का निरूपण। (विशेष द्र० भावप्रकाशन Preface) (V) शिङ्गभूपाल की नाटकपरिभाषा-इसका समय १३३० ई० के लगभग है (HSP.पृ० ४२३)। शिङ्गभूपाल के रसाणंव-सुधाकर तथा नाटक-परिभाषा दो ग्रन्थ हैं। नाटकपरिभाषा में केवल नाट्य विषय का वणंन किया गया है तथा रसा- रवसुधाकर में काव्य के अन्य विषयों के साथ-साथ नाट्य का भी संक्षिप्त वर्णन है। (VI) रूपगोस्वामी की नाटकचन्द्रिका- इसका समय १६ वीं शताब्दी है। रूपगोस्वामी चतन्य महाप्रभु के अनुयायी थे। उन्होंने 'भक्तिरसामृतसिन्धु' तथा 'उज्ज्वलनीलमणि' नामक दो काव्यशास्त्र सम्बन्धी ग्रन्थों की रचना की है और नाटक चन्द्रिका नामक नाट्य सम्बन्धी ग्रन्थ की भी। इस ग्रन्थ के आरम्भ में रूपगोस्वामी ने बतलाया है कि उन्होंने भरत तथा 'रससुधाकर' का अनुसरण किया है और साहि- त्यदर्पण के मतों का निराकरण किया है; क्योंकि उसमें भरत के मन्तव्यों के विपरीत मत हैं। इनमें नाटय सम्बन्धी प्रायः सभी विषयों का विवेचन किया गया है, जैसे नायक-नायिका, नान्दी, सन्धि, पताका, विष्कम्भक, भाषा इत्यादि। यहाँ भारती आदि वृत्तियों और रसों के साथ उनके सम्बन्ध का भी विवेचन है। अधिकांश उदाहरण वंष्णव ग्रन्थों से लिये गये हैं (HSP. पृ० ३१३) । इसमें साहित्यदपण से भी बहुत सी सामग्री ली गई है और उसकी आलोचना भी की गई है। परन्तु, जैसा कि कीथ का विचार है, नाटकचन्द्रिका साहित्यदर्पण की अपेक्षा कुछ सुधरी हुई या उत्कृष्ट नहीं है (मि०, सं० नाटक पृ० ३१४) । (VII) सुन्दरमिश्र का नाट्यप्रदीप- सुन्दरमिश्र का समय १७ वीं शताब्दी का आरम्भ है। नाट्यप्रदीप का रचना काल १६१३ ई० है (सं० नाटक पृ० ३१४

Page 22

भूमिका ११

तथा HSP. पृ० ४२३)। यह ग्रन्थ दशरूपक तथा साहित्यदपण के आधार पर लिखा गया है। उपयुक्त नाट्य-सम्बन्धी ग्रन्थों के अतिरिक्त त्र्यम्बक के नाटकदीप, रुय्यक की नाटकमीमांसा, पुण्डरीक का नाटकलक्षण, त्रिलोचनादित्य का नाट्यालोचन तथा नन्दिकेश्वर का नाट्यार्णव इत्यादि ग्रन्थों के भी उल्लेख मिलते हैं (HS P., पृ० ४२३.४२४) । (६) काव्यशास्त्र के ग्रन्थ, जिनमें नाट्य सम्बन्धी विवेधन है-जिन ग्रन्थों में काव्यशास्त्र के सर्वाङ्गीणा विवेचन के साथ-साथ नाड्य-विषयों का भी विवेचन किया गया है उनमें भोजराज के ग्रन्थ प्राचीन कहे जा सकते हैं। (i) भोजराज का शृङ्गारप्रकाश तथा सरस्वतीकण्ठाभरण-भोजराज का समय ११ वीं शताब्दी है। शृङ्गारप्रकाश काव्यशास्त्र का एक सुविशाल ग्रन्थ है। इसमें ३६ प्रकाश हैं। इनमें ११ वें प्रकाश से अन्त तक रस तथा भावों का विस्तार पूर्वक वर्णान किया है। इसी बीच १२ वें प्रकाश में रूपकों का निरूपण है तथा २१ वें में नायक-नायिका का। डा० राधवन् ने शृङ्गारप्रकाश का विशव अध्ययन प्रस्तुत किया है। सरस्वतीकण्ठाभरण में ५ परिच्छेव हैं। इसके पञ्चम परिच्छेद में रस, भाव, नायक-नायिका और उनके भेद तथा विशेषताओं, मुख आदि सन्धियों तथा भारती आदि चार वृत्तियों का निरूपण किया गया है। सरस्वतीकण्ठाभरण में ऐसे अनेक पद्य उद्धृत किये गये हैं जो धनिक की वृत्ति में हैं। यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता कि वहाँ वे सभी पद्य धनिक की वृत्ति से ही लिये गये हैं। किन्तु उनमें एक पद्य ऐसा भी है (लक्ष्मीपयोधरो० दश० ४. ७२) जिसे धनिक ने अपना कहकर (ममव) उद्धूत किया था। इससे प्रतीत होता है कि सरस्वतीकण्ठाभरण का लेखक किसी अंश में दशरूपक का ऋणी है। (ii) हेमचन्द्रसूरि का काव्यानुशासन-हेमचन्द्र विविध विषयों के अनेक ग्रन्थों के कर्त्ता के रूप में प्रसिद्ध हैं। उनका समय १२ वीं शताब्दी है। काव्यानु- शासन का रचना-काल ११३६-११४३ ई० माना जाता है। यह ग्रन्थ संकलन मात्र है। ग्रन्थ के तीन अंश हैं-सूत्र, वृत्ति तथा उदाहरण। समस्त ग्रग्थ आाठ अध्यायों में विभक्त है, जिनमें काव्य के सभी भ्रङ्गों का वर्णन किया गया है। नाट्य सम्बन्धी विवेचन केवल तीन अध्यायों में है। द्वितीय भध्याय में रस, स्थायी भाव, व्यभिचारी भाव तथा सात्विक भावों का विवेधन है। सत्म में नायक-नायिका का तथा अष्टम में दृश्य (प्रेक्ष्य) और श्रव्य काव्य और उनके भेद एवं लक्षण आदि का निरूपण किया गया है। काव्यानुशासन में अ्रनेक आचार्यों तथा ग्रन्थों का उल्लेख किया गया है किन्तु दशरूपक अथवा धनञजय या धनिक का कोई उल्लेख नहीं। (iii) विद्यानाथ का प्रतापरुद्रयशोभूषण-इसका समय चतु्दश शताब्दी माना जाता है। ग्रन्थ के तीन अंश हैं कारिका, वृत्ति और उदाहरख। उदाहुरणों

Page 23

१२ दशरूपकम्

की लेखक ने स्वयं रचना की है, जिनमें तैलंगाना के राजा प्रतापरुद्रदेव की प्रशंसा की गई है। इस ग्रन्थ में नो प्रकरण हैं, जिनमें से प्रथम प्रकरण में नायक, तृतीय में नाटक तथा चतुर्थ में रस का विवेचन है। इस भाग में दशरूपक का पर्याप्त प्रभाव परिलक्षित होता है। लगभग १० उद्धरण दशरूपक से लिये गये हैं (Haas Intro. P. xxviii)। इसके अतिरिक्त दशरूपक के मन्तव्यों की छाया भी कतिपय स्थलों पर दृष्टिगोचर होती है। (iv) विश्नाथ का साहित्यदर्पण-विश्वनाथ का समय चतुर्दश शताब्दी है। १३००-१३८४ ई० के मध्य साहित्यदर्पण की रचना की गई होगो। अन्तः साक्ष्य तथा बाह्य साक्ष्य के आधार पर भी इसी समय की पुष्टि होती है (HSP पृ० २६६-३०२)। साहित्यदपण में काव्यशास्त्र के सभी विषयों का सरल सुबोध भाषा शैली में विवेचन किया गया है। यह काव्यप्रकाश की शैली पर लिखा गया ग्रन्थ है। इसमें काव्यप्रकाश की अपेक्षा नायक-नायिका वर्णन तथा नाट्य-विषय का विवेचन अधिक है। इसमें दस परिच्छेद हैं। नाट्य-विषय की दृष्टि से तृतीय तथा षष्ठ परिच्छेद का ही महत्त्व है। तृतीय परिच्छेद में नायक-नायिका तथा रस का विवेचन है तथा षष्ठ परिच्छेद में रूपक, उपरूपक एवं उनके विविध अङ्गों का विस्तारपूर्वक निरूपण किया गया है। इसके नाट्य सम्बन्धी विवेचन में भरत के नाट्यशास्त्र की सामग्री का उपयोग करते हुए दशरूपक और इसकी टीका का पर्याप्त आधार लिया गया है। कहीं कहीं दशरूपक की पदावली को ज्यों का त्यों और कहीं कुछ परिवर्तन के साथ ले लिया गया है। धनिक के नाम से दशरूपक को उद्धृत भी किया गया है (६.६४) । करुणा विप्रलम्भ रस के विवेचन में (३.२०६) 'अभियुक्ताः' (=विद्वान्) शब्द का प्रयोग करके दशरूपक के मत का उल्लेख किया गया है इससे प्रतीत होता है कि दशरूपककार के प्रति विश्वनाथ का समादर भाव था। यह दूसरी बात है कि विश्वनाथ ने यत्र-तत्र दशरूपक के मन्तव्यों की आ्लोचना भी की है (उदाहर- रार्थ दश० २.४३ की सा० द० ३.४३ में आलोचना की गई है)। इसके अतिरिक्त साहित्यदर्पण में दशरूपक की अपेक्षा कुछ अधिक नाट्य विषयों का निरूपण किया गया है; जैसे वहां नाट्यलक्षण और नाट्यालद्दार का विवेचन किया गया है, जिसे दशरूपक में छोड़ दिया गया है। इसी प्रकार कतिपय अन्य ग्रन्थों में भी काव्य के विविध अङ्गों का विवेचन करते हुए नाट्य विषय का निरूपण किया गया है। प्रायः सर्वत्र ही नाट्यदिषयक विवेचन का मुख्य आधार भरत का नाट्यशास्त्र रहा है। अन्य नाटय ग्रन्थों का भी आश्रय लिया गया है, जिनमें से अधिकांश अप्राप्य हैं। कहीं कहीं नवीन मार्ग का भी ग्रहण किया गया है। फलतः नाट्य सम्बन्धी परवर्ती ग्रन्थों में पर्याप्त मात्रा में मतभेद मिलता है। अपने पूर्ववर्ती लेखकों से सामग्री ग्रहण करना यत्र तत्र उनकी

Page 24

भूमिका १३

आलोचना करना तथा नवीन स्थापना करना-इसी मार्ग से संस्कृत नाट्यशास्त्र का विकास होता रहा है। इस विकास-परम्परा में धनञ्जय के दशरूपक का अ्त्यन्त महत्त्वपूर्ण स्थान रहा है। २. धनञ्जय और उनका दशरूपक (१) धनञ्जय का समय-धनञ्जय का समय निश्चित सा ही है। उन्होंने ग्रन्थ के अन्त में स्वयं ही लिखा है कि उन्होंने राजा मुञ्ज की सभा में वैदग्व्य प्राप्त किया था, मुञ्जराज की पण्डित परिषद् में उनकी धाक थी। इतिहासकारों ने राजा मुञ्ज का समय निश्चित करने का प्रयास किया है। यह भी माना गया है कि 'गौडवाहो' के लेखक मुञ्ज से ये मुञ्जराज भिन्न हैं। 'गौडवाहो' के लेखक मुञ्ज तो महाराज यशोवर्मन् की सभा के पण्डित थे। उनका समय अष्टम शताब्दी माना जाता है (द्र० Haas Introduction to Dasrupa, p xxii) । दूसरी और मुञ्जराज का समय दशम शताब्दी माना जाता है। एपिग्राफिका इण्डिका (१'२२६) से विदित होता है कि मुञ्जराज के लिए विविध अभिलेखों में अनेक नामों तथा उपाधियों का प्रयोग किया गया है; जैसे वाक्पति, वाक्पतिराज, उत्पलराज, अमोघवर्ष, पृथिवीवल्लभ, इत्यादि। धनिक ने भी 'प्रसायकुपिताम्' इत्यादि पद्य को एक स्थल पर (४५८) वाक्पतिराज के नाम से तथा दूसरे स्थल पर (४'६०) मुञ्ज के नाम से उद्धूत किया है। बाद में परमार राजा अजुनदेव (१३ वीं शती) ने भी अमरुशतक की टीका में एक पद्य उद्धृत करते हुए यह स्पष्ट ही लिखा है कि यह पद्य हमारे पूर्वज महाराज मुञ्ज जिनका दूसरा नाम वाक्पतिराज था, का रचा हुआ है (अस्मत्पूर्वज- स्य वाक्पतिराजापरनाम्नो मुञ्जदेवस्य)। वाक्पतिराज मुञ्जदेव मालवा के परमारवंशी राजा थे। बुहलर के अनुसार वे अपने पिता (सीयक) के बाद ६७४ ई० में सिंहासनारुढ हुए और ६६पूतक राज्य करते रहे। ६६५ में चालुक्य राजा तैलप द्वितीय ने उन्हें पराजित कर दिया और उनकी हत्या कर दी (कील्होर्न एपिग्राफिका इण्डिका २. २१४-२१५)।' १. इस समय की पुष्टि निम्न आधार पर भी होती है-(१) इण्डियन एन्टीक्वेरी भाग ६ पृ० ५१.५२; वाक्पतिराज का एक अभिलेख ६७४ ई० (सं० १०३१) का है। इसमें लिखा है कि अहिच्छत्र देश से आये धनिक पण्डित के पुत्र वसन्ताचार्य को वाक्पतिराज ने भूमि दान में दी थी। (ii) इण्डियन एन्टीक्वेरी भाग १४, पृ० १५६-१६१ के अनुसार वाक्पतिराज ने सन् ६७६ ई० (सं १०३६) में उज्जयिनी में भट्टश्वरी को एक ग्राम पुरस्कार में दिया था। (iii) इण्डियन एन्टीक्वेरी भाग ३६ पृ० १७० के अनुसार तैलप द्वितीय ने मुञ्ज को हराया था। तैलप द्वितीय का मृत्युकाल शक सम्वत् ६१६ (६६७-६८ ई०) है (iv) अमितगति नामक विद्वान् ने 'सुभ।षितरत्नसन्दोह' नामक ग्रन्थ की सम्वत् १०५० (६६३-६४) में मुञ्ज के शासनकाल में रचना की थी। इस प्रकार मुञ्ज ६६३ तथा ६६७ के बीच मारा गया (मि०, HSP. पृ० २४६) ।

Page 25

१४ देशरूपकम्

वाक्पतिराज मुञ्ज विख्यात योद्धा थे। वे अच्छे कवि थे और कवियों का आदर भी करते थे। यद्यपि आज उनका कोई ग्रन्थ उपलब्ध नहीं है तथापि अ्नेक प्रमागों के द्वारा उनका कवि होना सिद्ध होता है। जैसा कि अभी ऊपर कहा गया है, धनिक ने उनका एक पद्य दो बार दो नामों से उद्धृत किया है। क्षेमेन्द्र (१०३७-१०६६) ने तीन पद्य उत्पलराज के नाम से उद्धृत किये हैं। धनञजय और धनिक के अतिरिक्त उनकी सभा को अनेक विद्वान् सुशोभित करते थे। तिलकमञ्जरी के लेखक धनपाल उनकी सभा के पण्डित थे। प्रसिद्ध कोषकार हलायुध ने भी अपना अन्तिम समय उनकी सभा में बिताया था। नवसाहसाङ्क चरित के रचयिता पद्मगुप्त ने भी उनका अनुग्रह प्राप्त किया था। फलतः अनेक विद्वानों ने उनकी काव्य-रुचि तथा गुणग्राहिता का वर्णन किया है। पद्मगुप्त ने उन्हें सरस्वती कल्पलता का कन्द, कविबान्धव (१. ७,८) तथा कविमित्र (११.६३) बतलाया है । हलायुध ने पिङ्गल की टीका में उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा की है। बल्लाल के भोजप्रबन्ध तथा मेरुतुङ्ग की प्रबन्धचिन्ता- मणि से भी उनके स्वयं कवि होने तथा कवियों को प्रोतसाहन देने के प्रमाण मिलते हैं।

विद्या तथा विद्वानों के प्रति मुञ्ज का यह अनुराग इस वंश में बाद में भी चलता रहा। उनके भतीजे भोजराज शृङ्गार-प्रकाश तथा सरस्वतीकण्ठाभरण आदि अ्रनेक ग्रन्थों के कर्त्ता के रूप में विख्यात हैं। जैसा कि ऊपर उल्लेख किया गया है इस वंश के एक राजा अरजुनदेव ने भमरुशतक पर टीका लिखी है। ऐसे विद्यानुरामी महाराज सुञ्ज के राज्यकाल में ही घनञ्जय ने दशरूपक की रचना की। इस प्रकार यह स्पष्ट ही है कि दशरूपक का रचना काल ६७४ मौर ६६४ के मध्य रहा होगा।

अन्य प्रमाणों के आधार पर भी इसी समय की पुष्टि होती है। दशरूपाव- लोक टीका में रुद्रट की एक कारिका ('रसनाद्रसत्वम्' काव्यालट्वार १२.४ तथा दश• ४.३५) उद्धूत की गई है तथा दश० की कारिका (४.३६) में भी रुद्रट के मन्तव्य की ओर संकेत है। इसी प्रकार ध्वन्यालोक की कारिका भी धनिक ने उद्- धुत की है। पी० वी० काणे के अनुसार रुद्रट का समय द५० ई० से पूर्व है तथा ध्वन्यालोक का समय र६० तथा ८६०ई० के मध्य है। इस प्रकार दशरूपक (कारिका तथा वृत्ति) की रचना का समय इनके पश्चात् ही हो सकता है। दूसरी ओर दश- रूपक में अभिनवमुप्त के मतों का कोई उल्लेख नहीं मिलता, न ही अभिनवगुप्त के ग्रन्थों में दशरूपक के मन्तव्यों का कोई संकेत हैं। इससे विदित होता है कि अभिनव- मुप्त और धनञजय के समय में बहुत अन्तर नहीं होगा (मि० HSP. पृ०- २४७-२४८) ।

Page 26

भूमिका १५

इस प्रकार दशरूपक का रचना-काल प्रायः निश्चित सा ही है। यह भी सुनिश्चित है कि धनज्जय के पिता का नाम विष्णु था, जैसा कि उन्होंने स्वयं ही दशरूपक के अन्तिम श्लोक में उल्लेख किया है। इसके अतिरिक्त धनञ्जय की जीवनी आदि के विषय में कोई तथ्य उपलब्ध नहीं होता, न ही यह विदित होता है कि दशरूपक के अतिरिक्त धनञ्जय ने किसी और ग्रन्थ की भी रचना की थी या नहीं। (२) वशरूपक का आरधार-दशरूपक नाट्यशास्त्र का एक महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ है। (नाट्य=रूप=रूपक) इस ग्रन्थ में दश मुख्य रूपों या रूपकों का वर्णन है। अ्रतः यह दशरूपक कहलाता है। हॉस (Haas) का सुझाव है कि इसका नाम दश- रूप रहा होगा, क्योंकि धनञ्जय ने अन्तिम श्लोक में दशरूप नाम ही दिया है (दशरूपम् एसत), धनिक ने भी ठीका का नाम दशरूपावलोक ही रकखा है (Intro- duction, p XXVII) । किन्तु आज यह ग्रन्थ 'दशरूपक'नाम से प्रसिद्ध है। नाट्य- शास्त्र में अत्यन्त विस्तार से वर्णित नाट्य सम्बन्धी सामग्री को संक्षेप में किन्तु विशद रूप से प्रस्तुत करना ही धनञ्जय का लक्ष्य है। नाट्यशास्त्र में नाट्यविषयक मन्तव्य इघर-उधर बिखरे हैं, विविध विषयों के विवेचन में यत्र-तत् उलके हैं तथा अत्यधिक विस्तार से प्रस्तुत किये गये हैं। इसलिये भले ही विद्वज्जन नाट्यशास्त्र के द्वारा पाठ्यविद्या का ज्ञान प्राप्त कर सकें, मल्पबुद्धि जनों के लिये तो वह दुरूह ही है। नाट्यविद्या को बोधगम्य बनाने के लिये ही धनञ्जय ने माट्यशास्त्र के मन्तव्यों को पाप: माठ्यशास्त्र के शब्दों में ही संक्षेप में ग्रथित किया है-वस्यार्थंस्तत्पवैस्तेन संक्षिप्य त्रियतेऽञ्जसा' (दश० १५)। नाट्यशास्त्र का आधार लेते हुए भी धनञ्जय ने यथासम्भव नवीन उद्भावनाऐ की है, जसा कि उन्होंने स्वयं ही बतलाया है- 'वाट्यानो किन्तु किञचत् प्रगुणरचनया लक्षण संक्षिपामि' (दश० १४)। वस्तुतः धनञजय वे उस समय उपलब्ध समस्त नाट्य सम्बन्धी सामग्री का भली भाति उपयोध किया है, पूववर्ती भचार्यों के मन्तव्यों का परिष्कार किया है औोर यथावसर आलोचना भी की है। उदाहरसाथं दशरूपक में उद्भट के वृत्ि- विषयक मत को (३.६१) तथा रुद्रट (४.३६) एवं ध्वनिकार (४.३७) के रसविषयक मत की पलोचना की गई है। मनेक स्थलों पर नाट्यशास्त में प्रयुक्त नाम, लक्षण तथा विभाजन को परिष्कृत किया गया है। भरत ने चार प्रकार की नायिका (दिव्या, नूपपत्नी, कुलस्त्री तथा गणिका) का निरूपण किया था, किन्तु धनञ्जय ने नायिका के तीन प्रकार बतलाये हैं-स्वकीया, अन्या (परकीया) और साधारणी। इसी प्रकार भरत ने शृङ्गार रस के दो भेद किये थे-सम्भोग तथा विप्रलम्भ; किन्तु वनञजय ने अयोग, विप्रयोग तथा सम्भोग नाम से तीन भेद किये हैं। धनञ्जय ने कहीं पारिभाषिक शब्दों के प्रयोग में परिवर्तन किया है (द्र० प्रकाश १ सूत्र ३१,७६ ८०, ६६, १०७, १२०, तथा २ सूत्र ८०, ८६ आदि), कहीं लक्षण में परिष्कार किया है (द्र० प्० १ सूत्र ४१, ४८, ५०, ८५, ६२, १०२) । सम्भवतः इन परि-

Page 27

१६ दशरूपकम्

वर्तनों और संशोधनों में उन नाट्याचार्यों के मन्तव्यों का भी प्रभाव पड़ा होगा जो भरत तथा धनञ्जय के मध्य के युग में रहे होंगे। (३) वशरूपक की शैली-इसकी शैली भरत के नाट्यशास्त्र से नितान्त भिन्न है। नाट्यशास्त्र में कोई बात अनेक वाक्यों में विस्तार से कही गई है, श्लोक पूर्ति के लिये बहुत से शब्दों और वाक्यांशों का प्रयोग किया गया है। इसके विपरीत दशरूपक में गिने चुने शब्दों में नाट्य के मन्तव्यों को कह दिया गया है। इसकी कारिकायें सूत्र रूप में ही तथ्य को प्रकट कर देती हैं। कहीं विवश होकर ही भर्ती के शब्दों या वाक्यांशों का प्रयोग किया गया है। यह अवश्य है कि कहीं कहीं अत्यन्त संक्षेप के कारण अर्थ की स्पष्टता में बाघा पड़ती है। फलतः वृत्ति की सहायता के बिना अनेक लक्षण स्पष्ट नहीं होते। जहाँ कहीं नाट्यशास्त्र के அ ஆவுன विस्तृत विषय को प्रकट करने के लिये केवल एक शब्द का प्रयोग कर दिया है, वहाँ तो नाट्यशास्त्र अथवा शन्य किसी व्याख्या की सहायता से ही अर्थ समझा जा सकता है। पारिभाषिक शब्दों के लक्षण करते समय धनञ्जय ने कहीं कहीं निर्वचन शैली का भी प्रयोग किया है। सम्भवतः नाट्यशास्त्र से प्रभावित होकर ही उन्होंने इस शैली को अपनाया है। उदाहरणार्थ अधिकार: फलस्वाम्यम- धिकारी च तत्प्रभुः' (१.१२) 'विशेषादाभिमुल्येन चरन्तो व्यभिचारिणः (४७)। किसी विषय के भेद-प्रभेद दिखलाकर उनकी व्याख्या करना; यह भारतीय प्रतिपादन शेली की प्रमुख विशेषता है जो दशरूपक में आरम्भ से अ्न्त तक दृष्टिगोचर होती है। नायक-नायिका तथा रस आदि के जो भेद-प्रभेद धनञ्जय को सम्भव प्रतीत हुए हैं, विस्तारपूर्वक बतलाये गये हैं। फिर भी धनञ्जय ने परवर्ती लेखकों की अपेक्षा संयम से काम लिया है। दशर पक पद्यमय रचना है। इस में अधिकतर अनुष्टुभ छन्द (श्लोक) का प्रयोग है। चारों प्रकाशों के अन्तिम पद्यों में तथा अन्यत्र भी १८ बार अन्य छन्दों का प्रयोग किया गया है; जैसे-५ आर्या वृत्त (१.३, ४.१३, ४.३५, ४.७६-७७) +३ स्रग्धरा (१.४, ४.८,४.२८) +३ इन्द्रवज्रा (१६,४.४६-६ चरण,४'८६) +४ वसन्ततिलका (१.६८, ३.७६, ४.७२, ४८५)१ उपजाति (२.७२)२ शादू लविकरीडित (४.७३,४७४)। छन्दों के निर्वाह के लिये भाषा में भी परिवर्तन करना पड़ा हैं। कहीं छोटे शब्दों का तथा कहों बड़े शब्दों का प्रयोग किया गया है, कहीं छोटे-छोटे समास हैं तो कहीं दीर्घ समास भी। समासों की विविधता छन्द-निर्वाह में बहुत सहायक हुई है। कभी कभी छन्द की पूर्ति के लिए 'आख्य' (१.१८) तथा 'अथ' इत्यादि शब्दों का भी प्रयोग करना पड़ा है। धनञ्जय ने 'श्यात्, भवेत् इष्यते, स्मृतः' इत्यादि शब्दों का प्रयोग करके भी भर्ती के शब्दों को बचा दिया है। इसके अतिरिक्त छन्द-निर्वाह

Page 28

भूमिका १७

के लिये (i) कहीं प्रसिद्ध शब्द के अर्थ में कोई अप्रसिद्ध शब्द रख दिया गया है; जैसे सूत्रधार के लिये सूत्रधृत् या सूत्रिन्, निद्रा के स्थान में स्वाप (४.८२) व्याधि के लिये आर्ति (४.७३) (ii) कहीं समस्त पद के लिये केवल पद का; जैसे विरहोत्कण्ठिता के लिये उत्का (४'६८), कहीं केवल पद के लिये समस्त पद का; जैसे शान्त के लिये शम- प्रकर्ष (४.४५) का प्रयोग किया गया है। (iii) कहीं उपसर्ग जोड़ दिया गया है; जैसे हर्ष के स्थान पर प्रहर्ष (४.७२), कहीं रपसर्ग पृथक कर दिया गया है; जैसे आवेग के स्थान पर वेग (४.७४), कहीं उपसर्ग बदल दिया गया है; जैसे अवमर्श के स्थान पर विमर्श (३.६०-६१), (iv) कहीं एक अर्थ के भिन्न भिन्न प्रत्ययों से निष्पन्न शब्दों का प्रयोग किया गया है; जैसे आलस्य के लिये अलसता (४.८), भाषण के लिये भाषा (१५०), अनुमान के लिये अनुमा (१.४०) और (v) कहीं शब्द के अन्त से 'क' को पृथक कर दिया गया है जैसे उद्घात्यक के स्थान पर उद्घात्य (३.१४) जनान्तिक के स्थान पर जनान्त (१.६५) (मि० Haas Intro.) । इसी प्रकार के कुछ अन्य परिवर्तन भी करने पड़े हैं। वस्तुतः पद्य-बद्ध जो शास्त्रीय ग्रन्थ लिखे जाते हैं उनमें इस प्रकार के भाषागत परिवर्तन अनिवार्य ही हो जाया करते हैं। फिर भी कहीं कहीं ऐसा अवश्य प्रतीत होता है कि यदि सावधानी रक्खी जाती तो भाषा को और अधिक सरल बनाया जा सकता था। कुछ दोषों के होते हुए भी अपने अपूर्व गुणों के कारण यह दशरूपक नाट्यविद्या के जिज्ञासुओं के लिये उपादेय बन गया। पठन-पाठन की दृष्टि से ही यह लोक-प्रिय नहीं हुआ प्रत्युत परवर्ती नाट्य-विषयक कृतियों में इसका अनुसर किया गया तथा कहीं-कहीं प्रतिद्वन्द्विता के भाव से इसकी आ्परलोचना भी की गई। जैसा कि ऊपर दिखलाया गया है, भावप्रकाशन, प्रताप-रुद्रयशोभूषण तथा साहित्य- दर्पण के नाटक सम्बन्धी विवेचन पर इस का अत्यधिक प्रभाव परिलक्षित होता है दूसरी और नाट्यदर्पण में इसके लिए प्रतिद्वन्द्विता की भोवना दृष्टिगोचर होती है। (भा० प्र०, ना० द०, प्रता० तथा सा० द० में दशरूपक की अपेक्षा जो विशेष अ्रन्तर हैं उनमें से अधिकांश का टिप्पणी में यथावसर उल्लेख किया गया है)। (४) वशरूपक की टीकाएँ औरर धनिक का दशरूपावलोक-भरत के नाट्यशास्त्र के पश्चात् धनञ्जय का दशरूपक ही भारतीय नाट्यविद्या का प्रसिद्ध ग्रन्थ रहा है। यह अत्यन्त संक्षिप्त है। इसलिये इस पर अनेक टीकाएँ लिखी गई होंगी, ऐसी संभावना है। किन्तु वे सभी टीकाएँ आज उपलब्ध नहीं, न ही उन सभी के कोई संकेत ही मिलते हैं। आज तो नृसिंह भट्ट, देवपाणि, कुरविराम तथा बहुरूपरमिश्र की टीकाएँ हस्तलिपि में मिलती हैं। इनमें बहुरूपमिश्र की टीका बहुत उपादेय तथा प्रमेयबहुल है (बलदेव उपाध्याय भा० सा० शा० पृ० ८३; डा० राघवन्, J. O. R., vol. viii, pp. 321-334) । हॉल (Preface, पृ० ४ नोटस्) ने क्षोणीघर मिश्र की टीका का भी उल्लेख किया है। उपरिलिखित

Page 29

१८ दशरूपकम्

टीकाओं में से नृसिंह की टीका धनिक की अवलोक टीका पर है (Bulletin of London School of O. Studies, vol. IV. p. २८०)- मि०,पी० वी० काणे HSP. पृ० २४७। ऐसा प्रतीत होता है कि ये सभी टीकाएँ अभी तक अप्रकाशित ही पड़ी हैं, सम्भवतः बहुरूप मिश्र की टीका प्रकाशित हो रही है (द्र० HSP. पृ० २४७) । इस समय केवल धनिक की दशरूपावलोक (अवलोक) वृत्ति ही उपलब्ध है, जो अ्नेक बार प्रकाशित हो चुकी है। वस्तुतः आज इस वृत्ति के कारण ही दशरूपक के महत्त्व को समझा जा सकता है। दशरूपक के मन्तव्यों को स्पष्ट करने का कार्य इस वृत्ति ने ही किया है। अतः कारिका और वृत्ति दोनों मिलकर ही दशरूपककार धनञ्जय के उद्दश्य को सिद्ध करती हैं।

(५) धनिक का समय तथा कृतियां आदि-धनिक भी विष्णु के पुत्र थे। अवलोक टीका के अन्त में यह लिखा मिलता है 'इति विष्णु-सूनोर्धनिकस्य कृतौ दशरूपावलोके रसविचारो नाम चतुर्थः प्रकाशः।' इससे विदित होता है कि धनिक विष्णु के पुत्र थे, वे धनञ्जय के अनुज रहे होंगे। किन्तु कुछ उल्लेखों के आधार पर यह प्रकट होता है कि धनन्जय और धनिक दोनों एक ही व्यक्ति के नाम हैं। साहित्यदर्पणकार विश्वनाथ विद्यानाथ, आदि ने दशरूपक की कारिकाओं को धनिक के नाम से उद्धृत किया है :- यदुक्तं धनिकेन 'न चातिरसतो .· ... लक्षरौः' [दश ३.३२-३३ तथा सा० द० ६.६४] सम्भवत : इन विद्वानों की दृष्टि में धनञ्जय तथा धनिक एक ही व्यक्ति थे। इस मत का समर्थन इन युक्तियों से किया जा सकता है :- (i) दशरूपक की कारिकाओं से पृथक वृत्ति में कोई मङ्गलाचरण नहीं किया गया। प्रायः यह देखा जाता है कि यदि वृत्ति, भाष्य या टीका का लेखक कोई भिन्न व्यक्ति होता है तो वह पृथक् मङ्गल किया करता है। (ii) परवर्ती आ्चार्यों ने धनिक की कृति के रूप में दशरूपक के उद्घरण दिये हैं जैसा अभी विश्वनाथ और विद्यानाथ के विषय में कहा गया है। (iii) यह वृत्ति दशरूपक की कारिकाओं का भ्रभिन्न अ्रङ्ग सा प्रतीत होती है, इसके बिना दशरूपक प्धुरा सा है। दूसरी औोर विज्ञानों का विभार है कि धनञ्जय और धनिक दो भिन्न-भिन्न व्यक्ति ही हैं; क्योंकि (i) कारिका तथा वृत्ति में कतिपय स्थलों पर मत-भेद दृष्टिगोचर होता है, उदाहरणार्थ २.२२ में 'सुखार्थ' शब्द के अर्थ में धनिक ने दो सम्भावनाएँ दिखलाई हैं-'अप्रयासावाप्तधनः' या 'सुखप्रयोजनः' किन्तु वहां कोई निर्णाय नहीं किया। इससे विदित होता है कि वृत्तिकार कारिकाकार से भिन्न व्यक्ति है। इसी प्रकार ३.४० में 'त्याज्यम् आवश्यक न च' यहाँ कारिकाकार का अभिप्रेत वह अरथ प्रतीत होता है कि कथावस्तु के विकास के लिये जो आवश्यक हो उसे नहीं छोड़ना चाहिये: किन्तु वृत्ति में इसका अर्थ किया गया है-'आवश्यक तु देवपितृ- कार्माद्यवश्यमेव क्वचित् कूर्यात्'। (२) हस्तलिखित प्रतियों में यह लिखा मिलता है-

Page 30

भूमिका १६

'धनिकस्य कृतौ दशरूपावलोके' तथा दशरूपक की कारिकाओं के अन्त में यह लिखा है-'धनञ्जयेन "" आविष्कृतम् ..... दशरूपमेतत्'। इससे स्पष्ट विदित होता है कि दशरूपक के कर्त्ता धनञजय हैं और दशरूपावलोक नामक वृत्ति के कर्त्ता धनिक हैं। हाँ, धनिक जो वृत्तिकार हैं वे धनञ्जय के तात्पर्य से भली भांति परिचित रहे होंगे तभी तो दुरुह कारिकाओं की भी स्पष्ट व्याख्या कर दी है। सम्भवतः कारिकाओं की रचना में धनिक का भी सहयोग रहा होगा (इस विषय में विशेष द्र0 Dr. De, S. P. Vol. I. pp. 131-134)| धनिक की जीवनी के विषय में हमारी अधिक जानकारी नहीं है, हॉल ने अपनी भूमिका (पृ० ३ नोट्स) में लिखा है कि अवलोक की एक हस्तलिपि के अनुसार धनिक उत्पलराज के यहां एक आफिसर थे। बुहलर (उदयपुर प्रशस्ति E. I. Vol. I. p.227) का कथन है कि धनिक उत्पलराज के 'महासाध्यपाल' थे। (मि०, काणे HSP. पृ० २४४-२४५ टिप्पणी ३) । जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है, उत्पलराज मुं्जराज का ही औपाधिक नाम माना जाता है, जिसका राज्यकाल ६६४ तक रहा। तब क्या इससे पूर्व ही अवलोक वृत्ति भी लिखी जा चुकी होगी ? किन्तु यह सभ्भव नहीं प्रतीत होता। कारण यह है कि धनिक ने पद्मगुप्त के नवसाहसाङ्कचरित का एक पद्य (उदा० १६५) उद्धृत किया है। नवसाहसाङ्ु- चरित की रचना सिन्धुराज के समय में हुई और सिन्धुराज मुञ्जराज के बाद सिंहासन पर बैठे। इसके अतिरिक्त जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है किसी धनिक पण्डित के पुत्र वसन्ताचार्य को मुञ्ज ने भूमि दान में दी थी। यदि लेखपत्र का धनिक पण्डित और अवलोक वृत्ति का कर्त्ता धनिक एक ही व्यक्ति हैं तो इन सब घटनाओं का सामञ्जस्य करने में कठिनाई है। इसलिये यह मानना उचित प्रतीत होता है कि अवलोक टीका सिन्धुराज के राज्यकाल में लिखी गई होगी, इसकी रचना धनिक ने अपनी वृद्धावस्था (लगभग ८० वर्ष की आयु) में की होगी फलतः इसका रचना- काल दशम शती का अन्त या एकादश शतो का आरम्भ माना जा सकता है। इस प्रकार धनिक को धनञ्जय का अनुज मानने में भी कोई कठिनाई नहीं है। किञ्च, दशरूपक तथा अवलोक टीका के समय में थोड़ा ही अन्तर रहा होगा। धनिक गम्भीर विद्वान् थे तथा कवि भी। अवलोक टीका में पदे-पदे उनकी विद्वत्ता सलकती है, साहित्यशास्त्र, नाट्यशास्त्र तथा मीमांसा आदि के विषय में उनका पाण्डित्य प्रकट होता है। धनिक ने कारिकाओं की व्याख्या के साथ-साथ उदाहरणों द्वारा भी नाट्य के नियमों को स्पष्ट किया है। काव्य तथा रूपकों से अवसर के अनुसार उद्धरण प्रस्तुत करना एक ओर तो उनके विस्तृत अध्ययन का सूचक है, दूसरी ओर उनके सूक्ष्म निरीक्षण एवं मनन को प्रकट करना है। अवलोक टीका में ३०० से अधिक उद्धरण दिये गये हैं, जिनमें कुछ गद्य में भी है। यहाँ २४ उद्धरण धनिक के स्वरचित हैं, जिनमें चार प्राकृत के हैं। इससे विदित होता है कि धनिक प्राकृत तथा संस्कृत के अच्छे कवि थे। वे साहित्यशास्त्र के भी

Page 31

दशरूपकम्

उच्चकोटि के विद्वान् थे। अवलोक टीका के एक उल्लेख से विदित होता है कि उन्होंने 'काव्यनिर्णय' नामक ग्रन्थ भी लिखा था। उस ग्रन्थ के सात पद्य अवलोक टीका में उद्धृत किये गये हैं। किन्तु दैववश वह ग्रन्थ आ्रज उपलब्ध नहीं है। अवलोक टीका में वनिक ने अनेक ग्रन्थों का आधार लिया है। आज उप- लब्ध पुस्तकों से उनके उद्धरशों में कहीं पाठ-भेद भी मिलता है। सम्भवतः उन्होंने अपनी स्मृति के आधार पर ही उद्धरण दिये होंगे; अथवा हस्तलिपियों में ही पाठ- भेद रहा होगा। धनिक ने कहीं-कहीं पूरा उद्धरण न देकर प्रतीक मात्र ही उदत की है। कहीं एक ही पद्य को कई नाट्य नियमों के उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया है। कहीं 'प्रागुदाहृतम्' कहकर पहले उदाहरण की ओर संकेत कर दिया है। कहीं 'उदयनचरित' आदि उपाख्यानों को भी उदाहरण रूप में दिखलाया है। उद- धरणों के विषय में धनिक की यह विशेषता है कि उन्होंने अधिकांश स्थलों पर ग्रन्थ या कवि का नामोल्लेख किया है,१ जिससे संस्कृत कवियों के काल-निर्णय में बड़ी सहायता मिलती है। इसके ततिरिक्त धनिक ने कतिपय शास्त्रीय ग्रन्थों को भी उद्धृत किया है। उनमें कहीं नामतः उल्लेख किया है, कहीं नहीं भी (इन सबका परिशिष्ट एक में विवरण दिया गया है)। दशरूपक की वृत्ति होते हुए भी दशरूपावलोक का अपना निजी महत्त्व है। इसमें अनेक विवादास्पद विषयों का विस्तृत विवेचन किया गया है; उदाहरणार्थं नाट्य में शान्तरस की योजना, रसों का विरोध तथा अविरोध, काव्य का रस-भाव आदि के साथ सम्बन्ध इत्यादि। इसी प्रकार दशरूपक के दुरूह स्थलों का भी स्पष्टीकरण करते हुए उन्हें उचित उदाहरणों द्वारा हृदयंगम कराने का प्रयास किया है। फिर भी यह टीका सर्वथा निर्दोष नहीं कही जा सकती। कहीं-कहीं स्पष्ट मन्तव्यों की भी विस्तृत व्याख्या कर दी गई है दूसरी ओर दुर्बोध बातों को भी 'स्पष्टम्' कहकर छोड़ दिया गया है। कतिपय स्थलों पर पारिभाषिक शब्दों का स्पष्टीकरण नहीं किया गया। वहाँ उदाहरण दिखलाये गये हैं किन्तु शब्दों के स्पष्टीकरण के बिना वास्तविक अरथ सन्दिग्ध ही रह जाता है। वस्तुतः इस प्रकार के दोष नगण्य हैं। इसमें सन्देह नहीं कि यही वृत्ति दशरूप किवा संस्कृत नाट्यशास्त्र को अवलोकित करती है। ३. द्रशरूपक के प्रतिपाद्य विषय पर एक दृष्टि-दशरूपक में नाट्यविषय का संक्षिप्त निरूपण किया गया है। इसमें चार प्रकाश हैं। प्रथम प्रकाश के आरम्भ में गणेश, विष्णु तथा शिव (द्र० टि० १.२) और भरतमुनि को नमस्कार करके सरस्वती की कृपा से ग्रन्थ रचना में प्रवृत्ति, रचना का उद्देश्य तथा नाट्य (एवं काव्य) का प्रयोजन बतलाया गया है यहाँ भामह के मन्तव्य पर उपालम्भ करते हुए मुख्यतः (१.) हिन्दी-अनुवाद में अधिकांश उद्धरणों के सन्दर्भ दिखलाये गये हैं। जहाँ सन्दर्भ ज्ञात नहीं हो सका है वहाँ प्रश्नचिह्न (?) रख दिया है। अथवा छोड़ दिया गया है।

Page 32

भूमिका २१

आनन्दानुभूति को ही नाट्य का प्रयोजन माना गया है (१.६) । फिर नाट्य (= रूप=रूपक) का लक्षण करते हुए उसका नृत्य तथा नृत्य से भेद प्रकट किया गया है। साथ ही दस प्रकार के रूपकों (१. नाटक, २. प्रकरण, ३. भाण, ४. प्रहसन. ५ डिम, ६. व्यायोग, ७. समवकार, ८. वीथी, ६. अङ्क और १०. ईहामृग) का उल्लेख करके रूपकों के भेदक तीन तत्त्वों वस्तु, नेता और रस का निर्देश किया गया है। यहाँ लक इस ग्रन्थ का प्रारम्भिक अंश कहा जा सकता है। 1 (9 प्रथम प्रकाश का मुख्य प्रतिपाद्य विषय रूपक की वस्तु है। वस्तु दो प्रकार की होती है-आधिकारिक और प्रासङ्गिक। प्रधान कथावस्तु (इतिवृत्त) को आधि- कारिक कहते हैं और सहायक को प्रासङ्गिक। प्रासङ्गिक इतिवृत्त दो प्रकार का होता है-पताका और प्रकरी। मुख्य कथा का दूर तक साथ देने वाली प्रासङ्गिक कथा पताका कहलाती है; जैसे रामायण की कथा में सुग्रीव की कथा है। मुख्य कथा के साथ थोड़ी दूर तक चलने वाली प्रकरी होती है; जैसे रामायण की कथा में श्रव या जटायु की कथा है (१.१३-१४)। पताका के प्रसङ्ग से धनञ्जय ने पताका- स्थान का भी निरूपण किया है। जहाँ समान विशेषणों के द्वारा अन्योक्ति से आगे आने वाले प्रस्तुत अर्थ की सूचना दी जाती है, वह पताकास्थान या पताकास्थानक कहलाता है (११५) । भावप्रकाशन में इसे तीसरे प्रकार का प्रासङ्गिक इतिवृत्त ही बतलाया गया है, किन्तु धनञ्जय ने ऐसा कुछ नहीं कहा। ये पताका इत्यादि मुख्य कथा के विकास में सहायक होते हैं। किन्तु यदि कथा- वस्तु सरल है तो इनके बिना भी हो सकती है। अतः ये कथावस्तु के अनिवार्य अङ्ग नहीं। ये आधिकारिक और प्रासङ्गिक कथाएँ भी तीन-तीन प्रकार की होती हैं-प्रख्यात; उत्पाद्य और मिश्रित (१.१५) इनमें से किसी एक प्रकार की कथा वस्तु का आश्रय लेकर रूपक की वस्तु-योजना की जाती है। वस्तु-योजना की दृष्टि से कथावस्तु का विभाजन- इतिवृत्त नाट्य का शरीर है। कवि इतिवृत्त की सुसम्बद्ध तथा सुव्यव स्थित योजना करता है और क्मिक विकास का ध्यान रखता है। इसी से कथा वस्तु रोचक और ग्राह्य बनती है। नाट्यशास्त्र (१६'१) के अनुसार इतिवृत्त का विभाजन ५ सन्धियों के आधार पर किया जाता है। ये ५ सन्धियाँ हैं-मुख प्रतिमुख, गर्भ, अवमर्श और उपसंहार । सन्धि का अर्थ है-इतिवृत्त के विभाग जो कि अर्थप्रकृतियों तथा कार्यावस्थाओं के आधार पर किये जाते हैं। नाटक आदि में इतिवृत्त के नायक का कोई लक्ष्य होता है वही फल कहलाता है। उस फल की सिद्धि के उपाय ही अर्थप्रकृतियां कहलाती हैं। ये अर्थप्रकृतियां पांच हैं-बीज, बिन्दु, पताका, प्रकरी तथा कार्य। (११८) । फल को लक्ष्य करके किया गया जो नायक का व्यापार (=कार्य) है उसकी भिन्न-भिन्न अवस्थाएँ ही कार्यावस्थाएँ कहलाती हैं। भारतीय नाट्यशास्त्र के अनुसार ये अवस्थाएँ पांच हैं-आरम्भ, प्रयत्न, प्राप्त्याशा, नियताप्ति तथा फलागम (११६-२२)।

Page 33

२२ दशरूपकम्

दशरूपक (एवं साहित्यदर्पण आदि) के अनुसार अर्थप्रकृतियों का कार्यावस्थाओों के साथ क्रमशः सम्बन्ध होने पर सन्धि का उद्भव होता है, किन्तु इसमें कुछ दोष प्रतीत होता है; अतः धनञ्जय का सन्धि का लक्षणा विचारणीय ही है (१.२४ टि०)। इन सन्धियों के ६४ अङ्ग हैं। उनका रूपक के विविध प्रकारों में यथासम्भव प्रयोग किया जाता है। सभी रूपकों में समस्त सन्धियों या सन्ध्यङ्गों का प्रयोग अनिवार्य नहीं हैं (विशेष द्र०, १.२४ टि०)। कीथ का विचार है कि 'इन सन्ध्यज्जो के बंटन (बंटवारे) का कोई वास्तविक मूल्य नहीं है' (सं० नाटक, पृ० ३२०)। किन्तु दशरूपक के अनुसार रूपकों में इन सन्ध्यङ्गों की योजना के ६ प्रयोजन हैं (१.१५)। इनकी योजना से कथावस्तु में क्रमबद्धता, रोचकता. प्रवाह तथा रसास्वादकता की अभिवृद्धि हुआ करती है। वर्शन की दृष्टि से कथावस्तु का विभाजन रूपकों का मुख्य उद्दश्य रसास्वादन कराना है किन्तु इतिवृत्त की सभी घटनाएँ सरस नहीं हुआ करतीं। साथ ही कतिपय घटनाएँ ऐसी भी होती हैं जिनका रङ्गमञ्च पर दिखलाना वाञ्छनीय नहीं होता। इसी लिये कथावस्तु के दो भाग किये गये हैं-सूच्य और दृश्य। जो घटनायें नीरस या अनुचित होती हैं, किन्तु कथा-प्रवाह के लिये उनका जानना आवश्यक होता है, उनकी केवल सूचना दी जाती है (विस्तृत वर्सन नहीं), वही सूच्य इतिवृत्त है। जो रोचक तथा सरस घटनायें होती हैं, उनका विशद वर्णन किया जाता है और रङ्गमञ्च पर भ्रभि- नय भी; वही हृश्य इतिवृत्त है। सूच्य इतिवृत्त की सूचना देने के लिये रूपकों में पांच प्रकार के अर्थोपक्षेपकों (अर्थ के सूचक) का प्रयोग किया जाता है-विष्क- म्भक, चूलिका, अङ्कास्य, अङ्कावतार और प्रवेशक (१.५८-६२) । दृश्य इतिवूस्त का रूपक के अङ्कों में विभाजन किया जाता है। अ्ङ्कों की संख्या सभी रूपकों में समान नहीं होती (द्र० दश० ३)। नाव्यधर्म (=नाट्योरि=नाटकीय संवाद) की दृष्टि से वस्तु-विभाजन भारत के नाट्यशास्त्रियों ने पाश्चात्य नाट्यशास्त्र के समान संवाद को पृथक नाटक का तत्त्व नहीं भाना, अपितु वस्तु के अङ्ग के रूप में ही संवाद का विचार किया है। संवाद (कथोपकथन) की दृष्टि से वस्तु तीन प्रकार की होती है-सर्वधाव्य, नियतश्राव्य और अ्धाव्य । सर्वश्राव्य को रूपकों में 'प्रकाशम्' शब्द के द्वारा प्रकट किया जाता है। नियतश्राव्य दो प्रकार का होता है-जनान्तिक और अपवारित। अशाव्य को 'स्वगत' भी कहते हैं। इनके अतिरिक्त 'आकाशभाषित' नामक एक अन्य प्रकार की नाट्योक्ति भी होती है। (द्र० १.६३-६७) । द्वितीय प्रकाश; नायक-नायिका के भेद-प्रभेद गाथ नायक शब्द का मुख्य अर्थ है नाटक आदि का मुख्य पात्र। किन्तु कभी- कभी 'नायक' शब्द का सामान्यतः किसी भी पात्र के लिये प्रयोग कर दिया जाता है। इस प्रकाश के आरम्भ में नायक के सामान्य गुणों का वन किया यया

Page 34

भूमिका २३

है (२.१-२)। फिर नायक के चार प्रकार (धीरोदात्त, धीरललित, धीरप्रशान्त औ्रोर धीरोद्धत) और उनके लक्षण बतलाकर प्ङ्गारी नायक की चार अवस्थाओं (दक्षिण, शठ,घृष्ट तथा अनुकूल) का निरूपण किया गया है (२'६-७) । यहां नायक के सहायकों का निरूपण भी है। इसमें पताका नामक इतिवृत्त का नायक 'पीठमद' कहलाता है जैसे रामायण की कथा में सुग्रीव है (२.८) विट और विदूषक नायक के शृङ्गारी सहायक हैं (२.६)। मन्त्री इत्यादि कार्यसिद्धि में, पुरोहित आदि धर्म में, सामन्त, सैनिक आदि दण्ड में और वर्षवर आदि अन्तः- पुर में नायक के सहायक होते हैं (२.४२-४६)। यहां कञ्चुकी का उल्लेख नहीं किया गया। रूपक में नायक के चरित्र को निखारने के लिये प्रतिनायक की योजना की जाती है अतः उसके स्वरूप का भी निरूपण किया गया है (२.६)। तदनन्तर नायक के शोभा आदि आठ सात्त्विक गुणों का निरूपण है (२.१०-१४)। नायिका भी सामान्यतः नायक के गुणों से युक्त होती है। वह तीन प्रकार की होती है-स्वकीया, परकीया तथा साधारण स्त्री (वेश्या)। स्वकीया भी तीन प्रकार की होती है मुग्धा, मध्या, प्रगल्भा। नायिका की स्वाधीनपतिका आदि आठ अवस्थायें हुआ करती हैं (२'२३-२८)। नायक के समान नायिका की भी सहायिकायें होती हैं, जो प्रायः दासी, सखी, पड़ोसिन, भिक्षुणी आदि होती हैं और दूती का काम भी करती हैं (२.२६)। नायिका के सन्दर्भ में युवतियों के २० सातत्विक अलद्धारों का भी वर्णन किया गया है। हाव, भाव, हेला इत्यादि युवतियों के शरीर की शोभा बढ़ाते हैं, इसी हेतु इन्हें युवतियों के अलद्दार कहा जाता है (२.३०-४२)। इसके पश्चात् नाट्यवृत्तियों का वर्णन है। नायक आदि के मानसिक, वाचिक और कायिक व्यापार ही नाट्य में वृत्तियाँ कहलाती हैं। नाट्यवृत्तियाँ चार हैं-सात्त्वती, भारती, कैशिकी तथा आरभटी। इनमें भारती विशेषकर शब्दवृत्ति है और शेष तीनों अर्थवृत्तियाँ कहलाती हैं। उद्भट के अनुयायी 'अर्थवृत्ति' नाम की एक अन्य वृत्ति मानते रहे, धनञज़य ने उनके मत का निराकरण किया है (२.६०-६१)। दशरूपक में श्रङ्गों सहित चारों वृत्तियों का निरूपण करते हुए यह भी दिखलाया है कि किस रस में कौन सी वृत्ति हुआ करती है (२.४७-६२) । द्वितीय प्रकाश के अन्त में प्रवृत्तियों का वर्णन है। प्रवृत्ति का अभिप्राय है, देश-भेद के कारण पात्रों के भिन्न-भिन्न वेष-भूषा तथा भाषा आदि होना। यहां अत्यन्त संक्षेप में भाषा-प्रयोग तथा सम्बोधन के प्रकार दिखलाये गये हैं। इस विषय का नाट्यशास्त्र तथा साहित्यदर्पण आदि में विशद विवेचन है। दशरूपक का यह तिरुपण उनके सामने अधूरा ही है। इस प्रकार द्वितीय प्रकाश में नायक-नायिका तथा उनके विविध व्यापारों का वर्णन किया गया है। इसके अतिरिक्त ना० था०

Page 35

दशरूपकम्

तथा साहित्यदर्पण आदि में ३३ नाट्यालङ्गारों तथा ३६ नाट्यलक्षणों का भी वर्णन किया गया है, जिनका पृथक वर्णन करना धनञ्जय को अभीष्ट नहीं (४. ८४)। तृतीय प्रकाश; दशरूपकों का स्वरूप-निरूपण-यहां प्रथमतः नाटक का वर्णन किया गया है; क्योंकि दस रूपकों में नाटक ही प्रमुख है। नाटक के रचना-विधान पर विचार करते हुए नाटक की स्थापना इत्यादि नाट्य-प्रयोग का भी निरूपण किया गया है, किन्तु पूर्वरङ्ग का वर्णन यहां नहीं किया गया। नान्दीपाठ का तो यहां उल्लेख भी नहीं है। वस्तुतः दशरूपक का उद्दश्य रूपक के रचना-विधान का विवेचन करना है, नाट्य-प्रयोग का विवेचन नहीं। तदनन्तर नाटक की स्थापना के प्रसङ्ग में भारती वृत्ति का अङ्गों सहित वर्णन किया गया है(३.४-२१)। फिर नाटक के नायक, वस्तु-संघटन (दर्शनीय तथा वर्जित घटनाओं का निर्देश) और रस-योजना आदि का विशद निरूपण किया गया है (३.२२.३८) । इसके रान्त प्रकरण, भाण, प्रहसन, डिम, व्यायोग, समत्रकार, वीथी, उत्सृष्टिकाङ्क (अङ्क) और ईहामृग नामक रूपकों का निरूपणा किया गया है। नाटक और प्रकरण का निरूपण करते हुए प्रसङ्ग से इन दोनों के सङ्कीणं रूप नाटिका का भी निरूपण किया गया है (३.४२.४८)। दशरूपक के अनुसार प्रकरणिका को नाटिका से भिन्न नहीं माना जाता (३.४४-४५)। उपर्युक्त रूपकों के अतिरिक्त परवर्ती आचार्यों ने उपरूपकों का भी विवेचन किया है; जैसे भावप्रकाशन के अनुसार २० उपरूपक हैं, साहित्यदर्पण के अनुसार १८ इत्यादि। नाट्यशास्त्र में उन भेदों का उल्लेख नहीं किया गया तथापि उनमें से कुछ का संकेत अवश्य मिल सकता है। ना० शा० (१८.५७) में जो नाटिका का वर्णन किया गया है उसकी व्याख्या में अभिनवगुप्त ने बतलाया है कि नाटिका का लक्षण करके भरत मुनि ने अन्य सङ्कीण रूपकों का भी दिग्दर्शन करा दिया है। ऐसा प्रतीत होता है कि धनञ्जय एवं धनिक भी उपरूपकों से परिचित थे। धनिक ने शङ्का के रूप में डोम्बी इत्यादि सात अन्य रूपकों का उल्लेख किया है (१.८) । किन्तु धनञ्जय तथा धनिक डोम्बी आदि को, 'नृत्य' कहते हैं। वे इन्हें रूपकों से पृथक् मानते हैं; क्योंकि ये रसास्वादन के अनुकूल (रसाश्रय) नहीं होते (१.६)। उनके विचार में सङ्कीणं रूपकों में केवल नाटिका ही वाञ्छनीय है, अन्य नहीं (४.४३)। दशरूपक में प्रतिपादित रूपकों में वस्तु, नायक, वृत्ति तथा रस आदि की दृष्टि से परस्पर भेद है; जिसका संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है :- १. नाटक-प्रख्यात (ऐतिहासिक या पौराशिक) वस्तु, पांचों सन्धियां, ५ से १० तक अङ्क, धीरोदात्त (नृप या दिव्य) नायक, चारों (कैशिकी, आरभटी,

Page 36

भूमिका २५

सात्त्वती और भारती) वृत्तियाँ, अ्ङ्गी रस वीर या शृङ्गार अ्ङ्गअन्य सभी रस।

२. प्रकरण=कल्पित (उत्पाद्य) वस्तु, पाँचों सन्धियाँ, ५ से १० तक अ्ङ्क धीर प्रशान्त (अमात्य, विप्र, वशिक) नायक, (कुलस्त्री या गणिका या दोनों नायिका), वृत्तियां तथा रस नाटक के समान। [ नाटिका- कल्पित (प्रकरण के समान), पांचों सन्धियां किन्तु अवमर्श सन्धि अत्यन्त संक्षिप्, चार अङ्क, धीरललित (प्रख्यात नूप नाटक के समान), देवी तथा प्राप्या कुलीन नायिकाए, विशेष रूप से कैशिकी वृति, शृङ्गार रस।] ३. भाण-धूर्तचरित विषयक-कल्पित वस्तु, मुख-निरवहण सन्धि, एक अङ्क। कुशल तथा बुद्धिमान् विट नायक, अधिकतर भारती वृत्ति, वीर या शृङ्गार की सूचना मात्र, आकाशभाषित के द्वारा सम्बोधन तथा कथोपकथन, लास्य के दस अङ्गों का प्रयोग । ४. प्रहसन- कल्पित वस्तु, मुख-निर्वहण सन्धि, एक अङ्क, पाखण्डी विप्र कामुक आदि पात्र, अधिकतर भारती वृत्ति, अङ्गी हास्य रस, भाण के समान लास्य के दस अङ्गों का प्रयोग। ५. डिम - प्रख्यात वस्तु, मुख-प्रतिमुख-गर्भ-निर्वहण चार सन्धियां, चार अङ्क, १६ उद्धत पात्र (पिशाच आदि), कैशिकी को छोड़कर शेष तीन वृत्तियां, श्रङ्गी रस रौद्र तथा अङ्ग रस वीर, बीभत्स, अद्भुत, करुण और भयानक। ६.व्यायोग- प्रख्यात वस्तु, मुख-प्रतिमुख-निर्वहण सन्धियां, एक अ्ङ्क, उद्धत प्रख्यात अधिक पुरुष पात्र, कैशिकी-भिन्न वृत्तियां, हास्य शृङ्गार से भिन्न ६ रस । ७. समवकार-प्रख्यात वस्तु (देव तथा असुरों से सम्बद्ध), विमर्श से भिन्न ४ सन्धियाँ, तीन अङ्क, विख्यात उदात्त प्रकृति के देव और दानव बारह नायक, कैशिकी की अल्पता के साथ चारों वृत्तियाँ, वीर रस की प्रधानता अन्य सभी रस विशेष रूप से शृङ्गार अ्रङ्ग रूप में। ८. वीथी-कल्पित वस्तु, मुख-निर्वहण दो सन्धियाँ, एक अङ्क, एक या दो पात्र, कैशिकी वृत्ति, प्रधानतः सूच्य रस शृङ्गार अन्य रसों का स्पर्शमात्र। ६. (अङ् उत्सृष्टिकाङ्क)-प्रख्यात वस्तु, मुख-निर्वहण सन्धि, एक अङ्क, साघारण जन नायक, अधिकतर भारती वृत्ति (भारवत्), अङ्गी रस करुणा। १०. ईहामृग-मिश्रित वस्तु. मुख-प्रतिमुख-निर्वहण तीन सन्धियाँ, चार अङ्क, नायक धीरोद्धत प्रख्यात देव तथा नर, सभी वृत्तियाँ (?), शङ्गार (शृङ्गाराभास- भी) रस।

Page 37

२६ दशरूपकम्

हिए क उपयुक्त विषयों में आचार्यों का कुछ मत-भेद भी है जो भा० प्र०, ना० द० तथा सा० द० आदि से जाना जा सकता है। (विशेष द्र० Mankad, The Types of Sankrit Drama) I चतुर्थ प्रकाश, रस-विचार रस के विषय में भी दशरूपक की कुछ मौलिक उदभावनाएँ हैं, जिनका अग्रिम अनुच्छेदों में विशद विवेचन किया जायेगा। चतुर्थ प्रकाश में प्रथमतः यह बतलाया गया है कि विभाव, अनुभाव सात्त्विक भाव तथा व्यभिचारी भावों के द्वारा आस्वादन योग्य होकर स्थायी भाव ही रस कहल ता है। रस का आस्वादन सहृदय सामाजिक को होता है, अनुकार्य को नहीं (४.१, ३८-३६)। यहाँ विभाव, अनुभाव, सात्विक भाव तथा व्यभिचारी भावों के स्वरूप तथा प्रकारों का निरूपण किया गया है (४.२-३३) । तदनन्तर स्थायी भाव का लक्षणा करते हुए (अवलोक टीका में) रसों के विरोध-अविरोध का विवेचन किया गया है (४.३४) । यह विवेचन परवर्ती ग्रन्थों के विवेचन के समान स्पष्ट नहीं प्रतीत होता। दशरूपक में आठ स्थायी भाव माने गये हैं। शम नामक स्थायी भाव की पुष्टि नायक में नहीं हो सकती, अतः नाट्य में शान्त रस नहीं होता; इस मन्तव्य की व्याख्या अन्य मतों का निराकरण करते हुए की गई है। यह भी दिखलाया गया है कि नागानन्द का नायक जीमूतवाहन धीरोदात्त नायक है धीरप्रशान्त नहीं (४. ३५-३६) । इसके उपरान्त विशेषकर अवलोक वृत्ति में विस्तार पूर्वक यह दिखलाया गया है कि रस- भाव आदि और काव्य का व्यङ्गयव्पञ्जकभाव सम्बन्ध नहीं है अपितु भाव्य-भावक सम्बन्ध है, रस आदि भाव्य हैं और काव्य भावक है (४.३७) । यहाँ रस-प्रत्रिया भी दिखलाई गई है (४.४०-४२)। साथ ही रसों का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण करने का प्रयास किया गया है। फलतः धनञ्जय एवं धनिक के अनुसार काव्यार्थ से होने वाली आत्मानन्द की अनुभूति ही रस है। यह आनन्द की अनुभूति सभी रसों में समान रूप से हुआ करती है। फिर भी भावक सामग्री (विभाव आदि) के भेद से इसमें चित्त की चार अवस्थाएँ हो जाती हैं-विकास, विस्तार, क्षोभ और विक्षेप। शृद्गार में चित्त का विकास होता है, वीर में विस्तार, बोभत्स में क्षोभ और रोद्र में विक्षेप। हास्य, अद्भुत, भयानक और करुण में भी क्रमशः विकास आदि चारों हुआ करते हैं। इनमें एक-एक अवस्था का दो-दो रसों से सम्बन्ध है इस लिये आठ ही रस होते हैं (४.४३-४५)। प्रीति, भक्ति तथा मृगया द्यूत आदि को भी किन्हीं आचार्यों ने भाव तथा रस के रूप में माना था। उनका दशरूपक में हर्ष, उत्साह आदि में ही अन्तर्भाव किया गया है (४.र३)। नाटय में तो शान्त रस होता नहीं, यदि श्रव्य काव्य में शान्त रस होता भी है तो उसमें मुदिता, मैत्री, करुणा तथा उपेक्षा ये चार चित्त की अवस्थाएँ हुआ करती हैं, जिनका विकास आदि चार अवथ ओं में ही समावेश हो जाता है (४.४५)। धनिक ने यह भी स्पष्टतः बतलाया है कि सभी

Page 38

भूमिका २७

रस आनन्दात्मक होते हैं। करुण आदि में भी सुखदुः खात्मक एक विशेष प्रकार के आनन्द की अनुभूति हुआ करती है। साथ ही काव्य-नाट्य से भावित करुणा आदि रस लौकिक शोक आदि की अपेक्षा नितान्त भिन्न होता है (४.४३-४५)। कोई स्थायी भाव आस्वादनीय-आस्वाद्य-आस्वादनयोग्य होकर ही रस कहलाता है अतः अवस्था का भेद है ही (मि०४. ४६-४७)। इसके पश्चात् शृङ्गार आदिआठ रसों के लक्षणा, भेद तथा उदाहरण दिखलाते हुए चतुर्थ प्रकाश समास होता है। ग्रन्थ के अन्त में धनञ्जय ने अपना अत्यन्त संक्षेप में परिचय भी दिया है। ४. रस-सिद्धान्त और दशरूपक का मन्तव्य (१) आचार्य भरत-सहृदयों को रस की अनुभूति कराना ही नाट्य का मुख्य प्रयोजन है। अतः रूपकों में रस का अत्यन्त महत्त्वपूर्ण स्थान है। प्रथमतः नाट्य के प्रसङ्ग में ही रस-सिद्धान्त की उद्भावना की गई थी। आज भरत के नाट्यशास्त्र में रस का सर्वप्रथम विवेचन उपलब्ध होता है। किन्तु नाट्यशास्त्र में रस का स्वरूप पर्याप्त विकसित अवस्था में मिलता है। इससे सहज ही यह अमुमान किया जा सकता है कि इससे पूर्व ही रस-सिद्धान्त की उद्भावना हो चुकी थी। भरत से पूर्व रस-सिद्धान्त का विकास किस प्रकार हुआ.यह आ्रज विदित नहीं है। भरत के अनुसार नाट्य के ११ तत्त्व हैं- रसा भावा ह्यभिनया धर्मी, वृत्तिप्रवृत्तयः । सिद्धि: स्वरास्तथातोद्यं गानं रङ्गश्च संग्रहः ॥ ६१०॥ इनमें रस ही प्रधान है। भरत ने रस के स्वरूप, संख्या तथा भाव, विभाव, अनुभाव एवं व्यभिचारी भावों का विस्तार से विवेचन किया है (ना० शा० अ० ६, ७)। भरत का रस-सूत्र है-विभावानुभावव्यभिचारिसंयोगाद रसनिष्पत्तिः। नाट्यशास्त्र में रूपकों के र रसों का उल्लेख किया गया है; किन्तु पाठान्तर के अनुसार वहाँ शान्त रस का भी वर्णन है। अभिनवगुप्त ने इस पाठान्तर को प्रामाशिक माना है और उन्होंने विस्तार के साथ शान्त रस का विवेचन किया है (अभि० भा०अ०६ का अन्त)। (२) अलङ्कारवादी आरचार्यों का रसविषयक दृष्टिकोण-भरत के अनन्तर साहित्याचार्यों ने रस सिद्धान्त को इतना महत्त्व नहीं दिया। आज जो उस समय के साहित्य शास्त्र सम्बन्धी ग्रन्थ उपलब्ध हैं उनमें रस-सिद्धान्त का स्पष्ट निरू- पण नहीं किया गया। सम्भवतः उस समय के कुछ ग्रन्थों में रस-सिद्धान्त का विकसित रूप अवश्य रहा होगा किन्तु वे ग्रन्थ आज उपलब्ध नहीं हैं। उस समय के उपलब्ध ग्रन्थों में सबसे प्राचीन भामह का काव्यालङ्कार माना जाता है, जिसमें रस को नगण्य सा स्थान दिया गया है। इसके प्रश्चात् दण्डी ने यद्यपि अलद्कार और रीति को ही अधिक महत्त्व दिया है तथापि आठों रसों का उदाहरण सहित वर्णन करते हुए काव्य में रसों के महत्त्व को स्वीकार किया है। वामन

Page 39

दशरूपकमे

ने 'कान्ति' नामक गुण के नाम से काव्य में रस की महत्ता स्वीकार की है(दीप्तरसत्वं कान्तिः, काव्यालङ्कारसूत्र ३.२१४)। उद्भट की रचनाओं में रस-सिद्धान्त के प्रति कुछ अधिक आदर भाव परिलक्षित होता है। उद्भट ते 'समाहित' नामक रसालङ्कार की नवीन उद्भावना की तथा यह भी दिखलाया कि नाटक में भी शान्त रस होता है :- शृङ्गारहास्य-करुण-रौद्र-वीर-भयानकाः बीभत्साद्भुत-शान्ताश्च नव नाट्ये रसा: स्मृताः ॥ (काव्यालङ्कारसंग्रह ४.४)। संगीतरत्नाकर (व्याख्यातारो भारतीये लोल्लटोद्भटशङ्कुका: ११६) से विदित होता है कि उद्भट की नाट्यशास्त्र पर कोई टीका थी। सम्भवतः उसमें उद्भट ने रस-सिद्धान्त का विशद विवेचन किया होगा। भामह से उद्भट पर्यन्त के युग में रस का विशेष सम्बन्ध नाट्य से ही माना जाता रहा। नाट्य से भिन्न काव्य में रस का विचार 'रसवत्' अलङ्कार आदि के रूप में ही विशेषतः किया गया। फिर भी कहीं-कहीं महाकाव्य के लिये भी रस को आवश्यक तत्त्व बतलाया गया हैं; जैसे 'युक्त लोकस्वभावेन रसश्च सकलैः पृथक' (भामह, काव्या० १.२१) तथा 'अलङकृतमसंक्षिप्तं रसभावनिरन्तरम' (दण्डी, काव्यादर्श १'१८) । इसके पश्चात् रुद्रट ने काव्य में रस के महत्त्व की ओर विशेष रूप से ध्यान दिलाया। उन्होंने बतलाया कि कवि को महान् प्रयास करके काव्य को रसमय बनाना चाहिए। उन्होंने शान्त रस को भी स्वीकार करते हुए प्रेयान् नामक एक अन्य रस का उल्लेख किया (काव्यालङ्वार १२.२-३)। साथ ही यह भी बतलाया कि निर्वेद आदि सभी भाव रसरूपता को प्राप्त कर सकते हैं (वही १२४)। दशरूपक में इस मत को उद्धृत करते हुए इसका निराकरण किया गया है (दश० ४.३६)। फिर भी रुद्रट अलङ्कारवादी आचार्य माने जाते हैं उन्होंने प्रासङ्गिक रूप से ही रस का विवेचन किया है। किन्तु रुद्र भट्ट नामक एक अन्य आचार्य ने भृङ्गारतिलक में नव रसों का विशद विवेचन किया है। इससे प्रकट होता है कि उस समय रस के प्रति आचार्यों का आदर भाव बढ़ रहा था। (३) ध्वनिवादी आ्चार्य तथा रससिद्धान्त-इसके उपरान्त ध्वनिवादी आ्नन्दवर्द्धन ने ध्वनि को काव्य की आत्मा बतलाते हुए रस-योजना में ही कवियों को विशेष रूप से उद्यत रहने की प्रेरणा दी :- व्यङ्गयव्यञ्जकभावेऽस्नि विविधे सम्भवत्यपि। रसादिमय एकस्मिन् कविः स्यादवधानवान्॥ ध्वन्या० ४०५ ।। उन्होंने रस को ध्वनि का सर्वोत्कृष्ट रूप बतलाया तथा यह भी कि रस काव्य का व्यङ्गय ही हो सकता है वाच्य या लक्ष्य नहीं। इस व्यङ्गयव्यरजक भाव के मन्तव्य को पूर्वपक्ष के रूप में प्रस्तुत करते हुए दशरूपक में इसका खण्डन

Page 40

भूमिका २६

किया गया है (४.३६-३७) । इस व्यङ्गयव्यञ्जक भाव की अभिनवगुप्त ने विशद व्याख्या की तथा ध्वनि-सिद्धान्त और रस-सिद्धान्त का सामञ्जस्य करके रस सिद्धान्त का परिनिष्ठित रूप प्रस्तुत किया। धनञ्जय तथा धनिक की कृतियों में अभिनव गुप्त के मन्तव्यों का कोई संकेत नहीं मिलता, यह ऊपर कहा जा चुका है। (४) ध्वनि विरोधी किन्तु रसवादी आचार्य-यद्यपि ध्वनिकार ने अत्यन्त दृढ आधारों पर ध्वनिवाद की स्थापना की थी तथापि ध्वनिवाद का अनेक आचार्यों ने विरोध किया। वे आचार्य नाट्य एवं काव्य में रस की महत्ता तो स्वीकार करते रहे; किन्तु रस आदि काव्य द्वारा व्यङ्गय हैं, इस मन्तव्य का उन्होंने खण्डन किया है। इन आचार्यों की एक शक्तिशाली परम्परा रही है। जिसमें प्रतिहारेन्दुराज, भट्टलोल्लट, शङ्कुक, भट्टनायक, कुन्तक, धनञ्जय तथा व्यक्तिविवेककार महिमभट्ट इत्यादि आचार्य विशेष उल्लेखनीय हैं। प्रतौहारेन्दुराज भामह एवं उद्भट के अलद्कार सम्प्रदाय के अनुयायी थे। वे मुकुल भट्ट के शिष्य थे। उनका मत है कि वस्तु, अलङ्कार तथा रस तीनों प्रकार की ध्वनियों का पर्यायोक्त, इलेष तथा रसवद् आदि अलङ्कारों में समावेश किया जा सकता है अतः व्यङ्गय अर्थ को पृथक मानने की आवश्यकता नहीं। साथ ही वे रस को काव्य की आत्मा मानना उचित ही समझते हैं। (काव्यालङ्कार- संग्रह लघुवृत्ति ६.७-८, मि. भा. प्र. भूमिका पृ. २४)। वक्रोवितिकार कुन्तक ने वकरोक्ति को काव्य का 'जीवित' बतलाते हुए भी रस को काव्य का अमृत माना है, जिससे काव्य में आन्तरिक चमत्कार का आधान हुआ करता है-काव्यामृतरसेना- उन्तश्चमत्कारो वितन्यते; वकोक्ति ०१.५। कुन्तक ने ध्वनि का वक्रोकिति में ही समावेश किया है-उपचार वक्रताभिः सर्वो ध्वनिप्रपञ्चः स्वीकृतः; वक्रोक्ति० । महिम भट्ट ने रस को काव्य का मुख्य तत्त्व माना है किन्तु यह स्वीकार नहीं किया कि रस व्यङ्गय है, वे ध्वनि (या व्यञ्जना) का एक विशेष प्रकार के अनुमान (काव्यानुमिति) में अन्तर्भाव करते हैं। भट्टलोल्लट, शङ्कुक तथा भट्टनायक तीनों ध्वनि-विरोधी आचार्य रस के व्याख्याकार के रूप में विर्यात हैं। उनके रस-सम्बन्धी मन्तव्यों पर कुछ विस्तार से विचार करना वाञ्छनीय है, तभी दशरूपक के रस-सम्बन्धी मन्तव्य के साथ उनके मन्तव्य का तुलनात्मक अनुशीलन किया जा सकता है। भट्टलोल्लट आदि के ग्रन्थ आज उपलब्ध नहीं हैं। अभिनवभारती, ध्वन्यालोकलोचन तथा काव्यप्रकाश आदि के आधार परही उनके रस-सम्बन्धी मन्तव्यों का निरूपण किया जा सकता है। संक्षप में उनके मन्तव्यों का स्वरूप इस प्रकार है :- (५) भरत के रससूत्र की विविध व्याख्याये :- भरत के रस-सूत्र के अनुसार विभाव, अनुभाव और व्यभिचारी भाव के संयोग से रस-निष्पत्ति होती है। रसव्सूत्र की व्याख्या करते हुए विद्वानों ने तीन प्रश्नों का उत्तर खोजने का

Page 41

३० दशरूपकम्

प्रयास किया है-(क) रस किसमें रहता है (अ्थात् रस का आस्वादन किसे होता है) ? (ख) रस का स्वरूप क्या है ? और (ग) रस-प्रक्रिया क्या है ? या रस- निष्पत्ति कैसे होती है ? (i) भट्टलोल्लट :- इनका रस-निष्पत्ति-विषयक मत रसोत्पत्तिवाद कहलाता है। यह मत मीमांसा सिद्धान्त पर आधारित समझका जाता है। इसके अनुसार रस (=रति आदि स्थायी भाव) मुख्य रूप से ऐतिहासिक या आख्यान- प्रसिद्ध राम आदि (अनुकार्य) में रहता है। सीता आदि तथा उद्यान आदि लैकिक कारण ही आलम्बन तथा उद्दीपन विभाव हैं। वे राम आदि के चित्त में रति आदि भाव के उत्पादक तथा उद्दीपक हैं। राम आदि के भुज फड़कना आदि अनुभाव हैं। उनके द्वारा राम आदि के चित्त में स्थित रति आदि भाव प्रतीति योग्य हु करता है। निर्वेद, चिन्ता इत्यादि सहकारी कारण ही व्यभिचारी भाव कहलाते हैं, जिनकी सहायता से रति आदि स्थायी भाव पुष्ट हो जाता है। राम आदि के चित्त में पुष्ट हुआ रति आदि स्थायी भाव ही रस कहलाता है। यह मुख्य रूप से राम आदि (अनुकार्य) में रहता है। किन्तु राम आदि के समान वेष-भूषा से सुसज्जित होकर कोई अभिनेता (नट) राम का अभिनय करता है और राम-सम्बन्धी काव्य का पाठ करता है तो सामाजिक जन उस अभिनेता को राम समभ लेते हैं ओर उसमें भी रति आदि भाव की प्रतीति होने लगती है। यह भ्रान्ति से होने वाली प्रतीति ही सामाजिक को आनन्द प्रदान करती है। इस प्रकार विभावों से उत्पन्न तथा उद्दीप् होकर, अनुभावों से प्रतीतियोग्य होकर तथा व्यभिचारी भावों से पुष्ट होकर अनुकार्य के चित्त में स्थित (लौकिक) रति आादि भाव ही रस है। इस मत की परवर्ती शङ्कुक आदि आचार्यों ने आलोचना की है। इसके अनुसार रस का आश्रय सामाजिक नहीं हो सकता। फिर राम आदि में स्थित या नट में प्रतीत होने वाले रस में सामाजिक को आनन्द की अनुभूति कैसे हो सकती है ? किञ्च इस प्रकार सामाजिक को होने वाली रस-प्रतीति भ्रान्तिमात्र होगी और काव्य आदि भ्रमोत्पादक होंगे अतः उपादेय न होंगे। धनञ्जय ने भी रस के अनुकार्य-गत होने का विरोध किया है;क्योंकि (i) रसानुभूति के समय अ््रनुकार्य राम आदि तो विदयमान नहीं होते; (Ii) उनके रसास्वादन के लिये काव्य लिखे भी नहीं जाते, न ही उनके लिये नाट्य का अभिनय किया जाता है। (iii) यदि अनुकार्य राम आदि में रस माना जाये तो श्रोता या दर्शक को 'इसमें रति भाव है' इम प्रकार की प्रतीति मात्र होगी तथा लज्जा, ईर्ष्या और राग-द्वेष आदि होने लगेंगे (४.३८.३६)। लोल्लट द्वारा निरूपित विभाव आदि का स्वरूप भी दशरूपक को अभिमत नहीं कहा जा सकता। लोल्लट के मत की केवल यही बात धनञ्जय की अभिमत कही जा सकती है कि रति आदि स्थायी भाव पुष्ट होकर रस कहलाता है। किन्तु उसकी पुष्टि की प्रक्रिया में तो दोनों आचार्यो का नितान्त भिन्न मत है।

Page 42

भूमिका CE ३१

(il) श्रीशङ्कुक :- इस के दूसरे व्याख्याकार श्रीशङ्कुक हैं। उनका मत रसानुमितिवाद कहलाता है। वह न्याय-सिद्धान्त पर आधारित माना जाता है। उनके अनुसार जब अ्रभिनेता जन निपुणाता के साथ राम आदि का अभिनय करते हैं और तत्सम्बन्धी काव्य का पाठ करते हैं तो सामाजिक उस अभिनेता को चित्र-तुरग न्याय से (जैसा चित्र में चित्रित अश्व को अश्व कह दिया जाता है वस्तुतः वह अश्व नहीं होता) 'यह राम है' ऐसा समझ लेते हैं तथा उस काव्यार्थ का अनुसन्धान करते हुए अभिनय द्वारा प्रदर्शित नायिका आदि (कारण), भुजाक्षेप आदि (कार्य) एवं शत्सुक्य इत्यादि (सहकारी) को कृत्रिम होते हुए भी कृत्रिम नहीं समझते। इस प्रकार के ये नायिका आदि ही काव्य-नाट्य में विपाव आदि कहलाते हैं। इन विभाव आदि के द्वारा अभिनेता में रति आदि भाव का अरनुमान कर लिया जाता है। यह अनुमित रति आदि भाव कलात्मक होने के करण अन्य अनुमित वस्तुओं से विलक्षण होता है तथा सौन्दर्यमय होने के कारण आस्वादनीय हो जाता है इसीलिये सहृदय सामाजिक अपनी वासना द्वारा इसका आस्वादन कर लेते हैं। इस प्रकार अभिनेता (नट) में अनुमित तथा सामाजिक द्वारा आस्वाद्यमान रति आदि भाव ही रस है। विभाव आदि के संयोग अर्थात् अनुमाप्य-प्रनुमापक भाव सम्बन्ध से रस की निष्पत्ति (अनुमिति) होती है।

इस मत के अनुसार वस्तुतः रति आदि स्थायी भाव अनुकार्य राम आदि में ही होता है किन्तु भ्रान्ति से उसका नट में अनुमान कर लिया जाता है। फिर भी (क) लौकिक कारण आदि से भिन्न विभाव आदि की कल्पना तथा (ख) सामा- जिक के द्वारा अपनी वासना से रस-चर्वरा-इस मत की ये दोनों बातें सिद्धान्त मत की ओर ले जाने वाली है। अभिनवभारती आदि में इस मत के दोष दिख- लाए गए हैं। मुख्य दोष यह है कि प्रत्यक्ष अनुभूति ही चमत्कार या आस्वादन उत्पन्न कर सकती है, केवल रति आदि भाव की अनुमिति से सामाजिक को आस्वा- दन नहीं हो सकता। किञ्च सहदयों का अनुभव बतलाता है कि रस का साक्षार्कार होता है (रस साक्षात् करोमि), अनुमान नहीं। धनञ्जय के अनुसार इस मत का निराकरण इसी कथन से हो जाता है कि रसिक में ही रस रहा करता है (४.३८-३६)। यदि नट भी काव्यार्थ की भावना से आस्वादन करता है तो वह भी रसिक ही है, अन्यथा उसमें रस नहीं रहता। शङ्कुक की त्रिभाव आदि के स्वरूप की कल्पना कुछ अश में धनञ्जय के मत की ओर ले जाने वाली अवश्य है फिर भी दोनों के विभाव आदि के स्वरूप में अन्तर तीत होता है; शङ्कुक के मत में कृत्रिम कारण आदि विभाव आदि ही कहलाते हैं किन्तु धनञ्जय के मत में काव्य के अतिशयोक्ति व्यापार के द्वारा विशिष्ट हो जाने वाले कारण आदि विभाव

Page 43

३२ दशरूपकम्

इत्यादि कहलाते हैं। शाङ्कुक के चित्र-तुरग न्याय और धनञ्जय के मिट्टी के हाथी के उदाहरण को भी समान नहीं कहा जा सकता। चित्र-तुरग न्याय तो यह बतलाता है कि सामाजिक राम का अभिनय करने वाले नट को राम कैसे समझ लेते हैं। दूसरी ओर मिट्टी के हाथी आदि का दृष्टान्त इस प्रश्न के उत्तर में दिया गया है कि यदि काव्य में राम एवं सीता आदि केवल (उदात्त आदि अवस्था वाले) पुरुष एवं स्त्री के रूप में होते हैं तो राम तथा सीता के रूप में उनका वर्णन क्यों किया जाता है (द्र० ४.४१)। (iii) भट्टनायक-रस के तीसरे व्याख्याकार भट्टनायक हैं। उन्होंने भट्ट लोल्लट्ट तथा शङ्कुक दोनों के मत के दोष दिखलाकर अपने मत की स्थापना की है। उनके मतानुसार विभाव आदि के द्वारा भोज्य-भोजक-भाव सम्बन्ध से (संयोगात्) सामाजिक को रस का भोग = आस्वादन (-निष्पत्ति) होता है। इसीलिये यह मत रसभुक्तिवाद कहलाता है। यह सांख्यसिद्धान्त पर आधारित समझा जाता है। तदनुसार काव्य-नाटय में शब्द के अभिधा व्यापार के समान ही भावकत्व तथा भोजकत्व नामक दो अन्य व्यापार होते हैं। काव्यार्थ का बोध हो जाने के पश्चात् भावकत्व व्यापार द्वारा काव्यनाटयगत नायक-नायिका आदि विभाव का, भुजाक्षेप आदि अनुभाव का तथा चिन्ता आदि व्यभिचारी भाव का साधारणीकरण हो जाता है; अरथात् सीता आदि की सामान्य नाथिका के रूप में (=साधारणीकृत) प्रतीति होती है (प्रदीप) अथवा उनकी केवल शृङ्गार रस के आलम्बन विभाव आदि के रूप में प्रतीति होती है (उद्योत)। साधारणीकृत विभाव आदि के द्वारा भावित हुए रति आदि स्थायी भाव का भोजक व्यापार द्वारा सामाजिक को आस्वादन होता है। रस का आस्वादन (=रस-भोग) यही है कि सहृदय के चित्त में सत्त्व का उद्र क होकर आनन्दमय एवं प्रकाशात्मक अनुभूति हुआ्र करती है। भट्टनायक ने रसिक में ही रस माना है, रस को अलोकिक अवस्था की ओर भी संकेत किया है। साथ ही विभाव आदि के साधारणीकरण की नवीन उदभावना की है। यह भट्टनायक की रस-सिद्धान्त को अपूर्व देन है। ध्वन्यालोकलोचन (रसस्य शब्दवाच्यत्वं तेनापि नोपगतम् .. ? ... ) से यह विदित होता है कि भट्टनायक रस को वाच्य नहीं मानते। फिर क्या उन्होंने रस को व्यङ्गय माना है? नहीं, वे रस को भावकत्व व्यापार का विषय मानते हैं। भावकत्व व्यापार से रस भावित होता है और भोजकत्व व्यापार से रस का आस्वादन होता है। 1. पी० वी० कारे का यह कथन "It appears from the Locana that Nayaka accepted that Rasa was the soul of poetry or drama and that it was व्यंग्य" (H SP. p. 371) विचार- गीय है। TYT

Page 44

भूमिका ३३

किन्त्वन्यशब्दवैलक्षण्यं काव्यात्मनः शब्दस्य त्र्यंशताप्रसादात्। तत्राभिधायकत्वं वाच्यविषयम्, भावकत्वं रसविषयम्, भोगकृत्वं सहृदयविषयम् इति त्रयोंशभूता व्यापारा: (लोचन २.४) भट्टनायक ध्वनि को नहीं स्वीकार करते। हाँ, यह अवश्य मानते हैं कि सहृदयों को रसास्वादन कराना ही काव्य का प्रयोजन है। भट्टनायक के मत का दोष यह है कि यहाँ भावकत्व और भोजकत्व नामक दो ऐसे काव्य-व्यापारों की कल्पना की गई है, जिनमें कोई प्रमाण नहीं। किञ्च भुक्ति या भोग अनुभूति मात्र है इसका अभिव्यक्ति में हो अन्तर्भाव हो सकता है। इसके अतिरिक्त भट्टनायक ने सामाजिक के चित्त में रति आदि भाव की स्थिति का उल्लेख भी नहीं किया। पी० वी० कारे का विचार है कि धनिक का रस-सम्बन्धी मत कुछ अंशों में भट्टनायक के मत के समान प्रतीत होता है (HS P. p 246)। वस्तुतः यह समानता आपाततः प्रतीत होती है। एक तो धनिक ने भावकत्व व्यापार की अलग से कल्पना नहीं की, इतना अवश्य कहा है 'काव्यं हि भावकम्, भाव्याः रसादयः।' किन्तु यहाँ तो काव्य तात्पर्य वृत्ति के द्वारा रस आदि का भावक होता है, भावकत्व नामक व्यापार के द्वारा नहीं। किञच, भट्टनायक का भावकत्व व्यापार तो साधार- शीकरण के रूप में है (साधारणीकरणात्मना भावकत्वव्यापारेण, का० प्र० वृत्ति ४.२८), दशरूपक में ऐसा नहीं है। इसके अ्तिरिक्त दोनों की रसानुभूति की प्रक्रिया में भी अन्तर है; भट्टनायक के अनुसार तो भोजकत्व नामक व्यापार के द्वारा सत्त्व का उद्रक होकर आनन्दमय अ्र्प्रनुभूति होती है; किन्तु धनिक के अनुसार काव्य के अर्थ के साथ सहृदय के चित्त की तन्मयता होने से आत्मानन्द की अनुभूति होती है। यह केवल शब्दों का भेद नहीं है, धारणा का भेद है। (iv) अभिनवगुप्त-रस-सूत्र के सर्वश्रेष्ठ व्याख्याकार अभिनवगुप्त हैं। उनकी व्याख्या ही यत्किञ्चित् परिवर्तन के साथ परवर्ती आचार्यों द्वारा स्वीकृत होती रही है। तदनुसार स्थायी भाव का विभाव आदि के साथ व्यङ्गयव्यञ्जक भाव सम्बन्ध होने से रस की अभिव्यक्ति होती है। यह मत रसाभिव्यक्तिवाद या रसव्यक्तिवाद कहलाता है और शैवागम पर आधारित माना जाता है। इसके अ्प्रनु- सार रस सहृदय के चित्त में अभिव्यक्त हुआ करता है। रस-प्रक्रिया तथा रसस्वरूप इस प्रकार है :- सहृदयों के चित्त में रति आदि स्थायी भाव वासना रूप में विद्य- मान होते हैं। सहृदय जन लोक में भी ललना आदि कारणों के द्वारा रति आदि भाव का अनुमान करने में निपुण हुआ करते हैं। वे समभते हैं कि जहाँ प्रमदा इत्यादि कारण, कार्य तथा सहकारी होते हैं वहाँ लोक में रति आदि भाव का उद्० भव देखा जाता है। फिर वे काव्य पढ़ते हैं, सुनते हैं या नाटक देखते हैं तो वहाँ प्रमदा आदि का विभाव आदि के रूप में अनुभव करते हैं [अर्थात् काव्य-नाट्य में प्रमदा आदि रति आदि भाव के कारण के रूप में नहीं होते अपितु अपने विभावन

Page 45

३४ दश रूपकम्

(= रति आदि में आस्वादयोग्यता का आरविर्भाव करना) आदि व्यापार के कारण अलौकिक विभाव आदि का रूप धारण कर लिया करते हैं।] काव्य-नाटय में ये विभाव आदि साधारणीकृत रूप में भासित होते हैं। अथवा कहिये कि 'ये मेरे ही हैं, शत्र के हैं तटस्थ के हैं' या 'ये मेरे नहीं हैं, शत्र के नहीं हैं तटस्थ के नहीं है'- इन प्रतीतियों से विलक्षस प्रतीति उन विभाव आदि के विषय में हुआ करती है, यही इनका साधारणीकरण कहलाता है। साधारणीकृत विभाव आदि के द्वारा सह्यों के चित्त में स्थित रति आदि स्थायी भाव अभिव्यक्त हो जाता है। इस अवस्था में सहृदय सामाजिक का परिमित प्रमातृभाव भी नहीं रहता वह अपरिमित हो जाता है तथा रति आदि भाव की सामान्य रूप से प्रतीति हुआ करती है। समस्त सहृदय जन समान रूप से उसका आस्वादन किया करते हैं। यह आस्वादन ब्रह्मा- नन्द के समान किसी विलक्षण आनन्द का अनुभव मात्र है, यही रस है। यह रस स्थायी भाव से विलक्षण है (स्थायिविलक्षण एव रसः) आस्वादन का विषय है या कहिये आस्वादन रूप ही है-तेन विभावादिसंयोगाद रसना यतो निष्पद्यतेऽ तस्तथाविधरसनागोचरो लोकोत्तरोऽर्थो रस इति तात्प्यं सूत्रस्य (अभि० भा० पृ० २८६)। यह रस न कार्य है, न ज्ञाप्य है; अपितु विभाव आदि के द्वारा व्यङ्गय है। यही मुख्य रूप से काव्य की आत्मा है। राजशेखर, मम्मट, रुय्यक, शौद्धोदनि तथा विश्वनाथ कविराज इत्यादि ने भी प्रायः इसी प्रकार का रस-सिद्धान्त स्वीकार किया है। जैसा कि ऊपर कहा गया है, अभिनवगुप्त का मन्तव्य धनञ्जय एवं धनिक के सामने नहीं था। उन्होंने ध्वनिकार के व्यङ्गयव्यञ्जक-भाव का ही विरोध किया है। (६) दशरूपक का रसविषयक मन्तव्य दशरूपक का रस-सम्बन्धी मत संक्षेप में इस प्रकार है :- रस की अनुभूति रसिक को ही होती है। रसिक के चित्त में रति आदि भाव पहले से ही विद्यमान होते हैं। जब काव्य के द्वारा विभाव, अनुभाव, सात्त्विक भाव और व्यभिचारी भावों की उपस्थिति कराई जाती है तो उनके द्वार। रसिक के चित में स्थित रति आदि भाव पुष्ट (=आस्वादन योग्य) हो जाता है। वही आस्वाद्यमान रति आदि भाव रस है जो विशेष प्रकार की आ्त्मानन्द की अनुभूति ही है। किन्तु प्रश्न यह है कि काव्य-नाटय से रस की अनुभूति कैसे होती है। काव्य के शब्दों के वाच्य जो नायक आदि हैं उनका शब्दों के द्वारा सामान्य रूप उपस्थित होता है; अरथात् वे राम तथा सीता आदि के रूप में नहीं प्रतीत होते अपितु सामान्यतः किसी उदात्त नायक या नायिका आदि के रूप में प्रतीत हुआ करते हैं। शब्दों द्वारा उपस्थित किया गया उनका यह रूप रसिकों के चित्त में साक्षात् सा भासित होने लगता है। इस प्रकार काव्य के अतिशयोक्ति रूप व्यापार द्वारा विशिष्ट रूप में होकर लौकिक प्रमदा आदि काव्य नाटय में विभाव आदि

Page 46

भूमिका ३५

कहलाने लगते हैं। वस्तुतः काव्य द्वारा रसिकों की बुद्धि में उपस्थित होने वाला प्रमदा आदि का रूप ही आलम्बन विभाव आदि हुआ करता है, बाह्य सीता आदि की आलम्बन आदि के रूप में अपेक्षा नहीं होती (४.२ अवलोक)। रसिक जन यह जानते हैं कि ये विशेष प्रकार के भाव तथा चेष्टाएँ रति आदि भाव के विना नहीं हुआ करते। इसीलिये विभाव आदि के बोध से लक्षणा द्वारा रति आदि स्थायी भाव की प्रतीति हो जाया करती है, रति आदि भाव व्यञ्जना का विषय नहीं है। जिस प्रकार वाक्य में पदार्थों का बोध होने के पश्चात् शब्द द्वारा उक्त या प्रकरण आदि द्वारा जानी गई क्रिया कारकों से अन्वित होकर वाक्य का अर्थ होती है; उसी प्रकार काव्य के शब्दों द्वारा बोधित विभाव आदि से अ्न्वित (संसृष्ट) शब्द द्वारा उक्त या लक्षणागम्य रति आदि स्थायी भाव काव्य का अर्थ ही है, जो तात्पर्यं वृत्ति द्वारा जाना जाता है। विभाव आदि से संसृष्ट स्थायी भाव के साथ सहृदय के चित्त की तन्मयता(=संभेद) हो जाती है और सहृदयों को विशेष प्रकार के आत्मानन्द का आ्स्वादन होता है। यही आस्वादन रस है (स्वाद; काव्यार्थसम्भेदा- दात्मानन्दसमुद्भवः ४.४३) । काव्य रस का भावक होताहै या कहिये कि काव्य केवाच्यार्थ विभाव आदि भावक होते हैं और रस आदि भाव्य होते हैं। अ्रतः रस आदि तथा काव्य में भाव्य-भावक सम्बन्ध है। धनिक के रस-सम्बन्धी मन्तव्य में रति आदि भाव की सामाजिक के चित्त में पहिले से विद्यमानता, लौकिक कारण आदि का काव्य के द्वारा विभाव आदि के रूप में हो जाना तथा काव्यार्थ=विभाव आदि से संसृष्ट रति आदि स्थायी भाव के साथ रसिक के चित्त की तन्मयता=स्वपर विभाव का लुप्त हो जाना इत्यादि तथ्य अभिनवगुप्त के मत से अधिकांश में समानता रखते हैं। सम्भ- वतः इसीलिए कीथ जैसे विद्वानों का विचार है कि "अभिनवगुप्त के द्वारा प्रति पादित रस-सिद्धान्त दशरूपक का भी सिद्धान्त है, यद्यपि वहां पर प्रतिपादन की संक्षिप्तता के कारण वह अधिक दुरूह हो गया है"। (संस्कृत नाटक, पृ० ३४२)। वस्तुतः दशरूपक का रस-विषयक मन्तव्य साहित्य जगत् में प्रसिद्ध अ्रन्य सभी रस सम्बन्धी मन्तव्यों से पृथक है। जैसा कि अभी ऊपर दिखलाया गया है, भट्ट लोल्लट शाङ्कुक तथा भट्टनायक के मत के साथ भी इसकी आंशिक रूप से समानता दृष्टिगोचर होती है, फिर भी पूर्णं रूपमें यह उनसे भिन्न ही है। उन तीनों के मिश्रित मन्तव्यों की अपेक्षा भी दशरूपक का रसविषयक मन्तव्य भिन्न ही है। अतः यह नहीं कहा जा सकता कि दशरूपक का रससम्बन्धी मत भट्टलोल्लट, शङ्- कुक तथा भट्टनायक के मतों का संमिश्रण मात्र है। अभिनवगुप्त तथा दशरूपक के रस-सम्बन्धी मन्तव्यों में भी मौलिक भेद है। दशरूपक के अनुसार रस आदि तथा काव्य में जो भाव्य-भावक सम्बन्ध है, वह अभिनवगुप्त के अभिमत अभि- व्यक्तिवाद (=व्यड्मूय-व्यञ्जक भाव) से नितान्त भिन्न है। अभिनवगुप्त का अ्र्पभि सत साधारणीकरण एवं प्रमाता का अपरिमित भाव इत्यादि भी दशरूपक के

Page 47

३६ दशरूपकम्

रस-सन्बन्धी मन्तव्य में परिलक्षित नहीं होते। मीमांसा के आधार पर परिकल्पित दशरूपक के रस-सिद्धान्त में शैवागम की भित्ति पर स्थापित अभिनवगुप्त के रस सिद्धान्त के साथ केवल ऊपरी समानता ही है। दशरूपक के रस-सम्बन्धी मन्तव्य का अपना एक विशिष्ट रूप ही है। ५ संस्कृत साहित्यशास्त्र विशेषकर नाठ्यशास्त्र को दशरूपक की देन दशरूपक का लक्ष्य है रूपक के मुख्य तत्त्व-वस्तु, नायक और रस का विवे- चन तथा रूपक के दस भेदों का निरूपण। इस लक्ष्य की सिद्धि के लिये विशेष रूप से भरत के नाट्यशास्त्र का आश्रय लिया गया है। साथ ही उस समय उपलब्ध नाट्य विद्या के अन्य ग्रन्थों से भो सहायता ली गई है। सम्भवतः कोहल इत्यादि के मन्तव्य का भी इस पर प्रभाव पड़ा है इसके अतिरिक्त भामह उद्भट आनन्दवद्धन, रुद्रट आदि के साहित्यशास्त्र सम्बन्धी ग्रन्थों का भी स्पष्ट प्रभाव परिलक्षित होता है। उस समय उपलब्ध रूपकों तथा काव्यों से यथावसर उदाह- रण प्रस्तुत किये गये हैं तथा नाट्य सम्बन्धी विषयों के स्पष्टीकरण में भी उनसे सहायता ली गई है; जैसे दूती के गुणों का निरूपण करते हुए मालतीमाधव को उद्धृत किया गया है (२.२६ वृत्ति)। यहां पूर्ववर्ती आचार्यो के मन्तव्यों का बुद्धि पूर्वक स्वीकरण त्ररथवा आ्वश्यकतानुसार युक्तिपूर्वक निराकरण किया गया है साथ ही नवीन मन्तव्यों की उद्भावना भी की गई है। संक्षेप में दशरूपक की विशिष्ट देन इस प्रकार है- (i) नाट्य-सम्बन्धी सामग्री का नवीन ढंग से विश्लेषण करना। (ii) मुख्य रूप से परमानन्द रूप रसास्वादन ही रूपकों का प्रयोजन है, यह स्थापना बरना (१.६)। (iii) नृत्य तथा वृत्त से भेद दिखलाते हुए नाट्य का लक्षसा (iv) रूपक के भेदक तत्त्वों का निर्देश। (V) विविध दृष्टियों (योजना, वर्न, नाटयोक्ति) से वस्तु-विभाजन । (VI) नायक-नायिका और उनके सहायकों का सरल-सुबोध वर्णन । (VII) भारती आदि वृत्तियों तथा देश-भेद से भिन्न-भिन्न भाषा आदि की प्रवृत्तियों का सक्षित्त निरूपण (Viii) उद्भट के अनुया यियों के मत का निराकरण करते हुए यह स्थापना करना कि कशिकी, सात्त्वती तथा आरभटी ही अर्थवृत्तियाँ हैं, इनसे भिन्न कोई अर्थवृत्ति नहीं है (२.६०-६१)। (XI) रस-प्रक्रिकया-विषयक मौलिक मत की उद्भावना; रस आदि और काव्य में व्यङ्गयव्यञ्जक भाव सम्बन्ध है, ध्वनिवादियों के इस मत का निराकरण करते हुए भाव्य-भावक सम्बन्ध दिखलाना। (X) नाट्य में शान्त रस का निषेध (४.३५,- ४५)। (XI) रसास्वादन के क्रम में मानसिक प्रक्रिया के यथार्थ स्वरूप के निरूपण का प्रयास, "उसके आधार पर रसों के भेद बतलाये गये हैं। शृङ्गार, वीर, बोभत्स और रौद्र-ये चार रस मूल रस माने गये हैं। इन चारों का सम्बन्ध चार

Page 48

३७

चित्तभूमियों से है-विकास, विस्तर, क्षोभ और विक्षेप। स्पष्ट है कि इन चित्त- भूमियों तक अन्तर्दर्शन के द्वारा पहुंचा जा सकता है। इनकी यह विशेषता नाट्य- शास्त्र में वर्णित चार मुख्य (मूल) और चार गौ रसों के सिद्धान्त का अर्ध- मनोवैज्ञानिक तार्किक आधार प्रस्तुत करती है।" (कीथ, संस्कृत नाटक, पृ० ३४३) (XI1) रस दस होते हैं, या इनसे भी अ्धिक हो सकते हैं इत्यादि रुद्रट (काव्या- लङ्कार १२.३-४) के मत का निराकरण करके 'अष्टौ नाटय रसाः स्मृताः' की स्थापना (दश० ४.३५,३६ . (XIII) प्रीति, भक्ति आदि अ्न्य भाव तथा रसों का हर्ष उत्साह आदि में अन्तर्भाव दिखलाना(४.८३)।(XIV) नाट्यालङ्वार तथा नाट्य-लक्षणों का उपमा आदि अलद्दारों तथा हर्ष उत्साह अदि भावों में अन्तर्भव मानना (४. ८४) जब कि भरत मुनि ने इनका पृथक्श; निरूपण किया था और धनञ्जय के परवर्ती विश्वनाथ इत्यादि ने भी पृथक् निरूपण किया है। इससे यह प्रतीत होता है कि दश- रूपक की प्रवृत्ति सरलता और सुबोधता की ओर रही है।(XV) नाटक आदि के लक्षणों मेंभी दशरूपक की अपनी विशेषताएँ है (जिनका यथावसर निर्देश किया गया है) उदाहरणार्थ 'प्रकरण का नायक धीर प्रशान्त ही होता है, यह स्थापना, ना० द० (३.११७) में इसका विरोध किया गया है। (XVI) प्रसङ्गवश रूपकों के किसी तत्त्व की समीक्षा, जैसे नागानन्द में शान्त रस नहीं अपितु दयावीर है उसका नायक जीमूतवाहन धीर प्रशान्त नहीं अपितु धीरोदात्त है तथा परोपकार में प्रवृत्ति भी विजिगीषा कही जा सकती है (२.४-५ तथा ४.३५) । (XVII) नामो- ल्लेख करके रूपकों तथा काव्यों के उदाहरण प्रस्तुत करना, जैसा कि कम आचार्यों ने किया है। इससे अनेक कवियों तथा ग्रन्थों के समय-निर्धारण में सहायता मिलती है। इसी प्रकार दशरूपक को अन्य देन भी खोजी जा सकती हैं। कतिपय परवर्ती आचार्यों ने यत्र-तत्र दशरूपक के मन्तव्यों की आलोचना अवश्य की है। किन्तु उनके ग्रन्थों के परिशीलन से विदित होता है कि वे किसी न किसी अंश में दशरूपक के ऋणी हैं। जैसा कि ऊपर दिखलाया जा चुका है, भावप्रकाशन में दशरूपक का पर्याप्त आधार लिया गया है; नाटयदर्पण भी किसी रूप में दशरूपक से प्रभावित है, यद्यपि प्रतिद्वन्द्विता की भावना के कारण वहाँ धनञ्जय के लिए कठोर शब्दों का प्रयोग कर दिया गया है (द्र० ऊपर)। प्रतापरुद्र-यशोभूषण में दशरूपक का बहुत प्रभाव परिलक्षित होता है तथा साहित्यदर्पण में भी। भानुदत्त की रसतराङ्गणी भी दशरूपक की ऋणी प्रतीत होती है। सम्भवतः वहाँ लौकिक रस और अलौकिक रस का भेद दशरूपक के आधार पर किया गया है। इस प्रकार परवर्ती आचार्यों ने जाने, अनजाने में दशरूपक का महत्त्व स्वीकार करके अपनी गुग्राहिता का परिचय दिया है। धनञ्जय एवं धनिक की यह कृति अत्यन्त महत्त्व पूरर है। उनका दशरूपक नाटयशास्त्र का अपूर्व ग्रन्थ है। -: 0 :-

Page 49

15 TE HF ([IX) IFPIRS fF COUI IPY FOR SON

क ज (VX) सीकर पिवाक

-w (1IVX)YeiE108

हद 1व पिगा शठक

Page 50

प्रथ 8 श्रीधनञजयविरचितं 8

दशरूपकम् धनिककृतावलोकसहितं हिन्दीव्याख्योपेतं च

प्रथम: प्रकाश: इह सदाचारं प्रमाणयन्द्रिरविघ्नेन प्रकरस्य समाप्त्यर्थमिष्टयोः प्रकृताभिमत- देवतयोनंमस्कार: क्रियते श्लोकद्वयेन- (१) नमस्तस्मै गणेशाय यत्कएठः पुष्करायते। मदाभोगघनध्वानो नीलकएठस्य ताए्डवे ॥ १ ॥ यस्य कण्ठः पुष्करायते=मृदङ्गवदाचरति; मदाभोगेन घनध्वानः=निबिड- ध्वनिः, नोलकण्ठस्य=शिवस्य, ताण्डवे=उद्धते नृत्ते, तस्मै गणोशाय नमः। अत्र खण्डश्लेषाक्षिप्यमाणोपमाच्छायालङ्वार :- नीलकण्ठस्य=मयूरस्य ताण्डवे यथा मेघ- ्वनि: पुष्करायत इति प्रतीतेः । आ्रचार्य धनञजय का दशरूपक नाट्य (रूपक) की विवेचना का एक प्रामाशिक ग्रन्थ है। इसमें रूपक के विविध अङ्गों का संक्षिप्त किन्तु विशद विवेचन है। प्रतिपाद्य विषय का चार प्रकाशों में विभाजन किया गया है। प्रथम प्रकाश में मङ्गल से आरम्भ करके ग्रन्थ का प्रयोजन, रूपक का लक्षण तथा रूपकों के भेदक तत्त्वों (वस्तु, नेता तथा रस) का निरूपण करके 'वस्तु' तत्त्व का वर्णन किया जा रहा है। मङ्गलाचरण शिष्टों के आचार को प्रमाण मानते हुए इस प्रकरण ग्रन्थ की निरविघ्न समाप्ति के लिये (धनञ्जय ने) दो श्लोकों द्वारा अभीष्ट=प्रकृत और अभिमत (दो) देवताओं को नमस्कार किया है- जिन गोश जी का मद की परिपूर्ता (आरभोग) से गम्भीर ध्वनि वाला कएठ, नीलकएठ (शिव) के ताए्डव (नृत्य) में मृदङ्ग का काम करता है, उन गणेश जी को नमस्कार है ॥१॥ (अनुष्दुभ, वृत्त) जिन (गरेश) का कण्ठ मृदङ़ग (=पुष्कर) के समान कार्य करता है (पुष्करायते=पुष्करइव आचरति), क्योंकि वह मद के आभोग (परिपूर्णता, वृद्धि) से गम्भीर (=घन) ध्वनि वाला है, कहाँ ? नीलकण्ठ पर्थात् शिव के ताण्डव (= उद्धत) नृत्य में, उन गणेश जी के लिये नमस्कार है। यहां खण्डश्लेष के द्वारा उपमा अलङ्कार की छाया प्रकट हो रही है, क्योंकि नीलकण्ठ अर्थात् नीले कण्ठ वाले मयूर के ताण्डव में जैसे मेघ की ध्वनि मृदङ्ग का काम करती है (उसी प्रकार शिव

Page 51

२ दशरूपकम्

(२) दशरूपानुकारेण यस्य माद्यन्ति भावकाः । नमः सर्वविदे तस्मै विष्णवे भरताय च ॥ २ ॥

के ताण्डव नृत्य में गरेश की कण्ठध्वनि मृदङ्ग का वाम करती है)-यह प्रतीति हो रही है ।य टिप्पणी- (१) मङ्गलाचरण करने में शिष्टाचार ही मुख्य प्रमाण है। शिष्ट जन ग्रन्थ के आरम्भ में मङ्गलाचरण किया करते हैं। उनके आचरण को प्रमाण मानते हुए ग्रन्थकार (धनञ्जय) भी यहाँ मङ्गलाचरण कर रहे हैं। मङ्गला- चरसा का फल है-ग्रन्थ की निर्विध्न समाप्ति (विशेष द्र०, न्यायमुक्तावली, मङ्गलश्लोक दिनकरी तथा रामरुद्री टीका) । (२) प्रकरण-दशरूपक एक प्रकरण ग्रन्थ है। जिस रचना में किसी शास्त्र के एक अंश का व्यवस्थित, संक्षिप्त किन्तु विशद विवेचन होता है, वह प्रकरण ग्रन्थ कहलाता है। दशरूपक में साहित्य शास्त्र या कहिये कि नाट्यशास्त्र के एक अंश दशरूपकों का संक्षिप्त तथा विशद विवेवन है। (३) प्रकृता- भिमतदेवतयो :- इष्ट देवता को नमस्कार करना ही मङ्गलाचरण का स्वरूप है। यहाँ इष्ट देवता दो प्रकार के हैं-(क) प्रसङ्ग के अनुकूल=प्रकृत=प्रकरण प्राप्त (ख) अभिमत=पूजनीय । प्रथम तथा द्वितीय श्लोक में अभिमत देव गणेश तथा विष्णु को साक्षान् रूप से नमस्कार किया गया है किन्तु साथ ही दो प्रकृत देवों- नाट्य में नृत्त (एव नृत्य) के प्रवर्तक शिव को तथा प्रयोग के प्रवर्तक भरत-को भी नमस्कार किया जा रहा है। (४) खण्डइलेष-श्लेष दो प्रकार का है अखण्ड और सखण्ड (या खण्डलेष)। जहाँ किसी पद के खण्ड मात्र में श्लेष होता है वहाँ खण्डश्लेष कहलाता है। यहाँ पर 'मदाभोगघनध्वानः' इस पद के 'घनध्वानः' इस खण्ड में ही श्लेष है अतः खण्डश्लेष है। (५) उपमाच्छाया -- जहां उपमा शब्दों द्वारा कही जाती है वहां उपमा वाच्य या अभिधेय होती है तथा स्पष्ट होती है। किन्तु जहाँ उपमा केवल तात्पर्य (तात्पर्यवृत्ति) द्वारा जानी जाती है वहां उपमाच्छाया (=अ्रस्पष्ट उपमा या तात्पर्य से प्रतीत होने वाली उपमा) कहलाती है। इसी प्रकार अन्य अलद्दारों के विषय में भी कहा जा सकता है। यहां उपमाच्छाया का अरथ उपमा-व्यञ्जना या उपमाध्वनि नहीं है क्योंकि धनञ्जय एवं धनिक व्यञ्जना वृत्ति को स्वीकार नहीं करते (द्र०, आगे ४.३७)। (की उन सर्वविद् (१. सर्वज्ञ तथा २. नाट्य-विद्या के पूर्ण ज्ञाता) विष्णु तथा आचार्य भरत को नमस्कार है जिनके दशरूपों (१. दस अवतारों, २. नाटक आदि दशरूपकों) के अनुकार (१. ध्यान, २. अभिनय) के द्वारा भावक जन (१. ध्यान करने वाले, २. रसिक) प्रसन्न हो जाते हैं (माद्यन्ति) ॥२॥ (अनुष्टुभ छन्द)

Page 52

प्रथम: प्रकाश: ३

एकत्र मत्स्यकूर्मादिप्रतिमानामुद्दशेन, अन्यत्रानुकृतिरूपनाटकादिना यस्य भावका := ध्यातारो रसिकाश्च, माद्यन्ति=हृष्यन्ति, तस्मै विष्यवेऽभिमताय प्रकृताय भरताय च नमः । श्रोतु: प्रवृत्तिनिमित्तं प्रदर्श्यते- (३) कस्यचिदेव कदाचिद्दयया विषयं सरस्वती विदुषः। घटयति कमपि तमन्यो व्रजति जनो येन वैदग्धीम्॥३॥ तं कञ्चिद्विषयं=प्रकरणादिरूपं कदाचिदेव कस्यचिदेव कवेः सरस्वती योज- यति येन=प्रकरणादिना विषयेरान्यो जनो विदग्धो भवति।

एक (विष्यु) पक्ष में (वशरूपानुकारेण का अर्थ है-) मत्स्य, कूर्म आदि रूपों (प्रतिमा) को लक्ष्य करके, दूसरे (भरत) पक्ष में अनुकृति रूप जो नाटक आदि रूपक हैं उनके द्वारा। जिसके भावक=(१) (विष्यु-पक्ष में) ध्यान करने वाले, (२) (भरत-पक्ष में) रसिक जन । माद्यन्ति=हर्षित हो जाते हैं। उन विष्णु के लिये जो प्रभिमत देव हैं तथा भरत के लिये जो प्रकृत (प्रकरण के अनुकूल) हैं-नमस्कार है। टिप्पणी-(१) यहाँ श्लिष्ट विशेषणों द्वारा नाट्य शास्त्र के प्रवर्तक भरत मुनि की स्तुति की गई है, 'दशरूपानुकारेण' तथा 'भादक' दोनों पदों में श्लेष है (द्र० अनुवाद)। (२) विष्णु शब्द के प्रयोग द्वारा यहाँ ग्रन्थकार धनञ्जय ने अपने पिता को भी नमस्कार किया है। (द्र० भूमिका)। प्रस्तुत ग्रन्थ का प्रयोजन किसी रचना के दो प्रकार के प्रयोजन होते हैं- २. पाठकों की दृष्टि से और २. लेखक की टटि से। दोनों का क्रमशः निरूपण किया जा रहा है। श्रोता (पाठक) की (इस ग्रन्थ में) प्रवृत्ति का प्रयोजन दिखलाया है :- सरस्वती कृपा करके कभी किसी विद्वान को किसी ऐसे विषय से घटित कर देती है, जिससे अन्य जन भी पाणडत्य को प्राप्त हो जाते हैं। ।।३। (आर्यावृत्त) अर्थात् उस किसी विषय को=प्रकरण आदि के विषय को, कभी ही किसी प्रतिभाशाली जन के लिये (कवेः) सरस्वती घटित करती है, जिस प्रकरण आदि से ब्रन्य जन विद्वान् हो जाते हैं। प्रन्थकार (इस ग्रन्थ की रचना में) अपने प्रवृत्त होने का प्रयोजन दिखलाते हैं :-

Page 53

४ दशरूपकम

स्वप्रवृत्तिविषयं दर्शयति- (४) उद्धृत्योद्धृत्य सारं यमखिलनिगमान्नाट्यवेदं विरिनिच- इचक्रे यस्य प्रयोगं मुनिरपि भरतस्ताएडवं नीलकएठः । शर्वाणी लास्यमस्य प्रतिपदमपरं लक्ष्म क: कर्तु मीष्टे नाख्यानां किन्तु किञचित्प्रगुसरचनया लक्षणं संत्तिपामि ॥४॥। यं नाट्यवेदं वेदेभ्यः सारमादाय ब्रह्मा कृतवान्, यत्संबद्धमभिनयं भरतश्चकार करणाङगहारानकरोत्, हरस्ताण्डवमुद्धत वृतं कृतवान्*, लास्यं सुकुमारं नृत्तं पार्वती कृतवती, तस्य सामस्त्येन लक्षणं कतु कः शक्तः, तदेकदेशस्य तु दशरूपस्य संक्षेप: क्रियत इत्यर्थः ।

ब्रह्मा ने समस्त वेदों का सार निकाल-निकाल कर जिस नाटयवेद की रचना की, मुनि होकर भी भरत ने जिसका प्रयोग (अभिनय) किया, शिव ने जिसका ताए्डव तथा पार्वती ने जिसका लास्य किया; उस (नाट्य- वेद) का प्रतिपद (प्रत्येक अङ्ग का) लक्षणा कौन कर सकता है तथापि किसी प्रकृष्ट गुण वाली अथवा सरल (प्रगुश) रचना के द्वारा मैं नाट्य के कुछ लक्षणों को संच्षेप में प्रस्तुत कर रहा हूँ।४॥। (स्त्रग्धरा) जिस = नाट्य वेद को, वेदों से सार लेकर ब्रह्मा ने रचा, जिसका अभिनय= करण तथा अङ्गहार भरत ने किया, शिव ने ताण्डव=उद्धत नृत्त औौर पार्वती ने लास्य =सुकुमार नृत्त किया, उसका पूर्णरूप से (=सामस्त्येन=प्रतिपदम) लक्षण कौन कर सकता है। किन्तु यहाँ उस (नाटयवेद के एक भाग दशरूपक का संक्षेप (में निरूपण) किया जा रहा है। टिप्पणी-(१) यहाँ नाट्यवेद की रचना के विषय में प्रचलित भारतीय परम्परा की ओर संकेत किया गया है। भरत के नाट्य शास्त्र के प्रथम अध्याय में नाट्य की उत्पत्ति तथा अभिनय आदि के प्रवर्तन की कहानी कही गई है। (२) करण और अङ्गहार-हाथ-पैर इत्यादि को व्यवस्थित करनेका क्र्म ही करण कहलाता है-हस्तपादसमायोगो नृत्यस्य करणं भवेत्, (भरत) । कलात्मक ढंग से अ्ङ्गों का विक्षेप ही अङ्गहार है-अ्ङ्गहारोऽङ्गविक्षेपः (भरत)। [शङ्का हो सकती है कि जब इसी विषय का नाटचवेद में विस्तृत वर्णन किया जा चुका है तो इस ग्रन्थ की रचना पिष्टपेषण (पुनरुक्ति) मात्र है] अतः विषय की एकता के कारण होने वाली पुनरुक्ति का परिहार करते हैं :-

  • 'नृत्तं कृतवान्' क्वच्चिन्नास्ति ।

Page 54

प्रथमः प्रकाशः

विषयैक्यप्रसक्त पौनरुक्त्यं परिहरति- (५) व्याकीर्ों मन्दबुद्धीनां जायते मतिविभ्रमः । तस्यार्थस्तत्पदैस्तेन संच्षिष्य क्रियतेऽवजसा ।४॥ व्याकीर्ण=विक्षिप्ते विस्तीर्णो च रसशास्त्रे मन्दबुद्धीनां पुसां मतिमोहो भवति, तेन तस्य नाट्यवेदस्यार्थस्तत्पदैरेव संक्षिप्य ऋजुवृत्त्या क्रियत इति। इदं प्रकरणं दशरूपज्ञानफलम्। दशरूपं किं फलमित्याह -- (६) आ्ररानन्दनिस्यन्दिषु रूपकेषु व्युत्पत्तिमात्रं फलमल्पबुद्धि: । योऽपीतिहासादिव दाह साधुस्तरमै नमः स्वादुपराड्मुखाय ॥६॥। तत्र केचित्- 'धर्मार्थकाममोक्षेषु वैचक्षण्यं कलासु च। करोति कीति प्रीति च साधुक व्यनिषेवणम् ।' इत्यादिना त्रिवर्गादिव्युत्पत्ति काव्यफलत्वेनेच्छन्ति तन्निरासेन स्वसंवेद्यः परमानन्दरूपो रसास्वादो दशरूपाां फलं न पुनरितिहासादिवत् त्रिवर्गादिव्युत्पत्ति- मात्रमिति दर्शितम्। नम इति सोल्लुण्ठम् । विस्तृत ग्रन्थ में मन्दबुद्धि वाले जनों को बुद्धि-भ्रम (Confusion) हो जाता है इसलिये उस (नाट्यवेद) का विषय (अररथ) यहाँ संच्षिप्त करके उसी के शब्दों द्वारा सरल रीति से (निरूपित) किया जा रहा है॥५॥ (अनुष्टुभ) व्याकीर्ण-बिखरे हुए तथा विस्तृत रसशास्त्र (नाटयवेद) में, मन्द बुद्धि वाले जनों का मतिमोह हो जाता है इस लिये उस नाट्यवेद का अरथ नाट्यवेद के शब्दों के ही द्वारा संक्षिप्त करके सरल रीति से (अञ्जसा=ऋजुवृत्त्या) प्रतिपादित किया जा रहा है। इस प्रकार इस प्रकरण ग्रन्थ का प्रयोजन है-दशरूपकों का ज्ञान। दश- रूपकों का क्या प्रयोजन होता है, यह बतलाते हैं- जो अल्पबुद्धि वाला आनन्द को प्रवाहित करने वाले रूपकों का फल भी इतिहास आदि के समान केवल व्युत्पत्ति (धर्म आदि का ज्ञान) को ही बतलाता है उस रसास्वाद से विमुख जन को नमस्कार है ॥६॥ (इन्द्रवज्रा) "सत् काव्य का सेवन (रचना तथा अनुशीलन) धर्म, अर्थ काम, मोक्ष (के विषय) में विद्वसा तथा कलाओं में प्रवीणता, (कवि की) कीरति एवं (पाठक के हृवय में) प्रीति को उत्पन्न करता है" इस प्रकार कहते हुए कुछ आचार्यों (भामह काव्यालङ्गार १२) ने त्रिवर्ग (धर्म, अर्थ, काम) आदि के जान को ही काव्य का कोजन माना है। उसका निराकण करके (धनञजय ने) यह दिखलाया है कि (सहृदयों की) अपनी अनुभूति का विषय जो परम आनन्द-रूपर सास्वादनय है वह दश- रूपकों का प्रयोजन है, इतिहास आदि के समान त्रिवर्ग आदि का ज्ञान ही इनका प्रयोजन नहीं है,। "रसास्वाद से विमुख जन को नमस्कार है" वह कथन उपालम्म के लिये है।

Page 55

६ दश रूपकम्

'नाट्यानां लक्षणं संक्षिपामि' इत्युक्तम, कि पुनस्तन्नाट्यमित्याह- (७) अवस्थानुकृतिर्नाट्य- काव्योपनिबद्धधीरोदात्ताद्यवस्थानुकारश्चतुविधाभिनयेन तादात्म्यापत्तिन ट्थम्। टिप्पणी-(१) प्राचीन काल से ही आचार्यों ने काव्य तथा रूपकों के प्रयोजनों पर विचार किया है। इस विषय में आचार्यों के विविध दृष्टिकोण हैं। यहाँ भामह (१.२) के मत का निराकरण विया गया है। धनञ्जय के मत में रूपकों का मुख्य प्रयोजन है-परम आनन्द की अनुभूति कराना, किन्तु त्रिवर्ग आदि का ज्ञान कराना भी रूपकों का गीए प्रयोजन है ही। 'व्युत्पत्तिमात्रम्' में प्रयुक्त 'मात्र' पद से यह तथ्य स्पष्ट प्रकट हो रहा है। दूसरी ओर भामह के अनुसार धर्म आदि का ज्ञान कराना काव्य या रूपक का मुख्य प्रयोजन है। साथ ही 'प्रीति' भी काव्य का प्रयोजन है ही। यदि प्रीति का अभिप्राय 'आनन' लिया जाता है तो भामह के अनुसार आनन्दानुभूति भी काव्य का प्रयोजन होगा। चाहे वह गौण ही क्यों न हो। तब तो धनञ्जय ने भामह को स्वादुपराङ्मुख कहते हुए जो उस पर आक्षेप किया है इसका तात्पर्य यही है कि धनञ्जय के अनुसार परम आनन्द की प्राप्ति ही काव्य का मुख्य प्रयोजन है। (२) इस प्रकार ग्रन्थकार ने अ््पनुबन्धचतुष्टय का संक्षेप में निरूपण किया है। अनुबन्धचतुष्टय है-विषय, अधिकारी, सम्बन्ध और प्रयोजन। इस ग्रन्थ का विषय दशरूपक है। दशरूपकों के ज्ञान का इच्छुक जन इसका अधि- कारी है। विषय और प्रकरण ग्रन्थ का प्रतिपाद्य-प्रतिपादक -- भाव सम्बन्ध है;अर्थात् दस प्रकार के रूपक प्रतिपाद्य हैं और ग्रन्थ उनका प्रतिपादक। इसग्रन्थ की रचना का प्रयोजन है :- रूपकों का स्पष्ट तथा संक्षिप्त विवेचन, जिससे मन्दबुद्धि वाले जन भी दशरूपक का ज्ञान कर सकें। पाठक की दृष्टि से इस ग्रन्थ का प्रयोजन है-दशरूपक का ज्ञान। किन्तु इस ज्ञान का भी कुछ फल होना चाहिये ? क्योंकि दशरूपकों से परमानन्द की प्राप्ति होती है इसलिये दशरूपकों का ज्ञान भी सप्रयोजन ही है। इस प्रकार परम आनन्द की अनुभूति ग्रन्थ के प्रयोजन का प्रयोजन है। प्रस्तुत ग्रन्थ के प्रति श्रोता को आकृष्ट करने के लिये ही यह विवेचन किया गया है। नाठ्य या रूपक का स्वरूप 'नाट्य के लक्षणों को संक्षिप्त करता हूँ', यह कहा गया है, अब 'वह नाट्य क्या है?' यह बतलाते हैं :- अ्रप्रवस्था का अ्र्रनुकरण नाट्य कहलाता है। काव्य में वशिगत (नायक की) धीरोदात्त आदि अवस्थाओं का अनुकरण, अर्थात् चार प्रकार के अभिनय द्वारा (अनुकार्य के साथ) एकरूपता प्राप्त कर लेना ही नाटय है। टिप्पणी-(१) नाट्य- नट का भाव या कर्म नाट्य कहलाता है। वह कर्म है-नायकों की उदात्त आदि अवस्थाओं का अनुकरण अथवा अभिनय-कौशल के

Page 56

प्रेथमेंः प्रकाश:

(८) -रूपं दृश्यतयोच्यते। तदेव नाट्यं हृश्यमानतया रूपमित्युच्यते, नीलादिरूपवत्। (e) रूपकं तत्समारोपात्- नटे रामाद्यवस्थारोपेण वर्तमानत्वाद्रूपक मुखचन्द्रादिवत्, इत्येकस्मिन्नर्थे प्रवर्त- मानस्य शब्दत्रयस्य 'इन्द्रः पुरन्दरः शक्र्ः' इतिवत्प्रवृत्तिनिमित्तभेदो दर्शितः ।

द्वारा नट का अनुकार्य(राम आदि) के साथ तादात्म्य (नटमें 'यह राम है' इस प्रकार की एकरूपता) प्राप्त करना। जो काव्य अभिनय के योग्य (अभिनेय) होता है वह भी नाट्य या रूपक कहलाता है। फलतः अभिनेय काव्य=नाटय=दृश्य=रूप - रूपक। (ii) अभिनय चार प्रकार का होता है-आङ्गिक, वाचिक, शहार्य और सात्विक। भुजा आदि अङ्गों का अभिनय आङ्भिक है। वचन के द्वारा किया जाने वाला अभिनय वाचिक है, इसे पाठ्य भी कहते हैं। श्हार्य=ग्राह्य, नाट्य के योग्य अलङ्कार आदि धारण करना; वेश रचना आदि के द्वारा जो अभिनय किया जाता है वह आहार्य कहलाता है। दूसरे के सुख दुःख की भावना से भक्ति अ्न्तः करण को सत्त्व कहते हैं। सत्त्व से निष्पन्न होने वाले भाव सात्त्विक कहे जाते हैं। उन स्तम्भ, स्वेद आदि सातत्विक भावों के द्वारा किया गया अभिनय सात्विक कहलाता है। दृश्य होने के कारण यह नाट्य रूप भी कहलाता है। भाव यह है कि जिस प्रकार दृश्य (चाक्षुष ज्ञान का विषय) होने के कारण नील इत्यादि रूप कहलाते हैं उसी प्रकार हृश्य होने के कारण नाट्य भी 'रूप' कहलाता है। आरोप किया जाने के कारण वह (तत्) नाट्य रूपक कहलाता है। जिस प्रकार मुख में चन्द्रमा का आरोप किया जाने के कारख 'मुख-चन्द्र' में रूपक (अलङ्गार) कहलाता है, इसी प्रकार नट में राम आदि की अवस्था (रूप) का आरोप होने के कारण नाट्य को भी 'रूपक' कहते हैं। इस प्रकार एक ही अर्थ (हृश्य काव्य) में प्रयुक्त होने वाले नाट्य, रूप और रूपक-इन तीनों शब्दों का इन्द्र' पुरन्दर तथा शक्र्क आदि के समान प्रवृत्तिनिमित्त का भेद दिखलाया गया है। टिप्परी (१) धनञ्जय के अनुसार 'रूप' शब्द की व्युत्पत्ति होगी-रुप्यते दृश्यत इति। नाट्यदर्पण के अनुसार-रूप्यन्ते अभिधीयन्त इति रूपाणि नाटकादीनि (पृ० १२)। (२) रूपक -- रूपम् एव रूपकम् (रूप-वम्) या रूपयति इति अ्रथवा आरोपयति इति (1 रुह +शिगच्)। नट में राम आदि (अनुकार्य) के रूप का आरोप करना ही रूपक शब्द की प्रवृत्ति का निमित्त है। (३) प्रवृत्तिनिमित -- जिस निमित्त से किसी अर्थ में शब्द का प्रयोग किया जाता है वह शब्द का प्रवृत्तिनिमित्त कहलाता है; जैसे गोत्व के कारण गायों में गो शब्द का प्रयोग होता है अतः गोत्व गो शब्द का प्रवृत्तिनिमित्त है। एक ही अर्थ (वस्तु) के लिये भिन्न-भिन्न निमित्तों से

Page 57

देशरूप कम्

(१०) -दशघैव रसाश्रयम्॥७। रसानाश्रित्य वर्तमानं दशप्रकारकम्, एवेत्यवधारणं शुद्धाभिप्रायेण। नाटि- काया: संकीर्णत्वेन वक्ष्यमाणत्वात्। तानेव दशभेदानुद्दिशति- (११) नाटकं सप्रकरणं भाण: प्रहसनं डिमः । व्यायोगसमवकारौ वीथ्यक्क हामृगा इति ॥।८।। अ्र्परनेक शब्दों का प्रयोग किया जाता है। वहाँ उन शब्दों के अर्थ में तो भेद नहीं होता किन्तु उन शब्दों के प्रयोग का निमित्त भिन्न-भिन्न हो सकता है। जैसे एक ही व्यक्ति परम ऐश्वर्यवान् होने के कारण इन्द्र तथा पुरों को विदीर्ण करने के कारण पुरन्दर कहलाता है। इसी प्रकार अ्भिनेय या हृश्य काव्य में उदात्त आदि अवस्थाओं का अनुकरण किया जाता है अतः वे नाट्य कहलाते हैं, वे हृश्य हैं इसी से वे रूप कहलाते हैं और वहाँ नट में राम आदि के रूप का आरोप किया जाता है इसलिये वे रूपक कहलाते हैं। ये तीनों शब्द एकार्थवाचक हैं किन्तु प्रवृत्तिनिमित्त का भेद है। नाट्य के प्रकार (भेद) रस पर आश्रित होने वाला यह रूपक दस प्रकार का ही होता है ।७।। भाव यह है कि रूपक रसों पर आश्रित होते हैं, वे दस प्रकार के ही हैं (अ्रधिक नहीं)। यहाँ शुद्ध रूपकों की दृष्टि (अभिप्राय) से ही 'एव' (=ही) शब्द द्वारा अवधारण (रूपक दस प्रकार के ही हैं, इस प्रकार का नियम) किया गया है क्योंकि संकीर्ण रूपक के रूप में आगे नाटिका कही जायेगी। टिप्पणी-भाव यह है कि प्रथमतः रूपक दो प्रकार के हो सकते हैं- १. शुद्ध, २. संकी्। धनञ्जय के अनुसार वस्तु, नेता और रस के आधार पर एक दूसरे से भिन्न स्वरूप वाले दस ही रूपक हैं। ये रूपक के शुद्ध भेद हैं। इनमें से दो या तीन के कतिपय लक्षणों का मिश्रण (संकीणता) जिस रूपक में पाया जाता है वह रूपक का सङ्कीरण भेद है जैसे नाटिका एक सङ्कीर्ण रूपक है, यह आगे (३.४३) बतलाया जायेगा। यह नाटिका भी रस पर आश्रित होती है तथापि यह रूपक का शुद्ध भेद नहीं है अपितु सङ्कीण भेद है। इस प्रकार धनञ्जय का अर्पभिप्राय यह है कि रस पर आश्रित होने वाले अभिनय रूपक कहलाते हैं। इन रूपकों के दो प्रकार हैं- शुद्ध और सङ्कीर्ण। शुद्ध रूपक १० प्रकार के ही होते हैं। इनके अतिरिक्त सङ्कीर्यं रूपक (नाटिका) आदि भी होते हैं। उन सभी का विवेचन करना आवश्यक नहीं है। उन दस भेदों का निर्देश करते हैं :- १. नाटक, २. प्रकरण, ३. भाए, ४. प्रह्सन, ५. डिम, ६. व्यायोग, ७. समवकार, म. वीथी, 8, अ्ङ्क और १०. ईहामृग।

Page 58

प्रथम: प्रकाश: है

ननु- 'डोम्बी श्रीगदितं भारो भाणीप्रस्थानरासकाः । काव्यं च सप्त नृत्यस्य भेदाः स्युस्तेऽपि भारवत् ।' इति रूपकान्तरारामपि भावादवधारणानुपपत्तिरित्याशङ्गयाह- (१२) अ्ररन्यद्भावाश्रयं नृत्यम्- रसाश्रयान्नाट्यां्द्गावाश्रयं नृत्यमन्यदेव। तत्र भावाश्रयमिति विषयभेदान्नृत्य- मिति नृतेरगात्रविक्षेपार्थत्वेनाङ्गिकवाहुल्यान्त तत्कारिषु च नर्तकव्यपदेशाल्लोकेऽपि च 'अत्र् प्रेक्षणीयकम्' इति व्यवहारान्नाटकादेरन्यन्नृत्यम्। तद्द दत्वाच्छ्रीगदितादेरवधारणोपपत्तिः। नाटकादि च रसविषयम्, रसस्य च पदार्थीभूतविभावादिकसंसर्गात्मकवाक्यार्थ- हेतुकत्वाद्वाक्याथाभिनयात्मकत्वं रसाश्रयमित्यनेन दशितम्। नाट्यमिति च 'नट अ्रवस्पन्दने' इति नटेः किञ्चिच्चलनार्थत्वात्सात्त्विकबाहुत्यम्, अत एव तत्कारिषु नटव्यपदेशः । यथा च गात्रविक्षेपार्थत्वे समानेऽप्यनुकारात्मकत्वेन नृत्तादन्यन्नृत्यं तथा (शङ्का) डोम्बी, श्रीगदित, भाण, भारगी, प्रस्थान, रासक और काव्य -- ये नत्य के सात भेद होते हैं। वे सभी भाण के समान हैं।" इस प्रकार अन्य प्रकार के रूपक भी विद्यमान हैं अतः 'दस प्रकार के ही रूपक हैं' इस प्रकार का, अवधारण (नियम) नहीं बन सकता। इस प्रकार की शङ्का उठाकर कहते हैं: भाव पर आश्रित होने वाला नृत्य (नाट्य से) भिन्न ही होता है। नाट्य रस पर आश्रित है किन्तु नृत्य भाव पर आश्रित है अतः नाट्य से नृत्य भिन्न ही होता है। यहाँ 'भावाश्रय' इस शब्द से विषय का भेद और 'ृत्य' इस शब्द से आ्ङ्गिक अ्रभिनय की प्रचुरता दिखलाई गई है, क्योंकि (नृत्य शब्द नृत धातु से बना है) नृत धातु का अर्थं है-गात्र-विक्षेप -- प्रङ्गों को चलाना। साथ ही नृत्य करने वाले के लिये 'नर्तक' शब्द का प्रयोग होता है और लोक में भी 'यहा (नृत्य में) दर्शनीय है'-यह व्यवहार होता है। अतः नृत्य नाटक आदि रूपकों से भिन्न ही है। क्योंकि श्रीगदित आदि नृत्य के भेद हैं (तद्-भेदत्वात्) (नाट्य के नहीं इसलिये (दस ही रूपक हैं, यह) नियम ठीक बन जाता है। दूसरी ओर नाटक आदि (रूपक) रसपरक होते हैं। 'रसाशयम्' इस कथन से यह दिखला दिया गया है कि रस वाक्यार्थ के अभिनय-रूप में हुआ करता है, क्योोक विभाव आदि पदों के अर्थ (पदार्थ) हैं और उन पदार्थों का संसर्ग (अन्वय) वाक्यार्थ है तथा वही वाक्यार्थ रस-निष्पत्ति का (रसस्य) हेतु होता है। किञ्च, 'नाट्य' इस शब्द से प्रकट होता है कि नाटय में सातत्विक अभिनय की प्रचुरता हुआ करती है, क्योंकि (नाट्य' शब्द की निष्पत्ति नट्धातु से होती है) 'नट् अवस्पन्दने' इस धातु का अर्थ है- कुछ चलना (अतः नाट्य में आङ्गिक क्रिया कम है और सस्विक अभिनय की प्रधानता होती है) इसीलिये अभिनय (नाट्य) करने वाले के लिये नट् शब्द का प्रयोग होता है (न्तक शब्द का नहीं)। और, जिस प्रकार (नृत्य तथा नुक्त में) गात्र-विक्षेप धर्य की समानता होने पर भी नृत से नृत्य इसलिये भिन्न

Page 59

दश रूपकम

वाक्यार्थाभिनयात्मकान्नाट्यात्पदार्थाभिनयात्मकमन्यदेव तृत्यमिति। प्रसङ्गान्नृत्तं व्युत्पादयति- (१३) -नृत्तं ताललयाश्रयम्। तालश्चञ्चत्पुटादिः, लयो द्र तादिः, तन्मात्रापेक्षोऽङ्गविक्षेपोऽभिनयशून्यो नृत्तमिति। अ्नन्तरोक्त द्वितयं व्याचष्टे- (१४) आद्यं पदार्थाभिनयो मार्गो देशी तथा परम् ॥६।। नृत्यं पदार्थाभिनयात्मकं मार्ग इति प्रसिद्धम्, नृत्त च देशीति। द्विविधस्यापि द्वं विध्यं दर्शयति- (१५) मधुरोद्धतभेदेन तद् द्वयं द्विविधं पुनः। लास्यताएडवरूपेण नाटकाद्युपकारकम ।१२।। सुकुमारं द्वयमपि लास्यम्, उद्धतं द्वितयमति ताण्डवमिति। प्रसङ्गोक्तस्योपयोगं दर्शयति-तच्च नाटकाद्युपकारकमिति, नृत्यस्य क्वचिदवान्तरपदार्थाभिनयेन नृत्तस्य च शोभाहेतुत्वेन नाटकादावुपयोग इति । है, क्योंकि उस (नृत्य)में अनुकर होता है (नृत्त में नहीं), उसी प्रकार नाट्य से भी नृत्य भिन्न है, क्योंकि नाट्य में वाक्यार्थ का अभिनय होता है, किन्तु नृत्य में पदार्थ का अभिनय। प्रसङ्गवश नृत्त का स्वरूप अतलाते हैं :- नृत्त ताल और लय पर आश्रित होता है। चञ्चत्पुट (हाथ की ताली) इत्यादि ताल है। द्र त (मध्यम, विलम्बित) इत्यादि लय है। केवल उन्हीं (ताल, लय) पर आश्रित होने वाला श्रङ्ग-विक्षेप (अ्रङ्गों का संचालन) नृत्त कहलाता हैं उसमें अभिनय बिल्कुल नहीं होता। अभी कहे गये दोनों (नृत्य तथा नृत्त) की व्याख्या करते हैं :- इनमें से पहिला (नृत्य) पदार्थाभिनय है जो मार्ग कहलाता है और दूसरा (नृत्त) देशी कहलाता है। ॥६।। अर्थात् नृत्य में पदार्थों का अभिनय होता है। वह 'मार्ग' नाम से प्रसिद्ध है और नृत्त' देशी नाम से। उन दोनों के ही दो दो प्रकार होते हैं, यह दिखलाते हैं :- वे दोनों (नृत्य और नृत्त) मधुर तथा उद्धत भेद से लास्य त्र््रौर ताए्डव रूप में दो दो प्रकार के होते हैं, जो नाटक आरदि (रूपकों) के उपकारक हुआ करते हैं॥१०॥ अरथात् दोनों (नृत्य तथा नृत्त) ही सुकुमार होने पर लास्य और उद्धत होने पर ताण्डव कहलाते हैं। प्रसङ्ग से कहे गये नृत्य और नृत्त का 'नाटकाद्य पकारकम्' इस कथन द्वारा नाव्य में उपयोग दिखलाया गया है। भाव यह है कि कहीं कहीं नाटक अदि में अ्रवान्तर पदार्थों के अभिनय के रूप में नृत्य का ओर शोभा बढ़ाने के लिये नृत्त का उपयोग किया जाता है।

Page 60

प्रथम: प्रकाश: ११

टिप्पणी १-यहाँ प्रसङ्ग से ही नाट्य, नृत्य और नृत्त का निरूपण किया गया है। धनञ्जय और धनिक ने इन तीनों का स्वरूप दिखलाते हुए इनका अन्तर भी लिखलाया है। संक्षेप में यह कहा जा सकता है-(क) नाट्य और नृत्त दोनों में अभिनय होता है, किन्तु (१) नाट्य में अवस्था की अनुकृति होती है, नृत्य में भावों की। (२) नाट्य में वाक्यार्थ का अरभिनय होता है, क्योंकि इसे रसाश्रित कहा गया है और दशरूपककार के अनुसार रस-निष्पत्ति वाक्यार्थ रूप में होती है। (द्र० आगे ४.३७)। दूसरी ओर नृत्य में पदार्थों का अभिनय होता है। (३) नाट्य में सात्त्विक अभिनय की बहुलता होती है किन्तु नृत्य में आङ्िक अभिनय की। (४) 'नाट्य' शब्द नट् धातु से निष्पन्न होता है। नट् धातु का अर्थ है-कुछ कुछ चलना, फलतः नाट्य में बाह्य अङ्गविक्षेप की अपेक्षा सात्विक अभिनय की प्रचुरता होती है, किन्तु नृत्य शब्द नृत् धातु से निष्पन्न होता है, जिसका अर्थ है-गात्रविक्षेप। इस प्रकार नृत्य में आङ्गिक अभिनय की प्रचुरता होती है। (५) नाट्य रस पर आश्रित है किन्तु नृत्य भाव पर। (६) नाट्य में अभिनय के साथ साथ पाठ्य (काव्य) भी होता है, जो श्रव्य होता है किन्तु तृत्य में सुनने के लिये कुछ नहीं होता इसीलिये यह कहा जाता है कि नृत्य केवन दर्शनीय होता है। (७) नाट्य के कलाकार को नट और नृत्यकार को नर्तक कहते हैं। (ख) नृत्य और नृत्त-(१) दोनों शब्दों की व्युत्पत्ति नृत् धातु से की जाती है। नृत् धातु का अर्थ है- गात्रविक्षेप। इन दोनों में ही श्ङ्गों का विक्षेप होता है। (२) दोनों के दो दो भेद हैं सुकुमार (लास्य) और उद्धत (ताण्डव)। (३) साथ ही ये दोनों नाट्य में उपयोगी हैं, अवान्तर पदार्थों का अभिनय करके नृत्य किसी नाट्य को पूर्ण करता है और नृत्त किसी अभिनय की शोभा बढ़ाता है। इन दोनों में अन्तर यह है-(१) नृत्य में शास्त्रीय पद्धति के अनुसार पदार्थ का अभिनय होता है इसी से इसे मार्ग भी कहा जाता है। किन्तु नृत्त में कोई अभिनय नहीं होता। इसमें जो अङ्ग-विक्षेप होता है वह शास्त्रीय पद्धति के अनुसार नहीं अपितु लोकसरणिग के अनुसार, इसीलिये इसे देशी कहा जाता है। (२) नृत्य भाव पर आश्रित है किन्तु नृत्त ताल, लय पर आश्रित है। २- दशरूपक के परवर्ती ग्रन्थों में भी नाट्य तथा नृत्त का विवेचन उपलब्ध होता है, जिनमें शारदातनय का भावप्रकाशन, विद्यानाथ का प्रतापरुद्रीय तथा शाङ्ग- देव का सङ्गीतरत्नाकर आदि उल्लेखनीय हैं। सिद्धान्तकौमुदी में भी 'नट् नृत्तौ' धातु के प्रकरण में इन तीनों शब्दों की व्याख्या मिलती है। प्रता०, सं० रतना० तथा सिद्धान्तकौमुदी की व्याख्या में दशरूपक का अनुसरण किया गया है किन्तु भाव- प्रकाश का एतद्विषयक विवेचन दशरूपक से नितान्त भिन्न है (विशेष द्र० The types of Sanskrit Drama पृ० १२-२२) ३-वृत्य और नृत्त का विस्तृत विवेचन सङ्गीत शास्त्र के ग्रन्थों मे द्रष्टव्य है। 0 :- १.3, स97 ,951

Page 61

१२ देश रूपकम्

अनुकारात्मकत्वेन रूपाणगामभेदार्तिकिकृतो भेद इत्याशङ्गयाह- aue (१३) वस्तु नेता रसस्नेषां भे दक :- वस्तुभेदान् नायकभेदाद् रसभेदाद् रूपाणगामन्योन्यं भेद इति। वस्तुभेदमाह- (१७) -वस्तु च द्विधा। कथमित्याह- (१८) तत्राधिकारिक मुख्यमङ्ग प्रासङ्गिकं विदुः ।११। प्रधानभूतमाधिकारिकं यथा रामायणो रामसीतावृत्तान्तः, तदङ्गभूतं प्रास्गिकं यथा तत्रैव विभीषणसुग्रीवादिवृत्तान्त इति। निरुक्त्याSडधिकारिक लक्षयति- (१६) अधिकारः फलस्वाम्यमधिकारी च तत्प्रभुः । तन्निवृ त्तमभिव्यापि वृत्तं स्यादाधिकारिकम् ।।१२।। रूपकों के भेदक तत्त्व सभी रूपक अनुकरणात्मक हैं अतः उनमें कोई भेद न होगा फिर उनमें भेद किस निमित्त से किया जाता है ? यह शङ्का होने पर कहते हैं :- वस्तु, नायक और रस उन (रूपकों) के भेदक तत्त्व हैं। कथावस्तु के भेद से, नायक के ेद से और रस के भेद से रूपकों का परस्पर भेद हो जाता है। टिप्पणी :- इन तीन भेदक तत्त्वों (वस्तु, नेता तथा रस) के विषय में यह समझा जाता है कि ये अरस्तू द्वारा प्रतिपादित पाश्चात्य समीक्षा शास्त्र के ६ तत्त्वों (१. कथावस्तु, २. चरित्र-चित्रण, २. शैली, ४. विचार (संवाद) ५. अभिनेयता और ६. गीत) के समान ही हैं और इनमें उन सभी का समावेश हो जाता है। वस्तुतः दोनों में कुछ समानता होते हुए भी अपनी-अपनी विशेषताएँ हैं। वस्तु (कथावस्तु) के भेद-प्रभेद वस्तु के भेद बतलाते हैं :- वस्तु दो प्रकार की होती है। किस प्रकार ? उनमें मुख्य कथावस्तु को आधिकारिक और अङ्ग रूप वस्तु को प्रासङ्गिक कहते हैं। प्रधान कथावस्तु आधिकारिक कहलाती है जैसे रामायण में राम और सीता का वृत्तान्त है उस प्रधान कथावस्तु की प्रङ्गरूप वस्तु प्रास्ङ्गिक है जैसे रामायणण में ही विभीषण तथा सुग्रीव आदि का वृत्तान्त। टि०-मि०, नाट्यशास्त्र १६.२ तथा सा० द० ६.४२। व्युत्पत्ति दिखलाते हुए आधिकारिक कथावस्तु का लक्षण करते हैं- अधिकार का अरथ है फल का स्वामी होना। उस फल का स्वामी अधिकारी कहलाता है। उस अधिकारी के द्वारा किया हुआ या उससे सम्बद्ध (काव्य में) अभिव्याप्त इतिवृत्त आधिकारिक कहलाता है ॥१२॥ टि०. नाट्यशास्त्र १६.३ -५; सा० द० ६.४३।

Page 62

प्रथम: प्रकाश: १३

फलेन स्वस्वामिसंबन्धोऽिकार: फलस्वामी चाधिकारी तेनाधिकारेणाधि- कारिणा वा निर्वृ त्तम फलपर्यन्ततां नीयमानमितिवृत्तमाधिकारिकम। प्रासङ्गिकं व्याचष्टे- (२०) प्रासङ्गिकं परार्थस्य स्वार्थो यस्य प्रसङ्गतः । FIR यस्येतिवृत्तस्य परप्रयोजनस्य सतस्तत्प्रसङ्गात्स्वप्रयोजनसिद्धिस्तत्प्रासा्ङ्गि।- मितिवृत्तं प्रसङ्गनिरवृ तेः । प्रासङ्गिकमपि पताकाप्रकरीभेदाद् द्विविधमित्याह- (२१) सानुबन्धं पताकाख्यं प्रकरी च प्रदेशभाक् ॥१३॥ दूरं यदनुवर्तते प्रासङ्गिकं सा पताका सुग्रीवादिवृत्तान्तवत्, पताकेवासाधारण- नायकचिह्नवत्तदुपकारित्वात्। यदल्पं सा प्रकरी श्रवरणादिवृत्तान्तवत्। भाव यह है कि फल के साथ स्व-स्वामि-भाव सम्बन्ध (फल का स्वामी होना) अधिकार कहलाता है और फल का स्वामी अधिकारी। उस अधिकार या अधिकारी के द्वारा किया गया, फल प्राप्ति तक पहुँचने वाला जो वृत्त या कथा है वही आधि- कारिक वस्तु है। प्रासङ्गिक वस्तु की व्याख्या करते हैं- दूसरे (प्रधान प्रयोजन) की सिद्धि के लिये होने वाली जिस (कथा) का प्रसङ्ग से अपना प्रयोजन भी सिद्ध होजाता है, वह प्रासङ्गिक है। जो इतिवृत्त दूसरे (आधिकारिक कथा) के प्रयोजन की सिद्धि के लिए होता है किन्तु प्रसङ्ग से उसके अपने प्रयोजन की भी सिद्धि हो जाती है, वह प्रासङ्िक इतिवृत्त कहलाता है; क्योंकि उसकी प्रसङ्ग से सिद्धि होती है। टि०-(१)ना०शा० १९.३-४, सा० द० ६.४३-४४, भा०प्र० २०१ पं०१-२। (२) प्रासङ्िक-प्रसङ्गात् निर्वृ त्तम्=प्रासङ्गिकम; प्रसङ्ग से होने वाला। इस शब्द की व्युत्पत्ति के अनुकूल ही प्रासङ्गिक वस्तु का लक्षण किया गया है। यह कथावस्तु आधिकारिक कथा की फलसिद्धि में सहायक होती है, किन्तु प्रसङ्ग से इसका अपना प्रयोजन भी सिद्ध हो जाया करता है। उदाहरणार्थ रामचरित में राम की कथा मुख्य (आधिकारिक) है उसका फल रावण-वध तथा सीता की प्राप्ति आदि है। सुग्रीव की कथा इस प्रधान फल की प्राप्ति में उपकरण है; किन्तु उस कथा का फल बालि-वध और राज्य-लाभ भी प्रसङ्ग से सिद्ध हो जाता है। प्रासङ्गिक कथावस्तु के भेद (पताका और प्रकरी) होता है :- प्रासङ्गिक इतिवृत्त भी पताका और प्रकरी के भेद से दो प्रकार का इनमें अनुबन्ध सहित (दूर तक चलने वाला) प्रासङ्गिक वृत्त पताका कहलाता है और एक प्रदेश में रहने वाला प्रकरी ।१३।।

Page 63

१४ दशरूपकम्

पताकाप्रसङ्गेन पताकास्थानक व्युत्पादयति - (२२) प्रस्तुतागन्तुभावस्य वस्तुनोऽन्योक्तिसूच कम्। हेकी IF पताकास्थानकं तुल्यसंविधानविशेषणाम्।।१४।। प्राकरशिकस्य भाविनोऽर्थस्य सूचकं रूपं पताकावद्द्वतीति पताकास्थानकम्। तच्च तुल्येतिवृत्ततया तुल्यविशेषणतया च द्विप्रकारम्-अन्योक्तिसमासोक्तिभेदात्। यथा रत्नावल्याम्- जो प्रासङ्गिक वृत्त (प्रधान इतिवृत्त के साथ) दूर तक चलता है वह पताका कहलाता है; जैसे सुग्रीव आदि का वृत्तान्त (जो रामकथा के साथ दूर तक चलता है)। जिस प्रकार पताका (ध्वजा) नायक का अ्साधारण चिह्न होती है और उसका उपकार करती है इसी प्रकार यह इतिवृत्त भी नायक (तथा तत्सम्बन्धी कथा) का उपकार करता है, इसलिए इसे पताका कहते हैं। जो प्रासङ्गिक वृत्त थोड़ी दूर तक

वृत्तान्त है। चलता है, वह प्रकरी कहलाता है; जैसे (रामायण आदि में) श्रवण आदि का

PITR टि०-(१) ना० शा० १६.२४-२५, सा० द० ६.१७-६६। भा० प्र० पृ० २०१-२०२। (२) सानुबन्ध=अ्नुबन्ध सहित; अनुबन्ध=पीछे बंधना, अनुवर्तन, दूर तक साथ चलना अथवा फल। इस प्रकार जो प्रासङ्गिक कथा प्रधान कथा का दूर तक अरनुवर्तन करती है जिसका अपना भी प्रयोजन होता है वह पताका कहलाती है। (३) पताका औप्रर प्रकरी दोनों ही प्रासङ्गिक कथावस्तु हैं, दोनों आधिकारिक कथा के प्रवाह में योग देती हैं और प्रधानफल की सिद्धि में सहायक होती हैं; फिर भी दोनों में अन्तर है :- (क) पताका-नायक का कुछ अपना भी प्रयोजन होता है। वह अपने प्रयोजन की सिद्धि के साथ-साथ प्रधान नायक के कार्य की सिद्धि में सहायक होता है जैसे 'रामचरित' में सुग्रीव है जो बालि-वध या राज्य-प्राप्ति के रूप में अपने प्रयोजन की सिद्धि के लिये राम का सहायक होता है। दूसरी ओर 'प्रकरी' का नायक अपने किसी प्रयोजन की सिद्धि की अपेक्षा न करके निरपेक्ष भाव से प्रधान नायक का सहायक होता है जसे रामचरित में जटायु है। (ख) पताका की कथा काव्य या नाट्य में बहुत दूर तक चलती है किन्तु प्रकरी की कथा एकदेशो होती है। पताकास्थानक पताका के प्रसङ्ग से पताकास्थानक का निरूपण करते हैं। जो किसी अन्य वस्तु के कथन द्वारा आगन्तुक प्रस्तुत वस्तु का सूचक होता है वह पताकास्थानक कहलाता है, वह समान इतिवृत्त (संविधान) तथा समान विशेषण (भेद से दो प्रकार का) होता है॥१४॥ प्राकरसिक किन्तु आगे आने वाले अर्थ का सूचक इतिवृत्त (रूप) जो पताका के समान होता है, पताकास्थानक कहलाता है। वह अन्योक्ति तथा समासोक्ति के भेद से दों प्रकार का है; अरथान् १. समान इतिवृत्त के द्वारा (प्रस्तुत आ्रगन्तुक अर्थ का सूचक) २. सम विशेषणों के द्वारा। (समान इतिवृत्त द्वारा) जैसे रत्नावली (३.६) में -

Page 64

प्रथम: प्रकाशः १५

'यातोऽस्मि पद्मनयने समयो ममैष सुप्ता मयैव भवती प्रतिबोधनीया। प्रत्यायनामयमितीव सरोरुहिण्याः सूर्योऽस्तमस्तकनिविष्टकर: करोति ।।१।' यथा च तुल्यविशेषणतया- उद्दामोत्कलिकां विपाण्डुररुचं प्रारब्धजुम्भां क्षणा- दायासं श्वसनोद्गमैरविरलैरातन्वतीमात्मनः । अद्योद्यानलतामिमां समदनां नारीमिवान्यां ध्रवं पश्यन्कोपविपाटलद्युति मुखं देव्या: करिष्यागयहम् ।२।। "हे कमलनयने; मेरे जाने का समय है, मैं जा रहा हूँ। सोती हुई तुमवो प्रातः मुझे ही जगाना है, इस प्रकार अस्ताचल के मस्तक पर अपनी किरणों को निविष्ट करने वाला यह सूर्य मानों कमलिनी को आश्वासन दे रहा है।"। टिप्पणी-(१) यह राजा उदयन की विदूषक के प्रति उक्ति है। इसमें सूर्य और कमलिनी के वृत्तान् द्वारा राजा उदयन और रत्नावली के भावी मिलन की सूचना दी गई है। सूर्य और कमलिनी का पुनर्मिलन तथा उदयन और रत्नावली का मिलन समान घटनाएँ हैं। यहाँ उदयन तथा रत्नावली की कथा प्रस्तुत है, उसकी दृष्टि से सूर्य और कमलिनी का वृत्तान्त अन्य (अप्रस्तुत) ही है। इसलिये यह अन्योक्ति के आधार पर पताकस्थानक का उदाहरण है। (२) यहाँ अर्प्रन्योक्ति का अर्थ है-समान इतिवृत द्वारा प्रस्तुत अर्थ का कथन। इसी प्रकार समान विशेषण द्वारा प्रस्तुत अर्थ की सूचना यहाँ समासोक्ति कही गई है। अन्योक्ति और समासोक्ति अलङ्गारों के लक्षण इन पर घटित करना वाञ्छनीय नहीं प्रतीत होता; क्योंकि इन दोनों उदाहरणों में करमशः अन्योक्ति और समासोवित अलद्कार हैं, यह निश्चित नहीं। समान विशेषणों के द्वारा (प्रस्तुत अर् की सूचना) जैसे रत्नावली (२.४) चटखती कलियों वाली (नायिका पक्ष में-उत्कट अभिलाषा वाली), पुष्पों से या विरह से) पाण्डुर वर्ण वाली, अभी-सभी खिलती हुई (जम्भाई लेती हुई), निरन्तर वायु के सञ्चार से अपना विस्तार (आयास) करती हुई [-निरन्तर निश्वासों के निकलने से अपनी पोडा (आयास)को प्रकट करती हुई], मदननामक वृक्ष के आश्रित (-काम-भावना से युक्त) दूसरी नारी जैसी इस उद्यानलता को देखता हुआ मैं आ्राज अवश्य ही देवी (वासवदत्ता) के मुख को कोप से आरक्त कान्ति वाला कर दूंगा। टिप्परी-(१) यह राजा उदयन की विदूषक के प्रति उक्ति है। इसमें तुल्य विशेषणों द्वारा रत्नावली-सम्बन्धी भावी वृत्त की सूचना दी गई है। आगे चलकर जो रत्नावली (सागरिका) और राजा का मिलन होने वाला है उसके निमित्त से देवी वासवदत्ता के करोध का वर्न किया जायेगा; उसी की ओर यहाँ संकेत किया गया है। इस प्रकार यह तुल्य विशेषणों के द्वारा भावी प्रस्तुत अर्थ का सूचक द्वितीय

Page 65

१६ दशरूपकम्

(२३) प्रख्यातोत्पाद्यमिश्रत्वभेदात्त्रेधापि त्त्रिधा। प्रख्यातमितिहासादेरुत्पाद्यं कविकल्पितम् ।।१५।। मिश्र' च सङ्करात्ताभ्यां दिव्यमर्त्यादिभेदतः । इति निगदव्याख्यातम्। पताकास्थानक है। (२) यहाँ धनिक ने जो अन्योक्ति तथा समासोक्ति शब्दों का प्रयोग किया है वह भ्रामक है। न तो धनिक से पूर्व ना० शा० में हो इन शब्दों का प्रयोग है, न ही अर्वाचीन ग्रन्थों नाट्यदर्पण या साहित्यदर्पण आदि में ही, हाँ, भा० प्र० (२००-१६) में इन शब्दों का प्रयोग अवश्य किया गया है। (३) पताका और पताकास्थानक- इन दोनों में नामसाम्य ही नहीं है अपितु पताका के समान ही पताकास्थानक भी प्रधानफल में उपकारक इतिबृत्त ही होता है (नाट्यदर्पण १.३०) भा० प्र० (२०१.११) के अनुसार तो प्रासङ्गिक इतिवृत ३ प्रकार का है-पताका, प्रकरी और पताकास्थानक। इसीलिए यहाँ पताका के प्रसङ्ग से पताकास्थानक का का वणन किया गया है। इसमें पताका से अन्तर यह है :- (क) यह पताका के समान दूर तक चलने वाला इतिवृत्त नहीं होता। (ख) अन्य के वर्णन द्वारा प्रधान इतिवृत्त-सम्बन्धी किसी भावी घटना की सूचना देता है, उसका शब्दों से वर्णन नहीं करता (ग) पताका के समान क्रमबद्ध इतिवृत्त नहीं होता अपितु कहीं बीच-बीच में इसका एक बार या अ्नेक बार निबन्धन किया जाता है। यह नाट्य और काव्य का अलङ्करण माना जाता है (द्र०, ना० द० १.३०)। (४) धनञ्जय और धनिक ने केवल दो प्रकार का पताकास्थानक बतलाया है किन्तु नाट्यशास्त्र (१६.३१-३४) में चार प्रकार का पताकास्थानक बतलाया गया था। बाद में नाट्यदर्पण (१.३१) तथा साहित्यदर्पणा (६.४४-४६) में भी चार प्रकार के पताकास्थानक का उदाहरण सहित निरूपण किया गया है। दशरूपक का जो (उद्दामोत्कलिकाम) द्वितीय पताका- स्थानक है विश्वनाथ ने उसे चतुर्थ पताकास्थानक माना है। किन्तु अभिनवगुप्त के अनुसार यह पताकास्थानक का उदाहरण ही नहीं है (अभि० १६.३४)। इसके अतिरिक्त दशरूपक के प्रथम उदाहरण को साहित्यदर्पण आदि ने लिया ही नहीं है। इसका अन्तर्भाव साहित्यदर्पण के किस पताकास्थानक में हो सकेगा, यह कहना कठिन ही है। यह भी चिन्तनीय है कि धनञ्जय ने भरत द्वारा कथित चारों प्रकारों का विवेचन क्यों नहीं किया। इस प्रकार एक प्रकार का आधिकारिक और दो प्रकार के प्रासङ्गिक (कुल मिला कर) इस तीन प्रकार के इतिवृत्त के फिर तीन-तीन प्रकार बतलाते हैं :- वह तीन प्रकार का (इतिवृत्त) भी फिर १. प्रख्यात, २. उत्पाद्य और ३. मिश्र भेद से तीन-तीन प्रकार का होता है। इतिहास आदि से लिया गया इतिवृत्त प्रख्यात, कवि द्वारा (स्वयं) कल्पित उत्पाद्य तथा इन दोनों के मिश्रण से मिश्र कहलाता है। ये सभी इतिवृत्त दिव्य, मर्त्य (अदिव्य) आदि भेद से भी भिन्न-भिन्न होते हैं। इस (कारिका) की ग्रन्थ में ही व्याख्या हो गई है।

Page 66

प्रथम: प्रकाशः १७

तस्येतिवृत्तस्य किं फलमित्याह- (२४) कार्य त्रिवर्गस्तच्छुद्धमेकानेकानुबन्धि च।।१६।। कडि धर्मार्थकामा: फलं तच्च शुद्धमेकेकमेकानुबन्धं द्वित्र्यनुबन्धं वा। टिप्पणी-(१) दिव्यमर्त्यादिभेदतः- यहाँ आदि शब्द से दिव्यादिव्य का ग्रहण होता है। जैसा कि साहित्यदर्पण (६.६) में बतलाया गया है, श्रीकृष्ण आदि का वृत्त दिव्य का उदाहरण है। जो दिव्य होकर भी अपने आपकी मानव समझते हैं वे श्री रामचन्द्र आदि दिव्यादिव्य के उदाहरण हैं। मर्त्य कथावस्तु का उदाहरण मृच्छकटिक इत्यादि हैं। प्रख्यात आदि इतिवृत्त के उदाहरण आगे यथावसर दिखलाये जायेंगे। इस प्रकार इतिवृत्त के अनेक भेद हो जाते हैं; जैसे- इतिवृत्त

आधिकारिक प्रासङ्ङिक

  • पताका प्रकरी

प्रख्यात उत्पाद्य मिश्र (दिव्य, मर्त्यं, दिव्यादिव्य) (दिव्य, मत्य, दिव्यादिव्य) (दिव्य, मर्त्य, दिव्यादिव्य) इतिवृत्त का फल उस इतिवृत्त का क्या फल होता है, यह बतलाते हैं- उसका फल त्रिवर्ग होता है। यह कभी तो शुद्ध (त्रिवर्ग में से कोई एक ही) और कभी (श्रन्य) एक से अनुगत तथा कभी अनेक(दो) से अनुगत होता है ॥१६।। 15 धर्म, अर्थ और काम (मुख्य) इतिवृत्त का फल होता है। वह फल कभी तो केवल शुद्ध अर्थात् तीनों में से कोई एक; कभी एक से अन्वित एक (जैसे अर्थ से अनुगत धर्म आदि) कभी दो से अन्वित एक (जैसे अर्थ और काम से अन्वित धर्म आदि) और कभी तीन से अन्वित एक (जैसे अर्थ, काम और मोक्ष से अन्वित धर्म आदि) होता है। टिप्पणी-पुरुषार्थ चार हैं -- धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष । किन्तु केवल मोक्ष कभी भी रूपक के इतिवृत्त का फल नहीं हो सकता। इसी हेतु शान्त रस को रूपक में स्वीकार नहीं किया गया है। और, इसी से त्रिवर्ग को ही इतिवृत्त का फल

Page 67

१८ दशरूपकम्

तत्साधनं व्युत्पादयति- (२५) स्वल्पोद्दिष्टस्तु तद्वं तुर्बीजं विस्ताय नेकघा। स्तोकोद्दिष्टः कार्यसाधकः पुरस्तादनेकप्रकारं विस्तारी हेतुविशेषो बीजवद्वीजं यथा रत्नावल्यां वत्सराजस्य रत्नावलीप्राप्तिहेतुरनुकूलदैवो यौगन्धरायव्यापारो विष्कम्भके न्यस्तः । यौगन्धरायणः-कः सन्देहः ('दीपादन्यस्मात्-' इति पठति), इत्यादिना 'प्रारम्भेस्मिन्स्वामिनो वृद्धिहेतौ' इत्यन्तेन। यथा च वेशीसंहारे द्रौपदीकेशसंयमनहेतुर्भीमकोधोपचितयुधिष्ठिरोत्साहो बीजमिति। तच्च महाकार्यावान्तरकार्यहेतुभेदादनेकप्रकारमिति। माना गया है, मोक्ष को नहीं। फिर भी मोक्ष से अनुगत धर्म आदि तो रूपक के इति- वृत्त का फल हो ही सकता है। धनिक की व्याख्या का यही स्वारस्य प्रतीत होता है भामह आदि प्राचीन आचार्यों ने तथा विश्वनाथ (पा० द० १.२) इत्यादि अर्वाचीन आचार्यों ने चतुर्वर्ग की प्राप्ति को काव्यों का फल स्वीकार किया भी है। फलप्राप्ति के साधन (अर्थप्रकृतियाँ) उस फल के साधन बतलाते हैं :- उस फल का निमित्त बीज कहलाता है, जिसका (आरम्भ में) सृक्ष्म रूप से संकेत किया जाता है औरौर (आगे चलकर) अ्नेक प्रकार से विस्तार होता है। विशेष प्रकार का (इतिवृत्त के) फल (कार्य) का निमिस जो किसी बीज के समान आरम्भ में सूक्ष्म रूप से कहा जाता है और आगे चलकर अनेक प्रकार से विस्तार को प्राप्त करता है, वह बीज कहलाता है; जैसे रत्नावलो नाटिका (१.६-७) में वत्सराज को रत्नावली की प्राप्ति फल है, उसका हेतु है-दैव की अनुकूलता से युक्त यौगन्धरायण का उद्योग; उसे विष्कम्भक में (बीज रूप से) रक्खा गया हैं :- यौग धरायण कहता हैं -- 'इसमें क्या सन्देह है ? (दवीपा० १.६), 'अनुकूल दैव दूसरे द्वीप से भी, सागर के मध्य से भी, विशानों के छोर से भी अ्भीष्ट वस्तु को लाकर शीघ्र मिला देता है'। इस उक्ति से लेकर (प्रारम्भे १.७) 'स्वामी के अभ्युदय के लिये आरम्भ किये गये इस कार्य में दैव ने भी इस प्रकार हाथ का सहारा दे दिया है अतः सचमुच ही इसकी सिद्धि में सन्देह नहीं है। फिर भी अपनी इच्छा से ही सब कुछ करने वाला मैं स्वामी से डर रहा हूँ।' इस कथन तक बीज का निर्देश किया गया है। इसी प्रकार वेशीसंहार (अङ्क १) में द्रौपदी का केश-संयमन फल है। उसका हेतु है-भीम के क्रोध से परिपुष्ट युधिष्ठिर का उत्साह, वही बीज है (जिसको 'स्वस्था भवन्ति मयि जीवति धार्तराष्ट्राः' १-८ से लेकर 'मन्थायस्त०' १-२२ तक सूचित किया गया है)। कP यह बीज महाकार्य तथा अवान्तर कार्य का हेतु होने से अनेक प्रकार का होता है। प्रवान्तर बीज का दूसरा नाम बतलाते हैं-

Page 68

प्रथम: प्रकाश: १६

अवान्तरबीजस्य संज्ञान्तरमाह- (२६) अ्र्रवान्तरार्थविच्छेदे बिन्दुरच्छे दकारगाम् ।।१७।। यथा रत्नावल्यामवान्तर प्रयोजनानङ्गपूजापरिसमाप्तौ कथार्थविच्छेदे सत्य- नन्तरकार्यहेतुः-उदयनस्येन्दोरिवोद्वीक्षते। सागरिका-(श्रत्वा) कहं एसो सो उदयणणरिन्दो जस्स अहं तादेण दिण्णा।' (कथमेष स उदयननरेन्द्रो यस्याहं तातेन दत्ता) इत्यादि। बिन्दुः-जले तैलबिन्दुवत्प्रसारित्वात्। अवान्तर प्रयोजन की समाप्ति से कथावस्तु के (मुख्य) प्रयोजन में विच्छेद प्राप्त हो जाने पर जो उसके अविच्छेद (सातत्य) का कारण होता है, वह बिन्दु कहलाता है। जैसे रत्नावली (१.२३) में कामदेव की पूजा एक अवान्तर कार्य है। उसकी समाप्ति पर कथा के (मुख्य) प्रयोजन (रत्नावली-समागम) का विच्छेद होने लगता है। तब उसके अनन्तर होने वाले कार्य का हेतु है-मागधों की 'उदयनस्येन्दो- रिवोद्वीक्षते' (जन-समुदाय चन्द्रमा की किरणों के समान उदयन के चरणों की प्रतीक्षा कर रहा है) इत्यादि उक्ति। इसको सुनकर सागरिका कह उठती है- 'कया यही वह राजा उदयन है जिसके लिये मुझे पिता ने दिया है' इत्यादि। जिस प्रकार जल में तैलबिन्दु फैल जाता है उसी प्रकार यह (फलोपाय) नाख्य में फैला होता है इसलिये यह बिन्दु कहलाता है। टिप्परी-(१) ना. शा० (१६.२२), भा० प्र०पृ० २०४, ना०द० (१.३२) प्रता०(३.७) तथा सा० द० (६.६६) आरदि ग्रन्थों में भी बिन्दु का स्वरूप विवेचन किया गया है। इनमें प्रता० तथा सा० द० का बिन्दुलक्षण दशरूपक से ही लिया गया प्रतीत होता है। भावप्रकाशन का लक्षण यह है- फले प्रधाने विच्छिन्ने बीजस्यावान्तरैः फलैः । तस्याविच्छेदको हेतुः बिन्दुरित्याह कोहलः । ना० द० में प्रायः नाट्यशास्त्र (अभि०) का अनुसरण किया गया है। इन सभी की व्यख्या में कुछ अपनी-अपनी विशेषताएँ हैं तथापि ना० द०में इसका विशद वर्णन मिलता है। (२) बिन्दु का स्वरूप है-रूपक की कथावस्तु का एक प्रधान फल होता है जो महाकार्य कहलाता है। इसके हेतु का संक्षेप में निर्देश किया जाता है। वह बीज कहलाता है। किन्तु बीच-बीच में कथाँशों के अनेक प्रयोजन हुआ करते हैं जो अवान्तर कार्य कहलाते हैं। जैसे रत्नावली नाटिका में महाकार्य है- रत्नावली समागम तथा चत्रवतित्व प्राप्ति (काम तथा अर्थ की सिद्धि)। किन्तु इसकी कथावस्तु में अन्य अ्नेक अवान्तर प्रयोजन हैं जैसे अनङ्गपूजा की घटना का प्रयोजन है- सागरिका के हृदय में विस्मय उत्पन्न करना इत्यादि। इस प्रकार के अवान्तर प्रयोजन की समाप्ति हो जाने पर मुख्य प्रयोजन के विच्छिन्न होने का अवसर उपस्थित हो जाता है किन्तु 'उदयनस्येन्दोरिवोद्वीक्षते, इत्यादि कथन के द्वारा अग्रिम प्रयोजन

Page 69

२० दशरूपकम्ः

इदानीं पताकादं प्रसङ्गाद्वय त्कमोक्त कमार्थमुपसंहरत्नाह- (२७) बीजबिन्दुपताकाख्यप्रकरीकार्यलक्षणः। अर्थप्रकृतयः पञ्च ता एताः परिकीर्तिताः ॥१८॥ f8y अर्थप्रकृतय := प्रयोजनसिद्धिहेतवः । की सिद्धि का निमित्त प्रस्तुत कर दिया जाता है। वह है - सागरिका के मन में 'शतसुक्य' उत्पन्न करना। इस प्रकार दशरूपक की दृष्टि से सागरिका के हृदय में औत्सुक्य या अनुराग आदि की उत्पत्ति ही अवान्तर बीज (बिन्दु) है। इसके द्वारा आगे कथा-तन्तु अविच्छिन्न रूप से चलता रहता है। अभि० तथा ना० द0 में बिन्दु का स्वरूप अधिक स्पष्ट किया गया है। तदनुसार अवान्तर कार्यों से मुख्यफल के विच्छिन्न होने लगने पर जो मुख्यफल का नायक आदि के द्वारा अनुसन्धान किया जाता है, वही बिन्दु कहलाता है। यह भी बीज के समान समस्त नाटक आदि में अन्त तक विद्यमान रहा करता है। तैल बिन्दु के समान समस्त इतिवृत्त में फैल जाने के कारणा ही इसे बिन्दु कहते हैं ( यह शब्द का प्रवृत्तिनिमित्त बतलाया गया है)। यह बिन्दु फल-प्राप्ति के कारणों का अनुग्राहक है तथा स्वयं भी परम कारण है। इसका दूसरा नाम अवान्तर बीज भी है। नायक अथवा उसके सहायकों के द्वारा अनेकशः फल का अनुसन्धान किया जा सकता है अतः किसी नाटक आदि में अनेक बार बिन्दु का प्रयोग हुआ करता है। (३) बीज और बिन्दु-समानता (क) दोनों फल-प्राप्ति के उपाय (अर्थप्रकृति) हैं (ख) फल की प्राप्ति तक दोनों विद्यमान रहते हैं। अन्तर यह है-(क) संक्षेप में निर्दिष्ट मुख्य-फल का हेतु बीज कहलाता है जैसे रत्नावली में रत्नावली की प्राप्ति का हैतु है-दैव की अ्नुकूलता से युक्त यौगन्धरा- यण का व्यापार। दूसरी ओर मुख्य फल का अनुसन्धान करना बिन्दु है जैसे सागरिका का यह अनुसन्धान कि यही राजा उदयन है जिसके लिये मुझे पिता ने दिया है। (ख) बीज का तो मुखसन्धि के आरम्भ में ही निर्देश कर दिया जाता है किन्तु बिन्दु का निर्देश बाद में होता है। ऊपर प्रसङ्गवश बिना कम के ही पताका इत्यादि को बतला दिया गया है, अब कमशः दिखलाने के लिये उपसंहार करते हुए कहते हैं :- बीज, बिन्दु, पताका, प्रकरी और कार्य नामक ये पाँच अर्थ प्रकृतियाँ कही गई हैं ॥१८॥। टिप्पणी-(१) ना० शा० (१६,२०-२१) ना० द० (१.२८) भा०प्र०, पृ० २०४.२०५, सा०द० (६.६४-६५)। (२) अर्थप्रकृति-यहाँ 'अर्थ' शब्द फल या प्रयोजन का वाचक है। प्रकृति शब्द का अर्थ है - हेतु या कारण। इस प्रकार फल की सिद्धि के उपाय ही अर्थप्रकृतियाँ कहलाती हैं (अर्थः फलं तस्य प्रकृतय उपायाः

Page 70

Pप्रथम: प्रकाश: २१

अन्यदवस्थापञचकमाह- (२८) अवस्था: पञ्च कार्यस्य प्रारब्धस्य फलार्थिभि:।६ यथोद्दशं लक्षणमाह- (२६) औत्सुक्यमात्रमारम्भ: फललाभाय भूयसे। 11R 15 इदमहं संपादयामीत्यध्यवसायमात्रमारम्भ इत्युच्यते, यथा रत्नावल्य।म्- प्रारम्भेऽस्मिन्स्वामिनो वृद्धिहेती दैवे चेत्थं दत्तहस्तावलम्बे।' इत्यादिना सचिवायत्त- सिद्ध वत्सराजस्य कार्यारम्भो यौगन्धरायणमुखेन द्शितः। फ़लहेतव इत्यर्थ :- अभिनवभारती १६.२०)। नाट्यदर्पण में भी अर्थप्रकृतियों को 'उपाय' कहा गया है (१.२८)। अभिनवभारती ओर नाट्यदर्पण के अनुसार इन पाँच उपायों में से बीज और कार्य दोनों जड़ (अचेतन) हैं। तीन; बिन्दु, पताका और प्रकरी चेतन हैं। किन्तु यह चेतन और अचेतन का विभाग युक्तियुक्त नहीं कहा जा सकता। सम्भवतः इसी हेतु सा० द० (६.६४-६५) आदि में इसे छोड़ दिया गया है। (३) बीज, बिन्दु और कार्य, ये तीन आवश्यक अर्थप्रकृतियाँ मानी गई हैं, पताका और प्रकरी का सभी रूपकों में होना अनिवार्य नहीं है। जहाँ प्रधान नायक को सहायक की आवश्यकता नहीं होती, वहाँ पताका और प्रकरी भी नही होती (मि० ना० द० १.३५) (४) यहाँ 'कार्य' शब्द का प्रयोग ध्यान देने योग्य है। कारिका १६ में 'कार्य' शब्द का अर्थ इतिवृत्त का फल या प्रयोजन है जो त्रिवर्ग प्राप्ति के रूप में है। किन्तु अर्थप्रकृतियों में जिस 'कार्य' का समावेश है वह फल नहीं है, अप तु फल-प्राप्ति का उपाय है। इस प्रकार फल के अधिकारी व्यक्ति का व्यापार ही कार्य नामक अर्थप्रकृति है। यह कार्य (नायक-व्यापार) आरम्भ से लेकर फल प्राप्ति तक चलता रहता है इसी हेतु कार्य शब्द का फल के अर्थ में भी प्रयोग कर दिया गया है। कार्य की पांच अवस्थाए और भी पाँच अवस्थाओं को बतलाते हैं :- फल की इच्छा वाले व्यक्ति के द्वारा आरम्भ किये गये कार्य की पाँच अवस्थाएं होती हैं- १ आरम्भ, २ यत्न, ३ प्राप्त्याशा, ४ नियताप्ति और ५ फलागम ॥१६॥ नामनिर्देश के क्रम से इनका लक्षण बतलाते हैं :- १ प्रचुर फल की प्राप्ति के लिये उत्सुकता मात्र होना ही आ्ररम्भ कहलाता है। भाव यह है कि "इस कार्य को मैं करूगा" इस प्रकार का निश्चय करना ही आरम्भ कहलाता है, जैसे रत्नावली नाटिका (१.७) में 'स्वामी के अभ्युदय के लिये किये गये तथा दंव के द्वारा हाथ का सहारा दिये गये इस कार्य में' आदि कथन के द्वारा वत्सराज उदयन के कार्य का आरम्भ यौगन्धरायण मन्त्री के मुख से दिखलाया गया है, क्योंकि उस (वत्सराज) की कार्यसिद्धि मन्त्री पर आश्रित है।

Page 71

२२ देशरूपकम

अथ प्रयत्न :- (३०) प्रयत्नस्तु तद्प्राप्तौ व्यापारोऽतित्वरान्वितः ॥२०। तस्य फलस्याप्राप्तावुपाययोजनादिरूपश्चेष्टाविशेषः प्रयत्नः। यथा रत्नावल्या- मालेख्याभिलेखनादिर्वत्सराजसमागमोपाय :- 'तहावि सत्थि अण्णो दंसरगुवाओ तति जहा-तहा आलिहितर जधासमीहितं करिस्सम्' (तथापि नास्त्यन्यो दर्शनोपाय इति यथा-तथालिख्य यधासमीहितं करिष्यामि।) इत्यादिना प्रतिपादितः । प्राप्त्याशामाह- (३१) उपायापायशङ्काभ्यां प्राप्त्याशा प्राप्तिसम्भवः । उपायस्यापायशङ्कायाश्च भावादनिर्धारितकान्ता फलप्राप्तिः प्राप्त्याशा। यथा रत्नावल्यां तृतीयेऽङ्क वेषपरिवर्ताभिसरणादी समागमोपाये सति वासवदत्तालक्षणा- पायशङ्काया :- 'एवं जदि अआालवादाली वित्र आअच्छित्र अण्णदो ए एाइस्सदि वासवदत्ता।' ('एवं यद्यकालवातालीवागत्यान्यतो न नेष्यति वासवदत्ता ।) इत्या- दिना दशितत्वादनिर्धारितकान्ता समागमप्राप्तिरुक्ता । नियताप्तिमाह -- (३२) अपायाभावतः प्राप्तिर्नियत प्तिः सुनिश्चिता ॥२१॥ २. प्रयत्न यह है :- फल के प्राप्त न होने पर (उसके लिये) अत्यन्त वेगपूर्वक उद्योग करना ही प्रयत्न कहलाता है ॥२०॥ जब फल प्राप्त नहीं होता और उसके लिये अनेक साधनों को जुटाना इत्यादि विशेष प्रकार की चेष्टा की जाती है तो वही प्रयत्न कहलाता है। जैसे रत्नावली नाटिका (अङ्क २) में (सागरिका द्वारा) चित्र बनाना इत्यादि वत्सराज उदयन से मिलने के उपाय हैं-'तथापि (वत्तराज के) दर्शन का दूसरा उपाय नहीं है इसलिये किसी प्रकार चित्र बनाकर मनचाही करूँगी।' ३. प्राप्त्याशा को बतलाया है- उपाय के होने तथा विघ्न की शङ्का होने से जो फलप्राप्ति की सम्भावना (मात्र) होती है, वह प्राप्त्याशा कहलाती है। ह। उपाय के होने पर भी विघ्न की शङ्का होने के कारण जब फलप्राप्ति का एकान्ततः निश्चय नहीं होता वही अवस्था प्राप्त्याशा कहलाती है। जैसे रत्नावली नाटिका के तृतीय अङ्क में (सागरिका द्वारा) वेष-परिवर्तन और अभिसरण आदि मिलन के उपाय होने पर वासवदत्ता रूपी विघ्न की शङ्गा इस प्रकार (विदूषक के कथन द्वारा) दिखलाई गई है-'ऐसा ही है, यदि अकाल की वायु के समान आकर वासवदत्ता इसे बदल न दे'। इस प्रकार यहां एकान्ततः निश्चित न की हुई (रत्नावली से) मिलन की प्राप्ति बतलाई गई है। ४. नियताप्ति को बतलाते हैं- विध्नों के अभाव से फल की निश्चित रूप से प्राप्ति ही नियताप्ति कहलाती है ।२१।। (wOB)

Page 72

प्रथम: प्रकाश: २३

अपायाभावादवधारितैकान्ता फलप्राप्तिनियताप्तिरिति । यथा रत्नावल्याम्- विदूषक :- सागरिका दुक्कर जीविस्सदि' (सागरिका दुष्करं जीविष्यति।) इत्युप- कम्य 'किं ए उपायं चिन्तेसि।' ( 'कि नोपायं चिन्तयसि ?) इत्यनन्तरम् 'राजा- वयस्य ! देवीप्रसादनं मुक्त्वा नान्यमत्रोपायं पश्यामि।' इत्यनन्तराङ्कार्थबिन्दुनानेन देवीलक्षणापायस्य प्रसादनेन निवारणान्नियता फलप्राप्तिः सूचिता। फलयोगमाह- (३३) समग्रफल संपत्ति: फलयोगो यथोदितः । यथा रत्नावल्यां रत्नावलीलाभचक्रवतित्वावाप्तिरिति । विध्नों के हट जाने पर फल-प्राप्ति का नितान्त निश्चय ही नियताप्ति है। जैसे रत्नावली नाटिका (३.१५-१६) में (वासवदत्ता द्वारा सागरिका को बन्दी बना लिये जाने पर) 'सागरिका कठिनाई से जीवित रहेगी' इस प्रकार आरम्भ करके विदूषक (राजा से) कहता है-'उपाय क्यों नहीं सोचते'। इसके पर्चात् राजा उदयन कहते हैं- मित्र, देवी वासवदत्ता को प्रसन्न करने के अतिरिकत मुझे कोई उपाय दिखलाई नहीं देता'। यहां अग्रिम (चतुर्थ) अङ्क की कथा का बिन्दु जो देवी-प्रसादन है उसके द्वारा देवीरूपी विघ्न का निवारण हो जाने से निश्चित फल-प्राप्ति की सूचना दी गई है। ५. फलागम को बतलाते हैं- पूर्ण रूप से फल की प्राप्ति ही फलागम है,जैसा कि पहले कहा गया है। जैसे रत्नावलो नाटिका में (उदयन को) रत्नावली की प्राप्ति और चक्रवर्ती पद की प्राप्ति-फलागम अवस्था है। टिप्पणी-(१) ना० शा० (१६.८-१४), भा० प्र० पृ० २०६, ना० द० (१.३७-४२), सा०द० (६.७०-७३) इत्यादि। (२) यथोदितः=जैसा कहा गया है। यद्यपि फलागम का स्वरूप ऊपर नहीं कहा गया तथापि 'कार्य त्रिवर्गः' (का० १.१६) इत्यादि में यह बतलाया गया है कि कहीं तो फल धर्म, अर्थ, काम में से कोई एक (शुद्ध) होता है और कहीं एक के साथ अन्य किसी एक का अथवा दो का अन्वय भी होता है। जिस रूपक का जो फल होता है शुद्ध या अन्य से अन्वित (अनुबद्ध) उसकी पूर्णातः प्राप्ति ही फलागम है। रत्नावली नाटिका में काम-सिद्धि का हेतु रतावली- समागम रूप फल है जो अर्थ-सिद्धि के हेतु चक्र्कवतित्व-प्राप्ति से समन्वित है। अतः दोनों के प्राप्त होने पर ही फल की पूर्णतः सिद्धि अर्थात् फलागम कहलाता है। (३) अरथप्रकृति्यां और कायविस्थाएँ-इन दोनों के स्वरूप-विवेवन से यह स्पष्ट है कि बीज, बिन्दु, पताका, प्रकरी और कार्य-ये पाँच अर्थप्रकृतियाँ फल-सिद्धि के उपाय हैं। यहाँ कार्य=नायक का व्यापार। फल को लक्ष्य करके किये गये कार्य अरथात् नायक-व्यापार की पांच अवस्थाएँ ही कार्यावस्थाएँ हैं। यद्यपि नाट्यशास्त्र आदि में इतिवृत्त के सन्दर्भ में ही अर्थप्रकृतियों तथा कार्यावस्थाओ्ं का उल्लेख

Page 73

२४ वशरूपकम्

सन्धिलक्षणमाह- (३४) अर्थप्रकृतयः पञ्च पञ्चावस्थासमन्विताः ॥२२॥। यथासंख्येन जायन्ते मुखाद्या: पञ्च सन्धयः। अर्थप्रकृतीनां पञ्चानां यथासंख्येनावस्थाभि: पञ्चभिर्योगात् यथासङ्य नैव वक्ष्यमाणा मुखाद्या: पञ्च सन्ध्यो जायन्ते। सन्धिसामान्यलक्षणमाह- (३५) अररन्तरैकार्थसंबन्धः सन्धिरेकान्वये सति ॥२३॥ हााग एकेन प्रयोजनेनान्वितानां कथांशानामवान्तरैकप्रयोजनसंबन्ध सन्धिः। के पुनस्ते सन्धय :- (३६) मुखप्रतिमुखे गर्भः सावमर्शोपसंहृतिः । किया गया है तथापि अर्थप्रकृतियों का साक्षात् सग्बन्ध इतिवृत्त के फल के साथ है, ये उसी फल की सिद्धि के उपाय होती हैं। कार्यावस्थाओं का साक्षात् सम्बन्ध नायक के व्यापार (कार्य) के साथ है। इन दोनों का इतिवृत्त के साथ साक्षात् सम्बन्ध नहीं, किन्तु परम्परया सम्बन्ध तो है ही। इसीलिये भारतीय नाट्यशास्त्र में इन दोनों के आधार पर इतिवृत्त का पाँच भागों में विभाजन किया गया है, जिसे पञचसन्धि के नाम से कहा जाता है। भरत मुनि ने बतलाया है-"इतिवृत्त नाट्य का शरीर है, उसका विभाग ५ सन्धियों द्वारा किया जाता है (ना० शा० १६१)। इस प्रकार अर्थप्रकृति, कार्यावस्था तथा सन्धि का भेद स्पष्ट ही है। अर्थप्रकृति=फल-सिद्धि के उपाय। कार्यावस्था-फल को लक्ष्य कर किये गये व्यापार की अवस्थाएँ। सन्धि= अर्थप्रकृति और कार्यावस्थाओं के आधार पर किये गये इतिवृत्त के विभाग। पाँच सन्धिया सन्धि शब्द का अरथ है-सन्धान, मिश्रण, ठीक ढंग से मिलाना। यर्हाँ पर किसी रूपक की कथावस्तु की सुव्यवस्थित योजना का नाम ही सन्धि है, अर्थात कथा वस्तु को विभक्त करके ठीक रूप से संघटित करना। सन्धि के स्वरूप, सामान्य लक्षणा, प्रकार तथा अङ्गों का आगे निरूपण किया जा रहा है। सन्धि का लक्षण बतलाते हैं :- पाँच अवस्थाओं से समन्वित होकर पांच अर्थप्रकृतियाँ ही क्रम से मुख इत्यादि पाँच सन्धियाँ बन जाती हैं ॥२२।। (बीज, बिन्दु, पताका प्रकरी और कार्य इन) पांच अर्थप्रकृतियों का क्रमशः आरम्भ आदि पांच अवस्थाओं के साथ योग होने से क्रमशः आे कही जाने वाली मुख, प्रतिमुख, गर्भ, विमर्श और उपसंहृति-ये पांच सन्धियां बन जाती हैं। सन्धि का सामान्य-लक्षणा बतलाया है :- एक प्रयोजन से अ्रन्वित होने पर किसी एक अवान्तर प्रयोजन के साथ सम्बन्ध होना ही सन्धि कहलाता है ॥२३॥ किसी एक (मुख्य) प्रयोजन से सम्बन्ध रखने वाले कथा भागों का दूसरे एक अवान्तर प्रयोजन के साथ सम्बन्ध होना ही सन्धि है। ये सन्धियाँ कौनसी हैं? Dbu मुख, प्रतिमुख, गर्भ, सावमर्श और उपसंहृति।

Page 74

प्रथमं: प्रकाशः २५

टिप्परी-(१) ना० शा० १६१, ३७; भा० प्र० पृ० २०७ -- २० ८; ना० द०१३७; सा०द० ६.७४-८१। (२) धनञ्जय के अप्रनुसार सन्धि का लक्षण यह है :- किसी रूपक में कई कथांश होते हैं उनके अपने प्रयोजन भी भिन्न-भिन्न होते हैं किन्तु वे इतिवृत्त के प्रधान प्रयोजन से समन्वित होते हैं और विसी अवान्तर प्रयोजन के साथ भी उन सब का सम्बन्ध हो सकता है। यही सम्बन्ध सन्धि कहलाता हैं अर्थात मुख्य प्रयोजन से अन्वित वथांशों का किसी एक अवान्तर प्रयोजन से सम्बन्ध। सन्धियों का रचनात्मक स्वरूप है- कIF १ बीज+प्रारम्भ=मुखसन्धि, २. बिन्दु-प्रयत्न=प्रतिमुख सन्धि, DPP३. पताका+प्राप्त्याशा=गर्भ सन्धि, ४ प्रकरी+नियताप्ति=अवमर्श ५. कार्य +फलागम=उपसंहृति। किन्तु यदि अर्थप्रकृतियों का अवरथाओं के साथ क्रमशः सम्बन्ध होने पर सन्धि का आविर्भाव होता है तो कठिनाई यह है कि अर्थप्रकृतियीं में पताका के पश्चात प्रकरी आती है, रामकथा में पताका का उदाहरण सुग्रीव कथा है और प्रकरी का उदाहरण शबरी या जटायु की वथा; किन्तु सुग्रीव-कथा का जटायु की कथा के बाद में वर्णन किया गया है अतः सन्धि में अथप्रकृतियों और अवस्थाओं का क्रमशः सम्बन्ध कैसे सम्भव है ? इसके अतिरिक्त ये सन्धियाँ पताका में भी होती हैं जिन्हें अनुसन्धि कहा जाता है (ना० शा० १.२८); फिर अर्थप्रकृति तथा अवस्थाओं के योग से सन्धि का अविर्भाव कैसे माना जा सकता है ? तथ्य यह है कि सन्धियाँ कार्याव- स्थाओं का अनुगमन करती है (ना० शा० १६.३७-४३ तथा ना० द० १.३७)। इस प्रकार प्रारम्भ आदि अवस्थाओंके अनुसार कमशः मुख आदि पाँच सन्धियां होती हैं। विभिन्न सन्धियों में कथावस्तु का क्मिक विकास निहित है और नायक का फल- प्राप्ति की ओर अग्रसर होना भी। अर्थप्रकृतियों के साथ सन्धियों का क्मिक सम्बन्ध नहीं बन सकता। हाँ, बीज, बिन्दु और कार्य जो किसी भी रूपक के लिये अनिवार्य अर्थप्रकृतियाँ हैं और जो इतिवृत्त में व्याप्त सी रहती हैं, उनकी विविध अवस्थाओ्रं का पञ्च सन्धियों से योग अवश्य रहता है, विशेषकर बीज तथा कार्य की अवस्थाओं का। इस प्रकार दशरूपक (तथा साहित्यदर्पण) का सन्धि का स्वरूप-विवेचन युक्तियुक्त नहीं प्रतीत होता। विन्तु इससे अर्थप्रकृतियों का विभाजन व्यर्थ नहीं हो जाता, जैसा कि कीथ आदि विद्वानों ने कहा है (संस्कृत नाटक)। अर्थ प्रकृतियाँ तो कार्य-सिद्धि के उपाय हैं। कथावस्तु के संघटन तथा विकास में उनका अपना सहत्त्व है।(३) प्रश्न यह है कि क्या ये पाँचों सन्धियाँ सभी प्रकार के रूपकों में अनि- वार्यं हैं ? नाo शा०(१६.१७,४४)के अनुसार नाटक तथा प्रकरण में पाँचों सन्धियाँ अनिवार्य हैं किन्तु अन्य रूपकों में इनमें से कुछ को छोड़ दिया जाता है। अभिनव भारती (१६.१७) में उद्धृत उपाध्याय-मत के अनुसार तो प्रत्येक इतिवृत्त पञ्च- सन्धि समन्वित ही होता है।

Page 75

२६ दशेरूपकःPR

यथोद्दशं लक्षणमाह- (३७) मुखं बीजसमुत्पत्तिर्नानार्थरससम्भवा ॥२४।। अङ्गानि द्वादशैतस्य बीजारम्भसमन्वयात्। बीजानामुत्पत्तिरनेकप्रकारप्रयोजनस्य रसस्य च हेतुमु खसन्धिरिति व्याख्येयं तेना- त्रिवर्गफले प्रहसनादौ रसोत्पत्तिहेतोरेव बीजत्वमिति। नाम-निर्देश के क्रम से (सन्धियों का) लक्षण बतलाते हैं :- जहाँ अ्रनेक प्रकार के प्रयोजन और रस को निष्पन्न करने वाली बीजोत्पत्ति होती है, वह मुखसन्धि है। बीज और आरम्भ के समन्वय से इसके बारह अङ्ग हो जाते हैं ।२४।। जहां बीजों की उत्पत्ति होती है और जो अ्रनेक प्रकार के प्रयोजन तथा रस की निष्पत्ति का निमित्त होती है वह मुख सन्धि है-ऐसी व्याख्या करनी चाहिये। इस प्रकार जिनका त्रिवर्ग (धर्म, अर्थ, काम) फल नहीं है ऐसे प्रहसन इत्यादि (रूपकों) में भी रसोत्पत्ति का हेतु ही बीज होता है। टिप्पणी-नानार्थरससम्भवा-यहाँ 'अर्थ' शब्द का अभिप्राय यदि त्रिवर्ग (धर्म, अर्थ, काम) लिया जाये तो दोष यह आता है कि प्रहसन आदि जो रूपक हैं वे तो केवल रसनिष्पित्ति के हेतु हैं, उनसे धर्म, अर्थ, काम इत्यादि की सिद्धि नहीं मानी जाती, फिर उनमें मुखसन्धि का लक्षणा कैसे घटित हो सकेगा ? इस दोष को दूर करने के लिये यहाँ अर्थ शब्द का तात्पर्य 'प्रयोजन' माना गया है, त्रिवर्ग नहीं। फिर भी इस समस्त पद का विग्रह दो प्रकार से हो सकता है (i) नानाऽर्थानां प्रयो- जनानां रसानां च सम्भवो यस्या: बीजसमुत्पत्ते := जो बीजोत्पत्ति अ्रनेकप्रकार के प्रयो- जनों तथा रसों की हेतु होती है। (ii) नानार्थस्य=अ्नेकप्रकारप्रयोजनस्य रसस्य सम्भवो यस्या :- जिससे अ्नेक प्रकार के प्रयोजन वाले रस की निष्पत्ति होती है; यहाँ 'नानार्थ' शब्द रस का विशेषण है (द्र० प्रता० टीका ३.८)। धनिक की व्याख्या से ये दोनों अर्थ निकल सकते हैं। (i) भाव यह है कि जहाँ बीज की उत्पत्ति अ्नेक प्रकार के प्रयोजन तथा रस-निष्पत्ति का हेतु होती है, वह मुख सन्धि है। (ii) अथवा रसनिष्पत्ति के भी अ्नेक प्रयोजन हो सकते हैं जैसे आ्ररानन्दानुभूति तथा सुख- पूर्वक त्रिवर्ग की व्युत्पत्ति आदि। प्रहसन आदि में भी आ्नन्दानुभूति होती है। यद्यपि वहाँ त्रिवर्ग की व्युत्पत्ति नहीं होती तथापि अनेक प्रकार के प्रयोजन वाले रस की निष्पत्ति बन ही जाती है अतः कोई दोष नहीं। फिर भी यहाँ धनञ्जय का क्या आशय है, यह विचारणीय ही है। भावप्रकाश (पृ०२०७-२०८)के अनुसार तो शृङ्गार आदि रस भी त्रिवर्ग प्राप्ति में उपयोगी हैं अतः यहाँ अर्थ शब्द का अभिप्राय 'त्रिवगं' माना जाये तो भी कोई कठिनाई नहीं।

Page 76

प्रथम: प्रकाशः २७

अस्य च बीजारम्भार्थयुक्तानि द्वादशाङ्कानि भवन्ति तान्याह- (३८) उपक्षेपः परिकरः परिन्यासो विलोभनम् ॥२५॥४1 युक्ति: प्राप्तिः समाधानं विधान परिभावना। उद्धे दभे दकरणान्यन्वर्थान्यथ लक्षणाम ॥२६।। एतेषां स्वसंज्ञाव्याख्यातानामपि सुखार्थ लक्षणं क्रियते- (३६) बीजन्यास उपच्षेप :- यथा रत्नावल्याम् -(नेपथ्ये) द्वीपादन्यस्मादपि मध्यादपि जलनिधेर्दिशोऽप्यन्तात्। आ्नीय झटिति घटयति विधिरभिमतमभिमुखीभूतः ।।३।। इत्यादिना योगन्वरायसो वत्सराजस्य रत्नावलीप्राप्तिहेतुभूतमनुकूलदैवं स्वव्यापारं बीजत्वेनोपक्षिप्तवानित्युपक्षेपः । परिकरमाह- (४०)-तद्बाहुल्यं परिक्रिया। इस (मुखसन्धि) के बीज, आरम्भ तथा प्रयोजन से समन्वित बारह श्रङ्ग होते हैं। उनको बतलाते हैं- १ उपच्ेप, २ परिकर, ३ परिन्यास, ४ विलोभन, ५ युक्ति, ६ प्राप्ति ७ समाधान, ८ विधान, ६ परिभावना, १० उद्भेद, ११ भेद और १२ करण ये अन्वर्थ नाम हैं। इनके लक्षता हैं॥२५,२६।। यद्यपि इनके नाम से ही इनकी व्याख्या हो गई है तथापि सुगमता के लिये इनका लक्षण किया जाता है। १. उपक्षेप बीज का (शब्दों में) रखना ही उपच्षेप है। जैसे रत्नावली नाटिका में (नेपथ्य में) द्वीपाद इत्यादि १.६ (अनुकूल दैव दूसरे द्वीप से भी, सागर के मध्य से भी, दिशाओरों के छोर से भी अभीष्ट वस्तु को लाकर शीघ्र मिला देता है) में यौगन्धरायण ने वत्सराज को रत्नावली की प्राप्ति का हेतु जो दैव की अमुकूलता सहित अपना (यौगन्धरायण का) उद्योग है, उसको बीज रूप में रख दिया है, अतः यह उपक्षेप है। २. परिकर को बतलाते हैं- उस (बीज) की वृद्धि ही परिकर है। जैसे वहीं (रत्नावली १.६-७)- 'यदि ऐसा (देव की अनुकूलता) न होता तो सिद्धों के कथन पर विश्वास करके (वत्सराज के लिये) माँगी गई सिंहलेश्बर,

Page 77

२८ देश रूप कमू

यथा तत्रैव-अन्यथा क्व सिद्धादेशप्रत्ययप्रार्थितायाः सिंहलेश्वरदुहितुः समुद्र प्रवहणभङ्गमग्नोत्थितायाः फलकासादनम् ।' इत्यादिना 'सर्वथा स्पृशन्ति स्वामिन- मभ्युदया: ।' इत्यन्तेन बीजोत्पल्तेरेव बहूकरणत्परिकरः । परिन्यासमाह- (४१) तन्निष्पत्तिः परिन्यास :- यथा तत्रंव- प्रारम्भेऽस्मिन्स्वामिनो वृद्धिहेतौ दैवे चेत्थं दत्तहस्तावलम्बे। सिद्ध भ्रान्तिर्नास्ति सत्यं तथापि स्वेच्छाकारी भीत एवास्मि भतुः ॥४॥ इत्यनेन यौगन्धरायणः स्वव्यापारदवयोनिष्पत्तिमुक्तवानिति परिन्यासः । विलोभनमाह- (४२)-गुखाख्यानं विलोभनम् ॥२७। यथा रत्नावल्याम् - अस्तापास्तसमस्तभासि नभसः पारं प्रयाते रवा- वास्थानीं समये समं नृपजनः सायंतने संपतन्। की पुत्री जलयान के टूट जाने पर डूबती हुई उठकर तख्ते को कैसे प्राप्त कर लेती ? -यहाँ से लेकर 'स्वामी (वत्सराज) को सब प्रकार से अभ्युदय प्राप्त हो रहे हैं।' यहाँ तक बीज की उत्पत्ति का ही बाहुल्य दिखलाया गया है, अतः यह परिकर है। ३. परिन्यास को बतलाते हैं- उस (बीज) की निष्पत्ति (सिद्धि) परिन्यास कहलाता है। जैसे वहीं (रत्नावली १.७ में ही)-'स्वामी के अभ्युदय के लिये आरम्भ किये गये इस कार्य में दैव ने भी इस प्रकार हाथ का सहारा दे दिया है अ्तः सचमुच ही इसकी सिद्धि में सन्वेह नहीं है। फिर भी अपनी इच्छा से कार्य करने वाला मैं स्वामी से डर रहा हूँ।' इसके द्वारा यौगन्धरायण ने अपने उद्योग और दैव की सिद्धि बतलाई है अतः यह परिन्यास है। टिप्पणी-(१) जिस प्रकार खेत में डाला गया बीज फूलकर अङ्क रोत्पादन के लिये समर्थ हो जाता है उसी प्रकार नाठ्य का बीज भी उपक्षिप् होकर तथा पुष्ट होकर फल की सिद्धि में समर्थ हो जाता है, यही बीजनिष्पत्ति है जिसे परित्यास कहते हैं। (२) ना० द० (१.५२) के अनुसार 'विनिश्चयः परिन्यासः' यह लक्षणा है किन्तु तात्पर्य यही है। ४. विलोभन को बतलाते हैं- गुणों का वर्णन विलोभन कहलाता है ।२७॥ जैसे रत्नावली (१.२३) में-"समस्त किरणों को अस्ताचल पर डाल चुकने वाले सूर्य के आकाश के पार चले जाने पर सायंकाल नृप-समुदाय एक साथ सभा अवन की ओर जा रहा है-और इस समय वह चन्द्रमा की किरों के समान

Page 78

प्रथम: प्रकाशः २६

00000000 संप्रत्येष सरोरुहद्युतिमुषः पांदास्तवासेवितु प्रीत्युत्कर्षकृतो दृशामुदयनस्येन्दोरिवोद्वीक्षते ।।५।। इति वतालिकमुखेन चन्द्रतुत्यवत्सराजगुणवर्गानया सागरिकाया: समागमहे- त्वनुराग-बीजानुगुण्येनैव विलोभनाद्विलोभनमिति। यथा च वेणीसंहारे- श्री मन्थायस्तार्णवाम्भ:प्लुतकुहरवलन्मन्दरध्वानधीर: कोणाघातेषु गर्जत्प्रलयघनघटान्योन्यसंघट्टचण्डः। कृष्णाकोधाग्रदूतः कुरुकुलनिधनोत्पातनिर्घातवातः केनास्मत्सिहनादप्रतिरसितसखो दुन्दुभिस्ताडितोऽयम् ॥६।। इत्यादिना 'यशोदुन्दुभिः' इत्यन्तेन द्रौपद्या विलोभनाद्विलोभनमिति। अ्रथ युक्ति :- (४३) संप्रधारणमर्थानां युक्ति :- थथा रत्नावल्याम्-'मयापि चैनां देवीहस्ते सबहुमानं निक्षिपता युक्तमेवा- नुष्ठितम् । कथितं च मया यथा बाभ्राव्यः कञ्चुकी सिंहलेश्वरामात्येन वसुभूतिना कमल की कान्ति को हरने वाले एवं आनन्द का अतिशय उत्पन्न करने वाले तुझ उदयन के चरणों की सेवा करने की प्रतीक्षा कर रहा है।" यहां वैतालिक के मुख से चन्द्रमा-सहृश वत्सराज के गुणों के वर्णन द्वारा सागरिका का विलोभन किया गया है जो (उदयन और रत्नावली के) समागम के हेतु अनुराग रूपी बीज का जनक है, अतः यहाँ विलोभन (नामक मुख सन्धि का श्रङ्ग) है। का टिप्पणी-आनुगुण्य=अनुकूलता=जनकता। रत्नावली-समागम का बीज है-अनुराग। वत्सराज के गुणों का श्रवण करके सागरिका (रत्नावली) के हृदय में यह अनुरगरपी बीज उत्पन्न होता है। और, जैसे वेरीसंहार (१.२२) में-'मन्थन से क्षुब्ध सागर के जल से भरी हुई गुफा वाले, घूमते हुए मन्दराचल की ध्वनि के समान गम्भीर, वादन दण्ड के ताडन के समय (कोरणधातेषु) गरजती हुई प्रलय-काल की घन.घटाओं के परस्पर टकराने के समान प्रचण्ड, द्रौपदी के करोध का अग्रदूत, कुरुवंश के विनाश के सूचक प्रचण्ड वायु के समान, हमारे सिंहनाद की प्रतिध्वनि का मित्र यह नगाड़ा किसने पीटा है ?' यहां से आरम्भ करके यशोदुन्दुभि: (१२५) तक (का अंश) द्रौवदी का विलोभन करने के कारण विलोभन (नामक मुखसन्धि का श्रङ्ग) है। ५. युक्ति की प्रयोजनों का निर्णाय करना ही युक्ति है। जैसे रत्नावली (१'६-७) में यौगन्धरायण कहता है-'मैंने भी इस (सागरिका) को आवरपूर्वक देवी (वासवदत्ता) के हाथ में सौंपकर उचित ही किया

Page 79

३० दशरूपकम्

सह कथंकथमपि समुद्रादुत्तीर्य कोशलोच्छित्तये गतस्य रुमण्वतो घटितः ।' इत्यनेन सागरिकाया अन्तःपुरस्थाया वत्सराजस्य सुखेन दर्शनादिप्रयोजनावधारणाद् बाभ्रव्य- सिंहलेश्वरामात्ययो: स्वनायकसमागमहेतुप्रयोजनत्वेनावधारणाद्युक्तिरिति। अथ प्राप्ति :- (४४) - प्राप्तिः सुखागमः । यथा वेगीसंहारे-'चेटी-भट्टिशि, परिकुविदो वित्र कुमारो लक्खीअदि।' [भ्त्रि, परिकुपित इव कुमारो लक्ष्यते ।] इत्युपक्मे भीम :- मथ्नामि कौरवशतं समरे न कोपाद् दुःशासनस्य रुधिरं न पिबाम्युरस्तः। संचूर्णयामि गदया न सुयोधनोरू सन्धि करोतु भवतां नृपतिः पऐोन ॥।७।। द्रौगदी-[श्रुत्वा सहर्षम] णाध, असुदपुव्वं खु एदं वश्रणं ता पुणो पुो भणा।' (नाथ, अश्रुतपूर्वं सत्वेतद्वचनं तत्पुनः पुनर्भण) इत्यनेन भीमकोधबीजा वयेनैव सुखप्राप्त्या द्रौपद्याः प्राप्तिरिति। यथा च रत्नावल्याम्-'सागरिका -- [श्रत्वा सहषं परिवृत्य सस्पृहं पश्यन्ती] कर्धं अतं सो रात उदयरो जस्स अहं तादेण दिण्णा ता परप्पेसणदूसिदं मे जीविदं है। मैंने यह भी कह दिया है कि बाभ्रव्य नाम का कञचुकी सिंहलराज के वसुभूति नामक अमात्य के साथ किसी प्रकार सागर से पार होकर कोशल के विनाश के लिये गये हुए रुमण्वान् से मिल गया है।' Tक इस (कथन) के द्वारा अन्तःपुर में स्थित सागरिका का सुगमतापूर्वक वत्सराज की दृष्टि में आ जाना इत्यादि प्रयोजन का निश्चय किया गया है तथा बाभ्रव्य और सिंहलेश्वर के अमात्य (वसुभूति) इन दोनों का अपने (यौगन्धरायण के) नायक (उदयन) के समागम (रत्नावली-मिलन) में हेतु होना आदि को प्रयोजन रूप में निश्चित किया गया है। अतः यहां युक्ति (नामक मुख सन्धि का श्रङ्ग) है। क (बीज के सम्बन्ध से) सुख का प्राप्त होना ही प्राप्ति है। ६. प्राप्ति जैसे वेरीसंहार (१.१५) में चेटी (द्रौपवी से) कहती है-हे स्वामिनि, कुमार (भीमसेन) कुद्ध से दिखाई दे रहे हैं।' इस सन्दर्भ में भीम कहता है- "वया मैं क्रोध से सौ कौरवों को युद्ध में न मारू ? दुःशासन के वक्षःस्थल से रक्त न पीऊँ ? दुर्योधन की जंघाओं को गदा से चूर्ण न करू ? आप(सहदेव आदि) का राजा भले ही शर्त (पसा) पर सन्धि कर ले।" तब द्रौपदी (सुनकर हर्ष के साथ) कहती है-'स्वामी, यह वचन पहले कभी नहीं सुना था, फिर से कहिये।' यहाँ भीम के क्रोध-रूपी बीज के सम्बन्ध से द्रौपदी को सुख की प्राप्ति होती है अतः यह प्राप्ति (नामक मुख सन्धि का अ्रङ्ग) है। की झर, जैसे रह्नावली (१.२३-२४) में सागरिका (बेतालिकों का कथन

Page 80

प्रथम: प्रकाश: ३१

एतस्स दंसशोा बहुमदं संजादम्।' [कथमयं स राजोदयनो यस्याहं तातेन दत्ता तत्परप्रेषसदूषितं मे जीवितमेतस्य दर्शनेन बहुमतं संजातम्] इति सागरिकायाः सुखागमात्प्राप्तिरिति । अथ समाधानम्। (४५) बीजागमः समाधानम्- यथा रत्नावल्याम्-'वासवदत्ता-तेण हि उरोहि मे उवत्ररणाइं। [तिन ह्य पनय म उपकरणोनि ।'] सागरिका-भट्टिशि, एदं सव्वं सज्जम् । ['भत्रि, एत- तसर्वं सज्जम् ।']वासवदत्ता-[निरूप्यात्मगतम्] अहो पमादी परिश्रणस्स जस्स एव्वं दंसरापहादो पशत्तेर रखखीतदि तस्स ज्जेव कहं दिट्टिंगोअर आगदा, भौदु एव्वं दाव। [प्रकाशम] हञ्जे सागरिए कीस तुमं अज्ज पराहीसो पशणो मश्ररूसबे सारिअं मोत्तूण इहागदा। ता तहिं ज्जेव गच्छ।' ['अहो प्रमादः परिजनस्य यस्यव दर्शनपथात्प्रयत्नेन रक्ष्यते तस्येव कर्थं दृष्टिगोचरमागता, भवतु एवं तावत् । चेटि सागरिके, कर्थ त्वमद्य पराधीने परिजने मदनोत्सवे सारिकां मुवत्वेहागता तस्मात्त- त्रं व गच्छ।') इत्युपक्र्मे 'सागरिका-(स्वगतम्) 'सारित्र दाव मए सुसङ्गदाए हत्थे समप्पिदा पेक्खिदु च मे कुतूहलं। ता अलक्खिआपेविविस्सम।' (सारिका तावन्मगा सुसङ्गताया हस्ते समरपिता प्रेक्षितु च मे कुतूहलं तदलक्षिता प्रेक्षिष्ये।') इत्यनेन। सुनकर हर्ष के साथ घूमकर स्पृहापूर्वक देखती हुई) कहती है-'क्या यही वह राजा उदयन है, जिसके लिये पिता जी ने मुझके दिया है, तब तो दूसरे की चाकरी से दूषित हुआ भी मेरा ज़ीवन इसके दर्शन से आदर-योग्य हो गया।' यहाँ सागरिका को (शत्सुक्य रूपी बीज के सम्बन्ध से) सुख की प्राप्ति होती है व्रतः यह प्राप्ति (नामक मुख सन्धि का अ्रङ्ग) है। ७. समाधान- बीज का आगमन समाधान है। जैसे रत्नावली (१.१८-१६) में वासवदत्ता- तब तो मेरी पूजा की सामग्री लाओो। आन सागरिका-स्वामिनी, यह सब तैयार है। ची वासवदत्ता-(देखकर मन ही मन) 'ओंह, दासियों का प्रमाद। जिस। राजा उदयन) के दृष्टिपथ से प्रयत्नपूर्वक बचाई जा रही है उसी की दृष्टि में पड़ जायेगी। अच्छा, तब मैं इस प्रकार कहूँ (प्रकट रूप से) अरी, सागरिका, आज सेवकों के मदन-महोत्सव में व्यस्त होने पर तुम सारिका को छोड़कर यहाँ कैसे था गई ? इसलिये शीघ्र वहीं जाओ।' इस सन्दर्भ में सागरिका (मन हीमन) कहती है-'सारिका तो मैंने सुसङ्गता के हाथ में साप दी है और मुझे देखने की उत्सुकता है। इसलिये छिपकर बेखूगी।'

Page 81

३२ दशरूपकम्R

वासवदत्ताया रत्नावलीवत्सराजयोर्दर्शनप्रतीकारात्सारिकाया: सुसङ्गतार्पयोनालक्षित- प्रक्षणेन च वत्सराजसमागमहेतोर्बीजस्योपादानात्समाधानमिति। यथा च वेगीसंहारे-'भीमः-भवतु पाञ्चालराजतनये शूयतामचिरेएांव कालेन चञ्चद्भुजभ्रमितचण्डगदा भिघातसंचूर्णितोरुयुगलस्य सुयोधनस्य।FF FR स्त्यानावनद्धघनशोशितशोणपाशिरुत सयिष्यति कचास्तव देवि भीमः ॥८॥ इत्यनेन वेशीसंहारहेतोः कोधबीजस्य पुनरुपादानात्समाधानम् । इस (कथन) के द्वारा (समाधान दिखलाया गया है)। यहां वासववत्ता के द्वारा रत्नावली और वत्सराज के परस्पर दर्शन को रोका जाता है इसीलिये सागरिका सारिका को सुसङ्गता के हाथों में सौंपकर, छिपकर (राजा के) दर्शन करती है। इससे वत्सराज के समागम के हेतु-रूप बीज का ग्रहण किया गया है, अतः यह समाधान (नामक मुख सन्धि का अ्रङ्ग) है। टिप्पणी-यहाँ 'सारिकायाः सुसङ्गतार्परेन+अलक्षितप्रेक्षणेन च बीजस्य उपादानात्'- यह अन्वय है। सारिका को सुसङ्गता के हाथों सौंपने धौर छिपकर देखने; इस सागरिका की चेष्टा द्वारा बीज का पुनः ग्रहणा किया गया हैं। इस प्रकार यही चेष्टा वत्सराज से समागम का हेतु है तथा यही बीज है। इस चेष्टा से सागरिका का औत्सुक्य प्रकट होता है। इसलिये कहीं कहीं 'औत्सुक्य' को भी बीज कह दिया गया है। और जैसे वेरगीसंहार (१.२१) में भीम कहता है-अ्रच्छा, पाञचाल की राजकुमारी, सुनिये। थोड़े ही समय में- हे देवी, फड़कती हुई भुजाओं द्वारा घुमाई गई भीषण गदा के प्रहार से चूर-चूर हुई जंघाओं वाले दूर्योंघन के चिकने (स्त्यान), अच्छी तरह लगे हुए (अवनद्ध) गाढ़े रक्त से लाल हाथों वाला भीम तेरे केशों को अलङ्कृत करेगा। इस (कथन) के द्वारा वेी को संवारने का हेतु जो (भीम का) क्रोध रूपी बीज है उसका फिर से ग्रहण किया गया है अतः यह समाधान नामक मुख सन्धि का श्रङ्ग) है। टिप्पणी - ना० शा० (१६.७२) में 'बीजार्थस्योपगमन समाधानम' यह लक्षणा है। सा०द० (६.८५) में दशरूपक के समान ही लक्षणा है। ना०द० (१.५३) में 'पुनर्न्यासः समाहितिः' अरथथात् संक्षेप में उपक्षिप्त बीज का फिर स्पष्ट रूप से आधान ही समाधान है। यहाँ यह लक्षणा अधिक स्पष्ट हो गया है। प्रता० (३.१०) में भी यही भाव है (बीजसन्निधानं समाधानम्)। ना०द० और सा०द० में दिये गये उदाहरण में दशरूपक से अन्तर है।

Page 82

प्रथम: प्रकाश: ३३

अथ विधानम्- (४६)-विधानं सुखदुःखकृत् ॥२८॥। यथा मालतीमाधवे प्रथमेऽङ्क-माधव :- यान्त्या मुहुर्वलितकन्धरमाननं तदावृत्तवृन्तशतपत्रनिभं वहन्त्या। दिग्धोऽमृतेन च विषेण च पक्ष्मलाक्ष्या गाढं निखात इव मे हृदये कटाक्षः ।।।। यद्विस्मय स्तिमितमस्तमितान्यभाव- मानन्दमन्दममृतप्लवनादिवाभूत् । तत्संनिधौ तदधुना हृदयं मदीय- मङ्गारचुम्बितमिव व्यथमानमास्ते ॥१०॥ इत्यनेन मालत्यवलोकनस्यानुरागस्य समागमहेतोर्बीजानुगुण्येनैव माधवस्य सुखदुःखकारित्वाद्विधानमिति। यथा च वेणीसंहारे-द्रौपदी-साध पुणोवि तुम्मेहिं अहं आशच्छित्र समासासिदव्वा। ('नाथ पुनरपि त्वयाहमागत्य समाश्वासयितव्या।') भीमः-ननु पाञ्चालराजतनये किमद्याप्यलीकाश्वासनया। भूय: परिभवक्लान्तिलज्ाविधुरिताननम्। अनिःशेपितकौरव्यं न पश्यसि वृकोदरम् ।।११।। इति सङ्ग्रामस्य सुखदुःखहेतुत्वाद्विधानमिति। 5. विधान सुख और दुःख (दोनों) को उत्पन्न करने वाला विधान कहलाता है। जैसे मालतीमाधव के प्रथम अ्रङ्ग (१.३०) में माधव कहता है-'भुके वृन्त वाले कमल के सहश बार बार वक्ित ग्रीवा वाले मुख को धारण करती हुई, रोमयुक्त नेत्रों वाली जाती हुई मालती ने अमृत और विष में बुझा हुग कटाक्ष (रूपी बाश) मानों मेरे हृदय में गहरा गाड़ दिया है।' माधव (मन ही मन) कहता है-(१.२०) जो मेरा हृदय मालती के समीप होने पर आश्चर्य से निश्चल था, जिसमें अन्य भावों का श्स्त हो गया था, जो मानों अमृत में स्नान करने के कारण आनन्द से स्तब्ध हो गया था, वही मेरा हृदय अब अङ्गारों से छुआ गया सा पीडायुक्त हो रहा है।' यहां पर मालती का अवलोकन और (माधव का उसके प्रति) अनुराग (मालती तथा माधव के) समागम का हेतु है वह बीज के अनुकूल होकर ही सुख तथा दुःख करने वाला है अतः विधान (नामक मुख सन्धि का अ्ङ्ग) है। और, जैसे वेरगीसंहार (१२५-२६) में द्रौपदी कहती है-'नाथ फिर भी आप आकर मुझे सानत्वना दीजियेगा।' इस पर भीम कहता है-'पाञचाल की राजकुमारी अब भूठे आाश्वासन से क्या लाभ ? अब फिर तूम भोम को कौरवों का नाश किये बिना तिरस्कार के कारण ग्लानि और लज्जा से दीन मुख वाला न देखोगी।

Page 83

३४ दशरूपकम्

अथ परिभावना- (४७) परिभावोऽ्द्ध तावेश :- यथा रत्नावल्याम्-'सागरिका-(दृष्ट्ा सविस्मयम्) कधं पच्चक्खो ज्जेव अणङ्गो पूतर पडिच्छेदि। ता अहंपि इध ठ्विदा ज्जेव एं पूजइस्सम्। ('कथं प्रत्यक्ष एवानङ्ग: पूर्जा प्रतीक्षते। तद् अहमपीह स्थितवैन पूजयिष्यामि'।) इत्यनेन वत्स- राजस्यानङ्गरूपतयापह्नवादनङ्गस्य च प्रत्यक्षस्य पूजाग्रहसास्य लोकोत्तरत्वादद्ध तर- सावेशः परिभावना। यथा च वेशीसंहारे-द्रौपदी-कि दाशि एसो पलअजलधरत्थणिदमंसलो खरो खरे समरदुन्दुभी ताडीअदि।' [ 'किमिदानीमेष प्रलयजलधरस्तनितमांसलः क्षणे क्षणो समरदुन्दुभिस्ताड्यते'] इति लोकोत्तरसमरदुन्दुभिध्वनेविस्मयरसावेशाद द्रौपद्या: परिभावना। यहाँ संग्राम सुख और दुःख का हेतु है अतः विधान (नामक मुख सन्धि का अ्रङ्ग) है। ह. परिभावना अद्भुत (भाव) का समावेश होना ही परिभावना है। जैसे रत्नावली (१.२२ -- २३) में 'सागरिका (कामदेव पूजा में उदयन को देखकर, अइचर्य के साथ) 'क्या! कामदेव प्रत्यक्ष होकर पूजा को ग्रहण कर रहा है। तो मैं भी यहाँ खड़ी होकर ही इसकी पूजा करूंगी।' इसके द्वारा कामदेव के रूप में समझने के कारण वत्सराज (के अपने रूप) को छिपाया गया है तथा कामदेव का प्रत्यक्ष होकर पूजा ग्रहण करना लोकोत्तर कार्य है अतः यहाँ अद्भुत रस का समावेश है और परिभावना (नामक मुख सन्धि का अङ्ग) है। और, जैसे वेरगीसंहार (१.२४ -- २५) में द्रौपदी कहती है -'इस समय यह प्रलयकालीन मेघध्वनि के समान गम्भीर रणमेरी क्षण-क्षणा में क्यों पीटी जा रही है।' यहाँ समर-दुन्दुभि की ध्वनि लोकोत्तर है उससे द्रौपदी (के हृदय) में अद्भुत रस (विस्मय) का आ्वेश वगिगत किया गया है, अतः परिभावना (नामक मुख सन्धि का अ्रङ्ग) है। टिप्पणी-ना० शा० (१६.७३) में 'कुतूहलोत्तरावेगो विज्ञेया परिभावना' अर्थात् कुतूहल से मिश्रित आवेग को परिभावना कहा जाता है। ना० द० (१.४५) में भी 'विस्मयः परिभावना' कहकर यही भाव प्रकट किया गया है। दशरूपक के लक्षण का भी यही भाव है तथा प्रता० (३.१०) में भी यही भाव है। सा० द० (६.८६) में यह भाव अ्रधिक स्पष्ट हो गया है-'कुतूहलोत्तरा वाचः प्रोक्ता तु परि- भावना' अर्थात् कुतूहलपूर्ण वचन ही परिभावना कहलाती है।

Page 84

प्रथम: प्रकाश: ३५

अथोद्भेद :- (४८)-उद्भेदो गूढभे दनम्। यथा रत्नावल्याँ वत्सराजस्य कुसुमायुधव्यपदेशगूढस्य वैतालिकवचसा 'अस्तापास्त' इत्यादिना 'उदयनस्य' इत्यन्तेन बीजानुण्येनैवोद्भेदनादुद्भेदः। यथा च वेगगोसंहारे-'आर्य, किमिदानीमध्यवस्यति गुरुः ।' इत्युपक्रमे [नेपथ्ये] यत्सत्यव्रतभङ्गभीरुमनसा यत्नेन मन्दोकृतं यद्धिस्मर्तुमपीहितं शमवता शान्ति कुलस्येच्छता। तद्यूतारणिसंभृतं नृपसुताकेशाम्बराकर्षौः कोधज्योतिरिदं महत्कुरुवने यौधिष्ठिरं जुम्भते ॥१२ ॥ भीम :- (सहर्षम्) जम्भतां जुम्भतां संप्रत्यप्रतिहतमार्यस्य क्रोधज्योतिः।' इत्यनेन छन्नस्य द्रौपदीकेशसंयमनहेतोर्यु धिष्ठरकोधस्योद्द दनादुन्द्दः। १०. उद्भेद (बीज के अनुकूल) किसी गूढ बात को प्रकट करना ही उद्भेद कहलाता है। जैसे रत्नावली नाटिका में वत्सराज कामदेव के नाम से छिपे थे। वैतालिक ने अस्तापास्त (१.२३) इत्यादि से आरम्भ करके 'उदयनस्य इन्दोरिवोद्वीक्षते' (१.२३) यहाँ तक के कथन द्वारा (अनुराग रूपी) बीज के अनुकूल रूप में (उदयन को) प्रकट कर दिया। अतः यहाँ उद्भेद (नामक मुख सन्धि का श्रङ्ग) है। और, जैसे वेरीसंहार नाटक (१.२४) में (भीमसेन के कञ्चुकी से) यह कहने पर "आर्य, अब ज्येष्ठ भ्राता (युधिष्ठिर) ने क्या निश्चय किया है?" नेपथ्य में कहा जाता है- 'द्रौपदी (नृपवधू) के केश और वस्त्रों को खींचने से द्यतरूपी शरशि से उत्पन्न, युधिष्ठिर की वह भारी क्रोधाग्नि, जिसे सत्य-व्रत के भङ्ग से डरने वाले युधिष्ठिर ने यत्नपूर्वक शान्त कर रक्खा था और जिसे शान्तियुक्त तथा कुल की शान्ति के इच्छुक युधिष्ठिर ने भुलाना नाहा था, अब कुरुकुल रूपी वन में प्रदीप्त हो रही है।' भीमसेन-आर्य के क्रोध की ज्वाला प्रदीप्त हो, ऐसी प्रदीप्त हो कि उसवी गति कहीं भी न रुके। द्रौपदी के केशसंयमन का हेतु जो युधिष्ठिर का क्रोध है, वह पहले गूढ़ (छन्न) है, उसका प्रकटन यहाँ हो रहा है अतः उद्भेद (नामक मुख मन्धि का अ्रङ्ग) है। टिप्पणी-ना० शा० (१६.७४) में यह लक्षण है-'बीजार्थस्य प्ररोहोः

Page 85

३६ दशरूपकम्

अथ करणम्- (४६) करएं प्रकृतारम्भ :- यथा रत्नावल्याम्-'एमो दे कुसुमाउह ता अमोहदंसरो में भविस्ससि ति। दिठ्ठं पेक्खिदव्तं ता जाव ण कोवि मं पेक्खइ ता गमिस्सम् ।' (नमस्ते कुसुमायुध, दमोघदर्शनो मे भविष्यसीति। दृष्टं यत्प्रेक्षितव्यं तद्यावन्न कोऽपि मां प्रेक्षते तद्गमि- यथा च वेीसंहारे-'तत्पाञ्चालि गच्छामो वयमिदानीं कुरुकुलक्षयाय, सह्देव :- आर्य, गच्छाम इदानीं गुरुजनानुज्ञाता विक्रमानुरूपमाचरितुम।' इत्यनेनानन्तराङ्कप्रस्तूयमानसङ्ग्रामारम्भणातकरणमिति। सर्वत्र चेहोद्द शप्रतिनिर्देश- वैषम्यं क्रियाक्र्कमस्याविवक्षितत्वादिति। अथ भेद :- (५०)- भेदः प्रोत्साहना मता ॥२६॥ यथा वेरीसंहारे-'साध, मा क्खु जण्णसेरीपरिभवुद्दीविदकोवा अणपेकखद- स उद्भेदः' । यही लक्षण सा० द० (६.८६) मे है। ना० द० (१.५४) में 'स्वल्प- प्ररोह उद्भेद:', यह लक्षण देकर अधिक स्पष्ट किया किया गया है, अर्थात् बीज का थोड़ा सा विस्तार जो भूमि में बोये गये बीज के फूलने के समान है, उद्भेद कहलाता है। स्पष्ट ही है कि दशरूपक का उद्भेद-लक्षणा उपयुक्त लक्षणों से भिन्न है। यहाँ तो छिपे हुए बीज का प्रकट करना ही उद्भेद वहा गया है। प्रता० (३.१०) में भी इसी का अनुसरण किया गया है। (I) यहां जो उद्भेद का उदारगा दिया गया है ना० द० तथा सा० द० में वह समाध न के उदाहग्णा के रूप में प्रस्तुत किया गया है। ११. करण प्रस्तुत कार्य का श्रारम्भ करना करण कहलाता है। जैसे रत्नावली (१.२ -- २३) में सागरिका कहती है हे कामदेव, तुम्हें नमस्कार है तुम्हारा दर्शन मेरे लिये सफल हो, जो देखना था मैंने देख लिया। इसलिये जब तक कोई मुझके नहीं देखता तब तक चली जाऊ।' इस (कथन) के द्वारा अग्रिम अङ्ध में वर्णनीय जो (सागरिका और वत्सराज का परस्पर) निर्विघ्न दर्शन है उसका ध्ारम्भ किया गया है अतः करण (नामक मुख सन्धि का श्रङ्ग) है। और, जैसे वेरगोसंहार (१.२५-२६) में भीमसेन कहता है-'अतः पाञ्चाली, अब हम कौरवों के नाश के लिये जाते हैं।' सहदेव-'अब गुरुजनों की अनुमति पाये हुए हम भी पराक्रम के योग्य कार्य करने के लिये जाते हैं।' इस (कथन) के द्वारा अग्रिम (द्वितीय) अङ्क में वर्णनीय जो संग्राम है उसका आरम्भ किया गया है। अतः करण (नामक मुख सन्धि का श्रङ्ग) है। यहाँ सब जगह क्रिया का क्रम विवक्षित नहीं है इसलिये उद्देश और प्रति- निर्देश (विधेय) का क्रम-परिवर्तन (वैषम्य) हो गया है।

Page 86

प्रथम: प्रकाश: ३७

सरीरा परिक्कमिस्सध जदो अप्पमत्तसंचरसीयाइं सुशीयन्ति रिउबलाइ। ['नाथ, मा खलु याज्ञसेनीपरिभवोद्दीपितकोपा अनपेक्षितशरीरा: परिकमिष्यथ यतोऽप्रमत्तसञ्जर- एीयानि श्रयन्ते रिपुबलानि।'] भीम :- अयि सुक्षत्रिये,

मग्नानां स्यन्दनानामुपरि कृतपदन्यासविक्रान्तपत्तौ। स्फीतासृक्पानगोष्ठीरसद शिवशिवातूर्यनृत्यत्कबन्धे सङ्ग्रामैकार्णवान्तः पयसि विचरितु पण्डिता: पाण्डुपुत्राः ॥१३॥7 इत्यनेन विषण्णाया द्रौपद्याः करोधोत्साहबीजानुगुण्येनैव प्रोत्साहनाद भेद इति। एतानि च द्वादशमुखाङ्गानि बीजारम्भद्योतकानि साक्षात्पारम्पर्येण वा विधेयानि। एतेषामुपक्षेपपरिकरपरिन्यासयुवत्युद्भेदसमाधानानामवश्यं भावितेति। टिप्पणी-सवंत्र-'गच्छामो वयम् इदानी कुरुकुलक्षयाय' यहाँ वयम् इत्यादि उद्देश है और 'गच्छामः' विधेय है, और सामान्य नियम यह है कि वाक्य में उद्दश को पहले रखना चाहिये तथा विधेय को बाद में। अतः 'इदानी वय कुरकुल- क्षयाय गच्छामः । इस प्रकार की वाक्ययोजना होनी चाहिये। इस शङ्का का समाधान करने के लिये धनिक ने कहा है कि यहाँ क्रिया का क्रम विवक्षित नहीं है अथवा यह कहा जा सकता है कि यहां क्रिया की प्रधानता नहीं मानी गई अपितु 'कुरुकुलक्षय' को ही प्रधान माना गया है और उस पर बल देने के लिये उसका बाद में प्रयोग किया गया है। १२. भेद प्रोत्साहन को भेद माना गया है ॥२६॥ जैसे वेरगीसंहार (१·२६ -- २७) में 'नाथ, नहीं, याज्ञसेनी के अपमान से उद्दीप्त है क्रोधाग्नि जिसकी ऐसे आप अपने शरीर की ओर असावधान होकर पराक्रम न दिखलाइयेगा, क्योंकि सुना जाता है कि शत्रु की सेना में सावधान होकर जाना चाहिये।' भीम-'अयि श्रेष्ठ क्षत्राणी, जहाँ परस्पर टकराने से विदीर्स हाथियों के रुधिर, चर्बी, मांस ओर मस्तिष्क से (उत्पन्न) कीचड़ में धसे हुए रथों के ऊपर पैर रखकर पैदल योद्धा पराक्रम दिखलाते हैं और जहाँ प्रचुर रुधिर की पान गोष्ठी में शब्द करती हुई अमङगलकारो भृगाली रूपी तुरही पर कबन्ध (धड़) नृत्य कर रहे हैं, उस समर रूपी अद्वितीय सागर के मध्य-जल में विचरण करने में पाण्डु के पुत्र कुशल हैं।' इस (कथन) के द्वारा क्रोध और उत्साह रूपी बीज के अनुरूप ही विषाद- युक्त द्रौपदी को प्रोत्साहित किया गया है अतः यह भेद (नामक मुख सन्धि का अ्रङ्ध) है। टिप्पणी-ना० शा० के अनुसार 'संघातभेदनार्थो यः स भेदः' पात्रों का अपने अपने कार्य के अनुसार भिन्न-भिन्न स्थानों में जाने का जो अभिप्राय होता है

Page 87

३८ दशरूपकम्

अथ साङ़ग प्रतिमुखसन्धिमाह- (५१) लक्ष्यालक्ष्यतयोद्भेदस्तस्य प्रतिमुखं भवेत्। बिन्दु प्रयत्नानुगमादङ्गान्यस्य त्रयोदश ।३०।। वह अभिनेता (नटों) के रङ्गभूमि से निकलने का भी निमित्त हुआ करता है। पात्रसंघात में भेद (पृथक्ता) का निमित्त होने के कारण वही भेद कहलाता है। ना० द० (१.४४) की वृत्ति में इसे भेद (भेदन) का दूसरा प्रकार कहा गया है। ना० द० के अनुसार भेद का प्रथम अभिप्राय है-पात्रों का रङ्गस्थल से बाहर जाना (भेदनं पात्रनिर्गमः)। दशरूपक के भेद-लक्षणा को ना० द० में तृतीय मत के रूप में उद्ध त किया गया है। सा० द० में भी केचित्तु 'कहकर इसी मत का उल्लेख किया गया है। प्रता०(३.१०) ने दशरूपक का ही अनुसरण किया है। सा० द० (६.८७) के अनुसार 'भेदः संहृतभेदनम्' 'मिले हुओरं को पृथक् करना ही भेद कहलाता. है'। इस मत का उल्लेख ना० द० में (चतुर्थ मत के रूप में) किया गया है। मुख सन्धि के ये १२ अङ्ग बीज (नामक अर्थप्रकृति) और आरम्भ (नामक कार्यावस्था) के सूचक होते हैं। इनका (रूपक में) साक्षात रूप से या परम्परा से विधान किया जाता है। इनमें से उपक्षेप, परिकर, परिन्यास, युक्ति, उद्भेद और समाधान का होना (प्रत्येक-रूपक में) आवश्यक है। टिप्पी-(१)संक्षेप में रूपक की जितनी अर्थराशि में फल-प्राप्ति के मुख्य उपाय बीज की सम्यक् उत्पत्ति हो जाती है तथा प्रारम्भ नाम की कार्यावस्था पूर्ण हो जाती है वह मुखसन्धि है। यह प्रसङ्ग के अनुसार रस-निष्पत्ति का भी हेतु हुआ करती है। जैसे रत्नावली नाटिका का प्रथम अङ्क है। यहाँ दैव की अनुकूलता से युक्त यौगन्धरायण का उद्योग ही बीज है। प्रथमतः उस उद्योग का विषय है-सागरिका द्वारा राजा का दर्शन किया जाना। इसी अर्थराशि में इतिवृत्त की आरम्भावस्था समाप्त हो जाती है। यहां बीजन्यास से लेकर भेद पर्यन्त १२ अवस्थाओं में जाते हुए बीज की उत्पत्ति दिखलाई गई है, जैसा कि बारह अ्ङ्गों के उदाहरण से स्पष्ट है। साथ ही यह अङ् नाना रसों की निष्पत्ति का भी हेतु होता है जैसे यौगन्धरायण के उत्साह वर्णन में वीर रस, उदयन के वसन्त रूप विभाव के वर्णन में शृद्गार तथा पुरवासियों के प्रमोद के अवलोकन में अद्द् त रस की निष्पत्ति होती है। (२) मुखसन्धि के उपर्युक्त १२ अङ्गों का ही ना० शा० (१६.५७)। प्रता० (३.६-१०) सा० द० (६.८१-८२) में भी निरूपणा किया गया है किन्तु क्रम में कुछ अन्तर है तथा किन्हीं अ्ङ्गों के लक्षणा में भी, जिसका यथावसर उल्लेख कर दिया गया है। ना० द० (१.४१-४२) में इन्हीं दस अङ्गों का वर्णन है किन्तु नाम तथा क्रम में कुछ अधिक अन्तर है। साथ ही कुछ विशद व्याख्या भी वहां है। प्रतिमुख सन्धि अब प्रतिमुख सन्धि का श्रङ्गों सहित वर्णन करते हैं- जहाँ उस बीज का कुछ लक्ष्य रूप में और कुछ अलक्ष्य रूप में उद्भेद होता है वह प्रतिमुख सन्धि कहलाती है। बिन्दु (नामक अर्थप्रकृति) औ्र्रौर प्रयत्न (नामक कार्यावस्था) के योग से इसके तेरह अङ्ग होते हैं।३०॥

Page 88

प्रथम: प्रकाश: ३६

तस्य बीजस्य, किञ्चिल्लक्ष्य: किञ्चिदलक्ष्य इवोद्भेद :- प्रकाशनं तत्प्रतिमुखम् । यथा रत्नावल्यां द्वितीयेऽङ्क वत्सराजसागरिकासमागमहेतोरनुरागबीजस्य प्रथमाङ्कोपक्षि- प्तस्य सुसङ्गताविदूषकाभ्यां ज्ञायमानतया किचिल्लक्ष्यस्य वासदत्तया च चित्रफलकवृत्ता न्तेन किचिदुन्नीयमानस्य हृश्यादृश्यरूपतयोद्भेद; प्रतिमुखसन्धिरिति। वेणीसंहारेऽपि द्वितीयेडङ्ग भीष्मादिवधेन विज्चिल्लक्ष्यस्य कर्णाद्यवधाच्चा- लक्ष्यस्य क्रोधबीजस्योद्भेदः । सहभृत्यगएं सबान्घवं सहमित्रं ससुतं सहानुजम् । स्वबलेन निहन्ति संयुगे न चिरात्पाण्डुसुतः सुयोधनम् ॥ १४॥ इत्यादिभि :- दुःशासनस्य हृदयक्षतजाम्बुपाने दुर्योधनस्य च यथा गद्योरुभङ्ग। तेजस्विनां समरमूर्धनि पाण्डवानां ज्ञया जयद्रथवधेऽ्पि तथा प्रतिज्ञा ॥१५। इत्येवमादिभिश्चोद्भेदः प्रतिमुखसन्धिरिति।

उस (तस्य) अर्थात् मुख सन्धि में निर्दिष्ट बीज का कुछ लक्ष्य रूप में और कुछ अलक्ष्य रूप में उद्भेद अर्थात् प्रकट होना ही प्रतिमुख सन्धि है, जैसे रत्नावली नाटिका के द्वितीय अङ्क में-जो वत्सराजऔर सागरिका के मिलन (फल) का हेतु अनुराग रूपी बीज है, उसका प्रथम अङ्क में उपक्षेप किया गया है। द्वितीय अङ्ग में सुसङ्गता और विदूषक के द्वारा वह जान लिया गया है। अतः कुछ कुछ लक्ष्य है और वासवदत्ता के द्वारा चित्रफलक को घटना द्वारा वह कुछ कुछ समझा भर गया है (अतः अलक्ष्य है) । इस प्रकार यहाँ (अनुराग रूपी) बीज कुछ लक्ष्य और कुछ अलक्ष्य रूप में प्रकट होता है तथा प्रतिमुख सन्धि है। वेणीसंहार के द्वितीय अङ्क में भी (प्रतिमुख सन्धि है) । वहाँ क्रोध रूपी बीज का भीष्म आदि के वध द्वारा कुछ कुछ लक्ष्य तथा कर्ण आदि का वध न होने के कारण कुछ अलक्ष्य रूप में प्रकट होना ही प्रतिमुख सन्धि है, जैसे कि (२-५) राजा दुर्योधन कञ्चुकी से कहते हैं-शीघ्र ही पाण्डु का पुत्र अपने बल से समर में भृत्यवर्ग, बन्धुगण, मित्र, पुत्र तथा अनुजों सहित दुर्योधन को मार देगा। इत्यादि (कथन) के द्वारा तथा (दुर्योधन के भानुमती के प्रति २.२७) 'दुःशासन के हृदय से रुधिर रूपी जल को पीने और गदा से दुर्योधन की जड्गा को तोड़ देने के विषय में तेजस्वी पाण्डवों की जैसी प्रतिज्ञा थी वैसी ही समर-भूमि में जयद्रथ के वध के विषय में भी समझनी चाहिये।' इत्यादि कथन के द्वारा भी जो बीज़ का प्रकटन होता है, वह प्रतिमुख सन्धि है।

Page 89

४० दशरूपकम्

अस्य च पूर्वाङ्कोपक्षिप्तबिन्दुरूपबीजप्रयत्नार्थानुगतानि त्रयोदशाङ्गानि भर्वन्ति, तान्याह- (५२) विलास: परिसर्पश्च विधूतं शमनर्मणी। नर्मदुतिः प्रगमनं निरोधः पर्यु पासनम् ॥३१॥ वज्र पुष्पमुपन्यासो वर्णसंहार इत्यपि। यथोद्दशं लक्षणमाह (५३) रत्यर्थेहा विलास: स्याद- यथा रत्नावल्याम्-'सागरिका-हिशरअ पसीद पसीद कि इमिणा आआसमेत्त- फलेश दुल्लहजराप्पत्थरणारुबन्वेण । ('हृदय, प्रसीद प्रसीद किमनेनायास- मात्रफलेन दुर्लभजनप्रार्थनानुबन्वेन।') इत्युपक्रमे 'तहावि आलेखगदं तं जएं कदुत जधासमीहिद करिस्सम्, तहावि तस्स सत्थि अण्सो दंसणोवाउत्ति।' ('तथाप्या- लेखगतं तं जनं कृत्वा यथासमीहितं करिष्यामि। तथापि तस्य नास्त्यन्यो दर्शनोपायः)।' इत्येतर्वत्सराजसमागमरति चित्रादिजन्यामप्युद्दिश्य सागरिकायाश्चेष्टाप्रयत्नोऽनुराग- बीजानुगतो विलास इति। जो प्रथम अङ्क में रक्खा गया है तथा अग्रिम अङ्क में बिन्दु रूप में आया है उस बीज तथा प्रयत्न (नामक कार्यावस्था) के आधार पर इस (प्रतिमुख सन्धि) के तेरह भ्रङ्ग होते हैं। उन्हें बतलाते हैं- विलास, परिसर्प, विधूत, शम, नर्म, नर्मद्युति, प्रगमन, निरोध, पयु- पासन, वज्, पुष्प, उपन्यास तथा वर्णसंहार (ये १३ प्रतिमुख सन्धि के शङ्ग हैं)॥३१।। नाम के करम से उनका लक्षण बतलाते हैं- १. विलास रति के लिये जो इच्छा होती है वह विलास कहलाता है। जैसे रत्नावली नाटिका (अङ्क २ प्रवेशक के बाद) सागरिका कहती है- हृदय, प्रसन्न हो, प्रसन्न हो, इस दुर्लभ जन (वत्सराज) की अभिलाषा के आग्रह से, जिसका केवल मात्र दुःख ही फल है, क्या लाभ ?' इससे आरम्भ करके 'तथापि "उस व्यक्ति को चित्रित करके मन चाही करूँगी। उसको देखने का कोई अन्य उपय नहीं है।' इन (कथनों) के द्वारा वत्सराज के समागम की रति के लिये (उद्दिश्य) सागरिका का चेष्टा रूपी प्रयत्न प्रकट हो रहा है, घद्यपि वह रति चित्र आदि के द्वारा ही उत्पन्न हुई है। यह प्रयत्न अनुराग रूपी बीज (जो द्वितीय अङ्ग में बिन्दु के रूप मेंहै) से भी अनुगत है अतः विलास (नामक प्रतिमुख सन्धि का अङ्ग) है। टिप्पणी-यहाँ 'रति' स्थायीभाव का उपलक्षण है। ईहा (=चेष्टा) रति आदि भाव के लिये नहीं अपि तु रति आदि भाव के विषय के प्रति होती है। इस प्रकार रति आदि भाव के विषय के लिये जो चेष्टा है वही विलास है। श्रृद्गार-

Page 90

प्रेथम: प्रकाशः ४१

अथ परिसर्प :-

परिसर्प :- (५४)-दष्टनष्टानुसर्परम ॥३२॥

यथा वेणगीसंहारे 'कंचुकी-योऽयमुद्यतेषु बलवत्सु, अथवा कि बलवत्सु वासुदेव- सहायेष्वरिष्वद्याप्यन्तःपुरसुखमनुभवति, इदमपरमयथातथं स्वामिन :- आशस्त्रग्रहणादकुण्ठपरशोस्तस्यापि जेता मुने- स्तापायास्य न पाण्डुसूनुभिरयं भीष्म: शरः शायितः। प्रौढानेकधनुर्धरारिविजयश्रान्तस्य चैकाकिनो बालस्यायमरातिलूनधनुष; प्रीतोऽ्भिमन्योर्वधात् ।। १६ ।। इत्यनेन भीष्मादिववे दृष्टस्याभिमन्युवधान्नष्टस्य बलवतां पाण्डवानां वासुदेव- सहायानां सङ्ग्रामलक्षणबिन्दुबीजप्रयत्नान्वयेन कञ्चुकिमुखेन बीजानुसर्परं परिसर्प इति। यथा च रत्नावल्यां सारिकावचनचित्रदर्शनाभ्यां सागरिकानुरागबीजस्य दृष्टनष्टस्य 'क्वासौ क्वासौ' इत्यादिना वत्सराजेनानुसरणात्परिसर्प इति। रस-प्रधान रूपकों में रति के विषय (प्रमदा या पुरुष) के लिये ईहा होती है किन्तु जहां वीर आदि रस प्रधान हैं वहां उत्साह आदि के विषय के प्रति ईहा होती है (द्र०, ना० द० १.६३) । उपयुक्त उदाहरण में सागरिका के प्रेम का विषय जो वत्सराज है, जो कि यहां चित्रगत ही है, उसके प्रति सागरिका की ईहा का वर्णन है। यह ईहा ही यहां प्रयत्न नामक कार्यावस्था है जो अनुराग रूपी अवान्तर बीज (=बिन्दु) से अनुगत है। अतः यहां प्रतिमुख सन्धि का प्रथम शङ्ग विलास है। २. परिसर्प पहले देखे गये और फिर नष्ट हुए बीज का अन्वेषण परिसर्प कहलाता है। जंसे वेशीसंहार (अङ्क २) में (आ्काश भाषित में दुर्योधन को लक्ष्य करके) कञ्दुकी कहता है-[धन्य हैं पतिव्रता भानुमती आप धन्य हैं, स्त्री होकर भी आ्रप अच्छी हैं किन्तु महाराज (शच्छे) नहीं] जो यह अब भी अन्तःपुर में सुख का भोग कर रहे हैं जबकि बलवान् शत्रु पाण्डु के पुत्र, अथवा चाहे बलवान् न भी हों किन्तु जिनके सहायक वासुदेव हैं, युद्ध के लिये तत्पर हैं। यह स्वामी का दूसरा अनुचित कार्य है-(वेरीसंहार २.२) 'शस्त्र-ग्रहण के आरम्भ से सेकर कभी जिसका परशु कुण्ठित नहीं हुआ, उस प्रसिद्ध मुनि (परशुराम) को जीतने वाला यह भीष्म पाण्डु-पुत्रों द्वारा बाणों से गिरा दिया गया और इससे यह (दुर्योधन) दुःखी न हुआ। साथ ही जो बड़े बड़े धनुर्धारी शत्रुओं की विजय से थका था, शत्रुओों द्वारा जिसका धनुष काट दिया गया था ऐसे अकेले, बालक अभिमन्यु के बध से यह प्रसन्न हो रहा है।'

Page 91

४२ दशरूपकम

अरथ विधूतम्- (५५)-विधूतं स्यादरति :- यथा रत्नावल्याम् 'सागरिका-सहि अ्हितं मे संतावो बाधेदि। ('सखि, अधिकं मे संतापो बाधते।') (सुसङ्गता दीघिकातो नलिनीदलानि मृणालिकाश्चानीया- स्या अङ्ग ददाति) सागरिका (तानि क्षिपन्ती)-सहि, अवणोहि एदाईं कि अशरणं अत्तार्ण आयासेसि ए भणामि-(सखि, अपनयैतानि किमक,रण आत्मानमा- यासयसि। ननु भणगामि- ) दुल्लहजरारुराओ लज्जा गरुई परव्वसो अप्पा। पित्रसहि बिसमं पेम्म मरणं सरणं एवर एक्कम् ।' (दुर्लभजनानुरागो लज्जा गुर्वी परवश आ्त्मा। प्रियसखि, विषमं प्रेम मरणां शरणं केवलमेकम् ॥१७॥ इत्यनेन सागरिकाया बीजान्वयेन शीतोपचारविधूननाद्विधूतम् । यथा च वेरगीसंहारे भानुमत्या दुःस्वप्नदर्शनेन दुर्योधनस्यानिष्टशङ्कया पाण्डव- विजयशङ्कया वा रतेविधूननमिति। इस (कथन) के द्वारा भीष्म आदि के वध से दिखलाई पड़ने वाले तथा भ्रभिमन्यु के वध से नष्ट हो जाने वाले बीज का कृष्ण की सहायता से युक्त बलवान् पाण्डवों के संग्राम रूपी बिन्दु नामक बीज, (अवान्तर बीज) और प्रयत्न के अन्वय से कञ्चुकी के द्वारा अन्वेषण किया गया है, अतः परिसर्प (नामक प्रतिमुख सन्धि का अङ्ग) है। और, जैसे रत्नावली (अङ्क २) में सारिका के वचन और चित्र-दर्शन के द्वारा सागरिका का अनुराग रूपी बीज प्रकट होकर नष्ट हो गया है उसका 'वह कहाँ है ? वह कहाँ है ?' इत्यादि (कथन) से वत्सराज के द्वारा अन्वेषण किया जाता है; अतः यहाँ परिसर्प (नामक प्रतिमुख सन्धि का श्रङ्ग) है। ३. विधूत (सुखप्रद् पदार्थों के प्रति) अरुचि (अनादर) ही विधूत कहलाता है। जैसे रत्नावली नाटिका में सागरिका कहती है-सखी, मेरा संताप अधिक बढ़ रहा है* । (सुसङ्गता वावड़ी से कमलिनी के पत्त और मृणालों को लाकर इसके श्रङ्गों पर रखती है)। सागरिका-(उन्हें फेंकती हुई) सखी, इन्हें हटा लो, क्यों व्यर्थ ही अपनेको कष्ट दे रही हो? मैं ठीक कहती हूं-'दुर्लभ जन के प्रति प्रेम है, अत्यधिक लज्जा है, शरीर दूसरे के आधीन है। प्रिय सखी, इस प्रकार प्रेम विषम है। अब तो केवल मृत्यु ही मेरी शरत है।' यहाँ सागरिका (अनुराग रूपी) बीज के सम्बन्ध से शोतोपचार का अनादर करती है अतः विधूत (नामक प्रतिमुख सन्धि का श्रङ्ग) है। और, जैसे वेरगीसंहार (अङ्ड२) में बुरा स्वप्न देखने के कारण दुर्योधन *मेिकतर संतापो बर्धते इति रत्नावल्यां पाठः

Page 92

प्रथम: प्रकाश: ४३

अथ शम :- (५६)- तच्छमः शमः। तस्या अरतेरुपशमः शमो। यथा रत्नावल्याम्-'राजा-वयस्य, अनया लिखितोऽहमिति यत्सत्यमात्मन्यपि मे बहुमानस्तत्क्थ न पश्यामि।' इति प्रकमे 'सागरिका - (आत्मगतम्) हिअ्रत्र, समस्सस। मणोरहोवि दे एत्तितं भूर्मि र गदो।' ( हृदय, समाश्वसिहि। मनोरथोऽपि त एतावतीं भूर्मि न गतः ।) इति किञ्चिदरत्युपशमाच्छम इति। अथ नर्म- (५७) परिहासवचो नर्म - यथा रत्नावल्याम्-'सुसङ्गता-सहि, जस्स कए तुमं आशदा सो अश पुरदो चिठ्ठदि।' ('सखि, यस्य कृते त्वमागता सोऽयं पुरतस्तिष्ठति') सागरिका- (सासूयम्) सुसङ्गदे, कस्स कए अहं आशदा । ('सुसङ्गते, कस्य कृतेऽहमागता) । सुसङ्गता-अइ अप्पसंकिदे, र चित्तफलअस्स ता गेण्ह एदम्। (अयि आत्मशङ्रिते ननु चित्रफलकस्य तद्गृहाणतत् ।') इत्यनेन बीजान्वितं परिहासवचनं नर्म। के अनिष्ट की आशङ्का से अथवा पाण्डवों की विजय की शङ्का से भानुमती ने रति का विधूनन कर दिया है। (अतः वहाँ भी विधूत नामक प्रतिमुख सन्धि का श्रङ्ग है)। ४. शम उस (अरति) की शान्ति शम कहलाती है। उस अरति का शान्त हो जाना शम है। जंसे रत्नावली (अङ्क २.११-१२) में राजा विदूषक से कहता है-'मित्र, इसने मेरा चित्र बनाया है, इससे सचमुच मुझे अपने आप पर भी बहुत गर्व हो गया है तो कैसे न देखू'? इस सन्दर्भ में सागरिका (मन ही मन) कहती है-'हृदय, धीरज धर, तेरा तो मनोरथ भी यहाँ तक नहीं पहुँच पाया था।' यहाँ (अपने प्रति राजा का प्रेम जानकर सागरिका की) अरति कुछ शान्त हो जाती है, इसलिए शम (नामक प्रतिमुख सन्धि का अ्रङ्ग) है। ५. नर्म- परिहास युक्त वचन ही नर्म कहलाता है। जैसे रत्नावली (अङ्ड२. १५-१६) में सुसङ्गता सागरिका से कहती है- सखी, जिसके लिये तुम आई हो, वह यह सामने स्थित है'। सागरिका -- (चिढ़कर) 'सुसङ्गता, मैं किसके लिए आई हूं ? सुसङ्गता-अरी, अपने पर शङ्का करने वाली चित्रफलक के लिये ही तो तुम आई हो, उसे ले लो।

Page 93

४४ दशरूपकम्

यथा च वेणीसंहारे- (दुर्योधनश्चेटीहस्तादर्घपात्रमादाय देव्याः समर्पयति, पुनः ) भानुमती-(अघं दत्त्वा) हला, उवोहि मे कुसुमाइ जाव अवराणं पि देवाएं सवरितं गिवत्तेमि। (हला उपनय मे कुसुमानि यावदपरेषामपि देवानां सपर्या" निवर्तयामि।') ( हस्ती प्रसारयति, दुर्योधनः पुष्पाण्युपनयति, भानुमत्यास्तत्स्पर्श- जातकम्पाया हस्तात्पुष्पाणि पतन्ति।') इत्यनेन नर्मरा दुःस्वप्नदर्शनोपशमार्थं देवतापूजाविघ्नकारिा बीजोद्धाटनात्परिहासस्य प्रतिमुखाङ्गत्वं युक्तमिति। अथ नर्मद्युति :- (५८)-धृतिस्तज्जा द्युतिर्मता ।।३३।। यथा रत्नावल्याम् -- 'सुसङ्गता -- सहि अदिरिगठ्ठुर दाशिग सि तुमम्।जा एवं पि भट्टिरा हत्थावलम्बिदा कोवं र मुञ्चसि। (सहि, अतिनिष्ठुरेदानीमसि त्वं यैवमपि भर्तरा हस्तावलम्बिता कोपं न मुञ्चसि।) सागरिका-(सभ्र भङ्गमीष- द्विहस्य) सुसङ्गदे, दागिं पि रा विरमसि।' ('सुसङ्गते, इदानीमपिन विरमसि।') इत्यनेनानु रागबीजोद्धाटनान्वयेन धृतिर्नर्मजा द्युतिरिति दशितमिति। इसके द्वारा जो (अनुराग रूपी) बीज से सम्बद्ध परिहास वचन कहा गया है वह नमं (नामक प्रतिमुख सन्धि का अ्रङ्ग) है। और, जैसे वेशीसंहार (अङ्ग २. १४-१५) में (दुर्योधन चेटी के हाथ से अर्घंपात्र लेकर देवी वासवदत्ता को देता है तब) भानुमती (अर्ध्य देकर) 'सखी' मुझे पुष्प दो जिससे दूसरे देवताओं का भी पूजन कर लूँ। (हाथ फैलाती है, दुर्योधन पुष्प देता है, दुर्योधन के स्पर्श से कम्पित भानुमती के हाथ से पुष्प गिर जाते हैं।) यहाँ दुस्स्वप्न-दर्शन की शान्ति के लिये जो देव-पूजा की जा रही है उसमें विघ्न करने वाले परिहास के द्वारा बीज का उद्घाटन हो जाता है अतः यहाँ परिहास को प्रतिमुख सन्धि का श्रङ्ग मानना युक्त ही है। ६. नर्मद्युति उस (नर्म) से उत्पन्न धृति ही नर्मद्युति मानी गई है। जैसे रत्नावली (२. १८-१६) में सुसङ्गता सागरिका से कहती है- 'सखी, तू अब बड़ी कठोर हो गई है जो इस प्रकार स्वामी द्वारा हाथ पकड़े जाने पर भी कोप नहीं छोड़ती।' सागरिका (भ्र भङ्ग के साथ कुछ मुहकरा कर) 'सुसङ़गता, तू अब भी नहीं मानती'। इसके द्वारा (सागरिका के) अनुराग रूपी बीज के उद्घाटन के सम्बन्ध से (सागरिका की) परिहास से उत्पन्न धृति का वर्णन है अतः नर्मद्यति (नामक मुख- सन्धि का अ्रङ्ग) दिखलाई गई है। टिप्पणी-कुछ आचार्यों के अनुसार दोष को आच्छादित्त करने वाला परिहास नर्मद्युति कहलाता है (द्र०, नाट्य शास्त्र तथा नाट्यदरपख)।

Page 94

प्रथम: प्रकाश: ४५

अथ प्रगमनम्- (५६) उत्तरा वाक्प्रगमनम्- यथा रत्नावल्याम्-'विदूषक :-- भो वग्रस्स, दिठ्ठिश् वढ्ढसे। ('भो वयस्य, दिष्ट्या वर्धसे।') राजा-(सकौतुकम्) वयस्य, किमेतत्। विदूषक :- भो, एदं वखु त जं मए भशिदं तुमं एव्व आलिहिदो को अण्णो कुसुमाउहव्ववदेसेण सिह्णवीअदि। ('भोः, एतत्खलु तद्यन्मया भशित त्वमेवालिखितः कोऽन्यः कुसुमायु- धव्यपदेशेन निह्नयते।') इत्यादिना। परिच्युतस्ततत्कुचकुम्भमध्यातिंक शोषमायासि मृणालहार, न सूक्ष्मतन्तोरपि तावकस्य तत्रावकाशो भवत. किमु स्यात् ॥१८॥ इत्यनेन राजविदूषकसागरिकासुसङ्गतानामन्योन्यवचनेनोत्तरानुरागबौजोद्धा- टनात् प्रगमनमिति। अथ निरोध :- (६०)- हितरोधो निरोधनम्। यथा रत्नावल्याम्-'राजा-धिङ्मूर्ख ! प्राप्ता कथमपि दैवात्कण्ठमनीतव सा प्रकटरागा। रत्नावलीव कान्ता मम हस्ताद् भ्रशिता भवता ॥ १६ ॥ ७ प्रगमन (बीज के सम्बन्ध में) उत्तरोत्तर वचन ही प्रगमन है। जैसे रत्नावली (२. ८-६) में विदूषक राजा से कहता है-'हे मित्र, भाग्य से बढ़ रहे हो।' राजा -- (कुतूहल से) 'मित्र, यह क्या है ? विदूषक-भाई, यह वही है जो मैंने कहा था कि इसमें तेरा ही चित्र बनाया गया है कामदेव (पुष्प के धनुष वाले) के बहाने से और किसको छिपाया जा सकता है ? यहाँ से आरम्भ करके "हे मृणालहार, उसके स्तनरूपी कलशों के मध्य से गिरा हुआ तू क्यों सूख रहा है ? जहाँ तेरे सूक्ष्म तन्तु के लिये भी जगह नहीं है, वहाँ तेरे लिये क से हो सकती है ?" यहाँ तक राजा, विदूषक, सागरिका और सुसङ्गता के परस्पर वचनों के द्वारा अनुराग बीज का उत्तरोत्तर उद्घाटन हो रहा है अतः प्रगमन (नामक प्रति- मुख सन्धि का अ्रङ्ग) है। टिप्पणी-नाट्यशास्त्र में 'प्रगमन' के स्थान पर 'प्रगयण' नाम रक्खा गया है तथा नाट्य-दर्पण में 'प्रतिवाक् श्रेणी'। 5. निरोधन हित का रुक जाना निरोधन कहलाता है। जंसे रत्नावली (२. १६) में राजा विदूषक से कहता है-"मूर्ख, धिक्कार है! किसी प्रकार संयोग से प्राप्त हुई, अनुराग को प्रकट करने वाली यह कान्ता,

Page 95

४६ दशरूपकम्

इत्यनेन वत्सराजस्य सागरिकासमागमरूपहितस्य वासवदत्ताप्रवेशसूचकेन विदूषकवचसा निरोधान्निरोधनमिति। अथ पर्युं पासनम्- (६१) पयु पास्तिरनुनय :- यथा रत्नवल्याम्-राजा- प्रसीदेति ब्र यामिदमसति कोपे न घटते करिष्याम्येवं नो पुनरिति भवदभ्युपगमः । न मे दोषोऽस्तीति त्वमिदमपि हि ज्ञास्यसि मृषा किमेततस्मिन् वक्तु क्षममिति न वेद्यि प्रियतमे ॥ २० ॥ इत्यनेन चित्रगतयोर्नयकयोदर्शनात्कुपिताया वासवदत्ताया अनुनयनं नायकयोरनुरा- गोद्वाटनान्वयेन पर्युपासनमिति। अथ पुष्पम् -- (६२)- पुष्पं वाक्यं विशेषतत् ॥३४॥ यथा रत्नावल्याम् -- '(राजा सागरिकां हस्ते गृहीत्वा स्पर्श नाटयति) विदूषक :- भो, एसा अपुव्वा सिरी तए समासादिदा। (भोः, एषाऽपूर्वा श्रीस्त्वया समासा- स्फुट कान्ति वाली रत्नावली के समान, कण्ठ से न लगाई गई ही, आपने मेरे हाथ से गिरा दी।" यहाँ वत्सराज का सागरिका-समागम रूपी हित है जिसे वासवदत्ता प्रवेश की सूचना देने वाले विदूषक के वचन ने रोक दिया है अतः निरोधन (नामक प्रतिमुख सन्धि का ग्रङ्ग) है। पर्युपासन (क द्व व्यक्ति को) मनाना ही पर्युपासन कहलाता है। जैसे रत्नावली (२. २०) में राजा (वासवदत्ता से) कहता है-"हे देवी, यदि मैं यह कहूँ 'प्रसन्न हो जाओ' तो यह कोप न होने पर संगत नहीं। यदि कहूँ कि 'फिर ऐसा न करू गा' तो (अपने अपराध की) स्वीकृति हो जायेगी। यदि 'मेरा दोष नहीं है' यह कहूँ तो तुम इसे झूठ मानोगी। प्रियतमे, इस दशा में क्या कहना उचित है, यह मैं नही जानता'। यहाँ पर चित्र में (एक साथ) नायक (वत्सराज) तथा नायिका (सागरिका) को देखने से कुपित होने वाली वासवदत्ता का अनुनय किया गया है, जिसका नायक और नायिका के अनुराग (रूपी बीज) के उद्घाटन से सम्बन्ध है अतः यहाँ पर्युपासन (नामक मुखसन्धि का श्ङ्ग) है। १० पुष्प (बीजोद्घाटन के सम्बन्ध में) विशेषतायुक्त कथन को पुष्प कहा जाता है। जैसे रत्नावली (अङ्क २) में (राजा सागरिका को हाथ से पकड़ कर स्पर्श

Page 96

प्रथम: प्रकाश: ४०

दिता।' राजा -- वयस्य सत्यम्- श्रीरेषा पाशिरप्यस्याः पारिजातस्य पल्लवः । कुतोऽन्यथा स्रवत्येष स्वेदच्छद्यामृतद्रवः ॥ २१ ।। इत्यनेन नायकयो: साक्षादन्योन्यदर्शनादिना सविशेषानु रागोद्धाटनात्पुष्पम्। अथोपन्यास :-- (६३) उपन्यासस्तु सोपायम्- यथा रत्नावल्याम्-'सुसङ्गता-भट्टा, अलं सङ्काए। मए वि भट्टिणो पसाएण कीलिदं एव्व ता। कि कण्णाभअोण अदो वि मे गरुश पसाओ जं कीस तए अहं एत्थ आलिहित त्ति कुविआा मे पितसही साअरिश ता पसादीअदु।' ('भर्तः अलं शङ्गया मयापि भर्तु: प्रसादेन क्रीडितमेव तत्कि कर्णाभरणेन, अतोऽपि मे गुरु प्रसादो यत्कथं त्वयाहमत्रालिखितेति कुपिता मे प्रियसखो सागरिका तत्प्रसाद्यताम् ।') इत्यनेन सुसङ्गतावचसा सागरिका मया लिखिता सागरिकया च त्वमिति सूचयता प्रसादोपन्यासेन बीजोद्द दादुपन्यास इति। का अभिनय करता है)। विदूषक-भाई, तुमने सचमुच ही यह अपूर्व लक्ष्मी प्राप्त कर ली है।' राजा-'मित्र, ठीक है, यह लक्ष्मी है, इसका हाथ पारिजात का पल्लव है, नहीं तो स्वेद के व्याज से यह अमृत रस को कहाँ से बहाता ?' इस कथन के द्वारा नायक और नायिका के परस्पर दर्शन आदि के द्वारा विशिष्ट अनुराग प्रकट होता है अतः पुष्प (नामक प्रतिमुख सन्धि का अङ्ग) है। ११ उपन्यास उपायसहित (=हेतुप्रदर्शक) कथन ही उपन्यास कहलाता है। जैसे रत्नावली (२. १५-१६) में सुसङ्गता का कथन है -- 'स्वामी, शङ्का न करें। मैंने भी 'स्वामी के प्रसाद से खेल ही किया है। इसलिये कर्णाभूषण की क्या बात है ? इससे भी बड़ा मुझ पर यह प्रसाद होगा कि "तूने इसमें मेरा चित्र क्यों बनाया' ? यह कहती हुई मेरी प्रिय सखी सागरिका कुपित हो गई है, तो उसे आप प्रसन्न कर दीजिये।' यहाँ "(चित्रफलक में) सागरिका का चित्र मैंने बनाया है और तुम्हारा चित्र सागरिका ने" यह सूचित करते हुए सुसङ्गता के वचन से (राजा के) प्रसाद का कथन करके (अनुराग रूपी) बीज का प्रकटन किया गया है अतः उपन्यास (नामक प्रतिमुख सन्धि का अ्रङ्ग) है। टिप्पणी -- बीज के उद्भेदन से सम्बन्ध रखने वाल हेतुप्रदर्शनपूर्वक या युक्तिसहित कथन ही उपन्यास है। यहां सागरिका को प्रसन्न करने के लिए जो निवेदन किया गया है उसमें हेतु यह है कि सुसङ्गता ने चित्रफलक पर राजा के चित्र के साथ सागरिका का चित्र बना दिया है, इस लिये वह कुपित है। इससे सागरिका का अनुराग भी प्रकट होता है।

Page 97

४८ दशरूपकम्

(६४)-वज्त्र' प्रत्यच्निष्ठुरम्। यथा रत्नावल्याम्-'वासवदत्ता-(फलकं निर्दिश्य) अज्जउत्त, एसावि जा तुह समीवे एदं कि वसन्तअस्स विण्णारम् ।''आर्यपुत्र, एषापि या तव समीपे एतर्तिक वसन्तकस्य विज्ञानम् ।' पुनः 'अज्जउत्त, ममावि एदं चित्तकम्म पेक्खन्तीए सीसवेअणा।' (आर्ययुत्र, ममाप्येतच्चित्रकर्म पश्यन्त्याः शीर्षवेदना समुत्पन्ना।' इत्यनेन वासवदत्तया वत्सराजस्य सागरिकानुरागोद्द दनात्प्रत्यक्षनिष्ठुशभिधानं वज्तमिति। अ्थ वर्णसहार :- (६५) चातुर्वएर्योपगमनं वर्णसंहार इष्यते। ३५।। यथा वीरचरिते तृतीयेऽङ्क- परिषदियमृषीणामेष वृद्धो युधाजित् सह नृपतिरमात्यैरलोमपादश्च वृद्ध:। अयम विरतयज्ञो ब्रह्मवादी पुराणः ! प्रभुरपि जनकानामद्र हो याचकस्ते ॥ २२॥ इत्यनेन ऋषिक्षत्रियामात्यादीनां सङ्गतानां वर्णानां वचसा रामविजयाशंसिन:

१२ वज्र प्रत्यक्ष रूप में निष्ठुर कथन ही वज्त्र कहलाता है। जैसे रत्नावली (२. १६-२०) में वासवदत्ता (चित्रफलक की ओर निर्देश करके) 'आर्यपुत्र, यह भी जो तुम्हारे समीप है, यह क्या आर्यवसन्तक की कला है? फिर कहती है-'आर्यं, इस चित्रकार्य को देखते हुए मेरे सिर में भी पीड़ा हो गई है।' इस (कथन) के द्वारा वासवदत्ता ने वत्सराज के सागरिका के प्रति अ्नुरग को प्रकट किया है जो प्रत्यक्ष रूप से निष्ठुर कथन है अतः यहाँ वञ्रर (नामक प्रति- मुख सन्धि का अङ्ग) है। १३ वर्शसंहार (ब्राह्मण आदि) चारों वर्णों का एकत्रित होना ही वर्णासंहार कहलाता है। जंसे महावीर चरित के तृतीय अङ्ध (३. ५) में "यह ऋषियों की सभा है यह वृद्ध युधाजित् है, और अ्रमात्यों के साथ ये वृद्ध नृपति लोमपाद हैं तथा यह निरन्तर यज्ञ करने वाला, पुराना (प्रसिद्ध, प्राचीन) ब्रह्मवादी, जनकों (नामक जनपदों) वा राजा --- ये सब आपसे क्रोधशान्ति (अद्रुहः=द्रोहाभावस्य) की याचना करते हैं। यहाँ पर एकत्रित हुए ऋषि, क्षत्रिय और अमात्य इत्यादि का कथन करके क्रोधशान्ति की प्रार्थना के द्वारा राम की विजय को सूचित करने वाले परशुराम के

Page 98

प्रथम: प्रकाश:

एतानि च त्रयोदश प्रतिमुखाङ्गानि मुखसंध्युपक्षिप्तबिन्दुलक्षणावान्तरबीजमहाबीज- प्रयत्नानुगतानि विधेयानि। एतेर्षा च मध्ये परिसर्प प्रशमवज्तोपन्यासपुष्पाणां प्राधान्यम्। इतरेषां यथासंभवं प्रयोग इति। दुर्एय (दुर्व्यवहार, अन्याय) का प्रकटन किया गया है अतः वर्णसंहार (नामक प्रतिमुख सन्धि का अङ्ग) है। टिप्पणी-ना० शा० (१६. ८२), सा० द० (६.६४) में भी यही लक्षण है। प्रता० (३, १३) में तथा भा० प्र० (पृ० २०६) में भी इसी प्रकार का लक्षण है। अभिनवगुप्त ने बतलाया है कि ब्राह्मणा आदि वर्णचतुष्टय के एकत्रीकरणा को बर्णासंहार मानना उचित नहीं अपितु यहां वर्ण का अर्थ नाटकीय पात्र (नायक, प्रतिनायक, नायिका इत्यादि) हैं। किसी कार्य के लिये उनके एक साथ मिलने का वर्णन ही वरणासंहार है। ना० द० (१.६७) में यही लक्षण माना गया है तथा इसका विशद विवेचन किया गया है। वहां दशरूपक के मत की समीक्षा भी की गई है तथा वर्णासंहार की एक तीसरी व्याख्या का भी उल्लेख है-एके तु 'वर्शितार्थ- तिरस्कारं वर्णसंहारमामनन्ति। प्रतिमुख सन्धि के ये तेरह श्रङ्ग हैं। मुख सन्धि में उपक्षिप्त बिन्दु नामक अवान्तर बीज एवं महाबीज (अर्थप्रकृति) और प्रयत्न (नामक कार्यावस्था) से अरन्वित इन अ्रङ्गों का निर्वाह करना चाहिये। इनमें परिसर्प, प्रशम, वज्र्र उपन्यास और पुष्प ये अ्रङ्ग प्रधान हैं (रूपकों में इनको स्थान देना आवश्यक है)। अन्यों का तो यथासम्मव प्रयोग किया जाता है। टिप्परी-(१) इस प्रकार प्रधानवृत्त का द्वितीय भाग प्रतिमुख सन्धि है। इसमें मुखसन्धि में न्यस्त बीज की किञ्चिद् लक्ष्य और यत्किन्चिद् अलक्ष्य रूप से अभिव्यक्ति हुआ करती है। साथ ही नायक-व्यापार की प्रयत्नावस्था का वर्न होता है। फलतः अवान्तर बीज अर्थात् बिन्दु या महाबीज की अभिव्यक्ति के साथ प्रयत्न अ्रवस्था की अन्विति का नाम प्रतिमुख सन्धि है। इसके तेरह अङ्गों में किसी न किसी रूप में इस अन्विति के दर्शन होते हैं। उदाहरसार्थ विलास नामक प्रथम श्रङ्ग में जो रति के लिये ईहा (चेष्टा) होती है वह अनुराग इत्यादि अवान्तर बीज की अभिव्यक्ति से अन्वित होती है। इसी प्रकार अन्य अङ्गों में वशिगत प्रयत्न भी बिन्दु या बीज की व्यक्ति(उद्भेदन) से अन्वित हुआ करते हैं। (२) प्रायः सभी नाट्याचार्यो के अनुसार प्रतिमुख सन्धि के उपर्युक्त १३ ही अङ्ग हैं। नामों में भी कोई विशेष भेद नहीं है, केवल दशरूपक के 'शम' और प्रगमन के स्थान पर ना० शा० (१६.५६), में 'तापन' तथा 'प्रगयण' दो अङ्ग माने हैं। सा० द० (६.८७) में 'निरोध' के स्थान पर विरोध' माना गया है। ना० द० (१.६२) के नामों में भी यत्किञ्चित् अन्तर है तथा इन अङ्गों के स्वरूप में भी कुछ नवीनता है।

Page 99

५० दशरूपकम्

अय गर्भसंधिमाह- (६६) गर्भस्तु दृष्टनष्टस्य बीजस्यान्वेषणं मुहुः। द्वादशाङ्ग: पताका स्यान्न वा स्यात्प्राप्तिसंभवः ॥३६।। प्रतिमुखसंधौ लक्ष्यालक्ष्यरूपतया स्तोकोद्द्रिन्नस्य बीजस्य सविशेषोद्ध दपूर्वक: सान्तरायो लाभ: पुनर्विच्छेदः पुनः प्राप्तिः पुनर्विच्छेदः पुनश्च तस्यंवान्वेषणं वारं वारं सोऽनिर्धारितकान्तफलप्राप्त्याशात्मको गर्भसंधिरिति । तत्र चौत्सर्गिकत्वेन प्राप्ताया: पताकाया अनियम दर्शयति-'पताका स्यान्न वा' इत्यनेन। प्राप्तिसंभवस्तु स्यादेवेति दर्शयति-'स्यात्' इति। यथा रत्नवल्यां तृतीयेऽङ्क वत्सराजस्य वासव- दत्तालक्षणापायेन तद्वषपरिग्रहसागरिकाभिसरणोपायेन च विदूषकवचसा सागरिका- प्राप्त्याशा प्रथमं पुनर्वासवदत्तया विच्छेद: पुनः प्राप्तिःपुनर्विच्छेदः पुनरपायनिवारणो- पायान्वेषणम् 'नास्ति देवीप्रसादनं मुक्त्वान्य उपायः' इत्यनेन दशितमिति। गर्भसन्धि और उसके अङ्ग जहाँ दिखलाई देकर खोये गये बीज का बार बार अन्वेषण किया जाता है, वह गर्भसन्धि है। इसमें पताका (नामक अर्थप्रकृति) कहीं होती है कहीं नहीं भी होती; किन्तु प्राप्त्याशा (नाम की कार्यावस्था) होती ही है। इसके बारह श्रद्ग होते हैं। प्रतिमुख सन्धि में जो बीज कुछ लक्ष्य रूप में तथा कुछ अलक्ष्य रूप में प्रकट होता है, उसका विशेष प्रकार से प्रकट होना-विध्नों के साथ प्रकट होना, फिर नष्ट हो जाना, फिर प्राप्त होना तथा फिर नष्ट हो जाना और फिर उसका ही बार-बार अन्वेषण किया जाना- यही गर्भ सन्धि कहलाती है, इसमें फलप्राप्ति की आशा का एकान्ततः निश्चय नहीं होता। (क्रमशः अर्थप्रकृति और कार्यावस्था के अन्वय से सन्धि की उत्पत्ति होतो है-इस) सामान्य नियम के अनुसार उस (गर्भ सन्धि) में पताका अवश्य होनी चाहिये किन्तु 'पताका स्थात् न वा' (पताका हो या न हो) इस कथन के द्वारा यह दिखलाया है कि पताका का होना अनिवार्य नहीं है। इसी प्रकार 'स्यात् प्रप्ति- सम्भवः' (प्राप्त्याशा होनी ही चाहिये), इस कथन से यह दिखलाया है कि (गर्भ सन्धि में) प्राप्त्याशा अवश्य होती है। (गर्भ सन्धि का उदाहरण है) जँसे रत्नावली के तृतीय श्रङ्क में पहिले तो विदूषक के उस वचन द्वारा सागरिका की प्राप्ति की आशा होती है जिसमें वासवदत्ता के रूप में विघ्न कहा गया है और वासवदत्ता का वेष धारण करके सागरिका के अभिसरण को (समागम का) उाय कहा गया है फिर वासवदत्ता की उपस्थिति से आशा-भङ्ग (विच्छेद) हो जाता है। इसी प्रकार फिर प्राप्ति और फिर विघ्न होता है और तब (विघ्न को दूर करने का) उपाय खोजा जाता है जो कि 'देवी (वासवदत्ता) को प्रसन्न करने के अतिरिक्त (सागरिका से मिलन) का कोई और उपाय नहीं है'-इस कथन के द्वारा दिखलाया गया है। उस (गर्भसन्धि) के बारह अ्रङ्ग होते हैं, उनके नाम ये हैं-

Page 100

प्रथम: प्रकाश: ५१

स च द्वादशाङ्गो भवति। तान्युद्दिशति- (६७) अभूताहरणं मार्गो रूपोदाहरणे क्रमः । संग्रहश्चानुमानं च तोटकाधिबले तथा ॥३७।। उद्वेगसंभ्रमाच्षेपा लक्षणं च प्रणीयते। fp यथोद्देशं लक्षणमाह- (६८) अभूताहरं छद्म- यथा रत्नावल्याम्-'साधु रे अमच्च वसन्तत साधु अदिसइदो तए अमच्चो जोगन्धराअरो इमाए संधिविग्गहचिन्ताए।' (साधु रे अमात्य वसन्तक साधु अति- शयितस्त्वयामात्यो यौगन्धरायणोऽनया संधिविग्रहचिन्तया ।') इत्यादिना प्रवेशकेन गृहीतवासवदत्तावेषायाः सागरिकाया वत्सराजाभिसरणं छद्म विदूषकसुसङ्गताक्लृप्त- काञ्चनमालानुवादद्वारेण दशितमित्यभूताहररम् । अथ मार्ग :- (६६) -- मार्गस्तत्वार्थकीर्तनम् ।।३८॥ यथा रत्नावल्याम्-'विदूषकः-दिठ्ठय्रा वड्ढसि समीहिदन्भधिकाए कज्ज- सिद्धीए। ('दिष्टया वर्घसे समीहिताभ्यधिकया कार्यसिद्ध या।') राजा-वयस्य कुशलं प्रियाया: ? विदूषक :- अइरेण सअ्रंज्जेव्व पेक्खित् जाणिहिसि। ('अचिरेण स्वयमेव प्रक्ष्य ज्ञास्यसि।') राजा-दर्शनमपि भविष्यति ? विदूषक :- (सगर्वम्) कीस ण भविस्सदि जस्स दे उवहसिदविहप्फदिबुद्धिविहवो अहं अमच्चो। ('कथं न भविष्यति यस्य त उपहसित-बृहस्पतिबुद्धिविभवोऽहममात्यः ।') राजा-तथापि कथमिति श्रोतु- मिच्छामि । विदूषक :- (कर्गों कथयति) एव्वम्।' ('एवम्')। इत्यनेन यथा विदूषकेर सागरिकासमागम: सूचितः, तर्थव निश्चितरूपो राज्ञे निवेदित इति तत्त्वार्थकथनान्मार्ग इति। १. तभूताहरण, २. मार्ग, ३. रूप, ४. उदाहरण, ५. क्रम, ६. संग्रह ७. अरप्रनुमान, ८. तोटक, ६. अघिबल, १०. उद्व ग, ११. संभ्रम और १२. श्राक्षेप; इनके लक्षण आगे किये जा रहे हैं ॥३७, ३८॥। नाम-निर्देश के क्रम से लक्षणा बतलाते हैं- १. प्रभूताहरगा- (प्रकृत विषय से सम्बद्ध) छलपूर्ण कार्य ही अ्रभूताहरण कहलाता है। जैसे रत्नावली (अ्रङ्क ३ प्रवेशक) में काञ्चनमाला (विदूषक को लक्ष्य करके) कहती है-'धन्य है रे अमात्य वसन्तक, धन्य है। इस सन्धि विग्रह के विचार में तूने अमात्य यौगन्धरायण को भी मात कर दिया है। यहाँ पर वासवदत्ता का वेष धारण करके सागरिका का वत्सराज के प्रति अभिसरणा करना ही छ्द्र है, जिसको विदूषक और सुसङ्गता के निश्चय का काञ्चनमाला द्वारा कथन कराके प्रवेशक में दिखलाया गया है टिप्पणी-ना० शा० (१६.८२), सा० द० (६.६६) ना०द० (असत्याहरणं १.८८) । २. मार्ग- (प्रकृत विषय के सम्बन्ध में)यथार्थ बात का कथन ही मार्ग कहलाता है।

Page 101

५२ दशरूपकम्

अथ रूपम्- (७०) रूपं वितर्कवद्वाक्यम्- यथा रत्नावल्याम्-'राजा-अहो किमपि कामिजनस्य स्वगृहिणीसमागम- परिभाविनोऽभिनवं जनं प्रति पक्षपातस्तथा हि- प्रसायविशदां दृष्टि ववत्रे ददाति न शङ्किता घटयति घनं कण्ठाश्लेषे रसान्न पयोधरौ। वदति बहुशो गच्छामीति प्रयत्नधृताप्यहो रमयतितरां सङ्कतस्था तथापि हि कामिनी ॥२३॥ कथं चिरयति वसन्तकः ? कि नु खलु विदितः स्यादयं वृत्तान्तो देव्याः।' इत्यनेन रत्नावलीसमागमप्राप्त्याशानुगुण्येनैव देवीशङ्कायाश्च वितर्काद्र पमिति। जैसे रत्नावली (३.४-५) में-'विदूषक-सौभाग्य से आप चाहे हुए से भी अधिक कार्य की सिद्धि के कारण वृद्धि को प्राप्त कर रहे हैं। राजा-मित्र प्रिया का कुशल तो है ? विदूषक-शीघ्र ही आप स्वयं देखकर जान लेंगे। राजा- क्या प्रिया का दर्शन भी हो जायेगा ? विदूषक-(गर्वपूर्वक)क्यों न होगा ? जिस (आप) का बुद्धि-वैभव से वृहस्पति को तिरस्कृत करने वाला मैं अमात्य हूँ। राजा-तो भी केसे ? यह सुनना चाहता हूँ। विदूषक-(कान में कहता है) इस प्रकार'। यहाँ पर सागरिका के समागम की जैसी सूचना मिली थी विदूषक ने निश्चय करके बैसा ही राजा से निवेदन कर दिया। इस प्रकार यहाँ यथार्थ बात का कथन है अतः (मार्ग नामक गर्भसन्धि का अ्ङ्ग) है। टि०-ना० शा (१६.८३), सा० द० (६.६४), ना० द०। (१'८७) ३. रूप- (प्राप्ति की आशा में) वितर्क से युक्त कथन को रूप कहते हैं। जैसे रत्नावली (अङ्क ३.६) में राजा- अ्हो ! अपनो पत्नी के मिलन की उपेक्षा करने वाले कामुक जनों का नये व्यक्ति के प्रति अनोखा भुकाव होता है। क्योंकि यद्यपि संकेत स्थल में स्थित कामिनी आशङ्धित होने के कारण प्रेम से निर्मल हुई दृष्टि को (नायक के) मुख पर नहीं डालती, कण्ठालिङ्गन में प्रीति के साथ स्तनों को दढतापूर्बक नहीं लगाती, प्रयत्नपूर्वक रोके जाने पर भी बार-बार यही कहती है 'मैं जाती हूँ' तथापि आश्चर्य है कि वह अधिक आनन्दित करती है।' क (विदूषक) कैसे देर कर रहा है ? तो क्या यह वृत्तान्त देवी (वासवदत्ता) ने जान लिया है?' इत्यादि के द्वारा रत्नावली-समागम की प्राप्ति की आशा के सम्बन्ध में ही वासवदत्ता-सम्नन्धी शङ्का का वितर्क किया गया है अतः यहाँ रूप (नामक गर्भ- सन्धि का अङ्ग) है।

Page 102

प्रथम: प्रकाशः ५३

अथोदाहरगम्- (७१)-सोत्कर्ष स्यादुदाहतिः । यथा रत्नावल्याम् - विदूषक :- (सहर्षम्) ही ही भोः, कोसम्बीरज्जलाहे- सावि ए तादिसो वग्रस्सस्स परितोसो असि यादिसो मम सत्रसादो पिशवश्ररं सुशित भविस्सदि त्ति तक्केमि।' ('ही ही भोः, कौशाम्बीराज्यलाभेनापि न तदृशो वयस्यस्य परितोष आसीत् यादशो मम सकाशात्प्रियवचनं श्रुत्वा भविष्यतीति तर्क- यामि।') इत्यनेन रत्नावलीप्राप्तिवार्तापि कौशाम्बीराज्यलाभादतिरिच्यत इत्युत्कर्षा- भिधानादुदाहृतिरिति। अथ क्रम :- (७२) क्रमः संचिन्त्यमानाप्ति :- यथा रत्नावल्याम्-'राजा-उपनतप्रियासमागमोत्सवस्थापि मे किमिदमत्य- र्थमुत्ताम्यति चेतः, अथवा- टिप्पणी-ना० शा० (चित्रार्थसमवाये तु वितर्को रूपम् १६.८३), सा० द० (६.६६) । ना० द० (रूप नानार्थसंशयः १.७८) के अनुसार 'अ्रनेक प्रकार की बातों का संशय ही रूप है।' वहां दशरूपक के मत का तथा अन्य एक मत का भी वृत्ति में उल्लेख किया गया है। ४-उदाहरण (उदाहृतति) (प्राप्त्याशा से सम्बद्ध) उत्कषयुक्त कथन उदाहृति कहलाता है। जैसे रत्नावली (३.४-५) में विदूषक (हषंपूर्वक)-'आा हा हा! मैं समभ्ता हूँ कि मेरे मित्र को कौशाम्बी का राज्य पाने से भी इतना सुख न होगा जितना कि आाज मुझसे प्रिय वचन सुनकर होगा।' इत्यादि के द्वारा "रत्नावली की प्राप्ति की बात भी कौशाम्बी-राज्य की प्राप्ति से बढकर है" इस उत्कर्ष का कथन किया गया है अतः उदाहृति (नामक गर्भसन्धि का अ्रङ्ग) है। टि०-ना० शा० (१६.८४), सा०द० (६.६७), ना०द० । (उदाहृतिः समुत्कर्षः १. ८१) ५. कम- सोची हुई वस्तु की प्राप्ति क्रम कहलाता है। जैसे रत्नावली (३.१०) में 'राजा-प्रिया का मिलन उपस्थित होने पर भी मेस हुदय अत्यधिक उत्कण्ठित क्यों हो रहा है ? अथवा

Page 103

५४ दशरूपकम्

तीव्रः स्मरसंतापो न तथादौ बाघते यथासन्ने। तपति प्रावृषि सुतरामभ्यर्णजलागमो दिवसः ॥२४॥ विदूषक :-- (श्कर्ण्य) भोदि सागरिए, एसो पिशवत्रस्सो तुमं ज्जेव उद्दि- सिश्न उक्कण्ठाशिगब्भरं मन्तेदि। ता निवेदेमि से तुहागमराम्।' (भवति सागरिके, एष प्रियवयस्यस्त्वामेवोद्दिश्योत्कण्ठानिर्भरं मन्त्रयति तन्निवेदयामि तस्मै तवागमनम्') इत्यनेन वत्सराजस्य सागरिकासमागममभिलषत एव भ्रान्तसागरिकाप्राप्तिरिति क्रमः। अथ क्रमान्तरं मतभेदेन- (७३)-भावज्ञानमथापरे॥३६॥ -iP यथा रत्नावल्याम्-'राजा (उपसृत्य) प्रिये सागरिके, शीतांशुमु खमुत्पले तव हशौ पद्मानुकारी करो रम्भागर्भनिभं तवोरुयुगलं बाहू मणालोपमौ। इत्या ह्वादक राखिलाङ्गि रभसान्निःशङ्कमालिङ्गय मा- मङ्गानि त्वमनङ्गतापविधुराण्येह्यहि निर्वापय ॥२५। इत्यादिना 'इह तदप्यस्त्येव बिम्बाधरे' इत्यन्तेन वासवदत्तया वत्सराजभावस्य ज्ञातत्वात्कमान्तरमिति। काम का तीव्र संताप प्रारम्भ में उतना नहीं सताता, जितना (प्रिया के मिलन के) निकट होने पर सताता है। वस्तुतः वर्षा ऋतु में वह दिवस अधिक तपता है जिसमें जल का आगमन निकट होता है। विदूषक-(सुनकर)आदरणीय सागरिका, यह मेरे प्रिय मित्र तुम को लक्ष्य करके ही अत्यधिक उत्कण्ठापूर्वक कुछ कह रहे हैं, तो मैं तुम्हारे आने की बात इनसे कहता हूँ।' इत्यादि के द्वारा सागरिका के समागम की कामना करते हुए ही वत्सराज को भ्रान्ति से (वासवदत्ता में) सागरिका की प्राप्ति होती है, अतः यह क्म (नामक गर्भ सन्धि का अङ्ग) है। मतभेद से क्रम का दूसरा रूप (कमान्तर-दूसरा कम) यह है- दूसरे आचाय भाव-ज्ञान को क्रम कहते हैं ॥३६॥ जंसे रत्नावली (२.११) में 'राजा-(समीप जाकर) प्रिय सागरिका, तेरा मुख चन्द्रमा है, नेत्र नील कमल हैं, हाथ (लाल) कमल के समान हैं, ऊरु-युगल कदली के अन्तर्भाग के सदृश है, भुजाएँ कमल-नाल के तुल्य हैं। इस प्रकार हे आह्लादित करने वाले समस्त अङ्गों वाली तुम आओ और निशङ् होकर अलपूर्वक मेरा आलिङ्गन करके काम के सन्ताप से व्याकुल मेरे अङ्गों को शान्त कर दो। इत्यादि से आरम्भ करके "वह अमृत भी तुम्हारे बिम्बाधर में विद्यमान है" (३.१३) यहाँ तक वासवदत्ता के द्वारा दत्सराज के भाव को जाना गया है। अतः यह दूसरे प्रकार का क्रम है। टिप्पणी-यहां क्म के स्वरूप के विषय में जो दो मत दिखलाये गये हैं उनमें से धनञ्जय को प्रथम अभीष्ट है किन्तु दूसरा मत किसका है, यह कहना कठिन है।

Page 104

प्रथम: प्रकाश: ५५

अ्रथ संग्रह :- (७४) संग्रहः सामदानोक्ति :- यथा रत्नावल्याम्-'साधु वयस्य, साधु इदं ते पारितोषिक कटकं ददामि।' इत्याभ्यां सामदानाभ्यां विदूपतस्य सागरिकासमागमकारिणः संग्रहात्सग्रह इति। अथानुमानम्- (७५) अभ्यूहो लिङ्गतोऽनुमा। यथा रत्नावल्याम्-'राजा-धिङ् मूर्ख, त्वत्कृत एवायमापतितोऽस्माकमनर्थ। कुतः- समारूढा प्रीतिः प्रसयबहुमानात्प्रतिदिनं व्यलीकं वीक्ष्येदं कृतमकृतपूर्व खलु मया । प्रिया मुञ्चत्यद्य स्फुटमसहना जीवितमसौ प्रकृष्टस्य प्रेम्णः स्खलितमविषह्य' हि भवति ॥२६॥ विदूषक :- भो वत्रस्स, वासवदत्ता कि करइस्सदि ति ए जाणामि साग- रिशा उण दुक्करं जीविस्सदित्ति तक्केमि'। ('भो वयस्य, वासवदत्ता कि करिष्य- तीति न जानामि सागरिका पुनर्दुष्कर जीविष्यतीति तर्कयामि ।') इत्यत्र प्रकृष्ट- प्रेमस्खलनेन सागरिकानुरागजन्येन वासवदत्ताया मरणाभ्यूहनमनुमानमिति१ ऐसा प्रतीत होता है कि नाट्यशास्त्र (१६.८४) में जो क्रम का लक्षणा दिया गया था-'भावतत्त्वोपलब्धिस्तु करमः' उसकी दो प्रकार की व्याख्यायें धनञ्जय से पूर्व प्रचलित रही होंगी, उन्हीं का यहाँ उल्लेख किया गया है। आगे चलकर भी क्रम की दो व्याख्यायें प्रचलित रही; नाट्यदर्पण (१.८२) मे 'कमो भावस्य निर्णायः' यह लक्षण देकर दो प्रकार की व्याख्या की गई है। साहित्यदर्पणकार ने यहाँ दशरूपक का अनुसरण नहीं किया अपि तु नाट्यशास्त्र के शब्दों में ही कम का लक्ष प्ररतुत किया है, किन्तु उसकी व्याख्या नहीं की। ६ सग्रह- (प्राप्त्याशा से सम्बद्ध) साम और दान से युक्त कथन ही संग्रह कहलाता है। जैसे रत्नावली (३.४-५) में राजा विदूषक से कहता है -- 'धन्य है, मित्र, धन्य है। यह तुम्हें पारितोषिक रूप में कटक देता हूं।' इत्यादि के द्वारा सागरिका से मिलन कराने वाले विदूषक का साम (प्रशंसा- त्मक वचन) तथा दान (कटक-प्रदान) के द्वारा संग्रह किया गया है। अतः संग्रह (नामक गर्भसन्धि का अ्रङ्ग) है।' ७- अनुमान-

लाता है। किसी चिह्न से किसी बात का निश्चय करना (अभ्यूह)अनुमान कह-

Page 105

५६ दशरूपकम्

अरथाधिबलम्- (७६) अधिबलमभिसंधि :- यथा रत्नावल्याम्-'काञ्चनमाला-भट्टिरिग, इश्र सा चित्तसालिआ। ता वसन्तअ्स्स सण्णं करेमि ('भत्रि, इयं सा चित्रशालिका तद्वसन्तकस्य संज्ञां करोमि ।') (छोटिकां ददाति), इत्यादिना वासवदत्ताकाञ्चनमालाभ्यां सागरिका- सुसङ्गतावेषाभ्यां राजविदूषकयोरभिसंधीयमानत्वादधिबलमिति। जैसे रत्नावली (३-१५) में 'राजा-मूर्ख, धिक्कार है, तेरे द्वारा किया गया ही हम पर यह अनर्थ आ पड़ा है। क्योंकि-प्रेम का अत्यधिक आदर करने के कारण प्रेम दिन प्रतिदिन बढ रहा था। पहिले न किये गये इस अपराध को मेरे द्वारा किया गया देखकर असहनशील प्रिया (वासवदत्ता) आज अवश्य ही प्राणों को त्याग देगी, क्योंकि उत्कट प्रेम का स्खलन असह्य होता है। विदूषक- हे मित्र, वासवदत्ता क्या करेगी, यह तो मैं नहीं जानता। किन्तु सागरिका का जीवन दूभर हो जायेगा, ऐसा मैं सोचता हूँ।' यर्हां पर सागरिका के प्रति (राजा के) अनुराग से उत्पन्न होने वाले प्रकृष्ट प्रेम के स्खलन से वासवदत्ता के मरण का अनुमान किया जाता है अतः अनुमान (नामक गर्भसन्धि का श्रङ्ग) है। टिप्पणी-सागरिका से प्रेम करने के कारण राजा का वासवदत्ता के प्रति जो प्रकृष्ट प्रेन था वह स्खलित हो गया है जो वासवदत्ता के लिये असह्य है। इसलिये इस प्रेम-स्खलन (लिङ्ग) द्वारा वासवदत्ता के मरण का अनुमान किया जाता है। 5- अधिबल- वञ्चना (=अभिसन्धि) ही अधिबल कहलाता है। जंसे रत्नावली (३.६-१०) में काञ्चनमाला (वासवदत्ता से कहती है)- 'स्वामिनी' यह वह चित्रशाला है अतः वसन्तक (विदूषक) को संकेत करती हूँ।' इत्यादि के द्वारा क्रमशः सागरिका तथा सुसङ्गता का वेष धारण करने वाली वासवदत्ता और काञ्चनमाला के द्वारा राजा और विदूषक की वञ्चना की गई है, अत. यहाँ अधिबल (नामक गर्भसन्धि का श्रङ्ग) है। टिप्पसी-अधिबल के स्वरूप के सम्बन्ध में आचार्यों का मतभेद है। नाट्यशास्त्र (१६.८७) के अनुसार कपट से किसी को वञ्चित करना ही अधिबल है। नाट्यदर्पण (१.८६) में "अधिबलं बलाधिक्यम्" यह लक्षण किया गया है किन्तु वहां अन्य भी कई मत प्रस्तुत किये गये हैं। एक मत के अनुसार वञ्चना का विफल होना ही अधिबल है जैसे रत्ना० ३.१४ में। दूसरे मत के अनुसार सोपालम्भ वाक्य को अधिबल कहते हैं जैसे वेशीसहार ५.२६ में। प्रतापरुद्रीय के अनुसार इष्ट जन को वञ्चित करना ही अधिबल है (३.१५)। साहित्यदर्पण (६.६६) में नाट्य- शास्त्र का लक्षण ही अपनाया गया है।

Page 106

प्रथम: प्रकाश: ५७

अथ तोटकम्- (७७)- संरब्धं तोटकं वचः।४०॥। यथा रत्नावल्याम्-'वासवदत्ता-(उपसृत्य) अज्जउत्त, जुत्तमि सरिस- मिाम् ।' (पुनः सरोषम्) अज्जउत्त उट्ठेहि कि अज्जवि आहिजाईए सेवादुक्खमरणु- भवीअदि, कंचणामाले, एदे ज्जेव पासेण बंधित आणोहि एएं दुट्ठबम्हणं। एदं पि दुट्ठकण्णअं अग्गदो करेहि।" (आर्यपुत्र, युक्तमिदं सदशमिदम्। आर्यपुत्र, उत्तिष्ठ किमद्याप्याभिजात्याः सेवादुःखमनुभूयते, काञ्चनमाले, एतेनव पाशेन बद्ध वानयैनं दुष्टब्राह्मणम् एतामपि दुष्टकन्यकामग्रतः कुरु।') इत्यनेन वासवदत्तासरब्धवचसा सागरिकासमागमान्तरायभूतेनाडनियत प्राप्तिकारणं तोटकमुक्तम। यथा च वेणीसंहारे- 'प्रयत्नपरिबोधितः स्तुतिभिरद्य शेषे निशाम् ।।२७।। इत्यादिना 'धृतायुधो यावदहं तावदन्यैः किमायुधैः' ॥२८॥ इत्यन्तेनान्योन्यं वर्णश्वित्थाम्नो: संरब्धवचसा सेनाभेदकारिणा पाण्डवविजय- प्राप्त्य।शान्वितं तोटकमिति। ६. तोटक आवेगपूर्ण वचन ही तोटक कहलाता है। जैसे रत्नावली (३.१८-१६) में 'वासवदत्ता(निकट जाकर) आर्यपुत्र, यह उचित है, यह योग्य है ? (फिर कोपपूर्वक) आर्यपुत्र, उठो उठो, अब भी कुलीनता की दृष्टि से सेवा के दुःख का क्यों अनुभव करते हो ? (क्रोधपूर्वक) काञ्चनमाला, इसी पाश में बाँधकर इस दुष्ट ब्राह्मण को ले चलो। इस दुष्ट कन्या को भी आगे कर लो।' इत्यादि के द्वारा सागरिका-समागम में विघ्न करने वाले वासवदत्ता के आवेगपूर्ण वचन से अनियत प्राप्ति का कारण दिखलाया गया है जो तोटक (नामक गर्भसन्धि का अ्रङ्ग) है। और, जैसे वेणीसंहार (अङ्क ३) में अश्वत्थामा दुर्योधन से कहता है- 'आज रात्रि में ऐसे सोओगे कि (प्रातः) मङ्गलस्तुतियों से प्रयत्नपूर्वक जागोगे' (३.३४) इससे आरम्भ करके 'जब तक मैंने आयुध धारण किये हैं तब तक अन्य आयुधों से क्या प्रयोजन ?' यहाँ तक कर्ण और अश्वत्थामा के सेना में सेद डालने वाले परस्पर आवेगपूर्ण वचन से पाण्डवों की विजय प्राप्ति की आशा से युक्त तोटक है। टिप्पणी-संरब्धं का अर्थ है-सरम्भयुक्त। सरम्भ=आवेग। नाड्यशास्त्र (१९.८७) में 'सरम्भवचन तोटक' यह लक्षणा किया है जिसका अभिनव भारती के अनुसार भाव यह है कि आवेगपूर्ण वचन ही सोटक है। यह आवेग हर्ष से, क्रोध से

Page 107

५८ दशरूपकम्

ग्रन्थान्तरे तु- तोटकस्यान्यथाभाव ब्र वतेऽधिबल बुधाः। यथा रत्नावल्याम्-'राजा-देवि एवमपि प्रत्यक्षदृष्टव्यलीकः कि विज्ञापयामि- आताम्रतामपनयामि विलक्ष एव लाक्षाकृतां चरसायोस्तव देवि मूर्ध्ना । कोपोपरागजनितां तु मुखेन्दुबिम्बे हतु क्षमो यदि परं करुणा मयि स्यात् ॥२६॥ संरब्धवचनं यत्त तोटकं तदुदाहृतम् ॥४१॥ यथा रत्नावल्याम्-'राजा-प्रिये वासवदत्ते, प्रसीद प्रसीद। वासवदत्ता- (अश्र गि धारयन्ती) अज्जउत्त, मा एवं भण अण्णासङ्गन्ताइ खु एदाइं अक्खराइं त्ति।' (आर्यपुत्र, मैवं भण। अन्यसंकान्तानि खल्वेतान्यक्षराीति।' यथा च वेगीसंहारे-राजा, अये-अये सुन्दरक, कच्चित्कुशलमङ्गराजस्य ? पुरुष :- कुसलं सरीरमेत्तकेण। ('कुशलं शरीरमात्रकेण।') राजा-कि तस्य किरीटिना हता धौरैयाः, क्षतः सारथिः, भग्नो वा रथः । पुरुषः-देव, ण भग्गो रहो भग्गो से मणोरहो (देव न भग्नो रथः । भग्नोऽस्य मनोरथः') राजा-(ससंभ्रमम् ) 'कथम्' इत्येवमादिना संरब्धवचसा तोटकमिति। या अन्य किसी निमित्त से हुआ करता है। क्योंकि हृदय को तोड़ने वाला वचन होता है, अतः इसे तोटक कहा जाता है (भिनत्ति यतो हृदयं ततस् तोटकम्-अभि०भा०)। नाट्यदर्पण (१.८६) के 'तोटक गर्भित वचः' का भी यही तात्पर्य है। प्रता०(१.१५) के अनुसार 'रोषसंरब्धवचनं तोटकम् यह लक्षण है जिसमें आवेग के निमित्त रोष मात्र का उल्लेख किया गया है। साहित्यदर्पण (६.६८) में दशरूपक का ही अनुसरण किया गया है (तोटक पुनः संरब्धवाक्)। कुछ व्याख्याकारों ने संरब्ध का अर्थ कोध-युक्त किया है, किन्तु उपयुक्त अर्थ ही प्रामाणिक प्रतीत होता है। इन सभी लक्षणों में प्रायः समानता है। आगे 'ग्रन्थान्तरे तु' इत्यादि के द्वारा जो तोटक का लक्षण उद्धृत किया जा रहा है उसमें भी कोई अन्तर नहीं है। हां, उदाहरण में अन्तर है। साथ ही 'अधिबल' के लक्षण में विशेष मतभेद है। अन्य ग्रन्थ में तो- विद्वान् लोग तोटक के विपरीत भाव को अधिबल कहते हैं। जैसे रत्नावली (३.१४) में 'राजा -- देवी, इस प्रकार जिसका अपराध प्रत्यक्ष देख लिया गया है ऐसा मैं क्या कहूं? देवी, इस प्रकार लज्जित हुआ मैं तुम्हारे चरणों की महावर से उत्पन्न लाली को अपने सिर से पोंछता हूँ। किन्तु तुम्हारे मुख रूपी चन्द्र-बिम्ब पर क्रोध (रूपी राहु) के ग्रहण से उत्पन्न लाली को तो मैं तभी दूर कर सकता हूं यदि मुझ पर तुम्हारी कृपा हो।' जो संरब्ध वचन है वह तो तोटक कहा गया है ॥४१।। जैसे रत्नावली (३.१३-१४) में 'राजा-प्रिय वासवदत्ता, प्रसन्न हो जाओ प्रसन्न हो जाओ। वासवदत्ता-(आँसू भरती हुई) आर्यपुत्र, ऐसा मत कहो, ये प्रक्षर (अब) दूसरी के लिये हो गये हैं।'

Page 108

प्रथम: प्रकाश:

अथोद्वग :- (७८) उद्व गोऽरिकृता भीति :- यथा रत्नावल्याम्-'सागरिका -- (आत्मगतम्) कह अकिदपुण्रोहि अत्तरो इच्छाए मरिउं पि स पारीअदि। ('कथमकृतपुण्यरात्मन इच्छया मर्तुमपि न पार्यते।') इत्यनेन वासवदत्तातः सागरिकाया भयमित्युद्वगः । यो हि यस्यापकारी स तस्यारि:। और, जैसे वेीसंहार (४.६-१०) में 'राजा-अरे सुन्दरक, अङ्गराज (कर्रग) कुशल से तो हैं ? पुरुष-केवल शरीर मात्र से कुशल हैं। राजा क्या अर्जुन ने उसके घोड़े मार दिये, सारथि घायल कर दिया या रथ तोड़ दिया ? पुरुष-देव, न केवल रथ ही तोड़ दिया, अपितु मनोरथ भी। राजा-(घबराहट के साथ) कसे ? इत्यादि आवेगपूर्ण वचन के द्वारा तोटक होता है। टिप्पणी-(१)हाल तथा हास का विचार है कि 'तोटकस्य .. तदुदाहृतम्' ।.४१।। यह श्लोक अरवलोक टीका में उद्धृत किया गया है। यह मूल ग्रन्थ का अंश नहीं है। (२) सुदर्शनाचार्य ने प्रभानामक संस्कृत टीका में सूत्र ७७ में स्थित 'संरब्ध' शब्द का अर्थ 'कोधयुक्त' किया है और प्रस्तुत श्लोक में स्थित 'संरब्धवचन' का अर्थ उद्विग्न वचन' किया है। किन्तु यहां संरब्ध के विपरीत (अन्यथाभाव) का अर्थ विनयवचन किया है और मतान्तर के अनुसार विनययुक्त वचन को ही अधिबल बताया है। तथ्य यह प्रतीत होता है कि संरब्धवचन सभी के अनुसार तोटक या त्रोटक है। संरब्धवचन का बहुसम्मत अर्थ है-आवगपूर्ण वचन। आ्वेग का मुख्य निमित्त करोध भी है इसीलिये प्रता० आदि में केवल कोध से उत्पन्न संरब्धवचन को तोटक मान लिया गया है। फिर भी तोटक के स्वरूप के विषय में मत-भेद नहीं है। हाँ, मतभेद है-अधिबल के स्वरूप के विषय में। कुछ विद्वानों का मत है कि आवेगपूर्ण वचन जो तोटक है उसका उलटा ही अधिबल है, अर्थात् ऐसा वचन जिसमें आवेग= उत्तेजना या क्षोभ न हो। जैसा कि ऊपर कहा गया है, आवेग नामक भाव क्रोध, हर्ष, शोक आदि से उत्पन्न होता है। यहां तोटक के दोनों उदाहरणों में पीड़ा या शोक से उत्पन्न आरवेग से युक्त वचन है और अधिबल के उदाहरण में आवेगरहित (प्रकृतिस्थ अवस्था का) कथन है। धनञ्जय के मत में वञ्बना ही अधिवल है (सून ७६) १०. उद्ूग- शत्रु से उत्पन्न भय उद्वेग कहलाता है। जैसे रत्नावली (२.१८.१६) में 'सागरिका (मन ही मन) क्या पुण्य न करने वाली मैं अपनी इच्छा से मर भी नहीं सकती'। इत्यादि के द्वारा वासवदत्ता से उत्पन्न सागरिका का भय दिखलाया गया है अतः उद्दग (नामक गर्भसन्धि का शङ्ग) है। (यदि शंका हो कि वासवदत्ता तो सागरिका की शत्रु नहीं है फिर यह भय शत्रु से उत्पन्न कहाँ रहा ? तो उत्तर है) जो जिसका अपकारी होता है वह उसका शत्रु ही है(वासवदत्ता भी सागरिका के वत्सराज से मिलन में बाधक है अतः शत्रु ही है)।

Page 109

६० दशरूपकम्

यथा च वेणीसंहारे-'सूतः-(शत्वा सभयम्) कथमासन्न एवासी कौरवराज- पुत्रमहावनोत्पातमारुतो मारुतिरनुपलब्धसंज्ञश्च महाराजः, भवतु दूरमपहरामि स्यन्दनम्। कदाचिदयमनार्यो दुःशासन इवास्मिन्नप्यनार्यमाचरिष्यति।' इत्यरिकृता भीतिरुद्वगः । अरथ संभ्रम :- (७६) - शङ्कात्रासौ च सभ्रमः। यथा रत्नावल्याम्-'विदूषकः-(पश्यन्) का उस एसा। (ससंभ्रमम्) कध देवी वासवदत्ता अत्ताणं वावादेदि।) 'का पुनरेषा ! क्थ देवी वासवदत्तात्मानं व्यापा- दयति') राजा -- (ससंभ्रममुपसर्पन्) क्वासी क्वासौ ?' इत्यनेन वासवदत्ताबुद्धिगृही- ताया: सागरिकाया मरणशङ्गया संभ्रम हति। यथा च वेणीसंहारे-('नेपथ्ये कलकलः') अश्वत्थामा-(ससंभ्रमम्) मातुल, मातुल, कष्टम्। एष भ्रातुः प्रतिज्ञाभङ्गभीरुः किरोटी सम शरवर्षदुर्योधनराधेयावभि और, जंसे वेरगीसंहार (४.१-२)में 'सूत-(सुनकर भयपूर्वक)क्या कौरव राजपुत्र रूपी महावन के लिये उत्पात-पवन यह पवनपुत्र (भीम) निकट ही है और अभी महाराज को चेतना नहीं प्राप्त हुई है। अच्छा, रथ को दूर ले जाता हूं। कही यह दुष्ट दुःशासन के समान इनके साथ भी दुष्टता न करे।' इस प्रकार शत्र के द्वारा उत्पन्न भय है अतः उद्वूग (नामक गर्भसन्धि का अ्रङ्ग) है। टिप्पणी-भाव यह है कि चौर, नूप, शत्र, नायिका इत्यादि से उत्पन्न होने वाला जो भय है, जिसके कारण नियताप्ति में विघ्न उपस्थित होता है उसका वर्णन ही उद्वग है। दशरूपक में 'अरिकृता' में 'अरि' शब्द का अपर्थ हैं-अपकारी= इष्ट कार्य में विध्न करने वाला। ११. सम्भ्रम- शङ्का और त्रास को सम्भ्रम कहा जाता है। जैसे रत्नावली (३.१५-१६) में 'विदूषक-(देखकर) यह कौन है ? क्या देवी वासवदत्ता आत्महत्या कर रही है ? राजा - (घबराहट के साथ निकट जाकर) वह कहाँ है ? वह कहाँ है ?' इत्यादि के द्वारा वासवदत्ता समझकर सागरिका के मरने की शङ्का होने से संभ्रम (नामक गर्भसन्धि का अङ्ग) है। और, जैसे वेणीसंहार (४-४७-४८) में (नैपथ्य में कलकल शब्द होता है) अशवत्थामा-(घबराहट के साथ) मातुल,

Page 110

प्रथम: प्रकाशः ६१

द्रवति। सर्वथा पीतं शोशितं दुःशासनस्य भीमेन।' इति शङ्का। तथा '(प्रविश्य संभ्रान्तः सप्रहारः) सूतः-त्रायतां त्रायतां कुमारः ।' इति त्रासः। इत्येताभ्यां त्रास- शङ्काभ्यां दुःशासनद्रोणवधसूचकाभ्यां पाण्डवविजयप्राप्त्याशान्वितः संभ्रम इति। मातुल, कष्ट की बात है! अपने भाई (भीमसेन) की प्रतिज्ञा के भङ्ग के भय से यह अर्जुन बाणों की वर्षा करते हुए एक साथ ही दुर्योधन और कर्णा की ओर बढ़ रहा है। भीम ने दुःशासन का रक्त बिल्कुल पी ही लिया।' यहाँ पर शङ्का दिखलाई गई है। और, (धबराहट के साथ प्रहारयुक्त प्रवेश करके) सूत-कुमार की रक्षा करो, रक्षा करो।' यहाँ त्रास दिखलाया गया है। यहाँ दुःशासन और द्रोण के वध की सूचना देने वाले इन त्रास और शङ्का के द्वारा पाण्डवों की विजय प्राप्ति की आशा से युक्त यह संभ्रम है। टिप्पणी-(i) वासवदत्ता बुद्धिगृहीताया := वासवता की बुद्धि से गृहीत की गई का, 'यह वासवदत्ता है' इस प्रकार की बुद्धि (ज्ञान) से गृहीत की गई का, सागरिका को वासवदत्ता समभकर। (ii) संभ्रम=वह शङ्का या श्रास जिसका सम्बन्ध प्राप्त्याशा से होता हैं, संभ्रम (नामक गर्भसन्धि का अङ्ग) है। यहाँ रत्नावली के उदाहरण में वासवदत्ता की आत्महत्या की जो शङ्का है वह सागरिका- समागम की प्राप्त्याशा के अनुकूल है। इसी प्रकार वेशीसंहार के उदाहरण में जो शङ्का तथा त्रास हैं उनसे होने वाला संभ्रम पाण्डवों की विजय-प्राप्ति की आशा के अनुकूल है। (iii) नाट्यशास्त्र में संभ्रम के स्थान पर 'विद्रव' नामक गर्भसन्धि के अङ्ग का निरूपण किया गया है, जिसका लक्षणा है-शङ्काभयत्रासकृतो विद्रवः' (ना० शा० १६८८)। अभिनवगुप्त के अनुसार इसकी दो व्याख्याएँ हैं- (१) 'भयत्रासकृतः' इस पद में षष्ठी विभक्ति है। 'शङ्गा' पृथक् प्रथमान्त पद है। इस प्रकार भय और त्रास उत्पन्न करने वाली वस्तु की शङ्का ही विद्रव है। शङ्का वा तात्पर्य है-विघ्न करने की सम्भावना (शङ्का =अपायकारकत्व- सम्भावना, ना० द० १'८४)। (२) 'शङ्काभयत्रासकृतः' यह एक समस्त पद है। शङ्का, भय और त्रास से किया गया (भाव) विद्रव है। वह भाव क्या है? सम्भ्रम। जैसा कि साहित्यदर्पण में स्पष्ट किया गया है (६.१००)। इस प्रकार शङ्का, भय और त्रास से होने वाली घबराहट का वर्णन ही विद्रव है। दशरूपककार ने शङ्का और त्रास को ही सम्भ्रम कहा है। किन्तु धनिक की टीका के अनुसार शङ्का और त्रास से उत्पन्न धबराहट का वर्शन, जो प्राप्त्याशा से अन्वित है वही, सम्भ्रम है। (iv) यह भी ध्यान देने योग्य है कि प्राप्त्याशा से अन्वित भय (भीति) का वर्णन उद्वेग है किन्तु भय, वास और शङ्का से उत्पन्न घबराहट का वर्णन सम्भ्रम याविद्रव है।

Page 111

६२ दशरूपकम

अथाक्षेप :- (८०) गर्भबीजसमुद्ध दादाक्षेप: परिकीर्तितः ।।४२।। यथा रत्नावल्याम्-'राजा-वयस्य देवीप्रसादनं मुक्त्वा नान्यत्रोपाय पश्यामि।' पुनःकमान्तरे 'सर्वथा देवीप्रसादनं प्रति निष्प्रत्याशीभूताः स्मः। पुनः 'तत्किमिह स्थितेन देवीमेव गत्वा प्रसादयामि।' इत्यनेन देवीप्रसादायत्ता सागरिकासमागसिद्धि- रिति गर्भबीजोन्द्ग दादाक्षेपः । यथा च वेरीसंहारे-'सन्दरकः -श्हवा किमेत्थ देव्वं उत्रलहामि तस्स वखु एदं रिगब्भच्छिद विदुरवअणबीअस्स परिभूदपिदामहहिदोवदेसङ् रस्स सउसिप्पो- च्छाहगारूढमूलस्स कूडविससाहिरो पञ्चालीकेसग्गहाकुसुमस्स फलं परिणमेदि।' ('अथवा किमत्र दैवमुपालभामि तस्य खल्वतन्निर्भत्सितविदुरवचनबीजस्य परिभूत- पितामहहितोपदेशाङ्ग रस्य शकुनिप्रोत्साहनारूढमूलस्य कूटविषशाखिनः पाञ्चालीकेश- ग्रहणाकुसुमस्य फलं परिणमति'।)इत्यनेन बीजमेव फलोन्मुखतयाक्षिप्यत इत्याक्षेपः। गर्भ के बीज का उद्भेद (प्रकटन) ही आक्षेप कहा गया है। १२. आक्षेप जैसे रत्नावली (३.१५-१६) में 'राजा-मित्र, देवी को प्रसन्न करने के अतिरिक्त इसका कोई दूसरा उपाय नहीं दिखलाई देता।' फिर दूसरे अवसर पर 'सर्वथा देवी को प्रसन्न करने के विषय में हम निराश हो चुके हैं।' फिर भी 'तो यहाँ ठहरने से क्या लाभ ? जाकर देवी को ही प्रसन्न करें।' इत्यादि के द्वारा देवी की प्रसन्नता के अधीन ही सागरिका के समागम की सिद्धि है, यह प्रकट किया गया है अतः गर्भ के बीज को प्रकट करने के कारण यह आक्षेप (नामक गर्भ सन्धि का अ्रङ्ग) है। और, जैसे वेरगीसंहार (४.६-१०) में 'सुन्दरक-अथवा इस विषय में भाग्य को क्या दोष दूँ ? क्योंकि यह तो उस कपट रूपी (कूट) विष वृक्ष का फल प्राप्त हो रहा है, विदुर के वचन का तिरस्कार ही जिसका बीज है, अवहेलना किया गया पितामह का हितकारी उपदेश ही जिसका अंकुर है, शकुनि के प्रोत्साहन से जिसकी जड़ दृढ़ हो गई है, द्रौपदी का केश-कर्षण ही जिसका पुष्प है।' इत्यादि के द्वारा बीज को ही फलोन्मुख रूप में दिखलाया गया है। अतः आक्षेप (नामक गर्भसन्धि का श्रङ्ग) है। टिप्परी-(१) नाट्य शास्त्र के अनुसार इसका नाम आक्षिप्ति है, जिसका लक्षण है-गर्भस्योद्भेदनं यत् साऽक्षिप्तिर् (१६.८६)। दशरूपक के उपयुक्तक लक्षणा में इसकी ही छाया है। प्रता०, साहित्यदर्पण (६.६६) के अनुसार रहस्यपूणं अर्थ को प्रकट करना ही आक्षेप कहलाता है। नाट्यदर्पण (१.५४) के अनुसार "प्राप्त्याशा की अवस्था में स्थित बीज का प्रकाशन ही आक्षेप है"। इन सभी लक्षणों के आधार पर आक्षेप का स्वरूप है-गर्भसन्धि में स्थित प्राप्त्याशा की अवस्था से अन्वित गुप्त बीज का प्रकाशन ही आक्षेप है। इसमें बीज की फलोन्मुखता का वर्णन होता है।

Page 112

प्रथम: प्रकाश: ६३

एतानि द्वादश गर्भाङ्गानि प्राप्त्याशाप्रदर्शकत्वेनोपनिबन्धनीयानि। एषां च मध्येऽभूताहरणमार्गतोटकाधिबलाक्षेपाणं प्राधान्यम् इतरेषां यथासंभवं प्रयोग इति साङ्गो गर्भसधिरुक्तः। ग्थावमशः- (८१) क्रोधेनावमृशेद्यत्र व्यसनाद्वा विलोभनात्। गर्भनिर्भिन्नबीजार्थः सोऽवमर्श इति स्मृतः ॥४३॥ इन गर्भसन्धि के १२ अरङ्भों को प्राप्त्याशा के प्रदशक के रूप में दिखलाना चाहिए। इन अङ्गों में अभुताहरण, मार्ग, तोटक, अधिबल और आक्षेप-ये मुख्य हैं (इनका रखना आवश्यक है) अन्य श्रङ्गों का यथासम्भव प्रयोग किया जाता है। इस प्रकार अङ्गों सहित गर्भसन्धि बतलाई गई है। टिप्पणी-(१) गर्भसन्धि में बीज अन्तर्निविष्ट सा रहता है वह कभी प्रकट हो जाता है कभी छिप जाता है। अतः उसका बार-बार अन्वेषण किया जाया करता है। इस प्रकार का बीज प्राप्त्याशा का प्रदर्शक होता है। प्राप्त्याशा से अन्वित कभी हृष्ट और कभी नष्ट होने वाले इस बीज के वर्णन में अनेक अवस्थाएं होती हैं जो नाट्य के सन्दर्भ में गर्भसन्धि के अङ्ग कहलाते हैं। जैसा कि धनिक ने बतलाया है इन अङ्गों में अभूताहरण इत्यादि अङ्ग अनिवार्य हैं किन्तु शेष अ्ङ्गों की योजना अनिवार्य नहीं है। (२) ना० शा० (१६.६१-६२) में गभसन्धि के १३ अङ्ग माने गये हैं, इसी प्रकार ना० द०(१.७६)तथा सा० द० (६.६४-६५) में भी। साथ ही इन अङ्गों के नाम, क्रम तथा स्वरूप में भी भेद है। किन्तु प्रता० (३.१४-१५) में दशरूपक के समान ही १२ अङ्ग माने गये हैं। इन अङ्गों का नाम भेद तथा संख्या-भेद निम्न विवरण से स्पष्ट है :-

नाट्यशास्त्र दशरूपक नाट्यदर्पण सहित्यदर्पण प्रतापरुद्रीय

अभूताहरण अभूताहरण संग्रह, रूप अभूताहरण मार्ग, रूप, मार्ग, रूप अनुमान, प्रारथना मार्ग, रूप उदाहरण, क्रम, उदाहरण, क्रम उदाहृति, क्रम उदाहरण, क्रम दशरूपक के संग्रह, अनुमान, समान प्रार्थना, अक्षिति, संग्रह, अनुमान उद्वग, विश्नव संग्रह, अनुमान तोटक, अधिबल आक्षेप, अधिबल प्रार्थना, क्षिप्ति ताटक, अधिबल, उद्वग, संभ्रम मार्ग, असत्या- तोटक, अधिबल उद्वग, विद्रव आक्षेप हरणा, तोटक उद्वग, विद्रव

विमर्श (अवमर्श) सन्धि और उसके अङ्ग अवमर्श सन्धि-जहाँ क्रोध से, व्यसन से अथवा प्रलोभन से (फलप्राप्ति के विषय में) विमर्श किया जाता है, तथा जिसमें गर्भसन्धि * 'सोऽतमर्शोऽङ्गसङ्ग्रहः' इति पाठान्तरम्।

Page 113

६४ दशरूपकम्

अवमर्शनमवमर्शः पर्यालोचन तच्च क्रोधेन वा व्यसनाद्वा विलोभनेन वा 'भवित- व्यमनेनार्थन' इत्यव्रधारितकान्तफलप्राप्त्यवसायात्मा गर्भसंध्युद्धिन्नबीजार्थसंबन्धो विमर्शोडवमर्शः, यथा रत्नावल्यां चतुर्थ ऽङ्कड्ग्निविद्रवपर्यन्तो वासवदत्ताप्रसकत्या निरपायरत्नावलीप्राप्त्यवसायात्मा विमर्शो दशितः । यथा च वेणीसंहारे दुर्योधन- रुधिराक्तभीमसेनागमपर्यन्त :- तीर्सों भीष्महोदधौ कथमपि द्रोणानले निवते कर्णाशी विषभोगिनि प्रशमिते शल्येऽपि याते दिवम्। भीमेन प्रियसाहसेन रभसादल्पावशेषे जये सर्वे जीवितसंशय वयममी वाचा समारोपिताः ॥३०॥ इत्यत्र 'स्वल्पावशेषे जये' इत्यादिभिर्विजय प्रत्यर्थसमस्तभीष्मादिमहारभिवधा- दवधारितकान्तविजयावमर्शनादवमर्शन दशितमित्यवमशसंधिः। द्वारा निर्भिन्न बीजार्थ का सम्बन्ध दिखलाया जाता है, वह शवमर्श (या विमर्श) सन्धि कहलाती है।४३॥ अवमश' शब्द का अरथं है-ऊहा-पोह करना, पर्यालोचन। वह (पर्यालोचन) क्रोध से अथवा व्यसन (आपत्ति) या विलोभन आदि (कारणों) से होता है। जहाँ 'यह फल होना चाहए' इस प्रकार अवश्यंभावी फल-प्राप्ति का निश्चय कर लिया जाता है और जिसमें गर्भसन्धि से प्रकाशित (उद्धिन्न) बीज रूपी अर्थ का सम्बन्ध दिखलाया जाता है, वह पर्यालोचन (विमर्श) ही अवमर्श सन्धि है। जैसे रत्नावली नाटिका के चतुर्थ अङ्क में अरग्नि के उपद्रव पर्यन्त वासवदत्ता की प्रसन्नता से विघ्न- रहित रत्नावली की प्राप्ति का निश्चय-रून विमर्श दिखलाया गया है। और, जैसे वेरगीसंहार में दुर्योधन के रक्त से सने (शक्त) भीमसेन के आगमन पर्यन्त विमर्श सन्धि है। जैसे कि-'(युधिष्ठिर का विमर्श ६.१) भीष्म-रूपी महा- सागर को पार कर लेने पर, द्रो-रूपी अग्नि के बुझक जाने पर, करगं-रूपी विषैले सर्प का दमन कर दिये जाने पर और शल्य के परलोक चले जाने पर विजय थोड़ी ही शेष रह गई है ; किन्तु साहस-प्रिय भीम ने आवेग के कारण अपनी प्रतिज्ञा द्वारा (वाचा) हम सबका जीवन संशय में डाल दिया है।" यहाँ पर 'विज़य थोड़ी ही शेष है' (स्वल्पावशषे जये) इत्यादि कथन के द्वारा विजय के बाधक सभी भीष्म आदि महारथियों के मारे जाने पर एकान्ततः निश्चित विजय का पर्यालोचन किया जाने के कारण अवमर्शन दिखलाया गया है, अ्रतः अवमर्श सन्धि है। टिप्परी-(१)ना०शा०(१६.४२),प्रता०(३.१६),ना०द० (१.३६),सा० द० (६.७६) में भी प्रायः इसी प्रकार का लक्षण दिया गया है। किन्तु उन सभी ने इसे 'विमर्श' सन्धि नाम दिया है। संक्षेप में इसका स्वरूप यह है-गर्भसन्धि में फल-प्राप्ति की संभावना होती है, बीज का उद्भेद हो जाता है किन्तु फिर क्रोध, व्यसन, विलोभन या शाप आदि के कारण विध्न उपस्थित हो जाने से नायक फल प्राप्ति के विषय

Page 114

प्रथम: प्रकाश: ६५

तस्याङ्गसंग्रहमाह- (८२) तत्रापवादसंफेटौ विद्रवद्रवशक्तय: द्युतिः प्रसङ्गश्छलनं व्यबसायो विरोधनम् ॥४४।। प्ररोचना विचलनमादानं घ त्रयोदश। यथोद्देशं लक्षणामाह- (८३) दोषप्रख्यापवादः स्यात्- यथा रत्नावल्याम्-'सुसङ्गता-सा खु तवस्सिणी भट्टिीए उज्जइगि णी- अदित्ति पवादं करित उवत्थिदे अद्धरत्ते ण जाणीअदि कहिंपि सीदेति। ('सा खलु तपस्विनी भट्टिन्योज्जयिनीं नीयत इति प्रवादं कृत्वोपस्थितेऽर्धरात्रे न ज्ञायते कुत्रापि नीतेति।') 'विदूषक :- (सोद्वगम्) अदिशिग्घिएं वखु किदं देवीए।' ('अतिनिर्घूएं खलु कृतं देव्या।') पुनः-'भो अवस्स, मा खु अण्णाधा संभावेहि सा खु देवीए उज्ज- इीं पेसिदा अदो अप्पिअं त्ति कहिदम्।' ('भो वयस्य, मा खल्वन्यथा संभावय सा खलु देव्योज्जयिन्यां प्रेषिता अतोऽप्रियमिति कथितम्') राजा-'हो निरनुरोधा मयि देवी ।' इत्यनेन वासवदत्तादोषप्रख्यापनादपवादः । में विमर्श (=सन्देह) करने लगता है। तत्पश्चात् विघ्न हट जाने पर फल-प्राप्ति का निश्चय (नियताप्ति) हुआ करता है। इस प्रकार जहां नियताप्ति (कार्यावस्था) से समन्वित होकर बीज गर्भसन्धि की अपेक्षा और अधिक प्रकट हो जाता है वह प्रधानवृत्त का भाग अवमर्श सन्धि है। इसमें प्राप्त्यंश की प्रधानता और अप्राप्ति- अंश की न्यूनता होती है किन्तु गर्भसन्धि में अप्राप्ति-अंश की ही प्रधानता होती है। उस. (अवमर्श सन्धि) के अङ्गों को बतलाते हैं- उसके १. अपवाद, २. संफेठ, ३. विद्रव, ४ द्रव, ५. शक्ति, ६. द्ुति ७. प्रसङ्ग, 5. छलन, ६. व्यवसाय, १०. विरोधन, ११. प्ररोचना, १२. विचलन और १३. आदान-ये तेरह अङ्ग होते हैं। टिप्पणी-ना० शा० (१६.६३-६४), ना० द० (१-६०), सा० द० (६.१०१-१०२) में अवमर्श सन्धि के विद्रब और विचलन नामक अङ्गों को नहीं माना गया। खेद और विरोध नामक दो अन्य अङ्गों को स्वीकार किया गया है। नाम-निर्देश के क्रम से इन अङ्गों का लक्षण बतलाते हैं :- १. अपवाद (किसी पात्र के) दोषों का कथन अपवाद कहलाता है। जैसे रत्नावली (श्रङ् ४ प्रवेशक) में 'सुसङ्गता-उस बेचारी (सागरिका) को देवी (वासवदत्ता) ने "उज्जयिनी को भेजी जा रही है" यह प्रवाद फैलाकर

Page 115

६६ दशरूपकम्

यथा च वेणीसंहारे-'युधिष्ठिर :- पाञ्चालक, कच्चिदासादिता तस्य दुरात्मनः कौरवापसदस्य पदवी ? पाञ्चालक :- न केवलं पदवी स एव दुरात्मा देवीकेशपाश- स्पर्शपातकप्रधानहेतुरुपलब्धः ।' इति दुर्योधनस्य दोषप्रख्यापनादपबाद इति। अथ संफेट :- (८४) संफेटो रोषभाषणम्। यथा वेरीसंहारे-'भोः कौरवराज, कृतं बन्धुनाशदर्शनमन्युना, मैवं विषादं कृथा :- 'पर्याप्ताः पाण्डवा समरयाऽहमसहाय' इति। पञ्चानां मन्यसेऽस्माकं यं सुयोधं सुयोधन। दंशिनस्यात्तशस्त्रस्य तेन तेऽस्तु रणोत्सव: ।।३१।। आधी रात होने पर न जाने कहाँ भेज दिया। विदूषक-(उद्वेगपूर्वक) देवी ने अ्र््रति निष्ठुर कार्य किया।' फिर (४.३-४) विदूबक-(राजा के प्रति) हे मित्र, कुछ और न समझो उस (सागरिका) को देवी ने उज्जयिनी भेज दिया है, इसलिए मैंने 'अप्रिय' ऐसा कह दिया है। राजा-अहो। देवी मेरे अनुकूल नहीं (निरनुरोधा) है। इत्यादि के द्वारा वासवदत्ता के दोषों का क्थन किया गया है अतः यहाँ अपवाद (नामक अवमर्श सन्धि का अङ्ग) है। और, जैसे वेरगीसंहार (६.३-४) में 'युधिष्ठिर-पाञ्चालक, क्या उस दुष्टात्मा कौरवाधम का पद-मार्ग मिल गया है ? पाञ्चालक-केवल पदमार्ग ही नहीं, अपितु देवी (द्रौपदी) के केश-पाश के स्पर्श रूपी पातक का मुख्य हेतु वह दुष्टात्मा ही मिल गया है।' इत्यादि के द्वारा दुर्योधन के दोषों का प्रख्यापन किया जाने के कारण यहाँ अपवाद (नामक अवमर्श सन्धि का अ्ङ्ग) है। टिप्परगी-(१) दशरूपक का यह लक्षण ना० शा० (१६.८६) के समान ही है। सा० द० (६.१०२) में इसी प्रकार का लक्षणा है। नाट्यदर्पण (१.६४) के अनुसार अपने या दूसरे के दोषों को प्रकट करना ही अपवाद कहलाता है। (२)

दोष है। यहां रत्नावली के उदाहरण में देवी वासवदत्ता का राजा के प्रतिकूल होना ही

(बीज से अ्रन्वित) रोषयुक्त कथनोपकथन (भाषण) ही संफेट २. संफेट

कहलाता है। जैसे वेगगीसंहार (६.१०-११) में (पाञ्चालक युधिष्ठिर को बतलाता है कि तब्र भीमसेन ने दुर्योधन से कहा) 'हे कौरवराज, बन्धुओं के नाश को देखकर शोक न करो। इस प्रकार का विषाद न करो कि युद्ध के लिये पाण्डव तो पर्याप्त हैं किन्तु मैं असहाय हूं। क्योंकि- हे दुर्योधन, हम पाँचों में से जिससे युद्ध करना सुगम समझो, कवच पहने और शस्त्र लिये तुम्हारा उसके साथ ही युद्धरूपी उत्सव हो जाये।

Page 116

प्रथम: प्रकाश: ६७

इत्थं श्र त्वाऽसूयात्मिकां निक्षिप्य कुमारयोहष्टिमुक्तवान्धार्तराष्ट्र :- कणंदुःशासनवधात्तुल्यावेव युवां मम। अप्रियोऽपि प्रियो योदधु त्वमेव प्रियसाहसः ।३२।। 'इत्युत्थाय च परस्परकोधाधिक्षेपपरुषवक्कलह प्रस्ताविघोरसङ्रग्रामी-इत्यनेन भीमदुर्योधनयोरन्योन्य रोषसंभाषरा द्विजयबीजान्वयेन संफेट इति। अथ विद्रव :- । ह (८५) विद्रवो वघबन्धादि: यथा छलितरामे- येनावृत्य मुखानि साम पठतामत्यन्तमायासितम् बाल्ये येन हृताक्षसूत्रवलयप्रत्यर्परीः क्रीडितम्। युष्माकं हृदयं स एष विशिखैरापूरितांसस्थलो मूर्च्छाघोरतमःप्रवेशविवशो बद्ध्वा लवो नीयते ॥३३॥ इस प्रकार सुनकर दोनों कुमारों (भीम और अर्जुन) पर ईर्ष्यापूर्ण दृष्टि डालकर धृतराष्ट्र का पुत्र (भीम से) बोला-करं और दुःशासन का वध करने के कारण तुम दोनों मेरे लिए समान ही हो। अप्रिय होने पर भी साहस-प्रिय होने से तुम (भीम) ही मुझे युद्ध के लिए इष्ट हो।- यह कहकर उठकर भीम और दुर्योधन ने परस्पर क्रोध के कारण निन्दा और कठोर वाक्-कलह के द्वारा भयंकर संग्राम आरम्भ कर दिया।' पी इत्यादि में विजय रूपी बीज से अन्वित भीम और दुर्योधन का परस्पर रोषपूर्वक कथोपकथन है अतः यहाँ संफैट (नामक अवमर्श सन्धि का अ्रङ्ग) है। टिप्पणी-ना० शा० (१.८६) में 'रोषग्रथितवाक्यं तु संफेटः' यह लक्षण दिया गया है, उसकी ही छाया दशरूपक के लक्षण में है। इसी प्रकार ना० द० (१.६३), प्रता० (३.१८) तथा सा० द० (६.१०२) के संफेट-लक्षण प्रायः दशरूपक के समान ही हैं। भाव यह है कि बीज से अन्वित दो पात्रों का परस्पर रोषपूर्ण कथोपकयन ही संफेट है। ३. विद्रव वध, बन्धन आदि का वर्णन ही विद्रव कहलाता है। जैसे छलितराम नामक नाटक में 'जिस (लव) ने सामवेद का पाठ करते हुओं का मुख बन्द करके बड़ा तंग किया था। बाल्यकाल में जिसने प्क्षसूत्र और वलय को छीनकर और फिर देकर कीड़ा की थी, जो तुम्हारा हृदय है, वही यह लद, जिसका कन्पा बाणों से भरा हुआ है जो मूच्छा के गहन अन्धकार में प्रविष्ट हो जाने से असमर्थ हो गया है, अब बांधकर ले जाया जा रहा है।

Page 117

६८ दशरूपकम्

यथा च रत्नावल्याम् -- हर्म्याणां हेमशृङ्गश्रियमिव शिखरैरचिषामादधानः सान्द्रोद्यानद्रुमाग्रग्लपनपिशुनितात्यन्ततीव्राभितापः । कुर्वन्कीडामहीध्र सजलजलधरश्यामलं धूमपात- रेष प्लोषारतयोषिज्न इह सहसैवोत्थितोऽन्तःपुरेऽग्निः ॥३४॥ इत्यादि। पुनः वासवदत्ता-'अज्जउत्त, क्खु अहं अच्रो कारणादो भरगामि एसा मए शिग्घिणहिअआए संजदा सागरिश विवज्जदि।' (आर्यपुत्र, न खल्वहमात्मनः कारणाद्द्गणामि एषा मया निघृशाहृदयया संयता सागरिका विपद्यते।' इत्यनेन सागरिकावधबन्धाग्निभिविद्रव इति। अथ द्रव :- (८६) द्रवो गुरुतिरस्कृतिः।।४५।। यथोत्तरचरिते- वृद्धास्ते न विचारीयचरितास्तिष्ठन्तु हुं वतते सुन्दस्त्रीदमने ऽप्यखण्डयशसो लोके महान्तो हि ते। यानि त्रीण्यकुतोमुखान्यपि पदान्यासन्वरायोधने और, जैसे रत्नावली (४.१४) में (नपथ्य में) 'ज्वालाओं के समूह से महलों को स्वर्ण के शिखरों जैसी शोभा प्रदान करती हुई, घने उद्यान के वृक्षों के अग्रभाग के भुलसने से (अपने) अत्यन्त तीव्र ताप को प्रकट करती हुई, धूम-पात के द्वारा कीड़ा-पर्वत को सजल जलधरों से श्यामल सा बनाती हुई, दाह से स्त्रियों को व्याकुल करती हुई यहाँ अन्तपुर में अकस्मात ही अग्नि उठ चली है।' इत्यादि। फिर 'वासवदत्ता-मैं अपने लिए नहीं कहती हूं। मुझ निर्दय के द्वारा बांधी गई यह सागरिका मर रही है (विपद्यते)।' इत्यादि में सागरिका के वध, बन्धन और अग्ति के (वर्शन) द्वारा विद्रव (अवमर्श सन्धि का अङ्ग) है। टिप्परी-(१) ना०शा० (अ०१६), ना०द० (प्रथम विवेक) और सा०द० में विद्रव को विमर्श (अवमर्श ) सन्धि के अङ्गों में नहीं माना गया। प्रता० (३. १७-१८) में तो दशरूपक के समान ही विद्रव का वर्णन किया गया है। जैसा कि ऊपर कहा गया है, ना० शा० (१६. ८८) ना० द० तथा सा० द० में संभ्रम के स्थान पर विद्रव नामक गर्भसन्धि का अङ्ग माना गया है। इस प्रकार सन्धियों के अङ्गों के निरूपण में दशरूपककार की अपनी निजी विशेषता है। ४. द्रव गुरुजनों का तिरस्कार द्रव कहलाता है।४५॥ जैसे उत्तररामचरित (५.३४) में (राम को लक्ष्य करके लव कह रहा है) 'उन वृद्ध जनों के चरित विचारणीय नहीं हैं, कैसे भी हों, हाँ, यह भी तो है।

Page 118

प्रथम: प्रकाश:

यद्वा कौशलमिन्द्रसूनुदमने तत्राप्यभिज्ञो जनः ॥३५॥ इत्यनेन लवो रामस्य गुरोस्तिरस्कारं कृतवानिति द्रवः । यथा च वेणीसंहारे-'युधिष्ठिर :- भगवन् कृष्णाग्रज सुभद्राभ्रातः, ज्ञातिप्रीतिर्मनसि न कृता क्षत्रियाणां न धर्मो रूढं सख्यं तदपि गणित नानुजस्यार्जुनेन। तुल्यः कामं भवतु भवतः शिष्ययोः स्नेहबन्धः कोऽयं पन्था यदसि विगुरो मन्दभाग्ये मयीत्थम् ।।३६।। इत्यादिना बलभद्र गुरु युधिष्ठिरस्तिरस्कृतवानिति द्रवः ।

सुन्द की स्त्री ताडका का वध कर देने पर भी अप्रतिहत यश वाले वे लोक में महान् ही हैं। खर के साथ युद्ध में जो पीछे की ओर तीन पद रक्खे थे और बालि (इन्द्रसूनु) के वध के समय जो कौशल दिखलाया था उससे भी लोग परिचित ही हैं।'

इत्यादि के द्वारा लव ने गुरुजन राम का तिरस्कार किया है अतः द्रव (नामक अवमर्श सन्धि का अ्रङ्ग ) है। और, जैसे वेरगीसहार (६·२०) में 'युधिष्ठिर-भगवन्, कृष्ण के बड़ भाई, सुभद्रा के भाई (बलराम), सम्बन्धियों के प्रेम को ध्यान में नहीं रक्खा, न क्षत्रियों के धर्म को ही; अर्जुन के साथ जो (तुम्हारे) अनुज (कृष्ा) की गाढ मैत्री थी उसको भी न गिना। दोनों शिष्यों (भीम और दुर्योधन) के प्रति आपका स्नेह-सम्बन्ध समान होना तो ठीक है किन्तु आपका यह कौन सा मार्ग है जो मुझ प्रभागे के प्रतिकूल (विगुण) हो गये हैं।' इत्यादि के द्वारा युधिष्ठिर ने गुरु बलराम का तिरस्कार किया है अतः यहाँ द्रव (नामक अवमर्श सन्धि का श्रङ्ग) है। टिप्पणी-ना० शा० 'गुरुव्यतिक्रमो यस्तु स द्रवः (१६.८६), ना० द० 'द्रव: पूज्यव्वतिक्रमः' (१.५६), गुरुतिरस्कृतिर्द्रवः (प्रता० ३.१८)। अभिनव गुप्त के अनुसार मार्ग से विचलित होना ही द्रव है। पूज्य व्यक्ति या गुरुजनों का अनादर करना मार्ग से विचलित होना ही है। शोक, आवेग इत्यादि हेतुओं के कारण यह मार्ग-विचलन हो जाया करता है, इस तथ्य का निरूपण साहित्यदर्पण (६. १०३) में किया गया है।

Page 119

७० दशरूपकम्

अथ शक्ति :- (८७) विरोधशमनं शक्ति: यथा रत्नावल्याम्-'राजा- सव्याज: शपर्थः प्रियेश वचसा चित्तानुवृत्त्याधिकK वैलक्ष्येण परेण पादपतनैर्वाक्यैः सखीनां मुहुः । प्रत्यासत्तिमुपागता नहि तथा देवो रुदत्या यथा प्रक्षाल्येव तयैव बाष्पसलिलै: कोपोऽपनीतः स्वयम् ॥३७॥ इत्यनेन सागरिकालाभविरोधिवासवदत्ताकोपोपशमनाच्छक्तिः । यथा चोत्तरचरिते लव: प्राह- विरोधो विश्रान्तः प्रसरति रसो निवृतिघन- स्तदौद्धत्यं क्वापि व्रजति विनयः प्रह्मयति माम् । भटित्यस्मिन्दृष्टे किमपि परवानस्मि यदि वा महार्घस्तीर्थानामिव हि महतां कोऽप्यतिशयः ॥३८॥

५. शक्ति- विरोध का शान्त हो जाना शक्ति कहलाता है। जसे रत्नावली (४.१) में 'राजा-कपटपूर्ण शपथों से, प्रिय वचन से, अधिक चित्त के अनुकूल आचरण करने से, अत्यन्त लज्जा-प्रदर्शन (वैलक्ष्य) से, चररों में पड़ने से और सखियों के बार.बार कहने से देवी (वासवदत्ता) उतनी प्रकृतिभाव (शान्तभाव) को प्राप्त नहीं हुई जितनी कि रोती हुई उसने स्वयं ही मानों अश्रु-जल से धोकर कोप दूर कर लिया।' इत्यादि के द्वारा सागरिका की प्राप्ति में बाधक वासवदत्ता के कोप की शान्ति का वर्न किया गया है अतः शक्ति (नामक अवमर्श सन्धि का श्रङ्ग) है। और, जैसे उत्तररामचरित नाटक (६.११) में लव कहता है-'(राम के दर्शन करके) विरोध-भाव शान्त हो गया, आनन्द से सान्द्र (सघन) रस (हृदय में) फैल रहा है, वह उद्धता कहीं चली जा रही है, नम्रता मुझे भुका रही है, इनको देखते ही मैं तुरत ही पराधीन हो गया हूँ। अथवा तीर्थस्थलों के समान महापुरुषों का कोई विलक्षण (कोऽपि) बहुमूल्य प्रभाव (अतिशय) होता है। [यहाँ पर लव के विरोध की शान्ति का वर्णन है अतः शक्ति नामक अवमर्श सन्धि का श्रङ्ग है]। टिप्पी -- ना० शा० (१६. ६०) में विरोधी के शमन को शक्ति कहा गया है तथा ना० द० (१.१००) में 'कद्ध को प्रसन्न करना' शक्ति का लक्षणा है। सा० द० (६.१०४) तथा प्रता० (३.१७) के शक्ति-लक्षण दशरूपक का ही अनुसरण करते हैं।

Page 120

प्रयम: प्रकाश: ७१

।अथ द्युति :- (=5) तर्जनोद्वजने द्युतिः। यथा वेशीसंहारे-'एतच्च वचनमुपश्रुत्य रामानुजस्य सकलनिकुञ्जपूरिता- शातिरिक्तमुद्भ्रान्तसलिलचरशतसंकुलं त्रासौद्व त्तनक्र्ग्राहमालोड्य सर: सलिल भेरवं च गजित्वा कुमारवृकोदरेणाभिहितम्- जन्मेन्दोरमले कुले व्यपदिशस्यद्यापि धत्से गदां मां दुःशासनकोष्णशोशितसुराक्षीबं रिपु भाषसे। दर्पान्धो मधुकैटभद्विषि हरावप्युद्धतं चेष्टसे मत्त्रासान्नृपशो, विहाय समर पङ्केधुना लीयसे।३६1तकजह इत्यादिना 'त्यक्त्वोत्थितः सरभसम्' इत्यनेन दुर्वचनजलावलोडनाभ्यां दुर्योधन- तर्जनोद्व जनकारिभ्यां पाण्डवविजयानुकूलदुर्योधनोत्थापनहेतुभ्यां भीमस्य द्युतिरुक्ता। अथ प्रसङ्ग :- (८६) गुरुकीतनं प्रसङ्ग: यथा रत्नावल्यां-'देव, याऽसौ सिंहलेश्वरेण स्वदुहिता रत्नावली नामायुष्मती ६. द्यु ति - तर्जन और उद्वेजन का वर्णन द्युति कहलाता है। जैसे वेरगीसंहार (६.७) में (पाञ्चालक युधिष्ठिर से कहता है) और, बलराम के अनुज (कृष्ण) के इस वचन को सुनकर कुमार भीम ने उस सरोवर के जल का आलोडन किया, जो सब दिशाओं के गह्यरों (=निकुञ्ज) को भर कर भी बच रहा था, जिसमें जलचर और पक्षियों का समुदाय घबरा गया था, नाके और गाह भय से उछल गये थे। फिर भयङ्कर गर्जन करके यह कहा-'तू निर्मल चन्द्रवंश मैं अपना जन्म बतलाता है, आज भी गदा को धारण करता है, दुःशासन के उष्ण रुधिर रूपी मद्य से मत्त हुए मुझको अपना शत्रु समझता है, दर्प से अन्धा हुआ तू मधु और कंँटभ के संहारक विष्यु के प्रति भी उद्धत चेष्टा करता है। किन्तु हे नरपशु, अब मेरे भय से युद्ध को छोड़कर कीचड़ में छिपा है।' इत्यादि से आरम्भ करके 'सरोवर के तल को छोड़कर वेगपूर्वक उठा' (६·६) यहाँ तक के वर्णन में भीम का दुर्वचन तथा जलावलोडन (दोनों) दुर्योधन का तर्जन एवं उद्वेजन करने वाले हैं, ये पाण्डवों की विजय में सहायक जो दुर्योधन का सरोवर से उठाना है, उसके भी निमित्त हैं अ्रपतः यहाँ द्युति (नामक अवमशं सन्धि का श्रङ्ग) है। टिप्पणी-ना० शा० 'वाक्यम् आधर्षसंयुक्त द्युति; (१६. ६२); यहा आधर्ष=न्यक्कार, तिरस्कार, नीचा दिखाना। ना० द० (१.६६) में भी 'तिरस्कारो द्यतिः' यही लक्षण किया गया है तथा तर्जन, उद्ववेजन और धर्षण आदि का तिस्कार में ही अन्तर्भाव किया गया है। प्रता० (३.१८) तथा सा० द० ( ६.१०४) में दशरूपक का ही अनुसरण किया गया है। ७. प्रसङ्ग: गुरुजनों का कीर्तन प्रसङ्ग कहलाता है। जंसे रत्नावली (४.१३-१४) में (वत्सराज़ के प्रति वसुभूति का यह

Page 121

७२ देशरूपकम्

वासवदत्तां दग्धामुपश्रुत्य देवाय पूर्वप्रार्थिता सती प्रतिदत्ता।' इत्यनेन रत्नावल्या लाभानुकूलाभिजनप्रकाशिना प्रसङ्गाद गुरुकीर्तनेन प्रसङ्गः । तथा मृच्छकटिकायाम्-'चाण्डालकः-एस सागलदत्तस्य सुओ अज्नविणण- अदत्तस्स शत्तू चालुदत्तो वावादिदु वज्भट्ठाएं रीतदि एदेण किल गणिआ वसन्त- सेरा सुवण्सलोभेण वावादिद त्ति।' ('एष सागरदत्तस्य सुत आर्यविनयदत्तर्य नप्ता चारुदत्तो व्यापादयितु वध्यस्थानं नीयते एतेन किल गणिका वसन्तसेना सुवर्णलोभेन व्यापादितेति') चारुदत्त :- मखशतपरिपूतं गोत्रमुद्भासितं यत् सदसि निबिडचैत्यब्रह्मघोषः पुरस्तात्। मम निधनदशायां वर्तमानस्य पापै- स्तदसहशमनुष्यर्घुष्यते घोषणायाम् ॥४०।। इत्यनेन चारुदत्तवधाभ्युदयानुकूलं प्रसङ्गाद गुरुकीर्तनमिति प्रसङ्ग: । कथन) ।'देव, आदरणीय सिहुलेश्वर ने वासवदत्ता को जली हुई सुनकर जो वह पहले माँगी गई, अपनी पुत्री आयुष्मती रत्नावली महाराज के लिये दी थी"।' इत्यादि के द्वारा प्रसङ्गवश रत्नावली की प्राप्ति में सहायक (अनुकूल) आभिजात्य (कुलीनता) को प्रकट करने वाला (माता-पिता आदि) गुरुजन का कीर्तन किया गया है अतः प्रसङ्ग (नामक अवमर्श सन्धि का अङ्ग) है। उसी प्रकार मृच्छकटिक (१०.१२) में 'चाण्डालक-यह सागरदत्त का पुत्र आर्य विनयदत्त का नाती (पौत्र) चारुदत्त वध के लिये वध्य-स्थान को ले जाया जा रहा है क्योंकि इसने स्वर्ण के लोभ से वसन्तसेना नाम की गणिका को मार दिया है। चारुदत्त-सैकड़ों यज्ञों से पवित्र जो मेरा वंश पहले सभाओं में जनाकीर्एं यज्ञशाला की वेदध्वनियों से प्रकाशित हुआ था, वही मेरे मरणदशा में होने पर इन पापी तथा अयोग्य जनों के द्वारा (अपराध-) घोषणा-स्थल में घोषित किया जा रहा है, इत्यादि के द्वारा प्रसङ्गवश चारुदत्त के वध और अभ्युषय के अनुकूल गुरु- जनों का कीर्तन किया गया है अतः प्रसङ्ग (नामक अवमर्श सन्धि का अ्रङ्ग) है। टिप्पणी-(१) गुरुकीर्तनम्=माता पिता आदि बड़ों का नाम उच्चारण करना। (२) ना० शा० (१६.६१); ना० द० (१.६२) में प्रसङ्गो महतां कीतिः; कीर्तिः=संशब्दन (कथन करना) यह लक्षा है। सा० द० (६. १०४) तथा प्रता० (३.१८) में दशरूपक का ही अनुसरण किया गया है। (३) कुछ आचार्य अप्रस्तुत अर्थ के कथन को प्रसज्ज कहते है (द्र०, ना० द० १.६२)।

Page 122

प्रथम: प्रकाशः ७३

प्रथ छलनम्- (६0) छलनं चावमाननम् ॥४६।। यथा रत्नावल्याम्-राजा-'हो निरनुरोधा मयि देवी। इत्यनेन वासव- दत्तयेष्टासंपादनाद्वत्सराजस्यावमाननाच्छलनम्। यथा च रामाभ्युदये सीतायाः परि- त्यागेनाऽवमाननाच्छलनमिति। अ्रथ व्यवसाय :- (६१) व्यवसाय: स्वशक्त्युक्तिः यथा रत्नावल्याम्-ऐन्द्रजालिक :- कि घरणीए मित्ङ्को आआसे महिहरो जले जलरो। मज्फण्हम्मि पश्रोसो दाबिज्जउ देहि आणत्तिम् ॥४१॥ अहवा कि बहुआ जम्पिएण- मज्य पइण्णा एसा भणगामि हिअएण जं महसि दट्ठुम् । तं ते दावेमि फुडं गुरुणो मन्तप्पहावेर ।।' ('किं धरण्यां मृगङ्क आकाशे महीधरो जले ज्वलनः । मध्याह्न प्रदोषो दर्श्यंतां देह्याज्ञप्तिम् ।४२॥) ८. छलन अवहेलना करने को छलन कहा जाता है। जंसे रत्नावली (अङ्क ४ प्रवेशक) में 'राजा-अहो देवी (वासवदत्ता) मेरे प्रतिकूल है।' यहाँ पर वासवदत्ता के द्वारा (सागरिका को अन्यन्न भेज दिया गया है) वत्सराज के अभीष्ट की सिद्धि नहीं की गई अतः उसकी अवहेलना की गई है। इस प्रकार छलन (नामक अवमर्श सन्धि का श्रङ्ग) है। और, जैसे रामाभ्युदय नामक नाटक में सीता का परित्याग करके उसका तिरस्कार किया गया है अतः छुलन (नामक अवमर्श सन्धि का श्रङ्ग) है। टिप्परी-(१) इष्टाऽसंपादनात्=इष्ट का सम्पादन न करने के कारण अथवा अनिष्ट करने के कारण। (२)अवमर्श सधधि के अङ्गों में 'छलन' के स्थान पर आंधिकांश आचार्यों ने 'छादन' माना है। ना० शा० (१६.६४) के अनुसार उसका लक्षण है-'अपमानकृत वाक्यं कार्यार्थ छादनं भवेत्'। सा० द० (६.१०७) में इसका ही रूपान्तर है। तदनुसार कार्यसिद्धि के लिये अपमान आदि के सहन करने को छादन कहते हैं। ना० द० (१.५८) में 'छादनं मन्युमार्जनम्' (अपमान का परिमा- जन छादन) है-यह लक्षणा दिया गया है। वहाँ वृत्ति में अन्य अनेक मतों का उल्लेख किया गया है जिनमें दशरूपक के 'छलन' का भी उल्लेख है, किन्तु दशरूपक या धनञ्जय का नामनिर्देश नहीं किया गया। प्रता० (पृ० १३६) में दशरूपक का ही अनुसरण किया गया है। ६. व्यवसाय अपनी शक्ति का वर्णन करना व्यवसाय कहलाता है। जैसे रत्नावली (४.८,e) में 'ऐन्द्रजा लिक-क्या पृथ्वी पर चन्द्रमा, आकाश में पर्वत, जल में अग्नि, मध्याह्न में रात्रि का प्रारम्भिक समय (प्रदोष) दिखलय।

Page 123

७४ दशरूपकम्

अथवा कि बहुना जल्पितेन। (मम प्रतिज्ञैषा भणामि हृदयेन यद्वाञ्छसि द्रष्टुम् । तत्ते दशयामि स्फुट गुरोमंन्त्रप्रभावेस ।।४३।) इत्य नेनंन्द्रजालिको मिथ्याग्निस भ्रमोत्थापनेन वत्सराजस्य हृदयस्थसागरिका- दर्शनानुकूलां स्वशक्तिमाविष्कृतवान्। यथा च वेणीसंहारे- नूनं तेनाद्य वीरेण प्रतिज्ञाभङ्गभीरुखा।9ह0ठ वध्यते केशपाशस्ते स चास्याकर्षणे क्षमः॥४४॥ इत्यनेन युधिष्ठिर: स्वदण्डशक्तिमाविष्करोति। अथ विरोधनम्- (६२)-संर्घानां विरोधनम। जाये ? आ्ाज्ञा दो अथवा बहुत कहने से क्या लाभ ? मेरी यह प्रतिज्ञा है, मैं हृदय से कहता हूँ कि जो तुम देखना चाहते हो मैं गुरु के मन्त्र के प्रभाव से वही तुम्हें स्पष्टरूप में दिखला दूंगा।' इस के द्वारा ऐन्द्रजालिक ने मिथ्या अग्नि की भ्रान्ति उत्पन्न करके वत्सराज के हृदय में स्थित सागरिका के दर्शन के अनुकूल अपनी शक्ति को प्रकट किया है (अतः यहाँ व्यवसाय नामक अवमर्श सन्धि का शङ्ग) है। और, जैसे वेरगीसंहार (६•६) में (युधिष्ठिर द्रौपदी से कहता है) 'अवश्य ही आ्रज प्रतिज्ञा के भङ्ग से डरने वाले उस वीर (भीम) के द्वारा तेरे केशपाश को बांध दिया जायेगा और इसको खींचने वाले (दुर्योधन) का वध कर दिया जादेगा'। इस (कथन) के द्वारा युधिष्ठिर अपनी दण्डशक्ति को प्रकट करता है (अतः व्यवसाय नामक अ्वमर्श सन्धि का अ्रङ्ग है)। टिप्पी-ना० शा० (१६.६१) के अनुसार 'व्यवसायश्च विज्ञेयः प्रतिज्ञा- हेतु सम्भवः' यह लक्षण है, अर्थात् अङ्गीकृत (प्रतिज्ञात) अर्थ के हेतु की प्राप्ति (सम्भव) व्यवसाय कहलाता है। जैसे रत्नावली में ऐन्द्रजालिक के प्रवेश से लेकर-एक पुनः खेलनमवश्यं प्रेक्षितव्यम्' यहाँ तक यौगन्धरायण ने जो करना ठाना था उसके हेतु की प्राप्ति होती है (अभि०भा०) । सा० द० (६.१०३) में भी ना० शा० का लक्षण ही दिया गया है। ना० द० (१.१०२) में 'व्यवसायोऽर्थ्यहेतु- युक्' अथात् अर्थनीय फल के हेतु का योग व्यवसाय है यह लक्षण है, जो नाट्यशास्त्र के समान ही है। ना० द० की वृत्ति में दशरूपक के लक्षणा का उल्लेख करके यह भी कहा गया है कि इसका संरम्भ नामक (विमर्शाङ्ग) में ही अन्तर्भाव हो जाता है। वहां 'संरम्भ: शक्तिकीतनम' यह विमर्श सन्धि का श्ङ्ग माना गया है। प्रता० (३.१८) 'स्वशक्तिप्रशंसनं व्यवसायः'। १०. विरोधन आवेगपूर्ण पात्रों का (संरब्धानाम्) अपनी शक्ति का वर्शन करना विरोधन कहलाता है। कलोगर Tr सद F हIस FR B BR U7 B

Page 124

प्रथम: प्रकाशः ७५

यथा वेगीसंहारे-'राजा-रेरे मरुतनय, किमेवं वृद्धस्य राज्ञः पुरतो निन्दितव्यमात्मकर्म श्लाघसे ? अपि च- कृष्टा केशेषु भार्या तव तव च पशोस्तस्य राज्ञस्तयोर्वा प्रत्यक्ष भूपतीनां मम भुवनपतेराज्ञया द्यूतदासी। अस्मिन्वरानुबन्धे तव किमपकृत तर्हता ये नरेन्द्रा बाह्वोर्वीर्यातिसारद्रविरणगुरुमदं मामजित्वैव दर्पः ॥४५। (भीमः क्रोध नाटयति) अर्जुन :- आर्य प्रसीद, किमत्र क्रोधेन ? अप्रियाणि करोत्येष वाचा शक्तो न कर्मणा। हतभ्रातृशतो दुःखी प्रलापैरस्य का व्यथा।।४६।। भीम :- अरे भरतकुलकलङ्क, अद्यैव कि न विसृजेयमहं भवन्तं दुःशासनानुगमनाय कटुप्रलापिन् । विघ्नं गुरू न कुरुतो यदि मत्कराग्र- निर्भिद्यमानरणितास्थनि ते शरीरे।४७।। (क) टिप्पणी-यहाँ ऊपर से 'स्वशक्त्युक्तिः' पद की अनुवृत्ति होती है। संरब्ध=आवेगपूर्ण, करोध आदि से युक्त, संरब्धानां=बद्धवैराणाम (प्रभा) । इस प्रकार क्रोध आदि से युक्त पात्रों द्वारा जो अपनी शक्ति का वर्णन किया जाता है वह विरोधन नामक अवमर्शाङ्ग है कोध आदि आवेगों से रहित जनों द्वारा अपनी शक्ति का वर्णन व्यवसाय है। जैसे वेरीसंहार (५'३०-३४) में-'राजा (दुर्योधन)-अरे, मरुत्पुत्र (भीम), इस प्रकार वृद्ध राजा (एतराष्ट्र) के सामने अपने निन्दनीय कर्म की प्रशंसा क्यों कर रहा है ? और भी, मुझ्क जगत् के स्वामी की आज्ञा से राजाओ्रों के समक्ष ही दयूत में दासी बनाई गई तेरी, तुभ पशु की, उस राजा (युघिष्ठिर) की अथवा उन दोनों (नकुल और सहदेव) की पत्नी (द्रौपदी) केश पकड़कर खींची गई थी; किन्तु बता इस वैर के प्रसङ्ग में उन राजाओं ने क्या श्रहित किया था, जिनको मार दिया गया ? भुजाओं के बलातिरेक रूपी धन के अत्यधिक मद वाले मुझ्क को जीते बिना ही यह अभिमान कर रहे हो। की भीम-(कोध का अभिनय करता है)। अर्जुन-आर्य, प्रसन्न हो, यहाँ क्रोध से क्या लाभ है ? 'यह (दुर्योधन) कार्य द्वारा अशक्त होंकर वाणगी से अप्रिय कर रहा है। इसके सौ भाई मारे गये हैं और यह दुःखी है अतः इसके निरर्थक वचनों से क्या पीड़ा ?' भीम -- अरे, भरतकुल के कलङ्ग, हे कटुभाषी, क्या दुःशासन का अनुसरण करने के लिए आपको मैं अभी न भेज देता, यवि मेरे हाथ के अप्रभाग से

Page 125

७६ दशरूपकम्

अन्यच्च भूढ, शोक स्त्रीवन्नयनसलिलैर्यत्परित्याजितोऽसि। भ्रातुर्वक्षःस्थलविदलने यच्च साक्षीकृतोऽसि। आसीदेतत्तव कुनृपतेः कारणं जीवितस्य क द्वे युष्मत्कुलकमलिनीकुञ्जरे भीमसेने॥४८॥ राजा-दुरात्मन् भरतकुलापसद पाण्डवपशो, नाहं भवानिव विकत्थनाप्रगल्भः । किन्तु -- द्रक्ष्यन्ति नचिरात्सुप्त बान्धवास्त्वां रणाङ्गणे। इत्यादिना संरब्धयोर्भीमदुर्योधनयो: स्वशक्त्युक्तिविरोधनमिति। टूटती हुई तथा शब्द करती हुई हड्डियों वाले तेरे शरीर के विषय में माता-पिता -(गुरु) विघ्न न डाल देते। और भी, मूर्ख, तुम्हारे कुल रूपी कमलिनी के लिए कुञ्जररूपी मुझ भीम सेन के होने पर भी तुझ जैसे दुष्ट राजा के जीवन धारण करने का यही कारण था कि स्त्रियों के समान नयन-जल के द्वारा तुझसे शोक प्रकट कराया और तेरे भाई (दुःशासन) के वक्षः स्थल को विदीणं करने में तुझे साक्षी बनाया। राजा --- दुष्टात्मा, भरतकुल में अ्रधम, पाण्डव-पशु, मैं आपकी तरह आ्त्म- इलाघा में प्रगल्भ नहीं हूँ। किन्तु शीघ्र ही तेरे बान्धव तुझे, मेरी गदा से टूटी हुई वक्षःस्थल की हड्डियों से निकलने वाले प्रवाह (वेशिका) की भङ्गिमा से भीषण होकर रण भूमि में पड़ा हुआ देखेंगे। इत्यादि के द्वारा क्रोधयुक्त भीमसेन तथा दुर्योधन ने अपनी शक्ति का वर्णन किया है अतः विरोधन (नामक अवमर्श सन्धि का श्रङ्ग) है। टिप्पणी-ना० शा० (१६.६३) में 'कार्यत्ययोपगमनं विरोधनम्' यह लक्षणा किया गया है। सा० द० (६.१०६) में भी यही है। इसका तात पर्य है- कार्य में विघ्त की उपस्थिति=कार्येअ्त्ययस्य विध्नस्य विनाशस्य वा उपगमनं प्राप्तिः। ना० द० में 'विरोधः प्रस्तुतज्यानिः' (प्रस्तुत कार्य की हानि ही विरोध है), यह कहा गया है जो ना० शा० के समान ही है। किन्तु दशरूपक का विरोधन नामक श्रङ्ग इनसे भिन्न है। नियताप्ति नामक कार्यावस्था में जहाँ पात्र क्र द्व होकर अपनी शक्ति का वर्णन करते हैं वहीं यह (निरोधन) अङ्ग होता है। करोध आदि आवेग के बिना अपनी शक्ति का वर्णन व्यवसाय है। प्रता० (३.१८) में दशरूपक के इस लक्षरम को कुछ परिष्कृत किया गया है-'कोधसंरब्धानामन्योन्यविक्षेपो निरोधनम्'।

Page 126

प्रथम: प्रकाश: ७७

अथ प्ररोचना- (६३) सिद्धामन्त्रशतो भाविदर्शिका स्यात्प्ररोचना ।।४७।। यथा वेरीसंहारे-'पाञ्चलक :- अहं च देवेन चक्रपाशिना' इत्युपक्रम्य 'कृतं संदेहेन- पूर्यन्तां सलिलेन रत्नकलशा राज्याभिषेकाय ते कृष्णाऽत्यन्तचिरोज्ज्ञिते च कबरीबन्धे करोतु क्षणम्। रामे शातकुठारभासुरकरे क्षत्रद्र मोच्छेदिनि क्रोधान्धे च वृकोदरे परिपतत्याजौ कुतः संशयः ॥५०॥ इत्यादिना 'मङ्गलानि कर्तुमाज्ञापयति देवो युधिष्ठिरः' इत्यन्तेन द्रौपदीकेशसंयमनयुधिष्ठिरराज्या भिषेकयोर्भाविनोरपि सिद्धत्वेन द्शिका प्ररोचनेति। ११. प्ररोचना यह सिद्ध ही है, इस प्रकार के कथन (आमन्त्रण) से भावी अर्थ का प्रदर्शन करने वाली प्ररोचना कहलाती है। टिप्पणी-सिद्धामन्त्रणतः=सिद्धिमेव इति आमन्त्रशतः, यह सिद्ध हो ही गया, इस प्रकार के कथन से अथवा सिद्धस्य आमत्त्रणतः=किसी सिद्ध पुरुष के कथन से। जहां 'यह कार्य तो सिद्ध हो ही गया' इस प्रकार कह कर भावी कार्य की सिद्धि का निश्चय कराया जाता है, नियताप्ति से अन्वित वह इतिवृत्त का भाग प्ररोचना कहलाता है। जैसे वेरीसंहार (६.१२) में 'पाञ्चालक-(युधिष्ठर से कहता है) और, चक्रपारि भगवान् कृष्ण ने मुझके आपके पास भेजा है (और देवकी-पुत्र मे कहा है)-यहां से आरम्भ करके-'सन्देह मत करो, तुम्हारे राज्याभिषेक के लिये रत्नकलश जल से भर दिये जायें। द्रौपदी बहुत समय से छोड़े गये अपने केश-पाश के बन्धन का उत्सव मनाये। तीक्ष्ण कुठार से दीप्त हाथों वाले तथा क्षत्रिय जाति रूपी वृक्षों का उच्छेद करने वाले परशुराम के और क्रोध से अन्धे हुए भीमसेन के समर-भूमि में पहुँच जाने पर सन्देह क से हो सकता है ? यहां से लेकर 'महाराज युधिष्ठिर मङ्गलोत्सव करने की आज्ञा दे रहे है' (कञ्चुकी के) इस कथन तक भविष्य में होने वाले भी द्रौपदी के केश-संयमन और युधिष्ठिर के राज्याभिषेक को सिद्ध (सम्पन्न) रूप में दिखलाने वाली प्ररोचना ( नामक अवमश सन्धि का अ्रङ्ग) है। टिप्पणी-ना० शा० (१६.६५) में 'प्ररोचना तु विज्ञेया संहारार्थंदशिनी' यह लक्षणा किया है। सा० द० (६. १०६) में भी यही है। ना० द० (१.१००) में 'भाविसिद्धिः प्ररोचना' यह कहते हुए इसी भाव को अधिक स्पष्ट किया गया है, अर्थात् निर्वहण सन्धि में सम्पन्न होने वाले भावी अर्थ का सिद्ध रूप में वर्णन ही प्ररोचना है। प्रता० (३.१८) में इसे और भी परिष्कृत कर दिया है-'सिद्धवद भाविश्रेय: कथनं प्ररोचनम्'।

Page 127

दशरूपकस्

अ्रथ विचलनम्- (६४) विकत्थना विचलनम्- -ई यथा वेणीसहारे-'भीम :- तात, अम्ब, सकलरिपुजयाशा यत्र बद्धा सुतस्ते 1हतृणामिव परिभूतो यस्य गर्वेण लोकः । रणशिरसि निहन्ता तस्य राधासुतस्य ॥ ०४ प्रशमति पितरौ वां मध्यम: पाण्डवोऽयम् ॥ ५१ ॥ F अपि च तात, चूर्णिगताशेषकौरव्यः क्षीबो दुःशासनासृजा। भङ्क्ता सुयोधनस्योर्वोर्भीमोडयं शिरसाऽञ्चति ॥५२॥ इत्यनेन विजयबीजानुगतस्वगुणाविष्करणाद्विचलनमिति। यथा च रत्नावल्याम्-'यौगन्धरायण :- देव्या मद्चनाद्यथाऽम्युपगतः पत्युर्वियोगस्तदा . किएिकण सा देवस्य कलत्रसंघटनया दुःखं मया स्थापिता। तस्या: प्रीतिमयं करिष्यति जगत्स्वामित्वलाभः प्रभो: 1ए ककी कि सत्यं दर्शयितु तथापि वदनं शक्नोमि नो लज्जया ॥ ५३ ॥ शक् इत्यनेनान्यपरेणापि यौगन्धरायणेन 'मया जगत्स्वामित्वानुबन्धी कन्यालाभो १२. विचलन आत्मरलाघा करना विचलन कहलाता है। जैसे वेरीसंहार (५.२७, २८) में 'भीम-( धृतराष्ट्र और गान्धारी से कहते हैं) तात, अम्ब, जिस (कर्ण ) में तुम्हारे पुत्रों ने समस्त शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने की आशा लगाई थी, जिसके गर्व से उन्होंने संसार का तृण के समान तिरस्कार किया था, उस राधा के पुत्र को रणा में मारने वाला यह मंभला पाण्डव (अर्जुन) आप माता-पिता को प्रणाम कर रहा है। और भी, तात, समस्त कौरवों को चूशिगत करने वाला, दुःशासन के रक्त से मत्त हुआ, दुर्योधन की जंघाओं को तोड़ देने वाला यह भीम शिरसा प्रणाम करता है।' इत्यादि के द्वारा विजय रूपी बीज से अन्वित अपने गुरों को प्रकट करने के कारण यहां विचलन (नामक अवमर्श सन्धि का अ्रङ्ग) है। और, जैसे रत्नावली (४.२०) में "यौगन्धरायण-जब मेरे कहने से देवी (वासदत्ता) ने पति का वियोग स्वीकार किया तब मैंने महाराज ( उदयन) का दूसरी पत्नी से सम्बध कराके उस ( वासवदत्ता) को दुःखी किया। ठीक है कि प्रभु की चक्रवर्ती पद की प्राप्ति उस (देवी) को सुख देगी तथापि लज्जा के कारण मैं उसको अपना मुख नहीं दिखला सकता।' इत्यादि में यद्यपि यौगन्धरायण का तात्पर्म दूसरा ही है तथापि "मैंने वत्सराज को ऐसी कन्या की प्राप्ति करा दी जिसका फल (अनुबन्ध) चत्र्वर्ती-पद

Page 128

प्रथम: प्रकाश: ७६

वत्सराजस्य कृतः।' इति स्वगुगानुकीर्तनाद्विचलनमिति। अथादानम्- (६x) आदानं कार्यसंग्रहः यथा वेरीसंहारे -- 'भीमः -- ननु भोः समन्तपञ्चकसंचारिणः, रक्षो नाहं न भूतं रिपुरुधिरजलाप्लाविताङ्ग: प्रकामं निस्तीर्णोरुप्रतिज्ञाजलनिधिगहनः क्रोधनः क्षत्रियोऽस्मि। भो भो राजन्यवीरा: समरशिखिशिखादग्धशेषा: कृतं व- स्त्रासेनानेन लीनैर्हतकरितुरगान्तहितैरास्यते यत् ।। ५४।। की प्राप्ति है" इस रूप में अपने गुणों का कीर्तन भी है अतः यहाँ विचलन (नामक अवमर्श सन्धि का अ्रङ्ग) है। टिप्परी-(१) अन्यपरेणापि=अन्यपरक होने पर भी, अन्य तात्पर्य रखने वाला होने पर भी (यौगन्धरायोन का विशेषण) यहां यौगन्धरायण का अभिप्राय है- वासवदत्ता के प्रति किये गये अपने व्यवहार के विषय में विचार करना। (२) ना० शा० में विमर्श सन्धि के श्ङ्गों का निर्देश करते समय 'विलचन' को नहीं रक्खा गया किन्तु अङ्गों का लक्षण करते समय 'ज्ञया विचलना तज्ज्ञैरव- मानार्थसंयुता' (१६.६६) यह अवश्य लिखा है। यह स्पष्ट ही है कि यह 'विचलना' दरारूपक के 'विचलन' 'से भिन्न ही है। ना० शा० के व्यवसाय तथा विरोध' आदि विमर्श सन्धि के अङ्गों में भी स्वशक्ति-वर्णन या आत्मश्लाघा आदि का अन्तर्भाव नहीं होता। इस प्रकार यह विचारणीय ही है कि क्या ना० शा० में इस भाव को व्यक्त करने वाला विमर्शसन्धि का अङ्ग नहीं माना गया था। ना० द भी 'प्रचलन' नामक अङ्ग नहीं माना गया। वृत्ति (१.६८) में अन्यमत के रूप में इंसका निरूपण अवश्य किया गया है फिर भी ना० द० के 'संरम्भ: शक्तिकीर्त्तनम् (१६६) में आत्मशक्ति-वर्णन त्र्प्रदि का समावेश हो जाता है। साहित्यदर्पण में भी अधिकतर ना० शा० का अनुसरण किया गया है अतः वहां भी यह चिन्तनीय है कि दशरूपक के 'विचलन' इत्यादि का कहां समावेश किया जाये। सम्भवतः उसके यहां 'व्यवसाय' में इन भावों का समावेश हो सकता है। प्रता० (३.१८) में दशरूपक का ही अनुसरण किया गया है। १३. आदान कार्यसंग्रह आदान कहलाता है। जंसे वेरगीसंहार (६.३७) में 'भीम-अरे, समन्तपञचक में घूमने वाले सैनिकों, न मैं रासक्ष हूं, न कोई भूत। शत्रु के रुधिर रूपी जल में भली भाँति सने हुए शङ्गों वाला, विशाल प्रतिज्ञा रूपी गहन सागर को पार कर चुकने वाला शेध करने वाला क्षत्रिय हूं। अरे, समर रूपी अग्नि की शिखा में जलने से वचे हुए ज्ञत्रिय वीरों, आपको ऐसा भय नहीं करना चाहिये जो (आप) मरे हुए हाथी औौर घोड़ों की ओट में छिपे बैठे है।

Page 129

८० दशरूपकमु

इत्यनेन समस्तरिपुवधकार्यस्य संगृहीतत्वादादानम्। यथा च रत्नावल्याम्-'सागरिका-( दिशोऽवलोक्य) दिठ्ठिय समन्तादो पज्जलिदो भअ्र्रवं हुअ्रवहो अज्ज करिस्सदि दुक्खावसाम्'।) दिष्टया समन्तात्- प्रज्वलितो भगवान्हुतवहोऽय्य करिष्यति दु.खावसानम्'।) इत्यनेनान्यपरेणापि दुःखा- वसानकार्यस्य संग्रहादादानम्। यथा च -- 'जगत्स्वामित्वलाभः प्रभोः, इति दशित- मेवम्। इत्येतानि त्रयोदशावमर्शाङ्गानि तत्रतेषामपवादशक्तिव्यवसायप्ररोचनादानानि प्रधानानीति। इत्यादि के द्वारा समस्त शत्रुओं के वध रूपी कार्य का संग्रह (उपसंहार) किया गया है अतः आदान (नामक विमर्श सन्धि का अ्ङ्ग) है। और जैसे रत्नावली (४.१६-१७) में सागरिका- (दिशाओं को देखकर) भाग्य से चारों ओर अ्ति देव प्रज्वलित हैं, वे आज मेरे दुःख का अन्त कर देंगे। यहाँ पर यद्यपि कथन का तात्पर्य दूसरा ही है तथापि दुःखों के अन्त रूपी कार्य का संग्रह किया गया है अतः आदान हैऔर जैसे (रत्नावली ४.२० में) 'प्रभु को चकवर्ती पद की प्राप्ति' इस (योगन्धराय) के (कथन) द्वारा यही (आदान) दिखलाया गया है। ये तेरह अवभर्श सन्धि के अङ्ग हैं। इन में अपवाद, शक्ति, व्यवसाय, प्ररोचना और आदान मुख्य हैं। टिप्पी-(१) ना० शा० में 'बीजकार्योपगमनमादानम्' (१६.६३) यह लक्षण है। इसका अभिप्राय है 'फल का समीप होना। इसी भाव को ना० द (१.१०१) में स्पष्ट किया गया है। उसके अनुसार 'फलसामीप्य' का अर्थ है-मुख्य फल का दर्शन। सा० द० (६.१०७) तथा प्रता० (३.१८) में दशरूपक का ही लक्षणा दिया गया है। इन सभी लक्षणों के तात्पर्य में भेद नहीं है; अर्थात् कार्य का उपसंहार-फल-सामीप्य-फल दर्शन समान ही हैं। (२) संक्षेप में गर्भसन्धि में उद्धिन्न हुग बीज अवमर्श सन्धि में फलोन्मुख हो जाता है फल की प्राप्ति का निश्चय हो जाता है। साथ ही फल के बाधक या विघ्नों के प्रति क्रोध आदि का अनुभव करके क्रोधपूर्ण उक्ति (संफेट) आदि का प्रयोग किया जाता है। कभी तर्जन-उद्वेजन तथा कभी गुरुजनों तक के प्रति तिरस्कार भाव का भी वर्णन होता है। इसी प्रकार फलप्राप्ति का निश्चय हो जाने से आत्मशक्तिवर्णन, आत्मश्लाघा आदि के प्रसङ्ग भी आ जाते हैं। इसी आधार पर अवमर्श सन्धि के तेरह अङ्ग हो जाते हैं। किन्तु ये सब अङ्ग सभी रूपकों में नहीं होते। जहाँ इतिवृत्त और रस आदि के अनुसार जो-जो अङ्ग सम्भव होते हैं वहां वे हुआ करते हैं। हाँ, अपवाद इत्यादि उपर्युक्त ५ तङ्ग सर्वत्र आनिवार्य हैं। (३) अवमर्श सन्धि के उपर्युक्त अ्रङ्गों के स्वरूप तथा नाम आदि में नाट्याचार्यों का मत-भेद है। स्परूप- भेद का यथावसर निरूपण किया जा चुका है। नाम आदि का भेद निम्न विवरण से स्पष्ट है :-

Page 130

प्रथम: प्रकाश:

अथ निर्वहणसंघि :-

(६६) -बीजवन्तो मुखादयर्ा विप्रकीर्णा यथायथम् ॥४८॥ ऐकार्थ्यमुपनीयन्ते यत्र निर्वहएं हि तत्। यथा वेरगीसंहारे -- 'कञ्चुकी -- (उपसृत्य सहर्षम्) महाराज, वर्धसे, वर्धसे अयं खलु कुमारभीमसेनः सुयोधनक्षतजारुणीकृतसकलशरीरो दुर्लक्षव्यक्ति: ।' इत्यादिना द्रौपदीकेशसंयमनादिमुखसंध्यादिबीजानां निजनिजस्थानोपक्षिप्तानामे- कार्थतया योजनम्।

नाट्यशास्त्र दशरूपक नाट्यदर्पण साहित्यदर्पण प्रतापरुद्रीय

अपवाद, संफेट, अपवाद, संफेट, विद्रव, शक्ति, द्रव, प्रसङ्ग, अपवाद, संफेट विद्रव, द्रव, व्यवसाय, द्रव शक्ति, द्युति संफेट, अपवाद व्यवसाय, प्रसङ्ग, द्युति छादन, द्युति दशरूपक के प्रसङ्ग, छलन खेद, निरोध द्युति, शक्ति

संरम्भ, शक्ति प्रसङ्ग, खेद समान खेद, निषेधन, व्यवसाय प्रतिषेध विरोध, आदान, विरोधन, प्ररोचना, विरोधन साधन, प्ररोचना प्ररोचना आदान प्ररोचना व्यवहार, विचलन, व्यवसाय। आदान युक्ति। आदान। छादन।

निर्वहण सन्धि और उसके अङ्ग

जहाँ बीज से सम्बन्ध रखने वाले मुख सन्धि आदि में अपने अपने स्थान पर (यथायथम्) बिखरे हुए (प्रारम्भ आदि) अरथों का एक (=मुख्य) प्रयोजन के साथ सम्बन्ध दिखलाया जाता है, वह निर्वहण सन्धि कहलाती है) ॥४८॥

जैंसे वेरगीसंहार नाटक (६.३८-३६) में कञ्चुकी (निकट जाकर, हर्षपूर्वक) महाराज, आपकी विजय हो, यह तो कुमार भीमसेन हैं, जिनका समस्त शरीर दुर्योधन के रक्त से लाल हो गया है, और (इसी हेतु) जिन्हें पहचानना कठिन है।' इत्यादि के द्वारा मुख-सन्धि आदि में अपने-अपने स्थान पर रक्खे गये द्रौपदी के केश-बन्धन (शत्रु-निपात, राज्य-लाभ) आदि के बीज (भीमसेन का क्रोध इत्यादि) हैं, उनका एक प्रयोजन (द्रोपदी-केश-बन्धन) के साथ सम्बन्ध दिखलाया गया है।

Page 131

८२ दशरूपकस

यथा च रत्नावल्यां सागरिकारत्नावलीवसुभूतिबाभ्रव्यादीनामर्थानां मुख- संध्यादिषु प्रकोर्णाां वत्सराजैकुकार्यार्थत्वम्। 'वसुभूतिः-(सागरिकां निर्वर्ण्यापवार्य) बाभ्रव्य सुसदृशीय राजपुत्र्या।' इत्यादिना दशितमिति निर्वहणसंधिः। अथ तदङ्गानि- (६७) संधिर्विबोधो ग्रथनं निर्णायः परिभाषणम् ॥४६॥ प्रसादानन्दसमयाः कृतिभाषोपगूहनाः। पूर्वभावोपसंहारौ प्रशस्तिश्च चतुर्दश ॥५०। यथोद्द शं लक्षणमाह- (६८) संधिर्बीजोपगमनम् और, जैसे रत्नावली नाटिका (४.१६-२०) में सागरिका, रत्नावली, वसुभूति और बाभ्रव्य आदि के कार्यों (ग्रथों) का, जो मुख सन्धि आदि में बिखरे पड़े हैं, वत्सराज के ही एक कार्य (रत्नावली-समागम) के लिये समाहार होता है। जो इस कथन द्वारा दिखलाया गया है- वसुभूति-(सागरिका को देखकर, अलग से) बाभ्रव्य, यह तो बिल्कुल राजपुत्री (रत्नावली) के जैसी है। इस प्रकार यहाँ निर्वहण सन्धि है। टिप्पणी-इतिवृत्त का अ्न्तिम भाग निर्वहणा सन्धि है। इसमें पञ्चम कार्यावस्था (फलागम) का कार्य(नायक-व्यापार) नामक अर्थप्रकृति के साथ समन्वय होता है। इस प्रकार बीज की फलरूप में परिणति हो जाती है। अथवा कहिये कि बीज से सभ्बन्ध रखने वाले जो प्रारम्भ आदि व्यापार मुख आदि सन्धियों में दिखलाये जाते हैं उनका मुख्य प्रयोजन के साथ सम्बन्ध दिखलाते हुए जहाँ उपसंहार किया जाता है वही इतिवृत्त का भाग निर्वहण सन्धि कहलाता है। इस सन्धि के स्वरूप का सा० द० (६.८०) प्रता० (३.१६) में दशरूपक के समान ही निरुपण किया गया है। ना० शा० (१६.४३) का लक्षणा कुछ अंश में भिन्न है जिसका ना० द० (१.४८) में कुछ अधिक अनुसरण किया गया प्रतीत होता है। नाट्यदर्पण वृत्ति में इस सन्धि का विस्तृन विवेचन किया गया है। वहाँ यह भी कहा गया है कि यह सन्धि सभी रूपकों के लिये अनिवार्य है (ध्रुवम) । उस (निर्वहण सन्धि के) अ्रङ्ग हैं- १. सन्धि, २. विबोध, ३. ग्रथन, ४. निर्णाय, ५. परिभाषण, ६. प्रसाद, ७. शरनन्द, म. समय, ६. कृति, १०. भाषा, ११. उपगूहन, १२. पूर्व- भाव, १३. उपसंहार, और १४ प्रशस्ति-ये चतुर्दश। हनाम-क्रम से लक्षणा बतलाते हैं- १. सन्धि बीज का (फलागम से अन्वित करके) सन्धान ही सन्धि कहलाती है।

Page 132

प्रथम: प्रकाश: ८३

यथा रत्नावल्याम्-'वसुभूतिः-बाभ्रव्य, सुसदृशीयं राजपुत्र्या। बाभ्रव्य :- ममाप्येवमेव प्रतिभाति। इत्यनेन नायिकाबीजोपगमात्संधिरिति। यथा च वेगोसंहारे-'भीमः-भवति यज्ञवेदिसंभवे, स्मरति भवती यत्तन्मयोक्तम् चञ्चद्भुजभ्रमितचण्डगदाभिघात- संचूर्णितोरुयुगलस्य सुयोधनस्य।

रुत्तंसयिष्यति कचांस्तव देवि भीमः ॥ ५५॥ इत्यनेन मुखोपक्षिप्तस्य बीजस्य पुनरुपगमात् सन्धिरिति। अथ विबोध :- (e६)-विबोधः कार्यमार्गाम्। यथा रत्नावल्याम्-'वसुभूतिः-(निरू प्य) देव, कुत इयं कन्यका? राजा-देवी जानाति। वासवदत्ता-अज्जउत्त, एसा सागरादो पाविश्त्ति भित्र अमच्चजोगन्धराअोण मम हत्थे गिगहिदा अदो ज्जेव सागरिशत्ति सद्दावीअदि। जैसे रत्नावली नाटिका (४.१६-२०) में 'वसुभूति-बाभ्रव्य, यह ठीक राजकुमारी जैसी है। बाभ्रव्य-मुझे भी ऐसा ही प्रतीत होता है।' इत्यादि के द्वारा नायिका रूपी बीज का सन्धान किया गया है; अतः यहाँ सन्धि (नामक निर्वहण सन्धि का भ्रङ्ग) है। और, जैसे वेशीसंहार (६.४१-४२) में 'भीम-श्रीमती यज्ञवेदिसम्भवा (यज्ञवेदि से उत्पन्न) द्रौपदी, क्या आपको याद है, जो मैंने कहा था-चञचद्भुज इत्यादि ऊपर उदा० ८। यहां मुखसन्धि में उपक्षिप्त वीज का पुनः उपगमन (सन्धान) किया गया है अतः सन्धि (नामक निर्वहण सन्धि का श्रङ्ग) है। टिप्पणी-उपगमनम्=निकटीभूतम्, सन्धानम्; पुनः स्मरण या उपसंहार रूप में स्मरण। अतः मुख सन्धि में उपक्षित्त बीज का फलागम अवस्था में सन्धान ही सन्धि है। ना० शा० (१६.६७), सा० द० (६.११०) तथा प्रता० (३.२१) में भी इसी प्रकार का लक्षण है। ना० द० में इसका विशद विवेधन है (सन्धि- र्बीजफलागम: १.१०४)। उसके अनुसार यह निर्वहण सन्धि का आवश्यक अङ्ग है। २. विबोध कार्य (फल) के अन्वेषण को विबोध कहा जाता है। जैसे रत्नावली (४.१६-२०) में 'वसुभूति-(देखकर ) देव, यह कन्या कहां से (आई) ? राजा-देवी जानती है। वासवदत्ता-आार्यपुत्र, "यह सागर से मिली है" ऐसा कहकर अमात्य यौगन्धरायण ने मेरे पास रख दी है। इसीलिये यह सागरिका कहलाती है। राजा-( मन ही मन ) यौगन्धरायण, ने रक्खी है, कैसे यह यह मुझे बिना बतलाये करेगा ?

Page 133

८४ दशरूपकम्

(आर्यपुत्र, एषा सागरात्प्राप्तेति भणित्वाSमात्ययौगन्धरायोन मम हस्ते निहिता अत एव सागरिकेति शब्द्ते ।') राजा- (आत्मगतम् ) यौगन्धरायगोन न्यस्ता, कथमसौ ममानिवेद्य करिष्यति।' इत्यनेन रत्नावलीलक्षणकार्यान्वेषणाद्विबोधः । यथा च वेशगीसंहारे-'भीमः-मुञ्चतु मुञ्चतु मामार्यः क्षणामेकम् । युधिष्ठिर :- किमपरमवशिष्टम् ? भीम :- सुमहदवशिष्टम्, संयमयामि तावदनेन दुःशासनशोणि- तोक्षितेन पशिना पाञ्चाल्या दुःशासनावकृष्टं केशहस्तम् । युधिष्ठिर :- गच्छतु भवान् अनुभवतु तपस्विनी वेरीसंहारम्। इत्यनेन केशसंयमनकार्यस्यान्वेषणाद्विबोध इति ! अथ ग्रथनम्- (१००) ग्रथनं तदुपक्षेपो- यथा रत्नावल्याम्-'यौगन्धरायण :- देव, क्षम्यतां यद्दवस्यानिवेद्य मर्यतत्कृ- तम्।' इत्यनेन वत्सराजस्य रत्नावलीप्रापणकार्योपक्षेपाद ग्रथनम्। यथा च वेगीसंहारे-'भीम :- पाञ्चालि, न खलु मयि जीवति संहर्तव्या इत्यादि के द्वारा रत्नावली रूप फल का अन्वेषण किया गया है इसलिये विबोध (नामक निर्वहण सन्धि का श्ङ्ग) है। और, जैसे वेरीसंहार (६.४०-४१) 'भीम-आर्यं, मुझ्के एक क्षण के लिये छोड़ दो। युधिष्ठिर-और, क्या शेष रहा ? भीम-बहुतकुछ शेष रह गया। अब तो दुशासन के रक्त से भीगे हुए हाथ से दुःशासन द्वारा खींचे गये द्रौपदी के केशहस्त को बाँधता हूँ। युधिष्ठिर-आप जाए। वह बेचारी वेरी-वन्धन का अनुभव करे। इत्यादि के द्वारा केश-संयमन रूप फल का अन्वेषण किया गया है, अतः विबोध (नामक निर्वहण सन्धि का अ्रङ्ग ) है। टिप्पणी-ना० शा० (१६.६८) में 'कार्यस्यान्वेषणं युवत्या निरोधः' यह लक्षणा है। ना० द० (१.१०५) में 'निरोधः कार्यमीमांसा' यह कहा गया है; अर्थात् विनष्ट कार्य के बनाने के लिये जो उसका अनुसन्धान किया जाता है वह निरोध है। सा० द० (६.११०) में तथा प्रता० (३.२१) में दशरूपक का ही अनुसरण किया गया है। किन्तु प्रता० में 'विबोध' के स्थान पर 'विरोघ' लिखा गया है। ३. ग्रथन उस (फल) के उपक्षेप (सूचना) को ग्रथन कहा जाता है। जैसे रत्नावली (४.२०-२१) में 'यौगन्धरायण-महाराज, क्षमा, कीजिये जौ मेंने आपसे निवेदन किये बिना यह कार्य किया है। इत्यादि के द्वारा वत्सराज का रत्नावली प्राप्ति रूप जो कार्य है, उसकी (सिद्धि ) की सूचना दी गई है अतः ग्रथन (नामक निर्वहसा सन्धि का श्रङ्ग) है। और, जैसे वेशीसंहार (६.३७-३८) में 'भीम-हे पाञचालपुत्री, मेरे जीवित रहते तुमको दुःशासन द्वारा खोली गई अपनी वेरगी अपने हाथ से नहीं बाँधनी चाहिये। ठहरो, मैं स्वयं ही बाँधता हूँ।'

Page 134

प्रथम: प्रकाश: ६५

दुःशासनविलुलिता वेशिरात्मपाखिना। तिष्ठनु, स्वयमेवाहं संहरामि।' इत्यनेन द्रीपदीकेशसंयमनकार्यस्योपक्षेपाद् ग्रथनम्। अथ निर्राय :- (१०१)-डनुभूताख्या तु निर्णायः ॥५१॥ यथा रत्नावल्याम्-यौगन्धरायणः-( कृताञ्जलिः ) देव, श्रूयताम्, इय सिंहलेश्वर-दुहिता सिद्धादेशेनोपदिष्टा -- योऽस्याः पाशि ग्रहीष्यति सावभौमो राजा भविष्यति, तत्प्रत्ययादस्माभिः स्वाम्यर्थे बहुशः प्रार्थ्यमानापि सिंहलेश्वरेस देव्या वासवदत्तायाश्चित्तखेदं परिहरता यदा न दत्ता तदा लावणिके देवी दग्घेति प्रसिद्धिमुत्पाद्य तदन्तिक बाभ्रव्यः प्रहितः।' इत्यनेन यौगन्धरायणः स्वानुभूतमर्थ खयापितवानिति निर्सायः । यथा च वेणीसंहारे-'भीमः- देव देव अजातशत्रो, क्वाद्यापि दुर्योधनह- तक: ? मया हि तस्य दुरात्मन :- इत्यादि के द्वारा द्रौपदी के केश-बन्धन रूपी कार्य की सूचना दी गई हैं, अतः ग्रथन (नामक निर्वहण सन्धि का श्रङ्ग ) है। टिप्पणी-(I) ना० शा० (१६६८) तथा प्रता० (३.२१) में यही लक्षण दिया गया है। सा० द० (६.११०) में 'उपन्यासस्तु कार्यारां ग्रथनम्' यह लक्षण है जिसका अभिप्राय दशरूपक के लक्षण के समान ही है। यहाँ उपन्यास := उपक्षेपः । नाटयदर्पण (१.१०६) में 'ग्रथनं कार्यदर्शनम्'-यह लक्षणा है। यहाँ कार्य=मुख्य फल। जिस इतिवृत्त के भाग-द्वारा मुख्य फल का व्यापार के साथ सम्बन्ध कराया जाता है वह ग्रथन कहलाता है। इस ना० द० के लक्षण का तात्पर्य भी दशरूपक आदि के लक्षणा के समान ही है। वस्तुतः उपक्षेप=सूचित करना, अतः जहाँ फलागम को सूचित किया जाता है वह ग्रथन है। ४. निर्ाय अरनुभूत (अनुभव किये गये) अर्थ का कथन निर्णाय कहलाता है। जैसे रत्नावली (४.२०-२१) में 'यौगन्धरायण-महाराज, सुनिये। इस सिंहलेश्वर की पुत्री के विषय में सिद्ध वचन से कहा गया था कि जो इसका पाशि- ग्रहर करेगा वह चकवर्ती राजा होगा। उसके विश्वास से हमारे द्वारा स्वामी के लिये अनेक बार माँगे जाने पर भी, जब देवी वासवदत्ता के मानसिक क्लेश को बनाते हुए सिंहलेश्वर ने ( रह्नावली को ) नहीं दिया ..... तब लावाणक में देवी (वासवदत्ता) जल गई, यह प्रवाद फैलाकर उस (सिंहलेश्वर) के पास बाभ्रव्य को भेजा।' इत्यादि के द्वारा यौगन्धरायण ने अपने अनुभूत अर्थ का वर्णन किया है अ्रतः निर्णाय (नामक निर्वहण सन्धि का अङ्ग) है। और, जैसे वेरीसंहार (६.३६) में देव, देव, अजातशत्रु, अब नीच दुर्योधन कहाँ है ? क्योंकि मैंने उस दुष्टात्मा के शरीर को पृथ्वी पर फैंक दिया है और

Page 135

८६ दशरूपकम्

भूमौ क्षिप्त्वा शरीर निहितमिदमसृव्चन्दनाभं निजाङ्ग लक्ष्मीरारये निषिक्ता चतुरुदधिपयःसीमया सार्धमुर्व्या। भृत्या मित्राणि योधा: कुरुकुलमखिलं दग्धमेतद्रणाग्न नामैकं यद् ब्रवीषि क्षितिप तदधुना धार्तराष्ट्रस्य शेषम् ॥ ५६॥ इत्यनेन स्वानुभूतार्थकथनान्निर्राय इति। अथ परिभाषणम्- (१०२) परिभाषा मिथो जल्पः यथा रत्नावल्याम्-"रत्नावली-(आत्मगतम् ) कआवराहा देवीए सक्कुणोमि मुहं दंसिदुम । (कृतापराधा देव्य न शक्नोमि मुखं दर्शयितुम्) 'वासवदत्ता- (सास्त्रं पुनर्बाह प्रसार्य) एहि अयि खिगट्ठुरे, इदाणीं पि बन्धुसिरोहं दंसेहि। (अपवार्य) अज्जउत्त, लज्जामि क्खु अहं इमिणा सिसंसत्तरोण ता लहु अवरोहि अपने शरीर पर उसके रुधिर को चन्दन के समान लगाया है। चारों समुद्रों के जल की सीमा वाली पृथिवी के साथ लक्ष्मी आप में (आये) स्थित हो गई है। ( उसके) भृत्य, मित्र, योधा और यह समस्त कुरुवंश समराग्नि में जल गये हैं। हे पृथ्वी- पालक, जिसे आप बोल रहे हैं केवल वह उतराष्ट्र के पुत्र ( दुर्योधन) का नाम ही शेष है।' इत्यादि में ( भीमसेन के द्वारा) अपने अनुभूत अर्थ का कथन किया गया है। अतः निर्णय (नामक निर्वहण सन्धि का अ्रङ्ग ) है। टिप्पणी-ना० शा० (१६.६८) में तथा सा० द० (६.१११) में भी इसी प्रकार का लक्षण है। प्रता०(३.२१) के अनुसार 'बीजानुगुकार्यप्रख्यापनं निर्णायः' अर्थात् बीज के अनुकूल फल का कथन ही निर्णय है। प्रता० का यह लक्षण अधिक स्पष्ट है तथा इसमें कुछ नवीनता भी है। ना० द० (१.१०७) का लक्षण दश- रूपक आदि के लक्षण से तात्पर्यतः भिन्न है-'निर्णयोऽनुभवख्यातिः', अर्थात् जानने योग्य अर्थ के विषय में सन्देहयुक्त या अज्ञानयुक्त व्यक्ति को निर्णाय कराने के लिये जो अनुभूत अर्थ का कथन है वह निर्राय है। ५. परिभाषण आपस की बात-चीत को परिभाषा या परिभाषण कहा जाता है। जसे रत्नावली (४.१६-२०) में 'सागरिका-(मन हीमन) मैने देवी (वासवदत्ता) का अपराध किया है इसलिये मैं मुंह नहीं दिखला सकती। वासवदत्ता-(अश्रुपूर्वक फिर भुजाएँ फैलाकर) आ, हे कठोर, अब तो बन्धु-स्नेह दिखला दे। (एक ओर होकर) आर्यपुत्र, मैं इस प्रकार की क्रूरता से लज्जित हूँ अतः शीघ्र ही इसका बन्धन हटा दो। राजा-जैसा देवी कहें। (बन्धन को हटाता है)। वासवदत्ता-वसूभूति के प्रति) आर्य अमात्य यौगन्धरायण ने भुझे बुरा बना दिया, जिसने जानते हुए भी न बतलाया।

Page 136

प्रथम: प्रकाशः ८७

से बन्धराम। ('एहि अयि निष्ठुरे, इदानीमपि बन्धुस्नेहं दर्शय। आर्यपुत्र, लज्जे खल्वहमनेन नृशंसत्वेन तल्लध्वपनयास्या बन्धनम्।') राजा-यथाह देवी। (बन्धनमपनयति ) वासवदत्ता- ( वसुभूर्ति निर्दिश्य), अज्ज, 'अ्र्र्रमच्चजोगन्ध- रायणेण दुज्जीकदह्नि जेण जाणन्तेण वि णाचक्खिदम् !' ('आर्य, अमात्य यौगन्धरायणोन दुर्जनीकृतास्मि येन जानतापि नाचक्षितम् ।') इत्यनेनान्योन्यवचना- त्परिभाषणम्। यथा च वेशीसहारे-'भीम :- कृष्टा येनासि राज्ञां सदसि नृपशुना तेन दुःशासनेन।' इत्यादिना 'ववासौ भानुमती योपहसति पाण्डवदारान्।' इत्यन्तेन भाषरात् परिभाषणम्। अथ प्रसाद :- (१०३) प्रसाद: पयुपासनम्। यथा रत्नावल्याम्-देव, क्षम्यताम ।' इत्यादिना दशितम् । यथा च वेणीसहारे-'भीमः-(द्रौपदीमुपसृत्य) देवि पाञ्चालराजतनये, इत्यादि के द्वारा परस्पर बातचीत के कारण यहां परिभाषण (नामक निर्वहण सब्धि का श्रङ्ध) है। औोर, जैसे वेणीसंहार (६.४१) में 'भीम-जिस नररूपी पशु, उस दुःशासन ने तुझे राजाओं की सभा में घसीटा था।' यहां से लेकर 'कहां है वह भानुमती जो पाण्डव-पत्नी का उपहास करती रही।' यहाँ तक आपस की बात-चीत है प्रतः परिभाषण (नामक निर्वहा सन्धि का अङ्ग) है। टिप्पणी-ना० शा० (१६.६६) में यह लक्षणा है-'परिवादकृतं यत्स्यात् तदाहु: परिभाषरम्'। अर्थात् निन्दा का सूचक वाक्य परिभाषण है। सा० द० (६.१११) में परनिन्दासूचक वचन को परिभाषण माना है जैसा कि उसके उदाहर से स्पष्ट है। ना० द० (१.१०८) में इसका रूप बदल गया है-'परिभाषा स्वनिन्दनम्'-अपने अपराध को प्रकट करना ही परिभाषा है। ना० द० का मत अभिनव भारती से अधिकांश में मिलता है। किन्तु दशरूपक के अनुसार आयस की बात-चीत ही परिभाषण है। उसमें किसी अन्य की निन्दा करना या अपना अपराध प्रकट करना आवश्यक नहीं। प्रता० (३.२१) में इसी प्रकार का लक्षण है। ना० द० में दशरूपक के मत को 'अन्ये तु' कहकर दिखलाया गया है। ६. प्रसाद

कहलाता है। आराधना (पर्युपासन-प्रसन्न करने का प्रयास) ही प्रसाद

जंसे रत्नावली (श्रङ्क ४) में 'महाराज क्षमा कीजिये' इत्यादि के द्वारा दिखलाया गया है। और, जैसे वेखीसंहार (६.४०-४१) में 'भीमसेन-(द्रौपदी के पास जाकर, देवी, पाञ्चालराजपुत्री, सौभाग्य से तुम शत्रु बुल के नाथ से बद्ध रही हो।

Page 137

दशरूपकम्

दिष्ट्या वर्धसे रिपुकुलक्षयेण।' इत्यनेन द्रौपद्या भीमसेनेनाराधितत्वात्प्रसाद इति ? अथानन्द :- (१०४) आनन्दो वाञ्छिताप्तिः यथा रत्नावल्याम्-राजा यथाह देवी (रत्नावलीं गृह्हाति)' यथा च वेीसहारे-'दौपदी-गाध विसुमरिदहि एदं वावारं णाघस्स प्पसादेण पुरगो सिक्खिस्सम् ( केशान्बघ्नाति ) ( नाथ, विस्मृतास्भ्येत व्यापार नाथस्य प्रसादेन पुनः शिक्षिष्यामि।') इत्याभ्यां प्राथितरत्नावलीप्राप्तिके शसंयम- नयोर्वत्सराजद्रौपदीभ्यां प्राप्तत्वादानन्दः । अथ समय :- (१०५) समयो दुःखनिर्गमः ॥५२॥ इत्यादि के द्वारा भीमसेन ने द्रौपदी का आराधन किया है अतः प्रसाद (नामक निर्वहण सन्धि का श्रङ्ग) है। टिप्पखणी-ना० शा० (१६१०१) के अनुसार 'शुश्रूषाद्युपसम्पन्नः प्रसादः प्रीतिरुच्यते'-सेवा आदि से उत्पन्न प्रसन्नता ही प्रसाद कहलाता है। किन्तु दश- रूपक के लक्षणानुसार 'प्रसन्न करने के लिये जो (सेवा) आदि प्रयत्न किया जाता है वही प्रसाद है। प्रता०(३.२१) तथा सा०द० (शुश्र षादिः प्रसादः स्यात् ६.११२) में भी दशरूपक का अनुसंरण किया गया है। ना० द (१.१०६) में 'प्रसाद' को 'उपास्ति' कहा है और यह भी उल्लेख किया है-'अन्ये त्वस्य स्थाने प्रियहिताचरण- जनितां प्रसत्ति प्रसादमङ्गमाहुः -दूसरे तो इस उपास्ति के स्थान पर प्रिय तथा हितकर आचरण से उत्पन्न होने वाली प्रीति (प्रसाद) को (निर्वहण सन्धि का) अङ्ग बतलाते हैं। यह किसके मत की ओर संकेत है, यह निश्चित रूप से कहना कठिन हैं। इतनाअवश्य कहा जा सकता है कि नाटयशास्त्र के उपरिनिर्दिष्ट लक्षण का भी यही तात्पर्य प्रतीत होता है। ७. आनन्द अभीष्ट की प्राप्ति होना आनन्द कहलाता है। जैसे रत्नावली (४.२०-२१) में 'राजा-जैसा देवी कहें। (रत्नावली को स्वीकार करता है)। और, जैसे वेरीसंहार (६.४१-४२) में द्रौपदी-नाथ, मैं इस काम को भूल गई हूँ, स्वामी की कृपा से फिर सीख जाऊँगी'। यहां (प्रथम उदाहरण में) वत्सराज को अपनी चाही हुई रत्नावली की प्राप्ति हो जाती है तथा (द्वितीय उदाहरण में) द्रौपदी को अभीष्ट केश-बन्धन की प्राप्ति होती है अतः आनन्द (नामक निर्वहण सन्धि का अङ्ग) है। टिप्पणी-ना० शा० (१६.१००), ना० द० (१.१११), सा०द० (६.११२) तथा प्रता० (३.२१) में भी इसी प्रकार के लक्षण हैं। ८. समप दुःख का दूर हो जाना ही समय कहलाता है।

Page 138

प्रथम: प्रकाशः

1H यथा रत्नावल्याम् 'वासवदत्ता-(रत्नावलीमालिङ्गय) समस्सस समस्सस बहिशिए।' ('समःश्वसिहि समाश्वसिहि भगिनिके।') इत्यनेन भगिन्योरन्यो- न्यसमागमेन दुःखनिर्गमात्समयः । यथा च वेरीसंहारे 'भगवन्, कुतस्तस्य विजयादन्यद् यस्य भगवान्पुराण- पुरुष: स्वयमेव नारायणो मङ्गलान्याशास्ते। कृतगुरुमहदादिक्षोभसंभूतमूर्ति गुशिनमुदयनाशस्थानहेतु प्रजानाम्। अजममरमचिन्त्यं चिन्तयित्वाऽपि न त्वां भवति जगति दुःखी कि पुनर्देव दृष्टवा॥ ५७ ॥ इत्यनेन युधिष्ठिरदुःखापगम दर्शयति। अथ कृति :- (१०६) कृतिर्लब्धार्थशमनम् यथा रत्नावल्याम् 'राजा-को देव्या प्रसाद न बहु मन्यते ?। वासवदत्ता उज्जउत्त, दूरे से मादुउलं ता तधा करेसु जधा बन्धुग्रएं न सुमरेदि।' ('आर्य- जैसे रत्नावली (४.१६-२०) में 'वासवदत्ता-(रत्नावली से गले मिलकर)क बहिन, धीरज रक्ष्खो, धीरज रक्खो।' इत्यादि के द्वारा दोनों बहिनों के परस्पर मिलन से दुःख दूर होता है अतः समय (नामक निर्वहण सन्धि का अङ्ग) है। और, जैसे वेरगीसंहार (६.४३) में 'युधिष्ठिर-(वासुदेव के प्रति) भगवन्, स्वयं पुराणपुरुष भगवान् नारायण जिसके मङ्गल की कामना करते हैं, उसकी विजय के अतिरिक्त और क्या हो सकता है ? हे देव, महत्तत्व आदि के महान् क्षोभ से व्यापक मूति (त्रिनयन आदि, अथवा विशाल जगत्, अथवा हमारे शरीर आदि) की रचना करने वाले, प्रजाओं की उत्पत्ति, नाश, स्थिति का कारण होने वाले, गुरयुक्त, अजन्मा, अमर और अचिन्त्य आप का चिन्तन करके भी कोई व्यक्ति दुःखी नहीं रहता, फिर देखकर तो क्या ?' इत्यादि के द्वारा युधिष्ठिर के दुःख का दूर होना दिखलाया गया है। टिप्पणी-ना० शा० (१६.१०१), ना०द० (१.११२), सा० द० (६.११२) तथा प्रता० (३.२१) में भी इसी प्रकार का लक्षण है। ६ कृति लब्ध अर्थ का शमन (शान्ति या स्थिरीकरण) कृति कहलाता है। जैसे रत्नावली (४.२०-२१) में 'राजा-देवी के प्रसाद को कौन अधिक सम्मान न देगा ? वासवदत्ता-आर्यपुत्र, इसका मातृकुल (मायका) दूर है अतः

Page 139

दशरूपकम्

पुत्र, दुरेऽस्या मातृकुलं तत्तथा कुरुष्व यथा बन्धुजन न स्मरति।') इत्यन्योन्यवचसा लब्धायां रत्नावल्यां राज्ञ: सुश्लिष्टय उपशमनात्कृतिरिति। यथा च वेगीसंहारे 'कृष्ण :- एते खलु भगवन्तो व्यासवाल्मीकि-' इत्यादिना 'अभिषेकमारब्धवन्तस्तिष्ठन्ति' इत्यनेन (इत्यन्तेन ) प्राप्तराज्याभिषे- कमङ्गलैः स्थिरीकरणं कृतिः । अथ भाषणाम्- (१०७) मानाद्याप्तिश्च भाषसम्। ऐसा कीजिये कि यह अपने बन्धु जनों को याद न करे।' इत्यादि के द्वारा रत्नावली के प्राप्त होने पर राजा के भली भाँति समागम (सुश्लिष्टि) के लिये उस (रत्नावली) का उपशमन (शान्ति, सान्त्वना) किया गया है। अतः कृति (नामक निर्वहण सन्धि का श्रङ्ग) है। और, जैसे वेरगीसंहार* (६.४४) में 'कृष्ण-ये भगवान् व्यास, वाल्मीकि यहाँ से आरम्भ करके अभिषेक का आरम्भ कर रहे हैं ... यहाँ तक प्राप्त हुए राज्य का अभिषेक के मङगल द्वारा स्थिरीकरण दिखलाया गया है अतः 'कृति' (नामक निर्वहणा सन्धि का अ्ङ्ग) है। टिप्पणी-ना० शा० (१६.१००) में 'लब्धार्थस्य शमनं द्युतिमाचक्षते पुनः' यह लक्षणा है। इससे प्रतीत होता है कि 'कृति' के स्थान पर 'द्ुति' नामक अ्ङ्ग भी माना गया था। अभि० के अनुसार इसका अभिप्राय है-क्रोध आदि जो शमन करने योग्य अर्थ हैं, यदि वे किसी प्रकार प्राप्त हो जायें तो भी उनका शमन कर देना द्युति है। ना० द० (१.११०) की वृत्ति में इस मत को 'अपरे तु' करके दिया गया है। ना० द० (१.११०) के अनुसार 'कृतिः क्षेमम्', क्षेमम्=लब्धस्य परिपालनम्; अरथात् प्राप्त वस्तु का स्थिरीकरण ही कृत्ति है। दशरूपक में उद्धृत रत्ना० का संदर्भ ही वहाँ उदाहरणार्थ दिया गया है। सा० द० (६.१११) में दशरूपक के समान ही लक्षण है किन्तु वृत्ति में 'स्थिरीकरणं कृतिः' कहा गया है। इसी प्रकार प्रता० (३.२१) में 'लब्धस्थिरीकरणं कृतिः' यह लक्षरण है। इस विवेचन से यह प्रतीत होता है कि 'प्राप्त वस्तु का स्थिरीकरण कृति है इसमें अधिकांश आचार्य सहमत है। अतः यहाँ उपशमन का एक अर्थ 'स्थिरीकरण' मानना तो सङ्गत ही है, (द्वितीय उदा०) । किन्तु प्रथम उदा० में 'रत्नावली को सान्त्वना देना' अथवा 'रत्नावली के प्राप्त हो जाने पर वासवदत्ता के क्रोध की शान्ति (ना० शा०)- उपशमन के ये दोनों अर्थ सम्भव हैं। १०. भाषण मान आदि की प्राप्ति भाषण कहलाती है। *यह पाठान्तर प्रतीत होता है।

Page 140

प्रथम: प्रकाशः

यथा रत्नावल्याम्-राजा-अतः परमपि प्रियमस्ति ? यातो विक्मबाहुरात्मसमतां प्राप्तेयमुर्वीतले सारं सागरिका ससागरमहीप्राप्त्येकहेतुः प्रिया। देवी प्रीतिमुपागता च भगिनीलाभाज्जिता कोशला: कि नास्ति त्वयिसत्यमात्यवृषभे यस्म करोमि स्पृहाम् ।।५८।। इत्यनेन कामार्थमानादिलाभाद्भाषणमिति। अथ पूर्वभावोपगूहने- (१०८) कार्यदृष्टयद्ग तप्राप्ती पूर्वभावोपगूहने ।।५३।। कार्यदर्शनं पूर्वभावः, यथा रत्नावल्याम्-'यौगन्घरायणः-एवं विज्ञाय भगिन्याः संप्रति करणीये देवी प्रमाशम्। वासवदत्ता-फुडं ज्जेव कि ए भणोसि ? पडिवाएहि से रअणमाल त्ति।' ('स्फुटमेव किन भरासि ? प्रतिपादयास्म जैसे रत्नावली (४.२१) में 'राजा-इससे अधिक भी कुछ प्रिय हो सकता है ?- विक्रमबाहु को अपने जैसा (आत्मीय) कर दिया, पृथिवीतल का सार सागर सहित समस्त पृथिवी की प्राप्ति का एकमात्र हेतु यह प्रिया सागरिका प्राप्त कर ली, बहिन की प्राप्ति से देवी (वासवदत्ता) प्रसन्न हो गई, कोसल प्रदेश जीत लिये गये। 'सचमुच ही, तुम जैसे श्रष्ठ, अमात्य के होने पर पर क्या नहीं है, जिसकी मैं कामना करू ?' इत्यादि के द्वारा काम, अर्थ और मान आदि की प्राप्ति दिखलाई गई है अतः यहाँ भाषण (नामक निर्वहण सन्धि का श्रङ्ग) है। टिप्पणी-ना० शा० (१६.१०२) के अनुसार 'सामदानादिसम्पन्न भाषरं समुदाहृतम्' यह लक्षणा है। सा० द० (६.११३) में भी 'सामदानादि भाषणम्' यह कहा गया है। ना० द० (१.११४) में 'भाषण सामदानोक्तिः' अरथात् प्रिय तथा हितकारी वचन भाषण है 'यह कहकर इसे अधिक स्पष्ट किया गया है। प्रता० (३.२१) के अनुसार 'प्राप्तकार्यानुमोदनमाभाषरम्'; अर्थात् प्राप्त हुये फल का अपनुमोदन करना ही आभाषण कहलाता है। उन लक्षणों पर विचार करने से प्रतीत होता है कि दशरूपक में दिया गया भाषण का लक्षण प्राचीन तथा अर्वाचीन सभी अचार्यों के लक्षणों से भिन्न है। यहाँ तो फलागम से अन्वित मान आदि की प्राप्ति का वर्णन ही भाषण कहलाता है। ११. पूर्वभाव १२. उपगूहन- कार्य (फल) का दर्शन (बिना कहे समझ लेना) पूर्वभाव कहलाता है तथा अद्भुत अरथ की प्राप्ति उपगूहन है। कार्य का दर्शन पूर्वभाव है; जैसे रत्नावली (४२०-२१) में 'यौगन्धरायण- यह जानकर बहिन (रत्नावली) के लिये अब क्या करना है इस विषय में देवी

Page 141

दशरूपके म् ७४,

रत्नमालामिति।') इत्यनेन 'वत्सराजाय रत्नावली दीयताम्' इति कार्यस्य यौगन्वरायणाभिप्रायानुप्रविष्टस्य वासवदत्तया दर्शनात्पूर्व भाव इति। अद्ध् तप्राप्तिरुपगूहन यथा वरणीसहारे (नेपथ्ये) महासमरानलदग्धशेषाय स्वस्ति भवते राजन्यलोकाय। करोधान्वैर्यस्य मोक्षात्क्षतनरपतिभि: पाण्डुपुत्र : कृतानि प्रत्याशं मुक्तकेशान्यनुदिनमधुना पार्थिवन्तः पुराशि। कृष्णाया: केशपाशः कुपितयमसखो धूमकेतुः कुरूणां दिष्टया बद्धः प्रजानां विरमतु निधनं स्वस्ति राजन्यकेभ्यः ॥५।।। युधिष्ठिर-देवि, एष ते मूर्घजानां संहारोऽभिनन्दितो नभस्तलचारिणा सिद्धजनेन ।' इत्येतेनाद्भुतार्थ प्राप्तिरुपगूहनमिति। लब्घार्थशमनात्कृतिरपि भवति। (वासवदत्ता) प्रमाण हैं। वासवदत्ता-स्पष्ट ही क्यों नहीं कहते कि इसे (महाराज को) रत्नावली दे दो'। इत्यादि में "रत्नावली वत्सराज को दे दी जाये" यह कार्य (फल) है, जो यौगन्धरायण के अभिप्राय के अन्तर्गत है। यहां इसे वासवदत्ता ने समझ लिया है। अतः पूर्वभाव (नामक) निर्वहण सन्धि का अ्ङ्ग है। अद्भुत अ्र्थ की प्राप्ति उपगूहन है; जैसे वेरगीसंहार (६.४२) में (नेपथ्य में) महासमर की अग्नि में जलने से बचे हुए क्षत्रियजन का कल्याण हो-जिस (केशपाश) के खुल जाने के कारण क्रोध से अन्धे हुए, अनुपम भुजबल वाले, राजाओं को नष्ट करने वाले पाण्डु के पुत्रों ने प्रत्येक दिशा में राजाओं के अन्तःपुरों को खुले हुए केशों वाला कर दिया था, कुद्ध यमराज का मित्र (उसके सदृश), कौरवों के लिये धूमकेतु कृष्णा (द्रौपदी) का वह यह केशपाश बँध गया है (अब प्रजा का विनाश रुक जाये, राजसमूह का कल्याण हो। हे देवी, गगनतल में विचरने वाले सिद्ध जनों के द्वारा इस केश-संयमन का अभिनन्दन किया जा रहा है। इत्यादि के द्वारा अद्भुत अर्थ की प्राप्ति का वर्णन है अतः यहां उपगूहन (नामक निर्वहण सन्धि का अङ्ग) है। साथ ही यहां प्राप्त अर्थ का शमन (स्थिरीकरण) भी है अतः कृति (नामक निर्वहण सन्धि का अ्रङ्ग) भी है। टिप्पणी-(i) ना० शा० (१६ १०३) के अनुसार 'पूर्ववाक्यं तु विज्ञेयं यथोक्तार्थप्रदर्शनम्' अरथात् पूर्वोक्त अर्थ का प्रदर्शन ही पूर्ववाक्य है। सा०द०(६.११३) में भी इसी प्रकार का लक्षण है। दशरूपक का लक्षण इससे भिन्न है। इसके अनु- सार कार्य (फल) किसी के अभिप्राय का अंश होता है दूसरा उस कार्य को शब्दों द्वारा कहे बिना ही भाँप लेता है। जैसा कि ऊपर रत्नावली नाटिका के उदाहरण से स्पष्ट है। ना०द०(१.११५) के 'प्राग्भावः कृत्यदर्शनम्' का तथा प्रता० (३.२१) के 'इष्टकार्यदर्शनं पूर्वभावः' का भी यही तात्पर्य है। (ii) ना० शा० (१६.१०२) ना० द० (१.११३), सा० द० (६.११२.११३) तथा प्रता० (३.२१) में भी उप- गूहन का इसी प्रकार का लक्षण है।

Page 142

प्रथम: प्रकाश:

अथ काव्यसंहार :- (१०६) वराप्तिः काव्यसंहार: यथा-'कि ते भूय, प्रियमुपकरोमि।' इत्यनेन काव्यार्थसंहरणात् काव्यसंहार इति। डी एअथ प्रशस्ति :- (११०) प्रशस्तिः शुभशंसनम्। यथा वेीसंहारे-'प्रीतश्चेद्दवान् तदिदमेवमस्तु- अकृपणमतिः काम जीव्याज्जनः पुरुषायुषं भवतु भगवद्क्तिद्वत विना पुरुषोत्तमे ? कलितभुवनो विद्वद्बन्धुगुरोषु विशेषवित् सततसुकृती भूयाद् भूपः प्रसाधितमण्डलः ॥ ६० ॥ इति शुभशंसनात्प्रशस्ति: । १३. काव्यसंहार -- वरदान की प्राप्ति काव्य-संहार कहलाता है। जंसे "मैं तुम्हारा और क्या प्रिय करू ?" इत्यादि के द्वारा काव्यार्थ का उपसंहार किया जाता है अतः यह काव्यसंहार (नामक निर्वहण सन्धि का अ्रङ्ग) है। टिप्पणी -- ना० शा० (१६.१०३) तथा सा० द० (६.११४) में 'वरप्रदान- सम्प्राप्ति: काव्यसंहार इष्यते'-यह कहा गया है। इसका तात्पर्य भी दशरूपक के लक्षण के समान ही है। ना० द० (१.११५) के अनुसार 'वरेच्छा काव्यसहारः' ईप्सित दातु वरेच्छा; अर्थांत् अभीष्ट वर को प्रदान करने की अभिलाषा को काव्य- संहार कहा जाता है। इस लक्षण में भाव अधिक स्पष्ट हो गया है। प्रता०(३.२१) में 'काव्यार्थोपसंहृतिः संहारः' यह लक्षण है। १४. प्रशस्ति शुभ (अर्थ) का कथन ही प्रशस्ति कहलाता है। जैसे वेरीसंहार (६.४६) में युधिष्ठिर कृष्णा के प्रति कहते हैं फिर भी यदि आप प्रसन्न हैं तो यह हो जाये-लोग अदीन मति वाले होकर पुरुष की आयुपर्यन्त जीवें। पुरुषोत्तम में अनन्य भक्ति होवे। राजा प्रजा-प्रेमी (दयितभुवनः=दयितं भुवनं यस्य स प्रियलोक:) विद्वानों का बन्धु, गुणों का विशेषज्ञ, निरन्तर पुण्य करने वाला तथा राज-समूह को अलङ्कृत करने वाला (अथवा वश में करने वाला) होवे। यहाँ शुभ-कथन किया गया है अतः प्रशस्ति (नामक निर्वहस सन्धि का अ्रङ्ग) है।

Page 143

दशरूपकम्

इत्येतानि चतुर्दशनिर्वहणाङ्गानि। एवं चतुः षष्टयङ्गसमन्विताः पञ्चसंधयः प्रतिपादिताः । टिप्पणी-(१) ना० शा० (१६.१०४) में 'नूपदेशप्रशान्तिश्च प्रशस्तिः' यह लक्षणा है। इसी प्रकार का लक्षणा सा० द० (६.११४) में है। इस लक्षण का तात्पर्य भी दशरूपक के लक्षण के समान ही है। ना० द (१.११६) तथा प्रता० (३.२१) में दशरूपक के समान ही लक्षणा है। (२) 'प्रशस्ति' नामक अरङ्ग को योजना अनिवार्य है। यह रूपक का अन्त मङ्गल है। (३) काव्यसंहार तथा प्रशस्ति दोनों रूपक के अन्त में इसी क्रम से आते हैं। ये चतुर्दश निर्वहण सन्धि के अङ्ग हैं। इस प्रकार ६४ अङ्गों से युक्त पञ्च- सन्धि का प्रतिपादन किया गया है। टिप्पणी-(१) निर्वहण सन्धि में बीज का फल प्राप्ति के साथ सम्बन्ध दिखलाया जाता है। यह फल-प्राप्ति कार्य (नायक-व्यापार) के द्वारा होती है। इसी हेतु इसे कार्य नामक अर्थप्रकृति और फलागम नामक कार्यावस्था का समन्वय कहा जाता है। उपयुक्त सभी अङ्गों का फलागम से सम्बन्ध होता है। उदाहरणार्थ फल-प्राप्ति को दृष्टि में रखकर जो बीज का संघान किया जाता है वही सन्धि नामक अङ्ग होता है। इसी प्रेकार अन्त में निर्विघ्न रूप से फल-प्राप्ति हो चुकने पर काव्य- संहार तथा प्रशस्ति नामक अ्रङ्ग हुआ करते हैं। (२) ना० शा० (१६,६५-६७), ना० द० (१.१०३) सा० द० (६,१०८-१०६) तथा प्रता० (३.२०-२१) में सवत्र निर्वहणा सन्धि के चौदह अङ्ग माने गये हैं। यत्र तत्र उनके नामों तथा लक्षणों में थोड़ा सा अन्तर है, जिसका यथावसर उल्लेख किया गया है। (३) पाँचों सन्धियों के कुल मिलाकर ६४ अङ्ग माने गये हैं (ना०शा० १६.६७); किन्तु इनके विषय में निम्न बातें ध्यान रखने योग्य है :- (क) किसी एक सन्धि में बतलाया गया अङ्ग दूसरी सन्धि में भी हो सकता है, जैसे 'युक्ति' नामक अङ्ग मुखसन्धि में कहा गया है किन्तु वेशीसंहार में गर्भसन्धि में भी इसकी योजना की गई है(अभिनव०१६.१०५) (ख) एक ही सन्धि में कोई एक सन्ध्यङ्ग दो या तीन बार भी आ जाता है (वही १६.१०५) । (ग) जैसा कि ऊपर निर्देश किया गया है। प्रत्येक सन्धि के अङ्गों में से कुछ ही अनिवार्य माने जाते हैं; परन्तु कभी-कभी श्रेष्ठ कवियों के प्रबन्धों में भी अनिवार्य माने जाने वाला अङ्ग नहीं मिलता। वस्तुतः भरतमुनि का कथन है कि कुशल कवियों को रस एवं भाव के आधार पर जो अङ्ग जिस सन्धि में आवश्यक हो उसकी योजना करनी चाहिये (ना० शा० १६.१०४.१०५)। (घ) सन्ध्यङ्गों का जो कम दशरूपक या किसी अन्य नाट्यग्रन्थ में दिया गया है वही क्रम रूपकों में नहीं हुआ करता (लक्षऐे एवाय कमो न निबन्धने; अभिनव० १६.६६)।

Page 144

प्रथम: प्रकाश: ६५ षइ्प्रकारं चाङ्गानां प्रयोजनमित्याह- (१११) उक्ताङ्गानां चतुःषष्टिः षोढा चैषां प्रयोजनम्॥५४।। कानि पुनस्तानि षट् प्रयोजनानि ? ( तान्याह)- (११२) इष्टस्यार्थस्य रचना गोष्यगुप्ति: प्रकाशनम्। राग: प्रयोगस्याश्चर्यं वृत्तान्तस्यानुपक्षयः ।।५५।। विवक्षितार्थनिबन्धनं गोप्यार्थगोपनं प्रकाश्यार्थप्रकाशनमभिनेयरागवृद्धिश्च- मत्कारित्वं च काव्यस्येतिवृत्तस्य विस्तर इत्यङ्ग: षट्प्रयोजनानि संपाद्यन्त इति। सन्ध्यङ्गों का प्रयोजन- इन सन्व्यङ्गों का प्रयोजन ६ प्रकार का है, यह बतलाते हैं- उपर्युक्त (सन्धि के) अङ्ग ६४ हैं और इनका प्रयोजन ६ प्रकार का है। वे ६ प्रयोजन कौन से हैं? उनको बतलाते हैं- १. इष्ट अर्थ की रचना, २. गोपनीय को गुप्त रखना, ३. प्रकाशन, ४. राग, ५. प्रयोग का वैचित्र्य और ६. इतिवृत्त का विच्छिन्न न होना। विवक्षित अर्थ की रचना, गोपनीय श्र्थ को छिपाना प्रकाशित करने योग्य वस्तु को प्रकाशित करना, अ्रभिनेय वस्तु के प्रति राग की वृद्धि और चमत्कारिता तथा काव्य की कथावस्तु का विस्तार, ये ६ प्रयोजन सन्धि अङ्गों के द्वारा सम्पादित किये जाते हैं। टिप्परी-(क)मि० ना० शा० (१६.५१.५२), सा० द० (६.११६-११७) प्रता० (३.२१)। (ख) ६४ सन्ध्यङ्गों की योजना के ६ प्रयोजन हैं। (१) रूपक में जिस अर्थ का समावेश करना अभीष्ट होता है उस अर्थ का समावेश कर दिया जाता है। (२) कथावस्तु का जो अंश रङ्गमञ्च पर दिखलाना अभीष्ट नहीं होता गोपनीय होता है उसको छिपा लिया जाता है। (३) अभि० भा० (ना० शा०- १६.५२) के अनुसार प्रकाशनम्=विस्तारम्। इस प्रकार जिस वस्तु का विस्तार करना उपयोगी है उसका विस्तार कर दिया जाता है। अथवा प्रकाशित करने योग्य वस्तु को प्रकाशित किया जाता है। (४) सन्धि के त्ङ्गों की समुचित योजना से इति- वृत्त की संघटना इतनी सुत्यवस्थित हो जाती है कि अभिनेय वस्तु के विषय में दर्शकों की रुचि (राग) बढ़ने लगती है। (५) बार बार सुनी गई भी कथा किसी काव्य या नाट्य का इतिवृत्त बन जाया करती है, सन्ध्यङ्गों की सम्यक योजना से उसका प्रयोग भी अपूर्व सा प्रतीत होने लगता है उसमें वैचित्र्य (चमत्कार) की प्रतीति होने लगती है। (६) नाट्य आदि प्रबन्धों में कथा का विच्छेद अरुचि एवं नीरसता को उत्पन्न कर दिया करता है, सन्ध्यङ्गों की सम्यक् योजना से कथावस्तु का विच्छेद नहीं होता। नाट्यदर्पण (१.११६) के अनुसार तो केवल इतिवृत्त का अविच्छेद ही सन्ध्यङ्गों का प्रयोजन है। कथावस्तु के अविच्छेद से रस की पुष्ति होती है।

Page 145

दशरूपकम्

पुनर्व स्तुविभागमाह- (११३) द्वेधा विभाग: कर्तव्यः सर्वस्यापीह वस्तुनः । सूच्यमेव भवेत् किंचिद् दृश्यश्रव्यमथापरम् ॥५६॥ कीदृक्सूच्यं कीहृग्हृश्यश्रव्यमित्याह (११४) नीरसोऽनुचितस्तत्र संसूच्यो वस्तुविस्तरः। -F95 दृश्यस्तु मधुरोदात्तरसभावनिरन्तरः ।५७।। सूच्यस्यप्र तिपादनप्रकारमाह- इसलिये रस-योजना में तत्पर कवियों को सन्ध्यङ्गों की सम्यक् योजना करनी चाहिये। सा० द० (६.१२०) में यह भी बतलाया है कि सन्ध्यङ्गों का उद्दश्य रस की अभिव्यक्ति है केवल नाट्यशास्त्र की मर्यादा का पालन नहीं। बीज तथा नायक-व्यापार (कार्यावस्था) के समन्वय की दृष्टि से इतिवृत्त का पाँच सन्धियों में विभाजन किया गया है। अब वर्णन (=वस्तु निबन्धन) की दृष्टि से वस्तु-विभाजन पर विचार किया जाता है। वस्तु-निबन्धन की दृष्टि से वस्तु-विभाजन फिर वस्तु का विभाजन बतलाया है- यहाँ (रूपक में ) समस्त वस्तु का दो प्रकार का विभाग करना चाहिये; कुछ वस्तु तो सूच्य होनी चाहिये और दूसरी दृश्य तथा श्रव्य ।।५६।। कैसी वस्तु सूच्य होती है और कैसी दृश्य तथा श्रव्य, यह बतलाते है- उनमें वस्तु का जो भाग (वस्तुविस्तर) नीरस हो या (जिसका रङ्गमञ्च पर दिखाना) अनुचित हो उसे भली भाँति सूचित करना चाहिये। किन्तु जो (वस्तु का भाग) चित्ताकर्षक उदात्त तथा रस एवं भाव से पूर्ण हो उसे रङ्गमञ्च पर दिखाना चाहिये (दृश्यः) ॥५७॥ टिप्परी-रूपक दृश्य होते हैं। उनका रङ्गमञ्च पर अभिनय किया जाता है। इसलिये किसी नायक के जीवन की सभी घटनाओं का रूपक में वर्णन नहीं किया जा सकता। इसके अतिरिक्त भारतीय नाटय-परम्परा के अनुसार कुछ हघटनाओं का रङ्गमञ्च पर अभिनय करना वर्जित (अनुचित) है, जैसे किसी की मृत्यु आदि। साथ ही, रूपक रसाश्रित होते हैं अतः नीरस वस्तु का वर्णन भी रूपक में वाञ्छनीय नहीं। इस प्रकार की सभी घटनाओं का अभिनय तो नहीं किया कीजाता किन्तु कथा-सूत्र को अविच्छिन्न रखने के लिये इनकी सूचना अवश्य देनी होती है। इसी आधार पर दो प्रकार की वस्तु होती हैं-१ सूच्य २ दृश्य। सूच्य है- नीरस तथा अनुचित (=रङ्गमञ्च पर न दिखलाने योग्य तथा वर्जित) हृश्य है- रोचक, उदात्तभावनाओं से पूर्ण, रस-भाव पूर्ण। सूच्य वस्तु के प्रतिपादन का प्रकार बतलाते हैं-

Page 146

प्रथम: प्रकाश: ६७

(११५) अर्थोपच्तेपकैः सूच्यं पञ्चभिः प्रतिपाद्येत् । विष्कम्भचूलिकाङ्कास्याङ्कावतारप्रवेशकैः ।।५८।। तत्र विष्कम्भ :- (११६) वृत्तवर्तिष्यमाणणनां कथांशानां निदर्शकः । संच्ेपार्थस्तु विष्कम्भो मध्यपात्रप्रयोजितः ।५६।। अतीतानां भाविना च कथावयवानां ज्ञापको मध्यमेन मध्ममाभ्यां वा पात्राभ्यां प्रयोजितो विष्कम्भक इति । स द्वित्रिधः शुद्धः, सङ्कीरश्चेत्याह- (११७) एकानेककृत: शुद्धः सङ्गीर्णो नीचमध्यमैः। एकेन द्वाभ्यां वा मध्यमपात्राभ्यां शुद्धो भवति, मध्यमाधमपात्रैर्यु गपत्प्रयोजितः सङ्कीणं इति। १. विष्कम्भक, २. चूलिका, ३. अङ्कास्य, ४. अङ्कावतार और ५. प्रवेशक इन पाँच अरथोपक्षेपकों (इतिवृत्त के सूचकों) के द्वारा सूच्य वस्तु का प्रति- पादन करना चाहिये।।५८॥। १. विष्कम्भक (विष्कम्भ) उनमें विष्कम्भ है :- बीते हुए और आागे होने वाले कथा-भागों का सूचक, संच्िप्त अर्थ वाला तथा मध्यम पात्रों द्वारा प्रयुक्त जो अर्थोपक्षेपक है, वह विष्कम्भ कहलाता है ॥५६॥ अर्थात (क) भूत और भविष्य के कथांशों का सूचक, (ख) एक या दो मध्यम पात्रों के द्वारा प्रयुक्त विष्कम्भक होता है। वह दो प्रकार का होता है-शुद्ध और सङ्कीर्ण, यह बतलाते हैं- एक या अ्र्प्रनेक मध्यम पात्रों द्वारा प्रयुक्त विष्कम्भक शुद्ध कहलाता है और मध्यम तथा अधम पात्रों द्वारा मिलकर प्रयोजित विष्कम्भक सङ्कीर्ण कहलाता है। टिप्परी (१) रूपक में तीन प्रकार के पात्र माने जाते हैं-उत्तम-राजा इत्यादि, ये संस्कृत बोलते हैं। मध्यम-अमात्य, सेनापति, वशिक, पुरोहित आदि, ये भी संस्कृत बोलते हैं। अधम-दास, चेटी इत्यादि जो प्राकृत भाषा बोलते हैं। (२) क- जिस इतिवृत्त को अङ्कों में नहीं दिखलाया जा सकता विष्कम्भक में उसकी सूचना दी जाती है। (ख) विष्कम्भक का वर्ण्य अर्थ संक्षिप्त होता है, विस्तृत अर्थ को भी संक्षेप में ही कहा जाता है। (ग) यह भूत तथा भविष्य के कथा-भाग को सूचित करके कथा-सूत्र को अविच्छिन्न बनाता है। (घ) इसका त्ङ्क के आरम्भ में प्रयोग किया जाता है, अर्थात् यह प्रथम अङ्ग में आ्रमुख के पश्चात् रवेखा जा सकता है तथा अन्य अङ्कों के आरम्भ में भी। किन्तु कोहल का मत है

Page 147

दशरूपकम्

अथ प्रवेशक :- (११८) तद्वदेवानुदात्तोक्त्या नीचपात्रप्रयोजितः ।६०।। प्रवेशोऽद्क्द्वयस्यान्तः शेषार्थस्योपसचकः । तद्वदेवेति भूतभविष्यदर्थज्ञापकत्वमतिदिश्यते, अनुदात्तोक्त्या नीचेन नीचैर्वा पात्र : प्रयोजित इति विष्कम्भलक्षापवादः, अङ्द्वयस्यान्त इति प्रथमाङ्क प्रतिषेध इति। कि विष्कम्भक का प्रयोग केवल प्रथम अङ् के आरम्भ में ही होता है, अन्य अङ्कों में इसका प्रयोग होता ही नहीं। (ना०द०१.२०)। (ङ) एक मध्यम पात्र द्वारा या अनेक मध्यम पात्रों द्वारा अथवा मध्यम और नीच दोनों प्रकार के पात्रों द्वारा इसका प्रयोग किया जाता है। (च) मध्यम पात्र संस्कृत बोलते हैं तथा अधम पात्र प्राकृत (शौरसेनी)-विशेष द्र०, ना० द० १.२०। (३) जिस विष्कम्भक में केवल मध्यम पात्र होते हैं वह शुद्ध कहलाता है, किन्तु जिसमें मध्यम तथा अधम दोनों प्रकार के पात्र होते हैं वह संकीएं। २. प्रवेशक- उसी प्रकार (=भूत और भविष्य के कथांशों का सूचक) नीच पात्रों द्वारा अनुदात्त उक्तियों से प्रयुक्त, दो अङ्कों के बीच में स्थित तथा शेष (अ्रप्रदर्शनीय) अर्थ का सूचक प्रवेशक (प्रवेश) कहलाता है॥६०॥ तद्वद् एव (उसी प्रकार) इस (शब्द) के द्वारा भूत और भविष्यत् अर्थ की सूचना देने वाला बतलाया गया है, अनुदात्त उक्ति से एक नीच या अ्नेक नीच पात्रों द्वारा प्रयुक्त-यह कहकर विष्कम्भ के लक्षण से भेद किया गया है; दो श्ङ्कों के बीच में यह कहकर प्रथम अङ्क में (प्रवेशक का) निषेध किया गया है। टिप्पणी (१) अतिदिश्यते=अतिदेश किया जाता है, एक पदार्थ के धर्म का दूसरे पदार्थ से सम्बन्ध दिखलाना अतिदेश कहलाता है-अन्यवर्मस्यान्यत्राभिसम्ब- न्धोऽतिदेशः । यहाँ विष्कम्भक के धर्म (भूत-भविष्यत् अर्थ की सूचकता) का प्रवेशक में अतिदेश किया गया है। (२) प्रवेशक में विष्कम्भक से समानता यह है-(क) अङ्कों में न दिखलाने योग्य इतिवृत्त का सूचक होता है। (ख) वर्ण्य अर्थ संक्षिप्त होता है। (ग) भूत तथा भविष्यत् के क्था-भाग को सूचित करके कथासूत्र को जोड़ता है। दोनों का अन्तर यह है :- (क) विष्नम्भक में विशेषकर मध्यम पात्रों का प्रयोग किया जाता है, कभी मध्यम के साथ अधम का भी। फलतः (ख) विष्कम्भक में मुख्यतः संस्कृत भाषा का व्यवहार होता है सङ्गीर्णं विष्कम्भक में संस्कृत के साथ प्राकृत (शौरसेनी) का भी, दूसरी ओर प्रवेशक में केवल अधम पात्रों का ही प्रयोग होता है और तदनुसार इसमें संस्कृत भाषा का व्यवहार नहीं होता केवल प्राकृत भाषा का व्यवहार होता है। प्राकृत भी निम्नकोटि की शकारी, आभीरी, चाण्डाली आदि (अनुदात्तोक्त्या इत्यादि) । (ग) विष्कम्भक की योजना प्रथम श्रङ्ग के आरम्भ में तथा अन्य अङ्कों के आरम्भ में भी हो सकती है किन्तु प्रवेशक सदा दो अङ्कों के बीच में ही आता है वह कभी प्रथम अङ्क के आरम्भ में नहीं आ सकता (ग्रङ्कद्वयस्यान्तः) ।

Page 148

प्रथम: प्रकाश:

अथ चूलिका (११६) अप्न्तर्जवनिकासंस्थैश्चूलिकार्थस्य सूचना ।।६१।। नेपथ्यपात्र रार्थसूचन चूलिका, यथोत्तरचरिते द्वितीयाङ्कस्यादौ-'(नेपथ्ये) स्वागतं तपोधनाया: ( ततः प्रविशति तपोधना )' इति नेपथ्यपात्रेण वासन्तिक- याऽडत्र यीसूचनाच्चूलिका। यथा वा वीरचरिते चतुर्थाङ्गस्यादौ-'(नेपथ्ये) भो भो वैमानिकाः, प्रवर्त्यन्तां प्रवर्त्यन्तां मङ्गलानि- कृशाश्वान्तेवासी जयति भगवान्कौशिकमुनिः सहस्रांशोवशे जगति विजयि क्षत्त्रमधुना। विनेता क्षत्त्रारेर्जगदभयदानव्रतधर: शरण्यो लोकानां दिनकरकुलेन्दुर्विजयते ॥ ६१॥ इत्यत्र नेपथ्यपात्रदेवे 'रामेण परशुरामो जितः' इति सूचनाच्चूलिका। अथाङ्कास्यम्- (१२०) अङ्कान्तपात्रैरङ्कास्यं छ्िन्नाङ्कस्यार्थसूचनात्। ३. चूलिका जवनिका के भीतर स्थित पात्रों के द्वारा किसी अर्थ (बात) की सूचना देना चूलिका कहलाता है ।।६१।। नेपथ्य में स्थित पात्र के द्वारा अर्थ की सूचना चूलिका है; जैसे उत्तररामचरित नाटक के द्वितीय अङ्क के आरम्भ में-'(नेपथ्य में) तपस्विनी का स्वागत हो (तब तपस्विनी आत्रेयी प्रवेश करती है)। यहां पर नेपथ्य-पात्र वासन्ती के द्वारा आत्रियी (के आने) को सूचना दी गई है अतः यहाँ चूलिका (नामक अर्थोपक्षेपक) है। अथवा जैसे महावीरचरित नाटक के चतुर्थ अङ्क के आरम्भ में-'(नेपथ्य में) हे विमान से चलने वालों (देवों), मङ्गलों का आरम्भ करो, आरम्भ करो- (४.१) कृशाश्व के शिष्य भगवान् कौशिक मुनि (विश्वामित्र) की जय हो रही है। इस समय संसार में सहस्त्ररश्मि (सूर्य) के वंश में क्षत्र (क्षत्रिय जाति या क्षात्र धर्म) विजयी हो रहा है। क्षत्रियों के शत्रुओं का दमन करने वाले (विनेता), संसार को अभयदान करने के व्रत के धनी, लोगों को शरण देने वाले सूर्यवंश के चन्द्रमा (राम) विजयी हो रहे हैं।' यहां पर नेपथ्य-पात्र देवों के द्वारा 'राम ने परशुराम को जीत लिया' यह सूचना दी गई है अतः चूलिका (नामक अरथोपक्षेपक) है। ४. श्रङ्कास्य अङ्क के अर्पन्त में आने वाले पात्रों के द्वारा (पूर्व अङ्क से) असम्बद्ध कहलाता है। (-विच्छिन्न) अग्रिम अङ्क के अरथ की सूचना देने के कारण यह त्रङ्कास्य

Page 149

१०० दशरूपकम्

अङ्कान्त एव पात्रमङ्गान्तपात्रं तेन विश्लिष्टस्योत्तराङ्कमुखस्य सूचनं तद्वशेनो- त्तराङ्गावतारोऽङ्कास्यमिति, यथा वीरचरिते द्वितीयाङ्कान्ते-'(प्रविश्य) सुमन्त्र :- भगवन्तौ वसिष्ठविश्वामित्री भवतः सभार्गवानाह्वयतः । इतरे क्व भगवन्तौ ? सुमन्त्र :- महाराजदशरथस्यान्तिके। इतरे-तदनुरोधात्तत्र व गच्छामः, इत्यङ्कसमातौ '(ततः प्रविशन्त्युपविष्टा वसिष्ठविश्वामित्रपरशुरामाः), इत्यत्र पूर्वाङ्कान्त एव प्रविष्टेन सुमन्त्रपात्र ए शतानन्दजनककथार्थविच्छेदे उत्तराङ्गमुखसूचनादङ्कास्यमिति। अङ्क के अ्न्त में ही आने वाला पात्र अङ्गपात्र है। उसके द्वारा (तेन) (पूर्व अङ्ग से) असम्बद्ध अग्रिम शङ्ग के आरम्भिक अ्रर्थ (मुख) की सूचना; उस (सूचना) का आश्रय लेकर जहां अग्रिम अङ्क का आरम्भ होता है वह अ्ङ्कास्य कहलाता है। जसे महावीर चरित नाटक में द्वितोय शङ्क के अन्त में (प्रविष्ट होकर) सुमन्त्र-आदरणीय वसिष्ठ और विश्वामित्र आप सबको परशुराम सहित बुला रहे हैं। दूसरे -- वे कहाँ हैं ? सुमन्त्र-महाराज दशरथ के पास। दूसरे-उनके अनुरोध से वहीं चलते हैं।' इस प्रकार अ्रङ्ध की समाप्ति हो जाने पर (तब बैठे हुए वसिष्ठ, विश्वामित्र, और परशुराम प्रवेश करते हैं)। यहां पर पूर्व (द्वितीय) श्रङ्ध के अन्त में ही प्रविष्ट होने वाले सुमन्त्र नामक पात्र के द्वारा शतानन्द और जनक की कथा के समाप्त हो जाने पर अग्रिम (तृतीय) अङ् के प्रारभ्भिक अर्थ (वसिष्ठ और विश्वामित्र आदि का संवाद) की सूचना दी गई है, शतः यह श्रङ्कास्य है। टिप्पणी-ना० शा० (१६.११६) में इसे 'अङ्गमुख' कहा गया है तथा इसे अङ्कावतार के पश्चात् रक्खा गया है। भरत के अनुसार अङ्कमुख का लक्षण है- विश्लिष्ट मुखमङ्कस्य स्त्रिया पुरुषेण वा। यदुपक्षिप्यते पूर्व तदङ्कमुखमुच्यते।। अर्थात् जहाँ किसी स्त्री या पुरुष पात्र के द्वारा पूर्व अङ्ध में दूसरे अङ्क की विच्छिन्न प्रारम्भिक कथा (मुस) की सूचना दी जाती है वहाँ अङ्कमुख होता है। दशरूपक में इसका ही अनुसरण किया गया है। ना० द० (१.२२) तथा प्रता० (३.२१) में भी इसी प्रकार का लक्षण है। ना० द० के अनुसार अ्रङ्कास्य तथा अङ्क- मुख एक ही है। भा० प्र० (पृ० २१७-२१८) का लक्षण भी इसके समान ही है। किन्तु वहाँ अङ्कास्य के साथ साथ अङ्गमुख का पृथकश. वर्णन किया गया है। साहि- त्यदर्पण का मार्ग भिन्न है। यहाँ पञ्चम अरथोपक्षेपक 'अङ्गमुख' माना गया है, जिसका लक्षणा है-जहाँ एक अङ्क में अन्य अङ्कों की कथा की सूचना दी जाती है और जो बीजार्थ का प्रकट करने वाला होता है (६.५६-६०)। साहित्यदर्पणकार ने दशरूपक का अङ्कास्य का लक्षणा तथा उदाहरण भी दिखलाया है किन्तु वहाँ यह भी उल्लेख कर दिया है कि अन्य नाट्याचार्यों के अनुसार दशरूपक का 'अङ्कास्य' तो अङ्कावतार के अन्तर्गत ही आ जाता है। भावप्रकाशन तथा साहित्यदर्पण के अनुशीलन से ऐसा प्रतीत होता है कि इनसे पूर्व अङ्कास्य और अङ्कमुख दोनों का पथक् पृथक् लक्ष माना जाने लगा होगा।

Page 150

प्रथमः प्रकाश: १०१

थाङ्कावतार :- (१२१) अङ्कावतारतत्वङ्कान्ते पातोऽङ्कस्याविभागतः ।६२।। यत्र प्रविष्टपात्रेण सूचितमेव पूर्वाङ्गाविच्छिन्नार्थतयैवाङ्कान्तरमापतति प्रवेशक- विष्कम्भकादिशून्यं सोडङ्कावतारः, यथा मालविकाग्निमित्रे प्रथमाङ्कानते 'विदूषकः- तेए हि दुवेवि देवीए पेक्खागेहं गदुत सङ्गीदोवअरणं करित्र तत्थभवदो दूद विसज्जेथ अथवा मुदङ्गसद्दो ज्जेव एं उत्थावयिस्सदि।' (तेन हि द्वावपि देव्याः प्रेक्षागेहं गत्वा सङ्गीतकोपकरणं कृत्वा तत्रभवतो दूतं विसर्जयतम्, अथवा मृदङ्गशब्द एवैनमुत्थाप- यिष्यति।') इत्युपक्रमे मृदङ्गशब्दश्रवरगादनन्तरं सर्वाण्येव पात्राणि प्रथमाङ्कप्रक्रान्त- पात्रसंक्रान्तिदर्शन द्वितीया ड्वादावारभन्त इति प्रथमाड्कार्थाविच्छेदेनैव द्वितीय। डस्या- वतरणादङ्कावतार इति।

५. अङ्गावतार जहाँ (पूर्व) अङ्क का अन्त हो जाने पर (अग्रिम) अङ्क का अरप्रभिन्न (अविच्छिन्न) रूप से अवतरण हो जाता है, वह अङ्कावतार कहलाता है। जहाँ पहिले अङ्क में प्रविष्ट पात्र के द्वारा सूचित किया गया, पहिले श्रङ्ध की कथा का विच्छेद किये बिना ही अङ्क अवतरित हो जाता है तथा प्रवेशक विष्कम्भक आदि का प्रयोग नहीं होता वह अङ्गावतार है। जैसे मालविकाग्निमित्र के प्रथम अङ्ग के अन्त में 'विदूषक-तो आप दोनों देवी के प्रेक्षागृह में जाकर सङ्गीत की सामग्री एकत्र करके उनके पास दूत भेज दीजिये अथवा मृदङ्ग का शब्द ही इन्हें उठा देगा'। इस प्रकार का उपकम होने पर मृदङ्ग का शब्द सुनने के पश्चात सभी पात्र द्वितीय अङ्ध के आरम्भ में प्रथम अङ् में प्रविष्ट पात्रों (हरदत्त और गणदास) के शिष्य-शिक्षा-क्रम (संक्रान्ति) का अवलोकन आरम्भ कर देते हैं। इस प्रकार यहाँ प्रथम अङ्ग की कथा का विच्छेद किये बिना ही द्वितीय अङ्ग अवतरित होता है अरतः अङ्कावतार (नामक अरथोपक्षेपक) है। टिप्परणी-(१) ना० शा० (१६.११५) के अनुसार अङ्कावतार का लक्षण है-जहाँ प्रयोग का आश्रय लेकर पूर्व अङ्क के अन्त में ही अग्रिम अङ्क अरवतरित हो जाता है, वह बीजार्थ की युक्ति से युक्त अङ्कावतार कहलाता है। ना० द० (१.२३) के अनुसार इसका लक्षण है-'सोऽङ्कावतारो यत् पात्र रङ्गान्तरमसूचनम्' अर्थात् जो पूर्व अङ्ध के पात्रों के द्वारा (विष्कम्भक आदि के माध्यम से अन्य पात्रों के आगमन की) सूचना दिये विना ही दूसरे अङ्क का आरम्भ कर दिया जाता है वह अङ्कावतार कहलाता है। यह लक्षण तथा उदाहरण दशरूपक के समान ही है। सा० द० (६.५८) तथा प्रता० (३.२५) में भी इसी प्रकार का लक्षण है किन्तु वहाँ यह कुछ अधिक स्पष्ट हो गया है। संक्षेप में जहाँ (क) पूर्व अङ्क में

Page 151

१०२ दशरूपकम्

(१२१ क) एभिः संसूचयेत् सूच्यं दृश्यमङ्कै: प्रदर्शयेत् । पुनस्त्रिधा वस्तुविभागमाह- अग्रिम अङ्क की वस्तु सूचित हो जाती है, (ख) उसे सूचित करने के लिये विष्कम्भक या प्रवेशक आदि का प्रयोग नहीं किया जाता। (ग) अग्रिम अङ्क के पात्रों की सूचना नहीं दी जाती; क्योंकि पूर्व अङ्क के पात्र ही अग्रिम अङ्क के आरम्भ में रहते हैं, (घ) पूर्व अङ् की कथा के प्रवाह में ही अग्रिम अङ्क का प्रारम्भ हो जाता है (अविभागतः), वहाँ अङ्कावतार कहलाता है। अङ्कास्य और अङ्कावतार-समा- नता-(क) दोनों किसी अङ्क के अभिन्न अङ्ग होते हैं प्रवेशक आदि की भाँति अङ्क से बाहर नहीं (ख) दो अङ्कों के मध्य में होते हैं। अन्तर यह है-अङ्कास्य में अग्रिम अङ्क पूर्व अङ्ग से असम्बद्ध रूप में आरम्भ होता है (छविन्नाङ्); अर्थात् पूर्व अङ्क का कथांश समाप्त हो जाता है, उस अङ्क में स्थित पात्रों द्वारा दूसरे (विच्छिन्न) कथा- भाग की सूचना दी जाती है और तब उस सूचित तथा पूर्व अङ्क की कथा से असम्बद्ध कथा का अग्रिम अङ्क में आरम्भ होता है। इसके विपरीत अङ्कावतार में पूर्व त्ङ्क के अङ्गरूप में ही अग्रिम अङ्क आरम्भ हो जाता है (अविभागतः)। अभिप्राय यह है कि पूर्व अङ्क की कथा का विच्छेद नहीं होता। अग्रिम अङ्ध की कथा उससे अविच्छिन्न रूप में चलती रहती है। हाँ, उस कथांश की सूचना पूर्व अङ् में श्रप्रवश्य मिल जाती है, जैसे माल० के प्रथम अङ्क के अन्त में हरदत्त और गणदास के शिष्य- शिक्षा-क्रम (संक्रान्ति) की सूचना मिल जाती है। (३) अन्य आचार्यों का मत है कि जिस अङ्क में दूसरे सब अङ्कों के बीजभूत अर्थ की अवतारण होती है वह अ्ङ्कावतार है। जैसे रत्नावली के द्वितीय अङ्क में 'ईदृशस्य कन्यारत्नस्येदृश एव वरेऽभिलाषेण भवितव्यम्' यहाँ सब अङ्कों का बीजभूत अनुराग रूप अर्थ है। इसे गर्भाङ्क भी कहा जाता है (ना० द० १.२३)। इन (उप्युक्त अर्थोपक्षेपकों) के द्वारा सूचित करने योग्य अर्थ को सूचित करना चाहिये और (रङ्गमञच पर) दिखलाने योग्य (दृश्य) वस्तु को अङ्कों के द्वारा दिखलाना चाहिये। टिप्परी -- (१) ना० द० (१.२४) में यह भी बतलाया गया है कि जहाँ बहुत अधिक अर्थ सूचित करना होता है वहाँ विष्कम्भक और प्रवेशक का प्रयोग किया जाता है। उससे अल्प अर्थ यदि सूचनीय हो तो अङ्कास्य का, अल्पतर अर्थ हो तो चूलिका का तथा अल्पतम अर्थ हो तो अङ्कावतार का प्रयोग किया जाता है। (२) अङ्कास्य तथा अङ्कावतार दोनों अङ्ग के अन्तर्गत रहते हैं, विष्कम्भक तथा प्रवेशक अङ्ग से बाहर होते हैं और चूलिका तो यथावसर अङ्ध के भीतर या बाहर हो सकती है (प्रता० ३.२५ टीका) । नाम्य-धर्म की दृष्टि से वस्तु के भेद फिर तीन प्रकार के वस्तु के भेद बतलाये हैं-

Page 152

प्रथम: प्रकाशः .१०३

(१२२) नाटयधर्म मपेक्ष्यैतत्पुनर्वस्तु त्रिधेष्यते ॥६३।। केन प्रकारेण त्रंधं तदाह- (१२३) सर्वेषां नियतस्यैव श्राव्यमश्राव्यमेव च। तत्र- (१२४) सर्वश्राव्यं प्रकाशं स्यादश्राव्यं स्वगतं मतम ॥६४।। सर्वश्राव्यं यद्वस्तु तत्प्रकाशमित्युच्यते। यत्तु सर्वस्याश्राव्यं तत्स्वगतमिति- शब्दाभिधेयम्। नियतश्राव्यमाह- नाट्यधर्म की दृष्टि से भी वस्तु तीन ग्रकार की मानी जाती है।६३॥ टिप्परी -- नाट्यधर्म=अभिनय के नियम; नाटयशास्त्रमर्यादा (प्रभा)। सा० द० (६.१३७) में नाटयधर्म के स्थान पर नाटयोक्ति शब्द का प्रयोग किया है। वस्तुतः ऐसा प्रतीत होता है :- अवस्थानुकृति ही नाटय है। इसमें लोकवृत्त का अनुकरण किया जाता है। लोक में सभी बातें एक रूप से नहीं कही जातीं। कोई बात सबके सामने कही जाती है (सर्वश्राव्य) कोई किसी से छिपाई जाती है तथा दूसरे पर प्रकट की जाती है (नियतश्राव्य)। कोई बात सभी से छिपाकर मन ही मन कही जाती है (अश्राव्य)। इनमें नियतश्राव्य किसी से गोपनीय होता है सभी से नहीं, अश्राव्य तो सर्वथा गोपनीय होता है। किन्तु नाटय में इनकी गोप- नीयता केवल अभिनय करने वाले पात्रों की अपेक्षा से होती है। सामाजिकों को तो ये सब बातें सुनानी होती हैं। यदि सामाजिक इन बातों को न सुन सकेगा तो कथा- प्रवाह में बाधा पड़ेगी और भली भाँति रसास्वादन न किया जा सकेगा। इस प्रकार लोकवृत्त का अनुकरण करने के लिये ही अभिनय में इन विविध उक्तियों का प्रयोग किया जाता है। ये नाट्य के धर्म (=स्वभाव) हैं। इनके प्रयोग से नाटय में स्वा- भाविकता रहती है। तीन भेद किस प्रकार हैं, यह बतलाते हैं- १. सबके ही सुनने योग्य (सर्वश्राव्य), २. नियत जनों के ही सुनने योग्य (नियतश्राव्य) तथा ३. किसी के भी न सुनने योग्य (अश्राव्य)। उनमें- १. प्रकाश, २. स्वगत- सबके सुनने योग्य वस्तु 'प्रकाश' तथा किसी के भी न सुनने योग्य वस्तु 'स्वगत' कहलाती है॥६४।। जो सर्वश्राव्य वस्तु है वह 'प्रकाश' (प्रकट रूप से) इस नाम से कही जाती है किन्तु जो सबके लिये ही अशाव्य होती है वह 'स्वगत' इस शब्द से कही जाती है। नियतश्राव्य को बतलाया है-

Page 153

१०४ दशरूपकम्

(१२५) द्विधाऽन्यन्नाटयधर्माख्यं जनान्तमपवारितम् । अन्यत्तु नियतश्राव्यं द्विप्रकारं जनान्तिकापवारितभेदेन। तत्र जनान्तिकमाह- (१२६) त्रिपताकाकरेणान्यानपवार्यान्तरा कथाम ।६५।। अन्योन्यामन्त्रणं यत्स्याज्जनान्ते तज्जनान्तिकम्। यस्य न श्राव्यं तस्यान्तर ऊर्ध्वसर्वाङ्गुल वक्रानामिकत्रिपताकालक्षणं करं कृत्वाऽन्येन सह यन्मन्त्र्यते तज्जनान्तिकमिति। अन्य नाट्यधर्म (नियतश्राव्य) दो प्रकार का है-जनान्त (जनान्तिक) और अपवारित।

दो प्रकार का होता है। अन्यत् (दूसरा)-नियतश्राव्य तो जनान्तिक और अपवारित के भेद से

३. जनान्तिक- उनमें से जनान्तिक को बतलाते हैं :- वार्तालाप के सन्दर्भ में (अन्तरा) जो त्रिपताका-रूप हाथ (की मुद्रा) के द्वारा अन्यों को बचाकर (अपवार्य)। बहुत से जनों के मध्य में दो पात्र आपस में बात-चीत करते हैं, वह जनान्तिक है ।।६५।। जिस (पात्र) को सुनाना नहीं है उसके बीच में हाथ की सारी अङ्गुलियाँ ऊंची हों, किन्तु अनामिका वकर हो, इस प्रकार त्रिपताका-रूप में हाथ को करके जब कोई पात्र दूसरे के साथ मन्त्रणा करता है वह (संवाद) जनान्तिक कहलाता है। टिप्पणी-(१) दशरूपक में 'जनान्तम्' (जनों के मध्य में) तथा 'जनान्ति- कम्' (जनों के निकट) दोनों शब्दों का प्रयोग किया गया है। धनञ्जय के अनुसार जनान्तिक नामक संवाद की ये विशेषतायें हैं-(क) कोई कथाप्रसङ्ग चलता रहता है उसके सन्दर्भ में यह दूसरे प्रकार का संवाद होताहै (अन्तरा कथाम्)। (ख) बहुत से जनों के मध्य में (जनान्ते) अन्यों को बचाकर दो पात्र परस्पर मन्त्रणा करते हैं। अतः यह अन्यों से गोपनीय संवाद होता है। (ग) अन्य जनों को त्रिपताकाकर से बचा दिया जाता है। जब हाथ की तीन अंगुलियाँ ऊपर उठी होती हैं केवल अनामिका अंगूठे से दबाकर नीचे भुका ली जाती है तो त्रिपताकाकर कहलाता है। यह हाथ की एक मुद्रा है। (२)सा०द० (६.१३६) में दशरूपक का लक्षण ही अपनाया गया है। ना० द० वृत्ति (१.१३) के अनुसार तो जनान्तिक वह संवाद है, जहाँ कोई पात्र त्रिपताकाकर से किसी एक पात्र को बचाकर अन्य बहुसंख्यक जनों से बात करता है। इस प्रकार यह संवाद एक से तो गोपनीय होता है किन्तु बहुतों के लिये श्राव्य होता है। जनान्तिक शब्द की व्युत्पत्ति ही है 'बहूनां (जनानां) अन्तिक भ्राध्यतया निकटं जनान्तिकम्।

Page 154

प्रेथमः प्रकाशः १०५

अथापवारितम- (१२७) रहस्यं कथ्यतेऽन्यस्य परावृत्त्यापवारितम ॥६६।। परावृत्त्यान्यस्य रहस्यकथनमपवारितमिति। नाटयधर्मंप्रसङ्गादाकाशभाषितमाह- (१२८) किं व्रवीष्येवमित्यादि विना पात्रं बर्वीत यत। श्रुत्वेवानुक्तमप्येकस्तत्स्यादाकाशभाषितम् ।।६७।। ४. अपवारित- अब अपवारित को बतलाते हैं- जहाँ (किसी पात्र के द्वारा) मुंह फेरकर (परावृत्त्य) दूसरे (व्यक्ति) से गुप्त बात (रहस्य) कही जाती है, वह अपवारित (संवाद) कहलाता है।६६।। मुंह फेर कर (घूमकर) दूसरे से गुप्त बात कहना ही अपवारित है । टिप्परी- (१) श्लोक तथा वृत्ति में जो 'अन्यस्य' शब्द है वह 'अन्यस्म' के अर्थ में है। ना० द० (१.१२) में भी यही लक्षण है-'परावृत्य रहस्याख्यऽन्यस्मै तदपवारितम्'। नाटकों के सन्दर्भ से भी यही विदित होता है (द्र०, रत्नवली २.१६-२०)। अतः 'रहस्यम् अ्रन्यस्य कथ्यते-रहस्य अन्य से कहा जाता है। (२) दशरूपक के अर्नुसार जनान्तिक औप्रर अपवारित दोनों गोपनीय कथन होते हैं। दोनोंका भेदयह है :- (क)जनान्तिक में त्रिपताकाकर सेअन्य जनों को बचाया बाया जाता है किन्तु अपवारित में मुँह फेर कर (=मुड़कर या घूमकर) अन्यों से बचा जाता है, (ख) जनान्तिक में जनों के मध्य में ही कथा-सन्दर्भ की बात कही जाती है किन्तु अपवारित में एक और मुड़कर रहस्य का कथन किया जाता है। स० द० (६.१३८) में अपवारित का लक्षण दशरूपक के समान ही है (३) ना०द० (१.१०) के अनुसार "मुख मोड़कर किसी दूसरे से रहस्य का कथन करना अपवारित है, यह बहुतों से छिपाकर एक पर प्रकट किया जाता है।" इस प्रकार जनान्तिक से इसका यह भी अन्तर है-जमान्तिक तो एक ज़न से गोपनीय होता है और बहुत जनों के लिये श्राव्य होता है। इसके विपरीत अपवारित बहुत जनों से गोपनीय होता है और एक व्यक्ति के प्रति ही श्राव्य होता है। (इह यद् वृत्तमेकस्यैव गोप्यं बहूनामगोप्यं तज् जनान्तिकम्। तद्विपरीतमपवारितम्-ना० द० (१.११)। ५. आकाशभाषित- नाव्यधर्म के प्रसङ्ग से आकाशभाषित को बतलाते हैं- जहां कोई अकेला पात्र (एकः) दूसरे पात्र के बिना तथा किसी के विना कहे भी मानों सुनकर ही 'क्या कहते हो ?' इस प्रकार कथोपकथन करता है (त्रवीति) वह आकाशभाषित है।

Page 155

१०६ दशरूप कम्

स्पष्टार्थः । अन्यान्यपि नाट्यधर्माशि प्रथमकल्पादीनि कैश्चिदुदाहृतानि तेषामभारतीयत्वा- न्नाममालाप्रसिद्धानां केषांचिद्द शभाषात्मकत्वान्नाट्यधर्मत्वाभावाल्लक्षणं नोक्तमित्युप- संहरति -- (१२६) इत्याद्यशेषमिह वस्तुविभेदजातं रामायणादि च विभाव्य बृहत्कथां च। आरसूत्रयेत्तदनु नेतृरसानुगुरयाच्िचित्रां कथामुचितचारुवच: प्रपञचैः ।६८॥ इति धनञ्जयकृतदशरूपकस्य प्रथमः प्रकाशः समाप्तः ।

इसका अर्थ स्पष्ट है। कुछ (विद्वानों) ने अन्य प्रथमकल्प इत्यादि नास्यधर्मों का भी वर्णन किया है; किनतु वे (प्रथमकल्य आदि) (१) भरत के अनुसार नहीं हैं (अभारतीय, भरतस्येवं भारतीयम्) (२) वे केवल नामावली में ही प्रसिद्ध हैं (उनके लक्षण आदि नहीं कहे गये), उनमें से कुछ देशभाषा रूप में ही हैं। अतः वे नाव्यधर्म नहीं है। इसी से उनका लक्षणा यहाँ नहीं दिया गया। टिप्पणी-(१) सा० द० (६.१३८) में आकाशभाषित का लक्षण दशरूपक के समान ही है किन्तु ना० द० (१.११) के अनुसार 'दूसरे पात्र के बिना स्वयं ही प्रश्न तथा उत्तर का कथन आकाशोक्ति कहलाता है।' इसमें कोई पाव कभी तो किसी प्रश्नकर्त्ता के विना ही प्रश्न की कल्पना करके स्वयं उत्तर देने लगता है और कभी स्वयं प्रश्न करके किसी उत्तरदाता के बिना ही उत्तर की कल्पना कर लेता है। (२) कहिचदुदाहृतानि-यहाँ धनिक ने किन्हीं पूर्ववर्ती नाट्याचार्यों के मत का उल्लेख किया है। ये आचार्य कौन से थे ? यह अन्वेषण का विषय है। (३) देशभाषात्मकत्वात्-देशभाषा रूप में होने के कारण; भाव यह है कि उन आचार्यों ने जो नाटयघर्म कहे हैं, उनमें से कुछ ऐसे हैं जो वस्तुतः नाटय के नियम नहीं हैं अपि तु किन्हीं पात्रों द्वारा किये गये लोकभाषा (Dialect) के प्रयोग मात्र हैं। किन्हीं बोलियों में उस प्रकार की उक्तियाँ प्रचलित थीं उनका कहीं अभिनय में प्रयोग देखकर उन आचार्यों ने उस प्रकार की उक्तियों को नाटयधर्मों में गिन लिया होगा। अब वस्तु का उपसंहार करते हैं- इस प्रकार (कवि) वस्तु के समस्त भेदों का तथा रामायशा आ्ररादि एवं बृहत्कथा का अनुशीलन करके तब (तदनु) नेता और रस के अनुरूप उचित और चारु उक्तियों के द्वारा विचित्र (विलक्षण) कथा को ग्रथित करे ॥६८॥ इस प्रकार धमञ्जयकृत दशरूपक का प्रथम प्रकाश समाप्त हुश।ह

Page 156

प्रथम: प्रकाश: १०७

वस्तुविभेदजातम्-वस्तु=वर्नीयं तस्य विभदजातं नाम भेदाः। रामा- यरगादि बृहत्कथां च गुणगाळ्यनिर्मितां विभाव्य आलोच्य। तदनु=एतदुत्तरम् । नेत्रिति-नेता वक्ष्यमाणलक्षणः, रसाश्च तेषमानुगुण्याच्चित्राम्=चित्ररूपां, कथाम्=आख्यायिकाम्। चारूणि यानि वचासि प्रपञ्चैविस्तर रासूत्रयेदनुग्रथयेत्। तत्र बृहत्कथामूलं मुद्राराक्षसम् -- चासाक्यनाम्ना तेनाथ शकटालगृडे रहः। कृत्यां विधाय सहसा सपुत्रो निहतो नृप:॥ योगानन्दयशःशेषे पूर्वनन्दसुतस्ततः । चन्द्रगुप्तः कृतो राजा चाण क्येन महौजसा ॥६२॥ का इति बृहत्कथायां सूचितम्,श्रीरामायणोक्त रामकथादि ज्ञयम्। ।। इति श्रीविष्युसूनोर्धनिकस्य कृती दशरूपकावलोके प्रथमः प्रकाशः समाप्तः॥

वस्तुविभेदजातम्-वस्तु का अर्थ है वर्णनीय उसका भेदसमूह अरथात अनेक भेद। रामायण आदि तथा गुणाळ्य द्वारा रचित बृहतथा का अनुशीलन करके (आलोच्य=विभाव्य) । तदनु=इसके पश्चात्, (नेतृ इत्यादि का अर्थ है)- नायक, जिसका लक्षण आगे बतलाया जायेगा और रस; उनके अनुकूल, विविधरूप वाली (चित्ररूपाम्) कथा (-आख्यायिका) को; चारु उक्तियों के विस्तार (=प्रपञ्च) द्वारा ग्रथित करे। जैसे मुद्राराक्षस (की कथा) का मूल बृहत्कथा है। बृहत्कथा में संकेत किया गया है :- "चाशक्य नामक उस व्यक्ति ने शकटाल के घर में एकान्त में कृत्या (देवी- विशेष, जो मारण-कर्म के लिये विशेषरूप से पूजी जाती है) को बनाकर पुत्रों सहित राजा को सहसा मार दिया। तत्र योगानन्द की कीर्तिमात्र शेष रह जाने पर (मर जाने पर) महान् शजस्वी चारक्य ने पूर्व नन्द के पुत्र चन्द्रगुप्त को राजा बनाया।" रामकथा इत्यादि रामायण में कही गई (वस्तु) जाननी चाहिये। इति श्रीविष्णुपुत्र धनिक की रचना दशरूपकावलोक में प्रथम प्रकाश पूर्ण हुआ। टिप्पणी-इस प्रकार यहाँ विविध दृष्टिकोणों से वस्तु का विवेचन किया गया है- प्रथमतः स्वरूप की दृष्टि से वस्तु दो प्रकार की है-१ आधिकारिक २ प्रासङ्गिक। इन दोनों के प्रख्यात, उत्पाद्य और मिश्र ये तीन भेद हैं=२x३= ६। इन ६ भेदों के दिव्य, मर्त्य और दिव्यादिव्य भेद से=६ x ३=१८ फल (उद्देश्य), वस्तुयोजना तथा वस्तु-संघटन की दृष्टि से इतिवृत्त में अर्थ- प्रकृति, कार्यावस्था तथा इन दोनों के समन्वित रूप सन्धियों का वर्णन किया गया है। रस और अभिनेयता की दृष्टि से सूच्य तथा हृश्य दो भेद करके श्राव्य, अश्राव्य, नियतश्राव्य आदि नाट्यधर्मों (नाट्योक्ति, कथोपकथन) का उल्लेख किया गया है।

Page 157

१०६ दश रूपकम

इस वस्तु विवेचन से यह स्पष्ट है कि यहाँ 'वस्तु' नामक तत्त्व के भीतर पाश्चात्य साहित्य समीक्षा शास्त्र के कथावस्तु, कथोपकथन, उद्दश्य तथा अभिनेयता (के कुछ अंश) का समावेश किया जा सकता है। देश-काल (के कुछ अंश का) प्रवृत्ति (द्वि0 प्रकाश) में समावेश हो जाता है। इसी प्रकार द्वितीय प्रकाश में निरूपित 'नायक' तत्व में पाश्चात्य समीक्षा पद्धति के 'चरित्र-चित्रण' का समावेश किया जा सकता है। पाश्चात्य 'शैली' तत्त्व के कुछ अंश भारती आदि वृत्तियों में तथा रस-योजना (द्वि० तथा च० प्रकाश) में अन्तर्भूत हो सकते हैं। यहाँ पृथकशः शैली तथा चरित्र-चित्रण पर विचार नहीं किया गया, यहाँ तो रूपकों को रसाश्रित कहा गया है। अभिनेयता को भी यहाँ पृथक् तत्त्व नहीं माना गया। रूपक तो अभिनेय होते ही हैं। इस प्रकार नाटक (रूपक) के तत्त्वों के विषय में पाश्चात्य साहित्य समीक्षा और संस्कृत साहित्य शास्त्र के दृष्टिकोण में यत्किञ्चित् समानता होते हुए भी पर्याप्त अन्तर है। इति प्रथम: प्रकाश:

Page 158

त्रथ द्वितीयः प्रकाशः

रूपकारगामन्योन्यं भेदसिद्धये वस्तुभेदं प्रतिपादयेदानीं नायकभेदः प्रतिपाद्यते- (१) नेता विनीतो मधुरस्त्यागी दक्षः प्रियंवदः । रक्तलोकः शुचिर्वाग्मी रूढवंशः स्थिरो युवा ॥१॥ बुद्धय त्साहस्मृतिप्रज्ञाकलामानसमन्वितः । शूरो दृढश्च तेजस्वी शास्त्रचत्तुश्च धार्मिकः ॥२। नेता नायको विनयादिगुणासम्पन्नो भवतीति। वस्तु, नेता (नायक) और रस को रूपकों (नाटक, प्रकरण आदि) का भेदक तत्त्व कहा गया है (ऊपर सूत्र १६) । इनमें से वस्तु के भेद-प्रभेदों का प्रथम प्रकाश में विवेचन किया जा चुका है। यहाँ द्वितीय प्रकाश में नायक के स्वरूप, भेद-प्रभेदों तथा भारती इत्यादि वृत्तियों एवं प्रवृत्तियों का वर्णन किया जा रहा है। रूपकों का एक दूसरे से भेद सिद्ध करने के लिये (प्रथम प्रकाश में) वस्तु- भेद का प्रतिपादन करके अब (यहाँ) नायक-भेदों का प्रतिपादन किया जा रहा है- नायक के गुण नायक विनीत, मधुर, त्यागी, चतुर, प्रिय बोलने वाला, लोकप्रिय (रक्तो लोको यस्मिन् तथाभूतः), पवित्र, वाक्पटु, प्रसिद्ध वंश वाला, स्थिर, युवक, बुद्धि-उत्साह-समृति-प्रज्ञा-कला तथा मान से युक्त, शूर, दृढ, तेजस्वी शास्त्रों का ज्ञाता और धार्मिक होता है ॥१-२। नेता=नायक; वह विनय आदि गुणों से युक्त होता है। टिप्पणी-(१) नाट्यशास्त्र (२४,१) में स्त्री तथा पुरुषों की प्रकृति तीन प्रकार की बतलाई गई है उत्तम, मध्यम तथा अधम। फिर मध्यम तथा उत्तम प्रकृति के नायकों के चार प्रकार बतलाये गये हैं-धीरोद्धत, धीरललित, धीरोदात्त और धीरप्रशान्त (२४.१६-१७)। इसी प्रकार भा० प्र० (पृ० ६२), ना० द० (१.५-६) तथा सा० द० (३.३०-३१), प्रता० (१.२७-२८) में नायक के गुण तथा भेदों का निरूपणा है। नायक-भेद के लिये विशेष द्रष्टव्य (ना० शा०अ० २४, ना० द० चतुर्थ विवेक०, सा० द० तृतीय परिच्छेद तथा प्रता० नायक-प्रकरण)। (२) रूपक के नायक (नेता) तत्त्व में प्रायः नायक, नायिका तथा उनके सहायक आदि सभी पात्रों का ग्रहण किया जाता है। किन्तु यहाँ नेता (नायक) शब्द प्रधान कथा-नायक के लिये प्रयुक्त हुआ है। प्रथमतः उसी के गुणों तथा प्रकारों का वर्णन किया जा रहा है। कारिका में निर्दिष्ट गुणों का क्रमश; उदाहरणसहित विवेचन इस प्रकार है-

Page 159

११० . दशरूपकध

तत्र विनीतो यथा वीरचरिते- 'यद्ब्रह्मवादिभिरुवासितवन्द्यपादे विद्यातपोव्रतनिधौ तपतां वरिष्ठे। दैवात्कृतस्त्वयि मया विनयापचारस्तत्र प्रसीद भगवन्नयमञ्जलिस्ते ।६३।। मधुर := प्रियदर्शनः । यथा तत्र व- राम राम नयनाभिरामतामाशयस्य सदशी समुद्वहन्। अप्रेतर्क्यगुरामशीयकः सर्वथैव हृदयङ्गमोऽसि मे ॥'६४॥ त्यागी=सर्वस्वदायकः । यथा- 'त्वचं कर्णाः शिविमांसं जीवं जीमूतवाहनः । ददौ दधीचिरस्थीनि नास्त्यदेयं महात्मनाम् ।' ६५ ॥। दक्ष := क्षिप्रकारी। यथा वीरचरिते- 5 स्फूर्जद्वज्तसहस्रनिर्मितमिव प्रादुर्भवत्यग्रतो - रामस्य त्रिपुरान्तकृद्दिविषदां तेजोभिरिद्वं धनुः । शुण्डार: कलभेन यद्वदचले वत्सेन दोर्दण्डक- स्तस्मिन्नाहित एव गजितगुएं कृष्टं च भग्नं च तत् ।।६६।।' १. उनमें विनस्र इस प्रकार का होता है। जँसा महावीरचरित (४.२१) में है- (रामचन्द्र जी परशुराम से कहते हैं)-'ब्रह्मवादियों के द्वारा जिनके चरणों की उपासना और वन्दना की जाती है, जो विद्या, तप तथा व्रत के निधि हैं, तपस्वियों में श्रष्ठ है, उन (आप) के विषय में (प्रति) मैंने दैववश विनय का पतिकमण किया है। भगवन्, अब आप प्रसन्न हो जाइये, यह आपके लिये हाथ जोड़कर प्रणाम (अञ्जलि) है। िजक [यहाँ रामचन्द्र जी की विनम्रता प्रकट हो रही है] २. मधुर का अर्थ है-जो देखने में प्रिय हो। जैसे वहीं (महावीर चरित्र २'३७)- 'हे राम, हे राम, हृदय के समान ही नयनाभिरामता को धारण करने वाले, अकल्पनीय गुरों से रमरीय आप सब प्रकार से मेरे हृदय में स्थित हों।' गी [यहाँ राम का माघुर्य प्रकट हो रहा है] ३. त्यागी का अर्थ है-अपना सब कुछ दान कर देने वाला। जैसे-(?) 'कर्रग ने त्वचा, शिवि ने मांस, जीमूतवाहन ने जीवन और दधीचि ने हड्डयाँ दे दी। महात्माओं के लिये कुछ भी अदेय नहीं है'। यहाँ कर्णा इत्यादि महापुरुषों का त्याग प्रकट हो रहा है] ४. दक्ष का अर्थ है-किसी कार्य को शीघ्रता से करने वाला। जैसे वीरचरित (१.५३) में-'(नेपथ्य में)' दीप्तिमान् हजारों वज्रों से बना हुआ सा, त्रिपुर का अन्त करने वाला, देवताओं के तेज से प्रदीप्त शिव का धनुष राम के सामने प्रकट हो रहा है। जिस प्रकार हाथी का वच्चा (कलभ) पर्वत पर सूंड को रख देता है, उसी प्रकार राजकुमार राम (वत्स) ने अपना भुजदण्ड उस (धनुष) पर रख दिया। गर्जना करती हुई प्रत्यञ्चा वाले उस धनुष को खींच लिया तथा तोड़ डाला।

Page 160

प्रथम: प्रकाश: १११

प्रियंवद := प्रियभाषी। यथा तत्र व- 'उत्पत्तिर्जमदग्नितः स भगवान्देवः पिनाकी गुरु- र्वीर्य यत्तु न तद्गिरां पथि ननु व्यक्त हि तत्कर्मभिः। त्याग: सप्तसमुद्रमुद्रितमहीनिर्व्याजदानावधि: 1 सत्यब्रह्मतपोनिधेर्भगवतः कि वा न लोकोत्तरम् ।।६७।। रक्तलोकः। यथा तत्र व- 'त्रय्यास्त्राता यस्तवायं तनूज- स्तेनादैव स्वामिनस्ते प्रसादात्। राजन्वन्तो रामभद्रेण राज्ञा लब्धक्षेमा: पूर्णकामाश्चरामः॥६८॥' एवं शौचादिष्वप्युदाहार्यम्। तत्र शौचं नाम मनोनैर्मल्यादिना कामाद्यनभि- भूतत्वम्। यथा रघौ- 'का त्वं शुभे कस्य परिग्रहो वा कि वा मदभ्यागमकारणं ते। आचक्ष्व मत्वा वशिनां रघूणां मनः परस्त्रीविमुखप्रवृत्ति ।।६६।। 1

[यहाँ राम की क्षिप्रकारिता प्रकट हो रही है] ५. प्रियंवद का अर्थ है-प्रिय बोलने वाला। जैसे वहीं (वीरचरित २.३६ में ही -(रामचन्द्र जी परशुराम से कहते हैं) 'आपका जन्म जमदग्नि से हुआ्, वह भगवान् पिनाकधारी (शिव) आपके गुरु है, आपका जो पराक्रम है वह वारगी का विषय नहीं हो सकता, वह तो आपके कर्मों से ही व्यक्त हो रहा है, सप्त सागरों से वेष्टित पृथिवी का निरपेक्षभाव से दान कर देना ही आपका त्याग है, क्षात्रतोज, ब्रह्मतेज और तपस्या के निधान आपकी क्या बात लोकोत्तर नहीं है। [यहां रामचन्द्र जी की प्रियवादिता प्रकट हो रही है] ७7६. रक्तलोक: (=लोकप्रिय) । जैसे वहीं (वीरचरित ४.४४ में ही)- (अयोध्या की प्रजा दशरथ से कह रही हैं) 'जो आपका यह पुत्र तीनों वेदों का रक्षक है, आप प्रभु की कृपा से, उस रामभद्र के आज ही राजा बनने से हम सब लोग श्रेष्ठ राजा से युक्त होकर, कुशलता प्राप्त कर, मनोरथों को पूर्ण कर विचरण करेंगे।' ७. इसी प्रकार शौच इत्यादि (नायक-गुणों) का भी उदाहरण दिया जा सकता है। मन की निर्मलता आदि के द्वारा काम आदि (दोषों) से अभिभूत न होना शौच कहलाता है। जैसे रघुवंश (१६.८) में "हे शुभे तुम कौन हो ? किसकी पत्नी हो ? मेरे पास तुम्हारे आने का क्या कारण है ? संयमी रघुवंशियों के मन की प्रवृत्ति पर-स्त्री से विमुख रहती है, यह समभकर मुझे (सब) बतलाओ'। [यहाँ नायक के मन की ऐसी पवित्रता का उल्लेख किया गया है जो पर- स्त्री आदि से अभिभूत नहीं होती]

Page 161

११२ वशरूपकम्

वाग्मी। यथा हनुमन्नाटके- 'बाह्वोबलं न विदितं न च कामुकस्य त्रैयम्बकस्य तनिमा तत एष दोषः । तच्चापलं परशुराम मम क्षमस्व डिम्भस्य दुर्विलसितानि मुदे गुरुणाम्।।७०।। रूढवंशो यथा- 'ये चत्वारो दिनकरकुलक्षत्रसन्तानमल्ली- मालाम्लानस्तबकमधुपा जज्ञिरे राजपुत्राः । रामस्तेषामचरमभवस्ताडकाकालरात्रि- प्रत्यूषोऽयं सुचरितकथाकन्दलीमूलकन्दः ।।७१।। स्थिरो वाङ्मन:क्रियाभिरचञ्चलः। यथा वीरचरिते- 'प्रायश्चितं चरिष्यामि पूज्यानां वो व्यतिक्रमात्। न त्वेव दूषयिष्यामि शस्त्रग्रहमहाव्रतम् ।।७२। यथा वा भर्तृ हरिशतके- 'प्रारभ्यते न खलु विघ्नभयेन नीचैः प्रारभ्य विघ्नविहता विरमन्ति मध्याः । ८. वाग्मी=वाक्कुशल। जैसे हनुमन्नाटक (१.३८) में (रामचन्द्र परशुराम से कहते हैं)-'हे परशुराम, मैंने अपनी भुजाओं के बल को नहीं समझा और न ही त्र्यम्बक (शिव) के धनुष की दुर्बलता को ही। इसीलिये यह (धनुष तोड़ने का) दोष हो गया है। मेरी इस चपलता को क्षमा कीजिये। बालक की दुष्चेष्टायें गुरुजनों के आनन्द के लिये होती हैं'। [यहाँ राम की वाग्मिता प्रकट होती है] ६. रुढवंश वाला (उच्च कुल का)। जैसे (?) 'सूर्यवंश के क्षत्रियों की सन्तान रूपी मल्लिका की माला के न मुरझाये हुए (अम्लान) गुच्छों के भ्रमरों के समान जो चार राजपुत्र उत्पन्न हुए, उनमें राम प्रथम है (अचरमभवः=अन्त में उत्पन्न न होने वाला) जो ताडका रूपी कालरात्रि के लिये प्रभात हैं, सुचरित कथा रूपी कन्दली के मूलकन्द हैं'। [यहाँ राम की कुलीनता प्रकट हो रही है] १०. स्थिर का अर्थ है-वाणगी, मन तथा कार्य से चञ्चल न होना। जैसे वीरचरित (३.८) में (परशुराम विश्वामित्र से कहते हैं)-'आप जैसे पूज्य जनों का अतिक्रमण करने के कारण मैं प्रायश्चित्त कर लूगा किन्तु शस्त्रग्रहण के महाव्रत को दूषित नहीं करूगा'। [यहाँ परशुराम की स्थिरता प्रकट हो रही है] अथवा जैसे भतृ हरिशतक (२६ ) में (कवि कहता है )-नीच जन विष्नों के भय से किसी कार्य को आरम्भ ही नहीं करते मध्य कोटि के लोग कार्य

Page 162

द्वितीय: प्रकाशः ११३

विध्नैः पुनः पुनरपि प्रतिहन्यमाना: प्रारब्धमुत्तमजना न परित्यजन्ति।।७३।। युवा प्रसिद्धः। बुद्धिर्ज्ञानम्। गृहीतविशेषकरी तु प्रज्ञा। यथा मालविकाग्निमित्रे -- 'यद्यत्प्रयोगविषये भाविकमुपदिश्यते मया तस्यै। तत्तद्विशेषकरणात् प्रत्युपदिशतीव मे बाला ।।७४।' स्पष्टमन्यत्। नेतृविशेषानाह- (२) भेदैश्चतुर्धा ललितशान्तोदात्तोद्धतैंरयम। यथोद्देशं लक्षणमाह- रुक जाते हैं। किन्तु उत्तम जन विध्नों से बार-बार प्रतिहत होकर भी आरम्भ किये हुए कार्य को नहीं छोड़ते। [यहाँ उत्तमजनों की स्थिरता दिखलाई गई हैं] ११. 'युवा' का अरथ स्पष्ट ही है। बुद्धि का अर्थ है-ज्ञान किसी वस्तु को जानना। किन्तु गृहीत (ज्ञान) में विशेषता उत्पन्न करने वाली प्रज्ञा कहलाती है। जैसे मालविकाग्निमित्र (१.५) में गणदास मालविका के विषय में कहता है मेरे द्वारा 'प्रयोग के विषय में जिस-जिस भाव का उपदेश दिया गया है उसमें ही विशेषता उत्पन्न करने के कारण वह बाला (मालविका) मानों मुझे बदले ही में उपदेश दे देती है'। अन्य (गुणों के उदाहरण आदि) स्पष्ट ही हैं। ११-२६)। टिप्पणी-मि०, ना० शा० (२४.३-४), सा० द० (३.३०), प्रता० (१. नायक के प्रकार नायक के प्रकार बतलाते हैं- यह (नायक) ललित, शान्त, उदात्त और उद्धत भेद से चार प्रकार का होता है। टिप्पणी-(१) ना० शा० (२४.१७), भा० प्र० (पृ० ६२) ना० द० (१.६), सा० द० (३.३१), प्रता० (१.२७) आदि। (२) 'ललित' आदि चारों से पूर्व धीर शब्द जोड़कर १. धीरललित, २. धीरप्रशान्त, ३. धीरोदात्त तथा ४. धीरोद्धत, ये चार प्रकार के नायक माने जाते हैं। (३) 'धीर' शब्द का अर्थ है- वैर्ययुक्त अर्थात् महान् संकट में भी कातर न होने वाला (ना० द० १.६) (Self- Controlled-Haas) । सा० द० (३.५३) के अनुसार 'महान् विघ्न उपस्थित होने पर भी अपने निश्चय से विचलित न होना ही धैर्य है। नाम-निर्देश के क्रम से लक्षण बतलाते हैं- १. धीरललित- * 'प्रारब्धमुत्तमगुणास्त्वमिहोद्वहन्ति' इति पाठान्तरम्।

Page 163

११४ दशरूपकम्किमी

(३) निश्चिन्तो धीरललितः कलासक्तः सुखी मृदु: ॥३॥ सचिवादिविहितयोगक्षेमत्वाच्चिन्तारहितः अतएव गीतादिकलाविष्टो भोग- प्रवश्च शृङ्गारप्रधानत्वाच्च सुकुमारसत्त्वाचारो मृदुरिति ललितः। यथा रत्नावल्याम्- 'राज्यं निर्जितशत्रु योग्यप्चिवे न्यस्तः समस्तो भर:' सम्यक्पालनलालिता: प्रशमिताशेषोपसर्गाः प्रजाः । प्रद्योतस्य सुता वसन्तसमयस्त्वं चेति नाम्ना धृर्ति काम: काममुपैत्वयं मम पुनर्मन्ये महानुत्सवः ।।७५।। प्रथ शान्त :- (४) सामान्यगुशयुक्तस्तु धीरशान्तो द्विजादिक: । चिन्ता रहित, (गीत आदि) कलाओं का प्रेमी, सुखी और कोमल (स्वभाव तथा आरचार वाला) नायक धीरललित कहलाता है। वह चिन्तारहित होता है, क्योंकि उसके योग (अप्राप्त वस्तु की प्राप्ति- अप्राप्तस्य प्राप्तिर्योग:) तथा क्षेम (प्राप्त वस्तु की रक्षा-प्राप्तस्य परिरक्षणं योगः) की सिद्धि अमात्य इत्यादि के द्वारा कर दी जाती है। चिन्तारहित होने के कारण (अतएव) वह गीत आदि कलाओं में संलग्न रहता है और भोगों में आसक्त रहता है। उसमें शृङ्गार (भाव) की प्रधानता होने के कारण वह कोमल स्वभाव (=सत्व=चित्त) तथा व्यवहार वाला होता है। इसी से उसे 'मृदु' कहा गया है। यही ललित नायक है। जैसे रत्नावली नाटिका (१.६) में (महाराज उदयन विदूषक से कर रहे हैं)-'ऐस। राज्य है जिसके शत्रुओं को जीत लिया गया है, योग्य मन्त्री पर समस्त भार रख दिया गया है; प्रजाएँ, जिनके समस्त उपद्रव शान्त कर दिये गये हैं ठीक प्रकार से पालन के द्वारा वृद्धि को प्राप्त हो रही हैं, प्रद्योत की पुत्री (वासवदत्ता), वसन्त का समय और तुम (मित्र) हो, इससे कामदेव (मदनोत्सव) नाम के कारण सन्तोष भले ही प्राप्त कर ले, किन्तु मैं समझता हूँ कि यह मेरा ही महान् उत्सव है'। टिप्पणी-इस वर्शन से प्रकट होता है कि रत्नावली का नायक उदयन निश्चिन्तता इत्यादि धीरललित नायक के गुणों से युक्त है अतः वह धीरललित नायक है। (२) भा० प्र० (पृ० ६२), ना० द० (१.६), सा० द० (३.३४), प्रता० (१.३२) । २. धीरशान्त सामान्य गुणों से युक्त द्विज आदि नायक तो धीर प्रशान्त कहलाता है।

Page 164

द्वितीय: प्रकाश। ११५

विनयादिनेतृसामान्यगुणयोगी घोरशान्तो द्विजादिक इति। विप्रवशिक्सचिवादीनां प्रकरणनेतृणामुपलक्षणं, विविक्षतं चैतत्, तेन नैश्चिन्त्यादिगुणसंभवेऽपि विप्रादीनां शान्ततैव, न लालित्यं, यथा मालतीमाधव-मृच्छकटिकादौ माधवचारुदत्तादिः । 'तत उदयगिरेरिवक एव स्फुरितगुरद्युतिसुन्दर: कलावान्। इह जगति महोत्सवस्य हेतु- नयनवतामुदियाय बालचन्द्रः ।७६।। इत्यादि। यथा वा- 'मखशतपरिपूत गोत्रमुद्द्ासितं यत् सर्दास निबिडचैत्यब्रह्मघोषैः पुरस्तात्। मम निधनदशायां वर्तमानस्य पापै- स्तदसदृशमनुष्यैर्घुष्यते घोषणायाम्' ॥७७॥ (इत्यादि) विनय इत्यादि जो नायक के सामान्य गुण (कहे गये) हैं उनसे युक्त द्विज आदि धीरशान्त होता है। द्विज इत्यादि' यह कथन प्रकरण के नायक होने वाले ब्राह्मस, वशिगक और मन्त्री आदि का उपलक्षण है। और, यह कहना अभीष्ट ही है। इस प्रकार निश्चिन्तता आदि गुरों के होने पर भी (प्रकरण के नायक) विप्र इत्यादि में शान्तता ही होती है, लालित्य नहीं। जैसे मालतीमाधव और मृच्छकटिक आदि में माधव एवं नारुदत्त आदि धीर प्रशान्त नायक हैं। जैसे (कामन्दकी माधव का वर्णन करती हुई कहती है)-"प्रकट होने वाले गुणों की कान्ति से सुन्दर, कलाओं वाला (१. नृत्य आदि कलाओं में निपुणण २. चन्द्रपक्ष में चन्द्रकलाओं से युक्त), इस संसार में नेत्र वालों के महोत्सव का निमित्त यह (माधव) उस देवरात से (ततः-तस्मात्) इसी प्रकार उत्तन्न हुआ जिस प्रकार उदयगिरि से बालचन्द्र उदित होता है"। इत्यादि। अथवा जैसे मृच्छकटिक (१०.१२) में मखशत० इत्यादि (ऊपर उदा० ४०) टिप्परी-(१) प्रकरणनेतृणगाम उपलक्षणम्-यहाँ 'द्विजादिक' (ब्राह्मण इत्यादि) शब्द प्रकरण (नामक रूपक-भेद) के नायकों को सूचित करता है। आगे (३.३६) जो प्रकरण के नायक कहे गये हैं -अमात्य, विप्र, वशिक वे धीरप्रशान्त होते हैं (२) विवक्षितं चैतत्- विप्र आदि धीरप्रशान्त होते हैं, यही अभीष्ट है। इस प्रकार यह नियम हो जाता है कि-विप्र इत्यादि धीर प्रशान्त ही होते हैं। यदि किसी विप्र आदि में धीरललित के गुरा (निश्चिन्तता इत्यादि) हों तो भी वह धीरप्रशान्त ही माना जायेगा। किन्तु यहाँ यह नियम नहीं होता कि विप्र आदि ही धीरप्रशान्त होते हैं। इसलिये अन्य क्षत्रिय (राजा) आदि भी धीरप्रशान्त हो सकते हैं जैसे बुद्ध धीरप्रशान्त नायक है।

Page 165

११६ दशरूपकमु

अथ धीरोदात :- (x) महासत्त्वोऽतिगम्भीरः क्मावानविकत्थनः ।।४।। स्थिरो निगूढाहङ्कारो धीरोदात्तो दृढव्रतः। महासत्त्व: =शोककोधाद्यनभिभूतान्तःसत्त्वः, अविकत्थनः=अनात्मश्लाघनः, नगूढाहङ्कार := विनयच्छन्नावलेपः, दृढव्रतः=अङ्गीकृतनिर्वािकः, धीरोदात्तः । यिथा नागानन्दे-'जीमूतवाहन :- शिरामुखः स्यन्दत एव रक्तमद्यापि देहे मम मांसमस्ति। तृप्ति न पश्यामि तवैव तावत् कि भक्षणात्वं विरतो गरुत्मन्॥७८॥। यथा च रामं प्रति- आाहूतस्याभिषेकाय विसृष्टस्य वनाय च। न मया लक्षितस्तस्य स्वल्पोऽप्याकारविभ्रमः ।७६।। यच्च केषांचित्स्थैर्यादीनां सामान्यगुानामपि विशेषलक्षणे क्वचित्सकीर्तनं तत्तेषां तत्र।धिक्यप्रतिपादनार्थम्। ३. धीरोदात्त- उत्कृष्ट अन्त:करण (सत्त्व) वाला, अत्यन्त गम्भीर, क्षमाशील, आत्म- श्लाघा न करने वाला, स्थिर, अहंभाव को दबाकर रखने वाला, दढव्रती नायक धीरोदात्त कहलाता है।४।। 'महासत्व' का अरथ है-जिसका अन्तःकरण शोक, क्रोध आदि से अभिभूत नहीं होता। 'अविकत्थन' का अर्थ है अपनी प्रशंसा न करने वाला। निगूढाहङ्गार का अर्थ है कि उसका गर्व (अवलेप) नम्रता से छिपा रहता है। दृढव्रत वह होता है जो स्वीकृत बात का निर्वाह करता हैं। ऐसा धोरोदात्त नायक होता है। जैसे नागानन्द नाटक में जीमूतवाहन है (जीमूतवाहन की गरुड़ के प्रति उक्ति ५'१६)- 'हे गरुड़, मेरी नसों के छिद्र से रक्त बह ही रहा है, अब भी मेरे शरीर में मांस है, तुम्हारी भी तो मैं तृप्ति नहीं देख रहा हूँ, फिर तुम (मुझको) खने से क्यों रुक गये' ? और जैसे राम के प्रति कहा गया है-'अभिषेक के लिये बुलाये गये और वन के लिये भेजे गये राम का (तस्य) मुझे तनिक भी आकृति-विकार नहीं दिखाई पड़ा'। यहाँ स्थिरता इत्यादि (नायक के) किन्हीं सामान्य गुणों का भी जो कहीं विशेष (प्रकार के नायक के) लक्षण में उल्लेख कर दिया गया है वह उन गुखों का उस विशेष प्रकार के नायक में (तत्र) आधिक्य बतलाने के लिये है। टिप्पणी-यह शङ्का हो सकती है कि नायक के सामान्य गुणों में स्थैर्य या स्थिरता का कथन किया जा चुका है फिर यहाँ धीरोदात्त नायक के लक्षण में स्थैयं का क्यों उल्लेख किया है ? इसका समाधान 'यच्च०' इत्यादि में किया गया है कि अन्य नायकों की अपेक्षा धीरोदात्त नायक में स्थिरता गुण का आधिक्य होता है, यह बतलाने के लिये यहाँ पुनः 'स्थिरः' यह कहा गया है।

Page 166

द्वितीय: प्रकाश: ११७

ननु च क्थ जीमूतवाहनादिनगिानन्दादावुदात्त इत्युच्यते ? शदात्त्यं हि नाम सर्वोत्कर्षेण वृत्तिः, तच्च विजिगीषुत्व एवोपपद्यते जीमूतवाहनस्तु निर्जिगीषुतयैव कविना प्रतिपादितः । यथा- 'तिष्ठम्भाति पितुः पुरो भुवि यथा सिंहासने किं तथा यत्संवाह्यतः सुखं हि चरणी तातस्य कि राज्यतः । कि भुक्ते भुवनत्रये धृतिरसी भुक्तोज्भिते या गुरो- रायासः खलु राज्यमुज्भितगुरोस्तत्रास्ति कश्चिद् गुरः ॥'८०॥ इत्यनेन। 'पित्रोविधातु शुश्रूषां त्यक्त्वैश्वर्यं क्रमागतम्। वनं याम्यहमप्येष यथा जीमूतवाहनः ।।'८१॥ इत्यनेन च। अतोऽस्यात्यन्तशम प्रधानत्वात्परमकारुशिकत्वाच्च वीतरागवच्छान्तता अन्यच्चात्रायुक्त यत्तथाभूत राज्यसुखादौ निरभिलाषं नायकमुपादायान्तरा तथाभूत- (शङा) (i) नागानन्द आदि (नाटक) में जीमूतवाहन इत्यादि धीरोदात्त नायक है, यह कैसे कहा जा सकता है ? क्योंकि उदात्त का अर्थ है- सर्वोकृष्ट रूप में रहना (वृत्ति) और, यह बात विजय की आकांक्षा होने पर ही बन सकती है। किन्तु जीमूतवाहन को तो कवि ने विजय की आकांक्षा से रहित ही वशित किया है। जैसे-(नागानन्द १.७) 'पिता के सामने सुमि पर बैठा हुआ (व्यक्ति) जैसा शोभित होता है, क्या वैसा सिंहासन पर बैठा हुआ (शोभित) हो सकता है ? पिता के चरण दबाते हुए को जो सुख मिलता है, क्या वह राज्य से मिल सकता है ? पिता के खाने से बचे हुए (भुक्तोज्भिते) पदार्थ को खाने से जो सन्तोष (धृति) मिलता है, क्या वह तीनों लौकों के भोग से भी मिल सकता है? पिता का परित्याग करने वाले के लिये राज्य तो केवल आयास मात्र है, क्या उसमें कुछ भी लाभ है' ? इसके द्वारा तथा नागानन्द (१-४)-क्रमागत (वंशपरम्परागत) ऐश्वर्य को छोड़कर माता-पिता की सेवा करने के लिये मैं वन को जा रहा हूँ, जैसे जीमूतवाहन चला गया था'। इसके द्वारा भी (जीमूतवाहन को विजय की झाकांक्षा से रहित दिखलाया गया है)। इसलिए इस (जीमूतवाहन) में अत्यधिक शम (निर्वेद) की प्रधानता है और अत्यन्त करुरगा-परायता है, अतः यह वीतराग (राग-रहित) की भाँति शान्त (धीरप्रशान्त) ही है। (ii) [यदि कोई कहे कि मलयवती के प्रति जीमूतवाहन के अनुराग का भी कवि ने बर्णन किया है अतः वह अत्यन्त शमप्रधान, वीतराग या निरभिलाष नहीं है-इस पर पूर्वपक्षी कहता है] और, नागानन्द नाटक में (अत्र) यह तो अनुचित ही है कि जो उस प्रकार के राज्य और सुख आदि में निरभिलाष नायक को लेकर उसके विषय में (अन्तरा) इस प्रकार मलयवती के अनुराग का वर्णन किया गया है।

Page 167

११८ दशरूपकम्

मलयवत्यनुरागोपवर्णनम् । यच्चोक्तम्-'सामान्यगुणयोगी द्विजादिर्धीरशान्तः' इति। तदपि पारिभाषिकत्वादवास्तवमित्यभेदकम्। अतो वस्तुस्थित्या बुद्ध-युधिष्ठिर-जीमूत- वाहनादिव्यवहाराः शान्ततामाविर्भावयन्ति । अत्रोच्यते-यत्तावदुक्तं सर्वोत्कर्षेण वृत्तिरौदात्त्त्यमिति न तज्जीमूतवाहनादौ परिहीयते। न ह्येकरूपैव विजिगीषुता। यः केनापि शौर्यत्यागदयादिनाऽन्यानतिशेते स विजिगीषुः, न यः परापकारेणार्थग्रहादिप्रवृत्तः। तथात्वे च मार्गदूषकादेरपि धीरोदा- त्तत्वप्रसक्तिः । रामादेरपि जगत्पालनीयमिति दुष्टनिग्रहे प्रवृत्तस्य नान्तरीयकत्वेन (iii) और, जो यह कहा गया है कि (विनय आदि) सामान्य गुणों से युक्त (प्रकरण के नायक होने वाले) ब्राह्मण, वैश्य, अमात्य (द्विजादि) धीर= प्रशान्त नायक होते हैं (अतः जीमूतवाहन धीरप्रशान्त नहीं हो सकता); वह कथन भी पारिभाषिक है वास्तविक नहीं (मिथ्या है) इसलिए भेदक (व्यावतक) नहीं। टिप्पणी-भाव यह है कि प्रकरगण के नायक ब्राह्मण आदि धीरप्रशान्त नायक होते हैं, यह कथन पारिभाषिक है, यह तो धनञ्जय की कल्पना है, वस्तुस्थिति तो यह है कि जिस व्यक्ति में धीरप्रशान्त के गुण होंगे वही धीरप्रशान्त हो जायेगा। इस प्रकार केवल कल्पित परिभाषा के द्वारा जीमूतवाहन को धीरप्रशान्त नायक होने से नहीं रोका जा सकता, या कहिये कि यह परिभाषा जीमतवाहन से धीरप्रशान्त के लक्षण की व्यावृत्ति (भेद) नहीं कर सकती। इस प्रकार वस्तु स्थिति की दृष्टि से बुद्ध, युधिष्ठिर और जीमूतवाहन आदि के व्यवहार (चरित्र) उनकी शान्तता को प्रकट करते हैं (उनके चरित्र से प्रकट होता है कि वे धीरप्रशान्त नायक हैं)। (समाधान) इस पर कहा जाता है-(i) जो यह कहा गया है कि सर्वोत्कृष्ट रूप में रहना उदात्तता है इत्यादि। उस उदात्तता का जीमूतवाहन में भी अभाव नहीं है (परिहीयते)। क्योंकि विजय की आकांक्षा केवल एक प्रकार की ही नहीं होती अपितु जो व्यक्ति शोर्य, त्याग, दया आदि (गुरों) के द्वारा दूसरों से बढ जाता है (अतिशते) वही विजिगीषु (विजयाकांक्षी) है। जो दूसरों का अपकार करके धन बटोरने आदि में लगा रहता है, वह विजिगीषु नहीं है। यदि उसे भी विजिगीषु माना जाये (तथात्वे=वैसा होने पर) तो बटमार (मार्गदूषक) आदि भी धीरोदात्त होने लगेंगे। [यहाँ यदि कोई कहे कि राम ने भी रावण आदि का वध करके भूमि, सम्पत्ति तथा यश आदि प्राप्त किया था फिर तो वे भी उदात्त नायक नहीं होंगे- इसका समाधान करते हुए कहते हैं-] 'जगत् का पालन करना है', इस विचार से दुष्टों को दण्ड देने में प्रवृत्त हुए राम आदि को भी आनुषङ्गिक रूप से (=नान्तरीयकत्वेन) भूमि आदि की

Page 168

द्वितीय: प्रकाश: ११६

भूम्यादिलाभः। जीमूतवाहनादिस्तु प्राएरपि परार्थसम्पादनाद्विश्वमप्यतिशेते, इत्युदा- त्ततमः । यच्चोक्तम्-'तिष्ठन्भाति' इत्यादिना विषयसुखपराङ्मुखतेति, तत् सत्यम्- कार्पण्यहेतुषु स्वसुखतृष्णासु निरभिलाषा एव जिगीषवः, तदुक्तम्- 'स्वसुखनिरभिलाषः खिद्यसे लोकहेतोः प्रतिदिनमथवा ते वृत्तिरेवंविधैव। अनुभवति हि मूर्ध्ना पादपस्तीव्रमुष्णं शमयपि परितापं छाययोपाश्रितानामु ।८२॥' इत्यादिना। मलयवत्यनुरागोपवर्रनं त्वशान्तरसाश्रयं शान्तनायकतां प्रत्युत निषेधति। शान्त- त्व चानहंकृतत्वं, तच्च विप्रादेरौचित्यप्राप्तमिति वस्तुस्थित्या विप्रादेः शान्तता न स्व- परिभाषामात्रेण। बुद्धजीमूतवाहनयोस्तु कारुशिकत्वाविशेषेऽपि सकामनिष्कामकरुण- त्वादिधर्मत्वाद्धदः। अतो जीमूतवाहनादेर्धीरोदात्तत्वमिति। प्राप्ति हो गई [वहाँ किसी के अपकार की भावना से धन-ग्रहण आदि नहीं है अ्तः राम आदि की उदात्तता में शङ्का करना ठीक नहीं]। और, जीमूतवाहन आदि तो प्राणों के द्वारा भी दूसरों का हित-सम्पादन करते हैं इस प्रकार सभी (विश्वम् अपि) से बढ़कर हैं अतः (उदात्त ही नहीं) उदात्ततम नायक हैं। और, जो (पूर्वपक्षी ने) कहा है कि 'तिष्ठन् भाति' इत्यादि के द्वारा (जीमूतवाहन की) विषय पराङ्मुखता प्रकट होती है, वह ठीक ही है, (सच्चे) विजिगीषु जन कार्पण्य (तुच्छता) को उत्पन्न करने वाली, अपने सुख की इच्छा के प्रति अभिलाषा रहित ही होते हैं। यही कहा भी है (शाकुन्तल ५.६ में दुष्यन्त के प्रति) "आप प्रतिदिन अपने सुख के प्रति अभिलाषा-रहित होकर लोक-(हित) के लिए कष्ट-सहन करते हैं; अथवा आपकी रचना (जन्म) ही इस प्रकार की हुई है। क्योंकि वृक्ष अपने सिर पर तीव्र उष्सता को सहन करता है, और अपनी छाया से आश्रित जनों के सन्ताप को शान्त करता है।' इत्यादि। (ii) मलयवती के प्रति (जीमूतवाहन के) अनुराग का वर्णन तो शान्त रस के अनुकूल नहीं हो सकता, बल्कि वह (जीमूतवाहन के) शान्त नायक होने का ही निषेध करता है। (iii) और, शान्तता का अरथ है-ग्रहंकार से रहित होमा (अहंकारंशून्यता) उसका ब्राह्मण इत्यादि में होना उचित (स्वाभाविक) ही है। इस प्रकार वस्तुतः ही ब्राह्मा इत्यादि में शान्तता होती है, केवल अपनी (कल्पित) परिभाषा से ही उनमें शान्तता नहीं मानी गई। यद्यपि बुद्ध और जीमूतवाहन दोनों में समानरूप से (अविशेष) करुण-भाव है तथापि (जीमूतवाहन में) सकाम करुणभाव और (बुद्ध में) निष्काम करुणभाव होने से दोनों में भेद है। इस प्रकार जीमृतवाहन इत्यादि धीरोदात्त नायक ही हैं।

Page 169

१२० देशरूपकम

अथ धीरोद्धत :- (६) दर्पमात्सर्यभूयिष्ठो मायाच्छद्मपरायणः ।।५।। धीरोद्धतस्त्वहङ्कारी चलश्चएडो विकत्थनः । दर्प := शौर्यादिमदः, मात्सर्यम्=असहनता, मन्त्रबलेनाविद्यमानवस्तुप्रकाशनं माया, छद्=वञ्चनामात्रम्, चलः=अनवस्थितः, चण्डः=रौद्रः, स्वगुणशंसी= विकत्थनो धीरोद्धतो भवति, यथा जामदग्न्यः-'कैलासोद्धारसारत्रिभुवनविजय' टिप्पणी-(१) हर्ष-कृत नागानन्द नाटक का नायक जीमूतवाहन है। धनिक की दृष्टि से वह धीरोदात्त नायक है। पूर्वपक्षी इस मत से सहमत नहीं। उसके अनुसार जीमूतवाहन धीरप्रशान्त नायक है। संक्षेप में उसकी तीन युक्तियाँ हैं, जिनका अभी अनुवाद में क्रमशः विवरण दिया गया है। उन तीनों युक्तियों का खण्डन करके धनिक ने यह सिद्ध किया है कि जीमूतवाहन धीरोदात्त नायक ही है (द्र०, अनुवाद) (२) विजिगीषुता (विजयाकांक्षा) उदात्त नायक का विशिष्ट गुण माना गया है (मि०, भा० प्र०, पृ० ६३ पं० ४)। (३) अतोऽस्य दीतरागवत् शान्तता-इस वाक्य द्वारा पूर्वपक्षी की ओर से जीमूतवाहन को शान्त नायक सिद्ध करने के लिये अनुमान प्रस्तुत किया गया है। अनुमान का प्रकार है :- जीमूतवाहन धीरप्रशान्त नायक है (प्रतिज्ञा); क्योंकि उसमें शम की प्रधानता है और वह परम कारुशिक है (हेतु); वीतराग के समान (उदाहरण) । यहाँ 'वीतराग' शब्द से 'बुद्ध' का ग्रहण होता है (?)। (४) शान्तत्वं चानहंकृतत्वम्-शान्त में तो अ्हंकार का सर्वथा अभाव होता है किन्तु उदात्त का अहंकार विनय के द्वारा छिपा रहता है, यही भेद है (द्र०, ना० द० १.६)। (५) बुद्धजीमूतवाहनयोस्तु ... भेदः-धनिक ने पूर्वपक्षी के अनुमान में दृष्टान्तदोष दिखलाया है। बुद्ध की करुणा निष्काम है, जीमूतवाहन की सकाम। इस धर्मभेद के कारण दृष्टान्त ठीक नहीं; तथा अनुमान अयुक्त है। भाव यह है कि बुद्ध धीरप्रशान्त हैं, किन्तु जीमूतवाहन धीरोदात्त हैं। ४. धीरोद्धत जिसमें घमएड (दर्प) और डाह (मात्सर्य) अधिक होता है, जो माया और कपट में तत्पर होता है, अहकारी, चञ्चल, क्रोधी तथा श्रत्म- श्लाघा करने वाला है, वह धीरोद्धत नायक है ॥५॥ दर्प=शूरता इत्यादि का घमण्ड, मात्सर्य=(दूसरों की समृद्धि को) न सहना; मन्त्र की शक्ति से अविद्यमान वस्तु को प्रकट कर देना माया कहलाती है और किसी को छलना मात्र ही छद है; चल का अर्थ है अस्थिर (चञ्चल); चण्ड=क्रोधयुक्त; विकत्थन=अपने गुणों की प्रशंसा करने वाला; ऐसा धीरोद्धत नायक होता है। जैसे (महावीर चरित २.१६ में) परशुराम के 'कैलासोद्वारसार०

Page 170

द्वितीय: प्रकाश: १२१

इत्यादि। यथा च रावणः-'त्रैलोक्यैश्वर्यलक्ष्मीहठहरणसहा बाहवो रावणस्य।' इत्यादि। धीरललितादिशब्दाइच यथोक्तगुणसमारोपितावस्थाभिधायिनः, वत्सवृषभमहोक्षा- दिवन्न जात्या कश्चिदवस्थितरूपो ललितादिरस्ति, तदा हि महाकविप्रबन्धेषु विरुद्धानेक- रूपाभिधानमसङ्गतमेव स्यात्-जातेनरपायित्वात्, यथा च भवभूतिनैक एव जामदग्न्य :-- 'ब्राह्मणातिकमत्यागो भवतामेव भूतये ॥ जामदग्न्यश्च वो मित्रमन्यथा दुर्मनायते ।।८३।' इत्यादिना रावसं प्रति धीरोदात्तत्वेन 'कैलासोद्धारसार-' इत्यादिभिश्च रामा- दीन्प्रति प्रथमं धीरोद्धतत्वेन, पुनः-'पुण्या ब्राह्मणाजातिः' इत्यादिभिश्च धीरशान्त- त्वेनोपवर्गिगतः। न चावस्थान्तराभिधानमनुचितम्, अङ्गभूतनायकानां नायकान्तरापे- क्षया महासत्त्वादेरव्यवस्थितत्वात् । अङ्गिनस्तु रामादेरेकप्रबन्धोपात्तान् प्रत्येकरूपत्वा- इत्यादि कथन से धीरोद्धतता प्रकट होती है। और, जैसे 'त्रैलोक्य०' (रावण की भुजाएँ तीनों लोकों के ऐश्वर्य की लक्ष्मी का बलपूर्वक हरण करने में समर्थ हैं) इत्यादि (रावण की उक्ति) के द्वारा रावण धीरोद्धत है (यह प्रकट होता है)। धीरललित आदि शब्द अवस्था-वाचक (i) धीरललित आदि शब्द उसी प्रकार यथोक्त (निश्चिन्तता आदि) गुणों से युक्त अवस्था को बतलाने वाले हैं, जिस प्रकार वत्स (बछड़ा), वृषभ (बैल) तथा महोक्ष (बड़ा बैल) एक ही व्यक्ति की भिन्न-भिन्न अवस्थाओं को बतलाते हैं। जाति के द्वारा नियत रूप वाला कोई ललित आदि नहीं होता। यदि ललितत्व आदि नियत होता तो (तदा) महाकवियों की कृतियों में जो एक ही नायक में भिन्न-भिन्न (विरुद्ध) अ्नेक अवस्थाओं (ललित आदि) का कथन किया गया है वह असङ्गत ही होता; क्योंकि जाति तो नष्ट होने वाली नहीं है (फिर जो नायक धीरोदात्त जाति का होगा वह, धीरोद्धत जाति का कैसे हो सकेगा ?) और, भवभूति जैसे कवि ने एक ही परशुराम को "ब्राह्मण के अ्तिकरमण का त्याग आापके ही कल्याण के लिये है, अन्यथा तुम्हारा मित्र परशुराम कृद्ध हो जायेगा।" (वीरचरित २.१०) इत्यादि कथन के द्वारा रावण के प्रति धीरोदात्त रूप में व्शित किया है: 'कैलासोद्धारसार०' (वीरचरित २'१०) इत्यादि के द्वारा राम आदि के प्रति पहले तो धीरोद्धत रूप में और फिर 'पुण्या०' (ब्राह्मणाजाति पवित्र है वीर० ४.२२) इत्यादि के द्वारा धीरशान्त रूप में वगिगत किया है। (ii) (न चेति०) यह शङ्ा करना भी ठीक नहीं कि (एक ही नायक की) भिन्न-भिन्न अवस्थाओं का वर्णन करना अनुचित है, क्योंकि जो अङ्गनूत (अप्रधान) नायक होते हैं उनका सभी अन्य नायकों के प्रति महासत्त्व आदि होना (तथा उदात्त आदि अवस्था) नियत (व्यवस्थित) नहीं होता। किन्तु जो प्रधान (अङ्गी) नायक राम आदि हैं उनकी एक प्रबन्ध में आये हुए (सभी) पात्रों के प्रति

Page 171

१२२ दशरूप कम्

दारम्भोपात्तावस्थातोऽवस्थान्तरोपादानमन्याय्यं, यथोदात्तत्वाभिमतस्य रामस्य छद्मना वालिवधादमहासत्त्वतया स्वावस्थापरित्याग इति। वक्ष्यमाणानां च दक्षिणाद्यवस्थानाम् 'पूर्वां प्रत्यन्यया हृतः' इति नित्यसापेक्ष-

अथ शृङ्गारनेत्रवस्था :- (७) स दृत्षिणः शठो घृष्टः पूर्वां प्रत्यन्यया हृतः ॥६॥ एकरूपता होनी चाहिए। इसलिये (किसी प्रधान नायक की) जिस (उदात्त आदि) अवस्था का आरम्भ में ग्रहण किया जाए (उसकी) उससे दूसरी अवस्था का ग्रहण अनुचित ही है। जैसे राम को उदात्त नायक के रूप में माना गया है अतः राम का छल से बालि-वध करना महासत्त्वता के प्रतिकूल है इसलिये अपनी (उदात्त) अवस्था का परित्याग ही है (जो अनुचित है)। (ii) किन्तु आागे वगिगत दक्षिण आदि (नायक की) अवस्थाओं में पहिले कही गई (उपात्त=गृहीत) अवस्था से भिन्न दूसरी अवस्था का वर्णन करना तो अप्रधान तथा प्रधान (दोनों प्रकार के) नायकों के विषय में ही अनुचित नहीं है, क्योंकि वे अवस्थाएं सदा ही एक दूसरी की अपेक्षा से उत्पन्न हुआ करती हैं, दूसरी नायिका के द्वारा आकृष्ट किया गया (नायक) ही प्रथम नायिका के प्रति दक्षिणा (आदि) होता है' (आगे२.६)। टिप्पणी-(१) (i) धनिक के अनुसार धीरोदात्तत्व आदि नायक की अव- स्थाएँ हैं, जातियाँ नहीं; इसलिये एक ही नायक धीरोदात्त, धीरललित, धीरोद्धत तथा धीरप्रशान्त हो सकता है। यदि धीरोदात्तत्व इत्यादि जातियाँ होती तो ऐसा सम्भव नहीं था, क्योंकि गोत्व जाति से युक्त व्यक्ति केभी भी महिषत्व जाति से युक्त नहीं हो सकती। (ii) एक अ्ङ्गभूत (अप्रधान) नायक में ही अ्र्परनेक (उदात्तत्व आरादि) अवस्थाओं का वर्गन करना उचित है, एक प्रधान नायक में नहीं। (iii) एक ही प्रधान नायक में भी दाक्षिण्य आदि अ्नेक अवस्थाओ्रं का वर्णगन किया जा सकता है। (२) ना० शा० (२४.१५) में भी उदात्तत्व आदि चारों अरवस्थाएँ शील पर आ्र्पाश्रित मानी गई हैं। ना० द० (१.६) के अनुसार नायकों के चार प्रकार के स्वभाव होते हैं। एक प्रधान तायक में तो एक ही प्रकार के स्वभाव का वर्णन करना चाहिये। किन्तु एक ही अप्रधान नायक में अनेक स्वभावों का भी वर्णान किया जा सकता है। नायक की शृङ्गाररस-सम्बन्धी अवस्थायें जो नायक दूसरी (नायिका) के द्वारा हर लिया जाता है, वह पहिली (नायिका) के प्रति दच्षिण, शठ या घृष्ट कहलाता है ॥६।। टिप्पणी-सा० द० (३.३५) तथा प्रता० (१.३५) में भी शृङ्गार की दृष्टि से नायक के चार भेद किये हैं-अनुकूल, दक्षिरा, धुष्ट और शठ।

Page 172

द्वितीय: प्रकाश: १२३

नायकप्रकरणात्पूर्वां नायिकां प्रत्यन्ययाऽपूर्वनायिकयाऽपहृतचित्तस्त्रयवस्थो वक्ष्यमा- रभेदेन स चतुरवस्थः। तदेवं पूर्वोक्तानां चतुर्रां प्रत्येकं चतुरवस्थत्वेन षोडशधा नायकः। तत्र- (८) दत्षिरोऽस्यां सहृदय :- योऽस्यां ज्येष्ठायां हृदयेन सह व्यवहरति स दक्षिणाः। यथा अमव- 'प्रसीदत्यालोके किमपि किमपि प्रेमगुरवो रतिकीडा: कोऽपि प्रतिदिनमपूर्वोऽस्य विनयः । सविश्रम्भ: कश्चित्कथयति च किन्चित्परिजनो न चाहं प्रत्येमि प्रियसखि किमप्यस्य विकृतिम् ॥८४॥ यथा वा- 'उचितः प्रशायो वरं विहन्तु' बहवः खण्डनहेतवो हि दृष्टाः । उपचारविधिर्मनस्विनीनां ननु पूर्वाभ्यधिकोऽपि भावशून्यः।।८५॥।' नायक का प्रकरण होने के कारण यह अर्थ है-दूसरी नवीन नायिका के द्वारा जिसका चित्त अपहृत हो गया है उसकी पहिली नायिका के प्रति तीन अवस्थाएं होती हैं। और, आगे कहे जाने वाले ('अनुकूल' नामक) भेद सहित उसकी चार अवस्थाएं हो जाती हैं। इस प्रकार पूर्वोक्त (धीरोदात्त इत्यादि) चारों में से प्रत्येक की चार अवस्था हो जाने से नायक सोलह प्रकार का हो जाता है। उनमें- १. दक्षिक नायक इस (पूर्व नायिका) के प्रति सहृदय (प्रीतियुक्त) रहने वाला दक्षिणा नायक है। जो (अन्य नायिका के द्वारा अपहृत-चित्त होकर भी) इस ज्येष्ठ (पूर्व) नायिका के प्रति हृवय के साथ व्यवहार करता है, वह दक्षिणा नायक है। जैसे मेरा (धनिक का) हो उदाहरण है-(कोई नायिका अपने प्रियतम के विषय में कहती है-) 'मुझे देखते ही प्रसन्न हो जाता है, इसकी रतिकेलियाँ कुछ (विशेष रूप से) प्रेम से भरी होती हैं, इसका विनय प्रतिदिन अपूर्व होता जाता है। किन्तु कोई विश्वनीय परिजन उसके विषय में कुछ (=उसका प्रेम किसी अन्य नायिका से हो गया है आदि) कहता है किन्तु, प्रिय सखी, मैं तो इसके किसी भी विकार (परिवर्तन) का विश्वास नहीं करती'। अथवा, जैसे-(मालवि० ३.३) 'प्रेम को तोड़ लेना ही अधिक उचित है, क्योंकि खण्डन के अनेक निमित्त देखे गये हैं। यद्यपि मनस्विनी नायिकाओं के प्रति की जाने योग्य औपचारिकता (आदर-सत्कार) पहिले से भी अधिक है तथापि वह भाव-शून्य ही है'।

Page 173

१२४ देशरूपकम्

अथ शठः- (६) - गूढविप्रियकृच्छठः । दक्षिएास्यापि नायिकान्तरापहृतचित्ततया विप्रियकारित्वाविशेषेऽपि सहृदयत्वेन शठाद्विशेषः, यथा- 'शठोऽन्यस्या: काञ्चीमशिरसितमाकर्ण्य सहसा यदाश्लिष्यन्न व प्रशिथिलभुजग्रन्थिरभवः । तदेतत्क्वाचक्षे घृतमधुमयं त्वद्वहुवचो- विषेणाघूर्णन्ती किमपि न सखी मे गणायति ।।८६।।' अथ घृष्ट :- (१०) व्यक्ताङ्गवैकृतो घृष्टो- टिप्परी-(१) दक्षिण नायक नवीन नायिका से प्रेम हो जाने पर भी पूर्वा नायिका के प्रति अपने प्रेमपूर्ण व्यवहार में कमी नहीं आने देता, भले ही उसका हार्दिक प्रेम कम हो जाये। (२) सा०द० (३.३५) के अनुसार तो अनेक नायिकाओं के साथ समान रूप से प्रेम करने वाला नायक दक्षिणा नायक कहलाता है। इसी प्रकार प्रता० (१.३५) के अनुसार भी 'तुल्योऽनेकत्र दक्षिणः' यह लक्षण है। २. शठ नायक-

होता है। (पूर्व नायिका का) गुप्त रूप से अप्रिय करने वाला शठ नायक

यद्यपि दक्षिण नायक का चित्त भी दूसरी नायिका के द्वारा हर लिया जाता है अतः वह भी समान रूप से पूर्व नाथिका का अप्रिय करता है तथापि वह (पूर्व नायिका के प्रति) सहृदय रहता है, यही उसमें शठ नायक से अन्तर है। जैसे-(अमरु १०६, नायिका की सखी नायक को उपालम्भ दे रही है) 'हे शठ अन्य नायिका की करधनी की मणि के शब्द को सुनकर जो तुमने सहसा ही (मेरी सखी का) आलिङ्गन करते हुए भी अपने भुज-बन्धन को शिथिल कर दिया था, इस बात को कहाँ कहूँ ? घृत और मधु से मिश्रित (चिकने-चुपड़े तथा मीठे) तुम्हारे बहुत से वचनों के विष से चक्कर खाती हुई मेरी सखी कुछ भी नहीं समझ पाती'। टिप्परी-प्रता० (१.३६) में भी यही लक्षणा है। सा०द० (३.३७) में तो लक्षण यह है-जो वस्तुतः तो एक नायिका से प्रेम करे किन्तु बाहर से दोनों नायि- काओं के प्रति प्रेम प्रदर्शित करे और छिपे रूप से दूसरी नायिका का अप्रिय करे वह शठ नायक है।-यह लक्षणा अधिक स्पष्ट है। जिस (नायक) के अङ्गों में विकार (=अन्य नायिका के प्रति किये गये प्रेम के चिह्न) स्पष्ट प्रकट होते हैं; वह धृष्ट नायक है।

Page 174

द्वितीय: प्रकाश: १२५

यथाऽमरुशतके- 'लाक्षालक्ष्म ललाटपट्टमभितः केयूरमुद्रा गले वक्त्रे कज्जलकालिमा नयनयोस्ताम्बूलरागोऽपरः । दृष्ट्ा कोपविधायि मण्डनमिदं प्रातश्चिरं प्रयसो लीलातामरसोदरे मृगहश: श्वासाः समात्ति गताः ॥८9।' भेदान्तरमाह- (११) - डनुकूलस्त्वेकनायिकः ॥७॥ यथा- 'अरद्वैतं सुखदुःखयोरनुगतं सर्वास्ववस्थासु यद्- विश्रामो हृदयस्य यत्र जरसा यस्मिन्नहार्यो रसः । कालेनावरसात्ययात्परिते यत्स्नेहसारे स्थितं भद्रं तस्य सुमानुषस्य कथमप्येकं हि तत्प्राप्यते ।।८८।'

जैसे अमरुशतक (६०) में '(अन्य नायिका से रमणा करके आये हुए) प्रातः काल प्रिय के ललाट पट के चारों ओर महावर का चिह्न, गले में केयूर का चिह्न, मुख पर काजल की कालिमा और नेत्रों में दूसरे प्रकार की पान की लालिमा इत्यादि कोप उत्पन्न करने वाले मण्डन को देर तक देखकर मृगनयनी के श्वास लीलाकमल के मध्य में ही समाप्त हो गये।' [ ईष्या-विकार को छिपाने के लिये सूँघने के बहाने कीडाकमल को मुख के समीप कर लिया, उसमें निश्वास निकल-निकल कर समाती रही, अमरु० पृ० २६१] टिप्पणी-प्रता० (१.३८) में 'व्यक्तागा गतभीर्घृष्टः' यह लक्षणा है। सा० द० (३.३६) में इसका ही विशद विवेचन है-जो प्रेम में अपराधी होने पर भी निशङ्क रहता है, भिड़की खाने पर भी लज्जित नहीं होता, स्पष्टतः दोषों के प्रकट हो जाने पर भी झूठ बोल देता है, वह धृष्ट नायक है।' अन्य भेद बतलाते हैं :- ४. अनुकूल नायक

है।।७।। जिसकी एक ही नायिका होती है, वह अनुकूल नायक कहलाता

जैसे उत्तररामचरित (१·३६) में (सीता का स्पर्श करते हुए राम कहते हैं) जो सुख और दुःख में एकरूप (अद्वंत) है और सभी अवस्थाओरं में अनुगत है, जिसमें हृदय का विश्राम होता है, जिसमें प्रीति बुढ़ापे से भी नहीं हटती, जो कि समय के द्वारा विवाह से लेकर मरण-पर्यन्त (श्र-वरस+अत्ययात्) परिपक् होने वाले प्रेम तत्व में स्थित रहता है, उस दाम्पत्य (सुमानुष) का वह एक कल्याण किसी प्रकार ही (पुण्य से, कठिनाई से) प्राप्त किया जाता है।

Page 175

१२६ दशरूपकमू :4जोही

किमवस्थ: पुनरेषां वत्सराजादिर्नाटिकानायकः स्यात् ? इत्युच्यते-पूर्वमनुपजातना- यिकान्तरानुरागोऽनुकूल:, परतस्तु दक्षिणाः। ननु च गूढविप्रियकारित्वाद्वयक्ततरविप्रि- यत्वाच्च शाठ्यधाष्ट्य डपि कस्मान्न भवतः, न तथाविधविप्रियत्वेऽपि वत्सराजादेरा- प्रबन्धसमाप्तेरज्येष्ठां नायिकां प्रति सहृदयत्वाद्दक्षिणतैव, न चोभयोज्यष्ठाकनिष्ठयो- रनायकस्य स्नेहेन न भवितव्यमिति वाच्यम्, अविरोधात्। महाकविप्रबन्धेषु च- 'स्नाता तिष्ठति कुन्तलेश्वरसुता वारोऽङ्गराजस्वसु- द्यूंते रात्रिरियं जिता कमलया देवी प्रसाद्याद च। इत्यन्तःपुरसुन्दरी: प्रति मया विज्ञाय विज्ञापिते देवेनाप्रतिपत्तिमूढमनसा द्वित्राः स्थितं नाडिकाः ।८६ै।।' इत्यादावपक्षपातेव सर्वनायिकासु प्रतिपत्त्युपनिबन्धनात्। तथा च भरत :- मधुरस्त्यागी रागं न याति मदनस्य नापि वशमेति। अवमानितर्च नार्या विरज्येत स तु भवेज्ज्येष्ठ: ।६०।। टिप्पणी- सा० द० (३.३७) अनुकूल एकनिरतः, प्रता० (१.३५) एकायत्तोऽनुकूल: स्यात् । (प्रश्न) (रत्नावली) नाटिका का नायक वत्सराज आदि इनमें से किस प्रकार का नायक होगा ? (उत्तर) कहते हैं-पहले जब तक दूसरी नायिका के प्रति प्रेम उत्पन्न नहीं होता वह अनुकूल नायक है, किन्तु बाद में (दूसरी नायिका से प्रेम हो जाने पर) वह दक्षिणा नायक है। (प्रश्न) क्योंकि (वत्सराज) गुप्त रूप से (वासवदत्ता का) अप्रिय करता है और स्पष्ट रूप से अप्रिय करने वाला (जान लिया जाता) है फिर वह कमशः शठ और घृष्ट नायक भी क्यों नहीं होता ? (उत्तर) नहीं, यद्यपि वत्सराज आदि उस प्रकार का अप्रिय आचरण करते हैं तथापि प्रबन्ध की समाप्ति पर्यन्त ज्येष्ठा नायिका (वासवदत्ता आदि) के प्रति सहृदय ही बने रहते हैं अतः वे दक्षिण नायक ही हैं। (प्रश्न) ज्येष्ठा और कनिष्ठा दोनों नायिकाओं में नायक का प्रेम नहीं हो सकता (क्योंकि वास्तविक प्रेम तो एक से ही हो सकता है)। (उत्तर) यह कहना ठीक नहीं, क्योंकि (ज्येष्ठा और कनिष्ठा दोनों के प्रति प्रेम होने में) विरोध नहीं है। और, महाकवियों के प्रबन्धों में 'स्नाता०' इत्यादि में (एक ही नायक का) सभी नायिकाओं में पक्षपात रहित प्रेम-वर्णन किया गया है, जैसे-(कञ्चुकी राजा के विषय में कहता है)। "कुन्तलेश्वर की पुत्री नहाई बैठी है, अङ्गराज की बहिन की बारी है, कमला ने यह रात्रि जुए में जीत ली है, आ्ज देवी को भी प्रसन्न करना है", इस प्रकार अन्तःपुर की सुन्दरियों के प्रति जानकर जब मैंने राजा को सूचित किया तो महाराज कुछ निश्चय न करने (अविप्रतिपत्ति) के कारण मूढ मन से दो-तीन घड़ी (नाडिका-घटिका) स्तब्ध रहे'। और, भरत ने भी ऐसा ही कहा है-'जो मधुर तथा त्यागी है, किसी एक में राग नहीं करता, न ही काम के वश में होता है। और, नारी के द्वारा अपमानित होकर विरक्त हो जाता है, वह ज्येष्ठ (=उत्तम) नायक होता है।

Page 176

द्वितीयः प्रकाश: १२७

इत्यत्र 'न रागं याति न मदनस्य वशमेति इत्यनेनासाधारण एकस्यां स्नेहो निषिद्धो दक्षिसास्येति। अतो वत्सराजादेराप्रबन्धसमाप्ति स्थितं दाक्षिण्यमिति। षोडशानामपि प्रत्येकं ज्येष्ठमध्यमाधमत्वेनाष्टाचत्वारिंशन्नायकभेदा भवन्ति। सहायानाह- (१२) पताकानायकस्त्वन्यः पीठमर्दो विचक्तणः । तस्यैवानुचरो भक्त: किञि्चिदूनश्च तद्गुरैः॥( प्रागुक्तप्रासङ्गकेतिवृत्तविशेषः पताका तन्नायकः पीठमर्दः प्रधानेतिवृत्तनायकस्य सहायः । यथा मालतीमाधवे मकरन्दः, रामायणे सुग्रीवः। सहायान्तरमाह- यहाँ पर 'राग नहीं करता, काम के वश में नहीं होता' इस कथन के द्वारा दक्षिए नायक का किसी एक नायिका में असाधारण प्रेम (=राग=आसक्ति) होने का निषेध किया गया है। इसलिये वत्सराज आदि का प्रबन्ध की समाप्ति पर्यन्त दक्षिण नायक होना (दाक्षिण्यम) निश्चित होता है। उपर्युक्त सोलह प्रकार के नायकों में से प्रत्येक के ज्येष्ठ, मध्यम और अ्धम भेद होने से नायक के ४८ भेद हो जाते हैं। टिप्पसी-इस प्रकार नायक के ४८ भेद हैं, यथा-धीरललित, धीरप्रशान्त धीरोदात्त, धीरोद्धत (४) x दक्षिणा, शठ, घृष्ट और अनुकूल (४) x ज्येष्ठ, मध्यम और अधम (३)=४८। सा०द०(३.२८) में भी इसी प्रकार भेद-गणना की गई है। नायक के सहायक (पीठमर्द) (नायक के) सहायकों को बतलाते हैं- (प्रधान नायक से) दूसरा पताका नायक होता है जो पीठमर्द कहलाता है। वह चतुर होता है, उस (प्रधान नायक) का अनुचर तथा भक्त होता है और उसके गुणों से कुछ न्यून गुण वाला होता है ॥८॥ ऊपर (१.१३) कहा गया है कि विशेष प्रकार का प्रासङ्गिक इतिवृत्त पताका है। उसका नायक पोठमर्द कहलाता है। वह प्रधान (आधिकारिक) इतिवृत्त के नायक का सहायक होता है। जैसे मालतीमाधव में मकरन्द है और रामायण में सुग्रीव। टिप्पणी-ऊपर (१.१२-१३) कथावस्तु के दो प्रकार बतलाये गये हैं- आधिकारिक और प्रासङ्गिक। प्रासङ्गिक वस्तु (इतिवृत्त) भी दो प्रकार की होती है-पताका तथा प्रकरी। प्रासङ्गिक व्यापक वृत्त पताका है उसका नायक ही पीठमर्द कहलाता है। सा०द०(३.३६) में भी इसी प्रकार का लक्षण है; किन्तु प्रता० (१.४०) में इसका लक्षण स्पष्ट नहीं है। अन्य सहायकों को बतलाते हैं-

Page 177

१२८१ दशरूपकम्

(१३) एकविद्यो विटश्चान्यो, हास्यकृच्च विदूषकः । गीतादिविद्यानां नायकोपयोगिनीनामेकस्या विद्याया वेदिता विटः। हास्यकारी विदूषकः । अस्य विकृताकारवेषादित्वं हास्यकारित्वेनैव लभ्यते। यथा शेखरको नागानन्दे विटः। विदूषकः प्रसिद्ध एव। अथ प्रतिनायक :- (१४) लुब्धो धीरोद्धतः स्तब्: पापकृद्वयसनी रिपुः ।।६।। दूसरा (नायक की उपयोगी) किसी एक विद्या को जानने वाला विट होता है और हास्य उत्पन्न करने वाला विदूषक होता है। नायक की उपयोगी जो गीत आदि विद्याएँ हैं उनमें से किसी एक विद्या को जानने वाला विट होता है। हास्य उत्पन्न करने वाला, प्रधान नायक का सहायक विदूषक होता है। क्योंकि इसे हास्य उत्पन्न करने वाला (हास्यकृत= हास्यकारी) कहा गया है, इसी से इसका विकृत आकार और वेष आदि वाला होना प्रकट हो जाता हैं। जैसे नागानन्द नाटक में 'शेखरक' विट है। विदूषक तो प्रसिद्ध ही है। टिप्पणी- (१) ना०शा० (३५.५५) में विट का लक्षण अधिक स्पष्ट है- वेश्योपचारकुशलः मधुरो दक्षिणाः कविः। ऊहापोहक्षमो वाग्मी चतुरश्च विटो भवेत् । सा० द० (३. ४१) में भी ना० शा० का अनुसरण करते हुए विट का विशद लक्षण किया गया है। तदनुसार "जो भोगों में अपनी सम्पत्ति नष्ट कर चुका है, धूर्त्त है, कुछ कलाओं को जानता है, वेशोपचार में कुशल है, वावकुशल, मधुर तथा गोष्ठी में सम्मानित होने वाला है, वह विट है।" प्रता० (१.४०) में दशरूपक का ही अनुसरण किया गया है। (२) ना० शा० (३५.५७) में विदूषक का लक्षण भी अधिक स्पष्ट है- वामनो दन्तुरः कुब्जो द्विजिह्नो विकृताननः । खलतिः पिङ्गलाक्षश्च स विधेयो विदूषकः । सा० द० (३.४२) में इसे और अधिक स्पष्ट कर दिया गया है। तदनुसार "कुसुम, वसन्त आदि नाम वाला, अपने कार्य, शरीर, वेष और भाषा आदि के द्वारा दूसरों को हँसाने वाला, कलह-प्रिय, अपने कर्म (हास्य या भोजन आदि) को जानने वाला विदूषक होता है।" धनिक की व्याख्या के अनुसार दशरूपक के 'हास्यकृत्' शब्द द्वारा ही इन सभी विशेषताओं की ओर संकेत कर दिया गया है। प्रता० (१.४०) में दशरूपक के समान ही लक्षण है। प्रतिनायक- लोभी, धीरोद्धत, स्तब्ध (कठोर, आग्रही), पाप करने वाला तथा व्यसनी व्यक्ति (प्रधान नायक का) शत्रु (=प्रतिनायक) होता है॥६।।

Page 178

द्वितीय: प्रकाश: १२६

तस्य नायकस्येत्थंभूतः प्रतिपक्षनायको भवति। यथा रामयुधिष्ठिरयो रावण- दुर्योधनौ। अथ सात्त्विका नायकगुणा :- (१५) शोभा विलासो माधुर्यं गम्भीर्य *स्थैर्यतेजसी। ललितौदार्यमित्यष्टौ ।सात्विकाः पौरुषा गुखाः ॥१०। तत्र (शोभा यथा)- (१६) नीचे घृशाधिके स्पर्धा शोभायां शौर्यदक्षते। नीचे घृणा यथा वीरचरिते- 'उत्तालताडकोत्पातदर्शनेऽप्यप्रकम्पितः । नियुक्तस्तत्प्रमाथाय स्त्रैणेन विचिकित्सति ।।६१।।' उस (प्रधान) नायक का इस (उपयुक्त) प्रकार का प्रतिनायक होता है। जैसे राम और युधिष्ठिर के प्रतिनायक रावण तथा दुर्योधन हैं। टिप्परी-(१) नायक की फलप्राप्ति में विघ्न करने वाला प्रतिनायक कहलाता है। उसे ही यहाँ 'शत्रु' (=प्रतिपक्षनायक) शब्द द्वारा कहा गया है। (२) ना० द० (४.२५०), सा० द० (३.१३१) में इसी प्रकार का लक्षण है। नायक के सात्त्विक गुण अब नायक के सातत्विक गुरों को बतलाते हैं- १. शोभा, २. विलास, ३. माघुर्य, ४. गम्भीरता, ५. स्थिरता, ६. तेजस, ७. ललित तथा ८. शदार्य-ये आठ, पुरुषों के सात्बिक गुणा हैं॥१०॥ टिप्पणी-(१) ना०शा०(२२.३३), सा०द० (३.५१), ना०द० (४.२४०) में भी प्रायः ये ही आठ गुण कहे गये हैं। सा० द० में 'स्थैर्य' के स्थान पर 'धैर्य' हैं। (२) 'सात्त्विक' का अ्पर्थ है-सत्त्व से उत्पन्न होने वाले (सत्त्वजाः)। रजोगुण और तमोगु के उद्र क से रहित मन ही 'सत्त्व' कहलाता है। 'रज्जस्तमोभ्यामस्पृष्ट मनः सत्त्वमिहोच्यते।' १. इनमें शोभा यह है जैसे- नीच के प्रति घणा, अपने से अधिक के प्रति स्पर्धा तथा शूरता और दक्षता, ये शोभा में होते हैं। 'नीच के प्रति घृणा यह है जैसे वीरचरित (१.३७) में (राक्षस मन ही मन कहता है)-'तालवृक्ष के समान ऊँची ताडका के उत्पात को देखकर भी राम कम्पित नहीं हुए; किन्तु उसके मारने के लिये नियुक्त किये जाने पर उसके स्त्री होने के कारण सन्देह में पड़ गये। [यहाँ राम में नीच के त्रति घृणा दिखलाई गई है] *'धैर्य इति पाठान्तरम् +'सत्त्वजा' इति पाठान्तरम्

Page 179

१३० दशरूपकम्

गुराधिक: स्पर्धा यथा- 'एतां पश्य पुरः स्थलीमिह किल क्रीडाकिरातो हरः कोदण्डेन किरीटिना सरभसं चूडान्तरे ताडितः । इत्याकर्ण्य कथाद्भुतं हिमनिधावद्री सुभद्रापते- र्मन्दं मन्दमकारि येन निजयोर्दोर्दण्डयोर्मण्डलम् ।।६२।।' शौर्यशोभा यथा ममैव- 'अन्त्र : स्वैरपि संयताग्रचरणो मूरच्छाविरामक्षरे स्वाधीनव्रणिगताङ्गशस्त्रनिचितो रामोद्गमं वर्मयन्।

धन्यो धाम जयश्रियः पृथुरशस्तम्भे पताकायते ।।६३।' दक्षशोभा यथा वीरचरिते -- 'स्फूर्जद्वज्नसहस्त्र निर्मितमिव प्रादुर्भवत्यग्रतो रामस्य त्रिपुरान्तकृद्दिविषदां तेजोभिरिद्धं धनुः । शुण्डार: कलभेन यद्वदचले वत्सेन दोर्दण्डक- स्तस्मिन्नाहित एव गजितगुएं कृष्टं च भग्नं च ततु ।६४।।' अधिक गुणों वाले के प्रति स्पर्धा यह है, जैसे- 'इस सामने के स्थल को देखो, यहाँ ही अर्जुन (किरीटी) ने अपने धनुष के द्वारा लीला से किरात का रूप धारण करने वाले शिव के मस्तक पर वेगपूर्वक प्रहार किया था। हिमालय में सुभद्रापति (अरजुन) की इस अद्भुत कथा को सुनकर जिस (महादेव) ने अपनी दोनों भुजाओं को धीरे-धीरे मण्डलाकार बना लिया'। [यहाँ अर्जुन के परात्रम को सुनकर महादेव में स्पर्धा का वर्णन किया गया है] शौर्य, शोभा यह है जैसे मेरा (धनिक का) ही पद्य है- 'अपनी ही आँतों से जिसके चरणों के अग्रभाग बँधे हैं, जो मूच्छा समाप्त होते ही अपने घाव भरे अङ्गों में प्रचुरता से (=स्वाधीन) शस्त्रों से भरा हुआ भी रोमाञ्च को ही कवच बनाए हुए है, जो अपने हारते योद्वाओं को उत्साहित करता है (वलयन्) तथा शत्रु के योद्धाओं को कठोरता से तर्जित करता है, वह विजयश्री के विशाल युद्धस्तम्भ पर पताका के समान है, वह धन्य है।' दक्ष-शोभा, जैसे वीरचरित (१.५३) में 'स्फूजंद' इत्यादि ऊपर उदा० ६६। [यहाँ राम में दक्ष-शोभा का वर्णन किया गया है] टिप्पणी- मि०, ना० शा० (२२.३४), ना० द० (४.२४४)। सा० द० (३५१) के अनुसार 'जिस विशेषता के कारण शूरता, दक्षता, सत्य, महान् उत्साह, अनुर ग, नीच के प्रति घृणा, अधिक के प्रति स्पर्धा होती है, उसे शोभा कहते हैं।"

Page 180

द्वितीय: प्रकाश: १३१ 000 100 000 100 अथ विलास :- (१७) गतिः सधैर्या दृष्टिश्र विलासे सस्मितं वच: ॥११॥ यथा-

धीरोद्धता नमयतीव गतिर्धरित्रीम्। कौमारकेऽपि गिरिवद् गुरुतां दघानो वीरो रसः किमयमेत्युत दर्प एव ।।६५।।' अथ माधुर्यम्- (१८) श्लक्ष्णो विकारो माधुर्य संत्ोभे समुहृत्यपि। महत्यपि विकारहेतौ मधुरो विकारो माधुर्यम्। यथा- 'कपोले जानक्याः करिकलभदन्तद्युतिमुषि स्मरस्मेरं गण्डोड्डमरपुलकं वक्त्रकमलम्। मुहुः पश्यञच्छण्वन्रजनिचरसेनाकलकलं जटाजूटग्रन्थिं द्रढयति रघूरां परिवृढः ।६६।' २. विलास विलास में धैर्ययुक्त गति तथा धैर्ययुक्त ही दृष्टि होती है और वचन मुस्कराहट के साथ ।११। जैसे (उत्तररामचरित ६·१६ में लव को देखकर राम कहते हैं)-'इसकी दृष्टि तीनों लोकों के बल के उत्कर्ष (सार) को तिनके के समान समभने वाली है, धीर एवं उद्धत चाल मानों भूमि को भुका रही है, कौमार अवस्था में भी पर्वत के समान गौरव को धारण करता हुआ यह (साक्षात) वीर रस ही है या दर्ष ही है'। टिप्पणी-ना० शा० (२२.३५); सा० द० (३.५२) में 'धौरा दृष्टिरगति- शिचित्रा विलासे सस्मितं वचः' यह लक्षण है तथा ना०द०(४.२४२) में 'विलासो वृष- वद यानं धीरा हक सस्मितं वच । ३. माधुर्य महान् संक्षोभ उपस्थित होने पर भी मृदु विकार उत्पन्न होना माधुर्य कहलाता है। महान् विकार का हेतु (=संक्षोभ) होने पर मधुर विकार होना माधुर्य है। जैसे (हनुमन्नाटक १.१६)-'रघुकुल के नायक (परिवृढः=प्रभुः) राम हाथी के बच्चे के दांतों की कान्ति का हरण करने वाले जानकी के कपोल में अपने मुस्कराहट से युक्त तथा गण्डस्थल पर मनोहर (उड्डमर) रोमाञ्च से युक्त मुखकमल को बार-बार देखते हुए और राक्षसों की सेना के कोलाहल को सुनते हुए जटाजूट की ग्रन्थि को दृढ कर रहे हैं'। टिप्पणी-ना० शा० (२२.३६); सा० द० (३.५२) में इसी प्रकार का लक्षणा है। ना० द० (४,२४३) में इसे अधिक स्पष्ठ किया गया है। यहाँ विकार

Page 181

१३२ दशरूपकम्

अथ गाम्भीर्यम्- (१६) गाम्भीर्यं यत्प्रभावेन विकारो नोपलक्ष्यते ॥१२।। मृदुविकारोपलम्भाद्विकारानुपलन्धिरन्येति माधुर्यादन्यद् गाम्भीर्यम्। यथा- 'आहूतस्याभिषेकाय विसृष्टस्य वनाय च। न मया लक्षितस्तस्य स्वल्पोऽप्याकारविभ्रमः ॥६७।।' अथ स्थैर्यम्- (२०) व्यवसायादचलनं स्थैर्य विघ्नकुलादपि। यथा वीरचरिते- 'प्रायश्चित्त चरिष्यामि पूज्यानां वो व्यतिक्रमात् । न त्वेवं दूषयिष्यामि शस्त्रग्रहमहाव्रतम् ।।६८।।' (=विकृति) का अ्पर्थ है-अपने सामान्य रूप से भिन्न रूप हो जाना। जहाँ रोमाञ्च आदि के द्वारा हलकी सी विकृति का प्रकाशन होता है, वहाँ माधुर्य गुण कहलाता है। यहाँ 'जटाजूटग्रन्थिं द्रढयति' इस कथन द्वारा राम का मृदु विकार प्रकट हो रहा है। ४. गाम्भीर्य - जिस गुण के प्रभाव से विकार नहीं दिखलाई पड़ता वह गाम्भीर्य कहलाता है ॥१२॥ मृदु विकार की उपलब्धि से विकार की अनुपलब्धि भिन्न होती है अ्तः माधुर्य से गाम्भीर्य भिन्न है। जैसे -- आहूतस्य इत्यादि ऊपर उदा० ७६। टिप्परी-(१) ना० शा० (२२.३८); सा० द० (३.५३) तथा ना० द० (४.२४६) में यद्यपि लक्षणा का स्वरूप भिन्न है तथादि तात्पर्य यही है। (२) माधुर्य में यह मृदु विकार होता है और उसकी प्रतीति भी होती है किन्तु गाभ्भीर्य वह गुणा है जिसके कारण कोई विकार लक्षित ही नहीं होता। जैसे यहाँ अभिषेक के लिये बुलाये गये अथवा बन में भेजे गये राम में कोई विकार लक्षित नहीं होता। ५. स्थैर्य- त्र्प्रनेकों विघ्नों से भी अपने निश्चय से विचलित न होना स्थैर्य है। जैसे वीरचरित (३.८) में ऊपर उदा० ७२। टिप्पसी-(१) ना० शा० (२२.३७); सा० द० (३.५३) में इसी प्रकार का लक्षणा है किन्तु इसे धैर्य कहा गया है। ना० द० (४.२४५) के अनुसार 'विघ्नों के उपस्थित होने पर भी अशुभ प्रारब्ध कार्य से भी विचलित न होना' ही स्थैर्य है। (२) यहाँ व्यवसाय=निश्चय, इसका अरथ 'कर्तव्यपालन' नहीं है अतः शुभ-अ्शुभ किसी प्रकार के निश्चय से विचलित न होना ही स्थैर्य है। 'प्रायश्चित्त' इत्याकि उदा० में परशुराम के शस्त्रग्रहण के महाव्रत से विचलित न होने का वर्णन है।

Page 182

द्वितीय: प्रकाश: १३३

9 अथ तेज :- (२१) अधिक्ेपाद्यसहनं तेजः प्राणात्ययेष्वपि ॥१३॥ यथा- 'ब्र त नूतनकूष्माण्डफलानां के भवन्त्यमी। अङ्ग लीदर्शनाद्येन न जीवन्ति मनस्विनः ।६६।' अथ ललितम्- (२२) शृङ्गाराकारचेष्टात्वं सहजं ललितं मृदु। सवाभाविक: शृङ्गारो मृदुः, तथाविधा शृङ्गारचेष्टा च ललितम्। यथा ममैव- 'लावण्यमन्मथविलासविजुम्भितेन स्वाभाविकेन सुकुमारमनोहरेण। किवा ममेव सखि योऽपि ममोपदेष्टा तस्यैव कि न विषमं विदधीत तापम् ॥१००। अथौदार्यम्- (२३) प्रियोक्त्याSडजीविताद्दानमौदार्यं सदुपग्रहः॥१४॥ ६. तेज- प्राणों का संकट उपस्थित होने पर भी अपमान आदि को न सहना तेज कहलाता है ॥१३॥ जैसे-'बतलाओ तो ये मनस्वी जन नवीन कुम्हड़े के फूलों के क्या लगते हैं जो ये अङ्गुली दिखलाने से ही जीवित नहीं रह पाते'। टिप्पणी-(१) ना० शा० (२२.४१); सा०द० (३.५४) में भी इसी प्रकार के लक्षणा हैं। (२) ऊपर के उदाहरण में मनस्वी जनों के तनिक सा अपमान न सह सकने का वर्णन किया गया है। ७. ललित -- शृङ्गार के अनुरूप स्वाभाविक और मृदु चेष्टा करना ही ललित कहलाता है। ल्वाभाविक शृङ्गार मृदु होता है। और, स्वाभाविक एवं मृद्द (=तथाविधा) शृङ्गार-चेष्टा ललित कहलाती है। जैसे मेरा (धनिक का) ही (पद्य है)-'हे सखि, (वह नायक) सौन्दर्य और काम-चेष्टा के स्वाभाविक, मृदु और मनोहर स्फुरण (विजुम्भित) के द्वारा जिस प्रकार मुझ्क में विषम सन्ताप उत्पन्न करता है, उसी प्रकार जो मुझके उपदेश देने वाला है, उसमें क्यों नहीं करता'? टिप्पणी-ना० शा० (२२.३६), ना० द० (४.२४८), सा० द० (३.५५) में भी इसी प्रकार का लक्षण है। 5. शदार्य- (क) प्रिय वचन के साथ जीवन पर्यन्त दान देना तथा (ख) सज्ज- नों की आराधना (उपग्रह=सन्तुष्ट करना, अपने अनुकूल बनाना अनुर- ञजन (Propitiation) औदार्य कहलाता है।

Page 183

१३४ देशरूपकम्

प्रियवचनेन सहाऽडजीवितावधेर्दानमौदार्यं सतामुपग्रहश्च। यथा नागानन्दे- 'शिरामुखैः स्यन्दत एव रक्तमद्यापि देहै मम मांसमस्ति। तृप्ति न पश्यामि तवैव तावत्कि भक्षणात्त्वं विरतो गरुत्मन् ॥१०१।' सदुपग्रहो यथा- 'एते वयममी दारा: कन्येयं कुलजीवितम्। ब्र त येनात्र वः कार्यमनास्था बाह्यवस्तुषु ॥१०२॥ अथ नायिका- (२४) स्वान्या साधारणत्त्रीति तद्गुणा नायिका त्रिधा। प्रिय वचन के साथ जीवन के अन्त तक दान देना औदार्य कहलाता है तथा सज्जनों का अनुरञ्जन भी। जैसे नागानन्द (५.१६) में 'शिरामुखँः' इत्यादि ऊपर उदा० ७८। [यहाँ जीमूतवाहन के जीवन तक दान देने का वर्णन है अतः उसके औदाय की अभिव्यक्ति होती है] सज्जनों की आराधना यह है, जैसे-'ये हम हैं, ये स्त्रियाँ हैं, कुल का जीवन यह लड़की है; इनमें से जिससे तुम्हारा प्रयोजन (सिद्ध) हो बतलाओ। बाह्य वस्तुओं में हमारी आस्था नहीं है'। [यहाँ किसी सज्जन को अपने अनुकूल बनाने का भाव प्रकट होता है] टिप्पणी-(१) औदार्य के दो रूप हैं- (१) प्रियवचन के साथ जीवनपर्यन्त दॉन (ii) सदुपग्रह। (२) ना० शा० (२२.४०) के अनुसार यह लक्षण है- दानमभ्युपपत्तिश्च तथा च प्रियभाषराम । स्वजने च परे वारऽपि तदौदार्य प्रकीतितम्। यहाँ स्वजन या पर (शत्रु) दोनों के लिये प्रिय वचन के साथ दान और दोनों की रक्षा आदि करना (अभ्युपपत्तिः=परित्रासादर्थिनोऽङ्गीकररम्) शदार्य कहा गया है, केवल सदुपग्रह को नहीं। इसी प्रकार ना० द० (४.२४७) के अनुसार अपने प्राण देकर भी शत्र तथा मित्र का उपकार (=उपग्रह) करना औदार्य है' तथा सा० द० (३.५५) में "प्रियवचन के साथ दान करना, तथा शत्रु और मित्र के. प्रति समभाव को शदार्य कहा गया है।' नायिका-भेद उस (नायक) के (समान) गुणों वाली नायिका होती है जो तीन प्रकार की होती है- स्वकीया, परकीया तथा साधारणस्त्री।

Page 184

द्वितीय: प्रकाश: १३५

तद्गुरेति। यथोक्तसम्भवे नायकसामान्यगुसयोगिनी नायिकेति, स्वस्त्री पर- साधारणस्त्रीत्यनेन विभागेन त्रिधा। तत्र स्वीयाया विभागगर्भ सामान्यलक्षणमाह- (२५) मुग्धा मध्या प्रगल्भेति स्वीया शीलाजवादियुक ।१५॥ शीलं=सुवृत्तम्, पतिव्रताऽकुटिला लज्जावती पुरुषोपचारनिपुणा स्वीया नायिका। तत्र शीलवती यथा- 'कुलबालिआए पेच्छह जोव्वसलाश्ण्णाविन्भमविलासा। पवसन्ति व्व पवसिए एन्ति व्व पिये घरं एत्ते ।।१०३।' ('कुलबालिकायाः प्रेक्षध्वं यौवनलावण्यविभ्रमविलासाः । प्रसवन्तीव प्रवसिते आगच्छन्तीव प्रिये गृहमागते ॥') आर्जंवादियोगिनी यथा- 'हसिअमविआारमुद्ध' भमितं विरहित्रविलाससुच्छाश्रम् । भणिअं सहावसरलं धण्णाण घरे कलत्तागम् ॥१०४॥ ('हसितमविचारमुग्धंभ्रमित विरहितविलाससुच्छायम् । भशितं स्वभावसरल धन्यानां गृहे कलत्रारगाम् ।।' तद्गुणणा का अर्थ है-जो नायक के गुण कहे गये हैं उनमें से जहां तक सम्भव हो उन नायक के सामान्य गुरों से युक्त नायिका होती हैं। वह अपनी स्त्री, दूसरे की स्त्री तथा साधारण स्त्री इस तरह के मेद से तीन प्रकार की होती है। टिप्पणी-सा० द० (३.५६), भा० प्र० (पृ० ६४ पं० २० तथा आगे) में भी इसी प्रकार नायिका के तीन भेदों का वर्णन है। आचार्य हेमचन्द्र (काव्या० ७. २३) ने इन तीनों भेदों का अधिक सुव्यवस्थित वर्णान किया है। उनके अनुसार शरीर की अवस्था (वयः) और कौशल (काम-चेष्टा की निपुणता) के आधार पर नायिकाओं के मुग्धा, मध्या और प्रौढा, ये तीन भेद होते हैं। ना० द० (४.२५५) में कुलजा, दिव्या, क्षत्रिया तथा पण्यस्त्री ये चार प्रकार की नायिकाएं कही गई हैं। १. स्वकीया- उन तीन प्रकार की नायिकाओं में (तत्र) स्वकीया का विभाग सहित सामान्य लक्षण बतलाते हैं- स्वकीया नायिका शील तथा सरलता आदि से युक्त होती है, वह मुग्धा, मध्या तथा प्रगल्भा (तीन प्रकार की) होती है ॥१५। शील का अर्थ है-अच्छा आचरण; अतः स्वकीया नायिका पतिव्रता, कुटिलता रहित (आर्जवयुक्ता), लज्जावती और पति की सेवा में निपुण होती हैं। उनमें शीलवती यह है, जसे-'कुल बालिका के यौवन, लावण्य, विभ्रम तथा विलास देखिये। प्रिय के प्रवास चले जाने पर मानों थे सब चले जाते हैं और प्रिय के घर आने पर आ जाते हैं'। सरलता आदि से युक्त यह है, जैसे-'भाग्य-

Page 185

१३६ दशरूपकमे

लज्जावती यथा- 'लज्जापज्जत्तपसाहणाइं परतित्तिशिप्पिवासाइं। अ्विादुम्मेहाइं धण्णाण घरे कलत्ताइं।।(०५॥' ('लज्जापर्याप्तप्रसाधनानि परतृप्तिनिष्पिपासानि । अविनयदुर्मेधांसि धन्यानां गृहे कलत्राि ।।') सा चैवंविधास्वीया मुग्धा-मध्या-प्रगल्भा-भेदात्त्रिविधा। तत्र- (२६) मुग्घा नववयःकामा रतौ वामा मृदु: क्रुधि। प्रथमावतीर्णतारुण्यमन्मथा रमणो वामशीला सुखोपायप्रसादना मुग्धनायिका। तत्र वयोमुग्धा यथा- शाली जनों के घर में नारियों की हँसी बिना सोचे-बिचारे ही मनोहर होती है, उनकी चाल विलास-रहित होकर भी शोभायुक्त (सुच्छायम्) होती है और बोलना स्वभाव से ही सरल होता है।' लज्जावती यह है, जैसे-'भाग्यशाली जनों के घर में ही ऐसो नारिया होती हैं जिनका लज्जा ही पर्याप्त प्रसाधन (अलङ्करण) है, जो पर-पुरुषों से तृप्ति की इच्छा नहीं रखतीं, अविनय करना नहीं जानतीं (अविनये दुर्मेधांसि= अ्रविनय में कुण्ठित बुद्धि वाली)'। और वह इस प्रकार की (स्वकीया) नायिका (क) मुग्धा, (ख) मध्या और (ग) प्रगल्भा भेद से तीन प्रकार की होती है। टिप्परी-(१) ना० द० (४.२५७) में सभी प्रकार की नायिकाओं के ये तीन भेद किये गये हैं। किन्तु सा० द० (३.५७) में दशरूपक का अनुसरण करके स्वकीया के ही ये तीन भेद किये गये हैं। इसी प्रकार भा० प्र० (पृ० ६४ पं० २१) में भी स्वकीया के ही ये तीन भेद हैं। (२) स्वकीया नायिका के लक्षरप में संस्कृत के साहित्यशास्त्र में आदर्श वादिता की भलक मिलती है किन्तु परकीया और साधा- रस स्त्री के वर्णन में उनका दृष्टिकोण यथार्थवादी रहा है। (क) मुग्धा नायिका उनमें- जिसकी अवस्था तथा काम-भावना नवीन होती है, जो रति-क्रीडा में िफकने वाली (वामा=विपरीत, प्रतिकूल विमुख) और क्रोध करने में कोमल होती है, वह मुग्धा नायिका है। अर्थात् जिसमें यौवन तथा काम-भाव का प्रथम अवतरण होता है, जो रतिकीड़ा में अनुकूल नहीं होती (क्योंकि उससे अनभिज्ञ होती है), (क्रोध करने पर) जिसे सुखपूर्वक प्रसन्न किया जा सकता है वह मुग्धा नायिका होती है। उनमें, वषोमुग्धा यह है, जैसे-'यह स्तनभार बढ़ने वाला है किन्तु अभी उचित विस्तार को नहीं प्राप्त हुआ है। यह त्रिबलि रेखाओं से तो प्रकट हो रही है किन्तु स्पष्टतः

Page 186

द्वितीय: प्रकाश: १३७

'विस्तारी स्तनभार एष गमितो न स्वोचितामुन्नति रेखोद्धासिकृतं वलित्रयमिदं न स्पष्टनिम्नोन्नतम् । मध्येऽस्या ऋजुरायतार्धकपिशा रोमावली निर्मिता रम्यं यौवनशैशवव्यतिकरोन्मिश्रं वयो वर्तते ॥१०६॥' यथा च ममैव- 'उच्छव सन्मण्डल प्रान्तरेखमाबद्धकुड्मलम् । अपर्याप्तमुरोवृद्ध: शंसत्यस्याः स्तनद्वयम् ।।१०७।' काममुग्धा यथा- 'दृष्टिः सालसतां बिभर्तति न शिशुकीडासु बद्धादरा श्रोत्र प्रेषयति प्रवर्तितसखीसम्भोगवार्तास्वपि। पुसामड्ूमपेतशङ्गमधुना नारोहति प्राग्यथा बाला नूतनयौवनव्यतिकरावष्टभ्यमाना शनैः ॥१०८॥' रतवामा यथा- 'व्याहता प्रतिवचो न सन्दे गन्तुमैच्छदवलम्बितांशुका । सेवते स्म शयनं पराङ्मुखी सा तथापि रतये पिनाकिनः ।१०६।।' नीची ऊँची नहीं है। इसके मध्य में सीधी विस्तृत रोमावली बन गई है, जो आधी कपिश वर्णग की (भूरी) ही है। इस प्रकार इसकी यौवन और शैशव के संसर्ग (व्यतिकर) से मिश्रित रमसीय अ््रवस्था है'। [यहाँ नायिका में तारुण्य के अवतरित होने का वर्णन किया गया है] और जैसे मेरा (धनिक का) ही (पद्य है)-'इसके दोनों स्तन, जिनके मण्डल के प्रान्त की रेखा उभर रही है कलियां बंध गई हैं, वक्षः स्थल की वृद्धि की अपूर्णता को बतला रहे हैं।'

होता है] [यहाँ विशेष प्रकार के स्तनों के वर्णन से योवन का अवतरित होना प्रकुट

काममुग्धा यह है, जैसे-'अब इस बाला की दृष्टि अलसाई सी रहती है, बाल-क्रीडा में यह रुचि नहीं रखती, सखियों के द्वारा चलाई गई सम्भोग की बातों में कान लगा लेती है, पहिले की भांति अब शङ्गारहित होकर पुरुषों की गोद में नहीं बैठ जाती। इस प्रकार धीरे-धीरे यह बाला नूतन यौवन के संसर्ग से युक्त हो रही है।' [यहाँ नायिका में धीरे धीरे काम के सञ्चार का वर्णन किया गया है] रतवामा यह है, जैसे-(कुमारसम्भव ८·२) 'जब (शिव ने, पार्वती से) कुछ कहा तो उसने उत्तर नहीं दिया, जब उसका आंचल पकड़ लिया तो उसने जाने की इच्छा की, वह दूसरी ओर को मुख करके शय्या पर सोती थी फिर भी वह शिव को आ्नन्द देने वाली थी'। [इस वर्णन से पावती की रति-विमुखता प्रकट होती है]

Page 187

१३८ देशरूपकस

मृदुः कोपे यथा- 'प्रथमजनिते बाला मन्यौ विकारमजानती कितवचरितेनासज्याक्के विनम्रभुजैव सा। चिबुकमलिक चोन्नम्योच्चैरकृत्रिमविभ्रमा नयनसलिलस्यन्दिन्योष्ठे रुदन्त्यपि चुम्बिता ।११०।' एवमन्येऽपि लज्जासंवृतानुरागनिबन्धना मुग्धाव्यवहारा निबन्धनीया;, यथा- 'न मध्ये संस्कारं कुसुममपि बाला विषहते न निःश्वासैः सुभ्र र्जनयति तरङ्गव्यतिकरम् । नवोढा पश्यन्ती लिखितमिव भर्तु: प्रतिमुख प्ररोहद्रोमाञ्चा न पिबति न पात्र चलयति ॥१११॥' कोप में मृदु यह है जैसे-'प्रथम बार उत्पन्न हुए कोप में वह बाला बिगड़ना नहीं जानती थी, वह भुजाओं को नीचे किये रही और उस धूर्त चरित्र वाले नायक ने उसे गोदी में खींचकर उसकी ठोड़ी और मस्तक (अलिक) को ऊपर उठाकर किसी प्रकार की कृत्रिम शृङ्गार-चेष्टा (विभ्रम) न करने वाली केवल रोती हुई उसका नेत्रों के जल से भीगे ओठों पर चुम्बन किया।' [इस वर्णन से प्रकट होता है कि मुग्धा कोप में विगड़ना नहीं जानती, यदि कोप करती भी है तो उसे सहज ही प्रसन्न किया जा सकता है] इसी प्रकार लज्जा से आच्छादित अनुराग द्वारा उत्पन्न होने वाली (लज्जया संवृतो योऽनुरागस्तन्निबन्धनाः) मुग्धा की चेष्टाओं का वर्णन करना चाहिये। जैसे-'यह बाला (पेय-पात्र के) बीच में पुष्प के संस्कार (शोभा या सुगन्ध के लिये रक््खे गये पुष्प) को भी सहन नहीं करती, वह सुन्दर भौहों वाली अपने श्वास द्वारा (पेय पदार्थ में) तरङ्गों का व्यवधान (व्यतिकर) भी नहीं उत्पन्न करती, वह नव विवाहिता प्रियतम के मुख के प्रतिबिम्ब को (पेय पदार्थ में) चित्रित सा देखती है, उसके रोमाञ्च उत्पन्न हो गये हैं तथा वह न तो (पेय को) पीती ही है और न पात्र को हिलाती है'। टिप्पणी-(१) 'न मध्ये' इत्यादि में लज्जा से आच्छादित अनुराग प्रकट होता है। बाला नवोढा है, मुग्धा है वह अनुराग के कारण पति को देखना चाहती है किन्तु लज्जा से उसका अनुराग ढका है और वह पेय पदार्थ में प्रिय के प्रतिबिम्ब को देखकर दर्शन की लालसा को तृप्त करना चाहती है। (२) सा० द० (३.५८), ना० द० (४.२५८) में भी प्रायः इसी प्रकार का विवेचन है। भा० प्र० (पृ० ६६ पं० १७-२०) में मुग्धा के स्वरूप का अधिक स्पष्ट चित्रण है- शीलसत्यार्जवोपेता रहःसम्भोगलालसा। मुग्धा नववयःकामा रतौ वामा मृदुः क्र घि।। यतते रतिचेष्टासु पत्युर्वीडामनोहरम्। अपराधे रुदत्येव न वदत्यप्रियं प्रिये।

Page 188

द्वितीय: प्रकाश: १३६

अथ मध्या- (२७) मध्योद्ययौवनानङ्गा मोहान्तसुरतक्षमा ॥१६।। सम्प्रास्ततारुण्यकामा मोहान्तरतयोग्या मध्या। तत्र यौवनवती यथा- 'आलापान् भ्रूविलासो विरलयति लसद्वाहुविक्षिप्यातं नीवीग्रन्थि प्रथिम्ना प्रतनयति मनाङ्मध्यनिम्नो नितम्बः । उत्पुष्पत्पाश्वमूच्छंत्कुचशिखरमुरो नूनमन्तः स्मरेण स्पृष्टा कोदण्डकोट्या हरिणशिशुद्दशो दृश्यते यौवनश्रीः ॥११२।' कामवती यथा- 'स्मरनवनदीपूरेणाः पुनर्गु रुसेतुभि- र्यदपि विधृतास्तिष्ठन्त्यारादपूर्णमनोरथाः । तदपि लिखितप्रख्यैरङ्ग: परस्परमुन्मुखा नयननलिनीनालाकृष्टं पिबन्ति रसं प्रिया: ॥११३।' मध्यासम्भोगो यथा- ताव च्चित्र रइसमए महिलाएं विब्भमा विराअ्ररन्ति। जाव रा कुवलयदलसच्छहाइं मउलेन्ति सश्रणाइं॥११४॥' (ख) मध्या नायिका जिसमें यौवन और काम का उदय हो रहा है, जो मूर्च्छा की अव- स्था (मोह) पर्यन्त रति में समर्थ है, वह मध्या नायिका है। तारुण्य और काम-भाव को प्राप्त कर चुकने वाली तथा मोह की अवस्था पर्यन्त सुरत के योग्य नायिका मध्या होती है। उनमें यौवन से युक्त यह है जैसे-'उसके भ्र विलास ने आलाप (वार्तालाप= बातचीत) को कम कर दिया है, उसका गमन भुजाओं के हिलने से शोभित है, मध्य भाग में नीचा नितम्ब अपने विस्तार से नीवी की ग्रन्थि को तनिक क्षीण (शिथिल) कर रहा है, वक्षस्थल के पाश्व भाग विकसित हो रहे हैं, स्तन-शिखर बढ़ रहा है (मूच्छंत)। ऐसा दिखलाई देता है कि अवश्य ही अन्तःकरण में स्थित कामदेव ने अपने धनुष की कोर से मृगशावकनयनी की यौवन-श्री का स्पर्श कर लिया है'।

रहा है] [इस वर्णन द्वारा यह प्रकट होता है कि नायिका को पूर्ण यौवन प्राप्त हो

काम से युक्त नायिका यह है, जैसे-'कामदेव की नूतन सरिता के प्रवाह में बहते हुए प्रिय यद्यपि गुरुजन रूपी सेतु के द्वारा रोके हुए अपूएं मनोरथ वाले होकर निकट बैठे हैं तथापि चित्रलिखित से अङ्गों द्वारा एक दूसरे के प्रति उन्मुख होकर नेत्र रूपी कमलनाल से लाये हुए रस का पान कर रहे हैं'। मध्या की रति इस प्रकार की होती है, जैसे-'महिलाओं की शृङ्गार-

Page 189

१४० दशरूपंकम्

('तावदेव रतिसमये महिलानां विभ्रमा विराजन्ते। यावन्न कुवलयदलस्वच्छाभानि मुकुलयन्ति नयनानि ।।' ) एवं धीरायामधीरायां धीराधीरायामप्युदाहायम्। अथास्या मानवृत्ति :- (२८) वीरा सोत्प्रासवक्रोक्त्या, मध्या साश्र कृतागसम्। खेद्येद् दयितं कोपाद्धीरा परुषाक्षरम् ॥१७। मध्याधीरा कृतापराधं प्रियं सोत्प्रासवकरोक्त्या खेदयेत्। यथा माधे- 'न खलु वयममुष्य दानयोग्याः पिबति च पाति च यासको रहस्त्वाम् । ब्रज विटपममु ददस्व तस्यै भवतु यतः सदृशोश्चिराय योग: ।११५।' चेष्टाएं रतिकाल में तभी तक शोभित होती है जब तक कि नीलकमल-पत्र के समान निर्मल आभा वाले नेत्र मुकुलित (बन्द) नहीं हो जाते'। [इस वर्णन से मूर्च्छा की अवस्था पर्यन्त रति-सामर्थ्य प्रकट होता है] इसी प्रकार धीरा, अधीरा तथा धीराधीरा का भी उदाहरण दिया जा सकता है। टिप्परी-(१) मि०, ना० द० (४.२५६) 'मध्या मध्यवयः-काम-माना मूर्च्छान्तिमोहना'; भा० प्र० (पृ० ६६ पं० २१-२२)। सा० द० (३-५६) में मध्या का लक्षण अधिक स्पष्ट है-'मध्या वह है जो विचित्र रतिलीला में निपुण हो, जिसका काम और यौवन उभार पर हो, जो कुछ प्रगल्भ वचन बोलती हो और मध्यम कोटि की लज्जा रखती हो।' (२) मध्या के धीरा, अधीरा तथा धीराधीरा, ये तीन प्रकार माने जाते हैं। तीनों प्रकार की मध्या नायिका के रतिवर्णन में भी कुछ अवान्तर भेद हो सकता है जिसके उदाहरण काव्य-नाट्य में देखे जा सकते हैं। ना० द० (४.२५६) तथा दशरूपक के अग्रिम (२.१७) विवेचन में धीरा, अधीरा तथा धीराधीरा की 'मानवृत्ति' का ही वर्णन किया गया है। इस (मध्या) नायिका की मानवृत्ति इस प्रकार की है :- 'मध्या घीरा ताने' (उत्प्रास) के साथ वक्रोक्ति से, धीराधीरा आँसुओं और ताने के साथ वक्रोक्ति से और अधीरा कोप के साथ अश्रुपूर्वक कठोर शब्दों से अपराधी प्रियतम को फटकारती है। मध्याधीरा अपराध करने वाले प्रियतम को ताने सहित वक्रोषिति से फटकारती है। जैसे माघ (७.५३) में [अपराध करने के पश्चात् कोई नायक नायिका को मनाने के लिये वृक्ष की शाखा (विटप) अपित करता है, इस पर नायिका कहती है] 'हम तो इस दान के योग्य नहीं हैं जो वह एकान्त में तुम्हें पीती है और तुम्हारी रक्षा करती है, जाओ, इस शाखा को उसी को दे दो; जिससे इन होनों समान वस्तुओं का चिरकाल के लिये संयोग हो जाये।

Page 190

द्वितीय: प्रकाश: १४१

धीराधीरा साश्र सोत्प्रासवकोक्त्या खेदयेत्, यथाऽमरुशतके- 'बाले नाथ विमुञ्च मानिनि रुषं रोषान्मया किं कृतं खेदोऽस्मासु न मेऽपराध्यति भवान्सर्वेऽपराधा मयि। तत्कि रोदिषि गद्गदेन वचसा कस्याग्रतो रुद्यते नन्वेतन्मम का तवास्मि दयिता नास्मीत्यतो रुद्यते ॥११६॥' अधीरा साश्रु परुषाक्षरम्, यथा- 'यातु यातु किमनेन तिष्ठता मुञ्च मुञ्च सखि मादरं कृथाः । खण्डिताधरकलङ्गितं प्रियं शक्नुमो न नयनैनिरीक्षितुम् ॥११७॥' एवमपरेऽपि ब्रीडानुपहिता: स्वयमनभियोगकारिणो मध्याव्यवहारा भवन्ति, यथा- 'स्वेदाम्भ:कणिकाञ्चितेऽपि वदने जातेऽपि रोमोद्गमे विश्रम्भेऽपि गुरौ पयौधरभरोत्कम्पेऽपि वृद्धिं गते। टिप्पणी -- (१) विटप=१. शाखा २. विट अर्थात् कामुक या उपपति का पान करने वाली या रक्षा करने वाली। (२) यहाँ नायिका ताना देकर वक्रोक्ति से फटकार रही है। धीराधीरा अश्रुपूर्वक ताने सहित वक्रोक्ति से अपराधयुक्त प्रियतम को फटकारती है। जैसे अमरुशतक (५७) में '(नायक) 'वाले, (नायिका) नाथ, (नायक) मानिनी, क्रोध को छोड़ दो। (नायिका) क्रोध से मैंने क्या कर लिया ? (नायक) हमारे (हृदय) में खेद उत्पन्न कर दिया। (नायिका) आपने मेरा कोई अपराध नहीं किया, सब मेरा ही दोष है। (नायक) तो फिर गद्गद वचन के साथ क्यों रो रही हो? (नायिका) किसके आगे रो रही हूँ ? (नायक) यह मेरे ही तो सामने। (नायिका) मैं तेरी कौन हूँ ? (नायक) प्रियतमा। (नायिका) आपकी प्रियतमा नहीं रही इसीलिये रो रहीं हूँ। टिप्पणी -- नायिका की इस फटकार में अश्रु है (रुद्यते) और ताने के साथ वक्रोक्ति भी (न मेऽपराध्यति, का तवाऽस्मि इत्यादि) । अधीरा मध्या अश्रुपूर्वक कठोर वचनों से अपराधयुक्त नायक को फटकारती है); जैसे-[अपराधयुक्त नायक कुपित नायिका को मनाने का प्रयास करता है, वह नहीं मानती तो नायक वापस चल देता है। इस पर कोई सखी नायक को रोकती है तो नायिका कहती है)-'हे सखी, इसे जाने दो, जाने दो, इसके ठहरने से क्या प्रयोजन ? छोड़ दो, छोड़ दो, इसका आदर मत करो। (अन्य नायिका के द्वारा) खण्डित अधर से कलङ्गित प्रिय को हम आंखों से भी नहीं देख सकतीं। इसी प्रकार मध्या नायिका के और भी व्यवहार होते हैं जो लज्जा से ढके नहीं होते और (सुरत में) नायिका की स्वतः प्रवृत्ति न कराने वाले होते हैं। जै.से-'यद्यपि नायिका का मुख स्वेद-जलकर से युक्त हो गया, उसे रोमाञच हो आया, गुरुजन (के न आने) से निश्चिन्तता भी रही, स्तन-भार का कम्पन भी बढ़

Page 191

१४२ दशरूपकम्

दुर्वारस्मरनिर्भरेऽपि हृदये नैवाभियुक्तः प्रिय- स्तन्वङ्गया हठकेशकर्षणघनाश्लेषामृते लुब्धया स्वतोऽनभियोजकत्वं हठकेशकर्षणघनाश्लेषामृते लुब्धयेवेत्युत्प्रेक्षाप्रतीतेः । अथ प्रगल्भा- (२६) यौवनान्धा स्मरोन्मत्ता प्रगल्भा दयिताङ्गके। विलीयमानेवानन्द।द्रतारम्भेऽ्यचेतना ।१८।। गाढयोवना यथा ममैव- 'अभ्युन्नतस्तनमुरो नयने च दीर्घे वक्र भ्र वावतितरां वचनं ततोऽपि। गया, हृदय कठिनता से रोकने योग्य काम-भाव से भर गया। फिर भी उस कृशाङ्गी ने मानों हठात केशकर्षण तथा गाढ आलिङ्गन रूपी अमृत के लोभ से प्रिय को स्वयं (सुरत में) प्रवृत्त नहीं कराया'। टिप्पणी -- (१) ना०द० (४.२५६ वृत्ति) तथा सा०द० (३.६१) में धीरा, अधीरा और वीराधीरा मध्या नायिकाओरं के मान का इसी प्रकार वर्णन किया गया है। (२) व्रीडानुपहिता=लज्जा की उपाधि से रहित, इस पद के द्वारा मध्या के व्यवहारों का मुग्धा के व्यवहारों से भेद दिखलाया गया है, मुग्धा के व्यवहार लज्जा से आच्छादित (लज्जासंवृत) होते हैं (२.१६) किन्तु मध्या के व्यवहार सर्वथा लज्जा से आच्छादित नहीं होते, हॉ, उनमें लज्जा रहती अवश्य है। इसीलिये सा० द० (३.५६) में इसे 'मध्यमव्रीडिता' कहा है। (३) स्वयम् अनभियोगफारिणाः-सुरते स्वकीय-(मध्या) प्रवृत्तप्रयोजकाः, प्रियः स्वयमेव सुरते प्रवर्तेतेति समीहते मध्येतेति भाव: (प्रभा)=नायक की सुरत में स्वयं प्रवृत्ति न कराने वाली, इस पद के द्वारा मध्या का प्रगल्भा से भेद दिखलाया गया है। प्रगल्भा नायिका नायक को सुरत में स्वयं प्रवृत्त कराने वाली होती है जैसा कि 'रतप्रगल्भा' (उदा० १२२) पद से विदित होता है। भा० प्र० में भी कहा है-'प्रगल्भाऽडरभते स्वैरं बाह्य चाभ्यन्तरे रते' (४) स्वतो ...... प्रतीते :- इस पंक्ति का अर्थ इस प्रकार है-हठकेशकर्षणघना श्लेषामृते लुब्धयेव (प्रियो नैवाभियुक्तः) इत्युत्प्रेक्षाप्रतीते: (नायिकाथाः) स्वतोऽनभि- योजकत्वं (लभ्यते)। (ग) प्रगल्भा- जो यौवन में त्रन्धी सी, काम से उन्मत्त सी, आनन्द के कारण प्रियतम के अरङ्गों में प्रविष्ट होती हुई सी और सुरत के आरम्भ में भी चेत- ना-रहित हो जाती है वह प्रगल्भा नायिका है। गाढ यौवन वाली (जवानी में अन्धी सी) यह है जैसे मेरा (धनिक का) ही (उदाहरण है)-'उस अनूठे यौवन वाली का उरः स्थल उभरे स्तनों वाला है, नेत्र विशाल हैं, भौंहें वक्र हैं, वचन उनकी अपेक्षा भी अधिक वक हैं, मध्यभाग

Page 192

द्वितीय: प्रकाश: १४३

मध्योऽधिकं तनुरतीवगुरुनितम्बो मन्दा गतिः किमपि चाद् तयौवनायाः ॥११६॥' यथा च- 'स्तनतटमिदमुत्तुङ्ग' निम्नो मध्यः समुन्नतं जघनम् । विषमे मृगशावाक्ष्या वपुषि नवे क इव न स्खलति ॥१२०। भावप्रगल्भा यथा- 'न जाने सम्मुखायाते प्रियाणि वदति प्रिये। सर्वान्यङ्गानि कि यान्ति नेत्रतामुत कर्णाताम् ॥१२१।' रतप्रगल्भा यथा- कान्ते तल्पमुपागते विगलिता नीवी स्वयं बन्धनाद- वासः प्रश्लथमेखलागुणधृतं किञ्चिन्नितम्बे स्थितम् । एतावत् सखि वेद्यि केवलमहं तस्याङ्गसङ्ग पुनः कोऽसी कास्मि रतं नु कि कथमिति स्वल्पाऽपि मे न स्मृतिः ॥१२२॥' एवमन्येऽपि परित्यक्तह्वीयन्त्रणावैदग्ध्यप्रायाः प्रगल्भाव्यवहारा वेदितव्याः।यथा- अत्यन्त क्षीणा है तथा नितम्ब अत्यधिक भारी, और चाल कुछ मन्द हो गई है। और जैसे-'यह ऊपर उठा हुआ स्तनतट, नीचा मध्यभाग, और फिर ऊंचा जघन- स्थल, इस प्रकार मृगशावकनयनी के इस विषम (ऊचे-नीचे) तथा नवीन शरीर में कौन स्खलित नहीं होगा ? टिप्पणी-यहाँ नायिका के गाढ यौवन का वर्णन है। 'विषमे न स्खलति' का तात्पर्य यह है कि जिस प्रकार नई ऊंची नीची भूमि में कोई भी व्यक्ति चलते हुए फिसल जाता है इसी प्रकार इसके गाढ यौवन से पूर्ण शरीर के प्रति भी उसके फिसलने की सम्भावना है। भावप्रगल्भा (भावों में प्रगल्भा यह है, जैसे (कोई नायिका अपनी सखी से कहती है) 'प्रियतम के सामने आने पर और प्रिय वचन कहने पर न जाने मेरे समस्त अरङ्ग हो नेत्र बन जाते हैं अथवा श्रोत्र बन जाते हैं (अर्थात् प्रियतम के निकट आाने पर मैं सब ओर उन्हें ही देखती हूँ, उनके बोलने पर सब ओर उनकी ही बात सुनती हूँ)। रतप्रगल्भा (रति में प्रगल्भा) यह है, जैसे (अमरु० १०१ में नायिका अपनी सखी से कहती है) 'प्रियतम के सेज पर आते ही मेरी नीबी की गांठ स्वयं ही खुल गई, ढीली करधनी की लड़ी (गुए) से रोका गया वस्त्र भी कुछ नितम्ब पर ही ठहरा रहा। मैं तो अब केवल इतना ही जानती हू। उसके अङ्गों का सम्पर्क होने के बाद की तो 'वह क्या है, मैं क्या हूँ, किस प्रकार की रतावस्था है' इत्यादि किसी बात की तनिक भी स्मृति मुझे नहीं रही'। इसी प्रकार और भी प्रगल्भा के व्यवहार जानने चाहियें, जिनमें लज्जा की यन्त्ररा छोड़ दी जाती है और विदग्धता का प्राचुर्य होता है। जैसे (भ्रमरु०

Page 193

१४४ दशरूपकमु

क्वचिच्चूर्णोद्गारी क्वचिदपि च सालक्तकपदः । वलीभङ्गाभौगैरलकपतितैः शीर्णाकुसुमैः स्त्रिया: स्वविस्थं कथयति रतं प्रच्छदपटः ॥१२३।' अथास्या: कोपचेष्टा- (३०) सावहित्थादरोदास्ते रतौ, धीरेतरा क्रधा। सन्तर्ज्य ताडयेद्, मध्या मध्याधीरेव तं वदेत् ॥१६॥ सहावहित्थेन=आकारसंवरणेनादरेण च=उपचाराधिक्येन वर्तते सा सावहि- त्थादरा, रतावुदासीना कधा कोपेन भवति। सावहित्थादरा यथाSमरुशतके - 'एक त्रासनसंस्थिति: परिहृता प्रत्युगद्गमाद् दूरत- स्ताम्बूलाहरणच्छलेन रभसाश्लेषोऽपि संविध्नितः । .१०७) 'बिछाने का वस्त्र (चादर) नायिका की सब प्रकार की रति को प्रकट कर -रहा है। वह वस्त्र कहीं पान से रंगा है, कहीं अगर के लेप के धब्बों से मलिन है, कहीं (गन्ध के) चूर्ण से युक्त है और कहीं महावर लगे पद (पद-चिह्न) से तथा कहों केशों से गिरे हुए मृदित (शीर्णा) पुष्पों से युक्त है'। टिप्परी-(१) क्वचित्० इत्यादि में नायिका की विविध प्रकार की काम- शास्त्रोक्त रति-विधियाँ प्रकट होती हैं। यदि नायिका लज्जा का निमन्त्रण स्वीकार करे या उसमें विदग्घता न हो तो वह विविध प्रकार की रतिविधियों का प्रयोग नहीं कर सकती (द्र० अमरु० १०७ टिप्पणी)। (२) ना० द० (४.२६०) के अनुसार दीप्त आयु, मान तथा काम वाली और प्रिय के स्पर्शमात्र से बेसुध हो जाने वाली प्रगल्भ नायिका होती है। सा० द० (३.६०) में प्रायः दशरूपक के समान ही प्रग- ल्भता का स्वरूप दिखलाया गया है। प्रता० (१.५६) में प्रगल्भा को 'प्रौढा' कहा गया है, इसी प्रकार वाग्भटालड्वार तथा काव्यानुशासन में भी। इस (प्रगल्भा) की कोपचेष्टा इस प्रकार होती है- धीरा प्रगल्भा अवहित्थ (-आकार-संवरण) तथा आदर-प्रदर्शन सहित व्यवहार करती है, वह कोप के कारण रति में उदासीन रहती है। अधीरा (धीरेतरा) प्रगल्भा क्रोध से (नायक को) फटकार कर पीटती है। घीरावीरा (मध्या) प्रगल्भा धीराधीरा मध्या के समान उस नायक से बात करती है ।१६/। जो (कुपित) आकार को छिपाकर अधिक औपचारिकता (आदर) के साथ व्यवहार करती है वह 'सावहित्यादरा' कहलाती है। कोप के कारण रति में उदासीन रहती है। अल सावहित्थादरा यह है, जैसे अमरुशतक (१८) में 'नायक को दूर से आते ०हुए द्रेखकर अगवानी में उठते हुए एक आसन पर बैठने को बचा दिया, पान लाने के बहाने से (नायक द्वारा) वेगपूर्वक किये जाते हुए आलिङ्गन में भी विघ्न कर

Page 194

द्वितीय: प्रकाश: १४५

आलापोऽपि न मिश्रितः परिजन व्यापारयन्त्याऽन्तिके कान्तं प्रत्युपचारतश्चतुरया कोप: कृतार्थीकृतः ॥१२४॥' रताबुदासीना यथा- 'आयस्ता कलहं पुरेव कुरुते न सत्रंसने वाससो भग्न भ्रूग तिखण्डयमानमधरं धत्ते न केशग्रहे। अङ्गान्यर्पयति स्वयं भर्वत नो वामा हठालिङ्गने तन्व्या शिक्षित एष सम्प्रति कुतः कोपप्रकारोऽपर: ॥१२५॥' इतरा त्वधीरप्रगल्भा कुपिता सती सन्तर्ज्य ताडयति। यथाऽमरुशतके -- 'कोपात्कोमललोलबाहुलतिकापाशेन बद्ध्वा दृढं नीत्वा केलिनिकेतनं दयितया सायं सखीनां पुरः। भूयोऽप्येवमिति स्खलत्कलगिरा संसूच्य दुश्चेष्टितं धन्यो हन्यत एष निह्न तिपरः प्रेयान् रुदन्त्या हसन् ॥१२६॥ धीराधीरप्रगल्भा मध्याधीरेव तं वदति सोत्प्रासवकोकत्या। यथा तत्रैव- 'कोपो यत्र भ्र कुटिरचना निग्रहो यत्र मौनं यत्रान्योन्यस्मितमनुनयो दृष्टिपातः प्रसादः ।

दिया, नायक के पास सेवकों को काम में लगाती हुई उसने नायक से बात-चीत भी न की। इस प्रकार प्रियतम के प्रति औपचारिकता का प्रदर्शन करके उस प्रगल्भा (नायिका) ने अपना कोप सफल कर लिया'। हिग रति में उदासीन यह है, जैसे (अमरु० १०६ में नायक कहता है)- 'परिश्रान्त सी (आयस्ता) वह वस्त्र खींचने पर पहिले के समान कलह नहीं करती, केश ग्रहण के समय भौंहें वक्र करके अधर नही काटती। स्वयं अपने श्रङ्गों को अरपित कर देती है औरर बलात आ्लिङ्गन करने पर विरोध नहीं करती। इस प्रकार कृशाङ्गी ने कहीं से यह और (=अपर=अनूठा) ही कोप का प्रकार सीख लिया है।' ए दूसरी अर्थात् अधीर प्रगल्भा तो कुपित होकर नायक को फटकार कर पीटती है। जैसे अमरुशतक (६) में (कवि वर्णन करता है)-'प्रियतमा अपनी काँपती हुई कोमल बाहुलता से प्रियतम को दृढतापूर्वक बांधकर सायंकाल सखियों के सामने ही वास-भवन में ले आई। 'फिर भी ऐसे ही' इस प्रकार की कम्पित मृदु वासगी से उसके अपराध को सूचित करके रोती हुई उस नायिका ने (अपने अपराध को) छिपाने में तत्पर तथा हँसते हुए उस सौभाग्यशाली (धन्य) को पीटा'। धीराधीरा जो प्रगल्भा होती है, वह भी धीराधीरा मध्या के समान उस (नायक) से ताने भरी वक्रोक्ति के साथ नातें करती है। जैसे वहीं (अमरु० ३८ में नायिका नायक से कहती है) 'जिस प्रेम में भ्र -विलास ही कोप है, मौन ही दण्ड है, एक दूसरे के प्रति मुसकराना ही अनुनय है, दृष्टि डालना ही प्रसन्नता है, देखो

Page 195

१४६ दशरूपकम्

तस्य प्रेम्णस्तदिदमधुना वैशसं पश्य जातं 6V6 तवं पादान्ते लुठसि न च मे मन्युमोक्षः खलायाः ॥१२७॥' पुनश्च -- (३१) द्वोधा ज्येष्ठा कनिष्ठा चेत्यमुग्धा द्वादशोदिताः । मध्याप्रेगल्भाभेदानां प्रत्येकं ज्येष्ठाकनिष्ठात्वभेदेन द्वादश भेदा भवन्ति। मुग्धा त्वेकरूपैव। ज्येष्ठाकनिष्ठेयथ।Sमरुशतके- 'दृष्ट्वैकासनसंस्थिते प्रियतमे पश्चादुपेत्यादरा- देकस्या नयने निमील्य विहितकीडानुबन्धच्छलः । ईषद्वक्रितकन्धरः सपुलकः प्रेमोल्लसन्मानसा- मन्तहससिलसत्कपोलफलकां धूर्तोऽपरां चुम्बति ॥१२८॥' न चानयोर्दाक्षिण्यप्रेमभ्यामेव व्यवहारः, अपि तु प्रम्शापि यथा चैतत्तथोक्तं दक्षिण-

तो उस प्रेम का यह अब कैसा विनाश (वैशसम) हुआ है कि तुम मेरे चरणों में लेट रहे हो और मुझ दुष्टा का कोप ही दूर नहीं होता'। टिप्पणी-मध्या नायिका के समान प्रगल्भा भी तीन प्रकार की होती - घीरा, धीराधीरा और अधीरा; मि०, ना० द० (४.२६० वृत्ति) तथा सा०द० (३. ६१)। ना० द० (४.२६० वृत्ति) तथा सा० द० (३.६२-६४)। में प्रगल्भा की कोपचेष्टा का प्रायः इसी प्रकार वर्णन किया गया है।

-- ( (मध्या तथा प्रगल्भा नायिकाएं) दो प्रकार की होती हैं- ज्येष्ठा और फिरभी

जाते हैं। तथा कनिष्ठा। इस प्रकार मुग्धा से भिन्न नायिकाओं के बारह भेद हो

मध्या और प्रगल्भा के भेदों में से प्रत्येक के ज्येष्ठा और कनिष्ठा दो भेदहोने से दोनों के कुल १२ भेद हो जाते हैं। किन्तु मुग्धा तो एक प्रकार की ही होती है। ज्येष्ठा और कनिष्ठा इस प्रकार की होती है, जैसे अमरुशतक (१६) में (कविवर्णन करता है) 'एक आसन पर बैठी हुई दो प्रियाओं को देखकर प्रियतम ने आदरपूर्वक पीछे से पास जाकर क्रीडा करने के बहाने से एक की आांखें मूंद लों और उस घूर्तने रोमाञ्चित होकर ग्रीवा को कुछ वक्र करके प्रेम से उल्लसित हृदय वाली एवं आन्तरिक हास से शोभित कपोल तल वाली दूसरी नायिका का चुम्बन किया'। 5 इन दोनों (ज्येष्ठा और कनिष्ठा) के प्रति करमशः (ज्येष्ठा के प्रति) केवल दाक्षिण्य का हो तथा (कनिष्ठा के प्रति) प्रेम का ही व्यवहार पाया जाता है, यह बात नहीं है, अपि तु (ज्येष्ठा के प्रति) प्रेम का भी व्यवहार देखा जाता है। यह किस प्रकार होता है यह दक्षिण नायक के लक्षणा के अवसर पर (सहृदयत्वेन शठाद् विशेष: इत्यादि) बतलाया जा चुका है।

Page 196

द्वितीय: प्रकाश: १४७

प्रगल्भा-धीराधीरप्रगल्भाभेदानां प्रत्येक ज्येष्ठाकनिष्ठाभेदाद द्वादशानां वासवदत्ता- रत्नावलीवत्प्रबन्धनायिकानामुदाहरणानि महाकवि प्रबन्वेष्वनुसर्तव्यानि। अथान्यस्त्री- - (३२) अन्यस्त्री कन्यकोढा च नान्योढाडङ्गिरसे क्वचित् ॥२०॥ कन्यानुरागमिच्छातः कुर्यादङ्गाङ्गिसंश्रयम। नायकान्तरसम्बन्धिन्यन्योढा यथा- 'दृष्टिं हे प्रतिवेशिनि क्षणमिहाप्यस्मिन्गृहे दास्यसि प्रायेरास्य शिशोः पिता न विरसा: कौपीरपः पास्यति। एकाकिन्यपि यामि तद्वरमितः स्रोतस्तमालाकुल नीरन्ध्रास्तनुमालिखन्तु जरठच्छेदानलग्रन्थयः ।१२६।' इयं त्वङ्गिनि प्रधाने रसे न क्वचिन्निबन्धनीयेति न प्रपञ्चिता। इन धीरमध्या, अधीरमध्या, धीराधीरमध्या तथा धीरप्रगल्भा, अधीरप्रगल्भा धीराधीरप्रगल्भा में से प्रत्येक के ज्येष्ठा और कनिष्ठा दो भेद होने के कारण कुल १२ भेद हो जाते हैं। इन १२ प्रबन्धनायिकाओरं के उदाहरण वासवदत्ता (ज्येष्ठा) तथा रत्नावली (कनिष्ठा) के समान महाकवियों की रचनाओं में खोजने चाहियें। टिप्परी(१) -- मि०, सा० द० (३.६४-६५), रसार्णव सुधासार (१.१०५)। (२) इस प्रकार स्वकीया नायिका के १३ भेद होते हैं :- मुग्धा केवल एक प्रकार =१ मध्या (धीरा, अधीरा,धीराधीरा) x (ज्येष्ठा, कनिष्ठा) =६ प्रगल्भा (धीरा, अधीरा, धीराधीरा)x (ज्येष्ठा, कनिष्ठा) =६ परकीया (अन्य स्त्री) आाता अन्य स्त्री (परकीया) दो प्रकार की होती है-कन्या तथा विवाहिता। अन्य विवाहिता स्त्री (परोढा) को कभी भी प्रधान रस की नायिका नहीं बनाना चाहिये। कन्या के अनुराग को तो कवि इच्छानुसार प्रधान या अप्रधान रस का आधार बना सकता है॥२०-२१।। किसी अन्य नायक की विवाहिता स्त्री अन्योढा (परोढा) कहलाती है, जैसे-'हे पड़ोसिन, क्षण भर को यहां हमारे घर पर भी निगाह रखना। इस बालक का पिता (अर्थात् मेरा स्वामी) कुएँ के स्वादरहित जल को नहीं पीता, इसलिये यह ठीक ही है कि मैं अकेली होकर भी तमाल वृक्षों से घिरे हुए स्रोत पर यहां से जाऊ, भले ही पुराने खण्डों वाली नल (नरसल) की घनी (नीरन्ध्रा := रन्घ्र अर्थात् छिद्र से रहित) गांठें मेरे शरीर को खरोंच दें'। m इस (परोढा) की तो अङ्गी अर्थात् प्रधान रस में कभी भी योजना नहीं करनी चाहिये, इसीलिये इसका विस्तारपूर्वक वर्णन नहीं किया गया। टिप्पणी-(१) इस उक्ति से प्रकरण आदि के अनुसार यह प्रकटहोता है कि नायिका परपुरुष से रतिकीडा के लिये जा रही है। रतिकीडा में होने वाले

Page 197

१४८ दशरूपकम्

कन्यका तु पित्राद्यायत्तत्वादपरिणीताप्यन्यस्त्रीत्युच्यते, तस्यां पित्रादिभ्यो डलम्यमानाय। सुलभायामपि परोपरोधस्वकान्ताभयात्प्रच्छन्न कामित्वं प्रवर्तते, यथा मालत्यां माधवस्य सागरिकायां च वत्सराजस्येति। तदनुरागश्च स्वेच्छया प्रधाना- प्रधानरससमाश्रयो निबन्धनीयः । यथा रत्नावलीनागानन्दयोः सागरिका-मलयवत्य- नुराग इति। (३३) साधारणस्त्री गणिका कलाप्रागल्म्यधौर्त्ययुक् ।२१॥ तद्व्यवहारो विस्तरतः शास्त्रान्तरे निदशितः। दिङ्मात्रं तु- दन्तक्षत, नखक्षत आदि को छिपाने के लिये वह नल की गाँठों से छिद जाने की बात बना रही है। (२) लोक में अन्य की परिणीता भी किसी अन्य पुरुष से प्रेम करने लगती है। संस्कृत के मुक्तक काव्यों में इस प्रकार के प्रेम-प्रसङ्गों का वर्णन किया गया है, यद्यपि इस प्रकार का प्रेम-वर्णन रसाभास (शृङ्गाराभास) के अन्त- गंत ही माना जाता है, रस के अन्तर्गत नहीं। साहित्य शास्त्र की यह भी मर्यादा है कि जहाँ शृङ्गार प्रधान रस हो उस शृङ्गार का आ्र्परलम्बन परोढा को नहीं बनाया जा सकता। यद्यपि कन्या अविवाहिता होती है तथापि उसे अन्य स्त्री (परकीया) कहा जाता है; क्योंकि वह पिता आदि के अधीन होती है। उस (कन्या) में गुप्त रूप से प्रेम की प्रवृत्ति हुआ करती है; क्योंकि (प्रथम तो) वह पिता इत्यादि से प्राप्त ही नहीं की जा सकती। यदि प्राप्त भी हो जाती है तो दूसरों की रुकावट या अपनी प्रियतमा का भय होता है। जैसे मालती में माधव का (दूसरों की रुकावट के कारण) और सागरिका में वत्सराज का (देवी वासवदत्ता के भय के कारण) अनुराग गुप्तरूप से प्रवृत्त होता है। कन्या के अनुराग का इच्छानुसार प्रधान तथा अप्रधान दोनों रसों में वर्णन किया जा सकता है। जैसे रत्नावली और नागानन्द में सागरिका तथा मलयवती के अनुराग का वर्णन है। टिप्पशी-(१) रत्नावली में प्रधान रस शृङ्गार है उसके सन्दर्भ में साग- रिका के अनुराग का वर्णन किया गया है नागानन्द में प्रधान रस दयावीर है, शङ्गार अप्रधान है, उसके सन्दर्भ में मलयवती के अनुराग का वर्णन किया गया है। सुदर्शनाचार्यकृत प्रभा (संस्कृत टीका) में कहा गया है-जीमूतवाहन शान्तरस का नायक है (जीमूतवाहनस्य ... प्राधान्येन शान्तरसनायकत्वात), यह कथन धनञ्जय और धनिक के मत के प्रतिकूल है। धनिक ने नागानन्द में दयावीर रस की प्रधानता मानी हैं (द्र०, आगे ४.३५)। (२) मि०, सा० द० (३.६६-६७) भा० प्र० (पृ० ६५)। साधारस स्त्री (सामान्य नायिका)

से युक्त होती है। साधारण स्त्री तो गणिका होती है जो कला, प्रगल्भता और धूर्तता

उस (साधारण स्त्री) का व्यवहार अन्य शाह्त्रों में विस्तारपूर्वक वर्णिगत किया गया है। दिग्दर्शन मात्र तो यह है-

Page 198

द्वितीय: प्रकाश: १४६

(३४) छन्नकामसुखार्थाज्ञस्वतन्त्राहंयुपएडकान्। रक्तेव रब्जयेदाढ्यान्निःस्वान्मात्रा विवासयेत् २२।। छन्नं ये कामयन्ते ते छन्नकामा: श्रोत्रियवशिग्लिङ्गिप्रभृतयः, सुखार्थः अप्रयासावा- प्तधन: सुखप्रयोजनो वा, अज्ञो मूर्खः, स्वतन्त्रो निरङ्कुशः, अहंयुरहङ्कृतः, पाण्डको वातपण्डादिः, एताम्बहुवित्तान् रक्तेव रञ्जयेदर्थार्थम्-तत्प्रधानत्वात्तद्वृत्तेः, गृहीतार्थान्कु- ट्टिन्यादिना निष्कासयेत् पुनः प्रतिसन्धानाय। इदं तासामौत्सर्गिक रूपम्। रूपकेषु तु -- वह छिपकर प्रेम करने वाले, सुखपूर्वक धन प्राप्त करने वाले, अ्रजञानी स्वच्छन्द, अहंकारी और पएडक आदि को, यदि धनवान् हों तो अनुरक्ता के समान प्रसन्न करती है और धन रहित होने पर इनको (निः खान) माता के द्वारा निकलवा देती है।२२। जो गुप्त रूप से काम-तृप्ति करते हैं वे 'छन्नकाम' कहे जाते हैं, जैसे भोत्रिय (वेदपाठी) व्यापारी तथा सन्यास इत्यादि का चिह्न (लिङ्ग) धार करने बाले; 'सुखार्थ' शब्द का अभिप्राय है वह व्यक्ति जिसे बिना प्रयास के ही धन मिल गया हो अथवा जिसका उद्देश्य सुख भोगना ही हो; अज्ञ-मूर्ख, स्वतन्त्र अर्थात् निरङ्कुश या स्वेच्छाचारी, अहंयु=अहंकारी; पण्डक का अर्थ है-वातपण्ड (=नपुंसक) इत्यादि। यदि ये प्रचुर धन वाले हों तो अनुरक्ता के समान धन की प्राप्ति के लिये इन्हें प्रसन्न करे, क्योंकि वेश्या की वृत्ति में धन की प्रधानता होती है (तद्वृत्ते := वेश्यावृत्तः, तत्प्रधानत्वात्=धनप्रधानत्वात्) । जब इनसे धन ले लिया जाये तो इनको कुट्टिनी इत्यादि के द्वारा निकलवा दे जिससे कि वे फिर भी मिल सकें। यह उन (गणिकाओं) का सामान्य रूप है। टिप्पणी-(१) भा० प्र० (६५.४), सा० द० (३.६७-७१) में सामान्य- नायिका का विस्तृत वर्णन किया गया है। 'पण्डक' शब्द का अरथ सा०द० में 'वात- पाण्ड्वादि' किया गया है; कुछ स्थलों पर इसका अरथ 'पाण्डुरोगी' किया गया है; वस्तुतः इसका अर्थ एक विशेष प्रकार का नपुंसक प्रतीत होता है जिसे चरक में 'वातिकपण्डक' कहा गया है (वाय्वग्निदोषाद् वृषणौ तु यस्य नाशं गती वातिकप- ण्डकः सः-चरक अ० २)। (३) पुनः प्रतिसन्धानाय=फिर मिलने के लिये, भाव यह है कि यदि कामुक का धन चुक जाने पर वेश्या उसे स्वयं निकालेगी तो वह फिर नहीं आयेगा किन्तु यदि स्वयं प्रम दिखाती रहेगी और कुट्टिनी द्वारा निकल- बायेगी तो धन मिलने पर वह फिर भी आ जायेगा। रूपकों में तो (वेश्या के विषय में यह विशेष बात है)-

Page 199

१५० दशरूपकम्

93833333388330338343 (३५) *रक्तैव त्वप्रहसने, नैषा दिव्यनृपाश्रये। प्रहसनवर्जिते प्रकरणादी रवतैवैषा विधेया। यथा मृच्छकटिकायां वसन्तसेना चारुदत्तस्य। प्रहसने त्वरक्तापि हास्यहेतुत्वात्। नाटकादी तु दिव्यनृपनायके नैव विधेया। अथ भेदान्तराणि- (३६) आसामष्टाववस्थाः स्युः स्वाधीनपतिकादिकाः ॥२३।। स्वाधीनपतिका वासकसज्जा विरहोत्कण्ठिता खण्डिता कलहान्तरिता विप्रलब्धा प्रोषितप्रिया अभिसारिकेत्यष्टी स्वस्त्रीप्रभृतीनामवस्थाः । नायिकाप्रभृतीनामप्यवस्था- रूपत्वे सत्यवस्थान्तराभिधानं पूर्वासां धर्मित्वप्रतिपादनाय। अष्टाविति न्यूनाधिकव्य- वच्छेदः ।

प्रह्सन से भिन्न अन्य रूपक में गणिका को (नायक के प्रति) अनु- रक्त ही दिखलाना चाहिये। जिस रूपक का आश्रय कोई दिव्य (नायक) या राजा हो उसमें इस (गणिका) को नहीं रखना चाहिये। प्रहसन को छोड़कर अन्य प्रकरण आदि में इस (गणिका) को नायक में अनुरक्त ही दिखलाना चाहिये जैसे सृच्छकटिक में वसन्तसेना को चारुदत्त में अनुरक्त दिखलाया गया है। प्रहसन में तो इसे नायक में अनुरक्त न होने वाली भी दिखलाया जाता है, क्योंकि प्रहसन हास्य का हेतु होता है। जिसमें दिव्य पुरुष या राजा नायक होता है ऐसे नाटक इत्यादि में तो गणिका को (नायिका रूप में) नहीं रखना चाहिये। नायिकाओं के अन्य भेद इन (नायिकाओं) की स्वाधीनपतिका इत्यादि आठ अवस्थाएं होती हैं।२३ । १. स्वाधीनपतिका, २. वासकसज्जा, ३. विरहोत्कण्ठिता, ४. खण्डिता, ५. कलहान्तरिता, ६. विप्रलब्धा, ७. प्रोषितप्रिया, ८. अभिसारिका-ये आाठ स्वीकीया (परकीया सामान्य) आदि नायिकाओं की अवस्थाएं हैं। यद्यपि नायिका होना (अथवा स्वकीया नायिका होना) इत्यादि भी (नारी की) अवस्थाएं ही हैं तथापि पूर्वोक्त (स्वकीया इत्यादि) अवस्थाएं धर्मी हैं और ये (स्वाधीनपतिका इत्यादि) उनके धर्म हैं (अर्थात् उन अवस्थाओं की ही ये अवस्थाएं हैं)-यह बतलाने के लिये इन अन्य अवस्थाओं का वर्णन किया गया है। 'आठ' (अष्टौ) इस शब्द का अभिप्राय है कि ये अवस्थाएं आठ ही हैं, कम या अधिक नहीं। कैसे ?

  • 'रूपके त्वनुरक्तव कार्या प्रहसनेतरे इति पाठान्तरम्।

Page 200

द्वितीयः प्रकाशः ६१५१

क न च वासकसज्जादेः स्वाधीनपतिकादावन्तर्भावः,अनासन्न प्रियत्वाद्वासकसज्जाया न स्वाधीनपतिकात्वम् । यदि चैष्यत्प्रियापि स्वाधीनपतिका प्रोषितप्रियापि न पृथग्वाच्या, न चेयता व्यवधानेनासत्तिरिति नियन्तु शक्यम्। न चाविदितप्रियव्यलींकायाः खण्डि- तात्वम्। नापि प्रवृतरतिभोगेच्छायाः प्रोषितप्रियात्वम् । स्वयमगमनान्नायकं प्रत्यप्रयो- जकत्वान्नाभिसारिकात्वम् । एवमुत्कण्ठिताप्यन्यव पूर्वाभ्यः। शचित्यप्राप्तप्रियागमन- समयातिवृत्तिविधुरा न वासकसज्जा। तथा विप्रलब्धापि वासकसज्जावदन्यैव पूर्वाभ्यः,

वासकसज्जा (-आने वाले प्रिय के लिये अपने आपको सजाने वाली) इत्यादि का स्वाधीनपतिका इत्यादि में अन्तर्भाव नहीं हो सकता। क्योंकि वासक- सज्जा का पति पास में नहीं रहता अतः वह स्वाधीनपतिका नहीं कहला सकती (स्वाधीनपतिका का पति पास में रहता है) । यह कहना भी ठीक नहीं कि वासक- सज्जा का पति शीघ्र ही आने वाला है (एष्यतपतिका) इसलिये वह स्वाधीनपतिका ही है, क्योंकि इस प्रकार तो प्रोषितप्रिया (जिसका पति दूरदेश में स्थित है) को भी स्वाधीनपतिका से पृथक् नहीं कहना चाहिये। (यदि कहो कि वासकसज्जा और उसके प्रिय के बीच तो देश काल की दूरी कम है किन्तु प्रोषितपतिका तथा उसके प्रिय के बीच देश-काल की दूरी अधिक है, इस प्रकार वासकसज्जा का पति निकट कहा जा सकता है और उसका स्वाधीन पतिका में अन्तर्भाव हो सकता है, स्वाधीन पतिका का नहीं, इस पर कहते हैं -- ) और, इतनी दूरी होने पर ही समीपता (आसति=पास होना) मानी जायेगो, इस प्रकार का नियम नहीं किय। जा सकता। अतः वासकसज्जा का स्वाधीनपतिका में अन्तर्भाव नहीं हो सकता, इसी प्रकार अन्य अवस्थाओरं में भी उसका अन्तर्भाव नहीं होता, कैसे ?)। वह (वासकसजा) खण्डिता भी नहीं कहला सकती, क्योंकि उसे प्रिय का अपराध (=व्यलीक, श्न्य स्त्री में आसक्ति) ज्ञात नहीं है। वह (वासकसज्जा) प्रोषितप्रिया भी नहीं है, क्योंकि रति और भोग की इच्छा में प्रवृत है (प्रोषितपतिका तो रति और भोग की इच्छा में प्रवृत्त नहीं होती)। वह (वासकसज्जा) अभिसारिका भी नहीं है; क्योंकि वह नायक के प्रति स्वयं नहीं जाती, न ही नायक को (अपने पास आने की) प्रेरणा देती है। टिप्पणी-इस प्रकार जिन अवस्थाओं में वासकसज्जा का अन्तर्भावहोने की आशङ्का थी, उनमें इसका अन्तर्भाव होना सम्भव नहीं है अतः वासकसज्जा नामक अवस्था अन्य अवस्थाओं से भिन्न ही है। इसी प्रकार विरहोत्कण्ठिता भी पूर्वोक्त नायिकाओं से भिन्न ही है। वह वासकसज्ा नहीं कहीं जा सकती, क्योंकि वह तो प्रिय के आगमन के उचित समय का अतिकरमण हो जाने पर व्याकुल (उत्कण्ठित) होने वाली है (इसके विपरीत आने वाले प्रिय के लिये सज्जा करने वाली वासकसजा होती है) । इसी प्रकार

Page 201

१५२ :दशरूपकम्

-उक्त्वा नायात इति प्रतारणाधिक्याच्च वासकसज्जोत्कण्ठितयोः पृथक्। कलहान्तरिता तु यद्यपि विदितव्यलीका तथाप्यगृहीतप्रियानुनया पश्चात्तापप्रकाशितप्रसादा पृथगेव खण्डितायाः। तत् स्थितमेतदष्टाववस्था इति। तत्र -- (३७) आरसन्नायत्तरमणा हृष्टा स्वाधीनभर्तृ का। विप्रलब्धा भी वासकसज्जा के समान ही पूर्वोक्त नायिकाओं से भिन्न है। (विप्रलब्धा का प्रियतम) 'वचन देकर भी नहीं आता' इस प्रकार वहां वञ्चना (प्रतारण) की अधिकता है इसलिये विप्रलब्धा वासकसज्ा और उत्कण्ठिता से भिन्न ही है (क्योंकि वे दोनों प्रिय के आगमन की प्रतीक्षा तो करती हैं किन्तु वहां वञ्चना नहीं होती)। यद्यपि कलहान्तरिता नायिका भी (खण्डिता के समान) पति के अपराध (=व्यलीक) को जानती है तथापि (भेद यह है कि) वह पहले तो प्रियतम की मनौती (अनुनय) को स्वीकार नहीं करती, फिर पश्चात्ताप द्वारा अपनी प्रसन्नता को प्रकट करती है (खण्डिता में यह बात नहीं होती) अतः वह खण्डिता से भिन्न ही है। इस प्रकार यह निश्चित है (स्थितम्) कि नायिकाओं की आठ अवस्थाएं होती हैं। टिप्पणी-(१) स्वाधीनपतिका इत्यादि जो आठ प्रकार की नायिकाएं हैं उनका लक्षण आगे दिखलाया जायेगा। (२) 'न च वासकसज्जादेः .. इति'-इस अवतरण में यह दिखलाया गया है जो ये नायिका की आठ अवस्थाएँ कही गई हैं। इनमें से किसी एक का दूसरी में अन्तर्भाव नहीं हो सकता इसलिये इन आठों को अलग-अलग मानना चाहिये। और, इन अवस्थाओं में नायिका की सभी दशाओं का समावेश हो जाता है अतः ये आठ ही अवस्थाएँ हैं, कम या अधिक नहीं। (३) न च' .. सारिकात्वम्-यहाँ वासकसज्जा का क्रमशः स्वाधीनपतिका, खण्डिता, प्रोषितप्रिया और अभिसारिका से भेद दिखलाया गया है। एवमुत्कण्ठिता .. वासकसज्जा'-यहाँ उत्कण्ठिता का अन्य अवस्थाओरं से भेद दिखलाया गया है। तथा ... पृथक्-यहाँ विप्रलब्धा का अन्य अवस्थाओं से भेद तथा 'कलहान्तरिता ... खण्डिता'-यहाँ कल्हान्तरिता का खण्डिता से भेद दिखलाया गया है (द्र०, ऊपर अनुवाद)। यह भी ध्यान रखने योग्य है कि इस अवतरण में उन्हीं अवस्थाओं का भेद दिखलाया गया है जिनमें एक दूसरे के अन्तर्भाव की सम्भावना हो सकती है। (४) नायिका की आठ अवस्थाओं के लिये मि०, ना० शा० (२२.२११-२१२), भा० प्र० (पृ०६८), ना० द० (४.२६१ तथा आगे), प्रता० (१.४१-४२) तथा सा० द० (३.७२-७३)। १. स्वाधीनपतिका- जिस नायिका का पति समीप में स्थित है तथा उसके अधीन है और जो प्रसन्न रहती है वह स्वाधीनपतिका है।

Page 202

द्वितीय: प्रकाश: १५३

यथा -- 'मा गर्वमुद्ृह कपोलतले चकास्ति कान्तस्वहस्तलिखिता मम मञ्जरीति । अन्यापि किं न सखि भाजनमीहशानां वैरी न चेद्द्वति वेपथुरन्तरायः ॥१३०॥' अथ वासकसज्जा- (३८) मुदा वासकसज्जा स्वं मए्डयत्येष्यति प्रिये ॥२४॥ स्वमात्मानं वेश्म च हर्षण भूषयत्येष्यति प्रिये वासकसज्जा। यथा --

अपरा परीक्ष्य शनकमु मुदे मुखवासमास्यकमलश्वसनैः ॥१३१॥' जैसे-'हे सखी, इस बात का गर्व न कर कि प्रियतम के अपने हाथ से चित्रित मञ्जरी मेरे कपोल तल पर विराजमान है। अन्य स्त्री भी क्या इस प्रकार के सौभाग्य का पात्र नहीं हो सकती यदि वैरी कम्पन बाधक न हो जाये'। टिप्पणी-(१) ना०शा० (२२.२१५), भा० प्र० (६६.१५-१६), ना०द० (४.२६७), प्रता० (१.४३) सा० द० (३.७४)। (२) 'मा गर्वम्' इत्यादि का भाव यह है-तुम्हारा प्रियतम प्रेम से आकृष्ट होकर तुम्हारे वश में नहीं है तभी तो किसी प्रकार के कम्पन आदि सात्त्विक विकार के बिना ही कपोल पर मञ्जरी चित्रित कर देता है। मेरा प्रियतम तो इतना प्रेम के वश है कि ज्योंही मञ्जरी चित्रित करने बैठता है त्योंही कम्पन आदि सात्त्विक भावों का उदय हो जाता है और मञ्जरी चित्रण में बाधक हो जाता है। इस कथन से प्रियतम का समीप स्थित होना, अपने वश में होना और इसीलिये नायिका की प्रसन्नता प्रकट होती है अतः यह स्वाधीनपतिका है (आसन्नः=समीपस्थः, आयत्तः=स्वाधीनश्च रमणो यस्याः सा तथा)। २. वासकसज्जा- प्रिय के आगमन की आशा होने पर जो हर्ष के साथ अपने को सजाती है वह वासकसज्जा है ॥२४॥ अर्थात् जब प्रिय आने वाला हो तब जो अपने आपको तथा अपने घर को भूषित करती है, वह वासकसज्जा है। जैसे-(माघ ६.५२ में) 'कोई अन्य रमरी अपने पाशिपल्लव के छोर से स्खलन के कारण नासिका के छिद्रों की ओर उठी हुई मुख-कमल की श्वासों के द्वारा धीरे से अपने मुख की सुगन्धि की परीक्षा करके प्रसन्न हुई'। टिप्पणी-ना० शा० (२२.२१३) भा० प्र० (६६.८-१४), ना० द० (४.२६६), प्रता० (१.४४), सा० द० (३.८५)। (२) 'वासकसज्जा' शब्द की व्युत्पत्ति कई प्रकार से की गई है; जैसे 'वासके वासवेश्मनि सज्जा सन्नद्धा सैव वास- कसज्जिका'। 'स्त्रीणां वारस्तु वासकः' इति पक्षे वासके वारदिवसे सज्जयति सज्जी करोति हर्षेण के लिगृहादिकमिति वासकसज्जिका। (प्रता० टीका पृ० २१)। प्रिय के साथ रात्रि आदि में रहना 'वासक' कहलाता है, वासक के लिये सज्जिता वासकसज्जा है (मि०, ना० द० वृत्ति ४.२६६)।

Page 203

१५४ दर्श रूपकम्

अथ विरहोत्कण्ठिता- (३६) चिरयत्यव्यलीके तु * विरहोत्कषठतोन्मनाः। यथा -- 'सखि स विजितो वीणावाद्यैः कयाप्यपरस्त्रिय पणिगतमभवत्ताभ्यां तत्र क्षपाललित ध्रुवम्। कथमितरथा शेफालीषु रखलत्कुसुम,स्वपि प्रसरति नभोमध्येऽपीन्दौ प्रियेण विलम्ब्यते ॥१३२॥' अथ खण्डिता- (४०) ज्ञातेऽन्यासङ्गविकृते खसिडतेर्ष्याकषायिता ॥२५। यथा- 'नवनखरदमङ्ग गोपयस्यंशुकेन स्थगयसि पुनरोष्ठं पाणिना दन्तदष्ठम् । प्रतिदिशमपरस्त्रीसङ्गशंसी विसर्पन् नवपरिमलगन्धः केन शक्यो वरीतुम् ।१३३।' ३. विरहोत्कण्ठिता- निरपराध होते हुए भी प्रिय के देर करने पर उत्कसिठित रहने वाली नायिका विरहोत्कषिठता कहलाती है। जैसे (कोई नायिका अपनी सखी से कहती है) 'हे सखी, किसी दूसरी स्त्री ने वीणा-वादन के द्वारा उसे जीत लिया है। अवश्य ही उन दोनों ने रात भर क्रीडा करने की शर्त लगा ली है (पशिपतम्)। यदि ऐसा न होता तो हारसिंगार (शेफाली) के पुष्प भड़ जाने पर भी चन्द्रमा के आकाश के मध्य में जाने पर भी मेरे प्रियतम बिलम्ब क्यों करते' ? टिप्पणी-(१) ना० शा० (२२.२१४), भा० प्र० (पृ० १००), ना० द० (४.२६५), प्रता० (१.४५), सा० द० (३.८६)। (२) व्यलीके=निरपराधे, निर- पराध होने पर। चिरयति-देर करने पर (सति सप्तमी) ४. खण्डिता- नायक को दूसरी नायिका के सहवास से विकृत (चिह्नित) जान लेने पर जो ईर्ष्या से कलुषित हो जाती है वह खसिडता है ॥२५॥ जैसे (माघ ११।३४, अपराधी नायक से नायिका कहती है)-'तुम अपने वस्त्र (उत्तरीय) से नखों के नवीन (ताजे) चिह्न वाले अंग को छिपा रहे हो और दाँतों से कटे हुए ओठ को हाथ से ढक रहे हो। किन्तु प्रत्येक दिशा में फैलता हुआ अन्य स्त्री के सङ्ग की सूचना देने वाला यह नवीन परिमल गन्ध किसके द्वारा छिपाया जा सकता है' ? टिप्पणी-ना० शा० (२२.२१७), भा०प्रे० (पृ० ६८), ना०द० (४.२६३), प्रता० (१.४६), सा० द० (३.७५)। (२) अन्यायाः सङ्गन विकृते (नायके) ज्ञाते सति, यह अन्वय है। * 'विरहोत्कण्ठिता मता' इत्यपि पाठ: ।

Page 204

द्वितीय: प्रकाश:

अथ कलहान्तरिता -- (४१) कलहान्तरिताSमर्षाद्विधूतेऽनुशयार्तियुक्। DR2e (98) यथा- 'निःश्वासा वदनं दहन्ति हृदयं निर्मूलंमुन्मथ्यते निद्रा नति न दृश्यते प्रियमुख नक्त दिव रुद्यते। अङ्ग शोषमुपति पादपतितः प्रेयांस्तथोपेक्षितः सख्यः कं गुसामाकलय्य दयिते मानं वयं कारिताः ॥१३४॥ अथ विप्रलब्धा- (४२) विप्रलब्धोक्तसमयमप्राप्तेऽतिविमानिता ॥२६।। यथा- उत्तिष्ठ दूति यामो यामो यातस्तथापि नायातः । याऽतः परमपि जीवेज्जीवितनाथो भवेत्तस्याः ।।१३५।। . कलहान्तरिता- क्रोध से (अपराधयुक्त नायक को) तिरस्कृत करके पश्चात्ताप की पीडा (का अनुभव करने) वाली कलहान्तरिता नायिका है। जैसे (अमरु० ६२, कोई नायिका सखियों को उपालम्भ दे रही है)- 'निश्वासे मुख को जला रही हैं, हृदय जड़ से उन्मथित हो रहा है, नींद नहीं आती, प्रियतम का मुख नहीं दिखलाई देता, रात-दिन रोना आता है, अङ्ग सूख रहा है, तब चरणों में पड़े प्रियतम की उपेक्षा कर दी। सखियों, बताओ तो क्या लाभ सोचकर प्रियतम से मान कराया था'। टिप्पसी-(१) ना० शा० (२२.२१६), भा० प्र० (पृ० ६५) ना० द० (४ २६४) प्रता० (१.५१) तथा सा० द० (३.८२) में कलहान्तरिता का लक्षणा कुछ अधिक स्पष्ट है। सा० द० के अनुसार जो खुशामद करते हुए भी प्रियतम को रोष से तिरस्कृत कर देती है और फिर पश्चात्ताप करती है, वह कलहान्तरिता नायिका है। (२) (क) कलहान्तरिता तो ईर्ष्या तथा कलह के कारण प्रिय से संगम की इच्छा ही नहीं रखती किन्तु खण्डिता समागम की अभिलाषा रखती है। (ख) कल- हान्तरिता अपने किये पर पश्चात्ताप करती है किन्तु खण्डिता प्रिय के प्रति ईर्ष्या रखती है। ६. विप्रलब्धा- प्रियतम के निश्चित समय पर न आाने के कारण अत्यधिक अपमा- नित होने वाली विप्रलब्धा कहलाती है ॥२६॥ जैसे-'हे दूती, उठो चलें, प्रहर (याम) बीत गया तथापि वह नहीं आया। जो इसके पश्चात् भी जीदित रहे वह तो उसी का प्राशनाथ होगा।

Page 205

१५६ देशरूपकम्

अथ प्रोषितप्रिया -- (४३) दूरदेशान्तरस्थे तु कार्यतः प्रोषितप्रिया। यथाऽमरृशतके- 'आदृष्टिप्रसरात्प्रियस्य पदवीमुद्वीक्ष्य निरविण्णाया विश्रान्तेषु पथिष्वहःपरिणतौ ध्वान्ते समुत्सपति। दत्त्वैकं सशुचा गृहं प्रति पदं पान्थस्त्रियास्मिन्क्षणे माभूदागत इत्यमन्दवलितग्रीवं पुनर्वीक्षितम् ॥१३६॥ अथाभिसारिका- (४४) कामार्ताऽभिसरेत्कान्तं सारयेद्वाभिसारिका।। २७।

टिप्पणी-(१)ना० शा० (२२.२१८), भा० प्र० (पृ० ६ह), ना० द० (४.२:२) प्रता० (१.४७) सा० द० (३८३)। (२) खण्डिता से विप्रलब्धा का अन्तर यह है कि विप्रलब्धा के पति की दूसरी स्त्री में आसक्ति होना निश्चित नहीं होता वह तो केवल उक्त समय पर नहीं आता। संकेत में वञ्चित होने के कारण ही वह नायिका अपने आपको तिरस्कृत अनुभव करती है (विप्रलब्धा=वञ्चिता) । ७. प्रोषितप्रिया- जिस नायिका का प्रिय किसी कार्य से दूसरे दूर देश में स्थित होता है वह प्रोषितप्रिया कहलाती है। जैसे अमरुशतक (७६) में 'जहाँ तक दृष्टि पहुँच सकी वहाँ तक वह दुःखित नायिका प्रिय का पथ (पदवी) निहारती रही। दिन के समाप्त हो जाने पर, अन्धेरा फेल जाने पर जब पथिक विश्रान्त हो गये (चलना बन्द कर दिया) तो उस पथिक (प्रोषित) की स्त्री ने दुःख के साथ घर की ओर एक पग क्षण रक्खा और फिर वेगपूर्वक (अमन्द) ग्रीवा को घुमाकर देखा कि 'कहीं वह इस न आगया हो'। टिप्पणी-ना० शा० (२२'२१६), भा० प्र० (प्र०१००), ना० द० (४.२६१) 'कार्यतः प्रोषिते पत्यावभूषा प्रोप्रितप्रिया" के लक्षण में अभूषा (=केश- संवारना आदि की भूषा से रहित] यह विशेषण अधिक है। प्रता०(१५३) तथा सा० द०(३.८४) । 5. अभिसारिका- जो काम से पीडित होकर नायक के पास स्वयं जाती है अथवा नायक को अपने पास बुलाती है वह अभिसारिका है।।२७।

Page 206

द्वितीय: प्रकाश। १५७

यथाSमरुशतके- 'उरसि निहितस्तारो हारः कृता जघने घने कलकलवती काञची पादी रणन्मशिनूपुरौ। प्रियमभिसरस्येवं मुग्धे त्वमाहतडिण्डिमा यदि किमधिकत्रासोत्कम्पं दिशः समुदीक्षसे ॥१३७॥ यथा च- 'न च मेऽवगच्छति यथा लघुतां करुणां यथा च कुरुते स मयि। निपुणं तथैनमुपगम्य वदेरभिदूति काचिदिति संदिदिशे ॥१३८॥' तत्र-

युक्ता: षडन्त्या द्व चादये क्रीडौज्ज्वल्यप्रहर्षि तैः ॥२८॥

जैसे अमरुशतक (३१) में "वक्षस्थल पर चंचल हार धारण कर लिया है, पुष्ट कटिप्रदेश पर कलकल ध्वनि करने वाली मेखला है, पैरों में भंकार करने वाले मणिनपुर हैं। हे मुग्धे, यदि तुम इस प्रकार ढिंढोरा पीटती हुई अभिसरण कर रही हो तो अधिक भय से काँपती हुई दिशाओं को क्यों देखती हो' ? अथवा जैसे (माघ ६.५६) 'किसी नायिका ने दूती से यह कहा-'इस (नायक) के पास जाकर ऐसे निपुणतापूर्वक कहना कि जिससे वह मेरी लघुता न समझे और मुझक पर करुरा भी करे'। टिप्परी-(१) ना० श०(२२.२२६-२३१) में विस्तार से अभिसरण के स्वरूप का वर्णन किया गया है। इसी प्रकार भा० प्र० (पृ० १००-१०१) तथा सा० द० (३'७६-८१) में भी। अभिसारिका का लक्षण द्र०, प्रता० (१.५३), ना० द० (४२६८) । (२) यहाँ प्रथम उदाहरस में नायिका के स्वयं अभिसरण का वर्णन है तथा 'न च' इत्यादि द्वितीय उदाहरण में नायिका अपने प्रिय को बुलाने के लिये दूती को भेज रही है। (३) यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि उपयुक्तआठ प्रकार की नायिकाओं में वासकसज्जा, स्वाधीनपतिका और अभिसारिका-इन तीनों के वर्णन में सम्भोग शृङ्गार होता है तर शेष के वर्णन में विप्रलम्भ शृङ्गार (मि०; ना० द० ४.२६६)। उन आठ प्रकार की नायिकाओं में- 'अन्तिम ६ (विरहोत्कषिठता, खसडता, कलहान्तरिता, विप्रलब्धा, प्रोषितप्रिया और अभिसारिका) तो चिन्ता, निःश्वास, खेद, अश्र, वर्ण का फीका पड़ जाना (वैवएर्य), ग्लानि तथा भूषणहीनता से युक्त होती हैं और आ्ररम्भ की दो (स्वाधीनपतिका और वासकसज्जा) क्रीडा, उज्जवलता और हर्ष से युक्त होती हैं ॥।२८॥

Page 207

१५६ दशरूपकस्

परस्त्रियौ तु कन्यकोढे संकेतात्पूर्वं विरहोत्कण्ठिते पश्चाद्विदूषकादिना सहा- भिसरन्त्यावभिसारिके कुतोऽपि संकेतस्थानमप्राप्ते नायके विप्रलब्धे इति व्यवस्था

यत्तु मालविकाग्निमित्रादौ' योऽप्येवं धीरः सौऽपि दृष्टो देव्या: पुरतः' इति मालविकावचनानन्तरम् राजा- 'दाक्षिण्यं नाम बिम्बोष्ठि नायकानां कुलव्रतम्। । ही तन्मे दीर्घाक्षि ये प्रारास्ते त्वदाशानिबन्धनाः ॥१३६॥' 3 इत्यादि, तत्र न खण्डितानुनयाभिप्रायेण, अपितु सर्वथा मम देव्यधीनत्वमा- शङ्कय निराशा मा भूदिति कन्याविश्रम्भणायेति। तथाऽनुपसंज्जातनायकसमागमाया देशान्तरव्यवधानेऽप्युत्कठतात्वमेवेति न प्रोषितप्रियात्वम् अनायत्तप्रियत्वादेवेति। टिप्पणी-अभूषण-यहाँ आभूषणों से रहित का अर्थ शोभा आदि से रहित (=दीन) किया गया है क्योंकि उपयुक्क६ नायिकाओं में अभिसारिका आभूषण धारण करती ही है (अभूषणायुक्ता नाम शोभारहिता दीना इति यावत, प्रभा)। वस्तुतः ऐसा प्रतीत होता है कि यह आवश्यक नहीं कि चिन्ता इत्यादि सभी चिह्न विरहोत्कठिता इत्यादि में से प्रत्येक में हों; अपि तु भाव यह है कि चिन्ता आदि चिह्न विरहोत्कण्ठिता इत्यादि में यथायोग्य होते हैं। 6- ig इस प्रकार स्वकीया नायिका की ये आठों अवस्थाएँ होती हैं किन्तु परकीया और सामान्यनायिका में सभी अवस्थाएँ नहीं होती, यह बतलाते हैं :- PSF कन्या तथा (दूसरे की) विवाहिता, येजो (दो प्रकार की) परकीया नायिकाएं हैं वे तो (१) संकेत के निश्चय से पहले विरहोत्कण्ठिता ही हैं। (२) इसके बाद विदूषक पदि के साथ अभिसरण करती हुईं अभिसारिका हो जाती हैं और (३) यदि किसी निमित्त से नायक संकेतस्थल पर न पहुँचे तो ये विप्रलब्धा नायिका होती हैं। इनकी यही व्यवस्था निश्चित है। इनका प्रिय अपने अधीन नहीं होता, इसलिये इनमें अन्य अवस्थाएँ नहीं हो सकतीं। के । किन्तु जो 'मालविकाग्निमित्र' आदि में जो राजा ऐसा धीर है वह भी देवी के सामने देख लिया' मालविका के इस कथन के पश्चात् राजा कहता है-'हे बिम्बा के समान शष्ठ वाली दक्षिण होना तो नायकों का कुल क्रभागत नियम है किन्तु मेरे जो प्राण हैं वे तो तुम्हारी ही आशा पर आश्रित हैं।' इत्यादि। वह खण्डिता नायिका को मनाने के अभिप्राय से नहीं कहता अपि तु मुझे (राजा को) सब प्रकार से देवी के अधीन समझकर निराश मत हो इस प्रकार से कन्या (मालविका) को विश्वास दिलाने के लिये कहता है। इसी प्रकार जब तक नायक से समागम नहीं होता तब तक यदि नायक दूसरे देश में चला जाये तो भी नायिका उत्कण्ठिता ही कहलाती है प्रोषितिपतिका नहीं; क्योंकि प्रिय उसके अधीन नहीं होता।

Page 208

द्वितीय: प्रकाश: १५६

टिप्पणी-इस प्रकार कन्या और परोढा दोनों प्रकार की जो परकीया हैं वह विरहोत्कण्ठिता, अभिसारिका तथा विप्रलब्धा ही हो सकती है, अन्य प्रकार की नहीं। क्यों ? इसके उत्तर में धनिक का कथन है 'क्योंकि प्रिय उसके अधीन नहीं होता अतः उसमें अन्य अवस्थायें नहीं हो सकतीं' (अस्वाधीनप्रिययोरवस्थान्तरायो- गात्) । अभिप्राय यह है कि जिस नायिका का प्रिय अपने अधीन होता है उसमें ही उपयुक्क तीनों अवस्थाओं से भिन्न अवस्थाएं हो सकती हैं, परोढा और कन्या के तो प्रिय अपने अधीन नहीं होता अतः इन दोनों (परकीया) में अन्य अवस्थाएं नहीं हो सकतीं। साहित्यदर्पण के टीकाकार सिद्धान्तवागीश के अनुसार इसका आशय यह है-कन्या और परोढा के निकट परपुरुष (प्रिय) निरम्तर नहीं रह सकता अतः वे स्वाधीनपतिका नहीं हो सकतीं। वे खण्डिता भी नहीं हो सकतीं; क्योंकि परपुरुष का अपनी पत्नी से समागम निश्चित ही है अतः यहाँ अन्य स्त्री के समागम के चिह्नों को देखकर ईर्ष्या होना असम्भव है। इसीलिये वे कलहा- न्तरिता भी नहीं हो सकतीं। परपुरुष तो दूर ही होता है, अतः कार्य के लिये दूर देश जाने का प्रश्न ही नहीं उठता, इसलिये परकीया प्रोषितपतिका भी नहीं होती। शनिष्ट की आशङ्का से परपुरुष के आगमन की प्रतीक्षा में सज्जा करना भी अस- म्भव है अतः परकीया वासकसज्जा भी नहीं होती। साहित्यद्पण (३.८9) में 'इति ..... कश्चित्' कहकर दशरूपक के इस मत को उद्धृत किया गया है। इससे प्रकट होता है साहित्यदर्पसकार की दृष्टि में दशरूपक का यह मत उचित नहीं। कारण यह है कि 'स्वाधीनपतिका' शब्द में या पति का अ्र्थ प्रिय है और पिता या पति के घर में यदि कोई परपुरुष विश्वसनीय समझ लिया जाता हैं तो निरन्तर समीप रह सकता है तब कन्या एवं परोढा भी स्वाधीनपतिका कहला सकती हैं। इसी प्रकार परकीया में परिस्थिति के अनुसार अन्य अवस्थाएं भी हो सकती हैं (द्र०, सा० द० टीका)। (२) प्रश्न यह हो सकता है कि यदि कन्या आदि परकीया की अन्य अवस्थाएँ नहीं होतीं तो मालविकाग्निमित्र में मालविका को खण्डिता के रूप में क्यों चित्रित किया है। 'यतु ... .. विश्रम्भणायेति'में इसका उत्तर दिया गया गया है। भाव यह है कियहाँ खण्डिता नायिका के रूप में मालविका का चित्रण नहीं है, (द्र० अनुवाद)। (३) तथा ... ... इति' में दिखलाया है कि परकीया प्रोषितपतिका भी नहीं हो सकती।

Page 209

१६० दशरूपकमु

अथासां सहायिन्या :- (४६) दूत्यो दासी सखी कारूर्घात्रेयी प्रतिवेशिका। लिङ्गिनी शिल्पिनी स्वं च नेतृमित्रगुणान्विताः ॥२६। दासी =परिचारिका । सखी=स्नेहनिबद्धा। कारू ::= रजकीप्रभृतिः। धात्रेयी =उपमातृसुता। प्रतिवेशिका=प्रतिगृहिणी। लिङ्गिनी=भिक्षुक्यादिका। शिल्पि- नी=चित्रकारादिस्त्री। स्वयं चेति दूतीविशेषा: नायकमित्राणां पीठमर्दादीनां निसृष्टार्थत्वादिना गुशोन युक्ता: तथा च मालतीमाधवे कामन्दकीं प्रति- 'शास्त्रेषु निष्ठा सहजश्च बोधः प्रागल्म्यमभ्यस्तगुणा च वाणी। कालानुरोधः प्रतिभानवत्त्वमेते गुणा: कामदुघाः क्रियासु ॥१४०॥ नायिका की सहायिकाएं इन (नायिकाओं) की सहायिकाएं हैं :- दासी, सखी, कारू, घाय की लड़की, पड़ोसिन, सन्यास आदि का चिह्न धारण करने वाली (लिङ्गिनी), शिल्पिनी और स्वयं (नायिका), ये दूती होती हैं; जो नायक के मित्रों (पीठमर्द आदि ) के गुणों से युक्त होती हैं ।।२६।।' 118 दासी=सेविका, सखी=स्नेह-युक्त सहचरी, कारु=धोबिन आदि, धात्रेथी= उपमाता की (धाय) की पुत्री, प्रतिवेशिका=समीप के घर में रहने वाली (पडोसिन) लिङ्गिनी-भिक्ष एी इत्यादि, शिल्पिनी=चित्र आदि बनाने वाली स्त्री और नायिका स्वयं भी, ये नायक के मित्र पीठमर्द इत्यादि के निसृष्टार्थता इत्यादि गुणों से युक्त दूतियां होती हैं। जैसे मालतीमाधव (३.११) में कामन्दकी के प्रति कहा गया है :- TF 'शास्त्रों में निष्ठ, स्वाभाविक ज्ञान, वाक्पटुता, गुणों में अभ्यस्त वाणी, समय के अनुसार कार्य करना, प्रतिभा-युक्त होना, - ये गुण कार्य में कामनाओं को पूर्ण करने वाले हैं'। टिप्पणी-(१) दूती के प्रकार तथा गुण-द्र० ना० शा० (२३.६-११) भा०प्र० (पृ० ६४), ना०द०(४.२८८), प्रता० (१.५५), सा० द० (३.१२८-१२६)। (२) निसृष्टार्थता-दूत तीन प्रकार के होते हैं-(i) निसृष्टार्थ, जो दोनों के भाव को समझ कर स्वयं उत्तर दे देता है और यथोचित कार्य कर लेता है, (ii) मितार्थ, जो बात तो थोड़ी करता है किन्तु जिस कार्य के लिये भेजा जाता है उसे सिद्ध कर देता है, (iii) संदेशहारक जो उतनी ही बात कहता है जितनी उसे बतलाई जाती है (मि०, सा० द० ३.४७-४६) । इन तीन प्रकार के दूतों के समान ही तीन प्रकार की दूतियाँ हुआ करती हैं। (३) 'शास्त्रेषु' इत्यादि पद्य माधव ने कामन्दकी (बौद्ध सन्यासिनी जो दूती का काम कर रही थी) को लक्ष्य करके कहा है। इसमें दूती के सामान्य गुणों का वर्णन किया गया है।

Page 210

द्वितीय: प्रकाश: १६१

+00 c09 4094 तत्र सखी यथा- 'मृगशिशुदृशस्तस्यास्तापं कथ कथयामि ते दहनपतिता दृष्टा मूर्तिर्मया नहि वैधबी। इति तु विदितं नारीरूप: स लोकदृशां सुधा तव शठतया शिल्पोत्कर्षो विधेविघटिष्यते ॥१४१॥ यथा च- 'सच्चं जाइ दट्ठु सरिसम्मि जणम्मि जुज्जए राओ्र। मरउ ण तुमं भशिस्स मरणं पि सलाहरिज्जं से ॥१४२॥ ('सत्यं जानाति द्रष्टुं सहशे जने युज्यते रागः । स्रियतां न त्वां भणिष्यामि मरमपि श्लाघनीयमस्या: ।।') स्वयं दवूती यथा- 'महु एहि कि सिवालअ हरसि शिश्नं वाउ जइ वि मे सिचअम। साहेमि कस्स सुन्दर दूरे गामो अहं एक्का ।१४३। ('मुहुरेहि कि निवारक हरसि निजं वायो यद्यपि मे सिचयम्। साधयामि कस्य सुन्दर दूरे ग्रामोऽहमेका ।') इत्यायूह्यम् । अथ योषिदलङ्वारा :- उन में सखी (का 'दूती होना) यह है, जैसे-(नायिका की सखी नायक के पास जाकर कहती है-) 'उस मृगशावकनयनी के संताप को तुमसे कैसे कहँ ? मैंने चन्द्रमा की (वैधवी-विधु की) मूति को अग्नि में पड़ा नहीं देखा (उससे ही इसकी समता की जा सकती थी)। मैं तो केवल यह जानती हू कि नारी के रूप में संसार की दृष्टियों का अमृत, विधाता के रचना-कौशल का उत्कृष्ट रूप वह शठता से नष्ट हो जायेगा'। और जैसे (कोई सखी नायक से कहती है-) 'ठीक है वह देखना जानती है, सदश व्यक्ति से प्रेम करना उचित ही है। (इस प्रेम में) वह मर जाये; किन्तु मैं तुमसे नहीं कहूँगी (योग्य व्यक्ति से प्रेम करने के कारण) उसका मरना भी सराहनीय हैं'। स्वयं दूती यह है, जैसे-'हे रोकने वाले वायु, यद्यपि तुम मेरा वस्त्र (आंचल) खींच रहे हो, किन्तु इससे क्या? फिर आओ। हे सुन्दर, मैं किसकी आराधना करू ? ग्राम दूर है और मैं अकेली हूँ।' टिप्पणी-'मुहुरेहि' इत्यादि में नायिका स्वयं दूती है। वायु को सम्बो- घित करती हुई वह किसी पान्थ को आमन्त्रित कर रही है। नायिकाओं के अलक्कार स्त्रियों के (सातत्विक) अलद्गार हैं-

Page 211

१६२ दशरूप कम्

(४७) यौवने सत्वजाः स्त्रीणामलङ्कारास्तु विंशतिः । यौवने सत्त्वोद्भूता विशतिरलद्काराः स्त्रीणां भवन्ति। तत्र- (४८) भावो हावश्र हेला च त्रयस्तत्र शरीरजाः ॥३०॥ शोभा कान्तिश्च दीप्रिश्च माधुर्य च प्रगल्भता। औदार्य धैर्यमित्येते सप्त भावा अ्यत्नजाः ।।३१।। तत्र भावहावहेलास्त्रयोडङ्गजाः, शोभा कान्तिर्दीत्तिर्माधुर्य प्रागल्भ्यमौदायं धैर्यमित्ययत्नजाः सप्।

यौवन में सत्त्व से उत्पन्न होने वाले स्त्रियों के बीस अलङ्कार होते हैं। टिप्पणी-(१) जिस प्रकारकेयूर आदि आभूषण शरीर की शोभा बढ़ाते हैं उसी प्रकार शरीर में प्रकट होने वाले कुछ विकार (परिवर्तन) हैं जो शरीर की शोभा बढ़ाते हैं अतः उन्हें भी केयूर आदि के समान अलङ्कार कहा जाता है। (२) यहाँ स्त्रियों के सात्त्विक अलङ्कारों का वर्शन किया जा रहा है। पुरुषों में भी इसी प्रकार उत्साह आदि सात्त्विक भाव होते हैं। और, जैसा कि साहित्यदर्पर (३-६३) में बतलाया गया है, आगे कहे गये अ्ङ्गज औ्परर अ्र्प्रयत्नज जो दस अलङ्कार हैं, वे भी पुरुषों में हो सकते हैं तथापि ये युवतियों में होने पर ही अधिक चमतका- रक होते हैं। स्त्रियों में भी विशेषकर योवनावस्था में ही प्रकट हुआ करते हैं, बाल्यकाल में प्रकट नहीं होते और वृद्धावस्था में प्रायः नष्ट हो जाते हैं। इसी- लिये इन्हें युवतियों के अलङ्कार कहा जाता है। (३) ये अलङ्कार सत्वज, सात्त्विक (सत्त्व से उत्पन्न) कहलाते हैं। 'सत्त्व' का क्या तात्पर्य है, यह आगे (३३ वें श्लोक की व्याख्या में) स्पष्ट किया जायेगा। (४) विशेष द्र०, ना० शा० अभि० (२२४) भा० प्र० (पृ० ६ पं० २०), ना० द० (४.२६६) सा० द० (३.८६-६२) में नायिका के २८ अलड्गारों का वर्णन किया गया है। प्रता० (पृ० १८७) में इनके स्थान पर १८ शृङ्गारचेष्टाओरं का वर्णन किया गया है। उन (सासत्विक अलङ्गारों) में- १. भाव, २. हाव और ३. हेला, ये तीन शरीरज अलक्कार हैं। १. शोभा, २. कान्ति, ३. दीप्नि, ४ माधुर्य, ५. प्रगल्भता, ६. औदार्य और ७. धैर्य; ये सात भाव अयत्नज (बिना यत्न के उत्पन्न होने वाले) अलक्कार हैं॥३१ ।। (टीका, तत्र इत्यादि मूल के समान हैं)

Page 212

द्वितीय: प्रकाश: १६३

(४६) लीला विलासो विच्छित्तिर्विभ्रमः किलकिलन्चितम्। मोट्टायितं कुट्टमितं विव्वोको ललितं तथा ॥३२।। विहृतं चेति विज्ञेया दश भावाः स्वभावजाः। तानेव निर्दिशति-

तत्र विकारहेती सत्यप्यविकारकं सत्त्वं यथा कुमारसम्भवे- 'श्रुताप्सरोगीतिरपि क्षोऽस्मिन्हरः प्रसंख्यानपरो बभूव । आत्मेश्वराणां नहि जातु विघ्ना: समाधिभेदप्रभवो भवन्ति ।१४४।।' १. लीला, २. विलास, ३. विच्छिति, ४. विभ्रम, ५. किलकिञिचित, ६, मोट्टायित, ७. कुट्टमित, म, विव्वोक, ६, ललित तथा १०. विहृत; ये दश भाव स्वभावज (स्वाभाविक) समझने चाहिये ।३२।। टिप्पणी-अभि० भा० (२२.५) तथा ना० द० वृत्ति (४.२६६) में शरी- रज (अङ्गज) इत्यादि को स्पष्ट किया गया है। संक्षेप में ये सातत्विक अलङ्कार दो प्रकार के हैं-१° यत्नज और २. अयत्नज। यत्नज का अर्थ है-क्रिया से उत्पन्न होने वाले। इच्छा से यत्न होता है और यत्न से देह-क्रिया होती है। उस देह-क्रिया के द्वारा इन अलद्कारों का आविर्भाव हुआ करता है। ये यत्नज अलङ्कार दो प्रकार के हैं-(क) अङ्गज (ख) स्वभावज या स्वाभाविक। (क) अङ्गज वे अलद्दार हैं जो सत्त्व द्वारा उद्बुद्ध पूर्ववासना के आधार पर बाह्य गन्ध-माल्य आदि प्रसाधनों के विना ही केवल शरीर में उत्पन्न हो जाते हैं, भाव, हाव और हेला ऐसे ही अल- द्वार हैं। (ख) स्वाभाविक अलङ्गार-अभिनवगुप्ताचार्य ने स्वाभाविक शब्द की दो प्रकार की व्याख्या की है-(i) ये युवती के हृदय में विद्यमान अपने रतिभाव (स्व-भाव) से उत्पन्न होते हैं, (ii) स्वभाव प्रकृति (Natare) से किसी स्त्री में कोई भाव होता है, दूसरी में कोई दूसरा भाव। ये स्वाभाविक अलङ्कार लीला इश्यादि दस हैं। ये भी चित्त के रतिभाव से व्याप्त हो जाने पर शरीर में होने वाली क्रियाएँ ही हैं अतः यत्नज कहलाती हैं। शोभा इत्यादि सात अयत्नज भाव हैं। ये शरीर के ऐसे धर्म हैं जो इच्छापूर्वक यत्न द्वारा उत्पन्न नहीं होते अपितु हृदय में रति-भाव के होने पर बिना यत्न के ही प्रकट हुआ करते हैं। (F) उन (अलङ्कारों) का (कमशः) वर्णन करते हैं- उनमें निर्विकारात्मक सत्व से उत्पन्न होने वाला प्रथम विकार भाव कहलाता है।३३।। विकार की उत्पत्ति का कारण होने पर भी विकार रहित रहना सत्त्व कहलाता है। जैसे कुमारसम्भव (३.४०) में 'अप्सराओं का गीत सुनकर भी इस समय महादेव ध्यान में तत्पर रहे; क्योंकि विघ्न-बाधाएं आत्मा को वश में कर लेने वाले व्यक्तियों की समाधि को भङ्ग करने में समर्थ नहीं हुआ करतीं।'

Page 213

१६४ दशरूपकम्

000 409 400 400 60 तस्मादविकाररूपात्सत्त्वात् यः प्रथमो विकारोऽन्तर्विपरिवर्ती बीजस्योच्छून-

तेव स भावः। यथा- 'दृष्टिः सालसतां बिरभात न शिशुकीडासु बद्धादरा श्रोत्रे प्रेषयति प्रवर्तितसखीसम्भोगवार्तास्वपि। पुंसामङ्गमपेतशङ्गमधुना नारोहति प्राग्यथा बाला नूतनयौवनव्यतिकरावष्टभ्यमाना शनैः ।।१४५।।'

टिप्पणी-निर्विकारात्मकात् सत्त्वात्, इस वाक्यांश में सत्त्व का स्वरूप बत- लाया गया है। इसी को धनिक ने 'तत्र विकारहेतौ०' इत्यादि से स्पष्ट किया है। भाव यह है कि मन की एक विशेष प्रकार की अवस्था सत्त्व कहलाती है। जब मन के विकृत होने का कारण विद्यमान होता है किन्तु मन विकृत नहीं होता, वही मन की अवस्था 'सत्त्व' है। इसी को कहीं कहीं 'रजस्तमोभ्यामस्पृष्ट मनः सत्त्वमि- होच्यते' कहा गया है। मन सत्त्व, रजस् और तमस् गुण वाला है। रजस् का स्व- भाव है-चञ्चलता और तमस् का स्वभाव है-जडता। इन दोनों से रहित होकर मन काम, कोध आदि विकारों से प्रभावित नहीं होता। इस प्रकार मन की रजस् तथा तमस् से रहित जो अवस्था है वह निर्विकार अवस्था ही है। धीरोदत्त नायक के लक्षण (ऊपर २.४) में जो 'महासत्त्व' शब्द है, वहाँ भी 'सत्त्व' शब्द इसी अरथ में आया है। आगे सात्त्विक भावों की व्याख्या के अवसर पर धनिक ने नाट्य शास्त्र का यह उद्धरण दिया है-'सत्त्वं नाम मनः प्रभवं तच्च समाहितमनस्त्वाद् उत्प- द्यते' अर्थात् एकाग्रता से उत्पन्न होने वाली मन की अवस्थाविशेष ही सत्त्व है। इसी प्रकार अभिनवगुप्ताचार्य ने सात्त्विक अलद्धारों के सन्दर्भ में भी 'सत्त्वं मनः समाधानजम्' (अभि० भा० २२.१) यह बतलाया है। नाट्यदर्पण (३.२२८) में 'अवहितं मनः सत्त्वम्' यह कहा गया है। भावप्रकाशन (पृ० ८) में निर्मल और गुणों से अस्पृष्ट मन को ही सत्त्व कहा गया है। इन सबका तात्पर्य भी यही है कि एकाग्रता या समाधान से मन विकार रहित हो जाता है या कहिये कि रजोगुण और तमोगुण से सूना सा हो जाता है। ऐसा मन ही सत्त्व कहलाता है। (२) 'श्रुताप्सरोगीतिः' यह सत्त्व का उदाहरण है। १. भाव- उस निरविकारात्मक सत्त्व से जो प्रथम विकार (परिवर्तन) होता है, वह भाव कहलाता है। वह इसी प्रकार (शरीर के) भीतर विद्यमान रहता है, जिस प्रकार (अङ्कुरित होने से पहिले) बीज की फुलावट (उच्छूनता) होती है। जैसे दृष्टिः सालसताम' इत्यादि ऊपर उदा० ... (काममुग्धा)।

Page 214

द्वितीय: प्रकाश: १६५

यथा वा कुमारसम्भवे- 'हरस्तु किञ्चित्परिलुप्तधैर्यश्चन्द्रोदयारम्भ इवाम्बुराशिः । उमामुखे बिम्बफलाधरोष्ठे व्यापारयामास विलोचनानि ।१४६।' यथा वा ममैव- 'तं च्चित्र वश्रणं ते च्चेत्र लोअणो जोध्वणं पि तं च्चेत्र्प्र । अण्णा अणाङ़गलच्छी अण्णं च्चित्र कि पि साहेइ ॥१४७॥' ('तदेव वचनं ते चैव लोचने यौवनमपि तदेव। अन्यानङ्गलक्ष्मीरन्यदेव किमपि साधयति ॥') पथ हाव :- (५१) 1हेवाकसस्तु शृङ्गारो हावोऽक्षिभ्र विकारकृत्। अथवा जैसे कुमारसम्भव (३.६७) में, महादेव का धैर्य इसी प्रकार कुछ-कुछ लुप्त हो गया जिस प्रकार चन्द्रोदय के आरम्भ में समुद्र का (स्थर्य भङ्ग हो जाता है) और उन्होंने बिम्बाफल के समान अधरोष्ठ वाले पार्वती के मुख पर दृष्टि डाली'। और, जैसे मेरा (धनिक का) ही पद्य है-'उस (नायिका) का बोलना पहले जैसा ही है, नेत्र भी वही है और यौवन भी वही है। किन्तु कुछ दूसरी ही काम की शोभा हो गई है जो कुछ और ही कायं कर रही है'। टिप्परी-(१) द्र० ना० शा० (२२-८), भा० प्र० (पृ०८), ना० द० (४.२७०), सा० द० (३.६३) । प्रता० (पृ० १८७)में 'रसाभिज्ञान योग्यत्वं भाव इत्यभिधीयते' यह लक्षण दिया गया है। (२) मिट्टी और जल के संयोग से बीज फूल सा जाता है वही उसकी उच्छूनता है। बीज का वह विकार अङ्क र रूप में बाहर नहीं आता अपितु भीतर ही रहता है। और, पारखी जनों को ज्ञात हो जाता है कि बीज अ्ङ्ध रोन्मुख है। इसी प्रकार विकाररहित (निर्मल) मन में जो रति के विकार का प्रथम स्फुरण होता है वह (उत्तमा) नायिका के भीतर ही रहता है किन्तु उसकी वारी और आँख आदि अङ्गों में एक विशेषता उत्पन्न हो जाती है जिससे सहृदय जन यह जान सकते हैं कि इसके हृदय में विकार का स्फुरण हुआ है। इसीलिये भाव (तथा हाव और हेला भी) अङ्गज या शरीरज कहलाते हैं (मि० ना० द० ४.२७०)। (३) 'दृष्टिः' इत्यादि (१४५) में किसी मुग्धा के 'भाव' नामक सास्विक अलद्धार का चित्रण है। 'हरस्तु०' (१४६) में महादेव में प्रथम विकार के स्फुरण का वर्गन है। 'तदेव०' (१४७) में भी किसी नायिका के 'भाव' का वर्णन है। २. हाव- उभरा हुआ(=हेवाकस=उद्बुद्ध, Ardent) रति भाव, जो आँख तथा भौंह इत्यादि (कुछ अङ्गों) में विकार उत्पन्न करता है, हाव कहलाता है। 1 'अल्पालापः' इत्यपि पाठः।

Page 215

१६६ दंशरूपकम्

प्रतिनियतास्विकारकारी शङ्गारः स्वभावविशेषो हावः। यथा ममैव -110 'जं कि पि पेच्छमाणं भणमाणं रे जहा तहच्चेअ्रपर। सिज्फाअ ोहमुद्ध वग्रस्स मुद्ध शिग्रच्छेहि ॥१४८॥' ('यत्किमपि प्रेक्षमाणां भणमानां रे यथा तथैव। निर्ध्याय स्नेहमुग्धां वयस्य मुग्धां पश्य ॥') अथ हेला- (५२) स एव हेला सुव्यक्तश्रृङ्गाररससूचिका ।।३४।। हाव एव स्पष्टभूयोविकारत्वात्सुव्यक्तशृङ्गाररससूचको हेला। यथा ममैव- 'वह भत्ति से पश्त्ता सव्वङ्ग विन्भमा थरुब्भेद। संसइतबालभावा होइ चिर जह सहीएं पि ॥१४६॥' ('तथा टित्यस्या: प्रवृत्ता: सर्वाङ्ग विभ्रमाः स्तनोद्ध्दे। संशयितबालभावा भवति चिरं यथा सखीनामपि।।') अर्थात् कुछ ही अङ्गों में विकार उत्पन्न करने वाला रतिभाव (शृङ्गार) ही हाव है, जो विशेष प्रकार का स्वभाव होता है। जैसे मेरा (धनिक का) ही पद्य है-(कोंई व्यक्ति अपने मित्र से कहता है)-'हे मित्र, जिस किसी को देखती हुई, जैसे तैसे बोलती हुई, कुछ सोचकर प्रेम से मुग्ध हुई उस मुग्धा नायिका को देखो' । टिप्पणी-(१) ना० शा० (२२.१०), भा० प्र० (पृ० ८), ना० द० (४.२७१). प्रता० (पृ० १८८), सा० द० (३.६४)। (२) भाव से अग्रिम अवस्था हाव है। यहाँ रतिभाव भाव दशा की अपेक्षा अधिक उदबुद्ध हो जाता है। भाव दशा में उससे बाह्य श्रङ्गों में विकार उत्पन्न नहीं होता किन्तु हाव-दशा में आँख. भौंह, गर्दन, ठोड़ी आदि में विकार हो जाया करता है। 'हेवाकसस्तु शृङ्गारो' के स्थान पर 'अल्पालापः सशृङ्गारो' पाठान्तर है, जिसका अर्थ है-थोड़े से आलाप और शृङ्गार से युक्त हाव होता है। 'यत्किमपि०' (१४८) में आँखों और वाणी का विकार दिखलाया गया है। ३. हेला- दह (हाव) जब स्पष्ट रूप से रतिभाव का सूचक होता है तो हेला कहलाती है॥३४।। अर्थात् जब हाव स्पष्ट और अधिक प्ङ्गविकारों को उत्पन्न करने के कारण स्पष्ट रूप से रतिभाव का सूचक होता है तब वह हेला कहलाता है। जैसे मेरा (धनिक का) ही पद्य है-'इस (नायिका) के स्तनों का उभार होते ही एक दम समस्त ग्रङ्गों में ऐसे विभ्रम उत्पन्न होने लगे कि सखियों को भी इसके बाल-भाव के विषय में संशय होने लगा'।

Page 216

द्वितीय: प्रकाश: १६७

अथायत्नजा: सप्। तत्र शोभा- (५३) रूपोपभोगतारुएयैः शोभाङ्गाना विभूषराम। यथा कुमारसम्भवे- 'तां प्राङ्मुखीं तत्र निवेश्य बालां क्षणं व्यलम्बन्त पुरो निषण्णाः। भूतार्थशोभाह्नियमाणनेत्राः प्रसाधने सन्निहितेऽपि नार्यः ॥१५०॥' इत्यादि। यथा च शाकुन्तले- 'अनाघातं पुष्पं किसलयमलूनं कररुहै- रनाविद्ध रत्नं मधु नवमनास्वादितरसम्। अखण्डं पुण्यानां फलमिव च तद्रूपमनघं न जाने भोक्तारं कमिह समुपस्थास्यति विधिः ॥१५१।'. टिप्पणी-(१) ना०शा०(२२.११), भा०प्र०(पृ०८), ना०द०(४.२७२), प्रला० (पृo १८८), सा० द० (३.६५)। (२) यहाँ नायिका के सभी अङ्गों में ऐसे विकारों के प्रकट होने का वर्णन किया गया है जिनसे उसके हृदय का प्रेम भाव स्पष्ट रूप से सूचित होता है, यही हेला का स्वरूप है। इस प्रकार भाव, हाव और हैला तीनों शरीरज विकार हैं। युवती के हृदय में स्थित रतिभाव से उत्पन्न होने वाला प्रथम अङ्ग-विकार जो बाह्यरूप में प्रकट नहीं होता, 'भाव' है। वही जब आंख आदि कुछ अङ्गों में विकार उत्पन्न कर देता है तो 'हाव' कहलाता है और अब प्रायः समस्त अङ्गों में विकार उत्पन्न करके रति भाव की सूचना देता है तब 'हेला' कहलाता है। अब यत्नज सात अलद्धारों का वर्णन करते हैं। उनमें- १. शोभा-

शोभा कहलाती है। रूप, उपभोग और तारुएय के द्वारा अङ्गों का सौन्दर्य बढ़ जाना ही

जैसे कुमारसम्भव (७.१७) में (विवाह के लिये अलङ्कृत की जाती हुई पार्वती के विषय में कवि ने कहा है)-'उस बाला (पार्वती) को पूर्व की ओोर मुख करके बैठाकर (प्रसाधन के लिये) सामने बैठी हुई नारियों के नेत्र उस की स्वाभाविक शोभा से हर लिये गये अतः भृद्गार की सामग्री सामने उपस्थित होने पर भी वे क्षण भर के लिये ठिठक गईं।' इत्यादि। और, जैसे शकुन्तलानाटक (२.११) में (राजा दुष्यन्त शकुन्तला के विषय में कहते हैं)-'उसका निर्दोष (अनघ) सौन्दर्य उस पुष्प के समान है जो सूंघा नहीं गया, उस किसलय के समान है जो नखों से नहीं नोचा गया, उस रत्न जैसा है जो अभी बींधा नहीं गया, ऐसा नवीन मधु है जिसका स्वाद नहीं लिया गया और पुण्यों के अखण्ड फल के समान है। न जाने विधाता यहाँ किस भोक्ता को समुवरिभत्त करेगा' ।

Page 217

दशरूपकम्

प्रथ कान्ति :- (५४) *मन्मथावापितच्छाया सैव कान्तिरिति स्मृता ॥३५॥ शोभैव रागावतारघनीकृता कान्तिः । यथा - 'उन्मीलद्वदनेन्दुदीप्तिविसरैर्दूरे समुत्सारितं भिन्नं पीनकुचस्थलस्य च रुचा हस्तप्रभाभिर्हतम्। एतस्या: कलविङ्ककण्ठकदलीकल्पं मिलत्कौतुका- दप्रात्ताङ्गसुखं रुषेव सहसा केशेषु लग्नं तमः ॥१५२॥' यथा हि महाश्वेतावर्णनावसरे भट्टबासस्य। टिप्पणी-(१) ना०शा०(२२.२७), भा०प्र०(पृ० ८), ना०द० (४.२८३), सा० द० (३.६५)। प्रता० (पृ० १८७) में 'शोभा' को शृङ्गार-चेष्टाओं में नहीं रक्खा गया। (२) 'तां प्राङमुखीम्०' (१५०) में रूप और तारुण्य के द्वारा होने वाली शोभा का वर्न है। 'अनाधातम्०' (१५१) में रूप द्वारा होने वाली शोमा का वर्णन है। २. कान्ति- जब काम-भाव (मन्मथ) के द्वारा उस (शोभा) की द्युति (छाया) बढ़ जाता है तो वही (शोभा) कान्ति कहलाती है॥३४।। अर्थात् राग की अधिकता (अवतार=आविर्भाव) से समृद्ध हुई शोभा ही कान्ति है। जैसे ( जब अन्धकार ने किसी नायिका के स्पर्श सुख को प्राप्त करने की चेष्टा की तब) 'नायिका के प्रफुल्लित मुख-चन्द्र की दीप्ति के विस्तार ने उस ( अन्धकार) को दूर भगा दिया, विशाल ( पुष्ट ) स्तनों की कान्ति से वह छिन्न-भिन्न हो गया, हाथों की प्रभा से मारा गया, इस प्रकार कौतुक के साथ नायिका से मिलने का प्रयत्न करता हुआ भी उसके अङ्गों का सुख न प्राप्त करके कलविङ्क पक्षी की कण्ठकदली के समान वह अन्धकार मानो क्रोध- पूर्वक एकदम हो उस बाला के केशों में लिपट गया।' और जैसे बाणभट्ट द्वारा महाश्वेता वर्न के अवसर पर कान्ति प्रकट होती है। टिप्पणी-(१) कान्तिः शोभैवापूर्णमन्मथा (ना० शा० २२.२८), कान्तिः स्यान् मन्मथाप्यायिता छवि: (भा० प्र०, पृ० ८), कान्तिः पूर्णसरभोगा (ना० द० ४.२८४), सैव कान्तिर्मन्मथाप्यायितद्युतिः (सा० द० ३.६६)। प्रता० (पृ० १८१) में 'कान्ति को शृङ्गार-चेष्टाओं में नहीं रकखा गया। (२) 'उन्मीलद्०' (१५२) में अनुराग की अधिकता के कारण नायिका की शोभा के बढ़ जाने का वर्णन है, जिससे चेतन प्राणी तो क्या जड़-अ्न्धकार भी उसके अङ्गों के स्पर्श-सुख के लिये इच्छा करता है। (३) मन्मथाध्यासितछाया इस पाठ में 'मन्मथेन अध्यासिता छाया यस्यां सा' अरथात् जिस शोभा में कामभाव के द्वारा द्युति आरोपित कर दी जाती है, वह कान्ति है। * 'मन्म याध्यासित' इत्यपि पाठः ।

Page 218

द्वितीय: प्रकाश: १६६

अथ माधुर्यम्- (५५) अनुल्बसत्वं माधुर्यम् -- यथा शाकुन्तले- सरजिसमनुविद्ध शैवलेनापि रम्यं मलिनमपि हिमांशोर्लक्ष्म लक्ष्मीं तनोति। इयमधिकमनोज्ञा वल्कलेनापि तन्वी किमिव हि मधुराएां मण्डनं नाकृतीनाम् ॥१५३॥ उन्रामर शI अथ दीपि :-

३. माधुर्य- (सब अवस्थाओं में) रमणीयता ही माघुर्य है। जैसे शकुन्तला नाटक (१.२०) में (राजा दुष्यन्त वल्कलधारिणी शकुन्तला को देखकर कहते हैं)-'सेवाल से लिपटा भी कमल रमणीय होता है, मलिन चिह्न भी शीतकर (चन्द्रमा) की शोभा को बढ़ाता है, यह कृशाङ़गी वल्कलधारण करके भी अधिक मनोहर है। वस्तुतः मधुर आकृतियों के लिये क्या आभूषण नहीं बन जाता' ? टिप्परी-(१) ना० शा० (२२.२६) के अनुसार माधुर्य का लक्षण है- सर्ववस्थाविशेषेषु दीप्तेषु ललितेषु च । अनुल्बरत्वं चेष्टाया माधुर्यमिति संज्ञितम् ।। भा० प्र० (पृ०८) में 'सर्वावस्थासु चेष्टानां माधुर्य मृदुकारिता'। ना० द० (४.२८५) में 'सौम्य तापेऽपि माधुर्यम्' अर्थात् क्रोध आदि का सन्ताप होने पर भी आकृति में विकार न होना माधुर्य हैं। इसी प्रकार रसाणवसुधाकरकार शिङ्गभूपाल के अनुसार भी 'माधुर्य नाम चेष्टानां सर्वावस्थासु मार्दवम्'-यह लक्षण है। इन सभी लक्षणों का अभिप्राय समान ही है। दशरूपक के लक्षण में 'अनुल्ब- शत्वं माधुय' ये नाट्यशास्त्र के ही पद लिये गये हैं। किन्तु यह लक्षणा स्पष्ट नहीं। सम्भवतः दशरूपककार के अभिप्राय को ही प्रता० तथा सा०द० ने स्पष्ट किया है। प्रता०(पृ०१८८) में 'अभूषेऽपि रम्यत्वं माधुर्यमिति कथ्यते' तथा सा०द० (३.६७) में 'सर्वावस्थाविशेषेषु माधुर्य रमणीयता'-ये लक्षण हैं। सा० द० में धनिक के समान ही 'सरसिजम्' इत्यादि उदाहरण भी दिया गया हैं। इन सबके आधार पर दशरूपक के माधुर्य का स्वरूप है-सभी प्रकार की अवस्थाओं में अक्षुण्ण रहने वाली रमरीयता मावुर्य है, जैसा कि ऊपर के उदाहरण से स्पष्ट है। (२) अनुल्बणत्वं =रमसीयता (प्रभा), मासृण्य (अभि० भा०), Not intense (Hass)। ४. दीप्ति-

Page 219

१७० दशरूपकम्

(५६) -दीप्तिः कान्तेस्तु विस्तरः । यथा-

अहिसारिआएँ विग्घं करोसि अण्णाणं वि हआसे॥१५४॥ ('दंवाद् दृष्ट्ा नितान्तसुमुखशशिज्योत्स्नाविलुप्ततमोनिवहे। अभिसारिकाणां विघ्नं करोष्यन्यासामपि हताशे ॥') अथ प्रागल्म्यम् -- (५७) निस्साध्वसत्वं प्रागल्भ्यम्- मनःक्षोभपूर्वकोडङ्गसादः साध्वसं तदभावः प्रागल्म्यम्, यथा ममव- 'तथा व्रीडाविधेयापि तथा मुग्धापि सुन्दरी। कलाप्रयोगचातुर्ये सभास्वाचार्यक गता ।१५५।। कान्ति का विस्तार ही दीप्ति कहलाता है। जैसे-'नितान्त सुन्दर मुखचन्द्र की ज्योत्स्ना से अन्धकार के समूह का नाश करने वाली, हे मूर्ख (हताश), तुम अकस्मात् इधर देखकर अन्य अभिसारिकाओं के मार्ग में भी विघ्न उपस्थित करोगी'। टिप्पणी-(१) ना० शा० (२२.२८), भा०प्र०(पृ० ८), ना०द०(४.२८४), सा० द० (३.६६) में भी इसी प्रकार का लक्षण है। प्रता० (पृ० १८७) में 'दीप्ि' की शृङ्गारचेष्टाओं में गणना नहीं की गई। (२) संक्षेप में रूप, यौवन आदि की जो उज्ज्वलता है उसकी तीन अवस्थाएँ हैं-मन्द,मध्य और तीव्र। वे ही क्रमशः शोभा, कान्ति और दीति कहलाती हैं। (मि० ना० द० ४. २८४)। ५. प्रागल्भ्य :- साध्वस रहित होना ही प्रागल्भ्य कहलाता है। मानसिक क्षोभ के कारण अङ्गों में म्लानता (अवसाद) हो जाना ही साध्वस है, उसका अभाव प्रागल्म्य है। जैसे मेरा (धनिक का) ही पद्य है-'उतनी लज्जा-परवश और उतनी अधिक मुग्धा होते हुए भी उस सुन्दरी ने सभाओं में कला-प्रयोग की निपुणता में आचार्यपद प्राप्त किया'। टिप्पणी-ना० शा० (२२.३१) के अनुसार 'प्रयोगनिस्साध्वसता प्रागल्भ्य' समुदाहृतम्' यह लक्षण है। अभिनवगुप्त के अनुसार 'प्रयोग का अरभिप्राय है- ६४ कामकला इत्यादि (प्रयोग इति कामकलादौ चातुःषष्टिक इत्यर्थः)। भा० प्र० (पृ० ८) में इसी प्रकार का लक्षण है। दशरूपक के लक्षण का भाव स्पष्ट नहीं किन्तु धनिक के उदाहरण को देखने से दशरूपक के लक्षण का भी नाट्यशास्त्र के लक्षणा के समान ही तात्पर्य प्रतीत होता है। इस प्रकार कलाओ्रों के प्रयोग में किसी प्रकार का मनः क्षोभ तथा झुख ऋदि की मलिनता न होना ही प्रामकभ्य है। ना0

Page 220

द्वितीय: प्रकाश:

प्रथौदार्यम्- (५८)-औदार्यं प्रश्रयः सदा ॥३६॥ यथा -- 'दिश्रहं खु दुक्खिआए सतलं काऊण गेहवावारम्। गरुएवि मण्रुदुक्खे भरिमो पाशन्तसुत्तस्स ॥१५६॥' ('दिवसं खलु दुःखितायाः सकलं कृत्वा गृहव्यापारम्। गुरुण्यपि मन्युदुःखे भरिमा पादान्ते सुप्तस्य ।।') यथा वा-'भ्र भङ्ग सहसोद्गता' इत्यादि। अथ धैर्यम्- (५६) चापलाऽविहता वैर्य चिद्वृत्तिरविकत्थना। चापलानुपहता मनोवृत्तिरात्मगुशानामनाख्यायिका धैर्यमिति। यथा मालतीमाधवे- द० (४.२८६) के अनुसार 'प्रागल्भ्यं कौशलं रते' अर्थात् रतिक्ीडा में निपुणता ही प्ागल्म्य है। सा० द० (३.६७) में यद्यपि दशरूपक का लक्षण ही लिया गया है तथापि उदाहरण से प्रतीत होता है कि उसका अभिप्राय ना०द० के समान ही है। ६. औदार्य सभी अवस्थाओं में (सदा) विनम्र रहना (=प्रश्रय) ही औदार्थ कहलाता है। जैसे (गाथासप्तशती ३.२६) 'दिन भर गृहकार्य करके दुःखी हुई उस नायिका के भारी क्रोधयुक्त क्लेश में पादतल में सोये हुए प्रिय की प्रभुता (भरिमा) है। अर्थात् प्रिय के चरसतल में सो जाने से वह करोधयुक्त दुःख शान्त हो गया है(?)। (इसका अर्थ स्पष्ट नहीं, गाथा० में पाठान्तर है)। और, जैसे 'भ्र भङ्ग' इत्यादि (रत्नावली २.२१)। टिप्पणी-(१) ना० शा० (२२.३१) में 'औदार्य प्रश्रयः प्रोत्तः सर्वावस्था- नुगो बुध:' यह लक्षण है। इसका भाव है-'अमर्ष, ईर्ष्या, क्रोध आदि सभी अव- स्थाओं में जो कठोर वचन आदि न कहना है, वही औदार्य है'। भा० प्र० (पृ० ८) में भी ना० शा० के समान ही लक्षणा है। ना० द० के अनुसार संतप्त होने पर भी विनय आदि उचित बातों का त्याग न करना ही औदार्य है। सा० द० (३.६७) में 'औदार्य विनयः सदा' यह लक्षण है। (२) भ्र भङ्ग इत्यादि में यह दिखलाया गया है कि वासवदत्ता कुपित हो गई तथापि उसने विनय नहीं छोड़ा। ७. घंर्य- चञ्चलता से रहित तथा आत्म-श्लाघा से शून्य चित्त-वृत्ति धैर्य कहलाती है। परथात् जो चित्तवृत्ति चञ्चलता से युक्त नहीं है, जो अपने गुणों का बखान करने वाली नहीं है, वह धंर्य है। जैसे मालतीमाधव (२.२) में(मालती अपनी सखी

Page 221

१७२ देश रूपकम

'ज्वलतु गगने रात्री रात्रावखण्डकल: शशी दहतु मदनः किवा मृत्यो: परेण विधास्यति। मम तु दयितः श्लाध्यस्तातो जनन्यमलान्वया कुलममलिन न त्वेवायं जनो न च जीवितम् ।१५७॥' अथ स्वाभाविका दश, तत्र- (६०) प्रियानुकरणं लीला मधुराङविचेष्टितैः ॥३७॥ प्रियाकृतानां वाग्वेषचेष्टानां शृङ्गारिीनामङ्गनाभिरनुकरणं लीला। यथा ममैव-दिट्ठं तह भशिअं ताए शिशदं तहा तहासीएम्। अवलोइअं सइण्हं सबिव्भमं जह सवत्तीहिं॥१५८॥' ('तथा दृष्टं तथा भणित तथा नियतं तथा तथासीनम्। अवलोकितं सतृष्णं सविभ्रमं यथा सपतनीभिः ।') यथा वा-'तेनोदितं वदति याति यथाऽसौ' आदि ॥१५६॥ से कहती है) 'प्रत्येक रात्रि में आकाश में सम्पूर्ण कलाओं वाला चन्द्रमा (भले ही) जला करे, कामदेव भी मुझ्के जला दे। मृत्यु से अधिक्र थे दोनों मेरा क्या करेंगे ? मुझे तो अपने श्लाध्य पिता, पवित्र वंश वाली माता और अपना निर्मल कुल ही प्रिय है। न तो यह जन (माघव) और न अपना जीवन प्रिय है'। टिप्पणी-(१) ना० शा० (२२.३०), भा० प्र० (पृ० ८), ना० द० (४. २८६). काव्यानु० (७.५०) तथा सा० द० (३.६८) में इसी प्रकार का लक्षण है। भा० प्र० (पृ० ८) में 'मानग्रहो हढो यस्तु तद् धैर्यम्' तथा प्रता० (पृ० १६६) में 'शीलादयलङ्घन नाम धर्यम्' यह कहा गया है। (२) उपयुक्त उदाहरण में मालती के धैर्य का वर्णन है। इस प्रकार सात अयत्नज अलद्दार कहे गये हैं। अब दस स्वाभाविक अलद्धारों का वर्णन करते हैं, उनमें- १. लीला- मधुर अङ्ग-चेष्टाओं द्वारा प्रियतम का अनुकरण करना ही लीला कहलाती है।३७।। अर्थात् प्रियतम की बोली तथा वेष-नूषा आदि की जो शृङ्गार-सम्बन्धी चेष्टाएँ हैं उनका श्रङ्गनाओं के द्वारा अनुकरण किया जाना ही लोला है। जैसे मेरा (धनिक का) ही पद्य है-'उस नायिका ने उसी प्रकार (नायक के समान) ही देखा, उसी प्रकार बातें कीं, उसी प्रकार नियन्त्रण किया तथा वह उसी प्रकार बैठी; जिससे सपत्नियों ने विभ्रम और तृष्णा के साथ उसे देखा'। अथवा जैसे '(नायिका) उस प्रियतम की कही बात को कहती है और जैसे वह चलता है, वैसे ही चलती है'। टिप्पखी-ना० शा० (२२.१४), भा० प्र० (पृ० ६), ना० द० (४,२७६), प्रता० (पू० १८६), सा० द० (३.६८-९६) में भी प्रायः इसी प्रकार का लक्षण है।

Page 222

द्वितीय: प्रकाश: १७३

अथ विलास :- (६१) तत्कालिको विशेषस्तु विलासोऽङ्गक्रियोक्तिपु*। दायितावलोकनादिकालेऽङ्गे क्रियायां वचने च सातिशयविशेषोत्पत्तिरविलासः। यथा मालतीमाधवे- 'अत्रान्तरे किमपि वाग्विभवातिवृत्त- वैचित्र्यमुल्लसितविभ्रममायताक्ष्याः । तद्भूरिसात्त्विकविकारविशेषरम्य- माचार्यक विजयि मान्मथमाविरासीत् ॥१६०॥' अथ विच्छित्ति :- (६२) आकल्परचनाऽल्पापि विच्छित्तिः कान्तिपोषकृत् ।।३८।। स्तोकोऽपि वेषो बहुतरकमनीयताकारी विच्छित्तिः। यथा कुमारसम्भवे- 'करापितो रोध्रकषायरूक्षे गोरोचनाभेदनितान्तगौरे। तस्या: कपोले परभागलाभाद्वबन्ध चक्षूषि यवप्ररोहः ॥१६१॥' २. विलास- प्रिय के दर्शन आदि के अवसर पर (नायिका के) अङ्ग, चेष्टा तथा वचनों में जो एक विशेषता आ जाती है, वही विलास कहलाता है। अर्थात् प्रिय के अवलोकन आदि के अवसर पर (नायिका के) अ्रङ्ग (मुख, नेत्र आदि) में, क्रिया ( उठना, बैठना आदि) में तथा बोलने में जो चमत्कार- पूर्णग विशेषता उत्पन्न हो जाती है, वही विलास है। जैसे मालतीमाधव (१.२६) में (माधव अपने मित्र मकरन्द से कह रहा है) 'इसी समय विशाल नेत्रों वाली (मालती) के लिये कामदेव का विजयशील अनूठा आचार्यत्व (आचार्यकम= आचार्यभावः, विविध शृङ्गार चेष्टाओं का उपदेश करना) प्रकट हुआ, जिसकी विचित्रता का वर्न करना वाणगी की शक्ति से बाहर है, जिसमें अ्नेक विभ्रम (शृङ्गार-चेष्टाएँ) उद्भावित हो रहे थे तथा जो अत्यधिक सातत्विक विकारों के कारण रमणीय हो रहा था'। टिप्पणी-ना० शा० (२२.१५), भा० प्र० (पृ०६), ना० द० (४.२७४), प्रता० (पृo १८६), सा० द० (३.६६)। ३. विच्छिति- यदि थोड़ी सी वेश-रचना (आकल्परचना) भी शोभा को बढ़ा देती है तो वहाँ विच्छित्ति नामक भाव होता है॥३८॥ अर्थात् अल्प भी प्रसाधन यदि अत्यधिक कमनीयता उत्पन्न करता है तो विच्छित्ति कही जाती है। जैसे कुमारसम्भव (७.१७) में 'उस (पार्वती) के कान में लगाया गया यवाङ्कुर लोध्रचूर् से रूक्ष तथा गोरोचना के मलने से अत्यधिक गोरे कपोल पर विशेष शोभा प्राप्त कर (लोगों की) आँखों को खींच रहा था'। * कियादिषु, इत्यापि पाठः ।

Page 223

१७४ दशरूपकक

अथ विभ्रम :- (६३) विभ्रमस्त्वरया काले भूषास्थानविपर्ययः । यथा- 'अभ्युद्गते शशिनि पेशलकान्तदूती- संलापसंवलितलोचनमानसाभिः । अग्राहि मण्डनविधिविपरीतभूषा- विन्यासहासितसखीजनमङ्गनाभिः ।१६२।' यथा वा ममैव- 'श्रुत्वाऽडयातं बहिः कान्तमसमाप्तविभूषया । भालेऽञ्जन दशोरलाक्षा कपोले तिलकः कृतः ॥१६३॥' अथ किलकिञ्चितम्- (६४) क्रोधाश्रहर्षभीत्यादेः सङ्करः किलकिलन्चितम् ॥३६॥ यथा ममैव- टिप्पणी- ना० शा० (२२.१६), भा०प्र० (पृ० ६), ना०द० (४.२७५) प्रता० (पृ० १६०), सा० द० (३.१००), अभिनवगुप्त के अनुसार विच्छित्ति का निमित्त सौभाग्य का गर्व होता है। ४. विभ्रम- TiTe प्रिय के आगमन आदि के समय (=काले) शीघ्रता के कारण आभूषणों के स्थान का उलट-फेर हो जाना विभ्रम कहलाता है। जैसे-'चन्द्रमा के उदित होने पर प्रिय नायक की दूती के वार्तालाप में मग्न नेत्र तथा मन वाली अङ्गनाओं ने ऐसा प्रसाधन कर लिया कि उनके विपरीत भूषण धारण के कारण सखियाँ हँसने लगों। .(४० टिप्पी-(१) ना०शा० (२२.१७), भा०प्र० (पृ० ६), ना०द०(४.२७३), प्रता० (पृ० १६०), सा० द० (३.१०४)। (२) संक्षेप में प्रियतम के आगमन आदि के अवसर पर राग तथा हर्ष आदि के कारण शघ्रतावश कार्यों का उलट फेर ही विश्रम है, जैसे किसी बात के स्थान पर दूसरी कह देना, कटि में पहनने योग्य आभूषण को गले में पहन लेना इत्यादि। अभिनवगुप्त के अनुसार विभ्रम का कारसा भी सौभाग्य का गर्व होता है। न५. किलकिञ्चित- क क्रोध, अश्रु, हर्ष तथा भय इत्यादि का एक साथ होना (सङ्कर) किल- किञ्चित कहलाता है॥३६॥

Page 224

द्वितीय: प्रकाश: १७५

रतिक्रीडाद्यूते कथमपि समासाद्य समयं मया लब्े तस्या: क्वशिगतकलकण्ठार्धमधरे। कृतभ्र भङ्गासी प्रकटितविलक्षार्धरुदित- स्मितकरोधोद्भ्रान्तं पुनरपि विदध्यान्मयि मुखम् ॥१६४॥ अथ मोट्ट।यितम्- (६५) मोट्टायितं तु तद्भावभावनेष्टकथादिषु । इष्टकथादिषु प्रियतमकथानुकरणादिषु प्रियानुरागे भावितान्तःकरणत्वं मोट्टायितम्। यथा पद्मगुप्तस्य- 'चित्रवर्तिन्यपि नृपे तत्त्वावेशेन चेतसि। व्रीडार्धवलितं चक्र मुखेन्दुमवशैव सा ॥१६५॥ यथा वा- 'मातः कं हृदये निधाय सुचिरं रोमान्चिताङ्गी मुहु- ज म्भामन्थरतारकां सुलिलतापाङ्गां दधाना हृशम्। सुप्तेवालिखितेव शून्यहृदया लेखावशेषीभव- स्यात्मद्रोहिगि कि हिया कथय मे गूढो निहन्ति स्मरः ॥१६६॥ जैसे मेरा (धनिक का) ही पद्य है-(नायक अपने मित्र से कहता है) -- 'रतिकरीडा के द्यत में किसी प्रकार दाब (समय) पाकर मैंने उसके अधर को पा दाव लिया जबकि उसका कण्ठ अस्फुट और मधुर ध्वनि कर रहा था। फिर भौंहें टेढी करती हुई और लज्जा प्रकट करती हुई उस (नायिका), ने अपना मुख कुछ रोदन, मुसकराहट तथा क्रोध से युक्त कर लिया। अच्छा हो कि वह फिर भी मेरे प्रति ऐसा मुख करे'। टिप्पणी-ना० शा० (२२.१८), भा० प्र० (पृ०६), ना० द० (४.२८२), प्रता० (पृ० १६०), सा० द० (३.१०१)। ६. मोट्टायित- प्रियतम की चर्चा इत्यादि के अवसर पर उस (प्रिय) के भाव में मग्न हो जाना मोटायित कहलाता है। इष्टकथा अर्थात् प्रिय की चर्चा और उसके अनुकरण आदि के अवसर पर प्रिय के प्रेम में मन का तल्लीन (भावित) हो जाना मोट्टायित है। जैसे पद्मगुप्त का पद्य है-'राजा के चित्रलिखित होने पर भी, चित्त में राजा के भाव का आ्वेश हो लिया।' जाने के कारण उस (नायिका) ने अपने मुखचन्द्र को लज्जा से कुछ वक कर

अथवा जैसे-'अरी, (मातः=आदरणीय, as a term of respect आप्टे) किसको अपने हृदय में रखकर बहुत देर से रोमाञ्चित हुई, बार-बार जम्भाई से मन्द (नेत्र के) तारों वाली, सुन्दर अपाङ्गों वाली दृष्टि को धारण करती हुई, सोई सी, चित्रलिखी सी, शून्य हृदय वाली होकर रेखामात्र शेष रह गई हो (अत्यन्त कृश हो गई हो) ? हे अपने साथ द्रोह करने वाली, लज्जा से क्या लाभ ? मुझे बतलाओ तो क्या छिपा कामदेव तुम्हें मार रहा है'।

Page 225

१७६ दशरूपकम्

यथा वा ममव- 'स्मरदवथुनिमितं गूढमुन्नेतुमस्याः ॥४p१ सुभग तव कथायां प्रस्तुतायां सखीभिः । भवति विततपृष्ठोदस्तपीनस्तनाग्रा ततवलयितबाहुजृ म्भितैः साङ्गभङ्ग: ॥१६७॥ अथ कुट्टमितम्- (६६) सानन्दान्तः कुट्टमितं कुप्येतकेशाधरग्रहे॥४०। यथा- 'नान्दीपदानि रतिनाटकविभ्रमाण- माज्ञाक्षराशि परमाण्यथवा स्मरस्य। और जैसे मेरा (धनिक का) ही पद्य है-(कोई दूती नायक से कहती है) 'हे सुभग, जब सखियाँ उस (नायिका) की काम-वेदना (दवथ=पीड़ा, अग्नि) के गूढ निमित को जानने के लिये तुम्हारी चर्चा करती हैं तब वह प्ङ्गभङ्ङ्गिमा के साथ जम्भाइयाँ लेती है जिनसे उसके पीन स्तनों के अग्रभाग उठ जाते हैं, पीठ फैल जाती है तथा भुजाएँ आगे फेलकर वलयाकार हो जाती हैं। टिप्पणी-धनञ्जय तथा धनिक के शब्दों से ऐसा प्रतीत होता है कि प्रिय की बात चलने आदि के समय नायिका के मन का भाव-मग्न हो जाना ही मोट्टायित है। इसी प्रकार का लक्षण भा० प्र० (पृ०६) में भी है। किन्तु ना०शा०(२२.१६), ना० द० (४.२८१), प्रता० (पृ० १६१) सा०द० (३.१०२) के अनुसार 'जब नायक की चर्चा चलने आदि के समय नायिका का चित्त उसके भाव में मग्न हो जाता है तब उसकी जो कान खुजलाना, अङ्ग मोड़ना, आदि शारीरिक चेष्टाएँ होती हैं वे ही मोट्टायित कहलाती हैं'। अभिनवगुप्त के अनुसार भी मोट्टायित का यही स्वरूप है-(अङ्गमोडनात् मोट्टायितम्)। वस्तुतः दशरूपक के लक्षण का भी यही अभिप्राय होना चाहिये; क्योंकि तद्भाव-भावना तो शरीर चेष्टाओं से ही प्रकट होती है। धनिक द्वारा दिये गये उदाहरणों से भी यही अभिव्यक्त होता है। अंतः दशरूपक के 'तद्भावभावना' शब्द का तात्पर्य है-तद्भावभावनाकृतम् (ना० शा०), अर्थात् उसके भाव में मग्न होकर की गई शारीरिक चेष्टा। ७. कु्टमित- ग्र(रतिकीडा में प्रियतम के द्वारा) केश और अधर का ग्रहण किये जाने पर (नायिका) जो हृदय में प्रसन्न होकर भी कोप प्रकट करती है, वही कुटटमित कहलाता है ॥४०॥ जैसे-'प्रियतम द्वारा ओठ काट लिया जाने पर (रोकने के लिये) हाथ के अ्ग्रभाग को हिलाती हुई नारी के सीत्कारयुक्त सूखे रुदन विजयी (सर्वोत्कृष्ट) हैं,

Page 226

द्वितीय: प्रकाशः १७७

दष्टेऽधरे प्रणायिना विधुताग्रपाणे: सीत्कारशुष्करुदितानि जयन्ति नार्या: ।१६८॥।' थ बिब्बोक :- (६७) गर्वाभिमानादिष्टेडपि बिब्बोकोSनादरक्रिया। यथा ममैव- 'सव्याजं तिलकालकान्विरलयंल्लोलाङ्ग लि: संस्पृशन् वारंवारमुदञचयन्कुचयुगप्रोदञ्चिनीलाञ्चलम् । यद्भ्र भङ्गतरङङ्गिताञ्चितहृशा सावज्ञमालोकितं तद्गर्वादवधीरितोऽस्मि न पुनः कान्ते कृतार्थीकृत: ॥१६६।' अथ ललितम्- (६८) सुकुमाराङ्गविन्यासो मसृरो ललितं भवेत् ।।४१।। वे (रुदन) रतिकीडा की नाटकीय चेष्टाओं के नान्दीपाठ हैं अथवा कामदेव के आदेश के बड़े-बड़े लेख है'। टिप्पणी-(१) द्र०, ना० शा० (२२.२०), भा० प्र० (पृ०६), ना० द० (४.२८०), प्रता० (पृ० १६१), सा० द० (३.१०३)। (२) केशाधरग्रहे प्रियतमेन, इति शेष: (अभि० भा०); सानन्दान्त :- सानन्दम् अन्तः (अन्तःकरणम्) यस्मिन् कमेंरि तत तथा; कुप्येत का करियाविशेषण है (प्रभा) । शुष्क-सूखा, भूठमूठ, बनावटी। ८. बिब्बोक गर्व और अभिमान के कारण इष्ट वस्तु के प्रति भी अनादर दिख- लाना बिब्बोक कहलाता है। जैसे मेरा (धनिक का) ही पद्य है-(नायक नायिका से कहता है)-'हे प्रियतमे (कान्ते), तिलक के बालों को विरल करके कपटपूर्वक चञ्चल अङ्गुलियों से तुम्हारा स्पर्श करते हुए तथा बार-बार कुच-युगल पर फहराते नीले आंचल को उठाते हुए मुझ पर तुमने जो टेढी भौँहों वाली वक्र दृष्टि से अवज्ञापूर्वक देखा, उस गर्व से मैं अपमानित हो गया हूँ, किन्तु तुमने मुझे कृतार्थ नहीं किया'। टिप्परी- (१) द्र०, ना० शा० (२२.२१), भा० प्र० (पृ०९), काव्यानु० (७.३६), ना० द० (४.२७७), प्रता० (पृ० १६२), सा० द० (३.१००)।(२) इष्टेऽपि-प्रिय में भी; प्रियतम अथवा अभीष्ट वस्त्र, अलङ्कार आदि का अनादर। गर्व-सौभाग्य का गर्व, हर्ष। अभिमान-चित्त का चढ़ा होना (ना० द०); रूपा- देगर्वः, यौवनादेश्चाभिमानः (प्रभा०)। ह. ललित- सुकुमार अङ्गों को स्निग्धतापूर्वक चलाना ललित कहलाता है॥४१॥

Page 227

१७८ दशरूपकम्

400 100 100 250 109 304 10 यथा ममैव- 'सभ्रूभङ्ग' करकिसलयावर्तनैरालपन्ती सा पश्यन्ती ललितललितं लोचनस्याञ्चलेन। विन्यस्यन्ती चरणकमले लीलया स्वैरयातै- निस्सङ्गीतं प्रथमवयसा नर्तिता पङ्ढजाक्षी ॥१७०॥ अथ विहृतम्- (६६) प्राप्तकालं न यद् ब्र याद् व्रीडया विहृतं हि तत्। प्राप्तावसरस्यापि वाक्यस्य लज्जया यदवचनं तद् विहृतम् यथा- पादाङ़ग ष्ठेन भूर्मि किसलयरुचिना सापदेश लिखन्ती भूयो भूय: क्षिपन्ती मयि सितशबले लोचने लोलतारे। वक्त्रं हरीन म्रमीषत्स्फुरदधरपुट वाक्यगर्भ दधाना यन्मां नोवाच किन्चित्स्थितमपि हृदये मानसं तद दुनोति॥१७१॥

जैसे मेरा (धनिक का) ही पद् है-'भ्र भङ्ग के साथ कर-पल्लव को घुमाकर बातें करती हुई, नेत्रों के कोनों से अत्यन्त सुन्दरता के साथ देखती हुई, स्वच्छन्दता के साथ लीलापूर्वक चरण-कमलों को रखती हुई उस कमलनयनी को यौवन का प्रादुर्भाव बिना सङ्गीत के ही नचा रहा है।' टिप्पणी- १) द्र०, ना० शा० (२२.२२), भा० प्र० (पृ०६), प्रता० (पृ० १६२) सा० द० (३.१०५)। (२) ना० द० (४.२७६) के अनुसार 'व्यर्थ ही सुकुमारतापूर्वक अङ्गों का चलाना ललित कहलाता है (ललितं गात्रसञ्चार: सुकुमारो निरर्थक:)। यहाँ सुकुमार=अतिमनोहर, निरर्थक=निष्पयोजन जैसे बिना द्रष्टव्य के ही दृष्टि डालना, बिना ग्राह्य के ही हाथ फैलाना आदि। (३) निष्प्रयोजन व्यापार ललित कहलाता है और सप्रयोजन विलास; यही दोनों का अन्तर है। (४) दशरूपक में भी सुकुमारोऽङ्ग-विन्यासः; यही पाठ उचित प्रतीत होता है, अर्थात् सुकुमार तथा स्निग्ध अङ्गविन्यास ललित है। १०. विहृत- जो अवसर आने पर भी (नायिका) लज्जा के कारण नहीं बोलती वही विहत है। अर्थात् जिसका अवसर हो ऐसे वाक्य का भी जो लज्जा के कारण न बोलना है वही विहृत कहलाता है। जैसे (अरमरुशतक १३६)-'किसलय के समान कान्ति वाले पैर के अंगूठे से किली बहाने भूमि को कुरेदती हुई; चञ्चल तारों वाले श्वेत एवं शबल नेत्रों को बार-बार मुझ पर डालती हुई; लज्जा से भुके, कुछ फड़कते अधरपुट वाले, भीतर किसी बात को लिये हुए मुख को धारण करती हुई उस (नायिका) ने मन में होते हुए भी जो मुझ से कुछ नहीं कहा, वही बात मेरे मन को दुःखी कर रही है।'

Page 228

द्वितीय: प्रकाश: १७६

अथ नेतुः कार्यान्तरसहायानाह- (७०) मन्त्री स्वं वोभयं वापि सखा तस्यार्थचिन्तने ॥ ४२॥ तस्य नेतुरर्थचिन्तायां तन्त्रावापादिलक्षणायां मन्त्री वाऽडत्मा वोभयं वा सहायः। तत्र विभागमाह- (७१) मन्त्रिणा ललितः, शेषा मन्त्रिस्वायत्तसिद्धयः । उक्तलक्षणो ललितो नेता मन्त्र्यायत्तसिद्धिः। शेषा धीरोदात्तादयः अनियमेन मन्त्रिणा स्वेन वोभयेन वाडङ्गीकृतसिद्धय इति। टिप्पणी-(१) द्र०, ना० शा० (२२.२४-२५), भा० प्र० (पृ०६), ना० द० (४.२७८), प्रता० (पृ० १६३), सा० द० (३.१०६)। (२) यहाँ 'बीडया' यह पद उपलक्षण मात्र है अतः अवसर पर भी लज्जा, मुग्धता, बालस्वभाव, अन्यमन- स्कता या किसी कपटभाव आदि के कारण प्रिथ मधुर वचन न कहना ही 'विहृत' हैं (मि०, ना० शा० तथा ना० द०)। नायक के अन्य सहायक [नायक के शृङ्गारी सहायक विदूषक आदि का ऊपर वर्णन किया जा चुका है] अब नायक के अन्य कार्यों में सहायकों का वर्णन करते हैं- उस (नायक) के अर्थ-चिन्तन में मन्त्री सहायक (सखा) होता है, अथवा वह स्वयं ही, या दोनों (नायक या मन्त्री) ही। ४२॥ उस नायक की अर्थ-चिन्ता अर्थात तन्त्र (=अपने राज्य में किया गया कार्थ) तथा आवाप (गुप्तचर भेजना आदि दूसरे राज्य में किया गया कार्य) इत्यादि में मन्त्री या वह स्वयं अथवा मन्त्री और वह दोनों ही साधक होते हैं। उनका विभाग करते हैं- घीरललित नायक की सिद्धि मन्त्र द्वारा होती है और अन्य नाचकों (धीरोदात्त, घीरप्रशान्त और धीरोद्धत) की सिद्धि मन्त्री तथा स्वयं के द्वारा होती है। जिसका ऊपर (२.३) लक्षण किया गया है उस धीर ललित नायक की सिद्धि मन्त्री के अधीन होती है। शेष जो धीरोदात्त आदि नायक हैं वे कभी मन्त्री द्वारा, कभी स्वयं ही, कभी दोनों के द्वारा (कार्य में) सिद्धि प्राप्त कर लेते हैं; इसमें कोई नियम नहीं है। टिप्पणी-(१) द्र०, ना० शा० (२४.७४), भा० प्र० (पृ० ६३), नो० द० (४.२५३), सा० द० (३.४३)। (२) अर्थ-चिन्तन=तन्त्रावापादि; अपने राज्य में किया जाने वाला कर्म तन्त्र कहलाता है और दूसरे राज्य में गुप्तचर आदि नियुक्त करना आवाप है। यहाँ 'आदि' शब्द से 'शत्रु को दण्ड देना' आदि का ग्रहण होता

Page 229

१८० दशरूपकम्

धर्मसहायास्तु- (७२) ऋत्विक्पुरोहितौ धर्मे तपस्विब्रह्मवादिनः ॥४३॥ ब्रह्म=वेदस्तं वदन्ति व्याचक्षते वा तच्छीला ब्रह्मवादिनः, आत्मज्ञानिनो वा। शेषा: प्रतीताः । दुष्टदमनं दण्डः। तत्सहायास्तु- (७३) सुहृत्कुमाराटविका दएडे सामन्तसैनिकाः। स्पष्टम।

है; (मि०, प्रभा०)। सखा=सहायः, साधक। (३) 'मन्त्री स्वं' इत्यादि कथन की विश्वनाथ ने (सा० द० ३.४३) ने इस प्रकार आलोचना की है-(i) अरथ-चिन्तन के उपायों के सन्दर्भ में यह कथन उचित हो सकता था नायक के सहायकों के सन्दर्भ में नहीं, (i1) नायक के अर्थचिन्तन में मन्त्री सहायक होता है, केवल इतना कहना ही पर्याप्त है, इसी से नायक का भी कार्य में भाग लेना स्वतः सिद्ध है फिर 'स्वं' तथा 'उभयं' इत्यादि कथन व्यर्थ ही है। (४) 'मन्त्रिणा ललितः' इत्यादि की भी विश्वनाथ ने (सा० द० ३.४३) आलोचना की है कि (i) 'निश्चिन्तो धीरललितः' (ऊपर २.३) इस लक्षण से ही यह सिद्ध है कि ललित नायक की सिद्धि मन्त्री के अधीन होती है, फिर यहाँ उसका कथन करना व्यर्थ है, किञ्च (ii) मन्त्री अरथ- चिन्तन में ललित नायक का सहाय नहीं होता अपि तु वह स्वयं ही उसके अर्थ का साधक होता है, ललित नायक तो अर्थ-चिन्तन आदि करता ही नहीं अतः मन्त्री को सहायक कहना ठीक नहीं नायक के धर्मकार्य में सहायक ये हैं- यज्ञ करने वाले (ऋत्विक), पुरोहित, तपस्वी और ब्रह्मज्ञानी या (वेदपाठी) धर्म में सहायक होते हैं ॥४३। ब्रह्म का अर्थ है-वेद, उसका प्रवचन या व्याख्या करने के स्वभाव वाले ब्रह्मवादी कहलाते हैं, अथवा आत्मज्ञानी। शेष (ऋत्विक् आदि) प्रसिद्ध ही हैं। दुष्टों का दमन करना दण्ड कहलाता है। उसमें ये सहायक होते हैं- मित्र, राजकुमार, वन-विभाग के कर्मचारी अथवा अरयवासी (आटविक), सामन्त तथा सैनिक दएड में सहायक होते हैं। यह स्पष्ट ही है। टिप्पणी-ना० शा० (२४.७४), भा० प्र० (पृ० ६३), ना. द० (४.२५३), सा० द० (३.४५)।

Page 230

द्वितीय: प्रकाश: १८१

एवं तत्तत्कार्यान्तरेषु सहायान्तराणि योज्यानि। यदाह- (७४) अन्तःपुरे वर्षवराः किराता मूकवामना:॥४४।। म्लेच्छाभीरशकाराद्याः स्वस्वकार्योपयोगिनः । शकारो राज्ञ: श्यालो हीनजातिः। विशेषान्तरमाह- (७५) ज्येष्ठमध्याधमत्वेन सर्वेषां च त्रिरूपता।।४५।। तारतम्याद्यथोक्तानां गुणानां चोत्तमादिता। एवं प्रागुक्तानां नायकनायिकादूतदूतीमन्त्रीपुरोहितादीना मुत्तममध्यमाधमभावेन त्रिरूपता, उत्तमादिभावश्च न गुएसंख्योपचयापचयेन कि तहि गुणातिशयतारतम्येन। इसी प्रकार भिन्न-भिन्न कार्यों में अन्य सहायकों को नियुक्त करना चाहिये। जैसा कि कहा है- अन्तःपुर में वर्षवर (नपुसक जन), किरात, गूंगे, बौने, म्लेच्छ, अहीर तथा शकार आदि अपने अपने कार्य में उपयोगी होते हैं॥४४-४५॥ राजा का साला जो नीच जाति का होता है, शकार हुआ करता है। टिप्पणी-() ना० शा० (२४.६८ तथा आगे), ना० द० (४.२५१), सा० द० (३.४३-४४) । (२) वर्षवर, किरात और वामन आदि का रत्नावली (२.३) में भी चित्रण किया गया है। शकार मूर्ख और घमण्डी होता है, नीच कुल का तथा ऐश्वर्यं-सम्पन्न होता है; वह राजा की अविवाहिता (रखेल) पत्नी का भाई होता है (सा० द०), वह हास्य का हेतु होता है और राजा का परि- चारक भी (ना० द०)। मृच्छकटिक में शकार की योजना की गई है। इन (नायक आदि) के अन्य भेद बतलाते हैं- इन सभी (नायक आदि) के ज्येष्ठ, मध्यम तथा अधम भेद से तीन-तीन प्रकार होते हैं। और, इनकी उत्तमता (मध्यमता तथा अधमता) आदि ऊपर कहे गये गुणों के तारतम्य (न्यूनता और अधिकता) से होती हैं।। ४५-४६ ।। अर्थात् इस प्रकार ऊपर कहे गये नायक, नायिका, वूत, दूती, मत्त्री, पुरोहित इत्यादि के उत्तम, मध्यम और अधम भेव से तीन-तीन प्रकार होते हैं। और, यह उत्तमता इत्यादि गुणों की संख्या की अधिकता और न्यूनता के आधार पर नहीं होती अपि तु गुणों की मात्रा (विशेषता) के न्यूनाषिक्य से होती है। टिप्पणी-(१) नायक आदि में से प्रत्येक तीन प्रकार का होता है, जिस प्रकान नायक पत्तम, मध्यम तथा अधम कोटि का हो सकबा है, इमी प्रकार नायिका

Page 231

१८२ दशरूपकम्

(७६) एवं नाट्य विधातव्यो नायकः सपरिच्छदः* ॥४६॥ उक्तो नायकः, तद्वयापारस्तूच्यते- (७9) तद्वयापारात्मिका वृत्तिश्चतुर्धा, दूत, दूती, मन्त्री आदि में से भी प्रत्येक तीन प्रकार का हो सकता है। धीरोदात्त आदि प्रत्येक नायक के भी तीन-तीन प्रकार होते हैं (ऊपर १.७) मि० सा० द० ३.३८, ३.८७, ३.१३०। (२) उत्तमादिभावश्च न गुरसंख्योपचयापचयेन-प्रश्न यह है कि इस उत्त- मता आदि की व्यवस्था का आधार क्या है ? एक तो यह हो सकता है कि किसी नायक आदि के जो गुणा बतलाये गये हैं, वे सभी गुण जिसमें हों वह उत्तम, जिसमें कुछ गुरों की कमी हो वह यध्यम और जिसमें बहुत से गुणों की कमी हो वह अधम कहलायेगा (द्र० भा० प्र० पृ० ६१-६२): जैसे महासत्त्व, अतिगम्भीर, आदि ७ गुणा धीरोदात्त नायक के बतलाये गये हैं (ऊपर २.४) । उन सातों गुणों वाला उत्तम, छः, पाँच या चार गुणों वाला मध्यम और शेष तीन, दो या एक गुण वाला अधम धीरोदात्त होगा। दूसरी व्यवस्था यह हो सकती है कि ये महासत्त्व आदि जिसमें अधिक मात्रा में हों या उत्कृष्ठ अवस्था में हों वह उत्तम होगा। गुणों की मात्रा अल्प तथा अल्पतर होने पर मध्यम तथा अधम होगा। धनञ्जय तथा धनिक का मन्तव्य है कि दूसरे प्रकार से उत्तम आदि की व्यवस्था माननी चाहिये। (३) इसके अतिरिक्त उत्तम, मध्यम तथा अधम पात्रों की एक अन्य व्यवस्था भी है जिसका उल्लेख विष्कम्भक और प्रवेशक के लक्षण (ऊपर १.५६-६०) में किया गया है। ऐसा प्रतीत होता है कि वहाँ पुरोहित, अमात्य, कञ्चुकी (ना० शा० १६. १०६) तथा विट, विदूषक (सा० द० ३.४६) आदि मध्यम पात्र हैं और शकार चेट (सा० द० '३.४६) आदि नीच पात्र माने गये हैं। इस प्रकार रूपक में परिच्छद (परिवार, सहायकों) सहित नायक की योजना करनी चाहिये।।४६।। टिप्पणी-'परिच्छद' का अर्थ है-सेवक, सहायक, परिवार, परिजन (Attendants, circle of dependents आप्टे)। नायक और नायिका के सहा- यकों का वर्णन करना रूपकों की परम्परा रही है, विशेषकर राज-परिच्छद का वर्शन करना। इसी हेतु नाट्य शास्त्र से लेकर प्रायः सभी नाट्य के ग्रन्थों में नायक का परिच्छद सहित विवेचन किया गया है। भारती आदि वृत्तियाँ (नाटयवृत्तियाँ) नायक का वर्णन किया जा चुका है अब उस (नायक) के व्यापार (प्रवृत्ति) का वर्णन किया जाता है- उस (नायक आदि) का व्यापार ही वृत्ति कहलाता है। यह वृत्ति चार प्रकार की है। 'सपरिग्रषः' इत्यपि पाठः ।

Page 232

द्वितीय: प्रकाश: १८३

प्रवृत्तिरूपो नेतृव्यापारस्वभावो वृत्तिः, सा च कैशिकी-सात्त्वती-आरभटी- भारतीभेदाच्चतुविधा। प्रवृत्तिरूप नायक (आदि) के व्यापार का स्वभाव ही वृत्ति कहलाता है। वह वृत्ति कैशिकी, सात्त्वती, आरभटी तथा भारती के भेद से चार प्रकार की होती है। टिप्पणी-(१) ना० शा० (२२.२३-२५), भा० प्र० (पृ० १२), ना० द० (३.१५५), प्रता० (२.१५), सा०द० (६.१२२-१२३)। (२) नेतृव्यापारस्वभाव :- नायकस्य व्यापारानुकूल: स्वभावो वृत्तिः (प्रभा); वस्तुतस्तु नेतृव्यापारस्य स्वभावः स्वरूपविशेषः एव वृत्तिः, कोहृशः स्वरूपविशेषः ? प्रवृत्तिरूपः। प्रवृत्ति का अर्थ है- मानसिक, वाचिक और कायिक चेष्टा। सामान्यतः नायक आदि के व्यापार अनेक प्रकार के होते हैं। वाचिक आदि चेष्टाओं के साथ-साथ वह देश-भेद से भिन्न-भिन्न प्रकार की भाषा बोलता है, भिन्न भिन्न प्रकार का वेष धारण करता है और अन्य भी नाना प्रकार के क्रिया-कलाप में व्यस्त रहता है किन्तु वे सभी व्यापार नाट्य- वृत्तियाँ नहीं कहलाते। इसीलिये विश्वनाथ ने 'नायकादिव्यापारविशेषा नाटकादिषु' (सा०द० ६.१२३) में 'विशेष' शब्द का ग्रहणा किया है तथा धनिक ने 'प्रवृत्तिरूपः' यह विशेषण दिया है। फलतः नायक आदि का मानसिक, वाचिक और कायिक व्यापार नाट्य में वृत्ति कहलाता है। इन वृत्तियों को 'काव्यानां मातृका वृत्तयः (ना० शा० १८.४) 'नाट्यमातरः' (ना० द० ३.१५५) नाट्यस्य मातृका: (सा०द० ६.१२३) कहा गया है क्योंकि कवि नायक आदि के कायिक, वाचिक और मानसिक व्यापारों को वर्णनीय रूप से अपने हृदय में रखकर ही काव्यरचना करता है। इसी से वृत्तियाँ काव्य की जननी हैं। (३) ये वृत्तियां चार मानी गई हैं-सात्त्वती, भारती और कैशिकी तथा आरभटी। इनमें सात्त्वती वृत्ति विशेषतः मानस व्यापार-रूप हीती है, भारती वाचिक व्यापार-रूप और कैशिकी तथा आरभटी दोनों वृत्तियाँ विशेषकर कायिक व्यापार-रूप हैं। किन्तु मानसिक, वाचिक और कायिक व्यापारों का असंकीर्ण रूप से होना तो असम्भव है, क्योंकि कायिक और वाचिक चेष्टायें तो सर्वदा मानस चेष्टाओं पर ही आश्रित रहती हैं। इसलिये किसी एक अंश की प्रधानता के कारण ही वृत्तियों का यह भेद किया गया है, जैसे जिस वृत्ति में वाक्चेष्ठा की प्रधानता है उसे भारती कह दिया गया है (द्र०, ना० द० वृत्ति ३.१५५ तथा अभि० भा० २०.२५)। इसके अरतिरिक्त रस-भेद तथा अभिनय भेद आदि भी वृत्तियों के भेदक माने जाते हैं। नाट्य में सभी व्यापार रस, भाव तथा अभिनय से युक्त होता है। अरतः ये वृत्तियां भी रस, भाव तथा अभिनय का अनुसरण करती हैं (रसभावाभि- नयगा:, ना० द० ३.१५५)। अभिनवगुप्त ने चारों वृत्तियों का स्वरूप संक्षेप में इस

Page 233

१८४ दशरूपकम्

(७७ क)-तत्र कैशिकी। गीतनृत्यविलासादैमृ दुः शृङ्गारचेष्टितैः ॥ ४७।। तासां गीतनृत्यविलासकामोपभोगाद्युपलक्ष्यमाणो मृदुः शृङ्गारी कामफला- वच्छिन्नो व्यापार: कैशिकी। सा तु-

तदित्यनेन सर्वत्र नर्म परामृश्यते। तत्र-

प्रकार बतलाया है-पाठ्य प्रधाना भारती, अभिनयप्रधाना सात्वती, अनुभावाद्या- वेशमयरसप्रधानारभटी, गीतवाद्योपरञ्जकप्रधाना कशिकीति (अभि० भा० २०.२३)। इन चारों वृत्तियों का विशद वर्णन आगे किया जा रहा है। १. कैशिकी वृत्ति- उनमें गीत, नृत्य, विलास आदि शृङ्गारिक चेष्टाओं से कोमल वृत्ति कैशिकी होती है।४७।। अर्थात् उन (चार प्रकार की वृत्तियों) में गीत, तृत्य, विलास, कामोपभोग इत्यादि से युक्त अतएव मृदु (सुकुमार) तथा शृङ्गार-पूर्ण अर्थात् कामरूपी फल की प्रात्ति से सम्यद्ध (नायक आदि का) व्यापार कैशिकी वृत्ति है। और उसके- (क) नर्म, (ख) नर्मस्फिन्ज, (ग) नर्मस्फोट और (घ) नर्मगर्भ। भेद से चार अङ्ग होते हैं। (कारिका में) तत् (वह) शब्द के द्वारा सब जगह 'नर्म' का ग्रहण होता है (अर्थात् ततिस्फञ्ज-उस नर्म का स्फिञ्ज या नर्मस्फिञ्ज इत्यादि)।अल टिप्पणी-(१) द्र०, ना०शा० (२०.५२-५३), भा० प्र० (पृ० १२), ना० द० (३.१६१), सा० द० (६·१२४)। (२) सा० द० में ना० शा० के कैशिकी-लक्षण का अनुसरण करते हुए इसे अधिक स्पष्ट किया गया है। तदनुसार 'जो विशेष प्रकार की वेश-भूषा से चित्रित हो, जिसमें स्त्री पात्रों की बहुलता हो, नृत्य गीत की प्रचुरता हो, शृङ्गारप्रधान व्यवहार हो, वह चारु विलासों से युक्त वृत्ति कैशिकी है'। ना० द० वृत्ति (३.१६१) के अनुसार कैशिकी शब्द को व्युत्पत्ति इस प्रकार है-लम्बे केश होने के कारणा स्त्री कैशिका कही जाती है और स्त्रियों का प्राधान्य होने के कारण इसे कैशिकी वत्ति कहते हैं। नर्म- उन (कैलिकी के चार शङ्गों) में -

Page 234

द्वितीय: प्रकाश:

(७६) वैदग्ध्यक्रीडितं नर्म प्रियोपच्छन्दनात्मकम् ॥४८॥ TFE FB हास्येनैव सशङ्गारभयेन विहितं त्रिधा। आत्मोपच्ेपसम्भोगमानैः शृङ्गार्यपि त्रिधा॥४६।। शुद्धमङ्ग भयं द्वेधा, त्रेधा वाग्वेषचेष्टितैः। सर्वं सहास्यमित्येवं नर्माष्टादशधोदितम् ॥५०। अग्राम्य इष्टजनावर्जनरूप: परिहासो नर्म, तच्च शुद्धहास्येन सश्ृङ्गारहास्येन सभयहास्येन रचितं तिविधम्, शृङ्गारवदपि स्वानुरागनिवेदन-सम्भोगेच्छाप्रकाशन- सापराधप्रिय प्रतिभेदनैस्त्रिविधमेव, भयनर्मापि शुद्धरसान्तराङ्गभावाद् द्विविधम्। एवं षड्विधस्य प्रत्येकं वाग्वेषचेष्टाव्यतिकरेराष्टादशविधत्वम् । प्रिय को प्रसन्न करने वाली विद्ग्धता से युक्त क्रीडा को नर्म कहा जाता है॥४८॥ वह नर्म (प्रथमतः) तीन प्रकार का होता है- (i) केवल हास्य से किया गया, (ii) शरृङ्गार सहित हास्य से किया गया और (iii) भय सहित हास्य से किया गया। इनमें (ii) शृङ्गारयुक्त (हास्य से किया गया) भी तीन प्रकार का होता है- (त्र) आत्मोपच्तेप, (आ) सम्भोग और (इ) मान ।।४६। भययुक्त (iii) (हास्य से किया गया) भी दो प्रकार का है- शुद्ध और अङ्ग। फिर हास्य नर्म सहित ये सब (अर्थात् कुल ६ प्रकार के नर्म) वाक् वेष और चेष्टा के भेद से तीन-तीन प्रकार के होते हैं। इस प्रकार नर्म अट्ठारह प्रकार का कहा गया है॥५०।। प्रियजन को आकृष्ट करने वाला विदन्ध (अग्राम्य=शिष्ट) परिहास ही नर्म कहलाता है। वह शुद्ध हास्य, शृङ्गारसहित हास्य तथा भयसहित हास्य से किया जाने के कारए तीन प्रकार का होता है। शृङ्गारसहित हास्य से किया गया नर्म भी-नायिका द्वारा अपने अनुराग का निवेदन (=आत्मोपक्षेप) नायिका द्वारा सहवास की इच्छा प्रकट करना (=सम्भोग) तथा अपराध करने वाले प्रिय के प्रति कोप करना (प्रतिभेदन, मान)-तीन प्रकार का होता है। भयसहित हास्य से किया गया नर्म भी-शुद्ध भय और अन्य रस के भ्रङ्ग: रूप भय के भेद से-वो प्रकार का होता है। इस प्रकार ६ प्रकार के नर्म के वाक्, वेष और चेष्टा के सेद से अट्ठारह मेद हो जाते हैं।

Page 235

१=६ देशरूपकमु

तत्र वचोहास्यनर्म यथा- 'पत्युः शिरश्चन्द्रकलामनेन स्पृशेति सख्या परिहासपूर्वम्। सा रञ्जयित्वा चरणौ कृताशीर्माल्येन ता निर्वचनं जघान ॥१७२॥ वेषनर्म यथा नागानन्दे विदूषव शेखरवव्यतिकरे। क्रियानमं यथा मालविकाग्नि- मित्र उत्स्वप्नायमानस्य विदूषकस्योपरि निपुणिका सर्पभ्रमकारणं दण्डकाष्ठं पातयति। एवं वक्ष्यमाशोष्वपि वाग्वेषचेष्टापरत्वमुदाहार्यम्। शृङ्गारवदात्मोपक्षेपनर्म यथा- मध्याह्नं गमय त्यज श्रमजलं स्थित्वा पयः पीयतां मा शून्येति विमुञ्च पान्थ विवशः शीतः प्रपामण्डपः । तामेव स्मर घस्मरस्मरशरत्रस्तां निजप्रेयसीं त्वच्चित्तं तुन रञ्जयन्ति पथिक प्रायः प्रपापालिका: ॥१७३॥ टिप्पणी-(१) ना० शा० (२०.५६-६१), ना० द० (३.१६१ तथा वृत्ति) सा० द० (६·१२५-१२८)। (२) १८ भेदों की गणना संक्षेप में इस प्रकार है- हास्य नर्म १+ शृङ्गार सहित हास्य (आत्मोपक्षेप, सम्भोग, मान) ३+भयसहित हास्य (शुद्ध, अङ्ग) २=६। नर्म को प्रकट करने वाले वाणी, वेष और चेष्टा हैं अतः इन ६ में से प्रत्येक के तीन भेद होकर ६x३=१८ । इनके नाम वचोहास्य नर्म, वेषहास्य नर्म इत्यादि होंगे। उनमें से वचोहास्यनर्म यह है, जैसे (कुमारसम्भव ७.१६)-"चरणों में लाली लगाकर सखी ने पार्वती को परिहासपूर्वक यह आशीस दी कि 'इससे पति के सिर की चन्द्रकला का स्पर्श करो' तब पार्वती ने बिता कुछ बोले ही माला से उसे पीटा।" वेष-हास्य-नर्म नागानन्द में विदूषक और शेखरक के सन्दर्भ में है। चेष्टा- हास्य-नर्म यह है, जैसे मालविकाग्निमित्र नाढक में निपुलिका नामक चेटी स्वप्न देखते हुए विदूषक के ऊपर सांप का भ्रम उत्पन्न करने के लिये लकड़ी का डण्डा डाल देती है। इसी प्रकार आगे कहे जाने वाले मेदों में भी वाक्, वेष और चेष्टा के उदाहरण दिये जा सकते हैं। (ii) (अ्र) शृङ्गारसहित आत्मोपक्षेप नर्म यह है, जसे-(कोई प्याऊ देने वाली किसी पथिक के प्रति अपना अनुराग प्रकट करती हुई कहती है) 'हे पथिक, दोपहरी बिता लो, पसीना सुखा लो, बैठकर पानी पीलो, 'यह सूना है' ऐसा समझकर बरनस इसे छोड़ न जाओ। यह प्रपामण्डप (प्याऊ का ओोंपड़ा) तो शीतल है। यहां (ठहरकर) काम के घातक (घस्मर) बाशों से त्रस्त अपनी उस प्रियतमा को ही माद करते रहनाः क्योंकि हे पथिक, प्याऊ, देने वाली तो प्रायः तुम्हारे चिल को प्रसन्न नहीं कर सकतीं।'

Page 236

द्वितौय: प्रकाश: १६७

सम्भोगनमं यथा- 'सालोए व्विग्र सूरे घरिरी घरसामिअस्स घेत्तूण। सोच्छन्तस्स वि पाए धुअइ हसन्ती हसन्तस्स ।१७४॥ ('सालोके एव सूर्ये गृहिणी गृहस्वामिकस्य गृहीत्वा। अनिच्छतोऽपि पादौ धुनोति हसनी हसतः ॥') माननर्म यथा- 'तदवितथमवादीर्यन्मम त्वं प्रियेति प्रियजनपरिभुक्त यद्दुकूलं दधानः । मदधिवसतिमागा: कामिनां मण्डनश्री- व्र जति हि सफलत्वं वल्लभालोकनेन ॥१७५।। भयनर्म यथा रत्नावल्यामालेख्यदर्शनावसरे 'सुसङ्गता-जाणिदो मए एसो सव्वो वुत्तन्तो समं चित्तफलएण ता देवीए शिवेदइस्सम्' (ज्ञातो मर्यष सर्वो वृत्तान्तः सह चित्रफलकेन तद्दव्यै निवेदयिष्यामि।') इत्यादि। शृङ्गाराङ्ग भयनर्म यथा ममैव- अभिव्यक्तालीकः सकलविफलोपायविभव- श्चिरं ध्यात्वा सद्यः कृतकृतकसंरम्भनिपुम्।

(प्रा) शृङ्गारसहित सम्भोग नर्म यह है, जैसे (गाथासप्शती २.३०) 'सूर्य के प्रकाशयुक्त रहते हुए ही हंसती हुई गृहिरी न चाहते हुए भी हंसते हुए गृह- स्वामी के चरणों को पकड़कर हिला रही है।'

(इ) शृङ्गारसहित माननर्म यह है, जैसे (माघ ११, कोई नायक किसी नायिका का वस्त्र धारण करके दूसरी नायिका के पास पहुँच गया, उसे देखकर वह नायिका मानपूर्वक परिहास करती हुई बोली)-'जो तुमने कहा कि 'तुम मेरी प्रियतमा हो' यह सत्य ही है। तभी तो तुम अपनी प्रिया के वस्त्र को धारण करके मेरे वासस्थान पर आये हो। क्योंकि कामी जनों की भृद्गार-शोभा प्रियतमा के द्वारा देख लिये जाने पर ही सफल होती है।' (iii) भयनर्म (शुद्ध) यह है, जैसे रत्नावली (२.१५-१६) में चित्र-दर्शन के अवसर पर 'सुसङ्गता-(राजा से परिहास करती है) मैंने चित्रफलक सहित यह समस्त वृत्तान्त जान लिया है तो अब जाकर महारानी से कह दूंगी' इत्यादि। शृङ्गार का भ्रङ्ग भयनर्म यह है, जैसे मेरा (धनिक का) ही पद्य है- 'जिस नायक का अपराध प्रकट हो चुका था फिर (मानवती नायिका को मनाने के) समस्त उपायों का सामर्थ्य भी विफल हो गया था, उस नायक ने देर तक सोचकर

Page 237

१८८ दशरूपकमु

इतः पृष्ठे पृष्ठे किमिदमिति सन्त्रास्य सहसा कृताश्लेषं धूर्तः स्मितमधुरमालिङ्गति वधूम् ॥१७६॥ अथ नर्मस्फिञ्ज :- (८०) नर्मस्फिञ्जः सुखारम्भो भयान्तो नवसङ्गमे। यथा मालविकाग्निमित्रे सङ्केते नायकमभिसृतायां नायिकायां नायक :- 'विसृज सुन्दरि सङ्गमसाध्वसं ननु चिरात्प्रभृति प्रणायोन्मुखे। परिगृहाण गते सहकारतां त्वमतिमुक्तलताचरितं मयि ॥१७३॥ 'मालविका-भट्टा देवीए भयेण अत्तणो वि पिश्रं काउ ए पारेमि।' (भर्त्तः देव्या भयेनात्मनोऽपि प्रियं कतु न पारयामि ।') इत्यादि। अ्रथ नर्मस्फोट :- (८१) नर्मसफोटस्तु भावानां सूचितोऽल्परसो लवैः॥५१॥ एकदम निपुणतापूर्वक कृत्रिम (कृतक) उद्वेग को दिखलाते हुए 'यह पीछे क्या है, पीछे क्या है !' इस प्रकार नायिका को डरा दिया। और, उस धूर्त ने पास को सटते हुए मुसकराहट पूर्वक मधुरता के साथ नायिका का आ्लिङ्गन किया।' नर्मस्फिञ्ज- यदि (नायिका को) प्रथम समागम के समय आरम्भ में सुख होता है और अन्त में भय तो वह नर्मस्फिञ्ज कहलाता है। जैसे मालविकाग्निमित्र (४.१३) में जब नायिका (मालविका) सङ्कत- स्थल पर नायक के पास पहुँचती है तो नायक (राजा) कहता है-'हे सुन्दरी, समागम के भय को छोड़ दो, बहुत समय से तुम्हारे प्रेम की प्रतीक्षा करने वाले अतएव सहकार (आम्रवृक्ष) के समान हो जाने वाले मेरे प्रति तुम माधवी लता का सा आचरण करो (जैसे माधवी लता आम्र्र से लिपट जाती है, उसी प्रकार .. )'। मालविका-स्वामी, देवी के भय से मैं अपना चाहा भी करने में समर्थ नहीं'। इत्यादि। टिप्पणी-ना० शा० (२०.५६), सा० द० (६.१२७) में भी लक्षणा तथा उदाहरण दश० के समान ही हैं। ना० शा० में इसका नाम नमस्फुञ्ज है। अभि० भा० के अनुसार इसकी व्युत्पत्ति है-नर्मणः स्फुञ्जः विघ्न इत्यर्थः। सा० द० में 'नर्मस्फूर्ज' नाम है। नर्मस्फोंट- जहाँ पर भावों के कुछ अंशों द्वारा (लवैः) अल्प रस सूचित होता है, वह नर्मस्फोट कहलावा है॥५१।

Page 238

द्वितीय: प्रकाश:

यथा मालतीमाधवे-'मकरन्द :- गमनमलसं शून्या दृष्टिः शरीरमसौष्ठवं श्वसितमधिकं कि न्वेतत्स्यात्किमन्यदितोऽथवा। भ्रमति भुवने कन्दपाज्ञा विकारि च यौवनं ललितमधुरास्ते ते भावाः क्षिपन्ति च धीरताम् ॥१७८॥ इत्यत्र गमनादिभिर्भावलेशैमधिवस्य मालत्यामनुरागः स्तोक: प्रकाश्यते। अथ नर्मगर्भ :- (८२) छन्ननेतृप्रतीचारो नर्मगर्भोऽर्थहेतवे। यथाऽमरुशतके- 'दृष्ट्वैकासनसंस्थिते प्रियतमे पश्चादुपेत्यादरा- देकस्या नयने निमील्य विहितकीडानुबन्धच्छनः । ईषद्वक्रितकन्धरः सपुलकः प्रेमोल्लसन्मानसा- मन्तहसिलसत्कपोलफलकां धूर्त्तोऽपरां चुम्बति ॥१७६॥ यथा (च) प्रियद्शिकायां गर्भाङ्क वत्सराजवेषसुसङ्गतास्थाने साक्षादृवत्सराज- त्रवेशः । जैसे मालतीमाधव नाटक (१२०) में 'मकरन्द-(माधव की दशा का वर्शन करते हुए कहता है) इसका गमन आलस्ययुक्त, दृष्टि सूनी, शरीर सौन्दर्य- हीन, श्वास अधिक चलता हुआ, यह क्या है ? अथवा इससे भिन्न क्या हो सकता है ? संसार में कामदेव की आज्ञा विचरण कर रही है और यौवन विकारशील है अ्रतः नाना प्रकार के ललित एवं मधुर भाव धैर्य को नष्ट कर देते हैं।' यहाँ पर (अलस) गमन इत्यादि भावलेशों के द्वारा माधव का मालती के प्रति थोड़ा सा प्रेम प्रकट होता है। टिप्पणी :- (१) ना० शा० (२०६०), सा० द० (६.१२८)। (२) अभि० भा० के अनुसार 'नर्मस्फोट' शब्द की व्युत्पत्ति है-नर्मणा इति तदुपलक्षितस्य शृङ्गारस्य स्फोटो वैचित्र्यं चमत्कारोल्लासकृतस्फुटत्वं यत्रेति'। (३) यहाँ 'भाव' शब्द से भय, हास, हर्ष, त्रास रोष आदि लिये जाते हैं। उनके अंशों के द्वारा जहां अल्प सा अनुराग सूचित होता है, वहाँ नम-स्फोट है (अभि० भा०); 'भावाना लव := अल्पैः सात्विकादिभावैः' (प्रभा) । नर्मगर्भ- किसी प्रयोजन (अथ) की सिद्धि के लिये नायक का गुप्त व्यवहार (प्रतीचारः) ही नर्मगर्भ कहलाता है। जैसे अमरुशतक (१६) में 'दृष्ट्वैकासन०' इत्यादि (ऊपर उदा०)। और, जसे प्रियदशिका नाटिका के गर्भाङ्क में वत्सराज के वेष में सुसङ्गता का प्रवेश होने के स्थान पर स्वयं वत्सराज का ही प्रवेश होता है।

Page 239

१६० दशरूपकमू

(८२ क) अङ्ग: सहास्यनिर्हास्यैरेभिरेषाडत्र कैशिकी ॥५२॥ अथ सात्त्वती- (८३) विशोका सात्त्वती सत्त्वशौर्यत्यागदयार्जवैः। संलापोत्थापकावस्यां साङ्कात्यः परिवर्तकः ॥५३॥ शोकहीन: सत्त्वशौर्यत्यागदयाहर्षादिभावोत्तरो नायकव्यापारः सात्त्वती, तदङ्गानि च संलापोत्थापकसाङ्कात्यपरिवर्तकाख्यानि। टिप्पसी :- (१) ना० शा० (२०-६१), सा० द० (६.१२८)। (२) छन्न- नेतृप्रतीचार :- नायक फा छिपकर व्यवहार करना, जैसे गुप्त रूप से सङ्गत-स्थल पर जाना इत्यादि (अभि० भा०), प्रतीचार := व्यवहारः, प्रवेशः (प्रभा), appro- ach (Haas), अर्थहेतवे=प्रयोजन के लिये, कार्य की सिद्धि के लिये, नव समागम की सिद्धि के लिये (अभि० भा०)। इस प्रकार हास्य-युक्त और हास्य-रहित अङ्गों के साथ यह कैशिकी वृत्ति यहाँ प्रतिपादित की गई है। २. सात्वती वृत्ति- सात्त्वती वृत्ति शोक-रहित होती है, यह सत्त्व, शौर्य,त्याग, दया और सरलता (आदि भावों) से युक्त होती है। इसमें संलापक, उत्थापक, सांघात्य और परिवर्त्तक (ये चार अङ्ग) होते हैं।५३॥ अर्थात् शोकरहित तथा सत्त्व, शौर्य, त्याग, दया, हर्ष आदि भावों के अनन्तर होने वाला नायक का व्यापार सात्त्वती वृत्ति है। (क) संलापक, (ख) उत्त्थापक, (ग) सांघात्य और (घ) परिवर्तक नाम से उसके (चार) अ्ङ्ग होते हैं। टिप्पणी-(१) द्र०, ना० शा० (२०.४१-४४), भा० प्र० (पृ० १२), ना० द० (३.१६०), सा० द० (६·१२८-१३०)। (२) सत्त्व का अर्थ है-मन, उसका व्यापार अर्थात् मानस व्यापार ही सात्त्वती वृत्ति है। यह मानस व्यापार सत्त्व, शौ्य, त्याग, दया, हर्ष आदि भावों के रूप में होता है और इसको सात्विक, वाचिक तथा आङ्गिक अभिनय के द्वारा प्रवट किया जाता है। किन्तु इसमें सात्त्विक अभिनय की ही प्रधानता होती है। इसीलिए नाट्य में इस नायक-व्यापार को सात्त्वती वृत्ति कहा जाता है (द्र०, न.० शा० अभि० भा० तथा ना० द०)। (३) मानसिक व्यापार अ्र्परनेक प्रकार का होता है। उन सबकी गणना करना असम्भव ही है। फिर भी नाट्याचार्यों ने उन मानस व्यापारों का चार भागों में विभाजन किया है। ये ही सात्त्विक वृत्ति के चार अङ्ग कहे गये हैं। ना० शा० में इन चारों का वर्णन है किन्तु भा० प्र० तथा ना० द० में नहीं। आगे चलकर सा० द० में भी इनका विवेचन है। (४) आर्जव=ऋजुता, कुटिलता का अभाव। हर्षादि-

Page 240

द्वितीय: प्रकाशः १६१

तत्र- (८४) संलापको गभीरोक्तिर्नानाभावरसा मिथः । यथा वीरचरिते-'रामः-अयं स यः किल सपरिवारकार्तिकेयविजयावजितेन भगवता नीललोहितेन परिवत्सरसहस्रान्तेवासिने तुभ्य प्रसादीकृतः परशुः। परशु- राम :- राम राम दाशरथे, स एवायमाचार्यपादानां प्रियः परशु :- शस्त्र प्रयोगखुरलीकलहे गणानां सैन्यैवृतो विजित एव मया कुमारः। एतावतापि परिरभ्य कृतप्रसादः प्रादादमु प्रियगुणो भगवान्गुरुर्मे ॥१८०।। इत्यादिनानाप्रकारभावरसेन रामपरशुरामयोरन्योन्यगभीरवचसा संलाप इति। अथोत्थापक :- (८५) उत्थापकस्तु यत्रादौ युद्धायोत्थापयेत्परम् ॥५३॥ भावोत्तर: यह नायकव्यापार:' का विशेषण है, हर्षादिभावप्रधानः (प्रभा), वस्तुतः हषं आदि भाव के पश्चात् होने वाला नायक-व्यापार, यह अर्थसङ्गत प्रतीत होता है। (क) संलापक- उनमें- अ्रनेक प्रकार के भावों तथा रसों से युक्त (पात्रों की)

होता है। पारस्परिक उक्ति (कथोपकथन) में संलापक (नामक सात्वती वृत्ति का श्रङ्ग)

जैसे वीरचरित (२.३४) में 'राम-यही वह परशु है जो सेनापति काति- केय की विजय से प्रभादित (आकृष्ट) होकर भगवान् शिव (नीललोहित) ने एक सहस्र वर्ष तक शिष्य रहने वाले आपको उपहार में दिया था। परशुराम-राम, राम, दशरथपुत्र, यह वही पूज्य आचार्य का प्रिय परशु है- 7'शस्त्र-प्रयोग की परीक्षा (खुरली) के विवाद में मैंने गणों की सेना से युक्त कुमार कार्तिकेय को जीत लिया। इतने पर भी गुणों को प्यार करने वाले मेरे गुरु भगवान् शंकर ने प्रसन्न होकर मुझ्क गले लगाकर यह परशु मुझे दिया था।' इत्यादि अ्रनेक प्रकार के भाव और रस से युक्त राम तथा परशुराम के पारस्परिक गम्भीर कथन में संलापक (नामक सातत्वती वृत्ति का अङ्ग) है। टिप्पणी-(१) ना० शा० (२०.४८), सा० द० (६.१३१)। (२) नाना- भावरसा मिथः गभीरोक्तिः संलापकः, यह वाक्य-योजना है। खुरली-लक्ष्यभेद- परीक्षा; (Military exercise or practice आप्टे)। (ख) उत्थापक- जहाँ एक पात्र दूसरे को पहले-पहल (आदौ) युद्ध के लिये उत्तेजित करे वहाँ उत्थापक (नामक सात्त्वती वृत्ति का अङ्ग) होता है।५३॥ एगकर

Page 241

१९२ दशरूपकम

यथा वीरचरिते- आनन्दाय च विस्मयाय च मया हष्टोऽसि दुःखाय वा वतृष्ण्यं नु कुतोऽद्य सम्प्रति मम त्वद्दर्शने चक्षुषः । त्वत्साङ्गत्यसुखस्य नास्मि विषयः किवा बहुव्याहृतै- रस्मिन्विश्र तजामदग्न्यविजये बाही धनुर्जू म्भताम् ॥१८१। अथ साङ्कात्य :- (८६) मन्त्रार्थ दैवशक्त्यादेः साङ्घात्यः सङ्घभेदनम्। मन्त्रशक्त्या यथा मुद्राराक्षसे राक्षससहायादीनां चाणकयेन स्वबुद्धा भेद- नम्। अर्थशकत्या तत्रैव यथा पर्दतकाभरसस्य राक्षसहस्तगमनेन मलयकेतुसहोत्थायि- भेदनम्। दैवशक्त्या तु यथा रामायणो रामस्य दैवशक्त्या रावणाद्विभीषणस्य भेद इत्यादि। जैसे वीरचरित (५.४६ बालि की राम के प्रति उक्ति) में-'हे राम, मुझे तुम आनन्द के लिये दिखलाई दिये हो या विस्मय के लिये अथवा दुःख के लिये (कहना कठिन है); किन्तु अब तुम्हारे दर्शन से मेरे नेत्रों की तृप्ति (वंतृष्ण्य) कैसे हो सकती है ? तुम्हारी सङ्गति के सुख का तो मैं पात्र नहीं हूँ। अतः व्यर्थ की बातों से क्या लाभ ? जमदग्नि के पुत्र (परशुराम) के दमन से प्रसिद्ध इस (तुम्हारे) हाथ में धनुष जुम्भित हो जाये (जम्भताम्=अंगड़ाई ले)'। टिप्पणी-(१) ना० शा० (२०.४५), सा० द० (६·१३०)। (२) उदा० १८१ में पहले बालि राम को युद्ध के लिए उत्तेजित करता है अतः यहां उत्थापक है। (ग) सांघात्य- जहाँ मन्त्रिशक्ति, अर्थशक्ति या दैवशक्ति आदि के द्वारा (प्रतिपक्षी के) संघ का भेदन किया जाता है, वहाँ सांघात्य (नामक सात्त्वती वृत्ति का अरङ्ग) होता है। मत्त्रशक्ति से (संघभेदन का उदाहरण है), जैसे मुद्राराक्षस नाटक में चारक्य ने अपनी बुद्धि से राक्षस के सहायक इत्यादि में भेद (फूट) उत्पन्न कर दिया। अर्थशक्ति से (संघमेदन का उदाहरणा है), जैसे वहीं पर्वतक के आभूषणों के राक्षस के हाथ में पहुँच जाने के कारण मलयकेतु के साथियों में भेद उत्पन्न हो गया। दैवशक्ति से (संघभेदन का उदाहरण है) है, जैसे रामायण में राम की देवी शक्ति के द्वारा रावण से विभीषण का भेद कर दिया गया। इत्यादि। हा टिप्पणी-ना० शा० (२०.५०), सा० द० (६·१३१)। (२) मन्त्रशक्ति= मन्त्रणा, जो राजनीति का अरङ्ग है।

Page 242

द्वितीय: प्रकाघ: १६३

अथ परिवर्तक :- (म७) प्रारब्घोत्थानकार्यान्यकरणात्परिवर्तकः ।५५।। प्रस्तुतस्योद्योगकार्यस्य परित्यागेन कार्यान्तरकरणं परिवर्तकः। यथा वीरचरिते- 'हेरम्बदन्तमुसलोल्लिखितैकभित्ति वक्षोविशाखविशिखव्रणलाञ्छनं मे। रोमाञ्चकञ्चुकितमद्ध तवीरलाभाद यत्सत्यमद्य परिरब्धुमिवेच्छति त्वाम् ॥१८२॥ राम :- भगवन्, परिरम्भणमिति प्रस्तुतप्रतीपमेतत् ।' इत्यादि। (७ क) एभिरङ्गइचतुर्घेयं सात्वती सात्त्वतीमुपसंहरन्नारभटीलक्षणमाह- (८८) आरभटी पुनः । मायेन्द्रजालसंग्रामक्रोधोद्भ्रान्तादिचेष्टितैः ।।५६।। (घ) परिवर्तक- आरम्भ किये गये उत्थान (पौरुष, पराक्रम) कार्य से भिन्न कार्य करने लगना परिवर्तक (नामक सात्त्वती वृत्ति का शरङ्ग) है ॥५५।। प्रस्तुत जो उद्योग (उत्थान, पौरुष) का कार्य है उसका त्याग करके अन्य कार्य करने लगना परिवर्तक (Change of action) कहलाता है, जैसे वीरचरित (२'३८) में (राम के प्रति परशुराम की उवित)-'सच कहता हूँ, जिसका एक भाग गणेश के दाँत रूपी मूसल से खरोंचा गया है, जो कार्तिकेय के बाण के व्रश से चिह्नित है, वह मेरा हृदय आज (तुम जँसे) अद्भुत वीर के मिल जाने के कारण रोमाञ्च रूपी कञ्चुक से युक्त होकर तुमसे गले मिलना चाहता है। राम-गले मिलना, यह तो प्रस्तुत के विपरीत है। प्टिपरी-(१) ना० शा० (२०.४६), सा० द० (६·१३२)। (२) प्रारब्धो- त्थान०-प्रारब्धात्=समारब्धात्, उत्यानकार्यात्=पौरुषकार्यात् युद्धादेः, यदन्यस्य -तद्विरुद्धस्य प्रीत्यानुकूल्यादेः करणं सम्पादन तत् परिवर्तकः, परिवर्तनमिति यावत् (प्रभा): whose development is already begun (Haas) । दशरूपक, अभि० भा० तथा सा० द० के उदाहरणों के आधार पर प्रभा टीका का अर्थ ही उपयुक्त प्रतीत होता है, अर्थात् पौरुष कार्य को छोड़कर अन्य कार्य करना ही परिवर्तक है। ऊपर के उदा० में परशुराम युद्ध को छोड़कर राम से गले मिलना चाहता है, यही परिवर्तक है। इन अङ्गों सहित यह चार प्रकार की सातत्वती वृत्ति कही गई है। सात्त्वती का उपसंहार करके आरभटी वृत्ति का लक्षणा करते हैं- ४. आरभटी वृत्ति- माया, इन्द्रजाल, संग्राम, क्रोध, उद्भ्रान्ति आदि चेष्टाओं के द्वारा आरभटी वृत्ति होती है ॥५६।।

Page 243

१६४ दशरूपकम्

संक्षिप्तिका स्यात्सफेटो वस्तूत्थानावपातने। माया=मन्त्रवलेनाविद्य मानवस्तुप्रकाशनम्, तन्त्रबलादिन्द्रजालम्। तत्र - (८६) संक्षिसवस्तुरचना संच्षिप्ति: शिल्पयोगतः ।।५७।। पूर्वनेतृनिवृत्त्याऽन्ये नेत्रन्तरपरिग्रहः। मृद्वंशदलचर्मादिद्रव्ययोगेन वस्तूत्थापनं संक्षिपतिः, यथोदयनचरिते किलिञ्ज- हस्तियोगः । पूर्वनायकावस्थानिवृत्त्यावस्थान्तरपरिग्रहमन्ये संक्षित्तिकां मन्यन्ते। यथा वालिनिवृत्त्या सुग्रीवः, यथा च परशुरामस्यौद्धत्यनिवृत्या शान्तत्वापादनम् 'पुण्या ब्राह्मणजाति :- ' इत्यादिना। इसमें - (क) संच्तिप्तिका, (ख) संफेट, (ग) वस्तूत्थान और (घ) अवपातन (ये चार अङ्ग) होते हैं। माया का अर्थ है-मन्त्र की शक्ति से अविद्यमान वस्तु को दिखला देना; किन्तु तन्त्र की शक्ति से अविद्यमान वस्तु को दिखला देना इन्द्रजाल है। टिप्पखी-(१) ना० शा० (२०.६४-६५), ना० द० (३.१६२), सा० द० (६·१३२-१३४)। (२) ना० शा० के अनुसार जहाँ प्रचुरता से आरभट के गुण हों, जो बहुत प्रकार के कपट तथा वर्चना से युक्त हो, दभ्भ तेथा अनृत वचन से युक्त हो, वह आरभटी वृत्ति होती है। आर अर्थात् अंकुश (प्रतोद) के समान उद्धत योद्धा ही आरभट कहलाते हैं (आरेण प्रतोदकेन तुल्या भटा उद्धताः पुरुषा आरभटा: ना०द०)। यह आरभटी वृत्ति सब प्रकार (शङ्गिक, वाचिक, मानसिक) के व्यापारों से युक्त होती है तथा इसमें सभी प्रकार के (आङ्गिक, वाचिक, सात्त्विक और शहार्य) अभिनय भी होते हैं (ना० द०)। इसके चारों अ्ङ्गों का आ्रागे निरूपण किया जा रहा है- (क) संक्षिप्तिका- उनमें - शिल्प के द्वारा संच्षिप्त रूप में किसी वस्तु की रचना कर देना संच्षिप्ति कहलाती है। अन्य आचार्य कहते हैं कि पूर्व नायक के हट जाने पर दूसरे नायक का आ जाना ही संच्षिप्ति है। मिट्टी, बाँस, पत्त, चमड़ा आदि पदार्थों को जोड़कर किसी वस्तु को उत्पन्न कर देना संक्षिप्ति है; जैसे उवयन के चरित में चटाई (किलिञ्ज) के बने हाथी का प्रयोग है। अन्य आचार्य मानते हैं कि नायक की प्रथम अवस्था के हट जाने पर दूसरी अवस्था का आ जाना ही संक्षिप्ति है; जैसे बालि के हट जाने पर सुग्रीव नायक होता है और जैसे परशुराम के उद्धत भाव की निवृत्ति हो जाने पर 'ब्राह्मण जाति पवित्र है (वीरचरित ४.२२) इत्यादि कथन के द्वारा (परशुराम में) शान्त-भाव की उत्पत्ति दिखलाई गई है।

Page 244

द्वितीय: प्रकाशा १६५

अथ संफेट :- (६०) संफेटस्तु समाघातः क्रद्धसंरब्धयोद्वयोः ॥५८॥ यथा माधवाऽघोरघण्टयोर्मालितीमाधवे। इन्द्रजिल्लक्ष्मएायोश्च रामायणप्रति- बद्धवस्तुषु । अथ वस्तूत्थापनम्- (६१) मायाद्युत्थापितं वस्तु वस्तूत्थापनमिष्यते। यथोदात्तराघवे- जीयन्ते जयिनोऽपि सान्द्रतिमिरव्रातैवियद्व्यापिभि- भस्विन्तः सकला रवेरपि रुच: कस्मादकस्मादमी ।

मुञ्चत्याननकन्दरानलमितस्तीव्राऽडरवा: फेरवाः ।१८३।। इत्यादि। टिप्पणी-(१) द्र०, ना० शा० (२०६८), सा० द० (६.१३५-१३६)। (२) नेत्रन्तरपरिग्रह :- धनञ्जय के अनुसार एक नायक के स्थान पर दूसरे नायक का आ जाना। इसका उदाहरण है बालि के स्थान पर सुग्रीव का आगमन। धनिक की व्याख्या के अनुसार नायक की एक अवस्था के हट जाने पर दूसरी अवस्था का आ जाना। इसका उदाहरण है-परशुराम की उद्धतावस्था के स्थान पर शान्ता- वस्था का आ जाना। इस अर्थ में धनञ्जय के मत का भी समावेश हो जाता है।

क्रुद्ध तथा उत्तजित दो व्यक्तियों का एक दूसरे पर प्रहार करना (ख) संफेट-

(समाघात) संफेट (नामक आरभटी वृत्ति का अङ्ग) है ॥।५८।। जैसे मालतीमाधव में माधव तथा अघोरघण्ट का और रामायण में व्शित कथा-प्रसङ्गों में मेघनाव और लक्ष्मणा का एक दूसरे पर प्रहार है। टिप्परी-(१) द्र०, ना०शा० (२०.७१), सा० द० (६.१३४)। (२) समाघातः = परस्परमधिक्षेपः; रामायणप्रतिबद्धवस्तुषु = रामायणोत्तचरित्रषु (प्रभा) । (ग) वस्तूत्थापनम् - माया आदि के द्वारा वस्तु को उपस्थित कर देना वस्तृत्थापन (नामक आरभटी वृत्ति का अङ्ग) है। जैसे उदात्तराघव नाटक में '(अन्धकार को) जीतने वाली, दीप्तियुक्त सूर्य की किरसों भी अकस्मात आकाश में व्याप्त होने वाले घने अन्धकार के समूह के द्वारा न जाने कैले जीत ली गई हैं ? और क्यों ? भयानक रुण्ड-मुण्डों के छिद्रों से निकले रुधिर के द्वारा फूले उदर वाले सियार जोर से चिल्लाते हुए अपने मुखरूपी कन्दरा से इधर आग छोड़ रहे हैं'। इत्यादि। टिप्परी-द्र०, ना० शा० (२०.७०), सा० द० (६'१३४)।

Page 245

१६६ दशरूपकम्

अथाऽवपात :- (६२) अवपातस्तु निष्क्रामप्रवेशत्रासविद्रवैः॥५६॥ यथा रत्नावल्याम्- कण्ठे कृत्वाऽवशेषं कनकमयमधः शृङ्गलादाम कर्षन् कान्त्वा द्वाराणि हेलाचलचरणवलत्किड्िणीचक्रवालः । दत्तातङ्को गजानामनुसृतसरशिः सम्भ्रमादश्वपाल: प्रभ्रष्टोऽयं प्लवङ्ग: प्रविशति नृपतेर्मन्दिरं मन्दुरातः ॥१८४॥ नष्टं वर्षवरैर्मनुष्यगणनाभावादकृत्वा त्रपा- मन्तः कञ्चुकिकञ्चुकस्य विशति त्रासादयं वामनः । पर्यन्ताश्रयिभिनिजस्य सदशं नाम्न: किरातैः कृतं कुब्जा नीचतयैव यान्ति शनर्करात्मेक्षणाशङ्किनः ।१८५॥। यथा च प्रियदर्शिकायाम्* प्रथमेऽङ्क विन्ध्यकेत्ववस्कन्दे। (घ) अवपात -- (पात्रों के) निष्क्रमण, प्रवेश, त्रास तथा (शग लगने आदि के द्वारा की गई) भगदड़ (=विद्रव) आदि के (वर्शन) द्वारा अवपात (नामक आरभटी वृत्ति का अङ्ग) होता है ॥५६॥ जसे रत्नावली (२·२) में (अश्वशाला से भागे हुए वानर को देखकर अन्तः पुर के लोगों की भगदड़ का वर्शगन है) 'सुवर्ण की जंजीर की माला को गले में डालकर बची हुई को नीचे (पृथिवी पर) घसीटता हुआ, द्वारों को लांघकर उछल- कूद (हेला) से चञ्चल चरणों में बजते हुए घुघरु समूह (किङ्धिी-चक्रवाल) वाला, हाथियों को भयभीत करने वाला, अश्व-रक्षकों के द्वारा घबराहट के साथ पीछा किया जाता हुआ यह वानर अश्वशाला से भागकर राजा के भवन में प्रवेश कर रहा है। (रत्ना० २.३, भागते वानर को देखकर) हिजड़े (वर्षवर) तो मनुष्यों में गिनती न होने के कारण लज्जा न करके छिप गये, यह बौना डर से कञचुकी के कञ्चुक में घुस रहा है, कोनों (पर्यन्त) का आश्रय लेने वाले किरातों ने अपने नाम के अनुकूल ही किया (किरं पर्यन्तभूमिस् अ्तन्ति इति किराताः), और कुबड़े लोग अपने देख लिये जाने की आशङ्का से और अधिक झुककर धीरे-धीरे जा रहे है।' औौर, जैसे प्रियदशिका के प्रथम अ्ङ्क में विन्ध्यकेतु का आक्रमण होने पर (भगदड़ का वर्न है)। टिप्पणी-द्र०, ना० शा० (२०.६६), सा० द० (६.१३६-१३७)। * 'प्रियदर्श नायाभ्' इत्यापि पाठः ।

Page 246

द्वितीय: प्रकाश: १६७

उपसंहरति-

(६४) - नार्थवृत्तिरतः परा। चतुर्थी भारती सापि वाच्या नाटकलक्षये ॥६०।। कैशिकीं सात्वतीं चार्थवृत्तिमारभटीमिति। पठन्तः पञचमीं वृत्तिमौद्धटाः प्रतिजानते ॥६१॥ सा तु लक्ष्ये क्वचिदपि न दृश्यते, न चोपपद्यते रसेषु, हास्यादीनां भारत्यात्म- कत्वात्, नीरसस्य च काव्यार्थस्याभावात्। तिस्र एवैता अर्थवृत्तयः। भारती तु शब्द- वृत्तिरामुखाङ्गत्वात्तत्रैव वाच्या। (आरभटी वृत्ति का) उपसंहार करते हैं- इन अङ्गों के द्वारा यह (आरभटी वृत्ति) चार प्रकार की होती है। उद्भट के अनुयायियों के मत का निराकरर इन (कैशिकी, सात्त्वती तथा आरभटी) से भिन्न कोई अर्थवृन्ति (नाम की वृत्ति) नहीं है। चतुर्थी भारती वृत्ति है, उसका नाटक के लक्षण में वर्णन किया जायेगा ॥६०। किन्तु उद्भट के अनुयायी (भारती वृत्ति के साथ) कैशिकी, सात्वती अर्थवृत्ति तथा आरभटी इनका निर्देश करते हुए पाँचवी (अर्थवृत्ति नामक) वृत्ति को स्वीकार करते हैं ।।६१।। वह (पञ्चमी तृत्ति) तो लक्ष्य ग्रन्थों (रूपकों) में कहीं भी दिखलाई नहीं बेती और वह रसों में बन भी नहीं सकती; क्योंकि सभी हास्य आदि रसों का स्वरूप भारती आदि (चार वृत्तियों) में ही समा जाता है। (यदि पूर्वपक्षी कहें कि यह अरथवृत्ति रसों का अनुसरण न करती हुई भी पञ्चमी वृत्ति है, तो इस पर कहते हैं-) और, कोई नीरस वस्तु काव्यार्थ नहीं हो सकती। इसलिये थे तीनों (कैशिकी, सात्त्वती और आरभटी) ही अर्थवृत्तियाँ हैं (इनसे भिन्न अर्थवृत्ति नाम की कोई वृत्ति नहीं)। भारती नामक वृत्ति तो शब्द-वृत्ति है, वह आ्रमुख का अ्रङ्ग है इसलिये उसका वहीं (आसुख के पकरण में) वर्सन करपा है। टिप्पणी- (१) उपर्युक्त कारिकाओं तथा धनिक की वृत्ति का व्याख्या- कारों ने विविध प्रकार से अर्थ किया है। इस विषय में विद्वज्जन स्वयं निर्णाय कर सकते हैं। (२) उद्भट के अनुयायियों (?) ने पाँच वृत्तियाँ मानी हैं-भारती, कैशिकी, सात्त्वती, आरभटी और अर्थवृत्ति, जैसा कि भावप्रकाशन (पृ० १२) में कहा गया है- भारती सात्त्वती चैव कैशिक्यारभटीति च। ओनभटा: पञ्चमीमर्थबति च प्रतिजानते।।

Page 247

१६८ दशरूपक

9010909109 वृत्तिनियममाह- (ex) शृङ्गारे कैशिकी, वीरे सात्त्वत्यारभटी पुनः।(03) रसे रौद्रे च बीभत्से, वृत्तिः सर्वत्र भारती ॥६२।। इस पर धनञ्जय एवं धनिक का कथन है कि चार ही वृत्तियां हैं। अरथ- वृत्ति नाम की कोई पृथक् अर्थवृत्ति नहीं अपि तु कैशिकी, सात्त्वती और आरभटी ये तीनों ही अर्थवृत्तियां हैं तथा चौथी वृत्ति भारती है जो शब्दवृत्ति है। अपनी स्थापना की सिद्धि के लिये धनिक ने दो युक्तियां दी हैं-(i) कैशिकी आदि से भिन्न अर्थवृत्ति नामक कोई वृत्ति रूपकों में दृष्टिगोचर नहीं होती, (ii) सभी रूपक रसाश्रित होते हैं। जैसा कि अभी आगे (२.६२) बतलाया जा रहा है सभी रसों का वर्णन भारती आदि चारों वृत्तियों के अन्तर्गत ही आ जाता है फिर वह पाँचवी वृत्ति कहाँ रहेगी ? यदि कहो कि वह नीरस रूपक में रहेगी तो ठीक नहीं; क्योंकि नीरस वस्तु रूपक या काव्य में हो ही नहीं सकती। (३) भारत्यात्मकत्वात्-इसके स्थान पर 'भारत्याद्यात्मकत्वात् पाठ शुद्ध प्रतीत होता है, तभी यह सद् हेतु बन सकता है। भाव यह है कि काव्य के जितने रस हैं उनके क्षेत्र में इन चारों में से कोई न कोई वृत्ति अवश्य रहती है फिर ऐसा कोई स्थल नहीं शेष रहता जिसमें अरथवृत्ति नाम की अन्य वृत्ति मानी जा सके। (४) रसाएवसुधाकर (१.२८६) में भी कैशिकी आदि को ही अर्थवृत्ति कहा गया हैं- आसां तु मध्ये वृत्तीनां शब्दवृत्तिस्तु भारती। तिस्रोऽर्थवृत्तयश्शेषा: तच्चतस्रो हि वृत्तयः ॥ रस तथा वृत्तियों का परस्पर सम्बन्ध वृत्तियों के प्रयोग की व्यवस्था बतलाते हैं- शृङ्गार रस में कैशिकी, वीर में सात्त्वती और रौद्र तथा बीभत्स रस में आरभटी का प्रयोग होता है। भारती वृत्ति का सभी इसों में प्रयोग होता है (क्योंकि यह शब्दवृत्ति है)। टिप्पणी-(१) द्र०, ना० शा० (२०.७२-७४), भा० प्र० (पृ० १२), ना० द० (३.१५५-१६२), प्रता० (२.१७-१८), सा० द० (६'१२२)। (२) यहाँ श्रृङ्गार से हास्य का, वीर से अद्भुत का, रौद्र से करुण का तथा बीभत्स से भयानक का भी ग्रहण होता है, क्योंकि जैसा आगे (४.४३-४५) कहा जायेगा हास्य आदि को क्रमशः शृङ्गार आदि से उत्पन्न ही कहा गया है। नाट्यशास्त्र (२०'७३-७४) में स्पष्टतः शृङ्गार आर्पदि नव रसों के साथ कैशिकी आदि चारों वृत्तियों का सम्बन्ध दिखलाया गया है-

Page 248

द्वितीय: प्रकाशः रहह

देशभेदभिन्नवेषादिस्तु नायकादिव्यापार: प्रवृत्तिरित्याह- (६६) देशभाषाक्रियावेषलक्षणः स्युः प्रवृत्तयः। लोकादेवावगम्यैता यथौचित्यं प्रयोजयेत्॥६३॥ हास्यशृङ्गारबहुला कैशिकी परिचक्षिता। सात्त्वती चापि विज्ञेया वीराद्भुतशमाश्रया ।। रौद्रे भयानके चैव विज्ञेयारभटी बुधैः । बीभत्से करुणे चैव भारती संप्रकीतिता ।। किन्तु इस प्रकार का सम्बन्ध भी प्रामाशिक नहीं प्रतीत होता; क्योंकि (i) ना० शा० का उपरयुक्त पाठ विवाद ग्रस्त है, (ii) उत्तरकालीन आचार्यों ने प्रायः इस प्रकार के सम्बन्ध को स्वीकार नहीं किया, (iii) ना० द० (३१५६ वृत्ति) में 'बीभत्से करुरो चैव भारती' इस मत का निराकरण किया गया है। फलतः दश० तथा सा० द० में भारती वृत्ति को सर्वरसविषयक ही कहा गया है। किन्तु इन दोनों का भी एतद्विषयक विवेचन अधूरा ही है। अतः यह निर्धारित करना कठिन ही है कि नवों रसों में से किन-किन के साथ किस वृत्ति का सम्बन्ध है। हां, ना० शा० के पाठ-भेदों में से यदि निम्न पाठ ले लिये जायें तो एक स्पष्ट रूप-रेखा अवश्य तैयार हो सकती है- हास्यशृङ्गारकरुणवृत्तिः स्यात कैशिकी रसैः । सात्त्वती चापि विज्ञेया वीरादुभुतशमाश्रया ।। भयानके च बीभत्से रौद्रे चारभटी भवेत् । सर्वेषु रसभावेषु भारती संप्रकीर्तिता ।। नाटय-प्रवृत्तियाँ देश के भेद से नायकों का जो भिन्न प्रकार का वेष आदि कार्य (व्यापार) होता है, वह प्रवृत्ति कहलाती है, यह बतलाते है :- देश के अनुसार (पात्रों की) भाषा, क्रिया और वेष आदि का होना ही प्रवृत्तियाँ कहलाती हैं। इन्हें लोक से जानकर इनका यथोचित प्रयोग करना चाहिये ।६३। टिप्पखी-यहाँ 'वृत्ति' के समान 'प्रवृत्ति' भी एक पारिभाषिक शब्द है। जैसा कि ऊपर कहा गया है नाटक आदि में नायक आदि का कायिक, वाचिक और मानसिक व्यापार ही वृत्ति कहलाता है। प्रवृत्ति भी नायक आदि का व्यापार ही है किन्तु यह व्यापार भिन्न प्रकार का है। देश के भेद से जो नायक आदि के भिन्न- भिन्न प्रकार के भाषा, वेष और आधार (क्रिया) होते हैं वे ही नाटक शदि में प्रवृत्ति कहलाते हैं। उदाहरखार्थ वाणी से परिहास करना एक वाचिक व्यापार है

Page 249

२०0 दशरूपकस

तत्र पाठ्य प्रति विशेष :- (६७) पाठ्य तु संस्कृत नणामनीचानां कृतात्मनाम्। लिङ्गिनीनां महादेव्या मन्त्रिजावेश्ययो: क्वचित् ॥ ६४॥ क्वचिदिति देवीप्रभृतीनां सम्बन्धः । वह कैशिकी (वचोहास्य नर्म) वृत्ति के अन्तर्गत है, किन्तु कौन पात्र किस भाषा में परिहास करे यह विचार करने पर देश आदि के भेद से जो भाषा-भेद होगा वह प्रवृति के अन्तर्गत आयेगा। एक विशेष प्रदेश के रहने वाले एक वर्ग के सभी पात्र एक सी भाषा, वेष और आचार का प्रकटन किया करते हैं अतः प्रवृत्ति को वर्गगत व्यापार भी कहा जा सकता है। नाट्य शास्त्र (१३.३८ गद्य) में प्रवृत्ति का स्वरूप इस प्रकार दिखलाया है-'प्रवृत्तिरिति कस्मात् ? उच्यते, पृथिव्यां नानादेशवेष- भाषाचारवार्ताः ख्यापयतीति।' अर्थात् प्रवृत्ति वह है जो पृथिवी के भिन्न-भिन्न प्रदेशों के वेष, भाषा और आचार तथा कृषि आदि व्यवसायों (वातो) को प्रकट करती है। इस भिन्न-भिन्न भाषा आदि का ज्ञान कवि लोक से प्राप्त करता है और उसी के अनुसार नाटक आदि में इनका निरूपसा करता है। यहाँ धनञ्जय ने पात्रों के भाषा-प्रयोग और सम्बोधन-प्रकार को प्रवृत्ति के अन्तर्गत रक्खा है। नाटथ- शास्त्र के विस्तृत विषय का यहाँ अत्यन्त संक्षेप में वर्णन किया गया है। भा० प्र० (पृ० १२) में दश० का प्रवृत्ति लक्षण ही दिया गया है। ना० द० (४.२६६-२६८) तथा सा० द० (६.१४४-१४६) में भाषा-प्रयोग एवं सम्बोधन-प्रकार का विस्तार- पूर्वक विवेचन करते हुए भी इन्हें 'प्रवृत्ति' नाम से नहीं कहा गया। पाव्य (भाषा)-सम्बन्धी प्रवृत्ति यहाँ भाषा के विषय में यह विशेष बात है- नीच-भिन्न अर्थात् मध्यस और उत्तम शिष्ट (कृतात्मनाम्) पुरुषों की भाषा संस्कृत होती है, (सन्यास आदि का) चिह्न धारण करने वाली तपस्विनियों की भाषा संस्कृत होती है और कहीं-कहीं महारानी, मन्त्री- पुत्री तथा वेश्या की भी भाषा संस्कृत होती है ।६४।। 'कचिद' (कहीं) इस शब्द का 'देवी' (महादेवी) शब्द से लेकर आगे के साथ सम्बन्ध है। टिप्पणी- (१ ना० शा० (१७.३१-६४), ना० द० (४.२८६), सा०द० (६. १५८, १६७, १६६)। (२) यहाँ 'कृतात्मनाम' शब्द के अर्थ की तीन सम्भाव- नाएँ हैं-(i) यह एक स्वतन्त्र पद है इसका अभिप्राय है-कृतात्मा (=devotee, Hass) जनों की भाषा संस्कृत होती है। (ii) यहाँ 'कृतात्मनाम्' लिङ्गिनीनाम्' का विशेषण है जो आत्म-संयम करने वाली या व्रतधारण करने वाली सन्यासिनी आदि हैं उनकी भाषा संस्कृत होती है किन्तु जो कपटवेष धारण करने वाली (व्याजलिङ्गिनी) हैं उनकी भाषा प्राकृत ही होती है, मि० ना० शा० (१७.३६,३८) तथा ना० द० (अव्याजलिङ्गिनाम् (४.२८६)। (iii) यह 'नृणाम' का विशेषण

Page 250

द्वितीय: प्रकाश: २०२

(६८) स्त्रीएां तु प्राकृतं प्रायः सौरसेन्यधमेषु* च। प्रकृतेरागतं प्राकृतम् । प्रकृतिः संस्कृतं त्वं तत्समं देशीत्यनेकप्रकारम्। सौरसेनी मागधी च स्वशास्त्रनियते। (६६) पिशाचात्यन्तनीचादौ पैशाचं मागधं तथा ॥६५॥ यद्देशं नीचपात्रं यत्तद्देशं तस्य भाषितम्। कार्यतश्चोत्तमादीनां कार्यो भाषाव्यतिक्रमः ॥ ६६॥ है। भाव यह है कि नीच-भिन्न उन पुरुषों की भाषा संस्कृत होती है जो कृतात्मा (आत्मसंयमी, शिष्ट, सुशिक्षित या स्वस्थ) हैं। इसीलिये मत्त, ग्रहग्रस्त, दारिद्रय या ऐश्वर्य से मोहित या अशिक्षित मध्यम एवं उत्तम पुरुषों की भाषा भी संस्कृत नहीं होती, अपितु प्राकृत होती है। वस्तुतः देहलीदीपक न्याय से 'कृतात्मनाम्' को नृशाम' और 'लिङ्गिनीनाम्' दोनों का विशेषण मानना उचित प्रतीत होता है। स्त्रियों की भाषा तो प्रायः प्राकृत होतो है और अधम पुरुष पात्रों की सौरसेनी भाषा होती है। प्रकृति से आमे वाली भाषा प्राकृत है। प्रकृति संस्कृत है। उससे उत्पन्न (तद्भव), उसके समान (तत्सम) तथा देशी इत्यादि अनेक प्रकार की (प्राकृत) है सौरसेनी और मागधी (दोनों) अपने-अपने शास्त्र (व्याकरण आदि) के द्वारा नियत हैं। टिप्परी-(१) ना० शा० (१७.३१६४), ना० द० (४.२६०, २६१), सा० द० (६.१५६, १६४)। (२) नाट्य शास्त्र (१४'५) के अनुसार पाठ्य दो प्रकार का है-संस्कृत तथा प्राकृत। प्राकृत के तीन प्रकार हैं-समान शब्द, विभ्रष्ट और देशीगतम् (१७.३)। इनमें से देशी को देशभाषा भी कहा गया है। ये देश- भाषाएं सात हैं- मागधी, अवन्तिजा, प्राच्या, शौरसेनी, अरधमागधी, बाह लीका दाक्षिणात्या। इन के अतिरिक्त शकारी आदि उपभाषाएं भी हैं। आगे चलकर इन देशी भाषाओं को अपभ्रश नाम दिया गया है (मि०, ना० द० ४.२६२)। इस प्रकार ऐसा प्रतोत होता है कि यहां जो स्त्रियों की भाषा प्राकृत कही गई है, उसका अर्थ है-तद्भव प्राकृत। कहीं कहीं स्त्रियों की भाषा शौरसेनी भी कही गई है (ना० शा० ७.५२ तथा सा० द० ६.१५६)।(३) अधम पात्रों की भाषा शौरसेनी या सौरसेनी है। शौरसेनी भाषा कौन सी है ? ? इसके उत्तर में धनिक ने बतलाया है कि शौरसेनी और मागधी का स्वरूप उनके व्याकरण आदि शास्त्रों द्वारा निश्चित ही है। पिशाच और अत्यन्त नीच आदि पात्रों की भाषा क्रमशः पैशाच (प्राकृत) तथा मागध (प्राकृत) होती है ।।६५।। जो नीच पात्र जिस देश का होता है उसी देश की उसकी भाषा होती है। और, कभी-कभी कार्यवश उत्तम आदि पात्रों में भी भाषा- परिवर्तन करना होता है॥ ६६ ॥ *'बूरसनी' 'शौरसेनी' इत्यपि पाठौ।

Page 251

२०२ दशरूपकम्

स्पष्टार्थमेतत्।

(१००) भगवन्तो वरैर्वाच्या विद्वद्देवर्षिलिङ्गिनः । विप्रामात्याम्रजाश्च्ार्या नटीसूत्रभृतौ मिथः ॥६७॥ आर्याविति सम्बन्धः । (१०१) रथी सूतेन चायुष्मान्पूज्येः शिष्यात्मजानुजाः । वत्सेति तातः पूज्योडप सुगृहीताभिवस्तु तैः ॥ ६८॥ अपिशब्दात्पूज्येन शिष्यात्मजानुजास्तातेति वाच्याः, सोपि तैस्तातेति सुगूही- तनामा चेति।

इसका शर्थ स्पष्ट ही है। टिप्पणी-(१) ना० शा० (१७.३१-६४), ना० द० (४.२६१) सा० द० (६.१५६-१६४) (२) पिशाचा०-भाव यह है कि पिशाचों की भाषा पैशाची होती है, अत्यन्त नीच पात्रों की मागधी। किन्तु इनकी भाषा मागधी तभी होती है जब इनके देश का निश्चय नहीं होता। यदि किसी अत्यन्त नीच पात्र के देश का ज्ञान होता है तो उसकी बोली उसी देश की भाषा होती है-(यद्दशम् इत्यादि)। कार्यत :- प्रयोजन या परिस्थिति के अनुसार इस भाषा-विभाग में परिवर्तन भी हो जाते हैं जैसा कि ना० शा०, ना० द० और सा० द० में दिखलाया गया है। आमन्त्रण (सम्बोधन) सम्बन्धी प्रवृत्ति सम्बोध्य और सम्बोधन कर्ता के श्ररचित्य के अनुसार सम्बोधन शब्द (आमन्त्रण) बतलाते हैं- उत्तम पात्र (वरैः) विद्वान्, देव, ऋषि, सन्यासी आदि को 'भगवन्' कहकर सम्बोधित करें और ब्राह्मणा, अमात्य तथा बड़े भाई को आर्य कह कर। नटी और सूत्रधार भी एक दूसरे को आर्य शब्द से सम्बोधित करें ॥ ६७ । नटी और सूत्रधार के साथ भी 'आर्य' शब्द का सम्बन्ध है, अर्थात् वे एक दूसरे को भ्रायं कहें। सारथि (सूत) रथ के स्वामी को 'आयुष्मान्' कहकर सम्बोधित करे और गुरुजन शिष्य, पुत्र तथा छोटे भाई को 'वत्स' कहकर। शिष्य पुत्र तथा छोटा भाई पूज्य जनों को 'तात' या 'सुगृहीतनामा' शब्दों से सम्बो- घित करे॥ ६८ ॥ 'पूज्योऽपि' में 'अपि' (भी) शब्द से तात्पर्य यह है कि गुरुजन (वूज्य) भी शिष्य, पुत्र सथा छोटे भाई को 'तात' कहकर पुकारें और वे (तेः, शिष्य आवि) भी उस (पूज्य) को 'तात' या 'सुगृहीतनामा' कहफर सम्बोधित करें।

Page 252

द्वितीय: प्रकाश: २०३

(१०२) भावोऽनुगेन सूत्री च मार्षेत्येतेन सोऽपि च। सूत्रधार: पारिपारश्वकेन भाव इति वक्तव्यः । स च सूत्रिणा मार्ष इति। (१०३) देवः स्वामीति नृपतिभ त्यैर्भट्टेति चावमैः ॥६६॥ आमन्त्रणीया: पतिवज्ज्येष्ठमध्याधमैः स्त्रियः। विद्वद्द वादिस्त्रियो भर्तृ वदेव देवरादिभिर्वाच्याः । तत्र स्त्रियं प्रति विशेष :- (१०४) समा हलेति, प्रेष्या च हञ्जे, वेश्याऽज्जुका तथा ॥७०॥। कुट्टिन्यम्वेत्यनुगतैः पूज्या वा जरती जनैः । यह क विदूषकेण भवती राज्ी चेटीति शब्दते ।७१।। पूज्या जरती अ्म्बेति। स्पष्टमन्यत्। पारिपाश्वक (= अनुग) सूत्रधार (=सूत्री) को 'भाव' शब्द से सम्बोधित करे और उस (पारिपाश्विक) को यह (सूत्रधार) 'मार्ष शब्द से। अ अर्थात् पारिपाश्विक सूत्रधार को 'भाव' कहे और सूत्रधार पारिपार्श्विक को 'मार्ष'। भृत्य (सेवक) राजा को 'देव' या 'स्वामी' शब्द से तथा अरधम पात्र 'भट्ट' शब्द से सम्बोधित करें। ज्येष्ठ, मध्यम और अ्धम पात्र स्त्रियों को भी उनके पति के समान शब्दों से सम्बोधित करें ॥६६॥ अर्थात् विद्वान् और देव आदि की स्त्रियों को देवर आदि उसी प्रकार सम्बोधित करें जिस प्रकार उनके पति को करते हैं। (जैसे उत्तम जन विद्वान् आदि की पत्नी को 'भगवती' शब्द से तथा विप्र आदि की पत्नी को 'आर्या' शब्द से सम्बोधित करें) यहाँ स्त्री के (सम्बोधन के) विषय में यह विशेष बात है :- बराबर की स्त्री परस्पर 'हला', सेविका को 'हन्जे', वेश्या को 'अज्जुका' शब्द से सम्घोघित करें। अनुचर जन कुट्टिनी को 'अम्ब' शब्द से तथा सभी लोग पूज्य वृद्धा स्त्री को 'अरम्ब' शब्द से पुकारें। और, विदूषक रानी तथा सेविका (चेटी) को 'भवती' शब्द से पुकारे ॥७०॥७१॥ सभी जन पूज्य वृद्धा को 'अ्रम्ब' शब्द से पुकारें। श्रन्य स्पष्ट ही है। टिप्पणी- द्र० ना० शा० (१७.६५-६४), ना० द० (४.२६४-२६७), सा० द० (६.१४४-१५७)। इन सभी में सम्बोधन-प्रकार का विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है। साथ ही काव्य में कवियों को किस प्रकार के नाम रखने चाहिये इसका भी वणंन किया गया है। * 'कुट्टिम्यनुगतेः पूज्या अ्रम्बेतिजरतीजनः' इति पाठान्तरम् ।

Page 253

२०४ दशरूपैकम्

(१०५) चेष्टागुणोदाहतिसत्त्वभावा- नशेषतो नेतृदशाविभिन्नान् । को वक्तुमीशो भरतो न यो वा यो वान देवः शशिखएडमौलि: ॥७२। । इति धनञ्जयकृतदशरूपकस्य द्वितीयः प्रकाशः समास्तः ॥ दिङ्मात्र दशितमित्यर्थः । चेष्टा लीलाद्याः, गुणा विनयाद्याः, उदाहृतयः संस्कृतप्राकृताद्या उत्तयः, सत्वं निर्विकारात्मक मनः, भावः सत्वस्य प्रथमो विकार- स्तेन हावादयो ह्य पलक्षिताः । इति श्रीविष्णुसूनोर्धनिकस्य कृतौ दशरूपावलोके नेतृप्रकाशो नाम द्वितीय: प्रकाशः समाप्तः । द्वितीय प्रकाश का उपसहार करते हुए कहते हैं :- भरत मुनि या चन्द्रकला को मस्तक पर धारण करने वाले शिव के अतिरिक्त कौन ऐसा है जो नायक की अवस्था के अनुसार भिन्न-भिन्न प्रकार की चेष्टा, गुश, उदाहृति (उक्ति) सत्त्व और भाव आदि का पूर्ण रूप से वर्णन करने में समर्थ हो सकता है ? ॥ ७२॥ ।। इस प्रकार धनञ्जयकृत दशरूपक का द्वितीय प्रकाश समाप्त हुआ॥ भाव यह है कि यहाँ (उपयुक्त विषयों का) दिग्दर्शन मात्र कराया गया है। (कारिका में) चेष्टा-लीला इत्यादि (ऊपर २.३२ आदि)। गुए=विनय आदि (ऊपर २.१ तथा आगे), उवाहृति=संस्कृत और प्राकृत आदि की उक्तियाँ (ऊपर २.६४ आदि), सत्त्व=विकार रहित मन (ऊपर २.४ तथा २.३०,३३ आदि), भाव=सत्त्व का प्रथम विकार (२.३३), इस 'भाव' शब्द के द्वारा के हाव इत्यादि का भी ग्रहण होता है (२.३४ तथा आगे)। टिप्पणी-इस प्रकाश में नायक के स्वरूप-प्रकार-सहायक-सातत्विक गुण तथा नायिका के भेद-सहायिका-यौवन के अलद्कार और कैशिकी आदि वृत्तियों तथा प्रवृत्तियों इत्यादि का विवेचन किया गया है। इति द्वितीय: प्रकाश:

Page 254

त्रथ तृतीयः प्रकाशः

बहुवक्तव्यतया रसविचारातिलङ्गनेन वस्तुनेतृरसानां विभज्य नाटकादिपृपयोग: प्रतिपाद्यते- (१) प्रकृतित्वादथान्येषां भूयो रसपरित्रह्दात्। सम्पूर्णलक्ष्यात्वाच्च पूर्व नाटकमुच्यते ॥ १ ॥ उद्दिष्टधर्मकं हि नाटकमनुद्दिष्टधर्मारां प्रकरणादीनां प्रकृतिः। शेषं प्रतीतम्। रूपक के तीन भेदक तत्त्वों वस्तु, नेता (नायक) और रस में से वस्तु का प्रथम प्रकाश में तथा नायक का द्वितीय प्रकाश में विस्तारपूर्वक विवेचन किया जा चुका है। अब क्रम के अनुसार रस का विवेचन करना चाहिये। किन्तु रस का विवेचन अत्यन्त विस्तार से करना है इसलिये अभी उसे छोड़कर यहाँ (तृतीय प्रकाश में) यह दिखलाते है कि नाटक आदि जो रूपक हैं, उनमें वस्तु, नेता और रस का पृथक् पृथक् क्या उपयोग है। इसी सन्दर्भ में यहाँ रूपक के दस प्रकारों का भी वर्णन किया जा रहा है। (रस के विषय में) बहुत कुछ कहना है अतः रस-विचार (के क्रम) का उल्लङ्गन करके वस्तु, नायक और रस का नाटक आदि में पृथक पृथक् उपयोग बतलाया जा रहा है। इनमें भी- प्रथमतः नाटक के विषय में कहा जाता है; क्योंकि (i) नाटक अन्य सभी रूपकों की प्रकृति (मूल) है, (ii) इसमें सभी रसों का आ्श्रय लिया जाता है और (iii) इसमें रूपक के सम्पूर्ण लक्षण होते हैं ॥ १॥ क्योंकि नाटक के सभी धर्म बतलाये गये हैं और प्रकरण आदि के सभी धर्म (शब्दों द्वारा) नहीं कहे गये (अपि तु शेष नाटकवत्' कहकर छोड़ दिये गये) हैं) अतः नाटक प्रकरण आदि की प्रकृति है। (कारिका का) शेष भाग स्पष्ट है। टिप्परी-(१) नाटक-लक्षण के लिये द्र०, ना० शा० (१८.१०-४३)। भा० प्र० (पृ० २२१-२४१) में दश० की उपयुक्त कारिका को उद्धृत करके इसकी संक्षिप व्याख्या भी की गई है। ना० द० (१.४ तथा आगे) प्रता० (३.३५-३६), सा० द० (६.७-११) । (२) (i) प्रकृतित्वात्-प्रकृति=कारण, मूल रूप, आधार। भाव यह है कि सभी रूपकों में नाटक प्रतिनिधिभूत ([ype) रूपक है। इसके सभी धर्मों (=विशेषताओं) का कथन किया गया है, अन्य प्रकरण आदि की सभी विशेषताओों का कथन नहीं किया गया अपितु उनके कुछ धर्मों का कथन करके यह

Page 255

२०६ दशरूपकम्

तत्र- (२) पूर्वरङ्ग विधायादौ सूत्रधारे विनिर्गते। प्रविश्य तद्वदपरः काव्यमास्थापयेन्नटः ॥२॥ पूर्व रज्यतेऽस्मिन्निति पूर्वरङ्गो नाट्यशाला तत्स्थप्रथमप्रयोगव्युत्थापनादौ पूर्वरङ्गता तं विधाय विनिर्गते प्रथमं सूत्रवारे तद्वदेव वैष्णवस्थानकादिना प्रविश्यान्यो नटः काव्यार्थ स्थापयेत्। स च काव्यार्थस्थापनात् सूचनात्स्थापकः । कह दिया गया है कि इसके शेष धर्म नाटक के समान ही होते हैं (भा० प्र० पृ०२२१. २२२)। इसलिये नाटक को प्रकृति कहा जाता है और प्रकरण आदि को उसकी विकृति। वस्तुतः नाटक के लक्षणा में वस्तु, नेता और रस का यथावश्यक परिवर्तन करके ही प्रकरण आदि के लक्षण बन जाते हैं। इसी बात को धनिक ने 'उहिष्ट- धर्मकम्' इत्यादि द्वारा स्पष्ट किया है, 'उदिष्टा साकल्येनोक्ता धर्मा यस्य तद् उदिष्ट धर्मकम् (प्रभा) । (ii) भूयो रसपरिग्रहात्-नाट्य में जो आठ रस माने गये हैं वे सभी त्रङ्ग या अ्रङ्गी रस के रूप में नाटक में हुआ करते हैं (भा० प्र० पृ० २२१)। इसमें शृङ्गार या वीर प्रधान (अङ्गी) रस हो सकता है और शेष रस अङ्ग-रूप में (आगे ३.३३) । (iii) सम्पूरंलक्षसत्वात्-नाट्य के जो लक्षणा प्रथम तथा द्वितीय प्रकाश में कहे गये हैं और जो रस आदि के विषय में आगे कहा जायेगा। वे सभी लक्षण पूर्णतः नाटक में ही घटित होते हैं अन्य रूपक में नहीं। उदाहरणार्थ अरथ- प्रकृतियाँ, अवस्थाएं, सन्धि, सन्ध्यङ्ग, विष्कम्भक आदि अपरथोपक्षेपक पूर्णतया नाटक में ही उपलब्ध होते हैं (भा० प्र०, पृ० २२२)। फलतः ऊपर (१.८) कहे गये दस रूपकों-१. नाटक २: प्रकरण, ३. भाण, ४. प्रहसन, ५• डिम, ६. व्यायोग, ७० समवकार, ८, बीथी, ६, अङ्क, १० ईहामूग-में से यहाँ प्रथमतः नाटक के विषय में कहा जाता है। १. नाटक उस (नाटक) में आरम्भ में पूर्वरङ्ग का कार्य करके सूत्रधार चला जाता है। फिर उसी के जैसा दूसरा नट (=अभिनेता) प्रविष्ट होकर काव्य की स्थापना करता है॥ २ ॥ जिसमें पहिले सामाजिकों का अनुरञ्जन (आ्नन्द) किया जाता है वह पूर्व- रङ्ग कहलाता है, अर्थात् नाट्यशाला। उस नाव्यशाला में जो (अभिनय-सम्बन्धी) प्रथम प्रयोग किया जाता है वह भी पूर्वरङ्ग (पूर्वरङ्ग का कार्य) कहलाता है। उस कार्य को करके पहले सुत्रधार निकल जाता है। तब उस (सूत्रधार) जैपा ही दूसरा प्रभिनेता (नट) वैष्शवस्थानक नामक चाल से प्रविष्ट होकर काव्य-वस्तु की स्थापना करता है। और, वह काव्य-वस्तु की स्थापना करने या सूचना देने के कारए इथापक कहलाता है।

Page 256

तृतीय: प्रकाश। २०७

टिप्पणी- (१) ना० शा० (५.१६२), भा० प्र० (पृ० २००, २२८), सा० द० (६.२६) । भा० प्र० तथा सा० द० में यह कारिका भी ली गई है। (२) दशरूपक में विशेषकर रूपक के रचना-विधान का विवेचन किया गया है, नाट्य-प्रयोग का नहीं। किन्तु इस प्रकार के सन्दर्भों में नाट्य-प्रयोग का भी उल्लेख कर दिया गया है। यहाँ पूर्वरङ्ग का स्वरूप नहीं बतलाया गया है। धनिक की व्याख्या में भी यह स्पष्ट नहीं। सा० द० (६.२२-२३) में केवल इतना कहा गया है कि नाट्य-मण्डप के विघ्नों की शान्ति के लिये अभिनेय वस्तु के प्रयोग से पहिले जो अभिनेता लोग मङ्गल आदि करते हैं वह पूर्वरङ्ग कहलाता है। ना० शा० (अ० १.३) में इसका विस्तृत वर्णन है तथा भा० प्र० (पृ० १६४) में संक्षिप्त और स्पष्ट वर्णन है। तदनुसार जहाँ गायक, वादक, नटी नट तथा सभापति और स।माजिक सभी का मनोरञ्जन किया जाता है वह 'रङ्ग' अर्थात् नाट्यशाला है। नाटक के प्रयोग से पहले वहाँ जो गीत, वाद्य आदि का कार्य किया जाता है वही पूर्वरङ्ग कहलाता है। इसके प्रत्याहार आदि बारह श्रङ्ग होते हैं, जिनमें नान्दी तथा प्ररोचना आदि भी हैं। (३) सूत्रधार-वह प्रमुख नट जो रङ्गमञ्च पर किसी नाटक आदि के अभिनय का प्रबन्ध करता है (Stage-manager)-सूत्र प्रयोगा- नुष्ठानं धारयतीति सूत्रधारः। (४) वैष्णवस्थानकादिना - वैष्यववेशादिना (प्रभा), दीर्घपादविक्षेपेण परिक्रमो वैष्यवस्थानकम् (इति कश्चित्) । वस्तुतः 'वैष्णवस्थानक' एक प्रकार की शरीर की अ्वस्था (कायसन्निवेश) है जो चलने के समय, चलने से पूर्व तथा चलने के पश्चात् भी होती है। ना० शा० (१०-५१) में काय-सन्निवेश की ६ अवस्थाएं बतलाई गई हैं जिनमें, वैष्णवस्थानक भी एक है। इस अवस्था में दोनों पैर ढाई ताल (एक माप) के अन्तर से रहते है, उनमें एक समस्थित दूसरा कुछ तिरछा; अङ्ग लियां पार्श्वों की ओर उन्मुख रहती हैं जानु '(घुटने) कुछ मुड़े रहते हैं तथा शरीर सीधा (ना० शा० १०.५२-५३)। (५) तद्वद्-उस (सूत्रधार) के समान। स्थापक या सूत्रधार भिन्न-भिन्न व्यक्ति हैं या एक ही, यह विवाद का विषय है। दशरूपक, भा० प्र० (पृ० २२८) तथा सा० द० (६.२६) से तो यही प्रतीत होता है कि ये दो व्यक्ति होते थे। सा० द० (६.२३ वृत्ति) से यह भी विदित होता है कि कालान्तर में एक ही व्यक्ति दोनों के कार्य करने लगा था। अभि० भा० (५.१६२) के अनुसार तो सूत्रधार पूर्वरङ्ग का कार्य करके बाहर चला जाता था और फिर वही स्थापक के रूप में प्रवेश करता था।.

Page 257

२०८ दशरूपकम्

  • (३) दिव्यम्त्ये स तद्रूपो मिश्रमन्यतरस्तयोः। सूचयेद्वस्तु बीजं वा मुखं पात्रमथापि वा॥ ३॥ T स स्थापको दिव्यं वस्तु दिव्यो भूत्वा मत्यं च मर्त्यरूपो भूत्वा मिश्रं च दिव्यमर्त्ययोरन्यतरो भूत्वा सूचयेत्। वस्तु बीजं मुखं पात्रं वा। वस्तु यथोदात्तराघवे- 'रामो मूध्नि निधाय काननमगान्मालामिवाज्ञां गुरो- स्तद्धक्त्या भरतेन राज्यमखिल मात्रा सहैवोज्भितम्। तौ सुग्रीवविभीषणावनुगती नीती परां संपदं प्रोद्वृत्ता दशकन्धरप्रभृतयो ध्वस्ताः समस्ता द्विषः ॥१८६।। बीजं यथा रत्नावल्याम- 'द्वीपादन्यस्मादपि मध्यादपि जलनिधेर्दिशोऽप्यन्तात्। आनीय फटिति घटयति विधिरभिमतमभिमुखीभूतः ॥१८७॥ वह (स्थापक) दिव्य और मर्त्य वस्तु (या बीज या मुख या पात्र) को उस (देव और मनुष्य) के ही रूप में होकर तथा मिश्रित (वस्तु आदि) को उनमें से किसी एक के रूप में होकर सूचित करे ॥ ३ ॥ अर्थात् स्थापक देवता-सम्बन्धी (दिव्य) वस्तु को देव रूप में होकर तथा मानव-सम्बन्धी को मानव रूप में होकर और मिश्रित (दिव्यादिव्य = देवता और मानव के गुों से मिश्रित जैसे राम आदि की कथा) वस्तु को देव या मानव में से किसी एक रूप में होकर सूचित करे। इस प्रकार वह कथावस्तु (वस्तु), बीज (बीज नामक झर्थप्रकृति), मुख या पात्र की सूचना दे । टिप्पसी-ना० शा० (५.१६७-१६८), भा० प्र० (पृ० २८८), सा० द० (६.२७) । सा० द० में चारों प्रकार के सूचनीय अर्थ के उदाहरण भी दशरूपक के समान ही दिये गये हैं। वस्तु की सूचना, जैसे उदात्तराघव में - 'पिता की आज्ञा को माला के समान सिर पर धारणा करके राम वन को चले गये। राम की भक्ति के कारण भरत ने माता कैकेयी सहित समस्त राज्य को छोड दिया। राम ने अपने अनुचर सुग्रीव और विभीषण दोनों को बडी सम्पत्ति प्राप्त करा दी और उद्धत आचरण वाले रावण आदि समस्त शत्रुओं को नष्टकर दिया।' टि०-इस पद्य में नाटक की कथावस्तु की संक्षेप में सूचना दी गई है। बीज की सूचना; जैसे रत्नावली (१.६) में 'द्वीपादन्यस्मादपि' (ऊपर उदा०)। 2क न टि०-रत्नावली की प्राप्ति रूप फल का बीज है-अनुकूल दैव से युक्त योगन्धरायण का प्रयत्न। उसकी यहाँ सूचना दी गई है।

Page 258

तृतीय: प्रकाश: २०६

मुखं यथा- 'आसादितप्रकटनिर्मलचन्द्रहासः प्राप्तः शरत्समय एष विशुद्धकान्तः । उत्खाय गाढतमसं घनकालमुग्रं रामो दशास्यमिव सम्भृतबन्धुजीव: ॥१८८॥ पात्रं यथा शाकुन्तले- 'तवास्मि गीतरागेण हारिरा प्रसभं हृतः । एष राजेव दुष्यन्तः सारङ्गेणातिरंहसा ।१८६॥। (४) रङ्ग प्रसाद मधुरैः श्लोकैः काव्यार्थसूचकैः। ऋतु कन्चिदुपादाय भारतीं वृत्तिमाश्रयेत् ॥४॥ रङ्गस्य प्रशस्ति काव्यार्थानुगतार्थेः श्लोकः कृत्वा- 'औत्सुक्येन कृतत्वरा सहभुवा व्यावर्तमाना हिया मुख की सूचना; जैसे-'जिसे उज्ज्वल औौर निर्मल चन्द्रहास (१. चन्द्रमा की चन्द्रिका, २. चन्द्रहास नामक रावण की तलवार) प्राप्त हो गया है, जो शुद्ध कान्ति वाला है तथा जिसने बन्धुजीव (१. दोपहरिया के पुष्प २. बन्धुओं का जीवन) को धारण किया है ऐसा यह राम सहय शरद का समय गाढ अन्धकार वाले (रावण के पक्ष में-अत्यधिक अज्ञानान्धकार वाले) उग्र (१, प्रचण्ड २. भयङ्कर) रावस-सदृश वर्षाकाल को नष्ट करके आ गया है'। टिप्पणी-दशरूपक में 'मुख' का स्वरूप नहीं बतलाया। सा० द० (६-२७ वृत्ति) के अनुसार 'श्लेष इत्यादि के द्वारा प्रस्तुत वस्तु की सूचना देने वाला वचन ही मुख कहलाता है (मुखं श्लेषादिना प्रस्तुतवृत्तान्तप्रतिपादको वाग्विशेषः)। उपयुक्त पद्य में शरत्काल का वर्णन किया जा रहा है। साथ ही श्लेष आदि के द्वारा प्रस्तुत कथा (राम द्वारा रावण का वध) की भी सूचना दी जा रही है। पात्र की सूचना: जैसे शकुन्तला नाटक (१.५) में (नटी से नट कहता है)- मन को हरने वाले तुम्हारे गीत-राग के द्वारा मैं उसी प्रकार बलपूर्वक आकृष्ट हो गया हूँ जिस प्रकार अ्त्यन्त वेग वाले (दूर तक) ले जाने वाले हरिए के द्वारा यह राजा दुष्यन्त'। टिप्पणी-इसके द्वारा हरिए का पीछा करते हुए दुष्यन्त के आगमन की सूचना दी जा रही है। स्थापक काव्य के अरथ को सूचित करने वाले मधुर श्लोकों के द्वारा रङ्ग (= रङ्ग में स्थितसामाजिकों) को प्रसन्न करके किसी ऋतु का प्रसङ्ग लेकर भारती वृत्ति का आश्रयण करे ॥४ ॥ अर्थात् काव्य-वस्तु से सम्बद्ध (अनुगत=अन्वित) अर्थ वाले इ्लोकों के द्वारा रङ्ग की प्रशस्ति करके स्थापक 'त्सुक्येन' इत्यादि के द्वारा भारती वृत्ति का आशयण करे। औत्युक्येन० (रत्नावली १.२) 'प्रथम मिलन के अवसर पर उत्सु-

Page 259

२१० दशरूपकमु

तैस्तैर्बन्धुवधूजनस्य वचनैर्नीताभिमुख्यं पुनः । दृष्ट्वाडग्रे वरमात्तसाध्वसरसा गौरी नवे सङ्गमे संरोहत्पुलका हरेणा हसता श्लिष्टा शिवा पातु वः ॥१६०। इत्यादिभिरेव भारतीं वृत्तिमाश्रयेत्। सातु- (५) भारती संस्कृतप्रायो वाग्यापारो नटाश्रयः । भेदैः प्ररोचनायुक्तैर्वीथीप्रहसनामुखैः ॥ ५॥ पुरुषविशेषप्रयोज्यः संस्कृतबहुलो वाक्यप्रधानो नटाश्रयो व्यापारो भारती, प्ररोचनावीथी प्रहसनाSSमुखानि चास्यामङ्गानि। कता के कारण शौघ्रता करती हुई, सहज लज्जा के कारण लौटती हुई, फिर बन्धु- वर्ग की स्त्रियों के अनेक प्रकार के वचनों से सामने लाई गई, पति को सामने देखकर भय तथा आनन्द का अनुभव करती हुई तथा रोमाज्चित हुई और हँसते हुए शिव द्वारा आलिङ्गित की गई वह पार्वती तुम्हारी (सामाजिकों) की रक्षा करे'। टिप्पणी-(१) ना० शा० (५.१६५), भा० प्र० (पृ० २२८), प्रता० (३-३७ वृत्ति), सा० द० (६.२८-२६)। (२) विद्वानों का विचार है कि इस कारिका की प्रथम पंक्ति नान्दी की ओर संकेत करती है (Haas)। (नान्दी का स्वरूप दश० में नहीं बतलाया गया, तदर्थ द्र० प्रता० ३.३७, सा० द० ६. २४-२५)। वस्तुतः नान्दी से इस पंक्ति का कोई सम्बन्ध नहीं प्रतीत होता। नान्दी तो पूर्वरङ्ग का अङ्ग है (भा० प्र० पृ० १६७, सा० द० ६.२३)। पूर्वरङ्ग का कार्य सूत्रधार करता है। उसके चले जाने पर स्थापक आता है और काव्यार्थ की स्थापना करता हैं। इस स्थापना में कई कार्य करने होते हैं। वह पहले रङ्प्रशस्ति या रङ्ग-प्रसादन करता है-जय, आशोर्वाद आदि के क्रम से सामाजिकों के हृदय को प्रसन्न (निर्मल) कर देता है जिससे वह रमास्वाद के योग्य हो जाये (अभि० भा० ५. १६५)। इस प्रशस्ति में वह यथासम्भव कथा की वस्तु, बीज, मुख अथवा पात्र को भो सूचित कर देता है। फिर काव्यार्थ की स्थापना करता है। इस स्थापना के लिये ही भारती वृत्ति का आश्रय लिया जाता है। (३) यहाँ 'रङ्गस्य प्रशस्तिं काव्यार्थानुगतैः श्लोक: कृत्वा'-इसके उदाहरण रूप में ही 'औत्सुक्येन०' इत्यादिभिरेव, यह कहा गया है (इत्यादिभि: श्लोकैरेव कृत्वा)। भारती वृत्ति वह (भारती वृत्ति) तो यह है- प्रायः संस्कृत भाषा में नट द्वारा किया गया वाचिक व्यापार भारती वृत्ति कहलाता है जो प्ररोचना, वीथी, प्रहसन और आरमुख (चार) शङ्गों से युक्त होता है ।।५।। अर्थात् जो नियत पुरुषों द्वारा किया जाता है, जिसमें प्रायः संस्कृत भाषा ही होती है, वाचिक व्यापार की प्रधानता होती है वह नट का कार्य भारती वृत्ति है। इसके (चार) श्रङ्ग हैं-१. प्रोचना, २, वीथी, ३. प्रहसन, ४. आमुख।

Page 260

तृतीय: प्रकाशः २११

यथोद्दशं लक्षणमाह- (६) उन्मुखीकरणं तत्र प्रशंसातः प्ररोचना। प्रस्तुतार्थ प्रशंसनेन श्रोतणां प्रवृत्त्युन्मुखीकररं प्ररोचना। यथा रत्नावल्याम्- श्रीहर्षो निपुण: कविः परिषदप्येषा गुराग्राहिणी लोके हारि च वत्सराजचरितं नाट्ये च दक्षा वयम्। वस्त्वेकैकमपीह वाञ्छितफल प्राप्तेः पदं कि पुन- मंद्ाग्योपचयादयं समुदितः सर्वो गुणानां गणः ॥१६१॥ टिप्पणी-(१) ना० शा० (२०.२६-२७), भा० प्र० (पृ० २२८), प्रता० (पृ०६५), सा० द० (६.२६-३०)। (२) संक्षेप में (i) पुरुष-विशेष अर्थात् नटों का वाचिक व्यापार ही भारती वृत्ति है, इसके अन्तर्गत कायिक या मानसिक व्यापार नहीं आता, इसीलिये यह शब्दवृत्ति कहलाती है। साथ ही स्त्री-पात्रों (नटी आदि) का वाचिक व्यापार भी भारती वृत्ति के अन्तर्गत नहीं आता। (ii) वह वाचिक व्यापार प्रायः संस्कृत भाषा में हुआ करता है; यहाँ प्रायः शब्द इसलिये दिया गया हैं कि कहीं-कहीं रूपकों में 'प्राकृत' भाषा में भी भारती वृत्ति देखी जाती है (ना० द० ३-१५६ वृत्ति)। (३) कारिका में भेद (भेदैः) शब्द का अर्थ अ्ङ्ग हैं। नाम निर्देश के कम से (अङ्गों के) लक्षण बतलाते हैं- १. प्ररोचना- उन (चार अङ्गों) में प्रशंसा के द्वारा (श्रोताओं को) उन्मुख करना प्ररोचना है। अर्थात् प्रस्तुत काव्यार्थ की प्रशंसा करके शरताओं की प्रवृत्ति उसकी घ्रोर करा देना ही प्ररोचना है। जैसे रत्नावली (१.५) में "(इस नाटिका का कर्ला) शरीहर्ष निपुण कवि है, यह सभा भी गुणों का ग्रहण करने वाली है, वत्सराज उदयन का चरित लोक में मनोहर माना जाता है और (इस नाटिका के प्रस्तुत कर्ता) हम सब भी अभिनय में कुशल हैं। इनमें से एक-एक वस्तु भी वाज्छित फल-प्राप्ति का निमित्त हो सकती है, फिर यहाँ तो मेरे भाग्य के उत्कर्ष से सभी गुणों का समूह एकत्र हो गया है।' टिप्पणी-(१) ना० शा० (२०.२८), भा० प्र० (पृ०१६७), ना० द० (३.१५६), सा० द० (६.३०)। (२) ना० शा०, भा० प्र० तथा ना० द० आदि में 'प्ररोचना' का पूर्वरङ्ग के अङ्गों में भी उल्लेख किया गया है। दोनों स्थलों पर लक्षण में भी समानता है। अभिनवगुप्ताचार्य का कथन हैं कि पूर्वरङ्ग का कार्य कर लेने के पश्चात् जो प्ररोचना की जाती है वह भारती वृत्ति का श्ङ्ग है (अभि० भा० २०. २८)-।

Page 261

२१ दशरूपकम्

6te 200000 000 800 607 (७) वीथी प्रहसनं चापि स्वप्रसङ्गेऽभिधास्यते ॥६ ॥ वीथ्यङ्गान्यामुखाङ्गत्वादुच्यन्तेडत्रैव, तत्पुनः । (८) सूत्रधारो नटीं ब्र ते मार्ष वाऽथ विदूषकम् ॥७॥ स्वकार्यं प्रस्तुताक्षेपि चित्रोक्त्या यत्तदामुखम्। प्रस्तावना वा (६) तत्र स्यु: कथोद्घातः प्रवृत्तकम् ॥८्॥ प्रयोगातिशयश्राथ वीध्यङ्गानि त्रयोदश। २. वीथी, ३. प्रहसन :- वीथी और प्रहसन का इनके प्रकरण में वर्णन किया जायेगा ॥६।। किन्तु (तत्पुनः) वीथी के अङ्गों का यहीं वर्णान किया जा रहा है; क्योंकि वीथी के अङ्ग आमुख के भी अङ्ग होते हैं। ४. आमुख :- जहाँ सूत्रधार (=स्थापक) विचित्र उक्ति के द्वारा नटी, पारिपार्श्विक (मार्ष) या विदूषक को प्रस्तुत अर्थ का आच्ेप करने वाला अपना कार्य बतलाता है वह आमुख या प्रस्तावना कहलाती है॥ ७-८॥ टिप्पसी-(१)ना० शा० (२०.३०-३१), भा० प्र० (पृ०२२६), ना० द० (३. १५७), प्रता० (३. २७), सा० द० ६. ३१-३२ ) । (२) यहाँ सूत्रधार= स्थापक (सा०द० वृत्ति ६.३१);क्योंकि वह सूत्रधार के समान ही होता है अथवा दूसरे मत के अनुसार सूत्रधार ही स्थापक के रूप में प्रविष्ट होता है। मार्ष=पारिपाश्विंक। (सा० द० ६.३१)। विदूषक=विदूषक का वेष धारण करने वाला नट(पारिपार्श्विक) यहां नाटक आदि में प्रसिद्ध विदूषक नहीं लिया जाता (ना० द० वृत्ति ३.१५७)। आमुख या प्रस्तावना के श्रङ्ग उस (आमुख या प्रस्तावना) में (क) कथोद्घात, (ख) प्रवृत्तक, (ग) प्रयोगातिशय, और वीथी में होने वाले १३ अङ्ध होते हैं ॥८-६।। टिप्परी-(१) ना० शा० (२०.३३), भा० प्र० (पृ० २२६), प्रता० (३. २८-३३), सा० द० (६-३३) । (२) ना० शा० तथा सा० द० में आमुख के पांच अङ्ग बतलाये गये हैं-उद्घातक, कथोद्घात, प्रयोगातिशय, प्रवर्तक और अवलगित। धनञ्जय का कथन है कि वीथी के जो १३ अङ्ग होते हैं वे शरमुख के भी अङ्ग होते हैं। ना०शा० में कहे गये उद्घातक और अवलगित वीथी के अङ्ग हैं अतएव दश० में इन्हें आमुख के अङ्ग के रूप में पृथक नहीं दिया गया। इस प्रकार दश० के अनुसार आमुख के कुल १६ अङ्ग हैं। इनमें तीन ऐसे हैं जो केवल आमुख के ही तङ्ग होते हैं और १३ ऐसे हैं जो वीथी तथा आमुख दोनों के समान रूप से अङ्ग होते हैं। भा०प्र० तथा प्रता० में इस आशय को स्पष्ट किया गया है।

Page 262

तृतीय: प्रकाशः २१३

तत्र कथोद्धात :- (१०) स्वेतिवृत्तसमं *वाक्यमर्थ वा यत्र सूत्रिणः ।।६ ।। गृहीत्वा प्रविशेत्पात्रं कथोद्घातो द्विघैव सः। वाक्यं यथा रत्नावल्याम्-'योगन्धरायण,-द्वीपादन्यस्मादपि-' इति। वाक्यार्थं यथा वेणीसहारे-'सूत्रधार :- निर्वाणवैरिदहना: प्रशमादरीणां नन्दन्तु पाण्डुतनयाः सह केशवेन। रक्तप्रसाधितभुव: क्षतविग्रहाश्च

ततोऽर्थेनाह-'भीम :- स्वस्था भवन्तु कुरुराजसुताः सभृत्याः ॥१६२॥

लाक्षागृहानलविषान्नसभाप्रवेशैः प्रारेषु वित्तनिचयेषु च नः प्रहृत्य। आकृष्टपाण्डववधूपरिधानकेशाः स्वस्था भवन्तु मयि जीवति धार्तराष्ट्रा: ॥१६३। (क) कथोद्घात उनमें से कथोद्घात यह है :- जहाँ पात्र अपनी कथावस्तु से समानता रखने वाले सूत्रधार के वाक्य या वाक्यार्थ को लेकर प्रविष्ट हो जाता है वह दो प्रकार का कथो- दूघात होता है॥ ६-१० ॥ वाक्य को लेकर (पात्र-प्रवेश); जंसे रत्नावली (१.६) में सूत्रधार के 'द्वीपादन्यस्मादपि' इस वाक्य को बोलता हुआ यौगन्धरायण प्रविष्ट होता है। वाक्यार्थ को लेकर (पात्र-प्रवेश); जैसे वेशीसंहार (१.७) में सूत्रधार कहता है-'शत्रुओं के शान्त हो जाने से जिनकी शत्रु-रूपी अग्नि बुझ गई है वे पाण्डुपुत्र श्रीकृष्ण सहित आनन्द करें; और, जिन्होंने पृथिवी को प्रसन्न एवं अलङ्कृत कर दिया है तथा झगड़ों (विग्रह) को शान्त कर दिया है वे कुरुराज के पुत्र (कौरव) भृत्यों सहित स्वस्थ रहें [सूचित अरथ है-जिन्होने रुधिर से पृथिवी को अलङ्कृत कर दिया है, जिनके शरीर (विग्रह) नष्ट हो गये हैं, वे कौरव भृत्यों सहित स्वर्ग में स्थित (स्वस्थ) होंवे।। तब इसके अर्थ को लेकर भीम (यह कहते हुए प्रविष्ट होता है)-'लाक्षागृड में आग, विष मिला भोजन एवं सभा में प्रवेश के द्वारा हमारे प्रारों और धन पर प्रहार करके और पाण्डवों की वधू (द्रौपदी) के वस्त्र एवं केशों को खींचकर भी क्या मेरे जीते जो छतराष्ट्र के पुत्र जीवित रह सकते हैं ? टिप्पणी-ना० शा० (२०.३५), भा० प्र० (पृ० २२६), प्रता० (३.२६) सा० द० (६. ३५)। *1वाक्यं वाक्यार्थमथवा प्रस्तुतं यत्र सुत्रिण' इति पाठान्तरम्।

Page 263

२१४ दशरूपकम्

प्रथ प्रवृत्तकम्- (११) कालसाम्यसमात्तिप्तप्रवेशः स्यात्प्रवृन्तकम् ॥ १० ॥ प्रवृत्तकालसमानगुणवर्णनया सूचितपात्रप्रवेशः प्रवृत्तकम्, यथा- 'आसादितप्रकटनिर्मलचन्द्रहासः प्राप्तः शरत्समय एष विशुद्धकान्तः ! उत्खाय गाढतमसं घनकालमुग्रं रामो दशास्यमिव सम्भृतबन्धुजीवः ॥१६४।। अथ प्रयोगातिशय :- (१२) एषोऽयमित्युपक्षेपात्सूत्रधारप्रयोगतः । पात्रप्रवेशो यत्रैष प्रयोगातिशयो मतः ॥ ११ ॥ यथा 'एष राजेव दुष्यन्तः' इति । (ख) प्रवृत्तक :- जहाँ काल (ऋतु) के वर्णन की समानता के द्वारा (पात्र के) प्रवेश की सूचना दी जाती है, वह प्रवृत्तक होता है ॥ १०॥ अर्थात् प्रारम्भ हुए (प्रवृत्त) किसी काल (वसन्त आदि ऋतु) के समान गुरों के वर्शन द्वारा जहाँ पात्र का प्रवेश सूचित होता है, वह प्रवृत्तक है, जैसे 'आसादित०' इत्यादि (ऊपर उदा० १८८)। टिप्पणी-(१) ना० शा० (२०.३०), भा० प्र० (पृ०२२६), प्रता० (३.३०), सा० द० (६.३७) । (२) भाव यह है कि किसी वसन्त आदि ऋतु के ऐसे गुणों का वर्णन किया जाताहै जो किसी पात्र के गुणों के समान ही होते हैं। इसी वर्णन के द्वारा पात्र-प्रवेश सूचित हो जाता है। यही प्रवृत्तक नामक आ्रमुख का अङ्ग है। जैसे आसादित० इत्यादि में शरद ऋतु के गुणों का वर्णन करते हुए राम के गुणों का भी वर्णन कर दिया गया है। इसी से राम के प्रवेश की सूचना दी गई है। (ग) प्रयोगातिशय :- 'यह वह है' इस प्रकार के सूत्रधार के वचन से सूचित होकर जहाँ पात्र का प्रवेश होता है वहाँ प्रयोगातिशय नामक (आमुख का अङ्ग) माना गया है॥११। जैसे शाकुन्तल (१.५) में 'इस राजा दुष्यन्त के समान' [सूत्रधार की इस उक्ति से दुष्यन्त का प्रवेश सूचित होता है]। टिप्परी-(१) ना० शा० (२०.३६), भा० प्र० (पृ०२२६), प्रता० (३.३१), सा० द० (६,३६)। (२) ना० शा० तथा सा० द० का प्रयोगातिशय का लक्षण यह है-जहां सूत्रधार अपने आरम्भ किये हुए प्रस्तावना के प्रयोग को छोड़कर नाट्य- प्रयोग का निर्देश कर देता है और उससे पात्र का प्रवेश हो जाता है, वहां प्रयोगातिशय होता है (सा० द० ६.३६)। यहाँ पात्र-प्रवेश से पहला अंश प्रस्तावना या आ्ररामुख है और बाद का अंश नाट्य है [ना० द० सूत्र १५८ वृत्ति] ।

Page 264

तृतौय: प्रकाशा २१५

अथ वीथ्यङ्गानि- (१३) उद्घात्यकावलगिते प्रपञ्चत्रिगते छलम्। वाक्केल्यधिबले गए्डमवस्यन्दितनालिके॥ १२॥ असत्प्रल।पव्याहारमृद्वानि त्रयोदश। तत्र- (१४) गूढार्थपदपर्यायमाला प्रश्नोत्तरस्य वा ॥ १३ ॥ यत्रान्योन्यं समालापो द्वेधोद्घात्यं तदुच्यते। गूढार्थं पदं तत्पर्यायश्चेत्येवं माला प्रश्नोत्तरं चेत्येव वा माला द्वयोरुक्तिप्रत्युक्तो तद्द्विविधमुद्धात्यकम् । तत्राद्यं विक्रमोर्वश्यां यथा-विदूषकः-भो वश्रस्स को एसो कामो जेण तुमं पि दूमिज्जसे सो किं पुरिसो आदु इत्थिअ्त्ति। (भो वयस्य क एष कामो येन त्वमपि दूयसे स कि पुरुषोऽथवा स्त्रीति।') राजा-सखे। मनोजातिरनाधीना सुखेष्वेव प्रवर्तते। स्नेहस्य ललितो मार्ग: काम इत्यभिधीयते ॥१६५॥ वीथी के श्रङ्ग- 1 वोथी के (१३) अङ्ग हैं :- (१) उद्घात्यक, (२) अवलगित, (३) प्रपञ्च, (४) त्रिगत, (५) छल, (६) वाक्केलि, (७) अधिबल, (८) गएड, (६) अवस्यन्दित, (१०) नालिका, (११) असत्प्रलाप, (१२) व्याहार, औौर (१३) मृदव ॥१२-१३॥ टिप्पणी-(१) ना० शा० (१८.११३-११४), भा० प्र० (पृ० २३०), प्रता० (३.३२-३३), सा० द० (६.२५५-२५६)। (२) ना० शा० तथा सा० द० में इन प्रङ्गों का प्रस्तावना के सन्दर्भ में वर्णन नहीं किया गया, अपितु वीथी नामक रूपक के प्रकरण में व्णन किया गया है। सा०द०(६.३६) का यह भी कथन है कि प्रस्तावना (या आमुख) में उद्घात्यक तथा अवलगित इन दो वीथी के अङ्गों का प्रयोग तो हुआ ही करता है। वीथी के अन्य ११ अङ्गों का प्रयोग भी यथावसर किया जा सकता है। १. उद्घात्यक- जहाँ (दो पात्रों का) परस्पर वार्तालाप या तो गूढार्थ पद तथा उसके पर्यायों की माला के रूप में होता है अथवा प्रश्न और उत्तर की माला के रूप में होता है, वह दो प्रकार का उद्घात्यक कहलाता है॥१३-१४॥ अर्थात् जहाँ दो पात्रों की उक्ति और प्रत्युक्ति में (i) (एक पात्र द्वारा) गूढ अर्थ वाला पद कहा जाये और फिर (दूसरे पात्र द्वारा) उसका समानार्थक शब्द कहा जाये, इस प्रकार की माला (कई बार प्रयोग) अथवा (ii) प्रश्न हो फिर उत्तर दिया जाये, इस प्रकार की माला होती है; वह दो प्रकार का उद्घात्यक है।

Page 265

२१६ दशरूपकव

विदूषक :- एवं पि ण जाणे ('एवमपि न जानामि ।') राजा-वयस्य इच्छा- प्रभव: स इति। विदूषक :- कि जो जं इच्छादि सो तं कामेदित्ति। (किं यो यदिच्छति स तत्कामयतीति।') राजा-अथ किम् । विदूषक :- ता जाशिदं जह अहं सूप्रआरसालाए भोगणं इच्छामि।' ('तज्ज्ञातं यथाऽहं सूपकारशालायां भोजनमिच्छामि।') द्वितीयं यथा पाण्डवानन्दे- 'का श्लाध्या गुशिनां क्षमा परिभवः को यः रुवकुल्यः कृतः कि दुःखं परसंश्रयो जगति कः श्लाध्यो य आश्रीयते। को मृत्युर्व्यसनं शुचं जहति के यनिजिता: शत्रवः कैविज्ञातमिदं विराटनगरे छन्नस्थितैः पाण्डवैः ॥१६६॥

(i) उनमें से प्रथम उद्घात्यक विक्रमोर्वशी में है, जैसे-'विदूषक-हे मित्र, यह कामवेव कौन है जिससे तुम भी दुःखी हो रहे हो ? वह पुरुष है या स्त्री ? राजा-मित्र, जो मन से उत्पन्न होता है, चिन्ता-रहित (अनाधीनाम) सुखों में ही प्रवृत्त हुआ करता है और स्नेह का सुन्दर मार्ग है, वह काम कहा जाता है। विदूषक-इस प्रकार भी मैं नहीं समझा। राजा-मित्र, जो इच्छा से उत्पन्न होता है। विदूषक-क्या? जो जिसकी इच्छा करता है, उसको कामना करता है। राजा-और क्या ? विदूषक-तो समझा, जैसे मैं भोजनशाला (सूपकार=पाचक, रसोइया) में भोजन की इच्छा करता हू। (ii) द्वितीय उद्घात्यक यह है, जैसे पाण्डवानन्द में-'इलाघनीय क्या है? गुरी-जनों की क्षमा। तिरस्कार क्या है ? जो अपने परिवार वालों द्वारा किया जाता है ।दुःख क्या है ? दूसरे की अधीनता। संसार में प्रशंसनीय कौन है? जिसका आश्रय लिया जाता है (आश्रय देने वाला)। मृत्यु क्या है ? व्यसन (=आपत्ति या बुरी लत)। शोक रहित कौन होते हैं ? जिन्होंने शत्रुओं को जीत लिया। यह सब किन्होंने जान लिया है ? विराट नगर में गुप्त रूप से रहने वाले पाण्डवों ने'। टिप्पणी-ना० शा० (१८. ११५-११६), भा० प्र० (पृ० २३०), प्रता० (पृ०८५), सा० द० (६.३४)। ना० शा० के अनुसार लक्षण यह है- पदानि त्वगतार्थानि ये नराः पुनरादरात्। योजयन्ति पदरन्यस्तदुद्घात्यकमुच्यते।। सा० द० में भी इसी का अनुसरण किया गया है।

Page 266

तृतीय: प्रकाश: ३१७

अथावलगितम्- (१५) यत्रैकत्र समावेशात्कार्यमन्यत्प्रसाध्यते ॥१४॥ प्रस्तुतेऽन्यत्र वाऽन्यत्स्यात्तच्चावलगितं द्विघा। तत्राद्यं यथोत्तरचरिते समुत्पन्नवनविहारगर्भदोहदायाः सीताया दोहदकार्येऽनु- प्रविश्य जनापवादादरण्ये त्यागः । द्वितीयं यथा छलितरामे-'रामः-लक्ष्मण, तात- वियुक्तामयोध्यां विमानस्थो नाहं प्रवेष्टु शक्नोमि। तदवतीर्य गच्छामि। कोऽपि सिंहासनस्याध: स्थितः पादुकयो: पुरः। जटावानक्षमाली च चामरी च विराजते ॥१६७॥ इति भरतदर्शनकार्यसिद्धिः । अथ प्रपञ्च :- (१६) असद्भूतं मिथः स्तोत्रं प्रपञ्चो हास्यकृन्मतः ॥१५॥ (२) अवलगित- (i) जहाँ एक कार्य में समावेश करके (या एक कार्य के बहाने से) दूसरा कार्य सिद्ध किया जाता है; अथवा (ii) एक कार्य के प्रस्तुत होने पर दूसरा कार्य सिद्ध हो जाता है; वह दो प्रकार का अवलगित होता है॥ १४-१५॥ (i) उनमें से प्रथम है, जैसे उत्तररामचरित में सीता को वनविहार का गर्भ-दोहद (गर्भवती की इच्छा) उत्पन्न हुआ, उस दोहद-कार्य के बहाने से (सीता को ले जाकर) लोकापवाद के कारण वन में छोड़ दिया गया। (ii) द्वितीय यह है, जैसे छलितराम नाटक में-'राम-हे लक्ष्मण, मैं पिता से विहीन अयोध्या में विमान पर बैठकर नहीं प्रवेश कर सकता, अतः उतर कर जाता हूँ। 'यह कोई सिंहासन के नीचे पादुकाओं के सामने बैठा हुआ जटाधारी, अक्षमाला तथा चामर वाला व्यक्ति विराजमान है'। इस प्रकार भरत-दर्शन रूप कार्य की सिद्धि हो जाती है। टिप्पणी-(१) ना. शा० (१८.११६), भा० प्र० (पृ०२३०), प्रता० (पृ० ८५), सा० द० (६.३८)। (२) यहां प्रथम प्रकार में तो दूसरा कार्य प्रयत्न- पूर्वक किया जाता है किन्तु द्वितीय प्रकार में दूसरा कार्य प्रसङ्ग से हो जाया करता है। दोहदकार्यऽनुप्रविश्य=दोहद कार्य में समावेश करके। भाव यह है कि प्रथम प्रकार में एक कार्य में दूसरा कार्य भी सम्मिलित कर लिया जाता है। (३) प्रपञ्च- (पात्रों द्वारा) एक दूसरे की इास्य उत्पन्न करने वाली मिथ्या प्रशंसा करना प्रपञच (नामक बीथी का शज्) माना गया है। १५।।

Page 267

२१६ दशरूपकम्

अ्रसद्भूतेनार्थेन पारदार्यादिनपुण्यादिना याऽ्न्योन्यस्तुतिः स प्रपञ्चः । यथा कपू रमञ्जर्याम्-भैरवानन्द :- रण्डा चण्डा दिक्खिदा धम्मदारा मज्जं मंसं पिज्जए खज्जए अ। भिक्खा भोज्जं चम्मखण्डं च सेज्जा कोलो धम्मो कस्स णो होइ रम्मो। ('रण्डा चण्डा दीक्षिता धर्मदारा मद्यं मांस पीयते खाद्यते च। भिक्षा भोज्यं चर्मखण्डं च शय्या कौलो धर्मः कस्य न भवति रम्यः ॥१६८॥) अरथ त्रिगतम्- (१७) श्रतिसाम्यादनेकार्थयोजनं त्रिगतं तिविह। नटादित्रितयालापः पूर्वरङ्गे तदिष्यते ॥ १६ ॥ यथा विक्रमोर्वश्याम्- 'मत्तानां कुसुमरसेन षट्पदानां शब्दोऽयं परभतनाद एष धीरः। असद्भूत बात अर्थात् परस्त्रीगमन (=पारदार्य) आदि में निपुणता इत्यादि के द्वारा जो एक दूसरे की प्रशंसा करना है, वही प्रपञ्च है। जैसे कपू र- मञजरी (१.२३) में 'भरवानन्द-जहाँ प्रचण्ड रण्डाएँ ही दीक्षा-प्रप्त धर्मपत्नियाँ हैं, मद्य और माँस खाया-पिया जाता है, भिक्षा ही भोजन है, चर्म-खण्ड ही शय्या है ऐसा कौल धर्म किसे रमणीय न लगेगा ? टिप्पणी-(१) ना० शा० (पृ० ४५६, १८.१२०), भा० प्र० (पृ०२३१), ना० द० (२.१४५), प्रता० (पृ० ८६), सा० द० (६.२५७) । (२) ना० द० के धनुसार किसी एक को लाभ प्राप्त कराने वाला स्तुति सहित मिथ्या हास्य प्रपञ्च है-प्रपञ्चः सस्तवं हास्यं मिथो मिथ्यकलाभकृत्। यह लक्षण ना० शा० का अ्रधिकांश में अनुसरण करता है। ना० द० में 'केचित' (कोई) कहकर धनिक के मत को उद्धृत किया गया है। (३) 'असद्भूत' मिथ्या, असत्य (अभि० भा०), untrde (Haas)। यहाँ धनिक की दृष्टि से 'असद्भूत' शब्द का क्या अर्थ है, यह सन्दिग्ध है। व्याख्याकारों ने इसका अर्थ निन्दनीय, अनुचित असत्कर्म आदि किया है। वस्तुतः धनिक का भाव यह प्रतीत होता है कि मिथ्या ही परदाराभिगमन आदि में निपुणता आदि बतलाकर जो हास्य उत्पन्न करने वाली परस्पर स्तुति की जाती है वह प्रपञच है। शब्द की समानता से अरनेक अरथों की योजना करना ही यहाँ त्रिगत ४. त्रिगत-

कहलाता है। जो नट इत्यादि तीनों के वार्तालाप को त्रिगत कहा गया है वह तो पूर्वरङ्ग में अभीष्ट है ॥ १६ ॥ जैसे विक्रमोर्वशी (१.३) में-'पुष्पों के रस से मतवाले भ्रमरों का यह शब्द है, यह कोयलों की गम्भीर ध्वनि है, देवगण के द्वारा सब ओर से सेवित कैलास पर किअ्जरियाँ रमखीय और मधुर शक्षरों में गा रही है'।

Page 268

तृतीय: प्रकाश। २१६:

कैलासे सुरगणसेविते समन्तात् किन्नर्यः कलमधुराक्षर प्रगीता: ॥१६६। अथ छलनम्- ही (35)

(१८) प्रिया भैरप्रियैर्वाक्यैर्विलोभ्य *छलनाच्छलम। यथा वेणीसंहारे-'भीमाजुनौ- कर्ता द्यूतच्छलानां जतुमयशरणोद्दीपनः साडभिमानी राजा दुःशासनादेगु रुरनुजशतस्याङ्गराजस्य मित्रम्। कृष्णाकेशोत्तरीयव्यपनयनपटठः पाण्डवा यस्य दासा: क्वास्ते दुर्योधनोऽसी कथयत पुरुषा द्रष्टुमभ्यागती स्व: ।।२००। टिप्पणी-(१) ना० शा० (अ० १८, पृ० ४५८), भा० प्र० (पृ० २३१), ना० द० (२. १४६), प्रता० (पृ० ८६), सा० द० (६. २५७) । ना० द० में 'त्रिगत' के कई प्रकार के लक्षणा तथा उदाहरण दिये गये हैं । (२) 'त्रिगत' में त्ि=अनेक, अनेकम् अरथ गतम् इति त्रिगतम् (अभि० भा०)। श्रुतिसाम्यात्=शब्द सारूप्यात् (अभि० भा०) अर्थात् ध्वनि की समानता से; जैसे ऊपर के उदाहरण में ध्वनि की समानता से यह भ्रमरों का शब्द है,कोयल की कूक है किन्नरियों का गीत है : ये अर्थ लिये गये हैं। (३) नटादि०-पूर्वरङ्ग का अ्ङ्ग भी 'त्रिगत' कहलाता है। किन्तु उसका स्वरूप इस वीथी के अङ्गभूत 'त्रिगत' से भिन्न है। वहां तो सूत्रधार, नटी और पारिपाश्विक इन तीनों का वार्तालाप ही 'त्रिगत' कहलाता है। (५) छलन- (ऊपर से) प्रिय लगने वाले किन्तु (वस्तुतः) अप्रिय वाक्यों के द्वारा लुभाकर छलना ही छल कहलाता है। जैसे वेशीसहार (५.२६) में भीम और अरजुन दुर्योधन के भृत्यों से कहते हैं-'दूत-कपट करने वाला, लाक्षागृह (जतुमय-शरण) को जलाने वाला, अ्त्यन्त अभिमानी राजा, दुःशासन आदि सौ अनुजों का अग्रज (गुरु), अङ्गराज कर्ण का मित्र, द्रौपदी के केश तथा वस्त्रों के हरण में निपुण, पाण्डवों को दास कहने वाला (पाण्डव जिसके दास हैं) वह दुर्योधन कहाँ है ? अरे मनुष्यों, बतलाओ, हम दोनों उसे देखने आये हैं'। टिप्पणी-(१) ना० शा० (अ० १८, पृ० ४५७), भा० प्र० (पृ० २३१), ना० द० २.१४७), प्रता० (पृ० ८६), सा० द० (६.२५८)। (२) ना० शा० के अनुसार लक्षणा यह है-'अन्यार्थमेव वाक्यं छलमभिसन्धान-हस्य-रोष-करणम्'। इसी का स्पप्ट रूप ना० द० के इस लक्षण में है-'वचोऽन्यार्थ छलं हास्य-वञ्चना- रोष-कारणम्। सम्भवतः सा० द० (६. २५८-२५६) में इसे अन्ये तु कहकर दिखलाया गया है। दश० के लक्षण का क्या आधार है, यह विचारणीय ही है। *छलना' इत्यपि पाठः।

Page 269

२२० देशरूपकम्

अथ वाक्केली- (१६) विनिवृत्त्यास्य वाक्केली द्विस्त्रिः प्रत्युक्तितोऽपि वा॥ १७॥ अस्येति वाक्यस्य प्रकान्तस्य साकाङ्क्षस्य विनिवर्तन वावकेली द्विस्त्रिर्वा उक्तिप्रत्युक्तयः, तत्राद्या यथोत्तरचरिते-वासन्ती- त्वं जीवितं त्वमसि से हृदयं द्वितीयं त्वं कौमुदी नयनयोरमृत त्वमङ्ग। इत्यादिभि: प्रियशतैरनुरुध्य मुग्धां तामेव शान्तमथवा किमतः परेण ॥२०१॥ उक्तिप्रेत्युक्तितो यथा रह्नावल्याम्-विदूषक :- भोदि मत्रणिए मं पि एदं चच्चरि सिक्खावेहि। ('भवति मदनिके, मामप्येतां चर्चरीं शिक्षय') मदनिका- हदास सा वखु एसा चच्चरी। दुवदिखण्डतं वखु एदम्। ('हताश न खल्वेषा चचरी द्विपदीखण्डकं खल्वेतत्।') विदूषक :- भोदि कि एदिरा खण्डेण मोदश करीअन्ति। ('भवति, किमेतेन खण्डेन मोदकाः क्रियन्ते ?') मदनिका-णाहि, पढीअदि क्खु एदम्।' ('नहि पठ्यते खल्वेतत्।') इत्यादि। ६. वाक्केली- (i) इस (आररम्भ किये हुए वाक्य) को रोक लेने से अथवा (ii) दो- तीन बार की उक्ति-प्रत्युक्ति से वाक्केली (वीथी का अङ्ग) हुआ करती है॥ १७ ॥ कारिका में अस्य (इसका)=वाक्य का अर्थात् प्रारम्भ किये हुए (प्रकान्त =प्रस्तुत) आकांक्षा-युक्त (अपरिसमाप्त) वाक्य को रोक लेना (पूणं न करना), यह (एक प्रकार की) वाक्केली है। अथवा दो या तीन बार कथन प्रतिकथन करना, यह (दूसरे प्रकार की) वाक्केली है। (i) इनमें से पहिली; जैसे उत्तररामचरित (३.२६) में ('वनदेवी वासन्ती सीता के साथ राम के वर्ताव का वशंन करते हुए राम से कह रही है)-'तुम मेरा जीवन हो, तुम दूसरा हृदय हो, तुम नेत्रों में चन्द्रिका हो, तुम मेरे अङ्गों के लिये परमृत हो, इत्यादि सैकड़ों प्रिय वचनों से भोली (मुग्धा) सीता को फुसलाकर (भनुरुध्य) उसको ही तुमने .". अथवा शान्त हो, इससे आगे कहने से क्या लाभ ?' (ii) उक्ति-प्रत्युक्ति से होने वाली वाक्केली: जसे रत्नावली (१.१६-१७) में 'विदूषक-हे मदनिका, मुझके भी यह चर्चरी सिखा दो। मदनिका-मूर्ख, यह चचरी नहीं, यह तो द्विपदखण्डक है। विदूषक-अरी, क्या इस खण्ड (खांड) से लड्डू बनते हैं। मदनिका-नहीं, यह तो पढ़ी जाती है। टिप्पणी-(१) ना० शा० (अ० १८, पृ० ४५६), भा० प्र० (पृ० २३१- २३२), ना० द० (२.१४६), प्रता० (पृ० ८६), सा० द० (६२५६)। (२) ना0 श्ा० में 'एकद्विप्रतिवचना वाक्केली स्यात् प्रयोगेऽस्मिन्' यह लक्षणा है। इसके आधार

Page 270

तृतीय: प्रकाश: २२१

अथाधिबलम् (२०) अ्रन्योन्यवाक्याधिक्योक्ति: स्पर्धयाऽधिबलं भवेत्। यथा वेशीसंहारे-'अरजुन :- सकलरिपुजयाशा यत्र बद्धा सुतैस्ते तृणमिव परिभूतो यस्य गर्वेण लोक: । रणशिरसि निहन्ता तस्य राधासुतस्य प्रशामति पितरौ वां मध्यम: पाण्डुपुत्रः ॥२०२। इत्युपक्रमे 'राजा -- अरे नाहं भवानिव विकत्थनाप्रगल्भः । किन्तु- द्रक्ष्यन्ति न चिरात्सुप्तं बान्धवास्त्वां रणाङ्गणे।

इत्यन्तेन भीमदुर्योधनयोरन्योन्यवाक्यस्याधिक्योक्तिरधिबलम् । पर लक्षणकारों ने विविध लक्षणा प्रस्तुत किये हैं। अभिनवगुप्ताचारयं के अनुसार अ्रनेक प्रश्नों का एक उत्तर ही वाक्केली है। सा० द० के अनुसार हास्य उत्पन्न करने वाली दो-तीन बार की उक्ति-प्रत्युक्ति ही वाक्केली है। सा० द० का लक्षण दश० की द्वितीय वाक्केली के समान है। सा० द० ने दश० की प्रथम वाक्केली को 'केचित्' कहकर और अभि० के वाक्केली के लक्षण को 'अन्ये' कहकर उद्धूत किया है। ना० द० में भी दश० की प्रथम वाक्केली को 'केचितु' कहकर उद्धुत किया गया है। (३) 'त्वं जीवितम्' इत्यादि में 'तामेव' के पश्चात् 'निर्वासितवान्' यह होना चाहिये अतः वाक्य साकांक्ष है। ७. अघिबल- (दो पात्रों का) स्पर्धा के कारण एक दूसरे की बात से बढ़कर बात कहना अधिबल कहलाता है। जैसे वेरगीसंहार (५.२७) में 'अरजुन -सकल० (ऊपर उदा० ५१) इत्यांडि से आरम्भ करके 'राजा-अरे, मैं आपकी तरह से आत्मश्लाघा में निपुस नहीं हूँ किन्तु द्रक्ष्यन्ति (ऊपर उदा० ४६)' यहाँ तक के वर्णन में भीम और दुर्योषन (दोनों) की एक दूसरे की बात से बढ़कर बात विखलाई गई है, अतः यह अधिबल्ष (नामक वीथी का अ्रङ्ग) है। टिप्पखी-(१) ना० शा० (अ० १८, पृ० ४५७), भा० प्र० (पृ० २३२), ना० द० (२.१४३), प्रता० (पृ० ८६), सा० द० (६२६०)। (२) ना० म्ा तथा ना० द० का लक्षण इससे भिन्न है। ना० द० में दश० के लक्षण को 'केकितु' कहकर उद्धृत किया गया है। सा० द० आदि में दश० के लक्षण का ही अनुसरर किया गया है। (३) गर्भसन्धि के अङ्गों में (१.४०) भी अधिबल है, वह इससे भिन्न है।

Page 271

२२२ दशरूपकम्

अथ गण्ड :- (२१) गएड: प्रस्तुतसम्बन्धि भिन्नार्थ सहसोदितम् ॥।१८ ।। यथोत्तरचरिते-'राम :- इयं गेहे लक्ष्मीरियममृतवर्तिनयनयो- रसावस्या: स्पर्शो वपुषि बहलश्चन्दनरसः । अयं बाहु: कण्ठे शिशिरमसृरो मौक्तिकसर: किमस्या न प्रेयो यदि परमसह्यस्तु विरहः ॥२०४॥ (प्रविश्य) प्रतीहारी -- देव उभ्रत्थिदो। ('देव उपस्थितः ।') रामः-अि क: ? । प्रतीहारी -- देवस्स आसण्णपरिचारत्रो दुम्मुहो।' (देवस्यासन्नपरिचारको दुमुखः ।')। अथावस्यन्दितम्- (२२) रसोक्तस्यान्यथा व्याख्या यत्रावस्यन्दितं हि तत्। =. गण्ड- जब भिन्न अरथ वाला होने पर भी प्रस्तुत से सम्बद्ध हो सकने वाला वाक्य अकस्मात् कह दिया जाता है तो वहाँ गएड (नामक वीथ्यङ्ग) होता है।। १८ ॥ जैसे उत्तररामचरित (१.३८) में 'राम -(सीता को देखकर)-यह घर में लक्ष्मी है, यह मेरे नेत्रों के लिये अमृत की शलाका है, इसका यह स्पर्श शरीर में घना चन्दन रस है, इसकी यह भुजा गले में शीतल और कोमल मोतियों की माला है। इसकी क्या वस्तु प्रिय नहीं है ? यदि कुछ असह्य है तो इसका वियोग ही। (प्रविष्ट होकर) प्रतिहारी-देव, उपस्थित है। राम-अरे, कौन ? प्रतिहारी आापका निकटवर्ती सेवक दुर्मुख'। 1 टिप्पणी-(१) ना० शा० (अ० १८, पृ० ४५८), भा० प्र० (पृ० २३२), ना० द० (२·१४४), प्रता० (पृ० ८६), सा० द० (६·२६०)। (२) यहां प्रतिहारी का वचन अन्यार्थक है; अर्थात् वह दुमुख के आगमन की सूचना देने वाला है। किन्तु उसका राम के प्रस्तुत वचन से भी सम्बन्ध हो जाता है। राम ने जो कहा है 'यदि परमसह्यस्तु विरहः' इस कथन का 'उपस्थितः' (विरहः उपस्थितः) से सम्बन्ध जुड़ जाता है। अतः यहाँ गण्ड नामक वीथ्यङ्ग है। i ह. पवस्यन्दित- जहाँ सहज स्वभाव (रस) से कहे गये वाक्य की दूसरे प्रकार से व्याख्या कर दी जाती है, वह अवस्यन्दित (नामक वीथ्यङ्ग) है।

Page 272

तृतीय: प्रकाश। २२३

यथा छलितरामे-'सीता-जाद, कल्लं क्खु तुम्हेहिं अजुज्भाए गन्तव्वं तहि सो राश विणएण रमिदव्वो। ('जात, कल्यं खलु युवाभ्यामयोध्यायां गन्तव्यं तहि स राजा विनयेन नमितव्यः ।') लवः-अम्ब, किमावाभ्यां राजोपजीविभ्यां भवित- व्यम ? सीता-जाद, सो क्खु तुह्माणं पिदा।('जात, स खलु युवयो। पिता।') लव :- किमावयो: रघुपतिः पिता ?। सीता-(साशङ्रम) जाद, णा क्खु परं तुहाएं, सअलाए ज्जेव्व पुहवीए।' ('जात, न खलु परं युवयोः, सकलाया एव पृथिव्याः ।') इति। अ्रथ नालिका- (२३) सोपहासा निगूढार्था नालिकैव प्रहेलिका ॥ १६ ॥ यथा मुद्राराक्षसे-'चर :- हंहो बह्मणा, मा कुप्प कि पि तुह उ्रज्काओ जाएादि कि पि अह्मारिसा जणा जाशन्ति। ('हंहो ब्राह्मण मा कुप्य, किमपि तवो- पाध्यायो जानाति किमप्यस्मादृशा जना जानन्ति।') शिष्यः-किमस्मदुपाध्यायस्य सर्वज्ञत्वमपहतुमिच्छसि ? चर :- यदि दे उवज्भाओ सव्वं जाणादि ता जाएादु जैसे छलितराम नाटक में 'सीता-पुत्र, कल सवेरे (कल्य) तुम दोनों को अयोध्या जाना है, वहाँ उस राजा को नम्रता से प्रणाम करना। लव-माता, क्या हमको राजा के आश्रित होना पड़ेगा। सीता-पुत्र, वह तो तुम्हारे पिता हैं। लव-क्या रघुपति (राम) हमारे पिता है ? सीता (आशड्ापूर्वक)-पुत्र, केवल तुम्हारे ही नहीं, समस्त पृथिवी के ही'। टिप्पणी-(१) ना० शा० (१८.११७), भा० प्र० (पृ० २३२), ना० द० (२.१५३), प्रता० (पृ० ८६), सा० द० (६.२६१)। ना० शा० तथा ना० व में इसका नाम 'अवस्पन्दित' है। (२) 'रसोक्तस्य' के स्थान पर भा० प्र० में "यथोक्तस्य', ना० द० में 'स्वेच्छोक्तस्य' तथा सा० द० में 'स्वरसोक्तस्य' शब्द दिया गया है। अतः यहाँ 'रसोक्त' का अर्थ है-बिना किसी अभिप्राय के, सहज स्वभाव से, संस्कारवश या भाववश कहा गया। रस=Sentiment (Haas)। (३) सीता ने सहज स्वभाव से ही 'राम तुम्हारे पिता है'-यह कह दिया। फिर उसकी दूसरे प्रकार से व्याख्या की। १०. नालिका- उपहास से युक्त गूढ अर्थ वाली पहेली ही नालिका कहलाती है ॥१६॥ जैसे मुद्राराक्षस (१.१८-१६) में 'चर-हे ब्राह्मणा, क्रोध न करो। कुछ तुम्हारे उपाध्याय जानते हैं, कुछ हम जैसे लोग भी जानते हैं। शिष्य-क्या हमारे उपाध्याय की सर्वज्ञता को छीनना चाहता है। चर-यदि तुम्हारे आाध्याय सब कुछ जानते हैं तो जान लें कि चन्द्रमा किसे अच्छा नहीं लगता। शिष्य-इसके जानने से क्या लाभ ? -इस सन्दर्भ में चारक्य (समभ लेता है) -चन्द्रगुप्त से अप्रसन्न लोगों को जानता हूं।' (चर के द्वारा) यह कहा गया है।

Page 273

२२४ दशरूपकम्

दाव कस्स चन्दो अशाभिप्पेदो तति। ('यदि ते उपाध्यायः सर्व जानाति तज्जानातु तावत्, कस्य चन्द्रोऽनभिप्रेत इति।') शिष्य :- किमनेन ज्ञातेन भवति ?' इत्युपक्मे "चाणक्य :- चन्द्रगुप्तादपरक्तान्पुरुषाञ्जानामि ।' इत्युक्त भवति। प्रथाऽसत्प्रलाप :- (२४) असम्बद्ध कथाप्रायोऽसत्प्रलापो *यथोत्तरः। ननु चासम्बद्धार्थत्वेऽसङ्गतिर्नाम वाक्यदोष उक्तः । तन्न-उत्स्वप्नायितमदो- न्मादशैशवादीनामसम्बद्धप्रलापितैव विभावः । यथा- 'अचिष्मन्ति विदाय वक्त्रकुहराण्यासृक्कतो वासुके- रङ्ग ल्या विषकबुं रान्गणयतः संस्पृश्य दन्ताङ्क रान्। एकं तरीणि नवाष्ट सप्त षडिति प्रध्वस्तसंख्याक्र्कमा वाच: क्रोञ्चरिपो: शिशुत्वविकलाः श्रयांसि पुष्णन्तु वः॥२०५।। यथा च- 'हंस प्रयच्छ मे कान्तां गतिस्तस्यास्त्वया हृता। विभावितैकदेशेन देयं यदभियुज्यते ॥२०६॥ टिप्पणी-(१) ना० शा० (१८.११८), भा० प्र० (पृ० १३२), ना० द० (२.१५०), प्रता० (पृ० =६), सा० द० (६२६१)। (२) प्रहेलिका = पहेली, (Enigmatical remark-Haas)। 'संवरणकार्युत्तरं प्रहेलिका (सा० द०)। प्रहेलिका परवितारणकारि यदुत्तरम (अभि० भा०); अर्थात् जिसका उत्तर दूसरों को असमञ्जस में डाल देता है वह पहेली है। यहाँ चन्द्र का गूढ अर्थ चन्द्रगुप्त है। ११. असत्प्रलाप- एक के बाद दूसरी (यथोत्तरः) अरसम्बद्ध बात से युक्त वर्णन अस- हप्रलाप कहलाता है। यदि कोई शङ्का करे (ननु) कि असम्बद्ध अर्थ वाली बात होने पर तो अ्रसङ्गति नामक वाक्य दोष बतलाया गया है। तो वह (शङ्का) ठीक नहीं, क्योंकि स्वप्न देखना, मद, उन्माद और शैशव आदि का तो असम्बद्धप्रलाप ही विभाव होता है; अर्थात् ये असम्बद्ध-प्रलाप द्वारा जाने जाते हैं। जंसे (शैशव के कारण होने वाला कार्तिकेय का असम्बद्ध-प्रलाप) 'बासुकि के प्रकाशमय मुख-छिद्रों को श्रोष्ठ के कोनों पर से (आसृक्कतः, सृक्क=शष्ठप्रान्त) फाड़कर, विष के कारस रंग-बिरंगे दाँतों के अङ्कुरों को अङ्गुलि से छकर एक, तीन, नौ, आाठ, सात, छह, इस प्रकार गिनते हुए, क्रौञ्च के शत्रु कातिकेय की संख्या के क्रम से रहित तथा शिशुता के कारण टूटी-फूटी बातें तुम्हारे कल्याण की वृद्धि करें'। और, जैसे (विक्रमोर्वशी ४.३३ में उर्वशी के विरह में उन्मत्त पुरुरवा का प्रलाप है)-'हे हंस मेरी प्रिया को लौटा दो, उसकी चाल तुमने चुरा ली है। औौर, जिसके पास (चौरो के माल का) एक भाग पहचान लिया जाता है उसे वह सब देना होता है जिसका दावा (अभियोग) किया जाता है। अथवा जैसे (यह १. 'यथोत्तरम्' इत्यपि पाठः ।

Page 274

तृतीयः प्रकाश: २२५

यथा वा- 'भुक्ता हि मया गिरयः स्नातोऽहं वह्निना पिबामि वियत्। हरिहरहिरण्यगर्भा मत्पुत्रास्तेन नृत्यामि ॥२०७॥ अथ व्याहार :- (२५) अन्यार्थमेव व्याहारो हास्यलोभकरं वचः ॥ २०॥ यथा मालविकाग्निमित्रे लास्यप्रयोगावसाने-'(मालविका निर्गन्तुमिच्छति) विदूषक :- मा दाव उवएससुद्धा गमिस्ससि।' (मा तावत् उपदेशशुद्धा गमिष्यसि') इत्युपक्रमे 'गणदास: - (विदूषक प्रति) आर्य, उच्यतां यस्त्वया क्रमभेदो लक्षितः । विदूषक :- पढमं पच्चूसे बह्मरस्स पूत भोदि सा तए लङ्गिदा (मालविका स्मयते)।' ('प्रथमं त्रत्यूषे ब्राह्मणास्य पूजा भवति। सा तया लङ्ङिता।') इत्यादिना नायकस्य विश्रब्धनायिकादर्शनप्रयुक्तेन हास्यलोभकारिा वचनेन व्याहारः। उन्मादपूर्ण कथन है)-'मैंने पर्वत खा लिये, मैंने आग से स्नान किया, मैं आकाश को पीता हूँ, विष्यु, शिव और ब्रह्मा मेरे पुत्र हैं। इसलिये मैं नाच रहा हू।' टिप्पणी-(१) ना० द० (१८.११६), भा० प्र० (पृ० २३२), ना० द० (२.१४८), प्रता० (पृ० ८६), सा० द०- (६.२६२)। (२) दश० का यह लक्षण ना० शा० के आधार पर नहीं है। इसका आधार क्या है ? यह चिन्तनीय है। भा० प्र०, ना० द० तथा सा० द० में असत्प्रलाप के कई प्रकार बतलाये गये हैं उनमें यह भी एक प्रकार है। सा० द० के असत्प्रलाप के लक्षण में प्रायः सभी पूर्वाचार्यों के लक्षणों का संग्रह हो जाता है। तदनुसार असत्प्रलाप तीन प्रकार का है- (i) असम्बद्ध वाक्य (मि०, दश० तथा प्रता०) (ii) असम्बद्ध उत्तर औरर (iii) न समभने वाले मूख के प्रति हितकारी वचन कहना (मि०, ना० शा०, ना० द० तथा भा० प्र०)। १२. व्याहार- हास्य के लोभ को उत्पन्न करने वाला ऐसा वाक्य जिसका प्रयोजन कुछ और ही होता है, व्याहार (नामक वीध्यङ्ग) है॥ २०॥ जैसे मालविकाग्निमित्र (२.५-१०) में लास्य-प्रयोग की समाप्ति पर (मालविका जाना चाहती है) विदूषक-अभी नहीं, शिक्षा में शुद्ध होकर जाओ्ररोगी' इस सन्दर्भ में गणदास (विदूषक के प्रति)-आर्य कहिये, जो आपने क्रम-भेद देखा है। विदूषक-पहिले तो प्रातःकाल ब्राह्मण की पूजा होती है, उसका इसने उल्लङ्डन कर दिया (मालविका मुसकराती है)। इत्यादि वचन नायक को आ्रश्वस्त (बिश्रब्ध) नायिका का दर्शन कराने के लिये प्रयुक्त हुआ है (अन्यार्थ है), किञ्च हास्य के लोभ को उत्पन्न करता है अतः यहाँ व्याहार (नामक वीथ्यङ्ग) है।

Page 275

. २२६ दणरूपकम्

अ्थ मृदवम्- (२६) दोषा गुणा गुखा दोषा यत्र स्युर्मृ दवं हि तत् । यथा शाकुन्तले- 'मेदरछेदकृशोदर लघु भवत्युत्थानयोग्यं वपुः सत्त्वानामुपलक्ष्यते विकृतिमच्चित्तं भयक्रोधयोः । उत्कर्षः स च धन्विनां यदिषवः सिध्यन्ति लक्ष्ये चले मिथ्यैव व्यसनं वदन्ति मृगयामीदृग्विनोदः कुतः ॥२०८॥ इति मृगयादोषस्य गुणीकारः। यथा च- 'सततमनिवृ' तमानसमायाससहस्रसङ्क लक्लिष्टम्। गतनिद्रमविश्वासं जीवति राजा जिगीषुरयम् ॥२०६॥। इति राज्यगुरास्य दोषीभावः। टिप्पणी-(१) ना० शा० (प्र० १८, पृ० ४५८), भा० प्र० (पृ० २३२), ना० द० (२.१४२), प्रता० (पृ० ८६), सा० द० (६.२६३)। (२) दश० का यह लक्षण ना० शौ० से भिन्न है। ना० द० में ना० शा० तथा दश० दोनों के आधार पर दो प्रकार का व्याहार बतलाया गया है भा० प्र०, प्रता० तथा सा०द० में दश० का अनुसरण किया गया है। (३) अभि० भा० के अनुसार व्याहार शब्द की व्युत्पत्ति है- 'विविधोऽर्थोऽभिनीयते येन'। ना० द० के अनुसार 'विविधोऽर्यं प्रह्रियतेऽनया (वाण्या) इति व्याहारः'। १३. मृदव- जहाँ दोष, गुणा और गुरा, दोष हो जाते हैं वह (कथन) मृदव (नामक वीध्यङ्ग) है। जसे शाकुन्तल (२.५) में (सेनापति मृगया के विषय में कहता है)- 'लोग मृगया (आखेट) को व्यर्थ ही व्यसन (बुरी आदत) बनलाते हैं। भला ऐसा विनोद कहां है ? इससे शरीर, चरबी (मेद) के छट जाने से कृश उदर वाला, हल्का और परिश्रम के योग्य हो जाता है, भय और क्रोध के समय भिन्न-भिन्न विकारों से युक्त जंगली जन्तुओं का चित्त भी दिखलाई दे जाता है। और, यह तो धनुर्धारियों का उत्कर्ष है कि उनके बाए चञ्चल लक्ष्य पर भी सफल हो जाते हैं'। यहाँ मृगया के दोषों को गुण बना दिया गया है। और, जैसे-'यह विजय की इच्छा वाला राजा ऐसा जीवन व्यतीत करता है कि जिसमें मन निरन्तर अशान्त (अनिर्वृत) रहता है, सहस्रों कठिनाइयों (आयास) से भरे रहने के कारण क्लेश रहता है, निद्रा नहीं आती तथा किसी का विश्वास नहीं होता'।

Page 276

तृतीय: प्रकाशः २२७

उभयं वा- क'सन्तः सच्चरितोदयव्यसनिनः प्रादुर्भवद्यन्त्रणाः सर्वत्रैव जनापवादचकिता जीवन्ति दुःखं सदा। अव्युत्पन्नमतिः कृतेन न सता नैवासता व्याकुलो युक्तायुक्तविवेकशून्यहृदयो धन्यो जनः प्राकृतः ॥२१०।। इति प्रस्तावनाङ्गानि। (२७) एषामन्यतमेनार्थ पात्रं वात्तिष्य सूत्रभृत् ॥ २१।। प्रस्तावनान्ते निर्गच्छेत्ततो वस्तु प्रपञचयेत्। तत्र- (२८) अ्रभिगम्यगुएैर्यु क्तो धीरोदात्तः प्रतापवान् ॥ २२॥ कीर्तिकामो महोत्साहस्त्रय्यास्त्राता महीपतिः। प्रख्यातवंशो राजर्षिर्दिव्यो वा यत्र नायकः ॥ २३ ॥ तत्प्रख्यातं विघातव्यं वृत्तमत्राधिकारिकम। उस इस प्रकार राज्य के गुणों को दोष-रूप में बतलाया गया है। अथदा दोनों (अर्थात् एक साथ ही गुरों को दोष के रूप में तथा दोषों को गुण के रूप में कहा जाता है); जैसे-'जिन्हें सच्चरित के उदय का व्यसन होता है और इसीलिये कष्ट उत्पन्न होते रहते हैं, वे सत्पुरुष सवत्र ही लोक-निन्दा से आशक्धित रहते हैं और सदा दुःखपूर्वक जीवन व्यतीत करते हैं। किन्तु जिसकी बुद्धि कुछ नहीं समभती (अव्युत्पन्नमतिः=मूर्ख), जो न तो अच्छे कर्म से न ही बुरे कर्म से ध्याकुल होता है और जिसका हृदय भले-बुरे के ज्ञान से शून्य है, वह साधारण (प्राकृतः) जन धन्य है'। (यहाँ सज्जनता रूप गुण को दोष बना दिया गया है और मूर्खता रूप दोष को गुण बना दिया गया है) टिप्पणी-ना० शा० (अ० १८, पृ० ४५७), भा० प्र० (पृ० २३३), ना० द० (२.१५०), प्रता० (पृ० ८६), सा० द० (६·२६३)। ये (१६) प्रस्तावना के अ्रङ्ग हैं। ह इनमें से किसी एक के द्वारा वस्तु या पात्र को सूचित करके सूत्रधार प्रस्तावना के अन्त में चला जावे और तब (नाट्य) कथावस्तु (के अभिनय) की व्यवस्था करे॥ २१-२२॥ टिप्पणी-भा० प्र० (पृ० २३३)। उस (नाटक) में- जिस (इतिवृत्त) में उत्कृष्ट (अभिगम्य =रमरीय, सेवन करने योग्य) गुशों से युक्त्त, धीरोदात्त, प्रतापशाली, कीर्ति का इच्छुक, अत्यन्त उत्साही, तीनों वेदों का रक्षक, पृथिवी का पालक, प्रसिद्ध वंश वाला कोई राजर्षि अ्रथवा दिव्य जन नायक हो, ऐसे इतिहास-प्रसिद्ध (प्रख्यात) इतिवृत्त को आधिकारिक कथावस्तु बनाना चाहिये॥ २२-२३-२४ ॥

Page 277

२२ दशरूपकम्

यत्रेतिवृत्ते सत्यवागसंवादकारिनीतिशास्त्रप्रसिद्धाभिगामिकादिगुणयुंक्तो रामा- यसमहाभारतादिप्रसिद्धो धीरोदात्तो राजषिर्दिव्यो वा नायकस्तत्प्रख्यातमेवात्र नाटक आधिकारिक वस्तु विधेयमिति। (२६) यत्तत्रानुचितं किञचिन्नायकस्य रसस्य वा ॥ २४॥ विरुद्ध तत्परित्याज्यमन्यथा वा प्रकल्पयेत्। अर्थात् जिस इतिवृत में संत्यवादिता, प्रवञ्चना न करना (?) तथा नीति शास्त्र में प्रसिद्ध सेवनीय (शभिगामिक) आदि गुणों से युक्त, रामायण महाभारत आदि में प्रसिद्ध धीरोदात्त राजषि अ्ररथवा दिव्य-जन नायक होता है ऐसे इतिहास प्रसिद्ध (प्र्यात) इतिवृत्त को ही इस नाटक में आधिकारिक (प्रधान) कथावस्तु बनाना चाहिये। टिप्पणी-(१) ना० शा० (१८.१०), भा० प्र० (पृ० २३३), ना० द० (१.४). प्रता० (३.३५-३६), सा० द० (६.७,६)। (२) उदात्त नायक का लक्षणा (ऊपर २.४-५)। (३) प्रख्यात वृत्त का अभिप्राय है कि जो वृत्त रामायण आदि में प्रसिद्ध हो (सा० द०)। (४) यहाँ नाटक का दो प्रकार का नायक बतलाया गया है-राजर्षि तथा दिव्य। राजर्षि (राज-ऋषि) का अर्थ है ऐसा क्षत्रिय जो अपने पवित्रता आदि गुणों से ऋषि-तुल्य हो गया हो। सा० द० में नाटक के तीन प्रकार के नायकों का निर्देश किया गया है -- (i) राजर्षि, जैसे शाकुन्तल का नायक दुष्यन्त आदि, (ii) दिव्य, जैसे श्रीकृष्ण इत्यादि दिव्य पुरुष; इन दोनों के इतिवृत्त महाभारत में हैं अतः ये प्रख्यात हैं। और, (iii) दिव्या- दिव्य; अर्थात् जो दिव्य पुरुष होते हुए भी मानव के समान व्यवहार करते हैं, जैसे उत्तररामचरित आदि में राम हैं, उनका इतिवृत्त रामायण-प्रसिद्ध है। इसके विपरीत नाट्य-दर्पणकार ने नाटक में (दिव्य) देव नायक को स्वीकार नहीं किया। उनका मत है कि नाटक तो 'राम के समान आचरण करना चाहिये रावण के समान नहीं', इस प्रकार का सरस उपदेश देने के लिये होता है। और, देवता तो अत्यन्त कठिन कार्य को भी इच्छा मात्र से कर लेते हैं। इसलिए उनके चरित का अनुसरण करना मनुष्यों के लिये असम्भव है और वह उपदेशप्रद नहीं हो सकता। (५) अभिगम्यगुरौः=अभिरम्यगुीः, उत्कृष्टगुरैर् इति यावत् (प्रभा) Attractive qualities (Haas)। 'असंवादकारि' के स्थान पर 'अविसंवादकारि' (प्रवञचना न करने वाला) पाठ शुद्ध प्रतीत होता है। उस (प्रख्यात) इतिवृत्त में जो कुछ नायक के लिये अनुचित हो या रस के विरुद्ध हो, उसे छोड़ देना चाहिये अथवा उसकी अन्य रूप में कल्पना कर लेनी चाहिये ।।२४।।

Page 278

तृतीय: प्रकाश। २२६

यथा छयना बालिवधो मायुराजेनोदात्तराघवे परित्यक्तः। वीरचरिते तु रावणसौहृदेन वाली रामवधार्थमागतो रामेणा हत इत्यन्यथा कृतः । (३०) आद्यन्तमेवं निश्चित्य पञचघा तद्विभज्य च।।२५॥ खए्डशः सन्धिसंज्ञांश् विभागानपि खण्डयेत्। चतुः षष्टिस्तु तानि स्युरङ्गानीति-

रोपक्लूप्तबीजबिन्दुपताकाप्रकरीकार्यलक्षणार्थप्रकृतिक पञ्चावस्थानुगुण्येन पञ्चधा विभजेत्। पुनरपि चैकैकस्य भागस्य द्वादश त्रयोदश चतुर्दशेत्येवमङ्गसंज्ञान् सन्धीनां विभागान्कुर्यात्। जैंसे मायुराज ने उदात्तराघव नामक नाटक में (राम के) छल से बालि- वध (की घटना) को छोड़ दिया है। महावीरचरित में (भवभूति ने) तो इस प्रकार परिवर्तित कर दिया है कि रावण की मित्रता के कारण बाली राम का वध करने के लिये आया था तब राम ने उसे मार दिया। टिप्पणी-(१) भा० प्र० (पृ० २३३-२३४), ना० द० (१.१५), सा० द० (६. ५०)। (२) । भा० प्र० में भी दश० की कारिका दी गई है। सा० द० में तनिक सा परिवर्तन करके दश० की कारिका तथा धनिक की टीका को ले लिया गया है। किन्तु नाट्य दर्पण में इस भाव को अधिक विस्तृत किया गया है, तदनुसार- अयुक्त च विरुद्ध च नायकस्य रसस्य वा। वृत्तं यत् तत् परित्याज्यं प्रकल्प्यमथवाऽ्न्यथा । अर्थात् जो बात नायक के अथवा रस के लिये 'अनुचित' और 'विपरीत' हो उसका परित्याग कर देना चाहिये अथवा उसकी अन्य प्रकार से कल्पना कर लेनी चाहिये। यहां अनुचित और विरुद्ध दोनों का नायक और रस दोनों के साथ सम्बन्ध है। उदाहरणारथं धीरललित नायक के लिये परस्त्री समागम अनुचित है तथा धीरोद्धतता का धीरललितता से विरोध है। इसी प्रकार शृङ्गार में आ्रलिङ्गन चुम्बन आदि का प्रत्यक्षतः दिखलाना अनुचित हैं और शृङ्गार का बीभन्स से विरोध हैं (ना० द० वृत्ति)। विचारणीय यह है कि क्या दश० की कारिका का तात्पर्य भी ना० द० के समान ही तो नहीं है। (नाटककार) इस प्रकार (इतिवृत्त के) आदि और अन्त का निश्चय करके और उसको (सन्धि नामक) पाँच भागों में विभक्त करके उन सन्धि नामक भागों को भी खएडों (सन्ध्यङ्गों) में विभक्त करे। इस प्रकार ये (आधिकारिक इतिवृत्त के) ६४ अङ्ग होते हैं ॥ २५-२६ ॥। (भाव यह है कि) जब (नायक के) अनौचित्य और रस-विरोध के परिहार से वस्तु शुद्ध हो जाये और उसमें सूच्य एवं हृश्य का विभाग कर लिया जाये तब नाटककार उसमें फल के अनुसार बीज, बिन्दु पताका, प्रकरी और कार्य नामक

Page 279

२३० दशरूपकथ

(३१) अपरं तथा ॥२६॥ पताकावृत्तमप्यूनमेकादयैरनुसन्धिभिः । ।. अङ्गान्यत्र यथालाभमसन्धि प्रकरीं न्यसेत् ।।२७।। अपरमपि प्रासङ्गिकमितिवृत्तमेकाधयरनुसन्धिभिर्न्यूनमिति प्रधानेतिवृत्तादेक- द्वित्रिचतुर्भिरनुसन्धिभिन्यूनं पताकेतिवृत्त न्यसनीयम्। अङ्गानि च प्रधानाविरोधेन यथालाभं न्यसनीयानि। प्रकरीतिवृत्तं त्वपरिपूर्णसन्धि विधेयम्। तत्रवं विभक्ते- (३२) आंदौ विष्कम्भकं कुर्यादङ्क' वा कार्ययुक्तितः । पाँच अर्थप्रकृतियों की कल्पना करे। फिर इस प्रकार की कथावस्तु को पांच कार्यावस्थाओं (आरम्भ, प्रयत्न, प्राप्त्याशा, नियताप्ति और फलागम) के अनुकूल पाँच भागों (=मुख आदि पाँच सन्धियों) में विभक्त करे। और, फिर भी एक- एक भाग के (प्रथम प्रकाश में बतलाये गये) बारह, तेरह या चौदह इत्यादि सभी सन्धियों के श्रङ्ग (सन्ध्यङ्ग) नाम के विभाग करना चाहिये। टिप्परी-ना० शा० (१६. १३६), भा० प्र० (पृ० २३४)। इसी प्रकार दूसरा जो पताका वृत्त है उसमें भी एक, दो आदि अनुसन्धियों की न्यूनता रखनी चाहिये तथा इस (पताक्ा वृत्त) में यथा- प्राप्त सन्ध्यङ्ग (= अङ्ग) रखने चाहियें। किन्तु प्रकरी (नामक प्रासङ्गिक इतिवृत्त) को तो सन्धि-रहित ही रखना चाहिये॥ २६-२७ । दूसरा (अपरस्=आधिकारिक इतिवृत्त से भिन्न) जो पताका नामक प्रासङ्धिक इतिवृत्त है; वह एक आदि अनुसन्धि से न्यून होता है अर्थात् (जिसमें पाँचों सन्धियाँ होती है उस) प्रधानवृत्त की अपेक्षा पताका नामक इतिवृत्त में एक, दो, तीन या चार अनुसन्धियाँ कम रखनी चाहियें। और, उसमें वे ही अ्रङ्ग रखने चाहियें जो प्राप्त हों (बन सकें) तथा जिनका प्रधान इतिवृत्त से विरोध न हो। प्रकरी नामक जो प्रासङ्गिक इतिवृत्त है वह तो सन्धि से रहित (अपरिपूर्ण) ही रखना चाहिये। टिप्पणी-(१) ना० शा० (१६.२८), भा० प्र० (पृ० २३४)। (२) अनुसन्धि-आधिकारिक वृत्त के समान पताका नामक प्रासङ्गिक वृत्त का भी सन्धियों में विभाजन किया जाता है। किन्तु पताकावृत्त की सन्धियाँ आधिकारिक वृत्त का अनुसरण करती हैं अतः वे अनुसन्धि कही जाती हैं, जैसा कि नाo शा० (१६. २८) में कहा गया है :- एकोडनेकोडपि वा सन्धि: पताकाया तुयो भवेत्। प्रधानार्थानुयायित्वादनुसन्धिः प्रकीर्त्यते॥ तब इस प्रकार इतिवृत्त का विभाग कर लेने पर- आरम्भ में (नाटककार) कार्य के औचित्य के अनुसार (कार्ययुक्तितः) विष्कम्भक अथवा अङ्ध की रचना करे।

Page 280

तृतीय: प्रकाश: २३१

इयमत्र कार्ययुक्ति :- (३३) अपेच्तितं परित्यज्य नीरसं वस्तुविस्तरम् ॥२८॥ यदा सन्दर्शयेच्छेषं कुर्याद्विष्कम्भकं तदा। (३४) यदा तु सरसं वस्तु मूलादेव प्रवर्तते ॥२६।। आदावेव तदाङ़क: स्यादामुखाक्तेपसंश्रयः। स च- (३५) प्रत्यक्षनेतृ चरितो बिन्दुव्याप्तिपुरस्कृतः ॥३०॥ अङ्को नानाप्रकारार्थसंविधानरसाश्रयः । इस विषय में कार्ययुक्ति यह है- जब (नाटककार) नीरस किन्तु (कथा-वस्तु के विकास के लिये) आवश्यक वस्तु-विस्तार को छोड़कर शेष भाग को (रङ्गमञ्च पर) दिखलाना चाहे; तब वह (उस नीरस वस्तु की सूचना देने के लिये) विष्कम्भक की रचना करे ॥ २८-२६॥ टिप्पणी-(१) भा० प्र० (पृ० २३४), सा० द० (६. ६१)। (२) विष्कम्भक पाँच अरथोपक्षेपकों में से एक है (ऊपर१.५८)। जब कथा के आरम्भ में ही कोई वस्तु नीरस होती है किन्तु कथा-सूत्र जोड़ने के लिये अपेक्षित होती है तब उसकी सूचना देने के लिये नाटक के आरम्भ में विष्कम्भक रखना आवश्यक हो जाता है। यह विष्कम्भक आमुख के पश्चात् हुआ करता है। जैसे रत्नावली में यौगन्धरायण द्वारा प्रयुक्त विष्कम्भक है। किन्तु जब आरम्भ से ही कथावस्तु सरस होती है तब तो (नाटक के) आदि में ही अङ्क रख दिया जाता है और उस अङ्क का आधार आ्रमुख (प्रस्तावना) में सूचित पात्र-प्रवेश हुआ करता है॥ २६-३०॥ टिप्पणी-(१) भा० प्र० (पृ० २३४), सा० द० (६. ६२-६३)। (२) शाकुन्तल में आमुख के पश्चात् अङ्क की ही योजना की गई है वहां आरम्भ में विष्कम्भक नहीं रक्खा गया। (३) आमुखेन पात्राक्षेपः संश्रयो यस्य सः आ्मुखाक्षेप- संश्रय इत्यङ्कविशेषसम (प्रभा)। औ्र, वह- जिसमें नायक का चरित प्रत्यक्ष रूप से प्रस्तुत किया जाता है, जो बिन्दु की व्याप्ति से युक्त होता है और अ्नेक प्रकार के प्रयोजन, संविधान तथा रसों का आश्रय होता है, वह अड्क है॥ ३०-३५।।

Page 281

२३२ दशरूपकम्

रङ्गप्रवेशे साक्षान्निदिश्यमाननायकव्यापारो बिन्दूपक्षेपार्थपरिमितोऽनेकप्रयो- जनसंविधानरसाधिकरण उत्सङ्ग इवाङ्क:। जहाँ रङ्गमञ्च पर नायक का प्रवेश होने पर साक्षात् रूप से नायक के व्यापार (कार्यों) का निर्देश किया जाता है जो बिन्दु के उपक्षेप रूप अर्थ से परिछिन्न होता है (टि०) तथा अनेक प्रकार के प्रयोजन, संविधान एवं रसों का उत्सङ्ग (गोद) के समान आधार होता है, वह श्रङ्क है। टिप्पणी-(१) ना० शा० (१८१३-१८), भा० प्र० (पृ० २३५), ना० द० (१.१६), प्रता० (३.२६), सा० द० (६.१२-१४)। (२) प्रत्यक्षनेतृचरित :- प्रत्यक्ष रङ्गप्रवेशेन साक्षान् निर्दिश्यमानं नेतृचरितं नायकव्यापारो यत्र; भाव यह है कि अङ्ग में रङ्गमञ्च पर नायक का प्रवेश कराके उसके कार्यों का साक्षात् रूप से (हृश्य रूप में) चित्रणा किया जाता है। नायक-व्यापार का अभिप्राय यह है कि नायक जो फल प्राप्ति के लिये उपाय करता है (चरित) तथा उसे जो फल (उपभोग) प्राप्त होता है, उन दोनों का ही साक्षात् रूप से निर्देश करना चाहिये तभी सामाजिक को नाटक आदि से उपदेश प्राप्त हो सकता है (मि०, प्रत्यक्षचरित- सम्भोग:, ना० शा० १८.१७ तथा दृश्यार्थः, ना० द० ११६) । (३) बिन्दुव्याप्ति- पुरस्कृत :- बिन्दुव्याप्तिः पुरस्कृता यत्र (=बिन्दूपक्षेपार्थपरिमितः-बिन्दोः उपक्षेप- रूपेण अर्थेन परिमितः) भाव यह है कि अङ् में बिन्दु के व्याप्ति रूप व्यापार का ध्यान रक्खा जाता है। जहाँ कोई एक प्रारम्भ आदि कार्यावस्था समाप्त हो जाती है अथवा कार्यावस्था तो समाप्त नहीं होती किन्तु ऐसी घटनाएं आ जाती हैं कि जिनका एक दिन में अभिनय करना सम्भव नहीं होता और अङ्क को समाप्त करना पड़ता है, वहाँ समाप्त होने वाले अङ्क का अग्रिम अङ्क से सम्बन्ध जोड़ने के लिये पूर्व अङ्क के अन्त में बिन्दु की योजना करनी होती है। इस बिन्दु के उपक्षेप पर्यन्त ही अङ्क हुआर करता है अतः धनिक ने 'बिन्दु-उपक्षेपार्थ-परिमितः' कहा है। यहां अर्थ=संक्षिप्त वृत्त, कथांश, कथा का स्वल्प भाग, उसी के द्वारा बिन्दु का उपक्षेप हुआ करता है अतः उसे 'बिन्दूपक्षेपार्थ कहा गया है। इस कथांश पर ही पूर्व अङ्ध समाप्त हो जाता है (द्र० आगे ३.३७ बिन्दुरन्ते च) और उस उपक्षिप्त बिन्दु का अग्रिम अङ्द में विस्तार हुआ करता है। (मि०, सबिन्दुः ना० द० १.१६) । प्रता० में 'बिन्दुव्यक्तिपुरस्कृतः' पाठ है। (४) नानाप्रकारार्थसंविधान- रसाश्रय :- अङ्ग (i) अ्नेक प्रकार के अवान्तरप्रयोजनों (अर्थ), (ii) विशेष प्रकार के कथासन्निवेश या वस्तु संघटन (=संविधान) तथा (iii) अङ्ग एवं अङ्गी होने वाले रसों का आश्रय होता है-नानाप्रकारार्थानाम्=अनेकावान्तरप्रयोजनानाम्, संविधानानाम्=कथासन्निवेशविशेषादीनाम्, रसानाम्=अङ्गभूतानाम् अङ्गिनो वा रसस्य (आश्रयः)- प्रता० टीका। अनेकप्रकारप्रयोजनसम्पादनस्य रसस्य चा- श्रयः (प्रभा)। ना० शा० (१८.१४ तथा आगे) में भी 'अर्थ एवं नानाविधान' आदि शब्दों का प्रयोग किया गया है। किन्तु वहां इनके अभिप्राय अस्पष्ट से हैं। अ्ङ्क योजना के लिये कुछ आवश्यक बाते आगे दी जा रही हैं :- 170

Page 282

तृतीय: प्रकाष २३३

तत्र च- (३६) अनुभावविभावाभ्यां स्थायिना व्यभिचारिभिः ॥३१।। गृहीतमुक्तै: कर्तव्यमङ्गिनः परिपोषगम्। प्रङ्गिन इत्यङ्गरसस्थायिनः संग्रहात्स्थायिनेति रसान्तरस्थायिनो ग्रहणम्। गृहीतमुक्तः परस्परव्यतिकीर्णौरित्यर्थः । (३७) न चातिरसतो वस्तु दूर विच्छिन्नतां नयेत् ॥३२॥ रसं वा न तिरोदध्याद्वस्त्वलङ्कारलक्षणैः। कथासन्ध्यङ्गोपमादिलक्षणर्भू षणादिभिः। और उस (अङ्ड) में- अनुभाव, विभाव, (अन्य रस के) स्थायी भाव तथा व्यभिचारी भावों का ग्रहण करते हुए तथा छोड़ते हुए, उनके द्वारा अङ्गी (प्रधान) रस का परिपोषण करना चाहिये॥ ३१-३२॥ 'क्योंकि (कारिका में) 'अङ्िनः' इस पद से अङ्गी रस के (साथ-साथ उसके) स्थायीभाव का भी ग्रहणा हो जाता है इसलिये 'स्थायिना' इस पद से अन्य (अ्रङ्गो से भिन्न) रस के स्थायी का ग्रहण होता है। 'गृहीतमुक्तः' का अर्थ है-एक दूसरे को लाँघकर रक्खे गये (?)। टिप्पणी-(१) भा० प्र० (पृ० २३५)। (२) गृहीतमुक्त :- पूर्व गृहोतः पश्चान् मुक्तः इति गृहीतमुक्त: तैः; अर्थात् किसी अनुभाव आदि का ग्रहण करके उससे प्रधान रस के स्थायी भाव को पुष्ट करे फिर उसको छोड़ दे। फिर दूसरे अनुभाव आदि का ग्रहण करे। धनिक के परस्पर व्यतिकीएं: पद का भी यही भाव प्रतीत होता है (वि+अति+कीणै := लांघकर या बचाकर रक्खे गये)। किन्तु प्रभा टीका के अनुसार परस्पर व्यतिकीणं := परस्पर मिश्रितः सापेक्षैर्वा। (३) अनुभाव आदि का स्वरूप देखिये आगे (४.२, ३, ७)। अत्यघिक रस (पोषण) के द्वारा कथावस्तु को अत्यन्त विच्छिन्न नहीं कर देना चाहिये और न ही वस्तु, अलङ्कार तथा लक्षणों के द्वारा रस को तिरोहित कर देना चाहिये ।३२-३३।। कथा सन्ध्यङ्ग (वस्तु), उपमा आदि अलङ्कार तथा भूषए आदि नाव्य- लक्षणों के द्वारा रस का तिरोधान न कर देना चाहिये। टिप्परी-(१) भा० प्र० (पृ० २३५-२३६), ना० द० (१.१५), सा० द० (६.६४) । (२) विच्छिन्नता-कथावस्तु के प्रवाह का भङ्ग हो जाना (disconne- ction) । वस्त्वलङ्कारलक्षणी :- ऐसा प्रतीत होता है कि धनिक के अनुसार वस्तु का अर्थ है-कथा तथा कथावस्तु के विभाग जो सन्ध्यङ्ग कहलाते हैं। अलंकार से उपमा आदि अलंकारों का ग्रहण होता है। लक्षण का अभिप्राय है-भूषण, शक्षर

Page 283

२३४ देश रूपकम

(३८) एको रसोऽङ्गीकर्तव्यो वीर: शृङ्गार एव वा ॥३३॥ अङ्गमन्ये रसाः सर्वे कुर्यान्निर्वहसोऽद्व तम्। ननु च रसान्तरस्थायिनेत्यनेनैव रसान्तराणामङ्गत्वमुक्तम्, तन्न-यत्र रसान्त- रस्थायी स्वानुभावविभावव्यभिचारियुक्तो भूयसोपनिबध्यते तत्र रसान्तराणामङ्गत्वम्, केवलस्थाय्युपनिबन्धे तु स्थायिनो व्यभिचारितैव। संघात इत्यादि ३६ नाट्य लक्षणा (सा० द० १७१-१७५)। भावप्रकाशन के अनुसार आऋरन्द आदि नाट्यालङ्वारों का भी यहां ग्रहणा होता है। (३) कारिको का भाव यह है कि रस और वस्तु दोनों का सन्तुलन ही वाञ्छनीय है। यहां अवलोक टीका का पाठ सन्देहास्पद है। नाटक में एक रस वीर पथवा शृङ्गार को अङ्गी (प्रधान) रखना चाहिये, अन्य सभी रसों को अङ्ग-रूप में; और निर्वहण सन्धि में अद्भुत रस रखना चाहिये। (शङा) कारिका ३१ में 'स्थायिना' (=रसान्तरस्थायिना) इस पद के द्वारा ही अन्य रस (प्रधान रस के) अ्रङ्ग होते हैं, यह कह दिया गया है ( फिर यहां कहने की क्या आवश्यकता है?) (समांधान) ऐसी शङ्गा करना ठीक नहीं (तन्न); क्योंकि जहाँ किसी अन्य रस का स्थायी भाव अपने अनुभाव, विभाव और व्याभचारी भावों के साथ भली भाँति (भूयसा) दिखलाया जाता है (उपनिबध्यते) वहाँ तो अन्य रस (प्रधान रस के) श्रङ्ग होते हैं (यह बात 'प्रङ्गमन्ये रसाः सर्वे में कही जा रही है) । किन्तु जहां (अन्य रस के) स्थायी का अनुभाव आदि के बिना (=केवल) ही निरूपण किया जाता है वहाँ तो वह धरन्य रस का स्थायी (प्रधान रस का) व्यभिचारी भाव ही हो जाता है (यह बात का० ३१ में 'स्थायिना' पद द्वारा कही गई थी)। टिप्परी-(१) ना० शा० (१८.४३), भा० प्र० (पृ० २३६), ना० द० (१.१५), प्रता० (३.३-४), सा० द० (६.१०)। (२) 'ननु'० इत्यादि शङ्का का आशय यह है कि ३१ वीं कारिका में 'स्थायिना' शब्द के द्वारा यह कहा गया है कि प्रधान (अङ्गी) रस का अन्य रसों के स्थायी-भावों द्वारा पोषण करना चाहिये। इस कथन से स्पष्ट है कि अन्य रस प्रधान रस के अङ्ग होते हैं फिर यही बात 'अ्रङ्गमन्ये०' इत्यादि द्वारा कहना पुनरुक्ति मात्र ही है। 'तन्न०' इत्यादि समाधान का अभिप्राय यह है :-- ३१ वीं कारिका में तो (अन्य रसों के) केवल स्थायी भावों को प्रधान रस का पोषक (अङ्ग) कहा गया है। केवल स्थायी भाव का अभिप्राय है-अनुभाव आदि से रहित स्थायी भाव । वह वस्तुतः प्रधान रस का व्यभिचारी भाव ही हो जाता है। वह पहले किसी रस का स्थायी भाव था इसीलिये उसे स्थायी कह दिवा जाता है। इसके विपरीत 'अङ्गमन्ये०' इत्यादि में ध्रन्य रसों को प्रधान रस का भ्रङ्ग बतलाया जा रहा है। जब कोई स्थायी भाव अनभाव आदि से पुष्ट होता

Page 284

तृतीय: प्रकाश: २३५

त0 (३६) दूराध्वानं वधं युद्ध राज्यदेशादिविप्लवम्।।३४।। संरोधं भोजनं स्नानं सुरतं चानुलेपनम्। *तम्बरग्रहणादीनि प्रत्यक्षाणि न निर्दिशेत् ॥३५॥ अङ्क नेवोपनिबघ्नीत, प्रवेशकादिभिरेव सूचयेदित्यर्थः । (४०) नाधिकारिवधं क्वापि त्याज्यमावश्यक न च। अधिकृतनायकवधं प्रवेशकादिनापि न सूचयेत्, आवश्यकं तु देवपितृकार्याद्य- वश्यमेव क्वचित्कुर्यात्। (४१) एकाहाचरितैकार्थमित्थमासन्ननायकम् ॥३६। पात्रैस्त्रिचतुरैरड्कं तेषामन्तेडस्य निर्गमः । PIRS है तभी वह रस कहलाता है और अनुभाव आदि से युक्त अन्य रसों के स्थायी-भाव जब प्रधान रस का पोषण करते हैं तब अन्य रस प्रधान रस के अङ् कहे जाते हैं। इस प्रकार पुनरुक्ति नहीं है। प्रङ्गों में अ्र्प्रदर्शनीय वस्तु - दूर की यात्रा, वध, युद्ध, राज्य-विप्लव और देश-विप्लव आदि, घेरा डालना (=संरोध), भोजन, स्नान, रतिक्रीडा, अनुलेपन, वस्त्र-ग्रहण इत्यादि को प्रत्यक्ष रूप से नहीं दिखलाना चाहिये॥३४-३५।। अर्थात् अद्धों के द्वारा इन्हें नहीं दिखलाना चाहिये, प्रवेशक आदि के द्वारा ही सूचित कर देना चाहिये। अधिकारी नायक के वध का कहीं भी निर्देश न करना चाहिये और आवश्यक वस्तु का त्याग न करना चाहिये। भाव यह है कि आधिकारिक वृत्त के नायक का वध प्रवेशक आदि के द्वारा भी न सूचित करना चाहिये। किन्तु देव-पितृ-कार्यं आदि जो आवश्यक वस्तु हैं उनका अवश्य ही कहीं न कहीं निर्देश करना चाहिये। टिप्पणी-(१) ना० शा० (१८. ३८), भा० प्र० (पृ० २३६), ना० द० (१. २१-२२), सा० द० (६-१६-१८)। (२) अधिकारिवधम-आधिकारिक इतिवृत्त के नायक का वध, प्रधान नायक का वध। कापि-कहीं भी, न तो अङ्क में न प्रवेशक आदि में। प्रङ्कों में वर्णनीय वस्तु एवं पात्र- इस पकार (नाटककार को) ऐसा अङ्क रखना चाहिये जो एक प्रयोजन के लिये किये गये एक दिन के कार्यों से युक्त हो, जिसमें नायक उपस्थित हो, जो तीन या चार पात्रों से युक्त हो और, उन पात्रों का (अङ्क के) अन्त में (रङ्गमञ्च से) निकल जाना दिखलाना चाहिये। *अस्त्रस्य' इत्यपि पाठः।

Page 285

२३६ दशरूपकम्

पात्राणामवश्यमङ्कस्यान्ते निर्गमः कार्यः । (४२) पताकास्थानकान्यत्र बिन्दुरन्ते च बीजवत् ॥३७।। एवमङ्काः प्रकर्तव्याः प्रवेशादिपुरस्कृताः । (४३) पञ्चाङ्कमेतदवरं दशाङ्क नाटकं परम् ॥३८॥ अर्थात् जो एक दिन में होने वाले एक प्रयोजन से सम्बद्ध हो, जिसमें नायक उपस्थित हो, बहुत से पात्रों का प्रवेश न किया गया हो; ऐसा अङ्क रखना चाहिये। और, उन (अङ्ड के) पात्रों का अङ्क के अन्त में अवश्य ही निष्कमण कर देना चाहिये। टिप्परी-(१) ना० शा० (१८. २१-२४, २८), भा० प्र० (पृ० २३६), सा० द० (६. १४, १५, १६)। (२) पाश्चात्य नाट्य-समीक्षा के अनुसार जो नाटक में अन्वितित्रय-(i) कालान्विति (unity of time) (ii) कार्यान्विति (unity of action) और (iii) स्थानान्विति (unity of place) मानी गई है, उनका भारतीय नाटकशास्त्र में स्पष्टतः विवेचन नहीं किया गया। फिर भी इस प्रकार के नाट्य-सम्बन्धी नियमों में उनकी कुछ भलक देखी जा सकती है। (३) प्रासन्ननायक-(ना० शा० १८-२८ सन्निहितनायक)-अङ्क में नायक के उपाया- सुष्ठान (चरित) ओर फलभोग को साक्षात् रूप से दिखलाना चाहिये (मि०, अभि० भा०)। इस (अङ्क) में पताकास्थानक होने चाहियें और अरन्त मैं बीज के समान ही बिन्दु रखना चाहिये। इस प्रकार पात्र-प्रवेश आरदि करते हुए अरङ्कों की रचना करनी चाहिये।३७-३८।। टिप्पी-(१) ना० शा० (१८. १६), भा० प्र० (पृ० २३६)। (२) पताकास्थानक, बिन्दु तथा बीज का लक्षण ऊपर (१. १४, १७) में दिया जा चुका है। (३) बिन्दुरन्ते च बीजवत्-यह कथन दुरूह सा है। अन्ते च बीजवत्-अन्ते बीजपरामर्शयुक्त कुर्याद इत्यर्थः (प्रभा); At the end, the Expansion (Bindu) Just like the Germ (Bija)[at the beginning ?]-Haas. वस्तुतः इसका भाव यह प्रतीत होता है कि समस्त कथावस्तु में अनुस्यूत जो बीज रूप अर्थ है उसका परामर्श तो अङ्ध के अन्त में आवश्यक है ही; कथा-प्रवाह को अविच्छिन्न बनाये रखने के लिये बीज के समान बिन्दु भी वहाँ अवश्य होना चाहिये। नाटक में अङ्कों की संख्या :- यह नाटक न्यून से न्यून पाँच अङ्रों का और अधिक से अधिक दस अड्कों का होना चाहिये।३।। टिप्पणी-(१) ना० शा० (१८. २६), भा० प्र० (पृ० २३७), ना० द० (१. १७), सा० द० (६. ८)। (२) पाँच से लेकर दस अङ्ों तक के नाटक संस्कृत

Page 286

तृतीय: प्रकाशः २३७

इत्युक्त नाटकलक्षणम्। (४४) अथ प्रकरणे वृत्तमुत्पाद्यं लोकसंश्रयम्। अमात्यविप्रवणिजामेकं कुर्याच्च नायकम् ॥३६॥ धीरप्रशान्तं सापायं धर्मकामार्थतत्परम्। शेषं नाटकवत्सन्धिप्रवेशकरसादिकम्॥४०॥। कविबुद्धिविरचितमितिवृत्त लोकसंश्रयम्=अनुदात्तम् अमात्याद्यन्यतमं धीर- प्रशान्तनायक विपदन्तरितार्थसिद्धि कुर्यात् प्रकरणे। मन्त्री अमात्य एव। सार्थवाहो वशिग्विशेष एवेति स्पष्टमन्यत् । साहित्य में हैं; जैसे विक्रमोर्वशीय पाँच अङ्ों का है, वेणीसंहार छह अङ्डों का है, अभिज्ञानशाकुन्तल सात अङ्डों का है। इसी प्रकार ८, ६ अङ्कों वाले नाटक भी हैं। बालरामायण दस अड्डों का नाटक है। 8F): इस प्रकार नाटक का लक्षण कहा गया। कप्रकर प्रकरण में लोक-स्तर का कवि-कल्पित (उत्पाद्य) इतिवृत्त तथा अमात्य, विप्र और वशिक में से कोई एक नायक रखना चाहिये, जो धीर- प्रशान्त हो एवं धर्म, काम और अर्थ (त्रिवर्ग) में तत्पर हो किन्तु उसकी कार्य- सिद्धि विध्नों से युक्त हो (सापायम्)। प्रकरण में शेष सन्धि, प्रवेशक और रस आदि नाटक के समान ही रखने चाहियें।३६-४०। प्रकरण का इतिवृत्त कवि-बुद्धि-कल्पित (=उत्पाद्य) तथा लोकसंश्रय अर्थात् अनुदात्त रखना चाहिये तथा अमात्य आदि में से कोई एक, जो धीरप्रशान्त हो, जिसकी कार्यसिद्धि आपत्तियों से व्यवहित हो (अर्थात् सिद्धि-प्राप्ति में विध्न हों), नायक रखना चाहिये। मन्त्री अमात्य ही होता है और सार्थवाह विशेष प्रकार का वशिक (व्यापारी) ही होता है (टि०)। अन्य स्पष्ट ही है। टिप्पणी-(१) ना० शा० (१८. ४४-५७), भा० प्र० (पृ० २४१), ना० द० (२. ११७), प्रता० (३. ३८ ), सा० द० (६. २२४-२२५) । (२) प्रकरण का प्रसिद्ध उदाहरण मृच्छकटिक है। उसका नायक चारुदत्त विप्र है, धीरप्रशान्त है, धर्म तथा काम में तत्पर। उसकी कार्यसिद्धि शकार की दुश्चेष्टाओं से विध्नयुक्त है। इसी प्रकार मालतीमाधव नामक प्रकरण का नायक अमात्य है तथा पुष्पदूषितत नामक प्रकरण का नायक वणिक है। (३) ना० द० (२. ११७ वृत्ति) में यह सिद्ध किया गया है कि प्रकरण में सेनापति और अमात्य धीरोदात्त नायक होते हैं धीर- प्रशान्त नहीं। किन्तु दश० तथा सा०द० आदि के अनुसार ये धीरप्रशान्त हो होते हैं। (४) लोकसंश्रयम्- लौकिक, लोक-सामान्य का, लोक स्तर का-लोकः संश्रयो यस्य तत् (वृत्तम्) । धनिक ने इसका अर्थ 'अनुदात्त' किया है। इसका अभिप्राय है कि प्रकरण का नायक उदात्त कोटि का नहीं होता। ना० शा० (१८. ४६) में भी

Page 287

२३६ दशरूपकम्

(४५) नायिका तु द्विधा नेतु: कुलस्त्री गणिका तथा। क्वचिदेकेव कुलजा वेश्या क्वापि द्वयं क्वचित् ॥४१।। कुलजाभ्यन्तरा, बाह्या वेश्या, नातिक्रमोऽनयोः। आभि: प्रकरणं त्रेधा, सङ्कीणं घूर्तसड्कुलम् ॥४२॥ वेशो भृति: सोस्या जीवनमिति वेश्या तद्विशेषो गणिका। यदुक्तम्- प्रि प्रताक 'भिरभ्यरथिता वेश्या रूपशीलगुणान्विता। (ि लभते गणिकाशब्दं स्थानं च जनसंसदि ॥' एवं च कुलजा, वेश्या, उभयमिति त्रेधा प्रकरणे नायिका। यथा वेश्यैव तरङ्ग दुत्ते, कुलजव पुष्पदूषितके, ते द्वे अपि मृच्छकटिकायामिति। कितवद्यूतकारादिधूरत- सङ्क लं तु मृच्छकटिकादिवत्स ङ्वीर्णा प्रकरणमिति। उदात्तनायक और दिव्यचरित का प्रकरण में निषेध किया गया है। (५) ना० शा० (१८. ४८) में अ्रमात्य से पृथक् 'सचिव' (मन्त्री) तथा वणिक से पृथक् 'सार्थवाह' का ग्रहण किया गया है। दश० में ऐसा नहीं किया गया। इसीलिये धनिक ने "मन्त्री अमात्य एव' इत्यादि कहा है। भाव यह है कि मन्त्री का भी अमात्य' शब्द से ही ग्रहण हो जाता है। नेशक प्रकरण के नायक की नायिका तो दो प्रकार की होती है-कुलीन नारी तथा गणिका। किसी प्रकरण में अपकेली कुलीन नारी ही होती है। किसी में अकेली वेश्या और किसी में कुलीन नारी और वेश्या दोनों ही (यही संकीर्ण है)। इनमें कुलीन नारी आररभ्यन्तर(Indoors) और वेश्या बाह्य (out doors) नायिका होती है, इनका व्यतिक्रम नहीं होता (टि०)। इन तीन प्रकार की नायिकाओं के द्वारा (आभिः) प्रकरण तीन प्रकार का हो जाता है। उन तीन प्रकारों में जो संकीर्ण (प्रकरण) है, वह धूर्त पात्रों (जुआरी, शकार आदि) से युक्त होता है॥४१-४२।। वेश का अर्थ है भृति (पालन-पोषण) वह वेश ही उसका जीवन है अतः वह वेश्या कहलाती है। उस (वेश्या) का एक भेद ही गणिका है। जैसा कि कहा गया है-इन (?) के द्वारा प्रार्थित, रूप, शील आदि गुणों से युक्त वेश्या गणिका संज्ञा को प्राप्त करती है (=गणिका कहलाती है) तथा जन-सभाओं में स्थान प्राप्त करती है। इस प्रकार कुलीन नारी या वेश्या अथवा दोनों -- यह तीन प्रकार की नायिका प्रकरण में होती है। जैसे तरङ्गदत्त नामक प्रकरण में केवल वेश्या ही नायिका है, पुष्पदूषितक में कुलीन नारी ही और मृच्छकटिक में वे दोनों (प्रकार की) नायिकाएँ हैं। मृच्छकटिक आदि जैसा सङ्कीर्एं प्रकरण तो कितव, जुभारी आादि धूतों से युक्त होता है।

Page 288

तृतीय: प्रकाशः २३६

श्रंथ नाटिका- (४६) लक्ष्यते नाटिकाप्यत्र सङ्कीर्णान्यनिवृत्तये। अ्र्रत्र केचित्- 'अनयोश्च बन्धयोगादेको भेद: प्रयोक्तृभिज्ञैयः । प्रख्यातस्त्वितरो वा नाटीसंज्ञाश्रिते काव्ये।।' इत्यमु भरतीयं श्लोकम् 'एको भेदः प्रख्यातो नाटिकाख्य इतरस्त्वप्रख्यातः प्रकरणिकासंज्ञो नाटीसंज्ञया द्व काव्ये आश्रिते' इति व्याचक्षाणः प्रकरशिकामपि मन्यन्ते। तदसत्। उद्दशलक्षरायोरनभिधानात्। समानलक्षणत्वे वा भेदाभावात्। टिप्पणी- (१) ना० शा० (१८.५०-५३), भा० प्र० (पृ० २४२), ना० द० (२'११८), सा० द० (६·२२६-२२७)। (२) नातिकमोऽनयो :- नायिका के भेद से प्रकरण तीन प्रकार के होते हैं-जहाँ नायिका (i) कुलीन नारी हो, (ii) वेश्या हो, (iii) कुलीन नारी तथा वेश्या दोनों हों। इनमें से पहिले दोनों शुद्ध प्रकरण कहलाते हैं और तीसरा संकीणं प्रकरण कहलाता है; क्योंकि इसमें दो प्रकार की नायिकाओं का संकर होता है। इस तृतीय भेद में कुलीन नारी को आभ्यन्तरा (घरके अन्दर रहने वाली, गृहिएी) और वेश्या को बाह्या (घरके बाहर रहने वाली, गृह-कार्यों से सम्बन्ध न रखने वाली) रखना चाहिये। यह नियम अनिवायं है, इसका भङ्ग नहीं होना चाहिये। (३) संकीएं धूर्तसङ्कुलम्-नायिका के भेद से जो प्रकरण के तीन भेद किये गये हैं उनमें तृतीय संकीणं प्रकरण कहलाता है। वह जुआरी शकार आदि धूर्तों से युक्त होता है। धनिक की वृत्ति में अन्वय इस प्रकार होगा-सङ्कीणंप्रकरणं तु कितवद्यूतकारादिधूर्तसङ्कुलं मृच्छकटिकादिवत् अथवा मृच्छकटिकादिवत् सङ्कीरण०। ना० द० (२.११८ वृत्ति), प्रता०-टीका (तृतीयं धूर्तसङ्कुलम्) तथा सा० द० (तत्र भेदस्तृतीयकः कितवद्य तकारादिविटचेट- सङ्कुल: ६.२२६-२२७) आदि के अनुशीलन से यही अर्थ सङ्गत है। (४) 'पुष्प- दूषितक' के स्थान पर ना० द० में पुष्पदूतिक, सा० द० में पुष्पभूषित पाठ है। अभि० भा० (पृ० ४३२) में पुष्पदूषितक' पाठ ही हैं। यह प्रकरण अनुपलब्ध है। नाटिका यहां (रूपक के) अन्य संकीर्ण भेदों की निवृत्ति के लिये नाटिका का भी लक्षण किया जा रहा है। कुछ (व्याख्याकार) सङ्कीएं रूपकों में (अन्) प्रकरशिका नामक भेव को भी मानते हैं। वे 'अनयोश्च०' [अर्थात् इन दोनों नाटक और प्रकरण की संघटना के योग से प्रयोक्ताओं को नाटीसंज्ञक काव्य में एक भेद जानना चाहिये चाहे वह प्रख्यात हो अथवा अप्रख्यात] इत्यादि भरतमुनि (१८.५७) के इ्लोक की इस प्रकार व्याख्या करते हैं-'एक भेद प्रसिद्ध है जो नाटिका कहलाता है और दूसरा अप्रसिद्ध है जो प्रकरणिका कहलाता है। इस तरह दो प्रकार के काव्य नाटी संज्ञा के आधार हैं।'

Page 289

२४० दशरूपकमू

वस्तुरसनायकानां प्रकरणाभेदात् प्रकरणिगकायाः । अतोऽनुद्दिष्टाया नाटिकाया यन्मु- निना लक्षणं कृतं तत्रायमभिप्रायः-शुद्धलक्षणसङ्करादेव तल्लक्षणे सिद्ध लक्षण- करणं सङ्कीर्णानां नाटिकैव कर्तव्येति नियमार्थं विज्ञायते। किन्तु यह ठीक नहीं; क्योकि प्रकरणिका का न तो नामनिर्देश किया गया है (उद्देश) और न लक्षणा ही बतलाया गया है। यदि कोई कहे कि नाटिका और प्रकरणिका का ससान ही लक्षण है तब तो दोनों में मेद नहीं होगा। वस्तुतः प्रकरणिका के वस्तु, रस और नायक का प्रकरण से कोई भेद नहीं होता, अतः यह प्रकरण से भिन्न नहीं (?) [क्योंकि वस्तु, नायक तथा रस ही रूपकों के भेदक तत्व हैं]। इस प्रकार जिसका (दस रूपकों में) नाम-निर्देश नहीं किया गया था उस नाटिका का जो भरतमुनि ने लक्षणा किया है, इसका यह अभिप्राय है कि शुद्ध रूपकों (नाटक और प्रकरण) के लक्षरों के संकर (मिश्रण) से ही उस (नाटिका) का लक्षण सिद्ध है फिर उसका लक्षणा इस नियम के लिये किया गया है-सङ्कीए रूपकों में विशेषतः नाटिका की ही रचना करनी चाहिये (अन्यों की नहीं)। क p टिप्पणी-(१) यद्यपि नाटिका दस रूपकों में नहीं आती तथापि भरत ने इसका (१८.५७ तथा आगे) लक्षणा किया है। ना० शा० का अनुसरण करते हुए दश० में भी इसका लक्षण किया गया है। (२) नाटिका संकीर्ण रूपक है। जैसा कि ऊपर (१.७ टि०) कहा जा चुका है, नाटक आदि दस शुद्ध रूपक हैं। उनमें से किसी दो या अधिक के लक्षणा जिसमें होते हैं वह संकीर् रूपक कहलाता है। ऐसे सङ्कीर्ण रूपक अ्र्प्रनेक प्रकार के हो सकते हैं। नाटिका में नाटक तथा प्रकरण दोनों के लक्षणों का संकर होता है। (३) अन्यनिवृत्तये-धनञ्जय का विचार है कि भरतमुनि ने नाटिका का लक्षण इसलिये किया है कि सङ्कीं रूपकों में नाटिका ही अधिक वाञ्छनीय है, अन्य संकीणं रूपक इतने वाच्छनीय नहीं। अभिनवगुप्ता- चार्य का मत इससे भिन्न है। तदनुसार भरतमुनि ने नाटक और प्रकरण के संकर से बनने वाले सङ्कोएं रूपक (नाटिका) का लक्षणा करके अन्य सङ्कीर्ण रूपकों का भी दिग्दर्शन करा दिया है। (४) 'अनयोश्च०' इत्यादि ना० शा० के श्लोक के आधार पर किन्हीं (?) व्याख्याकारों ने नाटिका और प्रकरणिका दो पृथक्-पृथक सङ्की्ण नाटक माने थे। धनिक ने उनके मत का खण्डन किया है। किन्तु आे चलकर ना० द० (१.३) में नाटिका और प्रकरशिका दोनों को पृथक्-पृथक् माना गया है और इन्हें रूपकों में जोडकर १२ रूपक मान लिये हैं। सा० द में भी १८ उपरूकों में नाटिका और प्रकरणिका दोनों को पृथक्-पृथक् गिनाया गया है। कहना न होगा कि धनञ्जय ने नाटिका को सङ्कीर्ण रूपक माना है। यह 'डोम्बी' इत्यादि नृत्य काव्यों से नितान्त भिन्न है। सा० द० आदि में सङ्की्ण रूपकों तथा डोम्बी इत्यादि नृत्यों को समान रूप से उपरूपकों के अन्तर्गत कैसे रख दिया है, यह चिन्तनीय है। (५) बन्धयोगात्-इतिवृत्तादिसाम्यात् (प्रभा)। (नाटिका में) उस (नाटक और प्रकरण के) संकर को दिखलाते हैं-

Page 290

तृतीय: प्रकाशः २४१

तमेव सङ्करं दर्शयति- (४७) तत्र वस्तु प्रकरण/न्नाटकान्नायको नृपः ।४३। प्रख्यातो धीरललितः शृङ्गारोडङ्गी सलक्षणः। उत्पाद्येतिवृत्तत्वं प्रकरणधर्मः, प्रख्यातनृपनायकादित्वं तु नाटकधर्म इति। एवं च नाटकप्रकरणनाटिकातिरेकेण वस्त्वादेः प्रकरणिकायामभावादङ्कपात्र- भेदात् यदि भेदस्तत्र (तदा) - (४८) स्त्रीप्रायचतुरक्कादिभेदकं यदि चेष्यते ॥४४। एकद्वित्र्यङ्कपात्रादिभेदेनानन्तरूपता। तत्र नाटिकेतिस्त्रीसमाख्ययौचित्यप्राप्तं स्त्रीप्रधानत्वम्, कैशिकीवृत्त्याश्रय- त्वाच्च। तदङ्गसंस्ययाऽल्पावमर्शत्वेन चतुरङ्कत्वमप्यौचित्यप्राप्तमेव। नाटिका में प्रकरण (के लक्षण) से वस्तु ली जाती है (अर्थात् वह कविकल्पित होती है)। इसका नायक नाटक (के लक्षण) से लिया जाता है। वह राजा होता है। वह प्रख्यात तथा धीर ललित होता है। नाटिका में अपने लक्षणों सहित शृङ्गार रस अङ्गी (प्रधान) होता है॥४३-४४॥। कल्पित इतिवृत्त होना, यह प्रकरण की विशेषता (धर्म) है और प्रख्यात राजा नायक होता है, इत्यादि नाटक की विशेषता है (ये दोनों विशेषताएँ नाटिका में भी होती हैं)। टिप्पणी-ना० शा० (१८.५८), भा० प्र० (पृ० २४३), ना० द० (२.१२१), सा० द० (६.२६६)। इस प्रकार प्रकरसिका में नाटक, प्रकरण तथा नाटिका से भिन्न वस्तु आदि नहीं होती। फिर भी यदि भ्रङ्कों की संख्या और पात्रों के भेद से (दोनों में) भेद माना जाये तब तो - (रूपकों के अनेक भेद हो जायेंगे, यह बतलाते हैं)- स्त्री-पात्रों का बाहुल्य, चार अङ्क होना इत्यादि को यदि (प्रकरणिगका और नाटिका का) भेदक माना जाये तब तो एक, दो या तीन अङ्क तथा पात्र आदि के भेद से (रूपकों के) अनन्त प्रकार हो जायेंगे ॥४४-४५॥ यहाँ (i) नाटिका इस स्त्री-वाची नाम (समाख्या) से तथा (ii) नाटिका कैशिका वृत्ति का आश्रय होती है, इस हेतु से भी नाटिका में स्त्री- पात्रों की प्रधानता मानना उचित है। उस (कैशिकी वृत्ति) के (नर्म आदि चार) अङ्गों की संख्या के अनुसार एवं अवमर्श सन्धि के अत्यल्प होने के कारण भी नाटिका में चार तङ्क होते हैं, यह मानना उचित है। टिप्पणी-(१) ना० शा० (स्त्रीप्राया चतुरड्डा १८.५६), भा० प्र० (पृ० २४४), ना० द० (२.१२१), सा० द० (६.२६६)। (२) कारिका का भाव यह है कि नाटिका में स्त्री-पात्रों का बाहुल्य होता है, चार अङ्क होते हैं, यह ठीक

Page 291

२४२ दणरूपकमु

60+ 104 000 विशेषस्तु- (४६) देवी तत्र भवेज्ज्येष्ठा प्रगल्भा नृपवंशजा।।४५।। गम्भीरा मानिनी, कृच्छ्रात्तद्वशान्न तृसङ्गमः । प्राप्या तु- (५०) *नायिका तादृशी मुग्धा दिव्या चातिमनोहरा ॥४६॥ तादृशीति नृपवंशजत्वादिधर्मातिदेशः । (५१) अन्तः पुरादिसम्बन्घादासन्ना श्रतिदर्शनैः। अनुरागो नवावस्थो नेतुस्तस्यां यथोत्तरम् ।।४७।। है। किन्तु केवल अङ्कों की संख्या और पात्रों के भेद से रूपकों के भेद नहीं होते, अपितु वस्तु नायक और रस के भेद से रूपकों के भेद हुआ करते हैं। (३) स्त्रीप्राय (स्त्रीप्रधानत्व) =स्त्री-पात्रों का बाहुल्य, प्रथम तो 'नाटिका' यह स्त्रीवाचक शब्द ही सूचित करता है कि नाटिका में स्त्री-पात्रों का बाहुल्य होता है, दूसरे नाटिका में कैशिकी वृत्ति की प्रधानता होने के कारणा शृङ्गार रस की प्रमुखता होती है और इसीलिये स्त्री-पात्रों की अधिकता हुआ करती है। (४) चतुरङ्गत्वम्=नाटिका में चार अङ्क होते हैं, (i) यहाँ कंशिकी वृत्ति का आश्रय लिया जाता है, जिसके (नर्म आदि) चार अङ्ग होते हैं अतः उन अ्ङ्गों की संख्या के अनुसार नाटिका में भी चार अङ्ध होते हैं। (ii) कथवस्तु के पाँच भाग (सन्धियाँ) होते हैं अतः सामान्यतः रूपक में पाँच अङ्क होने चाहियें। किन्तु नाटिका में अवमर्श सन्धि अत्यन्त संक्षिप्त होती है। अतः अवमर्श सन्धि और निर्वहण सन्धि से सम्बद्ध इतिवृत्त को एक श्रङ्क में रख दिया जाता है। इस प्रकार चार ही अङ्क होते हैं। नाटिका में (तत्र) विशेष बातें ये हैं :- उस (नाटिका) में देवी (महारानी) ज्येष्ठा होती है, वह राजवंशो- त्पन्ना होती है, प्रगल्भा, गम्भीरा तथा मानिनी होती है। उसके अरधीन होने के कारण (प्राप्य नायिका के साथ) नायक का मिलन बड़ी कठिनाई से होता है ।।४५-४६।। प्राप्तव्या तो- नायिका उसी प्रकार की (अर्थात् राजवंशोत्पन्ना) तथा मुग्धा होती है। वह दिव्य गुणों वाली और अत्यधिक मनोहर होती है ॥४६॥ 'ताहशी' (वंसी) शब्द के द्वारा राजवंत्र में उत्पन्न होना इत्यादि विशेषताओं की समानता दिखलाई गई हैं। अन्तः पुर आदि से सम्बन्ध होने के कारण वह (प्राप्य नायिका) नायक के निकट होती है। उसके विषय में सुनकर तथा उसे देखकर (श्रुति *'प्राप्यान्य' इत्यपि पाठः ।

Page 292

तृतीय: प्रकाश: २४३

नेता तत्र प्रवर्त्तत देवीत्रासेन शङ्कितः । प्रत्यासन्नायां नायकस्य देवीप्रतिबन्धान्तरित उत्तरोत्तरो नवावस्थानुरागो निबन्धनीयः । (५२) कैशिक्यङ्गश्चतुर्मिश्र युक्ताङकैरिव नाटिका ॥ ४८ ॥ प्रत्यड्कोपनिबद्धाभिहितलक्षण कैशिक्य ङ्गचतुष्टयवती नाटिकेति। अथ भाण :- (५३) भारस्तु धूर्तचरितं स्वानुभूतं परेए वा। यत्रोपवर्णायेदेको निपुण: पसडतो विटः ॥ ४६॥ सम्बोधनोक्तिप्रत्युक्ती कुर्यादाकाशभाषितैः। सूचयेद्वीरशृङ्गारौ शौयसौभाग्यसंरतवै ॥ ५० ॥ दर्शनैः) नायक का उसके प्रति (तस्याम्) उत्तरोत्तर नवीन अ्प्रनुराग होता जाता है। और, वह नायक देवी के भय से शङ्कित हुआ उस नायिका की ओर प्रवृत्त हुआ करता है ॥४७-४८॥ अर्थात् मुग्धा नायिका अन्तःपुर में वास अथवा सङ्गीत आदि के सल्बन्य से नायक के निकट होती है। उसके प्रति नायक का ऐसा अनुराग (नाटिका में) दिखलाना चाहिये जिसके बीच में देवी की बाधा हो (देवी-रूप विघ्न से व्यवहित हो) और जो उत्तरोत्तर नया-नया होता जाता हो। और, यह नाटिका जिस प्रकार चार अङ्कों से युक्त होती है उसी प्रकार कैशिकी वृत्ति के चार अङ्गों (नर्म, नर्मस्फिञ्ज, नर्मस्फोट तथा नर्मगर्भ) से युक्त होती है॥४८।। अर्थात् नाटिका के प्रत्येक अङ्ग में उपर्युक्त लक्षणा वाले कैशिकी वृत्ति के चारों अङ्गों में से एक-एक दिखलाया जाता है। टिप्पणी-(१) नाटिक-लक्षण-ना० शा० (१८. ५७-६०), भा० प्र० (पृ० २४३-२४४), ना० द० (२.१२१-१२३), सा० द० (६. २६६-२७२) (२) कंशिकी वृत्ति और उसके अ्ङ्ग (द्र0 ऊपर २.४८-५२)। (३) हर्षकृत रत्नावली तथा प्रियदशिका आदि नाटिका के उदाहरण हैं। नाटिका का एक प्रकार 'सट्टक' भी माना जाता है। उसमें प्रवेशक और विष्कम्भक नहीं होते। अङ्कों के स्थान पर चार वार यवनिकापात दिखलाया जाता है और प्राकृतभाषा का ही प्रयोग होता है; जैसे राजशेखर की क्पू रमञ्जरी एक सट्टक है (मि०, भा० प्र० पृ० २४४)। भाण वह (रूपक) है, जिसमें (i) कोई कुशल एवं बुद्धिमान् विट (द्र० टि०) अपने द्वारा अनुभूत या किसी दूसरे के द्वारा अनुभूत धूर्त-चरित का वर्शन करता है; (ii) वह आकाशभाषित के द्वारा सम्बोधन एवं उक्ति प्रत्युक्ति करता है; (iii) शौर्य के वर्णन द्वारा वीर रस की तथा विलास (सौभाग्य) के वर्णन द्वारा शरङ्गार रस की सूचना देता है; (iv) उसमें

Page 293

२४४ दशरूपकम्

भूयसा भारती वृत्तिरेकाङकं वस्तु कल्पितम्। मुखनिर्वहणो साङ्गे लास्याङ्गानि दशापि च ॥ ५१॥ धूर्ता्चौरद्यूतकारादयस्तेषां चरितं यत्रैक एव विटः स्वकृतं परकृतं वोपवर्णं- यति स भारतीवृत्तिप्रधानत्वाद्गाणः एकस्य चोक्तिप्रत्युक्तय आकाशभाषितैराशद्कितोत्त- रत्वेन भवन्ति। अस्पष्टत्वाच्च वीरशृङ्गारौ सौभाग्यशौर्योपवर्णानया सूचनीयौ।

अधिकतर भारती वृत्ति होती है; (v) एक श्रङ्ख होता है; (vi) कथावस्तु कल्पित होती है; (vii) अपने अङ्गों सहित मुख और निर्वहण दो सन्धियां होती हैं और (viii) लास्य के दस अङ्ग होते हैं॥४६-५१।। (कारिका में) धूर्त से अभिप्राय है चौर, जुआरी इत्यादि। जहाँ अपने द्वारा किये गये (अनुभूत=कृत) अथवा दूसरे के द्वारा किये गये उन (धूर्तों) के चरित का अकेला विट ही वर्णन करता है, वह (रूपक) भारती वृत्ति की प्रधानता होने के कारण भाण कहलाता है। एक ही व्यक्ति की उत्ति-प्रत्युक्तियाँ प्ररकाश- भाषित (नामक नाट्योक्ति) के द्वारा (क्या कहा? मैं यहाँ हूँ इत्यादि) उत्तर की आशङ्का करके बन जाती हैं। और, यहाँ प्रस्पष्ट होने के कारण विलास (सौभाग्य) तथा शौर्य की वर्ना द्वारा ही क्रमशः शृङ्गार तथा वीररस की सूचना दी जाती है। टिप्पणी-(१) ना० शा० (१८. १०७-११०); भा० प्र० (पृ० २४४-२४५), ना० द० (२.१२६-१३०), प्रता० (३. ३६-४०), सा० द० (६.२२७-२३०)। (२) भारतीवृत्तिप्रधानत्वात् भार ;- भारती वृत्ति शब्द-वृत्ति है। इसमें वाचिक अभिनय की प्रघानता होती है। विशेष रूप से वाचिक व्यापार (=भणन) के कारण ही यह रूपक भार कहलाता है। ना० द० के अनुसार-'भण्यते व्योमोक्त्या नायकेन स्वपर वृत्तं प्रकाश्यतेऽत्रेति भाणग': । (३) स्पष्टत्वात्-भाण में किसी वीर-रस- प्रधान या शृङ्गार-प्रधान चरित का वर्णन नहीं होता अतः ये रस स्पष्टतः नहीं दिखलाये जाते; अपि तु विलास-वर्शंन के द्वारा शृङ्गार रस की सूचना दी जाती है और शौर्य-वर्णन द्वारा वीर रस की। अस्पष्टत्वात् =शृङ्गारवीरप्रधानचरितस्या- दर्शनाद भार। (४) आकाशभाषित का लक्षणा (ऊपर १.६७), भारतीवृत्ति (ऊपर ३.५ तथा आगे)। (५) विट द्र० (ऊपर २.६), ना०शा० (३५.५५) तथा सा० द० (३.४१) । [६] सा० द० में 'लीलामधुकर' नामक भाण उदाहरण के रूप में दिखलाया गया है।

Page 294

तृतीय: प्रकांश: २४५

लास्याङ्गानि- (५४) गेयं पदं स्थितं पाठ्यमासीनं पुष्पगसडका। प्रच्छेदकस्त्रिगूढ़ च सैन्धवाख्यं द्विगूढ़कम् ॥ ५२ ॥। उत्तमोत्तमकं चान्यदुक्तप्रत्युक्तमेव च । लास्ये दशविधं ह्ये तद्ङ्गनिर्देशकल्पनम्*॥५३॥ शेषं स्पष्टमिति। लास्य के प्रङ्ग- (१) गेयपद, (२) स्थितपाठ, (३) आरसीन, (४) पुष्पगरिडका, (५) प्रच्छेदक, (६) त्रिगूढ़, (७) सैन्धव, (८) द्विगूढ़क, (६) उत्तमोत्तमक औरर (१०) उक्तप्रत्युक्त-इन दस प्रकार के अङ्गों का लास्य में निर्देश किया गया है।५२-५३।। शेष स्पष्ट है। टिप्परी-(१) ना० शा० (१८. ११६-१३५), भा० प्र० (पृ० २४५-२४६), सा० द० (६. २१२-२२३)। (२) लास्याङ्गों के प्रयोग से नाटय में विशेष हृदया- हबादकता (रञ्जना-वैचित्र्य) आ जाया करती है, इसीलिये इनका रूपक में विधान किया गया है (अभि० भा० १६. १२०)। (३) विविध ग्रन्थों में निरूपित लास्याङ्गों के स्वरूप में अन्तर है। सा० द० के अनुसार इनका संक्षिप्त स्वरूप यह है :- (१) गेयपद-सामाजिकों के सामने बैठकर वीणा आदि वाद्य के साथ अभिनय-शून्य (शुद्ध) गाना ही गेयपद है। (२) स्थितपाठ्य-काम-पीडित नायिका का बैठकर प्राकृत भाषा में गाना स्थितपाठ्य है। (३) आ्सीन-शोक या चिन्ता से युक्त नारी का बिना किसी वाद्य के और बिना आङ्गिक अभिनय के ही बठकर गाना आसीन है। (४) पुष्पगण्डिका-आतोद्य (वाद्य) के साथ पुरुष के वेश में स्त्री का विविध छन्दों में गाना पुष्पगण्डिका है। (५) प्रच्छेदक-अपने प्रियतम को अन्य नायिका में आसक्त मानकर प्रम- विच्छेद से उत्पन्न क्रोध के साथ स्त्री का वीणा-सहित गायन ही प्रच्छेदक है। (६) त्रिगूढ - स्त्रीवेशधारी पुरुषों का मधुर अपरभिनय त्रिगूढ है। (७) सैन्धव-जब कीई पात्र रसोचित सङ्केत को भूलकर (भ्रष्टसङ्कतः अभि० भा०) वीणा आदि वाद्य की क्रिया से युक्त होकर प्राकृत-वचन कहता है, वह सैन्धव है। (८) द्विगूढ-मुख तथा प्रतिमुख से युक्त, चतरस्रपद तथा रस-भाव आदि से पूर्णं गीत द्विगूढ़ है (यहाँ मुख-प्रतिमुख एवं चतुरस्रपद का अर्थ विवादास्पद है)। (8) उत्तमोत्तमक-कोप, प्रसाद तथा अधिक्षेप से युक्त, उत्तरोत्तर रस का आश्रय, हाव-हेला से युक्त, विचित्र श्लोक-रचना से मनोहर गायन उत्तमोत्तमक है। (१० उत्तप्रश्युक्त-उक्ति-प्रत्युक्ति से युक्त, उपालम्भपूर्र, भूठ से युक्त तथा विलास से युक्त गीत उक्त-प्रत्युक्त है। *'लश्षणम्' इति पाठान्तरम्।

Page 295

२४६ दशरूपकेवु

अथ प्रहसनम्- (५५) तद्वत्प्रहसनं त्रेधा शुद्धवैकृतसङ्करैः।

तत्र शुद्ध तावत्- (५६) पाखडविप्रप्रभृतिचेट चेटीविटाकुलम् ॥५४॥ चेष्टितं वेषभाषाभिः शुद्धं हास्यवचोन्वितम्। पाखण्डिन := शाक्यनिर्ग्रन्थप्रभृतयः, विप्राश्चात्यन्तमृजवः, जातिमात्रोपजी- विनो वा प्रह्सनाङ्गिहास्यविभावाः। तेषां च यथावत्स्वव्यापारोपनिबन्धन चेटचेटी- व्यवहारयुक्तं शुद्ध प्रहसनम् । विकृतं तु- (५७) कामुकादिव चोवेषैः षएढकञ्चुकितापसैः ॥५५॥ विकृतं, ४. प्रहसन- उस (भाग) क्रे समान ही प्रहसन होता है। वह शुद्ध, वैकृत और सहर के सेद से तीन प्रकार का है।५४-५५।। (कारिका में) तद्वत् (उसके समान)=भाणग के समान; इस प्रकार वस्तु, सन्धि, सन्ध्यङ्ग और लास्य आदि की (भारग के साथ) समानता दिखलाई गई है (अ्तिदेशः) । उनमें से शुद्ध प्रहसन है- जो पाखणडी, विप्र इत्यादि तथा चेट, चेटी और विट से भरा होता है, उनके चरित, वेश तथा भाषा से युक्त होता है (?) तथा हास्य-वचनों से व्याप्त होता है, वह शुद्ध प्रहसन है। पाखण्डी=बौद्ध और निर्ग्रन्थ(नग्न या जैन) इत्यादि। विप्र अर्थात् अत्यन्त सदल ववधाय वाले अ्रथया केवल जाति से जीविका चलाने वाले ब्राह्मण। ये प्रहसन के अङ्गी (प्रधान) रस हास्य के विभाव होते हैं। जहाँ इनके अपने चरित (व्यापार) का यथोचित निरुपण किया जाता है और जो चेट-चेटी आदि के व्यवहार से युक्त होता है, वह शुद्ध प्रहसन है। विकृत प्रहसन- जो कामुक आदि की भाषा और वेष को धारण करने वाले नपुं सक, कञ्चुकी तथा तपसवी पात्रों से युक्त होता है, वह विकृत प्रहसन है।।५५॥

Page 296

तृतीय: प्रकाश। २४७

कामुकादयो भुजङ्गचारभटाद्याः। तद्वषभाषादियोगिनो यत्र षण्ढकञ्चुकि- तापसवृद्धादयस्तद्विकृतम, स्वस्वरूपप्रच्युतविभावत्वात्। (५७ क) सङ्कराद्वीथ्य। सङ्कीणं धूर्तसङ्कुलम्। वीथ्यङ्गस्तु सङ्कीर्णत्वात् सङ्कीर्णम्। (५८) रसस्तु भूयसा कार्यः षड्विधो हास्य एव तु ॥ ५६॥ इति स्पष्टम् । कामुक इत्यादि का अर्थ है-कामुक (भुजङ्ग), दूत (चार) और योद्धा इत्यादि। उनके वेष-भाषा आदि को धारण करने वाले नपुसक, कञचुकी, तपस्वी तथा वृद्ध आदि जहाँ होते हैं, वह विकृत प्रहसन है, क्योंकि वहाँ जो (कामुक आदि) विभाव हैं, वे अपने-अपने (नपुंसक आदि) रूप को छोड़कर इन विभावों के रूप में आते हैं (यह विकृति=परिवर्तन है)। सङ्कीएं प्रहसन-

कहलाता है। वीथी (के अङ्गों) से मिश्रित तथा धूर्तों से भरा हुआ प्रहसन सङ्कीर्ण

वीथी के शङ्गों से सङ्कीर्ण होने के कारण यह सङ्कीर्ण कहलाता है। प्रहसन में ६ प्रकार का हास्य प्रचुरता से रखना चाहिये ॥५६॥ यह स्पष्ट ही है। टिप्पणी-(१) ना० शा० (१८. १०१-१०७), भा० प्र० (पृ० २४७), ना० द० (२. १३१-१३३), प्रता० (३.४१-४४), सा० द० (६. २६४-२६८)। (२) ना० शा० तथा ना० द० में प्रहसन के दो भेद किये गये हैं-शुद्ध तथा सङ्गीणं। सा० द० में कहा गया है कि भरत मुनि के अनुसार विकृत का भी सङ्कीरणं में ही अन्तर्भाव हो जाता है। (३) प्रहसन के लक्षण तथा भेदों के स्वरूप के विषय में विद्वानों के भिन्न-भिन्न मत हैं। दश० का पाठ भी अत्यन्त स्पष्ट नहीं है। दश० के अनुसार यह कहा जा सकता है कि जो भाण के समान वस्तु, सन्धि सन्ध्यङ्ग और लास्याङ्गों से युक्त होता है, जिसमें ६ प्रकार के हास्य का प्रचुरता से निरूपण किया जाता है वह प्रहसन नामक रूपक है। हास्य के ६ प्रकार हैं-स्मित, हसित, विहसित, उपहसित, अपहसित, अतिहसित (आगे ४. ७६-७७)। प्रहसन के तीन प्रकार हैं-(i) शुद्ध-जिसमें पाखण्डी आदि में से किसी एक के चरित का वर्णन किया जाता है; अर्थात् पाखण्डी विभाव होते हैं और उनके प्रति चेट, चेटी, विट आदि के हास्यवचन-पूर्ण व्यवहार दिखलाये जाते हैं। जैसे कन्दर्पकेलि (सा०द०) सागर-कौमुदी ( भा० प्र०) शुद्ध प्रहसन हैं । (ii) विकृत-जिसमें नपुंसक, कञ्चुकी, तपस्वी आदि कामुक आदि का वेष धार करके उनकी भाषा में ही उनके चरित को प्रकट करते हैं, जैसे कलिकेलि (भा० प्र०) । (iii) सड्कीर्ण-जो वीथी के अङ्गों से युक्त होता है तथा जिसमें अनेक धूर्तों का चरित वर्णित होता है, जैसे धूर्तचरितम (सा० द०), सैरन्ध्रिका (भा० प्र०) । (४) चेष्टितम्-वृत्तं (ना० द० २-१३), चरित।

Page 297

२४० दश रूपकमु

परथ डिम :- (५६) डिमे वस्तु प्रसिद्ध स्याद्वत्तयः कैशिकीं विना। नेतारो भूतप्रेतपिशाचाद्याः षोडशात्यन्तमुद्धताः। रसैरहास्यशृङ्गारै: डभिर्दीप्तैः समन्वितः ॥ ५८ ॥ मायेन्द्रजालसंग्रामक्रोधोद्भ्रान्तादिचेष्टितैः । चन्द्रसूर्योपरागैश्च न्याय्ये रोद्ररसेडङ्गिनि॥ ५६ ॥ चतुरदूश्चतुर्सन्धिनिर्विमर्शो डिमः स्मृतः । 'डिम सङ्गाते' इति नायकसङ्गातव्यापारात्मकत्वाद् डिमः। तत्रेतिहाससिद्ध- मितिवृत्तम्, वृत्तयश्च कंशिकीवर्जास्तिस्त्रः, रसाश्च वीररौद्रबीभत्साद्भुतकरुणभया- नका: षट्, स्थायी तु रौद्रो न्यायप्रधानः, विमर्शरहिता मुखप्रतिमुखगर्भनिर्वहणाख्या- श्चत्वार: सन्धयः साङ्गाः, मायेन्द्रजालाद्यनुभावसमाश्रय: (यः)। शेष प्रस्तावनादि नाटकवत्। एतच्च- 'इदं त्रिपुरदाहे तु लक्षणं ब्रह्मरोदितम् । ततस्त्रिपुरदाहश्च डिमसंज्ञः प्रयोजितः ।।' इति भरतमुनिना स्वयमेव त्रिपुरदाहेतिवृत्तस्य तुल्यत्वं दशितम् । ५. डिम- डिम नामक रूपक में कथावस्तु प्रसिद्ध (प्रख्यात) होती है। इसमें कैशिकी को छोड़कर अन्य वृत्तियां (सात्वती, आरभटी और भारती) होती हैं। देव, गन्वर्व, यक्ष, राक्षस, महासर्प, भूत, प्रेत, पिशाच आदि १६ उद्धत नायक (पात्र) होते हैं। यह हास्य और शङ्गार से भिन्न ६ दीप रसों से युक्त होता है। इसमें न्यायप्रधान रौद्र रस अङ्गी होता है। यह माया, इन्द्रजाल, युद्ध, क्रोध और उद्भ्रान्ति (उत्तजना) आदि चेष्टाओं से तथा चन्द्रग्रहण और सूर्यग्रहण से युक्त होता है। चार अङ्कों वाला, विमर्श सन्धि के अरतिरिक्त चार सन्धियों वाला यह रूपक डिम कहा गया है ॥५७-५६॥ 'डिम संघाते' यह धातु है। इस रूपक में (सोलह) नायकों के समुदाय का चरित दिखलाया जाता है अतः यह डिम कहलाता है।। इसमें (i) इतिहास आदि में प्रसिद्ध इतिवृत्त होता है। (ii) कैशिकी को छोड़कर शेष तीन वृत्तियाँ होती हैं। (iii) वीर, रौद्र, बीभत्स अद्भुत, करुणा और भयानक ये ६ रस होते हैं। (iv) जिसमें न्याय की प्रधानता होती है ऐसा रौद्र प्रधान (अङ्गी) रस होता है। (v) विमर्श के अतिरिक्त मुख, प्रतिमुख, गर्भ और निर्वहण नामक चार सन्धियाँ पङ्गों सहित होती हैं, तथा (vi) इसमें माया इन्द्रजाल इत्यादि अनुभावों का आश्रय लिया जाता है। (vii) शेष प्रस्तावना आदि नाटक के समान ही होते हैं। और यह बात भरतमुनि ने स्वयं ही त्रिपुरदाह के इतिवृत्त की समानता के द्वारा इस प्रकार दिखलाई है-'ब्रह्मा ने त्रिपुरदाह में यह लक्षणा बतलाया है इसी से त्रिपुरदाह को डिमसंज्ञक कहा गया है।'

Page 298

तृतौय: प्रकाश। २४ह

पथ व्यायोग :- (६०) ख्यातेतिवृत्तो व्यायोगः ख्यातोद्धतनराश्रयः॥६०। हीनो गर्भविमर्शाभ्यां दीप्ता: स्युर्डिमवद्रसाः। अ्स्त्रीनिमित्तसंग्रामो जामदृग्न्यजये यथा ॥६१॥ एकाहाचरितैकाङ्को व्यायोगो बहुभिनरैः। व्यायुज्यन्तेऽस्मिन्बहवः पुरुषा इति व्यायोगः । तत्र डिमवद्रसाः षट् हास्य- शृङ्गाररहिताः। वृत्त्यात्मकत्वाच्च रसानामवचनेऽपि कैशिकीरहितेतरवृत्तित्वं रसवदेव टिप्पणी- (१) ना० शा० (१८. ८४-८८), भा० प्र० (पृ० २४७-२४८), ना० द० (२. १३४-१३५), प्रता० (३. ४५-४७), सा० द० (६. २४१-२४४)। (२) दीप्त :- वीर आदि दीप्त रस माने जाते हैं। अभि० भा० के अनुसार इस शब्द से यह प्रकट किया गया है कि डिम में शान्त रस नहीं होता, वीर आदि दीप्त रस ही होते हैं। (३) न्याथ्ये रौद्ररसेऽङ्ङ्गिनि-'न्याय्य' शब्द का अर्थ है न्याययुक्त । धनिक ने इसे 'न्यायप्रधान' शब्द से कहा है। भाव यह है कि डिम में रौद्र रस की प्रधानता होती है और उसका स्थायी भाव जो करोध है वह न्यायपूणं (उचित) हुआ करता है। जैसे त्रिपुरदाह में शिव का क्रोध न्यायपूर्रं है (मि०, न्यायमार्गीरनायकः, भा० प्र०)। (४) भा०प्र० में त्रिपुरदाह के समान वृत्रोद्धरण, तारकोद्धरण दो अन्य डिमों का भी नामोल्लेख किया गया है। ६. व्यायोग- व्यायोग की (i) कथावस्तु प्रसिद्ध (ख्यात) होती है। (ii) उसमें प्रख्यात तथा उद्धत नायक का आश्रय लिया जाता है। (iii) वह गर्भ एवं विमर्श सन्धि से रहित होता है। (iv) उसमें डिम के समान ६ दीप् रस हुआ करते हैं।(v) कैशिकी के त्र्प्रतिरिक्त वृत्तियां होती हैं। उसमें ऐसे युद्ध का वर्णन होता है जो स्त्री के निमित्त नहीं किया जाता; जैसे 'जाम- दग्न्यजय' (नामक व्यायोग) में है। (vii) उसमें एक दिन के चरित को दिखलाने वाला एक अङ्क होता है औरर (viii) अधिक संख्या में पुरुष पात्र होते हैं॥६०-६२।। जिसमें बहुत से पुरुष पात्र प्रयुक्त होते हैं वह व्यायोग कहलाता है (यह व्यायोग शब्द की व्युत्पत्ति है) । उसमें डिम के समान हास्य और शृङ्गार से भिन्न ६ रस होते हैं। भौर, रस वृत्त्यात्मक हुआ करते हैं, इसलिये यद्यपि(कारिका में व्यायोग की वृत्तियों का) निर्देश नहीं किया गया तथापि रसों के अनुसार ही कैशिको को छोड़कर भन्य वुत्तियाँ इसमें होती हैं, यह प्रफट हो जाता है। इसमें

Page 299

२५० दशरूपेकमू

लभ्यते। अस्त्रीनिमित्तश्चात्र संग्रामो यथा परशुरामेण पितृवधकोपात्सहस्त्रार्जुनवधः कृतः । शेषं स्पष्टम् । प्रथ समवकार :- (६१) कार्य समवकारेऽपि श्र्ामुखं नाटकादिवत् ॥६२। ख्यातं देवासुरं वस्तु निर्विमर्शास्तु सन्धयः। वृत्तयो मन्दकैशिक्यो नेतारो देवदानवा: ॥६३॥ द्वादशोदात्तविख्याता: फलं तेषां पृथक्पृथक्। ऐसे युद्ध का वर्णन होता है जिसका निमित्त स्त्री न हो, जैसे परशुराम ने अपने पिता के वध के क्रोध से सहस्रारजुन को मार दिया था। शेष स्पष्ट ही है। टिप्पणी-(१) ना० शा० (१८. ६०-६३), भा० प्र० (पृ० २४८), ना० द० (२-१२५), प्रता० (३. ४८), सा०द० (६, २३१-२३३) । (२) ना० द० के अ्रनुसार व्यायोग में नायिका तथा दूती आदि पात्र नहीं होते। कैशिकी वृत्ति के न होने से उसमें स्त्री-पात्र स्वल्प होते हैं। (३) वृत्त्यात्मकत्वाच्च रसानाम्-क्योंकि भारती आदि जो शब्दवृत्ति एवं अर्थवृत्ति हैं, वे नायकों के नाट्यगत व्यापार ही हैं औोर दश० के अनुसार रस वाक्यार्थ के रूप में होता है अतः रस वृत्त्यात्मक हैं- वुत्तियों के स्वरूप में हुआ करते हैं। इसलिये जहाँ रस हैं वहाँ वृत्तियां होती ही हैं। व्यायोग में भी रसों के अनुसार वृत्तियाँ होती है। यहाँ हास्य तथा शृङ्गार रस नहीं होते और शृङ्गार में कैशिकी वृत्ति हुआ करती है अतः वह व्यायोग में नहीं होती। (४) किन्हीं आचार्यों का मत है कि व्यायोग में समवकार के समान १२ नायक होते ह (द्र० अभि० भा०, ना०द०)। इसका नायक राजर्षि या दिव्य होता है (ना० बा० तथा सा० द०)। (५) व्यायोग का उदाहरण है-सौगन्धिकाहरण (सा०द०)। ७. समवकार- ससवकार में भी नाटक आदि के ससान (i) आमुख रखना चाहिये। (ii) इसमें देव तथा असुरों की प्रसिद्ध कथा होती है। (iii) विमर्श को छोड़कर अन्य चार सन्धियां होती हैं। (iv) कैशिकी की अल्पता के साथ बारों वृत्तियाँ होती हैं। (v) इतिहास-प्रसिद्ध उदात्त प्रकृति के देव एवं दानव बारह नायक होते हैं, उन सबके प्रयोजन भिन्न-भिन्न हुआ करते हैं। (vi) उन सभी में वीर रस की प्रचुरता होती है जैसे कि समुद्रमन्थन (नामक समवकार) में है। (vii) यह तीन अ्रङ्रों का होता है। (viii) इसमें

Page 300

तृतीयः प्रकाश। २५१

बहुवीररसाः सर्वें यद्वदम्भोधिमन्थने ।६४॥। अङ्कैस्त्रिभिस्त्रिक पट रित्र शृङ्गारस्त्रिविद्रवः । द्विसन्घिरङकः प्रथम: कार्यो द्वादशनालिक :* ॥६५।। चतुर्द्विनालिकावन्त्यौ नालिका घटिकाद्वयम्। वस्तुस्वभावदैवारिकृताः स्युः कपटास्त्रयः ॥६६॥ नगरोपरोधयुद्धे वाताग्न्यादिकविद्रवाः । धर्मार्थकामैः शृङ्गारो नात्र बिन्दुप्रवेशकौ ॥६७॥ वीथ्यङ्गानि यथालाभं कुर्यात्प्रहसने यथा। समवकीयंन्तेऽस्मिन्नर्था इति समवकारः। तत्र नाटकादिवदामुखमिति समस्त- रूपकारगामामुखप्रापरम्। विमर्शवर्जिताश्चत्वारः सन्धयः, देवासुरादयो द्वादश मायकाः, तेषां च फलानि पृथक्पृथग्भवन्ति यथा समुद्रमन्थने वासुदेवादीनां लक्ष्म्यादि- लाभा:, वीरश्चाङ्गी, अङ्गभूता: सर्वे रस्षाः, त्रयोऽड्ाः, तेषां प्रथमो द्वादशनालिका- तीन कपट, तीन शृङ्गार और तीन विद्रव होते हैं। (ix) प्रथम अङ्क में (मुख तथा प्रतिमुख) दो सन्धियां रखनी चाहियें तथा इसकी कथा १२ नाड़ी (२४ घड़ी) की होनी चाहिये। शेष दो अर्क क्रमशः (द्वितीय) चार नाड़ी (८ घड़ी) और(तृतीय) दो नाड़ी (४ घड़ी) के होने चाहियें। नाड़ी (नालिका) दो घड़ी की होती है। समवकार में तीन कपट होते हैं-वस्तु-सवभावकृत, दैवकृत और अरिकृत। इसमें नगरोपरोध, युद्ध तथा वायु एवं अग्नि आरदि द्वारा किये गये (तीन) विद्रव (उपद्रव) होते हैं। धर्म, अरथ और काम से युक्त (तीन प्रकार का) शृङ्गार होता है। (x) इसमें बिन्दु (नामक अरथप्रकृति) और प्रवेशक (नामक अरथोपच्ेपक) नहीं होता। (xi) प्रहसन के समान ही यथायोग्य वीथी के अङ्ग भी हुआ करते हैं ।।६२-६७।। जिसमें अ्रनेक प्रयोजन भली भाँति निबद्ध किये जाते हैं वह समवकार है (यह समवकार शब्द की व्युत्पत्ति है)। इसमें भी नाटक आदि के समान परामुख होता है (कारिका के) इस वचन से सभी रूपकों में आमुख का होना प्रकट होता है। समवकार में विमर्श को छोड़कर अन्य चार सन्धियाँ होती हैं। देव, प्रसुर इश्यादि १२ नायक होते हैं, उनके प्रयोजन भिन्न-भिन्न हुआ करते हैं, जैसे समुद्र-मन्थन में विष्यु आदि को लक्ष्मी आदि की प्राप्ति होती है। उसमें वीरश्स चङ्गी (प्रधान) होता है और अन्य सभी रस शङ्ग होते हैं। तीन अङ्क होते हैं। उनमें प्रथम भरङ्क का इतिवृत्त १२ नाड़ी में समाप्त हुआ करता है। द्वितीय और वृतीय भ्रङ्ढ क्रम से चार नाड़ी और दो नाड़ी के होते हैं। नाड़ी (नालिका) दो घड़ी (घटिका) की होती है। प्रत्येक अङ्क में क्रमशः तीन कपट (प्रथम में वस्तु- स्वभावकृत, द्वितीय में दैवकृत और तृतीय में अरिकृत) तथा नगर का घेरा, युद्ध एवं वायु और अग्नि आदि के विद्रवों में से कोई एक विद्रव दिखलाया जाता है। *'नाडिकः' इति पाठान्तरम्। +'नाडिका' इति पाठान्तरम्।

Page 301

२५२ देशरूपेकम्

निरवृ त्तेतिवृत्तप्रमाः । यथासंख्यं चतुर्द्विनालिकावन्त्यौ, नालिका च घटिकाद्वयम् । प्रत्यङ्क' च यथासंख्यं कपटाः, तथा नगरोपरोधयुद्धवाताग्न्यादिविद्रवाणणां मध्य एकको विद्रवः कार्यः । धर्मार्थकामशृङ्गाराणामेककः शृङ्गारः प्रत्यङ्गमेव विघातव्यः । वीथ्यङ्गानि च यथालाभं कार्याणि। बिन्दुप्रवेशकौ नाटकोक्तावपि न विधातव्यौ । इत्ययं समवकारः । धर्म-शृङ्गार, अर्थ-शृङ्गार और काम-शृङ्गार में से एक-एक भृङ्गार प्रत्येक अङ्ग में दिखलाना चाहिये और वीथी के अङ्गों की भी यथायोग्य योजना करनी चाहिये। यद्यपि नाटक में बिन्दु और प्रवेशक का विधान किया गया है तथापि समवकार में वे नहीं रक्खे जाते। यही समवकार का स्वरूप है। टिप्परी-(१) ना शा० (१८. ६२-७७), भा० प्र० (पृ० २४६-२५०), ना० द० (२. १२६-१२६), प्रता० (३.४६-५२), सा० द० (६. २३४-२४०)। (२)सर्वेषां नायकानामर्था := प्रयोजनानि समवकीर्यन्ते=एकत्रीभवन्ति, अत्रेति समवकार इत्यर्थ: (प्रभा)। (३) त्रिकपट-कपट=वञ्चना (अभि०भा०), सत्य सा प्रतीत होने वाला मिथ्या-कल्पित प्रपञ्च (ना० द०)। तीन प्रकार के कपट की अनेक प्रकार से व्याख्या की गई है। संक्षेप में क्रूर प्राणी आदि से उत्पन्न होने वाला वस्तुस्वभावकृत कपट है, दवयोगात् या वायु आदि से उत्पन्न होने वाला दैवकृत है और किसी अपकारी द्वारा किया गया शत्रुकृत है। (४) त्रिविद्रव-विद्रवाः = उपद्रवाः (प्रभा), अनर्थ, जिससे लोग डरकर भागते हैं (अभि० भा०, ना० द०), कपटजन्य पलायन ही विद्रव है (प्रता० टीका)। इसके तीनों भेदों की व्याख्या भी भिन्न-भिन्न प्रकार से की गई है। धनञ्जय ने ना०शा० के वचन को ही कुछ हेर-फेर करके रख दिया है। अभिनवगुप्ताचार्य ने अचेतनकृत (वायु आदि से किया गया), चेतनकृत (हाथी आदि से किया गया) और उभयकृत (नगरोपरोध से किया गया)-ये तीन भेद किये हैं। ना० द० तथा सा० द० में अभि० भा० का ही अनुसरण किया गया है। त्रिशृङ्गार-शृङ्गार=शङ्गार का विषय प्रमदा (अभि० भा०). अथवा शृङ्गार का प्रसिद्ध अर्थ रतिभाव ही ग्राह्य है। अभि० भा० के अनुसार धर्मे शृङ्गारः=धर्म- शृङ्गारः, यह विग्रह है और सप्तमी विभक्ति (ध्म) के द्वारा हेतु तथा फल दोनों प्रकट किये गये हैं। भाव यह है कि जहां रतिभाव (या प्रमदा) की प्राप्ति धर्म के द्वारा होती है और उसका फल भी धर्म का आचरण होता है वह धर्मशृङ्गार है; जैसे पति-पत्नी-संयोग धर्मशृङ्गार है। यह व्रत तथा तप आदि से प्राप्त होता है और इसका फल है परस्त्रीत्याग आदि करते हुए गृहस्थ धर्म का पालन करना। अरथ- शृङ्गार है वेश्या आदि से संयोग यह षुरुष को धन (अथ) के द्वारा प्राप्त होता है और वेश्या की अर्थ-प्राप्ति इसका फल है। परस्त्री आदि से संयोग कामशृङ्गार है जो कामवश किया जाता है और केवल सुख-भोग (काम) ही उसका फल है। (द्र० अभि० भा० तथा ना०द०) (५०) समवकार का उदाहरण है समुद्रमन्थन या अमतमन्थन (भा० प्र०)।

Page 302

तृतीय: प्रकाश। २५३

अथ वीथी- (६२) वीथी तु कैशिकीवृत्तौ सन्ध्यङ्गाङ्कैस्तु भारदत ॥६८॥ रस: सूच्यस्तु शृङ्गारः स्पृशेद्पि रसान्तरम्। युक्ता प्रस्तावनाख्यातैरङ्गैरुद्घात्यकादिभिः ।६६॥। एवं वीथी विधातव्या द्वय कपात्रप्रयोजिता। वीथीवद्वीथी मार्गः अ्ङ्गानां पड्क्तिर्वा भाणवत्कार्या। विशेषस्तु रसः शृङ्गा- रोऽपरिपूर्णत्वाद् भूयसा सूच्यः, रसान्तराण्यपि स्तोकं स्पर्शनीयानि। कैशिकी वृत्ती रसौचित्यादेवेति। शेषं स्पष्टम्। ८. वीथी- वीथी तो कैशिकी वृत्ति में होती है। इसमें सन्धि के अङ्ग तथा अक्क भाग के समान होते हैं (अर्थात् मुख और निर्वहण दो सन्घियां होती हैं और एक अङ्क होता है) इसका (प्रधान) सूच्य रस शृङ्गार होता है किन्तु अन्य रसों का भी स्पर्श करना चाहिये। यह प्रस्तावना के उद्घात्यक आदि अङ्गों से युक्त होती है। इस प्रकार एक या दो पात्रों के द्वारा प्रयुक्त बीथी की योजना करनी चाहिये ॥६८-६६।। वीथी के समान होने से यह बीथी कहलाती है। वीथी का अर्थ है-मार्ग अथवा प्रङ्गों की पंकि। वीथी में प्रङ्गों की योजना भाण की तरह करनी चाहिये, (भाणग से) भेद यह है कि यहाँ पूर्ण वर्णन न होने के कारण शृङ्गार रस को ही बहुशः सूचित करना होता है, तथा शन्य रसों का भी अल्पमात्रा में स्पर्श किया जाता है। (शृङ्गार) रस के अनुकूल होने से ही यहाँ कैशिकी वृत्ति होती है। शेष स्पष्ट है। टिप्पणी-(१) ना० शा० (१८. १११-११३, वीथ्यङ्ग, ११४.), भा० प्र० (पृ० २५१), ना० द० (२. १४०-१४१), प्रता० (३.५३-५४), सा० द० (६. २५३-२५४, वीथ्यङ्ग २५५ ... )। (२) विशेषस्तु=किन्तु भेद यह है। भाण में वीर और शृङ्गार दोनों को सूचित किया जाता है किन्तु वीथी में केवल शृङ्गार को। (३) अपरिपूर्णंत्वात्=पूरं न होने के कारण, भाव यह है कि यहां शङ्कार का पूर्णतया वर्णन नहीं किया जाता अतः उसको बहुत से उपायों द्वारा सूचित करना होता है। (४) एक पात्र के आकाशभाषित द्वारा या दो पात्रों की उक्ति-प्रत्युक्ति द्वारा वीथी में वस्तु-वर्णन किया जाता है (सा० द०) । (४) ना०द० के अनुसार वीथी में वक्रोक्ति-वैचित्र्य हुआ करता है-वक्रोक्तिमार्गेए गमनाद वीथीव वी्थी। वकुलवीथी और इन्दुलेखा इत्यादि वीथी रूपक हैं (भा० प्र०)।

Page 303

२५४ दशरूपकम्

प्रथाङ :- (६३) उत्सृष्टिकाक्के प्रख्यातं वृत्त बुद्धया प्रपञचयेत्॥७॥ रसस्तु करुण: स्थायी नेतारः प्राकृता नराः। भाणवत्सन्धिवृत्त्यङ्गैयुक्तिः स्त्रीपरिदेवितैः ॥७१॥ वाचा युद्धं विघातव्यं तथा जयपराजयौ। उत्सृष्टिकाङ्क इति नाटकान्तर्गताङकव्यवच्छेदार्थम्। शेषं प्रतीतमिति। ६. उत्सृष्टिकाङ्ग- उत्सृष्टिकाङ्क (नामक रूपक) में (i) कवि को इतिहास-प्रसिद्ध इतिवृत्त अपनी बुद्धि से विस्तृत कर लेना चाहिये। (ii) इसमें करुण अङ्गी (स्थायी) रस होता है और (iii) साधारण जन नायक होते हैं। (iv) भाण के समान (मुख तथा निर्वहण) सन्धि, (भारती) वृन्नि तथा उनके अङ्गों की योजना (युक्तिः) होती है। (v) यह स्त्रियों के विलाप से युक्त होता है। (vi)इसमें वाग्युद्ध का वर्णन करना चाहिये तथा जय-पराजय का भी॥७०-७१॥ नाटक के श्रङ्क से भेद दिखलाने के लिये इसे उत्सृष्टिकाड्ग कहा जाता है। टिप्पणी- (१) ना०शा० (१८.६३-६६) भा०प्र० (पृ०२५१-२५३), ना० द० (२.१३६-१३७), प्रता० (३.५५), सा० द० (६.२५०-२५२)। (२) ...... व्यवच्छेवार्थम्-यह एक अङ् का रूपक है अतः इसे अङ्क भी कहा जा सकता है; किन्तु नाटक आदि में जो अङ्क होते हैं उनसे इसका भेद दिखलाने के लिये इसे उत्सृ- ष्टिकाङ्क कहते है (धनिक)। वस्तुतः इसके तथा नाटक आदि के अङ्क के रचना- विधान में अन्तर है। (अ्रङ्कलक्षराम्) उल्लङ्वय सृष्टिर्यस्य स उत्सृष्टिकः, स चासौऽङ्क रच इति उत्सृष्टिकाङ्क: (मि०, प्रता० टीका): अथवा उत्कान्ता विलोमरूपा सृष्टियं- वेत्युत्सृष्टिकाङ्क: (सा० द०)। अभि: भा० तथा ना० द० के अनुसार तो यह उत्सृ- ष्टिकाङ्क इसलिये कहलाता है; क्योंकि इसमें शोकग्रस्त नारियों का विशेष रूप से चित्रण होता है-उत्सृष्टिकाः शोचन्त्यः स्त्रियः। ताभिरङ्ितत्वाद उत्सृष्टिकाङकः। (३) भारगवत् सन्धिवृत्त्यङ्गर्युक्ति :- यहाँ अङ्ग के स्थान पर 'अङ्क' वाञ्छनीय प्रतीत होता है जिससे भाण के समान एक अङ्क होता है, यह अर्थ भी प्रकट हो सके।

Page 304

तृतोय: प्रकाशः २५४

अथेहामृग :- (६४) मिश्रमीहामृगे वृत्त चतुरङ्कं त्रिसन्धिमत् ॥७२॥ नरदिव्यावनियमान्नायकप्रतिनायकौ। ख्यातौ धीरोद्धतावन्त्यो विपर्यासादयुक्तकृत् ॥७३।। दिव्यस्त्रिय मनिच्छन्तीमपहारादिनेच्छतः । शृङ्गाराभासमप्यस्य किञ्चित्किञ्चित्प्रदुर्शयेत्।।७४।। संरम्भ परमानीय युद्धं व्याजान्निवारयेत्। वधप्राप्तस्य कुर्वीत वध नैव महात्मनः ।७५।। मृगवदलभ्यां नायिकां नायकोऽस्मिन्नीहते इतीहामृग: ख्याताख्यातं वस्तु। अन्त्य := प्रतिनायको विपर्यासाद्विपर्ययज्ञानादयुक्तकारी विधेयः। स्पष्टमन्यत्। १०. ईहामृग- ईहामृग नामक रूपक में (i) इतिवृत्त मिश्रित (अंशतः ख्यात, अ्रंशतः कल्पित) होता है (ii) जो चार अङ्कों तथा तीन सन्धियों (मुख, प्रतिमुख, निर्वहण) में विभक्त होता है; (iii) बिना किसी नियम के नर तथा देव नायक और प्रतिनायक होते हैं जो इतिहास-प्रासद्ध तथा धीरोद्धत होते हैं। (iv) इनमें से अ्र्प्रन्तिम (प्रतिनायक) भूल (भ्रान्ति) से अनुचित कार्य किया करता है। (v) वह न चाहती हुई दिव्य स्त्री को अपहरण आदि द्वारा प्राप्त करना चाहता है, इस प्रकार का वर्णन करके कवि को कुछ मात्रा में शृङ्गारा- भास भी प्रदशित करना चाहिये। (vi) युद्ध को चरमसीमा के वेग (सरम्भ) तक पहुंचाकर किसी बहाने से रोक देना चाहिये तथा (vii) वध की अवस्था तक पहुंचे हुये भी वीर का (महात्मनः) वध नहां करना चाहिये ॥७२-५।। इसमें मृग के समान नायक किसी अलभ्य नायिका को चाहता है इसलिये यह ईहामृग कहलाता है। इसकी कथावस्तु अंशतः इतिहास-प्रसिद्ध तथा अशतः कल्पित होती है। (कारिका में) अन्त्य ;= प्रतिनायक; उसे विपर्यास अरथात मिथ्या- ज्ञान के कारण अनुचित कार्य करने वाला दिखलाना चाहिये। अन्य स्पष्ट ही है। टिप्पणी-(१) ना० शा० (१८. ८०-८३), भा० प्र० (पृ० २५३), ना० द० (२. १३८-१३६), प्रता० (३. ५६-५७), सा० द० (६. २४५-२५०)। ना० व० तथा सा० द० में कुछ अधिक विशद विवेचन है। (२) अभि० भा० तथा ना० द० के अनुसार जिसमें केवल स्त्री के लिये मृग के समान ईहा होती है, वह ईहामूग कहलाता है-ईहा चेष्टा मृगस्येव स्त्रीमात्रार्था यत्र स ईहामृगः। (३) ईहामृग एक अङ्ध या चार अङ्क का होता है (ना० द०, सा० द०)। (४) शृङ्गाराभास-जहां अनुचित रति का वर्णन होता है वहाँ रत्याभास तथा शृङ्गाराभास होता है। ईहा-मृग में प्रतिनायक ऐसी नायिका की प्राप्ति के लिये चेष्टा करता है जो उससे प्रेम नहीं करती

Page 305

.२५६ दशरूपकमू

(६५) इत्थं विचिन्त्य दशरूपकलक्ष्ममार्ग- मालोक्य वस्तु परिभाव्य कविप्रबन्धान्। कुर्यादयत्नवदलङ्कृतिभि: प्रबन्धं वाक्यैरुदारमधुरैः स्फुटमन्दवृच्तैः॥७६॥ स्पष्टम् । ।। इति धनञ्जयकृतदशरूपकस्य तृतीयः प्रकाशः समाप्तः । वहां रति उभयनिष्ठ नहीं अतः शृङ्गाराभास है (द्र०, सा० द० ३. २६२)। (५) वधप्राप्तस्य०-चाहे कथावस्तु के मूलभूत आख्यान में वीर का वध व्गिगत हो तथापि यहां नहीं दिखलाना चाहिये (Haas)। नेपथ्य में भी वघ का वर्णान न करना चाहिये (ना० द०)। (६) ईहामृग का उदाहरण है-कुसुमशेखर (भा०प्र०) या कुसुमशेखर-विजय (सा० द०)। इस प्रकार दस रूपकों के लक्षणों के मार्ग का भली-भाँति विचार करके, वस्तु का निरीक्षण करके तथा कवियों की रचनाओं का अनुशीलन करके (परिभाव्य) किसी कवि को अकृत्रिम (अयत्नवद्) अलङ्कारों से युक्त, उदार (स्पष्ट अरथ वाले) एवं मधुर वाक्यों तथा स्पष्ट और सरल छन्दों के द्वारा रूपक (प्रबन्ध) की रचना करनी चाहिये।७६।। यह स्पष्ट ही है। टिप्पी-पयत्नवद०-'अयत्नवत्' के दो अरथ हो सकते हैं-(i) यह कुर्यात् का क्रियाविशेषण है, अयत्नवत् कुर्यात्=बिना आयास के प्रबन्ध-रचना करे; अर्थात् रचना में स्वाभाविकता हो, सहज प्रतिभा का उच्छलन हो; one may produce without effort(Haas), अयत्नवत्=अनायासेन=अक्लिष्टम् इत्यर्थः । क्लष्टरचनायामायाससंभवात् (प्रभा) । (ii) यह अलङ्कृति का विशेषण है- यत्नपूर्वक लाये गये अलङ्कारों के बिना=स्वाभाविक (अकृत्रिम) अलद्कारों से युक्त। इसके द्वारा कवियों को कृत्रिम अलद्धारों की भरमार करने के प्रति सचेत किया गया है। इस प्रकार इस तृतीय प्रकाश में नाटक आदि दस रूपकों के लक्षणों का विशद निरूपण किया गया है। प्रसङ्गानुसार नाटक का वस्तु-सन्निवेश, भारती वृत्ति उसके प्रस्तावना इत्यादि त्रङ्ग तथा अङ्ध का स्वरूप आदि भी दिखलाये गये हैं। इति तृतीय: प्रकाशः समाप्तः । 000100

Page 306

अथ चतुर्थः प्रकाशः

अथेदानीं रसभेदः प्रदरश्यते- (१) विभावैरनुभावैश्च सान्विकैर्व्यभिचारिभिः। आ्रनीयमानः स्वाद्यत्वं स्थायी भावो रसः स्मृतः ॥१।

तर्वा श्रोतृप्रेक्षकारणामन्तविपरिवर्तमानो रत्यादिर्वक्ष्यमाालक्षणः स्थायी स्वादगोचर- ताम्=निर्भरानन्दसंविदात्मतामानीयमानो रसः। तेन रसिका: सामाजिकाः, काव्यं तु तथाविधानन्दसंविदुन्मीलनहेतुभावेन रसवद् आयुर्वृ तमित्यादिव्यपदेशवत्। वस्तु, नायक और रस ये तीन रूपकों के भेदक तत्त्व हैं। इनमें से वस्तु तथा नायक का विस्तारपूर्वक वर्णन प्रथम तथा द्वितीय प्रकाश में किया गया है। तृतीय प्रकाश में रूपकों के विविध प्रकारों का स्वरूप दिखलाया गया है। चतुर्थ प्रकाश में क्रम-प्राप्त रस का विवेचन किया जाता है। अब यहाँ रस के भेद दिखलाये जाते हैं- विभाव, अनुभाव, सात्विक भाव और व्यभिचारी भावों के द्वारा आ्रस्वादन के योग्य किया गया स्थायी भाव ही रस कहलाता है ॥१॥ (श्रव्य-काव्य के) शरोताओं तथा (अभिनय के) दर्शकों के हृदय में विशेषरूप से विद्यमान रति आदि स्थायीभाव होता है, जिसका लक्षण आगे कहा जायेगा। वह (स्थायी) आगे बतलाये गये स्वरूप वाले, काव्य में वशिगत अथवा अ्भिनय द्वारा प्रदर्शित विभाव, अनुभाव, व्यभिचारी भाव और सात्विक भावों के द्वारा आस्वादन के योग्य अर्थात् अत्यधिक आनन्दमय अनुभूति के रूप में कर दिया जाता है तथा रस कहलाता है। इस प्रकार सामाजिक (शरोता तथा दर्शक) ही रसिक (=रस युक्त, रस का आस्वादन करने वाले) हैं। काव्य तो केवल उस प्रकार की आनन्दानुभूति के उद्बोधन का कारण होने से रसवत (रसयुक्त, सरस काव्य इत्यादि) कहलाता है; जिस प्रकार (लोक में) 'आयुघृ तम्' इत्यादि व्यवहार हुआ करता है। टिप्पणी-(१) इसका आधार यह रस-सूत्र है-'विभावानुभावव्यभिचारि- संयोगाद् रसनिष्पत्तिः' (ना० शा० अ० ६, पृ० २७२)। तुलनार्थ द्र०, भा० प्र० (षष्ठोऽधिकार:), का०प्र० (४.२७-२८), ना० द० (३. १६३), प्रता० (पृ० १५५), सा० द० (३.१)। (२) आयुर्घृ तम् इत्यादिव्यपदेशवत्-यह माना जाता है कि

Page 307

२५८ दशरूपकम्

तत्र विभाव :- (२) ज्ञायमानतया तत्र विभावो भावपोषकृत्। आ्रलम्बनोद्दीपनत्वप्रभेदेन स च द्विधा॥२॥ 'एवमयम्' 'एवमियम्' इत्यतिशयोक्तिरूपकाव्यव्यापाराहितविशिष्टरूपतया ज्ञायमानो विभाव्यमान: सन्नालम्बनत्वेनोद्दीपनत्वेन वा यो नायकादिरभिमतदेशका- लादिर्वा स विभावः। यदुक्तम्-'विभाव इति विज्ञातार्थ इति', तांश्च यथास्वं यथावसरं च रसेषूपपादयिष्यामः । घृत आयुवर्द्ध क है। यहाँ घृत आयु वृद्धि का हेतु है फिर भी औपचारिक रूप से यह कह दिया जाता है-आयुघृ तम् अर्थात् घृत आयु ही है। इसी प्रकार काव्य या नाटय सामाजिक के रसास्वादन का हेतु हुआ करता है। वह सहृदयों के हृदय में आनन्दा- नुभूति को उद्भावित करता है। यह आ्नन्दमय अ्र्पनुभूति ही रस है। औ्ररौर, अ्र्प्रनुभूति चेतन का धर्म है। अतः रस सामाजिक के हृदय में रहा करता है। वह अचेतन काव्य में नहीं रह सकता। इस प्रकार औपचारिक रूप से ही ऐसा व्यवहार हुआ करता है कि यह काव्य सरस (रसवत्) है। विभाव उनमें विभाव का स्वरूप यह है- उन (रस के उद्भावकों) में विभाव वह है जो स्वयं जाना हुआरर होकर (स्थायी) भाव को पुष्ट करता है। वह आलम्बन और उद्दीपन के भेद से दो प्रकार का होता है ॥२।। टिप्पणी-ना० शा० (अ० ७. पृ० ३४६, ३४७), भा० प्र० (पृ० ४), ना० द० (३. १६४), प्रता० (पृ० १५८), सा० द० (३. २८-२६)। 'यह (दुष्यन्त आदि) ऐसा है, अथवा 'यह ( शकुन्तला आदि) ऐसी है' इस प्रकार जो नायक आदि या अभीष्ट देश काल आदि काव्य के अतिशयोक्ति रूप वर्णन के द्वारा विशिष्ट रूप वाले हो जाने के कारण आलम्बन के रूप में अथवा उद्दीपन के रूप में जाने जाते हैं (ज्ञायमानः=विभाव्यमानः), वे विभाव कहलाते हैं। जैसा कि (भरतमुनि ने ना० शा० पृ० ३४६) कहा है-'विभाव अर्थात् जाना हुआ अर्थ'। जिस रस के जो विभाव होते हैं (यथास्वम्) उनका यथावसर रसों (के प्रकरण) में प्रतिपादन करेंगे। टिप्पणी- (१) अतिशयोक्तिरूप०=अतिशयोक्तिरुपेण काव्यव्यापारेण आहिता या विशिष्टरूपता तया। यहाँ 'अतिशयोक्ति' का अर्थ इस नाम का अलङ्कार नहीं है अपि तु अनूठी उक्ति या 'लोकोत्तर वर्णन है। इस अर्पर्थ में अतिशयोक्ति या वक्रोक्ति शब्द का प्रयोग होता रहा है (भामह .. ) कवि का कर्म=काव्य-व्यापार यही है कि वह लोक के पदार्थों का लोक से ऊपर उठकर अतिशयोक्ति द्वारा वर्न करता है। इसीलिये इस काव्य-व्यापार के द्वारा इतिहास आदि में प्रसिद्ध दुष्यन्त

Page 308

चतुर्थ: प्रकाषः

अमोषां चानपेक्षितबाह्यसत्वानां शब्दोपधानादेवासादिततद्दावानां सामान्या- त्मनां स्वस्वसम्बन्धित्वेन विभावितानां साक्षाद्गावकचेतसि विपरिवर्तमानानामाल- म्बनादिभाव इति न वस्तुशून्यता। तदुक्त भतृ हरिणा- शब्दोपहित रूपांस्तान्बुद्ध विषयतां गतान्। प्रत्यक्षमिव कंसादीन्साधनत्वेन मन्यते ।।' इति। षट्सहस्त्रीकृताप्युक्तम्-'एभ्यश्च सामान्यगुणयोगेन रसा निष्पद्यन्ते' इति। आदि एक विशिष्ट (=लोकोत्तर) रूप धारण कर लेते हैं और वे काव्य में आलम्बन आदि के रूप में जाने जाते हैं (विभाव्यमानः)। (२) 'एवम् अयम्' यहाँ अयन् (=यह) दुष्यन्त आ्रप्रादि नायक के लिये है। 'एवम्' (=ऐसा है) का अभि्राय है कि यह शकुन्तला आदि के प्रति अनुराग युक्त है जैसा कि काव्य में वर्शित इसकी वाक्-काय-चेष्टाओं से प्रकट हो रहा है (मि० काव्यप्र० शङ्क क मत)। और, यह शकुन्तला आदि ऐसी हैं (एवम् इयम) कि जिसके प्रति दुष्यन्त आदि के मन में अनुराग है। (३) विशिष्ट=इतिहास या लोक में प्रसिद्ध दुष्यन्त आदि की अपेक्षा भिन्न, लोकोत्तर। और, ये (नायक आदि) बाह्य सत्ता की अपेक्षा किये बिना ही शब्द की उपाधि के द्वारा अपने-अपने रूप में प्रकट होते हैं, सामान्य रूप वाले (साधारणीकृत) होकर सभी सहृदयों (भावक) के द्वारा अपने आपसे सम्बन्ध रखते हुए से समझं जाते हैं। इस प्रकार सहृदयों के चित्त में साक्षात् रूप से स्फुरित होते हुए आलम्बन आदि हो जाते हैं। इसलिये वहाँ नायक आदि का अभाव नहीं होता (न वस्तु- शून्यता)। भ्तृ हरि ने भी कहा है(?)-'शब्द के द्वारा जिनका स्वरूप प्रस्तुत कर दिया जाता है अतएव जो बुद्धि द्वारा ग्राह्य (विषय) हो जाते हैं, उन कंस आाि को बोद्धा प्रत्यक्ष के समान (कर्म आदि) कारक के रूप में समझ लेता है'। षट्सहस्त्री के कर्ता (भरत) ने भी कहा है-'इन (विभाव आदि) से सामान्यगुण के सम्बन्ध के द्वारा रसों की निष्पत्ति हो जाती है' (ना० शा०)। टिप्पणी-अमीषां .. न वस्तुशून्यता-यहाँ यह शङ्का हो सकती है कि काव्य में वर्णित नायक आदि तो वस्तुतः इस समय विद्यमान नहीं फिर वे सहुदय के भावोद्बोधन में आ्रलम्बन आदि कैसे हो सकते हैं ? इसका समाधान करते हुए धनिक ने कहा है-'गरमीषाम्' इत्यादि। भाव यह है :-- (i) यह ठीक है कि काव्यगत नायक आदि की इस समय बाह्य जगत में सत्ता नहीं। किन्तु इससे कोई दोष नहीं आता; क्योंकि उन्हें रस का आलम्बन बनाने के लिए उनकी बाह्य जगत् में सत्ता अपेक्षित नहीं है (अनपेक्षित बाह्य-सत्त्वानाम्) (ii) वस्तुतः उनकी बुद्धिगत

Page 309

२६०३ दशरूपकम्

तत्रालम्बनविभावो यथा- 'अस्या: सर्गविधौ प्रजापतिरभूच्चन्द्रो नु कान्तिप्रेदः शृङ्गारैकनिधिः स्वयं नु मदनो मासो नु पुष्पाकरः । वेदाभ्यासजड: क्थ नु विषयव्यावृत्तकौतूहलो निर्मातु प्रभवेन्मनोहरमिदं रूपं पुराणो मुनिः ॥२११॥

(बौद्धिक) सत्ता अपेक्षित है और वे साक्षात् रूप से सहृदय (भावक) के चित्त में स्थित रहते ही हैं (साक्षाद् भावरचेतसि विपरिवर्तमानानाम्)। कैसे ? (iii) काव्य के शब्दों द्वारा उनके अपने-अपने रूप उपस्थित हो जाया करते हैं (शब्दरूपाद उपधानाद्=उपाधे: आसादितः प्राप्तः तत्तद्भावः नायकदेशकालादिरूपता यैः तथा- भूतानाम्) । किन्तु प्रश्न यह है कि यदि शब्दों के द्वारा शकुन्तला आदि के रूप में नायिका आदि उपस्थित हो जायें तब भी वे सहृदय सामाजिकों का आलम्बन आदि नहीं हो सकते। इसके उत्तर में कहा गया है-सामान्यात्मनाम् अर्थात् शब्दों से सामान्य नायिका आदि के रूप में ही उनका बोध होता है और प्रत्येक भावक को वह नायिका आदि अपने आपसे सम्बन्ध रखती सी प्रतीत हुआ करती है (स्वस्व- सम्बन्धित्वेन विभावितानाम्)। इस प्रकार काव्यगत नायक आदि बाह्य जगत में विद्यमान न होते हुए भी सामाजिकों के आलम्बन आदि हो जाया करते हैं, क्योंकि शब्दों द्वारा ज्ञात होकर भी कोई पदार्थ साक्षात् रूप से चित्त में विद्यमान रहता है। (२) शब्दोपहित०-बुद्धि में स्थित अर्थ को भी मानव साक्षात् रूप से विद्यमान सा समभ लेता है, इस मन्तव्य के समर्थन में भतृ हरि की यह कारिका उद्धृत की गई है। इसका सन्दर्भ अज्ञात है (३) षट्सहस्त्री-जैसा कि शारदातनय (भा० प्र० दशम अधिकार पृ २८७) ने बतलाया है, नाट्यशास्त्र की दो पाठ-परम्परायें मानी जाती हैं। उनमें से एक बृहत् पाठ है, जिसमें १२००० श्लोक हैं तथा जी द्वादश- सहस्त्री कहलाता है। दूसरा लघु पाठ है, जिसमें ६००० श्लोक हैं तथा जो षट्- सहस्री कहलाता है। दोंनों के कर्त्ता भरत माने जाते हैं। षट्सहस्त्रीकार=भरत। उनमें आालम्बन विभाव यह है, जैसे (विक्रमोर्वशीय १.८, पुरुरवा की उक्ति में वणित उर्वशी आलम्बन विभाव है)-'इस (उर्वशी) के रचना-कार्य में क्या कान्तिदायक चन्द्रमा ही प्रजापति है ? अथवा जिसका शृङ्गार ही प्रधान रस हैं, वह कामदेव ही स्वयं इसका स्रष्टा है ? या पुष्पों का निधानभूत मास अर्थात मधुमास (वसन्त) इसका निर्माता है ? क्योंकि वेद के अभ्यास से कुण्ठित (जड़), सुन्दर विषयों में शत्सुक्य-रहित (व्यावृत्त) पुरातन मुनि ब्रह्मा इस रमणोय रूप के निर्माण में कैसे समर्थ हो सकता है?

Page 310

चतुर्थ: प्रकाश: २६१

उद्दीपनविभावो यथा- 'अयमुदयति चन्द्रश्चन्द्रिकाधौतविश्वः परिणतविमलिम्नि व्योम्नि कपू रगौरः । ऋजुरजतशलाकास्पर्धिभिर्यस्य पादैर्जगदमलमृालीपञ्जरस्थं विभाति ॥'२१२॥ (३) अर्प्रनुभावो विकारस्तु भावसंसूचनात्मकः । स्थायिभावाननुभावयन्तः सामाजिकान् सभ्र विक्षेपकटाक्षादयो रसपोषकारि- सोडनुभावाः। एते चाभिनयकाव्ययोरप्यनुभावयतां साक्षा्द्ावकोनामनुभवकर्मतयानु- भूयन्त इत्यनुभवनमिति चानुभावा रसिकेषु व्यपदिश्यन्ते। विकारो भावसंसूचनात्मक इति तु लोकिकरस।पेक्षया, इह तु तेषां कारणत्वमेव। यथा ममैव- 'उज्जूम्भाननमुल्लसत्कुचतटं लोलभ्रमद्भ्र लतं स्वेदाम्भ:स्रपिताङ्गयष्टिविगलद्व्रीडं सरोमाञ्चया। धन्यः कोऽपि युवा स यस्य वदने व्यापारिता: ससपृह मुग्धे दुग्धमहाब्धिफेनपटलप्रख्या: कटाक्षच्छटाः ॥' २१३॥ इत्य।दि यथारसमुदाहरिष्यामः । उद्दीपन विभाव वह है, जैसे 'कपूर के समान गौर वर्ण वाला, चाँदनी से समस्त संसार को धो डालने वाला यह चन्द्रमा निर्मल आकाश में उदित हो रहा है। और, सरल रजत-शलाकाओं से स्पर्धा करने वाली इसकी किरणों से यह संसार स्वच्छ मृाल के पिजरे में रक्खा हुआ सा शोभायमान है।' अ्ररनुभाव (रति आदि) भावों को सूचित करने वाला विकार (शरीर आदि का परिवर्तन) अरनुभाव है। सामाजिकों को (रति आदि) स्थायी भाव का अनुभव कराने वाले तथा रस को पुष्ट करने वाले भ्र विक्षेप सहित कटाक्ष आदि अनुभाव हैं। क्योंकि ये अ्रभिनय (दृश्य काव्य) तथा काव्य (श्रव्य) में अनुभावित होने वाले (अनुभावयताम रसिकों को साक्षात् अनुभव के कर्म के रूप में अनुभूत होते हैं इसलिये ये रसिकों में अनुभवन या अनुभाव कहलाते हैं। भाव को सूचित करने वाला विकार अनुभाव है, यह कथन लौकिक रस की दृष्टि से है। यहाँ (नाव्य या काव्य से आस्वादित रस में) तो वे (अनुभाव) रस के निमित्त ही हुआ करते हैं। (अनुभाव का उदाहरण है) जैसे यह मेरा (धनिक) ही पद्-'हे सुग्घे, रोमाञचयुक्त, ऊपर मुख किये जम्भाई लेकर, स्तनतट को ऊपर उभार कर, भ्र लता को चञ्चलता से घुमाकर, स्वेद जल के द्वारा भीगे शरीर से लाज को बहाकर तुमने स्पृहापूर्वक जिसके मुख पर क्षीर-सागर के फेन-पटल के समान श्वेत कटाक्षों की छटा बिखेरी है, वह अनोखा (कोऽपि=कोई) युवक धन्य है'। इत्यादि। इन अनुभावों के, रस के अनुसार, आागे उदाहरण देंगे।

Page 311

२६२ दश रूपकमू

(४) हेतुकार्यात्मनोः सिद्धिस्तयोः संव्यवहारतः ॥३।। टिप्पसी-(१)ना० शा० (७.५, पृ० ३४७), भा० प्र० (पृ० ४), ना० द० (३ .१६४), प्रत1० (पृ० १५६), सा०द० (३.१३२-१३३)। (२) यहां धनञ्जय ने केवल यह कहा है कि रति आदि भाव को सूचित करने वाले विकार अनुभाव कहलाते हैं। भाव यह है कि जब दुष्यन्त आदि के चित्त में शकुन्तला तथा उद्यान आदि के द्वारा रति आदि भाव उद्बुद्ध एवं उद्दीप्त हो जाता है तो दुष्यन्त आदि के शरीर में सुजोर्क्षेप (भुज फड़कना) आदि विकार हुआ करते हैं जो उसके हृदय में स्थित रति आदि को सूचित करते हैं, वे ही अनुभाव कहलाते हैं; क्योंकि ये भाव के पश्चात् उत्पन्न होते हैं (अनु पश्चाद भवत्तिःति) । धनिक का कथन है कि इस प्रकार यहाँ लौकिक रस की दृष्टि से ही अनुभावों को भाव-सूचक विकार (=रति आदिका कार्य) कहा गया है। काव्यरसिकों द्वारा आस्वादित रस की दृष्टि से तो अनुभाव रस के कारण होते हैं, कार्य (विकार) नहीं। उस दृष्टि से काव्य- नाटय में वर्शिगत या अभिनीत कटाक्ष आदि ही अनुभाव हैं। और, अनुभाव शब्द की व्युत्पत्ति है :- (i) 'सामाजिकान स्थायिभावान् अनुभावयन्ति इति'-जो सामा- जिकों को स्थायी भावों का अनुभव कराते हैं। काव्य-नाटय में अनुभावों का वर्णन पढ़कर या अभिनय देखकर सामाजिकों को दुव्यन्त आदि के रति भाव का अनुभव हो जाता है। इसी से ये अनुभाव रस-पोषण के निमित्त हो जाया करते हैं। अथवा (ii) काव्यनाटचयो अनुसूयन्ते इति अ्र्रनुभागा :- जिनका अनुसव किया जाता है वे अनुभाव है। (द्र० अनुवाद)। यहां भावकानां साक्षाद्अनुभवकर्मतया अनुभूयन्ते' यह अन्वय है। धनिक द्वारो की गई अनुभाव शब्द की ये दोनों व्युत्पत्तियां रस- स्वरूप के विश्लेषण में विशेष महत्त्व रखती हैं। (३) लौकिक रस का अभिप्राय हैं-लोक में दुष्यन्त आदि के हृदय में होने वाले रति आदि भाव। काव्य-नाटय का रस उस लौकिक रति आदि भाव से पिलकण है अतः वह अलीकिक रस कहलाता है। प्रायः उस के लिये केवल 'रस' शब्द का प्रयोग होता है और रति आदि भाव को लौकिक रस कहा जाता है। ये दोनों (विभाव तथा अनुभाव) क्रमशः (लौकिक रस के प्रति) कारण एवं कार्य होते हैं अतः इनका स्वरूप लौकिक व्यवहार से ही सिद्ध है।

Page 312

चतुर्थ: प्रकाश: २६३

तयोविभावानुभावयोलौंकिकरस प्रति हेतुकार्यभूतयो: संव्यवहारादेव सिद्ध- त्वान्न पृथग्लक्षणामुपयुज्यते। तदुक्तम्-'विभावानुभावी लोकसंसिद्धी लोकयात्रानु- गामिनी लोकस्वभावोपगतत्वाच्च न पृथग्लक्षणमुच्यते' इति। अथ भाव :- (५) सुखदुःखादिकैभावैर्भावस्तद्भावभावनम्। अनुकार्याश्रयत्वेनोपनिबध्यमानैः सुखदुःखादिरूपैर्भावैस्तद्दावस्य भावकचेतसो भावनं वासनं भावः। तदुक्तम्-'अहो ह्यनेन रसेन गन्घेन वा सर्वमेतद्द्भावितं वासि- तम्' इति। (कारिका में) तयो: (उन दोनों का)=विभाव तथा अनुभाव का; विभाव तथा अनुभाव क्रमशः लौकिक रस (रति आदि भाव) के कारण एवं कार्य होते हैं। वे लोक-व्यवहार से ही जान लिये जाते हैं अतः उनका पृथक् लक्षणा करना आवश्यक नहीं। जैसा कि कहा है (ना० शा० अ० ७, पृ० ३४८) 'विभाव और अनुभाव लोक में प्रसिद्ध ही हैं, ये लोक-व्यवहार का अनुसरण करते हैं और लोक के स्वभाव से ही इनका ज्ञान हो जाने के कारस इनका पृथक् लक्षणा नहीं बतलाया गया'। टिप्परी- (१) यहां ना०शा० अ० ७ श्लोक ६ तथा उससे पूर्व के गद्य का भावमात्र उद्धृत किया गया है। (२) लोक में जो रति आदि भाव के उत्पादक नायिका आदि तथा उद्दीपक चन्द्रिका आदि कारण हैं, वे ही काव्य-नाटय में क्रमशः आलम्बन एवं उद्दीपन विभाव कहलाते हैं। इसी प्रकार लोक में रति आदि भाव की उत्पत्ति के पश्चात् जो रति आदि के कार्यरूप कटाक्ष इत्यादि होते हैं वे ही काव्य- नाटय में अनुभाव कहलाते हैं। ये दोनों लोक से जान लिये जाते है, अतःइनका लक्षण करना आवश्यक नहीं समझा गया। भाव (रस का स्वरूप बतलाते हुए व्यभिचारी भाव तथा स्थायी भाव का उल्लेख किया गया है अतः) अब यहां भाव का स्वरूप बतलाते हैं। सुख दुःख आदि भावों के द्वारा (सहृदय के चित्त को) भावित कर देना भाव कहलाता है। जिन सुख दुःख आदि भावों का अनुकार्य (दुष्यन्त आदि) में वर्णन किया जाता है उनके द्वारा सहृदय (रसिक, भावक) के चित्त को भावित करना या वासित करना भाव कहलाता है। जैसा कि (ना० शा० अ० ७, पृ० ३४४) कहा गया है- 'शहो दस रस या गन्ध से यह सब भावित=वासित (गन्धयुक्त) हो गया है'।

Page 313

२६४ दशरूपकम्

यत्तु 'रसान्भावयन्भावः' इति 'कवेरन्तर्गत भावं भावयन्भावः' इति च तत् अ्भिनयकाव्ययोः प्रवर्तमानस्य भावशब्दस्य प्रवृत्तिनिमित्तकथनम् । ते च स्थायिनो व्यभिचारिणश्चेति वक्ष्यमाखाः। (६) प्रृथग्भावा भवन्त्यन्येऽनुभावत्वेऽपि सात्त्विकाः ॥४।। सत्त्वादेव समुत्पत्तेस्तचच तद्भावभावनम्। जो (ना० शा० ७.२-३, पृ० ३४६) यह कहा गया है कि 'रसों को भावित करने के कारण ये भाव कहलाते हैं' अथवा 'कवि के आन्तरिक भाव को प्रकट करने के कारण ये भाव कहलाते हैं', वह तो नाट्य (अभिनय) और काव्य के लिये प्रयुक्त होने वाले भाव शब्द का प्रवृत्तिनिमित्त बतलाया गया है। वे भाव स्थायी तथा व्यभिचारी (दो प्रकार के) होते हैं, जिनका आगे वशंन किया जा रहा है। टिप्पणी- (१) ना० शा० (अ० ७, पृ० ३४२-३४६), भा० प्र० (पृ० १३) सा० द० (३.१८१) । (२) तद्भावभावनम् = उस भाव से भावित कर देना; तद्- भावभावनं नाम तन्मयत्वेनावस्थानम् (प्रता०टीका पृ० १६०); यहा सुख दु.ख आदि भावों का उल्लेख किया गया है तथा भावक के चित्त का प्रकरण है इमीलिये धनिक ने यह अर्थ किया है- सुख दुःख आदि भावों से भावक के चित्त को भावित कर देना। भा० प्र० (पृ० १३) में भी यही कहा गया है- रामाद्याश्रयदुःखादेरनुभूतेस्तदात्मता। सामाजिकस्य मनसो या स भाव इति स्मृतः ॥ (३) ना० शा० के निम्न दो श्लोकों में प्रतिपादित मत को धनिक ने 'रसान् भावयन्' इत्यादि के द्वारा उद्धृत किया है; जैसे 'नानाभिनयसम्बद्वान् भावयन्ति रसा- निमान्' (७.२) तथा कवेरन्तर्गत भाव भावयन भाव उच्यते' (१.३)। धनिक के अनु- सार ना०शा० के इन स्थलों पर उस 'भाव' शब्द के प्रयोग का निमित(प्रवृत्तिनिमित्त) बतलाया गया है जिसका 'भावात्मकोऽभिनयः' या 'भावात्मक काव्यम' आदि में प्रयोग होता है। क्योंकि अभिनय रसों (रसनयोग्य रति आदि भावों) का बोध कराता है (भावयति) अतः भाव (=भावात्मक) कहलाता है। इसी प्रकार काव्य कवि के हृदयगत भाव को प्रकट करता है अतः भाव (=भावात्मक) कहलाता है। इसके विपरीत दशरूपक के 'भाव' के लक्षणा में यह बतलाया गया है कि स्थायी भाव तथा व्यभिचारी भाव इन दोनों को भाव क्यों कहा जाता है। तदनुसार काव्य में वर्णित या नाट्य में अभिनीत सुख दुःख आदि (अथवा रति एवं चिन्ता आदि) सहृदय के चित्त को भावित करते हैं-तन्मय करते हैं-अतः ये भाव कहलाते हैं। सात्त्विक भाव अन्य जो सातत्विक (भाव) हैं यद्यपि वे अनुभाव (भावों के पश्चात् होने वाले) ही हैं तथापि पृथक रूप से भाव कहलाते हैं; क्योंकि उनकी 'सत्त्व' से ही उत्पत्ति हुआ करती है। 'सत्त्व' का अरथ है किसी भाव से भावित करना (तन्मय करना) ।। ४-५।।

Page 314

चतुर्थ: प्रफाशंः २६५

परगतदुःखहर्षादिभावनायामत्यन्तानुकूलान्तःकरशत्वं सत्त्वं यदाह-'सत्त्वं नाम मनः-प्रभवं तच्च समाहितमनस्त्वादुत्पद्यते। एतदेवास्य सत्त्वं यतः खिन्नेन प्रहर्षि- तेन चाश्रुरोमाञ्चादयो निर्वत्यन्ते। तेन सत्त्वेन निवृत्ताः सात्त्विकास्त एव भावा- स्तत उत्पद्यमानत्वादश्रुप्रभृतयोऽपि भावाः। भावसंसूचनात्मकविकाररूपत्वाच्चानु- भावा इति द्वैरूप्यमेषाम् ।' इति। दूसरे के हृदय में स्थित दुःख और हर्ष की भावना में प्रायः उसी प्रकार के हृदय वाला हो जाना 'सत्त्व' कहलाता है। जैसा कि कहा गया है (ना० शा० प्र० ७ इलो० ६३, ६४ के बीच गद्य, पृ० ३७४-३७५)-'सत्त्व मन से उत्पन्न होने वाला (विशेष धर्म) है। वह मन के एकाग्र (समाहित) होने से उत्पन्न होता है। इस (नट ?) का सत्त्व यही है कि इसके द्वारा (दूसरे के दु.ख या हर्ष में) दुःखी होकर या हर्षित होकर अ्श्र एवं रोमाञ्च आदि उत्पन्न किये जाते हैं। उस 'सत्त्व' से उत्पन्न होने के कारण वे (नट के दुःख, हष आदि) ही भाव वस्तुतः सात्त्विक होते हैं। किन्तु उनसे उत्पन्न होने के कारण अश्र इत्यादि भी सात्विक भांव कहलाते हैं। दूसरी ओर, ये अध्र आदि (दुःख आदि) भाव से उत्पन्न होते हैं ( विकार ) तथा उनकी सूचना देते हैं अतः अनुभाव भी कहलाते हैं। इस प्रकार इन (अ्रश्रआदि) के (सात्त्विक भाव तथा अनुभाव) दोनों रूप होते हैं। टिप्पणी-(१) ना० शा० (अ० ७.६३-६४ पृ० ३७४-३७६), भा० प्र० (पृ० १३-१४), प्रता० (पृ० १५६-१६०), सा० द० (३. १३४, १३५)। (२) धनिक ने ना० शा० की 'सात्त्विक' शब्द की व्याख्या को स्पप्ट करने का प्रयास किया है और यहां कुछ परिवर्तन के साथ ना० शा० को उद्धत किया है। ना० शा० में अभिनय के सन्दर्भ में 'सात्विक' शब्द की व्याख्या की गई है। नट (अभिनेता) 'सत्त्व' के दाम ही अ्रश्रु आदि का अभिनय कर सकता है अतः ये सात्त्विक कहलाते हैं। सामान्यतः 'सत्त्व' शब्द का अरथ है-मन या निर्मल मन (भा० प्र०, पृ० ८ तथा ऊपर २.३३ टि०), और, सभी भावों का अभिनय मन के बिना नहीं किया जा सकता तथापि अरश्रु आदि भावों को सात्त्विक भाव कहने का कारण यह है कि ये सत्त्वविशेष से उत्पन्न होते हैं। वह 'सत्त्व' (विशेष) मन की एक अवस्था है जो एकाग्रता से उत्पन्न होती है। इस अवस्था में मन दूसरे के सुख दुःख में तद्र प (तन्मय) हो जाया करता है। यही 'तद्भावभावनम्' उसके सुख दुःख आदि से भावित होना है। इस सत्त्व के आधार पर ही अभिनेता (नट) अनुकार्य दुष्यन्त आदि के सुख-दुःख की भावना में अपने अन्तः करण को तन्मय कर लेता है। अथवा कहिये कि वह भी सुखी और दुःखी सा हो जाता है तभी वह रोमाञ्च या अश्रु आदि को प्रकट कर सकता है। अभिनेता के मन में जो सुख दुःख की भावना होती है वह सत्त्व-जन्य होती है अतः वस्तुतः उसके ये आरोपित सुख दुःख ही सात्त्विक होते हैं (सातत्विका त एव भावाः)। इनके

Page 315

२६६ देशरूपकम

ते च -- (७) स्तम्भप्रलयरोमाब्चा: स्वेदो वैवसर्यवेपथू ।।४।।

प्रलयो नष्टसंज्ञत्वम, शेषाः सुव्यक्तलक्षणाः ॥६।। यथा- वेवइ सेअदवदनी रोमञ्चिअ गत्तिए ववइ। विललुल्लु तु वलअ लहु वाहोअल्लीए रसेत्ति। मुहऊ सामलि होई खरो विमुच्छइ विश्रग्वेण। मुद्धा मुहअल्लो तुअ पेम्मेशा सावि र घिज्जइ ॥' २१४॥ ('वेपते स्वेदवदना रोमाञ्चं गात्र वपति। विलोलस्ततो वलयो लघु बाहुवल्ल्यां रणति । मुखं श्यामलं भवति क्षणं विमूच्छति विदग्धेन। मुग्धा मुखवल्ली तव प्रेम्णा सापि न धैयं करोति') द्वारा ही नट अश्रु, रोमाञ्च आदि को प्रकट करता है, अतः उसके अश्रु रोमाञ्च इत्यादि सातत्विक भावों से उत्पन्न होने के कारण सातत्विक भाव कहलाते है (ततः उत्पद्यमानत्वाद् अश्र् प्रभृतयोऽपि भावाः सातत्विका इतिशेषः)। ये अ्श्र इत्यादि भाव वस्तुतः अनुभाव ही हैं, क्योंकि ये अनुभावों के समान ही हृदय में स्थित हर्ष, दुःख आदि भावों के विकार होते हैं और उनकी सूचना देते हैं। और वे- (सात्विक भाव) आठ हैं-स्तम्भ, प्रलय, रोमाञ्च, स्वेद, वैवरर्य (रंग फीका पड़ जाना), वेपथु (कम्पन); अश्रु तथा वैस्वर्य (स्वरभङ्ग, आवाज बदल जाना)। इनमें अ्रङ्गों का क्रिया-रहित (निष्क्रिय) हो जाना स्तम्भ है, चेतना (=संज्ञा) का नष्ट हो जाना (सुघ-बुध खो देना) प्रलय है। शेष के स्वरूप स्पष्ट ही हैं ॥2-६।। जैसे (कोई सखी नायिका की काम-वेदना का वर्णन करती हुई नायक से कहती है) 'तुम्हारे प्रेम के कारण वह (नायिका) भी धैर्य धारण नहीं करती; वह काँपती है, उसके मुख पर पसीना आता है, शरीर पर रोमाञ्च हो जाता है, फिर चञ्चल वलय (कंकण) भुज-लता में मन्द-मन्द रणन करता है. उसका मुख काला पड़ गया है, वह वैदग्ध्य के साथ क्षण भर को मूच्छित हो जाती है और उसकी मुख-लता भी मुग्ध सी है'। टिप्पी-ना० शा० (७.६४, पृ० ३७५), भा० प्र० (पृ० १४), प्रता० (प्र० १६०). सा० द० (३.१२५-१४०)।

Page 316

चतुर्थ: प्रकाशः २६७

अथ व्यभिचारिण:, तत्र सामान्यलक्षणम्- (८) विशेषादाभिमुख्येन चरन्तो व्यभिचारिणः । (3) स्थायिन्युन्मग्ननिर्मग्ना: कल्लोला इव वारिधौ।७॥ यथा वारिधौ सत्येव कल्लोला उद्धवन्ति विलीयन्ते च तद्वदेव रत्यादौ स्थायिनि सत्येवाविर्भावतिरोभावाभ्यामाभिमुख्येन चरन्तो वर्तमाना निर्वेदादयो व्यभिचारिणो भावाः । व्यभिचारी भाव अबव्यभिचारी भाव बतलाये जाते हैं। व्यभिचारी भाव का सामान्य- लक्षण है :- विविध प्रकार से (स्थायी भाव के) अभिमुख (अनुकूल) चलने वाले भाव व्यभिचारी भाव कहलाते हैं, जो स्थायी भाव में इसी प्रकार प्रकट होकर विलीन होते रहते हैं, जिस प्रकार सागर में तरङें ।।७।। अर्थात् जिस प्रकार सागर के होने पर ही तरङ्गें उत्पन्न होती हैं और विलीन होती हैं, उसी प्रकार रति आदि स्थायीभाव के होने पर ही उसको लक्ष्य करके (=उसके पोषण के लिये) जिनका आविर्भाव और तिरोभाव हुआ करता है, वे निर्वेद आदि व्यभिचारी भाव कहलाते हैं। टिप्पणी- (१) ना० शा० (पृ० ३५५,३५६), भा० प्र० (पृ० २५-२६) ना० द० (३.१६४), प्रता० (पृ० १६१), सा० द० (३.१४०)। (२) यहाँ प्रथम पंक्ति में व्युत्पत्तिलभ्य अर्थ के आधार पर व्यभिचारी भाव का स्वरूप दिखलाया गया है। इसमें ना० शा० की छाया है। वि और अभि दो उपसर्गों से युक्त V चर धातु से व्यभिचारी शब्द निष्पन्न होता है-'विविधम् आभिमुख्येन रसेषु चरन्तीति व्यभिचारिणः'। पाठान्तर के अनुसार 'विविधानां रसानाम् आभिमुख्येन चरन्तीति] दश० तथा सा० द० आदि में 'विविधं' या 'विविधानां' के स्थान पर विशेषाद्' शब्द रक्खा गया है अतः इसका भी वही अभिप्राय प्रतीत होता है। इस प्रकार यहाँ 'विशेषाद्' का अर्थं होगा-विविध प्रकार से अथवा विविध रसों के; आभि- मुख्य=अनुकूल, लक्ष्य करके, पोषण के लिये (आभिमुख्यं=पोषकत्वस्, ना०द०) दश० की कारिका की दूसरी पंक्ति में, रस-प्रक्रिया में व्यभिचारी भावों का जी कार्य होता है उसके आधार पर व्यभिचारी भाव का स्वरूप बतलाया गया है। भाव यह है कि सागर में लहरों के समान स्थायी भाव में उत्पन्न होकर तथा विलीन होकर जो निर्वेद आदि भाव रति आदि स्थायी भाव को विविध प्रकार से पुष्ट करते हैं-उसे रसरूपता की ओर ले जाते हैं, वे व्यभिचारी भाव कहलाते हैं। इसके अतिरिक्त इनके व्यभिचारी भाव नाम का आधार यह भी है कि ये किसी स्थायी भाव के साथ नियत नहीं होते (ना० द०); अर्थात् (i) किसी स्थायी भाव

Page 317

देशरूपकम्

ते च- (६) निर्वेदग्लानिशङ्काश्रमधृति जडताहर्ष दैन्यौग्रथचिन्ता- स्त्रासेष्यामर्षगर्वाः स्मृतिमरणमदाः सुप्तनिद्राविबोधाः। व्रीडापस्मारमोहाः सुमतिरलसतावेगतर्कावहित्था व्याध्युन्मादौ विषादोत्सुकचपलयुतास्त्रिंशदेते त्रयश्च ।।5।। तेत्र निर्वेद :- (१०) तत्त्वज्ञानापदीर्ष्यादेर्निवेंदः स्वावमाननम्। तत्र चिन्ताश्रुनिःश्वासवैवयर्योच्छ वासदीनताः ।।ह।। के होने पर भी कोई व्यभिचारी भाव कभी होता है कभी नहीं, (ii) एक ही व्यभि- चारी भाव कभी किसी स्थायी भाव के साथ होता है कभी किसी दूसरे के साथ ही। इन्हें सञ्चारी भाव भी कहते हैं क्योंकि ये स्थायी भाव को रसरूपता की ओर ले जाते हैं 'सञ्चारयन्ति भावस्य गर्ति सञ्चारिणोऽपि ते' (रसाणवसुधाकर द्वितीय विलास, तथा मि० ना० शा०, पृ० ३५५-३५६)) औौर वे- व्यभिचारी भाव २३ होते हैं-निर्वेद, ग्लानि, शङ्का, श्रस, धृति, जडता, हर्ष, दैन्य, शग्रथ, चिन्ता, त्रास, ईर्ष्या, अमर्ष, गर्व, स्मृति, मरण, मद, सुप्र, निद्रा, विबोध, व्रीडा, अपसमार, मोह, सुमति, अलसता, वेग, तर्क, अवहित्था, व्याधि, उन्माद, विषाद, शरत्सुक्य तथा चपलता ॥८॥। टिप्पणी-(१) ना० शा० (७.६३, पृ० ३७४), भा० प्र० (पृ० १५), का० प्र० (४.३१-३४), ना० द० (३.१८२), प्रता० (पृ० १६१), सा० द० (३.१४१) । (१) विद्वानों का विचार है कि ३३ व्यभिचारी भाव (त्रिशद् एते त्रयश्च) कहना उपलक्षण मात्र है, अन्य भी व्यभिचारी भाव हो सकते हैं; जैसे तृष्सा, मैत्री, मुदिता, श्रद्धा, दया, उपेक्षा इत्यादि (ना० द०)। इसके अतिरिक्त रति आदि जो स्थायी भाव हैं वे भी अन्य रसों में व्यभिचारी भाव हो जाया करते हैं; जैसे शृङ्गार और वीर रस में 'हास'; हास्य, करुण और शान्त में रति; वीर में कोध; करुण और शृङ्गार में भय; भयानक और शान्त में जुगुप्सा; रौद्र एवं हास्य में उत्साह तथा प्रायः सभी रसों में विस्मय व्यभिचारी हो जाता है (काव्यप्रकाश- उद्योत तथा सा० द० ३.१७२-१७३) । इन निर्वेद इत्यादि ३३ व्यभिचारी भावों के लक्षण तथा उदाहरणों का कमशः निरूपण करते हैं :- (१) निर्वेद तत्वज्ञान, आपत्ति, ई्ष्या आदि के कारण अपना तिरस्कार करना निर्वेद कहलाता है। इसमें चिन्ता, अश्रु, निःश्वास, वैवरर्य उच्छ, वास और दीनता (अनुभाव) हुआ करते हैं।। ६ ।।

Page 318

चतुर्थ: प्रकाशः २६६

तत्वज्ञानान्निर्वेदो यथा- 'प्राप्ता: श्रियः सकलकामदुघास्ततः कि दत्त पदं शिरसि विद्विषतां ततः किम्। सम्प्रीणिता: प्रणायिनो विभवस्ततः कि कल्पं स्थितं तनुभृतां तनुभिस्ततः किम् ॥२१५॥ आपदो यथा- 'राज्ञो विपद्वन्धुवियोगदुःखं देशच्युतिदुर्गममार्गखेदः । आस्वाद्यतेऽस्याः कटुनिष्फलाया; फलं मर्यंतच्चिरजीवितायाः ॥२१६॥ ईर्ष्यातो यथा- 'न्यक्कारो ह्ययमेव मे यदरयस्तत्राप्यसौ तापसः सोऽप्यत्रैव निहन्ति राक्षसभटाञ्जीवत्यहो रावणः । धिग्धिक्शकजितं प्रबोधितवता कि कुम्भकर्रोन वा स्वर्गग्रामटिकाविलुण्ठनपरैः पीनः किमेभिभु जैः ॥२१७॥ वीरशृङ्गारयोव्यभिचारी निर्वेदो यथा- 'ये बाहवो न युधि वैरिकठोरकण्ठपीठोच्छलद्रुधिरराजिविराजितांसाः। नापि प्रियापृथुपयोधरपत्रभङ्गसंक्रान्तकुङ्कुमरसाः खलु निष्फलास्ते ॥२१८॥ तत्वज्ञान से होने वाला निर्वेद यह है, जैसे (वैराग्यशतक ७१), 'सकल मनोरथ प्रदान करने वाली सम्पदाएं प्राप्त करलीं तो क्या ? शत्रुओं के सिर पर पैर रख दिया तो क्या ? मित्र आदि प्रियजनों को धन-सम्पत्ति से तृप्त कर दिया तो क्या? शरीरधारियों के शरीर कल्पपर्यन्त स्थित रहे तो क्या ? आपत्ति से होने वाला निर्वेद यह है, जैसे-'मेरे द्वारा इस कटु तथा निष्फल चिर जीवन का यह फल भोगा जा रहा है कि राजा से विपत्ति, बन्धुग्रं के वियोग का दुःख, देश का त्याग तथा दुर्गम मार्ग में गमन की पीड़ा हो रही है।' ईर्ष्या से होने वाला निर्वेद यह है; जैसे-'मेरा यही अपमान है कि मेरे शत्रु है। उन (शत्रुओों) में भी वह तपस्वी (राम) और वह भी मेरे समीप ही राक्षस-योद्धाओं को मार रहा है। अही ! फिर भी रावस (मैं) जीवित है। इन्द्रजित (मेघनाद) को घिक्कार है। जगाये हुए कुम्भकर्र से क्या (लाभ) ? स्वगरूपी छोटे गाँव (ग्रामटिका) को लूटने में तत्पर मेरी इन शक्तिशाली भुजाओों से भी क्या (लाभ) ? वीर तथा शृङ्गार का व्यभिचारी भाव होने वाला निर्वेद यह है; जैसे- 'जो भुजाएं न तो युद्ध में शत्रु के कठोर कण्ठ-स्थल से छलकते हुए रुधिर की धार से स्कन्ध प्रदेश (अंस) पर सुशोभित हुई, न ही प्रिया के विशाल स्तनों की पत्र- रचना के कुकुम रस से युक्त हुई; निश्चय ही वे निष्फल हैं।'

Page 319

२७० दश रूपकधु

आत्मानुरूपं रिपु रमणीं वाऽलभमानस्य निर्वेदादियमुक्तिः। एवं रसान्त- राणामप्यङ्गभाव उदाहार्यः । रसानङ्ग: स्वतन्त्रो निर्वेदो यथा- 'कस्तवं भो: कथयामि दैवहतकं मां विद्धि शाखोटकं वैराग्यादिव वक्षि साधु विदितं कस्माद्यतः श्रयताम्। वामेनात्र वटस्तमध्वगजनः सर्वात्मना सेवते न च्छायापि परोपकारकरी मार्गस्थितस्यापि मे ॥२१६॥ विभावानुभावरसाङ्गानङ्गभेदादनेकशाखो निर्वेदो निदर्शनीयः । अथ ग्लानि :-

अपने अनुरूप शत्रु अथवा रमी को न प्राप्त कर सकने वाले व्यक्ति की यह निर्वेद के कारण कही गई उक्ति है। (यहाँ निर्वेद नामक भाव वीर तथा शृङ्गार का अरङ्ग होकर आया है) इसी प्रकार जहाँ निर्वेद अन्य रसों का श्रङ्ग हुआ करता है उसका भी उदाहरण दिया जा सकता है। किसी रस का शङ्ग न होने वाला स्वतन्त्र निर्वेद यह है, जैसे (पथिक के प्रश्न के प्रत्युत्तर में शाखोटक वृक्ष का निर्वेद प्रकट हो रहा है)-'अरे तुम कौन हो ? बतलाता हूँ-मुझके भाग्य का मारा शाखोटक (सेहुन्ड) वृक्ष जानो। तुम तो वैराग्य-युक्त से बोल रहे हो। हाँ, आपने ठीक जान लिया। किन्तु यह (वैराग्य) किस क्रारण से है ? सुनिये- यहाँ (मार्ग के) वाम भाग में जो वट वृक्ष है, पथिक जन उसका सब प्रकार (छाया, आरोहण आदि) से आश्रय लेते हैं; किन्तु मार्ग में स्थित होते हुए भी मेरी छाया भी दूसरे का उपकार नहीं कर सकती।' २rs इस प्रकार विभाव, अनुभाव, रस के अङ्ग तथा स्वतन्त्र (अनङ्ग=भ्रङ्ग न होने वाला) आदि भेद से निर्वद के अनेक प्रकार दिखलाये जा सकते हैं। टिप्पणी-ना० शा० (७.२८-३०, पृ० ३५६), भा० प्र० (पृ० १५), गा० द0 (३.१८३), प्रता० (पृ० १७३, सा० द० (३.१४२)। (२) विभावानुभाव०- यहाँ तत्त्वज्ञान आदि निर्वेद के विभाव हैं (मि०, ना० द०)। इनके आधार पर होने वाले प्रकार ऊपर दिखलाये गये हैं। इसी प्रकार अनुभावों के अनुसार भी निर्वेद के अनेक प्रकार हो जाते हैं। चिन्ता, अश्रु आदि इसके अनुभाव हैं। (२) ग्लानि - रति आदि की थकान, प्यास (तृद्) और भूख से होने वाली जो निष्प्राणता (शक्तिहीनता) है, वह ग्लानि कहलाती है। इसमें रंग फीका पड़ना, अनुत्साह, शरीर, वचन और क्रिया की चीएता आदि (अनुभाव) होते हैं ॥। १० ॥

Page 320

चतुर्थ: प्रकाशः २७१

व वर्ण्य कम्पानुत्साहादयोऽनुभावाः। यथा माघे- 'लुलितनयनतारा: क्षामवक्त्रेन्दुबिम्बा रजनय इव निद्राक्लान्तनीलोत्पलाक्ष्यः । तिमिरमिव दधाना: स्रंसिन: केशपाशा- नवनिपतिगृहेभ्यो यान्त्यमूर्वारवध्वः ॥२२०।। शेषं निर्वेदवदूह्यम्। अथ शङ्का- (१२) अनर्थप्रतिभा शङ्का परक्रौर्यात्स्वदुर्नयात्। कम्पशोषाभिवीक्तादिरत्र वर्णस्वरान्यता ।११।। तत्र परकोर्याद्यथा रत्नावल्याम्- 'ह्रिया सर्वस्यासौ हरति विदितास्मीति वदनं द्वयोर्द्ट ष्ट्वाSडलापं कलयति कथामात्मविषयाम् । अर्थात् बार-बार की रतिकरीडा से होने वाली थकान, प्यास, भूख तथा वमन आदि से उत्पन्न होने वाली शक्तिहीनता ही उलानि है। इसमें वैवर्ण्य (=रँग फीका पड़ना), कम्पन, अनुत्साह आदि अनुभाव होते हैं। जैसे-माघकाव्य (११.२०) में-'रात्रियों के समान चञ्चल नेत्र-तारिकाओं वाली, क्षीण मुखचन्द्र से युक्त, निद्रा से क्लान्त नीलकमल जैसे नेत्रों वाली, अन्धकार जैसे खुले केशों को धारण करती हुई ये वारवनिताएं राजा के भवनों से जा रही है। (विभाव आदि के भेद से ग्लानि के विधिध प्रकार इत्यादि) निर्वेद के समान समझने चाहियें। टिप्पणी- (१) ना० शा० (७.३१-३२, पृ० ३५७), भा० प्र० (पृ० १४), ना० द० (३.१८४), प्रता० (पृ० १७४), सा० द० (३.१७०)। (२) लुलितनयन- तारा:' इत्यादि 'रजनयः' (रात्रियां) के भी विशेषण हैं; जैसे-चञ्चल हैं नयन के तारों के समान तारे जिसमें (लुलिताः नयनताराः इव तारा: यासु) इत्यादि । (३) शङ्का - दूसरे की क्ररता या अपने दुर्व्यवहार के कारण होने वाली जो अनर्थ की आशङ्का है, वह शङ्का कहलाती है। इसमें कम्प, शोष (सूखना), इघर-उधर देखना (अभिवीक्षा) रंग बदल जाना (वर्णान्यता) और स्वर- भेद (स्वरान्यता) आदि (अनुभाव) होते हैं॥ ११॥ ।33 उनमें दूसरे की क्रूरता से होने वाली शङ्गा यह है, जैसे रत्नावली (३.४) में (राजा उदयन रत्नावली की अवस्था का वर्णन करते हैं)-'मुझे जान लिया गया है' इस प्रकार (सोचकर) वह लज्जा के कारण सबसे मुंह छिपाती है, दो

Page 321

२७२ दश रूपकसु

सखीषु स्मेरासु प्रकटयति वैलक्ष्यमधिकं प्रिया प्रायेरास्ते हृदयनिहितातङ्कविधुरा ॥२२१। स्वदुनयाद्यथा वीरचरिते- 'दूराद्दवीयो धरणीघराभं यस्ताटकेयं तृणवद्वयघूनोत्। हन्ता सुबाहोरपि ताडकारि: स राजपुत्रो हृदि बाधते माम् ॥२२२॥ अनया दिशाऽन्यदनुसतंव्यम्। अथ श्रम :- (१३) श्रमः खेदोऽध्वरत्यादेः स्वेदोऽस्मिन्मर्दनादयः । अध्वतो यथोत्तररामचरिते- अलसलुलित मुग्धान्यध्वसञ्जातखेदा- दशिथिलपरिरम्भैर्दत्तसंवाहनानि। परिमृदितमृणालीदुर्बलान्यङ्गकानि त्वमुरसि मम कृत्वा यत्र निद्रामवाप्ता ।२२३।। के वार्तालाप को देखकर उसे अपनी चर्चा समझने लगती है, सखियों के मुसकराने पर अत्यधिक लज्जित हो जाती है, इस प्रकार प्रिया (सागरिका) हृदय में स्थित आतङ्क से व्याकुल रहती है'। अपने दुर्व्यवहार से होंने वाली शङ्गा, जैसे महावीर चरित (२.१) में (रावण का मन्त्री माल्यवान् कहता है) 'जिसने पर्वत के सदृश ताड़का-पुत्र (मारीच) को तिनके के समान बहुत दूर फैंक दिया, जो सुबाह का मारने वाला है तथा ताड़का का शत्रु (संहारक) है, वह राजपुत्र (राम) मुझे हृदय में व्यथित कर रहा है'। इसी प्रकार और भी समझना चाहिये। टिप्पणी-ना० शा० (७.३३-३५, पृ० ३५७-३५८), भा० प्र० (पृ० १६), ना० द० (३.१८६), प्रता० (पृ० १७४), सा० द० (३.१६१)। (४) श्रम- यात्रा (शध्व) और रति आदि से होने वाली जो थकान है, वह श्रम है। इसमें स्वेद और मर्दन (अरङ्गों को मलना) आदि (अनुभाव) होते हें। यात्रा से उत्पन्न होने वाला थम यह है, जैसे उत्तररामचरित (१.२४) में राम सीता से कहते हैं) '(यह वही स्थान है) जहाँ मार्ग में चलने से उत्पन्न थकान के कारण आलस्ययुक्त, शिथिल तथा मनोहर, मेरे गाढ आलिङ्गनों के द्वारा दबाये गये, परिमृदित मृणाली के समान दुर्बल अङ्गों को मेरे वक्षःस्थल पर रख कर तुम सो गई थीं'।

Page 322

चतुर्थ: प्रकाश: २७३

रतिश्रमो यथा माघे- 'प्राप्य मन्मथरसादतिभूर्मि दुर्वहस्तनभराः सुरतस्य । शंश्रमुः श्रमजलार्द्रललाटश्लिष्टकेशमसितायतकेश्यः ।२२४। इत्याद्युत्प्रेक्ष्यम् । अथ धृति :- (१४) सन्तोषो ज्ञानशक्त्यादेवृ तिरव्यग्रभोगकृत् ॥१२। ज्ञानाद्यथा भतृं हरिशतके- 'वयमिह परितुष्टा वल्कलैस्त्वं च लक्ष्म्या ') सम इह परितोषो निर्विशेषो विशेषः । स तु भवतु दरिद्रो यस्य तृष्णा विशाला मनसि च परितुष्टे कोऽर्थवान् को दरिद्रः ।२२५। शक्तितो यथा रत्नावल्याम्- 'राज्यं निजितशत्र योग्यसचिवे न्यस्तः समस्तो भरः सम्यक्पालनपालिताः प्रशमिताशेषोपसर्गाः प्रजाः । रति से उत्पन्न श्रम, जैसे माघ (१०.८०) में 'जिनको स्तन-भार वहन करना कठिन था, जिनके केश काले तथा लम्बे थे, वे रमशियाँ काम के रस से सुरत की हद्द (अतिभूमि) को पहुँचकर पसीने से भीगे ललाट पर चिपके केशों से युक्त होती हुईं, थक गई।' इत्यादि समझना चाहिये। टिप्पणी-ना० शा० (७.४७,पृ० ३६०), भा० प्र० (पृ० १८), ना० द० (३.१८६), प्रता० (पृ० १७६), सा० द० (३.१४६) । (५) धति- ज्ञान और शक्ति आदि से होने वाला जो सन्तोष है, वह धृति कह लाती है। वह व्यग्रता-रहित भोग कराने वाली है, (=व्यत्रतारहित भोग उसका अनुभाव है) ॥१२॥ ज्ञान से होने वाली धृति; जैसे भतृ हरि के वैराग्यशतक (५३) में (सम्पत्ति शाली से कोई सन्तोषी कहता है)-"हम तो वल्कल वस्त्रों से सन्तुष्ट हैं और तुम लक्ष्मी से। हम दोनों की तृप्ति समान ही है, कोई विशेष भेव नहीं है। वस्तुतः वही दरिद्र हो सकता है जिसकी तृष्णा बढी हुई है। मन के सन्तुष्ट होने पर कौन धनी है और कौन दरिद्र' ? शक्ति से उत्पन्न होने वाली धृति; जैसे रत्नावली (१.६) में (विदूषक के प्रति राजा उदयन की उक्ति में धृति प्रकट होती है)-'जिसमें सब शत्रुओं को जोत लिया गया है ऐसा राज्य है, समस्त (राज्य का) भार योग्य मन्त्री पर रख दिया गया है; जिनके सब उपद्रव शान्त कर दिये गये हैं तथा जो भली भाँति

Page 323

२७४ दशरुपकस

प्रदयोतस्य भ्षुता वसन्तसमयस्त्वं चेति नाम्ना धृर्ति काम: काममुपैत्वयं मम पुनर्मत्ये महानुत्सवः ॥।२२६।। इत्याद्यूह्यम् । अ्रथ जडता- (१५) अप्रतिपत्तिर्जडता स्यादिष्टानिष्टदर्शनश्रतिभिः ।

इष्टदशनाद्यथा- एवमालि निगृहीतसाध्वसं शङ्करो रहसि सेव्यतामिति। सा सखीभिरुपदिष्टमाकुला नास्मरत्प्रमुखवर्तिनि प्रिये ॥२२७॥' अनिष्टश्रवणाधथोदात्तराघवे-'राक्षस :- तावन्तस्ते महात्मानो निहता: केन राक्षसाः। येषां नायकतां यातास्त्रिशिर:खरदूषणाः ॥२२८॥ द्वितीय :- गृहीतधनुषा रामहतकेन। प्रथम :- किमेकाकिनव ?। द्वितीय :- पालन के द्वारा समृद्ध हुई हैं ऐसी प्रजाएं है; प्रद्योत की पुत्री (वासवदत्ता) पत्नी है; वसन्त ऋतु का (रमशीय) समय है और तुम (जैसा मित्र) है। इस प्रकार कामदेव (मदनमहोत्सव) नाम होने से ही चाहे सन्तोष को प्राप्त कर ले किन्तु मैं तो समझता हैँ कि यह मेरा ही उत्सव है'। इत्यादि समभना चाहिये। टिप्पणी-(१) ना० शा० (७. ५६-५७, पृ० ३६३), भा० प्र० (पृ० २०), ना० द० (३. १६६), प्रता० (पृ० १७८), सा० द० (३. १६८)। (२) अ्रव्यग्रभोग- कृत्=अव्यग्रतापूर्वक भोग कराने वाली धैर्य होने हर व्यग्रता नहीं रहती। (६) जडता इष्ट या अनिष्ट वस्तु के देखने या सुनने से (कर्त्तव्य तथा अ्रकर- त्त व्य का) ज्ञान न रहना (अप्रतिपत्ति) जड़ता है। उसमें अपलक नेत्रों से देखना, चुप रहना आदि (अनुभाव होते) हैं॥ १३॥ t (4 इष्ट के दर्शन से होने वाली जडता; जैसे (कुमारसम्भव ८.५)-'जब प्रियतम (शिव) सम्मुख उपस्थित हुए तो पार्वती (सा) व्याकुल हो गई तथा सखियों के इस उपदेश का स्मरण न कर पाई कि-"हे सखी, भय तथा संकोष को दबाकर इस प्रकार एकान्त में शङ्कर के साथ व्यवहार करना"। प्रनिष्ट के श्रवण से होने वाली जडता; जैसे उदात्तराघव नाटक में- "राक्षस-त्रिशिर, खर और दूषण जिनके नायक थे, उन शक्तिशाली (=महात्मानः बहुसंख्यक (तावन्तः=उतने) राक्षसों को किसने मार दिया ? द्वितीय-धनुष धारण किये हुए दुष्ट (हतक=मर जाना, मरा) राम ने। प्रथम-क्या झफेले (राम) ने ही द्वितीय बिना देखे कोई विश्वास करता है ? देखो हमारी उतनी

Page 324

चतुर्थं: प्रकाश: २७५

शहृष्टवा कः प्रत्येति ? पश्य तावतोऽस्मद्वलस्य-

०रू कबन्घा: केवलं जातास्तालोत्ताला रणाङ्गणे ॥२२६॥

प्रथ हषं :- प्रथम :- सखे यद्येवं तदाहमेवंविधः कि करवाणि।' इति।

(१३) प्रसत्तिरुत्सवादिभ्यो हर्षोऽश्रुस्वेदगद्गदाः।

योऽनुभावाः यथा- प्रियागमनपुत्रजननोत्सवादिविभावश्चेतःप्रसादो हर्षः। तत्र चाश्रुस्वेदगद्गदाद-

आयाते दयिते मरुस्थल भुवामुत्प्रेक्ष्य दुर्लङ्यतां गेहिन्या परितोषबाष्पकलिलामासज्य दृष्टि मुखे। दत्त्वा पीलुशमीकरीरकवलान्स्वेनाञ्चलेनादरा- दुन्मृष्टं करभस्य केसरसटाभाराग्रलग्नं रजः ॥२३०॥ निर्वेदवदितरदुन्नेयम्। सेना के 'केवल ये रुण्ड (कबन्ध) ही समर-नूमि में बचे हैं, जो तुरन्त कटे हुए सिरों के नड्डों में गिरते हुए कङ्क नामक पक्षियों से घिरे हुए हैं, ताड़ के समान ऊंचे हैं।' प्रथम-मित्र, यदि ऐसा है तो मैं इस दशा में क्या करू ?" टिप्पणी-(१) ना० शा० (७. ६६, पृ० ३६६), भा० प्र० (पृ० २१), ना० द० (३. २१३), प्रता० (पृ० १८०), सा० द० (३. १४८)। (२) कुछ ग्रन्थों में जड़ता के स्थान पर 'जाड्य' कहा गया है। (३) अप्रतिपत्ति-अ्ज्ञान, कर्तव्य का ज्ञान न होना, किकर्तव्य-विमूढता। (७) हुर्ष उत्सव आदि से होने वाली जो प्रसन्नता है, वह हर्ष कहलाती है। इसमें अश्रु, स्वेद और गद्गद होना आदि (अनुभाव) होते हैं। प्रिय का भगमन तथा पुत्र-जन्म के उत्सव आदि विभावों से उत्पन्न होने वाली चित्त की प्रसन्नता ही हर्ष है। इसमें अभ्रु, स्वेद गद्गद होना आदि अनुभाव होते हैं। जैसे- 'जब प्रियतम (घर लौटकर) आया तो गृहिणी ने मरुस्थल की भूमि को पार करने की कठिनाई को समझकर (प्रियतम के) मुख पर सन्तोष के अंसुभों से भरी दृष्टि डाली और (मरुभूमि को पार करने वाले) उस ऊंट के बच्चे को (करभ) पीलु, शमी तथा करीर की पत्तियों के ग्रास देकर उसकी केसर-सटा(गर्वन के बाल) पर लगी हुई धूल को आदरपूर्वक अपने आंचल से पोंछ दिया'। *. अन्य बातें निर्वेद के समान समझ लेनी चाहियें। टिप्पणी-(१) ना० शा० (७.६१, पृ० ३६४), भा० प्र० (पृ० २०), ना० द० (३.२०३), प्रता० (पृ० १७६), सा० द० (३. १६५)। (२) प्रसति :- प्रसाद, प्रसन्नता; चित्त की प्रफुल्लता।

Page 325

२७६ दश रूपकमू

अथ दैन्यम्- (१७) दौर्गत्यादैरनौजस्यं दैन्यं कार्ष्यर्यामृजादिमत् ॥ १४॥ दारिद्रन्यक्कारादिविभावैरनौजस्कता चेतसो दैन्यं। तत्र च कृष्णतामलिन वसनदंशनादयोऽनुभावाः। यथा- 'वृद्धोऽन्धः पतिरेष मञ्चकगतः स्थूणवशेषं गृहं कालोऽम्यरणजलागमः कुशलिनी वत्सस्य वार्तापि नो। यत्नात्सञ्चिततैलबिन्दुघटिका भग्नेति पर्याकुला दृष्ट्वा गर्भभरालसां सुतवधू श्वश्र शचिरं रोदिति ।२३१।। शेषं पूर्ववत्। अथौग्रयम्- (१८) दुष्टेऽपराघदौमु ख्यक्रौयेश्चएडत्वमुग्रता। तत्र स्वेदशिर:कम्पतर्जनाताडनादयः ॥ १५॥। (८) दैन्य दुर्गति आदि के कारण निस्तेज हो जाना ही दैन्य है। यह (मुख की) मलिनता (कार्ष्य्य=कालिमा) तथा वस्त्रों की अस्वच्छता (अमृजा) आदि (अनुभावों) से युक्त होता है ॥१४॥। दरिद्रता तथा अपमान (न्यक्कार = नीचा दिखाना) आदि विभावों से जो चित्त में शोजस्विता का प्भाव हो जाता है, वह दन्य कहलाता है। इसमें (मुख का) कालापन, वस्त्रों तथा दांतों की मलिनता इत्यादि अनुभाव होते हैं। जैसे (भोज- प्रबन्ध २५५, किसी बृद्धा के दरिद्रता से उत्पन्न दैन्य का वर्णन है) 'यह वृद्ध और अ्रन्धा पति है जो खटिया पर पड़ा है, घर की थूणी मात्र शेष है, वर्षा का समय निकट है, पुत्र की कुशल वार्ता भी नहीं मिली, बड़े यत्न से तेल का एक-एक बिन्दु करके जोड़ी गई घड़िया फूट गई। इन बातों से व्याकुल हुई सास पुत्र-वधू को गर्भ- भार से अलासाई देखकर बहुत समय तक रोती रही। शेष पहिले के समान ही है। टिप्पणी-ना० शा० (७. ४६, पृ० ३६१), भा० प्र० (पृ० १८), ना० द० (३. २०६), प्रता० (पृ० १७६), सा० द० (३. १४५)। (६) उग्रता अपराध, दुमु खता (जली कटी बात कहना), क्ररता आदि के कारण जो दुष्ट के प्रति क्रोध (प्रचएडता) होता है, वह उग्रता कहलाती है। उसमें पसीना, सिर को हिलाना, घमकाना (तर्जन) और पीटना (ताडन) आदि अनुभाव होते हैं।।१४।।

Page 326

चतुर्थ: प्रकाशः २७७

यथा वीरचरिते-'जामदग्न्यः -- उत्कृत्योत्कृत्य गर्भानपि शकलयतः क्षत्त्रसन्तानरोषा- दुद्दामस्यकविशत्यवधि विशसतः सर्वतो राजवंश्यान्। पित्र्यं तद्रक्तपू्रं ह्रदसवनमहानन्दमन्दायमान- कोधाग्नेः कुर्वतो मे न खलु न विदितः सर्वभूतैः स्वभावः ॥२३२।। अथ चिन्ता- (१६) ध्यानं चिन्तेहितानाप्तेः शून्यताश्वासतापकृत् । यथा- 'पक्ष्माग्रप्रथिताश्रुबिन्दुनिकरमु क्ताफलस्पधिभिः कुर्वन्त्या हरहासहारि हृदये हारावलीभूषणम्। FRIRITE बाले बालमृणालनालवलयालङ्कारकान्ते करे। विन्यस्याननमायताक्षि सुकृती कोऽयं त्वया स्मर्यंते ॥२३३॥ जैसे वीरचरित (२.४८) में परशुराम (= जामदग्न्य) राम से कहते हैं- 'क्षत्रियों की सन्तान के प्रति रोष के कारण गर्भ-पिण्डों को भी काट-काट कर खण्ड खण्ड करने वाले, राजवंश में उत्पन्न जनों का इक्कीस बार नाश करने वाले और उनके रक्त से भरे हुए सरोवर में स्नान (सवन) करने के अत्यधिक आनन्द से करोष की प्रग्नि को शान्त करके पितृ-तर्पण करने वाले उत्कट तेज से युक्त (उद्दाम) मेरा स्वभाव समस्त प्राणियों ने नहीं जाना है, ऐसा नहीं'। टिप्पणी-ना० शा० (७. ८१, पृ० ३७०), भा०प्र० (पृ० २३), ना० द० (३. २०२), प्रता० (पृ० १८४), सा० द० (३. १४६)। (१०) चिन्ता इष्ट वस्तु की प्राप्ति न होने के कारण जो (उसका) ध्यान किया जाता है, वह चिन्ता कहलाती है। यह शून्यता (बुद्धि तथा इन्द्रियों की विकलता) श्वास (की अधिकता) तथा ताप आदि (अनुभाव) उत्पन्न करने वाली होती है। जं से (कोई सखी नायिका से कहती है)-'हे विशाल नेत्रों वाली सुन्दरी, पलकों के अग्र भाग पर फैले, मोतियों से स्पर्धा करने वाले अश्रु-बिन्दुग्ों के समूह से अपने हृदय पर महादेव के हास के समान हार का आभूषण रचती हुई, मृदु मृखाल-नाल के कङ्गण नामक अलद्धार से शोभित हाथ पर अपना मुख रखकर तुम किस पुण्यवान् की याद कर रही हो ?

Page 327

२७६ दधरूपकम्

यथा वा- 'अस्तमितविषयसङ्गा मुकुलितनयनोत्पला बहुश्वसिता। ध्यायति किमप्यलक्ष्यं बाला योगाभियुक्तेव ।।२३४।। अ्रथ त्रास :-

पथा माधे- 'त्रस्यन्ती चलशफरीविघट्टितोरु- र्वामोरूरतिशयमाप विभ्रमस्य। क्षुभ्यन्ति प्रसभमहो विनापि हेतो- र्लीलाभिः किमु सति कारये रमण्यः ॥२३५।। अथासूया- (२१) परोत्कर्षाक्षमासूया गर्वदौर्जन्यमन्युजा। दोषोक्त्यवज्ञे भ्रु कुटिमन्युक्रोधेङ्गितानि च ॥ १७ ॥ अथवा जैसे-'(रूप आदि) विषयों का सम्पर्क त्याग कर नेत्र-कमल को बन्द किये, बहुत श्वास लेती हुई यह बाला योगिनी (योगाभियुक्ता=योग में : स्थित) के समान किसी अलक्ष्य (वस्तु) का ध्यान कर रही है'। टिप्पणी-ना० शा० (७.५०, पृ० २६१), भा० प्र० (पृ० १८), ना० द०= (३. १६०), प्रता० (पृ० १७७), सा० द० (३. १७१)। (११) श्रास (बादल की) गर्जनाआदि से होने वाला मन का तोभ त्रास कहलाता है। इसमें कम्पन आदि (अनुभाव) होते हैं ॥१६॥ जैसे भाघ (जल-विहार वर्णन, ८.२४) में-'उस सुन्दर उरभों वाली एक) सुन्दरी के उरु में चलती हुई मछली टकरा गई, इससे डरती हुई वह अत्यधिक श्ङ्ग-भङ्ङिमाएं (विभ्रम) प्रकट करने लगी। अहो, रमणियाँ तो बिना कारण के केवल लीलाओं से भी बलात क्षुब्ध हो जाया करती हैं फिर यदि कारण हो तो (उनके क्षोभ का) क्या कहना ?" टिप्पसी-ना० शा० (७.६१, पृ० ३७३-३७४), भा० प्र० (पृ० २४), ना० द० (३. २०८), प्रता० (पृ० १८६), सा० द० (३. १६४) । (१२) असूया दूसरे की उन्नति को न सह सकना ही असूया है। यह गर्व दुर्जनता तथा क्रोध से उत्पन्न होती है। और, इसमें (दूसरे का) दोष-कथन, अनादर, भौंहे चढाना, मन्यु तथा क्रोध की चेष्टाए आदि (अनुभाव) होते हैं॥१७।

Page 328

चतुर्थ। प्रकाश। २७६

गर्वेर यथा वीरचरिते- 'अर्थित्वे प्रकटीकृतेऽपि न फलप्रात्तिः प्रभो: प्रत्युत द्रुह्यन्दाशरथिविरुद्वचरितो युक्तस्तया कन्यया। उत्कषं च परस्य मानयशसोविस्रंसनं चात्मनः स्त्रीरलं च जगत्पतिर्दशमुखो हप्तः कथं मृष्यते ॥२३६॥ दौजंन्याद्यथा- 'यदि परगुणा न क्षम्यन्ते यतस्व गुणार्जने नहि परयशो निन्दाव्याजैरलं परिमाजितुम् । विरमसि न चेदिच्छाद्वेषप्रसक्तमनोरथो दिनकरकरान् पाशिच्छत्रैनुं दञ्छुममेष्यसि ।२३७।। मन्युजा यथाऽमरुशतके- 'पुरस्तन्व्या गोत्रस्खलनचकितोऽहं नतमुखः प्रवृत्तो वलक्ष्यात्किमपि लिखितु वैवहतकः । स्फुटो रेखान्यासः कथमपि स ताहृक्परिणतो गता येन व्यक्ति पुनरवयवैः सैव तरुणी ॥२३८॥ गर्व से उत्पन्न होने वाली असूया; जंसे वीरचरित (२.६) में (माल्यवात् रावण की राम के प्रति असूया का वर्णन करता है)-'(जनक से तीता के लिये) बाचना करने पर भी स्वामी (रावण) को फल-प्राप्ति न हुई, प्रत्युत द्रोही एवं विचद कार्य करने वाले वशरथ-पुत्र (राम) ने उस कन्या को पा लिया। इस प्रकार शत्रु का उत्कर्ष, अपने मान और यश का ह्रास और स्त्री-रत्न का चला जाना- इन सबको संसार का स्वामी गर्वीला रावण कैसे सहन करेगा ?' दुर्जनता से होने वाली असूया; जैसे (सुभाषितावलि ४५३, महेन्द्र कवि का पद्य) 'यदि तुम दूसरे के गुणों को नहीं सहन कर सकते तो गुरों के अर्जन के लिये यत्न करो। निन्दा के बहाने से तो दूसरे का यश साफ (समाप्त) नहीं किया जा सकता। यदि इच्छा-द्वेष में लगे मनोरथ वाले तुम (पर-निन्दा से) नहीं रुकते हो तब तो हाथों के छत्र से सूर्य की किरणों को रोकते हो अतः (व्यर्थ ही) थक आाभोगे'। मन्यु से उत्पन्न असूया, जैसे अमरुशतक (५१.५२) में (कोई नायक कुपित प्रिया को मनाने में असफल होकर अपने मित्र से कहता है)-'उस कृशाङ्गी के सभक्ष अपने मुख से दूसरी नायिका का नाम निकल जाने (गोत्र-स्खलन) से मैं चकित हो गया और लज्जा (वंलक्ष्य) से नीचा मुख करके भाग्य का मारा मैं कुछ योही रेखा खींचने लगा। किन्तु वह रेखा-न्यास भी स्पष्ट रूप से इस प्रकार का हो गया कि वही तरुणी अपने समस्त शङ्गों में प्रकट हो उठी।

Page 329

२८० दशकपकमू

ततश्चाभिज्ञाय स्फुरदरुणगण्डस्थलरुचा मनस्विन्या रोषप्रसायरभसाद् गद्गदगिरा। अहो चित्रं चित्रं स्फुटमिति निगद्याश्र कलुषं रुषा ब्रह्मास्त्र मे शिरसि निहिती वामचरण: ॥२३६॥: अथामर्ष :- (२२) अधिक्षेपापमानादेर मर्षीडभिनिविष्टता। तत्र स्वेदशिर.कम्पतर्जनाताडनाद्यः ॥१८॥ यथा वीरचरिते- 'प्रायश्चित्तं चरिष्यामि पूज्यानां वो व्यतिक्रमात्। न त्वेवं दूषयिष्यामि शस्त्रग्रहमहाव्रतम् ॥२४०।। यथा वा वेणीसंहारे- 'युष्मच्छासनल ङ्नाम्भसि मया मग्नेन नाम स्थितं प्राप्ता नाम विगर्हणा स्थितिमतां मध्येऽनुजानामपि। क्रोधोल्लासितशोणितारुणगदस्योच्छिन्दतः कौरवा- नद्कं दिवसं ममासि न गुरुर्नाहं विषेयस्तव ।।२४१।। तब उसे पहचान कर मानिनी के कपोल फड़कने लगे, उनकी कान्ति लाल हो गई, कोध और प्रसाय के आवेग से उसकी वारगी गद्गद हो गई। और, उस मानिनी ने अश्रु-जल से मलिन होते हुए 'स्पष्ट ही यह अनोखा चित्र है' यह कहते हुए कोधपूर्वक ब्रह्मास्त्र जैसे अपने वामचरण को मेरे सिर पर रख दिया। टिप्पणी-ना० शा० (७.३६-३७, पृ० ३५८-३५६), भा० प्र० (पृ०१६), ना० द० (३. १८७), प्रता० (पृ० १७५). सा० द० (३. १६६) । (१३) अ्र्परमर्ष धिक्कार अधिक्षप abuse) तथा अपमान आदि से उत्पन्न होने वाला अभिनिवेश अमर्ष कहलाता है। उसमें स्वेद, सिर को हिलाना, तर्जना तथा ताडना आदि (अनुभाव) होते हैं ॥१८॥ जैसे वीरचरित (३.८) में ऊपर उदा० ७२। और, जँसे वेरीसंहार (१.१२) में (भीमसेन सहदेव के द्वारा युधिष्ठिर से कहला रहा है)-'मैं आपकी आज्ञा के उल्लंघन के जल में डूब गया हूँ, मैंने आपकी आज्ञा में स्थित रहने वाले अनुजों के बीच में भी निन्दा प्राप्त कर ली है। अब मैं क्रोधपूर्वक गदा उठाकर उसे रुधिर से लाल करता हुआ कौरवों का नाश करने वाला हूँ। आज एक दिन के लिये आप मेरे बड़े भाई नहीं हैं और न मैं आापका आज्ञाकारी (विधेय) हूँ।' टिप्परी-(१) ना० शा० (७. ७८-७६, पृ० ३६६-३७०), भा० प्र० (पृ० २२); ना० द० (३. १६७), प्रता० (पृ० १८३), सा० द० (३. १५६) । (२) अभिनिविष्टता=अभिनिवेशः, असहनमिति यावत् (प्रभा), Resoluteness

Page 330

चतुर्थ: प्रकाशा २८१

प्रथ गर्वः- (२३) गर्वोडभिजनलावएयबलैश्वर्यादिभिर्मदः। कर्माए याधर्षणावज्ञा सविलासाङ्गवीक्षसाम्॥ १६ ॥ यथा वीरचरिते- 'मुनिरयमथ वीरस्ताद्टशस्तत्प्रियं मे विरमतु परिकम्पः कातरे क्षत्रियासि।

परिचरणासमर्थो राघवः क्षत्रियोऽहम् ॥२४२॥ यथा वा तत्र व- 'ब्राह्मणातिक्रमत्यागो भवतामेव भूतये। जामदग्न्यश्च वो मित्रमन्यथा दुर्मनायते ॥२४३॥

(Haas), determination of purpose (Apte). यह शब्द यहाँ अस्पष्ट सा है। ना.द० में अमर्ष का रूप अ्रधिक स्पष्ट है- 'तिरस्कार आदि के कारण उत्पन्न होने वाली बदला लेने की इच्छा अमर्ष है (क्षेपादेः प्रतिकारेच्छाऽमर्षः) । काव्यानु- शासन (२. ४५) में भी 'प्रतिचिकीर्षारूपोऽमषंः' यही कहा गया है। ना० द० में प्रतिकारेच्छा (=अमर्ष) और क्रोध का अन्तर यह बतलाया गया है कि अपकारी के प्रति अपकार करने की इच्छा अमर्ष है और दूसरे के द्वारा अपकार न किये जाने पर भी दूसरे को हानि पहुंचाने का भाव क्रोध है। (१४) गर्व उच्चकुल, सौन्दर्य, बल, ऐश्वर्य आदि से उत्पन्न होने वाला मद ही गर्व है। दूसरे को तंग करना (आघर्षए=annoying), तिरस्कार करना तथा विलासपूर्वक (शान के साथ) अपने अङ्गों को देखना आदि इसके कार्य (अनुभाव) होते हैं ॥१६॥ जैसे वीरचरित (२.२७) में (परशुराम से डरी हुई सीता के प्रति राम की उक्ति)-'यह (मुनि परशुराम) ऐसा वीर है, यह मेरे लिये प्रसन्नता की बात है। हे भीता, काँपना छोड़ दो, तुम तो क्षत्रिया हो और मैं भी तपस्या में कीति का प्रसार करने वाले तथा दर्प से भुजाओं में खुजलाहट वाले (इस परशुराम की) सेवा में (दोनों प्रकार से) समर्थ रघुवंशी राम हूं। और जंसे वहीं (महावीरचरित २.१०) ऊपर २.६ उदा० "। टिप्पणी-(१) ना० शा० (७. ६७, पृ० ३६६), भा० प्र० (पृ० २२), ना० द० (३. २१०), प्रता० (पृ० १८०), सा० द० (३. १५४)। (२) कर्मासि= कार्य, विकार; अर्थात् अनुभाव।

Page 331

२९२ देशरूपकम्

घरथ हमृति :- (२४) सदृशज्ञानचिन्तादयैः संस्कारात्स्मृतिरत्र च।2ा (] ज्ञातत्वेनार्थ भासिन्यां भ्रसमुन्नयनाद्यः ॥ २०॥ यथा- 'मैनाकः किमयं रुणद्धि गगने मन्मागंमव्याहतं शक्तिस्तस्य कुतः स वज्त्रपतनाद्गीतो महेन्द्रादपि। ताक्ष्यः सोऽपि समं निजेन विभुना जानाति मां रावण- मा :! ज्ञातं, स जटायुरेष जरसा क्लिष्टो वधं वाञ्छति ॥२४४॥ यथा वा मालतीमाधवे-'माधवः-मम हि प्राक्तनोपलम्भसंभावितात्म- जन्मनः संस्कारस्यानवरतप्रबोधात् प्रतीयमानस्तद्विसहरैः प्रत्ययान्तरैरतिस्कृतप्रवाहः प्रियतमास्मृतिप्रत्ययोत्पत्तिसंतानस्तन्मयमिव करोति वृत्तिसारूप्यतश्चैतन्यम्। (१५) स्मृति समान वस्तु का ज्ञान या चिन्ता आदि के कारण संस्कार (के उद्बुद्ध होने) से स्मृति उत्पन्न होती है यह स्मृति "मैंने पहले यह जानी थी" (ज्ञात) इस रूप में किसी वस्तु का भास कराती है। इसमें भौंहों को ऊंचा उठाना आदि (अनुभाव) होते हैं॥२०॥ जंसे [महानाटक ३.७६, पृ० १२८ (Haas) में सीता-हरण करके आकाश- मार्ग से जाता हुआ रावण जटायु को देखकर सोचता है]-'क्या शाकाश में मेरे प्रबाषित मार्ग को यह मैनाक पर्वत रोक रहा है ? किन्तु उसकी ऐसी शक्ति कहां ? वह तो इन्द्र के भी वज्रपात से डरा हुआ है। फिर क्या यह गरुड़ (तार्क्ष्य) है? किन्तु वह भी अपने स्वामी (विष्यु) के सहित मुझक रावण को जानता है। अच्छा, समझा, यह वह जटायु है, जो बुढ़ापे से दुःखी हु (मेरे द्वारा) अपना वध बाहता है। औौर, जैसे मालतीमाघव (५.१०) में-माधव-जो (स्मृति) पहले ज्ञान (उपलम्भ) से अपना जन्म पाने वाले संस्कार के निरन्तर प्रबुद्ध होने के कारण प्रतीत हो रही है, अन्य ज्ञानों के द्वारा जिसका प्रवाह नहीं रोका गया है, ऐसी यह प्रियतमा (मालती) की स्मृति रूपी ज्ञान की उत्पत्ति की परम्परा (सन्तान) मेरी बेतना को वृत्ति के समान रूप वाली करती हुई मालतीमय (तन्मय) ही क रही है।

Page 332

चतुर्थ: प्रकाश: २53g

'लीनेव प्रतिबिम्धितेव लिखितेवोत्कीर्णरूपेव च प्रत्युप्तेव च वज्रसारघटितेवान्तर्निखातेव च। सा नश्चेतसि कीलितेव विशिखेश्चेतोमुवः पञ्चभि- शचिन्तासंततितन्तुजालनिबिडस्यूतेव लग्ना प्रिया ॥२४५।। मरणम्- (२५) मरं सुप्रसिद्धत्वादनर्थत्वाच्च नोच्यते। यथा- 'संप्राप्तेऽवधिवासरे क्षणामनु त्वद्वर्त्मवातायनं 8 (77)

वारंवारमुपेत्य निष्क्रियतया निश्चित्य किचिच्चिरम् । संप्रत्येव निवेद् केलिकुररीं सास्त्रं सखीम्यः शिशो- र्मधिव्या: सहकारकेण करुणाः पाशिग्रहो निर्मितः ॥२४६।।३ वह प्रिया (मालती) लीन सी, प्रतिबिम्बित सी, चित्रित सी, खोद (उत्कीर्र) कर बनाई सी, जड़ी गई सी, (प्रत्युप्ता), व्रज-लेप से रची गई सी, भ्रन्तःकरण में गड़ी सी, कामदेव के (चेतोभुवः) पाँच बाणों के द्वारा कील दी गई सी, चिन्ता- सन्तान रूपी तन्तुओं से मजबूती के साथ सिली सी हमारे चित्त में लगी है।' टिप्पणी- (१) ना० शा० (७.४६, पृ० ३६१), भा० प्र० (पृ० १८), ना० द० (३. २०६), प्रता० (पृ० १७६), सा० द० ( ३. १४५ ) । (२) प्रशवतनेति०-प्राक्तनेन उपलम्भेन ज्ञानेन सम्भावितं जातम् आत्मजन्म स्वोत्पत्तिरयस्य तथाभूतस्य संस्कारस्य। (३) वृत्तिसारू्यतः- सांख्य-योग के अनुसार चित्त (बुद्धि) का विषय रूप में जो परिणाम होता है, वही वृत्ति है। चैतन्य (पुरुष) जो कि बुद्धि में प्रतिबिम्बित हुआ करता है, वह बुद्धि से अपना विवेक न करता हुआ अपने आपको ही वृत्ति से युक्त या वृत्ति के सदश समझ लेता है। यही वृत्ति-सारूप्यहै" (वृत्तिसारूप्यमितरत्र, योगसूत्र, १.४)। यहां मालती-विषयक स्मृति (वृत्ति) हो रही है अतः माधव का चैतन्य मालतीमय हो रहा है। (१६) मरण मरण का लक्षण नहीं कहा; क्योंकि (i) वह प्रसिद्ध ही है तथा (ii) वह अनर्थ रूप होता है। जैसे (किसी प्रोषितपतिका की दूती घर लौटते हुए नायक से कह रही है)- '(चागमन की) अवधि का दिवस आने पर प्रतिक्षण बार-बार तुम्हारे आने के मार्ग की खिड़की पर आकर निष्क्रिय होकर देर तक कुछ निश्चय करके अभी- परभी कीडा की कुररी (एक पक्षिी) को आंसुओं के साथ सखियों को समर्पित करके उसने अल्प आयु वाली माधवो (लता) का सहकार (परस्र) के साथ करुर पाणि-प्रहण कर दिया'।

Page 333

२८४ देशरूपकमू

इत्यादिवच्छङ्गाराश्रयालम्बनत्वेन मरसो व्यवसायमात्रमुपनिबन्धनीयम्। अ्न्यत्र कामचारो यथा वीरचरिते-'पश्यन्तु भवन्तस्ताडकाम्- हन्मर्मभेदिपत दुत्कटक ङ्पत्रसंवेगतत्क्षणकृतस्फुरदङ्गभङ्गा। नासाकुटीरकुहरद्वयतुल्यनिर्यदुदबुद्बुदध्वनदसृतप्रसरा मृतैव ।२४७।। प्रथ मद :- (२६) हर्षोत्कर्षो मदः पानात्सखलदङ्गवचोगतिः ॥।२१। निद्रा हासोऽत्र रुदितं ज्येष्ठमध्याधमादिषु। इत्यादि के समान शृङ्गार के आश्रय (रतिभाव के आश्रय प्रिया अथवा प्रिय) को लक्ष्य करके (पालम्बनत्वेन) जो मरणा होता है उसमें केवल मरण की तैयारी का ही वर्णन करना चाहिये (साक्षात मरणा का नहीं)। अन्य रसों में इच्छानुसार (मरण की तैयारी या साक्षात् मरस का) वर्णन किया जा सकता है। जंसे वीरचरित (१.३६) में [ताड़का के साक्षात् मरणा का वर्णगन किया गया है] 'शाप ताड़का को देखें, हृदय-मर्म का भेदन करने वाले गिरते हुए (राम के) तेज बासों ने वेगपूर्वक तत्काल ही उसका अङ्ग-भङ्ग कर दिया है। उसके नासिकारूपी कुटीर के वोनों छिद्रों (कुहर) से समान रूप से बुदबुदों से भरी शब्द करती हुई रुबिर की धारा बह रही है, लो यह मर ही गई'। टिप्पणी-(१) ना शा० (७. ८६६०, पृ० ३७२-३७३), भा० प्र० (पृ० २४), ना० द० (३. १६८), प्रता० (पृ० १८५), सा० द० (३. १५५)। (२) शृङ्गाराश्रय०-शृङ्गारस्य य आश्रयः प्रियो वा प्रिया वा तादशालम्बनत्वेन नाम सादशशृङ्गाराश्रयमुद्दिश्य मरणो (प्रभा)। व्यवसाय=उद्योग, निश्चय, तैयारी; भाव यह है कि शृङ्गार के वर्णन में साक्षात् मरणा का वर्णन नहीं किया जाता अपितु मर की तैयारी का ही वर्णन किया जाता है। अतः ना० द० में मृत्युसंकल्पो मरणम, तथा प्रता० में 'मरणं मरणार्थस्तु प्रयत्नः परिकीर्तितः' ऐसा कहा गया है। ना० शा०आदि में जो मरण के प्रकार तथा अभिनय आदि का विस्तृत वर्णन किया गया है वह शृङ्गार से अन्य रसों के सन्दर्भ में ही समभना चाहिये। (१७) मद (मद्) पान से उत्पन्न होने वाली हर्ष की ऐसी अधिकता, जिसमें शरीर, वाणी और चाल लड़खड़ाने लगते हैं, मद कहलाती है। इसमें उत्तम, मध्यम तथा अधम जनों में क्रमशः निद्रा, हसना तथा रुदन (अनुभाव) हुआ करते हैं ॥२१।।

Page 334

चतुर्थ: एकाक्ा

यथा माधे- 'हावहारि हसितं वचनानां कौशलं दृशि विकारविशेषा।। -IFF

चक्रिरे भृशमृजोरपि वध्वा: कामिनेव तरुणन मदेन ॥२४८।। इत्यादि। अथ सुप्तम्- (२७) सुप्तं निद्रोद्गवं तत्र श्वासोच्छ वासक्रिया परम् ॥२२।। यथा- 'लघुनि तृशकृटीरे क्षेत्रकोणो यवानां नवकलमपलालस्रस्तरे सोपधाने। परिहरति सुषुप्तं हालिकद्वन्द्वमारात् कुचकलशमहोष्माबद्धरेखस्तुषारः ॥२४६॥ अथ निद्रा- (२८) मनर्संमीलनं निद्रा चिन्तालस्यक्कमादिभिः। तत्र जृम्भाङ्गभङ्गात्तिमीलनोत्स्वप्नतादय :* ।। २३॥। जैसे माघ (१.१३) में-'कामी युवक के समान मद ने भोली (मुग्बा) वधू में भी हाव से मनोहर हंसी, वचनों का कौशल तथा दृष्टि में विशेष प्रकार के विकार अत्यधिक मात्रा में उत्पन्न कर दिये'। इत्यादि । fVgR टिप्पणी-ना० शा० (७.३८-४६, पृ० ३५६.३६०), भा० प्र० (पृ० १६- १८), ना० द० (३. १८८), प्रता० (पृ० १७५), सा० द० (३. १४६-१४७) । (१८) सुप्त निद्रा से उत्पन्न होने वाला भाव सुप्त कहलाता है। उसमें श्वास तथा उछवास क्रिया (अनुभाव) मुख्यरूप से (परम्) होती है।२२॥ जैसे (सुभाषितावलि १८४०, कमलायुध नामक कवि का पद्य-Haas) 'जौ के खेत के एक कोने में बनी हुई छोटी सी ओोंप्ड़ी में नये धानों के पुभ्नाल के तकिये सहित विस्तरे पर सोई हुई हालिक की जोड़ी(दम्पती) को-स्तन-कलश की अत्यधिक उष्णता के कारण रेखा-बद्ध तुषार-निकट से ही बचा रहा है (समीप में स्थित होकर भी उस पर प्रभाव नहीं डाल रहा)'। टिप्पणी-ना० शा० (७. ७५-७६, पृ० ३६८-२६६), भा० प्र० (पृ०२३), ना० द० (३. २०१), प्रता० (पृ० १८२), सा० द० (३. १५२)। सा०द० में इसे 'स्वप्न' कहा गया है तथा स्वरूप में भी भेद है। (१६) निद्रा चिन्ता, आलस्य और थकान आदि के कारण मन का सम्मीलन (बाह्य इन्द्रियों से सम्बन्ध न होना) ही निद्रा है। उसमें जम्भाई, अंगड़ाई (अङ्गभङ्ग), आँखे मुदना तथा सोते में बड़बड़ाना (उत्स्वप्न) आदि (अनुभाव) होते हैं। २३ ॥ *'उच्छ वसवादयः' इति पाठान्तरम्।

Page 335

२८६ दशरूपकम्

यथा- निद्रार्घंमीलितहशो मदमन्थराि नाप्यर्थवन्ति न च यानि निरर्थकानि। अद्यापि मे मृगदशो मधुराणि तस्या- १I Bस्तान्यक्षराणि हृदये किमपि ध्वनन्ति ॥२५०। यथा च माघे- 'प्रहरकमपनीय स्वं निदिद्रासतोच्चैः प्रतिपदमुपहूतः केनचिज्ागृहीति। मुहुरविशदवर्गा निद्रया शून्यशून्यां दददपि गिरमन्तबुंध्यते नो मनुष्यः ॥२५१॥ अथ विबोध :- (२६) विबोध: परिणामादेस्तत्र जुम्भात्िमर्दने।

जैसे (सुभाषितावलि १२८०; कोई नायक किसी नायिका की निद्रावस्था का वर्णन करते हुए कहता है)-'आधे मुंदे नेत्रों वाली उस मृगनयनी के मद के कारण मन्द-मन्द कहे गये, न अर्थयुक्त और न ही निरर्थक, वे मधुर पक्षर भब भी मेरे हृदय में कुछ गुनगुना रहे हैं।' और, जैसे माघ (११.४) में 'किसी (पहरेदार) ने अपना पहरा समाप्त करके नींद लेने की इच्छा करते हुए (दूसरे पहरेदार को) पग-पग पर (प्रतिपदम) यह पावाज लगाई-'जागो जागो'। किन्तु वह मनुष्य निद्रा के कारण प्रस्पष्ट प्रक्षरों वाला सूना-सूना (अर्थशून्य) सा उत्तर देते हुए भी भीतर (मन) से नहीं जागता'।

टिप्पली-(१) ना० शा० (७.७१-७२, पृ० ३६७-३६८, भा० प्र० (पृ० २२), ना० द० (३. २००), प्रता० (पृ० १८२) सा० द० (३. १५७)। (२) मन: सेम्मीलनम्-मन का बाह्य इन्द्रियों से सम्बन्ध न होना; मनःनिमीलनं बाह्ये- न्द्रियसम्बन्धविरहः (प्रता० टीका। (३) ना० द० (३. २१) के अनुसार निद्रा और सुप्त का अन्तर यह है कि निद्रा में मन की वृत्ति रहती है केवल बाह्य इन्द्रियों से उसका सम्बन्ध नहीं होता, किन्तु सुप्त में मन की वृत्ति भी रुक जाती है। (२0) विबोष परिणाम (टि०) आदि से विबोध (=जागरण) उत्पन्न होता है। उसमें जम्भाई लेना, आँखे मलना आदि (अनुभाव) होते हैं

Page 336

चतुर्थ: प्र॥शः २८७

यथा माधे- 'चिरर तिपरिखेद प्राप्तनिद्रासुखानां चरममपि शयित्वा पूर्वमेव प्रबुद्धाः । अपरिचलितगात्रा: कुर्वते न प्रियाणा- मशिथिलभुजचक्राश्लेषभेदं तरुण्यः ॥२५२।। अरथ व्रीडा- (३०) दुराचारादिभिर्व्रीडा घाष्टर्याभावस्तमुन्नयेत्।

यथाSमरुशतके- 'पटालग्ने पत्यौ नमयति मुखं जातविनया हठाश्लेषं वाञछत्यपहरति गात्रारि निभृतम् । जैंसे माघ (११.१३) में - 'बाद में सोकर भी पहिले ही जग जाने वाली तरुखियाँ अपने शरीर को नहीं हिलातीं तथा चिरकालीन रति की थकान से निद्रा के मानन्व को प्राप्त करने वाले अपने प्रियतमों की भुजाओं के दृढ़ आलिङ्गन को भी, भङ्ग नहीं करती (कहीं उनकी निद्रा-भङ्ग न हो जाये ?)'॥ 175-टिप्पशी-(१) ना०शा० (७.७७,पृ० ३६६), भा०प्र० (पृ० २३), ना०द० (३. २१५), प्रaा० (पृ० १८३), सा० द० (३.१५१)। (२) काव्यानुशासन शादि में इसे प्रबोध कहा गया है। (३) परिणाम-परिामोऽवस्थान्तरप्राप्तिस्तथा प निद्रापगमावस्थया विबोधो जायत इत्यभि यः (प्रभा), अर्थात् निद्रा भज्ज होने की प्रवस्था। Coming to an end (of sleep)- Haas. वस्तुतः ऐसा प्रतीत होता है कि यहाँ ना० शा० का अनुसरण करके 'परिणाम' शब्द का प्रयोग किया गया है। र० छ्ा० में विबोध के कारणों का उल्लेख करते हुए 'आहार-परिणाम' को सबसे पहले रक्खा गया है भारतीय स्वास्थ्य-विज्ञान के अनुसार भोजन को भी निद्धा का एक कारण माना जाता है। ना० शा० (पृ० ३६७) में निद्रा के कारणों में 'आहार का भी निर्देश है। यह भी माना जाता है कि आहार का परिपाक हो जाने पर निद्रा टूट जाती है तथा जागरण हो जाता है जागरण के अन्य भी कारण होते हैं जैसे तीव्र शब्द या स्पर्श इत्यादि। उनमें से परिणाम भी एक है। परिणाम= आहार-परिणाम, भोजन का परिपाक। - (२१) व्रीडा अनुचित आचरण आदि के कार जो घृष्टता (प्रगल्भता) का अभाव होता है, वह व्रीडा कहलाती है। इसे एक ओर मोड़कर (साचीकृत) अङ्गों को छिपाना, रंग का फीका पड़ना, मुख नीवा कर लेना आदि (अनु- (भावों) के द्वारा प्रकट करना चाहिये॥ २४ ॥ स जसे अमरुशतक (४१) में (पति के आचरण से लज्जित होने वाली नायिका का वर्णन है)-'जब पति आंचल खींचता है तो वह विनय युक्त होकर मुख-नीचा कर लेती है, पति बलात आलिङ्गन करना चाहता है तो वह दुपके से

Page 337

चवरूपकम्

न शक्नोत्याख्यातु स्मितमुखसखीदत्तनयना हरिया ताम्यत्यन्तः प्रथमपरिहासे नववधूः ॥२५३॥ अथापस्मार :- (३१) आ्रवेशो ग्रहदुःखाधैरपस्मारो यथाविधि: (घि)।

यथा माघे- 'आश्लिष्टभूर्मि रसितारमुच्चैर्लोलद्भुजाकारबृहत्तरङ्गम्। फेनायमानें पतिमापगानामसावपस्मारिणामाशशङ्क।२५४। अपने अ्ङ्ग हटा लेती है। इस प्रकार मुस्कराते हुए मुख वाली सखियों पर दृष्टि डालते हुए भी वह कुछ कह नहीं सकती, वह नववधू इस प्रथम परिहास के अ्रवसर पर मन ही मन में उद्विग्न होती है। कली की टिप्पणी-(१) ना० शा० (७. ५८.५६, पृ० ३६३-३६४), भा० प्र० (पृ०१६), ना० द० (३.२०७), प्रता० (पृ० १७८), सा० द० (३.१६५)। प्रता० में व्रीडा का लक्षण अधिक स्पष्ट है- 'चेतसंकोचन व्रीडानङ्गरागस्तवादिभिः'। (२) साचीकृत-मोड़ा हुआ, एक ओर भुकाया हुआ (turned aside) दुराचार- अकार्य (काव्यानुशासन), जो किसी अवसर पर करने योग्य न हो, व्रीडा नाम- अकार्यकरणात्मिका (ना० शा०) । (२२) अपस्मार I ग्रह (के प्रभाव) तथा आपत्ति इत्यादि से उत्पन्न होने वाला चित्त-वि्ेप (आवेश) ही अपस्मार कहलाता है। इसमें यथायोग्य (यथा- विधि) भूमि पर गिरना, काँपना, पसीना आना, मुह में लाला (राल) तथा झाग (फेन) निकलना आदि अनुभाव होते हैं। २५॥ जैसे माघ (३.७२) में-'सूमि पर पड़े हुए, जोर से शब्द करते हुए, चञ्चल भुजाओं के समान बड़ी बड़ी तरंगों वाले, फेनयुक्त सागर(पतिम् आपगानाम) को कृष्णा (असौ) ने अपस्मार रोग वाला समझा। टिप्पणी-(१) ना० शा० (७. ७३-१४, पृ० ३६८), भा० प्र० (पृ० २३), ना०द० (३.१८५), प्रता०(पृ० १८२), सा०द० (३,१५३) । (२) आवेश := चित्त- विक्षेप, madness (Haas) मन की ऐसी दशा जिसमें कर्त्तव्य तथा अकर्तव्य का ज्ञान नहीं रहता, व्यक्ति पागल सा हो जाता है, (मिरगी का रोग), वैकल्यम्= कृत्याकृत्य।विवेचकत्वम् (ना० द०), मनः क्षेपः (सा० द०) । (३) यथाविधि :- (पाठान्तर यथाविधि)=प्रारब्धानुसारेण (प्रभा), properly speaking (Haas) वस्तुतः यथाविधि पाठ ही उचित प्रतीत होता है । यथाविधि=यथायोगम्; अर्थात् भिन्न-भिन्न कारणों से उत्पन्न होने वाले अपस्मार में यथायोग्य भूपात इत्यादि पनुभाव हुआ करते हैं।

Page 338

चतुर्थं: प्रकाश: २८६

प्रथ मोह :- (३२) मोहो विचित्तता भीतिदुःखावेशानुचिन्तनैः । तत्राज्ञानभ्रमाघातघूर्णनादर्शनादयः ॥ २६॥ यथा कुमारसम्भवे- 'तीव्राभिषङ्गप्रभवेन वृत्ति मोहेन संस्तम्भयतेन्द्रियाणगाम्। अज्ञातभर्तृ व्यसना मुहूतं कृतोपकारेव रतिर्बभूव ॥२५५॥ यथा चोत्तररामचरिते- विनिश्चेतु शक्यो न सुखमिति वा दुःखमिति वा प्रमोहो निद्रा वा किमु विषविसर्पः किमु मदः। तव स्पर्शे स्पर्शे मम हि परिमूढेन्द्रियगणो विकार: कोऽप्यन्तर्जडयति च तापं च कुरुते ॥।२५६। अथ मतिः- (३१) भ्रान्तिच्छेदोपदेशाभ्यां शास्त्रादेस्तत्त्वधीर्मतिः । (२३) मोह भय, दुःख, आवेश (चित्त-वि्ेप) तथा अनुचिन्तन आदि के कारण होने वाली मूर्छा (विचिस्तता = perplexity) ही मोह कहलाता है। उसमें अज्ञान, भ्रान्ति, टकराना (आघात), चक्कर खाना, दिखलाई न देना इत्यादि (अनुभाव) होते हैं॥ २६॥ जैसे कुमारसम्भव (३.७३) में 'इन्द्रियों की वृत्ति को रोक देने वाले, अचानक आने वाले तीव्र आघात (अभिषङ्ग) से उत्पन्न हुए मोह के द्वारा थोड़ी देर के लिये रति को अपने पति (कामदेव) की मृत्यु (व्यसन) का ध्यान न रहा। इस प्रकार मानों मोह ने उसका उपकार ही किया।' और, जैसे उत्तररामचरित (१.३५) में (सीता को लक्ष्य करके राम कहते हैं)-'यह निश्चय नहीं किया जा सकता कि यह सुख है या दुःख, यह मूर्च्छा है या निद्रा, यह विष का प्रसार है या मद। तुम्हारे प्रत्येक स्पर्श में मेरी इन्द्रियों को बिल्कुल मूढ कर देने वाला कोई ऐसा विकार (भाव) हो रहा है जो अन्त :- करण को जड़ बना रहा है और संताप भी उत्पन्न कर रहा है।' 1i टिप्परी-(१) ना० शा० (७.५२-५३, पृ० ३६२), भा० प्र० (पृ० १६), ना० द० (३. १६६), प्रता० (पृ० १७७), सा० द० (३-१५०)। (२) विचित्तता- अचेतनता, मूर्च्छा, मूर्च्छन (प्रता०), अचंतन्य (ना० द०); इस अवस्था में चेतना बिल्कुल समाण्त नहीं हो जाती अपितु सुध-बुध नहीं रहा करती, मोहः चित्तस्य शून्यत्वम् (भा० प्र०)। (२४) मति शास्त्र आदि से उत्पन्न होने वाला तत्त्वज्ञान (अर्थ का निश्चय) ही मति कहलाता है। यह भ्रान्ति-नाश तथा (शिष्य के प्रति) उपदेश आरदि (अनुभावों) से युक्त होती है।

Page 339

२६० दशरूपकम्

यथा किराते- 'सहसा विदधीत न क्रियामविवेक: परमापदां पदम्। वृणते हि विमृश्यकारिणं गुणालुब्धा: स्वयमेव संपदः ॥२५७॥ यथा च- 'व पण्ठिताः साहसिका भवन्ति श्रत्यापि ते संतुलयन्ति तत्त्वम्। वत्बं समादाय समाचरन्ति स्वार्थ प्रकुर्वन्ति परस्य चार्थम् ॥२५८॥ प्रथावस्यप- (३४) आलस्यं श्रमगर्भादेर्ञाड्य जुम्भासितादिमत् ॥२७॥ घथा मसैव- 'चलति कर्थञ्चितपृष्टा यच्छति वचनं कथन्चिदालीनाम्। आसितुमेव ह्वि मनुते गुरुगर्भभरालसा सुतनुः ॥२५६॥ जैसे किराताज नीय (२.३०) में 'विना विचारे कोई कार्य न करना चाहिये, थले बुरे का विचार न करना (अविवेक) बड़ी बड़ी आपत्तियों का कारण होता है। निश्चय ही गुखों से मुग्ध हुई सम्पत्तियाँ विचार कर कार्य करने वाले व्यक्ति का स्वयं ही वरण कर लेती हैं। और, जैसे (?) 'बुद्धिमान् व्यक्ति सहसा कार्य करने वाले नहीं होते। वे तो किसी बात को केवल सुनकर भी तत्त्व का तुलनात्मक विचार कर लेते हैं और तत्व का ग्रहण करके आचरण करते हैं। इस प्रकार अपने कार्य की सिद्धि (अर्थ) कर लेते हैं औौर दूसरे के भी'। टिप्पखी-(१) ना० शा० (७.८२, पृ० ३७१), भा० प्र० (पृ० २३), ना० द० (३. १६३), प्रता० (तत्त्वमार्गानुसन्धानादर्थनिर्धारणं मतिः, पृ० १८४), स्ा० द० (नीतिमार्गानुसृत्यादेरर्थनिर्धारणं मतिः, ३. १६३)। (२) शास्त्रादेः-शास्त्र इत्यादि मति के विभाव (उत्पत्ति के कारण) माने जाते हैं। यहाँ 'आदि शब्द से ऊहा-पोह (मनन), नीतिमार्ग का अनुसरण इत्यादि का ग्रहण होता है। भ्रान्ति-छेद तथा उपदेश आदि इसके अनुभाव हैं (ना० शा०)। यहां 'आदि' शब्द से सन्तोष, धैर्य इत्यादि का ग्रहण करना चाहिये (मि०, सा० द०)। (२५) आ्लस्य परिश्रम या गर्भ-धारण आदि से उत्पन्न होने वाली शिथिलता आलस्य है। यह जम्भाई लेना, बैठे रहना (आसित) आदि (अनुभावों) से युक्त होता है॥२७॥ जैसे मेरा (धनिक का) ही पद्य है-'वह किसी प्रकार (कठिमाई से) चलती है, सखियों के द्वारा पूछे जाने पर किसी प्रकार उत्तर भी दे देती है। किन्तु गर्भ के अत्यधिक भार से अलसाई हुई वह सुन्दरी बैठे रहना ही पसन्द करती है'। टिप्परी-(१) ना० शा० (७. ४८, पृ० ३६१), भा० प्र० (पृ० १८), ना० द० (३. २१४), प्रता० (पृ० १७६ ), सा० द० ( ३. १५५ ) ।

Page 340

चतुर्थ। बकाश। २६१

पथावेग :- (३५) आरवेगः सम्भ्रमोऽस्मिन्नभिसरजनिते शस्त्रनागाभियोगो* वातात्पांसूपदिग्वस्त्वरितपदगतिर्वर्षजे पिसिडताङ्गः। उत्पातात्म्स्तताङ्ग षवहितहितकृते शोकहर्षानुभावा वह्नघू माकुलास्यः करिजमनु भयस्तम्भकम्पापसाराः ।।२=।। अभिसरो राजविद्रवादिः, तद्धतुरावेगो यथा ममैव- आगच्छागच्छ सज्ज कुरु वरतुरगं सन्निघेहि द्र तं मे खङ्ग: क्वासौ कृपाणीमुपनय धनुषा कि किमङ्गप्रविष्टम् । संरम्भोत्निंद्रितानां क्षितिभृति गहनेऽन्योन्यमेवं प्रतीच्छन् वादः स्वप्नाभिहृष्टे त्वयि चकितदृशां विद्विषामाविरासीत् ॥२६०। (२) यद्यपि 'श्रम' भी एक व्यभिचारी भाव है तथापि यह आलस्य नामक व्यभिचारी भाव का विभाव हो जाता है, इसमें कोई दोष नहीं। हां, कोई व्यभिचारी भाव एक दूसरे का व्यभिचारी भाव नहीं हो सकता, क्योंकि व्यभि- चारी भाव तो किसी स्थायी भाव का ही हुआ करता है (ना०द०)। (२६) आवेग आ्रवेग का अर्थ है-सम्भ्रम (हड़बड़ाहट या घबराहट)। (यह अ्र्प्रनेक कारणों से हुआ्र्प्र करता है और प्रत्येक के अनुभाव भी भिन्न-भिन्न होते हैं; जैसे (१) किसी राजा के आक्रमण आदि (अभिसर) से उत्पन्न होने वाले आवेग में शस्त्र तथा हाथी आदि की योजना की जाती है, (२) आँघी (वात) से उत्पन्न होने वाले में धूलि से सना (उपदिग्ध=लिप्त) व्यक्ति तेज चाल से चलता है, (३) वर्षा से उत्पन्न होने वाले आवेग में व्यक्ति त्र््रङ्गों को समेटता है, (४) (उल्का-पात आदि) उत्पात से होने वाले आरवेग में अरङ्ग शिथिल हो जाते हैं, (५) शत्रु (अहित)द्वार। उत्पन्न होने वाले (आवेग) में शोक होता है (मित्र (हित) द्वारा होने वाले में हरष होता है, (६) अग्नि से होने वाले में व्यक्ति धूम से व्याकुल मुख वाला हो जाता है, तथा (७) हाथी से उत्पन्न होने वाले के पश्चात् भय, स्तब्घता, कम्प तथा भागना आदि अनुभाव हुआ करते हैं॥ २८ ।। टिप्पणी-(१) इसमें स्रग्धरा वृत्त है। (२) ना० शा० (७. ६३-६५, पृ०३६५-३६६), भा० प्र० (पृ० २०), ना० द० (३. १६२). प्रता० (पृ० १७६- १८०), सा० द० (३. १४३-१४५) । (३) अभिसर := आ्क्रमण, अभियान (attack-Haas); उत्पात=बिजली कड़कना, उल्का-पात, चन्द्र-सूर्य का ग्रहण इत्यादि (ना० शा०)। अभिसर का अर्थ है-राजा का अभियान आदि, उसके निमित्त से होने वाला आवेग यह है, जैसे मेरा (धनिक का) ही पद्य है-'हे राजन्, गहन पर्वत (क्षितिभृत्) पर सौये हुए तुम्हारे शत्रु जब तुम्हें स्वप्न में देख लेते हैं तो घबराहट से उनकी निद्रा भङ्ग हो जाती है, नेत्र चकित हो जाते हैं और एक दूसरे को लक्ष्य *मायाभियोगो इति पाठान्तरम्।

Page 341

२६२ दश रूपकम्

इत्यादि। 'तनुत्रां तनुत्राणं शस्त्र शस्त्र रथो रथः । इति शुश्र विरे विष्वगु्टाः सुभटोक्तय: ॥२६१। यथा वा- 'प्रारब्धां तरुपुत्रकेषु सहसा संत्यज्य सेकक्रिया- मेतास्तापसवन्यकाः किमिदमित्यालोकयन्त्याकुलाः । आरोहन्त्युटजद्रुमांश्च वटवो वाचयमा अप्यमी सदो मुक्तसमाधयो निजवृषीष्वेवोच्चपादं स्थिता: २६२॥ वातावेगो यथा -- 'वाताहतं वसनमाकुलमुत्तरीयम्' इत्यादि। वर्षजो यथा- 'देवे वर्षत्यशनपचनध्यापृता वह्निहेतो- गेहाद् गेहं फलकनिचितैः सेतुभि: पङ्कभीताः ।

शूर्पच्छत्रस्थगितशिरसो योषितः सञ्चरन्ति ॥२६३॥ उत्पातजो यथा- 'पौलस्त्यपीनभुजसम्पदुदस्यमान- कैलाससम्भ्रम विलोलहशः प्रियाया:। करके उनका इस प्रकार का वार्तालाप होने लगता है-"आाओो, आाध्ो, उत्तम घोड़े को तैयार करो, शीघ्र मेरे पास आ जाओ, यह खङ्ग कहाँ है ? कटारी लाओ्रो, धनुष से क्या (लाभ) ?, अरे क्या (शत्रु) प्रविष्ट हो गया"। इत्यादि। इसी प्रकार 'कवच कवच, शस्त्र-शस्त्र, रथ-रथ, इस प्रकार की श्रेष्ठ योद्धाओं की उत्कट उक्तियाँ चारों ओर (विष्वक्) सुनाई पड़ती थीं।' अथवा जैसे [तपोवन में किसी राजा की सेना या किसी भयजनक व्यक्ति के थ जाने पर तपस्वियों के सम्भ्रम का वर्णन है]-'ये तापस कन्याएँ पुत्र-तुल्य वृक्षों में प्रारम्भ की गई सेचन-किया को एक बम छोड़कर 'यह क्या है' इस प्रकार व्याकुल होकर देखती हैं। ये ब्रह्मचारी कुटी के वृक्षों पर चढ़ रहे हैं। और, मौनी तपस्वी (वाचंयम=a sage who maintains rigid silence-Apte) भी तुरन्त समाधि को छोड़कर अपने आसनों पर ही ऊँचे पैर करके खड़े हो गये हैं।' आाँधी से उत्पन्न होने वाला आवेग यह है, जैसे-'वायु से शहत यह उत्तरीय वस्त्र इधर-उधर उड़ रहा है (झाकुलम)', इत्यादि। एs वर्षा से उत्पन्न होने वाला आवेग; जैसे 'मेघ बरसने पर भोजन पकाने में व्यस्त नारियाँ निरन्तर जल वाले छप्पर के छोर को हाथों से हटाकर सिर को सूप के छाते से ढके हुए, कीचड़ से डरी हुई 'तख्तों के बने बाँधों से, आग लाने के लिये, एक घर से दूसरे घर जा रही है'। उत्पात से होने वाला आवेग है; जैसे-'चन्द्रशेखर (महादेव) की ऐसी स्थिति (आसितम्-आसनम) तुम्हारा वस्याए करे, जिसमें रावण (पौलस्त्य)

Page 342

चतुर्थ: प्रकाशा २६३

श्रेयांसि वो दिशतु निह्न तकोपचिह्न- मालिङ्गनोत्पुलकमासितमिन्दुमौले: ॥२६४॥ अहितकृतस्त्व निष्टदर्शनश्रवणाभ्यां तद्यथोदात्तराघवे-'चित्रमायः-(ससम्भ्र- मम्) भगवन् कुलपते रामभद्र परित्रायतां परित्रायताम्। (इत्याकुलतां नाटयति)' इत्यादि। पुनः चित्रमाय :-- मृगरूपं परित्यज्य विधाय विकटं वपुः । नीयते रक्षसाSनेन लक्ष्मणो युधि संशयम् ॥।२६५। रम :- वत्सस्याभयवारिधे: प्रतिभयं मन्ये कथं राक्षसात् त्रस्तश्चैष मुनिरविरौति मनसश्चास्त्येव मे सभ्भ्रमः । मा हासीजनकात्मजामिति मुहुः स्नेहाद् गुरुर्याचते न स्थातु न च गन्तुमाकुलमतेमू ढस्य मे निश्चय: ॥२६६॥

इष्टप्रासिकृतो यथाऽत्र व-'(प्रविध्य पटाक्षेपेण सम्भ्रान्तो वानरः) वानरः महारात्र, एदं खु पवणणन्दणणागमणेण पहरिस-'(महाराज, एतत्खलु पवननन्दनागम- नेन प्रह्षं-' 1) इत्यादि 'देवस्स हिअरआरणन्दजणणं वित्रलिदं महुवणम्।' (देवस्य हृदयानन्दजननं विदलितं मधुवनम्'।) इत्यन्तम् । की पुष्ट भुजाओं के बल द्वारा कैलास पर्वत के उठाये जाने की घबराहट से चञचल दृष्टि वाली प्रिया (पार्वती) के कोपचिह्न छिप गये हैं, जो (पार्वती के) आलिङ्गन से पुलकित है'। अ्रहितकृत आ्वेग तो अ्ररनिष्ट (वस्तु) के दर्शन या श्रवण आदि से होता है; जैसा कि उदात्तराघव में-'चित्रमाय (घबराहट के साथ)-भगवन्, कुल के स्वामी राम, रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये, (इस प्रकार व्याकुलता का अभिनय करता है) इत्यादि। फिर चित्रमाय-मृग के रूप को छोड़कर भयावना रूप बनाकर यह राक्षस युद्ध में लक्ष्मण (के जीवन) को संशय में डाल रहा है।' 'राम-निर्भयता के सागर वत्स लक्ष्मण को राक्षस से भय हो सकता है, यह कसे मानू ? यह मुनि (चित्रमाय) डरकर चिल्ला रहा है, इसलिये मेरे मन में घबराहट है ही। दूसरी ओर गुरु (?) ने बार-बार स्नेहपूर्वक यह अनुरोध किया था कि जनकपुत्री को (अकेला) न छोड़ना। इस प्रकार मेरी बुद्धि आकुल है, मैं किकत व्यविमूढ हूँ, मेरा न ठहरने का निश्चय हो रहा है, न ही जाने का।' यहाँ तक अनिष्ट-प्राप्ति से होने वाला संभ्रम है। इष्टप्राप्ति से होने वाला संत्रम; जैसे यहीं (उदात्तराघव में ही)- 'घबराया वानर पटपरिवर्तन के साथ प्रवेश करके सुग्रीव से कहता है) वानर-'पवनपुत्र (हनुमान्) के आगमन के आानन्द से इत्यादि से लेकर महाराज के हृदय में आानन्द उत्पन्न करने वाला मधुवन उजाड़ दिया', यहाँ तक।

Page 343

२६४ दश रूपक मू

यथा वा वीरचरिते- 'एह्य हि वत्स रघुनन्दन पूर्णचन्द्र चुम्बामि मूर्धनि चिरस्य परिष्वजे त्वाम्। आरोप्य वा हृदि दिवानिशमुद्वहामि TJEOR (FF

वन्देऽथवा चरणपुष्करकद्वयं ते ।।२६७।। वह्निजो यथाऽमरुशतके- 'क्षिप्तो हस्तावलग्नः प्रसभमभिहतोऽप्याददानोंऽशुकान्तं गृह्हन्केशेष्वपास्तश्चरनिपतितो नेक्षितः समभ्रमेण। आलिङ्गन् योऽवधूतस्त्रिपुरयुवतिभिः साश्रु नेत्रोत्पलाभिः कामीवार्द्रापराध: स दहतु दुरितं शाम्भवो वः शराग्निः ।।२६८।। यथा वा रत्नावल्याम्- 'विरम विरम वह्न मुञ्च धूमाकुलत्वं प्रसरयसि किमुच्चैरचिषां चक्र्वालम्। विरहहुतभुजाऽहं यो न दग्धः प्रियायाः प्रलयदहनभासा तस्य कि त्वं करोषि ॥२६६।।

अथवा जैसे वीरचरित (१.५५) में- 'पूरं चन्द्रमा के समान, रघुकुल को आनन्द देने वाले वत्स राम, साथो, आओ, बहुत समय के पश्चात् तुम्हारे मस्तक का चुम्बन कर लू, तुम्हें गले लगा लू अथवा हृदय में रखकर रात दिन तुम्हें साथ रबखू या तुम्हारे दोनों चरण- कमलों की वन्दना करू। अग्नि से उत्पन्न होने वाला सम्भ्रम; जैसे अमरुतक (२) में 'वह (त्रिपुर- दहन के अवसर की) शिव के बाणों की अग्नि तुम्हारे पापों को भस्म करे; जिस (अग्नि) को अश्रुपूणं नेत्रकमल वाली त्रिपुर-युवतियों के द्वारा, तत्काल अपराध करने वाले कामी के समान, हाथ छने पर झटक दिया गया (क्षिप्तः), बलात आँचल पकड़ते हुए भी ताडित किया गया, केशों को पकड़ते हुए हटाया गया, चरणों में गिरते हुए को सम्भ्रम (भय या आदर) से नहीं देखा गया तथा आलिङ्गन करते हुए दुत्कारा गया'।

अथवा जैसे रत्नावली (४.१६) में (सागरिका को बचाने के लिये अग्नि में प्रविष्ठ होते हुए उदयन की उक्ति)-'हे अग्नि, शान्त हो जाओ, शान्त हो जाओो, दूम को धाकुलता को छोड़ हो। तुम ऊँची खपटों के समूह को क्यों फेला रही हो ? जिस मुझकको प्रलय काल की अग्नि के समान तेज वाली प्रिया के विरह की अग्नि ने नहीं जलाया उसका तुम क्या करोगी'?

Page 344

चतुर्थ: बिकाश: २हप

करिजो यथा रघुवंशे- 'स च्छिन्नबन्धद्रुतयुग्यशून्यं भग्नाक्षपर्यस्तरथं क्षरौन। रामापरित्राणविहस्तयोधं सेनानिवेशं तुमुलं चकार ॥२७०॥ करिग्रहणं व्यालोपलक्षणार्थम्। तेन व्याघ्रशूकरवानरादिप्रभवा आवेगाः व्याख्याताः । प्रथ वितर्क :- (३६) तर्को विचारः सन्देहाद् त्रर शिरोङगुलिनर्तकः। यथा- कि लोभेन विलङ्धितः स भरतो येनतदेवं कृत सदः स्त्रीलघुतां गता किमथवा मातैव मे मध्यमा। मिथ्यैतन्मम चिन्तितं द्वितयमप्यार्यानुजोऽसी गुरु- र्माता तातकलत्रमित्यनुचितं मन्ये विधाना कृतम् ।।२७१।। हाथी से उत्पन्न होने वाला आवेग है, जैसे रघुवंश (५.४६) में 'उस बिगड़े हाथी) ने क्षसा-भर में सैनिक शिविर में ऐसी गड़बड़ी अचा बी (तुमुलं चकार) कि वह (शिविर) बन्धन को तोड़कर भाग जाने वाले श्श्वों से सूना हो गया, वहाँ टूटी धुरी बाले रथ इघर-उघर पड़े थे, योद्धा लोग स्त्रियों की रक्षा में व्याकुल (बिहस्त) थे'। (बक० की कारिका में) 'करिज' (हाथी से उत्पन्न) शब्द का ग्रहण (पशुजन्ध) बिनाश (ग्यालोप) को उपलक्षित करने के लिये है। इसके द्वारा व्याघ्र, शूकर, बानर धादि से होने वाले ध्रावेगों को भी बतला दिया गया है। (२७) चितर्क सन्देह से उत्पन्न होने वाला विचार ही तर्क कहलाता है, यह भौंहों, सिर तथा श्रक्गुलियों में चञ्चलता उत्पन्न करने वाला होता है (अर्थात् इसमें भौंहे चलाना इत्यादि अनुभाव होते हैं)। जैसे (?) (वनवास के निमित्त का विचार करते हुए लक्ष्मण कहते हैं)- 'क्या वह (विनय आदि से युक्त) भरत लोभ से आक्रान्त हो गया और उसने कैकेयी द्वारा (मात्रा) ऐसा करा दिया ? अथवा मेरी मझली माता ही स्त्रियों की (स्वाभाबिक) क्षुद्रता को प्राप्त हो गई ? नहीं, मेरे ये दोनों प्रकार के विचार मिय्या है; सयोकि वह बेरा उ्वेष्ठ आाता (पुरुः) भरत तो धार्य राम का अनुज है औोर वह मेरो घाता (कंबेडी) बिता (बहाराज बकरथ) की वर्मपत्ती है। इसलिये मैं समभता हूँ कि यह अनुचित कायं विधाता ने ही किया है'।

Page 345

२६६ दश रूपव मे

अ्थवा। 'कः समुचिताभिषेकाद्रामं प्रच्यावयेद् गुणज्येष्ठम्। मन्ये ममैव पुण्यैः सेवावसर: कृतो विधिना ॥२७२॥ 1913=11 अ्रथावहित्या- (३७) लज्जादयैर्विक्रियागुप्ताववहित्थाङ्गविक्रिया। यथा कुमारसम्भवे- 'एवंवादिनि देवर्षी पाश्वे पितुरधोमुखी। लीलाकमलपत्राणि गसयामास पार्वती।२७३।। (95) अ्रथ व्याधि :- (३८) व्याधयः सन्निपाताद्यास्तेषासन्यत्र विस्तरः ॥ २६॥ अथवा (रास-वनवास के अवसर पर ही लक्ष्मण का तर्क है)-'गुणों में उत्कृष्ट राम को उचित राज्याभिषेक से कौन वञ्चित कर सकता है ? मैं समभता हूँ कि सेरे पुण्यों से ही विधाता ने मुझके (राम की) सेवा का अवसर दिया है। टिप्प्खी-ना० शा० (७. ६२. पृ० ३७४), भा० प्र० (पृ० २५). ना० द० (३. २०६), प्रता० (पृ० १८६); सा० द० (३ .··... )। (२८) सवहिस्या लज्जा आदि के कारण (मुख-राग आदि) अङ्ग-विकार को छिपाना ही अवहित्था कहलाती है। इसमें अन्य अङ्गों का विकार आदि (अनुभाव) होते हैं। जैंसे कुमारसम्भव (६.८४) में 'देवर्षि नारद के इस प्रकार कहने पर पास में बैठी पार्वती नीचा मुख करके लीला-कमल के पत्तों को गिनने लगी'। टिप्परणी-(१) ना० शा० (७. ८०, पृ० ३७०), भा० प्र० (पृ० २२), ना० द० (३. २१२), प्रता० (पृ० १८४), सा० द० (३. १५८)। (२) अवहित्था का अभिप्राय है आकार को छिपाना। अनुराग आदि का भाव मन में उदित होने पर जो मुख-राग, भ्र -विकार आदि होने लगते हैं उन विकारों को लज्जा भय आदि के कारण छिपाना ही अवहित्था है। लज्जा, भय, गौरव, कुटिलता, धृष्टता आदि इसके विभाव होते हैं। अपने आकार को छिपाने के लिये व्यक्ति किसी अन्य कार्य में लग जाता है, कोई और बात कहने लगता है, किसी ओर देखने लगता है इस प्रकार की अङ्ग-विक्रिया ही अवहित्था के अनुभाव हैं (ना० शो० तथा ना द०) । (२६) व्याधि सन्निपात इत्यादि व्याधियाँ कहलाती हैं। इनका अन्य स्थलों (आयुवेंद आदि के अ्रन्थों) में विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है ॥।२६॥

Page 346

चतुर्थः प्रकाश:

दिङ्मात्र' तु यथा 'अच्छिन्नं नयनाम्बु बन्धुषु कृतं चिन्ता गुरुम्योऽर्पिता दत्त दैन्यमशेषतः परिजने ताप: सखीष्वाहित:। अद्य श्वः परनिवृति वजति सा श्वासैः पर खिद्यते विश्र्धो भव विप्रयोगजनितं दुःखं विभक्तं तया ॥२७४।।स अथोन्माद :- (३६) अप्रे क्षाकारितोन्मादः सन्निपातग्रहादिभिः। अस्मिन्नवस्था* रुदितगीत हासासितादयः ॥ ३०॥ यथा-'आ :! क्षुद्रराक्षस, तिष्ठ तिष्ठ, क्व मे प्रियतमामादाय गच्छसि' इत्युपक्रमे 'कथम्- दिग्दर्शनमात्र तो यह है, जंसे (अमरुतक ११०, कोई दूती नायक के पास जाकर विरह-सन्तप्ता नायिका का उपालम्भपूर्वक वर्शन करती है)-'उस विरहिसी ने निरन्तर बहने वाली अश्रु-धारा वन्धुजनों को अरपिति कर दी है, दीनता पूर्णातः परिजनों को दे दी है, क्षपना सन्ताप सखियों के पास रख दिया है। इस प्रकार उसने वियोग से उत्पन्न होने वाला दुःख बाँट दिया है। तुम निशिचिन्त रहो। वह तो आज या कल पर-निर्वाण को प्राप्त हो जायेगी। उसे तो केवल श्वास ही दुःख दे रहे हैं'। टिप्परी- (१) ना० शा० (७. ८३. पृ० ३७१), भा० प्र० (पृ० २३), ना० द० (३. १६४); प्रता० (पृ० १८५), सा० द० (३. १६४)। (२) सामान्यतः सन्निपात का अर्थ है-साथ मिलना। किन्तु आयुर्वद के अनुसार बात-पित्त-कफ तीनों के एक साथ विकृत होने को सन्निपात कहा जाता है। वात, पित्त और कफ में से किसी एक के विकृत होने पर ही रोग उत्पन्न हो जाया करता है। अतः तीनों के एक साथ विकृत होने से जो रोग उत्पन्न होता है वह अधिक कष्ट- साध्य हुआ करता है। इस प्रकार सन्निपात आदि किसी व्याधि (रोग) के निमित्त हुआ करते हैं। उनसे उत्पन्न होने वाले ज्वर आदि व्याघि कहलाती हैं (द्र०, ना० शा०, ना० द० तथा सा० द०)। दशरूपक में सन्निपात आदि से उत्पन्न होने वाली (ज्वर आदि) व्याधि के लिये सन्निपात आदि शब्द का प्रयोग कर दिया गया है। (३०) उन्माद सन्निपात तथा ग्रह ( के प्रभाव) आदि से उत्पन्न होने वाली जो बिना सोचे-समझे कार्य करने की अवस्था है, वह उन्माद कहलाती है। इसमें रोना, गाना, हंसना तथा बैठे रहना (शासित) आदि अवस्थाएं (अनुभाव) हुआ करती हैं॥ ३० ।। जैसे (विक्रमोर्वशीय नाटक ४.७, उर्वशी के वियोग में उन्मत्त पुरूरवा की उक्ति)-'घरे नीच राक्षस, ठहर ठहर। मेरी प्रियतमा को लेकर कहाँ जाता है'? इस सन्दर्भ में-'क्या? यह नवीन मेध उमड़ा है, यह गर्वयुक्त राक्षस नहीं है। यह *सथान०' इति पा०।

Page 347

देशरूपकम्

नवजलघरः सन्नद्धोऽयं न हप्तनिशाचर: सुरधनुरिदं दूराकृष्टं न तस्य शरासनम्। अयमपि पटुर्धारासारो न बाणपरम्परा कनकनिकषस्निग्धा विद्युत्प्रिया न ममोर्वशी ॥२७५॥ इत्यादि। प्रथ विषाद :- (४०) प्रारब्धकार्यासिद्धथादेर्विषादः सत्त्वसंक्षयः। नि.श्वासोच्छवासहत्तापसहायान्वेषणादिकृत् । ३१।। यथा वीरचरिते-'हा आर्ये ताडके, कि हि नामतत् अम्बुनि मज्जन्त्यलाबूनि, ग्रावार: प्लवन्ते। नन्वेष राक्षसपते: स्खलितः प्रतापः प्राप्तोऽद्भुतः परिभवो हि मनुष्यपोतात्। दृष्टः स्थितेन च मया स्वजनप्रमाथो दैन्यं जरा च निरुणाद्धि कथं करोमि ॥२७६।। क दूर तक फैला हुआ इन्द्रधनुष है, उसका धनुष नहीं है। यह भी तेज (पट) धारा की वर्षा है, बाणों की धारा नहीं है। कसौटी पर कनक-रेखा के समान स्निग्ध यह विद्युत् है, मेरी प्रिया उर्वशी नहीं है'। इत्यादि टिप्पणी-(१) ना० शा० (७. ८४- ८५, पृ० ३७२), भा० प्र० (पृ०२४), ना० द० (३.२०५), प्रता० 'उन्मादस्तुत्यबतित्वं चेतनाचेतनेष्वपि' (पृ० १८५), सा० द० (३. )। (२) यहाँ चश्निपात आदि उन्माद के विभाव हैं। इसी प्रकार इष्टजन-वियोग; विभव-नाश आदि भी इसके विभाव होते हैं (ना०शा०)। ऊपर के उदाहरण में इष्टजन-वियोग ही इसका विभाव है। रोना आदि इसके अनुभाव हैं। असम्बद्ध-प्रलाप भी इसका अनुभाव होता है (ना० शा०)। ऊपर के उदाहरण में यही अनुभाव है। (३१) विषाद . प्रारम्भ किये गये कार्य में असफलता आदि के कारण उत्साह (सत्व) का चीए हो जाना ही विषाद कहलाता है। यह निःश्वास, उच्छवास, हृदय का सन्ताप तथा सहायक की खोज आदि (अनुभावों) का जनक होता है॥ ३१॥ जैसे वीरचरित (१.४०) में (रावस का विषाद है)-'हाय, आर्या ताडका यह क्या हो रहा है ? जल में तूम्बी डूब रही हैं और पाषाण तर रहे हैं। सचमुच, यह राक्षसपति (रावण) का प्रताप क्षीण हो गया है; क्योंकि उसको मनुष्य के बच्ची से खद्सुत परासब घ्ाप्त हुआ है, सैंवे यहाँ रहते हुए ही स्वजनों का नाश देख लिया औोर दीनता तथा बुढ़ापा मुझे (कुछ करने से) रोक रहे हैं, कैसे करू"?

Page 348

चतुर्थ: मकाप: रहह

अथोत्सुक्यम्- (४१) कालाक्षमत्वमौत्सुक्यं रम्येच्छारतिसम्भ्रमैः। *तत्रोच्छ वासत्वराश्वासहत्तापस्वेदविभ्रमाः ॥ ३२ ।। यथा कुमारसम्भवे- आत्मानमालोक्य च शोभमानमादर्शबिम्बे स्तिमितायताक्षी। हरोपयाने त्वरिता बभूव स्त्रीणा प्रियालोकफलो हि वेषः ।२७७॥ यथा वा तत्र व- 'पशुपतिरपि तान्यहानि कृच्छ्रादनिनयदद्रिसुतासमागमोत्कः । कमपरमवशं न विप्रकुयु विभुमपि तं यदमी स्पृशन्ति भावाः ॥२७८॥ टिप्पणी-(१) ना० शा० (७. ६८-६६, पृ० ३६७), भा० प्र० (पृ०२२), ना० द० (३. २०४). प्रता० (पृ० १८१), सा० द० (३. १६७)। (२) सत्त्वसंक्षयः सत्त्व=चित्त (निर्मल चित्त या निर्विकार चित्त), उसकी क्षीणता, चित्त का अनुत्सा- हित तथा सन्तप्त हो जाना, मि० विषादस्तान्तिः, तान्तिः=अनुत्साहाक्रान्तश् चित्तसन्ताप:' (ना० द०) तथा 'विषादश्चेतसो भङ्गः' (प्रता०) अर्थात् दिल टूट जाना। (३२) औ्त्सुक्य (उत्सुकता) रमणीय वस्तु की अभिलाषा, गाढ अनुराग (रति) तथा घबराहट के कारण जो समय (विलम्ब) को न सह सकना है वह औत्सुक्य कहलाता है। उसमें उच्छवास जल्दबाजी, दीर्घ श्वास, हृदय का सन्ताप, पसीना और भ्रम आदि (अनुभाव) होते हैं ।।३२।। जैसे कुमारसम्भव (७.२२) में 'निश्चल (स्तिमित) तथा दीर्घ नेत्रों वाली पावंती दर्पण में अपने सुन्दर रूप को देखकर महादेव जी के पास जाने के लिये शीघ्रता करने लगी। वस्तुतः स्त्रियों की साज-सज्जा का फल यही है कि प्रियतम उसको देखे'। अ्रथवा जैसे वहीं (कुमारसम्भव ६.६५) 'पार्वती से मिलन के लिये उत्सुक महादेव (पशुपति) ने भी वे दिन अ्त्यन्त कठिनता से व्यतीत किये। ये (काम- सम्बन्धी) भाव जब धीर एवं संयमी (विभु) को भी प्रभावित करते हैं तो फिर किस दूसरे असंयमी (अवश) व्यक्ति को विकृत न कर देंगे ?' टिप्पखी-(१) ना० आ्रा० (७. ७०, पृ० ३५७), भा० प्र० (पृ० २१), ना० द० (३. २११), प्रता० (पृ० १८१), सा० द० (३. १५६)।(२) रम्येच्छारति०- यहाँ दो प्रकार का पदच्छेद किया जा सकता है (i) रम्येच्छा+अ्ररति (Haas) अरति=रति का अभाव (lack of the pleasures of love)। इसके कारण भी तत्सुक्य होता है (ii)रम्येच्छा+रति; रति=अनुराग, प्रेम। ना०द० में अभिष्वङ्ग (Intence attachment, affection) औत्सुक्य का निमित्त माना गया है। इसी भाधार पर यहां रदि (माढ अनुराग) यह पदच्छैद श्रषिक उचित प्रतीत होता है। *तन्नोच्छू वासत्वनिः इ्वास०' इति पाठान्तरष्।

Page 349

३०० दश रूपेकमू

अथ चापलम्- (४२)मात्सर्यद्व षरागादेश्चापलं त्वनवस्थितिः । तत्र भर्त्सनापारुष्यस्वच्छन्दाचरणादयः ॥३३॥ यथा विकटनितम्बाया :- 'अन्यासु तावदुपमर्दसहासु भृङ्ग लोलं विनोदय मनः सुमनोलतासु। बालामजातरजसं कलिकामकाले व्यर्थ कदर्थयसि किं नवमल्लिकाया: ।२७६॥ यथा वा- 'विनिकषणरणत्कठोरदंष्ट्राकक चविशङ्कटकन्दरोदराणि। अहमहमिकया पतन्तु कोपात् सममधुनैव किमत्र मन्मुखानि॥२८०॥ अथवा प्रस्तुतमेव तावत्सुविहितं करिष्ये।' इति। अन्ये च चित्तवृत्तिविशेषा एतेषामेव विभावानुभावस्वरूपानुप्रवेशान्न पृथग्वाच्याः।

(३३) चपलता मात्सर्य, द्वेष तथा राग आदि से होने वाली चित्त की अस्थिरता चपलता कहलाती है। उसमें डाँटना, कठोरता दिखलाना तथा स्वच्छन्द आचरण इत्यादि (अनुभाव) होते हैं॥। ३३ ॥ जैसे विकटनितम्बा (नामक कवयित्री) के इस पद्य में सुभाषितावलि ७३५) - 'हे भ्रमर, दूसरी पुष्पलताओं पर अपने चञ्चल मन को बहलाओ जो तुम्हारे उपमर्द (मर्दन, मसलन) को सहन कर सकें। इस नवमल्लिका की कली को, जो प्रभी छोटी है, जिसमें पराग (रजस्) नहीं उत्पन्न हुआ है, बिना अवसर केही व्यथं में क्यों बिगाड़ रहे हो ?' प्रथवा जैसे (रावण की इस उक्ति में ?)-'(दाँत) पीसने के कारण शब्द करती हुई कठोर दाढ रूपी आरों (करकच) से भीषण कन्दरा के समान मध्यभाग (उदर) वाले ये मेरे मुख 'मैं खाऊँ' 'मैं खाऊँ' यह कहते हुए क्या एक साथ कोधपूर्वक अभी इन (वानरों) पर गिर जाये ? भरथवा प्रस्तुत कार्य को ही भली भाँति करूगा'। (22 टिप्पणी-ना० शा० (७.६०, पृ० ३६४), भा० प्र० (पृ० २०), ना० द० (३. १६१) के अनुसार 'चापलं साहसम्, साहसम्=अविमृश्यकारिता (बिना विचारे काम करना), प्रता० (पृ० १७६), सा० द० (३.१६६)। (उपयुक्त भावों के अ्रप्रतिरिक्त) जो अ्न्य चित्तवृत्तियां हैं, उनका इन्हीं के विभाव तथा अनुभाव में अ्न्तर्भाव हो जाता है अतः उनका पृथक कथन नहीं करना चाहिये।

Page 350

चतुर्थ: प्रकाषः ३०१

अरथ स्थायी- (४३) विरुद्धैरविरुद्वैर्वा भवैर्विचछिद्यते न यः । आरत्मभाव नयत्यन्यान् स स्थायी लवणाकरः ॥३४॥ टिप्पसी-ना०शा० (७.६३, पृ० ३७४) में भी व्यभिचारी भावों की संख्या ३३ कही गई है। किन्तु भानुदत्त आदि कतिपय आचार्यों ने इनके अतिरिक्त 'छल' आदि को भी व्यभिचारी भाव माना है। इसी प्रकार ना० द० (३.१८२) में क्षुधा, तृष्णा, मंत्री, मुदिता आदि का भी व्यभिचारी भाव के रूप में उल्लेख किया गया है। साथ ही, जैसा कि ऊपर (४.८ टि०) कहा गया है, किसी रस का स्थायी भाव भी दूसरे रस में व्यभिचारी भाव हो जाया करता है। इसीलिये विश्वनाथ कविराज ने :३ व्यभिचारी भावों के निरूपण को उपलक्षण मात्र बतलाया है; अर्थात् इन ३३ भावों के अतिरिक्त और भी व्यभिचारी भाव हो सकते हैं। दूसरी ओर, साहित्य शास्त्र में एक ऐसी भी परम्परा प्रतीत होती है, जिसके अनुसार व्यभिचारी भाव ३३ ही हैं: अधिक नहीं। धनिक भी इसी मत के मानने वाले प्रतीत होते हैं। प्रस्तुत सन्दर्भ का भाव यह है कि व्यभिचारी भाव विशेष प्रकार की चित्तवृत्तियाँ हैं। निर्वेद इत्यादि ३३ भावों के अतिरिक्त इस प्रकार की औ्रर भी चित्तवृत्तियाँ हो सकती हैं, जो रस के पोषणा में सहायक हुआ करती हैं। फिर भी उनका पृथक् कथन करना आवध्यक नहीं। कारण यह है कि उनमें से कुछ चित्तवृत्तियाँ उक्त ३३ व्यभिचारी भावों के विभाव रूप में होंगी, कुछ इनके अनुभाव रूप में ही। इसलिये उनका इन्हीं में अन्तर्भाव हो जायेगा। द्रष्टव्य-अन्येऽपि यदि भावाः स्युश्चित्तवृत्तिविशेषतः। अन्तर्भावस्तु सर्वेषां द्रष्टव्यो व्यभिचारिषु॥ भा० प्र० पृ० २५ पं० ६.७। स्थायी भाव किरा जो (रति आदि) भाव अपने से प्रतिकूल अथवा अनुकूल किसी प्रकार के भावों के द्वारा विच्छिन्न नहीं होता और लवणाकर (नमक की खान या समुद्र) के समान अन्य सभी भावों को आत्मसात् कर लेता है, वह स्थायी भाव कहलाता है॥३४॥ टिप्परी-(१) ना०शा० (७.८ तथा ८ से पहिले गद्य; पृ० ३४६-३५०), भा० प्र० (पृ० २६), काव्यानुशासन (२.१८), ना० द० (३. १८१ वृत्ति), प्रता० (पृ० १५७), सा० द० (३.१७४)। (२) ये भाव स्थायी इसलिये कहलाते हैं क्योंकि ये स्थितिशील हैं-स्थित रहने वाले हैं (स्थायी यस्मादवस्थितः, ना० शा० पृ०३७६)। साथ ही ये प्रधान भी होते हैं- बह वाश्रयत्वात् स्वामिशताः स्थायिनी भावा: (ना०शा०, पृ० ३४६)। इस प्रकार इनकी दो विशेषताए हैं-(i) स्थिति घीलता और (ii) प्रधानता। दशरूपक में इन्हें इस प्रकार स्पष्ट किया गया है- (i) स्थायी भाव वह भाव है जो प्रतिकूल या अनुकूल भावों के द्वारा विच्छिन्न नहीं होता। (ii) जिस प्रकार लवणाकर में जो भी वस्तु गिर जाती है वही तद्रूप (लवण) हो जाती है, इसी प्रकार सभी व्यभिचारी भाव आदि स्थायी भाव के रूप में ही घुल

Page 351

३०२ दशरूपकम्

सजातीयविजातीयभावान्तररतिरस्कृतत्वेनोपनिबध्यमानो रत्यादि: स्थायी। यथा बृहत्कथायां नरवाहनदत्तस्य मदनमञ्जूषायामनुरागः तत्तदवान्तरानेकनायिका- नुरागैरतिरस्कृतः स्थायी। यथा च मालतीमाधवे शमशानाङ्के बीभत्सेन मालत्यनुराग- स्यातिरस्कार :- 'ममहि प्राक्तनोपलम्भसम्भावितात्मजन्मनः संस्कारस्यानवरतप्रबोधात् मिल जाते हैं। इस पर धनिक की व्याख्या है-'जिस रति आदि भाव का काव्य में इस प्रकार उपनिबन्धन किया जाता है कि वह सजातीय या विजातीय भावों के द्वारा तिरस्कृत नहीं होता, वही रति आदि भाव स्थायी भाव है। रति आदि से उपरक्त चित्त में अविरोधी भावों तथा व्यभिचारियों का सम्बन्ध होता है, यह सभी सहृदयों के अनुभव से सिद्ध है। इस प्रकार स्थायी भाव का स्वरूप यह है :- एक तो वह काव्य में इस प्रकार उपनिबद्ध किया जाता है कि सजातीय या विजा- तीय भावों से उसके सातत्य में विच्छेद नहीं होता, जैसे वृहत्कथा आदि के उदाहरण से स्पष्ट है। (स्थितिशीलता) दूसरे, वह, सहृदय के मन में (रसास्वादन के समय) उदबुद्ध रहता है अन्य सभी भाव उसी में विलीन होते रहते हैं (प्रधानता)। (३) अभिनवगुप्त के अनुसार इनकी स्थितिशीलता यह है कि प्रत्येक व्यक्ति के मन में जन्म से ही ये विशेष प्रकार के भाव रहते हैं। वासना रूप में रहने वाले ये भाव किसी निमित्त से उद्बुद्ध हो जाया करते हैं और अपना कार्य करके विलीन-से हो जाते हैं किन्तु ये कभी नष्ट नहीं होते। इनकी प्रधानता यह है कि ये भाव पुरुषार्थ-चतुष्टय से सम्बन्ध रखते हैं (द्र० अभि० भा०, पृ० २८२-२८३)। (४) आगे चलकर स्थायी भाव का स्वरूप परिष्कृत हुआ तथा 'पुष्ट होकर वा अभिव्यक्त होकर जो भाव रसरूपता को प्राप्त हो जाते हैं वे ही स्थायी भाव हैं', इस बात पर अधिक बल दिया जाने लगा। जैसे-प्रकृष्यमारो यो भावो रसता प्रतिपद्यते। स एव भावः स्थायीति भरतादिभिरुच्यते॥ भा० प्र० (पृ० २६)। किञ्च 'रसावस्थः परं भावः स्थायितां प्रतिपद्यते।' (उद्धृत सा०द० ३.१७२)। सा० द० के स्थायी भाव के लक्षणा में दश० की छाया है, फिर भी इसी पहलू पर अ्रधिक बल दिया गया है- अविरुद्धा विरुद्धा वा यं तिरोधातुमक्षमाः। आस्वादाङकुरकन्दोऽ सी भावः स्थायीति सम्मतः ॥ यहां 'आस्वादाङ्कुरकन्दः' यह शब्द विशेष रूप से ध्यान देने योग्य है। (हt (काव्य आदि में) वशिगत (उपनिबध्यमान) ऐसा रति आदि भाव ही स्थायी भाव कहलाता है, जिसका अन्य सजातीय या विजातीय भावों से अभिभव (तिरस्कार) नहीं होता। (सजातीय भावों से अभिभव न होने का उदाहरण है) जैसे बृहतकथा में जो मदनमञ्जूषा के प्रति नरवाहनदत्त के झनुराग का वर्णन किया गया है. उसका अ्रन्य (नायकों के) अनैक नायिकाओं के प्रति वशित परवान्तर अनुरगों से तिरस्कार नहीं होता। अतः वहां (नरवाहनदत्त निष्ठ) रति

Page 352

चतुर्थ: 5 क:शः ३०३

प्रतीयमानस्तद्विसदशैः प्रत्ययान्तरैरतिरस्कृतप्रवाहः, प्रियतमास्मृतिप्रत्ययोत्पत्ति- संतानस्तन्मयमिव करोत्यन्तवृंत्तिसारूप्यतश्चैतन्यम्' इत्यादिनोपनिबद्धः । तदनेन प्रकारेण विरोधिनामविरोधिनां च समावेशो न विरोधी। तथाहि-विरोधः सहानवस्थानं बाध्यबाधकमावो वा। उभयरूपेरपि न तावत्तादात्म्यमस्यकरूपत्वेनैवाविर्भावात्। स्थायिनां च भावादीना* यदि विरोधस्त- स्थायी भाव है। औौर (विजातीय भावों से न होने का उदाहरण हैं) जैसे मालती- माधव में इमशान के वर्णन-सम्बन्धी (पञ्चम तथा षष्ठ) शङ्क में बीभत्स के वर्णन से मालती के प्रति होने वाले (माधज के) अनुराग का तिरस्कार नहीं होता। जंसा कि इस (सन्दर्भ) में वर्णन किया गया है-(५. e के बाद) जो (स्मृति की धारा) पूर्व अनुभव (उपलम्भ) से उत्पन्न होने वाले संस्कार के निरन्तर प्रबुद्ध होने के कारण प्रकट हो रही है, जिसका अन्य विजातीय प्रतीतियों (प्रत्यय) से प्रवाह नहीं रोका जा रहा है; ऐसी यह प्रियतमा की स्मृति-रूप ज्ञान की उत्पत्ति को धारा मेरी चेतना को सन्तःकरसा की वृत्ति के सारूप्य से मालतीमय (तन्मय) बना रही हैं'। इस प्रकार विरोधी या अविरोधी भावों का एकत्र समावेश विरोधी (स्थायीभाव का विच्छेदक) नहीं होता। टिप्पणी-(१) विरुद्धः=विजातीय :; प्रविरुद्धः=सजातीयः । एक रति भाव (अनुराग) दूसरे रति भाव का सजातीय है, किन्तु जुगुप्सा आदि भाव रति भाव के विजातीय हैं; जैसे ऊपर से उदाहरणों में नरवाहनदत्त का मदनमञ्जूषा के प्रति जो अनुराग है, अन्य नायकों के अनुराग उसके सजातीय हैं। किन्तु मालती- माधव में माधव का जो मालती के प्रति अनुराग है, बीभत्स (जुगुप्सा) उसका विजातीय भाव है। (२) न विरोधी=विच्छेदक नहीं; ऊपर के उदाहरणों से स्पष्ट है कि सजातीय और विजातीय भावों के द्वारा स्थायी भाव का विच्छेद नहीं होता। इस प्रकार सजातीय या विजातीय भावों को अङ्गी स्थायी भाव का अङ्ग बनाकर काव्य में समाविष्ट किया जा सकता है उनके समावेश में कोई दोष नहीं होता। कैसे ? यह 'तथा हि ...... चाङगत्वायोगात्' में बतलाया गया है -- विरोध का अभिप्राय है-(दो भावों का) साथ न रह सकना (सहानवस्थान) अथवा एक दूसरे का बाध करना (बाध्य-बाधक-भाव)। इन दोनों ही रूपों में एक स्थायी भाव का (अस्य) किसी अन्य स्थायी भाव से विरोध (तादात्म्यय= विरुद्धत्वम्=विच्छेदकत्व, विरोध) नहीं हो सकता; क्योंकि सभी भावों की एक (रस के) रूप में ही प्रतीति हुआ करती है। यदि स्थायी भावों तथा व्यभिषारी भावों का परस्पर विरोध माना जाये, तो वह सहानवस्थान रूप विरोध नहीं हो सकता; क्योंकि यह सभी सहृदयों के अनुभव से सिद्ध होता है कि रति आदि भाव से उपरक्त चित्त में अ्रविरोधी व्यभिचारियों का इसी प्रकार सम्बन्ध हो जाता है *विभावादीनाम्' इि पाठान्तरभ।

Page 353

३०४ दशरूपकसू

ऋपि न तावत् सहानवस्थानम्-रत्यायुपरको चेतसि स्रकसूत्रन्यायेनाविरोधिनां व्यभिचारिणां चोपनिबन्धः समस्तभावकस्वसंवेदनसिद्धः। यथैव स्वसंवेदनसिद्धस्तथैव काव्यव्यापारसंरम्भेशानुकार्यप्यावेश्यमान: स्वचेतःसम्भेदेन तथाविधानन्दसंविदुन्मील- नहेतु: सम्पद्यते। तस्मान्न ताव्ावानां सहानवस्थानम्। बाध्यबाधकभावस्तु भावा- न्तरर्भावान्तरतिरस्कारः। स च न स्थायिनामविरुद्धव्यभिचारिभिः सथायिनोऽविरुद्ध- त्वात् तेषामङ्गत्वात्-प्रधानविरुद्धस्य चाङ्गत्वायोगात्।

जिस प्रकार माला के सूत्र में अनेक पुष्पों का (स्रक्सूत्रन्यायेन)। और, जिस प्रकार यह अपने अनुभव से सिद्ध होता है, उसी प्रकार काव्य-व्यापार के उपाय (संरम्भ) द्वारा अनुकार्य(राम आदि) में भी उस (रति आादि भाव से युक्त चित्त में अविरोधी व्यभिचारियों के सम्बन्ध) का वर्णन किया जाता है तथा (सहृदय के) अपने चित्त के साथ तन्मयता (सम्भेद=मिश्रण) हो जाने के कारण वह उस प्रकार की अनन्दमयी अपनुभूति के आविर्भाव का निमित्त बन जाता है। इसलिये सञचारी भावों का (स्थायीभाव के साथ) सहानवस्थान रूप विरोध तो होता नहीं। [बाध्यबाधकभाव विरोध भी नहीं हो सकता, क्यों ?) बाध्य-बाधक-भाव का श्रर्थं है-एक भाव के द्वारा दूसरे भाव का तिरस्कार। और, स्थायीभावों का अपने अविरोधी व्यभिचारी भावों के साथ बाध्य-बाधक-भाव विरोध (सः) हो नहीं सकता, क्योंकि वे स्थायीभाव के विरोधी नहीं होते अपि तु उसके भ्रङ्ग होते हैं। जो प्रधान का विरोधी होता है वह तो उसका अ्रङ्ग ही नहीं बन सकता।

प टिप्पणी-(१) विरोध=सहानवस्थान +बाध्यबाधक भाव। (२) भावों के विरोध में दो सम्भावनाएं हैं (i) या तो दो स्थायी भावों का परस्पर विरोध हो अथवा (ii) किसी स्थायी भाव का व्यभिचारी भावों के साथ विरोध हो। ऊपर (i) 'तथा हि- भावात्' इत्यादि में यह बतलाया है कि दो स्थायी भावों में न तो सहानवस्थान रूप विरोध हो सकता है और न ही बाध्य-बाधक-भाव रूप विरोध। कारण यह है कि रस रूप से जो स्थायी भाव का आस्वादन किया जाता है उसमें एक (मिश्रित) रूप में ही आस्वादन होता है (जिसे पानक रस न्याय भी कहा जाता है। वहाँ दो भावों की पृथक् प्रतीति नहीं होती। फिर उनका किसी प्रकार का किरोध कसे हो सकता है ? (ii) 'स्थायिनां च चाङगत्वायोगात्' में यह बतलाया गया है कि किसी स्थायी भाव का अविरोधी व्यभिचारियों के साथ भी न तो सहानवस्थान रूप विरोध हो सकता है और नहीं बाध्य-बाधक-भाव रूप विरोध (व्र० अनुवाद)। यहाँ यह भी ध्यान देने योग्य है कि इस सन्दर्भ में स्थायी भाव का अपने से अविरुद्ध व्यभिचारियों के साथ समावेश दिखलाया गया है। जो व्यभिचारी भौव किसी स्थायी भाव का विरोधी होता है, वह तो स्थायी भाव का अ्रङ्ग हो ही नहीं सकता (प्रधानविरुद्धस्य चाङ्गत्वायोगात्)। धनिक ने अङ्गी रस के साथ

Page 354

चतुर्थ: प्रकाश: ३०५-

आ्ररनन्तर्यविरोधित्वमप्यनेन प्रकारेणापास्तं भवति। तथा च मालतीमाधवे शृङ्गारानन्तर बीभत्सोपनिबन्धेऽपि न किञ्चिद्वरस्यम्। तदेवमेव स्थिते विरुद्धरसैकालम्बनत्वमेव चिरोधे हेतुः। स त्वविरुद्धरसान्तरव्यवधानेवोरनिबध्यमानो न विरोधी। मुहुकन्तह अगत्थणहत्रङ्ग ए फिटटइ गन्धु ॥२८१॥ (नितान्तास्फुटत्वादस्य श्लोकस्य च्छाया न लिख्यते ।) इत्यत्र बीभत्सरसस्याङ्गभूतरसान्तरव्यवधानेन शृङ्गारसमावेशो न विरुद्धः । प्रकारान्तरेण वैकाश्रयविरोध: परिहर्तव्यः । उसके समावेश का प्रकार नहीं बतलाया। ध्वन्यालोक(३.२४), का० प्र० (७.६३) तथा सा० द० (७.३०) आदि से विदित होता है कि यदि विरुद्ध व्यभिचारी आदि का बाध्य रूप में निबन्धन किया जाता है तो कोई विरोध नहीं होता अपितु गुण होता है। इस प्रकार यहाँ किसी स्थायी भाव का विरोधी तथा अविरोधी स्थायी भाव के साथ एवं अविरोधी व्याभिचारी भावों के साथ अङ्गाङ्गिभाव से समावेश दिख- लाया गया है। किन्तु जिन स्थायी भावों का विरोध (बाध्य-बाधक-भाव) सहृदय जनों के अनुभव से सिद्ध है, उनका तो अङ्गाङ्गिभाव हो नहीं सकता। अतः सब यह दिखलाते हैं कि वस्तुतः विरोधी भावों का काव्य में कैसे उपनिबन्धन किया जाना चाहिये :- इसी प्रकार (रसों) के आनन्तर्य विरोध का परिहार किया जा सकता है। जैसे मालती-माधव में शृङ्गार के अनन्तर बीभत्स की योजना की गई है फिर भी वहाँ किसी प्रकार की विरसता नहीं होती। अब ऐसा (कि भावों में सहानवस्थान इत्यादि विरोध नहीं हो सकता) सिद्ध हो जाने पर (स्थिते) केवल विरुद्ध रसों का एक आलम्बन होना (आलम्बनक्य) ही विरोध का निमित्त हो सकता है। किन्तु वहाँ भी यदि किसी अविरोधी रस को बीच में ररुकर विरुद्ध रसों की योजना की जाती है तो कोई विरोध नहीं होता। जैसे अण्राहु इत्यादि प्राकृत पद्य में है (इस पद्य की व्याख्या स्पष्ट नहीं)। यहाँ पर बीभत्स रस का श्रङ्ग जो श्न्य (?) रस है उसे बीच में रखकर शङ्गार रस का समावेश किया गया है। अतः कोई विरोध नहीं होता। अ्थवा आश्रयैक्यविरोध (विरोधी रसों का एक आश्रय में होना) का अन्य प्रकार से परिहार किया जा सकता है। टिप्पणी-(१) रस-विरोध तथा उसके परिहार के विशेष विवरण के लिये द्र० ध्वन्यालोक (३.१८-३०); काव्यप्रकाश (७.६०-६५), सा० द० (७. २६- ३१) । (२) रसों का विरोध तीन प्रकार का होता है :- (i) 'आनन्तर्य या नैरन्तर्यं विरोध-जो रस एक साथ बिना किसी व्यवधान के नहीं रह सकते, उनका

Page 355

३०६ दशरूपकम्

मनु यत्रेकतात्पर्येेत रेषां विरुद्धानामविरुद्धानां च न्यग्भूतत्वेनोपादानं तत्र भवत्वङ्ग- श्वेनाऽविरोषः, यत्र तु समप्रधानत्वेनानेकस्य भावस्योपनिबन्धनं तत्र कथम् ? नैरन्तयं विरोध होता है, जैसे शान्त (शम) और शृङ्गार (रति) दोनों एक व्यक्ति में एक ही साथ नहीं रह सकते अतः इनका नैरन्तर्य विरोध है। इस विरोध को दूर करवे के लिये दोनों के बीच में किसी अन्य रस का वर्णन करना चाहिये, जैसे वागानन्द में शान्त और शृङ्गार के बीच में अद्भुत रस का उपनिबन्धन किय। गया है। यहां धमिक ने जो शृद्गार के अनन्तर बीभत्स के उपनिबन्धन अविरोध में दिखलाया है, वस्तुतः वह मनन्तर्य विरोध का उदाहरण नहीं। बीभत्स और शृङ्गार का आालम्बनैक्य विरोध माना जाता है, आनन्तर्य विरोध नहीं।(ii) आलम्बनक्य विरोध- जो दो रस(स्थायी भाव)एक ही ग्लम्बन(विभाव)के निमित्त से नहीं हो सकते उनका ग्राजम्बनैक्य विरोध होता है; जैसे शृङ्गार और बीभत्स का ।अतः मालती आदि किसी एक ही आालम्बव विभाव के प्रति रति तथा जुगुप्सा दोनों भावों का उप- निबन्धन दोषयुक्त हैं। हाँ, मालती के प्रति रति भाव और रमशान आदि के प्रति जुगुत्सा भाव हो सकता है। इस प्रकार आलभ्बन का भेद करने से आलम्बनैक्य विरोध दूर हो जाता है (सा० द०)। धनिक की टीका के अनुसार इस विरोध के परिहार का उपाय है-बीच में अविरोधी रस की योजना कर देना, जो कि ऊपर प्राकृत के उदाहरण से दिखलाया गया है। (iii) साश्यैष्य विरोध-जिसमें किसी भाव की उत्पत्ति होती है वह आश्रय कहलाता है। जो दो रस (स्थायी भाव) एक ही आश्रय में नहीं हो सकते उनका आश्रयकय विरोध होता है; जैसे एक ही नायक में वीर और भयानक का उपनिबन्धन करना विरोधी होगा, क्योंकि वीर का स्थायी भाव 'उत्साह' और भयानक का स्थायी भाव 'भय' दीनों एक जगह एक साथ नहीं रह सकते। ध्वन्यालोक आदि के अनुमार आश्नयैक्य विरोध के परिहार का उपाय है-दोनों विरोधी रसों की भिन्न-भिन्न आश्रयों में योजना करना, जैसे वीर और भयानक का आश्रयैक्य विरोध है अतः वीर का नायक में तथा भयानक का प्रतिनायक में उपनिबन्धन कर देना चाहिये। धनिक ने इसके परिहार का उपाय नहीं बतलाया, केवल 'प्रकारान्तरेण परिहर्तव्यः' यह कह दिया है। वस्तुतः आलोक टीका का यह अंश अस्पष्ट सा हो गया है। (३) बीभत्सरसस्य श्ङ्गभूतरसान्तर०-बीभत्स का प्रङ्ग प्रायः भयानक रस हुआ करता है। प्रकारान्तरेण०=अङ्गाङङ्गिभावकल्पनया (प्रभा)। वस्तुतः आश्रयक्य विरोध के परिहार का जो उपाय अभी ऊपर बतलाया गया हैं, उसी में टीका का तात्पर्य प्रतीत होता है। (शङ्गा) मान लिया कि जहाँ एक के तात्पर्य से (एक रस को प्रधान करके) दूसरे विरुद्ध और अविरुद्ध भावों को अ्ङ्ग रूप में (न्यग्सूतत्वेन=दबाकर, गौए रूप से) रक्खा जाता है, वहाँ तो उन (विरोधी तथा अविरोधी भावों) के श्रङ्ग हो जाने के कारण विरोध न होगा; किन्तु जहाँ समान रूप में प्रधान रखकर (समप्रधानत्वेन) श्र्प्रनेक भावों की योजना की जाती है वहाँ (अविरोध) कैसे होगा ? जैसे (?)-

Page 356

चतुर्थ: पकाशः ३०७

यथा-'एक्कत्तो रुअइ पिश अण्णत्तो समरतूरणिग्घोसो। पेम्मेणा रसरसेन अ भडस्स डोलाइश्ं हिशशम्॥२८२॥ [एकतो रोदिति प्रियाऽन्यतः समरतूर्यनिर्धोषः । प्रेम्णा रणरसेन च भटस्य दोलायितं हृदयम् ।।) इत्यादौ रत्युत्साहयोः । यथा वा- 'मात्सर्यमुत्सारयं विचार्य कार्यमार्याः समर्यादमिद वदन्तु। सेव्या नितम्बाः किमु भूधराणामुत स्मरस्मेरविलासिनीनाम् ।२८३॥ इत्यादौ रतिशमयोः । यथा च- 'इयं सा लोलाक्षी त्रिभुवनललामकवसतिः स चायं दुष्टात्मा स्वसुरपकृतं येन मम तत्। इतस्वीव्रः कामो गुरुरयमितः क्रोधदहनः कृतो वेषश्चायं कथमिदमिति भ्राम्यति मनः ॥२८४॥ इत्यादौ तु रतिकोधयोः । 'अन्त्रः कल्पितमङ्गलप्रतिसरा: स्त्रीहस्तरक्तोत्पल- व्यक्तोत्तवभृतः पिनद्धशिरसा हृत्पुण्डरीकस्रजः। १. 'एक ओोर प्रियतमा रो रही है और दूसरी ओर रण-मेरी का निर्धोष हो रहा है। इस प्रकार प्रेम औौर समर के उत्साह से योद्ा का हृवय बोलायित हो रहा है।' इत्यादि में रतिभाव और उत्साह भाव की समान रूप से प्रधानता है। २. अथवा जैसे-(शृङ्गारशतक ३६) 'मात्सर्य को छोड़कर, बिचार करके आर्यजन मर्यादापूर्वक यह बतलायें कि पर्वतों के नितम्दों का सेवन करना चाहिये या काम-भाव से मुसकराती हुई विलासनियों के'? इत्यादि में रति और शम भाव की समान रूप से प्रधानता है। चौर, जंसे-(रावण की इस उक्ति में ?) ३.'इधर तो तीनों लोकों की सौन्दर्यं की एकमात्र वसति(बस्ती) यह चञ्चल नेत्रों वाली सीता (सा) है और उधर वह दुष्ट व्यक्ति है जिसने मेरो बहिन का वह (नाक काटना आदि) अपकार किया है। इधर तो तीव्र काम का भाव है और उधर महान् क्रोध की अग्नि। और, मैंने यह (सन्यासी का) वेष बनाया है। अतः मेरा सर चकरा रहा है कि यह सब कैसे हो रहा है'। इत्यादि में रतिभाव और क्रोध की समानरूप से प्रधानता है। और जैसे- ४. (मालती० ५.१८, रमशान वर्णन)-'ये पिशाच-नारियाँ-जो झाँतों से माँगलिक माला (प्रतिसर) बनाये हुए हैं, स्त्रियों के कर रूपी लाल कमलों के (कर्ण) आभूषस धारण किये हुए हैं, हृदयरूपी कमलों की माला सिर पर बाँधे हैं,

Page 357

३०८ दशरूपकम्

एताः शोशितपङ्गकुङ्कुमजुषः संभूय कान्तैः पिब- न्त्यस्थिस्नेहसुरां कपालचषकै: प्रीता: पिशाचाङ्गना: ।२८५॥ इत्याद।वेकाश्चयत्वेन रतिजुगुप्सयोः। एक ध्याननिमीलनान्मुकुलितं चक्षुद्वितीयं पुनः पार्वत्या वदनाम्बुजस्तनतटे शृङ्गारभारालसम्। अन्यद् दूरविकृष्टचापमदनकोधानलोद्दीपित शम्भोभिन्नरसं समाधिसमये नेत्रत्रयं पातु वः ॥२८६॥ इत्यादी शमरतिकोधानाम् । 'एकेनाक्ष्णा प्रविततरुषा वीक्षते व्योमसंस्थं भानोबिम्बं सजललुलितेनापरेणात्मकान्तम् । अह्वरछेदे दयितविरहाशङ्ङिनी चक्रवाकी द्वौ संकीरणों रचयति रसौ नतकीव प्रगल्भा ।।२८७।। इत्यादौ च रतिशोक क्रोधानां समप्राधान्येनोपनिबन्धस्तत्कर्थ न विरोध: ? रुधिर की पङ्ध का कुङकुस लगाये हुए हैं -अपने प्रियतमों के साथ मिलकर कपाल के प्यालों में अस्थि-हमेह (चर्बी) रूपी मदिरा का पान कर रही हैं'। इत्यादि में एक ही आ्लम्बन (=आश्रय) के निमित्त से होने वाले रति और जुगुप्सा भाव की समान रूप से प्रधानता है। और जैसे-(?) fिक ५. 'एक (नेत्र) तो ध्यान में मुँद जाने के कारण कली के समान स्थित (मुकुलित) है, दूसरा मेत्र पार्वती के मुख-कमल तथा स्तन-छोर पर लगा हुआ शृङ्गार के भार से अलसाया है। तीसरा नेत्र दूर तक धनुष को खोंचने वाले कामदेव के प्रति उत्पन्न क्रोध की अग्नि से प्रज्वलित हो रहा है। इस प्रकार समाधि के समय भिन्न-भिन्न भावों से युक्त शिव के तीनों नेत्र तुम्हारी रक्षा करें'। इत्यादि में शभ, रति तथा क्रोध की समानरूप से प्रधानता है। तथा जैसे- ६. (सुभाषितावलि १९१६, शार्ङ्ग० ३५६६ चन्द्रक कवि का पद्य) 'दिन की समाप्ति पर प्रियतम के वियोग की आशङ्का करने वाली चक्रवाकी क्रोध-भरे एक नेत्र के द्वारा आकाश में स्थित सूर्य-बिम्ब को देखती है और आँसुओों से भरे दूसरे कम्पित नेत्र के द्वारा अपने प्रियतम को देखती है। इस प्रकार एक निपुण नर्तकी के समान दो संकीर्ण भावों को प्रकट कर रही है'। इत्यादि में रति, शोक और क्रोध की समप्रधान रूप में योजना की गई है। फिर भी इनका विरोध क्यों नहीं है ? टिप्पखी-(१) ननु .. कथं न विरोध :- यह पूर्वपक्षी की शङ्का है। आशय यह है कि जहां एक रस (स्थायी भाव) प्रधान होता है, अन्य उसके श्रङ्ग होते हैं वहाँ स्थायी भाव का विरोधी तथा अविरोधी भावों के साथ अविरोध हो सकता है, किन्तु जहां दो या अधिक भावों की एमान रूप से प्रधानता होती है

Page 358

चतुर्थ: प्रकाश। ३०ह

अत्रोच्यते-अत्राप्येक एव स्थायी, तथा हि-'एक्कत्तो रुअइ पिशा इत्यादी स्थायीभूतोत्साहव्यभिचारिलक्षणवितर्कभावहेतुसन्देहकारणतया करुणसंग्रामतूर्ययोरु- पादानं वीरमेव पुष्णातीति भटस्येत्यनेन पदेन प्रतिपादितम् । न च द्वयोः समप्रधान- योरन्योन्यमुपकार्योपकारकभावरहितयोरेकवाक्यभावो युज्यते। किञ्चोनक्रान्ते संग्रामें सुभटानां कार्यान्तरकरणन प्रस्तुतसंग्रामौदासीन्येन महदनौचित्यम् ।अतो भर्तु: संग्रामै- करसिकतया शौर्यमेव प्रकाशयन् प्रियतमाकरुणो वीरमेव पुष्णाति। (समप्राधान्य)वहाँ उनमें अ्ङ्गाङ्गिभाव नहीं हो सकता। अतः वहां विरोध होगा ही। पूर्वपक्षी की और से ऐसे ६उदाहरण प्रस्तुत किये गये हैं जिनमें विरोधी भावों के पर- स्पर समप्राधान्य की सम्भावना है। (२)एकतात्पर्येण=एक (भाव या रस)में तात्पर्य मानकर, एक की प्रधानता के अभिप्राय से। एकाश्रयत्वेन=एक ही निमित्त से, पूर्व उदाहरणों में दो भावों के आलम्बन (निमित्त) का भेद है किन्तु यहां रति और जुगुप्सा दोनों का आलम्बन एक ही पिशाचाङ़ना है। रतिशोकक्रोधानाम्-वस्तुतः यहाँ दो भावों का ही वर्णन है, जैसा कि पद्य से सी प्रकट होता है-द्वो सङ्ीर रचयति रसी'।। वे दो भाव हैं-रति और क्रोध। शोक को तो भावी विप्रलम्भ (रति) का ही अङ्ग कहा जा सकता है। पूर्वपक्षी की शङ्का का समाधान करते हुए धनिक यह दिखलाते हैं कि उप्युक्त ६ उदाहरणों में अनेक भावों का सम-प्राधान्य नहीं है :- (समाधान) इस विषय में कहना यह है कि उपरयुक्त उदाहरणों में (अ्र्रत्र) भी एक-एक स्थायीभाव ही (प्रधान) है। (अतः यहाँ समप्राधान्य मानना उचित नहीं)। जैसे कि -- १. 'एकतो रोदिति प्रिया' इत्यादि में उत्साह स्थायीभाव है, वितर्क उसका व्यभिचारी भाव है, उस (वितर्क) का निमित्त सन्देह है और सन्देह के उत्पादक के रूप में रुदन (करुस) तथा रख-भेरी का वर्णन किया गया है। यह रुदन और रण-मेरी का वर्शन वीर (उत्साह) को ही पुष्ट करता है, यह बात 'भटस्य' (योद्धा के) इस शब्द के प्रयोग से प्रकट होती है। दूसरी बात यह भी है कि जिन दो भावों का सम-प्राधान्य होता है उनमें परस्पर उपकार्य-उपकारक-भाव (एक दूसरे का उपकार करना, अ्रङ्गाङ्गिभाव) नहीं हुआ करता। अतः उनकी एक- वाक्यता भी नहीं बन सकती (जिन भावों में भ्रङ्गाङ्गिभाव होता है, वे परस्पर साकांक्ष होते हैं अतः उनका ही एकवाक्य में वर्णगन किया जा सकता है, यहाँ दोनों का एक वाक्य में वर्णन है इससे सिद्ध होता है कि दोनों में अ्रङ्गाङ्गिभाव है)। इसके अतिरिक्त संग्राम काआ्रम्भ हो जाने पर श्रेष्ठ योद्धाओं का श्न्य कार्य करना और प्रस्तुत (कत्तव्य) संग्राम से उदासीन रहना नितिान्त अनुचित होगा। इसलिये यहाँ प्रियतमा का करुण-विप्रलम्भ (रति भाव) पति की एकमात्र संग्राम-रसिकता को दिख्वलाकर उसकी शूरता को ही प्रकट करता है तथा वीररस को ही पुष्ट करता है।

Page 359

३१० दश रूपकम

करिाल एवं 'मात्सर्यम्' इत्यादावपि चिरप्रवृत्तरतिवासनाया हेयतयोपादानाच्छमैक- परत्वम् 'आर्याः समर्यादम्' इत्यनेन प्रकाशितम्। एवम् 'इय सा लोलाक्षी' इत्यादा- वपि रावसस्य प्रतिपक्षनायकनया निशाचरत्वेन मायाप्रधानतया च रौद्रव्यभिचारि- विषादविभाववितर्कहेतुतया रतिकोधयोरुपादानं रौद्रपरमेव। 'अन्त्र: कल्पितमङ्गल- टिप्पशी-(१) स्थायीभूत०=यहां रुदन तथा रण-भेरी के वणंन से सन्देह उत्पन्न होता है जो (सन्देह)पद्य में 'दोलायित' पद द्वारा प्रकट किया गया है। सन्देह से वितर्क उत्पन्न होता है। इस प्रकार करुश तथा रण-भेरी का वर्णन सन्देह का कारण है और सन्देह है वितर्क का हेतु। पद का अर्थ यह है-स्थायीभूतो य उत्साहस्तस्य व्यभिचारिलक्षणो यो वितर्कभावः, तस्य हेतु: यः सन्देहः, तत्कारणतया। एकवाक्यभाव: = एकवाक्यता, अ्ङ्गाङङगिभावः (प्रभा) । प्रियतमाकरुण: - प्रिया में होने वाला करुणा भाव। यहाँ करुण का अभिप्राय करुण- विप्रलम्भ है। (२) अतो ... पुष्णाति-इस प्रकार यहां रति और उत्साह का सम- प्राधान्य नहीं है, अपि तु उत्साह (वीर) की प्रधानता है और रति (करुण-विप्रलम्भ) उसी को पुष्ट करता है। इसी प्रकार अग्रिम उदाहरणों में भी दो भावों का सम-प्राधान्य नहीं है अपितु एक भाव की ही प्रधानता है :- ३१० २. इसी प्रकार 'मात्सर्य, इत्यावि में भी चिरकाल से होने वाली रतिवासना का हेय (त्याज्य) रूप में ग्रहण किया गया है और यहाँ एकमात्र शम के वरन में ही तात्पर्य है। यह बात 'आर्याः, समर्यादम्' इन वोनों शब्दों द्वारा प्रकट हो रही है। टिप्पखी-भाव यह है कि श्रेष्ठजनों से मर्यादा का ध्यान रखते हुए यह पूछा जा रहा है 'रमशियों के नितम्ब सेवनीय हैं या पर्वत की उपत्यकायें अ्र्प्रतः स्पष्ट ही कवि का तात्पयं पवत की उपत्यकाओं के सेवन से है। इसलिये यहाँ शम भाव की प्रधानता है, रति और शम का सम-प्राधान्य नहीं। ३. इसी प्रकार 'इय सा लोलाक्षी' इत्यावि में भी केवल रौद्र रस में ही सात्पर्य है (रौद्रपरम् एव) क्योंकि यहां रावण प्रतिपक्ष नायक है और वह निशाचर होने के कारणा माया-प्रधान है। रौद्र रस का व्यभिचारी भाव विवाद है और विषाद का विभाव (निमित्त) वितर्क है। उस वितर्क के हेतु के रूप में रति भर क्रोध दोनों का वर्णन किया गया है। टिप्परी-(१) भाव यह है कि परस्पर विरुद्ध रति और क्रोध दो भावों के होने से यह वितर्क उत्पन्न होता है कि कया करें (कथम् इदम्) । इस वितर्क से विषाद की उत्पत्ति होती है। वह विषाद रौद्र रस का व्यभिचारी भाव है। इस प्रकार रति भाव की योजना रौद्र रस को ही पुष्ट करने के लिये है। यहां रौद्र इस की प्रधानता है, दोनों का समप्राधान्य नहीं। (२) रौद्र .. हेतुतया-रोद्रस्य व्यभिचारी विषादस्तस्य विभावः श्लम्बनविभावः सीता तद्विषयकः कथम्पदव्य-

Page 360

चतुर्थ: प्रफाश: ३११

प्रतिसरा:' इत्यादो हास्यरसकपरत्वमेव। 'एक ध्याननिमीलनात्' इत्यादो शम्भोर्भा- वान्तरैरनाक्षिप्ततया शमस्थस्यापि योग्यन्तरशमार्द्वलक्षण्यप्रतिपादनेन शर्मकपरतैव 'समाधिसमये' इत्यनेन स्फुटीकृता। 'एकेनाक्ष्णा' इत्यादी तु समस्तमपि वाक्यं भवि- ष्य द्विप्रलम्भविषयम् । इति न क्वधिदनेकतात्पर्यम्। डयो यो वितकस्तद्धेतुतया (प्रभा), वस्तुतः रौद्रस्य व्यभिचारी विषादः, तस्य विभाव: वितर्कः, तस्य हेतुतया; एक व्यभिचारी भाव दूसरे का विभाव हो जाया करता है, यह ऊपर (पृo २६१) कहा जा चुका है। ४. 'अन्त्रं: कल्पितमङ्गलपरिसराः' इत्यादि उदाहरण में एकमात्र हास्य रस में ही तात्पर्य है। टिप्पणी-घृशित उपकरणों से सज-धज कर पिशाचिनियां अपने प्रियतमों के साथ पान-गोष्ठी-सुख का अनुभव कर रही हैं, इस वर्णन से पिशाचिनियों के विकृत आकार, वेष तथा चेष्टाएँ प्रकट होती हैं जो हास्य रस कै विभाव हैं। अतः यहाँ हास्य रस की ही प्रधानता है, जुगुप्सा और रति दोनों हास्य रस के ही पोषक हैं। इस प्रकार इन दोनों भावों का समप्राधान्य नहीं। ५. 'एकं ध्याननिमीलनात' इत्यादि में यह प्रतिवादन किया गया है (प्रति- पादनेन) कि शम-भाव में स्थित शिव को अन्य (रति आदि) भाव विक्षिप्त नहीं कर सकते अतः उनका शम-भाव अ्रन्य योगियों से विलक्षण है। इस प्रकार यहाँ एकमात्र शम-भाव (के वर्शन) में तात्पर्य है। यही बात 'समाधिसमये' (समाधि के समय में) इस पद से स्पष्ट की गई है[इस प्रकार यहाँ शम की प्रधानता है, शम, रति तथा क्रोध तीनों का सम-प्राधान्य नहीं है]। ६. 'एकेनाक्ष्णा' इत्यावि उदाहरण में तो समस्त वाक्य का (चक्रवाकी) के भावी विप्रलम्भ में ही तात्पर्य है[यहाँ करोध तथा शोक रतिभाव के श्रङ्ग हैं और रतिभाव की ही प्रधानता है, यहाँ रति, शोक तथा कोध का सम-प्राधान्य नहीं]। इस प्रकार ऊपर के उदाहरणों में कहीं भी धनेक भावों के वर्णन में तात्पर्य नहीं है (और समप्राधान्य नहीं है)। टिप्पखी-इस प्रकार अश्लिष्ट पदों के प्रयोग के विषय में यह बतलाया गया है कि वहां एक ही भाव में वात्प्यं होता है भनेक में नहीं। अतः वहाँ दो अरथों की प्रधानता ही नहीं हो सकती। फिर सम-प्राधान्य कैसे होगा और दो भावों के विरोध की आशङ्का भी कैसे होगी ? अब, यह बतलाे हैं कि जहां श्लेष आदि के द्वारा अनेक अयों में तात्पर्य होता है, वहाँ भी श्नेक भावों का सम-प्राधाव्य तथा परस्पर-विरोभ नहीं हुभा करता :-

Page 361

३१२ दशरूपकष्

यत्र तु शलेषादिवाक्येष्वनेकतात्पर्यमपि तत्र वाक्यार्थभेदेन स्वतन्त्रतया चार्थदव- यपरतेत्यदोषः । यथा -- 'इलाध्याशेषतनु' सुदर्शनकर: सर्वाङ्गलीलाजित- त्रैलोक्यां चरणारविन्दललितेनाक्रान्तलोको हरिः। बिभ्राणां मुखमिन्दुसुन्दररुचं चन्द्रात्मचक्षुरदधत् स्थाने यां स्वतनोरपश्यदधिकां सा रुविमणी वोवतात् ।.२८८॥ इत्यादौ। किन्तु जहां इ्लेष दि से युक्त वाक्यों में अनेक अ्ररथों में तात्पर्य होता भी है, वहाँ वाक्यार्थ का भेद करके स्वतन्त्र रूप से ही दो अर्थ हुआ करते हैं, इसलिये कोई दोष नहीं। जैसे-'(१) सुन्दर हाथों वाले (अ्रथवा हाथ में सुदर्शन चक्र धारण करने वाले) (२) चरस-कमल के सौन्दर्य (ललित) से (अथवा चरण-कमल की ललित नामक गति से) लोक को आक्रान्त करने वाले (३) चन्द्रमा जैसे (प्रथवा चन्द्रमा रूपी) नेत्र को धारण करने वाले (अर्थात् चन्द्रमा जिनका एक नेत्र है, सूर्य तथा चन्द्र विष्णु के दो नेत्र माने जाते हैं) विष्शु ने।१ श्लाघनीय समस्त शरीर वाली (२) समस्त प्रङ्गों की लीला से तोनों लोकों को जीतने वाली (३) चन्द्रमा के समान सुन्दर वान्ति-युक्त मुख को धारण करने वाली जिस रुकमिी को, उचित रूप में ही, अपने शरीर से उत्कृष्ट देखा, वह रुक्मिखी तुम्हारी रक्षा करे'। इत्यादि में। टिप्परी-(१) इ्लेषादि-यहां 'आदि' शब्द के द्वारा ध्वनि, समासोक्ति तथा अन्योक्ति इत्यादि का ग्रहणा होता है। (२) श्लेष आदि के स्थल में दो स्थितियाँ हुआ करती हैं -- (i) कभी तो दोनों अर्थों में उपमानोपमेय-भाव होता है और (ii) कभी दोनों अर्थ एक दूसरे से स्वतन्त्र होते हैं। पहिली स्थिति में तो उप- मेय की प्रधानता होती है अतः सम-प्राधान्य का अवसर ही नहीं है। दूसरी स्थिति में भिन्न-भिन्न दो वाक्यार्थ होते हैं। उन दोनों का अपना अर्थ स्वतन्त्र होता है।' वहाँ एक वाक्य का अर्थ दूसरे का अङ्ध नहीं होता। एक वाक्य में एक ही अर्थ प्रधान होता है, अनेक नहीं। फिर अ्नेक अ्ररथों के सम-प्राधान्य का प्रश्न ही नहीं उठता। उदाहरणार्थ 'इलाध्याशेषतनुम्' इत्यादि में श्लेष द्वारा विष्णु के शरीर की पपेक्षा रुक्मिणी के शरीर के सौन्दर्य की उत्कृष्टता दिखलाई गई है। इसका रुक्मिणी के प्रति भक्ति भाव (रति) में तात्पर्य है। यहां हरि (विष्णु) के तीन विशेषण हैं सुदर्शनकरः, चररारविन्दललितेनाक्रान्तलोकः, चन्द्रात्मचक्षु: दधत्। इनके श्लेष द्वारा दो अर्थ होते हैं (द्र० अनुवाद)। एक अर्थ में विष्शु का पराक्रम तथा वैभव आदि प्रकट होता है और दूसरे अर्थ में विष्णु का सौन्दर्य। इस प्रकार यहां उत्साह और रति दो भिन्न-भिन्न भावों में तात्पर्य है तथापि इन दोनों का सम-प्राधान्य नहीं है; क्योंकि यहाँ वाक्य-भेद के द्वारा दो अर्थ किये जाते हैं। यह नियम है कि एक बार उच्चरित शब्द एक अर्थ का बोध कराता है (सकृद उच्चरितः शब्दः सकृद् अरथं गमयति)अतः दो श्ररथों को प्रकट करने के लिये वाक्य-भेद की कल्पना करनी होती है। इस प्रकार यहां सम-प्राधान्य न होने के कारण भावों का परस्पर-विरोध नहीं होता ।)

Page 362

चतुर्थ. प्रकाशः ३१३

तदेवमुक्तप्रकारेण रत्याद्युपनिबन्धे सर्वत्राविरोधः। यथा वा श्रयमाणरत्या- दिपदेष्वपि वाक्येषु तत्रंव तात्पर्यं तथाग्र दर्शयिष्यामः । ते च- (४४) रत्युत्साहजुगुप्सा: क्रोधो हास: स्मयो भयं शोकः। शममपि केचित्प्राहुः पुष्टिर्नाटथ षुनैतस्य ॥ ३५ ।। इस प्रकार उपयुक्त रीति से रति आदि भावों के वर्णन में कहीं भी विरोध नहीं होता। और, जिन वाक्यों में रति आदि शब्दों का प्रयोग नहीं होता, वहाँ भी उन (रति आदि) भावों के वर्णन में ही तात्पर्य होता है, यह बात आगे दिखलायेंगे। टिप्पणी-यथा वाश्रयमार०-यहाँ दो प्रकार का पदच्छेद किया जाता है- (१) यथा वा श्रयमाण० इत्यादि; भाव यह है कि यदि रति आदि पदों का काव्य में प्रयोग किया गया हो तो भी भाव-वर्णन में ही तात्पर्य होता है। रति आदि शब्दों के प्रयोग का रस-योजना से किसी प्रकार का विरोध नहीं है। इस प्रकार रस, स्थायी और व्यभिचारी भाव के शब्द द्वारा कथन (स्वशब्दवाच्यत्व) को जो दोष माना जाता है, वह धनिक को अभिमत नहीं है। ना० द० (३.१८० वृत्ति) में भी स्वशब्दवाच्यत्व को दोष नहीं माना गया है। (२) यथा वा+अश्रूयमाण० इत्यादि; इस पदच्छेद के अनुसार ही अनुवाद किया गया है। अभिप्राय यह है कि रति आदि पदों का प्रयोग किया जाये अथवा न किया जाये दोनों स्थितियों में काव्य का तात्पर्य भावों के उपनिबन्धन, या कहिये रस-योजना में ही होता है। और, वे स्थायीभाव हैं ;- (१) रति, (२) उत्साह, (३) जुगुप्सा, (४) क्रोध, (५) हास, (६) विस्मय, (७) भय तथा (८) शोक । कुछ आचार्य शम को भी (नवम) स्थायी भाव कहते हैं ; किन्तु उस (शम) की पुष्टि रूपकों में नहीं होती॥ ३५॥ टिप्पणी-(१) ना० शा० (६.१५,१७) में इन आठ भावों का निर्देश किया गया है किन्तु पाठोन्तर के अनुसार वहाँ 'शम' भाव का भी निर्देश माना जाता है (अभि०)। का० प्र० (४.२६) 'अष्टौ नाट्य रसा: स्मृताः'; भा० प्र० (पृ० २६) 'तस्मादष्टाविति मत स्थायिनो नाट्यवेविनाम'; ना० द० (३.१८१) में 'शम' भाव का भी निर्देश किया गया है तथा अन्यत्र (३.१७७) शान्त रस का भी। साथ ही वहाँ बलपूर्वक यह कहा गया है कि नाट्य में भी शान्त रस होता है। प्रता० (पृ० १५८)में नव रस तथा भावों का उल्लेख है। इसी प्रकार सा० द० (३.१८२) में भी।(२)यहाँ धनञ्जय ने 'शम' शब्द का प्रयोग किया है। अतः 'शम' नामक स्थायी भाव निर्वेद (व्यभिचारी भाव २६) से भिन्न है। मम्मट ने व्रान्त रस का स्थायी भाव निर्वेद माना है। निर्वेद का अर्थ है-अपने प्रति तिरस्कार की भावना (स्वाव- मानन) या विषय-वैराग्य अ्रथवा तत्त्वज्ञान (निर्वेदस्तत्त्वधीः ना० द० ३.१८३)।

Page 363

३१४ दव रूप कमू

इह शान्तरसं प्रति वादिनामनेकविधा विप्रतिपत्तयः, तत्र केचिदाहु :- 'नास्त्येव शान्तो रसः' तस्याचार्येण विभावाद्यप्रतिपादनाल्लक्षणाकरणात् । अन्ये तु वस्तुतस्त

वीरवीभत्सादावन्तर्भावं वर्णयन्ति। एवं वदन्तः शममपि नेच्छन्ति। यथा तथास्तु। सर्वथा नाटकादावभिनयात्मनि स्थायित्वमस्माभिः शमस्य निषिध्यते, तस्य समस्त- व्यापारप्रविलयरूपस्याभिनयायोगात्। यत्तु कश्चिन्नागानन्दादी शमस्य स्थायित्वमुपवर्णिगतम्, तत्तु मलयवत्यनुरागे- ISSप्रबन्धप्रवृत्तेन विद्याधरचक्र्वर्तित्वप्राप्त्या विरुद्धम। न हयकानुकार्यविभावा- लम्बनी विषयानुरागापरागावुपलब्धी, अतो दयावीरोत्साहस्यैव तत्र स्थायित्वं तत्र व किन्तु 'शम' का अर्थ है- वैराग्य-दशा में आत्मरति से होने वाला आनन्द (शमो निरीहावस्थायामात्मविश्रामज सुखम, सा० द० ३.१८०) अथवा किसी प्रकार की इच्छा का अभाव (निःस्पृहत्वं शमः, ना० द० ३.१८१)। नाट्यदर्पणकार ने मम्मट के मत का खण्डन किया है (ना० द० ३.१८३ वृत्ति) । (३) धनञ्जय के मतानु- सार नाट्य में आठ ही रस होते हैं, शान्त रस नाट्य में नहीं होता; क्योंकि नाट्य में शम भाव की पुष्टि नहीं हो सकती। इसकी व्याख्या करते हुए धनिक ने बतलाया है शान्त रस के विषय में विद्वानों के भिन्न-भिन्न मत हैं। उनमें से कुछ कहते हैं कि श्ान्त रस नहीं होता; क्योंकि आचार्य (भरत) ने (नाव्यशास्त्र में) न तो उसके विभाव आवि का वर्णन किया है और न ही उसका लक्षण किया है। दूसरे कहते हैं कि वस्तुतः शान्त रस हो ही नहीं सकता; क्योंकि (शम भाव की पुष्टि हो शान्त रस है और शम-भाव का भाविर्भाव राग-द्वेष का नाश होने पर होता है, किन्तु) अनादि काल से धारा रूप में चले माने वाले राग-द्वष का नाश नहीं किया जा सकता। अन्य आ्रचार्य तो वीर तथा बीभत्स आदि रसों में ही शान्त रस का अ्न्तर्भाव बतलाते हैं। और, इस प्रकार कहते हुए (विद्वान् लोग) शम भाव को भी स्बीकार नहीं करते। जो कुछ भी हो (इनमें से कोई मत भी ठीक हो), हम तो यहां केवल अभिनयात्मक नाटक आबि में शम के स्थायी होने का निषेध करते हैं। क्योंकि उस (शम की अवस्था) में समस्त क्रियाओों (व्यापार actions) का प्रभाव हो जाता है, इसलिये उसका भभिनय करना सम्भव नहीं है। जो किन्हीं (आचार्यों) ने नागानन्द आदि में 'शम' को स्थायी भाव बतलाया है, वह (कथन) तो नाटक के अन्त तक चलने वाले (जीमूतवाहन के) मलयवती के प्ति अनुराग तथा विद्याधर चकवर्ती पद की प्राप्ति के विरुद्ध है। क्योंकि एक ही धतुकायं का विभाव रप से आभ्य (आलव्वन) करके (उसमें) विषयों के प्रति अनुरथ (रति) तथा वराग्य (अपराष=घ्म) कहीं नहीं पाये जाते; इसलिये (नागानन्द में 'शम' स्थायीभाद नहीं है, अपि तु) बवावीर का उत्साह ही वहां

Page 364

चतुर्थं: प्रकाशः ३१५

शृङ्गारस्याङ्गत्वेन चक्र्वतित्वावाप्तेश्च फलत्वेनाविरोधात्। ईप्सितमेव च सर्वत्र कर्तव्यमिति परोपकारप्रवृत्तस्य विजीगीषोनन्तिरीयकत्वेन फलं सम्पद्यत इत्यावेदित- मेव प्राक्। अतोऽष्टावेव स्थायिनः । ननु च- 'रसनाद्रसत्वमेतेषां मधुरादीनामिवोक्तमाचार्य: । निर्वेदादिष्वपि तत्प्रकाममस्तीति तेऽपि रसा: ।' इत्यादिना रसान्तराणामप्यन्यरभ्युपगतत्वात् स्थायिनोऽप्यन्ये कल्पिता इत्यव- धारणानुपपत्ति: । स्थायी भाव है। उस(दयावीर के) उत्साह में ही शृङ्गार (रति भाव) श्रङ्ग रूप से आया है तथा चक्रवर्ती पद की प्राप्ति उसका फल है। इस प्रकार कोई विरोध नहीं होता। सर्वत्र कर्त्तव्य पालन करना ही अरभीष्ट है, इस भावना से परोपकार में तत्पर हुए विजिगीषु (विजय के इच्छुक) को आनुरषङ्गिक रूप से (अ्थवा उसके साथ अवश्यम्भावी होने के कारण) फल भी प्राप्त हो जाता है, यह पहले (२.४ उदात्त के लक्षणा में) कहा ही जा चुका है। इस प्रकार नाट्य में आठ ही स्थायी भाव होते हैं। टिप्पणी-(१) शान्त रस के विषय में भिन्न-भिन्न वादी कौन-कौन हैं? यह ज्ञात नहीं। (२) नागानन्द नाटक का नायक जीमूतवाहन धीरोदात्त है, यह सिद्ध करते हुए ऊपर (२.४) भी यह संकेत किया जा चुका है कि नागानन्द में शान्त रस नहीं। (३) तत्तु .... विरुद्धम्-यदि नागानन्द में शम स्थायी भाव होता तो उसके नायक जीमूतवाहन में शम की प्रधानता होती। शम का अर्थ है- विषयों के प्रति निःस्पृहता फिर समस्त नाटक में जो जीमूतवाहन का मलयवती के प्रति अनुराग दिखलाया गया है, वह कसे संगत हो सकता है ? इसी प्रकार फल के रूप में विद्याधरों के चक्रवर्ती पद की प्रात्ति जीमूतवाहन को हुई है वह भी शम भाव के विरुद्ध ही होगी।(४) एकानुकायंविभावालम्बनी=एको योऽनुकार्यलक्षणाविभावः= चेतनस्तदालम्बनी=तदाश्रयी विषयस्यानुरागापरागो (प्रभा)। नान्तरीयकत्वेन- तेन सहावश्यम्भावित्वेन (प्रभा) । इस प्रकार नाट्य में आठही स्थायी भाव होते हैं (किन्तु काव्य में शम नामक नवम स्थायी भाव भी हो सकता है) यह निर्धारण किया गया है। किन्तु रुद्रट आादि प्राचीन आचार्यों के मत में इनके पतिरिक्त और भी स्थायी भाव होते हैं। अतः उनकी ओ्र से शङ्का करके उसका समाधान करते हैं- (शङ्गा) 'जिस प्रकार मधुर ( तिक्त) आदि आस्वाद्य होने के कारण रस कहुलाले हैं, इसी प्रकार इन(रति आदि)को भी आस्वाद्य होने के कारण ही रसनाव आचार्यों ने रस कहा है। यह आस्थादता (रसन) निर्वेध आाबि भावों में घयेष्ट रूप से (प्रकामम) विद्यमान है। इसलिये वे भी रस हैं'। (ख्द्रट काव्यालखुार १२.४)

Page 365

३१६ दशरूपक मू

पत्रोच्यते- (४५) निर्वेदादिरताद्रप्यादस्थायी स्वद्ते कथम्। वैरस्यायैव तत्पोषस्तेनाष्टौ स्थायिनो मताः ॥१६॥ (अताद्रूप्यात्=) विरुद्धाविरुद्धाविच्छेदित्वस्य निर्वेदादीनामभावादस्थायि- त्वम्। अत एव ते चिन्तादिस्वस्वव्यभिचार्यन्तरिता अपि परिपोष तीयमाना वैरस्य- मावहन्ति। न च निष्कलावसानत्वमेतेषामस्यायित्वनिबन्धनम्, हासादीनामप्यस्थायि- त्वप्रसङ्गात्। पारम्पयेख तु निर्वेदादीनामपि फलवत्त्वात्। अतो निष्फलत्वमस्थायित्वे प्रयोजकं न भवति, किन्तु विरुद्धर्भावैरतिरस्कृतत्वम्। न च तन्निर्वेदादीनामिति न ते स्थायिनः। ततो रसत्वमपि न तेषामुच्यते। अतोऽस्थ।यित्वादेवैतेषामरसता ॥ इत्यादि कथन के द्वारा अन्य आचार्यों ने (आठ रसों से भिन्न) अन्य रसों को भी स्वीकार किया है। और, इसलिये अन्य स्थायी भावों की भी कल्पना की है। इस प्रकार आाठ ही स्थायीभाव होते हैं, यह अवधारण नहीं बन सकता। (समाधान) इस पर कहा गया है- निर्वेद आदि में विरुद्ध तथा अविरुद्ध भावों से विच्छिन्न न होने का गुण (ताद्रप्य) नहीं है, अतः वे स्थायी नहीं हैं और उनका आस्वादन भी नहीं हो सकता। यदि किसी प्रकार उनकी पुष्टि हो भी जाये तो वह वैरस्य उत्पन्न करने के लिये ही होगी। इसलिये आठ ही स्थायी भाव माने गये हैं॥ १६ ।। (जो भाव विरोधी तथा अविरोधी भावों से विच्छिन्न नहीं होते वे ही स्थायी भाव कहलाते है)तद्रूपता; अर्थात् विरोधी तथा अविरोधी भावों से विछिन्न न होना, निर्वेद आदि में नहीं है। अतः वे स्थायी भाव नहीं माने जा सकते (तथा उनकी रसरूपता नहीं हो सकती)। यदि (शृङ्गार आदि के) अपने-अपने चिन्ता आदि व्यभिचारी भावों से व्यवहित होकर भी वे पुष्ट हो जाते हैं तो भी वे वैरस्य ही उत्पन्न किया करते हैं। [कुछ विद्वानों का विचार था कि निर्वेद आदि का अन्त फल रहित (निष्फल) होता है अतः उन्हें स्थायी नहीं माना जा सकता, इस मत का निराकरण करते हुए कहते हैं :- ] अन्त (अवसान) में फल रहित होना तो इनके अस्थायी होने का निमित्त (निबन्धन) नहीं कहा जा सकता, क्योंकि इस प्रकार तो हास आदि भाव भी प्रस्थायी होने लगेंगे (उनका भी मनोरञ्जन के प्तिरिक्त कोई लौकिक या पार- लौकिक फल नहीं होता)। यदि कहो कि षरम्परा से हास आदि का फल होता है तब सो परम्परया निरवेद आादि का भी कल होता ही है। इसलिये निष्फल होना किसी भाव के अस्थायी भाव कहलाने का निमित्त नहीं हो सकता। विरुद्ध और

Page 366

चतुर्थ: प्रकाश: ३१७

प्रविरुद्ध भावों से तिरस्कृत न होना ही स्थायी भाव कहलाने का निमित्त है। और यह बात निर्वेद आदि भावों में होती नहीं। अतः वे स्थायी भाव नहीं हैं। इसी हेतु उनकी रसरूपता (रसत्व) नहीं मानी जाती। इस प्रकार निर्वेद आादि भाव रस रूप नहीं होते, क्योंकि वे स्थायीभाव ही नहीं हैं। टिप्पणी-(१) रुद्रट ने निर्वेद आदि की भी रसरूपता स्वीकार की है (काव्यालङ्कार१२.४)। रुद्रट के अभिप्राय को स्पष्ट करते हुए नमि साधु लिखते हैं- अयमाशयो ग्रन्थकारस्य-यदुत नास्ति सा कापि चित्तवृत्तिर्या परिपोष गता न रसीभवति। भरतेन हृदयावर्जकत्वप्राचुर्यात् संज्ञां चाश्रित्याष्टौ नव वा रसा उक्ता इति। (२) यहाँ 'निर्वेद' नामक व्यभिचारी भाव के स्थायी होने का निषेध किया गया है। शम इससे भिन्न होता है (द्र० ४.३५ टिप्पणी)। उसे तो धनञ्जय भी (काव्य में ही सही) स्थायी भाव मानते ही हैं। (३) अन्तरिता अपि=व्यवहिता अपि, भाव यह है कि शृङ्गार आदि रस की योजना में निर्वेद आदि भावों की तीन गतियाँ हो सकती हैं। प्रथम तो, उनका रति आदि भावों के अनन्तर उपनिबन्धन किया जाए और वे पुष्ट हो जायें। ऐसी दशा में (शृङ्गार और शान्त का) आ्न- न्तर्य विरोध होगा। अतः वैरस्य ही होगा। दूसरे, शृङ्गार के चिन्ता आदि व्यभि- चारी भावों के व्यवधान से उनका उपनिबन्धन किया जाये और वे पुष्ट हो जायें। ऐसी दशा मे भी निर्वेद आदि की पुष्टि विरसता ही उत्पन्न करेगी। तीसरे, शृङ्गार आदि की योजना में निर्वेद आदि भाव कदाचित् व्यभिचारी रूप में आ जाते है उनकी पुष्टि नहीं होती। इस दशा में ही वे चमत्कारक हुआ करते हैं (मि०, प्रभा) अथवा यहाँ अपि का अन्वय 'नीयमानाः' के पश्चात् है-परिपोषं नीयमाना अपि । भाव यह है कि निर्वेद आदि विरुद्ध तथा अविरुद्ध भावों के द्वारा अविच्छिन्न होने वाले नहीं हैं। अतएव इनका परिपोष नहीं हो सकता और ये रस रूप नहीं हुआ करते। यदि यह मान भी लिया जाये कि इनका परिपोष हो सकता है तो इनका परिपोष विरसता को उत्पन्न करने वाला ही होगा। स्थायी भाव तथा रस का काव्य से सम्बन्ध काव्य तथा नाटय के द्वारा सहृदयों को रस की प्रतीति कसे होती है ? इस विषय में भारतीय साहित्य शास्त्र में कई मत हैं। इनमें से प्रमुख ये हैं :- (१) प्रभाकर मिश्र के अनुयायी मीमांसकों के अनुसार अभिधा के दीर्घ-दीर्घतर व्यापार से ही रस की प्रतीति हो जाती है। (२) भाट्टमतानुयायी मीमांसक मानते हैं कि तात्पर्य वृत्ति के द्वारा ही रस की प्रतीति होती है। (३) मुकुल भट्ट ने रस को लक्षरणा का विषय भी बतलाया है-'तात्पर्यालोचन-सामर्थ्याच्च विप्रलम्भशृङ्गार- स्याक्षेप इत्युपादानात्मिका लक्षणणा (अभिधावृत्तिमातृका, पृ० १४) । (४) व्यक्ति- विवेककार महिमभट्ट के मतानुसार अनुमान द्वारा ही रस का बोध होता है। (५)

Page 367

३१८ दशरूपकमू

नमि। क: पुनरेतेषां काव्येनापि सम्वन्धः ? न तावद्वाच्यवाचकभावः स्वशव्दैरना- वेदितत्वात्, नहि शङ्गारादिरसेषु काव्येषु शृङ्गारादिशब्दा रत्यादिशब्दा वा श्रयन्ते यैन तेषां तत्परिपोषस्य वाभिधेयत्वं स्यात्। यत्रापि व श्रूयन्ते तत्रापि विभावादि- द्वारकमेव रसत्वमेतेषां न स्वशब्दाभिषेयत्वमात्रेणा। धवनिवाद को स्वीकार करने वाले रसवादी आचार्य आ्नन्दवर्धन, अ्रभिनवगुप्त, मम्मट, विश्वनाथ औौर पण्डितराज जगन्नाथ इत्यादि के मत में व्यञ्जना वृत्ति द्वारा ही रस की प्रतीति होती है। काव्य, नाट्य रस के व्यञ्जक होते हैं और रस व्यङ्गय होता है। रस और काव्य में व्यङ्गय-व्यञ्जकभाव सम्बन्ध है। धनञ्जय से पूर्व ही आनन्दवर्द्धन इस मत की स्थापना कर चुके थे। धनञ्जय (तथा धनिक)को यह मत स्वीकारय नहीं है। अतः यहाँ इस मत का खण्डन करते हुए रस प्रतीतिविषयक स्वमत की स्थापना करते हैं :- ध्वनिवादी की युक्तियाँ (रस आदि तथा काव्य में व्यङ्गय-व्यञ्जक-भाव) इन (स्थायी भाव आदि) का काव्य के साथ क्या सम्बन्ध है ? भाव आदि तथा काव्य में वाच्य-वाचक-भाव सम्बन्ध (भाव वाच्य है औौर काव्य वाचक) तो हो नहीं सकता। कारणा यह है कि (सर्वत्र ही) रति आदि शब्दों (स्वशब्द) के द्वारा (भाव या रस का) कथन नहीं किया जाता। शङ्गार आदि रस के काव्यों में (सर्वत्र ही) शृङ्गार शादि या रति आदि शब्द नहीं सुने जाते, जिससे यह माना जा सकता कि रति आादि भाव अथवा उनके परिपुष्ट रूप(=शृङ्गार आदि रस) वाच्य होते हैं। और, जहाँ कहीं (रति आवि याशृङ्गार आदि शब्द) सुनाई भी पड़ते हैं, वहाँ भी विभाव आदि के वर्णन-द्वारा इन (रति आदि) की आस्वाद्यता (रसत्व) होती है, केवल रति आदि शब्दों के वाच्य होने से नहीं। टिप्पणी-(१)"रस आदि व्यङ्गय होते हैं", यह सिद्ध करते हुए ध्वनिवादी ने बतलाया है कि वे न तो वाच्य हो सकते हैं और न लक्ष्य ही। न तावद् वाच्य- वाचक-भाव - मात्रेण' इत्यादि में यह बतलाया गया है कि रस अभिधा का का विषय (=वाच्य) नहीं हो सकता। कारण यह है कि रस या शृङ्गार आदि शब्दों के द्वारा रस-बोध नहीं हुआ करता अपितु विभाव आदि के द्वारा ही रस- प्रतीति हुआ करती है, विभाव आदि के वर्शन के बिना रस की प्रतीति होती नहीं। अतः रस आदि रति या शृङ्गार इत्यादि शब्दों के वाच्य नहीं हैं अपितु विभाव आदि के द्वारा प्रतीयमान (व्यङ्गय) हैं। (विशेष द्र० ध्वन्यालोक वृत्ति १.४)। (२) अनावेदितत्वात् =कथन न करने से, प्रतिपादन न किये जाने के कारण। शृङ्गारादिरसेषु-जिनमें शृङ्गार आदि रस हैं,(शृङ्गारादयो रसाः येषु तेषु काव्येषु) ऐसे काव्यों में। तत्परिपोषस्य-रति आदि के परिषोष का, रति आदि स्थायी भाव का परिपोष (पुष्टि) ही रस है।

Page 368

चतुर्थ: प्रकाशः ३१६

नावि लक्ष्यलक्षरुभावः-तत्सामान्याभिधायिनस्तु लक्षकस्य पदस्याप्रयोगात्। नापि लक्षितलक्षणया तत्प्रतिपत्तिः; यथा 'गङ्गायां घोषः' इत्यादी। तत्र हि स्वार्थे स्रोतोलक्षो घोषस्यावस्थानासम्भवात्स्वार्ये स्खलद्गतिगंङ्गाशब्द: स्वार्थाविनाभूतत्वो- पलक्षित तटमुपलक्षयति। अत तु नायकादिशब्दा: स्वार्थेऽस्खलद्गतयः कथमिवार्था- न्तरमुपलक्षयेयुः ?। को वा निमित्तप्रयोजनाभ्या विना मुख्ये सत्युपचरितं प्रयुञ्जीत ? अत एव 'सिंहो माणबकः' इत्यादिवत् गुणवृत्त्यापि नैयं प्रतीतिः । भाव आदि तथा काव्य का लक्ष्य-लक्षक-भाव सम्बन्ध भी नहीं हो सकता [यह नहीं माना जा सकता कि रति अाबि भाव लक्ष्य हैं औौर काव्य उनका लक्षक है]। कारण यह है कि काव्य में सामान्य रस-भाव शादि (तत) के वाचक किसी लक्षक शब्द का प्रयोग नहीं होता (जिससे उपादान लक्षणा द्वारा विशिष्ट सर्थ की प्रतीति हो सके ?]। यहाँ लक्षणा-लक्षखणा के द्वारा भी भाव आदि (तत्) की प्रतीति नहीं हो सकती, जिस प्रकार गङ्गायां घोष' इत्यादि में (गङ्गा' शब्द से तट की प्रतीति) होती है। वहाँ तो गङ्गा शब्द का जो अपना (मुख्य) अर्थ है- गङ्गा-प्रवाह, उसमें घोष की स्थिति बन नहीं सकती। इसलिये गङ्गा शब्द अपने अर्थ (प्रवाह) को कहने में शसमर्थ हो जाता है (स्खलद्गतिः=बाधित-१वृत्तिः) तथा अपने अर्थ से सम्बद्ध (अविनाभूत) गङ्गा-तट को लक्षित करता है। किन्तु यहाँ (काव्य में) तो नायक आादि (के वाचक) शब्द (जो विभाव आदि का वर्सन करके रस की प्रतीति कराते हैं) अपने अर्थ को बतलाने में असमर्थ नहीं है, फिर वे अन्य अर्थ (भाव आदि) को कैसे लक्षित करेंगे ? अ्रथवा निसित्त (मुख्यार्थबाध इत्यादि) तथा प्रयोजन के विना कौन व्यक्ति मुख्य धर्थ सम्भव होने पर सौपचारिक (लाक्षसिक, गौए) शब्द का प्रयोग करेगा ? इसीलिये 'सिहो माखवकः' (बालक सिंह है) इत्यादि के समान गौएी वृत्ति से भी यह (भाव आदि की) प्रतीति नहीं हो सकती। टिप्पशी- (१) नापि लक्ष्यलक्षकभाव :- रस आदि काव्य के द्वारा लक्ष्य भी नहीं हो सकते। जैसा कि ऊपर वहा गया है मुकुल भट्ट इत्यादि ने रस वो लक्षसा-गम्य भी माना है (अभिधावृत्ति० पृ० १४)। धनिक ने भी आगे रति आदि भाव को बक्षणा का विषय बतलाया है-लाक्षणिकी रत्यादिप्रतीति: (४.३७ अव- लोक टीका)। यहां यह भी उल्लेखनीय है :- मुख्य अर्थ का बोधक जो शब्द-व्यापार (वृत्ति) है वह अभिधा कहलाता है। साधारणतः लोकव्यवहार में अभिधा द्वारा बोधित मुख्य अर्थ में ही शब्दों का प्रयोग किया जाता है। किन्तु कभी-कभी ऐसा भी होता है कि शब्द का मुख्य अर्थ प्रकरण में ठीक नहीं बैठता, वहां वक्ता का तात्पर्य नहीं बनता (तात्पर्यानुपपत्ति)। अतः वहाँ शब्द अपने से सम्बद्ध किसी अन्य अर्थ का बोध

Page 369

३२० दशरूपकम्

कराता है। वह अन्य अर्थ या तो लोक-प्रसिद्ध (रूढ्) होता है अथवा उसका बोध कराने में कोई प्रयोजन हुआ करता है। वह अन्य अर्थ ही लक्ष्य अर्थ है। उसका बोधक शब्द लक्षक या लाक्षणिक कहलाता है और उसका बोध कराने वाला शब्द-व्यापार लक्षणा। अ्रतः लक्ष्य=लक्षणागभ्य=लक्षणा द्वारा बोध्य अरथ। इस प्रकार लक्षणा के तीन हेतु होते हैं-मुख्यार्थ-बाध, मुख्यार्थ से सम्बन्ध तथा रूढि अ्रथवा प्रयोजन (द्र0, का० प्र० २.६)। जो लक्षणा रूढि (=प्रसिद्धि) के कारण होती है वह रूढि लक्षणा कहलाती है, जैसे 'कर्मणि कुशलः' इत्यादि में 'कुशल' शब्द का मुख्यार्थ (कुशाओं को लाने वाला) बाधित हो जाता है और उसका लक्ष्यार्थ (चतुर' लिया जाता है। जो लक्षरणा किसी प्रयोजन से होती है वह प्रयोजनवती कहलाती है, जसे 'गङ्गायां घोषः' में गङ्गा शब्द की तट में लक्षणणा होती है। वहां शैत्य-पावनत्व आदि की प्रतीति कराना ही लक्षरा का प्रयोजन है। यह स्पष्ट ही है कि रस आदि रूढि लक्षणा के विषय नहीं हो सकते। रही प्रयोजनवती लक्षणा। वह दो प्रकार की है-उपादान लक्षणा और लक्षण लक्षणा (गौसी वृत्ति का यहां पृथक् उल्लेख किया जा रहा है)। उपादान लक्षणा वहाँ होती है जहां कोई शब्द अपने मुख्यार्थ की सङ्गति के लिये अपने से सम्बद्ध किसी अन्य अर्थ का भी ग्रहण कर लेता है। वह अपने अर्थ का त्याग न करते हुए दूसरे अर्थ को लक्षित करता है अतः इसे अजहत्स्वार्था वृत्ति भी कहते हैं। इसके स्थलों पर सामान्य अर्थ के वाचक शब्द का प्रयोग किया जाता है और उसका लक्ष्यार्थ विशिष्ट ध्र्थ हो जाता है, जैसे 'कुन्ताः प्रविशन्ति' (भाले प्रवेश कर रहे हैं) । यहाँ 'कुन्त' शब्द से कुन्तधारी (कुन्तविशिष्ट) पुरुष का लक्षणा द्वारा बोध होता है। इसी प्रकार काकेभ्यो दधि रक्ष्यताम्' इत्यादि उपादान लक्षणा के उदाहरण हैं। दूसरी लक्षण-लक्षणा है इसमें कोई शब्द अपने अर्थ को त्याग कर स्वसम्बद्ध अन्य अर्थ का उपलक्षक मात्र हुआ करता है। इसी हेतु इसे जहत्स्वार्था वृत्ति भी कहते हैं। जसे 'गङ्गायां घोषः' (गङ्गा पर घोसियों की बस्ती है), यहां गङ्गा शब्द का मुख्य अर्थ है-गङ्गा-जल की धारा। उस पर 'घोष' नहीं रह सकता। अतः मुख्यार्थ का बाध हो जाता है। इस प्रकार शैत्य-पावनत्व आदि प्रयोजन की प्रतीति के लिये गङ्गा शब्द की तट में लक्षणा मानी जाती है। ध्वनिवादी (पूर्वपक्षी) का आशय यह है कि उपादान लक्षणा या लक्षण- लक्षणा द्वारा काव्य से रस आदि की प्रतीति नहीं हो सकती (द्र० अनुवाद)। (२) सामान्याभिधायिनस्तु- सामान्य अपर्थ का वाचक जो लक्षक शब्द है, उसका काव्य में प्रयोग नहीं; अर्थात् काव्य में ऐसे सामान्य शब्दों का प्रयोग नहीं होता जो सामान्यतः रस आदि के वाचक हों किन्तु लक्षणा द्वारा शृङ्गार आ्रदि विशेष रस का बोध करा सकें। ऐसा प्रतीत होता है कि यहाँ उपादान लक्षणा की

Page 370

चतुर्थं: प्रकाशः ३२१

ओर संकेत है, जैसा कि अभी ऊपर दिखलाया गया है। *लक्षित-लक्षणा=लक्षण- लक्षणा। काव्य से लक्षण-लक्षणा द्वारा रस आदि का बोध इसलिये नहीं हो सकता क्योंकि यहां लक्षणा के हेतु ही नहीं हैं। काव्य में प्रयुक्त शब्दों का मुख्यार्थ बाध आदि नहीं होता। स्खलद्गतिः-स्खलिता बाधिता गतिः प्रवृत्तिः यस्य सः (शब्दः), जिसकी प्रवृत्ति रुक जाती है, जो अपने अर्थ का बोध कराने में असमर्थ हो जाता है ऐसा शब्द। को वा .... प्रत्युञजीत-जब शब्द का मुख्य अर्थ बन सकता है तो उसका औपचारिक अर्थ नहीं लिया जाता। फलतः काव्य में प्रयुक्त नायक आदि के वाचक शब्दों की रति आदि भाव अथवा शृङ्गार आदि रस में लक्षणा नहीं हो सकती। वे तो मुख्यार्थ के बोधन में ही समर्थ हैं। (३) गुणवृत्त्यापि नेयं प्रतीति :- क्योंकि निमित्त के विना औपचारिक शब्द का प्रयोग नहीं होता। इसलिये गौणी वृत्ति से भी काव्य में रस आदि की प्रतीति नहीं हो सकती। अभी कहा गया है कि उपचार का निमित्त (मुख्यार्थ बाध इत्यादि) वहाँ नहीं है। मीमांसक गौणी वृत्ति को लक्षणा से भिन्न मानते हैं (गौणीवृत्तिः लक्षणातो भिन्नेति प्राभाकरा:। प्रता० टीका पृ० ३३)। उनके अनुसार लक्षणा और गौणी का भेद यह है कि गौणी वृत्ति में लक्ष्य अर्थ के वाचक शब्द का भी प्रयोग हुआ करता है; जैसे 'सिंहो माणवकः' (बालक पिह है), यहाँ पर (शौर्यादि विशिष्ट) माणवक लक्ष्य है। यहाँ माणवक शब्द का भी प्रयोग किया गया है। किन्तु 'गङ्गायां घोषः इत्यादि में जो तट आदि लक्ष्य है, उसके वाचक शब्द का प्रयोग नहीं किया जाता। यहो दोनों का भेद है (गौएे शब्दप्रयोगो न लक्षणायाम्)। मम्मट इत्यादि आचार्यों ने गोणी वृत्ति को लक्षणा के ही अन्तर्गत माना है। तदनुसार लक्षणा दो प्रकार की है शुद्धा और गौणी। उपर्युक्त उपादान लक्षणा तथा लक्षण लक्षण दो भेद शुद्धा के हैं। जहाँ सादृश्य सम्बन्ध से लक्षणा होती है वहाँ गौणी लक्षण है और जहाँ साहृश्य से भिन्न और किसी (सामीप्य आदि) सम्बन्ध से लक्षणा होती है वह शुद्धा है। 'सिंहो माणवकः' में गौणी लक्षणा है। गौणी भी मुख्यार्थबाध इत्यादि तीनों हेतुओं से हुआ करती है। अतः इसका लक्षणा में ही अन्तर्भाव माना गया है। (४) रस आदि (व्यङ्गय अर्थ) को गौणी वृत्ति का विषय नहीं माना जा सकता, ध्वनिकार ने इस मन्तव्य को इस प्रकार बतलाया है- मुख्यां वृत्ति परित्यज्य गुणवृत्त्याऽर्थदर्शनम् । यदुद्दिश्य फल तत्र शब्दो नैव स्खलद्गतिः । (१.१७) * कुछ आचार्यों ने लक्षितलक्षणा नाम की एक अन्य प्रकार की लक्षणा भी मानी है(परमलघुमञ्जूषा पृ०६०)। लक्षित के अर्थ में लक्षणा=लक्षित लक्षणा; जैसे 'द्विरेफ शब्द का मुख्य अर्थ है-दो रेफ (र) वाला। इसका लक्ष्यार्थ है-भ्रमर शब्द, जिसमें दो रेफ हैं। उससे भौंरा रूप अर्थ का बोध होता है। यहाँ ग्रन्थकार का तात्पर्य उस विशेष प्रकार की लक्षणणा से नहीं है क्योंकि गङ्गायां घोषः उसका उदाहरण नहीं बन सकता।

Page 371

३२२ दशरूपकम्

-I यदि वाच्यत्वेन रसप्रतिपत्ति: स्यात्तदा के वलवाच्चवाचकभावमात्रव्युत्पन्न- चेतसामप्यरसिकानां रसास्वादो भवेत्। न च काल्पनिकत्वम्-प्रविगानेन सर्वसहृद- यानां रसास्यादोद्भूतेः। अ्रतः केचिदमिघालक्षणायोगीम्यो वाच्यान्तरपरिकल्पित- यक्तिम्पो व्यतिरिक्त व्यञ्जकत्वलक्षणां शब्दव्यापारं रसायङ्कारवस्तुविषयमिच्छन्ति। तथा हि विभावानुभावव्यभिचारिमुखेन रसादिप्रतिपत्तिरुपजायमाना कथमिव वाच्या स्यात्, यथा कुमारसभ्भवे- 'विवृण्वती शैलसुलापि सावमङ्ग: स्फुरढवालकदम्बकल्पैः । साचीकता चारुतरेश सस्थौ मुखेन पर्यस्तविलोचनेन ।२८६॥ दूसरी बात यह है कि यदि वाच्य रूप से रस की प्रतीति हुआा करे तो जो व्यक्ति काव्य के रसिक-नहीं हैं केवल वाच्य-वाचकभाव मात्र का ज्ञान रखते हैं (अर्थात काव्य का अर्थ समझते हैं) उनको भी रस का आस्वादन हो जाया करे (किन्तु ऐसा होता नहीं)। यह (रस आदि की प्रतीति) काल्पनिक भी नहीं है; क्योंकि समान रूप से सभी सहृदय जनों को रसास्वादन हुआ करता है। इसीलिये कतिपय आाचार्य व्यञ्जना नामक शब्द का एक व्यापार मानते हैं जो रस, अलङ्काय तथा वस्तु की प्रतीति कराता है औौर जो उन अभिधा, लक्षणा तथा गौणी वृत्तियों से (वितान्त) भिन्न है जिनका अन्य क्रथों के बोधन में सामर्थ्य निश्चित किया गया है। टिप्पणी-(१) झरसिकानां रसास्वादो भवेत-मि० ध्वन्यालोक 'शब्दारथं- शासनज्ञानमात्रेगव न वेद्यते। वेद्यते स तु कव्यार्थतत्त्वज्ञैरेव केवलम्। (१.७)।(२) काल्पनिकत्वम्-रस आदि केवल काल्पनिक नहीं हैं उनकी सत्ता वास्तविकी है, वह अनुभव-सिद्ध है। यदि रस आदि काल्पनिक होते तब तो जो इनकी कल्पना करते उन्हीं को आस्वादन हुआ करता सभी रसिकों को समान रूप से आस्वादन न होता। रस आदि ध्वति का अभाव मानने वालों के प्रति यह कयन है। मि०-यतो लक्षणकृतामेव स केवल न प्रसिद्धः, लक्ष्ये तु परीक्ष्यमाणेस एव सहदयाह लादकारि काव्यतत्त्वम् (ध्वन्यालोक वृत्ति १.१३) । तथा-तदेवमनु- भवसिद्धस्य तत्तद्रसादिलक्षणणार्थस्याशक्यापलापतया। (सा० द० ५.४ व्यञ्जनावृत्ति का उपसंहार)। (३) वाच्यान्तरपरिकल्पितशक्तिम्य :- वाच्यान्तरेषु परिकल्पिताः शक्तयों यासां ताभ्यः, यह 'अभिधालक्षणागौणीभ्यः' का विशेषण है। वाच्य=अर्थ। भाव यह है कि अन्य अर्थो में जिनकी शक्ति निश्चित की गई है ऐसी अभिधा इत्यादि वृत्तियों से व्यञ्जना भिन्न है। ध्वनिवादी (पूर्वपक्षी) की ओोर से अभी ऊपर यह कहा गया है कि व्यङ्गय (व्यञ्जना का विषय) अर्थ तीन प्रकार का होता है रस, वस्तु और अलङ्कार। उस तीनों प्रकार के व्यङ्गय अर्थ के उदाहरण इस प्रकार हैं :- रस-व्यञजना-क्योंकि रस आदि की प्रतीति विभाव, अनुभाव और व्यसिवारी भाव के द्वारा हुआ करती है फिर वह वाच्य कैसे हो सकती है? जैसे कुसारसम्भव (३.६८) में- क अ्रपर्वतपुत्री (पार्वती) भी फूले हुए बाल कदस्ब के समान (पुलकित) शङ्गों के द्वारा (प्रेम) भाव को प्रकट करती हुई, चञ्चल नेत्रों से युक्त तथा अधिक सुन्दर हुए मुख के साथ कुछ तिरछी सी होकर खड़ी हो गई'।

Page 372

चतुर्थं: प्रफाशा ३२३

इत्यादावनुराग जन्यावस्थाविशेषानुभाववद्गिरिजालक्षणविभावोपवर्णनादेवा- शब्दापि शृज्गारप्रतीतिरुदेति, रसान्तरेष्वव्ययमेव न्यायः । न केवलं रसेष्वेव यावद्वस्तुमात्र ऽपि। यथा- 'भम धम्मित्र वीसद्ो सो सुाओ भ्ज्ज मारिधो तेए। बोलाएइकच्छकुडङ्गवासिणा दरिभ्रसीहेख ॥२६०॥ ('भ्रम धार्मिक विधव्धः स श्वाजद्य मारितस्तेन। गोदावरीनदीकच्छकुञ्जवासिना दत्तसिंहेन ।') इत्यादौ निषेधप्रतिपत्तिरशाब्दापि व्यञ्जकशक्तिमूलैव। इत्यादि श्लोक में अनुराग से उत्पन्न होने वाली जो विशेष प्रकार की अवस्था (प्रङ्गों का पुलकित होना, नेत्रों की चञ्चलता, मुख की चारता धादि) अनुभाष के रूप में है, उससे युक्त पार्वती रूप विभाव के वर्णन से ही भृङ्गार की प्रतीति होती है, जबकि यहाँ (रति या शृङ्गार का वाचक) कोई शब्द नहीं है (अशब्दाडपि)। अन्य रसों की प्रतीति में भी यही नियम है [वहाँ भी वाचक शब्द के प्रयोग के बिना ही विभाव शादि के वर्णन से रस की प्रतीति हुधा करती है]। टिप्पणी-(१) विवृण्वती-जिस समय महादेव पर काम-बाण मिरने लगे उस समय की पार्वती की अवस्था का वर्णन है। पावती आलम्बन विभाव है। उसके नेत्र आदि के विकार उसके हाव (द्र० योषिद् अलङ्कार तथा सा० द० ३.६४) हैं, जिन्हें अनुभावों के अन्तर्गत माना जाता है। इन अनुभावों से युक्त विभाव के वर्णंन से शृङ्गार रस की प्रतीति हो रही है। (२) मि० ध्वन्यालोक वृत्ति (१.४) यतश्च स्वाभिधानमन्तरेण केवलेभ्योऽपि विभावादिभ्यो विशिष्टेभ्यो रसादीनां प्रतीतिः । केवलाच्च स्वाभिधानादप्रतीतिः । तस्मादन्वयव्यतिरेकाभ्याम् अभिधेय- सामर्थ्याक्षित्त्वमेव रसादीनाम्, त्वभिधेयत्वं कथञ्चन। वस्तुव्यञ्जना-रसों में ही यह बात नहीं है अपि तु वस्तु मात्र (की व्यञजना) में भी यही बात है [अर्थात् जहाँ वस्तु व्यङ्गय होती है वहाँ भी उसके वाचक शब्द के प्रयोग के बिना ही उसकी प्रतीति हुधा करती है]। जैसे (गाथा० २.७५)-[सङ्कत स्थान की ओर पुष्प-चयन के लिये जाने वाले किसी धार्मिक के प्रति अभिसारिका की उत्ति] 'हे धार्मिक, अब निश्चिन्त होकर भ्रमर करो, क्योंकि गोदावरी नदी के कछार के कुञ्जों में रहने वाले द्पयुक्त सिंह ने उस कुत्त को आाज मार दिया है'। हत्यादि में निषेधवाचक कोई शब्द नहीं है, केवल व्यञ्जना वृत्ति के आधार पर ही निषेध की प्रतीति होती है। टिप्पी-भ्रम धार्मिक० (मि०, ध्वन्यालोक१"४)-गोदावरी के तट-कुञ्ज पर किसी नायिका का सक्केत स्थान है। वहाँ कोई धार्मिक (भगत) भी पुष्पचयन के लिए आ जाया करता है। नायिका के कार्य में उसके आने से विघ्न होता है। नायिका पहिले तो एक कुत्ता साथ ले आती है कि जिससे डर कर धार्मिक उस

Page 373

३२४ दम रूप कम्

तथालड्कारेष्वपि- स्मेरेऽधुना तव मुखे तरलायताक्षि। क्षीभं यदेति न मनागपि तेन मन्ये सुव्यक्तमेव जलराशिरयं पयोधि: ।।२६१।। इत्यादिषु 'चन्द्रतुल्यं तन्वीवदनारविन्दम्' इत्याद्युपमाद्यलङ्कारप्रतिपत्तिर्व्यञ्ज- कत्वनिबन्घनीति। न चासावर्थापत्तिजन्या-अनुपपद्यमानाथ पिक्षाभावात्। नापि वाक्यार्थत्वं कुञ्ज में पुष्पचयन के लिये न आये। किन्तु धार्मिक कुत्ते से डरता-डरता भी वहाँ पुष्प-चयन के लिए आता रहता है। इस पर नायिका ने धार्मिक को भयभीत करने के लिए उपर्युक्त वचन कहा है। यहाँ वाच्य अर्थ है-'निश्चिन्त होकर भ्रमण करो'। यह अर्थ विधिरूप है। किन्तु नायिका का अभिप्राय यह है कि कभी भूलकर भी इवर मत आना। यह अभिप्राय निषेध रूप है जो व्यञ्जना द्वारा प्रतीत होता है। यह वाच्यार्थ नहीं हो सकता, क्योंकि इसका वाचक कोई शब्द यहाँ नहीं है। अलङ्कार-व्यञ्जना- इसी प्रकार अलङ्कारों (की व्यञ्जना) में भी हुआ करता है। जैसे-हे चञ्चल और विशाल नेत्रों वाली (प्रिये, इस समय लावण्य और कान्ति से विशाओं के मुख को परिपू्ण कर देने वाले तुम्हारे मुख के मुसकान युक्त होने पर भी जो यह सागर तनिक भी क्षुब्ध नहीं हो रहा है, इससे मैं समझता हूँ कि यह स्पष्ट रूप में ही जलराशि (जाड्यपुञ्ज) है'। इत्यादि में 'तन्वी का मुखकमल चन्द्रमा के समान है' इस उपमा अलङ्गार की प्रतीति व्यञ्जना के निमित्त से ही होती है। टिप्परी-(१) लावण्य० (मि०, ध्वन्यालोक २.२७) यहाँ जलराशि का श्लेष से जडराशि (जाड्यपुञ्ज) अर्थ है, श्लेष की दृष्टि से ल कौर ड का अभेद मान लिया जाता है। भाव यह है कि यदि यह सागर जड न होता तो तुम्हारे चन्द्र- तुल्य मुख को देखकर भी क्षुब्ध क्यों न हो जाता ? यहाँ श्लेष के द्वारा मुख और चन्द्रमा का साम्य (उपमा) व्यङ्गय है। यहाँ उपमा वाच्य नहीं हो सकती; क्योंकि उसका वाचक कोई शब्द नहीं है। (२) ध्वन्यालोक (२.२७) में इस स्थल पर रूपक अलङ्कार को व्यङ्ग्य बतलाया है। (३) व्यञ्जकत्वनिबन्धनी=व्यञजकत्व निब- न्धनं निमित्त यस्या: सा तथाभूता, व्यञ्जना के निमित्त से होने वाली। यह (रस भाव आदि की प्रतीति) अर्थापति से उत्पन्न होने वाली भी नहीं मानी जा सकती; क्योंकि इस (रस-प्रतीति के) लिये अनुपपद्यमान अर्थ की अपेक्षा नहीं होती। टिप्परी-भाट्ट मीमांसक तथा वेदान्ती अर्थपत्ति नामक एक प्रमाण मानते हैं। जब कोई बात ठीक नहीं बैठती-अनुपपद्यमान होती है-तो उसे ठीक बैठाने के लिये अन्य बात की कल्पना करली जाती है। वह बात अर्थतः उपपन्न हो

Page 374

चतुर्थ: प्रकाष: ३२५

व्यङ्गयस्य-तृतीयकक्षाविषयत्वात्। तथा हि-'भ्रम धार्मिक' इत्यादौ पदार्थ-

कान्ततृतीयकक्षाक्रान्तो निषेधात्मा व्यङ्गयलक्षणोऽर्यो व्यञ्जकशक्त्यधीन: स्फुटमेवाव- भासते अतो नासौ वाक्यार्थः । जाया करती है (अर्थाद् आपदते) इसलिये अर्थापत्ति का विषय कहलाती है। और, उसका ज्ञान कराने वाला प्रमाण अर्थापत्ति कहलाता है। उदाहरणार्थ हम देखते या सुनते हैं कि देवदत्त षुष्ट है किन्तु दिन में नहीं खाता (पीनो देवदत्तो दिवा न भुङ्ग)। यहां देवदत्त की पुष्टता बिना खाये तो बन नहीं सकती (अनुपपद्यमान है)। किन्तु यह भी सत्य है कि वह दिन में नहीं खाता, इसलिये यह कल्पना की जाती है कि वह रात्रि में खाता होगा। दिन में न खाने वाले देवदत्त की पुष्टता रात्रि भोजन के बिना नहीं बन सकती (अनुपपद्यमान है) अतः रात्रि-भोजन की कल्पना कर ली जाती है, जो अर्थापति का विषय है। कुछ विद्वानों (?) का मत है कि रस आदि की प्रतीति भी अरथापत्ति के द्वारा ही हो सकती है; इनकी प्रतीति के लिये व्यञ्जना आदि को मानने की आवश्यकता नहीं। ध्वनिवादी के अनुसार यह मत ठीक नहीं। क्यों? जिस प्रकार ऊपर के उदाहरण में दिन में भोजन न करने वाले देवदत्त की पुष्टता रात्रि-भोजन के बिना अनुपपद्यमान है, उसी प्रकार काव्य में रस आदि की प्रतीति के बिना कोई अर्थ अनुपपद्यमान नहीं होता। काव्य में रस आदि की प्रतीति के बिना भी अर्थ ठीक बन ही जाता है। फिर अर्थापत्ति द्वारा रस आदि की प्रतीति कैसे मानी जा सकती है ? व्यङ्गय (रस आदि) को वाक्य का अर्थ भी नहीं कह सकते; क्योंकि यह (शब्दजन्य बोध में) तृतीय कक्षा का विषय है। उदाहरणार्थ 'भ्रम धार्मिक' इत्यादि श्लोक में अभिधा नामक वृत्ति जो पदार्थों (पद के वाच्यार्थों) का बोध कराती है, यह प्रथम कक्षा है, इसके पश्चात् क्रिया और कारक का अन्वय (ससर्ग) रूप जो वाक्यार्थ है, जिसमें (हे धार्मिक, तुम स्वच्छन्द भ्रमणा करो इत्यादि) विधि का बोध होता है (विधिविषया), यह द्वितीय कक्षा है, फिर इसके परचात (तुम यहाँ कभी न आना इत्यादि) निषेध रूप जो व्यङ्गच अर्थ जाना जाता है, वह तृतीय कक्षा का विवय है। यह व्यञ्जना वृत्ति के निमित्त से होता है, यह स्पष्ट ही भासित हो रहा है। इसलिये यह (रस आदि रूप व्यङ्गय अर्थ) वाक्य का अर्थ नहीं हो सकता। टिप्पणी-(१) धनञ्जय तथा धनिक रस आदि की प्रतीति को वाक्यार्थ (तात्पर्यार्थ) के रूप में मानते हैं, यह आगे (४.३७) बतलाया जायेगा। ध्वनिवाद की स्थापना से पूर्व भी इस मत के मानने वाले कतिपय आचार्य थे (द्र०, ध्वन्या- लोक ३.३३ वत्ति)। ध्वनिवाद की ओर से उस मत का खण्डन किया गया था,

Page 375

३२६ दशरूपकमू

ननु च तृतीयकक्षाविषयत्वमश्रूयमाणपदार्थतात्पर्येषु 'विषं मुक्ष्व' इत्यादि- वाक्येषु निषेधार्थविषयेषु प्रतीयत एव वाक्यार्थस्य। न चात्र व्यञ्जकत्ववादिनापि वाक्यार्थत्वं नेष्यते तात्पर्यादन्यत्वाद ध्वनेः । तन्न, स्वार्थस्य द्वितीयकक्षायामविश्रान्त- स्य तृतीयकक्षाभावात्, सैव निषेधकक्षा। तत्र द्वितीयकक्षाविधौ क्रियाकारकससर्गा- नुपपत्ते: प्रकरणात्पितरि वक्तरि पुत्रस्य विषभक्षणनियोगाभावात्। जिसे यहां पूर्वपक्ष के रूप में रक्खा गया है। (२) वाक्यार्थ का बोध कैसे होता है ? इस विषय में दो प्रसिद्ध मत हैं-अभिहितान्वयवाद और अन्विताभिधानवाद। भाट्ट मीमासक अभिहितान्वयवादी हैं। उनके अनुसार प्रथमतः वाक्य में आये हुए शब्द अभिधा शक्ति के द्वारा अपने अपने अर्थ(पदार्थ) का बोध कराते हैं; (यही प्रथम कक्षा है)। इसके पश्चात् अभिधा द्वारा अभिहित पदार्थों का आकांक्षा, योग्यता और सन्निधि के आधार पर अन्वय (संसर्ग) होता है (अभिहितानाम् अन्वयः= अभिहितान्वयः); और, एक ऐसे अरथ का बोध हो जाता है, जो पदों का अर्थ नहीं अपि तु वाक्य का अर्थ होता है। यह पदार्थ से भिन्न होता है तथा तात्पर्य वृत्ति का विषय होता है, (यही दूसरी कक्षा है)। इस प्रकार अभिहितान्वयवादी के अनुसार वाक्यार्थ का बोध दूसरी कक्षा में होता है। किन्तु प्रभाकर (मीमासक) अभिहितान्वयवाद को नहीं मानते वे अन्विताभिधानवादी है। उनके अनुसार अभिधा वृत्ति द्वारा परस्पर सम्बद्ध (= अन्वित) अर्थ की ही प्रतीति होती है। शब्द अन्वित अर्थ का ही बोध कराते हैं (अन्वितानाम् अभिधानम्)। उनके मत में तात्पर्य वृत्ति को पृथक् मानने की आवश्यकता ही नहीं (विशेष द्र० का० प्र० २.७ तात्पर्यार्थोऽपि केषुचित्)। (३) ध्वनिवादी का कथन है कि द्वितीय कक्षा में वाक्यार्थ को परिसमाप्ति हो जाती है। व्यङ्गय थं उसके पश्चात् हुआ करता है। वह तृतीय कक्षा में होता है। फिर वह वाक्यार्थ या तात्पर्यार्थ कसे हो सकता है ? तृतीय कक्षा में तो वाक्यार्थ जाता ही नहीं। इस पर वाक्यार्थ (वात्पर्यार्थं) में ही तथाकथित व्यङ्गच अ्रर्थं का समावेश मानने वाला ध्वनिविरोधी प्रश्न करता है-ननु च इत्यादि- (प्रश्न) जिन वाक्यों का तात्पयं वाक्य में अप्रयुक्त श्रब्व के प्र्थ में होता है, वहां वाक्य का अरथ तृतीय कक्षा का ही विषय होता है; जैसे 'बिष खालो' इत्यावि वाक्य का तात्पर्य ('इसके घर कदापि न खाग्रर' इत्यादि) निषेध में है। और, इस स्थल पर व्यञ्नावादी को भी निषेध रूप वाक्यार्थ मानना पड़ेगा; क्योंकि उसके अनुसार ध्वनि तो तात्पर्य से (सर्वथा) भिन्न है (अतः यह निषेध ध्वनि का विषय नहीं हो सकता)। (उत्तर) यह कथन ठीक नहीं। कारण यह है कि जब तक द्वितीय कक्षा में वाक्य के अर्थ की परिसमाप्ति नहीं हो जाती तब तक तृतीय कक्षा होती हो वहीं। अतः यहाँ निषेध-धर्थ को प्रकट करने वाली वही अर्थात् द्वितीय कक्षा हो है। 'विष भक्ष्' यहाँ पर (तत्र) द्वितीय कक्षा में (विष सालो इस प्रकार का) विधि-

Page 376

चतुर्थ: बकाश: :३२७

रसवद्वाक्येषु च विभावप्रतिपतिलक्षणाद्वितीयकक्षाया रसानवगमात्। तदुक्तम्-'अप्रतिष्ठमविश्रान्तं स्वार्थे यत्परतामिदम्। 85P05 वाक्यं विगाहते तत्र न्याय्या तत्परताऽस्य सा।। परक अर्थ लेने पर करिया और कारक का अन्वय ही नहीं बनता; क्योंकि पकरख के अनुसार यहाँ वक्ता पिता है और पिता पुत्र को विष खाने का आदेश (नियोग) नहीं दे सकता। टिप्पणी-ध्वनि-विरोधी के प्रश्न का आशय यह है :- कहीं कहीं वाक्यार्थ की समाप्ति तृतीय कक्षा में ही होती है अतः यह नियम नहीं बन सकता कि वाक्यार्थ या तात्पर्यार्थ तृतीय कक्षा में नहीं जाता। और, जब तात्पर्यार्थ का विषय तृतीय कक्षा भी है तो व्यङ्गय शर्थ भी तात्पर्यार्थ ही है, उससे भिन्न नहीं। यदि कहो कि वाक्यार्थ तृतीय कक्षा में कहां जाता है तो 'विष भुङ्क्ष्व' इत्यादि उदाहरण को देखिये। यहां दो वाक्य हैं-(१) विषं भूङ्क्ष्व (२) मा चास्य गृहे सुङ्क्थाः (विषखालो, इसके घर न खाओरो)। 'विष भुङ्क्ष्व' का तात्पर्य भी दूसरे वाक्य के अर्थ में ही है; अर्थांत् कवाचित् भी इसके घर न खाओ, यह तात्पर्यार्थ है। यह तात्पयं तृतीय कक्षा में परिसमाप्त होता है :- प्रथम कक्षा में 'विषम्' तथा 'भुङ्क्ष्व' पदों के अथं (पदार्थ) का बोध होता है, द्वितीय कक्षा में 'विष खालो' यह विधि रूप वाक्यार्थ जाना जाता है। तृतीय कक्षा में-अब 'विष खालो' यह वाक्यार्थ ठीक नहीं बैठता तो 'कदापि इसके घरन खाओ' इस निषेध रूप अर्थ में तात्पर्य का निश्चय किया जाता है। ध्वनिवाबी के उत्तर का आ्श्चय यह है :- 'विषं भुङ्क््व' आदि में भी दो कक्षाओं में ही FR

वाक्यार्थ की परिसमाप्ति हो जाती है। प्रथम कक्षा में पदार्थ-बोध होता है। द्वितीय कक्षा में प्रथमतः(विष लालो, इस) विधि रूप भर्थ का बोध होता है। किन्तु यह अर्थ उपपन्न नहीं होता, कोई पिता अपने पुत्र को विष खाने के लिये नहीं कह सकता। परतः 'मा चाऽस्म पृहे भुड्क्थाः' की एक वाक्यता से 'कदापि इसके घर न खाओ' इस विषेध में वाकम का भ्ररथं (तात्पर्यार्थ) समझ लिया जाता है। जब तक वक्ता का तात्पयं नहीं प्रकट होता वब तक तात्प्यवृत्ति का कार्य अर्थात् वाक्यार्थ पूरा ही नहीं होता। इस प्रकार सभी जगह द्वितीय कक्षा में ही वाक्यार्थ की परिसमाप्ति हो जाती है। किन्तु को रस की प्रतीति कराने वाले (एसवद्) वाक्य हैं वहाँ तो द्वितीप कक्षा में विभाव आदि का बोध होता है, उस कक्षा में रस की प्रतीति नहीं होती (अपि तु तृतीय कक्षा में रस की प्रतीति होती है, जो वाक्यार्थ नहीं कही जा सकती)। संसा कि कहा है (?)- 'सब बादम सपने धर्भ में ठीक नहीं बठता धौर परिसमाप्त (विभान्त) नहीं होता तब यह जिस धर्थ में पहुँचकर विधान्त होता है, उस वाक्य का (अस्य.) उसी अर्थ में सात्पयं (तत्परता) -मानना उचित है। किन्तु जम वा्म्पसुपते सर्श्

Page 377

३२८ पयरूपकमू

यत्र तु स्वार्थविश्रान्तं प्रतिष्ठां तावदागतम्। तत्प्रसपति तत्र स्यात्सवंत्र ध्वनिना स्थितिः ॥' इत्येयं सर्वत्र रसानां व्यङ्गयत्वमेव। वस्त्वलङ्कारयोस्तु क्वचिद्वाच्यत्वं क्व- चिद्व्यङ्गयत्वम् । तत्रापि यत्र व्यङ्गयस्य प्राधान्येन प्रतिपत्तिस्तत्रव ध्वनिः, अन्यत्र गुणीभूत- व्यङ्गयत्वम् । तदुक्तम्- में विश्रान्त हो जाता है और ठोक बैठ जाता है फिर जो उससे आगे (किसी अर्थ में) पहुँचता है (प्रसर्पति) तो उस (अग्रिम अर्थ) में उस वाक्य की ध्वनि (व्यञ्जना) से ही स्थिति होती है।' इस प्रकार सभी जगह रस व्यङ्गय ही होते हैं। वस्तु और अलङ्गार तो कहीं वाच्य होते हैं, कहीं व्यङ्गच। टिप्पणी-(१) द्र० ध्वन्यालोकवृत्ति तथा ध्वन्यालोक लोचन (१.४), का० प्र० उ० ५ व्यञ्जनासिद्धि का आरम्भ। (२) यद्यपि ध्वनि अनेक प्रकार की होती है तथापि संक्षेप में सभी ध्वनियों का समावेश वस्तु, अलङ्कार तथा रस ध्व्रनि में किया जा सकता है, क्योंकि वस्तु, अलङ्कार और रस आदि तीन प्रकार के ही व्यङ्गय पर्थ हुआ करते हैं। अथवा कहिये कि काव्यप्रतिपाद्य अर्थ तीन प्रकार का होता है। प्रथमतः उसके दो भेद हैं- वाच्यता-सह और वाच्यता-असह। जो अर्थ वाच्य भी हो सकता - अभिधावृत्ति से भी जाना जा सकता है, वह वाच्यतासह है। वह भी दो प्रकार का है अविचित्र तथा विचित्र। जो अलङ्कार रूप अर्थ है वह विचित्र कहलाता है। जो अलङ्कार से भिन्न वस्तु मात्र अर्थ है वह अविचित्र कहा जाता है। ये वस्तु तथा अलद्कार कहीं वाच्य होते हैं और कहीं व्यङ्गय। जहाँ ये व्यङ्गय होते हैं वहीं वस्तुध्वनि तथा अलङ्कार ध्वनि कही जाती है, अन्यत्र नहीं। तीसरा जो रस आदि अर्थ है, वह तो वाच्यता-असह है, रस आदि कभी भी वाच्य नहीं हो सकते। वे तो विभाव आदि के द्वारा व्यङ्गय ही हुआ करते हैं। इस तीनों प्रकार के व्यङ्गयार्थ की प्रतीति तृतीय कक्षा में हुआ करती है। प्रथम कक्षा में पदार्थ का बोध, द्वितीय कक्षा में वाक्यार्थ (तात्पर्यार्थ) का बोध और तृतीय कक्षा में व्यङ्गयार्थ बोध होता है। रस आदि के व्यङ्गय होने पर भी (तत्रापि) जहाँ व्यङ्गय अर्थ की प्रधान रूप में प्रतीति होती है वहीं ध्वनि (काव्य) कहलाता है। अन्य स्थलों में (जहाँ व्यङ्गय प्ररथ प्रधान नहीं होता, गौण हो जाता है) तो गुशीभूतव्यङ्गय (काव्य) माना जाता है। जंसा कि (ध्वनिकार ने) कहा है :-

Page 378

चतुर्थ: प्रकाष! ३२६

यत्रार्थ: शब्दो वा यमर्थमुपसर्जनीकृतस्वार्थी। व्यङ्क्त: काव्यविशेष: स ध्वनिरिति सूरिभि: कथितः। प्रधानेऽन्यत्र वाक्यार्थे यत्राङ्ग तु रसादयः । काव्ये तस्मिन्नलङ्कारो रसादिरिति मे मतिः । यथा-'उपोढरागेण' इत्यादि। 'जहाँ अर्थ अपने आपको (स्व) तथा शब्द अपने अर्थ को गुरीभूत करके उस (प्रतीयमान) अर्थ को अभिव्यक्त करते हैं, उस काव्य-विशेष को विद्वानों ने ध्वनि कहा है'। (ध्वन्यालोक १.१३)। 'जहाँ अन्य (अ्रङ्भूत रस आदि से भिन्न वाच्य या व्यङ्गय) अर्थ प्रधान रूप से वाक्यार्थ होता है और रस आदि उसमें अङ्ग होते हैं वहाँ अ्ङ्गभूत रस आदि अलङ्कार (रसवदलङ्कार आदि) के विषय होते हैं (अर्थात् वहाँ गुणीभूत- व्यङ्गय होता है), यह मेरा विचार है।' (ध्वन्यालोक २. ५)। जैसे 'उपोढरागेण' इत्यादि में (गुणीभूतव्यङ्गय) है। टिप्पणी-(१) द्र० ध्वन्यालोक तथा ध्वन्यालोकलोचन (१.१३ तथा २.५), का० प्र० (१.४,५), सा० द० (४.१,१३)। (२) ध्वनिवाद के अनुसार काव्य के तीन भेद हैं (ध्वन्यालोक ३.४२७ तथा का० प्र० १.४, ५) -ध्वनि (उत्तम), गुणीभूतव्यङ्गय (मध्यम) और चित्र (अधम)। व्यङ्गय अर्थ की दृष्टि से ही ये तीन भेद किये गये हैं। ध्वनि काव्य में व्यङ्गय अर्थ की प्रधानता होती है अर्थात् वह वाक्यार्थ की अपेक्षा अधिक चमत्कारक होता है। इसके उदाहरण आगे दिये जायेंगे। गुणीभूतव्यङ्गय में व्यङ्गयार्थ होता तो है, किन्तु वह वाच्यार्थ से दबा रहता है, वाच्यार्थ की अपेक्षा गौण होता है। अथवा कोई एक व्यङ्गयार्थ दूसरे व्यङ्गय अर्थ का अङ्ग हुआ करता है। जैसे (ध्वन्यालोक वृत्ति १. १३)- उपोढरागेश विलोलतारकं तथा तृहीतं शशिना निशामुखम्। यथा समस्तं तिमिरांशुकं तया, पुरोऽपि रागाद् गलित न लक्षितम् ।। '(उदय काल में) राग को वारण किये हुए चन्त्रमा ने निशा के चञचल तारों से युक्त मुख को इस प्रकार ग्रहण किया कि राग (लालिमा या नायिका के हृदय में उत्पन्न अनुराग) के कारण समस्त अन्धकार रूपी वस्त्र गिर जाने पर भी उसने नहीं देखा।' यहां चन्द्रमा का वर्णन प्रस्तुत है,जो वाच्यार्थ है। किन्तु व्यङ्गय रूप में नायक- नायिका के व्यवहार की प्रतीति हो रही है। यहां समासोक्ति अलद्ार है। गुरीभूत व्यहृय काव्य है, ध्वनि नहीं; क्योंकि वाच्यार्थ (चन्द्रोदय-वर्णन) की प्रधानता

Page 379

३३० दशरूपकमु

तस्य च ध्वनेविवक्षितवाच्याविवक्षितवाच्यत्वेन द्वैविध्यम्। अविवक्षितवा- च्योऽप्यत्यन्ततिरस्कृतस्वार्थोऽर्थान्तरसंक्रमितवाच्यश्चेति द्विघा। विवक्षितवाच्यश्च प्रसंलक्ष्यक्रमः क्रमद्योत्यश्चेति द्विविधः, तत्र रसादीनामसंलक्ष्यत्रमध्वनित्वं, प्राधान्येन प्रतिपत्तौ सत्यां अङ्गत्वेन प्रतीतौ रसवदलङ्कार इति। है, व्यङ्गयार्थ गौण ही है। काव्य का तीसरा भेद जो चित्रकाव्य है वह किसी विशेष व्यङ्गयार्थ के प्रकाशन की शक्ति नहीं रखता, उसमें शब्द और अरथ का चमत्कार ही विशेषकर होता है। जैसे-(काव्यप्रकाश उ० १ उदा० ५)- विनिर्गत मानदमात्ममन्दिराद् भवत्युपश्रुत्य यदछयाऽपि यम् । ससंभ्रमेन्द्रद्रुतपातितार्गला निमीलिताक्षीव भियाऽमरावती। अर्थात् (शत्र ओं का) मान-मर्दन करने वाले जिस (हयग्रीव) को अपने भवन से बिना किसी उद्द श्य के (यों ही, इच्छानुसार) ही निकला हुआ सुनकर घबराहट के साथ जिसकी अगला गिरा दी गई थी ऐसी अमरावती (मानों) भय के कारण आँखें बन्द की हुई सी प्रतीत होती थी।' यहां उत्प्रेक्षा अलङ्कार वाच्य है, उसी में कवि का तात्पर्य है और वही चमत्कारक है। यद्यपि हयग्रीव की वीरता भी भलकती है तथापि वह स्फुटतया प्रतीत नहीं होती। अतः यह चित्र काव्य है। उस ध्वनि के दो भेद हैं-(१) विवक्षितवाच्य और (२) अविवक्षितवाच्य अविवक्षितवाच्य ध्वनि भी दो प्रकार की है-अत्यन्ततिरस्कृतवाच्य और अर्थान्तर- संक्रमित वाच्य । विवक्षितवाच्य ध्वनि भी दो प्रकार की है-असंलक्ष्यत्रम और संलक्ष्यक्रम व्यङ्गय। जब रस आदि की प्रधान रूप से प्रतीति होतो है तो असंलक्ष्य- कम ध्वनि होती है। किन्तु जब इनकी (किसी वाच्य या व्यङ्गच अर्थ के) भ्रङ्ग रूप में प्रतीति होती है तो रसवद् अलङ्कार होता है। टिप्परी-(१) ध्वन्यालोक तथा लोचन (२.१,२), का० प्र० (४.२४,२५) सा० द० (४.२,१,४,) । (२) ध्वनि काव्य के भ्नेक प्रकार है। यहाँ उनमें से चार मुखुय भेदों का उल्लेख किया थया है। प्रथमतः ध्वनि के दो भेव होते हैं-(i) भवि- वश्षितवाच्य औौर (ii) विवश्ितवाच्य। (१) सविवक्षितवाच्य वह ध्वनि है जहाँ वक्ता का तात्पर्य बाच्यार्थ में नहीं होता। बाच्मार्थ बधित हो जाता है तथा लक्ष्यार्थ का बोध कराता हुआ वयङ्ुचार्थ की प्रतीति कराता है। इस ध्वनि को लक्षणामूलक ध्वनि भी कहते हैं। मह पविवक्षितवाच्य ध्वनि दो प्रकार की होती है-(क) अर्था- न्तरसंक्रमित तथा (ख) भत्यन्ततिरस्कृत। (क) अर्थान्तरसंक्रमित में वाच्यार्थ अपने रूप में बाधित होकर अपने अर्थ की सिद्धि के लिये दूसरे अर्थ में परिणत हो जाता है। वह अर्थ का त्याग न करते हये ही दूसरे धर्थ में संकमित होता है अ्रतः यह ध्यनि उपादानलक्षणा के स्थलों पर होती है। बंसे- त्नामसम वण्मि विदुषां समयायोडन तिष्ठति। 15.४. आत्मीयां मतिमास्थाय स्थितिमत्र विवेहि ततु।।

Page 380

चतुथ: प्रकाशः ५३३१

'अर्थात् मैं तुम्हें यह बतलाता हूँ कि यहाँ पण्डितों का समुदाय उपस्थित है इसलिये तुम अपनी बुद्धि का आश्रय लेकर सावधानी से व्यवहार करना'। यहां पर 'वच्मि' का अर्थ है 'कहना' किन्तु जब वह कह ही रहा है तो 'कहता हूँ' (वच्मि) यह कथन व्यर्थ है और इसका लक्ष्यार्थ लिया जाता है-(वच्मि=उपदिशामि) 'उपदेश करता हूँ'। इस लक्ष्यार्थ के द्वारा हितकारिता व्यङ्गय है। (ख) अ्रत्यन्त- तिरस्कृत वाच्य ध्वनि में वाच्यार्थ बाधित होकर तिरस्कृत हो जाता है, उसको त्याग दिया जाता है और वह लक्ष्यार्थ का बोध कराता हुआ व्यङ्गय अर्थ की प्रतीति फराता है। ऐसा उपादानलक्षणा से भिन्न लक्षणा के स्थल पर होता है जैसे- उपकृतं बहु तत्र किमुच्यते सुजनता प्रथिता भवता परम्। विदधदीदृशमेव सदा सखे सुखितमास्व ततः शरदां शतम् ॥ 'अर्थात् हे मित्र, आपने बहुत उपकार किया है। इस विषय में क्या कहा जाये; आपने तो केवल सज्जनता दिखलाई है। इसलिये ऐसा ही करते हुए सैकड़ों वर्षों तक सुखपूर्वक रहो।' अनेक अपकारों से पीड़ित किसी व्यक्ति की अपने अपकारी के प्रति यह उक्ति है अतः 'उपकृतम्' इत्याडि का वाच्यार्थ बाधित होकर विपरीत अर्थ को लक्षित करता है; अर्थात् 'उपकृतम्' का लक्ष्यार्थं होता है-अपकृतम् । इसी प्रकार 'सुजनता' इत्यादि का लक्ष्यार्थ दुर्जनता आदि हो जाता है। और, यहाँ 'अपकार की अधिकता' व्यङ्गयार्थ होता है। (ii) विवक्षितवाच्य अथवा विवक्षितान्यपरवाच्य ध्वनि-यहाँ वाच्यार्थ विवक्षित (=तात्पर्य का विषय) तो होता है किन्तु वह अपने से अधिक रमसीय व्यङ्गय अर्थ की प्रतीति कराने में तत्पर हो जाता है। यहाँ अभिधामूला व्यञ्जना द्वारा व्यङ्गय अर्थ की प्रतीति हुआ करती है अतः इस ध्वनन को अभिधामूलक ध्वनि भी कहते हैं। यह भी दो प्रकार की होती है :- (क) असंलक्ष्यक्रमव्यङ्गच (र)असंलक्ष्यकमध्यङ्य-इसमें वाच्यार्थ से व्यङ्गचार्वं तक पहुँचने का करम खक्षित नहीं हुआ करता। जहाँ रस आवि व्यङ्गय होते हैं वहां यह ध्वनि होती है। जैसे भागे (उदा० २६२ इत्यादि) शृङ्गार आदि रसों के उदाहरणों में ध्वनिवादी की दृष्टि से रसध्वनि है। (ख) संलक्ष्यकमव्यङ्गय-यह ध्ववि भनेक प्रकार की होती है। इसमें वाच्यार्थ से व्यङ्गचार्थ तक पहुँचने का करम स्पष्टतः लक्षित हुआ करता है। जैसे- निरुपादानमसम्भारमभित्तावेव तन्वते। जगच्चित्रं नमस्तस्म कलाइ्लाध्याय शूलिने।। 'अर्थात् बिना तूलिका आदि उपकरण सामग्री के तथा बिना आधार के विविध आाकार के संसार का निर्मा करने वाले उम्र चन्द्रकला से शोभायमान बिन के लिये माम है।' यहां कलाकार उपमान है तथा शिव उपमेम है। उपमान की चपेक्षा उपमेय का उत्कर्ष मकढ हो रहा है (व्यङ्गय है)। अतः महाँ व्यवरिरेक अलद्कार व्यङ्डुष है। (विशेष द्र० का० प्र० तथा सा० ब०)।

Page 381

३३२ दवरूपकम्

पत्रोच्यते- (४६) वाच्या प्रकरणादिभ्यो बुद्धिस्था वा यथा क्रिया। वाक्यार्थः कारकैर्युक्ता स्थायी भावस्तथेतरैः ॥ ३७ ॥ (३) प्राधान्येन प्रतीतौ . रसवदलङ्कार :- जहां रस आदि की प्रतीति प्रधान रूप से होती है वहां रस ध्वनि आदि हुआ करती है किन्तु जब रस आदि किसी वाच्य या व्यङ्गय अर्थ के अङ्ग होकर आते हैं तो रसवत् अलद्कार आदि कहलाते हैं जैसे (महा० स्त्रीपर्व अ० २४)- अयं स रशनोत्कर्षी पीनस्तनविमर्दनः। नाभ्यूरुजघनस्पर्शी नीवीविस्रंसनः करः । यहाँ रणभूमि में कट कर गिरे हुए भूरिश्रवा के हाथ को लेकर उसकी पत्नी विलाप कर रही है। यहाँ करुणरस की प्रधानता है। पूर्वानुभूत शृङ्गार का वह स्मरण कर रही है। शृङ्गार रस करुण का अङ्ग है। अतः यहाँ रसवत् अलङ्कार है। मम्मट ने गुणीभूत व्यङ्ग्य के सन्दर्भ में इसका निर्देश किया है (का० प्र० ५ अपरस्याङ्ग गुणीभूतव्यङ्गय)। इस प्रकार ध्वनिवादी के मत में रस आदि व्यङ्गय हैं और काव्य उनका व्यञ्जक है। काव्य से व्यञ्जना वृत्ति के द्वारा ही रस आदि की प्रतीति होती है। किन्तु धनञ्जय तथा धनिक इस मत को स्वीकार नहीं करते। अतः ध्वनिवादी के मत को पूर्वपक्ष में रखकर अपना सिद्धान्त बतलाते हैं :- दशरूपककार का सिद्धान्त (रस आदि तथा काव्य में भाव्य-भावक सम्बन्ध) इस विषय में कहते हैं- जिस प्रकार (शब्दों द्वारा) वाच्य अथवा प्रकरण आदि के द्वारा बुद्धि में स्थित क्रिया ही कारकों से युक्त होकर वाक्य का अर्थ हुआ करती है, उसी प्रकार अन्यों (विभाव आदि) से युक्त होकर स्थायी भाव भी वाक्यार्थ होता है॥ ३७॥ टिप्पणी-यहाँ धनञ्जय ने यह दिखलाया है कि रति आदि भाव या रस काव्य के वाक्यार्थ ही होते हैं, रति आदि भाव और काव्य में व्यङ्गय-व्यञ्जक-भाव सम्बन्ध नहीं होता। काव्य से भित्र लौकिक वाक्यों के दृष्टान्त द्वारा इस मन्तव्य को स्पष्ट किया गया है। मीमांसक के अनुसार वाक्य के अथ में क्रिया की प्रधानता होती है। कारकों से अन्वित किया ही वाक्य का अथ होती है। श्रोता को क्रिया का ज्ञान दो प्रकार से हो सकता है। कहीं तो वाक्य में क्रियावाचक पद का प्रयोग होता है, जैसे 'गामभ्याज' (गाय लाओ)। यहां करिया 'अभ्याज' (लाओ) पद की वाच्य है। कहीं क्रियावाचक पद का प्रयोग तो नहीं होता फिर भी प्रकरण के द्वारा या संकेत आदि से श्रोता को किया का बोध हो जाता है; जैसे किसी ने कहा 'द्वारं बारम' (द्वार को द्वार को)। यहां प्करण से या संकेत से श्रीता 'बन्द करो' इस

Page 382

चतुर्थ: प्काश। ३३३

यथा लौकिकवाक्येषु श्रूयमाणक्रियेषु 'गामभ्याज' इत्यादिषु, अश्रूयमाणक्रियेषु च-'द्वारं द्वारम्' इत्यादिषु स्वशब्दोपादानात्प्रकरणादिवशाद् बुद्धिसन्निवेशिनी क्रियेव कारकोपचिता वाक्यार्थस्तथा काव्येष्वपि क्वचित् स्वशब्दोपादानात् 'प्रीत्य नवोढा प्रिया' इत्येवमादी, क्वचिच्च प्रकरणादिवशान्नियताभिहित विभावाद्यविनाभावाद्वा साक्षाद्ा- वकक्रिया को समभ लेता है। इन दोनों ही स्थलों में कारकों से अन्वित होकर करिया ही वाक्यार्थ मानो जाती है। अथवा कहिये कि प्रथमतः कारक पदों तथा क्रिया पद का पदार्थ -बोध हो जाता है फिर कारक-पद के अथों से अन्वित किया पद का अथ जाना जाता है। यही वाक्यार्थ है, जैसा कि अभिहितान्वयवादी मीमांसक मानते हैं। काव्य में भी यही बात है। प्रथमतः काव्य के वर्णनों द्वारा विभाव आदि का पृथक् पृथक् बोध होता है। वह पदार्थ-बोध के समान है। फिर विभाव आदि से संसृष्ट स्थायी भाव का बोध होता है। वह वाक्यार्थ-बोध के समान है। उपर्युक्त क्रिया-बोध के समान स्थायी भाव के बोध में भी दो अवस्थाएं हो सकती हैं ;- (क) कभी तो स्थायी भाव को शब्दों द्वारा कहा जाता है, जैसे 'प्रीत्य नवोढा प्रिया' यहां 'प्रीति' शब्द के द्वारा 'रति भाव' का बोध होता है। (ख) कभी स्थायी भाव को शब्दों द्वारा नहीं कहा जाता, अपितु(i)या तो अनुराग आदि के वर्णन के प्रकरण से श्रोता के मन में रति आदि भाव प्रस्फुरित हो जाता है अथवा (ii) किसी रति आदि भाव के साथ नियम से रहने वाले (नियत) जो विभाव, अनुभाव तथा सञ्चारी भाव हैं, उनका काव्य में वर्णन होता है। श्रोता यह जानता है कि ये विभाव आदि तो रति भाव के बिना नहीं रहते। अतः उसके मन में रति आदि भाव स्फुरित हो जाता है। काव्य के शब्दों के द्वारा या प्रकरण आदि से श्रोता के चित्त में स्फुरित हो जाने वाला वह स्थायी भाव काव्य में वर्णित विभाव आदि से पुष्ट हो जाया करता है। पुष्ट हुआ रति आदि स्थायी भाव ही शृङ्गार आदि रस कहलाता है। इस प्रकार काव्य में विभाव आदि का बोध पदार्थ स्थानीय है। और विभाव शादि से अन्वित स्थायी भाव की प्रतीति वाक्यार्थ के रूप में है। धनिक ने बतलाया है कि वाक्यार्थ बोध के समान तात्पर्य वृत्ति से ही विभाव आदि से स्थायी भाव (=रस) की प्रतीति हो जाती है। रसबोध के लिये व्यञ्जना वृत्ति की कल्पना आवश्यक नहीं है। इसका युक्ति-युक्त वर्णन आगे किया जा रहा है। जिस प्रकार 'गाय लाओ' इत्यादि जिनमें (अभ्याज=लाओ्ो) क्रिया का प्रयोग किया जाता है तथा 'द्वार को द्वार को' इत्यादि जिनमें (बन्द करो आदि) क्रिया का प्रयोग नहीं होता-दोनों प्रकार के लौकिक वाक्यों में क्रमशः क्रिया- वाचक शब्द के प्रयोग से अथवा प्रकरण आदि के कारण बुद्धि में स्थित होने से करिया ही कारकों से अन्वित होकर वाक्य का अर्थ हुआ करती है; उसी प्रकार काव्य के विषय में भी होता है। कहीं तो 'प्रीत्य नवोढा प्रिया' इत्यादि में स्थायी भाव के वाचक (प्रीति आदि) पव का प्रयोग होने से और कहीं प्रकरण आदि के

Page 383

३३४ दणरूपकल

चेतसि विपरिवर्तमानो रत्यादि: स्थायी स्वस्वविभावानुभावव्यभिचारिभिस्तत्तच्छ- दोपनीतैः संस्कारपरम्परया परं प्रौठिमानीयमानो रत्यादिवक्यार्थः। 'BR) व चाउपदार्थस्य वाक्यार्थश्वं नास्तीति वाच्यम्-कार्यप्यंवसायित्वात्तात्पयं- शक्त:। तथा हि पौरुषेयमपौरुवेयं वाक्यं सर्व कार्यपरम्, अतत्परत्वेऽनुपादेयत्वादुन्म- तादिवाक्यवत्। काव्यशब्दानां चान्वयव्यतिरेकाभ्यां निरतिशयसुखास्वादव्यतिरेकेण प्रतिपाद्यप्रतिपादकयो: प्रवृत्तिविषययोः प्रयोजनान्तरानुपलब्बे: स्वानन्दोद्भूतिरेव द्वारा पथवा काव्य में वर्गिगत (सभिहित) नियत विभाव सादि के साथ अविनाभाव सम्बन्ध होने के कारण सहृदय जनों के चित्त में रति आादि स्थायीभाव साक्षात् रूप से स्फुरित होने लगता है (विपरिवर्तमानः)। वह स्थायी भाव (काव्य के) भिन्न-भिन्न शब्दों द्वारा प्रकट किये गये अपने-अपने विभाव, अनुभाव और व्यभि- चारी भावों के द्वारा संस्कार-परम्परा से अत्यन्त पुष्ट हो जाता है और वही (काव्य में) वाक्यार्थ होता है। ( टिप्पणी-स्वशब्दोपादानात्-क्रियावाचक शब्द (=स्वशब्द) के प्रयोग से। बुद्धिसंनिवेशिनी-बुद्धि में स्थित। स्वशब्दोपादानात-रति आदि स्थायी भाव के वाचक शब्द (स्वशब्द) के प्रयोग से। नियताभिहित०-किसी रस के साथ नियत तथा काव्य-शब्दों द्वारा अभिहित जो विभाव आदि उनके साथ अविनाभाव सम्बन्ध होने के कारण। संस्कारपरम्परया-विभाव आदि के ज्ञान से उत्पन्न होने वाले संस्कारों की परम्परा से। भाव यह है कि काव्य-शब्दों के द्वारा जो विभाव आदि का ज्ञान होता है वह तो तृतीय क्षण में नष्ट हो जाता है। फिर विभाव आदि स्थायी भाव को पुष्ट कैसे कर सकते हैं ? इसलिये यह मानना चाहिये कि विभाव आदि के ज्ञान के पश्चात् भी उस ज्ञान के संस्कारों की परम्परा चलती रहती है। उसी संस्कार-परमरा से रति आदि भाव पुष्ट हुआ करता है। वाक्यार्थः=साक्षात् रूप से काव्य के वाक्यों का अर्थ है जो तात्पर्य वृत्ति से जाना जाता है। (यङ्का) यदि कोई कहे कि रस आादि पदों के घर्थ (पदार्थ) नहीं हैं अतः वे वाक्य के अर्थ (वाक्यार्थ) भी नहीं हो सकते (क्योंकि पदार्थों के संसर्ग से ही वाक्यार्थ बनता है) । (समाधान) यह कथन ठोक नहीं; क्योंकि तात्पर्य शक्ति की विभरान्ति कार्य (प्रवृत्ति या निवृत्ति रूप प्रयोजन) में ही हुआ करती है। भाव यह है कि दो प्रकार के वाक्य होते हैं-पौरुषेय तथा अपौरषेय। उन सबका तात्पर्य कार्य में ही होता है। यदि किसी वाक्य का तात्पर्य कार्य में न हो तो वह ग्राह्य ही न होगा; जैसे पागलों की बात ग्राह्य नहीं होती। और, काव्य के शब्दों की प्रवृत्ति का विषय जो प्रतिपादक (विभाव आदि) तथा प्रतिपाद्य (रति आदि स्थायी भाव) हैं, उनका अन्वय-व्यतिरेक के द्वारा निरतिशय आनन्दानुभूति के अतिरिक्त कोई अ्व्य प्रयोजन दिखलाई नहीं देता। इसलिये अपने आनन्द की अनुभूति करावा ही उनका प्रयोजन (कार्य) निश्चित किया जाता है (उसमें ही

Page 384

चतुर्थँ। प्रकाश। ३३५

कार्यत्वेनावधारयते। तदुद्भूतिनिमित्तत्वं च विभावादिसंसृष्टस्य स्थायिन एवावगभ्यते, भावादिप्रतिपादनद्वारा स्वपर्यंवसाणितामानीयते। तत विभावादयः पदार्थंस्थानीया- स्तत्संसृष्टो रत्यादिर्वाक्यार्थ।। सदैतत्काव्यवाक्यं पदीर्य ताविम पदार्यवाक्यार्थी।

काव्य-शब्दों का तात्पर्य है) । औौर, विभाव आादि के संसर्ग से युक्त स्थायीभाव को ही उस आनन्दानुमृति का निभित्त माना जाता है। इस प्रकार काव्य-वाक्यों की जो अर्थ-कथन की शक्ति (तात्पर्य शक्ति) है, वह भिन्न-भिन्न रसों के द्वारा अपनी ओर झाकृष्ट करली जाती है तथा अपने भिन्न-भिन्न धर्थ के लिये अपेक्षित जो विभाव आदि है उनके प्रतिपादन के द्वारा उस (तात्पर्य शक्ति) की परिसमाप्ति अपने (भिन्न-भिन्न रस के) स्वरूप में कर ली जाती है (अर्थात् काव्य के वाक्यों की तात्प्यं-शक्ति भिन्न-भिन्न रस के प्रतिपादन में विधान्त हुआ करती है)। इस प्रक्रिया में विभाव छादि तो पवार्थों (पद के धर्थों) के स्थान में हैं औौर रति झादि भाव वाक्यार्थ है। यह ऐसा काव्य-वाक्य ही है जिसके ये (विभाव ादि) पदार्थ हैं तथा (रसि सादि स्थायीभाव) बाबयाथं हैं। टिप्पणी-(१) कार्यपरम्-कार्य का अर्थ है-भाव, भावना तथा अपूर्व। वैयाकरख, भाट्टमीमांसक तथा प्रभाकरमतानुयायी मीमांसक तीनों के अनुसार ही वाक्य कार्यपरक है। किन्तु प्रथम मत में कार्य=किया (भाव), वाक्य में करिया की प्रधानता होती है। द्वितीय मत में कार्य=मुख्य विषेय (भावना) में ही तात्पर्य होता है, वही वाक्य का अर्थ होता है। तृतीय मत में कार्य=सपूर्व, इसमें वाक्य का तात्पर्य होता है। यहाँ भाट्टमीमांसक के मत से कार्य=मुख्य प्रयोजव (भावना) को वाक्यार्थ कहा गया है (भावनव बाक्यार्थः तन्त्रवा० पृ० ४४५)। मि०, प्रकरण- पञ्चिका, पृ० ३७६ टि०। (२) अतत्परत्वे - कार्यपरक न होने पर। काव्यशब्दानां प्रवृत्तिविषययोः प्रतिपाद्यप्रतिपादकयो: इत्यादि सन्वय है। काव्ये स्थायी वा रसो वा प्रतिपादो विभावादिश्च प्रतिपादक: (प्रभा) । स्वानन्दोद्भूतिरेव०-अपवे आनन्द की अनुभूति कराना ही काव्य के शब्दों का प्रयोजन है। यही काव्य वाक्य का कार्य है, जो तात्पर्य का विषय है तथा वाक्यार्थ ही है। यह आ्नन्दानुभूति ही रस है। विभाव आदि से अन्वित स्थायी भाव उसका निमित्त है। अतः विभाव आदि पदार्थ के समान हैं और विभाव आदि से संसृष्ट स्थायी भाव वाक्यार्थ है। स्वानन्द=आत्मानन्द, द्र० आगे (४.४३) स्वादः काव्यार्थसम्भेदादात्मानन्वसमुद्भवः।

Page 385

३३६ दशरूपकम्

न चैवं सति गीतादिवत्सुखजनकत्वेऽपि वाच्यवाचकभावानुपयोग: विशिष्ट- विभावादिसामग्रीविदुषामेव तवाविधरत्यादिभावनावतामेव स्वानन्दोद्भूतेः। तदने- नातिप्रस ङ्गोऽपि निरस्तः । (प्रश्न) यदि काव्य आ्र्प्रानन्दोद्भूति का निमित्त है (एवं सति) तब तो वह भी गीत आदि के समान (अथ जाने विना ही) आनन्द का जनक हो सकता है, फिर उसमें वाच्य-वाचक-भाव का कोई उपयोग न होगा। (उत्तर) यह कथन ठीक नहीं; क्योंकि जो व्यक्ति विशेष प्रकार की विभाव आदि सामग्री को जानते हैं तथा उस प्रकार की रति आदि की भावना से युक्त हैं, उन्हें ही काव्य के आनन्द की अनुभूति हुआ करती है। इस प्रकार इस कथन से (अरसिक जनों को भी काव्य से वाच्य-वाचक-भाव के द्वारा रसास्वाद होने लगेगा, इस) अतिप्रसङ्ग का भी निराकरण हो गया।

टिप्परी-(१) यहाँ रसास्वाद के दो निमित्त बतलाये गये हैं-(i) किसी रस के विभाव आदि का ज्ञान और (ii) सहृदय के चित्त में रसास्वादन योग्य रति आदि की भावना होना। भाव यह है कि विभाव आदि का ज्ञान काव्य से होता है, काव्य के शब्द ही विभाव आदि को बतलाते हैं, अतः वे वाचक हैं और विभाव आदि उनके वाच्य हैं। इसलिए रसानुभूति में वाच्य-वाचक-भाव का उपयोग है। जिस प्रकार किसी शास्त्रीय सगीत में राग, लय आदि से ही सामाजिकों को आनन्द की प्राप्ति हो जाती है, वहाँ वाच्य-वाचक-भाव का कोई उपयोग नहीं होता, उस प्रकार की बात काव्य में नहीं है। दूसरी बात यह है कि शृङ्गार आदि रस का आस्वादन उन्हीं को होता है जिनके हृदय में उस प्रकार की रति आदि भावना होती है। इसलिये जो केवल काव्य का अथं समझते हैं किसी रसास्वादन योग्य रति आदि की भावना से युक्त नहीं है उन्हें काव्य का रसास्वादन नहीं हो सता (मि० न जायते तदास्वादो विना रत्यादिवासनाम्, सा० द० ३.८)। इस प्रकार दोनों समुदित रूप से (मिलकर)रस स्वादन के कारण हैं। (२)विशिष्टविभावादिसामग्री- प्रत्येक रस में नियत विभाव आदि सामग्री। तथाविध०-रस के आस्वादन के योग्य; भाव यह है कि यदि किसी के चित्त में रति आदि को भावना दबे रूप में है तो उसे रसास्वादन नहीं हो सकता। यदि वह भावना रसास्वादन के योग्य होगी तभी रसास्वादन हो सकेगा (मि० स्थाय्यनुमानेऽम्यासपाटववताम्, का० प्र० वृत्ति ४.२८)। अ्र्प्रनेन-इस नियम से कि उस प्रकार की रति आदि भावना से युक्त जनों को ही काव्य से आनन्द की अनुभूति होती है। अतिप्रसङ्ग-अनिष्ट की प्राप्ति; अरसिक जनों को रसास्वादन होता है यह मानना अभीष्ट नहीं। किन्तु यदि केवल वाच्य-वाचक-भाव के द्वारा ही रसास्वादन होगा तो उन्हें भी होने लगेगा, यही अतिप्रसङ्ग है।

Page 386

चतुर्थ: प्रकाश: ३३७

ईदशि च वाक्यार्थनिरूपणे परिकल्पिताभिधादिशक्तिवशोनैव समस्तवाक्यार्था- वगते: शक्त्यन्तरपरिकल्पन प्रयासः, यथावोचाम काव्यनिर्रये- 'तात्पर्यानतिरेकाच्च व्यञ्जनीयस्य न ध्वनिः । किमुक्तं स्यादश्रुतार्थतात्पर्येऽन्योक्तिरूपिणि ॥१॥ विषं भक्षय पूर्वो यश्चैवं परसुतादिषु। प्रसज्यते प्रधानत्वाद् ध्ननित्वं केन वार्यते ॥२॥ इस प्रकार के वाक्यार्थ का निर्राय हो जाने पर स्वोकृत (परिकस्पित) अभिधा (तात्पर्य, लक्षणा) शक्ति के द्वारा ही सब प्रकार के वाक्यार्थ का बोध हो जाता है। इसलिये अन्य शक्ति (व्यञ्जना) की कल्पना केवल (व्यर्थ का) प्रयास ही है। जैसा कि हमने काव्यनिर्णय नामक ग्रन्थ में बतलाया है- व्यङ्गय कहा जाने वाला अर्थ (व्यञ्जनीय) तात्पर्य अर्थ से मिन्न नहीं होता। अतः कोई व्यञ्जना नामक वृत्ति (ध्वनि) नहीं होती (न ही ध्वनि नामक काव्य ही होता है)। टिप्पणी-(१) ईदृशि-सभी वाक्य कार्यपरक होते हैं, कार्य (प्रवृत्ति निवृत्ति रूप प्रयोजन) का बोध तात्पर्य शक्ति से ही हो जाया करता है और तात्पर्य शक्ति द्वारा बोध्य अर्थ वाक्यार्थ ही होता है। रस (आनन्दोद्भूति) भी काव्य-वाक्यों का कार्य है, उसका बोध तात्पर्य शक्ति से ही हो सकता है अतः वह वाक्यार्थ ही है- इस प्रकार के वाक्यार्थ का निरूपण करने पर। परिकल्पित-सकलत्रसिद्ध (प्रभा) सब के द्वारा जानी गई। अभिधादि-अभिधा, तात्पर्य तथा लक्षरा। समस्तवाक्या- र्थागते :- सब प्रकार के वाक्यार्थ का बोध हो जाने से; अर्थात् रस आदि भी वाक्यार्थ हैं और उनका बोध भी मानी गई शक्तियों के आधार पर ही हो सकता है। (२) काव्यनिर्एय०-यह धनिक का काव्य-शास्त्र-सम्बन्धी ग्रन्थ था, अब अनुप- लब्ध है। (३) तात्पर्या०- इस पंक्ति में धनिक ने अपने मत की स्थापना की है। व्यङ्गय कहे जाने वाले अरथ का तात्पर्यार्थ में ही अन्तर्भाव हो जाता है अतः उसके बोध के लिये व्यञ्जना वृत्ति को मानने की आवश्यकता नहीं। ध्वनि :- व्यञ्जना, अथवा वह काव्य जिसमें व्यङ्गय अर्थ की प्रधानता होती है। (धनिक की स्थापना में ध्वनिवादी की शङ्का)-यदि ध्वनि (व्यञ्जना) नहीं होती तो जहाँ प्रयुक्त (श्रत) शब्दों के (वाच्य) अर्थ में तात्पर्य नहीं हो सकता, उस अन्योक्ति रूप वाक्य के विषय में आप क्या कहेंगे ? [जँसे 'कस्तवं भोः, ...... मां विद्धि शाखोटकम्' ऊपर उदा० २१६, इत्यादि] ॥१॥ इसी प्रकार जब पिता आदि एक व्यक्ति (पूर्वः) दूसरे व्यक्ति (पर) पुत्र आदि से कहता है कि 'विष खालो' वहाँ (इसके घर खाना विष खाने से भी बुरा है, इत्यादि) प्रतीयमान अर्थ की प्रधानता के कारण वह (वाक्य) ध्वनि होगा, उसे कौन रोक सकता है ॥२।। इस प्रकार (ध्वनि औौर तात्पर्यार्य का स्पष्ट भेद है) यदि वाक्य अपने अर्थ में

Page 387

३३८ शरूपकम्

ध्वनिश्चेत्स्वार्थविश्रान्तं वाक्यमर्थान्तराश्रयम्। तत्परत्वं त्वविश्वान्तौ, कीच तन्न विश्रान्त्यसम्भवात् ।।३।। एतावत्येव विश्रान्तिस्तात्पर्यस्येति किंकृतम्। यावत्कार्यप्रसारित्वात्तात्पर्यं न तुलाधृतम् ।।४।। भ्रम धार्मिक विश्रब्धमिति भ्रमिकृतास्पदम् । निर्व्यावृत्ति कथ वाक्यं निषेधमुपसपति ।।४।। परिसमाप्त (विश्रान्त) होकर भी अन्य अर्थ का बोधक होता है तो वह द्वितीय धर्थ ध्यनि (व्यङ्गघ) होता है; किन्तु यदि वाक्म घपने धर्थ में विश्वाम्त नहीं होठा और (अपनी विशान्ति के लिये) किसी गन्य घर्थं का भी बोध करा देता ह तो वह अन्य अथं तात्पर्यार्थ होता है। टिप्पणी-धनिक की स्थापना के विरोध में ध्वनिवादी की युक्तियाँ इस प्रकार हैं :- (i, तात्पर्य का झर्थ है वक्ता की इच्छा। तात्पर्य किसी चेतन का होता है, जड़ का नहीं। अतः जहाँ जड़ वस्तु को सम्बोधित करके अन्योष्कि रूप वाक्य कहा जाता है और उससे किसी अन्य अर्थ की प्रतीति होती है वहां प्रतीयमान अर्थं को तात्पर्यार्थ नहीं कहा जा सकता; जैसे ऊपर उबा० २१६ में पाखोटक वृक्ष के प्रति जो संवाद है, उसमें 'विर्वेद' की प्रतीति हो रही है, वह तास्पयाणं जैसे होगी ? (ii) 'विषं भुङ्कक्ष्व' इत्यादि (ऊपर पृ०) में प्रतीयमान (व्यङष) धर्थ है- 'इसके घर भोजन करना विष खाने से भी बुरा है' घौर, यही अर्थ प्रधान है। जहाँ व्यङ्गय धर्थ की प्रधानता होती है वह काव्य ध्वनि होता है। पह व्यङ्गय धथं तात्पर्यार्थ हो नहीं सकता, यह ऊपर कहा जा चुका है। (iii) ध्वनि और तात्पर्यार्थ में स्पष्ट भेद भी है (द्र० अनुवाद)। अतः ध्वनि का तात्पर्यार्थ में अन्तर्भाव नहीं हो सकता। [ध्यनिवादी की शङ्का का समाधान, तन्न इत्यादि] -- यह कथन ठीक नहीं; क्योंकि वाक्य के अर्थ की (तब तक) विश्रान्ति नहीं हो सकती (जब तक कि समस्त तात्पर्य कर बोध न हो जाय) ।३। केवल इतने (नियत) अर्थ में ही तात्पर्य की विशरान्ति हो जाती है, इसका नियम किसने बना दिया ? वस्तुतः कार्य (प्रवृत्ति निवृत्ति रुप प्रयोजन) के बोध पर्यन्त तात्पर्य शक्ति का प्रसार होता है, वह तराजू पर तौला नहीं गया (कि यहीं तक तात्पर्य का विषय है आगे नहीं) ॥।४।। और, (ध्वनिवादी का जो यह प्रश्न है कि) 'हे धार्मिक निश्चिन्त होकर भ्रमण करो' यहाँ (शब्दों द्वारा) भ्रम क्रिया का ही प्रतिपादन किया गया है, इस वाक्य में निषेधवाचक कोई पद नहीं (निर्व्यावृत्ति) है, फिर यह वाक्य भ्रमण के निषेध अर्थ में कैसे जा सकता है ? (ध्वनिवादी के मत में तो निषेध अर्थ व्यञ्जना द्वारा प्रतीत हो जाता है) ॥।५।।

Page 388

चतुर्थ। प्रकाशः ३३६

प्रतिपाद्यस्य विश्रान्तिरपेक्षापूरणाद्यदि। वक्तुविवक्षिताप्राप्तेरविश्रान्तिन वा कथम् ॥६।। पौरुषेयस्य वाक्यस्य विवक्षापरतन्त्रता । वक्त्रभिप्रेततात्पर्य मतः काव्यस्य युज्यते ।।७॥' इति। (इस पर धनिक का उत्तर है) यदि 'भ्रम धार्मिक' इत्याधि में (धोता की) आकाक्षा पूर्ण हो जाने के कारण (ध्वनिवादी के अनुसार) तात्पयं (प्रतिपाद्य) भ्ररथ की परिसमाप्ति (विश्रान्ति) मानी जातीहै तो बक्ता के विषक्षित अरर्थं की प्ञाप्ति न होने के कारण यहां तात्पर्य की प्रविभान्ति क्यों नहीं भानी जा सबसी? ॥।६। किञ्च, मनुष्यों के सभी वाक्य विवक्षा के प्रधीन होते हैं( कुछ कहने की इच्छा से ही मनुष्य वाक्य का प्रयोग करता है)। इसलिये वक्ता के अभिप्रत धर्थ में ही वाक्य का तात्पर्य मानना उचित है ।।७।। टिप्पणी-(१) धनिक का आशय यह है-(i) विवश्षित गर्थ का पुर्णतया बोध कराये बिना तात्पर्यार्थं की विश्रान्ति नहीं होती। औौर, दाक्य के द्वारा जो कुछ भी प्रतिपादन किया जाता है वह उसके तात्पर्यार्थं के हो अन्वयत है। यह वहीं कहा जा सकता कि वाक्य का तात्पय यहीं तक है, आगे नहीं (तध् तुलाधृतस)। (ii) 'भ्रम धार्मिक' इत्यादि में जो ध्वनिवादी ने कहा है कि श्रोता की आ्कांक्षा विधि पथं (निश्चिन्त होकर भ्रमण करो) में पूणं हो जाती है, उसके पबषात् होबे वाला जो निषेध अर्थ (यहाँ कभी न आना) है, वह व्यङ्गय है। यह कथन भी ठीक नहीं; क्योंकि वक्ता का विवक्षित अर्थ तो पूणं नहीं होता। वहाँ वक्ता है एक कुलटा स्त्री, उसका विवक्षित अर्थ है-तुम यहाँ कभी न आना। इस निषेध धर्थ की प्रतीति के विना वक्ता के विवक्षित पर्थ की परिसमाप्ति नहीं होती। अतः यह निषेध अर्थं तात्पर्यार्थ ही है। तात्पर्य अर्थ की विश्रान्ति न होने पर जो अन्य अर्थ जाना जाता है, वह सात्पर्यार्थं (तथा वाक्यार्थ) ही होता है, यह ध्वनिवादी ने भी स्वीकार किया है। इस प्रकार यहाँ भ्रमण-निषेध तात्पर्यार्थ ही होगा, व्यङ्गय नहीं। (iii) वस्तुतः वक्ता का विवक्षित अरथ ही तात्पर्यार्थ होता है, श्रोता की आ्र्रकांक्षा के पूर्णं हो जाने से तात्पर्य परिसमाप्त नहीं हो जाता। तथ्य यह है कि वक्ता को जब कुछ कहने की इच्छा (विवक्षा) होती है तभी वह वाक्य का प्रयोग करता है। अतः मनुष्यों के वाक्य विवक्षा के अधीन होते हैं और जो विवक्षित अर्थ होता है, उसी में वाक्य का तात्पर्य होता है। काव्य-वाक्यों के विषय में भी यही बात है। काव्य का तात्पर्य भी वक्ता (कवि) के अभिप्रेत अर्थ में ही होता है। इस प्रकार रस आदि तात्पर्यार्थ ही हैं, व्यङ्गय नहीं। (२) भ्रमिकृतास्पदम=भ्रमराप्रतिपादकम् (प्रभा)। निर्व्यावृत्ति = भ्रमराव्यावृत्ति-रहितम् = भ्रमणनिषेधबोधकपदरहितम् (प्रभा)। अपेक्षापूरणात = वक्ता की आकांक्षा पूर्स हो जाने के कारण।

Page 389

३४० दशरूपकम्

अतो न रसादीनां काव्येन सह व्यङ्गयव्यञ्जकभावः । कि तहि भाव्यभावक- सम्बन्ध: ? काव्यं हि भावक, भाव्या रसादयः । ते हि स्वतो भवन्त एव भावकेषु विशिष्टविभावादिमता काव्येन भाव्यन्ते। न चान्यत्र शब्दान्तरेषु भाव्यभावकलक्षणसम्बन्धाभावात् काव्यशब्देष्वपि तथा भाव्यमिति वाच्यम्-भावनाक्रियावादिभिस्तथाङ्गीकृतत्वात्। किञ्च मा चान्यत्र तथास्तु अन्वयव्यतिरेकाभ्यामिह तथाऽवगमात्। तदुक्तम्- 'भावाभिनयसम्बन्धान्भावयन्ति रसानिमान्। यस्मात्तस्मादमी भावा विज्ञेया नाट्ययोक्तृभिः ॥' इति। धनिक के मत का उपसहार इस प्रकार रस आदि का काव्य के साथ व्यङ्गय-व्यञ्जक-भाव सम्बन्ध नहींहै। फिर इनमें क्या सम्बन्ध है? भाव्य-भावक सम्बन्ध है। काव्य (रस आदि का) भावक (भावना या आ्रपरास्वादन कराने वाला) है और रस आदि भाव्य (जिनकी भावना या आस्वादन कराया जाये) हैं। वे (रति आदि भाव) सहृदयों के चित्त में स्वतः (स्वभावतः) विद्यमान रहते हैं। भिन्न-भिन्न रसों के विशेष प्रकार के विभाव आदि का वर्शन करने वाले काव्य के द्वारा उनकी भावना करा दी जाती है। टिप्परी- (१) अत इत्यादि में धनिक ने अपने इस मत का उपसंहार किया है कि रस आदि तथा काव्य में भाव्य-भावक सम्बन्ध है। (२)स्वतो भवन्त := सहृदयों के चित्त में स्वभावतः रहते हुए। इससे विदित होता है कि अभिनवगुप्त से पहिले ही धनिक ने यह स्पष्ट कर दिया था कि सहृदयों के चित्त में रति आदि भाव विद्यमान रहा करते हैं। काव्यों के द्वारा भावित होकर उन्हीं का आस्वादन किया जाया करता है। (३) भावकेषु-सहृदयों में, सहृदयों के चित्त में। धनिक ने काव्य के लिये भी भावक शब्द का प्रयोग किया है और सहृदय को भी भावक कहा है। काव्य तो भावना (चर्वणा, आस्वादन) कराने वाला है अतः भावक है; किन्तु सहृदय जन भावना करने वाले हैं इसलिये भावक कहलाते हैं। प्रश्न हो सकता है कि दूसरे स्थलों पर (व्याकरण आदि के) अन्य शब्दों में तो भाव्य-भावक-रूप सम्बन्ध नहीं होता अतः काव्य के शब्दों में भी वह सम्बन्ध नहीं माना जा सकता। किन्तु यह ठीक नहीं; क्योंकि भावना के रूप में क्रिया को मानने वालों (मीमांसकों) ने अन्यत्र भी (शब्दों में) भाव्य-भावक सम्बन्ध स्वीकार किया है। दूसरी बात यह भी है कि चाहे अन्यत्र भाव्य-भावक सम्बन्ध न भी हो तथापि यहाँ (काव्य में) अन्वय-व्यतिरेक के द्वारा यह सम्बन्ध माना जाता है। जैसा कि कहा गया है :- (नाव्यशास्त्र ७.३) 'क्योंकि ये (चिन्ता आदि) सामाजिकों को (इमान्) भाव तथा अभिनय (अथवा भाव के अभिनय) से सम्बन्ध रखने वाले रसों की भावना कराते हैं इसलिये नाट्य-प्रयोक्ता जन इन्हें भाव मानते हैं'।

Page 390

चतुर्थ: प्रकाश: ३४१

कथं पुनरगृहीतसम्बन्वेभ्यः पदेभ्यः स्थाय्यादिप्रतिपत्तिरिति चेत ? लोके तथा- विधचेप्टायुक्तस्त्रीपु सादिषु रत्याद्यविनाभावदर्शनादिहापि तथोपनिबन्धे सति रत्याद्य- विनाभूतचेष्टादिप्रतिपादकशब्दश्रवस्ादभिवेयाऽविनाभावेन लाक्षणिकी रत्यादिप्रती- तिः। यथा च काव्यार्थस्य रसभावकत्वं तथाडग्रे वक्ष्यामः । टिप्पणी (१) भावनाक्रियावादिभिस तथाङ्गीकारात - भाट्ट मीमांसक के अनुसार करिया का अर्थ है-भावना। यह भावना दो प्रकार की होती है-शाब्दी भावना तथा आर्थी भावना। शाब्दी भावना का अर्थ है किसी पुरुष को क्रिया में प्रवृत्त कराने वाला विशेष प्रकार का व्यापार, जो वक्ता का अभिप्राय रूप व्यापार होता है तथा शब्दों से लिङ् लकार आदि के द्वारा प्रकट होता है (वेद में वह शाब्दी भावना शब्दनिष्ठ ही होती है)। किसी कार्य में प्रवृत्त होकर जब कर्ता फल की इच्छा से उसके साधनों का अनुष्ठान करता है तो यह कर्ता का प्रयत्न ही आर्थी भावना है जो आख्यात (तिङ्प्रत्यय) की वाच्य होती है। इस प्रकार शाब्दी भावना = प्रवर्तना, आर्थी भावना = प्रयत्न। जैसे 'स्वर्गकामो यजेत' = स्वर्ग की कामना वाला याग से स्वर्ग को भावित करे, इस वाक्य के द्वारा याग में प्रवृत्त हुआ पुरुष याग से स्वगं को भावित करता है। यहाँ याग करिया भावक है और स्वर्ग भाव्य है। इसी प्रकार काव्य में भी काव्य भावक है और रस आदि भाव्य हैं। (२) अन्वयव्यतिरेकाभ्याम् - जहाँ काव्यरस की चर्वणा होती है वहाँ काव्य-शब्द अवश्य हुआ करते हैं (अन्वय); यदि काव्य के शब्द नहीं होते तो काव्य-रस की चर्वणा भी नहीं होती ( व्यतिरेक)। इस अन्वय-व्यतिरेक से काव्य के शब्दों (- काव्य) को रस आदि का भावक माना जाता है और रस आदि को काव्य का भाव्य। (३) भावाभिनयसम्बन्धान्-नाट्यशास्त्र (७.३) में 'नानाभिनयसम्बद्धान्' पाठ है। यद्यपि ना० शा० के इस श्लोक में (चिन्ता आदि) भावों को रस का भावक कहा गया है तथापि भावों का बोध कराने वाले काव्य के शब्द भी रस के भावक होते हैं, यह समझना चाहिये। इस प्रकार काव्य के शब्द तथा अर्थ दोनों मिलकर रस आदि के भावक होते हैं। (प्रश्न) [जिन शब्दों का जिन अरथों के साथ सम्बन्ध-ग्रहण (सङ्कत-ग्रह) होता है उन शब्दों से उन्हीं अरथों का बोध हुआ करता है, यह नियम है। किन्तु रति आदि के साथ काव्य के शब्दों का सम्बन्ध-ग्रहण नहीं किया गया है फिर उन शब्दों से (रति आदि) स्थायी भावों का बोध कैसे हो सकता है ? (उत्तर) लोक में रति आदि से उत्पन्न होने वाली (तथाविध) चेष्टाओं से युक्त स्त्री-पुरुषों में (उन चेष्टाओं का) रति आदि स्थायी भाव के साथ नियत सम्बन्ध (=अविनाभाव) देखा जाता है। जब काव्य में भी उसी प्रकार का वर्णन होता है तो रति आदि भाव के बिना न रह सकने वाली जो चेष्टाएँ हैं उनके वाचक शब्द सुने जाते हैं और उन शब्दों के वाच्य अर्थ (चेष्टाओं) के साथ नियत रूप से रहने के कारण लक्षणा द्वारा रति आदि भाव की प्रतीति हो जाती है। काव्यार्थ रस की भावता कैसे कराता है, यह झागे बतलायेंगे।

Page 391

३४२ दशरूपकम्

(४७) रस: स एव स्वाद्यतवाद्रसिकस्यैव वर्तनात्। नानुकार्यस्य वृत्तत्वात्काव्यस्यातत्परत्वतः ।३८ ।। द्रष्टुः प्रतीतिव्रीडेर्ष्यारागद्वेषप्रसङ्गतः। लौकिकस्य स्वरमणीसंयुक्तस्येव दर्शनात्॥ ३६॥ टिप्पणी-तथाविधचेष्टा०-रति आदि भाव से उत्पन्न होने वाली चेष्टा अनुभाव इत्यादि। रत्याद्यविनाभावदर्शनात०-इत्यादि में मीमासक की प्रक्रिया के अनुसार यह दिखलाया गया है कि काव्य के शब्दों से लक्षखा द्वारा रति आदि भावों की प्रतीति होती है। कुमारिल भट्ट के अनुसार 'अभिधेयाविनाभूतप्रतीतिर्ल- क्षणोच्यते' (मि० का० प्र० २.१२) यह लक्षणा का स्वरूप है। प्रथमतः रति आदि से उत्पन्न होने वाली चेष्टाओं से युक्त स्त्री-पुरुषों में इस प्रकार के अविनाभाव सम्बन्ध (व्याप्ति) का ग्रहण किया जाता हैं कि ये चेष्टाएँ रति आदि भाव के विना नहीं हुआ करतीं (अथवा जहाँ-जहां उस प्रकार की चेष्टाए होती हैं वहाँ रति आदि भाव अवश्य होता है) । फिर काव्य में रति आदि की अविनाभावी चेष्टाओं के वाचक शब्द सुनकर उनका अर्थ समझ लिया जाता है और उन अथों (चेष्टाओं) के साथ रति आदि का अविनाभाव सम्बन्ध है अतः रति आदि की प्रतीति हो जाती है [रत्याद्यविनाभूतचेष्टादि०, इस कथन से व्याति-स्मरण और पक्ष-धर्मता दिखलाई गई है, काव्यप्रकाश २.१२ के अनुसार कुमारिल के वचन में अविनाभाव का अर्थ व्याप्ति नहीं है]। लाक्षशिकी-काव्य के शब्वों द्वारा अभिधा से चेष्टा आदि (अनुभाव इत्याषि) का बोध होता है, चेष्टा आदि अभिवेय हैं। उस चेष्टा आदि के साथ नियत रूप से रहने वाले रति आदि भाव का बोध लक्षणा द्वारा होता है वह प्रतीति लाक्षणिकी (लक्षणाजन्य) है। इस प्रकार रस आदि तथा काब्ब का भाव्य-भावक सम्बन्ध है, यह बतलाया गया। रस-प्रक्रिया आदि के विषय में भागे बतलाते हैं। रस का आश्रय वह (काव्यार्थ से भावित रति आदि स्थायी भाव) ही रस है; क्योंकि उसका आस्वादन किया जाता है (रस्यते स्वाद्यते इति रसः)। यह (रस) रसिक के हृदय में रहता है; क्योंकि रसिक ही (रस-प्रतीति के समय) विद्यमान होता है। अनुकार्य (राम, दुष्यन्त आदि) के हृदय में यह नहीं होता; क्योंकि वे तो अतीत काल में थे (काव्य या नाट्य के समय नहीं हैं)। और, काव्य उनके (रसास्वादन के) लिये रचा भी नहीं जाता ॥ ३८ ॥। (यदि अनुकार्य राम आदि में रस माना जाये तो) जिस प्रकार अपनी रमणी से युक्त किसी लौकिक पुरुष को देखकर हुआ करता है, उसी प्रकार अरभिनय के दर्शक (या काव्य के श्रोता अथवा पाठक) को (इसमें रति भाव है इस प्रकार की) प्रतीति मात्र होगी (रसास्वादन न होगा) अथवा लब्जा, ई्ष्या राग-द्वेष आदि होने लगेंगे ।। ३६ ।। टिप्पलणी- भा० प० (पृ० १५२), ना० द० (३.१६३ वृत्ति), सा० द०, अनुकार्यस्य रत्यादेरुद्बोधो न रसो भवेत (३.१८)।

Page 392

चतुर्थ: प्रकाश: ३४३

-F काव्यार्थोपप्लावितो रसिकवर्ती रत्यादि: स्थायी भावः स इति प्रतिनिरदिश्यते, स च स्वाद्यतां निर्भरानन्दसंविदात्मतामापाद्यमानो रसो रसिकवर्तीति वर्तमानत्वात्, नानुकार्यरामादिवर्ती वृत्तत्वात्तस्य । अथ शब्दोपहितरूपत्वेनावर्तमानस्यापि वर्तमानवदवभासनमिष्यत एव, तथापि तदवभासस्यास्मदादिभिरनुभूयमानत्वादसत्समतवाSडस्वादं प्रति, विभावत्वेन तु रामादे- वंर्तमानवदवभासनमिष्यत एवं। किञ्च न काव्यं रामादीनां रसोपजननाय कविभिः प्रवर्त्यते, अपि तु सहृदयानानन्दयितुम्। स च समस्तभावकस्वसंवेद् एव। ि यदि चानुकार्यस्य रामादेः शृङ्गारः स्यात्ततो नाटकादौ तद्दर्शनेन लौकिके इव नायके शृङ्गारिणि स्वकान्तासंयुक्ते दृश्यमाने शृङ्गारवानयमिति प्रेक्षकाण प्रतीतिमात्र भवेन्न रसानां स्वादः, सत्पुरुषाणां च लज्जा, इतरेषां त्वसूयानुरागाप- यहाँ ('रसः स एव' इत्यादि कारिका में) 'सः' (वह) शब्द से उस रति आदि स्थायी भाव का निर्देश किया गया है, जो रसिकों के हुवय में रहता है और काव्यार्थं (विभाव आदि) के द्वारा उद्भावित हुआ करता है। वह रति आ्रदि भाव ही भास्वावन का विषय होकर अर्थात पूरां आनन्दावुस्नति के रूप में आकर रख कहलाता है। वह (रस) रसिक के हृश्य में ही रहता है; क्योंकि (रस-प्रतीति के समय) रसिक ही विद्यमान होता है। अनुकार्य (राम आदि) में वह नहीं रहता; क्योंकि (रस-प्रतीति के समय) वे तो हो चुके होते हैं। घद्यपि यह ठीक है कि अनुकार्य राम आदि विद्यमान न होकर भी विद्यमान के समान प्रतीत हुआ करते हैं, क्योंकि (काव्य के) शब्दों द्वारा उनका रूप उपस्थित हो जाता है, तथापि हम लोगों (सामाजिकों) को ही उबका बिद्यमान के समान साभास होता है, वन्तुतः रसास्वावन के लिये तो वे अविश्यमान ही होते हैं। हाँ, विभाव रूप में तो राम आदि की विद्यमान के समान प्रतीति प्रधीष्ट ही है। घुसरी बात यह भी है कि कवियों ने राम आादि को रसास्वदन कराने के लिये काव्य-रचना नहीं की है अपि तु सहबय जनों को धानन्दित करने के लिये ही। और, वह रस समस्त सहृदय जनों की अपनी अनुभूति का विषय हुआ करता है। किञच, यदि यह माना जाये कि अनुकार्य राम शादि को शृङ्गार (रति भाव) आदि की प्रतीति होती है तो जिस प्रकार किसी लौकिक व्यक्ति को अपनी प्रिया से युक्त देखकर केवल यह शृङ्गार-युक्त है' इस प्रकार की प्रतीति हुआा करती है, उसी प्रकार नाटक के दर्शकों (अथवा काव्य के पाठफों) को भी 'यह भृद्धारी है' यही प्रतीति हुआ करेगी, रस का आस्वादन न होगा। श्रौर, (राम आदि रति-भाव से युक्त हैं) इस प्रकार की प्रतीति से सत्पुरुषों को लच्ना होगी तजा सन्य ननों को (स्वभाव के अनुसार) ईष्मा, राग एवं (नायिका कै) अपहरण की इच्छा आदि होने लगेंगे।

Page 393

३४४ दशरूपकम्

हारेच्छादयः प्रसज्येरन् । एवं च सति रसादीनां व्यङ्गयत्वमपास्तम्। अन्यतो लब्घ- सत्ताकं वस्त्वत्येनापि व्यज्यते, प्रदीपेनेव घटादि, न तु तदानीमेवाभिव्यञ्जकत्वाभि- मतैरापाद्यस्वभावम्। भाव्यन्ते च विभावादिभिः प्रेक्षकेषु रसा इत्यावेदितमेव। और, ऐसा सिद्ध हो जाने पर (कि काव्य के द्वारा रसिक के हृदय में भावित रति आदि भाव ही रस हैं) 'रस आदि व्यङ्गय होते हैं' इस मत का भी निराकरण हो गया। जो वस्तु पहिले किसी अन्य कारण से उत्पन्न हो चुकती है (लब्धसत्ताकम्-लब्घा सत्ता येन तव) वह किसी दूसरे निमित्त के द्वारा व्यङ्गच हुआ करती है, जैसे घट आदि (जो पहिले से ही विद्यमान होता है) दीपक के द्वारा व्यङ्ग्य (व्यञ्जनीय) हुआ करता है। दूसरी ओर वह वस्तु तो व्यङ्गय नहीं कहलाती जिसका स्वरूप (स्वभाव) अभिव्यञ्जक रूप में माने गये कारणों के द्वारा उसी (व्यञ्जना के) समय उत्पन्न किया जाता है। और, (रस के स्थल में यही बात है क्योंकि) विभाव आदि के द्वारा सामाजिकों के चित्त में रस की भावना कराई जाती है, यह पहिले ही बतलाया जा चुका है। टिप्पणी-(१) अभिनय से सम्बन्ध रखने वाले तीन प्रकार के व्यक्ति हो सकते हैं :- एक अनुकार्य (राम, दुष्यन्त आदि, जिनका अभिनेता लोग अनुकर करते हैं), दूसरे अनुकर्ता (नट, नर्तक) और तीसरे सामाजिक (दर्शक, श्रोता आदि)। इनमें से रस का आस्वादन किसे होता है ? इस विषय में साहित्य शास्त्र के ग्रन्थों में विचार किया गया हैं। यह भी ध्यान रखने योग्य है कि इस सन्दर्भ में रस का अर्थ है नाट्य का काव्य से भावित आनन्द। इस रस का आस्वादन सहृदय सामाजिक (रसिक) को हुआ करता है, इसमें प्रायः सभी एकमत हैं। वस्तुतः नाट्य की योजना या काव्य की रचना दर्शक या पाठक (श्रोता) के रसास्वादन के लिये ही की जाती है। वही अभिनय आदि के समय विद्यमान होता है अतः उसको रस का आस्वादन होता है। अनुकार्य राम आदि को इस रस का आस्वादन नहीं होता। क्यों? इसके लिये दशरूपक में तीन हेतु प्रस्तुत किये गये हैं :- (i) अनुकार्यस्य वृत्तत्वात्, (ii) काव्यस्यातत्परत्वतः, (iii) द्रष्टुः ..... दर्शनात् (द्र० अवलोक टीका तथा अनुवाद)। हाँ,दशरूपक के अनुसार नट(अभिनेता)को भी रस का आस्वादन हो सकता है, यदि वह काव्यार्थ की भावना करता है। जैसा कि सा० द० (३,१६) में बतलाया गया है उस समय नट भी सहृदय (रसिक) की श्रेणी में ही आ जाता है। अतः रसिक को ही रस का आस्वादन होता है ( रसिकस्यैव) यह निर्विवाद है। (२) काव्यार्थोपप्लावित :- काव्यार्थ के द्वारा भावित। शब्दोपहित- रूपत्वेन-द्र० ऊपर ४.२, अवलोक टीका तथा टिप्पणी। आपाद्यस्वभावम् =लभ्य- सत्ताकम् (प्रभा), वह वस्तु जो तथाकथित अभिव्यञ्जकों के द्वारा अपना रूप प्राप्त करती है, अर्थात् जो उनसे अभिव्यक्त नहीं होती अपि तु उत्पन्न होती है। भाव्यन्ते च०-भाव यह है कि विभाव आदि के संयोग से रसिक के चित्त में स्थित रति आदि स्थायी भाव आस्वादन के योग्य हो जाता है, वही रस कहलाता है। ऐसा नहीं होता कि रस नामक वस्तु पहिले से रसिक के चित्त में विद्यमान होती है और विभाव आदि के द्वारा उसकी अभिव्यक्ति हुआ करती है। इसलिये रस को व्यङ्गय नहीं कहा जा सकता।

Page 394

चतुर्थः प्रकाश ३४५

ननु च सामाजिकाश्रयेषु रसेषु को विभाव: कथं च सीतादीनां देवीनां विभा- वत्वेनाऽविरोध: ? उच्यते- (४८) घीरोदात्ताद्यवस्थानां रामादि: प्रतिपादकः । विभावयति रत्यादीन्स्वदन्ते रसिकस्य ते ॥ ४० ॥ नहि कवयो योगिन इव ध्यानचक्षुषा ध्यात्वा प्रातिस्विकीं रामादीनामवस्था- मितिहासवदुपनिबध्नन्ति, कि तहिं ? सर्वलोकसाधारणा स्वोत्प्रेक्षाकृतसन्निधी: धीरो- दात्ताद्यवस्था: कवचिदाश्रयमात्रदायिनीः (वि) दधति। (४६) ता एव च परित्यक्तविशेषा रसहेतवः। तत्र सीतादिशब्दा: परित्यक्तजनकतनयादिविशेषा: स्त्रीमात्रवाचिनः किमिवा- निष्ट कुयु: ? (प्रश्न) सामाजिकों में रहने वाले रसों का विभाव क्या होता है ? और, सीता आदि (पूज्य) देवियों को (सामाजिकों के रतिभाव का) आलम्बन विभाव मानने में दोष (विरोध) क्यों नहीं होता ? इस पर कहा जाता है :- (उत्तर) (नाटक आदि में अरभिनीत) राम इत्यादि धीरोदात्त आदि अव- स्थाओं को दिखलाने वाले होते हैं। वे रति आदि भावों को (सामाजिक के चित्त में) भावित करते हैं और उन रति आदि भावों का (=ते) सहृदय सामाजिक के द्वारा आस्वादन किया जाता है॥ ४० ॥ भाव यह है कि कविजन योगियों के समान ध्यानचक्षु से देखकर काव्य में इतिहास आदि की भाँति राम आदि की व्यक्तिगत अवस्था का वर्णन नहीं करते। तो फिर कवि क्या करते हैं ? वे ऐसी धीरोदात्त आदि अवस्थाओं का वर्शन करते हैं (विदधति), जो सभी (धीरोदात्त आदि) जनों में साधारण होती हैं और जिनकी योजना कवि अपनी कल्पना से करता है, केवल किसी (राम आदि) व्यक्ति को उनका आश्रय बना लेता है। और, (राम आदि की) निजी विशेषताओं से रहित वे (उदात्त आदि अवस्थाएं=ताः) ही रस के निमित्त हुआ करती हैं। इस प्रकार (काव्य में) सीता आदि शब्द 'जनकपुत्री होना' इत्यादि विशेषताओं को छोड़कर केवल स्त्रीमात्र के वाचक होते हैं। फिर क्या दोष (=अनिष्ट) हो सकता है ? (अर्थात् सीता आदि पूज्य देवियाँ सामाजिकों का आलम्बन विभाव कैसे होंगी, यह वोष नहीं होता) टिप्पणी-(१) प्रश्न है कि सीता आदि देवियाँ तो पूज्य हैं वे सामाजिक की रति का आलम्बन नहीं हो सकतीं। इसका उत्तर दशरूपक (४.४०-४१) तथा टीका में दिया गया है। भाव यह है कि कविजन जो राम आदि का वर्णन करते हैं वह इतिहास आदि के समान राम आदि का व्यक्तिगत वर्णन नहीं होता अपि तु धीरो- दात्त आदि अवस्था के प्रतीक रूप में उनका वर्णन होता है। जब कवि को धीरोदात्त

Page 395

३४६ दाह देशरूपकम्

किमर्थ तह्य पादीयन्त इति चेत ? उच्यते- (५०) क्रीडतां मृन्मयैयद्वद्बालानां द्विरदादिभिः ॥४१ ॥ स्वोत्साहः स्वदते तद्वच्छ्रोतृणामर्जु नादिभिः। एतदुक्त भवति-नात्र लौकिकशृङ्गारादिवत्स्त्र्यादिविभावादीनामुपयोगः, कि तहिं प्रतिपादितप्रकारे लौकिकरसविलक्षणत्वं नाट्यरसानाम् । यदाह-'अष्टौ नाट्यरसा: स्मृताः' इति । अवस्था के किसी नायक का वर्णन करना होता है तो वह इतिहास आदि तथा लोकवृत्त से प्राप्त अनुभव के आधार पर अपनी उर्वरा कल्पना से धीरोदात्त नायक के भावों तथा कार्यों की उद्भावना कर लेता है और उसका चरित्र-चित्रण कर देता है। वह चित्रण राम व्यक्ति का नहीं अपि तु साधारणतः किसी भी धीरोदात्त नायक का हुआ करता है। राम आदि को तो उसका आश्रय बना लिया जाता है; क्योंकि किसी व्यक्तिविशेष का आश्रय लिये विना सामान्य अवस्था का तो चित्रण किया नहीं जा सकता। इसी प्रकार काव्यगत या नाट्यगत सीता आदि भी केवल प्रतीक मात्र होती हैं, वहाँ वे जनक-पुत्री सीता या राम की पत्नी सीता के रूप में नहीं होतीं। वे अपनी व्यक्तिगत विशेषताओों को छोड़कर (परित्यक्तविशेषाः) स्त्री मात्र के रूप में रस का निमित्त हुआ करती हैं तथा कोई दोष नहीं आता। (२) स्वबन्ते = आस्वादन के विषय होते हैं। प्रातिस्विकीय = किसी एक व्यक्ति से सम्बन्ध रखने वाली, व्यक्तिगत अवस्था को। सबलोकसाधारणा: =- सभी व्यक्तियों में हो सकने वाली, सभी धीरोवात्त आदि नायकों में समान रूप से रहने वाली (अवस्थाओं को)। ताः = सीताद्याः (प्रभा); वस्तुतः ऐसा प्रतीत होता है कि ताः= वौरोदात्ताजवस्थाः, क्योंकि पहिली कारिका में धीरोदात्तादि प्वस्थाओं का वर्खन है। परित्यमतबिशेषा: = साधारणीकताः सामान्यतो नायिकादिरूपेणो- पस्थिता: (प्रभा), वस्तुतः व्यक्विगत विशेषताओों से रहित केवल बीरोदात्त इत्यादि भबस्थाएं। ऐसा प्रतीत होता है कि इस प्रकार के कथन से काव्म द्वारा विभाव परादि का साधारणीकरण बतलाया गया है [मि०, विभावादिताधारणीकरणात्मना भावकत्वव्यापारेण-भट्टनायक, का० प्र० ]। (पर्न) [जब काव्य में सीता आदि व्यक्तिविश्रेष के वाचक नहीं अपि तु स्त्रीमात्र के वाचक हैं] तब सीता आदि का ग्रहण क्यों किया जाता है ? उत्तर है- श्रोता गए को अरजुन आदि (पात्रों) के द्वारा उसी प्रकार अपने उत्साह का आस्वादन होता है जिस प्रकार खेलने वाले बालकों को मिट्टी से बने हाथी इत्यादि के द्वारा (अपने उत्साह का) ॥ ४१॥ यह कहा जा सकता है कि काव्य-नाट्य के रसास्वादन में (अत्र) लौकिक रतिभाष के समान स्त्री आदि बिभावों का उपयोग नहीं होता; प्रत्युत, मसा कि महलाया जा चुका है, नाट्य-रस लौकिक रस से विलक्षण होते हैं। (भरत ने ना० शा० ६.१५ में) कहा भी है-'नास्य में आठ रस माने जाते हैं'।

Page 396

चतुर्थ: प्रकाश: ३४७

(५१) काव्यार्थ भावनास्वादो नर्तकस्य न वार्यते ॥४२ ॥ नर्तकोऽपि न लौकिकरसेन रसवान् भवति तदानी भोग्यत्वेन स्वमहिलादेर- ग्रहणात् काव्यार्थभावनया त्वस्मदादिवत्काव्यरसास्वादोऽस्यापि न वार्यते। टिप्पणी-स्वोत्साहः स्वदते-अपने उत्साह का आस्वादन होता है। जब रसिक जन काव्य में अर्जुन आदि वीरों का वर्गान सुनते हैं तो उनकी बुद्धि में उत्साहयुक्त अर्जुन आदि का रूप उपस्थित हो जाया करता है (द्र० शब्दोपहित- रूपांस्तान्', ऊपर४.२टीका) और अरजुन आदि के सम्बन्ध में वर्णित विभाव आदि से संसृष्ट उत्साह (स्थायी भाव) के साथ सामाजिक के चित्त की तन्मयता (=संभेद) हो जाती है। इस प्रकार रसिक जन अपने ही उत्साह का आस्वादन किया करते हैं। सामाजिक के रसास्वादन में उस व्यक्ति के लौकिक रूप की अपेक्षा नहीं होती, जिसके प्रात अर्जुन का उत्साह भाव है (=विभाव), अपि तु शब्दों द्वारा सामाजिक की बुद्धि में उपस्थित होने वाले विभाव ही रसास्वादन के निमित्त हो जाया करते हैं। शङ्गार में भी यही बात है। वहाँ भी लौकिक शङ्गार के समान स्त्री आदि आलम्बन विभाव इत्यादि नहीं हुआ करते, अपि तु शब्दों द्वारा सामाजिक की बुद्धि में स्थित विभाव आदि ही रसास्वादन के निमित्त हुआ करते हैं। लौकिकरसबिलक्षण त्वम -- भाव यह है कि काव्य-रस लौकिक रस से विलक्षण होते हैं इसलिये वहाँ नायिका इत्यादि की अपने रूप से उपस्थिति अपेक्षित नहीं होती। इस प्रकार मुख्य रूप से रसिक (सहृषय सामाजिक) को ही रस का आस्वादन हुआ करता है, उसको रसास्वादन कराने के लिये ही काव्य-रचना की जातौ है, किन्तु- काव्यार्थ की भावना से नर्तक (नट=अभिनेता) को भी रस का आस्वादन हो सकता है, इसका निषेव नहीं किया जा सकता॥ ४२॥ भाव यह है कि नर्तक (नट) को भी लौकिक रस (रति भाव आदि) से रसयुक्त नहीं माना जा सकता; क्योंकि उस समय वह भोग्य रूप में अपनी स्त्री आादि का ग्रहण नहीं करता। किन्तु नर्तक को भी सामाजिक के समान (अस्मदा- दिवत्-हमारे समान) काव्यार्थ की भावना से रस का आस्वादन हुआ करता है, इस बात से नकार नहीं किया जा सकता। टिप्पणी-(१) रस का आस्वादन किसे होता है ? इस विषय में विशेष द्रष्टव्य अभि०भा०(ना०शा०६.३३), भा०प्र० षष्ठ अ्रधिकार(पृ० १५२-१५४१, ना० ब. (१.१६३ वृतति), सा० द० (३'१८-)। (२) काव्यार्थभावनया-काव्यार्थ के बाब दन्मयता होने से, भाव यह है कि यदि नट रसिक है तो उसै भी रसास्वादन हो सकता है, अन्यथा नहीं।

Page 397

३४८ दशरूपकम्

कवं च काव्यात्स्वानन्दोःभूतिः किमात्मा चासाविति व्युत्पाद्यते- (५२) स्वाद: काव्यारथ सम्भेदादात्मानन्दसमुद्गवः। पटिकिका विकासविस्तरक्षोभवित्तेपैः स चतुर्विध: ॥ ४३॥ शृङ्गारवीरबीभत्सरौद्रेषु मनसः क्रमात्। हास्याद्भुतभयोत्कर्षकरुणानां त एव हि॥४४ ॥ अतस्तज्जन्यता तेषामत एवावधारणम्। काव्यार्थेन=विभावादिसंसृष्टस्थाय्यात्मकेन भावकचेतसः सम्भेदे=अन्योन्य- संवलने प्रत्यस्तमितस्वपरविभागे सति प्रबलतरस्वानन्दोद्भूतिः स्वादः। तस्य च सामा- न्यात्मकत्वेऽपि प्रतिनियत विभावादिकारणजन्येन सम्भेदेन चतुर्धा चित्तभूमयो भवन्ति। तद्यथा-शृङ्गारे विकासः, वीरे विस्तरः, बीभत्से क्षोभः, रौद्रे विक्षेप इति। तदन्येषां चतुर्णां हास्याद्भुतभयानककरुणानां स्वसामग्रीलव्धपरिपोषाणां त एव चत्वारो विकासाद्याश्चेतसः सम्भेदाः, अत एव- रस की प्रक्रिया तथा स्वरूप अब यह प्रतिपादित किया जाता है कि काव्य से किस प्रकार अपने ही त्ानन्व की अनुभूति (रसास्वादन) होती है और उस (रस) का स्वरूप क्या है। काव्यार्थ के साथ तन्मयता (संभेद = एकतानता) के द्वारा जो अपने आनन्द का अनुभव होता है, वही स्वाद (रस) कहलाता है। वह स्वाद चार प्रकार का होता है-चिन्त का विकास, विस्तार, च्ोभ और विक्षेप; जो क्रमशः शृङ्गार, वीर, बीभत्स और रौद्र में हुआ करते हैं। हास्य, श्रद्भुत, भयानक (=भयोत्कर्ष) और करुण रस में भी क्रमशः वे (विकास आदि) चारों ही होते हैं ।। ४३-४४।। इसीलिये हास्य आदि रसों को (क्रमशः) करुण आदि से उत्पन्न होने वाला (जन्य) कह दिया जाता है। और इसी हेतु से (आठ ही रस हैं, इसी प्रकार का) नियम भी किया जाता है। काव्यार्थ का अभिप्राय है-विभाव आदि से संयुक्त स्थायी भाव। उसके साथ सहृदय (भावक) के चित्त का संभेद होता है। संभेद का अर्थ है-एक दूसरे का परस्पर घुल-मिल जाना (एकात्मता, तन्मयता, एकतानता); अर्थात् (काव्य में वशिगत विभाव आदि से संयुक्त स्थायी भाव के विषय में) सहृदय का 'यह मेरा है या पराया' इस प्रकार का भेद ही नष्ट हो जाता है। ऐसा होने पर जो उत्कृष्ट आात्मानन्द की प्राप्ति होती है वही स्वाद कहलाता है। यद्यपि वह स्वाद (सभी रसों में) समान रूप से होता है तथापि प्रत्येक रस में अपने-परपने विभाव आ्रप्रादि कारणों से उत्पन्न चित्त का संभेद (तन्मयता) हुआ करता है इसलिये चित्त की चार प्रकार की अवस्थाएँ हो जाती हैं। जैसे कि शृङ्गार रस में चित्त का विकास होता है, वीर रस में विस्तार, बीभत्स में क्षोभ और रौद्र में विक्षेप। इनसे भिन्न

Page 398

चतुर्थ: प्रकाश: ३४६

शृङ्गाराद्धि भवेद्धास्यो रौद्राच्च करुणो रसः । वीराच्चवाद्भुतोत्पत्तिर्बीभत्साच्च भयानकः ।' इति हेतुहेतुमद्भाव एव सम्भेदापेक्षया दर्शितो न कार्यकारणभावाभिप्रायेख तेषां कारणान्तरजन्यत्वात्। 'शृङ्गारानुकृतिर्या तु स हास्य इति कीतितः ।' इत्यादिना विकासादिसम्भेदैकत्वस्यैव स्फुटीकरणात्। अवधारणमप्यत एव 'अष्टो' इति सम्भेदान्तराणामभावात् । जो हास्य, अद्भुत, भयानक और करुण रस हैं, जिनकी पुष्टि अपनी-अपनी कारण सामग्री (विभाव आदि) से होती है, उनमें भी विकास आदि चित्त की चार अवस्थाएँ हुआ करती हैं। इसीलिये (भरतमुनि ने ना० शा० ६.३६) कहा है- 'भृङ्गार से हास्य होता है और रौद्र से करुण रस। वीररस से अद्भुत रस की उत्पत्ति होती है और बीभत्स से भयानक की"। यहाँ चित्त-संभेद की अपेक्षा से ही शृङ्गार आदि को हेतु तथा हास्य आादि को हेतुमान् (कार्य) कहा गया है, कार्यकरणभाव के अभिप्राय से नहीं [ऐसा नहीं कि शृङ्गार आदि कारण हैं और हास्य आदि उनके कार्य]; क्योंकि वे हास्य आदि तो अन्य कारणों (अपने विभाव आदि) से उत्पन्न हुआ करते हैं (शृङ्गार आदि से नहीं)। दूसरे स्थल (ना० शा० ६.४०) पर भी 'जो शङ्गार की अनुकृति है वह हास्य कहा जाता है' इत्यादि कथन के द्वारा (शृङ्गार तथा हास्य आदि में) विकास आदि चित्त-संभेद की एकता को ही स्पष्ट रूप में बतलाया गया है। चौर, (चित्त के संभेद की चार अवस्थाएँ हैं तथा एक-एक अवस्था का दो-दो रस्ों से सम्बन्ध है) इसीलिये 'आठ ही रस हैं' इस प्रकार का अवधारण किया गया है, इन चार से भिन्न तो चित्त की तन्मयता (संभेद) की अवस्थाएँ नहीं होतीं। टिप्पणी-(१) ना० शा० (६·३६-४१)। कि (२) स्वाद=रस। काव्यार्थ=विभाव, अनुभाव, व्यभिचारी भाव से संसृष्ट स्थायी भाव; काव्य में विभाव आदि पदार्थ के समान हैं और उनसे संयुक्त हथायी भाव वाक्यार्थ के समान; अतः संयुक्त स्थायी भाव ही काव्यार्थ है (द० ऊपर ४.३७)। संभेद=अन्योन्यसंवलन=प्रत्यस्तमितस्वपरविभाग :- एक दूसरे में घुल मिल जाना, 'यह मैं हूँ यह दूसरा है इस प्रकार के भेद का समाप्त हो जाना, तन्मयता। आत्मानन्दसमुद्भवः=आत्मानन्द की उत्पत्ति या अनुभूति, भात्मा=एव (Sefi); अपने चित्त में विद्यमान रति आदि भाव के आनन्द की प्राप्ति। इस प्रकार संक्षेप में रस-प्रक्रिया यह है-काव्य के प्रतिपाद्य विभाव आदि से संयुक्त रति आदि स्थायी भाव के साथ रसिक जनों के चित्त में विद्यमान रति आदि भाव की तन्मयता (संभेद) हो जाती है और रसिक जन अपने ही रति आदि भाव का आस्वादन करने लगते हैं (विशेष द्र० आगे ४.४६)। (कारिका में) प्रतस्तज्जग्पत्ा- Em

Page 399

३५० दशरूपकम्

ननु च युक्त शृङ्गारवीरहास्यादिषु प्रमोदात्मकेषु वाक्यार्थसम्भेदात् आनन्दो- द्रव इति करुरादी सु दुःखात्मके कथमिवासी प्रादुःष्यात् ? तथाहि-तत्र करुणात्म- ककाव्यश्रवणाद् दुःखाविर्भावोऽश्रुपातादयश्च रसिकानामपि प्रादुर्भवन्ति, न चैतदान- नदात्मकत्वे सति युज्यते। सत्यमेतत्, किन्तु तादृश एवासावानन्दः सुखदुःखात्मको थथा प्रहरणादिषु सम्भोगावस्थायां कुट्टमिते स्त्रीणगाम्, अन्यश्च लौकिकातकरुणात्का- व्यकरुमाः, तथा ह्यत्रोत्तरोत्तरा रसिकानां प्रवृत्तयः । यदि च लौकिककरुणवद् दुःखात्म- कत्वमेवेबस्यात्तदा न कश्चिदत्र प्रवर्तत, ततः करुणकरसानां रामायणादिमहाप्रबन्धा- नामुच्छेद एव भवेत्। अश्रुपातादपश्चेतिवृत्तवर्णनाकणनेन, विनिपातितेषु लौकिकष- वलव्पशनादिवत्, प्रेक्षकाणां प्रादुर्भवन्सों न विरुध्यन्ते तस्माद्रसान्तरवत्करुणस्वाप्बा- नन्दात्मकत्वमेय। क्योंकि जिस प्रकार शृङ्गार में चित्त का विकास होता है उसी प्रकार हास्य में भी इसलिये हास्य को शद्गार से उत्पन्न (शृङ्गाराद हि भवेद हास्यः' इत्यादि) कह दिया जाता है। ग्रत एव=क्योंकि चित्त की विकास इश्यादि चार धुथियां होती हैं तथा प्रत्येक के साथ दो दो रसों का सम्बन्ध है, इसलिये माठ ही रस है, यह अवधारण किया गया है। तस्य० -आस्वाद के। यद्यपि वह आस्वाद सभी रखों में समान रूप से हुआ करता है बथापि प्रत्येक रस के विभाव आदि पृथक-पृथक् होते हैं भव रसिक के चित्त की तन्मयता (संभेद) भी भिन्न-शिन्न प्रकार की हो जाती है। इसखिये भिन्न-भिन्न रस माने जाते हैं। हेतुहेतुमद्०-'हेतुहेतुमदभावः सम्भेदा- पेक्षया एव दशितः' यह अन्वय है। सभी रसों की आनन्दरूपता (रड्डा) शृङ्गार, वीर तथा हास्य यादि के स्थलों पर वाक्यार्थ के साथ सहृदय के चित्त की तन्भयता (संभेद) होने से ध्ानन्व की उत्पत्ति हो सकती है, यह तो ठीक है क्योंकि वे (शृङ्गार आादि) सुखात्मक हैं; किन्तु करुण आदि में आ्नन्द की उत्पत्ति कैसे हो सकती है ? वे तो दुःखात्मक हैं; क्योंकि करुण रस का काव्य सुचने से सहृदयों (के चित्त) में दुःख उत्पन्न होता है तथा अश्रुपात आदि होते हैं। यदि करुण रस सुखात्मक होता तो ऐसा न हुआ करता। आ (समाधान) यह ठीक है (कि करुण रस का काव्य सुनने से सहृदयों को दुःख होता है और अश्रुपात शादि हो जाते हैं); किन्तु काव्य से उत्पन्न होने वाला यह आनन्द (रस) उसी प्रकार सुखदुःखातमक होता है, जिस प्रकार सुरतावस्था में प्रहार (दन्तक्षत आदि) होने पर स्त्रियों के कुट्टमित (आनन्दपूर्वक कोप) में होने वाला आनन्द सुखदु खात्मक होता है। दूसरी बात यह भी है कि लौकिक करुए से काव्य का करुसा रस भिन्न होता है। इसीलिये काव्य के करुण रस में सहृदयों की प्रवृत्ि हुआ करती है। यदि लौकिक करु के समान काव्य में (इह) भी करुण रस दुःखात्मक ही होता तो कोई भी (सहृदय जब) इसमें प्रवृत्त न हाता।

Page 400

चतुर्थ: प्रकाश: ३५१

इस प्रकार जिनमें करुण रस की प्रवानता है ऐसे रामायण आदि महाकाव्यों का उच्छेर ही हो जाता। (जहाँ तक अश पात आदि की बात है) जिस प्रकार दुःखित ठ्यक्तियों को देखकर (विनिपातितेषु=दलित) लोक में हृदय का द्रवित होना (वेक्लव्य) देखा जाता है, उसी प्रकार कथा के वर्णन को सुनने से दशकों (या श्रोताओों) को अशपात आादि हो जाते हैं, इसमें कोई विरोध नहीं है। इस प्रकार अन्य रसों के समान करुणा भी आानन्दात्मक ही है। टिप्पणी-(१) द्र०, अभि० भा० (पृ० २७६ तथा सर्वजमी सुखप्रधानाः, पृ० २८२), ना० द० (३.१६३), सा० द० (३.५-७), शृङ्गारप्काश् तथा रस- कलिका इत्यादि। (२) सभी रस सुखात्मक हैं या नहीं इस विषय में मुख्य रूप से चार मत हैं :- (i) सभी रस सुखात्मक हैं-साहित्यदर्पण भदि। (ii) सभी रस सुखदठ खात्मक हैं- अभि०हभा० (पृ० २७६ अब्ात आचार्य का मत, 'रकाः हि सुखदुःसरूपा, प्र० ० भाग २ पृ० ३६६ बषा रढु. कलिका। (iii) श्रङ्गार, हारब, बीर, अद्भुत तथा शान्त रस सुखात्मक है किन्तु रौद्र, बीभत्स, भयानक धोर करूछा रस दुःखात्मक हैं-नाध्यदपंर (१.१६३)। (iv) शृङ्गार आदि रस सुखात्मक हैं किन्तु करुण आदि सुख-दुःखात्मक हैं। आचार्य विश्वेश्वर का विधार है कि वस्तुतः नाट्यदपणकार इस चतुर्थ मत को ही मानते होंगे (ना० द० भूमिका, पृ० ६५)। धनिक वे सभी रसों को आानन्दा- त्मक माना है अतः करुण आदि को भी आनन्दात्मक वतलाया है। फिन्तु करुण में होने वाले आनन्द को सुखदुःखात्सक कहा है-'तादृश एवासावानन्द; सुखदुखा- त्मक: ।' इस प्रकार धनिक उपयुक्त मतों में से चतुर्थ मत को मानने वाले प्रतीत होते हैं। करुएा आदि सुखदुःखात्मक होते हुए भी आनन्दात्मक होते हैं। इस प्रकार लौकिक सुख तथा काव्यानन्द में अन्तर समझना चाहिये। वस्तुतः रसात्मक स्वाद लोकिक सुख दुःख की अपेक्षा विलक्षण ही होता है। (३) साहित्यदपणकार ने भी प्रायः इसी प्रकार की युक्तियों के आधार पर करुण आदि को सुखात्मक कहा है। सार्थ ही यह भी बतलाया है-'सचेतसामनुभवः प्रमाणं तत्र केवलम्; सहृदयों का अनुभव ही इसमें प्रमाण है कि करुण आदि रस सुखात्मक होते हैं। (४) कुट्टमितेषु - कुट्टमित युवतियों का सात्त्विक अलद्धार है (द्र० ऊपर २.४०)। विनिपातितेषु =दुःखं प्राप्तेषु (प्रभा), गिराये हुओं, सताये हुओं के विषय में, वैक्लव्यम्=शोका- वेग: (प्रभा)।

Page 401

३५२ दशरूपकम्

शान्तरसस्य चाऽनभिनेयत्वात् यद्यपि नाट्यऽनुप्रवेशो नास्ति तथापि सूक्ष्मा- तीतादिवस्तूनां सर्वेषामपि शब्दप्रतिपाद्यताया विद्यमानत्वात् काव्यविषयत्वं न निवा- यंते अतस्तदुच्यते- (५३) शमप्रकर्षोऽनिर्वाच्यो मुदितादेस्तदात्मता।।४५।। शान्तो हि यदि तावत्- 'न यत्र दुःखं न सुखं न चिन्ता न द्वेषरागौ न च काचिदिच्छा। रसस्तु शान्तः कथितो मुनीन्द्रैः सर्वेषु भावेषु शमप्रधानः ।' इत्येवं लक्षणास्तदा तस्य मोक्षावस्थायामेवात्मस्वरूपापत्तिलक्षायां प्रादुर्भावात्, तस्य च स्वरूपेशानिर्वचनीयतां श्रतिरपि-'स एष नेति नेति' इत्यन्यापोहरपे- राह। न च तथाभूतस्य शान्तरसस्य सहृदया: स्वादयितारः सन्ति, अथापि तदुपाय- भूनो मुदितामैत्रीकरुणोपेक्षादिलक्षणस्तस्य च विकासविस्तारक्षोभविक्षेपरूपतैवेति तदु- वत्यैव शान्तरसास्वादो निरूपितः । शान्त रस का भी विकास इत्यादि चार अवस्थाओरं में अ्रन्तर्भाव :- शान्त रस का अभिनय नहीं किया जा सकता इसलिये यद्यपि नाव्य में शान्त रस का प्रवेश नहीं होता (पुष्टिर्नास्यषु नैतस्य ४.३५) तथापि सूक्ष्म तथा प्रतीत आदि सभी वस्तुगरों का शब्द द्वारा प्रतिपादन किया जा सकता हैं अतः शान्त रस भी काव्य का विषय होता है इस (तथ्य) का निषेध नहीं किया जा सकता। इसीलिये यह कहा गया है- यदि शम नामक स्थायी भाव का प्रकर्ष शान्त रस है तो वह अनिर्वचनीय है (उसका स्वरूप नहों बतलाया जा सकता)। किन्तु ( उसको प्रकट करने के उपाय) जो मुदिता (मैत्री, करुणा तथा उपेक्षा) आदि हैं वे उन (विकास, विस्तार, क्षोभ तथा विच्ेप नामक चित्त की अरवस्थाओं) के स्वरूप में ही होते हैं। [अतः शान्त रस का भी उपयुक्त्त चित्त की चार अवस्थाओं में ही समावेश हो जाता है।। भाव यह है कि यदि शान्त रस का यह लक्षणा माना जाये-'जहां न दुःख है न सुख है, न चिन्ता है न राग-द्वेष हैं और न ही कोई इच्छा है, समस्त भावों में शम की ही प्रधानता है; उसे श्रेष्ठ मुनिजनों ने शान्त रस कहा है।' तब तो उस (शान्त रस) का प्रादूर्भाव उस मोक्ष-अ्वस्था में ही हो सकता है जहाँ आत्म-स्वरूप की प्राप्ति हो जाती है। और, वह (आत्मा) स्वरूपतः अनिर्वचनीय है, यह बात श्रुति ने भी अन्याव्यावृत्ति के रूप में कही है कि 'वह (भत्म-स्वरूप) यह नहीं है, यह नहीं है'। और, उस प्रकार के (अनिर्वचनीय) शान्त रस का सहृदय जन आस्वादन नहीं कर सकते। किन्तु यदि (अथापि) उस (शम) के उपाय होने वाले मुदिता, मैत्री, करुणा तथा उपेक्षा ही उस (शान्त) का स्वरूप है तब तो वह (शान्त रस) भी विकास विस्तार, क्षोभ तथा विक्षेप के रूप में ही होगा। इसलिये उस (विकास आदि) के कथन द्वारा ही शान्त रस के आस्वादन का निरूपण कर दिया गया।

Page 402

चतुर्थ: प्रकाश: ३५३

टिप्पणी-(१) शान्त रस के विषय में द्र०, ना० शा० तथा अभि० भा० (६.८२ से आगे), का० प्र० (४.३५), ना० द० (३.१७६), प्रता० (पृ० १६८), सा० द० (३.२४५-२५०)। (२) अभी (कारिका ४३) यह बतलाया गया है कि काव्यार्थ से उत्पन्न होने वाला स्वाद (रस) चित् के विकास आदि भेद से चार प्रकार का होता है। चित्त की इन चार अवस्थाओं में ही आठों रसों का समावेश हो जाता है। किन्तु प्रश्न यह है कि चार अवस्थाओं में शान्त रस का समावेश कैसे होगा। यद्यपि नाट्य में शान्त रस सम्भव नहीं है तथापि श्रव्य काव्य में तो वह होता ही है। इस प्रश्न का उत्तर देते हुए दो विकल्प किये गये हैं :- वह शान्त रस शम भाव का प्रकर्ष (पुष्टि) है अथवा शम के उपायभूत मुदिता आदि भावों का प्रकर्ष है ? यदि शम का प्रकर्ष शान्त रस है तो कहना यह है कि शम तो समस्त सुख दुःख आदि भावों के अभाव का नाम है। ऐसी अवस्था तो तभी प्राप्त हो सकती है जब मनुष्य आत्मरूप या ब्रह्मरूप में स्थित हो जाये-मुक्त हो जाये। उस स्थिति का वर्णन नहीं किया जा सकता। उसे तोश्रुति ने भी अनिर्वचनीय कहा है। फिर न तो लोक में ऐसे शम भाव का अनुभव करने वाले हो सकते हैं, न यह काव्य का विषय हो सकता है और न ही इसका आस्वादन करने वाले रसिक जन ही हो सकते हैं। इसलिये यदि दूसरा विकल्प माना जाये; अर्यात् शम-भाव के जो उपाय हैं मुदिता, मैत्री, करुणा तथा उपेक्षा (मि० योगसूत्र १.३३), उनकी पुष्टि ही शान्त रस है; तब तो कोई दोष नहीं आता; क्योंकि मुदिता आदि चारों भावों का क्रमशः विकास आदि चित्त की चार अवस्थाओं में समावेश हो ही जाता है। (यहाँ ग्रन्थ का अनुसरण करके ऐसी व्याख्या ही उचित प्रतीत होती है, विद्वज्जन तथ्यातथ्य का स्वयं निर्राय करेंगे) (३) तदात्मता=तस्य शान्तरसस्यात्मलाभो जायते (प्रभा); वस्तुतः मुदितादेः विकासविस्तारक्षोभविक्षेपरूपता एव, यह अर्थ प्रतीत होता है (द्र० अवलोक टीका तथा अनुवाद)। तस्य १=इत्येवंलक्षस्य, शम- प्रकर्ष रूप शान्त का। तस्य २=आत्मस्वरूपापत्तिलक्षरास्य,आत्मस्वरूप प्रात्ति रूप का। तस्य ३=मुदितादिलक्षणस्य, मुदिता आदि रूप वाले का। अन्यापोह- रूपेश-अन्यव्यावृत्ति के रूप में, अर्थात् आत्मस्वरूप को इस प्रकार नहीं बतलाया जा सकता है कि 'यह ऐसा है' इसलिए श्रति ने बतलाया है कि जिसे तुम आत्मा समभते हो वह आत्मा नहीं है, इससे भिन्न है, विलक्षण है। तदुक्त्यैव-विकास आदि के कथन द्वारा ही।

Page 403

३५४ दशरूप कम्

इदानीं विभावादिविषयावान्तरकाव्यव्यापारप्रदर्शनपूर्वकः प्रकरणेनोपसंहारः प्रतिपा- द्यते- काव्याद्विभावसञ्चार्यनुभावप्रख्यतां गतैः ॥ ४६॥ भावितः खवद्ते स्थायी रसः स परिकीर्तितः। भिरालम्बनविभावैनिर्वेदा दिभिर्व्यभिचारिभाव रोमाञ्चाश्र भ्रक्षेपकटाक्षादैरनुभावैर- वान्तरव्यापारतया पदार्थीभूतैर्वाक्यार्थः स्थायीभावो विभावितः=भावरूपतामानीतः स्वदते स रस इति प्राक्प्रकरणे तात्पर्यम्। रस-प्रक्रिया तथा रसस्वरूप का उपसंहार अब विभाव आदि के विषय में जो काव्य का अवान्तर व्यापार होता है उसको दिखलाते हुए प्रकरण का उपसहार किया जाता है- काव्य में विभाव, सञ्चारी भाव तथा अनुभाव की संज्ञा को प्राप्त करने वाले क्रमशः चन्द्रमा, निर्वेद तथा रोमाब्च आदि पदार्थों के द्वारा पुष्ट किये गये (भावित) रति आदि स्थायी भाव का जो आ्स्वादन किया जाता है, वही रस कहलाता है॥४६॥ काव्य का व्यापार है अतिशयोक्ति=चमत्कारोत्पादक कथन। उसके द्वारा विशेषता (अलौकिकता या चमत्कार) प्राप्त करके चन्द्रमा आदि ही उद्दीपन विभाव कहलाते हैं, प्रमदा आदि ही आलम्बन विभाव, निर्वेद आदि ही व्यभिचारी भाव तथा रोमाञ्च, अश्रु, भ्र-विक्षेप और कटाक्ष इत्यादि ही अनुभाव कहलाते हैं। वे (विभाव आदि) काव्य के अवान्तर व्यापार के वाच्य होते हैं अतएव वे पदार्थ के समान हुआ करते हैं (पदार्थीभूतः)। उनसे पुष्ट हुआ-आस्वादन के योग्य हुआ (भावित) जो रति आदि स्थायी भाव है वह (काव्य में), वाक्यार्थ हुआ करता है। वह (आस्वादनयोग्य स्थायी भाव) रस कहलाता है। इस प्रकार ऊपर के प्रकरण में (इस कारिका का) तात्पर्य है। टिप्पणी-(१) रस-प्रक्रिया तथा रसस्वरूप के लिये विशेष द्र० ना० शा० तथा अभि० भा० (६.३१-४५), का० प्र० (४.२७-३५), भा० प्र० (षष्ठोऽधि- कार:, पृ० १५२-१५४), ना० द० (३.१६३-१६५), प्रता० (रसप्रकरण, पृ० १५५-१५८), सा० द० (३.१-२८), रसगङ्गाधर (रसप्रकरण) इत्यादि। (२) अतिशयोषितिरूपकाव्यव्यापार: = चमत्कारोत्पादक वर्णन करना ही काव्य का कार्य है, मि० 'लोकोत्तरवर्णनानिपुणकविकर्म (का० प्र० १.२)। आहितविशेष := आहिता: विशेषा: अतिशयाः येषु तैः, जिनमें विशेषता उत्पन्न कर दी गई है उनके द्वारा, विशिष्ट रूप में हो जाने वालों के द्वारा। अवान्तरव्यापार =जिस प्रकार व्यवहार में भाट्ट मीमांसक की दृष्टि से वाक्यार्थ बोध में दो प्रकार का व्यापार होता है एक अवान्तर व्यापार दूसरा प्रधान व्यापार। प्रथमतः शब्द अभिधा वृत्ति

Page 404

चतुर्थ: प्रकाशः ३५४

से अपने अपने अर्थ (पदार्थ) का बोध कराते हैं, यही अवान्तर व्यापार हैं। फिर आकांक्षा आदि से अन्वित होकर शब्दसमुदाय या वाक्य से तात्पर्य वृत्ति द्वारा अन्वित अर्थ (=वाक्यार्थ) का बोध होता है, यही प्रधान व्यापार है। इसी प्रकार काव्य में भी अवान्तर व्यापार द्वारा विभाव आदि की प्रतीति होती है जो पदार्थ के समान है तथा प्रधान व्यापार द्वारा विभाव आदि से संसृष्ट स्थायी भाव की प्रतीति होती है जो वाक्यार्थ के समान है। भावितः = विभावितः = भावरूपताम् आनीतः, आस्वादन के योग्य हुआ। (३) प्राकुप्रकरणो तात्पर्यम् - भाव यह है कि रस-प्रक्रिया का यहां उप- संहार किया जा रहा है। चतुर्थ प्रकाश के आरम्भ से कारिका ४७ तक रस-प्रक्रिया तथा रस-स्वरूप का विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है। संक्षेप में इनमें से कुछ कारिकाओं में ही रस-प्रक्रिया तथा रस-स्वरूप स्पष्ट हो जाते हैं; जैसे- विभावैः ४.१, वाच्या प्रकरणादिभ्यो० ४.३७, रसः स एव स्वाद्यत्वात् (४.३८), धीरो- दात्ताद्यवस्थानाम् ४.४०, ता एव ३.४१, स्वादः काव्यार्थसम्भेदाद् आत्मानन्दसमुद- भव: ४.४५, पदार्थे: ४.४६, अभेदाद् रसभावयो: ४.४७। इनके आधार पर यह कहा जा सकता है :- सहृदयों के चित्त में रति आदि स्थायी भाव विद्यमान रहा करता है। जब सहृदय जन अभिनय देखते हैं या काव्य सुनते हैं तो वहाँ किसी नायक नायिका आदि के अनुराग आदि का चित्रण उनके समक्ष आता है। उदाहरणार्थ शकुन्तला नाटक का अभिनय देखते समय शकुन्तला के प्रति दुष्यन्त के अनुराग का वर्णन सहृदय जन के समक्ष होता है। यह वर्णन काव्य के लोकोत्तर व्यापार (अतिशयोक्ति) द्वारा किया गया होता है इसलिये लोक की शकुन्तला आदि काव्य तथा नाट्य में एक विशेष रूप में हु करती हैं; अर्थात् काव्य में शकुन्तला आदि आलम्बन विभाव के रूप में होती हैं, लौकिक प्रेम को उद्दीप्त करने वाले निमित्त चन्द्रिका इत्यादि उद्दीपन विभाव के रूप में होते हैं। इसी प्रकार चिन्ता आदि भाव व्यभिचारी भाव के रूप में तथा दुष्यन्त की भुज फड़कना, रोमाञच इत्यादि चेष्टाएँ अनुभाव के रूप में होती हैं। इन विभाव आदि का काव्य के अवान्तर व्यापार द्वारा सहृदयों को बोध हुआ करता है। ये काव्य- शब्दों के वाच्य हैं। प्रतः इनकी काव्पार्थ में वही अवस्था होती है जो वाक्यार्थ के बोध में पदार्थ की। साथ ही ये शकुन्तला आदि काव्य में साधारण रूप में चित्रित किये जाया करते हैं। उनका अपना व्यक्तिगत रूप न होकर केवल नायिका (स्त्री) रूप ही होता है। इसलिये ये सभी सहृदयों के आलम्बन विभाव आदि हो जाते हैं और यह दोष नहीं आता कि वे पूज्य देवियाँ सहृदयों का आलम्बन विभाव कैसे होंगी। अथवा कहिये कि सहृदयों के आलम्बन विभाव होने में शकुन्तला आदि के लौकिक रूप का कोई उपयोग नहीं होता। होता यह है कि इनका शब्दों द्वारा उपस्थित बुद्धिगत रूप ही सहृदय का आलम्बन विभाव आदि हो जाया करता है। काव्य शब्दों के वाच्यार्थ इन विभाव आदि के द्वारा लक्षणा से रति आदि स्थायी

Page 405

३५६ दशरूपकम्

भाव की प्रतीति हो जाती है (लाक्षणिकी रत्यादिप्रतीतिः ४.३७ टीका)। तब तात्पर्य वृत्ति द्वारा विभाव आदि से संसृष्ट रति आदि स्थायी भाव का बोध होता है, यही काव्यार्थ कहलाता है जो काव्य-वाक्य का अरथ है (तत्र विभावादयः पदार्थ- स्थानीयाः तत्संसृष्टो रत्यादिर्वा्यार्थः ४.३७ टीका) । भाट्टमीमांसक के मत से व्यवहार में भी वाक्य का अर्थ तात्पर्य वृत्ति द्वारा ही जाना जाता है। इसी प्रकार विभाव आदि से संसृष्ट रति आदि स्थायी भाव (जो काव्य-वाक्य का अर्थ होता है) भी तात्पर्य वृत्ति से ही प्रतीत हो जाता है। इस काव्यार्थ के साथ सहृदय के चित्त की तन्मयता (सम्भेद) हो जाती है। और, उसके चित्त में विकास, विस्तार, क्षोभ या विक्षेप के रूप में एक विलक्षण आनन्द का उद्भव हुआ करता है। यही स्वाद या रस कहलाता है। काव्य इसका भावक होता है और यह काव्य का भाव्य। इस प्रकार रस भाव आदि तथा काव्य में भाव्य- भावक सम्बन्ध है, व्यङ्गय-व्यञ्जक-सम्बन्ध नहीं, जैसा ध्वनिवादियों ने माना है। यह आनन्द या स्वाद बाहर से नहीं आता अपितु रसिक जन दुष्यन्त आदि के चित्रण द्वारा अपने चित्त में स्थित रति आदि भाव का आस्वादन किया करते हैं, जिस प्रकार बालक मिट्टी के हाथी इत्यादि के द्वारा अपने उत्साह का आनन्द लिया करते हैं। इस प्रकार रसिकवर्ती रति आदि स्थायी भाव ही आस्वाद-योग्य होकर रस कहलाता है, क्योंकि उसका आस्वादन किया जाता है (रस्यते इति रसः)- 'रसः स एव स्वाद्यत्वात्'। या कहिये कि स्थायी भाव तथा रस में कोई मौलिक अन्तर नहीं है, स्थायी भाव का प्रकर्ष ही रस है (अभेदाद् रसभावयोः)। Tा ग्रन्थ के अनुशीलन से दशरूपक का रस-सिद्धान्त यही प्रतीत होता है। इस रस-सिद्धन्त के मुख्य तत्त्व हैं :- (i) रति आदि स्थायी भाव सहृदय के चित्त में पहिले से विद्यमान होते हैं। इस मन्तव्य को अभिनवगुप्त आदि ने भी स्वीकार किया है। (ii) विभाव, अनुभाव, सात्त्विक तथा व्यभिचारी भाव के द्वारा वह स्थायी भाव पुष्ट हो जाता है, आस्वादन योग्य हो जाता है (४.१)। यहाँ सात्त्विक भावों का पृथक्शः ग्रहण किया गया है, जो भरत के रस-सूत्र आदि में नहीं है। स्थायी भाव की पुष्टि की बात भट्टलोल्लट ने भी कही थी। किन्तु वह अनुकार्य गत रति आदि भाव (लौकिक रस) की लौकिक विभाव (प्रमदा आदि) इत्यादि से पुष्टि है अतः इससे नितान्त भिन्न है। वस्तुतः दशरूपक का यह मन्तव्य अभिनव गुप्त द्वारा स्थापित मत से बहुत साम्य रखता है, किन्तु रस की प्रक्रिया में अन्तर है। (iii) लौकिक प्रमदा आदि काव्य के अतिशयोक्ति रूप व्यापार से विभाव आदि कहलाने लगते हैं (मि० का० प्र०) । काव्य में उनके साधारण स्वरूप का चित्रणा होता है, विशेष व्यक्तिगत स्वरूप का नहीं। सहृदय के रति आदि भाव का पोषण करने में उनका शब्द से उपस्थित बुद्धिगत रूप ही अपेक्षित होता है, बाह्य रूप नहीं। यह मन्तव्य अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है भट्टनायक के 'विभावादि-साधारणी- करणात्मना भावकत्वव्यापारेण (का० प्र०) तथा अभिनवगुप्त के 'त्रासकस्यापार- मार्थिकत्वात् (अभि० भा० पृ० २७६) से इसकी तुलना की जा सकती है।

Page 406

चतुर्थ: प्रकाश: ३५७

विशेषलक्षणान्युच्यन्ते, तत्राचार्येण स्थायिनां रत्यादीनां शृङ्गारादीनां च पृथग्लक्षणानि विभावादिप्रतिपादनेनोदितानि। अत्र तु- (५५) लक्षणौक्यं विभावैक्यादभेदाद्रसभावयोः॥४७॥ क्रियत इति वाक्यशेषः । (iv) विभाव आदि से संसृष्ट स्थायी भाव ही काव्यार्थ है। उसके साथ सहृदय के चित्त की तन्मयता हो जाती है और आत्मानन्द का उद्भव होता है, यही रस है। इस मन्तव्य की अभिनवगुप्त के रति आदि भाव के साधारणीकरण (विशेष-रूपत्वाभावाद भीत इति अभि० भा० पृ० २७६, तथा साधारण्येन गोचरीकृतः' का० प्र०) से तुलना की जा सकती है। साहित्य दर्पण (३.६-१०) में जो अनुकार्य के साथ सामाजिक का तादात्म्य बतलाया है, वह भी इससे समानता रखता है। (v) काव्य से तात्पर्य वृत्ति द्वारा रस की प्रतीति होती है। विभाव आदि का बोध पदार्थ के सामान है तथा विभाव आदि से संसृष्ट स्थायी भाव का बोध वाक्यार्थ के समान है। काव्य रस का भावक (=भावना कराने वाला) है; किन्तु तात्पर्य वृत्ति द्वारा ही। यहां भट्टनायक का विशेष प्रकार का भावना व्यापार नहीं माना गया, न ही ध्वनिवादियों के समान काव्य में व्यञ्जना व्यापार माना गया है। इस प्रकार दरूपक का रसविषयक मन्तव्य भट्टलोल्लट, श्रीशङ्गक, भटनायक तथा अभिनवगुप्ताचार्यं के रस सम्तन्धी चार प्रसिद्ध मतों से भिन्न है। इसका अपना विशिष्ट रूप है। रस सम्बन्धी मतों के लिये द्र० अभि० भा० रससूत्र व्याख्या तथा का० प्र० चतुर्थ उल्लास आदि। इस प्रकार सामान्य रूप से रस तथा स्थायी भाव आदि का विवेचन करके अब शृङ्गार आदि आठ रसों के विशेष लक्षणा इत्यादि बतलाते हैं। रसों के लक्षणा, भेद तथा उदाहरण अब (रसों के) विशेष लक्षणा बतलाये जाते हैं। आचार्य (भरत) ने तो विभाव आदि का प्रतिपादन करते हुए रति आदि स्थायी भावों के तथा शृङ्गार आदि रसों के पृथक् पृथक् लक्षणा बतलाये हैं; किन्तु यहां- (शृङ्गार आदि) रस तथा (रति आदि) स्थायी भाव का एक ही लक्षण बतलाया जा रहा है; क्योंकि रस और स्थायी भाव के विभाव एक ही होते हैं अतः दोनों में अभेद होता है (स्थायी भाव का प्रकर्ष ही रस कहलाता है) ॥ ४७ ॥ (कारिका में) 'लक्षणंक्यम्' के साथ 'क्रियते' (किया जाता है) यह वाक्य का शेष अंश समझना चाहिये। टिप्पणी-आचार्य भरत ने षष्ठ अध्याय (श्लोक ४५ से आगे गद्य) में 'तत्र शृङ्गारो नाम रतिस्थायिभावप्रभवः' इत्यादि प्रकार से विभाव आदि का निर्देश करते हुए शृङ्गार आदि रसों के लक्षण किये हैं। दूसरी ओर सप्तम अध्याय

Page 407

३५८ दशरूाकमु

तत्र तावच्छ ड्वार :- (५६) रम्यदेशकलाकालवेषभोगादिसेवनैः । प्रमोदात्मा रतिः सैव यूनोरन्योन्यरक्तयोः। प्रहृष्यमाणणाशृङ्गारो मधुराङ्गविचेष्टितैः ॥ ४८॥ इस्थमुपनिबध्यमानं काव्यं शृङ्गारास्वादाय प्रभवतीति कव्युपदेशपरमेतत्। (श्लोक द से आगे गद्य) में 'रतिर्नाम प्रमोदात्मिका' इत्यादि के द्वारा फिर विभाव आदि का निर्देश करते हुए रति आदि स्थायी भावों के लक्षणा किये हैं। किन्तु शुङ्गार रस तथा रति भाव के विभाव एक ही हैं। धनञ्जय की दृष्टि से प्रपुष्ट रति स्थायी भाव है तथा पुष्ट रति शृङ्गार रस है या कहिये कि आस्वाद्यमान रति ही शृङ्गार है। अतः स्थायी भाव और रस में कोई तातत्विक भेद नहीं इसलिये दोनों का पृथक् पृथक् लक्षण करने की आवश्यकता नहीं। भृङ्गार रस का लक्षण, भेद तथा उदाहरण उन (रसों) में शृङ्गार का लक्षण है :-- रमणीय देश, कला, काल, वेष तथा भोग आदि के सेवन के द्वारा परस्पर अप्नुरक्त युवक-युवति को जो प्रमोद होता है वह रति भाव कहलाता है, वही मधुर अङ्ग चेष्टाओं से पुष्ट होकर (प्रहृष्यमाणः) शृङ्गार रस कहलाता है॥ ४८॥ भाव यह है कि इस प्रकार के वर्णन करने वाला काव्य शृङ्गार रस का आस्वावन कराले में समर्थ होता है। इसका अभिप्राय कवि को उपदेश (शिक्षा) देना है। टिप्परी-(१) ना० शा० (अ०६ शलोक ४५ से आगे गद्य), का० प्र० (४. २६), भा० प्र० (चतुर्थ अधिकार), ना० द० (३.१६६), प्रता० (पृ० १६३), सा० द० (३.१७६, १८३-१८६); रसगङ्गाधर (१ पृ० १३६) (२) यहां काव्य में वर्णानीय शृङ्गार का स्वरूप दिखलाया गया है, वह लौकिक शृङ्गार है। उसके काव्यगत वर्णन द्वारा जो सहृदयों के चित्त में विशेष प्रकार का आनन्द होता है वस्तुतः वही शृङ्गार रस है। इसी प्रकार अन्य रसों में भी समझ्ना चाहिये। (३) प्रमोदात्मा-प्रमोद ही है स्वरूप(आत्मा) जिसका, एक विशेष प्रकार की आनन्दात्मक चित्तवृत्ति रति कहलाती है; इस पद द्वारा रति का स्वरूप बतलाया गया है, मि० 'रतिप्र मोदात्मिका' (ना० शा० अ० ७ श्लोक क से आगे, पृ० ३५०) तथा 'रति- मनोनुकूलेऽर्थे मनसः प्रवणायितम् (सा० द०३. १७६)। रम्यदेश०-रमणीय देश आदि शृङ्गार के उद्दीपन विभाव हैं। युवक तथा युवति (नायक-नायिका) आलम्बन विभाव हैं। अन्योन्यरक्तयो :- परस्पर अनुरक्त युवक, युवति का। अभिप्राय यह है कि जहाँ नायक नायिका एक दूसरे के प्रति अनुराग रखते हैं, वहीं शृङ्गार रस हुआ करता है। यदि एक में अनुराग होता है दूसरे में नहीं तो शृङ्गाराभास हो जाता है द्र० साहि- त्यदर्पण(रतौ तथानुभयनिष्ठायाम् ३.२६३)। मधुर अङ्ग-चेष्टाएं इसके अनुभाव हैं, मि०, 'ललितमधुराङ्गहारवाक्यादिभिर् अनुभावैः ना० शा० अ० ६ श्लो० ४५ से आगे, पृ० :०५) तथा 'मधुराङ्गविहारः' (ना० शा० ७, ४५)। शङ्गार के व्यभि- चारी भावों का आगे (४.४६) निरूपण किया जायेगा।

Page 408

चतुर्थ: प्रकाशः ३५६

तत्र देशविभावो यथोत्तररामचरिते- 'स्मरसि सुतनु तस्मिन्पर्वते लक्ष्मरोन प्रतिविहितसपर्यासुस्थयोस्तान्यहानि। स्मरसि सरसतीरां तत्र गोदावरीं वा

कलाविभावो यथा- स्मरसि च तदुपान्तेष्वावयोर्वर्तनानि ॥२६२। 'हस्तैरन्तर्निहितवचनैः सूचितः सम्यगर्थः पादन्यासैलयमुपगतस्तन्मयत्वं रसेषु। शाखायोनिमृ दुरभिनयः षड्विकल्पोऽनुवृत्तं- र्भावे भावे नुदति विषयान् रागबन्धः स एव ।२६३।। यथा च- 'व्यक्तिर्व्यञ्जनधातुना दशविधेनाप्यत्र लब्धामुना विस्पष्टो द्रुतमध्यलम्बितपरिच्छिन्नस्त्रिधाऽयं लयः । गोपुच्छप्रमुखाः क्रमे यतयस्तिस्रोऽपि सम्पादिता- स्तत्त्वोघानुगताश्च वाद्यविधयः सम्यक् त्रयो दर्शिताः॥।२६४। प्रत्येक देश-विभाव आदि के उदाहरण इस प्रकार हैं।- उनमें देश-विभाव, जैसे उत्तररामचरित (१.२६) में-'(राम सीता से कहते हैं) हे सुन्दर शरीर वाली सीता, क्या तुम उस पर्वत पर लक्ष्मणा के द्वारा की गई सेवा से आनन्दपूर्वक रहते हुए अपने (दोनों के) उन दिनों को स्मरण करती हो ? या तुम्हें सरस तट वाली गोदावरी की याद है ? और, उसके निकट हम दोनों के विहार करने का स्मरण होता है ?' टिप्पणी-देश-विभाव वहां होता है जहां किसी रमणीय स्थल नदीतीर इत्यादि के निमित्त से रति भाव के उद्बोध का वर्णन किया जाता है। यहां पर्वत तथा गोदावरी के रमणीय तटों के निमित्त से होने वाली राम की रति का वर्णन किया गया है। कला-विभाव, जैसे (?)- 'जिनके भीतर (मानों) वचन छिपे हैं ऐसे हाथों ने अर्थ को भली भाँति प्रकट कर दिया, पाद-विक्षेपों के द्वारा लय प्राप्त हो. गई तथा रसों में तन्मयता भी; अनुवृत्तों (?) के द्वारा शाखा (विचित्र प्रकार का हस्तचालन) से उत्पन्न होने वाला ६ प्रकार का कोमल अभिनय हो गया। यह प्रत्येक भाव को विषयों में प्रेरित करता है, यही रागबन्ध (?) है'। और, जैसे (नागानन्द १.१५)-'यहाँ इस (सङ्गीत) ने दश प्रकार की व्यञ्जन धातु के द्वारा व्यक्तता प्राप्त कर ली है; द्रुत, मध्य तथा विलम्बित रूप से विभक्त यह तीन प्रकार का लय भी स्पष्ट हो गया है; गोपुच्छ इत्यादि तीनों यतियाँ भी क्रमशः की गई हैं तथा तत्त्व, शोध और अनुगत तीनों वाद्य-विधियाँ भली भाँति दिखला दी गई हैं'।

Page 409

३६० दशरूपकम्

कालविभावो यथा कुमारसम्भवे- असून सद्यः कुसुमान्यशोक: स्कन्धात्प्रभृत्येव सपल्लवानि। पादेन नापक्षत सुन्दरीणां सम्पर्कमाशिन्जितनूपुरेण ।२६५॥ इत्युपक्रकमे- 'मधु द्विरेफ: कुसुमकपात्रे पपौ प्रियां स्वामनुवर्त्तमानः । शृङ्गए संस्पर्शनिमीलिताक्षीं मृगीमकण्कूयत कृष्णसारः ॥२६६। टिप्परी-(१) कला-विभाव वहाँ होता है जहाँ नृत्य संगीत आदि कला के निमित्त से रति भाव के उद्भव का वर्णन होता है। यहाँ 'हस्तः' इत्यादि में नृत्य के निमित्त से उद्बुद्ध होने वाली रति का वर्शन है तथा 'व्यक्ति:०' इत्यादि में सङ्गीत के निमित्त से उद्बुद्ध होने वाली रति का। (३) लय-क्रिया के भनन्तर विश्राम ही लय है, यह तीन प्रकार का होता है-द्र त, मध्य और विलम्बित, जैसा कि सङ्गीतरत्नाकर (अ०५) में बतलाया है- क्रियानन्तरविश्रान्तिर्लयः स त्रिविधो मतः । द्र तो मध्यो विलम्बश्च द्रतः शीघ्रतमो मतः । द्विगुाद्विगुणी ज्ञेयौ तस्मान् मध्यविलम्बितौ।। शाखा-विचित्र प्रकार से हस्तचालन, जैसा कि सङ्गीतरत्नाकर (७) में कहा है-'तत्र शाखेति विख्याता विचित्रा करवर्तना'। शाखायोनिः=शाखा से उत्पन्न होने वाला (शाखा योनिर् यस्य ताहृशः, अभिनयः) षडविकल्प := ६ प्रकार का; अभिनय ६ प्रकार का होता है-तीन प्रकार (शारीर, मुखज और चेष्टाकृत) का १.३ आङ्गिक तथा ४. वाचिक, ५. शहार्य और ६. सात्त्विक (ना०शा०अ०८)। (४ व्यञजनषातुना ना० शा० (अ० २९) में वीशा में दस व्यञ्जन धातुओं का प्रयोग बतलाया गया है; पुष्प, द्वारा सङ्गीत की व्यक्तता हो जाती है। वे दस व्यञ्जन धातु हैं; पुष्प, कल, तल, निष्कोटित, उद्घृष्टम्, रेफ, अनुबन्ध, अनुस्वनित, बिन्दु तथा अपमृष्ट। यतयः-सङ्गीत में लय की प्रवृत्ति का नियम यति कहलाता है; जैसा कि सङ्गीतरत्नाकर (अ० ५) में कहा है-'लयप्रवृत्तिनियमो यतिरित्यभिधीयते। समा स्नोतोगता गोपुच्छा त्रिविघेति सा'। वाद्यविधयः-वाबन के प्रकार, ये तीन होते हैं-तश्व, अतुगत और ओध (सङ्गीतरत्नाकर अ० ६)। काल-विभाव, जैसे कुमारसम्भव (३.२६) में -: (वसन्त के आगमन से) पशोक वृक्ष ने तत्काल ही तने से लेकर ऊपर तक पल्लव-सहित कुसुमों को उत्पन्न कर दिया और उसने भङ्कृत नूपुरों वाले सुन्दरियों के चरण के स्पर्श (प्रहार) की भी अपेक्षा न की'। इससे आरम्भ करके (कुमारसम्भव ३.३६) 'भ्रमर अपनी प्रिया का अनुवर्तन करते हुए एक ही पुष्प-पात्र में मकरन्द पीने लया। काला हरिणा अपने सींग से हरिणी को खुजलाने लगा जो उसके स्पर्श से आँखें मूद रही थी'। टिप्पणी-काल-विभाव वहाँ होता है जहाँ कालविशेष वसन्त आदि के निमित्त से रतिभाव के उदबुद्ध होने का वर्णन होता है। यहां वसन्त के आगमन से वृक्षों तथा पशुओं आदि में भी रतिभाव के उद्भव का वर्णान किया गया है अतः वसन्त ऋतु (काल) विभाव है।

Page 410

चतुथं: प्रकाश: ३६१

वेषविभावो यथा तत्रैव-

मुक्ताकलापीकृतसिन्दुवारं वसन्तपुष्पा मरणं वहन्ती ।२६७/। उपभोगविभावो यथा- 'चक्षुर्लुप्तमषीकरं कवलितस्ताबूलरागोऽधरे विश्रान्ता कबरी कपोलफलके लुप्तेव गात्रद्युतिः । जाने सम्प्रति मानिनि प्रणायिना कैरप्युपायक्रमै- रभंग्नो मानमहातरुस्तरुणि ते चेतःस्थलीवर्धितः ।।२६८।। प्रमोदात्मा रतिर्यथा मालतीमाधवे- 'जगति जयिनस्ते ते भावा नवेन्दुकलादयः प्रकृतिमधुराः सन्त्येवान्ये मनो मदयन्ति ये। मम तु यदियं याता लोके विलोचनचन्द्रिका नयनविषयं जन्मन्येक: स एव महोत्सव: ॥२६६॥ वेषविभाव, जैसे (कुमारसम्भव ३.५३)-'(महादैव के निकट जाती हुई) पार्वती वसन्त ऋतु के पुष्पों के आभूषण धारण कर रही थी, जिनमें स्थित पशोक (पत्रों) के द्वारा पद्मराग मणि तिरस्कृत हो रही थी, कसिकार के द्वारा सुवर्स की कान्ति आकृष्ट की जा रही थी, सिन्दुवार (के पुष्पों) को मोतियों की माला के समान किया गया था'। टिप्पी-वेषविभाव वहां होता है जहां रमसीय वेष-विन्यास के निमित्त से रति के उद्भव का वर्णन किया जाता है। यहां पार्वती के वेष से शिव के चित्त में रतिभाव का उद्भव दिखलाया गया है। उपभोग विभाव, जैसे (?)- (नायिका में उपभोग के चिह्नों को देखकर कोई सखी उससे कहती है) 'हे सखी, तुम्हारे तेत्रों का काजल-कण कुछ छट गया है, अधर में पान की लालिमा भी चाट ली गई है, केशपाश (कबरी) कपोल तल पर बिखरा है, शरीर की कान्ति लुप्त सी हो गई है। हे मानिनी, ऐसा जान पड़ता है कि इस समय प्रियतम ने किन्हीं उपायों से तुम्हारे चित्त की भूमि में बढे हुए मान रूपी वृक्ष को तोड़ डाला है।' टिप्पणी-उपभोग विभाव वहां होता है जहां नायक-नायिका के उपभोग- चिह्नों के द्वारा रति भाव लक्षित होता है। यहां तरुणी के काजल की लुप्तता आदि उपभोग चिह्नों के द्वारा नायक का रतिभाव लक्षित होता है। प्रमोदात्मक रति, जैसे मालतीमाधव (१.३६) में-'संसार में नवीन चन्द्रकला इत्यादि पदार्थ विजयी (उत्कृष्ट) हैं। स्व्रभाव से मधुर दूसरे भी पदार्थ हैं जो मन को प्रफुल्लित कर देते हैं। किन्तु संसार में नेत्र-कौमुदी यह (मालती) जो मेरे नेत्रों का विषय हुई है, मेरे लिये जीवन में एक यही महान् उत्सत्र है'। टिप्पणी-अभी ऊपर रति भाव का स्वरूप बतलाते हुए उसे प्रमोदात्मा कहा गया है। प्रमोद =विशेष प्रकार का आ्रनन्द । 'जगति' इत्यादि में आ्र्ररनन्द-रूप रति भाव दिखलाया गया है। यहां मालती को देखकर माधव के प्रमोद का वर्णन है। यही प्रमोद रति भाव का स्वरूप है।

Page 411

३६२ दशरूपकम्

युवतिविभावो यथा मालविकाग्निमित्र- दीर्घाक्षं शरदिन्दुकान्तिवदनं बाहू नतावंसयो: संक्षिप्त निबिडोन्नतस्तनमुरः पाश्व प्रमृष्टे इव । मध्यः पाशिमितो नितम्बि जघनं पादावरालाङ्गुली छन्दो नर्तयितुर्यथैव मनसः स्पष्टं तथाऽस्या वपुः ॥३००॥ यूनोविभावो यथा मालतीमाधवे- 'भूयो भूय: सविधनगरीरथ्यया पर्यटन्तं दष्टवा दृष्टवा भवनवलभीतुङ्गवातायनस्था। साक्षात्काम नवमिव रतिर्मालती माधवं यद्- गाढोत्कण्ठालुलितललितैरङ्गकस्ताम्यतीति ॥३०१॥ अन्योन्यानुरागो यथा तत्रव- 'यान्त्या मुहुर्वलितकन्धरमाननं त- दावृत्तवृन्तशतपत्रनिभं वहन्त्या । दिग्धोऽमृतेन च विषेण च पक्ष्मलाक्ष्या गाढं निखात इव मे हृदये कटाक्ष: ॥३०२॥ युवतिविभाव, जैसे मालविकाग्निमित्र (२.३) में-'(राजा अग्निमित्र मन ही मन मालविका के विषय में सोच रहे हैं) 'इसका मुख विशाल नेत्रों वाला तथा शरदु के चन्द्रमा के समान कान्ति वाला है, भुजाएँ कन्धों पर भुकी हैं, वक्षःस्थल घने तथा उभरे स्तनों से कसा (संक्षिप्त) है, दोनों पारश्व भाग मानों परिमाजित किये हुए हैं, मध्य भाग मुट्ठी भर (पाशि-मितः=हाथ से मापा गया) है, जंघाएँ सुन्दर नितम्बों से युक्त हैं, चरण थोड़ी भुकी हुई (अराल) अङ्गुलियों से युक्त हैं। इस प्रकार नृत्य कराने वाले (नृत्याचार्य) की जैसी इच्छा होती है उसी प्रकार का इसका शरीर गढा गया है।' टिप्पणी-युवतिविभाव वहां होता है जहां किसी युवति के यौवन का वर्णन रति-भाव का निमित्त हुआ करता है। यहां मालविका का योवन अग्निमित्र के रति भाव के उद्भव का निमित्त दिखलाया गया है। युवक तथा युवति दोनों का विभाव, जैसे मालतीमाधव (१.१८) में- (कामन्दकी कहती है) 'महल की अटारी के ऊंचे वातायन में बैठी रति जैसी मालती बार बार अपने समीप की नगर की गली से घूमने वाले साक्षात् नवीन कामदेव के समान माधव को देख-देखकर गाढ उत्कण्ठा से युक्त हुई कम्पित सुन्दर अङ्गों से पीड़ित हो रही है'। टिप्पणी-जहां युवक और युवति दोनों के यौवन को पारस्परिक रति-भाव के निमित्त रूप में व्णित किया जाता है वहां दोनों ही विभाव होते हैं। 'भूयो भूयः' इत्यादि में मालती तथा माधव दोनों ही शृङ्गार के विभाव हैं। (नायक-नायिका का) परस्पर अनुराग, जैसे वहीं (मालतीमाधव १.३२) (माधव अपने मित्र मकरन्द से कह रहा है) 'जाते हुए बार बार(मुझे देखने के लिये)

Page 412

चतुर्थ। प्रकाश: ३६३

मधुराङ्गविचेष्टितं यथा तत्रैव- 'स्तिमित विकसितानामुल्लसद्भ्र लतानां मसृणमुकुलितानां प्रान्तविस्तारभाजाम् प्रतिनयननिपाते किन्चिदाकुन्चितानां विविधमहमभूवं पात्रमालोकितानाम् ॥३०३।। (५७) ये सत्त्वजा: स्थायिन एव चाष्टौ त्रिंशत्त्रयो ये व्यभिचारिणश्च। एकोनपञचाशदमी हि भावा युक्त्या निबद्धाः परिपोषयन्ति। (स्थायिनम्) आलस्यमौग्रथ' मरणं जुगुप्सा तस्याश्रयाद्वैतविरुद्धमिष्टम् ॥४६॥ घूमी हुई ग्रीवा वाले अतएव भुके वृन्त से युक्त कमल के सहश मुख को धारण करती हुई सुन्दर लोमों से युक्त (पक्ष्मल) नेत्रों वाली मालती ने अमृत तथा विष से बुझा हुआ कटाक्ष मानों मेरे हृदयमें गहरा गाड़ दिया है'। टिप्पणी-शृङ्गार के लक्षण में जो 'अन्योन्यरक्तयोः' यह पद दिया गया है, उसका उदाहरण है 'यान्त्या' इत्यादि। यहां मालती और माधव दोनों के परस्पर अनुराग का वर्णन किया गया है। परङ्गों की मधुर चेष्टाएं, जैसे वहीं (मालतीमाधव १.३०)-(माधव मकरन्द से कह रहा है) 'उस समय निश्चल तथा विकसित, ऊपर को चलती भ्र लताओं से युक्त, अनुरागपूर्ण (मसृण=अनुराग-कषायित) तथा मुकुलित, अपाङ्ग (नेत्र-छोर) तक विस्तार वाली, तथा मेरी दृष्टि पड़ने पर कुछ सङ्कुचित हुई (मालती की) विविध दृष्टियों का मैं पात्र बन गया'। टिप्पणी-मधुर अङ्ग चेष्टाएं अनुभाव हैं। ना० शा० में नायिका के नयन- चातुरयं, भ्रक्षेप, कटाक्ष के साथ नेत्र-सञ्चार आदि को मधुर अङ्ग-चेष्टा कहा गया है। स्तिमित आदि में मालती की मधुर अङ्ग-चेष्टाओं का वर्णन है। शृङ्गार के पोषक भाव जो आठ सात्विक भाव तथा आठ स्थायी भाव और तैंतीस व्यभिचारी भाव हैं वे सभी मिलकर ४६ होते हैं। उनकी युक्तिपूर्वक योजना शृङ्गार रस का परिपोष करती है। आलस्य, उम्रता, मरण और जुगुप्सा-इन भावों का शृङ्गार के साथ (तस्य) आ्र्लम्बनैक्य विरोध माना गया है॥४६॥

Page 413

३६४ दशरूपकम्

त्रयस्त्रिशद्वयभिवारिसाश्चाष्टी स्थायिनः, अष्टौ सात्विकाश्चेत्येकोनपञ्चा- शत्। युकत्या=प्रङ्गत्वेनोपनिबध्यमाना: शृङ्गारं सम्पादयन्ति। आलस्यौग्रयजुगुप्सा- मरणा।दान्येकालम्बनववभावाश्रयत्वेन साक्षादङ्गत्वेन चोपनिबध्यमानानि विरुध्यन्ते । प्रकारन्तरेण चाडविरोधः प्राक् प्रतिपादित एव। ३३ व्यभिचारी भाव, आठ स्थायीभाव तथा आठ सात्विक भाव ये उनचास (४६) भाव है। युक्ति के साथ अरथात् अङ्ग रूप में आ्रकर ये (भाव) भृङ्गार रस को भावित करते हैं। आलस्य, उग्रता, जुगुप्सा और मरणा इत्यादि भावों की यदि एक (अर्थात् रति भाव के) आलम्बन विभाव का ही आश्रय लेकर साक्षात् रूप से या श्रङ्ग रूप से योजना की जाती है तो विरोध हो जाता है। अन्य प्रकार से इनकी योजना करने में तो कोई विरोध नहीं होता; यह पहिले ४.३४) हो बतलाया जा चुका है। टिप्परी-(१) ना० शा० (६.४५ के पश्चात् गद्य तथा ७.१०६ और १०६ से पूर्व का पाठान्तर), का० प्र० (४.२६), भा० प्र० (चतुर्थ अधिकार), ना० द० (३.१६६ ), प्रता० (पृ० १६३), सा० द० (३.१८३-१८६), । (२) ना० शा० में 'आलस्यौग्रयजुगुप्सावर्ज्याः' यह कहा गया है। वहां 'मरणा' को विप्रलम्भ के व्यभि- चारी भावों में भी गिनाया गया है। किन्तु व्याख्याकारों का विचार है कि वस्तुत. मरण का शृङ्गार में वर्न नहीं किया जाता। हां, मरणासन्नता का वर्णन किया जा सकता है। सम्भवतः इसी हेतु दश० में 'मरण' नामक व्यभिचारी भाव को शृङ्गार का विरोधी बतनाया गया है। सा० द० (३.१६३-१६४) में इसकी स्पष्ट व्याख्या की गई है- रसविच्छेदहेतुत्वान्मरणं नैव वर्ण्यते। जातप्रायं तु तद् वाच्यं चेतसा काङ्क्षित तथा। वर्ण्यतेऽपि यदि प्रत्युज्जीवनं स्याददूरतः ॥ (३) स्थायिन एव चाष्टो-आठ स्थायी भावों में से रति तो शृङ्गार के स्थायी भाव के रूप में रहता है और शेष सात भाव इसके सञ्चारी हो जाते हैं। एकोनपञचाशत०-यहां परिपोषयन्ति = सम्पादयन्ति (धनिक) = उद्भावयन्ति ना० शा० १०६)। ये सभी भाव शृङ्गार रस को उदभावित करते हैं। आगे कहे गये ४ भावों को छोड़कर शेष ४५ भाव पृङ्गार रस के उद्भावक हैं। ना० शा० (७.१०६ से पहले) में ६ भाव बतलाये गये हैं क्योंकि वहाँ वर्जित भावों में मरण को नहीं गिना गया। आश्रयाद्वतविरुद्धम् = एकालम्बनविभावाश्रयत्वेन विरुद्धयन्ते (टीका); भाव यह है कि जो प्रमदा आदि रति भाव का आ्रलम्बन होता है उसी को आलम्बन करके आलस्य, उग्रता या घृणा आदि का वर्णन नहीं करना चाहिये। इसका रति भाव से विरोध है। अतः रस-विच्छेद हो जाता है (आलस्यादि च स्व- विभावप्रमदादिविषयमेव निषिद्धम्, अ्भि० भा० पृ० ३०६)। प्रकारान्तरेण = भावान्तरव्यवधानेन (प्रभा), वस्तुतः अन्यालम्बताश्रयत्वेन-दूसरे आलम्बन विभाव का आश्रय लेकर आलस्य आदि का वर्णन किया जा सकता है।

Page 414

चतुर्थः प्रकाश। ३६५

विभागस्तु (शृङ्गारस्य) (५८) अयोगो विप्रयोगश्च सम्भोगश्चेति स त्रिधा। -B अयोगविप्रयोग विशेषत्वाद्विप्रलम्भस्यैतत्सामान्याभिधायित्वेन विप्रलम्भशब्द उप- चरितवृत्तिर्मा भूदिति न प्रयुक्तः, तथा हि-दत्त्वा सङ्कतमप्राप्तेऽवध्यतिक्रमे साध्येन नायिकान्तरानुसराच्च विप्रलम्भशब्दस्य मुख्यप्रयोगो वञ्चनार्थत्वात्। शृङ्गार के भेद- वह (शृङ्गार रस) तीन प्रकार का होता है-अरयोग, विप्रयोग और सम्भोग। विशलम्भ शब्द औपचारिक न हो जाये' इस हेतु से यहाँ दोनों (अयोग+ विप्रयोग) को सामान्य रूप से बतलाने के लिये (दोनों के वाचक रूप में) 'विप्रलम्भ' शब्द का प्रयोग नहीं किया गया। वस्तुतः विशेष प्रकार का अ्योग तथा विप्रयोग ही विप्रलम्भ होता है। जब (किसी स्थान पर जाने का) संकेत देकर नायक वहाँ नहीं पहुँचता (अप्राप्ते), समय की अवधि बीत जाती है और नायक के द्वारा (साध्येन) दूसरी नायिका का अनुसरण कर लिया जाता है, उस अर्थ में 'विप्रलम्भ' शब्द का मुख्यतः प्रयोग होता है; क्योंकि इसका अर्थ है-वञ्चना। टिप्पणी-(१) शङ्गार-भेद के लिये द्र०, ना० शा० तथा अभि० भा० (अ०६, पृ० ३०३), ध्वन्यालोक वृत्ति (२.१३), का० प्र० (४.२६), भा० प्र० (वियोगायोगसंभोगः शृङ्गारो भिद्यते त्रिधा, पृ० ८५), ना० द० (३.१६६), सा० द० (३.१८६), रसगङ्गाधर (१. पृ० १३८) । (२) भा० प्र० तथा दश० के अति- रिक्त प्रायः सभी ने शृङ्गार के दो भेद माने हैं-सम्भोग तथा विप्रलम्भ। सम्भोग के लिये 'संयोग' शब्द का भी प्रयोग किया गया है तथा विप्रलम्भ के लिये वियोग का भी। (३) धनिक की टीका का आशय यह प्रतीत होता है :- प्रश्न उठ सकता है कि आचार्य भरत ने शृङ्गार के दो भेद किये हैं सम्भोग तथा विप्रलम्भ। वहाँ 'विप्रलम्भ' शब्द के द्वारा अयोग तथा विप्रयोग दोनों को कहा गया है फिर धनञ्जय ने ऐसा क्यों नहीं किया। इसके उत्तर में धनिक का कथन है कि वस्तुतः विप्रलम्भ शब्द का अर्थ है वञ्चना। जहाँ किसी नायिका को संकेत देकर भी कोई नायक समय पर नहीं आता और दूसरी नायिका के पास चला जाता है उस वञ्चना को साहित्य शास्त्र में विप्रलम्भ कहते हैं। यही वित्रलम्भ का मुख्य अरथ है। इस प्रकार विशेष प्रकार का अयोग तथा विप्रयोग ही विप्रलम्भ है। सभी प्रकार का (सामान्य) अयोग तथा विप्रयोग तो विप्रलम्भ है नहीं। फिर सभी प्रकार के अयोग तथा विप्र- योग को सामान्य रूप से बतलाने के लिये यदि विप्रलम्भ शब्द का प्रयोग किया जायेगा तो वह मुख्य अर्थ में नहीं होगा अपि तु शपचारिक होगा। किन्तु मुख्य अर्थ के सम्भव होने पर औपचारिक अर्थ में प्रयोग करना दोष माना जाता है। अन्य आचार्यों ने विप्रलम्भ शब्द को पारिभाषिक माना है अतः उन्होंने अयोग तथा वियोग दोनों के लिये इस शब्द का प्रयोग किया है-परस्परानुरक्तयो- रपि विलासिनो: पारतन्त्र्यादेरघटन चित्तविश्लेषो वा विप्रलम्भः (ना०द० ३.१६६)

Page 415

३६६ दशरूपकम्

(५६) तत्रायोगोऽनुरागेडपि नवयोरेकचित्तयोः ॥ ५०॥ पारतन्त्र्येण दैवाद्वा विप्रकर्षादसङ्गमः । योगोऽन्योन्यस्वीकारस्तदभावस्त्वयोगः, पारतन्त्रयेश विप्रकर्षाद्द वपित्राद्याय- त्तत्वात् सागरिकामालत्योर्वत्सराजमाधवाभ्यामिव दैवाद गौरीशिवयोरिवासमागमो- डयोगः । (ग्रन्थ के अनुशीलन से यही आशय प्रतीत होता है, इसके तथ्यातथ्य का निर्णाय विद्वान् स्वयं करेंगे)। (३) अयोगविप्रयोगविशेषत्वात्-क्योंकि विप्रलम्भ तो अयोगविशेष तथा विप्रयोगविशेष होता है। एतत्सामान्याभिधायित्वेन- सामान्य अयोग तथा विप्रयोग के वाचक रूप से। उपचरितवृत्ति :- उपचरिता वृत्ति: यस्य, औपचारिक। विशेष अर्थ का वाचक शब्द सामान्य अर्थ में शपचारिक (लाक्षणिक) हो जाया करता है जैसे 'काकेभ्यो दधि रक्ष्यताम् यहां 'काक' शब्द 'दध्युपघातक' के अर्थ में लाक्षणिगक माना जाता है। साध्येन = नायकेन (प्रभा) । प्योग- उनमें अयोग वह होता है कि जब नवयौवन से युक्त एक चित्त वाले (समान रूप से अनुरक्त) नायक तथा नायिका में अनुराग तो होता है किन्तु दूसरे (माता-पिता आदि) के अधीन होने के कारण या दैववश दोनों एक दूसरे से दूर रहते हैं अतः मिलन नहीं होता ॥ ५०॥ योग का अर्थ है नायक और नायिका द्वारा एक दूसरे को स्वीकार कर लेना। उसका अभाव ही अयोग कहलाता है। पराधीनता के कारण दूर रहने से जो प्रयोग होता है उसका उदाहरण है; जैसे दव (?) तथा पिता आदि के अधीन होने के कारण सागरिका का वत्सराज के साथ तथा मालती का माधव के साथ मिलन नहीं होता। दैववश होने वाला अयोग है, जैसे पार्वती और शिव का (बहुत समय तक) मिलन नहीं होता। टिप्पणी-(१) का० प्र० (४.२६) में अभिलाष-हेतुक विप्रलम्भ के रूप में तथा सा० द० (३.१८८) में पूर्वराग विप्रलम्भ के रूप में अयोग का वर्णन किया गया है। (२) विप्रकर्षात्-दूरी होने से, इसका पारतन्त्रयेण तथा दैवात् दोनों से सम्बन्ध है। दैवपित्राद्यायत्तत्वात्-दैव तथा पिता आदि के अधीन होने से। साग- रिका देवी वासवदत्ता के अधीन है और दैव भी उसके अयोग में निमित्त है ही, इसी प्रकार मालती माता-पिता के अधीन है और दैव भी वहां निमित्त है। दूसरी ओर पार्वती और शिव का अयोग केवल दैववश है, वहां माता पिता आदि निमित्त नहीं। अथवा उदाहरणों से ऐसा प्रतीत होता है कि 'देवीपित्राद्यायत्तत्वात्' यह पाठ रहा होगा (?) ।

Page 416

चतुर्थ: प्रकाश: ३६७

(६०) दशावस्थः स तत्रादावभिलाषोऽथ चिन्तनम् ॥ ५१॥ स्मृतिगु एकथोद्वेगप्रलापोन्मादसंज्दराः। जडता मरणं चेति दुरवस्थं यथोत्तरम् ॥। ५२॥ (६१) अभिलाष: स्पृहा तत्र कान्ते सर्वाङ्गसुन्दरे। दृष्टे श्रते वा तत्रापि विस्मयानन्दसाध्वसाः ॥५३॥ साक्षात्प्रतिकृतिस्वप्नच्छायामायासु दर्शनम्। श्रुतिर्व्याजात्सखीगीत मागधादिगुशस्तुतेः ॥ ५४॥ पयोग शृङ्गार की अररवस्थाएं उस (अयोग) की दश अवस्थाएं होती हैं। उनमें प्रथम अभिलाषा है। फिर (क्रमशः) चिन्तन, स्मृति, गुणकथन, उद्वेग, प्रलाप, उन्माद, संज्वर, जडता और मरण की अवस्थाएं होती हैं। इनमें आगे वाली अवस्था पहली-पहली से दुःखदायिनी होती है ॥५२।। टिप्पणी- (१) वैशिकशास्त्रकारश्च दशावस्थोऽभिहितः, ना० शा० (६. ४५ से आगे गद्य पृ० ३०६, तथा अ० २२), भा० प्र० (पृ० ८५), प्रता० (पृ० १६४) में १२ दशाओं का वर्णन है उनके नाम तथा क्रम में भी भेद है; सा०द० (३. १८६-१६४)। इनके अतिरिक्त रसमञ्जरी आदि साहित्यशास्त्र के ग्रन्थों में तथा कामसूत्र आदि में भी कामदशाओं का वर्णन किया गया है। इन अवस्थाओं का स्वरूप तथा उदाहरण आदि आगे दिखलाते हैं- १. अभिलाष उन (दश अवस्थाओं) में से अभिलाषा वह है जो सर्वाङ्ग-सुन्दर प्रिय का दर्शन होने पर या उसके विषय में सुनकर उसके प्रति इच्छा (चाह) होती है। उसमें विस्मय, आनन्द तथा सम्भ्रम (साध्वस) (ये तीन अनुभाव) हुआ करते हैं। (प्रिय का) दर्शन १. साक्तात् रूप से, २. चित्र में, २. स्वप्न में, ४ छाया में अथवा ५. माया (इन्द्रजाल आदि) में हुआ करता है। उसका श्रवण (श्रुति) १. सखी, २. गीत, तथा ३. मागध आदि द्वारा गुण-कीर्तन से हुआ करता है॥५३-५४॥ टिप्पणी-(१) ना० शा० (२२. १५७-१५८), का० प्र० (४. २६ वृत्ति) में अभिलाषा को विप्रलम्भ के पांच भेदों में दिखलाया है। वहाँ अभिलाष= पूर्वराग=अयोग विप्रलम्भ। भा० प्र० (पृ० ८८), ना० द० (३. १६६ वृत्ति), सा० द० (अभिलाषः स्पृहा ३. १६१)। (२) प्रतिकृतिः=चित्र। व्याजात्=द्वारा (प्रभा), उपाय से, सखीगीतमागधादिगुरास्तुतेः व्याजात-यह अन्वय है, स्तुतेः में षष्ठी विभक्ति है।

Page 417

३६८ दशरूपकम्

अभिलाषो यथा शाकुन्तले- असंशयं क्षत्रपरिग्रहक्षमा यदार्यमस्यामभिलाषि मे मनः । सतां हि सन्देहपदेषु वस्तुषु प्रमाणमन्तःकरणप्रवृत्तयः ॥३०४। विस्मयो यथा- 'स्तनावालीक्य तन्वङ्गयाः शिर: कम्पयते युवा। तयोरन्तरनिर्मग्नां दृष्टिमुत्पाटयन्निव॥३०५ आनन्दो यथा विद्धशालभन्जिकायाम्- 'सुधाबद्धग्रासैरुपवनचकोरैः कवलितां किरञ्ज्योत्स्नामच्छां लवलिफलपाकप्रणयिनीम्। उपप्राकाराग्रं प्रहिणु नयने तर्कय मना- गनाकाशे कोऽयं गलितहरिण: शीतकिरणः ॥३०६॥ साध्वसं यथा कुमारसम्भवे- 'तं वीक्ष्य वेपथुमती सरसाङ्गयष्टि- निक्षेपणाय पदमुद्धृतमुद्धहन्ती। मार्गाचलव्यतिकराकुलितेव सिन्धुः शैलाधिराजतनया न ययौ न तस्थौ।३०७॥

अभिलाष, जैसे अभिज्ञानशाकुन्तल (१.२३) में (कण्व के आश्रम में शकुन्तला को देखकर राजा दुष्यन्त सोचते हैं)-'निस्सन्देह, यह क्षत्रिय के द्वारा ग्रहण करने योग्य है, तभी तो मेरा पवित्र मन इसके प्रति अभिलाषा करता है। सन्देहास्पद विषयों में सज्जनों के अन्तःकरण की प्रवृत्ति ही प्रमाण होती है'। विस्मय, जैसे (?) 'उस कृशाङ्गी के स्तनों को देखकर युवक सिर हिलाने लगता है। मानों उन स्तनों के बीच गड़ी हुई अपनी दृष्टि को उखाड़ रहा हों'। आनन्द, जैसे विद्धशालभञ्जिका (१.३१) में (राजमहल के परकोटे के समीप नायिका के मुख को देखकर नायक कहता है)-'तनिक परकोटे के अग्रभाग पर दृष्टि तो डालो और विचार करो कि आकाश के विना ही, मृग (के लाञछन) से रहित यह कौनसा चन्द्रमा है, जो लवली-फल के पाक में प्रणयिनी (?) अमृत के ग्रसन में तत्पर (?) उपवन के चकोरों द्वारा पान की जाती हुई निर्मल चाँदनी को छिटका रहा है।' :(शीह साध्वस (सम्भ्रम), जैसे कुमारसम्भव (५.८५) में 'उस (शिव) को देखकर पर्वतराज (हिमालय) की पुत्री (पार्वती) का कोमल कृश शरीर काँपने लगा। आगे रखने के लिये उठाये हुए पग को लिये हुए वह मार्ग में पर्वत के आ जाने से क्षब्ध हुई नदी के समान न चल सकी न ठहर सकी'

Page 418

चतुर्थ: प्रकाश:

यथा वा- 'व्याहता प्रतिवचो न सन्दवे गन्तुमैच्छदवलम्बितांशुका। सेवते स्म शयनं पराङ्मुखी सा तथापि रतये पिनाकिन: ॥३०८।।३ (६२) सानुभावविभावास्तु चिन्तादा: पूर्वदर्शिताः गुणकीर्तनं तु स्पष्टत्वान्न व्याख्यातम् । (६३) दशावस्थत्वमाचार्येः प्रायोवृत्त्या निदर्शितम्॥ ५४॥गीह महाकविप्रबन्धेषु दृशयते तदननतता । E5 (37) दिङ्मात्र तु- (६४) दृष्टे श्रुतेऽभिलाषाच्च कि नौत्सुक्यं प्रजायते ॥ ५६॥। सोह अप्राप्तौ किं न निर्वेदो ग्लानिः कि नातिचिन्तनातू। अथवा जैसे (कुमारसम्भव ८.२) 'कुछ कहा जाने पर उत्तर नहीं दिया, का आँचल पकड़ लिया जाने पर चलने के लिये उद्यत हो गई। वह (पार्वती) शथ्या पर दूसरी ओर मुख करके सोई। फिर भी शङ्कर के आनन्द का निमित्त बनी।5ल टिप्पणी-अभिलाषा (=प्राप्त करने की इच्छा) होने पर (i) विस्मय आनन्द तथा (iii) साध्वस (सम्भ्रम) हुआ करते हैं। ये अभिलाषा के अनुभाव हैं। ऊपर (i) 'स्तना०' इत्यादि में कृशाङ्गी के विशाल स्तनों को देखकर युवक के विस्मय का वर्णन है। (ii) 'सुधा०' इत्यादि में नायिका को देखकर नायक के आनन्द का वर्णन है। (iii) (क) 'तं वीक्ष्य' इत्यादि में विवाह से पूर्व शङ्कर को देखकर पार्वती के सम्भ्रम का वर्णन है तथा (ख) 'व्याहृता' इत्यादि में विवाह पश्चात् शङ्कर के समक्ष पार्वती के सङ्कोच का वर्णन किया गया है। इस उदाहरण से यह प्रकट होता है कि अयोग की अभिलाष नामक पवस्था (विवाह के पश्चात् भी) मिलन पर्यन्त रहती है। अनुभाव तथा विभाव सहित चिन्ता आदि तो पहिले ही दिखलाये जा चुके हैं। यहाँ गुणकीर्तन (गुणकथा) की व्याख्या नहीं की गई, क्योंकि वह स्पष्ट ही है। टिप्पणी-पूर्वम्-व्यभिचारी भावों के प्रकरण में (४.६-३३)। गुण- कथा-प्रिय के गुणों का वर्णन। आचार्यों ने (अयोग की) दश ही अवस्थाएं इसलिये दिखलाई हैं कि प्रायः ये ही अवस्थाएं हुआ करती हैं। वस्तुतः महाकवियों की कृतियों में उन अवस्थाओं के अनन्त प्रकार दृष्टिगोचर होते हैं ॥५५॥ केवल दिग्दर्शन के लिये यह बात है- FUR JP

सर प्रिय को देखकर या उस (के गुणों) का श्रवण कर जब अभिलाषा उत्पन्न होती है तो उस अभिलाषा से क्या (मिलन की) उतसुकता नहीं होती, फिर प्रिय के न मिलने पर क्या निर्वेद नहीं होता और अत्यधिक चिन्ता से क्या ग्लानि नहीं हो जाती ? ॥५६॥।

Page 419

३७०३६ दशरूपकम्

शेषं प्रच्छत्कामितादि कामसूत्रादवगन्तव्यम्। 1SF5 अर थ विप्रयोग :- (६५) विप्रयोगस्तु विश्लेषो रूढविस्त्रम्भयोर्द्विघा ॥५७॥ मानप्रवासभेदेन, मानोऽपि प्रसायेर्ष्ययोः। प्राप्तयोरप्राप्तिर्विप्रयोगस्तस्य द्वौ भेदौ-मानः प्रवासश्च। मानविप्रयोगोऽपि द्विविध :- प्रसायमान ईर्ष्यामानश्चेति। (६६) तत्र प्रशायमान: स्यात् *कोपावसितयोद्व थोः ॥ ५८॥ प्रेमपूर्वको वशीकार: प्रणायः, तद्भङ्गो मानः प्रसायमानः स च द्वयोर्नयकयोर्भं-की वति। तत्र नायकस्य यथोत्तररमचरिते- छिपकर प्रेम करना आदि (प्योग की) अवस्थाएं कामसूत्र से जानी जा सकती हैं। टि०-प्रायोवृत्त्या-प्रायः इन्हीं का वर्णन (या व्यवहार) होने के कारण। तदनन्तता-कामावस्था की अ्नन्तता। विप्रयोग जिनका गाढ अनुराग (विस्रम्भ) होता है ऐसे नायक तथा नायिका का पृथक हो जाना (विश्लेष) ही विप्रयोग कहलाता है। यह दो प्रकार का है-मान-विप्रयोग और प्रवास-विप्रयोग। मान भी दो प्रकार का होता है-प्रशाय में और ईर्ष्या में ॥५७॥ एक दूसरे को प्राप्त कर लेने वाले नायक, नायिका का अलग होना ही विप्रयोग है। उसके दो भेद हैं-मान और प्रवास। मानविप्रयोग भी दो प्रकार का होता है-प्रसायमान और ईर्ष्यामान। टिप्पणी-का० प्र० (४.२६ वृत्ति) में अभिलाष, विरह, ईर्ष्या, प्रवास और शाप के हेतु से होने वाला पाँच प्रकार का विप्रलम्भ शृङ्गार बतलाया है। ना०द० (३. १६६) में मान, प्रवास, शाप, ईर्ष्या और विरह-ये पाँच भेद हैं; तथा सा० द० (३, १८७) में पूर्वराग, मान, प्रवास और करुण विप्रलम्भ-ये चार भेद हैं। का० प्र० का अभिलाष तथा सा० द० का पूर्वराग दश० के अयोग के स्थान में रक्खा जा सकता है। (२) रूढविस्रम्भयो :- दृढ अ्परनुराग वालों (नायक-नायिका) का, विस्रम्भ=प्रशाय, 'विस्रम्भ: प्रशयेऽपिच' (अमरकोष)। प्रयमान उनमें नायक, नायिका में से किसी एक या दोनों के कोपयुक्त होने पर प्रराय मान होता है। प्रेम के द्वारा (प्रिय को) वश में करना प्रणाय कहलाता है। उसको भज्ग करने वाला मान प्रसायमान है। वह नायक तथा नायिका दोनों में हुआ करता है। उनमें से नायक का प्रशयमान है, जैसे उत्तररामचरित (३.३७) में- ** कोपावेशितयोः इत्यपि पाठः ।

Page 420

चतुर्थं: प्रकाश: ३७१

'अस्मिन्नेव लतागृहे त्वमभवस्तन्मागंदलेक्षण:ीला (र) सा हंसैः कृतकौतुका चिरमभूद गोदावरीसकते । 6 आयान्त्या परिदुर्मनायितमिव त्वां वीक्ष्य बद्धस्तया कातर्यादरविन्दकुड्मलनिभो मुग्धः प्रणामाञ्जलि: ॥३०६॥ नायिकाया यथा श्रीवाक्पतिराजदेवस्य- 'प्रणायकुपितां दृष्टवा देवीं ससम्भ्रमविस्मित- स्त्रिभुवनगुरुर्भीत्या सद्यः प्रणामपरोऽभवत्। नमितशिरसी गङ्गालोके तया चरणाहता- ववतु भवतस्त्र्यक्षस्यैतद्विलक्षमवस्थितम् ॥३१०॥ उभयो: प्रसायमानो यथा- ns; की

'पराअकुविआाण दोह रावि अलिअपसुत्ताण माणाइन्तारम्। सिच्चलशिरुद्धरीसासदिण्साकण्णाण को मल्लो ।।३११।। ज्ारी निगड निश्चलनिरुद्धनिश्वासदत्तकर्णायो: को मल्लः ।') '(वन देवी वासन्ती राम से कहती है) इसी लतागृह में आप उस (सीता) के आने के मार्ग में दृष्टि लगाये हुए थे, और वह हंसों के साथ कीडा करती हुई गोदावरी के बालुकामय तट पर बहुत समय तक ठहरी रही। जब वह भ्राई तो आपको कुपित सा देखकर उसने कातरतापूर्वक कमल की कली के समान सुन्दर (मुग्ध) प्रणामाञ्जलि बाँधी'। नायिका का प्रसायमान, जैसे श्री वाक्पतिराज देव के पद्य में- कीा देवी (पार्वती) को प्रशाय से कुपित देखकर सम्भ्रम और आश्चर्य से भरे हुए तीनों लोकों के गुरु शिव प्रणाम करने लगे। किन्तु प्रणाम में सिर भुकाये हुए शिव के सिर पर गङ्गा को देखकर पार्वती ने (तया) पाद-प्रहार कर दिया। त्रिलोचन शिव की यह अनोखी (विलक्षम=strange) दशा सापकी रक्षा करे।' दोनों का प्रशायमान, जैसे (गाथा० २७) '(दोनों को प्रसायमान से युक्त देखकर सखियाँ आपस में कह रही हैं) दोनों प्रसाय से कुपित हैं, मानयुक्त हैं, सोने का बहाना कर रहे हैं, बिना हिले-डुले साँस रोके हुए (सोता है या जागता है, यह जानने के लिये) एक दूसरे की ओोर कान लगाये हुए हैं। देखो तो इनमें कौन वीर (मल्ल-पहलवान) है'?Rl (P टिप्परी-(१) भा० प्र० (पृ० ८६), सा० द० (३.१६८-१६६)। (२) भा० प्र० में 'कोपोपहतयोद्व'योः' पाठ है। सा० द० में इसे अधिक स्पष्ट किया गया है। नायक और नायिका के बहुत अधिक प्रेम युक्त होने पर भी यह अकारण कोप हुआ करता है; क्योंकि प्रेम की गति ही निराली है-प्रेम्णः कुटिलगामित्वात्।

Page 421

३७२: दशरूपकम्

(६७) स्त्रीणामीर्ष्याकृतो मान: कोपोऽन्यासङ्गिनि प्रिये।ी। श्रते वाऽनुमिते दृष्टे, श्रुतिस्तत्र सखीमुखात्॥ ५६। उत्स्वप्नायित भोगाङ्कगोत्रस्खलनकल्पितः I5SPTपरयाशाह त्रिधाऽनुमानिको, दष्टः साक्षादिन्द्रियगोचरः ॥६० ॥ ईर्ष्यामान: पुनः स्त्रीणामेव नायिकान्तरसङ्गिनि स्वकान्ते उपलब्धे सति। अन्यासङ्ग: श्रुतो वानुमितो दृष्टो वा स्यात्। तत्र श्रवणं सखीवचनात तस्या विश्वास्यत्वात्। यथा ममैव- 'सुभ्र त्वं नवनीतकल्पहृदया केनापि दुर्मन्त्रिण मिथ्यैव प्रियकारिणा मधुमुखेनास्मासु चण्डीकृता। किं त्वेतद्विमृश क्षणं प्रणायिनामेराक्षि कस्ते हितः कि धात्रीतनया वयं किमु सखी किंवा किमस्मत्सुहृत् ॥३१२॥ ईर्ष्यामान अपने प्रिय को अन्य नायिका में आसक्त सुनकर, अनुमान करके या देखकर जो स्त्रियों को कोप होता है वह ईर्ष्यामान कहलाता है। इनमें से सुनना तो सखी के मुख से होता है। अनुमान तीन प्रकार से हुआ करता है -- स्वप्न की बड़बड़ाहट (उत्त्वप्नायित) से, सम्भोग के चिह्नों (भोगाङ्क) से या भूल से दूसरी नायिका का नाम लेने (गोत्र-स्खलन) से। साक्षात् इन्द्रियों का विषय होने पर देखा हुआ कहा जाता है ।५६-६०॥क तिला्त्रा पफ टिप्पणी-द्र०, भा० प्र० (पृ० ८६), प्रता० (पृ० २००), सा० द० (३. १६६.२००)। अपने प्रिय को किसी दूसरी नायिका में आसक्त जानकर ईर्ष्यामान होता है । वह केवल स्त्रियों को ही हुआ करता है। प्रिय की अन्य नायिका में आ्सक्ति सुनी हुई, अनुमान से जानी गई या आँखों देखी हो सकती है। । ।(१) इनमें से सुनना सखी के वचन से होता है, क्योंकि वह (सखी) विश्वसनीय हुआ करती है। जैसे मेरा (धनिक का) ही पद्य है- '(ईष्यामान से युक्त नायिका से नायक कह रहा है) हे सुन्दर भौहों वाली, तुम मक्खन के समान (मृदु) हृदय वाली हो अतः किसी दुष्ट मन्त्रणण देने वाले, भू ठे ही तुम्हारा हितकारी बनने वाले मीठी बात कहने वाले (मधुमुख) व्यक्ति ने तुम्हें हम पर कुपित कर दिया है। किन्तु क्षणभर को यह तो विचारो कि इन सभी प्रिय जनों में तुम्हारा (सच्चा) हितैषी कौन है, यह धाय की पुत्री, या यह सखी, या हमारे मित्र अथवा हम।' पकटिप्पणणी- यहां सखी-वचन से प्रिय की अन्यासक्ति को सुनकर किये जाने वाले ईष्यामान का वर्णन है। इन शब्दों के द्वारा नायक मानवती को समझा रहा है। क(5 अनुमान से अन्यासक्ति का ज्ञान होने के उदाहरण इस प्रकार हैं :-

Page 422

चतुर्थ: प्रकाश: ४०३७३

उत्स्वप्नायितो यथा रुद्रस्य- 'निर्मग्नेन मयाऽम्भसि स्मरभरादाली समालिद्िताकणर' केनालीकमिदं तवाद्य कथितं राधे मुधा ताम्यसि। इत्युत्स्वप्नपरम्परासु शयने श्रत्वा वचः शाङ्िरा: सव्याजं शिथिलीकृत: कमलया कण्ठग्रहः पातु वः ॥३१३॥ iF

भोगाङ्कानुमितो यथा- 'नवनखपदमङ्ग गोपयस्यंशुकेन स्थगयसि पुनरोष्ठं पाणिना दन्तदष्टम्। (P3) प्रतिदिशमपरस्त्रीसङ्गशंसी विसर्पन् नवपरिमलगन्धः केन शक्यो वरीतुम् ।३१४॥ =FIDy गोत्रस्खलनकल्पितो यथा- 'केलीगोत्तक्खलसे विकुप्पए केअवं अआणन्ती। दुट्ठ उत्रसु परिहासं जात सच्चं विश्र परुण्णा ।३१५॥ ('केलीगोत्रस्खलने विकुप्यति कैतवमजानन्ती। दुष्ट पश्य परिहासं जाया सत्यमिव प्ररुदिता ।।') (क) स्वप्न की बड़बड़ाहट से होने वाला, जैसे रुद्र (?) का पद्य है :- "जल में डुबकी लगाये मैंने काम-वश सखी का आलिङ्गन कर लिया, यह भूठी बात आज किसने तुमसे कह दी। हे राधा, तुम तो व्यर्थ ही कुपित हो रही हो" इस प्रकार स्वप्न की बड़बड़ाहट में शय्या पर सोये विष्णु (कृष्ण) के वचन TE को सुनकर लक्ष्मी (रुक्मणी) ने किसी बहाने से (कृष्ण के) कण्ठग्रहण को शिथिल कर दिया।' (ख) भोग के चिह्न से अनुमित (अन्यासक्ति) यह है, जैसे (माघ ११.३४ कोई नायिका नायक से कहती है)-'नवीन नख-क्षत से युक्त अङ्ग को तो वस्त्र से छिपा रहे हो, दष्ट (कटे) अधर को हाथ से ढक रहे हो। किन्तु अन्य स्त्री के समागम को प्रत्येक दिशा में बतलाने वाला सर्वत्र फैलता हुआ यह नव परिमल गन्ध किस प्रकार छिपाया जा सकता है ?' (ग) गोत्र-स्खलन से अनुमित (अन्यासक्ति), जैसे (हाल ६६७, नाथिका की सखी नायक से कह रही है)-'हे दुष्ट, परिहास में तुम्हारे द्वारा अन्य स्त्री का नाम लिया जाने पर छल-कपट (कैतव) कोन जानने वाली वह वधू (जाया) सचमुच ही रोने लगी। अपने परिहास को देखो तो'। टिप्पशी-(१) उत्स्वप्नायित=स्वप्न की बड़बड़ाहट, उससे प्रिय की अन्यासक्ति का अनुमान होता है, जिससे ई्ष्यामान हुआ करता। 'निर्मग्नेन' इत्यादि में नींद में बड़बड़ाते हुए कृष्ण राधा से कह रहे हैं। उनके कथन को सुनकर कमला कृष्ण की राधा में आसक्ति का अनुमान करती है। यही ईर्ष्यामान का निमित्त है। (२) भोगाङ्गानुमित=भोग के चिह्नों से अनुमित अन्यासक्ति, उसके

Page 423

Fe ३७४ कव दशरूपकम्

दृष्टो यथा श्रीमुञ्जस्य- 'प्रायकुपितां दष्टवा देवीं ससम्म्रमविस्मित- स्त्रिभुवनगुरुर्भीत्या सद्य: प्रणामपरोऽभवत्। नमितशिरसो गङ्गालोके तया चरणाहता- 1159 ववतु भवतस्त्र्यक्षस्यैतद्विलक्षमवस्थितम् ॥३१६१ एषाम्- (६८) यथोत्तरं गुरु: षडि्भरुपायैस्तमुपाचरेत्। साम्ना भेदेन दानेन नत्युपेक्षारसान्तरैः ॥६१॥ एषाम्=श्र तानुमितहृष्टान्यसङ्गप्रयुक्तानामुक्तानां मानानां मध्ये उत्तरोत्तरं मानो गुरु := क्लेशेन निवार्यो भवतीत्यर्थः । तम्=मानम् । उपाचरेत्=निवारयेत्।

द्वारा ईर्ष्यामान होता है। द्र० नवनख० इत्यादि। (३) गोत्रस्खलन०=गोत्र-स्खलन द्वारा अनुमित; भूल से अन्य नायिका का नाम ले देना गोत्र-स्खलन कहलाता है। उससे अन्यासक्ति का अनुमान हो जाता है जिससे ईर्ष्यामान हुआ करता है (द० केली इत्यादि)। (३) प्रत्यक्ष से देखा गया (हृष्ट), जंसे श्री मुञ्ज (?) का पद्य है- 'प्रएयकुपिताम' इत्यादि (उपर, उदा० ३१०)।

टिप्पणी-दृष्टः-अन्य नायिका में आसक्त देखा गया, उससे ईर्ष्यामान हुआ करता है। प्रशयकुपिताम०=यहां पहिले तो पार्वती प्रशाय-मान से युक्त थीं, बिना कारगा के ही रूठ बैठी थीं अतः छन्द के पूर्वाद्ध में प्रशायमान का वर्णन है। किन्तु जब प्रणाम करते हुए शिव के सिर पर पार्वती ने अपनी सपतनी गङ्गा को देख लिया तो पार्वती में ईर्ष्यामान उत्पन्न हो गया। इस प्रकार छन्द का उत्तरार्ध ईर्ष्यामान का उदाहरण है। इन (श्रुत, अनुमित तथा हृष्ट अन्यासक्ति से होने वाले ईर्ष्या मानों) में- क्रमशः पूर्ववर्ती की अपेक्षा उत्तरवर्ती (उत्तरोत्तर) अधिक कष्टसाध्य (गुरु) हुआ करता है। इन मानों का ६ उपायों के द्वारा प्रतिकार करना चाहिये-साम, भेद, दान, प्रणति, उपेक्षा तथा अन्य रस (रसान्तर)। इनमें अर्थात् सुनी गई, अनुमान से जानी गई तथा देखी गई अन्यासक्ति के द्वारा होने वाले मानों में बाद-बाद वाला (पहले-पहले की अपेक्षा) भारी (गु) अर्थात् कठिनाई से दूर करने योग्य हुआ करता है। तम (उसको) का अर्थ है-मान को। उपाचरेत्' का अर्थ है-निवारण करे, दूर करे।

Page 424

चतुर्थ: प्रकाश: ३७५

(६६) तत्र प्रियवचः साम, भेदस्तत्सख्युपार्जनम्। दानं व्याजेन भूषादे:, पादयोः पतनं नतिः ॥ ६२॥ सामादौ तु परित्षीये स्यादुपेक्तावधीरएम रभसत्रासहर्षादेः कोपभ्रशो रसान्तरम् ॥ ६३ ॥2म कोपचेष्टाश्च नारीखं प्रागेव प्रतिपादिता: तत्र प्रियवच: साम यथा ममैव- 'स्मितज्योत्स्नाभिस्ते धवलयति विश्व मुखशशी दृशस्ते पीयूषद्रवमिव विमुञ्चन्ति परितः । वपुस्ते लावण्यं किरति मधुर दिक्षु तदिदं S FEINe FIS कुतस्ते पारुष्यं सुतनु हृदयेनाद् गुणितम् ।३१७॥ यथा वा- 'इन्दीवरेण नयनं मुखमम्बुजेन कुन्देन दन्तमधरं नवपल्लवेन। इनमें प्रिय वचन कहना साम कहलाता है। उस (नायिका) की सखियों को अपनी ओर मिला लेना (उपार्जन) भेद है। किसी बहाने आरभूषए आदि देना दान कहलाता है और चरणों में गिरना नति (प्रणति) है। साम आदि (चार उपायों) के विफल (चीरा) हो जाने पर (नायिका के प्रति) उदासीनता रखना उपेक्षा है। रभस (उद्विग्नता, शीघ्रता, जल्द- बाजी), भय तथा हर्ष आदि से (नायिका के) कोप का नाश हो जाना ही रसान्तर (अन्य रस का आ जाना) कहलाता है। नारियों को जो कोप- चेष्टाएं हुआ करती हैं, उनका तो पहले ही प्रतिपादन किया जा चुका है। टिप्पणी-(१) ना० शा० (२३. ६२-६५), भा० प्र० (पृ० ८६), सा०द० (३. २०१-२०३) इत्यादि । (२) रसान्तर-अ्न्य भाव का उत्पन्न हो जाना, अक्रस्मात् किसी भय, हर्ष आदि का प्रसङ्ग आ जाने से नायिका का कोप दूर हो जाया करता है (द्र०, आगे उदा० ३२३)। प्रागेव-पहिले ही (दश० २.२५, २६, २८)। प्रिय वचन कहना साम है, जैसे मेरा (धनिक का) ही पद्य है-(कोई नायक नायिका की मनौती करता हुआ कहता है) 'हे सुन्दर शरीर वाली (सुतनु), तेरा मुख-चन्द्र अपनी मुसकराहट रूपी चन्द्रिका से विश्व को धवलित कर रहा है, तेरी दृष्टियां चारों ओर अमृत रस सा बरसा रही हैं, तेरा शरीर समस्त दिशाओं में मधुर लावण्य बिखेर रहा है। फिर आज तेरे हृदय ने यह कठोरता कहाँ से बटोर ली है' ? अथवा जैसे (शृङ्गारतिलक ३) 'हे प्रिया, विधाता ने नीलकमल द्वारा तुम्हारे नेत्रों को बनाया है, लाल कमल द्वारा मुख को, कुन्द पुष्पों से बाँतों को, नई (लाल) कोपल से अधर को और चम्पा की पंखुड़ियों से भ्रङ्गों को बनाया है। फिर हृदय को पाषाण से क्यों बना दिया' ?

Page 425

ग३७६ : दशरूपकम्

अङ्गानि चम्पकदलैः स विधाय वेधा: किक (33) I कान्ते कर्थ रचितवानुपलेन चेतः ॥३१८॥ नायिका सखीसमावर्जन भेदो यथा ममैव- 'कृतेऽप्याज्ञाभङ्गे कथमिव मया ते प्रणतयो धृता: स्मित्वा हस्ते विसृजसि रुषं सुभ्र बहुशः । प्रकोप: कोऽप्यन्यः पुनरयमसीमाद्य गुणितो वृथा यत्र स्निग्धा: प्रियसहचरीखामपि गिर: ॥३१६॥ दानं व्याजेन भूषादेर्यथा माधे- 'मुहुरूपहसितामिवालिनाद- वितरसि नः कलिकां किमर्थमेनाम् । अधिरजनि गतेन धाम्नि तस्या: शठ कलिरेव महांस्त्वयाऽद्य दत्तः ॥३२०॥ पादगो: पतनं नतिर्यथा- छिक्ी'रोउरकोडिविलग्गं चिहुरं दइअस्स पाअपडिअस्स । हिश्ं माणपउत्थ उम्मोअं त्ि च्चि्र कहेइ ।।३२१।। (नूपुरकोटिविलग्न चिकुर दयितस्य पादपतितस्य। हृदयं मानपदोत्थमुन्मुक्तमित्येव कथयति ॥) नायिका की सखियों को अपनी ओर मिला लेना भेद कहलाता है, जैसे मेरा (धनिक का) ही पद्य है- (नायक नायिका से कह रहा है) 'हे सुन्दर भौहों वाली, अनेक बार आ्राज्ञा का भङ्ग करके भी जब मैं तुम्हारे सामने नत हो जाता था तो तुम मुसकरा कर मुझे हाथ से उठाकर कोप को छोड़ देती थीं। किन्तु आज यह कैसा (अनोखा) असीमित कोप तुमने धारण किया है, जिस पर प्रिय सखियों के स्नेह पगे वचन भी व्यर्थ हो रहे हैं। किसी बहाने से आभूषण आदि देना ही दान है, जैसे माघ (७.५५) में- (कोई मानवती नायिका नायक से कहती है) 'जिसका मानों भ्रमरों के गुञ्जार से बार-बार उपहास किया जा रहा है, उस कलिका (छोटी सी कली) को हमें क्यों दे रहे हो ? हे शठ, उस (नायिका) के घर रात्रि में जाकर आज तुमने बड़ी कलि (१. क्लेश २. कली) ही हमें दे दी है'। (नायिका के) चरगों में गिरना नति कहलाती है, जैसे (गाथा १८८)- प्रिया के चरों में गिरे हुए प्रियतम के केश उसके नूपुरों के कोनों में लगे हैं। वे मानों यह कह रहे हैं कि मान की अवस्था से उठा हुआ हृदय उन्मुक्त हो गया है (?)' ।

Page 426

चतुथँ। प्रकाश: २३७७

उपेक्षा तदवधीरणं यथा- 'कि गतेन नहि युक्तमुपैतु नेश्वरे परुषता सखि साध्वी।IBRIF आ्र््रानयैनमनुनीय क्थं वा विप्रियाणि जनयन्ननुनेय: ।३२२॥ रभसत्रासहषदि रसान्नरातकोपभ्रशो यथा ममैव- अभिव्यक्तालीकः सकलविफलोपायविभव- श्चिरं ध्यात्वा सद्यः कृतकृतकसंरम्भनिपुरम् । इतः पृष्ठे पृष्ठे किमिदमिति सन्त्रास्य सहसा कृताश्लेषां धूर्तः स्मितमधुरमालिङ्गति वधूम्॥३२३॥ अथ प्रवासविप्रयोग :- (७०) कार्यतः सम्भ्रमाच्छापात्प्रवासो भिन्नदेशता॥६४॥

(७१) स च भावी भवन् भूतस्त्रिघाद्यो बुद्धिपूर्वक: ॥ ६५॥ उपेक्षा का अर्थ है उस (नायिका) के प्रति उदासीनता, जंसे (?)- [ जब बार-बार मनाने पर भी नायिका नहीं मानती तो नायक उपेक्षा करके चला जाता है, इस पर पश्चात्ताप करती हुई नायिका सखी से कहती है] 'हे सखी, उसके पास जाने से क्या (लाभ) ? जाना ठीक नहीं है। किन्तु स्वामी के प्रति कठोरता भी ठीक नहीं, तुम उसको अव्वनय करके ले आओ। अ्थवा (छोड़ो) अप्रिय कार्य करने वाले व्यक्ति से अनुनय भी कसे किया जा सकता है ?' शीघ्रता, भय तथा हर्ष आदि अन्य भाव (रस) की उत्पत्ति के कारण RU कोप का नाश हो जाता है, जैसे मेरा (धनिक का) ही पद्य है-अभिव्यक्तालीकः' इत्यादि (ऊपर २.५०, उदा० १७६) । प्रवास-विप्रयोग अब प्रवास-विप्रयोग का स्वरूप बतलाते हैं :- किसी कार्य से, संभ्रम (घबराहट) से या शाप से दोनों (नायक और नायिका) का अलग-अलग प्रदेश में रहना ही प्रवास कहलाता है। उसमें अश्रुपात, निःश्वास, दुर्बलता, बालों का बढ़ जाना इत्यादि (अनुभाव) हुआ करते हैं।। ६४-६५।। टिप्पसी-(१) सर० क० (परिच्छेद ५), का० प्र० (४,२६), भा० प्र० (पृ० ८६), ना० द० (३.१६६), प्रता० (पृ० २०१), सा०द० (३. २०४-२०५)। (२) का० प्र० तथा ना० द० में प्रवास और शाप को भिन्न-भिन्न माना गया है। भा० प्र० तथा सा० द० का निरूपण प्रायः दश० के समान ही है। (३) प्रवास से होने वाले वियोग में नायिका प्रोषितप्रिया या प्रोषितपतिका कहलाती है। इनमें से प्रथम (कार्य से होने वाला) प्रवास बुद्धिपूर्वक (समभ- बूझ कर) होता है। वह तीन प्रकार का है-आगे होने वाला (भावी), वर्तमान समय का (भवन्) और बीता हुआ (भूत) ॥६५॥

Page 427

० ३७८ दशरूपकमू

आद्यः कार्यज: समुद्रगमनसेवादिकार्यवशप्रवृत्तौ बुद्धिपूर्वकत्वाद भूतभविष्यद्वतं- मानतया त्रिविधः । तत्र यास्यत्प्रवासो यथा-

पुच्छन्ती भमइ घरं घरेसु पिश्रविरहसहिरीआ॥३२४ (भविष्यत्पथिकस्य जाया आयुःक्षराजीवधारणरहस्यम्। पृच्छन्ती भ्रमति गृहाद् गृहेषु प्रियविरहसहीका ।) गच्छत्प्रवासो यथाऽमरुशतके- 'प्रहरविरतौ मध्ये वाऽह्रस्ततोऽपि परेऽथवा दिनकृति गते वास्तं नाथ त्वमद्य समेष्यसि। IER PR

इति दिनशतप्राप्यं देशं प्रियस्य यियासतो हरति गमनं बालालापैः सबाष्पगलजलै: ।३२५।। यथा वा तत्रव- 'देशैरन्तरिता शतश्च सरितामुर्वीभृतां काननै- र्यत्नेनापि न याति लोचनपर्थं कान्तेति जानन्नपि। उद्ग्रीवश्चरणार्धरुद्धवसुध: कृत्वाऽश्र पूर् दशो तामाशा पथिकस्तथापि किमपि ध्यात्वा चिर तिष्ठति ।३२६।। प्रथम=कार्य से होने वाले प्रवास में समुद्र-यात्रा तथा सेवा (नौकरी) आदि कार्य के लिये बुद्धिपूर्वक प्रवृत्ति होती है, अतः वह तीन प्रकार का होता है- मूख्ष, भविष्यत् तथा वर्तमान। उनमें से भविष्य में जाने वाले (पुरुष) का प्रवास है, जैसे (गाथा० ४७)- 'यात्रा के लिये उद्यत पथिक की पत्नी प्रियतम के विरह की आशङ्गा (ह्ीका=भय) से युक्त होकर (विरहकालीन) आयुके क्षणों में कैसे जीवन धारण किया जाता है, इस रहस्य को पूछती हुई घर-घर घूम रही है। (वर्तमान काल में) जाते हुए (पुरुष) का प्रवास यह है, जैसे अमरुशतक (१२)-(परदेश जाते हुए प्रिय से प्रिया कहती है) 'हे प्रिय, एक पहर बीतने पर या मध्याह्न में या उसके बाद अथवा सूर्य के अस्त हो जाने तक तो तुम आज यहाँ लौट आध्रोगे न ? बाला इस प्रकार की अपनी बातों से सौ दिन में पहुँचने योग्य देश को जाने के इच्छुक प्रिय का जाना रोक रही है'। अथवा जैसे वहाँ (भमरुशतक ६६) ही- (किसी विरही पुरुष का वर्णन है)-'प्रिया सैकड़ों प्रदेशों, नदी तथा पर्वतों के जङ्गलों से अन्तहित है, वह यत्न करने पर भी दृष्टिपथ में नहीं श्रा सकती, यह बात पथिक जानता है; तथापि वह गर्वन उठाकर, आाधे पग से सूमि को रुद्ध करके, नेत्रों को अश्रुयुक्त करके, उस दिशा की ओर कुछ सोचकर (देखकर) खड़ा है'।

Page 428

चतुर्थ: प्रकाश: ०=३७६

गतप्रवासो यथा मेघदूते- 'उत्सङ्ग वा मलिनवसने सौम्य निक्षिप्य वीणां मद्गोत्राङ्कं विरचितपद गेयमुद्गातुकामा। तन्त्रीमारद्रा नयनसलिलै: सारयित्वा कर्थचिद् भूयो भूय: स्वयमपि कृतां मूर्च्छनां विस्मरन्ती ॥३२७।

क मेव युक्तम्। आगच्छदागतयोस्तु प्रवासाभावादेष्यत्प्रवासस्य च गतप्रवासाऽविशेषात्त्रैविध्य- (७२) द्वितीय: सहसोत्पन्नो दिव्यमानुषविप्लवात्

देकरूप एव संभ्रमज: प्रवासः। यथोवशीपुरूरवसोविक्रमोर्वश्यां यथा च कपालकुण्ड- लापहृतायां मालत्यां मालतीमाधवयोः । (सूतकाल में) चले गये (पुरुष) का प्रवास यह है, जैसे मेघदूत (उत्तरमेघ २३) पे-(यक्ष मेघ से कह रहा है) 'अथवा, हे सौम्य, मलिन वस्त्रों वाले श्रङ्क में वीखा रखकर मेरे नाम से युक्त रचे गये पदों वाले गीत को गाने की इच्छुक, किन्तु नेत्र-जल से गीले तार को किसी प्रकार ठीक करके बार-बार स्वरचित मूर्च्छना को भी भूलती हुई (मेरी प्रिया तेरी दृष्टि में पड़ेगी)'। (प्रियतम) लौटकर यारहा हो (भागच्छत्) या आ गया हो (आगत) तब तो प्रवास ही नहीं रहता। और, जब (प्रियतम) लौटकर आने वाला हो (एष्यत्) तब तो गतप्रवास से कोई भेद नहीं होता। इसलिये (प्रवास विप्रयोग को) तीन प्रकार का मानना ही युक्तियुक्त है। टिप्पणी-(१) भा० प्र० (पृ० ८६). सा० द० (३.२०८, ।(२) विद्या, धन या धर्म आदि का संग्रह करना ही कार्य है। उसके लिये विचारपूर्वक देशान्तर गमन ही कार्य-प्रवास कहलाता है। यदि कार्य के लिये देशान्तर गमन हो चुका हो तो गतप्रवास, कार्यार्थ बाहर जाते हुए पुरुष का गच्छत्प्रवास तथा जो अभी आगे जाने वाला है उसका यास्यात् प्रवास कहलाता है। (३) कुछ (?) साहित्यशास्त्रियों ने आगच्छन् प्रवास, आगतप्रवास तथा एष्यत्प्रवास भी माने थे। उनके मत का निराकरण करते हुए धनिक ने बतलाया है कि इनमें से पहिले दो तो प्रवास ही नहीं हैं। जब प्रियतम लौटकर आ रहा है या आ गया है तो उसका प्रवास कहाँ रहा ? हां, प्रियतम लौटकर आने वाला है तब प्रयास अवश्य है; किन्तु उसका गतप्रवास में ही अन्तर्भाव हो जाता है। सम्भ्रम से होने वाला प्रवास द्वितीय अरथात् सम्भ्रम से उत्पन्न होने वाला प्रवास वह है, जो दैवी या मनुष्यकृत उपद्रवों से सहसा (यकायक) हो जाता है। हर भूकम्प आदि आपत्तियाँ (उत्पात), बिजली गिरना (निर्घात), आाँधी (वात) इत्यादि से उत्पन्न होने वाले (दिव्य) उपद्रव के कारण अथवा शत्रु द्वारा घेरा डालना (चक्र) आदि से उत्पन्न होने वाले (मानुष) उपद्रव के कारण होने वाला संभ्रमजन्य प्रवास एक प्रकार का ही होता है; क्योंकि वह सभी शबुद्धिपूर्वक

Page 429

दशरूपकम्

(७३) स्वरूपान्यत्वकरणाच्छ्रापजः सन्निधावपि ॥ ६६॥ यथा कादम्बर्यां वैशंपायनस्येति। (७४) मृते त्वेकत्र यत्रान्यः प्रलपेच्छोक एव सः। *वयाश्रयत्वान्न शृङ्गारः, प्रत्यापन्ने तुनेतरः ॥ ६७ ॥ यथेन्दुमतीमरणादजस्य करुण एव रघुवंशे, कादम्बर्या तु प्रथम करुण आका- शसरस्वतीवचनादूध्वं प्रवासशृङ्गार एवेति। (पूर्व विचार के विना ही, सहसा) हुआ करता है। जैसे विक्रमोवेशीय नाटक में उर्वशी और पुरूरवा का (दैवी उपद्रव से किया गया) तथा मालतीमाधव में कपालकुण्डल द्वारा मालती का हरण कर लिया जाने पर मालती और माधव का (मनुष्यकृत उपद्रव से किया गया) प्रवास होता है। टिप्पणी-(१) भा० प्र० (पृ० ८६), सा०द० (३. २०८ से आगे गद्य)। (२) संभ्रम का अर्थ है-घबराहट, आवेग। यह देवी या मानवीय उपद्रवों से उत्पन्न हुआ करता है। और, उससे नायक या नायिका दूसरे प्रदेश में चले जाते हैं तथा प्रवास हो जाता है। शाप से होने वाला प्रवास नायक तथा नायिका दोनों के समीप रहने पर भी जो स्वरूप बदल जाने के कारण देशान्तर गमन (का भान) 'होता है, वह शापज प्रवास है ॥। ६६ ।। जैसे कादम्बरी में वैशम्पायन का प्रवास है। टिप्पणी-(१) भा० प्र० (पृ० ८६), सा० द० (३. २०८ से आगे गद्य) इत्यादि (२) दश० का शापज प्रवास का लक्षण अपूर्ण सा प्रतीत होता है। वस्तुतः शाप के कारण जो नायक या नायिका का देशान्तरगमन है वही शापज प्रवास है। मेघदूत में यक्ष का प्रवास इसका उदाहरण है। इसी लक्षण के अनुसार कादम्बरी में वैशम्पायन का प्रवास भी शापज प्रवास होगा, क्योंकि स्वरूप बदल जाने के कारण समीप में स्थित होता हुआ भी वैशम्पायन देशान्तर में गया सा ही प्रतीत होता है। प्रवास-विप्रयोग तथा करुण का अ्र्न्तर (नायक; नायिका मैं से) एक के मर जाने पर जहाँ दूसरा विलाप करता है, वहाँ तो करुण (शोक) रस ही होता है, शृङ्गार नहीं; क्योंकि वहाँ शृङ्गार का आरलम्बन (आश्रय) ही समाप्त हो चुका होता है और यदि पुनर्जीवित हो जाता है तो करुण (इतरः) नहीं होता (अपि तु शृङ्गार ही होता है) ॥ ६७ ॥ जंसे रघुवंश में इन्दुमती की मृत्यु पर अ्रज का विलाप करुण ही है (प्रवास- विप्रयोग नहीं)। कादम्बरी में भी पहिले तो पुण्डरीक के (परलोक गमन पर) करुण ही है। आकाशवाणी होने के पश्चात् वहाँ प्रवास-विप्रयोग (शृङ्गार) ही है। *नराश्रयात्' इत्याप पाठः ।

Page 430

चतुर्थ: प्रकाशः ३५१

टिप्पणी-(१) सर० क० (परि० ५), भा० प्र० (पृ० ८६-८७), सा० द० (३. २०६)। रसासवसुधाकर (उल्लास २) इत्यादि। (२) कुछ आचार्य करुण-विप्रलभ्भ नामक पृथक् भेद मानते हैं। भोजराज का कथन है- भावो यदा रतिर्नाम प्रकर्षमधिगच्छति। नाधिगच्छति चाभीष्टं विप्रलम्भस्तदोच्यते। पूर्वरागो मानश्च प्रवासः करुणश्च सः । पुरुषस्त्रीप्रकाण्डेषु चतुःकाण्डः प्रकाशते ॥ (सर० क० परि० ५) रसार्णवसुधाकर (उल्लास २) में इसे करुण का भ्रम उत्पन्न करने वाला (करुण सा भासित होने वाला) वियोग शृङ्गार बतलाया है- द्वयोरेकस्य मरणो पुनरुज्जीवनावधौ। विरहः करुणोऽन्यस्य सङ्गमाशानिवर्तनः । उडी ती 7 करुण भ्रमकारित्वात् सोयं करुण उच्यते।। सा०द० [३.२०६] में करुणविप्रलम्भ का कुछ अधिक विशद विवेचन है- यूनोरेकतरस्मिन् गतवति लोकान्तरं पुनर्लभ्ये। विमनायते यदकस्ततो भवेत् करुणविप्रलम्भाखय: ॥ इस प्रकार नायक और तायिका में से किसी एक के परलोक चले जाने पर किन्तु पुनः [इसी जन्म में] मिलन की आशा होने पर जो दूसरा शोक करता है वहाँ [रति भाव का मिश्रण होने से] करुण विप्रलम्भ होता है। यदि परलोक गये व्यक्ति के फिर मिलने की आशा नहीं रहती अथवा दूसरे जन्म में मिलने की आशा होती है तो करुण ही होता है। सा० द० के अनुसार कादम्बरी में पुण्डरीक और महाश्वेता के वृत्तान्त में करुणविप्रलम्भ है। F इस सन्दर्भ में दशरूपककार का मन्तव्य है कि पुण्डरीक तथा महाश्वेता के वृत्तान्त में आकाशवाणणी से पूर्व करुण ही है, क्योंकि वहाँ रतिभाव का आलम्बन ही समाप्त हो जाता है अतः रति भाव का उद्भव ही नहीं हो सकता। हाँ, आकाश वारी होने पर महाश्वेता के हृदय में पुण्डरीक के पुनर्मिलन की आशा हो जाती है अतः रतिभाव का उद्भव होता है तथा वहाँ विप्रयोग नामक शङ्गार है, जिसका शार्पजन्य प्रवास में अ्न्तर्भाव हो जाता है। इस प्रकार दशरूपक के अनुसार करुण- विप्रलम्भ नाम का कोई एक रस नहीं होता। सा० द० [३. २०६ वृत्ति] मैं 'इत्यभियुक्ता मन्यन्ते' कहकर दश० के मत को प्रस्तुत किया गया है। [३]व्याश्रयत्वात्-आलम्बन रूप आश्रय के न रहने से। एक के मरण के बाद आलम्बन के समाप्त हो जाने से रति भाव का उद्भव नहीं हो सकता है। किन्तु शोक का आलम्बन तो 'इष्टनाश' होता है अतः करुणा हो सकता है। प्रत्यापन्ने=पुनरुज्जीविते, फिर जीवित हो जाने पर, फिर जीवित होने की भाशा हो जाने पर तो रति भाव हो सकता है।

Page 431

३८२= दशरूपकम्

तत्र नाथिकां प्रति नियम :- आ(७५) प्रसायायोगयोरुत्का, प्रवासे प्रोषितप्रिया। कलहान्तरितेर्ष्यायां विप्रलब्धा च खसिडिता ॥ ६८॥ पथ संभोग :- (७६) अनुकूलौ निषेवेते यत्रान्योन्यं विलासिनौ। दर्शनस्पर्शनादीनि स संभोगो मुदान्वितः ॥६६।। यथोत्तररामचरिते- 'किमपि किमपि मन्दं मन्दमासत्तियोगा- दविरलितकपोलं जल्पतोरक्रमेरा। को सपुलकपरिरम्भव्यापृतकैकदोष्णो- रविदितगतयामा रात्रिरेव व्यरंसीत् ।३२८।। उन (प्रयोग तथा विप्रयोग के मेदों) में नायिका (की अवस्था) के विषय में यह नियम है- प्रशायमान (विप्रयोग) में तथा अयोग में उत्किएठता (विरहोत्क- सिठता) नायिका होती है, प्रवास-विप्रयोग में प्रोषितप्रिया, ईर्ष्यामान (से होने वाले विप्रयोग)में कलहान्तरिता, विप्रलब्धा और खसिडता नायिका होती है।। ६८ ।। ापा टिप्पणी -- ऊपर [२.२३-२७] नायिका की आठअवस्थाएं बतलाई गई हैं। उनमें ही उत्कण्ठिता इत्यादि प्रकार हैं। सम्भोग शृङ्गार वह आनन्दपूर्ण अवस्था सम्भोग शृङ्गार है, जब दो विलासी जन अनुकूल होकर परस्पर दर्शन, स्पर्श आदि का उपभोग करते हैं ॥ ६६ ॥ टिप्पणी-(१) ना० शा० तथा अभि० भा० (६. ४५ के बाद गद्य), ध्वन्यालोक तथा लोचन (२. १२ वृत्ति), कॉ० प्र० (४, २६वृत्ति), भा० प्र० (पृ० ८७), ना० द० (३. १६६), प्रता० (पृ० १६६), सा० द० (३.२१०-२१३), रसगङ्गाधर (१ पृ० १३८)। (२) प्राथः सभी ने इसे सम्भोग शृङ्गार नाम से कहा है किन्तु रसगङ्गाधर तथा वाग्भटालङ्कार में संयोग नाम से कहा गया है। क जंसे, उत्तररामचरित (१.२७) में 5 (राम सीता से कह रहे हैं कि हे सीता, तुम्हें याद है यह वही स्थल है जहाँ) 'एक दूसरे के साथ कपोलों को सटाये धीरे धीरे बिना किसी क्रम के कुछ बातें करते हुए, अपने एक-एक बाहु को गाढ आ्लिङ्गन में लगाये हुए हम दोनों की वह रात्रि बीत गई थी, उसके बीतते हुए प्रहरों का पता ही न चला था।'।

Page 432

चतुर्थ: प्रकाश: ३८३

अथवा। 'प्रिये किमेतत्- विनिश्चेतु शक्यो न सुखमिति वा दुःखमिति वा प्रमोहो निद्रा वा किमु विषविसर्पः किमु मदः । तव स्पर्शे स्पर्शे मम हि परिमूढेन्द्रियगणो विकार: कोऽप्यन्तर्जडयति च तापं च कुरुते ॥३२६॥ यथा च ममैव- (१s.3) 'लावण्यामृतवर्षिशि प्रतिदिशं कृष्णागुरुश्यामले वर्षागामिव ते पयोधरभरे तन्वद्गि दूरोन्नते। किस नासावंशमनोज्ञकेतकतनुभ्र पत्रगर्भोल्लसत्- पुष्पश्रीस्तिलकः सहेलमलकभृ ङरिवापीयते ॥३३०॥ ('७) चेष्टास्तत्र प्रवर्तन्ते लीलाद्या दश योषिताम्। दात्िए्यमार्दवप्रेम्णामनुरूपा: प्रियं प्रति ॥ ७० ॥ ताश्च सोदाहृतयो नायकप्रकाशे द्शिताः । (७८) रमयेच्चाटुकृत्कान्तः कलाक्रीडादिभिश्च ताम्। LIRIEFgन आ्रम्यमाचरेत्किंचिन्नमभ्र शकरं न च ॥ ७१॥ ग्राम्य: सम्भोगो रङ्ग निषिद्धोऽपि काव्येऽपि न कर्तव्य इति पुननिषिध्यते। अथवा-प्रिया, यह क्या है ? विनेश्चेतुम् इत्यादि (उत्तर० १.३५; ऊपर उदा० २५६) । और, जैसे मेरा (धनिक का) ही पद् है- (कोई नायक, नायिका के सौन्दर्य का वर्णन करता है) 'हे कृशाङ्गी, वर्षा ऋतु की घनघटा के समान प्रत्येक दिशा में अ्रमृत बरसाने वाला, काले अगरु (की पत्र-रचना) से श्यामल तुम्हारा स्तन-भार अत्यधिक उभर आया है। उसके उभर आने पर तुम्हारे नासिका-वंश (उठा हुआ अस्थि भाग) रूपी सुन्दर केतकी के भौँहों रूपी पत्तों में से निकलते हुए पुष्प की शोभा वाले तिलक का तुम्हारे केश- रूपी भ्रमरों द्वारा पान किया जा रहा है। सम्भोग भृङ्गार की चेष्टाएँ उस (सम्भोग शृङ्गार) में युवतियों की प्रिय के प्रति लीला आ्ररदि दश चेष्टाएं हुआ करती हैं, जो दाक्िएय, मृदुता तथा प्रेम के अनुरूप होती हैं॥। ७० ।।

दिखला दी गई हैं। वे चेष्टाएँ उदाहरण सहित नायकविषयक द्वितीय प्रकाश (३०-४२) में

नायक को प्रिय वचन कहते हुए (काम-सम्बन्धी) कला तथा क्रीडा आदि के द्वारा उस (नायिका) के साथ रमण करना चाहिये। कोई भी ग्राम्य या नर्म को भ्रष्ट करने वाला आचरय न करना चाहिये । ७१ ॥ -ग्राम्य समभोग का रगमञ्य पर (दिखलाने का) तो निषेध किया ही जा चुका है। यहाँ फिर इसलिये निषेध किया जा रहा है कि काव्य में भी इसका बर्णन न करना चाहिये।

Page 433

३८४ दशरूपकम्

यथा रत्नावल्याम्- 'स्पृष्टस्त्वर्यष दयिते स्मरपूजाव्यापृतेन हस्तेन। उद्धिन्नापरमृदुतरकिसलय इव लक्ष्यतेऽशोक: ॥३३१।। इत्यादि। नायकनायिकाकेशिकीवृत्तिनाटकनाटिकालक्षणणाद्युक्त कविपरम्परावगतं स्वय- मौचित्यसम्भावनानुगुण्येनीत्प्रेक्षित चानुसन्दधानः सुकविः शृङ्गारमुपनिबध्नीयात्। (नायक के समुचित आचरण का उदाहर है), जैसे रत्नावली (१.२१) में [राजा वासवदत्ता से कहते हैं] 'हे प्रिया, तुम्हारे द्वारा कामदेव की पूजा में तत्पर हाथ से जिसका स्पर्श किया गया है वह अशोक ऐसा प्रतीत होता है मानों उसमें दूसरा अधिक कोमल नूतन पल्लव फूट आया है।' इस प्रकार (१) नायक, नायिका, कैशिकी वृत्ति, नाटक, नाटिका आदि के लक्षणों में बतलाये गये; (२) कवि-परम्परा से जाने गये तथा (३) औ्चित्य की सम्भावना के अनुकूल स्वयं कल्पित (तत्त्वों) का ध्यान रखते हुए श्रेष्ठ कवि को शृङ्गार रस का निबन्धन (यीजना) करना चाहिये। टिप्पणी-(१) चाटुकृत्-चाटुकारी करने वाला, प्रिय वचन कहने वाला। ग्राम्यम्-असंस्कृत जनों का आचरण, अविदग्ध जनों का कार्य; ग्राम्य शब्द-प्रयोग या अर्थ को साहित्यिक दोष भी माना गया है (द्र० का० प्र० तथा सा० द०)। नर्म-वैदग्व्यक्रीडित नर्म' इत्यादि ऊपर (२.४८)। नर्मभ्रशकरम्-नर्म को भ्रष्ट करने वाला क्रोध आदि। (२) इस प्रकार भेद-प्रभेदों सहित शृङ्गार का निरूपण किया गया है। शङ्गार के भेद-प्रभेदों के विषय में कतिपय प्रमुख मत इस प्रकार हैं :-

ना० शा० ध्वन्यालोक दशरूपक काव्यप्रकाश साहित्यदपण

शृङ्गार-भेद सम्भोग, सम्भोग, सम्भोग सम्भोग, सम्भोग, विप्रलम्भ । विप्रलस्भ, तथा अयोग विप्रलम्भ । विप्रलम्भ । विप्रयोग, सम्भोग (=विप्रलम्भ

विप्रलम्भ- भेद १.अभिलाष (विप्रयोग)- १.अभिलाष १. पूर्वराग, २. ईर्ष्या, १. मान= २. विरह, ३. विरह. (प्रएायमान, ईर्ष्यामान) ३. ईर्ष्या, २. मान, ३. प्रवास= ४. प्रवास। २.प्रवास= ४. प्रवास, (कार्य, शाप (कार्य, ५. शाप से संभ्रम तथा होने वाल तथा संभ्रम) ४. करुण- शाप से होने विप्रलम्भ। वाला)।

Page 434

चतुर्थ: प्रकाश: ३८५

अरथ वीर :- (७६) वीरः प्रतापविनयाध्यवसायसत्त्व- मोहाविषादनयविस्मयविक्रमादैः। उत्साहभू: स च द्यारणदानयोगात् ञेधा किलात्र सतिगर्वधृतिप्रहर्षाः ॥ ७२ ॥ प्रतापविनयादिभिविभावितः करुणायुद्धदानाद्यैरनुभावितो गर्वधृतिहर्षामर्षस्मृ- तिमतिवितर्कप्रभुतिभिर्भावित उत्साहः स्थायी स्वदते=भावकमनोविस्तारानन्दाय प्रभवतीत्येष वीरः । तत्र दयावीरो यथा नागानन्दे जीमूतवाहनस्य, युद्धवीरो वीर- घरिते रामस्य, दानवीर: परशुरामबलिप्रभृतीनाम्-'त्यागः सप्तसमुद्रमुद्रितमहीनिर्व्या- षबानावषि:' इति। वीर रस प्रताप, विनय, अध्यवसाय, सत्त्व, मोह, अविषाद, नय, विस्मय, पराक्रम इत्यादि (विभावों) के द्वारा होने वाले उत्साह (स्थायी भाव) से वीर रस होता है। वह दया, युद्ध और दान (अनुभावों) के योग से तीन प्रकार का हो जाता है। और, उसमें मति, गर्व, धृति तथा प्रहर्ष (व्यभि- चारी भाव) हुआ करते हैं॥ ७२॥ टिप्पणी-(१) ना० शा० (६. ६६ से आगे गद्य तथा ६७-६८; ७-२१, ११३, ११४), का० प्र० (४. २६ वृत्ति), भा० प्र० (पृ० ५, ६०), ना० द० (३. १७२), सा० द० (३. २३२-२३४), रसगङ्गाधर (१ पृ० १५०)। (२) 'हर्ष' के स्थान पर प्रहर्ष शब्द का प्रयोग छन्द-पूर्ति के लिये किया गया है, यह वसन्त- तिलका छन्द है। (३) प्रताप आदि का विवरण नायक के गुणों के प्रसङ्ग में (प्रकाश २) दिया जा चुका है। प्रताप, विनय आदि (बिभावों) के द्वारा विभावित होकर, दया, युद्ध, दान आदि (अनुभावों) के द्वारा अनुभावित होकर तथा गर्व, धृति, हर्ष, अ्रमर्ष, स्मृति, मति, बितकं इत्यादि (ध्यभिचारी भावों) के द्वारा भावित होकर उत्साह नामक स्थायी भाव का ग्ास्वादन होता है; अर्थात् वह सहृदयों के चित्त का विस्तार करते हुए धानन्द प्रदान करता है; यही वीर रस है। (वह तीन प्रकार का होता है, दयावीर, युद्धवीर और वानवीर); उनमें से दयावीर (का उदाहरण) है जैसे नागानन्द नाटक में जीमूतवाहन का (उत्साह), युद्धवीर का उदाहरण है महावीर- चरित में राम का उत्साह तथा दानवीर का उदाहरणा है परशुराम तथा बलि आदि का दान-विषयक उत्साह। जैसे (महावीरचरित २.३५ में परशुराम के प्रति राम कहते हैं)-'सातों समुद्रों से सीमित भूमि को निष्कपट भाव से दान करने पर्यन्त आापका त्याग है।'

Page 435

३८६ दश रूपकम्

'खर्वग्रन्थिविमुक्तसन्धि विकसद्वक्षःस्फुरत्कौस्तुभं निर्यन्नाभिसरोजकुड्मलकुटीगम्भीरसामध्वनि। पात्रावाप्तिसमुत्सुकेन बलिना सानन्दमालोकितं पायाद्वा कमवर्धमानमहिमाश्चर्यं मुरारेवपु: ।।३३२।। यथा च ममैद- 'लक्ष्मीपयोधरोत्सङ्गकुङ्कुमारुणितो हरेः। बलिरेष स येनास्य भिक्षापात्रीकृत: करः ॥३३३॥ विनयादिषु पूर्वमुदाहृतमनुसन्धेयस। प्रतापगुरावर्जनादिनापि वीराणां भावा- त्व्रंधं प्रायोवादः। प्रस्वेदरक्तवदननयनादिक्रोधानुभावरहितो युद्धवीरोज्यथा रौद्रः । [दानवीर का दूसरा उदाहरण है] -(बलि से दान लेते समय वामन के विराट रूप का वर्णन) 'जिस (विराट) शरीर में छोटी (खर्व) ग्रन्थियों से सब्धि- स्थलों के मुक्त हो जाने के कार वक्षःस्थल विकसित हो रहा था तथा कौस्तुभ सखि चमक रही थी, नाभि-कमल की कली रूपी कुटी से गम्भीर साम-गान की ध्वनि निकल रही थी; जिसे दान-पात्र को प्राप्त करने के लिये उत्सुक बलि ने आानन्दपूर्वक देखा था, वह कमशः बढ़ते हुए गौरव एवं आश्चर्य से भरा हुआ विष्शु का शरीर तुम्हारी रक्षा करे।' [दानवीर का ही अन्य उदाहरण]-और, जैसे मेरा (धनिक का) ही पद्य है- 'यह वही राजा बलि है जिसने लक्ष्मी के स्तनमण्डल के कुंकुम से लाल हुए विष्णु के हाथ को भिंक्षा का पात्र बनाया था।' विनय आदि के विषय में पहिले (नायक प्रकरण में) दिये गये उदाहरण ही समझने चाहियें। प्रताप, गुख तथा पवर्जन (आकर्षख) इत्यादि के भेद से भी (प्रताप वीर इत्यादि) बीर हुआ करते हैं। इसलिये (दयावीर इत्यादि) तीन प्रकार के ही वीर बतलाना प्राथिक कथन है (अर्थात् प्रायः तीन प्रकार के वीर हुआ करते हैं, इसलिये यहाँ तीन ही प्रकार कहे गये हैं)। किञच प्रस्वेद, मुख तथा नेत्रों का लाल होमा इत्यादि जो क्रोध के अनुभाव हैं, जब वे नहीं होते तब युद्धवीर हुध करता है, जब वे होते हैं (अन्यथा) तब रौद्र रस हुआ करता है। टिप्पखी-(१) यहां प्रताप आदि को सामान्य रूप से विभाव कहा गया है। ना० शा० तथा ना० द० में भी इसी प्रकार कुछ गुणों को विभाव कहा गया है। इससे यह प्रतीत होता है कि इन ग्रन्थों के समय रसों के आ्लम्बन तथा उद्दीपन विभावों के पृथक्शः निरूपण की परम्परा नहीं थी। सा० द० (३. २३२-२३४) आदि के अनुसार विजेतव्य (जिस पर विजय प्राप्त करना होता है) आदि व्यक्ति ही वीर रस का झालम्बन विभाव होता है-आलम्बनविभावास्तु विजेतव्यादयो मताः। इस प्रकार ये प्रताप आरदि वीर रस के उद्दीपन विभाव हैं। (२) उपयुक्त परशुराम

Page 436

चतुर्थ: प्रकाश: ३८७

प्रथ बीभत्स :- (८०) बीभत्सः कृमिपूतिगन्घिव मथुप्रायैर्जु गुप्सैकभू- रुद्वेगी रुधिरान्त्रकीकसवसामांसादिभिः च्षोभणः। वैराग्याज्जघनस्तनादिषु घृ।शुद्धोऽनुभावैवृतो।

के उदाहरण में परशुराम का दान के प्रति उत्साह स्थायी भाव है, दान के पात्र ब्राह्मण आलम्बन विभाव हैं, सत्त्व, अध्यवसाय इत्यादि उद्दीपन विभाव हैं, तथा सर्वस्व-त्याग इत्यादि अनुभाव हैं। हर्ष धृति इत्यादि सञ्चारी भाव हैं। इनसे पुष्ट होकर सहवय के चित्त में स्थित उत्साह नामक स्थायी भाव आस्वादन का विषय होता है तथा दानवीर रस कहलाता है। (मि०, सा०द०३.२३२-२३४-वृत्ति) ।(३)सा० द०(३.२३४) में वीर के चार भेद माने हैं-दानवीर, धर्मवीर, युद्धवीर तथा दया- वीर। युधिष्ठिर आदि धर्मवीर के उदाहरण हैं। हेमचन्द्र ने (काव्यानुशासन में)वीर रस के तीन ही भेद माने हैं तथा० भा० प्र० (पृ० ६५) में भी। ना०द० (३.१७२ वृत्ति) में युद्ध, दान आदि उपाधियों के द्वारा वीर के अनेक भेद माने गये हैं, इसमें धनिक की टीका के साथ बहुत समानता है। (४) युद्धवीर तथा रौद्र का अन्तर- (i) रौद्र का स्थायी भाव कोध है तथा युद्धवीर का उत्साह (ii) रौद्र में मुख तथा नेत्रों का लाल हो जाना इत्यादि अनुभावों का वणन होता है, युद्धवीर में नहीं (धनिक तथा सा० द०) (iii) युद्धवीर में मोहरहित तत्त्वनिश्चय (अध्यवसाय) की प्रधानता रहती है किन्तु रौद्र में तमोगुण की अधिकता के कारण मोह और विस्मय की प्रधानता रहती है। (मि०, अभि० भा० ६. ६८ तथा काव्यानुसाशन)। (iv) रोद्र में शत्रु का सिर काटने के बाद भी कोधवश उसकी भुजा आदि को काटने का वर्णन होता है, युद्धवीर में नहीं, यह अनुभाव भेद है (अभि० भा० ६. ६५)।(v) युद्धवीर में उत्साह तथा न्याय की प्रधानता होती है, रौद्र में मोह, अहङ्कार, अन्याय की (ना० द० ३. १७२ वृत्ति)। बीभत्स रस बीभत्स रस जुगुप्सा नामक स्थायी भाव से होता है। (यह तीन प्रकार का है) (क) कीड़े, दुर्गन्ध, वमन आदि (विभावों) से होने वाला उद्वेगी बीभत्स होता है, (ख) रुधिर, अंतड़ियाँ, हड्डी (कीकस) मज्जा (वसा), माँस आदि (विभावों) से होने वाला चोभए बीभत्स तथा (ग) जघन, स्तन आदि के प्रति वैराग्य से होने वाला घृणाशुद्ध बीभत्स होता है। यह नाक सिकोड़ना, मुह फेरना (विकूणन) आदि अनुभावों से युक्त होता है तथा इसमें आवेग, व्याधि (शर्ति), शङ्का आदि (व्यभिचारी भाव) हुआ करते हैं।। ७३।।

Page 437

दशरूपकम्

लक्षण उद्वेगी बीभत्सः। यथा मालतीमाधवे- 'उत्कृत्योत्कृत्य कृत्ि प्रथममथ पृथूच्छोपभूयांसि मांसा- न्यंसस्फिक्पृष्ठपिण्डाद्यवयवसुलभान्युग्रपूतीनि जग्ध्वा। आतंः पर्यस्तनेत्रः प्रकटितदशनः प्रेतरङ्क: करड्का- दङ्गस्थादस्थिसंस्थं स्थपुटगतमपि कव्यमव्यग्रमत्ति ॥३३४।। रुधिरान्त्रवसाकीकसमांसादिविभावः क्षोभणो बीभत्सो यथा वीरचरिते -

टिप्पसी-(१) ना० शा० (६.७२ से आगे गद्य तथा ७३.७४; ७.२६, ११६), का० प्र० (४. २६ वृत्ति), भा० प्र० (पृ० ६, ६३); ना० द० (३.१७४), प्रता० (पृ० १६१), सा० द० (३.२३६-२४१), रसगङ्गाधर(१पृ० १७०) । (२) यहां शार्दू लविकरीडित छुन्द है (३) जुगुप्सा नामक स्थायी भाव का परिपोष ही बीभत्स रस है। मानसिक अवस्था के आधार पर इसके तीन भेद किये गये हैं। उद्वेग, क्षोभण और शुद्ध वृणा तीनों मानस अनुभाव हैं। कभी उद्वेग से मिश्रित घृणा (जुगुप्सा) होती है, कभी क्षोभ से मिश्रित और कभी शुद्ध घृखा; जंसा कि आगे उदाहरणों से स्पष्ट है। (४) यहाँ भी सभी विभावों को समान रूप के कहा गया है। सा० द के अनुसार दुर्गन्ध, माँस, रुधिर आदि इसके आलम्बन विभाव हैं। उनमें कीड़े पड़ना आदि उद्दीपन हैं। (क) हृदय को बिल्कुल अच्छे न लगने वाले कीड़े तथा दुगन्ध आ्ादि से होने वाला जो जुगुप्सा नामक स्थायी भाव है उसका परिपोष ही उद्टेगी बीभतस रस होता है। जसे मालतीमाधव (५.४६) में- 'क्षुधा से पीड़ित, सभी ओर ताकता हुआ, दाँत निकाले हुए यह वरिद्र प्रेत पहले चर्म (कृति) को उधेड़ उघेड़कर तब कन्धे (अंस), उरुमूल (स्फकू) तथा जंघा के ऊपरी भाग (पृष्ठपिण्डी) आदि में सुलभ, बहुत पुष्टि के कारण पर्याप्त (पृथुना महता उच्छोफेन-उच्छ्रिततया भूयांसि) तीव्र दुर्गन्ध वाले मांस को खाकर (जग्ध्वा) अपनी गोद में पड़े अस्थिपञजर (करड) में से अस्थियों के ऊँचे नीचे भागों (स्थपुट) में स्थित कच्चे मांस को (ऋव्य) धीरे-धीरे खा रहा है।' (मि० का० प्र० उदा० ४२) । [पृथूच्छोफ' पाठ युक्त प्रतीत होता हैं] (ख) रुधिर, अँतड़ियाँ, हड्डी, मज्जा, माँस आदि विभावों से क्षोभण-बीभत्स रस होता है; जैसे महावीरचरित (१.३५) में- 'अँतड़ियों में पिरोये बड़े बड़े कपाल तथा जंघा की हड्डियों (नलक) से बने हुए, भयानक शब्द करने वाले कङ्करा आदि बहुत से चञ्चल (प्रेङ्गित) आभूषणों की ध्वनि से आकाश को प्रतिध्वनित करती हुई; पीकर उगले हुए रुिर की कीचड़ से लिपटे शरीर के ऊपरी भाग पर भयङ्कर रूप से दिखाई देने वाले

Page 438

चतुर्थँ: प्रकाश: ३८६

पीतोच्छर्दितरक्तकर्दमघनप्राग्भारघोरोल्लस- द्वर्यालोलस्तनभारभैरववपुर्बन्धोद्धतं धावति ।।३३५।। रम्येष्वपि रमणीजघनस्तनादिषु वैराग्याद् घृणा शुद्धो बीभत्सो यथा :-- 'लालां वक्त्रासवं वेति मांसपिण्डौ पयोधरौ। मांसास्थिकूटं जघनं जनः कामग्रहातुरः॥३३६॥ न चायं शान्त एव विरक्तः, यतो बीभत्समानो विरज्यते।प्रा अ्थ रौद्र :-- (८१) क्रोधो मत्सरवैरिवैकृतमयैः पोषोस्य रौद्रोऽनुज: क्षोभ: स्वाधरदंशकम्पभृकुटिस्वेदास्यरागैयु तः। (उल्लसत्) वेग से हिलते हुए स्तन भार से भयावने शरीर वाली, यह कौन है जो बन्ध के कारण उद्धत रूप से 'भाग रही है'। [का०प्र० उदा० २६८, वहाँ 'दर्पोद्धतं' पाठ है (वर्ष से उद्धत), वही शुद्ध प्रतीत होता है] रमी के सुन्वर नंधा तथा स्तन आदि के प्रति भी बैराग्य के निमिश् होने वाली घुणा शुद्ध बीभत्स है; जैसे (?)- 'काम-प्रह से व्याकुल जन लार को मुख-मदिरा समभता है, भांस के पिण्डों को स्तन और हाड़, मांस के उठे भागों को जंधा।' यहाँ (व्गित) विरक्त जन को शान्त (शान्त रस से युक्त) नहीं कहा जा सकता; क्योंकि जब कोई (रमणीय विषयों से) घृरा करता है तब विरक्त होता है [अतः यहाँ घृणा या बीभत्स ही है जो वैराध्य का कारण है]। टिप्पणी-(१) उत्कृत्य० इत्यादि में शव आ्रलम्बत विभाव है; शव को बार-बार काटना आदि उद्दीपन हैं। देखने वाले का थूकना, नाक सिकोड़ना आादि (जो कपना से जाने गये हैं) अनुभाव हैं तथा आ्वेग, शङ्का आदि व्यभिचारी भाव हैं। इनसे पुष्ट होकर जुगुप्सा भाव ही उद्ृगी बीभत्स रस कहलाता है। इसी प्रकार अन्य उदाहरणों में भी समझना चाहिये। (२) बीभत्समानो विरण्यते-रमणीय विषयों में घृणा करता हुआ व्यक्ति विरक्त होता है तथा विरक्ति के पश्चात् शम युक्त (शान्त) होता है। इस प्रकार यहाँ शान्तरस नहीं है, क्योंकि यहाँ तो केवल वराग्य के निमित्त शुद् घृणा (बीभत्स) का वर्णंन है (?) (मि० सभा)। रौद्र रस मात्सर्य तथा शत्रु द्वारा किये गये अपकार आदि (विभावों) से होने वाला जो क्रोध है उसकी पुष्टि रौद्र रस कहलाता है। इसके पश्चात् (मानस, अनुभाव) नोभ उत्पन्न होता है, जो ओठ चबाना, काँपना, ौहें टेढ़ी करना, पसीना, मुख लाल होना आदि तथा शस्त्र उठाना, डींग सारना (विकस्थन = आत्मश्लाघा), (हाथ से) अपने कन्धे पर तथा

Page 439

३६० दशरूपकम्

रत्रामर्षमदौ स्मृतिश्चपलतासूयौग्रथवेगादयः ॥७४॥ मात्सयंविभावो रौद्रो यथा वीरचरिते- 'त्वं ब्रह्मवचंसधरो यदि वर्तमानो यद्वा स्वजातिसमयेन धनुधरः स्याः । उग्रेण भोस्तव तपस्तपसा दहामि पक्षान्तरस्य सहशं परशुः करोति ।।३३७।। वैरिवैकृतादियथा वेणीसंहारे- लाक्षागृहानलविषान्नसभाप्रवेशैः प्राणेषु वित्तनिचयेषु च नः प्रहृत्य। (पैर से) भूमि पर चोट करना, प्रतिज्ञा करना इत्यादि (आङ्गिक, वाचिक अनुभावों तथा सातत्विक भावों) से युक्त होता है। इसमें अरमर्ष, मद, स्मृति, चपलता, असूया, उप्रता तथा वेग आदि अनुभाव हुआ करते हैं॥ ७४॥ टिप्परी-(१) ना० शा० (६,६३ के आगे गद्य तथा ६४-६६; ७. १५, ११२); का० प्र० (४. २६ वृत्ति), भा० प्र० (पृ० ६, ६६ आदि), ना० द० (३. १७१), सा० द० (३- २२७-२३१), रसगङ्गाधर (१ पृ० १४६)। (२) यहां झादू लविकीडित छन्द है। (३) भा० प्र० (पृ० ३५, अधिकार २) में क्रोध तीन प्रकार का बतलाया गया है-कोध, कोप और रोष। सा० द० के अनुसार रौद्र का आलम्बन विभाव शत्रु होता है तथा उसकी चेष्टाएं उद्दीपन विभाव होती हैं। (४) वैरिवेकृतम=वैरिकृतापकारस तन्मयः तत्प्रधानः, विभावः (प्रभा) बैरी के द्वारा किये अपकार हैं मुख्य जिनमें ऐसे विभावों से क्रोध उत्पन्न होता है। अनुजः क्षोभ :- कोध के अनन्तर क्षोभ उत्पन्न होता है। यह क्ोध का मानसिक अनुभाव है जो कि वाचिक तथा आङ्िक अनुभावों के साथ हुआ करता है। 'स्वाधर०' तथा 'शस्त्रोल्लास०' इत्यादि पदों के द्वारा वाचिक एवं आज्गिक अनुभाव बतलाये गये हैं। इनमें स्वेद आदि सातत्विक भाव भी हैं। मात्सर्म (किसी के गुणों में दोष देखना) विभाव से होने वाला रौद्र, जैसे महावीरचरित (३.४४) में- (परशुराम विश्वामित्र से कह रहे हैं) 'तुम इस समय ब्रह्मतेज को धारण करके उपस्थित हो (वर्तमानः) अथवा अपनी जाति के नियम के अनुसार (समयेन) धनुर्धारी हो सकते हो। फिर भी मैं अपने उग्र तप से तुम्हारे तप को जला दूंगा औौर दूसरे पक्ष (धनुर्धारी होने) के अनुकूल मेरा परशु कार्य करेगा।' शत्रु द्वारा किये गये अपकार आादि (विभाव) से होने वाला रौद्र यह है, जैसे- बेरगीलंहार (१.८) में-(नेपथ्य में भीम कहता है) 'लाक्षागृह में श्राग, विष-युक्त भोजन और सभा में प्रवेश के द्वारा हमारे प्राणों तथा धन पर प्रहार करके तथा

Page 440

चतुथँ: प्रकाश: ३६१

आकृष्टपाण्डववधूपरिधानकेशाः स्वस्था भवन्तु मयि जीवति धार्तराष्ट्राः ॥३३८॥ इत्येवमादिविभावैः प्रस्वेदरक्तवदननयनाद्यनुभावैरमर्षादिव्यभिचारिभिः क्रोध- परिपोषो रौद्रः, परशुरामभीमसेनदुर्योधनादिव्यवहारेषु वीरचरितवेणीसंहारादेरनु गन्तव्यः । अथ हास्य :- (८२) विकृताकृतिवाग्वेषैरात्मनोऽथ परस्य वा। हास: स्यात्परिपोषोऽस्य हास्यस्त्रिप्रकृति: स्मृतः॥।७५।। आत्मस्थान् विकृतवेषभाषादीन् परस्थान् वा विभावानवलम्बमानो हासस्त- त्परिषोषात्मा हास्यो रसो द्वयधिष्ठानो भवति, स चोत्तममध्यमाधमप्रकृतिभेदात्ष- ड्विधः । पाण्डवों की वधू (द्रौपदी) के वस्त्र एवं केशों को खींचकर भी पतराष्ट्र के पुत्र मेरे (भीम के) जीवित रहते कुशलपूर्यक रह सकते हैं?' इस प्रकार (मात्सर्य आदि) के विभावों से प्रस्वेद, मुख का लाल होना इत्यादि त्रनुभावों से तथा अ्ररमर्ष आवि व्यभिचारी भावों से जो क्ोष का परिपोष होता है, वही रौद्र रस है। इसे परशुराम, भीमसेन तथा वुर्योधन आादि के व्यवहारों में महावीरचरित तथा वेणीसंहार आवि नाटकों से खोजा जा सकता है। टिप्पखी-लाक्षागृह० इत्यादि में धृतराष्ट्र के पुत्र क्रोध के आलम्बन हैं, उनके किये गये लाक्षागृह में आग लगाना इत्यादि अपकार ही उद्दीपन विभाव हैं। 'स्वस्था भवन्तु' में काकु द्वारा प्रकट किया गया कौरवों के नाश का संकल्प ही अनुभाव है। इस कथन के द्वारा जाने गये अमर्ष; गर्व आदि ही व्यभिचारी भाव हैं। इनसे पुष्ट हुआ कोध नामक स्थायी भाव रोद्र रस कहलाता है। इसी प्रकार भरन्य उदाहरणों में भी समझना चाहिये। हास्य रस अपने या दूसरे के विकाश्युक्त (बिगड़े हुए) आकार, वचन तथा वेष आादि (बिभावों) से जो हास (स्थायी भाव) होता है उसका परिपोष हास्य रस कहलाता है। इसे (हास को) त्रिप्रकृति (=तीन प्रकार के आाश्रयों में होने वाला) कहा गया है॥७५।। अपने (शत्मस्थ) अथवा दूसरे के (परस्थ) विकृत वेष तथा भाषा आदि बिभावों का झालम्बन करके उत्पन्न होने वाला हास (नामक स्थायी भाव) है। उसका परिपोष ही हास्य रस है। इस (हास) के दो निभिस होते हैं (पात्मतथ और परस्थ), और वह उत्तम, मध्यम तथा अधम प्रकुति के भेद से ६ प्रकार का हो जाता है।

Page 441

३६२ दशरूपकम्

आत्मस्थो यथा रावण :- 'जातं मे परुषेश भस्मरजसा तच्चन्दनोद्धलन हारो वक्षसि यज्ञसूत्रमुचितं क्लिष्टा जटाः कुन्तलाः । रुद्राक्ष: सकलै: सरत्नवलयं चित्राशुक वल्कलं सीतालोचनहारि कल्पितमहो रम्यं वपुः कामिनः ॥३३६॥ परस्थो यथा -- भिक्षो मासनिषेवणं प्रकुरुषे ? कि तेन मदयं विना कि ते मद्यमपि प्रियम् ? प्रियमहो वाराङ्गनाभि: सह। टिप्पणी-(१) द्विविधश्चायम् आत्मस्थः परस्थर्च। यदा स्वयं हसति तदाsडत्मस्थः। यदा तु परं हासयति तदा परस्थः, ना०शा० (६, ४व से आगे गद्य) तथा ना० शा० ६, ४६,६१; ७. १०); का० प्र० (४. २६ वृत्ति), भा० प्र० (पृ० ५, ६४ आदि), ना० द० (३. १६८-१६६), प्रता० (पृ० १६४), सा० द० (३. २१४-२२१), रसङ्गाघर (१ पृ०१६८)। (२) सा०द० के अनुसार विकृत आकार, बाणी तथा चेष्टा वाला व्यक्ति हास का आलम्बन विभाव होता है, उसकी चेष्ठाएं उद्दीपन विभाव। (३) हास का अर्थ है वाणी आदि की विकृति को देखकर चित्त का विकास (सा० द० ३. १७६)। जिसके चित्त में हास नामक भाव (लौकिक रस) होता है यवि उसका कहीं साक्षात् वर्शन नहीं किया जाता तो भी उसको विभाव आदि के वान से समझ लिया जाता है। (मि०, सा०द० ३. २२०-२२१)। इसी प्रकार बीभत्स आदि रसों के सन्दर्भ में भी जानना चाहिये। (४) वृथधिषठान := दो हैं अथिष्ठान जिसके; भाव यह है कि विकृत आकार, चेष्टा आदि ही हास के निमिस है, वे कहीं तो आत्मस्थ (=हंसने वाले के अपने भीतर स्थित) होते हैं और कहीं परस्थ (=किसी अन्य जन में स्थित) होते हैं। षड्विध := ६प्रकार का, जिनके चित्त में हास नामक भाव होता है (=हास का आश्रय) वे तीन प्रकार के होते है उत्तम, मध्यम तथा अधम। इस प्रकार आत्मस्थ तथा परक्थ निमिसों से होने वाला प्रत्येक हास तीन प्रकार का होता है और कुल ६ प्रकार हो जाते हैं; जैसे १. आत्मस्य उत्तम प्रकृति, २. आत्मस्थ मध्यम प्रकृति, ३. आत्मस्थअ्रथम प्रकति, ४. परस्थ उत्तम प्रकृति, ५. परस्थ मध्यम प्रकृति, ६. परस्थ अधम प्रकृति। घपमै विकृत वेष आदि से होने वाला हास, जैसे (?) (रावणा-च्रपने आपको देखकर हुंस रहा है)-'कठोर भस्म की धूलि से मेरे शरीर में यह चन्दन का लेप हो गया है, यह ब्राह्मण-योग्य (उचित) यज्ञोपवीत ही वक्षःस्बल पर हार है, उलभी जटाएं ही (कोमल) केश हैं, समस्त रद्राक्षों के द्वारा रत्नयुक्त वलय (कड़े) बन गये हैं, वल्कल वस्त्र ही रंग बिरंगे रेशमी वस्त्र (=अंशुक) हैं। अहो, यह सीता के नेत्रों को लुभाले वाला ऐसा सुन्दर कामी का रूप बन यया है।' दूसरे के विकृत वेष आबि से होने वाला हास, जैसे (?)-'हे भिक्षुच, कया तुम मांस का सेवन करते हो ? (उत्तर) मदिरा के बिना मांस से क्या (लाभ) (प्रश्न) क्या तुम्हें मदिरा भी प्रिय है ? (उत्तर) शहो, वेश्याओों के साथ ही मदिरा

Page 442

चतुर्थ: प्रकाश:

वेश्या द्रव्यरुचि: कुतस्तव धनम् ? द्यूतेन चौर्येण वा चौयद्यूतपरिग्रहोऽपि भवतो नष्टस्य काऽन्या गतिः ?॥३४०॥ (८३) स्मितमिह विकासिनयनम्, किन्चिल्लक्ष्यद्विजं तु हसितं स्यात् मधुरस्वरं विह्सितम्, सशिरःकम्पमिदमुपहसितम् ॥७६। अपहसित सास्राक्षम, वित्िप्ताङ्ग भवत्यतिहसितम्। द्वे द्वे हसिते चैषां ज्येष्ठे मध्येऽघमे क्रमशः ॥७७॥। उत्तमस्य स्वपरस्थविकारदर्शनात् स्मितहसिते, मध्यमस्य विहसितोपहसिते, अधमस्याऽपहसितातिहसिते। उदाहृतयः स्वयमुत्प्रेक्ष्याः। प्रिय होती है। (प्रश्न) वेश्या तो धन में रुचि रखने वाली होती है और तुम्हारे पास धन कहां ? (उत्तर) धन तो दयूत या चोरी से आता है। (प्रश्न) क्या आप जुआ और चोरी भी करते हैं ? (उत्तर) जो नष्ट हो चुका है उसकी और गति ही क्या है?' टिप्पणी-(१) 'जातं मे' इत्यादि आत्मस्थ निमित्त से होने वाले हास का उदाहरण है। यहाँ विकृत वेष वाला रावण स्वयं ही अपने हास का आलम्बन है, उसका विकृत वेष उद्दीपन है, अपने वेष को देखकर नेत्र-विकास 'मुसकराहट आदि होना अनुभाव है तथा शञ्ा, ग्लानि आदि व्यभिचारी भाव हैं। इनसे परिपुष्ट हुआ सहृदय के चित्त का हास नामक स्थायी भाव हास्य रस कहलाता है। (२) 'भिक्षो' इत्यादि परस्थ निमित्त से होने वाले हास का उदाहरण है। यहाँ भिक्षु तथा उसकी विकृत वाखी आदि ही प्रश्नकर्ता के हास के निमित्त है। उत्तम आबि प्रकृति में होने वाले हास के भेद इस हास में (इह) (१) वह स्मित कहलाता है जिसमें (केवल) नेत्र विकसित होते हैं, (२) वह हसित है जिसमें दाँत कुछ-कुछ दिखलाई देते हैं, (३) वह विहसित है जिसमें मधुर स्वर होता है, (४) वह विह्सित जब सिर हिलाने के साथ होता है तो उपहसित कहलाता है, (५) वह अपहसित है जिसमें नेत्र अश्रयुक्त हो जाते हैं और (६) वह अतिहसित है जिसमें श्रङ्गों को (इधर-उधर) फैंका जाता है। इन (६) में से क्रमशः दो-दो उत्तम, मध्यम तथा अधम प्रकृति के हुआ करते हैं।७६-७७।। सर्थात् चपने या दूसरे के (आाकार आदि) विकार को देखकर उत्तम जन को स्मित और हसित हुआ करते हैं, मध्यम को विहसित और उपहसित तथा अधम को अपहसित और प्र्प्रतिहसित। इनके उदाहरण स्वयं देखने चाहियें।

Page 443

३६४ दशरूपकमु

व्यभिचारिणिश्चास्य -- (८४) निद्रालस्यश्रमग्लानिमूर्च्छाश्च सहचारिण: (व्यभिचारिणः)। प्रथाद्भुत :-- (८५) तरतिलोकैः पदार्थैः स्याद्विस्मयात्मा रसोऽद् तः॥७८॥ कर्मास्य साधुवादाश्रुवेपथुस्वेदगद्गदाः। हर्षावेगधृतिप्राया भवन्ति व्यभिचारिण: ।७६।। लोकसीमातिवृत्तपदार्थवर्णनादिविभावितः साधुवादाद्यनुभावपरिपुष्टो विस्मयः स्थायिभावो हर्षावेगादिभावितो रसीऽद्भुतः । यथा- 'दोर्दण्डाज्चित चन्द्रशेखरधनुर्दण्डावभङ्गोद्धत -- ष्टङ्कारध्वनिरार्यंबालचरितप्रस्तावनाडिण्डिमः । द्राक्पर्यस्तकपालसम्पुटमिलदुब्रह्माण्डभाण्डोदर- भ्राम्यत्पिण्डितचण्डिमा कथमसौ नाद्यापि विश्राम्यति ॥३४१। इत्यादि। इस (हास्य रस) के व्यभिचारी भाव ये हैं- निद्रा, आलस्य, श्रम, ग्लानि तथा सूच्छा (हास्य रस के) व्यभिचारी भाव होते हैं। टिप्पणी-यहां सभी व्यभिचारी भावों का उल्लेख नहीं किया गया है। ना० शा० (७. ११०) में शङ्का आदि तथा ना० शा० एवं सा० द० आदि में नेत्र- सड्ोच, मुसकरना (स्मेरता) आदि का भी उल्लेख है। अद्भुत रस अलौकिक पढार्थों (के दर्शन, श्रवण आदि) से उत्पन्न होने वाला विस्मय (स्थायी भाव) ही जिसका स्वरूप (आत्मा) है, वह अद्भुत रस है। साघुवाद (सराहना करना), अश्रु, कम्पन, प्रस्वेद तथा गद्गद होना आदि उसके कार्य (अनुभाव) हैं, हर्ष, आवेग और धृति इत्यादि व्यभिचारी भाव है।। ७८-७६॥ भाव यह है कि लोक सीमा का अतिकमण करने वाले पदार्थों के वर्णन परधि से विभावित होकर साधुवाव आदि अनुभावों से परिपुष्ट होकर हर्ष, भ्रावेग आदि (व्यभिवारी भावों) से भावित होकर विस्मय नामक स्थायी भाव ही अद्भुत रस कहलाता है। जंसे (महावीरचरित १.५४)- (धतुर्भङ्ग के परचात् उसकी टङ्कारध्ननि का बर्णन है) '(राम के) भुजदण्डों से खींचे गये शिव के धनुर्बण्ड के टूटने से उत्पन्न होने वाली टंकार की यह ध्वनि मान भी क्यों नहीं विश्रान्त हो रही है, जो (ध्वनि) मानों आर्य राम के बालचरित की प्रस्तावना का डिण्डम घोष है (अद्भुत बालचरित को सूचित करती है) हूर तक फैले कपाल-सम्पुटों के मिलने से बने हुए ब्रह्माण्ड रूपी पात्र के उदर में घूमने से जिसकी प्रचण्डता घनीभूत हो गई है।'

Page 444

चतुर्थ: प्रकाशः ३३५

अथ भयानक :- (८६) विकृतस्वरसत्त्वादेर्भयभावो भयानकः ।

दैन्यसम्भ्रमसंमोहत्रासादिस्तत्सहोदूरः ॥ ८०॥ रौद्रशब्दश्रवणगाद्रौद्रसत्त्वदर्शनाच्च भयस्थायिभावप्रभवो भयानको रसः, तत्र सर्वाङ्गवेपथुप्रभृतयोऽनुभावाः, दैन्यादयस्तु व्यभिचारिणः । भयानको यथा- 'शम्त्रमेतत्समुत्सृज्य कुब्जीभूय शनैः शनैः । य. नागतेनैव यदि शवनोषि गम्यताम् ॥३४२।। यथा च रत्नावल्यां प्रागुदाहृतम्-'नष्टं वर्षवरैः' इत्यादि। टिप्पणी-(१) ना० शा० (६. ७४ से आगे गद्य तथा ७५.७६; ७.२७, ११७), का० प्र० (४. २६ वृत्ति), भा० प्र० (पृ० ४. ३५, ६६), ना० द० (३. १७५), प्रता० (पृ० १६८), सा०द० (३.२४२-२४५), रसगङ्गाघर (१,पृ०१६५)। (२) सा० द० के अनुसार लोकातिक्रान्त वस्तु इसका आ्रलम्बन विभाव है, उस वस्तु के अव्भुत गुणा या कार्य उद्दीपन विभाव हैं। (३) अतिलोक := लोकसीमाति- क्रान्तैः, अलौकिक। साधुवाद-'साधु' इति वदनम्, 'बहुत अच्छा' इस प्रकार कहना' वाह-वाही करना, शाबाशी देना, सराहना। (४) दोर्दण्ड० इत्यादि उदाहरण में राम द्वारा धमुष तोड़ा जाना आलम्बन विभाव है, उसकी टङ्कार-ध्वनि उद्दीपन विभाव है, उसकी सराहना करना अनुभाव है, हर्ष, आवेग आदि व्यभिचारी भाव है। भयानक रस विकृत (डरावने) शब्द अथवा सत्त्व (पराक्रम, प्राखी, पिशाच आदि) आदि (विभावों) से उत्पन्न होने वाला भय नामक स्थायी भाव ही (परिपुष्ट होकर) भयानक रस होता है। सारे शरीर का काँपना, पसीना छूटना, मुंह सूख जाना, रंग फीका पड़ जाना (वैवरर्य) आदि इसके चिह्न (कार्य, अनुभाव) होते हैं। दीनता, सम्भ्रम, सम्मोह, त्रास आदि इसके व्यभिचारी भाव हैं॥ ८० ॥ भयावने शब्द को सुनमे या भयानक सत्त्व को देखने से उत्पन्न होने वाले भय स्थायी भाव से (परिपुष्ट होकर) भयानक रस होता है। इसमें शङ्गों में कम्पन इत्यादि अनुभाव होते हैं तथा दैन्य इत्यादि व्यभिचारी भाव होते हैं । भयानक (शब्द), जैसे (?)-'इस शस्त्र को छोड़कर कुबड़े से होकर (झुककर) जिस किसी प्रकार से भी, यदि जा सकते हो तो चले जाओ।' और (भयानक सत्व के दर्शन से होने वाला भय), जैसे रतनावली (२.१) य 'नष्टं वर्षवरः' इत्यादि (वानर को देखकर अन्तःपुर के भय का वर्णन है), जिसका उदाहुरण पहले (२.५६ उदा० १८५) दिया जा चुका है।

Page 445

३९६ दशरूपकम्

यथा- PFIFK FW स्वगेहात्पन्थानं तत उपचितं काननमथो गिरिं तस्मात्सान्द्रद्रुमगहनमस्मादपि गुहाम्। तदन्वङ्गान्यङ्ग रभिनिविशमानो न गएय- त्यराति: क्वालीये तव विजययात्राचकितघीः ॥३४३॥ अथ करुण :- (८७) इष्टनाशादनिष्टाप्तौ शोकात्मा करुोऽनु तम्। निश्वासोच्वासरुछदितस्तम्भप्रलपिताद्यः॥८१॥ स्वापापस्मारदैन्याधिमरणालस्यसम्भ्रमाः । विषादजडतोन्मादचिन्ताद्या व्यभिचारियः ॥८२॥ अथवा जैसे (कोई कवि किसी राजा की स्तुति करते हुए कहता है)- 'आपकी विजय-यात्रा से चकित बुद्धि वाला अत्रु अपने घर से भागकर मार्ग में गया वहां से घने वन में और फिर पर्वत पर, वहां से घने वृक्षों से गहन स्थान में गया औौर वहां से भी गुफा में चला गया। इसके पश्चात् भी अपने अङ्गों में ही प्रविष्ट होता हुआ वह (शत्रु) यह नहीं सोच पाता कि कहां छिपू।' टिप्परी-(१) ना० शा० (६.६८ से आगे गद्य तथा ६६-७२; ७.२२-२५, ११५), का० प्र० (४. २६ वृत्ति), भा० प्र० (पृ० ५, ३६, ६७), ना० द० (३. १७३), प्रता० (पृ० १६७), सा० द० (३. २३५-२३८], रसगङ्गावर (१ पृ० १७०)। (२) सा० द० के अनुसार जिस व्यक्ति से भय उत्पन्न होता है वह भयानक रस का आलम्बन विभाव है; उसकी भयावनी चेष्टाएं उद्दीपन विभाव हैं। (३) 'स्वगेहात्०' इत्यादि में विजेता राजा ही आलम्बन विभाव है; उसके परात्रम आदि उद्दीपन विभाव हैं; भयभीत शत्रु का इशर उधर भागना; छिपना आदि अनुभाव हैं: हत्य, सम्भ्रम, सम्मोह आदि व्यभिचारी भाव हैं। इनसे पुष्ट होकर भय नामक स्थायी भाव भयानक रस होता है। (४) सत्त्वदर्शनम्=सत्त्वानां पिशाचाना दर्शनम् (अभि० भा०); अथवा सत्त्व=प्राणी, भयोत्पादक प्राणी; या सस्व पराक्रम, बल (मि० ना० द०)। करुण रस करु रस का स्थायी भाव शोक है जो इष्ट के नाश तथा अनिष्ट की प्राप्ति से उत्पन्न होता है। उसके पश्चात् निःश्वास, उच्छ वास, रुदन, स्तम्भ तथा प्रलाप आदि (अनुसाव) होते हैं। निद्रा, अपस्मार, दैन्य, व्याधि, मरणा, आलस्य, सम्भ्रम, विषाद, जडता, उन्माद तथा चिन्ता इत्यादि इसके व्यभिचारी भाव हैं ॥=१०-द२॥। * 'आप्तेः' इति पाठान्तरमु।

Page 446

चतुथ: प्रकाश: ३६७

इष्टस्य बन्धुप्रभृतेर्विनाशादनिष्टस्य तु बन्धनादेः प्राप्त्या शोकप्रकर्षजः करुणः, तमन्विति तदनुभावनिःश्वासादिकथनम्, व्यभिचारिणश्च स्वापापस्मारादयः । इष्टनाशात्करुणो यथा कुमारसंभवे- 'अयि जीवितनाथ जीवसीत्यभिधायोत्थितया तया पुरः। दहशे पुरुषाकृति क्षितौ हरकोपानलभस्म केवलम् ॥३४४॥ इत्यादि रतिप्रलापः । अनिष्टावाप्तेः सागरिकाया बन्धनाद्यथा रत्नावल्याम्। (मम) प्रीतिभक्त्यादयो भावा मृगयाच्तादयो रसाः। हर्षोत्साहादिषु स्पष्टमन्तर्भावान्न कीर्तिताः ।८३।। प्रिय बन्धु आदि के नाश से तथा अनिष्ट कार्य बन्धन (बन्दी होना) आदि से उत्पन्न होने वाले शोक के परिपोष से करुण रस उत्पन्न होता है। (कारिका में) तम् अनु (=उसके पश्चात्) आदि के द्वारा उसके अनुभाव निःश्वास आदि का कथन किया गया है। निद्रा, अपस्मार आदि उसके व्यभिचारी भाव हैं। इष्टनाश से होने वाला करुण; जैसे कुमारसम्भव (४.३) में-'हे प्राणनाथ, तुम जीवित हो ? यह कहकर उठती हुई उस रति को अपने सामने भूमि पर पड़ी हुई केवल पुरुष की आकृति वाली शिव की कोपाग्नि की भस्म दिखलाई पड़ी।' इत्यादि रति का प्रलाप है। क अनिष्ट की प्राप्ति से होने वाला करुण; जैसे रत्नावली नाटिका में बन्धन के कारण होने वाला सागरिका का (शोक) है। टिप्पणी-(१) ना० शा० (६.६१ के आगे गद्य तथा ६२, ६३; अ० ७. ११-१४, १११); का० प्र० (४. २६ वृत्ति); भा० प्र० (पृ० ४, ४७, ४६, ६६-६७ आदि); ना० द० (३. १७०); प्रता० (पृ० १६५); सा० द० (३. २२२-२२६) रसगङ्गाधर (१. पृ० १४३)। (२) सा० द० के अनुसार करुण रस का आलम्बन विभाव वह विनष्ट बन्धु बान्धव आदि है जिसके प्रति शोक किया जाता है, उसकी दाह आदि अवस्था उद्दीपन विभाव हैं। (३) करुण तथा विप्रलम्भ का भेद द्र० ऊपर (४-६७) तथा सा० द० (३-२२६) । (४) अपि जीवितनाथ, इत्यादि में नष्ट हुआ कामदेव आलम्बन विभाव है; उसकी भस्म आदि उद्दीपन विभाव है; रति का प्रलाप आदि अनुभाव हैं तथा दैन्य; ग्लानि आदि व्यभिचारी भाव हैं। इनसे पुष्ट होकर शोक नामक स्थायी भाव सहृदय सामाजिकों को करुण रस के रूप में आस्वादनीय होता है। अन्य भाव आदि का उक्त भावों में ही अन्तर्भाव स्नेह (प्रीति), भक्ति आदि भावों का, शिकार खेलना (मृगया), द्यत (अक्ष) इत्यादि रसों का हर्ष तथा उत्साह आदि में ही स्पष्ट रूप से अन्त- र्भाव हो जाता है। इसलिये उनका पृथक निरूपण नहीं किया गया ॥८३॥

Page 447

दशरूपकम्

स्पष्टम्। (५६) षटत्रिशद् भूषरादीनि सामादीन्येकविंशतिः। *लक्ष्यसंध्यन्तराख्यानि सालक्कारेषु तेषु च ।।८४। 'विभूषणं चाक्षरसंहतिश्च शोभाभिमानो गुणकीर्तनं च' इत्येवमादीनि षटतरिशत् (विभूषसादीनि) काव्यलक्षणानि 'साम भेदः प्रदानं च' इत्येवमादीनि संध्य- न्तराण्येकविशतिरुपमादिष्वलङ्कारेषु हर्षोत्साहादिषु चान्तर्भावान्न पृथगुक्तानि। यह (कारिका) स्पष्ट ही है। टिप्पणी-(१) रुद्रट काव्यालद्कार (१५.(७-१६), सर० क० (५.२५२), रसतरङ्गिसी (६); सा० द० (३. २५१)। (२) कुछ आचार्यों ने स्नेह तथा भक्ति आदि को पृथक भाव के रूप में माना था जैसे रुद्रट ने प्रेयान् नामक रस माना है जिसका स्थायी भाव स्नेह है। स्नेह का अरथ है समान प्रकृति वाले जनों का परस्पर निश्छल मधुर भाव; जैसा दो मित्रों में हुआ करता है। (काव्या० १५. १७-१६)। इसी प्रकार किन्हीं ने (?) मृगया और द्यूत को भी पृथक् रस बतलाया था। उनको लक्ष्य करके ही धनञ्जय ने यह कहा है। (२) रूपगोस्वामी ने 'भक्तिरसामृतसिन्धु' में भक्ति रस का विस्तारपूर्वक विवेचन किया है तथा विश्वनाथ कविराज (सा०द० ३-२५१) ने वात्सल्य रस को भरतमुनि सम्मत बतलाया है। (इसी प्रकार) ३६ भूषण इत्यादि जो (नाटथ, काव्य के) नक्षण कहलाते हैं तथा २१ साम इत्यादि जो सन्ध्वन्तर कहलाते हैं उनका भी (उपमा आदि) अलङ्कारों तथा उन हर्ष, उत्साह आदि (तेषु) में ही अन्तर्भाव हो जाता है।।८४। विभुषण, श्रक्षरसंहति, शोभा, अभिमान तथा गुणकीर्तन इत्यावि ३६ काव्य-लक्षण कहे गये हैं तथा साम, भेद और दान इत्यादि २१ सन्ध्यन्तर नाम से कहे गये हैं। उनका उपमा आदि अलङ्कारों में तथा हर्ष, उत्साह आदि भावों में ही अन्तर्भाव हो जाता है। इसलिये वे यहाँ पृथक्शः नहीं बतलाये गये। टिप्प्खी-(१) ना० शा० (अ० १६) में तथा सा० द० (६. १७१-१६४) में भी विभूषण, अक्षर-संहति इत्यादि काव्यलक्षण या नाट्य लक्षणा बतलाये गये है। इन्हें भूषसा भी कहा जाता है। भरत मुनि का कथन है कि इनकी प्रत्येक रस के अनुसार काव्य में योजना करनी चाहिये। अभिनवगुप्त ने गुण तथा अलद्दारों से भेद दिखलाते हुए इन लक्षरों के स्वरूप और महत्त्व का भी निपण किया है। ये लक्षणा महापुरुषों के पद्म आदि चिह्नों के समान काव्य के सौन्दयं-वद्ध क होते हैं। उदाहरसार्थ विचित्र अर्थ वाले नपे तुले शब्दों द्वारा वस्तु-वर्णना ही अक्षरसंघात कहलाता है; जैसे अभिज्ञानशाकुन्तल में 'राजा-कच्चित् सखीं वो नातिबाधते शरीर- संताप: ? प्रियंबदा-साम्प्रत लब्धोषधमुपशमं गमिष्यति'। त्रियंवदा के इस उत्तर में एक विशेष लावण्य आगया है जो शृङ्गार रस के नितान्त अनुरूप ही है। ॥F ** 'लक्ष्यसन्ध्यन्तराख्यानि' इति पाठान्तरम्

Page 448

चतुर्थ: प्रकाश: ३६६

600 800 400 (६0) रम्यं जुगुप्सितसुदारमथापि नीच- मुग्रं प्रसादि गहनं विकृतं च वस्तु। यद्वाप्यवस्तु कविभावकभाव्यमानं तन्नास्ति यन्न रसभावमुपैति लोके ।।८५॥ (६१) विष्णोः सुतेनापि धनञ्जयेन विद्वन्मनोरागनिबन्घहेतुः। आविष्कृतं मुञ्जमहीशगोष्ठीवै दृग्ध्यभाजा दशरूपमेतत् ॥८६॥। । इति धनञ्जयकृतदशरूपकस्य चतुर्थः प्रकाशः समाप्तः । समाप्तश्चाऽयं ग्रन्थ: (२) सन्ध्यन्तर-रूपकों की मुख आदि सन्धियों के समान ही सन्ध्यन्तर भी काव्य शरीर की शोभा बढ़ाते हैं (सन्ध्यन्तराणि सन्धीनां विशेषास्त्वेकविशति।)। इनका ना० शा० (अ० १६) में निरूपण किया गया है। चतुर्थ प्रकाश का उपसंहार रमणीय या घृशित, उत्तम या अ्रधम, उग्र या आहलादक, और गम्भीर या विकृत ऐसी कोई भी (मूलकथा में वर्रित) वस्तु या (कविकल्पित) अरवस्तु लोक में नहीं है जो कवि तथा भावक के द्वारा भावित होकर रस- रूपता (रसभावम्) को प्राप्त नहीं होती ।।८५।। टिप्परी (१) वसन्ततिलका वृत्त है। (२) कविभाषकभाव्यमानय्=भाव- केन कविना भाव्यमानम् (प्रभा)। वस्तुतः कविभावकाभ्यां भाव्यमानमु (कवि तथा भावक के द्वारा भावित), यह अर्थ उचित प्रतीत होता है। ग्रन्थ का उपसंहार राजा मुन्न की सभा में विद्ग्धता को प्राप्त करने वाले विष्णु के पुत्र धनञ्जय ने विद्वानों के हृदय में आनन्द उत्पन्न करने के लिये इस दशरूपक (नामक ग्रन्थ) की रचना की है ॥८६।। टिप्पणी- इस कथन से धनञ्जय के जीवनवृत्त पर कुछ धुंधला सा प्रकाश पड़ता है। विशेषकर यह प्रतीत होता है कि धनञ्जय के पिता का नाम विष्णु था, धनञ्जय राजा मुञ्ज की सभा में प्रतिष्ठित विद्वान् था। इससे धनञ्जय के काल-निरणय में भी सहायता मिलती है, जिसका भूमिका में विशद विवेचन किया गया है। इस प्रकार यह ग्रन्थ (दशरूपक) सभाप्त होता है। -: 0 :-

श्री चन्द्रभानुनम्बरदारमहोदयानाम् आत्मजेन

श्रीनिवासशास्त्रिणा कृता हिन्दीव्याख्या समाप्ता। -oof-0100-

Page 450

परिशिष्टम् १ दशरूपकावलोके समुपन्यस्तानां ग्रन्थानां ग्रन्थकाराणीं चानुक्रमणिका अभिज्ञानशाकुन्तलम् (शाकुन्तलम्)-११६ (स्वसुख०), १६७, १६६, २०६, २१४ (स एष०), २२६, ३६८, अमरुशतकम्-१२४ (शठो०), १२५, १३६ (स्मर०), १४१, १४३ (कान्ते०), १४५, १४६, १५३ (मा गर्व०), १५५ (निः श्वासा०), १५६, १५७, १७८, १८६, २७६, २८७, २६४, २६७, ३७८,०: उत्तररामचरितम् (उत्तरचरितम्)-६८, ७०, ६६, १२५ (भद्वतं०), १३१ (दष्टि०), १४४ (क्वचित्०), २१७, २२०, २२२, २७२, २८६, ३५६. उदयनचरितम् (?)-१६४. उदात्तराघवम् (मायुराजकृतम्, अनुपलब्धम्)-१६५, २०८, २२६, २७४, २६३. करपू रमञ्जरी-२१८. कादम्बरी-३८०. कामसूत्रम्-३७०. काव्यनिर्णयः (धनिककृतः, अनुपलब्धः)-३३७. *काव्यालङ्कार: (भामहकृतः)-५ (धर्मार्थ०). *काव्यालङ्कारः (रुद्रटकृतः)-३१५ (रसनाद०). किरातम् (किरातार्जुनीयम्)-२६० कुमारसम्भवम्-१३४ (एते०), १३७, (व्याहता०), १६३, १६५, १६७, १७३, १८६ (पत्यु:०). २७४ (एवंमालि०), २८६, २६६, २६६, ३२२, ३६६ (व्याहृता०), ३६०, ३६१, ३६८, ३६७. छलितरामम् (अनुपलब्धम्)-६७, २१७, २२३. कशीप तरङ्गदत्तम् (अनुपलब्धम्)-२३८. त्रिपुरदाह :- २४८. *धनिक: (ममैव)-१२३, १३०, १३३, १३७, १४२, १६४, १६६, १७०, १७२, १७४, १७६, १७७, ११८, १८७. २६१, २६०, २६१,३३७ (यथावोचाम काव्यनिर्राये) ३७२, ३७५, ३७६, ३७७, ३६३, ३८६. *ध्वन्यालोक :- ३२६. नागानन्दम्-११६, ११७, १२८, १३४, ३१४, ३५६ (व्यक्ति०), ३८५. *नास्यशास्त्रम् (भारतीयम्)-२३६ (अनयोश्चo), २४८ ( इंदं०), २५८ (विभाव०), २६३ (विभावा०, अहो०), २६४ (रसानु०), २६५ (सत्त्वं०), ३४० (भावां०), ३४६ (अष्टो०), ३४६ (शृङ्गाराद०). *ग्रन्थकृता पुष्पा्गितानां नामोल्लेखो न विहितः।

Page 451

( ४०२ )

पद्मगुप्त: (नवसाहसाङ्कचरितम्)-१६५. पाण्डवानन्दम् (अनुपलब्धम्)-२१६. पुष्पदूषितकम् (अनुपलब्धम्)-२३८. प्रियदर्शिका (प्रियदर्शना)-१८६. बृहत्कथा-१०७, ३०२. भट्टबाण :- १६८. भरतमुनिः (भरतः, मुनिः)-४, १२६, २३६, २४०, २४८. भतृ हरि :- २५६. भर्तृ हरिशतकम्-११२, २६६ (प्राप्ता:०), २७३, ३०७ (मात्सयं०). भवभूति :- १२१. *भोजप्रबन्धः (?)-२७६. महाभारतम्-२२८. महावीरचरितम् (वीरचरितम्)-४८, ६६, १००,११०, १११, ११२, १२०, १२१, १२६, १३०, १३२, १६१, १६२, १६३, २२६, २७२, २७७, २७६,

(दोर्दण्ड) २८०, २८१, २८४, २६४, २६८, ६८५, ३८८, ३६०, ३६१, ३६४

माघम्-१४०, १५३ (निज०), १५४ (नव०), १५७ (न च०), १८७ (तद०), २७१, २७३, २७८, २८५-२८८, ३७४ (नव०), ३७६. मायुराज :- २२६. मालतीमाधवम्-३३, ११५, १२७, १६०, १७१, १७३, १८६, १६५, २८२, ३०२, ३०७ (अन्तं:), ३६१, ३७६, ३८८. मालविकाग्निमित्रम्-१०१, ११३, १२३ (उचित:०), १५८, १८८, २२५, ३६२, ३६३. मुञ्ज: (?)-३७४, मुद्राराक्षसम्-१०७, १६२, २२३. मृच्छकटिका-७२, ११५, १५०, २३८. मेघदूतम्-३७६. रघु: (रघुवंश:)-१११, २६५, ३८०. रत्नावली- १४, १५, १८, १६, २१-२३, २७-३१, ३४-३६, ३६-४८, ५०- ६०, ६२, ६४, ६५, ६८, ७०, ७१, ७३, ७, ८०, ६२-६१, ११४, १८७, १६६, २०८, २०६, २११, २१३, २२०, २७१, २७३, २६४, ३८४, ३६५, २६७.

Page 452

( ४०३ )

रामाभ्युदयम् (यशोबमंकृतम, अनुपलब्धम)-७३. रामायणम -- १२, १०७, १२७, १६२, १६५, २२८. रुद्र: (?)-३७३. वाक्पतिराजदेव: (?)-३७१. विकटनितम्बा (?)-३००. विक्रमोवंशी-२१५, २१८, २२४, २६०, २६७, ३७६.

वेरीसंहारम-१८, २६, ३०, ३२-३७, ३६, ४१, ४२, ४४, ५७, ५८, ६०, ६२, ६४, ६६, ६७, ६६, ७१, ७४-७६, ८१, ८३-६०, ६२, ६३, २१३, २१६, २२१, २८०, ३६०, ३६१. *शृङ्गारतिलक (?)-३७५. षट्सहस्त्रीकृत् (भरत)-२५६. हनुमन्नाटकम् (महानाटकम)-११२, ११६ (आहूतस्या०), १३१ (कपोले०), १३२ (प्राहूतस्या०), २६६ (न्यक्कारो०), २८२ (मैनाक:०). *हाल (गाथासप्तशती)-१३५ (कुल०, हसिअ), १३६ (लज्जा०). १३६ (ताव०) १६१ (सच्चं०, मुहुरेहि०), १७१ (दि अहं०), १८७ (सालोए०), ३२३ (भम०), ३७१ (परात्र०), ३७३ (केली०), ३७६ (रोउर०), ३७८ (होन्त).

SOp

Page 453

( ६०४)

परिशिष्टम् २ उदाहृतपद्यानुक्रमणिका घ०g ,१ -- प्रारागड .Fes-(!) 83

पद्यम् क्रमाड़क: पद्यम कमाङ़क:

अकृपणमतिः कामं जीव्यात् ६० आलापात्भ्र विलास: ११२ अच्छिन्न' नयनाम्बु २७४ आशस्रग्रहणादकुण्ठप रशो-१६ अण्ण हुराहुम हे लिश्र २८१ आश्लिष्टभूर्मि रसितारमुच्च: २५४ अ्रत्रान्तरे किमपि वाग्विभव १६० आसादित प्रकटनिर्मल- १८८, १६४ अद्यैव कि न विसृजेयमहम् ४७ आहूतस्याभिषेकाय इन्दीवरेा नयनम् ७६, ६७ अ्रद्वंतं सुखदुःखयोः ३१८ अनाघातं पुष्पं किसलय- १५१ इय गेहे लक्ष्मीरियममृत- २०४ अन्त्रपोतबृहत्कपाल- ३३५ इयं सा लोलाक्षी त्रिभुवन- २८४ अन्त्रे: स्वैरपि संयताग्रचरणः उचितः प्रसायो वरं विहन्तु ८५ अन्त्रः कल्पितमङ्गल- २८५ १०७ अन्यासु तावदुपमर्द- २७६ उज्जम्भाननमुल्लसत्कुच- २१३ अ्न्योन्यास्फालभिन्नद्विप- १३ उत्कत्योत्कृत्य कृत्तिम् ३३४ अप्रियासि करोत्येष ४६ उत्कृत्योत्कृत्य गर्भानपि २३२ भिव्यक्तालीक: १७६ ३२३ उत्तालताडकोत्पातदर्शने अभ्युद्गते शशिनि १६२ उत्तिष्ठ दूति यामो यामो- १३५ अभ्युन्नतस्तनमुरो नयने ११६ उत्पत्तिर्जमदग्नितः ६७ अयमुदयति चन्द्र: २१२ उत्सङ्ग वा मलिनवसने ३२७ अयि जीवितनाथ जीवसि ३४४ उद्दामोत्कलिकाम् २ अचिष्मन्ति विदार्य २०५ २३६ उपोढरागेण विलोलतारकम् पृ० ३२६ १५२ अर्थित्वे प्रकटीकृतेऽपि अलसलुलितमुग्धान्यध्व- २२३ उरसि निहितस्तारो हार: १३७ अशोकनिर्भत्सितपद्म २६७ एकत्रासनसंस्थिति: असंशयं क्षस्त्रपरिग्रह- ३०४ एकं ध्याननिमीलनान्मुकु- १२४ २८६ असूत सद्यः कुसुमान्यशोक: २६५ एकेनाक्ष्णा प्रविततरुषा २८७ अस्तमितविषयसक्का २३४ एक्कत्तो रुत्रइ पिश्रा २८२ अस्तापास्तसमस्तभासि ५ एतां पश्य पुरःस्थलीमिह हर अस्मिन्नेव लतागृहे ३०६ एते वयममी दारा: १०२ अस्या: सगविधो २११ एवंवादिनि देवर्षी २७३ आगच्छागच्छ सज्जम् २६० एवमालि निगृहीतसाध्वसम् २२७ आताम्रतामपनयामि २६ एह्यहि वत्स रघुनन्दन २६७ आत्मानमालोक्य च २७७ तत्सुक्येन कृतत्वरा १६० आदृष्टिप्रसरात्प्रियस्य १३६ कः समुचिताभिषेकादार्यं २७२ आनन्दाय च विस्मयाय १८१ कण्ठे कृत्वावशेषम् १८४ आयस्ता कलह पुरेव १२५ कपोले जानक्या: करणदुःशासनवधात् ६६ आयाते दयिते २३० ३२ कररापितो रोध्रकषायरूक्षे १६१

Page 454

( ४ ० ५ )

कर्ता द्यूतच्छलानाम् २०० ततश्चाभिज्ञाय २३६ कस्तवं भो: कथयामि २१६ तथा व्रीडाविधेयापि १५५ का त्वं शुभे कस्य ६६ तदवितथमवादीर्यन्मम १७५ कान्ते तल्पमुपागते १२२ तनुत्राएं तनुत्राएं २६१ का श्लाध्या गुणिनाम् १६६ तवास्मि गीतरागेण कि लोभेन विला्ङ्गितः २७१ तह भति से पश्रत्ता १४६ कि गतेन नहि युक्त- ३२२ तां प्राङ्मुखीं तत्र निवेश्य १५० कि घरणीए मित्रङ्को ४१-४२ ताव च्चित रइसमए ११४ किमपि किमपि मन्दम् ३२८ तावन्तस्ते महात्मान: २२८ कुलबालिअए पेच्छद १०३ तिष्ठन्भाति पितु: पुरः कृतगुरुमहदादिक्षोभ- ५७ तीर्ों भीष्ममहोदधौ ३०

कृतेऽप्याज्ञाभङ्ग ३१६ तीव्र: स्मरसंताप: २४

कृशाश्वान्तेवासी जयति ६१ तीव्राभिषङ्गप्रभवेण २५५ कृष्टा केशेषु भार्या ४५ तेनोदितं वदति याति १५६ केलीगोत्तक्खलगो ३१५ स्यकत्वोस्थितः मरभसम् पृ० ७१ केलासोद्धारसार- १२० कोपात्कोमललोलबाहु- १२६ त्याग: सप्तसमुद्रमुद्रितमही- पृ० ३८५ कोऽपि सिंहासनस्याध: १६७ त्रय्यास्त्राता यस्तवायम् ६८ कोपो यत्र भ्र कुटिरचना १२७ त्रस्यन्ती चलशफरी २३५ क्रोधान्धर्यस्य मोक्षात् त्रैलोक्यश्वर्यलक्ष्मी १२१ क्वचित्ताम्बूलाक्त: १२३ त्वचं कर्ण: शिविर्मासम ६५ क्षिप्तो हस्तावलग्नः २६८ त्वं जीवितं त्वमसि मे २०१ खवंग्रन्थिविमुक्तसन्धि- ३३२ त्वं ब्रह्मवर्चसधर: ३३७ गमनमलसं शून्या दृष्टि: १७८ वाक्षिण्यं नाम बिम्बोष्ठि १३६ चक्षुर्लुप्तमषीकणम् २६८ दिश्रहं खु दुक्खिआए १५६ चञ्चद्भुजभ्रमितचण्डगदी ८, ५५ दिट्ठं तह १५८ चलति कर्थंचित्पृष्टा २५६ दीर्घाक्ष शरदिन्दुकान्ति ३०० चाशक्यनाम्ना तेनाथ ६२ दुःशासनस्य हृदयक्षतजा १५ चित्रवर्तिन्यपि नपे १६५ १७ चिररतिपरिखेदप्राप्तनिद्रा दुल्लहजराणुराश लज्जा २५२ दूराद्दवीयो धरणीधराभम् २२२ चूर्छिताशेषकौरव्यः ५२ दृष्टि हे प्रतिवेशिनि १२६ जगति जयिनस्ते ते २६६ दृष्टिः सालसतां निरभत १०८, १४५ जं कि पि पेच्छमारं १४८ ६५ जन्मेन्दोरमले कुले ३६ हृष्ट्वैकासनसैस्थिते प्रियतमे १२८, १७६ जातं मे पुरुषेण भस्म ३३६ देया पसिअ् शित्रन्तसु १५४ जीयन्ते जयिनोऽपि १८३ देव्या मद्चनाद्यथा ५३ ज्ञातिप्रीतिर्मनसि न कृता ३६ देवे वर्षत्यशनपचन- २६३ ज्वलतु गगने रात्री रात्री १५७ देशैरन्तरिता शतैश्च ३२६ सोउरकोडिविलग्गं ३२१ दोरबण्डा्चित चन्द्रशेखर- ३४१ तं वीक्ष्य वेपथुमती ३०७ द्रक्ष्यन्ति न चिरात्सुप्तम् ४६, २०३ स च्चित्न वभ्रणं ते च्चेश्र्र १४७ दीपादन्यस्मादपि ३, १८७ तत उदयगिरेरिवक एव ७६ धृतायुधो यावदहं २८

Page 455

( ४०६ )

न खलु वयममुष्य ११५ प्रायश्चितं चरिष्यामि ७२, ६८, २४० न च मेऽवगच्छति यथा १३८ प्रारब्धां तरुपुत्रकेषु २६२ न जाने संमुखायाते १२१ प्रारम्यते न खलु ७३

नन्वेष राक्षसपतेः स्खलित: २७६ प्रारम्भेऽस्मिन्स्वामिन: ४,(पृ० १८, २१) न पण्डिता: साहसिका: २५८ बाले नाथ बिमूञ्च ११६

न मध्ये संस्कारम् १११ बाह्वोरबलं न विदितम् ७०

नवजलधर: सन्नद्वोऽयम् २७५ ब्राह्मणातिक्रमत्यागः ८३, २४३

नवनखपदमङ्गम् १३३, ३१४ ब्रा त नूतनकूष्माण्ड- नष्टं वर्षवरैमंनुष्यगणना- १८४ भम धरपित्र वीसद्वो २६० नान्दीपदानि रतिनाटक- १६८ मिक्षो मांसनिषेवणम ३४० निःश्वासा वदनं दहन्ति १३४ भुक्ता हि मया गिरयः २०७

निजपाणिपल्लवतटस्खलनात् १३१ भूमौ क्षिप्त्वा शरीरम ५६

निद्रार्धमीलितहशो २५० भूय: परिभवक्लान्ति- ११ निर्मग्नेन मयाऽम्भसि ३१३ भूयो भूय: सविधनगरी- ३०१

निर्वाणवैरिदहना: १६२ नूनं तेनाद वीरेण भ्र भङ्ग सहसोद्गता पृ० १७१ ४४ मखशतपरिपूत गोत्र- ४०, ७७ न्यक्कारो ह्ययमेव मे यदरय: २१७ मज्य पइण्णा एसा ४३

पक्ष्माग्रग्रथिताश्रुबिन्दु- २३३ मतानां कुसुमरसेन १६६

पञ्चानां मन्यसेऽस्माकम्- ३१ मथ्नामि कौरवशत समर ७

पटालग्ने पत्यौ नमयति २५३ मधु द्विरेफ: कसुमैकपात्रे २६६

पणातरकुविश्राण दोह्हवि ३११ मध्याह्नं गमय त्यज श्रमजलम् १७३ पत्युः शिरश्चन्द्रकलामनेन १७२ मस्थायस्तार्णवाम्भ: ६

परिच्युतस्तत्कुचकुम्भमध्यात् १८ मनोजातिरनाधीनां १६५

परिषदियमृषीणामेष २२ महु एहि कि सिवालअ १४३ पशुपतिरपि तान्यहानि २७८ मा गर्वमुद्धह कपोलतले १३० पादाङ्गुष्ठेन भूमिम् १७१ मातः कं हृदये निधाय १६६

पित्रोविधातु शुश्र षाम् ८१ मात्सर्यमुत्सार्य विचार्य २८३ पुण्या ब्राह्मणजातिः पृ० १२१ मुनिरयमथ वीरस्तादृशः २४२

पुरस्तन्व्या गोत्रस्खलन- २३८ मुहऊ सामलि होई २१४

पूर्यन्ता सलिलेन ५० मुहुरुपहसितामिवालिनादैः ३२०

पौलस्त्यपीनभुजसंपदु- २६४ मृगरूपं परित्यज्य २६५ प्रएायकुपितां दृष्टवा देवीम ३१०, ३१६ मृगशिशुद्दशस्तस्याः १४१

प्रसायविशदां हर्टटि वकत्रे २३ मेदच्छेदकृशोदरं लघु २०८

प्रथमजनिते बाला मन्यौ ११० मैनाक: किमयं रुणाद्धि २४४

प्रयत्नपरिबोधित: २७ यत्सत्यव्रतभङ्गभीरुमनसा १२ प्रसीदत्यालोके किमपि ८४ यदि परगुणा न क्षम्यन्ते २३७ प्रसीदेति ब्र यामिदमसति २० यद्ब्रह्मवादिभिरुपासित- ६३ प्रहरकमपनीय २५१ यद्यत्प्रयोगविषये ७४

प्रहरविरती मध्ये वाह्न: ३२५ यद्विस्मयस्तिमितम् १०

प्राप्ता: श्रिय: सकलकाम- २१५ यातु यातु किमनेन ११७ प्राप्ता कथमपि दैवात् १६ यातो विक्रमबाहुरात्म- प्राप्य मन्मथरसादति- २२४

Page 456

( ४०७ )

यातोऽस्मि पद्मनयने शस्त्र प्रयोगखुरली कलहे १८० यान्त्या मुहुर्वलितकन्धर ६, ३०२ शस्त्रमेतत्समुत्सृज्य ३४२ युष्मच्छासनलङ्घनाम्भसि २४१ शास्त्रेषु निष्ठा सहजश्च १४० ये चत्वारो दिनकर- ७१ येनावृत्य मुखानि शिरामुखैःस्यन्दत एव ७८, १०१ ३३ शीतांशुमु खमुत्पले २५ ये बाहवो न युधि २१८ शोक स्त्रीवन्नयनसलिलै: ४८ योगानन्दयशः शेषे ६२ श्रीरेषा पाशिरप्यस्याः -२१ रक्षो नाहं न भूतम् ५४ श्रीहर्षो निपुण: कविः १६१ रण्डा चण्डा दिक्खिदा १६८ रतिकीडादयूते कथमपि श्रुताप्सरोगीतिरपि १४४ १६४ श्रत्वायातं बहिः कान्तम् १६३ राज्ञो विपद् २१६ इलाध्याशेषतनु सुदर्शनकर: २८८ राज्यं निर्जितशत्र- ७५, २२६ सकलरिपुजयाशा ५१, ३०२ राम राम नयनाभिराम ६४ सखि स विजितो वीणा सच्चं जाएइ दट्ठुं सरि १३२ रामो मूध्नि निधाय १८६ १४२ लक्ष्मीपयोधरोत्सङ्ग- ३३३ लघुनि तृणकुटीरे सच्छिन्नबन्धद्र तयुग्यशून्यम् २७० २४६ सततमनिवृ तमानसम् २०६ लज्जापज्जत्तपसाहणा।इं १०५ सदयरिछन्नशिर: २२६ लाक्षागृहानलविषान्न- १६३, ३३८ सन्तः सच्चरितोदयव्यसनिनः २१० लाक्षालक्ष्म ललाटपट्टम् ८७ सभ्र भङ्ग करकिसलया १७० लालां वक्त्रासवं वेतति लावण्यकान्तिपरिपूरित- ३३६ समारूढा प्रीति: २६१ संप्राप्तेऽवधिवासरे २६ २४६ लोवण्यमन्मथविलास- १०० सरसिजमनुविद्धम् १५३ लावण्यामृतवर्षिसि लीनेव प्रतिबिम्बितेव ३३० सव्याजं तिलकालकान् १६६ २४५ सव्याज: शपथैः प्रियेर ३७ लुलितनयनतारा: २२० सहभृत्यगं सबान्धवम् १४ वत्सस्याभयवारिधे: २६६ सहसा विदधीत न क्रियाम् २५७ वयमिह परितुष्टा: २५५ सालोए चिश्र सूरे १७४ वाताहतं वसनमाकुलमुत्तरीयम् पृ० २६२ विनिकषणरणत्कठोरदंष्ट्रा सुधाबद्धग्रासैरुपवनचकोरैः ३०६ २८० विनिश्चेतु शक्य: सुभ्र त्वं नवनीतकल्पहृदया ३१२

विरम विरम वह्ने २५६, ३२६ स्तनतटमिदमुत्तुङ्गम् १२०

विरोधो विश्रान्तः प्रसरति २६६ स्तनावालोक्य तन्वङ्गयाः ३०५ ३८ विवृण्वती शैलसुतापि स्तिमितविकसितानाम् ३०३ २८६ विसृज सुन्दरि स्नाता तिष्ठति कुन्तलेश्वरभ्षुता १७७ स्पृष्टस्त्वयैष दयिते ३३१ विस्तारी स्तनभार एष- १०६ वृद्धास्ते न विचारणीय- ६६, ६४ ३५ स्मरदवथुनिमित्तं गूढम् वृद्धोऽन्धः पतिरेष मञ्चक- १६७ २३१ वेवइसेअदवदनी स्मरनवनदीपूरेगोढा: स्मरसि सुतनु तस्मिन् ११३ २१४ २६२ व्यक्तिव्यंञ्जनधातुना २६४ स्मितज्योत्स्नाभिस्ते ३१७ व्याहता प्रतिवचो न १०६, ३०८ स्वगेहात्पन्थानं तत- ३४३ शठोऽन्यस्या: काञ्जीमणि ८६ स्वसुखनिरभिलाषः द२

Page 457

स्वैदाम्भ:कणिकान्चिते ११८ हावहारि हसितं वचनानाम् २४५

हंस प्रयच्छ मे कान्ताम् २०६ हन्मर्मभेदिपतदुत्कटकङ्क- २४७

हरस्तु किञ्चित्परिलुप्तधैर्य: १४६ हेरम्बदन्तमुसलोल्लिखितैक- १८२

हर्म्याणां हेमशृङ्गश्रियमिव ३४ होन्तपहिअ्रस्स जाआा ३२४

हसिअमविश्ारमुद्धं १०४ ह्रिया सर्वस्यासौ हरति २२१

हस्तैरन्तनिहितवचनैः २६३

-000100

1959

#55

Page 458

हमारे कुछ उपयोगी ग्रन्थ १. ऋकसूक्त संग्रह, व्याख्याकार-डा० हरित्त शास्त्री २. काव्यप्रकाश, व्याख्याकार-डा० श्रीनिवास शास्त्री ३. वेदान्तसार, व्याख्याकार-डा० नरेन्द्रदेव सिंह शास्त्री ४. तर्कभाषा, व्याख्याकार-डा० सत्यनारायण पाण्डेय ५. मीमांशा परिभाषा, व्याख्याकार-डा० हरिदत्त शास्त्री ६. रत्नावली नाटिका, व्याख्याकार-डा० शिवराज शास्त्री ७. वेणीसंहार नाटक, व्याख्याकार-डा० शिवराज शास्त्री 5. मृच्छकटिकम, व्याख्याकार-डा० श्रीनिवास शास्त्री ६. मुद्राराज्सम्, व्याख्याकार-डा० निरुपण विद्यालंकार १०. एम० ए० संस्कृत व्याकरर, व्याख्याकार-डा० श्रीनिवास शास्त्री ११. धर्मशास्त्र में शुद्रों की स्थिति-डा० निरूपण विद्यालंकार १२. संस्कृत काव्यकार. (संस्कृत गद्य-पद्य लेखक तथा नाटककारों की पूरं आलोचन। १३. दर्शनशास्त्र का इततिहास डा० हरिदत्त शास्त्री तथा डॉ० नरेन्द्रदेव शास्त्री १४. नाट्यशासत्र-भवभूति श्मा १५. शिशुपालवध-महावाव्य १ सर्ग डा० श्रीनिवास शास्त्री १६. सांख्यकारिका-डा० हरिदत्त शास्त्री १७. नैषध-महाकाव्य प्रथम सर्ग-डा० शिवराज शास्त्री १८. संस्कृत निबन्तमाला-प्रथत, द्वितीय भाग प्रो० सी० मिश्रा, रमेश चन्द शास्त्री १६. रचनानुवादप्रभा-डा० श्रीनिवास शास्त्री २०. शंकराचार्य-उनका मायावाद तथा अन्य सिद्धान्तों का आलोचनात्मक अध्ययन डा० राममूर्ति शर्मा २१. संस्कृत काव्य में शकुन-डा० दीपचन्द शर्मा २२. उत्तररामचरितम-ब्रह्मानन्द शुक्ल तथा डा० कृष्णकान्त शुक्ल २३. दशरूपकम् व्याख्याकार-डा० श्रीनिवास शास्त्री २४. संस्कृत-शिक्षणा की नवीन योजना-डा० धर्नेन्द्रनाथ शास्त्री २४. मेघदूतम् -- डा० शिवराज शास्त्री २६. काढम्बरी (पूर्वाद्ध) डा० श्रीनिवास शास्त्री, डा० महेशचन्द 'भारतीय' २७ कालिदास और भवभूति के नाटकों का तुलनात्मक अ्रधयन डा० सुरेन्द्र देव शास्त्री २८ू. निरुक्तम् डा० कपिलदेव एम० ए० २६. वैदिक साहित्य का इतिहास डा० राममूर्ति शर्मा ३०. अभिज्ञानशाकुन्तम् डा० निरूपस विद्यालंकार ३१. संस्कृत साहित्य का आलोचन मक इतिहास डा० सत्यनारायण पाण्डेय ३२. कालिदास की कला और संस्कृति डा० देवीदत्त शर्मा साहित्य भण्डार, सुभाष बाजर, मेरठ ।