1. Devi Upanishad
Devi Upanishad
[ Sutra 1 ]
सर्वे वे देवा देवीमुपतस्थुः । कासि त्वं महादेवि ॥1॥
sarve ve devā devīmupatasthuḥ । kāsi tvaṃ mahādevi ॥1॥
— Translation from Aurovindo (Hindi) — समस्त देवगण देवी के समक्ष उपस्थित होकर प्रार्थना करते हुए बोले- 'हे महादेवि! आप कौन हैं? कृपा करके बताने का अनुग्रह करें '। तदनन्तर उन (देवी) ने उत्तर दिया-हे देवो! मैं ब्रह्म स्वरूपा हूँ । मेरे द्वारा ही यह प्रकृति-पुरुषात्मक विश्व प्रादुर्भूत हुआ है । (अज्ञानियों के लिए) यह मुझसे शून्य (रहित) तथा (ज्ञानियों के लिए) अशून्य (सहित) है । मैं ही आनन्दस्वरूपा एवं आनन्दरहिता हूँ । मैं विज्ञानमयी एवं विज्ञान -विहीना हूँ । निशय ही में जानने योग्य ब्रह्म एवं ब्रह्म से भी परे हूँ । ऐसा ही अथर्ववेद का यह मंत्र है ॥1॥
— Translation from Dr. A. G. Krishna Warrier — All the gods waited upon the Goddess (and asked): 'Great Goddess, who art Thou? ॥1॥
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[ Sutra 2 ]
साब्रवीदहं ब्रह्मस्वरूपिणी । मत्तः प्रकृतिपुरुषात्मकं जगच्छून्यं चाशून्यं च अहमानन्दानानन्दाः विज्ञानाविज्ञानेऽहम् । ब्रह्मा ब्रह्मणी वेदितव्ये । इत्याहाथर्वणी श्रुतिः ॥2॥
sābravīdahaṃ brahmasvarūpiṇī । mattaḥ prakṛtipuruṣātmakaṃ jagacchūnyaṃ cāśūnyaṃ ca ahamānandānānandāḥ vijñānāvijñāne'ham । brahmā brahmaṇī veditavye। ityāhātharvaṇī śrutiḥ ॥2॥
— Translation from Aurovindo (Hindi) — समस्त देवगण देवी के समक्ष उपस्थित होकर प्रार्थना करते हुए बोले- 'हे महादेवि! आप कौन हैं? कृपा करके बताने का अनुग्रह करें' । तदनन्तर उन (देवी) ने उत्तर दिया-हे देवो! मैं ब्रह्म स्वरूपा हूँ । मेरे द्वारा ही यह प्रकृति-पुरुषात्मक विश्व प्रादुर्भूत हुआ है । (अज्ञानियों के लिए) यह मुझसे शून्य (रहित) तथा (ज्ञानियों के लिए) अशून्य (सहित) है । मैं ही आनन्दस्वरूपा एवं आनन्दरहिता हूँ । मैं विज्ञानमयी एवं विज्ञान -विहीना हूँ । निशय ही में जानने योग्य ब्रह्म एवं ब्रह्म से भी परे हूँ । ऐसा ही अथर्ववेद का यह मंत्र है ॥2॥
— Translation from Dr. A. G. Krishna Warrier — She replied: I am essentially Brahman. From Me (has proceeded) the world comprising Prakriti and Purusha, the void and the Plenum. I am (all forms of) bliss and non-bliss. Knowledge and ignorance are Myself. Brahman and non-Brahman are to be known - says the scripture of the Atharvans ॥2॥
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[ Sutra 3 ]
अहं पञ्च भूतान्यपञ्चभूतानि । अहमखिलं जगत् वेदोऽहमवेदोऽहम् । विद्याहमविद्याहम् । अजाहमनजाहम् । अधश्चोर्ध्वं च तिर्यक्चाहम् ॥3॥
ahaṃ pañca bhūtānyapañcabhūtāni । ahamakhilaṃ jagat vedo'hamavedo'ham । vidyāhamavidyāham । ajāhamanajāham । adhaścordhvaṃ ca tiryakcāham ॥3॥
— Translation from Aurovindo (Hindi) — मैं ही पञ्चीकृत (पाँच तत्त्वों का सम्मिलित रूप) और अपञ्चीकृत (पाँच तत्त्वों का स्वतंत्र रूप) महाभूत भी हूँ । दृष्टिगोचर होने वाला सम्पूर्ण विश्व भी मैं ही हूँ । वेद (ज्ञान) एवं अवेद (अज्ञान) भी मैं हूँ । विद्या और अविद्या भी मैं ही हूँ । अजा (प्रकृति) और अनजा (प्रकृति से भिन्न) भी मैं ही हूँ । ऊर्ध्व एवं अध: और अगल-बगल भी मैं ही हूँ । मैं रुद्रों एवं वसुओं के रूप में सर्वत्र सञ्चरणशील हूँ । मैं आदित्यों एवं विश्वेदेों के रूप में सर्वत्र विचरण किया करती हैं । मैं ही मित्र तथा वरुण का, इन्द्र एवं अग्नि का तथा दोनों अश्विनीकुमारों का सदैव पालन-पोषण किया करती हूँ । मैं ही सोम, पूषा, त्वष्टा एवं भग को भी धारण करती हूँ । मैं ही त्रिलोकी को आक्रान्त करने के लक्ष्य-प्राप्ति हेतु विस्तीर्ण पादक्षेप करने वाले भगवान् विष्णु, ब्रह्मदेव एवं प्रजापति को भी धारण करती हूँ । मैं ही देवताओं को हवि पहुँचाने तथा सावधानी पूर्वक सोमाभिषव करने वाले यजमान के निमित्त हविर्द्रव्यों से सम्पन्न धन को धारण करती हूँ । मैं ही सम्पूर्ण विश्व की अधी श्वरी, उपासकों के लिए धन-प्रदान करने वाली, ज्ञानवती और यजन करने योग्य देवों में प्रमुख हूँ । मैं ही इस विश्व के पितास्वरूप सर्वाधिष्ठानरूप परमात्मा को प्रकट करती हूँ ॥3॥
— Translation from Dr. A. G. Krishna Warrier — I am the five elements as also what is different from them. I am the entire world. I am the Veda as well as what is different from it. I am the unborn; I am the born. Below and above and around am I. ॥3॥
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[ Sutra 4 ]
अहं रुद्रेभिर्वसुभिश्चराम्यहमादित्यैरुत विश्वदेवैः । अहं मित्रावरुणावुभौ बिभर्म्यहमिन्द्राग्नी अहमश्विनावुभौ ॥4॥
ahaṃ rudrebhirvasubhiścarāmyahamādityairuta viśvadevaiḥ । ahaṃ mitrāvaruṇāvubhau bibharmyahamindrāgnī ahamaśvināvubhau ॥4॥
— Translation from Aurovindo (Hindi) — मैं ही पञ्चीकृत (पाँच तत्त्वों का सम्मिलित रूप) और अपञ्चीकृत (पाँच तत्त्वों का स्वतंत्र रूप) महाभूत भी हूँ । दृष्टिगोचर होने वाला सम्पूर्ण विश्व भी मैं ही हूँ । वेद (ज्ञान) एवं अवेद (अज्ञान) भी मैं हूँ । विद्या और अविद्या भी मैं ही हूँ । अजा (प्रकृति) और अनजा (प्रकृति से भिन्न) भी मैं ही हूँ । ऊर्ध्व एवं अध: और अगल-बगल भी मैं ही हूँ । मैं रुद्रों एवं वसुओं के रूप में सर्वत्र सञ्चरणशील हूँ । मैं आदित्यों एवं विश्वेदेों के रूप में सर्वत्र विचरण किया करती हैं । मैं ही मित्र तथा वरुण का, इन्द्र एवं अग्नि का तथा दोनों अश्विनीकुमारों का सदैव पालन-पोषण किया करती हूँ । मैं ही सोम, पूषा, त्वष्टा एवं भग को भी धारण करती हूँ । मैं ही त्रिलोकी को आक्रान्त करने के लक्ष्य-प्राप्ति हेतु विस्तीर्ण पादक्षेप करने वाले भगवान् विष्णु, ब्रह्मदेव एवं प्रजापति को भी धारण करती हूँ । मैं ही देवताओं को हवि पहुँचाने तथा सावधानी पूर्वक सोमाभिषव करने वाले यजमान के निमित्त हविर्द्रव्यों से सम्पन्न धन को धारण करती हूँ । मैं ही सम्पूर्ण विश्व की अधी श्वरी, उपासकों के लिए धन-प्रदान करने वाली, ज्ञानवती और यजन करने योग्य देवों में प्रमुख हूँ । मैं ही इस विश्व के पितास्वरूप सर्वाधिष्ठानरूप परमात्मा को प्रकट करती हूँ ॥4॥
— Translation from Dr. A. G. Krishna Warrier — I move with Rudras and Vasus, with Adityas and Visvedevas. Mitra and Varuna, Indra and Agni, I support, and the two Asvins. ॥4॥
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[ Sutra 5 ]
अहं सोमं त्वष्टारं पूषणं भगं दधाम्यहम् । विष्णमुरुक्रमं ब्रह्माणमुत प्रजापतिं दधामि ॥5॥
ahaṃ somaṃ tvaṣṭāraṃ pūṣaṇaṃ bhagaṃ dadhāmyaham । viṣṇamurukramaṃ brahmāṇamuta prajāpatiṃ dadhāmi ॥5॥
— Translation from Aurovindo (Hindi) — मैं ही पञ्चीकृत (पाँच तत्त्वों का सम्मिलित रूप) और अपञ्चीकृत (पाँच तत्त्वों का स्वतंत्र रूप) महाभूत भी हूँ । दृष्टिगोचर होने वाला सम्पूर्ण विश्व भी मैं ही हूँ । वेद (ज्ञान) एवं अवेद (अज्ञान) भी मैं हूँ । विद्या और अविद्या भी मैं ही हूँ । अजा (प्रकृति) और अनजा (प्रकृति से भिन्न) भी मैं ही हूँ । ऊर्ध्व एवं अध: और अगल-बगल भी मैं ही हूँ । मैं रुद्रों एवं वसुओं के रूप में सर्वत्र सञ्चरणशील हूँ । मैं आदित्यों एवं विश्वेदेों के रूप में सर्वत्र विचरण किया करती हैं । मैं ही मित्र तथा वरुण का, इन्द्र एवं अग्नि का तथा दोनों अश्विनीकुमारों का सदैव पालन-पोषण किया करती हूँ । मैं ही सोम, पूषा, त्वष्टा एवं भग को भी धारण करती हूँ । मैं ही त्रिलोकी को आक्रान्त करने के लक्ष्य-प्राप्ति हेतु विस्तीर्ण पादक्षेप करने वाले भगवान् विष्णु, ब्रह्मदेव एवं प्रजापति को भी धारण करती हूँ । मैं ही देवताओं को हवि पहुँचाने तथा सावधानी पूर्वक सोमाभिषव करने वाले यजमान के निमित्त हविर्द्रव्यों से सम्पन्न धन को धारण करती हूँ । मैं ही सम्पूर्ण विश्व की अधी श्वरी, उपासकों के लिए धन-प्रदान करने वाली, ज्ञानवती और यजन करने योग्य देवों में प्रमुख हूँ । मैं ही इस विश्व के पितास्वरूप सर्वाधिष्ठानरूप परमात्मा को प्रकट करती हूँ ॥5॥
— Translation from Dr. A. G. Krishna Warrier — I uphold Soma, Tvastir, Pusan and Bhaga, The wide-stepping Vishnu, Brahma, Prajapati. ॥5॥
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[ Sutra 6 ]
अहं दधामि द्रविणं हविष्मते सुप्राव्ये३ यजमानाय सुन्वते । अहं राष्ट्री सङ्गमनी वसूनामहं सुवे पितरमस्य मूर्धन् ॥6॥
ahaṃ dadhāmi draviṇaṃ haviṣmate suprāvye3 yajamānāya sunvate । ahaṃ rāṣṭrī saṅgamanī vasūnāmahaṃ suve pitaramasya mūrdhan ॥6॥
— Translation from Aurovindo (Hindi) — मैं ही पञ्चीकृत (पाँच तत्त्वों का सम्मिलित रूप) और अपञ्चीकृत (पाँच तत्त्वों का स्वतंत्र रूप) महाभूत भी हूँ । दृष्टिगोचर होने वाला सम्पूर्ण विश्व भी मैं ही हूँ । वेद (ज्ञान) एवं अवेद (अज्ञान) भी मैं हूँ । विद्या और अविद्या भी मैं ही हूँ । अजा (प्रकृति) और अनजा (प्रकृति से भिन्न) भी मैं ही हूँ । ऊर्ध्व एवं अध: और अगल-बगल भी मैं ही हूँ । मैं रुद्रों एवं वसुओं के रूप में सर्वत्र सञ्चरणशील हूँ । मैं आदित्यों एवं विश्वेदेों के रूप में सर्वत्र विचरण किया करती हैं । मैं ही मित्र तथा वरुण का, इन्द्र एवं अग्नि का तथा दोनों अश्विनीकुमारों का सदैव पालन-पोषण किया करती हूँ । मैं ही सोम, पूषा, त्वष्टा एवं भग को भी धारण करती हूँ । मैं ही त्रिलोकी को आक्रान्त करने के लक्ष्य-प्राप्ति हेतु विस्तीर्ण पादक्षेप करने वाले भगवान् विष्णु, ब्रह्मदेव एवं प्रजापति को भी धारण करती हूँ । मैं ही देवताओं को हवि पहुँचाने तथा सावधानी पूर्वक सोमाभिषव करने वाले यजमान के निमित्त हविर्द्रव्यों से सम्पन्न धन को धारण करती हूँ । मैं ही सम्पूर्ण विश्व की अधी श्वरी, उपासकों के लिए धन-प्रदान करने वाली, ज्ञानवती और यजन करने योग्य देवों में प्रमुख हूँ । मैं ही इस विश्व के पितास्वरूप सर्वाधिष्ठानरूप परमात्मा को प्रकट करती हूँ ॥6॥
— Translation from Dr. A. G. Krishna Warrier — To the zealous sacrificer offering oblation And pressing the Soma-juice do I grant wealth; I am the state, the Bringer of Wealth; Above it all, place I its protector. ॥6॥
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[ Sutra 7 ]
मम योनिरस्वन्तः समुद्रे । य एवं वेद स देवीपदमाप्नोति ॥7॥
mama yonirasvantaḥ samudre । ya evaṃ veda sa devīpadamāpnoti ॥7॥
— Translation from Aurovindo (Hindi) — सभी प्राणियों के हृदय कमल (अन्तः समुद्र) और अप्तत्त्व (सृष्टि के मूल घटक पंचभूतादि) में मेरा निवास स्थान निहित है । जो मनुष्य ऐसा जानता है, वह देवी पद (देवी की विभूतियों) को प्राप्त करता है । इसके पश्चात् देवों ने पुनः निवेदन किया-हे महादेवि! आपको नमस्कार है । महान् प्रख्यात पुरुषों को भी स्वकर्तव्य पथ पर आरूढ़ करने वाली कल्याणमयी महादेवी को सादर नमन-वन्दन है । प्रकृति-स्वरूपा एवं भद्रा अर्थात् कल्याणमयी देवी को प्रणाम है । हम उन महान् देवी को नियमपूर्वक प्रणाम करते हैं ॥7॥
— Translation from Dr. A. G. Krishna Warrier — Whoso knows my essence in the water of the inner sea, Attains he the Goddess's abode. ॥7॥
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[ Sutra 8 ]
ते देवा अब्रुवन् । नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नमः । नमः प्रकृत्यै भद्रायै नियताः प्रणताः स्म ताम् ॥8॥
te devā abruvan । namo devyai mahādevyai śivāyai satataṃ namaḥ । namaḥ prakṛtyai bhadrāyai niyatāḥ praṇatāḥ sma tām ॥8॥
— Translation from Aurovindo (Hindi) — सभी प्राणियों के हृदय कमल (अन्तः समुद्र) और अप्तत्त्व (सृष्टि के मूल घटक पंचभूतादि) में मेरा निवास स्थान निहित है। जो मनुष्य ऐसा जानता है, वह देवी पद (देवी की विभूतियों) को प्राप्त करता है । इसके पश्चात् देवों ने पुनः निवेदन किया-हे महादेवि! आपको नमस्कार है । महान् प्रख्यात पुरुषों को भी स्वकर्तव्य पथ पर आरूढ़ करने वाली कल्याणमयी महादेवी को सादर नमन-वन्दन है । प्रकृति-स्वरूपा एवं भद्रा अर्थात् कल्याणमयी देवी को प्रणाम है । हम उन महान् देवी को नियमपूर्वक प्रणाम करते हैं ॥8॥
— Translation from Dr. A. G. Krishna Warrier — Those gods said: Salutation to the Goddess, the great Goddess! To Siva, the auspicious, salutation, for ever more. To blessed Prakriti, salutation! Ever to Her we bow. ॥8॥
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[ Sutra 9 ]
तामग्निवर्णां तपसा ज्वलन्तीं वैरोचनीं कर्मफलेषु जुष्टाम् । दुर्गा देवीं शरणमहं प्रपद्ये सुतरां नाशयते तमः ॥9॥
tāmagnivarṇāṃ tapasā jvalantīṃ vairocanīṃ karmaphaleṣu juṣṭām । durgā devīṃ śaraṇamahaṃ prapadye sutarāṃ nāśayate tamaḥ ॥9॥
— Translation from Aurovindo (Hindi) — उन अग्नि के सदृश वर्ण वाली, तप से प्रकाशित, दीप्तिमती एवं कर्मफल के प्राप्ति हेतु हम माँ भगवती दुर्गा देवी की शरण प्राप्त करते हैं । (हे देवि!) आप मेरे अज्ञानान्धकार को पूर्णतया नष्ट करें । प्राण रूपी देवताओं ने जिस प्रकाशमती 'वैखरी' वाणी को प्रकट किया, उस विविध रूपों वाली 'वैखरी' वाणी को सभी प्राणी बोलते हैं । कामधेनु के समान आनन्दमयी एवं अन्न और बल प्रदान करने वाली वाणी स्वरूपिणी माँ भगवती श्रेष्ठ एवं महान् स्तुतियों से प्रसन्न होकर हमारे समक्ष पधारें ॥9॥
— Translation from Dr. A. G. Krishna Warrier — Refuge I seek in Her who is the colour of fire, Burning with ascetic ardour, Goddess resplendent, Delighting in actions' fruits; O Thou, hard to reach, Dispel Thy gloom. ॥9॥
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[ Sutra 10 ]
देवीं वाचमजनयन्त देवास्तां विश्वरूपाः पशवो वदन्ति । सा नो मन्द्रेषमूर्जं दुहाना धेनुर्वागस्मानुपसुष्टुतैतु ॥10॥
devīṃ vācamajanayanta devāstāṃ viśvarūpāḥ paśavo vadanti । sā no mandreṣamūrjaṃ duhānā dhenurvāgasmānupasuṣṭutaitu ॥10॥
— Translation from Aurovindo (Hindi) — उन अग्नि के सदृश वर्ण वाली, तप से प्रकाशित, दीप्तिमती एवं कर्मफल के प्राप्ति हेतु हम माँ भगवती दुर्गा देवी की शरण प्राप्त करते हैं । (हे देवि!) आप मेरे अज्ञानान्धकार को पूर्णतया नष्ट करें । प्राण रूपी देवताओं ने जिस प्रकाशमती 'वैखरी' वाणी को प्रकट किया, उस विविध रूपों वाली 'वैखरी' वाणी को सभी प्राणी बोलते हैं । कामधेनु के समान आनन्दमयी एवं अन्न और बल प्रदान करने वाली वाणी स्वरूपिणी माँ भगवती श्रेष्ठ एवं महान् स्तुतियों से प्रसन्न होकर हमारे समक्ष पधारें ॥10॥
— Translation from Dr. A. G. Krishna Warrier — The gods engendered divine Speech; Her, beasts of all forms speak; The cow that yields sweet fruits and vigour - To us may lauded Speech appear. ॥10॥
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[ Sutra 11 ]
कालरात्रिं ब्रह्मस्तुतां वैष्णवीं स्कन्दमातरम् । सरस्वतीमदितिं दक्षदुहितरं नमामः पावनां शिवाम् ॥11॥
kālarātriṃ brahmastutāṃ vaiṣṇavīṃ skandamātaram । sarasvatīmaditiṃ dakṣaduhitaraṃ namāmaḥ pāvanāṃ śivām ॥11॥
— Translation from Aurovindo (Hindi) — कालरात्रि (सदृश), वेदों द्वारा स्तुत, वैष्णवी शक्ति, स्कन्दमाता, सरस्वती, दे की माता अदिति और दक्ष कन्या आदि रूपों में पापों को विनष्ट करने वाली एवं कल्याणमयी भगवती को हम नमस्कार करते हैं । हम माता महालक्ष्मी को जानते हुए सतत उन सर्वसिद्धिदात्री देवी को हृदय में धारण करते हैं, वे देवी हमें (सद्ज्ञान एवं सच्चिन्तन की और प्रेरित करें ॥11॥
— Translation from Dr. A. G. Krishna Warrier — To holy Siva, to Daksha's daughter, To Aditi and Sarasvati, To Skanda's Mother, Vishnu's Power, To Night of death by Brahma lauded, We render obeisance. ॥11॥
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[ Sutra 12 ]
महालक्ष्मीश्च विद्महे सर्वसिद्धिश्च धीमहि । तन्नो देवी प्रचोदयात् ॥12॥
mahālakṣmīśca vidmahe sarvasiddhiśca dhīmahi । tanno devī pracodayāt ॥12॥
— Translation from Aurovindo (Hindi) — कालरात्रि (सदृश), वेदों द्वारा स्तुत, वैष्णवी शक्ति, स्कन्दमाता, सरस्वती, दे की माता अदिति और दक्ष कन्या आदि रूपों में पापों को विनष्ट करने वाली एवं कल्याणमयी भगवती को हम नमस्कार करते हैं । हम माता महालक्ष्मी को जानते हुए सतत उन सर्वसिद्धिदात्री देवी को हृदय में धारण करते हैं, वे देवी हमें (सद्ज्ञान एवं सच्चिन्तन की और प्रेरित करें ॥12॥
— Translation from Dr. A. G. Krishna Warrier — Know we Great Lakshmi, Goddess of good Fortune; On all fulfillment do we meditate. May the Goddess inspire us! ॥12॥
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[ Sutra 13 ]
अदितिर्ह्यजनिष्ट दक्ष या दुहिता तव । तां देवा अन्वजायन्त भद्रा अमृतबन्धवः ॥13॥
aditirhyajaniṣṭa dakṣa yā duhitā tava । tāṃ devā anvajāyanta bhadrā amṛtabandhavaḥ ॥13॥
— Translation from Aurovindo (Hindi) — हे दक्ष ! जो आपकी कन्या अदिति है वे प्रसूता होने के पश्चात् स्तुत्य हैं एवं उन्होंने कल्याणकारी अमृतत्व गुणों से युक्त देवों को प्रादुर्भूत किया है । (आदिमूल विद्या इस प्रकार हैं-) यह काम,योनि,वज्रपाणि, कामकला-गुहा, वर्ण (ह और स),वायु, अभ्र,इन्द्र,पुनः गुहा,वर्ण(स,क,ल) और माया आदि से विशिष्ट-रूपा( बहुसुखदात्री या सर्वत्र गमनशीला या ऐश्वर्यरूपा) ब्रह्मस्वरूपपणी एवं 'आदि' मूल विद्या (प्रवर्धमान हुई) है ॥ [यहाँ आदिविद्या के बीज मन्त्रों का संकेत किया गया है । काम से 'क', योनि से 'ए', कामकला से 'ई', वज्रपाणि से 'ल', गुहा से 'ह्रीं', हस से 'ह' - ‘स', मातरिश्वा से ‘क’, अभ्र से 'ह', इन्द्र से 'ल', पुनर्गुहा से 'ह्री', सकल से 'स'-'क'-'ल', माया से 'ह्री' का संकेत तन्त्र ग्रन्थों में प्राप्त होता है।] ॥13॥
— Translation from Dr. A. G. Krishna Warrier — Through You, Dakshayani, was Aditi born; She is your daughter; after her were born The gods auspicious, Friends of deathlessness. ॥13॥
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[ Sutra 14 ]
कामो योनिः कामकला वज्रपाणिर्गुहा हसा मातरिश्वाभ्रमिन्द्रः । पुनर्गुहा सकला मायया च पुरूच्येषा विश्वमाताऽऽदिविद्योम् ॥14॥
kāmo yoniḥ kāmakalā vajrapāṇirguhā hasā mātariśvābhramindraḥ । punarguhā sakalā māyayā ca purūcyeṣā viśvamātā''dividyom ॥14॥
— Translation from Aurovindo (Hindi) — हे दक्ष ! जो आपकी कन्या अदिति है वे प्रसूता होने के पश्चात् स्तुत्य हैं एवं उन्होंने कल्याणकारी अमृतत्व गुणों से युक्त देवों को प्रादुर्भूत किया है । (आदिमूल विद्या इस प्रकार हैं-) यह काम,योनि,वज्रपाणि, कामकला-गुहा, वर्ण (ह और स),वायु, अभ्र,इन्द्र,पुनः गुहा,वर्ण(स,क,ल) और माया आदि से विशिष्ट-रूपा( बहुसुखदात्री या सर्वत्र गमनशीला या ऐश्वर्यरूपा) ब्रह्मस्वरूपपणी एवं 'आदि' मूल विद्या (प्रवर्धमान हुई) है ॥ [यहाँ आदिविद्या के बीज मन्त्रों का संकेत किया गया है । काम से 'क', योनि से 'ए', कामकला से 'ई', वज्रपाणि से 'ल', गुहा से 'ह्रीं', हस से 'ह' - ‘स', मातरिश्वा से ‘क’, अभ्र से 'ह', इन्द्र से 'ल', पुनर्गुहा से 'ह्री', सकल से 'स'-'क'-'ल', माया से 'ह्री' का संकेत तन्त्र ग्रन्थों में प्राप्त होता है।] ॥14॥
— Translation from Dr. A. G. Krishna Warrier — Love, womb, love's part, the bearer of the thunderbolt The cave, ha-sa, the wind, the cloud, Indra; Again the cave, sa-ka-la with Maya - So runs the full primeval science begetting all. ॥14॥
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[ Sutra 15 ]
एषात्मशक्तिः । एषा विश्वमोहिनी पाशाङ्कुशधनुर्बाणधरा । एषा श्रीमहाविद्या ॥15॥
eṣātmaśaktiḥ । eṣā viśvamohinī pāśāṅkuśadhanurbāṇadharā । eṣā śrīmahāvidyā ॥15॥
— Translation from Aurovindo (Hindi) — ये जगन्माता विश्व को सम्मोहित करने वाली परमात्मशक्ति हैं । ये पाश, अंकुश, बाण एवं धनुष को धारण करती हैं तथा यही श्रीमहाविद्या के नाम से जानी जाती हैं । जो मनुष्य इस प्रकार से इन्हें जानता है,वह शोक से मुक्त हो जाता है । हे भगवती ! आपको प्रणाम है । हे माता ! आप हमारी पूरी तरह से रक्षा करें ॥15॥
— Translation from Dr. A. G. Krishna Warrier — This is the power of Self, enchanting all, armed with the noose, the hook, the bow and the arrow. This is the great and holy Science. ॥15॥
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[ Sutra 16 ]
य एवं वेद स शोकं तरति ॥16॥
ya evaṃ veda sa śokaṃ tarati ॥16॥
— Translation from Aurovindo (Hindi) — ये जगन्माता विश्व को सम्मोहित करने वाली परमात्मशक्ति हैं। ये पाश, अंकुश, बाण एवं धनुष को धारण करती हैं तथा यही श्रीमहाविद्या के नाम से जानी जाती हैं। जो मनुष्य इस प्रकार से इन्हें जानता है,वह शोक से मुक्त हो जाता है । हे भगवती ! आपको प्रणाम है। हे माता ! आप हमारी पूरी तरह से रक्षा करें ॥16॥
— Translation from Dr. A. G. Krishna Warrier — Who knows thus tides over grief. ॥16॥
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[ Sutra 17 ]
नमस्ते अस्तु भगवति भवती मातरस्मान्पातु सर्वतः ॥17॥
namaste astu bhagavati bhavatī mātarasmānpātu sarvataḥ ॥17॥
— Translation from Aurovindo (Hindi) — ये जगन्माता विश्व को सम्मोहित करने वाली परमात्मशक्ति हैं । ये पाश, अंकुश, बाण एवं धनुष को धारण करती हैं तथा यही श्रीमहाविद्या के नाम से जानी जाती हैं । जो मनुष्य इस प्रकार से इन्हें जानता है,वह शोक से मुक्त हो जाता है । हे भगवती ! आपको प्रणाम है । हे माता ! आप हमारी पूरी तरह से रक्षा करें ॥17॥
— Translation from Dr. A. G. Krishna Warrier — Divine Mother! Salutation to you; protect us in all possible ways. ॥17॥
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[ Sutra 18 ]
सैषाऽष्टौ वसवः । सैषैकादश रुद्राः । सैषा द्वादशादित्याः । सैषा विश्वेदेवाः सोमपा असोम-पाश्च । सैषा यातुधाना असुरा रक्षांसि पिशाचा यक्षाः सिद्धाः । सैषा सत्वरजस्तमांसि । सैषाब्रह्म विष्णुरुद्ररूपिणी । सैषा प्रजापतीन्द्रमनवः । सैषा ग्रहा नक्षत्रज्योतींषि कलाकाष्ठादिकालरूपिणी । तामहं प्रणौमि नित्यम् ॥18॥
saiṣā'ṣṭau vasavaḥ । saiṣaikādaśa rudrāḥ । saiṣā dvādaśādityāḥ । saiṣā viśvedevāḥ somapā asoma-pāśca । saiṣā yātudhānā asurā rakṣāṃsi piśācā yakṣāḥ siddhāḥ । saiṣā satvarajastamāṃsi । saiṣābrahma viṣṇurudrarūpiṇī । saiṣā prajāpatīndramanavaḥ । saiṣā grahā nakṣatrajyotīṃṣi kalākāṣṭhādikālarūpiṇī । tāmahaṃ praṇaumi nityam ॥18॥
— Translation from Aurovindo (Hindi) — (इसके पश्चात् आगे ऋषि जगन्माता भगवती के स्वरूप का वर्णन करते हुए कहते हैं कि) वही जगदम्बा आठ वसुओं के रूप में हैं, एकादश रुद्र एवं द्वादश आदित्य भी वही हैं । सोम को ग्रहण करने वाले और ग्रहण न करने वाले जितने भी विश्वेदेव हैं, वे सभी जगन्माता के रूप में स्थित हैं । वे ही (जगन्माता) यातुधान (एक तरह के असुर), राक्षस, असुर, पिशाच, यक्ष एवं सिद्ध आदि भी हैं । वे ही ये सरा, रज, तम आदि तीनों गुण है । वे ही ये ब्रह्मा, विष्णु एवं रुद्रस्वरूपा हैं । वे ही ये प्रजापति, इन्द्र और मनु भी हैं । वे ही ग्रह, नक्षत्र एवं समस्त तारागण हैं तथा वे ही कला-काष्ठादि से युक्त कालस्वरुपिणी हैं । ताप (मनस्ताप) का शमन करने वाली, भोग एवं मोक्ष को प्रदान करने वाली, अनन्त गुणों वाली विजय की अधिष्ठात्री, दोष-विहीन, शरण प्राप्ति के योग्य, कल्याणदायिनी एवं मंगलमयी उन भगवती देवी को हम सर्वदा नमस्कार करते हैं ॥18॥
— Translation from Dr. A. G. Krishna Warrier — She, here, is the eight Vasus, the eleven Rudras, the twelve Adityas, She is the all-gods, (those) who drink Soma and (those) who do not; she is the goblins, the demons, the evil beings, the ghosts; she also, beings super-human, the semi-divine. She is Sattva, Rajas and Tamas. She is Prajapati, Indra and Manu. She is the planets, stars and luminous spheres. She is the divisions of time, and the form of primeval Time. I salute Her ever: ॥18॥
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[ Sutra 19 ]
तापापहारिणीं देवीं भुक्तिमुक्तिप्रदायिनीम् । अनन्तां विजयां शुद्धां शरण्यां शिवदां शिवाम् ॥19॥
tāpāpahāriṇīṃ devīṃ bhuktimuktipradāyinīm । anantāṃ vijayāṃ śuddhāṃ śaraṇyāṃ śivadāṃ śivām ॥19॥
— Translation from Aurovindo (Hindi) — (इसके पश्चात् आगे ऋषि जगन्माता भगवती के स्वरूप का वर्णन करते हुए कहते हैं कि) वही जगदम्बा आठ वसुओं के रूप में हैं, एकादश रुद्र एवं द्वादश आदित्य भी वही हैं । सोम को ग्रहण करने वाले और ग्रहण न करने वाले जितने भी विश्वेदेव हैं, वे सभी जगन्माता के रूप में स्थित हैं । वे ही (जगन्माता) यातुधान (एक तरह के असुर), राक्षस, असुर, पिशाच, यक्ष एवं सिद्ध आदि भी हैं । वे ही ये सरा, रज, तम आदि तीनों गुण है । वे ही ये ब्रह्मा, विष्णु एवं रुद्रस्वरूपा हैं । वे ही ये प्रजापति, इन्द्र और मनु भी हैं । वे ही ग्रह, नक्षत्र एवं समस्त तारागण हैं तथा वे ही कला-काष्ठादि से युक्त कालस्वरुपिणी हैं। ताप (मनस्ताप) का शमन करने वाली, भोग एवं मोक्ष को प्रदान करने वाली, अनन्त गुणों वाली विजय की अधिष्ठात्री, दोष-विहीन, शरण प्राप्ति के योग्य, कल्याणदायिनी एवं मंगलमयी उन भगवती देवी को हम सर्वदा नमस्कार करते हैं ॥19॥
— Translation from Dr. A. G. Krishna Warrier — Goddess who banishes distress Grants pleasure and deliverance alike, Infinite, victorious, pure, Siva, Refuge, the Giver of good. ॥19॥
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[ Sutra 20 ]
वियदीकारसंयुक्तं वीतिहोत्रसमन्वितम् । अ र्धेन्दुलसितं देव्या बीजं सर्वार्थसाधकम् ॥20॥
viyadīkārasaṃyuktaṃ vītihotrasamanvitam । ardhendulasitaṃ devyā bījaṃ sarvārthasādhakam ॥20॥
— Translation from Aurovindo (Hindi) — वियत् अर्थात् आकाश एवं 'ई' कार से संयुक्त, वीतिहोत्र अर्थात् अग्नि के सहित, अर्द्धचन्द्र (ँ) से सुशोभित को देवी का बीज (मन्त्र ह्री) शब्द है, वह समस्त इच्छा-आकांक्षाओं को पूर्ण करने में सक्षम है । इस एकाक्षर स्वरूप ब्रह्म का (संयमशील) साधुजन, जो शुद्धचित्त वाले हैं, परमानन्द से युक्त हैं तथा अगाध ज्ञान के सागर हैं, निरन्तर ध्यान करते हैं ॥20॥
— Translation from Dr. A. G. Krishna Warrier — Seed all-powerful of the Goddess' mantra, Is sky, conjoined with 'i' and fire, With crescent moon adorned. ॥20॥
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[ Sutra 21 ]
एवमेकाक्षरं मंत्रं यतयः शुद्धचेतसः । ध्यायन्ति परमानन्दमया ज्ञानाम्बुराशयः ॥21॥
evamekākṣaraṃ maṃtraṃ yatayaḥ śuddhacetasaḥ । dhyāyanti paramānandamayā jñānāmburāśayaḥ ॥21॥
— Translation from Aurovindo (Hindi) — वियत् अर्थात् आकाश एवं 'ई' कार से संयुक्त, वीतिहोत्र अर्थात् अग्नि के सहित, अर्द्धचन्द्र (ँ) से सुशोभित को देवी का बीज (मन्त्र ह्री) शब्द है, वह समस्त इच्छा-आकांक्षाओं को पूर्ण करने में सक्षम है । इस एकाक्षर स्वरूप ब्रह्म का (संयमशील) साधुजन, जो शुद्धचित्त वाले हैं, परमानन्द से युक्त हैं तथा अगाध ज्ञान के सागर हैं, निरन्तर ध्यान करते हैं ॥21॥
— Translation from Dr. A. G. Krishna Warrier — On the single-syllable mantra Meditate the pure-hearted sages, Supremely blissful; Of wisdom the various oceans. ॥21॥
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[ Sutra 22 ]
वाङमाया ब्रह्मभूस्तस्मात्यष्ठं वक्त्रसमन्वितम् । सूर्योऽ वामश्रोत्रबिन्दुःसंयुक्ताष्टात्तृतीयकः ॥22॥
vāṅamāyā brahmabhūstasmātyaṣṭhaṃ vaktrasamanvitam । sūryo' vāmaśrotrabinduḥsaṃyuktāṣṭāttṛtīyakaḥ ॥22॥
— Translation from Aurovindo (Hindi) — वाक्शक्ति (ऐं), माया (ह्रीं), ब्रह्मभू-काम (क्लीं), वक्त्र अर्थात् आकार युक्त छठा व्यञ्जन (चा), सूर्य (म), अवाम श्रोत्र-दक्षिण कर्ण (उ) एवं बिन्दु अर्थात् अनुस्वार सहित (मुं), नारायण अर्थात् 'आ' से युक्त 'ट' कार से तृतीय वर्ण (डा), वायु (य) वही अधर अर्थात् 'ऐ' से युक्त (यै) और 'विच्चे'- यह नवार्ण मन्त्र साधकों को आनन्द एवं ब्रहासायुज्य पद प्रदान करने वाला है ।। [उपर्युक्त मन्त्रों में जिस नयाण मन्त्र का संकेत है, उसका स्पष्ट स्वरूप हैं-'ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे । ’ इसका अर्थ इस प्रकार है- हे चिद्रूपिणी महासरस्वती! हे सत् स्वरूपिणी महालक्ष्मी! हे आनन्द स्वरूपिणी महाकाली ब्रह्मविद्या की प्राप्ति हेतु हम सदैव आपका ध्यान करते हैं, आपको प्रणाम करते हैं। अज्ञानरूपी रज्जु की सुदृढ़ गाँठ को खोलकर आप हमें मुक्ति प्रदान करें।] ॥22॥
— Translation from Dr. A. G. Krishna Warrier — Fashioned by speech; born of Brahman; the sixth With face equipped; the sun; the left ear where The point is; the eighth and the third conjoint. ॥22॥
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[ Sutra 23 ]
नारायणेन संयुक्तो वायुश्चाधरसंयुतः । विच्चे नवार्णकोऽर्णः स्यान्महदानन्ददायकः ॥23॥
nārāyaṇena saṃyukto vāyuścādharasaṃyutaḥ । vicce navārṇako'rṇaḥ syānmahadānandadāyakaḥ ॥23॥
— Translation from Aurovindo (Hindi) — वाक्शक्ति (ऐं), माया (ह्रीं), ब्रह्मभू-काम (क्लीं), वक्त्र अर्थात् आकार युक्त छठा व्यञ्जन (चा), सूर्य (म), अवाम श्रोत्र-दक्षिण कर्ण (उ) एवं बिन्दु अर्थात् अनुस्वार सहित (मुं), नारायण अर्थात् 'आ' से युक्त 'ट' कार से तृतीय वर्ण (डा), वायु (य) वही अधर अर्थात् 'ऐ' से युक्त (यै) और 'विच्चे'- यह नवार्ण मन्त्र साधकों को आनन्द एवं ब्रहासायुज्य पद प्रदान करने वाला है ।। [उपर्युक्त मन्त्रों में जिस नयाण मन्त्र का संकेत है, उसका स्पष्ट स्वरूप हैं-'ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे। ’ इसका अर्थ इस प्रकार है- हे चिद्रूपिणी महासरस्वती! हे सत् स्वरूपिणी महालक्ष्मी! हे आनन्द स्वरूपिणी महाकाली ब्रह्मविद्या की प्राप्ति हेतु हम सदैव आपका ध्यान करते हैं, आपको प्रणाम करते हैं। अज्ञानरूपी रज्जु की सुदृढ़ गाँठ को खोलकर आप हमें मुक्ति प्रदान करें।] ॥23॥
— Translation from Dr. A. G. Krishna Warrier — The air, with Narayana united, And with the lip; voice, the nine-lettered; The letter, shall delight the lofty ones. ॥23॥
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[ Sutra 24 ]
हत्पुण्डरीकमध्यस्थां प्रातःसूर्यसमप्रभाम् । पाशाङ्कुशधरां सौम्यां वरदाभयहस्तकाम् । त्रिनेत्रां रक्तवसनां भक्तकामदुघां भजे ॥24॥
hatpuṇḍarīkamadhyasthāṃ prātaḥsūryasamaprabhām । pāśāṅkuśadharāṃ saumyāṃ varadābhayahastakām । trinetrāṃ raktavasanāṃ bhaktakāmadughāṃ bhaje ॥24॥
— Translation from Aurovindo (Hindi) — जो( देवी) हृदय-कमल के मध्य में विराजमान रहती हैं, जो प्रात:काल के सूर्य की भाँति प्रभावाली, जरा एवं अंकुश धारण करने वाली,सौम्यरूपा,वर एवं अभय मुद्राओं से युक्त हाथ वाली,तीन नेत्रों से युक्त,लाल परिधान वाली तथा भक्तों की मनोकामना पूर्ण करने वाली हैं । हे देवि! आप महान् भय का विनाश करने काली,महासंकट को शान्त करने में समर्थ एवं महान् करुणामयी हैं, मैं आपको वन्दना करता हूँ ॥24॥
— Translation from Dr. A. G. Krishna Warrier — Seated in the lotus-heart, Resplendent as the morning sun, Goddess, bearing noose and hook, With gesture granting boons, dissolving fears; Tender, three-eyed, red-robed, granting devotees Their hearts' desires, Thee I adore. ॥24॥
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[ Sutra 25 ]
नमामि त्वामहं देवीं महाभयविनाशिनीम् । महादुर्गप्रशमनीं महाकारुण्यरूपिणीम् ॥25॥
namāmi tvāmahaṃ devīṃ mahābhayavināśinīm । mahādurgapraśamanīṃ mahākāruṇyarūpiṇīm ॥25॥
— Translation from Aurovindo (Hindi) — जो( देवी) हृदय-कमल के मध्य में विराजमान रहती हैं, जो प्रात:काल के सूर्य की भाँति प्रभावाली, जरा एवं अंकुश धारण करने वाली,सौम्यरूपा,वर एवं अभय मुद्राओं से युक्त हाथ वाली,तीन नेत्रों से युक्त,लाल परिधान वाली तथा भक्तों की मनोकामना पूर्ण करने वाली हैं । हे देवि! आप महान् भय का विनाश करने काली,महासंकट को शान्त करने में समर्थ एवं महान् करुणामयी हैं, मैं आपको वन्दना करता हूँ ॥25॥
— Translation from Dr. A. G. Krishna Warrier — I bow to Thee, Goddess, Thou dispeller of gravest fears, Vanquisher of obstacles; Thou wearer of great Mercy's form. ॥25॥
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[ Sutra 26 ]
यस्याः स्वरूपं ब्रह्मादयो न जानन्ति तस्मादुच्यतेऽज्ञेया। यस्या अन्तो न विद्यते तस्मादुच्यतेऽनन्ता । चस्या ग्रहणं नोपलभ्यते तस्मादुच्यतेऽलक्ष्या । यस्या जननं नोपलभ्यते तस्मादुच्यतेऽजा । एकैव सर्वत्र वर्तते तस्मादुच्यत एका । एकैव विश्वरूपिणी तस्मादुच्यते नैका । अत एवोच्यतेऽज्ञेयाऽनन्ताऽलक्ष्याऽजैका नैकेति ॥26॥
yasyāḥ svarūpaṃ brahmādayo na jānanti tasmāducyate'jñeyā । yasyā anto na vidyate tasmāducyate'nantā । casyā grahaṇaṃ nopalabhyate tasmāducyate'lakṣyā । yasyā jananaṃ nopalabhyate tasmāducyate'jā । ekaiva sarvatra vartate tasmāducyata ekā । ekaiva viśvarūpiṇī tasmāducyate naikā । ata evocyate'jñeyā'nantā'lakṣyā'jaikā naiketi ॥26॥
— Translation from Aurovindo (Hindi) — जिन (देवी) के स्वरूप को ब्रह्मा आदि भी नहीं जानते, इस कारण उन्हें 'अज्ञेया' कहा गया है । जिनका अन्त नहीं होता, अतः वे अनन्ता(अन्तरहित) हैं। जिनका स्वरूप दृष्टिगोचर नहीं होता, इस कारण उन्हें अलक्ष्या कहते हैं। जिनके जन्म का अता-पता नहीं, इसलिए उन्हें 'अजा' कहा जाता है । जो एकाकी ही सर्वत्र विद्यमान रहती हैं, इस कारण उन्हें 'एका' कहते हैं । जो अकेले ही विश्वरूप में विद्यमान हैं, इसलिए उन्हें 'नैका' कहा गया है । अतः वे इन्हीं कारणों से अज्ञेया, अनन्ता, अजा, एका और नैका के नाम से जानी जाती हैं ॥26॥
— Translation from Dr. A. G. Krishna Warrier — Brahma and others know not Her essence; so is she called the Unknowable. She has no end; so is she called the Endless. She is not grasped and so is she called the Incomprehensible. Her birth is not known and so is she called the Unborn. She alone is present everywhere, and so is she called the One. She alone wears all forms, and so is she called the Many. For these reasons is she called the Unknowable, the Endless, the Incomprehensible, the Unknown, the One and the Many ॥26॥
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[ Sutra 27 ]
मन्त्राणां मातृका देवी शब्दानां ज्ञानरूपिणी । ज्ञानानां चिन्मयातीता शून्यानां शून्यसा-क्षिणी ॥27॥
mantrāṇāṃ mātṛkā devī śabdānāṃ jñānarūpiṇī । jñānānāṃ cinmayātītā śūnyānāṃ śūnyasā-kṣiṇī ॥27॥
— Translation from Aurovindo (Hindi) — वे (देवी) समस्त मंत्रों में 'मातृका' अर्थात् मूलाक्षर में प्रतिष्ठित हैं और शब्दों में ज्ञान रूप से स्थित हैं । ज्ञान में 'चिन्मयातीता' रूप में और शून्यों में 'शून्यसाक्षिणी' के रूप में रहती हैं । जिनके अतिरिक्त और कुछ भी श्रेष्ठतम नहीं है, ऐसी वे दुर्गादेवी के नाम से प्रख्यात हैं । उन दुराचार का शमन करने वाली, दुर्विज्ञेया एवं भवसागर से पार उतारने वाली दुर्गादेवी को जगत् से भयभीत हुआ मैं प्रणाम करता हूँ ॥27॥
— Translation from Dr. A. G. Krishna Warrier — The Goddess is the source of all mantras: Of all the words the knowledge is Her form. Her conscious Form transcends all cognition; She is the witness of all emptiness. ॥27॥
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[ Sutra 28 ]
यस्याः परतरं नास्ति सैषा दुर्गा प्रकीर्तिता।तां दुर्गा दुर्गमां देवीं दुराचारविघातिनीम्। नमामि भवभीतोऽहं संसारार्णवतारिणीम् ॥28॥
yasyāḥ parataraṃ nāsti saiṣā durgā prakīrtitā।tāṃ durgā durgamāṃ devīṃ durācāravighātinīm। namāmi bhavabhīto'haṃ saṃsārārṇavatāriṇīm ॥28॥
— Translation from Aurovindo (Hindi) — वे (देवी) समस्त मंत्रों में 'मातृका' अर्थात् मूलाक्षर में प्रतिष्ठित हैं और शब्दों में ज्ञान रूप से स्थित हैं । ज्ञान में 'चिन्मयातीता' रूप में और शून्यों में 'शून्यसाक्षिणी' के रूप में रहती हैं । जिनके अतिरिक्त और कुछ भी श्रेष्ठतम नहीं है, ऐसी वे दुर्गादेवी के नाम से प्रख्यात हैं । उन दुराचार का शमन करने वाली, दुर्विज्ञेया एवं भवसागर से पार उतारने वाली दुर्गादेवी को जगत् से भयभीत हुआ मैं प्रणाम करता हूँ ॥28॥
— Translation from Dr. A. G. Krishna Warrier — Beyond Her is nothing; renowned is She As unapproachable; feared of life, I bow to the inaccessible One, Bulwark against all sins; the Pilot who Steers me across the sea of worldly life. ॥28॥
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[ Sutra 29 ]
इदमथर्वशीर्षं योऽधीते स पञ्चाथर्वशीर्षजपफलमवाप्नोति । इदमथर्वशीर्ष ज्ञात्वा योऽर्चां स्थाप -यति ॥29॥
idamatharvaśīrṣaṃ yo'dhīte sa pañcātharvaśīrṣajapaphalamavāpnoti । idamatharvaśīrṣa jñātvā yo'rcāṃ sthāpa -yati ॥29॥
— Translation from Aurovindo (Hindi) — इस अथर्वशीर्ष के मन्त्रों का जो मनुष्य पाठ करता है, वह पाँचों अथर्वशीर्षों के जप करने का फल -प्राप्त कर लेता है । इस अथर्वशीर्ष को न जानकर जो मनुष्य अर्चा (प्रतिमा को) स्थापित करता है, वह सैकड़ों-लाखों जप करके भी सिद्धि प्राप्त नहीं कर पाता है । (वैसे) १०८ बार जप करना ही इस पुरश्चरण की विधि कही गई है । जो पुरुष इस उपनिषद् का दस बार भी पाठ कर लेता है, वह उसी क्षण अपने दुष्कृत (पापों) से मुक्त होकर महादेवी की कृपा से महान् से महान् दुष्कर कठिनाइयों-मुसीबतों से पार हो जाता है ॥29॥
— Translation from Dr. A. G. Krishna Warrier — He who studies this Atharva Upanishad gains the fruit of repeating five (other) Atharva Upanishads; he who, having mastered this Atharva Upanishad, persists in worship. ॥29॥
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[ Sutra 30 ]
शतलक्षं प्रजप्त्वापि नासिद्धिं च विन्दति । शतमष्टोत्तरं चास्याः पुरश्चर्याविधि: स्मृतः ॥30॥
śatalakṣaṃ prajaptvāpi nāsiddhiṃ ca vindati । śatamaṣṭottaraṃ cāsyāḥ puraścaryāvidhi: smṛtaḥ ॥30॥
— Translation from Aurovindo (Hindi) — इस अथर्वशीर्ष के मन्त्रों का जो मनुष्य पाठ करता है, वह पाँचों अथर्वशीर्षों के जप करने का फल -प्राप्त कर लेता है । इस अथर्वशीर्ष को न जानकर जो मनुष्य अर्चा (प्रतिमा को) स्थापित करता है, वह सैकड़ों-लाखों जप करके भी सिद्धि प्राप्त नहीं कर पाता है । (वैसे) १०८ बार जप करना ही इस पुरश्चरण की विधि कही गई है । जो पुरुष इस उपनिषद् का दस बार भी पाठ कर लेता है, वह उसी क्षण अपने दुष्कृत (पापों) से मुक्त होकर महादेवी की कृपा से महान् से महान् दुष्कर कठिनाइयों-मुसीबतों से पार हो जाता है ॥30॥
— Translation from Dr. A. G. Krishna Warrier — Of this vidya ten million chants Are less than the worship's fruit. Eight and hundred recitations thereof Make but this rite's inauguration. ॥30॥
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[ Sutra 31 ]
दशवारं पठेद्यस्तु सद्यः पापैः प्रमुच्यते । महादुर्गाणि तरति महादेव्याः प्रसादतः ॥31॥
daśavāraṃ paṭhedyastu sadyaḥ pāpaiḥ pramucyate । mahādurgāṇi tarati mahādevyāḥ prasādataḥ ॥31॥
— Translation from Aurovindo (Hindi) — इस अथर्वशीर्ष के मन्त्रों का जो मनुष्य पाठ करता है, वह पाँचों अथर्वशीर्षों के जप करने का फल -प्राप्त कर लेता है । इस अथर्वशीर्ष को न जानकर जो मनुष्य अर्चा (प्रतिमा को) स्थापित करता है, वह सैकड़ों-लाखों जप करके भी सिद्धि प्राप्त नहीं कर पाता है । (वैसे) १०८ बार जप करना ही इस पुरश्चरण की विधि कही गई है । जो पुरुष इस उपनिषद् का दस बार भी पाठ कर लेता है, वह उसी क्षण अपने दुष्कृत (पापों) से मुक्त होकर महादेवी की कृपा से महान् से महान् दुष्कर कठिनाइयों-मुसीबतों से पार हो जाता है ॥31॥
— Translation from Dr. A. G. Krishna Warrier — Who reads it but ten times, Is released at once from sins; Through the grace of the Goddess great, Tides he over obstacles great. ॥31॥
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[ Sutra 32 ]
प्रातरधीयानो रात्रिकृतं पापं नाशयति । सायमधीयानो दिवसकृतं पापं नाशयति । तत्सायं-प्रातः प्रयुञ्जानः पापोऽपापो भवति । निशीथे तुरीयसंध्यायां जप्त्वा वाक्सिद्धिर्भवति । नूतनप्रतिमायां जप्त्वा देवतासान्निध्यं भवति । प्राणप्रतिष्ठायां जप्त्वा प्राणानां प्रतिष्ठा भवति । भौमाश्विन्यां महादेवीसंनिधौ जप्त्वा महामृत्युं तरति । य एवं वेदेत्युपनिषत् ॥32॥
prātaradhīyāno rātrikṛtaṃ pāpaṃ nāśayati । sāyamadhīyāno divasakṛtaṃ pāpaṃ nāśayati । tatsāyaṃ-prātaḥ prayuñjānaḥ pāpo'pāpo bhavati । niśīthe turīyasaṃdhyāyāṃ japtvā vāksiddhirbhavati । nūtanapratimāyāṃ japtvā devatāsānnidhyaṃ bhavati । prāṇapratiṣṭhāyāṃ japtvā prāṇānāṃ pratiṣṭhā bhavati । bhaumāśvinyāṃ mahādevīsaṃnidhau japtvā mahāmṛtyuṃ tarati । ya evaṃ vedetyupaniṣat ॥32॥
— Translation from Aurovindo (Hindi) — इस (उपनिषद्) को प्रात:कालीन वेला में पाठ करने से रात्रि में किये हुए पापों का और सायंकाल में पाठ करने से दिन में किये गये दुष्कृत्यों का शमन हो जाता है । दोनों संध्याओं में अध्ययन करने से पाप करने वाला भी पापरहित हो जाता है । मध्यकालीन रात्रि में तुरीय संध्या के समय में जप करने से वाणी की सिद्धि मिल जाती है । नवीन प्रतिमा के समक्ष जप करने से देवता का सान्निध्य प्राप्त होता है। अमृतसिद्धि योग (मंगलवार को अश्विनी नक्षत्र) में महादेवी के समीप में जप करने से मनुष्य महामृत्यु से पार हो जाता है । जो इस तरह से इस उपनिषद् को जानता है (वह महामृत्यु से पार हो जाता है). ऐसी ही यह देव्युपनिषद् है ॥32॥
— Translation from Dr. A. G. Krishna Warrier — Reading it in the morning one destroys the sins of the night; reading it in the evening one destroys the sins committed by day. Thus, reading both in the evening and morning, the sinner becomes sinless. Reading it midnight, too, the fourth 'junction', there results perfection of speech. Its recitation before a new image brings to it the presence of the deity. Its recitation at the time of consecration (of an image) makes it a centre of energy. Reciting it on Tuesday under the asterism Ashvini, in the presence of the great Goddess, one overcomes fell death - one who knows thus. This is the secret. ॥32॥