1. Dasarupaka Dhanika Bhola Shankar Vyas Chowkambha Sanskrit Series (Hindi)
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हिन्दी दशरपक
डॉ. भोला शंकर व्यास चौरवम्बा विद्या भवन, बनारस
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।। श्रीः।। विद्या भवन संस्कृत ग्रन्थमाला
हिन्दी
दशरूपक
दशरूपक की हिन्दी व्याख्या
व्याख्याकार- डॉ० भोलाशङ्कर व्यास एम. ए.
चौखम्बा विद्या भवन, चौक, बनारस-१
१९५५
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।। श्रीः।। विद्या भवन संस्कृत ग्रन्थमाला
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॥ श्री:॥ धनञ्जयविरचितं
दशरूपकम् (साबलोकम्) 'चन्द्रकला' हिन्दीव्याख्योपेतम्
व्याख्याकार- डाक्टर भोलाशङ्करव्यास एम. ए., पीएच. डी., एल. एल. बी., शास्त्री अध्यापक, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय
चौखम्बा विद्या भवन, चौक, बनारस-१
सं० २०११] [मूल्य ५)
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प्रकाशक :- चौखम्बा विद्या भवन, चौक, बनारस
(पुनर्मुद्रणादिका: सर्वेऽधिकारा: प्रकाशकाधीना:) Chowkhamba Vidya Bhawan, Chowk, Banaras-1 1955
मुद्रक- विद्याविलास प्रेस,
बनारस
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समर्पण
पूज्य पितामह
श्री गोवर्धन जी शास्त्री
तथा
गुरुवर
प्रो० चन्द्रशेखर जी पाण्डेय
(मू० पू० अध्यक्ष, संस्कृत विभाग, सनातनधर्म कालेज, कानपुर)
की
दिवंगत आत्माओं
को
सादर समर्पित
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मकत्याभिनन्दनम् काशीनाथप्रपदविहिताव्याजभक्तिपपूर्णो,
विद्याधाम प्रविततशुभाऽऽनन्दिनीसिद्धियुक्तो, देवः श्रेयो दिशतु सुचिरं कोऽपि गोवर्धनो मे ॥ १ ॥ नमदुबुन्दीनाथप्रमुखबहुसामन्तनिकरै- रलं मौलिस्यूतोन्मुखमणिमयूखैस्तरलितः। प्रभां का मातन्वन् नखंविधुरराजत् पदयुगे, तदीयः पौत्रोऽयं नमति पितरं ब्रह्मधिषणम्॥ २ ॥ कृँतो विद्यारम्भ: शुकमुखगलत्कृष्णचरिता- मृतास्वादेनैवाSल्पवयसि यदङ्के स्थितवता। गिरा गीर्वाखानामलभिकृपया यस्य विमला, तमेषोऽहं वन्देऽपरमिव गुरुं तातपितरम्॥ ३ ॥ श्रीचन्द्रशेखरकृपाततिमेव लब्ध्वा, नाव्यं चकार सरसं भरतोऽपि हृदयम्। अस्त्यद्भुतं किमिह तत्कृपयैव सैषा, व्याख्या कृतास्ति मर्यंका दशरूपकेऽस्मिन् ॥४ ॥ सर:स्वतीपूतसरःसु मज्जतोरहर्निशं ज्ञानतति वितन्वतोः। दिवि प्रकामं च सुरत्वमश्नतोस्तंयोः पदाब्जे निहिता नवा कृतिः॥५॥ १. गोवर्धन इति व्याख्याकर्तुः पितामहा महोपाध्याया गोवर्धनशास्त्रिणः । एतेषां पितरः व्याकरणचाचस्पतयः श्रीकाशीनाथशास्त्रिणः, माता च गौरी नाम्नी। त्रत्र शब्द- शक्तिमूलकेन ध्वनिना (व्यजनया) पितामहानां देवदेवस्य गणपतेश्व उपमानोपमेय- भावो व्यज्यते। अपरच्च, 'प्रवितत' इत्यादिपदे 'आनन्दिनी' ति मत्पितामही, गोवर्धन- शास्त्रिणां दारा अस्मिन् पक्ते आनन्दिनी एव सिद्धिस्तया युक्त' इति योज्यम्। गण- पतिपच्ते तु आसमन्तात् नन्दिनी एतादृशी (चासौ) सिद्धिर्गणपतिवधू: तया सह इति यथाप्रसंगं योजनीयम्। गरोशपक्षे 'गोवर्घन' इति पद 'गां वर्घयतीति' व्युत्पत्या सुष्टु परिणमति। 'कोपीति' पदद्वयेन भगवतो गणपतेः पितामहचरणानाश्च महामहित्वं य्योत्यत इति दिक्। २. नखविधुरित्यत्र जातावेकवचनम्। ३. अ्रनेन मम प्रथमे गीर्वाण- वाणीगुरवः पितामहपादा एव आसन्निति सूच्यते। तैरेव भागवत-कौमुदी-रघुवंशादयो प्रन्था: पाठिताः। ४. श्रीचन्द्रशेखरशास्त्रिण: पाण्डेया अनुवादकस्यालङ्कारशास्त्रे नाव्यशास्त्रे च गुरव आसन्। ५. 'मया इत्यर्थः। ६. तयो, पितामहानां, चन्द्रशेखरशास्त्रिणां चेति भाव:। शिवगरोशयोरित्यपि प्रसग्वेन व्यज्यत एव। ७. 'पदाब्जे' इति जातावेकवचनम्।
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- कशीस के केगर कगस
विषय-सूची
भूमिका १-४९ संस्कृत नाटक की उत्पत्ति व विकास-नाटक का मूल अनुकरणवृत्ति-भारतीय मत- वैदिक संवादों में नाटकीय तत्त्व-पाश्चात्य विद्वानों के मत-पाशिनि, पतञ्जलि तथा काम- सूत्र से नाटकों की स्थिति का संकेत-नाध्यशास्र का संचित्त इतिहास-भरत-भरत के व्याख्याकार-धनक्जय तथा धनिक का ऐतिहासिक परिचय-नाट्यशास्त्र के परवर्ती ग्रन्थ। ग्रन्थ का संच्षेप-रूपक उनके भेद व भेदक तत्त्व-कथावस्तु या इतिवृत्त-अर्थप्रकृति, अवस्था, सन्धि तथा सन्ध्यङ्ग-संस्कृत नाटकों में दुःखान्त नाटकों के अभाव का कारण- विष्कम्भक तथा प्रवेशक-पताका तथा पताकास्थानक-संवाद के प्रकाश, स्वगतादि भेद- नेता के धीरललितादि तथा दक्षिणादि भेद-नायक का परिच्छद-नायिका-भेद का आधार-रस की पुष्टि-रस के सम्बन्ध में मत-लोल्ट, शंकुक, भट्टनायक तथा अभिनव के मत-धनअ्य का मत-रसविरोध तथा उसका परिहार। धनञ्जय व धनिक की मान्यताएँ-व्यअ्ञना का खएडन-रस वाक्यार्थ है-रस तथा विभावादि में भाव्यभावक सम्बन्ध है-घनअ्य के मत में लोल्लट, शंकुक तथा भट्टनायक के मतों का मिश्रण-शान्त रस के सम्बन्ध में धन्जय के विचार। प्राचीन भारतीय रङ्गमश्च।
प्रथम प्रकाश १-७२ मंगलाचरण तथा ग्रन्थ के उद्देशादि का विवेचन-रूपक परिभाषा व भेद-नृत्य तथा नृत्त के मेद-इतिवृत्त के दो भेद-पताका तथा पताकास्थानक-५ अर्थप्रकृतियाँ-५ अव- स्थाएँ-५ सन्धियाँ-मुखसन्धि लक्षरा तथा १२ अङ्ग-प्रतिमुखसन्धि लक्षरा तथा १३ अङ्ग- गर्भसन्धि लक्षणा तथा १२ अङ्ग-अवमशसन्धि लक्षण तथा १३ अङ्ग-निर्वहरा सन्धि लक्षरा तथा १४ अङ्ग-वस्तु का दृश्य तथा सूच्य भेद-सूक्ष्म वस्तु के सूचक ५ अर्थोपके- पक-विष्कम्मक के दो मेद-प्रवेशक, चूलिका, अङ्कास्य तथा अङ्कावतार-वस्तु के सर्वश्राव्य, अश्राव्य तथा नियतश्राव्य ये तीन भेद-आकाशभाषित-उपसंहार। द्वितीय प्रकाश ७३-१४२ नायक का लक्षरा-उसके ४ मेद-धीरललित, धीरशान्त, धीरोदात्त, धीरोद्धत-शृङ्गारी नायक के ४ मेद-दच्िरा, शठ, धृष्ट तथा अनुकूल-उसके सहायक, विट, विदूषक, प्रति-
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नायक, नायक के सात्त्विक गुणा-नायिका के भेद, स्वीया, परकीया तथा सामान्या-मुग्धा, मध्या, प्रगल्भा तथा ज्येष्ठा कनिष्ठा आदि १३ मेद-अवस्था के आधार पर नायिका कें स्वाधीनपतिकादि ८ भेद। नायिका की सहायिकाएँ-नायिका के २० अलङ्कार-नायक के धर्मादि कार्य में सहायक-नायक के व्यवहार (वृत्ति) कैशिकी, कैशिकी के ४ अङ्ग- साख्व्रती, उसके अङ्ग-आरभटी, उसके अङ्ग-नाटक में पात्रों के उपयुक्त संस्कृत, शौरसेनी प्राकृत तथा मागधीप्राकृत के प्रयोग का नियम-पात्रों के आमन्त्रण (सम्बोधन) का प्रकार।
तृतीय प्रकाश १४३-१७५ / नाटक-पूर्वरङ्ग-भारती वृत्ति-भारती के प्ररोचनादि मेद-प्रस्तावना (आमुख) के तीन प्रकार-वीथ्यङ्ग-नाटक का इतिवृत्त-नायकानुचित्त इतिवृत्तांश का परित्याग-अक्क- विधान-नाटक में वीर तथा शृङ्गार रस-अङ्कों में पात्रों की संख्या व प्रवेश तथा निर्गम-
चतुर्थ प्रकाश १७६-२८२ रस-विभाव-आलम्बन तथा उद्दीपन-अनुभाव-भाव का लक्षण-सात्त्विक भाव- व्यमिचारी भाव-३३ व्यभिचारियों का सोदाहरणा लक्षरा-स्थायीभाव तथा भाव-विरोध पर विचार-शान्तरस तथा उसके स्थायी शान्त का निषेध-भावादि का काव्य से सम्बन्ध- व्यअनावादी के पूर्वपक्षी मत का उद्धरण-सिद्धान्तपक्ष की स्थापना-काव्य का वाक्यार्थ स्थायीमाव ही है-रस सामाजिक में रहता है-रसास्वाद के प्रकार-आस्वाद का लक्षणा तथा मेद-आठ रसों की संज्ञा-शान्तरस के विषय में पुनः विचार-शृङ्गार रस-संयोग तथा अयोग श्ृङ्गार-अयोग शृङ्गार के ३ मेद-प्रवास, प्रशायमान तथा ईर्ष्यामान-मान के हठाने के उपाय-करुण तथा अयोग शृङ्गार का भेद-वीररस-बीभत्सरस-रौद्ररस-हास्यरस- हास्य के ६ भेद-अद्भुत रस-भयानक रस-करुरारस-प्रीति, भक्ति आदि का इन्हीं में अन्तर्भाव-भूषणादि का भी इन्हीं में अन्तर्भाव-उपसंहार।
ज-फP
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दो शब्द धनञ्जय के 'दशरूपक' की यह हिंदी व्याख्या आज से कई वर्ष पूर्व ही प्रकाशित हो जानी चाहिये थी, पर समय के अनुकूल न होने से ऐसा न हो पाया। प्रकाशक महोदय ने आज से चार वर्ष पूर्व मुझसे इसकी हिंदी व्याख्या करने को कहा था। उन्हीं दिनों मैंने दशरूपक का कार्य आरम्भ भी कर दिया था, किन्तु लन्दन विश्वविद्यालय के स्कूल आव् ओरियन्टल स्टडीज के निमन्त्रण पर मुझे भाषाविज्ञान विषयक गवेषणा के लिए वहाँ जाना पड़ा। इसलिए अनुवाद कार्य खटाई में पड़ गया। लन्दन से लौटने के बाद मैं पी. एच. डी. उपाधि के थीसिस में व्यस्त रहा। जब मैंने अपना आजीविका-क्षेत्र ही बनारस चुना, तो प्रकाशक महोदय ने पुरानी बात याद दिलाई, और मुझे दशरूपक के अधूरे पड़े अनुवाद को पूरा कर देने को प्रोत्साहित किया। नाध्यशास्र के इतिहास में धनअ्य का दशरूपक एक महत्त्वपूर् अ्रन्थ है। भरत के नाध्यशास्त्र के रूपकविषयक सिद्धान्तों का संचित्त किन्तु सर्वाङ्गीण विवेचन इसकी विशेषता है। यह ग्रन्थ बाद के नाध्यशास्त्र तथा रसशास्र के अ्न्थ-प्रतापरुद्रीय, एकावली, साहित्यदर्पणा, नाध्यदर्परा, रसमअरी का उपजीव्य रहा है। ऐसे ग्रन्थ का हिन्दी अनुवाद आवश्यक था। अंगरेजी भाषा में हॉस ने इसका अनुवाद प्रकाशित कराया था, किन्तु वह केवल कारिकाओं का ही अनुवाद है। मेरी ऐसी धारणा है, कि घनअ्य की कारिकाएँ स्वतः अपूर्णां हैं। धनिक के अवलोक के बिचा वे अधूरी ही हैं, तथा नाध्यशास्त्र का आवश्यक ज्ञान अवलोकयुक्त दशरूपक के अध्ययन पर ही हो सकता है। अतः यहाँ पर मैंने सावलोक दशरूपक की व्याख्या की है। कारिका, वृत्ति तथा उदाहरणों की व्याख्या करने में मूल का सदा ध्यान रखा गया है। किन्तु भिन्न-भिन्न स्थलों पर आवश्यकतानुसार मिन्नता मिल सकती है। कारिकाभाग तथा वृत्तिभाग में एक ही बात के कहे जाने पर, तथा वृत्तिभाग में विशेषता न होने पर कहीं कहीं दोनों की एक साथ ही व्याख्या कर दी गई है। इसका कारण है, पुनरुक्ति दोष से बचना। वृत्तिभाग के शास्त्रार्थ स्थलों को स्पष्टरूप से समझाने की चेष्टा की गई है। इन स्थलों में मूल भाग की अवहेलना न करते हुए भाव को स्पष्ट किया गया है। ऐसे स्थलों पर पुनरुक्ति को दोष न समझ कर कभी कभी एक ही बात को दो तीन ढङ् से समझाया गया है, जिससे हिन्दी के पाठक संस्कृत साहित्य की
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[ २ ] शात्त्रार्थप्रणाली को हृदयङ्गम कर सकें। उदाहरणों की व्याख्या में दो शैलियाँ मिलेंगी। कुछ स्थलों पर पद्यों का शाब्दिक अनुवाद ही किया गया है, तो अन्य स्थलों पर पद्यों के भाव को स्वतन्त्र रूप से स्पष्ट करते हुए पद्य की व्याख्या की गई है। यह शैलीमेद विषय को ध्यान में रखकर किया गया है। व्याख्या में पसिडताउपन को बचाने की कोशिश की गई है, तथा भाषा में इस दोष को न आने दिया है। किन्तु कुछ स्थलों पर, संस्कृत की शाब्दिक परम्परा का अनुवाद (विशेषरूप से) अक्रशः स्पष्ट करने के कारण, पसिडताउपन आ गया हो, तो कषम्य है। भाषा को प्रवाहमय रखने के कारण कहीं कहीं अरबी-फारसी के प्रचलित शब्दों का प्रयोग हो गया है, किन्तु यह उदाहरणों के अनुवाद में उनके भावों की अभिव्यअ्ना को विशेष स्पष्ट करने में सहायक सिद्ध हुआ है और ऐसे ही स्थलों पर इनका प्रयोग किया गया है।
इस अनुवाद को पसिडत-मएडली के सम्मुख रखते हुए मैं यह दावा नहीं करता कि यह अनुवाद दोषरहित है। अपनी वस्तु किसे बुरी लगती है। मुझे इसके कई दोष नजर न आये हों। मैं साहित्यशास्त्र के नदीष्ण विद्वानों से प्रार्थना करूँगा कि उन दोषों को निर्दिष्ट करने की कृपा करें, जिससे भावी संस्करण में मैं उन्हें हटा सकूँ। इस अनुवाद को मैं अपने संस्कृत-साहित्य के प्रथम गुरु, अपने पितामह महोपाध्याय पं० गोवर्धन जी शात्री की दिवंगत आत्मा को, तथा अपने भारतीय साहित्यशास्त्र एवं नाव्यशात्र के आचार्य प्रो० चन्द्रशेखर जी पाएडेय एम. ए., शास्त्री, मूतपूर्व अध्यक्ष, संस्कृतविभाग, सनातन धर्म कालेज, कानपुर की स्वर्गत आत्मा को, श्रद्धाज्ञलि के रूप में भेंट कर रहा हूँ।
काशी दीपावली सं० २०११ भोलाशंकर व्यास
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भूमिका
(9) संस्कृत नाटक-उत्पत्ति व विकास मानव में स्वभाव से ही अनुकरण वृत्ति पाई जाती है। छोटे बच्चों की अविकसित चेतना में भी इसका बीज रूप देखा जाता है। मानव ही नहीं कई पशुओं में भी, विशेषतः बन्दरों में हम इस अनुकरणवृत्ति को मजे से देख सकते हैं। लन्दन के म्यूजियम के चिम्पेजीज हमारी तरह कुर्सी टेबिल पर बैठ कर प्याले-तश्तरी से चाय पीते हैं, और कभी कभी तो कोई चिम्पेजीज सुलगी हुई सिगरेट को देने पर अभ्यस्त व्यक्ति की तरह धूम्रपान भी करता हुवा देखा जा सकता है। वैसे मैं डार्विन के चिकासवाद का उस हद तक कायल नहीं, जितना कि लोग उसके सिद्धान्त के रबड़ को खींच कर बढ़ाते नजर आते हैं, पर इस विषय में मेरी धारणा आधुनिक जीवशास्त्रियों तथा मनःशास्त्रियों से मिलती है, कि चेतना की अविकसित स्थिति में भी हम अनुकरण- वृत्ति के चिह्न पा सकते हैं। मैं इस भूमिका को लिखने में व्यस्त हूँ, पीछे मेरी छोटी बच्ची जिसकी अवस्था डेढ वर्ष से भी कम ही है, मेरे चप्पलों को दोनों पैरॉ में पहनने की चेष्टा कर रही है। यही नहीं, मुझे रेडियो के वोल्यूम-कन्ट्रोलर को घुमाते देखकर, वह भी वोल्यूम-कन्ट्रोलर घुमाना चाहती है, यदि कभी कभी उसकी इस चेष्टा में बाधा उपस्थित की जाती है, तो वह रुदन के द्वारा उसकी प्रतिक्रिया करती है। बच्चों ही नहीं, बड़ों में भी दूसरे लोगों की चाल-ढाल, रहन-सहन, बोलने का ढङ्ग आदि का व्यंग्यात्मक अनुकरण देखा जाता है। यह क्यों? अनुकरण वृत्ति का एकमात्र लक्ष्य आनन्द प्राप्त करना, मन का रजन करना ही माना जा सकता है। अज्ञात रूप से मेरी छोटी बच्ची भी हमारी क्रिया-प्रक्रियाओं का, व्यवहार का, अनुकरण कर, अपनी मनस्तुष्टि ही सम्पादित किया करती है। हमारे नवयुवक, किन्हीं बहे-बूढों की हरकतों की नकल कर अपने दिल को बहलाया करते हैं। दिल बहलाना ही इसका एकमात्र कारण है। दिल बहलाने वाली वस्तु में हमें एकाग्रचित्त करने की क्षमता होती है, और कुछ क्षण तक वह हमें केवल मनोराज्य में ही विचरण कराती है। उस विषय के अतिरिक्त दूसरे विषयों से जैसे हम कुछ क्षणों के लिए अलग से हो जाते हैं। यहाँ मैं साधारण 'मनोरज्न' की बात कह रहा हूँ, काव्य के रसास्वाद को हम शत प्रतिशत रूप में इस कोटि का नहीं मान सकते, क्योंकि उसमें 'दिल बहलाने के अलावा' कुछ 'और' भी है, और यह कुछ और उसमें कम महत्त्वपूर्ण नहीं।
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काव्य या कला में भी अनुकरणवृत्ति को मूल कारण मानना अनुचित न होगा। सम्भवतः इसीलिए पाश्चात्य दार्शनिक अरस्तू ने तो 'कला को अनुकरण" ही माना। जहाँ तक नाटक का प्रश्न है, उसमें तो अनुकरण स्पष्टतः दिखाई पड़ता है। धनंजय की नाव्य तथा रूपक की परिभाषाएँ इस बात को अच्छी तरह स्पष्ट कर देती हैं :- 'अवस्थानुकृतिर्नाट्यम्' 'रूपकं तत्समारोपात्'। काव्य और ललित कला; विशेषतः नाटक, मानव तथा मानवेतर प्रकृति का अनुकरण कर उसके द्वारा आनन्द की उत्पत्ति या रसोद्बोध करते हैं। वे केवल बाह्य प्रकृति का ही अनुकरण नहीं करते, किन्तु मानव की अन्तः प्रकृति को, उसके मानसिक भावों को भी अनुकृत करते हैं। एक कुशल मूर्तिकार या चित्रकार न केवल किसी सुन्दरी के अवयवों का सुन्दर चित्रण कर सजीवता की अनुकृति करता है, किन्तु उसके मुखमण्डल, नेत्र आदि का टड्कन या अङ्कन इस प्रकार का करता है, कि वे उसके मनोगत भावों की व्यज्ना कराने में समर्थ होते हैं। इसी तरह कुशल कवि अपने पात्र के मनोगत रागादि को भी ठीक उसी तरह वर्णित करता है, जैसे उसके बाहरी रूप को। नाटक की सफलता भी तभी मानी जाती है, जब कि नाटककार ने पात्रों की आभ्यन्तर प्रकृति को सुन्दर तथा मार्मिक रूप से अभिव्यक्त किया हो। भारतीय अलङ्कारशात्त्र में रस-सिद्धान्त की महत्ता इसी ओर सङ्केत करती है, और दृश्य काव्य के क्षेत्र में रस की आत्मरूप में प्रतिष्ठा भरत मुनि के भी बहुत पहले ही-नन्दिकेश्वर या और किन्हीं आचार्यों के द्वारा-हो चुकी थी। इस प्रकार नाटक का एकमात्र लच्य मानव तथा मानवेतर प्रकृति का चित्रण ही है। त्रराजकल की समाजशास्त्रीय प्रगति ने काव्य के उद्भव के विषय में कई नई बातें खोज निकाली हैं। उनका कहना है, कि आदिम सभ्यता वाले लोगों में प्रकृति के रहस्यात्मक तत्त्वों की ओर जिज्ञासा का भाव रहता है। वे इसे समझने की चेष्टा करते हैं। यह जिज्ञासा-वृत्ति आदिम सभ्यता वाले लोगों में जादू की धारण को उत्पन्न करती है। जादू को समाजशास्त्री काव्य या सज्गीत के ही नहीं, भाषा के विकास में भी एक महत्त्वपूर्ण तत्त्व मानते हैं। जादू के द्वारा प्रकृति को अपने वश में करने की प्रक्रिय। में नृत्य, गीत तथा उत्सव की दूसरी कर्मकाण्डपद्धति का प्रयोग कई आर््रदिम सभ्यता वाली जातियों में पाया जाता है। समाजशास्त्री इन्हीं उत्सवों में नाटक के भी बीज ढूंढने की चेष्टा करेंगे। आर््स्तु, भारतीय परम्परा के अनुसार जैसा कि नाय्यशास्त्र में बताया गया है, नाटक की उत्पत्ति त्रेतायुग में ब्रह्मा के द्वारा की गई थी। सतयुग में लोगों को किन्हीं मनोरजन के साधनों की आवश्यकता न थी। त्रेतायुग में देवता लोग ब्रह्मा के पास गये, औरर उनसे प्रार्थना की कि वे किसी ऐसे वेद की रचना करें, जो शूद्रों के द्वारा भी अनुशीलित हो सके, क्योंकि शूदों के लिए निःश्रेयस् का कोई साधन न था, वेदाध्ययन १. Art is imitation .- Aristotle.
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उनके लिए निषिद्ध था। इस पर ब्रह्मा ने ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद तथा अभर्ववेद के आधार पर ही पश्चम वेद-नाव्यवेद-की रचना की। इस पथ्चम वेद में चार अ पाये जाते हैं :- पाठ्य, गीत, अभिनय तथा रस। इन चारों तत्त्वों को ब्रम्मा मे क्रमशः ऋक्, साम, यजुष् तथा अथववेद से गृहीत किया।9 इसके बाद व्रह्मा ने विश्वकर्मा को एक नाट्यगृह बनाने का आदेश दिया, तथा भरत मुनि को इस कला को सम्पादित करने तथा उसकी शिक्षा देने को कहा। ब्रह्मा ने भरत मुनि को सौ शिष्य तथा सौ अप्सराएँ भी इसलिए सौंपी, कि मुनि उन्हें नाट्यकला की व्यावहारिक शिक्षा दें। इस काम में शिव तथा पार्वती ने भी हाथ बँटाया। शिव ने नाट्य में ताण्डव नृत्य का, तथा पार्वती ने लास्य नृत्य का समावेश किया। नाय्यवेद के विकास के विषय में यह कल्पना कम से कम एक बात की पुष्टि अवश्य करती है, कि भरत के नाव्यशास्त्र की रचना के पूर्व भारतीय नाटक तथा भारतीय रज्म्न पूर्णतः विकसित हो चुके थे। पर, भरत का नाव्यशास्त्र कब लिखा गया ? इस प्रश्न का उत्तर हमें खोजना पड़ेगा । भरत के नाट्यशास्त्र की रचनातिथि, तथा महत्ता पर हम आगे प्रकाश डालेंगे। यहाँ तो हमें केवल यह बताना था कि भारतीय परम्परा नाटकों की दैवी उत्पत्ति मानती है। नाटकों के कई तत्त्वों में से दो तत्त्व विशेष प्रमुख हैं, संवाद तथा श्रमिनय। संवाद वाले तत्त्व को हम, भारत के प्राचीनतम साहित्य-ऋग्वेद, में ढूँढ सकते हैं। इस तरह नाटक के बीज वेदों में मजे से मिल सकते हैं। ऋग्वेद में लगभग १५ सूकर ऐसे हैं, जिनमें संवाद का तत्त्व पाया जाता है। इन्द्र-मरुत्-संवाद (११६५; ११७०); विश्वामित्र-नदी-संवाद ( २।२३ ), पुरुरवस्-उर्वशी-संवाद (१०।९५), तथा यम-यमी-संवाद (१०।१०) इनमें प्रमुख हैं। वैसे दूसरे संवादों का भी उल्ेख किया जा सकता है, जैसे इन्द्र, इन्द्राणी तथा वृषाकषि का संवाद (१०16६) अगस्त्य तथा उनकी पत्नी लोपामुद्रा का संवाद (१।१७९)। इन संवादों के आधार पर मैक्स- मूलर ने यह मत प्रकाशित किया था, कि इन सूक्तों का पाठ, यजञ के समग इस ढश से किया जाता रहा होगा, कि अलग अलग ऋत्विक अलग पात्र (मरुतू या इन्द्र) वाले मन्त्रों (संवादों) का शंसन करते होंगे। प्रोफेसर सिलवाँ लेवी ने भी इस मत की पुष्टि की है, तथा ऋग्वेद काल में अभिनय की स्थिति मानी है। उनका मत है, कि उस काल में देवताओं के रूप में, यज्ञादि के समय, नाव्याभिनय अवश्य होता होगा।१ लेवी तथा मैक्समूलर ही नहीं, श्रोएदर तथा हर्तेल भी इसी मत के हैं, कि ऋग्वेद के सूक्तों में अभिनय तथा संवाद के तत्त्व विद्यमान हैं, जो नाटकों के बीज हैं। हर्तेल का मत है कि वैदिक सूक्त गेय रूप में प्रचलित रहे हैं । अतः विभिन्न वक्ताओ्र्प्रों १. जश्राह पाठ्यं ऋग्वेदात् सामभ्यो गीत मेव च। यजुर्वेदादभिनयान: रसानाथर्वणा दपि॥ (भरतः नाव्वशास १) २. कीथः संस्कृत ड्रामा पृ. १५-१६. २ द० भू०
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के भेद का प्रदर्शन एक ही गायक ( या पाठक ) के द्वारा नहीं हो सकता था। इसलिए ऐसे सूक्तों का, जिनमें एक से अधिक वक्ता पाये जाते थे, अनेक पाठकों के द्वारा पढ़ा जाना असंम्भव नहीं। इस प्रकार ये सूक्त नाट्यकला के प्रारम्भ कहे जा सकते हैं। शएदर ने ऋग्वेद से कुछ सूक्त उपस्थित किये हैं, जिनको वे नाटक का आदिम रूप मानते हैं, तथा गेय एवं अभिनय दोनों तत्त्वों को वहाँ हूँढ़ते हैं। ऋग्वेद के मण्डूक सूक्त (७।१०२) के बारे में वे कहते हैं, कि ब्राह्मण लोग मेढकों से भरे तालाब में खड़े होकर इस सूक्त को गाते होंगे। ऋग्वेद के नवम मण्डल के ११२ वें सोम सूक्त के विषय में भी उनका यही मत है। किन्तु ये दोनों ऊपरी मत निःसार हैं। डॉ० कीथ ने इन दोनों मतों का खण्डन किया है। वे इन संवादों को नाटकीय संवाद न मान कर कर्मकाण्ड तथा पौरोहित्य कर्म के संवाद मानते हैं। वस्तुतः कर्मकाण्डीय परिपाटी को नाटकीय मान बैठना ठीक नहीं। साथ ही श्रोएदर आदि विद्वानों का यह कहना कि ये सूक्त गाये जाते थे, ठीक नहीं जान पड़ता। गेय तत्त्व के लिए तो सामवेद के मन्त्र थे। ऋग्वेद के मन्त्रों का 'उद्गीय' न होकर 'शंसन' होता था। हाँ इतना माना जा सकता है, कि ऋग्वेद के इन संवादों में नाटक के बीज विद्यमान हैं, पर इन्हें नाटक का स्थानापन्न मानना ठीक नहीं। : प्रो० श्रोएदर आदि के मत का खण्डन अन्य विद्वानों ने भी किया है। श्री सीताराम जी चतुर्वेदी ने अपने 'अभिनवनाव्यशास्त्रम्' में बताया है, कि नाटक स्वतः एक यजञ है, अतः इसे ऋग्वेद के उन सूक्तों का आधार मानकर किसी दूसरे यज्ञ का अज्ञ कैसे माना जा सकता है। साथ ही श्रोएदर आदि नाटक, नृत्य तथा संवाद सभी को एक मान बैठते हैं। कोरा नाच या कोरा संवाद नाट्य कदापि नहीं हो सकता, क्योंकि नाव्य में सास्विक, आज्गिक, वाचिक तथा आहार्य चारों प्रकार के अभिनयों के द्वारा रससृष्टि की जाती है। उन्होंने अपने मत का प्रदर्शन करते समय यह भी बताया है कि यूरोप चाले विद्वान् प्रत्येक स्थान पर विकासवाद का सिद्धान्त लागू करते हैं, और भारतीय नाटकों की परम्परा का अध्ययन भी इसी आधार पर करते हैं। ऐसा करना ठीक नहीं जान पड़ता। कुछ भी हो, ऋग्वेद के संवादों में नाटक के बीज मानने में कोई अनुचित बात नहीं है। नाच को नाटक का पूर्वरूप मानने वालों में मैकडोनल भी हैं। उनकी कल्पना है, कि संरु्कृत के नट तथा नाटक शब्द 'नट्' धातु से निकलते हैं। यह धातु संस्कृत के 'नृत्' (नाचना) धातु का ही प्राकृत या देशीरूप है। किन्तु यह मत ठीक नहीं है। संस्कृत में नट् तथा नृत् दोनों भिन्न धातु हैं, साथ ही नाव्य, नृत्य तथा नृत्त तीनों शब्दों का अरथ भी अलग अलग है। दशरूपकार ने वाक्यार्थमय अभिनय के द्वारा रससृष्टि करने को नाट्य माना है (वाक्यार्थाभिनयं रसाश्रयं)। इसी तरह केवल शब्दार्थ का अभिनय कर भावप्रदर्शनमात्र करने को नृत्य तथा ताल लय के साथ हस्त- पाइ सवालन को नृत कहा है। वे बताते हैं कि ये तोनों भिन्न भिन्न हैं-'अपद्
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[ x ] भावाश्रयं नृत्यमन्यत् ताललयाश्रयम्'। यह दूसरी बात है कि नृत्य तथा नृत्त दोनों ही, जिन्हें हम क्रमशः शास्त्रीय मार्ग तथा देशी भी कह सकते हैं, नाटक के उपस्कारक हो सकते हैं। इसी बात को दशरूपककार कहते हैं :- मधुरोद्धतमेदेन तद्दयं द्विविधं पुनः। लास्यताण्डवरूपेण नाटकाद्युपकारकम्॥ दशरूपककार की साक्षी पर मैकडोल का नाच और नाटक को एक मान लेने वाला मत धाराशायी हो जाता है। एक दूसरा मत प्रो० पिशेल का है, जो भारतीय नाटकों की उत्पत्ति पुतलियों के नाच, पुतलिकानृत्य-से मानते हैं। प्रो० पिशेल ने बड़े विस्तार के साथ यह बताया है, कि यूनान में प्राचीन नाटकों के पहले पुत्तलिका का प्रचलन नहीं था, अतः वहां के नाटकों को इसका विकसित रूप नहीं मान सकते। भारत में इनका प्रचार बहुत पुराना रहा है। महाभारत में पुतलियों का वर्णन मिलता है। कथासरित्सागर में भी इन पुतलियों का बड़ा वर्णन है। प्रो० पिशेल ने तो भारतीय नाटक के सूत्रधार की 'संज्ञा' को भी इनसे जोड़ने की चेष्टा की है। वे कहते हैं, कि पुतलियों को नचाते समय नचाने वाला उनके डोरों को-सूत्र को-पीछे से पकड़े रहता है। इसलिए वह 'सुत्र- धार' कहलाने लगा, और यही नाम नाटक के प्रयोक्ता को भी दे दिया गया। प्रो० पिशेल के इस मत का खण्डन एक दूसरे पाश्चात्य विद्वान् रिज़वे ने ही कर दिया है। 'सूत्रधार' शब्द की पिशेल वाली व्युत्पत्ति के बारे में कहा जा सकता है कि 'सूत्रधार' नाटक की कथावस्तु, नायक, रस आदि का सूत्र (संच्षेप ) में वर्णन करता है, इस लिए सूत्रधार कहलाता है, डोरे को पकड़ने के कारण नहीं। शारदातनय ने अपने 'भावप्रकाश' में इस शब्द की व्युत्पत्ति करते हुए लिखा है :- सूत्रयन् काव्यनित्तिप्तवस्तुनेतृकथारसान्। नान्दीश्लोकेन नान्द्यन्ते सूत्रधार इति स्मृतः ॥ डॉ० पिशेल एक दूसरा मत भी रखते हैं। इस मत के अनुसार नाटकों का विकास छाया-नाटकों से हुवा है। डाक्टर कोनो भी इस मत के समर्थक हैं। संस्कृत में कुछ छायानाटक पाये जाते हैं, जिनमें 'दूतान्द' विशेष प्रसिद्ध है। छायानाटक में महीन पर्दे के पीछे वास्तविक अभिनेताओं या मूर्तियों के द्वारा अभिनय दिखाया जाता है, सामाजिक पर्दे पर उनकी छायामात्र देखता है। दूताअ्द आदि संस्कृत के दो चार परवर्ती छायानाटकों के आधार पर भारतीय नाटकों का विकास छायानाटकों से मानना ठीक नहीं जान पड़ता। कुछ विद्वान चीरपूजा या इन्द्रध्वज उत्सव जैसे धार्मिक उत्सवों से नाटक का विकास मानते हैं, पर यह ठीक नहीं। संस्कृत के कई नाटकों में वीररस नहीं पाया जाता, उन्हें वीरपूजात्मक कैसे कहा जा सकता है। न यूनानी नाटकों की तरह भारतीय नाटक धार्मिक उत्सव से ही विकसित हुए हैं। कुछ लोग भारतीय नाटकों को यूनानी
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[ ६ ] नाटकों की देन कहते हैं। वे यह भी बताते हैं कि संस्कृत नाटकों में पर्दे के लिए प्युक्त 'यचनिका' शब्द 'यवन' से बना है, जो 'यूनानी' के लिए प्रयुक्त होता था। अतः इस शब्द से भारतीय नाटकों के यूनानी नाटकों के ऋणी होने का संकेत मिलता है। पर यह कल्पना बहुत दूर की है। यूनानी नाटक तो खुले मैदान में होते थे, वहां कोई पर्दा भी नहीं होता था। फिर भारत के नाटकों के पर्दों को 'यवन' से शब्द से सम्बद्ध करना, यूनानी नाटकों से कोई सम्पर्क नहीं रखता जान पढ़ता। इस मत के प्रतिष्ठापक वेबर का खण्डन डा० कीथ ने ही कर दिया है। भारत की प्रत्येक साहित्यिक कलात्मक या शास्त्रीय समृद्धि में यूनानी बीज ढूंढमा पाश्राह्य विद्वानों का प्रमुख-किन्तु निःसार-लच्ष्य रहा है। वेदों के बाद महाभारत तथा रामायण में नाटकों का सङ्केत हूंढा जा सकता है। कीथ के मतानुसार महाभारत तथा रामायण के नढ शब्दों ही के आधार पर उस काल में नाटकों का अस्तित्य नहीं माना जा सकता। रामायण में नाठक तथा नट शब्दों का प्रयोग पाया जाता है। आरम्भ में ही अयोध्या के वर्णन में महर्षि वाल्मीकि ने बताया है कि वहाँ नाठक की मण्डलियाँ तथा वेश्याएँ थीं ( वधूनाटकसंघैश्च संयुक्ताम्)। राम के अभिषेक के समय भी समायण में नटो, नर्त्तकों, गायकों आदि का उषस्थित होना तथा अपनी कलाकुशलता से लोगों को प्रसन्न करना लिखा है :- नटनर्तकसंधानां गायकानां च गायताम्। यत: कर्णसुखा चाच: शुभ्ाव जनता ततः॥ महाभारत में नट, शैलूष आदि शब्दों का प्रयोग हुचा है, और उसके हरिवंश पर्ष के ९१ से ९७ अध्याय तक तो नाटक खेले जाने का भी सङ्केत है। चज्रनाभ नामक दैत्य का चघ करने के लिए श्री कृष्ण तथा यादवों ने कपट-नटों का वेष धारण कर उसकी पुरी में जाकर रामायण का नाटक खेला। रामायण नाटक के अतिरिक्त इन्होंने कौवेररम्भाभिसार नाटक भी खेला। नाटक काअभिनय इतना सुन्दर हुआ, कि देत्यों व उनकी पत्नियों ने सुवर्ण के आभूषण खोल खोल कर नटों को दे दिये। इसके पश्चात् प्रदुम्न ने चज्रनाभ का वध किया तथा उसकी पुत्री प्रभावती से उनका विचाह सम्पन्न हुआ। इस कथा से यह सङ्केत मिलता है कि महाभारत-काल में नाटक का सर्वागीण रूप विद्यमान था। यह निःसन्देह है। डॉ० ए० बी० कीथ हरिवंश तथा महाभारत (हरिचंशेतर महाभारत ) के रचनाकाल में बड़ा अन्तर मानते हैं। वे कहते हैं कि 'महाभारत में कहीं भी नाटक के होने या खेले जाने का सक्केत नहीं है। जहाँ तक हरिवंश का प्रश्न है, वह बाद का क्षेपक है। हरिवंश की इस नाटक वाली कथा का इतना महत्त्व नहीं, क्योंकि हरिवंश की रचना-तिथि अनिश्चित है।' डॉ० कीथ हरिवंश को ईसा की दूसरी या तीसरी शती से पहले रखने को राजी नहीं।' महाभारत व रामायण के बाद बौद्ध प्रन्थों, तथा जैन प्रन्थों एवं वात्स्यायन के १. डॉ० ए० बी० कौथ-संस्कृत ड्रामा परिच्छेद २. पृष्ठ २८.
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[0] कामसूत्र में भी नाटकों का तथा नटों का सङ्केत मिलता है। ईसा की दूसरी शती के बहुत पहले भारत में नाटकों का अस्तित्व न मानने वाले पाश्चात्य पण्डितों के आागे वात्स्यान के अर्थशास्त्र से निम्न पंक्तियाँ उपस्थित की जा सकती है :- 'कुशीलवा श्रागन्तचः प्रेक्षणक मेषां दद्युः। द्वितोयेऽहनि तेभ्यः पूजा नियतं लमेरन्। ततो यथाश्रद्ध मेषां दर्शन मुत्सगौं वा। व्यसनोत्सवेषु चैषां परस्परस्यैककार्यता। (का० सू० १, ४, २८-३१) अर्थात् बाहर से आये हुए नट पहले दिन नागरिकों को नाटक दिखाकर उनका ठहराव या मेहनताना (पूजा) दूसरे दिन लेवें। यदि लोग देखना चाहें तो, फिर देखें नहीं तो नटों को बिदा कर दें। नगर के नटों व आगन्तुक नटों दोनों को एक दूसरे के कष्ट तथा आनन्द में परस्पर सहयोग देना चाहिए। इस से भी बहुत पहले पाणिनि के अष्टाध्यायी सूत्रों में ही शिलाली तथा कृशाश्व के नटसूत्रों का उल्लेख मिलता है :- पाराशर्यशिलालिम्यां भिन्तु- नटसूत्रयो: (४।३।११०) कर्मन्दकृशाश्वादिनि: ( ४।३।१११)। इससे शिलाली तथा कृशाश्व इन दो आचार्यों के नटसूत्रों का पता चलता है। डॉ० कीथ, प्रो० सिलवाँ लेवी की गवाही पर इन दोनों शब्दों में व्यंग्य मान कर इन्हें किन्हीं आचार्यों (नाव्याचार्यों) का नाम मानने से संहमत नहीं है। लेवी के मतानुसार 'शिलाली' का अरथ है 'जिसके पास शिलाकी ही शय्या है, और कोई चीज सोने को नहीं' और 'कृशाश्व' का अर्थ है 'जिनके घोड़े दुबले-पतले हैं'। पर इस तरह का अर्थ निकालना कोरा मनगढ़न्त ही जान पड़ता है। कीथ यह भी संकेत करते हैं कि 'नट' शब्द का पाणिनि में पाया जाना पुत्तलिका नृत्यादि की पुष्टि कर सकता है। पाणिनि का काल वे चौथी शताब्दी ई० पू० मानते हैं तथा पाणिनि में 'नाटक' शब्द के अभाव को उस काल में भारतीय नाटकों के न होने का प्रमाण मानते हैं।9 किन्तु 'नटसूत्र' शब्द वस्तुतः किन्हीं सैद्धान्तिक सूत्रों का सङ्केत करता है, जिसमें नटों के लिए क्रिया प्रक्रिया, कला-कौशल का विवेचन किया गया होगा। अतः 'शिलाली' व 'कृशाश्व' का लेवी की तरह उटपटाँग अर्थ लेना, या कीथ की तरह 'नाटक' शब्द या 'नाटक' के पर्यायवाची शब्द ही पर अडे रहना पक्षपातशून्य नहीं नजर आता। महाभाष्यकार पतञ्जलि में तो स्पष्ट रूप से 'कंसवध' तथा 'बलिबन्धन' इन दो कथाओं से सम्बद्ध नाटकों का उल्लेख है। महाभाष्यकार पतअ्जलि का समय निश्चित है, कि वे अभिमित्र (शुङ्गवंशी राजा ) के पुरेहित तथा गुरु थे। वे लिखते हैं कि कंस पहले मर चुका है, इसी तरह बलि का वन्धन भी अतीत काल में हो चुका है, किन्तु ये नट वर्त्तमान काल में भी हमारी आँखों के सामने कंस को मारते हैं, तथा बलि को चाँधते हैं :- इह तु कथं घर्त्तमानकालता कंसं घातयति बलिं बन्धयतीति १. वही-पृष्ठ ३१।
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[ = ] चिरहते कंसे चिरबद्धे च बलौ। अत्रापि युक्ता। कथम् । ये तावदेते शोभनिका (सौभिका) नामैते प्रत्यक्ष कंसं घातयन्ति, प्रत्यक्षं च बलिं बन्धयन्तीति।' प्रो० वेबर तथा प्रो० ल्यूडर्स पतज्जलि के इस स्पष्ट सङ्केत को भी उटपटाँग ढज्ग से सामने रखते हैं। वेबर के मतानुसार पतज्ञलि का सक्टेत पुत्तलिका रूप में कंसवध तथा बालिबन्धन से है। ल्यूडर्स के मतानुसार 'शौभिकाः' या 'शोभनिकाः' शब्द इस बात का स्पष्ट प्रमाण है, कि ये नट बिना किसी संवाद (Dialogue) के कंसवध या बलिबन्धन की नकल दिखाते थे। बाद के साहित्य में संवाद प्रयोक्ताओं के लिए 'प्रन्थिक' शब्द का प्रयोग मिलता है। पर इतनी खेंचातान, और यह गजनिमीलिका- यित क्यों, जब कि महर्षि पतज्जलि की पंक्तियाँ नाय्याभिनय के स्पष्ट सक्केत हैं। कुछ भी हो, महाभाष्यकार पतज्जलि के पहले ही से कवि भास से लेकर बीसवीं "शती के कुछ संस्कृत नाटकों तक संस्कृत नाटकों की एक अक्षुण्ण परम्परा पाई जाती है, जिसमें किन्हीं ग्रीक नाटकीय बीजों को ढूँढ़ना दुराग्रह तथा हठधर्मिता ही होगी। संस्कृत साहित्य का नाटक-अंग इतना समृद्ध है, कि मात्रा तथा गुण दोनों दृष्टियों में विश्व के नाटक साहित्य में उसका विशिष्ट स्थान है। संस्कृत में सैकड़ों एक से एक सुन्दर नाटक लिखे गये, जिनमें असंख्य नाटक अभी भी अन्धकार में पड़े हैं। उनमें से कुछ नाटकों का संकेत किन्हीं अलद्कार शास्त्र तथा नाव्य शास्त्र में दिये उदाहरणों से मिलता है। कई नाटक अभी २ अन्धकार से प्रकाशित हुए हैं। भास के नाटकों का ही लोगों को १९१३ ई० के पहले पता नहीं था, जब कि म० म० त० गणपति शास्त्री ने उनको प्रकाशित किया। भास, कालिदास, शुद्रक, अश्वघोष, भवभूति, मुरारि, विशाखदत्त, भट्टनारायण, राजशेखर, जयदेव आदि प्रमुख नाटककारों के अतिरिक्त जयदेवोत्तर काल (१२५०-१९५०) के सैकड़ों नाटककार ऐसे हैं जिन्होंने सुन्दर कलापूर्ण नाटक लिखे हैं। यह दूसरी बात है, कि जयदेवोत्तरकाल के नाटककारों में कई नाटककार सिद्धान्त व प्रक्रिया के सामज्स्य का निर्वाह अपने नाटकों में न कर पाये। नाटकीय सिद्धान्त व नाटकीय प्रक्रिया के सामजस्य की अन्तिम सीमा हम जयदेव का प्रसन्नराधव मान सकते हैं। मेरा तात्पर्य यह नहीं, कि इस काल के सारे ही नाटक रज्मच्चीय प्रक्रिया में खरे न उतरेंगे, किन्तु अधिकों की ऐसी ही दशा है। साथ ही इस काल में भाण-रूपकों की बहुतायत ने भी नाटक-साहित्य की विविधता को कुछ क्षति ही पहुँचाई। इस काल के प्रमुख नाटककारों में वामन भट्ट बाण, शेष कृष्ण, मथुरादास, युवराज रामवर्मा आदि हैं, जिनके क्रमणः पार्वतीपरिणय, कंसवध, वृषभानुजा नाटिका, अनङ्गविजय भाण आदि रचनाएँ हैं। संस्कृत के इस विशाल नाव्यसाहित्य के समुद्र से कुछ रत्नों को निकाल कर उनका महत्त्व बताना बड़ा कठिन है। कालिदास, शूद्रक तथा भवभूति की कवित्रयी तो समस्त संस्कृत नाटककारों की
१. महाभाष्य ३।१।२६।
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[ &] मूर्धन्य है ही। वैसे संस्कृत की प्राचीन परम्परा के पण्डित मुरारि को भवभूति से बढ़ कर मानते जान पड़ते हैं। तभी तो वे कहते हैं :- (१) मुरारिपदचिन्तायां भवभूतेस्तु का कथा। (२) भवभूति मनादृत्य मुरारि मुररी कुरु॥ पर भवभूति जैसी रागात्मक उद्धावना मुरारि में कहाँ, वहाँ तो शास्त्रीय पाण्डित्य ही विशेष है। कालिदास का पद निश्चित है, और उसका 'अभिज्ञानशाकुन्तल' समस्त काव्य (साहित्य) का सार-'एसेम्स'-है, इस बात का उद्धोष प्राचीन पण्डितों ने मुक्तकण्ठ से किया है :- काव्येषु नाटकं रम्यं तत्र रम्यं शकुन्तला। तत्रापि च चतुर्थोडङ्ग: तत्र श्रोकचतुष्टयम्।। संस्कृत के इस विशाल तथा सुन्दर नाट्य साहित्य की समृद्धि का श्रेय किसी हद तक भारत के नाय्यशास्त्र जैसे नाटक के सिद्धान्त-ग्रन्थों-लक्षणग्रन्थों-को भी देना होगा। स्वयं कालिदास मुनि भरत के नाटकीय सिद्धान्तों से पथप्रदर्शन पाते रहे होंगे। (२) नाट्य-शास्त्र का सड्डि इतिहास साहित्य में लक्षण ग्रन्थों व लक्ष्य ग्रन्थों का चोली दामन का साथ है। दोनों एक दूसरे के सहयोगी बन कर साहित्य की श्रीवृद्धि में योग देते हैं। यद्यपि साहित्य के आदि विधायक लक्ष्य ग्रन्थ, काव्यनाटकादि ही हैं, किन्तु वे जहाँ एक ओर लक्षण प्रन्थों को प्रोत्साहित करते हैं, वहाँ उनके द्वारा नियन्त्रित भी होते हैं। लक्ष्य प्रन्थों में रचयिता की उच्छृङ्कलता, मनमानी को रोकने थामने के ही लिये लक्षण ग्रन्थों की रचना हुई। ये लक्षण प्रन्थ भी स्वयं अपने पूर्व के लक्ष्य ग्रन्थों की विशेषताओं, उनके आदर्शों को मान बनाकर लिखे गये, तथा उन्हीं 'मानों' को भावी काव्यों या नाटकों का निकषोपल घोषित किया गया। वाल्मीकि, व्यास आदि कवियों के काव्यों ने ही भामह को अलंकार-विभाजन का मार्ग दिखाया। अन्यथा, रामायण, महाभारत या अन्य पूर्वचती कवियों की कविता के अभाव में भामह के लिए कविताकामिनी के इन सौन्दर्य विधायक उपकरणों का पता लगाना असम्भव नहीं होता क्या ? अरस्तू 'पोयतिका' तथा 'हेतोरिका' को तभी जन्म दे सका, जब उसके आगे एक ओर होमर के 'इलियड' तथा 'ओडेसी' एवं सोफोक्कीज़ के नाटक, तथा तत्कालीन ग्रीक पण्डितों की भाषणशैलियाँ प्रचचित थीं। इन लक्ष्यों के अभाव में लक्षण की स्थापना हो ही कैसे सकती थी। ठीक यही बात संस्कृत के नाट्यशास्त्र के विषय में कही जा सकती है। हम बता चुके हैं कि संस्कृत का नाव्यशास्त्र संस्कृत के नाटक साहित्य की समृद्धि का साक्षी है। आरज डेढ हजार वर्ष से भी अधिक पूर्व लिखा गया भरत का नाट्यशास्त्र इस बात की पुष्टि करता है कि भरत के पूर्व ही कई प्रौढ़ नाटक लिखे जा चुके होंगे, जो काल के गर्त में लीन हो गये और आज हमें भास ही सबसे पुराने संस्कृत नाटककार दिखाई पड़ते हैं।
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जैसा कि हम आगे चलकर बतायेंगे आरम्भ में नाव्यशास्त्र तथा अलङ्कार शास्त्र दो भिन्न शात्र थे। राजशेखर की काव्यमीमांसा में इसका स्पष्ट उल्लेख है। यही नहीं 'रस' की विवेचना नाव्यशास्त्र का अङ्ग थी, अंकरशास्त्र में इसका प्रवेश पहले तो निषिद्ध था, बाद में इसे गौण रुप देकर प्रवेशस्वीकृति दे भी दी गई। श्रव्य काव्य में रस की मान्यता ने नाव्यशास्त्र तथा अलङ्कारशास्त्र के बीच की खाई पाट दी। फलतः परवर्ती अलंकारशास्त्र के ग्रन्थों में नाय्यशास्त्र का भी समावेश होने लगा जिसके उदाहरण स्वरुप हम साहित्यदर्पण जैसे प्रन्थ रख सकते हैं। यहाँ पर हम नाव्यशास्त्र के इतिहास पर कुछ शब्द कहते समय शुद्ध अलङ्कारशास्त्र के लेखकों पर सङ्केत करना ठीक नहीं समझेंगे।
(१) भरत :- भरत का 'ना्यशास्त्र' नाव्यशास्त्र पर सब से प्राचीन ग्रन्थ है। 'नाट्यशास्त्र' पर ही नहीं अलङ्कारशास्त्र, सज्गीत, नृत्य तथा नाटक सभी का इसे प्राचीन- तम पथप्रदर्शक मानना होगा। भरत का नाम प्राचीन ग्रन्थों में भरत के परवर्ती ग्रन्थों में दो प्रकार से मिलता है-एक ब्रृद्धभरत या आदिभरत, दूसरे केवल भरत। नाव्य- शास्त्र के विषय में भी कहा जाता है कि नाव्यशास्र के दो ग्रन्थ मिलते हैं, एक नाट्यवेदागम, दूसरा नाव्यशास्त्र। पहला ग्रन्थ द्वादशसाहस्री, तथा दूसरा प्रन्थ षट्- साहस्री भी कहलाता है। शारदातनय के मतानुसार 'षट्साहस्री' प्रथम ग्रन्थ का ही संक्षिप्त रूप थी। एवं द्वादशसाहस्त्ैः श्रोकै रेकं तदर्घतः। षड्भि: श्लोक सहस्त्रै र्यो नाट्यवेदस्य संग्रहः॥ (भावप्रकाश) ना्यशास्त्र के रचयिता भरत का क्या समय है, इस सम्बन्ध में चिद्वानों के कई मत हैं। विद्वानों में कई उनके नाट्यशास्त्र का रचनाकाल ईसा के पूर्व द्वितीय शताब्दी में मानते हैं, कई इससे भी पूर्व। दूसरे विद्वान् भरत का समय ईसा की दूसरी या तीसरी शती मानते हैं। कुछ ऐसे भी विद्वान् हैं जो भरत का काल तो तीसरी या चौथी शती मानते हैं, किन्तु नाद्यशास्त्र के इस रूप को उस काल का नहीं मानते। डॉ० एस० के० दे के मतानुसार नाय्यशास्त्र के सङ्गीत वाले अध्याय चौथी शताब्दी की रचना है, किन्तु नाट्यशास्त्र में कई परिवर्तन होते रहे होंगे, और उसका उपलब्ध संस्करण आठवीं शती के अन्त तक हुआ जान पड़ता है। कुछ भी हो इतना तो अवश्य है कि भरत प्राचीनतम अलङ्कारशास्त्री, रसशास्त्री, व नाव्यशास्त्र ही हैं, जिनका ग्रन्थ हमें प्राप्त है । भरत के विषय में कुछ ऐसे बाह्य और आभ्यन्तर प्रमाण हमें मिलते हैं, जो उनके कालनिर्धारण में कुछ सहायक हो सकते हैं। हम पहले बाह्य प्रमाण ही लेंगे। वैसे तो कालिदास का भी समय मतभेद से रहित नहीं पर अधिकतर विद्वान् उसे चौथी शताब्दी (ईसवी) का ही मानते हैं। कालिदास के विक्रमोर्वशीय नाटक में एक स्थान पर र्पष्ट रूप से भरत का निर्देश मिलता है। निर्देश ही नहीं, भरत उस काल तक इतने प्रसिद्ध हो चुके थे कि कालिदास
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[ ११ ] इन्द्र के समक्ष भरत के नाटक के अभिनय का सङ्केत करते हैं। बात्पर्य यह है कि नाय्याचार्य भरत कालिदास से पूर्व ही पौराणिक व्यक्तित्व धारण कर चुके थे, वे ऋषि थे, उन्होंने स्वयं ब्रह्मा से नाव्यवेद सीखा था। नाव्यशास्त्र के प्रथम अध्याय में पाई जाने वाली नाटक की उत्पत्ति की घटना का सूचम सङ्केत कालिदास के वथ से भी मिल सक। है। विक्रमोर्वशीय नाटक के प्रथम अक्क का यह पद्य यों है :- मुनिना भरतेन यः प्रयोगो भवतीष्वष्टरसाश्रयो निबद्ध:। ललिताभिनयं तमद्य भर्ता मरुतां द्ष्टुमनाः स लोकपालः।। नाव्यशास्त्र के अन्तर्गत कुछ ऐसे स्थल हैं, जो उसकी प्राचीनता को और पुष्ट करते हैं। नाव्यशास्त्र में ऐन्द्र व्याकरण, तथा यास्क के उद्धरण हैं, किन्तु पाणिनि के नहीं। अतः नास्यशास्त्र उस काल की रचना है, जब ऐन्द्र व्याकरण का महत्त्व पाणिनीय व्याकरण के द्वारा घटाया नहीं गया था। नाव्यशास्त्र कई प्राचीनतम सूत्रों व शलोकों का उद्धरण मिलता है :- अ्त्रानुवंश्ये आर्यें भवतः। तत्र श्रोक:, आरदि- भाषा व विषयप्रतिपादन की दृष्टि से भी भरत का नाट्यशास्त्र प्राचीनता का द्योतक है। फलतः भरत भी भरतमुनि के नाम से प्रसिद्ध हो गये हैं। भरत का नाव्यशास्र कहीं कहीं सूत्रपरिपाटी का आश्रय लेता है। टीकाकारों ने भरत की रचना कई स्थानी पर 'सूत्र' तथा उन्हें 'सूत्रकृत्' कहा है। नान्यदेव भरत के लिए 'सुत्रकृत्' शब्द का प्रयोग करते कहते हैं :- 'कलानामानि सूत्रकृदुक्तानि यथा-'। अभिनव गुप्त भी भरत के नाव्यशास्त्र को 'भरतसूत्र' कहते हैं :- 'षट्त्रिंशकं भरतसूत्रमिदं विवृण्वन् ..... " अनुमान है भरत का नाट्यशास्त्र कालीदास से लगभग दो शताब्दी पूर्व का-ईसा की दूसरी शतीका है। भरत का नाव्यशास्त्र ३७ अध्यायों का भ्रन्थ है। भरत के नाटथशास्त्र के विषय में प्राचीन टीककारों का मत है कि वह ३६ अध्यायों में विभक्त है। अ्रभिनव गुप्त भी अभिनव भारती में उसे 'षटत्रिंशक'-३६ अध्याय वाला-ही मानते हैं। किन्तु इसके साथ ही अभिनव ३७ वें अध्याय पर भी 'भारती' लिखते हैं, साथ ही इस अध्याय का अलग से मङ्गलाचरण इसका संकेत करता है कि अभिनव ३६ अध्याय की परम्परागत मान्यता को स्वीकार करते हुए भी इस अध्याय की व्याख्या करते हैं। इतना ही नहीं नाटथशास्त्र के उत्तर व दक्षिण से प्राप्त प्राचीन हस्तलेखों में भी यह भेद पाया जाता है। उत्तर की प्रतियों में ३७ अध्याय हैं, जब कि दक्षिण के हस्तलेखों में ३६ व ३७ दोनों अध्याय एक साथ ही ३६ वें अध्याय में पाये जाते हैं। इसका क्या कारण है ? कुछ लोगों के मतानुसार ३६ वें अध्याय दो अध्यायों में विभक्त करना 'भारती' के रचयिता अभिनवगुप्तपादाचार्य को ही अभीष्ट था, यद्यपि वे पुरानी '३६ अध्यायवाली परिपाटी को स्वदा भज्त नहीं करना चाहते थे। अभिनवगुप्त अपने शैवसिद्धान्तों का मेल नाट्यशास्त्र के ३६ अध्यायों से मिलाकर, शैव ३६ तत्त्वों ३ द० भू०
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का सङ्केत करते जान पड़ते हैं। इन तत्त्वों परे स्थित 'अनुत्तर' तत्त्व का सङ्केत करने के लिए उन्होंने ३६ वें अध्याय में से ही ३७ वें अध्याय की रचना की हो। ३७ वें अध्याय की 'अभिनचभारती' का मङ्गलाचरण इसका सक्केत दे सकता है :- रभे 5 आकाङ्काणां प्रशमनविधे: पूर्वभावावधीनां धाराप्राप्तस्तुतिगुरुगिरां गुह्यतत्त्वप्रतिष्ठा। ऊर्ध्चादन्यः परभुचि न वा यत्समानं चकास्ति प्रौढानन्तं तदह मधुनानुत्तरं धाम चन्दे॥। नास्यशास्त्र के प्रथम अध्याय में नाटक व नाट्यशास्र (नाव्यवेद) की उत्पत्ति का वर्णन है, जिसका सङ्केत हम दे चुके हैं। बाद में रत्भूमि-रजमश्च के प्रकार, रङ्मश्च के विभिन्न अज्गों-रजशीर्ष, रङ्गमध्य, रज्पृष्ठ, मत्तवारणी, तथा दर्शकों के बैठने के स्थानों का विशद वर्णन है। चतुर्थ तथा पश्चम अध्याय में पूर्व रङ्नविधान का वर्णन है। इसके बाद भरत ने चारों प्रकार के अभिनयों का क्रमशः वर्णन किया है। हम आगे देखेंगे कि नाव्यशास्त्र में अभिनय चार प्रकार का माना गया है :- सास्विक, आज्ञिक, वाचिक तथा आहार्य। नाव्यशास्त्र के छठे तथा सातचें अध्याय में सातत्विक अभिनय का विचार किया गया है। इसके अन्तर्गत भावाभिव्यक्ति आती है। रसों, भावों, विमावों, अनुभावों व सश्चारियों का विचार भरत ने यहीं पर किया है। आगे के ६ अध्यायों में, ८ वे से १२ वें अध्याय तक, आंगिक अभिनय का विवेचन है। १४ वें अध्याय से २० वें अध्याय तक वाचिक तथा इसके बाद आहार्य अभिनय की विवेचना की गई है। भरत के इसी विभाजन को लेकर आगे के नाव्यशास्त्री चले हैं। भरत के नाय्यशास्त्र के विषय में एक और बात। कुछ लोगों का यह भी मत है कि नाय्यशास्त्र के रचयिता भरत न होकर भरत का कोई शिष्य था। यह मत अभिनव गुप्त के समय में भी प्रचलित था। अभिनव ने इस मत का डटकर खण्डन किया है, तथा इस बात को सिद्ध किया है कि नाव्यशास्त्र भरत की ही रचना है। अपने खण्डन का उपसंहार करते हुए अभिनव ने 'भारती' में लिखा है :- 'एतेन सदाशिवब्रह्मभरतमतत्रयविवेचनेन ब्रह्ममतसारताप्रतिपादनाय मतत्रयीसारासारविवेचनं तद्ग्रन्थखण्डप्रत्ेपेण चिहितमिदं शास्त्रम्, न तु मुनिरचितमिति यदाहु र्नास्तिकघुर्योपाध्याया स्तत्प्रत्युक्तम्।' भरत के नाय्यशास्त्र या सूत्रों पर कई टीकाएँ व व्याख्याएँ लिखी गईं जो नाव्यशास्त्र के विकास में सहायक हुईं। इनमें कई तो अनुपलब्ध हैं। भरतटीका, हर्षकृत वार्तिक, शाक्याचार्य राहुलककृत कारिकाएँ, मातृगुप्तकृत टीका, कीर्तिघरकृत टीका उनमें से हैं, जो उपलब्ध नहीं, इनमें से कुछ के उद्धरण व मत 'भारती' में मिलते हैं। भरत के प्रसिद्ध सूत्र 'विभावानुभावव्यभिचारिसंयोगात् रसनिष्पत्तिः' की व्याख्या करनेवालों में लोल्लट, शंकुट, भट्टनायक, व अरभिनवगुप्त प्रसिद्ध हैं। अभिनव ने 'भारती' की रचना की है। क्या लोल्लट, शंकुक् व भट्टनायक ने भी भरत के नाट्यशास्त्र पर कोई व्याख्याएँ लिखीं थी? er
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(२ ) लोल्लट :- अरभिनवगुप्त ने अ्रभिनव भारती में भट्ट लोल्लट के मतों का उल्लेख किया है। सम्भवतः लोल्ट ने भरत नाय्यशास्त्र पर कोई व्याख्या लिखी होगी, जो उपरब्ध नहीं। लोल्लट ने ही सर्वप्रथम भरत के रस परक सिद्धान्त की व्याख्या की। भरत के प्रसिद्ध सूत्र 'विभावानुभाव व्यभिचारिसंयोगाद रसनिष्पत्तिः' की व्याख्या में उसने 'संयोगात्' से 'कार्यकारण भावरूपसंबंध' तथा 'निष्पत्ति' से 'उत्पत्ति' अर्थ लिया। उन्होंने रस की स्थिति रामादि अनुकार्य पात्रों में मानी, न कि नटों या सहृदयों में। लोल्ट मीमांसक थे, तथा अभिधावादी थे। वे अभिधाशक्ति को ही समस्त काव्यार्थ का साधन मानते हैं। उनका मत था कि शब्द के प्रत्येक अर्थ की प्रतिपत्ति अभिधा से ठीक उसी तरह हो जाती है, जैसे बाण अकेला ही कवच को भेद, शरीर में घुसकर, प्राणों का अपहरण कर लेता है। मम्मट ने इसी मत को इस प्रकार उद्धृत किया है :- 'सोऽयमिषो रिव दीर्घदीर्घतरोSभिधाव्यापारः'। लोज्जट के मत का प्रभाव कुछ हद तक दशरूपककार धनज्ञय एवं अवलोककार धनिक पर भी पाया जाता है। लोल्लट के समय का पता नहीं, किन्तु यह निश्चित है कि लोल्लट व्यज्ञनावाद तथा ध्वनिवाद के उदय के बाद रक्खे जा सकते हैं। यदि ध्वनिकार, आनन्दवर्धन से भिन्न है, तो लोलट ध्वनिकार तथा आनन्दवर्धन के बीच के समय में उत्पन्न हुए हैं, अन्यथा वे आनन्दवर्धन के समसामयिक हैं। इस तरह लोल्ट का समय ईसा की नवी शती माना जा सकता है। जैसा कि लोल्लट के नाम से ही स्पष्ट है, वह काश्मीरी थे।
(३ ) शङ्कक :- अभिनव ने भारती में ही शङ्कुक के मत का भी उल्लेख किया है। शङ्कक ने भी भरत पर कोई व्याख्या लिखी होगी। शङ्कक की भरतसूत्र की व्याख्या 'अनुमितिवाद' के नाम से प्रसिद्ध है। शङ्कक नैयायिक थे, तथा उन्होंने निभावादि साधनों एवं रसरूप साध्य में अनुमाप्य-अनुमापकभाव की कल्पना की है। इस प्रकार वे रस को अनुमेय या अनुमितिगम्य मानते हैं। इसके अतिरिक्त वे एक कल्पना और करते हैं-'चित्रतुरगादिन्यया' की कल्पना। इस कल्पना के अनुसार नट सच्चे रामादि नहीं है, वे 'चित्र में लिखे घोड़े की तरह' राम है। इस कल्पना को दशरूपककार ने भी अपनाया है यह हम यथावसर बताएँगे। शङ्कक ने 'रस' की स्थिति सहृदयों या सामाजिकों में मानी है, ठीक चैसे ही जैसे घोड़े के चित्र को देख कर अनुभव होता है। शङ्कक ने ही सब से पहले लोल्लट के 'उत्पत्तिवाद' तथा सहृदयों में रसानुभष न मानने वाले सिद्धान्त का खण्डन किया है। शङ्कक भी काश्मीरी थे। वे लोह्ट के ही समसामयिक रहे होंगे। राजतरङ्विणी के मतानुसार शङ्कक ने भुवनाभ्युदय काव्य लिखा था, तथा वे काश्मीरराज अ्रपरजि तापीड के राज्यकाल में थे :- अथ मम्मोत्पलकयो रुदभूद्दारुणो रणः। Fल रुद्रप्रचाह्ा यत्रासीद् वितस्ता सुभटैहतैः॥
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[ १४ ] कवि ब्रुधमन:सिन्धुशशाङ्क: शक्ककाभिधः। यमुद्दिश्यकरोत्काव्यं भुवनाभ्युदयाभिघम् ॥(रा० त० ४,७०३-४) शार्ज्धरपद्धति तथा सूक्तिमुक्तावली में शङ्कक को मयूर का पुत्र कहा गया है, तथा निम्न पद्य को उसके नाम से उद्घृत किया गया है :- दुर्वारा: स्मरमार्गणा: प्रियतमो दूरे मनोऽप्युत्सुकं गाढं प्रेम नवं चयोऽतिकठिना: प्राणाः कुलं निर्मलम्। स्रीरवं धैर्यविरोधि मन्मथसुहृत् काल: कृतान्तोऽक्षमो नो सख्यश्रतुरा: कथ नु विरहस्सोढव्य इत्थं शठः।। क्या ये मयूर 'सूर्यशतक' के रचयिता ही हैं? यदि ऐसा हो तो शङ्कक सातवीं शती के आसपास रक्खे जा सकते हैं। किन्तु, नाव्यशास्त्री शङ्कक को इस काल का मानने में आपत्ति है। स्पष्ट हैं, दोनों शङ्कुक एक नहीं हैं। भरत के व्याख्याकार, अनुमिति- वाद के प्रतिष्ठापक तथा भुवनाभ्युदय काव्य के रचयिता शङ्कक एक ही हैं, और हम उन्हें नवीं शती का मान सकते हैं। (४) भट्टनायक :- रससूत्र के तीसरे व्याख्याकार भटटनायक हैं, जिनके मत का विशद उल्लेख अभिनवगुप्त ने किया है। अभिनवगुप्त, जयरथ, महिमभद्ट तथा रुय्यक ने भट्टनायक के मत का उल्लेख किया है, साथ ही इन लोगों ने भटटनायक की रचना 'हृदयदर्पण' का भी निर्देश किया है। भट्टनायक का 'हृदयदर्पण' स्वतन्त्र ग्रन्थ था, या भरत के नाटथशास्त्र की टीका इस विषय में दो मत रहे हैं। डॉ० एस० के० दे के मतानुसार हृदयदर्पण टीका न होकर अलङ्कारशास्त्र का स्वतन्त्र प्रन्थ था। हादयदर्पण उपलब्ध तो नहीं, पर सुना जाता है कि इसकी एक प्रति दक्षिण में थी, और उससे स्पष्ट है कि यह नाटयशास्त्र की टीका ही थी। वह प्रति भी अब उपलब्ध नहीं है। भट्टनायक भी लोल्लट तथा शङ्कक, महिमभट्ट एवं कुन्तक की भाँ ति अभि- धावादी ही हैं, वे व्यज्जना वृत्ति या ध्वनि जैसी कल्पना से सहमत नहीं। भट्टनायक आ्ानन्दवर्घन के ही समकालीन हैं। सम्भवतः वे भी आनन्दवर्धन के आश्रय काश्मीर- राज अवन्तिवर्मा (८५५-८८४ ई० ) के ही राजकवि थे। भट्टनायक रस के सम्बन्ध में 'भुक्तिवादी' सिद्धान्त के पोषक हैं। वे काव्य में भावकत्व एवं भोजकत्व दो व्यापारों की कल्पना करते हैं। इस पर भट्ट नायक 'संयोगात्' का अर्थ 'भाव्यभावक सम्बन्ध' मानते हैं, 'निष्पत्ति' से उनका तात्पर्य 'भुक्ति' (आस्वाद) से है। भट्टनायक रस की स्थिति सहृदय में पूर्णतः सिद्ध करते हैं। वे ही 'साधारणी करण' के सिद्धान्त के सर्वप्रथम प्रचर्तक हैं, जिसका विस्तार अभिनव ने किया है। भटटनायक सांख्यमतानुयायी हैं, वे अपने रससम्बन्घी सिद्धान्त में सांख्यदर्शन का ही आाश्रय लेते हैं। धनजय व धनिक के मत पर भट्टनायक के प्रभाव को हम यथावसर विश्लेक्ति करेंगे।
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[१x ] (५) अभिनवगुप्तपादाचार्य :- अभिनवगुप्त एक ओ्रर व्वनिसम्प्रदाय के संस्थापक आचार्य हैं, तो दूसरी ओर नाट्यशास्त्र के प्रसिद्ध आचार्य। इसके अतिरिक्त अभिनव का एक तीसरा भी व्यक्तित्व है, वह है उनका शैव दर्शन के आचार्य का व्यक्तित्व। अभिनवगुप्त ने ध्वनिवाद या नाव्यशास्त्र पर कोई स्वतन्त्र ग्रन्थ न लिखकर टीकाएँ लिखीं हैं। आनन्दवर्धन के 'ध्वन्यालोक' पर उनकी 'लोचन' टीका तथा भरत के नाव्यशास्त्रपर उनकी 'अभिनवभारती' (भारती) अमूल्य प्रन्थ हैं। यद्यपि ये दोनों टीका प्रन्थ हैं, तथापि इनका महत्त्व किन्ही आकर-प्रन्थों से कम नहीं, विद्वत्समाज में ये दोनों ग्रन्थ (टीकाएँ) अलङ्कारशास्त्र तथा रसशास्त्र के मूर्घन्य प्रन्थ हैं। इनके अतिरिक्त अरभिनव ने तन्त्रशास्त्र तथा शैच आगम पर अनेक ग्रन्थ लिखे हैं। इनमें 'तन्त्रालोक' तथा 'ईश्वरप्रत्यभिज्ञाकारिका' पर लिखी 'विमर्शिनी' टीका विशेष प्रसिद्ध हैं। अन्तिम रचना अभिनव गुप्त ने १०१५ ई० में की थी। इनके अतिरिक्त अभिनव ने एक तीसरे ग्रन्थ की भी देन अलङ्कारशास्त्र को दी थी, ऐसा जान पड़ता है। अभिनव- गुप्त की यह तीसरी साहित्यशास्त्रीय रचना 'काव्यकौतुकविवरण' थी जो अब अनुप- लब्घ है। अभिनव के कुल अन्थ ४०-४१ के लगभग हैं। अभिनव के गुरु पिता, कुल, तथा समय के विषय में अभिनव ने स्वयं अपनी रचनाओं में सङ्केत किया है। अभिनव के पिता नरसिंहगुप्त या चुखुलक थे।9 उनके गुरु भट्टेन्दुराज तथा भट्टतौत थे। इनके पिता स्वयं शैव आगम के प्रकाण्ड पण्डित तथा शिवभक्त भी थे। गुरु भट्टेन्दुराज कवि भी थे, क्योंकि अभिनव अपने 'लोचन' में उनके पद्यों को उद्धृत करते हैं। भटट तौत प्रसिद्ध मीमांसक माने जाते हैं, सम्भवतः अभिनव ने उनसे मीमांसाशास्त्र पढ़ा हो। साहित्यशास्त्र का अध्ययन अभिनव ने भटटेन्दुराज से ही किया होगा। अभिनवगुप्तपादाचार्य एक ओर शैव दार्शनिक थे, दूसरी ओर साहित्य में व्यज्ज- नावादी तथा ध्वनिवादी। अतः उनका रसपरक सिद्धान्त शैवदर्शन तथा व्यजनावाद की आधारमित्ति पर स्थापित है।3 वे रस को व्यंग्य मानते हैं, तथा भरतसूत्र के 'संयो- गात्' तथा 'निष्पत्तिः' के 'व्यङ्ञयव्यञ्ञकभावरूपात्' तथा 'अभिव्यक्तिः अर्थ करते हैं।
१. तस्यात्मज श्चुखुलकेति जने प्रसिद्धश्न्द्रावदाताधिषणो नरसिंहगुप्तः । यं सर्वशास्त्ररसमज्जनशुभ्रचित्तं माहेश्वरी परमलंकुरुते स्म भक्तिः ॥ (तन्त्रालोक ३७ )
(ध्वन्यालोकलोचन) ३. द्रष्टव्य-डॉ० पाण्डेय 'अभिनवगुप्त हिस्टीरिकल एण्ड फिलोसोफिकल स्टडी' इसी विषय का विशद विवेचन मैने अन्यत्र अपने 'ध्वनि सम्प्रदाय और उसके सिद्धान्त' नामक गवेषणापूर्ण प्रबन्ध के प्रथम भाग में किया है, जो शीघ्र ही प्रकाशित होगा।
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[ १६ ] वे रस की स्थिति सहृदय में मानते हैं तथा रसदशा को शैवों की 'विमर्शदशा' से जोड़ते जान पड़ते हैं। धनज्जय व धनिक को अभिनवगुप्त के सिद्धान्तों का पता था या नहीं, यह नहीं कहा जा सकता, क्योंकि ये दोनों अभिनव के समसामयिक ही हैं। पर, इन्हें आनन्दवर्घन के व्यक्तिवादी मत व रससम्बन्धी मत का पूरा पता था, जो अभिनव से भी पहले रस के व्यंग्यत्व की स्थापना कर चुके थे। तभी तो इन्होंने दशरूपक की कारिका में तथा अवलोकवृत्ति में व्यजना जैसी तुरीया वृत्ति की कल्पना का, तथा रस के व्यंग्यत्व का डटकर विरोध किया है, इसे हम देखेंगे। रस की चर्चणा, तथा निष्पत्ति के मत के अतिरिक्त अभिनव ने एक और नई स्थापना की है, वह 'शान्त रस' की स्थापना है। भरत नाट्यशास्त्र में आठ ही रसों का हवाला है; किन्तु भरत के ही आधार पर अभिनव ने 'भारती में शान्त रस जैसे नवम रस की स्थापना की है, जो अभिनव के शैवदर्शन वाले सिद्धान्त को सर्वथा अभीष्ट थी। धनञ्य व धनिक शान्त जैसे नवम रस को नाय्य में स्थान नहीं देते इसकी विवेचना हम भूमिका के अगले भाग में करेंगे। अभिनवगुप्त का समय दसवीं शती का अन्त तथा ग्यारहवीं शती का पूर्वभाग है। अभिनव की 'ईश्वरप्रत्यभिज्ञा-विमर्शिनी' की रचना १०१५ ई० में हुई थी, इसका निर्देश स्वयं अभिनव ने ही किया है। इति नवतितमेंशे वत्सरान्ते युगांशे, तिथिशशिजलविस्थे मार्गशीर्षावसाने। जगति विहितबोधा मीश्वरप्रत्यभिज्ञां व्यवृणुत परिपूर्णो प्रेरितश्शम्भु: पादैः॥ इस पद्य के अनुसार यह रचना कलिसंवत् ४०९० अथवा १०१५ ई० में हुई थी। अभिनवगुप्त का रससिद्धान्त ही मम्मट से लेकर जगन्नाथ पण्डितराज तक मान्य रहा है। संस्कृत के अलङ्कारशास्त्र व नाट्यशास्त्र में अभिनवगुप्त की गणना पहली श्रेणीके आचार्यो में होती रही है। (६) घनञ्जय :- प्रस्तुत ग्रन्थ 'दशरूपक' के रचयिता धनज्य विष्णु के पुत्र थे। ये मालवा के परमारवंश के राजा मुज (वाक्यतिराज द्वितीय) के राजकवि थे, जिनका समय ९७४-९९५ ई० माना जाता है। धनजय ने अपने पिता व आश्रयदाता का निर्देश अपने ग्रन्थ के ही अन्त में किया है :- विष्णोः सुतेनापि धनअ्जयेन विद्न्मनोरागनिबन्धहेतु:। आविष्कृतं मुअमहीशगोष्ठीवैदग्ध्यभाजादशरूप मेतत्॥ वनजय की 'दशरूपक' की कारिकाएँ भरत के नाटथशास्त्र के ही सिद्धान्तों का संच्ेप है। यही कारण है कि दो एक स्थानों पर किये गये कुछ परिवर्तनों के अतिरिक्त, जो प्रमुखतः नायिकाभेद तथा शङ्गार रस के विषय में हैं,-धनजय भरत के नाटयशास्त्र का ही आश्रय लेते हैं। वैसे धनजय आज्विक, वाचिक या आहार्य अभिनय के उस विस्तृत वर्णन में नहीं जाते, जो हमें नाटयशास्त्र में उपलब्ध होता है। धनजय:
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का प्रमुख लक्ष्य वस्तु, नेता तथा रस के विश्लेषण एवं रूपकों के प्रमुख दशमेदों के वर्णन तक ही सीमित है। घनञ्य को अभीष्ट भी यही था, क्योंकि उनका लक्ष्य तो केवल 'नाट्यानां किन्तु किश्चित् प्रगुणरचनया लक्षणं सङ्िपामि- यही रहा है। घनअय के नाटकसम्बन्धी, रससम्बन्धी या अन्य मतों का विशद विवेचन अगले पृष्ठों में किया जा रहा है। धनजय के दशरूपक तथा इनके भाई के द्वारा इसी के कारिकाभाग पर लिखी वृत्ति अवलोक का एक विशेष महत्त्व है। धनज्जय व धनिक के वस्तुविभाग, पाँच अर्थप्रकृति, अवस्था तथा सन्धियों के अङ्गविभाजन, अरथोपन्तेपकों का वर्णन, नायक व नायिकाओं का अवस्थानुरूप मनोवैज्ञानिक विभाजन, उनके सहकारियों का वर्णन, रसव उनके साधनों का विश्लेषण का प्रभाव बाद के अलङ्कारशास्त्र व नाटयशास्त्र के अ्रन्थों पर स्पष्ट परिलक्षित होता है। विद्यानाथ के प्रतापरुद्रीय का नायकनायिकाभेद इसका स्पष्टतः ऋणी है। विश्वनाथ के साहित्यदर्पण के तृतीय परिच्छेद का नायक- नायिकामेद तथा षष्ठ परिच्छेद का दृश्यकाव्यविवेचन दशरूपक से ही प्रभावित है। यहीं तक नहीं भानुदत्त की रसमअरी, रसतरङ्गिणी, भावमिश्र की रससरसी आदि रस व नायिकाभेद के भ्रन्थ भी इसके प्रभाव से अछूते नहीं। १६ वीं शताब्दी का गुणचन्द्र व रामचन्द्र का लिखा हुआ नाटथशास्त्र का ग्रन्थ 'नाटयदर्पण' भी दशरूपक को किसी हद तक उपजीव्य बनाकर चलता है। दशरूपक पर धनिक, बहुरूपभट्ट, नृसिंहभट्ट, देवपाणि, क्षोणीधरमिश्र, तथा कूरवीराम की टीकाएँ हैं। इनमें धनिक की अवलोक नामक वृत्ति ही प्रसिद्धि पा सकी है। (७) धनिक :- धनिक 'दशरूपक' कारिकाओं के रचयिता धनजय के ही छोटे भाई थे। अवलोक के प्रत्येक प्रकाश के अन्त की पुष्पिका से यह रपष्ट है कि वे विष्णु के पुत्र थे- इति श्रीविष्णुसूनोर्घनिकस्य कृतौ दशरूपावलोके रसविचारो नाम चतुर्थः प्रकाशः समाप्तः ॥। कुछ लोगों के मतानुसार कारिकाभाग तथा वृत्तिभाग दोनों एक ही व्यक्ति की रचनाएँ हैं। कई अलङ्कारग्रन्थों में दशरूपक को घनिक की रचना बताया जाता है। यही कारण है कि कारिकाकार तथा वृत्तिकार की अभिन्नता वाला भ्रान्त मत प्रचलित हो गया है। अवलोक में ऐसे कई स्थल हैं जो इस बात का स्पष्ट निर्देश करते हैं, कि कारिकाभाग तथा वृत्तिभाग दो भिन्न भिन्न व्यक्तियों की रचनाएँ हैं। धनिक के मतों का विशेष विवेचन हम आगे करेंगे। वैसे धनिक पक्के अभिधावादी तथा व्यज्जनाविरोधी हैं। वे रस के सम्बन्ध में भट्टनायक के मत को मानते हैं; यद्यपि उस मत में लोल्लट व शङ्कक के मतों का कुछ मिश्रण कर लेते हैं। वे शान्त रस को नाटक में स्थान नहीं देते। उनके इन सिद्धान्तों को हम आगे देखेंगे। धनिक ने 'अवलोक' के अतिरिक्त साहित्यशास्त्र पर एक दूसरे भ्रन्थ की भी रचना की थी, यह 'काव्यनिर्णय' था। धनिक अपनी वृत्ति के चतुर्थप्रकाश स्वयं इस
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[ १= ] ग्रन्थ का उल्लेख करते हुए इससे ७ कारिकाएँ उद्धत करते हैं :- 'यथावोचाम काव्यनिर्णये-सम्भवतः यह ग्रन्थ कारिकाओं में था। धनिक स्वयं कवि भी थे। वे स्थान २ पर उदाहरणों के रुप में अपने पद्यों को भी उद्धृत करते हैं। (८) विश्वनाथ :- साहित्यदर्पणकार विश्वनाथ महापात्र अळद्धारशास्त्र के आचार्यों में माने जाते हैं। साहित्यदर्पण में इन्होंने नाटथशास्त्र सम्बन्धी मतों का भी उल्लेख किया है। उनके प्रन्थ का षष्ठ परिच्छेद दृश्यकाव्य का विवेचन करता है। विश्वनाथ व्यज्जनावादी हैं, तथा रस के विषय में उनके सिद्धान्त अभिनवगुप्त के मत की ही छाया है। हाँ, वे एक दसवें रस-वात्सल्यरस-की स्थापना करते हैं। विश्वनाथ का समय चौदहवीं शताब्दी में माना जा सकता है, क्योंकि साहित्य- दर्पण में उदाहृत पद्यों में एक पद्य में अलाउद्दीन-सम्भवतः अलाउद्दीन खिलजी-का वर्णन मिलता है।9 विश्वनाथ महाकवि चन्द्रशेखर के पुत्र थे। जो कलिज्राज के सान्धिविभ्रहिक थे। विश्वनाथ ने साहित्यदर्पण के अतिरिक्त कई काव्यनाटकादि की रचना की थी, जिनका उल्लेख साहित्यदर्पण में मिलता है। (९) रामचन्द्र-गुणचन्द्रकृत 'नाट्यदर्पण :- 'नाटथदर्पण' के ये दोनों रचयिता हेमचन्द्राचार्य के शिष्य थे। इनका समय १२ वीं शताब्दी माना जा सकता है। 'नाटथदर्पण' का नाटयशास्त्र के ग्रन्थों में एक दृष्टि से महत्त्व है। वह यह है कि नाटथदर्पण में कई प्राचीन एवं अनुपलम्य काव्यों तथा नाटकों के उद्धरण पाये जाते हैं। विशाखदेव या विशाखदत्त के देवीचन्द्रगुप्तम् जैसे कई महत्त्वपूर्ण अनुपलब्ध नाटकों का पता इसी भ्रन्थ से मिलता है। कहा जाता है रामचन्द्र ने लगभग १०० ग्रन्थों की रचना की थी, जिनमें कई नाटक तथा काव्यग्रन्थ थे। रामचन्द्र के तीन चार ग्रन्थ प्रकाशित हो चुके हैं। नाटथदर्पण का प्रकाशन गायकवाड़ ऑरियन्टल सीरिज से हुवा है। संस्कृत के नाटकों व नाटयशास्त्रपरक ग्रन्थों के इतिहास पर दृष्टिपात करते समय हमें यह पता चलता है कि १३-१४ वीं शती के बाद सैकड़ों नाटकों की रचना हुई पर एक भी भ्रन्थ नाटयशास्त्र पर नहीं लिखा गया। इसका क्या कारण हैं ? नाठक या दृश्यकाव्य वस्तुतः रज्मञ्च की वस्तु है, खाली पढ़ने की नहीं। यवनों के भारत में आाने से भारत की कला को कुछ धक्का अवश्य पहुँचा, विशेषकर संस्कृत दृश्यकाव्यों के रज्मश्न को। साथ ही कवियों की प्रवृत्ति भी पाण्डित्यप्रदर्शन व जटिलता की ओरर इतनी हो गई कि-रज़मश्च से धीरे धीरे सम्पर्क छूटता गया। इसके बीज हम मुरारि के अनर्धराघव में ही देख सकते हैं। दूसरी ओर रजमश्च का ध्यान रखने वाले नाटकों में से भी कई नाटथशास्त्र में वर्णित पश्चसन्धियों के अप्गों (सन्ध्यज्ञों) के निर्वाह के फेर में इतने पड़ गये कि स्वतन्त्र कला में ये बाधक से हो गये। भट्टनारायण के वेणीसंहार, तथा हर्ष की रत्नावली में इन सन्ध्यज्ञों का पूर्ण निर्वाह देखा जा सकता है। १. सन्धौ सर्वस्वहरणं विग्रहे प्राणनिभ्रहः । अलावद्दीननृपतौ न सन्धिर्न च विग्रहः ॥
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[ १8 ] यह दूसरी बात है कि यह निर्वाह हर्ष की रल्नावली के सौन्दर्य को क्षुण्ण नहीं कर पाया है। साथ ही परम्परावादी भारतीय पण्डितों व कवियों ने भरत या अरभि- नवगुप्त की नाटथशास्त्र सम्तन्धी तथा रससम्बन्धी मान्यताओं को अन्तिम मान लिया था। वे इन्हीं का अध्ययन, मनन व विवेचन करते रहे। नाव्यशात्र व रसशास्त्र में नई कल्पना, नई उद्धावना, नये विचारों के प्रदर्शन की लगन न रही। फलतः नये ग्रन्थ न बन पाये। हम देख चुके हैं 'भारती' के बाद के नाटयशास्त्र के प्रन्थ या तो भरत के नाटथशास्त्र का संक्षेप है, या दशरूपक की नकल । रससिद्धान्त में वे अभिनव के पृष्ठगामी हैं। साथ ही ऐसे ग्रन्थों की गणना एक, दो, या अधिक से अधिक तीन ही है। इस गणना में हम कोरे रस व नायिकाभेद के संस्कृत प्रन्थों को छोड़ देते हैं।
( ३ ) धनञ्जय कृत कारिकाएँ व धनिककृत वृत्ति (ग्रन्थ का संच्ेप) जैसा कि हम बता चुके हैं दशरूपक कारिकाओं में लिखा हुवा ग्रन्थ है। धनज्य ने इसके कारिका भाग की रचना की है। इसकी 'अवलोक' नामक वृत्ति के रचयिता धनिक हैं। दशरूपक चार प्रकाशों में विभक्त ग्रन्थ है। इसके प्रथम प्रकाश में रूपकों का वर्णन, कथावस्तु या वस्तु के ६४ संध्यज्नों का वर्णन, तथा अर्थोपन्तेपकों का वर्णन, किया गया है। द्वितीय प्रकाश नायक तथा नायिका के भेद, उनके गुण, क्रियाएँ तथा उनके सहचरों का वर्णन है। इसी प्रकाश में नाटकीय वृत्तियों का वर्णन किया गया है। तृतीय प्रकाश में दशरूपकों में प्रमुख नाटक का विशद रूप से सलक्षण विश्लेषण किया गया है। तदनन्तर अन्य नौ रूपकों के लक्षणों का निर्देश है। चतुर्थ प्रकाश में रस की विवेचना है। प्रथम, द्वितीय, तृतीय एवं चतुर्थ प्रकाश के कारिका भाग में क्रमशः ६८, ७२, ७६, तथा ८४ कारिकाएँ है। इस गणना में अन्त के दो पद्, प्रशस्ति के पद छोड़ दिये गये हैं। कारिका भाग में ७ पद्यों को छोड़कर बाकी सारी कारिकाएँ अनुष्टप् छन्द में हैं। धनिककृत वृत्ति गद्य में है। इसी वृत्तिभाग में लक्षणों के उदाहरणस्वरूप कई काव्यों तथा नाटकों से पद्यों को उद्धृत किया गया है। अवलोक के अभाव में दशरूपक की कारिकाएँ अपूर्ण हैं, इसी से दशरूपक की 'अवलोक' वृत्ति का महत्त्व स्पष्ट हो जाता है। यहाँ पर सावलोक दशरूपक की रूपरेखा संच्षेप में दे देना आवश्यक होगा। प्रथम प्रकाश :- आरम्भ में मज्गलाचरण के पश्चात् कारिकाकार ने दशरूपक की रचना के उद्देश्य को बताया है। यहीं वह यह भी सङ्केत करता है कि दशरूपक कुछ नहीं भरत के नाट्यशास्त्र के मतों का ही संतेप है। तदनन्तर वह 'रूपकों में रस ही प्रमुख वस्तु है' इस मत का निर्देश करता है। रूपकों के फल की भांति, इस प्रन्थ का ४ द० भू०
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[ २0 ] भी फल 'रस' सिद्ध हो जाता है। भारतीय शास्त्रपरम्परा में शास्त्र के ४ अनुबन्घ माने जाते हैं, इन्हें 'अनुबन्ध चतुष्टय' कहते हैं। ये अरनुबन्ध है :- विषय, अधिकारी, सम्बन्ध' तथा प्रयोजन है। दशरूपककार ने आररम्भ में ही इनका विवेचन किया है। दशरूपक का विषय क्या है, इसके अध्ययन का अधिकारी कौन है, इस ग्रन्थ का विषय से क्या सम्बन्ध है, तथा इस प्रन्थ रचना का क्या प्रयोजन है। प्रथम प्रकाश की चतुर्थ कारिका में धनज्ञय ने बताया है कि इस ग्रन्थ का विषय नाट्यवेद है। वह नाट्यवेद, जिसकी रचना में चिरिश्चि, शिव तथा पार्वती ने योग दिया है, जिसकी प्रयोगरचना भरतमुनि ने की है। ऐसे दिव्य, विशाल नाव्यवेद का संकेप, इस ग्रन्थ का विषय है, और उसका संक्षिप्त रूप रखना धनजय का अभीष्ट प्रयोजन। उद्धृत्योद्घृत्य सारं यमखिलनिगमान्नाध्यवेद विरश्ि श्वक्रे यस्य प्रयोगं मुनि रपि भरतस्ताण्डवं नीलकण्ठः । शर्वाणी लास्य मस्य प्रतिपद मपरं लक्ष्म क: कर्तुमीष्टे नाध्यानां किं तु किश्चित् प्रगुणरचनया लक्षणं संत्तिपामि॥ इसके बाद की कारिका में धनजय ने अधिकारी का सक्केत करते हुए बताया है कि पण्डित लोग तो भरत का नाय्यशास्त्र ही पढ़ सकते हैं। हाँ, मन्दबुद्धि वहाँ अपनी गति नहीं पाते इसलिए उन लोगों के लिए ही नाट्यवेद का संचेप किया गया है। व्याकीणे मन्दबुद्धीनां जायते मतिविभ्रमः। तस्यार्थस्तत्पदै रेव संत्तिष्य क्रियतेऽञ्सा॥ आगे चलकर धनजय नाट्यवेद,-साथ ही दशरूपक-के सम्बन्ध का निर्वाह करते हुए उसके प्रयोजनरूप 'आ्नन्दास्वाद' का सङ्केत करते हैं। अनुबन्ध चतुष्टय के प्रकाशन के बाद कारिकाकार प्रस्तुत विषय की ओर बढ़ते हैं। आरम्भ में नाटथ, रूप, तथा रूपक की परिभाषा दी गई है, तथा रूपकों के दस भेदों का उद्देश-नाममात्र के द्वारा उनका सङ्कीर्तन-किया गया है। इनके लक्षण आगे तृतीय प्रकाश में किये गये हैं। इसके बाद नृत्य तथा नृत्त, के परस्पर भेद व इनके प्कारों का सङ्केत है, क्योंकि ये रूपकों के अन्तर्गत प्रयुक्त होते हैं, उसके उपकारक व शोभाविधायक हैं। तदनन्तर रूपक के ३ भेदकों-वस्तु, नेता तथा रस का निर्देश कर वस्तु की विवेचना आरम्भ की जाती है। वस्तु के आधिकारिक तथा प्रासङ्गिक दो भेद बताकर पताका के प्रसन्न में पताकास्थानकों का वर्णन किया गया है। फिर चस्तु के भेदों तथा उसकी पाँच अर्थप्रकृतियों, पाँच अवस्थाओं, पाँच सन्धियों, ६४ संध्यज्गों का सलक्षण वर्णन है। फिर विष्कम्भक, प्रवेशक, चूलिका, अङ्कास्य तथा अङ्कावतार इन ५ अरथोपक्षेपकों का निर्देश है। द्वितीय प्रकाश में रूपकों के दूसरे भेदक नायक या नेता का विवेचन है। नायक के गुणों का उल्लेख करने पर उसके ४ भेद, धीरोदात्त धीरशान्त, धीरललित तथा १. अनुबन्ध उसे कहते हैं, जो हमें किसी ज्ञान में प्रवृत्त होने की प्रवृत्ति के प्रयोजकज्ञान का विषय है-अर्थात् वह वस्तु जो हमें किसी प्रवृत्ति की श्रर ले जाते हैं :- 'प्रवृत्तिप्रयोजकज्ञानविषयत्व मनुबन्धत्वम्।'
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[ २१ ] धौरोद्धत्त के लक्षण उपक्षिप्त किये गये हैं। इसके बाद पताकानायक-पीठमर्द, तथा अन्य नेतृसहचरों का वर्णन है। तदनन्तर नायक के सातत्विक गुणों का सलक्षण वर्णन है। नायक के बाद नायिका का विवेचन प्राप्त होता है। नायिका के तेरह भेदों का सलक्षण वर्णन करते हुए उसके अवस्थानुरूप स्वाधीनभर्तृकादि आपाठ भेदों का भी लक्षण किया गया है। तब नायिका के बीस अलङ्कारों-शारीरिक, अयल्ज, तथा स्वभावज अलङ्कारों का-वर्णन मिलता है। इसके बाद नायक के परिच्छद (Paraphernalia) का वर्णन कर उसके व्यापाररूप चार नाटयवृत्तियों-कैशिकी, सात्त्वती, आरभटी तथा भारती का निर्देश किया गया है। इसी सम्बन्ध में प्रथम तीन वृत्तियों के अज्ञों का सलक्षण वर्णन है। तदनन्तर कौन पात्र किसे किस तरह सम्बोधित करे इसका उल्लेख है। तृतीय प्रकाश में काव्य की स्थापना या प्रस्तावना के प्रकारों का वर्णन है। यहीं भारती वृत्ति तथा उसके अङ्गों का वर्णन है। तदनन्तर प्रस्तावना के तीन प्रकारों- कथोद्वात, प्रवृत्तक, तथा अवलगित का निर्देश है। इसके बाद तेरह वीध्यङ्कों का वर्णन है। इसी प्रकाश में रूपकों के प्रकरणादि अन्यभेदों का लक्षण बताया गया है। दशरूपक के चौथे प्रकाश का विशेष महत्त्व है। इस प्रकाश में रस की विवेचना की गई है। रस की परिभाषा बताने के बाद उसके साधनों-विभाव, अनुभाव, सात्त्विक भाव तथा व्यभिचारियों का विस्तार से वर्णन किया गया है। अवलोककार ने उन्हें सुन्दर उदाहरण देकर रुपष्ट किया है। तदनन्तर स्थायी भाव के स्वरूप का वर्णन है। यहीं वृत्तिकार ने रसविरोध तथा भावविरोध के सम्बन्ध में अपने मत उपन्यस्त किये हैं। इसके बाद आठ भावों तथा आठ रसों का उल्लेख करते हुए 'शम' नामक स्थायी भाव की स्थिति का नाव्य में खण्डन किया गया है। इसी प्रसङ्ग में रस के व्यङ्यत्व वाले ध्वनिवादी सिद्धान्त का डटकर खण्डन किया गया है। ध्वनिकार के मतों को उदाहृत करके वृत्तिकार उनके व्यज्ञना दृत्ति वाले मत का खण्डन करता है, तथा यह सिद्ध करता है कि व्य्नयार्थ जैसी कोई वस्तु है ही नहीं, वह सब तात्पर्यार्थ ही है। यहीं वह रस के भावनावादी सिद्धान्त पर जोर देता है तथा विभावादि को भावक एवं रस को भाव्य मानता है। रस के स्वरूप तथा भेदों की विवेचना करने के बाद ग्रन्थ की परिसमाप्ति हो जाती है। यहाँ हमने दशरूपककार के कारिका भाग तथा धृत्तिभाग के विषय का सङ्क्षेप देने की चेष्टा की। दशरूपककार व वृत्तिकार के नाव्यशास्त्र एवं रस सम्बन्धी अभिनव सिद्धान्तों या मान्यताओं का विशद विवेचना हम भूमिका के अगले भाग में करेंगे। (४) रूपक, उनके भेद व भेदक तत्व अँगरेजी में जिस अर्थ में 'ड्रामा' (Drama) शब्द का प्रयोग होता है, उस अर्थ में संस्कृत साहित्य में 'रूपक' शब्द का प्रयोग पाया जाता है। वैसे अधिकतर इस आंग्ल शब्द का अर्थ 'नाटक' शब्द के द्वारा किया जाता है, किन्तु नाटक रूपकों
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का एक भेद-मात्र है, वह रूपकों के दश प्रकारों में से एक प्रकार है। वैसे यह प्रकार रूपक का प्रमुख भेद है। जब हम काव्य की विवेचना करने बैठते हैं, तो देखते हैं कि काव्य के दो प्रकार हो सकते हैं-एक श्रव्य काव्य, दूसरा दृश्य काव्य। पहला काव्य सुनने या पढ़ने की चस्तु है, इसमें श्रवरोन्द्रिय के द्वारा बुद्धि एवं हृदय का सम्पर्क काव्य के साथ होता है। दूसरा काव्य मुख्य रूप से देखने की वस्तु है, वैसे यहाँ भी पात्रों के संलाप में श्रव्यत्व रहता है। श्रव्य काव्य का कोई रज्मश् नहीं, वह अध्ययन- कक्ष की वस्तु है, जब कि दृश्यकाव्य रज्नमश्च की वस्तु है, उसका लक्ष्य अभिनय के द्वारा सामाजिकों का मनोरअन, उनमें रसोद्वोध उत्पन्न करना है। यही दृश्य काव्य 'रूपक' कहलाता है। इसे 'रूपक' इसलिए कहा जाता है कि इसमें नट पर तत्तत् पात्र का, रामादि का आरोप कर लिया जाता है' उदाहरण के लिए 'भरत-मिलाप' या 'रामराज्य' के चलचित्रों में एक नटविशेष-प्रेम अदीब-पर रामका, उसकी अवस्था का, आरोप किया गया है। प्रमुख रूप से रूपक के दस भेद किए गये हैं। वैसे तो रूपकों से ही सम्बद्ध १८ उपरूपक माने जाते हैं और भरत तथा विश्वनाथ ने उनका उल्लेख किया है, किन्तु धनज्ञय व धनिक ने उपरूपकों का वर्णन नहीं किया है। यह दूसरी बात है कि तृतीय प्रकाश में प्रसङ्गवश उपरूपक के एक प्रमुख भेद-नाटिका-का विवेचन मिलता है। प्रकरणिका, माणिका, हल्लीश, श्रीगदित, रासक आदि दूसरे उपरूपकों का वहाँ कोई सङ्केत नहीं। चस्तुतः इनमें से कई भेद रूपकों के ही अवान्तर रूप हैं और कुछ भेद ऐसे भी हैं, जिनका सम्बन्ध काव्य से न होकर प्रमुखतः सङ्गीत-कला व नृत्य-कला से है। रूपकों के ये दस भेद-चस्तु, नेता, तथा रस के आधार पर किये जाते हैं।१ किसी एक रूपक-प्रकार की कथावस्तु (Plot), उसका नायक-नायक की प्रकृति, तथा उसका प्रतिपाद्य रस उसे अन्य प्रकारों से भिन्न करता है। इसी प्रकार इन दसों रूपकों में से प्रत्येक एक दूसरे से, वस्तु, नेता, व रस की दृष्टि से भिन्न है। ये दस रूपक-ये हैं :- नाटक, प्रकरण, भाण, व्यायोग, समवकार, डिम, ईहामृग, अङ्क, वीथी और प्रहसन। नाटक मथ प्रकररं भाण व्यायोगसमवकारडिमाः। ईहामृगाङ्कवोथ्यः प्रहसन मिति रूपकाणि दश ॥ दशरूपककार की पद्धति का वर्णन करते हुए हमारे लिए ठीक यह होगा कि पहले इन तीन भेदकों-वस्तु, नेता तथा रस का विश्लेषण कर दे, फिर प्रत्येक रूपक की विवेचना करें। इन तीन भेदकों के विषय में अधिकतर यह माना जाता है कि ये नाटक के तीन तत्त्व है, ठीक वैसे ही जैसे अरस्तू ने रूपक के-प्रमुख रूप से त्रासद
१. रूपकं तत्समारोपात् II (कारिका) नटे रामाद्यवस्थारोपेण वर्तमानत्वाद्रूपकं मुखचन्द्रादिवत् ।। (दशरूपकावलोक ) . वस्तु नेनरा रसस्तेषां मेदक :- (वह्टी)
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[ २३ ] (Tragedy) के ६ अद्र माने हैं। अरस्तू के मतानुसार रूपक के छः अरज्ञः, १. इतिवृत्त, २. आचार, ३. वर्णनशैली, ४. विचार, ५. दृश्य तथा ६. गीत हैं। कुछ विद्वान् इन्हें तत्त्व मानने से सहमत नहीं। वे इन्हें केवल 'भेदक' कहना ठीक समझते हैं। किसी रूपक के तत्त्व उनके मत से १. कथा, २. संवाद और ३. रजनिर्देश ये तीन हैं। इन्हीं तीनों में अरस्तू के रूपक के छहों अङ्ग अन्तर्भावित हो जाते हैं। हमें यहाँ भेदकों का ही वर्णन करना अभीष्ट है। (१) कथा, वस्तु या इतिवृत्त :- रूपकों का पहला भेदक वस्तु है । इसे ही कथा, इतिवृत्त, कथावस्तु (Plot) आदि नाम से भी पुकारते हैं। वस्तु दो प्रकार की होती है, एक आधिकारिक, दूसरी प्रासङ्गिक। आधिकारिक कथावस्तु मूल वस्तु, तथा प्रासज्ञिक कथावस्तु गौण होती है। आधिकारिक वस्तु की यह संज्ञा इस लिए की गई है, कि इसका सम्बन्ध 'अधिकार' नायक के फलस्वामित्व, या फलप्राप्त करने की योग्यता से है। आधिकारिक वस्तु रूपक के नायक के फल की प्राप्ति से सम्बद्ध होती है, वह नायक के जीवन की उस महासरिता से सम्बद्ध है, जो निश्चित फल की, निश्चित लक्ष्य की ओर बढ़ती है। प्रासङ्गिक वस्तु इसी महासरिता में गिर कर उसके प्रवाह में अपनापन खो देने वाले, किन्तु आधिकारिक वस्तु को गति देने वाले क्षुद्र नदी, नद व नाले हैं। उदाहरण के लिए रामायण की वस्तु में रामचन्द्र की कथा आधिकारिक वस्तु है, सुत्रीव या शबरी की कथा प्रासज्ञिक। प्रासज्ञिक वस्तु के भी दो भेद किए जाते हैं-पताका तथा प्रकरी। जो कथा काव्य या रूपक में बराबर चलती रहती है-सानुबन्ध होती है-उसे पताका कहते हैं। इस पताका कथा वस्तु का नायक अलग से होता है, जो अधिकारिक वस्तु के नायक का साथी होता है, तथा उससे गुणों में कुछ ही न्यून होता है। इसे 'पताका- नायक' कहते हैं। उदाहरणार्थ, रामायण का सुग्रीच, या मालतीमाधव का मकरन्द पताका-नायक है, तथा उनकी कथा पताका। जो कथा काव्य या रूपक में कुछ ही काल तक चलकर रुक जाती है, वह 'प्रकरी' नामक प्रासज्ञिक कथा वस्तु होती है। रामायण की शबरी वाली कहानी 'प्रकरी' है। जैसा कि हम पहले बता चुके हैं पताका ब प्रकरी आधिकारिक कथा के प्रवाह में ही योग देती हैं। सुश्रीव व शबरी की कहानी राम-कथा को आगे बढ़ाने में सहकारी सिद्ध होती हैं। इस इतिवृत्त के मूल तथा प्रकृति के विषय में भी नाव्यशास्त्र के प्रन्थों में सङ्केत दिया गया है। इतिवृत्त मूल की दृष्टि से तीन तरह का होता है :- १ प्रख्यात, २ उपाद्य तथा ३ मिश्र। प्रख्यात इतिवृत्त रामायण, महाभारत, पुराण या बृहत्कथादि ऐतिहासिक ग्रन्थों के आधार पर होता है। इस प्रकार का इतिवृत्त प्रसिद्ध कथा से सम्बद्ध रहता है। उदाहरणार्थ, भवभूति के उत्तरचरित तथा मुरारि के अनर्धराघव की कथा रामायण से ली गई है। कालिदास के 'अभिज्ञानशाकुन्तलम्' की कथा महाभारत तथा पद्वुशण से गृहौत है। भास के स्वप्नवासवदत्तम्, प्रतिज्ञायौगन्धरायणम्; विशाखदस्त
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का मुद्राराक्षस ऐतिहासिक इतिवृत्त से सम्बद्ध है। इनका मूल गुणाव्य की बृहत्कथा में भी है। जैसा कि हम देखेंगे, नाटक के लिए यह परमावश्यक है कि उसका वृत्त प्रख्यात हो। दशरूपककार ने इतिवृत्त के मूल के विषय में लिखते हुए कहा है :- इत्याद्यशेष मिह वस्तुविभेदजातम्, रामायणादि च विभाव्य बृहत्कथा ञ्व। आसूत्रये त्तदनु नेतुरसानुगुण्या- च्ित्रां कथा मुचितचारुवच:प्रपञ्चैः। प्रख्यात इतिवृत्त के निर्वाह में कवि या नाटककार को बड़ी सावधानी बरतनी पड़ती है। वह कथा के प्रख्यात इतिवृत्त में अपनी कल्पना के अनुसार हेरफेर करके उसकी वास्तविकता को नहीं बिगाड़ सकता। ऐसा करने से सामाजिकों की वृत्ति को दुःख होता है। उदाहरण के लिए बज्गाली कवि माइकेल मधुसूदनदत्त के 'मेघनादवघ' में मेघनाद का उच्च आदर्श रूप में उपस्थित करना प्रख्यात इतिवृत्त को ठेस पहुँचाता है। इसी तरह का हेरफेर कथा के प्रख्यातत्व को क्षुण्ण करता है। इसका तात्पर्य यह नहीं कि कवि प्रख्यात इतिवृत्त में कोई हेरफेर कर ही नहीं सकता। यदि प्रख्यात इतिवृत्त की गति कुछ ऐसी हो कि वह नायक के गुणों, उसके धीरोदात्तत्व में बाधक होती हो, तो ऐसी दशा में रस के अनौचित्य दोष को हटाने के लिए कथा के उस अंश में कवि मजे से परिवर्तन कर सकता है। शकुन्तला नाटक में विचाह के बाद भी शकुन्तला को भूल जाने की दुष्यन्तवाली घटना पद्मपुराण में है। वहाँ दुर्वासाशाप का कोई हवाला नहीं। यह घटना दुष्यन्त के कामुकत्व को स्पष्ट कर उसके चरित्र को नीचा गिरा देती है। कालिदास ने दुष्यन्त के धीरोदात्तत्व को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए दुर्वासाशाप की कल्पना कर ली है। १इसी तरह भवभूति ने भी अपने 'महावीर- चरित' में रामभद्र (रामचन्द्र) के धीरोदात्तत्व की रक्षा के लिए बालिवध की प्रसिद्ध घटना में हेर-फेर कर दिया है। प्रख्यात घटना है कि राम ने बालि का वध छुल से किया था, पर यह रस के ठीक नहीं पड़ता, न राम के उदात्त चरित्र के ही। अतः भवभूति ने यह कल्पना की है कि बालि स्वयं रामचन्द्र से लड़ने आया और मारा गया। उत्पाद्य इतिवृत्त कवि का स्वयं का कल्पित होता है-उत्पाद्यं कविकल्पितम्। इस इतिवृत्त का प्रयोग कई प्रकार के रूपकों में देखा जाता है, यथा प्रकरण, भाण, प्रहसन। शूद्रक के मृच्छकटिक, भवभूति के मालतीमाधव आदि की कथा उत्पाद्य ही है।
भी होता है। मिश्र इतिवृत्त की पृष्ठभूमि प्रख्यात होती है, पर उसमें बहुत-सा अंश कल्पित
रूपक के समस्त इतिवृत्त को हम कुछ स्थितियों में बाँट लेते हैं। इतिवृत्त को पाँच अर्थप्रकृतियों, पाँच अवस्थाओं तथा पाँच सन्धियों में विभक्त किया जाता है। १. विचिन्तयन्ती य मनन्यमानसा तपोधनं वेत्सि न मामुपस्थितम्। स्मरिष्यति त्वां न स बोधितोऽपि सन् कथां प्रमत्तः प्रथमं कृता मिच। (शाकुन्तल, चतुर्थ अ्ठ)
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अर्थप्रकृतियाँ अ्रवस्थाएँ सन्धियाँ १. बीज. त्रारम्भ मुख २. चिन्दु. यत्न प्रतिमुख ३. पताका. प्राप्त्याशा गर्भ ४. प्रकरी. नियताप्ति विमर्श ५. कार्य. फलागम उपसंहृति अर्थप्रकृतियाँ नाटकीय इतिवृत्त के पाँच तत्त्व हैं। सारे नाठकीय इतिवृत्त इन नाट- कीय तत्त्वों में विभक्त होते हैं। बीज, वृक्ष के बीज की तरह वह तत्त्व है, जो अक्कुरित होकर नायक के कार्य या फल की ओर बढ़ता है। विन्दु वह स्थिति है, जब बीज पानी में गिरे तेल के बूँद की तरह फैलता है। इस दशा में इतिवृत्त का बीज फैल कर व्यक्त होने लगता है। पताका के अन्तर्गत पताका नामक प्रासज्ञिक इतिवृत्त, तथा प्रकरी में दूसरी प्रासङ्ञिक वस्तु होती है, यह हम बता चुके हैं। अवस्थाएँ नाटकीय इतिवृत्त की गति को व्यक्त करती हैं। हम देखते हैं मानव का जीवन एक सीधी रेखा की तरह अपने लक्ष्य तक नहीं पहुँचता। वह टेढ़ा मेढ़ा होता हुआ, अपने उद्देश्य तक पहुँचता है। मानव का जीवन सङ्वर्ष से भरा हुआ है, ये सङ्गर्ष ही उसे गति देते हैं। सद्वर्ष की चट्टानों को तोड़ता, उन पर विजय प्राप्त करता, आशा और उल्लास के साथ आगे बढ़ता है। मोक्ष जैसे परमानन्द की स्थिति का विश्वासी भारतीय निराशावादी नहीं, सङ्गर्षों से वह डरता नहीं, सङ्वर्ष तो उसकी परीक्षा हैं। यदि वह उनसे निराश भी होता है, दुखी भी होता है, तो वह निराशा, वह दुःख क्षणिक होता है। उस दुःख के काले पर्दे के पीछे सुख, आशा, उल्लास, आनन्द का दिव्य प्रकाश छिपा रहता है। भाव यह है, भारतीय को इस बात में पूर्ण विश्वास है कि जीवन के सद्गर्षो, वि्नों पर अवश्य विजय प्राप्त करेगा, उसे अपने लक्ष्य तथा उद्देश्य की प्राप्ति में सफलता मिलेगी, इसमें लेशमात्र भी सन्देह नहीं। भारतीय जीवन के 'फलागम' में पूर्ण विश्वास करता है। मानवजीवन का लक्ष्य ही धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष-चतुर्चर्ग फल प्राप्ति है। हम भारतीयों की धारणा पाश्चात्यों की तरह निराशावादी नहीं रही है। यह दूसरी बात है कि यहाँ भी कुछ निराशावादी सिद्धान्त अक्कुरित हुए, पर आशावाद के प्रताप में वे भुलस-से गये। काव्य या नाटक का इतिवृत्त कुछ नहीं मानव-जीवन का प्रतिबिम्ब है। 'नाटक मानवप्रकृति का दर्पण है।' भारतीय नाटक साहित्य में, (संस्कृत नाटकसाहित्य में) भारतीय मानव-जीवन पूर्णतः प्रतिबिम्बित हुवा है। यह दूसरी बात है कि उनमें सार्वदेशिकता, सार्चकालिकता, तथा मानव-जीवन के शाश्वत-मूल्यों का भी प्रदर्शन है। भारतीयों के आशावादी दृष्टिकोण के ही कारण यहाँ के नाटकों के नायक के लिए फल प्राप्ति आवश्यक है। नाटक का नायक सदुर्षो तथा विघ्नों को कुचलता, पददलित करता दुर्घर्ष गति से आगे बढे, तथा अपने लक्ष्य को प्राप्त करे। फलतः यहाँ के इतिवृत्तों का अन्त फल प्राप्ति में ही होगा, नायक की सफलता में ही
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[ २६ ] होगा; फलाभाव में या उसकी असफलता में नहीं। यही कारण है कि निराशावादी ग्रीस की तरह भरत ने दुःखान्तकियों या त्रासदों (Tregedy ) को जन्म नहीं दिया। यहाँ के नाटकों का इतिवृत्त सदा सुखान्त रहा है। यहाँ के समस्त नाटक उल्लासान्त या सुखान्त (Comedies) है। किन्तु प्रीस देश के त्रासदों की महत्ता की यहाँ कमी नहीं। भारतीय नाटक स्तुतः उस अर्थ में 'कॉ मेडीज़' नहीं, जो अर्थ इसका वहाँ लिया जाता है। वहाँ 'कॉ मेडी' के अन्तर्गत व्यंग्यात्मक प्रहसन आते हैं। इस कोटि में हमारे भाण या प्रहसन आयँगे। ट्रेजेड़ी के अन्तर्गत वे महापुरुषों के उदात्त चरित्र को हमारे सामने रखते हैं। ये महापुरुष विरोधी शक्तियों पर विजय प्राप्त नहीं कर पाते, फलतः उनका करुणमय पतन बताया जाता है। निराशावाद का इस प्रकार का परिणाम आवश्यक है। यह दूसरी बात है कि इन महापुरुषों के चरित्र में कुछ ऐसी कमी अवश्य चित्रित की जाती है, जो उन्हें असफलता की ओर ले जाती है। शेक्सपियर के हेमलेट या मेकबेथ उदात्त एवं महापुरुष हैं। किन्तु उनके चरित्र में कुछ कमी भी है, जो उन्हें मृत्यु के गर्त में ले जाती है। नाटक की समाप्ति के साथ सामाजिक के हृदय में उन महापुरुषों की नियतिगत दुरवस्था पर दया उमड आराती है, वह उनके प्रति सहानुभूति दिखाता है। दूसरी ओर वह जीवन के निराशामय वातावरण के विश्वास की पुष्टि करता है, कोरा भाग्यवादी बन जाता है। ग्रीस की 'दुःखान्तकियाँ' हमें नियतिवादी बनाती हैं, संस्कृत के 'सुखान्त' हमें पुरुपार्थवादी। किन्तु इसका मतलब यह नहीं कि संस्कृत के नाटकों में सङ्गर्षों या विघ्नों का चित्र उपस्थित करने में कोई कसर रहती है। सङ्गर्ष व विघ्नों का दुर्दम्य रूप उपस्थित करने में संस्कृत नाटककार कुशल है, और उसका नायक भी उन पर विजय पाने में सफल। यही कारण है कि यहाँ नाटकों में एक ओर ग्रीस देश की 'दुखान्तकियों' के तत्त्व की भी स्थिति होती है। यही कारण है कि कुछ लोगों ने संस्कृत के नाटकों को कोरे सुखान्त न कहकर 'सुखोन्मुख दुःखपरक' (Tragi-comedy) माना है। इस सब विवेचन से हमारा तात्पर्य यह है कि नाटकीय इतिवृत्त की ऊपर की पाँच अवस्थाओं में भारतीय दृष्टि से 'फलागम' का विशेष महत्त्व है। नाटकीय कथा चस्तु की पहली अवस्था आरम्भ है। इस अवस्था के अन्तर्गत नेता में किसी वस्तु की प्राप्ति की इच्छा होती है, यह दूसरी बात है कि उसका प्रकाशन कोई दूसरा पात्र करे। दूसरी अवस्था प्रयत्न है, जब नायक उस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए यत्नशील होता है। तीसरी अवस्था-प्राप्याशा में, विध्नादि के विचार कर लेने के बाद नायक की लक्षय प्राप्ति की सम्भावना हो जाती है। चौथी अवस्था-नियताप्ति में उसे सफलता का पूरा विश्वास हो, जाता है और पांचवीं अवस्था में वह 'फलागम' तक पहुंच जाता है। उदाहरण के लिए शकुन्तला नाटक में 'असं- शयं क्षत्रपरिग्रहत्तमा' आदि के द्वारा राजा में शकुन्तला की प्राप्ति की इच्छा के द्वारा आरम्भ अवस्था व्यक्त की गई है। तदनन्तर वह उसकी प्राप्ति के लिए दूसरे व तीसरे अङ्क में प्रयत्नशील है। यहां 'प्रयत्न' नामक अवस्था है। चतुर्थ अङ्क में
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[२७ ] दुर्वासा का क्रोध विघ्नरूप में उपस्थित होता है, किन्तु वहीं हमें पता चलता है कि उनका क्रोध शान्त हो गया है, और सामाजिक को नायक दुष्यन्त की शकुन्तला प्राप्ति की सम्भावना हो जाती है। यहां प्राप्याशा नामक अवस्था है। छठे श्ङ्क में मुद्रिका के फिर से मिल जाने पर शकुन्तला प्राप्ति नियत हो जाती है। यह प्राप्ति अगले अ्रङ्क में होती है, अतः यहां 'नियताप्ति' है। सातवें अङ्क में नायक व नायिका का मिलन हो जाता है, नायक को फल प्राप्ति हो जाती है। यहां 'फलागम' नामक अवस्था पाई जाती है। अर्थप्रकृति तथा अवस्था के अतिरिक्त नाटक की कथावस्तु में पांच सन्धियां भी होती हैं। इन्हें सन्धियां इसलिए कहते हैं कि ये पांच अर्थप्रकृतियों व पांच अवस्थाओं के मिश्रण से बनती हैं :- अर्थप्रकृतयः पञ्च पञ्चावस्थासमन्विताः। यथासंख्येन जायन्ते मुखाद्याः पञ्च सन्धयः॥ (प्रथम प्रकाश, का० २२ ) जैसा कि ऊपर पांचों अरथप्रकृतियों, अवस्थाओं तथा सन्धियों के नामनिर्देश में बताया है इनका क्रमशः एक दूसरे से सम्बन्ध है। बीज तथा आरम्भ मिलकर मुख को, बिन्दु तथा प्रयत्न मिलकर प्रतिमुख को, पताका तथा प्राप्याशा मिलकर गर्भ को, प्रकरी तथा नियताप्ति मिलकर विमर्श को, एवं कार्य तथा फलागम मिलकर उप- संहृति या निर्वहण को जन्म देते हैं। जैसे, शकुन्तला नाटक में प्रथम अङ्क से लेकर द्वितीय अङ्क के उस स्थल तक जब सेनापति चला जाता है; तथा दुष्यन्त कहता है- 'विश्रामं लभतामिदं च शिथिलज्याबन्ध मस्मद्धनुः' मुख सन्धि है। तद- नन्तर तृतीय अङ्क के अन्त तक प्रतिमुख सन्धि है। चतुर्थ अङ्क से पांचवें अंक के उस स्थल तक जहां गौतमी शकुन्तला का अवगुण्ठन हटाती है, गर्भसन्धि है। पांचवें श्रङ्क के शेष अंश तथा सम्पूर्ण षष्ठ अङ्क में विमर्श सन्धि है। तदनन्तर सप्तम अङ्क में निर्वहण सन्धि पाई जाती है। एक दूसरा उदाहरण हम रत्नावली से ले सकते हैं। रत्नावली के प्रथम अङ्ढ व द्वितीय अङ्क के उस स्थल तक जहां रत्नावली (सागरिका) वत्सराज उदयन का चित्र बनाना चाहती है, मुखसन्धि है। दूसरे अङ्क के शेष भाग में प्रतिमुख सन्धि है। तृतीय शङ्क में गर्भसन्धि पाई जाती है। चतुर्थ अङ्क में अ्रप्रग्नि काण्डवाली घटना तक विमर्श सन्धि है, तदनन्तर निर्वहण। पाँचों सन्धियों को ६४ सन्ध्ययों में विभक्त किया गया है। हम यहां सन्ध्यज्गों के नामनिर्देशन में न जायँगे। सन्ध्यङ्गों के इस विशाल विभाग के विषय में विद्वानों के दो मत हैं कुछ लोग इन्हें जटिल तथा अनावश्यक मानते हैं। डॉ. ए. बी. कीथ की मान्यता है कि नाटकीय इतिवृत्त की दृष्टि से यह विभाजन कोई वास्तविक मूल्य नहीं रखता।9 रुद्रट के मतानुसार प्रत्येक सन्ध्यङ्न का प्रयोग अपनी ही सन्धि में करना उपयुक्त १. कीथ-संस्कृत ड्रामा. पृ. २९९। ५ द० भू०
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r २= ] है। किन्तु, दूसरे विद्वानों के मत से सन्ध्यङ्ञों के लिए यह नियम निर्धारण ठीक नहीं। साथ ही यह भी आवश्यक नहीं कि नाटकादि में इन ६४ सन्ध्यङ्ों का, सभी का प्रयोग किया जाय। वैसे भट्टनारायण के वेणीसंहार जैसी नाटक-कृतियां ऐसी पाई जाती है, जिन्होंने इन सन्ध्यङ्गों का पूरा निर्वाह करने की चेष्टा की है। पर इसका परिणाम यह हुआ है कि भटटनारायण को वेणीसंहार के द्वितीय 'अ्ङ्ढ में भानुमती-दुर्योधन चाले प्रेमालाप की रचना जबर्दस्ती करनी पड़ी है। यह काव्य के रस में न केवल बाघक हुआ है, अपि तु उसने दुर्योधन के चरित्र को उपस्थित करने में गड़बड़ी कर दी है। कथावस्तु के इस विभाजन के विषय में कीथ का मत है 'कि जहां तक सन्धियों, का प्रश्न है, उनका विभाजन इसलिए ठीक है कि इनमें नाटकीय सङ्गर्ष पर जोर दिया गया है, किस प्रकार नायक विध्नों पर विजय प्राप्त करके फलप्राप्ति की ओर बढ़ता है यह इस विभाजन का लक्ष्य है किन्तु अर्थप्रकृति की कल्पना व्यर्थ की जान पड़ती है। सन्धियों की कल्पना कर लेने के बाद अर्थप्रकृति का विभाजन अनावश्यक है। साथ ही पांच सन्धियों का पांचों अर्थप्रकृतियों व पांचों अवस्थाओं से क्रम से मेल मिलाने की योजना दोषपूर्ण है।' पांचों सन्धियां कथावस्तु में आ्वश्यक हैं, विशेष कर नाटक की वस्तु में, क्योंकि उसे 'पञ्चसन्धिसमन्धित' होना ही चाहिए। यह दूसरी बात है कि कई रूपक ऐसे हैं, जिनमें पांचों सन्धियां न होकर चार या तीन ही सन्धियां पाई जाती हैं। हम यहां नाटक की इन पांच सन्धियों की गति को एक रेखाचित्र से व्यक्त कर देते हैं। गर्भ
मुख प्रतिमुख विमर्श उपसंहृति (निर्वहण) कथावस्तु के विभाजन पर विचार किया गया। हम देखते हैं दृश्य काव्य रजमश्च की वस्तु है। उसे रङ्गमञ्च की आवश्यकता के अनुसार दृश्यों का नियोजन करना होता है। कथा-सूत्रों में कई ऐसे भी होते हैं, जिन्हें मञ्च पर नहीं दिखाया जा सकता। कुछ को तो इसलिए कि उसमें समय विशेष लगता है, और कुछ को इस- लिए कि वे दर्शकों पर बुरा प्रभाव डाल सकते हैं। कुछ ऐसे भी कथा-सूत्र होते हैं, जो कथा-निर्वाह के लिए जरूरी तो है, पर इतने जरूरी नहीं कि उन्हें मञ्च पर बताया जाय। इस तरह हम दो प्रकार के कथा-सूत्र मान सकते हैं-१. दृश्य, तथा २. सूच्य। दृश्य कथासूत्र मच्च पर दिखाये जाते हैं, उनका अभिनय किया जाता है, सूच्य कथासूत्रों की पात्रों के संवाद के द्वारा सूचना मात्र दे दी जाती है। ये सूचना देने वाले पात्र प्रायः अप्रधान पात्र होते हैं। कभी-कभी सूच्य कथासूत्रों की सूचना नेपथ्य से भी दी जाती है। इन कथासूत्रों के सूचनाप्रकार 'अर्थोपक्षेपक' कह-
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[ २ ] लाते हैं, क्योंकि ये सूच्य अर्थ को आक्षिप्त करते हैं। अर्थोपच्ेपक पांच प्रकार के होते हैं :- १. विष्कम्भक, २. प्रवेशक, ३. चूलिका, ४. अङ्ढास्य तथा ५. अङ्कावतार। इन पांचों प्रकार के अरथोपचेपकों में विष्कम्भक तथा प्रवेशक का विशेष महत्त्व है, इन्हीं का प्रयोग नाटकों में प्रायः देखा जाता है। हम इन दोनों की विवेचना बाद में करेंगे। पहले, चूलिकादि तीन अरथोपच्षेपकों को ले लें। चूलिका में सूच्य अर्थ की सूचना नेपथ्य से, या यवनिका के भीतर से दी जाती है। अङ्कास्य वहां होता है, जहां किसी अङ्क के अन्त में किसी ऐसी बात की सूचना दी जाय, जिससे अगले अङ्ख का आरम्भ हो रहा हो। अड्डावतार में पहले अङ्क के पात्र पूर्व अक्क के अर्थ को विच्छिन्न किए बिना ही दूसरे अङ्क में आ जाते हैं। अङ्कास्य या अङ्कावतार में पात्रों के संवाद के द्वारा सूच्य अर्थ की सूचना दी जाती है। विष्कम्भक तथा प्रवेशक में भी विष्कम्भक विशेष प्रधान है। प्रवेशक विष्कम्भक का ही दूसरा रूप कहा जा सकता है, जहां नीच पात्र होते हैं, तथा उसका प्रयोग प्रथम अङ्क के आरम्भ में नहीं होता। विष्कम्भक अर्थोपचेपक में दो पात्र होते हैं; ये दोनों पात्र गौण अथवा अप्रधान पात्र होते हैं, किन्तु दोनों (या एक) उच्चकुल के होते हैं। चिष्कम्भक के द्वारा भूतकाल की या भविष्यत् काल में होने वाली घटना का सक्केत किया जाता है। इसका प्रयोग कहीं भी हो सकता है। यहां तक कि विष्कम्भक नाटकादि के आरम्भ में, प्रथम अङ्क के आरम्भ में भी प्रयुक्त हो सकता है। इस प्रकार का चिष्कम्भक का प्रयोग भवभूति के मालतीमाधव में देखा जा सकता है। विष्कम्भक दो प्रकार का होता है-शुद्ध तथा मिश्र। शुद्ध विष्कम्भक के सभी पात्र मध्यम श्रेणी के तथा संस्कृत वक्ता होते हैं। मिश्र विष्कम्भक में मध्यम श्रेणी तथा निम्न श्रेणी, दोनों तरह के पात्र होते हैं, तथा प्राकृत का भी प्रयोग होता है। शकुन्तला नाटक में चतुर्थ अरङ्क के पूर्व शुद्ध विष्कम्भक पाया जाता है, जहां कण्व ऋषि का एक शिष्य आरकर हमें बताता है, कि कण्व लौट आये हैं। प्रवेशक भी विष्कम्भक की भांति सूचक अङ्क है। इसके पात्र सभी निम्न श्रेणी के होते हैं, तथा प्राकृत भाषा बोलते हैं। प्रवेशक का प्रयोग नाटक के आरम्भ में कभी नहीं होता, वह सदा दो अङ्कों के बीच प्रयुक्त होता है। अभिज्ञानशाकुन्तल नाटक में छुठे अंक के पहले प्रवेशक का प्रयोग पाया जाता है। इसी सम्बन्ध में 'पताकास्थानक' को भी समझा दिया जाय। नाटककार कभी संवाद या घटना में कुछ ऐसी रचना करता है, जिससे भावी वस्तु या घटना की सूचना मिल जाती है। दशरूपककार ने पताकास्थानक के दो भेद माने हैं-अन्योक्ति- रूप तथा समासोक्तिरूप। रत्नावली से राजा के विदा होते समय नेपथ्य से 'प्राप्तो Sस्मि पद्मनयने समयो ममष ...... करः करोति' के द्वारा-उदयन के द्वारा-सागरिका के भावी आश्वासन की सूचना दी गई है। यहां अन्योक्तिपद्धति वाला पताकास्थानक है। अन्योक्तिपद्धति वाले पताकास्थान में प्रस्तुत तथा अप्रस्तुत दोनों का इतिवृत्त एक सा होता है, वे 'तुल्येतिघृत्त' होते हैं। प्रस्तुत उदयन-सागरिका-व्यापार की व्यज्जना
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(सूचना) अप्रस्तुत दिनकर-पद्मिनी-व्यापार के द्वारा कराई गई है। रत्नावली में ही एक दूसरे स्थान पर समासोक्तिरूप पताकास्थानक भी पाया जाता है। समासोक्ति- रूप पताकास्थानक में प्रस्तुत पक्ष तथा अप्रस्तुत पक्ष में विशेषणों की समानता होती है, वे 'तुल्यविशेषण' होते हैं। रत्नावली में कलियों से भरी हुई उद्यानलता को देखते समय की उदयन की उक्ति 'उद्दामोत्कलिकां विपाण्डुररुचं प्रारब्ध- जम्भं क्षणात् ..... देव्या: करिष्याम्यहम्' के द्वारा भावी सागरिकादर्शन से जनित देवीकोप की सूचना दी गई है। यहां लता के विशेषण अप्रस्तुत कामविदग्धा नायिका में भी अन्वित हो जाते हैं। पाश्चात्त्य शास्त्रियों की भांति यहां के नाट्यशास्त्रियों ने संवाद ( Dialogne) को अलग से तत्त्व नहीं माना है। इसका तात्पर्य यह नहीं, कि वे इसका विवेचन नहीं करते। वस्तुतः वे इसका विवेचन वस्तु के साथ ही करते हैं, तथा इसे वस्तु का ही अङ्ग मानते जान पड़ते हैं। पात्रों का संवाद हमारे यहां कई तरह का माना गया है :- प्रकाश, स्वगत, अपवारित तथा जनान्तिक। प्रकाश वह उक्ति है, जो सर्वश्राव्य हो, जिसे सारे पात्र सुन सकें। स्वगत वह उक्ति है, जो रङमश्च के अन्य पात्रों को सुनानी अभीष्ट नहीं। अपवारित तथा जनान्तिक कुछ ही लोगों को-रजमन्न पर स्थित कुछ ही पात्रों को, सुनाना अभीष्ट होता है। अपवारित में पात्र किसी दूसरे एक ही पात्र को अपनी बात सुनाना चाहता है। जनान्तिक में दो पात्र आपस में ग्ुप्त मन्त्रणा करते हैं। सामाजिक के लिए तो ये सारे ही संवाद श्राव्य होते हैं। इनके अरतिरिक्त कभी कभी नेपथ्य से आकाशभाषित का प्रयोग भी किया जाता है। (२ ) नेता तथा पात्र :- रूपकों का दूसरा भेदक नेता है। नेता शब्द के साथ नायक का सारा परिकर आ जाता है। नायिका, नायक के साथी, नायिका की सखियाँ आदि, प्रतिनायक और उसके साथी, सभी 'नेता' के अज्ग माने गये हैं। नाटकादि के इतिवृत्त का नायक वही बन सकता है, जिसमें विनीतत्वादि अ्रनेक गुण9 विद्यमान हो। नायक को नाय्यशास्त्र में चार प्रकार का माना गया है। यह प्रकार-भेद नायक की प्रकृति के आधार पर किया गया है। ये चारों प्रकार के नायक 'धीर' तो होते ही हैं। धीरत्व के अतिरिक्त इनमें अपनी २ प्रकृतिगत विशेषता पाई जाती है। नायक का पहला प्रकार 'ललित' या धीरललित है; दूसरा 'शान्त' या धीरशान्त (धीरप्रशान्त), तीसरा 'उदात्त' या धीरोदात्त और चौथा 'उद्धत' या 'धीरोद्धत'। इनके उदाहरण क्रमशः वत्सराज उदयन, चारुदत्त, राम तथा भीमसेन दिए जा सकते हैं। (१) धीरललित :- धीरललित राजपाट की या दूसरी चिन्ताओं से मुक्त होता १. इन गुणों के लिए दशरूपक के द्वितीय प्रकाश की पहली दो कारिकाएँ व उनकी वृत्ति देखिए।
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[ ३१ ] है। वह सङ्गीत, नृत्य, चित्र आदि कला का प्रेमी और रसिक-वृत्ति का होता है। प्रेम उसका उपास्य होता है, वह भोगविलास में लिप्त रहता है, तथा प्रायः अनेकपत्नी वाला होता है। धीरललित नायक अधिकतर राजा होता है। उसका राज्यकार्य मन्त्री आदि सँभाले रहते हैं और वह अन्तःपुर की चहारदीवारी में प्रेम क्रीड़ा किया करता है। यहीं पर वह नई नई सुन्दरियों के प्रति अपने प्रेम-प्रदर्शन की धुन में रहता है। उसके इस व्यापार में वह अपनी महादेवी-महारानी-से सदा डरता हुआ, शङ्कित होकर, प्रवृत्त होता है। भास तथा हर्षवर्धन का वत्सराज उदयन ऐसा ही धीरललित नायक है। रत्नावली तथा प्रियदर्शिका का नायक इन सब गुणों से युक्त है। (२) धीरप्रशान्त :- धीरप्रशान्त प्रकृति का नायक धीरललित से सर्वथा भिन्न होता है। कुल की दृष्टि से वह शान्त प्रकृति का होता है। शान्त प्रकृति प्रायः ब्राह्मण या वैश्य में ही होती है। अतः यह निष्कर्ष निकलता है कि धीरप्रशान्त कोटि का नायक या तो ब्राह्मण होता है या वैश्य (श्रेष्ठी )। यह दूसरी बात है कि वह चारुदत्त या माधव की तरह कलाप्रिय भी हो। प्रकरण नामक रूपकभेद का नायक प्रायः धीरप्रशान्त ही होता है। शूद्रक के मृच्छकटिक का नायक 'चारुदत्त' तथा भवभूति के मालतीमाधच प्रकरण का नायक माधव धीरप्रशान्त हैं। दोनों ही कुल से ब्राह्मण हैं। कुछ लोगों के मतानुसार युधिष्ठिर, बुद्ध या जीमूतवाहन को भी इसी कोटि में मानना ठीक होगा, क्योंकि वे शान्त प्रकृति के हैं। अवलोककार धनिक ने इस मत का अच्छी तरह खण्डन किया है। धनिक के मतानुसार वे धीरोदात्त हैं। (३) धीरोदात्त :- घीरोदात्तप्रकृति का नायक भी प्रायः राजा या राजकुलोत्पन्न होता है। वह निराभिमानी, अत्यन्त गम्भीर, स्थिर तथा अविकत्थन होता है, जिस व्रत को वह धारण कर लेता है, उसे छोड़ता नहीं है। धीरोदात्त नायक, नायक के सम्पूर्ण आदर्शों से युक्त होता है। नाटक का नायक इसी प्रकृति का चुना जाता है। उत्तर- रामचरित के रामचन्द्र या अभिज्ञानशाकुन्तल का दुष्यन्त धीरोदात्त नायक है। (४ ) धोरोद्धत :- धीरोद्धत नायक धमंडी, ईर्ष्यापूर्ण विकत्थन तथा छुली होता है। यही कारण है कि वह 'उद्धत' कहा जाता है। परशुराम या भीमसेन धीरोद्धत कोटि के नायक हैं। रूपक का प्रत्येक नेता इन प्रकारों में से किसी एक प्रकार का होता है। हम आरागे बतायेंगे कि किस किस रूपक का नेता किस किस प्रकृति का होता है। (१) राम व दुष्यन्त का धीरोदात्तत्व क्रमशः निम्न पद्यों से स्पष्ट हो जाता है :- (क) ... ...... 'यदि वा जानकी मपि। आराधनाय लोकस्य मुश्तो नास्ति में व्यथा।। (उत्तररामचरित, प्रथम अट्ठ ) (ख) स्वसुखनिरभिलाषः खिद्यते लोकहेतोः, प्रतिदिनमथवा ते वृत्तिरेवं विधैव। अनुभवति ही मूर्ध्ना पादपस्तीव्रमुष्णं शमयति परितापं छाययोपाश्रितानाम्॥ (शाकुन्तल, द्वितीय अरढ्ठ)
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नायक का एक दूसरे ढङ्ग का वर्गीकरण भी किया जाता है। यह वर्गीकरण उसके प्रेमव्यापार एवं तत्सम्बन्धी व्यवहार के अनुरूप होता है। प्रेम की तवस्था में नायक के दक्षिण, शठ, धृष्ट तथा अनुकूल ये ४ रूप देखे जा सकते हैं। ये रूप अपनी परिणीता पत्नी के प्रति किये गये उसके व्यवहार में पाये जाते हैं। दक्षिण नायक एक से अधिक प्रियाओं को एक ही तरह से प्यार करता है। रत्नावली नाटिका का वत्सराज डदयन दक्षिण नायक है। शठ नायक अपनी ज्येष्ठा नायिका के साथ बुरा बर्ताव तो नहीं करता, पर उससे छिप छिप कर दूसरी नायिकाओं से प्रेम करता है। धृष्ट नायक धोखे बाज है, वह ज्येष्ठा नायिका की पर्वाह नहीं करता, कभी २ खुले आम भी दूसरी नायिका-कनिष्ठा से प्रेम करता है। एक ही नायक में भी तीनों अवस्थाएँ मिल सकती हैं। रत्नावली का उदयन वैसे कई स्थान पर दक्षिणरूप में, कई स्थान पर शठरूप में तथा कई स्थान पर घृष्टरूप में सामने आता है। फिर भी उसमें प्रधानता दक्षिणत्व की ही है। अनुकूल नायक सदा एक ही नायिका के प्रति आसक्त रहता है। उत्तररामचरित के रामचन्द्र अ्नुकूल नायक हैं, जो केवल सीता के प्रति आसक हैं। नायक के अन्तर्गत आठ प्रकार के सात्त्विकगुणों की स्थिति होना आवश्यक है। ये गुण हैं :- शोभा, विलास, माधुर्य, गांभीर्य, स्थैर्य, तेज, लालित्य तथा औदार्य। नायक का शत्रु प्रतिनायक होता है। यह धीरोद्धत प्रकृति का होता है। जैसे महावीरचरित तथा वेणीसंहार में, रावण तथा दुर्योधन प्रतिनायक हैं। वे राम तथा युधिष्ठिर की फलप्राप्ति में बाधक होते हैं। नायक का साथी पताकानायक, पीठमर्द कहलाता है। यह बुद्धिमान होता है तथा नायक से कुछ ही गुणों में न्यून रहता है। पीठमर्द सदा नायक की सहायता करता है। रामायण का सुग्रीच, तथा मालतीमाधव का मकरन्द 'पीठमर्द' हैं। नायक के दूसरे सहायक भी होते हैं। नायक के राजा होने पर राज्यकार्य, तथा धर्मकार्य में उसके सहायक मन्त्री, सेनापति, पुरोहित आदि होते हैं। प्रेम के समय राजा या नायक के सहकारी विदूषक तथा विट होते हैं। विदूषक संस्कृत नाटक का एक महत्त्वपूर्ण पात्र है। वैसे तो वह नाटक में हास्य तथा व्यंग्य की रचना कर नाटकीय मनोरंजन का साधन बनता है, किन्तु उसका इससे भी अधिक गंभीर कार्य है। वह राजा के अन्तःपुर का आलोचक भी बनकर आता है। कभी कभी वह अपने संवाद में ऐसा संकेत करता है, जो उसकी तीच्णबुद्धि का संकेत कर देता है, वैसे मोटे तौर पर वह पेट्व तथा मूर्ख दिखाई पड़ता है। विदूषक ब्राह्मण जाति का होता है, उसकी वेशभूषा, चाल-ढाल, व्यवहार तथा बातचीत का ढंग हास्यजनक होता है। वह ठिगना, खल्वाट तथा दंतुल होता है। विदूषक प्राकृत भाषा का आश्रय लेता है। संस्कृत नाटकों में वह मोदकप्रिय तथा अपने पेटूपन के लिए मशहूर है। विदूषक राजा (नायक) का विश्वासपात्र व्यक्ति होता है, जिसे राजा अपनी गुप्त प्रेम-मन्त्रणा तक बता देता है। वह कभी कभी राजा के गुप्त प्रेम-व्यवहार में सहायक भी होता है। शकुन्तला का विदूषक, तथा मृच्छकटिक का
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मैत्रेय इसके उदाहरण हैं। व्यंग्य, हास्य तथा आलोचक-प्रवृत्ति की दृष्टि से विदूषक की तुलना शेक्सपियर के 'फालस्टाफ' (Falstaff) से की जा सकती है। किन्तु विदूषक में कुछ भिन्नता भी है, कुछ निजी व्यक्तित्व भी हैं, जो 'फालस्टाफ' के व्यक्तित्व से पूरी तरह मेल नहीं खाता। विदूषक के अतिरिक्त चिट भी राजा या नायक का नर्मसुहृत् होता है। विट किसी न किसी कला में प्रवीण होता है, तथ वेश्याओं के व्यवहारादि का पूरा जानकार होता है। भाण नामक रूपक में विट प्रधान पात्र भी होता है, जहाँ वह अपने अनुभव सुनाता है। कालिदास व भवभूति में विट नहीं है। हर्ष के नागानन्द में, तथा मृच्छकटिक में विट का प्रयोग पाया जाता है। राजा के और भी कई सहायक होते हैं दूत, कुमार, प्राड्विचाक आदि, जिनका प्रयोग नाटककार आवश्यकतानुसार किया करते हैं। (नायिका-भेद)-नाटकादि रूपक में नायिका का भी ठीक उतना ही महत्त्व है, जितना नायक का, विशेष करके श्रृद्गार रस के रूपकों में। नाटिका में तो नायिका का विशेष व्यक्तित्व है। नायिका का वर्गीकरण तीन प्रकार का होता है। पहले ढंग का वर्गीकरण उसके तथा नायक के संबन्ध पर आधृत होता है। दूसरे ढंग का वर्गीकरण एक ओर उसकी उम्र और अवस्था, दूसरी ओर नायक के प्रतिकूलाचरण करने पर उसके प्रति नायिका के व्यवहार के आधार पर किया जाता है। तीसरा वर्गीकरण उसकी प्रेमगत दशा के वर्णन से संबद्ध है। हम यहाँ इन्हीं को क्रमशः लेंगे। नायिका को मोटे तौर पर तीन तरह का माना जा सकता है :- १ स्वीया या स्वकीया; नायक की स्वयं की परिणीता पत्नी; जैसे उत्तररामचरित की सीता। २ अन्या; वह नायिका जो नायक की स्त्री नहीं है। अन्या या तो किसी व्यक्ति की अनूठा कन्या हो सकती है, या किसी की परिणीता पत्नी। अनूठा कन्या का रूप हम शकुन्तला, मालती या सागरिका में देख सकते हैं। परस्त्री या अन्य पत्नी का नायिका के रूप में प्रयोग नीति व धर्म के विरुद्ध होने के कारण नाटकादि में नहीं बताया जाता। ३ सामान्या, साधारण स्त्री या गणिका। कई रूपकों में विशेषतः प्रकरण, प्रकरणिका तथा भाण में गणिका भी नायिका के रूप में चित्रित की जा सकती है। मृच्छकटिक की नायिका चसन्तसेना गणिका ही है। अवस्था के अनुसार नायिका-१ मुग्धा, २ मध्या तथा ३ प्रौढा या प्रगरुभा । सुग्धा नायिका प्राप्तयौवना होती है, वह बड़ी भोली, प्रेम-कलाओं से अज्ञात, तथा प्रेम- क्रीडा से डरी-सी रहती है। वह नायक के समीप अकेली रहने में डरती है, तथा नायक के प्रतिकूलाचरण करने पर उस पर क्रोध नहीं करती, बल्कि स्वयं आँसू गिराती है। मध्या नायिका सम्प्राप्ततारुण्यकामा होती हैं; उसमें कामवासना उद्भूत हो जाती है। नायक के प्रतिकूलाचरण करने पर वह कुद्ध होती है। ऐसी दशा में उसके तीन रूप होते हैं :- १ धीरा, २. अधीरा, २ धीराधीरा। धीरा मध्या प्रतिकूलाचरण वाले नायक को श्लिष्ट वाक्यों के द्वारा उपालंभ देती है। अधीरा कटु शब्दों का प्रयोग करती है। धीराधीरा मध्या एक ओर रोती है, दूसरी ओर नायक को व्यंग्य भी सुनाती है। इस
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[ ३४ ] प्रकार मध्या तीन प्रकार की होती है। प्रौढा या प्रागल्भा नायिका प्रेमकला में दक्ष होती हैं, प्रेमक्रीडा में वह कई प्रकार के अनुभव रखती है। कृतापराध प्रिय के प्रति उसका आचरण मध्या की भाँति ही तीन तरह का हो सकता है। अतः वह भी तीन प्रकार की होती है :- १ धीरा, २ अधीरा, ३ धीराघीरा। धीरा प्रौढा प्रिय को कुछ नहीं कहती, वह केवल उदासीन वृत्ति धारण कर लेती है। इस प्रकार वह नायक की कामकीडा में हाथ नहीं बँटाती और उसमें बाधक-सी होकर अपने क्रोध की व्यजना करती है। अधीरा प्रौढा नायक को डराती, घमकाती और यहाँ तक कि मारती-पीटती भी है। धीराधीरा प्रौढा मध्याधीराधीरा की भांति ही व्यंग्योक्ति का प्रयोग करती है। इसके साथ ही मध्या तथा प्रौढा के तीन तीन भेदों का फिर से ज्येष्ठा तथा कनिष्ठा के रूप में वर्गीकरण किया जाता है। ज्येष्ठा नायिका नायक की पहली, तथा कनिष्ठा उसकी अभिनव प्रेमिका होती है। उदाहरण के लिए रत्नावली नाटिका में वासवदत्ता ज्येष्ठा है; सागरिका कनिष्ठा। इस प्रकार मध्या के ६ भेद तथा ग्रौढा के भी ६ भेद हो जाते हैं। मुग्धा नायिका केवल एक ही तरह की मानी जाती है। उसे इन भेदों में मिला देने पर इस वर्गीकरण के अनुसार नायिका के १३ भेद होते हैं। नायिका का तीसरा चर्गीकरण उसकी दशा को उपस्थित करता है। इसके अनुसार नायिका आठ तरह की होती है :- १. स्वाधीनपतिका, २. वासकसज्जा, ३. विरहोत्क- णठिता, ४. खण्डिता, ५. कलहान्तरिता, ६. विप्रलब्धा, ७. प्रोषितप्रिया तथा ८. अभि- सारिका। स्वाधीनपतिका का नायक सर्वथा उसके अनुकूल होता है, जैसे वह उसके आधीन होता है। वासकसज्जा नायिका नायक के आने की राह में सजधज कर बैठी रहती है। नायक के आने के विषय में उसके हृदय में पूर्ण आशा होती है। विरहोत्क- ण्ठिता का नायक ठीक समय पर नहीं आता, अतःउसके हृदय में खलबली मची रहती है, आशा तथा निराशा का एक संघर्ष उसके दिल में रहता है। खण्डिता का नायक दूसरी नायिका के साथ रात गुजार कर उसका अपराध करता है, और प्रातः जब लौटता है, तो परस्त्रीसम्भोग के चिह्नों से युक्त रहता है जिसे देखकर खण्डिता क्रुद्ध होती है। कलहान्तरिता नायिका कलह के कारण प्रिय से वियुक्त हो जाती है, तथा गुस्से में आकर प्रिय का निरादर करती है। विप्रलब्धा नायिका संकेतस्थल (सहेट) पर प्रिय से मिलने जाती है, पर प्रिय को नहीं पाती, वह प्रिय के द्वारा ठगी गई होती है। प्रोषितप्रिया का प्रियतम विदेश गया होता है। अभिसारिका नायिका सजधजकर या तो स्वयं नायक से मिलने जाती है, या दूती आदि के द्वारा उसे अपने पास बुला लेती है। नायक के गुणों की भाँति नायिका में भी गुणों की स्थिति मानी गई है। नायिका में ये गुण भूषण या अलंकार कहलाते हैं, तथा गणना में बीस हैं। इन बीस अलंकारों में पहले तीन शारीरिक हैं, दूसरे सात अयत्नज, तथा बाकी दस स्वभावज हैं। ये हैं :- भाव, हाव, हेला, शोभा, कान्ति, दीप्ति, माधुर्य, प्रगल्भता, शदार्य, धैर्य, लीला विलास, विच्छित्ति, विभ्रम, किलकिश्चित, मोहायित, कुद्टमित, विव्वोक, ललित, तथा विहृत।
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[ ३५ ] नायिकाओं में राजा की पट्टराज्ञी महादेवी कहलाती है। यह उच्चकुलोत्पन्न होती है। राजा की रानियों में कई निम्नकुल की उपपत्नियाँ भी हो सकती हैं। इन्हें स्थायिनी या भोगिनी कहा जाता है। राजा के अन्तःपुर में कई सेवक होते हैं। कज्जुकी इनमें प्रधान होता है। यह प्रायः वृद्ध ब्राह्मण होता है। कन्नुकी के अतिरिक्त यहाँ बौने, कुबड़े, नपुंसक (वर्षवर), किरात आदि भी रहते हैं। अन्तःपुर में रानियों की कई सखियाँ, दासियाँ आदि भी वर्णित की जाती है। इसी सम्बन्ध में कई नाट्यशास्त्र के प्रन्थों में पात्रों के नामादि का भी संकेत किया गया है, दशरूपक में इसका अभाव है। इनके मतानुसार गणिका का नाम दत्ता, सेना या सिद्धा में अन्त होना चाहिए, जैसे मृच्छकटिक में वसन्तसेना का नाम। दास- दासियों के नाम ऋतुसम्बन्धी पदार्थों से लिये गये हों, जैसे मालतीमाधव में कलहंस तथा मन्दारिका के नाम। कापालिकों के नाम घण्ट में अन्त होते हों, जैसे मालतीमाधव का अधोरघण्ट। नाटकादि में कौन पात्र किसे किस तरह सम्बोधित करे, इस शिष्टता का सङ्केत भी नाव्यशास्त्र के ग्रन्थों में मिलता है। सामन्तादि राजा को 'देव' या 'स्वामिन्' कहते हैं; पुरोहित या ब्राह्मण उसे 'आयुष्मन्' कहते हैं, तथा निम्न कोटि के पात्र 'भटट'। युवराज भी 'स्वामी' कहा जाता है, तथा दूसरे राजकुमार 'भद्रमुख' कहे जाते हैं। देवता तथा ऋषि-मुनि 'भगवन्' कहलाते हैं, तथा मन्त्री एवं ब्राह्मण 'आर्य' नाम से सम्बोधित किये जाते हैं। पत्नी पति को 'आर्यपुत्र' कहती है। विदूषक 'राजा' या नायक को 'चयस्य' कहता है, वह भी उसे 'वयस्य' ही कहता है। छोटे लोग बड़े लोगों को 'तात' कहते हैं, बड़े लोग छोटे लोगों को 'तात' या 'वत्स'। मध्यवर्ग के पुरुष परस्पर 'हंहों' कह कर सम्बोधित करे निम्न वर्ग के लोग 'हण्डे' कहकर। विदूषक महादेवी या उसकी सखियों को 'भवती' कहता है। सेविकाएँ महादेवी या रानियों को 'भटिनी' या 'स्वामिनी' कहती है। पति पत्नी को 'आर्या' कहता है। राजकुमारियाँ 'भर्तृदारिका' शब्द से सम्बोधित की जाती है। गणिका अज्ुका, कुट्टिनी या बृद्धा को 'अम्बा' कहती हैं। सखियाँ परस्पर 'हला' कहती है, और दासियों को 'हज्जा' कहकर सम्बोधित किया जाता है। ३. रस तथा भाव :- भारतीय नाव्यशास्त्र में रसविवेचना का विशेष स्थान है। हम बता चुके हैं किस तरह दृश्य काव्य में 'रस' की स्थिति भरत के भी पहले से चली आरही है। दृश्यकाव्य के तीन भेदकों में एक 'रस' भी है। 'रस' की व्यज्जना करना, सामाजिकों के हृदय में रसोद्रेक उत्पन्न करना दृश्य काव्य का प्रमुख लक्ष्य है। दृश्यकाव्य में नटों का यही उद्देश्य है कि उनके अभिनय के द्वारा सामाजिकों में रसोद्वोध हो। रस क्या है ? इस विषय में यहाँ तो हम इतना ही कहना चाहेंगे कि काव्य के पठन, श्रवण या दर्शन से जिस आनन्द का अनुभव हमें होता है, वही आनन्द 'रस' कहलाता है। यह रस किन साधनों के द्वारा होता है ? इस प्रश्न के उत्तर में भी यहाँ हम इतना ही कहना चाहेंगे कि 'रस की निष्पत्ति, विभाव, अनुभाव तथा व्यभिचारी ६ द० भू०
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[ ३६ ] के संयोग से होती है।' भरत मुनि ने 'रस' की चर्वणा के साधनों के विषय में नाय्य- शास्त्र में यही मत व्यक्त किया है :- 'विभावानुभावव्यभिचारिसंयोगाद् रस- निष्पत्तिः।' विभावादिकों तथा रस के परस्पर सम्बन्ध पर हम आरगे विचार करेंगे, जहाँ लोल्लट, शङ्कक, भट्टनायक, अभिनव तथा धनिक के मतों की विवेचना की जायगी। पहले हम यहाँ इनता समझलें कि सहृदय सामाजिकों के हृदय में 'भाव' रहता है। यदि आधुनिक मनोविज्ञान से सहायता ली जाय, तो हम कहेंगे कि 'भाव' मानव- मानस के अर्धचेतन, या अवचेतन भाग में छिपा रहता है। 'भाव' की उद्भूति हमारे व्यावहारिक तथा लौकिक जीवन से ही होती है, भारतीय पण्डित के मत से वह पूर्वजन्म का लौकिक जीवन भी हो सकता है। हम स्वयं अपने जीवन में किसी से प्रेम करते है, किसी के प्रति क्रोध, उत्साह, करुणा प्रदर्शित करते हैं; किसी शेर या साँप को देख कर डरते हैं या किसी कोढी के विकृत शरीर को देखकर जुगुप्सा का अनुभव करते हैं। यही नहीं, दूसरे लोगों को भी इस प्रकार के भाव प्रदर्शित करते देखते हैं। लौकिक तथा व्यावहारिक जीवन में, जब हम इस प्रकार के अनुभव बार-बार प्राप्त करते हैं, तो उनका प्रभाव हमारे चेतन मन पर पड़ता हुआ धीरे-धीरे हमारे अवचेतन मन के अन्तराल में अपना नीड बना लेता है। और जब हम काव्य नाटकादि में तत्तत् भाव का चित्रण पढ़ते या देखते हैं, तो वह छिपा भाव उभर कर चेतन मन की लहरों में उतराता नजर आता है। यही भाव काव्य में वर्णित विभावादि के द्वारा पुष्ट होकर रस रूप में परिणत हो जाता है, वह चेतन और अचेतन मन को जैसे कुछ समय के लिए एक करके, उनके बीच की यवनिका को जैसे हटाकर हमें हृदय की उस चरम सोपान सीमा तक पहुँचा देता है, जहाँ हम मनोराज्य में विचरण करते हैं, जहाँ आनन्द ही आनन्द है। और भारतीय रसशास्त्री के मत में यह आनन्द जिसे 'रस' की संज्ञा दी गई है, लौकिक होते हुए भी अलौकिक है, वह दिव्य है, तथा 'ब्रह्मास्वादसहोदर' है। पर 'रस' के साधन, 'भाव' को 'रस' रूप में परिणत करने वाले, ये विभावादि क्या है ? मान लीजिये, हम एक नाटक देख रहे हैं, कालिदास के शकुन्तला नाटक के प्रथम दृश्य को दिखाया जा रहा है। मञ्च पर दुष्यन्त आता है, वह आश्रम के पादपों को सींचती शकुन्तला को देखता है। शकुन्तला अपूर्व लावण्यवती है, घड़े को उठाकर नवमल्लिका को पानी पिलाते समय उसके अङ्गों का इस प्रकार का आकुश्न प्रसारण होता है कि वह उसके सौन्दर्य को बढ़ा देता है। भँवरे से डर के उसका इधर उधर दौड़ना, काँपना, आंखें हिलाना और चिल्लाना भी दुष्यन्त को उसकी ओर और अधिक आकर्षित करता है। और आगे जाकर दुष्यन्त तथा शकुन्तला के इसी अङ्क में परस्पर बिदा होते समय शकुन्तला का दर्भ से पैर के क्षत होने का बहाना बनाना, या लताओं में आँचल के न उलमने पर भी उसे सुलभाने का उपक्रम करना, शकुन्तला के प्रति दुष्यन्त के आकर्षण को परिपुष्ट रूप दे देता है। कण्व ऋषि के आश्रम का एकान्त उपचन तथा मालिनीतीर आदि भी दुष्यन्त के मानस
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[३७ ] में शकुन्तला के प्रति 'रति' भाव को व्यक्त कर उसे 'शज्गार' के रूप में परिणत करने में कारण होते हैं। इस प्रकार हम देखते हैं दुष्यन्त के मन में 'रस' व्यक्त होता है, अतः दुष्यन्त 'श्ङ्गार' रस का आ्र्स्वादकर्ता है, वह 'रति' भाव का आश्रय है। इस भाव को 'रस' रूप में परिणत करने का प्रमुख साधन शकुन्तला है, किन्तु इसके साथ शकुन्तला की चेष्टाएँ तथा उस दृश्य का देश-कालादि भी सहायता करते हैं। ये दोनों विभाव कहलाते हैं। शकुन्तला दुष्यन्त के 'रति' भाव का आलम्बन है तथा देश-कालादि इसके उद्दीपन। जब दुष्यन्त के मन में 'रति' भाव का अनुभव होने लगता है, तो उसके शरीर में कई चिह्न उत्पन्न होते हैं, उसका चेहरा खिल उठता है, कभी उसकी आँखें बार बार शकुन्तला की ओर अपने आप उठती हैं, वह फिर उन्हें समेटता है, इस प्रकार की दुष्यन्त की चेष्टाएँ 'अनुभाव' कहलाती हैं, क्योंकि ये 'रति' भावानुभूति के बाद पैदा होती हैं या उस 'भाव' का अनुभव सामाजिकों को कराती हैं। तीसरे साधन सश्चारिभाव या व्यभिचारिभाव हैं। हम देखते हैं, शकुन्तला के प्रति 'रति' भाव उत्पन्न होने पर, दुष्यन्त कभी सोचता है कि शकुन्तला ऋषिपुत्री है, अतः वह उसके द्वारा परिणययोग्य नहीं, वह निराशा तथा चिन्ता का अनुभव करता है। कभी उसे अपने मन पर विश्वास होता है, तथा शकुन्तला के विश्वामित्र पुत्री वाले वृत्तान्त को सुनकर हर्ष तथा आशा होती है। इसके पहले ही उसमें उत्सुकता होती है। इस प्रकार ये सभी प्रकार की भावानुभूतियां वे अस्थायी भाव हैं, जो थोड़े समय तक रहते हैं, और फिर लुप्त हो जाते हैं। एक क्षणिक भाव उठता है, लुप् हो जाता है, दूसर। उठता है, लुप् होता है, इस प्रकार एक स्थायी भाव में कई छोटे भाव सश्रण करते रहते हैं। ये भाव स्थायी भाव के सहकारी कारण हैं। इनकी स्थिति ठीक वैसी ही है, जैसे समुद्र में तरजों के उदय व अवसान की। स्थायी भाव समुद्र है, सश्चारिभाव तरह्नं। चूंकि ये भाव क्षणिक तथा अस्थिर हैं अतः ये सच्चारी या व्यभिचारी कहलाते हैं। गिनती में ये सश्चारी भाव ३३ है, जिनके नामादि ग्रन्थ में देखे जा सकते हैं। हम देखते हैं 'भाव' ही 'रस' का बीज है, रस का मूल रूप है। रस के अणु का 'न्यूल्कियस' (Mdens) यही 'भाव' है। भाव क्या है, इसे हम बता चुके हैं। भाव को क्षणिक सश्चारिभावों से अलग करने के लिए स्थायी भाव भी कहा जाता है। साहित्यशास्त्रियों ने आठ या नौ तरह के भाव माने हैं। धनंजय नाटक में आठ ही भाव मानते हैं, जैसा कि हम आगे 'धनंजय की मान्यताएँ' शीर्षक भूमिका भाग में बतायेंगे। अभिनच व नवीन रसशास्त्रियों को नौ भाव अभीष्ट हैं। ये भाव है :- रति, उत्साह, जुगुप्सा, क्रोध, हास, विस्मय, भय तथा शोक। इनके अतिरिक्त नवाँ भाव है 'शम"। इन्हीं भावों की परिणति क्रमशः आठ या नौ रसों में होती है :- शृङ्गार, वीर, चीभत्स, रौद्र, हास्य, अद्भुत, भयानक, करुण तथा नवें भाव 'शम' का १. आगे जाकर विश्वनाथ ने 'वत्सल' भाव की तथा वात्सल्य रस की भी की। इसी तरह रूपगोस्वामिन् ने 'उज्ज्वलनीलमणि में 'माधुर्य' रस (भक्ति रस)
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रसरूप 'शान्त'। इन आठ रसों में-शान्त की गणना न करने पर चार प्रमुख हैं, चार गौण। ऊपर की सूची के प्रथम चार प्रमुख हैं, द्वितीय क्रमशः प्रथम चार में से एक एक से उद्भूत माने जाते हैं। यथा हास्य को शङ्गार से, अद्भुत को वीर से, भयानक को बीभत्स से तथा करुण को रौद्र से उद्भूत माना जाता है। इस प्रकार श्ङ्गार- हास्य, चीर-अद्भुत, बीभत्स-भयानक, रौद्र-करुण इन रस-युग्मों की स्थिति हो जाती है। इनका सम्बन्ध मन की चार स्थितियों से लगाया जाता है। रसास्वाद के समय सामाजिक का मानस या तो विकसित होता है या फैलता है या क्षुब्ध होता है या उसमें विक्षेप की क्रिया होती है। इस प्रकार इन चार स्थितियों में से प्रत्येक का अनुभव ऊपर के एक एक रस-युग्म में क्रमशः पाया जाता है। यथा, श्ङ्गार-हास्य में मानस विकसित होता है, उसमें मन का विकास पाया जाता है। इसी तरह वीर- अद्भुत में मन के विस्तार, बीभत्स-भयानक में क्षोभ तथा रौद्र-करुण में विच्ेप की स्थिति रहती है। भूमिका-भाग में हम यहाँ प्रत्येक रस के स्वरूपादि का विवेचन कर व्यर्थ की कलेवर वृद्धि करना ठीक नहीं समझते। इनके लक्षणादि मूलग्रन्थ में देखे जा सकते हैं। रसनिष्पत्तिपर विभिन्न मत हम देख चुके कि भरत मुनि के मतानुसार विभाव, अनुभाव तथा सश्चारिभाव के 'संयोग' से रस की निष्पत्ति होती है। रसनिष्पत्ति के विषय में भरत के इस सूत्र की व्याख्या करते हुए लोल्लट, शङ्कक, भट्ट नायक तथा अभिनवगुप्तपादाचार्य ने अपने अपने रस सम्बन्धी सिद्धान्तों को प्रतिष्ठापित किया है। धनंजय का रस सम्बन्धी मत कोई नवीन कल्पना नहीं है। धनंजय तथा घनिक के मत का विवेचन हम यहां न कर अगले भूमिका-भाग में करेंगे कि किस तरह उसने लोल्लट, शङ्कक एवं भट्ट नायक के मतों का समन्वय उपस्थित किया है। (१) लोल्ट का उत्पत्तिवाद :- लोल्लट का रस सम्बन्धी मत, साहित्य शास्त्र में, 'उत्पत्तिवाद' के नाम से विख्यात है। लोल्लट रस को विभावादि के द्वारा उत्पन्न मानते हैं। विभावादि उत्पादक हैं, रस उत्पाद्य। इस प्रकार लोल्जट विभावादि को रस का ठीक उसी तरह कारण मानते हैं, जैसे घटरूप कार्य के मृद्दण्डचक्रादि कारण हैं।लोज्जट की इस मत सरणि पर मीमांसकों का प्रभाव है। लोल्लट स्वयं मीमांसक है। यही कारण है कि वे यहां कार्य कारणवाद, साधारणढङ्ग के कार्य कारण वाद की कल्पना कर 'उत्पत्तिवाद' को जन्म देते हैं। उदाहरण के लिए, भट्ट लोल्लट के मत से जो रति भाव, नायिका 'आलम्बन विभाव' के द्वारा उत्पादित होता है, उपवनादि उद्दीपन विभाव के द्वारा उद्दीप्त होता है, श्रलिङ्गनकटाक्षादि अनुभावों के द्वारा अनुभूत होता है, तथा औत्सुक्यादि सश्चारियों के द्वारा पुष्ट होता है, वही रति भाव रस रूप में की कल्पना की। शरृङ्गार प्रकाश में भोज ने केवल एक ही रस माना, श्ङ्गार। बाकी सारे रस भोज के मत से श्रङ्गार के ही विवर्त हैं। भवभूति सभी रसों को करुण का विवर्त मानते हैं।
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[ ३६ ] उत्पन्न होता है। यह रस नट या सामाजिक के हृदय में पैदा नहीं होता है। राम या दुष्यन्तादि पात्र ही इस रस का अनुभव करते हैं। वैसे नट उनकी नकल करता है, उनकी वेशभूषा में आराता है, चैसा व्यवहार करता है, इसीलिए सामाजिक उसे राम या दुष्यन्त समझ बैठते हैं। यह समझना भी भ्रान्ति जनित है। सच्चे राम या दुष्यन्त को चाँदी मान लें, तो राम या दुष्यन्त बना हुवा वह नट वह शुक्ति (सीप) है, जिसमें हमें रजत की भ्रान्ति हो जाती है। सामाजिक को इस भ्रान्ति से ही क्षणिक आनन्द मिल जाता है। लोल्लट का यह मत निर्दुष्ट नहीं कहा जा सकता। सामाजिक में रस की स्थिति न मानना इसका सबसे बड़ा दोष है। क्योंकि राम या दुष्यन्त जैसे पात्रों में ही रस मानना तथा सामाजिकों में रस की स्थिति का निषेध करना ठीक नहीं जान पड़ता। देखा जाय, तो राम या दुष्यन्त तो अतीत काल में थे, वर्तमान काल में तो उस नाटकादि के रस का आस्वादकर्ता सामाजिक ही है। यनि सामाजिक को रसास्वाद न हो, तो वह नाटकादि के प्रति प्रवृत्त ही क्यों होने लगा? यही नहीं, विभावादि तथा रस में परस्पर साधारण ढज्ग के कार्य कारण वाद की कल्पना करना भी एक दोष है, जिसका खण्डन हमें अभिनवगुप्त के मत में मिल सकता है। लोल्लट के मत के प्रथम दोष का निर्देश व उसके मत का खण्डन करते हुए शङ्कक ने नये मत को प्रतिष्ठापित किया। (२ ) शङ्कक का अर्प्रनुमितिवाद :- लोल्लट के उत्पत्तिवाद का सर्व प्रथम खण्डन नैयायिक शङ्कक ने किया है। शङ्कुक ने अपने मत की प्रतिष्ठापना में भरत के रससूत्र की नई व्याख्या उपस्थित की। उसके मतानुसार विभाव, अनुभाव तथा व्यभि- चारिभाव रस की अनुमिति कराते हैं। जैसे हम पर्वत में धुएँ को देखकर 'पर्वत अ्प्नि- मान् है; क्योंकि यह धूमवान् है' इस परामर्श के द्वारा पर्वत में वहि स्थिति की अनुमिति कर लेते हैं, वैसे ही नट में रामादि के से अनुभावादि देखकर हम वहां रस की स्थिति का अनुमान कर लेते हैं। इस प्रकार विभावादि रस के अनुमापक है, रस अनुमाप्य। उनमें उत्पाद्य-उत्पादक-भाव न होकर अनुमाप्य-अनुमापक-सम्बन्ध है। इसी सम्बन्ध में शक्कुक ने चित्रतुरगादिन्याय की कल्पना भी की है। जैसे चित्र का घोडा, वास्तविक घोड़ा न होते हुए भी उसे घोड़ा मानना ही पड़ता है, वैसे ही नट स्वयं राम या दुष्यन्त नहीं है, फिर भी सामाजिक उसे चित्रतुरग की भाँति राम या दुष्यन्त समझता है। तदनन्तर सामाजिक नट के द्वारा रत्यादि भाव का प्रकाशन देखता है, और यह अनुमान कर लेता है कि उसके हृदय में रत्यादि भात रसरूप में परिणत हो रहे हैं। सामाजिक इस अनुमिति का अनुभव करते समय, इस अनुभव के रसपूर्ण होने के कारण स्वयं भी रसानुभव करता है। इस प्रकार हम देखते हैं कि शङ्कक भी वास्तविक रस रामादि पात्रों में ही मानता है; किन्तु वह लोल्लट की भांति सामाजिकों में उसका सचथा अभाव नहीं मानता। शङ्कक का मत इतने पर भी निर्दुष्ट नहीं कहा जा सकता। रस को अनुमितिगम्य मानना ठीक नहीं जान पड़ता। यह अनुभव सिद्ध है कि रस प्रत्यक्ष प्रमाण संवेध्य है, वह प्रत्यक्ष
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[80] ज्ञान का विषय है। अतः प्रत्यक्ष ज्ञान को न मानकर रसास्वाद में अनुमिति की कल्पना करने में कोई साधक प्रमाण नजर नहीं आता। (३ ) भट्ट नायक का भुक्तिवाद :- भट्ट नायक अपने मत में रसास्वाद के विषय में उत्पत्ति, अनुमिति या अभिव्यक्ति वाले सिद्धान्तों को नहीं मानते। वे रस के विषय में 'भुक्ति' के सिद्धान्त को जन्म देते हैं। उनके मतानुसार विभावादि रस के भोजक हैं, रस भोज्य। भट्ट नायक ने काव्य के सम्बन्ध में 'अभिधा' शक्ति के अतिरिक्त दो अन्य व्यापारों की कल्पना की है। ये दो नये व्यापार हैं :- भावकत्व व्यापार, तथा भोजकत्व व्यापार। भट्ट नायक ने इन दो नये व्यापारों की कल्पना कर हमें रस के स्वरूप को स्पष्ट रूप से समभाने की चेष्टा की है। यह दूसरी बात है कि भट्ट नायक का मत भारतीय रसशास्त्र में मान्य न हो सका हो, किन्तु उसने जिन रस सम्बन्धी गूढ़ बातों का सङ्केत किया है, उनका उपयोग उसके विरोधी अभिवनगुप्त तक ने किया है। रस को अलौकिक रूप देने तथा साधारणी करण के सिद्धान्त को जन्म देने का श्रेय भट्ट नायक को ही जाना चाहिए। भट्ट नायक के मत से सामाजिक या श्रोता सर्वप्रथम काव्य की अभिधाशक्ति के द्वारा उसके वाच्यार्थ का ज्ञान प्राप्त करता है। तदनन्तर भावकत्व व्यापार के द्वारा वह रामादि पात्रों की भावना के साथ अपनी भावना का तादात्म्य करता है। इसी व्यापार द्वारा रामादि पात्र अपना व्यक्तित्व छोड़ कर साधारणी कृत हो जाते हैं। इस दशा में पहुँचने पर समाजिक की बुद्धि में रजस् तथा तमस् गुणों का प्रभाव नष्ट हो जाता है, वहाँ केवल सत्त्व गुण का उद्रेक पाया जाता है। रस दशा में सामाजिक समस्त लौकिक इच्छाओं से स्वतन्त्र हो जाता है। इस दशा में जो रसास्वाद होता है, उसका साधन भोजकत्व व्यापार है। भट्ट नायक के इस सिद्धान्त पर सांख्यदर्शनका प्रभाव परिलक्षित होता है। भट्ट नायक के इस सिद्धान्त में अभिनवगुप्त ने जो दोष निकाला, वह यही है कि भट्ट नायक की भावकत्व व्यापार तथा भोजकत्व व्यापार की कल्पना का कोई शास्त्रीय प्रमाण नहीं। (४) अभिनवगुप्त का व्यक्तिवाद :- भरत के रससूत्र के विषय में अन्तिम मत अभिनवगुप्त का व्यज्नावादी मत है। रसशास्त्र तथा अलङ्कारशास्त्र में यह मत अपनी दार्शनिक तथा मनोवैज्ञानिक आधारभित्ति के कारण अत्यधिक प्रसिद्धि पा सका है। जैसा कि हम देख चुके हैं अभिनवगुप्त व्यजनावादी तथा ध्वनिवादी आलङ्कारिक हैं। आनन्दवर्धन के द्वारा प्रतिष्ठापित सिद्धान्तों के अनुसार वे रस को ध्वनि का ही एक प्रमुख भेद-रसध्वनि-मानते हैं। इसी कारण वे रस को व्यंग्य मानते हैं, तथा उसे अभिघा या लक्षणा के द्वारा प्रतीतन मानकर व्यज्ञनावृत्ति के द्वारा अभिव्यक्त मानते हैं। काव्य या नाटकादि में प्रयुक्त विभाव, अनुभाव तथा सच्चारिभाव रस के अभिव्यञ्जक हैं, रस अभिव्यञ्चय। इस प्रकार अभिनव विभावादि तथा रस में परस्पर व्यञ्ञय-व्यञ्जक-भाव मानते हैं।
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हम देखते हैं कि लौकिक रूप में अपने जीवन में हम कई प्रकार के अनुभव प्राप्त करते हैं। ये अनुभव हमारे मानस में रत्यादि भावों की स्थिति को जन्म देते हैं। प्रत्येक सहृदय के मानस में ये रत्यादि भाव ठीक उसी तरह छिपे पड़े रहते हैं, जैसे नये शराब में छिपी मृत्तिका की सौंधी बास। जब शराब में जल डाला जाता है, तो भृत्तिका की गन्ध अभिव्यक्त हो जाती है, वह कहीं बाहर से नहीं आती, न पानी उस गन्ध को उत्पन्न ही करता है। ठीक इसी तरह जब सहृदय काव्य पढ़ता है या नाटकादि का अवलोकन करता है, तो उस काव्यनाटकादि में वर्णित विभावादि उसके मानस के अव्यक्त भाव को व्यक्त कर देते हैं, और वह भाव रसरूप में व्यक्त हो जाता है। इस प्रकार सहृदय ही रस का आस्वाद कर सकता है, क्योंकि इसके लिए पूर्व संस्कार अपेक्षित है। यह रस लौकिक भावानुभव से सर्वथा भिन्न होता है, यही कारण है कि इसे अलौकिक विशेषण से विभूषित कर, ब्रह्मास्वादसहोदर वताया जाता है। इस दशा में सहृदय आनन्दघन का अनुभव करता है। इस दशा की तुलना योगी की दशा से की जा सकती है। दोनों दशाओं में पूर्ण आनन्द का अनुभव होता है। अभिनवगुप्त की यह कल्पना रस की तुलना शै वेदान्त की 'विमर्श' दशा से करती जान पड़ती है, जहाँ साधक 'शिचोऽहम्' का अनुभव करता है। इस दशा में पहुँचने के लिए यह आवश्यक है कि विभावादि अपने वैयक्तिक रूप को छोड़ दें, साथ ही सामाजिक भी निवैयक्तिकता धारण कर ले। उस समय दुष्यन्त- शकुन्तला, राम-सीता अपने व्यक्तिकत्व को छोड़कर केवल नायक तथा नायिका के रूप में हमारे सामने आते हैं, साथ हीहम भी केवल रसानुभावकर्ता बन जाते हैं। इस प्रकार विभावादि केवल विषय-मात्र तथा सामाजिक केवल विषयि-मात्र रह जाता है। इसे ही साधारणीकरण कहा जाता है। अभिनवगुप्त ने 'भारती' में स्पष्ट बताया है कि साधारणीकरण केवल आलम्बन विभाव या आश्रय का ही नहीं, सभी तत्त्वों का- अनुभावादि का भी, होता है। साधारणीकरण के कारण ही रसानुभूति होती है, क्योंकि उस दशा में वैयक्तिक रागद्वेषादि का लोप हो जाता है। रसानुभूति का आरानन्द अलौकिक है। इसका आस्वाद प्रपाणक के आस्वाद की भाँति है। प्रपाणक में इलायची, कालीमिर्च, मिश्री, केशर, कर्पूर आदि के मिश्रण से एक अभिनव स्वाद की सृष्टि होती है, जो प्रत्येक वस्तु के अलग अलग स्वाद से सर्वथा भिन्न है। वैसे ही, विभावादि सभी का आस्वाद मिल कर रसकी विशेष प्रकार की चर्वणा को जन्म देता है। जैसा कि हम आगे धनजय एवं 'धनिक की मान्यताएँ' शीर्षक भूमिका भाग में देखेंगे, दशरूपककार रस को व्यङ्ञय न मानकर तात्पर्येवृत्तिगम्य मानते हैं, साथ ही विभावादि एवं रस में परस्पर भाव्य-भावक-भाव मानते हैं। उन्हें ध्वनिवादियों का रससम्बन्धी सिद्धान्त मान्य नहीं। X X X रूपक के तीन भेदक तत्त्वों की विवेचना की गई। इनके अतिरिक्त नाटकादि रूपकों में नाटकीय वृत्तियाँ, सङ्गीत, नृत्य, का भी प्रमुख स्थान है। दशरूपककार ने
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सङ्गीत तथा नृत्य की विवेचना नहीं की है। भरत के नाय्यशास्त्र में इन दोनों का क्रमशः वाचिक तथा आङ्िक अभिनय के अन्तर्गत विवेचन किया गया है। दशरूपककार ने सात्त्विक अभिनय-रस का ही विवेचन किया है। संस्कृत के कई नाटकों में हम सङ्गीत तथा नृत्य का चिनियोग पाते हैं। शकुन्तला में आरम्भ में नटी का सङ्गीत तथा षष्ठ अङ्क में हंसपदिका का गीत है। मालविकामि मित्र में मालविका का नृत्य है। पर दशरूपक में ही नहीं, बाद के अलङ्कारशास्त्र के उन प्रन्थों में भी जो नाट्यशास्त्र के रूपकसम्बन्धी विवेचन का प्रयोग करते हैं, सङ्गीत व नृत्य का चिवेचन इसलिए नहीं मिलता, कि वे इन्हें सङ्गीत-शास्त्र के विषय समझने लगे थे।9 नाटकीय वृत्तियों को एक ओर नायक का व्यापार बताया गया है, दूसरी ओर रसों से भी उसका सम्बन्ध स्थापित किया गया है। वृत्तियाँ चार हैं :- कैशिकी, सात्त्वती, आरभटी तथा भारती। भारती, दशरूपककार के मतानुसार शाब्दिक वृत्ति है, उसका प्रयोग विशेषतः आमुख या प्रस्तावना में पाया जाता है। कैशिकी वृत्ति का प्रयोग शद्गार रस के अरनुकूल होता है। इसके चार अर्प्ग होते हैं :- नर्म, नर्मस्फिज, नर्मस्फोट तथा नर्मगर्भ। इन अज्गों की विवेचना मूल प्रन्थ में द्रष्टव्य है। सात्वती वृत्ति वीर, अद्धुत तथा भयानक के उपयुक्त होती है। इसका प्रयोग करुण तथा शज्गार में भी किया जा सकता है। अरभटी वृत्ति का प्रयोग भयानक, वीभत्स, रौद्र रसों में होता है। इस भाग को समाप्त करने के पूर्व हम दशरूपकों की तालिका के साथ उनके वस्तु आदि भेदकों का सङ्केत कर देते हैं, जो उनके परस्पर भेद को रु्पष्ट कर देंगे। १ नाटक-पश्चसन्धियुक्त पौराणिक या ऐतिहासिक वस्तु, ५ से १० तक अङ्क, धीरोदात्त नायक, श्ृह्ार या वीररस, कैशिकी या सात्त्वती वृत्ति। २ प्रकरण-पञ्चसन्धियुक्त कल्पित वस्तु, ५ से १० तक अक्क, धीरप्रशान्त नायक, शृद्गार रस, कैशिकी वृत्ति। ३ भाण-धूर्तचरितविषयक कल्पित वस्तु, एक अङ्क, कलावित् विट नायक, एक ही पात्र की उक्ति-प्रत्युक्ति का प्रयोग (Mono-acting) वीर तथा शज्वार रस। ४ प्रहसन-कल्पित वस्तु, एक अ्रङ्क, पाखण्डी, कामुक, धूत आदि पात्र, हास्य रस। ५ डिम-पौराणिक वस्तु, चार अरङ्क, विमर्श रहित चार सन्धियों में विभक्त वस्तु, धीरोद्धत नायक, हास्य तथा श्रङ्गार से भिन्न ६ रस; सात्त्वती तथा आरभटीवृत्ति। ६ व्यायोग :- प्रसिद्ध पौराणिक चस्तु, गर्भ तथा विमर्श रहित तीन सन्धियाँ, एक अङ्क, धीरोद्धत नायक, हास्य तथा श्ङ्गार से भिन्न ६ रस, सात्त्वती तथा आरभटी वृत्ति,-इस रूपक-भेद में स्त्रीपात्र कम होते हैं, पुरुष पात्र अधिक। ७ समवकार-देव-दैत्यों से सम्बद्ध प्रसिद्ध पौराणिक वस्तु, विमर्श सन्धि का अरभाव बाकी चार सन्धियों की स्थिति, ३ अङ्क, धीरोदात्त तथा धीरोद्धत प्रकृति के १२ नायक; वीर रस, सात्वती तथा आरभटी वृत्ति। १. नृत्य तथा आंगिक अभिनय का विवेचन नंदिकेश्वर के अभिनयदर्पण में विशेषरूप से हुआ है।
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[ ४३ ] ८ वीथी-कल्पित वस्तु, एक अङ्क, श्ृङ्गारप्रिय नायक, श्रङ्गार रस, कैशिकी वृत्ति। ९ अङ्क-प्रसिद्ध पौराणिक वस्तु, एक अङ्क, प्राकृत पुरुष नायक, करुण रस, सात्त्वती वृत्ति। १० ईहामृग-मिश्रित कथावस्तु, चार अ्रङ्र, गर्भ व विमर्श से रहित तीन सन्धियाँ, धीरोद्धत नायक, श्ज्कार रस। रस-विरोध तथा उसके निराकरण पर कभी कभी ऐसा देखा जाता है, एक ही काव्य में एक से अधिक रसों का समा- वेश कर दिया जाता है। ऐसी दशा में कवि को यह ध्यान रखना पड़ता है कि कहीं ये रस परस्पर विरोधी तो नहीं, तथा प्रमुख भाव या रस को क्षति तो नहीं पहुंचाते। स्थायी भाव या भाव की परिभाषा निबद्ध करते समय दशरूपकार बताता है कि वह लवणाकर के समान है, जो सभी वस्तुएँ आत्मसात् कर लेत। है, उन्हें भी खारी बना लेता है। स्थायी भाव वही है, जो सजातीय तथा विजातीय भावों से क्षुण्ण न होता हो। विरुद्धैरविरुद्वैर्वा भावैर्षिच्छिद्यते न यः। आत्मभावं नयत्यन्यान् स स्थायी लवणाकर:॥ भावों का परस्पर विरोध दो तरह से हो सकता है-या तो वे भाव एक साथ एक काव्य में न रह सकें या एक दूसरे के बाधक बन जायँ, उनमें बाध्यबाधकभाव हो। जहाँ व्यभिचारियों का प्रश्न है उनका स्थायी के साथ कोई विरोध नहीं हो सकता, साथ ही वे एक साथ न रह सकते हों, यह भी बात नहीं है, क्योंकि वे तो स्थायी भाव के ही अज्ग बन कर काव्य में आते हैं। उनमें परस्पर वाध्यबाधकभाव भी नहीं माना जा सकता, क्योंकि अज् होने के कारण व्यभिचारिभाव स्थायी भाव के विरोधी नहीं हो सकते। जहाँ तक स्थायी भाव या रस के विरोध का प्रश्न है, यदि उनके आलम्बन अलग अलग हैं, तो कोई विरोध नहीं होता। उदाहरण के लिए मालतीमाधव में शज्गार रस है, उसके पश्चम अङ्क में बीभत्स का चित्रण है। ऐसी स्थिति में क्या यह विरोधी है? नहीं, मालतीमाधव में एक साथ शङ्गार तथा बीभत्स का उपनिबन्धन विरोधी इसलिए नहीं पड़ता कि इन दोनों के आलम्बन भिन्न भिन्न हैं। शज्गार का आर्प्रालम्बन मालती है, तो बीभत्स का श्मशान। वहीं रौद्र रस का उपनिबन्धन है, जहां अघोर- घण्ट कापालिक माधव के क्रोध का आलम्बन बनता है। यदि अलग अलग आलम्बन बनाकर, विरोधी रसों का उपनिबन्धन किया जाय, तो विरोध नहीं होता, न वे एक दूसरे के बाधक ही होते हैं। दो परस्पर विरोधी रसों के विरोध-परिहार का एक ढज् यह भी है कि दोनों के बीच ऐसे रस का समावेश कर दिया जो दोनों का विरोधी न हो। इसी बीच एक प्रश्न उठना सम्भव है। जहां एक हो रस प्रमुख हो, वहां अन्य विरोधी या अविरोधी रसों को उसका अज्ञ मान कर, विरोधाभाव मानना ठीक है। पर ७ द० भू०
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ऐसे भी काव्य हैं, जहां कई रसों का समप्राधान्य देखा जाता है, इन काव्यों में रस- विरोध का परिहार कैसे किया जाय? वृत्तिकार धनिक इस शङ्का के उठाते समय कई ऐसे काव्य-पद्य-उपस्थित करते हैं, जहाँ एक से अधिक भावों का समप्राधान्य देखा जाता है। वृत्तिकार इस शङ्का का निराकरण करते हुए बताते हैं कि वस्तुतः इन स्थलों में भी प्रधान भाव तथा प्रधान रस एक ही है, दूसरे उपन्यस्त रस या भाव गौण ही होते हैं। हम निम्न दो उदाहरणों को ले सकते हैं :- (१) एकत्तो रुअइ पिश अण्णत्तो समरतूरणिग्घोसो। पेम्मेण रणरसेण अ भडस्स डोलाइअं हिअअम्॥ (२ ) एकेनादणा प्रविततरुषा वीक्षते व्योमसंस्थं भानोर्बिम्बं सजललुलितेनापरेणात्मकान्तम्। अह्रश्छेदे दयितविरहाशङ्किनी चक्रवाकी द्वौ सङ्कीणों रचयति रसौ नर्तकीच प्रगल्भा ॥ यहाँ पहले उदाहरण में हम देखते हैं कि कोई योद्धा समर-यात्रा के लिए तैयार है। युद्ध में जाने के पहले वह प्रिया से विदा ले रहा है। बिदा होते समय प्रिया रोकर अपने दुःख की व्यज्ना कराती है। एक ओर प्रिया का रोना उसके हृदय में प्रेम का सव्चार करता है, दूसरी ओर युद्ध के तूर्य का शब्द हृदय में चीरता का सक्चार करता है। इस प्रकार योद्धा का दिल जैसे प्रेम और चीरता के हिडोंले पर, सन्देह- दोला में भूल रहा हो। शङ्का करने वाला यहां दोनों रसों-शङ्गार तथा वीर-का सम- प्राधान्य मानता है। धनिक इस शङ्का का निराकरण करते बताते हैं कि यहाँ वीररस की ही प्रधानता है, शरृद्गार रस तो गौण है, तथा उसी का पोषक बन कर आया है। ऊपर की गाथा का 'भटस्य' (भडस्स) पद भी इसी बात का सक्केत करता है। दूसरे उदाहरण में, सन्ध्याकाल के समय सूर्यास्त से उत्पन्न किसी चक्रवाकी की विरह दशा का वर्णन है। सूर्यास्त हो रहा है, सूर्य का बिम्ब पश्चिम में डूबने जा रहा है, रात्रि के आगमन की आशङ्का से भविष्यत् प्रियविरहशक्किनी चकवी सूर्यबिम्ब को एक आँख से गुस्से के साथ देख रही है। उसकी दूसरी आँख प्रिय पर टकी है, और उस आँख में आँसू भर आये हैं। इस तरह चकवी, एक कुशल नर्तकी की तरह एक साथ दो रसों की व्यज्जना करा रही है। यहां हम देखते हैं कि चकवी एक ओर क्रोध का अनुभव कर रही है, दूसरी ओर विरहविदग्धता का। इस प्रकार इस पद्य में एक साथ रति, शोक तथा क्रोध की व्यज्ना हो रहो है। शङ्का को उठाने वाले के मत से यहां तीनों भावों का समप्राधान्य है। धनिक इससे सहमत नहीं। यहां रसविरोध का निराकरण करते हुए वे बताते हैं कि इस काव्य में प्रमुखता भविष्यद्विप्रलम्भ की है; अ्तः यहां अनेकतात्पर्य की समप्रधानता नहीं है। 'एकेनादणा' इत्यादौ तु समस्तमपि वाक्यं भविष्यद्विप्रलम्भविषय- मिति न क्वचिदनेकतात्पर्यम्।'
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रस-शास्त्र के अन्य ग्रन्थों में कौन-कौन रस किस किस रस का विरोधी है, इसका विशद वर्णन मिलता है। उदाहरण के लिए श्रद्गार का रौद्र, शान्त तथा करुण से विरोध है। दशरूपककार का प्रमुख लक्ष्य नाव्यशास्त्र के सिद्धान्तों का एक छोटे से पैमाने में समावेश कर देना है। यही कारण है धनजय एवं धनिक अनावश्यक विस्तार में जाना अभीष्ट न समझ कर परस्पर विरोधी रसों की पूरी तालिका नहीं देते। फिर भी रसविरोध तथा उसके परिहार जितना कहा गया है, वह सूत्ररूप होते हुए भी महत्त्वपूर्ण है। धनञ्जय तथा धनिक की मान्यताएँ साहित्यशास्त्र, नाव्यशास्त्र तथा रस शास्त्र के सम्बन्ध में कुछ स्थलों पर धनज्य तथा धनिक ने दशरूपक में अपने सिद्धान्तों को व्यक्त किया है। धनिक की ये मान्य- ताएँ हम तीन शीर्षकों में बाँट देते हैं :- (१) धनिक तथा धनञय के द्वारा व्यञ्ना वृत्ति का निषेध। (२ ) रस की निष्पत्ति के सम्बन्ध में धनिक का मत। (३ ) धनिक तथा धनजय के द्वारा नाट्य में शान्त का निषेध। (१) घनञ्जय तथा व्यञ्ञनावृत्ति :- घनजय तथा धनिक दोनों ही भाट मीमांसकों के द्वारा अत्यधिक प्रभावित हैं। वे अभिधा, लक्षणा तथा तात्पर्य इन तीन ही वृत्तियों को मानते जान पड़ते हैं। ध्वनिवादी की नई कल्पना; व्यज्ना या तुरीया वृत्ति उन्हें स्वीकृत नहीं। भाट मीमांसक व्यज्जना वृत्तिगम्य प्रतीयमान अर्थ को तात्प- र्यार्थ से भिन्न नहीं मानते। उनका मत है कि प्रतीयमान अर्थ की प्रतीति तात्पर्य वृत्ति से ही हो सकती है। ध्वनिवादी रस को व्यङ्गथ मानते हैं, तथा उसकी प्रतीति के लिए व्यअना व्यापार की कल्पना करते हैं। धनिक ने चतुर्थ प्रकाश में इसी मत का खण्डन करते हुए अपने इस मत की प्रतिष्ठापना की है कि स्थायी भाव (रस भी) विभावादि के द्वारा प्रतीत वाक्यार्थ ही है; जैसे किसी वाक्य रूप में अभिहित या प्रकरणादि से बुद्धिस्थ क्रिया, कारकों से युक्त होकर, वाक्यार्थ बन जाती है। वाच्या प्रकरणादिभ्यो बुद्धिस्था वा यथा क्रिया। वाक्यार्थ: कारकैर्मुक्त: स्थायीभावस्तथेतरेः॥ धनजय की इस कारिका का वाक्यार्थ कुछ नहीं, तात्पर्यार्थ ही है, तथा वृत्तिकार धनिक ने इसे स्पष्टतः तात्पर्यशक्तिगम्य माना है। इसी कारिका के उपोद्धात के रूप में वृत्तिकार धनिक में सर्वप्रथम ध्वनिकार के मत को उपस्थित किया है, जो काव्य तथा रस में, या विभावादि तथा रस में वाच्य- वाचकभाव, या लच््यलक्षक भाव नहीं मानते। वे दलील देते हैं कि रस के वाचक शरृङ्गारादि शब्दों का प्रयोग काव्य में नहीं होता, यदि ऐसा होने पर रसप्रतीति हो तो वाच्यवाचक सम्बन्ध मान सकते हैं। साथ ही, मान लीजिये श्ज्गारादि शब्दों का प्रयोग हो भी, तो रस प्रतीति हो ही यह आवश्यक नहीं। साथ ही, वाच्यवाचकभाव
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मानने पर तो काव्य का वाच्य अरथ जानने के लिये प्रत्येक व्यक्ति को रसानुभूति होनी चाहिए; पर ऐसा होता नहीं, रस प्रतीति सहृदय ही कर पाता है। लक्षणा शक्ति के द्वारा रसप्रतीति मानने पर यह आपत्ति आती है कि काव्य का मुख्यार्थ ठीक बैठ ही जाता है, अतः वहाँ मुख्यार्थ बाध नहीं मान सकते और मुख्यार्थ बाघ के बिना लक्षणा संगत नहीं हो सकती। अतः रस तथा विभावादि में परस्पर कोई अन्य सम्बन्ध मानना होगा। वस्तुतः विभावादि व्यज्जना के द्वारा रस को अभिव्यक्त करते हैं। इस प्रकार इनमें परस्पर व्यङ्थ-व्यज्जक-भाव है। वृत्ति में धनजय ने आरनन्दवर्धन के ध्वन्यालोक से उदाहरण देते हुए ध्वनिकार व आनन्द के मतों को पूर्वपक्ष के रूप में उपन्यस्त किया है। ध्वनिकार की व्यज्जना तथा व्यङ्गथार्थ का खण्डन करते हुए धनिक ने ऊपर की कारिका की वृत्ति में अपने सिद्धान्त पक्ष की प्रतिष्ठापना की है। उसके मत से स्थायी भाव तथा रस काव्य के वाक्यार्थ या तात्पर्यार्थ है। हम देखते हैं कोई भी चैदिक या लौकिक वाक्य कार्यपरक होता है। ऐसा न हो तो वह उन्मत्त प्रलपित हो जायगा। काव्य के शब्दों का कार्य या लच््य आनन्दोद्भूति है। इस आनन्दोद्भूति के कारण विभावादि से युक्त्त स्थायी भाव ही है। वाक्य की अभिधाशक्ति उन-उन विभावादि का प्रतिपादन करती है और उनके द्वारा रस के रूप में पर्यवसित होती है। काव्यशब्दों के पदार्थ विभावादि हैं, तथा वाक्यार्थ स्थायी भाव एवं रस। इस प्रकार उनमें वाच्यवाचक भाव मानना पड़ेगा। यहां अपने अन्य ग्रन्थ काव्यनिर्णय से वे कुछ कारिकाएँ उद्धृत करते हुए इस मत को और स्पष्ट करते हैं :- 'काव्य का प्रतीयमान अर्थ तात्पर्यार्थ से भिन्न कोई वस्तु नहीं, अतः उसमें ध्वनि की कल्पना करना ठीक नहीं है। X X X X हम यह तो नहीं कह सकते कि तात्पर्य यहीं तक है, आगे नहीं। तात्पर्य कोई तौली हुई चीज तो है नहीं। वस्तुतः तात्पर्य तो वक्ता के कार्य, चक्ता के विवक्षित पदार्थ तक रहेगा।' तात्पर्यानतिरेकाच्च व्यअ्नीयस्य न ध्वनिः । X X X एतावत्येव विश्रान्तिस्तात्पर्यस्येति किं कृतम्। यावत्कार्यप्रसारित्वात् तात्पर्य न तुलाघृतम्।। इस प्रकार धनजय तथा धनिक को व्यजना वृत्ति या रस का व्यङ्गयत्व स्वीकृत नहीं। (२) धनञ्जय व धनिक का रससम्बन्धी मत :- हम देखचुके किधनज्य व धनिक को रस का व्यङ्गयत्व मान्य नहीं। वे विभावादि तथा रस में भाव्यभावक- सम्बन्ध मानते हैं। उनके मत से विभावादि या काव्य भावक है, रसादि भाव्य। हम भट्टनायक के मत में देख चुके हैं कि वे रस की निष्पत्ति के सम्बन्ध में दो व्यापारों की कल्पना करते हैं-भावकत्व तथा भोजकत्व। धनजय तथा धनिक भावकत्व व्यापार के आधार पर रसनिष्पत्ति के सम्बन्ध में भाव्यभावक सम्बन्ध की कल्पना :
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करते हैं। यदि कहीं भरतसूत्र का अर्थ धनज्य के मतानुसार किया जाय तो 'निष्पत्ति' का अर्थ 'भादना' होगा। 'भाव' इसलिए भाव कहलाते हैं कि सामाजिकों को शङ्गारादि रस की भावना कराते हैं :- भावाभिनयसम्बन्धान् भावयन्ति रसानिमान्। यस्मात्तस्मादमी भावा विज्ञेया नाव्ययोक्तृभिः॥ सामाजिक नाटकादि में नटों के द्वारा अर्जुनादि का अभिनय देखकर उन्हें अर्जुनादि समझ कर उनसे उत्साहादि का आस्वाद ठीक वैसे ही करता है, जैसे बालक मिट्टी के हाथी घोड़ों से खेलते हुए उनसे रस प्राप्त करता है। क्रीडतां मृण्मयैर्यद्धद्वलानां द्विरदादिभि:। स्वोत्साहः स्वदते तद्वच्छ्रोतृणामर्जुनादिभिः॥ इस प्रकार हम धनज्य व धनिक के रससिद्धान्त में तीन बातें पाते हैं :- (१) रस व्यङ्गय न होकर, काव्य का तात्पर्यार्थ है। (२) रस की भावना होती है, विभावादि में तथा उसमें परस्पर भाव्यभावकभाव है। (३) नटादि सामाजिक के लिए उसी तरह रामादि बन जाते हैं, जैसे बच्चे के लिए मिट्टी के हाथी-घोड़े सच्चे हाथी-घोड़े बन जाते हैं। हम एक बार लोल्लट, भट्टनायक तथांशङ्कुक के मतों को याद कर लें। लोल्लट व्यङ्गयार्थ को 'दीर्घदीर्घतराभिधाव्यापारजन्य' मानता है। धनजय के मत में पहला अंश लोख्जट का प्रभाव है। हम देख चुके हैं कि धनजय का रस की भावना वाला मत भट्टनायक की देन है। यद्यपि भट्टनायक 'निष्पत्ति' का अरथ 'भुक्ति' करते हैं, 'भावना' नहीं, तथापि 'भावना' भी भट्टनायक के मत में पाई जाती है। धनजय के मत का दूसरा अंश भटटनायक के मत का नवीनीकरण है। तीसरा मत स्पष्ट ही शंकुक से लिया गया है। नट के द्वारा अनुकार्य रामादि का अभिनय देखकर सामाजिक उसे रामादि ही समझते हैं। इस विषय में शङ्कुक ने रामादि के रूप में मश्च पर आये हुए नट की तुलना 'चित्रतुरग' (चित्र के घोड़े) से की है, तथा 'चित्रतुरगादिन्याय' की कल्पना की है। धनज्जय तथा धनिक का मिट्टी के हाथी आदि (मृण्मय द्विरदादि) का उदाहरण शङ्कक के उदाहरण का ही दूसरा प्रकार है। इस प्रकार स्पष्ट है धनजय के रससम्बन्धी मत में उनकी कोई नवीन कल्पना न होकर, ऊपर के तीन आचार्यों के मतों का ही संमिश्रण है। (३) धनञ्जय के द्वारा नाट्य में शान्तरस का निषेध :- धनअय ने चतुर्थ प्रकाश की ३५ वीं कारिका में शम नामक स्थायी भाव का निषेध करते हुए स्पष्ट कहा है :- रत्युत्साहजुगुप्सा: क्रोधो हास: स्मयो भयं शोकः। शममपि केचित्प्राह: पुष्टिर्नाटयेषु नैतस्य।। इस कारिका वृत्ति में धनिक ने शम स्थायी भाव तथा शान्तरस की अस्वीकृति के कारण उपन्यस्त किए हैं। पहले वे शमविरोधी तीन मतों को सामने रखते हैं :-
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(१) कुछ लोग शान्तरस को मानते ही नहीं, क्योंकि भरतमुनि ने, उसके विभावादि का प्रतिपादन तथा लक्षण नहीं किया। (२ ) कुछ लोग 'शान्तरस' का इसलिए अभाव मानते हैं, कि अनादिकाल से आये हुए रागद्वेष का नष्ट होना असम्भव है। (३) कुछ लोग शान्त का अन्तर्भाव वीर, वीभत्स आदि रसों में ही कर लेते हैं। धनजय बतलाते हैं कि वे शम भाव या शान्त रस का निषेध केवल नाटकादि रूपकों में ही करते हैं। शम में समस्त व्यापारों की परिसमाप्ति होनी चाहिए, यह व्यापार समाप्ति अभिनीत नहीं हो सकती। अतः अनभिनेय होने के कारण, शान्त की स्थिति नाटक में अस्वीकृत करनी ही पड़ेगी। इसी सम्बन्ध में एक प्रश्न और उठता है कि बुद्ध, युधिष्ठिर, जीमूतवाहन आदि में शान्त रस की स्थिति देखी जाती है। कुछ लोग उन्हें धीरप्रशान्त कोटि के नायक मानने की भी भ्रान्ति कर बैठते हैं। जो लोग नागानन्द नाटक में शान्तरस मानते हैं, उन्हें धनिक निम्न उत्तर देते हैं :- हम देखते हैं कि नागानन्द का नायक जीमूतवाहन एक ओर मलयवतती में प्रेम करता है, दूसरी ओर विद्याधर चक्रवर्तित्व प्राप्त करता है। ये दोनों बातें शम भाव के विरुद्ध पड़ती है। वस्तुतः जीमूतवाहन दयावीर है, तथा नागानन्द में चीर रस ही है। इस वीररस का मलयवती-प्रेम, तथा विद्याधर चक्रवर्तित्वलाभ से कोई विरोध भी नहीं जान पड़ता। इस सब निर्णय से स्पष्ट है कि नाटक में शान्त रस की स्थिति नहीं मानी जा सकती। भारतीय रङ्गमश्न दृश्य काव्य या रूपक रङ्गमञ्च पर अभिनीत किए जाने की वस्तु है। यही कारण है कि रङ्गमश्च के साथ उसका घनिष्ठ सम्बन्ध है। भरत के नाव्यशास्त्र में आ्रज से लगभग दो हजार वर्ष पहले के भारतीय रज्मच्च की एक माँकी देखी जा सकती है। धनज्जय ने रज्ञमन्च का संकेत नहीं किया है। हम देख चुके हैं धनजय का लक्ष्य सम्पूर्ण नाव्यशास्त्र के विषयों की विशद विवेचना नहीं था। इस भूमिका-भाग को समाप्त कर देने के पूर्व दो शब्द भारतीय रङ्गमञ्च की बनावट, प्रकार, साजसज्जा के विषय में कह देना अनावश्यक न होगा। भरत ने नाय्यशास्त्र में नाट्यगृहों का विशद वर्णन किया हैं। उनके मत से नाटकादि का अभिनय तीन प्रकार के नाव्यगहों में होता था। ये उत्तम, मध्यम तथा निकृष्ट श्रेणी के होते हैं। पहला १०८ हाथ लम्बा, दूसरा ६४ हाथ लम्बा, तथा तीसरा ३२ हाथ लम्बा होता है। इनमें दूसरा ठीक समझा गया है। समस्त नाट्यगृह को दो भागों में बाँट दिया जाता है :- रजमच्र तथा दर्शकों से बैठने की जगह। दर्शकों के बैठने की जगह में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्रों के बैठने की अलग अलग जगह होती थी। प्रत्येक वर्ण के व्यक्तियों के बैठने की जगह पर उसका संकेत करने
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वाला स्तम्भ होता था। ब्राह्मणों के बैठने की जगह श्वेत स्तम्भ होता था, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्रों के बैठने की जगह क्रमशः रक्त, पीत तथा नील स्तम्भ। बैठने के आसन लकड़ी या ईंट के होते थे। सामाजिकों के बैठने की जगह के सामने रज् या रजमश्च होता था। द्वितीय श्रेणी के नाट्यगृह में यह रज्ज आठ हाथ लम्बा और आठ हाथ चौड़ा होता था। इसके आखिर में रङशीर्ष होता था। रजमञ्च के पीछे पटी या जवनिका होती थी, इसके पीछे नेपथ्य गृह होता था। रजको रङ्शीर्ष, रज्मध्य तथा रजपृष्ठ इन तीन भागों में विभाजित किया जाता था। रङ् के दोनों ओर मत्तवारणी होती थीं, जहाँ से पात्र प्रवेश करता था। भरत के नाव्यशास्त्र में तीन तरह के नाव्यगहों का उल्लेख है :- प्रथम नास्यगृह दीर्घ चतुरस्र होता था, जिसे हम 'रेक्टेग्युलर' कह सकते हैं, इसकी लम्बाई अधिक व चौड़ाई कम होती थी। दूसरे ढङ्ग का नाव्यगृह विकृष्ट चतुरस्र होता था, जिसे हम 'स्क्वायर' कह सकते हैं, जो लम्बाई व चौड़ाई में बरावर होता था। तीसरे ढज्ग का नास्यगृह तिकौना होता था, इसे त्र्यस्त्र कहा गया है। इनमें प्रत्येक में सामाजिकों के बैठने की जगह का तथा रङ्मश्च के विभिन्न भागों का विभाजन उसकी बनावट तथा लम्बाई-चौड़ाई के आधार पर किया जाता था। हम बता चुके हैं भारतीय रङ्गमच् की अभिवृद्धि के साथ ही साथ संस्कृत के नाटकों का विकास हुआ। कालिदास, शूद्धक, हर्ष, भवभूति आदि के नाटक रङ्मच्च पर मजे से खेले जा सकते हैं, वे कोरे पाठ्य-नाटक नहीं। धीरे धीरे भारतीय रज्मश्च का ह्रास होता गया, किन्हीं कारणों से इन्हें राजाश्रय या लोकाश्रय न मिल पाया। फलतः नाटकों में सिद्धान्त और प्रक्रिया की दृष्टि से समन्वय न हो पाया। संस्कृत नाटक धीरे धीरे पाठ्य-नाटक से बनते गये और उनका एक मात्र लक्ष्य नाट्यशास्त्र के सिद्धान्तों का उदाहरण के रूप में प्रकाशन हो गया। इन नाटकों में धीरे धीरे श्रव्य काव्यत्व बढ़ता गया। इस प्रकार यवनों के भारत में आने के बाद ही भारतीय रज्मच्च तथा संस्कृत नाय्य-साहित्य दोनों अपनी प्राचीन समृद्धि को खो चुके थे।
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शुद्धिपत्र
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समर्पण (पिछला पृष्ठ) २७ महामहित्वं महामहिमत्वं
३० ३८ विषमत्वविशेषरोन विषमत्वेन
७६ २२ इस तरह मैं पर इस तरह मैं
८२ ३८ पटु तः पटुर्यतः
९१ २४ सन्यताग्र० संयताप्र०
१०४ ३० रलकपतितै शीर्ण० ०पतितः शीर्ण०
१२६ २९ सखिभि: सखीभि:
१४४ १९ नीता नीतौ
२२४ १८ मुख्याथबाध स्तद्योगे मुख्यार्थबाधे तद्योगे
२२५ ३८ तद्युक्तम् तदयुक्तम्
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॥श्रीः।I श्रीधनञ्जयविरचितं फगा
दशरूपकम् अमोड शिास
भी छमके एक शोहााकमी क रि जकम धनिककृतावलोकसहितं चन्द्रकलाहिन्दीव्याखयोपैतं च
प्रथम: प्रकाशः ।
इह सदाचारं प्रमाणयद्भिरविघ्नेन प्रकरणस्य समाप्त्यर्थमिष्टयोः प्रकृताभिमतदेवतयो- नमस्कार: क्रियते श्लोकद्वयेन- नमस्तस्मै गरोशाय यत्कण्ठः पुष्करायते। मदाभोगघनध्वानो नीलकण्ठस्य ताण्डवे। १॥ हार यस्य कण्ठः पुष्करायते = मृदङ्गवदाचरति, मदाभोगेन घनध्वानः= निबिडध्वनिः, नीलकण्ठस्य=शिवस्य, ताण्डवे = उद्धते नृत्ते, तस्मै गरोशाय नमः । अत्र खण्डश्लेषा- क्षिप्यमाणोपमाच्छायालङ्वार :- नीलकण्ठस्य=मयूरस्य ताण्डवे यथा मैघध्वनिः पुष्करा- यत इति प्रतीतेः। संस्कृत के ग्रन्थकारों में ऐसी परिपाटी तथा शिष्टाचार प्रचलित है कि ग्रन्थारम्भ के पूर्व वे अपने इष्टदेवता का स्मरण मङ्गलाचरण के रूप में किया करते हैं। इसी शिष्टाचार को प्रमाण मानकर उसका पालन करते हुए ग्रन्थकार धनज्ञय ने यहाँ सर्वप्रथम मङ्गलाचरण की अवतारणा की है। उनका ग्रन्थ बिना किसी विघ्न के पूरा हो जाय, इसीलिए अपने इष्टदेवता (गणेश तथा विष्णु) को दो श्रोकों से नमस्कार किया गया है। नीले कण्ठ वाले शिव के ताण्डव नृत्य करने पर मदजल की परिपूर्णता से गम्भीर तथा धीर ध्वनि वाला गणेश का कण्ठ मृदङ्ग के समान आचरण करता है। उन भगवान् गणेश को नमस्कार हो। यहाँ 'नीलकण्ठ' शब्द का अर्थ 'मयूर' भी होता है। मयूरपक्ष के अर्थ करने पर 'मदाभोगघनध्वानः' इस पद के 'धनध्वानः' इस खण्डको लेकर उसका अर्थ 'मेधध्वनि'लिया जा सकता है। इस खण्डशलेष अलक्कार के द्वारा शिव तथा गणेश पर मयूर तथा मघ का उपमानोपमेय भाव आक्षिप्त हो जाता है। अतः यहाँ श्लेष के द्वारा उपमा की छाया व्यजित हो रही है। भाव यह है कि जैसे मयूर के ताण्डव के समय मेघध्वनि मृदज़ के समान सुशोभित होती है वैसे ही शिव के उद्धत नृत्य के समय गणेश की गम्भीर कण्ठध्वनि भी वैसी
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*1 जगह पाठ्य ऋग्वेदत, समम्यो मितमेज या राजवैयदर्भिनयान रखोना थर्वरणा दवि।। 22.e कालि. मुनिना भरतेव यो प्रयोगो मक्तीष्वषुरसध्रुदा तिवदः। ललिताभिनय दुशरूपकम् तमय मर्ता महता 'प्रेष्टमन: सललाक्दात विकुम0 डक ही प्रतीत होती है। नृत्य के समय मृदङ्ग भी प्रयुक्त होता है, क्योंकि वह उसकी ताल और गति का नियामक है। दशरूपानुकारेण यस्य माद्यन्ति भावका:। नमः सर्वविदे तस्मै विष्णवे भरताय च ॥ २ ॥ एकत्र मत्स्यकूर्मादिप्रतिमानामुद्देशेन, अन्यत्रानुकृतिरूपनाटकादिना यस्य भावका := ध्यातारो रसिकाश्व, माधन्ति = हृष्यन्ति, तस्मै विष्णवेऽभिमताय प्रकृताय भरताय च नमः । जिन भगवान् विष्णु के मत्स्यकूर्मादि दशावतारों के श्रवणादि से भावुक भक्त प्रसन्न होते हैं, उन सर्वज्ञ भगवान् विष्णु को नमस्कार हो; तथा जिन महर्षि भरत के द्वारा निर्धृत दश (नाटकादि) रूपक-भेदों के अवलोकन और पर्यालोचन से सहृदय सामाजिक प्रसन्न होते हैं, उन मुनि भरत को भी नमस्कार हो। श्रोतुः प्रवृत्तिनिमित्तं प्रदर्श्यते- कस्यचिदेव कदाचिद्दयया विषयं सरस्वती विदुष:। घटयति कमपि तमन्यो व्रजति जनो येन वैदग्घीम्॥३॥ तं कंचिद्विषयँ प्रकरणादिरूपं कदाचिदेव कशयचिदेव कवेः सरस्वती योजयति येन प्रकरणादिना विषयेणान्यो जनो विदग्घो भवति। किसी भी ग्रन्थ के प्रति पाठक या श्रोता को आकृष्ट करना आवश्यक है। इसीलिए उसको प्रवृत्त करने के लिए बताया जाता है कि प्रकरणादिरूप किसी विषय या ग्रन्थ को हर कोई कवि सर्वागपूर्ण नहीं बना पाता। यह तो देवी सरस्वती की ही कृपा है कि वह किसी-किसी विद्वान के किसी विषय को कभी-कभी इस ढङ् से घटित कर देती है, कि उस विषय के पर्यालोचन से दूसरा मनुष्य ज्ञानी तथा विदग्ध हो जाता है। तीहित्मनरस्व स्वप्रवृत्तिविषयँ दर्शयति- मालविया- उद्घुत्योद्घृत्य सारं यमखिलनिगमान्नाट्यवेदं विरिश्ि- बरसम
श्वके यस्य प्रयोगं मुनिरपि भरतस्ताण्डवं नीलकण्ठः। शर्वाणी लास्यमस्य प्रतिपदमपर लक््म क: कर्तुमीष्टे नाट्यानां किन्तु किश्चित्प्रगुएरचनया लक्षणं संत्तिपामि॥४॥पाप यं नाव्यवेदं वेदेभ्यः सारमादाय ब्रह्मा कृतवान्, यत्संबद्धमभिनयं भरतक्चकार करणाज्हारानकरोत्, हरस्ताण्डवमुद्धतं, लास्यं सुकुमारं नृत्तं पार्वती, कृतवती तस्य सामस्त्येन लक्षणं कर्तु कः शक्तः, तदेकदेशस्य तु दशरूपस्य संत्षेपः क्रियत इत्यर्थः। Repaslare ell arml ग्रन्थ के आरम्भ के पूर्व यह भी अपेक्षित है कि अपने विषय का उल्लेख कर दिया जाय। aee. द. द.ह वृत्य and नृत, btt,ae hurpol उद्त्ह मथुर o) मध्चुरोद हमदिन तद्दयं द्विविधं पुत्र। लास्य ताण्वरु्देय नाटका धुपकार कम 3t5grz i mak on of lcmds P अतः दशरूपककार धनजय अपने ग्रन्थ के विषय तथा उसकी पर्यालोचना में आश्रित सरणि का सङ्केत करते हैं।FS समस्त वेदों के जिस सार को लेकर भगवान् ब्रह्मा ने ना्य नामक (पञ्चम) वेद की रचना की; जिस वेद से सम्बद्ध अभिनय प्रयोग को हाथ तथा पाँव के समायोग एवं अङ्गविक्षेप के द्वारा भरत मुनि ने (व्यावहारिक रूप में) पल्लवित किया; जिसमें भगवान् शिव ने ताण्डव (उद्धत) नृत्य का तथा भगवती पार्वती ने लास्य (कोमल) नृत्य का समावेश किया, उस अन्यत्भावा भमं तृत्यम क
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प्रथम: प्रकाश: ३
नाट्यवेद के सम्पूर्ण लक्षण को कौन कर सकता है ? यद्यपि देवताओं और महापुरुषों के द्वारा निबद्ध इस नाट्यशास्त्र की सिद्धान्तसरणि का विवेचन अस्मादृश लौकिक प्राणियों के लिए असम्भव है, फिर भी उन नाट्यों के लक्षणों को लेकर कुछ कुछ संक्षेप करता हूँ।ी विषयैक्यप्रसक्त पौनरुक्त्यं परिहरति- की व्याकीर्रों मन्दबुद्धीनां जायते मतिविभ्रमः। तस्यार्थस्तत्पदैस्तेन संत्तिष्य क्रियतेऽअ्सा॥ ५॥ व्याकीर्णे =विक्षिप्त विस्ती्णे च रसशास्त्रे मन्दबुद्धीनां पुंसां मतिमोहो भवति, तेन तस्य नाय्यवेदस्यार्थस्तत्पदैरेव संक्षिप्य ऋजुवृत्या क्रियत इति। क नाव्यवेद का विवेचन तो भगवान् ब्रह्मा तथा भरत मुनि कर चुके हैं; तो फिर से उसी का वर्णन करना क्या पिष्टपेषण न होगा; इस आशङ्का का उत्तर देते हुए ग्रन्थकार कहता है कि नाय्यशास्त्र (रसशास्त्र) बड़ा विस्तृत तथा गहन है, अतः मन्दबुद्धि वालों को बुद्धिभ्रम हो जाता है, वे वास्तविक ज्ञान को प्राप्त नहीं कर पाते। इसलिये इस ग्रन्थ में उसी (भरतमुनिप्रणीत) नाव्यवेद के अर्थ को लेकर उन्हीं पदों के द्वारा सीधे ढंग से संक्षिप्त कर दिया है। अतः यह ग्रन्थ कोई स्वतन्त्र अभिनव ग्रन्थ न होकर उसी का छोटा रूप है। इसलिए इसकी रचना में कोई पिष्टपेषण नहीं। इदं प्रकरणं दशरूपज्ञानफलम्। दशरूपं कि फलमित्याह- आनन्दनिस्यन्दिषु रूपकेषु व्युत्पत्तिमात्रं फलमल्पबुद्धि:। यो Sपीतिहासादिवदाह साघुस्तस्मै नमः स्वादुपराङमुखाय ॥६॥ तत्र केचित्- धर्मार्थकाममोक्षेषु वैचक्षण्यं कलासु च। करोति कीति प्रोति च साधुकाव्यनिषेवणम् ॥।' इत्यादिना त्रिवर्गादिव्युत्पत्ति काव्यफलत्वेनेच्छन्ति तन्निरासेन स्वसंवेद: परमानन्द- रूपो रसास्वादो दशरूपाणां फल न पुनरितिहासादिवत् त्रिवर्गादिव्युत्पत्तिमात्रमिति दर्शितम् । नम इति सोल्लुण्ठम्।* हमारे ग्रन्थ का विषय या प्रकरण दशरूपक (रूपक के नाटकादि दस भेद) है; तथा इस प्रकरण का फल है इन दस रूपकों का ज्ञान। किन्तु दशरूप का फल क्या है, इस प्रश्न के उपस्थित होने पर बताते हैं कि रूपकों के पर्यालोचन का लक्ष्य केवल व्युत्पत्ति या लौकिक ज्ञान न होकर रसरूप अलौकिक आस्वाद का अनुभव है। रूपक (अलौकिक) आनन्द से प्रवण रहते हैं। इनका लक्ष्य (फल) सहृदय को अलौकिक आनन्दरूप रस का आस्वाद कराना है। कोई अल्पबुद्धि विद्वान् इन रूपकों का फल केवल इतना ही मानता है कि इनसे व्युत्पत्ति होती है, ठीक वैसे ही जैसे इतिहास, पुराण आदि के पठन से लौकिक ज्ञान प्राप्त होता है। इस तरह के मत वाला विद्वान् रस के आस्वाद से पराङमुख है; उसमें सहृदयता या रसिकता का सवथा अभाव है। ऐसे विद्वान् को हमारा नमस्कार है। कुछ लोगों का कहना है कि 'सत्काव्य के सेवन करने से धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष में एवं कलाओं में विदग्धता प्राप्त होती है तथा अध्येता में कीर्ति तथा प्रीति का सन्निवेश होता है।' इस मत वाले लोग काव्य का फल या प्रयोजन धर्म आदि त्रिवर्ग का ज्ञान ही मानते हैं। * किन्सकी धतरिकोक्त चिन्त्यम। यदि धर्मारितिशच का व्यादिन्यो न स्थान्रहि भरतधुकत विरुध्येत। A com.
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e भरत- देवतानी सृखीरागं य राजामथ कुहुम्बनाम्। कृतानुकरणं लोके नाटयमिध्यमिधीयते।। लोकस्य चरितं पन्तु नानावस्थानतरातभम। ४ तदद गाभिन योषेतं नर पमित्यधसानतय दशरूपकम्
इस मत का खण्डन करते हुए धनअ्जय यह व्यजित करना चाहते हैं कि दशरूपकों के अनुशीलन का फल स्वसंवेध परमानन्दरूप रसास्वाद है, इतिहासादि के अध्ययन की तरह नहीं जो कोरे त्रिवर्गादि ज्ञान का ही कारण है। यहाँ इस मत के प्रवर्तक (आचार्य भामह) को जो नमस्कार किया है वह उनका मजाक उड़ाने के लिए है। 'नाट्यानां लक्षणं संक्षिपामि' इत्युक्तम्, किं पुनस्तनास्यमित्याह-
'नाय्यों का संक्षिप्त लक्षण देता हूँ' ऐसा कहने पर, नाय्य क्या है यह प्रश्न उठाना स्वाभाविक है, अतः उसको स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि 'अवस्था के अनुकरण को ही नाट्य कहते हैं'। जहाँ काव्य में निबद्ध या वर्णित धीरोदात्त, धीरोद्धत, धीरललित, धीरप्रशान्त प्रकृति के नायकों (तथा तत्तत्प्रकृतिगत नायिकाओं तथा अन्य पात्रों) का आङ्गिक, वाचिक, आहार्य तथा सातत्विक इन चार ढंग के अभिनयों के द्वारा अवस्थानुकरण किया जाता है, वह नाय्य है। उन्वयतिअवस्थानुकरण से यह तात्पर्य है कि चाल-ढाल, वेश-भूषा, आलाप-प्रलाप आदि के द्वारा पात्रों Af aat-b00 की प्रत्येक अवस्था का अनुकरण इस ढंग से किया जाय कि नटों में पात्रों की 'तादात्म्यापत्ति' t refesent हो जाय। जैसे नट दुष्यन्त की प्रत्येक प्रवृत्ति की ऐसी अनुकृति करे कि सामाजिक tti Lly S Falicula उसे दुष्यन्त ही समझें। नाव्य के समय दुष्यन्त और नट का भेद न रहे उनमें परस्पर Hhlion Celi अभेद प्रतिपत्ति हो जाय। Slaakonow-1 wrh edcet o Aroka - "a shadus dwrite " र्पद रत -रूप द्वश्यतयोच्यते। Trm an atot
9 नाटकितन तदेव नाट्यं दृश्यमानतया रूपमित्युच्यते नीलादिरूपवत्। नहिमे4 यही नाव्य रूप भी कहलाता है। नाय्य केवल श्रव्य काव्य न होकर रङ्गमञ्र के ऊपर नटमी, अभिनीत भी होता है, अतः यह दृश्य है, देखा जा सकता है। जैसे हम नीले-पीले आदि सषधिलरंग को देखते हैं तथा हमारे चक्षुरिन्द्रिय के विषय को रूप कहते हैं, उसी तरह चक्षुग्रोह: स्वमतति fast all lhis dramnas रूपकं तत्समारोपात्-DR. Thay wre/नn- wimalrepha.lak- नटे रामाद्यवस्थारोपेण वर्तमानत्वाद्रूपकं मुखचन्द्रादिवत् इत्येकस्मिन्नर्थे प्रवर्तमानस्य शब्दत्रयस्य 'इन्द्र पुरन्दरः शक्रः' इतिवत्प्रवृत्तिनिमित्तमेदो दर्शितः। वही नाव्य रूप रूपक भी कहलाता है; क्योंकि उसमें आरोप पाया जाता है। जैसे रूपक अलङ्कार में हम देखते हैं कि मुख पर चन्द्रमा का आरोप कर दिया जाता है-मुखचन्द्रः (मुखरूपी चन्द्रमा); वैसे ही नाट्य में नट पर रामादि पात्रों की अवस्था का आरोप किया जाता है, अतः इसे रूपक भी कहते हैं। जिस तरह इन्द्र, पुरन्दर, शक्र तीनों नामों से पुकारते हैं, वैसे ही एक ही अर्थ में नाट्य, रूप तथा रूपक तीनों शब्दों का प्रयोग होता है, इसे बताया गया है। 6 h aushisnd e/ ए्थक and wot -दृशधैव रसाश्रयम्॥७।ुम दवाणा रसानाश्रित्य वर्तमानं दशप्रकारकम्, एवेत्यवधारणं शुद्धाभित्रायेण। नाटिकाया:di संकीर्णत्वेन वत्यमाणत्वात्। Prt h अfका recaruat yppect i T रसों पर आश्रित यह नाव्य केवल दस ही तरह का होता है। शुद्ध नाय्य केवल दस ही तरह का होता है, इस अवधारण के लिए 'ही' (एव) का प्रयोग किया गया है। नाटिका
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Af dafmihor ofhe प्रथम: प्रकाश:Ams A mped rs follus तृत तृत्यपो नटिक ाvउत्वारिह स्वस-्व निरायं कृतमा (3.2 का समावेश रूपक के शुद्ध भेदों में नहीं। उनका वर्णन संकीर्ण रूपकों में आगे किया जायगा, इसीलिए रूपक केवल दस तरह के माने हैं। तानेव दशभेदानुद्दिशति- नाटकं सप्रकरणं भाण: प्रहसनं डिमः। व्यायोगसमवकारी वीथ्य ङ्केहामृगा इति ॥८॥ Seulon
उन दस भेदों का उल्लेख करते हैं :- 'नाटक, प्रकरण, भाण, प्रहसन, डिम, व्यायोग, समवकार, वीथि, अङ्ग, ईहामृग'।= 3त्यृष्ाड Mass ननु- 'डोम्बी श्रीगदितं भाणो भाणीप्रस्थानरासकाः। काव्यं च सप्त नृत्यस्य भेदा: स्युस्तेऽपि भाणवत्।। हेत्र 15 4vagolsil इति रूपकान्तराणामपि भावादवघारणानुपपत्तिरित्याशक्कयाह-ानर अन्यद्धाचाश्यं नृत्यम्- रसाश्रयन्नाय्याद्भावाश्रयं नृत्यमन्यदेव तत्र भावाश्रयमिति विषयमेदान्नृत्यमिति
यक्रम्' इति व्यवहारान्नाटकादेरन्यन्नृत्यं तद्भेदत्वाच्छ्रीगदितादेरवधारणोपपत्तिः। नाट- कादि च रसविषयम्, रसस्य च पक्षर्थीभूतविभावादिकसंसर्गात्मकवाक्यार्थहेतुकत्वाद्वा- क्यार्थाभिनयात्मकत्वं रसाश्रयमित्यनेन दर्शितम्। नाव्यमिति च 'नट अरवस्पन्दने' इति नटे: किश्विचलनार्थत्वात्सात्विकबाहुल्यम्, अत एव तत्कारिषु नटव्यपदेशः। यथा च गात्रविच्वेपार्थत्वे समानेऽप्यनुकारात्मकतवेन नृत्तादन्यन्नृत्यं तथा वाक्यार्थाभिनयात्मका- नास्यात्पदार्थाभिनयात्मकमन्यदेव नृत्यमिति। की इस विषय में यह आशक्का हो सकती है कि कोई कोई ग्रन्थकार का मत भिन्न है, जैसे 'नृत्य के डोम्बी, श्रीगदित, भाण, भाणी, प्रस्थान, रासक तथा काव्य ये सात भेद होते हैं, वे भाण की तरह ही होते हैं'। इस तरह तो दूसरे रूपक भी सिद्ध होते हैं, फिर 'रूपक दस ही हैं' इस प्रकार अवधारण करना ठीक नहीं जान पड़ता; इसका उत्तर देते हुए ग्रन्थकार कहते हैं कि '(नृत्य ना्य से भिन्न है) भावाश्रय नृत्य बिलकुल अलग चीज है'। नाट्य या रूपक रसों पर आश्रित है, जब कि नृत्य भाव पर आश्रित है, अतः वे दोनों भिन्न- भिन्न हैं। नाय्य रसाश्रित है, नृत्य भावाश्रित; इसलिये उनमें विषयभेद है; तथा 'नृत्य' शब्द की व्युत्पत्ति 'नृत्' धातु से हुई है जिसका अर्थ है 'गात्रविक्षेप'; जिसका तात्पर्य आज्ञिक अभिनय की बहुलता है, (जब कि नाव्य में चारों तरह के अभिनय पाये जाते हैं); साथ ही नृत्यकला- विशारद न्तक कहलाते हैं (नट नहीं); साथ ही नृत्य केवल देखने भर की चीज है, वहाँ श्रवणीय कुछ नहीं होता; कथनोपकथन का वहाँ अभाव रहता है; लौकिक व्यवहार में 'यहाँ? १. नाट्य में पात्रों का सर्वाङ्गीण चित्रण करते हुए रस की परिपुष्टता की जाती है, जो भाव की चरम परिपोषसीमा है, जब कि नृत्य में केवल भावों की अभिव्यजना ही रहती है। नाट्य में कथनोपकथन आवश्यक होता है, जब कि नृत्य में केवल गात्रविक्षेपादि से ही भावव्यअ्ञना होती है। नाय्य या रूपक का उदाहरण शाकुन्तल नाटक है, नृत्य का उदय शंकर के भाव-नृत्य।
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- लालो धन इति प्रोकता कलापातल ल्ठितः। कालस्य प्रमार व वि्रेय कालये किृतित: 4 चनपुरस्त रिज्ञेयसथा जा पपुरोडविच। चतुष्कला था डिकाल एतालो यस्मात प्रकतत ह2 नण डे.) > तृत: कलाकालकृतो लय इत्यभिसंतितः। त्यो लयास्तु विज्ञेया इ्रतमध्यविलम्बिता:1 4ीअ4 दशरूपकम्
प्रेक्षणीयक (दृश्य) है' ऐसा प्रयोग नृत्य के लिए पाया जाता है; इसलिए नाटकादि रूपकों से नृत्य सर्वथा भिन्न वस्तु है अतः 'दस ही रूपक हैं' यह अवधारण श्रीगदितादि के विषय में संगत बैठ जाता है। नाटकादि रूपक कोरे भाव पर आश्रित न होकर, रसपरक होते हैं। रस समस्त काव्य के उस वाक्यार्थ से निष्पन्न होता है, जो काव्य में प्रयुक्त पदों के अर्थरूप विभाव, अनुभाव तथा व्यमिचारी भावों के संसर्ग से युक्त होता है, इसलिए वाक्यार्थरूप अभिनय का पाया जाना (अर्थात् वाचिक अभिनय की सत्ता) ही रसाश्रय है इस बात का संकेत किया गया है। 'नाय्य' शब्द की व्युत्पत्ति 'नट अवस्पन्दने' धातु से हुई है, जहाँ नट धातु का अर्थ अवस्पन्दन, या कुछ २ चज्चलता है, अतः नाय्य में सात्त्विक अभिनय की बहुलता होती है, इसीलिए नाव्यविशारद नट कहलाते हैं। जैसे गात्रविक्षेप के समान रूप से दोनों में पाये जाने पर भी नृत्य नृत्त से सवथा भिन्न इसलिए है कि प्रथम में अनुकरण पाया जाता है, दूसरे में नहीं, वैसे ही वाक्यार्थरूप (वाचिक) अभिनय वाले नाव्य से पदार्थरूप अभिनय वाला नृत्य भी अलग चीज है। प्रसङ्गान्नृतं व्युत्पादयति- -नृत्तं ताललयाश्रयम्। की तालश्रञ्चत्पुटादि:, लयो द्रुतादि:, तन्मात्रापेक्षोSज्वित्षेपोडभिनयशून्यो वृत्यमिति। ऊपर के विवेचन में प्रसङ्गवश 'नृत्त' का उल्लेख हो गया है, अतः उसकी व्युत्पत्ति की जाती है। नृत्त ताल तथा लय पर आश्रित होता है। नृत्त में केवल अङ्गविक्षेप पाया जाता है, अभिनय का वहाँ अभाव रहता है। यह नृत्त ताल के आधार पर मात्रा का अनुसरण करता है, तथा लय के आधार पर गति (द्रुत, मन्द या मध्य) का आश्रय लेता है। इसमें किसी भी प्रकार के अभिनय की सत्ता नहीं होती, कोरा गात्रविक्षेप रहता है, जो ताल तथा लय के द्वारा नियमित होता है। अनन्तरोक्तं द्वितीयं व्याचष्टे- आद्ं पदार्थाभिनयो मार्गो देशी तथा परम्।। ६।। नृत्यं पदार्थाभिनयात्मकं मार्ग इति प्रसिद्धम्, नृत्तं च देशीति। द्विविधस्यापि द्वैविध्यं दर्शयति- इन्हीं नृत्य तथा नृत्त की पुनः व्याख्या करते हुए बताते हैं कि 'पहला पदार्थाभिनयरूप नृत्य मार्ग भी कहलाता है; तथा दूसरा (नृत्त ) देशी भी कहलाता है।' शास्त्रीयपद्धति से समन्वित पदार्थाभिनयरूप गात्रविक्षेप नृत्य कहलाता है। यह शास्त्रीय होने के कारण मार्ग भी कहलाता है। नृत्त में कोरा गात्रविक्षेप है, जो ताललयसमन्वित है, पर शास्त्रीय नहीं, अतः उसे 'देशी' के नाम से भी पुकारते हैं।" मधुरोद्धतमेदेन तद्दयं द्विविधं पुनः। लास्यताण्डवरूपेण नाटकादयुपकारकम् ॥ १०॥ १. ताल सङ्गीत में स्वर की मात्रा का तथा नृत्त में पदविक्षेप की मात्रा का नियामक होता 'है। जैसे सङ्गीत में १६ मात्रा के पद में पहली, पाँचवीं और तेरहवीं पर ताल दिया जाता है, नवीं खाली छोड़ दी जाती है, इसी तरह नृत्त की भी ताल दी जाती है। लय नृत्त की गति को तीव्र, मन्द या मध्यम करने की सूचना देती है। 2 २. मार्ग या नृत्य का उदाहरण दक्षिण में प्रचलित 'भरतनाव्यम्' या कथक नृत्य या उदयशंकर के भावनृत्य हैं। देशी या नृत्त के उदाहरण हैं लोकनृत्त जैसे भीलों का गरबा।
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प्रथम: प्रकाश: ७
सुकुमारं द्वयमपि लास्यम, उद्धतं द्वितयमपि ताण्डवमिति। प्रसन्गोक्तस्योपयोगं दर्शयति-तच्च गाटकायुपकारकमिति, नृत्यस्य क्वचिदवान्तरपदार्थाभिनयेन नृत्तस्य च शोभाहेतुत्वेन नाटकादावुपयोग इति। ये दोनों ही फिर से दो ढंग के होते हैं :- 'मधुर तथा उद्धत; मधुर लास्य कहलाता है, और उद्धत ताण्डव। ये दोनों तरह के नृत्य तथा नृत्त नाटकादि रूपकों के उपस्कारक होते हैं। ये दोनों प्रसङ्गोक्त नृत्य और नृत्त विषय के उपयोगी हैं इसलिए 'नाटकाद्युपकारक' पद का प्रयोग किया है। नाटकादि में पदार्थाभिनय के रूप में भावाश्रय नृत्य का तथा शोभाजनक होने के कारण नृत्त का प्रयोग पाया जाता है। 7शास्त्रीय नृत्य में कोमल भावों तथा उद्धत भावों की व्यजना में भिन्न २ सरणि का आश्रय लिया जाता है। इसीलिए इसे दो तरह का माना है सुकुमार लास्य और उद्धत ताण्डव। इसी तरह देशी नृत्त का भी हाल है। लोकनृत्तों में प्रयुक्त भैरोजी, माताजी के नृत्त जिन्हें हम गाँवों में देखते हैं, उद्धत होते हैं ! जब कि सावन या होली के अवसर पर प्रचलित कामिनियों के लोकनृत्य मधुरता तथा सुकुमारता लिये होते हैं। अनुकारात्मकरवेन रूपाणाममेदात्किंकृतो भेद इत्याशङ्कयाह- वस्तु नेता रसस्तेषां भेदक :- वस्तुभेदान्नायकमेदाद्रसमेदाद्रूपाणामन्योन्यं भेद इति। सभी रूपकों में अनुकरण पाया जाता है अतः उनमें कोई भेद नहीं दिखाई देता, फिर यह भेद क्यों किया जाता है, इस भेद के कारण क्या है, इस प्रश्न का उत्तर देते हुए कहते हैं :- इन रूपकों को एक दूसरे से भिन्न करने वाले तीन तर्व हैं :- वस्तु, नेता तथा रस। वस्तुभेद नायकभेद तथा रसमेद की दृष्टि से ही इनमें परस्पर भेद है। वस्तु मेदमाह- -वस्तु च द्विधा।॥। वस्तुभेद को बताते हुए कहते हैं कि-वस्तु दो तरह की होती है। कथमित्याह- तत्राधिकारिकं मुख्यमङगं प्रासङ्गिकं विदुः ॥ ११॥ प्रधानभूतमाधिकारिकं यथा रामायरो रामसीतावृत्तान्तः, तदङ्गभूतं प्रासज्ञिकं यथा तत्रैव विभीषणसुभ्रीवादिवृत्तान्त इति। इममें मुख्य वस्तु आधिकारिक (कथावस्तु) कहलाती है तथा अङ्गरूप वस्तु प्रास- ड्विक(कथावस्तु) कहलाती है। नाटकादि रूपकों में प्रधानभूत कथा को आधिकारिक कहते हैं, जैसे रामायण काव्य में राम तथा सीता का वृत्तान्त। इसी आधिकारिक कथा के अङ्गरूप में जिन उपकथाओं का समावेश होता है, वे प्रासङ्गिक कहलाती हैं, जैसे रामायणकथा में ही विभीषण का वृत्तान्त, सुग्रीव का वृत्तान्त या ऐसी ही दूसरी कथाएँ। निरुक्त्याSSघिकारिकं लक्षयति- अधिकार: फलस्वाम्यमधिकारी च तत्प्रभु:। तन्निर्वृत्तमभिव्यापि वृतं स्यादाधिकारिकम् ॥ १२॥ 1ल फलेन स्वस्वामिसंबन्धोSघिकार:फलस्वामी चाधिकारी तेनाघिकारेणधिकारिणा वा निर्वृ त्तम् = फलपर्यन्ततां नीयमानमितिवृत्तमाधिकारिकम् ल कि का किा
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दशरूपकम् आधिकारिक शब्द की व्युत्पत्ति करते हुए उसका लक्षण करते हैं। 'फल पर स्वामित्व प्राप्त करना अधिकार कहलाता है, तथा उस फल का स्वामी अधिकारी कहलाता है। उस फल या फलभोक्ता के द्वारा फल प्राप्ति तक निर्वाहित वृत्त या कथा आधिकारिक वस्तु कहलाती है।' उदाहरण के लिए राक्षसवध, सीताप्राप्ति तथा रामराज्य की स्थापना रामायण कथा का फल है, इसके स्वामी या भोक्ता राम हैं, अतः आरम्भ से रावणवध, सीताप्राप्ति तथा राज्याभिषेक तक की कथा आधिकारिक कथावस्तु है। प्रासद्विकं व्याचष्े- प्रासङ्गिकं परार्थस्य स्वार्थो यस्य प्रसङ्गतः। यस्येतिवृत्तस्य परप्रयोजनस्य, सतस्तत्प्रसज्कात्स्वप्रयोजनसिद्धिस्तरप्रासङ्विकमितिवृत्तं
अब प्रसङ्गोपात्त प्रासङ्िक वस्तु की व्याख्या करते हैं। जो कथा या वृत्त दूसरे (आधिकारिक के) प्रयोजन के लिए होती है, किन्तु प्रसङ्ग से जिसका स्वयं का फल भी सिद्ध हो जाता है; वह प्रासड्गिक वृत्त है। प्रासङ्गिक इतिवृत्त का प्रमुख ध्येय आधिकारिक वृत्त की फलनिर्वहणता में सहायता प्रतिपादित करना है, किन्तु प्रसङ्गतः उसका स्वयं का भी फल होता है, जैसे सुग्रीवकथा का प्रयोजन बालिवध तथा राज्यलाभ, तथा विभीषणवृत्त का प्रयोजन लङ्काराज्यप्राप्ति। प्रासङ्गिकमपि पताकाप्रकरीमेदाद्द्विविधमित्याह- सानुबन्धं पताकाख्यं प्रकरी च प्रदेशलाक् ॥ १३॥ T दूरं यदनुवतते प्रासज्ञिकं सा पताका सुभ्रीवादिवृत्तान्तवत-पताकेवासाधारणनायक चिह्नवत्तदुपकारित्वात्, यदल्पं सा प्रकरी श्रमणादिवृतान्तवत्। यह प्रासङ्विक इतिवृत्त भी पताका तथा प्रकरी दो तरह का होता है। 'जो प्रासङ्गिक कथा अनुबन्धसहित होती है, तथा रूपक में दूर तक चलती रहती है, वह पताका कहलाती है। तथा जो कथा केवल एक ही प्रदेश तक सीमित रहती है, वह प्रकरी कहलाती है।' रामायण की कथा में सुग्रीव व विभीषण का वृत्तान्त पताका है, वह दूर तक चलती है, वह मुख्य नायक के पताका चिह्न की तरह आधिकारिक कथा तथा मुख्य नायक की पोषक होती है। ( पताका का नायक भिन्न होता है तथा वह पताकानायक कहलाता है।) रामायण में छोटे-छोटे वृत्त प्रकरी है जैसे श्रमणा शबरी आदि की कथाएँ। पताकाप्रसङ्गेन पताकास्थानकं व्युत्पादयति- प्रस्तुतागन्तुभावस्य वस्तुनोऽन्योक्तिसूचकम्। पताकास्थानकं तुल्यसंविधानविशेषणम्॥। १४॥ प्राकरणिकस्य भाविनोऽर्थस्य सूचक रूपं पताकावद्धवतीति पताकास्थानक तच् तुल्येतिवृत्ततया तुल्यविशेषणतया च द्विप्रकारम्-अन्योकतिसमासोक्तिमेदात् । यथा रत्नावल्याम्- 'यातोऽस्मि पम्मनयने समयो ममैष सुप्ता मयैव भवति प्रतिबोधनीया। प्रत्यायनामयमितीव सरोरुहिण्याः सूर्योऽस्तमस्तकनिविष्टकरः करोति॥' क पताका के साथ ही यहाँ पताकास्थानक की व्युत्पत्ति करते हुए बताते हैं कि 'जहाँ प्रस्तुत भावी वस्तु की समान वृत्त या समान विशेषण के द्वारा अन्योक्तिमय सूचना हो, उसे
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प्रथम: प्रकाश:
पताकास्थानक कहते हैं।' कवि कभी-कभी रूपक में एक स्थान पर भविष्य में घटित होने वाली घटना का सक्केत कर देता है। यह सूचना पताका या ध्वजा की भाँति भावी वृत्त की सूचना देती है, इसलिये पताकास्थानक कहलाती है। यह संकेत या तो घटनाओं की समानती के आधार पर होता है या फिर उनमें समान विशेषणों के पाये जाने के कारण होता है। एक में (प्रथम भेद में) अन्योक्ति या अप्रस्तुतप्रशंसा का आश्रय लिया जाता है, द्वितीय में समासोक्ति का। रलावली नाटिका के निम्न पद्य में समान इतिवृत्तरूप अन्योक्ति प्रणाली वाला पताकास्थानक पाया जाता है। 'हे पद्म के नेत्र वाली (पद्म जैसे नेत्रवाली), मेरे जाने का समय आ गया है, यह मैं जा रहा हूँ। प्रातःकाल तुम्हें सोने से मैं ही जगाऊँगा।' अस्ताचल के मस्तक पर आखिरी किरणें रखे हुए यह सूर्य इस प्रकार पझ्मिनी को (अपने लौट आने का) विश्वास दिला रहा है। यहाँ पर सूर्य-पझ्मिनी वर्णन के द्वारा भावी उदयन-रलावलीरूप वृत्तान्त की अन्योक्तिमय व्यजना, पताकास्थानक ही है। इसी नाटिका के निम्न पद्य में समान विशेषण वाला पताकास्थानक भी पाया जाता है। यथा च तुल्यविशेषणतया- 'उद्दामोत्कलिकां विपाण्डुररुचं प्रारव्धजम्भा क्षणा- दायासं श्वसनोद्रमैरविरलैरातन्वतीमात्मनः। अदयोदानलतामिमां समदनां नारीमिवान्यां ध्रुचं पश्यन्कोपविपाटलद्ुति मुखं देव्या: करिष्याम्यहम् ॥'
१. प्रश्न होता है यहाँ सूर्यवर्णन भी जब प्रसङ्ग में प्रस्तुत है, तो फिर अप्रस्तुतप्रशंसा कैसे होगी। सुदर्शनाचार्य टीका में यहाँ स्पष्टतः कमलिनीसूर्यवृत्तान्त से नायकनायिकावृत्तान्त की प्रतीति में अन्योक्ति या अप्रस्तुप्रशंसा अलक्कार मानते हैं। यही वृत्तिकार धनिक भी कहते हैं। हमारे मतानुसार यह अन्योक्ति सूचकमात्र है, जिसका व्यंग्य उपमा मानकर उपमानोपमेय भाव माना जा सकता है। सन्ध्याकाल के प्रसङ्ग में कहे गये इस पद्य में प्राकरणिक तो सूर्यकमलिनी वृत्तान्त स्पष्ट है। उसे अप्राकरणिक मानने पर अप्रस्तुतप्रशंसा हो सकती है। यदि नायक- नायिका वृत्तान्त को अप्रस्तुत मान लेंगे, तो सारी गड़बड़ी हो जायगी। यहाँ भी समासौक्ति बनेगी, क्योंकि समासोक्ति में समान कार्य भी होता है। हमे इस मत से सहमत नहीं है। नाटिका में यह राजा की उक्ति शाम के समय कही गई है, अतः प्राकरणिक तथा प्रस्तुतार्थ उसे ही मानना होगा। हाँ, भावी प्रस्तुत नायका-नायिकावृत्तान्त को आर्थी व्यजना से मानकर वस्तु से उपमा अलक्काररूप व्यंग्य मान लेंगे। यहो गड़बड़ आगे के उदाहरण में भी पड़ेगी। यद्यपि वहां समासोक्ति ठीक बैठ जाती है। पर अप्रस्तुत नायक-नायिका रूप अर्थ 'सामान्य' रूप में लेंगे या 'सागरिका-उदयन रूप विशेष' अर्थ में। यदि प्रथम विकल्प माना जाय, तो पताकास्थानक मानने में कुछ कारण मानना होगा। यदि द्वितीय विकल्प, तो वह तो नाटिका का प्रस्तुत प्रतिपाद्य अवश्य है। हमारे समझ में दोनों में केवल यही भेद है, एक तुल्येतिवृत्तरूप है, दूसरा तुल्यविशेषण रूप। अप्रस्तुतप्रशंसा या समासोक्ति मानने की सारी गड़बड़ का कारण धनिक की वृत्ति की पंक्ति है। वस्तुतः यहां दोनों में व्यंग्यार्थ प्रतीति है। विश्वनाथ इसीलिए इस प्रकरण में अन्योक्तिसमासोक्ति का प्रयोग नहीं करते (देखिये साहित्यदर्पण षछ का. ४४-४९), न भरत ही (देखिये ना. शा. २१; ३१-३५)। वे दोनों दूसरे अर्थ को 'तल्लिङ्गार्थ' मानते हैं, अर्थात वह उसी चिह्न वाला है। २ द०
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१० दशरूपकम्
मैं चटकती कलियों वाली, पीले रंग वाली, खिलती हुई इस उपवनलता को देख रहा हूँ जो वायु के निरन्तर वेग के कारण अपनी विशालता को व्यक्त कर रही है तथा मदन नामक पौधों से आवृत्त है। इसे देखते हुए हुए ऐसा प्रतीत होता है कि मैं कामवासना से उत्कण्ठित, पीली पड़ी हुई, जँभाई लेती हुई, सकाम दूसरी स्त्री को देख रहा हूँ जो निरन्तर निःश्वास ले लेकर अपनी कामपीड़ा को व्यक्त कर रही हो। अतः मैं ऐसी कल्पना करता हूँ कि इस लता को देखकर मैं अन्य स्त्री को देखने के समान देवी वासवदत्ता का अपराध कर रहा हूँ तथा इस अपराध से मैं निश्चय ही देवी के मुख को क्रोध से आरक्त कान्तिवाला बना दूंगा। यहां लता के वर्णन में तुल्यविशेषणों के द्वारा अपर नायिका की सूचना दी गई है, जो रत्नावली संबद्ध भावी वृत्त को संकेतित करती है। अतः यहां दूसरे ढंग का पताकास्थानक है।
प १. हम देखते हैं, धनज्य तथा धनिक केवल दो तरह का पताकास्थानक मानते हैं। एक- तुल्येतिवृत्तरूप, दूसरा तुल्यविशेषणरूप। प्रथम का उदाहरण 'यातोऽस्मि पद्मनयने' इत्यादि पद्य है, दूसरे का 'उद्दामोत्कलिकां' आदि पद्य। भरत एवं विश्वनाथ दोनों ही चार चार तरह के पताकास्थानक मानते हैं। विश्वनाथ की परिभाषाएँ भरत के ही श्लोकों की नकल है; कहीं 'परिकीत्यते' की जगह 'परिकीतितम्' कर दिया है, तो 'इष्यते' की जगह 'उच्यते'; उनमें कोई तात्त्विक अन्तर नहीं है। भरत की परिभाषा यों हैं। 'जहाँ किसी एक अर्थ (वस्तु) के चिन्तन के समय नाटकादि के भावी पदार्थ होने के कारण उसी चिह्नों वाले अन्य अर्थ का भी प्रयोग किया जाय, वहाँ पताकास्थानक होता है। (१) जहाँ सहसा ही प्रेमानुकूल व्यापार (उपचार) के कारण उत्कृष्ट प्रयोजनसिद्धि हो, वहाँ पहला पताकास्थानक होता है। (२) अत्यधिक श्लिष्ट शब्दों वाला; अनेकार्थबोधक; नायकादि का मंगलसूचक पताका- स्थान दूसरे ढंग का होता है। (३) जहां वक्ता का अर्थ अव्यक्त, किन्तु सनिश्चय हो, तथा रिलष्ट उत्तर से युक्त हो, वहां तीसरा पताकास्थानक होता है। (४) जहां दो अर्थ वाले शलिष्ट वचनविन्यास का प्रयोग काव्य में हो, तथा वह प्रधाने- तर अर्थ की प्रतीति कराए, वहां चौथा (अन्य) पताकास्थानक होता है।' यत्रार्थे चिन्त्यमानेऽपि तहिंगार्थः प्रयुज्यते। आगन्तुकेन भावेन पताकास्थानकं च तत्। सहसैवार्थसम्पतिर्गुणवत्युपचारतः। पताकास्थानकमिदं प्रथमं परिकीत्यते॥ वचसाऽतिशयश्लिष्टं काव्यबन्धसमाश्रयम्। पताकास्थानकमिदं द्वितीयं परिकीतितम्।। अर्थोपक्षेपणं यन्तु लीनं सविनयं भवेत। रिलिष्टप्रत्युत्तरोपेतं तृतीयमिदमिष्यते। द्वयर्थों वचनविन्यासः सुश्लिष्टः काव्ययोजितः। उपन्याससंयुतश्च तच्चतुर्थमुदाहृतम्॥। (नाय्य शा० २१।३१-३५) यहाँ जब तक इनके उदाहरण न दिये जाँय, विषय स्पष्ट न होगा। विश्वनाथ के उदाहरण यों हैं :- F(१) रलावली में वासवदत्ता के रूप में सागरिका को लतापाश से मरता देख कर, राजा पहले उसे वासवदत्ता ही समझता है। बाद में सागरिका को पहचान लेने पर उसकी गुणवती अर्थसम्पत्ति (उत्कृष्ट प्रयोजनसिद्धि) होती है। (२) वेणीसंहार में सूत्रधार के 'रक्तप्रसाधितभुवः क्षतविग्रहाश्च, स्वस्था भवन्तु कुरु- राजसुताः समृत्या: में अनेकार्थबोधक रिलष्ट शब्दों से नायक की मंगलकामना की गई है।
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प्रथम: प्रकाश: ११
प्रख्यातोत्पाद्यमिश्रत्वमेदा्रेधापि तव्निधा। प्रख्यातमितिहासादेरुतपादं कविकल्पितम्॥ १५॥। मिश्रं च संकरात्ताम्यां दिव्यमर्त्यादिमेदतः। इति निगदव्याख्यातम्। इस तरह इतिवृत्त आधिकारिक, पताका तथा प्रकरी (प्रासंगिक के दो भेद) तीन प्रकार है, यह फिर से तीन तीन तरह का होता है। यह तीन तरह का इतिवृत्त प्रख्यात, उत्पाद्य तथा मिश्र इस तरह फिर से तीन तीन प्रकार का है। प्रख्यात इतिहास, पुराण आदि से गृहीत होता है; उत्पाद्य कवि की स्वयं की कल्पना होता है; तथा मिश्र में दोनों की खिचड़ी रहती है। साथ ही यह वृत्त दिव्य, मत्यं तथा दिव्यादिव्य होता है। तस्येतिवृत्तस्य किं फलमित्याह- कार्ये त्रिवर्गस्तच्छुद्ध मेकानेकानुबन्धि च ॥ १६॥ धर्मार्थकामाः फलं तच् शुद्धमेकेकमेकानुबन्धं द्वित्यनुबन्घं वा। इस इतिवृत्त का प्रयोजन या फल क्या है, इस प्रश्न का उत्तर देते हुए बताते हैं कि इसका फल (कार्य) धर्म, अर्थ तथा कामरूप त्रिवर्ग है। यह फल कभी तो इनमें से एक ही हो सकता है, कभी दो वर्ग और कभी तीनों वर्ग।
(३) वेणीसंहार के दूसरे अंक में जब राजा (दुर्योधन) भानुमती से कहता है कि मेरी दोनों जाँघे (उरुयुगल) ही तुम्हारे बैठने को पर्याप्त हैं, तो ठीक उसी वक्त 'कञ्रुकी उपस्थित होकर कहता है-'देव, तोड़ डाला'। इस प्रकार यहाँ सामाजिक एक बार 'पर्याप्तमेव करभोरु ममोरुयुग्मम्' सुनने के बाद हो कञ्जुकी की उक्ति 'देव, भग्म्' सुन कर सहम जाता है। आगे राजा जब पूछता है 'किसने', तो कञ्नुकी उत्तर देता है-'भीमसेन ने'। और फिर धीरे २ परता चलता है कि भीम ने राजा का रथ तोड़ डाला है। इस तरह यहाँ तीसरा पताका स्थानक है। इसका दूसरा उदाहरण उत्तररामचरित से दिया जा सकता है :- राम :- ' ... यदि परमसह्यस्तु विरहः' के बाद ही 'कञ्नुकी-देव, उपस्थितः', में सामाजिक विरह तथा उपस्थित का संबंध समझ बैठता है, जो भावी घटना का सूचक है। वैसे कन्रुकी तो दुर्मुख के उपस्थित होने की सूचना देने आता है। (४) चौथा उदाहरण 'उद्दामोत्कलिकां' ही है, जिसे धनिक ने दिया है। इस तरह धनंजय व धनिक वाला दूसरा पताकास्थानक भरत व विश्वनाथ का चौथा है। पर उनका पहला अन्योक्तिवाला (?) तुल्येतिवृत्त पताकास्थानक ऊपर के तीनों में से किस में आयगा ? वह पहले और तीसरे में तो नहीं आ सकता। क्या 'पझमनयने' को श्लिष्ट मानकर उसे दूसरे प्रकार के पताकास्थानक में मान सकते हैं? किन्तु परिभाषा में भरत 'अतिशयरिलिष्टं' का विशेषण देते हैं। 'यातोऽस्मि०' आदि पद् का बन्ध 'अतिशयश्लिष्ट' नहीं कहा जा सकता। तो हमारे मत से यह उदाहरण भरत के दूसरे पताकास्थानक में भी नहीं आ पाता। स्पष्ट है, धनंजय का यह भेद अन्य प्रकार का है। अगर इसे चौथे ही प्रकार का मान लिया जाय, तो यहाँ कुछ संगति बैठ जायगी। पर फिर भी धनंजय ने दूसरे पताकास्थान क्यों नहीं माने यह प्रश्न बना ही रहता है?
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१२ दशरूपकम्
तत्साघनं व्युत्पादयति-कर शकतB स्वल्पोद्दिष्टस्तु तद्धेतुर्बीजं विस्तार्यनेकथा। स्तोकोद्िष्टः कार्यसाघकः पुरस्तादनेकप्रकार विस्तारी हेतुविशेषो बीजवद्वीजं यथा रत्नावल्यां वत्सराजस्य रत्नावली प्राप्तिहेतुरनुकूलदैवो यौगन्धरायणव्यापारो विष्कम्भके न्यस्त :- 'यौगन्धरायण :- कः संदेह ('द्वीपादन्यस्मात्-' इति पठति)' इत्यादिना 'प्रारम्भेऽस्मिन्स्वामिनो वृद्धिहेतौ' इत्यन्तेन। यथा च वेणीसंहारे द्रौपदीकेशसंय मनहेतुर्भीमक्रोधोपचितयुधिष्टिरोत्साहो बीजमिति। तच महाकार्यावान्तरकार्यहेतुभेदादनेकप्रकारमिति। इस त्रिवर्गरूप फल के साधन की विवेचना करते हुए बताते हैं कि 'रूपक के आरंभ में अल्परूप में संकेतित वह तर्व जो रूपक के फल का कारण है तथा इतिवृत्त में अनेकरूप में पल्लवित होता है, बीज कहलाता है। अल्परूप में निर्दिष्ट हेतु जो वृत्त के कार्य (फल) का साधक है तथा वृक्ष के बीज की तरह पलवित होकर अनेकशाख वृक्ष की भाँति वृक्ष के रूप में विवृद्ध होता है, वह पारिभाषिक रूप में बीज कहलाता है। रत्नावली नाटिका के वृत्त का कार्य उदयन व रत्नावली का मिलन करा देना है, जो मंत्री यौगंधरायण को अभीष्ट है। नाटिका के विष्कम्भक में ही यौगन्धरायण की यह चेष्टा, जिसे भाग्य की भी अनुकूलता प्राप्त है, बीज के रूप में सामने रक्खी गई है। यौगन्धरायण इसमें क्या सन्देह है' कहते हुए तथा 'अनुकूल भाग्य कहीं से भी लाकर इष्ट वस्तु को प्राप्त करा देता है' (दवोपादन्यस्मादपि०) इत्यादि उक्ति से आरंभ करके 'स्वामी की उन्नति के कार्य को प्रारंभ करके तथा दैव के द्वारा सहायता मिलने पर मैं अपने कार्य में सफलता प्राप्त करूंगा' इस उक्ति तक बीज का संकेत करता है। वेणीसंहार नाटक में द्रौपदी का केश संयमन नाटक का फल है। इस कार्य का हेतु भीम के क्रोध से परिपुष्ट युधिष्ठिर का उत्साह है, यही इस नाटक का बीज है। यह बीज भी महाकार्य तथा अवान्तरकार्य का हेतु होने के कारण दो तरह का है। अवान्तरबीजस्य संज्ञान्तरमाह- अवान्तरार्थविच्छेदे बिन्दुरच्छेदकारणम्॥ १७॥ 1 यथा रत्नावल्यामवान्तरप्रयोजनानङ्गपूजापरिसमाप्तौ कथार्थविच्छेदे सत्यनन्तरकार्य- हेतु :- 'उदयनस्येन्दोरिवोद्वीक्षते। सागरिका-(श्रुत्वा) कहं एसो सो उदयणणरिन्दो जस्स अहं तादेण दिण्णा।' ( कथमेष स उदयननरेन्द्रो यस्याहं तातेन दत्ता ) इत्यादि। बिन्दुः-जले तैलबिन्दुवत्प्रसारित्वात्। महाकार्य बीज का संकेत हो चुका है, अब अवान्तरबीज की दूसरी संज्ञा (नाम) बताते हुए कहते हैं कि जहां किसी दूसरी कथा (अर्थ) से विच्छिन्न हो जाने पर इतिवृत्त को १. वेणीसंहार नाटक में बीज 'स्वस्था भवंतु मयि जीवति धार्तराष्ट्राः' इस भीमोक्ति से लेकर- 390 मन्थायस्तार्णवाम्भ: प्लुतकुह्दर वलन्मन्दरध्वानघीरः। कोणाघातेषु गर्जत्प्रलयघनघटान्योन्यसंघट्टचण्डः।। कृष्णाक्रोधाग्रदूतः कुरुकुलनिधनोत्पातनिर्घातवातः। केनास्मत्सिंह नाद प्रतिर सितसखो दुन्दुभिस्ताडितोऽयम्।। तथा 'क्रोधज्योतिरिदं महत्कुरुवने यौधिष्ठिरं जुम्भते' तक सचित हुआ है।
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प्रथम: प्रकाशः १३
जोड़ने और आगे बढ़ाने के लिए जो कारण होता है, वह विन्दु कहलाता है। जैसे रत्ना- वली नाटिका में वासवदत्ता के द्वारा कामदेव की पूजा एक अवान्तर वृत्त है, इससे एक अर्थ समाप्त हो जाता है और कथा में विश्व्लता आ जाती है। इसे संश्लिष्ट या श्रृंखलाबद्ध करने के लिए वहाँ नेपथ्य से मागधों की उक्ति के द्वारा 'महाराज उदयन के चरणों की बाट लोग इसी तरह देख रहे हैं जैसे चन्द्रमा की किरणों की' यह सूचना देकर सागरिका के रूप में वहाँ रहती हुई रत्नावली के द्वारा 'क्या यही वह राजा उदयन है, जिसके लिए पिताजी ने मुझे दे दिया है' यह उक्ति कहलवा कर कथा का अच्छेद (संधान) कर दिया है। यह अच्छेदकारण बिन्दु वृत्त में आगे जाकर ठीक वैसे ही प्रसारित होता है जैसे तेल की बूँद पानी में फैलती है। इसीलिए इसे बिन्दु कहते हैं।' इदानीं पताकायं प्रसज्गाद्वयुत्कमोक्तं क्रमार्थमुपसंहरत्राह- बीजबिन्दुपताकाख्यप्रकरीकार्यलक्षणः। अर्थप्रकृतयः पञ्च ता एताः परिकीर्तिताः॥१८॥ अर्थप्रकृतयः= प्रयोजनसिद्धिहेतवः। पताका तथा प्रकरी का वर्णन ग्रन्थकार ने क्रम के अनुसार नहीं किया था, इसलिये अब क्रम को ठीक करने के लिए उपसंहार करते हुए पाँच अर्थप्रकृतियों का विवेचन करते हैं :- रूपक में बीज, बिन्दु, पताका. प्रकरी तथा कार्यं ये पाँच अर्थप्रकृतियाँ होती हैं। अर्थप्रकृति से तात्पर्य उन तत्त्वों से हैं जो प्रयोजन सिद्धि के कारण होते हैं।, अर्थ से तात्पर्य प्रयोजन या वस्तु के फल से हैं, ये पाँचों उसी अर्थ की प्रकृति से संबद्ध होते हैं। १. प्रश्न होता है नाटकीय कथावस्तु में बिन्दु एक ही होता है, या अनेक? बिन्दु की परिभाषा के अनुसार बिन्दु जहाँ कथांश, एक प्रयोजन सिद्धि के पूरे होने के कारण टूट जाता है, वहाँ उसे जोड़ कर आगे बढ़ता है। इस तरह तो बिन्दु अनेक हो सकते हैं। हमारे मत में किसी नाटक में बिन्दु अनेक हो सकते हैं। २. अर्थप्रकृति की स्पष्ट करते हुए धनिक बताते हैं कि ये ( रूपक के नायक की) प्रयोजन- सिद्धि के हेतु हैं-'प्रयोजनसिद्धिहेतवः'। पर इस परिभाषा पर एक आपत्ति होती है। अर्थप्रकृतियाँ पाँच है :- बीज, बिन्दु, पताका, प्रकरी तथा कार्य। जहाँ तक पहली चार अर्थ- प्रकृतियों की बात है, वे प्रयोजनसिद्धिहेतु हैं ही। पर पाँचवी अर्थप्रकृति पर आते ही धनिक की परिभाषा गड़बड़ा जाती है। कार्य नामक अर्थप्रकृति स्वयं 'प्रयोजन' है। फिर 'प्रयोजन' स्वयं उसी का सिद्धिहेतु कैसे बन सकता है ? या तो ये दोनों प्रयोजन भिन्न होने चाहिए या फिर कार्य से इतर चार ही अर्थप्रकृति में प्रयोजनसिद्धिहेतुत्व मानना चाहिए। धनिक की भाँति विश्वनाथ भो 'प्रयोजनसिद्धिहेतवः' कहकर चुप रह जाते हैं। वस्तुतः वे षष्ठ परिच्छेद में धनिक की नकल करते हैं। इस समस्या को एक ढंग से सुलझाया जा सकता है। कार्य या प्रयोजन दो तरह के माने जाने चाहिए। एक प्रमुख कार्य जो नाटक का खास कार्य है, जैसे रामकथा में रावण का वध। दूसरा अवान्तरकार्य जैसे विभीषण का मिलना आदि। ऐसा मानने पर अवान्तर कार्य प्रमुख कार्यरूप प्रयोजन का सिद्धिहेतु बन जायगा। पर क्या धनंजय, धनिक तथा विश्वनाथ को यह अभीष्ट था। यदि ऐसा ही तो उन्हें संकेत करना चाहिए था। इसके अभाव में हम इस मत को दुष्ट ही मानेंगे। ३. यहां पताका तीसरी तथा प्रकृति चौथी अर्थप्रकृति मानी गई है। पताका का उदाहरण रामकथा में सुग्रीव-वृत्ताम्त तथा प्रकरी का शबरी वृत्तान्त दिया है। इस तरह तो रामकथा में शबरी का वृत्तान्त पहले आता है, सुग्रीव का बाद में। रामकथा में इस लिहाज से प्रकरी
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१४ दुशरूपकम्
गिट कक अवस्था: पश्च कार्यस्य प्रारब्धस्य फलार्थिभि:।
पाँच अर्थप्रकृतियों का निर्देश कर देने पर अब पाँच अवस्थाओं को बताते हैं :- 'फल की इच्छा वाले नायकादि के द्वारा प्रारब्ध कार्य की पाँच अवस्थाएँ होती हैं-आरम्भ, यत्न, प्राप्त्याशा, नियताप्ति तथा फलागम। यथोद्देशं लक्षणमाह- औरसुक्यमात्रमारम्भ: फललाभाय भूयसे। इदमहं संपादयामीत्यध्यवसायमात्रमारम्भ इत्युच्यते, यथा रतनावल्याम्-'प्रार- म्मेऽस्मिन्स्वामिनो वृद्धिहेतौ दैवे चेत्थं दत्तहस्तावलम्बे।' इत्यादिना सचिवायत्तसिद्धे- र्वत्सराजस्य कार्यारम्भो यौगन्धरायणमुखेन दर्शितः। इन्हीं पाँचों के नामानुसार लक्षण बता रहे हैं :- अत्यन्त फललाभ की उत्सुकता मात्र ही आरंभ कहलाती है। किसी भी फल की प्राप्ति के लिए नायकादि में इच्छा होती है तथा उसके प्रति उत्सुकता होती है। इस उत्सुकता मात्र का पाया जाना ही आरंभ है, क्योंकि प्राप्ति के लिए की गई चेष्टा का समावेश 'यत्न' नामक दूसरी अवस्था में हो जाता है। 'मैं इसे करूँ' सिर्फ इतनी चेष्टा ही आरंभ है, जैसे रत्नावली नाटिका में 'स्वामी की उन्नति के हेतु का आरंभ कर लेने पर तथा भाग्य के द्वारा इस तरह सहायता किये जाने पर .. 'आदि उक्ति के द्वारा वत्सराज उदयन के उस कार्यारंभ की सूचना यौगंधरायण के मुँह से दिलाई गई है, जिसकी सिद्धि मंत्री यौगंधरायण पर आश्रित है। यहाँ यौगंधरायण ने उदयन-रत्नावली-मिलन- रूप फल के प्रति उत्सुकता प्रदर्शित की है। अथ प्रयत्न :- प्रयत्तस्तु तदप्रात्ती व्यापारोSतित्वरान्वितः ॥ २० ॥ तस्य फलस्याप्राप्तावुपाययोजनादिरूपर चेष्टाविशेष: प्रयत्नः यथा रत्नाबल्यामाले ख्याभिलेखनादिर्वत्सरा जसमागमोपाय :- 'तहावि णत्थि अरणो दंसरुवाओ ति जहा- तहा आलिहिअ जघासमीहिअं करिस्सम्।' (तथापि नास्त्यन्यो दर्शनोपाय इति यथा- तथालिख्य यथासमीहितं करिष्यामि।) इत्यादिना प्रतिपादितः । उस फल की प्राप्ति न होने पर, उसे पाने के लिए बड़ी तेजी के साथ जो उपाय- तीसरी अर्थप्रकृति हो जायगी, पताका चौथी। इसे कैसे सुलझाना होगा ? इस अपने मत को हमने संधि के प्रकरण में फुटनोट में संकेतित किया है, वहाँ देखना चाहिए। १. दशरूपककार के मत से अर्थप्रकृति तथा अवस्था का भेद स्पष्ट नहीं होता। ये दोनों ह कथावस्तु में पाई जाती है। पर आखिर इनमें अन्तर क्या है ? हमारे मतानुसार बीज आदि पाँच अर्थप्रकृति वस्तु के उपादान कारण है। इसे हम वस्तु का 'मेटीरियल' कह सकते हैं। जहाँ भी ये पाँच अर्थप्रकृति होंगी, कथा का ढाँचा खड़ा हो जायगा। अवस्था नायक की मनोदशा से संबद्ध है, यह तत्तत् अवस्था की परिभाषा से स्पष्ट है। इस प्रकार यह जँचता है कि ५ अर्थप्रकृति नाटकीय कथावस्तु का औपादानिक विभाजन (Physical division) है, जब कि ५ अवस्था नायक की मनोदशा की दृष्टि से वस्तु का मनोवैज्ञानिक विभाजन (Psychological division) है। इस मत के लिये मैं प्रो० कान्तानाथ शास्त्री तैलंग का ऋणी हूँ।
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प्रथम: प्रकाश: १५
योजनायुक्त व्यापार या चेष्टा होती है, वह प्रयत्न है। प्रयत्न के अन्तर्गत नायक या नायिका अपनी अभीप्सित वस्तु को प्राप्त कर ने के व्यापार में संलग्न रहते है जैसे रत्नावली में नायिका सागरिका वत्सराज को प्राप्त करना चाहती है, इस प्राप्ति के उपाय रूप में वह वत्सराज के चित्र का आलेखन करती है। यहीं से नाटिका में यत्न नामक अवस्था पाई जाती है। 'वत्सराज उदयन के दर्शन का कोई दूसरा उपाय नहीं, फिर भी मैं जैसे तैसे उनका चित्र बनाकर इच्छा को पूर्ण करती हूँ।' इस उक्ति के द्वारा यत्न की सूचना दी गई है। प्राप्त्याशामाह- उपायापायशङ्काभ्यां प्राप्त्याशा प्राप्तिसंभव:। उपायस्यापायशङ्कायाथ् भावादनिर्घारितैकान्ता फलप्राप्तिः प्राप्त्याशा। यथा रत्ना- वल्यां तृतीयेषक्के वेषपरिवर्ताभिसरणादौ समागमोपाये सति वासवदत्तालक्षणापायश- ड्वाया :- 'एवं जदि अआलवादाली विश्र आअच्छिअ अण्णदो ण णइस्सदि वासव- दत्ता।' ( 'एवं यद्यकालवातालीवागत्यान्यतो न नेष्यति वासवदत्ता।') इत्यादिना दर्शि- तत्वादनिर्घारितैकान्ता समागमप्राप्तिरुक्ता। जहाँ उपाय तथा विध्न की आशंका के कारण फलप्राप्ति के विषय में कोई ऐकान्तिक निश्रय नहीं हो पाता, फल प्राप्ति की संभावना उपाय व विभ्नाशंका दोनों में दोलायमान रहती है, वहाँ प्राप्त्याशा नामक अवस्था होती है। जैसे रत्नावली नाटिका के तीसरे अंक में रत्नावली के वेष बदल कर अभिसरण करने वाले समागम के उपाय के होने पर भी, विदूषक की 'अगर अकाल वायु की तरह बीच में ही आकर देवी वासवदत्ता दूसरी ओर न ले जाय तो ऐसा ही होगा 'इस उक्ति के द्वारा वासवदत्ताजनित विन्न की आशंका दिखा कर समागमप्राप्ति के अनैकान्तिक निश्चय की सूचना दी गई है। यहाँ विदूषक की इस उक्ति से नायक तथा सामाजिकों को यह सन्देह हो जाता है कि कहीं फलप्राप्ति में कोई वि्न उपस्थित न हो जाय। नियताप्तिमाह- अपायाभावतः प्राप्तिर्नियताप्तिः सुनिश्चिता ॥२१॥ अपायाभावादवघारितैकान्ता फलप्राप्तिनियताप्तिरिति। यथा रत्नावल्याम्-'विदू- षक :- सागरिका दुक्करं जीविस्स्'द' ('सागरिका दुष्करं जीविष्यति।) इत्युपक्रम्य 'कि ण उपायं चिन्तेसि ।' ( 'किं नोपायं चिन्तयसि ? ) इत्यनन्तरम् 'राजा-वयस्य ! देवीप्रसादनं मुक्त्वा नान्यमत्रोपायं पश्यामि।' इत्यनन्तराङ्कार्थबिन्दुनानेन देवीलक्षणा- पायस्य प्रसादनेन निवारणान्नियता फलप्राप्ति: सूचिता। जब विघ्न के अभाव के कारण फल की प्राप्ति निश्चित हो जाती है तो नियताप्ि नामक अवस्था होती है। हम देख चुके हैं कि प्राप्त्याशा में फलप्राप्ति के बाद में नायक का मानस सन्देह से विचलित रहता है। किन्तु नियताप्ति में प्राप्ति निश्चित हो जाती है, उसका मानस एक बात को ('फल प्राप्ति अवश्य होगी' इसे ) निश्चित कर लेता है। जैसे १. भारतीय नाटक सभी सुखान्त होते हैं। अतः एकान्त निश्चय के बाद सदा फलप्राप्ति ही होगी। भारतीय नाव्यशास्त्र की कसौटी पर पाश्चात्य ढंग के दुःखान्त नाटकों की मीमांसा करने पर 'फलप्राप्ति नहीं होगी' इस निश्चय की दशा में नियताप्ति मानी जा सकेगी। किन्तु 'नियताप्ति' शब्द की व्युत्पत्ति भी सुखान्त रूपकों के ही अनुरूप है। 5 तिल हि.क एत
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१६ दशरूपकम् रत्नावली नाटिका में रत्नावली के तहखाने में बन्द किये जाने पर उसकी दशा के विषय में विचार करते हुए विदूषक बताता है कि 'सागरिका बड़ी मुश्किल से जिन्दगी काटेगी इसके बाद वह राजा से पूछता है-'तुम उसके छुटकारे का कोई उपाय क्यों नहीं सोचते ?' इसके उत्तर में राजा कहता है-'मित्र, इस विषय में देवी वासवदत्ता को खुश करने के अलावा कोई उपाय नहीं दिखाई देता ।' यहाँ भावी (चतुर्थ) अङ्क की घटना के बिन्दु के रूप में सूचित इस देवीप्रसादन से वासवदत्ताजनित विन्न समाप्त हो जायगा। इस प्रसादन की भावना के कारण फलप्राप्ति की निश्चिति सूचित की गई है। फलयोगमाह- समग्रफलसंपत्ति: फलयोगो यर्थादितः। यथा रत्नावल्यां रत्नावलीलाभचक्रवर्तित्वावाप्तिरिति। समस्त फल की प्राप्ति हो जाने पर फलयोग (फलागम) कहलाता है। इस लक्षण में फल के साथ 'समस्त' विशेषण प्रयुक्त हुआ है। इसका तात्पर्य यह है कि अधूरे फल मिलने तक 'नियताप्ति' अवस्था ही मानी जायगी। रत्नावली नाटिका में उदयन को रत्नावली का लाभ तथा तज्जनित चक्रवर्तित्वप्राप्ति नाटिका का फलागम है। संधिलक्षणमाह- अर्थप्रकृतय: पञ्च पञ्चावस्थासमन्विताः ॥२२॥ यथासंखयेन जायन्ते मुखाद्या: पञ्च संधयः। अर्थप्रकृतीनां पच्चानां यथासंख्येनावस्थाभि: पश्चभिर्योगात् यथासङ्गयेनैव वच््यमाणा मुखाद्या: पश्च संधयो जायन्ते। रूपक की अर्थप्रकृति तथा अवस्था का वर्णन करने पर उन दोनों के मिश्रण के संभूत संधियों का वर्णन करते हैं। बीज, विन्दु, पताका, प्रकरी तथा कार्य ये पाँच अर्थप्रकृतियाँ जब क्रम से अवस्था, यत्न, प्राप्त्याशा, नियताप्ति तथा फलागम इन पाँच अवस्थाओं से मिलती हैं, तो क्रमशः मुख, प्रतिमुख, गर्भ, विमर्श तथा उपसंहृति (उपसंहार) इन पाँच संधियों की रचना होती है। २. धनजय के मत से पांचों अर्थ प्रकृतियों में से एक एक, अवस्था के एक एक अंग से मिलकर ५ सन्धियों का निर्माण करती है। सन्धि की परिभाषा तो धनजय दूसरी ही देते हैं, कि जहां एक अवान्तर प्रयोजन पूर्ण हो जाय और मुख्य प्रयोजन से जोड़ते हुए कथांशों को आगे के प्रयोजन से सम्बद्ध कर दिया जाय, वहां वह सम्बन्ध सन्धि कहलाता है। पर परि- भाषा में तो कहीं अर्थप्रकृति तथा अवस्था के मिश्रण की बात नहीं है। धनञ्जय की परिभाषा के मतानुसार तो यह मिश्रण सिद्ध नहीं होता। भरत में इस बात का कोई संकेत नहीं मिलता। (दे० ना० शा० २१-३६-३७) विश्वनाथ ने भी धनज्जय के ही मत का अनुसरण किया है, वे भी यही कहते हैं :- यथासंख्यमवस्थाभिराभिर्योगात्तु पञ्चभिः। पञ्चधैवेतिवृत्तस्य भागा: स्युः पञ्चसन्धयः ॥(सा.द.६-७४) पर यह योग मानने पर एक गड़बड़ी हो सकती है। प्रकरी का सम्बन्ध विमर्श या अवमर्श से माना गया है। पर कहीं यह गर्भ में पाई जाती है। उदाहरण के लिए राम की कथा में शबरीवृत्तान्त प्रकरी माना जाता है। पर राम कथा में यहां गर्भसन्धि ही चल रही है, जो सुग्रीव के मिलन तक चलती है। फिर तो सारा सिद्धान्त गड़बड़ा जायगा। हमारे मत से यह पांच अर्थप्रकृति, तथा पांच अवस्था का मेल ५ सन्धि मानकर मेल मिलाने की कोशिश में ही सारी त्रुटि की जड़ है।
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प्रथम: प्रकाश: १७
संधिसामान्यलक्षणमाह- अन्तरकार्थसंबन्धः संधिरेकान्वये सति॥ २३॥ एकेन प्रयोजनेनान्वितानां कथांशानामवान्तरैकप्रयोजनसंबन्ध: संधिः। सन्धि का सामान्य लक्षण बताते हुए कहते हैं कि किसी एक प्रयोजन से परस्पर संबद्ध (अन्वित) कथांशों को जब किसी दूसरे एक प्रयोजन से संबद्ध किया जाय, तो वह सम्बन्ध सन्धि कहलाता है। एक ओर कथांशों का सम्बन्ध अर्थप्रकृति के रूप में कार्य से है, दूसरी और अवस्था के रूप में फलागम से दोनों को सम्बद्ध करने पर सन्धि हो जाती है। के पुनस्ते संघय :- मुखप्रतिमुखे गर्भः सावमर्शोपसंहतिः। ये सन्धियाँ कौन सी है ?- मुख, प्रतिमुख, गर्भ, अवमर्श (विमर्श) तथा उपसंहृति (उपसंहार या निर्वहण)। यथोद्देशं लक्षणमाह- मुखं बीजसमुत्पत्तिर्नानार्थरसंसम्भवा॥ २४॥ अङ्गानि द्वादरौतस्य बीजारम्मसमन्वयात्। बीजानामुत्पत्तिरनेक प्रकार प्रयोजनस्य रसस्य च हेतुर्मुखसंधिरिति व्याख्येयं तेना- त्रिवर्गफले प्रहसनादौ रसोत्पत्तिहेतोरेव बीजत्वमिति। क्रम से उनका लक्षण बताते हुए कहते हैं कि 'मुखसन्धि में नाना प्रकार के रस को उत्पन्न करने वाली बीजोत्पत्ति पाई जाती है। बीजारम्भ के लिये प्रयुक्त होने के कारण इस मुखसन्धि के बारह अंग हैं। मुखसन्धि में ही रूपक के बीज की सूचना दी जाती है। यही बोज काव्य या नाटक के विभिन्न रसों को उत्पन्न करता है, उनका हेतु है। अन्य रूपकों में तो धर्मादि में से कोई एक वर्ग हेतु या बीज के रूप में होता है, किन्तु प्रहसन, भाण आदि में स्पष्टरूप से कोइ वर्ग (पुरुषार्थ) हेतु के रूप में नहीं दिखाई देता। इसका समाधान करते हुए बताते हैं कि वहाँ भो हास्य आदि रस की उत्पत्ति तो होती ही है, अतः रसोत्पत्तिहेतु (रस का आलंबन, समाज का उपहास्य पक्ष) ही बीज माना जायगा। अस्य च बीजारम्भार्थयुक्तानि द्वादशाङ्गानि भवन्ति तान्याह- उपत्षेप: परिकर: परिन्यासो विलोभनम् ॥२५॥ उक्ति: प्राप्तिः समाधानं विधानं परिभावना। उद्भेदमेदकरणान्यन्वर्थान्यथ लक्षणम्॥ २६। इसमें बीज के आरम्भ के लिए प्रयुक्त द्वादश अंग होते हैं, उन्हीं का वर्णन करते हैं :- उपक्षेप, परिकर, परिन्यास, विलोभन, युक्ति, प्राप्ति, समाधान, विधान, परिभावना, उद्जेद, भेद तथा करण इन मुख के बारह अङ्गों के नाम अन्वर्थ हैं, अब इनका लक्षण कहेंगे। एतेषां स्वसंज्ञाव्याख्यातानामपि सुखार्थ लक्षणं क्रियते- वोजन्यास उपक्षेप :- यथा रत्नावल्याम्-'( नेपथ्ये ) द्वीपादन्यस्मादपि मध्यादपि जलनिधेर्द्विशोऽप्यन्तात्। म आ्नीय फटिति घटयति विघिरभिमतमभिमुखीभृतः ।' ( १) 'संश्रय।' इत्यपि पाठः । ३ द०
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१८ दशरूपकम् इत्यादिना यौगन्धरायणो वत्सराजस्य रत्नाक्लीप्राप्तिहेतुभूतमनुकूलदैवं स्वव्यापारं बीजत्बेनोपक्षिप्तवानित्युपच्षेपः । रूपक के आरम्भिक अंश में जब कवि बीज का न्यास करता है, तो उसे उपन्षेप कहते हैं। जिस प्रकार कृतक वृक्षादि के फल की हच्छा से भूमि में बीज का निक्षेप करता है, उसी प्रकार कवि भी कार्यरूप फल के हेतुरूप बीज का निक्षेप रूपक के प्रथम अंक या प्रथम भाग में किया करता है। जैसे रत्नावली नाटिका में मंच पर प्रवेश करने के पहले ही यौगन्धरायण अपने कार्य को बीजरूप में डाल देता है। यौगन्धरायण का कार्य वत्सराज उदयन तथा रत्नावली का मिला देना है, तथा वह इनके मिलाप के लिए व्यापार में संलग्न है, जिसमें उसे दैव की अनुकूलता भी प्राप्त है। इस बीजरूप व्यापार की सूचना यौगन्धरायण ने निम्न नेपथ्योक्ति के द्वारा दी है :- 'अनुकूल होने पर दैव अपनी ईप्सित वस्तु को दूसरे द्वीप से, समुद्र के बीच से, या दिशाओं के अन्त से कहीं से भी लाकर एकदम मिल। ही देता है।' इस प्रकार रत्नावली प्राप्ति रूप कार्य के बीज का न्यास होने से यहाँ उपक्षेप है।1 परिकरमाह- - तद्वाहुल्यं परिक्रिया। यथा तत्रैव-'अन्यथा क्व सिद्धादेशप्रत्ययप्रार्थितायाः सिंहलेश्वरदुहितुः समुद्रे प्रवह- णभङ्गमग्नोत्थिताया: फलकासादनम् ।' इत्यादिना 'सर्वथा स्पृशन्ति स्वामिनमभ्युदयाः।' इत्यन्तेन बीजोत्पत्तेरेव बहूकरणात्परिकरः । जब बीजन्यास का बाहुल्य पाया जाय ता उसे परिकर या परिक्रिया कहते हैं। जहां बीज की सूचना देकर पात्र उस बीजन्यास की पुष्टि आदि करते हुए उसे दृढ करे उसे परिकर कहेंगे। जैसे रत्नावली नाटिका में ही यौगन्धरायण अपने फल के बीज काब ाहुल्य प्रकाशित करते हुए बीजोत्पत्ति की पल्लवित करता है। इसकी सूचना यौगन्धरायण की इन उक्तियों से होती है-'(यदि दैव अनुकूल न होता) तो सिद्ध पुरुषों के वचनों पर विश्वास करके सिंहलपति की जिस पुत्री को वत्सराज उदयन से विवाहित करने के लिए प्राथित किया गया है, वह जह्दाज के टूट जाने से समुद्र में मग्न होने पर भी एक तख्ते के सहारे कैसे लग जाती' तथा 'ऐसा ज्ञात होता है स्वामी की उन्नति सब तरह से हो रही है ( उन्नति स्वामी का सब तरह से स्पर्श कर रही है)'। परिन्यासमाह-
यथा तत्रैव- तन्निष्पत्ति: परिन्यास :-
'प्रारम्भेऽस्मिन्स्वामिनो वृद्धिहेतौ दैवे चेत्थं दत्तहस्तावलम्बे। सिद्धर्भ्रान्तिर्नास्ति सत्यं तथापि स्वेच्छाकारी भीत एवास्मि भर्तुः ॥' इत्यनेन यौगन्घरायण: स्वत्यापारदैवयोर्निष्पत्तिमुक्तवानिति परिन्यासः। बीजन्यास के बाहुल्यरूप परिकर की सिद्धि या परिपक्कावस्था (निष्पत्ति) परि- १. रत्नावली के लक्का से आने वाले जहाज के हूट जाने पर, डूब जाने की खबर प्रसिद्ध कराकर दैववशप्राप्त उसे यौगन्धरायण सागरिका के रूप में वासवदत्ता की दासी बनाकर रख लेता है। वह इसे जानता है कि सागरिका ही रत्नावली है। तथा उसे पूर्ण विश्वास है उसकी इच्छा पूर्ण होगी, क्योंकि दैव उसके अनुकूल है।
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प्रथम: प्रकाशः १६
न्यास कहलाती है। धीरे धीरे रूपक के पात्र को अपने फलबीज के विषय में और अधिक विश्वास हो जाता है। जब उसकी क्रिया की सिद्धि की सूचना दी जाती है तो उसे परिन्यास कहते हैं। जैसे यौगन्धरायण को अपने व्यापार तथा दैव दोनों पर यह पूर्ण विश्वास है कि उसे सिद्धि अवश्य होगी, उसका बीज अवश्य निष्पन्न होगा। इसकी सूचना वह निम्नपद्य के द्वारा देता है- अपने स्वामी वत्सराज उदयन की उन्नति के लिये मैंने यह कार्यं (रत्नावली मिलापरूप) शुरू कर दिया है, इस कार्य में दैव भी मुझे इस तरह हाथ से सहारा दे रहा है (कि जहाज के टूटने पर भी रत्नावली बचकर मेरे हाथ लग गई) और कार्य सिद्धि के विषय में भी मुझे कोई संदेह नहीं है, इतना होने पर भी मैं यह मनमानी बात (रत्नावली संगोपन) करने के कारण स्वामी से डर रहा हूं। यहां यौगन्धरायण को अपनी सिद्धि के प्रति पूर्ण आस्था है। बीज डाल देने तथा उसके बाहुल्य के बाद जिस तरह कृषक को सिद्धि तथा बीज-निष्पत्ति की आस्था होती है, उसी तरह रूपक के पात्र को भी। जब वह इसकी अभिव्यअ्ना करता है, तो वह परिन्यास नामक नाट. कीय तत्त्व कहलाता है। विलोभनमाह- - गुणाख्यानं विलोभनम् ॥२७॥ यथा रत्नावल्याम्- 'अस्तापास्तसमस्तभासि नभसः पारं प्रयाते रवा- वास्थानीं समये समं नृपजन: सायंतने संपतन्। संप्रत्येष सरोरुहद्युतिमुष: पादांस्तवासेवितुं प्रीत्युत्कर्षकृतो दृशामुदयनस्येन्दोरिवोद्वीक्षते ।I' इति वैतालिकमुखेन चन्द्रतुल्यवत्सराजगुणवर्णनया सागरिकाया: समागमहेत्वनुराग- बीजानुगुण्येनैव विलोभनाद्विलोभनमिति। यथा च वेणीसंहारे- 'मन्थायस्तार्णवाम्भ: प्लुतकुहरवलन्मन्दरध्वानघोरः कोणाघातेषु गर्जत्प्रलयघनघटान्योन्यसंघट्टचण्डः। कृष्णाक्रोधाप्रदूतः कुरुकुत्तनिधनोत्पातनिर्घातवातः केनास्महिंसह नाद प्रतिरसितसखो दुन्दुभिस्ताडितोऽयम् ।।' इत्यादिन। 'यशोदुन्दुभिः' इत्यन्तेन द्रौपया चिलोभनाद्विलोभनमिति। जब (फल से संबद्ध किसी वस्तु के) गुणों का वर्णन किया जाय तो उसे विलोभन कहते हैं। कोई भी व्यक्ति किसी वस्तु के गुणों के कारण ही उस पर लुब्ध होता है, रूपक में भी नायकादि को फल की और लुब्ध करने के लिए कवि उसके गुणों का आख्यान करता है। नायकादि में इष्टप्राप्ति का लोभ उत्पन्न करने के कारण यह तत्व 'विलोभन' कहलाता है। जैसे रत्नावली नाटिका में ही वैतालिक चन्द्रमा तथा वत्सराज के समान गुणों के वर्णन के द्वारा सागरिका का विलोभन करते हैं, जो समागम (उदयन रत्नावली मिलन) के हेतुरूप अनुराग बीज को सागरिका के हृदय में बढा रहे हैं। इस प्रकार निम्न पद्य में विलोभन पाया जाता है- (१) 'गुणाख्यानात्' इत्यपि पाठः ।
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२० दशरूपकम् अस्त होने के समय समस्त शोभा (तेज) से शून्य सूर्य के आकाश के पार चले जाने पर, सभी राजालोग शाम के समय एकत्रित होकर प्रीति तथा उन्नति के विधायक वत्सराज उदयन के, कमल की शोभा का अपहरण करने वाले, चरणों का सेवन करने के लिए राजमण्डप में उसी तरह बाट देख रहे हैं, जैसे प्रीति तथा उन्नति के विधायक, चन्द्रमा की, कमल की शोभा को छीन लेने वाली, किरणों की बाट देख रहे हों। (यहाँ शाम के समय भावी चन्द्रोदय के साथ ही साथ वत्सराज उदयन के गुणों का वर्णन किया गया है। 'पादान्' के श्लिष्ट प्रयोग से अनुप्राणित उपमा अलंकार चन्द्र तथा उदयन के उपमानोपमेय भाव को व्यक्त करता है।) अथवा, जैसे वेणीसंहार नाटक में युविष्ठिर के द्वारा युद्ध घोषणा किये जाने व रणदुन्दुभि के बजने से द्रौपदी का विलोभन किया गया है। निम्न पद्य में भीम ने रणदुन्दुभि के गुणों के आख्यान के द्वारा नाटक की नायिका द्रौपदी का विलोभन किया है। यह दुन्दुभि किसने बजाया है, जिसकी आवाज हमारे सिंहनाद के समान है। इसका धीर तथा गंभीर शब्द मंथन के समय चंचल तथा क्षुब्ध समुद्र-जल से छिद्रों (गुहाओं) के भरने से शब्द करते हुए चंचल मंदराचल के गंभीर गर्जन के सदृश है, तथा जब एक साथ सैकड़ों ढक्काएँ तथा हजारों भेरियां बजाई जाती हैं तो ऐसी प्रचण्ड आवाज होती है जैसे गरजते हुए प्रलय के मेध परस्पर टकरा रहे हों। यह रणदुन्दुभि कौरवों के प्रति उत्पन्न द्रौपदी के क्रोध का अग्रदूत है, तथा कुरुकुल के भावी संहार का उत्पातसूचक प्रलयकालीन झंझावात है। अथ युक्ति :- संप्रधारणमर्थानां युक्ति :- यथा रत्नावल्याम्-'मयापि चैनां देवीहस्ते सबहुमानं निक्षिपता युक्तमेवानुष्ठितम्। कथितं च मया यथा बाभ्रव्यः कक्षकी सिंहलेश्वरामात्येन वसुभूतिना सह कर्थंकथमपि समुद्रादुत्तीर्य कोशलोच्छित्तये गतस्य रुमण्वतो घटितः।' इत्यनेन सागरिकाया अरन्तः- पुरस्थाया वत्सराजस्य सुखेन दर्शनादिप्रयोजनावधारणाद्वाभ्रव्यसिंहलेश्वरामात्ययोः स्वनाय कसमागम हेतुप्रयोजनत्वेनावधारणाद्युक्तिरिति। जहाँ अर्थों का (पात्र के अभीष्ट तथ्यों का) अवधारण या समर्थन किया जाय, वहाँ युक्ति होती है। जैसे अन्तःपुर में स्थित सागरिका बड़े मजे से वत्सराज के दृष्टिपथ में आ सकती है, इस प्रयोजन का समर्थन करने से तथा बाभ्रव्य एवं सिंहलेश्वर के मंत्री वसुभूति के सागरिका (रत्नावली) तथा वत्सराज के समागम के प्रयोजन के समर्थन करने के कारण वहाँ युक्ति की व्यंजना इन पंक्तियों में की गई है :- 'मैंने भी सागरिका को सम्मानपूर्वक देवी वासवदत्ता के हाथों सौंप कर ठीक ही किया है। मैंने यह भी कह दिया है कि कख्ुकी बाभ्रव्य सिंहलेश्वर के मंत्री वसुभूति के साथ किसी तरह समुद्र में डूबने से बच गया है और कोशल के जीतने के लिए प्रस्थित सेनापति रुमण्वान् के साथ है।' यहाँ 'मैंने यह ठीक ही किया है' इस वाक्य से यौगंधरायण ने अपने कार्य का समर्थन (अवधारण) किया है, अतः यहाँ युक्ति नामक नाटकीय तत्त्व है। अथ प्राप्ति :- -प्राप्ति: सुखागमः । यथा वेणीसंहारे-'चेटी-भद्विणि ! परिकुविदो विश्र कुमारो लक्खीयदि।' (भत्रि ! परिकुपित इव कुमारो लच्ष्यते।) इत्युपक्रमे 'भीम :-
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- मथ्नामि कौरवशतं समरे न कोपाह्ुशासनस्य रुधिरं न पिवाम्युरस्तः । संचूर्णयामि गदया न सुयोधनोरू संधिं करोतु भवतां नृपतिः परोन। - द्रौपदी-(श्रुत्वा सहर्षम्) णाध अरसुदपुव्वं खु एदं वश्रणं ता पुणो पुणो भण।' (नाथ ! अप्श्रुतपूर्व खल्वेतद्वचनं तत्पुनः पुनर्भण ) इत्यनेन भीमक्रोधबीजान्वयेनैव सुख- प्राप्या द्रौपदाः प्राप्तिरिति। यथा च रत्नावल्याम्-'सागरिका-(श्रुत्वा सहर्ष परिवृत्य सस्पृहँ पश्यन्ती) कर्ध अअं सो राआ उदयणो जस्स अहं तादेण दिण्णा ता परप्पेसणदूसिदं मे जीविदं एतस्स दंसरोण बहुमद संजादम्।' (कथमयं स राजोदयनो यस्याहं तातेन दत्ता तत्पर- प्रेषणदूषितं मे जीवितमेतस्य दर्शनेन बहुमतं संजातम् ) इति सागरिकायाः सुखागमा- त्प्राप्तिरिति। जहाँ (फल की प्राप्ति की आशा में) सुख का आगम हो, वहाँ प्राप्ति नामक मुखांग होता है। जैसे वेणीसंहार नाटक के प्रथम अंक में जब सेविका द्रौपदी को यह सूचना देती है कि 'स्वामिनि, कुमार भीमसेन क्रुद्ध से नजर आते हैं, और जब भीम निम्न उ्ति को सुनाता है- क्रोध के कारण मैं सौ कौरवों को युद्ध में न भथ दूँ; दुःशासन की छाती से खून को न पीऊ; सुयोधन की दोनों जाँघों को गदा से न तोडू ? तुम्हारे राजा युधिष्ठिर किसी (भी) शर्त पर (कौरवों से) संधि करते रहें; (मुझे इसकी कोई पर्वाह नहीं)। तब द्रौपदी हर्ष के साथ कहती है-'स्वामिन्, ऐसा वचन पहले कभी नहीं सुना, इस- · लिये फिर से (बार बार) कहिए।' यहाँ भीम के क्रोध के संबन्ध के कारण द्रौपदी को सुखप्राप्ति होती है (इसलिए कि भीम उसकी प्रतिज्ञा पूर्ण कर उसकी खुली वेणी को अवश्य आबद्ध करेगा), अतः प्राप्ति मानी गई है। अथवा, जैसे रत्नावली नाटिका में वैतालिकों की उक्ति सुनकर सागरिका हर्ष के साथ इधर उधर सस्पृह दृष्टि से देखती हुई कहती है-'क्या यही वह राजा उदयन है, जिसके लिए पिताजी ने मुझे दे दिया है; तब तो दूसरे लोगों की सेवा करने से कलुषित मेरा जीवन इसके दर्शन से सफल हो गया है।' यहाँ सागरिका को सुख की प्राप्ति हुई है, अतः यहाँ भी प्राप्ति है। अथ समाधानम्- बीजागम: समाधानम्- यथा रत्नावल्याम्-'वासवदत्ता-तेण हि उरोहि मे उवअरणाई। ('तेन ह्युप- 'नय म उपकरणानि।') सागरिका-भटिणि एदं सव्वं सज्जम्। ('भत्रि ! एतत्सर्वं सज्जम्।') वासवदत्ता-(निरूप्यात्मगतम् ) अरहो पमादो परिअरणस्स जस्स एव्व दंसणपहादो पशत्तेण रख्खीअदि तस्स ज्जेव कहं दिठि्ठिगोअरं आअदा, भोदु एव्वं दाव । (प्रकाशम्) हज्जे सागरिए कीस तुमं अ्रज्ज पराहीरो परिश्ररे मश्रणूसवे सारित्र्ं मोत्तूण इहागदा ता तहिं जेव गच्छ।' (अहो प्रमादः परिजनस्य यस्यैव दर्शनपथा- स्प्रयत्नेन रद्यते तस्यैव कर्थं दृष्टिगोचरमागता, भवतु एवं तावत्। चेटि सागरिके ! कर्थ स्वमय पराघीने परिजने मदनोत्सवे सारिकां मुक्त्वेहागता तस्मात्तत्रैव गच्छ।') इत्यु- पक्रमे 'सागरिका-(स्वगतम्) 'सारिआ दाव मए सुसंगदाए हत्ये समप्पिदा पेक्खिदुं
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२२ दशरूपकम् च मे कुतूइलं ता अलक्खिआ पेक्खिस्सम्।' ( 'सारिका तावन्मया सुसंगताया हस्ते सम- पिंता प्रेक्षितुं च मे कुतूहलं तदलक्षिता प्रेक्षिष्ये।' ) इत्यनेन। वासवदत्ताया रत्नावली- वत्सराजयोरदर्शन प्रतीकारात्सारिकायाः सुसंगतार्परोनालक्षितप्रेक्षरोन च वत्सराजसमा- गमहेतोर्बीजस्योपादानात्समाधानमिति। यथा च वेणीसंहारे-'भीमः-भवतु पाचालराजतनये श्रूयतामचिरेणैव कालेन 'चचद्भुजभ्रमितचण डगदाभिघातसंचूर्णितो रुयुगलस्य सुयोघन्य। स्त्यानावनद्धघनशोणितशोणपाणिरत्तंसयिष्यति कचांस्तव देवि भीमः ।।' इत्यनेन वेणीसंहारहेतोः क्रोधवीजस्य पुनरुपादानात्समाधानम्। बीज का उपादान; फिर से बीज का युक्ति के द्वारा व्यवस्थापन समाधान कहलाता है। जैसे रत्नावली नाटिका में सागरिका उदयन को देखने की इच्छा से मदनपूजा के स्थान पर आ जाती है, उसकी यह इच्छा बीजागम के रूप में इन पंक्तियों से स्पष्ट है। वासवदत्ता-तो पूजासामग्री मेरे पास ले आओ। सागरिका-स्वामिनि, यह सब तैयार है। वासवदत्ता (देखकर अपने आप)-दासियों का प्रमाद कैसा है, जिसकी ( राजा की) दृष्टि से बचाने के लिये हम बड़े प्रयत्न से इनकी रक्षा करते हैं, उसी के दृष्टिपथ में (यह) कैसे आ रही है। ठीक है मैं मामले को यों संभाल लूंगी। (प्रकट) अरी सागरिके, सब दासियों के दूसरे काम में संलस्न होने पर सारिका को छोड़कर तुम यहाँ मदनोत्सव में कैसे आ गई ? इसलिए वहीं चली वो। सागरिका-(स्व्रगत) मैना तो मैंने सुसंगता के हाथों सौंप रक्खी है, तथा वत्सराज को देखने की मेरी उत्सुकता है, इसलिए मैं छिपकर देखंगी। यहाँ एक ओर वासवदत्ता रत्नावली तथा वत्सराज के परस्पर दर्शन का प्रतीकार करती है तथा दूसरी और सागरिका मैना को सुसंगता के हाथों सौंप कर छिपकर उसे (राजा को) देखती है। यहाँ रत्नावली (सागरिका) की इस चेष्टा में वत्सराजसमागम के हेतुरूप बीज का उपादान किया गया है, अतः यहाँ समाधान नामक मुखांग है। अथवा, जैसे वेणीसंहार नाटक में निम्न र्उक्त के द्वारा द्रौपदी को आश्रस्त करता हुआ भीम कौरवसंहार की सूचना देकर बीज का समाधान कर रहा है। 'ठीक है। देवि पांचालराजपुत्रि सुनो, थोड़े ही दिनों में चंचल हाथों से घुमाई हुई गदा के प्रहारों से टूटी जांघों वाले दुर्योधन के धनेचकने खून से रंगे हाथों वाला भीम तुम्हारे बालों को सँवारेगा।' यहाँ वेणीसंहार के कारण भीम के क्रोध (बीज) का बार बार उपादान हुआ है, अतः समाधान है। समाधान के द्वारा पात्र दूसरे लोगों की इस बात का विश्वास दिलाता है कि फलप्राप्ति अवश्य होगी। अथ विधानम्- -विधानं सुखदुःखकृत्॥। २८॥ यथा मालतीमाघवे प्रथमेऽक्के-'माधवः- यान्त्या मुहुर्वलितकन्धर माननंत- दावृत्तवृन्तशतपत्रनिरभं वहन्त्या।
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दिग्घोऽमृतेन च विषेण च पदमलाच्या गाढं निखात इव मे हृदये कटाक्षः।। यद्विस्मयस्तिमितमस्तमितान्यभाव- मानन्दमन्दममृतप्लचनादिवाभूत्। शिक तत्संनिधौ तदधुना हृदयं मदीय- मङ्गारचुम्बितमिव व्यथमानमास्ते।।' : IFFINSIP Ts इत्यनेन मालत्यवलोकनस्यानुरागस्य समागमहे तोर्बीजानुगुण्येनैव माघवस्य सुखदुः खकारित्वाद्विधानमिति। यथा च वेणीसंहारे-'द्रौपदी-णाघ पुणोवि तुम्मेहिं अहं आश्रच्छित् समासा- सिदव्वा। ('नाथ पुनरपि त्वयाहमागत्य समाश्वासयितव्या।') भीमः-ननु पाच्चाल- राजतनये किमद्याप्यलीकाश्वासनया। 'भूय: परिभवक्कान्तिलज्जाविधुरिताननम् । अनिःशेषितकौरव्यं न पश्यसि वृकोदरम् ।।' इति सड्ग्रामस्य सुखदुःखहेतुत्वाद्विधानमिति। जहाँ (नायकादि के हृदय में) सुख तथा दुःख पदा हो, वहाँ विधान कहलाता है। फलप्राप्ति की इच्छा सुख तथा दुःख का नायकादि में रह रह्दकर संचार किया करती है, इसी को विधान के नाम से पुकारा जाता है। जैसे मालतीमाधव नाटक में मालती को देखने के बाद माधव सुख व दुःख का अनुभव करता है, इसका पता इन पद्यों से लगता है। माधव-टेढ़े झुके हुए वृन्त वाले कमल के समान, टेढ़ी गरदन वाले उस मुख का वहन करती हुई, रोमयुक्त आंखों वाली जाती हुई मालती ने अमृत और विष में (एक साथ) बुझा हुआ कटाक्ष (रूपी तीर) जैसे मेरे हृदय में बहुत गहरा गड़ा दिया है। उस मालती के नजदीक होने पर मानो अमृत के सेचन से जो मेरा हृदय विस्मय के कारण स्पन्दन हो गया था, तथा उसके दूसरे भावों का अस्त हो गया था, एवं वह आनन्द से मन्द गति वाला हो गया था, वही मेरा हृदय अब (उसके अभाव में) इस तरह तड़फ रहा है, मानों अंगारों का स्पर्श कर रहा हो। यहाँ मालती तथा माधव के भावी अनुराग तथा समागम का हेतु माधवकृत मालतीदर्शन बीज के अनुरूप होने के कारण माधव में सुख तथा दुःख को उत्पन्न कर रहा है, अतः यहाँ विधान नामक मुखांग है। अथवा जैसे वेणीसंहार में संभामजनित सुख तथा दुःख का वर्णन करके भीम ने विधान का संनिवेश किया है। द्रौपदी-नाथ, तुम फिर भी आकर मुझे आश्वासन दिला जाना। भीम-अरे पांचालराजपुत्रि, अब भी झूठे आश्वासनों की क्या जरूरत है। हार की ग्लानि तथा लज्जा से रहित मुख वाले वृकोदर को कौरवों को निःशेष न करने तक तुम फिर से न देखोगी। अथ परिभावना- परिभावोऽद्गुतावेश :- यथा रत्नावल्याम्-'सागरिका-(दृष्ट्वा सविस्मयम्) कघं पच्चक्खो ज्जेव श्रणङ्गो पूअं पडिच्छेदि। ता अहंपि इध टि्ठिद ज्जेव णं पूजइस्सम्। ( 'कथ प्रत्यक्ष एवानज्ग:
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पूजां प्रतीक्षते। तत् अ्रहमपीह स्थितैवैनं पूजयिष्यामि।') इत्यनेन वत्सराजस्यानज्ञरूप- तयापह्नवादनङ्गस्य च प्रत्यक्षस्य पूजा्रहणस्य लोकोत्तरत्वादद्ुतरसावेशः परिभावना। यथा च वेणीसंहारे-'द्रौपदी-किं दाणि एसो पलअजलघरत्थणिदमंसलो खरो खरो समरदुन्दुभी ताडीअदि।' ( 'किमिदानीमेष प्रलयजलघरस्तनितमांसलः क्षरौ
परिभावना। जहाँ अन्बुत आवेश हो अर्थात् आश्चर्य की भावना पात्र में पाई जाती हो, वहाँ परिभाव या परिभावना होती है। जैसे रत्नावली नाटिका में मदनपूजा के समय स्वयं उदयन को उपस्थित देखकर छिपकर देखती हुई सागरिका आश्चर्य के साथ कहती है-'अरे, क्या प्रत्यक्ष कामदेव ही पूजा ग्रहण कर रहा है? तो मैं भी यहीं से इसकी पूजा करूँगी।' यहाँ वत्सराज को कामदेव बनाकर उसकी स्वयं की सत्ता का निराकरण (अपह्ववन) किया गया है तथा प्रत्यक्ष अनंग के द्वारा पूजाग्रहण अलौकिक है इसलिये सागरिका की उक्ति में अभिव्यजित अद्भुत रस के आवेश के कारण यहाँ 'परिभावना' नामक सुखांग है। अथवा जैते वेणीसंह्ार में समरदुन्दुभि की लोकोत्तर ध्वनि को सुनकर द्रौपदी में अद्भुत रस का आवेश पाया जाता है, जिसकी व्यज्ना द्रौपदी की इस उक्ति हो रही है-'इस समय प्रलय की मैधध्वनि के समान गंभीर ध्वनि वाला यह समर दुन्दुभि क्षण-क्षण में क्यों बजाया जा रहा है?' अथोद्ेद :- -उद्धेदो गूढभेदनम्। यथा रत्नावल्यां वत्सराजस्य कुसुमायुधव्यपदेशगूढस्यवे तालिकवचसा 'अस्तापास्त' इत्यादिना 'उदयनस्य' इत्यन्तेन बीजानुगुण्येनवोद्देदनादुद्भेदः। यथा च वेणीसंहारे-'आर्य किमिदानीमध्यवस्यति गुरुः।' इत्युपक्रमे '(नेपथ्ये) यत्सत्यव्रतभज्गभीरुमनसा यतनेन मन्दीकृतं यद्विस्मर्तुमपीहितं शमवता शान्ति कुलस्येच्छता। तद्यूतारणिसंभृतं नृपसुताकेशाम्बराकर्षणैः क्रोधज्योतिरिदं महत्कुरुवने यौधिष्ठिरं जुम्भते।। भीम :- (सहर्षम्) जुम्भतां जुम्भतां संप्रत्यप्रतिहतमार्यस्य क्रोघज्योतिः।' इत्य-
जहाँ अब तक छिपे हुए (गूढ) बीज को प्रकट कर दिया जाय अर्थात् गूढ का भेदन हो, उसे उद्भेद कहते हैं। (पहले की स्थिति तक बीज का पोषण हो रहा है, अनुकूल भूमि, जल तथा खाद्य को पाकर बीज यहाँ फूट पड़ता है-कवि बीज का संकेत तो पहले ही कर देता है, किन्तु बीज के साधनादि का अवगुण्ठन, स्पष्टतः इसी के अंतर्गत हटाता है।) जैसे रत्नावली में कुसुमायुध के व्याज से वत्सराज की वास्तविक सत्ता छिपी थी, किन्तु वैतालिक की उक्ति में 'उदयन' शब्द के द्वारा उस गूढ वस्तु का भेदन होने से यह उद्भेद है। यह गूढभेद बीज का ही सहायक या साधन है। अथवा जैसे 'हे आर्य अब बड़े भाई क्या करना चाहेंगे'-सहदेव के यह पूछने पर ही; नेपथ्य से निम्न पथ सुनाई देता है-
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अपने सत्यव्रत के भंग से डरने वाले युधिष्ठिर ने जिस क्रोध को मन्दा कर लिया था, कुल की शान्ति की इच्छा वाले शान्तिप्रिय राजा ने जिस क्रोध की भुलाने की भी इच्छा की, युधिष्ठिर की वही क्रोधान्नि, जो द्रौपदी के बालों व वस्त्रों के खैंचने से, धूतरूपी अरणि (काष्ठ- दण्ड) से उत्पन्न हुई है, कौरवों के घने (बड़े) जंगल में फैल रही है। इसे सुनकर हर्ष के साथ भीम कहता है-'पूज्य भ्राता की क्रोधाग्नि अब बेरोकटोक फैले, बेरोकटोक फैले।' यहाँ द्रौपदी के बालों के बांधे जाने के कारणभूत युधिष्ठिरकोप का उन्ब्रेदन किया गया है, जो अब तक गूढ ही रहा है। अथ करणम्- करणं प्रकृतारम्भ :- यथा रत्नावल्याम्-'णमो दे कुमुमाउह ता अमोहदसणो मै भविस्ससि ति। दिठ्ठं जं पेक्खिदव्वं ता जाव ण कोवि मं पेक्खइ ता गमिस्सम्।' (नमस्ते कुसुमायुध- तदमोघदर्शनो मे भविष्यसीति। दृष्ट यत्प्रेक्षितव्यं तद्यावन्न कोऽपि मा प्रेक्षते तद्रमि- ष्यामि।) इत्यनेनानन्तराङ्कप्रकृत निर्विन्नदर्शनारम्भणात्करणम्। यथा च वेणीसँहारे-'तत्पाश्चालि गच्छामो वयमिदानीं कुरुकुलक्षयाय इति। सह- देव :- आर्य । गच्छाम इदानीं गुरुजनानुज्ञाता विक्रमानुरूपमाचरितुम् ।' इत्यनेनानन्त- राङ्कप्रस्तू यमानसडग्रामारम्भणात्करणमिति। सर्वत्र चेहोद्देश प्रतिनिर्देशवैषम्यं क्रियाक्रम- स्याविवक्षितत्वादिति। रूपक की कथा के अनुरूप प्रकृत कार्य का जहाँ आरम्भ हो, वहाँ करण होता है। (करण के द्वारा भावी अंक के वृत्त की व्यज्ञना भी कराई जाती है) जैसे रलावली में, 'हे कामदेव, मेरे लिए सफलदर्शन बनोगे। जो मुझे देखना चाहिए था, वह देख लिया। अब मैं इस ढंग से चली जाऊँ कि मुझे कोई न देख पावे।' रलावली की इस उक्ति के द्वारा भावी अंक में वर्णित निर्विन्न-दर्शन-प्रयत्न के आरम्भ की व्यज्ना कराई गई है, अतः करण नामक मुखाङ़ है। और जैसे वेणीसंह्ार में-(भीम) 'तो द्रौपदि, अब हम कौरवों के नाश के लिए जा रहे हैं।' (सहदेव) 'आर्य, अब गुरुजनों की आज्ञा पाकर पराक्रम के योग्य कार्य करने को चलें।' इस कथनोपकथन के द्वारा भावी अंक में प्रस्तूयमान युद्ध का आरम्भ व्यजित है, अतः करण है। यहाँ भीम व सहदेव दोनों के वाक्यों में सभी जगह (दोनों स्थानों पर) उद्देश तथा विधेय के क्रम में व्यतिक्रम पाया जाता है। वाक्य में पहले उद्देश (कुरुकुलक्षयाय; विक्रमानुरूपमाचरितुम्) का प्रयोग होना चाहिए, बाद में विधेयरूप क्रिया (गच्छामः) का। किन्तु इस वाक्य में पहले क्रिया (गच्छामः) का प्रयोग किया गया है, बाद में उद्देश का, यह दोष नजर आता है-इस शंका के उपस्थित होने पर इसका निराकरण करते हुए वृत्तिकार धनिक कहते हैं कि यहाँ 'गच्छामः' क्रिया कवि का विवक्षित न होकर, 'कुरुकुलक्षय' या 'विक्रमानुरूपाचरण' ही विवक्षित है, अतः वही विधेय होने के कारण यहाँ बाद में प्रयुक्त हुआ है। अथ भेद :- -भेदः प्रोत्साहना मता ॥ २६॥ यथा वेणीसहारे-'णाघ 1 मा क्खु जण्णसेणीपरिभवुद्दीचिदकोवा अगपेक्खिद- सरीरा परिक्कमिस्सघ जदो अप्पसत्तसंचरणीयाइं सुणीयन्ति रिउबलाइं। ('नाथ ! मा ४ दृ०
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२६ दशरूपकम् खलु याज्ञसेनीपरिभवोद्दीपितकोपा अनपेक्षितशरीरा: परिक्रमिष्यथ यतोऽप्रमत्तसंचरणी- यानि श्रूयन्ते रिपुबलानि।') भीमः-अयि सुक्षत्रिये ! अन्योन्यास्फालभिन्नद्विप रुधिरवसासान्द्रमस्तिष्कपक्के मम्नानां स्यन्दनानामुपरिकृतपदन्यासविक्रान्तपत्तौ। स्फीतासृक्पानगोष्ठीरसदशिवशिवातूर्यनृत्यत्कबन्धे सडग्रामैकार्णवान्तःपयसि विचरितुं पण्डिताः पाएडुपुत्राः ॥' इत्यनेन विषण्णाया द्रौपयाः क्रोधोत्साहबीजानुगुण्येनैव प्रोत्साहनाद्भ्ेद इति। एतानि च द्वादशमुखाङ्गानि बीजारम्भद्योतकानि साक्षात्पारम्पर्येण वा विधेयानि। एतेषामुपचेपपरिकरपरिन्यासयुक्त्युद्धेदस माधानानामवश्यंभावितेति।
वहां भेद होता है। जहाँ प्रोत्साहन पाया जाय, अर्थात् पात्र को बीज के प्रति प्रोत्साहित किया जाय,
जैसे वेणीसंहार के निम्न कथनोपकथन में क्रोध उत्साह रूप बीज के अनु-रूप वचन के द्वारा भीम विषण्ण द्रौपदी को प्रोत्साहित करता है। अतः यहाँ भेद नामक मुखाङ होगा। द्रौपदी-नाथ, यज्ञसेनी के पराभव से उद्दीप्त कोप वाले होकर, अपने शरीर को भूल कर युद्ध में न लड़ना, क्योंकि शत्रुओं की सेना सावधानी से घूमे जाने योग्य है ऐसा सुना जाता है। भीम-अरी सुक्षत्रिये ! पाण्डव के पुत्र उस संग्रामरूपी समुद्र के जल के बीच घूमने में कुशल हैं, जिसमें आपस के टकराने से टूटे हुए हाथियों के खून, चबीं और मस्तक के सान्द्र कीचड़ में मझ्न रथों के ऊपर होकर पदाति सेना पार हो रही हो तथा जिसमें जीभर कर खून पी-पीकर पानगोष्ठी में चिलाती हुई अमङ्गल शृगालियों के शब्दरूपी तूर्य की ताल पर कबन्ध नाच रहे हों। मुख 'घि के ये १२ अङ्ग बीज नामक अर्थप्रकृति तथा आरम्भ नामक अवस्था के व्यजक है; इनका संपादन साक्षात् रूप से या परम्परा से नाटक या रूपक में किया जाना चाहिए। इन बाहर में से भी उपक्षेप, परिकर, परिन्यास, युक्ति, उद्ध्ेद व समाधान इन अङ्गों का मुखसन्धि में उपादान सर्वथा आवश्यक है। अथ साङं प्रतिमुख संधिमाह- लक्ष्यालच्यतयोङ्गेदस्तस्य प्रतिमुखं भवेत्। बिन्दुप्रयत्नानुगमादङ्गान्यस्य त्रयोदश।। ३० ।। तस्य बीजस्य किंचिल्लच्य: किंचिदलच्य इवोद्धेद :- प्रकाशनं तत्प्रतिमुखम्। यथा रत्नावल्यां द्वितीयेऽ्क्के वत्सराजसागरिकासमागमहेतोरनुरागबीजस्य प्रथमा्ोपक्षिप्तस्य सुसङ्गताविदूबकाभ्यां ज्ञायमानतया किंचिल्लत्यस्य वासवदत्तया च चित्रफलकवृत्तान्तेन किंचिदुन्नीयमानस्य दृश्यादृश्यरूपतयोद्द्ेद: प्रतिमुखसंधिरिति। वेणीसंहारेऽपि द्वितीयेऽक्के भीष्मादिवधेन किचिल्लच्यस्य कर्णाद्यवघाच्चालच्यस्य क्रोधबीजस्योन्रेदः। 'सहृत्यगणं सवान्धवं सहमित्रं ससुतं सहानुजम् । स्वबलेन निहन्ति संयुगे न चिरात्पाण्डुसुतः सुयोधनम् ॥' (१) 'लच्याऽलक्ष्य इवोद्धेद:' इति पाठान्तरम्।
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इत्यादिभि :- 'दुःशासनस्य हृदयक्षतजाम्बुपाने दुर्योघनस्य च यथा गदयोरुभज्गे। तेजस्विनां समरमूर्घनि पाण्डवानां ज्ञिया जयद्रथवघेऽपि तथा प्रतिज्ञा ॥' इत्येवमादिभिश्रोद्धंद: प्रतिमुखसंधिरिति। अब प्रसक्गीपात्त प्रतिमुख संधि का अङ्गों सहित वर्णन करते हैं-उस बीज का कुछ-कुछ दिखाई देना और कुछ दिखाई न देना और इस लच्यालच्य रूप में फूट पड़ना (उद्विन्न होना) प्रतिमुख संधि का विषय है। इस संधि में बिन्दु नामक अर्थप्रकृति तथा प्रयत्न नामक अवस्था का मिश्रण होता है। इसके तेरह अङ्ग होते हैं। (मुखसंधि में बीज बोया जाता है, उसे उचित वातावरण में पोषण मिलता है। इस पोषण के द्वारा प्रतिमुख संधि में आकर वह फूटने लगता है, किन्तु जिस तरह पहले पहल निकलता बीजाङ्कुर कुछ-कुछ अस्पष्ट अवस्था में होता है, ठीक वैसे बीज का अह्कुर थोड़े अस्पष्टरूप में प्रतिमुख संधि में उद्धिन्न होता है। ) जैसे रलावली के प्रथम अङ्क में वत्सराज व सागरिका के (भावी) समागम के हेतुरूप जिस अनुरागबीज को बोया गया है, उसे दूसरे अङ्क में सुसंगता व विदूषक जान जाते हैं, इसलिए वह कुछ-कुछ प्रगट हो जाता है, तथा चित्रफलकवृत्तान्त के कारण वासवदत्ता के द्वारा कुछ-कुछ गृहीत हो जाता है। इस प्रकार बोज के अंकुर का दृश्य और कुछ अदृश्य रूप में उद्धिन्न होना प्रतिमुखसंधि है। वेणीसंहार में भी युधिष्ठिर का क्रोधबीज भीष्मादि के मरण से लक्ष्य हो गया है, किन्तु अभो कर्ण आदि के वध के न होने से अलक्ष्य है। इस लक्ष्यालक्ष्य रूप में उसका उद्धेद प्रतिमुख की व्यज्ञना करता है। 'पाण्डु का पुत्र युधिष्ठिर बड़ी जल्दी भृत्यों, बान्धवों, मित्रों, पुत्रों तथा अनुजों से युक्त सुयोधन को अपनी सेना के द्वारा युद्ध में (निश्चय ही) मार डालेगा।' (इत्यादि वाक्यों के द्वारा, जिनसे बीज-युधिष्ठिर कोप-लक्ष्य हो रहा है); तथा, दुर्योधन की निम्न उक्ति के द्वारा जहाँ दुर्योधन का साहस बीज को अलक्ष्य रख रहा है; प्रतिमुखसंधि अभिव्यजित है- युद्धस्थल में की गई तेजस्वी पाण्डवों की प्रतिज्ञा दुः्शासन के हृदय के खून को पीने के विषय में जैसी थी, तथा गदा से दुर्योधन की जाँघ को तोड़ने के विषय में जैसी थी, वैसी ही जयद्रथ के वध के विषय में समझी जानी चाहिए। (भाव यह है जैसे पाण्डव न तो दुःशासन का ही खून पी सके, न मेरी जाँघे ही गदा से तोड़ सके वैसे ही जयद्रथ को भी न मार सकेंगे, उनकी प्रतिश्ञा पूरी न हो सकेगी। यहाँ दुर्योधन पाण्डवों के लिए प्रयुक्त 'तेजस्वी' विशेषण के द्वारा उनकी अशक्तता की खिली उड़ाता हुवा, तथा उन्हें कोरा वाक्साहसी बताता हुवा व्यंग्य कस रहा है।) अस्य च पूर्वाड्कोपक्षिप्तबिन्दुरूपबीजप्रयत्नार्थानुगतानि त्रयोदशाङ्गानि भवन्ति, तान्याह- विलास: परिसर्पश्र विधूतं शमनर्मणी। १. यह वेणीसंहार के द्वितीय अंक में दुर्योधन के कंचुकी की उक्ति है, जिसे विश्वास हो गया है कि युधिष्ठिर अवश्य विजयी होगा।
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२५ दशरूपकम् नर्मद्युतिः प्रंगमनं निरोध: पर्युपासनम् ॥३१॥ वज्रं पुष्पमुपन्यासो वर्णासंहार इत्यपि। पहले अंक में जिस बीज को डाल दिया है, जो विन्दु के रूप में प्रकटित होने वाला है, उस बीज तथा प्रयत्न से अनुगत इस प्रतिमुखसंधि के जो तेरह अङ्ग होते हैं उनका वर्णन करते हैं :- विलास, परिसर्प, विधूत, शम, नर्म, नर्मद्युति, प्रगमन, निरोध, पर्युपासन, वज्र, पुष्प, उपन्यास तथा वर्णसंहार। यथोददेशं लक्षणमाह- रत्यर्थेहा विलास: स्याद्- यथा रत्नावल्याम्-'सागरिका-हिशअ पसीद पसीद किं इमिणा आआसमेत्- फलेण दुल्लहजणप्पत्थणाणुबन्धेण।' ( हृदय, प्रसीद प्रसीद किमनेनायासमात्रफलेन दुर्लभजनप्रार्थनानुबन्धेन।') इत्युपक्रमे 'तहावि आलेखगदं तं जणं कदुअ जधासमी हिदं करिस्सम्, तहावि तस्स णत्थि अण्णो दंसणोवाउत्ति।' ('तथाप्यालेखगत तं जनं कृत्वा यथासमीहितं करिष्यामि। तथापि तस्य नास्त्यन्यो दर्शनोपाय. ।') इत्येतैर्वत्स- राजसमागमरतिं चित्रादिजन्यामप्युद्दिश्य सागरिकायाश्चेष्टाप्रयत्नोऽनुरागबीजानुगतो विलास इति। उन्हीं का नाम के साथ-साथ लक्षण कहते हैं :- रति की इच्छा को विलास अङ्ग कहते हैं। (जहाँ नायक नायिका में परस्पर एक दूसरे के प्रति रति का इच्छा व्यक्त की गई हो वहाँ विलास होगा) जैसे रलनावली में सागरिका वत्सराजसमागमरति की इच्छा को लेकर चित्रादि के द्वारा ही उसे प्राप्त करने की चेष्टा करती करती है। यह चेष्टा प्रयत्न की अवस्था से संबद्ध है तथा यहाँ रत्नावली का अनुरागरूपी बीज साथ-साथ व्यजजित हो रहा है, अतः रति की इच्छा से यहाँ विलास है। इसकी व्यअ्जना सागरिका की निम्न उक्ति से होती है-'हृदय, प्रसन्न हो, प्रसन्न हो, दुर्लभजन (वत्सराज उदयन) की इस इच्छा के आग्रह से क्या लाभ, जिसका फल केवल दुःख ही है-अर्थात् जिस वत्सराज उदयन को कभी प्राप्त नहीं किया जा सकता, उसकी इच्छा करना केवल दुःख के ही लिए है।' फिर भी उसे चित्रित कर इच्छानुसार अवश्य करूँगी, फिर भी उसे देखने का कोई दूसरा उपाय नहीं है।' अथ परिसर्प :- दृष्टनष्टानुसर्पणम् ॥३२॥ परिसर्प :- यथा वेणीसंहारे-'कश्रुकी-योऽयमुद्यतेषु बलवत्सु, अथवा किं बलवत्सु वासुदेव- सहायेष्वरिष्वद्याप्यन्तःपुरसुखमनुभवति, इदमपरमयथातर्थं स्वामिन :- (१) 'प्रगयणम्' इत्यपि पाठः । ( २ ) 'रत्युत्थेहा' इत्यपि पाठः । १. संस्कृत टीकाकार सुदर्शनाचार्य 'रत्यर्थेहा' का अर्थ 'सुरतार्थेच्छा' करते हैं, किन्तु रति का अर्थ सामान्यनिष्ठ ही लेना ठीक होगा, सुरत के प्रकरण में विशेषनिष्ठ नहीं, यह हमारा मत है। वैसे वात्स्यायन मैथुन कई तरह के मानते हैं-दर्शनादि भी। लेकिन लौकिक अर्थ में सुरत केवल एक ही प्रकार का मैथुन है।
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प्रथम: प्रकाश: २६
'आशसत्रम्हणादकुण्ठपरशोस्तस्या प जेता मुने- स्तापायास्य न पाण्डुसूनुभिरयं भीष्मः शरैः शायितः । प्रौढानेकधनुर्धरारिविजयश्रान्तस्य चैकाकिनो बालस्यायमरातिलू नघनुषः प्रीतोऽभिमन्योर्वधात् ।।' इत्यनेन भीष्मादिवधे दृष्टस्याभिमन्युवघान्नष्टस्य बलवतां पाण्डवानां वासुदेवसहा- यानां सडग्रामलक्षण बिन्दुबीजप्रयत्नान्वयेन कञचुकिमुखेन बीजानुसर्पणं परिसर्प इति। थथा च रत्नावल्यां सारिकावचनचित्रदर्शनाभ्यां सागरिकानुरागबीजस्य दृष्टनष्टस्य 'क्वासौ क्वासौ' इत्यादिना वत्सराजेंनानुसरणात्परिसर्प इति। जब बीज एक बार दष्ट हो गया हो, किन्तु फिर दिखाई देकर नष्ट हो जाय, और उसकी खोज की जाय, तो यह खोज परिसर्प कहलाती है। जैसे वेणीसंहार में द्वितीय अंक में भीष्मादि के मरण से बीज दृष्ट हो गया था, किन्तु अभिमन्यु के वध से वह फिर से नष्ट हो गया। किन्तु कृष्ण की सहायता से युक्त, बलवान् पाण्डवों के युद्धरूप बिन्दु, बीज तथा प्रयत्न के सम्पर्क से कंचुको के मुख से निम्न पद् में फिर से बोज की खोज की गई है, इसलिये यहाँ परिसर्प नामक प्रतिमुखांग मानना होगा- जिन मुनि परशुराम का परशु शस्त्रग्रहण के समय से कभी किसी के आगे कुण्ठित न हुवा, उन्हीं परशुराम को जीतने वाले भीष्म का पाण्डुपुत्रों के द्वारा बाणों से गिरा देना इस दुर्योधन को दुखी न बना सका। वहो दुर्योधन अनेकों प्रौढ़ धनुर्धर शत्रुओं के विजय से थके हुए, शत्रुओं के द्वारा काटे गये धनुष वाले, अकेले बालक अभिमन्यु के मारे जाने से प्रसन्न हो रहा है। और जैसे रत्नावली में, मैना के बचन तथा चित्रदर्शन के द्वारा सागरिका का अनुराग बीज क्रम से दृष्ट तथा नष्ट हो गया है, उसी की 'वह कहाँ है, वह कहाँ है' कहकर वत्सराज के द्वारा खोज की जाती है, अतः यहाँ परिसर्प अङ्ग है। अथ विधूतम्- -विधूतं स्यादरति :- यथा रत्नावल्याम्-'सागरिका-सहि अहिअं मे संतावो बाधेदि। ( 'सखि ! अधिकं मे संतापो बाधते।') (सुसङ्गता दीर्घिकातो नलिनीदलानि मृणालिकाथ्वानी- यास्या अङ्गे ददाति ) सागरिका-(तानि क्षिपन्ती ) सहि! अरवरोहि एदाइं किं अपरआर्प्रार रो अत्ताणं आयासेसि णं भणामि-( 'सखि ! अपनयैतानि किमकारण आत्मानमायास - यसि। ननु भणामि- ) स)'दुल्नहजणाणुराओ लज्जा गरुई परव्वसो अप्पा। पिश्रसहि विसमं पेम्मं मरणं सरणं णवर एकम्।।' (दुर्लभजनानुरागो लज्जा गुर्ची परवश आरपात्मा। प्रियसखि विषमं प्रेम मरणं शरणं केवलमेकम्' ॥ ह इत्यनेन सागरिकाया बीजान्वयेन शीतोपचारविधूननाद्विधूतम्। यथा च वेणीसंहारे भानुमत्या दुःस्वप्नदर्शनेन दुर्योधनस्यानिष्टशङ्कया पाण्डव- विजयशङ्कया वा रतेरविधूननमिति। जहाँ अरति हो वहाँ विधूत नामक अङ्ग होता है। (अरति से यह तात्पर्य है कि
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३० दशरूपकम्
बीज के नष्ट होने पर पात्र उससे दुःखित होकर लक्ष्य को अलक्ष्य मान कर उसकी इच्छा छोड़ देता है; इसी को विधूत कहते हैं; जहाँ रति का विधूनन कर दिया गया हो।) जैसे रत्नावली में सागरिका का अनुराग बीज अरति के कारण विधूत कर दिया गया है। कामपीड़ासंतप्त सागरिका अपनी सखी सुसंगता से कहती है-'सखि, मुझे बड़ी ताप-पीड़ा हो रही है।' (सुसंगता बावली से कमल के पत्तों और मृणालों को लाकर इसके [अङ्ग पर रखती है)। सागरिका-(उन्हें फेंकती हुई) सखि, इन्हें हटाले, व्यर्थ में ही क्यों अपने आपको तकलीफ दे रही है। मैं मच कहती हूँ-हे प्रियसखि, दुर्लभ व्यक्ति के प्रति प्रेम, गहरी लाज, पराधीन आत्मा, (इस प्रकार की स्थिति में) प्रेम विषम है, ठीक नहीं है, अब तो केवल एक मरना ही (मेरी) शरण है। यहाँ सागरिका ने बीजान्वय से शीतोपचार को हटा दिया है, अतः यह विधूत है। और जैसे वेणीसंहार में दूसरे अङ्क में बुरा स्वप्न देखने पर दुर्योधन की पत्नी भानुमती की रति इसलिए विधूत हो जाती है कि या तो वह दुर्योधन के अनिष्ट से आशंकित हो जाती है, या पाण्डवों के विजय की आशंका से भयभीत हो उठती है। अथ शम :- - तच्छमः शम:। क तस्या अरतेरुपशमः शमो यथा रत्नावल्याम्-'राजा-वयस्य ! अनया लिखि- तोऽहमिति यत्सत्यमात्मन्यपि मे बहुमानस्तत्कथं न पश्यामि।' इति प्रक्रमे 'सागरिका- (आत्मगतम् ) हिअश ! समस्सस मणोरहोवि दे एत्तिअं भूमि ण गदो।' ('हृदय ! समाश्वसिहि मनोरथोऽपि त एवावतींभूमिं न गतः ।') इति किंचिदरत्युपशमाच्छम इति। जब उस अरति की शान्ति हो जाती है, वह शम नामक प्रतिमुखाङ्ग है। जैसे रत्नावली में; जब सागरिका अपने प्रति राजा की रति जान लेती है, तो उसकी अरति शान्त हो जाती है; (क्योंकि उसे वत्सराज की प्राति की आशा हो जाती है।) यह शम नामक प्रतिमुखाङ्ग इन पंक्तियों से स्पष्ट है- राजा-मित्र, इसने मेरा चित्र बनाया है, इस बात से सचमुच मुझे अपने आप पर गर्व है, तो अब मैं इस चित्रफलक को क्यों न देखूँगा। सागरिका (सुनकर-अपने आप) हृदय, आश्वस्त रह्द, तेरी इच्छा भी इतनी ऊँची मंजिल तक न पहुँच पाई है। अथ नर्म- क। परिहासवचो नर्म- यथा रत्नावल्याम्-'सुसज्गता-सहि ! जस्स कए तुमं आशदा सो अअं पुरदो चिद्ठदि।' ('सखि ! यस्य कृते त्वमागता सोऽयं पुरतस्तिष्ठति') सागरिका-(सासूयम्) सुसङ्दे। कस्स कए अहं आशदा। ( 'सुसङते ! कस्य कृतेऽहमागता।') सुसङ्दा- अइ अप्पसंकिदे! णं चित्तफलगस्स ता गेण्ह एदम्। ( 'अयि आत्मशङ्ठिते! ननु चित्रफलकस्य। तद्गृहाणैतत्।') इत्यनेन बीजान्वितं परिहासवचनं नर्म। १. यहाँ धनिक ने 'शीतोपचार विधूननात विधूतम्' लिखा है हमारा मत है कि गाथा में प्रिय को दुलभ बताया है, तथा इसके द्वारा 'अरति' की व्यजना हो रही है, अतः हमें 'विधूत' का कारण यों ठीक जान पड़ता है-'प्रियस्य दुर्लभत्वेन आत्मपारवश्यादिना च सचितेन प्रेम्णो विषमत्वेनारतेव्यञ्जनाद विधूतं; यद्वा विषमत्वविशेषणेन प्रेम्णो विधूननाद्विधूतम्।'
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प्रथम: प्रकाश: ३१
( यथा च वेणीसंहारे-'( दुर्योघनश्रेटीहस्तादर्घपात्रमादाय देव्याः समर्पयति पुनः) भानुमति-(अरर्घं दत्त्वा ) हला ! उवरोहि मे कुसुमाईं जाव अवराणं पि देवाणं सवरि- णिवत्तेमि। ( 'हला उपनय मे कुसुमानि यावदपरेषामपि देवानां सपर्यां निवर्तयामि।') (हस्तौ प्रसारयति, दुर्योघनः पुष्पाण्युपनयति, भानुमत्यास्ततस्पर्शजातकम्पाया हस्तात्पुष्पाणि पतन्ति ।)' इत्यनेन नर्मणा दुःस्वप्नदर्शनोपशमार्थ देवतापूजाविध्नकारिणा बीजोद्वाटना- त्परिहासस्य प्रतिमुखाङ्गत्वं युक्तमिति। नर्म से तात्पर्य परिहास के वचनों से है। (नर्म के अंतर्गत पात्रों का परिहास पाया जाता है।) जैसे रत्नावली नाटिका में इस वार्तालाप से नर्म की व्यज्ना हो रही है।ामर 'सुसंगता-जिसके लिए तुम आई हो, वह तुम्हारे सामने ही है। सागरिका-(रत्नावली) सुसंगता, मैं किसके लिये आई हूँ? सुसंगता-अरी अपने आप पर बहम करने वाली, इस चित्रफल के लिये। तो इसे ले लो।' यह परिहास वचन यहाँ बीज से संबद्ध है, यहाँ नम नामक प्रतिमुखांग है। और जैसे वेगीसंहार में, जब भानुमती देवपूजा कर रही है, तो दुर्योधन वहाँ पहुँच कर चुपचाप दासी के हाथ से अर्धपात्र लेकर भानुमती को सौंपता है। भानुमती (अर्घ देखकर) अरी दासी, जरा फूल लाओ, मैं दूसरे देवताओं की पूजन कर लूं। (भानुमती पुष्प लेने को हाथ बढ़ाती है, दुर्योधन पुष्पों को सौंपता है; उसके स्पर्श से कम्पित भानुमती के हाथ से फूल गिर जाते हैं।) यहाँ भानुमती दुःस्वप्नदर्शन की शान्ति के लिए देव-पूजा कर रही है, किन्तु यह दुर्योधनकृत परिहासरूप नरम उस पूजा में विध्न उपस्थित कर बीज का ही उद्धाटन कर रहा है। यह परिहास प्रतिमुखांग रूप नर्म ही है। अथ नर्मद्युति :- -घृतिस्तज्ा द्युतिर्मता॥ ३३ ॥ यथा रत्नावल्याम्-'सुसग्गता-सहि अदिणिठ्ठरा दाणि सि तुमम् जा एवं पि भट्टिणाहत्थाचलम्बिदा कोवं ण मुश्सि। (सहि ! अतिनिष्ठुरेदानीमसि त्वं यैवमपि भर्त्रा हस्तावलम्बिता कोपं न मुश्सि।') सागरिका-(सभ्रूभज्ञमीषद्विहस्य) सुसन्नदे! दाणिं पि ण विरमसि।' ( 'सुसङते ! इदानीमपि न विरमसि ।') इत्यनेनानुरागबीजो- द्वाटनान्वयेन धृतिर्नर्मजा द्तिरिति दर्शितमिति। धैर्य की स्थिति नर्मद्युति कहलाती है। (नर्मद्ुति के अन्तर्गत पात्र में धैर्य का संचार पाया जाता है।) जैसे रत्नावली की निम्न पंक्तियों में धृति के द्वारा अनुराग बीज उद्धाटित हो रहा है, यहाँ परिहास से उत्पन्न द्युति (नर्मद्युति) पाई जाती है। सुसंगता-सखि, तुम अब बड़ी निष्ठुर हो गई हो, जो स्वामी के इस प्रकार हाथ से पकड़े जाने पर भी गुस्से को नहीं छोड़ती। सागरिका (टेढ़ी भौंहे करके, कुछ हँस कर)-सुसंगता, अब भी चुप नहीं रहती। अथ प्रगमनम्- उत्तरा वाक्प्रगमनम्- यथा रत्नावल्याम्-'विदूषकः-भो वश्र्स्स! दिह्विश वढसे । ( 'भो वयस्य ! (१) 'प्रगयणम्' इत्यपि पाठः।
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३२ दशरूपकम्
दिष्टया वर्घसे।' ) राजा-(सकौतुकम्) वयस्य ! किमेतत्। विदूषक :- भो ! एदं व्खु तं जं मए भणिदं तुमं एव्व आलिहिदो को अण्णो कुसुमाउहव्ववदेसेण णिह्वी- अदि।' ('भो: ! एतत्खलु तद्यन्मया भणितं त्वमेवालिखितः कोऽन्यः कुसुमायुधव्यपदे- शेन निहूयते।') इत्यादिना 'परिच्युतस्तत्कुचकुम्भमध्यात्कं शोषमायासि मृणालहार ।। न सूक्ष्मतन्तोरपि तावकस्य तत्रावकाशो भवतः किमु स्यात् ॥' इत्यनेन राजविदूष कसागरिकासुसज्गतानामन्योन्यवचनेनोत्त रोत्तर नुरा गबी जो द्वाट ना -र त्प्रगमनमिति। जहाँ पात्रों में परस्पर उत्तरोत्तर वचन पाये जायँ (जिनसे बीज का साहाय्य प्रति- पादित हो), वहाँ प्रगमन होता है। जैसे रत्नावली नाटिका में विदूषक व राजा, सागरिका व सुसंगता के परस्पर उत्तरोत्तर वचन अनुराग बीज को प्रगट करते हैं, अतः वहाँ प्रगमन है। प्रगमन की व्यंजना विदूषक व राजा की इस बातचीत से हो रही है- विदूषक-मित्र, बड़ी खुशी की वात है; तुम्हारी वृद्धि हो रही है। राजा-(कौतुक से) मित्र, क्या बात है। विदूषक-अरे, यह वही है जो मैंने कहा था कि इस चित्र में तुम्हीं चित्रित हो, कामदेव के नाम से और दूसरे किस व्यक्ति को छिपाया गया है। राजा-हे मृणालहार, उसके वक्षःस्थल के बीच से गिर कर क्यों सूख रहा है। अरे जहाँ तेरे सूक्ष्म तन्तु के लिए भी जगह नहीं, वहाँ तुम्हारी गुंजायश कैसे हो सकती है। अथ निरोध :- -हितरोधो निरोधनम्। यथा रत्नावल्याम्-'राजा-घिड्मूर्ख! प्राप्ता कथमपि दैवात्कण्ठमनीतैव सा प्रकटरागा। रत्नावलीव कान्ता मम हस्तादुभ्रंशिता भवता ।।' इत्यनेन वत्सराजस्य सागरिकासमागमरूपहितस्य वासवदत्ताप्रवेशसूचकेन विदूषक- वचसा निरोधान्निरोधनमिति। हित की रोक (रोध) हो जाने पर निरोधन होता है। (प्राप्तव्य वस्तु की प्राप्ति से नायकादि को रोक दिया जाय उसमें अवरोध उत्पन्न कर दिया जाय, वहाँ निरोधन होगा।) जैसे रत्नावली में सागरिकासमागम वत्सराज का अभीष्ट हित है; किन्तु वासवदत्ता के प्रवेश की सूचना देकर विदूषक उसमें अवरोध उत्पन्न कर देता है। अतः वहाँ निरोधन है, जिसकी व्यंजना राजा की निम्न उक्ति से होती है- 'मूर्ख तुझे धिक्कार है। किसी तरह दैव की कृपा से प्राप्त, अनुराग से युक्त (जिसका प्रेम प्रकट हो गया है); प्रिया (सागरिका) को मैं कण्ठ से भी न लगा पाया था कि तूने उसे उसी तरह हाथ से गँवा दिया जैसे दैववश प्राप्त, उज्ज्वल रत्नावली (रत्नमाला) को गले में डालने के पहले ही गँवा दिया जाय।' अथ पर्युपासनम्- पर्युपास्तिरनुनय :- यथा रत्नावल्याम्-'राजा- नर ( P)
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प्रसीदेति ब्रूयामिदमसति कोपे न घटते करिष्याम्येवं नो पुनरिति भवेदभ्युपगमः।70VE Typ न मे दोषोऽस्तीति त्वमिदमपि हि ज्ञास्यसि मृषा किमेतस्मिन् वक्तुं क्षममिति न वेघि प्रियतमे॥' प2्ट क्रीकि इत्यनेन चित्र गतयोर्नायकयोदर्शनात्कुपिताया वासवदत्ताया अनुनयनं नायकयोरनुरा- गोद्वाटान्वयेन पर्युपासनमिति। (नायकादि के द्वारा किसी का) अनुनय-विनय पर्युपास्ति या पर्युपासन कहलाता है। (प्राप्तव्य के निरोध पर नायकादि उस अवरोध के निवारण के लिए, इस अंग के अंतर्गत अनुनय करते हैं।) जैसे रत्नावली नाटिका में; वत्सराज व सागरिका का एक चित्र में आलेखन देखकर वासवदत्ता क्रुद्ध हो जाती है। राजा उसका अनुनय करता है। यह अनुनय उन (वत्सराज सागरिका) दोनों के प्रेम को प्रकट कर उसका साहाय्य संपादित करता है, अतः यह पर्युपासन है। इसकी व्यंजना राजा की उक्ति के निम्न पद्य में हुई है। 'हे वासवदत्ते, 'तुम खुश हो जावो' यह कहना इसलिए ठीक नहीं है, कि तुम नाराज नहीं हो। 'मैं ऐसा फिर कभी नहीं करूँगा' यह कहने पर अपराध स्वीकार करना हो जाता है। 'मेरा कोई दोष नहीं है' ऐसा कहने पर तुम इसे भी झूठ समझोगी। इसलिये हे प्रियतमे, इस मौके पर मुझे क्या कहना चाहिए यह भी नहीं जानता।' अथ पुष्पम्- -पुष्पं वाक्यं विशेषचत्॥ ३४॥ प यथा रत्नावल्याम्-'( राजा सागरिकां हस्ते गृहीत्वा स्पर्श नाटयति) विदूषक :- भो ! एसा अपुव्वा सिरी तए समासादिदा। ('भोः! एषापूर्वा श्रीस्त्वया समासादिता!') राजा-वयस्य ! सत्यम्। श्रीरेषा पाणिरप्यस्याः पारिजातस्य पल्लवः। हर कुतोSन्यथा स्रवत्येष स्वेदच्छद्यामृतद्रवः ॥' इत्यनेन नायकयो: साक्षादन्योन्यदर्शनादिना सविशेषानुरागोद्वाटनात्पुष्पम्। F) जहाँ विशिष्ट वाक्यों द्वारा बीजोदघाटन हो, अथवा जहाँ पर वाक्य विशेष रूप बीजोद्घाटन से करे, वह पुष्प कहलाता है। (प्रथम अंक में निक्षिप्त बीज पल्लवित होकर, इस अंग में पुष्पोत्पत्ति करता है-जिस तरह वृक्ष में पुष्पाविर्भाव भावीफलप्राप्ति का साहाय्य सम्पादित करता है, वैसे रूपक में यह अंग भी है।) जैसे रत्नावली नाटिका में उदयन व सागरिका का अनुराग परस्पर दर्शन आदि से विशेष रूप में प्रकट हो जाता है। इस पुष्प की सूचना विदूषक व वत्सराज का निम्न कथनोप- कथन देता है। (राजा सागरिका को हाथ से स्पर्श करने का अभिनय करता है।) विदूषक-अरे मित्र, तुमने तो अपूर्व श्रीको पा लिया है। राजा-मित्र सच कहते हो। यह श्री है, और इसका हाथ कल्पवृक्ष का पछठव है। नहों तो, यह (हाथ) स्वेद के व्याज से अमृतद्रव को कैसे (कहाँ से) छोड़ता है।!) ५ द०
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३४ दशरूपकम्
अथोपन्यास :- उपन्यासस्तु सोपायम्- मफ़ीशर की शीहार
यथा रत्नावल्याम्-'सुसङ्गता-भट्टा ! अलं सक्काए मए वि भटिणो पसाएण कीलिदं एव्व ता किं कण्णाभअरोण अदो वि मे गरुश पसाओ जं कीस तए अहं एत्थ आलिहिअ ति कुविआ मे पिशसही साअरिय ता पसादीअदु।' ( 'भर्तः। अलं शङ्या मयापि भर्तु: प्रसादेन क्रीडितमेव तर्रिक कर्णाभररोन, अतोऽपि मे गुरुः प्रसादो यत्कथं त्वयाहमत्रालिखितेति कुपिता मे प्रियसखी सागरिका तत्प्रसादयताम्।') इत्यनेन सुसज्नतावचसा सागरिका मया लिखिता सागरिकया च त्वमिति सूचयता प्रसादोपन्यासेन बीजोद्द्ेदादुपन्यास इति। उपाययुक्तक या हैतुप्रदर्शक वाक्य उपन्यास कहलाता है। जैसे रत्नावली में सुसंगता यह बता कर कि चित्र में सागरिका मैंने आलिखित की है और सागरिका ने तुम; इस वाक्य में प्रसन्नता (हेतु) का उपन्यास कर बीज का उद्भेद किया है। अतः सुसंगता की इस उक्ति में उपन्यास है- क3क'स्वामिन्, सन्देह न करें, मुझे भी तो आपकी खुशी से प्रसन्नता है, इस कर्णाभूषण की क्या जरूरत है। इससे ज्यादा खुशी तो मुझे इसमें दोगी कि आप मेरी प्यारी सखी सागरिका को खुश करें, क्योंकि वह मुझ से इसलिए नाराज है कि मैंने उसे इस चित्र में आलिखित कर दिया है।' -वज्रं प्रत्यक्षनिष्ठुरम्। यथा रत्नावल्याम्-'वासवदत्ता-(फलक निर्दिश्य) अज्जउत्त! एसाचि जा तुह समीवे एदं किं वसन्तअ्स्स विण्णाणम्।' (आर्यपुत्र! एषापि या तव समीपे एतर्रिक वसन्तकस्य विज्ञानम्।') पुनः 'अज्जउत्त ! ममावि एदं चित्तकम्म पेक्खन्तीए सीसवेअणा समुप्पण्णा ।' (आर्यपुत्र! ममाप्येतच्चित्रकर्म पश्यन्त्याः शीर्षवेदना समुत्पन्ना।') इत्यनेन वासवदत्तया वत्सराजस्य सागरिकानुरागोद्द्ेद्दनात्प्रत्यक्षनिष्ठुरा- भिधानं वज्रमिति। जहाँ नायकादि के प्रति कोई पात्र प्रत्यक्षरूप में निष्ठुर वचन का प्रयोग करे वह (वञ्र के समान तीचण व मर्मभेदी) वाक्य वज्र कहलाता है। जैसे रत्नावली में वासवदत्ता उन दोनों के प्रेम को जान कर क्रुद्ध होती हुई निम्न कट वचनों को वत्सराज से कहती हैं, यहाँ वज्र प्रतिमुखाङ्ग है। '(चित्रफलक को दिखा कर) आर्यपुत्र, यह (सागरिका) तुम्हारे पास जो (चित्रित) है, क्या वह तुम्हारे मित्र वसन्तक (विदूषक) की करामात (कौशल; विज्ञान) है? X X X आर्यपुत्र, मेरे भी इस चित्रकर्म को देख कर सिरदर्द हो आया है।' अथ च्णसंहार :- चातुर्वर्ण्योषगमनं चर्णसंहार इष्यते ॥ ३५॥ यथा वीरचरिते तृतीयेऽक्के- 'परिषदियमृषीणामेष वृद्धो युधाजित सह नृपतिरमात्यैर्लोमपादश् वृद्धः। (१) 'प्रसादनमुपन्यासः' इति पाठान्तरम्। 05 X
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अयमविरतयज्ञो ब्रह्मवादी पुराण: मीp प। के पि प्रभुरपि जनकानामद्गहो याचकास्ते ।' ।। इत्यनेन ऋषिक्ष त्रियामात्यादीनां संगतानां वर्णानां चचसा रामविजय शंसिनः परशु- रामदुर्णयस्या द्रोहयाच्जाद्वारेणोद्ध नाद्वर्णसंहार इति । एतानि च त्रयोदश प्रतिमुखाज्वानि मुखसंध्युपक्षिप्तविन्दुलक्षणावान्तरवीजमहाबीज- प्रयत्मानुगतानि विधेयानि। एतेषां च मध्ये परिसर्पप्रशमवज्जोपन्यासपुष्पा्णा प्राघान्यम्, इतरेषां यथासंभवं प्रयोग इति। जहाँ चारों वर्ण (ब्राह्मणादि वर्ण) एक साथ एकत्रित हों, वहाँ वर्णसंहार होता है। जैसे महावीरचरित के तृतीय अङ्क में ऋषि, क्षत्रिय, अमात्य आदि (चारों) वर्ण इकट्ठे होकर वचनों के द्वारा रामविजय की आशंसा वाले परशुराम के गुस्से की शान्ति की प्रार्थना करते हैं। अतः यहाँ वर्णसंहार है, जिसकी सूचना उस अक्क के निम्न पद्य से हुई है। 'यह ऋषियों का समाज, यह बूढ़ा युधाजित्; अमात्यगण के साथ राजा, और बूढ़े लोमपाद, और यह निरन्तर यज्ञ करने चाले, पुराने (विख्यात) आत्मज्ञानी जनकों के राजा (राजा जनक) भी द्रौहरहित आपकी प्रार्थना करते हैं।' प्रतिमुखसन्धि के ये तेरह अङ्ग, मुखसन्धि के द्वारा डाले गये विन्दु रूप दूसरे बीज, महाबीज तथा प्रयत्न के साथ-साथ उपनिबद् किये जाने चाहिये। इनमें से परिसर्प, प्रशम, वज्र, उपन्यास तथा पुष्प प्रधान हैं; बाकी अङ्गों का प्रयोग यथा संभव हो सकता है। शक् अथ गर्भसंधिमाह- गर्भस्तु दृष्टनष्टस्य बीजस्यान्वेषणं मुहु:। द्वादशाङ्: पताका स्यान्न वा स्यात्माप्तिसंभव: ॥ ३६॥ प्रतिमुखसंघौ लच्यालदयरूपतया स्तोकोद्धिच्स्य वीजस्य सविशेषो द्ेदपूर्वकः सान्त- रायो लाभ: पुनर्विच्छेद: पुनः प्राप्ति: पुनर्विच्छेद: पुनथ् तस्यवान्वेषण वारंवार सोऽ- निर्धारितैकान्तफलप्राप्त्याशात्मको गर्भसंधिरिति। तत्र चौत्सर्गिकत्वेन प्राप्तायाः पताकाया अ्रनियमं दर्शयति-'पताका स्यान् वा' इत्यनेन। प्राप्तिसंभवस्तु स्यादेवेति दर्शयति- 'स्यात्' इति। यथा रत्नावल्यां तृतीयेऽक्वे वत्सराजस्य वासवदत्तालक्षणापायेन तद्वेष- परिप्रहसागरिकाभिसरणोपायेन च विदूषकवचसा सागरिकाप्राप्त्याशा प्रथमं पुनर्वासव- दत्तया विच्छेद: पुनः प्राप्ति: पुनर्विच्छेद: पुनरपायनिवारणोपायान्वेषणम् 'नास्ति देवी- प्रसादनं मुक्त्वान्य उपायः' इत्यनेन दर्शितमिति। जब बीज के दिखने के बाद फिर से नष्ट हो जाने पर उसका अन्वेषण बार-बार किया जाता है, तो गर्भसंधि होती है। यह गर्भसंधि बारह अङ्गों वाली होती है। इसमें वैसे तो पताका (अर्थप्रकृति) तथा प्राप्तिसम्भव (अवस्था) का मिश्रण पाया जाता है; किन्तु पताका का होना अनिवार्य नहीं; वह हो भी सकती है, नहीं भी; किन्तु प्राप्तिसंभव का होना बहुत जरूरी है। जिस बीज को प्रतिमुखसन्धि में कभी पनपता और कभी मुरझाता (लक्ष्यालक्ष्य रूप में) देखा गया है, क्योंकि वह बहुत थोड़ा फूटा है; वही बीज यहाँ आकर विशेष रूप से फूट पढ़ता है। किन्तु फललाभ विश्नरहित नहीं है; इसमें कभी तो विच्छेद (विन्र) होता है, फिर से उसकी प्रात्ति होती है, फिर वियोग (विच्छेद) हो जाता है, और इस प्रकार बार-बार उसी की
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खोज की जाती है। यहाँ प्राप्ति की सम्भावना तो होती है, किन्तु फल का ऐकान्तिक निश्चय नहीं हो पाता। यह गर्भसन्धि की विशेषता है। यहाँ पताका का होना आवश्यक नहीं है। इसका निदर्शन 'पताका हो या न हो' ( पताका स्यान्न वा) इसके द्वारा किया गया है। प्राप्तिसंभव तो होना ही चाहिए इसकी सूचना 'स्यात्' के द्वारा की गई है। जैसे रत्नावली के तीसरे अङ्क में वत्सराज की फलप्राप्ति में वासवदत्ता के द्वारा विघ्न होता है; किन्तु सागरिका के अभिसरण के उपाय से विदूषक के वचन सुनकर राजा को प्राप्ति की आशा हो आती है। पहले वासवदत्ता उसमें विच्छेद उपस्थित करती है, फिर से प्राप्ति होती है, फिर विच्छेद हो जाता है। फिर वि्न के निवारण के उपाय तथा फल-हेतु का अन्वेषर किया जाता है। इस अन्वेषण की व्यज्ञना राजा की इस उक्ति से होती है-'मित्र, अब वासवदत्ता को मानने के अलावा और कोई उपाय नहीं है।' स च द्वादशाङ्गो भवति। तान्युद्दिशति- अभूताहररं मार्गो रूपोदाहरणो क्रमः । संग्रह्चानुमानं च तोटकाधिबले तथा॥ ३७॥ उद्धेग संभ्रमात्षेपा: लक्षणं च प्रणीयते। इस गर्भसंधि के बारह अङ्ग होते हैं :- अभूताहरण, मार्ग, रूप, उदाहरण, क्रम, संग्रह, अनुमान, तोटक, अधिबल, उद्देग, संभ्रम, आत्ेप; इन अङ्गों के लक्षण (आगे) बताये जाते हैं। यथोददेशं लक्षणमाह- अभूताहरणं छुझ- यथा रत्नावल्याम्-'साधु रे अमच्च वसन्तश साधु अदिसइदो तए अमच्चो जोगन्घराअ्णो इमाए संधिविग्गहचिन्ताए।' ('साधु रे अमात्य वसन्तक साधु अति- शयितस्त्वयामात्यो यौगन्धरायणोऽनया संधिविग्रहचिन्तया।') इत्यादिना प्रवेशकेन गृहीतवासवदत्तावेषायाः सागरिकाया वत्सराजाभिसरणं छद्म विदूषकसुसङ्गताकलप्तकाश्चन- मालानुवादद्वारेण दर्शितमित्यभूताहरणम्। जहाँ छुद या कपट हो वहाँ अभूताहरण होता है। (कपट के द्वारा जहाँ प्राप्ति कराने की चेष्टा की जाय) जैसे रत्नावली में वासवदत्ता का वेष बना कर सागरिका वत्सराज के समीप अभिसरण करती है; इस छझ की सूचना प्रवेश की द्वारा विदूषक तथा काञ्चनमाला बनी हुई सुसंगता के कथनोपकथन से दी गई है- 'हे अमात्य वसन्तक तुम बड़े कुशल हो। इस संधि विग्रह की चिन्ता के द्वारा तुमने अमात्य यौगन्धरायण को भी जीत लिया। अथ मार्ग :- -मार्गस्तत्त्वार्थकीर्तनम् ॥३८॥ यथा रत्नावल्याम्-'विदूषकः-दिट्ठिआ वट्ठसि समीहिदव्भधिकाए कज्ज- सिद्धीए। ('दिष्टया वर्घसे समीहिताभ्यघिकया कार्यसिद्धथा।') राजा-चयस्य कुशलं प्रियायाः। विदूषक :- अइरेण सअं ज्जेव्व पेक्खिश जाणिहिसि। ('अचिरेण स्वय- मेव प्रेच्य ज्ञास्यसि।') राजा-दर्शनमपि भविष्यति। विदृषक :- (सगर्वम्) कीस ण भविस्सदि जस्स दे उवहसिदविहष्फदिबुद्धिविहवो अहं अमच्चो। ('कथ न भवि-
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व्यति यस्य त उपहसितवृहस्पतिबुद्धिविभवोऽहममायः ।') राजा-तथापि कथमिति श्रोतुमिच्छामि। विदूषकः-(कर्णे कथयति) एव्वम्।' ('एवम्') इत्यनेन यथा विदूषकेण सागरिकासमागमः सूचितः तथैव निश्चितरूपो राजे निवेदित इति तत्त्वार्थ- कथनान्मार्ग इति। जहाँ निश्चित तत्व का (अर्थप्राप्ति रूप तत्व का) कीर्तन हो, वह मार्ग है। ( यहाँ नायकादि के प्रति किसी शुभचिन्तक पात्र के द्वारा प्राप्ति के मार्ग की सूचना दी. जाती है।) जैसे रत्नावली में वासवदत्ता के वेष में सागरिकाभिसरण की सूचना देकर, विदूषक सागरिकासमागम का निश्चय राजा को दिला देता है। इस प्रकार तत्त्वार्थनिवेदन के कारण निम्न पक्कियों में मार्ग नामक गर्भाङ् है। 'विदूषक-बड़ी खुशी की बात है, तुम्हारी कार्यसिद्धि के ईप्सित ढङ्ग से पूर्ण होने से तुम्हारी वृद्धि हो रही है। राजा-वयस्य, प्रिया कुशल तो है। विदूषक-शीघ्र ही खुद ही देखकर सारी बात जान लोगे। राजा-क्या दर्शन भी होगा। विदूषक-(घमण्ड से) क्यों नहीं होगा, जब तुम्हारा मुझ जैसा मंत्री है, जिसने बृहस्पति के बुद्धिवैभव को भी तुच्छ समझ कर हँस दिया है। राजा-फिर जरा किस ढंग से यह होगा, इसे सुनना चाहता हूँ। विदूषक-(कान में कहता है) ऐसे।' अथ रूपम्- रूपं वितर्कवद्धाक्यम्- यथा रत्नावल्याम्-'राजा-अहो किमपि कामिजनस्य स्वगृहिणीसमागमपरिभा- विनोऽभिमवं जनं प्रति पक्षपातस्तथाहि- प्रणयविशरदा दृष्टिं वक्त्रे ददाति न शङ्किता घटयति घनं कण्ठाश्लेषे रसान्न पयोधरौ। वदति बहुशो गच्छामीति प्रयत्नधृताप्यहो रमयतितरां संकेतस्था तथापि हि कामिनी।। कथं चिरयति वसन्तकः किं नु खलु विदितः स्यादयं वृत्तान्तो देव्याः ।' इत्यनेन रत्नावलीसमागम प्राप्त्य।शानुगुण्येनैव देवीशड्कायाश्च वितर्काद्रूपमिति। जहाँ प्राप्ति की प्रतीक्षा करते समय नायकादि तर्कवितर्कमय वाक्यों का प्रयोग करें, उसे रूप कहते हैं। (प्राप्ति की प्रतीक्षा में कभी-कभी यह भी डर बना रहता है कि कहीं कोई विघ्न उपस्थित न हो जाय, इस द्विविध विचार की सूचना रूप में होती है।) जैसे रत्नावली में यह वित्क कि कहीं वासवदत्ता ने इस बात को न जान लिया हो, रत्नावली समागम की प्राप्त्याशा का ही साहाय्य प्रतिपादित करता है। यह वितर्करूप इन पंक्तियों में सचित है। 'राजा-अपनी गृहिणी (पत्नी) के समागम से परिभावित कामी मनुष्य का नये व्यक्ति (नई प्रेमिका) के प्रति किसी दूसरे ही ढंग का पक्षपात होता है; जैसे-यद्यपि (छिप कर) संकेत स्थल में अभिसरणार्थ आई हुई प्रेमिका, शक्कित होने के कारण नायक के मुख की ओर प्रेमभरी नजर से नहीं देख पाती; कण्ठ से आलिङ्गन करते समय प्रेम से स्तनों को जोर से
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दुशरूपकम् छाती से नहीं सटाती; तथा बड़ी कोशिश से रोके जाने पर भी बार-बार 'मैं जाती हूँ' इस तरह जाने का डर दिखाती है; तथापि वह कामी मनुष्य को अत्यधिक सुख पहुँचाती है, यह बड़े आश्चर्य को बात है। अथोदाहरणम्- -सोत्कर्ष स्यादुदाहतिः। यथा रत्नावल्याम्-'विदूषकः-(सहर्षम्) ही ही भो, कोसम्बीरज्जलाहेणावि ण तादिसी वश्रस्सर्स परितोसो असि यादिसो मम सआसादो पिशवअरणं सुणिश भविस्सदि ति तक्केमि।' ('ही ही भोः कौशाम्बीराज्यलाभेनापि न तादृशो चय- स्यश्य परितोष आसीत् यादृशो मम सकाशात्प्रियवचनं श्रुत्वा भविष्यतीति तर्कयामि।') इत्यनेन रत्नावलीप्राप्तिवार्तापि कौशाम्बीराज्यलाभादतिरिच्यत इत्युत्कर्षाभिघानादुदाह- तिरिति। उस्कर्ष या उन्नति से युक्त वाक्य उपाहृति या उदाहरण कहलाता है। जैसे रत्नावली में विदूषक रत्नावली प्राप्ति की बात को कौशांबीराज्य-लाभ से भी बढ़कर बताता है, अतः निम्न वाक्य सोत्कर्ष होने से उदाहरण का सूचक है- 'विदूषक-(हर्ष के साथ) हा, हा, मेरे पास से प्रियवचन सुन कर तुम्हें जितनी प्रसन्नता होगी, उतनी कौशांबी के राज्य लाभ से भी न हुई होगी।' अथ क्रम :- क्रम: संचिन्त्यमानाप्ति :- यथा रत्नावल्याम्-'राजा-उपनतप्रियासमागमोत्सवस्यापि मे किमिद्मत्यर्थमु- ताम्यति चेतः, अथवा- तीव्रः स्मरसंतापो न तथादौ बाघते यथासन्ने। कही
तपति प्रावृषि सुतरामभ्यर्णजलागमो दिवसः ॥ विदूषक :- (आकर्ण्य) भोदि सागरिए। एसो पिश्रवश्रस्सो तुमं ज्जेव उहि- सिशर उक्कण्ठाणिन्भरं मन्तेदि। ता निवेदेमि से तुहागमणम्।' ('भवति सागरिके! एष प्रियवयस्यरुत्वामेवोद्दिश्योत्कण्ठानिर्भर मन्त्रयति तन्निवेदयामि तस्मै तवागमनम्') इत्यनेन वत्सराजस्य सागरिकासमागममभिलषत एव भ्रन्तसागरिकाप्राप्तिरिति क्रमः । जहाँ आप्ति (इष्ट वस्तु की प्राप्ति) का चिन्तन किया जाय, तथा वह वस्तु प्राप्त हो जाय वहाँ क्रम नामक गर्भसन्धि का अङ्ग होता है। जैसे रत्नावली में निम्न पंक्तियों में वत्सराज सागरिका के समागम की अभिलाषा ही कर रहा था, कि भ्रान्त सागरिका (सागरिका के रूप में वासवदत्ता) आ जाती है, अतः क्रम है। 'राजा-प्रियासमागम के उत्सव के नजदीक आ जाने पर भी मेरा चित्त इतना ज्यादा बेचैन क्यों हो रहा है। अथवा, कामदेव की तीव्र पीड़ा आरम्भ में उतना नहीं सताती जितना इष्ट वस्तु के आने के काल के नजदीक होने पर। (सच है) बादलों के बरसने के पहले का दिन बरसात में बहुत तपा करता है। 5 विदूषक-(सुन कर) अरी सागरिके, यह प्रियवयस्य तुम्हें ही उद्देश करके बड़े उत्कण्ठित ढंग से चिन्ता कर रहा है। इसलिये, मैं तुम्हारे आगमन की सूचना इन्हें दे देता हूँ।'
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अथ क्रमान्तरं मतमेदेन- IFIP fit) -भावज्ञानमथापरे॥ ३॥गा यथा रत्नावल्याम्-'राजा-(उपसृत्य) प्रिये सागरिके। शीतांशुर्मुखमुत्पले तव दशौ पद्मानुकारौ करौ रम्भागर्भनिभं तवोरुयुगलं बाहू भृणालोपमौ।
मङ्गानि त्वमनङ्गतापविधुराण्येह्ेहि निर्वापय ।' इत्यादिना 'इह तदप्यरुत्येव बिम्बाघरे' इत्यन्तेन वासवदत्तय। वत्सराजभावस्य ज्ञातत्वात्क्रमान्तरमिति। दूसरे लोगों के मत से क्रम की परिभाषा भिन्न है। वे (दूसरे लोग) भाव के ज्ञान को क्रम मानते हैं। (इस मत के अनुसार जहाँ दूसरे पात्र के द्वारा नायकादि के भाव का ज्ञान हो जाय, वहाँ क्रम होता।) जैसे रत्नावली में वासवदत्ता (जो कि सागरिका की जगह स्वयं संकेत स्थल पर आ जाती है) निम्न पद्य से वत्सराज उदयन के रत्नावली विषयक अनुराग- भाव को जान जाती है अतः क्रम है। राजा-(नजदीक जाकर) प्रिये सागरिके, तेरा मुख चन्द्रमा है; तुम्हारी दोनों आँखें कमल हैं; तुम्हारे दोनों करतल प्रद्म के समान है; तुम्हारी दोनों जांघे केल के गर्भ के सदृश हैं; और तुम्हारे दोनों हाथ (बाजू) मृणाल के समान हैं। इस तरह तुम्हारे सारे अङ्ग ('मुझे) आह्लाद देने वाले हैं; हे आह्लादकराखिलांगि, आओ, आओ, निःशङ्क और शीघ्रता से मेरा आलिड्गन कर कामताग से पीड़ित मेरे अङ्गों को शान्त करो ।X X X 'इस विम्बाधर में वह मी मौजूद है ही।' अथ संग्रह :- संग्रह: सामदानोक्ि :- यथा रत्नावल्याम्-'साधु वयस्य ! साधु इदं ते पारितोषिकं कटकं ददामि।' इत्याभ्यां सामदानाभ्यां विदूषकस्य सागरिकासमागमकारिणः संप्रहात्संप्रह इति। जहाँ नायकादि अनुकूल आचरण करने वाले पात्र को साम व दान से प्रसन्न करें, वहाँ साम व दान की उक्ति संग्रह कहलाती है। जैसे रत्नावली में राजा सागरिका का समागम कराने वाले विदूषक को साम व दान से संग्ृहीत करता है, अतः संग्रह है। राजा-वयस्य बहुत अच्छा, बहुत अच्छा मैं तुम्हें यह कड़ा इनाम देता हूँ। अथानुमानम्- -अभ्यूहो लिङ्गतोऽनुमा। यथा रत्नावल्याम्-'राजा-घिड् मूर्ख! त्वत्कृत एवायमापतितोSसमाकमनर्थः । कुतः- समारूढा प्रीतिः प्रणयबहुमानात्प्रतिदिनं व्यलीकं वीच्येदं कृतमकृतपूर्व खलु गया। प्रिया मुश्त्यय्य स्फुटमसहना जीवितमसौ प्रकृष्टस्य प्रेम्ण: स्खलितमविषह्यं हि भवति ॥ विदूषक :- भो वश्रस्स ! वासवदत्ता कि करइर्सदि ति ण जाणामि सागरिआ उण
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४० : दशरूपकम् दुक्करं जी वस्सदि ति तक्केमि।' ('भो वयस्य ! वासवदत्ता कि करिष्यतीति न जानामि सागरिका पुनर्टुष्करं जीविष्यतीति तर्कयामि।') इत्यत्र प्रकृष्टप्रेमस्खलनेन सागरिकानुरागजन्येन वासवदत्ताया मरणाभ्यू हनमनुमानमिति।। जहाँ किन्हीं हेतुओं (लिगों) के आधार पर नायकादि के द्वारा तर्क किया जाय, वहाँ अनुमा या अनुमान होता है। (धूम पर्वत में अग्नि की सत्ता का अनुमापक लिङ्ग हैं। 'यत्र यत्र धूमः तत्र तत्र वह्निः' इस व्याप्ति के आधार पर वह पर्वत में अझनि की सत्ता सिद्ध कर देता है-पर्वतोडयं वह्विमान् (धूमात्)। इसी तरह जहाँ किन्हीं हेतुओं से किसी भी बात का अनुमान तर्कसरणि के आधार पर हो, वहाँ अनुमान नामक गर्भाङ्ग होगा। यथा, रत्नावली नाटिका में सागरिका से प्रेम करने से राजा प्रकृष्ट प्रेम से स्खलित हो गया है, इसलिए इस बात को जान कर वासवदत्ता जिन्दी न रह सकेगी, इस प्रकार प्रकृष्ट प्रेमस्खलन हेतु के द्वारा वासवदत्तामरण का तर्क अनुमान है, जिसकी सूचना निम्न पद्य में हुई। 'राजा-धिकार है, मूर्ख, तुमने ही यह सारा अनर्थ हमारे सिर डाला है। क्योंकि; (हम दोनों का) प्रेम दिन प्रति दिन प्रेम के सम्मान करने से बढ़ गया था; मेरे द्वारा अब तक कभी न किये इस अपराध को किया देखकर यह प्रिया वासवदत्ता इसे बर्दाश्त न करती हुई आज सचमुच जीवन का त्याग कर देगी। प्रकृष्ट (बहुत बढ़े हुए) प्रेम से (एक व्यक्ति का) गिरना (दूसरे के लिए) असहनीय ही होता है।' विदूषक-हे मित्र, वासवदत्ता क्या करेगी, यह तो नहीं जानता, हाँ स रिका बड़ी मुश्किल से जिन्दी रह सकेगी इतना अनुमान जरूर करता हूँ।' अथाधिबलम्- अधिव्लमभिसंधि :- यथा रत्नावल्याम्-'काञ्नमाला-भद्विणि ! इशं सा चित्तसालिआ। ता वसन्तअस्स सण्णं करेमि ('भन्रि ! इयं सा चित्रशालिका तद्वसन्तकस्य संज्ञां करोमि।') (छोटिकां ददाति)' इत्यादिना वासवदत्ताकाश्चनमालाभ्यां सागरिकासुसङ्गतावेषाभ्यां राजविदूषकयोरभिसंधीयमानत्वादघिब लमिति। जहाँ किन्हीं पात्रों के द्वारा नायकादि का अभिप्राय जान लिया जाय, वहाँ अधिबल होता है। जैसे रत्नावली नाटिका में वासवदत्ता व काव्नमाला सागरिकाभिसरण की बात जान कर सागरिका तथा सुसंगता का वेष बनाकर संकेत स्थल (चित्रशाला) को जाती हैं। यहाँ वे दोनों राजा व विदूषक से मिलती हैं तथा उनका अभिप्रायः जान लेती हैं, अतः अधिबल है। काख्नमाला की इस उक्ति से इसकी सूचना दी गई है। 'भट्टिणि, यह वह चित्रशाला है। तो मैं वसन्तक को संकेत करती हूं।' (ताली का संकेत देती है।) अथ तोटकम्- -संरब्धं तोटकं वचः॥ ४० ॥ यथा रत्नावल्याम्-'वासवदत्ता-(उपसृत्य) अज्जउत्त ! जुत्तमिणं सरिसमिणम्।' (पुनः सरोषम्) अज्जउत्त उट्ठेहि किं अज्जवि आहिजाईए सेवादुक्खमणुभवीअदि, कंचणमाले ! एदेण ज्जेव पासेण बंघित्र आरो हि एणं दुट्ठबम्हणं। एदं पिदुट्ठकणशं 15 2. यहाँ राजा व विदूषक दोनों की उक्ति में 'अनुमान' पाया जाता है।
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अग्गदो करेहि।' ('आर्यपुत्र। युक्तमिदं सदशमिदम्। आर्यपुत्र उत्तिष्ठ किमद्याप्याभिजात्या सेवादुःखमनुभूयते, काश्नमाले । एतेनैव पाशेन बद्वानयैनं दुष्ट- ब्राह्मणम् एतामपिदुष्टपासेन बन्घित्र आरोहि एणं दुट्ठकन्यकामप्रतः कुरु।') इत्यनेन वासवदत्तासंरव्धवचसा सागरिकासमागमान्तरायभूतेनाSनियतप्राप्तिकारणं तोटकमुक्तम्। क्रोध से युक्त वचन तोटक कहलाता है। जैसे रत्नावली में सागरिकासमागम के विध्न उपस्थित करते हुए वासवदत्ता कुद्ध वचन के द्वारा उदयन की इष्टप्राप्ति को अनिश्चित बना देती है। अतः यह तोटक है। वासवदत्ता की इस उक्ति में तोटक है-'(आगे बढ़कर) आर्यपुत्र, यह ठीक है, आपके सदृश है। (फिर रोष से) आर्यपुत्र उठो, क्या अब भी कुलीनता सेवा दुःख का अनुभव करती है। काञ़नमाला, इसी पास से इस दुष्ट ब्राह्मण (वसन्तक) को बांध- कर ले आ, और इस दुष्ट लड़की को भी आगे कर।' यथा च वेणीसंहारे- 'प्रयत्नपरिबोधितः स्तुतिभिरय्य शेषे निशाम्' इत्यादिना 'धृतायुधो यावदहं तावदन्यैः किमायुघैः iF इत्यन्तेनान्योन्यं कर्णाश्वत्थाम्नोः संरब्घवचसा सेनामेदकारिणा पाण्डवविजयप्राध्या- शान्वितं तोटकमिति। और जैसे वेणीसंहार में कर्ण और अश्वत्थामा के परस्पर क्रुद्ध वचनों के कारण कौरवों की सेना में भेद हो जाता है, और इससे पाण्डवविजय की प्राप्त्याशा की सहायता होती है, अतः यहां तोटक है। इसका आभास अश्वत्थामा की 'तुम आज स्तुतियों के प्रयत्नों से जगाये हुए, रात को सोवोगे' इस उक्ति से लेकर 'जब तक मैं आयुध धारण किये हूं; तब तक दूसरे आयुधों से क्या लाभ' इस उक्ति तक पाया जाता है न्थान्तरे तु- तोटकस्यान्यथाभावं ब्रुवतेऽधिबलं बुधाः। यथा रत्नावल्याम्-'राजा-देवि एवमपि प्रत्यक्षदष्टव्यलीकः किं विज्ञापयामि- - आताम्रतामपनयामि विलक्ष एव लाक्षाकृतां चरणयोस्तव देवि मूर्धा। कोपोपरागजनितां तु मुखेन्दुबिम्बे हर्तु क्षमो यदि परं करुणा मयि स्यात्।।' दूसरे नाट्यशास्त्र के ग्रन्थों में अधिबल व तोटक दोनों के लक्षण भिन्न बताये गये हैं। इनके विद्वानों के मतानुसार तोटक का उलटा ही अधिबल है। दशरूपककार के मत से क्रुद्धवचन तोटक है, अतः क्रुद्धवचन का उलटा विनीत व दीन वचन, अधिबल है। ये दूसरे नाट्यशास्त्री दीन वचनों को अधिबल मानते हैं, जैसे रत्नावली में राजा की इस उक्ति में- क 'देवि, इस तरह मेरे अपराध के प्रत्यक्ष देख लेने पर मैं क्या अ्ज कर सकता हूं। हे देवि लज्जित होकर मैं अपने सिर से तुम्हारे दोनों पैरों की अलक्तक (लाक्षा) की ललाई को हटा रहा हूं। (पोंछ रहा हूं)। लेकिन क्रोध रूपी ग्रहण से पैदा हुई पूर्ण मुखचन्द्र की ललाई को तो तभी हटा सकता हूं, जब तुम्हारी विशेष दया मैरे प्रति हो जाय।' संरब्धवचनं यत्तु तोटकं तदुदाहतम्॥ ४१ ॥ ६ द०
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४२ दुशरूपकम् यथा रत्नावल्याम्-'राजा-प्रिये वासवदत्ते! प्रसीद प्रसीद। वासवदत्ता- (अश्रूणि घारयन्ती ) अ्रज्जउत्त ! मा एवं भण अण्णसङ्कन्ताइं खु एदाइं अक्खराइं ति।' '(आर्यपुत्र मैवं भण। अन्यसंक्रान्तानि खल्वेतान्यक्षराणीति।) यथा च वेणीसंहारे-'राजा-अ्रये सुन्दरक। कच्चित्कुशलमन्गराजस्य। पुरुष :- कुसलं सरीरमेत्तकेण। ('कुशलं शरीरमात्रकेण।') राजा-किं तस्य किरीटिना हता घौरेयाः, क्षतः सारथिः, भमरो वा रथः। पुरुषः-देव। ण भग्गो रहो भग्गो से मणोरहो। ('देव न भग्नो रथः । भग्नोऽस्य मनोरथः' ) राजा-(ससंभ्रमम् ) कथम्।' इत्येवमादिना संरब्धवचसा तोटकमिति। इन दूसरे पण्डितों के मत से संर्ध (उद्विग्न) वचन तोटक है। जैसे रत्नावली में- 'राजा-प्रिये, वासवदत्ते, प्रसन्न हो, प्रसन्न हो। वासवदत्ता-(आंसू भर कर) आर्यपुत्र, ऐसा मत कहो। ये अक्षर अब दूसरे के लिए हो गये हैं।' और जैसे वेणीसंहार में राजा-अरे सुन्दरक, अङ्गराज कर्ण कुशल तो हैं ? पुरुष-उनका केवल शरीर कुशल है। राजा-क्या उनके घोड़े अर्जुन ने मार दिये; सारथि घायल कर दिया, या रथ तोड़ दिया। पुरुष-देव, उनका रथ नहीं, मनोरथ तोड़ डाला। राजा-(उद्विग्न होकर) कैसे।' पथोद्वेग :- उद्गोडरिकता भीति :- यथा रत्नावल्याम्-'सागरिका-(आत्मगतम् ) कहं अकिदपुण्ेहिं अत्तणो इच्छाए मरिउं पि ण पारीशदि ।' ('कथमकृतपुण्यैरात्मन इच्छया मर्तुमपि न पार्यते।') इत्यनेन वासवदत्तातः सागरिकाया भयमित्युद्देगः । यो हि यस्यापकारी स तस्यारि:। यथा च वेणीसंहारे-'सूतः-(श्रुत्वा सभयम्) कथमासन एवासौ कौरवराज- पुत्रमहावनोत्पातमारुतो मारुतिरनुपलब्घसंज्ञब्च महाराजः, भवतु दूरमपहरामि स्यन्दनम्। कदाचिदयमनाय दुःशासन इवास्मिन्नप्यनार्यमाचरिष्यति।' इत्यरिकृता भीतिरुद्वेगः । शत्रुओं के द्वारा किया गया भय उद्देग कहलाता है। जैसे रत्नावली में वासवदत्ता सागरिका का अपकार करने वाली है अतः उसकी शत्रु है। जब वह सागरिका को पकड़ कर ले जाती है तो सागरिका को भय होता है, अतः यह उद्देग है। सागरिका की इस उक्ति में इसी का संकेत है- 'क्या पुण्य न करने के कारण इच्छा से मरा भी नहीं जाता।' और जैसे वेणीसंहार में, सृत की निम्न उक्ति उसके भय की व्यञ्ञक है। 'सुनकर डर के साथ) क्या यह कौरव राजकुमारों के महान् वन के लिए भीषण झंझावात् (प्रलय वात) के समान भीमसेन समीप ही आ गया है और महाराज बेहोश हैं। ठीक है, रथ को दूर ले जाता हूं। शायद यह दुःशासन की तरह इनके साथ भी अनुचित व्यवहार कर बैठे।' अथ संग्रम :- 11 99 ॥ FT 55-शझात्रासौ च संभ्रम:।
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प्रेथम: प्रकाश: ४३
ह यथा रत्नवल्याम्-'विदूषक :- (पश्यन्) का उण एसा। (ससंत्रमम् ) कघं देवी वासवदत्ता अत्ताणं वाचादेदि। ('का पुनरेषा ! कथं देवी वासवत्तात्मानं व्यापा दयति'।) राजा-(ससंभ्रममुपसर्पन्) क्वासौ कासौ ।' इत्यनेन वासवदत्ताबुद्धिगृही- तायाः सागरिकाया मरणशङ्कया संभ्रम इति। यथा च वेणीसहारे-'( नेपथ्ये कलकलः) अश्वत्थामा-(ससंभ्रमम्) मातुल ! मातुल ! कष्टम् । एष भ्रातुः प्रतिज्ञाभज्गभीरुः किरीटी समं शरवर्षदुर्योघनराधेयावभि- द्रवति। सर्वथा पीतं शोणितं दुःशासनस्य भीमेन।' इति शङ्का। तथा '(प्रविश्य संभ्रान्तः सप्रहारः) सूतः-त्रायतां त्रायतां कुमारः।' इति त्रासः। इत्येताभ्यां त्रास- शङ्काभ्यां दुःशासनद्रोणवधसूचकाम्यां पाण्डवविजयप्राप्याशान्वितः संत्रम इति।1 जहाँ पात्रों में शंका एवं भय का संचार हो, वहाँ संभ्रम माना जाता है। जैसे रत्नावली में वासवदत्ता की बुद्धि से गृहीत सागरिका के मरने की आशंका निम्न उक्ति में पाई जाती है, अतः यहां संभ्रम है। विदूषक-(देखकर) यह कौन है ? (घवरा कर) क्या देवी वासवदत्ता अपने आप को मार रही है ( आत्महत्या कर रही है)। राजा-(घबराइट के साथ आगे बढ़ते हुए) वह कहां है, वह कहां है। और जैसे वेणोसंहार में, तीसरे अंक में त्रास तथा शंका द्रोण तथा दुः्शासन के बध की सूचक हैं, इनसे पाण्डवों की विजय की प्राप्त्याशा अन्वित है, अतः यहां संभ्रम नामक गर्भाङ्ग है, जिसकी सूचना निम्न स्थल पर हुई है। '(नेपथ्य में कोलाहल) अश्वत्थामा (घबराकर)-मामा, मामा, बड़े दुःख की बात है। भाई की प्रतिज्ञा के भङ्ग होने से डरा हुवा यह अर्जुन बाणों की वर्षा के साथ दुर्योधन व कर्ण का पीछा कर रहा है। भीम ने सचमुच दुम्शासन का खून पी ही लिया। यहाँ अश्वत्थामा को शंका हो रही है कि भीम कहीं अपनी प्रतिज्ञा पूरी न कर ले। इसी के आगे जब चोट खाया हुवा दु:शासन का सारथि अश्वत्थामा के पास आकर उसे बचाने को कहता है-'कुमार दु:शासन की रक्षा करो, उसे बचावो', तो त्रास की अभिव्यजना होती है। अथाच्षेप :- गर्भबीजसमुद्धेदादाक्षेप: परिकीर्तितः।। ४२।। यथा रत्नावल्याम्-'राजा-वयस्य देवीप्रसादनं मुक्त्वा नान्यत्रोपायं पश्यामि।' पुनः क्रमान्तरे 'सर्वथा देवीप्रसादनं प्रति निष्प्रत्याशी भूताः स्मः पुनः। 'तत्किमिह स्थितेन देवीमेव गत्वा प्रसादयामि । इत्यनेन देवीप्रसादायत्ता सागरिकासमागमसिद्धिरिति गर्भ-
यथा च वेणीसंहारे-'सुन्दरक :- अहवा किमेत्थ देव्वं उलहामि तस्स क्खु एवं णिन्भच्छिदविदुरवअणबीअस्स परिभुदपिदामहहिदोवदेसङ्कुरस्स सउणिप्ोच्छा- हणारूढमूलस्स कूडविससाहिणो पश्चालीकेसग्गहणकुसुमस्स फलं परिणमेदि।' (अथवा किमत्र दैवमुपालभामि तस्य खल्वेतन्निर्भर्तिसितविदुरवचनबीजस्य परिभूतपितामहहितो- पदेशाङ्कुरस्य शकुनिप्रोत्साहनारूढमूलस्य कूटविषशाखिनो पाय्चालीकेशप्रहणकुसुमस्य फलं परिणमति'।) इत्यनेन बीजमेव फलोन्मुखतयाक्षिप्यत इत्याक्षेपः। शिक्ष िशनी एतानि द्वादश गर्भाज्ञानि प्रात्याशाप्रदर्शकतवेनोपनिबन्धनीयानि। एषां च मध्ये-
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४४ दशरूपकम् ड्भूताहरणमार्गतोट का घिबलाक्षेपाणां प्राघान्यम् इतरेषां यथासंभवं प्रयोग इति साङ्गो गर्भसंधिरुक:। जहां गर्भ एवं बीज, अथवा गर्भ के बीज का उद्भेद हो, जहां बीज को विशेष रूप से प्रकट किया जाय, वहां आत्तेप कहलाता है। जैसे रत्नावली में राजा की निम्न उक्ति से यह स्पष्ट होता है कि सागरिका प्राप्ति वासवदत्ता की प्रसन्नता पर ही आश्रित है। इसके द्वारा उदयन गर्भ बीज को प्रकट कर देता है, अतः यहां आक्षेप है। 'राजा-मित्र, अब देवी वासवदत्ता को मनाने के अलावा मुझे कोई उपाय नजर नहीं आता। X X X देवी के प्रसन्न होने के बारे में हमें बिलकुल आशा नहीं रही है x x x तो यहां खड़े रहने से क्या फायदा। जाकर महादेवी को ही क्यों न प्रसन्न करूं। और जैसे वेणीसंहार में, सुन्दरक की निम्न उक्ति के द्वारा बीज की फलोन्मुखता का आक्षेप कर उसे प्रकट कर दिया गया है-'अथवा मैं ईश्वर को क्यों दोष दूँ। यह तो उसी षड्यन्त्र रूपी विषवृक्ष का फल पक रहा है, जिसका बीज विदुर के बचनों की अवहेलना करना था, जिसका अंकुर भीष्मपितामह के हितोपदेश का तिरस्कार था, जो शकुनि के प्रोत्साहन की जड़ पर टिका था एवं जिसका फूल द्रौपदी के बालों को घसीटना था।' ये गर्भसन्धि के बारहों अंग प्राप्त्याशा के पोषक तथा प्रदर्शक के रूप में निबद्ध होने चाहिएँ। इनमें अभूताहरण, मार्ग, तोटक, अधिबल तथा आक्षेप प्रमुख हैं; बाकी का यथासंभव प्रयोग हो सकता है। यहां तक गर्भसन्धि के अङ्गों का वर्णन किया गया। अथावमर्श :- क्रोधेनावमृशेधत्र व्यसनाद्वा चिलोभनात्। गर्भनिभिन्नवीजार्थः सोऽवमर्श इति स्मृतः ॥ ४३ ॥ श्रवमर्शनमवमर्शः पर्यालोचनं तच क्रोधेन वा व्यसनाद्वा विलोभनेन वा 'भित- व्यमनेनार्थेन' इत्यवघारितैकान्तफलप्राप्त्यवसायात्मा गर्भसंध्युद्धिन्नबीजार्थसंबन्घो विम• र्शोऽवमर्शः, यथा रतावल्यां चतुर्थेऽङ्केऽनिविद्रवपर्यन्तो वासवदत्ताप्रसक्त्या निरपाय- रत्नावलीप्राप्त्यवसायात्मा विमर्शो दर्शितः । यथा च वेणीसंहारे दुर्योघनरुधिराक्तभीमसे- नागमपर्यन्त :- 'तीर्णे भीष्ममहोदधौ कथमपि द्रोणानले निवृते कर्णाशीविषभोगिनि प्रशमिते शल्येऽपि याते दिवम् । भीमेन प्रियसाहसेन रभसादल्पावशेषे जये सर्वे जीवितसंशयं वयममी वाचा समारोपिताः ॥' इत्यत्र 'स्वल्पावशेषे जये' इत्यादिभिर्विजयप्रत्यर्थिसमस्तभीष्मादिमहारथवधादव- घारितैकान्तविजयाव मर्शनादवमर्शनं दर्शितमित्यवमर्शसंधिः। जहां क्रोध से, व्यसन से या विलोभन (लोभ) से जहां फल प्राप्ति के विषय में विचार या पर्यालोचन किया जाय; तथा जहां गर्भसन्धि के द्वारा बीज को प्रगट कर (फोड़) दिया गया हो, वह अवमर्श संधि कहलाती है। 'अवमश' शब्द की व्युत्पति 'अव' उपसर्ग पूर्वक 'मृश' धातु से 'धञ्' प्रत्यय से हुई है, जिसका अर्थ वही है जो इसके 'ल्युट्' वाले रूप अवमर्शन का है। दोनों का अर्थ है विचार, -डिछस (१) 'सोऽचमर्शोऽङ्संग्रहः' इति पाठान्तरम्।
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प्रथमः प्रकाश:
विवेचन या पर्यालोचन। यह फलप्राप्ति की पर्यालोचना क्रोध, व्यसन या विलोभन के द्वारा हो सकती है। 'यह चीज जरूर होगी' इस प्रकार फलप्राप्ति के निश्चय का निर्धारण जहां पाया जाय तथा गर्भसन्धि के द्वारा प्रकटित बीज से जहाँ सम्बन्ध पाया जाता है, वह पर्यालो- चन (विमर्श) अवमर्श कहलाता है। जैसे रत्नावली के चौथे अंक में वासवदत्ता की प्रसन्नता से रत्नावली की प्राप्ति बिना किसी विध्न के संभव है, इस विमर्श की सूचना अग्निदाह तथा उससे लोगों के भगकर डरने के वर्णन तक दी गई है। और जैसे वेणीसंहार में, दुर्योधन के खून से लथपथ होकर भीमसेन आता है, उस वर्णन तक विमर्श (अवमर्श) सन्धि है। यहां युधिष्ठिर नीचे के पद् में 'जीत बहुत थोड़ी बची है' (स्वल्पावशेषे जये) के द्वारा; समस्त शत्रुओं; भीष्मादि महारथियों के बध से अब विजय निश्चित रूप से निर्धारित हो गई है, इस बात की पर्यालोचना करता है, अतः अवमर्शन दिखाया गया है :- 'किसी तरह भीष्मरूपी महासमुद्र को भी पार कर लिया, द्रोणरूपी अग्नि भी बुझ चुका है, कर्ण रूपी जहरीला सांप भी शान्त हो चुका, और शल्य भी स्वर्ग चला गया। इतना होने पर तथा विजय के बहुत थोड़ा रह जाने पर साहसी भीमसेन ने शीघ्रता के साथ हम सब को वाणी के द्वारा जीवन के संशय से मुक्त बना दिया है।'
तत्रापवादसंफेटो विद्रवद्रवशक्तय: द्युतिः प्रसङ्गश्छलनं व्यवसायो विरोधनम्॥४४॥। प्ररोचना विचलनमादानं च त्रयोदश। इस अवमर्श संधि के अंगों का वर्णन करते हैं :- अपवाद, संफेट, विद्रव, द्रव, शक्ति, द्युति, प्रसंग, छलन, व्यवसाय, विरोधन, प्ररोचना, विचलन और आदान-अव- मर्श के ये तेरह अंग होते हैं। यर्थ देशं लक्षणमाह- दोषप्रख्यापवाद: स्यात्- यथा रत्नावल्याम्-'सुसङ्गता-सा खु तवस्सिणी भट्टिणीए उज्जइणिं णीश्रदित्ति पवादं करिश उवत्थिदे अद्धरत्ते ण जाणीशदि कहिंपि णीदेत्ति। ('सा खलु तपस्विनी भट्टिन्योज्जयिनी नीयत इति प्रवादं कृत्वोपस्थितेऽ्र्घरात्रे न ज्ञायते कुत्रापि नीतेति।') 'विदूषक :- (सोद्वेगम्) अदिणिग्घिणं क्खु कदं देवीए।' ('अतिनिर्घृणं खलु कृतं देव्या।') पुनः-'भो वअ्रस्स। मा खु अण्णधा संभावेहि सा खु देवीए उज्जइणी षेसिदा अदो अप्पिअं ति कहिदम्।' ( 'भो वयस्य ! मा खल्वन्यथा संभावय सा खलु देव्योज्जयिन्यां प्रेषिता अतोऽप्रियमिति कथितम्') राजा-अहो निरनुरोधा मयि देवी।' 'इत्यनेन वासवदत्तादोषप्रख्यापनादपवादः । यथा च वेणीसहारे-'युधिष्ठिरः-पाश्चालक ! कच्चिदासादिता तस्य दुरात्मनः कौरवापसदस्य पदवी? पाश्चालक :- न केवलं पदवी स एव दुरात्मा देवीकेशपाशस्पर्श- पातकप्रधानहेतुरुपलब्धः ।' इति दुर्योधनस्य दोषप्रख्यापनादपवाद इति। जहां किसी पात्र के दोषों का वर्णन किया जाय, वहां अपवाद होता है। जैसे रत्नावली में राजा सागरिका के प्रति वासवदत्ताकृत व्यवहार को सुनकर वासवदत्ता के दोष का वर्णन करता है, अतः यहां अपवाद है। ान
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४६ दशरूपकम् सुसंगता-उन्हें उज्जैन ले जाया जा रहा है इस तरह की अफवाह उड़ा कर देवी वासवदत्ता के द्वारा आधी रात के समय पता नहीं वह बेचारी (सागरिका) कहां ले जाई गई।' हि विदूषक (घबराकर)-देवी ने बड़ी कठोरता की है। X X X हे मित्र, कोई दूसरी बात न समझना, वह तो सचमुच देवी ने उज्जयिनी भेज दी है, इस लिये यह समाचार अप्रिय है ऐसा हमने कहा है। राजा-अरे, देवी वासवदत्ता मैरे प्रति बड़ी निष्करुण है।' और जैसे वेणीसंहार में निम्न वातालाप में दुर्योधन के दोषों का वर्णन है, अतः अपवाद नामक अवमर्शोग है। 'युधिष्ठिर-पांचालक, क्या उस नीच कौरव दुर्योधन के मार्ग का पता चला। क पांचालक-उसका मार्ग ही नहीं; देवी द्रौपदी के केशपाश के स्पर्श रूपी पाप का प्रधान कारण वह दुष्ट स्वयं भी पा लिया गया है। अथ संफेट :- -संफेटो शोषभाषणम्। यथा वेणीसंहारे-'भोः कौरवराज ! कृतं बन्धुनाशदर्शनमन्युना, मैवं विषादं कृथा :- पर्याप्ताः पाण्डवाः समरायाऽहमसहाय इति। पञ्चानां मन्यसेऽस्माकं यं सुयोधं सुयोधन। दंशितस्यात्तशस्त्रस्य तेन तेऽस्तु रणोत्सवः।। इत्थं श्रुत्वाऽसूयात्मिकां निक्षिप्य कुमारयोर्दष्टिमुक्तवान्धातराष्ट्र :- कर्णदुःशासनवधात्तुल्यावेव युवां मम। T पieअप्रियोऽपि प्रियो योडुं ख्वमेव प्रियसाहसः ॥। 'इत्युत्थाय च परस्परक्रोधाधिक्षेपपरुषवाक्कलह प्रस्तारितघोरस ग्रामौ-'इत्यनेन भीमदुर्योघनयोरन्योन्यरोषसभाषणाद्विजयबीजान्वयेन संफेट इति। रोष से युक्त बातचीत (रोषभाषण) संफेट नामक विमशाङ्ग है। जैसे वेणीसंहार में निम्न उक्तियों में भीमसेन तथा दुर्योधन के रोष संभाषण के कारण संफेट है। यह रोषसंभाषण पाण्डवों को भावी विजय से अन्वित है। 'भीम-ए कौरवराज, भाई के नाश के कारण उत्पन्न शोक व्यर्थ है। इस तरह शोक मत करो कि पाण्डव युद्ध में सबल हैं और मैं असहाय हूं। DS व्ह दुर्योधन, हम पांचों मैं से जिस किसी को तुम अच्छा लड़ाका समझो, कवच धारण किये हुए तथा शस्त्रों से युक्त उसी के साथ तुम्हारा द्वन्द्व युद्ध रूपी उत्सव हो जाय'। कुछ (इसे सुनकर दुर्योवन भीम व अर्जुन दोनों की और असूयामरी दृष्टि डाल कर (भीम से) कहता है-)।। 'वैसे तो कर्ण तथा दुःशासन दोनों के मारने के कारण तुम दोनों मेरे लिए बराबर (अनिष्टकारी) हो। वैसे तुम बड़े अप्रिय हो, किन्तु फिर भी लड़ने के लिए तुम्हीं प्रिय हो, क्योंकि तुम प्रिय साइस हो।' (इस तरह उठ कर एक दूसरे के प्रति गुस्से से परुष शब्दों का प्रयोग करते हुए तथा धोर संग्राम को विस्तारित करते हुए भीम व दुर्योधन (गदायुद्ध में प्रवृत्त हो गये)। शथ विद्रव :- विद्रवो वधबन्धादि :- गा
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प्रथम: प्रकाश: ४७
यथा छलितरामे- येनावृत्य मुखानि साम पठतामत्यन्तमायासितं बाल्ये येन हताक्षसूत्रवलयप्रत्यर्पणैः क्रीडितम्। युष्माकं हृदयं स एष चिशिखैशपूरितांसस्थलो मूर्च्छाधोरतम प्रवेशविवशो बड्धा लवो नोयते।।' यथा च रत्नावत्याम्- 'हर्म्याणां हेमशङ्श्रियमिव शिखररचिषामादधानः
कुर्वन्क्रीडामहीध्रंसजलजलघरश्यामलं धुमपातै- रेध पोषार्तयोषिज्जन इह सहसैवोस्थितोऽन्तःपुरेडमि: ॥' इत्यादि, पुनः। 'वासवदत्ता-अज्उत्त ! ण क्खु अहं अत्तणो कारणादो भणामि एसा मए णिश्घिणहिअआए संजदा सागरित विवज्दि।' (आर्यपुत्र 1 न खल्वह- मात्मनः कारणाद्गणामि एषा मया निर्घृणहृदयया संयता सागरिका विपद्यते।') इत्यनेन
किसी पात्र का मारा जाना, बँध जाना (बन्दी हो जाना), आदि (अर्थात् भय से पलायन आदि करना) विद्रव कहलाता है। जैसे छलितिराम नाटक में- 'जिस लव ने बचपन में सामवेद पढ़ते हुए तुम्हारे मुंह को बन्द करके बहुत तकलौफ दी थी, जिसने अक्षसूत्रों की माला को छिपाकर फिर से वापस देकर खेल किया था; वह तुम्हारा हृदय-यह लव, जिसका वक्षःस्थल तीरों से बिंध गया है और जो मूच्छा के अन्धकार के कारण बेबस हो गया है, बाँध कर ले जाया जा रहा है।' और जैसे रत्नावली नाटिका में सागरिका के बन्धन, मरण की आशंका, तथा असिरूप भय के वर्णन के कारण निम्न स्थल में विद्रव नामक विमर्शोग है। जो अपनी लपटों के किनारों से जैसे महलों के सोने के कँगूरों की शोभा को धारण कर रहा है, जो अपने तीव्र ताप की सूचना घने बाग के पेड़ों के अग्र भाग को झुलसा कर दे रहा है; ऐसा अझनि एकदम अन्तःपुर में फैल गया है। इसके धुएँ से क्रीडापर्वंत पानी से भरे बादलों के समान काला हो गया है; तथा इसके ताप से अन्तःपुर की स्त्रियाँ भयभीत हो उठी हैं।' वासवदत्ता-आर्यपुत्र, मैं अपने लिए नहीं कहती, निष्करुण मेरे द्वारा बन्दी बनाई हुई यह सागरिका मर रही है ( जल रही है)। अथ द्रव :- शमी -द्रवो गुरुतिरस्कृतिः। ४५॥ यथोत्तरचरिते- 'वृद्धास्ते न विचारणीयचरितास्तिष्ठन्तु हुं वतते फडीस सुन्दस्त्रीदमनेSप्यखण्डयशसो लोके महान्तो हि ते। यानि त्रीण्यकुतोमुखान्यपि पदान्यासन्खरायोधने कगाहक 8ी यद्वा कौशलमिन्द्रसूनुदमने तत्राप्यभिजो जनः ।।' ६ १. यह नाटक अनुपलब्ध है। कवि का नाम मायुराज था। त। ठि
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दशरूपकम् इत्यनेन लवो रामस्य गुरोस्तिरसकारं कृतवानिति द्रवः । यथा च वेणीसंहारे-'युघिष्ठिरः-भगवान् कृष्णाग्रज सुभद्राभ्रातः! ज्ञातिप्रीतिर्मनसि न कृता क्षत्रियाणां न धर्मो रूढं सख्यं तदपि गणितं नानुजस्थार्जुनेन। तुल्यः कामं भवतु भवतः शिष्ययो: स्नेहबन्घः कोऽयं पन्था यदसि विगुणो मन्दभाग्ये मयीत्थम्।।' इत्यादिना बलभद्रं गुरुं युधिष्ठिरस्तिरस्कृतवानिति द्रवः । जहाँ बड़े व्यक्तियों (गुरुओं) का तिरस्कार हो, वहाँ द्रव नामक विमर्शोग होता है- जैसे उत्तररामचरित में निम्न पद्य में लव पूज्य रामचन्द्र का तिरस्कार करता है अतः द्रव है- 'वे बड़े लोग हैं अतः उनके चरित्र की चर्चा करना ठीक नहीं। कैसे भी हों रहने दो। ताड़का (सुन्द की स्त्री) के मारने पर भी अखण्डित यशवाले वे लोग महान् हैं। खर के साथ युद्ध करते समय मुँह को बिना फेरे ही जो पीछे तीन कदम रखे गये और बालि (इन्द्रसूनु) के वध के समय जो कौशल बताया गया, उसे भी सभी लोग जानते हैं।' और जैसे वेणीसंहार में, युधिष्ठिर पूज्य बलभद्र का तिरस्कार करता है, अतः द्रव है- 'भगवन् कृष्णाग्रज, सुभद्रा के भाई, वलराम; न तो तुमने जाति की प्रीति का ही विचार किया, न क्षत्रियधर्म ही का विचार किया। तुम्हारे छोटे भाई कृष्ण का अर्जुन के साथ जो प्रेम है, जो मित्रता है उसका भी कोई खयाल नहीं किया। ठीक है, पर तुम्हारा दोनों शिष्यों (भीम व दुर्योधन) के साथ समान स्नेह होना चाहिए। फिर यह कौन सा वर्ताव है कि तुम मुझ मन्दभाग्य के प्रति इस तरह नाराजहो।' अथ शक्ति :- विरोधशमनं शक्ति :- यथा रत्नावल्याम्-'राजा- सःयाजै: शपथेः प्रियेण वचसा चित्तानुवृत्याधिकं वैलदयेण परेण पादपतनैर्वाक्यैः सखीनां मुहुः। प्रत्यासत्तिमुपागता नहि तथा देवी रुदत्या यथा प्रक्षाल्यैव तयैव बाष्पसलिलैः कोपोऽपनीतः स्वयम् ॥' इत्यनेन सागरिकालाभविरोघिवासवदत्ताकोपोपशमनाच्छ्रक्तिः। यथा चोत्तरचरिते लवः प्राह- 'विरोधो विश्रान्तः प्रसरति रसो निर्वृतिघन- स्तदौद्धत्यं क्वापि व्रजति विनयः प्रह्वयति माम्। फटित्यस्मिन्दष्टे किमपि परवानस्मि यदि वा महार्घस्तीर्थानामिव हि महतां कोऽप्यतिशयः॥ विरोध का शान्त हो जाना शक्ति कहलाता है। जैसे रत्नावली में निम्न पद् में सागरिकालाम का विरोध करने वाली वासवदत्ता के क्रोध की शान्ति का संकेत मिलता है, अतः यह शम है। 'झूठी शपर्थों से, प्यारे वचन से, अधिक प्रेम के बर्ताव से, अत्यधिक लज्ज। से, पैरों पर गिरने
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प्रथम: प्रकाश:
से तथा बार बार सखियों के वचनों से देवी वासवदत्ता वैसी प्रसेन्न न हो सकी जैसा उसने खुद ही रोकर अपने आंसू के पानी से धोकर ही क्रोध को निकाल दिया। और जैसे उत्तर रामचरित में राम को देखकर लव कहता है- 'मेरा विरोध शान्त हो गया है, एक शान्त सघन रस जैसे हृदय में फैल रहा है, वह उद्धतता पता नहीं कहाँ चली गई है, विनम्रता मुझे झुका रही है। यदि इन्हें देखते ही मैं एक दम पराधीन हो गया हूँ तो बड़े व्यक्तियों का प्रभाव ठीक उसी तरह महार्घ तथा मद्दत्वपूर्ण होता है, जैसे पवित्र स्थानों का।' अथ द्ुति :- -तर्जनोद्रेजने द्ुतिः। यथा वेणीसंहारे-'एतच वचनमुपश्रत्य रामानुजस्य सकलनिकुज्जपूरिताशातिरिक्त मुद्भ्रान्तसलिलचरशतसंकुलं त्रासोद्वृत्तनकप्राहमालोड्य सरःसलिलं भैरवं च गर्जित्वा कुमारवृकोदरेणाभिहितम- जन्मेन्दोरमले कुले व्यपदिशस्यद्यापि घत्से गदां मां दुशासनकोष्णशोणितसुराक्षीबं रिपुं भाषसे दर्पान्धो मधुकैटभद्विषि हरावप्युद्धतं चेष्टसे मत्रासान्नृपशो चिहाय समरं पक्केडधुना लीयसे। इत्यादिना 'व्यक्त्वोत्थितः सरभसम्' इत्यनेन दुवचनजलावलोडनाभ्यां दुर्योधन- तर्जनोद्वेजनकारिभ्यां पाण्डवविजयानुकूल दुर्योधनोत्थापनहेतुभ्यां भीमस्य द्युतिरुक्ता । किसी पात्र का तर्जन तथा उद्वेजन करना द्युति कहलाता है। जैसे वेणीसंदार में भीमसेन दुवचन तथा जलावलोडन (सरोवर के पानी के मथने) से दुर्योधन को भयभीत (तर्जित तथा उद्वेजित) करता है, तथा ये तर्जन व उद्वेजन एक ओर दुर्योधन के पानी से बाहर निकलने के तथा पाण्डव विजय के कारण हैं। अतः यहाँ दुति है। इसका संकेत इस उक्ति में है- 'कृष्ण के इस वचन को सुनकर सारे निकुंज से भरी दिशाओं के घिरे सरोवर के पानी को हिलाकर, जो डरे हुए सैकड़ों जलजन्तुओं से युक्त था, तथा जिसके मगर और घड़ियाल डर से डूबते-उतराते थे,-तथा जोर से गर्जना करके कुमार भीमसेन ने कहा- अपने आपको चन्द्रमा के निर्मल कुल में उत्पन्न कहता है, तथा अभी भी गदा धारण किये है, दुःशासन के गरम खून की शराब से मस्त मुझे शत्रु कहता है, घमण्ड से अन्धा होकर मधुकैटम के शत्रु कृष्ण के प्रति भी उद्धत व्यवहार करता है, (और ) हे नीच मानव, मेरे डर से युद्धभूमि को छोड़कर अब कीचड़ में छिपता है।' जागगाा अथ प्रसङ्ग :- गुरुकीर्तनं प्रसङ्ग :- यथा रत्नावल्याम्-'देव यासौ सिंहलेश्वरेण स्वदुहिता रत्नावली नामायुष्मती वासवदत्तां दग्घामुपश्रुत्य देवाय पूर्वप्रार्थिता सती प्रतिदत्ता।' इत्यनेन रत्नावल्या लाभानुकूलाभिजनप्रकाशिना प्रसङ्गाद्गरुकीर्तनेन प्रसङ्ग: । तथा मृच्छकटिकायाम्-'चाण्डालक :- एस सागलदत्तस्स सुओ अन्विणअद्त्तस्स णत्तू चालुदत्तो वावादिदुं वज्मठ्वाणं णीशदि एदेण किल गणिश्ा वसन्तसेणा सुवण्ण- ७ द०
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दुशरूपकम् लोभेण वावादिद ति।' ('एष सागरदत्तस्य सुत आर्यविनयदत्तस्य नप्ता चारुदत्तो व्यापादयितुं वध्यस्थानं नीयते एतेन किल गणिका वसन्तसेना सुवर्णलोमेन व्यापादितेति।') चारुदत्त :- मखशतपरिपूर्त गोत्रमुद्धासितं यत् सदसि निबिडचैत्यब्रह्मघोषैः पुरस्तात्। मम निधनदशायां वर्तमानस्य पापै- स्तदसदृशमनुष्यैर्घुष्यते घोषणायाम्॥।' इत्यनेन चारुदत्तवधाभ्युदयानुकूलं प्रसज्गाद्वुरुकीर्तनमिति प्रसभ्गः। जहाँ पूज्य व्यक्तियों (गुरुओं); मातापिता आदि का संकीर्तन हो, वहाँ प्रसंग नामक विमशांग होता है। (अथवा जहां महत्वपूर्ण (गुरु) वस्तु की चर्चा हो वहां प्रसंग होता है)। जैसे रत्नावली नाटिका में यौगन्धरायण निम्न उक्ति के द्वारा प्रसंग से गुरु (पूज्य, सिंहलेश्वर) का संकीर्तन करता है (अथवा राजा के प्रति महत्त्त्वपूर्ण समाचार को कहता है), इस 'गुरु कीर्तन' के द्वारा रत्नावली के लाम के अनुकूल सम्बन्धियों का प्रकाशन किया गया है, अतः यह प्रसंग है-'स्वामिन्, देवी वासवदत्ता को जला हुआ सुनकर पहले से ही प्राथित जो रत्नावली नामक पुत्री सिंहलेश्वर ने स्वामी को दी है,""(वही यह है)।' और जैसे मृच्छकटिक में, जब चाण्डाल चारुदत्त को वसन्तसेना के वध के दण्ड के लिए मारने ले जारहे हैं, तब उनकी घोषणा सुनकर चारुदत्त अपने कुल, शील तथा अभ्युदय का स्मरण कर प्रसंग से उनका कीर्तन करता है, अतः गुरुकीरतन होने के कारण निम्न स्थल में वहाँ भी प्रसंग नामक अवमर्शोग है। 'चाण्डाल-यह सागरदत्त का पुत्र, आर्य विनयदत्त का पौत्र, चारुदत्त वध के लिये वध्यस्थान ले जाया जा रहा है। इसने सोने के लोभ से गणिका बसन्तसेना को मार दिया है। चारुदत्त-जो मेरा गोत्र (कुल) चैत्यों के ब्रह्यघोषों के द्वारा सभा में सैकड़ों हवनों से पवित्र तथा देदीप्यमान होता था, वही आज मेरे मृत्यु की अवस्था में वर्तमान होने पर (चाण्डालों जैसे) नीच तथा पापी (अयोग्य) मनुष्यों के द्वारा घोषणा के रूप में घोषित किया जा रहा है। अथ छलनम्- -छलनं चावमाननम् ॥ ४६ ॥। यथा रत्नावल्याम्-राजा-अहो निरनुरोधा मयि देवी।' इत्यनेन वासवदत्तये- षासंपादनाद्वत्सराजस्यावमाननाच्छलनम्। यथा च रामाभयुदये सीतायाः परित्यागेनाS- वमाननाच्छलनमिति। जहाँ कोई पात्र किसी दूसरे की अवज्ञा (अवमान) करे, वह छलन कहा जाता है। जैसे रत्नावली में वासवदत्ता रत्नावली समागम में विघ्न उपस्थित करती है, इस प्रकार वह वत्सराज की ईप्सित वस्तु का सम्पादन नहीं करने के कारण उसकी अवश्ञा करती है, अतः अवमान के कारण यहाँ छलन नामक अवमर्शाङ है। इसकी व्यजना राजा की इस उक्ति से होती है :- " १. 'गुरुकीर्तनं' की व्युत्पत्ति, गुरूणां कीतनं भी हो सकती है, गुरु चैतत् कीर्तनं भी हो सकती है। अतः हमने कोष्ठक में गुरुकीर्तन के कर्मधारय वाले अर्थ को भी स्पष्ट कर दिया है। वैसे उदाहरणों को देखते हुए दोनों व्युत्पत्ति ठीक वैसी हैं। 710
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प्रथम: प्रकाश: ५१
'अरे, देवी वासवदत्ता मेरे प्रति बड़ी निष्करुण है।' अथवा जैसे रामाम्युदय नामक नाटक में सीता को छोड़ करे उसकी अवज्ञा (अवमान) की गई है, अतः छलन है। अथ व्यवसाय :- व्यवसाय: स्वशकत्युक्ति :- यथा रत्नावल्याम्-'ऐन्द्रजालिक :- किं धरणीए मिशड्को आआसे महिहरो जले जलणो। मज्मण्हम्मि पशोसो दाविज्जउ देहि आणत्तिम्। अहवा किं बहुआ जम्पिएण- मज्मा पइण्णा एसा भणामि हिशएण जं महसि दट्ठुम्। 'P() तं ते दावेमि फुडं गुरुो मन्तप्पहावेण ।।' ('किं धररयां मृगांक आकाशे महीधरो जले ज्वलनः । मध्याहे प्रदोषो दर्श्यतां देव्याज्ञप्तिम् ॥ काक्वता सट -: रि अथवा किं बहुना जल्पितेन। मम प्रतिज्वैषा भणामि हृदयेन यद्दाञ्छसि द्रष्टुम्। तत्ते दर्शयामि स्फुटं गुरोर्मन्त्रप्रभावेण ।।') इत्यने नैन्द्रजालिको मिथ्याम्नि संभ्रमोत्थापनेन वत्सराजस्य हृदयस्थसागरिकादर्शनानु- कूला स्वशक्तिमाविष्कृतवान्। यथा च वेणीसंहारे- 'नूनं तेनाद वीरेण प्रतिज्ञाभज्ञभीरुणा। बध्यते केशपाशस्ते स चास्याकर्षरो क्षमः ॥। इत्यनेन युघिष्टिरः स्वदण्डशक्तिमाविष्करोति। जहाँ कोई पात्र अपने सामर्थ्य के विषय में कहे, (जहाँ स्वशक्त्युक्ति पाई जाय), वहाँ व्यवसाय नामक अवमर्शाङ्ग होता है। जैसे रत्नावली के चतुर्थ अक्क में ऐंद्रजालिक झूठी आग फैला कर वत्सराज के हृदय में स्थित सागरिका के दर्शन के अनुकूल अपनी शक्ति को प्रकट करता है। इसकी सूचना इन दो गाथाओं से हुई है, ऐंद्रजालिक की उक्तियाँ हैं :- 'आज्ञा दीजिये, क्या मैं पृथ्वी पर चन्द्रमा, आकाश में पर्वत, जल में आग, और मध्याह् के समय प्रदोष (रात्रि का प्रारम्भ) दिखा दूँ। अथवा मैं ज्यादा डींग क्यों मारूँ। मेरी प्रतिश्ञा यह है, मैं हृदय से कह रहा हूँ; आप जो कुछ देखना चाहते हैं, गुरुजी के मन्त्र के प्रभाव के कारण मैं वही आपको दिखा सकता हूँ।' और जैसे वेणीसंद्ार के निम्न पद्य में, युधिष्ठिर भीम की वीरता का वर्णन करते हुए अपनी दण्डशक्ति को प्रकट कर रहे हैं :- 'प्रतिज्ञा के पूर्ण न होने के डर वाले उस वीर भीमसेन के द्वारा आज तुम्हारा यह जड़ा (केशपाश) जरूर बाँधा जायेगा। और वह इसके पूर्ण करने में पूर्णतया शक्त है।'
१. यहाँ मूल में 'बध्यते' पाठ है; किन्तु यहाँ व्तमान का प्रयोग निकटवर्ती भविष्य के अर्थ में हुआ है-'वर्तमानसामीप्ये वर्तमानवद्ा।'
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: दशरूपक्तम्
अध विरोधनम्- BF -संरब्धानां विरोधनम्। बथा वेणीसंहारे-'राजा-रे रे मरुत्तनय किमेवं वृद्धस्य राजः पुरतो निन्दितव्य- मात्मकर्म श्लाघसे ! अपि च- कृष्टा केशेषु भार्या तव तव च पशोस्तस्य राजस्तयोवाy B प्रत्यक्षं भूपतीनां मम भुचनपतेराजया धूतदासी। अस्मिन्वैरानुबन्धे तव किमपकृतं तैर्हता ये नरेन्द्राव बाह्नोरवीर्या तिसारद्रविणगुरुमदं मामजित्वैव दर्पः ॥ की हपार (भीमः क्रोधं नाटयति ) अरजुन :- आर्यं प्रसीद, किमत्र क्रोषेन १ अप्रियाणि करोत्येष वाचा शक्तो न कर्मणा ।ीणड़ कव हतभ्रातृशतो दुःखी प्रलापैरस्य का व्यथा ॥ भीम :- अरे भरतकुलकलङ्क ! अद्यैव किं न विसृजेयमह भवन्तं दुःशासनानुगमनाय कटुप्रलापिन्। विघ्नं गुरू न कुरुतो यदि मत्कराश्र- BiSPASPOFFS t निर्भिद्यमानरणितास्थिनि ते शरीरे॥ अन्यच मूढ । शोकं स्त्रीवज्जयनसलिलैर्य त्परित्याजितोऽसि भ्रातुर्वक्षःस्थलविदलने यच्ब साक्षीकृतोऽसि। आसीदेतत्तव कुनृपतेः कारणं जीवितस्य क्रुद्धे युष्मत्कुलकमलिनीकुअरे भीमसेने।। राजा-दुरात्मन् भरतकुलापसद पाण्डेवपशो! नाहं भवानिव विकत्थनाप्रगल किंतु
की द्र च्यन्ति वचिरात्सुपं बान्घवासवां रणाज्रौ।।
6 इत्यादिना संर्घयोर्भीमदुर्योधनयोः स्वशकत्युक्तिर्विरोधनमिति। 1जहाँ कुद पात्रों के द्वारा परस्पर स्वशक्ति का प्रकटीकरण हो, वहाँ विरोधन नामक अवमशांङ्ग होता है। (यहाँ मूल के 'संरब्धानां' के साथ ४७ वीं कारिका के प्रथम चरण का 'स्वशक्त्युक्तिः' पद अनुवतित हो जाता है।) जैसे वेणीसंहार में निम्न स्थल में क्रुद्ध भीम व दुर्योधन दोनों अपनी-अपनी शक्ति को वचनों द्वारा प्रकट करते हैं, अतः विरोधन है। 'राजा (दुर्योधन)-रे वायु के पुत्र, इस तरह बूढ़े राजा (धृतराष्ट्र) के सामने अपने निन्दनीय कर्म की प्रशंसा क्यों करता है ? और भी- तेरी, तुझ पशु की, उस राजा (युधिष्ठिर) की और उन दोनों की स्त्री को; उस जुएँ मैं जीती हुई दासी (द्रौपदी) को, लोक के स्वामी मेरी आज्ञा से राजाओं के सामने बालों (१) 'संरम्भोकि:' इत्यपि पाठः।
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प्रथम: प्रकाश: ५३
से खेंचा गया। इस बैर में बता तो सही उन राजाओं ने तेरा क्या बिगाड़ा था, जो युद्ध में मारे गये। दोनों भुजाओं के अतिशय बलरूपी धन के भारी मद वाले मुझे जोते बिना ही (इतना) धमण्ड ? (भीम गुस्से का अभिनय करता है) अर्जुन-आर्य, प्रसन्न हों, क्रोध करना व्यर्थ है। यह दुर्योधन वाणी से हमारा अप्रिय (बुरा) कर रहा है, कर्म से बुरा करने में यह अशक्त है। सौ भाइयों के मरने के कारण यह दुखी है, इसके प्रलाप से हमें कोई दुःख (क्रोध) नहीं। भीम-अरे भरतकुलकलक्क ! हे कटप्रलापिन्, क्या मैं तुझे आज ही दुःशासन के अनुगमन के लिए न भिजा दूँ ( मैं तुझे आजही अवश्य मार डालूँ)। काश, मेरे हाथों के अग्रभाग के द्वारा तोड़ो जाने वाली शब्द करती हुई हड्डियों वाले तेरे शरीर में पूज्य धृतराष्ट् व गांधारी विघ्न न करते होते। और मी मूर्ख, तुम्हारे कुलरूपी कमलिनी को नष्ट करने वाले हाथी, भीमसेन के क्रुद्ध होने पर (भी) तुझ दुष्ट राजा के जीवित रहने का कारण यह है, कि तूने भाई के वक्ष:स्थलको फटते समय साक्षी होकर देखा और औरतों की तरह आँसुओं के द्वारा शोक का त्याग कर दिया। राजा-दुष्ट भरतकुलापसद नीच पाण्डव, अरे तेरी तरह मैं डींग मारने वाला नहीं हूँ, किन्तु-तेरे बान्धव अब जल्दी ही तुझे युद्धभूमि में सोया हुवा देखेंगे। तेरा वक्षःस्थल, व हड्डियों का ढाँचा मेरी गदा से टूटा हुवा होगा और उस दशा में तू बड़ा भीषण प्रतीत होगा।' अथ प्ररोचना- सिद्धामन्त्रणतो भाविदर्शिका स्यात्परोचना॥ ४७। यथा वेणीसंहारे-'पाश्चालकः-अहं च देवेन चक्रपाणिना' इत्युपक्रम्य 'कृतं संदेहेन- पूर्यन्तां सलिलेन रत्नकलशा राज्याभिषेकाय ते कृष्णाSत्यन्तचिरोज्फिते च कबरीबन्धे करोतु क्षणम्। रामे शातकुठारभासुरकरे क्षत्रद्वुमोच्छेदिनि क्रोधान्धे च वृकोदरे परिपतत्याजौ कुतः संशयः ॥' इत्यादिना 'मजलानि कर्तुमाजञापयति देवो युधिष्ठिरः' इत्यन्तेन द्रौपदीकेशसंयम- नयुघिष्ठिर राज्याभिषेकयोर्भाविनोरपि सिद्धत्वेन दर्शिका प्ररोचनेति। जहाँ कोई सिद्ध व्यक्ति अपने वचनों के द्वारा भावी घटना की सूचना इस तरह दे, जैसे वह सिद्ध हो, वहां प्ररोचना नामक अवमर्शाङ्ग होता है। जैसे वेणीसंहार में पाञ्चालक (दूत) युधिष्ठिर के पास आकर भगवान् कृष्ण का वचन सुनाता है कि भीम की विजय में कोई संदेह नहीं, और बाद में सेवकों को आशा देता है कि महाराज युविष्ठिर ने जय के उपलक्ष में मंगल कार्यों के करने की आज्ञा दी है। इसके द्वारा द्रौपदी के केश-संयमन रूप तथा युधिष्ठिर के राज्याभिषेक रूप दो भावी घटनाओं की सूचना सिद्ध रूप में दी गई है। अतः यहाँ प्ररोचना है। पाञ्चालक की उक्ति का निम्न अंश इसकी सूचना देता है :- हआी 'चक्रपाणि भगवान् कृष्ण ने मुझे आज्ञा दी है X X सन्देह की आवश्यकता नहीं। तुम्हारे राज्याभिषेक के लिए रत्नकलश जल से पूर्ण हों। द्रौपदी बड़े दिनों से छूटे हुए केशों के बाँधने के लिए उत्सव मनावे। तीक्ष्ण परशु के द्वारा ज्वलन्त हाथ वाले, क्षत्रियरूपी वृक्ष को उखाड़ने वाले, परशुराम तथा क्रोध से अन्धे भीमसेन के युद्ध में उतरने पर सन्देह की गुंजायश ही कहाँ ?' गिली कि जगि।
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५४ दशरूपकम्
अथ विचलनम्- विकत्थना विचलनम्- यथा वेणीसंहारे-'भीम :- तात ! अम्ब ! सकलरिप्रुजयाशा यत्र बद्धा सुतैस्ते तृणमिव परिभूतो यस्य गर्वेण लोकः । रणशिरसि निहन्ता तस्य राघासुतस्य प्रणमति पितरौ वां मध्यमः पाण्डचोऽयम् ॥ अपि च तात। चूर्णिताशेषकौरव्यः क्षीबो दुःशासनासजा। भङ्का सुयोधनस्योर्वोर्भीमोऽयं शिरसाऽश्वति॥' इत्यनेन विजयबीजानुगतस्वगुणाविष्करणाद्विचलनमिति। यथा च रत्नावल्याम्-'यौगन्घरायण :- देव्या मद्चनाद्यथाऽभ्युपगतः पत्युर्वियोगस्तदा सा देवस्य कलन्रसंघटनया दुःखं मया स्थापिता। तस्याः प्रीतिमयं करिष्यति जगत्स्वामित्वलाभः प्रभो: सत्यं दर्शयितुं तथापि वदनं शक्कोमि नो लज्जया।' INFIR
इत्यनेनान्यपरेणापि यौगन्धरायोन 'मया जगत्स्वामित्वानुबन्धी कन्यालाभो वत्स- राजस्य कृतः ।' इति र्वगुणानुकीर्तनाद्विचलनमिति। जहाँ कोई पात्र आत्मशलाघा करे तथा डींग मारे, वहां विचलन नामक विमर्शोग होता है। जैसे वेणीसंहार में भीम अपने गुणों का आविष्करण करके डींग भारता है, अतः यहाँ विचलन है। भीम-तात, माता, जिस कर्ण में, तुम्हारे पुत्रों की समस्त शत्रुओं को जीत लेने की आशा बँधी हुई थी, जिसके घमण्ड के द्वारा सारा संसार तिनके की तरह तुच्छ समझा गया था, उसी राधा के पुत्र कर्ण को युद्धभूमि में मारने वाला, यह मध्यम पाण्डव (अर्जुन) आप दोनों (धुतराष्ट्र व गांधारी) माता पिताओं को प्रणाम कर रह़ा है। क और भी तात, जिसने सारे कौरवों को चूर्णित कर दिया है, जो दुर्योधन के खून से मस्त हो रहा है; तथा जो सुयोधन की जांधों को (जल्दी ही) तोड़ने वाला है, वह भीम सिर के द्वारा तुम्हारी पूजा करता है ( तुम्हें प्रणाम करता है)।' और जैसे रत्नावली में, यौगंधरायण निम्न उक्ति में, वत्सराज के प्रति मेरा कितना उपकार है, इस बात की व्यंजना कराते हुए अपने गुणों का कीर्तन करता है, अतः विचलन नामक विमशोग है। 10क 5 'मेरे वचन में विश्वास कर देवी वासवदत्ता ने पति के वियोग को प्राप्त किया, और फिर महाराज को (नई) पत्नो दिलाकर मैंने उसे दुःखित बना दिया। फिर भी कुछ भी हो, स्वामी वत्सराज की जगत्-स्वामित्व प्राप्ति उसे अवश्य प्रसन्न करेगी, यह सच है, फिर भी लज्जा के कारण मैं उसे (देवी को) अपना मुख नहीं दिखा सकता।' X Xx 'मैंने वत्सराज के लिए ऐसा कन्या लाभ कराया जो संसार के स्वामित्व को दिलाने वाला है।'
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अथादानम्- की ह-आदानं कार्यसंग्रहः। 5 यथा वेणीसंहारे-'भीमः-ननु भोः समन्तपश्चकसंचारिणः। की रक्षो नाहं न भूतं रिपुरुधिरजलाप्ताविताङ्ग: प्रकाम निस्तीर्णोरुप्रतिज्ञाजलनिधिगहन: क्रोघनः क्षत्रियोऽस्मि ! भो भो राजन्यवीरा: समरशिखिशिखादग्घशेषा: कृतं व- स्त्नासेनानेन लीनैरहतकरितुरगान्तर्हितैरास्यते यत् ।।' इत्यनेन समस्तरिपुवधकार्यस्य संगृहीतत्वादादानम्। यथा च रत्नावल्याम्-'सागरिका-(दिशोऽवलोक्य) दिट्विश्र समन्तादो पज्जलिदो भश्र्वं हुअवहो अज्ज करिस्सदि दुक्खावसाणन।' ( 'दिष्टया समन्तात्प्र- ज्वलितो भगवान्हुतवहोऽय करिष्यति दुःखावसानम्' ।) इत्यनेनान्यपरेणापि दुःखा वसानकार्यस्य संग्रहादादानम् । यथा च-'जगत्स्वामित्वलाभः प्रभोः' इति द्शित- मेवम्। इत्येतानि त्रयोदशावमर्शाज्गानि तत्रैतेषामपवादशक्तिव्यवसायप्ररोचनादानानि प्रधानानीति। जब नाटककार उपसंहार की ओर बढ़ने की कामना से नाटक या रूपक की वस्तु के कार्य को संगृहीत करता है अर्थात् समेटने की चेष्टा करता है, तो वह अवमर्शोग आदान कहलाता है। ० जैसे वेणीसंहार में दुर्योधन को मारकर लौटता हुवा भीम निम्न उक्ति के द्वारा समस्त शत्रुओं के वधरूपी कार्य का समाहार करता है अतः उपादान है। 'अरे हे समस्तपञ्चक में घूमने वाले, मैं न तो राक्षम हूँ, न भूत ही। मैं तो वह क्रोधी क्षत्रिय हूँ, जिसके अंग शत्रु के खूनरूपी जल में शराबोर हो चुके हैं और जो महती प्रतिज्ञा के समुद्र को पार कर चुका है। हे युद्धरूपी अग्नि की ज्वाला में जलने से बचे हुए वीर राजाओं, तुम्हारा यह भय व्यर्थ है, जिससे तुम मरे हुए हाथी व घोड़ों की आड़ में छिप कर बैठे हुए हो।' और जैसे रत्नावली में दुखी सागरिका जलती आग को देखकर यह समझती है कि सके दुःख का अवसान हो जायगा। यहाँ दुः्खावसानरूप कार्य का संग्रह है :- 'अच्छा है, चारों और जले हुये अग्नि देवता आज मेरे दुःख का अन्त कर देंगे।' और जैसे यौगन्धरायण की उक्ति कि राजा को जगत्स्वामित्व प्राप्त होगा। अवमर्श के ये १३ अंग हैं। इनमें से अपवाद, शक्ति, व्यवसाय, प्ररोचना व आदान ये पाँच अंग प्रमुख हैं। अथ निर्वहणसंधि :- बीजवन्तो मुखादर्था चिप्रकीर्णा यथायथम्।।४द।। ऐकार्थ्यमुपनीयन्ते यत्र निर्वहरां हि तत्। यथा वेणीसंहारे-'कन्चुकी-(उपसृत्य सहर्षम्) महाराज ! वर्घसे वर्धसे, अ्र्यं खलु कुमारभीमसेन: सुयोघनक्षतजारुणीकृतसकलशरीरो दुर्लक्षव्यक्तिः।' इत्यादिना द्रौपदीकेश संयमनादिमुखसंध्यादिबीजानां निजनिजस्थानोपक्षिप्तानामेकार्थतया योजनम्। यथा च रत्नावल्यां सागरिकारत्नावलीवसुभूतिबाभ्रव्यादीनामर्थानां मुखसंध्यादिषु
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५६ दशरूपकम् प्रकीर्णानां वत्सराजैककार्यार्थत्वम्। 'वसुभूतिः-(सार्गाकां निर्वर्ण्यापवार्य) बाभ्रव्य सुसदृशीयं राजपुन्या।' इत्यादिना दशितमिति निर्वहणसंघिः। रूपक की कथावस्तु के बीज से युक्त मुख आदि अर्थ जो अब तक इधर उधर बिखरे पड़े हैं, जब एक अर्थ के लिए एक साथ समेटे जाते हैं, या एकत्रित किये जाते हैं, तो वह निर्वहण संधि होती है। जैसे वेणीसंहार में कज्रुकी इस उक्ति के द्वारा द्रौपदी के केश संयमन, दुर्योधन वध आदि मुखसंधि आदि के बीजों को, जो अबतक नाटक में अपनी अपनी जगह बिखरे पड़े थे, एक लक्ष्य की दृष्टि से एकत्रित करता है- '(आगे बढ़कर खुशी से) महाराज की विजय हो, सुयोधन के खून से लाल शरीर वाले ये कुमार, भीमसेन हैं, जो पहचान में नहीं आर हे हैं।' और जैसे रत्नावली में सागरिका, रत्नावली, वसुभूति, बाभ्रव्य आदि के कार्यों (अर्थों) का जो मुखसन्धि आदि में इधर-उधर छिटके पड़े थे वत्सराज के ही कार्य के लिए समाहार होता है। इसकी सूचना वसुभूति की इस उक्ति के द्वारा दी जाती है-'(सागरिका को देख कर, एक ओर) बाभ्रव्य, यह तो राजपुत्री (रत्नावलो) जैसी दिखाई पड़ती है।' अथ तदङ्गानि- कसंधिर्विबोधो ग्रथनं निर्णयः परिभाषणम्॥ ४६॥ 0ORp प्रसादानन्दसमयाः कृतिभाषोपगूहनाः। पूर्वभावोपसंहारौ प्रशस्तिश्च चतुर्दश ॥ ५० ॥ इस निर्वहण संधि के १४ अंग हैं :- संधि, विबोध, अ्रथन, निर्णय, परिभाषण, प्रसाद, आनन्द, समय, कृति, भाषा, उपगूहन, पूर्वभाव, उपसंहार तथा प्रशस्ति। यथोददेशं लक्षणमाह- संधिर्बीजोपगमनम्- यथा रत्नावल्याम्-'वसुभूतिः-बाभ्रव्य ! सुसदृशोयं राजपुत्र्या। बाभ्रव्यः ममाप्येवमेव प्रतिभाति।' इत्यनेन नायिकाबीजोपगमात्संधिरिति। यथा च वेणीसंहारे-'भीमः-भवति यज्ञवेदिसंभवे ! रमरति भवती यत्तन्मयोक्तम्- संचूर्णितोरु्युगलस्य सुयोधनस्य। स्त्यानावनद्घनशोणितशोणपाणि- रुत्तंसयिष्यति कर्चांस्तव देवि भीमः॥'॥ जब बीज की उद्धावना की जाती है, तो वह संधि नामक निर्वहणांग होता है। जैसे रत्नावली नाटिका के चतुर्थ अंक में वसुभूति तथा वाभ्रव्य सागरिका को पहचान लेते हैं। यहाँ नायिका रूप बीज की उद्धावना की गई है, अतः संधि है। वसुभूति तथा वाभ्रव्य की यह बातचीत इसकी सूचक है :- 'वसुभूति-वाभ्रव्य, यह तो राजकुमारी (रत्नावली) के सदृश है। वाभ्रव्य-मुझे भी ऐसा ही मालूम पड़ता है।' और जैसे वेणीसंहार में भीमसेन दुर्योधन के खून से रँगे हाथों द्रौपदी का केश संयमन करते हुए उसे अपनी पिछली प्रतिश्ञा याद दिलाता है। यहाँ भीम की निम्न उक्ति के द्वारा मुखसन्धि में उपक्षिप्त बीज को फिर से उद्भावित किया गया है, अतः सन्धि नामक निर्वहणाऊ है।
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'यज्ञवेदी से उत्पन्न द्रौपदि ! मैंने जो कहा था, वह तुम्हें याद है? चज्चल हार्थों से घुमाई गई गदा के प्रहारों से टूटी जाँघों वाले दुर्योधन के घने चिकने खून से रँगे हार्थो वाला भीम तुम्हारे बालों को सँवारेगा।' अथ विबोध :- -विबोध: कार्यमार्गणम्। यथा रक्षावल्याम्-'वसुभूतिः-(निरूप्य) देव कुत इयं कन्यका ? राजा-देवी जानाति। वासवदत्ता-अज्ञउत्त ! एसा सागरादो पाविश्रत्ति भणिअ अमचजोगन्ध- रातरोण मम हत्ये णिहिदा अदो ज्ेव सागरिअत्ति सद्दावीअदि। ('आर्यपुत्र! एषा सागरात्प्राप्तेति भणित्वाSमात्ययौगंघरायरोन मम हस्ते निहिता अत एव सागरिकेति शब्धते।') राजा-(आत्मगतम्) यौगन्घरायरौन न्यस्ता, कथमसौ ममानिवेद करिष्यति।' इत्यनेन रत्नावलीलक्षणकार्यान्वेषणाद्विबोघः। यथा च वेणीसंहारे-'भीमः-मुश्चतु मुश्तु मामार्यः क्षणमेकम्। युघिष्ठिरः- किमपरमवशिष्टम् ? भीम :- सुमहद्वशिष्टम्, संयमयामि तावदनेन दुःशासनशो- णितोक्षितेन पाणिना पाश्ाल्या दुःशासनावकृष्ट केशहस्तम्। युधिष्ठिरः-गच्छतु भवान्, अनुभवतु तपस्विनी वेणीसंहारम्।' इत्यनेन केशसंयमनकार्यस्यान्वेषणाद्विबोघ इति। जहाँ नायक अब तक छिपे हुए अपने कार्य की फिर से खोज करने लगता है, उसे विबोध कहते हैं। जैसे रलावली के चतुर्थ अंक में वसुभूति व वाभ्रव्य सागरिका को पहचान कर उसके विषय में उदयन से पूछते हैं, यंहीं निम्न वार्तालाप के द्वारा रलावलीरूप कार्य की फिर से खोज होने के कारण विबोध नामक निर्वहणाङ्ग हैं :- 'वसुभूति-(देख कर) देव, यह कन्या कहाँ से आई है ? राजा-देवी वासवदत्ता जानती है। वासवदत्ता-आर्यपुत्र, यह कन्या समुद्र से पाई गई हैं, इतना कह कर अमात्य यौगन्धरायण ने मेरे हाथों सौंप दी है, इसीलिये इनका नाम सागरिका दिया गया है (इसे सागरिका कहा जाता है)। राजा-(स्वगत) यौगन्धरायण ने सौंपी, वह मुझसे निवेदन किये बिना कैसे करेगा (कैसे सौंप सकता है)।' और जैसे वेणीसंहार में, भीम के द्वारा द्रौपदी के केशसंयमन रूप कार्य का अन्वेषण किय जा रहा है, अतः षष्ठ अंक के निम्न स्थल में विबोध है। 'भीम-आर्य मुझे क्षण भर के लिए छोड़ दें। युधिष्ठिर-फिर क्या बच गया है? भीम-सबसे बड़ी चीज रह गई है, मैं दुःशासन के खून से रँगे हाथ से दुःशासन के द्वारा पकड़ा गया द्रौपदी का जूड़ा तो बाँध दूँ। युधिष्ठिर-आप जाइये, तपस्विनी द्रौपदी केशसंयमन का अनुभव करे।' अथ प्रथनम्- ग्रथनं तदुपक्षेपो- यथा रत्नावल्याम्-'यौगन्धरायण :- देव ! क्षम्यतां यह्दवस्यानिवेध मयैतत्कृ- तम्।' इत्यनेन वत्सराजस्य रत्नावलीप्रापणकार्यो पक्षेपाद्रथनम्। यथा च वेणीसंहारे-'भीमः-पाश्चालि ! न खलु मयि जीवति संहर्तव्या दुःशा- म द०
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५८ दुशरूपकम्
सनचिलुलिता वेणिशत्मपाणिना। तिष्ठतु तिष्ठतु। स्वयमेवाहं संहरामि।' इत्यनेन द्रौप-
उस कार्य का उपसंहार (उपक्षेप) करना ग्रथन कहलाता है। 'प्रथन' के अंतर्गत नाटककार अपने समस्त कार्य को एक स्थान पर समाहृत कर देता है। जैसे रत्नावली में यौगंधरायण की निम्न उक्ति वत्सराज के कार्यं रत्नावली-लाभ का उपसंहार कर देती है :- 'स्वामिन्, मैंने यह कार्य आपसे निवेदन किये बिना ही किया, अतः क्षमा करें।' और जैसे वेणीसंहार में, निम्न उक्ति के द्वारा भीम द्रौपदी के वेणीसंहार रूप कार्य का समाहार करता है, अतः यहाँ भी ग्रथन नामक निर्वहगांग है। 'पाञालि, मेरे होते हुए (जीवित रहते हुए) दुःशासन के द्वारा बिखराई गई वेणी का अपने हाथ से सँवारना ठीक नहीं। ठहरो, ठहरो। मैं खुद इसे सँवारता हूँ।' अथ निर्णय :- -- उनुभूताख्या तु निर्णयः॥५१॥ यथा रत्नावल्याम्-'यौगन्घरायण :- (कृताञ्जलिः) देव श्रूयताम् इयं सिंहलेश्वर- दुहिता सिद्धादेशेनोपदिश्ट-योऽस्याः पाणि म्रहीष्यति स सार्वभौमो राजा भवरिष्यति, तत्प्रत्ययादस्माभि: स्वाम्यर्थे बहुशः प्रार्थ्यमानापि सिंहलेश्वरेण देव्या वासवदत्तायाध्ि- तखेदं परिहरता यदा न दत्ता तदा लावणिके देवी दग्घेति प्रसिद्धिमुत्पाद्य तदन्तिकं बाभ्रव्यः प्रहितः ।' इत्यनेन यौगन्घरायण: र्वानुभूतमर्थ ख्यापितवानिति निर्णयः। यथा च वेणीसंहारे-'भीम :- देव देव अजातशत्रो ! क्वायापि दुर्योघनहतकः मया हि तस्य दुरात्मन :- भूमौ क्षिप्श्वा शरीरं निहितमिदमसक्चन्दनाभं निजाज लक्ष्मीरायें निषिक्ता चतुरुदधिपयः सीमया सार्घमुर्व्या। भृत्या मित्राणि योधा: कुरुकुलमखिलं दग्घमेतद्रणामौ नामैकं यद्व्रवीषि क्षितिप तदधुना धार्तराष्ट्रस्य शेषम्।।' इत्यनेन स्वानुभूतार्थकथनान्निर्णय इति। जब नायकादि अपने द्वारा विचारित या संपादित (अनुभूत) कार्य के विषय में वर्णन करते हैं, तो यह निर्णय कहलाता है। जैसे रत्नावली नाटिका में यौगंधरायण निम्न उक्ति के द्वारा कार्य से संबद्ध अपने अनुभवों को, या कार्यसंबद्ध अपने कार्यों को राजा से वर्णित करता है, अतः यहाँ निर्णय है। 'यौगंधरायण-(हाथ जोड़कर) देव, सुनिये सिद्ध व्यक्ति ने इस सिंहलेश्वर पुत्री रत्नावली के बारे में यह कहा था कि जो कोई इसका पाणिग्रहण करेगा, वह सावभौम (चक्रवर्ती) राजा बनेगा। उस सिद्धादेश के विश्वास के कारण आपके लिए हमने कई बार उसकी माँग सिंहलेश्वर से की, लेकिन सिंहलेश्वर ने वह इसलिए न दी कि ऐसा करने से वासवदत्ता के चित्त को दुःख होगा। तब हमने झूठे ही यह खबर फैला दी कि देवी वासवदत्ता लावाणक (वन) में जल गई और फिर वाभ्रव्य को सिंहलेश्वर के समीप (रत्नावली को माँगने के प्रस्ताव के साथ) भेजा।' और जैसे वेणीसंहार में भीम की निम्न उक्ति में उसके द्वारा अनुभूत अर्थ का कथन हुआ है, अतः निर्णय है :-
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प्रथम: प्रकाश:
'भीम-देव अजातशत्रु, अब भी नीच दुर्योधन कहाँ है, मैंने उस दुष्ट दुर्योधन के शरीर को जमीन पर फेंक दिया और अपने शरीर पर चन्दन के समान यह[ खून लगा लिया। चारों समुद्रों के जल की सीमा वाली पृथ्वी के साथ राज्यलक्ष्मी को आर्य में प्रतिष्ठापित कर दिया। इस युद्ध की आग में नौकर, मित्र, योद्धा, यहाँ तक कि सारा कुरुकुल जल गया है। हे राजन्, अब तो दुर्योधन का केवल नाम भर बचा है, जिसे आप बोल रहे हैं।' अथ परिभाषणम्- परिभाषा मिथो जल्प :- थथा रत्नावल्याम्-'रत्नावली-(आत्मगतम्) कआवराहा देवीए ण सक्कुणोमि मुहं दंसिदुम् ।( कृतापराधा देव्यै न शक्रोमि मुखं दर्शयितुम्)' वासवदत्ता-(सासत्रं पुन- र्बाहू प्रसार्य) एहि अयि णिट्ठुरे ! इदाणीं पि बन्धुसिरोहं दंसेही। (अपवार्य) अज्ञउत्त! लज्जामि क्खु अहं इमिणा णिसंसत्तोण ता लहुं अवरोहि से बन्घणम्। ( 'एहि अयि निध्ठुरे ! इदानीमपि बन्धुस्नेहँ दर्शय। आर्यपुत्र ! अज्े खल्व्हमनेन नृशंसत्वेन तलध्व- पनयास्या बन्धनम्।') राजा-यथाह देवी। (बन्घनमपनयति) वासवदत्ता- (वसुभूति निर्दिश्य) अरज्ज ! अ्ररमच्चजोगन्घरायरोण दुज्जणीकदह्ि जेण जाणन्तेण वि णाचक्खिदम्।' (आर्य! अमात्ययौगन्घरायरोन दुर्जनीकृतास्मि येन जानतापि नाच- क्षितम्।') इत्यनेनान्योन्यव चनात्परिभाषणम्। यथा च वेणीसंहारे-'भीमः-कृष्टा येनासि रजी सदसि नृपशुना तेन दुःशास- ननेन।' इत्यादिना 'क्वासौ भानुमती योपहसति पाण्डवदारान्।' इत्यन्तेन भाषणात्प- रिभाषणम् । जहाँ पात्रों में परस्पर जल्प पाया जाय, उसे परिभाषा कहते हैं। (यहाँ यह परस्पर जल्प-आपस की बातचीत-कार्य की सिद्धि के विषय में पाई जायगी) जैसे रत्नावली में इस स्थल पर अन्योन्य वचन के कारण परिभाषण नामक निर्वहणांग है। 'रत्नावली-(स्वगत) मैंने देवी वासवदत्ता का अपराध किया है, इसलिए उसे मुंह नहीं दिखा सकती।' वासवदत्ता (आंसू भरकर फिर से हाथ फैलाकर) इधर आ, ओ निष्ठर, अब भो बन्धुस्नेह को प्रकट कर दे। (एक ओर) आर्यपुत्र, मैं इस प्रकार के कठोर व्यवहार के कारण लज्जित हूँ, इसलिए जरा इसका बन्धन तो खील दो। राजा-जैसा देवी कहे। (बंधन खोलता है)। वासवदत्ता (वसुभूति की ओर) आर्य, अमात्य यौगंधरायण ने मुझे बुरा बना दिया है, जिन्होंने जानते हुए भी इस बात को नहीं कहा। और जैसे वेणीसंहार में भीम स्वयं ही बार बार अपने कार्य के विषय में जल्पन करता है, अतः भीम की निम्न उत्ति में भी परिभाषा नामक निर्वहणांग है। 'भीम-जिस नीच मनुष्य दुःशासन ने तुम्हें राजाओं की सभा में घसीटा। X वह भानुमती कहाँ है, जो पाण्डवों की पत्नी की हँसी उड़ाती हैं।' अथ प्रसाद :- -प्रसाद: पर्युपासनम् IFBiPFS यथा रत्नावल्याम्-'देव ! क्षम्यताम्।' इत्यादि दर्शितम्।(मापी) मा
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६० दशरूपकम् थथा च वेणीसंहारे-'भीमः-(द्रौपदीमुपसत्य) देवि पाश्चालराजतनये! दिष्टया वर्घसे रिपुकुलक्षयेन।' इत्यनेन द्रौपया भीमसेनेनाराधितत्वात्प्रसाद इति। किसी पात्र के द्वारा नायिकादि का प्रसादन (पर्युपासन) प्रसाद कहलाता है। जैसे रत्नावळी नाटिका में यौगंधरायण वत्सराज उदयन से क्षमा माँगता हुआ उसे प्रसन्न करता है-'देव, मुझे क्षमा करें।' और जैसे वेणीसंहार में, भीमसेन द्रौपदी को निम्न वाक्य के द्वारा प्रसन्न करता है, अतः प्रसाद है :- 'देवि पाश्ाल राजपुत्रि, बड़ी खुशी की बात है कि शत्रुओं के नाश से तुम्हारी वृद्धि हो रही है।' अथानन्द :- आनन्दो वाञ्छितावाप्ति :- यथा रत्नावल्याम्-'राजा-यथाह देवी ( रत्नावलीं गृहाति)' यथा च वेणीसंहारे-'द्रौपदी-णाध विसुमरिदह्नि एदं वावारं णाधस्स प्पसादेण पुणो सिक्खिस्सम् ( केशान्बघ्नाति)' ('नाथ ! विस्मृतास्म्येतं व्यापारं, नाथस्य प्रसादेन पुनः शिक्षिष्यामि।') इत्याभ्यां प्रार्थितरत्नावली प्राप्तिकेशसंय मनयोर्वत्सराजद्रौपदीभ्यां प्राप्तत्वादानन्द: । ईप्सित वस्तु की प्राप्ति होना आनंद कहलाता है। जैसे रत्नावली में वासवदत्ता की अनुमति मिलने पर राजा 'जैसा देवी कहे' इतना कहकर ईप्सित रत्नावली के पाणि का ग्रहण करता है। और जैसे वेणीसंहार में द्रौपदी अपने ईप्सित केशसंयमन को प्राप्त करती है, अतः आनन्द है। द्रौपदी के इस 'आनन्द' की व्यंजना इस उक्ति से हो रही है-'नाथ, मैं यह केशसंयमन का व्यापार भूल गई हूं, अब फिर से आपकी कृपा से सीख लूँगी।' शथ समय :- -समयो दुःखनिर्गम: ॥५२ ॥ यथा रत्नावल्याम्-'वासवदत्ता-(रत्नावलीमालिङ्जय ) समस्सस समस्सस बहि- णिए।' ( 'समाश्वसिहि समाश्वसिहि भगिनिके।') इत्यनेन भगिन्योरन्योन्यसमागमेन दुःखनिर्गमात्समयः। यथा च वेणीसंहारे-'भगवन् ! कुतस्तस्य विजयादन्यत् यस्य भगवान्पुराणपुरुषः स्वयमेव नारायणो मज्जलान्याशास्ते। कृतगुरुमहदा दक्षोभसंभूतमूर्ति। गुणिनमुदयनाशस्थानहेतुं प्रजानाम् । अजममरमचिन्त्यं चिन्तयित्वाSपि न त्वां भवति जगति दुःखी किं पुनर्देव दृष्द्वा ।।' इत्यनेन युधिष्ठिरदुःखापगम दर्शयति। नायकादि के दुःख का समाप्त हो जाना समय कहलाता है। जैसे रत्नावली में वासवदत्ता रत्नावली का आलिंगन करके उससे कहती है-'बहिन, आश्वासन रक्खो'। यहाँ दोनों बहिनों के परस्पर मिलने से दुःख निर्गम हो गया है, अतः समय (निर्वहणांग) है। Fasड 71 1
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और जैसे वेणीसंहार में, युविष्ठिर की निम्न उक्ति उसके दुःख की समाप्ति की द्योतक है :- 'भगवन्, कृष्ण, उस पुरुष के लिए विजय के अतिरिक्त और कैसे हो सकता है, जिसके मंगलों की आशा स्वयं पुरातन पुरुष नारायण (आप) ही किया करते हैं। हे स्वामिन्, महतत्व्र (प्रकृति) आदि के चंचल करने से जिन्होंने मूर्ति को उत्पन्न किया है, (जिसके प्रकाश से चंचल-क्षुब्ध-प्रकृति से सारी सांसारिक मूर्तियाँ उत्पन्न हुई है), तथा जो गुणी है, एवं प्रजाओं (जीवों) के उदय, नाश तथा पालन के कारण हैं, उन अज, अमर तथा अचिन्त्य परात्पर सत्ता रूप आपका चिन्तन करके ही मनुष्य इस संसार में दुखी नहीं होता, तो फिर आपके दर्शन पाकर दुखी कैसे हो सकता है ?' अथ कृति :- कृतिर्लब्धार्थशमनम्- यथा रत्नावल्याम्-'राजा-को देव्याः प्रसादं न बहुमन्यते?। वासवदत्ता- अ्रज्जउत्त ! दूरे से मादुउलं ता तधा करेसु जधा बन्धुअणं न सुमरेदि।' ( आर्य- पुत्र ! दूरेऽस्या मातृकुलं तत्तथा कुरुष्व यथा बन्धुजनं न स्मरति।') इत्यन्योन्यवचसा लब्धायां रत्नावल्यां राज: सुश्लिष्टय उपशमनात्कृतिरिति। यथा च वेणीसंहारे-'कृष्णः-एते खलु भगवन्तो व्यासवाल्मीकि-' इत्यादिना 'अभिषेकमारव्घवन्तस्तिष्ठन्ति।' इत्यनेन (इत्यन्तेन) प्राप्तराज्यस्याभिषेकमङ्गलैः स्थिरी- करणं कृतिः। लब्ध अर्थ के शमन करने को कृति कहते हैं। जैसे रत्नावली में रत्नावली के प्राप्त हो जाने पर राजा को खुश करने के लिए वासवदत्ता तथा वासवदत्ता को खुश करने के लिए राजा परस्पर वचनों के द्वारा उपशमन करते हैं, अतः यहाँ कृति है। 'राजा-देवी वासवदत्ता की कृपा की महत्ता को कौन नहीं मानेगा। वासवदत्ता-आर्यपुत्र, इस (रत्नावली) का नैहर दूर है, इसलिये यह जिस ढंग से अपने बान्धवों की याद न करे, ऐसी चेष्टा करें।' और जैसे वेणीसंहार में, कृष्ण युधिष्ठिर की राज्यप्राप्ति को अभिषेक के द्वारा स्थिर करते है, अतः यह भी कृति है। इसकी सूचना कृष्ण की यह उक्ति देती है-'ये भगवान् व्यास, वाल्मीकि आदि X X X x अभिषेक आरम्भ कर रहे हैं। अथ भाषणम्- -मानाद्यापतिश्व भाषणम्। यथा रत्नावल्याम्-'राजा-अतःपरमपि प्रियमस्ति ? यातो विक्रमबाहुरात्मसमतां प्राप्तेयमुर्चीतले सारं सागरिका ससागरमहीप्राप्त्येकहेतुः प्रिया। १. सांख्य दर्शन के मतानुसार जड़ त्रिगुणात्मक प्रकृति पर चेतन पुरुष के प्रतिबिम्ब पड़ने से उसमें 'क्षोभ' उत्पन्न होता है, और तब उससे महत्तत्त्व, बुद्धि, पञ्चतन्मात्रा आदि २५ तत्त्वों का विस्तार होता है, उन्हीं से क्रमशः संसार की उत्पत्ति है। २. 'कृतिर्लब्धार्थशमनम्' में 'शमन' का अर्थ 'प्रसादन' तथा स्थिरीकरण दोनों लिया जा सकता है। पहले में प्रसादन वाला उदाहरण हैं, दूसरे में स्थिरीकरण वाला।
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देवी प्रीतिमुपागता च भगिनीलाभाज्जिताः कोशलाः किं नास्ति त्वयि सत्यमात्यवृषभे यस्मै करोमि स्पृहाम् ।।' इत्यनेन कामार्थमानादिलाभाद्भाषणमिति।
कहलाता है। जहाँ नायकादि को मान आदि की प्राप्ति हो, उसका व्यक्षक वाक्य भाषण
जैसे रत्नावली में वत्सराज की यह उक्ति उसके काम, अर्थ, मान आदि के लाभ की दयोतक है। 'राजा-क्या इससे ज्यादा भी प्यारी कोई वस्तु है? मैंने विक्रमबाहु को अपने समान बना लिया (अथवा विक्रमबाहु के समान चक्रव्तित्व प्राप्त कर लिया); तथा ससागर पृथ्वी की प्राप्ति का कारण, इस प्रिया सागरिका को (रत्नावली)- जो सारे पृथ्वौतल का सार है-प्राप्त कर लिया। देवी वासवदत्ता बहिन की पाकर खुश हो गई, कोशल राज्य को जीत लिया गया। तुम जैसे श्रेष्ठ मन्त्री के होते हुए अब कौन चीज बची रह गई है, जिसकी मैं इच्छा करूँ। अथ पूर्वभावोपगूहने- कार्यदृष्ट्यद्भुतप्राप्ती पूर्वभावोपगूहने ॥५३ ॥ कार्यदर्शनं पूर्वभाव:, यथा रत्नावल्याम्-'यौगन्घरायण :- एवं विज्ञाय भगिन्याः संप्रति करणीये देवी प्रमाणम्। वासवदत्ता-फुडं ज्जेव किं ण भरोसि ? पडिवाएहि से रशणमालं त्ति।' ('स्फुटमेव किं न भणसि ? प्रतिपादयास्म रत्नमालामिति।') इत्य- नेन 'वत्सराजाय रत्नावली दीयताम्' इति कार्यस्य यौगन्घरायणाभिप्रायानुप्रविष्टस्य वासवदत्तया दर्शनात्पूर्वभाव इति। अद्भुत्प्राप्तिरुपगूहनं यथा वेणीसंहारे-'( नेपथ्ये) महासमरानलदग्घशेषाय स्वस्ति भचते राजन्यलोकाय। क्रोघान्घैर्यस्य मोक्षात्क्षतनरपतिभि: पाण्डपुत्र: कृतानि प्रत्याशं मुक्तकेशान्यनुदिनमधुना पार्थिवान्तःपुराणि। कृष्णाया: केशपाश: कुपितयमसखो धूमकेतुः कुरूणां: कीमशड दिष्ट्या बद्धः प्रजानां विरमतु निधनं स्वस्ति राजन्यकेभ्यः ॥ युधिष्ठिरः-देवि ! एष ते मूर्घजानां संहारोऽभिनन्दितो नभस्तलचारिणा सिद्धज- नेन।' इत्येतेनाद्धुतार्थप्राप्तिरुपगूहनमिति। लब्धार्थशमनात्कृतिरपिभ वति। नायकादि को अद्भुत वस्तु की प्राप्ति उपगूहन कहलाता है, तथा कार्य का दर्शन पूर्वभाग कहलाता है। (यहाँ ५० वीं कारिका के क्रम का विपर्यय है) पूर्वभाव का तात्पर्य कार्य का दर्शन है, जैसे रत्नावली में यौगन्धरायण अपनी निम्न उक्ति के द्वारा 'वत्सराज को रत्नावली दे दी जानी चाहिए' इस कार्य का- जिसकी अभिव्यक्ति यौगन्धरायण का अभिप्राय है-वासवदत्ता के द्वारा दर्शन होता है, अतः पूर्वभाव है। क 'यौगन्धरायण-यह जान लेने पर बहिन के बारे में क्या करना है, इस बारे में जैसी देवी की मर्जी हो। वासवदत्ता-साफ ही क्यों नहीं कहते? 'इनके लिए रत्नमाला सौंप दो।
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अद्भुत वस्तु की प्राप्ति उपगूहन है जैसे वेणीसंहार में नेपथ्य से सिद्धों के द्वारा अभिनन्दन, अद्भुत प्राप्ति है अतः यह उपगूहन है। इसकी सूचना इस स्थल पर हुई है :- '( नेपथ्य में) महासमर रूपी आग की छपटों से जलने के बाद बचे क्षत्रियों का कल्याण हो। जिस द्रौपदी की वेणी के खुले हं ने के कारण क्रोधान्ध पाण्डवों ने-जिन्होंने राजाओं का नाश किया-प्रतिदिन राजाओं की स्त्रियों को अब हर दिशा में खुले बालों वाला बना दिया, बड़ी खुशी की बात है कि वही द्रौपदी की वेणी (केशपाश) जो करुद्ध यमराज के समान (मित्र) है, तथा कौरवों का नाशसूचक धूमकेतु है, अब सँवारी जा चुकी है, अतः प्रजाओं का अब नाश बन्द हो, तथा राजाओं का कल्याण हो। युधिष्ठिर-देवि, यह तेरे बालों का सँवारना आकाश में सब्चार करने वाले सिद्धों ने अभिनन्दित किया है।' अथ काव्यसंहार :- चरात्ति: काव्यसंहार :-
यथा-'किं ते भूयः प्रियमुपकरोमि ।' इत्यनेन काव्यार्थसंहरणात्काव्यसंहार इति। नायकादि को वर की प्राप्ति काव्यसंहार कहलाता है। जैसे 'मैं और क्या प्रिय तुम्हारे लिये करूँ' इस वाक्य के द्वारा नाटक (रूपक) के काव्यार्थ का उपसंहार काव्यसंहार कहलाता है। अथ प्रशस्ति :- -प्रशस्तिः शुभशंसनम्। यथा वेणीसंहारे-'प्रीतश्ेद्धवान् तदिदमेवमस्तु- अकृपणमतिः कामं जीव्याज्जनः पुरुषायुषं भवतु भगवद्धक्तिद्वतं चिना पुरुषोत्तमे। कलितभुवनो विद्वद्वन्धुर्गुरोषु विशेषवित् सततसुकृती भूयाद्भूप: प्रसाघितमण्डलः ।।' इति शुभशंसनात्प्रशस्तिः। इत्येतानि चतुर्दश निर्वहणाङ्गानि। एवं चतुः षष्टथङ्गस मन्विताः पञ्चसंधयः प्रतिपादिताः। शुभ (कश्याण) की आशंसा प्रशस्ति कहलाती है। (इसी प्रशस्ति को भरतवाक्य भी कहते हैं।) जैसे वेणीसंहार में, युधिष्ठिर इस उक्ति के द्वारा कल्याण का कथन करता है, अतः प्रशस्ति है। 'यदि आप ज्यादा खुश हैं, तो यह हो। मनुष्य विशालबुद्धि वाला (कृपणमति वाला न) होकर सौ वर्ष तक जीवे। भगवान् विष्णु में द्वैतरहित विमल भक्ति हो। समस्त राष्ट्र को प्रसन्न करने वाला, पुण्यशाली, गुणों में विशेष ज्ञाननिष्ठ, तथा विद्वानों का बान्धव, एवं समस्त भुवन का पालन करने वाला राजा हो।' ये चौदह अङ्ग निर्वहण सन्धि के हैं। इस तरह ६४ अङ्गों से युक्त पांच सन्धियों का प्रतिपादन हो चुका है। षट्प्रकारं चाज्ञानां प्रयोजनमित्याह- उक्ताङानां चतुःषष्टि षोढा चैषां प्रयोजनम्।। ५४॥।
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६४ दशरूपकम् इन अङ्गों का छः प्रकार का प्रयोजन है इस बात को कहते हैं :- इन ६४ अङ्गों का प्रयोजन छः तरह का है। कानि पुनस्तानि षट्प्रयोजनानि ? ( तान्याह)- इष्टस्यार्थस्य रचना गोव्यगुप्तिः प्रकाशनम्। रागः प्रयोगस्याश्चर्य वृत्तान्तस्यानुपक्षयः ॥। ५५॥। विवक्षितार्थनिबन्घनं गोप्यार्थगोपनं प्रकाश्यार्थप्रकाशनमभिनेयरागवृद्धिश्चमतकारित्वं च काव्यस्येतिवृत्तस्य विस्तर इत्यज्गैः षट्प्रयोजनानि संपाद्यन्त इति। ये छः प्रयोजन कौन से हैं ?- इष्ट अर्थ की रचना, गोप्य की गुप्ति, प्रकाशन, राग, प्रयोग का आश्चर्य, तथा वृत्तान्त का उपक्षय। इष्ट अर्थ की रचना, गोप्य अर्थ को छिपाना, प्रकाश्य अर्थ को प्रकट करना, अभिनेय में राग की वृद्धि तथा उसमें चमत्कार का समावेश एवं काव्य की कथावस्तु का विस्तार इस प्रकार ये छः प्रयोजन इन ६४ संध्यंगों के द्वारा सम्पादित होते हैं। पहले कथावस्तु का अर्थप्रकृति, अवस्था तथा सन्धि के रूप में विभाजन किया गया। अब नाटक में दृश्य तथा श्रव्य अंश की दृष्टि से उसका विभाजन करते हैं। पुनर्वस्तुविभागमाह- द्वेघा विभाग: कर्तव्य: सर्वस्यापीह् वस्तुनः। सूच्यमेव भवेर्तिकचिद्दृश्यश्रव्यमथापरम्॥५६॥ १. संध्यंगों के इस ६४ प्रकार के भेद पर हमें थोड़ो आपत्ति है। पहले तो ये सभी अङ्ग, जो तत्तत् सन्धि में पाये जाते हैं, आवश्यक हैं या नहीं। धनजय ने इसे तो स्पष्ट कर दिया है कि अमुक-अमुक सन्धि में अमुक-अमुक अङ्ग आवश्यक हैं, बाकी गौण। पर कभी-कभी नाटक में आवश्यक अङ्गों में से भी कोई नहीं मिलता। साथ ही जब हम वृत्तिकार के दिये उदाहरण देखते हैं, तो दूसरी गड़बड़ी नजर आती है। संध्यंगों का व्युत्क्रम देखा जाता है। किसी नाटक के एक पद्य में अमुक संध्यंग माना गया है। उसके बाद के संध्यंग का उदाहरण वाला पद्य उसी नाटक में पहले पड़ता है। कभी-कभी एक संध्यंग दूसरी सन्धि में जा घुसता है। इस तरह नाटक के व्यावहारिक रूप में यह संध्यंग-घटना ठीक नहीं बैठती। यह धनिक की वृत्ति के तथा सा० दर्पण में विश्वनाथ के भी उदाहरणों से स्पष्ट है। २. काव्य के दो भेद होते हैं :- १. दृश्य, २. तथा श्रव्य। श्रव्य काव्य में वस्तु की सीमा का बन्धन नहीं। किन्तु दृश्य काव्य रक्षमव्र पर खेले जाने के कारण देश तथा काल की संकुचित सीमा में आबद्ध रहता है। यही कारण है कि किसी नायक के जीवन से सम्बद्ध घटना को अङ्गोपाङ्गसहित ठीक उसी रूप में नाटक (रूपक) में नहीं बताया जा सकता, जिस रूप में उसका वर्णन कवि श्रव्य काव्य में कर सकता है। यही कारण है कि नाटककार अत्यधिक प्रयोजनवती घटनाओं का दिग्दर्शन म्ज पर कराता है, बाकी घटनाओं को- अवान्तर गौ घटनाओं को-जो नाटक के कार्य से अप्रधानरूपेण संबद्ध है, पात्रों के वार्तालाप, नेपथ्य या और किसी प्रकार से सचित कर देता है। यही नहीं, कई मुख्य घटनांश भी ऐसे हैं, जिनका मख्र पर बताना नाट्यशास्त्र के विरुद्ध माना जाता है। भारतीय परम्परा इन अंशों को भी मञ्न पर न बता कर सूचना ही देती है। इस प्रकार के दृश्यों का वर्णन प्रसङ्गवश आगे आयेगा। इस संबन्ध में पाश्चात्य परम्परा भारतीय परम्परा से भिन्न है, जहाँ निधनादि के दृश्य मञ्न पर दिखाये जा सकते हैं। आधुनिक भारतीय साहित्य के नाटको में इस प्रकार के दृश्यों की योजना इसी पाश्चात्य नाव्यपद्धति का प्रभाव है।
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इस समस्त कथावस्तु का फिर से दो तरह का विभाजन होता है। इस वस्तु के कुछ अंश केवल सूच्य होते हैं-अर्थात् उनकी केवल सूचना ही दी जाती है, उन्हें मञ् पर दिखाया नहीं जाता। दूसरे अंश दृश्य तथा श्रव्य दोनों होते हैं, अर्थात् उन्हें म् पर दिखाया जाता है, वे सुने भी जाते हैं। ये दृश्य तथा सूच्य दो भाग करने पर यह प्रश्न उठता है कि सूच्य कैसे तथा कौन से हैं, तथा दृश्य श्रव्य कैसे हैं, अतः उसका उत्तर देते हैं :- कीदृक्सूच्यं कीदृग्दृश्यश्रव्यमित्याह- नोरसो ऽनुचितस्तत्र संसूच्यो बस्तुविस्तरः। दृश्यस्तु मधुरोदात्तरसभावनिरन्तरः॥। ५७ ।। वे वस्तुएँ (वस्त्वंश) जो नीरस हैं, जिनमें रसप्रवणता नहीं-जिनका मञ्च पर दिखाया जाना (नैतिकता आदि के) योग्य नहीं, वे संसूच्य या सूच्य कहलाते हैं। मधुर, उदात्त (नैतिक), रस तथा भाव से निस्यन्द वस्त्वंश. जिनका मञ्ज पर दिखाना नाटककार के लिए नाटक में प्रभावोरपादकता तथा रसमयता लाने के लिए अनिवार्य है, दश्य कहलाते हैं। इन नीरस तथा अनुचित वस्त्वंशों की सूचना किस ढंग से दी जाती है, तथा वे ढंग कितने हैं, इसे बताते हैं :- सूच्यस्य प्रतिपादनप्रकारमाह- अर्थोपक्ेपके: सूच्यं पश्चभिः प्रतिपाद्येत्। EIPBED Ep विष्कम्भचू लिकाङ्कास्याङ्कावतार प्रवेशकैः॥५८॥ सूच्य वसत्वंशों की सूचना पांच प्रकार के अर्थोपप्तेपकों (अर्थ-कथावस्तु-के उप- क्षेपक (सूचक)) के द्वारा की जाती है। वे अर्थोपत्ेपक हैं :- विष्कम्भ (विष्कम्भक), चूलिका, अंकास्य, अंकावतार, तथा प्रवेशक। तत्र विष्कम्भ :- 35 एकn वृत्तवर्तिष्यमाणानां कथांशानां निदशक:। संक्षेपार्थस्तु विष्कम्भो मध्यपात्रप्रयोजितः ॥ ५६॥ र्क अतीतानां भाविनां च कथावयवानां ज्ञापको मध्यमेन मध्यमाभ्यां वा पात्राभ्यां प्रयोजितो विष्कम्भक इति। विष्कम्भक नाटक (रूपक) में घटित घटनाओं या भविष्य में घटित होने वाली घटनाओं (कथांशों) का वह सूचक है, जिसमें मध्यपात्रों के द्वारा संच्ेप में इन कर्थांशों की सूचना दी जाय। विष्कम्भ वह सूच्य अर्थोपक्षेपक है, जो अतीत या भावी कर्थांशों की सूचना एक मध्यम पात्र अथवा दो मध्यम पात्रों के वार्तालाप के द्वारा देता है। यह विष्कम्भक शुद्ध तथा सक्कीणं इस प्रकार दो तरह का होता है। १. नाटक के पात्रों को उत्तम, मध्यम तथा अधम इन तीन भेदों के आधार पर विभाजित किया जाता है। राजा, राजमन्त्री, पुरोहित आदि उत्तम पात्र है। चोर, व्याध, सेविका, सेवक, सिपाही आदि अधम पात्र हैं। बाकी पात्र मध्यम श्रेणी में आते हैं। मध्यम श्रेणी के शिक्षित पात्र संस्कृत बोलते हैं, अशिक्षित शौरसेनी प्राकृत। ६ द०
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६६ दुशरूपकम्
स द्विविघः, शुद्ध: सड्कीर्णश्षेत्याह- एकानेककृत: शुद्ध: सङ्कीणों नीचमध्यमैः। एकेन द्वाभ्यां वा मध्यमपात्राभ्यां शुद्धो भवति, मध्यमाधमपात्रै्युगपत्प्रयोजितः सक्कीर्ण इति। एक अथवा अधिक (दो) मध्यम श्रेणी के पात्रों वाला विष्कम्भक शुद्ध कहलाता है, मध्यम श्रेणी के तथा अधम श्रेणी के पात्रों के द्वारा प्रयुक्त विष्कम्भक सक्कीणं (या मिश्र) कहलाता है। (ध्यान रखिये विष्कम्भक में मध्यम श्रेणी के पात्रों का होना जरूरी है। मिश्र (सङ्कीर्ण) विष्कम्भक में कम से कम एक मध्यम श्रेणी के पात्र का होना इसे विष्कम्भक बनाता है यदि दोनों ही पात्र अधम होंगे, तो वह विष्कम्भक न रहेगा, प्रवेशक नामक अर्थोपक्षेपक हो जायगा।) (यद्यपि ५९ वीं कारिका में प्रवेशक की गणना अन्त में है, किन्तु विष्कम्भक से भेड बताने के कारण तथा दूसरे महत्त्वपूर्ण अर्थोपक्षेपक होने के कारण, इसका वर्णन चूलिकादि से पूर्व किया जा रहा है।) 6 1ं अथ प्रवेशक :- तद्देवानुदात्तोकत्या नीचपात्रप्रयोजित: ॥ ६० ॥ प्रवेशो ऽङ्कद्यस्यान्त: शेषार्थस्योपसूचक:। तद्वदेवेति भूतभविष्यदर्थज्ञापकत्वमतिदिश्यते, अनुदात्तोक्त्या नीचेन नीचैर्वा पात्रैः प्रयोजित इति विष्कम्भलक्षणापवादः, शद्दद्वयस्यान्त इति प्रथमाक्के प्रतिषेध इति । प्रवेशक भी उसी तरह (विष्कम्भक की तरह) अतीत और भावी कथांशों का सूचक है। इसमें प्रयुक्त्त उक्ति उदात्त नहीं होती, (इसकी भाषा सद्ा प्राकृत होगी, तथा यह प्राकृत भी शिष्ट (शौरसेनी) प्राकृत न होकर मागधी, शकारी आदि अशिष्ट प्राकृत होगी); तथा इसमें नीच पात्रों का प्रयोग होता है। प्रवेशक की योजना सदा दो अङ्कों के बीच हो की जाती है, तथा यह भी शेष अर्थों (कथांशों) का सूचक है। यहाँ विष्कम्भक तथा प्रवेशक का भेद बता देना आवश्यक होगा, अतः इसे नीचे Lबनाया जा रहा है :- तुलना व भेद विष्कंभक प्रवेशक १. यह अतीत व भावी कथांशों का सूचक है। १. यह भी अतीत व भावी कर्थाशों का सूचक है। २. इसमें एक मध्यम पात्र या दो मध्यम २. इसके सारे पात्र (एक या दो) नीच पात्रों का प्रयोग होता है। कोटि के होते हैं। ३. इसकी भाषा संस्कृत व शौरसेनी ३. इसकी भाषा संस्कृत कभी नहीं होगी। प्राकृत होगी। प्राकृत भी निम्न कोटि की होगी यथा मागधी, शकारी, आभीरी, चाण्डाली, R पैशाची आदि। 1 हसा कक EIP
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विष्कम्भक प्रवेशिका ४. इसका प्रयोग नाटक (रूपक) के प्रथम ४. इसका प्रयोग सदा दो अंकों के बीच में अंक के पहले भी हो सकता है (जैसे होगा। रूपक के आदि में इसका प्रयोग मालतीमाधव नाटक में वृद्धा तापसी की कभी भी नहीं होगा। इसका प्रथम अंक उक्ति वाला विष्कंभक), दो अंकों के बीच में कभी भी प्रयोग नहीं होगा। (अंकद्दय- में भी (जैसे शाकुन्तल के चतुर्थ अंक स्यान्त इति प्रथमांके प्रतिषेध इति)। के पहले)। ५. उदाहरण-जैसे शाकुन्तल का चतुर्थ ५. उदाहरण-जैसे शाकुन्तल के षष्ठ अंक के अङ्क का विष्कम्भक। पहले का प्रवेशक। अथ चूलिका- अन्तर्जवनिकासंस्थैश्चूलिकार्थस्य सूचना ॥६१॥ नेपथ्यपात्रेणार्थसूचनं चूलिका, यथोत्तरचरिते द्वितीयाङ्कस्यादौ-'(नेपथ्ये) स्वागतं तपोधनायाः (ततः प्रविशति तपोधना)' इति नेपथ्यपात्रेण वासन्तिकयSSन्ने- यीसूचनाच्चू लिका। यथा वा वीरचरिते चतुर्थाङ्कस्यादौ-'( नेपथ्ये ) भो भो वैमानिकाः ! प्रवर्त्यन्ता प्रवर्त्यन्तां मङ्गलानि- कृशाश्वान्तेवासी जयति भगवान्कौशिकमुनिः सहस्रांशोचशे जगति विजयि क्षत्रमधुना। विनेता क्षत्रारेर्जगदभयदानव्रतघरः शरण्यो लोकानां दिनकरकुलेन्दुर्विजयते ।।' इत्यत्र नेपथ्यपात्रैर्देवैः 'रामेण परशुरामो जितः' इति सूचनाच्चूलिका।9 जहाँ अर्थ (कथावस्तु)की सूचना यवनिका के उस ओर अन्दर बैठे पात्रों के द्वारा दी जाय, वहाँ चूलिका नामक अर्थोपत्तेपक होता है। नेपथ्य पात्र के द्वारा अर्थ की सूचना चूलिका कहलाती है, जैसे उत्तररामचरित के दूसरे अंक के शुरू में आत्रेयो के आगमन पर वनदेवी नेपथ्य से उसका स्वागत करती है-'( नेपथ्य में) तपोधना भगवती का स्वागत हो। (तब तपोधना मंच पर प्रवेश करती है)।' इस प्रकार नेपथ्यपात्र वासन्ती के द्वारा आत्रेयी के आगमन की सूचना दी गई है, अतः यह चूलिका है। अथवा जैसे भवभूति के दूसरे नाटक वीरचरित (महावीरचरित) के चतुर्थ अंक के आरंभ में नेपथ्यस्थित देवता इस बात की सूचना देते हैं कि दाशरथि राम ने परशुराम को जीत लिया है। (नेपथ्य से ) हे देवताओं, मंगल कार्यों का आरम्भ करो, आरम्भ करो। कृशाश्व के शिष्य भगवान् ऋषि विश्वामित्र की जय हो। सूर्य के वंश में अब भी विजयी क्षत्रिय (क्षत्र) विद्यमान् हैं, उसकी जय हो। क्षत्रियों के शत्रु, परशुराम को जीतने वाले (ठीक करने वाले) समस्त संसार को अभयदान देने का जिन्होंने व्रत धारण कर लिया है, ऐसे लोगों के शरण्य, सूर्यवंश के चन्द्रमा (भगवान् रामचन्द्र) की जय हो। 15. १. यचपि मूल पाठ में पद्य में 'जयति' तथा 'विजयते' पदों का वर्तमाने लट का प्रयोग है, किन्तु हिन्दी अनुवाद में सुन्दरता लाने के लिए हमने यहाँ 'जय ही' यह अनुवाद किया है, वैसे शाब्दिक अनुवाद 'जय है' होगा।
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६८ दशरूपकम्
अथाङ्कास्यम्-1F
अद्धान्त एवं पात्रमद्ान्तपात्रं तेन विश्लिष्टस्योत्तराङ्कमुखस्य सूचनं तद्वशेनोत्तराङ्डा- वतारोऽङ्रास्यमिति, यथा वीरचरिते द्वितीयाङ्कावतारोऽङ्कास्यमिति, यथा वौरचरिते द्विती- याङ्कान्ते-'(प्रविश्य) सुमन्त्र :- भगवन्तौ वसिष्ठविश्वामित्रौ भवतः सभार्गवानाह- यतः। इतरे-क्व भगवन्तौ?। सुमन्त्रः-महाराजदशरथस्यान्तिके। इतरे-तदनु- रोघात्तत्रैव गच्छाम:' इत्यङ्डसमात्तौ '(ततः प्रविशन्त्युपविष्टा वसिष्ठविश्वामित्रपरशुरामाः) इत्यत्र पूर्वाक्कान्त एव प्रविष्टेन सुमन्त्रपात्रेण शतानन्दजनककथार्थविच्छेदे उत्तराड्मुख- सूचनादङ्कास्यमिति। जहाँ एक अंक की समाप्ति के समय उस अंक में प्रयुक्त पात्रों के द्वारा किसी छूटे हुए अर्थ की सूचना दी जाय, वहाँ अंकास्य कहलाता है। अंक के अन्त के पात्र अंकान्तपात्र कहलाते हैं, जहाँ इस प्रकार के पात्र के द्वारा विश्लिष्ट कथावस्तु की, जिसका वर्णन अगले अंक में आयगा सूचना दी जाय वहाँ उत्तरांकावतार अंकास्य कहलाता है। जैसे वीरचरित के दूसरे अंक के अन्त में सुमन्त्र (पात्र) आकर शतानन्द तथा जनक की कथा का विच्छेद कर, भावी अंक के आरंभ की सूचना देता है, अतः वहाँ अंकास्य है। जैसे- '(प्रवेश कर) सुमन्त्र-पूज्य वशिष्ठ तथा विश्वामित्र, आपको भार्गव (शतानन्द) के साथ बुला रहे हैं। दूसरे-वे कहाँ हैं ? सुमन्त्र-महाराज दशरथ के पास। दूसरे-उनके अनुरोध से वहीं चलते हैं।' (अंक का अंत) (इसके बाद अगला अंक-तब वशिष्ठ विश्वामित्र तथा परशुराम बैठे हुए प्रवेश करते हैं-इस प्रकार आरम्भ होता है।) पथाङ्कावतार :-
एभि: संसूचयेत्सूच्यं दश्यमङ्: प्रदर्शयेत्। । यत्र प्रविष्टपात्रेण सूचितमेव पूर्वाङ्काविच्छिन्नार्थतयैवाङ्कान्तरमापतति प्रवेशकविष्क- म्भकादिशन्यं सोऽङ्कावतारः, यथा मालविकाग्निमित्रे प्रथमाङ्कान्ते विदूषक :- तेण हि दुवेवि देवीए पेक्खागेहं गदुअ सज्जीदोवअरणं करिअ तत्थभवदो दूद बिसज्जेथ अथवा मुद- जसदो ज्जेव णं उत्थावयिस्सदि।' ('तेन हि द्वावपि देव्याः प्रेक्षागेहं गत्वा सज्गीतकोप- करणं कृत्वा तत्रभवतो दूतं विसर्जयतम्, अथवा मृदन्शब्द एवैनमुत्थापयिष्यति।') इस्युपक्रमे मृदजशब्दश्रवणादनन्तरं सर्वाण्येव पात्राणि प्रथमाङ्कप्रक्रान्तपात्रसंक्ान्तिदर्शन द्वितीयाड्वादावारभन्त इति प्रथमाङ्कार्थाविच्छेदेनैव द्वितीयाङ्कस्यावतरणादङ्कावतार इति। जहाँ प्रथम अङ्ढ की वस्तु का विच्छेद किये बिना दूसरे अङ्क की वस्तु चले, वहाँ अङ्काघतार होता है। सूच्य वस्तु की सूचना इन (अर्थोपक्षेपकों) के द्वारा देनी चाहिए, दश्यों (दश्य अर्थों) का मञज पर अक्कों के द्वारा प्रदर्शन करे।
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प्रथम: प्रकाश:
जब प्रथम अंक के पात्र किसी बात की सूचना दें, तथा वे ही पात्र उसी अंकार्थ (कथावस्तु) को लेकर उसे बिना विच्छिन् किये ही दूसरे अंक में प्रवेश करें, तो वहाँ प्रवेशक व विष्कम्भक आदि नहीं होता, यह अंकावतार है। जैसे सालविकाननिमित्र में प्रथम अंक के अन्त में विदूषक इस वाक्य के द्वारा भावी अंक की वस्तु की सूचना देता है- 'तो तुम दोनों देवी के नाय्यगृह् में जाकर संगीत की साज-सज्जा ठीक कर पूज्य मित्र के पास दूत भेज देना, अथवा मृदंग का शब्द ही इन्हें यहाँ से उटा देगा।' इसके बाद मृदंग शब्द के सुनने के बाद दूसरे अंक के आरंभ में सारे ही पात्र प्रथम अंक में व्णित पात्रों (हरदत्त तथा गणदास) के शिष्यशिक्षाक्रम का दर्शन करते हैं। इस तरह पहले अंक की कथा अविच्छिन्न रूप में ही द्वितीय अंक में अवतरित हुई है, अतः अंकावतार है।
१. धनंजय के इस अंकावतार तथा अंकास्य के बारे में हमें उसका मत चिन्त्य दिखाई देता है। धनिक तो वृत्ति में धनंजय की ही बात कहते हैं। साथ ही वृत्ति में दिये दोनों के उदा- हरण में हमें कोई भेद नहीं दिखाई देता। दोनों ही धनंजय की अङ्कावतार वाली परिभाषा में आ जाते हैं। वस्तुतः धनंजय व धनिक दोनों ने अंकास्य को स्पष्ट करने में कसर रक्खी है। भरत के नाट्यशास्त्र में पञ्चम अर्थोपक्षेपक अंकास्य नहीं कहा गया है। वे इसे अंकमुख कहते हैं। यद्यपि दोनों का अर्थ एक ही है, पर परिभाषा में भेद है। भरत के मतानुसार 'अंकमुख' वहाँ होता है, जहाँ किसी स्त्री या पुरुष के द्वारा अंक की कथा का संक्षेप आरम्भ में ही कर दिया जाय। 'विश्लिष्टमुख मंकस्य स्त्रिया वा पुरुषेण वा। यत्र संक्षिप्यते पूर्व तदङ्कमुख मिष्यते॥(ना.शा.२१११६) विश्वनाथ के साहित्यदर्पण में पञ्चम अर्थोपक्षेपक के रूप में पहले 'अंकमुख' का ही वर्णन किया गया है। विश्वनाथ के मतानुसार जहाँ एक ही अंक में (दूसरे) अंकों की सारी कथा की सूचना हो, वह अंकमुख है। यह नाटकीय कथावस्तु के बीज का सूचक है। यत्र स्यादक्क एकस्मिन्नंगानां सूचनाSखिला। तदङ्कमुख मित्याहु बींजार्थख्यापकं च तत् ।। ( सा. द. ६-५९) गइक साहित्यदर्पण की यह परिभाषा भरत पर ही आधृत होने पर भी विशेष स्पष्ट है। सा. द. में इसका उदाहरण मालतीमाधव के प्रथम अंक का आरंभ दिया गया है, जहाँ कामन्दकी व अवलोकिता मालती तथा माधव के अनुराग की सूचना प्रसंगवश दे देती हैं। सा० द० का यह लक्षण व उदाहरण, साथ ही इसे अंकमुख कहना ठीक जँचता है। साहित्यदर्पणकार ने अंकास्थ की भी धनंजय व धनिक वाली परिभाषा देकर वही उदा- हरण दिया है। अंकमुख के बाद वे अर्थोपक्षेपक का धनंजय सम्मत यह पञ्चम मेद भी करते हैं। पर वे धनंजय के मत से सहमत नहीं दिखाई देते। ऊपर की कारिका के आगे के ही कारिकार्ध की वृत्ति में वे लिखते हैं :- एतच्च धनिकमतानुसारेणोक्तम्। अन्ये तु 'अङ्कावतारेणै- वेदं गतार्थ' इत्याडुः। विश्वनाथ को स्वयं को भी यह धनिक विरोधी मत ही पसन्द है। पर वे अपने मत्थे न मढ़कर 'अन्ये' शब्द का प्रयोग कर देते हैं। वस्तुतः धनिक वाला मत अवैज्ञानिक ही है। धनंजय तथा धनिक यहाँ भरत का अनुसरण करते दिखाई नहीं देते। अन्यथा यह त्रुटि न हो पाती। यहाँ यह भी संकेत कर दिया जाय कि भरत अंकमुख का वर्णन अंकावतार के बाद करते हैं। ठीक यही विश्वनाथ ने किया है। धनंजय ने पहले अंकास्य को लिया है, बाद में अंकावतार को।
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७० दशरूपकम्
पुनस्त्रिघा वस्तुविभागमाह- नाट्यधर्मम पेदयैतत्पुनर्वस्तु त्रिधेष्यते॥ ६३॥ वस्तु फिर तीन तरह की होती है। नाटक (रूपक, नाट्य) की प्रकृति का निरीक्षण करके कथावस्तु फिर से तीन तरह की मानी जाती है। केन प्रकारेण त्रैधं तदाहT हत T सघेषां नियतस्यैव शाव्यमश्राव्यमेव च। तीन प्रकार की किस तरह, इसे कहते हैं :- कुछ सबके लिए सुनने लायक (सर्व- श्राव्य) होता है, कुछ परिमित लोगों (नियत लोगों) के लिए सुनने लायक (नियतश्राव्य) होता है, कुछ किसी भी पात्र केसुनने लायक नहीं (अश्राव्य) होता। तत्र सर्वश्राव्यं प्रकाशं स्यादश्राव्यं स्वगतं मतम्॥ ६४॥ सर्वश्राव्यं यद्स्तु तत्प्रकाशमित्युच्यते। यत्त सर्वस्याश्राव्यं तत्स्वगतमितिशब्दा भिधेयम् । सर्वश्राव्य को प्रकाश तथा अश्राव्य को स्वगत कहते हैं। सवश्राव्य वस्तु-सर्वश्राव्य कथनोपकथन-प्रकाश कहलाता है, जो सर्वश्राव्य (कथनोप- कथन) नहीं होता वह स्वगत कहलाता है। नियतश्राव्यमाह- द्विघा Sन्यन्नाट्यघमाख्यं जनान्तमपवारितम्। अन्यत्तु नियतश्राव्यं द्वित्कारं जनान्तिकापचारितमेदेन। दूसरा नाव्यधर्म-नियत श्राव्य वस्तु-दो तरह का होता है जनान्त (जनान्तिक), तथा अपवारित। तत्र जनान्तिकमाह- ग किकनग त्रिपताकाकरेणान्यानपवार्यान्तरा कथाम्॥ ६५॥ 0>अन्योन्यामन्त्रणं यत्स्याज्जनान्ते तज्जनान्तिकम्। लाए़
यस्य न श्राव्यं तस्यान्तर ऊर्ध्वसर्वाङ्गलं वक्रानामिकत्रिपताकालक्षणं करं कृत्वाऽन्येन सह यन्मन्त्र्यते तज्जनान्तिकमिति। जहाँ (मझ् पर) दूसरे पात्रों के विद्यमान होते हुए भी दो पात्र आपस में इस तरह मन्त्रणा करें कि उसे दूसरों को न सुनाना अभीष्ट हो, तथा दूसरे पात्रों की ओर 'त्रिपताकाकर' के द्वारा हाथ से संकेत कर (दर्शकों को) इस बात की सूचना दी जाय कि उनका वारण किया जा रहा है, वहाँ जनान्तिक नामक नियतश्राव्य (कथनोपकथन) होता है। जिस पात्र को कोई बात नहीं सुनानी है, उसकी ओर हाथ की सारी अंगुलियाँ ऊँची कर अनामिका अंगुली को टेढ़ा रखना त्रिपताका कहलाता है, ऐसे ढंग से हाथ करना 'त्रिपताकाकर' का लक्षण है। इस ढंग से अन्य पात्रों का अपवारण कर बातचीत करना जनान्तिक है। क
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प्रथम: प्रकाशः ७१
अथापवारितम्- कन ए-ह-पकरिनिक फf-की रहस्यं कथ्यते ऽन्यस्य परावृत्त्यापवारितम् ॥६६ ॥ कइ परावृत्त्यान्यस्य रहस्यकथनमपवारितमिति। जहाँ मुँह को दूसरी ओर कर कोई पात्र दूसरे व्यक्ति की गुप्त बात कहता है, उसे अपवारित कहते हैं। नाव्यवर्म के ही प्रसंग में आकाशभाषित का वर्णन करते हैं। 1अल
किं व्रवीष्येवमित्यादि विना पात्र व्रवीति यत्। श्रुत्वेवानुक्तमण्येक स्तत्स्यादाकाशभाषितम्॥ ६७।। स्पष्टार्थः । जहाँ कोई पात्र 'क्या कहते हो' इस तरह कहता हुआ दूसरे पात्र के बिना ही बातचीत करे, तथा उसके कथन के कहे बिना भी सुनकर कथनोपकथन करे, वह आकाशभाषित होता है। (एक पात्र वाले रूपक-माण-में इस आकाशभाषित का प्रयोग बहुत पाया जाता है। आज के एकाभिनय (Mono-acting) में भी इसका अस्तित्व है।) ककी अन्यान्यपि नाट्यघर्माणि प्रथमकल्पादीनि कैवििदुदाहृतानि तेषामभारतीयत्वान्नाम- मालाप्रसिद्धानां केषांचिद्देश भाषात्मकत्वान्नाव्यघर्मत्वाभावात्वक्षण नो कमित्युपसंहरति कुछ लोगों ने प्रथम कल्प आदि और नाव्यधर्मों को भी माना है, वे भरत नाट्यशास्त्र के मतानुसार नहीं है, तथा उनका केवल नाम ही प्रसिद्ध है, तथा कुछ देशभाषा में प्रयुक्त होते हैं, अतः नाट्यधर्म नहीं हैं, इसलिए उनका लक्षण नहीं दिया है। अब इस नाटक की कथावस्तु का उपसंहार करते हुए कहते हैं :- इत्याद्यशेषमिह वस्तुविभेदजातं रामायणादि च विभाव्य बृहत्कथां च। आसूत्रयेत्तदनु नेतृरसानुगुण्या- च्चित्रां कथामुचितचारुषचःप्रपञ्चैः।। ६८॥
इति धनज्जयकृतदशरूपकस्य प्रथमः प्रकाशः समाप्तः ।
१. वृत्तिकार (अवलोककार) धनिक 'कैश्चिदुदाहृतानि' के द्वारा इनके पूर्ववर्ती नाट्यकारों का उल्लेख करते हैं, जो प्रथम कल्प आदि अन्य नाट्यधर्मों को मानते हैं। यह मत भरत के बाद के ना्यशाख्तियों का है, किन्तु भरत-सम्मत नहीं इसका संकेत भी यहीं मिलता है। 'उदाहृतानि' पद स्पष्ट बताता है कि इस मत के प्रवर्तकों के नाव्यशास्त्र पर ग्रंथ भी रहे होंगे। ये कौन थे, इनके ग्रन्थ कौन कौन से थे, ये बातें अभी अन्धकार में ही पड़ी हैं। संभवतः भरत के नाव्यशास्त्र के वृत्तिकारों में से ही किन्हीं के मत हों।
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७२ दशरूपकमू
वस्तुविभेदजातम्-वस्तु = वर्णनीयं तस्य विभेदजातं नाम भेदाः। रामायणादि बृहत्कथां च गुणाढ्यनिर्मितां विभाव्य आलोच्य। तदनु = एतदुत्तरम्। नेत्रिति-नेता वक््यमाणलक्षणः, रसाश् तेषामानुगुण्याच्चित्राम् = चित्ररूपां, कथाम् =आख्यायिकाम्। चारूणि यानि वर्चासि तेषां प्रपश्चैविस्तरैरासूत्रयेदनुप्रथयेत्। तत्र बृहत्कथामूलं मुद्राराक्षसम्- 'चाणक्यनाम्ना तेनाथ शकटालगृहे रहः। कृत्यां विधाय सहसा सपुत्रो निहतो नृपः ॥ योगानन्दयशःशेषे पूर्वनन्दसुतस्ततः। चन्द्रगुप्त: कृतो राजा चाणक्येन महौजसा ॥।' इति बृहत्कथायां सूचितम्, श्रीरामायणोक्तं रामकथादि शेयम्। ।। इति श्रीविष्णुसूनोर्धनिकस्य कृतौ दशरूपावलोके प्रथमः प्रकाशः समाह्ः॥
(कवि) इस तरह कथावस्तु के समस्त भेदों का पर्यालोचन कर तथा रामायण (महाभारत, पुराण) आदि एवं बृहत्कथा का अनुशीलन कर नेता (नायक) तथा रस के अनुरूप सुन्दर कथा को उपयुक्त तथा सुन्दर कथनोपकथन के द्वारा निबद्ध करे। (नाटकादि रूपकों की रचना पौराणिक कथाओं के आधार पर ही नहीं होती, वे लौकिक कथाओं तथा ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर भी हो सकती है, इसीलिए गुणाढ्य की बृहत्कथा को भी रूपक की कथा का स्रोतोमूल माना है ।) जैसे मुद्राराक्षस नाटक का मूल बुहदत्कथा ही है :- 'शकटार के घर में छिपकर उस चाणक्य ने कृत्या (डाकिनी) को पैदा कर राजाको पुत्रों सहित एक दम मार डाला। योगानंद के की्ति के शेष रह जाने पर (मर जाने पर), पूर्वनन्द का पुत्र, चन्द्रगुप्त उस महापराक्रमी चाणक्य के द्वारा राजा बना दिया गया।' इस प्रकार का संकेत बृहत्कथा में मिलता है। रामकथा रामायण में कही गई है। प्रथम: प्रकाशः
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ी किरी 171811am अकशा शमरमा अथ द्वितीय: प्रकाशः। रूपकाणामन्योन्यं भेदसिद्धये वस्तुमेदं प्रतिपायेदानीं नायकमेद: प्रतिपाद्यते- नेता विनीतो मधुरस्त्यागी दक्षः प्रियंवदः। रक्तलोक: शुचिर्वाग्मी रूढवंशः स्थिरो युवा।।१।।
शूरो दढश् तेजस्वी शास्त्रचनुश्च धार्मिक:॥२॥ नेता नायको विनयादिगुणसम्पननो भवतीति। तत्र विनीतो यथा वीरचरिते- 'य द्न्रह्मवादिभिरुपासितवन्धपादे विद्यातपोव्रतनिधौ तपतां वरिष्ठे। देवात्कृतस्त्वयि मया विनयापचारस्तत्र प्रसीद भगवन्नयमज्जलिस्ते ।।' रूपकों में (नाटक, प्रकरण आदि वक्ष्यमाण रूपक-भेदों में) परस्पर भेद का कारण वस्तु नेता तथा रस का भेद है, (जैसा कहा भी गया है-वस्तु नेता रसस्तेषां भेदकः) अतः इनके भेद बताने के लिए वस्तु, नेता तथा रस के प्रकारभेदों का निर्देश आवश्यक हो जाता है। प्रथम प्रकाश में वस्तुभेद का प्रतिपादन किया गया, अब नायकभेद का प्रतिपादन करते हैं। नायक विनम्र, मधुर, श्यागी, चतुर (दक्ष), प्रिय बोलने वाला (प्रियंवद), लोगों को खुश करने वाला (रक्तलोक), पवित्र मनवाला (शुचि), बातचीत करने में कुशल (वाग्मी), कुलीन वंश में उत्पन्न (रूढवंश), मन आदि से स्थिर, युवक अवस्था वाला होता है। वह बुद्धि, उत्साह, स्मृति, प्रज्ञा, कला तथा मान से युक्त होता है, शूर, हढ, तेजस्वी, शास्त्रज्ञाता तथा धार्मिक होता है।। नेता अर्थात नायक विनम्रता आादि गुणों से भूषित रहता है। (वृन्तिकार धनिक इन्हीं गुणों को क्रमशः उदाहत करता है।) (१) नायक विनम्र हो, जैसे भवभूति के महावीरचरित में रामचन्द्र विनम्र हैं। उनकी विनम्रता की अभिव्यक्ति इस पद्य के द्वारा हुई है :- १. भारतीय नाव्यशास्त्र के अनुसार नाटक (रूपक) के वस्तु, नेता तथा रस ये तीन तश्व माने जाते हैं, इन्हीं के आधार पर किसी रूपक की पर्यालोचना की जाती है। पाश्रात्य पद्धति कथावस्तु, चरित्रचित्रण, कथनोपकथन, देशकाल, शैली, उद्देश्य इन छः तत्वों को मानती है, तथा उसके साथ 'रंगमंच' (अभिनेयता) नायक सातर्वें तत्त्व का भी समावेश करती है।। भारतीय पद्धति के इन तीनों तत्वों में पाश्चात्य प्रद्धति के ये सभी तत्त्व अन्तर्भूत हो जाते हैं। चरित्रचित्रण का समावेश नेता के साथ किया जा सकता है-यह दूसरी बात है कि भारतीय काव्यों व नाटकों के रसपरक होने से केवल चरित्रचचत्रण या शीलवैचित्र्य मात्र यहाँ नाटककार का लक्ष्य नहीं रहा है। 'नेता' शब्द में भारतीय नाट्य शास्त्री नायक के अतिरिक्त नायिका, पीठमर्दं आदि सभी पात्रों को अन्तर्भावित करते हैं, यह स्पष्ट है। कथनोपकथन का समावेश भारतीय पद्धति वस्तु के ही अन्तर्गत करती है, किन्तु यह रस का व्यअ्षक होने के कारण उसका भो अंग माना जा सकता है। देशकाल, शैली, व उद्देश्य तीनों का समावेश रसमें हो जाता है। अमिनेयता तो नाटक की खास प्रकृति है अतः उसे अलग से तत्व मानना पुनरुक्ति दोष होगा-फिर वाचिक, आंगिक, आहार्यं तथा सासत्रक अभिनय के द्वारा उनका भौ उपादान भारतीय नाट्य पद्धति ने किया ही है। १० दृ०
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७४ दशरूपकम्
ब्रह्मशों के द्वारा जिनके पवित्र चरणों की उपासना (लोगों के द्वारा) की गई है, जो विद्या एवं तप के निधि हैं, तथा तपस्वियों में श्रेष्ठ हैं, ऐसे आपके प्रति मैने सौभाग्यतः नमस्कार आदि विनयापचार किया है। हे भगवन् आप प्रसन्न हों, आपको मेरा यह नमस्कार है। मधुर :- प्रियदर्शनः । यथा तत्रैव- 'राम राम नयनाभिरामतामाशयस्य सदृशी समुद्दहन्। अरप्रत्क्यगुणरामणीयकः सर्वथव हृदयङ्गमोऽसि मे ॥' (२) नायक मधुर अर्थात् प्रियदर्शन (सुन्दर) होना चाहिए, जैसे वहीं महावीरचरित में रामचन्द्र के माधुर्य का उपनिबन्धन किया गया है :- S D हे सुन्दर राम, हृदय के समान, नेत्रों को अच्छी लगनेवाली, सुन्दरता को धारण करनेवाले तुम सर्वथा मेरे हृदयक्षम हो (तुमने मेरे हृदय में स्थान पा लिया है।। तुम्हारे[गुणों की तर्कना तथा विचार बुद्धि से परे हैं (तुममें अनेकानेक गुण हैं), अत एव तुम सुन्दर (ज्ञात होते) हो। त्यागी=सवस्वदायक: । यथा- त्वचं कर्ण: शिबिमांसं जीवं जीमूतवाहनः । ददौ दधीचिरस्थीनि नास्त्यदेयं महात्मनाम् ।।' (३) नायक त्यागी अर्थात् समस्त वस्तुओं (यन, मन, धन) की देने वाला हो, किसी भी सांसारिक वस्तु के प्रति उसका अनुचित मोह न हो। महातमाओं की इसी त्यागशीलता का उदाहरण नीचे त्याग गुण को स्पष्ट करने के लिए देते हैं: कर्ण ने त्वचा, शिविन मांस, जीमूतवाहन ने जीवन (जीव), तथा दधीचि ने हड्डियों को दे दिया। महात्मा लोगों के लिए कोई भी चीज़ अदेशा नई दक्ष := क्षिप्रकारी। यथा वीरचरिते-्र
रामस्य त्रिपुरान्तकृद्दिविषदां तेजोभिरिद्ध धनुः। शुण्डार: कलमैन यद्वदचले वत्सैन दोदण्डक हतस्मिन्नाहित एव गर्जितगुणं कृष्टं च भम्नं च तत्।।' ररी (४) नायक दक्ष होना चाहिए। दक्ष से तात्पर्यं किसी भी कार्य को एकदम फुर्ती से करने (क्षिप्रकारिता) से हैं। नायक सुस्त और दीर्घसूत्री न होकर क्षिप्रकारी होना चाहिए। इसका उदाहरण महावीरचरित से रामचन्द्र के विषय में दिया जाता है :- ॥। समस्त देवताओं के तेज से समिद्ध, त्रिपुर नामक दैत्य का अन्त करनेवाला, शिव का पिनाक धनुष जो मानों हजारों कड़कड़ाते कठोर बज्रों से बना हुआ है-राम के सामने प्रकटित होता है (राम के सामने पड़ा है)। वत्स राम ने उस अचल धनुष पर इसी तरह अपना हाथ रखा, जैसे हाथी का बच्चा सूँड रखता है, और सशब्द प्रत्यव्चा वाले उस धनुष को खैंचा तथा तोड़ डाला। प्रियंवद :- प्रियभाषी। यथा तत्रव T PS 1उत्पत्तिजमदप्नितः स भगवान्देवः पिनाकी गुरु- चीर्य यत्तु न तदिरां पथि ननु व्यक्तं हि तत्कमभिः॥ 351F pfदयाग: सपसमुद्र मुद्रितमहीनिर्व्याजदानावधिः सत्यब्रह्मतपोनिघेर्भगवतः किं वा न लोकोत्तरम् ॥"
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(५) नायक प्रियंवद अर्थात प्रियवचनों को बोलने वाला होता है। जैसे वहीं महावीर चरित में रामचन्द्र परशुराम से बात करते समय अपनी प्रियवदता का परिचय देते हैं :- आपकी उत्पत्ति महर्षि जमदगि्नि से है (महर्षिं जमदरिन आपके पिता हैं), वे भगवान् शिव आपके गुरु हैं। आपकी वीरता कार्यों से ही प्रकटित है, उसे वाणी के द्वारा नहीं कहा जा सकता (वह वाणी के मार्ग में नहीं आा सकती)। सातों समुद्रों के द्वारा सीमित पृथ्वी को बिना किसी व्याज के दान देना आपके त्याग का सूचक है। सत्य, ब्रह्म तथा तप के निधि (सत्यनिष्ठ, ब्रह्मनिष्ठ तथा तपोनिष्ठ) आपकी ऐसी कौन वस्तु है, जो अलौकिक न हो। रक्तलोकः । यथा तत्रव- काघ सपी-Bत्रय्यास्त्राता यस्तवार्य तनूज- स्तेनायैव स्वामिनस्ते प्रसादात्। राजन्वन्तो रामभद्रेण राज्ञा लब्घन्षेमाः पूर्णकामाश्वरामः ॥।' (६) नायक रक्तलोक होना चाहिए अर्थात सभी लोग उससे खुश रहें। जैसे महावीर चरित में राम के आचरण से लोग उनसे खुश हैं, उनमें अनुरक्त हैं, इसकी सूचना इस पद्य के द्वारा दो गई है। अपने महाराज आपकी कृपा से, हम लोग आपके इस पुत्र [रामचन्द्र के द्वारा राजा वाले होकर कुशलता प्राप्त कर, समस्त इच्छाओं को पूर्ण कर (आनन्द से) रह रहे हैं। आपका यह पुत्र तीनों वेदों की रक्षा करने वाला है। एवं शौचादिष्वप्युदाहार्यम्। तत्र शौचं नाम मनोनैमल्यादिना कामादनभिभूतत्वम्। यथा रघौ जा8। 'का त्वं शुभे कस्य परिग्रहो वा कि वा मदभ्यागमकारणं ते। आचच्व मत्वा वशिनां रघूणां मनः परस्त्रीविमुखप्रवृत्ति ।।2 (७.) इसी परिपाटी से नायक के अन्य गुणों-शौचादि-का भी उदाहरण दिया जा सकता है। शौच का तात्पर्य मन की निमलता है; जिससे मन काम आदि दोषों से युक्त न हो सके। जैसे रघुवंश के षोडश सर्ग में कुश अपनी शुचिता का प्रकाशन करते कहता है :- शिक पृरत् हे शुभे, तुम कौन हो, किसकी पतनी हो, तुम्हारे मेरे पास आने का क्या कारण है? वशी मन वाले जितेन्द्रिय रघुवंशियों के मन को परस्त्री विमुख समझ कर इन बातों का उत्तर दो। चागग्मी। यथा हनुमन्नाटके- 'बाह्ोर्बल न विदितं न च कामुकस्य एकमिए क तर्ब तनिमा तत एव दो प्रागु उक्त पककी तचापलं परशुराम मैम क्षमस्व प F E fF FE डिम्भस्य दुर्विलसितानि मुदे गुरुणाम् ।। (८) नायक बातचीत करने में कुशल होना जाहिए जैसे रामचन्द्र ! निम्न हनुमन्नाटक के पद्य में परशुराम की प्रत्युत्तर देते हुए राम अपनी वाग्मिता का परिचय देते हैं एी है परशुराम, न तो मुझे अपने हाथों के बल का ही पता था, न शिवजी के इस धनुष की कमजोरी का ही। इसलिए यह गलती हुई। अतः मेरी चपलता को क्षमा करें। बचों को चपल चेष्टाएँ बड़े लोगों को प्रसन्न ही करती है।
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७६ · दशरूपकम्
रूढवंशो यथा mppep FFM aFiF ( A ) 61 ये चत्वारो दिनकर कुलक्षत्रसन्तानमल्ली-ृ 3 पी मालाम्लानस्तबकमधुपा जज्ञिरे राजपुत्राः । किF 178 रामस्तेषामचरसभवस्ताडकाकालरात्रि ।i) PI क hey nए I पत्यूषोडयं सुचरितकथाकन्दलीमूलकन्दः ॥2 T 175 V (१) नायक उच्च वंश में उत्पन्न हो, जैसे रामचन्द्र की कुलीनता का व्यजक निम्न पद्य है :- सूयवंश में उत्पन्न क्षत्रिय संतानों की मालतीमाला (अथवा कल्पवृक्ष की कलियों की माला) के स्तबक के अनुरागी भँवरे, जो चार राजकुमार उत्पन्न हुए, उन चारों में सबसे बड़े रामचन्द्र हैं, जो ताडकारूपी कालरात्रि के प्रातःकाल हैं, तथा वह मूलकन्द्र हैं, जिससे सुन्दर चरित्र वाली यशगाथाओं की कन्दलियाँ पैदा हुई हैं। स्थिरो वाछन:क्रियाभिरचश्चलः। गथा वीरचरिते- 'प्रायश्चित्तं चरिष्यामि पूज्यानां वो व्यतिक्रमात्।
यथा वा मतृहरिशतके- न त्वेव दूषयिष्यामि शस्त्रप्रहमहाव्रतम् ।।'
B3 T IrUy 'प्रासभ्यते न खलु विप्नभयेन नीचैः प्रारभ्य विघ्नविहता विरमन्ति मध्याः। I 173 विघ्रः पुनः पुनरपि प्रतिहन्यमाना: प्रारब्धमुत्तमगुणास्त्वमिचोद्वहन्ति ।।' (१०) नायक स्थिर होना चाहिए अर्थात वह वाणी, मन तथा शरीर से चंचल न हो P. ST
जैसे महावीर चरित में ही- मैंने आप पूज्य लोगों का उल्लघन किया है, इसलिए मैं प्रायश्चित का आचरण करूँगा। इस तरह मैं शख्त्ग्रहण करने के बड़े प्रण की दूषित नहीं करूँगा। अथवा जैसे भतहरिशतक में, नीच कोटि के व्यक्ति केवल विध्नों के डर के ही कारण कोई काम नहीं करते। मध्यमकोटि के व्यक्ति काम तो शुरू करते हैं, पर विम्नों से पराभूत होकर उन्हें बन्द कर देते हैं। तुम जैसे उत्तमगुण (उत्तमकोटि के) व्यक्ति विम्नों से बार-बार पराभूत होने पर भी प्रारंभ किये हुए कार्य का वहन करते रहते हैं। सिडिक युवा प्रसिद्ध: । बुद्धिर्ज्ञानम्। गृंहीतविशेषकरी तु प्रज्ञा। यथा मालविकाभिमित्रे "यद्यत्प्रयोग विषये भाविकमुपदिश्यते मया तस्ये। तत्तद्विशेषकरणात् प्रत्युपदिशतीव मे बाला ॥।' स्पष्टमन्यत्। नायक के इन उपर्युक्त गुणों का विवेचन उदाहरण देना वृत्तिकार आवश्यक नहीं समझता। नायक का युवक होना भी भल आावश्यक गुण है, विशेष कर शरृंगार रस परक नाटकादि में यह सर्वथा अपेक्षित है। साथ ही वीरतादि गुण भी युवावस्था में ही चरमरूप में विकसित पाये जाते हैं। नायक के विषय में प्रयुक्त 'युवा' विशेषण स्पष्ट ही है। नायक में बुद्धि, प्रज्ञा आदि का भी अस्तित्व होना चाहिए, इसे कारिकाकार धनंजय बताते हैं। आमतौर पर बुद्धि व प्रज्ञा का एक अर्थ समझा जाने से एक साथ दोनों के प्रयोग पर पुनरुक्ति दोष की आशंका की जा सकती है। इस का निराकरण करने के लिए वृत्तिकार दोनों के भेद को बताते हुए कहते हैं, कि बुद्धि का अर्थ ज्ञान अर्थात ज्ञान सामान्य है। प्रज्ञा
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विशेष ज्ञान को उत्पन्न करने वाली है, अर्थात् किसी गृहीत ज्ञान में अपनी और कुछ मिलाकर उसे विशिष्ट रूप देने वाली अन्तःशक्ति का नाम प्रज्ञा है। जैसे मालविकाग्नि मित्र में- 'नृत्यकला के प्रयोग में मैंने जो जो ढंग (भाविक) उसे बताये हैं, वह बाला उनको विशिष्ट बना बनाकर ऐसा प्रयोग करती है मानों मुझे फिर से सिखा रह्दी है।' और बाकी सब स्पष्ट है। नेतृविशेषानाह- मेदैश्वतुर्धा ललितशान्तोदात्तोद्धतैरयम्। अब नायकों के भेदों का वर्णन करते हैं :- यह नायक ललित, शान्त, उदात्त तथा उद्धत इस प्रकार के भेदों के कारण चार तरह का होता है। कि (यहाँ यह जान लेना जरूरी है कि भारतीय नाटकों के नायक में धीरता (घैर्य) का होना परमावश्यक है, प्रत्येक प्रकार के नायक में धीरता होनी ही चाहिए, यही कारण है कि नायकों के सभी भेदों के साथ 'धीर' विशेषण जरूर लगाया जाता है। इस तरह नायक-भेद ४ तरह का माना जाता है-धीरललित, धीरशान्त, धीरोदात्त तथा धीरोद्धत) कगाड एाइ यथोदेशं लक्षणमाह- निश्चिन्तो धीरललित: कलासक्त: सुखी मृदु:॥३॥ सचिवादिविहितयोगच्ेमत्वाच्चिन्तारहितः अतएव गीतादिकलाविष्टो भोगप्रवणश् शज्गारप्रधानत्वाच सुकुमारसत्त्वाचारो मृदुरिति ललितः। यथा रत्नावल्याम्- 'राज्यं निर्जितशत्रु योग्यसचिवे न्यस्तः समस्तो भरः सम्यक्पालनलालिता: प्रशमिताशेषोपसर्गाः प्रजाः। प्रदोतस्य सुता वसन्तसमयस्त्वं चेति नाम्रा धृति काम: काममुपैत्वयं भम पुनर्मन्ये महानुत्सवः ।।' क्रम से इनका लक्षण नामसहित बताते हैं :- धीरललित वह नायक है जो सवंथा निश्चिन्त रहता है। वह कोमल स्वभाव का होता है, सुखी रहता है तथा कलाओं (नृत्यगीतादि) में आसक रहता है। धीरललित नायक के योगक्षेम की चिन्ता उसके मन्त्री आदि के द्वारा की जाती है, अतः १. वृत्तिकार ने नायक के बाकी गुणों को उदाहत करना विस्तार के भय से ठीक नहीं समझा है। दो एक के उदाहरण हम यों ले सकते हैं :- (१) युवा जैसे :- हिममुक्तचन्द्ररुचिर: सपझको मदयन् द्विजान् जनितमीनकैतनः। अभवत्प्रसादितसुरी महोत्सवः प्रमदाजनस्य से चिराय माधवः॥ (२) शूर जैसे :- पृष्वि स्थिरा भव भुजंगम धारयैनां त्वं कूर्मराज तदिदं द्वितयं दधीथाः। दिक्कुंजरा: कुरुत सम्प्रति संदिधीर्षी देव: करोति हरकार्मुक मातज्यम्।। (३) उत्साही जैसे :- कि क्रमिष्यति किलैष वामनी यावदित्थ महसन्न दानवाः। तावदस्य न ममौ नभस्तले लंघितार्कशशिमण्डल: क्रमः॥ int (४) तेजस्वो जैसे :- यं समेत्य च ललाटरेखया बिभ्रतः सपदि शम्भुविग्रहम्। क5 चण्डमारुतमिव प्रदीपवच्चेदिपस्य निरवाद्विलोचनम् ॥ इसी तरह बाकी गुणों के उदाहरण महाकाव्यों व नाटकों से ढूँढे जा सकते हैं। क। २. जो वस्तु अभी तक नहीं मिली है उसका मिलना योग; तथा मिली हुई चीज की रक्षा करना क्षेम कहलाता है-(अप्राप्तस्य प्राप्तिर्योगः, प्राप्तस्य परिरक्षणं क्षेमः)- IFIF
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दशरूपकम् वह इस प्रकार की चिन्ताओं से रहित रहता है। इस चिन्तारहिता के कारण वह गीतादिकलाओं का प्रेमी तथा भोगविलास में प्रवण रहता है। उसमें शंगाररस की प्रधानता होने के कारण वह सुकुमार आचरणवाला तथा कोमल स्वभाव वाला होता है। जैसे रत्नावली नाटिका का नायक वत्सराज उदयन इसी धीरललित कोटि का नायक है।पर पं आवान कFF पडीी 'राज्य के सारे शत्रु जीते जा चुके हैं, अब कोई भी शत्रु ऐसा नहीं जो राज्य में विध्न उपस्थित करे। राज्य-शासन का सारा भार सुयोग्य मंत्री यौगंधरायण को सौंप दिया है। प्रजाओं को अच्छी तरह से लालित व पालित किया गया है, उनके सारे दुःख-उपसर्गं- (अकाल आदि ईतियाँ) शांत हो चुके हैं। मेरे हृदय को प्रसन्न करने के लिए प्रद्योत की पुत्री वासवदत्ता मौजूद है, और तुम मौजू हो। इन सब वस्तुओं के नाम से ही काम (इच्छा) घैर्य को प्राप्त हो। अथवा इन सब वस्तुओं के विद्यमान होने पर कामदेव मजे से आयें, मैं तो यह समझता हूँ, कि मेरे लिए यह बहुत बड़े उत्सव का अवसर उपस्थित हुवा है। मैं कामदेव के उत्सव का स्वागत करने को प्रस्तुत हूँ। अथ शान्त :- गएक प सामान्यगुणयुक्तस्तु धीरशान्तो द्विजादिक:। विनयादिनेतूसामान्यगुणयोगी धीरशान्तो द्विजादिक इति विप्रवणिक्सचिवादीनां प्रकरणनेतृणामुपलक्षणं, विचक्षितं चैतत्, तेन नैश्चिन्त्यादिगुणसंभवेऽपि विप्रादीनां शान्ततैव, न लालित्यं, यथा मालतीमाधव-मृच्छकटिकादौ माधचचारुदत्तादि: । तत उदयगिरेरिचक एव 15 1 भागर 1 सफुरितगुणधुतिसुन्कर: कलावान्। इह जगति महोत्सवस्य हेतु कए 1ए ! : B5ल नयनवतामुदियाय, बालचन्द्र:।।' ।ईत्यादि। यथा वान हलीनारि -: है तिक कहीशापा उवड 1इ कि तस्ष व0क क । मखशतपरिपूर्त गोत्रमुद्धासितं यत् लामक ह्ा। के कडा री सदसि निबिडचैत्यब्रह्मघोषैः पुरस्तात्। ता। (भशीणण) भम निधनदशायां वतमानस्य पाप- स्तदसदृशमनुष्येघुष्यते घोषणायाम्' (इत्यादि)। धीरशान्त (धीरप्रशान्त) वह नायक है जिसमें सामान्य प्रकार से उपर्युक्त नाय. कगुणों का समावेश है। यह ब्राह्मण, वैश्य या मंत्निपुत्र आदि होता है। विनय आदि नायकगुणों का सामान्यरूप जिसमें पाया जाय, जो श्राह्मण, वैश्य, मंत्रिपुत्र आदि (द्विजादिक ) हो वह धीरशान्त नायक कहलाता हैं। धीरशान्तता प्रकरण (रूपकका एक मेद) के नायक का लक्षण है। यह बात कहना आवश्यक है कि प्रकरण रूपक के नायक में चाहे उपर्युक्त निश्चिन्ततादि (जिनका समावेश धीरललित की परिभाषा में किया गया है) पाये जायँ, फिर भी ब्राह्मणादि जाति के नायकों में शान्तता माननी ही होगी। यदपि प्रकरण १. यहां यहा संकेत करनी अनुचित न होंगा कि नाटिका के नायक सभी धीरललित होते हैं। वैसे मालविक्राग्निमित्र आदि कुछ नाटकों के नायक भी इस कोटि में आ सकते हैं। उनदें कुछ लोग धीरोदात्त मानना पसन्द करेंगे। विक्रमोर्वशीय का पुरुरवा चीरोदात्त ही माना जाना चाहिय-( : iE ्र:
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के नायक निश्चिन्त कलाप्रिय आदि होते हैं, फिर भी वे ललित कोदि के नहीं माने जाने चाहिए, उन्हें शांत ही मानना होगा, क्योंकि ब्राह्मणादि की प्रकृति ही शान्त होती है। मालतीमाधव का माधव, मृच्छकटिक, चारुदत्त आदि (यथा मेरे मन्दारवतीब्रह्मदत्त प्रकरण का ब्रह्मदत्त) ये सभी शान्त कोटि के हैं। इसकी अभिव्यंजना इन पद्यों से होती है :- (भगवती माधव का परिचय देते हुए कहती है) नेत्रवाले लोगों को प्रसन्न करने वाला, कलापूर्ण, कान्ति से युक्त बालचन्द्रमा जिस तरह उदयगिरि से उदित होता है, उसी तरह देदीप्यमान गुणों की कान्ति से मनोहर, कलाओं में पारंगत यह अकेला माधव, संसार के नेत्रधारियों के लिए महान् उत्सव (प्रसन्नता) का कारण बनकर उस कुल में उत्पन्न हुवा है। अथवा जैसे, (मृच्छकटिक में चारुदत्त स्वयं अपना परिचय देता हैं :- -) जो मेरा कुल सभाओं में चैत्यों के सघन वेदघोषों से ध्वनित होता था, तथा सैकड़ों हवन यश्ञों के द्वारा पवित्र रहता था, वही आज मेरी मृत्यु के समीप होने पर ऐसे नीच मनुष्यों (चाण्डालों) के द्वारा घोषणा में घोषित किया जारहा है।28 अथ धीरोदास :- महासत्वो उतिगम्भीर: क्षमावानविकस्थन: ॥४॥ स्थिरो निगूढाहङ्कारो धीरोदात्तो दढवतः। महासत्व := शोककोधाद्यनभिभूतान्तःसत्त्व:, अविकत्थनः=अनात्मश्लाघनः, विगूढा- हड्कार :== विनयच्छन्नावलेपः, दृढव्रतः-अङ्गीकृतनिर्वाहकः, धीरोदात्त := यथा नागानन्दे- 'जीमूतवाहन :- शिरामुखैः स्यन्दत एव रक्मद्यापि देहे मम मांसमस्ति। तृप्तिं न पश्यामि तवैव तावत्कि भक्षणात्त्वं विरतो गरुत्मन् ।।' यथा च रामं प्रति- वक्माड। की आहूतस्याभिषेकाय विस्ृष्टस्य वनाय च। Jpry F Ipnन मया लक्षितस्तस्य रुवल्पोऽप्याकारविभ्रमः॥' यच केषांचित्स्थर्यादीनां सामान्यगुणानामपि विशेषलक्षरो कचित्संकीर्तनं तत्तेषां तत्राघिक्यप्रतिपादनार्थम्। क ननु च कथ जीमूतवाहनादिर्नागानन्दादा दात्त इत्युच्यते? शदात्त्यं हि। नाम सर्वोस्कर्षेण वृत्ति:, तच्च विजिगीषुत्व एवोपपद्यते जीमूतवाहनस्तु निर्जिगीपुतयैव कविना प्रतिपादितः। यथा - 'तिष्ठन्भाति पितुः पुरो भुवि यथा सिंहासने किं तथाः यत्संचाहयतः सुखं हि चरणौ तातस्य किं राज्यत । १. अथवा जैसे मेरे मन्दारवतीब्रह्मदत्तप्रकरण का ब्रह्मदत्त :- ककरन् वेदान् केचिच्चतर्कग्रथन जटिलितान् न्यायबन्धांश्रकेचित् केचित सांख्यं च वेदान्त मिह च गणितं, पाणिनीयं पठन्तः । THE 9 साहित्यं चूतजम्बूमधुरसमधुरं केचिदास्व्रादयन्त स्तिष्ठन्त्यस्मद्गृहेष्वत्र विमलमतयो बालशिष्या: सुखेन ॥। (प्रथम अंक) कर
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दशरूपकम् िए कि किं भुक्ते भुवनत्रये धृतिरसौ भुक्तोज्फिते या गुरो-5त कीी रायासः खलु राज्यमुज्फितगुरोस्तत्रास्ति कश्विद्रणः ।।' इत्यनेन । पित्रोविधातुं शुश्रूषां त्यक्त्वश्षरयं क्रमागतम्। 83 मiी। वनं याम्यहमप्येष यथा जीमूतवाहन: ।।' इत्यनेन च। अतोऽस्यात्यन्तशमप्रधानत्वात्परमकारुणिकत्वाच्च वीतरागवच्छान्तता। अन्यच्ात्रायुकं यत्तथाभूतं राज्यसुखादौ निरभिलाषं नायकमुपादायान्तरा तथाभूतमल- यवत्यनुरागोपवर्णनम् । यच्चोक्त्तम्-'सामान्यगुणयोगी द्विजादिर्धीरशान्तः' इति। तदपि पारिभाषिकत्वादवास्तवमित्यभेदकम्। अरतो वस्तुस्थित्या बुद्ध-युधिष्टिर-जीमूतवाहना- दिव्याहारा: शान्ततामाविर्भावयन्ति। श्त्रोच्यते-यत्तावदुक्तं सवोत्कर्षेण वृत्तिरौदात्त्यमिति न तज्जीमूतवाहनादौ परिही- यते। न ह्येकरूपैव विजिगीषुता यः केनापि शौर्यत्यागदयादिनाSन्यानतिशेते स विजि- गीषुः, न यः परापकारेणार्थप्रहादिप्रवृत्तः, तथात्वे च मार्गदूषकादेरपि धीरोदात्तत्व- प्रसकिः। रामादेरपि जगत्पालनीयमिति दुष्टनिभ्रहे प्रवृत्तस्य नान्तरीयकत्वेन भूम्यादि लाभः। जीमूतवाहनादिस्तु प्राणैरपि परार्थसम्पादनाद्विश्वमप्यतिशेत इत्युदात्ततमः । यच्चोक्तम्-'तिष्ठन्भाति' इत्यादिना विषयसुखपराङ्मुखतेति तत् सत्यम्-कार्पण्यहेतुषु स्वसुखतृष्णासु निरभिलाषा एव जिगीषवः, तदुक्म्- 'स्वसुखनिरभिलाषः खिद्यसे लोकहेतोः प्रतिदिनमथवा ते वृत्तिरेवंविधैव। अनुभवति हि मूर्ध्ना पादपस्तीत्रमुष्णं शमयति परितापं छाययोपाश्रितानाम् II' इत्यादिना। सy 1 मलयवत्यनुरागोपवर्णनं त्वशान्तरसाश्रयं शान्तनायकतां प्रत्युत निषेधति। शान्तत्वं चानहंकृतत्वं, तच्च विप्रादेरौचित्यप्राप्तमिति वस्तुस्थित्या विप्रादेः शान्तता न स्वपरि- भाषामात्रेण। बुद्धजीमूतवाहनयोस्तु कारुणिकत्वाविशेषेऽपि सकामनिष्कामकरुणत्वादिघर्म- त्वाद्धेदः । अ्र्प्रतो जीमूतवाहना देर्घीरोदात्तत्वमिति। धीरोदात्त कोटि का नायक महासर्व, अत्यन्त गंभीर, कमाशील, अविकत्थन, स्थिर (अचंचल मन वाला), निगूढ अहंकार वाला, तथा दढवत होता है। महासत्त्व का अर्थ यह है, कि धीरोदात्त नायक का अन्तःकरण (अन्तःसख्व) क्रोध, शोक आदि विकारों से अभिभूत नहीं होना चाहिए। अविकत्थन का अर्थ यह है कि वह अपनी ही प्रशंसा करने वाला न हो। निगूढाहंकार का तात्पर्य यह है कि उसमें अहंकार व स्वाभिमान अवश्य हो, किन्तु वह विनम्रता के द्वारा दबाया हुवा तथा छिपाया हुवा हो। दृढव्रत से तात्पर्य यह है, कि उसने जिस बात का प्रण कर लिया है, उसका अन्त तक निर्वाह करने वाला हो। धीरोदात्त नायक का उदाहरण हम नागानन्द के नायक जीमूतवाहन के रूप में ले सकते हैं :- १. ध्यान रखिये विकत्थन होना जहाँ धीरोदात्त के लिए दोष है (गुण नहीं), वहाँ धीरोद्धत नायक के लिए दोष नहीं है।
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b 'हे गरुड, अभी भी मेरी नसों के किनारों से खून टपक रहा है, अभी भी मेरे शरीर में मांस बचा हुवा है, तुम भी अभी तृप्त नहीं हुए हो, ऐसा मेरा अन्दाजा है। फिर क्या कारण है कि तुम (मुझे) खाने से रुक गये हो।' अथवा जैसे राम के विषय में (उनकी धोरोदात्तता के विषय में) यह उक्ति है :- जब उन्हें अभिषेक के लिए बुलाया तब और जब उन्हें वन के लिए बिदा दी गई तब, दोनों वक्त मैंने उनके (राम) चेहरे पर कोई भी (थोडा सा भी) विकार नहीं देखा। 'नायक के स्थैय, दृढ़ता आदि गुणों का वर्णन नायक के सामान्य लक्षण में किया जा चुका है, अतः उनका धीरोदात्त के लक्षण में पुनः वर्णन पुनरुक्ति दोष है' इस शंका का समाधान कर ते हुए कहते हैं कि धीरोदात्त में ये सामान्य गुण विशिष्ट रूप में पाये जाने चाहिए, इस अवधारण के लिए इनकी फिर से गणना की गई है। इसका खास कारण धीरोदात्त में इन गुणों की अधिकता बताने के लिए है। धीरोदात्त नायक के उदाहरण के रूप में ऊपर विद्याधरराज के पुत्र जीमूतवाहन प्रसिद्ध त्यागशीलों तथा दानियों में से एक है, तथा उसमें विषयादि के प्रति सांसारिक जीव की भाँति निष्ठा न होकर, विरक्ति का भाव पाया जाता है। नागानंद के रचयिता हर्षवर्धन ने भी 'जीमूतवाहन का चित्रण विषय विरक्त के रूप में किया है। इन बातों को देखकर पूर्वपक्षी को जीमूतवाहन के धोरोदात्तत्व के विषय में शंका हो उठती है। इसी का संकेत यहाँ वृत्तिकार ने किया है। नागानन्द आदि नाटकों में1 जीमूतवाहन आदि नाटकों को धीरोदास्त क्यों कहा जाता है ? धीरोदात्त नायक में उदात्तता प्रधान गुण है। उदात्तता का तात्पर्य उस वृत्ति से है जो सबसे बढ़कर उत्कृष्टता प्रकट करती है अर्थात् अन्य लोगों से उत्कृष्ट होना ही उदात्तता है। यह उदात्तता तभी हो सकती है, जब नायक में दूसरों को जीतने की (उनसे उत्कृष्ट होने की) इच्छा विद्यमान हो। किन्तु जीमूतवाहन में यह विजिगीषा नहीं पाई जाती। कवि हर्षवर्षन ने उसका चित्रण निजिंगीपुरूप में किया है। इसका प्रमाण जीमूतवाहन की यह उक्ति दी जा सकती है- पिता के सामने जमीन पर बैठने से जो शोभा थी, क्या वैसी सिंहासन पर बैठने से है; पिता के चरणों की सेवा से जो सुख था, क्या वह राज्यप्राप्ति से हो सकता है ? तीनों लोकों के भोग से भी क्या वह धैर्य (सन्तोष) मिल सकता है, जो पिता के जूठन (भुक्तोज्झित) से ? पिता से विमुक्त मेरे लिए राज्य भी बोझा (भारस्व्ररूप ) हो गया है, इसमें भी कोई गुण ही है।' 'क्रमागत (वंश परम्परा प्राप्त ) ऐश्वर्य को छोड़कर माता-पिता की सेवा करने के लिए मैं वन में वैसे ही जारहा हूँ, जैसे जीमूतवाहन गया था।' इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि जीमूतवाहन में विरक्तता और शांति की प्रधानता पाई जाती है, साथ ही वह परमदयाल भी है अतः उसे रागहीन (वीतराग) की भांति शान्त मानकर धीरप्रशान्त कोटि का नायक मानना ठीक होगा। इसके अतिरिक्त हर्षवर्धन की नाटकीय कथावस्तु में कुछ दोष भी नजर आता है। इस तरह के शान्त तथा विकारहीन प्रकृति वाले नायक को लेकर, जो राज्यसुख आदि से सवथा उदासीन है, आगे जाकर मलयवती के साथ उसके अनुराग का वर्णन करना अनुचित प्रतीत होता है। इसके साथ ही धीरशान्त की परिभाषा-'सामान्यगुणों से युक्त ब्राह्मणादि धीरप्रशांत कोटि का नायक है'-भी मिथ्या है। क्योंकि सामान्य गुण-शौर्य, दक्षता, उत्साह कलावित्ता आदि शान्त तथा नीराग व्यक्ति में
१. आदि शब्द से भर्तृहरिनिर्वेद, आदि नाटकों का भी समावेश किया जा सकता है। ११ द०
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नहीं पाये जा सकते। अतः यह परिभाषा ठीक तरह से धीरप्रशान्त की विशेषता को व्यक्त नहीं कर पाती, तथा उसे अन्य धीरोदात्तादि से अलग करने में समर्थ नहीं जान पड़ती है। असल में वास्तविक स्थिति यह है कि बुद्ध, युधिष्ठिर, जीमूतवाहन आदि के नाम तथा इनके वृत्तान्त शान्त रस का आविर्भाव करते हैं। अतः इन्हें शान्त कोटि में ही मानना ठीक होगा। (समाधान) इस शंका का उत्तर देते हैं :- उदात्तता का तात्पर्य तुम सर्वोत्कर्ष वृत्ति मानते हो, ठीक है। सब लोगों से उत्कृष्ट होने की इस वृत्ति का जीमूतवाहन आदि में अभाव नहीं है। जहाँ तक दूसरों को जीतने की इच्छा के होने का प्रश्न है, विजिगीषुता एक ही तरह की तो होती नहीं। विजिगीषु उसे माना जाता है, जो शौर्य, त्याग, दया आदि गुणों से दूसरों को जीत लेता है, उनसे बढ़ जाता है। विजिगीषु हम उसे नहीं मान सकते, जो दूसरों का नुकसान करने या धन छीनने में प्रवृत्त है। ऐसा मानने पर तो डाकुओं को धीरोदात्त मानने का दोष उपस्थित होगा। यह ठीक नहीं। राम आदि धीरोदात्त नायकों में संसार के पालन करने का गुण पाया जाता है, क्योंकि वे दुष्टों को दण्ड देने में प्रवृत्त हैं। वैसे प्रसंगवश उन्हें राज्य आदि का भी लाभ हो जाता है। जब दुष्टों का संहार कर संसार का पालन करने वाले राम उदात्त हैं, तो जीमूतवाहन तो प्राणों को देकर भी परोपकार में व्यस्त रहता है, वह सारे संसार को अपने परोपकार से जीत लेता है, अतः वह उदात्त ही नहीं, उदात्ततम है। पूर्वपक्षी ने ऊपर के दो पद्यों (तिष्ठन् भाति०) को देकर जीमूतवाहन की विषयपराङ्मुखता प्रकट की है, वह ठीक है। असल में संसार को अपने कार्यों से जीतने की इच्छावाले उदात्त नायक कृपणता को उत्पन्न करनेवाली अपने सुख की इच्छाओं से उदासीन तथा विरक्त (निरभिलाष) ही रहते हैं, जैसा कि शाकुन्तल के नायक दुष्यन्त के लिए कहा गया है :- ( अपने सुखों के प्रति निरभिलाष होते हुए भी तुम प्रजा के लिए तकलीफ सहा करते हो। अथवा यह तो तुम्हारी दैनिक क्रिया-प्रक्रिया ही है। वृक्ष अपने सिर से तीव्र आतप को सहता है, किन्तु शरण में आये लोगों के ताप को छाया द्वारा शान्त कर देता है। पूर्वपक्षी ने जीमूतवाहन तथा मलयवती के अनुराग के निबन्धन को दोष माना है। इसका उत्तर देते हुए वृत्तिकार (सिद्धान्ती) कहते हैं कि मलयवती के अनुराग का वर्णन जो शान्तरस के उपयुक्त नहीं है, इस बात का दयौतक है कि नायक शान्त नहीं है, बल्कि वह जीमूतवाहन की धीरशान्तता का निषेध करता है। शान्त का जो पारिभाषिक अर्थ हम लोग लेते हैं, वह है अहंकार का न होना, यह ब्राह्मणादि में उचित है। इसलिए वास्तविक दृष्टि से ब्राह्मणादि में शान्तता पाई जाती है, यही नहीं कि कोरी परिभाषा से ही वे धीरशान्त मान लिये गये हों।१ बुद्ध की करुणा तथा जीमूतवाहन की करुणा में भी भेद है, एक की करुणा निष्काम है, दूसरे की सकाम। अतः उन दोनों में भेद है। इसलिए जीमूतवाहनादि धीरोदात्त ही हैं।
१. धीरशान्त नायक के ऊपर के दो उदाहरण (माधव व चारुदत्त) शरृद्गार रस वाले हैं। यहाँ मेरे 'दधीचिस्तव' से धीरप्रशान्त नायक का परोपकार वाला रूप दिया जा सकता है, जो जीमूतवाहन व दधीचि के क्रमशः धीरोदात्तत्व व धीरप्रशान्तत्व को स्पष्ट कर देगा। असहत शिरश्छेदं भूभृद्धिदा कृत मश्चिना, वनय दमलं मार्ग सदो विदा स्फुरदुल्कया। स्व मलमकरोद देहं धीमान् मुखेन च वाजिनो वर मथ भवान् प्रापच्छंओ: परार्थपटतः॥
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अथ धीरोद्धत :- दर्पमात्सर्यभूयिष्ठो मायाच्छद्यपरायण:॥।५॥ धीरोद्धतस्त्वहङ्कारी चलश्ण्डो विकत्थनः। दर्प: = शौर्यादिमद:, मात्सर्यम्=असहनता, मन्त्रबलेनाविद्यमानवस्तुप्रकाश नं माया, छम= वच्चनामात्रम्, चलः = अनवस्थितः, चण्डः = रौद्रः, र्वगुणशंसी= विकत्थनो धीरोद्धतो भवति, यथा जामदग्न्यः-'कैलासोद्वारसारत्रिभुवनविजय-' इत्यादि। यथा च रावण :- 'त्रैलोक्यैश्वर्यलदमीहठहरणसहा बाहवो रावणस्य ।' इत्यादि। धीरललितादिशन्दाश्ष यथोक्तगुणसमारोपितावस्थाभिधायिनः, वत्सवृषभमहोक्षा- दिवन्न जात्या कश्चिदवस्थितरूपो ललितादिरस्ति, तदा हि महाकविप्रबन्धेषु विरुद्धानेक- रूपाभिधानमसङ्गतमेव स्यात् -जातेरनपायित्वात्, तथा च भवभूतिनैक एव जामदग्न्य :- 'ब्राह्मणातिक्रमत्यागो भवतामेव भूतये। जामदग्न्यश् वो मित्रमन्यथा दुर्मनायते॥' इत्यादिना रावणं प्रति धीरोदात्तत्वेन 'कैलासोद्वारसार- इत्यादिभिश्व रामादीन्प्रति प्रथमं धीरोद्धतत्वेन, पुनः-'पुण्या ब्राह्मणजातिः' इत्यादिभिश्र धीरशान्तत्वेनोपवर्णितः, न चावस्थान्तराभिधानमनुचितम्, अङ्गभूतनायकानां नायकान्तरापेक्षया महासत्त्वादेरव्य- चस्थितत्वात् । अङ्गिनस्तु रामादेरेकप्रवन्धोपात्तान् प्रत्येकरूपत्वादारम्भोपात्तावस्थातोऽव- स्थान्तरोपादानमन्याय्यं, यथोदात्तत्वाभिमतस्य रामस्य छुघ्नना वालिवधादमहासत्त्वतया स्वावस्थापरित्याग इति। वच्यमाणं च दक्षिणाद्यवस्थानाम् 'पूर्वा प्रत्यन्ययाहृतः' इति नित्यसापेक्षत्वेनावि-
धीरोद्धत नायक घमण्ड (दर्प) और ईर्ष्या (मात्सर्य) से भरा हुआ, माया और कपट से युक्त, घमण्डी, चञ्जल, क्रोधी तथा आरमश्लाघी होता है। दर्प का तात्पर्य शौर्य आदि का घमण्ड है, मात्सर्य का तात्पर्य दूसरों की असहनता है। मन्त्र बल से झूठी वस्तुओं को प्रकट करना माया कहलाता है, दूसरों को ठंगना छल कहलाता है। चज्जल से मतलब है, जो स्थिर न हो। इन गुणों के अलावा धीरोद्धत क्रोधी और अपनी खुद की डींग मारने वाला होता है। जैसे वीरचरित के परशुराम जो अपने आपको 'कैलाश के उठाने तथा तीनों लोकों के जीतने में' समर्थ मानते हैं, तथा रावण 'जिसकी भुजाएँ तीनों लोकों के ऐश्वयं की लक्ष्मी को हठ से अपहृत करने में समर्थ हैं।'. नायक के धीरललित, धीरप्रशान्त, धीरोदात्त तथा धीरोद्धत कोटि के होने के विषय में एक भ्रन्ति हो सकती है कि नायक का पूरा जीवन-चित्रण एक ही कोटि का होगा। इस तरह तो दुष्यन्तादि धीरोदात्त नायकों में जो कलाप्रियता तथा रागमयता बताई गई है, तथा जो धीरललित का गुण है-ठीक नहीं बैठेगी। वस्तुतः ऐसा मानना ठीक नहीं। इसी बात को स्पष्ट करते हुए वृत्तिकार बताता है कि धीरललित आदि पारिभाषिक शब्द तत्तत्प्रकरण में वर्णित गुणों से समारोपित अवस्था के अभिधायक हैं। इस तरह एक ही नायक में कभी ललित वाली अवस्था, कभी शान्त वाली अवस्था, कभी उदात्त वाली अवस्था और कभी उद्धत वाली अवस्था पाई जा सकती है। (यह दूसरी बात है कि 'प्राधान्येन व्यपदेशा भवन्ति' इस न्याय के आधार पर उसकी धीरललितादि संज्ञा किसी एक गुण की विशिष्टता के कारण
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की जाती है।) जैसे बैल (गौः) को हम विभिन्न अवस्थाओं में बछड़ा, बैल और साँड़ इन नामों से पुकारते हैं, ठीक उसी तरह नायक के विषय में भी कहा जा सकता है। उदास, ललित आदि जाति (उदासत्व या ललितत्व) के रूप में नायक में स्थित नहीं है। जिस तरह गौ में वत्सत्वादि जाति न होकर गोत्व जाति है, वत्स, वृषभ, महोक्ष केवल बैल के गुण हैं, वैसे ही नायक में नायकत्व जाति है, उदात्त, ललित आदि उसके गुण हैं। अगर ललित आदि को ललितत्वादि जाति मानकर तत्तत्कोटि के नायक में अषिनाभावेन स्थित माना जाय, तो फिर एक ही नायक में अनेक तरह के रूपों (ललित, उदात्त आदि) का निरूपण अनुचित होगा। महाकवियों ने अपने काव्यों व लाटकों में एक ही नायक को कई रूपों से युक्त निरूपित किया, जो परस्पर विरुद्ध है-किन्तु यह विरोधि-समागम असङ्गत इसलिए नहीं लगता कि ये ललितादि गुण हैं, तथा एक ही व्या्त्त में विभिन्न समयों (अवस्थाओं) पर विभिन्न गुणों की स्थिति पाई आ सकती है। लेकिन अगर ललित आदि को जाति मान लिया जाय, तो जाति अविनाशी है, अतः जहाँ ललितत्व जाति का अस्तित्व है, वहाँ उदात्तत्व जाति कैसे पाई जायगी। (जब कि गुण विनाशी तथा क्षणिक है अतः परस्पर विरोधी गुणों का भिन्न-भिन्न अवस्थाओं में एक ही नायक में पाया जाता अनुचित तथा असङ्गत नहीं है।) उदाहरण के लिए भवभूति के महावीरचरित से परशुराम के पात्र को ले लीजिये। भवभूति के परशुराम में कई गुणों का समावेश पाया जाता है। एक ओर रावण के प्रति निम्न संदेश भेजते हुए परशुराम का धीरोदात्तत्व प्रकट किया है :- 'ब्राह्मणों के अपमान को छोड़ देना तुम्हारे ही कल्याण के लिए है। परशुराम वैसे तुम्हारा मित्र है, लेकिन (ब्राह्मणों का अपमान करने पर) वह क्रुद्ध होता हैं।' दूसरी ओर राम के प्रति 'कैलासोद्धारसार-'आदि उक्ति का प्रयोग करते उसका धीरोद्धत-रूप प्रकट किया गया है। तीसरी और फिर 'ब्राह्मणजाति पवित्र है' इस प्रकार धीरशांत के रूप में उनका चित्रण हुआ है। इस तरह अलग अलग अवस्थाओं में परशुराम का चित्रण अनुचित नहीं है। यहाँ परशुराम प्रधान नायक न होकर महावीरचरित के प्रधान नायक राम के अङ्गभूत नायक हैं। अङ्गभूत नायकों में महासत्वादि गुण प्रधाननायक की अपेक्षा न्यून तथा अव्यवस्थित ही होते हैं। अतः ऐसे अङ्गभूत नायकों का भिन्न-भिन्न अवस्थाओं का चित्रण सर्वथा उचित जान पड़ता है। लेकिन जहाँ तक प्रधान नायक का प्रश्न है, उसके बारे में ऐसा करना ठोक नहीं होगा। जैसे मान लीजिये किसी प्रबन्ध (काव्य या नाटक) में रामादि को प्रधान नायक निबद्ध किया गया। ऐसे स्थल पर प्रबन्ध के अन्य पात्रों के प्रति प्रधान नायक की जो अवस्था आरम्भ में कवि ने गृहीत की है, उसी का निर्बाह अन्त तक होना ठीक है, दूसरी अवस्था का ग्रहण वहाँ ठीक
१. वृत्तिकार का भाव यह है कि बड़े से घटत्व जाति पृथक नहीं की जा सकती, क्योंकि व्यक्ति तथा जाति का अविनाभाव सम्बन्ध है। किन्तु गुण के विषय में ऐसा नहीं है घड़ा, काला, लाल, नीला कई तरह का हो सकता है। घड़े में कृष्णत्व, रक्तत्व आदि जाति मानना ठीक नहीं होगा महाभाष्यकार भी गुण को जाति नहीं मानते-चतुष्टयी शब्दानां प्रवृत्तिः। गौश्शुक्कश्वलोडित्थ इति। नायक में अविनाभाव सम्बन्ध से नायकत्व की ही स्थिति है ललितादि गुणों की नहीं। अतः ललितादि गुण ती केवल तत्तदवस्था के रूपक हैं। व(अयं भावः यथा घटादौघटत्वादिजातिः वस्तुस्थित्याऽविनाभावेन तिष्ठति, किन्तु शुक्कादि- गुणस्तु अवस्थाविशिष्ट एव, तथैव नायके नायकत्वजाति रविनाभावेन तिष्ठति, ललितादिगुणास्तु अवस्थानिरूपका एवेति दिक्।) प २. वैसे परशुराम नाव्यशास्त्र की वृष्टि से धीरप्रशांत पात्र हैं। उ पराद क शत्रत BA
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नहीं जँचेगा। जैसे राम जैसे धीरोदात्त नायक के प्रबन्ध में कपट से बालि का बध करना उनके महासत्त्व में दोष उत्पन्न कर देगा और वे अपनी अवस्था छोड़ देंगे (क्योंकि छलादि का आश्रय धीरोद्धत नायक का गुण है); (अतः ऐसे अवसरों पर कुशल कवि प्रबन्ध में उचित हेर फेर कर ऐसे स्थल को नायक की धीरोदात्त प्रकृति के अनुरूप बना लेते हैं।)१ लेकिन आगे वर्णित दक्षिण, शठ, धृष्ट इन नायक भेदों का एक ही नायक में भिन्न-भिन्न अवस्थाओं में चित्रण अनुचित नहीं है, चाहे वह नायक प्रधान नायक हो या अङ्गभूत नायक हो। इस प्रकार के भेदों का आश्रय एक अवस्था के बाद दूसरी अवस्था के लिए लिया ज सकता है। इसका कारण यह है कि ये अवस्थाएँ एक दूसरी की अपेक्षा रखती हैं, परस्पर सा पेक्षिक हैं। जैसे एक ही नायक पहले ज्येष्ठा नायिका के प्रति सहृदय रहता है, अतः दक्षिण नायक रहता है। वही कभी छिप-छिप कर कनिष्ठा से शरक्गार चेष्ट करता है, अतः शठ हो जाता है। बाद में जब उसकी चालाकी साफ तौर पर ज्येष्ठा के द्वारा पकड़ी जाती है, तो वह घृष्ट नायक की कोटि में आ जाता है। अतः दाक्षिण्य आदि गुणों का अवस्थाभेद से प्रधान नायक में भी समावेश करना अनुचित तथा विरुद्ध नहीं है। अथ शज्गारनेत्रवस्था :- स दक्षिणः शठो घृष्टः पूर्वा प्रत्यन्यया हतः ॥ ६॥ नायकप्रकरणात्पूर्वा नायिकां प्रत्यन्ययाऽपूर्वनायिकयाSपहृतचित्तस्त्र्यवस्थो वत्यमा- णभेदेन स चतुरवस्थः। तदेवं पूर्वोक्तानां चतुर्णां प्रत्येकं चतुरवस्थत्वेन षोडशधा नायकः । जब नायक किसी नवीन (कनिष्ठा) नायिका के द्वारा हतचित्त हो जाता है, तो वह पूर्वा (ज्येष्ठा) नायिका के प्रति दक्षिण, शठ या ृष्ट (प्रकृति का) होता है। यहाँ नायक के प्रकरण में मूल कारिका में प्रयुक्त 'पूर्वा' तथा 'अन्यया' इन विशेषणों से इनके विशेष्य 'नायिका' का अध्याहार कर लेना पड़ेगा। यह नायक जब किसी नवीन नायिका के प्रेम में फँस जाता है, तो पहली नायिका के प्रति इसका व्यवहार कई प्रकार का हो सकता है। इसी व्यवहार के आधार पर शरृंगारी नायक के दक्षिण, शठ तथा धृष्ट ये भेद किये गये हैं। कुछ ऐसे भी नायक (अनुकूल) होते हैं, जो एक ही नायिका के प्रति आसक्त रहते हैं ( जैसे उत्तररामचरित के रामचन्द्र), इस भेद का वर्णन भी आगे किया जा रहा है। इस पर नायिका के प्रति व्यवहार की दृष्टि से नायक को चार तरह का माना जा सकता है। ऊपर धीर ललितादि चार प्रकार के नायकों के भेद बताये। प्रत्येक प्रकार का नायक दक्षिण, शठ, धृष्ट या अनुकूल हो सकता है, इस तरह (४x४=१६) नायक के भेद १६ तरह के हो जाते हैं। तत्र- दक्षिणोऽस्यां सहृदय :- १. प्रतिनायक (अङ्गभूत नायक) का चित्रण भिन्न-भिन्न अवस्था में करना उचित है, इसका स्पष्टीकरण मेरे 'शुम्भवधम्' महाकाव्य से दिया जा सकता है :- (१) धीरोदात्त :- यस्य प्रयाणसमये प्रतिभूभृतां तत् कीर्तिप्रकाण्डमतुलं हिमररिमगौरम्। अश्वैः खलीनपरिघर्षणजातलालाव्याजान्निजोदरदरीमभिनीयते स्म।। (२) धीरललिति :- रम्भापि :तद्भ्रवननिष्कुटमैत्य सदो रोमांचितात्र कुचसूनगुलुच्छकम्पैः। किम्पाणिपल्लवविलासभरै रिभस्य वामुष्य नो दितिसुतस्य जहार चेतः॥ (३) धीरोद्धत :- भीतौ यदीयखरखवकशाभिघाता दातानवं वपुषिकान्तिपुषि स्पृशन्तौ। । तन्मन्दुरावगणसेवनतत्परौ कि जातौ न देवभिषजावपि देववन्धौ।।
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योऽस्यां ज्येष्ठायां हृदयेन सह व्यवहरति स दक्षिणः। यथा ममैव- 'प्रसीदत्यालोके किमपि किमपि प्रेमगुरवो रतिक्रीडा: कोऽपि प्रतिदिनमपूर्वोऽस्य विनयः । सचिश्रम्भ: कश्षित्कथयति च किश्चित्परिजनो न चाहं प्रत्येमि प्रियसखि किमप्यस्य विकृतिम् ।।' यथा वा- 'उचितः प्रणयो वरं विहन्तुं बहवः खण्डनहेतवो हि दृष्टाः। उपचारविधिर्मनस्विनीनां ननु पूर्वाभ्यधिकोऽपि भावशून्यः ॥' दक्षिण नायक वह है जो नवीन नायिका से प्रेम हो जाने पर भी पूर्वा नायिका के प्रति अपने व्यवहार में कोई कमी नहीं आने देता, तथा उसे इस बात का अनुभव नहीं होने देता, कि वह उससे कुछ उदासीन हो गया है। संच्ेप में वह पूर्वा नायिका के प्रति सहृदय रहता है, ज्येष्ठा नायिका के प्रति भी ह्ृदय से व्यवहार करता है। दक्षिण नायक के उदाहरण के रूप में वृत्तिकार धनिक अपने ही बनाये हुए पद्य को रखते हैं। सखियाँ किसी नायक की अन्याशक्ति के बारे में बार बार आ आकर ज्येष्ठा नायिका को चेतावनी दे जाती हैं। इधर नायक का व्यवहार ज्येष्ठा के प्रति इतना सहृदयता- पूर्ण है कि उसे इस बात का विश्वास ही नहीं हो पाता कि उसका प्रेमी अब किसी दूसरी नायिका के प्रतिआसक्त हो गया है। इसी बात को नायिका स्वयं अपनी एक सखी से कह रही है। वह मुझे देखते ही खुश हो जाता है, तथा नाना प्रकार से (क्या क्या) रतिक्रीडाएँ किया करता है, जो प्रेम से भरी रहती हैं। उसकी विनम्रता प्रतिदिन अपूर्व रूप लेकर आती है। हर रोज वह एक नये प्रेम, नई खुशी, नई तहजीब के साथ मुझसे मिलता है। लेकिन दूसरी ओर मेरे विश्वासपात्र कोई सेवक (सखियाँ भी) कुछ दूसरी ही बात कहते हैं। विश्वासपात्र सेवकों से मुझे यह पता चला है कि अब वे कहीं दूसरी जगह आसक्त हो गये हैं। चूँकि सेवक विश्वासपात्र हैं, इसलिये मैं ऐसा भी नहीं मान सकती कि वे झूठ बोलते हैं। और इधर हे सखि, मैं स्वयं उसके विकार तथा परिवर्तन का विश्वास नहीं कर पाती हूं। अथवा, प्रेम को मजे से खत्म किया जा सकता है। एक से प्रेम होने पर किसी दूसरी प्रेयसी के प्रेम को खत्म करना उचित है। इस तरह प्रेम की समाप्ति के, प्रेम के खण्डन के, कई कारण हम लोगों ने देखे हैं। लेकिन कुछ कुशल लोग ऐसा न कर पहले की प्रेयसी के प्रति पहले से भी ज्यादा प्रेम दिखाते हैं। मानिनी प्रेयसियों के लिए नायक की यह उपचारविधि, नायक का यह व्यवहार, चाहे पहले से ज्यादा हो, फिर भी भाव तथा प्रेम से शून्य होता है। अरथ शठ :-
दक्षिणस्यापि नायिकान्तरापहृतचित्ततया विप्रियकारित्वाविशेषेऽपि सहृदयत्वेन शठाद्विशेष:, यथा- 'शठाऽन्यस्या:काश्चीमणिरणितमाकर्ण्यसहसा यदाश्लिष्यन्ने प्रशिथिलभुजग्रन्थिरभवः । तदेतत्काचच्े घृतमघुमयत्वद्वहुवचो- विषेणाघूर्णन्ती किमपि न सखी मे गणयति ।।'
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शठ नायक वह है, जो ज्येष्टा नायिका का बुरा तो करता है किन्तु छिप-छ्विप कर करता है। नवीन नायिका से प्रेम हो जाने पर शठकोटि का नायक पहली नायिका से डर डर कर छिपी शंगारचेष्टाएँ किया करता है। प्रथम नायिका की अप्रिय बात तो शठ और दक्षिण दोनों तरह के नायक समान रूप से करते हैं। प्रथम नायिका इस बात को पसन्द नहीं करेगी कि उसका नायक किसी दूसरी नायिका से प्रेम करे, चाहे उसका व्यवहार सहृदयतापूर्ण ही क्यों न हो। इस तरह दोनों में विप्रियकारित्व समान रूप से पाया जाता है, फिर भी दक्षिण में सहृदयत्व पाया जाता है, वह हृदय से ज्येष्ठा नायिका का दिल दुखाना नहीं चाहता, जब कि शठ चाहे बाहर से मीठी मीठी बातें भले ही कर लेता हो, दिल से साफ नहीं होता। इस प्रकार दक्षिण व शठ नायक में परस्पर भेद पाया जाता है। शठ नायक का उदाहरण यह दिया जा सकता है। नायक बड़ा चालाक है। ज्येष्ठा का आलिंगन करते समय ही वह कनिष्ठा की करधनी को आवाज सुनकर उधर उन्मुख होने के कारण आलिंगन को शिथिल कर देता है। पर कहीं ज्येष्ठा इस बात को नताड़ जाय, इसलिये वह मीठो-मीठी बातों में उसे उलझा देता है। ज्येष्ठा की एक सखी इस बात को ताड़ जाती है, और किसी दूसरे मौके पर वह नायक की चालाकी का पर्दाफाश करती नायक से कह रही है। अरे दुष्ट, तू मेरी सखी के सामने अनुकूल नायक बनने का ढोंग रचा करता है, लेकिन असल में तू शठ है। उस दिन एकदम दूसरी नायिका की करधनी की मणियों की आवाज सुनकर मेरी सखी का आर्लिंगन करते करते ही तूने अपने बाहुपाश को ढीला कर लिया। मैं इन बातों को क्या कहूँ। तू बड़ा धूर्त है, तेरे स्नेह और मिठास भरे वचन जैसे घी और शहद का मिश्रण है। जिस तरह घी और शहद को मिलाकर चाटने पर व्यक्ति धूणित होने लगता है, क्योंकि उचित मात्रा में न लेने पर उनका मिश्रण विष हो जाता है और चाटने वाले व्यक्ति को निश्चेतन बना देता है, वैसे ही तेरे (झूठे ) स्नेह तथा प्रेम के मिश्रण का आस्वाद कर मेरी सखी मदमस्त हो जाती है, और उस मस्ती में इतनी बदहोश हो जाती है कि तेरी इन चालाकियों के बारे में भी कुछ नहीं जान पाती। अथ घृष्ठः- वयकाङ्गवैकृतो घृष्टो- यथाSमरुशतके- 'लाक्षालक्ष्म ललाटपट्टमभितः केयूरमुद्रा गले वक्त्रे कज्जलकालिमा नयनयोस्ताम्बूलरागोऽपरः । दृष्ट्वा कोपविधायि मण्डनमिदं प्रातश्चिरं प्रेयसो लीलातामरसोदरे मृगदशः श्वासाः समाप्तिं गताः ॥' कभी नायक छिप-छिप कर कनिष्ठा नायिका के साथ भङ्गारचेष्टाएँ करता है, और उसकी इन चेष्टाओं का निशान उसके शरीर पर लगा रहता है। ज्येष्ठा नायिका के सामने जब उसके ये अङ्गविकार प्रकट हो जाते हैं और उसे नायक की छिप कर की गई सारी चेष्टाओं का भान हो जाता है, तो नायक घृष्ट कहलाता है। (एष्ट नायक इतना डीठ है कि वह इस तरह अङ्गविकारयुक्त होकर भी ज्येष्ठा के सामने जाने से नहीं हिचकिचाता।) धृष्ट नायक का उदाहरण अमरुकशतक से दिया गया है। कनिष्ठा के साथ रतिक्रोडा कर क्रीडा के चिह्नों से शोमित हो, नायक ज्येष्ठा के समोप आया है। उसे देखकर रात में की गई नायक की सारी हरकतें ज्येष्ठा को मालूम हो गई है। ज्येश्ठा के मन में इसे देखकर क्या
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भाव उठते हैं, उनकी अभिव्यअना इस पद्य में ज्येष्ठा के अनुभावों तथा सातत्विक भावों के द्वारा की गई है।। रात को रतिक्रीडा करते समय कनिष्ठा नायिका के रूठने पर नायक ने उसके चरणों पर सिर रखकर उसे मनाया था, इसलिए उसके ललाटतट पर नायिका के चरणों के अलक्तक का निशान हो गया था। रतिक्रीडा के समय नायिका के बाजू पर गला रखकर वह सोया था इसलिए उसके गले में अङ्गद (बाजूबन्द) का चिह्न हो गया था। उसने नायिका के नेत्रों का चुम्बन किया था, इसलिए मुख में कज्जल की कालिमा लगी हुई थी और उसके नेत्रों का चुम्बन नायिका ने किया था, इसलिये उसके नेत्रों पर ताम्बूल की ललाई लगी थी। सुबह जब नायक कनिष्ठा के पास से ज्येष्ठा नायिका के पास लौटा तो वह ऐसी साज-सज्जा से विभूषित था जो ज्येष्ठा को क्रुद्ध कर देने वाली थी। प्रिय के इस मण्डन को देखकर हिरन के समान चञ्चल नेत्र वाली नायिका के शास लीला कमल तक जाकर रुक गये, अथवा नायिका के श्रास लीलाकमल के समान मुख के अन्दर ही अन्दर समाप्त हो गये, वह पूरी तरह साँस भी न ले सकी। भेदान्तरमाह- डनुकूलस्त्वेकनायिक: ॥ ७ ॥ यथा- 'अद्वतं सुखदुःखवोरनुगतं सर्वास्ववस्थासु यद्- चिश्रामो हृदयस्य यत्र जरसा थस्मिन्नहार्यो रसः। कालेनावरणात्ययात्परिणते यत्त्नेहसारे स्थितं भद्रं तस्य सुमानुषस्य कथमेप्येकं हि तत्प्राप्यते ॥' किमवस्थः पुनरेषां वत्सराजादिर्नाटिकानायकः स्यात् ? इत्युच्यते-पूर्वमनुपजातना- यिकान्तरानुरागोऽनुकूल:, परतस्तु दक्षिणः। ननु च गूढविप्रियकारित्वाद्वय क्ततरविप्रि- यत्वाच् शाठ्यधाष्टर्येऽपि कस्मान्न भवतः, न तथाविधविप्रियत्वेऽपि वत्सराजादेराप्रबन्ध- समाप्तज्येष्ठां नायिकां प्रति सहृदयत्वाद्दक्षिणतैव, न चोभयोर्ज्येष्ठाकनिष्ठयोर्नायकस्य स्नेहेन न भवितव्यमिति वाच्यम्, अविरोधात्। महाकविप्रबन्धेषु च- 'सन्नाता तिष्ठति कुन्तलेश्वरसुता वारोऽङ्गराजस्वसु- द्ूंते रात्रिरियं जिता कमलया देवी प्रसादयाद्य च। इत्यन्तःपुरसुन्दरी: प्रति मया विज्ञाय विज्ञापिते देवेनाप्रतिपत्तिमूढमनसा द्वित्राः स्थितं नाडिकाः ॥।' प्री० इत्यादावपक्षपातेन सर्वनायिकासु प्रतिपत्त्युपनिबन्धनात्। तथा च भरत :- ह। 'मधुरत्यागी रागं न याति मदनस्य नापि वशमेति। क्रक5का अवमानितथ नार्या विरज्येत स तु भवेज्ज्येष्ठः ॥ (।। इत्यत्र 'न रागं याति न मदनस्य वशमेति' इत्यनेनासाधारण एकस्यां सनेहो निषिद्धो दक्षिणस्येति, अतो वत्सराजादेराप्रबन्धसमाप्ति स्थितं दाक्षिण्यमिति। षोडशानामपि प्रत्येकं ज्येष्ठमध्यमाघमत्वेनाष्टाचत्वारिंत्नायकमेदा भवन्ति।b क भPI
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5े जो नायक एक ही नायिका के प्रति आसक्त रहता है, (स्वन्न में भी दूसरी नायिका के प्रेम की बात नहीं सोचता), वह अनुकूल नायक है। जैसे उत्तररामचरित के रामचन्द्र अनुकूल कोटि के नायक हैं। इसका उदाहरण उत्तररामचरित का यह पद्य दिया जा सकता है :- सीता का प्रेम सुख तथा दुशख दोनों हो अवस्थाओं में एक-सा है, उसमें कोई भी फर्क नहीं आया; वह हर दशा में एक-सा रहा है। सीता का वह प्रेम हृदय को शान्ति देने वाला है, तथा प्रौढ़ावस्था (वृद्धावस्था) के आने पर भी उसकी सरसता में कमी नहीं पड़ी है। अच्छे व्यक्ति का ऐसा अच्छा कल्याणकारी प्रेम, जो समय के व्यतीत होने पर, परिपक्क स्नेह में स्थित है, क्योंकि समय ने बीच के पर्दे को इटा दिया है, किसी तरह ही प्राप्त किया जा सकता है? शृङ्गारी नायकों के भेदोपभेद की गणना हो जाने पर यह प्रश्ष उपस्थित हो सकता है कि नाटिका (उपरूपक) के नायक वत्सराज उदयन आदि को किस कोटि का मानना होगा ? (वत्सराज में कभी दक्षिणत्व, कभी शठत्व और कभी धृष्टत्व पाया जाता है, इसलिए एक ही नायक में भिन्न अवस्थाओं के पाये जाने से कोटिनिर्धारण के विषय में शङ्का उपस्थित होना सम्भव है। ), इसी प्रश्न का उत्तर देते हुए वृत्तिकार धनिक कहता है। रलावलीनाटिका आदि के नायक वत्सराज आदि का जब तक किसी दूसरी नायिका से प्रेम नहीं हो पाता तब तक उसे अनुकूल ही मानना होगा-(जसे कामदेवपूजा तक वत्सराज अनुकूल कोटि का नायक है); उसके बाद दूसरी नायिका से प्रेम हो जाने पर वह दक्षिण बन जाता है। इस पर पूर्वपक्षी यह शक्का कर सकता है, कि वत्सराज छिप-छिप कर वासवदत्ता का विप्रिय करता है, तथा इसका पता वासवदत्ता को चल जाता है, वत्सराज की चालाकी प्रकट हो ही जाती है, इसलिए वह शठ तथा घृष्ट क्यों नहीं है? इसीका उत्तर देते हुए वृत्तिकार कहता है कि वत्सराज को शठ या धृष्ट नहीं माना जा सकता। यद्यपि वत्सराज रल्नावली (सागरिका) से प्रेम करके वासवदत्ता का अपराध करता है, फिर भी सम्पूर्ण नाटिका में वत्सराज का व्यवहार अपनी ज्येष्ठा नायिका वासवदत्ता के प्रति सहृदयतापूर्ण ही रहा है, इसलिए वह दक्षिण कोटि का ही नायक है। यदि इस विषय में पूर्वपक्षी को यह आपत्ति हो कि ज्येष्ठा और कनिष्ठा दोनों के प्रति नायक का स्नेह होना ठीक नहीं, (क्योंकि नायक का वास्तविक खह एक से ही हो सकता है); तो ऐसा कहना ठोक नहीं है। क्योंकि दोनों से स्नेह करने में कोई विरोध नहीं दिखाई देता; साथ ही महाकवियों ने अपने काव्यों में सभी नायिकाओं के साथ दक्षिण नायक के एक-से पक्षपातशून्य प्रेम का चित्रण किया है। इसका उदाहरण यह पद्य दिया जा सकता है :- किसी राजा के अन्तःपुर का कंचुकी राजा से आकर अन्तःपुर की रानियों की स्थिति वर्णन करता है, तथा राजा किस रानी के यहाँ रात वितायँगे, इस विषय में आदेश चाहता है। राजा नीचे की बात सुन कर दो तीन घड़ी तका किसी बात का निर्णय नहीं कर पाता, क्योंकि वह दक्षिण प्रकृति का है, तथा उसका बर्ताव सभी रानियों के साथ सहृदयतापूर्ण है। डरी कुन्तलेश्वर की पुत्री रजोदर्शन के बाद आज शुद्ध हुई है, अतः राजा का वहाँ जाना धर्मानुकूल है। अङ्गराज की बहिन की आज बारी है कि आप उसके यहाँ रात्रि बितायें। कमला ने आज की रात जुएँ में जीत ली है और अप्रसन्न महारानी (देवी) को भी आज खुश करना है। जब जनाने की सारी बातें जानकर मैंने अन्तःपुर की रानियों के विषय में राजा से यह अरज किया तो वे किंकतव्यविमूढ से होकर दो तीन घड़ी तक चुप से बैठे रहे।pl नाव्याचार्यभरत ने भी ज्येष्ठ (दक्षिण) नायक की परिभाषा यों निबद्ध की है-'ज्येष्ठ नायक मधुर तथा त्यागी होता है, वह राग (विषय) में आसक्त नहीं होता, न कामदेव के १२ द०
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वशीभूत ही होता है और अपमान (तिरस्कार) करने पर वह नारी (ज्येषा नायिका) से विरक्त हो जाता है।' इस परिभाषा में 'वह राग में आसक्त नहीं होता, न कामदेव के वश में ही होता है' इसके द्वारा एक नायिका में दक्षिण नायक का अस्ाधारण स्नेह का होना निषिद्ध किया गया है। इसलिये वत्सराज उदयन पूरे काव्य (रत्नावली) में दक्षिण कोटि का नायक है। नायक पहले सोलह तरह के बताये गये। ये फिर ज्येष्ठ (उत्तम), मध्यम तथा अधम कोदि के भी हो सकते हैं अतः इनके ४८ भेद हो जाते हैं। सहायानाह- पताकानायकस्त्वन्यः पीठमर्दो विचक्षणः॥ तस्यैवानुचरो भक्त: किश्चिदूनश्च तद्गुणैः ॥८॥ प्रागुक्तप्रासञ्ञिकेतिवृत्तविशेषः पताका तन्नायकः पीठमर्दः प्रघानेतिवृत्तनायकस्य सहाय:, यथा मालतीमाधवे मकरन्दः, रामायरो सुग्रीवः। काव्य में नायक के कई साथी व सहायक उपनिबद्ध किये जाते हैं। इनमें प्रधान पताकानायक होता है। इसे पीठमर्द भी कहते हैं। पताकानायक चतुर तथा बुद्धिमान् होता है तथा प्रधान नायक का अनुचर तथा भक्त होता है। वह प्रधाननायक की अपेक्षा कुछ ही गुणों में कम हो ता है। कथावस्तु के भेद का वर्णन करते समय आधिकारिक तथा प्रासङ्गिक दो तरह की वस्तु बताई गई है। इसमें आधिकारिक का नायक प्रधान नायक होता है। प्रास्ञिक के दो भेद हैं-पताका व प्रकरी। इसी पताका नामक प्रासङ्गिक कथावस्तु का नायक पीठमद कहलाता है तथा वह प्रधान नायक का सहायक होता है। जैसे मालतीमाधव का मकरन्द तथा रामायण का सुग्रीव, जो क्रमशः माधव व राम के सहायक हैं, तथा उनसे गुणों की दृष्टि से कुछ ही कम हैं सहायान्तरमाह- पणा एकविद्यो विटश्ान्यो, हास्यकृच्च िदूषक:। 5 गीतादिविद्यानां नायकोपयोगिनीनामेकस्या विद्याया वेदिता विटः, हास्यकारी विदूषकः, अस्य विकृताकारवेषादित्वं हास्यकारित्वेनव लभ्यते। यथा शेखरको नागानन्दे विटः, विदूषकः प्रसिद्ध एव। हण नायक के दूसरे भी सहायक होते हैं, इनमें विट वह है, जो किसी एक विद्या में निपुण होता है, और विदूषक नाटक का मजाकिया पात्र होता है। की नायक के लिए उपयोगी गीत, नृत्य आदि विद्याओं में से किसी एक विद्या का जानने वाला विट तथा हास्यकारी पात्र विदूषक होता है। विदूषक के अजीब तरह के आकार व वेशभूषा हास्य के पैदा करने वाले हैं। नागानन्द नाटक का शेखरक विट है, विदूषक तो प्रसिद्ध है ही।१
1१. मृच्छकटिक में शकार का साथी विट है ( जो वस्तुतः शकार के खिलाफ वसन्तसेना की सहायता करता है), तथा चारुदत्त का साथी मैत्रेय विदूषक है। अथवा जैसे मेरे मन्दारवती ब्रह्मदत्त में विदूषक :- 'कहं हं ण वेज्जराओ। कहिदं कखु मए- सुण्ठमलीचिजुदं णं लोणं अम्हाणँ सव्वरोआणं। नासअभक्खअपअइं गच्छइ वअणं क्खु वेज्जराअस्स।I पाल INE NEW PPIF
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अथ प्रतिनायक :- लुच्धो धीरोद्धत: स्तब्धः पापकृळ्यसनी रिफुः ॥॥ तस्य नायकस्येत्थंभूतः प्रतिपक्षनायको भवति, यथा रामयुधिष्ठिरयो रावणदुर्योंघनौ। नायक की फलप्राप्ति में विन्न करने वाला, नायक का शत्रु प्रतिनायक होता है। यह प्रतिनायक लोभी, धीरोद्धत, घमण्डी, पापी तथा व्यसनी होता है। शिक् ज उस नायक का शत्रु प्रतिनायक इन विशेषताओं से युक्त होता है। जैसे राम तथा युधिष्ठिर के शत्रु क्रमशः रावण तथा दुर्योधन हैं।ह अथ सात्त्विका नायकगुणाः- शोभा विलासो माधुर्य गाम्भीर्य स्थैर्यतेजसी। ललितौदार्यमित्यष्टौ सा्विका: पौरुषा गुणाः॥ १०॥ नायक में पुरुषत्वयुक्त आठ सार्विक गुणों का होना आवश्यक है। ये आठ सात्विक गुण हैं :- शोभा, विलास, माधुर्य, गाम्भीर्य, स्थैर्य, तेज, ललित तथा औदार्य। तत्र (शोभा यथा)- नीचे घृणाधिके स्पर्धा शोभायां शौर्यदक्षते। नीचे घृणा यथा वीरचरिते- 'उत्तालताडकोत्पातदर्शनेऽप्यप्रकम्पितः ।
गुणाघिकैः स्पर्धा यथा नियुक्तस्तत्प्रमाथाय स्त्रैरोन विचिकित्सति ।।'
'एतां पश्य पुरः स्थलीमिह किल क्रीडाकिरातो हरः 1S IFD fB
कोदण्डेन किरीठिना सरभसं चूडान्तरे ताडितः। 5 1नडइत्याकर्ण्य कथाद्भुतं हिमनिधावद्रौ सुमद्रापते- र्मन्दं मन्दमकारि येन निजयोर्दोर्दण्डयोमण्डलम् ।।' शौर्यशोभा यथा ममैव- 'अन्त्रैः स्वैरपि सन्यताग्रचरणो मूर्च्छाविरामक्षरो स्वाधीनव्रणिताङ्गशस्त्रनिचितो रोमोद्रमं वमयन्।
धन्यो धाम जयश्रियः पृथुरणस्तम्भे पताकायते ॥' दक्षशोभा यथा वीरचरिते-
रामस्य त्रिपुरान्तकृद्दिविषदां तेजोभिरिद्धं धनुः। १. [ जैसे प्रतिनायक शुम्भ दैत्य (मेरे 'शुम्भवधम्' महाकाव्य में) इसी प्रकार की विशेषताओं से युक्त है :- प्राकप्रत्यगुत्तर दिशा मथदक्षिणस्या क क8 ॥: भत नू जिगाय समरेस महेन्द्रशघुः। िल कीक चक्रे कुचौधकुभृतः करजैश्व घातै रापाटितान् पटुवर: सुरते व तासाम् ॥ ]। (२) 'धैर्य' इसि पाठन्तरम्। (३) 'सत्त्वजाः' इति पाठान्तरम् ।। प्र णी
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शुण्डार: कलभेन यद्वदचले वत्सेन दोर्दण्डक- ॥ 3 स्तस्मिन्नाहित एव गर्जितगुणं कृष्टं च भभं च तत्।।' । शोभा नामक सार्विक गुण वहाँ होता है, जहाँ नायक में शौर्यं तथा दक्तता पाई जावे तथा नीच व्यक्ति के प्रति घृणा एवं स्वयं से अधिक व्यक्तिके प्रति स्पर्धा पाई जाती हो। Hpy IB 1 जैसे महावीर चरित के नायक रामचन्द्र में नीच के प्रति घृणा पाई जाती है। ताड़ के पेड़ के समान ऊँची ताड़का के उत्पात को देख कर भी रामचन्द्र कस्पित व भयभीत न हुए। फिर भी उसे मारने के लिए नियुक्त होने पर ताड़का के स्त्री होने के कारण वे कुछ विचार करने लगे हैं। दूसरे के अधिक गुणों को देखकर उसके प्रति स्पर्धा होना भी नायक का शोभा नामक सात्त्विक गुण है। उदाहरण के रूप में यहाँ महादेव के, अर्जुन के गुणों से प्रभावित होकर उससे स्पर्धा करने से सम्बद्ध निम्न पद्य दिया जा सकता है। 'इस सामने की स्थली को जरा गौर से देखो। यही वह जगह है, जहाँ अर्जुन ( किरीटी) ने धनुष के द्वारा लीला से भील बने हुए महादेव के सिर को तेजी से चोट पहुँचाई थी।' हिमालय में इस प्रकार की-सुभद्रा के पति अर्जुन की अद्भुत कथा सुनकर जिन महादेव ने अपनी दोनों भुजाओं को धीरे-धीरे मण्डलाकार करके सहलाया-(उनकी जय हो)। जहाँ नायक में अतिशय वीरता पाई जाय वहाँ शौर्यशोमा होगी, जैसे वृत्तिकार धनिक का स्वयं का यह पद्य। नायक रणस्थल में बुरी तरह घायल होकर गिर पड़ा है तथा मूच्छित हो गया है। किन्तु मूच्छा के समाप्त होते ही वह फिर से रणस्थल में आ जाता है, इसी विषय का पद है। यद्यपि उस वीर के पैरों के अग्रभाग अपनी ही अँतड़ियों से बँध गये हैं, फिर भी मूर्च्छा के समाप्त होते ही वह उठ खड़ा होता है। उसका शरीर घावों से तथा उनमें लगे शस्त्रों से परिपूर्ण है। वीरता का सव्ार होने के कारण उसके रोगटे खड़े हो गये हैं, जैसे उसने रोमों का कवच धारण कर लिया है। हारे हुए अपने सैनिकों को वह फिर से जोश दिला रहा है, तथा शत्रु-सैनिकों को निष्ठुरतापूर्वक फटकार रहा है। वह जयलक्ष्मी का निवासस्थान (अथवा जयलक्ष्मी का तेजःस्वरूप ) उत्कृष्ट वीर धन्य है, जो उस महान् युद्धस्थल के स्तम्भ पर पताका के समान फहरा रहा है।१ नायक में चतुरता का पाया जाना भी एक सातत्विक गुण है तथा इसका समावेश भी शोमा में ही होता है। दक्षशोभा जैसे वीरचरित के राम में- समस्त देवताओं के तेज से समिद्ध, त्रिपुर नामक दैत्य का अन्त करने वाला, शिव का पिनाक थनुष-जो मानों हजारों कड़कड़ाते कठोर वज्रों से बना हुआ है-राम के सामने प्रकटित होता है (राम के सामने पड़ा हैं)। वत्स राम ने उस अचल धनुष पर इसी तरह अपना हाथ रखा, जैसे हाथी का बच्चा सूँड रखता है, और सशब्द प्रत्यश्चा वाले उस धनुष को खेचा तथा तोड़ डाला। अथ चिलास :- गतिः सधैर्या दष्टिश्च चिलासे सस्मितं चचः ॥११॥
१. दशरूपककार धनज्य व उनके भाई वृत्तिकार धनिक दोनों घाराधीश मुज के सभा- पण्डित थे। सम्भवतः धनिक ने इस प्रथ में मुज की ही वीरता का वर्णन किया हो! )
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क क सपरीक वीरोद्वता नमयतीव गतिर्धरित्रीम le TFF I'S IHNH TF रफी कबड प्रा थ हक ककी प्रकी कौमारकेऽपि गिरिवद् गुरुतां दधानो चीरो रसः किमयमेत्युत दर्प एच ।। नायक का दूसरा साध्विक गुण विलास है। विलास नामक सात्विक गुण वह है, जब नायक में धेर्ययुक्त दृष्टि तथा धर्ययुक्त गति पाई जाय, एवं उसकी वाणो स्मिति से युक्त हो। उतररामचरित में चन्द्रकेतु लब खकर उसकी गति तथा दृष्टि के विषय में वर्णन करता कहता है :- जब यह देखता है तो ऐसा जान पड़ता है जैसे इसकी नजर ने तीनों लोकों की वीरता को तुच्छ समझ रक्खा है। इसकी धीर और उद्धत चाल जैसे पृथ्वी को भी झुका देती है। वैसे तो यह कुमारावस्था में ही है, फिर भी पहाड़ के समान गुरुत्व धारण किये हुए है। इसे देख कर ऐसा सन्देह होता है कि यह स्वयं वीर रस ही आ रहा है, या स्वयं मूर्तिमान् दर्प ही। अथ माधुयम् श्च्णो विकारो माधुर्य संत्षोमे सुमहत्यपि। महत्यपि विकारहेतौ मधुरो विकारो माधुर्यम्। यथा- 'कपोले जानक्याः करिकलभदन्तद्युतिमुषि1 स्मरस्मेरं गण्डोद्द्ुमरपुलकं चक्त्रकमलम्।
जटाजूटग्रन्थि द्रदयति रघूणां परिवृढः ॥'हस नायक का तीसरा साखिवक गुण माधुर्य है। जब बहुत बड़े क्षोभ के होने पर भी मामूली सा विकार नायक में पाया जाय, तो वह माघुर्य कहलाता है।। ईम दिए जैसे नीचे के पद में खरदूषण के युद्धार्थ उपस्थित होने पर भी रामचन्द्र में बहुत ज्यादा विकार नहीं पाया जाता। उनमें बहुत थोड़ा विकार हुआ है, यह इस पद् के द्वारा ध्वनित होता है। रघुकुल के नायक रामचन्द्र हाथी के बच्चे के कोमल दांत की कान्ति वाले, जानकी के कपोल में, मुसकराते हुए तथा, रोमांचित गण्डस्थल वाले अपने मुखकमल को बार बार देखते हुए तथा राक्षसों की सेना के कोलाहल को सुनते हुए; अपनी जटाओं के जूडे को दृढ़ कर रहे हैं। अरथ गाम्भीरयम्- गाम्भीय यत्प्रभावेन विकारो नोपलच्यते ॥१२ ॥ मृदुविकारोपलम्भाद्विकारानुपलब्धिरन्येति माधुर्यादन्यद्राम्भीयेम्।
'आहूतस्याभिषेकाय विसष्टस्य वनाय चहक णृत कन8 लगा हलन मया लक्षितस्तस्य स्वल्पोऽप्याकारविभ्रमः ॥'73 1F1म कााड
गाम्भीर्य नायक का वह सात्विक गुण है, जब विकार के महान् हेतु के होने पर भी उसका कोई प्रभाव नहीं पड़ता, जब कुछ भी विकार दिखाई नहीं पड़ता।फिाड
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माधुर्यं तथा गाम्भीर्य दोनों गुण एक दूसरे से भिन्न है। माधुर्य गुण में विकार अवश्य पाया जाता है, यह दूसरी बात है कि वह बड़ा कोमल होता है। गाम्भीर्य गुण में विकार का सर्वंथा अभाव होता है। गाम्भीर्य गुण के उदाहरण के रूप में रामचन्द्र के विषय में कहा गया यह श्लोक दिया जा सकता है। जब उन्हें अभिषेक के लिए बुलाया गया तब और जब उन्हें वन के लिए विदा किया गया तब, दोनों वक्त मैंने उनके (राम के) चेहरे पर कोई भी (थोड़ा सा भी) विकार नहीं देखा। अथ स्थैर्यम्- व्यवसायादचलनं स्थैर्य विन्नकुलादपि। यथा वीरचरिते- 'प्रायश्चित्तं चरिष्यामि पूज्यानां वो व्यतिकमात्। न त्वेवं दूषयिष्यामि शस्त्रग्रहमहाव्रतम् ।।' स्थैयं वह सास्विक गुण है, जब नायक अनेकों विध्नों के होने पर भी उनसे चज्जल नहीं होता हो, वह अपने व्यवसाय (मार्ग) से कभी भी विचलित नहीं होता हो। जैसे महावीर चरित का यह पद्य स्थर्य का व्यज्क है। मैने आप जैसे पूज्य लोगों की अवहेलना की है, अतः मैं प्रायश्चित करूंगा। मैं शस्त्रग्रहण के बड़े व्रत को इस तरह दूषित नहीं करूंगा। अथ तेज :- अधित्षेपाद्यसहनं तेज: प्राणात्ययेव्वपि ॥ १ ३ ॥। यथा- 'ब्रूत नूतनकूष्माण्डफलानां के भवन्त अङ्गुलीदर्शनादेन न जीवन्ति मनस्विनः I' तेज नामक सार्विक गुण वह है, जब नायक तिरस्कार आदि को मरते दम तक नहीं सहे। ह जैसे, बताओ तो सही कितने लोग ऐसे हैं, जो नये कुम्हड़े के फलों की तरह हैं। मनस्वी व्यक्ति दूसरे लोगों के अंगुलीदर्शन आदि इशारों पर नहीं जीते हैं। ि पकरी अथ ललितम्- क कि शृङ्गाराकारचेष्टत्वं सहजं ललितं मृदु।F स्वाभविक: शज्गारो मृदुः, तथाविधा श्ङ्गारचेष्टा च ललितम्। यथा ममैव- 'लावण्यमन्मथविलासविजम्भितेन स्वाभाचिकेन सुकुमारमनोहरेण। किंवा ममेव सखि योऽपि ममोपदेष्टा तस्यैव कि न विषमं विदधीत तापम् ॥। स्वाभाविक कोमलता से युक्त भङ्गारपरक चेष्टाओं का नायक में पाया जाना, ललित नायक सास्विक गुण कहलाता है। स्वाभाविक शरृङ्गार कोमल होता है, स्वाभाविक शुङ्गारी चेष्टा ही ललिति नामक सात्विक गुण है। जैसे वृत्तिकार का स्वयं का निम्नोक्त पद्य नायक के ललित नामक गुण का अभि- व्यजक है।1 ड9 किक ब्ाहकी अली मि
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हे सखि, सुन्दरता तथा कामविलास से युक्त, स्वाभाविक सुकुमारता तथा मनोहरता वाले उस नायक के द्वारा मेरे ही क्या मुझे उपदेश देने वाले के भी हृदय में विषम ताप नहीं किया जा सकता है क्या ? अर्थात् उसका लावण्य, सुकुमारता तथा मनोहरता ऐसी है, कि वह मेरे ही कामजन्य ताप उत्पन्न नहीं करता, बल्कि किसी भी देखने वाली रमणी के इसी प्रकार का ताप कर सकता है। अथौदार्यम्- प्रियोक्त्या 55जीचिता दानमौदार्ये सदुपग्रहः॥ १४॥ प्रियवचनेन सहाSSजीवितावधेर्दानमौदार्यं सतामुपग्रहथ। यथा नागानन्दे- 'शिरामुखैः स्यन्दत एव रक्तमद्यापि देहे मम मांसमस्ति। तृप्तिं न पश्यामि तवैव तावरिंक भक्षणात्त्वं विरतो गरुत्मन् II' सदुपभ्रहो यया- 'एते वयममी दाराः कन्येयं कुलजीचितम्। ब्रूत येनात्र व: कार्यमनास्था बाह्यवस्तुषु ॥' जहां नायक प्रिय 'वचनों के द्वारा प्राण तक देने को प्रस्तुत हो, तथा सज्जन व्यक्तियों को अपने आचरण से अनुकूल बना ले, वहां उसमें औदार्य सात्विक गुण माना जाता है। इसका उदाहरण नागानन्द नाटक से जीमूतवाहन के रूप में दिया जा सकता है। जीमूत- वाहन के औदार्य की व्यअ्ना इस पद्य से हो रही है- 'हे गरुड, अभी भी मेरी नसों के किनारों से खून टपक ही रहा है, अभी भी मेरे शरीर में मांस बचा हुआ है, तुम भी अभी तृप्त नहीं हुए हो, ऐसा मेरा अन्दाजा है। फिर क्या कारण है कि तुम (मुझे ) खाने से रुक गये हो।' सज्जनों के अपने अनुकूल बनाने का (सदुपग्रह का ) उदाहरण यों दिया जा सकता है। ये हम, यह हमारी पत्नी और हमारे कुल का प्राण यह लड़की, हम सभी बाह्य वस्तुओं के प्रति विरक्त हैं ( बाह्य वस्तुओं में कोई आस्था नहीं रखते), जिस किसी से तुम्हारा काम हो, वह कही। नायक के वर्णन के साथ ही साथ नायिका का वर्णन भी प्रसंगोपात्त है, अतः उसका विवेचन करते हैं :- अथ नायिका- स्वान्या साधारणस्त्रीति तद्गुणा नायिका त्रिधा। तद्गुरोति। यथोक्तसम्भवे नायकसामान्यगुणयोगिनी नायिकेति, स्वस्त्री परस्त्री साधारणस्त्रीत्यनेन विभागेन त्रिधा। नायिका नायक के ही सामान्य गुणों से युक्त होती है। यह तीन तरह की होती है-स्वकीया, अन्या (परकीया), तथा साधारण स्त्री। (स्वीया जैसे उत्तररामचरित की सीता; साधारण स्त्री जैसे मृच्छकटिक की वसन्तसेना, परकीया का वर्णन काव्यों व नाटकों में अंगोरस के आलम्बन के रूप में नहीं किया जाता। वैसे संस्कृत के कई मुक्तक पद्यों में इसका चित्रण पाया जाता है। जैसे, वानीरकुओड्डीनशकुनिकोलाहलं शृण्वन्त्याः। गृहकर्मव्यापृताया: बष्वाः सीदन्ति अंगानि ॥)
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तत्र स्वीयाया विभागगर्भ सामान्यलक्षणमाह- मुग्धा मध्या प्रगल्मेति स्वीया शीलार्जवादियुक्॥१५॥ ए. शीलं-सुतृत्तम् , पतिव्रताऽकुटिला लज्जावती पुरुषोपचारनिपुणा स्वीया नायिका। तत्र शीलचती यथा- 'कुलबालिआए पेच्छह जोव्वणलाअण्णविन्भमविलासा। पवसन्ति व्व पचसिए एन्ति व्व पिये घरं एत्ते॥।2गी (कुलबालिकायाः प्रेक्ष्वं यौवनलावण्यविभ्रमचिलासा] प्रवसन्तीव प्रवसिते शरगच्छन्तीव प्रिये गृहमागते॥') [ाही आार्जवादियोगिनी यथा-
भणिअं सहावसरलं धण्णाण घरे कलत्ताणम् ॥'p fy ('हसितमविचार मुग्धं भ्रमितं विरहितविलाससुच्छायम्। FEBB भणित स्वभावसरलं धन्यानां गृहे कलत्राणाम् ।) प आशा र लज्जावती यथा- f wywtt fivw fi faiss
अरविणअदुम्मेहाईं धण्णाण घरे कलत्ताई ॥'e क पपTF Ts पH f('लज्जापर्याप्पसाधनानि परतृप्तिनिष्पिपासानिका एक पक्ी। अविनयदुर्मेधांसि धन्यानां गृहे कलत्राणि ॥' मय क सा चैवंविधा रवीया मुग्धा-मध्या-प्रगल्भा-भेदात्रिविधा। अब स्वीया के विभाग के साथ ही साथ उसका सामान्य लक्षण भी बताते हैं :- स्वीया नायिका शील, लज्जा आदि से युक्त है। वह सच्चरित्र, पतिव्रता, अकुटिल, लज्जायुक्त तथा पति के प्रति व्यवहार में बड़ी निपुण होती है। यह स्वीया सुरधा, मध्या तथा प्गल्भा इस प्रकार तीन तरह की होती है। स्वीया नायिका के शील, आर्जव तथा लज्जा के उदाहरण क्रमशःदिये जाते हैं शीलवती जैसे, कुलवती बालिकाओं के यौवन, लावण्य तथा श्रक्गार चेष्टाएँ प्रिय के प्रवास में चले जाने पर चली जाती हैं, तथा उसके घर पर लौट आने पर वापस लौट आती हैं। आजव आदि गुणों से युक्त जैसे, धन्य व्यक्तियों के घर की स्त्रियां बिना विचार के ही मुग्ध हँसी हँसती है, उनकी चाल- ढाल नजाकत से भरी नहीं होती, फिर भी सुन्दर होती हैं, उनका बोलना-चालना स्वभाव से ही सरल होता है। लज्जावती जैसे, ककप) धन्य व्यक्तियों के घर की स्त्रिया लज्जा के पर्याप्त प्रसाधन से युक्त होती हैं, अर्थात् विशेष लज्जा वाली होती हैं, वे दूसरे पुरुषों से तृप्ति की इच्छा नहीं रखती, तथा अविनय का उनमें अभाव रहता है, अर्थात् बड़ी विनयशील होती हैं। इस प्रकार शील, आर्जव तथा लज्जा से युक्त स्वीया के मुग्धामध्या तथा प्रगल्भा ये तीन भेद होते हैं।
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तत्र सुग्धा नववयःकामा रतौ वामा मृदु: क्रुधि। BR प्रथमावतीणतारुण्यमन्मथा रमरो वामशीला सुखोपायप्रसादना मुग्धनायिका। सुग्धानायिका अवस्था तथा कामवासना दोनों में नई रहती है, रति से वह वाम रहती है अर्थात् रति से कतराती है तथा नायक से मानादि में क्रोध करने में भी कोमल होती है। मुग्धानायिका वह है जिसमें यौवन तथा काम दोनों का पहला आविर्भाव पाया जाता है, जो सुरतक्रोड़ा से डरती है तथा बड़े सरल ढङ्ग से खुश की जा सकती है। तत्र वयोमुग्धा यथा- 'विस्तारी स्तनभार एव गमितो न स्वोचितामुन्नति रेखोद्धासिकृतं वलित्रयमिदं न स्पष्टनिम्नोन्नतम्। मध्येऽस्या ऋजुरायतार्घकपिशा रोमावली निर्मिता रम्यं यौवनशैशवव्यतिकरोन्मिश्रं वयो वर्तते ॥।' वयोमुग्धा का उदाहरण यों दिया जा सकता है। नायिका वयः सन्धि की अवस्था में है। इसी वयःसन्धि का वर्णन करते हुए कवि कहता है कि नायिका की यौवन तथा शैशव के परस्पर मिश्रण से उत्पन्न अवस्था बड़ी सुन्दर है। इसका स्तनभार बढ़ रहा है, किन्तु अभी अपनी उचित उन्नति को नहीं प्राप्त हुआ है। रेखाओं के द्वारा प्रकाशित निम्नोन्नत ये तीन रेखाएँ (त्रिवलि ) अभी स्पष्ट नहीं दिखाई पड़ रही हैं। इसके मध्यभाग में लम्बी तथा आधी भूरी कोमल रोमवाली बन गई है। इन सब बातों से स्पष्ट है कि नायिका इस समय वयःसन्धि में वर्तमान है। यथा च ममव- 'उच्छूसन्मण्डलप्रान्त रेखमाबद्धकुड्मलम्। अपर्याप्तमुरो वृद्धेःशंसत्यस्या: स्तनद्वयम् ॥' वयोमुग्धा का दूसरा उदाहरण वृत्तिकार धनिक स्वयं अपना पद्य देता है- 'इस नायिका के स्तनों की प्रान्तरेख गोलाई के फूलने से स्पष्ट दिखाई पड़ रह्ी है, तथा वे कली के समान भरे हुए एवं बँधे हुए हैं। स्तनों की यह अपर्याप्त अवस्था इस नायिका की उरःस्थल वृद्धि की सूचना देती है।' काममुग्धा यथा- 'दृष्टिः सालसतां बिभर्ति न शिशुकीडासु बद्धादरा एक प्रमन
श्रोत्रे प्रेषयति प्रवर्तितसखीसम्भोगवार्तास्वपि। गडकी एष
पुंसामङ्कमपेतशङ्कमधुना नारोहति प्राग्यथा बाला नूतनयौचनव्यतिकरावष्टभ्यमाना शनैः॥।' (काममुग्धा) मुग्धा नायिका कामवासना एवं कामसम्बन्धी विचारों के विषय में भी मुग्ध (अनमिज्ञ-सी, भोली) रहती है। जैसे निम्न पद्य में नायिका धीरे-धीरे यौवन में पदार्पण कर रही है। अब वह बचपन की चेष्टाओं को छोड़ रही है। नायिका की इस वयः सन्धिजन्य अवस्था में होने वाले मनोविकारों का कवि ने बड़ा सुन्दर वर्णन किया है। की इसकी नजर पहले बड़ी चज्चल थी, लेकिन अब वह अलसाई-सी नजर आती है (उसकी १३ द०
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हद दशरूपकम्
दृष्टि ने अलसता धारण कर रक्खी है)। पहले बचपन में, वह छोटे बच्चों के खेलों से आनन्द प्राप्त करती थी, लेकिन अब छोटे बच्चों के खेलों में वह कोई दिलचस्पी नहीं लेती। वयस्क स्त्रियों की बात सुनने में पहले उसे कोई मजा नहीं आता था, लेकिन अब अपनी सखियों को सम्भोग की बात करते सुन कर वह अपने कान उन बातों की और लगाती है। सम्भोग की बातों को सुनने में अब उसे कुछ-कुछ दिलवस्पी होने लग गई है। बच्ची होने पर वह बिना किसी हिचक के पुरुषों की गोद में बैठ जाया करती थी, लेकिन अब पहले की तरह पुरुषों की गोद में नहीं बैठती। निःसन्देह यह वाला धीरे-धीरे नवीन यौवन के आविर्भाव से युक्त हो रही है। रतवामा यथा- 'व्याहृता प्रतिवचो न सन्दधे गन्तुमच्छदवलम्बितांशुका। सेवते स्म शयनं पराङमुखी सा तथापि रतये पिनाकिनः ॥' (रतवामा ) मुग्धा नायिका सुरतकीड़ा से बड़ी डरती हैं। यही कारण है कि वह सुरत के समय सदा वामवृत्ति का आचरण करती है। इसका उदाहरण वृत्तिकार धनिक ने कुमारसम्भव के अष्टम सर्ग से, शक्करपार्वती सम्भोग वर्णन से दिया है। जब शङ्कर उससे कुछ कहते थे, तो पावती कोई भी जवाब नहीं देती थी। जब वे उसे बिठाने को या आलिड्वन करने को उसका वस्त्र पकड़ लेते थे, तो वह जाने की कोशिश करती थी। शंकर के साथ एक ही शय्या पर सोने पर भी वह दूसरी और मुँह करके सीती थी। इस प्रकार वामवृत्ति का आचरण करने पर भी पावती शंकर को अच्छी ही लगती थी तथा उनमें रति की वृद्धि ही करती थी। मृदु: कोपे यथा- 'प्रथमजनिते बाला मन्यौ विकारमजानती कितवचरितेनासज्याक्के विनम्रभुजैव सा।
in .5. THy चिबुकमलिकं चोन्नम्योच्चेरकृत्रिमविभ्रमा नयनसलिलस्यन्दिन्योष्ठे रुदन्त्यपि चुम्बिता ।।' (कोपमृदु) मुग्धा नायिका पति के अपराध करने पर भी उस पर गुस्सा करना नहीं जानती और अगर कहीं वह गुस्सा करती भी है, तो उसका गुस्सा बड़ा हलका होता है, उसे आसानी से खुश किया जा सकता है। सुग्धा की इसी विशेषता को स्पष्ट करते हुए निम्न उदाहरण दिया जा सकता है- EकhIR नायक ने किसी दूसरी नायिका के पास जाकर अपराध किया है। अपराध करके वह प्रथम नायिका के पास आया है, जो मुग्धा नायिका है। इस वक्त इस नायिका को नायक पर गुस्सा तो आ रहा है, लेकिन इस गुस्से के पहले पहल आने के कारण वह यह नहीं जानती, कि इस गुस्से को किन विकारों से प्रकट किया जाय। यह नायिका इतनी भोली है, कि कलह तथा मान के अस्ों का प्रयोग करना उसने अभी सीखा ही नहीं है। इधर नायक को इतना तो पता चल गया है, कि नायिका ने उसको उन हरकतों को बुरा समझा है, उसके दिल में कुछ कुछ गुस्सा भी है। इस गुस्से को खतम करने के लिए वह धूर्त नायक, बड़ा नम्र होकर उसे गोद् में बैठा लेता है, तथा उसकी ठुड्डी और बालों को ऊँचा कर लेता है और oy $8
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उस स्वाभाविक विलास वाली रोती हुई नायिका के आंसुओं से भीगे हुए अधर ओष्ठ को चूम लेता है। ज र् ल एवमन्येऽपि लज्जासंवृतानुरागनिबन्धना मुग्धाव्यवहारा निबन्धनीया, यथा ि की 'न मध्ये संस्कार कुसुममपि बाला विषहते न निःश्वासैः सुभ्रूजनयति तरङ्गव्यतिकरम्। नवोढा पश्यन्ती लिखितमिव भर्तु: प्रतिमुखं प्ररोहद्रोमाश्चा न पिबति न पात्रं चलयति।।' इसके अलावा मुग्धा की दूसरी शृङ्गारी चेष्ाएँ, जो उसके लज्जा से ढँके हुए अनुराग की दयोतक हैं, कवियों के द्वारा वर्णित की जानी चाहिए। यहाँ लज्जा के कारण आवृत अनुराग की अभिव्यज्ञना मुग्धा नायिका के द्वारा किस तरह की जा रही है, इसका वर्णन एक कवि ने किया है। नायिका नवोढ़ा है, अभी अभी विवाह के बाद नायक के घर आई है। एक और वह राग के कारण पति को देखना चाइती है, दूसरी ओर लज्जा के कारण अपनी उत्सुकता को छिपाती है। इसीका वर्णन यहाँ किया गया है। नायिका किसी पात्र से पानी पी रही है, (अथवा शीधुपान कर रही है), समीपस्थित नायक के मुख की परछाई उस पात्र पर पड़ रही है तथा पेय पदार्थ में उसका प्रतिबिम्ब दिखाई दे रहा है। नायिका उसे एकटक देखती है। उधर नायक भी नायिका के समीपस्थ होने के कारण अनुरागवश स्तब्ध हो रहा है, अतः उसका प्रतिबिम्ब ऐसा प्रतीत होता है जैसे चित्रित को भाँति चव्नलताहीन हो। नायिका में राग की भावना उद्बुद्ध होने के कारण उसके रोमाव्र खड़े हो गये हैं, तथा नायक के प्रतिबिम्ब को देखने में वह इतनी तल्लीन है कि बीच में फूल जैसी छोटी सी वस्तु के विध्न को भी बर्दाश्त नहीं कर सकती। उसके साँस रुक गये हैं, वह निःश्वासों के द्वारा लहरों की शोभा की सृष्टि भी नहीं कर पाती है, क्योंकि नायिका में स्तम्भ नामक सात्त्विक भाव की उत्प्ति हो गई है। पेय पदार्थ के पीने या पानपात्र के हिलाने डुलाने से नायक के मुख के प्रतिबिंब का ओझल हो जाना जरूरी है, इसलिए वह न तो पीती ही है, न पात्र को ही हिलाती है हकR B3 अथ मध्या मध्योद्यदयौवनानङ्गा मोहान्तसुरतक्षमा ॥ १६॥ सम्प्राप्ततारुण्यकामा मोहान्तरतयोग्या मध्या। तत्र यौवनवती यथा- 'आलापान्म्रविलासो विरलयति लसद्वाहुविक्षिप्तियातं नीवीग्रन्थि प्रथिम्रा प्रतनयति मनाङ्मध्यनिम्नो नितम्बः । उत्पुष्पत्पार्श्वमूच्छत्कुचशिखरमुरो नूनमन्तः स्मरेण स्पृष्टा कोदण्डको्या हरिणशिशुदृदशो दृश्यते यौवनश्रीः।।' स्वीया नायिका का दूसरा भेद मध्या है। मध्या में यौवन कामवासना प्रप्त हो चुकी होती है, वह यौवन व कामवासना दोनों की दृष्टि से पूर्ण रहती है; तथा सुरतक्रीडा को वह मोह के अन्त तक सहन कर सकती हैं। १. ठीक इसी से मिलता जुलता भाव तुलसी ने भी कवितावली में निबद्ध किया है- 'राम को रूप निहारति जानकि कञ्नके नग की परछाहीं। या ते सबै सुधि भूलि गई कर टेकि रही पल टारत नाहीं॥
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(यौवंनवती मध्या) कामदेव ने सचमुच ही अपने धनुष के किनारे से इस हिरन के बच्चे के समान आँख वाली नायिका के यौवन की कान्ति को छू दिया है, ऐसा मालूम पड़ता है। पहले यह बड़ी बातें बनाती थी, पर अब इसकी बातें कम हो गई है, जैसे इसके भौहों के विलास ने इसके आलाप-प्रलाप को कम कर दिया है। जब यह चलती है, तो इसकी चाल सुन्दर ढंग से हाथ के मटकाने से सुशोभित रहती है। इसकी कमर (मध्यभाग) बड़ी पतली है और इसके पुट्ठे (नितम्ब्र) बड़े भारी। ये नितम्ब अपने भारीपन के कारण नीवीकी ग्रन्थि को बड़ा पतला बना देते हैं। इसके मोटे भारी नितम्बों के आगे नीवी की ग्रन्थि बड़ी पतली नजर आती है। इसके वक्ष:स्थल के दोनों किनारे (दिन व दिन) पुष्पित होते जा रहे, अर्थात् इसका उरः स्थल दोनों ओर से बढ़ता जा रहा है, तथा उसमें कुचों की अभिवृद्धि हो रह्दी है। नायिका की इस दशा को देखकर ऐसा जान पड़ता है कि कामदेव ने अपने धनुष से इसकी यौवन श्री को छू दिया है। इससे यह भी व्यंग्य प्रकटित होता है, कि नायिका को देखते ही कामोद्दीपन हो जाता है। कामवती यथा- 'स्मरनवनदीपूरेणोढाः पुनर्गुरुसेतुभि- र्यदपि विधृतास्तिष्ठन्त्यारादपूणमनोरथाः। तदपि लिखितप्रख्येरङ्व: परस्परमुन्मुखा नयननलिनीनालाकृष्टं पिबन्ति रसं प्रियाः॥' (कामवती मध्या) यौवनवती मध्या नायिकाओं में कामसम्बन्धी विभिन्न प्रकार के मनोरथ उत्पन्न हो रहे हैं। ये अपूर्ण मनोरथ कामदेव की नवीन नदी के चढ़ाव आने के कारण उस चढ़ाव के द्वारा डूबते उतराते दृष्टिगोचर होते हैं। नायिका लज्जा आदि कई प्रकार के बड़े बड़े सेतुओं के द्वारा कामदेव की नदी के प्रवाह को रोक कर इन मनोरथों की बाँध के द्वारा नियमित कर देती हैं। इस प्रकार नियमित किये जाने पर भी ये मनोरथ नहीं मानते, और मध्या नायिका की च्चेष्टाओं में इसकी व्यञ्जना हो ही जाती है, कि वे कामवासना से युक्त हैं। ये नायिकाएँ वैसे लज्जादि के द्वारा मनोरथों को नियमित कर देती हों, फिर भी स्तब्ध (चित्रलिखित-से) अपने अङ्गों के द्वारा एक दूसरे की ओर उन्मुख होकर (नायक का दर्शन करती हुई) नायक- दर्शनरूप रस का पान इसी तरह करती है, मानो नेत्ररूपी कमल के नालों से उसके रस को खींचकर पी रह्दी है। (हंसिनी नलिनीनाल के रस का पान किया करती है, मध्या नायिकाएँ नजरों से प्रीतम के दर्शन रूपी रस का पान करती है, इस प्रकार यहाँ हँसिनी व नायिकाओं का उपमानोपमेय भाव भी व्यंग्य है।) मध्यासम्भोगो यथा- 'ताव चित्र रइसमए महिलाणं विब्भमा विराअ्रन्ति। जाव ण कुवलयदलसच्छहाइं मउलेन्ति णअणाईं।।' ('तावदेव रतिसमये महिलानां विभ्रमा विराजन्ते। यावन्न कुवलयदलस्वच्छाभानि मुकुलयन्ति नयनानि ॥') एवं धीरायामधीरायां धीराधीरायामप्युदाहार्यम्।
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(मोहान्तसुरतक्षमा मध्या) रति के समय स्त्रियों की श्रङ्गारचेष्टएँ तभी तक सुशोभित होती हैं, जब तक कि कमलों के समान स्वच्छ कान्ति वाले उनके नेत्र मुकुलित नहीं हो पाते। इसी तरह मध्या के कोप सम्बन्धी उदाहरण दिये जा सकते हैं। कोप के समय मध्या के धीरा, अधीरा तथा धीराधीरा ये तीन रूप पाये जाते हैं। (ध्यान रखिये 'कोपेमृदुः' तथा 'सुखो- पायप्रसादना' होने के कारण मुग्धा नायिका में इस ढङ्ग के कोई भेद नहीं पाये जाते।) अथास्या मानवृत्ति :- धीरा सोत्प्रासचक्रोक्त्या, मध्या साश्रु कृतागसम्। खेदयेद्दयितं कोपादधीरा परुषाक्तरम् ।। १७ ।। नाथक के अपराध करने पर (अन्य नायिका से प्रेम करने पर) धीरा मध्या तानें सुनाकर उसका दिल दुखाती है, धीराधीरा मध्या रोती भी है, साथ ही ताने भी सुनाती है। तीसरी कोटि की अधीरा मध्या रोती है तथा नायक को कड़े बचन सुनाती है। मध्याधीरा कृतापराधं प्रियं सोत्प्रासवक्रोक्त्या खेदयेत्, यथा माघे- 'न खलु चयममुष्य दानयोग्याः पिबति च पाति च यासकौ रहस्त्वाम्। व्रज विटपममुं ददस्व तस्ये भवतु यतः सदशोश्चिराय योग: ॥' (मध्याधीरा) मध्याधीरा कृतापराध प्रिय को तानें मारती है। जैसे शिशुपालवध के सातवें सर्गका निम्न पद्य। किसी नायक ने अन्य नायिका से प्रेम करके तथा उसके पास रात्रियापन करके अपराध किया है। वहाँ से लौटने पर ज्येष्ठा नायिका के पास आकर वह उसे खुश करने के लिए पल्लव (किसी वृक्ष का कोमल पत्ता) उसके प्रसाधनार्थ देना चाहता है। नायिका उसे ताना भारती हुई कहती है :- माफ कीजिये, हम इस पछवदान के उपयुक्त पात्र नहीं हैं। जो कोई तुम्हारी प्रिया हो, जो एकान्त में तुम्हारा पान (चुम्बन) करती हो, तथा (प्रेम करके) तुम्हारी रक्षा करती हो, जाइये, उसे ही यह पहव (विटप), अथवा यह शरङ्गारी रसिक जो विटों की रक्षा करता है-सौंपिये। ताकि कम से कम दोनों समान गुण वालों का योग इमेशाके लिए हो जाय। वह तुम्हारी प्रिया तुम जैसे विटों का पान करती है तथा रक्षा करती है, इसलिए 'विटप' है, और इधर यह पल्लव भी 'विटप' है तो क्यों न दोनों विटपों का योग करा देते हो। (यहाँ 'विटप' शब्द में रलेष है-जिसका अर्थ पछ्लव, तथा कामी रसिक व्यक्ति (छैला) दोनों होता है।) घीराधीरा साश्रु सोत्प्रासवक्रोक्त्या खेदयेत्, यथाऽमरुशतके- 'बाले नाथ चिमुश्च मानिनि रुषं रोषान्मया किं कृतं खेदोऽस्मासु न मेऽपराध्यति भवान्सर्वेऽपराधा मयि। तत्किं रोदिषि गद्गदेन वचसा कस्याप्रतो रुदते UIE कFE TF: नन्वेतन्मम का तवास्मि दयिता नास्मीत्यतो रुद्यते ।।' (धीराधीरा मध्या) धीराधीरा मध्या एक और रोती है, साथ ही नायक के दिल को तानें सुनाकर भी दुखाती है। जैसे अमरुकशतक का यह प्रसिद्ध पद्य-
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नायक अन्य नायिका से प्रेम करने के कारण अपराधी सिद्ध हो चुका है। जब वह घर पर आता है तो ज्येष्ठा नायिका को मान व रोष से युक्त पाता है। उसे मनाने के लिये वह कुछ कहना चाहता है इसलिए उसे केवल सम्बोधित करता है 'बाले'। इसके पहले कि वह कुछ कह पाये नायिका-क्या कहना चाहते हैं-इस बात की ब्यजना कराते हुए केवल 'नाथ' इस प्रकार जबाब देती है। यहाँ यह भी व्यंग्य है कि अब आप मुझसे प्यार नहीं करते हैं इसलिए मैं आपको 'प्रिय' कहते कुछ हिचकिचा रही हूँ। हाँ मैं आपकी दासी हूँ और आप मेरे स्वामी। इस पर नायक कहता है-'मानिनि, रोष को छोड़ दो।' 'शेष करके मैंने क्या किया है-व्यंग्य है इससे तुम्हारा क्या बिगड़ा है।' 'तुम्हारे रोष करने से हमें दुःख हो रहा है।' 'अपने मेरा कोई अपराध नहीं किया है, सारे अपराध मैंने ही तो किये हैं।' अब नायक कुछ उत्तर नहीं दे पाता, तो कहता है-'तो फिर तुम गद्द वचनों से क्यों रोती हो।' 'मैं किसके आगे री रही हूँ।' 'यह मेरे सामने रो रही हो ना।' 'मैं तुम्हारी क्या हूँ।' 'प्रिया' 'नहीं, मैं तुम्हारी प्रिया नहीं हूँ। इसीलिए तो रो रह्ी हूँ।' अधीरा साश्रु परुषाक्षरम्, यथा- 'यातु यातु किमनेन तिष्ठता मुन्न मुश्च सखि मादरं कृथाः। खण्डिताधरकलड्कितं प्रियं शक्नुमो न नयनैनिरीक्षितुम्।' (अधीरा मध्या) अधीरा मध्या एक ओर रोती है, दूसरी ओर अपराधी नायक को कटूक्ति भी सुनाती है। जैसे निम्न पद्य में- 1p नायक अपराध करके नायिका के पास लौटा है और आकर नायिका को प्रकुपित देखता है। उसे मनाने के लिए बड़ी कोशिश करता है, पर वह प्रसन्न नहीं होती। अन्त में, लाचार होकर वह वापस लौट रहा है। इधर नायिका की सखियाँ दोनों में समझौता कराना चाहती हैं। वे लौटते हुई नायक से रुकने के लिए मिन्नतें करती हैं। नायिका ऐसे मौके पर सखियों से कह रही है। इसे जाने दो। इसके ठह्दरने से क्या फायदा है। हे सखि इसे छोड़ क्यों नहीं देती। इससे ज्यादा मिन्नतें मत करो। जो प्रिय दूसरी नायिका के दन्तक्षत अधरसे कलक्कित हो चुका है, उसे हम आँखों से देखने में असमर्थ है-उसे हम देख भी नहीं सकती, प्रेमालाप व रतिक्रीड़ा करना तो दूर रहा। प्रेष एवमपरेपि व्रीडानुपहिता: स्वयमनभियोगकारिणो मध्याव्यवहारा भवन्ति, यथा- 'स्वेदाम्भ:कणिकाश्चितेऽपि चदने जातेऽपि रोमोद्रमे चिश्रम्भेऽपि गुरौ पयोधरभरोत्कम्पेऽपि वृद्धिं गते। दुर्वारस्मरनिर्भरेऽपि हृदये नैवाभियुक्त: प्रिय- स्तन्वङ्या हठकेशकर्षणघनाश्लेषामृते लुब्धया। स्वतोऽनभियोजकत्वं हठकेशकर्षणघनाश्लेषामृते लुब्धयेवेत्युत्प्रेक्षाप्रतीतेः। मध्या नायिका के इस तरह के कई व्यवहार काव्य में उपनिबद्ध होते हैं। ये व्यवहार लज्जा आदि से छिपे नहीं रहते ( क्योंकि यह बात मुग्धा में पाई जाती है); तथा इनके द्वारा नायिका स्वयं नायक को अपनी और प्रवृत्त करती है। D १. स्वयमनभियोगकारण := सुरतेस्वकीय-(मध्या) प्रवृत्त्यप्रयोजकाः, प्रियः स्वयमेव सुरते प्रवर्तेतेति समीहते मध्येति भाव:। (सुदर्शनाचार्यः प्रभा टीका) Dime लद। S 1hug
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मध्या नायिका के इन व्यवहारों में से एक चित्र उपस्थित किया जाता है। नायिका के सम्मुख नायक मौजूद है। नायक के समीपस्थ होने के कारण कामवासना तीव्र रूप से उसे सता रही है। पर वह यह चाहती है, कि नायक स्वयं रतिक्रीड़ा में प्रवृत्त हो। इसलिये स्वयं प्रिय के प्रति कोई शरृङ्गारी चेष्टा नहीं करती। कामोद्दीपन के कारण नायिका के मुख पर पसीनें की बूँदें झलक आई हैं, तथा उसके रोगटे खड़े हो गये हैं। उसे बहुत ज्यादा स्तम्भ हो रहा है, तथा उसके स्तनों की कँपकपी और बढ़ गई है। नायिका के हृदय में काम का वेग इतना बढ़ गया है, कि अब रोके भी नहीं रुक पाता। इतना सब होने पर भी तन्वङ्गी नायिका ने प्रिय को इसलिए आलिद्गित न किया, कि वह उस आनन्द की इच्छुक थी, जो नायक के द्वारा हठपूवक बालों को पकड़ने और जोर से आश्लेष करने से मिल सकता था। कवि कल्पना (उत्प्रेक्षा) करता है मानों वह हठ-केशकर्षण तथा धनाश्लेष रूपी अमृत की अत्यधिक इच्छुक (लुब्धा) थी। इस उत्प्रेक्षा के द्वारा नायिका का स्वयं क्रीड़ा में प्रवृत्त न होना व्यजित है। अथ प्रगल्मा- यौवनान्धा स्मरोन्मत्ता प्रगल्भा दयिताङ्गके
प्रगल्भा नायिका में यौवन का इतना प्रवाह होता है, कि वह मानों अन्धी सी हो जाती है। कामसम्बन्धी भाव भी उसमें इतने अधिक रहते हैं, कि जैसे वह उनमें ही पागल हो गई हो। वह बड़ो डीढ (प्रगल्भ)-लजारहित होती है। रतिक्रीड़ा के समय वह प्रिय के अङ्ग में ऐसी चिपकती है, जैसे उसमें विलीन हो जायगी, और रतिक्रीड़ा में उसे इतना आनन्द आता है, कि सुरतक्रीड़ा की आरम्भिक अवस्था में ही वह अचेतन-सी हो जाती है। (इसी नायिका को अव्य अलक्कारशास्त्री व नाव्यशास्त्री प्रौढ़ा भी कहते हैं।) गाढयौवना यथा ममैव- 'अभ्युन्नतस्तनमुरो नयने च दीर्घे चक्रे भ्रुवावतितरां वचनं ततोऽपि। मध्योऽधिकं तनुरतीव गुरुर्नितम्बो शकी । मन्दा गतिः किमपि चाद्धुतयौवनायाः॥' मि्या नमय (गाढ़यौवना या यौवनान्धा म्रौढ़ा) इसका उदाहरण वृत्तिकार धनिक ने स्वयं अपना ही पद्य दिया है। इस नायिका के उरःस्थल में स्तन बहुत ज्यादा उठे हुए हैं, नेत्र कानों तक फैले हुए (लम्बे) व टेढ़े हैं; इसकी मौंहे बड़ी टेढ़ी है, और इसके वचन उससे भी ज्यादा टेढ़े (व्यंग्ययुक्त) हैं। इसकी कमर बड़ी पतली है, तथा नितम्ब बहुत ज्यादा भारी हैं। इस अद्भुत यौवन वाली नायिका की चाल कुछ धीमी (मन्थर) दिखाई देती है। यथा च- Tim : 'स्तनतटमिदमुत्तुजं निम्नो मध्यः समुन्नतं जघनम्। F) S Fp विषमे मृगशावाच्या वपुषि नवे क इव न स्खलति॥' कनायिका के यौवनान्धत्व का दूसरा उदाहरण यह भी दिया जा सकता है। इस नायिका के स्तन ऊँचे हैं, कमर नीची (पतली) है, और जघनस्थल फिर उठा हुआ है। इस तरह इसका शरीर विषम-ऊँचा नीचा है। हिरन के समान नेत्रवाली इस नायिका के इस विषम
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तथा नवीन शरीर में कौन नहीं फिसलता है। अर्थात् जो भी इसे देखता है वही कामासक्त हो जाता है। विषमस्थली में कोई भी व्यक्ति चलते समय फिसल सकता है, इसकी भी व्यंग्य रूप में प्रनीति हो रही है। भावप्रगल्भा यथा- 'न जाने सम्मुखायाते प्रियाणि वदति प्रिये। सर्वाण्यज्ञानि किं यान्ति नेत्रतामुत कर्णताम् ।।' (भावप्रगल्भा या रमरोन्मत्ता प्रौढ़ा)। नायक के समीपस्थित होने या उसकी याद आने पर प्रौढ़ा अत्यधिक भावमझन पाई जाती है। इसका उदाहरण यह है- कोई प्रोढ़ा नायिका अपने नायक के समीपस्थ होने के विषय में सखियों को बताते हुए कहती है-जब प्रिय मेरे सम्मुख आकर प्यारी बातें कहा करते हैं, तो मुझे उन्हें देखने और उनकी बातें सुनने के अलावा कुछ नहीं सूझता। क्या मेरे सारे ही अङ्क उस समय आँखें या नेत्र हो जाते हैं। रतप्रगल्भा यथा- कान्ते तल्पमुपागते विगलिता नीवी स्वयं बन्धना- द्वास: प्रश्लथमेखलागुणघूतं किञ्चिन्नितम्बे स्थितम्। एतावत्सखि वेझ्यि केवलमहं तस्याङ्गसङ्ग पुनः कोऽसौ कास्मि रतं नु किं कथमिति स्वल्पापि मे न स्मृतिः ।।' (रतप्रगल्भा, जैसे) किसी प्रौढ़ा नायिका से उसकी सखियाँ नायक के साथ उसकी सुरतक्ीड़ा के बारे में पूछती हैं। नायिका उसका उत्तर देते हुए कहती है। हे सखि क्या बताऊँ, जब प्रिय शय्या पर सुरतक्रीड़ा के लिये आते हैं, तो मेरी नीवी का बन्धन अपने आप ही खुल जाता है। मेरा अधोवस्न किसी तरह कुम्हलाई करधनी के डोरे से रुक कर नितम्ब में ठहर जाता है। हे सखि, बस मैं इतना भर जानती हूँ। उसके बाद तो मैं उसके अ्ज्गों के स्पर्श से आनन्द में इतनी विभोर हो जाती हूँ, कि मैं कौन हूँ, वह कौन है, सुरतक्रीड़ा क्या है, कैसी है, इन सारो बातों का जरा सा भी खयाल मुझे नहीं रहता। एवमन्येऽपि परित्यक्तहीयन्त्रणा वैदग्व्यप्राया प्रगरभाव्यवहारा वेदितव्याः। यथा-
क्वचिच्चूर्णोदारी क्वचिदपि च सालक्तकपदः। वलीभज्ञाभोगैरलकपतितै शीर्णकुसुमै: एक स्त्रियाः सर्वाचस्थं कथयति रतं प्रच्छदपटः ॥' डिप्रगल्भा के ये व्यवहार लज्जा से सवथा रहित होते हैं, तथा उनमें अत्यधिक चतुरता (विदग्धता) पाई जाती है। इस तरह के प्रौढ़ा व्यवहारों का ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है। जैसे- किसी नायिका ने, रात्रि में, नायक के साथ विभिन्न प्रकार की कामशास्रोक्त विधियों (आसनादि ) से रतिक्रीड़ा की है। प्रातः काल उसकी शय्या के चादर को देखने से इन सारी विधियों का पता लग जाता है। इसी विषय में कवि कहता है, कि शय्या का चादर (प्रच्छदपट) स्त्री (नायिका) के विभिन्न प्रकार के सुरत की सूचना दे रहा है। चादर पर कहीं तो ताम्बूल का निज्ञान बना है, तो वह कहीं अगुरु के अङ्गराग-पक्क (जो स्तनों पर
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लगाया जाता है) से मलिन हो रहा है। कहीं उस पर नायिका के ललाटतट पर लगाया हुआ चूर्ण बिखर गया है, तो कहीं महावर का पैर चिह्नित है। दूसरी जगह चादर पर नायिका की त्रिवली के कारण सिलवटें पड़ी हैं और कहीं उसके बालों से गिरे हुए हुए फूल पड़े हैं। इस तरह ये सारे चिह्न नायिका की नाना प्रकार की सुरतक्रीड़ा की व्यअ्ना कर रहे हैं। (इस पद्य में वात्स्यायनोक्त विभिन्न रतिविधियों-धेनुक, विपरीत आदि-की व्यजना करा कर नायिका का प्रौढ़त्व प्रकटित किया गया है। मुग्धा या मध्या सुरत में इस प्रकार का सहयोग नहीं दे सकती, यह सहृदय जानते ही होंगे।) अथास्याः कोपचेष्टा- सावहित्थादरोदास्ते रतौ, धीरेतरा क्रुधा। सन्तर्ज्य ताडयेत्, मध्या मध्याधीरेव तं घदेत् ।। १६ ।। सहावहित्येन=आकारसंवररोनादरेण च= उपचाराधिक्येन वर्तते सा सावहि त्थादरा, रतावुदासीना क्रुद्धा-कोपेन भवति। नायक के अपराध करने पर प्रौढ़ा या प्रगल्भा नायिका जिस प्रकार से कोप करती है, उसके आधार पर उसके धीरा, अधीरा तथा धीराधीरा ये तीन भेद किये जा सकते हैं। धीरा प्रगल्भा अपना कोप दो तरह से, पकटित कर सकती है, या तो वह नायक का जरूरत से ज्यादा आदर कर उसे लजित करे, या फिर सुरत के प्रति उदासीनता दिखा कर रतिक्रीड़ा में नाथक को सहयोग न दे। अधीरा प्रगल्भा गुस्से में होकर नायक को पीटती है तथा झिड़कती है, धीराधीरा प्रगल्भा का व्यवहार मध्या जैसा ही होता है, अर्थात् वह तानें मार कर नायक को फटकारती है। सावहित्यादरा धीरा प्रगल्भा वह नायिका है, जो कोप की दशा में अपनी स्थिति को छिपा कर नायक के प्रति और आदर दिखाती है; दूसरे प्रकार की धीरा रति में उदासीन रहती है। सावहित्थादरा यथाSमरुशतके 'एकत्रासनसंस्थिति: परिहृता प्रत्युद्रमाद्दूरत- SPR स्ताम्बूलाहरणच्छलेन रभसाश्लेषोऽपि संविध्नितः। आलापोऽपि न मिश्रितः परिजनं व्यापारयन्त्याऽन्तिके कान्तं प्रत्युपचारतश्चतुरया कोप: कृतार्थीकृतः ॥' (सावहित्थादरा) जैसे अमरुकशतक के निम्न पद्य में- नायक अपराध करके नायिका के पास लौटा है। नायिका अपने कोप को इस चतुरता से बताती है, कि नायक को पता तो लग जाय, पर कोप साफ तौर से नजर न आवे। जब नायक आया, तो उसे दूर से ही देख कर वहआदर करने के लिए उठ खड़ी हुई, और इस तरह नायक के साथ एक ही आसन पर बैठने से उसने अपने आप को बचा लिया। नायक के साथ एक साथ न बैठ कर वह कोप की व्यजना कर रही है, पर उठने के आदर के बहाने वह उसे छिपा भी रही है। नायक उसे आलिङ्रन करना चाहता है, लेकिन एक दम ताम्बूल लाने के बहाने से कतरा कर, उसने आलिङ्गन में भी विघ्न डाल दिया। नायक के सेवा-शुश्रूषा के लिए वह बार-बार नौकरों को पास में बुलाती ही रही, और इस तरह उसने नायक से बातचीत भी न की। इस प्रकार नाना प्रकार से नायक की शुश्रूषा आदि करके चतुर नायिका ने अपने कोप को सफल बना दिया। कमोह काया गड
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रतावुदासीना यथा- आयस्ता कलहं पुरेव कुरुते न संसने वाससो भभभ्रूगतिखण्ड्यमानमघरं धत्ते न केशग्रहे। अज्ञान्यर्पयति स्वयं भवति नो वामा हठालिङ्गने तन्व्या शिक्षित एष सम्प्रति कुतः कोपप्रकारोऽपरः॥' (रति में उदासीन-रताबुदासीन) जैसे निम्न पद्य में- अपराधी नायक घर आकर नायिका को प्रसन्न करने के लिए रतिक्रीड़ा में प्रवृत्त होता है। पर नायिका कोप के कारण सुरतक्रीड़ा में नायक का सहयोग न देकर उदासीन वृत्ति से स्थित रहती है। पहले रतिक्रीड़ा के लिए नायक के पकड़ने पर तथा वस्र को ढीला करने पर कलह करती थी, पर अब वह उस तरह से कलह नहीं करती है। जब नायक रतिक्रीड़ा के समय केशग्रह् करता था, तो वह भौहे टेढ़ी करके उसके अधर को दाँतों से काटा करती थी, पर अब ऐसा भी नहीं करती। अब नायक के द्वारा हठ से आलिङ्गन करने पर वह अपने अङ्गों को स्वयं नायक को सौंप देती है, पहले की तरह उसका विरोध नहीं करती। इस तन्वी नायिका से यह नये ढङ्ग का कोप, पता नहीं, कहाँ से सीख लिया है। इतरा त्वधीरप्रगल्भा कुपिता सती सन्तर्ज्य ताडयति। यथाऽमरुशतके 'कोपात्कोमललोलबाहुलतिकापाशेन बद्धा दृढं नीत्वा केलिनिकेतनं दयितया सायं सखीनां पुरः। भूयोऽप्येवमिति स्खलत्कलगिरा संसूच्य दुश्वेष्टितं धन्यो हन्यत एष निह्ृतिपर: प्रेयान्रुदन्त्या हसन् ।।' (अधीरा प्रगल्भा ) अधीरा प्रगल्भा अपराधी नायक को गुस्से से फटकारती है और पीटती है। जैसे अमरुकशतक में- अपराधी नायक के घर पर आने पर शाम के वक्त नायिका उसे कोमल व चज्जल बाहुओं की लताओं के पाश से, गुस्से के कारण मजबूती से बाँधकर क्रीडागृह में ले जाती है। वहाँ पर सखियों के सामने सखलित वाणी के द्वारा उससे कहती है-'ऐसा फिर करोगे', और इस तरह उसके अपराध को सूचित करती है। रोती हुई नायिका के द्वारा लज्जित तथा हँसता हुआ यह धन्य नायक पीटा जा रहा है। धीराधीरप्रगल्भा मध्याधीरेव तं वदति सोत्प्रासवक्रोक्त्या। यथा तत्रैव- 'कोपो यत्र भ्रकुटिरचना निभ्रहो यत्र मौनं यत्रान्योन्यस्मितमनुनयो दृष्टिपातः प्रसादः। तस्य प्रेम्णस्तदिदमधुना वैशसं पश्य जातं त्वं पादान्ते लुठसि न च मे मन्युमोक्ष: खलायाः ॥' (धीराधीरा प्रगल्भा) धीराधीरा प्रगल्भा उसे मध्या धीराधीरा की तरह तानें मारती है। जैसे अमरुकशतक का ही निम्न पद्य- अपराधी नायक नायिका को प्रसन्न करने के लिए बड़ी मिन्नतें करता है। उसी का उत्तर देते हुए नायिका कहती है-हे नाथ, देखो, अब उस प्रेम का अन्त हो चुका है, जिस प्रेम में
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कोप, भौहों को टेढ़ा करना, निग्रह तथा मौन का व्यवहार होता था, तथा वह कोप एक दूसरे की और हँसकर अनुनय करने व देखने भर से समाप्त हो जाता था। अब तो वह प्रेम ही समाप्त हो चुका है, (फलतः ) तुम मुझे प्रसन्न करने के लिए पैरों में लोट रहे हो, और मुझ दुष्ट का गुस्सा शान्त ही नहीं होता। पुनश्र- द्वेवा ज्येष्ठा कनिष्ठा चेत्यमुग्धा द्वादशोदिता:। मध्याप्रगल्भाभेदानां प्रत्येकं ज्येष्ठाकनिष्ठात्वभेदेन द्वादश भेदा भवन्ति। मुग्धा त्वेकरूपैव। ज्येष्ठाकनिष्ठे यथाSमरुशतके- 'दृष्ट्वैकासनसंस्थिते प्रियतमे पश्चादुपेत्यादरा- देकस्या नयने निमील्य चिहितक्रीडानुबन्धच्छलः। ईषद्वक्रितकन्धरः सपुलकः प्रेमोल्लसन्मानसा- मन्तर्हासलसत्कपोलफलकां धूर्तोऽपरां चुम्बति ॥' न चानयोर्दाक्षिण्यप्रेमभ्यामेव व्यवहारः, अपि तु प्रेम्णापि यथा चैतत्तथोक्ततं दक्षिण- लक्षणावसरे । एषां च धीरमध्या-अधीरमध्या-धीराधीरमध्या-धीरप्रगल्भा-अधीर- प्रगल्भा-धीराधीरप्रगल्भाभेदानां प्रत्येकं ज्येष्ठाकनिष्ठाभेदाद्द्वादशानां वासवदत्ता-रत्नाव- लीवत्प्रबन्धनायिकानामुदाहरणानि महाकविप्रबन्धेष्वनुसर्तव्यानि। मुग्धा के अलावा दूसरी नायिकाएँ-तीन तरह की मध्या तथा तीन तरह की प्रगल्भा-ज्येष्ठा तथा कनिष्ठा इस प्रकार दो तरह की होती है-इस तरह सब मिलाकर ये १२ प्रकार की होती है। (ध्यान रखिये ये भेद मुग्धा के नहीं होते, वह केवल एक ही तरह की होती है।) ज्येष्ठा तथा कनिष्ठा का उदाहरण अमरुकशतक का यह पद्म दिया जा सकता है- नायक ने देखा कि उसकी ज्येष्ठा तथा कनिष्ठा दोनों नायिकाएँ एक ही आसन पर बैठी हैं। इसलिए वह आदर के साथ (कुछ भय से) धीरे धीरे पीछे से वहाँ पहुँचता है। वहाँ जाकर वह कीडा करने के ढोंग से ज्येष्ठा नायिका के नेत्रों को दोनों हाथों से बन्द कर देता है। इसके बाद वह धूर्त नायक अपनी गरदन को जरा टेढ़ी करके, रोमाख्चित होकर उस कनिष्ठा नायिका को चूम लेता है, जिसका मन प्रेम के कारण उल्लसित हो रहा है, तथा जिसके कपोल- फलक आन्तरिक हँसी के कारण सुशोभित हो रहे हैं। नायक का ज्येष्ठा के प्रति केवल दाक्षिण्य व्यवहार (सहृदयतापूर्ण व्यवहार) पाया आता हो और प्रेम कनिष्ठा के प्रति ही हो, ऐसा मानना ठीक नहीं है न ऐसा होता ही है। वस्तुतः नायक का ज्येष्ठा के प्रति भी प्रेम पाया जाता है। क्योंकि दक्षिण नायक के लक्षण के समय यह स्पष्ट बताया गया है कि उसका प्रेम सभी से हो सकता है। इस प्रकार धीरमध्या, अधीरमध्या, धीराधीरमध्या, धीरप्रगल्भा, अधीरप्रगल्भा, धीराधीरप्रगल्भा इन छः प्रकार की नायिकाओं के पुनः ज्येष्ठा व कनिष्ठा इन दो भेदों के अनुसार बारह भेद होते हैं। इन १२ भेदों के उदाहरण महाकवियों की रचनाओं में वासवदत्ता रत्नावली आदि के रूप में पाये जा सकते हैं।
ह१. देखिये-'सनाता तिष्ठति कुन्तलेश्वरसुता वारोङ्राजस्वसुः' इत्यादि उदाहृत पद का प्रकरण।
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)अथान्यस्त्री- अअर एक कर IN5 ) कि मरिशा अन्यस्त्री कन्यकोढा च नान्योढा ङगिरसे कचित् ॥ २० ।। कन्यानुरागमिच्छातः कुर्यादङ्गाङ्िसंश्रयम्। नायिका का दूसरा भेद अन्य स्त्री (परकीया) होता है। यह अन्य स्त्री दो तरह की हो सकती हैं-किसी की अविवाहित पुत्री (कन्या) तथा किसी दूसरे व्यक्ति की परिणीता स्त्री। नाटकादि में अङ्गी (प्रधान) रस के आलम्बन के रूप में अन्योढा (अन्य परिणीता) परकीया का वर्णन कभी भी नहीं करना चाहिए। कन्या के प्रति अनुराग अङ्गीरस का भी अङ्ग हो सकता है, अङ्गरस का भी। अतः कन्या के अनुराग वर्णन में कोई दोष नहीं है। नायकान्तरसम्बन्धिन्यन्योढा यथा- 'दृष्टिं हे प्रतिवेशिनि क्षणमिहाप्यस्मिन्गहे दास्यसि भा की प्रायेणास्य शिशोः पिता न विरसा: कौपीरपः पास्यति। णीड करशक एकाकिन्यपि यामि तद्वरमितः स्रोतस्तमालाकुलं -प्रीगह-शजाणरप्रि-1 नीरन्ध्रास्तनुमालिखन्तु जरठच्छेदानलग्रन्थयः ॥' -शक- 1अF 1BS (नायकान्तर सम्बन्धिनी परकीया) (कभी कोई परिणीता स्त्री भी किसी उपनायक से प्रेम करने लगती है। लौकिक व शास्त्रीय तमिर्यादा की दृष्टि से यह अनुचित भले ही हो, पर ऐसा लोक में देखा अवश्य जाता है, इस लिए रस-शास्त्र में इसका दृष्टान्त देना जरूरी हो जाता है। संस्कृत के कई मुक्तक पद्य इन परकीयाओं की चेष्टाओं पर मिल सकते हैं। हाँ अङ्गीरस में इनका निबन्धन इसलिए अनुचित माना गया है कि इस प्रकार का प्रेम नैतिकता के विरुद्ध है।) यहाँ इसी का एक उदाहरण देते हैं :- कोई परकीया नायिका उपपति के साथ रतिक्रीडा करने के लिए सहेट की ओर जा रही है। अपनी वास्तविकता को छिपाने के लिए वह दूर के झरने से पानी लाने का बहाना बना रही है। अपनी बात को पक्का करने के लिए वह पहले से ही एक पड़ोसिन से इस तरह से कहती है, कि प्रत्येक व्यक्ति उसके कथन के वाच्यार्थ पर विश्वास कर ले। हे पड़ोसिन, जरा ।हमारे इस घर पर भी नजर डालती रहना। इस लड़के के पिता प्रायः कुएँ का खारा पानी नहीं पीते हैं (खारा पानी नहीं पीयेंगे।) इसलिये मैं अकेली ही दूर के उस झरने से पानी लाने जा रही हूं, जो तमाल के पेड़ों से आवृत है। पर्वाह नहीं, एक दूसरे से घने सटे हुए पुराने नल की ग्रन्थियाँ मेरे शरीर को खर्रोच डाले। एणहlI कगयहाँ परकीया की इस उक्ति से यह प्रकटित होता है कि नायिका उपनायक से की जाने वाली रतिक्रीडा के समय के दशनक्षत व नखक्षत को छिपाने के लिए पहले से ही अपनी । पृष्ठभूमि तैयार कर रही है। साथ ही अपने परिणेता पति के लिए किये गये 'अस्य शिशोः पिता' इस प्रयोग से कोई कोई सहृदय यह भाव भी प्रकटित होता मानते हैं कि वह मेरा 'प्रिय' नहीं है। इय त्वद्विनि प्रधाने रसे न क्वचिन्निबन्धनीयेति न प्रपश्चिता। कन्यका तु पित्राद्या- यत्तत्वादपरिणीताप्यन्यत्त्रीत्युच्यते, तस्यां पित्रादिभ्योऽलभ्यमानायां सुलभायामपि परोपरोधस्वकान्ताभयात्प्रच्छन्नं कामित्वं प्रवतते, यथा मालत्यां माधवस्य सागरिकायां pच वत्सराजस्येति। तदनुरागश्च स्वेच्छया प्रधानाप्रधानरससमाश्रयो निबन्धनीयः। यथा रक्षावलीनागानन्दयोः सागरिका-मलयवत्यनुराग इति।
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फड़ी इस परकीया नायिका का प्रधान रस में निवन्धन करना उचित नहीं, इसलिए विस्तार से वर्णन नहीं किया गया है।१ कन्यका को अन्य स्त्री (परकीया) इसलिये कहा जाता है कि वह शादी न होने के पहले पिता आदि के आधीन होती है। उस कन्या को पिता आदि के द्वारा निगृहीत होने के कारण यद्यपि प्राप्त नहीं किया जा सकता, फिर भी वह सुलभ है, फलतः नायक छिप छिप कर उससे प्रेम करता है, क्योंकि वह नायिका दूसरे लोगों के वश में होती है, या फिर नायक अपनी ज्येष्ठा नायिका (स्वकान्ता) से डरता है। जैसे एक ढंग का छिपा प्रेम मालतीमाधव में मावव का मालती के प्रति है, दूसरे ढंग का रत्नावलो नाटिका में सागरिका के प्रति वत्सराज उदयन का है। एक स्थान पर 'परोपरोध' तथा दूसरे स्थान पर 'स्वकान्तामय' छिपे प्रेम के कारण हैं। कवि इस प्रकार के प्रेम को अपनी इच्छा से प्रधान या अप्रधान दोनों प्रकार के रसों में निबद्ध कर सकता है। जैसे रत्नावली व नागानन्द में क्रमशः सागरिका तथा मलयवती का प्रेम। रत्नावली नाटिका में सागरिका का प्रेम प्रधान रस में निबद् है, जब कि नागानन्द में मलयवती व जोमूतवाहन का प्रेम प्रधान रस में निबद्ध नहीं हुआ है, क्योंकि वहाँ प्रधान रस जीमूतवाहन की दयावीरता का अभिव्यजक वीर रस है। साधारणस्त्री गणिका कलाप्रागल््यधौत्ययुक ।। २१॥ तीसरी श्रेणीकी नायिका साधारण स्त्री है, यह गणिका होती है, जो कलाचतुर, प्रगल्भा तथा धूर्त होती है। तव्यवहारो विस्तरतः शास्त्रान्तरे निदर्शितः। दिङ्मात्रं तु- छन्नकामसुखार्थाज्ञस्वतन्त्रा हंयुपण्डकानू। रक्तेव रख्येदाळ्यान्निःस्वान्मान्रा विवासयेत्।। २२।। इसका व्यवहार दूसरे शास्त्र (वात्स्यायनादि) में विस्तार से दिखाया गया है। यहाँ उसका सक्केत भर दिया जाता है। जो लोग छिपकर कामतृप्ति करना चाहते हैं, जिनसे बड़ी सरलता से पैसा ऐंठा जा सकता है, जो बेवकूफ (मूर्ख) हैं, आजाद हैं, घमण्डी हैं, या नपुंसक हैं, ऐसे लोगों से गणिका ठोक इसो तरह व्यवहार करती हैं, जैसे वह उन्हें सचमुच प्रेम करती हो, किन्तु उसी वक्त, तक जब तक कि उनके पास पैसा है। जब वह देख लेती है, कि वे गरीब (निःस्व) हो गये हैं, तो वह उन्हें अपनी मा के द्वारा घर से निकलवा देती है। छुननं ये कामयन्ते ते छन्नकामा: श्रोत्रियवणिग्लिद्विप्रमृतयः, सुखाथः अप्रयासावा- प्रधन:सुखप्रयोजनो वा, अज्ञो मूर्खः स्वतन्त्रो निरङ्कशः,अहंयुरहक्कतः, पण्डको वातपण्डादि:, १. बाद के एक भक्तिवादी रसशास्त्री रूपगोस्वामी ने कृष्णभक्तिरूप माधुर्यरस में अङ्गीरस में ही परकीया का उपादान उचित माना है, पर वह गोपिका व कृष्ण के प्रेम तक ही सीमित है :- नेष्टं यदङ्गिनि रसे कविभि: परोढा, तद्रोकुलांबुजदृशां कुलमन्तरेण। आशंसया रतिविधे रवतारितानां कंसारिणा रसिकमण्डलशेखरेण ।। क(उज्जवलनीलमणि में उद्धत, पृ.९९) सक 8१. प्रभा के निबद्धा सुदर्शनाचार्य का इस सम्बन्ध में-मलवत्यनुरागश्चाऽप्रधानरस-(श्रृङ्गार) समाश्रयः जीमूतवाहनस्य तत्रत्यनायकस्य प्राधान्येन शान्तरसनायकत्वादिति विवेक :- यह कहना चिन्त्य है। क्योंकि धनजय व धनिक दोनों के मत के यह विरुद्ध पड़ता है, जो शान्तरस को नवाँ रस नहीं मानते। (दे० प्रकाश ४, का. ३५) वे नागानन्द का रस 'वीर मानते हैं :- अतो दयावीरोत्साह स्यैव तत्र स्थायित्वं तत्रैव श्रक्कारस्याङ्गत्वेन चक्रवतित्वावाश्ेश्व फलत्वेनाविरोधात।
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एतान्बहुवित्तान् रक्तेव रजयेदर्थार्थम्-तत्प्रधानत्वात्तद्वृत्तेः, ग्रहीतार्थान्कुट्टिन्यादिना निष्कासयेत् पुनः प्रतिसन्धानाय। इदं तासामौत्सर्गिकं रूपम्। जो लोग छिप छिप कर कामतृप्ति करते हैं या प्रेम करते हैं, जैसे वेदपाठी श्रोत्रिय, बनिये, संन्यासी या दूसरे लोग; जिनसे सुख से बिना किसी प्रयास के धन प्राप्त हो सकता है; जो मूर्ख हैं, स्वतन्त्र अर्थात् निरक्कश हैं, अहंयु अर्थात् अद्ङ्कारी हैं, पण्डक अर्थात् वातपण्डादि रोगों से पीडित (नपुंसक) हैं, इनके पास बहुत पैसा होने पर गणिका उनके प्रति अनुरक्त-सी होकर उन्हें प्रसन्न करती रहती है। जब उनसे सारा पैसा ऐंठ लिया जाता है, तो वह उन्हें मा (कुट्टिनी) के द्वारा घर से निकलवा देती है। यह उनका सामान्य (औत्सर्गिक) लक्षण है। रूपकेषु तु- (१)रक्तैव त्वप्रहसने, नैषा दिव्यनृपाथ्ये। प्रहसनवर्जिते प्रकरणादौ रक्तैवषा विधेया। यथा मृच्छकटिकायां वसन्तसेना चारुदत्तस्य। प्रहसने त्वरक्तापि हास्यहेतुत्वात्। नाटकादौ तु दिव्यनृपनायके नैव विधेया। प्रहसन से भिन्न रूपक में गणिका को नायक के प्रति अनुरक्त रूप में ही चित्रित करना चाहिए (चाहे प्रहसन में उसका अननुरागी रूप हो सकता है)। नायक के दिव्य कोटि के होने पर या राजा होने पर रूपक में गणिका का निबन्ध नहीं होना चाहिए। प्रह्सन से भिन्न प्रकरण आदि रूपकों में इसका अनुरागी रूप ही निबद्ध किया जाना चाहिए। जैसे मृच्छकटिक में वसन्तसेना गणिका चारुदत्त के प्रति अनुरक्त है। प्रहसन में इसको अननुरक्त भी बनाया जा सकता है, क्योंकि वहाँ वह हास्यरस का अवलम्बन है। दिव्यनायक तथा नृपनायक वाले नाटकादि में इसका सभावेश उचित नहीं। अथ भेदान्तराणि- आसामष्टाववस्था: स्युः स्वाधीनपतिकादिकाः ॥ २३॥ स्वाधीनपतिका वासकसज्जा विरहोत्कण्ठिता खण्डिता कलहान्तरिता विप्रलब्धा प्रोषितप्रिया अभिसारिकेत्यष्टौ स्वस्त्रीप्रभृतीनामवस्थाः। नायिकाप्रभृतीनामप्यवस्थारूपत्वे सत्यवस्थान्तराभिधानं पूर्वासां धर्मित्वप्रतिपादनाय। अष्टाविति न्यूनाधिकव्यवच्छेदः। ये सभी तरह की नायिकाएँ अवस्था भेद से आठ ही तरह की होती हैं :- स्वाधीनपतिका, वासकसज्जा, विरहोत्कण्ठिता, खण्डिता, कलहान्तरिता, विप्रलब्धा, प्रोषितप्रिया, तथा अभिसारिका। वैसे तो नायिकाओं में नायिकात्व आदि (आदि से मुग्धा, मध्या आदि का समावेश होगा) भी उनकी अवस्था के धोतक ही नहीं हैं, फिर भी इन दूसरे ढङ्ग की अवस्थाओं का प्रतिपादन इसलिये किया गया है, कि पहली अवस्थाओं को धर्मी माना गया है, इन अवस्थाओं को धर्म। जिस प्रकार धर्मी व धर्म, गुणी व गुण, विशेष्य व विशेषण दो भिन्न भावों का प्रतिपादन करते है, वैसे ही मुग्धादि अवस्थाएँ विशेष्य हैं; स्वाधीनमर्तृकादि अवस्थाएँ विशेषण। ये अवस्थाएँ आठ ही हैं, न ज्यादा, न कम इस पर जोर देने के लिए 'अष्टावेव' इस अवधारण का प्रयोग हुवा है। इसी को आगे स्पष्ट करते हैं कि ये अवस्थाएँ आठ से कम नहीं हो सकती, क्योंकि इनमें से किसी का भी एक दूसरे में अन्तर्भाव नहीं हो सकता। न च चासकसज्जादे: स्वाधीनपतिकादावन्तर्भावःअनासन्न प्रियत्वाद्वासकस्जाया न (१) 'रूपके त्वनुरत्तैव कार्या प्रहसनेतरे' इति पाठान्तरम्।
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स्वाधीनपतिकात्वम्। यदि चैष्यत्प्रियापि स्वाधीनपतिका प्रोषितप्रियापि न पृथग्वाच्या, न चेयता व्यवधानेनासत्तिरिति नियन्तुं शक्यम्। न चाविदितप्रियव्यलीकायाः खण्डि- तात्वम्। नापि प्रवृत्तरतिभोगेच्छायाः प्रोषितप्रियात्वम्। स्वयमगमनान्नायकं प्रत्यप्रयोज- कत्वान्नाभिसारिकात्वम्। एवमुत्कण्ठिताप्यन्यव पूर्वाभ्यः । औरचित्यप्राप्तप्रियागमनसमया- तिवृत्तिविधुरा न वासकसज्जा, तथा चिप्रलब्धापि वासकसज्जावदन्यैव पूर्वाभ्यः,-उक्त्या नायात इति प्रतारणाधिक्याच्च वासकसज्जोत्कण्ठितयोः पृथक्। कलहान्तरिता तु यद्यपि चिदितव्यलीका तथाप्यगहीतप्रियानुनया पश्चात्तापप्रकाशितप्रसादा पृथगेव खण्डितायाः। तत् स्थितमेतदष्टावचस्था इति। वासकसज्जादि नायिका-कोटि का अन्तर्भाव स्वाधीनपतिकादि दूसरी कोटि में नहीं किया जा सकता। वासकसज्जा और स्वाधीनपतिका एक नहीं मानी जा सकती (स्वाधीनपतिकात्व की स्थिति वासकसज्जा में नहीं पाई जा सकती), क्योंकि स्वाधीनपतिका का पति उसके समीपस्थ होता है, जब कि वासकसज्जा का पति (प्रिय) आसन्न या नायिका के समीपस्थ नहीं होता। वासकसज्जा नायिका का वह भेद है, जब कि नायक आने वाला है और उसकी प्रतीक्षा में वह साज-सज्जा से विभूषित हो रही है, इस प्रकार वासकसज्जा एष्यत्प्रिया (जिसका पति आने वाला है) है। अगर इस एष्यत्प्रिया को भी स्वाधीनपतिका मान लिया जायगा, तो फिर प्रोषितप्रिया को भी अलग से मानने की क्या जरूरत है। देखा जाय तो एष्यत्प्रियत्व उसमें भी पाया जाता है। यदि इसका उत्तर यह दिया जाय, कि वासकसज्जा तथा उसके प्रिय के बीच का देशकाल का व्यवधान कम है, तथा प्रोषितप्रिया तथा उसके प्रिय के बीच का देशकाल का व्यवधान लम्बा है, तो हम इस व्यवधान की कोई निश्चित सीमा नहीं बता सके कि यहाँ तक समीपता (आसत्ति) मानी जायगी और इसके बाद दूरी। हमारे पास व्यवधान के कोटिनिर्धारण की कोई तराजू तो नहीं है। साथ ही खण्डिता जैसे भेद को भी अलग मानना ही होगा, क्योंकि खण्डिता वही है जिसे प्रिय के अपराध का पता लग जाता है। जिसे प्रिय के अपराध का पता नहीं चलता (अविदितप्रियव्यलीका), वह खण्डितात्व से युक्त नहीं हो सकती। जो नायिका किसी नायक के साथ रतिक्रीड़ा में प्रवृत्त है या रति की इच्छा से युक्त है, उसे प्रोषितप्रिया नहीं माना जा सकता। साथ ही ऐसी नायिका को अभिसारिका भी नहीं कहा जा सकता, क्योंकि वह खुद नायक के पास नहीं जाती, तथा उसमें नायक के प्रति प्रयोजकत्व नहीं पाया जाता। अभिसारिका में नायक को अपने पास बुलाने का या स्वयं उसके पास जाने का धर्म पाया जाता है। इस तरह उत्कण्ठिता (विरहोत्कण्ठिता) भी उपर्युक्त स्वाधीनपतिका, वासकसज्जा, प्रोषितप्रिया, खण्डिता या अभिसारिका से भिन्न है। जो नायिका नायक के आने के उचित समय के व्यतीत हो जाने पर उसके न आने से व्याकुल रहती है, वह वासकसज्जा नहीं मानी जा सकती, उसे विरहो त्कण्ठिता ही मानना होगा। इसी तरह विप्रलब्धा भी वासकसज्जा की तरह दूसरी अवस्था वाली नायिकाओं से भिन्न ही है। विप्रलब्धा का प्रिय आने का वादा करके भी नहीं आया है इस प्रकार वहाँ प्रतारणा (छल) की अधिकता पाई जाती है, इसलिए विप्रलब्धा वासकसज्जा तथा उत्कण्ठिता दोनों से भिन्न है। खण्डिता नायिका अपने प्रिय के परनारीसम्भोग रूप अपराध को जान जाती है; कलहान्तरिता में भी यह बात तो खण्डिता के समान ही पाई जाती है; किन्तु वह नायक के अनुनय विनय करने पर भी नहीं मानती, तथा प्रसन्न नहीं होती, बाद में जब नायक चला जाता है तो पश्चात्ताप के कारण प्रसन्न हो जाती है। इस
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प्रकार कलहान्तरिता खण्डिता से भिन्न सिद्ध होती है। इस प्रकार यह सिद्ध हो गया, कि नायिकाओं में आठ हो अवस्थाएँ हैं। तत्र- आसन्नायत्तरमणा हष्टा स्वाधीनभर्तृका। यथा- 'मा गवमुद्दह कपोलतले चकास्ति कान्तस्वहस्तलिखिता मम मअ्जरीति। अन्यापि किं न सखि भाजनमीद्शानां वैरी न चेद्भवति वेपथुरन्तरायः ॥' जिस नायिका का प्रिय समीप में रहता है तथा उसके आधीन होता है, तथा जो नायक की समीपता के कारण प्रसन्न रहती है, वह स्वाधीनभर्तृका कहलाती है। जैसे, कोई सखी किसी स्वाधीनभतृका के गर्व को देखकर उससे कह रही है। मेरे कपोलफलक पर प्रिय के स्वयं के हाथों से चित्रित पत्रावली (मजरी) विद्यमान है-यह समझ कर घमण्ड न करो। हे सखि, अगर कान्त के समीपस्थ होने तथा उसके स्पर्श से जनित कम्प शत्रु बन कर विघ्न न करे, तो क्या कोई दूसरी नायिका ऐसी ही पत्रावलियों का पात्र नहीं बन सकती। दूसरी नायिका भी कान्त के अपने हाथ से चित्रित पत्रावली से युक्त हो सकती है, किन्तु कान्त के स्पर्श के कारण उनमें इतना कम्प हो जाता है, कि कान्त पत्रावली नहीं लिख पाता। (व्यंग्य है-क्यों घमण्ड करती हो, पति के समीपस्थ होने पर भी तुम किसी प्रकार के कम्पादि सात्त्विक भाव का अनुभव नहीं करती, तुम्हारी सहृदयत्वशून्यता है। सच्चे राग को तुम क्या जानी।) यथा वासकसजा- मुदा वासकसज्ा स्वं मण्डयत्येष्यति प्रिये॥ २४॥ स्वमात्मानं वेश्म च हर्षेण भूषयत्येष्यति प्रिये वासकसज्जा। यथा- क 'निजपाणिपल्लवतटस्खलनादभिनासिका विवरमुत्पतितैः। THB JE अपरा परीकष्य शनकर्मुमुदे मुखवासमास्यकमलश्वसनैः ॥।' वासकसज्जा वह नायिका है, जो प्रिय के आने के समय हर्ष से अपने आपको सजाती है। वासकसज्जा प्रिय के आने के समय के समीप होने पर अपने आपको व अपने घर को खुशी से सजाती है। इसका उदाहरण शिशुपालवध के नवम सर्ग का यह पद् दिया जा सकता है :- कोई नायिका अपने हाथ रूपी पल्लव के किनारे से स्खलित होने के कारण नासिका के छिद्रों की और उड़े हुए मुख-कमल के वायु (मुखश्वास) के द्वारा धीरे से अपने मुंह की सुगन्धि की परीक्षा करके प्रसन्न हो रही थी। अथ चिरहोत्कण्ठिता- चिरयत्यव्यलीके तु विर(१)होत्कण्टितोन्मनाः।
(१) 'विरहोत्कण्ठिता मता' इति पाठान्तरम्।
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यथा- 'सखि स विजितो वीणावादैः कयाप्यपरस्त्रिया पणितमभवत्ताभ्यां तत्र क्षपाललितं ध्रुवम्। कथमितरथा शेफालीषु स्खलत्कुसुमास्वपि प्रसरति नभोमध्येऽपीन्दौ प्रियेण चिलम्ब्यते ॥।' प्रिय (पति) के अपराधी न होने पर भी देर करने पर जो नायिका उत्कण्ठित मन से उसकी प्रतीक्षा करती है, वह विरहोत्कण्ठिता है। किसी नायिका के प्रिय के आने का समय व्यतीत हो चुका है। आधी रात होने को आई, पर वह अभी तक नहीं आया है। इससे नायिका बड़ी उत्कण्ठित होकर अपनी सखी से कह रही है। हे सखि, ऐसा जान पड़ता है किसी दूसरी स्त्री ने वीणा आदि वाद्यों के द्वारा उसे जीत लिया है। सचमुच ही उन दोनों में रात भर क्रीड़ा करने की शर्त हो चुकी है। अगर ऐसा नहीं होता, तो हरसिद्गार के फूल के झर जाने पर भी और चन्द्रमा के आकाश के बीच में आ जाने पर भी, मेरा प्रिय क्यों देर कर रहा है। अथ खण्डिता- ज्ञाते न्यासङ्गविकृते खण्डितेर्ष्याकषायिता॥ २५॥ यथा- 'नवनखपदमन्नं गोपयस्यंशुकेन स्थगयसि पुनरोष्ठं पाणिना दन्तदष्टम्। प्रतिदिशमपरस्त्रीसङ्गशंसी विसर्पन् नवपरिमलगन्धः केन शक्यो वरीतुम् ।।' जब नायिका को किसी दूसरी सत्री से सम्भोग करने का नायक का अपराध पता हो जाय, तथा इस अपराध के कारण वह ईर्ष्या से कलुषित हो उठे, तो वह खण्डिता कहलाती है। जैसे शिशुपाल के ग्यारहवें सर्ग का निम्न पद्य। कोई नायक अपराध करके नायिका के पास लौटा है। वह अन्य नायिकादत्त अपने नखक्षत व दन्तक्षत को उत्तरीय आदि से छिपा रहा है। नायिका यह सब समझती हुई कहती है। तुम अपने उत्तरीय से नवीन नखक्षत के चिह्न से युक्त अङ्ग को छिपा रहे हो। अन्य स्त्री के दाँतों से काटे हुए ओठ (अधरोष्ठ) को हाथ से ढँक रहे हो। लेकिन चारों दिशाओं में फैलता हुआ; अन्य स्त्री के सम्भोग की सूचना देने वाला यह नवीन परिमलगन्ध (सुगन्धि) किसके द्वारा छिपाया जा सकता है। तुम नखक्षत व दन्तक्षत को लाख छिपाओ, तुम्हारी देह से आने वाली यह नई खुशबू ही किसी दूसरी स्त्री के साथ की हुई रतिक्रीड़ा की सूचना दे रही है। अथ कलहान्तरिता- कलहान्तरिताSमर्षाद्विधूते ऽनुशयार्तियुक्। यथा निःश्वासा वदनं दहन्ति हृदयं निर्मूलमुन्मथ्यते निद्रा नैति न दृश्यते प्रियमुखं नक्तंदिवं रुद्ते। अङ्ं शोषमुपैति पादपतितः प्रेयांस्तथोपेक्षितः सख्यः कं गुणमाकलय्य दयिते मानं चयं कारिताः ॥' १५ द०
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कलहान्तरिता नायिका वह है, जो नायक के अपराध करने पर क्रोध से उसका तिरस्कार करती है, बाद में अपने व्यवहार के विषय में पश्चात्ताप करती है। किसी नायिका ने अपराधी नायक के प्रति मान किया है। बाद में अपने व्यवहार पर पश्चाप्ताप करती हुई नायिका अपनी सखियों से कह रही है। प्रियतम के अपमान के पश्चात्ताप के कारण जनित निःश्वास जैसे सारे मुख को जला रहे हैं; हृदय जैसे जड़ से हिल रहा है- उन्मथित हो रहा है; रात में नींद भी नहीं आती; प्रियतम का मुँह भी दिखाई नहीं देता; (क्योंकि वह रुष्ट होकर लौट गया है); रात दिन रोने के सिवा कुछ नहीं सूझता। हमारा शरीर सूख गया है, इधर हमने पैरों पर गिर कर अपराध की क्षमा माँगते हुए प्रिय का भी तिरस्कार कर दिया। हे सखियों, बताओं तो सही, तुमने किस गुण को सोच कर हमसे प्रिय के प्रति मान करवाया था। अ्रथ विप्रलब्धा- विप्रलब्धोक्तसमयम प्राप्ते Sतिविमानिता॥ २६॥ यथा- 'उत्तिष्ठ दूति यामो यामो यातस्तथापि नायातः । याऽतः परमपि जीवेज्जीचितनाथो भवेत्तस्याः ॥' प्रिय के दत्तसंकेत समय पर उपस्थित न होने पर जो नायिका अपने आपको अत्यधिक अपमानित समझती है, वह विप्रलब्धा कहलाती है। नायिका सक्केनस्थल (सहेट) पर बड़ी देर से दत्तसङ्कत नायक की प्रतीक्षा कर रही है। उसके न आने पर झुँझला कर वह अपनी सखी (दूती) से कह रही है। हे दूति, अब उठी अधिक देर तक इन्तजार करना व्यर्थ है। चलो चलें। एक पहर इन्तजार में बीत गया पर फिर भी वह नहीं आया। जो नायिका इसके बाद भी जिन्दी रह सके, उसी का वह प्रिय (जीवितनाथ) हो सकता है। अथ प्रोषितप्रिया- दूरदेशान्तरस्थे तु कार्यतः प्रोषितप्रिया। यथाSमरुशतके- 'आदृष्टिप्रसरात्प्रियस्य पदवीमुद्दीक््य निर्विण्णया विश्रान्तेषु पथिष्वहःपरिणतौ ध्वान्ते समुत्सपति। दत्त्वैकं सशुचा गृहं प्रति पदं पान्थस्त्रियास्मिन्क्षरो माभूदागत इत्यमन्दवलितग्रीवं पुनर्वीक्षितम् ।।' जिस नायिका का प्रिय किसी कार्य से दूर देश में स्थित होता है, वह प्रोषित प्रिया (प्रोषितभर्तृका) कहलाती है। जैसे अमरुकशतक में- किसी नायिका का प्रिय विदेश में है। वह कई दिनों से उसकी प्रतीक्षा कर रही है। उसकी उत्सुकता इतनी बढ़ गई है कि वह प्रिय के आने के रास्तों की और खड़ी होकर नजर डाला करती है। जहाँ तक उसकी नजर जाती है, वहाँ तक वह प्रियतम के मार्ग (पदवी) का दुखी होकर अवलोकन किया करती है। जब शाम पड़ जाती है, चारों ओर अँधेरा फैलने लगता है, सारे रास्ते बन्द हो जाते हैं (राहगीरों का चलना बन्द हो जाता है), तो वह शोक से अपने एक पैर को घर की ओर बढ़ाती है, लेकिन इसी क्षण वह प्रोषितपतिका पान्थवधू यह
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सोचकर कि कहीं वह आ न गया हो, अपनी गरदन को जरा टेढ़ी करके फिर पीछे (रास्ते) की ओर देख लेती है। अथाभिसारिका- कामार्ता ऽभिसरेत्कान्तं सारयेद्रा Sभिसारिका॥२७॥ नाक यथाSमरुशतके- 'उरसि निहितस्तारो हारः कृता जघने घने कलकलवती काश्ची पादौ रणन्मणिनू पुरौ प्रियमभिसरस्येवं मुग्धे त्वमाहतडिण्डिमा यदि किमधिकत्रासोत्कम्पं दिशः समुदीक्षसे ॥।' यथा च- 'न च मेऽवगच्छति यथा लघुतां करुणां यथा च कुरुते स मयि। निपुणं तथनमुपगम्य वदेरभिदूति सं काचिदिति संदिदिशे ॥' जो नायिका कामपीड़ित होकर या तो स्वयं नायक के पास अभिसरण करे, या नायक को अपने पास बुलावे, वह अभिसारिका कहलाती है। जैसे अमरुकशतक में- अपनी सम्पूर्ण साज-सज्जा से विभूषित होकर कोई नायिका प्रिय के पास अभिसरणार्थ जा रही है। डर के मारे वह इधर-उधर काँपती नजर से देख लेती है कि कहीं कोई देख तो नहीं रहा है। नायिका की इसी दशा को देख कर कवि उससे कह रहा है। हे भोली रमणी, तुम बड़े ठाट बाट से प्रिय से मिलने जा रही है। तुमने उरःस्थल पर सुन्दर हार पहन रक्खा है, घने जघनस्थल पर सशब्द करधनी पहन रक्खी है और तुम्हारे पैरों में मणिनूपुर झणझणायमान हो रहे हैं। इस प्रकार तुम्हारे हार, करधनी व नूपुरों का कलरव तुम्हार जाने की सूचना लोगों को दे रहा है। हे भोली, जन तुम इस तरह ढिढोंरा पीटती हुई (खुले आम) प्रिय के पास अभिसरणार्थजा रही हो, तो फिर डर के मारे काँपती हुई चारों और क्यों देख रही हो। (यहाँ प्रथम उदाहरण में नायिका का वह रूप बताया गया जब वह स्वयं अभिसरण कर रही है। अब दूसरा उदाहरण शिशुपाल वध के नवम सर्ग से दिया जा रहा है, जहाँ नायिका नायक को अपने पास बुलाने के लिए दूती भेज रही है।) और जैसे- 'हे सखी, तुम उसके समीप जाकर इस ढङ्ग से इस कुशलता से बातचीत करना कि वह अपने आपकी लघुता का अनुभव न करे तथा मेरे प्रति दया का भाव बरते।" कोई नायिका अपनी दूती को इस तरह संदेश दे रही थी।१ तत्र-
युक्ताः षडन्त्या द्े चाद्ये क्रोडौज्ज्वल्यप्रहर्षितैः ॥ २८॥ परस्त्रियौ तु कन्यकोढे संकेतात्पूर्चं चिरहोत्कण्ठिते पश्चाद्विदूषकादिना सहाभिसर-
१. अवलोककार धनिक इस पद्य की नाथिका को अभिसारिका मानते हैं, यह स्पष्ट ही है। माघ के टीकाकार मल्लिनाथ इसी पद्य की टीका में नाथिका को कलहान्तरिता स्वीकार करते हैं :- 'नायिका तु कलहान्तरिता। 'कोपात्कान्तं पराणुद पश्चात्तापसमन्विता' इति लक्षणात्।' (९।५६) हमारे मतानुसार इसे अभिसारिका ही मानना ठीक होगा।
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न्त्यावभिसारिके कुतोऽपि संकेतस्थानमप्राप्ते नायके विप्रलब्धे इति व्यवस्था व्यवस्थितै- वाऽनयोरिति-अस्वाधीनप्रिययोरवस्थान्तरायोगात्। यत्तु मालविकाभिमित्रादौ 'योऽप्येवं धीरः सोऽपि दृष्टो देव्याः पुरतः' इति मालवि- कावचनानन्तरम् 'राजा- दाक्षिण्यं नाम बिम्बोष्ठि नायकानां कुलव्रतम्। तन्मे दीर्घाक्षि ये प्राणास्ते त्वदाशानिबन्धनाः ॥' इत्यादि, तत्र खण्डितानुनयाभिप्रायेण, अपितु सर्वथा मम देव्यधीनत्वमाशङ्कय निराशा मा भूदिति कन्याविश्रम्भणायेति। तथाऽनुपसज्ञातनायकसमागमाया देशान्तरव्यवधानेऽप्युत्कण्ठितात्व मेवेति न प्रोषि- तप्रियात्वम्-अ्रपरनायत्तप्रियत्वादेवेति। इस सम्बन्ध में इन आठों नायिकाओं के सामान्य भूषणों का उल्लेख करना आवश्यक है। इनमें अन्तिम छः (विरहो कण्ठिता, खण्डिता,कलहान्तरिता, विप्रलब्धा, प्रोषितप्रिया तथा अभिसारिका) नायिकाओं में चिन्ता, निःश्वास, खेद, अश्र, वैवर्ण्यं तथा ग्लानि ये अभूषण (दीनताजनक चिह्न) पाये जाते हैं। आरम्भिक दो नायिकाओं स्वाधीनपतिका तथा वासकसज्जा में क्रीड़ा, उज्जवलता तथा हर्ष विद्यमान रहते हैं। स्वकीया नायिका के आठ प्रकार बताने के बाद यहाँ परकीया का इस प्रकार रूप बताना जरूरी है। कन्या तथा परोढारूप परकीया नायिका संकेतस्थल पर प्रिय से मिलने के पूर्व विरहोत्कण्ठिता की तथा बाद में विदूषक, दूती, सखो आदि के साथ प्रिय के पास छिपकर जाने के कारण अभिसारिका की कोटि में आती है। कभी नायक सक्केतस्थल पर नहीं आ पाता, तो वह विप्रलब्धा हो जाती है। इस तरह परकीया नायिका की तीन ही अवस्थाएँ होती हैं (आठ अवस्थाएँ नहीं), क्योंकि इनका प्रिय स्वाधीन न होने के कारण दूसरी अवस्याएँ इनमें नहीं पाई जा सकतीं। मालविकाननिमित्र नाटक में एक स्थान पर मालविका के यह कहने पर कि 'तुम इतने धीर हो, पर देवी ( महारानी) के आगे तुम्हारी हालत क्या थी, यह हम देख चुके हैं;' राजा अभनिमित्र मालविका को मनाते तथा विश्वास दिलाते हुए कहता है :- 'हे बिम्ब के समान ओठ वाली मालविके, उच्चकोटि के नायकों का कुलव्रत दक्षिणर हना (सब नायिकाओं के साथसहृद- यतापूर्ण बर्ताव करना) है। हे बड़ी आँखों वाली, मेरे प्राण तो तुम्हारी ही आशा से निबद्ध हैं।' इस स्थल पर मालविका में खण्डितात्व की भ्रान्ति करना अनुचित होगा। यह कभी नहीं सोचना चाहिए कि यहाँ मालविका राजा के देवी के प्रति प्रेम के कारण ईर्ष्यालु होकर खण्डिता हो गई है। यह स्थल तो कवि ने इसलिए सन्निविष्ट किया है, कि राजा मालविका को यह विश्वास दिला देना चाहता है, कि मैं देवी के बिलकुल अधीन हूँ, ऐसी आशक्का करके निराश मत होना। परकीया नायिका के प्रिय के समागम न होने के पूर्व हो प्रिय के दूर देशस्थ होने पर उसे प्रोषितप्रिया नहीं माना जायगा, क्योंकि वहाँ उसका उत्कण्ठित रूप ही है, अतः वह उत्कण्ठिता ही मानी जायगी, क्योंकि अभी तक प्रिय उसे प्राप्त नहीं हो सका है, तथा उसके अधीन नहीं है। अथासां सहायिन्य :-
की: दूत्यो दासी सखी कारूर्धत्रियी प्रतिवेशिका। लिङ्गिनी शिल्पिनो स्वंच नेतृमित्रगुणान्विताः॥२६॥
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दासी= परिचारिका। सखी=स्नेहनिबद्धा। कारू := रजकीप्रभृतिः। धात्रेयी= उपमातृसुता। प्रतिवेशिका=प्रतिगृहिणी। लिङ्गिनी = भिक्षुक्यादिका। शिल्पिनी = चित्र- कारादिस्त्री। स्वयं चेति दूतीविशेषा: नायकमित्राणां पीठमर्दादीनां निसृष्टार्थत्वादिना गुरोन युक्ताः । तथा च मालतीमाधवे कामन्दकीं प्रति- 'शास्त्रेषु निष्ठा सहजश्व बोधः प्रागल्म्यमभ्यस्तगुणा च चाणी। कालानुरोधः प्रतिभानवत्त्वमेते गुण।: कामदुघाः क्रियासु ॥' इन नायिकाओं का नायक के साथ समागम कराने वाले सहायक ये लोग हैं :- दूतियाँ, दासी, सखी, नीच जाति की औरतें, धाय की बेटी, पड़ोसिन, सन्यासिनी, शिल्पिनी, स्वयं नायिका ही (स्वयं दूती के रूप में), ये सभी दूतियाँ आदि नायक के मित्र-पीठमर्द, विट, विदूषकादि के गुणों से युक्त होती हैं। इसी के उदाहरण रूप में प्रथम उदाहरण मालतीमाधव से कामन्दकी (लिङ्गिनी-तपस्विनी) का दिया गया है जो माधव के प्रति मालती को आकृष्ट करने का प्रयत्न करती है :- । शास्त्रों में निष्ठा होना, सहज ज्ञान, प्रगल्मता, गुणवती वाणी, समय के अनुरूप प्रतिभा का होना, ये गुण सभी क्रियाओं में इच्छानुसार सफलता दिलाने वाले होते हैं। (यहाँ भगवती कामन्दकी माधव के गुणों का वर्णन सामान्य उक्ति के द्वारा कर रही है।) तत्र सखी यथा- 'मृगशिशुदृशस्तस्यास्तापं कथं कथयामि ते दहनपतिता दृष्ठा मूर्तिर्मया नहि वैधवी इति तु विदितं नारीरूप: स लोकदशां सुधा तव शठतया शिल्पोत्कर्षो विधेविंघटिष्यते॥' वहीं मालतीमाधव में सखी दूती रूप में माधव के पास जाकर मालती की विरहजनित अवस्था का वर्णन कर रही है। हे माधव, उस हिरन के शावक के समान आँखों वाली मालती के विरहताप को कैसे कहूँ, उसका वर्णन करने के लिए मेरे पास कोई शब्द ही नहीं। अगर कहीं मैंने चन्द्रमा की मूर्ति को आग में पड़ी देखा होता, तो मैं बता पाती; पर मैंने वैधवी मूर्ति (चन्द्रकला) को कभी अभनि में पड़ी देखा नहीं। हाँ मैं इतना भर जानती हूँ, कि मालती बड़ी सुन्दर है, मालती का वह रमणीरूप सारे संसार की दृष्टि के लिए अमृत के समान है, पर ऐसा मालूम पड़ता है, कि तेरी दुष्टता के कारण ब्रह्मा की वह सबसे सुन्दर कलाकृति योही बरबाद हो जायगी। यथा च- 'सच्च जाणइ दट्ठुं सरिसम्मि जणम्मि जुज्जए राओ। मरउ ण तुमं भणिस्सं मरणं पि सलाहणिजजं से॥' ('सत्यं जानाति द्रष्टं सदृशे जने युज्यते रागः । म्रियतां न त्वां भणिष्यामि मरणमपि श्ाघनीयमस्याः ॥') और जैसे-कोई दूती (सख्यादि) नायक के पास आकर नायिका विरहजनित दशा का वर्णन करती है-यह बात देखने में ठीक है, कि योग्य व्यक्ति के प्रति प्रेम करना उचित है (उसने योग्य व्यक्ति के प्रति प्रेम किया, यह अच्छा है)। अगर वह मर जाय, तो मर जाय, मैं तुम्हें कुछ न कहूँगी। क्योंकि योग्य व्यक्ति से प्रेम करके उसके विरह में उसका मर जाना भी प्रशंसाई ही होगा।
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स्वयं दूती यथा- 'महु एहि किं णिवालत हरसि णिअं वाउ जइ वि मे सिचअम्। साहेमि कस्स सुन्दर दूरे गामो अहं एका' ('मुहुरेहि किं निवारक हरसि निजं वायो यद्यपि मे सिचयम्। साधयामि कस्य सुन्दर दूरे ग्रामोऽहमेका ॥।') इत्याद्यूह्यम्। स्वयं दूती जैसे-कोई नायिका किसी पान्थादि के साथ उपभोग की इच्छा से उसे सुनाकर कह रही है। हे निगोड़े वायु, तुम बार बार आते हो, मेरे वस्त्र को (आंचल को) क्यों हर रहे हो। यद्यपि तुम मैरे आँचल को हर रहे हो, फिर भी हे सुन्दर मैं किसे प्रसन्न करूँ, गाँव तो दूर है, और यहाँ मैं बिलकुल अकेली हूँ। (इस शून्य स्थल में पान्थ के साथ की गई रतिक्रीडा को कोई न देख पायगा, इस बात की व्यअना स्वयं दूती की उक्ति कर रही है। आँचल को हिलाकर वह चेष्टा से भी पान्थ को आमन्त्रित कर रही है-यह सहृदयहृदयसंवेद्य तत्त्व है।) अथ योषिदलङ्कारा :- यौवने सत्वजा: स्त्रीणामलङ्कारास्तु विंशतिः। यौवने सत्त्वोद्भूता विंशतिरलङ्काराः स्त्रीणां भवन्ति। तत्र- भावो हावश्च हेला च त्रयस्तत्र शरीरजाः॥ ३० ॥ शोभा कान्तिश्च दीप्षिश्च माघुर्य च प्रगल्भता।को औदार्य धैर्यमित्येते सप्त भावा अयतजाः॥३१॥ तत्र भावहावहेलास्त्रयोऽप्नजाः, शोभा कान्तिर्दीप्तिर्माधुर्यं प्रागल्भ्यमौदार्यं धैर्यमित्य- यत्नजाः सप्त। लीला िलासो विच्छित्तिर्विभ्रम: किलकिश्चितम्। मोट्टायितं कुट्टमितं विव्वोको ललितं तथा॥३२।। विहतं चेति विज्ञेया दश भावा: स्वभावजाः। तानेव निर्दिशति-
तत्र विकारहेतौ सत्यप्यविकारं सत्वं यथा कुमारसम्भवे 'श्रुताप्सरोगीतिरपि क्षणेऽस्मिन्हरः प्रसंख्यानपरो बभूव। आत्मेश्वराणां नहि जातु विघ्नाः समाधिभेदप्रभवो भवन्ति ।।' स्त्रियों में यौवनावस्था में सत्वज (स्वाभाविक) बीस अलक्कार माने जाते हैं :- भाव, हाव, हेला ये तीन शरीरज (शारीरिक) अलङ्कार हैं। शोभा, कान्ति, दीक्षि, माधुर्य, प्रगतभता, औदार्य, धैर्य ये सात सर्वज भाव वे अलङ्कार है, जो स्ति्रियों में अयरन रूप से पाये जाते हैं, अर्थात् इन्हें प्रकटित करने में नायिकाओं को कोई यत्न नहीं करना पड़ता। लीला, विलास, विच्छित्ति, विभ्रम, किलकिञ्चित, मोहायित, कुट्ट- मित, विव्वोक, ललित, विहृत ये दस भाव स्वभावज भाव हैं, अर्थात् स्वभाव से ही
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स्तियों में स्थित रहते हैं। इन्हीं का आगे एक एक को .लेकर लक्षण व उदाहरण दिया जाता है। निर्विकारात्मक सत्व से जब विकार का सर्व प्रथम विस्फुरण पाया जाता है, तो इसी प्रकार के प्रथम स्फुरण को 'भाव' कहते हैं। मानवप्रकृति में सत्त्व, रजस् तथा तमस् ये तीन गुण माने जाते हैं। इन गुणों में से सत्व की यह विशेषता है, कि विकार को उत्पन्न करने वाले कारण के विद्यमान होने पर भी विकार नहीं हो पाता (विकार हेतौ सति विक्रियन्ते येषां न चेतांसि त एव धीरा:)। इसी को पहले नायक के गुणों में 'गाम्भीर्य' कहा गया है। इस सत्त्व का उदाहरण कुमारसम्भव का यह पद्य दिया जा सकता है- अप्सराओं के सङ्गीत को सुनकर भी महादेव उसी क्षण समाधि में स्थित हो गये। जितेन्द्रिय तथा जितात्मा व्यक्तियों की समाधि को कोई भी विघ्न भङ्ग नहीं कर सकते। तस्मादविकाररूपात्सत्वात् यः प्रथमो विकारोऽन्तर्विपरिवर्ती बीजस्योच्छूनतेव स
भाव:। यथा- 'दृष्टिः सालसतां बिभर्ति न शिशुक्रीडासु बद्धादरा श्रोत्रे प्रेषयति प्रवर्तितसखीसम्भोगवार्तास्वपि। पुंसामङ्कमपेतशङ्कमधुना नारोहति प्राग्यथा बाला नूतनयौवनव्यतिकरावष्टभ्यमाना शनैः ॥' इस प्रकार सत्त्व वह अवस्था है, जब कि व्यक्ति सर्वथा निर्विकार रहता है। इस अवस्था के बाद विकार की जो सर्वप्रथम अवस्था पाई जाती है, जिसमें विकार बड़ा अस्फुट रूप से रहता है 'भाव' कहलाती है। यह विकार शरीर के अन्तस् में ही छिपा रहता है, और इसकी तुलना बीज की उच्छूनता से की जा सकती है। जिस तरह पानी, मिट्टी आदि संयोग से अङ्कुरित होने के पहले बीज कुछ उच्छून हो जाता है। इस समय बीज में विकार तो होता है, पर वह् विकार बीज के अन्तस् में ही होता है, इसी प्रकार नायिका के अन्तस् में पाया जाने बाला (श्रृङ्गार ) विकार 'भाव' नाम से अभिहित होता है। इस 'भाव' नामक शारीरिक अलद्कार का उदाहरण यों दिया जा सकता है। मुग्धा नायिका में सर्वप्रथम विकार का स्फुरण हो रहा है। कवि उसी का वर्णन कर रहा है। इसकी नजर पहले बड़ी चज्जल थी, लेकिन अब वह अलसाई-सी नजर आती है ( उसकी दृष्टि ने अलसता धारण कर ली है)। पहले बचपन में, वह छोटे बच्चों के खेलों से आनन्द प्राप्त करती थी, लेकिन अब छोटे बच्चों के खेलों में वह कोई दिलचस्पी नहीं लेती। वयस्क स्त्रियों की बात सुनने में, पहले उसे कोई मजा नहीं आता था, लेकिन अब अपनी सखियों को सम्भोग की बात करते सुन कर वह अपने कान उन बातों की ओर लगाती है। सम्भोग की बातों को सुनने में अब उसको कुछ कुछ दिलचस्पी होने लग गई है। बच्ची होने पर वह बिना किसी हिचक के पुरुषों की गोद में बैठ जाया करती थी, लेकिन अब पहले की तरह पुरुषों की गोद में नहीं बैठती। निःसन्देह यह बाला धीरे धीरे नवीन यौवन के आविर्भाव से युक्त हो रही है। अथवा यह नायिका नवीन यौवन के द्वारा अवलम्बित या अवरुद्ध (अवष्टम्यमान) हो रही है। यथा वा कुमारसम्भवे- 'हरस्तु किश्चित्परिलुप्तधैर्यश्रन्द्रोदयारम्भ इवाम्बुराशिः। उमामुखे बिम्बफलाघरोष्टे व्यापारयामास विलोचनानि॥'
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१२० दशरूपकम् ग अथवा जैसे कुमारसम्भव में महादेव में विकार का प्रथम स्फुरण पाया जाता है। इसी का वर्णन कालिदास ने यों किया है :- कामदेव के बाण मारने पर महादेव का धैर्य कुछ कुछ उसी तरह लुप्त हो गया, जैसे चन्द्रोदय की आरम्भिक दशा में समुद्र की तरह महादेव का मन चज्जल हो उठा। उन्होंने बिम्बाफल के समान अधरोष्ठ वाले सुन्दर पार्वती के मुख की और अपने नेत्रों को डाला। यथा वा ममच- 'तं चित्र वत्रणं ते च्चेतर्प्र लोअरो जोव्वणं पि तं च्चेअ। अण्णा अणङ्गलच्छी अण्णं चित्र किं पि साहेइ॥।' ('तदेव वचनं ते चैव लोचने यौवनमपि तदेव। अन्यानङ्गलक््मीरन्यदेव किमपि साधयति॥') अथवा जैसे धनिक की बनाई हुई निम्न प्राकृत गाथा में भी नायिका के 'भाव' नामक शरीरज अलक्कार का वर्णन है :- उस नायिका की बातचीत (वचन) भी वही है, नेत्र भी वही है, यौवन भी वहो है; इनमें कोई भी परिवर्तन दिखाई नहीं देता। लेकिन उसके शरीर में भिन्न प्रकार की काम- शोभा दिखाई पड़ती है, जो दूसरे ही ढङ्ग का प्रभाव (लोगों पर) डालती है। अथ हाव :- अल्पालापः सशङ्गारो हावोऽक्षिम्रुविकारकृत्। प्रतिनियताङ्गविकारकारी शज्गारः स्वभावविशेषो हावः यथा ममैव- 'जं किं पि पेच्छमाणं भणमाणं रे जहातहच्चेत्र्। णिज्फाअ रोहमुद्धं वश्र्स्स मुद्धं णिअच्छेह॥I' ('यत्किमपि प्रेक्षमाणां भणमानां रे यथातथैव। निर्ध्याय स्नेहमुग्धां वयस्य मुग्धां पश्य॥।') नायिका में बातचीत कम करने की अवस्था का होना तथा शक्गार का होना 'हाव' कहलाता है। यह 'हाव' आँख, भौंहे आदि में विकार उत्पन्न करता है। निश्चित अङ्गों में विकार करने वाला शरृङ्गार 'हाव' कहलाता है, यह 'हाव' स्वाभाविक तथा शरीरज अलक्कार है। जैसे धनिक की ही यह गाथा नायिका के 'हाव' की व्यजना करती है :- हे मित्र, उस नायिका के देखते हुए या बोलते हुए, दोनों का जो कुछ असर होता है, वह एक-सा ही होता है। या तो तुम स्नेहमुग्धा भोली नायिका को दृष्टिपात करती देखो, या बोलती देखो, एक-सा अनुभव होगा। यहाँ नायिका का दृष्टिपात भी आह्लददायक है इस प्रकार उसमें 'हाव' की स्थिति सूचित की गई है। अथ हेला- स एव हेला सुव्यक्तशङ्गाररससूचिका॥ ३४॥ हाव एच स्पष्टभूयोविकारत्वात्सुव्यक्तश्ज्गाररससूचको हेला। यथा ममैव- 'तह मत्ति से पश्चत्ता सव्वज्गं विन्मा थणुब्मेए। संसइत्ररबालभावा होइ चिरं जह सहीणं पि ।।' ( 'तथा फटित्यस्याः प्रवृत्ताः सर्वाज्ञं चिभ्रमाः र्तनोद्ेदे। संशयितबालभावा भवति चिरं यथा सखीनामपि ॥')
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यही 'हाव' जब शुङ्गार रस को प्रकट रूप में अच्छ्री तरह अभिव्यक्त करने लगे, तो 'हेला' नामक शरीरज अलङ्कार बन जायगा। 'हेला' में नायिका के विकार स्पष्ट रूप में परिलत्तित होते हैं, तथा प्रकट रूप में शद्गार चेष्टा के द्ोतक होते हैं। जैसे धनिक की स्वयं की इस गाथा में- ज्योंही इसके स्तन उद्धिन्न होने लगे, त्योंही इस नायिका के सारे अङ्गों में इस ढङ्ग से विलास व विभ्रम प्रवृत्त होने लगा, कि इसकी सखियाँ भी एक बारगी इसके बालभाव के बारे में संशय करने लग गई। अथायत्नजाः सप्त। तत्र शोभा- रूपोपभोगतारुण्यैः शोभाङ्गानां विभूषणम्। यथा कुमारसम्भवे- अलमाउ तां प्राक्मुखीं तत्र निवेश्य बालां क्षणं व्यलम्बन्त पुरो निषण्णाः। भूतार्थशोभाहियमाणनेत्राः प्रसाधने सन्निहितेऽपि नार्यः ॥' इत्यादि। यथा च शाकुन्तले- 'अनाघातं पुष्पं किसलयमलूनं कररुहै- रनाविद्धं रत्नं मधु नवमनास्वादितरसम्। ममा ि अखण्डं पुण्यानां फलमिव च तद्रूपमनघं न जाने भोक्तारं कमिह समुपस्थास्यति विधिः ॥ म म ज अयलज अलक्कार सात माने गये हैं। इनमें प्रसङ्गप्राप्त शोभा अलक्कार का वर्णन पहले किया जा रहा है। रूप, विलास तथा यौवन के कारण जब नायिका के अङ्ग विभूषित हो उठते हैं, तो उस अलङ्कार को 'शोभा' नामक अयतज अलङ्कार कहते हैं। कुमारसम्भव के सप्तम सर्ग में पार्वती को विवाह के लिए सजाया जा रहा है। उसी का वर्णन करते समय कवि कुलगुरु कालिदास कहते हैं :- उस बाला पार्वती को पूर्व दिशा की ओर मंह करके बिठा कर अन्य स्त्रियाँ उसके सामने बैठ कर एक क्षण के लिए ठिठक सी गई-पार्वती का प्रसाधन करने से रुक सी गई। पार्वती की नैसर्गिक शोभा को देख कर वे स्तब्ध हो गई, उनके नेत्र लज्जित हो गए कि इस नैसगिंक सौन्दर्य के लिए इन बाह्य प्रसाधनों की क्या जरूरत ? और इस तरह प्रसाधन सामग्री के समीप रहने पर भी वे एक क्षण के लिए पावती का प्रसाधन न कर सकीं। और जैसे शकुन्तला के स्वाभाविक सौन्दर्य रूप शोभा अलक्कार का वर्णन करते हुए :- इस सम्मुख स्थित बाला की शोभा देख कर ऐसा कहा जा सकता है, कि यह वह फूल है, जिसे अब तक किसी ने नहीं सूँधा है, यह वह कोमल किसलय है जिसे किसी के नखों ने नहीं तोड़ा है-नहीं खरोंचा है; यह वह रत्न है जिसको अभी बेधा भी नहीं गया है, तथा यह वह नया शहद है, जिसके रस को किसी ने नहीं चखा है। इसका यह अकलुष रूप- अनिन्ध सौन्दर्य-जैसे पुण्यों का अखण्ड फल है। पता नहीं ब्रझ्मा इस फल का उपभोक्ता किसे बनायेगा ? अरथ कान्ति :- मन्मथावापितच्छाया सैव कान्तिरिति स्मृता॥ ३५ ॥ ची १. 'मन्मथाध्यासित-' इति पाठान्तम्। १६ द०
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शोभैव रागावतारघनीकृता कान्तिः। यथा- कि का अका ह0 Pa SPs प्का उन्मीलद्वदनेन्दुदीप्तिविसरै्दूरे समुत्सारितं 1565 भिन्नं पीनकुचस्थलस्य च रुचा हस्तप्रभाभिहतम्। एतस्या: कलविङ्ककण्ठकदलीकल्पं मिलत्कौतुका- दप्राप्ताङ्गसुखं रुषेच सहसा केशेषु लमं तमः॥' यथा हि महाश्वेतावणनावसरे भट्टबाणस्य। शोभा में नायिका में कामविकार नहीं होता। जब कामाविर्भाव के बाद इसकी कान्ति और अधिक बढ़ जाती है, तो वही शोभा राग (काम) के उत्पन्न होने से सघन होने के कारण कान्ति नामक अलक्कार होती है। जैसे निम्न पद्य में नायिका में मन्मथ का अवतरण होने से उसकी मनोहारिता और सघन हो गई है। उसकी इस कान्ति को देख कर मानव या चेतन प्राणी तो क्या ,अन्धकार भी उसके अङ्गों के स्पर्शसुख को प्राप्त करना चाहता है। लेकिन नायिका उसे अपने पास भी नहीं फटकने देती। वह अपने प्रफुल्लित मुख रूपी चन्द्रमा की प्रकाश-किरणों से उसे (अंधेरे को) दूर भगा देती है; उसे अपने मोटे भारी वक्षोजों की कान्ति से फोड़ देती है, और हाथ की कान्ति से खूब पीटती है। इस तरह वह अपने अङ्गों का सुख प्राप्त करने वाले कामुक अन्धकार को दूर से मार भगाती है। उइण्ड कामी की भाँति चोट खाने पर भी अन्धकार पीछे नहीं हटता, वह एक बार नायिका के अङ्गस्पर्श का सुख पाना ही चाहता है, और इस बार वह क्रोष से नायिका के पीछे पड़ ही तो जाता है। भला एक बार तो उसका अपमान करने वाली नायिका को मजा चखा ही दिया जाय। इसलिए कलविक्क पक्षी के कण्ठ के समान सघन काला अन्धकार: कौतुक के साथ एक दम उस नायिका के बालों में आकर मानों रोष से चिपट गया है। भाव यह है, कि उस नायिका का मुख अपूर्व कान्ति से युक्त है जैसे पूर्ण चन्द्रमा हो, उसके वक्षोज पूर्णतः उन्नत है, उसके हाथ भी सुन्दर हैं, तथा उसके केश अन्धकार के समान घने काले हैं।१ कान्ति का दूसरा उदाहरण हम बाण की कादम्बरी के महाश्वेतावर्णन में देख सकते हैं। अथ माधुयम् मत की प्रा० अनुल्बणत्वं माचुर्यम्- यथा शाकुन्तले- 'सरसिजमनुविद्धं शैवलेनापि रम्यं मलिनमपि हिमांशोरलेद्म लक्ष्मीं तनोति। इयमधिकमनोज्ञा वल्कलेनापि तन्वी किमिव हि मधुराणां मण्डनं नाकृतीनाम् ।।' नायिका में अनुल्वणता या रमणीयता का होना माधुर्य नामक भाव कहलाता है। जैसे शकुन्तला के वर्णन में शाकुन्तल नाटक में- शैवल से युक्त होने पर भी कमल सुन्दर ही लगता है। चन्द्रमा का काला कलङ् भी १. जब कोई व्यक्ति जबर्दस्ती पीछे पड़ता है, तो भगाने की कोशिश को जाती है, मोटी चीज, पत्थर, सोठे आदि से उसे फोड़ा जाता है, और हाथों में मारा-पीटा जाता है; नायिका ठीक यही बर्ताव अन्धकार के साथ करती है, यह रपष्ट है। तागाान .?
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उसकी शोभा ही बढ़ाता है। यह (शकुन्तला) वश्कल पहनने पर भौ बड़ो सुन्दर लग रही है। मधुर आकृतियों के लिए कुछ भी मण्डन बन जाता है।रF अथ दीप्ति :- तिमिज -दीप्षि: कान्तेस्तु विस्तरः। यथा- देआ पसित्र णिअन्तसु मुहससिजोण्हाविलुत्ततमणिवहे। अ्रहिसारिशरगँ विग्घं करोसि अण्णाणँ वि हआसे।।' क म्रीधाल (प्रसीद पश्य निवर्तस्व मुखशशिज्योत्स्नाविलुप्ततमोनिवहे। अभिसारिकाणां विघ्नं करोष्यन्यासामपि हताशै॥') गह कामा
कान्ति नामक भाव का विस्तार-उसका विशेष पाया जाना; दीप्षि नामक भाव कहलाता है। जैसे हे रमणी, खुश हो जाओ, देखो तो तुम्हारे मुख रूपी चन्द्रमा की ज्योत्स्ना से अन्धकार नष्ट हो रहा है। लौट चलो, हे मूर्ख (हताशे); तुम दूसरी अभिसारिकाओं-अन्धकार में प्रिय का अभिसरण करती हुई कृष्णामिसारिकाओं-के भी प्रियाभिसरण में विष्न क्यों कर रही हो? अथ प्रागल्भ्यम्- निस्साध्वसतवं प्रागल्म्यम्- गेना कुरी
मनःक्षोभपूर्वकोऽप्गसाद: साध्वसं तदभाव: प्रागल्भ्यम्, यथा ममैव- 'तथा ब्रीडाविधेयापि तथा मुग्धापि सुन्दरी।डालगह कलाप्रयोगचातुयें सभास्वाचार्यकं गता ।' मन के तोभादि का न पाया जाना प्रागलभ्य नामक भाव कहलाता है। जैसे धनिक का स्वयं का यह पद्य- माल लक 10 यद्यपि वह सुन्दरी उतनी अधिक लज्जापूर्ण तथा भोली है; फिर भी सभा में कलाप्रयोग की चतुरता का प्रदर्शन करते समय आचार्यत्व को प्राप्त हो गई। अथौदार्यम्- -औदार्य प्रश्य: सदा॥३६॥ hF BS
यथा- 'दिश्हं खु दुक्खिआए सशलं काऊण गेहवावारम्। 1 गरुएवि मण्णुदुक्खे भरिमो पाअन्तसुत्तस्स ॥।' ('दिवसं खलु दुःखितायाः सकलं कृत्वा गृहव्यापारम्की शड गुरुण्यपि मन्युदुःखे भरिमा पादान्ते सुप्तस्य ।।' यथा वा-'भ्रूभज्े सहसोदता' इत्यादि। सदा प्रेम से युक्त रहना; नायक के प्रति अनुकूल रहना, औदार्य कहलाता है। जैस दिन भर घर का कामकाज करके थकी हुई, नायिका के भारी क्रोध व दुःख प्रिय के चरणपतित होने पर शान्त हो गये। अथवा जैसे 'भरूमे सहसीद्वता' (मौंहे टेढ़ी होते हुए उठ खड़ी हुई) इत्यादि उदाहरण में।
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अथ घैर्यम्- चापलाSविहृता धैरय चिद्टत्तिरविकत्थना।ीका प्रार। छ्रि चापलानुपहता मनोवृत्तिरात्मगुणानामनाख्यायिका धैर्यमिति यथा मालतीमाधवे- 'ज्वलतु गगने रात्रौ रात्र वखरडकल: शशी दहतु मदन: किंवा मृत्यो: परेण विधास्यति। मम तु दयितः क्लाध्यस्तातो जनन्यमलान्वया IV '। कुलममलिनं न त्वेवायं जनो न च जीचितम् ।।' चज्जलता से रहित, तथा अपने स्वयं के गुणों की प्रशंसा से रहित मनोधृत्ति को धैर्य नामक भाव कहते हैं। जैसे मालतीमाधव की मालती में धैर्य भाव पाया जाता है :- हर रात आकाश में पूर्ण चन्द्रमा प्रकाशित होकर मुझे जलाया करे (जला करे)। कामदेव (मुझे) जलाया करे, वह मृत्यु से बढ़कर अधिक क्या बिगाड़ सकता है ? मुझे तो अपना प्रिय, अपने पिता, पवित्र वंश में उत्पन्न अपनी माता, तथा अपना निर्मल कुल अभीष्ट है, यह जन (अपने आप) तथा यह अपना जीवन प्रिय नहीं है। अथ स्वाभाविका दश, तत्र- प्रियानुकररं लीला मधुराङविचेष्टितैः ॥ ३७॥ प्रियकृतानां वाग्वेषचेष्टानां श्रृङ्गारिणीनामङ्गनाभिरनुकरणं लीला। यथा ममन- 'तह दिट्ठं तह भणिअं ताए णिशदं तहा तहासीणम्। अवलोइं सइण्हं सबिब्भमं जह सवत्तीहिं॥' ('तथा दृष्टं तथा भणितं तया नियतं तथा तथासीनम्। अवलोकितं सतृष्णं सविभ्रमं यथा सपत्नीभिः ॥') काए क अब दस स्वाभाविक भावों का उल्लेख करते हैं। नायिका के मधुर अङ्गों की चेष्टाओं के द्वारा प्रिय (नायक) के वाग्वेषचेष्टादि का शङ्गारिक अनुकरण करना लीला नामक भाव कहलाता है। जैसे धनिक की स्वयं की इस गाथा में- उस नायिका का प्रेक्षण, बोलचाल, नियन्त्रण, तथा बैठना इस ढंग का है, कि उसकी सौतें विलास व तृष्णा के साथ उसे देखती हैं। यथा वा-'तेनदितं वदति याति तथा यथाऽसौ' इत्यादि।' अथवा जैसे, 'जैसे वह बोलता है, वैसे ही यह बोलती है, तथा जैसे वह चलता है, वैसे ही यह चलती है।' आदि। अथ विलास :- तात्कालिको विशेषस्तु विलासो उङ्गक्रियोक्तिषु। दयितावलोकनादिकालेSब् क्रियायां वचने च सातिशयविशेषोत्पत्तिर्विलासः। यथा मालतीमाधवे- अत्रान्तरे किमपि वाविभवातिवृत्त-
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तद्भूरिसात्त्विकविकार विशेषरम्य- 35॥। माचार्यक विजयि मान्मथमाविरासीत ॥'त प्रिय के दर्शनादि के समय नायिका की अङ्गचेष्टाओं तथा बोलचाल में, जो विशेष प्रकार का तात्कालिक विलास पाया जाता है, उसे विलास कहते हैं। जैसे मालतीमाधव में- इसी बीच में, लम्बी आँखों वाली मालती का कामदेव सम्बन्धी विजयी आचार्यत्व प्रकट हुआ, जिसकी विचित्रता वाग्विलास से बढ़ गई थी; जो विलास व विभ्रम से युक्त था; तथा जो अत्यधिक सात्विक भावों के कारण विशेष रमणीय हो गया था। अथ विच्छित्ति :- आकल्परचना उल्पापि विच्छित्ति: कान्तिपोषकृत् ॥। ३८॥ स्तोकोऽपि वेषो बहुतरकमनीयताकारी विच्छित्तिः। यथा कुमारसम्भवे- F का कर्णार्पितो रोध्रकषायरूे गोरोचनाभेदनितान्तगौरे। तस्या: कपोले परभागलाभाद्विबन्ध चततूंषि यवप्ररोहः॥' थोड़ी सी वेषभूषा व साज-सज्जा भी जहाँ कान्ति को अधिक पुष्ट करती है, वहाँ विच्छित्ति नामक भाव होता है। जैसे कुमारसम्मव में पार्वती के वर्णन में- प्रसाधन करते समय पार्वती के कान में लगाया गया यव का प्ररोह; लोध चूर्ण के कारण रूखे तथा गोरोचन की पत्रावली से अत्यधिक गोरे उसके कपोल पर विशेष सुन्दरता प्राप्त कर (लोगों की) दृष्टि को अपनी और आकृष्ट कर रहा था। अथ चिभ्रम :- ीकि
विभ्रमस्त्वरया काले भूषास्थानविपर्ययः। यथा- 'अभ्युदते शशिनि पेशलकान्तदूती- संलापसंवलितलोचनमानसाभि:। ॥ अप्राहि मण्डनविधिर्विपरीतभूषा- विन्यासहासितसखीजनमङ्गनाभिः ॥' यथा वा ममेच- 'श्रुत्वाऽडयातं बहिः कान्तमसमाप्तविभूषया । भालेऽ्जनं दशोर्लाक्षा कपोले तिलकः कृतः ॥। जल्दी के कारण समय पर आभूषणों का उलट-पलट पहन लेना विभ्रम कहलाता है। जैसे -- ि1ार कीडक कि िटी चन्द्रमा के उदय होने पर; प्रिय नायक की दूतियों के सुन्दर वचनों से उल्लसित नेत्र व मन वाली नायिकाओं ने आभूषण-मण्डन इस ढङ् से किया; कि उनके आभूषणों को विपरीत प्रकार से पहना देखकर (उनका विपरीत विलास देखकर) सखियाँ इँस पड़ीं। का कि अथवा जैसे धनिक का स्वयं का यह पद्- प्रिय नायक को बाहर आया जान कर, शृद्गार करती हुई नायिका ने, जिसका शृङ्गारकार्य समाप्त नहीं हुआ था, ललाट में अजन, आँखों में लाक्षारस (अलक्तक ) तथा कपोल पर तिलक लगा लिया।
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अथ किलकिश्चितम्- क्रोधाश्रुहर्षभीत्यादे: सङ्कर: किलकिश्चितम्॥३६॥ यथा ममन- िषरिचार रतिक्रीडाद्यूते कथमपि समासाद्य समयं मया लब्धे तस्या: क्वणितकलकण्ठार्घमधरे। र 1B T कतभ्रूभङ्गासौ प्रकटितविलक्षार्धरुदित- स्मितक्रोधोद्भ्रान्तं पुनरपि विदध्यान्मयि मुखम् ॥' नायिका में एक साथ क्रोध, अश्रु, हर्ष तथा भय का साङ्कर्यं पाया जाना किलकिज्चित कहलाता है। जैसे धनिक के इस पद्य में- रतिक्रीडा के समय जुआँ खेलते समय किसी तरह समय पाकर मेरे द्वारा उसके अधर को जीत लेने पर, टेढ़ी भौंहों वाली उस नायिका ने कलकल कण्ठ से अर्धस्फुट आवाज करते हुए, लज्जा, रुदन, मुसकराहट तथा क्रोध के अस्फुट मिश्रण से उद्भ्रान्त मुखको मेरीऔर कर दिया। अथ मोधयितम्- मोट्टायितं तु तद्भावभावनेष्टकथादिषु। इष्टकथादिषु प्रियतमकथानुकरणादिषु प्रियानुरागेण भावितान्त:करणत्वं मोह्ायितम्। यथा पद्मगुप्तस्य- चित्रवर्तिन्यपि नृपे तत्त्वावेशेन चेतसि। ब्रीडार्घवलितं चक्रे मुखेन्दुमवशैव सा।।' यथा चा- 'मातः कं हृदये निधाय सुचिरं रोमाश्चिताज्गी मुहु र्जृम्भामन्थरकां सुललितापाङ्गां दघाना दशम्। सुप्तेवालिखितेव शून्यहृदया लेखावशेषीभव- स्यात्मद्रोहिणि किं हिया कथय मे गूढो निहन्ति स्मरः ॥' यथा वा मम- 'स्मरदवथुनिमित्तं गूढमुन्नेतु मस्या: सुभग तव कथायां प्रस्तुतायां सखिभि:। भवति विततपृष्ठोदस्तपीनस्तनाग्रा IBाडडक प्ाल ततवलयितबाहुजृम्भितैः साङ्भज्गः ।।' प्रिय की कथादि का श्रवण मननादि करते समय उसके भाव से प्रभावित हो जाना एकतान हो जाना मोह्ठायित कहलाता है। क राजा के चित्रित होने पर भी-उसके चित्र को देखते समय चित्र में राजा के प्रेमावेश से युक्त होकर परवश बनी हुई उस नायिका ने अपने मुख रूपी चन्द्रमा को लज्जा के कारण कुछ टेढ़ा कर लिया। अथवा,किमे 9 हे सखी (माई), तुम किसे हृदय में बैठाकर बड़ी देर से रोमाश्िित होकर अपनी दृष्टि को जिसकी पुतलियाँ जँभाई के कारण निश्चल हो गई हैं, तथा जो सुन्दर अपाङ वाली है-धारण करती
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हुई, सोई-सी, चित्रित-सी, शून्य हृदय होकर केवल मूर्तिमती बन गई हो। हे आत्मद्रोह्दिणि, क्या कामदेव गुप्त रूप से तुम्हें परेशान कर रहा है, लज्जा क्यों करती हो, मुझे बताओ तो सही। अथवा जैसे धनिक के इस पद्य में- कोई दूती या सखी नायक के पास जाकर नायिका की दशा का वर्णन करती हुई कहती है :- हे सुन्दर युवक, जब सखियाँ उस नायिका की कामपीड़ा के गुप्त कारण को जानने के लिए तुम्हारी बातचीत छेड़ती हैं, तो वह अपनी पीठ को मरोड़ कर पीन स्तनों को ऊँचा करती हुई, हाथो को फैलाकर समेटती हुई, अङ्गभङ्ग तथा जँभाई से युक्त हो जाती है। अथ कुद्टमितम्- सानन्दान्त: कुट्टमितं कुष्येत्केशाधरग्रहे॥ ४० ॥ यथा- 'नान्दीपदानि रतिनाटकवित्रमाणा- माज्ञाक्षराणि परमाण्यथवा स्मरस्य। दष्टेडघरे प्रणयिना विधुताग्रपाणी: सीत्कारशुष्करुदितानि जयन्ति नार्याः ॥' रतिक्रीडा में नायक के द्वारा केश तथा अधर को ग्रहण करने पर दिल से प्रसन्न होने पर भी जब नायिका बाहर से क्रोध करे, तो वह कुट्टमित भाव कहलाता है। प्रियतम के द्वारा अधर दंशन करने पर हाथ को फटकारती नायिका का सीत्कार से युक्त वह सूखा रोना विजयी है (सर्वोत्कृष्ट है), जो रतिक्रीडा के नाटकीय विलासों का नान्दीपद (मङ्गलाचरण) है, तथा कामदेव (स्मर) के परम आज्ञाक्षर-आदेश-हैं। अथ विब्बोक :- गर्वाभिमानादिष्टेSपि विब्बोको नादरक्रिया। यथा ममैव- 'सव्याजं तिलकालकान्विरलयंल्लोलाङ्डुलि: संस्पृशन्
यद्भूभङ्गतर्विताश्चितदृशा सावज्ञमालोकितं तदर्वादवधीरितोऽस्मि न पुनः कान्ते कृतार्थीकृतः ॥' जब नायिका गर्व तथा अभिमान के कारण इष्ट वस्तु के प्रति भी अनादर दिखाती है, तो उसे बिब्बोक नामक भाव कहते हैं। जैसे धनिक के स्वरचित निम्न पद्य में नायिका की इस चेष्टा में :- हे प्रिये, तुम्हारे तिलकालकों का कपट से स्पर्श करते हुए, तथा चज्जल अङ्गुलियों से कुचयुगल पर उठे हुए नीले अज्जल को बार-बार छूकर उठाते हुए, मेरी ओर तुमने जो टेढ़ी भौंहों वाली दृष्टि से अवज्ञा के साथ देखा; उस गर्व से तुमने मेरी अवहेलना ही की मुझे सफल न किया। (अथवा, तुमने उस गर्व से मेरी अवहेलना करना चाहा, लेकिन वास्तव में मेरी अवज्ञा न हुई, वरन् तुम्हारे बिब्बोक भाव के कारण उस शोभा को देखकर मैं सफल हो गया।) अथ ललितम्- के कामार
हना।र सुकुमाराङविन्यासो मखृणो ललितं भवेत् ॥ ४१॥द्ा. की।
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यथा ममैव- पप Fe 1ीप क.क 39 कसभ्रभङ्गं करकिसलयावर्तनैरापन्ती सा पश्यन्ती ललितललितं लोचनस्याश्चलेन। क किाविन्यस्यन्ती चरणकमले लीलया रवरयात- रनिस्सङ्गीतं प्रथमवयसा नर्तिता पङ्कजाक्षी।। कोमल तथा स्त्निग्ध प्रकार से अङ्गों का विन्यास ललित नामक भाव कहलाता है। जैसे धनिक के ही निम्न पद्य में- उस कमल-से नेत्रवाली नायिका को जैसे बिना सङ्गीत ही यौवन के प्रथमाविर्भाव ने नचा दिया है। दूसरा आचार्य तो किसी कलाभिनेत्री को सङ्गीत व ताल पर नाचता है, लेकिन यह नायिका यौवन के आविर्भाव होने पर इस तरहका आचरण कर रही है, जैसे बिना ताल के ही नाच रही हो। वह भौंहे टेढ़ी करके, हाथ रूपी किसलयों को फैलाती हुई बात करती है; आँखों के अपाङ्ग से बड़ी मधुर-मधुर ढङ्ग से देखती है, और चलते समय अपने चरणकमलों को बड़ी लीला (भाव) के साथ उठाती है। एक कुशल नतकी जैसे ताल व सङ्गीत के आधार पर अङ्ग, उपाङ्ग तथा अपाङ्ग का विक्षेपादि करती है, वैसे ही यह भी कर रही है। उस पर भी बड़ाई यह कि यह नायिका बिना सङ्गीत व ताल के ही नृत्यकला का प्रदर्शन कर रही है। अथ विहृतम्- प्राप्तकालं न यद्ब्याड्रीडया विहतं हि तत्।ी प्राप्तावसरस्यापि वाक्यस्य लज्जया यदवचनं तद्विहृतम्, यथा- 'पादाङ्ुष्टेन भूमिं किसलयरुचिना सापदेशं लिखन्ती भूयो भूय: क्षिपन्ती मयि सितशबले लोचने लोलतारे। वकं ह्रीनम्रमीषत्स्फुरदधरपुट वाक्यगर्भ दधाना यन्मां नोवाच किश्वित्स्थितमपि हृदये मानसं तहुनोति।' जहां नायिका समय आने पर भी तदनुकूल वाक्य का प्रयोग लज्ा के कारण नहीं कर पाती; वहां विहृत नामक भाव माना जाता है। जैसे, कोंपल के समान कान्ति वाले पैर के अँगूठे से पृथ्वी को किसी बहाने से कुरेदती हुई और मेरी और बार-बार चज्चल कनीनिका वाले सफेद व भूरे नेत्रों को फेंकती हुई, उस नायिका ने, जिसका मुँह अपने आप में किसी वचन को छिपाये था, जिसके ओठ कुछ-कछ फड़क रहे थे, तथा जो लज्जा से नम्र हो रहा था; मुझ से हृदय में स्थित बात को भी न कहा; यह बात मेरे मानस को पीड़ित कर रही है। अथ नेतुः कार्यान्तरसहायानाह- मन्त्री स्वं वोभयं वापि सखा तस्यार्थचिन्तने॥ ४२॥ तस्य नेतुरर्थचिन्तायां तन्त्रावापादिलक्षणायां मन्त्री चाऽडत्मा वोभयं वा सहायः। नायक के शङ्गारी सहायकों का वर्णन किया जा चुका है। अब उसके दूसरों कार्यों के सहायकों का वर्णन करते हैं :- यदि नायक राजा होता है तो उसके अर्थादि-राजनीति आदि की चिन्ता करने में मन्त्री
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या वह स्वयं सहायक होता है। कभी-कभी मन्त्री व नायक स्वयं दोनों ही इन राजनीति सम्बन्धिनी (तन्त्रावाप१ आदि की) चिन्ता में व्यस्त रहते हैं।T9 तत्र विभागमाह- मन्त्रिणा ललितः, शेषा मन्त्रिस्वायत्तसिद्धयः। उक्तलक्षणो ललितो नेता मन्त्र्यायत्तसिद्धिः। शेषा धीरोदात्तादयः अ्रनियमेन मन्त्रिणा स्वेन वोभयेन वाऽङ्रीकृतसिद्धय इति। उपर्युक्त धीरोदात्तादि नायकों में धीरललित के समस्त कार्यों की सिद्धि मन्त्री के ही आधीन होती है; अन्य नायकों की सिद्धि मन्त्री तथा स्वयं दोनों पर निर्भर रहती हैं। (यहाँ यह स्पष्ट है कि धीरप्रशान्त के सम्बन्ध में यह बात लागू नहीं हो सकेगी।) धमसहायास्तु- ऋत्विक्पुरोहितौ धर्मे तपस्विव्रह्मवादिनः ॥४३॥ ब्रह्म = वेदस्तं वदन्ति व्याचक्षते वा तच्छीला ब्रह्मवादिनः, आत्मज्ञानिनो वा। शेषा: प्रतीताः । Fनायक के धर्माचरण में ऋत्विक (यजनकर्ता); पुरोहित, तपस्वी तथा ब्रह्मज्ञानी महाश्मा सहायक बनते हैं। दुष्टदमनं दण्डः । तत्सहायास्तु सुहत्कुमाराटचिका दण्डे सामन्तसैनिका:। स्पष्टम्। नायक के राजा होने पर उसकी दण्डविधान में सहायता करने वाले मित्र (राजा), युवराज, आहविक (वनविभाग के लोग; अथवा अरण्यनिवासी) सामन्त तथा संनिक होते हैं। इस प्रकार नाटक की रचना करने वाले कवि को तत्सम्बन्ध में उन-उन सहायकों का नियोजन करना उचित है। जैसे कहा गया है- एवं तत्तत्कार्यान्तरेषु सहायान्तराणि योज्यानि, यदाह- अन्तःपुरे वर्षवराः किराता मूकवामनाः ।।४४।। म्लेच्छाभीरशकाराद्या: स्वस्वकार्योपयोगिन:। शकारो राज: श्यालो हीनजातिः। ी राजा के रनिवास में वर्षवर (नपुंसक व्यक्ति), किरात, गूँगे तथा बौने व्यक्ति, आदि का सन्निवेश किया जाना चाहिए। ग्लेच्छ, आभीर, शकार (राजा का नीच जाति में उत्पन्न साला) ये सभी अपने-अपने कार्य में राजा के लिए उपयोगी हैं।5 १. अपने राष्ट्र की चिन्ता 'तन्त्र' तथा परराष्ट्र की चिन्ता 'अवाप' कहलाती है। मिलाइ्ये माघ का यह पद्य- तन्त्रावापविदा योगै मण्डलान्यधितिष्ठता। सुनिग्रहा नरेन्द्रेण फणीन्द्रा इव शत्रवः ।। (२. ८८) २. जैसा कि रत्नावली के अन्तर्गत उदयन के अन्तःपुर का वर्णन है :- नष्टं वर्षवरैर्मनुष्यगणनाभावादपास्य त्रपा- मन्तः कख्चुकिकश्जुकस्य विशति त्रासादयं वामनः । पर्यन्ताश्रयिभिनिजस्य सदृशं नाम्न: किरातैः कृतं, कुब्जा नी चतयैव यान्तिशनकै रात्मेक्षणा शक्किनः ॥pp १७ दृ०
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ज्येष्ठमध्याधमत्वेन सर्वेषां च त्रिरूपता॥ ४५।। तारतम्याद्यथोक्तानां गुणानां चोत्तमादिता। एवं प्रागुक्तांनां नायकनायिकादूतदूतीमन्त्रिपुरोहितादीनामुत्तममध्यमाधमभावेन त्रिरूंपता, उत्तमादिभावश् न गुणसंख्योपचयापचयेन किं तर्हि गुणातिशयतारतम्येन ?। इन नायकों के भेद को पुनः बताते कहते हैं :- ये सभी नायकादि ज्येष्ठ, मध्यम तथा अधम के भेद से तीन तरह के होते हैं। इनमें उपर्युक्त्त गुणों के तारतम्य के आधार पर ही इनकी यह उत्तमता, मध्यमता या अधमता निर्धारित की जाती है। इस प्रकार नायक, नायिका, दूत, दूती, मन्त्री पुरोह्दित आदि सारे ही नाटकीय पात्र उत्तम, मध्यम व अधम रूप से तोन प्रकार के माने जाते हैं। यह उत्तमत्वादि कोटिनिर्धारण गुणों की संख्या की कमो या अधिकता के कारण न होकर गुणों की विशेषता के तारतम्य के आधार पर स्थित है। एवं नाट्ये विधातव्यो नायक:सपरिच्छदः ॥४६ ॥ : कीइस प्रकार नायक को उसके परिच्छद (साथियों-नायिकामन्न्निदूतादि) के साथ नाटक में सलिविष्ट करना चाहिए। उक्तो नायक: तद्वथापारस्तूच्यते- तद्वयापारात्मिका वृत्तिश्धतुर्घा, तत्र कैशिकी। गीतनृत्यविलासाद्यैर्मृदु: शङ्गारचेष्टितैः॥४७॥ 190 प्रवृत्तिरूपो नेतृव्यापारस्वभावो वृत्ति:, सा च कैशिकी-सात्त्वती-आरभटी-भारतीभेदा- चतुर्विधा, तासां गीतनृत्यविलासकामोपभोगाद्यपलच््यमाणो मृदु: शङ्गारी कामफला- वच्छिन्नो व्यापार: कैशिकी। सा तु- इस प्रकार नायक का वर्णन करने पर नायक के व्यापार तथा तत्सम्बन्धिनी वृत्ति का उल्लेख करना जरूरी है, अतः उसे ही बताते हैं। नायक के व्यापार की चार तरह की वृत्तियां पाई जाती हैं-(कैशिकी, सार्वती, आरभटी तथा भारती)। इनमें से कैशिकी वृत्ति गीत, नृत्य, विलास आदि भुङ्गारमयी चेष्टाओं के कारण कोमल होती है। की वृत्ति का तातपर्य नायक का वह व्यापार या स्वमाव है, जो नायक को किसी विशेष और प्रवृत्त करता है। ये प्रवृत्तियाँ चार हैं :- कैशिकी, सात्त्वती, आरभटी तथा भारती। इनमें से गीत, नृत्य, विलास, कामक्रीड़ा आदि से युक्त कोमल तथा श्रृङ्गारी व्यापार, जिसका फल काम (पुरुषार्थ) है, कैशिकी वृत्ति कहलाता है। नर्मत तस्फअतत्स्फोटत द्र्भैश्वतुरङगिका। yP IS PIH तदित्यनेन सर्वत्र नर्म परामृश्यते। इस कैशिकी वृत्ति के चार अङ्ग माने जाते हैं :- नर्म, नर्मस्फिअ्ज, नर्मस्फोट तथा नमंगर्भ। की I कारिका के 'तत्' शब्द से सभी जगह नम का अन्वय अभीप्सित है।
१. 'सपरित्रहः' इत्यपि पाठः। os e९
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तत्र-ffh f hhe kr t lsanF वैदग्ध्यक्रीडितं नर्म प्रियोपच्छन्दनात्मकम्॥४८॥ हास्येनैव सभङ्गारभयेन चिहितं त्रिधा। आत्मोपतेपसस्भोगमानै: शङ्गार्यपि त्रिधा॥४६॥ शुद्धमङ्गं भयं द्वेवा घेधा वाग्वेषचेष्टितैः। सर्वे सहास्यमित्येवं नर्माष्टादशघोदितम्॥५० ॥ अग्राम्य इष्टजनावर्जनरूप: परिहासो नर्म, तच् शुद्धहास्येन सश्वङ्गारहास्येन सभयहास्येन च रचितं त्रिविधम्, शग्गारवदपि रवानुरागनिवेदन-सम्भोगेच्छाप्रकाशन- सापराधप्रिय प्रतिभेदनैस्त्रिविधमेव, भयनर्मापि शुद्धरसान्तराङ्गभावाद्द्विविधम्, एवं षड्विधस्य प्रत्येकं वाग्वेषचेष्यव्यतिकरेणाष्टादशविधत्वम्। प्रिया नायिका (या, नायिका पक्ष में प्रिय) के चित्त को प्रसन्न करने वाला विलासपूर्ण व्यापार 'नर्म' कहलाता है। यह तीन प्रकार का होता है-हास्य से युक्त नर्म, श्ुङ्गार से युक्त नर्म, तथा भय से युक्त नर्म। इनमें प्रथम भेद हास्य से युक्त होता है; दूसरा शङ्गारी नर्म तीन प्रकार का होता है, १. आत्मोपन्षेप-परक, जहां नायक या नायिका स्वयं के प्रेम को प्रकट करते हैं; २. सम्भोगपरक, जहां सम्भोग की इच्छा प्रकट की जाय; तथा ३. मानपरक, जहां प्रिय के अनिष्ट करने पर नायिका मान करती है। भययुक्त नर्मं दो तरह का होता है-शुद्ध तथा अङ्ग। ये छुः प्रकार के नर्म वाकू, वेष तथा चेष्टा के त्रिविध प्रकाशन के अनुसार १८ प्रकार के हो जाते हैं। इन सभी नर्म प्रकारों में हास्य का समावेश तो रहता ही है। नमं उस हँसी मजाक (परिहास) को कहते हैं जो प्रियजन को प्रसन्न करने वाला सभ्यतापूर्ण (अग्राम्य) व्यवहार है। इसका प्रमुख तत्त्व हास्य है, अतः यह हास्य कभी तो केवल रूप में, केवल श्रृद्गार से युक्त होकर तथा कभी भय से युक्त होकर पाया जाता है। इस तरह नर्मं के तीन प्रकार होते हैं :- १. शुद्ध हास्य, २. शङ्गारी ह्ार्य, १. भययुक्त हास्य। दूसरे ढङ्ग का श्रृङ्गारी हास्य -१. स्वानुरागनिवेदन, २. सम्भोगेच्छाप्रकाशन, तथा ३. मान इस प्रकार तीन तरह का होता है। भय वाला हास्य भी १. शुद्ध तथा २. रसान्तरांग (किसी दूसरे 'रस का अङ्गभूत होकर) इस तरह दो तरह का होता है। इस तरह शुद्ध हास्य (१) श्रृङ्गारी हास्य के तीन भेद (३) व भययुक्त हास्य के दो भेद (२) कुल ६ भेद नर्म के माने जाते हैं। नर्म का प्रकाशन करने के साधन वाणी, वेषभूषा या चेष्टा ये तीन तरह के हैं-इस तरह इनके आधार पर नर्म के भेद ३X६ =१5 हो जाते हैं। तत्र वचोहास्यनर्म यथा- 'पत्युः शिरश्चन्द्रकलामनेन स्पृशेति सख्या परिहासपूर्वम्। सा रजयित्वा चरणौ कृताशीर्माल्येन तां निर्वचनं जघान ।।' वेषनर्म नागानन्दे विदूषकशेखरकव्यतिकरे। क्रियानर्म यथा मालविकाभिमित्र उत्स्वप्ायमानस्य विदूषकस्योपरि निपुणिका सर्पभ्रमकारणं दण्डकाष पातयति। एवं वक््यमारोष्वपि वाग्वेषचेष्ठापरत्वमुदाहार्यम्। १. इन नर्ममेदों में से वचोहास्य रूप नर्म का उदाहरण (कुमारसम्भव के सप्तम सर्ग से) यों दिया जा सकता है। चरणों में अलक्त लगा देने पर जब सखी ने पारवती से परिहास के साथ यह आशीस
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१३२ दशरूपकम् दी कि 'इस पैर से पति के सिर की चन्द्रकला का स्पर्श करो' तो पार्वती ने कुछ न कहते हुए उसे फूल माला से पीट दिया। वेषनम जैसे नागानन्द नाटक में विदूषक तथा शेखरक के सम्बन्ध में। चेष्टानमं (क्रियानम) जैसे मालविकाझनिमित्र में औंघते हुए विदूषक के ऊपर दण्डकाष्ट डाल कर निपुणिका साँप का भ्रम उत्पन्न कर देती है। इसी तरह दूसरे भेदों में भी वाक, वेष तथा चेष्टा के उदाहरण दिये जाने चाहिए। (यहाँ मोटे तौर पर छः ही प्रकार के नर्म के उदाहरण दिये जाते हैं।) शङ्गारवदात्मोपक्षेपनर्म यथा- 'मध्याहं गमय त्यज श्रमजलं स्थित्वा पयः पीयतां मा शून्येति विमुश् पान्थ विवशः शीतः प्रपामण्डपः। तामेव स्मर घस्मरस्मरशरत्रस्तां निजप्रेयसी त्वच्चित्तं तु न रजयन्ति पथिक प्रायः प्रपापालिकाः ॥' २. आत्मोपक्षेप रूप शरृङ्गारी नर्म का उदाहरण- कोई प्रपापालिका किसी पथिक के प्रति अपना अनुराग निवेदन करती हुई कहती है- हे राहगीर, जरा ठहरो, दुपहरी काट लो, पसीना सुखा लो, और ठहर कर पानी पी लो। यह प्याऊ सूनी है, यह समझ कर छोड़ न जाओ। हे पथिक, यहाँ तो बड़ा ठण्डा प्रपामण्डप विद्यमान है। (अरे तुम तो ठहरते ही नहीं) अच्छा, कामदेव के तीक्ष्ण घातक बाणों से डरी अपनी उसी प्रेयसी ही को याद करो। ठीक है, तुम्हारे चित्त को प्रपापालिकाएँ प्रायः प्रसन्न नहीं कर पाती हैं। सम्भोगनर्म यथा- 'सालोए चिशर सूरे धरिणी घरसामिअरस्स घेत्तूण। सोच्छन्तस्स वि पाए धुअइ हसन्ती हसन्तस्स ।।' ('सालोके एव सूर्ये ग्ृहिणी गृहस्वामिकस्य गृहीत्वा। अनिच्छतोऽपि पादौ धुनोति हसन्ती हसतः ॥')
मड ३. सम्भोगनम का उदाहरण- सूर्य के दृष्टिगोचर रहते हुए भी (दिन में ही) गृहिणी हँसते हुए गृहस्वामी के पैरों को पकड़ कर, उसके इच्छा न करते हुए भी, हँसती हुई हिला रह्ी है। माननर्म यथा- 'तदवितथमवादीर्यन्मम त्वं प्रियेति प्रियजनपरिभुक्तं यद्ुकूलं दधानः। मदधिवसतिमागा: कामिनां मण्डनश्री- व्रजति हि सफलत्वं वल्लभालोकनेन ।I' ४. माननर्म का उदाहरण (माघ के एकादश सर्ग में) जैसे- अपराधी नायक से नायिका व्यंग्य में कह रही है। तुम जो कहा करते थे कि मैं तुम्हारी ज्यारी हूँ, वह बिलकुल सच है। क्योंकि तुम अपनी प्यारी के द्वारा पहने दुकूल को पहन कर यहाँ मेरे घर पर आये हो। ठीक है, कामी व्यक्तियों की वेशभूषा का शृद्गार वल्लभाओं (प्रियाओं) के देखने से सफल हो जाता है। यदि मैं तुम्हारी प्यारी न होती, तो तुम यह शक्गार बताने थोड़े ही आते।
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(नायक भूल से दूसरी नायिका के दुकूल को पहन कर प्रातः काल ज्येष्ठा के पास लौटा है। वह बड़े मीठे तथा व्यंग्य भरे ढङ्ग से मानपूर्वक परिहास कर रही है।) कि भयनर्म यथा रत्नावल्यामालेख्यदर्शनावसरे-'सुसङ्गता-जाणिदो मए एसो सव्वो वुत्तन्तो समं चित्तफलएण ता देवीए णिवेदइस्सम्' ('ज्ञातो मयैष सर्वो वृत्तान्तः सह चित्रफलकेन तद्देव्यै निवेदयिष्यामि ।') इत्यादि। ५. भयनर्म, जैसे रलावली नाटिका में चित्रदर्शन के अवसर पर सुसक्गता की यह उक्ति- 'अच्छा ! मैंने यह सारी बात जान ली है। मैं इस बात को इस चित्रफलक के साथ देवी वासवदत्ता को निवेदित करूँगी।' डार शृङ्गाराङं भयनर्म यथा ममव- 'अभिव्यक्तालीकः सकलविफलोपायविभव- श्विरं ध्यात्वा सद: कृतकृतकसरम्भनिपुणम्। इतिर्शड इतः पृष्ठे पृष्ठे किमिदमिति सन्त्रास्य सहसा कृताश्ल्वेषं धूर्त: स्मितमधुरमालिङ्गति वधूम्' ६. भयनम का दूसरा भेद वह है, जहाँ भय किसी रस का अङ्ग बन जाय। यहाँ शरृङ्गार के अङ्गभूत भयनम का उदाहरण धनिक ने स्वरचित पध के रूप में दिया है :- कीनायक का अपराध प्रकट हो गया है, इसलिये नायिका बड़ा मान किये हैं। नायक कई प्रकार से उसे मनाने के उपाय करता है, लेकिन वह असफल ही होता है। इसके बाद वह उसे प्रसन्न करने का कोई तरीका सोचने के लिए बड़ी देर तक सोचविचार करता है, फिर युक्ति सोच लेने पर एकदम झूठे डर का बड़ी निपुणता से बहाना करके वह 'यह पीछे क्या है, यह इधर पीछे क्या है' इस तरह नायिका को एकदम डरा देता है। इससे डर कर नायिका उसकी ओर झुकती है, वह मुस्कराहट व मधुरता के साथ आश्लेष कर नायिका का आलिङ्गन करलेता है। अथ नर्मस्फिअ :- नर्मस्फिक्षः सुखारम्भो भयान्तो नवसङ्गमे। यथा मालविकाभ्निमित्रे सङ्केते नायकमभिसतायां नायिकायां नायक :- 'विसृज सुन्दरि सन्मसाध्वसं ननु चिरात्प्रभृति प्रणयोन्मुखे। परिगृहाण गते सहकारतां त्वमतिमुक्तलताचरितं मयि ॥' नर्मस्फिश् उसे कहते हैं, जहाँ नायक व नायिका को प्रथम समागम के समय पहले तो सुख होता है, किन्तु बाद में भय होता है कि कहीं कोई (पिन्नादि व देव्यादि) उनके भेद को न पा ले। जैसे मालविकासिमित्र नाटक में सक्केतस्थल पर नायक के प्रति अभिसरणार्थ आई हुई मालविका से अभनिमित्र कहता है :- 'हे सुन्दरि मालविके, नवसङ्गमजनित भय को छोड़ दो। बड़ी देर से मैं तुम्हारे प्रेम के प्रति उन्मुख हूँ। इसलिए सहकार (आम्र) बने हुए मेरे लिए तुम अतिमुक्त लता के सदृश व्यवहार का आचरण करो। जैसे अतिमुक्त लता आम्रवृक्ष का आलिक्गन करती है, वैसे ही तुम भी मेरा आलिड्गन करो।' मालविका-भट्टा देवीए भयेण अत्तणो वि पिअ्नं काउं ण पारेमि' ('भर्तः देव्या भयेनात्मनोऽपि प्रियं कर्तु न पारयामि।') इत्यादि।
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ा मालविका-स्वामिन्, महारानी (देवी) के डर से मैं अपने लिए भी प्रिय बात नहीं कर पाती हूँ।' अरथ नर्मस्फोट :- उत् कबा नमस्फोटस्तु भावानां सूचितो उल्परसो लचैः॥। ५१॥ यथा मालतीमाघवे-'मकरन्द :- गमनमलसं शून्या दृष्टि: शरीरमसौष्ठवं हरी 9 श्वसितमधिकं किं न्वेतत्स्यात्किमन्यदितोऽथवा। भ्रमति भुवने कन्दर्पाज्ञा विकारि च यौवनं ललितमधुरास्ते ते भावाः क्षिपन्ति च धीरताम् ।।' इत्यत्र गमनादिभिर्भावलेशैर्माधवस्य मालत्यामनुरागः स्तोकः प्रकाश्यते। नर्मस्फोट वह है, जहाँ सात्विकादि भावों के लेशमात्र से किञ्ञित् मात्र रस की सूचना कर दी जाय। जैसे मालतीमाधव में मकरन्द निम्न पद्य के द्वारा माधव के अलस गमनादि सात्विरिक-भावलेश का वर्णन कर उसके मालतीविषयक अनुराग को सूचित करता है- इसकी चाल अलसाई है; दृष्टि सूनी-सी है, शरीर में सुन्दरता व स्वस्थता नहीं दिखाई पड़ती, साँस बड़े जोरों से चलती है। इन सब बातों को देखते हुए ऐसा अनुमान होता है कि क्या यह (कामपीड़ा) कारण हो सकता है; इसके अतिरिक्त और कारण हो ही क्या सकता है? सारे संसार में कामदेव की आज्ञा प्रसारित है, फिर यौवनावस्था बड़ी विकारशील होती है। नाना प्रकार के रमणीय व मधुर श्ुक्गारी भाव युवकों के धैर्य को समाप्त कर ही देते हैं। अथ नर्मगर्भ :- छन्ननेतृप्रतीचारो नर्मगर्भी उर्थहेतवे। अङ्ग: सहास्यनिर्हास्यैरेभिरेषा Sत्र कैशिकी ॥ ५२ ॥ यथाSमरुशतके- 'दृष्ट्रवैकासनसंस्थिते प्रियतमे पश्चादुपेत्यादरा- कादेकस्या नयने निमील्य विहितक्रीडानुबन्धच्छलः। ईषद्वक्रितकन्धर: सपुलकः प्रेमोज्जसन्मानसा-त 1 शक क mाा मन्तर्हासलसत्कपोलफलका धूर्पोऽपरां चुम्बति ॥'वरीग 9यथा (च) प्रियदर्शिकायां गर्माक्के वत्सराजवेषसुसङ्गतास्थाने साक्षाद्वत्सराजप्रवेशः। जहाँ किसी प्रयोजन के लिये नायक छिप कर प्रवेश करे, उसे नर्मगर्भ कहते हैं। कैशिकी के ये अङ्ग सहास्य तथा निर्हास्य (हास्यरहित) दोनों ढङ्ग के हो सकते हैं। जैसे अमरुकशतक के इस पद्य में- नायक ने देखा कि उसकी ज्येष्ठा तथा कनिष्ठा दोनों नायिकाएँ एक ही आसन पर बैठी है। इसलिए वह आदर के साथ ( या कुछ भय से) धीरे-धीरे पीछे से वहाँ पहुँचता है। वहाँ जाकर वह क्रीड़ा करने के ढोंग से ज्येष्ठा नायिका के नेत्रों को दोनों हाथों से बन्द कर लेता है। उसके बाद वह धूर्त नायक अपनी गरदन को जरा टेढ़ी करके, रोमाश्चित होकर, उस कनिष्ठा नायिका को चूम लेता है, जिसका मन प्रेम के कारण उलसित हो रहा है, तथा जिसके कपोलफलक आन्तरिक हँसी के कारण सुशोभित हो रहे हैं। िरी मिदानिलि
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अथवा जैसे प्रियदर्शिका (हषकृत) नाटिका के गर्भाङ्क में वत्सराज के रूप में सुसब्गता के प्रवेश होने के स्थान पर वत्सराज स्वयं ही रङ्षमन पर आ जाता है। अथ सात्त्वती- विशोका सान्वती सच्वशौर्यत्यागदयाजवैः। संलापोत्थापकावस्यां साङ्गात्यः परिवर्तकः॥५३॥ शोकहीन: सत्त्वशौर्यत्यागदयाहर्षादिभावोत्तरो नायकव्यापार: सात्त्वती, तदज्गानि
सात्वती वृत्ति वह है, जहाँ नायक का व्यापार शोकहीन होता है, तथा उसमें सख्व, शौर्यं, त्याग, दया, कोमलता, हर्ष आदि भावों की स्थिति होती है। इस सार्वती वृत्ति के संलाप, उस्थापक, साङ्कात्य तथा परिवर्तक ये चार अङ्ग होते हैं।
तत्र संलापको गभीरोक्तिनानाभावरसा मिथः। यथा वीरचरिते-'राम :- अयं स यः किल सपरिवारकार्तिकेयविजयावर्जितेन भगवता नीललोहितेन परिवत्सरसहस्त्रान्तेवासिनेतुभ्यं प्रसादीकृत: परशुः राम राम दाशरथे ! स एवायमाचार्यापादानां प्रियः परशुः। शत्त्रप्रयोगखुरलीकलहे गणानां सैन्यवृतो विजित एव मया कुमारः । एतावतापि परिरभ्य कृतप्रसाद: प्रादादमुं प्रियगुणो भगवान्गुरुर्मे ।I' इत्यादिनानाप्रकारभावरसेन रामपरशुरामयोरन्योन्यगभीरवचसा संलाप इति। संलाप (संलापक) साश्वती वृत्ति का वह अङ्ग है, जहाँ पात्रों में परस्पर नाना भाव वारसयुक्त गम्भीर उक्ति पाई जाती है। जैसे महावीरचरित में राम व परशुराम की परस्पर गम्भीरोक्ति में संलापक पाया जाता है :- राम-ससैन्य स्वामिकातिकेय के विजय से प्रभावित भगवान् शङ्कर ने सैकड़ों वर्षों तक शिष्य बने आपको जो परशु प्रसाद रूप (पुरस्कार रूप) में दिया है, यह वही परशु है। परशुराम-राम, राम, यह वही पूज्य गुरुवर का प्रिय परशु है- शस्त्र प्रयोग की क्रीड़ा का युद्ध करते समय मैंने देवगणों की सेना से युक्त कुमार कातिकेय को जीत लिया था। इस विजय से हो प्रसन्न होकर मेरा आलिङ्गिन कर गुणों से प्रसन्न होने वाले मेरे गुरु भगवान् शङ्कर ने यह परशु मुझे दिया है। अथोत्थापक :- उत्थापकस्तु यत्रादौ युद्धायोत्थापयेत्परम् ।।५४।। यथा वीरचरिते- 'आनन्दाय च विस्मयाय च मया दष्टोऽसि दुःखाय वा वैतृष्ण्यं नु कुतोऽय सम्प्रति मम त्वद्शने चक्षुषः त्वत्साङ्गत्यसुखस्य नास्मि विषयः किं वा बहुव्याहतै- रस्मिन्व्रिश्रुतजामदग्त्यविजये बाहौ धनुजुम्भतामू।"-म>
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१३६ दशरूपकम् जहाँ एक पात्र दूसरे पात्र को युद्ध के लिए उत्तेजित (उत्थापित) करे, वहाँ उत्थापक नामक सात्विकी-अङ्ग होता है।् वहीं महावीरचरित में परशुराम रामचन्द्र से कह रहे हैं :- 'तुम मुझे आनन्द के दिए दिखाई दिये हो, या विस्मय के लिए, या दुःख के लिए- मैं नहीं कह सकता हूँ। आज तुम्हें देख कर मेरो आँखें तृप्त कैसे हो सकती हैं। तुम्हारी सङ्गति (समागम ) के सुख का तो मैं विषय नहीं हूँ। अधिक क्या कहूँ। जमदननि के पुत्र परशुराम के विजय से प्रसिद्ध इस (तुम्हारे ) हाथ में यह धनुष जुम्भित हो।' अथ साङ्वात्य :- मन्त्रार्थदवशक्त्यादेः साङ्गात्य: सङ्गभेदनम्। मन्त्रशक्त्या यथा मुद्राराक्षसे राक्षससहायादीनां चाणक्येन स्वबुद्धया भेदनम्। अर्थशक्त्या तत्रैव यथा पर्वतकाभरणस्य राक्षसहस्तगमनेन मलयकेतुसहोत्थायिभेदनम्। दैवशक्त्या तु यथा रामायरो रामस्य दवशक्त्या रावणाद्विभीषणस्य भेद इत्यादि। शत्रु (प्रतिनायक) के सङ्ख का जहाँ मन्त्रशक्ति, अर्थशक्ति, दैवशक्ति आदि के द्वारा भेदन किया जाय, वहाँ साङ्कात्य नामक सार्विकी-अङ्ग होता है। (यहाँ नायक या नायक के साथी किन्हीं शक्तियों से प्रतिनायक के साथियों को फोड़ कर उसकी शक्ति कम कर देते हैं।) जहाँ मन्त्रणा या बुद्धिबल के आधार पर भेदन हो वह भेदन मन्त्रशक्ति के द्वारा होता है। जैसे मुद्राराक्षस नाटक में चाणक्य अपनी बुद्धि से राक्षस के सहायकों को फोड़ लेता है। अर्थशक्ति के आधार पर अर्थादि (द्रव्यादि) के आधार पर भेदन किया जाता है। जैसे उसी नाटक में पर्वतक के आभूषण के राक्षस के हाथों पहुँचने से मलयकेतु के साथ उसका भेदन हो जाता है। दैवशक्ति, जैसे रामायण में रामचन्द्र की अलौकिक शक्ति (अथवा दैवशक्ति) के कारण ही विभोषण का रावण से भेद हो जाता है। ॥ अथ परिचर्तकः प्रारब्घोत्थानकार्यान्यकरणात्परिवर्तक: ॥५५॥ प्रस्तुतस्योद्योगकार्यस्य परित्यागेन कार्यान्तरकरणं परिवर्तकः। यथा वीरचरिते-
वक्षो विशाखविशिखव्रणलञ्छनं मे।
यत्सत्यमद्य परिरब्धुमिवेच्छति त्वाम्॥ जहाँ किसी एक कार्य का आरम्भ किया गया है, किन्तु उस कार्य को छोड़ कर जहाँ दूसरे ही कार्य को किया जाय, वहाँ परिवर्तक नामक अङ्ग होता है। जैसे महावीरचरित में राम की वीरता से चकित होकर परशुराम उनसे युद्ध न कर उनका आलिङ्गन करना चाहते हैं, यह परिवर्तक ही है :- परशुराम :- यह बात बिलकुल सच है, कि गणेशजी के दांत रूपी मुसलों के द्वारा चिह्नित, तथा कार्तिकेय के अनेकों बाणों के धावों से युक्त मेरा वक्षस्थल, तुम जैसे अद्भुत वीर के मिलने से रोमाश्चित होकर तुम्हें आलिङ्गन करना चाहता है। राम :- भगवन् ! परिम्भणमिति प्रस्तुतप्रतीपमेतत् ।' इत्यादि। राम-'भगवन्, यह परिरंभण तो प्रस्तुत विषय से विपरीत है।'
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सात्त्वतीमुपसंहरन्नारभटीलक्षणमाह- एभिरङ्गश्वतुर्धेयं सात्त्वत्यारभटी पुनः।19111 मायेन्द्र जाल संग्रामक्रोधोद्भान्तादिचेष्टितैः॥ ५॥हर संत्षिप्तिका स्यात्संफेटो वस्तृत्थानावपातने। 5गीर माया=मन्त्रबलेनाविद्यमानस्तुप्रकाशनम्, तन्त्रबलादिन्द्रजालम्। अब साश्वती का उपसंहार करते हुए, आरभटी वृत्ति का लक्षण बताते हैं। इस तरह सारती के चार अङ्ग हैं। आरभटी वृत्ति में माया, इन्द्रजाल, संग्राम, क्रोध, उद्भ्रान्त आदि चेष्टाएँ पाई जाती हैं। इसके, संक्षिप्तिका, सम्फेट, वस्तूत्थापन तथा अवपातन ये चार अङ्ग होते हैं। माया वह है, जहाँ अवास्तव वस्तु को मन्त्रबल से प्रकाशित किया जाय, यही कार्य जब तन्त्र बल से किया जाय तो वह इन्द्रजाल कहलाता है। तत्र- संत्षिप्तवस्तुरचना संत्षिप्ति: शिल्पयोगतः॥। ५७।। पूर्वनेतृनिवृत्त्याउन्ये नेत्रन्तरपरिग्रहः। मृद्वंशदलचर्मादिद्रव्ययोगेन वस्तूत्थापनं संक्षिप्तिः यथोदयनचरिते किलिजहस्ति- योगः। पूर्वनायकावस्थानिवृत्त्यावस्थान्तरपरिप्रहमन्ये संक्षिप्तिकां मन्यन्ते यथा वालिनि- वृत्त्या सुग्रीवः, यथा च परशुरामस्यौद्धत्यनिवृत्त्या शान्तत्वापादनम् 'पुण्या ब्राह्मण- जाति :- इत्यादिना। संच्षिप्तिका में नाटककार शिल्प का प्रयोग कर संतिप्त वस्तु की रचना करता है। कुछ लोगों के मत से संच्िप्तिका वहां होती है, जहां पहला नायक निवृत्त हो जाय तथा दूसरा नायक आवे, या फिर नायक की एक अवस्था छोड़ कर दूसरी अवस्था का ग्रहण किया जाय। मिट्टी, बाँस, पत्ते चमड़े आदि से किसी मकान आदि वस्तु का निर्माण संक्षिप्ति या संक्षिप्तिका कहलाता है, जैसे उदयनचरित में किलिजहरिति का प्रयोग। कुछ लोग नायक की पहली अवस्था को छोड़ कर दूसरी अवस्था का ग्रहण करना संक्षिप्तिका मानते हैं। जैसे बालि की निवृत्ति पर सुग्रीव नायक के रूप में गृहीत होता है और जैसे परशुराम को उद्धतता की निवृत्ति पर 'ब्राह्मण जाति पवित्र है' इस तरह शान्तत्व का ग्रहण किया जाता है। अथ संफेट :- संफेटस्तु समाघातः क्रुद्धसंरब्धयोईयो:॥५८॥ यथा माधवाSघोरघण्टयोर्मालतीमाधवे। इन्द्रजिल्लक््मणयोक्ष रामायणप्रतिबद्धवस्तुषु जहां दो कुद्ध पात्रों का परस्पर समाघात-एक दूसरा का अधितेप, पाया जाता है, वह सम्फेट कहलाता है। जैसे मालतीमाधव में माधव तथा अघोरघण्ट का एक दूसरे के प्रति क्रुद्ध होकर अधिक्षेप करना, और जैसे रामायण के आधार पर बनाई कथावस्तुओं में मेघनाद व लक्ष्मण का परस्पर अविक्षेप सम्फेट के अन्तर्गत आता है। १म द०
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अथ वस्तूत्थापनम्- मायाद्युत्थापितं वस्तु वस्तत्थापनमिष्यते। यथोदात्तराघवेाल्यस 'जीयन्ते जयिनोऽपि सान्द्रतिमिरव्रातैर्वियद्यापिभि-ए्ा र्भास्वन्तः सकला स्वेरपि रुचः कस्मादकस्मादमी।
5 इत्यादि। मन्त्रबल के द्वारा माया से किसी वस्तु की उत्थापना करना वस्तूत्थापन कहलाता है। जैसे उदात्तराघव के इस वर्णन में- यह क्या बात है, कि सारे संसार के अन्धकार को जीतने वाली, प्रकाशमान सूर्य की किरणें भी आकाश में व्याप्त होते हुए सघन अन्धकार-समूह से एकदम जीत ली गई हैं, और कबन्धों के ऊँचों छिद्रों से निकले खून के पीने से पेट को खूब भरे हुए, जोर से चिछ्लाती हुई ये सियारनियाँ इधर अपने मुखविवर की आग को छोड़ रही हैं। अथाSवपात :- श्वपातस्तु निष्कामप्रवेशन्नासविद्रवैः ॥५६॥ यथा रत्नावल्याम्- 'कण्ठे कृत्वाऽवशेषं कनकमयमधः शृङ्गलादाम कर्षन् क्रान्त्वा द्वाराणि हेलाचलचरणवलत्किड्किणीचक्रवालः। इत्तातङ्को गजानामनुसतसरणिः सम्भ्रमादश्वपालैः प्रभ्रष्टोऽयं प्रवङ्गः प्रविशति नृपतेमन्दिरं मन्दुरातः॥ नष्टं वर्षवरमनुष्यगणनाभावादकृत्वा त्रपा- 1F B6ड 1 मन्तः क्चुकिकश्नुकस्य विशति त्रासादयं वामनः। 1 कण पर्यन्ताश्रयिभिर्निजस्य सदृशं नाम्न: किरातैः कृतं सकि5 की कुब्जा नीचतयैव यान्ति शनकैरात्मेक्षणाशक्किनः॥' किसी भी पात्रादि के रङ्गमञ्च पर प्रवेश करने से या रङ्गमञ्ज से चले जाने से दूसरे पात्रों में जो भय तथा भगदड़ मचती है, वह अपवात कहलाता है। जैसे रलावली नाटिका में मन्दुरा (घुड़साल) से बन्दर के छूटने पर अन्तःपुर के लोगों को भगदड़ का निम्न वर्णन- कण्ठ की सोने की ज़औीर को तोड़ कर, बची हुई जजीर को घसीटता हुआ, अपने पैरों की किक्किणी को लीला से फेंके हुए पैरों से बजाता हुआ यह बन्दर, वाजिशाला से छूट कर भाग कर कई द्वारों को पार करता हुआ, महाराज के महल की और घुस रहा है। इसे देखकर हाथी आतक्कित हो गये हैं, और भय से घबड़ाये हुए घोड़ों के सईस (अश्वपाल) इसके मार्ग का पीछा कर रहे हैं। बन्दर को छूटा देख कर वर्षवर (हिंजड़े) लज्जा को छोड़ कर भाग खड़े हुए हैं-उनका लज्जा त्याग कर भग जाना ठीक है, क्योंकि उनकी गितनी मनुष्यों (स्त्री या पुरुष) में नहीं होती। यह बौना डर कर कंचुकी के बड़े जामे (कंचुक) में छिप रह्दा है। इधर-उधर कोनों
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में जाकर छिपे किरातों ने अपने नाम के अनुकूल कार्य (किरं अतति, जो कोनों में घूमते हैं) किया है। कुबड़े अपने आपके देखे जाने के डर से नीचे होकर धीरे-धीरे चल रहे हैं। यथा च प्रियदर्शनायां ( प्रियदर्शिकायाम्) प्रथमेऽक्के विन्ध्यकेत्ववस्कन्दे। और जैसे प्रिहर्षकृत यदशिका नाटिका के पहले अङ्क में विन्ध्यकेतु के आक्रमण के समय डेरे का वर्णन। उपसंहरति एभिरङ्गश्तुर्धेयम्, नार्थवृत्तिरतः परा। चतुर्थी भारती सापि वाच्या नाटकलक्षरो॥ ६० ॥ कैशिकीं सात्वतीं चार्थवृत्तिमारभटीमिति। पठन्तः पञ्चमीं वृत्तिमौद्धटाः प्रतिजानते ॥६१॥ सा तु लच्षये क्वचिदपिन दृश्यते, न चोपपद्यते रसेषु, हास्यादीनां भारत्यात्मकत्वात्, नीरसस्य च काव्यार्थस्याभावात्। तिस् एवता अर्थवृत्तयः। भारती तु शब्दवृत्तिरामु- खाङ्गत्वात्तत्रव वाच्या। इस प्रकार आरभटी वृत्ति में चार अङ्ग होते हैं। इन तीन वृत्तियों-कैशिकी, सारवती तथा आरभटी, के अतिरिक्त और कोई भी अर्थवृत्ति नहीं होती। नाटक के सम्बन्ध में भारती नामक चौथी वृत्ति का भी उल्लेख करना आवश्यक हो जाता है। उसका उल्लेख नाटक के लक्षण में किया जायगा। वैसे अर्थवृत्तियां तीन ही हैं-कैशिकी सारवती, तथा आरभटी। उद्जट के मतानुयायी नाव्यशास्त्री एक अलग से पांचवीं वृत्ति मानते हैं; (वह हमें स्वीकृत नहीं)। भारतीवृत्ति का अर्थ रूप रस (लक्ष्य) में कहीं भी सन्निवेश नहीं होता; वह रसों में नहीं पाई जाती। हास्यादि भारतीपरक होते हैं; तथा कोई भी काव्यार्थ नीरस नहीं होता। अतः सारे हो काव्यार्थों का समावेश रसपरक कैशिक्यादि वृत्तित्रय में हो जाता है। भारती में पात्र संस्कृतभाषाभाषी होते हैं तथा वीथी आदि उसके वक्ष्यमाण अङ्ग होते हैं। वस्तुतः भारतीवृत्ति नाटक के आमुख का अङ्ग है, इसलिए वह लक्षण में पाये जाने के कारण शब्दवृत्ति है। अतः उसका वर्णन यहां रसपरक अर्थवृत्तियों में न कर नाटक लक्षण के अवसर पर करना योग्य है। अर्थवृत्तियाँ तो ये तीन ही मानी जा सकती हैं। वृत्तिनियममाह- शङ्गारे कैशिकी, वोरे सात्त्वत्यारभढी पुनः। रसे रौद्रे च बोभत्से, वृत्ति: सर्वत्र भारतो ॥६२ ॥ वृत्ति का सम्बन्ध नायक के व्यापार से है, अतः रसपरक होने के कारण उनका किस किस रस में प्रयोग होता है यह बताना उचित होगा। कैशिका का प्रयोग श्रृंगार में, सात्वती का वीर में, तथा आरभटी का रौद्र एवं कीमत्स रस में किया जाता है। भारती वृत्ति का (शष्दवृत्ति होने के कारण) सभी रसों में प्रयोग होता है। [यहां श्रक्गार से हास्य; वोर से अद्भुत, रौद्र से करुण, तथा वीभत्स से भयानक रस का तत्तत्प्रकरण में भाव लिया जा सकता है, जो क्रमशः श्रुङ्गारादि से घनिष्ठतया सम्बद्ध हैं।]
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देशभैदमिन्नवेषादिस्तु नायकादिव्यापार: प्रवृत्तिरित्याह-प देशभाषाक्रियावेषलक्षणा: स्युः प्रवृत्तय:। लोकादेवावगम्यैता यथौचित्यं प्रयोजयेत्॥ ६३॥ वृत्ति के साथ ही साथ नाटकीय प्रवृत्ति का भी उल्लेख कर देना आवश्यक है। देश तथा काल के अनुसार नायक की भिन्न भिन्न भाषा, भिन्न भिन्न वेष, भिन्न भिन्न क्रिया प्रघृत्ति कहलाती हैं। इनका ज्ञान नाटककार (कवि) लोक से हो प्राप्त कर सकता है कि किस देश में कैसी भाषा, कैसा वेष व कैसी क्रिया-चेष्टा पाई जाती है। इसका ज्ञान प्राप्त कर कवि उनका तदनुरूप सन्निवेश अपने नाटक में करे। तत्र पाठ्यं प्रति विशेष :- पाष््यं तु संस्कृतं नृणामनीचानां कृतात्मनाम्। लिङ्गिनीनां महादेव्या मन्त्रिजावेश्ययोः क्चित्॥ ६४॥ B। कचिदिति देवीप्रभृतीनां सम्बन्धः । जहां तक उनकी भाषाके नाटक में बोलने (पाठथ) का प्रश्न है, इस विषय में एक विशेषता यह है कि-नाटक में कुलीन कृतात्मा पुरुषों की भाषा संस्कृत ही होनी चाहिए। तपस्विनियों, महारानी, मंत्रिपुत्री तथा वेश्याओं के सम्बन्ध में कहीं कहीं संस्कृत पाठय का सन्निवेश किया जा सकता है।। ककिण्ड स्त्रीणां तु प्राकृतं प्रायः सौरसेन्यधमेपु च। प्रकृतेरागतं प्राकृतम् = प्रकृतिः संस्कृतं तद्भवं तत्समं देशीत्यनेकप्रकारम्। सौरसेनी वििक
मागघी च स्वशास्त्रनियते। स्त्रीपात्रों का पाठय प्रायः प्राकृत-शौरसेनी प्राकृत-होता है। और अधम जाति के अकुलीनपात्र भी प्राकृत ही बोलते हैं। I प्राकृत शब्द की व्युत्पत्ति यह है कि जो स्वभाव से आया हो (प्रकृते रागतं), अथवा इसकी दूसरी व्युत्पत्ति 'प्रकृति अर्थात् संस्कृत से उत्पन्न' (प्रकृतिः संस्कृतं तद्भवं) है। ये प्राकृत शब्द तद्द्व, तत्सम, देशी इस प्रकार अनेक प्रकार के होते हैं। शौरसेनी तथा मागघी अपने अपने देशकालानुसार नाटक में प्रयुक्त होती हैं। पिशाचात्यन्तनीचादौ पैशाचं मागधं तथा॥ ६४॥ यद्देशं नीचपात्रं यत्तद्देशं तस्य भाषितम्। कार्यतश्चोत्तमादीनां कार्यों भाषाव्यतिक्रमः॥६६॥ स्पष्टार्थमेतत्। पिशाच तथा अत्यन्त अधम पात्रों (चाण्डालादि) की भाषा पैशाची या मागधी हो। जो नीचपात्र जिस देश का रहने वाला है, उसी देश की बोली के अनुसार उसकी पाठथ भाषा नाटक में नियोजित की जाय। वैसे कभी उत्तम आदि पात्रों की भाषा में किसी कारण से व्यतिक्रम भी पाया जा सकता है कि उत्तम पात्र प्राकृत बोलें या अधम पात्र संस्कृत बोलें, (पर यह सदा नहीं हो सकता।)।
१ 'शूरसेनी' 'शौरसेनी' इत्यपि पाठौ। T
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भगवन्तो वरैर्वाच्या विद्धद्देवर्षिलिङ्गिनः । चिप्रामात्याग्रजाश्चार्या नटीसूत्रभृतौ मिथः॥ ६७ ।। आर्याविति सम्बन्धः। अब कौन पात्र किस पात्र को किस तरह सम्बोधित करे इसे बताते हैं :- उत्तम पात्रों के द्वारा विद्वान्, देवर्षि तथा तपस्वी पात्र 'भगवन्' इस तरह सम्बोधित किये जाने चाहिए। विप्र, अमात्य तथा गुरुजनों या बड़े भाई (अग्रज) को वे 'आर्य' इस तरह सम्बोधित करें। नटी व सूत्रधार आपस में एक दूसरे को 'आर्य' व 'आर्ये' इस तरह सम्बोधित करें। रथी सूतेन चायुष्मान्पूज्यैः शिष्यात्मजानुजाः। वत्सेति तातः पूज्योऽपि सुगृहीताभिधस्तु तैः॥ ६८॥ अपिशब्दात्पूज्येन शिष्यात्मजानुजास्तातेति वाच्याः, सोऽपि तैस्तातेति सुगही- तनामा चेति। सारथी अपने रथी वीर को आयुष्मान् कहे; तथा पूज्य लोग शिष्य, पुत्र या छोटे भाई आदि को भी 'आयुष्मान्' ही कहें, अथवा 'वत्स' या 'तात' कहें। शिष्य, पुत्र, छोटे भाई आदि पूज्यों को 'तात' या 'सुगृहीतनामा' आदि कह सकते हैं। भावो ऽनुगेन सूत्री च मार्षेत्येतेन सोऽपि च। सूत्रधार: पारिपाश्वेकेन भाव इति वक्तव्यः।स च सूत्रिणा मार्ष इति। पारिपार्श्विक सूत्रधार को 'भाव' कहे, तथा सूत्रधार पारिपार्धिक को 'मार्प' (मारिष) के नाम से सम्बोधित करे। देव: स्वामीति नृपतिर्भृत्यैर्भद्टेति चाघमैः ॥६६॥ श्रामन्त्रणीयाः पतिवज्ज्येष्ठमध्याधमैः स्त्रियः। विद्वद्देवादिस्नियो भर्तृवदेव देवरादिभिर्वाच्याः। उत्तम नौकर राजा को 'देव या स्वामी' कहें और अधम भृत्य उसे 'भट्टा' (भर्तः) कहें। ज्येष्ठ, मध्यम या अधम पात्र स्ति्रियों को ठीक उसी तरह सम्बोधित करें, जैसे उनके पतियों को। विद्वानों, देवताओं आदि की स्त्रियों को देवर आदि उनके पति के अनुरूप सम्बोधित करें। जैसे ऋषि पलियों, तपस्विनियों या देवियों को 'भगवति' कहें; ब्राह्मणियों या पूज्या स्त्रियों को 'आर्ये' कहें। तत्र स्त्रियं प्रति विशेष :- समा हलेति, प्रेष्या च हखे, वेश्या5जुका तथा॥ ७० ॥ कुंट्टिन्यम्बेत्यनुगतैः पूज्या वा जरती जनैः। विदूषकेण भवती राज्ी चेटीति शब्दते॥७१॥ पूज्या जरती अम्बेति। स्पष्टमन्यत्। १. 'कुट्टिन्यनुगतैः पूज्या अम्बेतिजनै' इति पाठान्तरम्।
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१४२ दशरूपकम् स्त्रियों के सम्बोधन में जो विशेषता पाई जाती है, उसका उल्लेख करते हैं :- सखियाँ एक दूसरे को 'हला' कहें। नौकरानी (प्रेष्या) 'हञ्त' कहे, वेश्या को अंजुका' कहा जाय। कुट्टिनी को लोग 'अम्ब' कहें, तथा पूज्य वृद्धा स्त्री को भी 'अम्ब' ही कहें। विदूषक रानी व सेविका दोनों को 'भवती' शब्द से सम्बोधित करे। चेष्टागुणोदाहतिसत्त्वभावा- 5 Wg 'E नशेषतो नेतृदशाविभिन्नान्।। (PR) को वक्तुमीशो भरतो न यो वाी। ne 8yयो वा न देव: शशिखण्डमौलिः॥ ७२॥ दिब्बात्रं दर्शितमित्यर्थः । चेष्टा लीलादाः, गुणा विनयाद्याः, उदाहृतयः संस्कृत- प्राकृतादा उक्तयः, सत्त्वं निर्विकारात्मकं मनः, भावः सत्त्वस्य प्रथमो विकारस्तेन हावादयो ह्रुपलक्षिताः।
। इति धनजयकृतदशरूपकस्य द्वितीयः प्रकाशः समाप्तः ॥
नायक की विभिन्न दशाओं के अनुरूप चेष्टा, गुण, उदाहरण (उक्ति), सर् तथा भावों का निःशेष वर्णन कौन व्यक्ति कर सकता है, जो नाव्यचार्य महर्षि भरत या देव चन्द्रशेखर नहीं। अर्थात् इसका निःशेष सर्वाङ्ग वर्णन करने में तो महर्षि भरत तथा देवाधिदेव महादेव ही समर्थ है। अतः मेरे जैसा अल्पबुद्धि तो केवल दिखान्न वर्णन कर सकता है। लीलादि चेष्टा, विनयादि गुण, संस्कृत प्राकृत आदि उक्तियाँ, निर्विकारात्मक मन, तथा सत्त्व का प्रथम विकार भाव इन नायक की विशेषताओं के उल्लेख के द्वारा कारिकाकार ने हाव आदि दूसरी विशेषताओं का सक्केत किया है, जो उपलक्षण से इस प्रसङ्ग में गृहोत होंगी। यहाँ धनजय ने नायक की इन विशेषताओं का संक्षिप्त (दिख्मात्र) वर्णन ही किया है।
द्वितीय: प्रकाशः समाप्त: शी
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अथ तृतीय: प्रकाश: बहुवक्तव्यतया रसविचारातिलङ्गनेन वस्तुनेतृरसानां विभज्य नाटकादिषूपयोगः प्रतिपाद्यते- प्रकृतित्वादथान्येषां भूयो रसपरिग्रहात्। कड्री सम्पूर्रालक्षणत्वाच्च पूर्व नाटकमुच्यते ॥ १॥ उद्दिष्टधर्मकं हि नाटकमनुद्दिष्टघर्माणां प्रकरणादीनां प्रकृतिः शेषं प्रतीतम्। प्रथम प्रकाश में नाटकीय कथावस्तु का विवेचन किया। तदनन्तर द्वितीय प्रकाश में दूसरे नाटकीय तत्त्व 'नेता' (नायक) का सपरिग्रह वर्णन किया। अब नाटक का तीसरा अङ्ग प्रसङ्गोपात्त है। किन्तु रस के विवेचन में दशरूपकार धनजय को कई बातें कहनी है। अतः विस्तारी बिषय होने के कारण उसका उल्लङ्गन कर वस्तु, नेता तथा रस के भेद के आधार पर नाटकादि रूपकों का वर्णन तथा उनमें इनके विभाग का उपयोग किस प्रकार होता है, इसका प्रतिपादन किया गया है। (यहाँ 'सूचीकटाहन्याय' से रस के विस्तारी विषय को छोड़ कर पहले संक्षिप्त व अल्प विषय का विवेचन आरम्भ किया गया है।) यहां सर्व प्रथम हम नाटक (रूपकभेद) का विवेचन कर रहे हैं। इसके तीन कारण हैं :- पहले तो नाटक ही अन्य रूपकभेदों की प्रकृति अथवा मूल है, उसीमें वस्तु, नेता या रस के परिवर्तन करने से प्रकरणादि रूपकों की सृष्टि हो जाती है। EEEES दूसरे, नाटक में रस का परिपाक पूर्ण रूप से तथा अनेक रूप से पाया जाता है- उसमें शङ्गार या वीर कोई भी रस अङ्गी रस हो सकता है, तथा अन्य सभी रस अङ्ग रूप में सन्निविष्ट किये जा सकते हैं। तीसरे, वस्तु व नेता के जो लक्षण हम कह चुके हैं, तथा रस के जिन लक्षणों का वर्णन हम आगे करने जा रहे हैं, वे सभी लक्षण नाटक में पाये जाते हैं। नाटक के लक्षण का उद्देश हो चुका है, उनसे युक्त नाटक ही उन प्रकरणादि रूपकों का मूल कारण है, जिनका अभी वर्णन नहीं किया गया है। कारिका का शेष अंश स्पष्ट ही है। तत्र पूर्वरङ्गं विधायादौ सूत्रधारे विनिगते। प्रविश्य तद्वदपर: काव्यमास्थापयेन्नटः ॥२॥ पूर्वं रज्यतेऽस्मिन्निति पूर्वरङ्गो नाव्यशाला तत्स्थप्रथमप्रयोगव्युत्थापनादौ पूर्वरज्नता तं विधाय विनि्गते प्रथमं सूत्रधारे तद्वदेव वैष्णवस्थानकादिना प्रविश्यान्यो नटः काव्यार्थं स्थापयेत्। स च काव्यार्थस्थापनात् सूचनात्स्थापकः । जब सूत्रधार पूर्वरङ्ग का विधान करने के बाद रङ्गमञ्च से चला जाता है, तो उसी की तरह (की वेशभूषा वाला) दूसरा नट मञ्च पर प्रवेश कर काव्य की प्रस्थापना करे। पूर्वरङ्ग शब्द की व्युत्पत्ति इस प्रकार है-'पूर्व रज्यतेऽस्मिन्'-जिसमें सामाजिकों को पहले आनन्द मिले। इस प्रकार पूर्वरङ्ग का तात्पर्य नाय्यशाला से है। नाट्यशाला में नाटकादि रूपक के आरम्भ मेंजो औपचारिक क्रियाएँ (प्रयोग, व्युत्थापनादि)-मङ्गलाचरण, देवतास्तवनादि- की जाती हैं, उन्हें पूर्वरङ्गता (पूर्वरङ्ग का काम) कहेंगे। इस मङलाचरणादि के कर लेने पर जब सूत्रधार लौट जाता है, तो उसी की तरह के वैष्णववेश में आकर कोई दूसरा नट
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नाटकादि कथावस्तु के काव्यार्थ की स्थापना या सूचना करता है। यह नट काव्यार्थ की स्थापना या सूचना करने के कारण स्थापक कहलाता है। दिव्यमत्यें स तद्रपो मिश्रमन्यतरस्तयोः। सूचयेद्स्तु बीजं वा मुखं पात्रमथापि वा॥ ३॥ स स्थापको दिव्यं वस्तु दिव्यो भूत्वा मर्त्यं च मर्त्यरूपो भूत्वा मिश्रं च दिव्यम- स्ययोरन्यतरो भूत्वा सूचयेत्-वस्तु बीजं मुखं पात्रं वा। यह स्थापक कथावस्तु के अनुरूप ही वेशभूषा बना कर प्रवेश करे। यदि वस्तु देवतासम्बन्धी (दिव्य) हो तो वह दिव्य रूप में मञ पर प्रवेश करे। यदि वह मानवसम्बन्धी (मत्य) हो तो वह नट मर्त्य रूप में आवे। कथावस्तु के मिश्र (दिग्यादिव्य) होने पर (जैसे रामादि की कथा में) वह या तो दिव्य रूप में या मर्त्य रूप में आ सकता है। मञ् पर आकर काव्यार्थ की स्थापना करते समय वह काव्य (रूपक) की कथावस्तु, उसकी बीज नामक अर्थप्रकृति, सुख (श्लेष के द्वारा) या प्रमुख पात्र की सूचना दे।5 रत इस प्रकार काव्यार्थ की स्थापना सूच्य के भेद से ४ प्रकार की हो जाती है। इन्हीं चारों प्रकारों को वृत्तिकार धनिक भिन्न २ नाटकों के स्थापना प्रकारों को लेकर उदाहृत करते हैं। की वस्तु यथोदात्तराघवे- सँंकष 'रामो मूर्ति निधाय काननमगान्मालामिवाजां गुरो- ।ई लिए डि शेएस्तिद्धक्स्या भरतेन राज्यमखिलं मात्रा सहैवोज्कितम्। तौ सुग्रीवविभीषणावनुगतौ नीता परां संपदं प्रोद्वृत्ता दशकन्घरप्रभृतयो ध्वस्ताः समस्ता द्विषः ॥' ( १) वस्तुसूचना, जैसे उदात्तराघव नाटक में निम्न पद्य के द्वारा नट नाटक की समस्त कथावस्तु का संक्षिप्त सक्केत देता है :- अपने पिता की वन जाने की आज्ञा को माला की तरह सिर पर धारण कर रामचन्द्र बन के लिए रवाना हो गये। रामचन्द्र की मक्ति के कारण भरत ने माता कैकैयी के साथ ही समस्त राज्य का परित्याग कर दिया। रामचन्द्र ने अपने अनुचर सुग्रीव तथा विभीषण को अनुपम सम्पत्ति से विभूषित कर दिया, तथा रावण आदि समस्त उत्कट शय्ुओं को नष्ट कर दिया। बीजं यथा रत्नावल्याम्- 'द्वीपादन्यस्मादपि मध्यादपि जलनिधेर्दिशोऽप्यन्तात्। गाक :5F आनीय फटिति घटयति विधिरभिमतमभिमुखीभूतः ॥ (२) बीजसूचना, जैसे रल्नावली नाटिका में स्थापक नाटकीय कथावस्तु के बीज की सूचना देता है :- " क5 अनुकूल होने पर दैव अपने अभीष्ट अर्थ को किसी दूसरे द्वीप से, समुद्र के बीच से, या दिशाओं के अन्त से भी लाकर एकदम मिला देता है। की(यहाँ दैव की अनुकूलता के कारण समुद्र में खोई रत्नावली भी यौगन्धरायण को मिल
१. उदात्तराघव नाटक अनुपलभ्य है। इसके रचयिता कवि मायुराज थे, इसका पता अवश्य चलता है। ाल Fस
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जाती है, इस बीज की ओर सक्केत किया गया है। इस प्रकार यौगन्धरायण के अभीष्ट रत्नावली उदयन-समागम रूप फल के बीज की सूचना यहाँ दी गई है।) मुखं यथा- 'आसादितप्रकटनिर्मलचन्द्रहासः प्राप्तः शरत्समय एष विशुद्धकान्तः। उत्खाय गाढतमसं घनकालमुग्रं रामो दशास्यमिव सम्भृतबन्धुजीचः ॥l' (३) मुखसूचना-दशरूपक के रचयिता या वृत्तिकार ने यहाँ मुख शब्द को स्पष्ट नहीं किया है। साहित्यदर्पणकार के मतानुसार मुख में श्रेष के द्वारा वस्तु की सूचना दी जाती है (मुखं श्लेषादिना प्रस्तुतवृत्तान्तप्रतिपादको वाग्विशेषः)। यहाँ दिये गये उदाहरण से भी विश्वनाथ महापात्र का मत पुष्ट होता है। मुखसूचना में वस्तु का वर्णन श्लेष के द्वारा किया जाता है। यहाँ निम्न पद्य में स्थापक भारती वृत्ति में शरत्काल का वर्णन कर रहा है। यह शरत्काल का वर्णन श्रिष्ट शब्दों में हुआ है, जिससे साथ ही रामचन्द्र की तथा उनकी नाटकीय वस्तु की भी सूचना होती है। विशुद्ध तथा सुन्दर यह शरत्काल, जिसमें चन्द्रमा का निर्मल प्रकाश प्रकटित हो गया है, तथा जिसने बन्घुजीव (दुपहरिया) के फूलों को धारण कर लिया है (जिसमें दुपहरिया के फूल फूलते हैं), सघन अन्धकार वाले प्रचण्ड वर्षाकाल को उखाड़ कर ठीक उसी तरह प्राप्त हुआ है, जैसे चन्द्रमा के निर्मल हास से युक्त (अथवा जिन्होंने रावण के निर्मल चन्द्र- हास खड्ग को ध्वस्त कर दिया है), विशुद्ध तथा सुन्दर रामचन्द्र, बान्धवों के जीवों को फिर से लौटाते हुए; अत्यधिक अज्ञान (तम) वाले, उग्र तथा सघन काले राक्षस रावण को मारकर प्राप्त हुए हैं। पात्रं यथा शाकुन्तले- 'तवास्मि गीतरागेण हारिणा प्रसभं हृतः । एष राजेव दुष्यन्तः सारञ्गणातिरंहसा ।I' (४) पात्रसूचना-इसमें स्थापक किसी पात्र की (नेता या अन्य किसी पात्र की) सूचना देते हुए प्रथम अक्क में उसके भावी प्रवेश का सङ्केत देता है। जैसे शाकुन्तल में, (नट कह रहा है।) हे नटी, तेरे गीत की सुन्दर राग से मैं ठीक उसी तरह आकृष्ट हो गया हूँ, जैसे इस तेज बेग वाले हरिण के द्वारा यह राजा दुष्यन्त आकृष्ट किया गया है। (शाकुन्तल के प्रथम अङ्क में इस सूचना के बाद रथ पर बैठे दौड़ते हरिण का पीछा करता हुआ राजा दुष्यन्त मञ् पर प्रविष्ट होता है। इस प्रकार स्थापक नट की यह स्थापना-पात्र- स्थापना (पात्रसूचना) कहलायगी।) रङ़ं प्रसाद मधुरैः श्रोकैः काव्यार्थसूचकैः। ऋतुं कञ्चिदुपादाय भारती वृत्तिमाश्रयेत्।।४ ।। रजस्य प्रशस्ति काव्यार्थानुगतार्थैः शरोकैः कृत्वा 'औत्सुक्येन कृतत्वरा सहभुचा व्यावर्तमाना हिया तैस्तैर्बन्धुवधूजनस्य वचनैर्नीताभिमुख्यं पुनः। १६ दृ०
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लिलाना ड हष्ट्राSये वरमात्तसाध्वसरसा गौरी नवे सङ्गमे ie-ti Pty Hp. 5 mN संरोहत्पुलका हरेण हसता श्िष्टा शिवा पातु वः ॥' निश इत्यादिभिरेव भारतीं वृत्तिमाश्रयेत्। स्थापक नट सर्वप्रथम काव्य के अर्थ की सूचना देने वाले मधुर श्ोकों के द्वारा रङ्गस्थ सामानिकों को प्रसन्न कर, किसी ऋतु को वर्णित करते हुए भारती वृत्ति का प्रयोग करे। सबसे पहले काव्यार्थ से युक्त श्रोकों से. रङ्गप्रशस्ति कर, स्थापक निम्न पद्य के सदृश भारती वृत्ति का प्रयोग करे। जैसे रत्नावली नाटिका में निम्न पद्य में भारती वृत्ति का आश्रय लिया गया है। शम नववधू पार्वती के हृदय में अपने पति शक्कर से मिलने की उत्सुकता है, इसलिए वह तेजी के साथ पति के पास जाना चाहती है, पर दूसरी ओर नारीसहज लज्जा उसे वापस लौटा रही है। इस दशा को देखकर पार्वती के बान्धव सखियाँ आदि उसे अनेक प्रकार के वचनों से शङ्कर के प्रति उन्मुख करते हैं, और उन वचनों के द्वारा वह फिर से शक्कर के सन्मुख ले जाई जाती है। जब वह आगे बढ़ती है, तो अपने प्रति को देखकर भय तथा प्रेम दोनों से युक्त हो जाती है। इस नव सङ्गम के समय उसके रोमान्र खड़े हो जाते हैं। शङ्कर पार्वती को सामने देख कर हँसते हुए उसका आलिङ्गन कर लेते हैं। हँसते हुए शङ्कर के द्वारा इस तरह आश्लिष्ट शर्माई हुई पार्वती सामाजिकों की (आप लोगों की) रक्षा करे। सातु-z भारती संस्कृतप्रायो वाग्यापारो नटाश्रयः। भेदैः प्ररोचनायुक्तैर्वीथीप्रहसनामुखैः ॥ ५॥ पुरुषविशेषप्रयोज्यः संस्कृतबहुलो वाक्यप्रधानो नटाश्रयो व्यापारो भारती, प्ररोचना- चीथीप्रहसनाS5मुखानि चास्यामज्ञानि। की
नट के द्वारा प्रयुक्त संस्कृत भाषा वाला वाग्यापार भारती वृत्ति कहलाता है। इसके प्ररोचना, वीथी, प्रहसन तथा आमुख ये चार भेद पाये जाते हैं। TTP यथोद्दशं लक्षणमाह-
( f FIP उन्मुखीकररां तत्र प्रशंसातः प्ररोचना उ) प्रस्तुताथप्रशंसनेन श्रोतृणां प्रवृत्त्युन्मुखीकरणं प्ररोचना। यथा रत्नावल्याम TFEBFI (Y)
'श्रीहर्षो निपुणः कविः परिषदप्येषा गुणग्राहिणी स Tलोके हारि च वत्सराजचरितं नाट्ये च दक्षा वयम्।6 वस्त्वेकैकमपीह वाञ्छितफलप्राप्तेः पदं किं पुन । मद्भाग्योपचयादयं समुदितः सर्वो गुणानां गणः ॥। अब नाम के साथ साथ उनकी परिभाषा भी देते हैं :- काव्यार्थादि की प्रशंसा के द्वारा सामाजिकों को उसकी ओर उन्मुख करना, उनके मन को आकृष्ट करना प्ररोचना कहलाता है। जैसे रत्नावली नाटिका में निम्न पद्य में नट अपने नाटक की प्रशंसा कर सामाजिकों को आकृष्ट करना चाहता है :- इस नाटिका का कवि श्री हर्ष है, जो कविता में बड़ा निपुण है। सामाजिकों की यह सभा भी गुणों का ग्रहण करने वाली है। नाटिका की कथावस्तु वत्सराज उदयन के चरित्र op Sy
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पर आधृत है, जो संसार में अतीव मनोहर (समझा जाता) है। साथ ही हम लोग भी नाय्यकला में बढ़े दक्ष हैं। कहाँ तक कहें, एक एक साधन से भी ईप्सित फल की प्राप्ति हो सकती है, तो फिर यहाँ तो मेरे सौभाग्य की वृद्धि से सारे ही गुणों का समूह एकत्रित हो गया है, इसलिए नाटक के सफल होने में कोई सन्देह ही नहीं। वोथी प्रहसनं चापि स्वप्रसङ्गडभिघास्यते ॥६॥
सूत्रधारो नटीं ब्रते मार्ष वाउथ चिदूषकम् ॥७॥ स्वकार्ये प्रस्तुताक्षेपि चित्रोकत्या यत्तदामुखम्। ी क प्रस्तावना वा तत्र स्युः कथोद्वातः प्रवृत्तकम् ॥॥ प्रयोगातिशय्ाथ वथ्यङ्गानि त्रयोदश। प्रसङ्गोपात्त वीथी तथा प्रहसन का वर्णन हम आगे करेंगे। वैसे वीथी तथा आमुख दोनों भारती भेदों के अङ्ग एक ही हैं, इसलिए उन भेदों का वर्णम हम यहीं कर रहे हैं। आमुख उसे कहते हैं, जहाँ सूत्रधार नटी, मार्प (पारिपार्श्रिक) या विदूषक के साथ बात करते हुए विचित्र उक्ति के द्वारा प्रस्तुत का गानेप कर (वस्तु का सङ्केत करते हुए) अपने कार्य का वर्णन करें। इसी आमुख को प्रस्तावना के नाम से भी पुकारते हैं। इसके कथोद्वात, प्रवृत्तक तथा प्रयोगातिशय ये तीन अङ्ग पाये जाते हैं। वीथी के तेरह अङ्ग होते हैं-(जिनका वर्णन हम इनके बाद करेंगे)। तत्र कथोद्वात :- शाफर स्वेतिवृत्तसमं वाक्यमर्थ वा यत्र सूत्रिणः ॥ ६॥ गृहीत्वा प्रचिशेत्पात्रं कथोद्वाती द्विधैव सः। वाक्यं यथा रत्नावल्याम्-'यौगन्घरायणः-द्वीपादन्यस्मादपि-' इति। वाक्यार्थं यथा वेणीसंहारे-'सूत्रधारः- निर्वाणवैरिदहना: प्रशमादरीणां किकन नन्दन्तु पाण्डुतनया: सह केशवेन।
स्वस्था भवन्तु कुरुराजसुताः सभृत्या: ।' सूत्रधार के समान घटना वाले वाक्य को या वाक्यार्थ को लेकर तदनुकूल उक्ि का प्रयोग करते हुए जब कोई नाटकीय पात्र मञ्ज पर (प्रथम अङ्क में) प्रवेश करता है, तो उस प्रस्तावना को कथोद्वात कहते हैं। उपर्युक्तक भेद के आधार यह दो तरह हो जाता है-वाक्यमूलक तथा वाक्यार्थमूलक। जैसे वाक्य का प्रयोग रत्नावली नाटिका में पाया जाता है, जहाँ यौगन्धरायण सूत्रधार के ही वाक्य-'द्वीपादन्यस्मादपि'-इत्यादि का प्रयोग अपनी उक्ति में करते हुए प्रविष्ट होता है। वाक्यार्थ का प्रयोग वेणीसंहार की प्रस्तावना (आमुख) में मिलता है। भीमसेन सूनधार के वाक्य के अर्थ को लेकर तदनुकूल उक्ति का प्रयोग करते हुए प्रविष्ट होता है। जैसे निम्न स्थल में
शत्रुओं के शान्त होने से वे पाण्डव कृष्ण के साथ आनन्द करें, जिनके वैरियों की आग सूत्रधार :-
१. वाक्यं वाक्यार्थमथवा प्रस्तुतं यत्र सूत्रिणः इति पाठान्तरम् ।
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बुझ चुकी है। परिजनों से युक्त कौरव, जिन्होंने लड़ाई झगड़े को समाप्त कर दिया है, तथा सारी पृथ्वी को प्रसन्न तथा परिपुष्ट कर दिया है,।स्वस्थ रहें। (सपरिजन कौरव जिनके शरीर क्षतविक्षत हो गये हैं, खून से पृथ्वी को रँगकर, स्वर्ग में निवास करें।) ततोऽर्थेनाह-'भीम :- लाक्षागृहानलविषान्नसभाप्रवेशः प्राशोषु वित्तनिचयेषु च नः प्रहृत्य । आकृष्टपाण्डववधूपरिधानकेशाः स्वस्था भवन्तु मयि जीवति धातराष्ट्राः ।।' भीम :- लाक्षागृह में आग लगाकर, विष के अन्न को देकर तथा सभा में हमें धूतक्रीडा में जीतकर, हमारे प्राण एवं सम्पत्ति पर प्रहार कर, क्या वे धृतराष्ट्र के पुत्र मेरे जीते जी स्वस्थ रह् सकते हैं, जिन्होंने पाण्डवों की वधू द्रौपदी के वस्त्र तथा केशों को आकृष्ट किया है? अथ प्रवृत्तकम्- कालसाम्यसमात्िप्तप्रवेशः स्यात्प्रवृत्तकम् ॥ १०॥ प्रवृत्तकालस मानगुणचणनया सूचितपात्रप्रवेश: प्रवृत्तकम्, यथा- आसादित प्रकट निर्मलचन्द्रहासः प्राप्तः शरत्समय एष विशुद्धकान्तः। उत्खाय गढतमसं घनकालमुग्रं रामो दशास्यमिव सम्भृतबन्धुजीवः । प्रवृत्तक नामक आमुख भेद वह होता है, जहाँ ऋतु के वर्णन की समानता के आधार पर श्लेष से किसी पात्र के प्रवेश की सूचना दी जाय। जैसे निम्न पद्य में शरत् का वर्णन करने के साथ ही साथ श्लिष्ट शब्दों के द्वारा समान गुणों का वर्णन करते हुए राम के प्रवेश की सूचना दी गई है।' विशुद्ध तथा सुन्दर यह शरत्काल, जिसमें चन्द्रमा का निर्मल प्रकाश प्रकटित हो गया है, तथा जिसमें बन्धुजीव (दुपहरिया) के फूल फूल गये हैं, सघन अन्धकार से पूर्ण वर्षाकाल को उखाड़ कर ठीक उसी तरह आया है, जैसे चन्द्रमा के निर्मल हास से युक्त (अथवा, जिन्होंने रावण के निर्मल चन्द्रहास खड्ग को ध्वस्त कर दिया है), विशुद्ध तथा सुन्दर रामचन्द्र बान्धवों के जीवों को फिर से लौटाते हुए, अत्यधिक अज्ञान (तम) वाले उग्र तथा सघन काले राक्षस रावण की मारकर आये हैं। अरथ प्रयोगातिशय :-
पात्रप्रवेशो यत्रैष प्रयोगातिशयो मतः ॥११॥ यथा 'एष राजेव दुष्यन्तः' इति। 'यह वह आ रहा है' इस प्रकार के वचन को प्रयोग कर जहाँ सूत्रधार किसी पात्र का प्रवेश करता है, वह प्रयोगातिशय नामक आमुख है। जैसे शाकुन्तळ में 'जैसे यह राजा दुष्यन्त' इस सूचना के कारण प्रयोगातिशय है। T १. निम्न पद्य किस नाटक का है यह पता नहीं। धनिक ने भी यहाँ नाटक का उल्लेख नहीं किया है। वैसे इस पद् को धनिक ने दो स्थान पर इसी प्रकाश में उद्धत किया है।
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अथ वीथ्यज्ञानि- उद्धात्यकावलगिते प्रपञ्चत्रिगते छलम्। वाक्केल्यधिबले गण्डमवस्यन्दितनालिके॥ १२॥ असत्प्रलापव्य।हारमृदवानि त्रयोदश। वीथी के जिन तेरह अङ्कों का सक्केत ऊपर किया गया, वे ये हैं :- उद्धात्यक, अव- लगित, प्रपञ्ज, त्रिगत, छल, वाक्केली, अधिबल, गण्ड, अवस्यन्दित, नालिका, असखलाप, व्याहार और मृदव। तत्र- गूढार्थपदपर्यायमाला प्रश्नोत्तरस्य वा ॥ १३ ॥ यत्रान्योन्यं समालापो द्वेघोद्धात्यं तदुच्यते। गूढार्थं पदं तत्पर्यायश्वेत्येवं माला प्रश्नोत्तरं चेत्येवं वा माला द्वयोरुक्तिप्रत्युक्तौ तद्विविधमुद्धात्यकम्। तत्रादं विक्रमोवश्यां यथा-'विदूषकः-भो वश्रस्स को एसो कामो जेण तुमं पि दूमिज्जसे सो किं पुरीसो आदु इत्थित्र त्ति। ('भो वयस्य! क एष कामो येन त्वमपि दूयसे स किं पुरुषोऽथवा स्त्रीति।' ) राजा-सखे। मनोजातिरनाधीनां सुखेष्वेव प्रवर्तते। स्न्नेहस्य ललितो मार्ग: काम इत्यभिधौयते॥ विदूषक :- एवं पि ण जारो ( 'एवमपि न जानामि।') राजा-चयस्य इच्छाप्रभवः स इति। विदूषकः-किं जो ज इच्छादि सो तं कामेदित्ति। ( 'किं यो यदिच्छति स तत्का- मयतीति।') राजा-अथ किम्। विदूषक :- ता जाणिदं जह अहं सूभआरसालाए भोअणं इच्छामि।' ('तज्ज्ञातं यथाऽहं सूपकारशालायां भोजनमिच्छामि।') जहाँ दो पात्रों की परस्पर बातचीत इस ढङ्ग की पाई जाय, कि वहाँ या तो गूढार्थ पदों तथा उनके पर्याय (अर्थ) की माला बन जाय, या फिर प्रश्न तथा उत्तर की माला पाई जाय। कभी कभी एक पात्र के द्वारा प्रयुक्त गूढार्थ पदों को दूसरा पात्र नहीं समझ पाये, तथा वह उसका व्याख्यान करे, उसके पर्याय का प्रयोग करे, तो वह पहले ढङ्ग का उद्धात्य या उद्धात्यक होता है। कभी २ पात्र अपनी उक्ति में किन्हीं बातों पर प्रश्न पूछकर उसके साथ ही उत्तर देता जाता है, यह प्रश्नोत्तर माला दूसरे उङ्ग का उद्धात्यक है। इस तरह उद्धात्यक दो तरह का होता है। पहले ढङ्ग के उद्धात्यक का उदाहरण विक्रमोर्वशीय नाटक से नीचे दिया जा रहा है, जहाँ राजा 'काम' के विषय में गूढार्थं पदों का प्रयोग कर फिर उसका व्याख्यान करता हैं :- विदूषक-हे वयस्य, वह 'काम' कौन है, जिससे तुम दुःखी हो रहे हो; वह पुरुष है या स्त्री। राजा-मित्र, प्रेम का वह सुन्दर मार्ग जो केवल सुख की ओर ही प्रवृत्त होता है, तथा मन में उत्पन्न होता है, काम कहलाता है। विदूषक-मैं यह भी नहीं जानता। राजा-मित्र, वह काम इच्छा से उत्पन्न होता है। विदूषक-तो क्या, जो जिसकी इच्छा करता है, उसकी वह कामना करता है।
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राजा-और नहीं तो क्या? विदूषक-तो समझ गया, जैसे मैं सूपकार शाला (भोजनशाला) में भोजन की इच्छा करता हूँ।' द्वितीयं यथा पाण्डवानन्देा 'का श्लाध्या गुणिनां क्षमा परिभवः को यः स्वकुल्यैः कृतः किं दुःखं परसंश्रयो जगति क श्ाव्यो य आश्रीयते।गf तक्कीक को भृत्युर्व्यसनं शुचं जहति के यैर्निजिताः शत्रवः काफी हाा कणिल कैर्विज्ञातमिदं विराटनगरे छन्नस्थितैः पाण्डवैः॥9फ दूसरी तरह के उद्धात्यक का उदाहरण पाण्डवानन्द नाटक से निम्न पद्य के रूप में दिया जा रहा है जहाँ प्रश्नोत्तर की माला है :- सबसे अधिक श्राध्य वस्तु क्या है? गुणियों की क्षमा। परिभव या तिरस्कार किसे कहते हैं ? वह तिरस्कार जो अपने ही कुल के बान्धवों के द्वारा किया गया है। दुःख क्या है ? दूसरे के शरण में रहना ही दुःख है। संसार में प्रशंसनीय कौन है ? जिसका आश्रय लिया जाता है, जिसकी शरण में दूसरा आता है। मौत किसे कहते हैं ? व्यसन को। शोक का त्याग कौन कर सकते हैं ? जो अपने शत्रुओं को जीत लेते हैं। ये सारी बातें किनने जान ली? विराटनगर में अज्ञात रूप में छिपकर रहते हुए पाण्डवों ने ! अथावलगितम्- यत्रकत्र समावेशात्कार्यमन्यत्प्रसाध्यते॥१४॥ प्रस्तुते ऽन्यत्र वाSन्यत्स्यात्तच्चावलगितं द्विधा। तत्रादं यथोत्तरचरिते समुत्पन्नवनविहारगभदोहदायाः सीताया दोहदकार्येऽनु (ण) प्रविश्य जनापवादादरण्ये त्यागः। द्वितीयं यथा छलितरामे 'रामः-लक्ष्मण तातवियुक्तामयोध्यां विमानस्थो नाहं प्रवेष्दं शक्ोमि तदवतीर्य गच्छामि। (५ 1कोऽपि सिंहासनस्याध: स्थित: पादुकयो: पुरल जटावानक्षमाली च चामरी च विराजते ।। इति भरतदर्शनकार्यसिद्धिः॥ जहाँ एक ही क्रिया के द्वारा एक कार्य के समावेश से किसी दूसरे कार्य की भी सिद्धि हो जाय, वह पहले ढङ् का अवलगित होता है। अथवा एक कार्य के प्रस्तुत होने पर वह न होकर दूसरा हो वह अवलगित का दूसरा प्रकार है। इस तरह अवलगित दो तरह का होता है। जैसे पहले ढड़ के अवलगित का उदाहरण उत्तरचरित (भवभूति के उत्तररामचरित) से दिया जा सकता है, जहाँ वनविहार की दोहद इच्छा वाली गर्भवती सीता के दोहद को पूर्ण करने के कार्य से वन में ले जाकर जनापवाद के कारण वहाँ छोड़ दिया गया है। यहाँ एक कार्य के समावेश (सीतादोहदपूर्ति रूप) से दूसरा कार्य वनत्याग भी सिद्ध हो गया है। दूसरा प्रकार हम छलितिराम नाटक में देख सकते हैं :- यहाँ राम इसलिए पैदल जाना चाहते हैं कि पिता से वियुक्त अयोध्या में विमान से प्रवेश करना ठीक नहीं। यहाँ इस प्रस्तुत वस्तु के होते हुए उन्हें आगे भरत के दर्शन (दूसरे कार्य) की सिद्धि हो जाती है। 'राम-लक्ष्मण, पूज्य पिताजी के द्वारा वियुक्त अयोध्या में मैं विमान पर बैठ कर प्रवेश नहीं कर सकता। इसलिए उतर कर पैदल ही चलता हूँ। १. छलितराम नाटक अनुपलब्ध है, तथा इसके रचयिता का भी पता नहीं।
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अरे, सामने सिंहासन के नीचे, पादुकाओं के सामने कोई जटाधारी, अक्षमाला तथा चामर वाला व्यक्ति दिखाई पड़ रहा है।ड पर भिजरी अथ प्रपश्च :- प्सद्धतं मिथास्तोत्रं प्रपञ्चो हास्यकृन्सतः॥। १५ ।। असद्भूतेनार्थेन पारदार्यादिनपुण्यादिना याऽन्योन्यस्तुतिः स प्रपश्ः। यथा
रण्डा चण्डा दिक्खिदा धम्मदारा मज्जं मंसं पिज्जए खज्जए अ। भिक्खा भोजं चम्मखण्डं च सेज्जा कोलो धम्मो कस्स णो होइ रम्मो। ('रण्डा चण्डा दीक्षिता धर्मदारा मद्यं मांस पीयते खादते च। भिक्षा भोज्यं चर्मखण्डं च शय्या कौलो धर्मः कस्य न भवति रम्यः ॥' हि प्रपञ्च वह वीथ्यङ्ग है, जहाँ पात्र आपस में एक दूसरे की ऐसी अनुचित प्रशंसा करे, जो हास्य उत्पन्न करने वाली हो। कारिका के असद्भूत अर्थ का तात्पर्य परस्त्रीलोलुपता आदि निपुणता से है, इस ढङ् की परस्पर स्तुति जहाँ होगी, वह प्रपञ्न कहलाता है।कि जैसे राजशेखर के कर्पूरमजरी सट्टक में कापालिक भैरवानन्द अपने विषय में हास्यमय अनुचित प्रशंसा करते हुए कहता है :- बताइये तो सही, यह कौल धर्म किसे अच्छा न लगेगा, जहाँ विधवा दीक्षित स्त्रियें धर्मपत्ियाँ बन जाती है, खाने-पीने को मांस मद्य मिलता है, भिक्षा का भोजन प्राप्त होता है, चमड़े के टुकड़े की शय्या होती है। कही। अथ त्रिगतम्- श्रुतिसाम्यादनेकार्थयोजनं त्रिगतं त्विंह। नटादित्रितयालाप: पूर्वरङ्गे तदिष्यते॥१६॥ यथा विक्रमोवश्याम्- करी क्रायमिह
'मत्तानां कुसुमरसेन षट्पदानां शब्दोऽयं परभृतनाद एष धीरः । घैलासे सुरगणसेविते समन्तात् किन्नर्य: कलमधुराक्षरं प्रगीताः ॥' जहाँ शब्द की समानता के कारण अनेक अर्थों (वस्तुओं) की एक साथ योजना की जाय, वह त्रिगत नामक वीथ्यङ्ग होता है। नट आदि तीन पात्रों के आलाप के कारण पूर्वरङ्ग में भी त्रिगत पाया जाता है। त्रिगत का उदाहरण विक्रमोर्वंशीय नाटक से निम्न पद्य के रूप में दिया गया है। राजा, अप्सराओं के सङ्गीत को सुन कर शब्दसाम्य के आधार पर भ्रमरों के कलकल निनाद तथा कोकिल की काकली की योजना करता है, अतः यह त्रिगत है।FI क अकार लगा I फूलों के रस से मस्त भौरों का यह कलकल है, यह कोकिल की गम्भीर काकली है। देवताओं के समूह के द्वारा चारों ओर से सेवित कैलास पर्वंत पर किन्नरियाँ रमणीय व मधुर अक्षरों में गा रही हैं।
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अथ छुलनम्- प्रियाभैरप्रियैर्धाक्यैविलोभ्य छंलनाच्छलम्। यथा वेणीसंहारे-'भीमार्जुनौ- कर्ता दयूतच्छलानां जतुमयशरणोद्दीपनः सोडभिमानी राजा दुःशासनादेर्गुरुरनुजशतस्याङ्गराजस्य मित्रम्। कृष्णाकेशोत्तरीयव्यपनपनपटः पाण्डवा यस्य दासा: क्वास्ते दुर्योधनोऽसौ कथयत पुरुषा द्रष्टमभ्यागतौ स्वः ।।' जहाँ कोई पात्र बाहर से प्रिय लगने वाले, किन्तु वस्तुतः अप्रिय वाक्यों के द्वारा दूसरों का विलोभन करके उनके साथ छल करे, वह छल नामक वीथ्यङ्ग है। जैसे वेणीसंहार में भीमसेन तथा अर्जुन दुर्योधन को ढूंढते हुए निम्न उक्ति का प्रयोग करते हैं, जो ऐसे अप्रिय वाक्यों से युक्त है, जो बाहर से प्रिय-से मालूम पड़ते हैं :- धूतक्रीड़ा के समय छल करने वाला, लाक्षागृह को जलाने वाला, दुःशासनादि सौ छोटे भाइयों का पूज्य अग्रज (गुरु), अङ्गराज कर्ण का मित्र, वह अभिमानी राजा दुर्योधन; जो द्रौपदी के बालों व उत्तरीय को खोलने में चतुर है, तथा जिसके पाण्डव सेवक हैं; कहाँ है? हे पुरुषों, हमें बता दो, इम उसे देखने को आये हैं। अथ वाकली- विनिवृत्त्यास्य वाक्केली द्विस्त्रि: प्रत्युक्तितोऽपि था॥१७॥ एँलअस्येति वाक्यस्य प्रक्रान्तस्य साकाड्क्षस्य विनिवर्तनं वाक्कली द्वित्रिर्वा उक्तिप्रत्युक्तय:, तत्राद्या यथोत्तरचरिते-'वासन्ती- त्वं जीवितं त्वमसि मे हृदयं द्वितीयं त्वं कौमुदी नयनयोरमृतं त्वमङ्गे। इत्यादिभि: प्रियशतैरनुरुष्य मुग्धां तामेव शान्तमथवा किमतः परेण ॥' उक्तिप्रत्युक्तितो यथा रत्नावल्याम्-'विदूषकः-भोदि मत्रणिए मं पि एदं चच्चरिं सिक्खावेहि। ('भवति मदनिके मामप्येतां चर्चरीं शिक्षय') मदनिका-हदास ण क्खु एसा चच्चरी। दुवदिखण्डअं क्खु एदम्। ( 'हताश न खल्वेषा चर्चरी द्विपदि- खण्डकं खल्वेतत्।' ) विदूषक :- भोदि कि एदिणा खण्डेण मोदआ करीअन्ति। ('भवति किमेतेन खण्डेन मोदकाः क्रियन्ते?') मदनिका-णहि, पढीतरदि क्खु एदम्।' ( 'नहि पठ्यते खल्वेतत्।') इत्यादि। जहाँ वाक्य की विनिवृत्ति पाई जाय, अर्थात् साकाङ्क वाक्य को पूर्ण न कर उसको अधूरा ही कहा जाय तथा उसके भाव को गम्य रख दिया जाय; अथवा जहाँ दो या तीन बार उचिप्रयुक्ति का प्रयोग पात्रों द्वारा किया जाय, वहाँ वाक्केली नामक वीथ्यङ्ग होता है। (इस तरह वाक्केली दो तरह की होती है।) पहले प्रकार की वाक्केली का उदाहरण उत्तरचरित के तृतीय अङ्क से दिया गया है, जहाँ सीता के साथ किये गये राम के बर्ताव का वर्णन करते हुए वासन्ती (वनदेवता) राम से कह रही है :- १. 'छलना' इत्यपि पाठः।
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तुमने सीता से कहा था कि तुम मेरा जीवन हो, मेरा दूसरा हृदय हो, मेरे नेत्रों को तृप्त करने वाली चन्द्रिका हो, मेरे अङ्गों को जीवन देने वाला अमृत हो, इस तरह के सैकड़ों प्रिय वाक्यों से उस भोली सीता को भुलावे में डालकर, हाय, तुमने उसी को ...... (बनवास दे दिया); अथवा शान्त हो, इससे आगे के विषय में कहना व्यर्थ है। दूसरे प्रकार की वाक्केली में दो तीन बार र्उक्त प्रत्युक्ति पाई जाती है, जैसे रत्नावली नाटिका के निम्न स्थल में- विदूषक-हे मदनिके, मुझे भी यह राग (चर्चरी) सिखा दो ना। मदनिका-मूर्ख यह चर्चरी नहीं है, यह द्विपदीखण्डक है। विदूषक-अरी, क्या इस खण्ड (शक्कर) में लड्डू बनाये जाते हैं। मदनिका-नहीं, इसे तो पढ़ा जाता है-गाया जाता है। अथाधिबलम् अन्योन्यवाक्याधिक्योक्ति: स्पर्धयाSधिबलं भवेत्। यथा वेणीसँहारे-'अर्जुन :- सकलरिपुजयाशा यत्र बद्धा सुतैस्ते तृणमिच परिभूतो यस्य गर्वेण लोकः। दि रणशिरसि निहन्ता तस्य राधासुतस्य प्रणमति पितरौ वां मध्यमः पाण्डुपुत्रः ॥।' जहाँ नाटकीय पात्र एक दूसरे के प्रति वाक्यों का प्रयोग करते समय स्पर्धासे अपने आधिक्य की उक्ति कहें उसे अधिबल कहते हैं। जैसे वेणीसंहार के निम्न स्थल पर अर्जुन, भीम व दुर्योधन का परस्पर वार्तालाप इस ढङ्ग का पाया जाता है कि वे एक दूसरे की स्पर्धा करते हुए अपने आधिक्य की सूचना करते हैं। अर्जुन :- हे पिता-माता, (धृतराष्ट्र व गान्धारी), जिस कर्ण में आपके पुत्रों की समस्त शत्रुओं को जीतने की आशा बँधी हुई थी, और जिसने घमण्ड से सारे संसार को तिनके की तरह नगण्य समझ रखा था, उसी राधापुत्र कर्ण को युद्धस्थल में मारने वाला यह मध्यम- पाण्डव अजुन आप दोनों को प्रणाम करता है। इत्युपक्रमे 'राजा-अरे नाहं भवानिव विकत्थनाप्रगल्भः । किन्तु- द्रत््यन्ति न चिरात्सुप्तं बान्घवास्त्वां रणाङ्गरौ।
राजा-अरे, मैं तुम्हारी तरह आत्मप्रशंसा करने में चतुर नहीं हूँ। लेकिन मेगी गदा से टूटी वक्षःस्थल की हड्डियों के समूह के कारण भीषण दिखाई पड़ते हुए तुम्हें तुम्हारे बान्धव शीघ्र ही युद्धभूमि में सोया पायेंगे। अथ गण्ड :- गण्ड: प्रस्तुतसम्बन्धिभिन्नार्थ सहसोदितम् ॥ १८ ॥ यथोत्तरचरिते-'राम :- इयं गेहे लक्षमीरियममृतवतिर्नयनयो- रसावस्याः स्पर्शो वपुषि बहलश्वन्दनरसः । १. चर्चरी, द्विपदीखण्डक आदि गीतों की शैलियां हैं, जैसे ध्रुपद, ख्याल, ठुमरी आदि हैं। २० द०
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अयं बाहु: कण्ठे शिशिरमसृणो मौक्तिकसर: किमस्या न प्रेयो यदि परमसह्यस्तु विरहः ॥' (प्रविश्य ) प्रतीहारी-देव उअ्र्प्रत्थिदो। ( 'देव उपस्थितः ।' ) राम :- अर्रयि कः?। प्रतीहारी-देवर्स आ्रसण्णपरिचारओर दुम्मुहो।' ( 'देवस्यासन्नपरिचारको दुर्मुखः।') इति। जहां प्रस्तुत विषय में सम्बद्ध अर्थ से भिन्न वस्तु एकदम उपस्थित हो जाय, वहां गण्ड होता है। (गण्ड वस्तुतः वह वाक्य है, जहाँ नाटककार भावी घटना का सक्केत किसी भिन्न विषय पर दे जाता है। पाश्चात्य नाटकों की 'ड्रेमेटिक आइरनी' से यह कुछ कुछ मिलता जुलता है।) जैसे उत्तररामचरित में राम के 'इसका विरह बड़ा असह्य है' यह कहते ही 'देव यह उपस्थित है' इस वाक्य के द्वारा भिन्नार्थ की एकदम उपस्थिति पाई जाती है। राम-यह सीता मेरे घर की लक्ष्मी है; मेरी आँखों को आनन्द देने वाली अमृत की शलाका है। इसका स्पर्श अङ्गों को इतना शीतल लगता है जैसे सघन चन्दन का लेप हो। सीता का यह बाहु कण्ठ में इस तरह मालूम देता है जैसे शीतल तथा कोमल मोतियों की माला हो। सीता की कौन वस्तु सुन्दर तथा प्यारी नहीं लगती, केवल इसका विरह ही असह्य है। प्रतीहारी (आकर)-महाराज, उपस्थित है। 5p राम-अरे कौन। प्रतीहारी-महाराज, आपका सेवक दुमुख। अथावस्यन्दितम्- रसोक्तस्यान्यथा व्याख्या यत्रावस्यन्दितं हि तत्। यथा छलितरामे-'सीता-जाद कलं क्खु तुम्हेहिं अजुज्फाए गन्तव्वं तहिं सो रा विणएण णमिदव्वों। ( 'जात कल्यं खलु युगभ्यामयोध्यायां गन्तव्यं तर्हि स राजा विनयेन नमितव्यः ।') लव :- अम्ब किमावाभ्यां राजोपजीविम्यां भवितव्यम् ? सीता-जाद सो क्खु तुहाणं पिदा। ('जात स खलु युवयोः पिता।') लवः-किमा- वयोः रघुपतिः पिता?। सीता- (साशङ्कम्) जाद ण क्खु परं तुह्माणं, सअलाए ज्जेव्व पुहवीए।' ( 'जात न खलु परं युवयोः, सकलाया एव पृथिव्याः ।') इति। जहां भावावेश (रस) के कारण किसी वाक्य का प्रयोग कर दिया जाय, और बाद में उस वाक्य की व्याख्या दूसरे ही ढङ्ग से कर वास्तविकता को छिपा दिया जाय, उसे अवस्यन्दित कहते हैं। जैसे छलितराम नाटक के निम्न स्थल में भावावेश में लव के सम्मुख सीता के मंह से यह बात निकल जाती है कि 'राम तुम्हारे पिता है'; पर वह बाद में इसकी व्याख्या दूसरे ही ढङ्ग से कर देती है, कि वे तुम्हारे ही नहीं सारी पृथ्वी के पिता हैं। सीता-तात, कल तुम्हें अयोध्या जाना है, वहाँ राजा को नम्रता से प्रणाम करना। लव-माता, क्या हमें राजा के नौकर बनना है? सीता-तात, वे तुम्हारे पिता हैं। लव-क्या रघुपति हमारे पिता हैं ? सीता-(आशक्का के साथ) तात तुम्हारे ही नहीं, सारी पृथ्वी के।
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अथ नालिका- सोपहासा निगूढार्था नालिकैव प्रहेलिका ॥ १॥क्म क फ यथा मुद्राराक्षसे-'चरः-हंहो बह्मण मा कुप्प किं पि तुह उअज्काओ जाणादि किं पि अ्रह्मारिसा जणा जाणन्ति। ('हंहो ब्राह्मण मा कुप्य, किमपि तवोपाध्यायो जानाति किमप्यस्मादृशा जना जानन्ति।') शिष्यः-किमस्मदुपाध्यायस्य सर्वजञत्वमप- हर्तुमिच्छसि। चर :- यदि दे उवज्काओ सव्वं जाणादि ता जाणादु दाव कस्स चन्दो अणभिप्पेदो त्ति। ('यदि त उपाध्यायः सर्व जानाति तज्जानातु तावत्, कस्य चन्द्रोऽनभिप्रेत इति ।' ) शिष्य :- किमनेन ज्ञातेन भवति।' इत्युपक्रमे 'चाणक्यः-चन्द्र- गुप्तादपर क्तान्पुरुषाज्ञानामि ।' इत्युक्तं भवति। हास्य से युक्त, छिपे अर्थ वाली पहेली भरी उक्ति को ही नालिका कहते हैं। जैसे विशाखदत्त के मुद्राराक्षस नाटक में हास्य से युक्त तथा गूढार्थ पहेली 'बताओ चन्द्र किसे अच्छा नहीं लगता' इसका प्रयोग चर के द्वारा किया जाता है जहाँ चन्द्र का गूढार्थं चन्द्रगुप्त (मौर्य) से है। चर :- अरे ब्राह्मण, गुस्सा न करो, कुछ तो तुम्हारे आचार्य चाणक्य जानते हैं, कुछ हम जैसे लोग हो जानते हैं। शिष्य-क्या तुम हमारे गुरु की सर्वज्ञता को चुनौती देने की इच्छा करते हो। चर-अगर तुम्हारे आचार्य सारी बातें जानते हैं, तो बतार्वें कि किस व्यक्ति को चन्द्र (चन्द्रमा; चन्द्रगुप्त) अच्छा नहीं लगता। शिष्य-इसे जानने से क्या फायदा। X X X चाणक्य-चन्द्रगुप्त से अप्रसन्न लोगों को मैं जानताह अथाऽसत्पलाप :- असम्बद्धकथाप्रायोऽसत्प्लापो यथोत्तरः। ननु चासम्बद्धार्थत्वेऽसङ्गतिर्नाम वाक्यदोष उक्त: ।तन्न-उत्स्वप्रायतमदोन्मादशेश वादीनामसम्बद्धप्रलापितव विभावो यथा- 'अचिष्मन्ति विदार्य वककुहराण्यासक्कतो वासुके- रकुल्या विषकर्बुरान्गणयतः संस्पृश्य दन्ताङ्कुरान्। एकं त्रीणि नवाष्ट सप्त षडिति प्रध्वस्तसंख्याक्रमा वाच: क्रौश्चरिपोः शिशुत्वविकलाः श्रेयांसि पुष्णन्तु वः ॥' जहां उटपटांग असम्बद्ध उक्ति तथा प्रलाप पाया जाय, वह असतपलाप नामक वीथ्यङ्क होता है। असम्बद्ध प्रलपित के बारे में यह शक्का की जा सकती है, कि नाटक में इसका पाया जाना दोष है, क्योंकि असम्बद्ध कथा में असङ्गति नामक वाक्यदोष आ जायगा। इस शङ्का का निरा- करण करते हुए वृत्तिकार धनिक कहते हैं कि उनींदे, मदमस्त, पागल तथा बालक पात्रों की बातचीत में असम्बद्ध प्रलपित पाया जाना स्वाभाविक ही है। जैसे निम्न स्थल में बालक कार्तिकेय का असम्बद्ध प्रलाप स्वाभाविक है। बालक कार्तिकेय बाललीला के कारण पिता शिव के गले में लटकते हुए वासुकी के १. 'यथोत्तरम्' इत्यपि पाठः।
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प्रकाशमय मुखों को ओठों पर से फाड़ देते हैं। उसके बाद वे उसके जहरीले तथा चित्रविचित्र दाँतों के अङ्करों को अङ्कुली से छू-छू कर गिनते हैं :- एक, तीन, नौ, आठ, सात, छः। इस तरह कार्तिकेय की गणना में संख्या का कोई क्रम नहीं पाया जाता। क्रौश के शत्रु कार्तिकेय की संख्या व्यतिक्रमयुक्त बचपन से तुतलाई हुई वाणी आप लोगों के कल्याण को पुष्ट तथा अभिवृद्ध करे। यथा च- 'हंस प्रयच्छ मे कान्तां गतिस्तस्यास्त्वया हता। विभावितैकदेशेन देयं यदभियुज्यते ।।' यथा वा- 'भुक्ता हि मया गिरयः स्नातोऽहं चहिना पिवामि वियत्। हरिहरहिरण्यगर्भा मत्पुत्रास्तेन नृत्यामि ।।' और जैसे प्रिया-विरह के कारण उन्मत्त पुरूरवा की इस उक्ति में- 'हे हंस, मुझे मेरी प्रिया को लौटा दे, उसकी चाल तूने छीन ली है। मेरी प्रिया के एकदेश (गति) को लेने वाले तेरे द्वारा मुझे जो कुछ लौटाने योग्य है, उसे लौटा देना ठीक होगा।' अथवा निम्न उन्मादोक्ति में- मैं पर्वतों को खा चुका हूँ, आग से नहा चुका हूँ, आकाश को पी रहा हूँ। ब्रझ्मा, विष्णु, महेश मेरे पुत्र हैं। इसलिए मैं नाच रहा हूँ। त्रथ व्याहार :- अन्यार्थमेव व्याहारो हास्यलोभकरं वचः॥ २० ॥ यथा मालविकाभिमित्रे लास्यप्रयोगावसाने-'(मालविका निर्गन्तुमिच्छति) विदूषक :- मा दाव उचएससुद्धा गमिप्ससि।' ( 'मा तावत् उपदेशशुद्धा गमिष्यसि') इत्युपक्रमे 'गणदास :- (विदूषकं प्रति) आप्रार्य उच्यतां यस्त्वया क्रमभेदो लक्षितः। विदूषक :- पढमं पच्चूसे बह्मणस्स पूत्रा भोदि सा तए लङ्खिदा (मालविका स्मयते)।' ('प्रथमं प्रत्यूषे ब्राह्मणस्य पूजा भवति सा तया लङ्ङिता।') इत्यादिना नायकस्य विश्रब्धना यिकादर्शनप्रयुक्तेन हास्यलोभकारिणा वचनेन व्याहारः। जहाँ हँसी के लोभ को उत्पन्न करने वाले ऐसे वाक्य का प्रयोग हो, जिसका अर्थ कुछ और ही हो, वह व्याहार कहलाता है। जैसे मालविकान्निमित्र में मालविका के द्वारा लास्य के प्रदर्शन किये जाने के बाद वह जाना चाहती है। इस पर विदूषक कहता है- 'तुम उपदेश से शुद्ध होकर (हमसे यह सीख कर) न चली जाना। कि गणदास-(विदूषक से) आर्य कोई गलती हुई हो तो कहें। विदूषक-पहले पहल प्रातः काल में ब्राह्मण की पूजा की जाती है। उसने उस पूजा का उछ्लङ्वन किया है। (मालविका मुसकुराती है।) यहाँ नायिका को विश्वास में डाल कर नायक को उसका दर्शन कराने के लिए प्रयुक्त वचन का प्रयोग विदूषक ने किया है, जो हास्यकारी है। अतः यहाँ व्याहार नामक वीथ्यज् है।
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अथ मृदवम्- दोषा गुणा गुणा दोषा यत्र स्युर्मृदवं हि तत्। यथा शाकुन्तले- 'मेदच्छेदकृशोदरं लघु भवत्युत्थानयोग्यं वपुः सत्त्वानामुपलच््यते विकृतिमच्चित्तं भयक्रोधयोः। उत्कर्ष: स च धन्विनां यदिषवः सिध्यन्ति लक्ष्ये चले मिथ्यैव व्यसनं वदन्ति मृगयामीदृग्विनोद: कुतः॥' इति भृगयादोषस्य गुणीकारः। जहां कोई पात्र गुणों को दोष बता कर तथा दोषों को गुण बता कर कहे, वह मृदव वीथ्यङ्ग है। जैसे शाकुन्तल के इस पद्य में राजा मृगया के दोषों की गुणों के रूप में रखता है :- लोग इस मृगया को झूठ में ही व्यसन (बुरी आदत) बताया करते हैं। भला इस जैसा आनन्द कहाँ मिल सकता है ? देखो, मृगया से शरीर की सारी चर्बी कम हो जाती है, पेट पतला हो जाता है, तथा शरीर उठने बैठने के योग्य हो जाता है। दूसरी ओर मृगया खेलने से जङ्गली पशुओं के चित्त व आकृति में भय तथा क्रोध के समय क्या-क्या विकार होते हैं, इसका ज्ञान प्राप्त होता है। तीसरे, मृगया खेलने में चञ्चल लक्ष्य को विद्ध करना पड़ता है, अतः उसके बाण चञ्चल लक्ष्य को विद्ध करने में सिद्ध हो जाते हैं, और यह धनुर्धारियों की बहुत बड़ी विशेषता है। यथा च-
गतनिद्रमविश्वासं जीवति राजा जिगीषुरयम् ।।' इति राज्यगुणस्य दोषीभावः। अथवा जैसे निम्न पद्य में राज्य के गुणों को दोष के रूप में वर्णित किया गया है- शश्चुओं को जीतने की इच्छा वाला यह राजा बड़े कष्ट के साथ जी रहा है-इसका मन कभी शान्त व स्थिर नहीं रहता, अनेक व्यथाएँ इसे क्लेश दिया करती हैं, इसे न तो नींद ही आती है, न किसी के प्रति यह विश्वास ही करता है। उभयं वा- 'सन्तः सच्चरितोदयव्यसनिनः प्रादुर्भवद्यन्त्रणाः सर्वत्रैव जनापवादचकिता जीवन्ति दुःखं सदा। अरव्युत्पन्नमतिः कृतेन न सता नैवासता व्याकुलो युक्तायुक्तविवेकशून्यहृदयो धन्यो जनः प्राकृतः ॥' इति प्रस्तावनाज्गानि। कभी-कभी दोनों-गुणों का दोषीभाव तथा दोषों का गुणीभाव एक-एक साथ भी पाये ना सकते हैं :- सच्चरित्रता के उदय की इच्छा वाले तथा इसीलिए सदा दुखी रहने वाले सज्जन लोग, ओ इमेशा लोगों के द्वारा की गई निन्दा से डरा करते हैं, बड़े दुःख व कष्ट के साथ जीवनयापना करते हैं। वस्तुतः सौभाग्यशाली तो वह प्राकृत (अज्ञानी) पुरुष है, जो मौके
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की बात को भी नहीं सोच पाता, जो अच्छे या बुरे काम से कभी व्याकुल नहीं होता और भले-बुरे के ज्ञान से जिसका हृदय शून्य रहता है।णू अणड T एषामन्यतनेनार्थ पात्रं वात्तिष्य सूत्रभृत् । २१। प्रस्तावनान्ते निर्गच्छेत्ततो वस्तु प्रपश्चयेत्। सूत्रधार इस प्रकार प्ररोचना, चीथी, प्रहसन, आमुख आदि किसी के द्वारा (भारती वृत्ति का आश्रय लेते हुए) काव्यार्थ अथवा नाटकीय पात्र की सूचना दे। उसका आक्षेप तथा परिचय दे देने पर प्रस्तावना के अन्त में वह रङ्गमञ्च से निष्कान्त हो जाय तथा तदनन्तर कथावस्तु को प्रपश्चित करे। तत्र-अभिगम्यगुरार्युक्तो धीरोदात्तः प्रतापवान्॥ २२॥ कीर्तिकामो महोत्साहस्त्रय्यास्त्राता महीपतिः। प्रख्यातवंशो राजषिर्दिव्यो वा यत्र नायकः ॥२३॥ TH छ तत्प्रस्यातं विधातव्यं वृत्तमत्राधिकारिकम्। यत्रेतिवृत्ते सत्यवागसम्वादकारिनी तिशास्त्रप्रसिद्धाभिगामि कादिगुणयुक्तो रामायण- महाभारतादिप्रसिद्धो धीरोदात्तो राजषिर्दिव्यो वा नायकस्तत्प्रख्यातमेवात्र नाटक आधि- कारिकं वस्तु विधेयमिति। यहां नाटक (रूपकविशेष) ही का प्रकरण चल रहा है। अतः नाटक के ही नायक तथा तत्सम्बन्ध वस्तु का ही सङ्केत करते हुए कहते हैं :- नाटक का नायक या तो प्रसिद्ध कुल में उत्पन्न राजर्षि भूपति होता है, जो उत्कृष्ट गुर्णी से युक्त होता है, धीरोदात्त प्रकृति का तथा प्रतापशील होता है। वह यश तथा कीर्ति की कामना किया करता है, उत्साह से युक्त होता है तथा तीनों वेदों (वैदिक परम्परा) का रक्षक होता है। अथवा नाटक का नायक कोई दिव्य-देवता-हो सकता है, जो इन सभी विशेषताओं से युक्त होता है। उस नायक के विषय में इतिहास पुराणादि में प्रसिद्ध कथावस्तु को ही नाटक की आधिकारिक वस्तु रखना चाहिए। (यदि कवि उसके सम्बन्ध में रसानुकूल कोई कल्पित वस्तु का सन्निवेश करना चाहता है, तो वह प्रासङ्गिक रूप में ही की जानी चाहिए।) जिस इतिहास प्रसिद्ध (प्रख्यात) वृत्त में इस तरह का, इन गुणों व विशेषताओं से सम्पन्न, नायक हो, वही वृत्त नाटक के उपयुक्त होता है। जिस कथा (इतिवृत्त ) में सत्यवादी, नीतिशास्त्र में प्रसिद्ध उच्च गुणों से युक्त तथा अनुचित कार्य न करने वाला रामायण महाभारतादि-बृहत्कथा आदि ग्रन्थों में भी-में प्रसिद्ध धीरोदात्त कोटि का राजा या दिव्य नायक पाया जाता है, उसी प्रसिद्ध कथा को यहाँ नाटक की आधिकारिक कथावस्तु बनाना ठीक होगा।F (जैसे शाकुन्तल की कथा का नायक दुष्यन्त धीरोदात्त राजर्षि है, कथा महाभारत में प्रसिद्ध है। उत्तररामचरित की कथा भी रामायणादि में प्रख्यात है, तथा इसके नायक धीरोदात्त राजर्षि हैं, वैसे अवतार के कारण उन्हें दिव्यशक्ति सम्पन्न होने से दिव्य भी माना जा सकता है। मुद्राराक्षस का नायक चन्द्रगुप्त धीरोदत्त राजा अवश्य है, यह दूसरी बात है कि उसमें-जिस रूप में वह वहाँ चित्रित हुआ है-उच्च कुलीनता नहीं मिलती है। फिर भी नन्द की मुरा दासी के पुत्र होने के कारण-प्रख्यातवंशत्व उसमें घटित हो ही जाता है। कथा भी बृहत्कथादि में प्रख्यात है ही।) e2 Sfx IrPIEpPiC
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तृतीय: प्रकाश:
यत्तत्रानुचितं किश्चिन्नायकस्य रसस्य वा ॥ २४॥ विरुद्धं तत्परित्याज्यमन्यथा वा प्रकल्पयेत्। यथा छझना वालिवधो मायुराजेनोदात्तराघवे परित्यक्तः। वीरचरिते तु रावण सौहृदेन वाली रामवधार्थमागतो रामेण हत इत्यन्यथा कृतः । नायक की प्रकृति (धीरोदात्तता) तथा नाटक के प्रमुख रस (वीर, या शङ्गार') के प्रतिकूल जो कोई बात उस इतिवृत्त में पाई जाती हो, कवि को चाहिए कि उसे इस तरह से परिवर्तित कर दे कि नायक के चरित्र का वह दोष न रहे, या रस का वह प्रतिकूल तत्व हट जाय। इस तरह की जो कोई अनुचित बात हो या तो उसे छोड़ ही दे या परिवर्तित करके नये रूप में रख दे। जैसे मायुराज ने अपने नाटक उदात्तराघव में राम के द्वारा छल से बालि का वध सवथा छोड़ दिया है, उसने इस घटना का हवाला ही नहीं दिया है। भवभूति के वीरचरित में रावण की मित्रता के कारण बाली राम के वध के लिए आता है, और राम उसे मार देते हैं, इस तरह वह घटना बदल दी गई है। यहाँ ध्यान देने की बात है कि राम जैसे दिव्यावतार तथा धीरोदात्त राजषि के उज्जवल तथा सात्विक चरित्र में बालि को छल से मारना कलङ है। (हम इसीका दूसरा उदाहरण अभिज्ञान शाकुन्तल से ले सकते हैं। पझमपुराण में जहाँ से यह कथा ली गई है दुर्वासा वाली घटना-शाप-का उल्लेख नहीं। इस प्रकार शकुन्तला की बिना किसी कारण भूल जाना दुष्यन्त की कामुकता व लम्पटता को सिद्ध कर उसके धीरोदात्तत्व को दूषित कर देता है। कविवर कालिदास ने धीरोदात्त दुष्यन्त के चरित्र को अकलुषित रखने के लिए दुर्वासा शाप को कल्पना की है :- रमरिष्यति तवां न स बोधितोऽपि सन्, कथां प्रमतः प्रथमं कृता मिव ।।) आधन्तमेवं निश्चित्य पञ्चधा तद्विभज्य च ॥ २५॥ खण्डशः सन्धिसंज्ञांञ्च विभागानपि खण्डयेत्। आ्र्पनौचित्यरसविरोधपरिहारपरिशुद्धीकृतसूचनीय दर्शनीयवस्तुविभागफलानुसारेणोप- क्लप्तबीज बिन्दुपताका प्रकरीकार्यलक्षणार्थप्रकृतिकं पच्चावस्थानुगुण्येन पञ्चधा विभजेत्। पुनरपि चैकैकस्य भागस्य द्वादश त्रयोदश चतुर्दशेत्येवमङ्गसंज्ञान् सन्धीनां विभागान्कुर्यात्। नाटक के रचयिता को चाहिए कि उस प्रख्यात कथा का आदि व अन्त कहां रखेगा इसका निश्चय कर ले। नाटक किस विशेष घटना से आरम्भ करेगा, और कहां जाकर समाप्त करेगा, इसे निश्चित कर लेने पर उसे सारी कथा को पांच भागों में बांट लेना चाहिए। ये पांच खण्ड ही पांच सन्धियां-मुख, प्रतिमुख, गर्भ, विमर्श, व निर्वहण हैं। इन सन्धियों को विभागों, अङ्गो में भी विभाजित कर देना चाहिए। जब रस व नायक के अनौचित्य व विरोध के परिहार से नाटकीय इतिवृत्त परिशुद्ध हो जाय तथा कवि इस बात का विभाग कर ले कि कथावस्तु में किन-किन बातों को उसे रङ्गमञ्न पर दिखाना है, किन-किन बातों की नहीं (अर्थात् किन-किन को विष्कम्भकादि के द्वारा सूचना ही देना है)। इसके अनुसार वहतिवृत्ति में बीज, विन्दु, पताका, प्रकरी तथा कार्य इन अर्थ प्रकृतियों की कल्पना करे, इस प्रकार की उपल्कृप्त वस्तु को आरम्भादि पाँच अवस्थाओं के अनुकूल पाँच डुकड़ों में-मुखादि पाँच सन्धियों में-बाँट दें। फिर इसके बाद १. दशरूपककार धनञन शान्त को रस नहीं मानते, अतः यहाँ हमने नहीं ।लिखा है। हम नाटक में शान्त के अङ्गी रूप को भी स्वीकार करते हैं।
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१६० दशरूपकम्
मुख व गर्भसन्धि को बारह, प्रतिमुख व विमर्श को तेरह तथा निर्वहण सन्धि को चौदह अङ्गों में विभक्त कर दे। [ नाटकीय कथावस्तु के आरम्भ से लेकर अन्त के विभागों को हम एक रेखाचित्र के द्वारा व्यक्त कर सकते हैं। गर्भ
मुख प्रतिमुख विमर्श निर्वहण नाटकीय कथावस्तु एक सरल या सीधी रेखा की तरह एक ही दिशा में नहीं चलती। प्रतिमुख तक वह सीधी चलती है और फिर वह फलप्राप्ति की इच्छा में उन्नतिशील होती है। गर्भसन्धि इसकी चरम सीमा है जिसके अन्तर्गत 'सङ्गर्ष' की स्थिति पाई जाती है। तदनन्तर वह नीचे आती है। विमर्श के बाद फिर वह सीधी होकर नायक के कार्य तथा फलप्राप्ति की और उन्मुख होती है। पाश्चात्य नाट्यशास्त्रियों में कुछ लोग इसी तरह की पाँच स्थितियाँ नाटक की कथावस्तु में मानते हैं। यह दूसरी बात है कि वहाँ अन्त सदा सुखान्त न होता हो। कुछ लोग तीन ही अवस्थाएँ मानते हैं-आरम्भ (Begining), सङ्गर्ष तथा उसकी चरम स्थिति (Climax ) तथा अन्त ( Denovement). ] चतुःषष्टिस्तु तानि स्युरङ्गानीत्यपरं तथा॥२६॥
अङ्गान्यत्र यथालाभमसन्धि प्रकरी न्यसेत्॥ २७।। अपरमपि प्रासङ्चिकमितिवृत्तमेकादैरनुसन्धिभिन्यूनमिति प्रधानेतिवृत्तादेकद्वित्रिचतु- र्भिरनुसन्धिभिन्यूनं पताकेतिवृत्तं न्यसनीयम्। अज्ञानि च प्रधानाविरोधेन यथालाभं न्यस- नीयानि। प्रकरीतिवृत्तं त्वपरिपूर्णसन्धि विधेयम्। इस प्रकार आधिकारिक इतिवृत्त के ६४ अङ्ग होते हैं। दूसरा प्रासङ्गिक इतिवृत्त है। इसके पताका नामक भेद में पांचों सन्धियां हों यह आवश्यक नहीं। वह प्रधान वृत्त की अपेक्षा, एक, दो, तीन या चार सन्धियों से न्यून हो सकता है। इसमें यथा- वश्यक रूप से अङ्गों का समावेश हो सकता है। प्रासङ्गिक कथा के प्रकरी नामक भेद में सन्धिसन्निवेश नहीं होना चाहिए। दूसरा प्रासङ्गिक इतिवृत्त एकादि सन्धियों से न्यून हो अर्थात् प्रधान इतिवृत्त से एक, दो, तीन या चार अनुसन्धियों से न्यून रूप में पताका इतिवृत्त का विन्यास करना चाहिए। इसके अङ्क यथावश्यक रूप में रखे जा सकते हैं, इस तरह कि प्रधान इतिवृत्त से उनका विरोध न पड़े। प्रकरी नामक प्रासङ्चिक इतिवृत्त में सन्धि की परिपूर्णता की जरूरत नहीं अतः उसमें सन्धि का विधान नहीं होना चाहिए। तत्रवं विभक्ते- आदौ विष्कम्भकं कुर्यादङं वा कार्ययुक्तितः। इयमत्र काययुक्तिः- अपेत्षितं परित्यज्य नीरसं वस्तुविस्तरम् ॥ २८।।
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तृतीय: प्रकाश: १६१ आरी यदा सन्दशयेच्द्रेषं कुर्याद्विष्कम्भकं तदा।AकE मिह यदा तु सरसं वस्तु मूलादेव प्रवर्तते ॥ २६॥ का आदावेव तदाङ: स्यादामुखात्ेपसंश्रयः इतिवृत्त का इस प्रकार विभाजन कर लेने पर कवि नाटक के आरम्भ में कार्य की युक्ति के अनुसार या तो विष्कम्भक की योजना करे या अङ्क की व्यवस्था करे। यह योजया कार्य के आधार पर होगी। यदि आरम्भिक कथांश नीरस है किन्तु उनकी आवश्यकता नाटक की वस्तु को गतिविधि देने के लिए होती ही है, तो ऐसी दशा में कवि को चाहिए कि नीरस किन्तु आवश्यक वस्तु- विस्तार को छोड़कर जब वह कथावस्तु के शेषांश को रक्षमन्न पर दिखाना चाहे तो वह उस नीरस कमांश की सूचना देने के लिए विष्कम्भक का सन्निवेश करे। यदि कथावस्तु में आरम्भ से ही रसमय वस्तु पाई जाती है, तो ऐसी दशा में विष्कम्भक का प्रयोग करना ठीक नहीं। ऐसी स्थिति में शुरू में ही अङ्क का सन्निवेश करना चाहिए तथा प्रयोगातिशय आदि आमुख भेदों के आधार पर आरम्भ में ही पात्रप्रवेश कर देना चाहिए।कगा] [ जैसे मालतीमाधव के आरम्भ में नीरस वस्तु की सूचना के लिए विष्कम्भक की योजना पाई जाती है, जहाँ भगवती (तापसी) आकर भूत वस्तु की सूचना देती है, तब प्रकरण आरम्भ होता है। शाकुन्तल में आरम्भ से ही सरस कथावस्तु का सन्निवेश पाया जाता है, अतः नाटक अङ्क से शुरू किया गया है। ] सच- प्रत्यक्षनेतृचरितो बिन्दुव्याप्तिपुरस्कृतः॥ ३० ॥ अङ्को नानाप्रकारार्थसंविधानरसाश्रयः। #रजप्रवेशे साक्षान्निर्दिश्यमाननायकव्यापारो बिन्दूपक्षेपार्थपरिमितोSनेकप्रयोजनसंवि- धानरसाधिकरण उत्सज्न इवाङ्क: । विष्कम्भक व अङ्क का भेद बताते हुए कहते हैं कि अङ्क में नाटकादि के नायक का चरित प्रश्यक्ष रूप से पाया जाता है। या तो वह स्वयं मञ्ज पर आता है या मञ् पर घटित घटना उसके चरित्र से सात्तात् सम्बद्ध होती हैं। उसमें बिन्दु नामक अर्थ प्रकृति डयाप्त पाई जाती है तथा वह नाना प्रकार के नाटकीय प्रयोजन के सम्पादन तथा रस दोनों का आश्रय होता है। पात्र के रङ्ग मञ्र पर प्रवेश करने पर जहाँ साक्षात रूप से नायक का व्यापार मख् पर दिखाया जाता है, जहाँ बिन्दु का उपक्षेप पाय। जाता है, तथा अनेक प्रकार के प्रयोजन का विधान रहता है तथा जिसमें रस स्थित रहता है, उसे अक्क कहते हैं। चूँकि इसमें बिन्दु, नायक का व्यापार तथा रसादि ठीक उसी तरह रहते हैं जैसे गोद में-इसीलिए इसे 'अङ्क' (गीद, उत्सङ्ग) (उपमान के आधार पर) कहा जाता है। तत्र च- अनुभावविभावाभ्यां स्थायिना व्यभिचारिभिः॥३१॥ गृहीतमुक्तै: कर्तव्यमङ्गिनः परिपोषणम्। अज्विन इत्यज्गिरसस्थायिन: संग्रहात्स्थायिनेति रसान्तरस्थायिनो ग्रहणम्। गृहीत- मुक्तः परस्परव्यतिकीणैरित्यर्थः । इस प्रकार अङ्कव्यवस्था के बाद कवि को चाहिए कि नाटक के अङ्गी रस को पुष्ट २१ द०
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१६२ दशरूपकम् बनावे, उसका परिपोषण करे। यह रस की पुष्टि वह अनुभाव, विभाव तथा व्यभिचारि- भाव एवं स्थायी भाव के द्वारा करें। इनमें से वह कुछ को ले सकता है, कुछ को छोड़ सकता है, इस तरह उन विभिन्न अनुभावों, विभावों तथा सज्जारियों का मिश्रण व त्याग वह आवश्यकतानुसार कर सकता है। यहाँ मूलकारिका के 'अङ्गिनः' इस पद से अङ्गी रस के साथ ही साथ उसके स्थायीभाव का भी ग्रहण हो जाता है; इसलिए कारिका 'स्थायिना' पद से रसान्तरस्थायी-अङ्गिस्थायी से भिन्न स्थायीभाव-का ग्रहण करना चाहिए। गृहीतमुक्त का अर्थ परस्पर अमिश्रित होने से है। -कछ हज़न चातिरसतो वस्तु दूरं विच्छिन्नतां नयेत्॥ ३२ ॥
TF रस का इतना अधिक परिपोष भी न किया जाय कि कथावस्तु ही विच्छिन्न हो जाय; और न वस्तु, अलङ्कार या नाटकीय लक्षणों से रस को ही तिरोहित कर दिया जाय। [नाटक के सम्बन्ध में रस व वस्तु दोनों महत्त्वपूर्ण वस्तु हैं, अतः दोनों में समुचिन सन्तुलन करने से ही नाटक की परिपूर्णता होगी।] उR क एको रसोऽङ्गी कर्तव्यो वीरा शृङ्गार एवघा ॥ ३३ ॥ T अङ्गमन्ये रसाः सर्वे कुर्यान्निर्वहरोऽद्भुतम्। ननु च रसान्तरस्थायिनेत्यनेनैव रसान्तराणामङ्गत्वमुक्तम्, तन्न-यत्ररसान्तर- स्थायी स्वानुभावविभावव्यभिचारियुक्तो भूयसोपनिबध्यते तत्र रसान्तराणामङ्गत्वम्, केव- लस्थाय्युपनिबन्धे तु स्थायिनो व्यभिचारितव। नाटक में अङ्गी रस एक ही उपनिबद्ध होना चाहिए; वह या तो शङ्गार हो सकता है या वीर। अङ्ग रूप में और सभी रसों का निबन्धन हो सकता है। निर्वहण सन्धि में अद्भुत रस का उपनिबन्धन किया जाना चाहिए। क यहाँ दूसरे रसों के अङ्गत्व के विषय में इस कारिका में जो उल्लेख किया गया है, उसमें पूर्वपक्षी को पुनरुक्ति दोष दिखाई पड़ता है। इसी शक्का को उठाते हुए वह कहता है। ती की ऊपर की ३१ वीं कारिका में स्थायी (भाव) का रसान्तरगतत्व [निर्दिष्ट हो चुका है। स्थायी का ही परिपाक रस है, अतः उससे ही अङ्गी रस में दूसरे रसों की अक्गता स्पष्ट हो ही जाती है। (फिर-फिर से रसान्तरों का अङ्गी रस में अङ्गत्व निरदिष्ट करना, पुनरुक्ति नह्दीं है, तो और क्या ?) का इसी का उत्तर देते हुए सिद्धान्तपक्षी बताता है कि वस्तुतः यह बात नहीं है। ३१ वीं कारिका के स्थायी के उल्लेख में रस का समावेश नहीं होता। क्योंकि दोनों की अवस्था भिन्न है। जहाँ किसी दूसरे रस का स्थायी इस ढङ् से उपनिबद्ध किया जाय, कि वह अपने अनुकूल अनुभाव, विभाव तथा व्यभिचारी से युक्त हो, तथा उसका निबन्धन अच्छी तरह किया गया हो, वहाँ दूसरे रसों का अङ्गत्व माना जायगा। जहाँ केत्रल (अनुभावादिहीन) स्थायी का निबन्धन हो वहाँ स्थायी का अङ्गत्व है, तथा वहाँ स्थायी भाव एक प्रकार से व्यभिचारी भाव का ही काम करता है। १. नाय्यशास्त्र में भरत ने नाटकों के सम्बन्ध में ३२ लक्षण माने हैं, इन्हें नाट्यालक्कार भी कहते हैं। अलक्कारों से तात्पर्य शब्दालक्कार व अर्थालक्कार से है। २. ध्यान रखिये धनज्य शान्त रस को नहीं मानते, न उसका सन्निवेश अङ्गी रूप में नाटक में ही मानते हैं। शष की प्जाए कि म
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दूराध्वानं वधं युद्धं राज्यदेशादिविप्लवम् ॥३४॥। संरोधं भोजनं स्नानं सुरतं चानुलेपनम्। S317य अम्वरग्रहणादीनि प्रत्यक्षाणि न निर्दिशेत्॥।३५॥ अङ्कैनैंवोपनिबन्नीत, प्रवेशकादिभिरेव सूचयेदित्यर्थः।अणाककजा कुत इस प्रकार रस का वस्तु में सन्निवेश कर लेने पर, कवि को इसे समझ लेना होगा कि कुछ बातें मध पर बताने की नहीं है; यथा-लम्बी सफर, वध, युद्ध, राज्य व देश की क्रान्ति, पुरी का घेरा डाल देना, भोजन, स्नान, सुरत, उबटन लगाना, वस्त्रों का पहनना आदि वस्तुओं को प्रत्यक्ष रूप से मञ्ज पर नहीं बताना चाहिए। इन बातों का उपनिबन्धन अङ्कों के द्वारा कभी न करे, हाँ प्रवेशकादि सूचकों के द्वारा इनकी सूचना दी जा सकती है। नाधिकारिवधं क्वापि त्याज्यमावश्यक न च। अधिकृतनायकवधं प्रवेशकादिनापि न सूचयेत्, आवश्यकं तु देव पितृकार्याद्यवश्य- मेव क्वचित्कुर्यात्। अधिकारी नायक के वध की सूचना प्रवेशकादि के द्वारा भी न दे, वैसे आवश्यक वस्तु देव-पितृ-कार्य आदि का निबन्धन अवश्य करे, उस आवश्यक वस्तु की उपेक्षा न करे। एकाहाचरितैकार्थमित्थमासन्ननायकम्॥ ३६॥ पात्रैस्त्रिचतुरैरक्कं तेषामन्तेऽस्य निर्गमः । एकदिवसप्रवृत्तैकप्रयोजनसम्बद्धमासन्ननायकमबहुपात्रप्रवेशमङ्कं कुर्यात्, तेषां पात्रा- णामवश्यमङ्कस्यान्ते निर्गमः कार्यः । काज अब अङ्क के विभाजन उसकी वस्तु की समय-सीमा तथा पात्र संख्या का उत्लेख करते कहते हैं :-- एक अङ्क में वस्तु की योजना इस ढद्ग की हो कि वह केवल एक ही दिन की घटना (चरित) से सम्बद्ध हो, साथ ही एक ही प्रयोजन या एक ही अर्थ से सम्बद्ध हो। उसमें नाटक का नायक आसन्-समीपस्थ-हो तथा अधिक पात्रों की भीड़ का प्रवेश न कराया जाय, केवल तीन या चार ही पात्र वहाँ प्रवेश करें। अङ्क के अन्त में इन सारे पात्रों का निर्गम कर दिया जाय-ये सारे ही पात्र अङ्क के समाप् होते समय मञ्च से निष्क्रान्त हो जावें। १. 'अस्त्नस्य' इत्यपि पाठः। २. यहाँ यह बात याद रखने की है कि पाश्चात्य नाय्यशास्त्र, वध, युद्ध, संरोध आदि को मञ्न पर दिखाना अनुचित नहीं समझते, बल्कि त्रासद (Tragedies) नाटकों में तो वे इन्हें मञ्च पर अवश्य दिखाते हैं। ३. पास्त्रात्य यवन नाट्यशास्त्र अरस्तू ने नाटकों के लिए 'अन्विति-त्रय' (थ्री यूनिटीज़) की आवश्यकता मानी है। भारतीय नाय्यशास्त्र में अङ्क में एक ही दिन को घटना का, तथा एक ही प्रयोजन का सन्निवेश, क्रमशः कालान्विति (यूनिटी आव् टाइम) तथा कार्यान्विति (यूनिटी आव् एक्शन) से सम्बद्ध है। इसके अतिरिक्त भारतीय नाटक के अक्कों की एक दृश्यता (जिन में दृश्यों का विभाजन नहीं होता है) स्थलान्विति (यूनिटी आव् प्लेस) को भी पूरा करती ही है।।
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पताकास्थानकान्यत्र बिन्दुरन्ते च बीजवत्॥।३७॥ एवमङ्का: प्रकर्तव्याः प्रवेशादिपुरस्कृताः। पश्चाङ्कमेतदवरं दशाङं नाटकं परम्॥ ३८॥ इत्युक्तं नाटकलक्षणम्। इस नाटक में भावी भावों के सूचकों-पताकास्थानकों का भी सन्निवेश होना चाहिए। इसमें बिन्दु नामक अर्थ प्रकृति का प्रयोग हो, तथा अन्त में बीज का परामर्श पाया जाय। इस प्रकार अङ्कों की योजना की जाय, जिनमें पात्रों का प्रवेश व निर्गम समुचित रूप से किया जाय। नाटक के अङ्कों की संख्या पाँच अङ्कों या दस अङ्कों की होती है। इसमें पाँच अङ्कों का नाटक निम्न कोटि का होता है, दस अङ्कों का श्रेष्ठ। [नाटकों को देखने पर पाँच से लेकर दस तक अङ्कों वाले नाटक पाये जाते हैं। अधिकतर संस्कृत नाटक सप्ताङ्क है :- यथा शाकुन्तल, उत्तररामचरित, मुद्राराक्षस। वेणीसंहार में छः अङ्क हैं, तथा विक्रमोर्वशीय में पाँच। वैसे हनुमन्नाटक में चौदह तक अक्क पाये जाते हैं। पर मोटे तौर पर नाटक में अङ्क संख्या ५ से १० तक पायी जाती है।] यहाँ तक नाटक के लक्षण कहे गये। अथ प्रकरणो वृत्तमुत्पाद्यं लोकसंश्रयम्। अमात्यविप्रवणिजामेकं कुर्याच्च नायकम्॥ ३६॥ धीरप्रशान्तं सापायं धर्मकामार्थतत्परम्।
कविबुद्धिविरचितमितिवृत्तं लोकसंश्रयम् = अ्र्प्रनुदात्तम् अर्रमात्याद्यन्यतमं धीरप्रशान्त- नायकं चिपदन्तरितार्थसिद्धिं कुर्यात् प्रकररो, मन्त्री अमात्य एव। सार्थवाहो वणिग्वि- शेष एवेति स्पष्टमन्यत्। नाटक के बाद प्रकरण का लक्षण तथा विशेषताएँ बताते हैं :- प्रकरण का इतिवृत्त कल्पित तथा लोकसंश्रय होता है। लोकसंश्रय का तात्पर्य यह है कि यह राजा आदि की कथा न होकर मध्यम वर्ग के सामान्य व्यक्ति की कथा होती है। इसका नायक मन्त्री, ब्राह्मण या बनिये में से कोई एक हो सकता है। यह नायक धीरप्रशान्त कोटि का होता है, तथा विश्नों से युक्त होता है। यह नायक धर्म, अर्थ तथा काम (त्रिवर्ग) में तत्पर होता है। इसके अन्दर सन्धि, प्रवेशक तथा रसादि का समावेश ठीक नाटक की ही तरह होता है। इसका इतिवृत्त कवि बुद्धि विरचित तथा लोकसंश्रय अर्थात् अनुदात्त होता है। मन्त्री आादि में से कोई एक इसका नायक होता है, वह धीरप्रशान्त होता है, तथा उसके कार्य की सफलता विम्नों से अन्तहिंत होती है। मन्त्री अमात्य ही होता है, सार्थवाह बनिया है। और सब स्पष्ट है। [मृच्छकटिक प्रकरण की कथा कल्पित है तथा लोकसंश्रय भी। इसका नायक चारुदत्त ब्राह्मण है, धीरप्रशान्त है। इसका रस शरृङ्गार है। मालतीमाधव की कथा भी कल्पित है। उसका नायक भी ब्राह्मण है, तथा धीरप्रशान्त है। दोनों में कार्य सिद्धि विपदन्तर्हित है- एक में शकार की दुष्टता के कारण, दूसरे में मालती के पिता के वैर तथा नियति की विडम्बना के कारण, जिसमें मालती अघोरघण्ट कापालिक के फन्दे में फँस जाती है।] नायिका तु द्विधा नेतु: कुलस्त्री गणिका तथा।
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तृतीय: प्रकाश: १६५ क्वचिदेकैव कुलजा वेश्या क्वापि दयं कचित्॥४१॥ कुलजाभ्यन्तरा, बाह्या वेश्या, नातिक्रमोऽनयोः।कघा आभि: प्रकरणं त्रेधा, सङ्कीण धूर्तसङ्कलम्॥४२॥ कक् िकाप्रनी
वेशो भृतिः सोऽस्या जीवनमिति वेश्या तद्विशेषो गणिका। यदुक्तम् 'आभिरभ्यर्थिता वेश्या रूपशीलगुणान्विता। RE I लभते गणिकाशब्दं स्थानं च जनसंसदि॥' एवं च कुलजा वेश्या उभयमिति त्रेधा प्रकररो नायिका। यथा वेश्यैव तरजदत्त कुलजैव पुष्पदूषितके, ते द्वेऽपि भृच्छकटिकायामिति। कितवद्यूतकादिघूर्तसङ्कलं तु मृच्छ- कटिकादिवत्सङ्कीर्णप्रकरणमिति। प्रकरण के नायक की नायिका दो तरह की हो सकती है-या तो वह कुलीन स्त्री हो या गणिका हो। किसी प्रकरण में अकेली कुलस्त्री ही नायिका हो सकती है, कहीं अकेली वेश्या ही। किन्हीं प्रकरणों में एक साथ दोनों-कुलस्त्री व गणिका-नायिका रूप में पाई जा सकती है। कुलस्त्री आभ्यन्तर नायिका होती है, वेश्या बाहरी नायिका। इस प्रकार प्रकरण की नायिका या तो कुलस्त्री या गणिका या दोनों होंगी इनका व्यतिक्रम नहीं किया जा सकता। इस तरह प्रकरण तीन तरह का हो जाता है- कुलजानिष्ठ, गणिकानिष्ठ, उभयानिष्ठ। जिस प्रकरण में धूर्त-विट शकारादि का समावेश होता है वह प्रकरण सङ्कीर्ण (मिश्रित) होता है। वेश्या शब्द की व्युत्पत्ति बताते हुए वृत्तिकार बताता है कि जिसका भरणपोषण-वेश- हो जीवन है, वह वेश्या कहलाती है। गणिका वेश्या का ही भेद है। जैसा कि कहा गया है :- 'इन व्यक्तियों के द्वारा प्राथित, रूप शील तथा गुण से युक्त वेश्या ही गणिका कहलाती है तथा वह सभाओं में स्थान प्राप्त करती है।' इस तरह प्रकरण में-कुलजा, वेश्या, दोनों-तीन तरह की नायिका होती है। जैसे तरबदत्त प्रकरण में वेश्या नायिका है; पुष्पदूषितक में कुलजा नायिका है, तथा मृच्छकटिक में दोनों है। धूर्त, जुआरी आदि पात्रों से सककुल होने पर प्रकरण सङ्कीर्ण कोटि का होता है, जैसे मृच्छकटिक। [मालतीमाधव की नायिका मालती कुलजा है, मृच्छकटिक या भास के चारुदत्त की वसन्तसेना वेश्या है, चारुदत्त वधू ब्राह्मणी कुलजा।] अथ नाटिका- लक्ष्यते नाटिकाष्यत्र सङ्कीर्णान्यनिवृत्तये। IP 財 飯 अत्र केचित्- 'अनयोश् बन्घयोगादेको भेद: प्रयोक्कृमिर्जेयः । प्रख्यातस्त्वितरो वा नाटीसंज्ञाश्रिते काव्ये।।' इत्यमुं भरतीयं श्लोकम् 'एको भेदः प्रख्यातो नाटिकाख्य इतरस्त्वप्रख्यातः प्रकर- णिकासंज्ञो नाटीसंज्ञया द्वे काव्ये आश्रिते' इति व्याचक्षाणाः प्रकरणिकामपि मन्यन्ते तद- सत्। उद्देशलक्षणयोरनभिधानात्। समानलक्षणत्वे वा भेदाभावात, वस्तुरसनायकानां प्रकरणाभेदात् प्रकरणिकायाः, अतोऽनुद्दिष्टाया नाटिकाया यन्मुनिना लक्षणं कृतं तत्राय- मभिप्रायः-शुद्धलक्षणसङ्करादेव तल्जक्षरो सिद्ध लक्षणकरणं सङ्कीर्णानां नाटिकैव कर्त- व्येति नियमार्थं विज्ञायते।
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१६६ दशरूपकम् यहाँ नाटक तथा प्रकरण दोनों के लक्षण का निर्देश करने के बाद इनके सङ्कीणं भेद नाटिका (उपरूपक) का उल्लेख करते हुए कहते हैं कि दूसरे उपरूपक का निराकरण करने के लिये यहीं पर सक्कीर्ण (मिश्रित) नाटिका का लक्षण कर देते हैं। कुछ लोग सक्कोण उपरूपकों में नाटिका, तथा प्रकरणिका दो भेदों को मानते हुए प्रकर- णिका नामक भेद को भी मानते हैं। इसके प्रमाण स्वरूप वे भरत के इस श्लोंक को देते हैं :- 'अनयो .*... काव्ये'। इस शरोक का अर्थ वे यों करते हैं कि 'नाटक व प्रकरण इन दोनों के योग से काव्य के दो भेद होते हैं-एक भेद प्रख्यात है-नाटिका; तथा दूसरा अप्रसिद्ध प्रकरणिका है। दोनों नाटी इस संज्ञा से अभिहित होते हैं।' वृत्तिकार धनिक को यह मत स्वीकार नहीं। वे तो प्रकरणिका को अलग भेद मानने से सहमत नहीं। उनका कहना है कि भरत के उद्धृत श्रौक में प्रकरणिका का नाम (उद्देश) व लक्षण दोनों नहीं पाये जाते। इसका कारण यह है कि प्रकरण के समान ही लक्षण प्रकरणिका में पाये जाते हैं तथा उनमें कोई भिन्नता नहीं। साथ ही प्रकरणिका के वस्तु, रसतथा नायक प्रकरण से अभिन्न होते हैं। नाटिका का लक्षण मुनि भरत ने इसलिए किया है कि वे उस पर कुछ जोर देना चाहते हैं। वैसे तो नाटिका का लक्षण शुद्ध रूपकों (नाटक व प्रकरण) के लक्षणों के सक्कर-मिश्रण से ही सिद्ध हो जाता है, पर फिर भी उसका अलग से लक्षणकरण इस बात का नियमन करता है कि सक्कीणं उपरूपक त्रोटकादि में विशेषतः कवि को नाटिका की ही योजना करनी चाहिए। तमेव सङ्करं दर्शयति- तत्र वस्तु प्रकरणान्नाटकान्नायको नृपः ॥४३॥ प्रख्यातो धीरललितः शङ्गारोऽङ्गी सलक्षणः। उत्पाद्येतिवृत्तत्वं प्रकरणधर्म:, प्रख्यातनृपनायकादित्वं तु नाटकधर्म इति, एवं च नाटकप्रकरणनाटिकातिरेकेण वस्त्वादे: प्रकरणिकायामभावादङ्कपात्रभेदात् यदि भेद- स्तत्र (तदा)। इसी सङ्कर को बताते हैं कि-नाटिका की कथावस्तु प्रकरण से ली जाती है अर्थात् वह कविकल्पित होती है। उसका नायक नाटक से गृहीत होता है, वह राजा होता है। वह प्रख्यातवंश तथा धीरललित होता है। इसका अङ्गीरस शद्धार होता है। कल्पित इतिवृत्त का होना प्रकरण की विशेषता है, प्रख्यात नृप का नायक होना नाटक की विशेषता। इस तरह नाटक, प्रकरण, नाटिका के अतिरिक्त वस्तु आदि के भेद के अभाव से प्रकरणिका कोई अलग भेद नहीं जान पड़ता। वैसे अक्कों व पात्रों के भेद से ही अलग भेद माना जाय, तो फिर भेदगणना असीम हो जायगी। रूपकों व उपरूपकों के अनेक व् अनन्त भेद हो जायँगे। स्त्रोप्रायचतुरङ्कादिभेदकं यदि चेष्यते।। ४४॥ एक द्वित्यङ्कपात्रादिमेदेनानन्तरूपता। तत्र नाटिकेतिस्त्रीसमाख्ययौचित्यप्राप्तं स्त्रीप्रधानत्वम्, कैशिकीवृत्त्याश्रयत्वाच तदन्- संख्ययाSल्पावमर्शत्वेन चतुरङ्कत्वमप्यौचित्यप्राप्तमेव। स्त्री प्राय (स्त्री पात्रों की प्रधानता) तथा चार अङ्क ये नाटिका की विशेषता हैं। इनके कारण प्रकरणिका को भिन्न माना जाय तो एक, दो, तीन अङ्कों या पात्रों के भेद से अनन्तरूप-रूपकों के हो जायेंगे।
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नाटिका की संज्ञा में स्त्रीत्व का प्रयोग इस बात का सूचक है कि इसमें स्त्रीपात्रों की प्रधानता है। इसमें कैशिकी वृत्ति का आश्रय लिया जाता है, उसके नर्मादि चार अङ्ग हैं, तथा नाटिका में अवमर्श नामक सन्धि बहुत अल्प होती है, इसलिए इसमें चार अङ्कों का सन्निवेश उचित ही जान पड़ता है। विशेषस्तु- देवी तत्र भवेज्ज्येष्ठा प्रगल्भा नृपवंशजा।। ४५॥ गम्भीरा मानिनी, कृच्छ्रात्तदशान्नेतृसङ्गमः। नाटिका में कुछ विशेषता होती है :- इसमें दो नायिका होती हैं। ज्येष्ठा नायिका देवी (महारानी) होती है, जो राज 'श में उत्पन्न तथा प्रगल्भ प्रकृति की होती है। वह बड़ी गम्भीर तथा मानिनी होती है। नायक का कनिष्ठा नायिका के साथ सङ्गम बड़े कष्ट से होता है, वह सङ्गम इसी ज्येष्ठा देवी के अधीन होता है। प्राप्या तु की नायिका तादशी मुग्धा दिव्या चातिमनोहरा ॥ ४६ ॥ तादृशीति नृपवंशजत्वादिधर्मातिदेशः। नायिका भी ज्येष्ठा की भांति ही नृपवंशजा होती है, किन्तु वह मुग्धा होती है- (प्रगल्भ, गम्भीर या मानिनी नहीं) वह अत्यधिक मनोहर तथा सुन्दर होती है। [रत्नावली नाटिका का नायक राजा उदयन है, उसकी ज्येष्ठा नायिका वासवदत्ता नृपवंशजा है। प्रकृति से वह गम्भीर, प्रगल्भ, तथा मानिनी है। उदयन व रत्नावली का समागम उसी के वश में है। रत्नावली (सागरिका) भी नृपवंशोत्पन्न है-वह मुग्धा तथा सुन्दरी है।] अन्तःपुरादिसम्बन्धादासन्ना श्रुतिदर्शनैः। अनुरागो नवावस्थो नेतुस्तस्यां यथोत्तरम्॥। ४७ ॥ नेता तत्र प्रवर्तेत देवीतासेन शङ्कितः। तस्यां मुग्धनायिकायामन्तःपुरसम्बन्धसज्गीतकसम्बन्घादिना प्रत्यासन्नायां नायकस्य देवीप्रतिबन्धान्तरित उत्तरोत्तरो नवावस्थानुरागो निबन्धनीयः। अन्तःपुर आदि के सम्बन्ध के कारण वह नायिका राजा के श्रुतिपथ तथा दष्टिपथ में अवतरित होती है। उसे देखकर तथा उसके बारे में सुनकर राजा उसको प्रेम करने लगता है। यह प्रेम-अनुराग आरम्भ में नवीन होता है, धीरे-धीरे वह परिपक्क होता जाता है। नायक यहां पर सदा महारानी के भय से शङ्कित रहता है-(फलतः उसकी अनुरागचेष्टा छिप छिप कर चला करती है।) इस मुग्धा नायिका को अन्तःपुर में सङ्गीत आदि के समय नायक समीप पाकर उसके प्रति प्रेम करने लगता है। यह प्रेम देवी के प्रतिबन्ध के कारण छिपा रहता है, पर उत्तरोत्तर बढ़ता रहता है। नाटिका में नायक के इस प्रकार के अनुराग का निबन्धन होना चाहिए। कैशिक्यङ्गैश्धतुर्भिश्च युक्ताङ्केरिव नाटिका॥ ४३॥८
इस नाटिका में कैशिकी के चार अङ्ग-नर्म, नर्मस्फिज, नर्मस्फोट तथा नर्मगर्भ प्रयुक्त होते हैं, तथा तदुपयुक्त चार अङ्कों की योजना की जाती है। १. 'प्राप्यान्य' इत्यपि पाठः।
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१६म दुशरूपकम्
नाटिका वह है जहाँ हर अङ्क में उपर्युक्त लक्षण वाले कैशिकी वृत्ति के चार अङ्गों नर्मादि का सन्निवेश किया जाय। [ नाटिका के उदाहरण स्वरूप-रतनावली, प्रियदर्शिका, विह्णकृत कर्णसुन्दरी, आदि काव्य दिये जा सकते हैं। इसी का एक विशेष प्रकार का भेद सट्टक माना जा सकता है, जहाँ केवल प्राकृत भाषा का ही प्रयोग होता है सट्टक का उदाहरण राजशेखर की क्पूरमअरी है।] अथ भाण :- भाणस्तु धूर्तचरितं स्वानुभूतं परेण वा। यत्रोपवर्णायेदेको निपुणः पण्डितो विटः॥ ४६॥
किनिशर सम्बोधनोक्तिप्रत्युक्ती कुर्यादाकाशभाषितैः। सूचयेद्वीरशङ्गारौ शौर्यसौभाग्यसंस्तवैः॥ ५० ॥ भूयसा भारती वृत्तिरेकाङ्क चस्तु कल्पितम्। मुखनिर्वहरो साङ्गे लास्याङ्गानि दशापि च ॥ ५१ ॥ धूर्ताक्षौरद्यूतकारादयस्तेषां चरितं यत्रैक एव विटः स्वकृतं परकृतं वोपवर्णयति स भारतीवृत्तिप्रधानत्वाद्ाणः । एकस्य चोक्तिप्रत्युक्तय आकाशभाषितराशङ्कितोत्तरत्वेन भवन्ति। अस्पष्टत्वाच्च वीरशङ्गारौ सौभाग्यशौर्योपवर्णनया सूचनीयौ। अब प्रसङ्गोपात्त भाण नामक रूप का लक्षण उपनिबद्ध करते हैं :- भाण वह रूपक है जहां कोई अत्यधिक चतुर तथा बुद्धिमान् (पण्डित) विट (एककलापारङ्गत व्यक्ति) अपने द्वारा अनुभूत अथवा किसी दूसरे के द्वारा अनुभूत धूर्तचरित का वर्णन करे। यहां पर सम्बोधन, उक्ति व प्रत्युक्ति का सन्निवेश आकाश- भाषित से किया जाता है। यहां पर कोई दूसरा पात्र नहीं होता। वही विट आकाश- भाषित के द्वारा किसी से भाषण या कथनोपकथन करता दिखाया जाता है। भाण के द्वारा सौभाग्य तथा शौर्य के वर्णन कर शङ्गार तथा वीर रस की सूचना दी जाती है। इसमें भारती वृत्ति की प्रधानता पाई जाती है तथा एक ही अङ्क की योजना की जातो है। इसकी कथावस्तु कविकल्पित होती है। इसमें पांचों सन्धियां नहीं बताई जा सकतीं, अतः मुख तथा निर्वहण ये दो ही सन्धियां पाई जाती हैं। इन दो सन्धियों के अङ्गों की योजना इसमें की जाती है, तथा दस लास्याङ्गों का सन्निवेश भी होता है। कि जहाँ धूत, चोर, जुआरी आदि लोगों के चरित्र का स्वकृत अथवा परकृत वर्णन विट के द्वारा किया जाय, वह भारती वृत्ति की प्रधानता होने के कारण भाण कहलाता है। एक ही विट आकाशभाषित के द्वारा आशक्का तथा उत्तर देकर उक्तिप्रत्युक्ति का प्रयोग करता है। यहाँ रस की स्पष्टता नहीं पाई जाती अतः सौभाग्य एवं शौर्य के वर्णन के द्वारा क्रमशः शरक्गार व वीर रस की सूचना दी जाती है। [इस प्रकार माण की ये विशेषताएँ हैं :- १. इसकी वस्तु कल्पित व धूर्तचरितपरक होती है, जिसमें मुख व निर्वहण सन्धि होती है। २. इसका नायक विट होता है, वही एक पात्र इस रूपक में पाया जाता है। वह कथनोपकथन का प्रयोग आकाशभाषित के द्वारा करता है। ३. इसमें भारती वृत्ति पाई जाती है।
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४. वीर तथा श्रृद्गार रस की सूचना दी जाती है।१] ५. इसमें केवल एक अङ्क होता है। लास्याङ्गानि- गेयं पदं स्थितं पा्यमासीनं पुष्पगण्डिका। प्रच्छेदक स्त्रिगूढं च सैन्धवाख्यं द्विगूढकम् ॥ ५२ ॥ () उत्तमोत्तमकं चान्यदुक्तप्रत्युक्तमेव च। लास्ये दशविधं ह्येतदङ्गनिर्देशकल्पनम्।।५३॥। शेषं स्पष्टमिति। भाण के सम्बन्ध में दस लास्याङ्गों का वर्णन किया गया है-ये दस लास्याङ्ग-संगीत के भेद हैं। इनका वर्णन करना आवश्यक समक कारिकाकार बताते हैं कि लास्य में इन दस अङ्गों की कल्पना की जाती है :- गेयपद, स्थितपाठ्य, आसीन, पुष्पगण्डिका, पच्छेदक, त्रिगूढ, सैन्धव, द्विगूढक, उत्तमोत्तमक तथा उक्तप्रत्युक्त। [(१) गेयपद :- जहाँ पुरःस्थित नायक के सामने वीणा के द्वारा शुष्कगान गाया जाय, वह गेय पद है। (तन्त्रीभाण्डं पुरस्कृत्योपविष्टस्यासनेपुरः। शुप्कगानं गेयपदम्, ) (२) स्थितपाठ्य-स्थितपास्य वह है-जहाँ नायिका मदन से उत्तप् होकर प्राकृत में गीत पढ़ती है। (स्थितपाठ्यं तदुच्य ते मदनोत्तापिता यत्र, पठति प्राकृतं स्थिता ।।) (३) आसीन-जहाँ किसी भी वाद्य की स्थिति न हो, तथा शोक व चिन्ता से युक्त स्त्री गात्र को फैलाती हुई गीत गावे, वह आसीन लास्यांग है। (निखिलातोदर हितं शौकचिन्तान्विताडबला। सुप्रसारितगात्रं यदासी दासीन मैव तत् ।।) १. भाण कई अवस्था में-पाश्चात्य पद्धति के एकामिनय (मोनो-एक्टिंग) से मिलता है। उसमें भी इसी की तरह एक ही पात्र अभिनय करता है। संस्कृतसाहित्य के रूपक-साहित्य में भाण का विशेष स्थान रहा है। आठवीं शती से लेकर १७ वीं अठारहवीं शती तक सैकड़ों भाण लिखे गये। वामनभट्ट बाण, युवराजरामवर्मा आदि अनेकों ने भाणों को एक सुन्दर साहित्यिक रूप दिया। भाण के द्वारा कवि सामाजिक कुरीतियों पर भी बड़ा गहरा व्यङ् कसता है। सामाजिक कुरीतियों का पर्दाफाश करने के लिए कवि के पास भाण व प्रह्सन ये दो बड़े अस्र थे। किन्तु दोनों की प्रणाली में गहरा भेद है। भाण की व्यंग्यप्रणाली बड़ी गम्भीर व उदात्त होती है, प्रहसन की छिछली। यही कारण है कि भाण का रस हास्य नहीं होता है, प्रहसन का हास्य होता है। संस्कृत के भाणों में अधिकतर वेश्याओं के वर्णन उनके बाजारों के वर्णन, उनसे सम्बद्ध दूसरे धूर्त व जुआरियों के वर्णन मिलेंगे। भाणों में सर्वत्र श्रृद्गार की प्रधानता मिलती है, वीर बहुत कम। इनके प्राकृतिक वर्णन भी शरद्गार से प्रभावित होते हैं, जसे युवराज राजवर्मा के एक भाण के इस वर्णन में- नझां वीक्ष्य नभस्थलीं विलुलितप्रत्यग्रधाराधरश्रेणीकञ्जुकवाससं पति रसौ रक्तः स्वयं चुम्बति। इत्यन्तश्चिरमाकलय्य रजनी शोकातिरेकादिव व्यादायाम्बुज माननं विलपति व्यालोलमृद्गारवैः॥ २. 'लक्षणम्' इति पाठान्तरम्। २२ द०
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१७० दशरूपकरमू (४) पुष्पगण्डिका-वह गेय जिसमें वाद्यों का प्रयोग होता है, विविध छन्द पाये जाते हैं, तथा स्त्री एवं पुरुष की विपरीत चेष्टा पाई जाती है, पुष्पगण्डिका है। (आतोदयमिश्रितं गेयं छन्दांसि विविधानि च। स्त्रीपुंसयोविपर्यासचेष्टितं पुष्पगण्डिका।।) (५) प्रच्छेदक-प्रति को अन्यासक्त मानकर प्रेमविच्छेद के क्रोध व शोक से जब स्त्री वीणा के साथ गाती है, वह प्रच्छेदक कहलाता है। (अन्यासङ्गं पति मत्वा प्रेमविच्छेदमन्युन्ता 1 वीणापुरस्सरं गानं स्त्रियाः प्रच्छेदको मतः ॥) (६) त्रिगूढ-जहाँ स्त्रीवेशधारी पुरुष नाचे व गायें, वह मधुर गान त्रिगूढक कहलाता है। (स्त्रीवेशधारिणां पुंसां नाव्यं श्लक्ष्णं त्रिगूढकम्।) (७) सैन्धव-जहाँ कोई नायक सक्केतस्थल पर प्रिया के न आने पर, प्राकृत में इस प्रकार वचन कहता है कि उसका करण (गीतप्रकार) स्पष्ट रहता है, उसे सैन्धव कहते हैं। (कश्चन भ्रष्टसक्केतः सुव्यक्तकरणान्वितः। प्राकृतं वचनं वक्ति यत्र तत् सैन्धवं विदुः ॥) (८) द्विगूढ़-मुख तथा प्रतिमुख से युक्त चतुरस्रपद गीत द्विगूढ़ है।। (चतुरस्त्रपदं गीतं मुखप्रतिसुखान्वितम्, द्विगूढम् ।।) (९) उत्तमोत्तमक-रस तथा भाव से युक्त गीत उत्तमोत्तमक कहलाता है। (रस भावाढ्य मुत्तमोत्तमक पुनः ॥) (१०) उक्तप्रत्युक्त्-जहाँ मान तथा प्रसाद हो, नायक का तिरस्कार हो, रस से युक्त हो, हाव तथा हेला से युक्त हो, तथा चित्रबन्ध के कारण जो सुन्दर हो, जिसमें उक्ति प्रत्युक्ति पाई जाती हो, तथा उपालम्भ हो एवं झूठी बातें हों, जिसमें श्रङ्गारचेष्टा पाई जाती हो; ऐसा गीत उक्तप्रयुक्त कहलाता है।] (कोपप्रसादजमधिक्षेपयुक्त रसोत्तरम्। हावहेलान्वितं चित्रलोकबन्धमनीहरम्।। उक्तिप्रत्युक्तिसंयुक्तं सोपालम्भमलीकवत । विलासान्वितगीतार्थ मुक्तप्रत्युक्त मुच्यते॥ अथ प्रहसनम्- तद्वत्प्रहसनं त्रेधा शुद्धवैकृतसङ्करः।
तत्र शुद्धं तावत् पाखण्डिविप्रप्रभृतिचेट चेटीविटाकुलम्॥। ४४॥ चेष्टितं वेषभाषाभिः शुद्धं हास्यवचोन्वितम्। पाखण्डिन: शाक्यनिर्भ्रन्थप्रभृतयः, विप्राश्चात्यन्तमृजवः, जातिमात्रोपजीविनो वा प्रहसनाञ्निहास्यविभावाः, तेषां च यथावत्स्वव्यापारोपनिबन्धनं चेटचेटीव्यवहारयुक्तं शुद्धं प्रहसनम्। प्रहसन नामक रूपकभेद वस्तु, सन्धि, सन्ध्यङ्ग, अङ्क तथा लास्यादि में भाण की ही तरह होता है। यह शुद्ध, विकृत तथा सक्कर इन भेदों से तीन तरह का होता है। इनमें शुद्ध प्रहसन में पाखण्डी, ब्राह्मण, आदि नौकर और नौकरानियां (चेट तथा चेटी) का जमघट होता है-ये इसके पात्र हैं। इनके वेश, तथा इनकी भाषा के अनुरूप चेष्टा यहां पाई जाती है, तथा इनका वचन (कथनोपकथन) हास्ययुक्त होता है (तथा यह हास्यपूर्ण वचन से युक्त होता है।)
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क पाखण्डी का अर्थ ढोंगी संन्यासी-बौद्ध जैन आदि भिक्षुओं से है-ब्राह्मण बड़े भोले भाले पात्र होते हैं, अथवा ये केवल अपनी जाति पर ही आश्रित रहते हैं। ये प्रहसन के हास्य रस के विभाव हैं। इनके उपयुक्त व्यापार का निबन्धन, जहाँ सेवक सेविका का व्यवहार भी पाया जाता है शुद्ध कोटि का प्रह्सन है। विकृतं तु- कामुकादिवचोवेषैः षण्ढकञ्चुकितापसैः॥५४॥ विकृतम्, सङ्कराद्वीथ्या सङ्कीर्ण धूर्तसङ्कुलम्। कासुकादयो भुजङ्गचारभटाद्याः तद्देषभाषादियोगिनो यत्र षण्ढकञ्चुकितापसवृद्धादय- स्तद्विकृतम्, स्वस्वरूपप्रच्युतविभावत्वात। वीथ्यज्ञस्तु सङ्कीर्णत्वात् सङ्कीर्णम्। रसस्तु भूयसा कार्य: षद्विधो हास्य एव तु ॥ ५६॥
जहां ऐसे नपुसक, कख्चुकी या तपस्वी पात्र निबद्ध हों, जो कामुक लोगों के वचन इति स्पष्टम्।
व वेष का प्रयोग करें, वह प्रहसन विकृत कहलाता है। धूर्त व्यक्तियों से पूर्ण प्रहसन सङ्कीर्णं कहलाता है। इस प्रहसन में केवल हास्य रस का ही प्रयोग करना चाहिए। यह हास्य रस पूरी तरह से अपने छः भेदों में उपनिबद्ध होना चाहिए। जहाँ पर नपुंसक, बुड्ढा कञ्रुकी और तपस्वी (भुजङ्ग) कामुक के समान उनकी भाषा व वेष का प्रयोग करे वहाँ वे अपने स्वरूप से गिर जाते हैं। इस प्रकार के विभाव के उपनिबन्धन के कारण यह प्रहसन विकृत कहलाता है। सक्कीणं में वीथ्यङ्गों का मिश्रण पाया जाता है। (इसमें हसित, अपहसित, उपहसित, अवहसित, अतिहसित, बिह्सित इन हास्य के छः रूपों का पूर्णतः सन्निवेश होता है।) अथ डिम :- ल डिमे वस्तु प्रसिद्धं स्यादृत्तय: कैशिकीं विना। नेतारो देवगन्वर्वयक्षरक्षोमहोरगाः॥ ५७।। भूतप्रेतपिशाचाद्या: षोडशात्यन्तमुद्ताः। रसैरहास्यशङ्गारः षड्भिर्दीत: समन्वितः॥ ५८॥
चन्द्रसूर्योपरागैश्ध न्याय्ये रौद्ररसेडङ्िनि॥ ५६॥ चतुरङ्कध्वतु स्सन्धिनिविमर्शो डिम: स्मृतः। 5-'डिम सङ्गाते' इति नायकसङ्गातव्यापारात्मकत्वाड्डिमः, तत्रेतिहाससिद्धमितिवृत्तम्, वृत्तयक्ष कैशिकीवर्जास्तिस्र:, रसाश् वीररौद्रबीभत्साद्भतकरुणभयानका: षट्, स्थायी तु रौद्रो न्यायप्रधान:, विमर्शरहितामुखप्रतिमुखगर्भनिर्चहणाख्याश्वत्वारः सन्घयः साज्गाः, मायेन्द्रजालादयनुभावसमाश्रयाः (यः)। शेषं प्रस्तावनादि नाटकवत्। एतच- "इदं त्रिपुरदाहे तु लक्षणं ब्रह्मणोदितम् । ततस्त्रिपुरदाहश्च डिमसंज्ञः प्रयोजितः ॥' इति भरतमुनिना रवयमेव त्रिपुरदाहेतिवृत्तस्य तुल्यत्वं दर्शितम्। डिम नामक रूपक की कथावस्तु प्रसिद्ध-रामायणादि से गृहीत होती है। इसमें कैशिकी के अतिरिक्त अन्य वृत्तियों-सार्वती, आरभटी व भारती-का समावेश होता है। इसमें नेता देवता, गन्धर्व, यत, राकस, नाग आदि म्त्येतर जाति के होते हैं। अथवा भूत, प्रेत, पिशाच आदि पात्रों का भी समावेश होता है। इसके पात्र संख्या में १६ होते हैं तथा वे बड़े उद्धत होते हैं। इसमें शद्वार व हास्य के अतिरिक बाकी छः रसों का
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प्रदीपन पाया जाता है। इसका अङ्गी रस रौद्र होता है तथा इसमें माया, इन्द्रजाल, युद्ध, क्रोध, उद्धान्ति आदि चेष्टाओं तथा चन्द्रग्रहण एवं सूर्यग्रहण का दृश्य दिखाया जाता है। इसमें केवल चार अङ्क होते हैं, तथा विमर्श सन्धि के अतिरिक्त बाकी चार सन्धियां पाई जाती हैं। 'डिम सङ्घाते' इस धातु से जिसका अर्थ घात-प्रतिघात करना है, डिम शब्द की व्युत्पत्ति होती है। अतः डिम का तात्पर्य वह रूपक है जहाँ नायक का सङ्ात व्यापार हो। इसका इतिवृत्त इतिहास प्रसिद्ध होता है, कैशिकी से इतर तीन वृत्तियाँ पाई जाती हैं, तथा वीररौद्र वीभत्सअद्भुतकरुणभयानक ये छः रस पाये जाते हैं। इनमें प्रधान स्थायी रस रौद्र ही होना चाहिए। विमर्श सन्धि इसमें नहीं होती। मुख, प्रतिमुख, गर्भ तथा निर्वहण ये चार सन्धियाँ अङ्गों सहित पाई जाती हैं। इसमें भाण, इन्द्रजाल आदि अनुभावों का आश्रय लिया जाता है। बाकी प्रस्तावना आदि नाटक की ही तरह होती हैं। यही बात महर्षि भरत ने स्वयं त्रिपुरदाह की कथावस्तु की तुल्यता के बारे में बताई है :- 'ब्रह्मा ने त्रिपुरदाह में इसी लक्षण को बताया है। इसलिए त्रिपुरदाह डिम संज्ञक है।' शथ व्यायोग :- ख्यातेतिवृत्तो व्यायोग: ख्यातोद्धतनराश्रयः॥ ६० ॥ हीनो गर्भविमर्शाभ्यां दीप्ता: स्युडिमचद्रसाः। अस्त्रोनिमित्तसंग्रामो जामदग्न्यजये यथा॥ ६१॥ एकाहाचरितैकाङ्को व्यायोगो बहुभिनरैः। व्यायुज्यन्तेऽस्मिन्बहवः पुरुषा इति व्यायोग:, तत्र डिमचद्रसाः षट् हास्यश्द्गार- रहिताः। वृत्त्यात्मकत्वाच्च रसानामवचनेऽपि कैशिकीरहितेतरवृत्तित्वं रसवदेव लभ्यते। अस्त्रीनिमित्तश्ात्र संग्रामो यथा परशुरामेण पितृचधकोपात्सहस्त्राजुनवघः कृतः। शेषंस्पष्टम्। व्यायोग की कथावस्तु इतिहासप्रसिद्ध होती है, तथा किसी प्रसिद्ध उद्धत व्यक्ति (पौराणिक व्यक्तित्व) पर आश्रित होती है। इसमें गर्भ तथा विमर्श ये दो सन्धियां नहीं होती। रसों की दीप्षि डिम की तरह ही होती है, अर्थात् हास्य व शङ्गार से भिन्न रस इसमें हो सकते हैं। इसमें युद्ध वर्णित होता है, पर वह युद्ध स्त्री प्राप्ति के कारण नहीं होता, जैसे जामदग्न्यजय नामक व्यायोग में परशुराम का युद्ध स्त्री निमित्तक नहीं है। व्यायोग की कथा एक ही दिन की होती है तथा उसमें एक ही अङ्क होता है। इसके पात्रों में अधिक संख्या पुरुष पात्रों की होती है। 'जिसमें अनेक पुरुष प्रयुक्त हों' (व्यायुज्यन्ते अस्मिन् बहवः पुरुषाः) इस व्युत्पत्ति के आधार पर व्यायोग शब्द निष्पन्न हुआ है। इसमें डिम की तरह हास्यश्रङ्गारवर्जित छः रस होते हैं। रस वृत्ति से अभिन्न हैं अतः यद्यपि कारिका में व्यायोग की वृत्ति का उल्लेख नहीं, पर रस के अनुकूल कैशिकीरहित अन्य वृत्तियों की स्थिति स्पष्ट होती है। यहाँ युद्ध वणित होता है, जो अस्त्रीनिमित्तक होता है, जैसे परशुराम ने पिता के वध से कुपित होकर सहस्रार्जुन को मारा। अन्य सब स्पष्ट है। अथ समचकार :- कार्य समघकारेऽपि आमुखं नाटकादिचत्॥ ६२॥ ख्यातं देवासुरं वस्तु निविंमर्शास्तु सन्धयः। 5वृत्तयो मन्दकैशिक्यो नेतारो देवदानवाः ॥६३॥ द्वादशोदास्तविख्याता: फलं तेषां पृथकपूथक्।
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बहुवीररसाः सर्वे यद्दम्भोधिमन्थने ॥६४॥जि फ्रीस कत अङ्कस्त्रिभिस्त्रिक पट स्त्रिश्ङ्गारस्त्रिवििद्र व ःर । द्विसन्धिरङ्: प्रथमः कार्यो द्वादशनोलिकः॥६५॥ चतुर्द्विनालिकावन्त्यौ नालिका घटिकादयम्। वस्तुस्वभावदैवारिकृता: स्यु: कपटास्रयः ॥६६॥ नगरोपरोधयुद्धे वाताग्न्यादिकविद्रवाः । धर्मार्थकामैः शङ्गारो नात्र बिन्दुप्रवेशकौ ॥६७॥ वोथ्यङ्गानि यथालाभं कुर्यात्प्रहसने यथा। समवकार में भी नाटक की तरह आमुख की योजना करना चाहिए। इसकी कथा देवताओं व दत्यों से सम्बद्ध प्रसिद्ध वस्तु होती है। इसमें विमर्श सन्धि नहीं होती। कैशिकी से भिन्न वृत्तियां पाई जाती है तथा इसके नेता-पात्र-देवता व दानव होते हैं। ये नायक इतिहास प्रसिद्ध होते हैं तथा संख्या में १२ होते हैं। इन सब का फल भिन्न भिन्न होता है। ये सभी नायक वीररस से पूर्ण होते हैं, जैसे समुद्रमन्थन में पाये जाते हैं। (इस प्रकार इसका रस वीर होता है।) इसमें तीन अङ्क होते हैं जिनमें तीन बार कपट, तीन प्रकार का धर्म, अर्थ व काम का शंगार तथा तीन बार पात्रों में भगदड़ व विद्रव का संयोजन किया जाना चाहिए। इसके पहले अङ्क में मुख व प्रतिमुख ये दो सन्धियां होनी चाहिए तथा इसकी कथा २४ घड़ी (१२ नालिका) की होनी चाहिए। बाकी के दो अङ्कों में क्रमशः ४ तथा २ नालिका की कथा होनी चाहिए। नालिका से मतलब दो घड़ी से है। इसमें जिन तीन कपटों की योजना होती है वे वस्तु, स्वभाव तथा शत्रुओं के द्वारा विहित होते हैं। इसमें नगरोपरोध, युद्ध, वात, अग्नि आदि उत्पातों के कारण विद्रव (पलायन) का वर्णन होता है। इसमें धर्म, अर्थ तथा काम तीनों तरह का शक्गार पाया जाता है; तथा बिन्दु नामक अर्थप्रकृति, प्रवेशक नामक सूचक (अर्थोपत्तेपक) नहीं पाया जाता। प्रहसन की तरह इसमें यथावश्यक वीथ्यङ्गों की योजना की जानी चाहिये। समवकीर्यन्तेऽस्मिन्नर्था इति समवकारः। तत्र नाटकादिवदामुखमिति समस्तरूप- काणामामुखप्रापणम्। विमर्शवर्जिताश्षत्वारः सन्धयः, देवासुरादयो द्वादश नायकाः, तेषां च फलानि पृथक्पृथग्भवन्ति यथा समुद्रमन्थने वासुदेवादीनां लक्ष्म्यादिलाभाः, वीरश्वाङ्गी, अज्गभूता: सर्वें रसाः, त्रयोडङ्काः, तेषां प्रथमो द्वादशनालिकानितृत्तेतिवृत्तप्रमाणः, यथासंख्यं चतुर्द्विनालिकावन्त्यौ, नालिका च घटिकाद्वयम्। प्रत्यक्कं च यथासंख्यं कपटाः तथा नगरोपरोधयुद्धवाताग्न्यादिविद्रवाणां मध्य एकको विद्रवः कार्यः। धर्मार्थकामश्रज्गाराणा- मेकैकः शङ्गारः प्रत्यक्कमेव विधातव्यः । वीथ्यज्ञानि च यथालाभं कार्याणि। बिन्दुप्रवेशकौ नाटकोक्तावपि न विधातव्यौ। इत्ययं समवकारः । 'इसमें काव्य के प्रयोजन छिटकाये जाते हैं' (समवकीर्यन्तेऽस्मिन्नर्था इति समवकारः) इस व्युत्पत्ति से समवकार निष्पन्न होता है। इसमें नाटक की तरह ही आमुख होता है। कारिका का 'अपि' यह बताता है कि सारे रूपकों में आमुख अबश्य होना चाहिए। विमर्श- बजिंत चार सन्धियाँ होती हैं, तथा देव दैत्य आदि १२ नायक पात्र होते हैं। इन पात्रों के फल भिन्न २ होते हैं। जैसे समुद्रमन्थन में विष्णु आदि नेताओं को क्रमशः लक्ष्मी आदि की १. 'नाडिकः' इत्यपि पाठः। २. 'नाडिका' इत्यपि पाठः। ि डाल करकी 1लड
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फल प्राप्ति होती है। इसमें चीर अङ्गी रस होता है, वाकी रस अङ्ग होते हैं, तथा तीन अङ्क होते हैं। इनमें से प्रथम अक्क का इतिवृत्त १२ नालिका का होता है। बाकी दो अक्क क्रमशः चार नालिका व दो नालिका के इतिवृत्त से युक्त होते हैं। नालिका का तात्पर्य दो घड़ी है। हर अङ्क में तीन कपट तथा नगरोपरोध, युद्ध, वात, अशनि आदि से जनित विद्रवों में से एक एक विद्रव वर्णित होना चाहिए। धर्म, अर्थ तथा काम इन तीन तरह के शरृङ्गारों में से हर अङ्क में एक एक शरङ्गार की योजना होनी चाहिये। वीथ्यङ्गों का प्रयोग आवश्यकतानुसार किया जाना चाहिए। नाटक के बारे में बिन्दु व प्रवेशक का वर्णन किया गया है, पर यहाँ उनकी योजना नहीं की जानी चाहिए। यह समवकार का लक्षण है। अथ चीथी- चीथी तु कैशिकोवृत्तौ सन्ध्यङ्गाङ्वेस्तु भाणवत् ॥६द॥ रस: सूच्यस्तु शङ्गारः स्पृशेदपि रसान्तरम्।
एवं वीथी विधातव्या ह्ेकपात्रप्रयोजिता। विथीवद्विथी मार्ग: अज्ञानां पङ्किर्वा भाणवत्कार्या। विशेषस्तु रसः शङ्गारोऽपरिपूर्ण- त्वाद्धूयसा सूच्यः, रसान्तराण्यपि स्तोकं स्पर्शनीयानि। कैशिकी वृत्ती रसौचित्यादेवेति। शेषं स्पष्टम्। वीथी कैशिकी वृत्ति में निबद्ध की जानी चाहिए। उसमें सन्धि उसके अङ्क तथा अक्क भाण की तरह होते हैं-अर्थाद मुख निर्वहण ये दो ही सन्धियां होती है तथा केवल एक अङ्क। इसका सूच्य रस शङ्गार होता है, वैसे वह दूसरे रसों का भी स्पर्श कर सकता है। यह प्रस्तावना के उद्धात्यक आदि उपर्युक्त अङ्गों से युक्त होती है। इस तरह बीथी में दो-एक पात्रों की हो योजना करनी चाहिए। की वोथी मार्ग को कहते हैं-यह रूपकमेद मार्ग की तरह है अतः वीथी कहलाता है। इसमें सन्ध्यङ्गों का सन्निवेश भाण की तरह ही होना चाहिये। भेद यह है, कि इसमें श्रृङ्गार रस होता है, उसका पूर्ण परिपाक न होने के कारण वह सूच्य होता है और रसों का भी थोड़ा- बहुत स्पर्श करना चाहिये। कैशिकी वृप्ति शरृङ्गाररस के औचित्य के कारण ही विधेय है। अथाङ्क :- उत्सृष्टिकाङ्के प्रख्यातं वृत्तं बुद्धया प्रपञ्चयेत्॥ ७0 ।। रसस्तु करुण: स्थायी नेतार: प्राकता नराः। भाणवत्सन्धिवृत्यङ्गैर्युक्ति: स्त्रोपरिदेवितैः॥।७१।। वाचा युद्धं विघातन्यं तथा जयपराजयौ। उत्सष्टिकाङ्क इति नाटकान्तर्गताङ्कव्यवच्छेदार्थम्। शेषं प्रतीतमिति। अङ्क अथवा उत्सृष्टिकाङ्ग नामक रूपकभेद में इतिवृत्त इतिहास प्रसिद्ध होता है, पर कवि को उसमें अपनी बुद्धि से हेरफेर कर लेना चाहिए। इसका स्थायी रस करुण होता है, तथा इसके नेता-पात्र-प्राकृत (सामान्य) मनुष्य होते हैं। इसके सन्धि, वृत्ति व अङ्क भाण की तरह होते हैं-अर्थात् इसमें केवल मुख तथा निर्वहण सन्धियाँ होती हैं; भारती वृत्ति पाई जाती है, तथा एक अंङ्क होता है। करुण रस होने के कारण इनमें स्त्रियों का रुदन होना चाहिए। इसके पात्रों में वाग्युद्ध की एवं जय तथा पराजय की योजना की जानी चाहिये। कारिकाकार ने अङ्क को उत्सृष्टिकाङ्क इसलिए कहा है कि नाटक के अन्तर्गत वर्णितअङ्क से इसकी भिन्नता स्पष्ट हो जाय। बाकी कारिका रपष्ट है।ा ग कान ।
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तृतीयः प्रकाश: १७५
अथेहामृग :- मिश्रमोहामृगे वृत्तं चतुरडकं त्रिसन्धिमत् ।।.७२।।प्ड नरदिव्यावनियमान्नायक प्रतिनायकी। जगानी ॥ ख्यातौ धीरोद्तावन्त्यो विपर्यासादयुक्तकृत्।।७३॥। दिव्यस्त्रियमनिच्छन्तीमपहारादिनेच्छतः। शृङ्गाराभासमण्यस्य किश्चित्किश्चित्प्रदर्शयेत्।। ७४।। ग्रणाग
संरम्भं परमानीय युद्धं व्याजान्निवारयेत्। वधप्राप्तस्य कुर्वीत वर्ध नैव महात्मनः॥। ७५॥ मृगवदलभ्यां नायिकां नायकोऽस्मिन्नीहते इतीहामृगः। ख्याताख्यातंवस्तु अन्त्य := प्रतिनायको विपर्यसाद्विपर्ययज्ञानादयुक्तकारी विधेयः । स्पष्टमन्यत्। ईहामृग की कथा मिश्रित-प्रख्यात व कल्पित का मिश्रण होती है। इसमें चार अङ्क होते हैं तथा तीन सन्धियाँ-अर्थात् गर्भ व अचमर्श नहीं होती। नर तथा देवता के नियम से इसमें नायक व प्रतिनायक की योजना होती है। ये दोनों इतिहास प्रसिद्ध तथा धीरोद्धत होते हैं। प्रतिनायक ज्ञान की भ्रान्ति के कारण अनुचित कार्य करने वाला वर्णित होना चाहिये। यह किसी दिव्यस्त्री को-जो उसे नहीं चाहती, भगा कर ले जाना चाहता है-इस तरह कवि को चाहिये कि कुछ-कुछ इसका शृङ्गाराभास भी प्रदर्शित किया जाय। इन नायक व प्रतिनायक के विरोध को पूर्णता तक ले जाकर किसी बहाने से युद्ध को हटा दे, उसका निवारण कर दे। उसके वध के समीप होने पर भी उसका वध कभी न करावे। ईहामृग का यह नाम इसलिये रखा गया है कि इसमें नायक हिरन की तरह-किसी अलभ्य नायिका को प्राप्त करने की इच्छा करता है। इसकी कथावस्तु प्रख्यात व उत्पाद्य का मिश्रण होती है। कारिका का 'अन्त्य' शब्द प्रतिनायक का सूचक है, जो मिथ्या ज्ञान के कारण अनुचितकारी होना चाहिए। बाकी स्पष्ट है। इत्थं विचिन्त्य दशरूपकलदममार्ग- मालोक्य वस्तु परिभाव्य कविप्रबन्धान् कुर्यादयतवदलंकृतिभिः प्रबन्धं वाक्यरुदारमधुरै: स्फुटमन्दवृत्तैः।।७६। स्पष्टमू। ॥ इति धनअयकृतदशरूपकस्य तृतीयः प्रकाशः समाप्तः ॥
कवि को चाहिये कि इस तरह से दशरूपक के लक्षणों से चिह्नित मार्ग को अच्छी तरह समझ कर; कथावस्तु का निरीक्षण कर तथा प्राचीन कवियों के प्रबन्धों का अनुशीलन कर, स्वाभाविक (अयतज ) अलङ्कारों से युक्त, तथा प्रगट एवं सरल छन्द वाले, उदार एवं मधुर-अर्थ की क्षमता वाले तथा रमणीय-वाक्यों के द्वारा प्रबन्ध (रूपक) की रचना करे। तृतीयः प्रकाश: -0070400-
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अथ चतुर्थः प्रकाशः। अथेदानीं रसमेदः प्रदश्यते- विभावैरनुभावैश्च सान्विकैर्व्यभिचारिभि:। आनीयमान: स्वाद्यत्वं स्थायी भावो रसः स्मृतः॥१॥
श्रोतृप्रेक्षकाणामन्तर्विपरिवर्तमानो रत्यादिर्वच्यमाणलक्षणः स्थायी स्वादगोचरताम्= निर्भरानन्दसंविदात्मतामानीयमानो रसः, तेन रसिकाः सामाजिकाः, कात्यं तु तथा विधा- नन्दसंविदुन्मीलनहेतुभावेन रसवत् आयुर्धृतमित्यादिव्यपदेशवत्। रूपकों की विशेषता का विवेचन करते हुए प्रथम प्रकाश में वस्तु का साङ्गोपाङ्ग वर्णन किया गया, तथा द्वितीय प्रकाश में सपरिकर नायक की विवेचना की। तीसरे प्रकाश में रूपकों के विभिन्न प्रकारों के लक्षण बताये गये। अब रूपकों के आनन्दभूत रस की विवेचना आवश्यक हो जाती है, क्योंकि रूपकों के तीन तत्वों में से एक 'रस' भी है। अतः अव यहाँ चतुर्थ प्रकाश में धनञ्जय रस के भेदों का प्रदर्शन करते हैं। ा विभाव, अनुभाव, सात्विक भाव एवं व्यभिचारियों के द्वारा जब रत्यादि स्थायी भाव आस्वाद्य-चर्वणा के योग्य-बना दिया जाता है, तो वही रस कहलाता है। काव्य में प्रयुक्त अथवा नाटकादि अभिनय के द्वारा प्रदर्शित विभाव, अनुभाव, व्यभिचारी भाव तथा साश्विक भावों के द्वारा-जिनका लक्षण व स्वभाव आगे इसी प्रकाश में वर्णित किया जायगा-जब श्रोताओं (श्रव्य काव्य के सम्बन्ध में) तथा दर्शकों (रूपकों के सम्बन्ध में) के हृदय में परिवर्तनशील रत्यादि स्थायी भाव-जिसका लक्षण हम आगे करेंगे, आस्वाद्य या स्वादगोचर होता है, तो वही रस कहलाता है। काव्य या नाटक का यह स्वाद अनुपम आनन्द से युक्त चेतना वाला होता है। रस का स्वाद लेने वाले रसिक है, अतः सामाजिक इसी नाम से कहे जाते हैं। इस प्रकार की अलौकिक निर्भर आनन्द-चेतना को प्रकट करने के कारण; उसके हेतु होने से, श्रव्य या दृश्य काव्य 'रसवत्' कहलाता है, ठीक उसी तरह जैसे 'आयुर्घृतं' इस उदाहरण में घृत को 'आयु' कहा आता है। वृत्तिकार का अभिप्राय यह है कि घृत मनुष्य की आयु तथा बल बढ़ाता है, इस बात को देख कर घृत में आयु का हेतुत्व स्पष्ट है। इसलिए उपचार या लक्षणा शक्ति के आधार पर हम घृत को भी आयु कह देते हैं, एक तौर से घृत में आयुद्द को उपचरित कर लेते हैं। ठीक इसी तरह काव्य आनन्दरूप ज्ञानस्वरूप रस को प्रकट करने का कारण है; इसलिए उसमें कार्यकारण भावजन्य लक्षणा के आधार पर ही हम 'रसवत्' का उपचार कर 'रसवत् काव्यम्' इस प्रकार का प्रयोग करते हैं।१ १. यहाँ ध्यान देने की बात है कि धनअ्य व धनिक दोनों ही मोमांसक भट्ट लोलट के मतानुयायी हैं। उनके मतानुसार विभवादि रस के हेतु हैं, तथा उसमें वे परस्पर ,'उत्पाद- उत्पादक' सन्बन्ध मानते हैं। 'स्वाद्यत्वं आनीयमानः' का दूसरा पद भी इसी बात का सङ्केत करता है। भरत के प्रसिद्ध सूत्र 'विभावानुभावव्यभिचारिसंयोगाद् रसनिष्पत्तिः' की विभिन्न व्याख्यायें भूमिका भाग में द्रष्टव्य है। यहाँ पर यह कह देना होगा कि ध्वनिवादी साहित्यशास्त्री रस को व्यञ्य मानते हैं, वाच्य तथा उत्पाद्य नहीं, अतः उनकी रस की परिभाषा में इसका स्पष्ट उल्लेख होता है :- 'विभावै रनुभावैश्च व्यक्तः सव्चारिणा तथा। रसना मेति रत्यादि: स्थायी भावः सचेतसाम् ॥ (साहित्यदर्पण)
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तल विभाष :- ली ज्ञायमानतया तत्र विभावो भावपोषकृत्। आलस्वनोद्दीपनत्वप्रमेदेन स च द्विघा॥२॥ अब रस के हेतु भूत विभावादि में सर्वप्रथम विभाव का ही विवेचन करते हैं :- विभाव शब्द की व्युत्पत्ति 'विभाव्यत इति' इस प्रकार होने से इसका अर्थ यह है, कि विभाव वह है, जिसका ज्ञान हो सके। जिसे विभावित करके सामाजिक रसास्वाद करता है, वह विभाव है। यह विभाव भाव (स्थायी भाव) को पुष्ट करने वाला है, उसे रसरूप में परिणत करने वाला है। यह विभाव, आलम्बन तथा उद्दीपन इस भेद से दो तरह का होता है। 'एवमयम्' 'एवमियम्' इत्यतिशयोक्तिरूपकाव्यव्यापाराहितविशिष्टरूपतया ज्ञायमानो विभाव्यमान: सन्नालम्बनत्वेनोद्दीपनत्वेन वा यो नायकादिरभिमतदेशकालादिर्चा स विभाव:। यदुक्तम्-'विभाव इति विज्ञातार्थ इति' तांक्र यथास्वं यथावसरं च रसेषू- पपादयिष्यामः । अ्ररमीषां चानपेक्षितबाह्यसत्त्वानां शब्दोपधानादेवासादिततद्भावानां सामान्यात्मनां स्वस्वसम्बन्धित्वेन विभावितानां साक्षाद्भावकचेतसि विपरिवर्तमानानामाल- म्बनादिभाव इति न वस्तुशून्यता। श्रव्य काव्य में वर्णित या दृश्य काव्य में मख् पर प्रदर्शित दुष्यन्त-शकुन्तला या राम- सीता का रूप धारण करने वाले पात्रों को हो हम वैसा मान लेते हैं। जिस रूप में काव्य में दुष्यन्तादि का व्यापार उपनिबद्ध होता है, वह् अतिशयोक्तिपूर्ण रहता है, पर इस अतिशयोक्ति रूप वर्णन के द्वारा कवि विशिष्ट दुष्यन्तादि के रूप को ही सम्पादित करता है, और सामाजिक यह समझ लेता है कि 'दुष्यन्त इस तरह का है, राम इस तरह का है' 'शकुन्तला इस तरह की है, सीता इस तरह की है।' इस प्रकार के विशिष्ट रूप में सामाजिकों के ज्ञान का विषय बनाने वाले, उनके द्वारा विभावित होने वाले विभाव कहलाते हैं। ये आळम्बन रूप में नायकादि, दुष्यन्त-शकुन्तला, राम-सीता आदि हो सकते हैं, या उद्दीपन रूप में इष्ट देशकाल आदि, मालिनीतट, मलयानिल, वसन्त ऋतु, पुष्पवाटिका आदि होते हैं। विभाव का अर्थ है, सामाजिकों के द्वारा ज्ञायमान अर्थ, जैसा कि किसी आचार्य ने कहा है :- 'विभाव का अर्थ है जिसका अर्थ ज्ञात हो।' ये आलम्बन व उद्दोपन विभाव रसादि के भेद के अनुसार रसों के वर्णन करते समय वर्णित होंगे। विभावों के श्ञायमानत्व के विषय में कोई पूर्वपक्षी यह शङ्का कर सकता है, कि काव्य के विभावादि तो शब्दों तक ही सीमित रहते हैं, उनकी वास्तविक सत्ता तो होती हो नहीं-क्योंकि दृश्य काव्य में भी दुष्यन्तादि वास्तविक न होकर अवास्तविक हैं, ठीक यही बात मालिनीतटादि उद्दीपन विभाव के लिए कही जा सकती है-तो फिर उनकी वस्तुशून्यता के कारण उनका प्रत्यक्ष ज्ञान नहीं हो पाता, अतः काव्य के विभावादि में श्ञायमानत्व घटित नहीं होता। इसी शङ्का का उत्तर देते हुए वृत्तिकार धनिक कहते हैं, कि काव्य में वर्णित विभावों के बारे में ठीक वही बात लागू नहीं होगी, जो लौकिक ज्ञान के विषयरूप विभावों के बारे में। लौकिक ज्ञान में उनके भौतिक सर्व की आवश्यकता होती है-(टेबुल के ज्ञान में प्रत्यक्ष रूप से टेबुल इन्द्रियग्राह्य होनी चाहिए।) किन्तु काव्यगत विभावों को बाह्य सत्त्व-भौतिक सत्ता की आवश्यकता नहीं होती, क्योंकि काव्यगत विभावों की भावना, उनका ज्ञान तो काव्य प्रयुक्त २३ द०
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शब्दों के द्वारा ही हो जाता है; साथ ही लौकिक ज्ञान के विषय विशिष्ट होते हैं, जब कि काव्यगत विभाव सामान्यरूप (सामान्यात्मना) होते हैं।१ ये विभाव अपने अपने रस के अनुकूल विभावित होते हैं, तथा सहृदय के चित्त में इस तरह घूमते रहते हैं, जैसे वह इनका साक्षात् ज्ञान प्राप्त कर रहा हो। इन्हीं विशेषताओं से युक्त विभावों को हम आलम्बन व उद्दीपन भाव कहते हैं। किन्तु यह स्पष्ट है, कि सहृदय के हृदय में इन विभावों के सामान्य रूप का साक्षात् ज्ञान होता है, इसलिए इनमें वस्तुशून्यता नहीं मानी जा सकती। शब्दों के द्वारा, जब हम किसी भी वस्तु के बौद्धिक ज्ञान को प्राप्त करते हैं, तो वह प्रत्यक्ष-सा ही होता है। तदुक्तं भतृहरिणा- D p pg'शब्द्रोपहित रूपांस्तान्बुद्धर्विषयतां गतान्। प्रत्यक्षमिच कंसादीन्साधनत्वेन मन्यते ॥I' इति। षट्सहस्रीकृताप्युक्तम-'एभयश्च सामान्यगुणयोगेन रसा निष्पद्यन्ते' इति। इसकी पुष्टि में भतृहरि के वाक्यपदीय की यह कारिका दी जा सकती है :- वाक्यादि में जब 'कंस' आदि शब्द का प्रयोग करते हैं, तो शब्द के कहने के साथ ही साथ ने शब्द कंसादि के रूप को बुद्धि का विषय बना देते हैं। और फिर बुद्धिगत कंसादि को हम लोग प्रत्यक्ष रूप की नाईं कर्म, कारक आदि साधन के रूप में या हमारे ज्ञान के ज्ञापक (साधक) के रूप में ग्रहण करते हैं।
निष्पन्न करते हैं।' षटसहस्रीकार ने भी यही बात कही है :- 'ये विभाव, सामान्य गुणयुक्त होकर ही रस को तत्रालम्बनविभावो यथा- pक मे पa 'अस्या: सर्गविधौ प्रजापतिरभूच्चन्द्रो नु कान्तिप्रदः कीशिक शृङ्गारैकनिधिः स्वयं नु मदनो मासो नु पुष्पाकरः। वेदाभ्यासजड: कथ नु विषयव्यावृत्तकौतूहलो निर्मातुं प्रभवेन्मनोहरमिदं रूपं पुराणो मुनिः' इसमें आलम्बन विभाव नाटक के सामाजिक के लिए नायक व नायिका दोनों हैं। जब कि नायक के लिए नायिका आलम्बन है, व नायिका के लिए नायक। किन्तु मोटे तौर पर आलम्बन विभाव का विवेचन करते समय नायक को ही रस का आश्रय माना जाता है। उसके लिए आलम्बन नायिका होती है। यहाँ पर इसी ढङ्ग का उदाहरण दिया जा रहा है। विक्रमोवंशीय नाटक में पुरूरवा उर्वशी को देखकर मुग्ध हो जाता है। निम्न पद्य में वह आलम्बन विभाव रूप उवशी का वर्णन कर रहा है :- लोग कहते हैं, कि संसार के प्राणियों की रचना ब्रह्मा करते हैं, पर इस उर्वशी को देखकर तो ऐसी कल्पना होती है, कि इसकी रचना उस अरसिक बूढ़े खूसट ब्रझ्मा के द्वारा नहीं की गई है। क्योंकि वेदों के बार बार पढ़ने से जड़ व शुष्क हृदय वाला वह बूढ़ा ऋषि ब्रह्मा, जिसका अब भोगविलास-विषय के प्रति कोई कुतूहल नहीं रह गया है, इस रमणी के ऐसे मनोहर रूप को बनाने में कैसे समर्थ हो सकता है? हाँ, यदि इसकी सृष्टि करने में कोई स्ष्टा 199 1 76 १. लोकिक ज्ञान व काव्यसम्बन्धी ज्ञान में सभी साहित्यशास्त्री यह भेद मानते हैं, कि एक में व्यक्ति व विशिष्ट (इन्डिविडुअल) का ज्ञान होता है, दूसरे में जाति या सामान्य (Idea) का। इसी को भारतीय साहित्यशास्त्री 'साधारणीकरण' कहता है। प्लेटो काव्य का विषय-बिशिष्ट न मानकर सामान्य मानता है, व उसे (Idea) कहता है। यही मत शोपेनहावर का है, जो कला या काव्य का प्रतिपाध (the Idea of such things) को मानता है।
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चतुर्थ: प्रकाशः १७६
रहा होगा, तो मेरी ऐसी कल्पना है, कि वह या तो स्वयं चन्द्रमा ही होगा, जो कान्ति को देने वाला है, या फिर शृङ्गार का एक मात्र कोश-कामदेव रहा होगा, या ये दोनों न रहे हों, तो फिर इसकी रचना फूलों से लदे वसन्त मास ने की होगी। इतनी सुन्दर रचना करने की सामर्थ्य चन्द्रमा, कामदेव या वसन्त ऋतु में ही है, उस बूढ़े खूसट ब्रह्मा में कहाँ?क FMg उद्दीपनविभावो यथा- 'अयमुदयति चन्द्रश्वन्द्रिकघौतविश्वः परिणतविमलिम्नि व्योम्नि कपूरगौरः। ऋजुरजतशलाकास्पर्धिभिर्यस्य पाद- जगदमलभृणालीपञ्जरस्थं विभाति ॥।' उद्दीपन विभाव के अन्तर्गत देश काल आदि का समावेश होता है। किसी भी आलम्बन विभाव के कारण उद्बुद्ध स्थायीभाव को ये उद्दीपन विभाव और अधिक उद्दीप्त कर रसत्व को पहुँचाते हैं। मान लीजिये, शकुन्तला को देखकर दुष्यन्त के मन में रति भाव उद्बुद्ध होता है; यहाँ शकुन्तला आलम्बन है। मालिनीतट, वसन्त ऋतु, लताकुज, कोकिल की काकली आदि वे विभाव हैं, जो उस रति भाव को दुष्यन्त के मन में उद्दीप्त करते हैं। ये उद्दीपन विभाव कहलाते हैं। यहाँ चन्द्रिकारूप उद्दीपन विभाव का उदाहण देते हैं :- 32काकड कपूर के समान श्वेत यह चम्द्रमा, जिसने सारे विश्व को चाँदनी से धी दिया है, निर्मलता से युक्त (जिसकी निर्मलता प्रकट हो गई है) आकाश में उदित हो रहा है। इसकी, कोमल चाँदी की शलाका के समान श्वेत किरणों के द्वारा सारा संसार ऐसा सुशोभित हो रहा है, मानो निर्मल मृणाल तन्तु के पिंजरे में रखा हुआ हो। अनुभावो विकारस्तु भावसंसूचनात्मक: । गमीकि विभाव का विवेचन करने पर प्रसङ्गप्राप्त अनुभाव का लक्षण बताते हैं :- ककि रस्यादि स्थायी भाव की सूचना करने वाले विकार (जो दुष्यन्तादि आश्रय में पाये जाते हैं) अनुभाव कहलाते हैं। स्थायिभाषाननुभावयन्तः सामाजिकान् सम्रूविच्ेपकटाक्षादयो रसपोषकारिणोड़नु गनाफ
भावाः, एते चाभिनयकाव्ययोरप्यनुभावयतां साक्षाद्भावकानामनुभवकमतयानुभूयन्त इत्यनुभवनमिति चानुभावा रसिकेषु व्यपदिश्यन्ते। विकारो भावसंसूचनात्मक इति तु लौकिकरसापेक्षया, इह तु तेषां कारणत्वमेव। यथा ममैव-8क FIREI IPE
धन्यः कोऽपि युवा स यस्य वदने व्यापारिता: सस्पृहकक मुग्धे दुग्धमहाब्धिफेनपटलप्रख्या: कटाक्षच्छटाः ॥।' गाड हाह इत्यादि यथारसमुदाहरिष्यामः। T अनुभाव, इस शब्द की व्युत्पत्ति यह की जाती है, कि वे सामाजिकों की रत्यादि स्थायिभाव का अनुभव कराते हैं। इन्हें ।देखकर सामाजिकों को यह अनुभव हो जाता है, कि अमुक T १. अनुभाव शब्द की दूसरी व्युत्पत्ति यह भी की जाती है 'अनुपश्चाद् भवन्तीति अनुभावा:' जो आश्रय में स्थायी भाव के उद्बुद्ध होने के बाद पैदा होते हैं। इसलिए इन्हें स्थायी भाव का कार्य भी कहा जाता है। विभाव, अनुभाव, व्यभिचारी को स्थायी भाव का
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१८० दशरूपकम् पात्र-दुष्यन्तादि में, अमुक स्थायी भाव उद्बुद्ध हो रहा है। ये अनुभाव भ्रूविक्षेप, कटाक्ष आदि (आश्रय के) शारीरिक विकार हैं, तथा रस को परिपुष्ट करते हैं। अभिनय (दृश्य काव्य) तथा काव्य में इन अनुभवों का प्रत्यक्ष अनुभव करने वाले सामाजिकों के अनुभव के विषय होते हैं इसलिए अथवा ये रत्यादि स्थायी भाव के बाद होते हैं इसलिए ये अनुभाव कहलाते हैं। रसिकों में ये इसी नाम से पुकारे जाते हैं। कारिका में अनुभावों को भावसंसूचक विकार कहा गया, यह लौकिक रस की दृष्टि से ही कहा गया है, काव्य में तो ये भी रसपोष के कारण ही होते हैं। (लोक में नायक नायिका का जो प्रेम देखा जाता है, वह लौकिक रस है। वहाँ भ्रूविक्षेप आदि उस रस (प्रेम) से उत्पन्न होते हैं, अतः वे कार्य हैं। नाटक व काव्य का रस, जिसकी चर्वणा सामाजिकों द्वारा की जाती है, अलौकिक रस है। वह अनुभाव के बिना उत्पन्न नहीं हो सकता, अतः यहाँ इन्हें कारण ही मानना ठीक होगा।) क अनुभावों के उदाहरण के लिए धनिक का स्वरचित पद्य लिया जा सकता है, जहाँ किसी युवा को देखकर रति भाव से आविष्ट सुन्दरी के अनुभावों का वर्णन किया गया है। है भोली सुन्दरी, वह कोई भी युवक सचमुच धन्य है, जिसके चेहरे की ओर (तुमने) कामवासना से पूर्ण होकर; मुंह से जँभाई लेते हुए, स्तनतट को ऊँचा उठाकर सुशोभित होते हुए, भौहों की लता को चञ्चलता के साथ मटकाते हुए, अपने शरीर को पसीने के जल से नहलाते हुए तथा लज्जा का त्याग करते हुए, रोमाञ्ित होकर, दुग्ध-महासमुद्र के फेनसमूह के समान कान्ति वाले कटाक्षों की शोभा को व्यापारित किया। जिसकी और तुमने इस तरह के भाव से कटाक्ष-पात किया, वह युवक सचमुच भाग्यशाली है। इन अनुभावों को हम प्रत्येक रस के अवसर पर उदाहृत करेंगे। हेतुकार्यात्मनो: सिद्धिस्तयोः संव्यवहारतः॥३॥ ये विभाव तथा अनुभाव रस (लौकिक रस) के कारण तथा कार्य हैं तथा लोकव्यवहार में इनका प्रत्यक्ष रूप देखने के कारण ये व्यवहार सिद्ध है-(अतः इनका पृथक् लक्षण नहीं किया गया है।) तयोर्विभावानुभावयोलोंकिकरसं प्रति हेतुकार्यभूतयोः संव्यवहारादेव सिद्धत्वान्न पृथग्लक्षणमुपयुज्यते। तदुक्तम्-'विभावानुभावौ लोकसंसिद्धौ लोकयात्रानुगामिनौ लोक- स्वभावोपगतत्वाच्च न पृथग्लक्षणमुच्यते' इति। ये दोनों विभाव व अनुभाव जो लौकिक रस के हेतु तथा कार्य हैं, लौकिक व्यवहार से ही सिद्ध हैं, अतः इनका पृथक् लक्षणकरण आवश्यक नहीं। जैसा कि कहा गया है-'विभाव तथा अनुभाव लोकव्यवदार के द्वारा प्रमाणित है, तथा वे लोकव्यवहार के अनुसार पाये जाते हैं-लोकयात्रानुगामी हैं-साथ ही लोकस्वभाव से युक्त हैं, इन कारणों से उनका पृथक् कक्षण नहीं कहा गया है।' अथ भाव :- सुखदुःखादिकैर्भावैर्भावस्त द्वावभावनम्। अनुकार्याश्रयत्वेनोपनिबध्यमानैः सुखदु:खादिरूपैर्भा वैस्तद्धावस्य भावकचेतसो भावनं वासनं भावः। तदुक्म्-'अहो ह्यनेन रसेन गन्धेन वा सर्वमेतद्भावितं वासितम्' इति। क्रमशः कारण, कार्य तथा सहकारो कारण माना जाता है, वैसे काव्य में ये सभी कारण हैं। यहाँ यह बात भी याद रखने की है, कि आलम्बन के शारीरिक विकार 'अनुभाव' नहीं माने जाते। वे 'हा' 'हेला' आदि के अन्तर्गत आते हैं, तथा उद्दीपन विभाव के अज्र हैं।सि
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चतुर्थ: प्रकाश: १८१
यत्तु 'रसान्भावयन्भावः' इति 'कवेरन्तर्गतं भावं भावयन्भावः' इति च तत् अ्ररभि- नयकाव्ययोः प्रवर्तमानस्य भावशब्दस्य प्रवृत्तिनिमित्तककथनम्। ते च स्थायिनो व्यभि- चारिणश्चेति वच््यमाणाः । प्रथम कारिका में विभाव व अनुभाव के साथ साख्विक तथा व्यभिचारी का उल्लेख हुआ है। सा र्वक तथा व्यभिचारी दोनों के साथ स्थायी की भाँति 'भाव' शब्द का प्रयोग पाया जाता है, जैसे सार्विक भाव, व्यभिचारी भाव, स्थायी भाव। इसलिए यहां 'भाव' शब्द की परिभाषा देना आवश्यक हो जाता है। उसीका लक्षण बताते हैं :- काव्य या अभिनय में उपनिबद्ध आश्रय (दुष्यन्तादि) के सुख दुःख, हर्ष-शोक आदि भावों के द्वारा सामाजिक के हृदय का उस ही भाव से भावित होना-उस भाव तथा सामाजिक के भाव की एकतानता 'भाव' कहलाती है। नाटक में जिन व्यक्तियों का अनुकरण किया जाता है, वे वास्तविक रामादि या दुष्यन्तादि होते हैं। कवि इन्हीं में सुख दुःख आदि भावों का उपनिबन्धन करता है, जिनका निरूपण नट करता है। इन अनुकार्य व्यक्तियों के सुख दुःखादि भाव की भावना-वासना-अब सहृदय हृदय के द्वारा होती है, तो इस वासना को भाव कहते हैं। (मान लीजिये, शकुन्तला से विरहित दुष्यन्त को दुःखी देख कर व उसके शोक में षष्ठ अङ्क में चित्रलेखन के द्वारा जी बहलाते देख कर दुष्यन्त के दुःख के साथ हमारी एकतानता हो उठती है। जैसे दुष्यन्त के दुःखादि भाव ने हमारे मानस को भावित या वासित कर दिया है।) ठीक यही बात एक आचार्य ने कही है :- 'अरे इस रस या गन्ध से यह सब कुछ भावित हो गया, वासित हो गया है।' (यह ठीक वैसे ही है जैसे अगरबत्ती आदि की धूप जो अगरबत्ती में आश्रित है, स्फुट होने पर सारे समीपस्थ प्रदेश को वासित कर देती है, वैसे ही अनुकार्य रामादि में आश्रित दुःखादि, सामाजिक के हृदय को वासित कर देते हैं।) भाव की व्युत्पत्ति दूसरे ढज् से भी की गई है-'भाव वह है जो रसों को भावित करता है;' या 'भाव वह है जो कवि के आन्तरिक भाव को भावित करता है।' इसलिए पूर्वपक्षी यह शक्का कर सकता है, कि प्राचीन आचार्यों की 'भाव' के सम्बन्ध में यह त्युत्पत्ति है; फिर ऊपर जो नई व्युत्पत्ति दी गई वह कैसे मानी जाय। इसीका उत्तर देते हुए धनिक का कहना है कि ये दो व्युत्पत्तियाँ उस भाव शब्द की की गई है, जो अभिनय व काव्य का प्रवर्तक या बोधक है, तथा इसका प्रयोग उन्हीं दोनों काव्यों से सम्बद्ध भाव के लिए है। मैंने (धनिक ने) जिस अर्थ से भाव की व्युत्पत्ति की है वह रसिक के हृदय में भावित भाव की दृष्टि से। अतः दोनों का विषय भिन्न होने से इस व्युत्पत्ति का प्राचीनों की व्युत्पत्ति से कोई विरोध नहीं पड़ता। ये भाव दो तरह के होते हैं :- स्थायी तथा व्यभिचारी, इनका वर्णन आगे किया जायगा। पृथग्भावा भवन्त्यन्येऽनुभावत्वेऽपि सात्त्विकाः॥४ ॥ सत्त्वादेव समुत्पत्तेस्तच्च तद्भावभावनम्। परगतदुःखहर्षादिभावनायामत्यन्तानुकूलान्तःकरणत्वं सत्त्वं यदाह-'सत्त्वं नाम मनःप्रभवं तच्च समाहितमनस्त्वादुत्पद्यते, एतदेवास्य सत्त्वं यतः खिन्नेन प्रहर्षितेन चाश्रुरोमाच्चादयो निर्वर्त्यन्ते तेन सत्त्वेन निर्वृत्ताः सात्त्विकास्त एव भावास्तत उत्पद्यमानत्वा- दश्रुप्रभृतयोऽपि भावा भावसंसूचनात्मकविकाररूपत्वाच्चानुभावा इति द्वैरूप्यमेषाम्।' इति। यद्यपि सात्विक भावों में अनुभावत्व है, वे अनुभावों की ही तरह आश्य के विकार
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१८२ दशरूपकम् हैं, फिर भी सात्विक भाव अलग से भाव माने जाते हैं। इन सार्विकों को 'भाव' संज्ञा इसलिए दी जाती है कि ये सच्व (मानसिक स्थिति) से ही उत्पन्न होते हैं। सत्व का अर्थ है, अनुकार्य रामादि के दुःखादि भाव से भावक के चित्त का भावित होना। दूसरे लोगों के दुःख, हर्ष आदि की भावना में जब भावक का अन्तःकरण अत्यधिक अनुकूल व एकतान हो जाय उसे 'सत्त्व' कहते हैं। जैसा कहा गया है-'सत्त्व का अर्थ है मन से उत्पन्न, यह सत्त् मन की एकागता से उत्पन्न होता है। मन का सत्त्व यही है कि जब वह दुखी या हर्षित होता है तो अश्रु रोमाळ्र आदि निकल पड़ते हैं। ये अश्वुरोमाञ्जादि सत्व से निर्वृत्त होते हैं, अतः सात्त्विक भाव कहलाते हैं। इसलिए सत्त्व से उत्पन्न होने के कारण ये अश्रु आदि-किन्तु ये भाव के सूचक हैं-भाव कहलाते हैं; दूसरी ओर ये विकार रूप भी हैं इसलिए अनुभाव भी हैं। इस तरह अश्रु आदि एक और सात्त्विक भाव व दूसरी ओर अनुभाव इन दो रूपों से युक्त होते हैं। (निम्नोक्त आठ सात्विक भावों के अतिरिक्त और विकाररूप अनुभाव ही होते हैं।) ते च- स्तम्भप्रलयरोमाञ्चाः स्वेदो वैवर्ण्यवेपथू ।। ५॥
प्रलयो नष्टसंज्ञत्वम्, शेषाः सुव्यक्तलक्षणाः ॥ ६।। ये सात्विक भाव आठ हैं :- स्तम्भ, प्रलय (अचेतनता), रोमाञ्ज, स्वेद, वैवण्यं (मुंह का रङ् फीका पड़ जाना), वेपथु (कम्प), अश्रु, वैस्वर्य (आवाज में परिवर्तन)। स्तम्भ का अर्थ है अङ्गों का निष्क्रिय हो जाना, तथा प्लय का अर्थ है संज्ञा-चेतना- का नष्ट हो जाना। बाकी नाम स्पष्ट ही हैं। यथा- वेवइ सेअदवदनी रोमच्चिअर गत्तिए ववइ। चिललुल्लु तु चलअ लहु वाहोअल्लीए ररोत्ति॥ मुहऊ सामलि होई खरो विमुच्छइ विशग्घेण। मुद्धा मुहश्रल्ली तुअ पेम्मेण सावि ण धिज्इ।I' (वैपते रुवेदवदना रोमाश्वं गात्रे वपति। विलोलस्ततो वलयो लघु बाहुवल्लयां रणति॥ मुखं श्यामलं भवति क्षणं विमूच्छति विदग्धेन मुग्धा मुखवल्ली तव प्रेम्णा सापि न धैर्यं करोति') उदाहरण के रूप में एक ही उदाहरण में सारे सात्विक भावों का उल्लेख करते हैं :- हे युवक, तेरे प्रेम के कारण वह नायिका बिलकुल धैर्य धारण नहीं करती। उसके चेहरे पर पसीना आ जाता है, उसके शरीर में रोगटें उठ आते हैं, तथा वह काँपने लगती है। उसका चञ्चल कड़ा (हाथ का वलय) बाहु रूपी लता में मन्द-मन्द शब्द करता है। उसका मुंह काला पड़ जाता है, तथा क्षण भर के लिए मू्च्छित हो जाती है। उसकी मुखरूपी लता कुछ भी धीरज नहीं धरती।B -अथ व्यभिचारिण:, तत्र सामान्यलक्षणम्- विशेषादाभिमुख्येन चरन्तो व्यभिचारिण:। रेटयुत स्थायिन्युन्मन्ननिर्मग्रा: कल्लोला इव वारिघी। ७॥
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चतुर्थ: प्रकाश: १८३
यथा वारिधौ सत्येव कल्लोला उद्धवन्ति विलीयन्ते च तद्वदेव रत्यादौ स्थायिनि सत्येवा विर्भाव तिरोभावाभ्यामाभिमुख्येन चरन्तो वर्तमाना निर्वेदादयो व्यभिचारिणो भावाः। अब प्रसङ्गप्राप्त व्यभिचारियों का सामान्यलक्षण बताते हैं :- जो भाव विशेष रूप से, अर्थात् आभिमुख्य से, स्थायी भाव के अन्तर्गत कभी उठते और कभी गिरते- डूबते-उतराते-नजर आते हैं, वे व्यभिचारी भाव होते हैं। ये भाव स्थायी भाव में इसी तरह उन्मन्न तथा निमझ होते हैं, जैसे समुद्र में तरडें उठती हैं व विलीन हो जाती हैं। जैसे समुद्र में ही लहरें पैदा होती हैं और विलीन होती हैं, वैसे हो रत्यादि स्थायी भाव में ही निर्वेदादि व्यभिचारी भाव आविभूत होते हैं तथा तिरोहित हो जाते हैं, इस प्रकार व्यमिचारी भाव विशेष रूप से स्थायी भाव में ही उठते व विलीन होते रहते हैं। ये भाव ३३ होते हैं। एEI ते च- निर्वेदग्ला निश काश्रमधृतिजडताहर्षदैन्यौग्यचिन्ता- स्रासेर्ष्यामर्षगर्वाः स्मृतिमरणमदाः सुप्तनिद्राविबोधाः। घरीडापस्मारमोना: सुमतिरल सतावेगतर्कावहित्था एक्रा व्याध्युन्मादौ विषादोत्सुकचपलयुतास्त्रिंशदेते त्रयश्च ॥८॥ ये व्याभचारी भाव ३३ होते हैं :- निर्वेद, ग्लानि, शङ्का, श्रम, धति, जड़ता, हर्ष, दन्य, औग्न्य, चिन्ता, त्रास, ईर्ष्या, अमर्ष, गर्व, स्मृति, मरण, मद, सुप, निद्रा विबोध, वीडा, अपस्मार, मोह, मति, अलसता, वेग, तर्क, अवहित्था, व्याधि, उन्माद, विषाद, उत्सुकता (औत्सुक्य) तथा चपलता। तत्र निर्वेद :- तत्वज्ञानापदीर्ष्यादेनिर्वेद: स्वावमाननम्।
तश्वज्ञान, आपत्ति या ईर्ष्या के कारण स्वयं का तिरस्कार, निर्वेद नामक (निर्वेद)
व्यभिचारी भाव कहलाता है। इसके चिह्न (अनुभाव) चिन्ता, अश्रु, वैवर्ण्य, उच्छास तथा दीनता है। तत्त्वज्ञानान्निर्वेदो यथा- 'प्राप्ताः श्रियः सकलकामदुधास्ततः किं दत्तं पदं शिरसि विद्विषतां ततः किम्। सम्प्रीणिता: प्रणयिनो विभवस्ततः कि कल्पं स्थितं तनुभृतां तनुभिस्ततः किम् ॥' तत्वज्ञान से निर्वेद जैसे- अगर समस्त इच्छाओं को पूर्ण करने वाली सम्पत्ति प्राप्त हो जाय तो उससे क्या ? शत्रुओं के सिर पर पैर रख दिया गया हो, उन्हें जीत लिया हो, तो उससे क्या? मित्रों व स्नेही बान्धवों को धनादि से तुष्ट कर दिया हो, तो क्या लाभ १ शरीरधारी मनुष्यों के शरीर आकल्प जीवित रहे, तो भी क्या लाभ१ हा फ्ील श।मक
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आपदो यथा- 'राजो विपद्वन्धुवियोगदुःखं देशच्युतिर्दुर्गममार्गखेदः। आस्वाद्यतेऽस्याः कटुनिष्फलायाः फलं मयैतच्चिरजीवितायाः॥' आपत्ति से निर्वेद जैसे- राजा के लिए विपत्ति, बान्धवों के वियोग का दुःख, देश का खो देना, तथा दुर्गम मार्ग में घूम कर कष्ट सहना-(विरोधी बातें हैं।)। पर मेरे द्वारा कड़वे फलवाली, शाश्वत रहने वाली, इस (प्रकृति-स्वभाव) का यह फल चखा जा रहा है। ईरष्यातो यथा- 'न्यक्कारो ह्ययमेव मे यदरयस्तत्राप्यसौ तापसः सोऽप्यत्रैव निहन्ति राक्षसभटाजीवत्यहो रावणः। धिग्धिक्शक्रजितं प्रबोधितवता किं कुम्भकर्णेन वा स्वर्गग्रामटिकाविलुण्ठनपरैः पीनैः किमेभिर्भुजैः ॥' ईरष्या से निर्वेद, जैसे राम से हारते हुए रावण की निम्न उक्ति में- यह मेरा सबसे बड़ा अपमान है, कि मेरे जैसे वीर के भी शत्रु हो सकते हैं, और फिर शत्रु भी हैं, तो यह तापस बाबा, और फिर वह यहीं-मेरे घर में ही, लङ्का में-आकर राक्षस वीरों को मार रहा है। इस तिरस्कार व अपमान को सह कर भी रावण जिन्दा है, यह बद्ुत बड़े दुःख की बात है। इन्द्र को जीतने वाले मेधनाद को-उसकी वीरता को-धिककार है, अथवा कुम्भकर्ण को नींद से जगाने से भी क्या लाभ हुआ, और स्वर्ग के छोटे गाँव को लूटने में निपुण मैरे ये मोटे हाथ भी व्यर्थ हैं। वीरशङ्गारयोरव्यभिचारि निर्वेदो यथा- 'ये बाहवो न युधि चैरिकठोरकण्ठ- पीठोच्छल द्रुधिरराजिविराजितांसाः। नापि प्रियापृथुपयोधरपत्रभङ्ग- संक्रान्तकुङ्कुमरसाः खलु निष्फलास्ते ॥' आात्मानुरूपं रिपुं रमणीं वाडलममानस्य निर्वेदादियमुक्तिः। एवं रसान्तराणाम- प्यज्गभाव उदाहार्यः । वीर तथा श्रृद्गार रस के व्यभिचारिभावरूप निर्वेद का उदाहरण, जैसे- जो हाथ, न तो युद्ध में वैरियों के कठोर कण्ठतट में उछलते हुए, खून से सुशोभित भाग वाले हैं; और न प्रिया के पीन स्तनों की पत्रावलो के कुङ्कम रस से गीले ही हुए हैं, निःसन्देह वे हाथ निष्फल ही हैं।' यह उक्ति ऐसे व्यक्ति के निर्वेद को सूचक है, जिसे न तो अपने लायक शत्रु ही मिला है, न कोई सुन्दरी प्रिया हो प्राप्त हुई है। जैसे यहाँ वीर तथा श्रृङ्गार के व्यभिचारिभूत निर्वेद का उदाहरण दिया गया, वैसे दूसरे रसों के अङ्गरूप में भी इसका उदाहरण दिया जा सकता है। रसानङ्ग: स्वतन्त्रो निर्वेदो यथा- 'कसत्वं भोः कथयामि दैवहतकं मां विद्धि शाखोटकं वैराग्यादिव वक्षि साधु विदितं कस्माद्यतः श्रूयताम्।
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चतुर्थ: प्रकाश: १८५
वामेनात्र वटस्तमध्वगजन: सर्वात्मना सेवते न च्छायापि परोपकारकरणी मार्गस्थितस्थापि मे ॥' विभावानुभावरसी्नप्गभेदादनेकशाखो निर्वेदो निदर्शनीय: डागक निर्वेद स्वतन्त्र रूप में भी पाया जा सकता है, जहाँ वह किसी रस का अङ्ग नहीं रहता। स्वतन्त्र निर्वेद का उदाहरण, जैसे- कोई व्यक्ति शाखोटक वृक्ष से प्रश्न पूछ रहा है, तथा वह उत्तर देता है। इस प्रकार वत्तर प्रत्युत्तर रूप में शाखोटक वृक्ष का निर्वेद बताया गया है। 'तुम कौन हो, भाई' 'कहता हूँ, मैं अभागा शाखोटक हूँ' 'तुम तो वैराथ्य से बोल रहे हो।' 'तुमने ठीक समझा' 'ऐसा क्यों' 'तो सुनो देखो, इधर बाईं और एक बरगद का पेड़ है। राहगीर उसे हर तरह से सेते हैं। यद्यपि मैं सड़क पर खड़ा हूँ, तथापि मेरी छाया भी दूसरे का उपकार नहीं कर पाती।* (अप्रस्तुत प्रशंसा के द्वारा किसी ऐसे व्यक्ति का निर्वेद सूच्य ै , जो दिल से तो परोपकार करना चाहता है, पर उसके पास परोपकार करने के साधन नहीं है।) यह निर्वेद विभाव, अनुभाव तथा रस के अब्ब रूप में तथा स्वतन्त्र रूप में अनेक प्रकार का दिखाया जा सकता है। अथ ग्लानि :- रत्याद्यायासतद तुद्धिग्लानिनिष्पाणतेह च।
निधुवनकलाभ्यासादिश्रमतृटक्षुद्वमना प्राणतारूपा ग्लानिः।अस्यां च चैव-
सुरत आदि से जनित परिश्रम, तृषा तथा तुधा के द्वारा जो निष्प्राणता हो (ग्लानि)
जाती है, उसे ग्लानि भाव कहते हैं। इसके अन्तर्गत वैवर्ण्यं, कम्प, अनुत्साह, अङ्ग, वचन, व क्रिया का मन्द हो जाना-थे अनुभाव पाये जाते हैं। यथा माघे-र गिगार ज्रीड विए्या 'लुलितनयनताराः क्षामव्रेन्दुबिम्बा रजनय इव निद्राक्कान्तनीलोत्पलाचयः। शिक एP क 5 तिमिरमिव दधाना: सरंसिन: केशपाशाकदृष् क हान उवरर क ि नवनिपतिगृहेभ्यो यान्त्यमूर्वार वध्व: शेषं निर्वेदवदूहम्। 1 ग्लानि का उदाहरण माघ के एकादश सर्ग का निम्न पद्य दिया गया है :- मि देखो, प्रातः काल होते ही ये वारविलासिनियाँ, जिनके नेत्रों की पुतलियाँ निष्कम्प हो गई हैं; जिनके मुख रूपी चन्द्रबिम्ब दुबले पड़ गये हैं (क्षीणकान्ति हो गये हैं); और जिनकी नील कमल के समान नींद के कारण सुन्दर आँखें मुरझा गई हैं; अन्धकार के समान फैले घने काले केशपाश को धारण करती हुई, राजाओं के घर से इसी तरह लौट रही हैं, जैसे प्रातः काल के कारण प्रकाशहीन तारों वाली; फीके चन्द्रमा वाली, तथा क्रान्त इन्दीवर से युक्त, अन्धकार मय रात्रियाँ राजगृह से वापस जा रही हों। नाही5 ग्लानि के विषय में रसाङ़ता या अननता ठोक उसी तरह समझी जानी चाहिए, जैसा हम निर्वेद के बारे में कह चुके हैं को लए िकु भFर मिशहाल २४ द०
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T दशरूपकम्
पथ शङ्का- अनर्थप्रतिभा शङ्का परक्रौर्यात्स्वदुर्नयात्। कम्पशोषाभिवीत्तादिरत्र वर्रास्वरान्यता ।। ११।
जहाँ दूसरे व्यक्ति की क्रूरता या अपने दुर्नय (दु्व्यवहार) के कारण अनर्थ की आशङ्का हो, उसे शङ्का कहते हैं। शङ्का के अन्तर्गत कम्प, शोष, डरकर इधर उधर देखना, स्वरभङ्ग आदि अनुभाव होते हैं। तत्र परकरौर्याद्यथा रत्नावल्याम् 'हिया सर्वस्यासौ हरति विदितास्मीति वदनं द्वयोर्दृष्ट्वाSडलापं कलयति कथामात्मविषयाम्। Taplp कh S सखीषु स्मेरासु प्रकटयति वैलच्यमधिकं प्रिया प्रायेणास्ते हृदयनिहितातक्कविधुरा ।।' 5 परक्रौर्यजनित शङ्का जैसे रत्नावली नाटिका में-(राजा उदयन रत्नावली की दशा का वर्णन करते कह रहा है।) यह प्यारी रत्नावली अपने हृदय में शक्कित होने के कारण सचमुच ही व्यथित दृष्टिगोचर होती है। लोगों के आगे से यह लज्जा के साथ अपना मुह यह समझ कर छिपा लेती है कि उन्होंने इसके गुप्त प्रेम को जान लिया है। किन्हीं दो लोगों को बातचीत करते देखकर वह यही समझती है कि वे उसी के बारे की बात कर रहे हैं। सखियाँ को अपनी ओर मुसकराते देखकर वह अत्यधिक लज्जित हो जाती है। इन सारी चेष्टाओं को देखने से पता चलता है कि वह अत्यधिक शक्कित हो रही है। रवदुनयाद्यथा वीरचरिते- 'दूराहवीयो धारणीघराभं यस्ताटकेयं तुणध्यधूनोत् । क की F ,FFक हन्ता सुबाहोरपि ताडकारिः स राजपुत्रो हृदि बाधते माम् ॥' अनया दिशाऽन्यदनुसर्तव्यम्। स्वदुनयजनित शङ्का, जैसे महावीरचरित मेंP3 17S जिस छोटे से राजपुत्र ने दूर से ही प्रर्वंत के समान डीलडौल वाले ताड़का के पुत्र मारीच राक्षस को तिनके की तरह उड़ा दिया, तथा जो सुबाडु का मारने वाला है, वह ताड़का का शत्रु राजकुमार (राम) मुझे हृदय में व्यथित कर रहा है। इसी तरह और भी समझना चाहिए। अथ श्रम: अ्रमः खेदो उध्वरत्यादे: स्वेदो Sस्मिन्मर्दनादयः। अध्वतो यथोत्तररामचरिते-
दशिथिलपरिरम्मदत्तसंवाहनानि। प्रिणा लक आाR
त्वमुरसि मम कृत्वा यत्र निद्रामवाप्ता I' क आी ।9 05 89
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E DS HDREE (श्रम) ाल H मार्ग में चलने के कारण या सुरत के कारण जनित खेद को श्रम कहते हैं। इसमें स्वेद, मर्दन आदि अनुभाव पाये जाते हैं। आ B IF FEIBPOIT 1 SF WVSPE मार्गजनित श्रम, जैसे उत्तररामचरित में (राम सीता से कहते हैं)- त 1ienp *हे सीते, यह वही स्थान है, जहाँ मार्ग में चलने के कारण उत्पन्न खेद से अलसाए मनोहर एवं मुग्ध अङ्गों को, जो कुम्हलाए विसतन्तु के समान दुर्बल थे, तथा जिन्हें मैंने गाढ आलिजनों के द्वारा संवाहित किया (दबाया) था-मेरे वक्षःस्थल पर रखकर तुम सो गई थी हना) गळ रतिश्रमो यथा माघे-7 ही 'प्राष्य मन्मथरसादतिभूमि दुर्वहस्तनभराः सुरतस्य।
इत्याद्युत्प्रेच्यम्। रतिश्रम, जैसे शिशुपाल वध के दशम सर्ग में- काले तथा लम्बे बालों वाली रमणियाँ, जिनको स्तन का भार वहन करना बड़ा कठिन ही गया था, मन्मथ राग के कारण सुरत की पराकाष्ठा को प्राप्त कर (अत्यधिक सुरतक्रीड़ा करके), पसीने की बूँदों से गीले ललाट पर चिपके हुए बालों को चारण करती हुई, थक गईं। श्रम के विषय में रसाङगत्वादि इसी तरह समझ लेना चाहिए।s 1 अ्रथ धृतिः-
ज्ञानादयथा भतृहरिशतके- 'वयमिह परितुष्टा वल्कलैस्त्वं च लच््म्या o न की सम इह परितोषो निर्विशेषो विशेषः। ला स तु भवतु दरिद्रो यस्य तृष्णा विशाला हिी। मनसि च परितुष्टे कोऽर्थवान् को दरिद्रः ॥' शक्तितो यथा रन्नावल्याम्- 'राज्यं निर्जितशत्रु योग्यसचिवे न्यस्तः समस्तो भरः सम्यक्पालनपालिता: प्रशमिताशेषोपसर्गाः प्रजाः 15-315 प्रदयोतस्य सुता वसन्तसमयस्त्वं चेति नाम्रा धृतिnएजक्री काम: काममुपैत्वयं मम पुनर्मन्ये महानुत्सवः ॥ तिफ :क
॥ छaI(धति) ज्ञान, शक्ति, आदि के कारण जहाँ ऐसा सन्तोष हो जाय, जो बिना किसी व्यग्रता के कर्मभोग को भोगे, वह सन्तोष धति (धैयं) कहलाता है।RiEN1 ज्ञान से धृति जैसे भर्तृहरिशतक में-(कोई सन्तोषी सम्पत्तिवान् से कहता है) HIT हम लोग इन वल्कलों से ही सन्तुष्ट हैं और तुम सम्पत्ति से प्रसन्न हो । इस तरह तुम्हारा और हमारा सन्तोष समान है। अब हम लोगों में कोई विशेष अन्तर नहीं है। जिसकी तृष्णा बहुत बढ़ी होती है, वह दरिद्र हो सकता है। अरे जब मन ही सन्तुष्ट है तो कौन सम्पत्ति- शाली, और कौन दरिद्र S n i F mF-PfbA
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दशरूपकम्
शक्ति से जनित धृति, जैसे रलावली नाटिका के उदयन में धृति भाव की स्थिति- मैं राज्य के सारे शत्रु जीते जा चुके हैं। अब कोई भी शत्रु ऐसा नहीं जो राज्य में विष्न उपस्थित करे। राज्यशासन का सारा भार सुयोग्य मन्त्री यौगन्धरायण को सौंप दिया है। प्रजाओं को अच्छी तरह से लालित व पालित किया गया है, उनके सारे दुःख-उपसर्ग- (अकाल आदि ईतियाँ) शान्त हो चुके हैं। मेरे हृदय को प्रसन्न रखने के लिए प्रदोत की पुत्री वासवदत्ता मौजूद है और तुम (वसन्तक) मौजूद हो। इन वस्तुओं के नाम से ही काम (इच्छा) धैर्य को प्राप्त ही। अथवा इन सब वस्तुओं के विद्यमान होने पर कामदेव मजे से आये, मैं तो यह समझता हूँ कि मेरे लिए यह बहुत बड़े उत्सव का अवसर उपस्थित हुआ है। मैं कामदेव के उत्सव का स्वागत करने को प्रस्तुत हूँ। इसी तरह और भी समझना चाहिए। अथ जडता- अप्रतिपत्तिर्जडता स्यादिष्टानिष्टदर्शनश्रुतिभिः। अनिमिषनयन निरीक्षणतर्ष्णीभावादयस्तत्र ॥ १३ ॥ विठीक इष्टदशनायथा 'एवमालि निगहीतसाध्वसं शङ्करो रहसि सेव्यतामिति। सा सखीभिरुपदिष्टमाकुला नास्मरत्प्रमुखवर्तिनि प्रिये II' ज
ईप्सित या अनीप्सित वस्तु के देखने या सुनने से जो अज्ञानावस्था तथा (जड़ता)
किंकर्तव्यविमूढ़ता हो जाती है, उसे जड़ता कहते हैं। इनमें नेत्रों का अपलक ठहर जाना, चुप रहना इत्यादि अनुभाव पाये जाते हैं। इष्टदर्शन जनित जड़ता, जैसे कुमारसम्भव में पार्वती के निम्न वर्णन में- 'हे सखी, एकान्त में चित्त को स्थिर करके इस ढब से शङ्कर के प्रति आचरण करना। इस तरह सखियों के द्वारा दिये गये उपदेश को; शङ्कर के सम्मुख होने पर व्याकुल पावती बिलकुल याद न कर पाई ।.ीफ अ्निष्टश्रवणाद्यथोदात्तराघवे-'राक्षसः- तावन्तस्ते महातमानो निहता केन राक्षसाः। येषां नायकतां याताखितरिशिर:खरदूषण: ॥। द्वितीय :- गरृहीतघनुषा रामहतकेन। प्रथम :- किमेकाकिनव ? द्वितीय :- अदष्ट्वा कः प्रत्येति ? पश्य तावतोSस्मद्वलल्य-
कबन्धाः केवलं जातास्तालोत्ताला रणाङ्गयो ॥। I प्रथम :- सखे यद्येवं तदाहमेवंविध: किं करवाणि ।' इति। जोए कड़ ाष् अनिष्टश्रवणजनित जड़ता, जैसे उदात्तराघव नाटक में-1D 35गिति कि कड राक्षस-जिन राक्षसों के सेनापति त्रिशिरा, खर व दूषण थे, उन असंख्य महावली राक्षसों को किसने मार गिराया? जीस सष द्वितीय-धनुर्षारी दुष्ट राम ने॥3 प्रथम- क्या अकेले ने ही उन्हें मार पिराया? IF9 tt tF FEP द्वितीय-बिना देखे कौन विश्वास करता है ? सुनो, इमारी सारी सेना युद्धभूमि में केवल
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चतुर्थ: प्रकाश:
ताड़ के वृक्ष के समान लम्बे-लम्बे उन कबन्धों (रण्डों) के रूप में बची रह गई, जो (रुण्ड) सिर के एक दम कट जाने से पैदा हुए गड्ढों में घूमते तथा डुबकी लगाते गीव पक्षियों से व्याकुल हो रहे थे। व जार जिर प्रथम-मित्र, यदि यही बात है, स अवस्था में कर ही क्या सकता हूँ? अथ हर्ष :- प्रसत्तिरुत्सवादिभ्यो हर्ष उश्रुस्वेदगद्दाः। प्रियागमनपुत्र जननोत्सवादिविभावैश्वेतःप्रसादो हर्षः। तत्र चाश्रुस्वेदगद्रदादयोऽनु- भावाः। यथा- आयाते दयिते मरुस्थलभुवामुत्प्रेच्य दुलङ्वयतां Tगेहिन्या परितोषबाष्पकलिलामासज्य दृष्टि मुखे। ि कि दत्त्वा पीलुशमीकरीरकवलान्स्वेनाश्वलेनादरा- दुन्मृष्टं करभस्य केसरसटाभाराग्रलमं रजः ।।' निर्वेदवदितरदुन्नेयम्। (हर्ष) उत्सव आदि के कारण जनित प्रसन्नता हर्ष कहलाती है। इसके अनुभाव अश्रु, स्वेद तथा गद्गद हो जाना है। प्रिय के आगमन, पुत्रोत्पत्ति आदि विभावों मन में जो प्रसन्नता होती है, उसे हषं कहते हैं। इसके अश्रु, स्वेद, गद्गद आदि अनुभाव हैं से प्रिय के आगमन से प्रसन्न युवती का निम्न पद्य में वर्णित हर्ष का चित्रण- प्रिय बड़े दिनों में घर लौट कर आया है। मार्ग में उसने अगम्य तथा दुलब्य मरुभूमि को पार किया है। मरुभूमि की इस गहन पद्धति का विचार कर गृहिणी (पान्थवधू) ने उसके मुख की ओर प्रसन्नता व सन्तोष से आये आँसुओं से भरी निगाह डाली। आखिर मेरे लिए तुम मरुभूमि की गहनता की भी पर्वाह न करके आये ही, यह भाव भी यहाँ अभिव्यञ्ञ है। लेकिन इसमें प्रमुख साधन तो वह ऊँट है, जो मरुभूमि के दुर्भेद कान्तार को पार कर नायक को यहाँ तक ले आया है, अतः वह भी तो प्रशंसा का पात्र है। नायिका अपने आज्जल में पील, शमी तथा करीर की पत्तियों को लेकर बड़े आदर से अपने हाथों उसे खिलाती है, और फिर उस ऊँट की गरदन में, अयाल पर, लगी हुई धूल को झटकार देती है। 5. और बातें ठीक निर्वेद की ही तरह समझी जानी चाहिए। अथ देन्यम्- दौर्म त्यादयैरनौजस्यं दैन्यं काव्पर्यामृजादिमत्।।१४। 9> 195 दारिद्रथन्यकारादिविभावैरनौजस्कता चेतसो दैन्यं तत्र च कृष्णतामलिनवसनदश- नादयोऽनुभावाः। यथा-gPp 'वृद्धोऽन्धः पतिरेष मश्चकगतः स्थूणावशेषं गृहं कालोऽभ्यर्णजलागम: कुशलिनी वत्सरय वार्तापि मो ।।' यह्नात्सश्वचिततैलबिन्दुघटिका भग्नेति पर्याकुला दृष्द्वा गर्भभरालसां सुतचधूं धश्रुथिरं सोदिति। क शेषं पूर्ववत्व किद्कमग-F
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१६० दशरूपकम्
5 बुद्धिहीनता आदि कारणों से कान्ति तथा ओज का त्षीण हो जाना, दैन्य (छणड) (दैन्य)
कहलाता है, इसमें कालापना, मलिनता आदि अनुभाव पाये जाते हैं। दारिद्रय, अपमान आदि विभावों से जनित चित्त का मन्दकान्ति होना दैन्य कहलाता है, इसके अनुभाव है :- कृष्णता, वस्त्रों व दाँतों का मलिन रहना आदि। जैसा निम्न पद्य में किसी बुढ़िया के दारिद्रथ का तथा तज्जनित दैन्य का वर्णन है :- पति तो बड़ा बूढ़ा है और हर दम खटिया में पड़ा रहता है। घर अब केवल स्थूणा (थूणी) के ही आधार पर टिका है, वह भी गिरने वाला है। बरसात का मौसम पास है। इ्धर विदेश में गये बेटे की कोई कुशल-खबर भी नहीं आई। बड़े यत से तेल की बूँद-बूँद को जोड़ कर तेल की एक छोटी सी हँड़िया भरी थी, हाय, वह भी फूट गई। इन सारी बातों को सोच कर तथा बहू को गर्भ के भार के कारण अलसाई देख कर व्याकुल सास बड़ी देर तक रोती रहती है। अथौग्व्यम्- दुष्टेऽपराधदौर्मुख्य करौरयेश्चण्डत्वमुग्रता। तत्र स्वेदशिर:कम्पतर्जनाताडनादयः॥। १५॥ यथा वीरचरिते-'जामदग्न्यः- उत्कृत्योत्कृत्य गर्भानपि शकलयतः क्षत्रसन्तानरेष-प वृद्ा सक पव i 6b 9 fiy दुद्दामस्यकविंशत्यवधि विशसतः सर्वतो राजवंश्यान्। thFE S9x पित्र्यं तद्रक्तपूणहद सवनमहानन्दमन्दायमान- क्रोधाम्नेः कुर्वतो मे न खलु न विदितः सर्वभूतैः स्वभावः ॥' (औग्न्य ) क अपराध, दुष्टता, क्रूरता आदि के कारण दुष्ट व्यक्ति के प्रति जो क्रोध आता है, जो कर्कश भाव उत्पन्न होता है, उसे उग्रता कहते हैं। इसके अनुभाव है :- स्वेद, सिर को हिलाना, लोगों को डराना, धमकाना तथा पीटना, आदि। 1 जैसे महावीरचरित की परशुराम की निम्न उक्ति में- 1 क्षत्रियों की सन्तान के प्रति जनित रोष के कारण गर्भ में स्थित भ्रूणों की भी काट-काट कर डकड़े करते हुए; तथा समस्त राजवंशोत्पन्न क्षत्रियों को २१ बार मौत के घाट उतारने वाले दुधरषं तेज वाले, मेरा स्वभाव समस्त प्राणियों द्वारा विदित न हो यह बात नहीं है, बल्कि हर एक व्यक्ति मेरे इस स्वभाव को जानता है; कि मैंने राजवंशोत्पन्न क्षत्रियों के रक्त से भरे तालाबों में तर्पणादि करके अत्यधिक आनन्दित होकर अपनी क्रोध रूपी अभनि को शान्त किया है, तथा इस प्रकार पितृ-कार्य-श्रद्ध-तर्पणादि-विहित किया है।। अथ चिन्तााफकु ध्यानं चिन्तेहितानाप्े: शून्यताश्वासतापकृत्।।:हटिशा यथा-
कुर्वन्त्या हरहासहारि हृदये हारावलीभूषणम्।छालाड बाले बालमृणालनालवलयालङ्कारकान्ते करे 15 विन्यस्याननमायताक्षि सुकृती कोऽयं त्वया स्मर्यते॥'
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चतुर्थः प्रकाश: १६१
यथा वा- 'अस्तमित विषयसङ्गा मुकुलितनयनोत्पला बहुश्वसिता।788उण ध्यायति किमप्यलच्यं बाला योगाभियुक्तेव ।।'
ईप्सित वस्तु की प्राप्ति न होने के कारण उसके बारे में जो ध्यान किया जाता है, (चिन्ता)
उसे चिन्ता कहते हैं। इसके अनुभाव शून्यता, बुद्धि की निष्क्रियता, श्वास तथा ताप हैं। ह लंबी-लंबी आँखों वाली सुन्दरी, बताओ तो सही वह कौन सौमाग्यशाली व्यक्ति है, जिसे-कोमल मृणाल नाल के वलय के आभूषण वाले सुन्दर हाथ पर अपने मुख को रख कर, आँखों की पलकों पर गुंथे हुए मोतियों के समान अश्रुबिन्दुओं से; महादेव के हास के समान श्वेत हार के आभूषण की उरःस्थल रचना करती हुई; तुम याद कर रहो हो। अथवा, इन्द्रियों के विषयों का ज्ञान अस्तकर, आँखों के कमलों को बन्द किये, अत्यधिक साँस वाली, यह सुन्दरी, योग में स्थित, योगिनी के समान किसी अलक्ष्य वस्तु (प्रिय) का ध्यान कर रही है। अथ त्रास :- गर्जितादेर्मनःक्षोभस्रासो Sत्रोत्कस्पितादयः ॥ १६ ॥9६ यथा माघे- 'त्रस्यन्ती चलशफरीविघट्टितोरु- र्वामोरूरतिशयमाप विभ्रमस्य। क्रा क्षुभ्यन्ति प्रसभमहो विनापि हेतो-p liv) र्लीलाभि: किमु सति कारणे रमण्यः ।' नाड प्रक (त्रास) FF fh बादल की गरज आदि से जनित मन का तोभ त्रास कहलाता है, इसके अनुभाव कम्प आदि हैं। जैसे माघ के अष्टम सर्ग के जलविह्यारवर्णन में- रमणियाँ अपने प्रियों के साथ जलविहार कर रही हैं। किसी सुन्दरी की जांध के पास से पानी में तैरती हुई मछली स्पर्श कर जाती है, उससे डरी हुई वह रमणी सुन्दर बन जाती है। रमणियाँ तो बिना किसी कारण के ही, केवल लीला व श्ृङ्गारिक चेष्टा से ही, बहुत ज्यादा चज्चल हो उठती है, तो फिर कहीं सचमुच में कोई क्षौभ पैदा करने वाला कारण विद्यमान हो, तो उनके क्षोभ के बारे में कहना ही क्या ? अथासूया- परोत्कर्षाक्षमा 5सूया गर्वदौर्जन्यमन्युजा। दोषोक्त्यवज्ञे भ्रुकुटिमन्युक्रोधेङ्गितानि च॥१७॥ गर्वेण यथा चीरचिते- 'अर्थित्वे प्रकटीकृतेऽपि न फलप्राप्तिः प्रभोः प्रत्युत TE कT BS द्रह्यन्दाशरथिर्विरुद्धचरितो युक्कतस्तया कन्यका। FIST
काक उत्कर्ष च परस्य मानयशसोर्विसरंसनं चात्मन: शि क i S J PIस्त्रीरत्नं च जगत्पतिर्दशमुखो इप्: कथं मृष्यते ॥।'9जक म एरीH
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१६२ दशरूपकम्
घमण्ड, दुष्टता, तथा क्रोध के कारण किसी दूसरे व्यक्ति की उन्नति का न सह (असूया)
सकना असूया कहलाता है। इसमें दोष से युक्त उक्ति का प्रयोग, उस व्यक्ति के प्रति अनादर, भ्रुकुटि, क्रोध, शोक आदि चिह्न पाये जाते हैं। गर्वजनित असूया जैसे महावीरचरित की इस उक्ति में जहाँ रावण के गर्व का उल्लेख किया गया है :- रावण ने जनक से अर्थी बन कर सीता को माँगा, पर फिर भी स्वामी रावण को फलप्राप्ति न हो सकी। बल्कि उनसे शत्रुता करने वाले विरोधी दशरथ के पुत्र राम को वह कन्या मिल गई। शत्रु की उन्नति, स्वयं के मान तथा यश का ध्वंस, तथा स्त्रीरल का इस तरह हाथ से चला जाना, भला वह घमण्डी जगत्पति रावण कैसे सह सकेगा ? दौर्जन्यादयथा- साछ करीआा यदि परगुणा न क्षम्यन्ते यतस्व गुणाजने काफ्ड T (Fस]) नहि परयशो निन्दाव्याजैरलं परिमार्जितुम्। विरमसि न चेदिच्छाद्वेषप्रसक्तमनोरथो दिनकरकरान् पाणिच्छत्र्नुदञ्छूम मेष्यसि॥' दुष्टताजनित असूया, जैसे- अगर तू दूसरों के गुणों को नहीं सह सकता, तो खुद ही गुणों के अर्जन का प्रयत्न कर। दूसरों की निन्दा कर कर इस बहाने से उनके यश को हटाने की, उसे धोने की, चेष्टा करन। ठीक नहीं है। इच्छा व द्वेष से भरे मनोरथ वाला है तू दूसरों की निन्दा करने से नहीं रुकेगा, तो सूर्य की किरणों को हाथ के छत्रों से रोकने की चेष्टा करता हुआ खुद ही थक कर शान्त हो जायगा। दूसरे यशस्वी पुरुषों की निन्दा कर तू उनका उसी तरह कुछ भी नहीं बिगाड़ पायेगा, जैसे सूर्य की किरणों को रोकने की कोशिश करने पर भी उन्हें कोई नहीं रोक पाता। र कशा कि खड मन्युजा यथाSमरुशतके- 'पुरस्तन्व्या गोत्रस्खलनचकितोऽहं नतमुखः भें डीरट एक्क
उर f प्रवृत्तो वैलद्यात्किमपि लिखितु दैवहतक:।श कP F FyR $ FIF 6E
स्फुटो रेखान्यास: कथमपि स तादृक्परिणतो दp लिस् गता येन व्यक्तिं पुनरवयवैः सैव तरुणी ॥ ततश्वाभिज्ञाय स्फुरदरुणगण्डस्थलरुचा मनस्विन्या रोषप्रणयरभसाद्रदवदगिरा। अहो चित्रं चित्रं स्फुटमिति निगद्याभ्ुकलुषं रुषा ब्रह्मात्त्ं मे शिरसि निहितो वामचरण: ।।' क्रोधजनित असूया, जैसे अमरुकशतक के इस पद्यद्वय में- कोई नायक किसी मित्र से अपने प्रति आचरित ज्येष्ठा नायिका के क्रोध का वर्णन करते कह रहा है। बातचीत के सिलसिले में उस सुन्दरी-ज्येष्ठा नायिका-के सामने मेरे मुंह से एक दम दूसरी नायिका का नाम निकल गया। उसके मुंह से निकलते ही देख कर मैं चकित हो गया, और कहीं यह ज्येष्ठा नायिका, उस दूसरी नायिका के प्रति मेरे प्रेम को न ताड़ ले, इसलिए मैं लज्जा से मुंह नीचा किये कुछ लिखने लग गया। पर, मैं मन्दभाग्य था, मेरे द्वारा जो
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चतुर्थः प्रकाश: ०१६३
चित्र लिखा गया, उसकी रेखाएँ ही कुछ इस दङ्ग से बन गई कि, वह कनिष्ठा उस रेखाचित्र के द्वारा सम्पूर्ण अङ्गों से युक्त स्पष्ट दिखाई पड़ी-वह उसीका चित्र बन गया। तब उस चित्र को देख कर वह ज्येष्ठा नायिका सारी बात समझ गई। उसके कपील पर क्रोध के कारण लाली दौड़ आई, वे फरकने लगे, तथा उसकी वाणी रोष व प्रेम से गद्गर हो गई। उस मानिनी ने आँस गिराते हुए 'अहो, बड़ा आश्चर्य है, बड़ा आश्चर्य है, (अथवा, अहो बड़ा सुन्दर चित्र है) यह कह कर, ब्रह्मास्त्र के समान अपने बायें चरण को क्रोध से मेरे सिर पर डाल दिया। ER अथामर्ष :- अधितेपाप मानादेरमर्षो डभिनिविष्टता। कि5 तत्र स्वेदशिर:कम्पतर्जनाताडनादयः॥ १८॥ रका यथा वारचरिते- 'प्रायश्चित्तं चरिष्यामि पूज्यानां वो व्यतिक्रमात्। न त्वेवं दूषथिष्यामि शस्त्रग्रहमहाव्रतम्।।'
तिरष्कार, अपमान आदि को न सह सकना अमर्ष कहलाता है। इसमें स्वेद, सिर (अमर्षं)
को हिलाना, तर्जन, ताड़न आदि अनुभाव पाये जाते हैं। क जसे महावीरचरित में- आप जैसे पूज्यों का उल्लङ्गन करने के कारण मैं प्रायश्चित करूँगा। शस्त्रग्रहण करने की महती प्रतिज्ञा को मैं यों ही दूषित न करूँगा। यथा वा वेणीसंहारे- 'युष्मच्छासनलङ्गनाम्भसि मया मग्नेन नाम स्थितं प्राप्ता नाम विगर्हणा स्थितिमतां मध्येऽनुजानामपि। क्रोधोल्लासितशोणितारुणगदस्योच्छिन्दतः कौरवा-।। नद्यैकं दिवसं ममासि न गुरुर्नाहं विधेयस्तव ।' अथवा जैसे वेणीसंहार की भीमसेन की निम्न उक्ति में भीमसेन युधिष्ठिर के पास सहदेव के द्वारा यह बात कहला रहा है :- 'आप की आज्ञा के उल्लङ्न न करने के कारण मैं अब तक आपकी आज्ञा के लङ्न रूपी जल में मझ रहा; अब तक मैंने आपकी आज्ञा का लङ्गन न किया। और इसीलिए आपकी आज्ञा में स्थित दूसरे छोटे भाइयों के बीच मैंने (भी) निन्दा व तिरस्कार प्राप्त किया। पर आज तो मैं कौरवों से सारा बदला चुका लेना चाहता हूँ। इसलिए खून से रँगी गदा को क्रोध से घुमाते हुए तथा कौरवों का नाश करते हुए मेरे, सिर्फ एक दिन के लिए, खाली आज भर के लिए, न तो आप बड़े भाई ही हैं, और न मैं आप का आज्ञाकारी सेवक (विधेय) ही।' Bष्थ गर्व :-
कर्माण्याघर्षणावज्ञा सविलासाङ्गवीक्षणम्॥ १६ ॥ यथा वीरचरिते- 'मुनिरयमथ चीरस्तादशस्तत्प्रियं मे विरमतु परिकम्पः कातरे क्षत्रियासि TFक २५ द०
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१६४ दशरूपकम्
रीछ तपसि विततकीर तेंरदर्पकण्डलनोष्ण: परिचरणसमर्थो राघवः क्षत्रियोऽहम् ॥
ही उच्च कुल, सुन्दरता, बल, ऐश्वरयं आदि के द्वारा जनित मद को गर्व कहते हैं। (गर्व)
इसमें ऐंठ, दूसरों की अवज्ञा करना, अपने अङ्गों का विलास के साथ देखना आदि अनुभाव होते हैं। स के ल जैसे महावीरचरित में- राम परशुराम से डरी हुई सोता को सांत्वना बँधाते कह रहे हैं :- यह मुनि परशुराम इतने वीर हैं, तो यह मेरे लिए अच्छी बात है, मुझे प्यारी लग रह्ी है। लेकिन सीते, तुम क्षत्रिया हो, इसलिए यह दीनता व कम्प ठीक नहीं, इस कम्प को रोक लो। तपस्या में यश प्राप्त करने वाले, तथा घमण्ड से जिसके हाथों में खुजली चल रह्ी है, ऐसे व्यक्ति की परिचर्या करने में मैं-क्षत्रिय राम-भलीभाँति समर्थ हूँ। यथा वा तत्रव- 'ब्राह्मणातिक्रमत्यागो भवतामेव भूतये। जामदग्न्यक्ष वो मित्रमन्यथा दुर्मनायते ॥' अथवा वहीं वीरचरित नाटक में ही परशुराम के द्वारा रावण को भेजे गये निम्न सन्देश में- कि ब्राह्मणों के प्रति अपराध करने को छोड़ देना, तुम्हारे ही कल्याण के लिए है। जमदभ्नि का पुत्र परशुराम तुम्हारा मित्र है। यदि तुम व्राह्मणों का अतिक्रम करना नहीं छोड़ते, तो वह बड़ा क्रोधी है। अथ स्मृति :- सदशज्ञानचिन्तादयः संस्कारात्स्मृतिरत्र च। ज्ञातत्वेनार्थभासिन्यां भ्रसमुन्नयनादयः ॥ २०॥ यथा- 'मैनाकः किमयं रुणद्धि गगने मन्मार्गमव्याहतं शक्तिस्तस्य कुतः स वञ्रपतनाद्भीतो महेन्द्रादपि। घE :13) ताद्र्य: सोऽपि समं निजेन विभुना जानाति मां रावण- माः ! ज्ञातं, स जटायुरेष जरसा क्विष्टे वधं वाळ्छति ॥'
PI जब किसी समान पदार्थ के ज्ञान या उसकी चिन्ता आदि कारणों से, जिस वस्तु (स्मृति )
का ज्ञान हम पहले कर चुके हैं उस पूर्वानुभव का संस्कार मन में उद्बुद्ध होता है, तो इसी को स्मृति कहते हैं। स्मृति में हम पहले ज्ञात किसी वस्तु का ज्ञान फिह से प्राप्त करते हैं; स्मृति पूर्वज्ञान के द्वारा अपने ज्ञेय पदार्थ या प्रमेय को याद दिलाती है। इसके अनुभाव, भौहों का ऊँचा करना आदि है। जैसे, सीता को रथ से भगाकर ले जाता हुआ रावण किसी विशाल शरीर को उसके मार्ग का अवरोध करते देखता है। इसे देखकर वह सोच रहा है-क्या मेरे अप्रतिहृत मार्ग को, आकाश में, यह मैनाक रोक रहा है। पर मैनाक में मेरे मार्ग को रोकने की ताकत कहाँ से आई, वह तो इन्द्र के वञ्नपात से भी डरा हुआ है, डरकर समुद्र में छिपा है। यह गरुड़ भी
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चतुर्थ: प्रकाश: १६५
नहीं हो सकता, क्योंकि वह अपने स्वामी विष्णु के साथ मुझ रावण को खूब जानता है। गरुड़ ही नहीं, गरुड़ का स्वामी विष्णु भी मेरे बल को खूब जानता है, इसलिए मेरे रास्ते को रोकने की हरकत गरुड़ भी कभी नहीं करेगा। (तो फिर यह कौन हो सकता है।) आहा, पता चल गया, यह तो बूढ़ा जटायु है, जो मेरे हाथों अपनी मौत को बुला रहा है। उF 1 गा यथा वा मालतीमाधवे-'माधवः-मम हि प्राकनोपलम्भसभावितात्मजन्मनः संस्कारस्यानवरतप्रबोधात् प्रतीयमानस्तद्विसद्दशैः प्रत्ययान्तरैरतिरस्कृतप्रवाहः प्रियतमा- स्मृतिप्रत्ययोत्पत्तिसंतानस्तन्मयमिव करोति वृत्तिसारूप्यतश्चैतन्यम्- 'लीनेव प्रतिविम्बितेव लिखितेवोत्कीर्णरूपेव च प्रत्युप्तेव च वज्रसारघटितेवान्तर्निखातेव च। सा नश्चेतसि कीलितेव विशिखश्वेतोभुवः पश्चभि- श्चिन्तासंततितन्तुजालनिबिडस्यूतेव लग्ना प्रिया ।' अथवा मालतीमाधव की निम्न उक्ति में- माधव-प्राक्तन ज्ञान के साक्षात्कार से उत्पन्न संस्कार के बार बार प्रबुद्ध होने के कारण मन में प्रतीत होता हुआ, तथा जिससे भिन्न दूसरे ज्ञानानुभवों के द्वारा जिसकी धारा को रोका नहीं गया है, ऐसी प्रियतमा स्मृति रूप ज्ञान की परम्परा मेरी समस्त आत्मा को जैसे मालती की वृत्ति में ही परिणत कर रही है। मालती को एकाग्रचित्त होकर स्मृतिपथगत बनाते हुए मेरा चित्त जैसे मालतीमय हो गया है-ऐसा प्रतीत हो रहा है, जैसे मालती मेरे मन में घुल मिल गई हो, अथवा जैसे वह मन में प्रतिबिम्बित हो गई हों, अथवा मन के चित्रफलक पर चित्रित हो गई हो, या किसी शिल्पकार ने इस मन में टकूण के द्वारा उसकी मूर्ति को खोद दिया (उत्कीर्ण कर दिया) हो। अथवा वह इसमें जड़ दी गई हो, या फिर जैसे वज्रसार (चूने आदि के मजबूत लेप) के द्वारा उसकी मूर्ति को मन में ही चुन दिया गया हो, अथवा जैसे मन में खोद दी गई हो। मालती हमारे चित्त में इसी तरह बैठ गई है मानो कामदेव के पाँच वाणों ने हमारे चित्त में उसे कील दिया है, अथवा चिन्ता (बार बार उसका विचार करने) की परम्परा रूपी धागों के जाल के द्वारा उसे मन में सघन रूप से सी दिया है, मानों चिन्ता के धागों ने उसे मन में अनुस्यूत कर दिया है। अथ मरणम्- मरणं सुप्रसिद्धत्वादनर्थत्वाच्च नोच्यते। यथा- 'संप्राप्तेऽवधिवासरे क्षणमनु त्वद्वर्त्मवातायनं वारंवारमुपेत्य निष्क्रियतया निश्चित्य किंचिच्चिरम्। संप्रत्येव निवेद केलिकुररीं सास्त्रं सखीभ्यः शिशो- र्माधव्याः सहकारकेण करुण: पाणिग्रहो निर्मितः ॥' इत्यादिवच्छृभ्माराश्रयालम्बनत्वेन मररो व्यवसायमात्रमुपनिबन्धनीयम्। मरण लोकप्रसिद्ध है, तथा अनर्थ सूचक है, इसलिए इसका लक्षण नहीं किया गया है। (मरण)
जैसे प्रोषितभतृ का नायिका के इस वर्णन में- नायक विदेश चला गया है। उसके आने का दिन आ गया है। उस दिन नायिका की क्या अवस्था थी, इसी का वर्णन करते हुए उसकी सखियाँ नायक से कह रही है। बड़े दिनों
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से प्रतीक्षा करते करते, आखिर तुम्हारे आने का दिन समीप आया। उस दिन नायिका बार बार तुम्हारे आने के मार्ग की ओर के वातायन के पास जा जा कर खड़ी रह्ी। उस समय उसका शरीर निष्क्रिय-सा हो गया, बड़ी देर तक वह तुम्हारे आने की बाट देखती रही। पर तुम न आये। यह देखकर उसने बड़ी देर तक कुछ सोचा। फिर आँखों में आँस भरकर लीला के लिए पाली हुई कुररी पक्षिणो को एक दम सखियों को सौंप दिया, और छोटी सी माथवी लता का करुणाभरा विवाह आम के पेड़ के साथ कर दिया। शरृङ्गार के आलम्बन में कभी भी मरण का वर्णन नहीं करना चाहिए। वहाँ केवल मरण लालशकंड
की तैयारी भर का सक्केत किया जा सकता है। ऊपर के पद्य के वर्णन की तरह शृङ्गार में मरण का व्यवसायमात्र ही निबद्ध करना चाहिए। अन्यत्र कामचारो यथा चीरचरिते-'पश्यन्तु भवन्तस्ताडकाम्-
नासाकुटीरकुहरद्वयतुल्यनिर्यदु ह्ु द्वुदध्वनदसक्प्रसरा मृतैव ।।' दूसरे रसों में मरण का यथेच्छ वर्णन हो सकता है, जैसे वीरचरित में- 10 'आप लोग ताड़का को देखें-यह ताड़का तो मर ही गई है। इसके हृदय के मर्म का भेदन करने वाले, राम के तेज कक्कपत्र (बाण) ने वेग के साथ ही साथ उसी क्षण इसके अङ्गों का भङ्ग कर दिया है, और इसके दोनों नाक के नथुनों (नाक की दो गुफाओं) से समान रूप से बुदबुदों से युक्त; बुदबुद शब्द करता हुआ रक्तप्रवाह निकल रहा है। यथा मद :- हर्षोत्कर्षो मदः पानात्सखलदङ्गवचोगतिः।२१॥ निद्रा हासोSत्र रुदितं ज्येष्ठमध्याधमादिषु। (मद) मद्यपान से उत्पन्न हर्ष को मद कहते हैं। इसमें अङ्ग, वचन व गति रखलित होने लगती है, अङ्ग, वाणी व चाल लड़खड़ाने लगती है, यह मद तीन तरह का होता है, ज्येष्ठ, मध्य तथा अधम जिनमें क्रमशः निद्रा, हास तथा रुदन ये अनुभाव पाये जाते हैं। यथा मघ- 'हावहारि हसितं चचनानां कौशलं दृशि विकारविशेषाः। चक्रिरे भृशमृजोरपि वध्वा: कामिनेव तरुरोन मदेन I।'H इत्यादि। जैसे माघ के दशम सर्ग में- अत्यधिक उत्कट मद ने मुग्धा नायिका में हावभाव से मनोहर हँसी, वचनों के कौशल, आँखों में विकार (वक्रदृष्टिपात) को ठीक उसी तरह उत्पन्न कर दिया, जैसे तरुण नायक ने मुग्धा में भी इन भावों को उत्पन्न कर दिया है। जब शराब के नशे में मुग्धा नायिकाओं की ही यह दशा थी, तो फिर मदमस्त प्रौढा नायिकाओं की हावपूर्ण हँसी, वचनभङ्गी तथा तिरछी दृष्टि से देखने की बात तो क्या कहें। अथ सुप्तम्- डील सुप्तं निद्रोङ्गवं तत्र श्वासोच्छ्ासक्रिया परम् ॥ २२॥ अथा- ककि किशिक कही 'लघुनि तृणकुटीरे क्षेत्रकोरो यवानां रकी कp 0 T B नवकलमपलालस्स्तरे सोपधाने।F18P॥
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चतुर्थ: प्रकाश: १६७
परिहरति सुषुप्तं हालिकद्वन्द्वमारात् कुचकलशमहोष्माबद्धरेखस्तुषार।
जनिद्ा के कारण जनित स्थिति को 'सुप्त' कहते हैं। इसके अनुभाव श्वास तथा (सुप्त)
उछास की क्रिया है। हाम जौ के खेत के एक कोने पर बनी घास की छोटी झोंपड़ी में, नये पुआल के बिछौने पर, जिस पर (पुआल का ही) तकिया लगा है, सोये हुए कृषकदम्पति को, कृषकसुन्दरी के कुचकलश की गर्मी के कारण वहाँ लगी हुई ठंडक जगा रहा है। वायु में तुषार (शीतलता) है, कृषकरमणी के स्तनकलशों की गर्मी से वह ठंडक प्रतीत होता है, और उस ठण्डक का अनुभव करते ही कृषकदम्पति जग जाते हैं। अथ निद्रा- मनस्संमीलनं निद्रा चिन्तालस्यक्कमादिभि:।कp B
यथा-शि कक निद्रार्धनिमीलितदृशो मदमन्थराणि के औी. उण्माक क नाप्यर्थवन्ति न च यानि निरर्थकानि IFFTFE अद्यापि मे मृगदृशो मधुराणि तस्या- स्तान्यक्षराणि हृदये किमपि ध्वनन्ति ॥' कलरह के करी ह ण्गक के सरि
चिन्ता, आलस्य, परिश्रम आदि कारणों से मन का सम्मीलन निद्रा कहलाता है। (निद्रा)
इसके अनुभाव हैं, जँभाई लेना, अङ्गों का बल खाना, आँखों का मींच लेना, सोना आदि। जैसे निम्न पद्य में नायिका की निद्राजनित अवस्था का वर्णन है। उस हिरन के समान नेत्र वाली सुन्दरी के वे मधुर अक्षर, जो नींद के कारण आँखों के आधे बन्द होने के कारण, मद से मन्थर-मन्थर धीमे-धीमे रूप में उच्चरित किये गये, और जिन्हें न तो सार्थक ही कहा जा सकता है, न निरर्थक है-आज भी मेरे हृदय में कुछ ध्वनि कर रहे हैं।
यथा च माघे- 'प्रहरकमपनीय स्वं निदिद्रासतोचचः प्रतिपदमुपहूत: केनचिज्ागृहीति मुहुरविशदवर्णां निद्रया शून्यशून्यां किनी कप 5 दददपि गिरमन्तर्बुध्यते नो मनुष्यः ॥' कऔर जैसे माघ के एकादश सर्ग के इस वर्णन में- किसी पहरेदार ने अपना पहरा जगकर पूरा कर दिया है। अब अपने पहरे को समाप् कर वह सोना चाहता है, और इसीलिये बार बार दूसरे व्यक्ति को (जिसका पहरा आने वाला है) 'उठो, उठो' इस तरह पुकार रहा है। वह आदमी नींद से अस्पष्ट वर्ण वाली शून्य वाणी में उत्तर तो दे रहा है, पर जग नहीं रहा है।।
१. उद्सनादयः' इति पाठान्तरम्।
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अथ विबोध :- विबोध: परिणामादेस्तत्र जृम्भात्तिमर्दने। (विषोध) परिणाम अर्थात् अवस्था के परिवर्तन आदि के कारण विबोध उत्पन्न होता है, नींद की अवस्था के चले जाने पर विबोध होता है। इसके अनुभाव, जँभाई लेना, तथा आंखें मसलना है। 1 कि क यथा माघे :- मी (i6कns) T 'चिरर तिपरिखेद प्राप्तनिद्रासुखानां चरममपि शयित्वा पूर्वमेव प्रबुद्धाः । अपरिचलितगात्रा: कुर्वते न प्रियाणा- मशिथिलभुजचक्राश्लेषभेदं तरुण्यः ।' जैसे माघ के एकादश सर्ग के ही इस वर्णन में तरुण तथा तरुणियों ने रात को बड़ी देर तक सुरतक्रीडा की। इस लम्बी सुरतक्रौडा के कारण थककर तरुण तथा तरुणियोंने दोनों नींद के सुख को प्राप्त किया। सुरतक्रीडा की थकावट के कारण नींद के सुख में डूबे प्रियतमों के पहले ही अच्छी तरह सोकर जगी हुई सुन्दर युवतियाँ अपने शरीर को नहीं हिलातीं डुलातीं, तथा अपने बाहुओं के गाढ़ परिरम्भण को नहीं छोड़तीं। उन्हें एक तो इस बात का डर है कि कहीं प्रिय की निद्रा में बाधा न पड़े, साथ प्रेम के कारण वे प्रिय के आलिंगन को भी नहीं छोड़ना चाहतीं। अथ व्रीडा- दुराचारादिभिवरीडा धार्ष्ट्याभावस्तमुन्नयेत्। 1ई 1ल साचीकृताङ्गावरणवैवर्ण्याधोमुखादिभिः॥२४॥
स्वकृत बुरे आचरणों के कारण वीडा उत्पन्न होती है। छृष्ठता का समाप्त होना वीडा (चीडा)
को उत्पन्न करता है। टेढ़ा मुँह करके अङ्गों को छिपाना, मुँह के रङ्ग का फीका पढ़ना, नीचा मुँह कर लेना आदि इसके अनुभाव हैं। यथाS्मरुशतके- 'पटालगने पत्यौ नमयति मुखं जातविनया हठाश्लेषं वाञ्छत्यपहरति गात्राणि निभृतम्। न शक्रोत्याख्यातुं स्मितमुखसखीद त्तनयना हिया ताम्यत्यन्तः प्रथमपरिहासे नववधू: ॥' जैसे अमरुकशतक के निम्न पद्य में- कोई नई पत्नी पति के समीपस्थ होने पर बड़ी लज्जित हो रही है। इसी का एक चित्र यहाँ उपस्थित किया गया है। पति उसे बिठाने के लिए या आलिङ्गन करने के लिए उसके आंचल को पकड़ लेता है, इसे देखकर वह झुककर अपने मुंह को नीचा कर लेती है। जब पति जबरदस्ती उसका आलिड्न करना चाहता है, तो वह चुपके से अङ्गों को हटा लेती है। अपनी सखियों को हँसते देखकर वह उनके मुंह की और दृष्टि डालती है, पर लाज के मारे कुछ कह नहीं पाती। इस तरह नई पत्नी के साथ पहले पहल परिहास किया जाता है, तो वह लज्जा के कारण मन ही मन परेशान रहती है।
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चतुर्थ: प्रकाश: अथापस्मार :- ी TNVS IS To pant fie NyF आवेशो ग्रहदुःखादयैरपस्मारो यथाविधि: (धि)। भूपातकम्पप्रस्वेदलाला फेनोद्रमादयः-॥२५॥
प्रारब्घवश ग्रहजनित दुःख आदि के कारण जो आवेश आ जाता है, उसे अपस्मार (अपस्मार)
कहते हैं। जमीन पर गिर पढ़ना, काँपना, पसीना आ जाना, मुंह में लाला और फेन का भर जाना, आदि अपस्मार के अनुभाव हैं। यथा माघे- की गथड
फेनायमानं पतिमापगानामसावपस्मारिणमाशशक्के॥' जैसे माघ के तृतीय सर्ग में- कृष्ण ने भूमि का आलिङ्गन करते हुए (पृथ्वी पर गिरे हुए), भुजाओं के समान बड़ी बड़ी चज्रल तरह्ों वाले (चज्चल भुजाओं वाले), जोर से शब्द करते हुए (चिल्लाते हुए), फेनयुक्त (जिसके मुंह से झाग निकल रहे हैं), समुद्र (नदियों के पति) की अपस्मार रोग से पीडित समझा। अथ मोह :- जह मोहो विचित्तता भीतिदुःखावेशानुचिन्तनैः।
(मोह) ।1 भय, दुःख का आवेश तथा चिन्ता के कारण चित्त का अस्त व्यस्त हो जाना मोह कहलाता है। इसमें अज्ञान, भ्रम, चोट का लग जाना, सिर का चकराना, दिखाई न देना आदि अनुभाव पाये जाते हैं। लाइ यथा कुमारसम्भवे- 'तीव्राभिषङ्जप्रभवेन वृत्ति मोहेन संस्तम्भयतेन्द्रियाणाम्। अज्ञातभर्तृव्यसना मुहूत कृतोपकारेव रतिबभूव ।I' जैसे कुमारसम्भव के तृतीय सर्ग में- समस्त इन्द्रियों की वृत्ति को स्तब्ध कर देने वाले, तीव्र पराभव से जनित मोह के द्वारा क्षण भर के लिए रति का उपकार ही किया गया, क्योंकि मोह के कारण वह अपने पति कामदेव की मृत्यु के बारे में कुछ न जान सकी। यथा चोत्तररामचरिते- 'विनिश्वेतुं शक्यो न सुखमिति वा दुःखमिति वा ी अ कि प्रमोहो निद्रा वा किमु विषविसर्पः किमु मदः॥aF 1he 8f ह तव स्पर्शे रपर्शे मम हि परिमूढेन्द्रियगणो :TSIRS विकार: कोऽप्यन्तर्जडयति च तापं च कुरुते॥'शर्मनाह अथवा, जैसे उत्तररामचरित में-(राम सीता से कह रहे हैं :- 'मैं यह निश्चय ही नहीं कर पाता कि यह सुख है या दुःख है। अथवा यह मोह है, या निद्रा, या फिर जहर का असर है या नशा। तेरे प्रत्येक स्पर्शं में कोई ऐसा विकार मेरे अन्तः
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करण को स्तब्ध कर देता है, तथा ताप पैदा करता है, जिसके प्रभाव से मेरी सारी इन्द्रियाँ मन्द पड़ जाती हैं।' अथ मतिः- भ्रान्तिच्छेदोपदेशाभ्यां शास्त्रा देस्तत्त्वधीर्मतिः। (मति) शास्त्र आदि में भ्रान्ति के हट जाने तथा उपदेश के कारण जो ता्वज्ञान की बुद्धि होती है, उसे मति कहते हैं। यथा किराते- 'सहसा विदधीत न क्रियामविवेक: परमापदां पदम् । ाए वृणते हि विभ्ृम्यकारिणं गुणलुब्धा: स्वयमेव संपद: ॥ यथा च- किक कामछ न पण्डिता: साहसिका भवन्ति श्रुत्वापि ते संतुलयति तत्वम्। [वकु पष कला तत्त्व समादाय समाचरन्ति स्वार्थ प्रकुर्वस्ति परस्य चार्थम। ि म र जसे किराताजुनीय के द्वितीय सग में-(युधिष्ठिर कहते हैं :- ) कन) लकात किसी भी काम को बिना सोचे समझे एकदम नहीं करना चाहिए। बुद्धिहीनता, ज्ञान का अभाव, परम आपत्तियों का कारण है। सौच विचार कर काम करने वाले व्यक्ति के गुणों से आकृष्ट होकर सम्पत्ति खुद ही उसका वरण करती हैं। और जैसे, बुद्धिमान् तथा विद्वान् व्यक्ति साहसी (किसी भी काम को एकदम कर लेने वाले) नहीं होते। किसी बात को सुन लेने पर भी वे उसके तत्व की आलोचना करते हैं। तत्त्व के ग्रहण करने के बाद ही वे स्वार्थसम्बन्धी या परार्थसम्बन्धी कार्य का व्यवहार रूप में आचरण करते हैं। F अथालस्यम आलस्यं श्रमगर्भादेर्जाड्यं जुम्भासितादिमत् ॥२७॥ यथा ममव- 'चलति कथश्चित्पृष्टा यच्छति वचनं कथश्चिदालीनाम्। आसितुमेव हि मनुते गुरुगभभरालसा सुतनुः ॥'
परिश्रम, गर्भ आदि के द्वारा जनित जाड्य को आलस्य कहते हैं। जँभाई लेना, (आलस्य)
एक जगह बैठा रहना आदि इसके अनुभाव हैं। जैसे धनिक की स्वनिमित निम्न आर्या में- गर्भ के अति भार के कारण अलसाई हुई सुन्दरी किसी तरह चलती अवश्य है, तथा सखियों के पूछने पर किसी तरह उत्तर भी अवश्य देती है; पर सच पूछो तो वह एक जगह पर ही बैठा रहना चाहती हैं। छ अथावेग :- आवेग: सम्भ्रमोSस्मिन्नभिसरजनिते शस्त्रनागाभियोगो वातात्पांसूपदिग्धस्त्वरितपदगतिर्वर्षजे पिण्डिताङ्ग:। :D 9. मायाभियोगौ' इति पाठान्तरम्।
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उत्पातात्स्नस्तताङ्गष्वहित हितकृते शोकहर्षानुभावा वह्नर्धूमाकुलास्य: करिजमनु भयस्तम्भकम्पापसाराः॥ २८॥।
युद्धादि से डर के राजाओं का भागना, झंझावात, जोर की वर्षा, उत्पात, अग्नि, (आवेग)
हाथी आदि के द्वारा जनित ध्वंस से लोगों में जो संभ्रम या हढ़बड़ी पाई जाती है, उसे आवेग नामक सज्जारी भाव कहते हैं। अभिसार या राजविद्रवादि जनित आवेग में शस्त्र, हाथी आदि का सम्मर्द पाया जाता है। झंझावात जनित आवेग में लोग धूलिधूसरित होते हैं तथा उनकी चाल बड़ी तेज होती है। जोर की वर्षा से उत्पन्न आवेग में अङ्गप्रत्यङ्ग सक्कचित रहते हैं। उत्पातजनित आवेग में अङ्ग शिथिल हो जाते हैं। यदि आवेग शत्रुजनित (शत्रुकृत) है तो शोक, तथा वह सुहृत्कृत है तो हर्ष अनुभाव पाया जाता है। अग्निजनित आवेग में मुंह का धुएं से व्याकुल चित्रित करना आवश्यक है। तथा हस्तिजनित आवेग में भय, स्तम्भ, कम्प तथा भगदड़-ये अनुभाव पाये जाते हैं। अभिसरो राजविद्रवादि: तद्ेतुरावेगो यथा ममव- आगच्छागच्छ सज्जं कुरु वरतुरगं सन्निघेहि द्रुतं मे खङ्ग: क्वासौ कृपाणीमुपनय धनुषा किं किमङ्गप्रविष्टम्। संरम्भोन्निद्रितानां क्षितिमृति गहनेऽन्योन्यमेवं प्रतीच्छन् वाद: स्वप्राभिदृष्टे त्वयि चकितदृशां विद्विषामाविरासीत् ।।' इत्यादि। वृत्तिकार इन्हीं विभिन्न कारणों से जनित आवेगों के उदाहरण क्रमशः उपस्थित करते हैं। पहले पहल अभिसर या राजविद्रवादि जनित आवेग के उदाहरण के रूप में स्वनिमित पद्य देते हैं :- हे राजन्, तुम्हारे डर से (या तुमसे हार कर) गहन पर्वत में भगे हुए तुम्हारे शत्रु कभी-कभी सोते समय स्वप्न में तुम्हें देख लेते हैं। जब वे तुम्हें स्वप्न में देखते हैं, तो एकदम हड़बड़ा कर जग जाते हैं और चञ्चल नेत्रों से एक दूसरे को देखते हुए इस तरह कहा करते हैं। 'आओ, इधर आओ, मैरे श्रेष्ठ घोड़े को सजा दो, जल्दी करो, मेरा खड्ग कहाँ है, कटार (छुरी) ले आओ, धनुष से क्या होगा, अरे क्या (शध्ु राजा नगर में) घुस आया है।' 'तनुत्राणं तनुत्राणं शत्त्रं शस्त्रं रथो रथः। इति सुश्रुविरे विष्वगुन्डटाः सुभटोक्तयः ॥ 'कवच, कवच, शस्त्र, शस्त्र, रथ, रथ' इस प्रकार की योद्धाओं की उत्कट उक्तियाँ चारों तरफ सुनाई देती थीं।'यहाँ युद्धस्थल में भटों की आवेगदशा का वर्णन है। यथा वा- 'प्रारब्धां तरुपुत्रकेषु सहसा संत्यज्य सेकक्रिया- मेतास्तापसकन्यकाः किमिदमित्यलोकयन्त्याकुलाः। आरोहन्त्युटजहुमांथ् बटवो वाचंयमा अप्यमी कऔर कश सदो मुक्तसमाधयो निजवृषीष्वेवोच्चपादं स्थिता ॥ वातावेगो यथा-'वाताहतं वसनमाकुलमुत्तरीयम्' इत्यादि। २६ द०
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अथवा जैसे, पुत्रों के समान स्नेह से पाले गये वृक्षों की सेकक्रिया को एक दम छोड़ कर ये तपस्वी कन्याएँ 'यह क्या हो गया' इस प्रकार व्याकुल होकर देख रही हैं। ब्रह्मचारी शिष्य उटज के वृक्षों पर चढ़ कर देख रहे हैं, तथा महर्षि लोग अपनी समाधि को एक दम छोड़ कर अपने आसन पर ही बिना बोले (मौन धारण किये हुए) भी पैरों को ऊँचा करके खड़े हो रहे हैं। क (किसी राजा की सेना, या आततायियों का समूह आश्रम के समीप आया है। उसके कारण सारी आश्रम-शान्ति भङ्ग हो गई है। इसी सम्भ्रम से जनित आवेग का उदाहरण है।) 1 वातजनित आवेग जैसे 'हवा के तेज झोंके से वस्त्र तथा उत्तरीय चज्चल (व्याकुल) हो रहा है।' वर्षजो यथा- छक्ा देवे वर्षत्यशनपचनव्यापृता चहिहेतो- डि कक स98 मेहातुहं फलकनिचितैः सेतुभिः पङ्कभीताः॥ आपI IFFO नीध्रप्रान्तानविरलजलान्याणिभिस्ताडयित्वा शूर्पच्छत्रस्थगितशिरसो योषितः सश्चरन्ति॥ प्रिडड वृष्टजनित आवेग जैसे- चारों और बड़े जोरों से बारिश हो रही है। घर की ख्त्रियाँ भोजन बनाने में व्यस्त है, पर अझनि के लिए वे एक घर से दूसरे घर लकड़ी के तख्तों से पटे हुए सेतुओं (पुलों) के द्वारा जाती हैं। इन पुलों पर चढ़ कर वे इसलिए जाती हैं कि कहीं कीचड़ में न सन जायँ। वे निरन्तर घने जल वाले पटलप्रान्तों को हाथों से पीटती हुई, सूप के छत्र से अपना सिर ढँक कर भोजन बनाने के लिए आग लेने घर-घर घूम रही हैं। उत्पातजो यथा- 'पौलस्त्यपीनभुजसम्पदुदस्यमान- कैलाससम्भ्रमविलोलदृदशः प्रियाया:। श्रेयांसि वो दिशतु निहुतकोपचिह्न- Bक 835 H मालिङ्गनोत्पुलकमासितमिन्दुमौलेः॥ उत्पातजनित आवेग, जैसे- पुलस्त्य के पौत्र रावण की पुष्ट भुजाओं से कैलास के उठाए जाने पर डरी हुई पार्वती के नेत्र चज्चल हो उठते हैं। उनका क्रोध कम पड़ जाता है, तथा शिव के प्रति उत्पन्न प्रणयकोप के चिह्न छिप जाते हैं। वे भय तथा सम्भ्रम से महादेव का आलिङ्गन करलेती है, जिसके कारण महादेव (इन्दुमौलि) का शरीर रोमाश्चित हो उठता है। महादेव का यह पार्वती-आलिङ्गन- जनित पुलक आप लोगों को कल्याण प्रदान करे। अ्र्हितकृतस्त्वनिष्टदर्शनश्रवणाभ्यां तद्यथोदात्तराधवे-'चित्रमायः ( ससम्भ्रमम् ) भगवन् कुलपते रामभद्र परित्रायतां परित्रायताम्। (इत्याकुलतां नाटयति )' इत्यादि। पुनः 'चित्रमाय :- मृगरूपं परित्यज्य विधाय विकट चपुः। नीयते रक्षसाऽनेन लक्ष्मणो युधि संशयम् ।। अहितकृत आवेग अनिष्ट वस्तु के दर्शन या श्रवण से होता है, जैसे उदात्तराघव नाटक में- 'चित्रमाय (संभ्रम के साथ)-भगवान् रामचन्द्र, रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये। o5 3F
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(आकुलता का अभिनय करता है) क हिरन के रूप को छोड़ कर तथा विकट शरीर को धारण कर, यह राक्षस युद्ध में लक्ष्मण को संशय से युक्त (उसके जीवन को सन्देहमय) बना रहा है। राम :- वत्सस्याभयवारिधे: प्रतिभयं मन्ये कथ राक्षसात् त्रस्तश्वैष मुनिर्विरौति मनसश्वास्त्येव मे सम्भ्रमः । माहासीजनकात्मजामिति मुहुः स्नेहाद्गुरुर्याचते न स्थातुं न च गन्तुमाकुलमतेर्मूढस्य मे निश्चयः॥।' इत्यन्तेनानिष्टाप्राप्तिकृतसम्भ्रमः। इष्टप्राप्तिकृतो यथाSत्रैव-'(प्रविश्य पटाच्ेपेण सम्भ्रान्तो वानरः) वानर :- महारात्र एदं खु पवणणन्दणागमरोण पहरिस-' ('महाराज स्तत्खलु पचनन्दनागमनेन प्रहर्ष-' ।) इत्यादि 'देवर्स हिअ्त्रणन्दजणणं वित्रलिदं महुचणम्।' ('देवस्य हृदयानन्दजननं विदलितं मधुचनम्'।) इत्यन्तम्। राम-निर्भयता के समुद्र वत्स लक्ष्मण को राक्षस से भय हो यह मैं कैसे मान लूँ। और यह मुनि (चित्रमाय) डर कर लक्ष्मण को बचाने के लिए चिला रहा है, तो इसे भी झूठ कैसे मान लिया जाय। मैरे मन में भी संग्रम है ही। गुरु ने स्नेह से यह उपदेश दिया था कि 'सीता को अकेली कभी मत छोड़ना'। इन सारी बातों को सोच कर मैं किकर्तव्यविमूढ़ हो गया हूँ तथा मेरी बुद्धि व्याकुल हो गई है। मैं न तो ठहरने के ही न लक्ष्मण की सहायता करने जाने के ही बारे में निश्चय कर पा रहा हूँ। हितकृत संभ्रम, जैसे उदात्तराघव नाटक में ही यवनिका को हटाकर प्रविष्ट व्याकुल वानर सुग्रीव को सूचना देता है-'महाराज, हनुमान् के आगमन से प्रसन्न वानरों ने आपके हृदय को प्रसन्न करने वाले मधुवन नामक उपवन को उजाड़ दिया है।' यथा वा वीरचरिते -- IFIS
'एह्येहि वत्स रघुनन्दन पूर्णचन्द्र चुम्बामि मूर्धनि चिरस्य परिष्वजे त्वाम्। आरोप्य वा हृदि दिवानिशमुद्धहामि कणणीर rF8 चन्देऽथवा चरणपुष्करकद्दयं ते।।' अथवा, जैसे महावीरचरित में- अहै, पूर्ण चन्द्रमा के समान सुन्दर वत्स राम, आओ, धर आओ। मैं तुम्हारे सिर को बड़ी देर तक चूम तथा तुम्हारा आलिडन करूँ। अथवा तुम्हें अपने हृदय में बिठा कर दिन-रात धारण किया करूँ, या तुम्हारे दोनों चरणकमलों की वन्दना करूँ। वह्िजो यथाSमरुशतके- 'क्षिप्तो हस्तावलम्ः प्रसभमभितोऽप्याददानोंऽशुकान्तं गृहन्केशेष्वपास्तश्वरणनिपतितो नेक्षितः सम्भ्रमेण।
कामीवार्द्रापराधः स दहतु दुरितं शाम्भवो वः शराभिः I।'
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अस्निजनित आवेग जैसे अमरुकशतक में- त्रिपुरासुर के वध के समय महादेव के बाणों से फैला हुआ प्रचण्ड अग्नि आप, लोगों के पापों को जला दे। महादेव के बाणों का यह अग्नि कामी पुरुष के समान (अपराधी नायक के समान) त्रिपुरासुर की स्त्रियों के समीप जाता है; जब वह जाकर उनको हाथ से (लपटों से) पकड़ता है, तो वे इसे अलग हटा देती हैं; जब वह उनके वस्त्र का अञ्जल पकड़ने लगता है, तो इसे बड़े जोरों से पीटती है; जब वह उनके केश पकड़ने लगता है, तो हटा दिया जाता है, जब वह (उन्हें खुश करने के लिए) पैरों पड़ता है, तो वे संभ्रम के कारण उसे देखती भी नहीं; तथा आलिङ्गन करने पर वे उसका तिरस्कार करती है। इसी प्रकार आँसू से भरे कमल के समान नेत्रों वाली त्रिपुर-युवतियों के द्वारा अपराधी कामी की तरह तिररकृत महादेव के बाणों का अग्नि आपके दुष्कर्मों को भस्म कर दे। यथा वा रत्नावल्याम् 'विरम विरम वहे मुच्र धूमाकुलत्वं प्रसरयसि किमुच्चरर्चिषां चक्रवालम्। विरहहुतभुजाऽहं यो न दग्धः प्रियायाः प्रलयदहनभासा तस्य किं त्वं करोषि ।।' अथवा जैसे रलावली नाटिका में- सागरिका को अभनि से बचाने के लिए उद्यत उदयन अगनि से कह रहा है। 'हे अझनि, शान्त हो जाओ, इस धुएँ की आकुलता को छोड़ दो। लपटों के इस ऊँचे समूह को क्यों फैला रहे हो। अरे मुझे प्रिया के विरह की अभनि ही न जला पाई, तो फिर प्रलय काल की अग्नि के समान तेज से तुम मैरा क्या विगाड़ लोगे ? करिजो यथा रघुवंशे- 'स च्छिन्नबन्धद्रुतयुग्यशून्यं भग्नाक्षपर्यस्तरथं क्षरौन। रामापरित्राणविहस्तयोघं सेनानिवेशं तुमुलं चकार ।I' करिग्रहणं व्यालोपलक्षणार्थं, तेन व्याघ्रशूकरवानरादिप्रभवा आरवेगा व्याख्याताः। करिज आवेग जैसे रधुवंश में- उस हाथी ने अपने सारे बन्धन तेजी के साथ तोड़ दिये, वह शृङ्कला से शून्य था। उसने एक ही क्षण में सेना के रथों की घुरी को तोड़ कर छिन्न-भिन्न कर दिया। हाथी के भय से डरी स्त्रियों को बचाने के लिए सारे योद्ा जुट गये थे, तथा सारे सेनानिवेश में भीषण व्याकुलता व कोलाहल का सक्चार हो गया था। कारिका के 'करिज आवेग' के 'करि' शब्द से सारे ही पशुओं का उपलक्षण हो जाता है। इसलिये व्याघ्र, शूकर, वानर आदि के भय से उत्पन्न आवेग की भी व्याख्या हो जाती है। कोई पूर्वपक्षी यह शङ्का करे कि आवेग अन्य पशुओं के कारण भी हो सकता है, तो उसीका उत्तर देते हुए वृत्तिकार ने इसे स्पष्ट किया है। अथ चितर्क :- तर्को विचार: सन्देहाद्ूशिरोङ्गुलिनर्तकः ।
सन्देह के कारण जनित विचार को तर्क कहते हैं। इसमें भौहें, सिर व अँगुलियों (वितर्क)
की चज्चलता पाई जाती है, ये इसके अनुभाव हैं।ग
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यथा- 'किं लोभेन विलङ्गितः स भरतो येनैतदेवं कृतंF नए' सद: स्त्रीलघुतां गता किमथवा मातैव मे मध्यमा। मिथ्यैतन्मम चिन्तितं द्वितयमप्यार्यानुजोऽसौ गुरु-1F र्माता तातकलत्रमित्यनुचितं मन्ये विधात्रा कृतम् ।।' जैसे; नीचे के पद्य में लक्ष्मण तर्क कर रहे हैं :- क्या कहीं भरत लोभ के वशीभूत हो गया है। जिससे उसने यह कार्य (राम का वनवासविषयक) किया है। या फिर मेरी मँझली माँ कैकेयी ही अन्य स्त्रियों की भाँति एक दम तुच्छ स्वभाव वाली हो गई। मेरा ये दोनों बातें सोचना झूठा है। आखिर भरत आर्य राम के छोटे भाई तथा मेरे अग्रज हैं; साथ ही माता कैकेयी पूज्य पिता की पली है। अतः राम के अनुज, तथा दशरथ के कलत्र से ऐसी अनुचित क्रिया नहीं हो सकती। ऐसा प्रतीत होता है कि यह सारी अनुचित बात विधाता की ही करतूत है। अथवा। 'कः समुचिताभिषेकादार्य प्रच्यावयेद् गुणज्येष्ठम्। मन्ये ममैष पुण्येः सेवावसरः कृतो विधिना॥।' अथवा, राम-वनवास को सुनकर लक्ष्मण के तर्क का दूसरा उदाहरण- समस्त गुणों से उत्कृष्ट पून्य रामचन्द्र को उनके योग्य अभिषेक से कौन च्युत कर सकता है ? मुझे तो ऐसा मालूम होता है कि मेरे ही पुण्यों के कारण विधाता ने मुझे रामचन्द्र की सेवा करने का अवसर दिया है। अथावहित्था- लज्जाद्यैर्विक्रियागुप्ताववहित्थाङ्गविक्रिया।
हृदय के भाव या विकार को लज्ा आदि के द्वारा छिपाना अवहित्था कहलाता है, (अवहित्या)
इसके अनुभाव है :- अङ्गों में विकार उत्पन्न होना। यथा कुमारसम्भवे- किकाफड शखना 'एवंवादिनि देवषौं पार्श्वे पितुरधोमुखी। लीलाकमलपत्राणि गणयामास पार्वती।।' जैसे, कुमारसम्भव के षष्ठ सर्ग में पावती का यह अवहित्था नामक स्चारी भाव- जब नारद पार्वती तथा शिव के भावी विवाह के विषय में हिमालय से बातें कर रहे थे, तो पास में ही बैठो हुई पावती अपना सिर नीचा करके लीलाकमल के पत्तों को (हिमालय व नारद की बातों में कोई कुतूहल न बताती-सी, तथा लज्जा से अपने भाव को छिपाती हुई) गिन रही थी। अथ व्याघि :- व्याधयः सन्निपाताद्यास्तेषामन्यत्र विस्तरः ॥ २ह॥ (व्याधि) सन्निपात आदि रोगों को व्याधि कहते हैं। व्याधियों का विशेष विवरण दूसरे स्थल पर, आयुर्वेद के ग्रन्थों में किया गया है, अतः वहीं इन्यष्ट है। FI ?
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दिड्मात्रं तु यथा- 'अच्छिननं नयनाम्बु बन्धुषु कृतं चिन्ता गुरुभ्योऽर्पिता दत्तं दैन्यमशेषतः परिजने तापः सखीष्वाहितः। अद्यश्रःपरनिवटृति्रजतिाश्वासः परं खिद्यतेकी विश्रब्धो भव विप्रयोगजनितं दुःखं विभकं तया ॥' यहाँ उसका सक्केत मात्र कर दिया जाता है- क कोई सखी नायक के पास जाकर उसके वियोग से उत्पन्न नायिका की मरणासन्न दशा का वर्णन करते कह रही है। पहले तो तुम्हारे वियोग में वह नायिका दिनरात रोया करती थी, चिन्ता करती थी, दीन प्रतीत होती थी, तथा विरहताप से उत्तप्त रहती थी। पर अब तो उसकी दशा ही बदल गई है। जब तुम्हारे वियोगजनित दुःख को वह न सह पाई, तो उसने अपने सारे दुःख को दूसरे लोगों में बाँट दिया। अपने नेत्रजलों के निरन्तर धाराप्रवाह को उसने बान्धवों में बाँट दिया है। उसने चिन्ता घर के बड़े-बूढ़े-मातृ-पित्रादि को अर्पित कर दी है। उसने अपनी सारी दीनता नौकरों को दे दी है, तथा अपने विरहताप को सखियों के पास रख दिया है। उस नायिका की मरणासन्न अवस्था देखकर बान्धव रो रहे हैं, बड़े-बूढ़े चिन्तित हैं, नौकर परेशान हैं, तथा सखियां विह्वल हैं। वह आज या कल परम शान्ति को प्राप्त होने वाली है, केवल सांस ही उसे परेशान कर रहे हैं, उसके बाकी सारे दुःख मिट गये हैं। इसलिए उसके विषय में कोई भी सोचने की बात नहीं है, उसके बारे में तुम निश्चिन्त रहो, उसको कोई दुःख नहीं, क्योंकि दूसरे लोगों ने उसके दुःख को बटा लिया है। तुम्हारे वियोग में दुखी नायिका कुछ ही समय की मेहमान है, यह व्यंग्य है। अथोन्माद :- अप्रेक्षाकारितोन्माद: सन्निपातग्रहादिभिः। -119
अस्मिन्नवस्था रुदितगीतहासासितादयः॥ ३० ॥ (उन्माद) । त्रिदोषजन्य सन्निपात, ग्रह आदि कारणों ने बुद्धि का अस्तव्यस्त हो जाना तथा विवेकहीन कार्य करना उन्माद कहलाता है। इसमें रोना, गाना, हँसना, बैठ जाना, गिर पढ़ना आदि अनुभाव पाये जाते हैं। यथा-'आः1 क्षुद्रराक्षस ! तिष्ठ तिष्ठ, क्व मे प्रियतमामादाय गच्छसि' इत्युपक्रमे 'कथम्- नवजलधरः सन्नद्वोऽयं न दप्तनिशाचरः सुरधनुरिदं दूराकृष्टं न तस्य शरासनम् । अयमपि पटुर्धारासारो न बाणपरम्परा कनकनिकषस्त्निग्धा विद्यत्प्रिया न ममोवेशी II' इत्यादि। जैसे विक्रमोवंशीय में उवशी के अन्तर्धान से विरहित पुरूरवा की इस उन्मादोक्ति में- 'अरे नीच राक्षस, ठहर, ठहर। मेरो प्रिया को लेकर कहां जा रहा है। क्या १ यह तो पानी के भार से झुका हुआ नया बादल है, वह डीढ राक्षस नहीं है। यह तो दूर तक फैला हुआ इन्द्रधनुष है, उस राक्षस का धनुष नहीं है। और यह भी तेज वारिश की बूर्दें हैं, बाणों
१. 'स्थान०' इति पा०। अ
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चतुर्थ: प्रकाश: २०७
की वर्षा नहीं है। जिसे मैं उवशी समझ रहा हूँ, वह भी मेरी प्रिया उवशी नहीं है,किन्तु सुवर्ण की कसौटी की रेख के समान चिकनी व सुन्दर बिजली है।' गिफ्ीस अथ विषाद :- IF प्रारब्धकार्यासिद्यादेविषादः सत्वसंक्षय:। H H 1U1
(विषाद) 新 存 आरम्भ किये हुए कार्य के पूरे न होने पर व्यक्ति का सत्व, बल, मन्द पड़ जाता या नष्ट हो जाता है। इसी 'सत्वसंक्षय' को विषाद कहते हैं। इसके अनुभाव हैं :- निःश्वास, उच्छास, हृदय में ताप होना, सहाय को ढूँढना आदि। यथा वीरचरिते-'हा आर्यें ताडके? किं हि नामैतत् अम्बुनि मज्जन्त्यलाबूनि, आ्रावाण: प्रवन्ते।॥ नन्वेष राक्षसपतेः स्खलितः प्रताप: प्राप्तोऽद्तः परिभवो हि मनुष्यपोतात्। दृष्टः स्थितेन च मया स्वजनप्रमाथो फहिक
दैन्यं जरा च निरुणद्धि कथं करोमि ॥' जैसे वीरचरित में राक्षसपति रावण का विषाद हा, पूज्ये ताडके ? यह क्या आश्चर्य है कि समुद्र के पानी में लौकियां डूब रह्दी हैं, पर पत्थर तर रहे हैं। ऐसा मालूम होता है कि राक्षसों के स्वामी रावण का प्रताप मन्द पड़ गया है। तभी तो इस मनुष्य के बच्चे से उसकी हार हो रही है। मैंने जीवित रहते हुए बान्धवों का नाश खुद अपनी आंखों से देखा है। दीनता और वृद्धावस्था दोनों ने मुझे, (मेरी शक्ति को) रोक दिया है, मैं अब क्या करूँ। अथौत्मुक्यम्-छी 5> कालाक्षमत्वमौत्सुक्यं रम्येच्छारतिसम्भ्रमैः। तत्रोच्छ्ासत्वराश्वासहत्तापस्वेद्विभ्रमाः ॥३२॥ (और्सुक्य) किसी मनोहर अभिलाषा, सुरत या सम्भ्रम के कारण समय को न सह सकता रसुकता (औत्सुक्य) कहलाती है। उछ्कास, त्वरा, श्वास, हुत्ताप, पसीना, भ्रम ये अनुभाव औत्सुक्य में पाये जाते हैं। यथा कुमारसम्भवे- -IF IFP 'आत्मानमालोक्य च शोभमानमादर्शबिम्बे स्तिमितायताक्षी हरोपयाने त्वरिता बभूव स्त्रीणां प्रियालोकफलो हि वेषः ॥' जैसे कुमारसम्भव में- । शिव के पास जाने के लिए तैयारी करती हुई चञ्जल व लम्बे नेत्र वाळी पा्वती अपने सुन्दर रूप को दर्पण में देखती है, तथा शिव के पास जाने के लिए शीघ्रता करतो है। सच है ख्त्रियों की सुन्दर वेश भूषा तभी सफल है जव कि वह प्रिय के नयनपथ में अवतरित हो .
-१. 'त्वनिः' इति पा० ।
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यथा वा तत्रैव- 'पशुपतिरपि तान्यहानि कृच्छादनिनयदद्रिसुतासमागमोत्कः। कमपरमवशं न चिप्रकु्युर्विभुमपि तं यदमी स्पृशन्ति भावाः ॥'शगी अथवा जैसे उसी काव्य में- पार्वती के समागम की उत्सुकता वाले पशुपति महादेव ने भी उन दिनों को बड़ी कठिनाई से किसी तरह गुजारा। जब इस तरह के रतिविषयक भाव महादेव जैसे परम सर्थम देवता को ही चक्रल कर सकते हैं, तो दूसरे साधारण मानव को चज्जल तथा अवश क्यों नहीं बना सकते ? अथ चापलम्- की शक मात्सर्यद्रेषरागादेधापलं त्वनवस्थितिः। तत्र मत्सनपारुष्यस्वच्छन्दाचरणादयः॥ ३३॥
मात्सर्य, द्वेष, राग आदि से मन का स्थिर न रहना चापल है। इसमें भर्त्सना, (चापल)
कठोरता, स्वच्छन्दता, आदि का आचरण पाया जाता है। यथा विकटनितम्बाया :- 'अन्यासु तावदुपमदसहासु भृज्ज लोलं विनोदय मनः सुमनोलतासु। बालामजातरजसं कलिकामकाले व्यर्थ कदर्थयसि किं नवमल्लिकायाः ॥' जैसे विकटनितम्बा के इस पद्य में जहाँ भ्रमर की चञ्चलता का वर्णन किया गया है। हे, भँवरे, तुम कहीं दूसरी पुष्पलताओं पर जाकर अपने चज्जल मन को बहलाओ जो तुम्हारे बोझे तथा मदन को सह्द सकें। अरे मूर्ख, इस नवमल्लिका की कोमल (बाला) कली को, जिसमें अभी पराग भी उत्पन्न नहीं हुआ है, व्यर्थ ही क्यों बिगाड़ रहे हो। अरे अभी तो इसके विकास का समय भी नहीं आया अप्रस्तुतप्रशंसा के द्वारा किसी रागी नायक को जो अप्राप्तयौवना बाला नायिका को ही भोगना चाहता है, कवयित्री सचेत कर रही है। अरे तुम कहीं प्रौढ़ नायिकाओं के साथ जाकर विहार करो, इस भोली-भाली बाला को, जो अभी ऋतुधर्म से भी युक्त नहीं हुई, क्यों नष्ट करना चाहते हो।१ यथा वा-
अहमहमिकया पतन्तु कोपात् सममधुनैव किमत्र मन्मुखानि ॥ अथवा प्रस्तुतमेव तावत्सुविहितं करिष्ये।' इति। > अन्ये च चित्तवृत्तिविशेषा एतेषामेव विभावानुभावस्वरूपानुप्रवेशान्न पृथग्वाच्याः । १. मिलाइये-बिहारी का प्रसिद्ध दोहा-(जो इसी पद्य की छाया है) नहिं पराग, नहिं मधुर मधु, नहिं विकास इहि काल। अली कली ही तैं बँध्यों आगे कौन हवाल ।। (बिहारीसतसई)
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चतुर्थः प्रकाश: २०६
अथवा, रावण की निम्न उक्ति में- बार-बार पीसने के कारण शब्द करती हुई कठोर डाढ़ों की करवत से भीषण कन्दरा वाले, मेरे सारे मुंह, गुस्से से, अह्महमिका के साथ (पहले मैं खाऊँ, पहले मैं खाऊँ) एक साथ ही यहाँ इस वानरसेना पर गिर पड़ें। अथवा अवसर के अनुरूप कार्य को ठीक तरह से करूँगा।' पूर्वपक्षी इस विषय में यह शङ्का कर सकता है कि चित्तवृत्ति के तो कई प्रकार पायें जाते हैं, जिनमें से कई का उल्लेख यहाँ नहीं किया गया है। इसीका उत्तर देते हुए कहते हैं कि इस बात से हम सहमत है कि दशरूपककार के द्वारा निर्दिष्ट चित्तवृत्तियों के अतिरिक्त चित्तवृत्तियाँ भी लोकव्यवहार में पाई जाती हैं, पर वे सब इन्हीं के अन्तर्गत होकर विभाव या अनुभाव के रूप में, प्रविष्ट होती हैं, इसलिए उनका अलग से उल्लेख करना ठीक नहीं समझा गया है। (इस सम्बन्ध में यह निर्देश कर देना अनावश्यक न होगा कि भरतसम्मत ३२ सक्जारियों को हो सभी आचार्यों ने माना है। केवल मानुमिश्र ने 'रसतरङिणी' में 'छल' नामक ३४ वें सव्जारी की कल्पना की है। इन्हीं के आधार पर हिन्दी के रीतिकालीन कवि व आलक्कारिक देव ने भी 'छूल' का अलग से उल्लेख किया है। पर ऐसा करने पर तो सक्जारियों की संख्या में अनवस्था हो जायगी, क्योंकि सव्ारियों को संख्या अनगिनती है। भरतसम्मत २२ सक्चारी तो वस्तुतः केवल उपलक्षण मात्र हैं, अतः मोटे तौर पर उपलक्षणार्थ यही संख्या मान लेना विशेष ठीक होगा।) अथ स्थायी- विरुद्ैरचिरुद्वैर्वा भावैर्विच्छिद्यते न य:। आत्मभावं नयत्यन्यान् स स्थायी लवणाकरः॥। ३४॥। सजातीय विजातीयभावान्तरैरतिरस्कृतत्वेनोपनिबध्यमानो रत्यादि: स्थायी यथा बृहत्कथायां नरवाहनदत्तस्य मदनमख्जुकायामनुरागः तत्तदवान्तरानेकनायिकानुरागैरतिर- स्कृत: स्थायी। यथा च मालतीमाधवे श्मशानाड्े बीभतसेन मालत्यनुरागस्यातिरस्कार :- 'मम हि प्राक्तनोपलम्भसम्भावितात्मजन्मनः संसुकारस्यानवरतप्रबोधात् प्रतीयमानस्तद्विस- दृशैः प्रत्ययान्तरैरतिरस्कृतप्रवाहः प्रियतमास्मृतिप्रत्ययोत्पत्तिसंतानसतन्मयमिव करोत्य- न्तर्वृत्तिसारूप्यतश्वैतन्यम्' इत्यादिनोपनिबद्धः। तदनेन प्रकारेण विरोधिनामविरोधिनां च समावेशो न विरोधी। सास्विक भाव तथा सव्चारी भाव के विवेचन के बाद स्थायी भाव का विवेचन प्रसङ्गप्राप्त है, अतः उसीको स्पष्ट करने के लिए धनज्ञय ने निम्न कारिका अवतरित की है- स्थायी भाव को स्पष्ट करने के लिए समुद्र (लवणाकर) की उपमा ले सकते हैं। समुद्र के अन्तर्गत कोई भी खारा या मीठा पानी मिलकर तद्रूप हो जाता है। समुद्र समस्त वस्तुओं को आत्मसात करके, आत्मरूप बना लेता है। वैसे ही स्थायी भाव भी बाकी सभी भावों को आत्मरूप बना लेता है। स्थायी भाव हम उसे कहते हैं, जो (रत्यादि) भाव अपने से प्रतिकूल अथवा अनुकूल किसी भी तरह के भाव से वि्छ्न्न नहीं हो पाता, तथा दूसरे सभी प्रतिकूल या अनुकूल भावों को आत्मरूप बना लेता है। वह रत्यादि भाव जो सजातीय या विजातीय अन्य भावों से तिरस्कृत नहीं हो पाता, स्थायी भाव कहलाता है। जैसे बृहत्कथा में मदनमञ्जुका के प्रति नरवाहनदत्त के राग का २७ द०
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वर्णन किया गया है, वहीं दूसरे नायकों का भी अन्य नायिकाओं से प्रेम वर्णित है; किन्तु नरवाहन के बृहत्कथा के प्रमुख नायक होने से उसका रति भाव, अन्य नायकों के रति भावों से तिरस्कृत नहीं हो पाता। इस प्रकार बृहत्कथा में सजातीय भाव उस रति भाव को विच्छिन्न नहीं कर पाते हैं। इसी तरह मालतीमाधव के पञ्चम व षष्ठ अङ्क में वर्णित शमशान का बीभत्स वर्णन, तथा वीभत्स रस मालती के प्रति उत्पन्न माधव के रति भाव को तिरस्कृत नहीं कर पाता। इस प्रकार यहाँ स्थायी भाव विजातीय या प्रतिकूल भाव के द्वारा भी विच्छिन्न नहीं हो पाता। माधव का रति भाव बीभत्स के द्वारा विच्छिन्न नहीं होता, यह माधव की उसी अङ्क की इस उक्ति से स्पष्ट है-'प्राक्तन ज्ञान के साक्षात्कार से उत्पन्न संस्कार के बार बार प्रबुद्ध होने के कारण मन में प्रतीत होता हुआ, तथा उस ज्ञान से भिन्न दूसरे ज्ञानानुभवों के द्वारा जिसकी धारा को रोका नहीं गया है, ऐसी प्रियतमा-स्मृति-रूप-ज्ञान की परम्परा मैरी आत्मा को जैसे मालती की वृत्ति में ही परिणत कर रही है। मालती को एकाग्रचित्त होकर स्मृतिपथ का विषय बनाते हुए मेरा चित्त जैसे मालतीमय हो गया है।' प्रश्न हो सकता है कि दो भावों का एक साथ वर्णन (समावेश) विरोधी होगा, इसी को बताते हुए कहते हैं कि इस प्रकार अङ्गाङ्गिभावरूप में अनुकूल या प्रतिकूल भाव को अङ्गी स्थायी भाव का अङ्ग बनाकर समाविष्ट करना विरोधी न हो सकेगा। तथाहि-विरोध: सहानवस्थानं बाध्यबाघकभावो वा उभयरूपेणापि न तावत्ता- दात्म्यमस्यैकरूपत्वेनवाविर्भावात्। स्थायिनां च भावादीनां यदि विरोधस्तत्रापि न तावत् सहानवस्थानम्-रत्याद्युपरक्ते चेतसि स्नक्सूत्रन्यायेनाविरोधिनां व्यभिचारिणां चोप- निबन्ध: समस्तभावकस्वसंवेदनसिद्धः, यथैव र्वसंवेदनसिद्धस्तथैव काव्यव्यापारसंरम्भे- णानुकार्येप्यावेश्यमानः स्वचेतःसम्भेदेन तथाविधानन्दसंविदुन्मीलनहेतुः सम्पद्यते तस्मान्न तावद्भावानां सहानवस्थानम्। इसी अविरोध को स्पष्ट करते हुए बताते हैं :- भावों में परस्पर विरोध दो तरह से हो सकता है। या तो वे भाव एक ही स्थल पर साथ साथ न रह पाते हों (सहानवस्थान), या फिर उनमें परस्पर बाध्यबाधक भाव हो, अर्थात् एक भाव दूसरे भाव की प्रतीति में बाधा उपस्थित करता हो। लेकिन इस विषय में यह बात ध्यान में रखने की है कि यदि उन भावों की प्रतीति एक रूप में होती है, यदि वे एक- रूप में आविभूत होते हैं, तो फिर इन दोनों दशाओं में भी विरोध नहीं होगा। भाव यह है कि यदि दोनों भावों की प्रतीति अलग अलग हो रही हो, तो ऐसी दशा में विरोध हो सकता है, पर उनकी प्रतीति मिश्रितरूप में होने पर विरोध नहीं माना जायगा क्योंकि विरोध होने पर तो मिश्रण ही न हो सकेगा। यदि कोई यह कहे कि स्थायी भावों का दूसरे भावों, सक्वारी भावों के साथ विरोध हो सकता है, तो यह ठीक नहीं. क्योंकि ऊपर बताया जा चुका है कि विरोध दो ही दशाओं में हो सकता है। सज्चारी भाव तथा स्थायी भाव में कोई विरोध नहीं है, क्योंकि वे तो साथ साथ अवस्थित रहते ही हैं, उनमें सहानवस्थान वाला नियम लागू नहीं हो सकता। लौकिक व्यवहार में हम देखते हैं कि रति आदि भावों से युक्त व्यक्ति के चित्त में चिन्ता आदि व्यभिचारी भाव अविरुद्ध रूप में पाये जाते हैं। जैसे एक सूत्र में माला बनाते समय कई पुष्प गूँथ दिये जाते हैं, वैसे ही 'स्रक्सूत्रन्याय' से रतिभाव में कई व्यभिचारी भी उपनिबद्ध होते हैं। इस तरह रतिभावयुक्त चित्त में दूसरे व्यभिचारी भावों का आविर्भाव होता है, यह सभी सहदय के अनुभवगम्य है। ठीक यही बात हम काव्य या नाटक के अनुकार्य राम,
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दुष्यन्त, माधव या चारुदत्त के भावों के विषय में कह सकते हैं। यह बात नहीं हैं कि काव्य के अनुकार्य रामादि की भावानुभवदशा हमारी व्यावहारिक भावानुभवदशा से भिन्न हो। काव्यव्यापार के निबन्धन के द्वारा भावों तथा सक्वारियों का जो प्रादुर्भाव अनुकार्य रामादि में उपनिबद्ध किया जाता है, वह रस की अलौकिक संवित को उद्बुद्ध करने में इसलिए समर्थ हो जाता है कि रामादि के चित्त के साथ हमारे चित्त का तादात्म्य हो जाता है। रामादि में उपनिबद्ध स्थायी भाव तथा सव्वारियों का यह सहावस्थान (एक साथ वर्णन) हमारे चित्त में रस का आविर्भाव करता है, अतः उन दोनों में सहानवस्थान (एक साथ रहने की अयोग्यता) नहीं है। स्थायी और व्यभिचारी भाव एक साथ नहीं रह सकते, यह कैसे माना जा सकता है, क्योंकि ऐसा मानना अनुभवविरुद्ध होगा। बाध्यबाधकभावस्तु भावान्तरर्भावान्तरतिरस्कारः स च न स्थायिनामविरुद्धव्यभि- चारिभिः स्थायिनोऽविरुद्धत्वात तेषामङ्गत्वात्-प्रधानविरुद्धस्य चाङ्गत्वायोगात्, आ्रान- न्तर्यविरोधित्वमप्यनेन प्रकारेणाऽपास्तं भवति। तथा च मालतीमाधवे श्रङ्गारानन्तर बीभत्सोपनिबन्धेऽपि न किच्िद्वरस्यं तदेवमेव स्थिते विरुद्धरसैकालम्बनत्वमेव विरोधे हेतुः, स त्वचिरुद्धरसान्तरव्यवघानेनोपनिबध्यमानो न विरोधी। सह्दानवस्थान के बाद विरोध की दूसरी शर्त है-बाध्यबाधकभाव। जहाँ एक भाव दूसरे भाव का तिरस्कार कर दे, उसकी प्रतीति ही न होने दे, वहाँ उनमें परस्पर बाध्यबाधकभाव माना जायगा। यह बाध्यबाधकभाव स्थायी भावों के अपने अपने अविरुद्ध व्यभिचारियों के साथ नहीं होगा। भाव यह है कि प्रत्येक स्थायी भाव के कुछ नियत सब्बारी माने गये हैं। जहाँ इन सक्चारियों का स्थायी भाव के साथ समावेश होगा, वहाँ बाध्यबाधकभाव नहीं हो सकता। क्योंकि सव्जारी भाव सदा स्थायी भाव के अङ्ग होते हैं, और अज्ञ होने के कारण ये स्थायी भाव के घिरोधी नहीं हो सकते। अङ्गी से विरुद्ध भाव उसका अङ्ग बन ही नहीं सकता, वह उसका अङ्ग बनने के योग्य नहीं। इस तरह से एक के बाद दूसरे का वर्णन भी विरोधी नहीं है यह बता दिया गया है। भावों का आनन्तर्यविरोध भी इसी तरह हटा दिया गया है। इसो को स्पष्ट करने के लिए मालतीमाधव के शमशानाङ्क से बीभत्स व शरृद्गार के दो विरोधी भावों-जुगुप्सा तथा रति-का एक साथ समावेश उदाहृत करते हुए बताते हैं। मालतीमाधव में एक ओर श्रृद्गार का वर्णन है, उसी के बादबीभत्स का उपनिबन्धन किया गया है, यहाँ कोई भी विरोध या वैरस्य नहीं है। इनमें परस्पर विरोध न माने जाने का कोई कारण है। दो विरोधी रसों का एक ही आलम्बन को लेकर किया गया निबन्धन विरोध का कारण हो सकता है। (मान लीजिये एक ही आलम्बन-मालती-के प्रति रति तथा जुगुप्सा दोनों भावों की प्रतीति हो रही हो, तो यह विरोध होगा। पर रमशान के दृश्य के प्रति जुगुप्सा, मालती के प्रति उत्पन्न रति की बाधक नहीं हो सकती, क्योंकि दोनों भावो, दोनों रसों के आलम्बन भिन्न-भिन्न हैं।) लेकिन एक ही आलम्बन के प्रति दो विरोधी रसों का समावेश कभी कभी अविरुद्ध भी हो सकता है। यदि उन दोनों विरोधी रसों के बीच में किसी ऐसे रस का समावेश कर दिया जाय जो दोनों का विरोधी न हो, तो ऐसी दशा में उन रसों में विरोध नहीं होगा। यथा-'अण्णहुणाहुमहेलिअहुजुहुपरिमलुसुसुअन्धु। ITE F मुहुकन्तह अगत्थणह्अङ् ण फिदइ गन्धु।।' (नितान्तास्फुटत्वादस्य श्कोकस्य च्छया न किलगते।) P IPPUF
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२१२ देशरूपकम्
इत्यत्र बीभत्सरसस्यान्गभूतरसान्तरव्यवधानेन शङ्गारसमावेशो न विरुद्धः। प्रकारा न्तरेण वैकाश्रयविरोध: परिहर्तव्यः। नन यत्रैकतात्पर्येरोतरेषां विरुद्धानामविरुद्धानां च न्यग्भूतत्वेनोपादानं तत्र भवत्वङ्ग- त्वेनाऽविरोधः, यत्र तु समप्रधानत्वेनानेकस्य भावस्योपनिबन्धनं तत्र कथम् ? जैसे 'अण्णहुणाडुमहेलिअ' आदि गाथा में एक साथ बीभत्स रस तथा शृङ्गारस का समावेश किया गया है, किन्तु श्रुङ्गाररस का समावेश करने के पहले बीभत्स रस के अङ्गभूत दूसरे रस का, जो दीनों का विरोधी नहीं है-समावेश किया गया है, अतः इसके व्यवधान के कारण बीभत्स व श्रृङ्गार का एक साथ वर्णन विरोधी नहीं है। अथवा एक आश्रय के प्रति दो विरोधी रसों के समावेश वाला विरोध किसी दूसरे ढङ्ग से भी हटाया जा सकता है। इस सम्बन्ध में पूर्वपक्षी एक शङ्का उठाता है। वह इस बात से तो सहमत है कि जहाँ किन्हीं भी विरोधी या अविरोधी भावों का एक ही तात्पर्य को लेकर (एक विषय में) हस तरह उपनिबन्धन किया जाय, कि दूसरे भाव कुछ निम्न कोटि के दर्शाये गये हों, वे न्यग्भूल हो गये हों, वहाँ वे न्यग्भूत भाव, प्रधान भाव के अङ्ग हो जाते हैं, अतः उनमें परस्पर विरोध नहीं होगा। लेकिन पूर्वपक्षी को इस विषय में सन्देह है कि जहाँ एक साथ कई भाव समान रूप में उपनिबद्ध हों, वहाँ भो अविरोध ही रहेगा। इसीलिए वह उत्तरपक्षी से पूछना चाहता है कि अनेक भावों के समाधान रहने पर उनका सम्बन्ध अविरोधी कैसे रहेगा ? इसकी स्पष्ट करते हुए वृत्तिकार ने पूर्वपक्ष के मत की पुष्टि में ६ पद्य दिये हैं, जहाँ पूर्वपक्षी के मत से कई परस्पर विरोधी भावों का समप्राधान्य उपनिबद्ध किया गया है। यथा-'एकत्तो रुइ पिश अण्णत्तो समरतूरणिग्घोसो। पेम्मेण रणरसेन अ भडस्स डोलाइअं हिअअम्।।' (एकतो रोदिति प्रियाऽन्यतः समरतूर्यनिर्घोषः । प्रेम्णा रणरसेन च भटस्य दोलायितं हृदयम् ॥) इत्यादौ रत्युत्साहयो:, यथा वा- १. युद्ध में जाते हुए प्रिय के वियोग की आशक्का से एक और प्रिया रो रही है, दूसरी ओर युद्ध की तूर्य-ध्वनि सुनाई दे रही है। प्रिया के अनुराग के कारण वीर योद्धा का हृदय यह चाहता है कि वह यहीं रहे, लड़ने न जाय; पर दूसरी ओर युद्ध का उत्साह उसे रणभूमि में जाने को बाध्य कर रहा है। इस तरह योद्धा का हृदय प्रियानुराग तथा युद्धोत्साह से दोलायित हो रहा है। इस गाथा में एक ओर योद्धा के हृदय में रति नामक स्थायी भाव का चित्रण किया गया है, तो दूसरी और वीर रस के स्थायी भाव उत्साह का भी समावेश पाया जाता है। ऐसी दशा में एक ही आश्रय में दो भावों का समान रूप से चित्रण किया गया है। प्रिया के प्रति जनित रति तथा युद्ध के प्रति जनित उत्साह दोनों इस गाथा में समान रूप से प्रधान हैं, कोई भी एक दूसरे का अङ्ग नहीं है। यहाँ इनमें परस्पर विरोध कैसे न होगा? 'मात्सर्यमुत्सार्य विचार्य कार्यमार्याः समर्यादमिदं वदन्तु। सेव्या नितम्बाः किमु भूघराणामुत स्मरस्मेरविलासिनीनाम् ।I' इत्यादौ रतिशमयोः, यथा च- २. हे महानुभावो ! मात्सर्यं की छोड़ कर तथा अच्छी तरह विचार कर मर्यादापूर्वक इस बात पर अपना निर्णय दीजिये कि लोगों को पर्वतों की तलइटियों का सेवन करना चाहिए या कामदेव की लीलाओं से रमणीय विलासिनियों के नितम्बों का ।ही
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यहाँ 'पर्वतों की तलइटियों के सेवन' के द्वारा शम या निर्वेद माव का तथा 'विलासिनियों के नितम्बों के सेवन' के द्वारा रति भाव का उपनिबन्धन किया गया है। ऐसी दशा में रति भाव तथा शम भाव दोनों का समप्राधान्य स्पष्ट है। यहाँ भी उनमें अविरोध कैसे होगा ? 'इयं सा लोलाक्षी त्रिभुचनललामैकवसतिः स चायं दुष्टात्मा स्वसुरपकृतं येन मम तत्। इतस्तीवरः कामो गुरुरयमितः क्रोधदहन:
इत्यादौ तु रतिक्रोधयोः, कृतो वेषश्वायं कथमिदमिति भ्राम्यति मनः ॥'
किसी नाटक से रावण की उक्ति है :- ३. जब रावण सीता का अपहरण करने आया है, तो सीता तथा लक्ष्मण को देख कर वह सोच रहा है। 'एक ओर तो समस्त संसार की सुन्दरता का खजाना-यह चज्जल आँखों वाली सुन्दरी है; और दूसरी और यह वही दुष्ट व्यक्ति मौजूद है, जिसने मेरी बहिन का अपकार किया है। इस सुन्दरी के प्रति तीव्र कामवासना उत्पन्न हो रही है, और इधर इस दुष्ट के प्रति महान् क्रोधा्नि प्रज्वलित हो रही है। और इधर मैंने इस संन्यासी के वेष को धारण कर रक्खा है। 'यह कैसे हो सकता है' यह सोच कर मेरा मन किसी निर्णय पर स्थिर नहीं ही रहा है, वह घूम रहा है। यहाँ एक ही आश्रय में एक साथ रति व क्रोध नामक स्थायी भावों का निबन्धन किया गया है। यह निबन्धन समप्राधान्यरूप में है, क्योंकि सुन्दरी के प्रतिरति, तथा स्वसा के अपकारी दुष्ट के प्रति क्रोध दोनों ही प्रधान रूप से चित्रित किये गये हैं। यहाँ रति व क्रोध का परस्पर विरोध कैसे निराकृत होगा ?
2 - न्यक्ोत्तंसभृत: पिनद्धशिरसा हत्युएडरीकलज:I एताः शोणितपड्ककुङ्कुमजुषः संभूय कान्तैः पिब- न्त्यस्थित्नेहसुरां कपालचषकैः प्रीताः पिशाचाङ्गनाः॥।' इत्यादावेकाश्रयत्वेन रतिजुगुप्सयो:, ४. किसी श्मशान का वर्णन है। पिशाचिनियों ने अँतड़ियों को गले और हाथ में लपेट रखा है, जैसे उन्होंने मकलसूत्र पहन रखा हो। उन्होंने अपने कानों में स्त्रियों के हाथों के लाल कमल खोंस लिये हैं; वे स्त्रियों के हाथों को कानों में इसी तरह खोसे है, जैसे रमणियाँ कमल का अवतंस धारण करती हैं। नसों तथा शिराओं के द्वारा मृतकों के हृदय के कमलों को पिरो कर उनकी माला उनने पहन रखी है। अथवा शवों के मस्तकों तथा हृत्कमलों की माला उन्होंने पहन रखी है। उन्होंने अपने शरीर पर खून के घने कुङुम को लगा रहा है, इस तरह उत्सव के अनुरूप मझल वेषभूषा बना कर (मङलसूत्र पहन कर कमल का अवतंस धारण कर, माला पहन कर तथा कुङ्कम लगा कर) ये पिशाचों को स्त्रियाँ अपने प्रिय पिशाचों के साथ प्रसन्न होकर, कपाल के पान पात्रों से अस्थिरनेह (च्बीं) की मदिरा का पान कर रही हैं। यहाँ एक ही आश्रय-पिशाचाङ्गनाओं-में एक साथ समप्रधानरूप रति तथा जुगुप्सा दोनों भावों का निबन्धन हुआ है। यहाँ भी इनमें परस्पर अविरोध कैसे हो सकेगा ? 'एकं ध्याननिमीलनान्मुकुलितं चक्षुर्द्वितीयं पुनः एकक पार्वत्या वदनाम्बुजतनतटे श्रज्ञारभारालसम्।
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ीशी अन्यद्दूरविकृष्टचापमदनक्रोधानलोह्दीपितं शम्भोर्भिन्नरसं समाधिसमये नेत्रत्रयं पातु वः ॥' 15 : इत्यादौ शमरतिक्रोधानाम्, ५. महादेव समाधि में स्थित हैं। इधर समीपस्थित पार्वती के प्रति उनके मन को चज्जल, करने के लिए कामदेव बाण मारता है, और महादेव के नेत्र एक साथ खुल पड़ते हैं। महादेव के तीनों नेत्रों की विभिन्न दशा का वर्णन करते हुए कवि कहता है कि उनका एक नेत्र तो ध्यान में मझ् होने के कारण मुकुलित (बन्द) है। उनका दूसरा नेत्र पार्वती के मुखरूपी कमल तथा स्तन पर टिक कर शरुङ्गार के बोझ से अलसाया-सा हो गया है, अर्थात पार्वती को देख कर उनका दूसरा नेत्र रति भाव का अनुभव कर रहा है। महादेव का तीसरा नेत्र दूर में बैठ कर धनुष को चढ़ाये हुए कामदेव के प्रति उत्पन्न क्रोधरूपी अभनि से प्रज्वलित हो रहदा है। इस तरह समाधि के समय महादेव के तीनों नेत्रों में तीन भिन्न-भिन्न रसों की स्थिति हो रही है। महादेव के ये तीन नेत्र आप लोगों की रक्षा करें। यहाँ एक ही आश्रय-महादेव-में एक साथ शम (समाधिविषयक), रति (पार्वतीविषयक), तथा क्रोध (कामविषयक) इन तीन भावों का निबन्धन समप्रधान रूप में हुआ है। यहाँ भी शम, रति तथा क्रोध में परस्पर कोई विरोध नहीं है यह कैसे माना जा सकता है, क्योंकि इन तीनों में वस्तुतः विरोध माना जाता है। 'एकेनाच्णा प्रविततरुषा वीक्षते व्योमसंस्थं कीs T9 भानोर्बिम्बं सजललुलितेनापरेणात्मकान्तम्।ि अह्ृश्छेदे दयितविरहाश्किनी चक्रवाकी॥ द्वौ संकीणौं रचयति रसौ नर्तकीव प्रगल्भा ॥। इत्यादौ च रतिशोकक्रोधानां समप्राधा न्येनोपनिबन्धस्तत्कथ न विरोध: ? ६. सूर्य अस्ताचल का चुम्बन करने जा रहा है। दिनान्त को समीप जान कर चक्रवाकी समझ लेती है कि अब उसका अपने प्रिय से वियोग होने वाला है। वह इस वियोग का एकमात्र कारण सूर्य की ही समझती है। कहीं यह सूर्य कुछ देर और रुक जाता, इसे अस्त होने की जल्दी क्यों पड़ी है, आखिर यह मुझे प्रिय से वियुक्त करना क्यों चाहता है। चक्रवाकी क्रोध से भरे हुए एक नेत्र से आकाशस्थित सूर्य-मण्डल की ओर,-जो अस्त होने को है- देख रही है। दूसरे नेत्र में आँसू भर कर वह अपने प्रिय को देख रही है, जो अब रात भर के लिए उससे दूर हो जाने वाला है। इस प्रकार सूर्य के प्रति क्रोध, तथा प्रिय के भावी विरह के कारण शोकमिश्रित रति इन दो भावों का सक्वार एक साथ चक्रवाकी के हृदय में हो रहा है। दिनावसान के समय, प्रिय के विरह की आशक्का वाली चक्रवाकी एक कुशल नतकी के समान दो भिन्न रसों-रौद्र (क्रोध) तथा श्रङ्गार (रति) को मिश्रित रूप में एक साथ प्रकट कर रही है। जिस तरह एक कुशल नर्तकी एक साथ ही शरीर के विभिन्न अङ्गों के सञ्चालन के द्वारा भिन्न भिन्न रसों की व्यजना करने में समर्थ होती है, तथा यह उसकी कला-निपुणता की उत्कृष्टता है, इसी तरह चक्रवाकी भी, शाम के समय, एक साथ एक-एक नेत्र के द्वारा अलग- अलग भाव की व्यअ्ना कर रह्ी है। इस पद्य में चक्रवाकी को आश्रय बना कर एक साथ क्रोध (सूर्यविषयक), तथा शोकपूर्ण रति (कान्तविषयक) का समावेश किया गया है। इसीलिये वृत्तिकार का कहना है कि यहाँ रति, शोक तथा क्रोध तीनों का उपनिबन्धन प्रधान रूप से तथा समान रूप से हुआ है।
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ऐसी दशा में इस पद्य में निबद्ध रति, शोक तथा क्रोध में परस्पर विरोध किस तरह नहीं माना जायगा। पूर्वपक्षी ने उपर्युक्त छः पद्यों के द्वारा ऐसे स्थल उपस्थित किये, जहाँ उसके मतानुसार एक साथ कई भिन्न भावों का समप्रधानरूप से समावेश किया गया है। ऐसी दशा में इनमें विरोध है या नहीं। पूर्वपक्षी स्वयं तो यहाँ विरोध ही स्वीकार करता है। इसीका उत्तर देते हुए, पूर्वपक्षी की शक्का का परिहास करते हुए वृत्तिकार धनिक इन्हीं पद्ों को एक-एक लेकर सिद्धान्तपक्ष को प्रतिष्ठित करते हैं। अत्रोच्यते-अत्राप्येक एव स्थायी, तथा हि-'एकत्तो रुअइ पिश्रा' इत्यादौ स्थायीभूतोत्साहव्यभिचारिलक्षण वितर्कभावहेतुसन्देहकारणतया करुणसंग्रामतूर्ययोरुपादानं चीरमेव पुष्णातीति भटस्येत्यनेन पदेन प्रतिपादितम्। न च द्वयोः समप्रधानयोरन्योन्य- मुपकार्योपकारकभावरहितयोरेकवाक्यभावो युज्यते, किश्चोपक्रान्ते संग्रामे सुभटाना कार्यान्तरकररोन प्रस्तुतसंग्रामौदासीन्येन महदनौचित्यम्। अतो भर्तुः संग्रामकरसिकतया शौर्यमेव प्रकाशयन् प्रियतमाकरुणो वीरमेव पुष्णाति। इस विषय में हमारा यह उत्तर है कि इन उदाहरणों में भी ध्यान से देखा जाय तो स्थायी भाव दो न होकर एक ही है, चाहे वे दो या अधिक दिखाई देते हों। इन पद्यों में प्रधान स्थायी भाव एक ही चित्रित किया गया है, अन्य भाव उसके ही अङ्गरूप में उपनिबद्ध किये गये हैं, तथा उन भावों का समप्राधान्य मानना ठीक नहीं होगा। इस मत को स्पष्ट करने के लिए पूर्वपक्षी के उपयुद्धृत छ हों उदाहरणों को एक-एक कर लिया जा सकता है, तथा उनके पर्यालोचन से यह मत और अधिक पुष्ट हो जाता है। सबसे पहले 'एकत्तो रुअह पिआ' इस पहली गाथा को ले लीजिये, जहाँ भट में एक साथ प्रियानुराग (रति) तथा युद्धोत्साह का सज्चार हो रहा है। क्या यहाँ दोनों का समप्रधान्य है? नहीं। इस गाथा का प्रधान स्थायी भाव उत्साह है, इस उत्साह स्थायी भाव के साथ वितक नामक व्यभिचारी भाव का समावेश किया जाता है और इस वितर्क का कारण भट का यह सन्देह है कि उसे यहाँ रहना चाहिए या जाना चाहिए। योद्धा के हृदय का संशयग्रस्त हो जाना वितर्क का कारण है, तथा वितक नामक।व्यमिचारी उत्साह का अङ्ग बन कर आया है। साथ ही गाथा में एक ओर प्रिया के करुण रुदन तथा दूसरी ओर युद्धतूर्य का निबन्धन हुआ है, ये दोनों वीर रस को ही पुष्ट कर रहे हैं। दो भिन्न उपकरणों-करुणरुदन तथा युद्धवाद्य का उपादान इसीलिए किया गया है कि वही तो योद्धा के हृदय को दोलायित करने वाला है, उसके हृदय में सन्देह उत्पन्न करने वाला है, अतः करुण रुदन तथा युद्धवाद्य दोनों एक ही लक्ष्य-उत्साह स्थायी भाव-के साधन हैं। गाथा में 'भट' शब्द का प्रयोग हुआ है (भडस्य दोलाइअं हिअअम्), जिसका अर्थ है वीर योद्धा। इसलिए प्रकरण में वीर योद्धा के उचित उत्साह स्थायी भाव की ही प्रधानता प्रतिपादित है। और अधिक स्पष्ट करते हुए हम कह सकते हैं कि वीर योद्धा के हृदय में केवल सन्देह भर हुआ है, उसने लड़ने जाना छोड़ नहीं दिया है, अतः उत्साह को ही प्रधान भाव तथा वीर को ही अङ्ी रस मानना होगा।
१. वस्तुतः इस पद्य में दो ही भावों का समावेश है-रति तथा क्रोध का। शोक को अलग से भाव मानना ठीक न होगा। वह तो भविष्यत् विप्रलम्भ शृक्गार के स्थायी भाव रति में ही अन्तर्भावित हो जाता है। पद्यकारके 'दौ सङ्कीणौं रचयति रसौ' से भी यही सिद्ध होता है।
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२१६ दशरूपकम् पूर्वपक्षी इस बात पर ज्यादा जोर देता हैं कि दोनों भाव समप्रधान रूप से उपनिवद्ध किये गये हैं। इसीका उत्तर देते हुए वृत्तिकार बताता है कि यदि कहीं दो भाव समप्रधान है तो इसका अर्थ यह है कि वे एक दूसरे के उपकारक नहीं। समप्रधान होने पर उनमें उपकार्य- उपकारक-भाव माना हो नहीं जा सकता। ऐसी दशा में उनका समावेश अलग-अलग वाक्यों मैं करना ही ठीक होगा। जब वे दोनों एक दूसरे के साथ सम्बद्ध ही नहीं है, दोनों समान रूप से प्रधान है, तथा एक दूसरे से स्वतन्त्र है तो उनका एक ही वाक्य में प्रयोग ठीक नहीं है, ऐसा करना दोष ही होगा। हाँ, एक अङ्गी भाव के उपकारक अङ्गभूत भावों का वर्णन एक ही वाक्य में करना ठीक है। ऐसी दशा में यदि यहाँ दोनों भावों का समप्रधान्य मान लेते हैं तो ऐसा समावेश दोष होगा। बीर पुरुषों का युद्ध के उपस्थित होने पर किसी दूसरे काम में फँस जाना तथा संग्राम के प्रति उदासीन हो जाना बहुत अनुचित है। ऐसी दशा में वीर पुरुष का युद्ध के उपस्थित होने पर भी प्रियानुराग के प्रति महत्व देना अनुचित ही माना जायगा। इसलिए प्रिया का करुणविप्रलम्भ एक तरह से वीर योद्धा के संग्रामप्रेम तथा शौर्य को ही प्रकाशित करता है तथा वीररस की ही पुष्टि करता है। इस तरह स्पष्ट है कि 'एकत्तो रुअइ पिआ' इस गाथा में प्रमुखता वीर रस तथा उत्साइ भाव की ही है, प्रियाविषयक विप्रलम्भ (करुणविप्रलम्भ) इसीका अङ्ञ तथा पोषक भाव है। एवं 'मात्सर्यम्' इत्यादावपि चिरप्रवृत्तरतिवासनाया हेयतयोपादानाच्छमकपरत्वम् 'आर्याः समर्यादम्' इत्यनेन प्रकाशितम्। दूसरे उदाहरण 'मात्सर्यमुत्सार्य' आदि पथ में भी यही दशा है। वहाँ भी दोनों भाव- शम तथा रति-समप्रधान नहीं हैं। यहाँ भी चिरकाल से प्रवृत्त कामवासना तथा रति को तुच्छ तथा नगण्य बताने के कारण शम ही की प्रधानता सिद्ध होती है। कवि यहाँ शम भाव को ही प्रधान मानता है और 'आर्या: समर्याद' इस पदद्य के द्वारा उसने साफ बता दिया है कि वह इस बात का निर्णय पर्वत की तलइटियाँ अच्छी हैं, या रमणियों के नितम्ब, पूज्य सम्मान्य व्यक्तियों से ही पूछता है, तथा इसका मर्यादित निर्णय सुनना चाहता है। यह इस बात का प्रकाशन करता है कि यहाँ रति भाव शम भाव का ही पोषक अद्ग है। एवम् 'इयं सा लोलाक्षी' इत्यादावपि रावणस्य प्रतिपक्षनायकतया निशाचरत्वैन मायाप्रधानतया च रौद्रव्यभिचारिविषाद विभाववितकहेतुतया रतिक्रोधयोरुपादानं रौद्र- परमेव। 'अन्त्रैः कल्पितमङ्गलप्रतिसराः' इत्यादौ हास्यरसैकपरत्वमेव, 'एकं ध्याननिमील- नात्' इत्यादौ शम्भोर्भवान्तररनाक्षिप्ततया शमस्थस्यापि योग्यन्तरशमाद्वलक्षण्यप्रति- पादनेन शमैकपरतैव 'समाधिसमये' इत्यनेन स्फुटीकृता। 'एकेनादणा' इत्यादौ तु समस्तमपि वाक्यं भविष्यद्विप्रलम्भविषयमिति न क्वचिदनेकतात्पर्यम्। तीसरा उदाहरण 'इयं सा लोलाक्षी' रावण की उक्ति है। इसमें एक साथ रति तथा क्रोध, इन दो भावों का समावेश किया गया है। पूर्वपक्षी यहाँ इन दोनों भावों का समप्राधान्य मानता है। किन्तु रावण के विषय में यह ठोक नहीं जान पड़ता। रावण पहले तो प्रतिपक्ष नायक है, दूसरे वह राक्षस है, तीसरे मायावी है। इन सब बातों को देखने से यह पता चलता है कि यहाँ का अङ्गी रस रौद्र ही है। रौद्र रस के व्यभिचारी भाव विषाद का, तथा उसके (विषाद के) आलम्बन सीता व लक्ष्मण के विषय में उत्पन्न वितर्क के द्वारा रति तथा क्रोध इन दो भावो का समावेश हुआ है। अतः 'क्या किया जाय, एक ओर तो यह सुन्दरी है, दूसरी और यह दुष्टात्मा, तथा दोनों विभिन्न भावों के आलम्बन हैं' यह वितर्क रौद्र रस की
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ही पुष्टि करता है। इस तरह रति भाव भी रौद्र रस का ही पोषक है तथा उसीका अङ्ग है। 'इयं सा लोलाक्षी' इस पद्य में क्रोध ही प्रमुख स्थायी भाव है यह स्पष्ट है। क01 DoB चौथे उदाहरण में; पिशाचिनियों का वर्णन करते हुए कवि ने एक साथ बीमत्स व शरृङ्गार का समावेश 'अन्त्रैः कल्पितमङ्गलप्रतिसरा:' इस पद्य में किया है। यहाँ भी जुगुप्सा तथा रति भाव का समप्राधान्य नहीं है, जैसा पूर्वपक्षी मानता है। यहाँ पर तो पिशाचिनियों को हास्यरस का आलम्बन बनाया गया है तथा जुगुत्सा व रति दोनों उसके अङ्ग बने हुए हैं। 'अहा, पिशाचिनियाँ किस ठाट से सजधज कर उत्सव में सम्मिलित होती हुई पानगोष्ठी का अनुभव कर रह्दी है' यह व्यञ्ञय पिशाचिनियों के प्रति हास भाव की प्रतीति करा रहा है। अतः पूर्वपक्षी की शङ्का का यहाँ भी निराकरण हो ही जाता है। यहाँ भी केवल एक ही अर्थ प्रधान है, वह है हास्य रस तथा उसका स्थायी हास। पाँचवा उदाहरण 'एकं ध्याननिमीलनात्' आदि है। इसमें रति, शम तथा क्रोध इन भावों की स्थिति व्णित की गई है। यहाँ भी पूर्वपक्षी इन तीनों का समप्राधान्य मानता है। यहाँ महादेव के वर्णन में समाधि के शम भाव के अतिरिक्त दूसरे भावों का समावेश इसलिए किया गया है, कि कवि यह बताना चाहता है कि समाधिस्थ होने पर भी महादेव की शम भाव की अनुभूति साधारण योगियों से विलक्षण है। इसलिए इस सारे पद्य में शम ही प्रधान है, तथा रति भाव एवं क्रोध दोनों भाव शमपरक ही हैं। 1) 'एकेनाक्ष्णा प्रविततरुषा' इस छठे उदाहरण में क्रोध, शोक तथा रति भाव का समावेश है। यहाँ भी इन तीनों का समप्राधान्य नहीं माना जा सकता। सारे पद्य का एक ही विषय है और वह यह है कि शाम के समय चक्रवाकी अपने प्रिय के भावी वियोग की आशक्का से दुःखित हो रही है। ऐसी दशा में समस्त वाक्य भावी विप्रलम्भ का ही सूचक है। इसलिए क्रोध या शोक के अर्थ का कोई अलग तात्पर्य नहीं निकलता। क्रोध (सूर्यविषयक) तथा शोक दोनों रति के ही अङ्ग बन जाते हैं। अतः यहाँ भी प्रधानता एक ही भाव की सिद्ध होती है।" यत्र तु श्लेषादिवाक्येष्वनेकतात्पर्यमपि तत्र वाक्यार्थभेदेन स्वतन्त्रतया चार्थद्वयपर- तेत्यदोषः। यथा- कुछ ऐसे भी स्थल होते हैं, जहाँ एक ही वाक्य के द्वारा अनेक तात्पर्यों की प्रतीति होती है। ऐसे स्थलों पर दो मिन्न भावों का एक साथ समावेश पूर्वपक्षी दोष माने, तो उसका निराकरण करते हुए वृत्तिकार कहते हैं कि जिन स्थलों में श्लेष आदि से अनेकार्थ वाक्यों में कई तातपर्यों की प्रतीति होती है, वहाँ उसी वाक्य के अलग-अलग प्रतीत तात्पर्यार्थ स्वतन्त्र हैं, वे एक दूसरे से संबद्ध नहीं हैं, अतः उनमें दो अर्थ माने जायँगे। ऐसी दशा में उनमें दोष नहीं रहेगा। भाव यह है कि श्लेष के द्वारा एक ही वाक्य से दो या अधिक अर्थों की प्रतीति होती है। जहाँ इन दोनों अर्थों में उपमानोपमेय भाव होगा, वहाँ तो उपमेयपक्ष वाले अर्थ १. इसी सम्बन्ध में एक उदाइरण और लिया जा सकता है :- UFF कपोले जनक्याः करिकलभदन्तदुतिमुषि स्मरस्मेरस्फारोड्डुमरपुलकं वक्त्रकमलम्। मुडुः पश्यष्छृण्वन् रजनिचरसेनाकलकलं जटाजूटग्रन्थि द्रढयति रघूणां परिवृढ्:॥ क (इस पद के अनुवाद के लिए देखिये द्वितीय प्रकाश में माधुर्य का उदाहरण)ि यहाँ पर राम में एक ओर रति तथा दूसरी और उत्साह का वर्णन किया गया है। ऊपर के 'एकत्तो रुअइ' आदि गाथा की भाँति यहाँ भी उत्साह ही प्रमुख भाव मानना ठीक होगा। रति भाव यहाँ वीर रस का ही पोषक अंग है, यह स्पष्ट है। (अनुवादक) २८ द०
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की प्रधानता सिंद्ध हो ही जाती है। यदि दोनों ही अर्थ स्वतन्त्र हैं, तो फिर तत्तत् प्रकरण में तत्तत् अर्थ की प्रधानता सिद्ध हो सकती है। इस तरह श्लेषादि के द्वारा दो या अधिक भावों का एक साथ समावेश विरुद्ध नहीं होगा। श्लेष के एक उदाहरण को लेकर इसे स्पष्ट करते हैं- 'शाध्याशेषतनुं सुदर्शनकरः सर्वाङ्गलीलाजित- त्रैलोक्यां चरणारविन्दललितेनाक्रान्तलोको हरिः। विभ्राणां मुखमिन्दुसुन्दररुचं चन्द्रात्मचक्षुद्धत् स्थाने यां स्वतनोरपश्यदधिकां सा रुक्मिणी वोऽवतात् ।।' इत्यादौ। तदेवमुक्तप्रकारेण रत्याद्युपनिबन्धे सर्वत्राविरोधः। यथा वा श्रूयमाण- रत्यादिपदेष्वपि वाक्येषु तत्रैव तात्पर्यं तथाग्रे दर्शयिष्यामः। जब कृष्ण ने रुक्मिणी को देखा, तो उन्हें पता चला कि वह तो उनसे भी अधिक सुन्दर है, उनके भी शरीर से अधिक है। कृष्ण का तो केवल हाथ ही सुन्दर (सुदर्शनकर) है; (कृष्णके हाथ में सुदर्शन चक्र है), लेकिन रुक्मिणी का समस्त शरीर अतीव प्रशंसनीय तथा रमणीय है। कृष्ण ने संसार को केवल चरणारविन्द की ही सुन्दरता से जीता है; अर्थात् उनका केवल चरण ही ललित है, जो सुन्दरता में संसार की होड कर सके; (कृष्ण ने वामनावतार में चरणकमल के द्वारा सारे लोकों को नाप लिया है); लेकिन रुक्मिणी ने सारे अंगों की शोभा से तीनों लोकों को जीत लिया है। कृष्ण की केवल आँख ही चन्द्रमा के समान है, बाकी सारा मुँह कुरूप है; (कृष्ण परमात्मा के अवतार होने के कारण, उनका वाम नेत्र चन्द्रमा है); लेकिन रुक्मिणी सुन्दर कान्तिवाले मुख-चन्द्र को धारण करती है। इस तरह कृष्ण का केवल हाथ ही सुन्दर है, पाँव ही शोभामय है, तथा आँख ही चन्द्रतुल्य है, जब कि रुक्मिणी का पूरा शरोर सुन्दर है, उसके सारे अंग शोभा से तीनों लोकों को जीत लेते हैं, तथा उसका पूरा मुख चन्द्रमा जैसा है; इसलिए कृष्ण रुक्मिणी को अपने से अधिक पाते हैं। वह रुक्मिणी जो कृष्ण से अधिक सुन्दर तथा उत्कृष्ट है, आप लोगों की रक्षा करे। इत्यादि उदाहरणों में वाक्यार्थ अनेक पाये जा सकते हैं, पर उनके दो अर्थ होने के कारण अदोष ही मानना होगा। इस तरह से उपर्युक्त प्रक्रिया से काव्य में रति आदि स्थायी भावों के उपनिबन्धन में विरोध नहीं आता। इस विषय में यह भी पूछा जा सकता है कि जहाँ रत्यादि पदों का काव्य में प्रयोग होता ( रत्यादि पद अश्रयमाण होते हैं), वहाँ भी तात्पर्य रति आदि भावों में ही होता है, क्योंकि विभाव आदि साधनों के कारण ही भावों का आक्षेप होता है, पदों के साक्षात् प्रयोग के कारण नहीं। ते च- रत्युत्साहजुगुप्सा: क्रोधो हास: स्मयो भयं शोकः। शममपि केचित्प्राहु: पुष्टिर्नाटयेषु नैतस्य।। ३५॥ ये स्थायी भाव आठ होते हैं :- रति, उत्साह, जुगुप्सा, क्रोध, हास, स्मय, भय तथा शोक। कुछ आचार्य शम जैसे नवें स्थायी भाव को भी मानते हैं, किन्तु इस भाव की पुष्टि नाट्य (रूपकों) में नहीं होती। हमारे मतानुसार यह भाव नाख्यानुकूल नहीं है। अतः नाव्यशास्त्र की दृष्टि से स्थायी भाव केवल आठ ही है। शम जैसे नवें स्थायी भाव तथा उसके रस-शान्त-को अलग से मानना हमें सम्मत नहीं। 1 १. यहाँ यह भी अर्थ हो सकता है कि जहाँ रत्यादि पद का काव्य में साक्षात प्रयोग (श्रूयमाण) होता है, वहाँ भी तात्पर्य (फिर से) उन्हीं भावों में होगा। R T
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(इस प्रकार धनजय के मत से श्रुक्धार, वीर, वीभत्स, रौद्, हास्य, अद्भुत, भयानक तथा करुण ये आठ ही रस होते हैं। उसे शान्त रस रवीकार नहीं, क्योंकि वह रूपकों के अनुपयुक्त है।) इह शान्तरसं प्रति वादिनामनेकविधा विप्रतिपत्तयः, तत्र केचिदाहु :- 'नास्त्येव शान्तो रसः' तस्याचार्येण विभावाद्यप्रतिपादनाल्लक्षणाकरणात्। अन्ये तु वस्तुतस्तस्याभाव वर्णयन्ति-अनादिकालप्रवाहाय तरागद्वेषयोच्छेत्तुमशक्यत्वात्। अन्ये तु वीरबीभत्सादा- वन्तर्भावं वर्णयन्ति। एवं वदन्तः शममपि नेच्छन्ति। यथा तथास्तु। सवथा नाटका- दावभिनयात्मनि स्थायित्वमस्माभि: शमस्य निषिध्यते, तस्य समस्तव्यापारप्रविलय- रूपस्याभिनयायोगात्।। शान्त रस के विषय में विद्वानों के कई भिन्न भिन्न मत पाये जाते हैं। शान्त रस के विरोधी इसका निषेध कई ढङ्ग से करते हैं। कुछ लोगों का कहना है कि शान्त जैसा रस है ही नहीं। नाय्यशास्त्र में आचार्य भरत ने केवल शृक्गारादि आठ ही रसों के विभावादि साधनों का वर्णन किया है। नाव्यशास्त्र में शान्त रस के न तो विभावादि ही वर्णित हैं, न उसका लक्षण ही दिया गया है। ऐसी दशा में यह स्पष्ट है कि मुनि भरत शान्ति को नवाँ रस नहीं मानते। यदि शान्त को अलग से रस माना जाता, या वह रस होता, तो भरत उसका वर्णन अवश्य करते। शान्त को अलग रस मानना प्रस्थानविरुद्ध तथा आचार्य भरत के मत के प्रतिकूल है। अतः शान्त जैसा रस नहीं है। दूसरे लोग उसका वास्तविक अभाव मानते हैं। पहले मत वाले तो केवल नाय्य में (या काव्य में भी) उसकी सत्ता नहीं मानते, पर ये दूसरे मतावलम्बी शम की शत्ता व्यावहारिक क्षेत्र में भी नहीं मानते। इनकी दलील है कि शान्त रस की स्थिति तभी हो सकती है, जब कि व्यक्ति के राग-द्वेष का नाश हो जाय। राग तथा द्वेष मनुष्य में अनादि काल से चले आ रहे हैं, अतः उनकी आत्यन्तिक निवृत्ति होना असम्भव है। जब अनादि काल से चले आते हुए राग-द्वेष का नाश असम्भव है तो फिर शान्त रस कैसे परिपुष्ट हो सकता है। कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो शम या शान्तपरक चित्तवृत्ति की स्थिति तो मानते हैं, पर उसे अलग से स्थायी भाव नहीं मानते। उनके मतानुसार शम को वीर वीभत्स आदि में अन्तर्भावित किया जा सकता है। यथा संसार के प्रति घृणा, जो शम का एक तत्त्व है वीमत्स के अन्तर्गत आ जाता है, इसी तरह अनश्वर परम तत्व के प्रति उन्मुखता वीर के स्थायी उत्साह का अङ् बन जाता है। इस तरह शान्त को अलग से रस नहीं माना जा सकता जब ये तीनों मत वाले विद्वान् शान्त रस को ही नहीं मानते तो उसके स्थायी भाव शम को कैसे स्वीकार करेंगे? इसलिए वे शम की भी इच्छा नहीं करते। खैर उनका मूत कुछ भी हो, तथा लौकिक रूप में शम को माना जाय या न माना जाय, इससे हमें कोई मतलब नहीं। हम लोग तो यह मानते हैं कि शम स्थायी (शान्त रस) रूपक (अभिनय) के सर्बथा अनुपयुक्त है। नाटकादि रूपकों में अभिनय की प्रधानता है, अभिनय ही इन रूपकों की आत्मा है। अतः अभिनयपरक रूपकों में हम शम का निषेध सचमुच में कर रहे हैं। इसका खास कारण यह है कि शम में व्यक्ति की समस्त लौकिक प्रक्रियाओं का लोप हो जाता है, (एक वीतराग समाधिदशा शम में पाई जाती है)। इस प्रकार की दशा का अभिनय करना असम्भव है। इसलिए अभिनय की अशक्यता के कारण ही हम नाटकादि में शम स्थायी की स्थिति स्वीकार नहीं करते। यत्तु केक्षिनागानन्दादौ शमस्य स्थायित्वमुपवर्णितम्, तत्तु मलयवत्यनुरागेणाSSप
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२२० दशरूपकम् बन्धप्रवृत्तेन विद्याधरचक्रवर्तित्वप्राप्त्या विरुद्धम्। न ह्येकानुकार्यविभावालम्बनौ विषया- नुरागापरागावुपलब्धौ, अतो दयावीरोत्साहस्यैव तत्र स्थायित्वं तत्रैव श््गारस्यान्नत्वेन चक्रवर्तित्वावाप्तेक्ष फलत्वेनाविरोधात्। ईप्सितमेव च सर्वत्र कर्तव्यमिति परोपकारप्रवृत्तस्य विजिगीषोर्नान्तरीयकत्वेन फलं सम्पद्यत इत्यावेदितमेव प्राक्। अतोऽष्टावेव स्थायिनः। कुछ लोग (पूर्वपक्षी ) हर्षरचित नागानन्द नाटक में शान्त रस मानकर उसका स्थायी शम मानते हैं, वह ठोक नहीं है। नागानन्द नाटक में सारे प्रबन्ध में आरम्भ से अन्त तक जीमूतवाहन (नायक) का मलयवती के प्रति अनुराग निबाहा गया है, तथा उसे अन्त में विद्याधरचक्रवतित्व की प्राप्ति होती है। ये दोनों ही बातें शम के विरुद्ध पड़ती है। शम की स्थिति में अनुराग का वर्णन तथा बाद में किसी लौकिक फल की प्राप्ति होना विरोधी है। शम में तो व्यक्ति विषयों से विमुख रहता है, तथा किसी लौकिक फल की इच्छा नहीं रखता, यदि उसे कोई इच्छा होती भी है तो वह पारलौकिक फल (मोक्ष) की ही। ऐसी दशा में नागानन्द का स्थायी भाव शम कैसे हो सकता है? एक ही अनुकार्य जीमूतवाहनादि के विभाव तथा आलम्बन एक साथ विषयानुराग (विषय के प्रति आसक्ति), तथा विषयापराग (विषयों से विरक्ति) दोनों नहीं हो सकते। या तो उसमें विषयासक्ति ही हो सकती है, या विषय-विरक्ति ही। जीमूतवाहन में विषय राग स्पष्ट है, अतः विषय-विरक्ति रूप शम नहीं हो सकता। ल तो फिर नागानन्द का स्थायी क्या है? यह प्रश्न सहज ही उपस्थित होता है। इसी का उत्तर देते हुए वृत्तिकार कहते हैं कि इस नाटक में वीर रस का स्थायी उत्साह ही स्थायी भाव है। उत्साह को स्थायी भाव मान लेने पर मलयवती विषयक प्रेम (शङ्गार) उसका अङ्ग बन जाता है तथा चक्रवतित्त्व की प्राप्ति भी उसका फल हो जाता है। इस प्रकार उत्साद्द स्थायी भाव का शरङ्गार तथा ऐहिक फल प्राप्ति से कोई विरोध भी नहीं पढ़ता। जो भी कुछ किया जाता है उसकी इच्छा अवश्य होती है, सारे कर्तव्य ईप्सित होते हैं, इसलिए परोपकार में प्रवृत्त वीर को, जो दूसरे लोगों को परोपकारादि से जीत लेना चाहता है, फल प्राप्ति होना तो आवश्यक ही है, यह हम पहले ही द्वितीय प्रकाश के धीरोदात्तनायक के प्रकरण में बता चुके हैं। ननु च- 'रसनाद्रसत्वमेतेषां मधुरादीनामिवोक्तमाचा्यैः । निर्वेदादिष्वपि तत्प्रकाममस्तीति तेऽपि रसाः ॥' इत्यादिना रसाम्तराणामप्यन्यैरभ्युपगतत्वात् स्थायिनोऽप्यन्ये कल्पिता इत्य धारणानुपपत्ति:। कि Sक इसलिये यह स्थित है कि केवल आठ ही स्थायी भाव हैं। पूर्वपक्षी को इस संख्या (आठ) के अवधारण पर आपत्ति है। वह कहता है कि निर्वेद आदि भावों को भी रस मानना ठीक होगा। नाटकादि में निर्वेदादि भावों का आस्वाद किया ही जाता है, उनकी चर्वणा ठीक उसी तरह होती है, जैसे रत्यादि स्थायी भावों की। आस्वाद विषय होने के कारण मधुर, अम्ल आदि रस कहलाते हैं, क्योंकि उनका रसन (स्वाद) प्राप्त किया जाता है। यह रसन निर्वेदादि भावों में भी पूरी तरह मौजूद है, इसलिए ये मी रस हैं। इनको रस मानने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। 'इस उक्ति के अनुसार कई विद्वानों ने दूसरे रसों को भी स्वीकार किया है, और इस तरह उन उन रसों के दूसरे स्थायी भाव की भी कल्पना हो जाती है। अतः धनजय का कारिका में केवल आठ ही भाव गिनाना तथा वृत्तिकार का भी 'अष्टावेव' इस तरह संख्या का अवधारण कर देना ठीक नहीं
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बैठ पाता। उन विद्वानों से यह मत विरुद्ध जान पड़ता है। इसी पूर्वपक्ष रूप शंका का समाधान करते हुए धनजय ने आगे की कारिका अवतरित की है :- छि अ्त्रोच्यते- निर्वेदा दिरताद्रूष्यादस्थायी स्वदते कथम्। वैरस्यायैव तत्पोषस्तेनाष्टौ स्थायिनो मताः ॥ ३६ ॥ हम बता चुके हैं कि स्थायी भाव वह है जो विरुद्ध या अविरुद्ध भावों से विच्छिन्न नहीं हो पाता, वह समुद्र की तरह उन्हें आत्मसात् कर लेता है। यह ताद्रूप्य (इस तरह से विरुद्ध या अविरुद्ध भाषों से विच्छिन्न न होने का गुण) निर्वेदादि में नहीं पाया जाता। अतः स्थायी की शर्तें पूरी न उतरने से निर्वेदादि को स्थायी कैसे मान सकते हैं, तथा उनकी चर्वणा कैसे हो सकती है? यदि निर्वेदादि की काव्य नाटकादि में पुष्टि होगी भी तो वह रस के स्थान पर वैरस्य (रसविकार) उत्पन्न करेगी। अतः उन्हें रस के स्थायी नहीं माना जा सकता, इसी लिए हमने आठ ही स्थायी माने हैं। (अतादूप्यात्=) चिरुद्धाविरुद्धाविच्छेदित्वस्य निर्वेदादीनामभावादस्थायित्वम्, अत एव ते चिन्तादिस्वस्वव्यभिचार्यन्तरिता अपि परिपोष नीयमाना वैरस्यमावहन्ति। न च निष्फलावसानत्वमेतेषामस्थायित्वनिबन्धनम्, हासादीनामप्यस्थायित्वप्रसङ्गात्। पारम्पर्येण तु निर्वेदादीनामपि फलवत्त्वात्, अतो निष्फलत्वमस्थायित्वे प्रयोजकं न भवति किन्तु विरुद्धरविरुद्धर्भावरतिरस्कृतत्वम्। न च तन्निर्वेदादीनामिति न ते स्थायिन:, ततो रसत्वमपि न तेषामुच्यते अतोऽस्थायित्वादेवतेषामरसता। वाम स्थायी भाव की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह विरोधी तथा अविरोधी भावों से विच्छेदित नहीं होता। निर्वेदादि भाव दूसरे भावों से विच्छिन्न हो जाते हैं इसलिए इनमें 'विरुद्धाविरुद्धविच्छेदितत्व' नहीं माना जा सकता। इसके अभाव के कारण निर्वेदादि स्थायी भी नहीं बन सकते। कुछ कवि लोग निर्वेदादि के साथ चिन्ता आदि अपने-अपने अविरोधी व्यभिचारियों का समावेश कर काव्य में उनकी पुष्टि कराते हैं, किन्तु वहाँ वे पुष्ट नहीं हो पाते। चिन्तादि सञ्चारियों के द्वारा दूसरे विरोधी रसों से अलग कर दिये जाने पर भी निर्वेदादि की पुष्टि रस के स्थान पर वैरस्य ही उत्पन्न करती है। जो चर्वणा सहृदयों को शरृङ्गारादि (रत्यादि) के परिपोष से होती है, तथा जो आनन्द संवित् का अनुभव इनसे होता है, वह निर्वेदादि से नहीं। यदि कोई यह कहे कि निर्वेदादि भावों का अन्त (परिणाम) फलरहित है, इसलिए उनको स्थायी नहीं माना जा सकता, तो यह बात नहीं है। निष्फलावसानत्व के ही कारण इनको स्थायी न मानने पर तो हास आदि भावों को भी स्थायी नहीं मानना पड़ेगा। हास आदि भावों के परिणाम भी फलरहित ही हैं, क्योंकि हास के आश्रय को मनोरजन के अतिरिक्त ऐहिक या पारलौकिक फल प्राप्ति नहीं होती। और ध्यान से देखा जाय तो निर्वेदादि भी फलरहित नहीं हैं; क्योंकि निर्वेदादि किसी न किसी स्थायी के अङ्ग बन कर आते हैं; यह स्थायी फलरहित नहीं होता, इस तरह परम्परा से वे भी फलयुक्त हो ही जाते हैं। इसलिए जो भी भाव निष्फल हैं, वे स्थायी नहीं हैं, यह कोई नियम नहीं है; फलरहितिता को हम स्थायी न मानने का कारण (प्रयोजक) नहीं मानते। यदि किसी भाव को स्थायी घोषित न करने का कोई कारण है, तो वह केवल यही कारण हो सकता है कि अमुक भाव विरोधी तथा अविरोधी भावों से तिरस्कृत हो जाता है। विरोधी तथा अविरोधी भावों से तिरस्कृत न होना ही वह कसौटी है जिस पर भाव के स्थायित्व की परख होती है,
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यही उसका प्रयोजक है। निर्वेदादि भावों में यह बात नहीं पाई जाती, अतः वे स्थायी नहीं हैं। जब वे भाव ही नहीं तो उनके रस (शान्तादि ) भी नहीं हो सकते, उन्हें 'निर्वेदादिष्वपि तत् प्रकाम मस्तीति तेऽपि रसाः' के आधार पर रस भी नहीं कहा जा सकता। जब इनमें से कोई भाव स्थायी नहीं तो वे रस भी नहीं हैं। अतः स्पष्ट है कि स्थायी भाव तथा उनके रस आठ ही हैं। [ स्थायी भावों व रसों का निर्धारण ही जाने पर; उनकी संख्या नियत कर देने पर; एक प्रश्न उठना स्वभाविक है, कि रस व स्थायो का काव्य-नाटक से क्या सम्बन्ध है। काव्य या नाटक के द्वारा रस की प्रतीति किस तरह से, किस प्रक्रिया से, कौन से व्यापार से होती है। इसके विषय में विद्वानों के कई मत है। धनज्ञय व धनिक के विरोधी मतों में प्रमुख मत ध्वनिवादियों का है जो रस तथा काव्य में व्यञ्ञ्यव्यञ्जक भाव सम्बन्ध मानते हैं, तथा इस सम्बन्ध के लिए अभिधा, लक्षणा तथा तात्पर्य इन तोन वृत्तियों (शब्दक्तियों) से भिन्न तुरीया वृत्ति-व्यज्ञना-की कल्पना करते हैं। ध्वनिकार तथा आनन्दवर्धन दोनों ही रस को वाच्य, लक्ष्य या तात्पर्यार्थ मानने से सहमत नहीं, वे इसे अभिव्यङ्ञय मानते हैं। धनजय तथा धनिक मीमांसक हैं, वे अभिधावादी हैं, तथा लोलट के दीर्घदीर्घतराभिधाव्यापार को भी मानते हैं जहाँ अभिधाव्यापार बाण की तरह काम करता माना गया है :- सौयमिषोरिव दीर्घदोर्घतरोऽभिधाव्यापारः। स्थायी भाव तथा रस की प्रतीति को वे तात्पर्य या वाक्यार्थ ही मानते हैं। इसलिए ध्वनिवादियों की व्यज्ना तथा उसके आधार पर रस या भाव की व्यञ्यता का खण्डन करने के लिए वृत्तिकार 'वाच्या प्रकरणादिभ्यो' इस कारिका के पहले ध्वनिवादी के पूर्वपक्षी मत को विशद रूप से रखता है, जिसके उत्तर में इस कारिका में धनज्जय ने अपना सिद्धान्तपक्ष प्रतिष्ठापित किया है।] कः पुनरेतेषां काव्येनापि सम्बन्धः१ न तावद्वाच्यवाचकभावः स्वशब्दरनावेदि- तत्वात्, नहि शरङ्गारादिरसेषु काव्येषु श्रज्गारादिशब्दा रत्यादिशब्दा वा श्रयन्ते येन तेषां तत्परिपोषस्य वाभिधेयत्वं स्यात्, यत्रापि च श्रयन्ते तत्रापि विभावादिद्वारकमेव रसत्वमेतेषां न स्वशब्दाभिधेयत्वमात्रेण। प्रश्न होना स्वासविक है कि स्थायी भावों तथा उनके रसों का काव्य से किस प्रकार का सम्बन्ध है ? यह तो स्पष्ट है कि काव्य (नाटकादि) के ही द्वारा-देख कर (या सुन कर) सहृदय रस की चर्वणा करते हैं; किन्तु रस चर्वणा काव्य का साक्षात् अर्थ, वाच्यार्थ है, लक्ष्यार्थ है, अथवा इससे भी भिन्न कोई दूसरा अर्थ इसे माना जाना चाहिए। इस प्रश्न का उत्तर ध्वनि तथा व्यअना की कल्पना करने वाले आचार्य इस प्रकार से देते हैं। उनके मतानुसार काव्य तथा रस में वाच्यवाचक भाव सम्बन्ध नहीं मान सकते; न तो रस वाच्य ही है, न काव्य (काव्य ही नहीं काव्य में वर्णित विभावादि भी) उसका वाचक ही। शब्द की अब तक दो शक्तियाँ मानी जाती रही हैं, अभिधा तथा लक्षणा, जिनके साथ तात्पर्य नामक वाक्यवृत्ति का भी समावेश किया जाता है। अभिधा शक्ति के द्वारा शब्द तथा उसके अर्थ में जो सम्बन्ध स्थापित किया जाता है, वह सम्बन्ध वाच्यवाचक भाव सम्बन्ध कहलाता है। जैसे 'गौः' शब्द 'सासतादिमान् पशु' का वाचक है, तद्विशिष्ट पशु उसका वाच्य। काव्य तथा रस के विषय में ऐसा नहीं कहा जाता।
१. ध्वनिवादियों के इस मत का विवेचन भूमिका भाग में द्रष्टव्य है। TIE
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मान लीजिए, कि काव्य (अर्थात् काव्य प्रयुक्त शब्द) रस के वाचक हैं, तथा मुख्या (अभिधा) वृत्ति के द्वारा साक्षात रूप में उसका बोध कराते हैं, तो ऐसी दशा में शरृद्गार, वीर आदि शब्दों का प्रयोग तत्तत्काव्य में अवश्य होना चाहिए। तभी तो रस वाच्य रूप में प्रतीत हो सकता है। किन्तु काव्यगत वास्तविकता इससे सवथा भिन्न है। हम किसी भी शृङ्गारादि रस के काव्य को ले लें। ऐसे काव्यों में शृद्गारादि शब्दों या उनके स्थायी भाव रत्यादि के वाचक शब्दों का प्रयोग नहीं होता; ऐसा प्रयोग किसी भी काव्य में नहीं सुना जाता है। वाच्यार्थ की प्रतीति तभी होगी, जब उसके साक्षात् वाचक शब्द का श्रवणेन्द्रिय से सन्निकर्ष हो। जब काव्य में शरृक्गार या रति (रस अथवा उसके भाव) का साक्षात् प्रयोग ही नहीं होता, तो फिर रस या स्थायी भाव की पुष्टि को वाच्य कैसे मान सकते हो, वह अभिधेयत्व की कोटि की ग्रहण ही कैसे कर सकता है।2 मान लीजिये, कुछ स्थलों पर ऐसे शब्दों का प्रयोग देखा भी जाता है, किन्तु यहाँ भी यह नहीं कहा जा सकता कि तत्तत् भाव या तत्तत् रस की प्रतीति उन शब्दों के प्रयोग के ही कारण है। भाव या रस का परिपोष विभाव अनुभाव तथा सव्जारी के कारण होता है। अतः शब्दो के प्रयोग होने पर भी वहाँ उस काव्य में वर्णित विभावादि के कारण ही रस प्रतीति होती है, खाली शब्दों के द्वारा ही रस वाच्य नहीं हो सकता। (यदि किसी काव्य में केवल रत्यादि भाव या शरृङ्गारादि रस के वाचक शब्दों का प्रयोग कर दिया जाय, और विभावादि का सुचारु सन्निवेश न हो पाय, तो रसचर्वणा हो ही न सकेगी। साथ ही ध्वनिवादी के अनुसार तो कभी-कभी काव्य के भाव या रस के स्वशब्द का प्रयोग-स्वशब्दनिवेदित दोष भी माना गया है।)" (इस विवेचना से यह स्पष्ट है कि भाव या रस की प्रतीति अभिधा से मानना वास्तविकता से दूर जाना है, जब कि काव्यादि में उसके अभिधायक या वाचक शब्द हैं ही नहीं। इस तरह 'घटादि' शब्द के उच्चारणाभाव में 'घटादि' के अर्थ की प्रतीति मान लेने का प्रसंग उपस्थित हो सकता है। वस्तुतः काव्य रस या भाव का वाचक कभी नहीं माना जा सकता।) नापि लक्षयलक्षकभाव :- तत् सामान्याभिधायिनस्तु-लक्षकस्य पदस्याप्रयोगात् नापि लक्षितलक्षणया तत्प्रतिपत्तिः। यथा 'गज्गायां घोषः' इत्यादौ तत्र हि स्वार्थे स्त्रोतोलक्षणो घोषस्यावस्थाना सम्भवात्स्वार्थे र्खलद्तिर्गज्गाशब्द: स्वार्थाविनाभूतत्वीपलक्षितं तटमुपल- १. उदाहरण के लिए- शयिता सविधेडप्यनीश्वरा सफलीकर्तु महो मनोरथान्। दयिता दयिताननाम्बुजं दरमीलन्नयना निरीक्षते ॥ (पण्डितराज) अथवा, सघन कुज छाया सुखद, सीतल मन्द समीर। मन है, जात अजौं बहै, वा जमुना के तीर॥ (विहारी) इन दोनों पद्यों में रति भाव या शरद्गार रस के वाचक शब्दों का प्रयोग नहीं हैं, तथापि सहृदयों को संयोग तथा विप्रलम्भ शरृङ्गार की क्रमशः प्रतीति हो रही है, यह अनुभवसिद्ध ही है। २. पक्काविम्बाधरोष्ठी तां दृष्टा प्रोद्यत्कुचां मुदा। नही सखे मनसि निस्तन्द्रो भावो रति रजायत॥। (अनुवादस्य) इस पद्य में वर्णित रति भाव या श्रृद्गार रस 'मावो रतिः' इसके प्रयोग के कारण प्रतीत नहीं हो रहा है, अपितु यहाँ 'स्व शब्द निवेदित दोष' ही है। इसके स्थान पर 'सखे मनसि निस्तन्द्रं मधुमित्रमजायत' इस पाठ के कर देने पर भी भावप्रतीति में कोई भेद न आयगा, प्रत्युत दोष भी न रहेगा। यहाँ तद्राचक कोई शब्द नहीं है।
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२२४ दुशरूपकम् क्षयति। अत्र तु नायकादिशब्दाः स्वार्थेऽस्खलद्रतयः कर्थमिवार्थान्तरमुपलक्षयेयुः?। को वा निमित्तप्रयोजनाभ्यां विना मुख्ये सत्युपचरितं प्रयुज्जीत ! अत एव 'सिंहो माणवकः' इत्यादिवत् गुणवृत्त्यापि नैयं प्रतीतिः । काव्य तथा उसके कार्यभूत रस में वाच्यवाचकभाव का निराकरण करने के बाद पूर्वपक्षी उसके लक्ष्यलक्षकभाव का निराकरण करता है। काव्य तथा रस में लक्ष्यलक्षकभाव भी नहीं है। न तो काव्य लक्षक ही है, न रस लक्ष्य ही। अभिधा के बाद दूसरी शब्द शक्ति है लक्षणा। अभिधा का निराकरण करने पर कुछ लोग रस को लक्ष्य मानकर उसको लक्षणा व्यापारगम्य माने, तो यह मत भी ठोक नहीं।१ (जब हम देखते हैं कि किसी वाक्य में प्रयुक्त कोई शब्द साक्षात अर्थ को लेने पर प्रकरण में ठीक नहीं बैठ पाता, तो हम उस दशा में मुख्यार्थ का त्याग कर देते हैं, तथा दूसरे अर्थ की प्रतीति करते हैं। यदि यह दूसरा अर्थ किसी न किसी तरह मुख्यार्थ से सम्बद्ध रहता है, तथा उस प्रकार के शब्द से मुख्यार्थ का बाध होने के कारण वैसे अमुख्यार्थ की (जो कि मुख्यार्थ से सम्बद्ध है) प्रतीति कराने में कोई न कोई कारण (रूढि या प्रयोजन) विद्यमान रहता है, तो उस अर्थ की प्रतीति को हम लक्षणाव्यापारगम्य मानते हैं, क्योंकि वह दूसरा अर्थ मुख्यावृत्ति के द्वारा प्रतीत नहीं हो पाता। इस तरह लक्षणा शक्ति के क्रियाशील होने में तीन शर्तों का होना आवश्यक है-मुख्यार्थबाध, तद्योग; रूढि अथवा प्रयोजन। इसी बात को मम्मट ने काव्यप्रकाश में कहा हैं- मुख्यार्थबाधस्तयोगो रूढितोडथ प्रयोजनाद। अन्योडर्थों लक्ष्यते यत् सा लक्षणाSडरोपिता क्रिया॥ (काव्यप्रकाश २-९) लक्षणा का हम प्रसिद्ध उदाहरण ले सकते है :- 'गङ्गयां घोषः', जहाँ 'गङ्गा' का अभिधा शक्ति के द्वारा प्रतीत वाच्यार्थ है 'गङ्गा की धारा, गङ्गा का प्रवाह', जब कि गङ्गा में आभीरों की बस्ती (घोष ) स्थित नहीं रह सकती। प्रवाह तो कभी भी किसी बस्ती का आधार नहीं हो सकता। फलतः मुख्यार्थ का बाध हो जाता है, वाच्यार्थ ठीक नहीं बैठता। इसके बाद इसका अर्थ 'गङ्गा के तीर पर आमीरों की बस्ती 'यह लेना पड़ता है। अभिधा के केवल सक्केतित शब्द तक ही सीमित रह सकने के कारण, इस अर्थ की प्रतीति किसी दूसरी वृत्ति 'लक्षणा' के द्वारा होती है। यहाँ 'गङ्गातीर' 'गङ्गाप्रवाह' के समीप है, इस तरह उन दोनों में योग है ही, साथ ही 'गक्ञा' शब्द का प्रयोग करने का यह प्रयोजन है कि गङ्गातीर में भी गङ्गाप्रवाह की शीतलता तथा पवित्रता की प्रतिपत्ति हो। इस तरह 'गङ्गायां घोषः' में लक्षणा है।) काव्य तथा रस में लक्ष्यलक्षकभाव इसलिए नहीं माना जा सकता कि लक्षणा व्यापार सामान्यशब्द (गङ्गादि) का प्रयोग विशिष्ट धर्मवाले पदार्थ (गङ्गातीरादि) में किया जाता है। (मोटे तौर पर सामान्य का अर्थ बतानेवाले शब्द का विशिष्ट अर्थ में प्रयोग लक्षणा है।) .यदि रस को काव्य का लक्ष्य माने, तो काव्य में ऐसे लक्षक शब्दों (पदों) का प्रयोग होना चाहिए, जो (मुख्या वृत्ति न सही, लक्षणा से ही) रस की प्रतीति करावें। काव्य में ऐसा नहीं होता, इसलिए लक्षितलक्षणा (अजहलक्षणा) के द्वारा रस की पुष्टि या प्रतीति होती है, १. इस सम्बन्ध में यह संकेत कर देना अनावश्यक न होगा कि 'अभिधावृत्तिमात्रिका' के रचयिता मुकुलभट्ट ने रसको लक्षणागम्य ही माना है। 'दुर्वारा मदनेषवो' आदि उदाहरण को लेकर वे इसमें विप्रलम्भशद्गार को लक्ष्य मानते लिखते हैं :- ण ग 'तात्पर्यालीचनसामर्थ्याच्च विप्रलम्भशृङ्गारस्याक्षेप इत्युपादानात्मिका लक्षणा।' 15 कि लड i मक (अभिधावृत्तिमात्रिका पृ. १४)
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ऐसा नहीं कहा जा सकता। इसे स्पष्ट करने के लिए हम लक्षणा के प्रसिद्ध उदाहरण 'गङ्गायां घोषः' लेकर उसकी अर्थ प्रक्रिया की तुलना रसप्रतीति की प्रक्रिया से कर सकते हैं। इससे साफ होगा कि रस लक्षणाव्यापार का विषय है ही नहीं। 'गङ्गाया घोषः' इस उदाहरण में हम देखते हैं कि 'गङ्गा' का वाच्यार्थ (स्वार्थ, मुख्यार्थ) गङ्गा का स्रोत या गङ्गा का प्रवाह है। किन्तु गङ्गा के स्रोत पर घोष की स्थिति असम्भव है। इस तरह से 'गङ्गा' शब्द इस वाक्य में अपने अर्थ की प्रतीति कराने में असमर्थ है, उसकी गति सखलित हो जाती है। जब वह अपने स्वार्थ की प्रतीति नहीं करा सकता, तो उस स्वार्थ से सम्बद्ध (अविनाभूत) गङ्गातट को लक्षित करता है। ठीक यही बात रस के बारे में कहना ठीक नहीं होगा। काव्य में वर्णित दुष्यन्तादि नायक, तथा उनसे सम्बद्ध विभावादि ही रस के प्रत्यायक हैं, यह तो सर्वमान्य है। ऐसी दशा में दुष्यन्तादि के अभिधायक शब्द ही रस के लक्षक हो सकते हैं। जब दुष्यन्तादि शब्दों के द्वारा रस लक्षित होता है, तो लक्षणा के हेतुत्रय के अनुसार सबसे पहले दुष्यन्तादि शब्दों के मुख्यार्थं दुष्यन्तादि का तो बाध होना आवश्यक ही है। पर नाटकादि में दुष्यन्तादि शब्दों में मुख्यार्थ बाघ स्वीकार लेने से तो बड़ी गड़बड़ी हो जायगी। दुष्यन्तादि शब्द दुष्यन्तादि की प्रतीति कथमपि नहीं कराते, यह तो विरोधी पक्ष को भी मान्य नहीं होगा। अतः स्पष्ट हो जाता है कि काव्य के नायकादि शब्द स्खलद्गति नहीं है। जब वे स्खलद्गति नहीं है, तो दूसरे अर्थ-लक्ष्यार्थ (रस) की प्रतीति कैसे करायँंगे, वे रस को लक्षित कर ही कैसे सकते हैं? साथ ही लक्षणा के प्रयोग में रूढि या प्रयोजन का होना भी आवश्यक है, पर यहाँ न तो शब्द रखलद्गति ही हैं, न प्रयोजन ही दिखाई देता है।१ यदि कोई व्यक्ति यह कहे कि अभिधा तथा शुद्धा लक्षणा से रस की प्रतीति न होती है, तो रस को उपचार प्रतीत या गौणी लक्षणा के द्वारा प्रतिपादित मान लिया जाय, तो ऐसा कहना भी ठीक नहीं।१ यदि वाच्यत्वेन रसप्रतिपत्तिः स्यात्तदा केवलवाच्यवाचक भावमात्रव्युत्पन्नचेतसामप्य- रसिकानां रसास्वादो भवेत्। न च काल्पनिकत्वम्-अविगानेन सर्वसहृदयानां रसास्वा- दोद्धूतेः । अरपरतः केचिदभिधालक्षणागौणीम्यो वाच्यान्तरपरिकल्पितशक्तिभ्यो व्यतिरिकं व्यञ्जकत्वलक्षणं शब्दव्यापारं रसालङ्कारवस्तुविषयमिच्छन्ति। (जिस तरह शुद्धा लक्षणा में मुख्यार्थबाध, तद्योग तथा प्रयोजन कारण होता है, उसी १. लक्षणा के द्वारा तुरीयकक्षाविनिविष्ट व्यंग्यार्थ की प्रतीति कराने की चेष्टा करने वाले आचार्यों का खण्डन ध्वनिवादियों ने इसी आधार पर किया है। काव्यप्रकाशकार मम्मटकी निम्न प्रसिद्ध कारिका इस सम्बन्ध में उद्धत की जासकती है, जहाँ व्यंग्य को (जिसमें रस भी सम्मिलित है) लक्ष्य न मानने के कारण बताये गये हैं :- लक्ष्यं न मुख्यं, नाप्यत्र बाधी योग: फलेन नो। न प्रयोजन मेतस्मिन् न च शब्द: स्खलद्गतिः॥ (काव्यप्रकाश कारिका १२, पृ. ६०.) २. प्राभाकर मीमांसक गौणी को अलग से वृत्ति मानते हैं, जब कि भाट्ट मीमांसक (तथा व्यंजनावादी मी) उसे लक्षणा के ही अन्तर्गत मानकर लक्षणा के शुद्धा तथा गौणी, ये दो भेद, उपचारामिश्रितत्व तथा उपचार मिश्रितत्व के आधार पर करते हैं। प्रभाकर मीमांसकों का यह मत प्रतापरूद्रीयकार विद्यानाथ ने उद्धत किया है :- गौणवृन्तिर्लक्षणातो मिन्नेति प्राभाकराः । तद्युक्तम्। तस्या लक्षणायामन्तर्भावात्। -प्रतापरुद्रीय (के.पी.त्रिवेदी सं. ) पृ. ४४. २६ द०
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२२६ दशरूपकम् तरह गौणी में भी ये तीन कारण अवश्य होते हैं। शुद्धा तथा गौणी का परस्पर प्रमुख भेद यह है कि शुद्धा में तद्योग किसी सादृश्येतर सम्बन्ध (कार्य-कारण, सामीप्य, अङ्गाङ्गिभाव आदि सम्बन्ध) के कारण होता है, जब कि गौणी में वह सादृश्य सम्बन्ध पर आधृत होता है। इसी को उपचार भी कहते हैं। जहां दो भिन्न पदार्थों के अत्यधिक सादृश्य के कारण उन दोनों में भेदप्रतीति को छिपा दिया जाय, उसे उपचार कहते हैं :- 'अत्यन्तं विशकलितयोः सादृश्या- तिशयमहिम्ना भेदप्रतीतिस्थगन मुपचार:।' 'मुखं चन्द्रः' (मुख चन्द्रमा है), गौ र्वाहीकः' (पंजाबी बैल है); 'सिंहो माणवकः (बच्चाशेर है) आदि में मुख तथा चन्द्र, गौः तथा वाहीक माणवक तथा सिंह इन परस्पर अत्यन्त भिन्न पदार्थों में क्रमशः आह्लादकत्वादि, मौग्ध्यादि, तथा शौर्यादि के सादृश्य के कारण अभेद स्थापित कर दिया गया है। यह सादृश्य ही मुख्य वृत्ति के स्थान पर उपचरित वृत्ति का, वाचक शब्द के स्थान पर उपचारक शब्द के प्रयोग का निमित्त तथा प्रयोजन है। प्रयोक्ता वाहीक के साथ 'गौः' का प्रयोग इस निमित्त से करता है कि श्रीता को इस बात की प्रतीति हो जाय कि (यह) पंजाबी उतना ही मूर्ख है, जितना पशु-बैल।) कि हम देखते हैं कि जहाँ कहीं 'सिंहो माणवकः' आदि उदाहरणों में गौणी (उपचार) वृत्ति का प्रयोग होता है, वहाँ किसी निमित्त तथा प्रयोजन की स्थिति अवश्य होती है, वहाँ शौर्यादि के सादृश्य की प्रतीति कराना प्रयोजन होता है। यदि किसी सादृश्य की प्रतीति कराना न होता, तो मुख्य के स्थान पर अमुख्य पद का प्रयोग उन्मत्तप्रलपित ही होगा। जब किसी भी अर्थ (माणवकादि ) का वाचक शब्द विद्यमान है, तो ऐसा कौन होगा जो बिना किसी निमित्त या प्रयोजन के उपचरित शब्द (सिंहादि) का भी प्रयोग करे ? रसादि को उपचारवृत्ति का विषय नहीं माना जा सकता। जैसे 'सिंहो माणवकः' में सिंह तथा माणवक (बच्चा) में समान शौर्य देखकर उस शौर्य के सादृश्य की प्रतीति कराना, उपचारवृत्ति का प्रयोजन है, वैसे रस तथा काव्य में भी कोई सादृश्य है तथा उसकी प्रतीति कराना कवि को अमीष्ट है, ऐसा नहीं कहा जा सकता। काव्य तथा रस में कोई अतिशय सादृश्य है ही नहीं, जब ऐसा सादृश्य है हो नहीं, तो उसकी प्रतीति कराने का भी प्रश्न उपस्थित नहीं होता।१ 5 अगर विरोधी पक्ष के इस मत को हम मान भी लें कि काव्य रस की प्रतीति अभिधाशक्ति १. काव्य में मुख्यार्थबाघ होने पर ही तो हम रस को उपचारगम्य मान सकते हैं; पर काव्य में प्रयुक्त पदादि में मुख्यार्थबाध-रखलद्तित्व- होता ही नहीं है। प्रश्युत मुख्यार्थ से ही रस की प्रतीति तीसरे क्षण में होती है। इसीलिए व्यङ्चार्थ को (रस को भी) गौणीवृत्ति का विषय नहीं माना जा सकता है, इस बात को ध्वनिकार ने इस कारिका में निवद्ध किया है :- मुख्यां वृत्ति परित्यज्य, गुणवृत्यार्थदर्शनम्। यदुदिश्य फलं तत्र शब्दो नैव स्खलद्गतिः ॥ (ध्वन्यालोक. उद्योत १. कारिका २०.) इसी को अभिनवगुप्त ने अपने 'लोचन' में ठीक उसी उदाहरण को लेकर स्पष्ट किया है, जिसको वृत्तिकार धनिक ने ऊपर पूर्वपक्षी के मत में उद्धृत किया है। आचार्य अभिनवगुप्त ने बताया है कि 'सिंहो बटुः' उदाहरण में भी उपचार के द्वारा 'सिंह' शब्द का अन्वय 'बट' से घटित हो जाता है, किन्तु उसका प्रयोजन-शौर्यातिशय की प्रतीति-तो उपचारागम्य माना ही नहीं जा सकता (ठीक यही बात रसके बारे में कही जा सकती है)। उपचार के प्रयोजन को भी उपचारगम्य मानने में तो अनवस्था दोष आ जायगा। 'यदि च सिंहो वटः" इति शौर्यातिशये प्यवगमयितव्ये र्खलद्गतित्वं शब्दस्य, तत्तहिं प्रतीति नैव कुर्यादिति कि वा तस्य प्रयोगः। उपचारेणकरिष्यतीति चेतु, तत्रापि प्रयोजनान्तर मन्वेष्यम्। तत्राद्युपचारेडनवस्था, अथ न तत्र रखलद्गतित्त्वम्।' (लो. पृ. २७६) (मद्रास सं.) 05 3F
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चतुर्थ: प्रकाश: २२७ के द्वारा कराते हैं, तथा काव्य या काव्योपात्त शब्द रस के वाचक हैं, तथा रस वाच्यार्थ, तो इस मत को मानने पर यह भी मानना होगा कि जिस किसी व्यक्ति को उस उस शब्द के साक्षात् सङ्केतित अर्थ का ज्ञान है, उसे रसचर्वणा अवश्य होगी। हम दो आदमियों की ले लेते हैं, दोनों को शब्द तथा उनके मुख्यार्थ का व्यावहारिक ज्ञान है। उनमें से एक सहृदय है, दूसरा सहृदय नहीं है। हम एक काव्य की लेकर उनको सुनाते हैं। वे दोनों काव्य का मुख्यार्थ समझ लेते हैं। पर सहृदय व्यक्ति उसके उपनिषद्भूत रस का भी आनन्द उठाता है, जब कि अरसिक व्यक्ति को उस काव्य में कोई आनन्द नहीं आता। यदि रस वाच्यार्थ या मुख्यार्थ ही होता, तो मुख्यार्थ को समझने वाले व्यक्ति को भी रसास्वाद होना चाहिए था। पर वास्तविकता यह नहीं है। वाच्यवाचक भाव मात्र का ज्ञान हो जाने भर से अरसिक व्यक्तियों को रसास्वाद नहीं हो पाता। अतः इस युक्ति से यह स्पष्ट हो जाता है कि रस वाच्यार्थ नहीं है, न काव्य व रस में वाच्यवाचक भाव ही है।" कुछ लोग ऐसे भी हैं जो काव्योपात्त शब्दों के द्वारा रस प्रतीति को किसी दूसरे ही ढंग से समझाने का प्रयत्न करते हैं। ये लोग रस की काल्पनिक मानते हैं। इन लोगों का यह मत है कि कवि अपने काव्य के शब्दों को अपने ईप्सित रस का काल्पनिक सङ्केत मान लेता है। इस प्रकार इन इन शब्दों के प्रयोग से अमुक काव्य में अमुक रस की प्रतीति होगी, ऐसी कल्पना कर लेता है। पर यह मत भी ठीक नहीं। रस को काल्पनिक नहीं मान सकते। यदि रस काल्पनिक होता, तो फिर उसकी प्रतीति कुछ ही लोगों को हो पाती, जिन्हें काव्य के रचयिता कवि की उस कल्पना-उस कल्पित सक्केत का पता है। किन्तु, ऐसा नहीं है। इस बात में कोई विरोध नहीं कि सभी रसिकों को एक साथ रस का आस्वाद प्राप्त होता है। अतः रस काल्पनिक नहीं है। इस ऊपर के तक के आधार पर कुछ लोग (ध्वनिबादी) रस, अलद्कार तथा वस्तुरूप (व्यंग्य या प्रतीयमान) अर्थ की प्रतीति व्यज्ञकत्वरूप नये शब्दव्यापार (व्यजना शक्ति) के द्वारा मानते हैं; जो वाच्यार्थादि की प्रतीति के लिए कल्पित अभिधा, लक्षणा या गौणी शक्ति से सवथा भिन्न है। (यहाँ यह बता दिया जाय कि ध्वनिवादी काव्यार्थ के तीन रूप मानते हैं-रस, वस्तु तथा अलक्कार। रस रूप काव्यार्थ में काव्य में उपात्त शब्दों का मुख्यार्थ रत्यादि भाव या शृङ्गारादि रस की व्यञ्ना कराता है, वह उन्हें सहृदयहृदय के आस्वाद का विषय बनाता है। वस्तुरूप काव्यार्थ में काव्य का वाच्यार्थ, जो स्वयं वस्तुरूप या अलक्काररूप होता है, किसी वस्तु की व्यज्ना कराता है। अलक्काररूप काव्यार्थ में काव्य का वस्तुरूप या अलङ्काररूप वाच्यार्थ, अलक्कार की व्यज्ना करता है। वस्तु तथा अलक्कार व्यज्जक भी हो सकते हैं, व्यङ्गथ १. मिलाइये-शब्दार्थशासनज्ञानमात्रेणैव न वेधते। वेद्यते स तु काव्यार्थतत्वशै रेव केवलम् ।। (ध्वन्यालोक कारिका. १०७) २. व्यङ्गथार्थ के काल्पनिक मानने के मत को प्रकारान्तर से विश्वनाथ ने साहित्यदर्पण में भी उद्धत किया है, तथा उसका खण्डन किया है, यद्यपि विश्वनाथ करपना के स्थान पर वहाँ 'सूचनबुद्धि' का प्रयोग करते हैं :- किश्र, वस्त्रविक्रयादौ तर्जनीतोलनेन दशसंख्यादिवत् सूचनबुद्धिवेद्योऽप्ययं न भवति। (साहित्यदर्पण परिच्छेद ५; पृ. ३९०) ३. मिलाइये- तस्मात् अभिधातात्पर्यलक्षणाव्यतिरिक्त श्रतुर्थोडसौ व्यापारो ध्वननदोतनव्यअ्ञनप्रत्याय- नावगमनादिसोदरव्यपदेशनिरूपकोडभ्युपगन्तव्यः।(लोचन, पृर. ११५-मद्रास संस्करण)
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२२८ दुशरूपकम् भी। रस सदा व्यंङ्रथ ही होता है, उसका व्यञ्ञक, काव्य का मुख्यार्थ (वाच्यार्थ), वस्तुरूप होगा या अलक्काररूप। ऊपर ध्वनिवादी ने बताया है कि प्रतीयमान अर्थ अभिधादि के द्वारा प्रतीत हो ही नहीं सकता। उसके लिए व्यज्ञना नामक व्यापार की कल्पना करनी ही पड़ेगी, इसे स्पष्ट करने के लिए धनिक ने पूर्वपक्षी के मत को तोन उदाहरणों से स्पष्ट किया है। इन तीनों उदाहरणों का प्रयोग आनन्दवर्धन ने अपने 'आलोक' (ध्वन्यालोक) में किया है। धनिक ने उन्हीं के आधार पर पूर्वपक्ष को स्पष्ट किया है।) तथा हि विभावानुभावव्यभिचारिमुखेन रसादिप्रतिपत्तिरुपजायमाना कथमिच वाच्या स्यात्, यथा कुमारसम्भवे- 'विवृण्वती शैलसुतापि भावमज्नैः स्फुर द्वालकदम्बकल्पैः । साचीकृता चारुतरेण तस्यौ मुखेन पर्यस्तविलोचनेन॥I' इत्यादावनुरागजन्यावस्थाविशेषानुभाववद्विरिजालक्षण विभावोपवर्णनादेवाशाब्दापिश- जारप्रतीतिरुदेति, रसान्तरेष्वप्ययमेव न्यायः, न केवलं रसेष्वेव यावद्वस्तुमात्रेऽपि। हम बता चुके हैं कि रस की प्रतीति काव्योपात्त शब्दों के द्वारा नहीं होती। वह तो विभाव, अनुभाव तथा व्यभिचारी के निबन्धन के द्वारा होती है। अतः काव्योपात्त शब्दोंया काव्य का उसे वाच्यार्थ कैसे माना जा सकता है। इसे स्पष्ट करने के लिए हम कुमारसम्भव के तृतीय सर्ग से निम्न पद्म ले सकते हैं :- कोमल तथा छोटे चज्जल कदम्ब के समान सुन्दर अङ्गों से भाव को प्रकट करती हुई पार्वती भी, (उस समय, जब कामदेव ने शिव को अपने बाण का लक्ष्य बनाया), इधर उधर चञ्चलता से फेंके हुए नेत्र वाले सुन्दर मुख से कुछ टेढ़ी होकर बैठी थी। इस पद्य में शिव विषयक रति भाव के आलम्बन विभावरूप पार्वती का वर्णन किया गया है। पार्वनीरूप विभाव में अनुराग के कारण उत्पन्न अवस्था वाले अनुभावों; अङ्गों का पुलक, नेत्रों का चाञ्चल्य, मुख का साचीकरण आदि का वर्णन किया गया है। इस प्रकार आलम्भव विभाव (पार्वती) का उसके अनुभावों के साथ वर्णन श्रक्कार की प्रतीति करा रहा है। यद्यपि यहाँ रति भाव या श्रक्गार रस का वाचक शब्द नहीं है, फिर भी श्रुद्गार की प्रतीति उत्पन्न हो ही रही है। यह बात श्रङ्कार के बारे में ही नहीं है, दूसरे रसों के विषय में भी लागू होती है। रस ही नहीं वस्तु या अलक्कार भी जहाँ प्रतीयमानरूप में प्रतीत होते हैं, वहाँ शब्द के वाचक न होने पर भी उनकी प्रतीति होती ही है। इम वस्तुमात्र या अलक्कारमात्र का एक एक उदाहरण ले सकते हैं, जहाँ रस की प्रधानता नहीं है। यथा-'भम धम्मित चीसद्धो सो सुणहो अज्ज मारिओ तेण। गोळाणइकच्छ कुडप्चासिणा दरिअसीहेण।।' ('भ्रम धार्मिक विश्रब्धः स श्वाय मारितस्तेन। गोदावरीनदीकच्छकुज वासिना दप्तसिंहेन') इत्यादौ निषेधप्रतिपत्तिरशाब्दापि व्यञ्ञकशक्तिमूलैव। 'हे धार्मिक, अब तुम आनन्द से गोदावरी के तीर पर घूमा करो, अब तुम्हें चिन्ता वस्तुमात्र जैसे- करने की आवश्यकता नहीं। गोदानदी के कछार पर कुज में रहने वाले बलवान् सिंह ने उस कुत्ते को आज मार डाला है, (जिसके डर से तुम वहाँजानेसे घबराया करते थे)।' -11 १. घूमहुँ अब निहचिन्त है धार्मिक गोदातीर (ए बा कूकर कौ कुज मैं मारथो सिंह गॅभीर ॥ (अनुवादक)
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चतुर्थ: प्रकाश: २२६
किसी नायिका का उपपति से मिलने का सङ्केतस्थल गीदावरी के तीर का कुज है। पर एक धार्मिक पुष्पचयन के लिए वहाँ जा जाकर उनके चौर्यरतादि के कार्य में विप्न उपस्थित कर देता है। नायिका उसका आना रोकने के लिए एक कुत्ता पाल लेती है, जो तापस को कुज में आने नहीं देता, उसे भौंक कर डराता है। पर धार्मिक भी तो अपनी पूजा आदि धार्मिक क्रिया में विप्न कैसे कर सकता था? वह कुत्ते से नहीं घबराता। उसका पुष्पचयन करना जारी रहता है, और साथ ही हमारे नायक-नायिका का दुर्भाग्य, कि उनका शुभ कार्य सदा टोक दिया जाता है। नायिका इस बूढ़े धार्मिक से बचने की नई योजना बनाती है। एक दिन वह बड़ी खुशी से धार्मिक को यह खुशखबरी सुनाती है कि उसे परेशान करने वाले कुत्ते को गोदातीर के कुज में रहने वाले शेर ने फाड़ खाया है, अब धार्मिक को सताने वाला कुत्ता नहीं है, इसलिए वह मजे से गोदातीर पर भ्रमण करे। पर वाच्य के इस तरह नियोजित करने पर भी नायिका का अभिप्राय यह है, कि इस खबर को सुन कर धार्मिक महाराज शेर के खाये जाने के डर से वहाँ जाना छोड़ दें। नायिका के इस वाक्य का व्यड्याथं तो यह है :- 'बच्चू, उधर पैर भी न रखना, नहीं तो जान खतरे में होगी।' चाहे गाथा में प्रकट रूप में 'वहाँ मजे से भ्रमण करो' इस वाच्यरूप विधि का प्रयोग हुआ है, पर व्यज्यार्थ 'वहाँ कभी न जाना' इस निषेध की प्रतीति कराता है। इस प्रकार गाथा में विधिरूप वाच्य वस्तु के द्वारा निषेधरूप व्यञ्ञ वस्तु की व्यअ्ञना कराई गई है। इस गाथा में निषेध का स्पष्ट प्रयोग नहीं है। काव्य में 'भम' (भ्रम) का प्रयोग हुआ है 'ण भम' (न भ्रम) का नहीं। इसलिए शाब्दिक या वाच्य रूप में तो विध्यर्थ ही प्रतीत होगा। किन्तु यह सहृदयानुभव सिद्ध है कि यह कुलटा नायिका अपने चौर्यरत का निर्बाध सज्चार चाहने के कारण धार्मिक का गोदातीर पर जाना पसन्द नहीं करती, तथा कुत्ते के मारे जाने की झूठी खबर उड़ा रही है। इसलिए गाथा का निषेधरूप अर्थ पुष्ट हो जाता है। गाथा में निषेधवाचक शब्दों के अभाव के कारण निषेध प्रतीति अशाब्द ही माननी होगी। अतः उसे अभिधाविषयक न मान कर, व्यजना शक्तिविषयक मानना पड़ेगा।
स्मेरेऽवुना तव मुखे तरलायताक्षि। क्षोभं यदेति न मनागपि तेन मन्ये 5सुव्यक्तमेव जलराशिरयं पयोधिः' इत्यादिषु 'चन्द्रतुल्यं तन्वीवदनारविन्दम्' इत्यायुपमाद्यलङ्कारप्रतिपत्तिर्व्यजकत्व- निबन्घनीति। न चासावर्थापत्तिजन्या-अनुपपद्यमानार्थापेक्षाभावात्। नापि वाक्यार्थत्वं व्यङ्ञयस्य-तृतीयकक्षाविषयत्वात्। तथा हि-'भ्रम धार्मिक' इत्यादौ पदार्थविषया- भिधालक्षणप्रथमकक्षा तिक्रान्त क्रियाकारकसंसर्गात्मकविधिविषयवाक्याथकक्षातिक्रान्ततृतीय- कक्षाक्रान्तो निषेधात्मा व्यज्यलक्षणोरऽर्थो व्यज्जकशक्त्यधीनः स्फुटमेवावभासते अतो नासौ वाक्यार्थः। ठीक यही बात अलक्काररूप प्रतीयमान अर्थ के बारे में कही जा सकती है। जैसे निम्न उदाहरण में- है चञ्जल नेत्र वाली सुन्दरी, समस्त दिशाओं को अपने लावण्य (सौन्दर्य) की कान्ति से प्रदीप्त करने वाले, मुस्कराते हुए तुम्हारे मुख की देख कर भी यह समुद्र बिल्कुल क्षुब्ध
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२३० दशरूपकम्
नहीं होता, इस बात को देख कर मैं मानता हूँ कि समुद्र सचमुच ही जड़राशि (पानी का समूह; मूर्ख) है। तुम्ारा मुख पूर्ण चन्द्रमा है। समुद्र पूर्णिमा के चन्द्र को देखकर चज्जल व क्षु्ध होता ही है। पर तुम्हारे मुखरूपी पूर्णचन्द्र को देख कर उसका क्षुब्ध नहीं होना उसके 'जड़राशित्व' की पुष्टि कर देता है। तुम जैसी अनिन्ध सुन्दरी को देख कर किसका मन चञ्चल न होगा। यदि कोई व्यक्ति चञ्चल न हो, तो वह मेरी समझ में मूर्ख है। इस पद्य में 'नायिका का मुख पूर्ण चन्द्रमा है' इस रूपक अलक्कार की प्रतीति हो रही है, पर पद्य में इस ढङ्ग की पदावली नहीं कि इस अर्थ को शाब्दिक या वाच्य कहा जा सके। अतः इस रूपक अलक्कार रूप अर्थ को अभिधा का विषय न मान कर व्यजनाप्रतिपादय ही मानना ठीक होगा। ऊपर के पद्य में 'नायिका का मुखकमल चन्द्र के समान है' यह उपमादि अलक्कार की प्रतिपत्ति व्यज्ना के हो द्वारा होती है। (कुछ लोग व्यङ्ञयार्थ को अर्थापत्तिग्राह्य मान लेते हैं। मीमांसकों ने यथार्थ ज्ञान के साधनरूप प्रमाणों में एक नये प्रमाण की कल्पना की है। यह प्रमाण अर्थापत्ति कहलाता है। जहाँ वाक्य का अर्थ ठीक नहीं बैठ पाता हो और बाहर से वाक्य में प्रयुक्त पदों में अनुपपद् मानता हो, वहाँ अर्थापत्ति प्रमाण के द्वारा अर्थ की प्रतीति मानी जाती है। उदाहरण के लिए 'मोटा देवदत्त दिन में नहीं खाता' ( पीनो देवदत्तो दिवा न भुक्के) इस वाक्य में 'देवदत्त कभी खाता ही नहीं' ऐसा अर्थ नहीं ले सकते। क्योंकि वह खाना ही न खाता होता, तो मोटा न रह पाता, पतला हो जाता। इसलिए यहाँ 'अर्थात् वह रात में खाता है' (अर्थात् रात्रौ मुझ्े) इस अर्थ की प्रतीति अर्थापत्ति से हो जाती है। इसी सरणि से व्यङ्रयार्थ-रसादि- की भी प्रतीति हो ही सकती है यह व्यअ्नाविरोधी का मत है।) के जिस तरह 'पीनो देवदत्तो दिवा न भुङ्धे' इस वाक्य का देवदत्तविषयक रात्रिभक्षण रूप अर्थ अर्थापत्ति प्रमाण वेद है, ठीक वैसे ही रस भी अर्थापत्ति के द्वारा काव्योपात्त वाक्यों से प्रतीत हो जायगा, यह मत मानना ठीक नहीं। वस्तुतः रसचर्वणा अर्थापत्तिवेद् या अर्थापत्तिजन्य नहीं है। अर्थापत्ति वहाँ हो होगी, जहाँ अर्थ ठीक नहीं बैठता हो। काव्योपात् शब्दों का वाच्यार्थ तो ठीक बैठ ही जाता है; अतः वहाँ 'अर्थात्' की आपत्ति नहीं करनी पड़ती। रसादि की चर्वणा के पूर्व वहाँ अनुपपद्यमानार्थत्व होता ही नहीं। रसादि की प्रतीति में, अर्थ ज्ञान ठीक नहीं बैठने पर हो अर्थापत्ति हो सकती है। व्यङ्गयरूप रसादि को वाक्यार्थ भी नहीं माना जा सकता, क्योंकि व्यङ्गय की प्रतीति सदा तीसरे क्षण में होती है, वह तृतीय कक्षा का विषय है। इम इसे स्पष्ट करने के लिए कोई भी काव्य ले सकते हैं। उदाहरण के लिए 'भ्रम धार्मिक' वाली गाथा ले लें। सबसे पहले इस गाथा में 'अ्रम' 'धार्मिक' 'विश्रब्धः' आदि पदों में से प्रत्येक पद का अभिधा वृत्ति के द्वारा स्वतन्त्र रूप में वाच्यार्थ प्रतीत होगा। जब काव्योपात्त समस्त पद स्वतन्त्र रूप से वाक्य के पदों की अपनी-अपनी अभिधा से अपना-अपना वाच्यार्थ बता चुकेंगे, तब फिर सारे वाक्य में क्रिया तथा कारक के संसर्ग या अन्वय के द्वारा वाक्यार्थ की प्रतीत होगी। इस तरह वाक्यार्थ तक पहुँचने में दो क्षण लगेंगे। पहले क्षण में, पहली कक्षा में, शब्द अपने निजी वाच्यार्य का स्वतन्त्र होकर प्रत्यायन करायँगे। दूसरे क्षण में, दूसरी कक्षा में, वे कारक क्रिया के आधार पर (अथवा आकाङ्का, योग्यता तथा आसत्ति के आधार पर) अन्वित होंगे तथा सम्पूर्ण वाक्य फिर वाक्यार्थ की प्रतीति करायेगा। इसके बाद व्यङ्ञयार्थ की, रसादि की प्रतीति हो सकेगी। इस तरह व्यङ्गयार्थ सदा तृतीय कक्षाविषयक होगा। 'भ्रम धार्मिक' में पहले अलग-अलग पद का अर्थ हुआ, फिर सारे वाक्य का 'वहाँ जरूर घूमो, निश्चिन्त होकर घूमो' इस विधिरूप वाक्यार्थ का; तब तीसरे क्षण में जाकर 'वहाँ कभी न जाना' यह निषेधरूप
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चतुर्थ: प्रकाश: २३१
व्यङ्गचार्थ प्रतीत हो सकेगा। इस तरह यह निषेधरूप व्यङ्गयार्थ तृतीय कक्षा का विषय है। यह सर्वमान्य है कि शब्द, बुद्धि तथा कर्म एक ही क्षण तक रहते हैं। 'शब्दबुद्धिकर्मणां विरम्य- व्यापाराभाव:' इस न्याय के अनुसार पदार्थप्रत्यायक अभिधा केवल वाच्यार्थ तक ही सीमित रहती है। दूसरे क्षण का वाक्यार्थ भी बुद्धि के ज्ञान का विषय उसी क्षण तक रहता है। तब तीसरे क्षण में बुद्धि को जिस अर्थ का ज्ञान होता है वह न तो वाच्यार्थ ही है, न वाक्यार्थ ही। वह इन सब से भिन्न व्यङ्गचार्थ है, जिसकी प्रतिपत्ति व्यज्ञनाशक्ति के आधीन है, यह स्पष्ट ही प्रतीत हो जाता है।१
ननु च तृतीयकक्षाविषयत्वमश्र्यमाणपदार्थतात्पर्येषु 'विषं भुंच्व' इत्यादिवाक्येषु निषेधार्थविषयेषु प्रतीयत एव वाक्यार्थस्य। न चात्र व्यज्जकत्ववादिनापि वाक्यार्थत्वं नेष्यते तात्पर्यादन्यत्वाद्धनेः। तन्न, स्वार्थस्य द्वितीयकक्षायामविश्रान्तस्य तृतीयकक्षाभा- वात्, सैव निषेधकक्षा। तत्र द्वितीयकक्षाविधौ क्रियाकारकससर्गानुपपत्तेः प्रकरणात्पितरि वक्तरि पुत्रस्य विषभक्षणनियोगाभावात्। रसचद्वाक्येषु च विभावप्रतिपत्तिलक्षणद्वितीयकक्षायां रसानवगमात्। इस सम्बन्ध में, तात्पर्य में व्यञ्जना का समावेश करने वाला ध्वनिवादी के सम्मुख यह युक्ति रखता है। हम एक वाक्य ले ले 'विषं भुंक्ष्व मा चास्य गृहे भुखथाः'-'चाहे विष खालो, पर इसके घर कभी न खाना'। इस वाक्य में 'विषं भुंक्ष्व' (जहर खालो) इसका प्रयोग हुआ है, यहाँ पदार्थ रूप में विधि का प्रयोग हुआ है, किन्तु पदार्थ का तात्पर्यं निषेध रूप में ही हैं। 'इस शत्रु के घर कभी खाना न खाना' यह निषेधरूप वाक्यार्थ तीसरे क्षण में ही प्रतीत होता है। अतः 'विषं भुङ्क्ष्व' इस वाक्य को इस बात का उदाहरण माना जा सकता है कि तात्पर्य रूप वाक्यार्थ तृतीय कक्षा का विषय भी हो सकता है। यदि कोई कहे कि यहाँ १. वाक्यार्थ के विषय में मीमांसकों के दो दल हैं। भाट मीमांसक यह मानते हैं कि वाक्यार्थ की प्रतीति आकाक्का, योग्यता तथा सन्निधि के आधार पर वाक्य में प्रयुक्त पदों के अर्थों के अन्वित होने पर तात्पर्य वृत्ति के द्वारा होता है। तथा यह वाक्यार्थ पदार्थ से सर्बथा भिन्न होता है-'विशेषवपुरपदार्थोऽपि वाक्यार्थः'। ये लोग सबसे पहले अभिधा के द्वारा पदार्थ (वाच्यार्थ) प्रतीति, तदनन्तर तात्पर्य वृत्ति के द्वारा वाक्यार्थ प्रतीति मानते हैं। अतः इन्हें अभिहितान्वयवादी कहा जाता है। दूसरे लोग जो प्रभाकर भट्ट के अनुयायी हैं इस वृत्ति को नहीं मानते। वे अभिधा से ही वाक्यार्थ प्रतीति भी मानते हैं। उसके मतानुसार लोगों को किसी भी अर्थ का ज्ञान वाक्य रूप में ही होता है-पदों का प्रयोग, पदों के स्वतन्त्र वाच्यार्थ का ज्ञान भी वे अन्वयव्यतिरेक से ही करते हैं। 'देवदत्त गाय लाओ, 'घोड़ा लाओ, घोड़ा ले जाओ, गाय ले जाओ' आदि वाक्यों को सुन कर ही बच्चा भाषा सीखता है, तथा तत्तत् अर्थ का ग्रहण 'आवापोद्वाप' से करता है। पर बारीकी में पहुँचने पर प्रभाकर भी इस वाच्यार्थ रूप वाक्यार्थ के 'सामान्य' तथा 'विशेष' दो रूप मानते जान पड़ते हैं (देखिये, काव्यप्रकाश उल्लास ५)। इस प्रकार वाक्यार्थ तो दोनों ही मानते हैं, इसमें समानता है। हाँ, उनकी प्रतिपत्ति की सरणि या प्रक्रिया में दोनों सम्प्रदायों में परस्पर भेद है। इन्हीं लोगों के मतानुयायी आलक्कारिकों ने-जिनमें धनज्जय व धनिक भी शामिल है-व्यङ्गयार्थ को वाक्यार्थ या तात्पर्य में ही शामिल करने की चेष्टा की है। इन्हीं लोगों का विरोष ऊपर किया गया है। ध्वनिवादी के इसी विरोध को धनिक ने पूर्वपक्ष के रूप में रक्खा है।
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निषेधार्थ रूप अर्थ वाक्यार्थ नहीं है, तो ऐसा खुद व्यअनावदी भी मानेंगे। व्यअनावादी स्वयं ध्वनि को तात्पर्य से भिन्न मानते हैं; तथा यहाँ तात्पर्य है। अतः यहाँ पर व्यअनावादी भी वाक्यार्थ नहीं है, ऐसा न कहेंगे। वे भी यहाँ वाक्यार्थ मार्नेगे ही। यदि विरोधिपक्ष, इस तरह से तृतीय कक्षा तक तात्पर्य वृत्ति का विषय तथा वाक्यार्थ माने तो ठीक नहीं। 'विषं भुंक्ष्वं' में पहली कक्षा में 'विष' तथा 'भुंक्ष्व' के व्यस्त पदों के अर्थ की प्रतीति होती है। द्वितीय कक्षा में वाक्य अन्वयघटित होकर प्रकरणसम्मत अर्थ की प्रतीति करता है। इसी प्रकरणगत अन्वित अर्थ को वाक्यार्थ कहेंगे। इस वाक्य को लेने पर हम देखते हैं कि 'विष खालो' यहीं तक द्वितीय कक्षा नहीं है। जब तक वाक्यार्थ द्वितीय कक्षा में विश्रान्त नहीं हुआ है, तब तक तृतीय कक्षा का प्रश्न ही नहीं उठता। कहने का तात्पर्य यह है कि 'विष खालो' तक पूर्ण रूप से वाक्य का प्रकरण घटित नहीं हो पाता, विधिरूप अर्थ पूर्ण वाक्यार्थ नहीं होने के कारण अर्थ की आकाहा बनी ही रहती है। इस तरह द्वितीय कक्षा यहीं समाप्त नहीं हो जाती, वह तो 'उस शत्रु के घर पर भोजन न करना' इस निषेधार्थ रूप वाक्यार्थ पर जाकर विश्रान्त होती है। अतः निषेध की प्रतीति द्वितीय कक्षाविषयक ही है। अतः द्वितीय कक्षा के समाप्त होये बिना हो इस निषेयरूप अर्थ में तृतीय कक्षा मानना अनुचित है, उसमें तृतीय कक्षा का सवथा अभाव है। प्रकरण के पर्यालोचन से पता चलता है कि इस वाक्य का प्रयोग पिता ने अपने पुत्र के प्रति किया है। द्वितीय कक्षा में वाक्यार्थ ज्ञान होते समय जब हम देखते हैं कि यह वाक्य पिता ने पुत्र से कहा है, जो यह कभी नहीं चाहेगा कि उसका पुत्र विष खाले, तो हमें यह पता लगता है कि यहाँ 'भुंक्ष्व' क्रिया के साथ 'कर्ता' (त्वं) तथा कर्म (विषं) इन कारकों का अन्वय ठीक तरह उपपन्न नहीं होता। क्योंकि यह स्पष्ट है कि पिता का पुत्र के प्रति यह आदेश नहीं है कि 'सचमुच विष खालो,' किन्तु यह कि शत्रु के घर न खाना। इसलिए पूरा अर्थ द्वियीय कक्षा का ही विषय है। और यह नियम है कि रसादि व्यङ्गयार्थ सदा तृतीयकक्षानिविष्ट ही हैं। यह निश्चित है। रस से युक्त वाक्यों में हम देखते हैं कि वाक्यार्थ विभाव, अनुभाव या सव्वारी परक होता है। विभावादि के ज्ञान वाली द्वितीय कक्षा में ही रस प्रतीति नहीं हो जाती, क्योंकि विभावादि तो रस की व्यञ्ञना के साधन हैं, अतः उनका प्राग्भाव होना आवश्यक है। विभावादि के साथ साथ ही, द्वितीय कक्षा में ही, रस प्रतिपत्ति कभी नहीं होगी।2 तदुक्त्म्-'अप्रतिष्ठम विश्रान्तं स्वार्थे यत्परतामिदम्। वाक्यं विगाहते तत्र न्याय्या तत्परताऽस्य सा ॥ यत्र तु स्वार्थविश्रान्तं प्रतिष्ठां तावदागतम्। तत्प्रसर्पति तत्र स्यात्स्वत्र ध्वनिना स्थितिः ॥।' इत्येवं सर्वत्र रसानां व्यक्ञयत्वमेव। वस्त्वलङ्कारयोस्तु क्वचिद्वाच्यत्वं क्वचि्यक्कयत्वं, तत्रापि यत्र व्यक्षयस्य प्राधान्येन प्रतिप्रत्तिस्तत्रैव ध्वनिः, अन्यत्र गुणीभूतव्यज्ञयत्वम्। जैसा कि ध्वनिकार ने कहा भी है :- 'जब तक वाक्य अपने अर्थ पर समाप्त नहीं हो पाता, तथा पूरी तरह ठीक नहीं बैठता, तथा किसी दूसरे अंश तक अर्थ को उपपन्न करता है; तब तक उस अर्थ तक वाक्य का वाक्यार्थ १. ध्यान रखिये विभावादि।कारण से रसरूप कार्य तक पहुँचने का क्रम असंलक्ष्य भले ही हो, पर वहाँ क्रम का सवथा अभाव नहीं चाहे वह क्रम 'शत्तपत्रपत्र' के भेदन के सदृश त्वरित 3हो। 'शतपत्रपत्रभेदन्यायेनाकलनात्'।
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माना जायगा। वाक्यार्थ के ठीक न बैठने पर जहाँ कहीं वाक्यार्थ ठीक बैठे वहीं तक (विषंभुक्ष्व आदि वाक्यों में निषेधरूप अर्थ तक) तत्परता-वाक्यार्थपरता मानी जायगी। लेकिन जहाँ वाक्य, वाक्यार्थ में आकर समाप्त हो जाता है, तथा अर्थ पूर्णंतः प्रतिष्ठित या उपपन्न हो जाता है, और वाक्य किसी अन्य अर्थ का बोध कराने के लिए फिर से आगे बढ़ता है, तो ऐसे स्थलों पर वाक्यार्थ तो पहले ही विश्रान्त हो चुका है, अतः यह अन्य अर्थ व्यङ्ञथ ही होता है, ऐसे स्थलों पर ध्वनि का ही विषय होता है।' इन कारिकाओं के आधार पर स्पष्ट है कि विभावादि रूप वाक्यार्थ के विश्रान्त होने पर प्रतीत रस व्यक्ष्य ही हैं, वाक्यार्थ नहीं। वस्तु तथा अलद्कार के बारे में दूसरी बात है। वे कहीं व्यङ्गय भी होते हैं, कहीं वाच्य भी, किन्तु रस सदा व्यङ्गय ही होता है। लेकिन वस्तु तथा अलक्कार के व्यङ्गय रूप में भी जहाँ व्यङ्चार्थ वाच्यार्थ से प्रधान है, वहीं ध्वनि होगी, और स्थानों पर वाच्यार्थ के समकक्ष होने पर या वाच्यार्थ के प्रधान होने पर व्यङ्गयार्थ गौण होगा, अतः वे काव्य गुणीभूत व्यक्गय ही कइलायँगे।१
१. ध्वनिवादी काव्य के तीन भेद करता है :- ध्वनि (उत्तम), गुणीभूत व्यङ्गथ (मध्यम) तथा चित्रकाव्य (अधम) यह भेद व्यङ्यार्थ की प्रधानता या अप्रधानता के आधार पर किया जाता है। (१) ध्वनि काव्य में व्यङ्गचार्थ वाच्यार्थ से अधिक चमतकारी तथा प्रधान होता है- 'इद मुत्तम मतिशयिनि व्यङ्गथे वाच्याद् ध्वनिरबुंधैः कथितः। जसे :- निःशेषच्युतचन्दनं स्तनतटं निरगृष्टरागोडघरो नेत्रे दूर भनअने पुलकिता तन्वी तवेयं तनुः। मिथ्यावादिनि दूति बान्धवजनस्याज्ञातपीडोद्गमे वापीं स्नातु मितो गतासि न पुनस्तस्याधमस्यान्तिकम् ॥ 1'ह बान्धवों की पीड़ा न जानने वाली झूठी दूति, तू यहाँ से बावली में नहाने गई थी, उस अधम के पास न गई। तेरे स्तनों के प्रान्त भाग का सारा ही चन्दन खिर गया है, तेरे अधर ओष्ठ की लाली मिट गई है, दोनों नेत्रों के किनारे अजन रहित हैं, तथा तेरा यह दुर्बल शरीर भी पुलकित हो रहा है।' यहाँ 'तू उस अधम के पास न गई' इस विधिरूप वाच्यार्थ से 'ये सब चिह्न वापी स्नान के नहीं है, अपितु तू मैरे प्रिय के साथ रमण करके आई है' यह व्यङ्गयार्थ प्रतीत होता है, जो काव्य में वाच्यार्थ से प्रधान है। अतः व्यङ्गयार्थ के वाच्यार्थ से प्रधान होने के कारण यहाँ ध्वनि काव्य है। (२) गुणोभूत व्यक्षथ में व्यङ्गयार्थ वाच्यार्थ से प्रधान नहीं होता। (अतादृशि गुणीभूतव्यङ्गथं व्यङ्गथे तु मध्यमम्) जैसे- वाणीरकुडङ्डुड्गोणसउणिकोलाइलं सुणन्तीए। क घरकम्मवावडाए बहुए सीअन्ति अङ्गाईं॥। (वानीरकुजजोड्डीनशकुनिकोलाइलं शृण्वन्त्याः। का ए2 कF कि गृहकर्मव्यापृताया वध्वाः सीदन्त्यङ्गानि॥) अविसत कुज् से उड़ते पक्षियों के कोलाहल को सुनती हुई, घर के काम में व्यस्त, बहू के अङ्ग शिथिल हो रहे हैं।' ३० द०
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तदुक्तम्-'यत्रार्थः शब्दो वा यमर्थमुपसर्जनीकृतस्वार्थौ। व्यङ्क: काव्यविशेषः स ध्वनिरिति सूरिभिः कथितः ॥ प्रधानेऽन्यत्र वाक्यार्थे यत्राज्ञं तु रसादयः । काव्ये तस्मिन्नलङ्कारो रसादिरिति मे मतिः ॥' जैसा कि ध्वनिकर ने कहा है :- 'जिस काव्य में शब्द अथवा उसका वाच्यार्थ, अथवा दोनों एक साथ, अपने वाच्यार्थं को तथा स्वयं को गौण बना कर किसी अलौकिक रमणीयता वाले व्यङ्गचार्थ को अभिव्यज्जित करते हैं, उस काव्य को ध्वनि कहा जाता है। भाव यह है कि ध्वनि काव्य में या तो शब्द अपने वाच्यार्थ को गौण बना कर व्यङ्गचार्थ की प्रधान रूप में प्रतीति कराता है, या वाच्यार्थ स्वयं को गौण बना कर व्यङ्चार्थ को प्रतीति कराता है, या शब्द और अर्थ दोनों एक साथ वाच्यार्थ तथा स्वयं को गौण बना कर व्यङ्गथ की प्रतीति कराते हैं। (ध्यान रखने की बात है, इसीके आधार शब्दशक्तिमूलक, अर्थशक्तिमूलक, तथा उभयशक्तिमूलक, ये तीन ध्वनिभेद किये जाते हैं।)' जिस काव्य में वाक्यार्थ (वाच्यार्थ) के प्रधान होने पर, रसादि (रस, वस्तु, या अलक्कार, अथवा रस, भावादि) उसके अङ्ग बन जाते हैं, उस काव्य में रसादि रसवत् आदि अलक्कार बन जाते हैं, ऐसा हमारा मत है। (इन स्थलों पर जहाँ व्यङ्गचार्थ वाच्यार्थ का अङ्ग हो जाता है, गुणीभूत व्यङ्षय नामक काव्य होता है।)' यथा-'उपोढरागेण' इत्यादि। तस्य च ध्वनेर्विवक्षितवाच्याविवक्षितवाच्यत्वेन
विचक्षितवाच्यश्च असंलक्ष्यक्रमः क्रमद्योत्यक्चेति द्विविधः, तत्र रसादीनामसंलक्ष्यक्रमध्व- नित्वं प्राधान्येन प्रतिपत्तौ सत्यां अज्गत्वेन प्रतीतौ रसवदलङ्कार इति। जैसे 'उपोढरागेण' आदि पद्य में व्यङ्गचार्थ वाच्यार्थ का अज्ञ हो गया है, तथा प्रधानता वाच्यार्थ की ही है। पूरा पद्य यों है :- यहाँ शकुनि कोलाहल सुन कर अङ्गों का शिथिल पड़ जाना वाच्यार्थ है। प्रकरणादि के वश से शकुनियों के उड़ने के कारणभूत, वेतस कुज में उपपति के आगमन की व्यङ्गथार्थ रूप में प्रतीति हो रही है। यहाँ यह व्यङ्थार्थ प्रथम तो उतना चमत्कारयुक्त नहीं है, जितना कि 'अङ्गों के शिथिल पड़ जाने वाला' वाच्यार्थ। दूसरे यह व्यङ्ञचार्थ वाच्यार्थ का साधन बन कर उसे स्पष्ट करता है। व्यङ्गयार्थ की प्रतीति होने पर ही 'अङ्गों के शिथिल पड़ने' का अर्थ घटित होता है। व्यङ्गथार्थ यहाँ वाच्यार्थ का उपस्कारक हो गया है। इस प्रकार व्यङ्गचार्थ के अप्रधान (गौण) होने के कारण यहाँ गुणीभूत व्यङ्गथ है। (३) चित्रकाव्य में शब्दालक्कार या अर्थालक्कार रूप वाच्यार्थ इतना अधिक होता है, कि व्यङ्गयार्थ सर्वथा नगण्य बन जाता है, जैसे- विनिगतं मानद मात्ममन्दिरात् भवत्युपश्रुत्य यदृच्छयापि तम्। ससम्भ्रेन्द्रद्रुतपातितागला निमीलिताक्षीव भियाSमरावती॥ हयग्रीव के निकलने की खबर सुनते ही इन्द्र अमरावती की अगला को बन्द करा देता था, मानों अमरावती डर के मारे आँखें बन्द कर लेती थी। इस अर्थ में उत्प्रेक्षा रूप अर्थालक्कार वाला वाच्यार्थ ही प्रधान है; ह्यग्रीव की वीरता वाला व्यक्षय नगण्य।
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उपोढरागेण विलोलतारकं तथा गृह्ीतं शशिना निशामुखम्।-कजजनिन यथा समस्तं तिमिरांशुकं तया पुरोपि रागाद गलितं न लक्षितम्।। 'चन्द्रमा के उदय का वर्णन है। उदयकालीन ललाई लिए चन्द्रमा पूर्व दिशा में उदित हो रहा है, उसकी किरणों से सारा अन्धकार नष्ट हो गया है। ललाई (राग) को धारण करने वाले चन्द्रमा ने रात्रि के प्रारम्भिक अंश को, जिसमें तारे झिलमिला रहे थे, इस तरह ग्रहण किया कि उसकी ललाई (प्रकाश) के कारण रात्रि ने अपने सारे अन्धकार रूपी वस्त्र को फिसलते ही न जाना। इस प्रस्तुत वाच्यरूप चन्द्रवर्णन के द्वारा कवि ने यहाँ नायक- नायिका-व्यवहार रूप अप्रस्तुत व्यङ्गथार्थ की प्रतीति कराई है। यहाँ पर समासोक्ति नामक अलक्कार है। व्यक्षथ रूप में शब्दों के श्िष्ट प्रयोग के कारण नायक-नायिका-व्यवहार- समारोप प्रतीत हो रहा है।' प्रेम को धारण करते हुए नायक (चन्द्रमा ) ने चज्रल पुतलियों वाले नायिका (निशा) के मुख को इस तरह चूम लिया कि उस नायिका ने प्रेम के आवेश के कारण आगे से गिरते हुए (गलित होते हुए) अपने समस्त वस्त् को भी न जाना। नायक के चूमने पर राग के कारण नायिका के वस्र एक दम शिथिल हो गये, और इसे राग के वशीभूत होने के कारण नायिका जान भी न पाई। इस उदाहरण में व्यक्ष्थार्थ गौण ही है, क्योंकि प्रधानता प्रस्तुत चन्द्रोदय वर्णनरूप वाच्यार्थ की ही है। अतः यहाँ गुणीभूत व्यङ्गथ ही है। तथा यह व्यङ्गयार्थ समासोक्ति रूप अलक्कार का उपनिबन्धक है। इस ध्वनि के सर्वप्रथम दो भेद हैं :- विवक्षितवाच्य (अभिधामूलक), तथा अविवक्षित- वाच्य (लक्षणमूलक) अविवक्षितवाच्य के भी दो भेद होते हैं :- अत्यन्त तिरस्कृतवाच्य तथा अर्थान्तर संक्रमितवाच्य। विवक्षितवाच्य ध्वनि के असंलक्ष्यक्रम तथा संलक्ष्यक्रम (क्रमद्योत्य) ये दो भेद होते हैं। जब काव्य में रसादि की प्रतिपत्ति प्रधानरूप से हो, असंलक्ष्य क्रम ध्वनि होती है। यदि रसादि अज्जरूप में प्रतीत होते हों, तो वहाँ ध्वनि नहीं होती, वहाँ पर रसवत् अलक्कार हो होता है।१ १. ध्वनि के मोटे तौर पर १८ भेद माने जाते हैं। इनमें भी पहले पहल लक्षणा के आधार पर दो भेद, तथा अभिधा के आधार पर दो भेद होते हैं। इन्हें क्रमशः अर्थान्तर संक्रमित- वाच्य, अत्यन्त तिरस्कृतवाच्य, असंलक्ष्यक्रम व्यङ्गय तथा संलक्ष्यक्रम व्यक्षय कहा जाता है। ध्वनि के भेदोपमेदों के विशेष प्रपश्न के लिए ध्वन्यालोक या काव्यप्रकाशादि द्रष्टव्य हैं। यहाँ दिड्मात्ररूप में इन चार ध्वनिभेदों को स्पष्ट कर देना पर्याप्त होगा। अविवत्तितड्काच्य ध्वनि :- नहाँ लक्षक पद के द्वारा प्रतीत प्रयोजनरूप व्यङ्गयार्थ काव्य में प्रधान हो, वहाँ लक्षणामूलक अविवक्षितवाच्य ध्वनि होती है। लक्षणा के दो भेद होते हैं :- लक्षणलक्षणा तथा उपादान लक्षणा। अतः इन्हीं के आधार इस ध्वनि के भी दो भेद हो जाते हैं। लक्षणलक्षणा वाले व्यङ्षयार्थ की प्रधानता हो तो वहाँ अत्यन्त तिरस्कृतवाच्य होगा। उपादान लक्षणा में अर्थान्तर संक्रमितवाच्य ध्वनि होगा। इन दोनों के उदाहरण क्रमशः ये हैं :- (क) अत्यन्ततिरस्कृतवाच्य :- उपकृतं बहु तत्र किमुच्यते, सुजनता प्रथिता भवता परम्। विदधदीदृश मेव सदा सखे सुखित मास्स्व ततः शरदां शतम्॥ इस पद्य में किसी अपकारी व्यक्ति के प्रति कहा जा रहा है :- 'आपने हमारा बड़ा उपकार किया है, कहाँ तक कहें। आपने बड़ी सज्जनता बताई है। मगवान् करे आप इसी
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अ्त्रोच्यते-प्राहजी एीप तोड पक सपकी एs/एe वाच्या प्रकरणादिभ्यो बुद्धिसथा वा यथा किया। कग वाक्यार्थः कारकैर्युक्ता स्थायीभावस्तथेतरैः॥३७॥ ध्व्वनिवादी के इस पूर्वपक्ष का-जिसके अनुसार रस व्यङ्गय है, तथा व्यजनाशक्ति प्रति- पाद है-खण्डन करते हुए धनजय निम्न कारिका में अपने सिद्धान्तपक्ष का अवतरण करते हैं :- किसी वाक्य को सुनकर या पढ़कर उस वाक्य के प्रकरण-चक्ता, श्रोता, देश, काल आदि का ज्ञान प्राप्त करके, इस प्रकरण के द्वारा हम वाक्य में प्रयुक्त
तरह उपकार करते सैकड़ों वर्ष सुखी रहें।' यहाँ इस वाच्यार्थ के बाद 'आपने हमारा बड़ा अपकार किया है' इस लक्ष्यार्थ के प्रतीत होने पर तृतीयकोटि में व्यंग्यार्थ प्रतीत होता है जो उस व्यक्ति की नीचता ध्वनित करता है। अतः यहाँ वाच्यार्थ के पूर्णतः तिरस्कृत हो जाने से अत्यन्त तिरस्कृतवाच्य ध्वनि है। (ख) अर्थान्तरसंक्रमितवाच्य :- मुखं विकसितस्मितं वशितव क्रिमप्रेचितं, समुच्छलितविभ्रमा गतिरपास्तसंस्था मतिः। उरो मुकुलितस्तनं जघनमंसबन्धोड्ुरं बतेन्दुवदनातनौ तरुणिमोद्गमो मोदते।। यौवन से युक्त किसी नायिका को देखकर, उसके यौवन के नूतन प्रादुर्भाव की स्थिति का वर्णन करते हुए कवि कह रहा है। इस चन्द्रमुखी नायिका के शरीर में यौवन का उद्गम प्रसन्न हो रहा है। यौवन सचमुच अहोभाग्य है कि वह इस चन्द्रमुखी के शरीर में प्रविष्ट हुआ है। इसीलिए यौवन फूला नहीं समाता। यौवन के प्रादुर्भाव के समस्त चिह्न इस नायिका में दृष्टिगोचर हो रहे हैं। इसके मुख में मुस्कराहट विकसित हो रही है। जिस तरह फूल के विकसित होने पर सुगन्ध फूट पड़ती है, वैसे ही इसके मुख में सुगन्ध भरी पड़ी है। इससे नायिका पझ्मिनी है यह भी व्यजना हो रह्ी है। इसकी आंखों ने बाँकेपन को भी वश में कर लिया है। इसकी टेढ़ी चितवन सब लोगों को वश में करने की क्षमता रखती है। जब यह चलती है, तो ऐसा जान पड़ता है कि विलास और लीला छुलक पड़ रहे हों। इसमें विलास तथा लीला का प्राचुर्य है। अतः इसका प्रत्येक अङ्ग मनोहर है। इसकी बुद्धि एक जगह स्थिर नहीं रहती। यौवन के आगम के कारण इसका मन अत्यधिक अधीर तथा चञ्चल हो गया है। पहले तो भोलेपन के कारण बड़े लोगों के सामने प्रियतम को देखकर इसकी बुद्धि मर्यादित रहती थी, किन्तु अब वैसी नहीं रहती। गुरुजनों के सामने अब भो वैसे तो मर्यादापूर्ण ही रहती है, पर प्रियतम को देखकर मन से अधीर हो उठती है। इसके वक्षःस्थल में स्तन मुकुलित हो गये हैं। कली की तरह ये स्तन भी कठिन हैं तथा आलिङ्गन योग्य हैं। इसके जघनस्थल के अवयव उभर आये हैं। इसका अत्यधिक रमणीय हो गया है, इन सब बातों को देखकर यह जान पड़ता है कि नायिका ने यौवन में पदार्पण कर लिया है। यहाँ 'मोदते' 'विकसित' 'वशित' 'समुच्छलित' 'मुकुलित' आदि शब्दों का लाक्षणिक प्रयोग हुआ है। इनसे यौवन का नायिका को पाकर अपने आपको सौभाग्यशाली समझना, सुख का सुगन्धित होना, आदि आदि व्यङ्गथार्थो की प्रतीति होती है, जिन्हें ऊपर पद्य की व्याख्या में स्पष्ट कर दिया गया है। यहाँ ये पद अपने वाच्यार्थ को रखते हुए लक्ष्यार्थ की प्रतीति कराकर व्यङ्रथार्थ प्रतिपत्ति कराते हैं।
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चतुर्थ: प्रकाश: २३७ कारकों की सहायता से वाक्य में साक्षात उपात्त शब्द के वाच्यार्थ के रूप में क्रिया का ज्ञान प्राप्त करते हैं। कभी कभी वाक्य में क्रिया का साक्षात् वाचक शब्द उपात्त नहीं होता, फिर भी प्रकरणानुकूल क्रिया का (बुद्धिस्थ क्रिया का) अध्याहार कर ही लिया जाता है। इस प्रकार वाक्य में चाहे क्रिया वाच्य हो, या बुद्धिस्थ हो; वही वाक्य का वाक्यार्थ है। ठीक इसी तरह विभावानुभावव्यभिचारी के द्वारा स्थायी भाव काव्य के वाक्यार्थ (तात्पर्य) के रूप में प्रतीत होता है। स्थायी भाव भी वाक्य में बुद्धिस्थ क्रिया की भांति वाच्य न होकर प्रकरण संवेद् है। यथा लौकिकवाक्येषु श्रूयमाणक्रियेषु 'गामभ्याज' इत्यादिषु अश्रूयमाणक्रियेषु च- 'द्वारं द्वारम्' इत्यादिषु स्वशब्दोपादानात्प्रकरणादिवशाद्वुद्विसन्निवेशिनी क्रियव कारको- पचिता काव्येष्वपि क्वचित् स्वशब्दोपादानात् 'प्रीत्ये नवोढा प्रिया' इत्येवमादौ क्वचिच्च प्रकरणादिवशान्नियताभिहितविभावाद्यविनाभावाद्वा साक्षाद्भावकचेतसि विपरिवर्तमानो रत्यादि: स्थायी स्वस्वविभावानुभावव्यभिचारिभिस्ततच्छन्दोपनीतैः संस्कारपरम्परया परं प्रौढिमानीयमानो रत्यादिर्वाक्यार्थः। हम देखते हैं कि किसी भी लौकिक वाक्य में दो प्रकार के पदों का प्रयोग होता है, एक कारक पद, दूसरे क्रिया पद। इन्हीं को अर्तृहरि तथा दूसरे वैयाकरणों ने सिद्ध पद तथा साध्य पद कहा है। वाक्य का तात्पर्य वही होगा, जो अभी तक सिद्ध नहीं है, किन्तु साध्य ही है। अतः क्रिया में ही वाक्य का तात्पर्य निहित होता है। किसी भी वाक्य में क्रियारूप वाक्यार्थ (तात्पर्य) का होना आवश्यक हैं, चाहे उस क्रिया के वाचक शब्द का प्रयोग वाक्य में हुआ हो या न हुआ हो। उदाहरण के लिए हम दो लौकिक वाक्यों को लेते हैं, एक में क्रिया वाच्य विवच्ितवाच्य-जहाँ अभिधा द्वारा प्रतीत वाच्यार्थ ही व्यङ्गयार्थ प्रतीति कराता हो, वहाँ विवक्षितवाच्य ध्वनि होगा। इसके प्रक्रिया के आधार पर दो भेद होते हैं। एक में वाच्यार्थ से व्यङ्गयार्थ तक पहुँचने का क्रम लक्षित होता है, दूसरे (रसादि) में यह 'शतपत्र- पत्रभेदन्याय' से असंलक्ष्य होता है। इस तरह इसके संलक्ष्यक्रम व्यङ्गय तथा असंलक्ष्यक्रम व्यङ्गय दो भेद होते हैं। इसके हम हिन्दी काव्य से दो उदाहरण दे रहे हैं। (ग) संलच्यक्रमव्यङ्गय- पत्राही तिथि पाइये वा घर के चहुँपास। नित प्रति पून्यौ ही रहत, आनन ओप उजास।। यहाँ वाच्य रूप वस्तु से 'नायिका मुख पूर्ण चन्द्र है' इस अलक्कार (रूपक अलक्कार) की व्यङ्गयार्थप्रतीति हो रही है। यहाँ वस्तुरूप वाच्यार्थ से रूपक अलक्काररूप व्यङ्गथार्थ तक का क्रम अच्छी तरह लक्षित हो जाता है। (घ) असंलच्यक्रमव्यङ्गय सघन कुज छाया सुखद सीतल सुरभि समीर। मन हवै जात अजौ वहै, वा जमुना के तीर। :यहाँ वाच्यार्थ के द्वारा विप्रलम्भ शरद्गार की व्यज्ञना हो रही है। वाच्यार्थ स्मृति तथा औत्सुक्यनामक सज्ारिभावों की प्रतीति कराकर उनके द्वारा विप्रलम्भ शुङ्गार की अभिव्यजना कराता है। वाच्यार्थ से इस रसरूप व्यङ्गयार्थ तक पहुँचने का क्रम लक्षित नहीं है। अतः यहाँ असंळक्ष्यक्रम व्यक्ञथ ध्वनि है।F ध्यान रखिये, इन चारों उदाहरणों में व्यक््यार्थ ही वाच्यार्थ से प्रधान है, अतः ध्वनि काव्य है। ऐसा न होने पर काव्य में ध्वनित्व नहीं हो पाता, वह गुणोभूत व्यक्षय हो जाता है।
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है, श्रूयमाण है, दूसरे में वह केवल बुद्धिस्थ है, प्रकरणवेद है।'गा मभ्याज' (गा ले जावो) इस वाक्य में या ऐसे ही दूसरे लौकिक वाक्यों में 'अभ्याज' आदि क्रिया श्रूयमाण है, वक्ता इस क्रिया के वाचक शब्द का साक्षात् प्रयोग करता है, तथा श्रोता को वह शब्द कर्णशष्कुली के द्वारा सुनाई देता है। दूसरे वाक्यों में क्रिया का साक्षात् उपादान न भी पाया जाय, जैसे 'द्वार द्वारं' इस वाक्य में क्रिया श्रूयमाण नहीं है, वक्ता उसका साक्षात् प्रयोग नहीं करता पर प्रकरणवश 'दरवाजा खोलो' या 'दरवाजा बंद करो' अर्थ लिया जा सकता है। दोनों ही वाक्यों में चाहे शब्द का प्रयोग हो, चाहे प्रकरण के द्वारा ही क्रिया बुद्धिस्थ हो जाय, दोनों स्थानों पर कारकों के द्वारा पुष्ट होकर क्रिया ही वाक्यार्थ का रूप धारण करती है। कारकपरिपुष्ट क्रिया ही वाक्यार्थ या वाक्य का तात्पर्य है। ठीक यही बात काव्य के विषय में लागू होती है। काव्य में कभी कभी तो रत्यादि भाव के वाचक शब्दों का साक्षात् प्रयोग पाया जाता है, जैसे 'प्रीत्यै नवोढा प्रिया' जैसे उदाहरणों में रति भाव के वाचक शब्द (प्रीत्य) का साक्षात् उपादान पाया जाता है। दूसरे उदाहरणों में जो शृद्गार रस या रति भाव के प्रतिपादक हैं, ऐसे शब्दों का उपादान नहीं भी हो सकता है। ऐसे काव्यों में प्रकरण आदि के आधार पर हो काव्य के द्वारा वाच्यरूप में उपात्त (अभिहित) विभाव, अनुभाव, तथा सव्चारी भावों के साथ स्थायी भाव का अविनाभाव सम्बन्ध होने के कारण, रत्यादि स्थायी भाव सहृदय के चित्त में ठीक उसी तरह स्फुरित होने लगता है, जैसे प्रकरणादि के कारण किसी वाक्य में प्रयुक्त कारकादि के द्वारा उनसे अविनाभावतया सम्बद्ध क्रिया की प्रतिपत्ति होती है। इन रत्यादि स्थायी भावों के तत्तत् विभावों, अनुभावों या सक्चारियों का तो काव्य में साक्षात शब्द से उपादान होता है, ये तो साक्षात वाच्यरूप में प्रतिपन्न होते ही हैं, ये संस्कार परम्परा के कारण, विभावों के पूर्वानुभव के आधार पर रत्यादि स्थायी भाव को पुष्ट करते हैं। इस प्रकार काव्य में वाच्यरूप में उपात्त विभावादि के द्वारा प्रतीत, काव्य में वाच्यरूप से उपात्त अथवा प्रकरणादि के द्वारा बुद्धिस्थ रूप में प्रतीत रत्यादि स्थायी भाव, किसी व्यजना जैसी कल्पित शक्ति का विषय न होकर, काव्य का वास्तविक वाक्यार्थ ही है। न चाऽपदार्थस्य वाक्यार्थत्वं नास्तीति वाच्यम्-कार्यपर्यवसायित्वात्तात्पर्यशक्तेः। तथा हि-पौरुषेयमपौरुषेयं वाक्यं सर्वं कार्यपरम्-अतत्परत्वेऽनुपादेयत्वादुन्मत्तादिवा- क्यवत्। काव्यशब्दानां चान्वयव्यतिरेकाभ्यां निरतिशयसुखास्वादव्यतिरेकेण प्रतिपाद्य- प्रतिपादकयो: प्रवृत्तिविषययोः प्रयोजनान्तरानुपलब्धे: स्वानन्दोद्भतिरेव कार्यत्वेनावधार्यते, तदुद्ूतिनिमित्तत्वं च विभावादिसंसृष्टस्य स्थायिन एवावगम्यते, अतो वाक्यस्याभिधान- शक्तिस्तेन तेन रसेनाSSकृष्यमाणा तत्तत्स्वार्थापेक्षितावान्तरविभावादिप्रतिपादनद्वारा स्वप- र्यवसायितामानीयते, तत्र विभावादयः पदार्थस्थानीयास्तत्संसरष्टो रत्यादिर्वाक्यार्थः । तदेतत्काव्यवाक्यं यदीयं ताविमौ पदार्थवाक्यारथौं। रसादि प्रतीयमान अर्थ वाक्य में प्रयुक्त पदों के वाच्यार्थ तो है ही नहीं, अतः अश्रूयमाण पदों वाले अर्थ को वाक्यार्थ कैसे माना जा सकता है। वाक्य तो पदों का सङ्ात है, अतः पदों के वाच्यार्थों का समूह ही वाक्यार्थ कहा जा सकता है। ऐसी दशा में 'ब्रम धार्मिक' आदि उदाहरणों में निषेधवाची पद के न होने से निषेध को पदार्थ भाव के कारण वाक्यार्थ नहीं माना जाना चाहिए। ठीक यही बात रस के विषय में कही जा सकती है। यदि पूर्वपक्षी इस प्रकार की दलोल दे, तो ठीक नहीं। अपदार्थ रसादि को वाक्यार्थ नहीं माना जा सकता, यह कहना ठीक नहीं है। क्योंकि तात्पर्य शक्ति का पर्यवसान वक्ता के प्रयोजन (कार्य) तक रहत
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चतुर्थ: प्रकाश: २३६ है। जिस प्रकार अभिधा शक्ति का साध्य वाच्यार्थ है, लक्षणा शक्ति का साध्य लक्ष्यार्थ है, ठीक वैसे ही तात्पर्य शक्ति वक्ता के कार्य को प्रतिपादित करती है। अतः जहाँ तक वक्ता का कार्य प्रसारित होगा, वहीं तक तात्पर्यशक्ति का क्षेत्र होगा। यदि वक्ता का कार्य 'निषेधरूप' है, यदि वक्ता को निषेधार्थ ही अमीष्ट है तो तात्पर्य शक्ति की सीमा वहाँ तक मानी जाय गी, उसका द्योतन कराने के बाद ही तात्पर्य शक्ति क्षीण होगी। संसार में जितने वाक्यों का प्रयोग होता है, चाहे वे लौकिक भाषा के वाक्य हों, या वैदिक वाक्य हों, किसी कार्य को लेकर आते हैं, उस प्रयोजन की सिद्धि हो उस वाक्य का लक्ष्य होता है। यदि वाक्य में कोई कार्य या प्रयोजन न होगा, तो उन्मत्त प्रलपित की तरह उस वाक्य का लौकिक उपयोग न हो सकेगा। कार्यहीन वाक्य का प्रयोग करने पर वक्ता, शता को किसी प्रकार के भाव की प्रतिपत्ति न करा सकेगा, वह उन्मत्तप्रलाप के समान निरर्थक ध्वनिसमूह (न कि वाक्य) होगा। अतः स्पष्ट है कि किसी भी लौकिक या वैदिक वाक्य में कार्यपरत्व होना आवश्यक है। काव्य में शब्दों के द्वारा विभावादि अर्थ की प्रतीति होती है, तथा विभावादि स्थायी भाव तथा रस की प्रतीति कराते हैं। ऐसी दशा में काव्य के शब्दों (काव्य में प्रयुक्त वाक्य) का विभावादि रूप अर्थ से अन्वय व्यतिरेक रूप सम्बन्ध है। यदि काव्य में तदभिधायक शब्दों का प्रयोग होगा तो विभावादि की प्रतीति होगी, अन्यथा नहीं। इस प्रकार काव्योपात्त शब्दादि ही विभावादि की प्रतीति कराते हैं। इन काव्योपात्त शब्दों या विभावादि में ही निरतिशय सुख का आस्वाद-रस रूप अलौकिक आनन्द की चर्वणा-नहीं पाया जाता, अपितु वह 'रस' इनका प्रतिपाद्य है। इस प्रकार काव्यप्रयुक्त शब्दों की प्रवृत्ति, उनका प्रयोग, विभावादि स्थायी भाव एवं रस के लिए होता है। इनमें भी विभावादि स्थायी भाव तथा रस के प्रतिपादक हैं, रस व भाव उनके प्रतिपाद्य। काव्य, काव्योपात्तशब्द, विभावादि, तथा स्थायी भाव एवं रस के परस्पर सम्बन्ध की पर्यालोचना करने पर काव्यरूप वाक्य का हमें केवल एक ही कार्य अथवा प्रयोजन दिखाई पड़ता है, वह है सहृदय के चित्त में आनन्दोद्भूति करना। इस प्रयोजन के अतिरिक्त काव्य का और कोई प्रयोजन दिखाई नहों पड़ता, अन्य किसी भी काव्यप्रयोजन की उपलब्धि नहीं होती, इसलिए आनन्दोद्भूति को ही काव्य का कार्य माना जायगा। यह आनन्दोद्भूति विभावादि से युक्त स्थायी के ही कारण होती है। काव्य में विभावादि से युक्त स्थायी भाव की पर्यालोचना करने पर ही सहृदय को आनन्द की प्राप्ति होती है। इस प्रकार हम देखते हैं कि काव्यप्रयुक्त वाक्य की प्रतिपादक शक्ति (तात्पर्य शक्ति ) काव्य के प्रतिपाद्य तत्तत् रस के द्वारा आकृष्ट होती है, कार्य रूप रस उस शक्ति को क्रियमाण होने को बाध्य करता है। इसलिए वाक्य की प्रतिपादक तात्पर्य शक्ति को रस रूप स्वार्थ की प्रतीति कराने के लिए विभावादि अन्य साधनों की आवश्यकता होती है, तथा उन विभावादि के प्रतिपादन के द्वारा ही वह शक्ति रस की प्रतीति करा कर पर्यवसित होती है। रस प्रतीति की सरणि में काव्यप्रयुक्त पदों के अर्थ (पदार्थ) विभावादि हैं, तथा इन विभावादि से संसृष्ट रत्यादि स्थायी भाव काव्य का वाक्यार्थ है। इस प्रकार वह काव्यवाक्य ही है, जिसके विभाव पदार्थ हैं, और स्थायी भाव वाक्यार्थ। (अतः स्पष्ट है कि स्थायी भाव तथा रस की प्रतीति व्यक्ष्थ न होकर, काव्य का वाक्यार्थ है, तथा उसकी प्रतीति व्यज्ञना नामक कल्पित शक्ति का विषय न होकर, तात्पर्यशक्ति का क्षेत्र है।) १. एक वस्तु के होने पर, दूसरी वस्तु का होना, तथा एक के अभाव में, दूसरी वस्तु का न रहना, अन्वयव्यतिरेक सम्बन्ध कहलाता है। (तत्सत्वे तत्सत्वं अन्वयः, तदभावे तदभाव: व्यतिरेकः ।) की संगनण्वत 1जी।
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२४० दशरूपकम् न चैवं सति गीतादिवत्सुखजनकतवेऽपि वाच्यवाचकभावानुपयोग: विशिष्टविभावा- दिसामग्रीविदुषामेव तथाविधरत्यादिभावनावतामेवस्वानन्दोद्भूतेः, तदनेनातिप्रसङ्गोऽपि निरस्तः ईदृशि च वाक्यार्थनिरूपरो परिकल्पिताभिधादिशक्तिवशेनव समस्तवाक्यार्था- वगतेः शक्त्यन्तरपरिकल्पनं प्रयासः यथावोचाम काव्यनिर्णये- हम देखते हैं कि गीतादि के श्रवण के बाद सुख (आनन्द) उत्पन्न होता है। पर गीतादि उस सुख के वाचक नहीं, न वह सुख गीतादि का वाच्य ही। ठीक इसी तरह काव्य तथा उससे प्राप्त सुख (निरतिशय आनन्दरूप रस) के बारे में कहा जा सकता है। अतः काव्य तथा रस के विषय वाच्यवाचक भाव का उपयोग नहीं हो पाता। यदि पूर्वपक्षी ऐसी युक्ति दे, तो ठीक नहीं। गीतादि तथा तज्जनित सुख वाला दृष्टान्त काव्य तथा रस के बारे में देना ठीक नहीं होगा। इम देखते हैं कि काव्य से प्रत्येक व्यक्ति को रस प्रतीति नहीं होती। जो लोग विशिष्ट विभावादि सामग्री का ज्ञान रखते हैं, तथा उस प्रकार के रत्यादि भाव की भावना से युक्त हैं, केवल उन्हीं सहृदयों के हृदय में काव्य को सुन कर तत्तत् रसपरक आनन्द की प्रतीति होती है। इससे यह भी स्पष्ट हो जाता है कि इन विभावादि के ज्ञान से रहित तथा रत्यादि भावों की भावना से शून्य, अरसिकों को आनन्द की प्रतीति नहीं होती। इस प्रकार हमें पता चलता है कि रस के वाक्यार्थ रूप में निरूपित कर देने पर अब तक दाशनिकों तथा आलक्कारिकों द्वारा स्वीकृत अभिधा आदि (तात्पर्यशक्ति, लक्षणा) शक्ति के द्वारा ही समस्त श्रूयमाणपदार्थ या अश्रूयमाणपदार्थ की प्रतीति हो ही जाती है। इसलिए व्यअ्ना जैसी अलग से शक्ति की कल्पना व्यर्थ का प्रयत्न है। इसी बात को हम काव्यनिर्णय नामक दूसरे अ्रन्थ में बता चुके हैं। 'तात्पर्यानतिरेकाच्च व्यज्ञनीयस्य न ध्वनिः। किमुक्तं स्यादश्रुतार्थतात्पर्येऽन्योक्तिरूपिणि ॥।१॥ धनिक ने काव्यनिर्णय से उद्धृत इन कारिकाओं में से प्रथम पाँच कारिकाओं में व्यअनावादी पूर्वपक्ष को उद्घृत किया है, तथा बाद की दो कारिकाओं में सिद्धान्तपक्ष की प्रतिष्ठापना की है। इनमें भी चतुर्थ कारिका में धनिक का सिद्धान्तपक्ष वादविवाद के रूप में आ गया है। अतः १, २, ३ तथा ५ कारिका में ही पूर्वपक्ष है। व्यअ्ना तथा ध्वनि के विरोधियों का कहना है कि 'काव्य में प्रतीयमान या व्यजनीय अर्थ का समावेश तात्पर्य में ही हो जाता है' इसलिए प्रतीयमान अर्थ की प्रतीति तात्पर्यशक्ति के द्वारा ही हो जाती है, फिर इसके लिए व्यञ्ना जैसी शक्ति की कल्पना, या इस प्रतीयमान अर्थ को ध्वनि कहना ठीक नहीं।' इन ध्वनिविरोधियों से हम पूछना चाहते हैं कि जहाँ वक्ता का तात्पर्य श्रयमाण नहीं है, उसका काव्य में साक्षात प्रयोग नहीं हुआ है, पर फिर भी अन्योक्ति के कारण प्रतीयमान अर्थ की व्यअ्ञना हो ही रही है; ऐसे स्थलों पर अश्रुत- पदार्थ में वाक्यार्थ (तात्पर्य) कैसे माना जा सकेगा। (जैसे 'कस्त्वं भी: कथयामि दैवहतकं मां विद्धि शाखोटकं' आदि पूर्वोदाहृत पद्य को ले लीजिये। इस पद् में कहने वाला कवि शाखोटक जैसे जड़ वृक्ष के निर्वेद का वर्णन कर रहा है। यहाँ कवि की इच्छा में तात्पर्य हो सकता है, शाखोटक के निर्वेद में नहीं है, क्योंकि वहाँ वक्ता का प्रयोजन नहीं है। इसलिए व्यङ्गार्थ का १. धनिक ने दशरूपक की 'अवलोक' वृत्ति के अतिरिक्त 'काव्यनिर्णय' नामक अलक्कार- ग्रन्थ की रचना की थी। किन्तु खेद का विषय है कि धनिक का काव्यनिर्णय अनुपलब्ध है। काव्यनिर्णय में धनिक ने व्यज्ञनावृत्ति का विशेष रूप से खण्डन किया था, इसका पता इस वृत्ति में उद्धृत काव्यनिर्णय की कारिकाओं से चलता है।
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तात्पर्य में अन्तर्भाव नहीं हो सकता। व्यजञना की अपेक्षा होने पर ध्वनि की भी सिद्धि हो ही जाती है।) विषं भक्षय पूर्वो यश्चैवं परसुतादिषु। प्रसज्यते प्रधानत्वाद्धनित्वं केन वार्यते ॥ २ ॥ तात्पर्यवादी 'बिषं भक्षय, मा चास्य गृहे भुदक्थाः' (विष खालो, इसके घर भोजन न करो) इस वाक्य के आधार पर व्यअ्ना तथा ध्वनि का समावेश तात्पर्य शक्ति तथा तात्पर्य में करते हैं। उनका कहना है कि प्रकरणज्ञान के बाद वक्ता के पित्रादि हितैषी होने पर 'जहर खालो' वाला विध्यर्थ ठीक नहीं बैठता, क्योंकि कोई पिता या मित्र पुत्रमित्रादि से यह न कहेगा। अतः उसका निषेधार्थरूप अर्थ लेना पड़ेगा। यह निषेधार्थ अश्र्यमाणपद है, तथा ध्वनिवादी भी यहाँ तात्पर्य मानता ही है। प्रतीयमान रसादि भी ठीक इसी तरह अश्र्यमाण- पद हैं, तथा वे तात्पर्य ( वाक्यार्थ) ही माने जाने चाहिए। इस ध्वनिविरोधी मत की दलील का उत्तर देते हुए ध्वनिवादी कहता है कि जो अश्रय माणपदादि में आप लोगता त्पर्यं मानते हैं, वह भी ठीक नहीं, क्योंकि 'विषं भक्षय' इस वाक्य से प्रतीत अर्थ जिसका प्रयोग पुत्रादि के लिए किया गया है, वहाँ भी 'जहर खा लेने से भी बुरा शत्रु भोजन है' यह प्रतीयमान अर्थ तात्पर्यशक्ति के द्वारा प्रतीत नहीं हो पाता, अतः यहाँ ध्वनि ही है तथा इसकी प्रतीति व्यअना व्यापार से ही होती है। इस अर्थ में ध्वनित्व को कौन मना कर सकता है ?१ ध्वनिश्चेत्स्वार्थविश्रान्तं वाक्यमर्थान्तराश्रयम्। तत्परत्वं त्वविश्रान्तौ, तन्न विश्रान्त्यसम्भवात् ।। ३।। ध्वनि वहीं होगी, जहां स्वार्थ (वाक्य का तात्पर्यार्थ) एक बार समाप्त हो गया हो, वह विश्रान्त हो गया हो, तथा वाक्य किसी दूसरे तात्पर्यार्थभिन्न प्रतीयमान अर्थ का आश्रय ले। जैसे 'भ्रम धार्मिक' वाक्य में तात्पर्य विध्यर्थ में ही विश्रान्त हो जाता है, किन्तु वाक्य निषेध- रूप प्रतीयमान की भी प्रतीति कराता है। ऐसे स्थलों पर ही ध्वनि हो सकेगी। यदि स्वार्थ विश्रान्त नहीं हो सका है, तो उसकी विश्रान्तिसीमा तक तात्पर्य माना जायगा। पर इस बात से ध्वनिविरोधी सहमत नहीं है। ध्वनिविरोधी धनिक का कहना है कि जहां कहीं व्यङ्कथ माना जाता है, वहां व्यङ्गय या ध्वनि मानना ठीक नहीं होगा, क्योंकि किसी भी वाक्य के वाक्यार्थ या तात्पर्यार्थ की विश्रान्ति होना असम्भव है-काव्य के प्रयोजन पर ही आकर वह विश्रान्त होता है। (इस तृतीय कारिका में 'तत्परत्वं त्वविश्रान्तौ' तक पूर्वपक्षी ध्वनिवादी का मत है, 'तन्न विश्रान्त्यसम्भवात्' यह सिद्धान्तपक्षी धनिक का मत है। आगे की चतुर्थ कारिका में भी सिद्धान्त पक्ष ही उपनिबद्ध हुआ है। पञ्नम कारिका में फिर ध्वनिवादी का मत है, तथा षष्ठ एवं सप्तम कारिका में पुनः सिद्धान्त पक्ष की प्रतिष्ठापना।)
१. इस सम्बन्ध में यह कह देना होगा कि मम्मट आदि ध्वनिवादियों ने इस वाक्य के निषेधरूप अर्थ को व्यङ् न मानकर तात्पर्य ही माना है। 'विषं भक्षय' वाले वाक्यार्थ का निषेधार्थ वे 'मा चास्य गृहे भुंडक्थाः' इस उत्तराथ परक मानते हैं तथा 'च' से सम्बद्ध होने के कारण दोनों वाक्यों को उद्देश्यविधेयरूप से सम्बद्ध मान लेते हैं। अतः इस उदाहरण को व्यजना का उदाहरण वे भी नहीं मानते। मम्मट यहाँ तात्पर्य में अश्रूयमाणपदत्व भी नहीं मानते, क्योंकि इस वाक्य के उत्तरार्धं में 'मा चास्य गृहे सुंकखथाः' में निषेध स्पष्टतः वाच्य है। (देखिये-काव्यप्रकाश उल्लास ५, पृ.२८८) ३१ द०
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शीशी ीएतावत्येव विश्रान्तिस्तात्पर्यस्येति किंकृतम्। यावत्कार्यप्रसारित्वात्तात्पर्यं न तुलाधृतम् ॥४ ॥ ध्वनिवादी तात्पर्य के अविश्रान्त होने पर तो तात्पर्य शक्ति का विषय मानता है, तथा उसके विश्रान्त होने पर भी अर्थान्तरप्रतीति होने पर उसे व्यङ्थार्थ मानते हुए व्यञ्जना तथा ध्वनि का विषय मानता है। इस विषय में सिद्धान्त पक्षो उससे यह पूछता है कि किसी भी (अमुक) वाक्य में तात्पर्य यहीं तक है, बस इसके आगे नहीं, उसकी यहां विश्रान्ति हो जाती है, इस बात का निर्धारण किसने कर दिया है ? वस्तुतः किसी भी वाक्य के वाक्यार्थ या तात्पर्य की कोई निश्चित सीमा निबद्ध नहीं की जा सकती। तात्पर्य तो जहां तक वक्ता का प्रयोजन (कार्य) होता है, वहीं तक फैला रहता है; इसलिए वह इतना ही है, इससे अधिक नहीं ऐसा तौल या माप जोख नहीं है। तात्पर्य को किसी तराजू पर रख कर नहीं कहा जा सकता, कि इतना तात्पर्य है, बाकी अन्य वस्तु। इसलिए तुम्हारा व्यक्गय भी तात्पर्य ही में अन्तर्नि- विष्ट हो जाता है। भ्रम धार्मिक विश्रब्धमिति भ्रमिकृतास्पदम्। निर्व्यावृत्ति कथं वाक्यं निषेधसुपसपति ॥५॥ ध्वनिवादी 'भ्रम धार्मिक विश्रब्धः' वाली प्रसिद्ध गाथा को लेकर निम्न युक्ति के आधार तात्पर्यवादी से वाद करता है कि इस गाथा में निषेधरूप अर्थ वाक्यार्थ नहीं माना जा सकता। इस गाथा में वाक्य 'भ्रमिक्रिया' की प्रतीति कराता है। नायिका धार्मिक को 'मजे से घूमो' यही कह रही है। इस गाथा का वाक्य विध्यर्थपरक ही है, अतः तात्पर्य विध्यर्थ में ही होगा। वाक्य में तो स्पष्टतः निषेध का उल्लेख नहीं, वह भ्रमणक्रिया के बोधक पद से ही युक्त है, भ्रमणनिषेध के बोधक पद का वहां प्रयोग नहीं है। इसलिए ऐसा वाक्य निषेध परक कैसे हो सकता है? अतः निषेधपरक अर्थ की प्रतीति तात्पर्य से भिन्न वस्तु है। हमारे मत में वह व्यङ्यार्थ है, तथा व्यज्ना शक्ति के द्वारा प्रतिपाद्य है। प्रतिपाद्यस्य विश्रान्तिरपेक्षापूरणाद्यदि। का वक्तुविवक्षिताप्राप्तरविश्रान्तिन वा कथम् ॥ ६ ॥ ध्वनिवादी के मत का खण्डन, तथा तात्पर्य वृत्ति की स्थापना का उपसंहार करते हुए धनिक सिद्धान्तपक्ष का निबन्धन कर रहे हैं :- आप लोग 'भ्रम धार्मिक विश्रब्धः' इत्यादि गाथा में केवल इसलिए विध्यर्थमात्र को तात्पर्य मान लेते हैं कि वहां अपेक्षा की पूर्णता हो जाती है। जब कोई श्रोता इस वाक्य को सुनता है, तो वह विध्यर्थरूप में अर्थ लगा लेता है, तथा उसे वाक्यार्थ पूर्ति के लिए किसी अन्य पद की आवश्यकता नहीं पड़ती। इसलिए ध्वनिवादी इस विध्यर्थ में तात्पर्य की विश्रान्ति मान लेते हैं। ठीक है श्रोता की दृष्टि से यहां विश्रान्ति हो भी, तो भी वक्ता (कुलटा नायिका) का अभिप्राय तो विध्यर्थक नहीं है। यदि विध्यर्थ तक ही अर्थ मान लें, तो वक्ता के अभिप्राय की प्रतोति न हो सकेगी, तथा वाक्य का सच्चा अर्थ तो वक्ता का अभिप्राय ही है। जब तक वक्रो नायिका का आशय-'तुम वहां कमी न जाना, नहीं तो तुम्हें शेर मार डालेगा'-ज्ञात नहीं होता, तब तक वाक्यार्थ की अविश्रान्ति क्यों नहीं होगी? वस्तुतः इस गाथा में वक्त्री कुलटा नायिका के अभिप्राय को, निषेधरूप अर्थ को, जान लेने पर ही तात्पर्य की विश्रान्ति हो सकेगी, उसके पूर्व कदापि नहीं। पौरुषेयस्य वाक्यस्य विवक्षापरतन्त्रता। वक्रभिप्रेततात्पर्यमतः काव्यस्य युज्यते॥७॥'इति। कF कोई भी लौकिक या पौरुषेय वाक्य किसी न किसी विवक्षा पर आश्रित रहता है। जब 35
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कोई वक्ता किसी भी वाक्य का प्रयोग करता है, तो वह किसी बात को कहना चाहता है। लौकिक वाक्य में तात्पर्यार्थ उसी वस्तु में होगा, जो वक्ता का अभिप्राय है। ठीक यही बात काव्य में भी घटित होती है। काव्य में रसादि अर्थ (जिन्हें ध्वनिवादी व्यङ्गय कह ते हैं), काव्य के या कवि के अभिप्रेत हैं, अतः वे तात्पर्य ही हैं। अतो न रसादीनां काव्येन सह व्यज्ञ्यव्यजकभावः। किं तर्हि भाव्यभावकसम्बन्धः? काव्यं हि भावकं, भाव्या रसादयः। ते हि स्वतो भवन्त एव भावकेषु विशिष्टविभावादि- मता काव्येन भाव्यन्ते। अतः यह सिद्ध हो गया है कि काव्य का रस के साथ व्यक्षय व्यक्ञक सम्बन्ध नहीं है, न तो काव्य व्यअ्ञक ही है, न रसादि व्यङ्गय ही। तो फिर इन दोनों में कौन सा सम्बन्ध है ? काव्य तथा रस में परस्पर भाव्यभावक भाव या ात्यभावक सम्बन्ध है। काव्य भावक है, रसादि भाव्य। सहृदय के मानस में स्थायी भाव या रस की चर्वणा होती है, इसी चर्वणा को 'भावना' भी कहते हैं। इसीके आधार पर काव्य भावक है, रस उसके भाव्य। रसादि सहृदय के हृदय में अपने आप ही पैदा होते हैं, तथा तत्तत् रस के अनुकूल विशिष्ट विभावों के द्वारा काव्य उनकी भावना कराता है।1 न चान्यत्र शब्दान्तरेषु भाव्यभावकलक्षणसम्बन्घाभावात् काव्यशन्देष्वपि तथा भाव्यमिति वाच्यम्-भावनाक्रियावादिभिस्तथाङ्गीकृतत्वात्। किश्व मा चान्यत्र तथास्तु अन्वयव्यतिरेकाभ्यामिह तथाऽवगमात् । तदुक्तम्- काव्य तथा रस के भाव्यभावक सम्बन्ध के विषय में पूर्वपक्षी एक शङ्का उठा सकता है कि दूसरे शब्दों तथा उनके अर्थों में माव्यभावक रूप सम्बन्ध नहीं पाया जाता। काव्य के शब्द भी, इतर शब्दों की ही तरह हैं, इसलिए काव्य तथा उनके अर्थ रसादि में मी भाव्यभावक लक्षण सम्बन्ध का अभाव ही होना चाहिए। धनिक का कहना है कि पूर्वपक्षी के द्वारा यह शक्का उठाना ठीक नहीं। भावना नामक क्रिया को मानने वाले भावनावादी मीमांसकों ने 'भावना' क्रिया में भाव्यभावक सम्बन्ध माना ही है। उनके मतानुसार 'स्वर्गकामोयजेत' या 'पुत्रकामोयजेत' इत्यादि श्रुतिसञ्चोदित वाक्यों के प्रमाण के अनुसार यागादि क्रिया से स्वर्गादि
१. काव्य तथा रस के परस्पर सम्बन्ध, एवं विभावादि तथा रसादि के परस्पर सम्बन्ध के विषय में रसशास्त्र में चार मत विशेष प्रसिद्ध हैं। ये मत भट्ट लोलट, शङ्कक, भट्ट नायक, तथा अभिनवगुप्तपादाचार्य के हैं। इन मतों का संक्षिप्त विवेचन इसी ग्रन्थ के भूमिका भाग में द्रष्टव्य है। भट्ट नायक ने व्यज्ञनावादियों का खण्डन करते हुए विभावादि एवं रस में परस्पर 'भोज्यभोजक' सम्बन्ध माना है। उन्होंने इसके लिए अभिधा के अतिरिक्त 'भावना' तथा 'भोजकत्व' इन दो व्यापारों की कल्पना की थी। भट्ट नायक के अनुपलब्ध ग्रन्थ 'हृदय दर्पण' में इसका विवेचन किया गया था। धनिक का काव्य तथा रस में भाव्यभावक सम्बन्ध मानना भट्ट नायक का ही प्रभाव है। सम्भवतः धनिक को हृदय दर्पण का भी पता हो। वैसे ध्यान से देखने पर पता चलता है कि रस व काव्य के सम्बन्ध के विषय में धनिक का कोई स्वतन्त्र मत नहीं रहा है। वह प्रमुखतः भट्ट लोलट के 'दीर्घदीर्घतरव्यापार' तथा भट्ट नायक के भावता व्यापार से प्रभावित हुवा है, जिसमें धनिक ने तात्पर्यशक्ति वाला मत भी मिला दिया है, जो भट्ट लोल्लट का 'दीर्घदीघंतर अभिधाव्यापार' ही है। एक स्थान पर धनिक शङ्कक के भी ऋणी हैं, जहां वे दुष्यन्तादि की 'मृण्मयद्विरद' के समकक्ष रख कर शङकक के 'चित्रतुरगादि- न्याय' का ही आश्रय लेते हैं।ग।
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की प्राप्ति होती है। इस प्रकार मीमांसक यागादि क्रिया तथा स्वर्गादि फल में 'भावना' क्रिया की कल्पना करते हैं। यागादि क्रिया रूप कारण के द्वारा स्वर्ग प्राप्ति रूप कार्य निष्पन्न होता है। यागादि क्रिया भावक है, स्वर्गप्राप्ति भाव्य। इस प्रकार मीमांसक दर्शनिकों ने इस सम्बन्ध को माना ही है, इसलिए यह भाव्यभावक सम्बन्ध की कर्पना शास्त्रानुमोदित है। शब्दों के अन्य लौकिक प्रयोग में, या अन्य लौकिक स्थलों पर यह भाव्यभावक सम्बन्ध नहीं होता, यह तो काव्य तथा रस के सम्बन्ध में ही घटित होता है। इस बात की पुष्टि काव्य तथा रस के परस्पर अन्वयव्यतिरेक सम्बन्ध से हो जाती है। काव्य में रसादि भावक पदों का प्रयोग नहीं होगा तो किसी तरह मी रस की 'भावना' (चर्वणा) न हो सकेगी, तथा उसके होने पर सह- दयहृदय में रसादि अवश्य भावित होंगे, इस अन्वयव्यतिरेक सरणि से यह स्पष्ट है कि काव्य तथा रस में माव्यभावक सम्बन्ध है। 'भायाभिनयसम्बन्धान्भावयन्ति रसानिमाम्। बस्मात्तस्मादमी भावा विज्ञेया नाव्ययोकृभिः ॥' इति। जैसा कि कहा भी गया है :- भाव, भावों तथा अभिनय के द्वारा, अथवा भावों के अभिनय के द्वारा रसों की भावना कराते हैं, इसीलिए नाव्यप्रयोक्ता इन्हें भाव कहते हैं। इससे यह सिद्ध है कि स्थायी भाव रसों की भावना कराते हैं। अतः रस भाव्य है, यह भी स्पष्ट हो जाता है। इसके आधार पर काव्य तथा रस में माव्यभावक सम्बन्ध स्थापित हो जाता है। कथं पुनरगृहीतसम्बन्धेभ्यः पदेभ्यः स्थाय्यादिप्रतिपत्तिरिति चेत्? लोके तथावि- धचेष्टायुक्तत्त्रीपुंसादिषु रत्याब्यविमाभावदर्शनादिहापि तथोपनिबन्धे सति रत्याद्यविनाभूत चेष्ठादिप्रतिपादकशब्दश्रवणादभिधेयाऽविनाभावेन लाक्षणिकी रत्यादिप्रतीतिः। यथा च काव्यार्थस्य रसभावकत्वं तथाऽग्रे वच्यामः। काव्योपात्त पदों से रत्यादि स्थायी भावों की प्रतीति के विषय में पूर्वपक्षी फिर प्रश्न उठाता है कि काव्योपात्त पदों का रत्यादि भावों से कोई सम्बन्ध नहीं है, अन्य शब्दों तथा उनके अर्थों में अभिधा व्यापार इसलिए काम करता है कि वे अर्थ उन उन पदों के सक्केतित अर्थ होते हैं। स्थायी काव्योपात्त शब्दों का सक्केतित अर्थ तो है ही नहीं। अतः रत्यादि से कोई सम्बन्ध न होने से काव्योपात्त पद स्थायी आदि भावों या रस की प्रतीति कैसे करायँगे ? इस शक्का का उत्तर सिद्धान्तपक्षी यों देता है। हम संसार में दो प्रेमियों को देखते हैं, या स्त्री पुरुषों के परस्पर अनुराग को देखते हैं। ये स्त्री पुरुष नाना प्रकार की प्रेमपरक चेष्टाओं से युक्त दिखाई देते हैं। इनकी ये चेष्टाएँ देखकर अविनाभाव सम्बन्ध से हम रत्यादि का भी दर्शन कर लेते हैं। उन अनुरागपूर्ण चेष्टाओं को देखकर हम उनके परस्पर प्रेम को जान लेते हैं। ठोक यही बात काव्य के विषय में कही जा सकती है। काव्य में तत्तत् स्थायी भाव की चेष्टाएँ निबद्ध की जाती हैं। काव्य में प्रयुक्त शब्द इन चेष्टाओं के वाचक हैं। इस प्रकार काव्योपात्त शब्द के सुनने से चेष्टाओं की प्रतीति होती है और चेष्टाएँ अविनाभाव सम्बन्ध के द्वारा रत्यादि स्थायी भाव की प्रतीति कराती हैं। इस प्रकार काव्योपात्त शब्दों के श्रवण से अभिधेय चेष्टादि से सम्बन्ध रत्यादि की प्रतीति लाक्षणिक है, उसे लक्षणाशक्तिगम्य मानना होगा। काव्य का वाच्यार्थ रस की भावना कैसे कराता है, इसे हम आगे बतायेंगे। रस: स एव स्वाद्यत्वाद्रसिकस्येव वर्तनात्। नाबुकार्थस्य बुच्तत्वातकाव्यस्यातत्परत्वतः।। र्र॥
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लौकिकस्य स्वरमणीसंयुक्तस्येव दर्शनात् ॥ ३६॥ रत्यादि स्थायी भाव स्वाद्य होता है, सहृदय उसका आस्वाद करते हैं, इस लिए लौकिक स्वाद के विषय 'रस' की भांति यह भी रस कहलाता है। यह रस रसिक सहृदय में ही पाया जाता है, अनुकार्य राम, दुष्यन्त, सीता, या शकुन्तला में यह नहीं पाया जाता। रस का स्वाद, रस की चर्वणा रसिकों को, दर्शक सामाजिकों को, ही होती है, अनुकार्य पात्रों को नहीं। अनुकार्य पात्रों की तो केवल कथा भर ली जाती है, काव्य का प्रयोजन सामाजिकों को रसास्वाद कराना ही है। काव्य के अनुकार्य रामादि तो भूतकाल के हैं, उन्हें रसचर्वणा हो ही कैसे सकती हैं। वस्तुतः रसचर्वणा नाटकादि काव्य के द्रष्टा सामाजिक में ही मानी जा सकती है। यदि अनुकार्य रामादि में मानी जायगी, तो वे भी ठीक उसी तरह होंगे, जैसे हम आमतौर पर व्यावहारिक संसार-त्षेत्र में, अपनी नायिका से युक्त किसी नायक को देखते हैं। किन्हीं दो प्रेमी प्रेमिका को शङ्गारी चेष्टा करते देख हमें रस प्रतीति नहीं होती, हमें या तो लज्ा होगी, या ईर्ष्या, राग या द्वेष। यदि अनुकार्य दुष्यन्तादि में रस मान लें, तो सामाजिकों को रसास्वाद नहीं हो सकेगा, प्रत्युत उनके हृदय में लज्जा, ईर्ष्या, राग या द्वेष की उत्पत्ति होगी। श्रङ्गारी चेष्टा देखकर बढ़े लोगों को लज्जा होगी, दूसरों को ईर्ष्यादि। अतः अनुकार्य नायकादि में रस मानने पर दोष आने के कारण सामाजिक में ही रसस्थिति माननी होगी। काव्यार्थोपप्नावितो रसिकवर्ती रत्यादि: स्थायीभावः स इति प्रतिनिर्दिश्यते, स च स्वाद्यतां निर्भरानन्दसंविदात्मतामापाद्यमानो रसो रसिकवर्तीति वर्तमानत्वात्, नानु- कार्यरामादिवर्ती वृत्तत्वात्तस्य। काव्य के वाच्यार्थ के द्वारा उद्धावित रत्यादि स्थायी भाव, जो रसिको के हृदय में रहता है, कारिकाके 'सः' (वह) पद के द्वारा निरदिष्ट हुआ है। यही भाव जब आस्वाद का विषय बनता है, सामाजिक के हृदय में अलौकिक आनन्दघन चेतना को विकसित करता है, तो रस कहलाता है, क्योंकि वह रसिक सामाजिकों में ही रहता है। नाटकादि काव्य का प्रत्येक द्रष्टा रसचर्वणा नहीं कर सकता, उसके लिए रसिक (सहृदय) होना आवश्यक है। अतः रस की स्थिति रसिक में ही होती है। रसिक तो वर्तमान है, अनुकार्य रामादि अतीत काल से सम्बद्ध हैं, अतः रस की स्थिति अनुकार्य रामादि में नहीं मानो जा सकती। अथ शब्दोपहितरूपत्वेनावर्तमानस्यापि वर्तमानवदवभासनमिष्यत एव, तथापि तदवभासस्यास्मदादिभिरननुभूयमानत्वादसत्समतैवाSSस्वादं प्रति, विभावत्वेन तु रामादेवर्तमानवदवभासनमिष्यत एव। किच न काव्यं रामादीनां रसोपजननाय कविभि: प्रवत्यते, अपि तु सहृदयानानन्दयितुम्। स च समस्तभावकस्वसंवेद् एव। यदि चानुकार्यस्य रामादे: शङ्चारः स्यात्ततो नाटकादौ तद्दशने लौकिके इव नायके शृक्गारिणि स्वकान्तासंयुक्त दृश्यमाने शज्गारवानयमिति प्रेक्षकाणां प्रतीतिमात्रं भवेन रसानां स्वाद:, सत्पुरुषाणां च लज्जा, इतरेषां त्वसूयानुरागापहारेच्छादयः प्रसज्येरन्। एवं च सति रसादीनां व्यक्षयत्वमपास्तम्। अन्यतो लब्धसत्ताकं वस्त्वन्येनापि व्यज्यते प्रदीपेनेव घटादि, न तु तदानीमेवाभिव्यअ्जकत्वाभिमतैरापाद्यस्वभावम्। भाव्यन्ते च विभावादिभि: प्रेक्षकेधु रसा इ्यावेदितमेष।3अक के है
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कोई कहे कि काव्य में तो अनुकार्य रामादि का वर्णन वर्तमान की तरह ही किया जाता है, तो ठीक है। काव्य में उपात्त शब्दों के द्वारा रामादि अनुकार्य पात्रों का रूप इस तरह उपस्थित किया जाता है कि साक्षात रूप में वर्तमान न होने पर भी नाटकादि में वे ही वर्तमान हैं, इस तरह का आभास होता है। कवि तथा सामाजिक दोनों को ही इस प्रकार की प्रतीति इष्ट भी है, (अन्यथा रस प्रतीति न होगी)। इतना होने पर भी रामादि का वर्तमान के रूप में आमास हम लोगों (सामाजिकों) को ही होता है, अतः अनुकार्य रामादि की आस्वाद (रस) की दृष्टि से सत्ता है हो नहीं, आस्वाद की दृष्टि से वे अवर्तमान ही हैं। रामादि का वर्तमान के रूप में वर्णन, विभाव के रूप में किया जाता है, अतः वर्तमान के रूप में अवभास सामाजिकों की रस प्रतीति का कारण (विभाव) है। विभाव रूप में उनका इस प्रकार निबन्धन कवि व सामाजिक दोनों को अभीष्ट है। साथ ही यह भी बात ध्यान देने की है कि (भवभूति आदि) कवि रामादि की रस प्रतीति के लिए काव्य की रचना नहीं करते। कवि काव्य की रचना इसलिए करता है कि उससे सहृदय सामाजिक आनन्दित हो, उन्हें रसास्वाद हो। इस रस का अनुभव समस्त सहदय के स्वतः प्रमाण का विषय है। अगर यह मान भी लिया जाय कि शुद्गार (रस) की प्रतीति अनुकार्य रामादि को होती है, तो नाटकादि के दर्शन पर दर्शकों को वैसे ही कोई भी रसास्वाद न होगा, जैसे लौकिक प्रेमी को अपनी कान्ता से युक्त देखकर दर्शकों को केवल इतनी ही प्रतीति होती है कि यह युवक श्रृङ्गार से युक्त है। रसास्वाद की बात तो जाने दीजिये, ऐसी अवस्था में देखने वाले सज्जन व्यक्तियों को लज्जा होगी, क्योंकि दूसरे लोगों की शरद्गारी चेष्टा देखना उन्हें पसन्द नहीं। दूसरे विलासी दर्शकों को ईर्ष्या, अनुराग, द्वेष होगा, शायद उन्हें यह भी इच्छा हो कि ऐसी सुन्दर नायिका का अपहरण कर लिया जाय। अतः रस को नायकादि अनुकार्य पात्रों में नहीं माना जा सकता। इस निष्कर्ष से यह भी निराकृत हो जाता है कि रस व्यङ्गथ है। रस को व्यङ्गय मानने वाले लोगों के मत का खण्डन इस ढङ्ग से भी हो जाता है। व्यजना उसी वस्तु की हो सकती है, जो पहले से हो स्वतन्त्ररूप से विद्यमान हो, तथा किसी दूसरी वस्तु से व्यजित हो। उदाहरण के लिए घट की सत्ता प्रदीप से पहले ही है तथा स्वतन्त्र है, तभी तो प्रदीप घट को (अन्धकार में) व्यजजित करता है। रसादि पहले से ही होते तो विभावादि या काव्योपात्त शब्दादि उनकी व्यअ्षना करा सकते थे। अतः रस की पूर्व सत्ता न होने पर, व्यजनावादी उसे व्यङ्गय नहीं मान सकते। विभावादि के द्वारा रसों को भावना (आस्वाद या चर्वणा) दर्शकों, सामाजिकों में होती है, यह बात हम पहले ही बता चुके हैं। ननु च सामाजिकाश्रयेषु रसेषु को विभाव: कथं च सीतादीनां देवीनां विभावत्वे- नाऽविरोधः ? उच्यते- धीरोदात्ताद्यवस्थानां रामादि: प्रतिपादक: । विभावयति रत्यादीन्स्वदन्ते रसिकस्य ते ॥। ४० ॥ सामाजिकों में रस की स्थिति मानने पर यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि उनके विभाव कौन है; तथा सीता आदि पूज्य देवियों को श्रद्गारादि का विभाव मानने में दर्शकों के लिए दोष क्यों नहीं होता। इस प्रकार सामाजिकों की रसचर्वणा के विभाव कौन हैं? तथा सीतादि को विभाव मानने में अविरोध कैसे स्थापित होगा? इन्हीं प्रश्नों का उत्तर निम्न कारिका में दिया जाता है। नाटकादि में वर्णित अनुकार्यं रामादि तदनुकूल धीरोदात्त आदि अवस्था के
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प्रतिपादक हैं। ये रामादि सामाजिकों में रत्यादि स्थायी भाव को विभावित करते हैं, रत्यादि स्थायी भाव की प्रतीति में कारण बनते हैं। ये रत्यादि स्थायी भाव ही रसिक सामाजिक के द्वारा आस्वादित किये जाते हैं। 5 नहि कवयो योगिन इच ध्यानचक्षुषा ध्यात्वा प्रातिस्विकीं रामादीनामवस्थामितिहा- सवदुपनिबन्नन्ति, किं तहि ? सर्वलोकसाधारणा स्वोत्प्रेक्षाकृतसन्निधीः धीरोदात्ताद्यवस्थाः क्वचिदाश्रयमात्रदायिनीः (वि) दघति। कवि रामादि का वर्णन ठीक उसी तरह से नहीं करते, जैसा पुराणेतिहास में होता है। कवि योगियों की तरह ध्यान करके ज्ञानचक्षु के द्वारा रामादि के अतीत चरित्र का प्रत्यक्ष दर्शन करके उनकी अवस्था का हू-ब-हू वर्णन ठीक उसी तरह नहीं करते, जैसा इतिहास में पाया जाता है। तो फिर कवि कैसा वर्णन करते हैं? कवि तो लौकिक व्यवहार के आधार पर ही उनका निबन्धन करते हैं। वे अपनी उत्प्रेक्षा (कल्पना) से रामादि में तत्तत् प्रकार की उन धीरोदात्तादि अवस्था का चित्रण करते हैं, जो किन्हीं अनुभूत राजादि (आश्रय) में कवि ने देखी है। इस प्रकार कवि अपने ही लौकिक जीवन में प्रत्यक्ष किये राजा आदि में धीरोदात्तादि अवस्था देख कर उसमें कुछ कल्पेना का समावेश कर रामादि की अवस्था का नितन्धन करते हैं। 9ता एव च परित्यक्तविशेषा रसहेतव:। 19 काव्य में वर्णित वे रामादि ही जब अपने विशेष व्यक्तित्व, (रामत्वादि) को छोड़ कर सामान्य (नायकमात्र) रूप धारण कर लेते हैं, तो सहृदय के हृदय में रस प्रतीति कराने के कारण (विभाव) बन जाते हैं। तत्र सीतादिशब्दा: परित्यक्तजनकतनयादिविशेषा: स्त्रीमात्रवाचिन: किमिवानिष्टं कुर्यु: किमर्थं तर्त्युपादीयन्त इति चेत् ? उच्यते- क्रोडतां मृण्मयैर्यद्धद्वलानां द्विरदादिभिः॥४१॥ स्वोत्साढ: स्वदते तद्चछ्ोतृणापर्जुनादिभि:। कारिका से स्पष्ट है कि सीता, शकुन्तला आदि पात्र अपने विशिष्ट व्यक्तित्व को छोड़ कर सामान्य रूप को धारण कर लेते हैं, दूसरे शब्दों में वे साधारणीकृत हो जाते हैं। इस सम्बन्ध में यह प्रश्न उठ सकता है कि काव्य में सीतादि शब्द जनकतनयादि के विशेष व्यक्तित्व को छोड़ कर केवल सी मात्र का बोध कराने लगते हैं, यह मान लेने पर उनका किसी भी तरह का अनिष्ट नहीं होगा। तो फिर काव्य में उनका उपादान क्यों होता है? जब सीता वहाँ परित्यक्त जनकतनयात्व धारण करती है, तो फिर उसके प्रति आदरादि का भाव न हो सकेगा, तथा उससे रसास्वाद भी कैसे होगा? इसीका उत्तर देते हए कहते हैं ? छोटे बच्चे मिट्टी के बने हुए हाथी, घोड़े आदि से खेलते हैं। वे उन्हें सच्चे हाथी, सच्चे घोड़े ही समझ कर खेलते हैं, तथा उनसे आनन्द प्राप्त करते हैं। ठीक इसी तरह काव्य के शोता सामाजिक भी अर्जुन आदि पात्रों के द्वारा उन पात्रों में उत्साह देख कर स्वयं उत्साह का आस्वाद करते हैं। यद्यपि अर्जुनादि, मृण्मय द्विरदादि की तरह ही अवास्तविक हैं केवल प्रतिकृति मात्र हैं, तथापि सामाजिकों को उनसे आनन्द प्राप्ति होती है। एतदुक्तं भवति-नात्र लौकिकश्ज्गारादिवत्स्त्र्यादिविभावादीनामुपयोग:, किं तर्हि प्रतिपादितप्रकारेण लौकिकरसविलक्षणत्वं नाय्यरसानाम् ?। यदाह-'अष्टौ नाय्यरसाः स्मृताः' इति।
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२४८ दशरूपकम् इस विषय में यह कहा जा सकता है कि काव्य का शृङ्गार ठोक उसी तरह नहीं है जैसा लौकिक शरृङ्गार। लौकिक शरृङ्गार में जैसे स्त्री आदि विभावों का प्रयोग होता है, उस तरह काव्य में नहीं होता है। तो फिर यहाँ क्या होता है ? काव्य का रस (नाट्यरस) सांसारिक रस से सवथा विलक्षण, तथा भिन्न है, इसको हम बता चुके हैं। जैसे कहा भी है कि नाट्यरस संख्या में केवल आठ ही होते हैं। काव्यार्थभावनास्वादो नर्तकस्य न चार्यते॥४२॥ नर्तक (नट) को रसास्वाद होता है या नहीं, इस विषय में हमारा मत यह है कि नतक को भी रसास्वाद हो सकता है। हम नर्तक के काम्यार्थ भावना-रस-के आस्वाद का निषेध नहीं करते। नर्तकोऽपि न लौकिकरसेन रसवान् भवति तदानीं भोग्यत्वेन स्वमहिलादेरग्रहणात् काव्यार्थभावनया त्वस्मदादिवत्काव्यरसास्वादोऽस्यापि न वार्यते। नाटकादि में अनुकार्य रामादि के अनुकरणकर्त्ता नट भी लौकिक रस से रसयुक्त नहीं माने जा सकते, क्योंकि वे नाटक में अनुकरण करने वाली महिला को भोग्य रूप में ग्रहण नहीं कर सकते। अतः उनमें लौकिक रस की स्थिति नहीं मानी जा सकती। वैसे काव्यार्थ की भावना के द्वारा नर्तक को भी रसास्वाद हो सकता है, पर उस दशा में नतक भी हमारी तरह सामाजिक होगा। भाव यह है यदि नर्तक सहृदय है, तो सामाजिक के रूप में, सामाजिक के दृष्टिकोण से, वह रसास्वाद कर सकता है। उसे कथमपि रसास्वाद नहीं होता, ऐसा हमारा मत नहीं है। कथं च काव्यात्स्वानन्दोद्भतिः किमात्मा चासाविति व्युत्पाद्यते- स्वाद: काव्यार्थसम्भेदादात्मानन्दसमुद्व:। चिकासविस्तरक्षोभविक्षेपैः स चतुर्विधः॥ ४३।। शृङ्गारवीरबीभत्सरौद्रेषु मनस: क्रमात्। हास्याद्ुतभयोत्कर्षकरुणानां त एव हि॥ ४४॥ अतस्तजन्यता तेषामत एवावधारणम्। काव्य से आनन्द कैसे उत्पन्न होता है, तथा यह आनन्द किस प्रकार का होता है, इसीको स्पष्ट करते हैं :- काव्यार्थ के ज्ञान के द्वारा आत्मा में (सहृदय के हृदय में) विशेष प्रकार के आनन्द का उत्पन्न होना स्वाद कहलाता है। यह स्वाद चार प्रकार का माना जाता है- चित्त का विकास, चित्त का विस्तर, चित्त का क्षोभ, तथा चित्त का विच्षेप। ये चारों प्रकार के मनोविकार-विकास, विस्तर, क्षोभ तथा विक्षेप-क्रमशः शङ्गार, वीर, बीभत्स तथा रौद्र रसों में पाये जाते हैं। ये चारों मनःप्रकार ही क्रमशः हास्य, अद्भुत, भय तथा करुण में पाये जाते हैं। इस प्रकार भङ्गार तथा हास्य में विकास, वीर तथा अद्भुत में विस्तर, बीभत्स तथा भय में तोभ, एवं रौद्र तथा करुण में विच्षेप की स्थिति होती है। इसीलिए हास्यादि चार रसों को शङ्गारादि चार रसों से उत्पन्न माना जाता है, तथा 'आठ ही रस है' इस प्रकार की अवधारणोक्ति भी इसीलिए कही गई है, क्योंकि मन की चार स्थितियों से चार शङ्गारादि तथा चार तजन्य हास्यादि का ही सम्बन्ध घटित होता है, (नौ या दस वाली रस संख्या का नहीं)। काव्यार्थेन= विभावादिसंसृष्टस्थाय्यात्मकेन भावकचेतसः सम्भेदे = अर्प्रन्योन्यसंव- लने प्रत्यस्तमितस्वपरविभागे सति प्रबलतरस्वानन्दोद्भतिः स्वाद:, तस्य च सामान्या-
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त्मकत्वेऽपि प्रतिनियतविभावादिकारणजन्येन सममेदेन चतुर्धा चित्तभूमयो भवन्ति। तथथा-शक्वारे विकासः, वीरे विस्तर:, बीभससे क्षोमा, रौद्रे वित्तेप इति। तदन्येषां चतुर्णा हास्याद्ुतभयानककरुणानां स्वसामग्रीलव्वपरिपोष्रणं त एव चत्वारो विकासा- व्याश्वेतसः सम्भेदाः, अत एव- स 'शृद्गाराद्वि भवेद्धास्यो रौद्राच्च करुणो रसः। वीराचैवाद्भुतोत्प त्तिर्वीभत्साच भयानकः ॥' इति हेतुहेतुमद्भाव एव सम्मेदापेक्षया दर्शितो न कार्यकारणभावाभिप्रायेण तेषां कारणान्तरजन्यत्वात्। काव्य का वास्तविक अर्थ विभावादिकों से युक्त स्थायी भाव है, अतः काव्यार्थ शब्द से इस कारिका में विभावादियुक्त स्थायी भाव रूप अर्थ का तात्पर्य है। इस काव्यार्थ के द्वारा सहृदय के चित्त में अनुकार्य रामादि के सदृश अवस्था का संवलन हो जाता है। सहृदय स्थायी भाव रूप काव्यार्थ का अनुशीलन कर 'स्व' तथा 'पर' के विभाग को भूल जाता है, उसका चित्त साधारणीकृत हो जाता है। इस स्थिति में सहृदय को जिस महान् आनन्द की प्रतीति होती है, वही स्वाद (रस) कहलाता है। यह स्वाद वैसे तो सभी रसों में सामान्य रूप से पाया जाता है, फिर भी अलग-अलग रस के अलग ढुङ्ग के विभाव पाये जाते हैं, इसलिए इस भेद के कारण सहृदय के चित्त की चार प्रकार की स्थितियाँ माई जाती हैं। जैसे-शरङ्गार में विकास, वीर में विस्तर, बीभत्स में क्षोभ, तथा रौद्र में विक्षेप। शृङ्गारादि इन चार रसों से इतर हास्य, अद्भुत, भयानक, तथा करुण इन चार रसों में भी-जिनकी पुष्टि अपने-अपने विभावों के अनुसार होती है-वे ही चार विकासादि चित्तभूमियाँ क्रमशः मिलती हैं। इसीलिए शरृक्गारादि के हास्यादि का कारण इसी सम्मेद के आधार पर माना जाता है। 'शृङ्गार से हास्य, रौद्र से करुण, वीर से अद्भुत, तथा बीमत्स से भयानक रस की उत्पत्ति होती है।' इस वचन में शृङ्गारादि को क्रमशः हास्यादि का हेतु, तथा हास्यादि को हेतुमान् माना है, इसका केवल यही कारण है कि उनमें एक सी चित्तभूमि पाई जाती है, जो दूसरे रसों में नहीं। इस भेद को बताने के लिए ही इस कार्यकारण भाव का उल्लेख हुआ है। इस कार्यकारण भाव के प्रदर्शन का यह अर्थ नहीं है कि एक उनके कारण हैं, तथा दूसरे कार्य, क्योंकि हास्यादि के कारण (विभाव) शृक्गारादि के कारणों (विभावों) से सवथा भिन्न हैं। 'श्ङ्गारानुकृतिर्या तु स हास्य इति कीर्तितः।' इत्यादिना विकासादिसम्भेदैकत्वस्यैव स्फुटीकरणात्, अवधारणमप्यत एव 'अष्टौ' इति सम्मेदान्तराणामभावात्। क ननु च युक्तं शग्गारवीरहास्यादिषु प्रमोदात्मकेषु वाक्यार्थसम्भेदात् आनन्दोद्व इति, करुणादौ तु दुःखात्मके कथमिवासौ प्रादुष्यात् ? तथाहि-तत्र करुणात्मककाव्य श्रवणाहुःखाविर्भावोऽश्रुपातादयक्ष रसिकानामपि प्रादुर्भवन्ति, न चैतदानन्दात्मकत्वे सति युज्यते। सत्यमेतत् किन्तु तादृश एवासावानन्दः सुखदुःखात्मको यथा प्रहरणादिषु सम्भोगाद स्थाया कुहमिते स्त्रीणाम् अन्यक्ष लौकिकाल्करुणात्काव्यकरुण:, तथा हात्रोत्तरोत्तरा रसिकानां पवृत्तयः। यदि च लौकिककरुणवहुःसात्मकत्वमेचेह ख्यासदा न कश्विदत्र ३२ द०
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प्रवर्तैत, ततः करुणैकरसानां रामायणादिमहाप्रबन्धानामुच्छेद एवं भवेत्। अश्रुपाताद- यश्चेतिवृत्तवर्णनाकर्णनेन विनिपातितेषु लौकिकवैक्कव्यदर्शनादिवत् प्रेक्षकाणां प्रादुर्भवन्तो न विरुध्यन्ते तस्माद्रसान्तरवत्करुणस्याप्यानन्दात्मकत्वमेव। 'शृङ्गार के अनुकरण को हास्य रस कहते हैं' इस उक्ति के द्वासा विकासादि के सम्भेद को ही स्पष्ट किया गया है। इसीलिए यह अवधारण भी दिया गया है कि 'रसों की संख्या आठ ही होती है;' क्योंकि चार चित्तभूमियों के आठ ही रसमेद हो सकते हैं, नौ या दस नहीं। साथ ही मन की चित्तभूमियाँ भी चार ही प्रकार की पाई जाती है। रस का स्वरूप, उसकी संख्या, तथा उनकी चित्तभूमियों का निर्देश करने पर रस के आनन्द स्वरूप के विषय में एक प्रश्न उठता है। जैसा कि बताया गया है रस की स्थिति में सहृदय की चित्तवृत्ति अलौकिक आनन्द से युक्त हो जाती है, यही आनन्दास्वाद रस है। जब हम रसों की ओर देखते हैं तो हमें पता चलता है कि शक्गार, वीर ह्ास्य आदि रसों (अद्भुत को भी ले सकते हैं) में देखने वाले को सुख मिलता है। ये रस सुखात्मक है अतः इन रसों वाले काव्य के अर्थ से सहृदय के मानस में आनन्दोत्पत्ति होना ठौक भी है। लेकिन यही बात करुण आदि रसों के विषय में कहना ठीक नहीं। दुःखात्मक करुण, बीभत्स, भयानक तथा रौद्र रसों से आनन्दोत्पत्ति कैसे हो सकती है ? पूर्वपक्षी अपने मत को और अधिक स्पष्ट करते हुए कहता है कि करुणात्मक काव्य को सुन कर रसिक व्यक्ति आँसू गिराते हैं, रोते हैं, इस प्रकार उनके हृदय में दुःख का आविर्भाव होता ही है। अगर करुणादि को आनन्दरूप माना जाय, वे आनन्दात्मक होते, तो रसिक को उनके आस्वाद के समय रोना नहीं चाहिए। इसी शङ्का का उत्तर देते हुए वृत्तिकार धनिक सिद्धान्तपक्ष निबद्ध करते हैं :- तुम्हारा यह कहना बहुत ठीक है कि करुण काव्यों के श्रवण से रसिक लोगों को दुःख होता है, तथा रोते हैं, आँस गिराते हैं। पर लौकिक करुणादि से काव्यगत करुणादि का भेद है। काव्यगत करुणादि दुःखपरक होते हुए भी आनन्दात्मक हैं। जैसे सुरत के समय स्त्रियों का कुट्टमित, उनके नखक्षत, दन्तक्षत, प्रहारादि रसिकों को सुख तथा दुःख से मिश्रित आनन्द प्रदान करते हैं, ठीक वैसे ही करुण रस में रसिकों को आनन्द की प्रतीति होती है। साथ ही लौकिक करुण से काव्य का करुण रस भिन्न है, इसीलिए रसिक लोग करुण काव्य के प्रति अत्यधिक प्रवृत्त होते हैं। अगर काव्यगत करुण रस भी लौकिक करुण रस की तरह दुःखात्मक ही होता, तो कोई भी व्यक्ति ऐसे काव्य का अनुशीलन न करता। ऐसा होने पर तो करुण रसपरक काव्यों-रामायण जैसे महाकाव्यों का उच्छेद ही हो जायगा। ऐसे काव्यों की कोई पूछ न होगी। पर बात दूसरी ही है। लोग रामायणादि करुण रसपरक काव्यों को बड़े चाव से पढ़ते-सुनते हैं, तथा रसास्वाद ग्रहण करते हैं, अतः करुण रस काव्य भी आनन्दोत्पत्ति अवश्य करते हैं, यह सिद्ध है। वैसे कथा के वर्णन को सुनने पर रसिक सामाजिक दुःख का अनुभव करके आँसू उसी तरह गिराता है, जैसे लौकिक व्यवहार में किसी दुखी व्यक्ति को देख कर हम लोग आँसू गिराते हैं। अतः सामाजिकों का ऐसे वर्णनों को सुन कर आँसू गिराना रस का या आनन्द का विरोधी नहीं है। इन सब बातों से स्पष्ट है कि श्रृक्गारादि रसों की तरह करुण रस से भी आनन्दोत्पत्ति होती है, वह भी आनन्दात्मक है। पहले की एक कारिका में शान्त रस का रसत्व तथा शम का स्थायित्व निषिद्ध किया गया है-'शममपि केचित् प्राहुः पुष्टिर्नाव्येषु नैतस्य'। यहाँ पर उसी शम स्थायी भाव तथा
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चतुर्थ: प्रकाश: २५१
शान्त रस के विषय में पुनः सिंहावलोकन करते हुए सिद्धान्तपक्ष का उल्लेख किया जाता है। शान्तरसस्य चाऽनभिनेयत्वात् यद्यपि नाम्येऽनुप्रवेशो नास्ति तथापि सूच्मातीता- दिवस्तूनां सर्वेषामपि शब्दप्रतिपाद्यताया विद्यमानत्वात् काव्यविषयत्वं न निवायते अरत- स्तदुच्यते- रामप्रकर्षो Sनिर्वाच्यो मुदितादेस्तदात्मता।। ४५॥ हम बता चुके हैं कि शान्त रस का अभिनय नहीं हो सकता। इसलिए नाटक में शान्तरस का प्रवेश, शान्तरस का निबन्धन नहीं होता। यद्यपि नाटक में शान्तरस नहीं पाया जाता, फिर भी सूक्ष्म, अतीत आदि सभी वस्तुओं की प्रतिपत्ति शब्द के द्वारा कराई जा सकती है, अतः वे भी काव्य के विषय तो हो ही सकती है। सूक्षम, अतीत आदि वस्तुएँ काव्य का विषय नहीं हो सकती, हमारा यह मत नहीं है। इसी को कारिकाकार यों स्पष्ट करते हैं :- शम नामक स्थायी भाव का प्रकर्ष-शान्तरस अनिर्वाच्य है, इसका वर्णन नहीं किया जा सकता, क्योंकि दुःख, सुख, चिन्ता, राग, द्वेष सभी से परे है, तथा वह मुदिता, मैत्री, करुणा एवं उपेक्षा से प्रतीत होता है। शान्तो हि यदि तावत्- 'न यत्र दुःखं न सुखं न चिन्ता न द्वेषरागौ न च काचिदिच्छा। रसस्तु शान्त: कथितो मुनीन्द्रैः सर्वेषु भावेषु शमप्रधानः ।।' इत्येवंलक्षणस्तदा तस्य मोक्षावस्थायामेवात्मस्वरूपापत्तिलक्षणायां प्रादुर्भावात, तस्य च स्वरूपेणानिर्वचनीयतां श्रुतिरपि-'स एष नेति नेति' इत्यन्यापोहरूपेणाह। न च तथाभूतस्य शान्तरसस्य सहृदयाः स्वादयितारः सन्ति, अथापि तदुपायभूतो मुदितामै- त्रीकरुणोपेक्षादिलक्षणस्तस्य च विकासविस्तारक्षोभविच्तेपरूपतैवेति तदुक्त्यैव शान्तरसा- स्वादो निरूपितः । शान्तरस का निम्न लक्षण माना जाता है :- 'जहाँ दुःख भी नहीं है, सुख भी नहीं है, न चिन्ता है न द्वेष, न कोई राग है, न कोई इच्छा, वह शान्तरस है, ऐसा मुनीन्द्र भरत ने कहा है। समस्त भावों में शम स्थायी भाव प्रधान होता है।' यदि शान्तरस का यही लक्षण है, तो यह अवस्था केवल मौक्षावस्था में ही प्राप्त हो सकती है, जब कि आत्मस्वरूप की प्राप्ति हो जाती है। यह मोक्षावस्थारूप आत्मप्राप्ति स्वरूपतः अनि- वंचनीय है, उसका वर्णन करना अशक्य है। इसकी अनिर्वचनीयता का प्रमाण भगवती श्रुति है जहाँ कहा गया है कि 'वह आत्मरूप यह नहीं है, यह नहीं है'। जब शान्त- रस सांसारिक विषयों से विराग वाला है, तो फिर उससे रसिक सहद्यों को-लौकिक सामाजिकों को कोई आनन्द नहीं मिलेगा। वैराग्ययुक्त शान्तरस का आस्वाद रागी लौकिक रसिक नहीं करेंगे। वैसे शान्तरस अनिर्वचनीय है, तथा उसका वर्णन नहीं हो सकता, फिर भी किसी तरह यहाँ पर शान्तरस के आस्वाद का औपचारिक निरूपण किया ही जाता है। शान्तरस के उपाय है चित्त की चार प्रकार की वृत्तियाँ-मुदिता, मैत्री, करुणा तथा उपेक्षा। ये चारों वृत्तियाँ चित्त की पूर्वोक्त चार भूमियों-विकास, विस्तर, क्षोभ तथा विक्षेप-का ही प्रतिरूप हैं। अतः उनके कारण शान्तरस में चारों प्रकार की चित्तभूमियों का निरूपण किया जा सकता है।
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२५२ दशरूपकम्
फलि इदानीं विभावादिविषयावान्तरका व्यव्यापारप्रदर्शनपूर्वकः प्रकररोनोपसंहारः प्रतिपाद्यते-
काव्याद्विभावसञ्चार्यनुभावप्रख्यतां गतैः ॥ ४६॥ भावितः स्वदते स्थायी रसः स परिकीर्तितः। अब रसादि का विवेचन कर लेने पर प्रकरण का उपसंहार करते हुए विभावादिरूप इतर काव्यव्यापारों का प्रदर्शन करते हैं :- चन्द्रमा जैसे विभाव, निर्वेद जैसे सज्वारी भाव तथा रोमाज जसे अनुभावों के द्वारा भावित स्थायी ही रस है। काव्य में प्रयुक्त पदों का अर्थ इन्दु (चन्द्रमा ) आदि विभाव परक, निर्वेद आदि भाव परक तथा रोमाज्जादि अङ्गविकार परक होता है। ये ही चन्द्र, निर्वेद, रोमाञ् आदि क्रमशः विभाव, सज्जारी तथा अनुभाव के नाम से प्रसिद्ध हैं। इनके द्वारा जब स्थायी रस भावित होता है, तो वह रस कहलाता है।१ अतिशयोक्तिरूपकाव्यव्यापाराहित विशेषैश्वन्द्रायरुद्दीपनविभावैः प्रमदाप्रभृतिभिराल- म्बनविभावैनिर्वेदादि भिर्व्य भिचारिभावे रोमाश्चाश्ुभ्रूच्षेपकटाक्षादैरनुभावैरवान्तरव्यापारतया पदार्थीभूतैर्वाक्यार्थः स्थायीभावो विभावितः= भावरूपतामानीतः स्वदते स रस इति प्राक्प्रकरये तात्पर्यम्। काव्य व्यापार में अतिशयोक्ति के रूप में वणित चन्द्रमा, नदीतीर, आदि उद्दीपनविभाव, रमणी आदि आलम्बनविभाव, निर्वेदादि व्यभिचारी भाव, रोमाज्र, अश्रु, भ्रक्षेप, कटाक्ष आदि अनुभावों की ही प्रतीति कराई जाती है। अतः चन्द्रादि जो काव्योपात्त शब्दों के पदार्थ है अपने द्वारा अविनाभाव सम्बन्ध से विभावादि की प्रतीति कराते हैं। ये चन्द्रादि विभावादि ही वाक्यार्थरूप स्थायी भाव को भावनाविषयक बनाकर आस्वादयरूप में प्रतिपन्न करते हैं, तो वह स्थायी भाव रस हो जाता है। आव यह है सहदव सामाजिक तत्तत् काव्य में वर्णित चन्द्र, निर्वेद, अश्रु आदि विभाव, सज्चारी भाव तथा अनुभावों को काव्योपात्त पदार्थ के रूप में ग्रहण करता है, फिर ये पदार्थ सहृदय हृदय में स्थित स्थायी भाव को भावनागम्य बनाते हैं, और सहृदय सामाजिक को आस्वादरूप आनन्द की प्राप्ति होती है। यही आस्वाद रूप आनन्द रस है। अतः रस कुछ नहीं विभावादि के द्वारा भावित (भावनाविषयीकृत) स्थायी भाव की ही परिपुष्ट दशा है। विशेषलक्षणान्युच्यन्ते, तत्राचार्येण स्थायिनां रत्यादीनां श्रङ्गारादीनां च पृथग्लक्ष- णानि विभावादिप्रतिपादनेनोदितानि। अरत्र तु १. भूमिका भाग में हम देख चुके हैं कि भरत के नाव्यसूत्र 'विभावानुभावव्यभिचारि- संयोगाद् रसनिष्पत्तिः' के 'संयोगात्' पद का अर्थ अलग २ आचार्यों ने अलग २ लगाया है। भट्ट लोछट के मतानुसार उसका अर्थ है-उत्पाद्य-उत्पादकभाव, शङकक के मत से इसका अर्थ है-अनुमाप्यानुमापकभाव, भट्ट नायक के अनुसार इसका अर्थ 'भोग्यभोजकमाव' है तथा अभिनवगुप्त या ध्वनिवादी के मत में 'व्यञ्यव्यजकभाव। घनज्ञय 'संयोगात्' को 'भावितः' पद से स्पष्ट कर 'भाव्यभावकसम्बन्ध' मानते हैं। जिस तरह लोछट, शङकुक, भट्ठ नायक तथा अभिनवगुप्त के मतों को क्रमशः उत्पत्तिवाद, अनुमितिवाद, मुक्तिवाद तथा अभिव्यक्तिवाद (या व्यक्तिवाद) कहा जाता है, धनज्ञय के रसवादी मत को वैसे ही 'भावनावाद' कहा जा सकता है। पर हम बता चुके हैं कि धनजय तथा धनिक का रस सम्बन्धी मत कोई स्वतन्त्र कल्पना नहीं है, अपितु भट्ट लोलट तथा भट्ट नायक के मतों की ही खिचड़ी है। ही
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चतुर्थ: प्रकाश: २५३
लक्षणैक्यं विभावैक्याद मेदाद्रसभावयोः॥।४७॥ किमनल क्रियत इति वाक्यशेषः। अब तक सामान्य रूप से रस तथा स्थायी भाव का विवेचन किया गया। अब आठ स्थायी भावों तथा आठ रसों का विशेष लक्षण निबद्ध करते हैं। भरत मुनि ने नाव्यशास्त्र में स्थायी भावों तथा रसों का लक्षण अलग अलग किया है। इसका कारण यह है कि उन्होंने विभावादि के वर्णन के द्वारा उनका वर्णन किया है। विभावादि के द्वारा प्रतिपादन करने के कारण उनका पृथक् पृथक लक्षण किया गया है। पर यहाँ हम दोनों का एक साथ ही लक्षण करते हैं। रस तथा उसके भाव (स्थायी भाव) का विभाव (आलम्बन तथा उद्दीपन) एक ही होता है, तथा उनमें कोई भैद नहीं है, अपि तु अभेद है, क्योंकि भाव की ही परिपुष्ट स्थिति रस कही जाती है, अतः उनका लक्षण एक ही किया जाता है। भरत मुनि की तरह अलग अलग लक्षण नहीं किया गया है। तत्र तावच्छजार :- रम्यदेशकलाकालवेषभोगादिसेवनः।। प्रमोदात्मा रतिः सैव यूनोरन्योन्यरक्तयोः। 5 प्रहष्यमाणा शङ्गारो मधुराङ्गविचेष्टितैः॥ ४८॥ इत्थमुपनिबध्यमानं काव्यं शज्ञारास्वादाय प्रभवतीति कव्युपदेशपरमेतत्। 1 सबसे पहले शरृद्धार तथा उसके स्थायी रतिभाव का सौदाहरण लक्षण उपनिबद्ध करते हैं। परस्पर अनुरक्त युवक नायक नायिका के हृदय में, रम्य देश, काल, कला, वेश, भोग, आदि के सेवन के द्वारा आत्मा का प्रसन्न होना रति स्यायी भाव है। यही रति स्थायी भाव नायक या नायिका के अङ्गों की मधुर चेष्टाओं के द्वारा एक दूसरे के हृदय में परिपुष्ट (प्रहर्षित) होकर शङ्गार रस होता है। इस प्रकार रम्य देशादि के द्वारा परिपुष्ट रति के उपनिबद्ध करने पर काव्य से शरृङ्गार की चर्वणा होती है, इसलिए यह लक्षण कवियों के उपदेश के लिए किया गया है। तत्र देशविभावो यथोत्तररामचरिते あ DE い 防 5
'स्मरसि सुतनु तस्मिन्पर्वते लक्ष्मरौन का प्रतिचिहितसपर्यासुस्थयोस्तान्यहानि। * स्मरसि सरसतीरां तत्र गोदावरीं वा स्मरसि च तदुपान्तेष्वावयोर्वर्तनानि ॥' अब देश, काल आदि की रमणीयता रूप उद्दीपन विभाव को स्पष्ट करते हुए तत्तत् विभाव के द्वारा कैसे रति भाव का स्फुरण तथा शरङ्गार की चर्वणा होती है, इसे उदाहरणों के द्वारा स्पष्ट करते हैं। देशरूप विभाव का उदाहरण, जैसे उत्तररामचरित नाटक में, निम्न पद्य में राम तथा सीता के परस्पर अनुराग रूप रति भाव की गोदावरीतीर रूप देश के द्वारा शद्गार के रूप में चर्वणा हो रही है। ap क हे सुन्दर शरीर वाली सीता, उस पर्वत पर लक्ष्मण के द्वारा पूजा की सभी सामग्री के प्रस्तुत कर देने के कारण मजे से रहते हुए, हमारे उन दिनों को तुम याद करती हो न। अथवा सरसतीर वाली गोदावरी को तथा उसके पास हम दोनों के इधर उधर परिभ्रमण (विहार) को याद करती हो ना। सनका
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२५४ दशरूपकम् कलाविभावो यथा- 'हस्तैरन्तर्निहितवचनैः सूचितः सम्यगर्थः PT पादन्यासैरलयमुपगतस्तन्मयत्वं रसेषु। शाखायोनिर्मृदुरभिनयः षड्विकल्पोऽनुवृत्तै- र्भावे भावे नुदपि विषयान् रागबन्धः स एव ।।' कला विभाव का उदाहरण, जैसे मालविकाननिमित्र के इस पद्य में, जहाँ मालविका की नृत्यकला के द्वारा अझनिमित्र के हृदय में स्फुरित स्थायी भाव श्रृद्गार रस के रूप में परिपुष्ट हो रहा है :- इस माळविका ने अपने उन हाथों के सव्वालन के द्वारा भाव के अर्थ की व्यअना ठीक तरह से करा दी है, जिन के सञ्ालम में जैसे शब्द (वचन) छिपे बैठे हैं। जिस तरह शब्द के सुनने पर उसके अर्थ की प्रतीति होती है, वैसे ही इसके हस्तसञ्चालन से अर्थव्यज्जना हो रही है, मानों वचन इसके हाथों में छिपे हैं। जब यह एक क्रिया के बाद थोड़ी देर द्रुत, मध्य या विलम्बित विश्राम (लय) का आश्रय लेती है, तो जैसे इसके पदन्यास ने लय को रस के साथ तन्मय बना दिया है। दर्शक इसके 'लय' तक पहुँचने पर रसमझ्र हो जाता है। इस्तसव्चालन तथा पादन्यास के द्वारा किया गया छः प्रकार का (शारीर, मुखज, तथा चेष्टाकृत ये आङ्गिक के तीन प्रकार, तथा वाचिक, आहार्य एवं सात्विक) कोमल अभिनय जो शाखा वाला (हाथ के विचित्र सव्वालन वाला) है प्रत्येक भाव के प्रकाशन के साथ साथ हृदय में विषयों को प्रेरित कर रहा है। यही अनुराग है, यही रागबन्ध या प्रेम कहा जा सकता है। यथा च- 'व्यक्ति व्यज्जनधातुना दशविधेनाप्यत्र लब्घाSमुना
गोपुच्छप्रमुखाः क्रमेण यतयस्तिस्त्रोऽपि सम्पादिता- स्तत्वौद्यानुगताश् चाद्यविघयः सम्यक् त्रयो दर्शिताः ॥' अथवा, इस दूसरे उदाहरण में जहाँ सङ्गीत की कला के विभाव का वर्णन पाया जाता है। मृच्छकटिक का पद्य है। सङ्गीत शास्त्र में प्रसिद्ध दस प्रकार के व्यञञन धातुओं पुष्प, कल, तल, निष्कोटित, उद्ष्ट, रेफ, अनुबन्ध, अनुस्वनित, बिन्दु तथा अपमृष्ट के द्वारा वीणावादन के समय भाव की व्यज्ञना कराई गई है। वीणावादन में द्रुत, मध्य तथा लम्बित इस प्रकार तीनों तरह की गीत की लय स्पष्ट सुनाई दे रही है। लय के कालभेद में कोई गड़बड़ी नहीं है। वीणावादक ने गोपुच्छ, समा, तथा स्नोनोगता इन तीन प्रकार की यतियों में लय की प्रवृत्ति के नियमों को क्रम से सम्पादित किया है। गोपुच्छादि यतियों के प्रयोग के नियम में कोई क्रमभङ्ग नहीं हुआ है। साथ ही वीणावादन के समय तत्त्व, ओघ तथा अनुगत इन तीन प्रकार की वाद्यविधियों को १.लय तीन प्रकार का होता है :- क्रियानन्तरविश्रान्ति्लयः स त्रिविधोमतः। द्रुतो मध्यो विलम्बश्च द्रुतः शीघ्रतमो मतः । द्विगुणाद्विगुणौ शेयौ तस्मान्मध्यविलम्बितौ।। २. आङ्विको वाचिकश्चैव ह्याहार्य: सार्तिविकस्तथा। श्ेयस्त्वभिनयो विप्राश्चतुर्ा परिकल्पितः त्रिविधस्तवाद्गिको ज्ञेयः शारीरो मुखजस्तथा। तथा चेष्टाकृतश्चैव शाखाङ्गोपाङ्गसंयुतः॥क ३- विहाय त्रीनभिनयानाङ्गिकोऽत्रामिधीयते। तस्य शाखाककरो नृत्तं प्रधानं त्रितयं मतम्। तत्र शाखेति विख्याता विचित्रा करवर्तना ॥ (सज्जोतरत्नाकर)
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चतुर्थ: प्रकाश: २५५
भी अच्छी तरह दर्शाया है। इस प्रकार समस्त व्यञ्ञन धातुओं का, लय के त्रिप्रकार का, तीन तरह की यतियों तथा वाद्यविधियों का प्रयोग बता रहा है कि वीणा बजाने वाला व्यक्ति वीणावादन की कला में अत्यधिक निपुण है। कालविभावो यथा कुमारसम्भवे- 'असूत सद्यः कुसुमान्यशोकः स्कन्धात्प्रभृत्येव सपल्लवानि।RMmPS पादेन नापैक्षत सुन्दरीणां सम्पर्कमाशिञितनूपुरेण ॥' काल (समय) के विभावपक्ष का उदाहरण,जैसे कुमार सम्भव के तृतीय सर्ग में वसन्त के आविर्भाव के वर्णन में वसन्त के कारण पशुओं तक में रतिभाव के सव्ार का वर्णन- हिमालय प्रदेश में शिवजी के आश्रम के आसपास वसन्त के फैल जाने पर अशोक के वृक्ष ने शाखाओं के कंधों तक पल्लवों तथा पुष्पों को एकदम उत्पन्न कर दिया। उस अशोक वृक्ष ने नूपुर से झंकृत सुन्दरियों के चरण की भी अपेक्षा न की। प्रायः यह प्रसिद्ध है कि अशोक में पुष्पोपत्ति रूप दोहद रमणियों के चरणाघात के कारण होता है। जैसा कि कहा भी जाता है-'पादाघातादशोकः'। अतः रमणियों के चरणाघात का होना आवश्यक है। किन्तु शिवजी को पार्वती के प्रति आकृष्ट करने के लिए प्रस्थित काम की सहायता करने वाला वसन्त इस तरह से हिमालय में फैल गया कि वसन्त के सारे चिह्न एकदम उपस्थित हो गये। अशोक के पल्लव तथा पुष्प, जिनका आविर्भाव वसन्त ऋतु में होता है, निकल आये, तथा उनने सुन्दरियों के पादाघात की भी प्रतीक्षा न की। इत्युपक्रमे- 'मधु द्विरेफ: कुसुमैकपात्रे पपौ प्रियां स्वामनुवर्तमानः । शृङ्गेण संस्परशनिमीलिताक्षी मृगीमकड्यत कृष्णसारः ॥।' काम के सखा वसन्त के वनमें फैल जाने पर पशु-पक्षियों में भी रति का सक्चार होने लगा, (मनुष्यों की तो बात ही निराली है)। भँवरा अपनी प्रिया के साथ रह कर फूल के एक ही पात्र से पराग या शहद का पान करने लगा, ठीक वैसे ही जैसे कोई विलासी युवक अपनी प्रिया के साथ एक ही चषक से मधुपान करता है। काला हिरण अपने स्पशं के कारण बन्द आँखों वाली (जिसने आंखे बन्द कर ली है) मृगी को अपने सींग से खुजलाने लगा। यहां भ्रमर तथा भ्रमरी का एक पुष्प-पात्र से मधुपान करना, तथा मृग का मृगी को अपने सींग से खुजलाना तथा मृगी का उसके स्पर्श को पाकर आंखें बन्द कर लेना श्रुङ्गार रस के ही अनुभाव हैं। वेषविभावो यथा तत्रव-
मुक्ताकलापीकृतसिन्दुवारं वसन्तपुष्पाभरणं वहन्ति ।I' वेष का विभाव, जैसे कुमार-सम्भव के निम्न उदाहरण में पार्वतीरूप आलम्बन के वेष उद्दीपन विभाव का वर्णन किया गया है, जो शिवके मानस में रति को पुष्ट करता है :- जब पार्वती शिव के चरणों में सूखे कमलबीजों की माला रखने आई, तो उसने वसन्त ऋतु के विकसित पुष्पों के आभूषणों को पहन रक्खा था। उसके ये आभूषण, जो वासन्ती कुसुमों के थे सुवर्ण या रलनों के आभूषणों से भी बढ़ कर मनोहर थे। उसने जिन अशोक पुष्पों को पहन रक्खा था, वे पझमराग मणि की शोभा को भी लज्जित कर रहे थे। अशोक का फूल भी लाल होता है, पझमराग मणि भी लाल। उसके वसन्ताभरण के कर्णिकार पुष्पों ने सोने की
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कान्ति को खींच लिया था। ये दोनों पीले रंग के होते हैं। तथा सिन्दुवार के फूलों के द्वारा उसने मोतियों की माला बना रक्खी थी। इस तरह अशोक, कर्णिकार तथा सिन्दुवार के कुसुमों से बना पार्वती का आभरण (वसन्ताभरण) पझमराग, सुवर्ण तथा मोतियों के बने आभूषणों-सा लग रहा था, वैसा ही नहीं, किन्तु उससे भी कहीं बढ़ चढ़ करल उपभोगविभावो यथा 'चक्षुर्लुप्तमषीकणं कवलितस्ताम्बूलरागोऽघरे DppT कRTF विश्रान्ता कबरी कपोलफलके लुप्तेव गात्रदुतिः। जाने सम्प्रति मानिनि प्रणथिना कैरप्युपायक्रमै- के कीड घार र भगो मानमहातरुस्तरुणि ते चेतःस्थलीवर्घितः ॥' हा उपभोग-विभाव, जहाँ नायक या नायिका के उपभोग विभाव के द्वारा उनकी रति की व्यअ्ना हो। जैसे निम्न पद्य में- कि I कोई नायिका नायक से दुखी थी। पर रात के समय नायकने बड़ी मान-मनौती करके उसका गुस्सा हलका कर दिया। फलतः दोनों रतिक्रीड़ा में भी प्रवृत्त हुए। सुबह नायिका को सखी ने उसके शरीर पर रति के चिह्न देखे, तथा यह अनुमान लगा लिया कि नायक ने उसे खुश कर लिया है। इसी बात को सखी नायिका से कह रही है। हे तरुणि, तुम्हारे आँखों का कज्जल-कण लुप्त हो चुका है, तुम्हारी आँखों का सारा कज्जल तो नहीं, पर उसका कुछ हिस्सा मिट गया है, यह रति से ही हो सकता है। तुम्हारे नीचे के ओठ (अधर, न कि ऊपर का ओठ) की ताम्बूल के कारण उत्पन्न ललाई जैसे किसी ने निगल ली है, अर्थात् अधर का ताम्बूलराग भी नष्ट हो गया है। तुम्हारी कबरी (केशपाश) कपोल पर इस तरह पड़ी है, जैसे थक गई हो (रति के कारण तुम ही नहीं, तुम्हारी कबरी भी थक गई); तुम्हारे केश असंयत हैं। और तुम्हारे शरीर की कान्ति भी जैसे नष्ट हो गई है; शरीर की शोभा भी मन्द पड़ गई है। ये सारी बातें बताती हैं कि रात को तुमने नायक के साथ सुरतकीडा की है। पर तुम तो कल मान किये बैठी थी न ? ऐसा प्रतीत होता है, मेरा यह अनुमान है कि हे मानिनि, तुम्हारे प्रियतम ने अनेक उपायों द्वारा, तुम्हारे चित्त की स्थली पर बढ़ा हुआ (उगा हुआ) मान का बड़ा वृक्ष आखिर तोड़ ही गिराया। इन सारे चिह्नों से यह स्पष्ट है कि नायक ने किसी न किसी तरह तुम्हारे गुस्से को हटा ही दिया। प्रमोदात्मा रतिर्यथा मालतीमाधवे 'जगति जयिनस्ते ते भावा नवेन्दुकलादयः प्रकृतिमधुराः सन्त्येतान्ये मनो मदयन्ति ये। मम तु यदियं याता लोके विलोचनचन्द्रिका नयनविषयं जन्मन्येक: स एव महोत्सवः ।I' श्रक्गार के लक्षण में यह बताया गया है कि रति स्थायी भाव में आत्मा (हृदय) प्रसन्न रहता है, वह उल्लसित होता है। अतः रति भाव की इसी विशेषता को उदाहत करते हैं। मालती को देखने पर माधव की दशा के वर्णन के द्वारा रति के इस प्रमोदात्मत्व को स्पष्ट करते हैं :- . मन को प्रसन्न करने वाले, उसमें मद का सक्चार करने वाले कई सुन्दर भाव संसार में देखे जाते हैं। नबीन चन्द्रमा की कला जैसे स्वामाविक चातुर्य वाले अनेकों दूसरे भाव उत्कृष्ट हैं; जिनसे लोगों का मन मस्त हो उठता है। लोग उन्हें देखकर अपनी आँखों का उत्सव
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चतुर्थः प्रकाशः मनाते हैं। पर मेरे विषय में बात ही दूसरी है। मेरे दृष्टिपथ में तो चन्द्रिका के समान नेत्रों को आह्लादित करने वाली यह मालती अवतरित हो गई है। इसलिए मालती का नयनों का विषय बनना मैरा बहुत बड़ा सौभाग्य है। मेरी तो ऐसी धारणा है कि इस जन्म में मेरे लिए केवल एक ही बात महाम् उत्सव की रही है, और वह है माळती का मेरी आँखों के आगे से गुजरना। युवतिविभावो यथा मानविकाशनिमित्रे- 'दीर्घाक्षं शरदिन्दुकान्तिवदनं बाहू नतावंसयोः संक्षिप्तं निविडोन्नतस्तनमुरः पार्श्वे प्रभृष्टे इव। मध्यः पाणिमितो नितम्बि जघनं पादाचरालाङुली छन्दो नर्तयितुर्यथैव मनसः स्पष्टं तथाऽस्या वपुः ॥ युवतिविभाव, जहाँ नायिका के यौवन का उसके युवतित्व का वर्णन किया जाग। जैसे मालविकाभनिमित्र नाटक में नाचती हुई मालविका की मुद्रा का तथा उसके द्वारा स्पष्ट दिखाई पड़ते उसके यौवन का वर्णन- नाचती हुई मालविका को देख कर अभनिमित्र कह रहा है-इसका मुख शरत् के चन्द्रमा के समान सुन्दर है, जिसमें लम्बी-लम्बी आँखें हैं। इसके दोनों हाथ कन्धों के पास से झुके हुए हैं, तथा इसका वक्षःस्थल सक्कुचित हो रहा है, जिसमें निबिड़ (घने) तथा उठे हुए स्तन दिखाई देते हैं, एवं इसके दोनों पार्शभाग सिमटे से हैं। मालविका का मध्यमाग (कमर) इतना पतला है, कि पाणि (मुट्ठी) से नापा जा सकता है, इसका जघनस्थल नितम्ब के भारीपन के कारण उभरा हुआ है, तथा इसके दोनों पैरों की अङ्कुलियाँ गति की (यौवनाविर्भाव के कारण, या नृत्य के कारण जनित) अस्तव्यस्तता से कुटिल (टेढ़ी) हो रही हैं। इसके सौन्दर्य को देख कर प्रसन्नता तथा खुशी से नाचते हुए मन का जैसा अभिप्राय होता है, ठीक उसी अभिप्राय के अनुरूप इसका शरीर बना हुआ है। यूनोर्षिभावो यथा मालतीमाधवे- भूयो भूयः सविधनगरीरथ्यया पर्यदन्तं दृष्द्वा दृष्ट्वा भवनवलभीतुङ्गवातायनस्था। साक्षात्कामं नवमिव रतिर्मालती माधवं य- ड्वाढोत्कण्ठा लुलितललितैरजकैस्वाम्यतीति ॥' दोनों युवकों-नायकनायिकाओं-का विभाव, जहाँ दोनों के यौवन का वर्णन किया जाय। जैसे मालतीमाधव के प्रथम अक्क का निम्न पद्य, जहाँ माधव तथा मालती दोनों के यौबन का वर्णन किया गया है :- समीप की गली से बार-बार धूमते हुए, साक्षात् अभिनव काम के समान सुन्दर माधव को महल के ऊँचे छज्जे से बार-बार देख कर रति के समान सुन्दर मालती अत्यधिक उत्कण्ठित होकर अपने कोमल तथा सुन्दर अङ्गों से पीड़ित रहती है। सुन्दर माघव को देख- देख कर सुन्दरी मालती उसके प्रति आकुष्ट हो गई है, तथा उसकी प्राप्ति के लिए उत्कण्ठित है, तथा इस उत्कण्ठा के कारण उसके अङ्ग विरहपीड़ा से पीड़ित हैं। अन्योन्यानुरागो यथा तत्रव- 'यान्त्या मुहुर्वलितकन्घरमाननं त- दावृत्तवृन्तशतपत्रनिभं वहनत्या । ३३ द०
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दिग्घोऽमृतेन च विषेण च पच्मलाच्या गाढं निखात इव मे हृदये कटाक्षः।I' नायक तथा नायिका का परस्पर अनुराग, जैसे वहीं मालतीमाधव में। माधव अपने मित्र मकरन्द से कह रहा है। टेढ़ी टहनी वाले कमल के समान सुन्दर टेढ़ी गर्दन वाले मुख को धारण कर, जाती हुई उस सुन्दर नेत्रों वाली मालती ने एक साथ अमृत तथा विष से बुझा हुआ कटाक्ष (बाण) जैसे मैरे हृदय में खूब गहरा गड़ा दिया हो। जब टेढ़ो गर्दन करके चलती हुई मालती ने मेरी तरफ तिरछी दृष्टि से देखा, तो मुझे आनन्द भी हुआ, तथा पीड़ा भी; मुझे एक साथ अमृत तथा विष से बुझे बाण की चौट का अनुभव हुआ, जैसे मेरा हृदय एक मधुमय पीड़ा का अनुभव कर रहा हो। मधुराज्विचेष्टितं यथा तत्रैव
मसृणमुकुलितानां प्रान्तविस्तारभाजाम्। प्रतिनयननिपाते किश्चिदाकुश्चितानां विविधमहमभूवं पात्रमालोकितानाम् ॥' अङ्गों की मधुर चेष्टाएँ, जैसे मालतीमाधव में ही मालती की मधुर चेष्टाओं का वर्णन- मालती के दृष्टिपातों का मैं अनेक प्रकार से पात्र बना। मेरी ओर कई ढङ्ग से मालती ने देखा। मालती के ये दृष्टिपात कभी बन्द होते थे, और फिर विकसित हो जाते थे, उसकी भौंहों की लताएँ सुशोमित हो रही थीं, तथा उसके वे नेत्र कोमल, स्निग्ध तथा कुछ-कुछ बन्द थे। मालती के वे नेत्रपात कोनों पर विस्तार वाले थे, अर्थात कानों तक फैले हुए नेत्रों के कोनों (कनखियों) से वह देखती थी, एवं प्रत्येक नयनपात के बाद वे कुछ-कुछ आङकुचित हो जाते (सिमट जाते) थे। मालती ने भौहे नचा कर दीर्घ नेत्रों के द्वारा स्निग्ध तथा कभी मन्द होते एवं कभी विकसित होते कटाक्षपात को नाना प्रकार से मेरी ओर किया। ये सत्त्वजा: स्थायिन एव चाष्टौ त्रिंशघयो ये व्यभिचारिणश्च। एकोनपञ्चाशदमी हि भावा युक्त्या निबद्धा: परिपोषयन्ति। (स्थायिनम्) आलस्यमौग्यं मरणं जुगुप्सा
त्रयस्त्रिंशद्यभिचारिणश्चाष्टौ स्थायिन अष्टौ सात्त्विकाश्चेत्येकोनपश्चाशत्। युक्त्या= अज्ञत्वेनोपनिवध्यमाना: शङ्गारं सम्पादयन्ति। आलस्यौ्यजुगुप्सामरणादीन्येकालम्ब- न विभावाश्रयत्वेन साक्षादज्गत्वेन चोपनिबध्यमानानि विरुध्यन्ते। प्रकारान्तरेण चाऽविरोध: प्राक् प्रतिपादित एव। आठ सत्वज (सात्विक) भाव, आठ स्थायी भाव, और तेंतीस व्यभिचारी भावों- इन ४९ भावों-का काव्य में युक्तिपूर्वक निबन्धन शङ्गार की पुष्टि करता है। शङ्गार के अङ्ग रूप में इन ४९ भावों का युक्तियुक्त निबन्धन हो सकता है। किन्तु इस विषय में एक बात ध्यान रखने की है कि आलस्य, औउय तथा मरण नामक सज्जारी तथा
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जुगुप्सा नामक स्थायी का एक ही आलम्बन विभाव को आश्रय बनाकर किया गया उपनि बन्धन विरोधी होता है। तैतीस व्यभिचारी, आठ स्थायी तथा आठ सात्त्विक भाव ये ४९ भाव हैं। युक्ति का अर्थ है अङ्गरूप में उपनिबद्ध होना। अज्गरूप में निबद्ध होने पर ये शरृङ्गार रस की परिपुष्टि करते हैं। आलस्य, औगय, मरण, जुगुप्सा आदि का एक ही आलम्बन विभाव को आश्रय बनाकर निबन्धन, अथवा उन्हें रस का साक्षात् अङ्ग बना देना शरृङ्गार रस के विरुद्ध पड़ता है। अन्य प्रकार से निबन्धन करने पर विरोध नहीं होगा, इसे हम बता चुके हैं। विभागस्तु (शरङ्गारस्थ)- अयोगो विप्रयोगश्च सम्भोगश्रेति स त्रिधा। अयोगविप्रयोगविशेषत्वाद्विप्रलम्भस्यैतत्सामान्याभिघायित्वेन विप्रलम्भशब्द उपच- रितवृत्तिर्मा भूदिति न प्रयुक्त, तथा हि-दत्त्वा सङ्केतमप्राप्तेऽवध्यतिक्रमे साध्येन नायिकान्तरानुसरणाच्च विप्रलम्भशब्दस्य मुख्यप्रयोगो वश्चनार्थत्वात्। शृङ्गार का विवेचन कर लेने पर अब शरङ्गार के विभाजन का उल्लेख करते हैं :- भङ्गार रस तीन प्रकार का होता है :- अयोग, विप्रयोग तथा संयोग। विप्रलम्भ शब्द का प्रयोग इसलिए नहीं किया गया है कि विप्रलम्भ सामान्यतः नायक व नायिका के संयोगाभाव को ही अभिहित करता है। उसके दो विशेष प्रकार पाये जाते हैं-अयोग (जो कि नायक-नायिका में पूर्वानुराग की अवस्था में पाया जाता है), तथा विप्रयोग। विप्रलम्भ शब्द इतना सामान्य है कि कहीं उसका उपचार के द्वारा दूसरा अर्थ 'प्रवश्चनारूप' अर्थ न ले लिया जाय, इसलिए भी अयोग तथा विप्रयोग को अलग अलग बताया गया है। जैसा कि प्रसिद्ध है विप्रलम्भ शब्द का प्रयोग, सङ्केत स्थल पर का वादा करके नायक के न पहुँचने पर तथा नायिका के वहाँ पहुँचने पर नायककृत प्रवञ्चना के लिए देखा जाता है। विप्रलम्भ का मुख्य प्रयोग यही है। इसीलिए ऐसीना यिका को विप्रलब्धा कहते हैं। अतः कहीं यह अर्थ न ले लिया जाय, इसलिए 'विप्रलम्म' शब्द का प्रयोग बचाया गया है। तन्नाऽयोगोनुरागेऽपि नवयोरेकचित्तयोः॥ ५० ॥ पारतन्त्येण दैवाद्ा चिप्रकर्षादसङ्गम:। योगोऽन्योन्यस्वीकारस्तदभावस्त्वयोग :- पारतन्त्र्येण विप्रकर्षाद्दैवपित्राद्यायत्तत्वा-
अयोग शङ्गार की स्थिति वह है, जहाँ दो नवयुवकों (नायक-नायिका) का एक दूसरे के प्रति परस्पर अनुराग होता है, उनका चित्त एक दूसरे के प्रति आकृष्ट रहता है, किन्तु परतन्त्रता (पिता, माता आदि के कारण), या दैव, के कारण वे एक दूसरे से दूर रहते हैं, उनका सङ्कम नहीं हो पाता। अयोग शङ्गार की स्थिति में दोनों में एक दूसरे के प्रति पूर्वानुराग की स्थिति होती है, पर उनका मिलन किन्हीं कारणों से नहीं हो पाता। योग का अर्थ है नायक-नायिका का परस्पर समागम। इस समागम के अभाव को ही अयोग कहते हैं। यह अयोग या तो पिता-आदि के आधीन होने के कारण, परतन्त्र होने के कारण होता है, पित्रादि की अनुमति न होने से यह समागम नहीं हो पाता। जैसे रलावली नाटिका में सागरिका देवी वासवदत्ता के आधीन है, अतः वहाँ दोनों का योग वासवदत्ता की परतन्त्रता
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२६० देशरूपकम् के कारण नहीं हो पाता। मालतीमाधव को मालती पिता के आधीन है, तथा उसके पिता को माशच के कुल से शत्रुता है, अतः वहाँ भी पारतन्त्र्य के कारण प्रारम्भ में अयोग दशा ही रहती है। दैव के कारण नायक-नायिका के अयोग का उदाहरण शिव तथा पार्वती के अयोग को ले सकते हैं, जहाँ शिव के प्रतिज्ञा कर लेने के कारण दैववश दोनों का समागम नहीं हो पाता, जैसा कि कुमारसम्भव के पश्चम सर्ग तक उपनिबद्ध हुआ है। दशावस्थः स तत्रादावभिलाषोऽथ चिन्तनम्॥। ५१॥
जडता मरणं चेति दुरवस्थं यथोत्तरम्॥। ५२।। अभिलाष: स्पृहा तत्र कान्ते सर्वाङ्गसुन्दरे। दष्टे भ्रुते या तत्रापि विष्मयानन्दसाध्वसाः ॥। ५३॥ साक्षात्प्रतिकृतिस्वप्रच्छायामायासु दर्शनम्।
इस अयोग श्रुद्गार की दस अवस्थाएँ होती हैं :- अभिलाष, चिन्तन, स्मृति, गुण- कथा, उ्देग, प्रलाप, उन्माद, संज्वर, जडता तथा मरण। इनकी प्रत्येक उत्तर अवस्था पहले से अधिक तीव्र होती है। अभिलाष वह अवस्था है जब कि सर्वाङ्गसुन्दर नायक के प्रति नायिका की समागमरूप इच्छा उत्पन्न होती है। यह इच्छा उसको साक्षात् देखने पर या उसके चित्र को देखने पर, अथवा उसके विषय में सुनने पर होती है। इस दशा में आश्चर्य, आनन्द, सम्भ्रम आदि भावों की प्रतीति होती। नायक या नायिका का दर्शन साक्षात् रूप से, चित्र के द्वारा, स्वम के द्वारा या इन्द्रजाल आदि माया के द्वारा हो सकता है। अपना वह सखियों आदि के गीत, या मागध आदि के गुणस्तवन के सुमने के बहाने से भी हो सकता है। अभिलाषो यथा शाकुन्तले- असंशयं क्षत्रपरिग्रहक्षमा यदार्यमस्यामभिलाषि मे मनः । सतां हि सन्देहपदेषु वस्तुषु प्रमाणमन्तःकरणप्रवृत्तथः ॥' अभिलाष का उदाहरण, जैसे अभिज्ञान शाकुन्तल में शकुन्तला को देखने पर दुष्यन्त की उसके प्रति इच्छा हो जातो है :- याह सुन्दरी तापसकन्या निःसंदेह क्षत्रिय के द्वारा परिणयन के योग्य है, क्योंकि मेरा पचित्र मन इसके प्रति अभिलाष युक्त हो रहा है। सन्देह के स्थलों में उत्कृष्ट तथा पवित्र चरित्र वाले व्यक्तियों की अन्तःकरण-वृत्तियाँ ही प्रमाण होती हैं। मुझे अब तक इसके विषय में यह सम्देह था कि यह ब्राह्मणकन्या है या क्षत्रियकन्या है। यदि यह ब्राह्मणकन्या होती, तो क्षत्रिय इससे विवाह कर नहीं सकता, पर मेरा मन इसके प्रति अभिलाष युक्त हो रहा है। मेरा मन अत्यधिक पवित्र है, अतः मेरा मन इस बात का प्रमाण है कि यह क्षत्रिय के द्वारा विवाह करने योग्य अवश्य है। विस्मयो यथा- 'स्तन्मवालोक्य तन्वञ्ञयः शिरः कम्पयते युथा। तयोरन्तरनिर्ममां दृष्टिमुत्पाटयनिव ।।' विस्मय (आश्चर्य) का उदाहरण, जैसे- उस कीमल अजों वाली सुन्दरी के स्तनों को देखकर (वह) युवक शिर को कँपाने
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लगता है, मानों उसके स्तनों के बीच में फँसी हुई अपनी दृष्टि को जबर्दस्ती बाहर निकाल रहा हो। उस नायिका के स्तनों का विस्तार-भार तथा उसके द्वारा अनुमित काठिन्य की कल्पना कर, तथा उनके आलिगनयोग्यत्व को जान कर युवक अत्यधिक आश्चर्य चकित हो जाता है, वह आश्चयं से सिर हिलाने लगता है। आनन्दो यथा विद्धशालभजिकायाम्- 'सुधाबद्धप्रासरुपवनचकोर: कवलितां किरञ्ज्योत्स्नामच्छां लवलिफलपाकप्रणयिनीम्। उप प्राकाराग्रं प्रहिणु नयने तर्कय मना- गनाकाशे कोऽयं गलितहरिणः शीतकिरणः ॥' आनन्द, जसे राजशेखर की विद्धशालभजिका नादिका में नायक नायिका को देखकर आनन्दित हो जाता है। इसकी व्यजना नायक की इस उक्ति से हो रही है :- जरा इस परकोठे के अगले हिस्से पर तो दृष्टि डालो। कुछ अनुमान तो लगाओ कि आकाश के बिना ही, उस परकोठे पर बिना हिरण वाला (जिसका हिरण का कलक्क गल गया है), यह चन्द्रमा कौन है। यह चन्द्रमा चारों और स्वच्छ चाँदनी को छिटका रहा है, और लवलीलता के पके फलों के समान श्रेत उस चन्द्रिका को अमृत का ग्रास समझ कर ग्रहण करने बाले. उपवन के चकोरों के द्वारा उसका पान किया गया है। यहाँ नायिका के चन्द्रमा के समान सुन्दर मुखमण्डल को देखकर नायक यह तरक कर रहा है कि आकाश के बिना ही परकोठे पर चन्द्रमा कैसे हो सकता है, और वह भी फिर निष्कलक चन्द्रमा। नायिका के मुख को चन्द्रमा समझ कर तथा उसकी कान्ति को चन्द्रिका समझ कर उपवन के चकोर उसकी ओर टकटकी लगाये हैं, या उसकी कान्ति का पान कर रहे हैं, इसके द्वारा भ्रान्तिमान् अलक्कार की प्रतीति होती है। साध्वसं यथा कुमारसम्भवे- 'तं वीक्ष्य वेपथुमती सरसाङ्गयष्टि- निच्ेपणाय पदमुद्गृतमुद्दहन्ती। मार्गाचलव्यतिकराकुलितेव सिन्धुः शैलाधिराजतनया न ययौ ने तस्थौ।।' सम्भ्रम, जैसे शिव को सामने देखकर कुमारसम्भव में वर्णित पार्वती की दशा- शिव को अपने सामने देखकर सरस अङ्गों वाली हिमालय की पुत्री पार्वती काँपने लग गई। उस स्थान से चले जाने के लिए उठाये हुए एक पैर को धारण करती हुई पार्वती इतनी सम्भ्रान्त हो गई कि वह मार्ग में पर्वंत के द्वारा रोक दिये जाने के कारण चज्जल तथा व्याकुल नदी के समान न तो वहाँ से जा ही सकी न वहाँ ठहर ही सकी। यथा वा 'व्याहता प्रतिवचो न सन्दधे गन्तुमेच्छदवलम्बितांशुका। सेवते स्म शयनं पराङ्मुखी सा तथापि रतये पिनाकिनः ॥I' अथवा, जैसे कुमारसम्भव में ही पार्वती की इस अवस्था का वर्णन- जब शककर उसे पुकारते थे, तो वह उत्तर ही नहीं देती थी, जब शक्कर उसके आँचल को पकड़ लेते थे, तो वह उठकर जाना चाहती थी, और एक शय्या पर सोते समय वह दूसरी ओर मुँह करके सोतों थी। इस तरह यद्यपि वह शक्कर का रतिक्रीडा में विरोध ही करती थी, किन्तु फिर भी इन क्रियाओं के द्वारा शक्कर में रति (अनुराग) को ही उत्पन्न करती थी।
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सानुभावविभावास्तु चिन्ताद्याः पूर्वदर्शिताः। गुणकीतनं तु स्पष्टत्वान्न व्याख्यातम्। चिन्ता आदि का तो हम अनुभाव व विभावों के साथ पूरी तरह वर्णन पहले ही कर चुके हैं। आचार्यों ने प्रायः इन्हीं दश अवस्थाओं का निदर्शन किया है। वैसे इन अवस्थाओं के अनेक प्रकार देखे जा सकते हैं और उनका दर्शन महाकवियों के प्रबन्धों में मिल सकता है। यहाँ गुणकीतन का अलग से लक्षण या व्याख्या नहीं है, इसका कारण यह है कि वह स्पष्ट है। महाकवियों के प्रबन्धों में जो दूसरी दशाएँ पाई जाती है, उनका दि्मात्र निदर्शन यहाँ किया जाता है। दशावस्थत्वमाचायेः प्रायोवृत्या निदर्शितम्॥५४॥
दिच्यात्रं तु- महाकविप्रबन्धेषु दृश्यते तदनन्तता।
दृष्टे श्रुतेऽभिलाषाच्च कि नौत्सुक्यं प्रजायते ॥५६॥ अप्राप्तौ किं न निर्वेदो ग्लानि: किं नातिचिन्तनात्। शेषं प्रच्छन्नकामितादि कामसूत्रादवगन्तव्यम्। क्या प्रिय के दर्शन या श्रवण से जनित अभिलाषा से औत्सुक्य पैदा नहीं होता; प्रिय के न मिलने पर निर्वेद तथा उसके विषय में अत्यधिक चिन्तन से ग्लानि उत्पन्न नहीं होती क्या ? इस तरह अभिलाष दशा में औत्सुक्य, निर्वेद तथा ग्लानि की अवस्था भी पाई जाती है। अयोग की दशा में छिप कर अनुराग किया जाता है, तथा दूसरी जो बातें पाई जाती हैं, उनका ज्ञान वात्स्यायन के कामसूत्र से प्राप्त करना चाहिए। अथ विप्रयोग :- चिप्रयोगस्तु विश्लेषो रूढविस्रम्भयोद्विंधा॥ ५७॥ मानप्रवासमेदेन, मानोऽपि प्रणयेर्ष्ययो:। प्राप्तयोरप्राप्तिर्विप्रयोगस्तस्य द्वौ भेदौ-मानः प्रवासश। मानविप्रयोगोऽपि द्विविध :- प्रणयमान ईर्ष्यामानश्वेति। विप्रयोग या वियोग शुद्धार में नायक तथा नायिका का समागम नहीं होता। यह समागमाभाव एक बार समागम हो लेने के बाद की दशा का है। यह वियोग या तो बहुत अधिक (रूढ) हो सकता है, या खाली प्रेम का ही एक बहाना हो सकता है। इसके अनुसार यह दो तरह का हो जाता है प्रवास रूप वियोग, जो रूढ होता है, जब कि नायक विदेश में होता है, तथा मानरूप वियोग, जब प्रियकृत अपराध के कारण नायिका मान किये बैठी रहती है। मानपरक वियोग या तो प्रेम के कारण होता है, या ईर्ष्या के कारण। मिले हुए नायक नायिका का अलग हो जाना विप्रयोग (वियोग) कहलाता है। इसके दो भेद हैं :- मान तथा प्रवास। मान भी दो तरह का होता है-प्रणयमान तथा र्ईर्ष्यामान। तत्र प्रणयमान: स्यात्कोपावसितयोईयो: ॥५८॥ १. 'कोपावेशितयोः' इति पाठान्तरम्।
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प्रेमपूर्वको वशीकार: प्रणयः, तद्भङ्गो मानः प्रणयमानः स च द्वयोर्नायकयोर्भवति। तत्र नायकस्य यथोत्तररामचरिते- 'अस्मिन्नेव लतागृहे त्वमभवस्तन्मार्गदत्तेक्षणः सा हंसैः कृतकौतुका चिरमभूद्रोदावरीसैकते। आयान्त्या परिदुर्मनायितमिव त्वां वीच्य बद्धस्तया कातर्यादरविन्दकुड्मलनिभो मुग्ध: प्रणामाज्जलि: ॥' नायक नायिका में से एक के या दोनों के कोप युक्त होने पर, क्रुद्ध रहने पर प्रणयमान वाला विप्रयोग होता है। प्रेमपूर्वक दूसरे को वश में करना प्रणय कहलाता है। इस प्रणय को भङ्ग करने वाला मान प्रणयमान कहलाता है। वह नायक तथा नायिका में पाया जाता है। नायक के प्रणयमान का उदाहरण, जैसे उत्तररामचरित के इस पद्य में राम का मान- वनदेवी वासन्ती राम को पुरानी बातें याद दिला रह्दी है। ठीक इसी लताकुअ में तुम सीता के मार्ग को देखते हुए, उसकी प्रतीक्षा कर रहे थे। उधर गोदावरी के तीर पर गई हुई सीता, नदी की रेती पर हंसों से खेलने लग गई थी, और इसीलिए देर हो गई थी। जब वह लौटकर आई तो उसने तुम्हें इस तरह देखा, जैसे तुम क्रुद्ध से हो। इसलिए तुम्हें प्रसन्न करने के लिए उस सीता ने कातरता के साथ कमल की कली के समान हाथों की अज्लि बांध कर तुम्हें भोले ढङ्ग से प्रणाम किया था। नायिकाया यथा श्रीवाक्पतिराजदेवस्य- 'प्रणयकुपितां दृष्ट्वा देवीं ससम्भ्रमविस्मित- स्त्रिभुवनगुरुर्भीत्या सद्यः प्रणाभपरोऽभवत्। नमितशिरसो गङ्गालोके तया चरणाहता- ववतु भवतस्त्र्यक्षस्यैतद्विलक्षमवस्थितम् ॥' नायिका का प्रणयमान, जैसे श्रीवाक्यतिराजदेव के इस पद्य में- तीनों लोकों के पूज्य महादेव ने जब देवी पावती को प्रणयमान के कारण क्रुद्ध देखा, तो वे सम्भ्रम तथा आश्चर्य से युक्त होकर, डर के मारे सिर झुका कर एकदम प्रणाम करने लगे, जिससे पावती प्रसन्न हो जाय। पर महादेव के सिर को नीचा कर लेने पर पार्वती ने गङ्गा (पा्वती की सौत) को देख लिया। तब तो वह और अधिक क्रुद्ध हो गई, तथा उसने अपना चरण महादेव के सिर पर गिराया। इससे महादेव बड़े लज्जित हुए। तीन आँखों वाले महादेव का यह लज्जित होना आप लोगों की रक्षा करे। उभयः प्रणयमानो यथा- 'पणकुविआराण दोह्नवि अलिअपसुत्ताण माणइन्ताणम्।
नायक तथा नायिका दोनों का प्रणयमान, जैसे इस गाथा में- बताओ तो सही, प्रणयमान किये बैठे, झूठे ही सोये हुए, दोनों मानी प्रिय तथा प्रिया में, जिनने बिना हिलते डुलते अपने साँस रोक रक्खे हैं, तथा कानों को एक दूसरे के निःश्ास
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२६४ दुशरूपकम्
को सुनने के लिए, यह जानने के लिए वह सोया है या नहीं, खड़े कर रखे हैं-कौन अधिक मल्ल (जोरदार) है। नायक तथा नायिका दोनों एक सा मान किये बैठे हैं तथा झूठमूठ सो रहे हैं। इस तरह का मान करने में जोरदार कौन है यह निर्णय करना कठिन है, दोनों ह्ी मान करने में बड़े प्रबल हैं। स्त्रीणामीर्ष्याकृतो मान: कोपो ऽन्यासङ्गिनि प्रिये। श्रुते वाऽनुमिते दृष्टे, श्रुतिस्तत्र सखीमुखात्।। ५१ ॥ उत्स्वप्ना यितभोगाङ्कगोत्रस्खलनकल्पित:। त्रिधा ऽनुमानिको, हष्टः साक्षादिन्द्रियगोचरः॥ ६० ॥ ईर्ष्यामान: पुनः स्त्रीणामेव नायिकान्तरसङ्गिनि स्वकान्ते उपलब्धे सत्यन्यासभ्गः श्रुतो वाऽनुमितो दृष्टो वा (यदि) स्यात्। तत्र श्रवणं सखीवचनात्तस्या विश्वास्यत्वाच्च। प्रिय के किसी दूसरी नायिका के प्रति आसक होने पर स्तियों में जो क्रोध होता है, वह ईर्ष्याकृत मान होता है। यह नायक की अन्यासक्ति या तो स्वयं आंखों से देखी हो, अथवा वह अनुमान कर ले ( नायक के शरीर पर परसी सम्भोगादि चिह्न आदि देखकर इसका अनुमान कर ले) अथवा किसी के मुख से सुन लें। इस सम्बन्ध में प्रिय की अन्यासक्ति की श्रति सखी के मुँह से हो सकती है। प्रिय की अन्यासक्ति का अनुमान तीन तरह से हो सकता है-या तो नायक स्वप्न में उस अन्य नायिका का नाम ले ले, या फिर नायिका उसके शरीर पर अन्य स्त्री भोग के चिह्न देख ले, या नायक गलती से ज्येष्ठा को पुकारते समय उस कनिष्ठा का नाम ले बैठे (गोत्र- स्खलित कर बैठे)। उसका अन्य नायिका से प्रेम दृष्टरूप में तब होगा कि जब कि नायिका स्वयं अपने आँखों से देखने, या कानों से उन्हें प्रेमालाप करते हुए सुन ले। ईर्ष्यामान केवल स्त्रियों में ही पाया जाता है (नायकों में नहीं)। नायक को किसी दूसरी नायिका को प्रेम करते देखकर, सुनकर, या अनुमान करके यह र्ईर्ष्यामान होता है। इसमें सुनना सखी के वचनों से होगा, क्योंकि सखी विश्वस्त होती है, इसलिए झूठ नहीं कह सकती। यथा ममैव- 'सुभ्रु त्वं नवनीतकल्पहृदया केनापि दुर्मन्त्रिणा मिथ्यैव प्रियकारिणा मधुमुखेनास्मासु चण्डीकृता। किं त्वेतद्विमृश क्षणं प्रणयिनामेणाक्षि कस्ते हितः किं धात्रीतनया वयं किमु सखी किंवा किमस्मत्सुह्ृत्।।' मानवती नायिका को नायक कह रहा है। हे सुन्दर भौंहें वाली सुन्दरी, बता तो सही • बुरी सलाह देने वाले किस व्यक्ति ने जो बाहर से मीठी मीठी बातें करने वाला है, और झूठे ही तुम्हारा प्रिय करने वाला है, तुम्हारे प्रिय कार्य करने का दिखावा करता है, मक्खन के समान कोमल हृदय वाली तुम्हें हमारे प्रति मानवती (चण्डी) बना दिया है। जरा तुम यह तो सोच लो, कि तुम्हारे सारे प्रिय व्यक्तियों में तुम्हारा सचा हितैषी कौन है-तुम्हारा सच्चा हितैषी, तुम्हारी धाय की लड़की है, या हम हैं, या फिर तुम्हारी सखी है, या हमारे मित्र। उत्स्वप्नायितो यथा रुद्रस्य- 'निर्मम्रेन मयाःम्भसि स्मरभरादाली समालिड्गिता केनालीकमिदं तवाद्य कथितं राधे मुधा ताम्यसि।
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इत्युत्स्वप्नपरम्परासु शयने श्रुत्वा वचः शार्ङ्गिण: सव्याजं शिथिलीकृत: कमलया कण्ठग्रहः पातु चः ॥' उत्स्वप्नायित, जहाँ नायक स्वप्न में परनायिका का नाम ले बैठे, और नायिका उसे सुन ले। जैसे, रुद्र कवि के इस पद् में- पानी में डूबे हुए मैंने काम के बोझे के कारण किसी तरह उस सखी का आलिङ्गन कर लिया था, हे राधे, तुमसे यह झूठी बात कि मेरा प्रेम उस सखी से है, किसने कह दी, तुम बिना बात ही क्यों दुखी हो रही हो। निद्रा के समय स्वप्न में कहे गये विष्णु (कृष्ण) इन वचनों को सुनकर किसी न किसी बहाने से लक्ष्मी (रुक्मिणी) ने अपने हाथ को उनके कण्ठ से हटा लिया, कण्ठग्रह को शिथिल कर दिया। इस तरह से कमला के द्वारा शिथिलित विष्णु का कण्ठग्रह तुम्हारी रक्षा करे। भोगाङ्कानुमितो यथा- 'नवनखपदमवं गोपयस्यंशुकेन स्थगयसि पुनरोष्ठं पाणिना दन्तदष्टम्। प्रतिदिशमपरस्त्रीसङ्गशंसी विसर्पन् नवपरिमलगन्ध: केन शक्यो वरीतुम् ॥।' भोगाक्कानुमित अन्यासक्ति, जैसे शिशुपालबध के एकादश सर्ग के इस पद्य में- कोई नायिका अपराधी नायक के शरीर पर परस्त्री सम्भोग के चिह्न देखकर उसे झिड़कती कह रही है। तुम इस वस्त्र से नायिका के नक्षक्षत से युक्त अङ्ग को छिपा रहे हो; तथा उसके दाँतों से काटे हुए अधरोष्ठ को हाथ से ढक रहे हो। पर यह तो बताओ, अन्य स्त्री सम्भोग की सूचना देता हुआ, चारों दिशाओं में फैलता हुआ यह नवीन सुगन्ध किस ढङ्ग से छिपाया जा सकता है। यह गन्ध ही बता रहा है कि तुम अन्य नायिका का उपभोग करके आ रहे हो। गोत्रस्खलनकल्पितो यथा- 'केलीगोत्तक्खलरो विकुप्पए केअ्परवं त्र्प्र्र्प्राणन्ती। दुट्ठ उतसु परिहासं जाआ सच्चं विशर परुण्णा ।I' ('केलीगोत्रस्खलने विकुप्यति कैतवमजानन्ती। दुष्ट पश्य परिहास जाया सत्यामिव प्ररुदिता ॥।') गोत्रस्खलन के द्वारा अनुमित अन्यासक्ति, जैसे निम्न गाथा में- कोई नायिका नायक के गोत्रस्खलन को सुनकर रोने लगी है। यह देखकर सखी कह रही है। हे अन्यासक्त दुष्ट, मजाक तो देखो, तुम्दारी पत्नी सचमुच की तरह रो रही है क्रीडा के समय तुम्हारे गोत्रस्खलन के कारण, छल को न जानती हुई वह मान कर रही है। दृष्टो यथा श्रीमुजस्य- 'प्रणयकुपितां दृष्ट्वा देवीं ससम्भ्रमविस्मित- स्त्रिभुवनगुरुर्भीत्या सद्यः प्रणामपरोऽभवत्। नमितशिरसो गङ्गालोके तया चरणाहता- ववतु भवतस्त्र्यक्षस्यैतद्विलक्षमवस्थितम्॥।' दृष्ट अन्यासक्ति, जैसे वाक्पतिराज मुज का यह पद्य- तीनों लोकों के पूज्य महादेव ने जब देवी पार्वती को प्रणयमान के कारण कुपित देखा, ३४ द०
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२६६ दशरूपकम् तो वे सम्भ्रम तथा आश्चर्यं से युक्त होकर, डर के मारे सिर झुकाकर, एकदम प्रणाम करने लगे, जिससे पार्वती प्रसन्न हो जाय। पर महादेव के सिर को नीचा कर लेने पर, पार्वती ने गङ्गा (पावती की सौत) को देख लिया। तब तो वह और अधिक कुपित हो गई, तथा उसने अपने चरण को महादेव के सिर पर मार गिराया। इससे महादेव बड़े लज्जित हुए। तीन आँखों वाले महादेव का यह लज्जित होना आप लोगों की रक्षा करे। एषाम्- यथोत्तरं गुरु: षड्भरुपायैस्तमुपाचरेत्। साग्ना भेदेन दानेन नत्युपेक्षारसान्तरैः ॥ ६१॥ एषाम् = श्रुतानुमितदृष्टान्यसङ्गप्रयुक्तानामुक्तानां मानानां मध्ये उत्तरोत्तरं मानो गुरु := क्वेशेन निवार्यो भवतीत्यर्थः । तम्=मानम्। उपाचरेत्=निवारयेत् ॥ ६१॥ तत्र प्रियवचः साम, भेदस्तत्सख्युपार्जनम्। दानं व्याजेन भूषादे, पादयो: पतनं नतिः॥ ६२॥ सामादौ तु परित्षीरो स्यादुपेत्षावधीरणम्। रभसत्रासहर्षादे: कोपभ्रंशो रसान्तरम् ॥ ६३॥ कोपचेष्टाश्च नारीणां प्रागेव प्रतिपादिताः । श्रुत से लेकर दृष्ट अन्यासक्ति तक प्रत्येक परवर्ती प्रमाण से सिद्ध नायक की अन्यासक्ति पूर्ववर्ती से अधिक कठिन होता है। नायिका के इस ईर्ष्यामान को छः तरह से हटाया जा सकता है-साम, भेद, दान, नति (प्रमाण), उपेक्षा, या रसान्तर (अन्य रस के द्वारा)। मधुर प्रिय वचनों का प्रयोग साम नामक उपाय है। उसकी सखी का सहारा लेना भेद है, तथा गहने आदि के बहाने खुश कर लेना दान है। पैरों पर गिरना नति कहलाता है। यदि सामादि चार उपाय काम न करे तो नायिका के प्रति उदासीनता बरतना, उपेक्षा कहलाती है। शीघ्रता में उत्पन्न भय तथा हर्ष आदि के द्वारा कोप को नष्ट कर देना रसान्तर कहलाता है। स्तियों की कोपचेष्टाओं का वर्णन तो हम बता ही चुके हैं। तत्र प्रियवचः साम यथा ममैव- 'स्मितज्योत्स्नाभिस्ते धवलयति विश्वं मुखशशी दशस्ते पीयूषद्रवमिव विमुश्चन्ति परितः। वपुस्ते लावण्यं किरति मधुरं दिक्षु तदिदं कुतस्ते पारुष्यं सुतनु हृदयेनाद् गुणितम् ।।' प्रिय वचनों का प्रयोग साम कहलाता है, जैसे धनिक का स्वयं का यह पद्- हे सुन्दर अङ्गों वाली प्रिये, तेरा मुखरूपी चन्द्रमा सारे संसार को अपनी मुस्कराइट की चाँदनी से श्वेत बना देता है, तेरी दृष्टि जैसे चारों तरफ अमृत का झरना गिराती है, तेरा यह शरीर सब दिशाओं में मधुर सौन्दर्य (लावण्य) को विखेर रहा है। इन सब बातों को देखते आश्चर्य होता है कि आज तेरे हृदय के साथ कठोरता का सम्बन्ध कहाँ से हो गया? यथा वा- 'इन्दीवरेण नयनं मुखमम्बुजेन कुन्देन दन्तमधरं नवपल्लवेन।
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चतुर्थ: प्रकाश: २६७
अज्गानि चम्पकदलैः स विधाय वेघा: कान्ते कथं रचितवानुपलेन चेतः ।I' अथवा, जैसे इस पद्य में- हे सुन्दरी, उस ब्रह्मा ने तेरे नेत्रों को नील कमल से, मुख को लाल कमल से, दाँतों को कुन्द-कली से, अधर को नई लाल कोपल से, तथा अङ्गों को चम्पे की पंखुड़ियों से बनाकर हृदय (चित्त) को पत्थर से कैसे बनाया? नायिकासखीसमावर्जनं भेदो यथा ममैव- 'कृतेऽप्याज्ञाभङ्गे कथमिच मया ते प्रणतयो धृताः स्मित्वा हस्ते विसृजसि रुषं सुभ्रु बहुशः। प्रकोप: कोऽप्यन्यः पुनरयमसीमाद्य गुणितो वृथा यत्र स्न्रिग्धाः प्रियसहचरीणामपि गिरः ॥' नायिका की सखी के द्वारा उसे वश में करने की चेष्टा भेद कहलाता है। भेद का उदाहरण जैसे धनिक का ही निम्न पद्य- नायक मानवती नायिका से कह रहा है। हे सुन्दर भौहों वाली रमणी, आज्ञा का भङ्ग कर देने पर भी मैंने किसी तरह तुम्हें कई बार प्रणाम किया था और तब तुम हँसकर गुस्से को हाथों हाथ छोड़ देती थी। ऐसा अनेकों बार हुआ है। पर इस बार तो पता नहीं, तुम्हारा यह गुस्सा दूसरे ही ढङ्ग का है, यह अत्यधिक बढा चढ़ा तथा निःसीम दिखाई पड़ रहा है, जिस क्रोध में प्रिय सखियों के मधुर स्नेहपूर्ण वचन भी व्यर्थ हो गये हैं। पहले तो मैं चरणों में गिरकर ही तुम्हें खुश कर लिया करता था, पर इस बार तो सखियों का अनुनय भी व्यर्थ हो रही है, पता नहीं आज ऐसी अधिक क्रुद्ध क्यों हो रही हो? दानं व्याजेन भूषादेर्यथा माघे- 'मुहुरुपहसितामिवालिनादै- ्वितरसि नः कलिकां किमर्थमेनाम्। अधिरजनि गतेन धाम्रि तस्या: शठ कलिरेव महांस्त्वयाऽय दत्तः ॥।' आभूषण आदि के बहाने से दान के द्वारा प्रसन्न करने की चेष्टा, जैसे शिशुपावध के सप्तम सर्ग में- कोई नायक रात भर दूसरी नायिका के पास रहा। जब वह लौट कर आया तो नायिका मान किये थी। उसे प्रसन्न करने के लिए वह किसी लता की कलिका को उसको सजाने के लिए देना चाहता है। उसे कलिका देते हुए देख कर ज्येष्ठा नायिका व्यङ्गय सुनाते हुए कह रही है-हे शठ, भँवरों के गुजन से मानों उपहसित (जिसकी हँसी उड़ाई गई है), इस कली को हमें बार-बार क्यों दे रहा है ? अरे दुष्ट, उस नायिका के घर पर रात भर रह कर तूने पहले ही हमें इस महान् दुःख तथा क्लेश को (कलि को) दे दिया है। पादयोः पतनं नतिर्यथा- 'गोउरकोडिविलग्गं चिहुरं दइअस्स पाअपडिअस्स। हिअअं माणपउत्थं उम्मोअं त्ति च्चिअर कहेइ।।' (नूपुरकोटिविलमं चिकुरं दयितस्य पादपतितस्य। ड हृदयं मानपदोत्थमुन्मुक्तमित्येव कथयति॥)
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२६८ दशरूपकम् नायिका के पैरों पर गिरना नति कहलाता है-जैसे इस गाथा में- प्रिया के पैरों पर गिरे हुए, प्रिय के केश, जो प्रिया के नूपुरों में उलझ गये हैं, इस बात की सूचना दे रहे हैं, कि नायिका के मानी हृदय को अब मान से छुटकारा मिल गया है। उपेक्षा तदवधीरणं यथा- 'किं गतेन नहि युक्तमुपैतुं नेश्वरे परुषता सखि साध्वी। आनयैनमनुनीय कथं वा विप्रियाणि जनयन्ननुनेयः ॥' प्रिया के प्रति उदासीनता दर्शाना उपेक्षा कहलाता है, जैसे- किसी नायिका के पास अपराधी प्रिय आता है, पर वह मान किये बैठी है। उसे मनाने के लिए नायक अनेक उपाय करता है, पर व्यर्थ जाते हैं। तब वह वहाँ से उपेक्षा दिखा कर चला जाता है। उसके चले जाने पर नायिका का मान ठण्डा पड़ता है और वह अपनी [सखी (दूती) को उसे बुला कर लाने को कह रही है। वह चला भी गया तो क्या, उसके पास जाना भी ठीक नहीं है, क्योंकि उसने अपराध किया है। पर इतना होने पर भी वह समर्थ है, सब कुछ उचित अनुचित कार्य कर सकता है। इसलिए समर्थ के प्रति कठोरता दिखाना, उसके प्रति अब भी मान किये बैठा रहना, ठीक नहीं है। हे सखि, तुम जाओ और किसी तरह उसे मना कर ले आओ, अथवा हम लोगों का अपराध करने वाले व्यक्ति (नायक) को मनाया भी कैसे जा सकता है? रभसत्रासहर्षादे रसान्तरात्क्रोपभ्रंशो यथा ममैव- 'अभिव्यक्तालीकः सकलविफलोपायविभव- श्विरं ध्वात्वा सदः कृतकृतकसंरम्भनिपुणम् । इतः पृष्ठे पृष्ठे किमिदमिति सन्त्रास्य सहसा कृताश्लेषां धूर्तः स्मितमधुरमालिङ्गति वधूम् ॥।' भय हर्ष आदि के द्वारा किसी दूसरे रस की उत्पत्ति के कारण क्रोध का शान्त होना; जैसे धनिक का यह स्वरचित पद्य- नायक का अपराध प्रकट हो गया है, इसलिए नायिका बड़ा मान किये है। नायक कई प्रकार से उसे मनाने के उपाय करता है, लेकिन वह असफल होता है। इसके बाद वह उसे प्रसन्न करने का कोई तरीका सोचने के लिए बड़ी देर तक सोचविचार करता है। फिर तरीका सोच लेने पर एक दम झूठे डर का बड़ी निपुणता से बहाना करके वह 'यह पीछे क्या है, यह इधर पीछे क्या है' इस तरह नायिका को एक दम डरा देता है। इससे डर कर नायिका उसकी ओर झुकती है, वह मुस्कराइट व मधुरता के साथ आलिङ्गन करती हुई नायिका का आलिक़न करता है। अथ प्रवासविप्रयोग :- कार्यतः सम्भ्रमाच्छापात्प्रवासो भिन्नदेशता॥ ६४॥
स च भावी भचन् भूतस्त्रिधाद्यो बुद्धिपूर्वकः ॥ ६४॥ आयः कार्यज: समुद्रगमनसेवादिकार्यवशप्रवृत्तौ बुद्धिपूर्वकत्वाद्भूतभविष्यद्वर्तमानतया त्रिविध: । अब प्रवासजनित विप्रयोग का लक्षण निबद्ध करते हैं :- किसी काम से, किसी गढ़बड़ी से, या शाप के कारण नायक-नायिका का अलग-
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चतुर्थ: प्रकाश: २६६
अलग रहना, उनका भिन्न-भिन्न देश में स्थित होना, प्रवास विप्रयोग है। इसमें नायक तथा नायिका दोनों ही में अश्रु, निःश्वास, दुर्बलता, बालों का न सँवारे जाने के कारण लम्बा होना, आदि अनुभव पाये जाते हैं। यह प्रवास विप्रयोग तीन तरह का होता है-भावी (भविष्यत्), भवत् (वर्तमान) तथा भूत; जब कि प्रवास होने वाला हो, हो रहा हो, या हो चुका हो। इसमें पहले ढङ्ग का नायक का प्रवास किसी कारण से होता है; जैसे नायक समुद्रयात्रा में गया हो अथवा कहीं नौकरी आदि के लिए विदेश गया हो। यह प्रवास भी बुद्धि के अनुसार तीन तरह का होता है-भूत, भविष्यत् तथा वर्तमानरूप इन्हीं के उदाहरणों को क्रमशः बताते हैं :- तत्र यास्यत्प्रवासो यथा- 'होन्तपहिअ्रस्स जाश्र आउच्छणजीअधारणरहस्सम्। पुच्छन्ती भमइ घरं घरेसु पिशविरहसहिरीआ॥' (भविष्यत्पथिकस्य जाया आयु:क्षणजीवधारणरहस्यम्। पृच्छन्ती भ्रमति गृहाद्गृहेषु प्रियविरहसहीका ॥) पहला उदाहरण यास्यत्प्रवास का है, जब कि प्रिय विदेश गया नहीं है, किन्तु जाने वाला है- प्रिय के भावी विरह की आशक्का से दुखी भावी पथिक की पत्नी पड़ोस के लोगों से पति के चले जाने पर जीवन को धारण करने के रहस्य के बारे में पूछती हुई घर-घर धूम रही है। गच्छत्प्रवासो यथाSमरुशतके- 'प्रहरविरतौ मध्ये वाहस्ततोऽपि परेऽथवा दिनकृते गते वास्तं नाथ त्वमद्य समेष्यसि। इति दिनशतप्राप्यं देशं प्रियस्य यियासतो हरति गमनं बालालापेः सवाष्पगलज्जलैः ॥' गच्छत्प्रवास, जब कि पति विदेश जा रहा है। इसका उदाहरण जैसे अमरुकशतक का यह पध- 'हे नाथ, तुम एक पहर के बाद, या दिन के भध्याह्न में, या अपराह्न में, या सूर्य के अस्त होने तक तो लौट आओगे न,' आँसुओं को गिराते हुए सजल नेत्रों से इस प्रकार के वचन कहती हुई नायिका बड़े दूर (सौ दिन में प्राप्य) देश को जाने की इच्छा वाले प्रिय का जाना रोक रही है। यथा वा तत्रैव- 'देशैरन्तरिता शतैश्र सरितामुर्वीभृतां काननै- यत्नेनापि न याति लोचनपथं कान्तेति जानन्नपि। उद्धीवश्वरणार्घरुद्धवसुध: कृत्वाऽश्रुपूर्णे दशौ तामार्शा पथिकस्तथापि किमपि ध्यात्वा चिरं तिष्ठति ।।' अथवा वहीं अमरुकशतक के निम्न पद्य में- प्रिया अनेकों देशों, सैकड़ों नदी व पहाड़ों वाले जङ्गलों से अन्तर्हित है, और यत् करने पर भी वह दृष्टिगोचर नहीं हो सकती, इस बात को पथिक भलीभाँति जानता है। पर इतना जानने पर भी गरदन ऊँची करके, आँखों में आँसू भरे हुए, तथा आधे चरण के द्वारा पृथ्वी
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२७० दशरूपकम्
को रुद्ध करके (उस ओर आधा पाँव उठाकर) वह प्रवासी नायक उस देश की दिशा की और पता नहीं क्या सोचता हुआ बड़ी देर तक खड़ा रहता है। गतप्रवासो यथा मेघदूते- 'उत्सङ्गे वा मलिनवसने सौम्य निक्षिप्य वीणां मद्गोत्राङ्कं विरचितपदं गेयमुद्रातुकामा। तन्त्रीमार्द्रा नयनसलिलै: सारयित्वा कथंचिद्- भूयो भूयः स्वयमपि कृतां मूर्च्छनां चिस्मरन्ती ॥' आगच्छदागतयोस्तु प्रवासाभावादेष्यत्प्रवासस्य च गतप्रवासाSविशेषात्त्रैविध्यमेव युक्तम्। गतप्रवास, जब प्रिय विदेश चला गया हो, जैसे मेघदूत में- हे मेध, मेरे घर पहुँच कर तुम प्रिया की इस दशा में पाओगे। वह अपनी गौद में या किसी मैले कुचैले कपड़े पर वीणा की रख कर उसके ही द्वारा बनाए हुए मेरे नाम से अक्कित गीत (पद) को गाने की इच्छा कर रही होगी। पर इसी समय उसे मेरी याद आ गई होगी, इसलिए वह रोने लगी होगी। आँसुओं से गीली वीणा को किसी तरह सँवार कर अपने द्वारा बनाये हुये गीत की मूच्छंना को बार-बार भूलती हुई, वह तेरे दृष्टिपथ में अवतरित होगी। कुछ लोग प्रवास के और भी भेद मानते हैं-जैसे आगतपतिका, आगच्छत्पतिका, तथा एष्यत्पतिका। किन्तु ये भेद मानना ठीक नहीं। आगतपतिका तथा आगच्छत्पतिका में प्रवास विप्रयोग का अभाव ही है, क्योंकि संयोग हो चुका है, या हो रहा है। एष्यत्पतिका का समावेश गतप्रवास में हो ही जाता है। अतः प्रवास के तीन भेद मानना ही ठीक जान पड़ता है। द्वितीय: सहसोत्पन्नो दिव्यमानुषचिष्लवात्। उत्पातनिर्धातवातादिजन्यविप्लवात् परचक्रादिजन्यचिप्लवाद्वा बुद्धिपूर्वकत्वादेकरूप एव संभ्रमजः प्रवास: यथोवशीपुरूरवसोर्विक्रमोर्वश्यां यथा च कपालकुण्डलापहृतायां मालत्यां मालतीमाधवयोः । सम्भ्रमजनित प्रवास वह होता है, जहाँ दैवी या मानुषी विप्लव के कारण नायक- नायिका एक दम एक दूसरे से वियुक्तक कर दिये गये हों। उत्पात, बिजली गिरना, तूफान आना आदि की गड़बड़ी से, या किसी दूसरे राजा के आक्रमण से, बुद्धिपूर्वक नियोजित प्रवास सम्भ्रमजनित प्रवास कहलाता है। जैसे विक्रमोर्वशीय में पुरुरवा और उवशी का वियोग, अथवा जैसे मालती के कपालकुण्डला के द्वारा हर लिये जाने पर मालती तथा माधव का वियोग। स्वरूपान्यत्वकरणाच्छ्ापजः सन्निधावपि॥ ६६॥ यथा कादम्बर्या वैशंपायनस्येति। मृते त्वेकत्र यत्रान्यः प्रलपेच्छ्ोक एव सः। व्याश्रयत्वान्न शङ्गारः, प्रत्यापन्ने तु नेतरः ॥ ६७ ॥। यथेन्दुमतीमरणादजस्य करुण एव रघुवंशे, कादम्ब्यों तु प्रथमं करुण आकाशसर- स्वतीवचनादूर्घ्वं प्रवासशर्गार एवेति। १. 'निराश्रयात्' इति पाठान्तरम्।
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चतुर्थ: प्रकाश: २७१
नायक तथा नायिका के समीप होने पर भी जहाँ उनका स्वरूप-उनका स्वभाव या रूप-शाप के कारण बदल दिया जाय, वह शापज प्रवास कहलाता है। जैसे कादम्बरी में शाप के कारण वैशम्पायन (पुण्डरीक) तथा महाश्वेता का वियोग। प्रवास विप्रयोग तथा करुण का भेद बताते हुए कहते हैं-एक व्यक्ति (नायक या नायिका) के मर जाने पर जहाँ दूसरा व्यक्ति प्रलाप करे, वहाँ प्रवास विप्रयोग नहीं माना जा सकता, वहाँ तो शोक भाव तथा करुण रस ही होगा। जब आलम्बन ही विद्यमान नहीं है, तो वहाँ शङ्गार नहीं माना जा सकता है। किन्तु मरण के बाद भी दैवी शक्ति से पुनः जीवित हो जाने पर करुण नहीं होगा। उदाहरण के लिए रघुवंश के अष्टम सर्ग में इन्दुमती के मरने पर अज का विलाप करुण ही है, (प्रवास विप्रयोग नहीं)। कादम्बरी में पहले तो करुण है, किन्तु आकाशवाणी के सुन लेने के बाद पुण्डरीक तथा महाश्वेता का वियोग प्रवास शरृङ्गार ही है। तत्र नायिकां प्रति नियम :- प्रणयायोगयोरुत्का, प्रवासे प्रोषितप्रिया। कलहान्तरितेर्ष्यायां विप्रलब्धा च खण्डिता॥ ६८ ॥ अब इस सम्बन्ध में नायिकाओं के नियम का निबन्धन करते हैं। प्रयणमान में नायिका विरहोत्कण्ठिता होती है। प्रवास विप्रयोग की दशा में वह प्रोषितप्रिया होती है, तथा ईर्ष्यामान वाले विप्रयोग में वह कलहान्तरिता या विप्रलब्धा या खण्डिता होती है। इस तरह विप्रयोग की दशा में नायिका की पाँच प्रकार की अवस्थाओं का निर्देश किया गया है। अथ संभोग :- अनुकूलौ निषेवेते यत्रान्योन्यं चिलासिनौ। दर्शनस्पर्शनादीनि स संभोगो मुदान्वितः ॥६६ ॥ यथोत्तररामचरिते- 'किमपि किमपि मन्दं मन्दमासत्तियोगा- दविरलितकपोलं जल्पतोरक्रमेण। सपुल कपरिरम्भव्यापृतैकैकदोष्णो- रविदितगतयामा रात्रिरेव व्यरंसीत् ।।' अयोग तथा विप्रयोग की विवेचना के बाद अब सम्भोग का लक्षण निबद्ध करते हैं :- जहाँ नायक व नायिका एक दूसरे के अनुकूल होकर, विलासपूर्ण होकर, दर्शन, स्पर्शन आदि का परस्पर उपभोग करते हैं, वहाँ प्रसन्नता तथा उल्लास से युकत सम्भोग होता है। जैसे उत्तररामचरित नाटक में राम तथा सीता का सम्भोग शरृद्गार- हे सीते, तुम्हें याद है यह वही स्थल है, जहाँ हम दोनों एक दूसरे के पास अपने कपोलों को सटाकर सो रहे थे, तथा पता नहीं क्या क्या क्रमरहित (बिना सिलसिले की) बातें कर रहे थे। हमने अपने एक एक हाथ से एक दूसरे को घना आलिङ्गन कर रक्खा था तथा हम पुलकित हो रहे थे। इस तरह एक दूसरों को हाथ से आलिङ्गन कर तथा एक दूसरे के कपील से कपोल सटाकर, सोये हुए तथा बातें करते हुए हमने सारी रात गुजार दी। रात की पहरों के व्यतीत होने की भी खबर हमें न रही कि कितनी रात गुजर चुकी है। इस तरह रात ही गुजर गई, पर हमारी वारतें समाप्त न हुईं।
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२७२ दशरूपकम्
अथवा। 'प्रिये किमेतत्- विनिश्चेतुं शक्यो न सुखमिति वा दुःखमिति बा प्रमोहो निद्रा वा किमु विषविसर्पः किमु मदः। तव स्पर्शे स्पर्शे मम हि परिमूढेन्द्रियगणो विकार: कोऽप्यन्तर्जडयति च तापं च कुरुते ॥' अथवा, जैसे वहीं- हे प्रिये, यह क्या है। मैं इस बात का निर्णय ही नहीं कर पाता कि यह तुम्हारा स्पर्श मेरे लिए सुख है या दुःख, यह मोह है या नींद को बेहोशी है। अथवा तुम्हारा स्पर्श होने पर मेरे शरीर में विष का सव्वार हो रहा है, या कोई नशा फैल रहा है। तुम्हें स्पर्श करने पर, तुम्हारे कर स्पर्श पर, मेरे हृदय में एक विशेष प्रकार का विकार उत्पन्न होता है, जो मेरी इन्द्रियों को निष्क्रिय बना देता है, अन्तस् को जड़ बना देता है, तथा जलन (ताप) उत्पन्न करता है। यथा च ममैच- 'लावण्याभृतवर्षिणि प्रतिदिशं कृष्णागरुश्यामले वर्षाणामिव ते पयोधरभरे तन्वत्ि दूरोनते। नासावंशमनोजकेतकतनुभ्रूपत्रगर्भोल्लस- त्पुष्पश्रीस्तिलकः सहेलमलकैभृज्वैरिवापीयते ॥' अथवा, जैसे धनिक के स्वयं के इस पद्य में- कोई नायक नायिका की यौवनश्री की वृद्धि का वर्णन करता हुआ चाटूक्ति का प्रयोग कर रहा है। हे कोमल अङ्गों वाली सुन्दरी, इर दिशा में लावण्यरूपी अमृत को बरसाने वाले, तथा कृष्णागुरु की पत्र रचना से काले तेरे स्तन का भार खूब उठा हुआ है, जैसे हर दिशा में अमृत के बरसाने वाले काले मैघ (आकाश में) उठ आये हों। तेरे स्तनों के भार के उठ जाने पर ये तेरे बालरूपी भौरे नाकरूपी बांस से अथवा नाक के कारण सुन्दर केतक के समान रङ्ग बाले, भौह्ों की पंखुड़ियों से सुशोभित पुष्प की शोभा वाले इस तिलक-तिलक के समान इस तुम्हारे नाक के तिलक पुष्प के रस का जैसे पान कर रहे हैं। चेष्टास्तत्र प्रवर्तन्ते लीलादा दश योषिताम्। दात्षिण्यमार्दवप्रेम्णामनुरूपाः प्रियं प्रति॥७० ॥ हने ताक् सोदाहृतयो नायकप्रकाशे दर्शिताः। इस सम्भोग शद्धार में नायिकाओं में प्रिय के प्रति लीला, आदि दस चेष्टाएँ पाई जाती हैं। ये चेष्टाएँ दात्तिण्य, मृदुता तथा प्रेम के उपयुक्त होती हैं। इनका विवेचन उदाहरणसहित नायकप्रकाश (द्वितीय प्रकाश) में कर दिया गया है। रमयेच्चाटुकृत्कान्त: कलाक्रीडादिभिश्च ताम्। न ग्राम्यमाचरेत्किंचिन्नर्मभ्रंशकरं न च।। ७१॥। प्राम्यः सम्भोगो रज्े निषिद्धोऽपि काव्येऽपि न कर्तव्य इति पुनर्निषिध्यते। यथा रत्नावल्याम्- 'सपृष्टस्त्वयैष दयिते स्मरपूजाव्यापृतेन हस्तेन। उद्धिन्नापरमृदुतरकिसलय इव लक्ष्यतेऽ्शोकः II' इत्यादि।
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चतुर्थ: प्रकाश: २७३
नायकनायिकाकैशिकीवृत्तिनाटकनाटिका लक्षणाधुक्त कविपरम्परावगतं स्वयमौचित्य- सम्भावनानुगुण्येनोत्प्रेक्षितं चानुसन्दधान: सुकविः शङ्गारमुपनिबघ्नीयात्। नायक को नायिका के साथ कला, क्रीडा आदि साधनों से रमण करना चाहिए। नायक को रमण करते समय उसकी चाटुकारिता करनी चाहिए, तथा कोई भी ऐसा व्यवहार नहीं करना चाहिए जो ग्राम्य हो या नर्म (शङ्गार) को नष्ट करने वाला। ग्राम्य सम्भोग रक्षमन्न पर निषिद्ध है ही पर काव्य में भी निषिद्ध है इसलिए इसका निषेध पुनः किया गया है। शरृद्गार का उपनिबन्धन, जैसे रत्नावली में- 'हे प्रिये वासवदत्ते, कामदेव की पूजा में व्यस्त तेरे हाथ से छुआ हुआ यह अशोक ऐसा मालूम पड़ता है, जैसे इसमें फिर कोई अत्यधिक कोमल किसलय निकल आया हो।' नायक, नायिका, कैशिकी वृत्ति, नाटक, नाटिका आदि के लक्षणों से युक्त, कविपरम्परा के ज्ञात, अथवा कवि के स्वयं के द्वारा औचित्य के अनुसार उपनिबद्ध शृङ्गार का प्रयोग कवि को काव्य में करना चाहिए। अथ वीर :- वीर: प्रतापचिनयाध्यवसायसत्त्व-
उत्साहभू: स च दयारणदानयोगा- ब्रेधा किलात्र मतिगर्वधृतिप्रहर्षाः॥। ७२।। प्रतापविनयादिभिर्विभावितः करुणायुद्धदानादैरनुभावितो गर्वधृतिहर्षामर्षस्मृतिमति- वितर्कप्रभृतिभिर्भावित उत्साहः स्थायी स्वदते=भावकमनोविस्तारानन्दाय प्रभवतीत्येष वीरः। तत्र दयावीरो यथा नागानन्दे जीमूतवाहनस्य, युद्धवीरो वीरचरिते रामस्य, दानचीरः परशुरामबलिप्रभृतीनाम्-'त्यागः सप्तसमुद्रमुद्रितमही निर्व्याजदानावधिः' इति। (वीर रस) प्रताप, विनय, कार्यकुशलता, बल, मोह, अविषाद, नय, विस्मय, तथा शौर्य आदि विभावों से वीर रस की पुष्टि होती है। यह वीर रस उत्साह नामक स्थायी भाव से भावित होता है तथा दयावीर, रणवीर तथा दानवीर इस तरह तीन तरह का होता है। इसमें मति, गर्व, प्ृति तथा प्रहर्ष ये सज्जारी विशेष रूप से पाये जाते हैं। प्रताप विनय आदि विभावों के द्वारा उत्पन्न, करुणा, युद्ध, दान आदि अनुभावों के द्वारा व्यक्त, एवं गर्व, धृति, हष, अमर्ष, स्मृति, मति, वितर्क आदि व्यभिचारी भावों के द्वारा भावित उत्साह स्थायी भाव जब सहृदय के मन का विस्फार कर उन्हें आनन्दित कर, उनके द्वारा आस्वादित होता है, तो वह वीर रस के रूप में परिपुष्ट होता है। दयावीर का उदाहण, जैसे नागानन्द नाटक में जीमूतवाहन की वीरता (दयावीरता); युद्धवीर जैसे महावीरचरित में रामचन्द्र का उत्साह, तथा दानवीर जैसे परशुराम, बलि आदि लोगों का दानसम्बन्धी उत्साह। जैसे परशुराम के लिए राम कहते हैं :- 'सातों समुद्रों तक फैली हुई पृथ्वी को निष्कपटरूप से दान देना आपके त्याग का परिचायक है।' 'खर्वग्रन्थिविमुक्तसन्धि विकसद्वक्षःस्फुरत्कौस्तुभं निर्यन्नाभिस रोजकुड्मलकुटीगम्भीरसामध्वनि। ३५ द०
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२७४ दश रूपकम्
पात्रावाप्तिसमुत्सुकेन बलिना सानन्दमालोकितं पायाद्वः क्रमवर्धमानमहिमाश्चयं मुरारेर्वपुः ।।' दानवीर का ही एक उदाहरण देते हैं :- दानवराज बलि से दान लेते समय भगवान् वामन ने अपने शरीर को विराटरूप में परिवर्तित कर लिया। उनके छोटे छोटे शरीर के जोड़ों की सन्धियाँ खुल पड़ीं, वे लम्बे होने लगे, उनके बढ़ते हुए वक्षःस्थल पर कौस्तुभमणि चमकने लगी, और उनकी नाभि से निकलते हुए कमल के कुड्मल की कुटी से (वहाँ बैठे हुए ब्रह्मा की) गम्भीर वेदगान की ध्वनि सुनाई देने लगी। अपने अनुकूल दानपात्र को पाकर अत्यधिक उत्सुक दानवराज बलि भगवान् विष्णु के शरीर को आनन्द से देखने लगे। इस तरह बलि के द्वारा आनन्दित होकर देखा हुआ, धीरे धीरे बढ़ते हुए महत्व तथा आश्चर्य वाला मुरदैत्य के शत्रु भगवान् विष्णु का विराटरूप शरीर आप लोगों की रक्षा करे। यथा च ममैव- 'लक्षमीपयोधरोत्सङ्गकुङ्कुमारुणितो हरेः। बलिरेष स येनास्य भिक्षापात्रीकृतः करः ॥' विनयादिषु पूर्वमुदादृतमनुसन्धेयम्। प्रतापगुणावर्जनादिनापि वीराणां भावात्त्रैधं प्रायोवादः। प्रस्वेदर क्वदननयनादिक्रोधानुभावरहितो युद्धवीरोऽन्यथा रौद्रः। अथवा जैसे धनिक का स्वयं का पद्य- वह दानवराज बलि हो था, जिसके आगे जाकर विष्णु भगवान् ने अपने उस हाथ को, जो लक्ष्मी के स्तनों के कुङ्कम से अरुण हो गया था, भिक्षा का पात्र बनाया। विनय आदि के उदाहरण हम धीरोदात्त नायक के पक्ष में दे चुके हैं। पुराने विद्वानों के मतानुसार वीर के प्रताप वीर, गुणवीर, आवर्जन वीर आदि भेद भी होते हैं। युद्धवीर वहीं है, जहाँ आश्रय में प्रस्वेद आना, मुंह का लाल हो जाना, नेत्रों का लाल होना आदि क्रोध के अनुभाव न पाये जायँ। यदि ये अनुभाव पाये जायँगे, तो वहाँ वीर रस न होगा, रौद्र रस होगा। अथ बीभत्स :-
रुद्देगी रुधिरान्त्रकीकसवसामांसादिभि: त्ोभण:। वैराग्याज्जघनस्तनादिषु घृणाशुद्धोऽनुभावैर्वृतो नासावक्रविकूणनादिभिरिहावेगार्तिशङ्कादयः॥ ७३॥ अत्यन्ताहृयैः कृमिपूतिगन्धिप्रायविभावरुद्धतो जुगुप्सास्थायिभावपरिपोषणलक्षण उद्देगी बीभत्सः। यथा मालतीमाधवे- 'उत्कृत्योत्कृत्य कृत्तिं प्रथममथ पृथूच्छोथभूयांसि मांसा-
आर्तः पर्यस्तनेत्रः प्रकटितदशनः प्रेतरङ्क: करड्का- दड्कस्थादस्थिसंस्थं स्थपुटगतमपि क्रव्यमव्य्रमत्ति ॥'
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चतुर्थ: प्रकाश: २८५
कृमि (कीड़े), बुरी दुर्गन्ध, वमन आदि विभावों से, जुगुप्सा स्थायी भाव से उत्पन्न होने वाला बीभत्स उद्देगी बीभत्स होता है। खून, अँतड़ियां, हड्डियां, तथा चर्बी व मांस आदि विभावों से चोभण बीभत्स उत्पन्न होता है। जघन, स्तन आदि के प्रति वैराग्य के कारण उत्पन्न घृणा से शुद्ध बीभत्स होता है। बीभत्स रस के अनुभाव नाक को टेढ़ा करना, सिकोड़ना आदि हैं, तथा सज्चारी भाव आवेग, अर्ति, शङ्का, आदि हैं। अत्यधिक बुरे तथा असुन्दर, कीड़े, दुर्गन्ध आदि विभावों के द्वारा उत्पन्न, जुगुप्सा स्थायी भाव की पुष्टि उद्वेगी बीभत्स कहलाता है। जैसे मालतीमाधव के शमशानाङ्क में शमशान के इस वर्णन में- देखो तो सही, यह दरिद्र प्रेत पहले तो शव से चमड़े को उखाड़ रहा है। चमड़े को उखाड़-उखाड़ कर कन्धे, कूल्हे, पीठ आदि के अङ्गों में मजे से प्राप्त, अत्यधिक फूले हुए, बड़ी बुरी दुर्गन्ध वाले, मांस को खा रहा है। उसे खाकर आँखें फैलाता हुआ, यह दीन दरिद्र प्रेत, जिसके दाँत साफ दिखाई दे रहे हैं, अक्क में रक्खे हुए शव से, इड्डी के बीच से निकाले हुए हथेली पर रखे मांस को भी आनन्द से खा रहा है। रुधिरान्त्रकीकसचसामांसादिविभाव: क्षोभणो बीभत्सो यथा वीरचरिते- 'अन्त्रप्रोतबृहत्कपालनलकक्रूर क्वणत्कङ्कण-
पीतोच्छर्दित रक्तकदमघनप्राग्भारघोरोल्लस- द्वयालोलस्तनभारभैरववपुर्बन्धोद्धतं घावति ।।' खून, अँतड़ियाँ, च्बीं, हड्डी, मांस आदि विभावों से क्षोभण बीभत्स उत्पन्न होता है। जैसे महावीरचरित के निम्न पद्य में- राम को देख कर ताड़का राक्षसी उनकी ओर दौड़ती आ रही है। इस पद्य में उसीका वर्णन है। ताड़का राक्षसी ने अँतड़ियों के धागे में बड़े-बड़े कपालों की माला को पो रक्खा है, इन कपालों की नलियों में अत्यधिक भीषण शब्द करते हुए घुँघरू लगे हैं, और उनके हिलने से उन कपालों के भूषणों के शब्द से ताड़का सारे आकाश को शब्दायमान बना रही है। जब ताड़का आती है, तो अँतड़ियों में पोये हुए कपालों को पुँधुरुओं की आवाज सारे आकाश में व्याप्त हो जाती है। (राम को देख कर) वह ताड़का अपने दोनों स्तनों को हिलाती हुई उनकी ओर बड़ी उद्धतता के साथ दौड़ती है। उस समय उसका शरीर, पीकर फिर से उगले हुए खून के कीचड़ से सने हुए अत्यधिक चज्जल स्तनों के बोझ से बड़ा डरावना लगता है। इस तरह डरावने शरीर वाली, ताड़का, आकाश को भूषणों से शब्दित करती हुई बड़ी तेजी से दौड़ रही है।
रम्येष्वपि रमणीजघनस्तनादिषु वैराग्याद्वृणा शुद्धो बीभत्सो यथा :- 'लालां वक्रासवं वेत्ति मांसपिण्डौ पयोधरौ। मांसास्थिकूटं जघनं जनः कामप्रहातुरः ॥' न चायं शान्त एव विरक्त :- यतो बीभत्समानो विरज्यते। रर्माणियों के सुन्दर जघनस्थल तथा स्तन आदि अङ्गों के प्रति वैराग्य के कारण जो घृणा पाई जाती है, वह शुद्ध वीभत्स है, जैसे-
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२७६ दशरूपकम्
काम के द्वारा आविष्ट आतुर व्यक्ति, मुंह की लाला को मुख की मदिरा समझता है, मांस के पिण्डों को स्तन मानता है, तथा मांस और हड्डी के उठे हुए हिस्से को जधन देखा जाय तो रमणियों के कोई अङ्ग सुन्दर नहीं बलकि मांस, हड्डी आदि कुत्सित पदार्थ हैं। इस पद्य में वैराग्य शान्त रस ही नहीं है। वस्तुतः यहाँ पर वीभत्स ही है किन्तु वही तो विराग (वैराग्य) का कारण है। अथ रौद्र :- क्रोधो मत्सरवैरिवैकृतमयेः पोषोऽस्य रौद्रोऽनुजः त्षोभ: स्वाधरदंशकम्पभ्रुकुटिस्वेदास्यरागैर्युतः।
रत्रामर्षमदौ स्मृतिश्चपलतासूयौग्यवेगादयः॥ ७४॥ मात्सर्यविभावो रौद्रो यथा वीरचरिते- त्वं ब्रह्मवर्चसधरो यदि वर्तमानो यद्वा स्वजातिसमयेन धनुर्घरः स्याः। उग्रेण भोस्तव तपस्तपसा दहामि पक्षान्तरस्य सदृशं परशुः करोति।।' (रौद्र रस) मत्सर, अथवा वैरी के द्वारा किये गये अपकार आदि कारणों (विभार्वी) से क्रोध उत्पन्न होता है। इसी क्रोध स्थायी भाव का परिपोष रौद्र रस है, जिसका साथी कषोभ है। शस्त्र को बार-बार चमकाना, बड़ी डीगें मारना, जमीन पर चोट मारना, प्रतिज्ञा करना आदि इसके अनुभाव हैं। रौद्र रस में अमर्ष, मद, स्मृति, चपलता, असूया, औग्न्य, वेग आदि सञ्चारी भाव पाये जाते हैं। मात्सय विभाव से उत्पन्न रौद्र, जैसे महावीरचरित के इस पद्य में (परशुराम की उक्ति है।) अगर तुम ब्रह्मतेज को धारण करने वाले हो, ब्राह्ण हो; अथवा यदि तुम अपनी जाति के व्यवहार के अनुकूल धनुर्धारी बने हो; तो दोनों दशा में मैं तुम्हारे तेज का खण्डन करने में समर्थ हूँ। तुम्हारे तपस्वी ब्राह्मण होने पर; मैं अपने उग्र तप से तुम्हारे तप को जला दूँगा (जलाता हूँ), और तुम धनुर्धारी क्षत्रिय हो तो (दूसरी दशा में) मेरा परशु तुम्हारे उपयुक्त आचरण करेगा। यदि तुम क्षत्रिय हो, तो मैं तुम्हें इस परशु से जीत कर, मौत के घाट उतार दूंगा। वैरिवकृतादिर्यथा वेणीसंहारे- लाक्षागृहानलविषान्नसभाप्रवेशैः प्राशोषु वित्तनिचयेषु च नः प्रहृत्य। आकृष्टपाण्डववधूपरिधानकेशाः स्वस्था भवन्तु मयि जीवति धार्तराष्ट्राः॥ इत्येवमादिविभावैः प्रस्वेद रक्त्तवदननयनाद्यनुभावैरमर्षादिव्यभिचारिभिः क्रोधपरिपोषो रौद्रः, परशुरामभीमसेनदुर्योधनादिव्यव हारेषु वीरचरितवेणीसंहारादेरनुगन्तव्यः।
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चतुर्थ: प्रकाश: २७७
शत्रु के द्वारा कृत अपकार के कारण जनित रौद्र, जैसे वेणीसंहार की भीमसेन की इस उक्ति में- लाक्षागृह में आग लगा कर, विष का भोजन देकर, तथा सभा में अपमान करके हम पाण्डवों के प्राणों पर, तथा सम्पत्ति पर कौरवों ने अत्यधिक प्रहार किया है। यही नहीं, उन्होंने पाण्डवों की पल्नी द्रौपदी के वस्त्र तथा बालों को भी खेचा है। इस प्रकार हमारा अत्यधिक अपकार करने वाले कौरव, मुझ भीमसेन के जिन्दे रहते कुशल कैसे रह सकते हैं ? इस तरह के विभावों के द्वारा जनित, प्रस्वेद, रक्तवदन, रक्तनयन आदि अनुभावों, तथा अमर्ष आदि व्यमिचारियों के द्वारा उत्पन्न क्रोध स्थायी भाव ही परिपुष्ट होकर रौद्र रस बनता है। परशुराम, भीमसेन, दुर्योधन आदि के व्यवहार रौद्र रस के उदाहरण हैं। इनको हम वीरचरित, वेणीसंहार आदि नाटकों में देख सकते हैं। अथ हास्य :- विकृताकृतिवाग्वेषैरात्मनोऽथ परस्य वा। हास: स्यात्परिपोषो ऽस्य हास्यस्त्रिप्रकृतिः स्मृतः ॥ ५७ ॥ आत्मस्थान् विकृतवेषभाषादीन् परस्थान् वा विभावानवलम्बमानो हासस्तत्परिपो- षात्मा हास्यो रसो द्वयधिष्ठानो भवति, स चोत्तममध्यमाधमप्रकृतिभेदात्वडि्विधः। (हास्य रस) स्वयं या दूसरे के आकार, वाणी, तथा वेष में विकार देख कर हास की उत्पत्ति होती है। इस हास स्थायी भाव का परिपोष हास्य रस कहलाता है। इस हास्य रस की तीन प्रकृतियां तीन भेद होते हैं। अपने विकृत वेष, भाषा आदि को, या दूसरे के विकृत वेष, भाषा, आदि को देख कर, इन विभावों के द्वारा जनित स्थायी भाव हास, जब परिपुष्ट होता है, तो हास्य रस होता है। यह हास्य रस उत्तम, मध्यम तथा अधम इन तीन प्रकृतियों के आधार पर वक्ष्यमाण छः रूप वाला होता है। आत्मस्थो यथा रावण :- 'जातं मे परुषेण भस्मरजसा तचचन्दनोदूलनं हारो चक्षसि यज्ञसूत्रमुचितं क्लिष्टा जटा: कुन्तलाः। रुद्राक्षैः सकलैः सरत्नवलयं चित्रांशुकं वल्कलं सीतालोचनहारि कल्पितमहो रम्यं वपुः कामिनः । आत्मस्थ वेषादि का विकार देख कर उत्पन्न हास्य, जैसे रावण की इस उक्ति में- मेरे शरीर पर लगी हुई इस कठोर भस्म से चन्दन की भूषा की गई है। यह तपस्वो का बाना-यज्ञोपवीत-वक्षःस्थल पर हार का काम कर रहा है। ये उलझी हुई लम्बी जटाएँ कोमल कुन्तल हैं। इन सारे रुद्राक्षों से शरीर पर रलों के कड़ों की तुलना की जा सकती है; तथा यह वल्कल वस्त्र सुन्दर रेशमी वस् बना हुआ है। सीता के नेत्रों का आकर्षण करने वाला कितना सुन्दर श्रृङ्गारी (काम सम्बन्धी) वेष कामी रावण ने (मैंने) बना लिया है ? जिस तरह कोई कामी किसी रमणी को आकृष्ट करने के लिए सुन्दर वेषभूषा धारण करता है, ठीक वैसे ही मैंने इस संन्यासी के वेष को बना रक्खा है।
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२७ देशरूपकम्
परस्ो यथा- 'भिक्षो मांसनिषेवणं प्रकुरुषे ? किं तेन मद्यं विना किं ते मद्यमपि प्रियम् ? प्रियमहो वारङ्गानाभि: सह। वेश्या द्रव्यरुचिः कुतस्तव घनम् ? द्ूतेण चौर्येण वा चौर्यद्यूतपरिभ्रहोऽपि भवतो ? नष्टस्य काऽन्या गतिः ?॥' किसी दूसरे व्यक्ति के आकार आदि के विकार को देख कर उत्पन्न हास्य, जैसे निम्न पद्य में- हे भिक्षुक क्या तुम मांस का सेवन करते ही? तो फिर तुम्हारे मध के बिना कैसे काम चलता होगा ? क्या तुम्हें मदिरा भी प्यारी है ? पर मदिरा तो वेश्याओं के सम्पर्क होने पर ही अच्छी लगती है। वेश्याएँ तो पैसे को प्यार करती हैं, धन के प्रति आसक्त रहती है, तुम नङ्गधड़ड मिखारी के पास पैसा कहाँ से आता है ? पैसा तुम्हारे पास या तो जुएँ से आ सकता है, या चोरी से, तुम कोई जीविकोपार्जन का कार्य, व्यवसायादि तो करते नहीं। तुम जैसे भिक्षुक को भी चौरी, जुआरी का व्यसन है क्या ? एक बार (समाज तथा आचरण से) नष्ट व्यक्ति के पास दूसरा चारा ही क्या है? (इस पद्य में प्रश्नोत्तर को एक ही व्यक्ति का माना जा सकता है, या फिर प्रश्न किसी दूसरे का, और उत्तर भिक्षुक का स्वयं का।) स्मितमिह विकासिनयनम्, किश्चिल्लच्यद्विजं तु हसितं स्यात्। मधुरस्वरं विहसितम्, सशिर:कम्पमिदमुपहसितम्॥७६ ॥ अपहसितं सास्राक्षम्, वित्िप्ताङ्गं भवत्यतिहसितम्। दे द्वे हसिते चैषा ज्येष्ठे मध्येऽघमे क्रमशः॥७॥ उत्तमस्य स्वपरस्थविकारदर्शनात् स्मितहसिते, मध्यमस्य विहसितो-पहसिते, अघमस्याSपहसितातिहसिते। उदाहृतयः स्वयमुत्प्रेच्याः। यह हास्य तीन प्रकृतियों के अनुसार छः तरह का होता है। स्मित हास्य वह है, जहां खाली नेत्र ही विकसित हो। हसित वह है, जहाँ दाँत कुछ कुछ नजर आा जायँ। मधुर स्वर में हँसना विहसित कहलाता है, तथा सिर को हिलाकर हँसना उपहसित होता है। आंखों में आँसू भर आवें, इस तरह हँसना अपहसित होता है, तथा अङ्गों को फेंक कर हँसना अतिहसित कहलाता है। इनमें दो दो प्रकार के हसित क्रमशः ज्येष्ठ, मध्यम तथा अधम प्रकृति के होते हैं। अपने व दूसरे के विकार को देखकर स्मित व इसित होना उत्तम हास्य है, विद्दसित तथा उपहसित होना मध्यम है, तथा अपददसित या अतिहसित होना अधम। उदाहरण अपने आप समझे जा सकते हैं। व्यभिचारिणश्षास्य- निद्रालस्यश्रमग्लानिमूर्द्याश्च सहचारिण: (व्यभिचारिण: ) इस हास्य रस के व्यभिचारी निम्न हैं- निद्रा, आलस्य, श्रम, ग्लानि तथा मूर्च्छा ये व्यभिचारी भाव हास स्थायी भाव के सहचर हैं।
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चतुर्थ: प्रकाश: २७६
अथाद्भुतः- अतिलोकैः पदार्थैः स्याद्विस्मयात्मा रसोऽद्भुतः॥७८॥ कर्मास्य साधुवादाश्रुवेपथुस्वेदगद्गदाः। हर्षावगधृतिप्राया भवन्ति व्यभिचारिण: ॥। ७६।। लोकसीमातिवृत्तपदार्थवर्णनादिविभावितः साधुवादाद्यनुभावपरिपुष्टो विस्मय: स्थायिभावो हर्षावेगादिभावितो रसोऽद्ुतः । यथा-
षृद्घारध्वनिरार्यबालचरित प्रस्तावनाडिण्डिमः । द्राक्पर्यस्तकपालसम्पुटमिलद् ब्रह्माण्डभाण्डोदर- भ्राम्यत्पिण्डितचण्डिमा कथमसौ नाद्यापि विश्राम्यति ।' इत्यादि। अन्भुत रस) अलौकिक पदार्थों के दर्शन श्रवणादि से अन्भुत रस उत्पन्न होता है, जो विस्मय नामक स्थायी भाव का परिपोष है। साधुवाद (उस पदार्थ की प्रशंसा करना), आँसू आना, कांपना, गद्गद हो आना, इसके अनुभाव हैं। अद्भुत रस में हर्ष, आवेग, छति आदि व्यभिचारी पाये जाते हैं। लोकसीमा को अतिक्रान्त करने वाले अलौकिक पदार्थ के वर्णन आदि से जनित, साधुवाद आदि अनुभावों के द्वारा परिपुष्ट विस्मय स्थायी भाव हर्ष आदि व्यमिचारियों के सहचर होने पर अद्भुत रस के रूप में परिणत होता है। रामचन्द्र के धनुष तोड़ने पर लक्ष्मण कह रहे हैं। अभी भी आर्यं रामचन्द्र के द्वारा शिवधनुष को तोड़ दिये जाने की टक्कारध्वनि, पता नहीं, क्यों विश्रान्त नहीं हो रही है। राम ने अपने दोनों भुजदण्डों से शिवजी के धनुष को चढ़ाकर उसे तोड़ दिया है और इससे यह टक्कारध्वनि उत्पन्न हुई है। यह ध्वनि ऐसी प्रतीत होती है, जैसे आर्य रामचन्द्र के बालचरित्र की प्रस्तावना का डिण्डिम घोष हो-यह ध्वनि बालक राम में ही इतना बल है, इसकी सूचना दे रही है। इस धनुष की टक्कार ध्वनि दो कपालों के सम्पुट से घने बने हुए इस ब्रह्माण्डरूपी भाण्ड के बीच घूमकर तथा गूँज गूँज कर और अधिक गम्भीर हो गई है। अरथ भयानक :- विकृतस्वरसत्त्वादेर्भयभावो भयानकः। सर्वाङ्गवेपथुस्वेदशोषवैचित्त्यलक्षणः ।। दैन्यसम्भ्रमसम्मोहत्रासादिस्तत्सहोदरः।। द० ।। रौद्रशव्दश्रवणाद्रौद्रसत्त्वदर्शनाच्च भयस्थायिभावप्रभवो भयानको रसः, तत्र सर्वाङ्ग- वेपथुप्रभृतयोऽनुभावाः दन्यादयस्तु व्यभिचारिणः । (भयानक रस) किसी व्यक्ति के स्वर, शरीर, आदि का डरावनापन देखकर भय नामक स्थायी भाव होता है, उसी का परिपोष भयानक रस है। इसके अनुभाव हैं :- सारे शरीर का १. 'वैवर्ण्य-' इत्यपि पाठः।
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२८० दशरूपकम्
कांपना, पसीना छूटना, मुँह सूखना, मुँह का पीला पड़ना, चिन्ता होना आदि। इसमें दैन्य, सम्भ्रम, सम्मोह, त्रास आदि व्यभिचारी पाये जाते हैं, वे इसके सहोदर हैं। रौद्र शब्द के सुनने या रौद्र शरीर के देखने पर जनित मय स्थायी भाव से भयानक रस उत्पन्न होता है। इसमें शरीर का काँपना आदि अनुभाव होते हैं, तथा दैन्य आदि व्यभिचारी। भयानको यथा- 'शस्त्रमेतत्समुत्सृज्य कुब्जीभूय शनैः शनैः। यथातथागतेनैव यदि शक्कोषि गम्यताम् ।।' यथा च रत्नावल्यां प्रागुदाहृतम्-'नष्टं वर्षवरैः' इत्यादि। भयानक का उदाहरण, जैसे इस पद्य से- इस शस्त्र को छोड़कर, धीरे धीरे कुबड़े की तरह दुबक कर, किसी भी तरह यहाँ से जा सको, तो तुम चले जाओ। अथवा, जैसे रत्नावली में बन्दर के वाजिशाला से छूटने पर अन्तःपुर की भगदड़ का वर्णन-'नष्टं वर्षवरः' आदि जिसका उदाहरण पहले दिया जा चुका है। यथा च- 'स्वगेहात्पन्थानं तत उपचितं काननमथो गिरिं तस्मात्सान्द्र द्रुमगहनमस्मादपि गुहाम्।
त्यरातिः क्वालीये तव विजययात्राचकितघीः॥' अथवा, जैसे इस पद्य में- तुम्हारी विजययात्रा से चकित बुद्धिवाला शत्रु राजा डरकर घर से मार्ग पर, मार्ग से घने जङगल में, वहाँ से भी घने पेड़ों से घिरे पर्वत पर, तथा पर्वंत से गुफा में जाकर छिप गया है। वहाँ भी जाकर वह अपने अङ्गों को अङ्गों में समेट लेने पर भी यह नहीं गिन पाता, यह नहीं सोच पाता, कि तुम्हारे डर से कहाँ छिपे। घर से भागते भागते पर्वत की गहन गुफा तक पहुँच जाने पर भी उसका भय नहीं मिटा है, वह अभी तक भी तुम्हारे डर से, कि कहीं विजययात्रा में प्रवृत्त तुम्हारी सेना वहाँ न भी पहुँच जाय, छिपने की ही सोचा करता है। अथ करुण :- इष्टनाशादनिष्टाप्तौ शोकान्मा करुणोऽनु तम्।
विषादजडतोन्मादचिन्ताद्या व्यभिचारिणः॥ दर।। इष्टस्य बन्धुप्रभृतेर्विनाशादनिश्ट्स्य तु बन्धनादे: प्राप्त्या शोकप्रकर्षजः करुणः, तम- न्विति तदनुभावनिःश्वासादिकथनम्, व्यभिचारिणश्च स्वापापस्मारादयः। (करुण रस) इष्ट वस्तु के नाश पर या अनिष्ट वस्तु की प्राप्ति पर उत्पन्न शोक स्थायी भाव की पुष्टि करुण रस है। निःश्वास, उच्छास, रुदित, रतम्भ, प्रलपित आदि इस रस के १. 'आप्तेः' इति पाठान्तरम्।
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चतुर्थः प्रकाश: २८१
अनुभाव हैं। करुण रस में स्वाप, अपस्मार, दैन्य, आधि, मरण, आलस्य, सम्भ्रम, विषाद, जड़ता, उन्माद, चिन्ता आदि व्यभिचारी भाव पाये जाते हैं। इष्ट बान्धव आदि के नाश से, या अनिष्ट, कैद आदि, की प्राप्ति होने से शोक का परिपोष करुण होता है। इसमें उसमें निःश्वासादि अनुभाव तथा स्वाप, अपस्मार आदि व्यभिचारी भाव पाये जाते हैं। इष्टनाशात्करुणो यथा कुमारसंभवे- अयि जीवितनाथ जीवसीत्यभिधायोत्थितया तया पुरः। ददृदशे पुरुषाकृति क्षितौ हरकोपानलभस्म केवलम् ॥' इत्यादि रतिप्रलापः । अनिष्टावाप्तेः सागरिकाया बन्धनाद्यथा रत्नावल्याम्। इष्टनाश से उत्पन्न करुण जैसे कुमारसम्भव के रतिविलाप में- 'हे स्वामी, हे प्राणनाथ, तुम जीवित तो हो न,' इस तरह चिल्ा कर खड़ी हुई रति ने जब सामने देखा, तो महादेव के क्रोधरूपी अभनि से जलाई हुई पुरुष के आकार वाली भर्म को ही पृथ्वी पर पड़ा पाया, उसकी केवल राख भर दिखाई पड़ी। अनिष्ट प्राप्ति से, जैसे रलनावली नाटिका में सागरिका के कैद हो जाने से। प्रीतिभक्त्यादयो भावा मृगयात्तादयो रसा:। हर्षोत्साहादिषु स्पष्टमन्तर्भावान्न कीर्तिताः॥।न३।। स्पष्टम्। षट्तिंश ्ूषणादीनि सामादीन्येकविंशतिः। लक्ष्यसंध्यन्तराख्यानि सालङ्कारेषु तेषु च ॥। द४ ॥ 'विभूषणं चाक्षरसंहतिश्व शोभाभिमानौ गुणकीर्तनं च' इत्येवमादीनि षट्त्रिंशत् (विभूषणादीनि) काव्यलक्षणानि 'साम भेद: प्रदानं च' इत्येवमादीनि संध्यन्तराण्येक- विंशतिरुपमादिष्वलङ्कारेषु हर्षोत्साहादिषु चान्तर्भावान्न पृथगुक्तानि। ।। इति घनअयकृतदशरूपकस्य चतुर्थः प्रकाशः समाप्तः ॥
कुछ लोग प्रीति, भक्ति आदि को स्थायी भाव मानते हैं तथा मृगया, जुआं आदि को रस मानते हैं। इनका समावेश हर्ष, उत्साह आदि स्थायी भावों में हो ही जाता है। अतः इनका पृथक विवेचन करना ठीक नहीं समझा गया है। काव्य के ३६ भूषणों; २१ प्रकार के साम, भेद आदि सन्ध्यन्तरों आदि का भी अलग से विवेचन तथा लक्षण नहीं किया गया है। इसका कारण यह है कि अलङ्कारयुक्त हर्षोस्साहादि भावों में ही इनका भी समावेश हो जाता है। 'भूषण, अक्षरसंहति, शोभा, अभिमान, गुणकीर्तन' आदि ३६ विभूषण, जो कि काव्य- लक्षण भी कहलाते हैं; तथा 'साम, भेद, प्रदान' आदि २१ सन्ध्यन्तर; इन दोनों का अन्तर्भाव
१. 'लक््मसन्ध्यन्तराख्यानि' इत्यपि पाठः । ३६ द०
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दशरूपकम्
उपमादि अलङ्कारों में तथा हर्षोत्साह आदि भावों में हो जाता है। इसलिए इनका वर्णन अलग से नहीं किया गया है। रम्यं जुगुप्सितमुदारमथापि नीच- मुग्रं प्रसादि गहनं विकृतं च वस्तु। यद्ाष्यचस्तु कविभावकभाव्यमानं तन्नास्ति यन्न रसभावमुपैति लोके ॥। ८५॥ विष्णो: सुतेनापि धनञ्जयेन विद्वन्मनोरागनिबन्धहेतु:। आविष्कृतं मुअमहीशगोष्ठीवैदग्धभाजा दशरूपमेतत्॥ दद ॥ सुन्दर या घृणित, उदार या नीच, उग्र या प्रसन्न, गम्भीर या विकृत, किसी भी ढङ्ग की ऐसी कोई भी वस्तु इस संसार में नहीं है, जिसे कवि की भावना प्राप्त होने पर, वह रस तथा भाव को प्राप्त न हो सके। मुख्जराज की सभा में कुशलता को प्राप्त करने वाले, विष्णु के पुत्र, धनज्जय ने, पण्डितों के मन को प्रसन्नता व प्रेम से निबद्ध करने वाले, इस दशरूप को आविष्कृत किया।
चतुर्थः प्रकाशः समाप्त:
-00,000-
यं प्रासूत पतित्रता वतयुतं घीसीति नाम्नी मुदा, तीव्रज्ञाननिधे: शिवोपपदभाग्दत्तांदू द्विजेष्वग्रिमात्। भोलाशङ्करनामकेन विदुषा सज्ाव्यशास्त्रे नवा, व्याख्या श्रीदशरूपकस्य रचिता, विद्वन्मुदे जायताम्।।
मुखचन्द्रगगननयने (२०११) वर्षे काश्यां च कार्तिके मासि। दर्श दीपावल्यां सैषा पूर्ति गता व्याख्या।
समाप्तोऽयं ग्रन्थः।
-००0२00
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शोक: पृष्ठम् शोकः पृष्ठम् अकृपणमतिः कामं जीव्यात् ६३ अच्छिनं नयनाम्बु आ्रसादितप्रकट निर्मल- १४५, १४८ २०६ अण्णहुणाहुमहेलिअ आहूतस्याभिषेकाय ७९, ९३ २११ अन्नान्तरे किमपि वाग्चिभव- इन्दीवरेण नयनम् २६६ १२४ अधेव किं न विसृजेयमहम् इयं गेहे लक्ष्मीरियममृत- १५३ ५२ अद्धैतं सुखदुःखयो: इयं सा लोलाक्षी त्रिभुवन- २१३ ८८ ८६ अनाघ्ातं पुष्पं किसलय- उचितः प्रणयो वरं विहन्तुं १२१ उच्छसन्मण्डलप्रान्त ९७ अन्न्नप्रोतबृहत्कपाल- २७५ अन्त्रः स्वैरपि संयताग्रचरण: १७९ ९१ अन्त्न: कल्पितमङ्गल- उत्कृत्योत्कृत्य कृत्तिम् २७४ २१३ अन्यासु तावदुपमद- उत्कृत्योत्कृत्य गर्भानपि १९० २०८ ९१ अन्योन्यास्फालभिन्नद्विप- उत्तालताडकोत्पातदशने २६ अप्रतिष्ठमविश्रान्तं उत्तिष्ठ दूति यामो यामो ११४ २३२ अप्रियाणि करोत्येष उत्पत्तिर्जमदभितः ५२ ७४
अभिव्यकालीकः १३३, २६८ उत्सङ्गे वा मलिनवसने २७०
अभ्युद्धते शशिनि १२५ उद्दामोत्कलिकाम्
अभ्युन्नतस्तनमुरो नयने १०३ उन्मीलद्वदनेन्दुदीप्ति- १२२
अयमुदयति चन्द्रः १७९ उपोढरागेण विलोलतारकम् १३४
अयि जीवितनाथ जीवसि २८१ उरसि निहितस्तारो हार: ११५
अचिष्मन्ति विदार्य १५५ एकत्रासनसंस्थिति: १०५
अर्थित्वे प्रकटीकृतेऽपि एकं ध्याननिमीलनान्मुकु- १९१ २१३
अलसलुलित मुग्धान्यध्व- १८६ एकेनाचणा प्रविततरुषा २१४ एकत्तो रुअप्इ पिश्र्रा २१२ २५५ असंशयं क्षत्रपरिप्रह- एतां पश्य पुरःस्थलीमिह ९१ २६० एते वयममी दारा: ९५ असूत सद: कुसुमान्यशोक: २५५ अस्तमितविषयसङ्गा एवंचादिनि देवर्षौ २०५ १९१ १८८ अस्तापास्तसमस्तभासि एचमालि निगहीतसाध्वसम् १९ २०३ अस्मिन्नेव लतागृहे एह्येहि वत्स रघुनन्दन २६३ १४५ अस्याः सर्गविधौ औत्सुक्येन कृतत्वरा १७८ कः समुचिताभिषेकादार्य २०५ आागच्छागच्छ सज्जम् २०१ कण्ठे कृत्तावशेषम् १३८ आताम्रतामपनयामि ४१ कपोले जानक्याः ९३ आत्मानमालोक्य च २०७ कणदुःशासनवघात् ४६ आदृष्टिप्रसरात्प्रियस्य ११४ कर्णापितो रोध्रकषायरूक्षे १२५ आनन्दाय च विस्मयाय १३५ कर्ता दूतच्छलानाम् १५२ आयस्ता कलहं पुरेव १०६ कस्त्वं भो: कथयामि १८४ आयाते दयिते १८९ का त्वं शुभे कस्य ७५ आलापान्म्रूविलास: ९९ कान्ते तल्पमुपागते १०४ आशस्त्रप्रहणादकुण्ठ परशो- २९ १५० आश्छिष्टभूमिं रसितारमुच: का श्लाध्या गुणिनाम् १९९ किं लोभेन चिलङ्गितः २०५
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[ २८४ ]
शलोक: पृष्ठम् शलोकः पृष्ठम्
किं गतेन नहि युक्त- २६८ तह दिठ्ठं तह भणिअं १२४
किं धरणीए मित्रङ्को ५१ तां प्राङ्मुखीं तत्र निवेश्य १२१
किमपि किमपि मन्दम् २७१ ताव च्चत्र रइसमए १००
कुलबालिआए पेच्छह ९६ तावन्तस्ते महात्मान: १८८
कृतगुरुमहदादिक्षोभ- ६० तिष्ठन्भाति पितु: पुरः ७९
कृतेऽप्याज्ञाभज्ज २६७ तीर्णे भीष्ममहोदधौ ४४
कृशाश्वान्तेवासी जयति ६८ तीव्र: स्मरसंताप: ३८
कृष्टा केशेषु भार्या ५२ तीव्राभिषज्जप्रभवेन १९९
केलीगोत्तक्खलरो २६५ तेनोदितं वदति याति १२४
कैलासोद्धारसार- ८३ त्यक्त्वोत्थितः सरभसम् ४९
कोपात्कोमललोलबाहु- १०६ त्याग: सप्तसमुद्रमुद्रितमही- २७३
कोऽपि सिंहासनस्याध: १५० त्रय्यास्ाता यस्तवायम् ७५
कोपो यत्र भ्रुकुटिरचन, १०६ त्रस्यन्ती चलशफरी १९१
क्रोधन्धैर्यस्य मोक्षात् ६२ ८३
· क्वचित्ताम्बूलाक्तः १०४ त्वचं कर्ण: शिबिर्मासम् ७४
क्षिप्तो हस्तावलग्नः २०३ त्वं जीवितं त्वमसि मे १५२
खर्वग्रन्थिविमुक्तसन्धि- २७३ त्वं ब्रह्मवचेसधरः २७६
गमनमलसं शून्या दृष्टिः १३४ दाक्षिण्यं नाम बिम्बोष्ठि ११६
चक्षुलुप्तमषीकणम् २५६ दिशहं खु दुक्खिआए १२३
२२, ५६ दीर्घाक्षं शरदिन्दुकान्ति २५७
चलति कथंचित्पृष्टा २०० दुःशासनस्य हृदयक्षतजा २७
चाणक्यनाम्ना तेनाथ ७२ दुल्लहजणाणुराओ्र लज्जा २९
चित्रवर्तिन्यपि नृते १२६ दूराहचीयो धरणीधराभम् १८६
चिररतिपरिखेदप्राप्तनिद्रा १९८ दृष्टिं हे प्रतिवेशिनि १०८
चूर्णिताशेषकौरव्यः ५४ दृष्टिः सालसतां बिभर्ति ९७, ११९
जगति जयिनस्ते ते २५६ दृष्टिस्तृणीकृतजगत्रयसत्त्वसारा ९३
जं किं पि पेच्छमाणं १२० दृष्ट्वकासनसंस्थिते प्रियतमे १०७, १३४ जन्मेन्दोरमले कुले ४९ देआ पसिअ णिअन्तसु १२३
जातं मे पुरुषेण भस्म २७७ देव्या मद्दचनादयथा ५४
जीयन्ते जयिनोऽपि १३८ देवे वर्षत्यशनपचन- २०२
ज्ञातिप्रीतिर्मनसि न कृता ४८ देशरन्तरिता शतश्र २६९
ज्वलतु गगने रात्रौ रात्रौ १२४ दोदण्डाश्चितचन्द्रशेखर- २७९
रोउरकोडिविलग्गं २६७ द्रक्त्यन्ति न चिरात्सुप्तम् ५२, १५३
तं वीचय वेपथुमती २६१ द्वीपादन्यस्मादपि १२, १७, १४४
तं च्चित्रर वञ्रणं ते च्चेत्र्प्र १२० धृतायुधो यावदहम् ४१
तत उदयगिरेरिचैक एव ७८ न खलु वयममुष्य १०१
ततश्वाभिज्ञाय १९२ न च मेऽवगच्छति यथा ११५
तथा व्रीडाविधेयापि १२३ न जाने संमुखायाते १०४
तदवितथमवादीरयन्मम १३२ नन्वेष राक्षसपतेः रखलितः २०७
तनुत्राणं तनुत्राणं २०१ न पण्डिता: साहसिका: २००
तवास्मि गीतरागे १४५ न मध्ये संस्कारम् SS
सह ऋत्ति से पश्नत्ता १२० नवजलधरः सन्नद्धोऽयम् २०६
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[ २८५ ]
शोक: पृष्ठम् शोकः पृष्ठम् नवनखपद्मङ्गम् ११३, १७४, २६५ ब्राह्मणातिक्रमत्यागः ८३, १९४ नष्टं वर्षवरैमनुष्यगणना १३८ ब्रूत नूतनकूष्माण्ड- • ९४ नान्दीपदानि रतिनाटक- १२७ भम घम्मिअ वीसद्धो २२८ निःश्वासा वदनं दहन्ति ११३ भिक्षो मांसनिषेचणम् २७८ निजपाणिपल्लवतटस्खलनात् ११२ भुक्ता हि मया गिरय: निद्राघमीलित दृशो १९० भूमौ क्षिप्त्वा शरीरम् १५६ ५८ निर्मग्नेन मयाऽम्भसि २६४ भूयः परिभवक्कान्ति- २३ निर्वाणवैरिदहनाः १४७ २५७ नूनं तेनाद वीरेण भूयो भूय: सविधनगरी- ५१ १२३ न्यक्कारो ह्ययमेव मे यदरयः भ्रूभज्ग सहसोद्गता १८४ मखशतपरिपूतं गोत्र- ५०, ७८ पद्तमाप्रग्रथिताश्रुबिन्दु- १९० मज्फ पटण्णा एसा ५१ पञ्चानां मन्यसेऽस्माकम्- ४६ मत्तानां कुसुमरसेन मथ्नामि कौरवशतं समरे १५१ पटालग्ने पत्यौ नमयति १९८ २१ पणअरकुविश्राण दोहवि २६३ मधु द्विरेफ: कुसुमकपात्रे पत्युः शिरश्न्द्रकलामनेन १३१ मध्याहं गमय त्यज श्रमजलम् २२५
परिच्युतस्तत्कुचकुम्भमध्यात् १३२ ३२ परिषदियमृषीणामेष मन्थायस्तार्णवाम्भ: ३४ पशुपतिरपि तान्यहानि मनोजातिरनाधीनां १९
२०८ १४९
पादाङ्गुष्टेन भूमिम् महु एहि किं णिचालअ १२८ ११८
पित्रोर्विधातुं शुश्रूषाम् मा गर्वमुद्दह कपोलतले ८० ११२
पुण्या ब्राह्मणजातिः मातः कं हृदये निधाय ८३ १२६
पुरस्तन्व्या गोत्रस्खलन- मात्सयमुत्साय विचार्य १९२ २१२ मुनिरयमथ चीरस्तादृश: ५३ मुहऊ सामलि होई १९३ पूर्यन्तां सलिलेन १८२ पौलस्त्यपीनभुजसंपदु- २०२ मुहुरुपहसितामिवालिनादैः २६७ प्रणयकुपितां दृष्ट्वा मृगरूपं परित्यज्य २०२ देवीम् १७३, १७४, २६३, २६५ मृगशिशुद्दशस्तस्याः ११७ प्रणयविशदां दृष्टिं वक्त्रे ३७ मेदश्छेदकृशोदर लघु मैनाक: किमयं रुणद्धि १५७ प्रथमजनिते बाला मन्यौ ९८ १९४ प्रयत्नपरिबोधित: ४१ २४ प्रसीदत्यालोके किमपि ८६ यदि परगुणा न क्षम्यन्ते १९२ प्रसीदेति ब्रूयामिदमसति ३३ य दूब्रह्मवादिभिरुपासित- ७३ प्रहरकमपनीय १९७ यद्यत्प्रयोगविषये ७६ प्रहरविरतौ मध्येवाह्नः २६९ यद्विस्मयस्तिमितम् २३ प्राप्ताः श्रियः सकलकाम- १८३ प्राप्ता कथमपि दैवात् यातु यातु किमनेन १०२ ३२ यातो विक्रमबाहुरात्म- ६१ प्राप्य मन्मथरसादति- १८७ यातोऽस्मि पद्मनयने ८ प्रायश्चित्तं चरिष्यामि १९४, ९३ यान्त्या मुहुवलितकन्धर- २२ प्रारब्धां तरुपुत्रकेषु २०१ युष्मच्छासनलङ्गनाम्भसि १९३ प्रारभ्यते न खलु ७६ ये चत्वारो दिनकर- ७६ १२, १४, १८ येनावृत्य मुखानि ४७ बाले नाथ विमुश् १०१ ये बाहवो न युधि १८४ बाह्योबलं न विदितम् ७५ योगानन्दयशः शेषे ७२
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[ २=६ ]
रक्षो नाहं न भूतम् ५५ श्रुत्वायातं बहिः कान्तम् १२५
रण्डा चण्डा दिक्खिदा १५१ शाध्याशेषतनुं सुदर्शनकरः २१८
रतिक्रीडाद्यूते कथमपि १२६ सकलरिपुजयाशा ५४, १५३
राज्ञो विपद्वन्धुवियोगदुःखम् १८४ सखि स विजितो वीणा ११३
राज्यं निर्जितशत्रु- ७७, १८७ सच्चं जाणइ दहठ सरि ११७
राम राम नयनाभिर म ७४ सच्छिन्नबन्धद्रुतयुग्यशून्यम् २०४
रामो मूर्ति निधाय १४४ सततमनिवृतमानसम् १५७
२७२ सदश्छिन्नशिर: १८८
लघुनि तृणकुटीरे १९६ सन्तः सच्चरितोदयव्यसनिनः १५७
लज्जापज्जत्तप साहणाइं ९६ लाक्षागृहानलचिषान्न- सभ्रूभञ्जं करकिसलया १४८,२७६ १२८ समारूढा प्रीतिः ३९ लाक्षालच्म ललांटपट्टम् ८७ १९५ लालां चक्त्रासवं वेतति संप्राप्तेडवधिवासरे २७५ लावण्यकान्तिपरिपूरित- सरसिजमनुविद्धम् १२२ २२९ सत्याजं तिलकालकान १२७
लावण्यमन्मथविलास- ९४ सव्याजैः शपथैः प्रियेण ४८
लावण्यामृतवर्षिणि २७२ लीनेव प्रतिबिम्बितेव सहभृत्यगणं सवान्धवम् २६ १९५
लुलितनयनतारा: सहसा विदधीत न क्रियाम् १८५ २०० सालोए चिअर सूरे १३२
वत्सस्याभयवारिधे: २०३ सुधाबद्धप्रासरुपवनचकोरै: २६१
चयमिह परितुष्टाः १८७ सुभ्र त्वं नवनीतकल्पहृदया २६४
चाताहतं वसनमाकुलमुत्तरीयम् २०१ स्तनतटमिदमुत्तुङ्गम् १०३
२०८ स्तनावालोक्य तन्वक्या: २६०
विनिश्चेतुं शक्य: १९९, २७२ स्तिमितविकसितानाम् २५८
विरम विरम वहे २०४ स्नाता तिष्ठति कुन्तलेश्वरसुता ८८
विरोधो विश्रान्तः प्रसरति ४८ स्पृष्टस्त्वयेष दयिते २७२
विवृण्वती शैलसुतापि २२८ ७४ , ९१
विसटज सुन्दरि १३३ स्मरदवथुनिमित्तं गूढम् १२६
विस्तारी स्तनभार एष- ९७ स्मरनचनदीपूरेणोढा वृद्धास्ते न विचारणीय- ४७ स्मरसि सुतनुं तस्मिन् २५३
वृद्धोऽन्धः पतिरेष मश्चक- १८९ स्मितज्योत्स्नाभिस्ते २६६
वेव इसेअदवदनी १८२ स्वगेहात्पन्थानं तत- २८०
२५४ स्वसुखनिरभिलाष: ८०
व्याहता प्रतिवचो न २६१ स्वेदाम्भ: कणिकाश्चिते १०२
शठाऽन्यस्या: काश्चीमणि- ८६ हंस प्रयच्छ मे कान्ताम् १५६
शस्त्रप्रयोगखुरलीकलहे १३५ हरस्तु किश्चित्परिलुप्तधैर्य: ११९
शस्त्रमेतत्समुत्सज्य २८0 हर्म्याणां हेमशङ्गश्रियमिच ४७
शास्त्रेषु निष्ठा सहजश्ष ११७ हसिअ्मविआ्रारमुद्धं ९६
शिरामुखैः स्यन्दत एव ७९, ९५ हस्तैरन्तर्निहितवचनेः २५४
शीतांशुर्मुखमुत्पले ३९ हावहारि हसितं वचनानाम् १९६
शोकं स्त्रीवन्नयनसलिले: ५२ हन्ममभेदिपतदुत्कटकड्क- १९६
श्रीरेषा पाणिरप्यस्याः ३३ हेरम्बदन्तमुसलोल्लिखितैक- १३६
श्रीहर्षो निपुणः कविः १४६ होन्तपहिअ्रस्स जाश्र २६९
श्रुताप्सरोगीतिरपि ११८ हिया सर्वस्यासौ हरति १८६-
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आधुनिक परीक्षोपयोगी ग्रन्थ-
१ साहित्यदर्पण-अतिमनोरम हिन्दी व्याख्या, शब्दानुवाद, पदकृत्य, भाष्य-चक्तव्य, टिप्पणी (नोट्स) सुविस्तृत प्रस्तावना, दर्पण-समीक्षा आदि से सुसंस्कृत राष्ट्रभाषा का बेजोड़ संस्करण प्रेस में २ काव्यप्रकाश-'शशिकला' हिन्दी व्याख्या, विमर्श-टिप्पणी, सुविस्तृत समालोचना आदि आधुनिक विविध विषयों से सुसज्जित । व्याख्याकार- डा० सत्यव्रत सिंह एम० ए०, प्रो० लखनऊ विश्वविद्यालय प्रेस में ३ रसगंगाधर-'चन्द्रिका' संस्कृत टीका, हिन्दी भाष्य, वक्तव्य, सुविस्तृत हिन्दी प्रस्तावना, समीक्षा आदि आधुनिक विषयों से समलंकृत प्रेस में ४ कादम्बरी-चन्द्रकला-विद्योतिनी संस्कृत-हिन्दीटीका, कादम्बरी समीक्षा, महाकवि की जीवनी, कथाधार आदि आधुनिक विषयों से सुसन्जित। जाबाल्याश्रमवर्णनपर्यन्त ३) कथामुखपर्यन्त ३।) पूर्वार्ध पर्यन्त १२।।) ५ शिशुपालवध-मल्लिनाथी तथा 'मणिप्रभा' संस्कृत-हिन्दी टीका, सुविस्तृत हिन्दी समालोचना, कथासार आदि परोक्षोपयोगी विषयों से सुसज्जित १-६ सर्ग २।) सम्पूर्ण प्रेसमें ६ तर्कभाषा-आधुनिक 'तत्त्वालोक' संस्कृत-हिन्दी ठीका सहित १।) ७ तर्कभाषा-'तर्करहस्यदीपिका' हिन्दी व्याख्या, सरकार द्वारा पुरस्कृत ४।।) ८ अर्थसंग्रह-परीक्षोपयोगी 'दीपिका' नामक सुविस्तृत हिन्दी टीका १) ९ वेदान्तसार-'भावबोधिनी' संस्कृत-हिन्दी टीका, टिप्पणी, समालो- चनादि आधुनिक विषयों से सुसज्जित १।) १० सांख्यकारिका-'गौड़पाद भाष्य' टिप्पणी, भाषानुवाद सहित १) ११ प्रस्तावतरङ्गिी-संस्कृत निबन्ध के लिये स्वीकृत पाठ्यप्रन्थ ३) १२ उत्तररामचरित-चन्द्रकला-विद्योतिनी संस्कृत-हिन्दी टीका' नोट्स, समीक्षादि सहित। प्रो० कान्तानाथ शास्त्री एम० ए० ४।।) १३ तर्कामृत-'प्रकाश' संस्कृत-हिन्दी टीका, 'परीक्षासेतु' परिशिष्ट सहित ॥) १४ वृत्तरत्नाकर-'नारायणी-मणिमयी' संस्कृत-हिन्दी टीका ३) १५ वेणीसंहार-प्रबोधिनी-प्रकाश संस्कृत-हिन्दी टीका कथासारादि सहित ३) १६ मृच्छकटिक-'प्रकाश' संस्कृत-हिन्दी टौका प्रो० कान्तानाथ शास्त्री एम. ए. विरचित नवीन निर्धारित समालोचना, नोट्स आदि सहायक विषयों से सुसज्जित सुलभ संस्करण ५) राज संस्करण ६) १७ नैषधकाव्य-जीवातु-मणिप्रभा संस्कृत-हिन्दी टीका समालोचनादि सहित। प्रा० प्रिंसिपल-गवर्नमेंट संस्कृत कालेज बनारस। सम्पूर्ण १३)
प्राप्तिस्थान-चौखम्बा विद्या भवन, चौक, बनारस-१
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नवीन शिक्षापद्धति के अनमोल रन्न- साहित्यदर्पण-अ्तिमनोरम हिन्दी व्याख्या, शब्दानुवाद, पदकृत्य, भाष्य-वक्तव्य, टिप्पणी (नोट्स) सुविस्तृत प्रस्तावना, दर्पण-समीक्षा आदि से सुसंस्कृत राष्ट्रभाषा का बेजोड़ संस्करण प्रेसमें काव्यप्रकाश-'शशिकला' हिन्दी व्याख्या, विमर्श-टिप्पणी, सुविस्तृत समालोचना आदि आधुनिक विविध विषयों से सुसन्जित। व्याख्याकार- डा० सत्यव्रत सिंह एम० ए०, प्रो० लखनऊ विश्वविद्यालय प्रेस में अभिज्ञानशाकुन्तल-प्रो० कान्तानाथ शाख्ररी एम. ए० सम्पादित शाकुन्तल-समीक्षा, कविकी जीवनी, पात्रालोचन, कथासार, नोट्स आदि हिन्दी राष्ट्रभाषा से सुसज्ित 'किशोरकेलि' संस्कृतहिन्दी टीका विभूषित ६) मृच्छकटिक-'प्रकाश' संस्कृत-हिन्दी टीका प्रो० कान्तानाथ शास्त्री एम. ए. विरचित नवीन निर्धारित समालोचना, नोट्स आदि सहायक विषयों से सुसन्जित सुलभ संस्करण ५) राज संस्करण ६) उत्तररामचरित-प्रो. कान्तानाथ शात्री एम. ए संपादित नोट्स सहित 'चन्द्रकला' 'विद्योतिनी' संस्कृट हिन्दी टीका, विस्तृत प्रस्तावना विभूषित ४।।) माहविकाग्निमित्र-'प्रकराश' संस्कृत-हिन्दी टीक्ा, समालोचनादि सहित ३) मालतीमाधव-'चन्द्कला' संस्कृत-हिन्दी टीका, समालोचनादि सहित X) रत्नावली-'प्रकाश' संस्कृत-हिन्दी टीका, समालोचना, नोट्स सहित ३) चिक्रमोर्वशीय-'प्रकाश' संस्कृत-हिन्दी टीका, समालोचना, नोट्स सहित ३) महावीरचरित-'प्रकराश' संस्कृत-हिन्दी टीका " वेणोसंहारनाटक-'प्रयोधिनी' 'प्रकाश' संस्कृत-हिन्दीटीका कथासार " ३) वासवदत्ता-'चपला' संस्कृत हिन्दी टीका प्रस्तावनादि सहित ४ दूताङ्गद-'दूताअद्चन्द्रिका' संस्कृत-हिन्दी टीका प्रस्तावनादि सहित १) नागानन्दनाटक-'भावार्थदीपिका' संस्कृत-हिन्दी टीका " " ३) नाट्यशास्त्र-'मयूख' सुविस्तृत हिन्दी टीका १-२ अच्याय स्वप्रवासवद्त्ता-'प्रबोघिनी' 'प्रकाश' संस्कृत-हिन्दी टीका " २।।।) कादम्वरी-चन्द्रकला-विद्योतिनी संस्कृत-हिन्दी टीका सहित पूर्वार्ध १२।) तर्कभाषा-'तर्करहस्पदीपिका' हिन्दी व्याख्या समालोचनादि सहित वेदान्तसार-भावबोघिनी संस्कृत-हिन्दी टीका समालोचनादि सहित १।।) vII) सांख्यकारिका-संस्कृत टीका, भाषा टीका सहित नैषधमहाकाव्य-'जीवातु' 'प्रबोधिनी' संस्कृत-हिन्दी टीका" 111=) १) १ सर्ग १) १-३ सर्ग २) १-४ सर्ग ३।।) १-९ सर्ग ६) १-२२ सर्ग संपूर्ण १३) प्राप्तिस्थानम्-चौखम्बा विद्या भवन, चौक, बनारस-१