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1. Dhvanyaloka Hindi Vyakahya Visvesvar Siddhanta Shiromani Ed. Nagendra.djvu

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ध्वन्यालोकः

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ध्वन्यालोकः

आचार्य विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि

डॉ० नगेन्द्र, एम.ए., डी. लिट.

ज्ञानमण्डल लिमिटेड वाराणसी

(श्री आनन्दवर्धनाचार्य-विरचित ध्वन्यालोकी हिन्दी व्याख्या)

अध्यक्ष ‘श्रीधर अनुसंधान विभाग’ एवं ‘श्री रामदास दर्शनपीठ’ गुरुकुल विश्वविद्यालय वृन्दावन तथा सम्मान्य सदस्य ‘हिन्दी अनुसंधान परिषद्’ दिल्ली-विश्वविद्यालय

व्याख्याकार

आचार्य विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि

अध्यक्ष ‘श्रीधर अनुसंधान विभाग’ एवं ‘श्री रामदास दर्शनपीठ’ गुरुकुल विश्वविद्यालय वृन्दावन तथा सम्मान्य सदस्य ‘हिन्दी अनुसंधान परिषद्’ दिल्ली-विश्वविद्यालय

सम्पादक

डॉ० नगेन्द्र, एम.ए., डी. लिट.

ज्ञानमण्डल लिमिटेड वाराणसी

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ध्वन्यालोक

आचार्य अभिनवगुप्त

डा० बलदेव उपाध्याय

ज्ञानमण्डल लिमिटेड, वाराणसी

मूल्य : 200.00 रुपये

प्रथम संस्करण, श्रावण, संवत् २०९६ वि०

द्वितीय संस्करण, फाल्गुन, संवत् २०३८ वि०

तृतीय संस्करण, संवत् २०४२ वि०

पुनर्मुद्रित संशोधित संस्करण सन् १९८८

© ज्ञानमण्डल लिमिटेड, वाराणसी

प्रकाशक : ज्ञानमण्डल लिमिटेड, वाराणसी (बनारस)

मुद्रक : ज्ञानमण्डल लिमिटेड, सन्त कबीर मार्ग, वाराणसी (बनारस)

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ध्वन्यालोक

आचार्य आनन्दवर्धन

डॉ. श्यामदेव पारिख

महाकवि माघ शोध संस्थान

समर्पण

जिनके चरणोंमें बैठकर विविध शास्त्रोंके अध्ययन एवं सूक्ष्म विवेचनका सौभाग्य प्राप्त हुआ

जिनके शुभ आशीर्वादने इस दुरूह ग्रन्थके परिष्कारकी क्षमता प्रदान की

उन प्रातःस्मरणीय गुरुजनॉंके करकमलोंमें,

या पुण्य स्मृतिमें,

गुरुपूर्णिमा संवत् २००९ की यह

विनम्र भेंट

सादर समर्पित

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ध्वन्यालोक

आचार्य आनन्दवर्धन

डॉ. हरदत्त शर्मा

चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन

विषय-सूची

भूमिका

प्रथम उद्योत

१. ग्रन्थारम्भका प्रयोजन

कारिकारकार और वृत्तिकारका अभेद

ध्वनिविषयक तीन विप्रतिपत्तियाँ

'समन्वातपूर्व:' का समाधान

विप्रतिपत्तियोंका विश्लेषण

अभिधावादी (प्रथम) पक्षके तीन भेद

भक्तिवादी (द्वितीय) पक्षका निरूपण

अलक्षणीयतावादी (तृतीय) पक्ष

ध्वनिनिरूपणका प्रयोजन

२. ध्वनिसिद्धान्तकी भूमिका

३. ग्रन्थमें वाच्य (अभिधारादि) के प्रति-पादनका अभाव

४. प्रतीमान अर्थका वाच्यव्यंग्यविरचित्व

वस्तुध्वनिका वाच्यार्थसे स्वरूपकृत भेद

वस्तुध्वनिका वाच्यार्थसे विषयकृत भेद

मेदके भेद

अलङ्कारध्वनिका वाच्यार्थसे भेद

रसध्वनिका वाच्यार्थसे भेद

'अभिधा' शक्ति से व्यङ्ग्यार्थबोधकका निराकरण

'तात्पर्य' शक्तिसे व्यङ्ग्यबोधकका निराकरण

'अन्विताभिधानवाद' और व्यङ्ग्यार्थ-बोध

कुमारिलभट्ट और प्रभाकर

मण्डनमिश्रके मतकी आलोचना

धनञ्जय तथा धनिकके मतकी आलोचना

लक्षणावादका निराकरण

विशिष्ट लक्षणावादका निराकरण

अखण्डार्थतावादी वेदान्तमत

अखण्डार्थतावादी वैयाकरण मत

वाच्यार्थ तथा व्यङ्ग्यार्थके मेदक हेतु

महिमभट्टका अनुमितिवाद

५. प्रतीमान रस ही काव्यका आत्मा

६. महाकवियोंकी प्रतिभाका योतक

७. प्रतीमान अर्थकी सङ्घटना सवैच्यत्व

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ध्वन्यालोक:

विषय

पृष्ठ

विषय

पृष्ठ

८. व्यङ्ग्य-व्यञ्जककी पहचान आवश्यक

३३

अलङ्कारोंमें ध्वनिके अन्तर्भाववादके

५२

[का. ८] प्रत्यभिज्ञापरिचय

३३

स्वण्डनका उपसंहार

५२

९. व्यङ्ग्यप्राधान्यमें वाच्यवाचकका

३४

ध्वनिसिद्धान्तका आदि मूल

५३

उपादान क्यों [का. ९]

३४

ध्वनिके अभाववादके खण्डनका

५३

१०. व्यङ्ग्यार्थकी प्रतीति वाच्यार्थप्रतीतिपूर्वक

३५

उपसंहार

५५

रसध्वनिकी असंलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्यता

ध्वनिके दो मूल भेद

५५

[का. १०]

३५

बीचमें ध्वनिमेद दिखलानेका प्रयोजन

५७

११-१२. वाच्यकी प्रथमप्रतीति होनेपर भी

५८

१४. भक्तिवादके द्वितीय विकल्प लक्षण-

व्यङ्ग्यार्थके प्राधान्यका उपपादन

वादका खण्डन [का. १४]

५८

[का. ११, १२]

३६

१५. ध्वनिविषयका निर्देश [का. १५]

६१

योग्यता, आकाङ्क्षा, आसत्तिके लक्षण

३६

१६. रुढि लक्षणास्थलमें भक्ति या लक्षणाके

६२

१३. ध्वनिकाव्यका लक्षण [का. १३]

३७

होते हुए भी व्यङ्ग्यप्रयोजनका

अलङ्कारोंमें ध्वनिके अन्तर्भावका खण्डन

३८

अभावप्रदर्शन [का. १६]

६२

सामासोक्तिमें ध्वनिके अन्तर्भावका निषेध

३९

१७. प्रयोजनवती लक्षणाओंमें व्यङ्ग्य प्रयोजन

६२

आखेपालङ्कारमें ध्वनिके अन्तर्भावका

होनेपर भी उस फलका लक्षण-

निषेध

४०

में अव्याप्तिप्रदर्शन [का. १७]

६२

चारुत्वोत्कर्ष ही प्राधान्यका नियामक है

१८. भक्तिको ध्वनिका लक्षण माननेमें

६५

चारुत्वोत्कर्षमूलक दीपक और अपहुति-

अव्याप्ति दोष [का. १८]

६५

व्यवहार

४२

लक्षणा और गौणीचर्वितिका भेद

६५

विशेषोक्तिमें ध्वनिके अन्तर्भावका निपेध

४३

१९. भक्तिके कहीं उपलक्षण होनेपर भी

पर्यायोक्तमें ध्वनिके अन्तर्भावका निपेध

४४

ध्वनि उसके अन्तर्गत नहीं

६७

अपह्नुति और दीपकमें ध्वनिके अन्त-

[का. १९]

भावका निषेध

४६

भक्तिवादके तृतीय विकल्प उपलक्षण-

६७

सङ्करालङ्कारमें ध्वनिके अन्तर्भावका निषेध

४६

पक्षका खण्डन

अप्रस्तुतप्रशंसामें ध्वनिके अन्तर्भावका

ध्वनिविरोधी तृतीय पक्ष अलक्षणी-

६८

निषेध

४७

यतावादका खण्डन

६८

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विषय-सूची

द्वितीय उद्योत

[पृ० ६९-९५]

विषय

प्रष्ठ

विषय

प्रष्ठ

१. अविवक्षितवाच्य [लक्षणामूल] ध्वनिके अर्थान्तरसङ्क्रमितवाच्य और अत्यन्ततिरस्कृतवाच्य दो भेद [का० १]

६९

१. भट्टलोलटका 'उत्पत्तिवाद' भट्टलोलटकी आलोचना

८०

क--अविवक्षितवाच्य [लक्षणामूल] ध्वनिके दो भेद

६९

२. श्री शङ्कुकका 'अनुमितिवाद' शङ्कुकके 'अनुमितिवाद'की आलोचना

८१

इन भेदोंका आधार लक्षणा ६९

३. महनायक द्वारा इन मतोंकी आलोचना

८२

१. अर्थान्तरसङ्क्रमितवाच्यध्वनिके दो उदाहरण ७१

४. अभिनवगुप्तपादाचार्यंका 'अभिव्यक्तिवाद'

८३

२. अत्यन्ततिरस्कृतवाच्यके दो उदाहरण ७२

५. अन्यमत नाट्यरस काव्यरस

८३

२. विवक्षितवाच्य [अभिधामूल] ध्वनिके असंलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य और संलक्ष्य-क्रमव्यङ्ग्य दो भेद [का० २] ७४

भाव रसाभास और भावाभास

८४

ख--विवक्षितान्यपरवाच्य [अभिधा-मूल] ध्वनिके दो भेद

७४

६. रसवदलङ्कारसे भिन्न ध्वनिका विषय [का० ४]

८४

३. असंलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्यध्वनि [का० ३] रसप्रक्रिया स्थायिभाव आलम्बन और उद्दीपन विभाव अनुभाव व्यभिचारिभाव रगास्वाद और रससंख्या रसानुभवकालीन चर्व्वितचर्व्वण विशिष्टदृष्टि रसचुतुष्टयवाद काव्य और नाटकके स्रोतप्रतिपादकविषयक

७५ ७६ ७७ ७८ ७८ ७९

७. रसवदलङ्कारोंका विषय [का० ५] गुद्ररसवदलङ्कारका उदाहरण सङ्कीर्ण रसवदलङ्कारका उदाहरण रसोंका परस्पराविरोधाविरोध विरोधी रसोंके अविरोधसम्भावेदनकां उपाय स्वादरस क्र कम्बनिष्ठ रसवदलङ्कारविषयक मतभेद

८५ ८६ ८७ ८९ ८९ ९० ९०

विविध मत ८०

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ध्वन्यालोक:

विषय पृष्ठ विषय पृष्ठ

रसवदलङ्कार तथा गुणीभूतव्यङ्गयकी व्यवस्था ९१ १६. अलङ्कारप्रयोगकी कसौटी [का० १६] १०५

ध्वनि, उपमादि तथा रसवदलङ्कार ९१ १७. शृङ्गारादिमें समीक्ष्य विनिवेशित रूप-

६. गुण और अलङ्कारक मेद [सिद्धान्त- पक्ष] [का० ६] ९४ १७-१९. रूपकादि अलङ्कारोंके प्रयोगके

वामनमत

९४ छः नियम [का० १८, १९] १०९

भामहमत : ९५ संसृष्टि या संकरसंवत् अलङ्कारान्तर ११३

नव्यमत ९५ २०. संलक्ष्यक्रमव्यङ्गयके दो मेद [का० २०] ११८

७. माधुर्य गुणका आश्रय [का० ७] ९५ २१. शब्दशक्त्युद्भव ध्वनि [का० २१] ११९

'एकोकारश्रिषा मत:' ९६ ध्वनि १२८

८. सम्भोगशृङ्गार, विप्रलम्भशृङ्गार और करुणरसमें माधुर्यंका उतरोत्तर उत्कर्ष [का० ८] ९७ २२. अर्थशक्त्युद्भव ध्वनि [का० २२] १३१

दस गुणोंकी अन्तिमाव ९७ २३. व्यङ्गयार्थकी स्वशब्दबोधक्ति होनेपर

९. रौत्रादि रसोंमें ओजकी स्थिति [का० ९] ९८ २४. अर्थशक्त्युद्भव ध्वनिके मेद [का० २४] १३६

ओज गुणके आश्रय [क—शब्द] का उदाहरण ९८ २५. अर्थशक्त्युद्भव अलङ्कारध्वनि

ओज गुणके आश्रय [ल—अर्थ] का उदाहरण ९८ [का० २५] १३९

१०. प्रसाद गुणका आश्रय [का० १०] ९९ २६. अलङ्काररचनिका विषय बहुत है

[का० २६] १३९

११. अनित्यदोषोंकी व्यवस्था [का० ११] १०० २७. अलङ्काररचनिमें अलङ्कारकी प्रघानता

१२. असंलक्ष्यक्रमव्यङ्गयत्वनिके मेद [का० १२] १०१ [का० २७] १४०

१३. दिङ्मात्र प्रदर्शीन [का० १३] १०२ २८. अलङ्काररचनिका प्रयोजन [का० २८] १४९

१४. शृङ्गारमें शब्दालङ्कारोंका अधिक प्रयोग अनुचित [का० १४] १०२ २९. वस्तुतः अलङ्कार व्यङ्गय होनेपर

१५. शृङ्गारमें और विशेषतः विप्रलम्भ शृङ्गारमें यमकादिका प्रतिषेध [का० १५] १०३ ध्वनितव [का० २९] १४९

३०.अलङ्कारसे अलङ्कार व्यङ्गय होनेपर ध्वनितव [का० ३०] १५०

३१. अभिधामूलं ध्वनिका गुणीभूतव्यङ्गयत्व [का० ३१] १५१

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विषय-सूची

विषय ३२. लक्षणामूल ध्वनिका गुणीभूतव्यङ्गयत्व [का० ३२] पृष्ठ १५३ विषय ३३. केवल व्यङ्गयप्रधानस्यैव ध्वनिकालक्षण [का० ३३] पृष्ठ १५३

द्वितीय उद्योत [पृ०१५४-२३७]

१. ध्वनिके पदप्रकाश्य तथा वाक्यप्रकाश्य भेद [का० १] पृष्ठ १५४ १०-१४. प्रकरणव्यञ्जकता [का० १०-१४] पृष्ठ १८८

२. असंलस्यक्रमव्यङ्गचके चार भेद [का० २] पृष्ठ १६४ १५. संलस्यक्रमव्यङ्गचयुक्त प्रवन्ध भी रसादिव्यञ्जक [का० १५] पृष्ठ १९६

३-४.९. वर्णोंकी रसव्योत्कता[का० ३,४]१६४ १६. मुसिद्धादि पदोंकी व्यञ्जकता [का० १६] पृष्ठ १९८

२. पदगतस्य अर्थसंलस्यक्रमस्यैव रसपदार्थाच्योत्य असंलस्यक्रमस्यैव रसादिव्यञ्जक [का० १७-१९] पृष्ठ २१२

५. सङ्घटनाके व्यञ्जकत्वके प्रसङ्गमें सङ्घटनाके तीन भेद [का० ५] पृष्ठ १६८ २०. विरोधी रसाद्वोंके निवन्धनके नियम [का० २०] पृष्ठ २१८

६. सङ्घटनाका व्यञ्जकत्व [का० ६] पृष्ठ १९९ १. विरोधी.रसाद्वोंके वाध्यतेन अविरोषके उदाहरण पृष्ठ २२२

गुण और सङ्घटनाके सम्बन्धविषयक तीन पक्ष गुणोंको सङ्घटनामित्र या सङ्घटनारूप माननेमें दोष . पृष्ठ १७० गुणोंका वास्तविक आश्रय . पृष्ठ १७२ सङ्घटनाका नियामक तत्त्व पृष्ठ १७८

९. काव्यप्रकारोंका [विषयगत] औचित्य सङ्घटनानिवार्यस्य[का० ७] पृष्ठ १८१ २४. वाच्य-व्यातक विरोधमें अङ्गिताका उपपादन [का० २४] पृष्ठ २३२

८. गद्यकाव्योंमें भी उक्त औचित्य आवइयक है [का० ८] पृष्ठ १८६ २५. एकाश्रयमें विरोधी रसोंका अविरोषसम्पादन'[का० २५] पृष्ठ २३६

९. रसवन्धका औचित्य सर्वत्र आवश्यक [का० ९]

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ध्वन्यालोक:

विषय

पृष्ठ

विषय

पृष्ठ

२६. नैरन्तर्यविरोधी रसोंका अविरोध-सम्पादन [का० २६]

२३७

आश्रयभेदसे व्यङ्ग्यक्त्वकी सिद्धि

२५९

ध्यान्तरस्की स्थिति

२३८

मीमांसकमतमें व्यङ्ग्यक्त्व अपिरिहार्ये

२७२

२७. विरोधी रसोंमें व्यवधान द्वारा अविरोधसम्पादन [का० २७]

२४०

वैयाकरणमत ध्वनिसिद्धान्तके अनुकूल

२७६

२८. रसोंके विरोधाविरोधका उपसंहार [का० २८]

२४९

न्यायमत व्यङ्कत्वके अनुकूल

२७६

२९. शृङ्गारमें विरोधी रसादिका परिहार अनिवार्य [का० २९]

२४९

अनुमितिवादका निराकरण

२७८

३०. विरोधी रसोंमें भी शृङ्गारका पुष्ट [का० ३०]

२८२

३४. ध्वनिका उपसंहार [का० ३४]

२८६

३१. विरोधाविरोधके ज्ञानसे व्यामोहाभाव [का० ३१]

२८३

३५. गुणीभूतव्यङ्ग्यका निष्पन्न [का०३४]

२८७

३२. रसादि गुण शब्दार्थयो योजना कविका मुख्य कर्म [का० ३२]

२८४

३६. गुणीभूतव्यङ्ग्यकी उपादेयता [का० ३६]

२८९

३३. वृत्तियोंका विवेचन रसकी आत्मरूपताका उपपादन

२८४

३७. व्यङ्ग्यके सम्प्रदायसे वाच्यका, चरुत्व [का० ३७]

२९०

रसमें अक्रमता नहीं, अलंक्ष्यक्रम-व्यङ्गयताका उपपादन

२८६

३८. प्रतীয়मान अर्थ काव्यका भूषण [का० ३८]

२९७

संलक्ष्यक्रम शब्दशक्तिमूलकं क्रम

२९०

३९. काव्याख्यित गुणीभूतव्यङ्ग्य [का० ३९]

२९८

संलक्ष्यक्रम अर्थशक्तिमूलकं क्रम

२९१

४०. गुणीभूतव्यङ्ग्यमें ध्वनियोजनाका निपेध [का० ४०]

३००

अविवक्षितवाच्य [लक्षणामूल ध्वनि] में भी क्रम

२९२

४१. गुणीभूतव्यङ्ग्यका ध्वनिरूपमें पर्यवसान [का० ४१]

३०२

पुनः व्यङ्ग्य-व्यञ्जकभावकी सिद्धि

२९३

४२-४३. चित्रकाव्यका निरूपण [का० ४२-४३]

३०९

रूपकभेद में व्यङ्गयत्वांशक

२९५

४४. सदूषण तथा सदूषण [का० ४४]

३१४

महार्दिके पदार्थवाच्यार्थन्यायका संप्लन

२९६

लोचनकारके अनुसार ध्वनिके भेदोंकी वणना

३१५

मौदान्तपक्षमें घट-प्रदीप-न्याय

२९७

काव्यप्रकाशाद्वत ४१ ध्वनिभेद

३१५

'लोचन तथा 'काव्यप्रकाश' के ध्वनिभेदोंकी तुलना

३१६

सृष्टि तथा सदूषणमेदसे लोचनकारकी गणना

३१७

'लोचन' की एक और चित्य गणना

३१८

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ध्वन्यालोक

आचार्य आनन्दवर्धन

डॉ. हरदत्त शर्मा

चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन

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ध्वन्यालोक:

विषय

१५. अक्षरयोजनासे विविध वाच्यार्थके समान परिमित अर्थोंसे अपरिमित काव्य [का० १५]

१६. पूर्वछ्छायासे अनुगत होनेपर सुन्दर वस्तुकी रचना अनुचित नहीं [का० १६]

पृष्ठ

३६१

विषय

१७. स्वयं सरस्वती की प्रतिभिकीสาธक [का० १७]

३६२

प्रथम परिशिष्ट—ध्वन्यालोककी कारिकार्थ-सूची

द्वितीय परिशिष्ट—ध्वन्यालोककी उदा-हरणादि-सूची

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भूमिका

डा० नगेन्द्र, एम० ए०, डी० लिट०

ध्वनिसिद्धान्त

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ध्वनिकार्थ और परिभाषा

आचार्य आनन्दवर्धन

डॉ. सीताराम शुक्ल

कल्पतरु रिसर्च एकेडमी

यत्रार्थः स्वयं तात्पर्यार्थमुपसर्जनीकृततथ्यः। तस्यध्वनिः काव्यविशेषः स ध्वनिरिति सूरिभिः कथितः॥

प्रतीयमानं पुनरन्यदेव वस्त्वस्ति वाणीषु महाकवीनाम् । यत्तत्प्रसिद्धावयवातिरिक्तं विभाति लावण्यमिवाङ्गनासु ॥

सरसती स्वादु तदर्थवस्तु निःष्पन्दमाना महतां कवीनाम् । अलौकसामान्यमभिधानतन्त्री परिस्फुरन्तं प्रतिभाविशेषम् ॥

सर्वत्र शब्दार्थयोः सम्बन्धं ध्वननव्यापारः। स काव्यविशेषः इति।

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भूमिका

के द्वारा प्रथानतया समुदाय शब्द, अर्थ—वाच्य [व्यङ्क] अर्थ और व्यङ्ग्य अर्थ तथा शब्द और अर्थका व्यापार ही ध्वनि है।

अभिनवगुप्तके कहनेका तात्पर्य यह है कि कारिकाके अनुसार ध्वनि संज्ञा केवल काव्यकां ही नहीं दी गयी वरन् शब्द, अर्थ और शब्द अर्थके व्यापार इन सबको ध्वनि कहते हैं।

ध्वनि शब्दके व्युत्पत्ति-अर्थोसे भी ये पाँचों भेद सिद्ध हो जाते हैं :

१. ध्वनति ध्वनयति वा यः स व्यङ्ककः शब्दः ध्वनिः—जो ध्वनित करे या कराये वह व्यङ्कक शब्द ध्वनि है।

२. ध्वनति ध्वनयति वा यः स व्यङ्ककोऽर्थः ध्वनिः—जो ध्वनित करे या कराये वह व्यङ्कक अर्थ ध्वनि है।

३. ध्वन्यते इति ध्वनिः—जो ध्वनित किया जाये वह ध्वनि है। इसमें रस, अलंकार और वस्तु—व्यङ्ग्य अर्थके ये तीनों रूप जा जाते हैं।

४. ध्वन्यते अनेन इति ध्वनिः—जिसके द्वारा ध्वनित किया जाये वह ध्वनि है। इसे शब्द अर्थके व्यापार—व्यञ्जना आदि वृत्तियोंका बोध होता है।

५. ध्वन्यतेऽस्मिन् इति ध्वनिः—जिसमें वस्तु, अलंकार, रसादि ध्वनित हों उस काव्यको ध्वनि कहते हैं।

इस प्रकार ध्वनिका प्रयोग पाँच भिन्न-भिन्न परन्तु परस्पर सम्बद्ध अर्थोमें होता है : १. व्यङ्कक शब्द, २. व्यङ्कक अर्थ ३. व्यङ्ग्य अर्थ, व्यञ्जना [व्यञ्जनाव्यापार], और व्यङ्यप्रधान काव्य ।

उपरोक्तों ध्वनिकरा अर्थो है व्याकरण, परन्तु पारिभाषिक रूपमें यह व्याकरण पाँचों प्रकारोंमें ही होना चाहिये : वाच्यातिशायिने व्यङ्ग्ये ध्वनिः [साहित्यदर्पण]। इस आतिविद्य अध्यय अथवा प्राभान्यका आधार है चारुत्व अर्थात् रमणीयताका उत्कर्ष, 'चार्वलोकार्थनिवन्धना हि वाच्यव्यङ्गययोः प्राधान्य-विवक्षा' [ध्वन्यालोक]। अतएव वाच्यातिशायीका अर्थ हुआ वाच्यसे अधिक रमणीय—और ध्वनि का संक्षिप्त लक्षण हुआ : 'वाच्यसे अधिक रमणीय व्यङ्गयको ध्वनि कहते हैं ।'

ध्वनिकी प्रेरणा—स्कोटसिद्धान्त

ध्वनिसिद्धान्तकी प्रेरणा ध्वनिकारको वैयाकरणोंके स्कोटसिद्धान्तसे मिली है। उन्होंने स्पष्ट स्वीकार किया है कि 'सूरिमिः कथितः'में सूरिमिः [विद्वानों द्वारा] से अभिप्राय वैयाकरणोंसे है क्योंकि वैयाकरण ही पहले विद्वान् हैं और व्याकरण ही सब विद्याओंका मूल है। वे श्रूयमाण [सुने जाते हुए] वर्णोंमें ध्वनिका व्यापार करते हैं।

लोचनकारने इन परम्पराओं और रूपको किया है। उन्होंने वैयाकरणोंके स्कोटसिद्धान्तके मार्ग आलंकारिकोंके इस ध्वनिसिद्धान्तका पूर्णतः संगमजस्य स्थापित करते हुए तद्रूपचियत्क पृथग्भावरकी श्राख्योपाख्य व्याख्या की है। ध्वनिके पाँच रूप—व्यङ्कक शब्द, व्यङ्कक अर्थ, व्यङ्ग्य अर्थ, व्यञ्जना-व्यापार तथा व्यङ्गय काव्य—सभीके लिये व्यापारोंमें निश्चित एवं स्पष्ट सक्केत हैं।

लोचनकारके विवरणीका व्याख्यान करनेके लिये मैं अपने मित्र श्री विश्वम्भरप्रसाद द्विवेदीजीकी 'ध्वन्यालोक-टीका'से दो उदाहरण देता हूँ !

'जब मनुष्य किसी दामदका उच्चारण करता है तो श्रोता उसी उच्चरित दामदको नहीं सुनता। मान लीजिये, मैं आपसे १० गजकी दूरीपर खड़ा हूँ। आपने किसी शब्दका उच्चारण किया। आपका उच्चरित शब्द मुझत्के

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ध्वन्यालोक:

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भूमिका

श्री विश्वनाथप्रसाद डबराल

ध्वनिकी स्थापना

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ध्वन्यालोक:

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भूमिका

वास्तवमें 'ध्वनिका विशाल भवन' व्यञ्जनाके आधारपर ही खड़ा हुआ है और ध्वनिकी स्थापनाका अर्थ व्यञ्जनाकी ही स्थापना है। सबसे पहले अभिधावादियोंके विकल्प लीजिये। उनका एक तर्क यह है कि ध्वनिप्रतिपादनके पूर्व भी तो काव्यमें काव्यत्व था, और सहृदय निर्विशेष उसका आस्वादन करते थे। यदि ध्वनि काव्यकी आत्मा है तो पूर्ववर्ती काव्यमें काव्यत्वकी हानि हो जाती है। इसका उत्तर ध्वनिकारने ही दिया है—और वह यह है कि ध्वनिका नामकरण उस समय नहीं हुआ था, परन्तु उसकी स्थिति तो उस समय भी थी। उदाहरणके लिए पर्यायोक्त आदि अलङ्कारोंमें व्यङ्ग्य अर्थ अत्यन्त स्पष्ट रूपसे वर्तमान रहता है—उसका महत्त्व गौण है, परन्तु उसका अस्तित्व तो असन्दिग्ध है। इस व्यञ्जनार्थके लिए केवल व्यञ्जना ही उत्तरदायी है। इसके अतिरिक्त रस आदिकी स्फूर्तिमें भी स्पष्टतः व्यञ्जनककी तात्त्विकी प्रतीति निष्पन्न है, चाहे निरूपण न हो।

अभिधावादियोंकी सबसे प्रबल युक्ति यह है कि व्यञ्जनाका पृथक् अस्तित्व माननेकी आवश्यकता नहीं है। वह अभिधाके या फिर लक्षणाके अन्तर्गत आ जाती है। इसका एक अभिधात्मक उत्तर तो यह है कि ध्वनिके जो दो प्रमुख भेद किये गये हैं उन दोनोंका अन्तर्भाव अभिधा या लक्षणामें नहीं किया जा सकता। शब्दवाच्यव्यङ्ग्यभवति अभिषाके आश्रित नहीं है। अभिषाके विफल हो जानेकै बाद लक्षणाकी सामर्थ्यपर ही उसका अस्तित्व अवलम्बित है। उधर विशिष्टवाच्यपरवाच्यमें लक्षणा बीचमें आती ही नहीं। अतःपर यह सिद्ध हुआ कि ध्वनिका एक प्रमुख भेद तथा उसके उपभेद अभिषाके अन्तर्गत नहीं समा सकते और दूसरा भेद तथा उसके अनेक प्रभेद लक्षणासे बाहरंग हैं। अर्थात् ध्वनि अभिधा और लक्षणामें नहीं समा सकती। भावात्मक उत्तर यह है कि अभिधार्थ और लक्षणार्थका ध्वन्यर्थसे पार्थक्य : बोधक, स्वरूप, सङ्ख्या, निमित्त, कार्य, काल, आश्रय और विषय आदिके अनुसार व्यङ्ग्यार्थ प्रायः वाच्यार्थसे भिन्न हो जाता है—

बोधकाद्यनुसार पार्थक्य : वाच्यार्थकी प्रतीति कोश-व्याकरणादिके प्रत्येक ज्ञाताको हो सकती है, परन्तु ध्वन्यर्थकी प्रतीति केवल सहृदयको ही हो सकती है।

स्वरूप—कहीं वाच्यार्थ विधिरूप है तो व्यङ्ग्यार्थ निषेधरूप। कहीं वाच्यार्थ निषेधरूप है, पर व्यङ्ग्यार्थ विधिस्वरूप। कहीं वाच्यार्थ संशयात्मक है, पर व्यङ्ग्यार्थ निश्चयात्मक।

सङ्ख्या—संख्याके अन्तर्गत प्रकरण, वक्ता और श्रोता का भेद भी आ जाता है। उदाहरणके लिए 'सूर्यास्त हो गया' इस वाक्यका वाच्यार्थ तो सभीके लिए एक है, पर व्यङ्ग्यार्थ वक्ता, श्रोता तथा प्रकरणके भेदसे अनेक होंगे।

निमित्त—वाच्यार्थका बोध साक्षरतामात्रसे हो जाता है, परन्तु व्यङ्ग्यार्थकी प्रतीति प्रतीवि प्रतिभा द्वारा ही सम्भव है। वास्तवमें निमित्त और बोधका पार्थक्य बहुत-कुछ एक-सा ही है।

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ध्वन्यालोक:

काव्य—वाच्यार्थसे वस्तुज्ञानमात्र होता है। परन्तु व्यङ्ग्यार्थसे चमत्कार—आनन्दका आस्वादन होता है।

काल—वाच्यार्थकी प्रतीति पहले और व्यङ्ग्यार्थकी उसके बाद होती है। यह क्रम लक्षित हो या न हो, परन्तु इसका अस्तित्व असन्दिग्ध है।

आश्रय—वाच्यार्थकेद्वारा शब्द या पदके आश्रित रहता है, परन्तु व्यङ्ग्यार्थ शब्दमें, शब्दके अर्थमें, शब्दके एक अंशमें, वर्ण या वर्णरचना आदिमें भी रहता है।

विषय—कहीं वाच्य और व्यङ्ग्यका विषय ही मिलता होता है : कहीं वाच्यार्थ एक व्यक्तिके लिए अभिप्रेत होता है, और व्यङ्ग्यार्थ दूसरेके लिए।

पर्याय—इसके अतिरिक्त, पर्याय शब्दोंके भी व्यङ्ग्यार्थमें अंतर होता है। स्पष्टतः सभी पर्यायोंका वाच्यार्थ एक-सा होता है, परन्तु व्यङ्ग्यार्थ मिलता हो सकता है। उपयुक्त विशेषणका चयन बहुत-कुछ इसी पार्थक्यपर निर्भर रहता है।

आधुनिक हिन्दी काव्यमें तथा विदेशके साहित्यशास्त्रमें विशेषतया काव्यचिदम्बका विशेष गुण माना गया है और उसका अत्यन्त सूक्ष्म विवेचन भी किया गया है।

अनन्वित अर्थोंकी व्यञ्जना—अभिधा केवल अन्वित अर्थका ही बोध करा सकती है परन्तु कहीं-कहीं अन्वित अर्थके अतिरिक्त किसी अनन्वित अर्थकी भी व्यञ्जना होती है। इस प्रकरणमें सममतने 'कुर कुरचि' और 'रचि कुर'का उदाहरण दिया है। अन्वित अर्थकी दृष्टिसे 'रचि कुर' सर्वथा निदोष है, परन्तु इसमें 'कुचि'के द्वारा, जो सर्वथा अनन्वित है, अश्लील अर्थका बोध होता है। पण्डित रामदहिन मिश्रने पन्तकी निम्नलिखित पंक्तियोंमें भी यही उदाहरण घटाया है—

'सरलपन ही था उसके मन'से सरल पनही (जूतो) था उसका मन' इस अनन्वित अर्थकी व्यञ्जना भी हो जाती है।

यह अनन्वित अर्थ अभिधाका व्यापार तो हो नहीं सकता। वैसे भी यह वाच्य न होकर व्यङ्ग्य ही है, अतएव व्यञ्जनाका ही व्यापार सिद्ध हुआ।

रसादि भी अभिधाश्रित ध्वनिविमेदके अन्तर्गत आते हैं। ये विशिष्टतान्यपरवाच्यके असंलक्ष्य-क्रम व्यङ्ग्यके अन्तर्गत हैं। ये रसादि भी व्यञ्जनाओंके अस्तित्त्वके प्रबल प्रमाण हैं। क्योंकि ये कहीं भी वाच्य नहीं होते सदा वाच्य द्वारा आक्षित व्यङ्ग्य होते हैं। शृङ्गार शब्दके अभिधेयार्थके द्वारा शृङ्गार-रसकी प्रतीति असम्भव है। इस प्रकार यह सिद्ध हो जाता है कि कमसे कम रसादिकी प्रतीति अभिधाशक्तिकी सामर्थ्यसे बाहर है। इस प्रसङ्गको लेकर संस्कृतके आचार्योंमें बड़ा विवाद हुआ है।

संबंध पहले तो भतृहरि व्याकरणके विषय करते हुए व्यञ्जनाका भावकत्व और भोजकत्व दो शक्तियों माननी और चार अर्थका भावन तथा रसका आस्वाद उभयकी द्वारा माना। परन्तु अभिनवगुप्तने मार्मिक और चारु अर्थका भावन तथा रसका आस्वाद उभयकी द्वारा माना। परन्तु अभिनवगुप्तने मार्मिक और चारु अर्थका भावन तथा रसका आस्वाद केवल भावकत्व द्वारा माना, तथा व्याकरण आदिके आधारपर व्यञ्जनाकी ही स्थापना की।

वास्तवमें भट्टनायक अपने सिद्धान्तको अधिक वैज्ञानिक रूप नहीं दे सके। शब्दकी भावकत्व और भोजकत्व जैसी शक्तियोंके लिए न तो व्याकरणमें और न मीमांसा आदिमें ही कहीं कोई आधार मिलता है, और इधर मनोविज्ञान तथा भाषाशास्त्रकी दृष्टिसे भी इसकी सिद्धि नहीं हो सकती।

भावकत्वका काव्य भावन करानेमें सहायक होना है, और भावन 'बहुत-कुछ कल्पनाकी क्रिया है। अतएव भावकत्वका काव्य हुआ कल्पनाको उद्बुद्ध करना। इधर भोजकत्वका काव्य है साधारणीकृत

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अर्थकै भावन द्वारा रसकी चर्वणा करानां । भट्टनायकके कहनेका तात्पर्य आधुनिक शब्दावलीमें यह है।कि काव्यगत शब्द पहले तो पाठकको अर्थबोध कराता है, फिर उसकी कल्पनाको जागृत करता है और तदनन्तर उसके मनमें वासनारुपसे स्थित स्थायी मनोविकारोंको उद्बुद्ध करता हुया उसको आनन्दमग्न करा देता है । उनका यह सम्पूर्ण प्रयत्न इस तथ्यको स्पष्ट करनेके लिये है कि शब्द और अर्थकै द्वारा काव्यगत ‘उस विचित्र आनन्द’की प्राप्ति कैसे होती है । जहांतक काव्यानन्दके स्वरुपका प्रश्न है, भट्टनायकको उसके विषयमें कोइँ भ्रान्ति नहीं है । वे जानते हैं कि यह आनन्द वासनामूलक तो अवश्य है, परन्तु केवल वासनामूलक आनन्दके अन्य रुपोंसे इसका वैचित्र्य स्पष्ट है । वास्तवमें, जैसा कि मैने अन्यत्र स्पष्ट किया है, काव्यानन्द एक मिश्र आनन्द है—इसमें वासनाजन्य आनन्द और बौद्धिक आनन्द दोनोंका समन्वय रहता है । उसके मिश्र स्वरुपको पढीसनेने कल्पनाका आनन्द कहा है जो मनोविज्ञानकी दृष्टिसे ठीक भी है क्योंकि कल्पना चित्त और चैतन्यकी मिश्रित क्रिया ही तो है । इसी मिश्र रुपकी व्याख्यामें [यद्यपि भट्टनायकने स्वयं इसको अपने शब्दोंमें व्यकत नहीं किया है और इसका कारण परम्परासे चला आया हुया ‘अनिर्वचनीय’ शब्द था] भट्टनायकने भावकत्व और भोजकत्वकी कल्पना की है—भावकत्व उसके बौद्धिक अंशका हेतु है और भोजकत्व उसके वासनाजन्य रुपका व्याख्यान करता है । अभिनवगुप्तने ये दोनों विशेषताएँ, अकेली व्यज्जनामें मानी हैं । व्यज्जना ही हमारी कल्पनाको जगाकर हमारे वासनारुप स्थित मनोविकारोंकी चरम परिणतिके आनन्दका आस्वादन कराती है । इस प्रकार मूलतः भावकत्व और भोजकत्व दोनोंका उद्देस्य भी वही ठहरता है जो अकेली व्यज्जनाका । व्याख्यान और मीमांसा आदिके सहारे व्यज्जनाका आाधार चूँकि अधिक पुष्ट है, इसलिए अनतोगत्वा वही सर्वमान्य हुयी । भट्टनायककी दोनों शक्तियों निराधार घोषित कर दी गयीं ।

इस प्रकार अभिधावादियोंका यह तर्क खण्डित हो जाता है कि अभिधाका अर्थ ही तीरकी तरह उत्तरोत्तर शक्ति प्रदान करता जाता है ।

वादमें महिमभट्टने व्यज्जनाका प्रतिपेष किया और कहा कि अभिधा ही शब्दकी एकमात्र शक्ति है, जिसे व्यज्जय कहा जाता है वह अनुमेयमात्र है, तथा व्यज्जना पूर्वसिद्ध अनुमानके आातिरिक्त और कुछ नहीं । वे वाच्यार्थे और व्यज्ज्यार्थमें व्यज्जक-व्यज्ज्यसम्बन्ध न मानकर लिङ्ग-लिङ्गीसम्बन्ध ही मानते हैं । परन्तु उनके तकोंका मम्मटने अत्यंत युक्तिपूर्वक खण्डन किया है । उनकी युक्ति है कि सर्वत्र ही वाच्यार्थे और व्यज्ज्यार्थमें लिङ्ग-लिङ्गीसम्बन्ध होना अनिवार्य नहीं है । लिङ्ग-लिङ्गीसम्बन्ध निश्चयार्थक है । अर्थात् हेतु लिङ्ग [साधन या हेतु] निश्चय रूपसे वर्तमान होगा, वहाँ लिङ्गी [अनुमेय वस्तु] का अनुमान किया जा सकता है । परन्तु व्यनिप्रसङ्गमें वाच्यार्थे सदा ही लिङ्गी [अनुमेय वस्तु] नहीं होता—यह बात अनेकार्थक होता है । ऐसे स्थिति में उसे व्यज्ज्यार्थरुप निश्चयात्मक हेतु न हो सकता—वह प्रायः अनैकान्तिक होता है । इस चमत्कारके अनुमानका हेतु कैसे माना जा सकता है ? मनोविज्ञानकी दृष्टिसे भी महिमभट्टका तर्क अधिक सज्जत नहीं है क्योंकि अनुमानमें साधनसे साध्यकी सिद्धि तर्क या बुद्धिके द्वारा होती है, पर ‘वनमें वाच्यार्थसे व्यज्ज्यार्थकी प्रतीति तर्कके सहारे न होकर संहदयता [भादुकता, कल्पनाएँ आदि] के द्वारा होती है ।

अब भाक्त [लक्षणा] वादियोंको लीजिये । उनका कहना है कि वाच्यार्थके अतिरिक्त यदि कोई दूसरा अर्थ होता है तो वह लक्यार्थके ही अन्तर्गत आ जाता है । व्यज्ज्यार्थमें लक्यार्थंका ही एक रुप है, अतएव लक्षणा और व्यज्जना जैसी कोई शक्ति नहीं है । इस मतका खण्डन अधिक सरल है ।

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काव्यत्वका अधिवास : वाच्यार्थमें या व्यङ्ग्यार्थमें ?

आचार्य शुक्लने इस प्रसङ्गते सम्भेद एक अत्यन्त महत्वपूर्ण तथा रोचक प्रश्न उठाया है : काव्यत्व वाच्यार्थमें रहता है या व्यङ्ग्यार्थमें ? अपने इन्दौर भाषणमें उन्होंने कहा है :

"वाच्यार्थके योग्य और अनुपपन्न होनेपर योग्य और उपपन्न अर्थ प्राप्त करानेके लिये लक्षणा और व्यञ्जनाका सहारा लिया जाता है । अब प्रश्न यह है कि काव्यकी रमणीयता किसमें रहती है ? वाच्यार्थमें याथवा लक्ष्यार्थमें या व्यङ्ग्यार्थमें ? इसका वेधड़क उत्तर यही है : 'वाच्यार्थमें,' चाहे वह योग्य हो वा उपपन्न हो अथवा अयोग्य और अनुपपन्न ।"

इसके आगे उन्होंने साकेतसे दो उदाहरण दिये हैं--

९. " 'जीकर हाय पतझ मरै कया ?' इसमें भी यही बात है। जो कुछ वैचित्र्य या चमत्कार है वह इस अयोग्य और अनुपपन्न वाक्य या उसके वाच्यार्थमें ही है । इसके स्थानपर यदि

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दूसरे उदाहरणमें यह तथ्य और भी स्पष्ट हो जायगा क्योंकि इसमें रमणीयता वास्तवमें अधिक है।

आप अवधि बन सकूँ कहाँ तो क्या कुछ देर लगाऊँ। मैं अपनेको आप मिटाकर जाकर उनको लाऊँ॥

उर्मिला और लक्ष्मणके बीच अवधिका व्यवधान है। मिलनेके लिये इस व्यवधान अत्यन्त अवधिको मिटाना आवश्यक है। अवधि साधारणतः तो अपने समयपर ही मिटेगी, तुर्त मिटना उसका समय नहीं। उर्मिला उसके एक दृश्य उपायककी कल्पना करती है—वह स्वयं यदि अवधि बन जाय तो उसका अन्त करना उसके अपने अधिकाधिककी बात हो जाय। अपनेको तो वह तुर्त मिटा ही सकती है और जब अवधि उसका अपना रूप हो जायगी, तो उसके अन्तके साथ अवधिका अन्त भी हो जायगा। इस तरह व्यवधान मिट जायगा और लक्ष्मणसे मिलन हो जायगा। परन्तु जब उर्मिला ही मिट जायगी तो फिर मिलनसुखका भोक्ता कौन होगा; अतएव अपनेको मिटानेका अर्थ यहाँ अपने जीवनका अन्त कर लेना न होकर लक्षणकी सहायतासे 'बड़ेसे बड़ा बलिदान करना' आदि ही हो सकता है। परन्तु यह लक्ष्यार्थ देते ही उक्तिमें कोई चमत्कार नहीं रह जाता। चमत्कार तो अर्थकी बाह्य अनुप्रप्तता परन्तु आन्तरिक उपपत्तिके विरोधाभासमें है। किन्तु क्या उक्तिकी रमणीयता इसी चमत्कारतक ही सीमित है? वास्तवमें बात इतनी नहीं है, जैसा शुक्ल जीने स्वयं दिखलाया है, इससे उर्मिलाका 'अत्यन्त औत्सुक्य' व्यञ्जित होता है। इस 'अत्यन्त औत्सुक्य'की व्यञ्जना ही उक्तिकी रमणीयताका कारण है—यही पाठकके मनका इस 'अत्यन्त औत्सुक्य'के साथ तादात्म्य कर उसमें एक मधुर अनुभूति जगाती है। यही उक्ति की रमणीयता है जो सहृदयको आनन्द देती है। शुक्लजीका यह तर्क बड़ा विचित्र लगता है कि सारी रमणीयता इसी व्याहृत और बुद्धिग्राह्य वाच्यार्थमें है, इस योग्य और बुद्धिग्राह्य व्यङ्ग्यार्थमें नहीं कि उर्मिलाको अत्यन्त औत्सुक्य है। इसमें दो टुटीयाँ हैं; एक तो उर्मिलाको 'अत्यन्त औत्सुक्य है' यह व्यङ्ग्यार्थ नहीं रहा—वाच्यार्थ हो गया। औत्सुक्यकी व्यञ्जना ही चित्तकी चमत्कृतिका कारण है, उसका कथन नहीं। दूसरे जिस अनुप्रप्ततापर वे इतना बल दे रहे हैं वह रमणीयताका कारण नहीं है, उसका एक साधनमात्र है। उसका यहाँ वही योग है जो रसकी प्रतीतिमें अलङ्कारका। उपर्युक्त विवेचनसे ऐसा प्रतीत होता है मानो विरोध करते-करते अनायास ही किसी दुर्बल क्षणमें शुक्लजीपर क्रोचेका जादू चल गया हो। क्रोचेका यह मत अवश्य है कि उक्ति ही काव्य है, और इसके प्रतिपादनमें उनकी उक्ति यह है कि व्यङ्ग्यार्थ और वाच्यार्थ दोनोंका पार्थक्य असम्भव है—एक प्रतिप्रतिक्रियात्मक अभिव्यक्ति सम्भव है। क्रोचेके अनुशार 'आप अवधि बन सकूँ' आदि उक्ति और 'उर्मिलाको अत्यन्त औत्सुक्य हैं' यह उक्ति सर्वथा पृथक् हैं—ये दो सर्वथा मिल प्रतिप्रतिक्रियाओंकी अभिव्यञ्जनाएँ हैं। अतएव 'आप अवधि बन सकूँ' आदिका चमत्कार [काव्यत्व] उसका अपना है जो केवल उक्तिके द्वारा अभिव्यक्त हो सकता है, 'उर्मिलाको अत्यन्त औत्सुक्य है' यह एक दूसरी ही बात है।

वास्तवमें रमणीयताका अर्थ है हृदयको रमानेकी योग्यता और हृदयका सम्भ्रान्त भावसे वह भावमें ही रम सक्ता है क्योंकि उसका समस्त व्यापार भावोंके द्वारा ही होता है। अतएव वही उक्ति वास्तवमें रमणीय हो सकती है जो हृदयमें कोई रम्य भाव उद्बुद्ध करे; और यह तभी हो सकता है जब वह स्वयं इस प्रकारके भावकी वाचिका हो। यदि उसमें यह वाचिका नहीं है तो वह बुद्धिको

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ध्वनिके भेद

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ध्वनिकी व्यापकता

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कारक, कृत् प्रत्यय, तद्धित प्रत्यय, समास, उपसर्गनिपात, काल आदि में लेकर वर्ण, पद, वाक्य, मुक्तक पद्य और महाकाव्यतक उसके अधिकरक्षेत्रका विस्तार है। जिस प्रकार एक उपसर्ग या प्रत्यय या पदविभक्तिमात्रसे एक विशिष्ट रमणीय अर्थंका ध्वनन होता है, इसी प्रकार संपूर्ण महाकाव्यसे भी पृथक् विशिष्ट अर्थका ध्वनन या स्कोट होता है। म, पर, कु, वा, डा आदि जहाँ एक रमणीय अर्थको व्यक्त करते हैं, वहाँ 'रामायण' और 'महाभारत' जैसे विशालकाय ग्रंथका भी एक ध्वन्यर्थ होता है जिसे आधुनिक दार्शनिकोंने सकेंत, मूल्यार्थ आदि अनेक नाम दिये गये हैं।

रति और रस

भरतने रसकी परिभाषा की है : विभाव, अनुभाव, संचारी भाव आदिके संयोगसे रसकी निर्भत्ति होती है। इससे स्पष्ट है कि काव्यमें केवल विभाव-अनुभाव आदिका ही कथन होता है—उनके संयोगके परिपाकरूप रसका नहीं, अर्थान् रस वाच्य नहीं होता। इतना ही नहीं, रसका वाचक शब्दों द्वारा कथन एक रसदोष भी माना जाता है—रस केवल प्रतीत होता है। दूसरे, जैसा कि अभी व्याख्यानके विषयमें कहा गया है, किसी उक्तिकाका वाच्यार्थ रसप्रतीति नहीं कराता, केवल अर्थबोध कराता है। रस सहृदयकी हृदयस्थित वासनाकी आनन्दमय परिणति है जो अर्थबोधसे भिन्न है। अतएव उक्ति द्वारा रसका प्रत्यक्ष वाचन नहीं होता, अपृथक् प्रतीति होती है—पारिभाषिक शब्दोंमें व्यंजन या ध्वनन होता है। इसी तकषे ध्वनिकारने उसे केवल रस न मानकर रसध्वनि माना है।

ध्वनिके अनुसार काव्यके भेद

ध्वनिवादियोंने काव्यके तीन भेद किये हैं—उत्तम, मध्यम और अधम। इस वर्गक्रमका आधार स्पष्टत: ध्वनि अथवा व्यंग्यकी सापेक्षिक प्रधनाता है। उत्तम काव्यमें व्यंग्यकी प्रधानता रहती है अर्थात् उसमें वाच्यार्थकी अपेक्षा व्यंग्यार्थ प्रधान रहता है, उसीको ध्वनि कहा गया है। ध्वनिके भी अर्थात् उत्तम काव्यके भी तीन भेदक्रम हैं : रसध्वनि, अलंकारध्वनि और वस्तुध्वनि। इनमें रसध्वनि सर्वश्रेष्ठ है। मध्यम काव्यको गुणीभूतव्यंग्य भी कहते हैं। इसमें व्यंग्यार्थका अस्तित्व तो अवश्य होता है, परन्तु वह वाच्यार्थकी अपेक्षा अधिक रमणीय नहीं होता—वरन् समान रमणीय या कम रमणीय होता है, अर्थात् उसकी प्रधानता नहीं रहती। अधम काव्यके अन्तर्गत चित्र आता है जो वास्तवमें काव्य भी नहीं। उसमें व्यंग्यार्थका अस्तित्व ही नहीं होता और न अर्थगत चारुत्व ही होता है। ध्वनिकारने उसकी असमर्थता स्वीकार करते हुए भी काव्यकी कोटिमें उसे स्थान दे दिया है—परन्तु रसका सर्वथा अभाव होनेके कारण अभिनवने और उनके बाद विश्वनाथने उसकी काव्यकोटि-पूर्ति: बहिष्कृत कर दिया है। इस प्रकार ध्वनिके अनुसार काव्यका उत्तम रूप है ध्वनि और ध्वनिमें भी सर्वोत्तम है रसध्वनि। पण्डितराज जगन्नाथने इसे उत्तमोत्तम भेद कहा है, अर्थात् रस या रसध्वनि ही काव्यका सर्वोत्तम रूप है। दूसरे शब्दोंमें रस ही काव्यका सर्वश्रेष्ठ तत्व है। शास्त्रीय दृष्टिसे रस और ध्वनिका यही सम्बन्ध एवं तारतम्य है।

ध्वनिमें अन्य सिद्धान्तोंका समाहार

ध्वनिकार अपने सममुख दो उद्देश्य रखकर चले थे : एक ध्वनिसिद्धान्तकी निर्भान्त स्थापना, दूसरा अन्य सभी प्रचलित विद्वान्तोंका ध्वनिमें समाहार। वास्तवमें ध्वनिसिद्धान्तकी सर्वमान्यताका मुख्य कारण भी यही हुआ। ध्वनिको उन्होंने इतना व्यापक बना दिया कि उसमें न केवल उनके

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चित्ररूपसे तात्पर्य यह है कि वे श्रोता के मन में भावनाका जो 'विम्ब' जगाये वह क्षीण और 'मिल्न न होकर पुष्ट और भास्वर हो; और यह कार्य कविकी कल्पनाशक्तिकी अपेक्षा करता है क्योंकि काव्यकल्पनाकी सहायताके बिना सहृदयकी कल्पनामें यह चित्र साकार कैैसे होगा ? उसके लिये कविको निश्रय ही अपने शब्दोंको कल्पनागर्भित करना पड़ेगा। दूसरे शब्दों में हम यह कह सकते हैं कि यह 'विशेष प्रयोग' भाषाका कल्पनात्मक प्रयोग है। अपनी कल्पनाशक्ति को नियोजन करके कवि भापा के शब्दोंको एक ऐसी शक्ति प्रदान कर देता है कि उन्हें सुनकर सहृदयको केवल अर्थबोध ही नहीं होता वरन् उसके मनमें एक अतिरिक्त कल्पना भी जग जाती है जो परिपाककी अवस्थामें पहुंचकर रसास्वादनमें विशेषतया सहायक होती है। शब्दोंकी इस अतिरिक्त कल्पना जगानेवाली शक्तिको ही 'ध्वनिकारने 'व्यञ्जना' और उसके इस सवैच रुपको ही 'रसवत्‌नी' कहा है। ध्वनिस्थापनाके द्वारा वास्तवमें ध्वनिकारने काव्यमें कल्पनातत्वके महत्त्वकी प्रतिष्ठा की है।

पाश्चात्य साहित्यशास्त्र में ध्वनिका सीधा विवेचन ढूँढ़ने तो असफलत होगी क्योंकि पाश्चात्य अपनी पृथक् जीवनदृष्टि एवं संस्कृति और उसके अनुसार साहित्य, कला, दर्शन, विज्ञान आदि प्रति अपना पृथक् दृष्टिकोण रहा है। परन्तु मानवीयजीवनकी मूलभूत एकताके कारण जिस प्रकार जीवनके अन्य मौलिक तत्वोंमें अनेक प्रकारकी प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष समानताएँ मिलती हैं, इसी प्रकार साहित्य और कलाके क्षेत्रमें भी मूल तत्व अत्यन्त भिन्न नहीं है।

जैसा कि उपर्युक्त विवेचनसे स्पष्ट है, ध्वनिका सिद्धान्त मूलतः कल्पनाकी महत्त्वसिद्धि ही है और कल्पनाका प्रसुत्व पाश्चात्य काव्यशास्त्र में आरंभसे ही रहा है। पाश्चात्यके आचार्यों के प्लेटो हैं, जिन्होंने अप्रत्यक्ष विधिविधानों से काव्यमें सत्यके आधारिकी प्रतिष्ठा की। परन्तु वे विज्ञानके सत्य और काव्यके सत्यका अन्तर स्पष्ट न कर सके—उन्होंने बुद्धिके 'शोशेनिक' सत्य और कल्पनाके सत्यको एक माना । प्लेटोंने काव्यको अनुवृत्ति माना—वह मौतिक पदार्थों या घटनाओंका अनुकरण करता है, और मौतिक पदार्थ एवं घटनाएँ आध्यात्मिक (ideal) पदार्थों और घटनाओंकी प्रतिरूपमात्र हैं। और चूँकि वास्तविक सत्य आध्यात्मिक घटनाएँ ही हैं, अतएव कविकी रचना सत्यकी मौतिक प्रतिरूपकी प्रतिरूप है। और प्रतिरूपके रूपमें भी वह सर्वथा शुद्ध नहीं है; क्योंकि उसमें अनेक विकृतियाँ हैं। अतएव निष्कर्ष यह निकलता है कि काव्य सत्यसे दूर है। एक तो वह सत्यकी प्रतिरूपकी प्रतिरूप है और उसपर भी विकृति है। भारतीय काव्यशास्त्रकी मान्यदावलीमें उन्होंने वाध्यर्थको ही काव्यमें मुख्य मान लिया, स्थूलार्थकी प्रतीति वें नहीं कर सके। और, इसीलिए वे काव्यकी आत्माको व्यक्त नहीं कर पाये। दाँदीयक धरातलपर प्लेटोके उपर्युक्त सिद्धान्तमें बहुत कुछ मार्मिक दर्शनके अभिप्रायको व्यक्तित्ववाद और व्याकरणके स्कोटवादका आभास मिलता है जिनसे भारतीय आचार्योंको ध्वनिसिद्धान्तकी प्रेरणा मिली थी। यह एक विचित्र संयोग है कि इनकी दार्शनिक अनुभूति ह्रासपर भी प्लेटो काव्यका रहस्य ग्रहणसमर्थ रहे।

प्लेटोंकी युदिधका समाधन अरस्तूते किया। उन्होंने मी प्लेटोंकी माँति काव्यको अनुकारिता ही माना। परन्तु उन्होंने अनुकृतिका अर्थ 'प्रतिरूप' अथवा पुनर्निर्माण अथवा पुनःसृजन किया। प्लेटोंकी धारणा थी कि काव्य वस्तुकी विषयगत 'प्रतिरूपांत है, परन्तु अरस्तूने उसे वस्तुका रसास्वादनात्मक पुनर्निर्माण अथवा पुनःसृजन माना। कवि कथन नहीं करता प्रसुत्व करता है, और भोतों या पाठक तदनुसार वस्तुके प्रत्यक्षस्पको ग्रहण नहीं करता, वरन् कविमानससचात रूपसे ही ग्रहण करता है, अनुकूलजीके शब्दों में वह 'कविकी उत्क्ंा 'अर्थ ग्रहण नहीं करता; 'विम्ब ग्रहण करता

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हैं । इस प्रकार अरस्तूने वन्य या व्यक्जक्य आदि द्रव्योंका प्रयोग न करते हुए भी काव्यार्थको वाच्य न मानकर व्यङ्गच्य ही माना है; इनकी 'सिमीसिस'—अनुकरणाश्रयी व्याख्यामें "वस्तुनो कथपनारमक पुनःसृजन" का अर्थ विभाव, अनुभाव, आदिके द्वारा [वस्तुसे उद्भूद] भावकी व्यञ्जना ही है । इस प्रकार अरस्तूके सिद्धान्तमें प्राकारणतरसे ध्वनिकी स्वीकृति असन्दिग्ध है ।

अरस्तूके उपरान्त यूनान, गॅम तथा मध्य यूरोपके आलोचकोंने काव्यके स्वरूप और उपादानोंका विवेचन किया । इन आलोचकोंमेंसे प्रायः एक बात तो सर्वत्र स्पष्ट थी कि काव्यमें ग्राह्य अपने साधारण—कोश और व्यवहारगत—अर्थके अतिरिक्त असाधारण अथवा विशेष अर्थको व्यक्त करते हैं । इस तथ्यको अनेक प्राचीन आचार्योंने स्थान-स्थानपर व्यक्त किया है । रोमन आलोचककवि होरेसने दाब्दोंके प्रयोगपर प्रकाश डालते हुए एक स्थानपर लिखा है, "कविको अपने शब्दोंके संघुम्फनमें अत्यन्त सावधानी और मेधासे काम लेना चाहिए: ... ... यदि आप किसी विदग्ध प्रसङ्गकी उद्भावना कर किसी प्राचीन दाब्दका नवीन अर्थ दे सकें, तो आप पूज्यत: सफल होंगे ।" प्रसङ्गके द्वारा साधारण [प्राचीन] शब्दमें [विशेष [नवीन] अर्थका उद्भव स्वभावादियोंकी अत्यन्त परिचित युक्ति है । इसी प्रकार क्रिटिलियनने दाणिमें चमत्कार लानेके लिए कलाकी गोपन आवश्यक माना है । ये कलाके मर्म रहस्य यह मानते हैं कि वह "अपने कर्ताके अतिरिक्त और सभीके लिए अत्यक्त रहे ।" कलाके अत्यक्त रूपकी यह स्थापना भी ध्वनिकी प्रकारणतरसे स्वीकृति है ।

यूनान और गॅमके साहित्यिक ऐश्वर्यके अनन्तर यूरोपमें अन्धकारयुग आता है जो ज्ञान-विज्ञान और कला-साहित्यके चरम हासका युग था । इस अन्धकारमें केवल एक ही उद्ज्ज्वल नक्षत्र है और वह है दान्ते । दान्तेने विषय और भाषा दोनोंकी गरिमापर बल दिया । भाषाके विषयमें उन्होंने प्रामीण भाषाओं बचाने और औज्ज्वल्यमयी मादृभापाके प्रयोगका समर्थन किया है । उन्होंने शब्दोंके चिपयमें 'विस्तारसे लिखा है । उदात्त शैलीके लिए उन्होंने लौज्ज्वलताकी भाँति उदात्त शब्दोंके प्रयोगको अनिवार्थ माना है । शब्दोंको उन्होंने अनेक वग्गोंर्मे विभक्त किया है—कुछ शब्द

वाच्यकी तरह (·hildlin) नतुलाते हैं—वे अत्यन्त सरल-सामान्य नित्य प्रतिदिनके हलके-फुलके शब्द होते हैं । कुछ शब्दोंमें ध्वनिका अभाव और लचील खियों जैसी (womanish) लोच लचककीमात्र होती है, उनके विपरीत कुछ शब्दोंमें पौषप होता है । इस तीसरे वग्गमें भी दो प्रकारके शब्द होते हैं—ग्रामीण और नागरिक; नागरिक शब्दोंमें भी कुछ मसंन (ccmbcd) और चिकण (slippery) होते हैं और कुछ प्रकृत (shaggy) और अनगढ़ (rumpled) हैं । इनमें चिकण और अनगढ़में केवल नाद प्रभावमात्र होता है । उदात्त शैलीके अवयव केवल मसंन और प्रकृत शब्द ही हैं । शब्दोंमें इस प्रकारके गुणोंकी कल्पना असन्दिग्ध स्वीकृति है—व्यञ्जनाशक्तिको स्वीकार किये विना शब्दोंकी उपयुक्त विशोषणों और वग्गोंकी उद्भावना सम्भव ही नहीं हो सकती ।

अन्धकारयुगके अनन्तर यूरोपमें पुनर्जागरण कालका आरम्भ हुआ । यह काव्य और कलाके लिए मध्ययुगीन कच्जनोंसे मुक्तिका युग था । इस युगके काव्य और साहित्यमें जहाँ जीवनके निकटसम्पर्क और उसकी पूण्णताकी अभिव्यक्ति मिलती है, वहाँ काव्यशास्त्रमें प्रायः प्राचीन आदशोंकी ही स्थापना है । परन्तु धीरे-धीरे नवीन जीवन आदशों उसमें भी प्रतिफलित होने लगे और सर फिलिप सिडनीको स्वीकार करना पड़ा कि शिल्प और प्रसादनके अतिरिक्त काव्यका एक और महत्तर प्रयोजन है आनन्दोल्लसित करना । इसके साथ ही प्राचीन काव्यकलाके मानोंमें भी परिवर्तन होने लगा—गरिमा और नियमनके स्थानपर कल्पना और प्रकृत भावोच्चारका महत्व बढने लगा । जैसी

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ध्वन्यालोक:

क्रोचेके अनुसार काव्य सहृदयासुमूति है और सहृदयानुभूति अनिवार्यतः अभिव्यञ्जना है—अतःएव काव्य मूलतः अभिव्यञ्जना है। क्रोचेके अभिव्यञ्जनाको अखण्डरूपेणी मानते हैं—अभिव्यञ्जनाका एक ही रूप होता है; उसमें अभिधा, लक्षणा, व्यञ्जना अथवा वाच्य और व्यङ्ग्यका भेद नहीं होता। परन्तु फिर भी क्रोचेकी सहृदयानुभूति कल्पनाकी कल्पना की है। क्रोचेके ही अनुसार वह चेतनाकी अरूप शक्तियोंका एक समन्वित विम्बरूप होती है। स्पष्टतः ही यह विम्बरूप सहृदयानुभूति कथित नहीं हो सकती, ध्वनित ही हो सकती है। कहनेका अभिप्राय यह है कि क्रोचेके लिए वाच्य-व्यङ्गयका भेद तो सर्वथा अनर्गल है, परन्तु उन्होंने व्यङ्गयका कहीं निपेध नहीं किया। उन्होंने अभिव्यञ्जनाको अखण्ड और एकरूप माना है, उसके प्रकार और अवयवभेद नहीं माने यह ठीक है। परन्तु विम्बरूप सहृदयानुभूतिकी यह अभिव्यञ्जना कथनरूप तो हो नहीं सकती, होगी तो वह ध्वनिरूप ही। क्रोचेके लिए सिद्धान्तरूपमें ध्वनि अग्रासङ्गिक थी—परन्तु व्यवहाररूपमें तो वे भी इसको बचा नहीं सके। वास्तवमें क्रोचे आत्मवादी दार्शनिक ये। उन्होंने अभिव्यञ्जनाका आत्माकी रूपमें विवेचन किया है, उसके मूर्त शब्द-अर्थरूपमें उन्हें अभिरुचि नहीं थी। परन्तु क्रोचेके बाद उनके अनुयामियोंोंने अभिव्यञ्जनाके स्थूल रूपको अधिक ग्रहण किया है और अभिव्यञ्जनाके चमत्कारको ही कला का सार-तत्त्व माना है। स्वभावतः ही इन लोगोंका ध्वनिसे निकटतर सम्बन्ध है। प्रतिक्रियावाद तो स्वीकार्य रूपसे प्रतिकारात्मक तथा शाब्देतिक अभिव्यक्तिके ही आभ्रित है। उसकी तो समूची किया-प्रणाली ध्वनि [शाब्देतिक अर्थ] को लेकर ही होती है।

इस ग्रन्थके काव्य और कला सम्बन्धी विचारोंपर फ्रायडका आधरा प्रभाव है परन्तु फ्रायडने कलाके मूल दर्शोंका विवेचन किया है—उसकी मूर्त अभिव्यक्तिके लिए उन्होंने चिन्ता नहीं की। वे काव्य और कलाको स्वप्नका सगोत्री मानते हुए उसे मूलतः स्वप्नचित्र (Phantasy) रूप जानते हैं। कहनेकी आवश्यकता नहीं कि ये स्वप्नचित्र भी अनिवार्यतः व्यञ्ज्यके ही आश्रयसे व्यक्त हो सकते हैं। कवि अपने मनके कुण्ठाजन्य स्वप्नचित्रकी स्पष्टः व्यञ्जना ही कर सकता है, कथन नहीं। क्रोचे और फ्रायडका उल्लेख मैनेँ केवल इसलिए किया है कि आधुनिक कलां-विवेचनपर इनका गहरा और शवैभौम प्रभाव है तथा किसी भी काव्य-सिद्धान्तकी समीक्षामें इनकी उपेक्षा नहीं की जा सकती। जैसे इनका सीधा सम्बन्ध प्रस्तुत विषयसे नहीं है [यदि इनके सिद्धान्तोंमें ध्वनिकी अप्रत्यक्ष स्वीकार्य सर्वथा असन्दिग्ध है]। इनकी अपेक्षा डा० ब्रैडले जैसे कलावादी (Aesthetetes) तथा श्रीयुक्त रीड जैसेआतिवस्तुवादी (Surrealist) आलोचकोंका 'ध्वनिसिद्धान्तसे अधिक ऋणु सम्भन्व है। कलावादियोंका “कलात्मक अनुभूति अनिर्वचनीयता” का सिद्धान्त भी आनन्दवर्धनके “प्रतीयमानं पुनरन्यदेव” का ही रूपान्तर है। फ्रायडके अतिवस्तुवादी और उनके अंग्रेज प्रवक्ता श्री रीड और उपर्युक्त सिगमंड जैसे प्रभाववादी (Impressionists) तो व्यङ्गयके ही नही, गूढ़ व्यङ्गयके भी समर्थक हैं। प्रभाववादी तो एक शब्दशः केवल एक अर्थका ही नहीं, सारे प्रकारकी व्यञ्जनाका दुष्कर कार्य लेते हैं। देखिये सिंगानेकी कविताका ध्वन्यालोक-कुंत 'विश्लेषण [चिन्तामणि भाग, २]।

उपर्युक्त प्रायः सभी काव्यसिद्धान्तोंमें अतिवाद है। इंग्लैण्डके मेधावी आलोचक रिचर्ड्स ने मनोविश्लेषणकी वैज्ञानिक कटौतीपर कसकर इन सबको छोटा ठहराया और काव्यानुसन्धित्सकी वैज्ञानिक विवेचना प्रस्तुत करनेका प्रयत्न किया। उन्होंने 'अपने प्रिंसिपल्स ऑफ़ लिटररी क्रिटिसिस्म' [काव्यशोधनके सिद्धान्त] और 'मीनीङ्ग ऑफ़ मीनीङ्ग' [अर्थका अर्थ] नामक प्रसिद्ध ग्रन्थोंमें शब्दोंकी व्यञ्जक शक्ति और कविताकी ध्वन्यात्मकताके विषयमें कई सुदृढ़ोंपर बहुमूल्य विचार प्रकट किये

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हैं । काव्यानुभूति की प्रक्रिया में वे छै संस्थान मानते हैं—१. शब्दको पढ़कर या सुनकर उत्पन्न होने वाले दृष्टिगोचर संवेदन अथवा कर्णगोचर संवेदन, २. समबद्ध मूर्ति विधान, ३. स्वतन्त्र मूर्ति विधान, ४. विचार, ५: भाव और ६. रागात्मक दृष्टिकोण ।

काव्यको पढ़कर या सुनकर पहले तो सवर्थ्या भौतिक, दृष्टिगोचर या कर्णगोचर संवेदन उत्पन्न होते हैं, उनके बाद उनके समबद्ध वाकूचित्र (Verbal images) उत्पन्न हो जाते हैं, फिर यह क्रिया और आगे बढ़ती है और एक स्वतन्त्र चित्नजाल मनकी आँखों के समक्ष जग ज़ाला है । तदनन्तर उसे समबद्ध विचार और फिर भाव और अन्त में इसे काव्यात्मक दृष्टिस्वरूप विशेष रागात्मक दृष्टिकोण बन जाता है । जैंसा कि स्वयं रिचर्ड्स ने ही स्पष्ट किया है, इनमें से २ अर्थात् वाकूचित्रों का समबन्ध शब्दसे है और ३ का शब्दके अर्थसे १ कहनेकी आवश्यक्ता नहीं कि इस विवरणमें ध्वनि-सिद्धान्तका स्पष्ट आभास है । ३ में रिचर्ड्स के प्रकारान्तरसे वर्ण्यवस्तुकी चर्चा कर रहे हैं और ३ और उसके आगे ४, ५, ६ में शब्द और अर्थव्यञ्जनिकी (of things words stand for) । आगे चलकर भापके विवेचनमें उन्होंने अपना मन्तव्य और स्पष्ट किया है । भापके वे दो प्रयोग मानते हैं : एक वैज्ञानिक (Scientific) प्रयोग, दूसरा रागात्मक (Emotive) प्रयोग । वैज्ञानिक प्रयोग किसी वस्तुका ज्ञानभरा करानेके लिये किया जाता है, रागात्मक प्रयोग भाव जगानेके लिये किया जाता है । धुक्लरके शब्दोंमें 'पहलेसे अभिप्रेतका ग्रहण होता है, दूसरेंसे विम्बका ।

भारतीय काव्यशास्त्र की शब्दावलियोंमें, पहले प्रयोगका आधार ध्वनकी अभिधाशक्ति है, और दूसरेका आधार व्यञ्जना अथवा लक्षणा-आश्रित व्यञ्जना । अवतक मैंने जिन पाश्चात्य आचार्योंका उल्लेख किया है, उनमेंसे प्रायः अधिकांशमें प्रकार- न्तरसे ही ध्वनिसिद्धान्तकी सीकृति मिलती है । अब अन्तमें मैं एक ऐसे पाश्चिम्य आलोचकका उदाहरण देकर इस प्रसङ्गको समाप्त करता हूँ जिन्होंने काव्यमें ध्वनिसिद्धान्तका सीधा प्रतिपादन किया है । ये हैं अँग्रेजीके कवि-आलोचक एवरकोम्बी । उनका मत है, "साहित्यका कार्य है अनुभूति भाषा में अनूदित होनी चाहिये जिसक सह्दयस फिर अपनी अनुभूतिमें अनुवाद कर सकें—दोनों अवस्थाओंमें ही अनुभूति..मात्र तो होगो ही ।" "... 'इस प्रकार, अनुभूति जैसी अन्तन तर्ल [परिवर्तनशील] वस्तुका अनुवाद भाषामें करना पड़ता है जिसकी शक्ति स्वभावसे हो अत्यन्त सीमित है। अतएव काव्यकला सदा हो किसी-न-किसी अंशमें ध्वनिरूप होती है और काव्यकलाका चरम उद्देश्य है भाषाकी इस व्यञ्जनाशक्तिको अधिकसे अधिक व्यक्त, प्रभवशाली, प्रत्यक्, स्पष्ट तथा सूक्ष्म बनाना ।" यह व्यञ्जनाशक्ति भाषाकी साधारण अर्थवोधिनी (अभिधा) शक्तिकी सहायक होती है ।

"भापकी इस शक्तिका परिज्ञान कविको सामान्य व्यक्तिके पृथक् करता है ।" इस व्यञ्जनावृत्तिके प्रति संवेदनशीतता सहृदयकी पहिचान है । [अतएव] कर्त्ताओं प्रेरक, और श्रोताओंमें ग्राहक रूपसे वर्तमान यहीं वह विशेष गुण है जिसे कि काव्यकी आत्मा मानना चाहिये । उपयुक्त उदाहरणपर प्रकाश डालनेकी आवश्यक्ता नहीं । इसे पढ़कर ऐसा लगना है मानो प्रो० एवरकोम्बी भारतीय ध्वनिसिद्धान्तका अँग्रेजीमें व्याख्यान कर रहे हों । हमारे यहाँ पाश्चात्य काव्यशास्त्रके अलङ्कारविधानमें, ध्वनिकी सीकृति और भी प्रत्यक्ष है ।

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लक्षण-व्याख्यानाको शब्दशक्ति याँ मानकर उनके चमत्कारका पृथक् विवेचन किया गया है, परन्तु पक्षिममें उनके चमत्कार अलङ्काररूपमें प्रहण किये गये हैं। उदाहरणके लिये वक्रोक्तिमूलक इतिवृत्तों और आयरनमें व्यञ्जनाका प्रत्यक्ष आधार है। इन दोनोके अनेक उदाहरण शुद्ध ध्वनिके उदाहरण-रूपमें प्रस्तुत किये जा सकते हैं। भारतीय काव्यशास्त्रके अनुसार उनका समावेश अलङ्कारोंके अन्तर्गत नहीं किया जा सकता क्योंकि उनमें वाच्यार्थका चमत्कार नहीं, प्रायः व्यङ्ग्यार्थका ही चमत्कार होता है। गुप्पयुमिज्झमें कटुताको बचानेके लिये अप्रिय बातको प्रिय शब्दोंमें लपेटकर कहा जाता है—संस्कृतके पर्यायकी भाँति उसका भी आधार निश्चित् ही व्यञ्जना है। इत्यादि।

हिन्दीमें ध्वनि

साधारणतः हिन्दीका आदिकवि चन्द और आदिकाव्य ‘पृथ्वीराज रासो’ माना जाता है, परन्तु इससे पूर्ववर्ती पुरानी हिन्दीका काव्य भी आज उपलब्ध हो गया है—जिसके अन्तर्गत अनेक प्रवन्धकाव्य तथा स्फुट नीतिशास्त्र मिलता है। प्रवन्धकाव्यकारोंमें सबसे प्रतिष्ठित थे स्वयंभुदेव कविराज, जिनका समय चन्दसे ढाई शताब्दी पूर्व सन् ७९० ई० के आसपास था। उनका रामायण ग्रन्थ अनेक रूपोंमें तुलसीके रामचरित मानसका प्रेरणास्रोत था। स्वयंभुदेवने तुलसीदासकी तरह ही अपनी विनम्रताका वर्णन किया है। अथवा यों कहिये कि तुलसीदासने ही उनसे प्रेरणा ग्रहण करते हुए अपनी दीप्तता आदिका बलिदान किया है। स्वयंभुदेवने कुछ स्थलोंपर काव्यसिद्धान्त-सम्बन्धी दो-एक सङ्केत दिये हैं :

बहरेण सयं पेम्हि णिअहिँ । महु मरिज्जइ अहण्णहि कुप्पहिं ॥ वायरणु कव्वारण जणियड । सड विचित्ति सुण्णहं वक्खाणियड ॥ णउ णिसुणिउ पंच मह्हाकव्भु । पड बुज्झड पिंगल पच्छाव ॥ पड भामह वंदिय लक्खारु ॥ युषजनोंके प्रति स्वयंभु विनती करता है कि मेरे सरिस अन्य कुकवि नहीं है। मैं व्याकरण किंचित् भी नहीं जानता। इतिवृत्तका वर्णन भी नहीं कर सकता। मैंने पञ्च महाकाव्य नहीं सुने हैं और न भरत [के नाट्यशास्त्र] का अध्ययन किया है, मैं सब छन्दोंके लक्षण भी नहीं जानता। न मैं पिंगल-प्रस्तारसे अभिज्ञ हूँ और न मैंने भामह तथा दण्डीके अलङ्कारग्रन्थ ही पढ़े हैं।

इसके अतिरिक्त एक और स्थानपर स्वयंभुने लिखा है—

अक्खर बास जलोह मणोहर । सुयलक्खणु छन्द मच्छोहर ॥ दीह-समासा पवाइह बंकिय । सक्कय पाइय पुलिणालक्खिय ॥ देसी-भासा उभय तइज्जल । कवि-दुक्कर घण-उदय-सिलाइयल ॥ यास्य राहुल कल्लोल । णिडिट्ठय आसा-सय-सम-उद्द परिट्ठिय ॥

इसमें [रामकाव्यमें]

अक्षर मनोहर जलोक हैं, सु अलङ्कार और छन्द मलखियाँ हैं। दीर्घ समास वक्रिण प्रवाह है। संस्कृत-प्राकृत पुलिन हैं। देसी भाषाके उभय उज्ज्वल तट हैं। कवियोंके लिए तुष्कर घने शब्द शिलतल हैं। अर्थ-बाहुल्य कल्लोलें हैं। शत-शत आशाएँ तरङ्गें हैं। इत्यादि ।

प्रबन्धकाव्यकार होनेके नाते स्वयंभुदेवको रसके प्रति आग्रह होना चाहिये था। परन्तु उपयुक्त सङ्केतोंमें रसका उल्लेख नहीं है, ध्वनिका तो प्रश्न ही नहीं उठता क्योंकि स्वयंभुदेव आनन्दवर्धनके

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पूर्ववर्ती कवि ये। वास्तवमें उनपर पूर्वध्वनिकालीन प्रभाव था, इसीलिए उन्होंने भामह और दण्डीके अलङ्कारनिूपण और वामनकी रीतिदृष्टि [रीतिनिर्णय] का ही उल्लेख किया है। उन्होंने दीर्घसमास और घनी शान्दावली [रीति, वृत्ति], अलङ्कार, ध्वनप्रसारक अधिक महत्व दिया है। 'अर्थव्यञ्जकत्वा'में भी रसवादी कवियोंको छोड़ भारवि और माघ आदि शब्द-अर्थ-शिल्पी कवियोंकी ओर ही सङ्केत है। परन्तु यह समयका प्रभाव था।

हिन्दीके आरम्भिक काल—वीरगाथाकाल—में मुख्यतः वीरगाथाएँ और वीरपीतियाँ तथाः सुभाषितः नीतिपरक मुक्तक कविताओंकी रचना हुई थी। इनकी अतिनिकट संभावना है। कतिपय पण्डित-गोष्ठियोंमें साहित्यशास्त्रकी मी चर्चा होती रही हो जिसमें रस, ध्वनि, अलङ्कार आदि शास्त्रसिद्धान्तोंका स्वण्डन-मण्डन, अध्ययुन-अध्यापन होता रहा होगा। परन्तु उसका कोई लिखित प्रमाण या परिणाम आज उपलब्ध नहीं है। वीरगाथाकार कवि विशेषतः चन्द निश्शेष ही शास्त्रमर्मज्ञ कवि थे। उन्होंने छः भाषाओंका तथा विभिन्न शास्त्र-पुराण आदिका विधिवत् अध्ययन किया था।

उनके काव्यमें व्यावक धर्मनीति और राजनीतिका समावेश तथा नवरसका परिपाक है।:

उत्तिके धर्म विसालस्य । राजनीतिं नवं रसं ॥

भट्टरायाः पुराणं च । कुराणं कथितं मया ॥

'पूर्वव्ाराज रासो'में जिस प्रौढताके साथ अलङ्कार, गुण, रीति तथा रसव्यञ्जनाशीलतिका प्रयोग किया गया है उससे स्पष्ट है कि कवि चन्दनने काव्यशास्त्रके अङ्ग-उपाङ्गों सम्यक् अध्ययन किया था। परन्तु यह सब होते हुए भी सिद्धान्तविवेचन उनके काव्यके लिए अपराज्ञिक था। वैसे उनके काव्यका अध्ययन करनेवाले उपरान्त यही निष्कर्ष निकलता है कि वीर यौद्ध शृङ्गारका परिपाक करनेवाले ये कवि रसवादी थे। 'प्रबन्धकाव्यकला होनेके नाते भी ध्वनिकी अपेक्षा रससम्प्रदायसे ही इनका घनिष्ठतर सम्बन्ध था। चन्दनने लिखा मी है, '... राक्षनीति नवं रसं '

वीरगाथाकालके अनन्तर निर्गुण काव्यधारा प्रवाहित हुई। ये कवि सिद्धान्त और व्यवहार, दोनोंकी दृष्टिसे शास्त्रीय परम्पराके दूर थे। इनके तो काव्यके लिए मी काव्यसिद्धान्तोंका ज्ञान मी अप्रासङ्गिक था, विवेचन तो औरकी बात रही। फिर मी इनके काव्यका ध्वनिसिद्धान्तसे अनिवार्य तथा प्रत्यक्ष सम्बन्ध था। जैसा कि मैंने पाक्षात्य काव्यशास्त्रके प्रसङ्गमें स्पष्ट किया है, रसवादीका 'स्वान्तः अनिवार्यः सम्बन्ध है क्योंकि रस्यानुभावियोंका कथन नहीं हो सकता, व्यञ्जना ही हो सकती है। इसीलिए कबीरने अपने रस्यानुभवको गूँगा गुड़ बताते हुए सैन-बैनाके द्वारा ही उसकी अभिव्यक्तिं सम्भव माना है। सैन-बैनाका स्पष्ट अर्थ है शाब्दिक भापा अर्थात व्यञ्जना-प्रधान भाषा। इसी प्रकार प्रेमाश्रयी कवियोंकी रचनाएँ मी ध्वनिकाव्यक अन्तर्गत ही आती हैं। जायसीने अपने काव्यको अन्योक्ति कहा है। प्रायःनिगद अन्योक्ति [अथवा समासोक्ति या रूपक

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उन्होंने आरम्भमें ही कहा है : "वर्णनां अर्थसज्ज्ञानां रसनां छन्दसामपि । मज्जलानां च कर्तारौ वन्दे वाणीविनायकौ ॥"

कृष्णभक्त कवियोंमें तो रामतत्त्वका और भी अधिक प्राधान्य है । इसका अभिप्राय यह नहीं है कि इन कवियोंके काव्योंमें ध्वनिकी किसी प्रकार उपेक्षा की गयी है । वास्तवमें तुलसी, सूर और अन्य सगुण भक्त कवियोंकी रचनाओंमें रसध्वनि, वस्तुध्वनि तथा अलङ्कारध्वनिके अगणित उत्कृष्ट उदाहरण मिलते हैं । सूर तथा अन्य कृष्णभक्त कवियोंका अमरगीतकाव्य जो मूलतः उपालम्भकाव्य है, रसध्वनिका उत्कृष्ट नमूना है । फिर भी इन अतिद्रुण्य रागी कवियोंको रसवादी न मानना इनके काव्यकी आत्माके प्रति अन्याय करना होगा ।

इन कवियोंके अन्तर हिन्दी-साहित्यमें रीतिकवियोंका आविर्भाव हुआ । ये सभी कवि मूलतः काव्यसिद्धान्तके प्रति जागरूक थे । इन्होंने काव्यशास्त्र और उसके विभिन्न सम्प्रदायोंका विधिवत् अध्ययन किया था, और अनेकोंने अपने काव्यमें उनका विवेचन भी किया । नयवहाररूपसे भी यह युग मुक्तक-काव्यका युग था—और जैसा कि अन्यत्र कहा गया है, ध्वनिसिद्धान्तका आवि- ष्कार ही वास्तवमें मुक्तक-काव्यको उचित स्वीकृति देनेके लिए हुआ था । अतएव हिन्दी साहित्यके इतिहासमें ध्वनिसिद्धान्तकी वास्तविक महत्त्वस्वीकृति इसी युगमें हुई । वैसे तो इसमें सन्देहके लिए अवकाश नहीं है कि रीतियुगपर रसवाद और उसमें भी श्रृङ्गारवादकै ही आधिपत्य रहा, फिर भी अन्य वादोंकी भी पूर्णतः उपेक्षा नहीं की गयी—अलङ्कार और ध्वनिके समर्थकोंका स्वर भी मन्द नहीं रहा । सबसे पहले तो सेनापतिने ही अपने काव्यकी सिफारिश करते हुए उसकी ध्वन्यात्मकतापर विशेष बल दिया है— 'रसौ अनुप्रास-रुप यौं भति है ।' उनका रीतिग्रन्थ 'काव्यकल्पद्रुम' आज अप्राप्य है, अतएव इसके विषयमें कुछ कहना असङ्गत होगा ।' उनके बाद हिन्दीके अनेक आचार्योंने मम्मटके अनुसरणपर काव्यक सविस्तर-विवेचन किया है जिसमेंसे मुख्य हैं—कुलपति, श्रीपति, दांप और प्रताप- साहि । इन कवियोंकी प्रवृत्ति अपेक्षाकृत वौद्धिक थी और ये मम्मटकी ही भांति ध्वनि अथवा रस- ध्वनिवादी ये । उनके काव्यकी पद्धति और रीतिसिद्धान्त दोनों ही इनके प्रमाण हैं । कुलपतिने स्पष्टः

ध्वन्यः जीव ताकौ कहतु, शब्द अर्थ हैं देह ।। गुन : भुषन भुषनै, दूषण दूषण देह ।।

दासने यद्यपि आरम्भमें रसको कविताके अङ्ग अथवा प्रधान अङ्ग माना है—

रंस कविता को अंग, भुषन हैं भुषन सकल, गुन सरूप और रस दूषन करि कुहूषन ।

परन्तु फिर भी उनके ग्रन्थमें इस प्रकारके स्पष्ट सङ्केत हैं कि इससे उनका तात्पर्य रसध्वनिका ही है ।

भिन्न मिश्र यद्यपि सकल; रस भावादिक दास, सबै ध्वंस्य सबको कहतु, ध्वनि कछु जद्यौं प्रकाश ।

इसके अतिरिक्त मम्मटकी ही तरह इन्होंने अलङ्कारको भी बहुत महत्त्व दिया है—

अलंकार बिनु' रसहुं है, 'रसौं अलंघति छोंडि, मुक्तकवि वचन रचनान सों, देत दुहनकों मंडि ।

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वि्हारी और प्रतापसाहि

व्यंग जीव है कवित में, शब्द, अर्थ गति अंग । सोई उत्तम काव्य है, बरने व्यंग प्रंसग ॥

उन्होंने व्यक्जयपर एक स्वतन्त्र ग्रन्थ ही रचा है जिसमें सारे रसप्रकाश्का व्यज्जय [ध्वनि]के द्वारा वर्णन किया गया है ।

सतसैया के दोहरे, ज्यों नावक के तीर । देखन में छोटे लगें, घाव करें गम्भीर ॥

यह निश्श्य ही उनके व्यज्जय-गुणकी प्रचास्ति है । इस युगमें ध्वनिका प्रबल विरोध दो आचार्योंने किया——केशवदास और देवने । केशवदासने अलंकारवादकी निर्भ्रान्त स्थापना की, साथ ही 'रसिकप्रिया'में व्यज्जनवारदको भी मान्यता दी, परन्तु ध्वनिका उन्होंने सर्वथा बाहिष्कार किया । उन्होंने भामह-दण्डीकी ध्वनिपूर्व अलंकारप्रभृति परम्पराको तो मुख्यतः अपनाया ही, उनके साथ ही ध्वनि-उत्तर श्ंगारवादको भी ग्रहण किया । परन्तु ध्वनिकी उन्होंने सर्वथा उपेक्षा की । दूसरे आचार्य रसभूति देव रसवादके प्रवर्तक पण्डितोष्क य ई । उन्होंने तो व्यज्जनाको अप्सम ही कह दिया : अभिधा उत्तम काव्य है, मध्य लच्छन-लीन । व्यघम ध्यंजना रस-कुटिल, उलटी कहत नवीन ॥

सली मृगध मूरति सुधा, प्रौढ सिता पद सिक । परकीया करकस सिता, मरिच परिचयनि तिक् ॥

उपर्युक्त दोहेको मूल-प्रसङ्गसे विच्छिन्न कर आचार्य शुक्लंने अपनी अमोघ शैलमें उसकी आवश्यकता अधिक छील-छालकर हृदयङ्गम बना ली, और दूसरे लोग भी मूल-प्रसङ्गको देखे बिना ही उनका अनुकरण करते गये हैं । उपर्युक्त दोहा भात्रवर्णनप्रसङ्गका है : देवने शु्दस्तभावा स्वकीयाको वाच्यवाचक पात्र माना है, वस्तुत्मावा स्वकीयाको लक्ष्य-लाक्षणिक पात्र, और शु्द्ध-परकीयाको व्यक्जक्यपात्र । इस प्रकार शु्दस्तभावा मुग्धा स्वकीयाका सम्बन्ध अभिधासे है अर्थात् वह मुग्धस्तभावा होनेके कारण अभिधाका प्रयोग करती हुई सीधी-सादी बात करती है । गरवस्तभावा प्रौढा स्वकीयाके स्वभाव और वाणीमें मुग्ध सारल्यकी कमी हो जाती है, और उसको अभिव्यक्ति का साधन लाक्षणा हो जाती है । परकीयाके स्वभाव और वाणीमें वक्रतां होना अनिवार्य है. अतएव उसकी अभिव्यक्ति का माध्यम होती है व्यज्जना । इसी कारण देवका मत है कि, कहनेका तात्सर्य यह है कि देवने अभिधाश्रको शु्दस्तभावा स्वकीयासे और व्यज्जनानाको परकीयासे एकरूप कर देखा है; अथवा उपर्युक्त दोहेंमें व्यज्जनाकी भरतृनायिका लक्ष्य बहुत-कुछ परकीयाकी रसाभिव्यक्ति ही है । उपर्युक्त स्थलगतके बाद भी, देवके काव्य-प्रवेचनका सर्वाङ्गरूपसे पर्यवेक्षण

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करनेपर इसमें सन्देह नहीं कि देवको रक्षक प्रति अत्यन्त प्रबल ग्राह था और उन्होंने ध्वनिका बहिष्कार ही किया है। उन्होंने काव्यके सभी अज्ञोंका—यहाँतक कि पिङ्गलका भी यत्किञ्चित् विस्तारसे विवेचन किया है, परन्तु ध्वनिका उल्लेखमात्र भी नहीं किया। वास्तवमें देव हृदयकी रागात्मक अनुभूतियोंको ही काव्यकला सर्वस्व मानते थे, अतएव उन्हें स्वभावोक्ति और अभिधासे ही ममता थी—व्यञ्जनाकी पहेली-गुझौवल मानेनेकी गूदता तो उन्होंने नहीं की, परन्तु उनकी रसयोजनामें उसका स्थान गौण ही है। संस्कृतमें ध्वनिके समर्य प्रवक्ता मम्मटने ध्वनिको काव्यकी आत्मा मानते हुए रस आदि

की असंलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्यनिके अन्तर्गत वर्णन करनेकी परिपाटी चल पड़ी थी, जिसका पण्डितराज जगन्नाथने भी अनुसरण किया। परन्तु विश्र्वनाथने रसको अङ्गी घोषित करते हुए मम्मटकी पद्धतिमें संशोधन किया। उन्होंने रसका स्वातन्त्र्य विवेचन करते हुए ध्वनिकी एक पृथक् परिच्छेदमें व्याख्या की। रीतिकारोंने रस और ध्वनिके सम्बन्धमें प्रायः विश्र्वनाथका ही मार्ग ग्रहण किया है।

रीतियुगके अनन्तर आधुनिक युगका आरम्भ होता है। इस युगके तीन खण्ड किये जा सकते हैं—भारतेन्दु-काल, द्विवेदी-काल, वर्तमान-काल। इनमेंसे भारतेन्दु-काल प्रयोगकाल था, उसमें मुख्तयः गद्यकाव्यका रूपप्रस्फुटाक निर्माण हुआ। कविताके प्रति हृदयकोण भी वन्देलना आरम्भ हो गया था और वह कभी पीछे भक्तिकुग्गकी ओर देखती हुई और कभी आगे जीवनकी वास्तविकताकीओर दृष्टि डालती हुई अपने नूतन पथका निर्माण कर रही थी। यह हृदयकोण द्विवेदी-कालतक आते-आते सिमर हो गया। हिन्दी कविताने अपना मार्ग चुन लिया था—उसने जीवनकी वास्तविकताको अपना संदेश मान लिया था। कतिपय प्रारम्भिक रूपोंमें हिन्दीके किसी युगमें ध्वनिका इतना विस्तार नहीं हुआ।

इस दृष्टिसे यह ध्वनिके चरम पराभवका समय था। इस कालखण्डकी कविता-रौलीको आचार्य शुक्लने इसीलिए इतिवृत्त कहा है। इतिवृत्तद्वेधी ध्वनिका एकान्त विपरीत रूप है। व्यञ्जनाकी वैपरीत्य इतिवृत्तकथन अथवा वाच्यार्थ है और द्विवेदी-युगकी कवितामें इसका प्राधान्य था।

द्विवेदी-युगकी कविता और आलोचनामें एक विचित्र व्यवस्था मिलती है। कवितामें जहाँ इतिवृत्तात्मकता और गद्यमयता है, वहाँ काव्यसिद्धान्तोंमें भामहः परम्पराका ही प्रबल आग्रह है। इस युगके प्रतिनिधि आलोचकोंमें मिश्रबन्धु-पण्डित कृष्णविहारी मिश्र, शि० भगवानदीन तथा पण्डित पद्मसिंह शर्मा उल्लेख्य हैं। इनमें मिश्रबन्धुओंके काव्यसिद्धान्तोंकी परिधि व्यापक है—उनमें पूर्व और पश्चिमके विद्वानोंका मिश्रण है। पण्डित कृष्णविहारी मिश्रकी शिल्पकी दृढ़ि अधिक सिथर है, उन्होंने भारतीय काव्यसिद्धान्तोंको अधिक स्वच्छ रूपमें ग्रहण किया है और स्थान-स्थानपर रस, अलङ्कार, ध्वनि आदिकी चर्चा की है। परन्तु सब मिलाकर ये रसवादी ही हैं—कृष्णविहारीजीकी रसदृष्टि विहारी और केशवके काव्यकी अपेक्षा देव, मतिराम और बेनी प्रवीनके सरस काव्योंमें ही अधिक रमी है। उन्होंने स्पष्ट शब्दोंमें रससिद्धान्तकी मान्यता घोषित की है।

"वास्तवमें रसात्मक काव्य ही सत्काव्य है।" "रसात्मक वाक्यमें बड़ी ही सुन्दर कविताका प्राणुन्मेष होता है। नीरस एवं अलङ्कारप्रधान कवितामें बहुत थोड़ी रमणीयता पायी जाती है। शब्दचित्रशैले पूर्ण वाक्य तो केवल कहनेमरको कविताके अन्तर्गत मान लिया गया है।" "रमणीय वह है जिसमें चित्त रमण करे—जो चित्तको अपने आपमें लगा ले। रमणीयता आनन्ददायी उत्कृष्ट करती है। कविताकी रमणीयतासे जो आनन्द उत्पन्न होता है, वह लोकोत्तर है।" कविता कई प्रयोजनोंसे की जाती है। एक प्रयोजन आनन्द भी माना गया है। यह आनन्द

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लो० भगवान्दीन

पण्डित पद्मसिंह शर्मा

१. "इस प्रकारके स्थलोंमें [जहाँ विहारीपर पूर्ववर्ती महाकवियोंकी छाया है] ऐसा कोई अवसर नहीं जहाँ इन्होंने 'बातमें बात' पैदा न कर दी हो ।"

(विहारी सतसई, पृ० २५)

२. "'विहारीलल' पद यहाँ बड़ा ध्वनिपूर्ण है ।"

(पृ० ६७)

३. "इनके इस वर्णनमें [विरहवर्णनमें] एक निराला बॉकपन है, कुछ विशेष वक्रता है, न्यज्यपना प्रावल्य है ।••"

(पृ० १६०)

४. "कविताकी तरह और भी कुछ चीजें पैदा हैं जहाँ वक्रता [बॉकपन, बंकई] ही कदर और कीमत पाती है । विहारीने कहा है—

गठर-रचना बरदनी अलक चितवनि मोहन करति ।

आपुन बंकई ही ब(च) है तहँ निर तुंगनि तानि ॥

(पृ० २१९)

और सिध्दान्तस्लपमें—

"मुक्तकमें अलौकिकता लानेके लिये कविको 'अभिप्रायो बहुत कम और ध्वान, व्यञ्जनासे अधिक काम लेना पड़ता है । यही उसके चमत्कारका मुख्य हेतु है । इस प्रकारके ध्वानिवादी काव्यके निर्माता ही वास्तवमें 'महाकवि' पदके समुचित अधिकारी हैं ।"

आचार्य रामचन्द्र शुक्ल जी इन्हींके समसामयिक थे—परन्तु सिध्दान्तविवेचनकी दृष्टिसे वे अपने समयसे बहुत आगे थे । वास्तवमें वे श्री मैथिलीशरण गुप्तकी माँति द्विवेदी-युग और वर्तमान-युगके सन्धिस्थलपर खड़े थे । उन्होंने भारतके प्राचीन काव्यशास्त्र और यूरोपके नवीन आलोचना-सिध्दान्तोंका सम्यक् अध्ययन कर दोनोंका साधु समन्वय करनेका सफल प्रयास किया । मौलिक सिध्दान्तविवेचनकी दृष्टिसे श्राचार्यजी श्रेणीमें केवल उह्हीं ही प्रतिष्ठित किया जा सकता है । भारततिथ काव्यशास्त्रके विमिन्न सम्प्रदाय भुक्तरुत्पत्तिकी सम्भावनेयी रसिककी परिषदमें आये और उन्होंने

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भूमिका

अपनी अनुभूति और विवेचकं प्रकाशमें उनकी परीक्षण किया। ध्यानिक महत्वमें वे परिचित थे—कुल मिलाकर ध्यानसिद्धांतका आधार इतना पुष्ट है कि शुक्तलजी जैसे प्रौढ़ विचारक उनकी उपेक्षा कैसे कर सकते थे? परन्तु फिर भी वे ध्यानसिद्धियोंकि श्रेणीमें नहीं आते। ध्यानि [ध्यज्ञना] के विषयमें उनका मन्तव्य इस प्रकार है—

"व्यज्जनाके सम्बन्धमें कुछ विचार करनेकी आवश्यकता है। व्यज्जना दो प्रकारकी मानी गयी है—वस्तुव्यज्जना और भावव्यज्जना। किसी तथ्य या तत्त्वकी व्यज्जना वस्तुव्यज्जना कहलाती है और किसी भावकी व्यज्जना भावव्यज्जना। (भावकी व्यज्जना ही जब रसके स्थायी अवयवोंके सहित होती है तब रसव्यज्जना कहलाती है।) यदि थोड़ा ध्यान देकर विचार किया जाय तो दोनों भिन्न प्रकारकी वृत्तियाँ ठहरती हैं। वस्तुव्यज्जना किसी तथ्य या तत्त्वका बोध कराती है, 'पर भावव्यज्जना जिस रूपमें मानी गयी है उस रूपमें किसी भावका सञ्चार करती है, उसकी अनुभूति उत्पन्न करती है। बोध या ज्ञान कराना एक बात है और कोई भाव जगाना दूसरी बात। दोनों भिन्न कोटिक्की वृत्तियाँ हैं। पर साहित्यके ग्रन्थों दोनोंमें केवल इतना ही भेद स्वीकार किया गया है कि एकमें वाच्यार्थसे व्यज्ज्यार्थ—

या पाटकको लक्ष्यित नहीं होता। पर यात इतनी ही नहीं जान पड़ती। रति, क्रोध आदि भावोंका अनुभव करना एक अर्थसे दूसरे अर्थपर जानना नहीं है, अतः किसी भावकी अनुभूतिको व्यज्ज्यार्थ कहना बहुत उपयुक्त नहीं जान पड़ता। यदि व्यज्जय कोई अर्थ होगा तो वस्तु या तथ्य ही होगा और इस रूपमें होगा कि अमुक प्रेम कर रहा है, अमुक क्रोध कर रहा है। पर केवल इस बातका ज्ञान करना कि अमुक क्रोध या प्रेम कर रहा है वह स्वयं क्रोध या रतिभावका रसानात्मक अनुभव करना नहीं है। रसव्यज्जना इस रूपमें मानी भी नहीं गयी है। अतः भावव्यज्जना, या रसव्यज्जना वस्तुव्यज्जनाके सर्वथा भिन्न कोटिक्की वृत्ति है।"

"रसव्यज्जनाकी इसी भिन्नताके विषयमें आचार्य महिमभट्टका सामना करना वस्तुव्यज्जनाके सम्बन्धमें भट्टजोका पक्ष ठीक ठहरता है। व्यज्जनावस्तु या तथ्यतक हम वास्तवमें अनुमान द्वारा ही पहुँचते हैं। पर रसव्यज्जना लेकर जहाँ वे चले हैं वहाँ उनके मार्गोमें बाधा पड़ गयी है। अनुमान द्वारा वैषेधक इस प्रकारके शातनक पहुँचकर कि 'अमुकके मनमें प्रेम है' उन्हें फिर इस शातनको 'आस्वाद-पदवी'तक पहुँचाना पड़ा है। इस 'आस्वाद-पदवी'तक रत्यादिका ज्ञानकिस प्रक्रियासे पहुँचता है, यह सवाल ज्याँका त्यों रह जाता है। अतः इस विपयको स्पष्ट कर लेना चाहिये। या तो हम भाव या तथ्यके सम्बन्धमें 'व्यज्जना' शब्दका प्रयोग न करें, अथवा वस्तु या तथ्यके सम्बन्धमें।"

[विन्तामणि भाग २, पृ० १६३-?६४]

इससे निम्नलिखित निष्कर्ष निकलते हैं :

१. शुक्लजी भावव्यज्जना [रसव्यज्जना] और वस्तुव्यज्जनाको दो भिन्न प्रकारकी वृत्तियाँ मानते हैं।

२. इन दोनोंमें प्रकारका ही अन्तर है, 'वस्तुत्वम'की 'मात्राका नही।

३. भावका बोध कराना और अनुभूति कराना दो अलग-अलग वातें हैं, और, किसी भावका बोध कराना या किसी तत्त्वका बोध कराना एक ही बात है।

४. वस्तु और भाव दोनोंके सम्बन्धमें व्यज्जना शब्दका प्रयोग आभमक है। वस्तुव्यज्जनाके सम्बन्धमें शुक्लजी महिमभट्टकी 'अनुमिति'को ठीक माननेके लिए तैयार हैं।

वहाँतक मैं सहमत हूँ, आचार्य शुक्लका अभिप्राय यह है, किं वस्तुव्यज्जनामें काचित्त नहीं।

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ध्वन्यालोक:

दिवेदी-युगके इतिवृत्तकाव्यकी मीमांसा प्रतिक्रियारूप ध्वयावादका

होता, परन्तु वह भावव्यञ्जनाकी सहायक अवश्य है । इसी प्रसङ्गमें अन्यत्र उन्होंने लिखा है कि वस्तुव्यञ्जनासे अभिप्राय वस्तुमें 'उपपन्न अर्थ' का है [जो व्यञ्जनाकी सहायतासे उपपन्न होता है] और इसे वे काव्य न मानते हुए 'काव्यको धारण करनेवाला सत्य मानते हैं' । [चिन्तामणि भाग २, पृ० १६७] । काव्यत्वके विषयमें वे निर्भ्रान्त रसवादी हैं । व्यञ्जना उन्हें वहाँतक मान्य है जहाँतक उसका सम्बन्ध किसी-न-किसी प्रकार भावसे अवश्य हो : उन्होंने 'काव्यमें रहस्यवाद' में स्पष्ट लिखा है :

'हमारे यहाँ पुराने ध्वनिवादियोंके समान आधुनिक 'व्यञ्जनावादी' भी भावव्यञ्जना और वस्तुव्यञ्जना दोनोंमें काव्यतत्व मानते हैं । उनके निकट अनूठे ढङ्गसे की हुई व्यञ्जना भी काव्य ही है । इस सम्बन्धमें हमारा यही वक्तव्य है कि अनूठीसे अनूठी उक्ति काव्य तभी हो सकती है जब कि उसका सम्बन्ध—कुछ दूरका सही—हृदयके किसी भाव या वृत्तिसे होगा । मान लीजिये कि अनूठे मज़ेधन्तरसे कथित किसी लक्षणापूर्ण उक्तिमें सौन्दर्यका वर्णन है । उस उक्तिमें चाहे कोई भाव सीधे-सीधे व्यञ्जित न हो, पर उसकी तहमें सौन्दर्यको ऐसे अनूठे ढङ्गसे कहनेकी प्रेरणा करनेवाला रतिभाव या प्रेम छिपा हुआ है । जिस वस्तुकी सुन्दरताके वर्णनमें हम प्रवृत्त होंगे वह हममें रति-भावकका आलम्बन होगी । आलम्बनमात्रका वर्णन भी रसात्मक माना जाता है । [चिन्तामणि २, पृ० १९७-९८] ।

यह ध्वनिकी अपेक्षा रसकी असन्दिग्ध स्वीकृति है । और वास्तवमें आचार्यके समग्र काव्य-दर्शन और जीवनदर्शनको देखते हुए इसमें सन्देह भी कौन कर सकता है ? वे जीवनमें लोकधर्मी और काव्यमें प्रबन्धध्वकाव्यको ही अधिक महत्व देते थे क्योंकि वे लोकधर्मी पूर्ण अभिव्यक्ति प्रबन्ध-काव्यमें ही पा सकते थे । मुक्तक और प्रगीतमें उनकी रुचि पूरी तरह नहीं समाती थी । अतएव ध्वनिकी अपेक्षा रसके प्रति उनका आग्रह स्वभावतः ही अधिक था, और वास्तवमें इस युगमें रसवादका इतना प्रबल प्रचाराण्ड स्याख्यात दुबारा नहीं हुआ ।

हुक्सर्लजीके अतिरिक्त केवल दो काव्यशास्त्रियोंके नाम ध्वनिके प्रसङ्गमें उल्लेखनीय हैं—सेट कन्हैयालाल पोद्दार तथा पण्डित रामदहिन मिश्र । सेठजीने मम्मटके 'काव्यप्रकाश'को अपना आधार-ग्रन्थ मानते हुए ध्वनिसिद्धान्तकी हिन्दीमें विस्तारसे व्याख्या की है । यह ठीक है कि उनके ग्रन्थमें मौलिक विवेचनका अभाव है । सेठजी उदाहरण भी हिन्दीसे नहीं दे सके हैं, उनके लिए भी उन्हें संस्कृत छन्दोंका ही अनुवाद करना पड़ा है । फिर भी ध्वनि जैसे जटिल विषयकी हिन्दीमें अवतारणा करना ही अपने आपमें एक बड़ा काम है, और हिन्दी काव्यशास्त्रका अध्येता उनका सदैव आभारी रहेगा । इस दृष्टिसे पण्डित रामदहिन मिश्रका कार्य और भी अधिक स्तुत्य है । उनका ज्ञान अधिक निर्भ्रान्त तथा विवेचन उपेक्षाकृत मौलिक है । उन्होंने अपने विवेचनमें सैद्धान्तिक प्रेरणा जहाँ सर्वत्र ही संस्कृत काव्यशास्त्रसे प्राप्त की है, वहाँ व्यावहारिक आधार हिन्दी काव्यको ही माना है । इसीलिए उनका विवेचन अधिक स्पष्ट और प्राञ्जल हो सका है । अद्भुत सुझकका परिचय दिया है । साथ ही आधुनिक विद्वानोंसे भी उनका अच्छा परिचय है, और परम्परामें मुख्तः हिन्दीके ये दो विद्वान् ही आते हैं । ये लोग हैं कुशल ध्वनिवादी—इन्होंने रसको स्वतन्त्र न मानकर ध्वनिके अन्तर्गत ही माना है । और असंलक्ष्यक्रमव्यङ्गयके प्रपञ्चरूपमें ही उसका वर्णन किया है ।

दिवेदी-युगके इतिवृत्तकाव्यकी मीमांसा प्रतिक्रियारूप ध्वयावादका जन्म हुआ । दिवेदी-

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भूमिका

कविताकी इतिह्हास-दौौलीके विपरीत छायावादकी दौौली अतिद्राय व्यञ्जनापूर्ण है । द्विवेदी-युगका कवि जहाँ व्यञ्जनाके रहस्यसौन्दर्यसे अपरिचित रहा, वहाँ छायावादमें लक्षण-व्यञ्जनाका आकर्षण इतना अधिक बद्ध गया कि अभिव्यञ्जक्री एक प्रक्रियासे उपेक्षा हो गयी । छायावादके प्रवर्त्तक प्रसादने छायावादके व्युत्पत्ति-अर्थके सूत्रमें ही व्यञ्जनाका आधार माना । जिस प्रकार मोतीमें वास्तविक सौन्दर्य उसकी छाया है, जो दानेशकी सारभूत छविके रूपमें पृथक् ही झलकती है, उसी प्रकार काव्यमें वास्तविक सौन्दर्यं उसकी ध्वनि है जो छन्दोऱे वाच्यार्थींसे पृथक् ही व्यजित होते हैं । इसकी प्रेरणा प्रसादजीने स्पष्टतः संस्कृतके ध्वनिवादी आचार्योंसे ही प्राप्त की है । आनन्दवर्धनने ध्वनिको अज्ञुनाशरीमें लावण्यके सदृश कहा है । बादमें लावण्यकी परिभाषा इस प्रकार की गयी :

मुखाफलस्येव छायायास्तरलत्वविमान्तरा । सन्निध्यते यदक्ष्ष्ष्ष तल्लावण्यमिहोच्यते ॥

नोलियोंमें कान्तिकी तरलता [पानी] की तरह जो वस्तु अज्ञोंके अन्दर दिखायी देती है उसे लावण्य कहा जाता है । इसी रहस्यको और स्पष्ट करते हुए कवि पन्तने पल्लवकी भूमिकमें लिखा :

"कविताके लिये चित्रभाषाकी आवश्यकता पड़ती है, उसके शब्द ध्वनिस्वर होने चाहियें, जो बोलते हों, सजीवकी तरह जिनके रसकी मधुर बालिमा भीतर न समा सकनेके कारण बाहर झलक पड़ें, जो अपने भावको अपनी ही ध्वनिमें आँखोंके सामने चित्रित कर सकें, जो झाँकीमें चित्र, चित्रमें झाँकी हो"

"कवितामें शब्द तथा अर्थकी अपनी स्वतन्त्र सत्ता नहीं रहती, वे दोनों भावकी अभिव्यक्तिमें हृदय जाते हैं । किसीके कुशल करोंका मायावी स्पर्श उनकी निर्जीवतामें जीवन फूँक देता, वे अथल्स्यकी तरह झपमुक्त हो जगा उठते, हम उन्हें पाषाण-खण्डोंका समुच्चय न कह ताजमहल कहने लगते हैं, वाक्य न कह काव्य कहने लगते हैं ।"

इसी प्रसङ्गमें उन्होंने पर्याय-शब्दोंके व्यञ्जक्यार्थमेदकी भी बड़ी ही मार्मिक व्याख्या की है :

"भिन्न-भिन्न पर्यायवाची शब्द, प्रायः सन्नीतिमेदके कारण, एक ही पदार्थके भिन्न-भिन्न स्वरूपोंको प्रकट करते हैं । जैसे, भूसे कोषकी वृत्तता, भूखितसे कटाक्षकी चञ्चलता, मौहोसे स्वाभाविक प्रसन्नता, ऋजुताकों हृदयमें 'अनुभव होता है । ऐसे ही हिलोरमें उठान, लहरमें सलिलके वक्शःस्थलका कौमल कम्पन, तरङ्गमें लहरोंके समूहका एक-दूसरेको ठकेलना, उठकर गिर पड़ना, बढ़ो-बढ़ो कहनेका शब्द मिलता है, वीचिसे जैसे किरणोंमें चमकती, हवाोंके चलनेमें होले-होले उठती हुई हँसमुख लहरियोंका, ऊर्मिसे मधुर-मुकुलाते हिलोरोंकी, हिडोल-केहोलसे ऊँची-ऊँची बाहें उठाती हुई उद्धतपूर्ण तरङ्गोंका आभास मिलता है ।"

उपर्युक्त विवेचन 'पिनाकिनः' और 'कपालिनः' के ध्वन्यर्थमेद-विवेचनका नवीन काव्यात्मक संस्करणमात्र है ।

इधर श्रीमती महादेवी वर्माजी भी छायावादकी अभिव्यक्तिमें व्यञ्जनाके महत्त्वपर प्रकाश डाला है : "व्यापक अर्थमें तो यह कहा जा सकता है कि प्रत्येक सौन्दर्य या प्रत्येक सामञ्जस्यकी अनुभूति भी रहस्यानुभूति है ।" (महादेवी वर्माका विवेचनात्मक गद्य, पृ० २६)

"...इस प्रकारकी अभिव्यक्तिमें भाव रूप चाहता है, अतः छायालोक कुछ सहृदयतयी हो जाना

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ध्वन्यालोक:

म० का० लि० ग०

उपसंहार

ध्वनिसिद्धान्तकी परीक्षा

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भूमिका

ग्रन्थकार

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ध्वन्यालोक:

डा० संकरनने अभिनवके उद्धरणों द्वारा ही इस भेदसिद्धान्तका खण्डन किया है, और संस्कृतकी परम्पराको ही मान्य घोषित किया है।

डा० संकरनका तर्क है कि यदि कारिकाकारका व्यक्तित्व पृथक् था तो उनके लगभग एक शताब्दी पश्चात् कुन्तक, महिमभट्ट तथा अभिनवके शिष्य क्षेमेन्द्रको इस विषयमें आान्तिके लिये अधिक अवकाश नहीं था। इसके अतिरिक्त यह कैसे सम्भव हो सकता है कि स्वयं आनन्द ही उनसे परिचित न हों या उन्होंने जान-बूझकर अपने गुरुका नाम छिपाकर अपनेको ही ध्वनिकार घोषित कर दिया हो। आनन्दने स्पष्ट ही अपनेको ध्वनिका प्रतिष्ठाता कहा है :

इति काव्यार्थविवेको योडर्य चेतश्चमत्कृतिविधाय्यी । सूरिभिरुसुतसारैरैरसमदुपलोऽ न विषयाध्व्रः ॥

[इस प्रकार चित्तको चमत्कृत करनेवाला जो काव्यार्थविवेक हमारे द्वारा प्रस्तुत किया गया वह सारग्राही विद्वानों द्वारा विस्मरण योग्य नहीं है। ]

यहाँ 'असदुपलः'—'हमने उसकी प्रतिष्ठा की है' स्वयं व्यञ्जक है।

इसके अतिरिक्त अन्तिम श्लोक—

सत्यकाव्यतस्वविष्ये सुरुरितप्रसुतसकलप्य मनस्सु परिपक्वधियं यदासित् । तदूद्याकरोस्सहृदयोदयलासमहेतोरानन्दवर्धन इति प्रतिताभिधानः ॥

[काव्य (रचना) का तत्व और नीतिका जो मार्ग परिपक्व बुद्धि (सहृदय विद्वानों) के मनमें प्रसुम्न-सा (अव्यक्त रूपमें) स्थित था, सहृदयोंकी अभिहित और लाभके लिये, आनन्दवर्धन नामक (पण्डितने) उसको प्रकाशित किया ]

इस प्रकारकी स्पष्टीकोंने रहते हुए भी यदि कारिकाकारका पृथक् अस्तित्व माना जाय तो यह दूसरे शब्दोंमें आनन्दवर्धनपर साहित्यिक चौर्यका अभियोग लगाना होगा जो सर्वथा अनुचित है। अतएव यहीं निष्कर्ष निकलता है कि आनन्दवर्धनने ही कारिका और वृत्ति दोनोंकी रचना की है, और 'ध्वन्यालोक' एक ही ग्रन्थ है। जिन सहृदयसरोमणि आनन्दवर्धनने पहिली कारिकामें प्रतिज्ञा की थी कि 'तेन त्रमः सहृदयमनःप्रीतये तत्त्वरूपम्' अर्थात् इसलिए अव सहृदयसमाजके मनःप्रीतके लिए

उसका स्वरूप वर्णन करते हैं, उन्होंने ही वृत्तिके अन्तमें 'तदूद्याकरोस्सहृदयोदयलासमहेतोरानन्दवर्धन इति प्रतिताभिधान:' अर्थात् उसका सहृदयोंके उदयलाभ (व्युत्पत्ति-विकास)के लिये आनन्दवर्धनने व्याख्यान किया।

आनन्दवर्धनका समयनिर्धारण कठिन नहीं है। 'राजतरङ्गिणी'में स्पष्ट लिखा है कि वे अवन्तिवर्माके राज्यके कवियोंमें थे।

मुकाकणः शिवस्वामी कविरानन्दवर्धनः । प्रथां रत्नाकरश्श्रागाद्वाज्येडवन्नितवर्मणः ॥

अवन्तिवर्मा या वर्मन् कश्मीरके महाराज ये और उनका राज्यकाल सन् ८५५ ई० से ८८३ ई० तक था। दूसरे सूत्रोंसे भी इस निर्णयकी पुष्टि सहज ही हो जाती है।

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भूमिका

आचार्य आनन्दवर्धन

महामहोपाध्याय डा० रामशङ्कर त्रिपाठी

चौखम्बा विद्याभवन

ध्वन्यालोक'का प्रतिपाद्य विषय

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ध्वन्यालोक:

सम्यकू परिपाक करता है। इसी प्रसङ्गमें आनन्ददने शान्तरसको भी सबल शब्दोंमें मान्यता दी है। शान्तका स्थायी है राम, जो सांसारिक विपयोंका निपेष है। यह अपने आपमें परम सुख है। अन्य भावोंका आस्वाद इसकी तुलनामें नगण्य है। यह ठीक है कि इसको सभी प्रात नहीं कर सकते, परन्तु इससे शान्तरस्की अमान्यता सिद्ध नहीं होती। अन्तमें, चौथे उद्योतमें प्रतिभाके आननत्यका वर्णन है। प्रतिभाशाली कवि ध्वनिके द्वारा प्राचीन भाव, अर्थ, उक्ति आदिको नूतन चमत्कार प्रदान कर सकता है। इस प्रकार अनेक प्राचीन काव्योंके रहते हुए भी काव्यक्षेत्र असीम है। प्रतिभाशाली कवियोंमें भावसाम्य या उक्तिसाम्यक पाया जाना कोई दोप नहीं है। यह साध्य तीन प्रकारका होता है—विम्वत, चित्रवत और देहवत। इनमें विम्व और चित्रसाम्य स्खलुनीय नहीं हैं, परन्तु देहसाम्यमें कोई दोष नहीं है, वह प्रतिभाका उपकार ही करता है।

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ध्वन्यालोक:

आनन्दवर्धनाचार्य

विश्वेश्वर सिद्धिर्मित्र

प्रथम उद्योत:

स्वेच्छाकेसरिण: स्वच्छस्वच्छत्नागार्यसिन्धुदय: । ग्राह्यनां वो मधुरिपो: प्रपनान्तरिच्छेदो नग्ना: ॥

अथ श्रीमदाचार्यविश्वेश्वसिद्धिमित्रेण मणिप्रवीरचितां 'आलोकदीपिका' हिन्दीव्याख्यया

उपेतां वाचस्पतिरूपेण वाचस्पतिरिहंयताम् । से श्रुतेन गमेमहि मा श्रुतेन विराधिपा ॥—अथर्ववेद १.१.८

ध्वन्यमानं गुणीभूतस्वपादु विश्वसृपकात । रसवयं परं ब्रह्म खाद्वतं समुपास्महे ॥

स्वारं स्वारं चरणयुगलं श्रीगुरोस्तत्वदीपमे । श्रावं श्रावं ध्वनिनवयनं वर्धनोपक्रमेणे

ध्वन्यालोकं विद्रतिविधादं भापया सन्तनोमि ॥

मङ्गलाचरण

समस्त शुभ कार्योंके प्रारम्भमें भगवान्का स्मरण सांगमें आनेवाली वाधाओंपर विजय प्राप्त करनेकी शक्ति प्रदान करता है, इसलिए ग्रन्थारम्भ जैसे महत्वपूर्ण कार्यके प्रारम्भमें भी उसक्री निश्चित् परिसमाप्तिक्री भावनासे भगवान्के स्मरणरूप मङ्गलाचरणक्री परिपाटी सदाचारप्राप्त रही है । यद्यपि भगवान्का स्मरण मानसिक व्यापार है, परन्तु ग्रन्थकार जिस रूपमें भगवान्का स्मरण करता है उसक्रो शिष्योंक्री शिक्षाके लिये ग्रन्थके आरम्भमें आहूत कर देनेकी प्रथा भी संस्कृतसाहित्यक्री एक सदाचारप्राप्त परिपाटी है । इसलिए सस्कृतक ग्रन्थोंमे प्राय: सवत्र मङ्गलाचरण पाया जाता है ।

ध्वन्यालोककार श्री आनन्दवर्धनाचार्यने अपने प्रणीत ग्रन्थकी निश्चित् समासि और उसके मार्गमें आनेवाले विघ्नोंपर विजय प्राप्त करनेके लिये आशीर्वाद, नमस्क्रिया तथा वस्तुनिदेशारूप त्रिविध मङ्गलप्रकारोंमेंसे आशीर्वचनरूप मङ्गलाचरण करते हुए नरसिंहावतारके प्रपनान्तरिच्छेदक नखोंका स्मरण किया है।

स्वयं अपनी इच्छालते सिंह [नृसिंह] रूप धारण किये हुए [मधुरिपु] विष्णु भगवान्के, अपनी निर्मल कान्तिसे चन्द्रमा को विद्ध [लज्जित] करनेवाले, शरणागतोंके दु:खनाशनमें समर्थ, नख तुम सब [व्याघ्रयाता तथा धोतरा] की रक्षा करें ।

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ध्वन्यालोक:

आनन्दवर्धनाचार्य

कारिका १

आनन्दवर्धनाचार्य

आनन्दवर्धनाचार्य

आनन्दवर्धनाचार्य

आनन्दवर्धनाचार्य

आनन्दवर्धनाचार्य

आनन्दवर्धनाचार्य

आनन्दवर्धनाचार्य

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कारिका १ ] प्रथम उद्योत: ३

और कुछ लोग उसके रहस्यको वाणीका अवयव [अवर्णनीय, अनिवर्चनीय] बतलाते हैं। अतएव [ध्वनिके विषयमें इन नाना विप्रतिपत्तियोंके होनेके कारण उनका निराकरण कर, ध्वनिस्थापना द्वारा] सह्दयों [काव्यरसज्ञ जनों] की मनकी प्रसन्नता [हृदयाह्लाद]के लिये हम उस [ध्वनि] के स्वरूपका निरूपण करते हैं ॥ १ ॥

इस पद्यमें ग्रन्थकारने ध्वनिसिद्धान्तको 'समाम्नातपूर्वः' एक प्राचीन सिद्धान्त माना है। परन्तु जहाँतक लिखित वाङ्मयका संकलन है, संस्कृत साहित्यमें ध्वनिसिद्धान्तके विषयमें 'ध्वन्यालोक' से प्राचीन कोई ग्रन्थ उपलब्ध नहीं हैं। तब आनन्दवर्धनाचार्यने इसका 'समाम्नातपूर्वः' कैसें कहा है यह प्रश्न उपस्थित होता है। इसका समाधान यह है कि यद्यपि 'ध्वन्यालोक'के पूर्व लिखित रूपमें ध्वनि-सिद्धान्तका प्रतिपादन कहीं नहीं हुआ था, किन्तु मौखिकरूपसे काव्यके आत्मभूत तत्वोंके विषयमें वैसे साहित्यमर्मज्ञ ध्वनिकारकाशब्दके लिए 'ध्वनि' पदका प्रयोग होता है। श्रौतग्राह्य शब्द अपने स्थूल परे स्फोटरूप शब्दके व्यञ्जक होता है। वह स्फोटरूप शब्द ही प्रधान है। इसी प्रकार काव्यके शब्द अपने वाच्यार्थसे परे किसी अन्य अर्थको व्यक्त करते हैं। यह व्यङ्ग्य अर्थ ही प्रधान और काव्यका आत्मा होता है। इसी सादृश्यके आधारपर काव्यके आत्मभूत तत्वका 'ध्वनि' यह नामकरण किया गया। 'बुधैः समाम्नातपूर्वः' इन शब्दोंको लेकर ही काश्यपकाराचार्यने 'बुधैवैयाकरणैः प्रधानभूतस्फोटरूपव्यङ्गच्यव्यञ्जकस्य शब्दस्य ध्वनिरिति व्यपदेशः' [सूत्र २] यह पंक्ति लिखी है। स्वयं आनन्दवर्धनाचार्यने भी आगे वही बात लिखी है। इससे प्रतीत होता है 'समाम्नातपूर्वः' यह मौखिक परम्पराका निर्देश है।

विप्रतिपत्तियोंका विशलेपण

ग्रन्थरूपमें 'ध्वन्यालोक' ध्वनिका प्रतिपादन करनेवाला प्रथम ग्रन्थ है। अलङ्कारशास्त्रमें इसके पहिले भरतमुनिका 'नाट्यशास्त्र', भामहका 'काव्यालङ्कार', उद्भटके इस 'काव्यालङ्कार'पर 'भामहविवरण' नामक टीका, वामनका 'काव्यालङ्कारसूत्र' और रुद्रटका 'काव्यालङ्कार' यही पाँच मुख्य ग्रन्थ लिखे जा चुके थे। इनमें भी 'भामहविवरण' अमौलिक उपलब्ध या प्रकाशित नहीं हुआ है। परन्तु 'ध्वन्यालोक'की लोचन टीकामें उसका उल्लेख बहुत मिलता है। इन पाँचों आचार्योंने अपने ग्रन्थोंमें ध्वनिको नामले नहीं किया शौर न उसका खण्डन ही किया है। इसलिए यह अनुमान किया जा सकता है कि ये ध्वनिको नहीं मानते थे। ध्वन्यालोककार आनन्दवर्धनाचार्यने इन्हींके ग्रन्थोंके आधारपर सम्भावित तीन ध्वनिविरोधी पक्ष वनाये प्रतीत होते हैं। एक अभाववादी पक्ष, दूसरा भक्तिवादी पक्ष और तीसरा अलङ्करणीयतावादी पक्ष। इन्हीं तीनों पक्षोंका निर्देश इस कारिकामें 'तस्याभावम्', 'भाक्तम्' और 'वाचां स्थितमविवये' शब्दोंसे किया है। येभीं पक्ष उत्तरोत्तर श्रेष्ठ हैं। इनमेंसे प्रथम अभाववादी पक्ष विपर्ययमूलक, दूसरा भक्तिपक्ष सन्देहमूलक और तीसरा अलङ्करणीयतावाद अज्ञानमूलक है। अर्थात् प्रथम अभाववादी पक्षने प्राचीन आनायोंके ग्रन्थोंको जो ध्वनिका अभावबोधक समझा है यह उनका भ्रम या विपर्ययज्ञान है। इसलिए वह सर्वथा हेय या निःकृष्ट पक्ष है। दूसरे भक्तिवादी पक्षने भामहके 'काव्यालङ्कार' और उसपर उद्भटके विवरणमें

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ध्वन्यालोक:

भामहने

उद्भटने

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कारिका १ ] प्रथम उद्योतः

बुधैः काव्यतत्त्वविनिश्चयीः काव्यस्यात्मा ध्वनिरिति संज्ञितः, परम्परया यः समाम्ना- तपूर्वः सम्यक् आसमान्ताद् म्नातः प्रकटितः, तस्य सहृदयहृदयानु- प्रकाशमानस्यात्म- तदभाववादिनां चापि विकलाः सम्भवन्ति ।

तत्र केचिदचक्षीरन् शब्दार्थशरीरं तावत् काव्यम्। तत्र शब्दगतात् श्राकुत्वहेतवो- ऽनुप्रासादयः प्रसिद्धा एव। अर्थत आओपमादयः वाक्यमकस्मादेवोदियते नो प्रतीयन्ते। तदनतिकृतत्वयोर्वृत्तयोद्भि' या कैश्चिदुपनारिकायाः प्रकाशिता; ता अपि गताः श्रवणगोचरम्। रीतयश्च वैदर्भीप्रसृतयः। तदुक्तम् 'तिरिकः कोऽयं ध्वनिनिर्णयमेति ? अन्ये न्रूयुः नास्त्येव ध्वनिः, प्रसिद्धप्रस्थाननयतिरेकिणः काव्यप्रकारस्य काव्य- त्वहानेः। सहृदयहृदयानुगामि यत्समेव काव्यलक्षणम् न चोकप्रस्थानातिरेकिणो

'बुध' अर्थात् काव्यमर्यादमेंने काव्यके आधारभूत जिस तत्वको 'ध्वनि' यह नाम दिया, और [इसके पूर्व किसी विशेष पुस्तक आदिमें निवेश किये विना भी] परम्परासे जिसको बार-बार प्रकाशित किया है। भली प्रकार विशद रूपसे अनेक वार प्रकट किया है, सहृदय [काव्यमें] जनोंके मनमें प्रकाशमान [सकलसहृदयसंचेच] उस [चमत्कारजनक काव्यात्मभूत ध्वनि] तत्वका भी [नामक, भट्टोद्भट आदि] कुछ लोग अभाव कहते हैं।

उन अभाववादियोंके ये [निम्नलिखित तीन] विकल्प हो सकते हैं। १—कौई [अभाववादी] कह सकते हैं कि काव्य शब्दार्थशरीरवाला है। [अथवा शब्द और अर्थ काव्यके शरीर हैं।] यह तो निर्विवाद है। [तावत् शब्द ध्वनि- वादी सहित इस विषयमें सबकी सम्मति सुचित करता है। काव्यके शरीरभूत उन शब्द और अर्थगत [अर्थके स्वरूपगत] चारुत्वहेतु दो प्रकारके हो सकते हैं। एक स्वरूपगत और दूसरे सङ्केत- नागत [शब्दगत सङ्केतके स्वरूपगत] चारुत्वहेतु अनुप्रासादि [शब्दालङ्कार] प्रसिद्ध ही हैं। और अर्थगत [अर्थके स्वरूपगत] चारुत्वहेतु उपमा [अर्थालङ्कार] प्रसिद्ध है। और [इन शब्द अर्थके सङ्कटना गत चारुत्वहेतु] वर्णसङ्कटना धर्म जो माधुर्यादि [गुण]

हैं वे भी प्रतीत होते हैं। उन [अलङ्कार तथा गुणों] से भिन्न जो उपनागरिकादि वृत्तियाँ हैं [प्रभेदोक्तर] ने प्रकाशित कीं हैं वे भी भव्यगुणोंसे ओतप्रोत हैं और [प्रभुयादि गुणोंसे अभिष] वैदर्भी प्रभृति रीतियाँ भी। [परन्तु] उन सबसे भिन्न यह ध्वनि कौन सा [नया] पदार्थ है ?

अभाववादका दूसरा विकल्प निम्नलिखित प्रकार है— २—दूसरे [अभाववादी] कह सकते हैं कि ध्वनि [कुछ] है ही नहीं। प्रसिद्ध प्रस्थान [प्रतिष्ठिते परम्परया व्यवहरन्ति येन मार्गेण तत् प्रस्थानम्। शब्द और अर्थ जिनमें परम्परासे काव्यव्यवहार हार होता है उस प्रसिद्ध] मार्गेण को अतिक्रमण करनेवाले ['ध्वनि' रूप किसी नवीन] काव्यप्रकार [को माननेसे उस]

में काव्यत्वहानि होगी १. तदनतिकृतत्वयोर्वृत्तयोद्भि नि०।

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ध्वन्यालोक:

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कारिका १ ] प्रथम उद्योतः

तथा चान्येन कृत एवात्र श्लोक:— यसिन्नास्ति न वस्तु किंचन मनःप्रह्लादि सालंकृते न युत्पन्नै रचितं न चैव वचनैर्व्येक्रोक्तिश्रुयानि यत् । काव्यं तद् ध्वनिना समन्वितमिति प्रीत्या प्रशंसन् जडो नो विद्मःसोडविदघाति किं सुमतिना पृष्टः स्वरूपं ध्वने: ॥

[फलतः ध्वनिवादौका यह अकाण्डताण्डव सर्वथा हेयर्थे है ।] इसलिए ध्वनि यहाँ एक प्रवादमात्र है जिसका विचारयोग्य तत्व कुछ भी नहीं बतलाया जा सकता है । इसी आशयका अन्य [ध्वन्यालोेककार आनन्दवर्धनाचार्यके समकालीन मनोरथ कवि]का श्लोक भी है— जिसमें अलंकारयुक्त, अतएव मनको आह्लादित करनेवाला कोई वर्णनीय अर्थ-तत्व [वस्तु] नहीं है [इससे अर्थालंकारोंका अभाव सूचित होता है], जो चातुर्यसे युक्त सुन्दर शब्दोंसे विगचित नहीं हुया है [इससे शब्दालंकारशून्यता सूचित होती है] और जो सुन्दर उक्तियोंसे शून्य है [इससे गुणशून्यता सूचित होती है] । इस प्रकार जो शब्दके चारुत्वहेतु अनुप्रासादि शब्दालंकारों, अर्थात्के चारुत्वहेतु उपमादि अर्थालंकारों और शब्दार्थसंघटनाके चारुत्वहेतु माधुर्यादि गुणोंसे सर्वथा शून्य हैं] उसकी यह ध्वनिसे युक्त [उत्कृष्ट] काव्य है यह कहकर [गतानुगतिक, गड्ढे में गिरनेवाले] प्रीतिपूर्वंक प्रशंसा करनेवाला मूर्ख, किसी युक्तिमान्के पूछनेपर मालूम नहीं ध्वनिका क्या स्वरूप बतायेगा ।

२. भक्तिवादी पक्ष

यह अभाववादी पक्षका उपसंहार हुया । आगे ध्वनिविरोधी दूसरा भक्तिवादी-पक्ष आता है । प्रथम अभाववादी और तृतीय अलंक्षणीयतावादी ये दोनों पक्ष सम्भावित पक्ष हैं अतएव दोनोंका निर्देश 'जगडु:' तथा 'ऊकु:' इन परोक्ष 'लिट्' लकारके प्रयोगों द्वारा किया गया है । परन्तु बीचके भक्तिवादी पक्षका, जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है, 'भामह'के 'काव्यालंकार' और उद्भट के 'भामहविवरण' ग्रन्थों द्वारा परिचय प्राप्त हो चुका है, इसलिए उनका निर्देश परोक्षात्प्रचक लिट् लकार द्वारा न करके, नित्यप्रवर्तमानसूचक लट् लकारके 'आहु:' पदसे किया गया है ।

'भक्तिवाद' में अभुक्त भक्ति शब्दकी व्युत्पत्ति चार प्रकारसे की गयी है । भक्ति ध्वनद्वेषी आलंकारिकोंकी 'लक्षणा' और मीमांसकोंकी 'भौणी' नामक दो प्रकारकी शब्दशक्तियोंका ग्रहण होता है । आलंकारिकोंकी लक्षणाके मुख्यार्थबाध, सामीप्यादि सम्बन्ध और शौत्यादिवोधरूप प्रयोग ये तीन बीज हैं । इन तीन लक्षणा-बीजोंको बोधन करनेके लिए भक्ति ध्वनद्वेषी तीन प्रकारकी न्युत्पत्तियाँ की गयी हैं । 'मुख्यार्थस्य भङ्गो भक्ति:' इस मङ्झार्थक व्यास्यानसे मुख्यार्थबाध, 'भज्यते सेव्यते पदाथैन इति भक्ति:' इस चेष्टार्थक व्यास्यानसे सामीप्यादि सम्बन्धनिमित्तकी सिद्धि और 'प्रतिपाद्ये शौत्यपावनत्वादौ श्रद्धादितयो भक्ति:' इस श्रद्धादितयार्थक व्यास्यानसे भक्तिपद प्रयोजनका सूचक होता है । 'तत आगत: भक्ति:'—मुख्यार्थबाधादि तीनों बीजोंसे जो अर्थ प्रतीत होता है उस

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ध्वन्यालोक:

आलोककारिकों ने लक्षण के दो भेद किये हैं, शुद्धा और गौणी । सामान्यतः समस्तवस्तु गौणी लक्षणा मानते हैं । परन्तु मीमांसकों ने लक्षण से भिन्न 'गौणी' को अलग ही वृत्ति माना है, लक्षणाका भेद नहीं । प्रकृत भक्त पद से मीमांसकों की उक्त गौणी वृत्तिका भी संग्रह होता है । उसके बोधनके लिये मक्तिपदकी चौथी व्युत्पत्ति 'गुणसमुदायवृत्तः : शब्दस्य अर्थभागस्तैष्ण्यादि: [शौर्यैक्यादिः] भक्तः, तत् आङ्गात् भक्तः: तैष्ण्य अर्थात् 'विहितो भावकः:' आदि प्रयोगों में की गयी है । अर्थात् धैर्यैक्यादिगुणविशिष्टप्राणिनिविशेषके वाचक गुणवाचक 'सिंह' शब्द से उसके अर्थभाव शौर्यैक्यादिरूप ग्रहण भक्ति है, और उससे प्राप्त होनेवाला गौण अर्थ 'भक्त' है । इस प्रकार 'भक्ति' शब्द के लक्ष्यार्थ और गौणार्य ये दोनों अर्थ हैं । आगे इस भक्तिवादी पूर्वपक्ष का निरूपण करते हैं ।

४—दूसरे लोग उसका लक्ष्य या गौण कहते हैं । अन्य लोग उस ध्वनि नामक काव्यको गुणवृत्ति गौण कहते हैं । गुणवृत्ति पद काव्यक शब्द और अर्थ दोनोंके लिये प्रयुक्त है । गुण अर्थात् सामीप्यादि और तैष्ण्यादि, उनके द्वारा जिस शब्दका अर्थान्तरमें वृत्तिवोधकत्व होता है वह शब्द और उनके द्वारा वाब्दकी वृत्ति जहांँ होती है वह अर्थ, इस प्रकार शब्द और अर्थ दोनों ही गुणवृत्ति शब्दसे यथेष्ट हो सकते हैं । अथवा 'गुणद्वारेण वर्तनं गुणवृत्तिः' अर्थात् मुख्य अभिधाव्यापार भी गुणवृत्ति शब्दसे बोषित होता है । इसका आशय यह है कि दूसरे लोग ध्वनिको गुणवृत्ति कहते हैं । 'ध्वनतीति ध्वनिः' इस व्युत्पत्तिसे शब्दका, 'ध्वन्यतेsस्मिन्निति ध्वनिः' इस व्युत्पत्तिसे काव्यक बोषक होता है । इस प्रकार गुणवृत्ति शब्द 'गुणे: शाब्द्यादिमिस्स्रैकष्यादिभिव्यापारैरैथान्तरे वृत्तियस्त्र स गुणवृत्ति: शब्दः । तैरुपयैः: शब्दस्य वृत्तियंत्र समनाधिकरण—समनविभक्तिक—प्रयोग हुया है, उसका विशेष प्रयोजन है । पदोंके समानाधिकर-ण्यका अर्थ एकगर्मिबोधकत्व अर्थात् उनके पदाथोंका अभेदान्वय ही होता है । जैसे 'नीलमुत्पलम्' इस उदाहरणमें समानविमक्त्यन्त 'नीलम्' और 'उत्पलम्' पदोंसे नील और उत्पलका अभेद या तादात्म्य ही बोषित होता है । उसका अर्थ 'नीलोत्पलाभुपलम्भ:' ही होता है । इसी प्रकार यहाँ भक्ति और ध्वानिका जो समानाधिकरण्य है उससे उन दोनोंका तादात्म्य ही सूचित होता है । इन दोनोंके तादात्म्यका ही स्पष्डन आगे सिद्धान्तपक्षमें करना है । वैसे अनेक स्पलोंपर लक्षणा और ध्वनि या गौणी और ध्वनि दोनों साथ पायी जाती हैं । परन्तु अनेक स्पलोंपर लक्षणा या गौणीके अभावमें भी ध्वनि रहती है । इसलिये गौणी या लक्षणा और ध्वानिका तादात्म्य या अभेद नहीं है । आगे चलकर यही सिद्धान्तपक्ष स्थिर करना है इसलिये पूर्वपक्षमें समानाधिकरण्य द्वारा उन दोनोंका तादात्म्य किया है ।

यचापि काव्यलक्षणकारोंने ध्वनि शब्दका उल्लेख करके ['ध्वनि नाम लेकर] गुणवृत्ति या अन्य [गुण, अलङ्कारादि] कोई प्रकार प्रदर्शित नहीं किया है, फिर भी

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कारिका १ ] प्रथम उद्योत:

प्रकारः प्रकाशितः, तथापि अमुख्यवृत्त्या³ काव्येषु व्यवहारं दर्शयता ध्वनिनिर्मागो³ मनाक् स्पृष्टोऽपि², न व्यक्तिगतिः परिकल्‍यैवमुक्तम्, भक्तिमाहुस्तमन्ये इति । केचित् पुनर्ल³क्षणकरणशाली²नबुद्ध्यो ध्वनेस्तत्त्वं गिरामगोचरं सहृदयहृदयसंवेद्यमेव समाख्यातवन्तः । तेनैविविधासु विमतिषु स्थितासु सहृदयमनःप्रीतये तत्‌तत्त्वरूपं त्रमः । तस्य हि ध्वने: स्वरूपं सकलसत्कविकालोपीतनिष्प²भूतम्, अतिरमणीयम्, अणीयसी-

भिरूपं चिरन्तनकाव्यविक्‍षणवीधा²नां बुद्धिसंरुचिभाजिततत्‍वपरं । अथ च रामायणमहा-भारतप्रभृतिषु न लक्‍ष्ये सवच्त्र प्रसिद्ध²व्यवहारं लक्‍षयतां सहृदयानाम् आनन्दो मनसि लभतां प्रतिष्ठामिति प्रकारद्यते ॥१॥

[भामहके 'शब्दाश्रयौध्वनिधानाथोः' के व्याख्याकारसद²मे³ 'शब्दानामभिधानमभिधा-व्यापारो मुख्यो गुणवृत्ति²श्च' लिखकर] काव्योंमें गुणवृत्ति²से व्यवद्वार दिखानेवाले [भट्टोद्‌भट्‌ या उनके उपजीव्य भामह] ने ध्वनिनिर्मागो³ का थोड़ा-स स्पर्श करके भी [उसका स्पष्ट] लक्‍षण नहीं किया [इसलिए अर्थतः उनके मतमें गुणवृत्ति² ही ध्वनि हैं] पेसंी कल्पना करके 'भक्तिमाहुस्तमन्ये' यह कहा गया है ।

१—लक्‍षणतिमि³जोंमें अग्रगण्यबुद्धि किन्हीं [तीसरे वादी] ने ध्वनिके तत्त्वको ['न शक्‍यते वर्ण²यितुं गिरा' तथा स्वर्य तदन्तःकरणेन गृह्यते] के समान] केवल सहृदयहृदयसंवेद्य और चेतनाके² पर [शब्दलक्‍ष्यौ, अर्थविवक्षितौ] कहा है । इसलिए इस प्रकारके सत्समेदौके होनेसे सहृदयोंके हृदयाह्लादके लिये हम उसका स्वरूप प्रतिपादन करते हैं ।

काव्यक प्रयोजनोंमें यथा और अर्थकी प्राप्ति, व्यवदारज्ञान और रति:परनि²वृत्ति³ परमानन्द आदि अनेक फल माने गये है । परन्तु उन सर्वमें सत्या: परनि²वृत्ति³ या आनन्द ही सबसै प्रधान फल है । अन्य यथा और अर्थ आदिकी चरम परिणति आनन्दमें ही होती है । इसलिए यहाँ काव्यात्‌भूत ध्वनि-तत्त्वके निरूपणका एकमात्र आनन्द फल मूल कारिकामें 'सहृदयमनःप्रीतये' शब्दसे और उसकी वृत्तिमें 'आनन्द' शब्दसे दिखाया है ।

उस ध्वनिके स्वरूप समस्त सत्कवियोंक काव्योंका परम रहस्यभूत, अत्यन्त सुन्दर, प्राचीन उ.लक्‍षणकारोंकी सूच²स्तर बुद्धियोंसे भी प्रसकु³तित न हुअ है । इसलिये, और रामायण, महाभारत आदि लक्‍ष्य ग्रन्थोंमें सर्वच्‍त्र उसके प्रसिद्ध व्यवद्दार-को परिलक्‍षित करनेवालों सहृदयोक मनम आनन्द [प्रतिपादन] प्रतिष्ठाका² प्राप्त करे, इसलिप्‍ड उद्‌भटको प्रकाण्डित किया जाता है ।

ऊपर जो ध्वनितत्त्व³भी पक्ष दिखायें हैं उनमें अभामावादीक पक्षोंके तीन विकल्प और अन्तके दो पक्ष मिलाकर कुल पाँच पक्ष बन गयें हैं । ऊपरकी इन पंक्तियोंमें ध्वनिका जो विशिष्ट रुप प्रदर्शित किया है उसमें प्रयुक्त वि²देषण उन पूर्वपक्षोंके निराकरणको ध्वनित करनेवाले और साभिप्राय हैं ।

१. गुणवृत्त्या नि० ।

२. मनाक् स्पृष्टो² लक्‍ष्यतां नि० ! स्पृष्ट इति दी० ।

३. अणीयसी²मिश्रितत्व नि० दी० ।

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ध्वन्यालोकः

आनन्दवर्धनाचार्य

[कारिका १

आनन्दवर्धनाचार्य

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कारिका २ ] प्रथम उचोतः

'तत्र ध्वनेरेव लक्षणतुमारुढवस्य भूमिकां रचयितुमिदमुख्यते—

'योऽर्थः सहदयैर्ललाच्यो ग्राह्यात्मेति व्यवस्थितः ।

वाच्यप्रतीयमानाभ्यौ तस्य भेदावुभौ स्मृतौ ॥२॥

काव्यस्य हि विलितोचितसन्निवेशचारुतः शरीरस्येवात्मा सारूप्यतया स्थितः

सहदयरलाच्यो योऽर्थः, तस्य वाच्यः प्रतीयमानश्चेति द्वौ भेदाव् ॥२॥

आधिकारी आरम्भन्ध ये चार अनुवन्ध माने गये हैं और प्रत्येक ग्रन्थके आरम्भमें उनका निरूपण

आवश्यक माना गया है ।

अतएव इस 'ध्वन्यालोक'के प्रारम्भमें भी ग्रन्थकारने उन चार अनुबन्धोंको सूचित किया है ।

'तत्स्वरूपं ब्रूमः'से ग्रन्थका प्रतिपाद्य विषय ध्वनिकका स्वरूप है, यह सूचित किया । विमति-निवृत्ति

और जुगते 'छद्दयमनःप्रीतये'से मनःप्रीतिरूप मुख्य प्रयोजन सूचित हुआ । ध्वनिस्वरूपनिरूपणासु

सहदय उसका अधिकारी और शास्त्रका विपयके साथ प्रतिपाद्य-प्रतिपादकभाव तथा प्रयोजनके साथ

साध्य-साधनभाव सम्बन्ध है इस प्रकार अनुवन्धचतुष्टयकी भी सूचना हुई ॥१॥

यहाँ “तत्र” पद भावलक्षण सममीके या शति सममीके द्विवचनान्तसे नल प्रत्यय करके बना है,

इसलिए उसका अर्थ उन दोनों अर्थात् विपय और प्रयोजनके स्थित होनेपर होता है ।

विपय और प्रयोजनके स्थित हो जानेपर, जिस ध्वनिका लक्षण करने जा रहे

हैं उसकी आधारभूमि [ भूमिरिव भूमिका ] निर्माणके लिए यह कहते हैं—

सहदयों द्वारा प्रशंसित जो अर्थ काव्यके आत्मारूपमें प्रतिष्ठित है उसके वाच्य

और प्रतीयमान दो भेद कहे गये हैं ॥२॥

शरीरमें आत्मके समान, सुन्दर [गुणालङ्कारयुक्त], अवित [रसादिके अनुरूप

रचनाके कारण रमणीय काव्यके साररूपमें स्थित, सहदयप्रांसित जो अर्थ है उसके

वाच्य और प्रतीयमान दो भेद हैं ।

'योऽर्थः सहदयैर्ललाच्यः' इत्यादि दूसरी कारिका वैसे सरल जान पड़ती है परन्तु उसकी सङ्क्ति

तनिक किलष्ट है । उसके आपाततः प्रतीत होनेवाले अर्थने साहित्यदर्पणकार श्री विश्वनाथको भी भ्रममें

डाल दिया, जिसके कारण उन्होंने अपने ग्रन्थमें इस कारिकाका खण्डन करनेकी आवश्यकक्ता समझी । उन्होंने

लिखा कि सहदयरललाघ्य अर्थ अर्थात् ध्वनि तो सदा प्रतीयमान ही है, वाच्य कभी नहीं होता । फिर,

ध्वनिकारने जो उसके वाच्य और प्रतीयमान दो भेद किये हैं वह उनका वदतो व्याघात—स्ववचन-

विरोध है ।

इस सम्भावित आन्तिको समझकर टीकाकारने इस कारिकाकी व्याख्या विशेष प्रकासे की

है । ध्वनिके स्वरूप-निरूपणकी प्रतिज्ञा करके वाच्यका कथन करने लगना भ्रमजनक हो सकता है,

इसलिए स्वयं ग्रन्थकारने भी इस कारिकाकी अवतरणिकामें सूचेत कर दिया है कि यह ध्वनिकी

भूमिका [भूमिरिव भूमिका] है । आधारभूमिका निर्माण हो जानेपर ही उसके ऊपर भवन-निर्माणका

कार्य प्रारम्भ होता है; उसी प्रकार वाच्यार्थ ध्वनिकी आधारभूमि है, उसीके आधारपर प्रतीयमान

अर्थकी व्यक्ति होती है ।

१. तत्र पुनर्ध्वने: नि० ।

२. अर्थैः ' . . . 'काव्यात्मा यो नि० ।

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ध्वन्यालोक:

काव्यलक्ष्माविधायिभिः

केवलमनूदृते पुत्रयेथोपयोगम्

तत्र वाच्यः प्रसिद्धो यः प्रकारैरुपमादिभिः । बहुधा व्याकृतः सोऽन्यैः,

ततो नेह प्रतन्यते

वाच्यं' ये यहां अलंकारोंका ग्रहण किया है वह न्यायशास्त्रका नहीं, अतः विश्ननाथकृत संप्रदान उचित नहीं है। पूर्वपक्ष प्रदर्शित करते हुए लिखा था, 'शब्दार्थशरीरं काव्यम्' । इसमेंसे शब्द तो स्थूलके स्थूलत्वादिके समान सर्दजनसंवेद्य होनसे शरीररहित ही है। परन्तु अर्थ तो स्थूल शरीरकी भौंति सर्वजनसंवेद्य नहीं है। व्यञ्जनार्थ तो सद्धदयैकवेद्य है ही पर उससे भिन्न वाच्यार्थ भी शक्तेतमहपूर्वक व्युत्पन्न पुरुपोंको ही प्रतीत होता है, अतएव अर्थ सर्वजनसंवेद्य न होनसे स्थूलशरीरस्यान्तरीय नहीं है । जब शब्दको शरीर माना लिया तो फिर उसको अनुप्राणित करनेवाले भावमाका मानना भी आवश्यक है। और यह अर्थ उस आत्माका स्थान लेता है। परन्तु सारा अर्थ नहों केवल सद्धदयग्राह्य अर्थ काव्यात्मा है'। इसकलिपे अर्थके दो भेद किये हैं, एक वाच्य और दूसरा प्रतीमान । सद्धदयग्राह्य वाच्यार्थ वह है जो वाच्य अर्थ [वाच्यः प्रसिद्धो यः प्रकारैरुपमादिभिः] काव्यक आत्मा नहीं उसे हम इस रूपकमें सूक्ष्म शरीर या अनःकरण अथवा मनःख्यानीय मान सकते हैं । जिस प्रकार आत्मतत्त्वके विपर्ययमें विप्रतिपत्त चार्वाकादि कोई स्थूल शरीरको और कोई सूक्ष्म मन आदिको हो आत्मा समझ लेतें हैं इसी प्रकार यहां शब्द, अर्थ, गुण, अलंकार, रीत आदि मेंसे किसी एक या उनकी समष्टिको काव्य समझ लेना चार्वाकमतके सदृश है ।

कारिकाकारने 'वाच्यप्रतीममानाख्ययोः' पदमें वाच्य और प्रतीमान दोनोंका 'द्वन्द' समास किया है । 'उभयपदाथप्रधानो द्वन्दः ।' अर्थात द्वन्द समासमें द्वन्दघटक समस्तपदोंका समप्राधान्य होता है । इसलिये यहां वाच्य और प्रतीमान दोनोंका समप्राधानय सूचित होता है, जिसका भाव यह है कि जिस प्रकार वाच्य अर्थका अपह्नव नहीं किया जा सकता है उसी प्रकार प्रतीमान अर्थ भी अनपह्नवनीय है । उसका अपह्नव—निपेष नहीं किया जा सकता है । इस प्रतीमान अर्थके विषयमें की जाननेवाली विप्रतिपत्ति आत्मतत्त्वके विषयमें की जाननेवाली चार्वाकी विप्रतिपत्तिके समकक्ष हो है । अतएव सर्वथा हेय है ।

उनमेंसे, वाच्य अर्थ वह है जो उपमादि [गुणालंकार] प्रकारोंसे प्रसिद्ध है और अन्योंने [पूर्व काव्यलक्षणकारोंने] अनेक प्रकारसे उनका प्रदर्शन किया है । इसलिये हम यहां उनका विस्तारसे प्रतिपादन नहीं कर रहे हैं ।

केवल आवश्यकतानुसार उसका अनुवादमात्र करेंगे । 'वाच्यप्रतीममानाख्ययोः' में 'वाच्य' पदसे घट-पटादिरूप अभिधेयार्थका ग्रहण अभीष्ट नहीं है अपितु उपमादि अलंकारोंका ग्रहण अपेक्षित है इसलिये दूसरी कारिकामें 'वाच्यपदकी व्याख्या करते हैं—उसका यहां अनुवाद करेंगे । अज्ञात अर्थका ज्ञान यहां 'प्रतनन' है और ज्ञातार्थका ज्ञान 'अनुवाद' कहलाता है । भट्टवार्तिकमें कहा है—

९. नि० दी० ने 'काव्यलक्ष्माविधायिभिः' को कारिकाभाग और 'ततो नेह प्रतन्यते' को वृत्तिभाग मानकर छापा है । परन्तु 'लोचन' के अनुसार हमारा पाठ हो ठोक है ।

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कारिका ४ ] प्रथम उद्योतः

प्रतीयमानं पुनरन्यदेव वस्त्वस्ति वाणीषु महाकवीनाम् । यत् तत् प्रसिद्धावयववाच्यार्थैरिकतं विमाति लावण्यमिवाझनासु ॥४॥

प्रतीममानं पुनरन्यदेव वाच्यार्थात् वस्त्वस्ति वाणीषु महाकवीनाम् । यत् तत् 'सहदयसुप्रसिद्धं प्रसिद्धावयवैरलङ्कृतेऽपि: प्रतीतेप्यो वावयवेभ्यो व्यतिरिक्त्वेन प्रकाशते लावण्यमिवाझनासु । यथा झझनासु लावण्यं पृथक् निर्वर्ण्यमानं नेखिलावयवव्यतिरेकि किमप्यनन्यदेव सहदयालोलचनान्तरं तद्रदेव सोऽर्थः ।

स ह्यार्थो वाच्यार्थसामर्थ्यैकविषयं वस्तुमात्रम्, 'अलङ्काररसादृश्र्चेत्यनेकप्रभेदप्रभिन्नो दर्शयिष्यते । सर्वेपु च तेषु प्रकारेषु तस्य वाच्यादन्यत्वम् । तथा हि, आद्यास्तावत् प्रभेदो वाच्याद् दूरं भिद्यतेवान् । स हि कदाचिदु वाच्ये विधिरूपे प्रतिषेधरूपः । यथा—भ्रम धम्मिअ वीसरहो सो सुनओ अज्ज मारिओ देण । गोळाणइकञ्च्छुडङ्गवासिणा दरिअसाहेण ॥[श्र्रम धार्मिक 'वीसरन्ध्र: स शुनकोऽपि मारितस्तेन । गोदानलीकञ्चुकुज्जयवासिना हतसिंहेन ॥ इति छाया] "यत्राद्र्तदयोपः प्राथम्यं सिध्यत्वं चाप्यनुवदति । तत्रच्छन्दयोग औचित्यं साधयत्वं च विधेयता ।"

रसोके पूर्वार्द्धमें 'अनुवाद' या उक्तेयतया लक्षण किया है और उत्तरार्द्धमें 'विधेय'का ॥३॥

प्रतीपमैन कुछ और ही चीज है जो रसज्ञोंके प्रसिद्ध [मुख, नेत्र, श्रोत्र, नासिकादि] अङ्गोंसे भिन्न [उनके] लावण्यकके समान, महाकवियोंकी वृत्तियोंमें

[वाच्य अर्थसे] अलङ्गा ही भाषित होता है ॥४॥

वाच्यार्थसहितं प्रतीममान कुछ और ही वस्तु है । जो प्रसिद्ध अलङ्कारों अथवा मतीत दोनेवाले अवयवोंसे भिन्न, सहदयसुप्रसिद्ध अङ्गनाओंके लावण्यकके समान [अलङ्गा ही] प्रकाशित होता है । जिस प्रकार सुन्दरियोंका सांङ्गयं पृथक् दिखायी देनेवाला समस्त अवयवोंसे भिन्न सहदयनेत्रोंके लिऱ अमृततुल्य कुछ और ही तत्व है, इसी प्रकार वह [प्रतीममान] अर्थ है ।

वस्तुच्यनिका वाच्यार्थसे स्वरूपकृत-मेद

वह [प्रतीममान] अर्थ वाच्य सामर्थ्यसे आक्षित वमतुमात्र, अलङ्कार और रसादि-भेदसे अनेक प्रकारका दिखावा जायगा । उन सभी मेदोंमें वह वाच्यसे अलग हॅै । जैसे पहला [वस्तुध्वनि] मेद वाच्यसे अत्यन्त मिन्न है । [क्योंकि] कहीं वाच्यके

विधिरूप होनेपर [मी] वह [प्रतीममान] निपेधरूप होता है । जैसे—

१. सहदयहृदयसुप्रसिद्धं नि०, दी० । २. अलङ्कारा रसादयश्र नि० । ३. विरशब्दः नि० । ४. गोदावर्रीनदीकूलहल्तागहनवासिना हसो ।

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ध्वन्यालोक

पण्डितजी

पण्डितजी महाराज ! गोदावरीके किनारे कुञ्जमें रहनेवाले मदमत्त सिंहने आज उस कुत्तेको मार डाला है, अब शाप निःशेष होकर भूमि में

गोदावरीतटका कोई सुन्दर स्थान किसी कुल्याका सङ्केतस्थान है। उस स्थानकी सुन्दरताके कारण कोई धार्मिक पण्डितजी—भगतजी—सन्ध्योपासन या भ्रमणके लिये उठकर आ जाते हैं। इसके

कारण उस कुल्याके कार्यों में विघ्न पड़ता है और वह चाहती है कि वह इधर न आया करें। वैसे बिना बात उनको आनाेकी सीधा निषेध करना तो अनुचित और उसक अनधिकार चेष्टा होती,

इसलिए उसने सीधा निषेध न करके उस प्रदेशमें मद् मत्त सिंहकी उपस्थितिकी सूचना द्वारा पण्डितजीको भयभीत कर उसके रोकेनेका यह मार्ग निकाला है। प्रकृत श्लोकमें वह पण्डितजी महाराजको यहीं

सूचना दे रही है। परन्तु उसके कहनेका एक विशेष ढंग है। वह कहती है, ‘पण्डितजी महाराज ! वह कुत्ता जो आपको रोज तंग किया करता था उसे गोदावरीके किनारे कुञ्जमें रहनेवाले मदमत्त सिंहने

मार डाला है', अर्थात् प्रतिदिन आपके भ्रममें बाधा डालनेवाले कुत्तेके मर जानेसे आपके मार्गकी वह बाधा दूर हो गयी है और अब आप निर्भय होकर भ्रमण करें। कुलटा जानती है कि पण्डितजी तो

कुततेसे ही डरते हैं, जब उन्हें मालूम होगा कि उसे सिंहने मार डाला और वह सिंह यहीं कुञ्जमें रहता है तो निश्चय ही पण्डितजी भूलकर भी उठर आनेका साहस नहीं करेंगे। इसीलिए वह पण्डितजीको

निश्शङ्कल होकर भ्रमण करनेका निमन्त्रण दे रही है। परन्तु उसका तात्पर्य यही है कि कभी भूलकर भी इधर पैर न रखना, नहीं तो फिर आपकी कुशल नहीं है। श्लोकमें ‘धार्मिक’ पद पण्डितजी

महाराजकी भीडताका, ‘दतः’ पद सिंहकी भीषणताके अतिरेकका और ‘वाधिना’ पद सिंहकी निरन्तर

विध्वमनताका सङ्केत है। इस श्लोकका वाच्यार्थ तो विधिलुप्त है। परन्तु जो उससे प्रतीतिमान अर्थ

[वस्तुध्वनि] है वह निध्धरूप है। इसलिए वाच्यार्थसे प्रतीतिमान अर्थ अत्यन्त भिन्न है। लिङ्‌ लोट्‌, तव्यत्‌ प्रय्तय ‘विधि प्रत्यय’ कहलाते हैं। विधिप्रत्ययात पदोंको सुननेसे यह

प्रतीत होता है कि ‘अर्थ में प्रवर्त्यते’। विधिप्रत्ययके प्रयोगको सुनकर सुननेवाला नियमसे यह

समझता है कि यह कहनेवाला मुझे किसी विशेष कार्यमें प्रवृत्त कर रहा है। इसलिए विधि प्रत्ययका

सामान्य अर्थ प्रवर्तनार ही होता है। यह प्रवर्तना वक्ताका अभिप्रायरूप है। मीमांसकोंने विशेष्यका

विशेष रूपसे विचार किया है। उनके मतमें वेद अपौरुषेय हैं। वेदमें प्रयुक्त ‘स्वर्गकामो यजेत’ आदि

विधिप्रत्यय द्वारा जो प्रवर्तना बोधित होती है वह शब्दनिष्ठ व्यापार होनेसे ‘शाब्दी भावना’ कहलाती

है। लौकिक वाक्योंमें तो प्रवर्तकत्व पुरुषनिष्ठ अभिप्रायरविषयमें रहता है परन्तु वैदिक वाक्योंका वक्ता

पुरुष न होनेसे वहाँ वह प्रवर्तकत्वव्यापार वेदरूप शब्दनिष्ठ होनेसे ‘शाब्दी भावना’ कहलाता है। उसे ‘आर्थी भावना’ कहते हैं।

‘पुरुषप्रवर्तकत्वको वाच्यत्वेनान्वितविषयकः शाब्दी भावना’, ‘प्रयाजनिष्ठान्तर्गतनियोगविषयो

आर्थी भावना’। साधारणतः विधि शब्दका अर्थ प्रवर्तकत्व या भावना आदि रूप होता है परन्तु

यहाँ ‘क्वाचिद् वाच्ये विधिलुप्ते प्रतिबेधरुपो यथा’ में यह अर्थ सङ्गत नहीं होगा। इसीलिए यहाँ

विधिका अर्थ प्रतिप्रसव या प्रतिषेधनिवर्तन माना गया है। कुत्तेकी उपस्थिति धार्मिकके भ्रमणमें प्रतिषेध

घातक या बाधारूप थी। कुत्तेके मर जानेसे उस बाधाकी निवृत्ति हो गयी। यही प्रतिषेधनिवृत्ति

या प्रतिप्रसव यहाँ ‘इवाचि’ शब्दका अर्थ है, न कि नियोगादि। ‘भ्रम’ पदका जो लोट् लकार है वह

‘प्रैषातिसर्गप्राप्तकालेगु कृत्याक्ष’ [पा० सू० ३।३।१६२] सूत्रसे अतिसर्ग अर्थात् कामना, स्वेच्छाविहार

और प्राप्तकाल अर्थमें हुआ है। प्रैप [प्रेरणान्तरप्रसिमितेऽनु पुरुषनिष्ठा प्रवर्तना प्रैषः] अर्थमें नहीं है।

निर्णयसागरी संस्करणमें ‘विश्रब्धः’ पाठ है उसकी अपेक्षा अभिनवगुप्तिके ‘विध्रब्धः’ पाठ अधिक

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कारिका '५ ] प्रथम उद्योतः

क्वचिद् वाच्ये प्रतिषेधरूपे विधिरूपो यथा—

अत्ता एत्य पिमज्जहिं पत्थ अहं दिअसऱिं पलोएहि !

मा पधिअ रसिअन्थअ सेज्जाए महु णिमज्जहिसि ।।

[ध्वश्रुत निमज्जति जन्नाहं दिवसकं प्रलोकय ।

मा पथिक राध्यक राघ्यायां मम निमंस्यासि:' ।। इति च्छाया]

कवचिद् वाच्ये विधिरूपेऽनुभयरूपो यथा—

बच्च महु त्विअ पेक्कह होन्तु णीसासरोडअव्वाइं ।

मा तुज्झ वि तिआ विणा दक्खिणणहुअस्स जआन्तु ।।

[ब्रज ममैवकृत्या भव-तु निःश्वासरोदितव्यनि ।

मा तवापि तया विना दाक्षिण्यहतनस्य जनिषत ।। इति च्छाया]

उयुक्त है । 'श्रमु विश्वासे', 'श्रमु प्रमादे' दन्त्यादि 'श्रमु' धातु विश्वासार्थक और तालव्यादि

'श्रमु' धातु प्रमादार्थक है । यहाँ विश्वासार्थक दन्त्यादि 'श्रमु' धातुक ही प्रयोग अधिक उपयुक्त

है । इसलिये 'विस्सव' पाण अधिक अच्छो है ।

कहों वाच्यार्थं प्रतिपेधरूपे ध्वानेप [प्रतीपममानार्थ] विधिरूप होता है । जैसे—

हूँ पथ्थक ! णित्तम अच्छिओ तुहुँ देस्खि लो, यहाँ सोसजो सोती हूँ । [रतकाँ] रसांंधोप्रस्त [होकर] कहाँ हस्सरी घाटपर त गिर पड्ना ।

यहाँ वाच्यार्थ निवेद्यरूप है परन्तु व्यङ्ग्यार्थ [प्रतीपममानार्थ] विधिल्प है । यहाँ भी विधिका

अर्थ प्रवर्त्तना नहीं अपितु प्रतिप्रसव अर्थात् निपेध-निवर्त्तनरूप लेना चाहिये । किसी प्रोषितभर्तृकाको

देखकर मदनाकुरसम्पन्न पथिक पुरुषोंको इस निपेध द्वाग उसकी ओरसे निपेध-निवर्त्तनरूप स्वीकृति

या अनुमति प्रदान की जा रही है । अप्रवृत्त-प्रवर्त्तनरूप निमंत्रण नहीं । विद्वानोंको निमन्त्रणरूप

माननेपर तो प्रथम स्तानुरागप्रकाशनसे साहाय्याभिलाषमान खोण्डित होगा । इसीलिए यहाँ विधि

शब्द [निपेध्भावरूप अस्युप्रयमात्रका सूचक है ।

कहाँ वाध्यार्थ विधिरूप होनेपर [प्रतीपममान अर्थ] अनुभयात्मक [विधि, निपेध

दोनोंसे भिन्न] हात है । जैसे—

[तुम] जआहा, में अकली हि हूँ । "श्वास और रोनेको मेंगूँ [सो यच्छा है], कहाँ

दाक्खिण्य [मेरे प्रति सी अनुराग 'अणेकहिलासमग्गं' दक्खिण- कण्यित:' के चक्करमें

पड्कर, उसके बिना तुम्हका भी यद्द सव न माँगना पडे ।

१. आद्योमौक्षीः णिँ०, द्रु० । 'राघ्यसस्रसती' में मूल पाठ भिन्न है । उसका पाठ और छाया

निम्नलिखित है—

एत्य णिमज्जहिं अत्ता एत्य अहं परिअणो सहळो ।

पथिक राध्यक रसिअन्थअ मा महु सेअण्णे णिमज्जहिस्सि ।

पथिक राध्यक मा मम धायने निमंस्यासि ॥

गाघासस्रती ७, ६७

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ध्वन्यालोक:

आनन्दवर्धन

महामहोपाध्याय डॉ० म० रा० दिवाकर

चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन

कचिद् वाच्ये प्रतिषेधरूपेणुभयलुपो यथा—

दे आ पसिअ णिवत्तसु मुहस्सिजोहाविलुत्ततमणिवहे ।

आहिसारिआँ विगयं करोसी अण्णाणं वि हूआसे ॥

[प्रार्थ्ये तावत् प्रसीद नितवत्स मुखशशिज्योत्स्नाविलोलतमोनिवहे ।

अभिसारिकाणां विघ्नं करोत्यन्यासामपि हेतवे ॥

इति [छाया]

इस इलोकमें खींचता [प्रकाशमेति लिङ्गो, नपुंसकलिङ्गोऽन्वितः] सख्या अन्यसम्भोगान्निवृत्तिः । सा शाब्देनैव कयिता ध्वैरस्योऽङ्कगायिता ॥ सा० द० ३, ११७ ॥ नायिकाका प्रगाढ मन्यु [दुःख] प्रतीयमान है । वह न तो क्रोधामावृप निपेध ही है और न अन्य निषेध्यभावरूप विधि ही है । इसलिये यहाँ प्रतीमान अर्थ अनुभयरूप है ।

आचार्य अभिनवगुप्त

महामहोपाध्याय डॉ० म० रा० दिवाकर

चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन

कहीं वाच्यार्थे प्रतिषेधरूप होनेपर [भी प्रतीमान अर्थ] अनुभयरूप होता है ।

जैसे—

[मैं] प्रार्थना करता हूँ । मान जाओ, लौट आओ । अपने मुखचन्द्रकी ज्योत्स्नासे गाढ अनङ्कारका नाश करके अरी हताशो ! तुम अन्य अभिसारिकाओं [के कार्य] का भी विघ्न कर रही हो ।

इस श्लोककी व्याख्या कई प्रकारसे की गयी है । पहली व्याख्याके अनुसार नायकके घरपर आयी परन्तु नायकके गोत्रस्खलनादि अपराधसे नाराज होकर, लौट जानेकी लिए उद्यत नायिका के प्रति नायककी उक्ति है । नायक प्रार्थनापूर्वक उसको लौटानेका यत्न करता है । न केवल अपने सुखमें विघ्न डाल रही हो बल्कि अन्य अभिसारिकाओंके कार्यमें भी विघ्न बन रही हो तो फिर तुम्हें कहीं सुख कैसै मिलेगा ? इस प्रकारका वहभ्रान्तिमद्रूप चाटु विशेष व्यङ्गच है ।

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दूसरी व्याख्याके अनुसार सखीके समझानेपर भी उसकी बात न मान कर अभिसारोयत नायिकाके प्रति सखीकी उक्ति है । लाघव प्रदर्शन द्वारा अपनकों अनादरास्पद करके हताशो ! तुम न केवल अपनी मनोरथसिद्धिमें विघ्न कर रही हो अपितु अपने मुखचन्द्रकी ज्योत्स्नासे अनङ्कारका नाश करके अन्य अभिसारिकाओंके कार्यमें भी विघ्न डाल रही हो । इस प्रकार सखीका चाटु रूप अभिप्राय व्यङ्गच है ।

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महामहोपाध्याय डॉ० म० रा० दिवाकर

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इन व्याख्याओंमेंसे एकमें नायकगत चाटु अभिप्राय और दूसरीमें सखीगत चाटु अभिप्राय व्यङ्गच है ।

सखीप्रकरणे नायिका[विषयक] रतिरूप भाव [रतिदेवादिविषया भावो व्यभिचारी तथाक्षितः । अर्थात नायक नायिकासे मिलनविषयक रति और व्यञ्जनागम्य व्यभिचारीको 'भाव' कहते हैं] व्यङ्गच है और वह अनुभावरूप 'अन्यासामपि विघ्नं करोति हताशो' आदि वाच्यार्थके प्रति अलङ्कारूप हो जानसे वस्तुतः गुणीभूतव्यङ्गचका उदाहरण बन जाता है, ध्वनिका नहीं ।

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इसी प्रकार जहाँ 'भाव' दूसरेका अलङ्क हो उसे 'प्रेयः' कहते हैं वह भी गुणीभूतव्यङ्गच ही है । नायककोटिके पक्षमें उसी प्रकारसे नायकगत रति उत्ते अनुभावरूप अर्थ द्वारा 'निवर्तत्स्व' इस वाच्यका अलङ्क हो जानसे 'रसवत्', जहाँ रस अन्यका अलङ्क हो जाय वहाँ 'रसवत् अलङ्कार होता है । यह भी गुणीभूतव्यङ्गचरूप ही है । अतएव इन दोनों व्याख्याओंमें यह ध्वनिकाव्यका उदाहरण न होकर गुणीभूतव्यङ्गचका उदाहरण है ।

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भट्टनायककी तीसरी व्याख्या यह की गयी है कि 'इष्यतस्ते नायकके घरको अभिसार करती

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कारिका ४ ] प्रथम उद्योत:

कचिद् वाच्याद् विविधविषयत्वेन व्यवस्थापितो यथा—

कस्स वा ण होद् रोसो दड्‌डूण पियाएँ सव्वणं अहम्मं । सभमरसउमग्गाइणि वारिअवामे सहसु पहिमु ॥

[कस्य वा न भवति रोषो दण्डेन प्रियाया: सन्नणमधरम् । सभ्रमरपडुमाग्रणि वारितवामे सहस्वेदान्तीम् ॥ इति छाया]

अन्ये चैवंप्रकारा: वाच्याद् विमोक्तिन: प्रतीमामनुमेदा: सम्भवन्ति । तेषां दिङ्‌मात्र-

मेतत्त् प्रदर्शितम् । द्वितीयोडपि प्रभेदो वाच्याद् विमित्न: सप्रपञ्चममे दर्शयिष्यते ।

हुई नायिका के प्रति, रास्ते में मिले हुए और नायिका के घर की ओर आते हुए नायक की यह उक्ति है । यहाँ 'निवर्तत्स' लौट चलो, यह वाच्यार्थ है । परन्तु वह लौट चलना नायक, नायिका या किसी के

घर की ओर भी हो सकता है अतः तुम मेरे घर चलो या हम दोनों तुम्हारे घर चलें यह तात्पर्य

व्यङ्‌ग्य है । यह तात्पर्य न विम्बरूप है और न निपेधरूप । अतएव वाच्य प्रतीपेधरूप होने पर भी

व्यङ्‌ग्य अनुमयरूप होने से प्रतीमान अर्थ वाच्यार्थ से अत्यन्त भिन्न है ।

वस्तुध्वनिका वाच्यार्थ से विषयकृत भेद से भेद

उपरके चारों उदाहरणों में धार्मिक, पान्थ, प्रियतम और अभिसारिका ही क्रमशः वाच्य और

व्यङ्‌ग्य दोनो के विषय हैं । इस प्रकार विषय के भेद से भी वाच्य और व्यङ्‌ग्य का स्वरूपभेद से

भेद दिखाया है । अगले उदाहरण में यह दिखाते हैं कि वाच्य और व्यङ्‌ग्य का विषयभेद भी हो

सकता है और उस विषयभेद से भी वाच्य और व्यङ्‌ग्य दोनो को अलग मानना होगा ।

अथवा प्रियाङ्‌के [इतरनिमित्तक] सव्वण अघरको देखिऊण किस्सु कोध नहीं

आता । मना कर ने पर भी न मान कर भ्रमर सहित कमल को सूँघने वाली तू अब उसका

फल भोग ।

किसी अविनीता के अघर में दर्शन जन्य प्रण कहीं चौर्यरति के समकक्ष हो गया है । उसका पति

जव उस को देखेगा तो उसकी दुर्‌दर्शितता को समझ जायगा और अप्रसन्न होगा । इसलिए उसकी

ससी, उसने आस-पास कहीं विद्यमान पति को लक्ष्य में रख कर उसके सुनाने के लिए, इस प्रकार से

मानों उसने पतिं को देखा है नहीं, उस अविनीता से उपर्युक्त वचन कह रही है । यहाँ वाच्यार्थ का

विषय तो अविनीता है परन्तु उसका व्यङ्‌ग्यार्थ है कि इसका प्रण परपुरुषजन्य नहीं अपितु भ्रमर-

दर्शनजन्य है अतः इस का अघराष नहीं है । इस व्यङ्‌ग्य का विषय नायिका है । इसलिए यहाँ वाच्य और

व्यङ्‌ग्य का विषयभेद होने से व्यङ्‌ग्य अर्थ वाच्यार्थ से अत्यन्त भिन्न है ।

इस में और भी अनेक विषय वन सकते हैं । वाच्यार्थ का विषय तो प्रत्येक दशा में अविनीता

नायिका ही रहेगी परन्तु व्यङ्‌ग्य के विषय अन्य भी हो सकते हैं, जैसे आज तो इस प्रकार से वच्‌च गयी,

आगे कभी इस प्रकार के प्रकट चिह्नों का अवसर न आने देना । इस व्यङ्‌ग्य में प्रतिनायक ।

अलङ्‌कारध्वनिका वाच्यार्थ से भेद

इस प्रकार वाच्यार्थ से मित्र् प्रतीमामल [वस्तुध्वनि] के और भी भेद हो सकते

हैं । यह तो उनका केवल दिग्‌दर्शन मात्र कराया है । दूसरा [अलङ्‌कारध्वनिरूप] प्रकार

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ध्वन्यालोक:

भी वाच्यार्थसे भिन्न है । उसे आगे [द्वितीय उद्योतमें] सचिस्तार दिखलायेंगे ।

रसध्वनिका वाच्यार्थसे भेद

तीसरा [रसध्वनि] रसादिरूप भेद वाच्यकी सामर्थ्यसे आक्षित होकर ही प्रकाशित होता है, साक्षात् शब्दव्यापार [अभिधा, लक्षणा, तात्पर्या शक्त्य्यापार] का विषय नहीं होता, इसलिये वाच्यार्थसे भिन्न ही है । क्योंकि, [यदि उसका वाच्य माना जाय तो] उसकी वाच्यता [दो प्रकारसे हो सकती है] या तो स्वशब्द [अर्थात् रसादि शब्दों अथवा शृङ्गारादि नामों] से हो सकती है अथवा विभावादि प्रतिपादन द्वारा । [इन दोनोंमेंसे] पहले पक्षमें [जहाँ रस शब्द अथवा शृङ्गारादि शब्दका प्रयोग नहीं किया गया है परंतु विभावादिका प्रतिपादन किया गया है वहाँ] स्वशब्दसे निवेदित न होनेपर रसादिकी प्रतीति अभाव प्राप्त होगा । [रसादिका अनुभव नहीं होगा] और सब जगह स्वशब्द [रसादि अथवा शृङ्गारादि संज्ञा शब्द] से उन [रसादि] का प्रतिपादन नहीं किया जाता । जहाँ कहीं [स्वशब्द रसादि अथवा शृङ्गारादि संज्ञा पदोंका प्रयोग] होता भी है वहाँ भी विशेष विभावादिके प्रतिपादन द्वारा ही उन [रसादि] की प्रतीति होती है । संज्ञा शब्दोंसे तो वह केवल मनूदित होती है । उनसे जन्म नहीं होती । क्योंकि दूसरे स्थानोंपर उस प्रकरणसे [विभावादिके अभावमें केवल संज्ञा शब्दोंके प्रयोगसे] वद्ध [रसादिम्रतीति] दिखलायी नहीं देती । विभावादिके प्रति-पादनरहित केवल [रस या] शृङ्गारादि शब्दके प्रयोगवाले काव्यमें तनिक भी रसवस्तु प्रतीत नहीं होती । क्योंकि [रसादि] संज्ञा शब्दोंके बिना केवल विशिष्ट विभावादिसे ही रसादिकी प्रतीति होती है, और [विभावादिके बिना] केवल [रसादि] संज्ञा शब्दोंसे प्रतीति नहीं होती इसलिये अन्यथ, व्यतिरेकसे रसादि वाच्यकी सामर्थ्यसे आक्षित ही प्रतीति होती है।

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कारिका ४ ] प्रथम उद्योत:

होते हैं, किसी भी दशा में वाच्य नहीं होते। इसलिये तीसरे [रस, भाव, रसाभास, भावाभास, भावप्रचाम, भावोदय, भावसंधि, भावशाबलता आदि रूप] भेद भी वाच्य से भिन्न ही है यह निश्चित है । वाच्य के साथ-सी [असंबलक्ष्यक्रम] इसकी प्रतीति आगे दिखलायी जायगी ।

ऊपर अन्वय-व्यतिरेकी शब्द आये हैं । साधारणतः ‘तत्सत्वे तत्सत्ता अन्वयः’, ‘तदभावे तदभावो व्यतिरेकः’ यह अन्वय-व्यतिरेक का लक्षण है । परन्तु इसके स्थान पर अन्वयपक्ष में ‘तत्सत्वे तद्विकारसत्त्वं कार्यसत्तापकायः’ ‘तदभावे कार्याभावो व्यतिरेकः’ लक्षण अलंकारशास्त्र में प्रसिद्ध है । अन्वय में सकल कारणसमुदाय अपेक्षित है । व्यतिरेक तो एक के अभाव में भी हो सकता है । प्रतीमान वस्तु, अलंकार और रस आदि रूप धर्म, लौकिक तथा अलौकिक दो भागों में निबद्ध किये जा सकते हैं । वस्तु और अलंकार कभी स्वाश्रयवाच्य भी होते हैं । इसलिए वे लौकिकके अन्तर्गत आते हैं और रस सदैव वाच्यसामर्थ्याश्रित ही होता है इसलिए काव्यव्यापारेगोचर होनेसे अलौकिक माना जाता है । लौकिकके वस्तु और अलंकार दो भेद इस आधारपर किये हैं कि इनमें एक [अलंकार] भेद ऐसा है जो कभी किसी अन्य प्रधानभूत अलंकार्य रसादिका शोभाधायक होनेसे उपमारादि अलंकार रूप में भी व्यवद्धत होता है । परन्तु जहाँ वह वाच्य नहीं अपितु वाच्यसामध्यार्क्षिस्‌स्वद्रूप्य है वहाँ वह किसी दूसरे का अलंकार नहीं अपितु स्वयं प्रधानभूत अलंकार्य है । फिर भी उसका भूतपूर्वावस्थाके कारण ‘ब्राणाश्रमण्यन्याय’ से अलंकार्य्यनि कहते हैं । ‘ब्राणाश्रमण्यन्याय’ का अभिप्राय यह है कि कोई पूर्वावस्था का ब्राह्मण पीठे नौद या जैन मिथु ‘श्रमण’ बन गया । उस समय भी उसकी पूर्वावस्थाके कारण उसे श्रमण न कह कर ब्राह्मण-श्रमण ही कहा जाता है । इस मकार उपमारद अलंकार जहाँ प्रतीमान या स्वद्रूप्य होते हैं वहाँ वे प्रधानताके कारण अलंकार नहीं अपितु अलंकार्य कहे जाने योग्य होते हैं फिर भी उनकी पूर्वावस्थाके आधारपर उनको अलंकार नामसे कहा जाता है । यह अलंकार्य्यनि प्रतीमानका एक लौकिक भेद है । और जो अनलंकार वस्तुमात्र प्रतीमान है उसको वस्तुश्र्वनि कहते हैं । प्रतीमानका तीसरा भेद रसादि रूप ध्वनि कभी वाच्य नहीं हे.ताआइसलिए वह अलौकिक प्रतीमान कहा जाता है । इन तीनोंमें रसादि रूप ध्वनिकी प्रधानता होते हुए भी सबसे पहले वस्तुश्र्वनिका निरूपण इसलिए किया जाता है कि लौकिक और वस्तुरूप होनेसे वाच्यसे अतिरिक्त उसका अस्तित्व, अलौकिक रसादिके अस्तित्वकी अपेक्षा सरलतासे समझमें आ सकता है ।

'अभिधा शक्तिसे व्यक्ज्यार्थबोधका निराकरण

इस प्रतिपमान अर्थकी प्रतीति अभिधा, लक्षणा और तात्पर्यवृत्तियों से भिन्न व्यञ्जना नामक वृत्तिसे ही होती है । उसके अतिरिक्त प्रतीमान अर्थके बोधका और कोई प्रकार नहीं है । लोचनकारने ‘भ्रम ध्वंसिक’ आदि पदवाक्यमें इस विषयपर विद्धत रूपसे विवेचना की है । उसका सारांश इस प्रकार है । शब्दसे अर्थका बोध करानेवाली अभिधा, लक्षणा आदि जो शब्द-शक्तियाँ मानी गयी हैं उनमें सबसे प्रथम अभिधा शक्ति है । इस अभिधा शक्तिसे ही यदि प्रतीमान अर्थके बोध मानें तो उसके दो रूप हो सकते हैं—या तो वह वाच्यार्थके साथ ही व्यक्ज्य्यार्थका भी बोध मानें तो उसके दो रूप हो सकते हैं—या तो वह वाच्यार्थके साथ ही व्यक्ज्यार्थका भी अभिधासे ही बोध माना जाय, या फिर पहले वाच्यार्थका और पीछे प्रतीमानका इस प्रकार कमशः दोनों अर्थोंका अभिधासे ही बोध माना जाय । इनमेंसे वाच्य और प्रतीमान दोनोंका साथ-साथ बोध तो इसलिए नहीं बनता कि उसके उदाहरणोंमें विधिनिषेधादि रूपसे वाच्य और प्रतीमानका

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ध्वन्यालोक:

मेद दिखलाया है उसके रहते हुए दो विधिनिषेधलुप विरोधी अर्थ एक साथ एक ही व्यापारसे बोधित नहीं हो सकते । अब दूसरा पक्ष रह जाता है वह भी युक्तिसंगत नहीं है । क्योंकि 'शब्द-बुद्धिकरणां विरम्य व्यापाराभावः,' अथवा 'विधोऽप्यं नामिधा गच्छेत् क्षीणशक्तिर्विरोधपने' आदि सिद्धान्तोंके अनुसार अभिधा शक्ति एक ही बार व्यापार कर सकती है और उस व्यापार द्वारा वह वाच्यार्थको उपस्थित करा चुकी है । अतएव वाच्यार्थबोधमें शक्तिका क्षय हो जाननेसे अभिधा शक्ति से प्रतीयमान अर्थका बोध नहीं हो सकता +दूसरी बात यह भी है कि अभिधा शक्ति सकृद्वृत्ति अर्थको ही बोधित कर सकती है । प्रतीयमान अर्थ तो सकृदृत्ति अर्थ नहीं, इसलिए भी वह अभिधा द्वारा बोधित नहीं हो सकता है ।

'तात्पर्यो' शक्तिसे व्यङ्ग्य-बोधका निराकरण

अभिधा शक्तिके द्वारा पदाथोंपस्थितिके बाद 'अभिहितान्वयवादी' उन पदाथोंके परस्पर सम्बन्धके [अन्वय] बोधके लिए 'तात्पर्य्य' नामकी एक शक्ति मानते हैं । इसके द्वारा पदाथोंके संसर्‌ग-रूप वाक्यार्थका बोध होता है । 'सः [तत्‌] वाच्यार्थः परः प्रधानतया प्रतिपाद्यः येऽपां तानि तात्पर्य्याणि । 'तात्पर्य्य' शक्तिः तात्पर्य्यां शक्तिः |' इस अभिहितान्वयवादियोंकी अभिमत 'तात्पर्य्य' शक्तिका प्रतिपाद्य तो केवल पदाथोंसंसर्गरूप वाक्यार्थ ही है अतएव इस अति विशेषभूत प्रतीयमान अर्थको बोध करनेंकी क्षमता उसमें भी नहीं है ।

'अन्विताभिधानवाद' और व्यङ्ग्यार्थबोध

इस 'तात्पर्य्यां' शक्तिको माननेवाला 'अभिहितान्वयवाद' मीमांसकोंमें कुमारिलभट्टका है । उसका विरोधी 'प्रभाकर' का 'अन्विताभिधानवाद' है । अभिहितान्वयवादके अनुसार पहिले पदोंसे अनन्वित पदार्थ उपस्थित होते हैं । पीछे 'तात्पर्य्य' शक्तिसे उनका परस्पर सम्बन्ध होनेसे वाक्यार्थ-बोध होता है । परन्तु प्रभाकरके 'अन्विताभिधानवाद' में पदोंसे, अन्वित-पदार्थ ही उपस्थित होते हैं इसलिए उनके अन्वयके लिए 'तात्पर्य्य' शक्त माननेकी आवश्यकता नहीं है । इस 'अन्विताभिधानवाद' का प्रतिपादन प्रभाकरने इस आधारपर किया है कि पदोंसे जो अर्थकी प्रतीति होती है वह शक्तिग्रह या सङ्केतग्रह होनेपर ही होती है । इस सङ्केतग्रहके अनेक उपाय हैं [वाक्यग्रहे व्याकरणोपमानकोशास्-वाक्याद् व्यवहारतश्शाक्‍क्ष्याद् वृद्धतस् सादृश्यतस् सिद्धपदस्य हृदात्: II] परन्तु इनमें सबसे प्रधान उपाय व्यवहार है । व्यवहारमें उत्तमबुद्धि [पितादि] मध्यमबुद्धि [नौकर या बालकके भाई आदि] को किसी गाय आदि पदार्थके लानेका आदेश देता है । परशमें बैठा बालक उत्तमबुद्धिके उन 'गामानय' आदि पदोंको सुनता है और मध्यमबुद्धिको आसन्नस्थितमान गवादिका पिण्डको लाते हुए देखता है । इस प्रकार प्रारम्भमें 'गामानय' इस अखण्ड वाक्यसे सास्नादिमान् पिण्डका आनयनरूप सम्पिण्डित अर्थ ग्रहण करता है । उसके बाद दूसरे वाक्यमें 'गाम्' के स्थानपर 'अश्वम्' या आनयन के स्थान-पर 'वघान' आदि अल्ग-अल्ग पदाथोंका अर्थ समझने लगता है । इस प्रकार व्यवहारसे जो शक्तिग्रह होता वह केवल-पदार्थमें नहीं अपितु अन्वित-पदार्थमें ही होगा । क्योंकि व्यहार अन्वित पदार्थका ही सम्भव है, के.वलकप नहीं । इसलिए प्रभाकर अन्वित-अर्थमें ही शक्त मानते हैं ।

इस 'अन्विताभिधानवाद'के अनुसार इतना तो कहा जा सकता है कि केवल-पदार्थमें शक्तिग्रह नहीं होता अपितु अन्वित-अर्थमें ही होता है । परन्तु जब यह प्रश्न होगा कि 'गाम्' पदका व्यवहार तो 'आनयन' पदके साथ भी हुआ और 'वघान' पदके पदके साथ भी, तो आनयनान्वित गोमें गो पदका

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कारिका ४ ] प्रथम उच्योतः

शक्तिग्रह होगा या बन्धनान्वितमें । इसका निर्णय किसी एक पक्षमें नहीं हो सकता क्योंकि वाक्यान्तरमें प्रयुक्त आनयनादि पद तो वही हैं । इसलिए सामान्यतः पदार्थोन्वितमें शक्तिग्रह होता है और अन्तमें ‘निर्विशेषं न सामान्पम्‌’के अनुसार उस सामान्यान्वितका पर्यवसान अन्वित-विशेषमें होता है । यही ‘अन्विताभिधानवाद’का सार है । इस मतमें विशेषपर्यवसित सामान्यविशेषरूप पदार्थ सकृदेकविषय है परन्तु व्यञ्जना तो उसके भी वाद प्रतीत होनेसे ‘अतिविशेष’ रूप है । उस अतिविशेषरूप व्यङ्ग्यका ग्रहण अन्विताभिधानवादके मतमें भी अभिधा द्वारा नहीं हो सकता है ।

‘अभिहितान्वयवाद’में अन्वित अर्थ और ‘अन्विताभिधानवाद’में पदार्थान्वित अर्थ वाच्यार्थ है । परन्तु वाक्यार्थ तो अन्वितविरोधरूप है इसलिए वस्तुतः दोनों ही पक्षोंमें वाक्यार्थ अवाच्य ही है । और जब वाक्यार्थ ही अवाच्य है तो फिर प्रतीतिमान् अर्थको वाक्यकोटिमें रखनेका प्रश्न ही नहीं उठता ।

कुमारिलभट्ट और प्रभाकर

‘अभिहितान्वयवाद’के आचार्य कुमारिलभट्ट और ‘अन्विताभिधानवाद’के संस्थापक प्रभाकर दोनों ही मीमांसक हैं । यों तो प्रभाकर कुमारिलके शिष्य हैं परन्तु दार्शनिक साहित्यमें प्रभाकरका मत ‘गुरुमत’ नामसे और कुमारिलभट्टका ‘दौतातिक’ नामसे उल्लिखित हुआ है । इसका कारण यह है कि प्रभाकर बड़े प्रतिभाशाली थे । अपने गुरुके सामने हर एक विषयपर वे अपना तर्कसङ्गत नया मत उपस्थि‍त करते थे । इसलिए इन दोनोंके दार्शनिक मतोंमें बहुत मेद पाया जाता है, जिनमेंसे यह ‘अभिहितान्वयवाद’ और ‘अन्विताभिधानवाद’का मेद प्रकृत मुख्य सैद्धान्तिक मेद है ।

भट्टोल्लटके मतकी आलोचना

‘अभिहितान्वयवादी’ भट्टके मतानुयायी भट्टोल्लट प्रस्थतिने ‘यत्परः शब्दः स शब्दार्थः’ और ‘शब्द्यमिश्रित दीर्घदीर्घतरोट्टमिश्रव्यापार:’की युक्तियाँ देकर व्यङ्ग्यको अभिधा द्वारा ही सिद्ध करनेका प्रयत्न किया है । [ ‘ध्वन्यालोक’के टीकाकारने इस मतको ‘शब्द्यान्विताभिधानवादी यत्परः शब्दः स शब्दार्थः इति यावत्‌ येहीला ध्वनिभ्रमिष्यापारमेव दीर्घदीर्घतरदीर्घतमिश्रयति’ लिखकर इस मतको

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ध्वन्यालोक:

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कारिका ४ ] प्रथम उद्योत

तो वह् ‘तात्पर्यّ’ शक्तिको भी मानते हैं और ‘मानान्तरविरुद्धे तु मुख्यार्थस्य परिग्रहे । अभिधेयाविना भूतप्रतीतिलक्षणोच्यते ॥ लक्षणामाणगुणैयोंगाद् ऋत्तरत्स्था तु मौणता । इत्यादि भट्टवार्तिकके अनुसर ‘लक्षणा’ वृत्ति भी मानते हैं । जब दीर्घदीर्घांतर अभिधाव्यार्य से ‘तात्पर्य्य’ तथा ‘लक्षणा’ के भी वादमें होनेवाले प्रतियमान अर्थका ज्ञान हो सकता है तब उसके पूर्ववर्तीं वाच्यार्थं तथा लक्ष्यार्थंका बोध भी उसी दीर्घदीर्घतर व्यापार द्वारा अभिधासे ही हो सकता है, फिर इन दोनोंको माननेकी क्या आवश्यकता है ? दीर्घदीर्घीतर अभिधाव्यापारके साथ ‘तात्पर्य्य’ और ‘लक्षणा’ व्यक्तिको भी मानना ‘वदतो व्याघात’ है ।

इसी प्रकार ‘ब्राझण पुत्रस्ते जाः’ इस पुत्रोत्पत्तिके समाचारको सुनकर हर व्यक्तिको प्रसन्नता होती है । और ‘कन्या ते गमिणी जाता,’ कन्या अर्थात् अविवाहिता कन्या गमिणी हो गयी, इस वाक्यको सुनकर शोक होता है । इन शोक और हर्षके प्रति वह वाक्य कारण है । परन्तु वह कारणत उत्पत्तिके प्रति है, जातिके प्रति नहीं । वाक्य हर्ष-शोकका उत्पादक कारण है, ज्ञापक नहीं । यदि शब्दप्रयोगके बाद सभी अर्थ अभिधा शक्तिसे ही बोधित होता है तो ये हर्ष, शोकादि भी वाच्य मानने चाहिये । परन्तु सिद्‌धान्त यह है कि वाक्योसे ये हर्ष-शोक पैदा होते हैं और मुख्यविकास आदिके अनुमान द्वारा ज्ञात होते हैं । ‘उत्पत्तिस्थित्यभिव्यक्तिविकारप्रत्ययासामयः । वियोगान्तवधृतयः कारण नवधा स्मृतम् ॥’योग द० ३, २८]के अनुसार उत्पत्ति, स्थिति आदिके भेदसे नौ प्रकारके कारण माने गये हैं । उपर्युक्त ‘ब्राझण पुत्रस्ते जाः’ आदि वाक्य हर्ष-शोकादिसे उत्पत्तिमात्रके कारण है । परन्तु उनका ज्ञान शब्द द्वारा न होकर मुख्यविकासादिसे होता है । यदि शब्दव्यापारके बाद प्रतीत होनेवाला सारा अर्थ अभिधा शक्तिसे उपस्थित माना जाय तो हर्ष-शोकादिको भी वाच्य मानना होगा, जो कि युक्तिसंगत नहीं है और मीमांसक स्वयं भी नहीं मानते ।

एक बात और है । ‘श्रुतिलिङ्गवाक्यप्रकरणस्थानसमाख्यानां समवाये पारदौर्बल्यं अर्थविप्रकर्षात’ यह मीमांसादर्शनका एक प्रमुख सिद्धान्त है । यदि उक्त दीर्घदीर्घीतर अभिधाव्यापारवाला सिद्धान्त मानं लिया जाय तो यह श्रुतिलिङ्गादिका ‘पारदौर्बल्य’वाला सिद्धान्त नहीं बन सकता । मीमांसामें विशिष्टवाक्योंके चार भेद माने गये हैं—उत्पत्तिविधि, विनियोगविधि प्रयोगाविधि और अभिकारविधि । इनमेंसे ‘अज्ञ्अज्ञानसमबन्धबोधको विधिः विनियोगविधिः’ यह विनियोगविधिका लक्षण किया है । अर्थात् जिसके द्वारा गुण और प्रधानके सम्बन्धका बोध हो उसे विनियोगविधि कहते हैं । इस विनियोगविधिके सहकारी श्रुति, लिङ्ग, वाक्य, प्रकरण, स्थान और समाख्या नामक छः प्रमाण माने गये हैं । और जहाँ इनका समवाय हो वहाँ पारदौर्बल्य अर्थात् उत्तरौत्तर प्रमाणको दुर्बल माना जाता है । इसका कारण यह है कि श्रुतिके श्रवणमात्रसे अज्ञ्‌-प्रधानभावका ज्ञान हो जाता है, परन्तु लिङ्‌आ आदिमें प्रत्यक्ष विनियोजक शब्द नहीं होते अपितु उनकी कल्पना करनी होती है । जैसे ‘श्रीहिमियङ्‌त्‌’ यहाँ ‘श्रीहिमि:’ इस तृतीयाविभक्तिसे करणत ही श्रीहिकी योगके प्रति करणतारूप अज्ञता प्रतीत हो जाती है । परन्तु लिङ्‌आदिमें विनियोजककी कल्पना करनी पड़ती है । जवतक उससे लिङ्‌के आधारपर विनियोजक वाक्यकी कल्पना की जायगी उसके पूर्वव ही श्रुतिसे उसका साक्षात् विनियोग हो जानसे लिङ्‌की कल्पकत्वशक्ति व्याहत हो जाती है । अतएव लिङ्‌आदिकी अपेक्षा श्रुति प्रबल है । जैसे ‘पैन्‌द्र्यागा गाहं पत्यसुपतिष्ठते ।’ यह लिङ्‌की अपेक्षा श्रुतिकी प्रबलताका उदाहरण है । जिन ऋचाओंका देवता इन्द्र है वे ऋचाएँ ‘पैन्‌द्री’ ऋचा कहलाती हैं । इन्द्री ऋचाओंमें इन्द्रका लिङ्‌ होनेसे उनको इन्द्रस्तुतिका अज्ञ होना चाहिये यह बात लिङ्‌से बोधित होती है । परन्तु श्रुति प्रत्यक्ष

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ध्वन्यालोक

[कारिका ४

अनुसार विवाहके समयके यज्ञकी अग्नि]की श्रुतिके अज्ञरुपमें विनियोग करती है। श्रुतिके प्रबल होनेके कारण ऐन्द्र ऋचाओं गाईपत्यकी श्रुतिका अज्ञ होता है, जिससे इन्द्रस्तुतिका अज्ञ नहीं होता।

यदि भट्टलोल्लटके अनुसार ‘दीर्घदीर्घतराद्रोडमिधाव्यापार:’वाला सिद्धान्त माना जाय तो श्रुति, लिख्न आदिते जो-जो अर्थ उपस्थित होना है वह सब एक ही दीर्घदीर्घतर अभिधाव्यापारसे बोधित हो जायगा। तब फिर उनमें दुर्बल और प्रबलकी कोई बात ही नहीं रहेगी। इसलिए भट्टलोल्लटका यह दीर्घदीर्घंतर अभिधाव्यापारवाला सिद्धान्त मीमांसाके सुप्रतिष्ठित श्रुतिलिङ्गादि के पारदौर्बल्यसिद्धान्तके

विपरीत होनेसे भी आप्राह्य है। इस प्रकार भट्टलोल्लटका सारा ही सिद्धान्त मीमांसाकी दार्शनिकपरम्परा और साहित्यकी शक्ति परम्परा दोनोंके ही विरुद्ध और अमान्य है।

भट्टलोल्लटके इस सिद्धान्तका भी पुष्टछूत मीमांसकके ही एकदेशी सिद्धान्त ‘नैमित्तिकनुसरण निमित्तानि कस्यन्ते’ भी है। इस सिद्धान्तका भाव यह है कि व्यञ्जक या प्रतीमान अर्थकी प्रतीति किसी निमित्तसे ही हो सकती है क्योंकि वह जन्य या नैमित्तिक है। प्रकृतमें उस प्रतीतिका निमित्त शब्दके अतिरिक्त और कुछ बन ही नहीं सकता इसलिए शब्द ही उसका निमित्त है और शब्द

अभिधा द्वारा ही उस अर्थको बोधन कर सकता है, अन्य कोई मार्ग है ही नहीं, इसलिए अभिधा द्वारा ही प्रतीमान अर्थकी प्रतीति हो सकती है। इस मतका खण्डन तो स्पष्ट ही है। अभिधा द्वारा ‘शक्कु:कित’ अर्थ ही उपस्थित हो सकता है। यदि प्रतीमानकी अभिधा द्वारा उपस्थित मानना है तो उसको शक्कु:कित अर्थ मानना होगा। यह युक्तिसंगत नहीं है। यह कहना भी ठीक नहीं है कि निमित्तजन्य होनेसे तो शक्कु:कितका उपस्थित होना होती है किन्तु नैमित्तिक व्यञ्जयप्रतीतिक लिए शक्तिग्रहकी

आवश्यकता नहीं उसकी प्रतीति बिना शक्तिग्रहके ही हो जाती है। अतः यह मत भी युक्तिविरुद्ध होनेसे अप्राह्य है।

धनञ्जय तथा धनिकके मतकी आलोचना

आलङ्कारिकोंमें ‘दशरूपक’के लेखक धनञ्जय और उसके टीकाकार धनिकने भी क्रमशः अभिधा और तात्पर्याँ शक्तिद्वारा ही प्रतीमान अर्थका बोध दिखानेका प्रयत्न किया है। धनञ्जयने दशरूपकके चतुर्थ प्रकाशमें ‘वाच्या प्रकरणादिम्यो हृदिस्था वा यथा क्रिया। वाक्यार्थ:कारकैर्युक्ता, स्थायीभावस्तथेलर: ॥’ यह कारिका लिखी है।

इशका आशय यह है कि जिस प्रकार वाक्यमें कहीं वाच्या क्रिया ‘द्वारम्’ आदि अश्रूण्माणक्रियावाले वाक्योंमें प्रकरणादिवश हृदिस्थ क्रिया सन्नद्ध होकर वाक्यार्थरूपमें प्रतीत होती है, उसी प्रकार विभाव, अनुभाव,

सञ्चारिणोंके साथ मिलकर रत्यादि स्थायी भाव हो वाक्यार्थरूपमें प्रतीत होता है। विभावादि पदार्थस्थानीय और तत्वसंश्रित रत्यादि वाक्यार्थस्थानीय हैं। अर्थात् पदार्थसंश्रितबोधके समान तात्पर्याँ

शक्तिसे ही उनका बोध हो जाता है। इसी कारिकाकी व्याख्यामें टीकाकार धनिकने लिखा है ‘तात्पर्याव्यतिरेकाच्च व्यक्ककत्व न ध्वनि:। यावत्कार्यप्रसारितत्वात् तात्पर्य न तु लाघवात्॥’ तात्पर्यंका

क्षेत्र बड़ा व्यापक है। वह कोईँ नपा-तुला पदार्थ नहीं है कि इससे अधिक नहीं हो सकता। वह तो यावत्कार्यप्रसारी है। जहाँ जैसी और जितनी आवश्यकता हो वहाँतक तात्पर्यका व्यापर हो सकता है।

ध्यनिवादीनें प्रथम कक्षामें वाच्यार्थ, द्वितीय कक्षामें तात्पर्यार्थ, तृतीय कक्षामें लक्ष्यार्थ और चतुर्थ कक्षामें व्यङ्ग्य्यार्थको रखा है। परन्तु इस कक्षाविभागसे तात्पर्यकी शक्ति कुण्ठित नहीं होती। उस

चतुर्थकक्षानिविष्ट अर्थतक तात्पर्यकी पहुँच हो सकती है। इसलिये चतुर्थकक्षानिविष्ट व्यङ्ग्य अर्थ भी

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कारिका ४ ] प्रथम उद्योतः

तात्पर्यंकी सीमामें ही है, उससे बाहर नहीं है । घनखजय और धनिकके व्याखनाविरोधी मतका यही सारांश है ।

इसका उत्तर यह है कि आपकी यह तात्पर्यां शक्ति 'अभिहितान्वयवाद'में मानी गयी तात्पर्यां शक्ति ही है अथवा उससे भिन्न कोई और ? यदि अभिहितान्वयवादियोंवाली ही तात्पर्यां शक्ति है तो उसका क्षेत्र तो बहुत सीमित है, असीमित नहीं । उसका काम केवल पदार्थसंरगंबोध कराना है, उससे अधिक वह कुछ नहीं कर सकती । इसलिए प्रतीममान अर्थका बोध करा सकना उसकी सामर्थ्यके बाहर है । वह तो द्वितीयकक्ष्यानिविष्ट वाच्यार्थबोधक ही सीमित है । चतुर्थकक्ष्यानिविष्ट व्यङ्ग्यार्थक उसकी गति नहीं है । इसलिए आपको यह तात्पर्यां शक्ति, जो यावत्कार्यप्रसारिणी हो—आवश्यकतानुसार हर जगह पहुँच सके— , तो उससे भिन्न कोई अलङ्गा ही शक्ति माननी होगी । और उस दशामें ध्यानवादके साथ उसका नाममात्रका भेद हुआ । जब अभिधा, लक्षणा, तात्पर्यांसे भिन्न एक चौथी शक्ति मानी ही गयी तब उसका नाम चाहे व्यंजना रखो या तात्पर्यां, अर्थमें कोई भेद नहा आता ।

लक्षणावादका निराकरण

व्यञ्जनाको न मानकर अन्य शब्दशक्तियोंसे ही उसका काम निकालनेवाले मतोंमेंसे एक मत और रह जाता है । 'श्रुत धामिक' इत्यादि स्थलोंमें कुछ लोग विपरीतलक्षणा द्वारा निपेध या विधि-रूप अर्थकी प्रतीति मानते हैं । इस मतकी आलोचना करते हुए लोचनकारने जो युक्तियाँ दी हैं उनका संग्रह श्री मम्मटाचार्यने अपने 'काव्यप्रकाश'में बडी अच्छी तरह एक ही जगह चार कारिकाओंमें कर दिया है

यस्य प्रतीतिमात्रं लक्षणा समुपास्यते । फले दानैकगम्येष्टे व्यञ्जनानुपपत्तिः क्रिया ॥ नामिधा समयामात्रात्, हेत्वभावाच्च लक्षणा । लक्ष्यं न मुख्यं नाप्यप्रय बाधो योगः फलेन नो ॥ न प्रयोजनमेतस्मिन्, न च शाब्दः स्वलद्रुपतिः । एवमभयनवस्थायां या मूललक्षणकारिणी ॥ प्रयोजनैः सहितां लक्षणीयां न युज्यते । ज्ञाप्यस्य विप्रयोगात् फलमन्यदुदाहतम् ॥ का० प्र० २, १४-१७

इन कारिकाओंका भावार्थ इस प्रकार है—

१. जिस शौच्य-पावनत्वके अतिदाय आदि रूप प्रयोजनकी प्रतीति करानेके लिए लक्षणाका आश्रय लिया जाता है वह केवल शब्दसे गम्य है और उसके बोधनमें शब्दका व्यञ्जनाके अतिरिक्त और कोई व्यापार नहीं हो सकता ।

२. उस फलके बोधनमें अभिधाव्यापार काम नहीं दे सकता, क्योंकि फल सक्केतित अर्थ नहीं है । इसलिए 'समय' अर्थात् सङ्केतग्रह न होनेसे अभिधाके फलकी प्रतीति नहीं हो सकती है । मुख्यार्थबाध और मुख्यार्थसम्बन्ध तथा प्रयोजनरूप लक्षणाके तीन कारकोंमेंसे किसेकी भी न होनेसे फलकका बोध लक्षणासे भी नहीं हो सकता है । यदि शौच्य-पावनत्वको लक्ष्यार्थ मानना चाहें तो उससे पहिले उपस्थित होनेवाले तीरूप अर्थों, जो कि इस समय लक्षणासे बोधित माना जाता है, उससे पहिले उपस्थित होनेवाले तीरूप अर्थों, जो कि इस समय लक्षणासे बोधित माना जाता है, मुख्यार्थ मानना होगा । उसका बाध मानना होगा और उसका शौच्य पावनत्वसे सम्बन्ध एवं शौच्य-पावनत्वका भी कोई और प्रयोजन मानना होगा । ये तीनों बातें नहीं बनती हैं । लक्ष्य अर्थात्

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ध्वन्यालोक:

तीररूप अर्थे मुख्यार्थे नहीं है, फिर उस तीररूप अर्थंक बाध भी नहीं है और उसका शौत्य पावनत्वके समन्वय भी नहीं है । शौत्य-पावनत्वसे तो गङ्गाका समन्वय है तीसरा नहीं, इसलिए शौत्य-पावनत्वके तीरत्व लक्षणार्थे नहीं हो सकता है ।

३. शौत्य-पावनत्वका अतिदिशय जो इस समय प्रयोजनरूपसे प्रतीत होता है उसको यदि लक्ष्यार्थे मानें तो उसका फिर कोई और प्रयोजन मानना होगा, परन्तु उस शौत्य-पावनत्वके अतिदिशयबोधका कोई दूसरा प्रयोजन प्रतीत ही नहीं होता और न तो गङ्गा शब्द उसके बोधनके लिए स्वलक्षणद्योति-वाच्यतार्थ-ही है । और यदि कश्चित् उस शौत्य-पावनत्वके अतिदिशयमें कोई प्रयोजन मानकर उसको लक्ष्यार्थे मान लिया जाय तो फिर वह जो दूसरा प्रयोजन प्रतीत हुआ उसको भी लक्ष्यार्थे माननेके लिए उसका भी एक और तीसरा प्रयोजन मानना होगा । इसी प्रकार तीसरे प्रयोजनकी चौथा, चौथेका पाँचवाँ आदि प्रयोजन मानने होंगे और यह प्रयोजनकी परम्परा कहीं समाप्त नहीं होगी । इसलिए 'अनवस्थादोष' होगा जो मुख्य अर्थोत् शौत्य-पावनत्वके अतिदिशयबोधको लक्ष्यार्थे मानने ही नहीं देगा ।

विशिष्ट लक्षणावादका निराकरण

४. उपरकी कारिकामें जो दोष दिखलाये गये हैं कि तीर मुख्यार्थे नहीं है, उसका बाध नहीं होता और उसका शौत्य-पावनत्वरूप फलके साथ समन्वय नहीं है, ये सब दोष उस अवस्थामें आते हैं जब शौत्य-पावनत्वको लक्ष्यार्थे माना जाय । इसलिए पूर्वपक्ष, उस स्थितिको बदल कर यह कहता है कि न केवल तीर लक्ष्यार्थे है और न शौत्य-पावनत्वका अतिदिशय अपितु शौत्यपावनत्ववविशिष्ट तीरमें लक्षणा माननी चाहिये । इस प्रकार व्यञ्जनाकी आवश्यकता नहीं होगी । इस पूर्वपक्षका समाधान करनेके लिए अगली कारिका दी है-'प्रयोजनैन सहितं लक्षणीयं न युज्यते' । प्रयोजन सहित अर्थात् शौत्यपावनत्ववविशिष्ट-तीर लक्षणित नहीं हो सकता है । क्योंकि तीर अर्थे लक्षणाजन्य ज्ञानका 'विषय' और शौत्य-पावनत्व लक्षणाजन्य ज्ञानका 'फल' है । ज्ञानका 'विषय' और ज्ञानका 'फल' दोनों अलगअलग ही होते हैं । वे कभी एक नहीं हो सकते । इसलिए लक्षणाजन्य ज्ञानका 'विषय' तीर और उसका 'फल' शौत्य-पावनत्व इन दोनोंका बोध एक साथ नहीं हो सकता । उनमें कारणकार्यभाव होनेसे पौर्वापर्य आवश्यक है । पहिले कारणभूत तीरबोध और उसके बाद फलरूप शौत्य-पावनत्वका बोध दोनों अलग-अलग ही होंगे, एक साथ नहीं । अतएव शौत्य-पावनत्वके बोधके लिए लक्षणासे अतिरिक्त व्यञ्जना माननी ही होगी ।

ज्ञानका 'विषय' और 'फल' दोनों अलग-अलग होते हैं और यह सभी दार्शनिकोंका सिद्धान्त है । न्यायके मतमें 'अयं घट:' इस ज्ञानका 'विषय' घट होता है और उससे आत्मामें एक 'घटज्ञानवान्' या 'घटमहं जानामि' इस प्रकारका ज्ञान उत्पन्न होता है । इस ज्ञानको न्यायिक 'अनुव्यवसाय' कहता है । यह अनुव्यवसाय 'अयं घट:' ज्ञानका फल है । इसलिए न्यायिकमतमें ज्ञानका 'विषय' घट और ज्ञानका 'फल' 'अनुव्यवसाय' होनेसे दोनों अलग-अलग हैं । इसी प्रकार मीमांसकके मतमें भी 'अयं घट:' इस ज्ञानका 'विषय' तो घट है और उसका ज्ञानका 'फल' 'ज्ञातता' नामक धर्मं है । इसलिए उभके यहाँ भी ज्ञानका 'विष्य' घट और ज्ञानका 'फल' 'ज्ञातता' दोनों अलग होनेसे दोनोंका ग्रहण एक कालमें नहीं हो सकता ।

नैयायिक और मीमांसक दोनों ही 'अयं घट:' इस ज्ञानका 'विषय' घटको मानते हैं । परन्तु फलके विषयमें दोनों योडश-षा मतभेद है । नैयायिक 'अयं घट:' इस ज्ञानका फल 'अनुव्यवसाय''अनुव्यवसाय'-

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कारिका ४] प्रथम उद्योतः

को और मीमांसक 'ज्ञातता'को मानता है । 'अनुभवसाय' और 'ज्ञातता'के स्वरूपमें अन्तर यह है कि नैयायिकके मतमें 'अनुभवसाय' आत्मामें रहनेवाला धर्म है । 'घटज्ञानवानहं' या 'घटमहं जानामि' इत्यादि रूप 'अनुभवसाय' आत्मामें उत्पन्न होता है । ज्ञानेके ज्ञानका नाम 'अनुभवसाय' है । 'अयं घट:' इस व्यवसायात्मक ज्ञानका विषय घट होता है, 'घटज्ञानवानहं' इस अनुभवसायात्मक ज्ञानका विषय 'घटज्ञान' हेतु है । और वह 'अनुभवसाय' आत्मामें रहता है । यह नैयायिक-सिद्धान्त है । दूसरी ओर मीमांसककी 'ज्ञातता' आत्मामें न अपितु घटरूप पदार्थमें रहनेवाला धर्म है । इसी 'ज्ञातता'के आधारपर घट और ज्ञानका विषयविषयिभाव बनता है । घटज्ञान घटसे पैदा होता है इसलिए घट उसका विषय होता है पट नहीं, यदि यह कहा जाय तो फिर घटज्ञान आलोकसे भी पैदा होता है और चक्षु भी उसका कारण है । तब तो फिर आलोक और चक्षु भी उस ज्ञानका विषय होने लगेंगे । इसलिए इस उत्पत्तिके आधारपर विषयविषयिभावका उपपादन नहीं हो सकता । अतः विषयविषयिभावका उपपादन 'ज्ञातता'के आधारपर ही समझना चाहिये । 'अयं घट:' इस ज्ञानसे जो 'ज्ञातता' नामक धर्म पैदा होता है वह घटमें रहता है, पटमें नहीं रहता । यह मीमांसकका कहना है । इस प्रकार यद्यपि नैयायिक और मीमांसक दोनों, ज्ञानका फल अलग-अलग 'अनुभवसाय' और 'ज्ञातता'को मानते हैं, परन्तु वे दोनों ही इस विषयमें एकमत हैं कि ज्ञानका 'विषय' और 'फल' दोनों अलग ही होते हैं । इसलिए ये दोनों रक्षणाजन्य ज्ञानका 'विषय' तीर और उसका 'फल' शौत्य-पावनत्वका औपाधिक-भावविशिष्ट तीसरीको लक्ष्यार्थ माननेका जो पूर्वपक्ष उठाया गया था वह ठीक नहीं है । उन दोनोंका बोध एक साथ नहीं हो सकता है । अतएव उन दोनोंका बोध अलग-अलग क्रमशः रक्षणा तथा व्यज्जना द्वारा ही मानना होगा । फलितार्थ यह हुआ कि अभिधा, तात्पर्या और लक्षणा इन तीनोंमेंसे किसी भी दृष्टि से व्यञ्जनाका काम नहीं निकाला जा सकता है । इसलिए व्यञ्जनाको अलग वृत्ति मानना ही होगा ।

अखण्डार्थतावादी वेदान्तमत

अद्वैतरूप ब्रह्मवादी वेदान्ती तथा स्कोटरुप शब्दब्रह्मवादी वैयाकरण अखण्डवाक्य और अखण्डवाक्यार्थ मानते हैं । वेदान्तमतमें क्रियाकारकभावको स्वीकार कर उत्पन्न होनेवाली बुद्धि स्खण्डित या सखण्ड और उससे भिन्न क्रियाकारकभावरहित बुद्धि अखण्ड बुद्धि है । उनके मतमें यह सारा संसार ही मिथ्या है अतएव धर्म अधर्मभाव या क्रियाकारकभाव आदि सब मिथ्या है । इसलिए वाक्योंमें यह वाक्यार्थ है, यह लक्ष्यार्थ है, यह व्यङ्ग्यार्थ है, इस प्रकारका विभाग नहीं किया जा सकता । अपितु समस्त अखण्डवाक्यसे वाच्य, लक्ष्य, व्यङ्ग्य और उससे भी आगे जितना भी अर्थ प्रतीत होता है वह सब अखण्ड रूपमें उपस्थित होता है । अतः व्यञ्जना आदिको माननेकी आवश्यकता नहीं है । वेदान्ती अखण्डवाक्य मानते हैं । उसका लक्षण कहीं 'संर्गानुगोचरप्रपितिजनकत्वमखण्डार्थत्वम्' अर्थात् क्रियाकारकभावादिरूप संसर्गाविषयक प्रतीतिको पैदा करनेवाला वाक्य अखण्डार्थक शाक्य है । इस प्रकार किया गया है और कहीं 'अविशिष्टमपयर्यायानेकशब्दप्रकाशितम् । एकं वेदान्तनिष्ठातात्त्वमखण्ड प्रपेदिरे |' इत्यादि रूपमें किया गया है ।

अखण्डार्थतावादी वैयाकरण मत

लगभग इसी प्रकार स्कोटरुप शब्दब्रह्मवादी वैयाकरणोंने भी अखण्डवाक्यकी कल्पना की है । उसका उपपादन करते हुए भर्तृहरिने लिख । है—"ब्राह्मणायो यथा नास्ति कश्चिद् ब्राह्मणकम्बले ।

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ध्वन्यालोक:

वाच्यार्थ व्यङ्ग्यार्थके भेदक हेतु

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कारिका ५ ] प्रथम उद्योतः

काव्यस्यात्मा स एवार्थस्तथा वाचिकवैः पुरा । क्रौडनवृत्तान्तवियोगोत्थः शोकः इलोकत्वमागतः ॥५॥

जा चुका है । 'कस्य वा न भवति रोयः' इत्यादिमें वाच्यार्थबोधका विषय नायिका और व्यङ्ग्यार्थबोधका विषय नायक होनेसे विषयभेद भी है । इस प्रकार वाच्य और व्यङ्गयके बीच अनेक प्रकारके भेद होनेसे व्यङ्ग्यार्थको वाच्यार्थसे भिन्न ही मानना होगा ।

महिमभट्टको अनुमानवाद

यह सब विचार तो वृत्तियोंकी दृष्टिसे हुआ, अर्थात् व्यङ्ग्य अर्थकी प्रतीति अभिधा, तात्पर्या और लक्षणा इत्यादिसे नहीं हो सकती है । अतएव उसका बोध करानेके लिए व्यञ्जनाको एक अलग वृत्ति मानना अनिवार्य है । परन्तु ध्वनिकारके उत्तरकारोंमें कुछ लोग व्यङ्ग्यार्थबोधको शब्दकी वृत्ति मानना अनिवार्य नहीं मानते हैं । इनमें महिमभट्टका स्थान सर्वोपरि है । महिमभट्टने अपने 'व्यक्तिविवेक' नामक ग्रन्थमें ध्वनिके समस्त उदाहरणोंको अनुमान द्वारा सिद्ध करनेका प्रयत्न किया है । परन्तु 'काव्यप्रकाश', 'साहित्यदर्पण' आदिने महिमभट्टके इस अनुमानवादका पूर्ण रूपसे खण्डन कर दिया है । इसलिए विमवादिप्रतीतियोंको रसादिकी प्रतीतिका साधक निधि मानकर महिमभट्ट अनुमान द्वारा रसादिकी सिद्धि करना चाहते हैं । उसके अनुसार अनुमानवाक्यकका रूप होगा, 'रामः सीताविषयकरतिमान् तत् न तिलक्षणसंसक्ततत्कार्यसच्वात् यो नैवं स नैव यथा लक्षणः ।' इसके उत्तरमें ध्वनिपक्षका कहना यह है कि इस अनुमानसे रामके सीताके प्रति अनुरागका ज्ञान हो सकता है । परन्तु उसे हम रस नहीं मानते हैं । उसके द्वारा सहृदयोंके हृदयमें जो अपूर्व अलौकिक आनन्दका उद्बोध होता है उसे हम रस मानते हैं । और उसका बोध व्याप्ति न होनेसे अनुमान द्वारा सम्भव नहीं है ।

आपको रसको अनुमान द्वारा सिद्ध करना चाहिये था परन्तु आप किसकी सिद्धि कर रहे हैं वह तो रससे भिन्न कुछ और ही पदार्थ है । इसलिये आपका यह प्रयत्न 'विनायक प्रकृतवाणो रचयामास वारनरम' जैसा उपहास योग्य है । इसी प्रकार 'श्रम धार्मिक' इत्यादि उदाहरणोंमें महिमभट्ट गौडवरीतीरपर धार्मिकके भ्रमके निपेधको अनुमानका विषय सिद्ध करना चाहते हैं i

उस अनुमानका रूप इस प्रकार हो सकता है, 'गोदावरीतीरं धार्मिकमीश्वरप्रसङ्गायोग्यं सिंहवत् तत्र तत्रैव यथा गृहम् ।' गौडावरीका तीर धार्मिक भीष्मके लिए भ्रमप्रद अयोग्य है क्योंकि वहाँ सिंह रहता है । इस अनुमानमें 'सिंहवत्त्वात्'को हेतु और 'भीरुप्रतियोगित्व'को साध्य माना है । उन दोनोंकी व्याप्ति इस प्रकार बनेगी, 'यत्र यत्र सिंहस्तत्र तत्र भीरुप्रतियोगित्व-त्वम् ।' परन्तु राजाकी आज्ञा अथवा गुरुकी आशा अथवा प्रियके अनुरागसे भयकारणको जानते हुए भी मनुष्य जाते हैं । इसलिए यह व्याप्ति ठीक न होनेसे अनुमान नहीं बन सकता है । इस प्रकार व्यञ्जनाका काम अनुमानसे भी नहीं हो सकता । अतः व्यञ्जनाको अलग शक्ति मानना अनिवार्य है । यह व्यञ्जनावादियोंका मतका सारांश है ॥ ४ ॥

प्रतीयमान रस ही काव्यका आत्मा

काव्यका आत्मा वही [प्रतीयमान रस] अर्थ है । इसीलिए प्राचीनकालमें कौश [पक्षी] के जोड़ेके वियोगसे उत्पन्न आदिकवि वाल्मीकिकी शोक [करुणरसका स्थायिभाव] इलोक [काव्य] रूपमें परिणत हुआ था॥ ५ ॥

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ध्वन्यालोक:

कारिका '१

'विविधवाच्यस्यवाच्यरचनाप्रपञ्चचारुणः काव्यस्य स एवार्थः सारभूतः । तथा वादिकवेर्योल्मीकोनिहितसहचररीविरहकातरकौष्चाक्रन्दजनितः शोक एव श्लोकतया परिणत: ।

मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समा: । यन क्रौञ्चमिथुनादेकमवधीः काममोहितम् ॥

शोको हि करुणरसस्थायिभावः । प्रतीममानस्य चान्यमेददर्शनेऽपि रसभावमुखेनैवोपलक्षणं प्राभान्यात् ।

नाना प्रकारके शब्द, अर्थ और सङ्केतनाके प्रपञ्चसे मनोहर काव्यकका सारभूत [आत्मा] वही [प्रतीमान रस] अर्थ है । तभी [निषादके वाणसे] विद्ध किये गये, मरणासन्न अतः ] सहचरीके वियोगसे कातर [जो] कौञ्च [तत् करुंक, अथवा कौञ्चो-द्दयक क्रौञ्चीकरुंके] के क्रन्दनसे उत्पन्न आदिकवि वाल्मीकिके [वाच्योभिनिष्ठ करुणरसका स्थायिभाव] का शोक श्लोक ['मा निपाद' इत्यादि काव्य] रूपमें परिणत हुया ।

हे व्याध, तूने काममोहित, कौञ्चके जोडेंमेंसे एक [क्रौंच] को मार डाला अतपव अनन्त कालतक [कभी] प्रतिष्ठा [शुकोति] को प्राप्त न हो ।

शोक करुणरसका स्थायिभाव है । [सचयापि] प्रतीममानके और [वस्तु अलङ्कार-व्यनि] भी भेद दिखाये गये हैं, परन्तु [रसभिवो] प्राधान्यसे रसभाव द्वार ही उनका उपलक्षण [ज्ञान] होता है ।

कौञ्चघ्नकी जिस घटनाका उल्लेख यहाँ किया गया है वह वाल्मीकिरामायणके प्रारम्भमें मिलती है । उद्दृत 'मा निषाद' इस श्लोकमें 'एकम्' इस पुलिङ्गप्रयोगसे प्रतीत होता है कि उस जोडेंमेंसे नर क्रौंच ही मारा गया था और उसके वियोगमें क्रौंची रो रही थी । आगेके श्लोक 'तं शोकनितपरितापं चेष्टमानं महीतले । दृष्ट्वा क्रौंच सरोदार्तां करुणा खे परिश्रमा ॥' में इसका स्पष्ट ही वर्णन है । परन्तु यहाँ ध्वन्याोलोकारने अपने वृत्तिभागमें 'निहतसचिवरीविरहकातरकौष्चाक्रन्दजनित:'

पाठ दिया है जिससे प्रतीत होता है कि नष सहचरी क्रौंचीका हुया और रोदन करनेवाला नर क्रौंच था । इसकी टीकाओं लोचनकारने भी 'सहचरीहननोद्भूतेन, तथा निहतसहचरीति विभाव उत्कः' लिख कर इसको पुष्टि की है । न केवल इन दोनोंने अपितु काव्यमimpartsकारने भी अपने ग्रन्थमें निषादनिहितसहचरोक क्रौंचयुवानम्' लिखा है । यह सब वाल्मीकिरामायणके विरुद्ध प्रतीत होता

१. इस स्थलपर निर्णयसागरीय तथा वाराणसीय संस्करणोंके अनेक पाठभेद हैं । नो० सा० में विविध शौर धार्यके बीचमें 'विसृष्ट' पाठ अधिक है । 'तथा वादिकवेर्योल्स्सीके:' इतना पाठ नहीं है । 'निहतसहचरी'के स्थानपर 'सच्विहितसहचरी' पाठ है । 'प्रतीममान एवेति प्रतिपादितम्' इतना पाठ बढा हुया है । वाराणसीय संस्करणमें 'मा निषाद' इत्यादि श्लोक मूल पाठमें नहीं है । इसका कारण सम्भवतः लोचनमें उसकी व्याख्याका अभाव है । 'दीधितिमें 'सहचरी' के स्थानपर 'सहचर' और 'क्रौष्चाक्रन्द' के स्थानपर 'क्रौच्याक्रन्द्य' पाठ है । इन पाठभेदोंके अतिरिक्त अन्य दृष्टिसे भी यह स्थल विचारणीय है ।

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सरस्वती स्वादु तदर्थवस्तु नि:श्रयन्तमानां महतां कवीनाम् | अलोकसामान्यमभिधानकलि परिस्कुरनतं प्रतिभाविशेषम् ||५||

तत् वस्तुतत्त्वं नि:श्रयन्तमानां महतां कवीनां भारती अलोकसामान्यं प्रतिभाविशेषं परिस्कुरनतम् अभिधानकलि | येनासिन्नतिविचित्रकविपरम्परावाहिनि संसारे कालिदास-प्रभृतयो चित्रा: पठ्यन्ते एव वा महाकवय इति गण्यन्ते ||६||

है | इसलिये दीक्षितिकार आदि कुछ लोग मूल वृत्तिग्रन्थ और उसके लोचन दोनोंके पाठ बदल कर उसकी व्याख्या करते हैं | दूसरे विद्वानोंका मत यह है कि 'ध्वन्यालोक' ध्वनिप्रधान ग्रन्थ है | इसमें क्रौञ्चमिथुनसे सीता और रामकी जोड़ी, निषाद पदसे रावण और बधसे सीताका अतिशयपीडन-रूप वध अभिव्यक्त होता है | इसलिये ध्वन्यालोककारने सहचरी पदसे सीतारूप अर्थको अभिव्यक्त करनेके लिये 'निहतसहचर:'के स्थानपर 'निहतसहचरी' पाठ रखा है | दूसरे लोग 'सहचरी'के स्थानपर 'सहचर' पाठ परिवर्तन करते हैं वे भी यहाँ व्याख्यार्थ इस प्रकार निकालते हैं कि भावी रावणवधके सूचनार्थ सहचर रावणके विरहसे कातर क्रौञ्ची मन्दोदरी, उसके आक्रन्दनसे ननित शोक स्लोकत्वको प्राप्त हुआ | हमने ऊपर इस अंशका जो अनुवाद किया है वह इन सबसे मिलता है | 'ध्वन्यालोक' और लोचनकी सभी प्रतियोंमें सहचरीवाला पाठ ही पाया जाता है इसलिये हमने उसको प्रामाणिक पाठ न मानकर 'स्थितस्तु गतिश्रृङ्गनित्यै:'के अनुसार उसकी छाया प्रति लगानेका प्रयत्न किया है |

निहतसहचरीविरहकातरस्वचौ क्रौञ्च: निहतसहचरीविरहकातरक्रोञ्च: तदुभयेश्चक: क्रौञ्चीकरतुंको या आक्रन्द: तजनित: शोक: |' इस प्रकारकी व्याख्या करनेसे पाठकी कथमपि सङ्गति लग जाती है | भावार्थ यह हुआ कि 'निहत:' पद 'सहचरी'का विशेषण नहीं अपितु 'निहत:' और 'सहचरीविरहकातर:' ये दो विशेषण 'क्रौञ्च:'के हैं | मरते समय जैसे सांसारिक पुरुषको अपने स्त्री-बच्चोंका वियोग दुःखी करता है इसी प्रकार वाणविद्ध वह क्रौञ्च अपनी सहचरीके विरहसे कातर था | उसको उद्देशमें रखकर जो क्रौञ्चीका मन्तन उससे समदुःखमूत शोक आदि कवि वाल्मीकिका शोक, श्लोकरूपमें परिणत हुआ | ऐसा अर्थ करनेवाले मूल वृत्तिमें जो रामायणका विरोध प्रतीत होता है उसका परिहार हो सकता है | लोचनमें जहाँ 'सहचरीह्ननोद्भवमूत' पाठ है वहाँ 'सहचरह्ननोद्भवमूत' है उसका परिहार हो सकता है | लोचनके 'निहतसहचरीति विभाव उत्त:' इस पंक्तिको प्रतीक मानकर परन्तु काव्यमीमांसकारने जो 'निषादनिहतसहचरीकं क्रौञ्चयुगलं' लिखा है वह ठीक नहीं है |

उस [प्रतीममान रसभावादि] अर्थतत्त्वको प्रवाहित करनेवाली महाकवियोंकी वाणी [उनके] अलौकिक, प्रतिभासमयान प्रतिभा [अपूर्ववस्तुनिर्माणक्षमा प्रज्ञा]के वैशिष्ट्यथको प्रकट करती है ||५||

वाणी [उनके] थलौकिक, प्रतिभासमयान, प्रतिभाविशेषको व्यक्त करती है | जिसके कारण नानाविध कविपरम्पराशाटी इस संसारमें कालिदास आदि दो-तीन अथवा पाँच-छ: ही महाकवि माने जाते हैं ||६||

प्रतीयमान अर्थंकी सत्ता सिद्ध करनेवाला यह और भी प्रमाण है—

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ध्वन्यालोक:

शब्दार्थशासनज्ञानमात्रेणैव न वेद्यते । वेद्यते स तु' काव्यार्थे तत्वज्ञैरैव केवलम्॥७॥

सोडर्थो यस्मात् केवलं काव्यार्थेतत्स्वहैरैव ज्ञायते । यदि च वाच्यरूप एवासावर्थ: स्यात्, तद् वाच्यवाचकश्रुतलक्षणमात्रकृतश्रमाणां काव्यतस्वार्थभावनाविमुखानां स्वरश्रुत्यादिलक्षणमिवाप्रगीतानां गन्धर्वलक्षणविदामपि स एवासावर्थ: ॥७॥

वह [प्रतीयमान अर्थ] शब्दशास्त्र [व्याकरणादि] और अर्थशास्त्र [कोशादि]के ज्ञानमात्रसे ही प्रतीत नहीं होता, वह तो केवल काव्यमर्मज्ञोंको ही विदित होता है ॥७॥ क्योंकि केवल काव्यार्थेतत्स्वल् ही उस अर्थको जान सकते हैं । यदि वह अर्थ केवल वाच्यरूप ही होता तो शब्द और अर्थके ज्ञानमात्रसे ही उसकी प्रतीति होती । परन्तु [केवल पुस्तकसे] गन्धर्वविद्याको सीख लेनेवाले उत्तम गानके अनभ्यासी [नौसिखिया] गायकोंके लिए स्वरश्रुति आदिके रहस्यके समान, काव्यार्थभावनासे रहित केवल वाच्य-वाचक [कोशादि अर्थनिरूपक शास्त्र और व्याकरणादि शब्दशास्त्र] में इतथम पुरुषोंके टिप्प में वह [प्रतीयमान] अर्थ अज्ञात ही रहता है ॥७॥ यहाँ वात्प्रिया टीकावाले वाराणसीय संस्करणमें 'अप्रगीतनाम्न' पाठ आया है । उसके स्थानपर निर्णयसागरीय तथा द्विच्छेदकी दृष्टिसे 'प्रगीतनाम्न' पाठ भी रखा है । लोचनने दोनों ही पाठोंका अर्थ किया है । दोनों ही दशाओंमें उसका अर्थ नौसिखिया गायक ही होगा । 'अप्रगीतनाम्न' पाठ माननेपर 'प्रधुनैषी गीतं गानं येषां ते प्रगीता न प्रगीता: अप्रगीता:' अर्थात् उत्तम गानविद्याके अनभ्यासी यह अर्थ होगा और 'प्रगीतनाम्न' पाठ माननेपर 'आदि कर्मणि क्तः कर्त्तरी च' [अष्टाध्यायी ३, ४, ७१] इस पणिनिसूत्रसे आदि कर्ममें क्त प्रत्यय मानकर 'गाढुं प्रारंभ: प्रगीता:' जिनहोंने गाना अभी प्रारम्भ किया है ऐसा अर्थ होगा । स्वरश्रुति आदि गन्धर्व शास्त्रके पारिभाषिक शब्द हैं । स्वर शाब्दकी व्युत्पत्ति है, 'स्वतः सहकारणानिरपेक्षं रक्ष्यति श्रोतृचित्तम् अनुतर्क्य करोतीति स्वर:', जो अन्यकी सहायता के बिना स्वयं ही श्रोताके चित्तको आह्लादित करे उसे 'स्वर' कहते हैं । सङीतशास्त्रमें षड्ज, ऋषभ, गान्धार, मध्यम, पञ्चम, धैवत और निषाद ये सात स्वर माने गये हैं। इनहींका संक्षिप्त रूप सरगमके स, र, ग, म, प, ध, नि रूप हैं । स्वरके प्रथम अवयवकी श्रुति कहते हैं । 'सङीतरत्नाकर'में उनके लक्षण इस प्रकार कहे हैं—

प्रथमश्रवणाच्छब्द: श्रूयते हस्वमात्रक: । स श्रुति: समपेक्ष्यैव स्वरावयवलक्षणा ॥ श्रुत्यन्तरभावी य: सङ्घोडनुरणनात्मक: । सतो रक्ष्यति श्रोतृचित्तं स स्वर उच्यते ॥

१. वि० में 'तु' के स्थानपर 'हि' है । २. 'शब्दार्थशासनज्ञानमात्रेऽपि परं न वेद्यते' इतना पाठ नि० में वाक्यारम्भमें अधिक है । ३. नि० प्रगीतानां ।

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कारिका < ] प्रथम उद्योतः

सोडर्थस्तद्व्यक्तिसामर्थ्ययोगी शब्दरच करचन । यत्नतः प्रत्यभिज्ञेयौ तौ शब्दाथौं महाकवे: ॥८॥

इस प्रकार वाच्यार्थसे मिश्रित व्यंजकव्यकी सत्ता को सिद्ध करके प्राधान्य [सी] उस्सीका है यह दिखाते हैं— वद्ध [प्रतीयमान] अर्थ और उसकी अभिव्यक्ति में समर्थ विशेष शब्द, इन दोनों को भली प्रकार पहिचानने का प्रयत्न महाकविको [जो महाकवि वनना चाहे उसको] करना चाहिये ॥८॥ वह व्यंजक्य अर्थ और उसको अभिव्यक्त करने की शक्ति से युक्त कोई विशेष शब्द [ही] है । शब्दमात्र [सारे शब्द] नहीं । महाकवि [बनने के अभिलाषी] को वही शब्द और अर्थ भली प्रकार पहिचवाने चाहिये । व्यंजक्य और व्यंजक के सुनहूद प्रयोग से ही महाकवियों को महाकविपद की प्राप्ति होती है; वाच्य-वाचक-रचनामात्र से नहीं ॥८॥

प्रत्यभिज्ञापरिचय

द्वाविंशति केचिदुदाहरन्ति श्रुती: श्रुतिशानविचारदक्ष: । षट्त्रिशदभिन्ना: खलु केचिदासामनन्त्यमेव प्रतिपादयन्ति''॥७॥

'प्रत्यभिज्ञा' शब्दका प्रयोग यहाँ किया गया है । प्रत्यभिज्ञा का लक्षण है, 'तत्तेदन्तावगाहिनी प्रतीति: प्रत्यभिज्ञा ।' 'तत्ता' अर्थात् तहँदश और तत्काल सञ्चन्ध अर्थात् पूर्वदेश और पूर्वकाल सञ्चन्ध को अवगाहन करनेवाली प्रतीति को 'प्रत्यभिज्ञा' कहते हैं । जैसे 'सोडयं देवदत्तः' यह वही देवदत्त है जिसे हमने काशी में देखा था । इसमें 'स:' पद 'तत्ता' अर्थात् पूर्वदेश और पूर्वकाल सञ्चन्ध को और 'अयम्' पद 'इदन्ता' अर्थात् पदेश और एतत्काल सञ्चन्ध को बोधन करता है । इस प्रकार इस प्रतीतिमें 'तत्ता' 'इदन्ता' दोनों का बोध होने से यह प्रतीति 'प्रत्यभिज्ञा' कहलाती है । अर्थात् परिचित वस्तु के पुन: दर्शन के अवसर पर पूर्ववैशिष्ट्य सहित उसकी प्रतीति 'प्रत्यभिज्ञा' कहलाती है । 'प्रत्यभिज्ञेयौ' पद में अर्हत्यर्थ में 'अर्हे कत्यतुचदच' [अ० ३, ३, १६९] इस सूत्र के साथ

१. बालप्रियांवाले संस्करण में 'स' पाठ नहीं है । २. 'न शब्दमात्रमू' के स्थानपर 'न सवैं:' पाठ नि०, दी०, में है ।

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ध्वन्यालोक

आचार्य आनन्दवर्धन

श्री उत्पलाचार्य

इदानों व्यज्जयत्ययड्ककयोः प्राधान्येडपि यद् वाच्यव्यवकावेव प्रथममुपाददते कवि-

यस्तदपि युक्तमेवेत्याह

आलोकार्थी यथा दीपशिखायां यत्नवान् जनः।

तदुपायतया तद्वदर्थे वाच्ये तदाहतः ॥९॥

एकवाक्यतापत्तन 'अचो यत्' [अ० २, ३, ९७] सूत्रसे यत् प्रत्यय हुआ है । और कृत्य प्रत्ययके योगमें

'कृत्यानां कर्तरि वा' [अ० ३, ४, ७१] सूत्रके कर्तामें 'महाकवे:' यह षष्ठी विभक्ति हुई है । शेष षष्ठी

मानकर 'सहदयदयै: महाकवै: सम्वन्धिनो तो शब्दायों प्रत्यमिजेदो:' ऐसी व्याख्या करनेसे उस प्रतोय-

मान अर्थक प्राघान्में, सहृदयलोकसिद्धत्व प्रमाण है, यह बात भी व्यक्त होती है और नियोगार्थक

कृत्य [यत्] प्रत्ययके द्वारा विशक्षाम अर्थात् कविविशक्षाप्रकार भी ध्वनित होता है ।

'ध्वन्यालोक'के टीकाकार श्री अभिनवगुप्तपादाचार्यके परमगुरु श्री उत्पलाचार्यंका

दार्शनिक सिद्धान्त भी प्रातमिशादर्शनके नामसे प्रसिद्ध है । यह प्रातमिशादर्शन कश्मीरका

विख्यात दर्शन है और उसपर बहुत बड़े शालियकी रचना हुई है । इस सिद्धान्तके अनुसार, ईश्वरके

साथ आत्माके अभेदकी 'प्रत्यमिज्ञा' करना ही परमपदका हेतु है । उत्पलादाचार्यने लिखा है—

तैस्तैरुपायैश्चित्तेर्ननतस्तन्व्या: स्पितोद्यनितके

क्वाप्नो लोकस्मान एवपरिज्ञातो न रत्नं यथा ।

लोकैरपि तथानवेकृतगुणः स्वात्मापि विशेश्वरेः

नैवांहि निजवैभवाय तदियं तत्रस्मभिज्ञोदिता ॥

[जिस प्रकार अनेक कामनाओं और प्रार्थनाओंसे प्राप्त और रमणोके पासमें स्थित होनेपर भी

जगतक वह अपने पतिको पतिरूपसे जानती नहीं है तबतक अन्य पुरुषोंके समाम होनेते वह उसके

सहवासका सुख प्राप्त नहीं कर पाती, उसी प्रकार यह विश्वेश्वर परमात्मा समस्त संसारका आत्मभूत

होनेपर भी जगतक हम उ सके पहिचानें नहीं उसके आनन्दका अनुभव नहीँ कर सकते । इसीलिए

उसकी पहिचानके निमित्त यह प्रत्यमिज्ञादर्शन बनाया गया है । ] यही प्रत्यमिज्ञादर्शनका मूल सिद्धान्त

है ! इसी प्रकार प्रकृतमें व्यञ्जकनक्रम शब्दार्थकी प्रत्यमिज्ञासे ही महाकाविपद प्राप्त होता है । ॥८॥

व्यज्जयप्राधान्न्यमें वाच्यव्यवकाका उपादान क्यों ?

उपर व्यज्जक अर्थका प्राधान्न प्रतिपादित किया है परन्तु कवि तो व्यज्जकके पूर्व वाच्य-

वाचकको ही अग्रह्न करते हैं । वाच्यव्यवककके प्रथमोपादानसे तो उनकी प्रथमता प्रतीत होती है । इस

शंकाका दूर करनेके किए अगला कारिका है । उनका भाव यह है कि वाच्यव्यवककका प्रथम उपादान

उनकी प्रथमताको नहीं अपितु उनकी गौणताको ही सूचित करता है, क्योकि उनका प्रथमोपादान

तो केवल उपायमूत होनेके कारण किया जाता है । उपेय प्रधान और उपाय सदा गौण ही होता है ।

अथ व्यज्जक-्य और वाचककका प्राघान्न होते हुए भी कविगण जो पहिले वाच्य

और वाचकको ही अग्रह्न करते हैं वह भी ठीक ही है यह कहतते हैं—

जैसे आलोक [प्रकारा अथवा 'आलोकनमालोक: वनितावदनारविन्दादिविलोकन-

मित्यर्थ:' पदार्थदर्शन]की इच्छा करनेवाला पुरूष उसका उपाय होनेके कारण दीप-

शिक्षा[के विषय]में यत्न करता है इसी प्रकार व्यज्जयार्थमें आदरवान् कवि वाच्यार्थका

उपादान करता है ।॥९॥

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कारिका १०] प्रथम उद्योत:

यथा आलोकार्थीं सन्नपि दीपशिखायां यत्नवान् जनेा भवति, तदुपायतया । नहि दीपशिखामन्तरेण आलोक: सम्भवति । तददू ड्यज्य॑ यथार्थं प्रतीच्छतो जनेा वाच्ये॑र्थे यत्नवान् भवति । अननेन प्रतिपादकस्य कवेर्य्य॑ज्य यथार्थं प्रति व्यापारो दर्शित: ॥९॥

जिस प्रकार आलोकार्थी होनेपर भी मनुष्य दीपशिखा [के विषय]में, उपायरूप होनेसे, [प्रथम] प्रयत्न करता है; दीपशिखाके बिना आलोक नहीं हो सकता है । इसी प्रकार व्यकृ॑य अर्थके प्रति आदरवान् पुरुष भी वाच्यार्थमें यत्नवान् होता है । इससे प्रतिपादक [कवि]का व्यकृ॑य अर्थके प्रति व्यापार दिखलाया ॥९॥

यथा पैदार्थद्वारेण वाक्यार्थे: समर्प्योते ।

जैसे पदार्थ द्वारा [पदार्थोंकी उपस्थिति होनेके बाद पदार्थसंसर्गरुप] वाक्यार्थ-की प्रतीति होती है उसी प्रकार उस [व्यकृ॑य] अर्थकी प्रतीति वाच्यार्थ [के ज्ञान] पूर्वक होती है ॥१०॥

वाच्यार्थीपवर्गका तदूवृतं प्रतीपत्तस्यं वस्तुन: ॥९॥

जैसे कि पदार्थ द्वारा वाक्यार्थका बोध होता है उसी प्रकार वाच्यार्थकी प्रतीति-पूर्वक व्यकृ॑यार्थकी प्रतीति होती है ।

यथा हि पदार्थद्वारे वाक्यार्थावगमस्तथा वाच्यार्यप्रतीतिपूर्विका व्यकृ॑यस्यार्थस्य प्रतीति: ॥१०॥

निर्णयसागरीय संस्करणमें 'प्रतिपत्तव्यवस्तुन:' पाठ है । लोचनकारने 'प्रतिपदित भावे किंपु। तस्य वस्तुन: व्यकृ॑यरुपस्स सारस्ये॑र्थ:' व्याख्या की है । इसलिए लोचनविरुद्ध होनेसे वह पाठ प्रामादिक है । जैसे जिस व्यक्तिको भाया या वाक्यार्थपर पूरा अधिकार नहीं होता उसको पहिले पदार्थ समझने होते हैं तब वाक्यार्थ समझमें आता है, परन्तु जिनका वाक्यपर अधिकार है वे भी यद्यपि पदार्थग्रहणपूर्वक ही वाक्यार्थ ग्रहण करते हैं फिर भी वह इतनी शीघ्रतासे हो जाता है कि वहाँ कम

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ध्वन्यालोक:

[कारिका ११-१२

इदानीं वाच्यार्थप्रतीतिपूर्वकल्वेडपि तत्प्रतीते:, व्यक्‍त यस्यार्थस्य प्राधान्‍यं यथा न विलुप्येत' तथा दर्शयति—

स्वसामर्थ्येवशोनैव वाक्यार्थ: प्रथयतेऽपि । यथा व्यापारनिष्पत्तौ पदार्थो न विभाव्यते ॥११॥

यथा स्वसामर्थ्येवशोनैव वाक्यार्थ: प्रकाशयन्नपि पदार्थो व्यापारनिष्पत्तौ न विभाव्यते' विभक्ततया ॥११॥

तद्वत् सचेतसां सोऽर्थो वाच्यार्थविमुख्वात्मनाम् । बुद्धौ तत्त्वार्थदर्शिनां झटित्येवावभासते' ॥१२॥

अनुभवमें नहीं आता । जैसे कमलके बहुत-से पत्ते रखकर उनमें सुई चुभायी जाय तो वह एक-एकको क्रमसे ही भेदेगी । फिर भी शीघ्रताके कारण वह कम लक्षित नहीं होता, उसी प्रकार जो अत्यन्त सहृदय नहीं हैं उनको वाच्यार्थ और व्यङ्ग्यार्थ क्रमसे ही प्रतीत होते हैं । परन्तु अत्यन्त सहृदय व्यक्तियोंको व्यङ्ग्यार्थकी प्रतीति तुरन्त हो जाती है । वहाँ प्रतीतिमें क्रम रहते हुए भी 'उत्पल्‍यद-एतव्यतिमेदवश्लाघवान् सलक्ष्यते' १ क्रम अनुभवमें नहीं आता । इसीलिए रसध्वनिको असंलक्ष्यक्रम-व्यङ्ग्यार्थन कहा है यह बात भी यहाँ सूचित की है ॥१०॥

अब व्यक्‍त यार्थकी प्रतीति वाच्यार्थके वाद होनेपर भी व्यक्‍त यार्थक प्राधान्य जिससे लुप्त न हो वह [प्रकार] दिखाते हैं— जैसे पदार्थ अपनी सामर्थ्ये [योग्यता, आकांक्षा, आसत्ति]से [पदार्थसंसरूप] वाक्यार्थको प्रकाशित करते हुए भी, [अपने वाक्यार्थबोधनरूप] व्यापारके पूर्ण हो जानेपर [पदार्थ] अलग प्रतीत नहीं होता है ॥११॥

जैसे अपनी सामर्थ्ये [योग्यता, आकांक्षा, आसत्तिरूप] से ही वाक्यार्थको प्रकाशित करनेपर भी व्यपारके पूर्ण हो जातेपर पदार्थ विभक्तरूपमें अलग प्रतीत नहीं होते ॥११॥

इसी प्रकार वाच्यार्थसे विमुख [उससे विलक्षणरूप परितोपको प्राप्त न करनेवाले] सहृदयकी तत्त्वदर्शनसमर्थ बुद्धिमें वह [प्रतीतिमान] अर्थ तुरन्त ही प्रतीत हो जाता है ॥१२॥

'स्वसामर्थ्यवशोनैव' कारिकामें स्वसामर्थ्ये अथन्त पदार्थकी सामर्थ्यसे अभिप्राय योग्यता, आकांक्षा और आसत्तिसे है । 'वाक्यं स्यात् योग्यताकाङ्क्षासत्तियुक्त: पदोच्चय:' १ योग्यता, आकांक्षा और आसत्ति युक्त पदसमूहको वाक्य कहते हैं । 'योग्यता नाम पदार्थोंन् परस्परसम्बन्धे बाघाभाव:' २ पदाथोंके परस्पर सम्बन्धमें बाधाका अभाव 'योग्यता' है । योग्यतरहित पदसमूह वाक्य नहीं होता, जैसे 'वह्निना सिञ्चति', यद्यपि यहाँ वह्निमें सिञ्चनकी क्षमता वाचित है । पदस्य पदात्‍तरल्‍यतिरेकप्रयुक्ता-

१. 'विलुप्येत' बालप्रिया० । २. 'प्रकाशयन्' बा० प्र० । ३. 'विभाव्यते' नि० । ४. 'यथा(ना)वभासते' १ (!) नि० में वृत्तिरूपमें अधिक दिया है

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कारिका १३ ] प्रथम उद्योतः

एवं वाच्यव्यतिरेकिणो व्यज्जयस्यार्थस्य सद्भावं प्रतिपाद्य प्रकृत उपयोगयमार्ग— यत्रार्थः शब्दो वा तमर्थमुपसर्जनीकृतस्वार्थों । व्यङ्ग्यः काव्यविशेषः स ध्वनिरिति सूरिभिः कथितः ॥१३॥

यत्रार्थो वाच्यविशेषः; वाचकविशेषः शब्दो वा, तमर्थं व्यङ्ग्यक्तः; स काव्यविशेषो ध्वनिरिति । अननेत वाच्यवाचकचारुत्वहेतुत्वं उपमादिभिःडनुप्रासादिभिरव्यक्ष विभक्त एव ध्वनविषय इति विस्पष्टम् ।

न्वयाननुभावकत्वमाकांक्षा १' जिन पदोंमें एक पद दूसरे पदके बिना अन्वयबोध न करा सके वे पद साकांक्षा या आकांक्षायुक्त हैं । उनमें रहनेवाला धर्म 'आकांक्षा' है । उसके अभावमें 'गौरक्ष: पुरुषो हन्ति श्वनिरुंगो ब्रह्माणः' आदि पदसमूह वाक्य नहीं कहलाता है । दूसरे लोगोंने आकांक्षाका यही लक्षण इस प्रकार किया है, 'यत्सदस्य यत्सदाभावप्रयुक्तमन्वयबोधजनकत्वं तत्तदविशिष्टतत्पदार्थमाकांक्षा । वैचित्र्यं वाव्यवहितपूर्ववृत्तित्वव्यवहितोत्तरत्वानन्तरसमन्वयेन वोध्यम' । 'आसत्तिरहेतद्वविच्छेदः' अविलम्भित उच्चारणके कारण बुद्धिके अविच्छेदको 'आसत्ति' कहते हैं । घण्टे—दो—घण्टेके व्यवधानसे बोले गये 'देवदत्त—गाम—आनय' आदि पद "आसत्ति'के अभावमें वाक्य नहीं कहलाते हैं । इन तीनों धर्मोंमेंसे योग्यता साक्षात् पदार्थका धर्म है, आकांक्षा मुख्यतः श्रोताकी जिज्ञासारूप होनेसे आत्माका धर्म है । परन्तु वह पदार्थबोध द्वारा ही आत्ममें पैदा होती है । इसलिए परम्परया, अथवा अन्वयाननुभावकत्व होनेसे 'आकांक्षा' साक्षात् पदार्थ-धर्म भी है । आसत्ति पद द्वारा पदार्थधर्म है ।

दूसरी 'तदत सचेतसाम्' कारिकाके 'शक्त्युत्पन्नावभावनं' से यह सूचित किया कि यद्यपि वाच्यार्थ और व्यङ्गयार्थकी प्रतीतिमें क्रम अवश्य रहता है । परन्तु वह लक्षित नहीं होता । इसलिए रसादिरूप ध्वनि असंलक्ययक्रमव्यङ्गध्वनि है, अक्रमव्यङ्ग्य नहीं ॥१२॥

इस प्रकार वाच्यार्थसे अतिरिक्त व्यङ्गयार्थकी सत्ता तथा प्राघान्य [सद्भाव उसका उपयोग दिखलाते हुए कहते हैं— जहाँ अर्थ अपनेको [स्व] अथवा शब्द अपने अर्थको गुणीभूत करके उस [प्रतीयमान] अर्थको अभिव्यक्त करते हैं, उस काव्यविशेषको विद्वान् लोग ध्वनि [काव्य] कहते हैं ॥१३॥

'स्वार्थश्र स्वार्थों । तौ गुणीभूतौ याम्यां यथासंख्येन, तेन अर्थो गुणीकृतात्मा, शब्ददश, रौणीकृताभिधेयः १' 'व्यङ्ग्यः' यह विवरण इस बातका सूचक है कि व्यङ्ग्य अर्थका अभिव्यक्तिमें शब्द और अर्थ दोनों ही कारण होते हैं, किन्तु एक प्रधान कारण दूसरा सहकारी । 'यत्रार्थः शब्दो वा' में पठित 'वा' पद, शब्द और अर्थके प्राधान्याभिप्रायेण विकल्पको वोधन करता है । अभिव्यक्तिमें कारण दोनों होते हैं परन्तु प्राधान्य शब्द और अर्थमें एकका ही होता है । इसीलिए शब्दी और अर्थी दो प्रकारकी व्यञ्जना मानी गयी है और इसीलिए, साहित्यदर्पणकारने दोनोंकी व्यङ्जकता दिखाते हुए लिखा है—'शब्दनोऽप्यो व्यङ्क्तव्यः शब्दोऽन्योन्तराश्रयः । एकस्य व्यङ्कत्वे तदनन्यस्य सहकारिता ॥' सा० द० २, १८

जहाँ अर्थ वाच्यविशेष, अथवा वाचकविशेष शब्द, उस [प्रतीयमान] अर्थको अभिव्यक्त करते हैं उस काव्यविशेष को 'ध्वनिकाव्य' कहते हैं । इससे वाच्यवाचकके

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ध्वन्यालोक:

यदप्युक्तम्—“प्रसिद्धप्रस्थानातिरेकिणो मार्गस्य काव्यत्वहानेध्वोर्निर्निबन्धि”, इति तदप्युक्तम्। यतो लक्षणकृतामेव स केवलं न प्रसिद्ध;, लक्षणे तु परीक्ष्यमाणे स एव सहृदयहृदयाह्लादकारि काव्यतस्वम्। ततोडन्यच्चित्रमेवेत्यमे दर्शयिष्याम:

यदप्युक्तम्—“कामनीयकमनीयतिवर्तमानस्य तस्योच्चालड्ढारादिप्रकारोऽवन्तरभाव:

इति, तदप्यसमीचीनम्। वाच्यवाचकभावाश्रयिणि प्रतिष्ठाने व्यङ्ग्य-वाच्ययोरकसमाश्रयणव्यतिरेकिणस्त्वने: कथमिवस्मात्। वाच्यवाचकचमत्कृतिहेतवो हि वाच्यार्थमूला:, स त्वङ्गिरूप' एवेति प्रतिपादयिष्यमाणत्वात्। परिकरालोकेनात्र—

व्यङ्ग्य-वाच्यैकसमन्वयनिवन्धनतया ध्वने:।

वाच्यवाचकचचारुत्वहेतुत्वेन्त:पातिता कुत:॥

चारुत्वहेतु उपमादि और अनुगामादिसे अलग ही ध्वनिका विषय है यह दिखलाया।

‘विषय’ शब्द शिष्य वन्धने' धातुसे बना है। ‘विशेषेण जिनोति स्वस्मान्निधनं पदार्थमिति विषय:' इस व्युत्पत्तिसे ध्वनिको वाच्यवाचकचारुत्वहेतुओंसे पृथक् अनुबन्ध कर दिया है।

और जो यह कहा था कि ‘प्रसिद्ध [शब्दार्थध्वारीं काव्य वाले] मार्गसे मिन्न मार्गमें काव्यत्व ही नहीं रहेगा इसलिये ध्वनि नहीं है’ वह ठीक नहीं है, क्योंकि वह केंचल [उन] लक्षणकारों ही प्रसिद्ध [ज्ञात] नहीं हैं, परन्तु लक्षण्य [रामायण, महाभारत प्रस्तुति] की परीक्षा करनेपर तो सहृदयोंके हृदयोंको आह्लादित करनेवाला काव्यकासारभूत वही [ध्वनि] है। उससे मिन्न [काव्य] चित्र [काव्य] ही है यह हम आगे दिखलायेंगे।

अलङ्कारोंमें ध्वनिके अन्तर्भावका खण्डन

और जो यह कहा था कि यदि वह ‘रमणीयताका अतिक्रमण नहीं करता है तो उत्त [गुण, अलङ्कारादि] चारुत्वहेतुओंमें ही उस [ध्वनि] का अन्तर्भाव हो जाता है’ वह भी ठीक नहीं है। क्योंकि केवल वाच्यवाचकभावपर आभ्रित मार्गके अन्दर व्यङ्ग्य-वाच्यैकसमन्वयपर आभ्रित ध्वनिका अन्तर्भाव कैसे हो सकता है। वाच्यवाचक [अर्थ और शब्द] के चारुत्वहेतु [उपमादि तथा अनुगामादि अलङ्कार] तो उस ध्वनिके अङ्गरूप है और वह [ध्वनि] तो अङ्गी [प्रधान] रूप है यह आगे प्रतिपादन करेंगे। इस सम्बन्धमें एक परिकरालोक भी है—

ध्वनिके व्यङ्ग्यवाचैकभाव सम्बन्धमूलक होनेसे वाच्यवाचकचारुत्वहेतुओं [अलङ्कारादि] में [उसका] अन्तर्भाव कैसे हो सकता है।

कारिकामें अनुक्त परन्तु अपेक्षित अर्थको कहनेवाला श्लोक ‘परिकरश्लोक’ कहलाता है—

‘कारिकायस्य अधिकावापं कत्थ श्लोक: परिकरश्लोक:। कारिकायमनुक्तस्यापेक्षितस्यार्थस्य आवाप: प्रक्षेप: तं कत्थु श्लोक: परिकर:।’

?. ‘स तदङ्गरूप'के स्थानपर नि० सं० में ‘न तु तदेकरूप', पाठ है। दी० में भी।

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कारिका १३ ] प्रथम उद्योतः ३९

नतु यत्र प्रतीयमानार्थेsय वैशद्येनाप्रतीति: स नाम मा भूद् ध्वनेरेव विषय: । यत्र तु प्रतीति:सति, यथा समासोक्त्यादिष्वाक्षेपानुकनिमित्तविशेषोक्तिपर्यायोक्तिहुतिदीपकसङ्करादौ, तत्र ध्वनेरन्तर्भावो भविष्यति, इत्यादि निराकरुंडुमिहितम्‌ "उपसर्जनीकृत-स्वार्थों" इति । अर्थों गुणीभूतात्मा, गुणीभूताभिधेय: शब्दो वा यत्रार्थोऽन्तरमभिलन्यनक्ति स ध्वनिरिति । नेघु कथं तस्यान्तर्भाव: । व्यङ्गच्यध्वप्राधान्येsहि ध्वनि: । न चैतत् समासो-कृत्यादिदर्शयति ।

समासोक्तौ तावत्— उपोढरागेण विलोलतारकं तथा गृहीतं शशिना निशामुखम् । यथा समस्तं तिमिरांशुकं तथा पुरोडपि रागाद् गलितं न लक्षितम्‌ ॥

यदि कोई यह कहे कि [नतु] जहाँ प्रतीयमान अर्थकी स्पष्ट रूपसे प्रतीति नहीं होती वह ध्वनि [के अन्तर्भावका] का विषय न माना जाय तो न सही, परन्तु जब [उसकी] प्रतीति होती है, जैसे समासोक्ति, आक्षेप, अनुकृति-निमित्त विरोषोक्ति, पर्यायोक्त, अपह्नुति, दीपक तथा सङ्कर आदि अलङ्कारोंमें, वहाँ ध्वनिका अन्तर्भाव हो जायेगा । इस मतके निराकरणके लिये पिछली कारिकामें कहा है, "उपसर्जनीकृतस्वार्थों" । जहाँ अर्थ अपनेको अथवा शब्द अपने अर्थको गुणीभूत करकें अर्थान्तर [प्रतीयमान] को अभिव्यक्त करते हैं उसको ध्वनि कहते हैं । उन [समासोक्ति आदि अलङ्कारों] में उस [ध्वनि] का अन्तर्भाव कैसे होगा ? व्यङ्गच्यार्थकी प्रधनातामें ध्वनि [काव्य] होता है । समासोक्ति आदिमें यह [व्यङ्गच्यका प्राधान्य] नहीं है ।

समासोक्तिमें ध्वनिके अन्तर्भावका निषेध समासोक्तिमें तो— सन्ध्याकालीन ारुणको धारण किये हुए [दूसरे पक्षमें प्रेमोन्मत्त] शशाी [अर्थात् चन्द्र, पक्षान्तरमें पुंल्लिङ्ग रागी शशि पदसे व्यङ्गच्य नायक] ने निशा शब्दसे नायिका] के चञ्चल तारोंसे युक्त [तारक नक्षत्र, पक्षान्तरमें नायिकाके चञ्चल चञ्चलकनिनिकावाले] मुख [प्रारम्भिक अन्धकार प्रादोषकाल, अन्यत्र आलिङ्गन] को [चुम्बन करनेके लिये] इस प्रकार ग्रहण किया कि रागी [सन्ध्याकालीन अरुण रक्तांश, पक्षान्तरमें नायिकाके स्पर्शसे अनुरागातिशय] के कारण शशाी-तामर-रूप वक्त्र गिर जानेपर भी उसे [निशा तथा नायिकाको] दिखलायी नहीं दिया । यह समासोक्ति अलङ्कारका उदाहरण है । भामहने समासोक्तिका लक्षण निम्नलिखित प्रकार किया है— 'यचोक्तौ गम्यतेsन्योऽर्थस्तत्समासत्तसमनैवि डोषणै: । वा समासोक्तिरुदिता सङ्कीर्णा र्थतया बुधै: ॥' भामह २,७९

जिस उक्ति में, स मान विरोषणोंके कारण प्रस्तुतवै अन्य अर्थकी प्रतीति हो उस उक्तिको [संक्षेपमें] सङ्कीर्णार्थ होनेसे [एक साथ प्रकट और अप्रकट दोनोका वर्णन करनेवाले] समासोक्ति कहते हैं । ऊपरके उदाहरणमें सन्ध्याकालमें चन्द्रादयका वर्णन कवि कर रहा है ! उसमें निशा और शशीक

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इत्यादौ व्यक्‍ख्येनाथुगतं वाच्यमेव प्राधान्येन प्रतीतं । समारोपितनायिकानायकव्यवहारयोर्निर्देशाशिनोरेष वाक्यार्थ एवात्र ।

वर्णन प्रकृत है । निशा और शशाङ्के के समान लिङ्ग और समान विशेषणों के कारण नायक-नायिका की प्रतीति होती है और उनके व्यवहार का समारोप निशा और शशाङ्क पर होने से यह समासोक्ति अलङ्कार माना जाता है । पूर्वपक्ष यह है कि यहाँ नायक-नायिका का व्यवहार व्यङ्ग्य है, वाच्य नहीं । अर्थात् इस श्लोक में समासोक्ति के साथ ध्वनि भी है । इसलिए ध्वनिका अन्तर्भाव समासोक्ति अलङ्कार में माना जा सकता है । इसके उत्तर में ग्रन्थकार लिखते हैं—

यहाँ समारोपित नायक-नायिकाभ्यवहार से युक्त शशी और निशाके ही वाक्यार्थ होने से, व्यङ्ग्य से अनुगत वाच्य ही प्राधान्य से प्रतीत होता है [अर्थात् व्यङ्ग्य होने का प्राधान्य न होने से यहाँ ध्वनि नहीं है अतः ध्वनिका समासोक्तिमें अन्तर्भाव नहीं हो सकता है] ।

आक्षेपालङ्कारे ध्वनिकेऽन्तर्भावका निषेध

ध्वनिका अलङ्कारे अन्तर्भाव करने के लिए पूर्वपक्ष की ओर से दूसरा उदाहरण आक्षेप अलङ्कार का प्रस्तुत किया गया है । आक्षेप अलङ्कार का लक्षण भामह ने निम्नलिखित प्रकार किया है—

"प्रतिषेध इवेच्छस्य यो विरोधाभिधित्सया । वस्तुमान्तरविषया: स आक्षेपो द्विविधो मतः ।"

जहाँ विरोधता-बोधन करने के अभिप्राय से कहना चाहते हुए भी बात का निषेध किया जाता है वहाँ आक्षेप अलङ्कार होता है । वह निषेध कहीं वस्तुमान अर्थात् आगे कही जानेवाली बात का पूर्व ही निषेध और कहीं उक्त अर्थात् पूर्व की हुई बात का पीछे निषेध करने से वस्तुमान विषयक और उक्तविषयक दो प्रकार का होता है । वस्तुमान विषयक का उदाहरण भामह ने यह दिया है—

"अहं त्वां यदि नेक्षेय क्षणमप्युक्तुचा ततः । इत्यदैवास्तवोद्येन किमुतेनाप्रियेण ते ॥"

'मैं यदि तुमको तनिक देर भी न देखूँ, तो उत्कण्ठातिरेक से' इतना ही रहने दो, आगे तुम्हारी अप्रिय बात कहने से क्या लाभ ? यहाँ आगे 'मर जाऊँगी' यह वस्तुमान अर्थ है, उसका पूर्व ही निषेध कर दिया है । आगे तुम्हारे अप्रिय बात करने से क्या लाभ ? इस प्रकार यहाँ 'म्रिये' मर जाऊँगी यह व्यङ्ग्य है । इसलिए यहाँ आक्षेप अलङ्कार में व्यङ्ग्य होने से ध्वनिका अन्तर्भाव आक्षेप अलङ्कार में किया जा सकता है । यह पूर्वपक्ष है । उत्तर लगभग उसी आशय का होगा जो समासोक्तिमें दिया जा चुका है । अर्थात् ध्वनि वहीं होती है जहाँ व्यङ्ग्य का प्राधान्य हो । यहाँ व्यङ्ग्य है तो, परन्तु वह प्रधान नहीं है । उस व्यङ्ग्य से वाच्यार्थ ही अलङ्कृत होता है । इसलिए यहाँ ध्वनि है ही नहीं । तब आक्षेप अलङ्कार में उसके अन्तर्भाव का प्रश्न ही नहीं उठ सकता है ।

यह भामह के अनुचर आक्षेप अलङ्कार का विवेचन किया । परन्तु वामन ने आक्षेप का लक्षण, 'उपमानाक्षेप:' [ वामन ५० ४, ३, ३७ ] किया है । इसका अभिप्राय यह है कि जहाँ उपमान का आक्षेप अर्थात् निष्फलत्वाभिधान किया जाय उसे आक्षेप अलङ्कार कहते हैं । नवीन आचार्य लोग इस स्थिति में प्रतीप अलङ्कार मानते हैं और आक्षेप का लक्षण भामह के लक्षण के समान ही करते हैं ।

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कारिका १३ ] प्रथम उद्योतः ४१

आक्षेपेडपि व्यङ्गचविशेषाक्षेपिणोडपि' वाच्यस्यैव चारुत्वं प्राधान्येन वाक्यार्थी

व्याहित्यदर्पणकारने प्रतीपका लक्षण 'प्रतिद्दृश्योपमानस्योपमेयत्वप्रकल्पनम् । निष्फलत्वाभिधानं वा प्रतीपमिति कश्यते ॥' [सा० द० १०, ८७] किया है । और उसका उदाहरण—

"तद् वचनेन यदि मुद्रिता शायिकया ह्वा हेम सा चेद् युवतिसतच्चकुर्वेति हारितं कुवलयैस्तन्व्या स्थितं का शुधा । धिक् कनकदर्पणस्थतुङ्गबौ यदि च ते, कि वा बहु भूमिहे यत्सत्यं पुनरुक्तवस्तुविमर्शः सङ्क्रमो वेधाः ॥"' सा० द० १०, ८७

दिया है । वामनेके 'उपमानाक्षेप' सूचककी व्याख्या करते हुए लोचनकारने 'उपमानस्य चन्द्रादेराक्षेपः, असिनन् रति किं त्वया कृतमिति' लिखा है और उसका उदाहरण दिया है । यह लक्षण और उदाहरण दोनों 'व्याहित्यदर्पण'के प्रतीप अलङ्कारसे मिलते हैं । लोचनकारने वामनके लक्षणानुसार आक्षेपका निम्नलिखित उदाहरण दिया है—

"तस्यास्तनुस्मस्ति सौम्यसुभगं किं पार्वणेन्तुना सैन्यस्य पदं हृश्यो इद च तैः कि नाम नीलोत्पलैः । किं वा कोमलकान्तिभिः किसलयैः सत्येव तन्वाघरे द्वाघ्रात् पुनरुक्तवस्तुचरणारम्भमेवपुंसां प्रहः ॥"

यहाँ पूर्णिमाचन्द्रके साथ मुखका साहश्य आदि रूप उपमा व्यङ्गय है, परन्तु वह प्रधान नहीं अपितु वाच्यको ही अलङ्कृत करती है । 'किं पार्वणेन्तुना'है चन्द्रमाका निष्फलत्वाभिधानरूप अपमानात्मक वाच्य ही अधिक चमत्कारी है। अतएव यहाँ भी व्यङ्गचप्रधानरूप ध्वनिका अस्तित्व न होनेसे उसके आक्षेपालङ्कारमें अन्तर्भावका प्रश्न ही नहीं उठता ।

इन सब उदाहरणोंमें यह ध्यान रखना चाहिये कि व्यङ्गच और ध्वनि शब्द समानार्थक नहीं हैं। सभी प्रतीपमान अर्थ व्यङ्गच हैं परन्तु ध्वनिकाव्य वहाँ माना जाता है जहाँ व्यङ्गचका प्राधान्य होता है ।

कुछ लोगोंने वामनके 'उपमानाक्षेप:' [वा० सू० ४, ३, २७] की व्याख्यामें 'उपमानस्य आक्षेपः सामर्थ्यादाकर्षणम्' किया है । अर्थात् जहाँ उपमानका सामर्थ्यसे आकर्षण किया जाय, वह शब्दतः उपाच्च न हो, उसे आक्षेप अलङ्कार कहते हैं । इस व्याख्याके अनुसार आक्षेपालङ्कारका निम्नलिखित उदाहरण दिया है—

"ऐन्द्रे घने: पाण्डुपयोधरेण धारद्दधानाद्रैर्नलक्षताभम् । प्रसादयित्री सकलङ्कमिन्दुं तापं रवेर्मधिकं चकार ॥"

पाण्डुवर्णके पयोधर—मेघ [पक्षान्तरमें स्तन] पर आद्र्त् गीले, स्त्रः समुत्पादित नखक्षतके समान इन्द्रघनुष्को धारण करनेवाली और कलङ्क [चिह्न] सहित [पक्षान्तरमें नायिकोपमोगजन्य कलकंसे युक्त] चन्द्रकला प्रसन्न [आनन्द] अथवा उद्ययके और पद्मान्तरमें हसित करती हुई 'तेन दृष्टं [रूप नायिकं] के सन्तापको और बढ़ा दिया ।

यहाँ भी इङ्गिताक्षिप्त नायकान्तररूप उपमान आक्षिप्त होना है, परन्तु वह वाच्यार्थको ही अलङ्कृत करता है । वामनके मतसे यह भी आक्षेपका उदाहरण दिया गया है परन्तु भामह आदिके मतसे तो यहाँ समासोक्ति है ।

[इस प्रकार] आक्षेपालङ्कारमें भी व्यङ्गचविशेषका आक्षेप करानेवाला होनेपर १. दी० में 'अपि' नहीं है ।

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ध्वन्यालोकः

आचार्य आनन्दवर्धन

डॉ. रघुनाथ पाण्डेय

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय

आक्षेपोक्तिसामध्योंदेव ज्ञायते । तथाहि' तत्र शब्दोपालढः विशेषाभिधानेच्छया प्रतिषेधरुपो य आक्षेपः स एव व्यङ्ग्य-वविशेषमाक्षिपन् मुख्यं काव्यशरीरम् । चारुत्वोत्कर्षनिर्बन्धना हि वाच्यलिङ्ग-ययोः प्राधान्यविवक्षा । यथा—

अत्र सन्ध्यामयी कृतक-वप्रीतौ वाच्यसौन्दर्य चारुत्वोत्कर्षनिबन्धनादिति तस्यैव प्राधान्यविवक्षा ।

भी वाच्यका ही चारुत्व [चमत्कार प्राधान्य] है। क्योंकि आक्षेपवचनके सामर्थ्यसे ही प्रधानता: वाक्यार्थ प्रतीत होता है । क्योंकि वहाँ [आक्षेपालङ्कारमें] विशेषके बोधनकी इच्छासे शब्दोपास्य प्रतिषेधरूप जो आक्षेप है, वही व्यङ्ग्य-वविशोषका आक्षेप कराता हुवा मुख्य काव्यशारीर है।

चारुत्वोत्कर्ष ही प्राधान्यका नियामक है

चारुत्वके उत्कर्षमूलक ही काव्य और व्यङ्ग्यका प्राधान्य विवक्षित होता है। जैसे— सन्ध्या [नामक या रूपिणी नायिका] अनुराग [अर्थात् सन्ध्याकालीन छलिमा, पक्षान्तरमें प्रेम] से युक्त है और दिवस [नामक या रूपे नायिका] उसके सामने [स्थित दो नहीं 'पुरःसरति गच्छति इति पुरःसरः'] बढ़ रहा है [समाने छा रहा है] । ओह, दैवकी गति कैसी [विलक्षण] है कि फिर भी [उनका] समागम नहीं हो पाता !

यहाँ वामनके मतसे आक्षेपालङ्कार और भामहके मतसे समासोक्त अलङ्कार है इस बातको ध्यानमें रखकर समासोक्ति और आक्षेपका सम्मिलित यह उदाहरण ग्रन्थकारने दिया है । वास्तवमें यहाँ समासोक्ति है या आक्षेप यह विचारणीय प्रश्न नहीं है।

चारुत्वोत्कर्षमूलक दीपक और अपह्नुतिन्यवहार

दीपकका लक्षण काव्यप्रकाशकारने 'सकृदृत्तेः स्थितो धर्मस्य प्रकृताप्रकृतात्मनाम् । सैव क्रियासु वह्नीकृत्येति दीपकम् ।' किया है, जिसका अभिप्राय यह है कि प्रकृत और अप्रकृत अनेक पदार्थों- में एक धर्मका सम्बन्ध वर्णन करना अथवा अनेक क्रियाओंमें एक ही कारकका सम्बन्ध वर्णन करना दीपकलङ्कार है ।

१. दी०, नि० 'तथाहि' इतना पाठ नहीं है ।

२. 'शब्दोपालढतयोः' नि० ।

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कारिका १३ ] प्रथम उद्योत ५४३

यथा च दीपकापहुत्यादौ न्यक्‍यं यत्रेनोपमायाः प्रतीतावपि प्राधान्यान्नाविवक्षिततत्त्वान्न या व्यपदेशास्तद्वदत्रापि दृश्यन्ययम् ।

"मणिः स्वाणोह्रीढः समरविजयी हेतिदक्षः कलाश्चन्द्रः सुरतमुदिता बालललना । मदक्‍षीणो नागः, शरदि सरिदास्यानपुलिनातनिम्नाः श्रोभन्ते गलितविमवाश्राथिथु जना: ॥"

यहाँ याचकोंको दान देकर क्षीणविभव पुरुप प्रकट हैं और स्वाणोह्रीढ मणि, शस्त्रोंसे दलित युद्धविजयी वीर, कलाविशारद ननदमा, सुरतमुदित बाल ललना, मदक्‍षीण हाथी, शरत्कालमें क्षीणकाय नदी ये सब अप्रकृत हैं ।

विशेषोक्तिमें ध्वनिके अन्तर्भावका निषेध

साहित्यदर्पणकारने विशेषोक्तिका लक्षण किया है, 'सति हेतौ फलभावे विशेषोक्ति:' [मा० द० १०, ६७] ।

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ध्वन्यालोक:

आचार्य आनन्दवर्धन

डॉ. हरिदत्त शर्मा

मोतीलाल बनारसीदास

अनुक्तनिमित्तायामपि विशेषोक्तौ—

आहूतोऽपि सहायैः, ओंमित्युक्त्वा विषयक्तिनिद्रोऽपि ।

गन्तुमना अपि पथिकः सद्योचं नैव शिथिलयति ॥

इत्यादि व्यज्जय-रस्य प्रकरणसामध्यात् प्रतीतिमात्रं न तु तत्र प्रतीतिनिमित्ता काचिद्वारुत्वनिष्पत्तिरिति न प्राधान्यम् ।

‘पुष्पाणि जयति जगन्ति कुसुमायुधः ।

हरतापि तनुं यस्य कामयुना न हतं बलं ॥’

शिवजीने जिसके शरीरको ‘भस्म’ कराके भी वलको हरण नहीं किया वह कामदेव अकेला ही तीनों लोकोंको जीत लेता है। इस अचिन्त्यनिमित्ता विशेषोक्तिमें तो व्यज्जय है ही नहीं। उक्तनिमित्ता का उदाहरण है—

कामं ईह दवदग्धोऽपि शक्तिमान् यो जने जने ।

नमोज्वलवार्चीवशीर्याय तस्मै मकरध्वजाय वे ॥

इस उक्तनिमित्ता विशेषोक्तिमें भी व्यज्जयके सन्दर्भाकी झलक नहीं है। इसलिए ग्रन्थकारने विशेषोक्तिके इन दोनों भेदोंको छोड़कर केवल अनुक्तनिमित्ता विशेषोक्तिका उल्लेख किया है और उसका उदाहरण दिया है। ‘आहूतो’ साधियों द्वारा बुलाये जानेपर भी, हाँ कहकर जाग जानेपर भी और जानेकी इच्छा रहनेपर भी पथिक सद्योचको नहीं छोड़ रहा है। यहां सद्योच न छोड़नेका निमित्त उक्त ‘न होनेभी’ अनुक्तनिमित्ता है। निमित्तके अनुक्त होनेपर भी वह अचिन्त्य नहीं है, उसकी कल्पना की जा सकती है। भङ्गोद्भटने शीतके आधिक्यको उसका निमित्त माना है और अन्य रसिक ध्वाख्याता यह कल्पना करते हैं कि पथिक, गमनकी अपेक्षा भी स्वप्नको प्रियासमागमका मुकार उपाय समझकर स्वप्न-लोभसे सद्योच नहीं छोड़ रहा है, सिमटे-सिमटाये खाटपर पड़ा ही हुआ है।

इत्यादि [उदाहरण]में कारणवशा व्यज्जय-रस्य केवल प्रतीति होती है। किन्तु उस प्रतीतिके कारण कोई सौन्दर्य उत्पन्न नहीं होता, इसीलिए उसका प्राधान्य नहीं है।

पर्यायोक्तका लक्षण आभहने इस प्रकार किया है—

पर्यायोक्तं यदन्येन प्रकारेणाभिधीयते ।

वाच्यावाचककृत्तिस्थां ध्वन्येनावगमात्मना ॥

भार्ग ३, ८

काव्यप्रकाशकार और साहित्यदर्पणकार आदिने भी पर्यायोक्तके इसी प्रकारके लक्षण किये हैं—

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कारिका १२ ]

पर्यायोक्तेडपि यदि प्राधान्येन व्यङ्ग्य-वस्तु तदू भवतु नाम तथ्य ध्वनापनन्तरमौष: ।

"पर्यायोक्तं यदा मज्ञात्या गम्यमेवाभिषीयते" सा० द० १०, ६०

"पर्यायोक्ते विना वाच्यवाचकत्वेन यदू वच: ।" का० प्र० १०, ११५

पर्यायोक्त प्रकारान्तरेण, अवगमामत्ना व्यङ्गचेन उपलक्षितं सदू, यदभिषीयते तदभिषीयमानम् उत्कं सत् पर्यायोक्तम् ।

अर्थात् व्यङ्गच्यरूपसे अवगत अर्थको ही अभिषारे कहा जाय वहाँ पर्यायोक्त अलङ्कार होता है । जैसे—"अलक्षिते हि कन्या मनोरुग्धागामिनः । रामस्यानेन धनुषा देवचिता धर्मदेशना ॥"

मुनिके लिए शस्तुभाव रखना ही अनुचित है । फिर उस शस्त्रके ऊचेद या विनाशकी बात सोचना और भी अनुचित है ।

उसकी भी द्वेषिमा—आग्रह अत्यन्त अनुचित है । इसलिए शस्त्रके विनाशके लिए इतस्तत:कूप अतएव उन्मार्गगामी परचक्राराम—भार्गव—सुनिको भी भर्स्सके इस धनुषने अपने धर्मपालनकी शिक्षा दे ।

यहाँ भी भर्स्सकी वाक्ति भार्गव परचक्रारामकी वाक्तिले अधिक है । भीष्मने परचक्रारामको पराजित कर दिया यह व्यङ्गच्य अर्थ है, उश्को 'देवचिता धर्मदेशना'के शब्दोंसे अभिषया वोधन किया गया है, इसलिए यह पर्यायोक्त अलङ्कारका उदाहरण है ।

यहाँ व्यङ्गच्य अर्थकी प्रतीति तो है परन्तु वह प्रधान नहीं है अपितु वाच्यको ही अलङ्कृत करती है ।

अतएव यहाँ ध्वनि नहीं है । भामहने पर्यायोक्तका उदाहरण निम्नलिखित दिया है—

"गृहेऽवस्थतं वा नान्नं मुहुर्महे यदधीतिनः । विप्राः न मुक्षते तस्माद् रसदानान्निवृत्तये ॥"

यह कृष्णाकी शिुशुपालके प्रति उक्ति है । उसका भाव यह है कि 'अर्थात्—ब्राह्मण लोग जिस अन्नको नहीं खाते उसे हम न घरपर खाते हैं और न मार्गमें अर्थात् यात्रामें ।'

बाहर, हम विद्वान् ब्राह्मणोंको खिलानेके बाद ही भोजन करते हैं । यहाँ 'विषदाननिवृत्तिचि' व्यङ्गच्य है ।

जैसा कि उन्होंने स्वयं कहा है—'तच्च रसदाननिवृत्तये' ।

'रसादानौ विषे वीर्यें गुरणे रागे द्रवे रसः' इति कोष: ।

भामहप्रदत्त इस उदाहरणमें रसदानान्निवृत्ति व्यङ्गच्य है परन्तु उससे कोर्ड चारुत्व नहीं आता, इसलिए उसका प्राधान्य-नहीं है अपितु विमोंको भोजन कराये बिना भोजन न करना यह जो वाच्यार्थ है वही पर्याय अर्थात् प्रकारान्तरसे उत्क होकर भोजनार्थीको अलङ्कृत करनेसे पर्यायोक्त अलङ्कारका उदाहरण वनता है ।

भामहने जो उदाहरण दिया है उसमें व्यङ्गच्यकी प्राधान्यता न होनेके परन्तु पर्यायोक्त अलङ्कारके इस प्रकारके उदाहरण मिल सकते हैं जहाँ व्यङ्गच्यका प्राधान्य हो ।

उस दशामें उसे हम ध्वनिकाव्यके दूसरे भेद अलङ्कारध्वनिका उदाहरण मानेंगे ।

परन्तु इसका अर्थ यह नहीं कि ध्वनिका अलङ्कारोंमें अन्तर्भाव हो गया अपितु वस्तुतः अलङ्कारका ध्वनिमें अन्तर्भाव कहा जा सकता है ।

क्योंकि ध्वनि तो महाविषय—व्यापक है, इस प्रकारके पर्यायोक्तके व्यङ्गच्यप्रधान उदाहरणोंको छोडकर अन्यत्र भी ध्वनि रहता है इसलिए महाविषय—व्यापक होनेसे ध्वनिका अन्तर्भाव अलङ्कारमें नहीं माना जा सक्ता ।

व्यङ्गच्यप्रधान पर्यायोक्तका उदाहरण 'श्रम धामिक' इत्यादि पूर्वोंद्दाहृत श्लोक हो सक्ता है ।

मूल ग्रन्थकी पंक्तियोंका अनुवाद इस प्रकार है—

पर्यायोक्त अलङ्कार [ के 'श्रम धार्मिक' सदृशा व्यङ्गच्यप्रधान उदाहरणों ] में भी यदि व्यङ्गच्यकी प्राधान्यता हो तो उसे [ अलङ्कार ] का ध्वनि [ अलङ्कारध्वनि ] में

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ध्वन्यालोक:

अप्पय्यदीपकयो:

तुनर्बाध्यस्य

न तु ध्वनेरनन्तर्भावः

तस्य महाविषयत्वेन

अकिञ्चित्करत्वेन च ! प्रतिपाद्यविषयमाणत्वात्।

न पुनः पर्योक्ते भामहदीपोद्धृततदंशो व्यक्‍ृयस्यैव प्राधान्यम्

वाच्यस्य तत्रोपसर्जनीभावेनाविवक्षितत्वात् ।

अपहूति और दीपकमें अन्तर्भावका निषेध

अपहूति तथा दीपकमें वाच्यका प्राधान्य और व्यक्‍ृयका वाच्यनुगामित्व प्रसिद्ध ही है ।

सदृरालङ्‌कारमें अन्तर्भावका निषेध

विरुद्धालङ्‌कारैकलेक्खे समं तदुक्तिह्यसम्भवे । एकस्य च ग्रहे न्यायदोषाभावे च शक्कः ॥

गजाजलसलिलस्फुरन्मदहयाकारा कृत इविधना ॥

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कारिका १३ ] प्रथम उद्योतः

सूत्रे 'शाशी एव बदनं यस्या:' या 'शाशिवदना' ऐसा समास माननेले रूपक, और 'उपमितं व्याघ्रादिमिः सामान्यप्रयोगे' [अ० २, १, ४६] इस सूत्रे 'शशिवदु बदनं यस्या:' यह समास माननेले उपमा होती है। श्लोकमें 'शाशिवदना' आदि तीन विशेषण दिये हैं। वे तीनों क्रमशः गगन, जल और स्थलसे सम्बद्ध होनेले 'गगनसम्भवत्व, 'असिततटसञ्जननया' पद जलसम्भवत्व और 'सितकुसुमदर्शन-पक्ति' पद स्थलसम्भवत्वको बोधन करते हैं। इस प्रकार मानो विष्णुने उस नायिकाको गगन, जल और स्थल तीनोंसे बनाया है, यह श्लोकका भाव है। इसमे उपमा और रूपकमेले क्या माना जाय उसका कोई निर्णायक वेनिगमक हेतु न होनेले यहाँ तन्मूलक सन्देहसकर अलंकार है। इसलिये यहाँ कौन वाच्य है और कौन व्यङ्ग्य है इसका ही जब निर्णय नहीं है तब उसकी प्राधान्यता या गौणताका प्रश्न ही नहीं उठता।

सकुरका दूसरा भेद एकार्थानुप्रवेशसकर है। भामहोद्धटने इसके दो भेद कर दिये हैं—एकवाक्यानुप्रवेश और एकार्थानुप्रवेश। इन दोनों भेदोंका वर्णन और लक्षण भामहने निम्नलिखित प्रकार किया है--

"शब्दार्थैवर्त्यलङ्कारा वाक्य एकत्र वर्त्तिनः । सकुरसचैकवाक्यस्यांप्रवेशाद्वाराभिधीयते ॥" भामह ३, ४८

जहाँ शब्दवर्ती तथा अर्थवर्ती, अर्थात् शब्दालङ्कार तथा अर्थालङ्कार दोनों एक ही वाक्यमें स्थित हों वहाँ एकवाक्यप्रवेश अथवा एकवाक्यांप्रवेश भेदसे दो प्रकारका सकुर अलंकार होता है। इन दोनोंके उदाहरण निम्नलिखित प्रकार हैं--

"सर सरमिव प्रियं रमयसे यमालिङ्गनैः"

कामदेवके समान जिस प्रियको आलिङ्गनसे रमण कराती हो, उसको शरण करो। यहाँ 'सर-सर' पदकी आवृत्तिले यमक-रूप शब्दालङ्कार और 'सरमिव' इस उपमारूप अर्थालङ्कारका एकार्थानुप्रवेशरूप सकुर है। यहाँ प्रतीपमानकी छायाका भी अवसर नहीं है, उसके गुणप्रधान भावका निर्णय तो दूर रहा। इसका दूसरा उदाहरण है--

"तुल्योदयावसानत्वाद् गतेष्टं प्रति मालती । वासाय वासरः क्लान्तो विशतीव तमोगुहाम् ॥"

सूर्य और वासर [दिन] दोनों तुल्योदयावसान हैं, दोनोंका उदय और अस्त साथ-साथ होता है। इसलिये जब सूर्य अस्त होने लगा तो मानो वह वासर भी तमोगुहामें प्रविश्ट-सा हो जाता है। यह इस श्लोकका भाव है। यहाँ 'विशतीव' यह उपेक्षा अलंकार है और 'तमोगुहाम्' यह एक-द्वैतविधि वाचक है। यहाँ सूर्यका अस्त होना स्वामिविपत्ति और वासरका अस्त होना स्वामिविपत्ति और वासरका अस्त होना स्वामिविपत्तिसमुचिततत्प्रहणरूप है। परन्तु इन सकुरका आरोप नहीं किया है, केवल तमपर शुद्धाका आरोप है। इसलिये यह एकदेशविवर्ति रूपक है। इस प्रकार यहाँ रूपक और

सकुरका चौथा भेद अज्ञातद्वभावसकर है। उसका लक्षण और उदाहरण निम्नलिखित है--

"परस्परोपकारण यत्रालङ्कृत्यः स्थिताः । स्वातन्त्र्येणात्मलाभेऽपि नो लमन्ते चोदपि सकृतः ॥" भामह ३, ४८

जहाँ अनेक अलंकार परस्परोपकारक भावसे स्थित हों, स्वातन्त्र्यसे नहीं, वह भी [अज्ञात-द्वभाव] सकुर होता है जैसै--

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ध्वन्यालोक:

आचार्यलोचनानिर्वाहश्र

सकृरालकृतेपि यदालोकृतेरडलकृतारान्तरच्छायामनुगृह्णाति, तद्वा व्यङ्ग्यथस्य प्राधान्येन नाविवक्षितत्वाच्छान्तिविषयत्वम्। अलङ्कारद्वयसम्भावनायान्तु वाच्यव्यङ्ग्यथयोः समं प्राधान्यम्। अथ वाच्योपसर्जनीभावेन व्यङ्ग्यथस्य तत्रावस्थानं तदा सोऽपि ध्वनिविषयोऽस्तु, न तु स एव ध्वनिरिरिति वक्तुं शक्यम्, पर्यायोक्तनिदर्शनन्या यात्। अपि च सकृरालकृारेपि व कश्चित् सकृरोक्तिरेव ध्वनिसम्भावनां निराकरोति?

पूर्वोक्तनिरासोऽनुवादश्र

आचार्यलोचनानिर्वाहश्र

तया रीत्यां तु मगाइन्नाभ्यस्ततो रीतिर्नु मगाइन्नामि:॥

यह 'कुमारसम्भव' [१, ४५] का श्लोक है। उस आचार्य काशीनाथ पावंतिने प्रवात—तेज हवासे चञ्चल नीलकमलके समान अथीर दृष्टि क्या मुगाइन्ने लि अथवा मुगोंने उस पार्वतीसे लि? यह कालिदासके इस श्लोकका भाव है। अर्थात् उसकी दृष्टि हरिणीकी दृष्टिके समान चञ्चल है। इस प्रकार यहाँ उपमा अलङ्कार व्यङ्ग्य है और सन्देहालङ्कार वाच्य है। परन्तु व्यङ्ग्य उपमा वाच्य सन्देहालङ्कारको ही चमत्कृत्प्रदान कर अनुग्रहीत करती है। उसका पर्यवसान सन्देहकी पुढिमें ही होता है इसलिए वह गौणभूत है और उपमानित चमत्कृतिमें सन्देह साहाय्य करता है इसलिए दोनोंका परस्पर अज्ञातिभाव है।

इस प्रकार सकृरके चारों भेदोंमेंसे बीचके दो भेदोंमें तो व्यङ्ग्यकी सम्भावना ही नहीं है। चतुर्थ अज्ञातिभाव सकृरमें और प्रथम सन्देहसकृरमें व्यङ्ग्यकी सम्भावना हो सकती है, परन्तु वहाँ भी व्यङ्ग्य यका प्राधान्य न होनेसे ध्वनिव्यवहार नहीं हो सकता। इसी बातको ग्रन्थकार आगे कहते हैं—

सकृरालकृारमें भी जहाँ एक शलङ्कार दूसरीकी छाया [सौन्दर्यं] को पुष्ट [अनुगृहीत] करता है [अर्थात् अज्ञातिभावरूप चतुर्थ भेदमें] वहाँ व्यङ्ग्य यका प्राधान्य विचक्षित न होनेसे वह ध्वनिका विषय नहीं है। [सन्देहसकृरूप प्रथम भेदमें] दो अलङ्कारोंकी सम्भावना होनेपर तो वाच्य और व्यङ्ग्य य दोनोंका समप्राधान्य होता है। [अतः वहाँ भी ध्वनिकी सम्भावना नहीं हैं] और यदि वहाँ [अज्ञातिभाव सकृलङ्कारमें] व्यङ्ग्य य वाच्यके उपसर्जनीभाव [गौणरूप] से स्थित हो तब तो वह भी ध्वनि [अलङ्कारध्वनि] का विषय हो सकता है, न कि केवल वही ध्वनि है, पर्यायोक्तनिदिष्ट न्यायसे। और एक बात यह भी है कि सकृरालकृारमें सर्वत्र सकृर शब्दका प्रयोग ही ध्वनिसम्भावनाका निराकरण कर देता है।

क्वचिदपि सकृरालकृारेपि व कश्चित्

इसकी व्याख्या करते समय 'क्वचिदपि सकृरालकृारेपि व कश्चित्' इस प्रकार अन्यत्र करना चाहिये। उसमें भी 'क्वचिदपि'का अर्थ सर्वत्र होगा। 'क्वचिदपि सकृरालकृारेऽपि'का अर्थ हुआ कि सकृरालकृारके सभी भेदोंमें सकृर शब्दका प्रयोग उनकी सकृरगीताका प्रतिपादक है। वहाँ यदि किसी एककी प्राधान्य हो जाय तो फिर सकृर ही कहाँ रहेगा? इसलिए सकृर शब्दका प्रयोग ही वहाँ व्यङ्ग्यप्राधान्यरूप ध्वनिका निराकरण कर देता है। फिर भी यद्याद आप—

१. 'तत्रापि व्यवस्यास्याम्' नि०, दी०।

२. 'सकृरालकृारस्य सकृरोक्तिरेव ध्वनिसम्भावनां करोति' नि०।

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कारिका १३ ] प्रथम उद्योत:

"न मवति गुणानुरागः स्वलानां केवलं प्रसिद्धिरणामभिः ।

किञ्चित् प्रतीयते शशिमणिः चन्द्रे न प्रियामुखे हृश्ये ॥"

केबल प्रसिद्धि वानेवाले दुष्येङ्को गुणोंसे प्रेम नहीं होता । चन्द्रकान्तमणि चन्द्रमाको देखकर तो द्रवित हो जाता है, प्रियाके मुखको देखकर नहीं । यहाँ शशिमणि अर्याद् 'चन्द्रकान्तमणि चन्द्रमाको देख कर द्रवित होने लगता है परन्तु चन्द्रसे भी अधिक सुन्दर प्रियामुखको देखकर द्रवित नहीं होता' इस विशेष उदाहरणसे 'प्रसिद्धिमात्र वानेबाले दुष्येङ्को गुणोंसे अनुराग नहीं होता' इस सामान्य नियमका समर्थन करनेसे अर्थान्तरत्यास अलङ्कार वाच्य है । और प्रियामुख चन्द्रमे भी अधिक सुन्दर है यह ब्यतिरेक अलङ्कार, तथा यह चन्द्र नहीं है प्रियामुख ही चन्द्र है, यह अपह्नुति अलङ्कार ब्यङ्ग्य है ।

इस प्रकारके किसी उदाहरणमें ब्यङ्ग्यकी प्रधानतापर ही वल दें तो फिर उस स्थानपर अलङ्कारध्वनि हो जायगी । अर्थात् वहाँ सदृशका अन्यभाव अलङ्कारध्वनिमें हो जायगा, क्योंकि पर्यायोक्तन्यायमें ध्वनिके महाविषय और अङ्गी होनेसे उनमें अन्य अलङ्कारादिका अन्तभाव दिखाया जा चुका है । उसी न्यायसे यहाँ भी समझना चाहिये ।

अप्रस्तुतप्रशंसासमें अन्तर्भावका निषेध

अप्रस्तुतके वर्णनसे जहाँ प्रस्तुतका आक्षेप किया जाता है वहाँ अप्रस्तुतप्रशंसा नामक अलङ्कार होता है । अप्रस्तुतप्रशंसाके तीन प्रकारकी होती है—पहिली सामान्यविशेषभावमूलक, दूसरी कार्यकारणभावमूलक, और तीसरी साध्यसाम्यमूलक । इनमेंसे पहिली और दूसरी प्रकारकी अप्रस्तुतप्रशंसाके दो-दो भेद हो जाते । इस प्रकार उन दोनोंके दो-दो भेद होकर चार भेद और एक साध्यसाम्यमूलक

इस प्रकार पाँच भेद हो जाते हैं । सामान्यविशेषभावमूलकके दो भेद इस प्रकार होते हैं कि एक जगह सामान्य अप्रस्तुत होता है और उससे प्रस्तुत विशेषका आक्षेप होता है और दूसरी जगह अप्रस्तुत विशेष होता है उससे प्रस्तुत सामान्यका आक्षेप होता है । इसी प्रकार कार्यकारण-भावमूलकके भी दो भेद हो जाते हैं । एक जगह कारण अप्रस्तुत होता है, उससे प्रस्तुत कार्यका

आक्षेप होता है और दूसरी जगह अप्रस्तुत कार्यसे प्रस्तुत कारणका आक्षेप होता है । इस प्रकार चार भेद हुए । पाँचवाँ भेद साध्यसाम्यमूलक होता है । इस भेदके भी सादृश्यनिमित्तक, समायोक्तिनिमित्तक और साध्यसामात्रनिमित्तक इस प्रकार तीन भेद हो जानसे अप्रस्तुतप्रशंसाके सात भेद वन जाते हैं । परन्तु भावमहे केवल पहिले तीन भेद ही किये हैं; एक सामान्यविशेषभावमूलक, दूसरा कार्यकारण-

प्रधान्य होनेसे ध्वनिके अवसर ही नहीं है इसलिए उसके अन्तर्भावका विचार ही नहीं हो सकता ।

तीसरे साध्यसाम्यमूलक भेदमें यदि अभिधीयमान अप्रस्तुतका प्राधान्य और प्रतীয়मान प्रस्तुतका प्राधान्च्य विवक्षित होगा तो अलङ्कारका ध्वनिमें अन्तर्भाव हो जायगा अन्यथा अप्रस्तुत अभिधीयमान-का प्राधान्च्य विवक्षित होनेपर अप्रस्तुतप्रशंसा अलङ्कार होगा । इसी भावको मनमें रखकर अन्यकारने

प्रकृत सन्दर्भ में लिखा है ।

भावमहित अप्रस्तुतप्रशंसाके लक्षण उदाहरणादि निम्नलिखित प्रकार हैं—

"अधिकारादपेतस्य वस्तुनोऽन्यस्य या स्तुतिः ।

अप्रस्तुतप्रशंसा सा त्रिविधा परिकीर्तिता ॥" भामह ३,२९

अप्रस्तुत सामान्योंसे प्रस्तुत विशेषके आक्षेपका उदाहरण—

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ध्वन्यालोक

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कारिका १२ ] प्रथम उद्योतः

अप्रस्तुतप्रशंसायामपि यदापि सामान्यविशेषभावाभ्रित्तिचित्तविभावाद्रौमिधीयमा-

नस्याप्रस्तुततस्य प्रतीमानेन प्रस्तुतेनाभिसम्बन्धस्तदा' अभिधीयमानप्रतीयमानयोः सममेव

प्राधान्यम् । यदापि तावत् सामान्यस्याप्रस्तुतस्य अभिधीयमानस्य प्राकरणिकेन विशेषेण

प्रतीयमानेन सम्बन्धस्तदा विशेषप्रतीतौ सत्यामपि प्राधान्येन 'तत्सामान्येनैवविनाभावात्

सामान्यस्यापि प्राधान्यम् । यदापि विशेषस्य सामान्येनिष्ठत्वं तदापि सामान्ये

सामान्ये सर्वविशेषणान्तर्भावात् विशेषस्यापि प्राधान्यम् । निश्चिन्तनिश्चितभावे

चायमेव न्यायः ।

यदापि तु सारल्यमात्रवशेनाप्रस्तुतप्रशंसायामप्रकृतप्रकृतयोः सम्वन्धस्तदाप्य-

प्रस्तुतस्य सरूपस्थामिधीयमानस्य प्राधान्येनाभिवक्षित्यां ध्वनाबोधान्तःपातः । इतर्था

त्वलड्वारान्तरमेव ।

लोचनकारने भावग्रातवाला यह जो श्लोक उदाहरणरूपमें दिया है वह कुछ कठिन हो गया है ।

लोचनकारने

वस्तुतः सभी अन्योंकियाँ इसका उदाहरण हो सकती हैं ।

इस प्रकार अप्रस्तुतप्रघंसा अलंकारमें व्यङ्गच्यप्रतीति रहते हुए सामान्यविशेषभावमूलक

और कार्यकारणमावमूलक चार मेदोंमें अभिधीयमान और प्रतीमान दोनोंका समप्राधान्य होनेसे

ध्यनिका अवसर नहीं, और पाँचवें साधस्यमूलक मेदमें जहाँ प्रतीमानका प्राधान्य है वह अन्योंकि-

रूप मेदमें अप्रस्तुतप्रशंसा अलंकार ही नहीं अपितु वस्तुत्वपति है । इसलिए ध्वनिका अन्तर्भाव अप्रस्तुत-

प्रशंसा अलंकारमें भी नहीं हो सकता । यही प्रस्तुत सन्दर्भका अभिप्राय है । शब्दानुवाद इस

प्रकार होगा -

अप्रस्तुतप्रशंसामें भी जब सामान्यविशेषभाववश अथवा निमित्तचिनिमित्तभाववश,

अभिधीयमान अप्रस्तुतका प्रतीमान प्रस्तुतके साथ सम्बन्ध होता है तब अभिधीय-

मान और प्रतीमान दोनोंका समान ही प्राधान्य होता है । जब कि अभिधीयमान

अप्रस्तुत सामान्यका प्रतीमान प्रस्तुत विशेषसे सम्बन्ध होता है तब प्रघानतः विशेषकी

प्रतीति होनेपर भी ['निर्योशं न सामान्यम्' इस नियमके अनुसार] उसका सामान्यसे

अविनाभाव होनेके कारण सामान्यका भी प्राधान्य होता है । और जब विशेष सामान्य-

निष्ठ होता है [अर्थात् जब अभिधीयमान व्यप्रस्तुत विशेषसे प्रतीमान प्रस्तुत सामान्य-

का आक्षेप होता है] तब भी सामान्यके प्राधान्य होनेपर, सामान्यमें ही समस्त

विशोषोंका अन्तर्भाव होनेसे विशेषका भी प्राधान्य होता है । निमित्तनिमित्तिमावमें भी

यही नियम लागू होता है ।

जब साधस्यमात्रसूलक अप्रस्तुतप्रशंसामें प्रकृत और प्रकृतंका सम्बन्ध होता

है तब भी अभिधीयमान अप्रस्तुत तद्य पदार्थका प्राधान्य विधक्षित होनेकी दशामें

[वस्तु] ध्वनिमें अन्तर्भाव हो जायेगा । अन्थथा [प्राधान्य न होनेपर] ही अलंकार होगा ।

१. 'अभिधीयमानस्य अप्रस्तुतस्य प्रतीमानेन प्रस्तुतेनाभिसम्बन्धस्तदा' इतना पाठ नि०में नहीं है ।

२. 'तस्य' नि० दी० ।

३. 'कार्यकारणभावे' क्वी० ।

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ध्वन्यालोक:

तदय मन्त्र संक्षेप: !

  1. ये तीनों कारिकाएँ वहीं, संग्रह या परिकरालोक हैं । इसलिपे इनपर दृष्टि भी नहीं है । नित० सा० तथा दी० में इधर १५, १५, १६ कारिकासङ्ख्या डाली गयी है, जो उचित नहीं है ।

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कारिका १२ ] प्रथम उद्योत:

'सूत्रभिः कथितः' इति विद्दुपलक्ष्येयुक्तिः, न तु यथाकथश्चित् प्रष्टुंक्षेति प्रतिपाद्यते ।

प्रथमे हि विद्वांसी वैयाकरणाः, व्याकरणमूलत्वात् सर्वविद्यानाम् । ते च श्रूयमाणेषु वर्णेषु ध्वनिरिरिति व्यवहरन्ति । तथैवानुयैस्तन्मताहुसारिमिः काव्यतस्त्वार्थदर्शिभिरवाच्य-वाचकसंनिम्रशः शब्दार्था कान्वमिति व्यवदेक्ष्यो व्यञ्जकत्वसाम्याद् ध्वनिरितियुक्तः ।

न चैवंविधस्य ध्वनेर्नैकेक्यमाणप्रेमेदतद्भेदसङ्कलनया महाविषयस्य यत् प्रकाशनं 'तद्भेदसङ्कलनैरविग्रोष्ठितप्रतीपादने' तुल्यमात्रे तद्र्विवृतत्वचचत्वात् युक्तं एवञ्च श्रुतिकथविदिष्ट्योकलुथितशेमुषीक्त्वमाविष्करणीयम् । तदेवं 'ध्वनिरभाववादिनः प्रत्यूक्ता ।

ध्वनिसिद्धान्तका आदि मूल

'सूत्रभिः कथितः' [कारिका सं० १२ के इस वचन] से यह [ध्वनिप्रतिपादनपरक] उक्ति [ध्वनिवाद] विद्वन्मतमूलक है, यों ही [अग्रामाणिक स्वकल्पित रूपसे] प्रवालित नहीं हो गयी है यह सूचित किया है ।

'विद्धदृश्य उपचाः, प्रथम उपक्रमो ध्वानं वा यस्ता उक्तेः सा" इस प्रकार बहुव्रीहि समास ही करनेते तत्पुरुषसमास्याश्रित 'उपशोभक्रमे तद्वाच्याचिस्यासायाम्' [अ० २, ४, २१] सूत्रते नपुंसकत्वका अवकाश नहीं रहता । अन्यथा तत्पुरुष समास करनेपर तो 'विद्धदृश्यो' यह स्त्रीलिङ्गप्रयोग न होकर 'विद्धदुपरम' यह नपुंसकलिङ्ग प्रयोग ही होगा । अतः यहाँ बहुव्रीहि समास ही करना चाहिये ।

प्रथम [सर्वसे मुख्य] विद्धान् वैयाकरण हैं, क्योंकि व्याकरण सब विद्याओंका मूल है । वे [वैयाकरण] सुनाई देनेवाले वर्णोंको ध्वनि कहते हैं । उसी प्रकार उनके मत-को माननेवाले काव्यतत्त्वार्थदर्शी अन्य विद्वानोंने भी १. वाच्यार्थ, २. वाचक, [समिम्रश्शयते विमावालुभावसंवलनयेत समिम्रशः व्यङ्गच्यार्थः] ३. व्यङ्गच्यार्थ, [शब्दनं शब्दः तदात्मा व्यञ्जनरूपः शब्दव्यापारः] ४. व्यञ्जनाव्यापार, और ५. काव्य पदसे व्यवहाय्र्य[अर्थात् काव्य, इन पाँचों] को ध्वनि कहा है । ['ध्वनतीति ध्वनिः' इस व्युत्पत्तिसे वाचकशब्द

व्युत्पत्तिसे व्यञ्जनाव्यापारको और 'ध्वनयतेऽस्मिन्निति ध्वनिः' इस व्युत्पत्तिसे पूर्वोक्त-ध्वनिच्चुतद्र्ययुक्त काव्यको ध्वनि कहते हैं । यह व्याख्या लोचनकारके अनुसार है ।

ध्वनिके अभाववादके खण्डनका उपसंहार

इस प्रकारके और आगे कहे जानेवाले भेद-प्रभेदके सङ्कलनसे अत्यन्त व्यापक [महाविषय] ध्वनिका जो प्रतिपादन है वह केवल अप्रसिद्ध अलङ्कारविरोषोंके प्रति-पादनके समान [नगण्य] नहीं है इसलिये उसके समर्थकोंका उत्साहातिरेक उचित ही है । उनके प्रति किसी प्रकारकी ईर्ष्याकलुषित वृत्ति प्रदर्शित नहीं करनी चाहिये ।

इस प्रकार ध्वनिके अभाववादियों [१. पृ० पाँचपर कहे हुए 'तदलङ्काराविद्यवाचिकः कोऽयं ध्वनिरभिधेयः' स० पृ० छःपर कहे हुए 'तत्समयान्तःपातिनः सहृदयहृदयकाङ्क्षित्परिकलिप्यचिदनुप्रविष्टामव-कल्प्य तत्वसिद्धथ' इत्यादि-]

१. 'तदङ्ग्र प्रसिद्धा' नि०, टी० ।

२. 'ध्वनेस्तावदभाववादिनः' नि०, टी० ।

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ध्वन्यालोक:

लस्बते' इत्यादि और भी. पृ० ६३:पर कहे हुये 'तेषामन्यतमस्यैव वा पूर्वसमाध्यामात्रकरणे यत्किञ्चन कथनं स्थात्' इत्यादि अभागवाद्री तीनों पक्षों]का निराकरण हो गया ।

प्रथम विद्वान् वैशाकरण श्रौयमाण वर्णाँको ध्वनि कहते हैं इसलिए उनके अनुयायी आळ-कारिकों ने ध्वनि शब्दका प्रयोग किया है। यहाँ वैशाकरणोंके साथ जो आळङ्कारिकोंका सैद्धान्तिक मतभेद प्रदर्शित किया है उसके स्पष्ट रूपसे समझनेके लिये वैशाकरणोंके 'स्फोटवाद' और उसके साथ शब्द

तथा उसके अर्थबोधकी सारी प्रक्रियाका समझना आवश्यक है। इसलिए संक्षेपमें उसका उल्लेख यहाँ कर रहे हैं।

शब्द जिसका हम कानोसे सुनते हैं उसके तीन कारण वैशेषिकदर्शनमें माने गये हैं—१. संयोग, २. विभाग और ३. शब्द । शब्दका आश्रय आकाश है, उसका मुख्य श्रोत्रेन्द्रियसे होता है, और संयोग या विभाग अथवा शब्द इनमेंसे किसी एकसे उसकी उत्पत्ति होती है । ध्वण्टा या मेरीके

वजानेसे जो शब्द पैदा होता है वह 'संयोगज' शब्द है। उसकी उत्पत्ति घण्टा और मुठरी अथवा मेरी और दण्डके संयोगसे होती है। बाँस या कागज आदिके फाड़नेसे जो शब्द उत्पन्न होता है वह 'विभागज' शब्द है, वाँसेके दलदल या कागजके दोनों खण्डोंके विभागसे उसकी उत्पत्ति होती है। इस प्रकार प्रातम्भिक शब्दकी उत्पत्ति तो संयोग या विभाग इन दो ही कारणोंसे होती है ।

परन्तु वह प्रातम्भिक शब्द हमको सुनाई नहीं देता । ध्वण्या विद्वानोंमें बजता है, हम आश्रममें बैठे हैं। इस देशमेंके कारण उस प्रथमोत्पन्न ध्वनिको हम साक्षात् नहीं सुनते हैं । उस शब्दसे वायु-मणडलमें क्रमिक शब्दधारा उत्पन्न होते-होते जो शब्द हमारे श्रोत्रेन्द्रियमें आकर उत्पन्न होता है वह शब्द हमको सुनाई देता है। आत्य शब्द या बीचक शब्द सुनाई नहीं देते । घण्टेका शब्द सुना, यह

प्रतीति सादृश्यके कारण होती है।

इस शब्दधारा में प्रथम शब्दके बाद जितने भी शब्द उत्पन्न होते हैं वे सब 'ध्वनिजन' शब्द हैं। इस शब्दधाराकी प्रगतिके विषयमें दो प्रक्रारके मत हैं, एक 'वीचीतरङ्गन्याय' और दूसरा 'कदम्-मुकुलन्याय' नामसे कहा जाता है। जिस प्रकार तालाबमें एक कंकड़ डाल देनेसे उसमें लहरें उत्पन्न

हो जाती हैं, प्रारम्भमें वह लहर एक बहुत छोटा-सा गोलाकार चक्र बनाती है जो बढते-बदते सारे तालाबमें व्याप्त हो जाता है; उसी प्रकार प्रथम शब्दसे उसके उत्पत्तिस्थानके चारों ओर एक शब्द-तरङ्गका चक्र उत्पन्न होता है जो बढते-बदते सुदूरवर्ती आकाशक्षेत्रतक व्यापक हो जाता है। और

जहाँ-जहाँ उस शब्दको ग्रहण करनेका उपकरण श्रोत्रयन्त्र अथवा रेडियो आदि अन्य यन्त्र होता है वहाँ-वहाँ वह शब्द सुनाई देता है। यह 'वीचीतरङ्गन्याय' हुआ, इसमें सब दिशाओंमें उत्पन्न होनेवाली शब्दधारा परस्परसंबद्ध और एक है।

दूसरा 'कदम्बमुकुलन्याय' है। कदम्बमुकुलन्यायका अर्थ है कलमकी कली । इस कलमके केन्द्रस्थ इन्द्रियाँस्थानमें एक नन्हीं-सी कील जैसी रहती है। फिर उस केन्द्रबिन्दुके चारों ओर उसी

प्रकारका अवयवोंका एक वृत्त बन जाता है। इसी प्रकार यह वृत्त बढता हुआ सारे कदम्बमुकुलमें व्याप्त हो जाता है। यही शब्दध्वनिकी स्थिति है। इसको 'कदम्बमुकुलन्याय' कहते हैं। इन दोनों

न्यायोंमें अन्तर यह पडता है कि 'वीचीतरङ्गन्याय'के अनुसार सब दिशाओंमें चलनेवाली शब्दधारा एक है और 'कदम्बमुकुलन्याय'में सब कीलोंके अलग-अलग व्यक्तित्वके समान सब ओर उत्पन्न

होनेवाले शब्द अनेक हैं।

यह शब्दके सुननेकी प्रक्रिय हुई। इस प्रक्रियासे जिस समय उस शब्दधारााका हमारे श्रोत्रसे

संपर्क होता है उस समय हमको शब्दका ग्रहण होता है। फिर जब शब्दधारा आगे बढ

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कारिका १२ ] प्रथम उद्योत: ५५

अस्ति ध्वनि: । स चाविवक्षितवाच्यो विवक्षितान्यपरवाच्यश्चेति द्विविध: सामान्यान्य । तत्सिद्ध्योदाहरणम्—

ध्वनिके दो मुख्य भेद

[इसलिए] ध्वनि है वह सामान्यानतः अविवक्षितवाच्य [अभिधामूल] भेदसे दो प्रकारका होता है । उनमेंसे प्रथम [अविवक्षितवाच्य, लक्षणामूल ध्वनि] का उदाहरण यह है—

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कारिका १२ ] प्रथम उद्योतः

अस्ति ध्वनि: । स चाविवक्षितवाच्यो विवक्षितान्यपरवाच्यश्चेति द्विविध: सामान्येन । तत्रावस्थ्योदाहरणम्—

जाती है तब हमको शब्दका सुनाई देना बन्द हो जाता है। इसी को शब्दको अनित्य माननेवाले नैयायिक आदि शब्दका नाशा और नित्यातवादी वैयाकरण आदि तिरोभाव कहते हैं। इसलिए शब्द भाश्रयुत्तर विनाशी अथवा तिरोभावी है, क्षणिक है। ऐसी दशामें तीन-चार वर्णोसे मिलकर बने हुए घट:, पट: इत्यादि शब्दोंमें प्रत्येक वर्ण सुनाई देनेके बाद अगिले क्षणोंमें नष्ट या तिरोभूत हो जानेसे सबका एक समुदायरूपमें इकट्ठा होना सम्भव नहीं है। इसलिए अनेक वर्णोंके समुदायरूप पद और अनेक-पदोंके समुदायरूप वाक्य आदिका निर्माण भी नहीं हो सकता। फिर उनके अर्थबोध कैसे होगा, यह एक प्रश्न है। इसके समाधानके लिए प्राचीन शब्दशास्त्री वैयाकरणोंने ‘स्फोटवाद’की कल्पना की है। ‘स्फोट’ शब्दका अर्थ है ‘स्फुटित: अर्थ: यस्मात् स स्फोट:’ जिससे अर्थ स्फुटित होता है, अर्थकी प्रतीति होती है उसको ‘स्फोट’ कहते हैं। इस सिद्धान्तके अनुहार अर्थकी प्रतीति सुनाई देनेवाले वर्णोंसे नहीं होती, क्योंकि उनके क्रमिक और आभ्यंतर विनाशी अथवा तिरोभावी होनेसे उनके वर्णोंते नहीं होते, क्योंकि उनके क्रमिक और आभ्यंतर विनाशी अथवा तिरोभावी होनेसे उनके समुदायरूप ‘घट’ ही नहीं बन सकते। इसलिए इन श्रोणिमान वर्णोंसे ही, जिनको ध्वनि भी कहते हैं और नाद भी, पूर्वपूर्ववर्णोंजनितसंस्कारसहकृतचरमसंवर्णप्रविणसे सद्दृद तिरोभूत समस्त वर्णोंको ‘अहण’ करनेवाली सदानदनित्येकवर्णावगाहिनी पदप्रतीति होती है। अर्थात् बुद्धिमें समस्त वर्णोंका समुदायरूप एक नित्य शब्द अभिव्यक्त होता है। इसको वैयाकरण ‘स्फोट’ कहते हैं। इस्सीसे अर्थकी प्रतीति होती है। वैयाकरण जन शब्दको नित्य कहते हैं; तब उसका अभिप्राय इस्सी ‘स्फोट’ रूप शब्दकी नित्यता से होता है। इस्सी प्रकार अनेक पदोंके समुदायरूप ‘वाक्यस्फोट’की अभिव्यक्ति पदों द्वारा होती है। वैयाकरणोंने १. वर्णस्फोट, २. पदस्फोट, ३. वाक्यस्फोट, ४. अखण्ड-पदस्फोट, ५. अखण्डवाक्यस्फोट, ६. वर्ण, ७. पद, ८. वाक्यगत तीन प्रकारके जातिस्फोट इस प्रकार आठ तरहके स्फोटोंका वर्णन ‘वैयाकरणभूषण’ आदि ग्रन्थोंमें विस्तारपूर्वक किया है। उन सबका मूल महर्षि पतंजलिका ‘महाभाष्य’ और भतृहेरिका ‘वाक्यपदीय’ ग्रंथ है।

आलंकारिकोंने वैयाकरणोंके ‘ध्वनिशब्दका प्रयोग इस आधारपर लिया है कि वैयाकरण उन वर्णोंको ध्वनि कहते हैं जो ‘स्फोट’को अभिव्यक्त करते हैं, अर्थात ‘ध्वनितीति ध्वनि:’ इस व्युत्पत्तिके आधारपर वाच्यवाचकत्वे मिल्ल व्यज्जक अर्थको बोधन करनेवाले शब्द, और उसीके आधारपर काव्यप्रकाशकारने, ‘बुद्धेधैयाकरणे: प्रधानभूतस्फोटरुपव्यङ्गचवयकलक्षण शब्दस्य ध्वनिरिति व्यवहा: कृत:,

तत्स्तन्मतानुसारिभिरतैरपि न्यायभाषितवाच्यैव्यञ्जकव्यञ्जनक्षमस्य शब्दार्थयुगलस्य लिखा है। [इस प्रकार मुख्य रूपसे १. शब्द, २. अर्थके लिए और फिर ३. व्यंजनाव्यापार, ४. व्यज्जक्य अर्थ, तथा ५. व्यज्जयप्रधान काव्यके लिए ‘ध्वनि’ शब्दका व्यवहार होने लगा। अतएव ध्वनिवाद स्वकल्पित नहीं अपितु पाणिनि-पतञ्जलि-सिद्ध सद मुनियोंके मतके आधारपर आश्रित है।

ध्वनिके दो मुख्य भेद

[इस्लिए] ध्वनि है। वह सामान्यतः अविवक्षितवाच्य [लक्षणामूल] और विवक्षितान्यपरवाच्य [अभिधामूल] भेदसे दो प्रकारका होता है। उनमेंसे प्रथम [अविवक्षितवाच्य, लक्षणामूल ध्वनि] का उदाहरण यह है—

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ध्वन्यालोक:

लोचनकार

सुवर्णपुष्पां पृथिवीं चिन्वन्ति पुरुषा:श्रूयते । कृतविद्याश्र यथा जानाति सेवितुम् ॥

द्वितीयस्यापि— शिखरिणी क तु नाम कियदिरं किमविघानमसाकरोत्पः । सुमुखि येन तवादरपाटलं दशाति बिम्बफलं शुष्कशावकः ॥१३॥

सुवर्णं जिसका पुष्प है ऐसी पृथिवीका चयन [अर्थात् पृथिवीको रूप] लताके सुवर्णरूप पुप्पोंका चयन [चयन] तीन ही पुरुष करते हैं—शूर, चित्तान और जो सेवा करना जानता है।

इस श्लोककी व्याख्यामें लोचनकारने 'सुवर्णानि पुष्पतीति सुवर्णपुष्पा' यह व्याख्या की है । वह चिन्त्य है । इस विग्रहमें 'कर्म' सुवर्ण उपपद रहते नामधातुसे 'कर्मण्यण्' सूत्रसे अण् प्रत्यय और उसके प्रभावसे 'टिड्ढाणञ्' इत्यादि सूत्रसे डीप् होकर 'सुवर्णपुप्पी' प्रयोग बनेगा, 'सुवर्णपुष्पा' नहीं । इसलिए उसका विग्रह 'सुवर्णमेव पुष्पं यस्याः सा सुवर्णपुष्पा' इस प्रकार करना चाहिये । हमने इसी विग्रहको मानकर अर्थ किया है । लोचनग्रन्थको अर्थप्रदर्शना-नाटकमात्र मानकर, न कि विग्रह मान कर कदर्थित् उपपादन करना चाहिये ।

यहाँ न तो पृथिवी कोई सत्ता है, न सुवर्ण पुष्प और न उसका चयन ही हो सकता है अतः 'सुवर्णपुष्पा पृथिवीका चयन' यह वाक्य यथाश्रुतरूपमें अन्वित नहीं हो सक्ता, इसलिए मुख्यार्थबाध होनेसे लक्षणा द्वारा विग्रह धन और उसके आनायासोपार्जनसे सुलभ सुवृद्धिसम्भारभाजनताको व्यक करता है । लक्षणाका प्रयोजन, शूर, कृतविद्य और सेवकोंका प्राधान्य, स्वादसे वाच्य न होकर गौण्यमान कामिनी-रुचकलकशवत् सैन्यद्योतिहयारूपसे ध्वनित होता है । लक्षणामूल होनेसे इसको 'अतिवक्षित-वाच्यध्वनि' कहते हैं । यहाँ यदि अभिहितान्वयवादियोंकी तात्पर्या शक्तिको भी माना जाय तो अभिधा, तात्पर्या, लक्षणा, व्यञ्जना ये चारों अन्यथा तीनों वृत्तियाँ व्यापार करती हैं ।

दूसरे [निरक्षितन्यपरवाच्य, अभिधामूलध्वनि]का भी [उदाहरण देते हैं] हे सुमुखि ! इस शुष्कशावकने किस पर्यंतपर, कितने दिनौंतक, कौन-सा तप किया है, जिसके कारण तुम्हारे अधरके समान रक्तवर्ण विम्बफलको काट [नेका सौभाग्य—पुन्योदयतिशयलभ्य सौभाग्य—प्राप्त कर] रहा हूँ ॥१३॥

श्लोकमें 'तवादरपाटलं' में 'तव' पदका असमस्त स्वतन्त्र पदके रूपमें प्रयोग किया है। 'तद्वारपाटलं' पदका समस्त प्रयोग नहीं किया है । इसे कुछ लोग केवल छन्दके अनुरोधसे किया हुआ प्रयोग मानते हैं, परन्तु वह वास्तमें ठीक नहीं है । यहाँ अधरके साथ त्वत् पदार्थ अत्यन्त सम्बोधित की जानेवाली नायिकाका सम्बन्ध प्राधान्येन बोष्धन करना अभीष्ट है । यदि 'त्व' पदको समासमें डाल दिया जाय तो वह अधरपदार्थका विशोषणमात्र हो जानेसे प्रधान नहीं रहेगा । उसको असमस्त रखनेका अभिप्राय यह है कि जैसे 'अरण्या गवा' सौक विशोषणगभूत आरण्यका साङ्ख्यतासम्बन्धशते कदर्थते भी सम्बन्ध हो जाता है । अथवा 'धनवान् सुश्री' इस लौकिक वाक्यमें वान् इस मतुप् प्रत्ययर्थमें अन्वित धनशब्दका प्रयोज्यत्वसम्बन्धेऽपि सुलके साथ भी अन्वय होकरं अर्थबोष होता है । इसौ प्रकार अर्थान्वित त्वत् पदार्थका प्रयोजनत्वसम्बन्धेऽपि विम्बफलकर्मक-अर्थबोष होता है ।

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कारिका १९ ] प्रथम उद्योत:

यदि भक्तिर्

यद्यप्युक्तं भक्तिर्

वाच्यवाचकाभ्यां तात्पर्येण प्रकाशनं यत्र व्यङ्ग्य-व्यप्राधान्ये स ध्वनि:

तदन्वये साध्य भी अवलम्बन होकर तुमको अधरारूपी ललाटके ललाम गर्वित विभ्रमफालका तुम्हारे सम्भ्रमनेत्र ही, मुख्यतः तुमके लक्श्मेमें रसकर ही दर्शन कर रहा है, यह अर्थ विवक्षित है। इसलिए 'तत्' इस अंशमे पदका प्रयो

ग किया है। 'दर्शति'का अर्थ औदारिक अर्थात पेटूके समान खा जाना नहीं अपितु रसास्वाद करना है। शुककाव्यकी उचित तारुण्यकालपर उसकी प्राप्ति और रसज्ञता यह सत् पुण्यातिशयालभ्य है यह अर्थ और इसके साथ अनुरागकी स्वाभिप्रायव्यापन व्यज्ज्य है। यहाँ अभिधा, तात्पर्या और व्यञ्जना इन तीन वृत्तियोंोंके ही व्यापार होते हैं। वीचमें मुख्यार्थ-वाच्य न होनेसे लक्षणाकी आवश्यकता नहीं होती। अथवा इस आकारसक प्रश्नकी असझति मानकर यदि लक्षणाकी भी उपयोग किया जाय तो फिर यहाँ भी पूर्वश्लोकके समान चार व्यापार हो जायेंगे। फिर भी इसको पूर्वोल्लखणामूलक अविवक्षितवाच्यव्यञ्जनसे भिन्न इस आधारपर किया जायगा कि पूर्व उदाहरणमें केवल लक्षणा ही ध्वननव्यापारमें प्रधान सहकारिणी थी और यहाँ चतुर्दशेऽपि व्यङ्ग्यकी प्रतीति होनेसे अभिधा और तात्पर्या शक्ति मुख्य सहकारिणी हैं। लक्षणाका तो नाममात्रका उपयोग होता है।

नीचमें ध्वनिभेद दिखलानेका प्रयोजन

ग्रन्थारम्ममें प्रथम कारिकामें १. अभाववादी, २. भक्तिवादी और ३. अलक्षणीयतावादी ध्वनिविरोधी तीन पक्ष दिखलाये थे। उनमेंसे यहींतक अभी अभाववादी प्रथमपक्षका खण्डन किया गया है। 'ध्वनेस्तावद्भाववादिनः प्रत्यूक्तः' अभाववादियोंके खण्डनके बाद 'भक्तिमाहुस्तमन्ये' इस सिद्धान्तका खण्डन करना चाहिये था। उसको न करके ग्रन्थकार ध्वनिके अविवक्षितवाच्य और विवक्षितान्यपरवाच्य भेदका प्रतिपादन करनेमें लग गये। इसका कारण यह है कि इन उदाहरणोंके आधारपर भक्तिवाद और अलक्षणीयतावादका खण्डन सुकर होगा। भत् इन उदाहरणोंके बाद उन दोनो मतोंका खण्डन करेंगे॥१२३॥

दूसरे 'भक्तिमाहुस्तमन्ये' इस पक्षके प्रथम विकल्प अमेदवादका खण्डन— जो यह कहा था कि भक्ति ध्वनि है उसका समाधन करते हैं—

यह उक्त [रागादि, अर्थ, व्यञ्जना-व्यापार, व्यङ्ग्यार्थ और काव्य इन पाँचों मेद-वाला] ध्वनि, [भक्ति या लक्षणा]से मिश्ररूप होनेके कारण भक्ति-[लक्षणा] के साथ अमेद-[एकत्व]को प्राप्त नहीं हो सकतें है। यह उक्त प्रकारका [पञ्चविध] ध्वनि [लक्षणा]से मिश्ररूप होनेके कारण 'भक्ति' [लक्षणा]से अभिन्न नहीं हो सकत। वाच्यार्थसे मिश्र अर्थको व्यङ्ग्यव्यका प्राधानय होते हुये, जहाँ वाच्यवाचक द्वारा तात्पर्यरूपसे प्रकाशित किया जाता है उसको 'ध्वनि' कहते हैं। और भक्ति तो केवल उपचारका नाम है [ अतः 'ध्वनि' 'भक्ति'रूप नहीं हो सकता है, उससे भिन्न है]।

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ध्वन्यालोक:

'अभाववाद'के समान 'भक्तिवाद'के भी तीन विकल्प करके उसका खण्डन करेंगे। उनमें पहला विकल्प यह है कि जब पूर्वपक्षी 'भक्ति'को 'ध्वनि' कहता है तो क्या भक्ति और ध्वनि शब्दको घट, कलश आदिके समान पर्यायवाचक मानकर दोनोंका अभेद-प्रतिपादन करना चाहता है? दूसरा विकल्प यह है कि क्या वह भक्तिको ध्वनिका लक्षण कहना चाहता है? अथवा 'काकवद् देवदत्तस्य गहम्'के समान भक्तिको ध्वनिका उपलक्षण मानता है? यह तीसरा विकल्प है।

इतरत्रावतक् अथवा अन्य समानजातीय और असमानजातीय पदार्थोंसे भेद करनेवाले अशाधारण धर्मको 'लक्षण' कहते हैं। जैसे गन्धवत्त्व पृथिवीका लक्षण है। 'गन्धवती पृथिवी'—यह गन्धवत्त्व धर्म पृथिवीमें रहता है, परन्तु उसको छोड़कर उसके समानजातीय या असमानजातीय और किसी भी पदार्थमें नहीं रहता है इसलिए वह पृथिवीका लक्षण होता है। पृथिवी द्रव्य है। उसके समानजातीय

अप, तेज, वायु, आकाश, काल, दिक्, आत्मा और मन ये आठ द्रव्य और नवाँ पृथिवी, इस प्रकार कुल नौ द्रव्य विशेषोंमें माने गये हैं। उनमें पृथिवीको छोड़कर और किसीमें गन्धवत्त्व नहीं रहता [जल या वायुमें जो सुगन्ध-दुर्गन्ध प्रतीय होता है वह पार्थिव परमाणुओंके सम्बन्धसे ही होता है]। इसी प्रकार पृथिवीके असमानजातीय गुण, कर्म, सामान्य, विशेष, समवाय आदि पदार्थ वैशेषिकोंने माने हैं। उनमें भी गन्ध नहीं रहता, इसलिए गन्धवत्त्व पृथिवीके समानजातीय और असमानजातीय पदार्थोंसे भिन्न करनेवाला पृथिवीका असाधारण धर्म होता है। इसीको 'लक्षण' कहते हैं।

'लक्षणन्त्वसाघारणधर्मोंवचनम्।' समानासमानजातीयश्चे भेद करना ही लक्षणका प्रयोजन है—'सामाना-विशेषोण' वतमानो व्यावर्त्तक धर्म होता है और अवर्तमान व्यावर्त्तक धर्मको 'उपलक्षण' कहते हैं। जैसे 'काकवद् देवदत्तस्य गहम्' यहाँ काकवत्त्व देवदत्तके गृहका लक्षण या विशेषण नहीं अपितु 'उपलक्षण' है। इसका अभिप्राय यों समझना चाहिये कि कभी दो आदमी साथ-साथ कहीं गये।

एक मकानपर उन्होंने बहुत कौए से बैठे देखे जिसके कारण उनका ध्यान उस ओर गया। वह अपने घर चले आये। पीछे किसी दिन उनमेंसे एक आदमीको देवदत्तके घरका परिचय देनेकी आवश्यकता पड़ी। उस समय यह वाक्य प्रयुक्त किया गया है। उसका अभिप्राय यह है कि जिस घरपर कौए बैठे थे वही देवदत्तका घर है। यहाँ जिस समय यह वाक्य देवदत्तके घरका परिचय करा रहा है उस समय उपर कौए न बैठे होनेपर भी यह 'काकवद्' पद देवदत्तके गृहका अन्य वृत्तोंसे विभेदबोध कराता है। इस प्रकार वर्तमान व्यावर्त्तक धर्मको 'विशेषण' तथा अवर्तमान व्या- वर्त्तक धर्मको 'उपलक्षण' कहते हैं।

'उपचारात् मति:'कें 'उपचार' शब्दका अर्थ गौण प्रयोग है। जो शब्द जिस अर्थमें सद्द्बद्ध है उस अर्थको छोड़कर उससे सम्बद्ध अन्य अर्थको बोधन करना 'उपचार' कहाता है और व्यक्तार्थका जहाँ प्राधान्य होता है उसे 'ध्वनि' कहते हैं। इस रूपमेंके कारण 'ध्वनि' और 'भक्ति' अभिन्न नहीं हो सकते। यह प्रथम विकल्पका खण्डन हुआ।

भक्तिवादके द्वितीय विकल्प लक्षणवादका खण्डन

ध्वनिको 'भक्त' माननेवाले पक्षके तीन विकल्प करके उनका खण्डन किया गया है। इनमेंसे पहिले भक्ति और ध्वनिका अभेद माननेवाले विकल्पका खण्डन तो 'भक्त्या विभ्रान्त नैष्कतम्' इत्यादि कारिकाके पूर्वार्द्धसे हो गया। तीसरे 'उपलक्षण' पक्षके विषयमें आगे १९ वीं कारिकामें कहेंगे। इस समय भक्तिको ध्वनिका लक्षण माननेवाले द्वितीय [१४-१८ कारिकातक] विकल्पका खण्डन प्रारम्भ करते हैं—

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कारिका १४ ] प्रथस उद्योत:

'मा चैतत् स्याद् भक्तिलक्षणं ध्वनेरित्याह—अतिव्याप्तेरथाव्याप्तेर्नैव चासौ लक्षणं तया ॥१४॥

'नैव भक्त्या ध्वनिलक्षणं यते । कथम् ? अविव्याप्तेरव्यासेक्रव । तत्रातिव्याप्तिरस्याऽपि शब्दवृत्तेर्नि च्छ-विरक्षेपि विषये भक्ते: सम्भवात् । यत्र हि 'व्यञ्जकवृत्तं महत् सौष्ठवं नास्ति तत्राप्युप-चरितशब्दवृत्त्या प्रसिद्ध-यनुरोधप्रवृत्तिनिमित्तवधारः कवयो हरयन्ते । यथा—

प्रमाणम्

प्रमाणनिरूपणसङ्ग्रहदूषणम्;

तन्नोर्मध्येsस्यास्त: परिमितनमप्राप्तं हरिणम् । इदं वचस्तन्यासं 'इल्यथमुजलताक्षेपवलने:', वृक्षाग्रस्था: सन्तपं वदति विसिनिपत्रशयनम् ॥

यहाँ भक्ति ध्वनिका लक्षण भी नहीं हो सकती है, यह कहते हैं—अतिव्यासि और अव्यासिके कारण 'ध्वनि' भक्तिसे लक्षित भी नहीं हो सकता है ॥१४॥

'भक्ति' ध्वनिका लक्षण भी नहीं हो सकती । क्यों ? अतिव्यासि और अव्यासिके कारण । उसमें अतिव्यासि इसलिए है कि 'ध्वनिसे भिन्न विषयमें भी 'भक्ति' [लक्षणा] हो सकती है । जहाँ व्यङ्गच-चके कारण विशेष सौन्दर्य नहीं होता वहाँ भी कवि, प्रसिद्धिवशात्, उपचार या गौणी शब्दवृत्तिसे व्यव हार करते हुए देखे जाते हैं । जैसे—कमलिनीपात्रोंका यह राग [सागरिका]के पीन स्तन और जघनके संसर्गसे दोनों और मलिन हो गया है और शरीरके बीचके [कमर] भागका पत्तोंसे स्पर्श न होनेके कारण [शुष्का] वह भाग हरा है । शिथिल भुजाओंके इधर-उधर फेंकनेके

कारण इसकी रचना यस्त-व्यस्त हो गयी है । इस प्रकार यह कमलिनीपत्रकी शाख्या [सागरिका]के सन्तापको कह रही है ।

यहाँ 'रत्नावली' नाटिकामें सागरिका के मदनशल्याको छेड़कर स्त्राकुञ्चसे चले जानेके बाद राजा और विदूषकके उस कुशमें प्रवेश करनेपर उस मदनशल्याकी अवस्थाको देखकर विदूषकके प्रति राजाकी उक्ति है । उसमें राजा ध्वव्याका वर्णन कर रहा है ।

यहाँ 'वदति' का अर्थ प्रकट करना है, यह बात स्पष्ट है । इस अगूढ़ बातको यदि 'वदति' पदसे लक्षणासे कहनेके बजाय 'प्रकटयति' पदसे अभिधा द्वारा प्रकट किया जाता तो भी कोई अचारत्न नहीं होता । और अब लक्षणा द्वारा कहनेसे उसमें कोई आधिक चारुत्व नहीं हो गया ।

इस प्रकार यहाँ व्यङ्गचप्रधान्यरूप ध्वनिके न होनेपर भी 'वदति' पदमें लक्षणारूप भक्तिका आश्रय लिया गया है । अतएव भक्तिके ध्वनिसे मिन्न स्वानपर अतिव्यासि होनेसे वह ध्वनिका लक्षण नहीं हो सकती है ।

१. तत्रेतत् ।

२. 'न च' नि०, दी० ।

३. 'व्यञ्जकवृत्तं' नि० ।

४. 'प्रशिथिलमुजलाक्षेपवलने:' नि० ।

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ध्वन्यालोक:

तथा—

जुम्बिज्जइ सअहुतं अवरानिज्जइ सहस्सहुत्तम्मि । विरमिअ पुणो रमिज्जइ पिओ जणो णत्थि पुनरुक्तं ॥ [जुम्बत्ये शतक्रतोडवरुच्यते सहस्रकृत्वः । विरस्य पुना रम्यते प्रियो जने नास्ति पुनरुक्तम् ।] इति छाया

तथा—

कविआओ परसच्चाओ ओरणणमुहिओ विहसमाणाओ । जइ गहिओ तइ हिअअँ हरन्ति उच्छिन्नतमहिलाओ ॥ [कविता: प्रसन्ना अवरुदितमुल्यो' विहसन्न्य: । यथा गृहीतास्तथा हृदयं हरन्ति स्वैरिण्यो महिलाः ।] इति छाया

तथा—

अज्जाए पहारो णावलदाए दिसणो पिएण घणबन्धे । मिज्जो वि दूसहो जाओ हिअए सवत्तीणमू ॥ ["आर्याया: प्रहारो नवलतया दत्तः प्रियेण स्तनपृष्ठे । मृदुरपि दुस्सह इव जातो हृदये सपत्नीनाम् ।] इति छाया

इसी प्रकार—

प्रियजनको सैकड़ों वार चुम्बन करते हैं, हजारों वार आलिङ्गन करते हैं । रक-रेक कर वार-वार रमण किया जाता है फिर भी पुनरुक्त [अरुचिकर] नहीं प्रतीत होता । यहाँ पुनरुक्त, अर्थ तो असम्भव है, इसलिए पुनरुक्त पदसे अनुपादेयता—अरुचिकरता लक्षित होती है । यहाँ भी व्यङ्ग्यप्राधान्यरूप ध्वनि न होनेपर भी पुनरुक्त पदसे लक्षगा द्वारा अनुपादेयता या अरुचिकरता अर्थ लक्षित होनेसे अतिव्याप्ति के कारण भक्ति ध्वनिका लक्षण नहीं हो सकती ।

इसी प्रकार—

स्वैरिणी स्त्रियाँ नाराज या प्रसन्न, हँसती हुई या रोती हुई, जैसे भी देखो [सभी रूपमें] वह मनको हरण कर लेती हैं । यहाँ 'गृहीता' पदसे उपादेयता और 'हरण' पदसे उनकी अधीनता लक्षगा द्वारा बोधित होती है । परन्तु ध्वनिका अव्सर न होनेसे यहाँ भी अतिव्याप्ति है । अतः भक्ति ध्वनिका लक्षण नहीं हो सकती है ।

इसी प्रकार—

नयी नवेली होनेसे कान्तिआ भार्याके स्तनोंपर दिया हुआ प्रिय [नायक] का स्खुड प्रहार भी सपत्नियॉंके हृदयके लिप डुस्सह हो गया ।

१. 'घणबन्धे' नि० ।

२. 'भार्याया:', 'बालप्रियाया:', 'कान्तभार्याया:' द्वि० नि०।

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प्रथम उद्योतः

कारिका १५ ]

तथा—

परार्थे य: पीडामनुभवति भृत्येऽपि मधुरो

यदि य: सर्वेषामिह खलु विकारोऽप्यभिमतः ।

न सम्प्राप्तो वृद्धि यदि स श्रूयमाणे पतितः

किमक्षोद्भसोऽपि न पुनर्गुणाया मरुसुतः ॥

अत्रैकपक्षेऽन्यपक्षेऽनुभवतिशब्दः ।

न चैवंविध: कदाविदपि ध्वनेर्विषयः । १४॥

यतः—

उक्त्यन्तरेणाशक्यं यत् तच्चारुत्वं प्रकाशयन् ।

शब्दो व्यञ्जकता बिब्रद् ध्वनयुक्तैरविषयीकभवेत् ॥१५॥

यहाँ 'दत्तः' पदमें लक्षणा है । 'दत्तः' प्रयोग 'हुदात्‌ दाने' घातु. बना है । दानका लक्षण 'स्वतत्त्वनियतिपूर्वकं परतत्त्वावदानं दानम्' अर्थात् किसी वस्तुपरसे अपने अधिकारको हटाकर दूसरे-

का अधिकार स्थापित कर देना 'दान' है । यह दानका अर्थ यहाँ असक्त होनेसे प्रतिफलित-

रूप अर्थको लक्ष्यया बोधित करता है । यहाँ भी ध्वनिके अभावमें भी लक्षणा होनेसे अत्य्याप्ति है ।

इसकी प्रतीक—

जो [सज्जनपक्षमें] दूसरोंके लिये पीड़ा सहन करता है [इष्टुपक्षमे कोद्रुमें पहला

जाता है], जो [सज्जनपक्षमें] अपमानित होनेपर भी [इष्टुपक्षमे ताँड़ा जाननेपर भी] मधुर

रहता है, [जिसका विकार [सजनपक्षमें] क्रोधादि, [इष्टुपक्षमे उससे बना गुड़-राकर

आदि] भी सबको अच्छा लगता है वह यदि किसी अनुचित स्थान [इष्टुपक्षमे उत्तर

खेत] में पड़कर वृद्धि [पदसमृद्धि या उर्वतिको, इष्टुपक्षमे आकारवृद्धिको] प्राप्त नहीं

होता है तो क्या यह इष्टु [रेंड़, गचाँ] का दोष है, उस निर्गुण भूमि [स्वामी, इष्टुपक्षमें

खेत] का दोष नहीं है ?

यहाँ इष्टुपक्षमें 'अनुभवति' पदका मुख्यार्थ असक्त होनेसे लक्षणा द्वारा पीड्यमानत्वका बोध

करता है । परन्तु व्यञ्जकका प्राधान्य न होनेसे ध्वनि नहीं है । और ध्वनिके अभावमें भी भक्ति

[लक्षणा] है इसलिए 'शाङ्गामवबददूषितत्व' रूप अत्य्याप्ति होनेसे भक्ति ध्वनिका लक्षण नहीं

हो सकती ।

यहाँ इष्टुपक्षमें 'अनुभवति' शब्द [आङ्क] है ।

परन्तु पेसा कभी भी ध्वनिका विपय नहीं होता ॥१५॥

कयोंकि—

उक्त्यन्तरसे जो चारुत्व प्रकाशित नहीं किया जा सकता उसको प्रकाशित

करनेवाला व्यञ्जनाश्रापारयुक्त शब्द ही ध्वनि कहलानेका अधिकारी हो सकता

है ॥१५॥

१- 'ध्वनेर्विषयोडभिमतः' नि० ।

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ध्वन्यालोक:

अत्र चोदाहते विषये नोक्ष्यन्तराशक्य चारुत्ववच्य किहेतो: शब्द: ॥१५॥

किच्च— रुढा ये विषयेऽनपत्न शब्दा: स्वविषयादपि । लावण्याद्या: प्रयुक्तास्ते न भवन्ति पदं ध्वने: ॥१६॥

तेपु चोपचरितशब्दवृत्तिरस्तीति¹ । तथाविधे च विषये कचित् सम्भवन्नापि ध्वनित्ववहार- प्रकारान्तरेण प्रवर्त्तन्ते, न तथाविधशब्दसमभुक्षण ॥१६॥

आपि च— मुख्यां वृत्तिं परित्यज्य गुणवृत्त्यादिर्धदर्थद्योतनम् । यथु हि चमत्कृ तिशयविशिष्टार्थप्रकाशनलक्षणे प्रयोजनेऽ कर्तव्ये यदि शब्दस्य मुख्यता तदा तस्य प्रयोगे दृष्टतैव स्यात् । न चैवम् ॥१७॥

तत्र हि चारुत्वातिशयविशिष्टार्थप्रकाशनलक्षणे प्रयोजनेऽ कर्तव्ये यदि शब्दस्य मुख्यता तदा तस्य प्रयोगे दृष्टतैव स्यात् । न चैवम् ॥१७॥

और यहाँ ऊपर उद्धृत उदाहरणोंमें कोई शब्द उक्त्यन्तरसे अशक्य चारुत्वको प्रकाशित करनेका हेतु नहीं है [इसलिए ध्वनिका विषय नहीं है] ॥१५॥ और भी— जो 'लावण्य' आदि शब्द अपने विषय [लावण्यादिरूप अर्थ] से भिन्न [सौन्दर्यादि] अर्थमें रूढ़ [प्रसिद्ध] हैं, वे भी प्रयुक्त होनेपर ध्वनिके विषय नहीं होते हैं ॥१६॥

लक्षणा में रूढि या प्रयोजनमेसे एकका होना आवश्यक है । इस रूढिसे लक्षणाके दो भेद हो जाते हैं । इन दोनों भेदोमेंसे पहले रूढिवाले भेदमें भक्ति—लक्षणा तो रहती है, परन्तु प्रयोजनरूप व्यक्त या ध्वनिका भाव ही होता है । दूसरे प्रयोजनवाले भेदमें प्रयोजन व्यक्त या ध्वनिका लक्षण नहीं, व्यक्तनासे बोषित होता है । इसलिए भक्ति ध्वनिका लक्षण नहीं हो सकती । इसी यातका क्रमश: प्रतिपादन करनेके लिए १६वीं तथा १७वीं कारिका लिखी है ।

उन [लावण्य आदि शब्दों] में उपचरित गौणी शब्दवृत्ति तो है [परन्तु ध्वनि नहीं है] । इस प्रकारके उदाहरणोंमें यदि कहीं ध्वनित्ववहार सम्भव भी हो तो वह उस प्रकारके [लावण्य, आहुलाद, प्रातिकूल्य आदि] शब्द द्वारा नहीं अपितु प्रकारान्तरसे होता है ॥१६॥ और भी— जिस [शैत्यप्रकाशनत्वादि] फलको लक्ष्यमें रखकर 'गङ्गायां घोष:' इत्यादि वाक्योंमें मुख्य [अभिधा] वृत्तिको छोड़कर गुणवृत्ति [लक्षणा] द्वारा अर्थबोध कराया जाता है उस फलका वोधन करनेमें शब्द वाच्यार्थ [स्वलक्ष्यार्थ] नहीं है ॥१७॥

उस चारुत्वातिशयविशिष्ट अर्थके प्रकाशनरूप प्रयोजनके सम्पादनमें यदि शब्द गौण [वाच्यार्थ] हो तब तो उस शब्दका प्रयोग दूषित ही होगा । परन्तु ऐसा

१. 'तैपुरे वत्ति' त्कका पाठ दी० में नहीं है ।

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कारिका १६-१७ ]

प्रथम उद्योतः

१३

इसका अभिप्राय यह है कि शान्दका मुख्य अर्थ अयंबोधक व्यापार अभिधा है। सामान्यतः अभिधा द्वारा वाचित मुख्यार्थ में ही हम शब्दोंका प्रयोग करते हैं। परन्तु कहीं-कहीं मुख्यार्थको छोड़कर उसे समृद्ध किसी अन्य अर्थमें भी शब्दोंका प्रयोग करते हैं। ऐसे प्रयोजनोंके समय कोई विरोष कारण हमारे सामने अवश्य होता है। ये कारण दो प्रकारके हैं, एक तो रूक्ति, दूसरा विरोध प्रयोजन। रूक्ति अर्थ प्रसिद्धि है। रूक्ति उदाहरण लावण्य, आनुलोम्य, प्रतिकूल्य आदि शब्द हैं। 'लक्षणस्य भावो लावण्यम्', लावण्यके भाव अथवा लावण्ययुक्ततत्वको 'लावण्य' कहना चाहिये। यहाँ उसका मुख्यार्थ है। परन्तु हम 'लावण्य' शब्दका प्रयोग इस अर्थमें करके सौन्दर्यके अर्थमें करते हैं। इसका कारण रूक्ति या प्रसिद्धि ही है। 'लावण्य' शब्द बहुत प्रयोगके कारण सौन्दर्य अर्थमें रूढ़ हो गया है। इसी प्रकार 'लोभानामनुकूल' अनुलोमे मर्दनम्।' धारिके रोमोंके अनुकूल मालिश अनुलोम मर्दन है। पैरमें मालिश करते समय यदि नीचेस अनुलोम मर्दन होगा। इसी प्रकार 'कूलस्य प्रतिकूलतया स्थितः स्वतः प्रतिकूलम्।' नदीकी धारा कूल अर्थात किनारेको काट देती है इसलिए कूलके प्रतिकूल विरोधी रूप होनेसे 'प्रतिकूल' कहलाती है। यह उनके मुख्यार्थ हैं। परन्तु उनका प्रयोग उस मुख्यार्थको छोड़कर तत्तत्सदृश अनुकूल और विरोध अर्थमें होता है। ये अर्थ यद्यपि उन शब्दोंके वाच्यार्थ नहीं है फिर भी बहुत प्रयोगके कारण वे शब्द उन अर्थमें रूढ़ हो गये हैं। इसलिए रूक्ति लक्षणके उदाहरण हांते हैं। इनमें मक्ति 'लक्षणा' तो होती है परन्तु व्यङ्गयका ही अभाव होनेसे व्यङ्गयप्राधानुरूप ध्वनि नही होती। इसका प्रतिपादन १६वीं कारिकामें किया है।

दूसरी प्रयोजनवती लक्षणा होती है। इसमें किसी विशेष प्रयोजनसे मुख्यार्थको छोड़कर गौण अर्थमें शब्दका प्रयोग किया जाता है। जैसे 'गङ्गायां घोषः।' 'गङ्गा' का अर्थ गङ्गाजीका जलधारा है और घोषका अर्थ आभीरपल्ली—घासियोंकी वस्ती या नगला—है। 'गङ्गायाम्' में यत्समी विभक्तिका अर्थ आधेयतत्व है। इस प्रकार 'जलप्रवाहके ऊपर घोष है' यह वाक्यार्थ होता है। परन्तु जलप्रवाहके ऊपर घोषियोंकी वस्ती बन नहीं सकती। इसलिए 'गङ्गा' शब्द 'टट' रूप अर्थका बोध कराता है और उसका अर्थ [गङ्ढ़ाके] किनारेपर घोष, यह होता है। इस वातको सीधे 'गङ्ढ़ातटे घोषः' इन शब्दोंमें भी कह सकते थे और उस दशामें अभिधा शक्तिसे ही काम चल जाता। परन्तु वक्ताने 'गङ्ढ़ातटे घोषः' न कहकर जो 'गङ्ढ़ायां घोषः' कहा है उसका विशेष प्रयोजन है। तटकी सीधा नहुत दूरतक है। इलाहाबाद और कानपुर गङ्ढ़ातटके नगर हैं। उनका गङ्ढ़ासे सदैव अधिक दूरका भाग भी, जो कई मील दूर हो सकता है, गङ्ढ़ातटकी सीमामें आ जाता है। वहांतक गङ्ढ़ांक शौच्यपावनत्वादि धर्मोंका कुछ प्रभाव नहीं रहता। परन्तु जो स्थान ठीक गङ्ढ़ाके, तटपर है। वहाँ शौच्य आदि होगा और पावनत्व भी। यह आभीरपल्ली [घोष] बिलकुल गङ्ढ़ामें है अतः वहाँ शौच्यपावनत्वका अतिशय है। इस वातको बोधन करनेके लिए 'गङ्ढ़ायां घोषः' इस प्रकारका प्रयोग किया गया है। शौच्यपावनत्वलक्षणा वाधन करना लक्षणाका प्रयोजन है। यहां लक्षणा शक्तिसे तटतुल्य अर्थ वाधित होता है और शौच्यपावनत्वके अतिशय रूप प्रयोजनका बोध व्यञ्जनाद्वारासे होता है। उसका बोध लक्षणास नहीं हो सकता। इसी वातका प्रतिपादन १७वीं कारिकामें किया गया है।

'गङ्ढ़ायां घोषः' इस वाक्यमें पहिले अभिधा शक्तिसे वाच्यार्थ उपस्थित होता है, उसका वाध होनेपर लक्षणासे तटतुल्य अर्थ प्रतीत होता है। यह लक्यार्थ होता है। अर्थात जिस अर्थको हम 'लक्ष्यार्थ' कहते हैं उसे पूर्वी मुख्यार्थका उपस्थित होना और उसका वाध होना ये दोनों वातें लक्षणामें

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ध्वन्यालोक:

कारिका १६-१७

आवश्यक हैं । अब यदि ध्वन्यपावनत्वके अतिशयको 'लक्ष्यार्थ' मानना चाहें तो उससे पूर्वं उपस्थित

'तट्' रूप अर्थको मुख्यार्थ मानना और फिर उसका 'अन्वयानुपपत्ति' या 'तात्र्यांनुपपत्ति' रूप बाध

मानना आवश्यक है । इसकें लिये कारिकामें बाधितार्थबोधक 'स्कलदूति:' शब्दका प्रयोग किया

गया है । परन्तु ध्वन्यपावनत्वातिशयमोधके पूर्व उपास्थित हांनेवाला 'टट्' रूप अर्थ न तो 'गड्ना' शब्दका

मुख्यार्थ ही है और न वाचित ही है । क्योंकि उसका बोधके साथ आचार्यध्वेयभावसमन्वन्ध माननेमें

कई बाधा नहीं है । फिर 'दुर्जानतोषन्याय' से उसका बाधितार्थ मानें तो भी फिर उसके बाद

उपस्थित होनेवाले ध्वन्यपावनत्वके अतिशयको लक्ष्यार्थ कहना होगा । ऐसी दशामें गड़ना पदके इस

अर्थमें रूढ़ न होनेसे उस 'लक्षणा' का कोई प्रयोजन मानना पड़ेगा । उस दूसरे प्रयोजनोंको भी

'लक्ष्यार्थ' कहोने तो फिर उसका भी तीसरा प्रयोजन मानना होगा और इस प्रकार अनवस्था होनी ।

इसलिए यह मार्ग ठीक नहीं है । यही ९७वीं कारिकाका अभिप्राय है । इसी विषयको मम्मटने अपने

'काव्यप्रकाश' में निम्नलिखित शब्दोंमें लिखा है—

"नैतस्य प्रतिप्रतिमार्थं लक्षणा समुपास्यते ।

नामिधा समयाभावात्, हेत्वभावान्न लक्षणा ।

लक्ष्यं न मुख्यं नाप्यन्वितो यङ्ग: फलं नो प्रयोजनमेतसिन्, न च शब्द: स्कलदूति: ।

एवमप्यनवस्था स्यात् या मूललक्ष्यकारिणी ॥" क॰ प्र॰ २, १४, १६

"जिस तरहसे प्रतीति करानेके लिये लक्षणाका आश्रय लिया जाता है वहाँ है, शब्दमात्रसे बोध्य उस

फलके बोधनमें व्यञ्जनाके अतिरिक्त दूसरा व्यापार सम्भव नहीं है ।

"रूढ़ेत न होनेसे अभिधा नहीं हो सकती और मुख्यार्थव्याघातद् हेतुओंके न होनेसे लक्षणा

नहीं हो सकती है । लक्ष्यार्थ न तो मुख्यार्थ ही है, न उसका बाध ही होता है, न उसके फलके

साथ समन्वय है, न उसमें कोई प्रयोजन है और न शब्द स्वलदूति है । और यह सब मानें भी तो

मूलका ही विनाश कर देनेवाली अनवस्था हो जायगी ।"

अधिकांश लोग 'अन्वयानुपपत्ति' को लक्षणाका वीज मानते हैं । परन्तु नागेशाने 'तात्र्यां-

उपपत्ति' को लक्षणाका वीज माना है । इसका कारण यह है कि 'काकेभ्यो दधि रक्ष्यताम्' में अन्वया-

नुपपत्ति नहीं है । कोई अपना दहा! बाहर छोड्कर जरा देरके लिये भीतर गया । उसे डर था कि

उतनी देरमें कौए दधिको खराब कर देंगे । इसलिए वह अपने पासके आदमीसे कहता गया

कि बस कौओंसे दहीको बचाना । इस वाक्यके अन्वयमें कोई बाधा न होनेसे लक्षणाका अवरार

नहीं है । परन्तु यहाँ 'काकेभ्य:' पदकी लक्षणा 'तद्द्युपपत्ति' अर्थमें होती है । कहनेवालोंकी दृष्टि

यह नहीं है कि केवल कौओंसे बचाना और यदि कुत्सा आये तो उसे खा लेने देना । उसका

अभिप्राय तो दहीके उपवातक सबसे ही बचानेंमें है । इसलिए 'तात्र्यांनुपपत्ति' को लक्षणाका

वीज माननेसे ही लक्षणा हो सकती है । अतएव नागेश अन्वयानुपपत्तिके बजाय तात्र्यांनुपपत्तिको

लक्षणाका वीज मानते हैं ।

इसलिए जिन हेत्यपावनत्वादिरूप प्रयोजनेके बोधनके लिये मुख्यवृत्ति अभिधाको छोड़्कर

गुणवृत्ति लक्षणासे अथ्यग्राहिपादन किया जाता है वह प्रयोजन लक्षणासे नहीं अपितु व्यञ्जनासे बाधित

होता है । इसलिए लक्षणा-व्यापार और व्यञ्जना-व्यापार दोनोंका विप्रभेद है । 'गड्नायां गोप:' में

':क्ति' या लक्षणाका विषय टट और व्यञ्जनिका विषय ध्वत्यपावनत्व है । विषयभेद होनेसे उन दोनोंमें

विप्रभेद है ।

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वाचकत्वाश्रयेणैव गुणवृत्तिर्यवस्थिताः । व्यङ्गयत्वैकमूलस्य ध्वने स्याल्लक्षणं कथम् ॥१८॥

तस्मात्—

तस्मादन्यो ध्वनिः, अन्याः च गुणवृत्तयः । अतद्यात्रिरण्यस्य लक्षणस्य । नहि ध्वनिप्रभेदो विवक्षितान्यपरवाच्यलक्षणः, अन्ये च बहवः प्रकारो भक्त्यो व्यप्यन्ते । तस्माद् भक्तिलक्षणमेव ।

धर्मोंधर्मिभाव नहीं हो सक्ता । धर्मिगत कोई धर्मविरोष ही 'लक्षण' होता है । ध्वनि और भक्ति में धर्मंधर्मिभाव न होनेसे भी भक्ति ध्वनिका 'लक्षण' नहीं । वाचक शब्दसे बोधित मुख्यार्थका वाच्य होनेपर ही लक्षणा प्रवृत्त होती है इसलिए लक्षणा वाचकाश्रित या अभिधापूचभूता है, वह विषयभेद होनेसे व्यञ्जना मात्राश्रित ध्वनिका 'लक्षण' नहीं हो सकती । विपयतासाम्य होने भक्ति में अधि करण तीर, और ध्वनिका अधिकरण चैत्यपादनत्व है । अतः एकविषयघटित स्वविषयविपयकत्वरूप परम्परा सम्बन्धेन भक्ति के ध्वन्यद्रविते होनेसे भक्ति ध्वनिका 'लक्षण' नहीं हो सकती ॥१८॥

इसीलिए—

वाचकके आश्रयस्थित होनेवाली गुणवृत्ति--भक्ति केवल व्यङ्गचतन्मूलक ध्वनिका लक्षण कैसे हो सकती है ॥१८॥

इसलिए ध्वनि अलग है और गुरणवृत्ति [लक्षणा] अलग ।

१८वीं कारिकामें "अतिव्यासेरथालव्यहेतुं चासौ लक्ष्यते तयोः" कहा था । उसमें यहाँतक अतिव्याप्ति ['अलक्ष्यदृष्टितन्मात्रव्याप्तः'] दोषका निष्पण किया । आगे 'लक्ष्यैकदेवेदृश्यादृष्टितन्मयो व्याप्तिः' रूप अव्यासिदोपका प्रतिपादन करते हैं । अव्यासि और अतिव्याप्ति दोनों 'लक्षण' के दोष हैं । इनके अतिरिक्त एक 'असाम्भव' दोष और है, 'लक्ष्यमात्राद्वस्थितस्सम्भवः' । यहां कारिकाकारने अव्यासि तथा अतिव्यासिका ही उल्लेख किया है । जो 'लक्षण' लक्ष्यके एक देशमें न रहे उसका अव्यासिदोप प्रस्त कहा जाता है । यहां भक्तिको ध्वनिका लक्षण माननेमें अव्यासिदोप भी आता है । ध्वनिके अभी अविवक्षितवाच्य तथा विवक्षितान्यपरवाच्य दो भेद बताये ये । अतएव भक्तिको यदि ध्वनिका लक्षण माना जाय तो इन दोनों भेदोंमें भक्तिका अस्तित्व अपेक्षित है । किन्तु विवक्षितान्यपरवाच्य अभिधामूल ध्वनिमें लक्षणा नहीं होती है । अतः अव्यासिदोप है । इसी बातको कहते हैं—

इस लक्षणकी अव्यासि भी है । विवक्षितान्यपरवाच्य [अभिधामूल] ध्वनि और ध्वनिके अन्य अनेक प्रकारभी भक्ति या लक्षणा व्याप्त नहीं रहती । इसीलिए भक्ति ध्वनिका 'लक्षण' नहीं है ॥१८॥

लक्षणा और गौणीवृत्तिका भेद

यहां भक्तिको ध्वनिका लक्षण माननेमें अव्यासिदोष दिखलाया है कि विवक्षितान्यपरवाच्यअभिधामूलध्वनिके उदाहरणोंमें ध्वनि तो रहता है, परन्तु वहां भक्ति या लक्षणा नहीं रहती इसलिए ऊपर विवक्षितान्यपरवाच्यध्वनिका उदाहरण 'शिखरिणी' आदि श्लोक दिया था । उसकी व्याख्या करते हुए [पृष्ठ ५७ पर] लिखा था कि साधारणतः उसमें अभिधा, तात्पर्य और व्यञ्जना—इन तीनों

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ध्वन्यालोक:

[कारिका १८

वृत्तियोंके व्यापार होते हैं। परन्तु उसके साथ दूसरा विकल्प यह भी दिखलाया था कि "यदि वा आकस्मिकवि‌ष्ट‌प्रक्न‌म‌ा‌र्था‌नुपपत्तौ मुख्यार्थवाधायां सादृश्याल‌लक्षणा भवति मध्येः। तेन न द्वितीयमेदे‌डपि चत्वार एव व्यापाराः।" [लोचन] अर्थात् इस इलोकमें यह जो प्रश्न किया गया है उस आकस्मिक प्रश्नका कोई अवसर न होनेसे वह अनुपपत्ति है। इस प्रकार मुख्यार्थबाध मानकर बीचमें सादृश्यसे लक्षणा‌व्यापार भी माननेसे इस उदाहरणमें भी चार व्यापार हो जाते हैं। परन्तु ध्वननमें लक्षणाके विशेष सहकारी न होनेसे लक्षणामूलकध्वननिसे भेद रहेगा। इस सादृश्यमूलक लक्षणाको आ‌लं‌कारिक 'गौणी' लक्षणा नामसे व्यवहृत करते हैं। परन्तु मीमांसक गौणीको लक्षणासे मिन्न अलग वृत्ति मानते हैं। उनके मतसे 'लक्षणा' और 'गौणी' का भेद यह है कि "गौणे शब्दप्रयोगो न लक्षणायाम्‌"। "सिंहो माणवकः" यह गौणीका उदाहरण है। इसमें सिंह शब्द गौणी वृत्तिसे क्रो‌ध्रा‌दि‌वि‌शिष्ट प्राणि‌का बोधक होता है और उसका माणवक पदके साथ सामानाधिकरण्य होता है। पदोंके सामानाधिकरण्यका अभिप्राय विमि‌र्श‌रूपेण एक‌र्था‌म्बोधकत्व है। सिंह और माणवक पदके सामानाधिकरण्यका अभिप्राय यही है कि वे दोनों मिन्न-मिन्न रूपसे एक माणवक अर्थको ही बोधन करते हैं। इस प्रकार सिंह पद और माणवक पद दोनों सामानाधिकरण्यके कारण एक ही अर्थका बोधन करते हैं। फिर भी दोनों शब्दोंका प्रयोग होता है इससे यह गौणी है। "गौणपे शब्दप्रयोगो न लक्षणायाम्‌"। 'गजो‌द्भि‌यां घोषः' इस लक्षणाके उदाहरणमें तद‌र्थ‌के बोधक शब्दका प्रयोग नहीं होता यही 'लक्षणा' और 'गौणी' का भेद है। परन्तु आ‌लं‌कारिकोंके मतमें यह शब्दप्रयोग भी गौणी तथा लक्षणाका भेदक नहीं है क्योंकि आ‌लं‌कारिकोंके प्रकारान्तरसे लक्षणाके सारोपा और साध्यवसाना भेद भी माने हैं—"वि‌षय‌स्तानि‌र्गि‌र्ण‌स्त्यान्य‌न्यातादात्म्य‌प्र‌ति‌ति‌कृत्‌। सारोपा स्यानि‌र्गि‌र्ण‌स्त‌स्य सा‌ध्यवस‌ानि‌का।" जिसमें विषयका निगरण नहीं होता अतएत् माणवक शब्दका भी प्रयोग होता है उसे 'सारोपा' कहते हैं। और जहाँ उसका निगरण हो जाता है वहाँ उसे 'साध्यवसाना' कहते हैं। इस प्रकार जिसे मीमांसक 'गौणी' भी चार व्यापार मान ही लिये तब यह कैसे कहा जा सकता है कि विवक्षितान्यपरवाच्य‌ध्वननिमें लक्षणा अव्याप्त होनेसे भक्तिको ध्वनिका लक्षण नहीं माना जा सकता।

इस प्रश्नका उत्तर यह है कि विवक्षितान्यपरवाच्य‌ध्वननिके असं‌ल‌क्ष्य‌क्रम और सं‌ल‌क्ष्य‌क्रम‌व्यङ्ग्य यह दो मुख्य भेद आगे किये जायेंगे। इन दोनोंमें रसादि ध्वनिको असं‌ल‌क्ष्य‌क्रम‌व्य‌ङ्ग्य‌ध्वनन कहते हैं और सं‌लक्ष्य‌क्रम‌व्य‌ङ्ग्यके पन‌द्रह भेद किये गये हैं। इनमें विवक्षितान्यपरवाच्य‌ध्वननिके समस्त भेदोंमें रस‌व्य‌ङ्ग्य ही सबसे अधिक प्रधान है और उसमें मुख्यार्थबाध आदिका कोई अवसर नहीं है, इसलिए उस मुख्य भेदमें लक्षणाका अवसर न होनेसे विवक्षितान्यपरवाच्य‌ध्वननिमें भक्तिकी अव्याप्ति प्रदर्शित की है।

कुछ मीमांसक इस रस‌नो‌द्गोंमें शब्द‌व्यापारकी आवश्यकता नहीं मानते हैं। वह रसको अनुमान या स्मृति‌का विषय मानते हैं। उनका कहना है कि धूमदर्शनके बाद जैसे अग्निकी स्मृति हो आती है इसी प्रकार विभावादिके ज्ञानके अनन्तर रत्यादि चित्तवृत्तिकी स्मृति हो आती है। इसलिए उसमें शब्द‌व्यापारकी आवश्यकता ही नहीं है। तब उसमें भक्ति या लक्षणाकी अव्याप्ति दिखलाना और उसके आधारपर भक्ति‌को ध्वनिका लक्षण कहना व्यर्थ है।

इस शङ्काका समाधान यह है कि क्या क‌से‌रेकी वृत्तिके परिज्ञानमात्रको आप रस समझते हैं अथवा स्वानुभवगोचर वर्णना‌त्मा आ‌लौकिक जो आनन्दानुभव है उसका रस कहते हैं? यदि आप दूस‌प्रे‌की चित्तवृत्तिके परिज्ञानमात्रको रस समझते हैं तो यह आपका भ्रम है। हम उसे रस नहीं कहते।

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कारिका १९ ] प्रथम उद्योतः ६९

कस्यचित् ध्वनिविमेदस्य सा तु स्यादुपलक्षणम् । सा पुनर्भेदैकवक्ष्यमाणप्रभेदमध्यादन्यतमस्य भेदस्य यदि नामोपलक्षणतया सम्भाव्येत । यदि च गुणवृत्त्यैव ध्वनिरलक्ष्यत इत्युच्यते तदभिधायापारेण तदितरोज्झलद्धारवर्ग: समग्र एव लक्षणरणवैयर्थ्यप्रसङ्ग: ।

किञ्च — लक्षणान्यथा: कृतेऽपि पक्षसंसिद्धिरेव न: ।।१९।। कृतेऽपि पूर्वमेवैवन्निलक्षणे पक्षसंसिद्धिरेव न:, यस्माद् ध्वनिरस्तीति न: पक्ष: । स च प्रागेव संसिद्ध इति, आयत्नसम्पन्नरसमीहिताथो: सम्प्रज्ञा: स्म: ।

यह अवश्य है कि उसका परिज्ञान अनुमान या स्मृति आदिसे हो सकता है परन्तु वह हमारे यहाँ रस नहीं है । हम तो अपने आत्मामें होनेवाली अलौकिक आनन्दकी अनुभूतिको रस कहते हैं । वह अनुमेय नहीं है अत: हमारे यहाँ तो रस अनुमानका विषय नहीं है । उसका अनुमान द्वारा सिद्ध करनेके लिए जो भी हेतु दिये जा सकते हैं वे सब हेत्वाभासमात्र हैं; रस वस्तुत: उससे परे है । इसलिए विवक्षितान्यपरवाच्यव्यञ्जनके प्रधान भेद रसव्यञ्जनि और उसके प्रभेद रसाभास, भाव, भावाभास, भावोदय, भावसन्धि, भावशवलता आदि ध्वनियोंमें मुख्यार्थबाधके बिना ही रसादिकी प्रतीति होनेसे भक्तिके प्रवधेका अवसर नहीं है और इस प्रकार अव्याप्ति होनेसे भक्ति ध्वानिका लङ्घन नहीं हो सकता । यह स्पष्ट हो गया ।।टि।।

भक्तिवादके तृतीय विकल्प उपलक्षणपक्षका खण्डन

वह भक्ति ध्वनिके किसी विशेष भेदका ['काकवद् देवदत्तस्य गृहम्'के समान अविद्यमानव्यवर्तक] उपलक्षण हो सकती है । वह भक्ति ध्वनिमाण प्रभेदोंमेंसे किसी विशेष भेदका 'उपलक्षण' हो सकती है । [किन्तु सारे ध्वनिमात्रका उपलक्षण भी नहीं हो सकती है]। और यदि [दुर्जनतोषन्यायसे यही मान लिया जाय कि] गुणवृत्तिसे [समग्र] ध्वनि लक्ष्यित हो सकता है, [उसी प्रकार यह भी कहा जा सकता है कि] यह कहा जाय तो, अभिधायापारसे ही समग्र अलङ्कारवर्ग भी लक्षित हो सकता है इसलिए [वैयाकरणों और मीमांसकों द्वारा अभिधाका लक्षण कर देनेपर और उसके द्वारा समस्त अलङ्कारोंके लक्षित हो जानेसे] अर्थ-समुचय अलङ्कारोंके लक्षण करना [अर्थात् व्यर्थ आलङ्कारिकोंका प्रयत्न और सारा: साहि:यशास्त्र ही] व्यर्थ हो जाता है । और भी—

[लक्षण या भक्तिको ही ध्वनिका लक्षण मान लेनेपर] यदि अन्य लोगोंने ध्वनिका लक्षण कर दिया है तो हमारी पक्षसिद्धि ही होती है ।।१९।। अथवा यदि पहले [भक्तिको ध्वनिका लक्षण माननेवाले] किन्हींने ध्वनिका लक्षण कर दिया है तो हमारी पक्षसिद्धि ही होती है । क्योंकि ध्वनि है—यहाँ हमारा पक्ष है । और वह पहले सिद्ध हो गया इसलिए हम तो बिना प्रयत्नके ही सफलमनोरथ हो गये [हमारी इष्टसिद्धि हो गयी] ।

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ध्वन्याटोकः

श्रीराजानकानन्दवर्धन

श्रीमाचार्यविंचचेदवसिद्धान्तशिरोमणि

आलोककाश्यपिकाक्षयां हिन्दीव्याख्यायां

ध्वनिविरोधी तृतीय पक्ष अलक्षणीयतावादका खण्डन

उद्योतके प्रारम्भमें अभाववादी, भक्तिवादी और अलक्षणीयतावादी मत इस प्रकार ध्वनिविरोधी तीन पक्ष दिखलाये ये । इनमें अभाववादी और भक्तिवादी मतोंका खण्डन विस्तारपूर्वक इस उद्योतमें किया है । इसी खण्डनप्रसङ्गमें 'यत्नार्थः शब्दो वा' । कारिका सं० १३। ध्वनिका सामान्य लक्षण करके ध्वनिके अलक्षणीयतावादका भी निराकरण कर ही दिया है । यह मान कर मूलकारने अलक्षणीयतावादके खण्डनके लिये अलग कारिका नही लिखी । परन्तु वृत्तिकार विषयको परिपूर्ण करनेके लिये 'येऽपि' से प्रारम्भ कर 'युक्ताभिधायिनः' तक उस अलक्षणीयतावादका खण्डन करते हैं ।

जिन्होंने सहृदयसवेद्यदूष्य ध्वनिको आत्मस्वरूप अवर्णनीय, अलक्षणीय कहा है उन्होंने भी सोच-समझ कर पेसा नहीं कहा है । क्योंकि अबतक कही हुई तथा आगे कही जानेवाली नीतिसे ध्वनिके सामान्य और विशेष लक्षण प्रतिपादित कर देनेपर भी यदि ध्वनिको अलक्षणीय कह जाय तो फिर पेसा अलक्षणीयत्व तो सभी वस्तुओंमें आ जायगा ।

यदि ये [अलक्षणीयतावादी] इस अतिरायोक्ति द्वारा [वेदान्तियोंके अनिर्वचनीय-यतावादके समान] ध्वनिको अन्य काव्योंसे उत्कृष्ट स्वरूपका प्रतिपादन करते हैं तब तो वे भी ठीक ही कहते हैं ।।१९।।

इति श्रीमाचार्यविंचचेदवसिद्धान्तशिरोमणिबिरचितायाम् आलोककाश्यपिकाक्षयां हिन्दीव्याख्यायां

प्रथम उद्योतः ।

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द्वितीय उद्योत:

एवमविचक्षितवाच्यविवक्षितान्यपरवाच्यत्वेन ध्वनिनिदर्शनप्रकार: प्रकाशित: । वत्राविवक्षितवाच्यस्य प्रभेदप्रतिपादनायेदमुच्यते—

अर्थान्तरे सङ्क्रमितमत्यन्नं वा तिरस्कृतम् । अविवक्षितवाच्यस्य ध्वनेरेऽयं द्विधा मतम् ॥९॥

तथाविधानां च तासां व्यञ्ज्यतयैव विशेष: ।

अथ 'आलोकदीपिकायां' द्वितीय उद्योत:

क अविवक्षितवाच्य [लक्षणामूल] ध्वनिके दो भेद

इस प्रकार [प्रथम उद्योतमें] अविवक्षितवाच्य [लक्षणामूल] भेदसे दो प्रकारके ध्वनिका वर्णन किया था । उसमेंसे अविवक्षितवाच्य [लक्षणामूल]के भेदों [प्रभेद रूढिका अर्थ अवांतर भेद और विवक्षितान्यपरवाच्य]के प्रतिपादनके लिये यह [कारिका] कहते हैं—

अविवक्षितवाच्य [लक्षणामूल] ध्वनिका वाच्य कहाँ अर्थान्तरसङ्क्रमित और कहाँ अत्यन्ततिरस्कृत होनेसे दो प्रकारका माना गया है ॥९॥

उस प्रकारके [अर्थात् अर्थान्तरसङ्क्रमित और अत्यन्ततिरस्कृतस्वरूप] उन दोनों [वाच्यों] से व्यङ्ग्यार्थकका ही विशेष [उत्कर्ष] होता है । [हस्तलिप् व्यङ्ग्यात्मक ध्वनिके प्रभेदके प्रसङ्गमें जो ये वाच्यके दो भेद प्रदर्शित किये हैं वे अप्रासङ्गिक नहीं हैं । क्योंकि उनके द्वारा व्यङ्ग्यथकका ही उत्कर्ष सम्पादन हाता है ।]

इन भेदोंका आधार लक्षणा

अर्थान्तरसङ्क्रमितमित्यमं निञ्जान्त सङ्क्रमित शब्दका प्रयोग किया है इसलिए उनका प्रयोजक कर्ता अपेक्षित है । इसी प्रकार तिरस्कृतमें भी कर्ताकी अपेक्षा है । इन शब्दोंके प्रयोगसे यह सूचित किया है कि इस ध्वनिके व्यञ्जनाव्यापारमें जो सहकारी वर्ग लक्षणा, वक्रोक्ति आदि हैं उनके प्रभावसे वाच्यार्थको दोनों अवस्थाएँ होती हैं । कहीं वह अर्थान्तरसङ्क्रमित कर दिया जाता है और कहीं अत्यन्त तिरस्कृत । यह व्यञ्जनाके सहकारी वर्ग मुख्यतः लक्षणाका प्रभाव है । इसीलिए इस अविवक्षितवाच्यध्वनिका दूसरा नाम लक्षणामूलध्वनि भी है । अविवक्षितवाच्यध्वनिके लक्षणाके प्रभावसे वाच्य अर्थान्तरसङ्क्रमित या अत्यन्ततिरस्कृत क्यों और कैसे हो जाता है इसे समझनेके लिये लक्षणाकी प्रक्रियापर थोड़ा सा ध्यान देना चाहिये ।

१. 'वाच्यत्वे' नि० ।

२. 'ध्वति व्यङ्ग्यप्रकाशनपरस्य ध्वनेरेवार्थ प्रकार:' नि० तथा द्वी० में आधिक है ।

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ध्वन्यालोक:

काव्यप्रकाशकारने लक्षणाका निरूपण करते हुए उसके मुख्य दो भेद किये हैं, उपादान लक्षणा और लक्षणलक्षणा । लक्षणाका लक्षण है—

"मुख्यार्थंबाधे तद्योगे रूढितोडथ प्रयोजनात् | अन्योडर्थो लक्ष्यते यत्स लक्षणालक्षणा क्रिया ॥" का० प्र० २, ९

अर्थात् मुख्यार्थे बाधित होनेपर रूढि अथवा प्रयोजनमेंसे अन्यतर निमित्तसे मुख्यार्थे सम्बद्ध अन्य अर्थकी प्रतीति जिस शब्दशक्तिसे होती है, शब्दमें आरोपित उस शक्तिका नाम लक्षणा है। इस कारिकामें 'तद्योगे' शब्दसे मुख्यार्थ और लक्ष्यार्थंका सम्बन्ध आवश्यक बतलाया गया है। मुख्यार्थसे सम्बद्ध अर्थ ही लक्षणासे बोधित हो सकता है, असम्बद्धार्थ नहीं। असम्बद्ध अर्थमें यदि लक्षणा होने लगे तो किसी पदकी कहीं भी लक्षणा होने लगेगी, कोई व्यवस्था नहीं रहेगी। इसलिये सम्बन्धका होना आवश्यक है। लक्षणाका नियन्त्रण करनेवाले ये सम्बन्ध मुख्यतः पाँच प्रकारके माने गये हैं—

"अभिधेयेन संयोगात् सामीप्यात् समवायतः । वैपरीत्यात् क्रियायोगाल्लक्षणा पञ्चधा मता ॥"

इन पञ्चविध सम्बन्धोंमें साहदस्यसम्बन्ध परिणणित नहीं हुआ है, इसलिए मीमांसक साहदस्य-मूलक अन्यार्थप्रतीतिजनक 'गौणी' वृत्तिको लक्षणासे अलग मानते हैं। आलङ्कारिक इन पाँचोंको केवल रूढा लक्षणाका ही नियामक सम्बन्ध मानकर साहदस्यमूलक लक्षणाको गौणी-लक्षणा नामसे लक्षणाका ही अवान्तर भेद मानते हैं।

लक्षणाके अवान्तर भेद करते हुए काव्यप्रकाशकारने उसके उपादानलक्षणा और लक्षणलक्षणा दो मुख्य भेद माने हैं और उनके लक्षण इस प्रकार किये हैं—

"स्वस्विधये पराक्षेपः परार्थे स्वसमर्पणम्‌। उपादानं लक्षणा चेत्युक्ता शुद्धैव वा द्विधा ॥" का० प्र० २, १०

जहाँ मुख्यार्थ अपनी सिद्धि अर्थात् अन्यानुपपत्तिको दूर करनेके लिए किसी अन्य अर्थंका आक्षेप करा लेता है और उस आक्षित अर्थकी सहायतासे अपने अन्वयको उपपन्न करा देता है उसको 'उपादानलक्षणा' कहते हैं। इसका दूसरा नाम 'अजहल्लक्षणा' भी है। जैसे, 'धवेतो धावति' या 'कुन्ताः प्रविशन्ति' उदाहरणोंमें धावनक्रिया श्वेत गुणमें नहीं, किसी द्रव्यमें ही रह सकती है। श्वेत गुणवके साथ धावनक्रियांका आक्षेपत् अन्वय बाधित है। इसलिए मुख्यार्थे बाधित होनेसे श्वेत शब्द समवायसम्बन्धसे सम्बद्ध अश्वका आक्षेप करा लेता है। इस प्रकार लक्षणासे अश्व अर्थका आ

जाननेपर 'ध्वेतराश्वान् धावति' यह अर्थ बन जाता है, उसमें कहीं अनुपपत्ति नहीं रहती। इसमें श्वेत पदका अर्थ भी बना रहता है। इसलिए इसको 'उपादानलक्षणा' कहते हैं। इसी प्रकार 'कुन्ताः प्रविशान्ति' में अचेतन कुन्तों [ मारों ] में प्रविशक्रियाका अन्वय अनुपपन्न है। इसलिए कुन्त शब्द, कुन्तके साथ संयोगसम्बन्धसम्बद्ध कुन्तधारी पुरुषका आक्षेप करा लेता है और उसकी सहायतासे अन्वय उपपन्न हो जाता है। ये दोनों उपादानलक्षणाके उदाहरण हैं।

'लक्षणलक्षणा' का उदाहरण 'गङ्गायां घोषः' है। इस वाक्यमें जलप्रवाहरूप 'गङ्गा' के साथ आमीरणह्री [ नदीतटकी वस्ती ] का आघाराघेयभावसे अन्वय अनुपपन्न होनेपर घोष पदार्थका आघेयतासिद्धिके लिए गङ्गा शब्द अपने अर्थको समर्पित कर देता है। अर्थात् गङ्गा शब्द अपने अर्थको छोड़-

कर तटरूप अर्थका लक्षणया बोध कराता है। इस प्रकार गङ्गा शब्दने अपने अर्थको छोड़कर सामीप्य-

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कारिका १ ]

तत्रार्थान्तरसङ्क्रमितवाच्यो यथा— सङ्घर्षयामलकान्तिलिङ्गविचितो वेल्लद्धलाका घनात् वाताः शीकरणः पयोत्सुहृदामानन्दकेका: कलाः । कामं सन्तु हृदः कठोरहृदयो रामोऽस्मि सर्वे सखे वैदेही तु कयं भविष्यति वह्हा हा देवी घोरा भव ॥

इत्यत्र रामशब्दः । अनेन हि व्यङ्ग्ययधर्मान्तरपरिणतः संक्षीप्रस्याद्यते न संक्षिमात्रम् ।

सम्प्रन्थे तटतूप अर्थंका बोध कराया इसलिये यह 'लक्षणलक्षणा' का उदाहरण है । इसको 'जहत्स्वार्था' भी कहते हैं ।

इस प्रकार लक्षणाके दो मुख्य भेदोंमेंसे एक 'अजहत्स्वार्था' उपादानलक्षणामें शब्द अपने मुख्य अर्थको छोड़ता नहीं, अपितु लक्षणा उसके सामान्यव्यापक अर्थको किसी विशेष अर्थमें सङ्कुचित करा देती है । इसीलिये उसको अजहत्स्वार्था कहते हैं । यही अर्थान्तरसङ्क्रमितवाच्यध्यव्निका मूल है । इसीके प्रभावसे अविवक्षितवाच्यध्यव्निके अर्थान्तरसङ्क्रमितवाच्यभेदमें वाच्य अर्थ अपनी स्थिति रखते हुये स्व-विशेषमें पर्यवसित होता है । इसीलिए उसको अर्थान्तरसङ्क्रमितवाच्यध्यव्नि कहते हैं । 'नयनने तसैवक नयने' उसीके नेत्र नेत्र हैं जिसने**; इसमें द्वितीय नयन शब्द भाग्यवृत्तादिगुणविशिष्ट नयनका बोधक है । यदि दोनों शब्दोंका साधारण नेत्र ही अर्थ करें तो पुनरुक्ति होगी, इसीलिये दूसरा नयन शब्द भाग्यवृत्तादिगुणविशिष्ट नेत्रोंका अतिपादक होनेसे अर्थान्तरसङ्क्रमितवाच्यध्यव्निका उदाहरण होता है ।

लक्षणाका दूसरा भेद लक्षणलक्षणा है । इसमें दूसरेकी अन्वयसिद्धिके लिये एक शब्द अपने अर्थको बिलकुल छोड़ देता है, इसलिए इसको जहत्स्वार्था कहते हैं । मुख्यार्थका अत्यन्त परित्याग कारण ही उसका तिरस्कार है । इसलिये लक्षणलक्षणामें वाच्यार्थके अत्यन्त तिरस्कार—सर्वथा परित्यागके भेदका मूल है । इस प्रकार अर्थान्तरसङ्क्रमितवाच्यध्यव्निके नाममें प्रयुक्त सङ्क्रमित पदका प्रयोग व्यञ्जनाकी सहकारिणी लक्षणाके प्रभावको द्योतित करता है । आगे इन दोनोंके उदाहरण देते हैं—

१. अर्थान्तरसङ्क्रमितवाच्यध्यव्निके उदाहरण

अर्थान्तरसङ्क्रमितवाच्य [का उदाहरण] जैसे— सङ्घर्ष पवं इयाम कान्तिसे आकारको व्याप्त करनेवाले और [वल्लाका] वक-पंक्ति जिनके पास विद्धार कर रही है ऐसे सघन मेघ [मले ही उमड़ें], श्वेत [छोटे-छोटे जत्कणों] से तुक [शीतलमन्द] समीर [मले ही वहे] और मेघोंके मित्र मयूरोंकी आनन्दभरी कूकें भी चाहे कितनी ही [श्रवणगोचर] हों, मैं तो कठोरहृदय राम हूँ, सब-कुछ सह लूँगा । परन्तु [अतिं शुचुमारी, कोमलहृदया, वियोगिनी] वैदेहीकी क्या दशा होगी ? हा देवी, घैर्य रखना !

इसमें 'राम' शब्द [अर्थान्तरसङ्क्रमितवाच्य] है । इससे केवल संक्षिप्त रामका बोध नहीं होता अपितु व्यङ्ग्यधर्मंविशिष्ट [अत्यन्त दुःखसहिष्णुरूप संक्षी] रामका बोध होता है ।

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ध्वन्यालोक:

यथा च ममैव विषमबाणलीलायाम्—

ताला जआन्ति गुणा जाला दे सहिअअहि घेस्पन्ति । रक्खिरणानुगहिआइँ होन्ति कमलाइँ कमलाइँ ॥

[ तदा जायतेऽत्र गुणा यदा ते सहदयैरगुणीभान्ते । रक्तिकरणानुगृहीतानि भवन्ति कमलानि कमलानि ॥ ] इति छाया ]

इत्थं द्वितीय: कमलशब्द: ।

अत्यन्ततिरस्कृतवाच्यो यथादिकवेर्‌वोऽलम्कृते:

इस इलोकके वक्ता राम हैं । अतएव 'रामोऽस्मि' के स्थानपर केवल 'अस्मि' कहनेपर भी 'अहं' पदकी प्रतीति द्वारा रामका बोध हो जाता है । इसलिए प्रकृतिमें रामपदका मुख्यार्थ अनुपपन्न होकर [अजहल्स्वार्थी उपादान] रक्खणा द्वारा, अत्यन्त दुःखसहिष्णुत्वविशिष्ट रामका बोध कराता है । 'मैं राम हूँ' अर्थात् पिताके अत्यन्त वियोग, राज्यत्याग, वनवास, जटाचीरधारण, श्रीहरण आदि अनेक दुःखोंका सहन करनेवाला अत्यन्त कटोरहृदय राम हूँ, मैं सबकुछ सहन कर सकूँगा । यहाँ 'दुःखं कटोरहृदय:' यह पद उत्त्क्षर्‌यार्थकी प्रतीतिमें विशेष सहायक होता है और रामपद अत्यन्त दुःखसहिष्णुत्वविशिष्ट रामका बोधक होनेसे 'अर्थान्तरसङ्क्रमितवाच्यशब्दिका' उदाहरण है । उन्होंने

यद्यपि ग्रन्थकारने इसे केवल 'अर्थान्तरसङ्क्रमितवाच्यके' उदाहरणके रूपमें प्रस्तुत किया है और अत्यन्ततिरस्कृतवाच्यका उदाहरण आगे देंगे, परन्तु यहाँ आख़िरके निराकार होनेसे उसका लेपन सम्भव न होनेसे 'लिट्' शब्द अपने अर्थको सर्वथा छोड़कर, 'व्यास' अर्थका बोध कराता है । इसी प्रकार 'पयोदसुधादाम्‌' में सौहार्द चेतनका धर्म ही हो सकता है, इसलिए मेघमें सम्भव न होनेसे 'सुधा' शब्द अपने अर्थको छोड़कर लक्षणलक्षणासे 'आनन्ददायक' अर्थका बोध कराता है । इस प्रकार ये दोनों पद अत्यन्ततिरस्कृतवाच्यके उदाहरण भी हो सकते हैं । परन्तु अन्यकारने तिरस्कृतवाच्यका अलम्‌ब ही उदाहरण देना उचित समझा इसलिए वे आगे इसका उदाहरण देंगे । अभी अगला

एक और उदाहरण अर्थान्तरसङ्क्रमितवाच्यके ही स्वरचित 'विषमबाणलीला' नामक काव्यसे देते हैं ।

और जैसे मेरे ही 'विषमबाणलीला' [नामक काव्य] में—

[गुण] गुण तभी होते हैं जब सहृदय उनका ग्रहण करते हैं; सूर्यकी किरणोंसे अनुरगृहीत कमल ही कमल होते हैं ।

यहाँ द्वितीय कमल शब्द [अर्थान्तरसङ्क्रमितवाच्य है] ।

यहाँ द्वितीय कमल शब्द रक्खणा द्वारा रक्खणाभाजनत्वादिर्वर्मविशिष्ट कमलका बोधक होनेसे अर्थान्तरसङ्क्रमितवाच्य है और चारुत्वका अतिशय व्यङ्ग्य है । इसी प्रकार पूर्वार्धमें गुण शब्दकी आख्‍यक्ति मानकर गुण तभी गुण होते हैं जब सहृदय उनका ग्रहण करते हैं । ऐसा अर्थ सङ्क्रमितवाच्य होगा और उस दशामें द्वितीय गुण शब्द उत्त्क्षर्‌श्वादिर्शर्मविशिष्ट गुणका बोधक होनेसे अर्थान्तरसङ्क्रमितवाच्य होगा और उस उत्त्क्षर्षका अतिशय व्यङ्ग्य होगा । ये दोनों इलोक अर्थान्तर-

२. अत्यन्ततिरस्कृतवाच्यके दो उदाहरण

अत्यन्ततिरस्कृतवाच्यके [का उदाहरण] जैसे प्रादिकवि कवि‍भीकिका [पञ्चवटीमें हैमन्तवर्णनके प्रसंगमें रामचन्द्रजीका कहा हुआ यह इलोक]—

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कारिका ९ ]

द्वितीय उद्योत:

रविसङ्क्रान्तसौभाग्यसुषुमारावृतमण्डल: ।

नि:श्वासान्ध इवादर्श इव चन्द्रमा न प्रकाशते ॥

इत्थं

अत्रान्धशब्द:

गअणं व मत्तमेहं धारालुलिअज्जुणालइं अ वणाइइं ।

णिरहड्कारमिअंका हरन्ति णीलाअ व णिसाअ ॥

[रागनं व मत्तमेघं धारालालितार्ज्जुनानि व वनान्ति ।

निरहङ्कारमृगाड्का 'हरन्ति नीला अपि निशा: ।।

इति च्छाया ]

अत्र मत्तनिरहड्कारशब्दौ ।।१।।

[हेमन्तमें सूर्यके चन्द्रमाके समान अनुष्ण और आह्लादायक हो जानेसे] जिस [चन्द्रम] की शोभा सौर्यमें सङ्क्रान्त हो गयी है [अथवा सूर्यसे प्रकाशको ग्रहण करनेवाले] तुषारसे आच्छादित मण्डलवाला चन्द्रम निःश्वाससे मलिन दर्पणके समान प्रकाशित नहीं हो रहा है ।

यहाँ अन्ध शब्द [अत्यान्ततिरसकृतवाच्य है] ।

'अन्ध' शब्द नेत्रहीनका वाचक है ।

चन्द्रममें नेत्रहीनस्वरूप अनधत्व अनुपपन्न होनेसे 'अन्ध' शब्द अपने नेत्रविहीनत्व अर्थको सर्वथा छोड़कर अपकाशारूप अर्थको जहत्स्वार्थी लक्षणलक्षणा द्वारा बोधित करता है और अप्रकाशातिद्योतितव्यङ्गच्य होता है ।

अन्ध शब्द अपने अर्थको सर्वथा छोड़कर अपकाशारूप अर्थका बोधन करता है इसलिए अन्ध शब्दका मुख्यार्थ यहाँ अत्यन्ततिरसकृत हो जाता है ।

इससे इसको 'अत्यन्ततिरसकृतवाच्यध्वनि' का उदाहरण माना है ।

भट्टनायकने इस इलोककी व्याख्यामें 'इव' शब्दका यथाश्रुत अन्वय मानकर 'इव शब्द-योगाद् गौणतापत्त्र न काचित्' लिखकर अन्ध पदमें लक्षणा माननेकी आवश्यकता नहीं समझी है ।

परन्तु उनकी यह व्याख्या सङ्गत नहीं है । 'इव' शब्द चन्द्रम और आदर्शके उपमानोपमेयभावका बोधक है ।

नि:श्वासान्ध पद आदर्शका विरोषण है ।

'नि:श्वासान्ध आदर्श इव चन्द्रम न प्रकाशते' इस प्रकार अन्वय होनेसे 'इव' शब्द मिथ्यैक्रम है ।

इसलिए अन्ध पदको स्वार्थमें बाधित होनेसे जहत्स्वार्थी लक्षणलक्षणा द्वारा 'अप्रकाशारूप अर्थका बोधक माननेना ही होगा और उस दशामें अपकाशातिद्यायको व्यङ्गच्य द्वारा बोधित कर वह अत्यन्ततिरसकृतवाच्यध्वनिका उदाहरण होगा ।

[न केवल ताराओंसे भरा निर्मेघ आकाश ही अपितु] मेघोंसे आच्छादित आकाश [भी, न केवल मेघविमुक्त मेघय मलय पवन, सारसके] आन्दोलित आञ्जन ही अपितु वर्षाकी अन्धकारमयी] धाराओंसे आन्दोलित अर्जुनवन [और न केवल उज्ज्वल चन्द्रकिरणोंसे धवलित चाँदनी रातें ही मनको लुभानेवाली होती हैं अपितु सौन्दर्यसे रहित] गवन्धीन चन्द्रमावाली [वर्षाकालकी अन्धकारमयी] कालो रातें भी मनको हरण करनेवाली होती हैं ।

यहाँ मत्त और निरहड्कार शब्द [अत्यान्ततिरसकृतवाच्य हैं] ।।१।।

मत्तके उपयोगसे पैदा हुइ क्रोधका 'मत्त' शब्दका और सौन्दर्यादिके कारण उत्पन्न 'दर्प', आह्लादकार शब्दका मुख्यार्थ है ।

ये दोनों धर्मी चेतनमें ही रह सकते हैं ।

यहाँ मत्तताका मेघके साथ और निरहड्कारतका वनचन्द्रके साथ जो सम्बन्धवर्णन किया है वह अनुपपन्न है ।

अतः मुख्यार्थ-

और निरहड्कारतका वनचन्द्रके साथ जो सम्बन्धवर्णन किया है वह अनुपपन्न है । अतः मुख्यार्थ-

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ध्वन्यालोक:

असंलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्योक्त: क्रमेण व्योतिन: परं: । विवक्षितानभिधेयस्य ध्वनेरात्मा द्विधा मतः ॥१॥

मुख्यतया प्रकारामानो व्यङ्ग्य-व्यञ्जकौ ध्वनेरात्मा । स च वाच्यार्थोपेक्षया कश्चिद्-लक्ष्यक्रमतया' प्रकाराने, करिचित् क्रमेणेति द्विधा मतः ॥२॥

वाच्ये कारण यह 'मत्' शब्द सादृश्यवशा हुनीवारत्व आदि तथा निरहार शब्द विच्छायत्वादि घमोंको व्यक्त करता है । अतएव यहां अत्यन्ततिरस्कृतवाच्यव्यवस्था है ॥१॥

ध्वनिवक्षि्तान्यपरवाच्य [अभिधामूल] ध्वनिके दो भेद

उपर ध्वनिळे दो भेद किये ये हैं । अविवक्षितवाच्य या लक्षणामूल ध्वनि और दूसरा विवक्षितान्यपरवाच्य अभिधामूल ध्वनि । इनमेंसे पहिले अर्थात् अविवक्षितवाच्य [लक्षणामूल] ध्वनिके अर्थान्तरसंक्रमितवाच्य और अत्यन्ततिरस्कृतवाच्य यह दो अवान्तर भेद और किये । इसी प्रकार अव विवक्षितान्यपरवाच्य [अभिधामूल] ध्वनिके अवान्तर भेद दिखलायेंगे । इसके मी पहिले दो भेद होते हैं—एक असंलक्ष्यक्रमव्यङ्गच्य और दूसरा संलक्ष्यक्रमव्यङ्गच्य । रस, भाव, रसभाव, भावाभास, भावशान्त, भावसंवलितरूप झास्वादप्रधान ध्वनिको 'असंलक्ष्यक्रमव्यङ्गच्य' ध्वनि कह्ते हैं ।

इसके अवान्तर भेदोंका अनन्त विस्तार हो जायगा इस कारण उसका विस्तार नहीं किया गया है, अपितु अर्थात् लक्षणाक्रमव्यङ्गच्यकका एक ही भेद माना है । दुसरे संलक्ष्यक्रमव्यङ्गच्यके अनेक भेद किये गये हैं । आगे विवक्षितान्यपरवाच्य [अभिधामूल] ध्वनिके अवान्तर भेद करके पहिले असंलक्ष्यक्रमव्यङ्गच्यके विषयमें कुछ विशेष बातें लिखते हैं ।

विवक्षितवाच्य [अभिधामूल] ध्वनिका आत्मा [स्वरूप] असंलक्षित क्रमसे और दूसरा संलक्षित क्रमसे प्रकाशित [होनेसे] दो प्रकारका माना गया हैं ॥३॥

प्रधान रूपसे प्रकाशित होंनेवाला व्यङ्गच्य अर्थ ध्वनिका आत्मा [स्वरूप] है । और वह् कहीं वाच्यार्थकी अपेक्षासे अलक्षित क्रमसे प्रकाशित होता है और कहीं [संलक्ष्य] क्रमसे, इस प्रकार दो तरहका माना गया है ।

कारिकामें विवक्षिताभिधेय और ध्व्यान दानोंका समानाधिकरणरूपसे प्रयोग किया गया है । यों अभिधेय अभिधात्का और ध्वनि व्यञ्जनाशक्तिका विषय होंनेसे दोनों अलग-अलग हैं । परन्तु यहां दानोंका सादृश्य और सामानाधिकरण्य, अभिधेयकी अनुप्रप्ताको व्यक्त करता है । तदनुसार विवक्षिताsभिधेयका अर्थ विवक्षितान्यपरवाच्य करणसे ध्वनिके साथ उसका सामानाधिकरण्य उपपन्न हो जाता है । प्रथमा कारिकामें अभिवक्षितवाच्य [लक्षणामूल] ध्वनिके जो अन्तर-संक्रमितवाच्य और अत्यन्ततिरस्कृतवाच्य दो भेद दिखलाये है वे वाच्यार्थशब्दी प्रतीतांकके स्वरूपभेदसे दिखाये है औीर इस कारिकामें विवक्षितान्यपरवाच्य[अभिधामूल]ध्वनिके जो असंलक्ष्यक्रमव्यङ्गच्य और संलक्ष्यक्रमव्यङ्गच्य दो भेद दिखलाये हैं वे व्यञ्जनाव्यापारक स्वरूपभेदसे दिखलाये है ॥२॥

असंलक्ष्यक्रमव्यङ्गच्यध्वनि

प्रधान रूपसे प्रकाशित होंनेवाला व्यङ्गच्य ही ध्वनिका स्वरूप है । अर्थात् जहां व्यङ्गच्य अर्थका प्राधान्य प्राप्त होता है वही ध्वनि काव्य माना जाता है । इसका अर्थ यह हुंआ कि जहां व्यङ्गच्यका प्राधान्य

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रसभावतदभावसततप्रशान्त्यादिरक्रमः

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ध्वन्यालोक:

अर्थात् देवता, गुरु आदिविषयक रति— प्रेम तथा अभिलाष्यक्‌। व्यभिचारी भावको भाव कहते हैं और रस तथा भावके अनुचित वर्णनको रसाभास एवं भावाभास कहते हैं।

रसप्रक्रिया

"विभावानुभावव्यभिचारिसंयोगाद् रसनिष्पत्तिः:" यह भरतमुनिका सूत्र है। इसका आशय यह है कि विभाव, अनुभाव और व्यभिचारिभावके संयोगसे परिपुष्ट रत्यादि स्थायिभाव आस्वादावस्थापन होकर रस कदलते हैं। यह भरतका मूल सूत्र सीधा-सा जान पड़ता है परन्तु वह बड़ा विवादग्रस्त रहा है। अनेक आचार्योंने अनेक प्रकारसे उसकी व्याख्या की है। 'काव्यप्रकाश' में मम्मटाचार्यने उनमेंसे १. भट्टलोल्लट, २. श्रीशङ्कुक, ३. भट्टनायक, ४. अभिनवगुप्ताचार्यके चार मतोंका उल्लेख मिलता है। उन सब मतोंको समझनेके लिए पहिले रसप्रक्रियाके पारिभाषिक शब्द विभाव, अनुभाव, व्यभिचारिभाव, स्थायिभाव आदिको समझ लेना चाहिये।

स्थायिभाव

मनुष्य जो कुछ देखता, सुनता या अन्य किसी प्रकार अनुभव करता है उस सबका संस्कार उसके मनपर रहता है। वह अनुभव तो क्षणिक होकर नष्ट हो जाता है परन्तु वह अपने पीछे एक स्थायी वस्तु 'संस्कार' छोड़ जाता है, जिसे 'वासना' भी कहते हैं। ये संस्कार अपने योग्य उद्बोधक सामग्री पाकर उद्बुद्ध हो जाते हैं। उस उद्बोधक सामग्रीसे न देखल इस समय या इस जन्मके पूर्वकृत संस्कारोंमेंसे अनेक संस्कार-राशि-राशि उनसे व्याप्त होकर अथवा इस जन्ममें अनेक देशदेशान्तरसे व्याप्त संस्कारोंका उद्बोध हो सकता है। योगदर्शनने इन वासनाओं अथवा संस्कारोंके भनादित्त्व और अत्यन्त गुदूरवस्थावस्थ संस्कारोंकी भी अभिव्यक्तिका वर्णन करते हुए लिखा है— "वासना मनोअनुभूतवर्गविषयो नित्यत्वात्।" योगसूत्र ४, ९ "जातिदेशकल्यकवहितानामप्यानन्त्यं स्मृतिसंस्कारयोरेकरूपत्वात्।" यो० ४,१०

यदि हम इन संस्कारोंकी गणना करना चाहें तो वह असम्भव है। एक पुरुषके मनके एक जन्मके संस्कारोंका परिज्ञान भी सम्भव नहीं है। फिर उसके अपरिगणित पूर्वजन्मोंके और संसारके अपरिमित प्राणियोंके संस्कारोंकी गणना तो सर्वथा असम्भव ही है। फिर भी प्राचीन आचार्योंने उन संस्कारोंका वर्गीकरण करनेका प्रयत्न किया है। साहित्यशास्त्रकी रसप्रक्रियामें स्थायिभाव शब्दसे कहीं चार, कहीं नौ और कहीं दस स्थायिभावोंका वर्णन किया गया है। वह उन अनादिकालीन संस्कारों या वासनाओंका वर्गीकृत रूप ही है। मनमें स्थायी रूपसे रहनेवाली वासना या संस्कारका नाम ही स्थायिभाव है। इन संस्कारोंमें सबसे प्रबल और बहुधा व्यक्त वासनाएँ १. रति, २. हास, ३. उत्साह और ४. जुगुप्सा सम्बन्ध रखनेवाली होती हैं, क्योंकि ये प्राणीकी सबसे अधिक स्वाभाविक प्रवृत्तियाँ हैं और न केवल मानवयोनिमें अपितु पक्षी, कीट, पतङ्ग आदि सभी योनियोंमें पायी जाती हैं। साहित्यिक आचार्योंने इन स्थायिभावोंका परिगणन इस प्रकार किया है—

"रतिहासशोकक्रोधोत्साहौ भयं तथा। जुगुप्साविस्मयश्चेति स्थायिभावा: प्रकीर्तिता: ॥" का० प्र० ४, ३०

या वैराग्यको भी मिलाकर नौ स्थायिभाव मानने गये हैं।

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आलम्बन और उद्दीपनविभाव

इन स्थायिभावोंको उद्बुद्ध करनेवाली सामग्री मुख्यतः दो प्रकारकी है—एक आलम्बन और दूसरी उद्दीपन । नायक और नायिकादिके आलम्बनसे स्थायिभाव उद्बुद्ध होते हैं, इसलिए उनको आलम्बनात्मक सामग्री या आलम्बनविभाव कहते हैं । वाञ्छा परिस्थिति—उद्यान, प्राकृतिक सौन्दर्य आदि उनके उद्दीपक होनेसे उद्दीपनसामग्री में आते हैं और उद्दीपनविभाव कहलाते हैं । आलङ्कारिकोंने स्थायिभावोंकी इस द्विविध उद्बोधक सामग्रीको ‘विभाव’ नामसे निर्दिष्ट किया है—

“विभावौ द्वौ रसोत्पत्तौ स्तुतौ आलम्बनोद्दीपनौ । आलम्बनो नायकादिस्तमालम्ब्य रसोद्र्माति:” सा० द० ३, ३०. “उद्दीपनविभावास्ते रससुदीपनायन्ति ये । आलम्बनस्य चेष्टाद्या देशकालादयस्तथा ॥” सा० द० ३, १३९

अनुभाव

मनके भीतर स्थायिरूपसे विद्यमान रत्यादि वासनाओं या स्थायिभावोंका इस आलम्बन तथा उद्दीपनसामग्री अर्थात् विभावोंसे उद्बोधनमान्र होता है, उससे उत्पत्ति नहीं । भट्टलोल्लटने “विभावैर्‌ललितोऽन्वादिभिरलम्भनोद्दीपनकारणै: रस्‍यादिको भावो जनित:” लिखा है । यहाँ ‘जनित:’ का अर्थ ‘उद्बुद्ध:’ ही करना चाहिए, क्योंकि यदि रत्यादिको उत्पत्ति मानें तो फिर वह स्थायिभाव ही कहाँ रहा । इस प्रकार जब इस सामग्रीसे रत्यादि वासना उद्बुद्ध हो आती है तो उन वासनाओंका प्रभाव बाहर दिखलायी देने लगता है । मनोगत चिरसुप्त वासनाके अनुरूप ही मनुष्यकी वेषा, आकारभङ्गी आदिमें भेद हो जाता है । इसे लोग आलङ्कारिक लोग ‘अनुभाव’ कहते हैं । विभाव तो रत्यादिके उद्बोधकके कारण हैं और ‘अनुभाव’ उनके कार्य हैं । इसीलिए इनको ‘अनु पश्चाद् भवन्तीति अनु-भावा:’ ‘अनुभाव’ कहते हैं । ये अनुभाव हर एक वासना या स्थायिभावके अनुसार अलग-अलग होते हैं ।

“उद्बुद्धं कारणं स्वच्‌चं सत्त्वहिरम्भोभ्य: प्रकाशयन् । लोकेऽनु कार्यरूप: सङ्‌चारानुभाव: काव्यनाट्ययो: ॥” सा० द० ३, १३२

“स्वाप्‍म: स्वेदोऽथ रोमाञ्‍च: स्वरभङ्‌ग्योऽथ वेपथु: । वेवर्ण्यमश्रु प्रयय इत्यष्टौ सात्त्विकाः स्मृताः ॥” सा० द० ३, १३५

इन अनुभावोंमें—

इन आठ सात्त्विक भावोंको प्रधान होनेके कारण ‘गोवल्‍लभदैन्याद्‌’यसे अलग भी गिना दिया जाता है ।

व्यभिचारिभाव

स्थायिभावते उलटा व्यभिचारिभाव है, उसको संचारिभाव भी कहते हैं । स्थायिभावकी विशेषता है, इसी प्रकार व्यभिचारिभावका अंशोऽपि उसकी विशेषता है । स्थायिभावकी उपमा ‘रङ्‌वणाकर’से दी गयी है । सागर झीलमें जो कुछ डाल दो थोड़े समयमें नमक बन जाता है । इसी प्रकार जो विरुद्ध या अविरुद्ध भावोंसे विच्छिन्न नहीं होता है वही स्थायिभाव है ।

“विरुद्धैरविच्छेदैस्‍त्‍वं भावैर्‌वैचिच्छेदते न य: । आत्मभावं नयत्यनन् स: स्थायी रङ्‌वणाकर: ॥” दशारूपक ४, ३८

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ध्वन्यालोक:

रसास्वाद और रससङ्घ्या

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कारिका २ ] द्वितीय उद्योतः

इसका भाव यह है कि रामको स्थायिभाव माननेके विषयमें कई प्रकारकी विप्रतिपत्तियाँ पायी जाती हैं। १. भरतने नाट्यशास्त्रमें शान्तरसके विभावादिका प्रतिपादन भी नहीं किया है और न राम का लक्षण ही किया है, इसलिए कुछ लोग रामको स्थायिभाव नहीं मानते। २. दूसरे लोगोंका कहना यह है कि राग-द्वेष आदि दोषोंका सर्वथा नाश हो जानेपर ही इसकी स्थिति उत्पन्न हो सकती है, परन्तु अनादिकालप्रवाहिते आनेवाले राग-द्वेषका सर्वथा अभाव सम्भव नहीं है। इसलिए शम हो ही नहीं सकता। ३. अन्य लोग वीर, बीभत्स आदि रसोंमें उसका अन्तर्भाव करते हैं। इनमेंसे चाहे जो ठीक हो। हमारा ['दशरूपक' और उसके टीकाकारका] कहना यह है कि समस्त व्यापारविलय रूप 'रामका' अभिनय सम्भव नहीं है। इसलिए अभिनयात्मक नाट्यमें रामका स्थायिभावत्व हम नहीं मान सकते। जिन लोगोंने 'नागानन्द' नाटकमें शान्तरस माना है उनका वह कथन 'नागानन्द' में आदिसे अनन्तक पाय जानेवाले मलयवतीके प्रति अनुराग और विद्याधरचक्रवर्तित्वकी प्रातिके विरुद्ध होनेसे वहाँ शान्तरस नहीं अपितु दयावीरका उत्साह ही वहाँ स्थायिभाव और वीररस है।

स्थायिभावका लक्षण 'विरुद्धाविरुद्धाविच्छेदित्य' ऊपर कहा गया है वह भी राममें नहीं घटता। अतएव शम स्थायिभाव नहीं है। नाटकमे उसका परिपोष वैस्त्यापादक ही होगा। इसलिए दशरूपककार धनञ्जयके मतमें कमसे कम नाटकमें शम स्थायिभाव नहीं है।

रसानुभवकालीन चतुर्विध चित्तवृत्ति

विभाव, अनुभाव, सञ्चारिभावके योगसे स्थायिभावका परिपोष होकर जो आस्वादन होना है उसीको रस कहते हैं। यह आस्वादन या रस वस्तुतः चित्तकी एक अवस्थाविशेष है। और हमने लिखा था कि हमारे अन्तःकरणमें अनादिकालसे सञ्चित जो वासनाएँ हैं, जिन्हें संस्कार भी कहते हैं, उन्हींको साहित्यशास्त्र या अलङ्कारशास्त्रके आचार्योंने वर्गीकरण करके स्थायिभाव नाम दिया है। यह वर्गीकरण वस्तुतः रसानुभूतिकालमें चित्तकी जो अवस्था होती है उसीके आधारपर किया गया है और वह उनकी दृष्टि मनोवैज्ञानिक विवेचनाशक्तिकी परिचायक है। ऊपर जो आठ स्थायिभाव दिखलाये हैं उनको भी संक्षिप्त करके चार प्रकारकी मनोदशाओंका विवेचन दशरूपककारने किया है। रसानुभवके समय चित्तकी जो-जो मिलीजुली अवस्थाएँ होती हैं उन्हें विकाश, विस्तार, विक्षोभ और विक्षेप इन चार रूपोंमें विभक्त किया गया है। प्रेमके समय या शृङ्गाररसके अनुभवकालीन चित्तवृत्तिको 'विकाश' रखा गया है। इसी प्रकार वीररसके

कालिक मनःस्थितिको 'विकाश' रखा गया है। इसी प्रकार वीररसके अनुभावकालीन चित्तवृत्तिको 'विस्तार', बीभत्सानुभूतिकालीन चित्तवृत्तिको 'विक्षोभ' और रौद्रानुभूति-कालिक मनःस्थितिको 'विक्षेप' नाम दिया गया है।

रसचतुष्टयवाद

इस प्रकार चित्तकी चार प्रकारकी ही दशा होनेसे शृङ्गार, वीर, बीभत्स और रौद्र इन चार रसोंको ही इन लोगोंने मौलिक रस माना है और शेष चार करुण, हास्य, अद्भुत और भयानकको उनके आभित; क्योंकि इन चारोंमें भी वही चार प्रकारकी मनोदशा होती है। इसलिए हास्यमें शृङ्गारके समान चित्तका 'विकाश', अद्भुतमें वीररसके समान चित्तका 'विस्तार', भयानकरमें बीभत्सके समान 'विक्षोभ' और करुणरसमें रौद्ररसके समान चित्तमें 'विक्षेप' का प्राधान्य होता है। इस प्रकार रसानुभूतिकालमें चित्तकी चार प्रकारकी मनोदशा सम्भव होनेके कारण चार ही मौलिक रस हैं और शेष चार उनके द्वारा उत्पन्न होते हैं।

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ध्वन्यालोक:

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कारिका ३ ] द्वितीय उद्योत:

वास्तविक तद्रग वहाँ नहीं है। “तद्रति तत्प्रकारकं ज्ञानं प्रमा” यह यथार्थज्ञान या प्रमा का लक्षण है; वह नहीं घटता इसलिए चित्रतुरगरबुद्धि या नाट्यस्थाल्यागत रामरूपचारी नटमें रामबुद्धि यथार्थ नहीं है। न वह मिथ्या ही है और न शाब्दस्य या संशयरूप। इन सबके विलक्षण ध्वनिवंचनीय रामप्रतीतिले नटको रामरूपमें ग्रहण करके उस नटके द्वारा प्रकाशित अनुभावादि भी जो वास्तविक कृतिम हैं पर उनको कृतिम न मानकर उनके आधारपर नटमें रत्यादिका अनुमान होता है। वह अनुमिति-प्रवृत्ति भी अन्य अनुभीयमान पदाथोंसे मिल्न प्रकारकी होती है, क्योंकि साधारणतः अनुमिति परोक्षज्ञान है और रसकी अनुभूति प्रत्यक्षात्मक होती है। इसलिए रसादिप्रतीतिले अनुमितिरूप होते हुए भी अन्य अनुमितियोंसे विलक्षण होनेसे नटगत रत्यादिका सामाजिकको अनुभव होता है। यह शाब्दुकका मत है।

शाब्दुकके 'अनुमितिवाद'की आलोचना

परन्तु यह शाब्दुक महोदय वस्तुतः त्रिशङ्कुकी भाँति अथर्मे लटके हुए हैं। उनका सब-कुछ कल्पित है। अनुमितिले लिए जिस नटरूपरामको पक्ष बनाया है उसका रामत्व निश्चित नहीं है। उधर अनुमानके लिए जिन अनुभावादिको लिङ्ग या हेतु बनाया वे भी कल्पित—कृतिम हैं, पर उनको अकृतिम माना जा रहा है। उसे देखके द्वारा जिस रत्यादि स्थायिभावकी सिद्धि करनी है वह भी सम्भावितमात्र, अयथार्थ है। उस परोक्ष अनुमितिको जो अपरोक्शात्मक या साक्षात्कारात्मक अनुभूतिस्वरूप माना है वह भी कल्पित है। यह सब उनका स्वकपित मत है। इन्हीं सारी कल्पनाओंमें भरतके “विभावानुभावव्यभिचारिसंयोगाद रसनिष्पत्तिः” इस सूत्रमें आये हुए 'संयोग' शब्दका अर्थ उन्होंने 'साम्यगमकभावरूपात् सम्बन्धात्' किया है और उस गम्यगामकभावसे “रामोड्यं सीताविषयकरतिमान् सीताविष्यकविमावादिमनिष्पत्तिलाद् सीताविष्यकरटाक्षादिमत्स्वाद्र यो नैवं स नैवं यथाहम्‌” यह जो अनुमान किया है उसमें 'अहं'को व्यतिरेकी उदाहरण बनाया है और उसी 'अहं' पदबोध्य सामाजिकको रसका चर्वणाश्रय माना है। यह सब-कुछ एकदम असंगत है। इसलिए भट्टनायकने शाब्दुकके मतका खण्डन कर अपने 'युक्तिवाद'की स्थापना की है।

भट्टनायक द्वारा इन मतोंकी आलोचना

तीसरा मत भट्टनायकका 'भुक्तिवाद' है। भट्टनायकने कहा है कि रस यदि परगत अर्थात् अनुकार्यगत या अनुकर्त्तं नटगत प्रतीत हो तो दोनों ही दशाओंमें उसका सामाजिक सहृदयसे कोई सम्बन्ध नहीं बन सकेगा। और वह सामाजिकके लिए, तटस्थके समान निष्प्रयोजन होगा। दूसरी ओर यदि उसकी उत्पत्ति स्वगत अर्थात् सामाजिकगत माने तो भी रज्जु नहीं है, क्योंकि उसकी उत्पत्ति सीता आदि विभावोंके द्वारा होती है। वे सीता आदि रामके प्रति तो विभावादि हो सकते हैं, सामाजिकके प्रति नहीं। साधारणीकरणव्यापारसे सीता और रामादिका व्यक्तित्व निकलकर उनमें सामान्य कान्तत्व आदि रूप ही रह जाता है, इसलिए वे सामाजिकके प्रति भी विभावादि हो सकते हैं, यह कहना भी ठीक नहीं है। अथवा बीचमें स्व-कान्ताका स्मरण माननेसे भी काम नहीं चलेगा, क्योंकि देवतादिके वर्णन—जैसे 'कुमारसम्भव' आदि—में पार्वती आदिके वर्णनप्रसङ्गमें भी रसास्वाद होता है और उनको भी होता है जिनकी कान्ता न थी, न है। देवतावर्णनस्थलमें वर्ण्यमान पार्वती आदिमें देवताबुद्धि और पूज्यताप्रतीति ही साधारणीकरणमें बाधक है। इसलिए रसकी न स्वगत [सामाजिकगत] उत्पत्ति बनती है और न परगत [अनुकार्य रामादिगत नटादिगत]। इसी

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ध्वन्यालोक:

भट्टनायककृत 'शुक्तिवाद'

प्रकार स्वगत या परगत न प्रतीति बनेगी और न अभिव्यक्ति। आभिव्यक्तिपक्षमें और भी दोष है। अभिव्यक्ति पूर्वसिद्ध अर्थकी ही होती है। परन्तु रस तो अनुभूति का नाम है, अनुभवकालके पूर्व या पश्चात् उसका कोई अस्तित्व ही नहीं है। इसलिये भी अभिव्यक्ति नहीं बनती। यदि यह कहें कि रस वासना या स्थायिभावके रूपमें स्थित है, उसीकी अभिव्यक्ति होती है, तो भी ठीक नहीं है, क्योंकि अभिव्यक्ति.स्थले दीपकादि अभिव्यंजक सामग्रीमें उत्त्कृष्टता-निकृष्टताका तारतम्य भी उपलब्ध होता है। वैसा तारतम्य रसाभिव्यंजक सामग्रीमें नहीं बनता है, इसलिये रसकी स्वगतता या परगतता उत्पत्ति, प्रतीति या अभिव्यक्ति कुछ भी नहीं बनती। इसलिये न 'तात्स्थ्येन [अनुकूल्यंगतत्वेन नटगतत्वेन वा] नात्मगतत्वेन [सामाजिकगतत्वेन] वा रसः प्रतीयते, नोत्पद्यते, नाभिव्यज्यते" [काव्यप्र०] "तेन न प्रतीतिर नाभिव्यज्यने काव्येन रसः" [लोचन०]।

यह तो अन्य मतोंकी आलोचना हुदं; तब भट्टनायककृत अपना मत क्या है ? उनका अपना मत यह है कि काव्यात्मंक द्रव्योंमें अन्य 'अभिधायकत्व', 'भावकत्व' और 'भोजकत्व'-रूप तीन व्यापार रहते हैं। अभिधायकत्वव्यापार अर्थविपयक, भावकत्वव्यापार रसादिविषयक, और भोजकत्वव्यापार हृदयविपयक होता है। यदि इन तीन व्यापारोंको मानकर केवल एक [चन्द्र] अभिधायक्त्वागार ही माना जाय तो 'तन्न' आदि शास्त्रनयाय और इलेषादि अलङ्कारोंमें कोई भेद न रहंगा ! "तन्नं नाम अनेकार्थयोःध्वनित्या पदस्खेक्य सकृदूचारणम्" अनेक अर्थोंके बोधनकी शक्तिरूप हि शृङ्खलारसाभिव्यक्तौ विषयार्जनतारतम्यप्रदृष्टिः स्तात्। जैसे पाणिनिके 'हलन्त्यम्' सूत्रमें 'तन्त्रन्याय' से दो अर्थ होते हैं— 'हलिति सूत्रे अन्येऽनित्य इत् श्यात्' और 'उपदेशोऽनत्य हल् इत् स्यात्'। यहाँ 'तन्त्रन्याय' में दो अर्थ तो प्रतीत हो जाते हैं परन्तु महृदयसंवेद्य कोई चमत्कार प्रतीत नहीं होता। इसी प्रकार 'भावकत्व' और भोजकत्व' व्यापारके, अभास्वमे 'सर्वदो माङ्गल्य:' आदि इलैगालकूरे स्थलोंमें दो अर्थोंकी प्रतीति तो हो जायगी परन्तु महृदयसंवेद्य कोई चमत्कार अनुभवयोग्य नहीं होगा। इसलिये दूसरा भावकत्वव्यापार मानना आवश्यक है। इस भावकत्वव्यापारके बलसे अभिधायक्त्वमें विलक्षणता हो जाती है। यह भावकत्वव्यापार रसके प्रति होता है और वह विभावादिका सादृश्यीकरण करता है। उसमें साधारणीकरण द्वारा रसादिके भावित हो जानेपर तीसरे भोजकस्वव्यापार द्वारा अनुभव और स्मृतिरूप द्विविध लोकिक विलक्षण चिनके विस्तारविकासादिरूप, रसस्तमोभे:चिन्यानुतिविभासनसमय, निजचेतनस्वरूप, आनन्दरूप, परब्रह्म-स्वादसहोदर अनुभूतित्त्वप, 'भोग' निष्पन्न होता है, यह भट्टनायकका मत है। लोचनकारने उनके मतका इस प्रकार उल्लेख किया है—

"रसौ यदा परगतत्वा प्रतीयते तहिं ताटस्थ्यमेव स्यात्। न च स्वगतत्वेन रामादिचरितम्या-त्काव्यादिवो प्रतीयते। स्वात्मगतत्वेन च प्रतीतौ स्वात्मनि रसस्वप्रतीरेवाभ्युपगता स्यात्। सा चायुक्ता: सामानिकं प्रत्यविभावत्वात्। कान्तारं साधारणं वासनाविकारसहेतुविभावनायां प्रयोजकमिति चेत्—देवतावर्णनादौ तदापि कथम्। न च स्वकान्तास्मरणं मध्ये संवेत्तते। अलोकसामान्यां च रामादीनां ये समुर्दश्रेतोऽनुभवनादयो विभावास्ते कथम् साधारण्यं भजेयु:। न चोत्काहादिमान् राम: स्मर्यते, अननुभूतत्वात्। शृङ्गारादिपि तत्प्रतीपत्तौ न रसोपजनः, प्रत्यक्षादिवत्। नापि करुणस्योत्पत्तौ दुःखिते करुणरस्प्रेक्ष्याद पुनरप्रतीतेः स्तात्। नाप्यभिव्यक्तिः, चक्षुरादिप्य हि शृङ्गारसाभिव्यक्तौ विषयार्जनतारतम्यप्रदृष्टिः स्तात्। तन्नापि कि स्वगतोऽभिव्यक्ते रसः परगतो वेति पूर्ववदेव दोषः।

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कारिका ३ ] द्वितीय उद्योतः

तेन न प्रतीयते नोच्यते नाम विभाव्यज्यते काव्येन रसः । किन्त्वन्यशब्दवैलक्षण्यं काव्यात्मनः शब्दस्य च्युतशक्तिप्रसादात् । तत्राभिधायकत्वं वाच्यविषयम्, भावकत्वं रसादिविषयम्, भोगकृतत्वं सहृदयविषयमिति त्रयोंड्साभूता व्यापारा:। तत्राभिधाभागो यदि श्रृद्रः स्थात् तत्तन्नादिम्यः शाब्दन्यास्येम्यः । इलेषादिलक्ȸराण को भेदः । ध्वनिभेदवैचित्र्यं चाकि किल्करम् । श्रुतिदुश्शदिवर्जनं च किंरर्थम् । तेन रसभावनाश्रयो द्वितीयो व्यापारः । यद्यस्यादमिधाविलक्षणंवै । तच्चैतनद्रावकत्वं नाम रसस्य प्रति यत्काव्यस्य तद्विभावादीनां साधारणत्वापादनं नाम । भाविते च रथे तस्य भोगो योगानुभवसरणप्रतिपत्तिभयो विलक्षण एव दृष्टि-विस्तर विकासात्मा रसस्तमो वैचित्र्याननुवेधादसत्वभयान्निर्जिसचित्स्वभावनिȸतिमतिलक्षण: परमार्थतस्तु-विधः: । स एव प्रधानभूतोऽङ्ग: शृङ्गार इति । व्युत्पत्तिनामाप्रधानमेवेति ॥

४. अभिनवगुप्तपादाचार्यका ‘अभिव्यक्तिवाद’

अगला चौथा मत लोचनकार अभिनवगुप्तका है । भट्टनायकके मतमें जो ‘भावकत्व’ और ‘भोजकत्व’ दो नये व्यापार माने गये हैं उन्हें अभिनवगुप्त अनावश्यक मानते हैं और अप्रामाणिक भी । वे काव्यसे व्यञ्जनात्मक व्यापार द्वारा गुण, अलंकार आदिके औचित्यरूप इतिकर्तव्यतासे रसको सिद्ध करते हैं । यहाँ साधक काव्य है, साध्य रस । साधन व्यञ्जनाव्यापार है और इतिकर्तव्यतारूपमें गुणालंकारादि औचित्यका अनुयव होता है । इस प्रकार ‘भावकत्व’ और ‘भोजकत्व’ दोनोंको व्यञ्जनारूप मानकर उस व्यञ्जनासे सामाजिकमें रसकी अभिव्यक्ति मानते हैं । अतः उनका मत ‘अभिव्यक्तिवाद’ कहलाता है ।

५. अन्यमत

इसके अतिरिक्त कुछ और भी छोटे-बड़े मत हैं जिनका उल्लेख लोचनकारने बहुत संक्षेप में इस प्रकार किया है—

"अन्ये तु श्रृङ्गारम्, अपरे श्रृङ्गमतुभावम्, चैचित्यु स्थायिभावम्, इतरे व्यभिचारिणम्, अन्ये तत्त्संयोगम्, एके अनुमित्यम्, केचन सकलमेव समुदायं रसमाहुः ।"

नाट्यरस

यह सब मत नाट्यरसके सम्बन्धमें हैं । नाट्यरस शब्दका प्रयोग भरतमुनिने किया है । ऊपरके व्याख्याताओंने नाट्यरस शब्दकी व्युत्पत्ति भी अपने-अपने सिद्धान्तके अनुसार अलग-अलग ढंगसे की है । लो ल्डटके मतमें अनुकार्यगत रसकी उत्पत्ति होती है और ‘नाट्ये प्रयुज्यमानत्वान्नाट्यरस:' यह नाट्यरसकी विग्रह होता है । शा कु लकके मतमें अनुनकार्याभिन्न नटवर्गमें अनुमीयमान रसका सामाजिक आस्वादन करता है । इसलिये उनके मतमें ‘नाट्ये नाट्याभ्रये नटे रसः नाट्यरसः’ यह विग्रह होता है । इसी प्रकार दूसरें मतोंमें ‘नाट्याद्रस:' अथवा ‘नाट्यमेव रसः नाट्यरसः’ ये विग्रह होते हैं ।

नाट्यके भी दो रूप माने गये हैं—एक लोकधर्मी नाट्य और दूसरा नाट्यधर्मी नाट्य । लोकधर्मी नाट्य उसको कहते हैं जिसमें स्वाभाविक अभिनय होता है । अर्थात् जो पुरुषका और पुरुष भवेन्ताऽथ्य लोकधर्मीति सा मूता ॥' और जहाँ स्वर, अलंकार और श्री पुरुषादिके वेषपरिवर्तन आदिकी आवश्यकता होती है वह नाट्यधर्मी नाट्य होता है—‘स्वारक्ȸरसंयुक्तमत्वस्थपुȸषाद्रश्यम् । यदीहस्त भवन्ताऽथ्य नाट्यधर्मीति सा मूता ॥'

काव्यरस

काव्यरसकी प्रक्रिया नाट्यरसकी प्रक्रियासे तनिक भिन्न है, क्योंकि वहाँ नाटकके समान आलम्बन और उद्दीपन विभाव हृदयगोचर नहीं होते अपितु काव्यशब्दोंसे बुद्धिस्थ होते हैं । काव्यमें

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ध्वन्यालोक:

विभावादि उपस्थापक लोकधर्मी नाट्यके स्थानपर स्वभावोक्ति और नाट्यधर्मी नाट्यके स्थानपर वक्रोक्तिको माना है। इनके विभावादिकी उपस्थिति हो जानपर आगे रसकी प्रक्रिया प्रायः समान ही है।

भाव

असंलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य नामक ध्वनिभेदमें रखोंके बाद स्थान भावोंका है। देवादिविषयक अर्थात् देवता, गुरु, राजा आदिविषयक रति और प्रधानरूपसे व्यङ्गित व्यभिचारिभाव इन दोनोंको 'भाव' कहते हैं—“रतिदेवादिविषया व्यभिचारी तयोदितः। भावः प्रोक्तः” देवादिविषयक रतरूप भावके निम्नलिखित उदाहरण हो सकते हैं—१—“कण्ठक्रोञ्चविनिषीदताम्रा ते कालकूटमपि मे महामृतम् । अप्युपात्तममृतं भवदुपमेन्दुध्त्रु यदि मे न रोचते ॥” २—“हरतयं सम्प्रति हेतुरेष्यतां ध्युमस्य पूर्वंचारितैः कृतं चुम्बैः । धीररम्यां भवदीयदर्शने व्यनक्ति कालत्रितयेऽपि योम्यताम् ॥” इनमें पहिलेमें शिवविषयक और दूरेमें नारदसुनिविषयक रति [प्रेम, श्रद्धा] प्रदर्शित की है। अतएव यह 'भाव' है। इसके अतिरिक्त नहाँ व्यभिचारिभाव प्रधानतया व्यक्‍त होता है वहाँ भी 'भाव' व्यव हार्‍ा ही होता है।

व्यभिचारिभावकी स्थितिमें उदय, स्थिति और अपाय ये तीन दशाएँ हो सकती हैं। इनमेंसे उदयवाली स्थितिको भावोदय नामसे और अपायवाली दशाको भावशान्ति नामसे अलग कह दिया है। स्थितिवाली दशाके भी तीन प्रकार हो सकते हैं—एकले एक भावकी स्थिति, अथवा दो दोसे अधिक भावोंकी स्थिति। इनमें दो भावोंकी स्थितिको 'भावसन्धि' और दोनोंसे अधिक भावोंकी स्थितिको 'भावशवलता' कहा जाता है। भावोंकी ये सभी अवस्थाएँ आस्वाद-योग्य होनेसे 'रस्यते इति रसः' इस व्युत्पत्तिके अनुसार रसश्रेणीमें आती हैं, इसलिए कारिकामें 'तत्स्थ-मार्दि' में आदि पदसे भावोदय, भावसन्धि, भावशवलताका भी ग्रहण किया गया है।

रसाभास और भावाभास

कारिकाका 'तदाभास' शब्द 'रसाभास' और भावाभासका बोधक है। 'अनौचित्यप्रवर्तिता रसा रसाभासा:' और 'अनौचित्यप्रवर्तिता भावा भावाभासा:'—अनुचित रूपसे वर्णित रस 'रसाभास' और अनुचित रूपसे वर्णित भाव 'भावाभास' कहलाते हैं। जैस, पशु-पक्षियोंके शृङ्गारका वर्णन अथवा गुरु आदि पूज्य पुरूषोंके सङ्घर्ममें हास्यका प्रयोग 'रसाभास' के अन्तर्गत होता है ॥३॥

रसवदलङ्कारसे मिश्र ध्वनिका विषय

[पिछली कारिकामें कहा था कि] 'अङ्गित्वेन' अर्थात् प्राधान्‍येन प्रवीत होनेवाले रस आदि ध्वनिके आत्मा हैं। इससे यह प्रवीत होता है कि रसादिकी प्रतीति कहीं-कहीं अङ्ग अर्थात् अप्रधान-रूपमें भी होती है। जहाँ रस किसी अन्‍यके अङ्गरूपमें प्रवीत होते हैं वहाँ रसादि ध्वनिरूप न होकर रसवदलङ्कार कहलाते हैं। रसवदलङ्कार चार प्रकारके होते हैं—एक रसवत्, दूसरा प्रेयस्, तीसरा ऊर्जस्वि और चौथा समाहित नामसे कहा जाता है। 'रस्यते इति रसः' इस व्युत्पत्तिके अनुसार रस, दूसरे भाव, तीसरे तदाभास और चौथे भावशान्त्यादि ये चारों रस कहे ये। इन्हीं चारोंकी अङ्गरूपमें

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ध्वन्यालोक

आचार्य आनन्दवर्धन

महामहोपाध्याय डॉ० श्यामदेव शास्त्री

रामलाल कपूर ट्रस्ट

कारिका ४-५ ]

द्वितीय उद्योतः

८५

इदानों रसवदलङ्कारादलङ्कव्यपक्रमघोतनात्सनो ध्वनेर्विषक्ते विषय इति प्रदर्श्यते ।

वाच्यवाचकचारुत्वहेतूनां विविधात्मनाम् ।

रसादिपरता यत्र स ध्वनेविषयो मतः ॥४॥

रस-भाव-तदाभास-तत्संशमलक्षणं मुख्यमर्यादिमतुत्तमं माना यत्र शब्दार्थालङ्कारा गुणाश्रयपरस्परं ध्वन्यपेक्षया विभिन्नरूपा व्यवस्थितास्तत्र काव्ये ध्वनिरिति व्यपदेशः ॥४॥

प्रधानेऽन्यत्र वाक्यार्थे यत्राङ्गीभूतु रसादयः ।

काव्ये तस्मिन्नलङ्कारो रसादिरिति मे मतिः ॥५॥

यद्यपि रसवदलङ्कारस्याऽन्यैरुदाहृतो विषयस्थापि यस्मिन् काव्ये प्रधानतयाङ्गीकृत्यो वाक्यार्थीभूततत्त्वस्य चाङ्गभूता ये रसादयस्ते रसादेरलङ्कारस्य विषयाः इति मामकीनः पक्षः । तथैथा चाङ्गुप्रेयोजलङ्कारस्य वाक्यार्थस्त्वेतदपि रसादयोऽङ्गभूता हृश्यन्ते ।

प्रतीति रसनेपे रसवदलङ्कार चार प्रकारके कहलाते हैं। रस किसी अन्य रसादिका अङ्ग हो जाय तो रसवत्; भाव अन्यका अङ्ग प्रतीत हो तो प्रेयः; रसाभास या भावाभास किसी अङ्ग हों तो ऊर्जस्वि और भावशान्त्यादि किसीके अङ्ग हों तो समाहित नामक अलङ्कार कहा जाता है। इन रसवदलङ्कारों और रसध्वनिके इसी भेदका अगली दो कारिकाओंमें प्रतिपादन है ।

अब रसालङ्कार्यकाव्यमध्यगतुरूप ध्वनिका विषय, रसवदलङ्कारोंसे पृथक है यह बात दिखलाते हैं—

जहाँ नाना प्रकारके शब्द [वाचक] और अर्थ [वाच्य] तथा उनके चारुत्वहेतु अलङ्कार] रसादिपरक [रसादिके अङ्ग] होते हैं वह ध्वनिका विषय है ॥४॥

रस-भाव-तदाभास और तत्प्रशमरूप मुख्य अर्थके अनुगा भी शब्द, अर्थ, उनके अलङ्कार तथा गुण, परस्पर और ध्वनिसे मिश्रस्वरूप जहाँ [अनुगामी रूपमें] स्थित होते हैं उसी काव्यको ध्वनिकाव्य कहते हैं ॥४॥

यहाँ ‘वाच्यं च वाचकं च तयोश्चारुत्वहेतवः’ [तयोः शब्दार्थयोः चारुत्वहेतवः] इस प्रकार द्वन्द्वसमास करना चाहिये । इसी प्रकार वृत्तिमें भी पिछले उद्योतमें यह दिखलाया था कि समासोक्ति आदि अलङ्कारोंमें वस्तुध्वनिका अन्तर्भाव नहीं हो सकता है। यहाँ यह दिखलाया है कि रसवदलङ्कारोंमें रसध्वनिका अन्तर्भाव नहीं होगा ॥५॥

रसवदलङ्कारोंका विषय

जहाँ अन्य [अर्थात् अङ्गभूत रसादिसे भिन्न, रस या वस्तु अथवा अलङ्कार] प्रधान वाक्यार्थ हो, और उसमें रसादि [रस, भाव, तदाभास, भावशान्त्यादि] अङ्ग हों, उस काव्यमें रसादि अलङ्कार [रसवत्, प्रेयः, ऊर्जस्वि, समाहित] होते हैं। यह मेरी सम्मति है ॥५॥

यद्यपि रसवदलङ्कारका विषय अन्योंने प्रदर्शित किया है फिर भी जिस काव्यमें प्रधानतया कोई अन्य अर्थ [रस, या वस्तु, या अलङ्कार] वाक्यार्थ हो उस [प्रधान वाक्यार्थ] के अङ्गभूत जो रसादि [हों] वे रसादि अलङ्कारके विषय होते हैं, यह मेरा मत है।

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ध्वन्यालोक:

स च रसादिरलङ्कारः शुद्धः सद्द्रिर्णो वा । तत्राद्यो यथा— किं हृदयेन न मे प्रयास्यसि पुनः, प्राप्तप्रश्रयाहशं केयं निष्कारण ! प्रवासरोचिता ? केनासि दूरीकृतः । स्पजान्तर्लेपिति ते बदनं प्रियतमन्यस्यक्तकण्ठमहो बुद्बुद्वा रोदिति रिक्तवاهुलयस्तारं रिपुब्जनः ॥

पक्ष है। जैसे 'चार्ड वाक्यार्थ' [वाच्यलदृासक वचनों] में प्रयोडलङ्कार [भामहने गुरु, देव, नृपति, पुष्टविषयक प्रेमवर्णनको प्रेयोडलङ्कार कहा है उस] के [मुख्य] वाक्यार्थ होनेपर भी रसादि अलङ्करूपमें दिखलायी देते हैं [वहाँ रसादि अलङ्कार होगा यह मेरा मत है]।

इस गद्यद्रुतिभागकी व्याख्यामें लोचनकारने बहुत संक्षेप किया है। यद्यपि मूलदृत्तिग्रन्थकी रचना यहाँ कुछ अतिपटी-ची है फिर भी लोचनकारकृत संक्षेपको देखना भी उसकी सङ्क्ति लगा सकती है। उन्होंने 'तस्य चाङ्गभूता' में 'तस्य' शब्दका अर्थ 'काव्यस्थ समवधिनो ये रसादय:' ऐसा किया है। उसके बजाय 'तस्य वाक्यार्थोंऽततस्य अङ्गभूता ये रसादय:' यह अर्थ अधिक सरल और सङ्जत होगा। 'तदङ्गा चाडुः' इस अंशकी व्याख्यामें भी दो पक्ष दिखलाये हैं। भामहके अभिप्रायसे इस वाक्यको एक वाक्य माना है और उद्भटके मतानुसार वाक्यभेद माना है।

"भामहाभिप्रायेण चाडु प्रेयोलङ्कारस्य वाक्यार्थत्वेऽपि रसादयोऽङ्गभूता दश्यन्ते इतीदमेकं वाक्यम्‌।" "उद्भटमतानुसारस्तु भवदुक्ता व्याचक्षते ।"

'न हृद्येन' इत्यादि उद्धरणरूपमें उद्धृत पद्यमें वर्ण्यमान नरपतिप्रभाव ही वाक्यार्थ है, न कि अलङ्कार । इसलिए मूलके 'प्रेयोलङ्कारस्य वाक्यार्थत्वे' का अर्थ बहुतहीइसमास मानकर 'प्रेयानलङ्कारो यत सः प्रेयोलङ्कार:' अर्थात् प्रेयान् अलङ्कार जिसका है वह वर्ण्यमान नरपतिप्रभावरूप अलङ्करणीय वाक्यार्थ है। अथवा 'वाक्यार्थत्वे' का अर्थ वाक्यार्थ न मानकर प्राधान्य किया जाय इस प्रकारकी द्विविध व्याख्या भामहमतसे की है।

उद्भटमतानुसार इन दोनोंको अलग वाक्य मानकर पूर्ववाक्यका अर्थ रसवदलङ्कारका विषय होता है, यह किया है। और इस उत्तरवाक्यका अर्थ चाडुवाक्यके वाक्यार्थ होनेपर प्रेयोलङ्कारका भी विपय होता है। न चेद्वल रसवदलङ्कारका अपितु प्रेयोलङ्कारका भी विपय होता है। रसवत् और प्रेय शब्दसे ऊर्जा, समाहित, भोजोदय, भावसन्धि, भावशवलता सहित सातों रसवदलङ्कारोंका ग्रहण है।

शुद्ध रसवदलङ्कारका उदाहरण वह रसादि अलङ्कार शुद्ध और सद्द्रिर्णो [दो प्रकारका होता है । जो अङ्गभूत अन्य रस या अलङ्कारसे मिश्रित नहीं है अर्थात् जहाँ एक ही रस आदि प्रेयोलङ्कार अर्थात् गुरु, देव, नृपति, पुष्टविषयक प्रीतिका अङ्ग है वहाँ शुद्ध रसवदलङ्कार] होता है,

[इस इलोकमें किसी राजाकी स्तुतिकी गयी है ।] भाव यह है कि तुमने अपने शत्रुओंका नाश कर डाला। उनकी स्त्रियाँ रातको स्वप्नमें अपने पतिको देखती हैं और उनके गलेमें हाथ डालकर कहती हैं] इस दुःसी करनेसे क्या लाभ है। बहुत दिन बाद दराज्‌ हुप हैं। अब मैं जाने नहीं दूँगी । हे निष्ठुर ! वत्से, तुम्हारी प्रवासमें

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कारिका '५ ] द्वितीय उद्योतः

इत्यत्र करुणस्य शुद्धस्याझभावात् स्पष्टमेव रसवदलङ्कारत्वम् । एवमेवंविधे विषये रसान्तराणां स्पष्ट एवाझभावः ।

सङ्कीर्णों रसादिरङ्गभूतो यथा—

क्षिमो हतावलग्नः प्रसभमिहिततोऽड्याददानोऽङ्गुकान्तं गृह्णन् केशेषुपास्तशरणनिपतितो नेक्षिता सम्भ्रमेण । आलिङ्ग्योऽङ्गभूतेरिपुरयुवतीभिः साश्रुनेत्रोत्पलाभिः कामीवाद्योपराधः स दहतु दुरितं शम्भुको वः शरणिनः ॥

इत्यत्र त्रिपुररिपुणा भावातिशायस्य वाक्यार्थत्वे ईष्योऽविप्रलम्भस्य म्लेषसहितस्याझभाव इति ।

एवंविध एव रसवदलङ्कारस्य' न्याय्यो विषयः । अत एव चेष्योऽविप्रलम्भकरुण-स्पष्टं पतिके करण्टका आलिङ्गन कर उठकर [पियतमके करण्टकमहणके लिपि] अपने फैलाये हुए वाहुल्यको रिक्त देखकर तारस्वरसे रोती हैं ।

इस उदाहरणमें छद [रसान्तर अथवा अलङ्कारान्तरसे असङ्कीर्ण] करुणरस [रजविषयक प्रीति] अङ्ग है । इसलिए स्पष्ट ही रसवदलङ्कार है । इसी प्रकार इस नरहके उदाहरणोंमें अन्य रसोंका भी अङ्गभाव स्पष्ट है ।

सङ्कीर्ण रसवदलङ्कारका उदाहरण

सङ्कीर्ण रसादि [भी] अङ्गरूप [होना है] जैसे—त्रिपुरदाहके समय शम्भुके वाणसे समुद्भूत, त्रिपुरकी युवतियों द्वारा, आदर्रा-पराध [तत्कालकृत पराङ्नोपमोगादि अपराधयुक्त] कामीके समान, हाथ छुड़ानेपर झटका दिया गया, जोरसे ताड़ित करनेपर भी वक्षके छोरको पकड़ता हुआ; केशोंको पकड़ते समय हटाया गया, पैरोंमें पड़ हुआ भी सम्भ्रम [क्रोध अथवा घबराहट] के कारण न देखा गया और आलिङ्गन [करणेका प्रयत्न] करनेपर आँसुओंसे परिपूर्ण नेत्रकमलवाली [कामीपक्षमें ईर्ष्याके कारण और अग्निपक्षमें वस्तुतः आश्रयसे रोती हुई] चिपुर-युवतियों द्वारा तिरस्कृत [कामीपक्षमें प्रत्यालिङ्गन द्वारा स्त्रीकृत न करके और अग्निपक्षमें सारे शरीरको झटककर फेंका गया] शम्भुका शराग्नि तुम्हारे दुःखोंको दूर करे ।

इस [श्लोक] में त्रिपुरारि [शिव] के प्रभावातिशयके [मुख्य] वाक्यार्थ होनेपर श्लेषसहित ईर्ष्योऽविप्रलम्भम [और करुण] उसका अङ्ग है [इसलिये यहाँ सङ्कीर्ण रसादि अङ्ग है] ।

इसी प्रकारके उदाहरण रसवदलङ्कारके उचित विषय होते हैं । इसीलिये ९. 'रसवदलङ्कारस्य' द्वितीय ।

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ध्वन्यालोक:

योरङ्गत्तेन व्यवस्थानात्समावेशो न दोषः ।

यत्र हि रसस्य वाक्यार्थीभावस्तत्र कथमलङ्कारत्वम् ? अलङ्कारो हि चारुत्वहेतुः प्रसिद्धः । न त्वसावतैवातमनङ्गारुत्वहेतुः । तथा चायमत्र संक्षेपः—

'रसभावादितात्पर्येमाश्रित्य विनिवेशनम् । अलङ्कृतिनां सर्वालङ्कारत्नसाधनम् ।।'

तस्माद्यत्र रसादयो वाक्यार्थीभूता: 'ते सर्वे न रसादेलङ्कारस्य' 'विषय:', स ध्वने: प्रभेदः । तस्योपमादियोज्यल्काराः । यत्र तु प्राधान्येनार्थान्तरस्य वाक्यार्थीभावे रसादिभिश्राङ्गुत्वनिष्पत्तिः क्रियते स रसादेरलङ्कारताया विषयः ।

[यहाँ] ईष्यादिविप्रलम्भन और करुण दोनों [विरोधी रसों] के अलङ्करूपमें स्थित होनेसे दोष नहीं है ।

जहाँ रसका वाक्यार्थत्व है [अर्थात्‌ जहाँ रस ही प्रधान है वहाँ तो वह अलङ्कार्य है, अलङ्कार नहीं, अतएव वह ध्वनि होती है, रसवदलङ्कार नहीं] वहाँ उसको [रसवत्‌] अलङ्कार कैसे मानें ? [अर्थात्‌ नहीं मान सकते] क्योंकि चारुत्वहेतुको ही अलङ्कार कहते हैं । वह स्वयं ही अपना चारुत्वहेतु [अर्थात्‌ प्रधान होनेसे स्वयं ही अलङ्कार्य है और रसवदलङ्कार होनेसे चारुत्वहेतु भी] हो यह तो नहीं हो सकता । इसलिए इसका सारांश यह हुआ कि—

रस, भाव आदिके तात्पर्यसे [अर्थात्‌ रसभावादिको प्रधान मानकर उनके अलङ्करूपमें] अलङ्कारोंकी स्थिति ही सच अलङ्कारोंके अलङ्कारत्व [चारुत्वहेतु]का साधक है ।

इसलिए जहाँ रसादि वाक्यार्थीभूत [अर्थात्‌ प्रधानतया येधित] होते हैं, वह सब [स्थल] रसादि अलङ्कारके विषय नहीं [अपितु] वे ध्वनि [रसादिध्वनि]के भेद हैं । उसके [रसादिध्वनिके चारुत्वहेतु] उपमादि अलङ्कार होते हैं । और जहाँ प्राधान्येन कोई दूसरा अर्थ वाक्यार्थीभूत हो और रसादि उसके चारुत्वका सम्पादन करते हैं वह रसादि अलङ्कारका विषय है ।

'विषो हि इष्टावलम्बन:' इत्यादि पद्यमें कविनिष्ठ शिवविपयक भक्ति प्रधानतया व्यङ्ग्यमान है तथा शिवका त्रिपुरदाहके प्रति उत्साह उसका पोषक है । परन्तु वह उत्साह अनुभव, विभाव आदिसे परिपुष्ट न होनेके कारण परिपक्व रस न होकर 'भाव'मात्र रह गया है । प्रतियोंके मर जानेपर अग्निकी इस आपत्तिमें पड़ी हुई त्रिपुर-सुन्दरियोंके वर्णनसे प्रकट होनेवाला करुणरस उस उत्साहका अङ्ग

१. नि० तथा श्री० ने इसपर कारिकाकी संख्या दी है । बालक्रियावाले संस्करणमें नहीं ।

२. 'सर्वे हे' मि० ।

३. 'वा' अधिक है नि० ।

४. 'विषय:' नि० ।

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कारिका '९ ]

द्वितीय उद्योत:

८९

है । और 'कामीवात्रोंपराग:'में प्रदर्शित कामीके साम्यसे उपमा द्वारा प्रतीत होनेवाला शृङ्गाररस उस करुणरसका अज्ञ है । परन्तु वह करुण भी अन्तिम विश्रान्तिधाम नहीं है बल्कि उत्साहका अज्ञ है । इस प्रकार करुण और शृङ्गार दोनों ही उत्साहोपनिषत् शिवविषयक रति-प्रिति-रूप 'भाव'के उपकारक अज्ञ हैं । परन्तु ग्रन्थकारने केवल 'श्लेपसहितस्य इत्यादिविप्रलम्भस्य अज्ञभाव:' कहा है । उस अज्ञभावमें करुणको नहीं दिखलाया । उनका अभिप्राय यह है कि यद्यपि यहाँ करुणरस है तो, परन्तु चाक्षुष-निष्पादनमें उसका अधिक योग नहीं है । इसलिए 'श्लेपसहितस्य इत्यादिविप्रलम्भस्य' लिखा है ।

रसोंका परस्पराविरोधाविरोध

रसोंमें परस्पर घृणु-मित्रभाव भी माना गया है । कुछ ऐसे रस होते हैं जिनका साश्र-साथ वर्णन हो सकता है । कुछ ऐसे हैं जिनका साथ-साथ वर्णन नहीं किया जा सकता । इस प्रकारके विरोधी रसोंमें शृङ्गाररसका करुण, वीरभत्स, रौद्र, धीर और भयानकके साथ विरोध माना गया है । 'आश्चर्य: करुणवीमत्स्यौत्रवीरमर्यनकै:' इस नीतिस्थ अनुशार करुण और शृङ्गारका एकत्र वर्णन नहीं किया जा सकता । परन्तु इस 'क्षिप्तो:' इत्यादि श्लोकमें करुण और शृङ्गार दोनोंका वर्णन आया है । इसीक समाधन करनेके लिये ग्रन्थकारने "अत एव चेद्याविप्रलम्भकरुणयोरकत्वेन व्यवस्थनात् समावेशो न दोप:" यह पंक्ति लिखी है ।

रसोंके इस विरोधके तीन प्रकार हैं । किन्हींका विरोध आलम्बन ऐक्यमें होता है । किन्हींका आलम्बनवैचये विरोध है; एक ही आलम्बन विभावसे शृङ्गार और वीर दोनोंका परिपोष नहीं हो सकता । इसी प्रकार हास्य, रौद्र और वीरभत्सके साथ सभ्भोगशृङ्गारका तथा वीर, करुण, रौद्रादिके साथ विप्रलम्भशृङ्गारका आलम्बनैक्यसे विरोध है ।

वीर और भयानकरसका आश्रय ऐक्यसे विरोध है । एक ही आश्रय-- व्यक्तिमें एक साथ वीर और भयानकके स्थायिभाव--भय और उत्साह उद्बूत नहीं हो सकते । इसीलिए शान्त और शृङ्गार रसका नैरन्तर्य विरोधजनक हैं । अर्थात् शृङ्गारसे अव्यवहित शान्तरसका वर्णन दोषजनक है । यह रसोंके विरोधकी व्यवस्था हुयी । इस रूपमें ये रस एक-दूसरेके विरोधी या घातु हैं । परन्तु शृङ्गारका अद्भुतके साथ, भयानकका वीरभसके साथ, वीररसका अद्भुत और रौद्ररसके साथ किसी प्रकार विरोध नहीं है। न आलम्बनैक्येन, न आश्रयैक्येन और न नैरन्तर्येण; इसलिए इनको मित्ररस कहा जा सकता है ।

प्रदत्त 'क्षिप्त:' इत्यादि श्लोकमें पतियोंके मरनेसे आर्तकी विपत्तिमें पड़ी त्रिपुर-सुन्दरियाँ करुण-रसको आलम्बनविभाव हैं । और 'कामीवात्रोंपराग:' इस 'कामी' उपमाके सम्बन्ध में भी उनके साथ ही होनेसे शृङ्गारका आलम्बनविभाव भी वे ही हैं । इस प्रकार यहाँ करुण और विप्रलम्भशृङ्गार दोनोंका आलम्बन ऐक्यसे वर्णन किया है । परन्तु आलम्बनैक्यसे ही इन दोनों रसोंका विरोध है । इत्यलिए यहाँ अनुचित रसवर्णन किया गया है । यह शङ्का है जिसका समाधन मूलमें 'ईदृशाविप्रलम्भ-करुणयोरकत्वेन व्यवस्थनात् समावेशो न दोप:' लिखकर किया है ।

विरोधी रसोंके अविरोधसम्पादनका उपाय

विरोधिनोडपि स्मरणे, सङ्ग्रेन वचनेऽपि वा । भवेद् विरोधो नान्योन्यमडिन्यङ्गलत्मास्योः ॥"" सा० द० ७,३०

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ध्वन्यालोक

अभिनवगुप्त

अर्थात् दो विरोधी रसोंका स्मरणात्मक वर्णनमात्र हो, अथवा दोनोंका सम्भावनमात्र अर्थात् गुणप्रधान-भावरहित वर्गीकरण हो अथवा दोनों यदि किसी तीसरेके अज्ञातरूपमें वर्णित हों, तो इन तीन अवस्थाओंमें उक्त विरोधी रसोंका एक साथ वर्णन भी दोषजनक नहीं होता, यह सिद्धान्त माना गया है । यहाँ करुण और विप्रलम्भशृङ्गार दोनों उत्साहपरिपोषित भगवद्विषयक रति—भक्ति के अङ्ग हैं। इसलिए उनका एक साथ वर्णन दोषजनक नहीं है । यही भाव "विप्रलम्भकथनयोरकृत्स्नैव व्यवस्था नातः समवेतयो न दोषः" इस समाधानका है ।

ध्वन्यालोकमें जिस त्रिपुरदाहके अभिनकाण्डका वर्णन है वह पौर्णिक कविके आधारपर है ।

तारकाक्षु नामका एक प्रसिद्ध असुर था । उसके तीन पुत्र हुए, तारकाक्ष, विद्युन्माली और कमललोचन । इन तीनोंने महागोर तप करकै द्रक्षाजी और शिवजीको प्रार्थन किया और उनहें अन्तरिक्षके तीनों पुरोंका अधिकार प्रमत किया ! परन्तु पीछे अधिकाःमदसे मत्त हो, वे नाना प्रकारके अत्याचार करने लगे । तब सब देवताओंने दीनताके नेउलवमें शिवजीसे मिलकर उनके नाश करनेकी पार्थना की । देवताओंकी प्रार्थना मानकर शिवजीने एक ही बाण छोड़ा जिससे वे तीनों पुर अग्निसे प्रज्वलित हो उड़े और भस्म होकर नष्ट हो गये । तवसे शिवका एक नाम 'त्रिपुरारि' मी हो गया है । प्रकृत इलोकमें उसी समयके इस अग्निकाण्डका वर्णन किया गया है ।

खण्डन या संशयारिस

अभी रसोंके अज्ञात्किभाव तथा विरोधकी जो चर्चा की गयी है उसके सम्बन्धमें एक शङ्का यह रह जाती है कि रसोंको अलक्ष्य समूहालम्वनात्मक, दृश्यास्तादिसहोदर माना गया है । ऐसे दो रसोंका युगपत् एकत्र समावेश या प्रादुर्भाव ही सम्भव नही है, इसलिए उनके विरोध अथवा अज्ञात्किभावका उपपादन कैसे होगा ? इसका उत्तर यह है कि आपका कहना ठीक है । इसलिए ऐसे अपूर्ण रसोंको रस न कहकर प्राचीन लोग 'रसद्वारी' रस नाममात्र व्यवहृत करते हैं और चण्डीदासने उनका 'खण्डरस' नामसे कहा है ।

"अज्ञं बाध्योदय संसर्गी यचयापि स्यात्सान्तरे । नास्यादृते संप्रत्य तततः खण्डरसः स्मृतः ॥" सा० द० ७

रसदलङ्काराविषयक मतभेद

अभी चौथी कारिकामें रसदलङ्कारोंका वर्णन करते हुए कारिकाकारने लिखा है कि "काव्ये तस्माल्लङ्कारो रसादिरिति मे मतिः ।" अर्थात् जहाँ अन्य कोई मुख्य वाच्यार्थ हो और रसादि अलङ्काररूपमें वर्णित हों वहाँ रसादि अलङ्कार होता है यह मेरी सम्मति है । "मे मतिः" शब्द इस विषयमें मतभेदको सूचित करते हैं । यहाँकí वृत्तिमें वृत्तिकारने भी "यद्यपि रसदलङ्कारस्यैवंविध्यं विषयः" लिखकर उस मतभेदकी चर्चा की है । इस मतभेदके दो रूप हैं । कक्झ लोगोंने कहना है कि अलङ्कार तो कटककुण्डलके समान हैं, वे साक्षात् वाच्य-वाचकके उपकारक और परम्परया रसके उपकारक होते हैं । जैसे कटककुण्डल साक्षात् शरीरके उपकारक और शरीर द्वारा आत्माके उपकारक कहलाते हैं । इसलिए— "उपकुर्युःन्ति तं सन्तं येऽलङ्कारेण जातुचित् । हारादिवदलङ्कारास्तेऽपि रसनुपासोपमादयः ॥" का० प्र० ८, २

इत्यादि अलङ्कारके लक्षणोंमें अनुप्रास-उपमादिको अज्ञ अर्थात् शब्द और अर्थ द्वारा ही रसोपकारक माना है । परन्तु रसदलङ्कार वाच्य और वाचक, अर्थ या शब्दके उपकारक न होकर साक्षात्

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कारिका ' ९ ] द्वितीय उद्योतः

रसादिके उपकारक होते हैं इसलिए उनमें अलङ्कारका लक्षण ही नहीं घटता है अतः रसवदलङ्कार नहीं होते । ऐसी दशामें जहाँ रसादि अन्यके आधीन हैं वहाँ ये लोग रसवदलङ्कार न मानकर उसके गुणीभूतव्यङ्गच्य ही कहते हैं ।

रसवदलङ्कारके विषयमें उठायी गयी इस आपत्तिको दूर करनेके लिये कुछ लोग चिन्तन स्वभावहारानुरोधेन रसोपकारकत्वमात्रसे गुणीभूत रसोंमें भक्त अलङ्कारव्यवहार मानकर कथञ्चित् उनके रसवदलङ्कारत्वका उपपादन करते हैं ।

दूसरे लोग इस समस्याको हल करनेके लिये अलङ्कारके लक्षणमें शब्दार्थका समावेश व्यर्थ बताकर रसोपकारकत्वमात्रको अलङ्कारका मुख्य लक्षण मानकर गुणीभूत रसोंमें साक्षात् रसोपकारकत्व होनेसे उनमें रसवदलङ्कारका उपपादन करते हैं । इनके मतमें यह अलङ्कारव्यवहार भान्त नहीं अपितु मुख्य ही है ।

इस दूसरे मतके लोग 'उपकुर्वन्ति ते सन्तं येऽङ्गीकृत्य न जातुचित्' इत्यादि अलङ्कारके लक्षणमें अलङ्कारविशिष्टशब्दार्थ्यथञ्जानार्थञ्चेन और स्वमत्कारत्वेन कार्यकारणभाव मानकर उस अलङ्कारलक्षणका इस प्रकार परिष्कार करते हैं—

"समवायिसमवेत्यावच्छिन्नचमत्कृतितल्लक्षणावच्छिन्नेधनरुज्यताज्ञानिरूपित, स्वावच्छेदकजनकतानिरूपित विप्रकृष्टसम्बन्धावच्छिन्नशब्दार्थ्यन्यतरनिरूपितस्वावच्छेदकताज्ञानिरूपित, समवायिसमवन्धावच्छिन्नाच्छादकज्ञान-स्वावच्छेदकजनकतानिरुपित, विप्रकृष्टसम्बन्धावच्छिन्नशब्दार्थ्यन्यतरनिरूपितकतावत्त्वमलङ्कारस्वम्"

रसवदलङ्कार तथा गुणीभूतव्यङ्गच्यधककी व्यवस्था

रसवदलङ्कारके साथ ही गुणीभूतव्यङ्गच्यका प्रश्न भी सामने आ जाता है । अलङ्कार साक्षात् शब्दार्थके ही उपकारक होते हैं और गुणीभूत रस शब्दार्थके उपकारक न होकर साक्षात् रसान्तरके उपकारक होते हैं इसलिए उनमें अलङ्कारका सामान्य लक्षण न घटनेसे जो लोग उनको रसवदलङ्कार न कहकर गुणीभूतव्यङ्गच्य कहते हैं उनका मत स्पष्ट हो गया । उनके मतमें ध्वनि और गुणीभूत-व्यङ्गच्य दो ही वस्तु हैं, इनसे भिन्न रसवदलङ्कार नामकी तीसरी वस्तु नहीं है । परन्तु ध्वनिकारने रस-वदलङ्कार भी माने हैं और गुणीभूतव्यङ्गच्य भी । इनके मतमें रसादिश्वानिके अपराज्ञ होनेमें रसवत् तथा प्रेयोलङ्कार और वस्तु या अलङ्कारध्वनिके अपराज्ञादि होनेपर गुणीभूतव्यङ्गच्य माननेसे ही दोनोंका समन्वय हो सकेगा ।

ध्वनि, उपमादि तथा रसवदलङ्कारों

रसवदलङ्कारोंके विषयमें दूसरा मतभेद जिसकी ओर कारिका और टीकियोंमें सङ्केत किया गया है उसका स्वरूप यह है कि कुछ लोग १. चेतनके वाक्यार्थीभूत होनेपर रसवदलङ्कार जोर २. अचेतनके वाक्यार्थीभूत होनेपर उसमें चित्तद्रुतिरूप रसादि सम्भव न होनेसे उनके वर्णनमें रसवदलङ्कारकी सम्भावना नहीं है । अतएव उनको उपमादि अलङ्कारका विषय और चेतनके वाक्यार्थीभावमें रसवदलङ्कारका विषय मानना चाहिये । आलोचकारने 'इति मे मति:' लिखकर इसी मतके विरुद्ध अपनी सम्मति प्रदर्शित की है । उनका आशय यह है कि—

१. जहाँ रसादिकी प्रतीति प्रधान रूपसे होती है वहाँ रसवचनिका विषय समझना चाहिये ।

२. जहाँ मुख्य रस अलङ्कार्य है और कोई दूसरा रस भी अलङ्कार्य नहीं है वहाँ उपमादि अलङ्कारका क्षेत्र है ।

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ध्वन्यालोक:

आचार्य आनन्दवर्धन

महामहोपाध्याय डा० बलदेव उपाध्याय

चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन

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कारिका '७ द्वितीय उद्योत:

यथा वा— नन्वो मेघजलात्पल्वलवतया धौताधरेष्वाश्रुमि: शून्येवाभरणं: स्वकाळविरहादिशान्तपुष्पोद्रमात। चिन्तामौननिमिवार्त्रिता मधुकृतां शब्दैर्विना लक्यते चण्डी समबध्य पादपतितं जाताजुपापेव सा॥

यथा वा— तेषां गोपवधूविलाससुहृदां राधारह:साक्षिणां श्रेम भद्र कलिन्दशैलतनयातीरं लतावेष्टननाम। विच्छिन्ने सरतल्पकल्पनमृदुच्छेदोपयोगेऽधुना ने जाने जरठीभवन्ति विगलन्म्रोलालितृष: पङ्क्र्वा:॥

इत्येवमादौ विप्रलक्षितचेतनानां वाक्यार्थीभावेऽपि चेतनवस्त्वस्तान्तर्योगनाड्स्येब। अथ यत्र चेतनवस्तुत्र्तान्तर्योगनाडस्ति तत्र रसादिरलक्‌दार: तदेवं सत्युपमादयो निर्विषया: प्रविभलविषया: वा स्यु:। यस्यास्त्येवासावचेतनवस्त्वस्तान्त्रो यत्र चेतन-वस्त्वस्तान्तर्योगना नास्ति तत्र विभावाद्वेब। तस्माद्वेव च रसादीनामलक्‌दारता। य: पुनरपि रसो भावो वा सर्वाकारमलक्‌दारयै: स ध्वननरात्मेति॥५॥

अथवा जैसै— तन्नी [उर्वशी] पैरोंपर पड़े हुए मुझे तिरस्कृत करके पङ्क्तौ आपयुक्त होकर आँसुओंसे गीले अधरोंके समान यर्पाकें जलसे आर्द्र पल्वको धारण किये, ऋतुका न होनेसे पुप्पोदरमरहित आभरणशून्य-सी, भोंगोंके रस्स्के अभावमें चिन्तामौन-सी [लतारूपमें] दिखलाई देती है।

अथवा जैस— हे भद्र ! गोवधूमोंके विलाससखा, राधाकी एकान्तकीडाओंके साक्षी, यमुना-तटके लताकुज तों इधरालसे हैं ? अथवा [अब तो] मदनरथके निर्माणके लिप मृदु किसलयांकें ताडनेंका प्रयोजन न रहनेंपर नीलकान्तिकों छिटकाते रूप वे पल्लव [पुराने] रुढ़ हो जाते हैं।

इत्यादि उदाहरणांम अचेतन [ग्र.पाठ: पहले श्लोकमें, दूसरमें लता ओर तीसरेमें लनाकुज] वस्तुंओंके याकथादि भाव [प्रधानता] होनेपर भी [विभावादि द्वारा कथंवित] चेतन वस्तुंकें ब्यवहारकी योजना है ही। और जहाँ चेतनवस्तुत्र्तान्त्की योजना है वहाँ रसादि अलक्‌कार है। पश्रा होनेपर उपमादि अलक्‌कार सर्वथा निर्बियय हों जायेंगे अथवा उनके उदाहरण बहुत ही कम मिल सकेंगे। क्योंकि ऐसा कोर्इ अचेतन-वृत्तान्त नहीं मिलेगा जहाँ चेतनवस्तुत्र्तान्तका सम्बन्ध, अन्ततः विभावरूपसे [ही सदृश] न हो। इसलिए रसादिके अङ्ग होनेपर रसवदलक्‌कार होते हैं और जो अङ्गी रस सदृश] न हो। इसलिए रसादिके अङ्ग होनेपर रसवदलक्‌कार होते हैं और जो अङ्गी रस

या भाव सय प्रकारसे अलक्‌कायै है वह ध्वनिका [आत्मा] स्वरूप है।

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ध्वन्यालोकः

आचार्य आनन्दवर्धन

डॉ. महावीर सरन जैन

नर्मदा प्रचारिणी सभा, जबलपुर

किच्च —

तस्मर्थमवलम्बते येऽङ्गिनं ते गुणाः स्मृताः । उज्जाश्रितास्त्वलङ्काराः मन्तव्याः कटकादिवत् ॥५॥ ये तस्मैरसाविलक्षणमद्रिरन्त्सन्तसमवलम्बन्ते ते गुणाः शौर्यादिवत् । वाच्यवाचक- लक्षणान्यङ्कानि चे 'पुनस्तदाश्रितास्तेऽलङ्काराः मन्तव्याः कटकादिवत् ॥ ६॥

इस प्रकार आलोककारने रसवदलङ्कारके विषयमें परमतका निराकरण करते हुए अपने मतका उपसंहार किया । इनका भाव यह हुआ कि चेतनवस्तुके वाच्यार्थीभावके आधारपर रसवदलङ्कार और अचेतनवस्तुके वाच्यार्थभावमें उपमादि अलङ्कार होते हैं यह जो दोनोंका मत है वह ठीक नहीं है, क्योंकि अचेतनवस्तुके साथ चेतनद्वचेतनताका सम्बन्ध हो ही जाता है अतः सर्वत्र रसवदलङ्कार ही होगा । उपमादिका विषय बहुत कम या बिल्कुल नहीं मिलेगा या फिर अचेतनपरक काव्यको नीरस ठहराना पड़ेगा ॥१॥

गुण और अलङ्कारका भेद [सिद्धान्तपक्ष]

और— जो उस प्रधानभूत [रस] अङ्गीके आश्रित रहनेवाले [माधुर्यादि] हैं उनको 'गुण' कहते हैं । और जो [उसके] अङ्ग [शब्द तथा अर्थ] में आश्रित रहनेवाले हैं उनका कटकादिके समान अलङ्कार कहते हैं ॥६॥ जो उस रसादिरूप अङ्गीभूतका अवलम्बन करते हैं [तदाश्रित रहते हैं] ये शौर्य आदिके समान 'गुण' कहलाते हैं । और वाच्य तथा वाचक रूप [अर्थ तथा शब्द उस काव्यक] अङ्ग हैं, जो उन [अङ्गों] के आश्रित हैं वे कटक आदिके समान अलङ्कार समझने चाहिये ।

पाँचवीं कारिकाकी व्याख्यामें रसध्वनि, रसवदलङ्कार तथा उपमादि अलङ्कारका विषयविभाग किया था । छठी कारिकामें गुण तथा अलङ्कारोंका विषयविभाग किया है । जो साक्षात् रसके आश्रित रहनेवाले माधुर्य आदि हैं उनको साक्षात् आत्मामें रहनेवाले शौर्य आदिके समान 'गुण' कहते हैं और जो उसके अङ्गभूत शब्द तथा अर्थमें रहनेवाले धर्म हैं वे उनको कटकादिके समान 'अलङ्कार' कहते हैं ।

वामनमत

मम्मटके 'काव्यालङ्कार'की वृत्तिमें भट्टोद्भटका तथा वामनका मत इस विषयमें इससे भिन्न है । वामनेने तो 'काव्यशोभाया: कर्तारो धर्मा गुणाः तदतिशयहेतवस्त्वलङ्काराः' लिखा है । अर्थात् काव्यके शोभाजनक धर्मोंको गुण और उस शोभाके वृद्धिकारक हेतुओंको अलङ्कार कहा है । 'काव्य प्रकार'ने इसका खण्डन करते हुए लिखा है कि "जो लोग यह लक्षण करते हैं उनके मतमें 'कि काव्यव्यवहार उत कतिपयैः — या समस्त गुण मिलकर काव्यव्यवहारके प्रयोजक होते हैं अथवा कुछ ही पर्याप्त होते हैं ? यदि सब गुणोंकी समग्रता ही काव्यव्यवहारका प्रयोजक माने जो गौड़ी, पांचाली आदि रीति जिनमें समस्त गुण नहीं रहते उनको काव्यका आत्मा मानोगे ? इस

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कारिका ७ ]

तथा च— शृङ्गार एव मधुरः परः प्रकाशनो रसः । तन्मयं काव्यमाश्रित्य माधुर्यं प्रतिनिष्ठिति ॥७॥ शृङ्गार एवं रसान्तरापेक्षया मधुरः प्रह्लादहेतुत्वात् । 'तत्प्रकाशनपरशब्दार्थैंतया काव्यस्य स माधुर्येलक्षणो गुणः । श्रव्यत्वं पुनरोजसोदपि साधारणमिति ॥ ७॥

आश्रयेका भाव यह है कि वामन तो रीतिसम्प्रदायके प्रवर्तक हैं । "रीतिरात्मा काव्यस्य" यह उनका सिद्धान्त है । गौडी, पांचाली आदि रीतियोंमें समस्त गुणोंका समावाय तो होता नहीं फिर उनकी काव्यकला आत्मा कैसे मानी वे? और यदि एक-एक गुणकी उपस्थितिको ही काव्यस्यवद्वारके लिए पर्याप्त मानों तो "श्रद्धावत् प्रह्लादस्यनिरुचैः, प्राज्यः प्रोद्यानुलसत्सत्प ध्वूमः" इत्यादिमें ओज आदि गुण होनेके कारण उनमें भी काव्यव्यवहार क्यों नहीं होगा? मम्मटने वामनके लण्डनमेंयहाँ जो युक्तिप्रबाह उपस्थित किया है वह कुछ थोडील-सा जान पडता है ।

भामहमत भामहके विवरणमें भट्टोद्भटने तो गुण और अलङ्कारके भेदको ही नहीं माना है । उनका कहना है कि लौकिक गुण [चौयौदि] और अलङ्कार [कटंक, कुण्डलादि] में तो भेद स्पष्ट है । चौयौदि गुण आत्मामें समवायसम्बन्धसे रहते हैं और कटक, कुण्डल आदि अलङ्कार शरीरमें संयोगसम्बन्धसे आश्रित होते हैं ! इसलिए लौकिक गुण और अलङ्कारोंमें वृत्तिनियामक सम्बन्ध संयोग तथा समवायके भेदसे भेद हो सकता है । परन्तु ओजःप्रभृतिनां गुण और अनुप्रासादि अलङ्कार दोनों ही समवायसम्बन्धश्रय रहते हैं इसलिए [समवायस्यैव शौर्याद्रे:, संयोगस्यैव तु हारादयः इत्यस्तु गुणालङ्काराणां भेदः ओजःप्रभृतीनां अनुप्रासोपमादीनां चोभयेषामपि समवायस्य स्थितिरिति गडुलिकाप्रवाहेणैवैषां भेदः] इन दोनोंका भेद मानना गडलिलकाप्रवाह [मेहचाल]के समान ही है । परन्तु आलोक और काव्यप्रकाशके आादिकarne रसनिष्ठ धर्मोंको गुण और शब्दार्थनिष्ठ धर्मोंको अलङ्कार मानकर दोनोंका भेद किया है । अर्थात् वृत्तिनियामक सम्बन्धभेदसे नहीं, अपितु आश्रयभेदसे गुण और अलङ्कारका भेद है ।

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ध्वन्यालोक:

एककाराक्षिधा मतः

तो ओजकः भी साधारणधर्मे है। [अर्थात् माधुर्यके समान ओजमें भी श्रव्यत्व रहता है।]

'एककाराक्षिधा मतः'

'शुक्कार एव मधुरः' इत्यादि सातवीं कारिकामें 'पद' पदका प्रयोग किया गया है। इस 'पद'का प्रयोग तीन प्रकारसे होता है और उन तीनोंमें उसके अर्थमें भेद हो जाता है। वह कभी विशेषणके साथ प्रयुक्त होता है, कभी विशेष्यके साथ और कभी क्रियाके साथ। विशेष्यके साथ प्रयोग होनेपर वह अन्ययोगका व्यवच्छेदक होता है [विशेष्यसक्ततत्स्वभावकारो अन्ययोगस्य व्यवच्छेदकः]। जैसे 'पार्थ एव धनुर्धरः'में पार्थ विशेष्य है, उसके साथ प्रयुक्त एकका अर्थ अन्ययोगका व्यवच्छेद करना है। अर्थात् वह विशेष्य पृथ्येरे अन्यमें विशेषण धनुर्धरके सम्बन्धका निषेध करता है। 'पार्थ एव धनुर्धरो नान्यः' यह उसका भावार्थ होता है। विशेषणके साथ प्रयुक्त एवं अन्ययोगव्यवच्छेदक होता है [विशेषणसक्ततत्स्वभावकारो अन्ययोगव्यवच्छेदकः]। जैसे 'पार्थो धनुर्धर एव' यहाँ विशेषण धनुर्धरके साथ प्रयुक्त 'एव' विशेष्यमें विशेषणके अयोग अर्थात् सम्बन्धाभावका निषेध करता है और उसमें धनुर्धरत्वका नियमन करता है। इसी प्रकार जब 'पद' क्रियाके साथ अन्वित होता है तब अन्यन्तयोगस्य व्यवच्छेदक होता है। जैसे 'नीलं करलं भवति' इस वाक्यमें 'भवति' क्रियाके साथ अन्वित एककार कमलमें नीलत्वके अत्यन्त असम्बन्धका निषेध कर किसी विशेष कमलमें नीलके सम्बन्धको नियमित करता है। इस प्रकार एवके तीन प्रकारके प्रयोग होते हैं-'अयोगमन्ययोगं चालयन्तयोगमेव च। व्यवच्छिन्नान्ति धर्मस्य एककाराक्षिधा मतः।'

प्रकृत 'शुक्कार एव मधुरः' इत्यादि कारिकामें विशेष्यके साथ अन्वित एवके अन्ययोगव्यवच्छेदक होनेसे उसका अर्थ 'शुक्कार एव मधुरो नान्यः' यह होगा। परन्तु अगली ही कारिकामें [शुक्कारे विप्रलम्भाख्ये करुण च प्रकर्यवतः] करुण आदि रसमे भी उसका अस्तित्व ही नहीं माना अपितु सम्भोगशृङ्गारकी अपेक्षा विप्रलम्भमें और उससे भी आधिक करुणरसमें माधुर्यका उत्कर्ष माना है। यदि 'शुक्कार एव'का एककार अन्ययोगव्यवच्छेदक है तो उसकी सज्जाति कैसे लगेगी? यह एक प्रश्न है। इस प्रश्नका उत्तर यह है:क अन्यकके भीतर दो प्रकार वस्तुएँ आती हैं, विशेष्यकी सजातीय और विजातीय। यहाँ विशेष्य शृङ्कार है। उसके सजातीय अन्य रस करुणादि भी अन्यकी श्रेणीमें आते हैं। अन्यत्वव्यवच्छेदक एककार कहीं सजातीयका व्यवच्छेद करता है। और कहीं विजातीयका व्यवच्छेद करता है। यहाँ यदि उसे सजातीयका व्यवच्छेदक मानें तो वह करुण आदि में माधुर्यके योगका व्यवच्छेदक होगा और उस दशमें अगली कारिकासे विरोध होगा। परन्तु यदि उसे विजातीय अन्यका व्यवच्छेदक मानें तो वह शब्द तथा अन्यम माधुर्यका व्यवच्छेदक होगा और इस प्रकार गुणके शब्दधर्मेत्व अथवा अर्थधर्मेत्वका निषेध करके रसैकधर्मत्वका प्रतिपादक होगा। यही आलोककारका सिद्धान्तपक्ष शृङ्गारके साथ एव पदसे सुचित किया है।

कारिकाकी वृत्तिमें 'भव्यत्वं पुनरोजसोडपि साधारणम्' लिखा है। यह पंक्ति भामहके 'अथ्यैर्नातिस्थास्तायैश्चैवं मधुरमिष्यते' [भामह २,२,३] इस वचनकी आलोचनामें लिखी गयी है। लोचनपाणिनीय चमूग्रन्थों' इत्यादि ओजके उदाहरणों में भी पाया जाता है। अतएव यह माधुर्यका लक्षण नहीं हो सकता है।

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कारिका <] द्वितीय उद्योत:

शृङ्गारे विमलम्भाख्ये करुणे च प्रकर्योभयम् । माधुर्येमाद्रंतां याति यतस्तत्राधिकं मनः ॥८॥

सहदयहृदयावर्जनातिशयानिमित्तविप्रलम्भशृङ्गारकरुणयोस्तु माधुर्यमेव प्रकर्षवत् । तत्वादिति ॥८॥

विप्रलम्भशृङ्गार और करुणरसमें माधुर्य [गुणका प्राचीन विशेष रूप] उत्कर्ष-युक्त होता है, क्योंकि उसमें मन अधिक आद्रंता को प्राप्त हो जाता है ॥८॥ विप्रलम्भशृङ्गार और करुणमें तो सहृदयोंके हृदयोंके अतिशय आकृष्ट करनेका निमित्त होनेसे माधुर्य [गुण] ही उत्कर्षयुक्त होता है ॥८॥

दस गुणोंका अन्तर्भाव

प्राचीन आचार्योंने [श्लेष: प्रसाद: समता माधुर्यं सुकुमारता । अर्थव्यक्तिरुदारत्व-मोजः कान्तिसमाधयः ॥] दस शब्दगुण और दस अर्थगुण माने हैं । शब्दगुणों और अर्थगुणोंके नाम तो एक ही हैं परन्तु उनके लक्षण दोनों जगह अलग-अलग हो जाते हैं । आलोक, लोचन, काव्य-प्रकाशादिने इन दस गुणोंका अन्तर्भाव अपने तीन गुणों—माधुर्य, ओज और प्रसादमें ही कर लिया है । उन गुणोंके अन्तर्भावप्रकारको निम्नांकित चित्र द्वारा दिखलाया जा सकता है ।

शब्दगुणों तथा अर्थ-गुणोंके नाम

शब्दगुणोंके लक्षण तथा उनका अन्तर्भाव

अर्थगुणोंके लक्षण तथा उनका अन्तर्भाव

१. श्लेष: | शब्दगुणदशमें लक्षण | अन्तर्भाव | अर्थगुणदशमें लक्षण | अन्तर्भाव

बहूनां पदाना मेकपद-द्वासनाम् | ओजसि

क्रमकौटिल्यानुल्वणत्व-योगास्पघटनादिः | विचित्रतामात्रम्

२. प्रसाद: | ओजोमिश्रितशैल्यितास्मा | ओजसि | अर्थवैमल्यम् | अपुष्टार्थत्वभावे

३. समता | मार्गामेदसरूपिणी [कचिदोष:] | यथायथम् | प्रकान्तपकृत्यादिनिवर्हः | प्रकटमदोषभावे

४. माधुर्यम् | पृथक्पृथकत्वम् | माधुर्ये | माधुर्यमुक्तियैचिन्यम् | अनवीकृतदोषभावे

५. उदारता | विकटत्वमू, पदाना न त्यत्यायतत्वम् | ओजसि | आगाम्यत्वम् | ग्राम्यत्वभावे

६. अर्थव्यक्ति: | पदाना श्टित्यर्समर्पणम् | प्रसादे | वस्तुस्वभावस्कुटत्वम् | स्वभावोक्त्यलकृते

७. सुकुमारता | अपारुष्यम् | दुःश्रवतास्यागे | आगारुध्यम् | अमदृलास्लीलत्यागे

८. ओजः | वर्णवैचित्र्यम् | ओजसि | शाभिप्रायत्वम् | अपुष्टार्थत्वभावे

९. कान्तिः | औज्ज्वल्यम् | ग्राम्यत्वभावे | दीप्तरसत्वम् | ध्वनिरुणीभूतव्यङ्गयोः

१०. समाधिः | आरोहावरोहकमः | ओजसि | अर्थछरुरप: अयोनिः | अर्थदृष्टिन गुणः

अन्यच्छायायोर्निश्रेति | द्विविधः |

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प्रथम उद्योतः

यो यस्तर्कर्मसाक्षी चरति मयि रणेऽपि यस्तं यक्षं प्रतिप्य: क्रोधान्धत्स्तं तस्य स्वयमपि जगतामन्तकस्यास्तकौडहंम् । इत्यादौ दृयोरोजस्वम्

[द्रोणवध] का साक्षी है [जो-जो खड़ा हुआ उस द्रोणके शवको देखता रहता है] और मेरे युद्ध करते समय जो कोई उसमें बाधा डालेगा, आज क्रोधसे अन्धा हुआ मैं [अभव्यत्यामा] उसका नाश कर दूँगा फिर चाहे वह सन जगतका अन्तक स्वयं यमराज ही क्यों न हो ।

समर्पकत्वं काव्यस्य गन्तु सर्वरसां प्रति । स प्रसादो गुणो ज्ञेय: सर्वसाधारणक्रिय: ॥?०॥

इन दोनों उदाहरणोंमें [क्रमशः शब्द और अर्थ] दोनों ओजःस्वरूप हैं । ये दोनों श्लोक 'वेणीसंहार' नाटकके हैं । इनमेंसे पहिली भीमकी और दूसरी अश्वत्थामाकी उक्ति है । पहिलमें समासबहुल रचना है, वहाँ शब्द ओजके अभिव्यञ्जक हैं और दूसरे उदाहरणमें दीर्घसमासरचना है, वहाँ अर्थ ओजका अभिव्यञ्जक है । कारिकाकी वृत्तिमें 'लक्षणया त एव द्वितिरित्युच्यते' लिखा है । आधारणतः 'विरोधध्यवाचक-पदसमनवचनकल्भास्यतस्त्व' यह नियम माना गया है । इसका अर्थ यह है कि आक्ष्यात अर्थात् क्रियापदका वचन विशेष्यवाचक पदके समान होना चाहिये । इसीलिये प्रकृतान्त-विकृतावस्थलमें 'वृक्ष: पुष्प नौका भवति' और उपमार्थमेदाद्यारोपस्थलमें 'पङ्को द्वे शायते' इत्यादि प्रयोग उत्पन्न माने गये हैं । यहाँ 'त एव द्वितिरित्युच्यते' में विशेष्यवाचक तत्‌षब्दके 'ते' इस बहुवचनान्त रूपके समान आक्ष्यात 'उच्यते' का भी बहुवचनान्त प्रयोग होना उचित था, फिर ए'वचनका प्रयोग कैसे साधु होगा ? इसका कथनित समाधान यह करना चाहिये कि इति शब्दसे उपस्थाप्यमान वाक्यार्थ ही यहाँ वच्येऽर्थनिरूपित कर्मता आश्रय है । और उस सामान्यमें संख्याविशेषकी अविवक्षायै एकवचन-बहुवचनम्] सुज्ञोंका 'एकवचनम्' द्विहोरिहद्वचनैकवचने' इस प्रकारका न्यास करते हुए भाष्यकारने सुचित की है । तदनुसार सामान्यमें एकवचनका प्रयोग है । कारिकाके 'रौद्रादयो' पदमें 'आदि' पदके 'वीरादिसुतङ्गौपि ग्रहणम्' यह लोचनकारने लिखा है । अतएव यहाँ आदि पदका परिभाषार्थ ने मानकर प्रकार अर्थवा सामान्यलक्षक माना है, तभी रौद्ररसके सदृश वीरादिका ग्रहण किया है । अतएव उसमें वीररसके विभावोंसे उत्पन्न अद्भुतरसका भी ग्रहण करना चाहिये ॥९॥

प्रसाद गुणका आश्रय

[श्रृङ्गारेऽनलमे आग्निके समान अथवा स्वच्छ वह्निमें ज्वलनेके समान] काव्यक समस्त रसोंके प्रति जो समर्पकत्व [बोधकके हृदयमें झटिति व्याप्तिकरत्व] है और समस्त रसोंमें और रचनाओंमें [सर्वसाधरणी क्रिया युक्तिः, स्थितिर्यस्य सः] रहनेवाला है उसे 'प्रसाद' गुण समझना चाहिये ॥?०॥

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ध्वन्यालोक:

प्रसादस्तु स्वच्छता शब्दार्थयोः । स च सर्वरससाधारणो गुणः । सर्वरचनासाधारणत्वे च व्यकृ-पदार्थपेक्षयैव मुख्यतया व्यवस्थितो मन्तव्यः ॥१०॥

प्रसाद [का अर्थ] शब्द और अर्थकी स्वच्छता है। वह सब रसोंका साधारण गुण है, और सब रचनाओंमें समान रूपसे रहता है। [फिर चाहे यह रचना शब्दगत हो या अर्थंगत, समस्त हो या असमस्त] मुख्य रूपसे व्यकृ्यार्थकी अपेक्षासे ही उसे स्थित समझना चाहिये।

श्रुतिमुखदुरदयो दोषा अनित्या ये च वशिता । ध्वननोत्पत्तिन्येव श्रृङ्गारे ते हेया इत्युदाहृताः ॥११॥

ये गुण मुख्यतया प्रतिपन्नाके आस्वादमय होते हैं, फिर रसमे उपनरित होते हैं और फिर लकक्षणासे शब्द और अर्थमें भी उनका व्यवदार होता है। माधित्यदर्शणकारने इसीलिए 'प्रसाद'का लक्षण इस प्रकार किया है—"चित्रं त्यजन्ति यतः लिङ्गं चिह्नं-ध्वनिमिवानलः । स प्रसादः समस्तेऽपि रचनेपु रच्यते च ॥"

अनित्या दोषास्ते ये श्रुतिमुखदुःखः सूच्यास्तेऽपि न वाच्ये अर्थमात्रे, न च व्यकृ्ये श्रृङ्गारत्विरेकिणि, श्रृङ्गारे वा ध्वनेरलातलमूते । किन्तर्हि ध्वन्यात्मन्येव श्रृङ्गारेगक्ष्यितया व्यकृ्ये ते हेया इत्युदाहताः । अन्यथा हि तेषामनित्यदोषत्वैव न स्यात् ॥१२॥

इस प्रकार ग्रन्थकारने यह सिद्ध किया कि जहाँ रसादिका असंलग्रष प्राधान्य है वहाँ रस-ध्वनि, जहाँ वह किसी अन्यका अलंकार है वहाँ रसवदलंकार और जहाँ रस अलंकार्य है और अन्य कोई रसान्तर अज्ञभूत नहीं है वहाँ उपमादि अलंकार होते हैं। यह इनका विपयविभाग है। इसी प्रकार अज्ञीभूत रसादिके आश्रित धर्म गुण, शब्द या अर्थके चारुत्वहेतु अलंकार होते हैं ॥१०॥

अनित्यदोषोंकी व्यवस्था

यह कहते हैं कि हमने जो रसध्वनि आदिका क्षेत्र निर्धारित किया है उसको माननेपर ही नित्य और अनित्यदोषोंकी व्यवस्था भी बन सकती है।

श्रुतिमुखादिव्यपि । श्रुतिकष्टं तयैवेहदुष्टवे चतुर्विघम् ।" भामह] जो अनित्यदोष बताये गये हैं वह ध्वन्यात्मक श्रृङ्गार [रसध्वनिरूप प्रधानभूत श्रृङ्गार] में ही त्याज्य कहे गये हैं ॥११॥

जो अनित्य श्रुतिमुखादि दोष सूचित किये गये वे न तो वाच्यार्थमात्रमें, न श्रृङ्गारसे मित्र व्यकृ्य [रसादि]में और न ध्वनिके अनातमभूत श्रृङ्गार [गुणीभूत श्रृङ्गार] में हेय कहे गये हैं, किन्तु प्राधान्यया व्यकृ्य ध्वन्यात्मक श्रृङ्गारमें ही हेय कहे गये हैं । अन्यथा उनकी अनित्यदोषता ही न बनेगी ॥१२॥

१. नो, टी०में 'श्रुति' पाठ है अथवा इति पाठ अधिक है । २. ति में 'न वाच्यार्थमात्रे, न च व्यकृ्ये श्रृङ्गारे, श्रृङ्गारस्यास्तिरेकिणि का ध्वनेःनालातलमूते' पाठ है । ती० में 'ध्वननोत्पत्तिन्येव'में 'श्रुति'के स्थानपर 'भावे' पाठ है ।

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कारिका १२ ] द्वितीय उद्योत: १०१

एवमयमसंलक्ष्य क्रमध्वनोतः' ध्वनिरात्मा प्रदर्शितः सामान्येन ।

तस्याङ्गानि प्रभेदा ये प्रभेदा स्वगताङ्ग्र ये । तेषामन्यत्नमन्योन्यसम्बन्धपरिकलपने ॥१२॥

आङ्गितया व्यङ्ग्यशो रसादिरिविवक्षितान्यपरवाच्यस्य ध्वनेरेक आत्मा य उत्कत्सत्याङ्गानां वाच्यवाचकानुपातिनामलङ्काराणां ये प्रभेदा निरवधयो ये च स्वगतात्सत्याङ्गिनोऽर्थस्य रस-भाव-तदाभास-तत्प्रशमलक्षणा विभावानुभावव्यभिचारिप्रतिपादनसहिता अनन्ताः स्वाश्रयापेक्षया निःसीमत्वो विशेषास्त्वेषामन्योन्यसम्बन्धपरिकल्पने क्रियमाणे कस्यचिद्-नयतमस्याङ्गपि रसस्य प्रकाराः परिसङ्ख्यायातुं न शक्यन्ते किमुत सर्वेषाम्।

तथा हि—'शृङ्गारस्याङ्गिनस्तावदायौ द्वौ भेदौ । सम्भोगो विप्रलम्भश्च । सम्भोगस्य च परस्परप्रेमदर्शननसूत्रविहरणादिलक्षणाः प्रकाराः । विप्रलम्भस्याङ्गानांभिलाष्यो विरह-

असंलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्यध्वनिके भेद

इस प्रकार यहाँ असंलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्यध्वनिका स्वरूप सामान्यतः प्रदर्शित किया ।

उस [असंलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य रसध्वनि] के अङ्ग [अलङ्कारादि] हे, और [स्वयं रसादिरूपे] जो स्वगत भेद हैं, उनका एक-दूसरेके साथ सम्बन्ध [संरुपादि, प्रस्तारादि] कल्पना करनेपर उनकी गणना अनन्त हो जायगी ॥१२॥

विवक्षितान्यपरवाच्यस्य ध्वनिका आङ्गितया [प्रधानतया] व्यङ्ग्य रसादिरूप जो एक स्वरूप [आत्मा, प्रभेद] कहा है उसके अङ्गभूत अर्थ तथा शब्दके। आक्षित [उपमादि तथा अनुप्रासादि] अलङ्कारोंके जो अपरिमित भेद हैं, और उस प्रधानभूत [रसादि ध्वनिरूप] अर्थके जो स्वगत भेद रस, भाव, तदाभास, तत्प्रशमरूप विभावानुभाव-व्यभिचारिभाव प्रतिपादन सहित अनन्त और अपने आश्रय [श्री, पुरुष आदि प्रकृतिभेद] के कारण निःसीम जो अवान्तर विशेष [भेदोपभेद] हैं उनका पक-डूसरेके साथ सम्बन्ध [संरुप्टि, सूत्र या प्रस्तारादि] कल्पना करनेपर, उनमेंसे किसी एक भी रसके भेदोंकी गणना कर सकना सम्भव नहीं है, फिर सबकी तो बात ही क्या है।

जैसे [उदाहरणके टिप्प]-प्रधानभूत शृङ्गाररसके, प्रारभमें दो भेद होते हैं, सम्भोग [शृङ्गार] और विप्रलम्भ [शृङ्गार]। उनमें भी सम्भोगके परस्परप्रेमदर्शन [दर्शन, सम्भापणादिका भी उपलक्षण है], सुरत, [और उद्यान] विधारादि भेद हैं। [इसी प्रकार] विप्रलम्भके भी अभिलाष, दैन्यादि, विरह, प्रवास और विप्रलम्भादि [शापादि-निमित्तक वियोगादि भेद हैं]। उनमेंसे प्रत्येक [भेद] के विभाव, अनुभाव, व्यभिचारि-

१. 'ध्योतध्वने:' नि० १। २. 'श्रृङ्गारस्याङ्गिन:' नि० द्वि० ।

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ध्वन्यालोक:

श्रृङ्गारस्याल्लिनो यत्नादेकरूपातुश्रनयचानन् । सर्वेष्वेव प्रभेदेषु नानुप्रास: प्रकाशक: ॥१४॥

प्रवासविग्रलम्बादय: । तेषां च प्रत्येकं विभावादिभावनन्यविचारिमेद: । तेषां च देशकालावाश्रयावस्थामेदे इति स्वगतभेदापेक्षयैकस्यै तस्यापरिमितत्वम् । किं पुनरङ्गप्रबेदकल्पनायाम् वे हि शृङ्गारप्रबेदा: प्रत्येकमङ्ग्रिप्रबेदसम्बन्धघटितकल्पने क्रियमाणे सत्यांनत्यमेवोपयान्ति ॥ १२॥

दिङ्मात्रं तुच्यते येन व्युत्पन्नानां सचेत्तसाम् । बुन्दिरासादितालोका सर्वत्रैव भविष्यति ॥१३॥

दिङ्मात्रकथनेन हि व्युत्पन्नानां सहदयानामेकत्रापि रसभेदे सहृदयैरेकाङ्गभावपरिज्ञाने चासादिवालोकानां बुद्धि: सर्वत्रैव भविष्यति ॥१३॥

तत्र —

भावके [मेदके] भेद हैं । और उन [विभावादि] के भी देश, काल, आश्रय, अवस्था [आदि] के भेद हैं । इस प्रकार स्वगत भेदोंके कारण उस एक [शृङ्गार] का परिमाण करना [ही] असम्भव है फिर उसके अङ्गोंके भेदोपभेदकल्पनाकारी तो बात ही क्या है ?

वे अङ्गों [अलङ्कारादि] के प्रभेद प्रत्येक अङ्गी [रसादि] के प्रभेदोंके साथ सम्बन्धघटितकल्पना करनेपर अनन्त ही हो जाते हैं ॥१२॥

[उसका] दिङ्मात्र [कुछ थोड़ा-सा, आगे] कहते हैं, जिससे व्युत्पन्न सहदयोंकी बुद्धि सर्वत्र प्रकाश प्राप्त कर सकेगी ॥१३॥

[इस] दिङ्मात्रकथनसे अलङ्कारादिके साथ रसके प्रत्येक ही भेदके अङ्गाङ्गिभावके परिज्ञानेसे व्युत्पक्ष सहदयोंकी बुद्धिको अन्य सब स्थानोंपर [स्वयं] ही प्रकाश मिल जायगा ॥१३॥

श्रृङ्गारमें शब्दालङ्कारोंका अधिक प्रयोग अनुचित है उसमें—

प्रधानभूत [अङ्गी] श्रृङ्गारके सभी प्रभेदोंमें यत्नपूर्वक समानरूपसे [निरन्तर] उपनिबद्ध अनुगत [रसका] अभिव्यञ्जक नहीं होता ॥१४॥

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कारिका १५] द्वितीय उद्योतः १०३

ध्वन्यालोकमते शृङ्गारे यमकादिनिबन्धनम् । शक्तावपि प्रमादित्वं विप्रलम्भे विशेषतः ॥

ध्वनेरालम्बनं ज्ञेयं रसाद्यनुगतकथाकथां प्रकाशनप्रतिपादनशक्तियुक्तं यमकादीनां निवन्धनं दुष्करशब्दबन्धरुचिरलेशादीनां शक्तावपि प्रमादित्वम् । प्रमादित्वमित्यनेन एतदह्रयते काकतालीयेन कदाचिल्लक्ष्यचिदेकस्य यमकादेरनिष्पत्तावपि भून्वालङ्कारान्तरवद्रसालङ्कारचर्वेन निवन्ध्यो न कर्तव्य इति । विप्रलम्भे विशेषत इत्यनेन विप्रलम्भे सौकुमार्योतिशयः ख्याप्यते । तस्मिन्न् ध्योत्पे यमकादेरङ्गस्य निवन्धो नियमात्र कर्तव्य इति ॥५॥

प्रधानभूत [अङ्गी] शृङ्गारके जो प्रबन्ध कहे हैं उन सब [ही] में एकाकाररूपसे निरन्तर निबद्ध रसप्रास [रसकाव्य] अभिव्यञ्जक नहीं होता । अङ्गिनः इस पदसे अङ्गभूत [गुणीभूत] शृङ्गारमें समानानुरूपसे [निरन्तर] अनुयासकी रचना का यथेष्ट प्रयोग किया जा सकता है यह सूचित किया है ॥१४॥

शक्ति होते हुए भी, ध्वन्यात्मक शृङ्गारमें और विशेषरूपसे विप्रलम्भशृङ्गारमें यमकादिका निवन्धन [कविके] प्रमादित्व [का ही] सूचक है ॥१५॥

[रसादि] ध्वनिका आत्मभूत शृङ्गार [रस] शब्द और अर्थ द्वारा तात्पर्ये[तात्पर्यविषयीभूत, प्रधानतया] रूपसे प्रकाशित होता है, उसमें यमकादि [यहाँ आदि शब्द प्रकारार्थक अर्थात् सादृश्यार्थक हैं], यमकसदृश दुष्कर शब्दश्लेष या समाधिश्लेष आदि [और मुरजबन्धादि किलष्ट अलङ्कारों] का शक्ती होनेपर भी प्रयोग करना [कविके] प्रमादित्वका सूचक है ।

प्रमादित्वसे यह सूचित किया है कि काकतालीयन्यायसे कभी किसी एक यमकादिकी रचना हो जानेपर भी, अन्य अलङ्कारोंके समान बाहुल्येन रसाङ्गरूपमें उनकी रचना नहीं करनी चाहिये । 'विप्रलम्भे विशेषतः' इन पदोंसे विप्रलम्भ [शृङ्गार] में सुकुमारताका अतिशय घोतित किया गया है । उस [विप्रलम्भशृङ्गार] के ध्योत्प होनेपर यमकादि [अलङ्कारों] का प्रयोग नियमितः नहीं करना चाहिये ॥१५॥

आदिशब्दन्तु मेधावी चतुरश्रयंशपु भाषते । प्रकारे च व्यवस्थायां सामीप्येऽप्यवयवे तथा ॥

यमकादिमें आदि शब्द प्रकार अर्थात् साहसयपरक है । यमकसदृश दुष्कर अलङ्कारोंमें मुरजबन्धादि और समाधिश्लेष या शब्दश्लेष भी सम्मिलित हैं । 'श्लिष्टः' पदेर्नेकार्योमिघाने श्लेष इत्यते—श्लिष्ट पदोंसे अनेक अर्थोंका बोधन करना श्लेष अलङ्कार कहलाता है । 'पुनःश्लिष्य समञ्जस्योड्याभिन्नस्तदुभयात्मकः'—वह समाधिश्लेष, अमकश्लेष

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ध्वन्यालोक:

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अत्र युक्तिमभिधीयते—

रसाक्षिसतया यस्य बन्धः शक्यक्रियो भवेत् । अपृथग्यत्ननिरवर्त्यः सोजलङ्कारो ध्वनौ मतः ॥१६॥

निष्पत्तावाश्रयेभूतोऽपि यस्यालङ्कारस्य रसाक्षिसततयैव बन्धः शक्यक्रियो भवेत् सोऽस्मिन् अलङ्क्यक्रमव्यङ्ग्ये ध्वनावलङ्कारो मतः । तस्यैव रसाङ्गत्वं मुख्यमित्यर्थः ।

अर्थश्लेषे हि नो दोनौस् मिलनं हि । और वह वहीं होता है जहाँ शब्दका परिवर्तन कर देनेपर भी दोनों अर्थ निकलते रहते हैं । जैस—

“स्लोकेनोक्तिमयायाति स्तोकेनायास्यधोगतिम् । अहं सुशड्कडी वृत्तिस्तुलाकोटेः सलस्य च ॥”

तराजूः डण्डी और दुष्ट पुरुपकी वृत्ति एक समान ही है । तनिक-से तोलने, मापने, रत्तीमें नीचे झुक जाती है और तनिकमें ऊपर चढ़ जाती है । यहां 'उन्नतिमायाति' आदिको बदलकर उसका पर्यायवाची 'ऊर्ध्वं प्रयाति' आदि कोई दूसरा शब्द रख दिया जाय तो भी दोनों अर्थ प्रतीत होते रहते हैं । अतएव यहां अर्थश्लेष होता है । अर्थश्लेष तो भट्टिज्ञानेर्मी प्रयुक्त हो सकता है । वल्कि मूल ग्रन्थमें जो दुष्कर शब्द-भङ्गी-ललेखका ग्रहण किया है उससे तो यह सूचित होता है कि क्लिष्ट समझ-

अलङ्कारप्रयोगकी कौट्टी

इस विषयमें युक्ति [व्यापक नियम] भी कहलाते हैं—

[रसादि] ध्वानिमें, जिस [अलङ्कार] की रचना रससे आक्रान्त [रसके ध्यानसे विभावादिकी रचना करते हुए स्वयं निष्पन्न] रूपमें बिना किसी अन्य प्रयत्नके हो सके [ध्वनिमें] वही अलङ्कार मान्य है ॥९८॥

[यमकादिकी] निष्पत्ति [रचना] हो जानेपर आश्चर्यजनक होनेपर भी [विना प्रयत्नके इतना सुन्दर यमकादि कैसे बन गया, इस प्रकार आश्चर्यका विषय होनेपर भी] जिस अलङ्कारकी रचना रससे आक्रान्त [विना प्रयत्नके स्फ़य अनायासला'द्ये] रूपसे हो सके वही इस-असंलक्ष्यक्रमव्यङ्गच [रसादि] ध्वनिमें अलङ्कार माना जाता है । वही मुख्यरूपसे रसका अङ्ग होता है ।

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ध्वन्यालोक:

यथा— कपोले पत्राली करतालनिरोधेन मुदिता निपीतो निःश्वासैरयममृतहृदयोदधरसः। इयुङ्: कण्ठे लग्नस्तरङ्गयति वाष्पः स्तनतटीन्' प्रियेऽ मन्युजूतस्तव निरुरोधे न हि वयम्॥ रसोद्रे तु वस्यै लक्षणमक्षुण्णामप्यनुवर्त्तमाननिरवच्छिन्नमिति। यो रसः वचनानुरञ्जनापरिस्पन्दनिष्पत्त्यते स न रसाक्षस्मिति। यमके च प्रवन्धेन बुद्धिपूर्वकं क्रियमाणे नियमेनैव यत्नान्तरपरिम्रह आपतति शब्दविशेषणत्व-षणरूपः। अलङ्कारान्तरेष्वपि तथैल्यमिति चेत् नैवम्। अलङ्कारान्तराणि हि निह्न्यमाणडु-घटनान्यपि रससमाहितचेतसः प्रतिबिम्बत: कवेरह्मूर्तंक्रियया परापतन्ति। यथा

इसीलिए न केवल शृङ्गार या विप्रलम्भशृङ्गारमै अपितु वीर तथा अद्भुतादि रसमें भी प्रयत्नपूर्वक गढ़कर रसले गये यमकादि रसविच्नकारी होते हैं। ग्रन्थकारने जो 'चैवल शृङ्गारका नाम लिया है वह इस हविेरे ही कहा है कि शृङ्गार या विप्रलम्भशृङ्गारमें वे रसके विघ्नकारी हैं यह वात लो विद्वेषाके सद्भावया नहीं है। वे साधारण पुरुष भी समझ सकते हैं। उनकी हविेरे शृङ्गारका नाम विशेषरूपसे लिख दिया है। वास्तवमें तो करुण आदि अन्य रसोंमें भी कुनिम यमकादि प्रतिबन्धक होते हैं इसलिए आगे 'रसैकद्रव् त्सादृश्यों न विद्यते' लिखकर सामान्प रूपसे सभी रसोंमें उनकी रसाक्ष्ताका निपेष किया है। जैसे— [तुम्हारे] गालपर बनी हुर्ई पत्रावलीको हाथकी रगड़ने मळ डाला, [तुम्हारे] amृतके समान मधुर अघररसका पान [यह उष्ण] नि:श्वास कर रहे हैं, ये अश्रुबिन्दु वार-बार तुम्हारे कण्ठका आलीङ्गन कर स्तनोंको छिला रहे हैं; अप्रिय निर्दये, यही क्रोध तुम्हें [इतना] प्रिय हो गया और हम [हमारी कहाँ पूछ ही] नहीं। उस [अलङ्कार] के रसाङ्ग होनेपर अपृथग्यत्ननिर्वर्त्यैव हि उसका लक्षण है। जो अलङ्कार, रसचयन्त्रणमें तत्पर कविकी उस [रसचयनाघवसाय] वासनाका अतिक्रमण करकै [अलङ्कारान्तर-निर्वाह] दूसरे प्रयत्नकी आाश्रय लेनपर [ही] बनता है वह रसका अङ्ग नहीं है। और जान-बूझकर यमकका निरन्तर प्रयोग करनेपर तो [उसके लिपि, उपयोग] विरोष शब्दोंकी खोजरूप नया प्रयत्न अवश्य ही करना पड़ता है।

पूर्वपक्षी पूछता है कि यह वात आप यमकके लिये ही क्यों कह्ते हैं, उपयोगी शब्दोंकी खोजका प्रयत्न तो अन्य अलङ्कारोंमें भी करना पड़ता है। यह [वात] तो

१. 'तटस्' नि०। २. 'लक्षणमक्षुण्णामप्यनुवर्त्तमान इति' नि०, दी०। ३. 'यो' यह पद 'कवे:' के बाद है दी०। १ नि० में 'यो' पद है ही नहीं। ४. 'स' नहीं है नि०।

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कारिकां ९६ ]

द्वितीय उद्योत:

९.०९

कादम्बर्यां कादम्बरीदर्शनावसरे । यथा च मायारामाशिरोदर्शनेऽपि विह्ललायां सीतादेव्यां मेत्तौ ।

युक्तं ब्रैवत । यतो रसा वाच्यविशेषैरेव वाक्षेमुख्याः । तत्रातिपादकेकत्र शब्दैस्तल्म-कारिनो वाच्यविशेषा एवं रूपकाद्योडलङ्काराः तस्मात् तेषां बहिरङ्कत्वं रसाभिव्यक्तौ ।

यत्तु रसवत् कानिचिद्वाक्यमकृतद्विति क्रियातद्वे तत्र रसादीनामङ्गत्वं, यमकादीनामस्त्वङ्गितैव । रसाभासे चाङ्गत्वमप्यविरुद्धम् । आङ्कितया1 तु व्यकृतये रसे नाकृतवं 'पृथक्प्रयत्न-निर्वर्त्येत्यादू यमकादेः ।

अन्य अलङ्कारोंमें भी समान ही है—यह कहनां ठीक नहीं है । क्योंकि, दूसरे अलङ्कार रचनाओं में कठिन दिखाई देनेपर भी रसमैं दत्तचित्त प्रतिभावान् कविके सामने होड़ लगा-कर स्वयं दौड़े आते हैं । जैसे कादम्बरी [प्रबन्ध] में कादम्बरी [नायिका] के दर्शंनके अवस्तरपर । अथवा जैसे सेतुबन्ध [काव्य] में रामचन्द्रके [कटे हुए] सिरको देखकर सीतादेवीके विह्वल होनेपर ।

और यह [अहंपूर्वक या परापण] उचित भी है, क्योंकि रसोंकी अभिव्यञ्जना वाच्यविशेषसे ही होती है । और उन [वाच्यविशेष] के प्रतिपादक शब्दोंसे उन [रसादि] के प्रकाशक रूपकादि अलङ्कार [जन शब्दोंसे प्रकाशित] वाच्यविरोष ही हैं । इसलिये रसकी अभिव्यक्तिमें उन [रूपकादि अलङ्कारों] की बहिरङ्गता नहीं है । यमक आदिके दुष्कर [बुद्धिपूर्वक बहुप्रयत्नसाध्य] मार्गमें तो बहिरङ्कत्व [भिन्नप्रयत्ननिष्पाद्यत्व] निश्चित ही है ।

जहाँ कहीं कोई-कोई यमकादि [अलङ्कार] रस सहित दिखलायी देते हैं वहाँ यमकादि ही [अङ्गी] प्रधान हैं, रसादि उनके अङ्ग हैं । [अर्थात् वहाँ रसाङ्गता नहीं है ।] जहाँ रस प्रधानतया [अङ्गितया] व्यकृत्य हो, वहाँ तो पृथक्प्रयत्नसाध्य होनेसे [यम-कादि] अङ्ग नहीं हो सकते ।

मूल ग्रन्थके 'निरुपमाणदुर्योःतस्यानि' पदको 'निरुप्यमाणानि सन्ति दुर्योऽतस्यानि', 'डिदिपूर्वं चिकीर्षितान्यपि कृत्वमशक्यानि' अर्थात् बुद्धिपूर्वक सोच-विचारकर रचना करना चाहै तो भी जिनकी रचना न हो सके इतने कठिन, और साथ ही जब अनायास ही उनकी रचना हो जाय तो 'निरुप्य-माणे दुर्योऽतनानि' यह देखकर आश्चर्य हो कि यह इतना सुन्दर अलङ्कार कैसे आ गया । यह दो प्रकारके अर्थ हो सकते हैं । यह दोनों ही अर्थ प्रकृत विषयको परिपुष्ट करनेवाले हैं । इसलिये लोचन-कारने इस पदकी व्याख्या करते समय दोनों अर्थ दिखलाये हैं । और यहाँ इन दोनों अर्थोंका विकल्प नहीं अपितु समुच्चय ही ठीककारको अभीष्ट है ।

१. 'आङ्किता' नि०, दी० ।

२. 'पृथक्प्रयत्न' दी० ।

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ध्वन्यालोक:

अस्यैवार्थस्य संग्रहलोका:—

'रसवदिति हि वस्तूনি सालङ्काराणि कानिचिन् |

एकैनेव प्रयत्लेन निर्दर्येयंने महाकवे: ॥

यमकादिनिबर्ह्ये तु पृथग्यत्नैरुडस्य जायते इ

शक्तस्यापि रसेहृत्त्यं तस्मादयं न विधीयते ॥

रसाभासौ तथैवास्मात् यमकारादे: वार्यते ।

ध्वन्यातमभूते शङ्कारे त्वकृत्या नोपपद्यते ॥१६॥

इदार्नीं ध्वन्यातमूतस्य शङ्कारस्य व्यङ्गचकोडलङ्कारवर्ग आसङ्यायने—

ध्वन्यातमभूते शङ्कारे समीकष्य विनिवेशित: ।

रूपकादिरलङ्कारवर्ग एति यथार्थताम् ॥१७॥

अलङ्कारो हि वाच्यालङ्कारसाम्यादृणश्रयत्वहेतुरुरुच्यते । वाच्यालङ्कारवर्गाश्र

रूपकादियोंवानुक्तो, वस्त्यते च कौचित्रीदृ, अलङ्काराणामनन्तत्तात्, स' सर्वोंडपि यदि समीक्ष्य

विनिवेशयते वदलक्षणविमलङ्ग्यस्य ध्वनेरङ्गिन: 'सर्वस्यैव' चारुत्वहेतुनिष्पद्यते ॥ ९ ७॥

इसो [उपर्युक्त गद्यस्थ विषय] अर्थके संग्रह [आत्मक ये निम्नोक्त] श्लोक हैं—

कोह-कोई रसयुक्त वस्तुपँ [रसवदिति वस्तूনি] महाकविके [रसनिबन्धनालङ्कुच्ल] एक ही व्यापारसे सालङ्कार [मौ] बन जाते हैं [अर्थात् उतमें अलङ्कारनिष्पादनार्थ अलङ्ग

व्यापार नहीं करना पड़ता] ।

परन्तु यमक आदिकी रचनाओं तो प्रतिभावान् [शक्तस्यापि] कविको भी पृथक्

प्रयत्न करना पड़ता है इसलिये वे [यमकादि] रसके अङ्ग नहीं होते ।

[हाँ] रसाभासोंमें उनको अङ्ग माननेका निषेध नहीं है, [केवल] प्रधानभूत

[ध्वनिरूप] शङ्कार [अथवा रसों]में ही वह अङ्ग नहीं बन सकते हैं ॥१६॥

शङ्कार रसोंमें हेय यमकादिवर्गोंका वर्णन कर दिया, अब आगे उपदेश अलङ्कार वर्गका

निरूपण करेंगे ।

अब ध्वनिके आत्मभूत शङ्कारके अभिव्यञ्जक अलङ्कारवर्गोंका निरूपण करते हैं—

ध्वन्यातमक शङ्कारमें [अधिम कारिकाओंमें प्रतिपादित पद्धितसे] सोच-समझकर

[उचित रूपोंमें] प्रयुक्त किया गया रूपकादि अलङ्कारवर्ग वास्तविक अलङ्कारताको प्राप्त

होता है ।

[अलङ्कार्ये प्रधानभूत शङ्कारादिका वास्तव्यहेतु होनेसे अपने 'अलङ्कार' नामको चरितार्थ करता है । ] ॥१७॥

वाच्य आभूषणोंके समान प्रधानभूत [अङ्गी] रसके चारुत्वहेतु [रूपकादि ही]

अलङ्कार कहे जाते हैं । जितने भी रूपकादि वाच्यालङ्कार प्राचीन [भामहादि] कह चुके

हैं अथवा अलङ्कारों [चारुत्वहेतुओं] की अनन्तताके कारण, आगे कहे जायँगे, उन

सबको यदि विचारपूर्वक [काव्यमें] निबद्ध किया जाय [अगली कारिकाओंमें प्रदर्शित

९. 'स' सि०, वी० में नहीं है ।

२. 'सर्वं एष' नि०, वी० !

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कारिका १८-१९ ] हितीय उद्योत:

एषा चास्य विवेचने समीक्षा—

विवक्षा तत्रपरत्वेन नादित्येन कदाचन । काले च ग्रहणत्यागौ नातिनिर्बंधेनिषिता ॥१८॥ निव्यूढावपि चादित्ये यत्तेन प्रत्यवेक्षणम् । 'रूपकादिरलंकारवर्गेस्यादित्यसाधनम्' ॥१९॥

रसवन्‍धेष्वादरतमानः कविरेलंकारं तदृत्तया विवक्षति । यथा— चलोपार्जितहृष्टि रूपशसि बहुशः चंपूयुतिं रहस्याख्यायीय स्वनसि श्रुतु कर्णान्तिकचरः?

नियमोंके अनुकूल प्रयुक्त किया जाय] नो चै, असंलक्ष्यचमत्कारक़्‌य प्रधानभूत सभी ध्वनियों [रसों] के वाचकत्वहेतु [अलंकार] होते हैं ॥१८॥ रूपकादि अलंकारोंके प्रयोक्तके छ नियम

इस [रूपकादि अलंकार] के [काव्यान्तर्गत] प्रयोगमें [यह समीक्षा] इन वातोंका विचार करना आवश्‍यक है— १. [रूपकादिकी] विवक्षा [सदैव रसकेो प्रधान मानकर] रसपरत्वेन ही [वण्‍य] हो, २. प्रधान रूपसे किसी भी दशामें नहीं । ३. [उचित] समयपर [उनका] ग्रहण और ५. त्याग होना च्‍‌ाहिये, ४. [श्राव्‍‌दसे अन्‍ततक] अत्यन्‍त निर्बंधकी इच्‍‌छा [यत्न] नहीं करनी च्‍‌ा हिये ॥१८॥ ६. [यदि कहें अनायास आचान्‍त निर्वाह हो जाय तें] निर्वाह हो जानेपर भी [वह] अज्ञातरूपमें [ही] हो यह वात सावधानीसे फिर देख लेन्‍ी च्‍‌ाहिये । यही [समीक्षा]

इन कारिकाओंमें प्रथम कारिकाके चारों चरणों और दुसरी कारिकाके पूवार्ध इन पाँचोंके साथ अन्‍तिम कारिकाके उत्तरार्द्धक उ‌पकादिरलंकारवर्गेस्यादित्यसाधनम्‌ का अन्वय होता है । फिर इन सबोंको मिलाकर १—[पृ० १०९] 'यत्नलक्‍‌ष्यं तदृत्तया विवक्षात, २—[पृ० ११०] नादित्येन, ३—[पृ० १११] यमत्सरे यत्न त, ४ — [पृ० ११६] यमत्सरहं स्‍‌यजात, ५—[पृ० ११६] य नात्यन्तं निर्वन्धमिच्छति, ६—[पृ० ११७] स एवं- सुपनिबद्ध्यम्‍‌ानो रसाभिव्यक्ति हेतुभवति'' यह बडा लम्‍‌बा महावाक्य है । इस + हायाकेके वीचमें उदा- हरणोंके देने, उनकी सङ्ङति लगाने और उस सङ्ङतिके समर्‍‌थन आदिके करनेके लिये बीचका शेष ग्रन्‍थ है । इस विस्‍तृत महावाक्‍यका प्रारम्भ अगले वाक्यमें होता है और उसकी समाप्ति आगे चलकर पृष्ठ ११७ पर होगी ।

१—रसवन्‍धमें आदरवान् कवि जिस अलंकारको उस [रस] के अज्ञातरूपमें कहना चाहता है । [उसका उदाहारण j जैसे—

[कालिदासक 'राकुन्‍तला' नाटकमे, डाटिकासिख्‍‌झनमें लगी हुर्ई राकुन्‍तलाको छिपकर देख्‍‌ते हुए हुप्‍यान्‍त उसके पास मॅडराते हुए अमरकॉ देखकर कहते हैं] हे

१. 'रूपकादे:' नि०, वी० । २. 'यत:' नि० ।

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ध्वन्यालोक:

करो व्याजुनवत्या: पिन्रस्ति रतिसर्वस्वमघरं

वयं तत्त्वान्वेषान्मधुकर हतास्त्वं खलु कृतो॥

अत्र हि भ्रमरस्वभावोक्तिरलङ्कारो रसालङ्गुणः।

नालङ्कव्येनeti न° प्राधान्येन। कदाचिद्रसादितात्पर्येण विवक्षितोऽपि° अलङ्कारः कश्चिदङ्गत्वेन विवक्षितो दृश्यते।

यथा—

चक्राभिघातप्रसभमार्ज्जयैव चकार यो राहुवध्दूजनस्य।

आलिङ्गनोदामविलासचञ्चलं रतोत्सवं चुम्बनमात्रशेषम्॥

अत्र हि पर्यायोक्त्याङ्गितेन विवक्षा रसादितात्पर्येण सत्यपीति।

मधुकर! तुम इस शकुन्तलाकी [मयपरिकम्पित] कखल और तिरछी चितवनका

[खुन] स्पर्शो कर रहे हो, एकान्तमें या रहस्य निवेदन करनेकेलिये समान कानके सभीप जाकर गुनगुनाते हो, [उड़ानेके लिये दृढ़तर उधार] हाथ इधरकरती हूई इस [तरुणी राकुन्तला] के रतिसर्वस् अधर [अमृत] का पान कर रहे हो। हे मधुकर! हम तो

तत्त्वान्वेषण [अर्थात् हमारे म्रहण करने योग्य क्षत्रिया है या नहीं, इस खोज] में

ही मारे गये और तुम कृतकृत्य हो गये।

यहाँ भ्रमरकं स्वभावका वर्णनरूप 'स्वभावोक्ति' अलङ्कार रसके अनुरूप ही है।

२—नालङ्कित्वेन [का अर्थ] न प्राधान्येन, प्रधान रूपसे नहीं" यह है। कभी-कभी रसादितात्पर्यसे निबद्ध होनेपर भी अलङ्कार अङ्गी—प्रधान रूपमें दिखलायी देता है इसको बातको आगे कहते हैं।

रसादितात्पर्यसे [रसादिको प्रधान मानकर] विवक्षित होनेपर भी कोई अलङ्कार प्रधान

रूपसे विवक्षित दिखलायी देता है। जैसे—

[विष्णुने] चक्रप्रहाररूप [अपनी] अनुस्लङ्घनीय आखासे राहुकी पत्नियोंके

सुरतोत्सवको, [आलिङ्गनोपयोगी हस्तादि न रहनेसे] आलिङ्गनप्रधान विलासोंसे विहीन, चुम्बनमात्रावशेष कर दिया।

यहाँ रसादिमें तात्पर्य होनेपर भी पर्यायोक्त [अलङ्कार] प्रधानतया विवक्षित है।

इस इलोकमें राहुके कण्ठच्छेदकी घटनाका प्रकारान्तरसे उल्लेख करनेसे यहाँ पर्यायोक्त अलङ्कार है। राहुके कण्ठच्छेदकी घटना पौराणिक कथाके आधारपर इस प्रकार है। समुद्रमन्थनके समय जब अमृत निकल तव देवता और दैत्य दोनों उसकॆ लिये लड़ने लगे। विष्णुने माहिनी-

रूप धारण कर अमृत-कलशको अपने हाथमें ले लिया। दैत्य उनके मोहिनी-रूपपर मोहित हो गये

और अमृतका ध्यान भूल गये। विष्णुने दैत्योंको अलग पक्षमें एक ओर, देवतॊंको दूसरी ओर

१. ति०, ली० में 'न' पाठ नहीं है।

२. दी० में 'अपि' नहीं है।

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कारिका ९ ] तृतीय उद्योतः १९६

अज्ञत्वेन विवक्षितमपि यमवसरे गृह्यते नानवसरे । अवसरेच गृहीतियेथा—

उद्दामोत्तकलिकां विपाण्डुरुरुञ्च प्ररूढघनुम्भों क्षणा-दायासं इतसनोद्ग्रैरत्रिलैरातनवर्तीमतमनः ॥

बिडाकर देवताओंोंकी ओरमें अमृत वँटना शुरू किया । उनका आशय था कि पहिले देवताओंमें अमृत बाँटकर वहीं उसका समात कर दिया जाय । राहु इस अभिप्रायको समझ गया और चुपकेसे उठकर देवताओंकी पंक्ति में सूर्य और चन्द्रमाके वीचमें बैठ गया । मोहिनीने उसे भी अमृत पिला दिया और वह अमर हो गया । परन्तु पास बैठे सूर्य-चन्द्रमाके सद्यंतत्ते जब मोहिनीरुपधारी विष्णुको यह बात मालूम हुइ तो उन्होंने अपने चक्रसे राहुके सिरको अलग कर दिया । उसका सिरका भाग 'राहु' और धड़का भाग 'केतु' कहा जाता है । अमृतपान कर चुकनेके कारण सिर कटजानेपर भी वह मरा नहीं । तभीसे सूर्य और चन्द्रमाके साथ राहुका वैर है ।

इस श्लोकमें चत्रपहारूप आालङ्कारसे राहुकी पत्नियोंके सुरतोत्सवको आालिङ्गनप्रधान विलासोंसे विद्हीन चुम्बनमात्रशेष कर दिया । इस कचनपद्धतिसे उसके कण्ठच्छेदका प्रकaranान्तरसे कथन किया है ।

रसादिमें तात्पर्य हंते हुए भी यहाँ पर्यायोक्त अलङ्कारका प्राश्रनान्य है । यदि इतनी ही व्याख्या इसकी मानी जाय तो यह 'नाङ्गत्वेन कदाचन' के विपरीत होंनेसे दोषका उदाइरण होना चाहिये ।

परन्तु लोचनकारने इसकी व्याख्या प्रकaranान्तरसे करकै यह सिद्ध किया है कि यह दोषका उदाइरण नहीं है, कयोंकि आगे अन्यकारने महाभारतके दूषणोद्घाटनके लिये दोष बतलाये है । अतएव इस श्लोकमें उन्होंने दूषणोद्घाटन नहीं किया है यह लोचनकारका कहना है ।

इसकी रसादिपरता सिद्ध करनेके लिये लोचनकार कहते हैं कि यहाँ वास्तुकेवक् प्रतापका ही मुख्यतः वर्णन है ।

इसलिए प्रधान तो वहीी भाव है किन्तु भावरूप हानसे वह चारुत्वहेतु नहीं है, चारुत्वहेतु तो पर्यायोक्त अलङ्कार ही है ! यह इस वातका एक उदाइरण है कि कहाँ-कहाँँ प्रतीयमान वस्तु अलङ्कारको भी अज्ञभूत अलङ्कार तिरस्कृत कर देता है ।

किन्तु लोचनकारकी यह व्याख्या अमङ्गत और ग्रन्थकारके अभिप्रायके विरुद्ध है । ग्रन्थकारने इस श्लोककी जो अवतरणिका दी है उसमें इसे अलङ्कारकी प्रधानताका उदाइरण माना है ।

२—अलङ्कृपते विवक्षित होंनेपर भी जिसको अवसरपर ग्रहण करता है, अनवसरमें नहीं । अवसरपर ग्रहणपका [उदाइरण] जैस—

आज मदनावेशायुक्त अन्य नारिके समान, [लतापक्षमें मदन नामक वृक्षविशेषके साथ स्थित, उसपर चढ़ी हुई], प्रणल उत्कृष्टतासे युक्त [लतापक्षमें प्रचुरसात्रामें कलियोंसे लदती हुई] [नारीपक्षमें उत्कण्ठातिशयंक कारण] पाण्डुवर्ण्ण [और लतापक्षमें कलिकावाहुल्यंक कारण उपरसे नोंचंतक इतस्ततः] और उसी समय [नारीपक्षमें मदनावेशांक प्रभावसे] जंम्भाई लेती हुई [लतापक्षमें विकसति होंती हुइ] तथा [नारीपक्षमें] लस्वी साँसोंसे अपने मदनावेग या हृदयकं सन्तापकौं प्रकट करती हुइ [लतापक्षमें चञ्चुके निरन्तर झोंकौसे काम्पत हुइ], स्वमदना [नारीपक्षमें काम-विकारयुक्त और लतापक्षमें मदनफुलकं वृक्षकं साथ अस्थात् उसपर चढ़ी हुइ], इस

१. अज्ञत्वेन विवक्षितमपि, नि०, दी० ।

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ध्वन्यालोक:

अद्योध्यानलतासिमां समदनां तारोर्मिवान्याः श्रुवं पद्रयन्तु विपिपातलभुजं तैरुरस्खंदेव्या: करिष्याम्य्येहम् ॥ इत्यत्र 'उपमालंकारस्य' । गृहीतामपि यमवसरे त्वजति तद्रसाद्रुगुणतया लड्ध्वारान्तरापेक्षया । यथा—रत्नत्वं नवपल्सवैरहिमपि रलाच्चै: प्रियाया गुणै-स्त्वन्मायान्ति शिलीमुखैः; सरचतुरसुन्दैः मत्तो मामपि ॥ कान्तापादतलादितस्तव मुंदे तद्रत्नमालाऽऽययोः: सर्वं तु ल्यमशोक ! देवलमहं धात्रा सशोकः कृतः ॥

उद्यानलतांको देखते हुए निश्चित ही आज मैं रानीके मुखको क्रोधसे लाल कर दूँगा ![यहाँ गजा उद्यानने भावी सागरिका-प्रेममूलक हृद्यो विप्रलम्भको अनजाने सूचित किया ।]

यहाँ उपमालंकारका [अवसरमें ग्रहण है । उसके द्वारा रसका परिपोष हो रहा है । अतः यह अवसरपर ग्रहणका उदाहरण है ।

यह पद्य 'रत्नावली' नाटिकाका है । राजाकी नवमालिका लता दोहदविशेषके प्रयोगसे सकालमें कुसुमित हो उठती है और रानी वासवदत्ताकी नहीं । यह जान कर राजा अपने नर्मसचिव विदूषकसे कह रहा है कि आज जब मैं मदनविधेयुक्त परनारिके सुमान इस लताको देखूँगा तो रानी वासवदत्ताका मुख इन्द्र्यसे लाल हो जायगा । इन्द्रियाँका मुख्य कारण तो यही है कि प्रस्तुत विरोधियोंसे लता कामके वादविवादसे युक्त परनारिके सुमान प्रतीत हो रही है, अतः उसकी ओर देखना रानीको असह्य होगा । इस कारणसे जव मैं उद्यानलताको देखूँगा तो रानीका मुख क्रोधसे रक्तल् हो जायगा ।

४—ऋहण करनेपर भी उल रसके अनुकूल होनेसे अलंकारान्तरकी अपेक्षासे प्रकटकारका उदाहरण जैसे—

[यह श्लोक भी 'रत्नावली' नाटिकाका है । राजा अशोकवृक्षसे कह रहे हैं] हे अशोक ! तुम अपने नचीन पल्लवोंसे रक्त [लाल हो रहे] हो, मैं भी प्रियाके गुणोंसे रक्त [अनुरागयुक्त] हूँ । [इस श्लोकमें प्रत्येक चरणका पुष्टार्थ, उद्देश्यनविभावपरक समझना चाहिये] तुम्हारे पास शिलीमुख [अमर] आते हैं और हे मित्र ! कामदेवके धनुषसे छोड़े गये शिलीमुख [बाण] मेरे ऊपर भी आते हैं । ["पादाघातादशोंको विकसति, वकुलं योषितामस्त्यमदयै:'की कविप्रसिद्धिके अनुसासर] कान्ताका पादप्रहार सुरतघन्वविशेष द्वारा वह मेरे लिये भी आनन्ददायक है । [इस प्रकार] हे अशोक ! [हम तुम] सव प्रकार घरावर हैं केवल [अन्तर यह है कि] विधाताने मुझे सशोक [शोक-युक्त] कर दिया [और तुम अशोक—शोकरहित हो ।]

१. निं० दी० में 'उपमा' पद नहीं है ।

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कारिका ९] द्वितीय उद्योत:

अत्र हि प्रवन्धप्रकृतोऽपि श्लेषो व्यतिरेकविवक्षया तस्यमानो रसविशेषं पुरुषयति । नात्रालङ्कारदूषणमपि जात्;, किन्तर्हि, अलङ्कारान्तरमेव श्लेषव्यतिरेकलक्षणं नरसिंहवदिति चेत् ?

न । तस्य प्रकारान्तरेण व्यवस्थापनात् । यत्र हि श्लेषविषय एव शब्दे प्रकारान्तरेण व्यतिरेकप्रतीतिजायते, स तस्य विषयः । यथा— “न किलोप्तौ नेदः सहरसनिगूहनविधे”

इत्यादौ ।

अत्र हान्य एव शब्द:' श्लेषस्य विपयोड्न्यश्र व्यतिरेकस्य । यदि चैवंविधे

यहाँ [तीन पदोंमें] निरन्तर विद्यमान श्लेष, [अन्तमें] व्यतिरेक [अलङ्कार] की विवक्षासे छोड़ देनेसे रसविशेषकी परिपुष्टि करता है ।

संस्कृति या नरसिंहवत अलङ्कारान्तर

आगे पृष्ठ ११६ तकके इस लम्बे प्रकरणमें प्रकृत 'रक्तस्त्रवम्' इत्यादि श्लोकमें श्लेष और व्यतिरेककी संरुति है अथवा नरसिंहवत यह कहीं तृमगा ही अलङ्कार है । इस विपयका विचार किया गया है । पूर्वपक्ष अलङ्कारान्तरवादियोंका है और सिद्धान्तपक्षमें यहाँ श्लेष और व्यतिरेककी संरृति मानी है । प्रकृत प्रकरणमें प्रकट करते हुए इसके अवसानपर नाना अलङ्कारान्तरममाननेका खण्डन किया है ।

[अलङ्कारान्तयावादी पूर्वपक्षीकी शङ्का यह है कि]—यहाँ दो अलङ्कार [श्लेष और व्यतिरेक] नहीं हैं [क्योकि यहाँ दो अलङ्कारकी अपेक्षासे अन्तिम चरणमें श्लेषका छोड़ दिया है]। तब क्या है? नरसिंहके समान [श्लेष और व्यतिरेको मिलाकर] दूसग ही [अलङ्कार है?

[संस्कृतिवादी सिद्वान्तपक्षमें]—यह कहना ठीक नहीं है । क्योंकि उस [एकाश्रयानुप्रवेशात् न अलङ्कार] की स्थिति प्रकट अलङ्कारके विपयभूत [शब्दशक्त्युप्तोत्पन्न] अलङ्कारकी प्राणिति होती है वही उस [श्लेष और व्यतिरेकके एकार्थयानुप्रवेशात् सदृर] का विपय होना है, जैसे—वह देव तो नाममात्र स हृदि है और यह [राज] श्रेष्ठ अश्वस मूर्छके कारण सदृशि है ।

[संस्कृतिवादी] द्यन्यातिद उदाहरणमें [श्लेष और व्यतिरेक दोनों 'सदृशि' इस एक ही पदमें आथित हैं । इसलिये यहाँ तो श्लेष और व्यतिरेकका एकार्थयानुप्रवेशसदृर वन जाता है]।

संस्कृतिवादी—[परन्तु यहाँ 'रक्तस्त्रवम्' इत्यादि श्लोकमें] यहाँ तो श्लेषके विपय अन्य [रक्त आदि] शब्द हैं और व्यतिरेकके विपय [अशोक तथा मदशोक] अन्य शब्द हैं [अतः यहाँ एकार्थथानुप्रवेशासदृर नहीं हो सकता]। [संस्कृतिवादी सदृशगवदीको

१. 'शब्दश्लेषस्य' नि० ।

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ध्वन्यालोक

आचार्य आनन्दवर्धन

महामहोपाध्याय डॉ० रघुनाथ उपाध्याय

चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन

विषयेडलङ्कारान्तरतत्त्वकल्पना कियते 'तत्संस्तरेऽत्रैवष्यापहार एव स्यात् ।

इलेषयुक्षेनैवात्र व्यतिरेकस्यात्मलाभ इति नायं संसृष्टिरेव विषय इति चेत् ?

न । व्यतिरेकस्य प्रकारान्तरेणापि दर्शनेनात् । यथा—

नो कल्पापयवायोरदयदयदलस्लाघारस्यापि शक्या गाढोद्रेकैरज्ज्वलशरीररहनि न राहिता नो तमःकज्जलेन ।

प्राप्तौत्पत्तौ: पतङ्कज्ञ पुनरुपगता माषमुषितवर्षा वार्त्ति: सैवानुरूपा सुखयतु निखिलद्विपदीपस्य दीप्ति: ॥

ओरसे शङ्का उठाना है कि—यद्यपि इलेष और व्यतिरेकके विषय भिन्न हैं परन्तु वह है तो एक वाक्यके अन्तर्गत । इसलिए इलेष और व्यतिरेकका विषय भिन्न न मानकर उस वाक्यको मना जाय तब तो उन दोनोंका एकवाक्याश्रयरूप एक आश्रयमें अनुत्रप्रेशारूप सङ्कर वन जाता है । आगे संसृष्टिवादी उत्तर देता है कि—यदि ऐसे विषयमें सङ्कररूप अलङ्कारन्तरकी कल्पना की जाय तब फिर संसृष्टिका विषय ही कहीं नहीं रहेगा । [क्योंकि एकवाक्याश्रयकी सीमा तो बहुत विस्तृत है] । संसृष्टिके सभी उदाहरण इस प्रकारके सङ्करकी सीमामें आ जायेंगे । इसलिए यहाँ 'रक्तस्त्वम्' इत्यादिमें सङ्कर मानना उचित नहीं है । संसृष्टि ही माननी चाहिये ।

सङ्करवादी फिर सङ्कर करता है कि—अथवा यहाँ एकाश्रयानुप्रवेशलक्ष्मी न सङ्कीर्णा, फिर भी सङ्कीर्णका दूसरा भेद अङ्गाङ्गिमावसङ्कर हो सकता है । क्योंकि व्यतिरेक तो उपमार्गमं होता है, किन्तु दोकी तुलना करके ही उनमें एकका आधिक्य कहा जा सकता है और यहाँ अशोकवृक्ष और नायिकाका साम्य 'रक्तस्त्वम्' इत्यादि दिखष्ट विरोधके कारण ही प्रतीत होता है । इसलिए इलेष, व्यतिरेकका अनुप्राहक है । अतएव हम कहते हैं—यहाँ अङ्गाङ्गिमावसङ्कर ही है, संसृष्टि नहीं ।

जब एक ही सङ्कीर्णालङ्कार है तब व्यतिरेकके लिए इलेषको छोड़ दिया गया यह 'अवशेष त्याग' का उदाहरण ठीक नहीं ।

[सङ्करवादी पूर्वपक्ष]—इलेष द्वारा ही यहाँ व्यतिरेककी सिद्धि होती है, इसलिए यह संसृष्टिका विषय नहीं है यहाँ शङ्का करो तो [संसृष्टिवादी सिद्धान्तपक्ष] यह कहना ठीक नहीं है । क्योंकि व्यतिरेक [उपमाके ऊपर ही आश्रित नहीं है, उपमा-कथनके बिना भी] प्रकारान्तरसे [उपमा या साम्यकथनके बिना] भी देखा जाता है । जैसे—

अखिल विश्वके प्रकाशक [त्रिपक] सूर्यदेवकी दीसिरूप वह लोकोत्तर वत्सी, जो निष्ठुर वेगसे पर्वतोंको विदलित करनेवाले कल्पान्तवायुसे भी बुझा नहीं सकती, जो दिनमें भी अत्यन्त उज्ज्वल प्रकार देती है, जो तमोरूप कज्जलसे सर्वथा रहित है, जो पतङ्क [कीटविशेष] से बुझती नहीं बलिक [पतङ्क = सूर्यसे] उत्पन्न होती है, वह [लोको—

त्तर वत्सी] आप सबको सुखी करे ।

१. 'ततः सङ्घटे' दी० ।

२. दी० में 'यथा' पाठ नहीं है ।

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कारिका १९ ] द्वितीय उद्योत: ११५

अत्र हि साम्यप्रपञ्चप्रतिपादनं विनैव व्यतिरेकं दर्शित: । नात्र श्लेषमात्रावचारत्वनिष्पत्तिरस्तिति श्लेषस्य व्यतिरेकाद्व्यतिरेकत्वेनैव विवक्षितत्वात् न स्वतःश्लाघारतेऽपि न वाच्यम् । यत एतद्विधे विषये साम्यमात्रादपि सुप्रतिपादि- तादृशत्वं हृदयत एव । यथा— आकदाहः स्तनितैरविचलोचनजलानुश्रान्तधारामुखीभिः । सतृष्णिकेशवधनुषः शोकजलिनिर्मुक्तलक्ष्यावदितिर्मौः ॥ अन्तमें दयितामुखं तथ शशो वृत्तिः समैवावयो- स्तत् किं नामनिशां सखे जलधर त्वं दयितास्ववेद्यत: ॥ इत्यादौ ।

यहाँ साम्यकथनके बिना ही व्यतिरेक दिखाया गया है [अतः व्यतिरेकके लिपे शाब्द उपमा की अपेक्षा न होनेसे 'रक्तस्त्वम्' में इलेपोपमा का व्यतिरेकका अनुग्राहक माननेकी भी आवइयकता नहीं । अपितु इलेप और व्यतिरेक दोनों अलग अलग अलंकारोंकी सृष्टि ही माननी चाहिये] । [सड्ढ़रबादी पूर्वपक्षी फिर आक्षेप करता है कि यद्यपि "नो कल्पापायवायो:" वाले इस इलोकमें व्यतिरेकानुगृहिणी उपमा नहीं दिखायीं देती है, बिना उपमाके भी व्यतिरेक है, परन्तु "रक्तस्त्वम्"वाले उदाहरणमें तो व्यतिरेकके लिये इलेपोपमा ग्रहण करनी गयी है । क्योंकि उसके बिना केवल इलेपोपमासे चारुत्वप्रतीति नहीं होती । इसलिप अकेले श्लेषोपमाको स्वतन्त्र अलंकार—चारुत्वहेतु— नहीं मान सकते । अतः इलेपोपमानुगृहीन व्यतिरेकके ही चारुत्वहेतुत्व सम्भव होनेसे यहाँ अलंकारिभावसङ्कर ही है, संसृष्टि नहीं । इसीलिये कहते हैं —] [सड्ढ़रवादीकी ओरसे आक्षेप]—यहाँ "रक्तस्त्वम्" में केवल इलेपमात्रसे चारुत्वप्रतीति नहीं होती है, इसलिये इलेप यहाँ व्यतिरेकके अङ्ग [अनुग्राहक] रूपसे ही विवक्षित है अतः वह स्वयं अलंकार नहीं है । [यह शंका करो तो संसृष्टिवादी सिद्धान्तपक्ष] यह भी नहीं कहना चाहिये । क्योंकि इस प्रकारकें [व्यतिरेकके] विपयमें [इलेपगर्भ] साम्यमात्र [उपमागर्भ व्यतिरेक] के सम्यक् प्रतिपादनसे भी चारुत्व दिखायीं देता है । जैसे— [मेरे] कलन तम्हारे गर्जनके समान हैं । [मेरे] अश्रु तुम्हारी निरन्तर बहनेवाली जलधाराके समान हैं । उस [पियतमके] के वियोगसे उत्पन्न शोकानल्ने तुम्हारी विद्यु- च्छटाके समान है; मेरे हृदयमें [अपनी] प्रियतमाका मुख है और तुम्हारे हृदयमें चन्द्रमा है इसलिये हमारी तुम्हारी वृत्ति समान ही है [हम दोनों सधर्मी मित्र हैं] हे मित्र जलधर ! फिर तुम रात दिन मुझको जलानेको ही क्यों तैयार रहते हो ? इत्यादिमें ।

१. 'विवक्षितत्वम्' नि०, दी० । २. 'अलङ्कारत्वे' नि०, दी० । ३. अगला 'रसनिरूपणैक्शतानहृदययशः' यह पाठ नि० में इत्यादौके साथ रखा है ।

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ध्वन्यालोक:

'रसनिदे हणैकतानहृदयो यद्वा नात्यन्तं निर्वोंडुमिच्छति । यथा—

यहाँ इलोकेके चतुर्थ पदमें बन्युजेनपीडाकारिल्वरूपसे जलधरका अपनी अपेक्षा व्यतिरेक

कोपात् कोमलजोलोलवाहुलतिका पाशेन वदद्धा हृदे

दिस्लाया है और पूर्वके तीनों चरणोंमें अपना और जलधरका साम्य दिसलाया है । परन्तु उनमें श्लेष

नीत्वा वासनिकेतनं दयितया सायं सखीभिः पुरः ।

नहीं है । इसलिए यहाँ श्लेपके बिना उपमा और व्यतिरेक, 'नो कल्पाप्रिय' में बिना उपमाके व्यतिरेक

भूयो नैवमिति स्वलत्कलगिरा संश्र्च दुश्श्रोत्रितं

पाया जाता है, अतः 'नत्स्वरूपमे' श्लेप और व्यतिरेकको अलग-अलग अलङ्कार मानकर उनकी

घन्यो हन्यत एव निहुतिपरः प्रेयान् रुदत्या हसन् ।।

"मिथोऽन्वेष्यतयैवां स्थिति: संस्कृत्यच्यते" संस्कृति माननेमें कोई आपत्ति नहीं हो सकती । अतः यहाँ

अत्र हि रूपकमाक्षिमननिवृयौधं परं रसपुष्टये ।

संस्कृति हो है । इसलिए व्यतिरेककी अपेक्षासे तीन चरणोंमें निरन्तर चलनेवाले श्लेपका परित्याग चतुर्थ

निर्वोंडुमिष्टमपि यं यत्नाद्‌झटितेन प्रत्यवेक्षते । यथा—

चरणमें कर देनेसे 'अवसर त्याग' रूप चतुर्थ समीक्षाप्रकारका जो यहाँ उदाहरण दिया गया है वह ठीक

इत्यामास्वादं चकितहरिणीप्रेक्षणे रथिपातं,

ही है । यह सिद्धान्तपक्ष स्थित हुआ । आगे पद्चम प्रकार कहते हैं—

वाणच्छायां शशिनि शशिनां वह्निभारेऽपि केशान् ।

५—रसनिद्रघमें अत्यन्त तत्पर [कवि] जिस [अलङ्कार] का अत्यन्त निर्वाह

करना नहीं चाहता है । [उसका उदाहरण] जैसे—

क्रोधावेशमें अपने कोमल तथा वक्ष्थल वाहुलताके पार्श्वमें जकड़कर अपने केशि-

भवनमें ले जाकर सायङ्कालको सखियोंके सामने [पराङ्मुखप्रेमजन्य नखक्षत आदि

चिह्नोंसे] उसके दुश्श्र्रितिको भले प्रकार सूचित कर, फिर कभी पैसा न हो [क्रोधके

कारण] लड़खड़ाती हुई वाणीसे पैसा कहकर, रोती हुई प्रियतमाके द्वारा, हँसते हुप

[अपने नखक्षतादिको] छिपानेवाला सौभाग्यशाली प्रिय पीटा ही जाता है । [सखियोंके

मना करनेपर भी नायिका उसको मारती है ।]

यहाँ [बाहुलतिका पाशेनसे] रूपक [आक्श्षित] प्रारम्म किया गया था परन्तु केवल

[परं, अथवा अत्यन्त] रसपुष्टिके लिये उसका निर्वाह नहीं किया गया ।

यह पञ्चम समीक्षाप्रकार हुआ । आगे छठे समीक्षाप्रकारका उदाहरण देते हैं ।

६—[अनन्ततक] निर्वाह हष्टि होनेपर भी जिसको सावधानीसे अङ्गरूपमें ही देखता

[निबद्ध करनेका ध्यान रखता] है । जैसे —

हे भीरु ! मुझे तुम्हारे अङ्ग [कर साहदर्य] प्रियडङ्गुलिताओंमें, तुम्हारा दष्टिपात

चकित हरिणियोंकी चञ्चल चितवनमें, तुम्हारे कोपोलकी कान्त चन्द्रमामें, तुम्हारे केश-

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कारिका १९ ] द्वितीय उद्योत: १९०

उत्प्रत्यामि प्रतनुपु नदीवीचियु श्रृङ्गविलासारं हन्तैकस्थं कवचिदपि न ते भीरु साधयत्यमस्ति ॥ इत्यादौ ।

स एवमुपनिवन्ध्यमानोऽलङ्कारो रसाभिव्यक्तिहेतुः कवेर्मर्षणायते । उक्तप्रकारातिक्रमे तु नियमेनैव रसभङ्गहेतुः सम्पद्यते । लक्यं च तथाविधं महाकविग्रन्थेष्वपि' दरियते

बहुशः । तत्र सुक्तिसहचयोचिततात्पन्नां महात्मनां दोषोद्रोपणमात्रंन एव दूषणं भवतीति न विमर्श्य दोषितम् ।

किन्तु रूपकादेरलङ्कारवर्गस्य येयं व्यङ्ग्यकल्पे रसादिविपये 'लक्षणदिग्दर्शिता, तामनुसरन् स्वयं चान्यहृणमुत्प्रेक्षमाणो 'यथालक्ष्यक्रमप्रतिममनन्तरोक्तमेवं घनेरारात्सानुपनिवन्धनाति सुकवि: समाहितचेतास्तदा तस्यात्मलाभो' भवति महीयानिति॥ १९॥

पाश -- मग्नोऽपिच्छमें आँम तुम्हारे अङ्गअङ्ग नदीकी पतली-पतली तरङ्गोंमें दिखलायी पड़ते हैं [इसलिए मैं इधर-उधर मारा-मारा फिरता हूँ ।] परन्तु खेद है कि तुम्हारा साधरस्य कहीं एकट्ठा नहीं दिखलायी देता [नहीं तो मैं उसी एक से सन्तोप कर लेता । तुम भीङ ही जो टहरों कदाचित् टसीलिए तुमने अपनी सारी विभूतिको एक जगह नहीं रखा ] इत्यादिमें ।

[यहाँ तद्राव्यारोप्यारोपक उत्प्रेक्षाको अनुप्राणित करनेवाले साधरस्यको प्राप्तमसे उठाकर अन्ततक उसका निर्वाह किया है । परन्तु यह आभासरूप ही रहै इस वातिका पूरी ध्यान रखा गया है । इसलिए वह विप्रलम्भशृङ्गार का पावक ही है ।]

वह [रूपकादि अलङ्कारवर्ग] इस प्रकार [उपयुक्त यत्नविध समीक्षाप्रकारको ध्यानमें रखकर] उपनिबद्ध अलङ्कार, कविके [अभिप्रे] रसको अभिव्यक्त करनेका हेतु होता है । उक्त पदतिका उल्लङ्घन करनेसे तो अवदय ही रसमङ्काका हेतु वन जाता है । इस प्रकारके [समीक्षा नियममूलक रसभङ्गप्रदर्शी' ] यहुत-से उदाहरण महाकवियोंके ग्रन्थों [काव्यों] में भी पाये जाते हैं । [परन्तु] सहृदय सुक्कियों-

की रचना द्वारा लक्षिति उन महाकवियोंके दोपोंका उद्धार करना अपने ही लिये दोपजनक होता है, इसलिए उस [महाकवियोंके दोपयुक्त उदाहरणभाग]को अतद्र नहीं दिखलाया है ।

किन्तु [अत्र हि निदर्शन यह है कि] रूपकादि थलङ्कारवर्गका रसादिविपयक व्यञ्जकत्वसहचरा जो यह मार्ग प्रदर्शित किया है उसका अनुसरण करते हुए, और स्वयं भी लक्षणोंका अनुसन्धान करते हुए यदि कोई सुकवि पूर्वकथित असंलक्ष्यक्रम-

व्यङ्गचकत्वसहचरा ध्वनिके आत्मभूत [रसादि]को सावधानतासे निबद्ध करता है तो उसे [वड़ा आमूलात् आमूलात्—कविप्रकका महालाभ] महाकविप्रदकी प्राप्ति होती है ॥१९॥

१. नि०, दी० में 'अपि' शब्दको 'तथाविधमपि' यहाँ जोड़ा । २. 'लक्षणा' नि०, दी० । ३. 'यथालक्ष्यक्रमप्रतिममनन्तरोक्तमेव' नि०, दी० । ४. 'तस्यात्मलाभो' नि० ।

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ध्वन्यालोक

आचार्य आनन्दवर्धन

डॉ. महावीर सरन जैन

मोटी लाल बनारसी दास

कारिका ३१

यस्याहुः शशिमच्छिरो हर इति स्तुत्यं च नामामराः पात्यन्ते स स्वयमन्थकक्ष्यकरस्त्वां सर्वदोर्माधवः ॥ नन्वलङ्कारान्तरप्रतिभायामपि इलेषैक्यपदेशो भवतीति दृश्यितं भट्टोद्भटेन । तत् पुनरपि शब्दशक्तिमूलो ध्वनिरिन्निर्वचकाशः

इत्याशङ्क्येदमुक्तम् ''आक्षितम्'' इति । तद्यमर्थः, 'रत्न' शब्दशक्त्या साक्षादलङ्कारान्तरं वाच्यं सत्त्वं भजतामिति सङ्वेः इलेषविषयं वाच्यं न्वयातिरिक्तं व्यङ्ग्यथ्यमेवालङ्कारान्तरं प्रकाशते स ध्वनेविषयं । शब्दशक्त्या साक्षादलङ्कारान्तरप्रतिभा यथा—

तस्या विनापि हारेण निसर्गादेव हारिणौ । जनयामासतुः कस्य विस्मयं न पयोदरौ ॥

नाम लेते हैं। अनेक अर्थात् यदवों का द्वारिकामें क्षय निवासस्थान वनानेवाले अथवा मूसल पर्वमें यादकों नाश करानेवाले और सब मनोकामनाओंको पूर्ण करनेवाले 'माधव' विष्णु तुम्हारी रक्षा करें।

[शिवपक्षमें] 'ध्वस्तः अनोभवः कामो येन सः ध्वस्तमनोभवः' कामदेवका नाश करनेवाले, जिन शङ्करने 'पुरा' त्रिपुरदाहके समय 'ध्वलितकायः' विष्णुके शरीरको अभस्माकृतः वाण बनाया, जो महामयान्तक मुजदण्ड सर्पाका द्वार स्वेलथक रूपमें धारण करते हैं, जो मृगांकको धारण किये हुए हैं, जिनका [मस्तक] शिर शशि चन्द्रमासे युक्त है और देवता लोग जिनका प्रद्युम्नसनीय 'हर' नाम कहते है, अनङ्कासुरका विनाश करनेवाले ये 'उमाधव' पार्वतीके पति [गौरीपति] रक्षा सदैव तुम्हारी रक्षा करें।

[यहाँ दोनों अर्थ वस्तुरूप हैं और अभिधाशक्तिसे प्रकाशित हो रहे हैं। इसलिए यहाँ इलेषालङ्कार है। यह शब्दशक्तिमूल-ध्वनि नही है।]

[पूर्वपक्षीकी दलील] भट्टोद्भटने [न केवल वस्तुध्वयको प्रतीतिमें आपितु] अलङ्कारान्तरकी प्रतीति होनेपर भी इलेषैक्यपदवहार दिखलाया है। इसलिये शब्दशक्तिमूलध्वनिका न्तरकी प्रतीति होनेपर भी इलेषैक्यपदवहार दिखलाया है। इसलिये शब्दशक्तिमूलध्वनिका अवसर फिर भी नहीं रहता है।

[उत्तर] इसी आक्षाद्धके कारण [कारिकाकारने] 'आक्षितम्' यह [पद] कहा है। इसका यह अर्थ हुआ कि जहाँ शब्दशक्तिसे साक्षात् वाच्यरुपमें अलङ्कारान्तरकी प्रतीति होती है वहाँ सव इलेषकका विषय है और जहाँ शब्दशक्तिके बलसे आकृष्ट वाच्यार्थसे भिन्न, व्यङ्ग्य-रूपसे ही दूसरे अलङ्कारकी प्रतीति होती है वह ध्वनिका विषय है।

शब्दशक्तिसे साक्षात् [वाच्यरूपसे भी] दूसरे अलङ्कारकी प्रतीति [का उदाहरण] है। जैसे—

हारकै विना भी स्वभावतः ही [मनो] द्वारा उसके स्तन किस [के मन] में विस्मय उत्पन्न नहीं करते ।

१. 'अत्र' दी० । २. 'अलङ्कार' नि० ।

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कारिका २१ ] द्वितीय उद्योतः १२१

अत्र शृङ्गाररस्यविचारी विषयाङ्यो भावः साक्षाद् विरोधालङ्कारस्व प्रतिभासते, इति विरोधच्छायातुम्राहिणः श्लेषस्यायं विषयः । न त्वङ्गुस्वानोपमयङ्गयस्यस्य ध्वने: । अलङ्कयक्रमभयङ्गयस्य' तु ध्वनेरङ्ग्येन इहलेषेण विरोधेन वा व्यङ्ग्यतस्य विषय एव ।

यथा समैव—

श्राघ्याशेषतनुं सुदर्शनकरः सर्वाङ्गलीलाजित-३ त्रैलोक्यं चरणारविन्दललितेनाक्रान्तलोको हरिः ।

विभ्राणां मुखमिन्दुरुपमखिलं चन्द्रातमचचन्द्रदेङ्लत सथाने यां स्वतनोरपरयदधिकार्ं सा रुक्मिणी बोडवतात् ।।

अत्र वाच्यतयैव ध्यतिरेकच्छायातुम्राही श्लेष: प्रतीयते ।

यथा च—

अभिमरतिमलसहदयतां प्रलयं मूर्छां तमः शरीरसादम् । मरणं च जलदसुजगजं प्रस्यह कुरते विषं वियोगिनीनाम् ।।

यहाँ शृङ्गार [रस] का व्यभिचारिभाव विस्सय [विस्मय शब्दसे] और [अपि शब्दसे] विरोधालङ्कार [दोनों] साक्षाद [वाच्यरूपमें] प्रतीत होते हैं । इसलिए यह विरोधक्री छाया से अनुगृहीत श्लेष्येक का विस्सय है, अनुसन्धानसापेक्ष [संलक्ष्य क्रमव्यङ्गच] ध्वनिका नहीं । परन्तु [श्लोकमें इलेप तथा विरोधका अज्ञातभावसङ्कर होनेसे] वाच्य श्लेष अथवा विरोध [अलङ्कार] से अभिव्यक्त असंलक्ष्यक्रमव्यङ्गच ध्वनिका [तो यह श्लोक] विस्सय है ही ।

[अलङ्कारान्तर्गत वाध्यतया प्रतीत होनेका दूसरा उदाहरण] जैसे मेरा ही— [अलङ्कारान्तर्गत]

[सुदर्शनान्तर्गत] जिनका कंवल हाथ ही सुन्दर है [अथवा सुदर्शनचक्रयुक्त दोने से सुदर्शनकर विष्णु], जिन्होंने कंवल चरणारविन्दके सौन्दर्यैषे [अथवा पादविशेषेप्ते] नत्नको धारण करते हैं [अर्थात जिनका कंवल एक नेत्र ही चन्द्ररूप है] पेंस चिप्णुने अक्खिल दृश्यापिसोन्दर्य- शाछिनों, सर्वाङ्गसौन्दर्यसे त्रैलोक्यविजय करनेवाटी और चन्द्रसदृश सम्पूर्ण मुखको धारण करनेवाली जिन [रुक्मिणी देव्री] को उल्कृष्ट रूपसे ही अपने शरीरसे ही उत्कृष्ट देखा वे लक्ष्मीण देबी तुम सबकी रक्षा करें ।

यहाँ व्यतिरेककी छायाको परिपुष्ट करनेवाला श्लेष ['स्वतनोरपरयदधिकार्ं' इस पदसे] ही वाच्यरूपसे प्रतीत होता है ।

[इसी प्रकारका तीसरा उदाहरण और जैसे— मेघरूप सर्पे उतपन्न विष वियोगिनीनों चक्कर, वैचनी, अलसहदयत्व, ज्ञान और चेष्टाका अभाव ['प्रलय: सुभदुर्नाम्यों चेष्टाज्ञाननिराकृतेः'], मूर्छा, तम, शरीर- साद और मरण वलात् उतपन्न कर देता है ।

१. 'व्यङ्गचप्रतिभासस्य' नि० दी० । २. 'जीत' नि० ।

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ध्वन्यालोकः

यथा वा—

चमइअमाणसकक्खणपडुअणिम्महिअपरिमला जस्स । अरइंडिअणपसारा बाहुप्परिठिअ ठिअ गइंदा ॥ [चविण्डितमाणसकाउण्वनपक्खजणनिम्मिधितपरिमला यस्स । अवरइंडितदानप्रसरा बाहुपरिठा इव गजेन्द्रा: ॥इति च्छाया]

अत्र रूपकचछोभायोनुगमाहुः इलेषा वाच्यतया विवक्षित ।

यहाँ विष शब्दके जल तथा जहर दोनों वाच्यार्थ होते हैं । वैसे प्रकरणादि द्वारा नियन्नित हो जाननेपर तो अभिधाशक्ति एक ही अर्थका बोधन करती, परन्तु यहाँ सुगम शब्द भी दिया हुआ है इसलिए अभिधाशक्ति, केवल जलरूप अर्थको बोधन करके विश्रान्त न होकर दोनों ही अर्थोंको बोधन करती है । इसलिए नवीन मतानुसार यहाँ शब्दश्लेष और प्राचीन मतानुसार अभङ्गश्लेष—अर्थश्लेष—है । नवीन मतानुसार 'ब्रिमिरतिमें' आदि पदोंमें 'स्तोकेनोन्नतिमायाति' आदि के समान अर्थश्लेष है । और 'जलदसुगम' में रूपक है । इस प्रकार रूपक और रूपकच्छायानुगामी श्लेष दोनों वाच्यतथा प्रतीत होते हैं । यह भी श्लेषका ही स्वरूप है, शब्दशक्तिमूलध्यानिका नहीं ।

अथवा जैसे निरीह शब्दोंके मनरूप स्वर्णकमलोंके निर्माणके कारण यथा:सौरभको फैलानेवाले और नितरान दानमें लगे हुए, जिसके बाहुपद ही मानसरोवरके स्वर्ण-कमलोंको तोड़नेसे सुगन्धयुक्त और अनवरत मद प्रवाहित करनेवाले हाथीके समान है ।

यद्याँ [इन दोनों उदाहरणोंमें] रूपकचछायानुग्राही श्लेष वाच्यरूपसे ही प्रतीत होता है ।

यहाँ गजेन्द्र शब्दके कारण 'निर्मीथित', 'परिमल' और 'दान' शब्द क्रमशः तोड़ना, सौरभ और मदरसरूप अर्थका प्रतिपादन करके भी फैलाने, प्रतापसौरभ अथवा यश:परिमल और दान [स्वस्त्वनिर्झरितपूर्वकं वस्त्वोत्पादनं दानम्] अर्थको भी बोधित करते हैं । इस प्रकार यहाँ रूपकच्छायानुग्राही श्लेष वाच्यतया ही प्रतीत हाँता है । अतः ये सब श्लेषके विषय हैं, शब्दशक्तिमूल-ध्यानिके नहीं ।

इसी एक्कीसवीं कारिका “आक्षित एवालङ्कारः शब्दशक्त्यच्यवसायते । यस्यत्रनुरूप: शब्देन शब्दशक्त्युद्भवद्वहि: ।” में शब्दशक्तिमूलध्यानिकाका विषय निष्पारित किया है । यहाँ अलङ्कार वाच्य न हो अपितु आक्षित शब्दसामर्थ्यसे व्यङ्ग्य हो वहाँ शब्दशक्तिमूलकनिका विषयं है, यह उसका तात्पर्य है । और जहाँ वाच्य या अलङ्कारान्तर वाच्य हो वहाँ श्लेष का विषय होता है । इस प्रकार यहाँतक कारिकागत 'आक्षित' शब्दके व्यचछेद्यका प्रदर्शन किया । जहाँ अलङ्कारान्तर आक्षित हो—व्यङ्ग्य हो—वहाँ शब्दशक्तिमूल [अलङ्कार] ध्वनि होगा । जहाँ वाच्य होगा, वहाँ नहीं । इसी प्रकारके उदाहरण 'येन वस्तुनो' से लेकर 'स्वाण्डितमानो' तक पाँच श्लोकोंमें दिये हैं । इनमेंसे पहिले 'येन स्वस्तमनो' में वस्तुद्रय वाच्य हैं और शेष उदाहरणोंमें अलङ्कारान्तर वाच्य प्रतीत होते हैं इसलिए ये सब शब्दशक्तिमूलध्यानिकाके उदाहरण न होकर श्लेषके उदाहरण हैं । आगे कारिकागत

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कारिका २१ ]

द्वितीय उद्योत:

१२३

स चाक्षिप्टोडलक्षणो यत्र पुनः शब्दान्तरेणाभिहितस्वरूपस्तन 'शब्दशक्त्युद्भवा-तुरणतरूपण्यद्ध-यध्वनित्यवहारः । तत्र वक्रोक्त्यादिवाच्यालङ्कार्यवहार एव ।

मम्मट भापाओंमें वाच्य-से शब्द अनेकार्थक होते हैं परन्तु वे श्राधिकांश स्थलोंपर प्रकरणादिविशेष

In the language of Mammaṭa, words are polysemous in their literal sense, but they are mostly used in a specific context.

एक ही अर्थको बोधन करते हैं, अनेक अर्थोंको नहीं । इसका कारण उनका प्रकरण आदि द्वारा एक अर्थमें नियन्त्रण हो जाना ही है । हमारे यहाँ अनेकार्थक शब्दके एक अर्थमें नियन्त्रणके विरोध हेतु

They convey only one meaning, not multiple meanings. The reason for this is that they are controlled by the context, etc., to convey only one meaning. Here, to counter the control of a polysemous word to one meaning,

माने गये हैं । उन हेतुओंका संग्रह करनेवाली निम्नांकित कारिकाएँ वस्तुतः भर्तृहरिके 'वाक्यपदीय'

have been considered. The following kārikās, which collect those reasons, are actually from Bhartrhari's 'Vākyapadīya'

नामक व्याकरणग्रन्थ कीं हैं परन्तु आलङ्कारिकोंने यथायथकरके 'ध्वनि' शब्दके समान इन कारिकाओं-

named Vyākaraṇa text. However, the Alankārikas have used these kārikās, similar to the word 'Dhvani',

को भी अपना लिया है । इसीलिए साहित्यके सभी मुख्य ग्रन्थोंमें इनका उल्लेख मिलता है । कारिकाएँ

as their own. Therefore, their mention is found in all the major texts of literature.

निम्नलिखित प्रकार हैं—

The kārikās are of the following type—

"सयोगो विप्रयोगसच साहचर्य वििरोधिता ।

"Samyogo viprayogaśca sahaacaryaṃ virodhitā.

अर्थः प्रकरणं लिङ्गं शब्दस्यान्यस्य सन्निधिः ।

Arthaḥ prakaraṇaṃ liṅgaṃ śabdasya anyasya sannidhiḥ.

सामर्थ्यमौचिती देशः कालो व्यक्ति: स्वरादयः ।

Sāmarthyamaucitī deśaḥ kālo vyaktiḥ svarādayaḥ.

शब्दार्थस्य निश्चयचच्छेदे विशेषस्मृतिहेतवः ॥"

Śabdārthasya niścaye cchēde viśeṣasmṛtihetavaḥ."

शब्दार्थका निश्चित्य न होनेकी दशामें अर्थात् अनेकार्थकशब्दप्रयोगकी अवस्थामें उसका

When the meaning of a word is not certain, i.e., in the case of a polysemous word, its

विरोधतया एक अर्थविशेषमें नियमन करनेके हेतु संयोग, विप्रयोग, साहचर्य, विरोध, अर्थ, प्रकरण,

control is achieved through factors like conjunction, disjunction, association, opposition, meaning, context,

लिङ्ग, शब्दान्तरके सन्निधान, सामर्थ्य, औचित्य, देश, काल, व्यक्ति और स्वर आदि होते हैं ।

linguistic feature, proximity of another word, capability, propriety, place, time, person, and accent, etc.

जहाँ अनेकार्थक शब्दका प्रयोग तो हो परन्तु उसके एक अर्थमें नियन्त्रण करनेवाले इन

Where a polysemous word is used, but its meaning is controlled by these factors,

कारणोंमेंसे प्रकरणादिरूपं कोई कारण उपस्थित न हो वहाँ शब्दके दोनों अर्थ वाच्य होते हैं । जैसे

if none of these factors, such as context, etc., are present, both meanings of the word are literal.

'येन ध्वस्तमनोबवेन०' इस लोकमें एकार्थनियामक हेतु न होनेसे दोनों अर्थ वाच्यतया प्रतीत होते हैं ।

For example, in the verse 'Yena dhvasta-manobhavena', since there is no factor controlling the meaning to one, both meanings are understood literally.

इसलिए स्पष्ट ही ऐलेपकका विषय माना जाता है, शब्दशक्तिमूलध्वनिका नहीं, क्योंकि वहाँ कोई अर्थ

Therefore, it is clearly considered a subject of Ālepa, not Śabdaśaktimūladhvani, because there is no meaning

आक्षित नहीं है, दोनों अर्थ वाच्य हैं ।

that is not literal; both meanings are literal.

इमके अतिरिक्त जहाँ द्वितीय अर्थको अभिधासे बोधन करानेमें कोर्ं साधक प्रमाण उपस्थित

In addition to this, where there is a supporting evidence for conveying the second meaning through Abhihitā

है वहाँ द्वितीयार्थंक्री प्रतीति अभिधासे ही होती है । इस प्रकारके चार उदाहरण 'तस्या विनापि

there, the understanding of the second meaning occurs through Abhihitā only. Examples of this type are 'Tasyā vināpi'

हारण०', 'श्लाघ्याङ्ग०', 'भ्रमिमरति०' और 'स्खलित०' ऊपर दिये गये हैं । इनमें अपि

Hāraṇa', 'Ślāghyāṅga', 'Bhramimrati', and 'Skhalita' have been given above. In these, the word 'Api'

द्वाव्यके प्रयोगवशसे 'हारिणः' आदि शब्द 'हारयुतः' और 'मनोहरः' दोनों अर्थोंको अभिधया

due to the usage of the dual number, words like 'Hāriṇaḥ' convey both meanings 'Hārayutaḥ' and 'Manoharaḥ' through Abhihā

बोधन करते हैं । इसलिए इन सब उदाहरणोंमें ऐलेपकलङ्कार है, शब्दशक्तिमूलध्वननि नहीं । इसके

Therefore, in all these examples, there is Ālepaka ornamentation, not Śabdaśaktimūladhvani.

अतिरिक्त जहाँ अभिधाके नियामक हेतु होनेपर भी प्रवल बाधक हेतुके कारण वह अकिञ्चित्कर हो

In addition, even if there is a controlling factor for Abhihā, if there is a strong counteracting factor, it becomes ineffective.

जाता है वहाँ भी वाव्यशक्तिमूलध्वनि नहीं होता । यही बात आगे सोदाहरण है—

There, too, there is no Śabdaśaktimūladhvani. This is explained with examples below—

['स चाक्षिप्टो' में च शब्द अपिके अर्थमें मिश्रक्रम है अतः 'आक्षितः' के बाद अपि

['Sa cākṣipṭo' where the word 'ca' is used in the sense of 'api', indicating a mixture. Thus, after 'ākṣiptaḥ', 'api'

अर्थोंमें प्रयुक्त होनेसे आक्षितोऽपि] आक्षित ह्रैनपर भी अर्थात् आक्षिततया प्रतीत होने-

is used in the sense of 'even if indicated'. Even if it is indicated, i.e., even if it is understood as indicated,

पर भी, [प्रवलतर- वाधक हेतुके कारण एकार्थनियामक हेतुके अकिञ्चित्कर हो जानेसे]

due to the presence of a stronger counteracting factor, the controlling factor becomes ineffective,

जहाँ वह अलङ्कार दूषतर राघद्रसे अभिहितरूप हों जाता है वहाँ राघदशक्त्युद्भव संलक्ष्य-

where it becomes a figure of speech due to the presence of a more powerful counteracting factor, there, the Śabdaśaktimūladhvani is not understood,

कमध्वनिका व्यवहार नहीं होता, वहाँ वक्रोक्ति आदि वाच्यालङ्कारका ही व्यवहार होता है ।

and instead, the ornamentation of Vakraokti, etc., is used.

१. 'न' नहीं है न०, नञ् ।

  1. 'Na' is not 'na', it is a negative particle (Nañ).

२. (नैव, किन्तु) तिङ्०में क्त्विक है ।

  1. (Nai, but) in 'tiṅ', it is a 'ktvik' (a suffix forming an absolutive).

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ध्वन्यालोक:

अवधूतীয়क: स्ववै एतत् भवतु कार्म वाच्यश्लेषस्य विषय:

हस्त्रया केशव गोपरागहतया किञ्चिच्चत् हस्त्रं मया तेनै स्वालितास्मि नाथ पतितां कित्राम नालम्बसे। एकस्त्वं विषमेपु क्षित्रमनसां सर्वोबलानां गति-गोंत्वैव गदित: सलेपामवताद् गोष्टे हरिवंशिरम्॥

जैसे— हे केशव [कृष्ण] गौओंकी [उड़ायी] धूलिसे दप्रिहरण हो जानेसे मैं [रास्तेकी विपमता आदि] कुछ नहीं देख सकी, इसीसें [टीककर खाकर] गिर पड़ी हूँ। हे नाथ, गिरती हूँद [मुङ्ख] को [उठानेके लिप आप अपने हाथ्योंे] पकड़ते क्यों नहीं हैं ? [हाथका सद्दारा देकर उठानेमें क्यों सद्दोच करते हैं ?] विपम [उबड़-खाबड़ रास्ते] स्थलोंमें घबड़ा जाननेवाले [न चल सकनेवाले बाल-बृद्ध-वनतादि] निर्बलजनेंके [अत्यन्त शक्तिहीनोंके] केवल आप ही एकमात्र सद्दारा हो सकते हैं। गौष्ट [गोशाला]में द्वार्यंक शब्दोंमें गोपी द्वारा [अथवा सलेहों ससूचनम्। अल्पीभवनम् हि सूचनमेव] इस प्रकार कहे गये कृष्ण तुम्हारी रक्षा करें।

['सलेह' पदकही सामर्थ्यसे दूसरा अर्थ इस प्रकार प्रतीत होता है। इस पक्षमें 'केशवगोपरागहतया' की व्यास्या दो प्रकारसे हो सकती है। पक् तरीक़े तो केशव और गोप दोनों सम्बोधनपद हैं। गोपका अर्थ रक्षक, स्वामी है।] हे स्वामिन् केशव [राग अर्थात्] आपके अनुरागसे अन्धी होकर मैंने कुछ नहीं देखा-माला। अथवा [यदि 'केशाव' और 'गोप' दो अलग-अलग सम्बन्धनपद न मानकर दोनोंको एक् ही पदमें सम्मिलित किया जाय तो उसका अर्थ यह होगा कि-केशावग: उपराग: केशवगोपरागहतया मुग्धया] हे कांदव स्वामिन् ! आपके अनुरागसे अन्धी होकर मैंने कुछ देखा-माला नहीं। सोच्चा-विचारा नही [इसलिये] अपने पातित्रतधर्ममें भ्रष्ट [पतित] हो गयी हूँ। हे नाथ [अब आप मेरे प्रति] पतिभाव क्यों प्रषट नहीं करते [मेरे साथ पतिपत्नी-व्यवहार, सम्भोगादि क्यों नहीं करते।] क्योंकि काम [वासना] से सन्तस्त मनवाली [विषमेपु पत्नवान: काम:] समस्त अवलाओं [गोपियों] की एकमात्र आप ही गति [हैर्योगिदित द्रुतिसाघन] हो। इस प्रकार गोशाला में गोपी द्वारा लेशापूर्वंक कहे गये वच न तुम्हारी रक्षा करें।

इस प्रकारके सब उदाहरण मले ही वाच्यश्लेषके विषय हों। यहाँ यदि 'सलेहों' पदका प्रयोग न होता तो 'केशावगोपरागहत्या', 'पतित' आदि शब्दोंके अनेकार्थ सम्भवे होनेपर मी प्रकरणादिवश एकार्थमें नियमन्र हो जानेसे वे एक् ही अर्थको योषण करते। परन्तु 'सलेहों' पदकी उपस्थितिने प्रकरणादिकी एकार्थनियामक सामर्थ्यको कुण्ठित कर दिया है जिससे अभिधा प्रतिबिम्बित-सी होकर दोनों अर्थोंको वाच्यतया बोधित करती है। इसलिए यह द्वाब्दश्लेष:मूलध्वनिका नहीं अपितु श्लेषका ही विषय है।

इस प्रकार पुथ ११९ के 'येन क्वस्तु' से लेकर पुथ १२४ के 'हस्त्रया केशाव', यहाँतक श्लेषका विषय दिखलाया। अब आगे उशसे भिन्न शाब्दयक्तिमूलध्वनिका विषय मी है यह आगे दिखलाते हैं—

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कारिका २१ ] द्वितीय उद्योत: ३२५

यत्र तु सामर्थ्योक्षित्पं सदलङ्कारान्तरं शब्दशक्त्या प्रकाशते स सर्वे एव ध्वनेर्विषय: । यथा—

"अत्रान्तरे ह्यसुमसमयुगमुपसंहररजस्सम्भत श्रीष्मानभिधान: फुल्लमल्लिकाध्वन्यादृहासो महाकाल: ।" यथा च—

उक्त: प्रोळसद्दार: कालागुरुमलीमस: । पयोघरभरस्तन्या: कं न चक्रेडभिलापिणम् ॥

जहाँ शब्दशक्तिसे सामर्थ्योक्षित होकर अलङ्कारान्तर प्रतीत होता है वह सब ध्वनिका ही विषय है । जैसे—

इसी समय पुप्पसमृद्धियुरा [अर्थात् वसन्तके चैत्र-वैशाख युगल मास] का उपसंहार करता हुआ, खिली हुई मल्लिकाओं [जुही] के, अट्टालिकाओंको धवलित करनेवाले हास [विकास] से परिपूर्ण, [दूसरा अर्थ] प्रलयकालमें हत युग आदिका संहार करते हुए और खिली हुई जुहीके समान घवल अट्टहास करते हुए महाकाल और शिवके समान, श्रीष्म नामक महाकाल प्रकट हुआ ।

और जैसे—

काले अगरके समान कृष्णवर्ण, विद्युदधारा अथवा जलधारासे सञ्चालित, [उस वर्षा ऋतुके उदित होते हुए] मेघसमूहने [दूसरा अर्थ] काले अगर [के लेप] से कृष्णवर्ण, द्वारोसे अलङ्कृत [उस कामिनीके] उन्नत उरोजोके समान किस [पथिक या किस युवक] को [उस कामिनी अथवा अपनी दयिताके मिलनेके लिप] उत्कण्ठित नहीं कर दिया ।

इस इलोकका उपलक्षण पाठ 'पयोघरभरस्तन्या: कं न चक्रेडभिलापिणम्' है । उसके अनुसार एक पक्षमें तो तन्वीके स्तनयुगने किसको [उनकी प्रासङ्गिके लिये] उत्कण्ठित नहीं कर दिया ।

यह ग्रीष्म अर्थ लग जाता है । पर्योधर और तन्वीका सम्बन्ध विशिष्ट है । परन्तु दूसरे वर्णनवाले अर्थमें किस पथिकको तन्वीका अभिलाषी नहीं बनाया इस प्रकारका अर्थ करनेवाले वही रुचिरांत होगी । लोचनक्री बालप्रिया टीकाकारने 'तन्या:' की जगह 'तस्या:' पाठ माना है । उस सदृशनाम 'तस्या:' का सम्बन्ध दोनों पक्षोंमें पर्योधरके साथ ही रहता है । उस प्राकृत वपुर्द मेघ और

उस कामिनीकेउरोज यह अर्थे दोनों पक्षोंमें लग जाता है । ऊपर दिये हुए इन दोनों गद्य और पचात्त्मक उदाहृरणोंमें : "यार्थकी प्रतीति शब्द-शक्तिसे वाच्य न होकर सामर्थ्योक्षित्स्वरूपमें व्यञ्जना द्वारा होती है, इसलिये ये दोनों उदाहरण क्लेश-लड्ढारके नहीं अपितु शब्दशक्तिमूलकनिबन्ध विषय हैं ।

इस स्थलपर 'शब्द्दशक्त्या' और 'सामर्थ्योक्षित्सम' दोनों शब्दोंका प्रयोग हुआ है । शक्त्ति और सामर्थ्य शब्द सभिधानार्थक होनेसे उन दोनों शब्दोंके प्रयोगका प्रयोजन या भेद प्राय: समझमें नहीं आता । इसलिये उसको यों समझना चाहिये कि 'सामर्थ्य' शब्दका अर्थ यहाँ 'साहस्यादि' होता है ।

अथवा दूसरे अर्थकी प्रतीति शब्दशक्त्तिसे साधसस्य आदि के द्वारा होती है । इस द्वितीयार्थप्रतीतके विषयमें मुख्यतः तीन प्रकारके मतभेद पाये जाते हैं । उनका संक्षिप्त परिचय हम नीचे दे रहे हैं ।

११

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ध्वन्यालोक:

[ कारिका २१

पहिला मत यह है कि महाकाल आदि शब्दोंकी जिधर अर्थमें अभिधाशक्ति ज्ञाताको पूर्वसे यहीत है। महाकाल शब्द शिवरूप अर्थमें रूढ है। और दूसरा 'महान् दीर्घं च दुरतिवह काल' यह श्रीम-पक्षमें अन्वित होनेवाला अर्थ यौगिक अर्थ है। साधारणतः "योगाद् रूढिर्बलीयसी" इस न्यायके अनुसार यौगिक अर्थकी अपेक्षा रूढ अर्थ मुख्यार्थ होता है। पहिले गौणक उदाहरणमें ऋतुवर्णन प्रकृत होनेसे श्रीविशिष्ट अर्थ प्रकृत अर्थ है। परन्तु वहाँ महाकाल शब्दका रूढ अर्थ प्रकारणमें अन्वित नहीं होता इसलिए उस साधारण नियमका उल्लंघन करके यौगिक अर्थ लिया जाता है। परन्तु ज्ञाताको उस शब्दका शिव अर्थमें सहृदयताग्रह है। इसलिए प्रकारणवश अभिधाशक्तिका एकार्थमें नियान्त्रण हो जानेपर यहीतसहृदयपदे साहृद्यायदि सामर्थ्यवशा ध्वननव्यापार द्वारा आकांक्षिक शिवरूप अर्थकी भी प्रतीति होती है। इस प्रकार द्वितीयार्थके बोधनके सदृदयग्रहमूलक और ध्वनन-व्यापारमूलक होनेसे उसको शब्दशक्तिमूलध्यान करते है। इसमें 'शब्दशक्तिमूल' शब्द उसके अभिधा-सहृदय और 'ध्यान' शब्द उसके व्यञ्जनान्यापारका बोधक है। अतः उसके नामकरणमें दोनों शब्दोंका प्रयोग विरुद्ध नहीं है।

दूसरा मत "शाब्दी हि आकांक्षा शाब्दनेतैव पूर्व्यते" सिद्धान्तके अनुसार मीमांसक कुमारिलभट्टके 'शब्दाध्याहारवाद'पर आश्रित है। इसके अनुसार जहाँ जितने भी अर्थ प्रतीत होते हैं वह सब शब्दसे अभिधा द्वारा ही बोधित होते हैं। उस वाक्यमें शब्द चाहे एक ही सुनायी दे हो परन्तु अर्थबोधके समय प्रत्येक अर्थके बोधनके लिए अलग-अलग शब्द अध्याहार द्वारा उपस्थित किये जाते हैं। यह अनेक शब्दोंकी उपस्थिति भी कहीं एकार्थमें नियान्त्रण न होनेपर अभिधा द्वारा और कहीं एकार्थमें नियान्त्रण हो जानेपर ध्वननन या व्यञ्जना द्वारा होती है, जैसे इत्थेके शब्ददलेश और अर्थ-श्लेष दो भेद माने गये हैं। प्राचीन आचार्योंने 'शब्दद्वैमाथव:' [पृथ् ११९ देखिये] आदि समभ्र-श्लेषको शब्दश्लेष माना है। इसमें दोनों अर्थोंको बोधन करनेवाले शब्द अलग अलग ही हैं। एक पक्षमें 'सर्वंदः माधव:' शब्द हैं और दूसरमें 'सर्वंदा उमादाशव:' शब्द हैं। दोनों अर्थबोधक शब्द विद्यमान ही हैं, इसलिए दोनों अभिधाशक्तिद्वारा अपने-अपने अर्थको बोधन करा देते हैं। दूसरे अभङ्ग अर्थात् अर्थश्लेषमें यद्यपि 'अनशङ्कः शयकर:' यह एक ही शब्द सुनायी देता है परन्तु अर्थबोधके समय सममानुपूर्वींक इसौ धातुकी 'प्रत्ययेथे धातु: भिद्यते' इस न्यायके अनुसार दुबारा कल्पना की जाती है और वह कल्पित हुवा दूसरा शब्द अभिधा द्वारा द्वितीयार्थका बोधन करता है।

प्राचीन विद्वद्वर्योंमें प्रहेलिकाओंके रूपमें वैदग्ध्यप्रदर्शक प्रश्नोत्तरका एक विशेष प्रकार पाया जाता है। इस सम्बन्धका विशिष्ट ग्रन्थ 'विदग्धमुखमण्डन' है। इस प्रश्नोत्तरप्रकारके अनुसार 'कः इतो भावति' और 'किङ्गुणविशिष्ट इतो भावति' कौन इथर दौड़ रहा है और किस गुणसे युक्त इथर दौड़ रहा है, दो प्रश्न हैं। इन दोनों प्रश्नोंका एक उत्तर 'श्वेतो भावति' है। पहिले प्रश्न 'कः इतो भावति'के उत्तरमें उसके 'श्वा इतो भावति' ये दो खण्ड किये जाते हैं और द्वितीय प्रश्न 'किङ्गुणविशिष्ट इतो भावति'के उत्तरमें 'श्वेतो भावति' यह एक पद रहता है। इस प्रकार दो अर्थ-बोध करनेके लिए दो बार शब्दकी कल्पना की जाती है। इन अर्थश्लेष और प्रश्नोत्तरादिके प्रकरणोंमें द्वितीय शब्दकी उपस्थिति एकार्थमें नियञ्चण न होनेसे अभिधा द्वारा ही होती है इसलिए यह सब वाच्य-श्लेषालङ्कारके उदाहरण होते हैं।

परन्तु 'कुसुमसुमयुग्मुपसहचरन्' [१२५ पृ०] इत्यादि उदाहरणोंमें प्रकारणादिदश अभिषाके नियान्त्रित हो जानेसे द्वितीय बार पदकी उपस्थिति अभिषासे न होकर ध्वननव्यापारसे होती है और ध्वननव्यापारसे उपस्थित होनेके बाद शब्द अभिषाशक्तिद्वारा द्वितीयार्थका बोधन करता है। इस

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कारिका २१ ] द्वितीय उद्योत: १२७

यथा वा—

दत्तानन्दः प्रजानां समुचितसमयाकृष्टसृष्टेः प्रयोभिः | पूर्वाह्ने विप्रकीर्णं दिशि दिशि विरमत्यहि संहारभाजः || दीप्तांशोर्दीच्यंदु:खप्रभवभवभयोदन्वहुत्तारणावो गावो वः पावनानां परमपरिमितां प्रीतिमुत्पादयन्तु ||

वाक्यस्यासमञ्जद्वार्थ- षष्ठाहरणेषु शब्दाक्षया प्रकाशमाने सत्यप्रतिपादनिकेऽथन्तरे, वाक्यस्यासमञ्जद्वार्थ- भिषायितवं मा प्राक्षीदित्यप्रतिपादनिकप्रकारणिकार्थयोःपमानोपमेयभावः कल्प्यतितवयः | सामञ्जस्योदित्यर्थाक्षिप्तोड्यं इलेषो न शब्दोपारूढ इति विमिश्र एव इलेषादतुस्वानोपम- व्यज्ज-यस्य ध्वनेविषयः |

प्रकार यद्यपि द्वितीयार्थकी प्रतीति अभिधातেই होती है परन्तु उस शब्दकी उपस्थिति 'ध्वनन या व्यञ्जनाव्यापार द्वारा होनेसे इसका 'शब्दशक्तिमूलध्वनि' ही कहा जाता है।

तृतीय मतके अनुसार प्रथम प्राकरणिक अर्थ अभिधासे उपस्थित हो जाता है, उसके बाद प्रकरणादिवश अभिधाके एकार्थमें नियत्नण होनेपर भी जो अर्थसामर्थ्य, साहसादि है उसके कारण अभिधाशक्ति अप्रसृत पुनरुज्जीवित-सी हो जाती है। इस प्रकार द्वितीयार्थी अभिधाशक्तिते ही बांचित हांता है। द्वितीयार्थका वाघन हो जानेके बाद उस अप्राकरणिक अर्थकी प्राकरणिक अर्थके साथ अत्यन्त असम्बद्धताका न हो जाय, इसीलिए उन दोनो अर्थो उपमानोपमेयभाव आदि की कल्पना की जाती है। यहां यह कल्पना व्यञ्जनाव्यापारिका विषय हाता है। इसालिए वहाँ उपमालङ्कार स्वकृञय कहलाता है। प्रकृत 'कुचुमयुगसमयुपसंहरन्'वाले उदाहरणमें रूपकके व्यञ्जनाव्यापारिका विषय होनेते रूपकालङ्कार व्यञ्जनाव्यापार द्वारा होनेसे इसका 'शब्दशक्तिमूलध्वनि' कहते हैं।

अथवा जैसे— समुचित समय [सूर्योेकिरणपक्षमें श्रेष्ठ ऋतु और आयपक्षमें दोहनपूर्वककाल] पर आकृष्ट [समुद्रादिसे वाष्परूपमें आकृष्ट, पक्षान्तरमें अयनमें चढ़ाये हुए] और प्रदत्त जल तथा दुर्गंधोसे प्रजाको आनन्द देनेवाली, प्रातःकाल [सूर्योदयके कारण, पक्षान्तरमें चरने जानेके कारण] चारों दिशाओंमें फैल जानेवाली और सूर्यास्तके समय [सूर्यास्तके कारण, पक्षान्तरमें चरकर लौट आनेके कारण] एकत्र हो जानेवाली, दीर्घकालव्यापी दुःखके कारणभूत अवसागरको पार करनेके लिये नौकारूप, विश्वके पवित्र पदाथोंमें सर्वो*कृष्ट गौओंके समान सुर्यंदेवकी किरणें तुम्हें अनन्त सुख प्रदान करें !

१. कुचुमसमययुगमुपसंहरन्, २. उद्धतः प्रातःसिद्धार्; ३. दत्तानन्दः इन तीनों] उदाहरणोंमें 'शब्दशक्तिसे अप्राकरणिक दूसरे अर्थक प्रकट होनेपर वाक्यककी असम्बद्धतार्थबोधकता न हो जाय इसीलिए प्राकरणिक और अप्राकरणिक अर्थोंके उप- मानोपमेयभावकी कल्पना करनी चाहिये। इस प्रकार शब्दसामर्थ्य [सादृश्यादि] वश इलेष आक्षिप्तरूपमें उपास्यित होता है, न कि 'शब्दनिष्ठरूपमें। इसीलिए [इन उदाहरणों- में] इलेषसे अनुगानसिद्धिम संलक्ष्यक्रमध्यञ्ज्य-का विषय अथवा ही है।

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ध्वन्यालोक:

भट्ट वाणस्य

अन्येऽपि चालङ्काराः शब्दशक्तिमूलानुस्वानरूपयक्खच ध्वनौ सम्भवन्त्येव। तथा हि विरोधोऽपि शब्दशक्तिमूलानुस्वानरूपो हृश्यते। यथा स्थाप्यीश्वराख्यजनपदवर्णने

इसका अभिप्राय यह हुआ कि १. अग्रान्तरे, २. उत्ततः, ३. दत्तानन्दा: इन तीनों उदाहरणोंम प्रकरणवश आभिषाका एकतायाम् नियमनत्रण हो जाननेसे प्रस्तुत अर्थकी प्रतीति अभिधास हो जाननेके बाद शब्दशक्ति अर्थात् अभिधामूला व्यञ्जनान्ते अप्राकरणक दूसरे अर्थकी प्रतीति होती है।

"यत्र च 'मातङ्गमिन्यः' शिलीन्ध्रवरच, गौर्यो विभवरतसुच, इत्यामः पद्मरागिण्यरच, धवलङ्किटजुचिवदना मदिरामोदरहसनारच प्रमदा:।"

इन वाक्यों और व्यञ्जना, प्रस्तुत और अप्रस्तुत अर्थोंमे यदि किसी प्रकारका सम्बन्ध न हो तो वाक्यमें अन्वितार्थबोधकत्व दोष हो जायगा! इसलिये उनके उपमानोपमेयभावसम्बन्धकी कल्पना करनी पढती है अर्थात् उन्हें व्यङ्ग्यनागम्य माना जाता है। इस प्रकार वाच्यार्थ प्रस्तुत होनेसे उपमेय ओर व्यङ्ग्यार्थ अप्रस्तुत हानसे उपमानरूपमें प्रतीत होता है। इस प्रकार द्वितीय अर्थ वाच्य न होनेसे, शब्दोपारुड न होनेसे, श्लेषपक्ष में विपय नहीं है अपितु शब्दशक्तिमूल [अलङ्कार] ध्वनिका विषय है।

शब्दशक्तिमूल विरोधाभास अलङ्कारश्च

इस प्रकार ललेष और ध्वनिका विषयविभाग स्पष्ट हो जाता है। 'उपमानो*मेयभावः कल्प्यितव्यः' से यह सूचित किया है कि अलङ्कारध्वनियोंमें सर्वत्र व्यतिरेकण, निहश्व आदि व्यापार ही आस्वादप्रतीतिके प्रधान विधास्निस्थान हैं, उपमेयादि नहीं।

शब्दशक्तिमूल सङ्केत्यक्रमव्यङ्गच्यवचनमे [पूर्वोक्त उपमादके अतिरिक्त] और भी अलङ्कार हो ही सकते हैं। इससे शब्दशक्तिमूल सङ्केत्यक्रमव्यङ्ग-थ विheň [अलङ्कार] भी दिखलायी देता है। जैसे थानेश्वर नामक नगरके वर्णन [प्रसङ्ग] मे वाणभट्टका—

जहाँ गजगामिनी और शीलवती [दूसरे पक्षमें मातङ्गका अर्थ चाण्डाल, मातङ्गमिन्यः अर्थात् चाण्डालसे भोग करनेवाली और शीलवती यह विरोध प्रतीत होता है जो गजगामिन्यः अर्थ करनसे नहीं रहता]। गौरवर्ण और वैभवतिमन्न [दूसरे पक्षमें गौरी पार्वती और भव-शिव, विश्व द्वैमिध, से रमण करनेवाली, यह विरोध हुया जो प्रथम अर्थ करनपर नहीं रहता ] 'इत्यामा यौवनमध्यस्थ' तरुणी और पद्मराग मणियों [के अलङ्कारों] से युक्त [पक्षान्तरमें इत्यामवर्ण और कमलके समान रागयुक्त यह विरोध हुया जो प्रथम अर्थ करनपर नहीं रहता ] निर्मल ग्राह्यवर्णके समान पवित्र मुखवाली और मदिगन्धयुक्त इवासवाली यह विरोध [अर्थ करनसे परिहृत हो जाते हैं] क्यो हैं।

आलोककारने 'हृश्रचर्यत' का यह उदाहरण पूरा नहीं दिया है। अन्योंम 'प्रमदा:' पदके पूर्वं चार पंक्तियाँँ इसी प्रकारके विरोधोंकी ओर भी हैं। परन्तु इतने ही अंशसे उदाहरण पूरा बन जाता है

१. 'मचमातङ्ग' नि०, दी० ।

२. 'चन्दनान्तवपुपः' चारूचकोमलालङ्क-यच, अमुज्ज्वलागल्या: कल्कुंकिन्यच, पृथुक्कलत्रश्रियौ दरिद्र- मध्यकल्तिताइच, लावण्यवत्यौ मधुरमाधुर्ययच, झषप्रसक्तोज्ज्वलरागाइच, शकौतुका: प्रमोदाइच' इतना पाठ 'प्रमदा:' के पूर्वं और है। नि०, दी० ।

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कारिका २१ ] द्वितीय उद्योतः १२९

अत्र हि वाच्यो विरोधस्तत्रायानुम्राही वा इलेषोऽध्यमिति न शक्यं वक्तुम्' । साक्षाच्छन्देन विरोषालङ्कारस्याप्रकाशितत्वात् । यत्र हि साक्षाच्छन्दावेदितो विरोधलङ्कारस्तत्र हि इलेषो वाच्यालङ्कारस्य विरोधस्य वा विषयत्वम् । यथा तत्रैव—

'समवाय एव विरोधिनां पदार्थानाम् । तथाहि, सत्रिहितवाचालङ्ककारापि भास्वन्मूर्ति: १' इत्यादौ ।

इसलिए ग्रन्थकारने शेष भागको छोड़ दिया है । निर्णयसागरीय संस्करणने उस परिशिष्ट भागको भी पूष्ठ १०० पर कोष्ठकके भीतर देकर मूल ग्रन्थके साथही छाप दिया है । परन्तु वह वस्तुतः मूल ग्रन्थका पाठ नहीं है ।

यहाँ विरोधालङ्कार अथवा विरोधच्छायानुम्राही इलेष वाच्य है यह नहीं कह सकते हैं, क्योंकि साक्षात् शब्दसे विरोधालङ्कार प्रकाशित नहीं हुवा है । जहाँ विरोधालङ्कार शब्दसे साक्षात् बोधित होता है उस दिलष्ट वाक्यमें ही विरोध अथवा इलेष [तन्मूलक सङ्देहसङ्क]के वाच्यालङ्कारतत्का विषय हो सकता है । [वहाँ विरोध अथवा इलेषमें वाच्यालङ्कारत्व कद्ना जा सकता है] जैसे वहाँ, ['हर्षचरित'के उसी प्रसङ्गमें]—

विरोधी पदार्थोंके समुदायके समान [थे] । जैसे, वाच्य अप्रौढरूप अनङ्ककारसे युक्त सूर्यकी मूर्ति यह विरोध हुवा, पक्षान्तरमें [रूप] षण्णकशोभसे युक्त भी देदीप्यमान मूर्ति थे ।

इत्यादिमें [वाच्यशक्तिमूल विरोधाभास अलङ्काराध्यन्ति है] ।

इस प्रकार यहाँ इलेषानुप्राणित विरोधाभासकी प्रतीति होनेपर भी विरोधाभासके वाचक 'अपि' शब्दके अभावके कारण विरोधाभासको वाच्य नहीं कहा जा सकता है । इसी प्रकार प्रस्तुत और अप्रस्तुत दोनों अर्थोंके वाच्य न होकर अप्रस्तुत अर्थकी प्रतीति अभिधामूला व्यञ्जनानसे होनेके कारण इलेषको वाच्य नहीं कहा जा सकता है, अपितु व्यञ्जना ही है । अतएव यह अभिधामूल अलङ्कारध्वनिका उदाहरण है ।

जिस इलेषयुक्त वाक्यमें विरोध साक्षात् शब्दसे बोधित होता है वहाँ वाच्य विरोधाभास अलङ्कार अथवा इलेषालङ्कार वाच्यका विषय होता है । 'अपि' शब्द अथवा विरोध शब्द ही विरोधके वाचक शब्द हैं । अगले 'समवाय एव विरोधिनां पदार्थानाम्' इत्यादि उदाहरणमें विरोध शब्द होनेसे वाच्य अलङ्कार है और उसका उपकारक इलेष भी उसके अनुरोधसे वाच्य माना जाता है ।

यहाँ प्रस्तुत यह होता है कि 'अपि' शब्द और 'विरोध' शब्दको तो आप विरोधका वाचक शब्द मानते ही हैं परन्तु उनके अतिरिक्त पुनः पुनः प्रयुक्त समुच्चयार्थक 'च' शब्दको भी विरोधका वाचक शब्द मानना चाहिये । 'मत्स्यमात्स्यगामिन्यः शीलवत्यश्व, गौओं विमवरताश्व' इत्यादि उदाहरणोंमें और 'सत्रिहितवाचालङ्ककारा भास्वन्मूर्तिश्र' इत्यादि उदाहरणोंमे चकारका पुनः पुनः प्रयोग होनेसे विरोधालङ्कारको वाच्य ही मानना चाहिये, व्यङ्गच्य नहीं । इसलिए यहाँ भी 'भास्वन्मूर्तिश्र'के

१. 'वदति तुब्' दी० । २. 'तत्रैव'के स्थानपर 'हर्षचरिते' नि०, द्वी० । ३. 'च' अधिक है नि० दी० ।

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ध्वन्यालोक

यथा वा ममैव—

सदैँकशरणमक्षयममधीशमीशं धियां हरिं कृष्णम् । चतुरात्मानं निधियमरिमथनं नमत चक्रधरम् ॥

अत्र हि शाब्दशक्तिमूलानुस्वानरूपो विरोध: स्फुटमेव प्रतीयते । एवंविधो व्यतिरेकोडपि हृरगते । यथा ममैव—

खं येउपुज्ज्वलतया ननु सततस्मो ये वा नभोऽसिनो ये पुण्यान्ति सरोरहश्रियपि श्रृण्वज्जम्भासिच्च ये । ये मूर्धसु वभासिन: क्षितितलतां ये चामरां शिरः- स्रुत्कामस्तुभयेऽपि ते दिनपते: पादाः श्रिये सन्तु वः ॥

ममान 'शीलवत्यश्र' आदि में विरोधालङ्कारको वाक्य ही मानना चाहिये । इस अर्थचिकी मनमें रखकर अपना बनाया दूसरा उदाहरण भी प्रस्तुत करते हैं ।

अथवा जैसे मेरा ही—

सबके पकमाघ कारण, आश्रयस्थान और अविनाशी [पक्षान्तरमें शरण और क्षय दोनों शब्‍दोंका अर्थ ग्रह होता है । इस दशामें सवके गृह और 'अक्षय' अगृह यह विरोध आता है जो प्रथम अर्थमें नहीं रहता ।]'अधीरासमू' इदृशां धियाम्' जो सवके प्रभु और बुद्धिके स्वामी हैं [पक्षान्तरमें इदृशां धियाम् बुद्धिके स्वामी और 'अधीश' जो वाराह अवतारमें बुद्धिके स्वामी नहीं है यह विरोध आता है जो प्रथम अर्थसे परहित होता है] विष्णु [स्वरूप] कृष्ण [पक्षान्तरमें हरि और कृष्ण वर्णका विरोध प्राप्त होता है] उसका परिहार प्रथम अर्थसे होता है] सर्वेऽक्षरत्नप निध्रिय [पक्षान्तरमें पराक्रमयुक्त और 'निध्रिय' अरियोंका नाश करनेवाला चक्रधारी [विष्णु, पक्षान्तरमें चक्रके अवयव अगोका नाश करनेवाला चक्रधर कैसे होगा यह विरोध प्रथम अर्थसे दूर होता है] को नमस्कार करो ।

इस [उदाहरण]में विरोधालङ्कार शाब्दशक्तिमूल संलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्यार्थके रूपमें स्पष्ट प्रतीत होता है ।

इस प्रकारका [शाब्दशक्तिमूल संलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्यार्थवति] व्यतिरेकालङ्कार भी पाया जाता है । जैसे, मेघ ही [बनाया निम्नलिखित इलोक इसका उदाहरण है]—

इसमें सूर्यकिरणरूप पद और विग्रहवहेवता*क्षके अनुसार देहधारी सूर्यके चरणरूप पद इन दोनों प्रकृतकारकपदोंकी स्‍वत: वृत्ति गयी है और उनमें व्यतिरेकालङ्कार व्यङ्ग्य है । शाब्दार्थ इस आकार होगा —

[सूर्येन्देवके] अन्यकारका नाश करनेवाले जो [किरणरूप] पद आकाशको प्रकाशमान करते हैं और जो [चरणरूप पद] नखाँसे सुरोभित [तथा आकाशको उद्भासित न्] करनेवाले हैं, जो [सूर्य किरणरूपेमे] कमलोंकी श्रीकों भी पुष्ट करते हैं और [चरणरूपसे] कमलोंकी शोभाको तिरस्कृत करते हैं, जो [पर्वतोंके शिखरपर शोभित होते हैं अथवा] क्षितिभूतां गजाओंके शिरोपर अवभासित होते हैं और [प्रणामकालमें] देचताङ्के शिरोंका भी अनिक्रमण करते हैं, सूर्यदेवके वे दोनों [प्रकारके] पद [किरण और चरणरूप] तुम सवके लिए कद्याणकर हों ।

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द्वितीय उद्योत:

एवमन्येऽपि शब्दशक्तिमूलतुम्वालमुपपद्य यध्वनिप्रकाराः सन्ति ने सङहृदयैः स्वयमनुसर्तव्याः। इह तु ग्रन्थविस्तरभयान्त तत्प्रपञ्चः कृतः ॥२१॥

इस प्रकार शब्दशक्तिमूल संलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य ध्वनिके और भी [अलङ्कार तञ्ञ वस्तुरूप] प्रकार होते हैं। सहृदय उनका स्वयं अनुसन्धान कर लें। ग्रन्थविस्तारके भयसे हमने यहाँ उनका प्रतिपादन नहीं किया है॥२१॥

अथैचाक्त्युङ्गदवस्त्वङ्गो यत्रार्थे स प्रकाशते। यस्तात्पर्येण वसनच्युतो ध्वनवत्कुचि्टि विना स्वनः ॥२२॥

ग्रन्थकारने इस दलोकमें नखोक्त्रासी, कमलकान्तिको तिरस्कृत करनेवाले और राजाओंके मस्तकपर शोभित होनेवाले चरणोंकी अपेक्षा आकारको प्रकाधित करनेवाले, कमलोंको विकसित करनेवाले और देवताओंके धीरोंका अतिक्रमण करनेवाले किरणरूप पदोंका आधिक्य होनेसे व्यक्तिरेक अलङ्कार माना है। परन्तु वह सङ्केतादर्शनं आदि पहिले श्लोकके समान विरोषालङ्कारकका उदाहरण भी हो सकता है। विवक्षितान्यपरवाच्य [अभिधामूल] ध्वनिके असंलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य और संलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य दो भेद किये थे। संलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्यके फिर शब्दशक्त्युङ्ग्य, अर्थशक्त्युङ्ग्य आंर उभयशक्त्युङ्ग्य तीन भेद किये गये हैं। इनमेंसे शब्दशक्त्युङ्ग्य ध्वनिका बहुत विस्तारपूर्वक विचार यहाँ किया गया है। इसलिये इस २१वीं कारिकाकी इतनी लम्बी व्याख्या हो गयी है कि पाठक ऊबने लगता है। पन्तु फिर भी ग्रन्थकारने इस बारे विवेचनमें वस्तुध्वनिका कहीं नाम नहीं लिया है। तात्पर्यार्थ गुमोगिराकर अलङ्कारका ही विस्तार किया है। अलङ्कारध्वनिके स्पष्टीकरणके लिये जो इतना अधिक प्रयत्न ग्रन्थकारने किया है वह सम्भवतः उसके विवादास्पद स्वरूप और महत्त्वको ध्यानमें रखकर किया है। वस्तुध्वनिके अधिक स्पष्ट और विवादरहित होनेके कारण ही उसका विवेचन नहीं किया है। उत्तरवर्ती आचार्योंने वस्तुध्वनिकी भी सोदाहरण विवेचना कर इस कमोको पूरा कर दिया है॥२२॥

अर्थशक्त्युङ्ग्य ध्वनि

शब्दशक्त्युङ्ग्यके बाद अर्थशक्त्युङ्ग्य संलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्यका वर्णन कमप्राप्त है। नवीन आचार्योंने उसके स्वतःसम्भवी, कविप्रौढोक्तिसिद्ध और तात्प्रबन्धचतुत्रप्रौढोक्तिसिद्ध ये तीन भेद और उनमेंसे प्रत्येकके वस्तुतः वस्तु, वस्तुतः अलङ्कार, अलङ्कारसे वस्तु, और अलङ्कारसे अलङ्कार व्यक्तव्य, चार कुल मिलाकर ३×४ =१२ भेद किये हैं। आलोककारने भी ये भेद किये हैं। परन्तु उतने स्पष्ट नहीं हुए हैं।

संलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्यध्वनिके प्रथम शब्दशक्त्युङ्ग्य भेदके सविस्तार निरूपणके बाद उसके दूसरे भेद अर्थशक्त्युङ्ग्य संलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्यका निरूपण करते हैं— अर्थशक्त्युङ्ग्यच [नामक संलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य यध्वनिका] दूसरा भेद [वह] है जहाँ पेषा अर्थ [अभिधासे] प्रतीत होता है जो शाब्दव्यापारके बिना [ध्यननव्यापारसे] स्वतः ही तात्पर्यविषयीभूततरूपसे अर्थान्तरको अभियुक्त करे ॥२२॥

यहाँ तात्पर्यशब्दको पदार्थसंसरूप वाक्यार्थबोधमें उपसीन तात्पर्याख्या शक्तिका ग्राहक नहीं, अपितु ध्वननव्यापारका ग्राहक समझना चाहिये।

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ध्वन्यालोक:

यत्रार्थः स्वामध्योर्धान्तरमभिधनक्ति शब्दद्यापारं विनैव सोऽर्थशक्युद्रुद्वो नामालुस्वानोपमन्यक्कॆन यो ध्वनि: ।

यथा—

एवंवादिनि देवर्षौ पार्श्वे पितुरघोसुखी । लीलाकमलपत्राणि गणयामास पार्वती ॥

अत्र हि लीलाकमलपत्रगणनमुपसजनौचित्यस्वरूपं शब्दद्यापारं विनेवाथान्तरं व्यभिचारिभावलक्षणं प्रकाशयति ।

न वाच्यमलक्ष्यक्रमव्यङ्गॆन ध्वनेर्विषय: । यतो यत्र साक्षाच्छदनिवेदितेऽथ्यो विभावानुभावङ्गभिचारिभयो रसादीनां प्रतीति: स तस्य केवलस्य मार्ग: ।

जहाँ अर्थ [वाच्यार्थ] शब्दद्यापारके बिना अपने [ध्वनन] नामक अर्थसे अर्थान्तरको अभिधीयक करता है वह अर्थशक्यतद्रुद्र संलक्ष्य क्रमव्यङ्गॆन य नामक ध्वनि है । जैसे—

देवर्षे [समर्षिमण्डल] के ऐसा कहने [शिवके साथ पार्वतीके विवाहकी चर्चा और शिवकी सहमति प्रकट करने] पर चिता [पर्वतगज हिमालय]के पास बैठी हुर्दी पार्वती मुहूँ नीचा करके लीलाकमलकी पँखुड़ियाँ गिनने लगी ।

यहाँ लीलाकमलपत्रोंकी गणना [रूप पार्वतीका व्यभिचार] स्वयं गुणीभूतव्यङ्गॆरूप होकर शब्दद्यापारके बिना ही [लोचनकारके मतमें लज्जा और विश्वनाथके मतसे अवहित्थारूप] व्यभिचारिभावरूप अर्थान्तरको अभिधीयक [प्रकट] करती है ।

लोचनकारने इसे लज्जारूप व्यभिचारिभावका अभिधीयक माना है परन्तु साहित्यदर्पणकारने अवहित्थाके उदाहरणमें इस दलोकको उद्धृत किया है । ‘अवहित्था’ का लक्षण इस प्रकार किया गया है—‘भयगौरवलज्जादेहपांङ्गाकारसुिरवहिथा । व्यापारान्तरसमुत्पन्नव्यभाषणाविलोकनादिकरी ।’

भय, गौरव, लज्जा आदिके कारण व्यापारान्तर, अन्यथाभाषण या अन्यथाविलोकनादि जनक आकारगोपनका नाम अवहित्था है । इस अवहित्थामें भी लज्जाका समावेश रहता है और भय, गौरव, लज्जा आदि आकारसुचिके हेतुओंमेंसे यहाँ लज्जा ही हेतु है । इसलिये विश्वनाथ और लोचनकारके मतमें तात्विक भेद न होनेसे विरोधकी शङ्का नहीं करनी चाहिये ।

यह [‘एवंवादिनि’ आदि इलोक] असंलक्ष्य क्रमव्यङ्गॆन [रसादि] ध्वनिका ही उदाहरण [भो] नहीं है । क्योंकि जहाँ साक्षात् शब्दसे वर्णित विभाव, अनुभाव और व्यभिचारिभावोंसे रसादिको प्रतीति होती है वही केवल उस [असंलक्ष्य क्रमव्यङ्गॆन ध्वनिका] मार्ग है ।

पहिले यह लिख आये हैं कि व्यभिचारिभावोंका वाचकशब्दोंसे कथन उचित नहीं है और यहाँ उनके साक्षात् शब्दनिवेदित होनेसे ही रसादि प्रतीत होते हैं यह कह रहे हैं । ये दोनों बातें परस्पर विरुद्ध हैं । ऐसी शङ्का उत्पन्न हो तो उसका समाधान यह है कि वाच्यार्थप्रतीतिसे अव्यवहित व्यभिचारिभवकी प्रतीति होनी चाहिये यहीं यहाँ साक्षात् शब्दनिवेदितत्वसे अभिप्रेत है । व्यभिचारिभावका वाच्यत्व इष्ट नहीं है ।

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ध्वनेर्विषय:

यथा—

सङ्केतकलमनसं विटं ज्ञात्वा विदगधया । हसन्त्यर्पिताकुतं लीलापदं निर्मालितम् ॥

जैसे 'कुमारसम्भव' के वसन्तवर्णनप्रसङ्ग में वासन्ती पुष्पपुञ्जके आभूषणोंसे अलङ्कृत देवी पार्वती [आलम्बनविभाव] के आगमनसे लेकर कामदेवके शरसन्धानपर्यन्त [अनुभाववर्णन] और धैर्येच्युत शिवकी चेष्टाविशेषवर्णनादि [व्यभिचारिभाव] साक्षात् शब्दनिवेदित है । [अतः वहाँ असंलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य रसध्वनि है ।]

['कुमारसम्भव' के प्रकृत श्लोक निम्नलिखित प्रकार हैं—

१—निर्वाणाभिषिक्तपदमथास्य धींयं सङ्ग्रुक्षयन्नीव वपुरुरुणेन । अनुप्रयानता वनदेवतामिरराधयत् स्वावरजकन्या ॥

२—प्रतिगृहीतं प्रणयिग्रिप्रितानु त्रिलोचनस्तामुपचक्रमे च ।

सम्भोगहन नाम च पुंपधन्वा धनुर्जयोभि: समधत्त सायकम् ॥

३—हरस्तु किशित्परिवृत्तधैर्यश्रमनोद्यरामः इवामुराशेः । उमामुखे तिम्बफलाधरोष्ठे व्यापारयामास बिलोचनानि ॥]

यहाँ ['पर्ववादिनि देवगणैर्मे' तो [लीलाकमलके पत्तोंकी गड़गड़ाहट द्वारा] सामर्थ्यसे आक्रिम [लज्जारूप] व्यभिचारिभाव द्वारा रसकी प्रतीति होती है । इसलिए [रसध्वनि-रूप असंलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्यके भेदसे भिन्न अर्थशक्त्युद्भव संलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्यरूप] यह दूसरा ध्वनिका प्रकार है ।

इसमें यह सूचित किया कि यद्यपि रसादि सदा व्यङ्ग्य ही होते हैं वाच्य नहीं, परन्तु उनका असंलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य होना अनिवार्य नहीं है । वह कभी संलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य अर्थशक्त्युद्भव ध्वनिके द्वारा भी प्रतीत हो सकते हैं । परन्तु उत्तरवर्ती आचार्य रसादिशब्दिको असंलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य ही मानते हैं । सलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्यके जितने भेद उन्होंने किये हैं उन सबके उदाहरण वहुत्वभानि यहाँ अलङ्कारध्वनि जैसे ही दिये हैं ।

जहाँ शब्दशक्तिप्रकाशकी सहायतासे व्यङ्ग्य, दूसरे अर्थको अभिव्यक्त करता है वह [अर्थशक्त्युद्भव संलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य] ध्वनिका विषय नहीं होता [वहाँ गुणीभूत व्यङ्ग्य हो जाता है] ।

जैसे—

[नायकके श्रृङ्गारसहायकको भी] विट [सम्भोगहीनसम्पद् विटस्त्र धूर्तः कलैक देहाक्षि] चेशोपचारकुलो मदुरोदय बहुमतो गोष्ठयाम् ॥ कहते हैं, किन्तु यहाँ विटका अर्थ उत्पत्ति है । उत्पत्तिकी सङ्केतकाल [नायक-नायिकाके मिलनसमय] की जिज्ञासाको समझकर चतुरा [नायिका] ने नेत्रोंसे [अपना] अभिप्राय ध्यक करते हुए हँसते हुए [अपने हाथके] लीलाकमलको बन्द कर दिया ।

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ध्वन्यालोक:

अत्र लीलाकमलनीलनस्य व्यङ्ग्यजकत्वमुक्त्यैव निवेदितम् ॥२२॥

यहाँ लीलाकमलनीलन [द्वारा सङ्केतकाल]की व्यङ्ग्यकता [नेत्रार्पिताकृतं पदने] शब्द द्वारा ही सूचित कर दी । [अतः अर्थशक्त्युद्भव ध्वनिका नहीं, गुणीभूत-व्यङ्ग्यका उदाहरण है ।] ॥२२॥

शब्दार्थशक्त्याक्षिप्तोऽपि व्यङ्ग्य योडर्थः कविना पुनः । यत्राविष्क्रियते स्वोक्त्या सानैयैवालङ्कृतिः स्वने ॥ २३॥

शब्दशक्त्या, अर्थशक्त्या, शब्दार्थशक्त्या वाक्यप्रपोदपि व्यङ्ग्य योडर्थः कविना पुनरयक्त्र मोक्तन्या प्रकारेणोपमेयादृश्वान्तरप्रविष्टमुख्यकृत ध्वनेर्नन्या एवालङ्कारः । अलङ्क्ष्य-अलङ्क्ष्यप्रकारेण सति सम्भवे स तादृगन्वयोल्ड्ड्कारः ।

व्यङ्गयार्थकी स्वशब्दोक्ति होनेपर ध्वनि नहीं और इस्से [कथा भी है कि— शब्दशक्ति, अर्थशक्ति, अथवा शब्द, अर्थ उभय शक्तिसे आक्षितप्त [व्यङ्ग्य होने-पर भी जहाँ व्यङ्ग्य या अर्थको कवि पुनः अपने वचन द्वारा प्रकट कर देता है वह [व्यङ्गयार्थकके वाच्यसिद्धिका अङ्ग होकर गुणीभूत वन जानेके कारण] ध्वनिसे भिन्न अन्य ही (श्लेष आदि) अलङ्कार है ॥२३॥

शब्दशक्ति, अर्थशक्त्य् अथवा शब्दार्थोभयशक्तिसे आक्षितप्त होनेपरभी व्यङ्ग्य्य अर्थको जहाँ कवि फिर अपनी ढङ्कसे [भी] प्रकाशित कर देता है वह इस अनुसन्धानोपम [सङ्ललङ्क्ष्याक्रमव्यङ्ग्यस्य वा ध्वने: सति सम्भवे स तादृगन्वयोल्ड्ड्कार:] ध्वनिसे अलग ही (श्लेष आदि) अलङ्कार होता है । अथवा असंल्ल-लङ्क्ष्यक्रमव्यङ्गयध्वनिका यदि कोई इस प्रकारका उदाहरण मिल सके तो [वाच्यालङ्कारसे भिन्न] वह उस प्रकारका [विशेष चमत्कारजनक] अन्य ही अलङ्कार होता है ।

इस कारिकासे पूर्वं सङ्ललङ्क्ष्यक्रमव्यङ्गयध्वनिके शब्दशक्त्युद्भव और अर्थशक्त्युद्भव व्यङ्ग्य दो भेद किये ये । परन्तु इस कारिकामें उभयशक्त्युद्भव तृतीय भेद भी सूचित किया है । ‘शब्ददक्ष अर्थस्य इति शब्दार्थो’ इतने विमर्शसे शब्दशक्त्युद्भव तथा अर्थशक्त्युद्भव और फिर ‘शब्दार्थों च वाच्यैकदेशोऽपि’ इस प्रकार इतनेसमासमें एकशेष करके ‘शब्दार्थो’ पदसे ही उभयशक्त्युद्भवरूप तृतीय भेदका भी प्रतिपादन किया है ।

१. ‘वाक्यप्रपोदपि’ नो पा० । ‘सानैयैवालङ्कृतिः स्वने:’की व्याख्या भी वृत्तिकारने दो प्रकारसे की है । एक पक्षमें ‘ध्वने:’ पद-को पृथक्‌मन्त और सङ्क्ष्यक्रमव्यङ्गयध्वनिका बोधक मानकर ‘चोद्यस्सादनस्वानोपमव्यङ्गयादृश्वान्तरप्रविष्टमुख्यकृत ध्वनेर्नन्या एवालङ्कार:’ यह व्याख्या की है और दूसरे पक्षमें ‘ध्वने:’को असंल्ललङ्क्ष्यक्रमव्यङ्ग्यस्य वा ध्वने: सति सम्भवे स तादृगन्वयोल्ड्ड्कार:’ यह व्याख्या की है ।

मानकर ‘असंल्ललङ्क्ष्यक्रमव्यङ्ग्यस्य वा ध्वने: सति सम्भवे स तादृगन्वयोल्ड्ड्कार:’ यह व्याख्या की है । व्यङ्गयार्थके स्वशब्दोक्ते कथन कर देनेपर उसकी प्रघानता नष्ट हो जाती है और श्लेषादि अलङ्कारोंकी प्रघानता हो जाती है । अतः वहाँ व्यङ्गयके गुणीभूत हो जानेसे ‘ध्वनि’ व्यवहार न होकर श्लेषादि अलङ्कारका व्यवहार होता है ।

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कारिका २९ ]

द्वितीय उद्योत:

१२४:

तत्र शब्दशक्त्या ग्रथा—

वत्से मा गा गा विपादं उवसनमुरूजवं मन्त्यजोच्चैःप्रवृत्तं

कम्पः को वा गुरुसले भवतु वलभिदा जृम्भितेनात्र यादि ।

प्रत्याख्यानं सुराणामिति भयशमनछद्मना कारयित्ता

यस्मै लक्ष्मींमदाद् वः स दहतुं दुरितं मन्यमूर्खां पयोदिः ॥

अर्थशक्त्या यथा—

अम्या इन्द्रोदृ वृद्वा परिणतवयसामप्रनेइत्र तातो

नि:शेषागारकर्मश्रमशिथिलतनुः कुम्भदासी तथात्र ।

उसमें शब्दशक्तिसे [आक्षित, शब्दशक्त्युद्भव व्यङ्गच, स्वशब्दसे कथित होने-

से गुणीभूत और इलेषालङ्कारप्रधान हो गया है उसका उदाहरण] जैसे—

[रसोद्गमनवेलामें] स्वभावतः सुकुमारी होनेके कारण समुद्रकी भीषण

तरङ्गोंको देखकर भयभीत [मन्थनसे भीत लक्ष्मीको [उसके पिता] समझने भय दूर

करनेके बहाने [यह कहकर कि] बेटी, घबराओ नहीं [व्यङ्ग्यार्थ 'विषमस्तीति विषादः'

विषको भक्षण करनेवाले भयानक शिवके पास मन जाना] नीतिमतिसे चलनेवाली

लक्ष्मी उपागमको यन्नद करे [व्यङ्ग्यार्थ तोइअनतिवाले भयङ्कर वाच्य और अर्थज्चलन-

स्वभाववाले भयङ्कर वामनदेवताकी यात छोड़ो], यह इतना काँप रही हो और शक्तिहीन

को नष्ट करनेवाली इन जङ्गमादि[यों]को जग यन्नद करे [व्यङ्ग्यार्थ 'कं जलं पानोति कम्पः

वरुणः' प्रजापतिः ब्रह्मा, कम्प अस्तोत] वरुणदेव और प्रजापति ब्रह्मा नो तुम्हारे

गुरु, पितृ-सदृश है । 'जृम्भितेन वलभिदा भवतु' पेष्ययोगेनात्र इन्द्रदेवको भी छोड़ो,

इस प्रकार भय-शान्ति करनेके बहाने अन्य सब देवताओं [के साथ विवाह] का प्रत्य-

ध्यान [निपेध] करके और यहाँ [विष्णुके पास] जाओ ऐसा कहकर जिन [विष्णु] को

[अपनी पुत्री] लक्ष्मीको [बधूरूपमें] प्रदान किया वे [विष्णु] तुम्हारे दु:खोंको दूर करें ।

यहाँ देवताओंके प्रत्याख्यानका बोधक अर्थ व्यङ्गच होता, परन्तु 'भयशमनछद्मना' में 'छद्म' शब्द

द्वारा कविने उसे वाच्य बना दिया इसीलए कामिनीपुंस्कलहावत् गोपनकृत् चारुत्व न

रहनेसे यह सङ्केत्यक्रमव्यङ्गचध्वनिका उदाहरण नहीं है । 'कारयित्ता' में 'णिच्-प्रतय समर्थनका सूचक

है, अप्रयुक्तप्रवृत्तत्वदर्शन नहों । अर्थात देवताओंका प्रत्याख्यान करनेकी प्रेरणा पिताने नहीं की अपितु

लक्ष्मी द्वारा किये गये प्रत्याख्यानका समर्थनमात्र किया । यही णिच्‌का तात्पर्य है । 'एकोरनत्यवरस्याम'

मूर्छनसे लक्ष्मीको कर्म संबन्ध हुंवा है ।

अर्थशक्तिसे [आक्षित, अर्थशक्त्युद्भवच व्यङ्गच जहाँ शब्दसे कथित होनेसे

गुणीभूत और इलेषालङ्कार प्रधान हो गया है उसका उदाहरण] जैसे—

वृद्धी माताजी यहाँ सोती हैं, और वृद्धोंके अग्रमान्य पिताजी यहाँ । सारे घर-

का काम करनेमें अत्यन्त थकी हुं दासी यहाँ सोती है । मैं अभागिनी, जिसके पति

कुछ दिनोंसे परदेश चले गये हैं, इस [कमरे] में अकेली पड़ी रहती हूँ । इस प्रकार

१. 'किमिह' दी० ।

Page 182

ध्वन्यालोकः

[कारिका २४

अस्मिन् पापाहमेकां कति पयदिवसप्रोपितप्राणनाथा पान्थायेल्थं तरुण्याः कधितमवसराङ्गितलोल्याजपूर्वेम् ॥

उभयशक्त्या यथा—‘दृष्ट्या केशव गोपरागहतया’ इत्यादि ॥२३॥

उभयशक्त्या यथा—‘दृष्ट्या केशव गोपरागहतया’ इत्यादि ॥२३॥

प्रौढोक्तिमात्रनिष्पन्नशरीरः सम्भवी स्वतः । अर्थोंऽपि द्विविधो ज़्ञेयो वस्तुनोडन्यस्य दीपकः ॥२४॥

प्रौढोक्तिमात्रनिष्पन्नशरीरः सम्भवी स्वतः । अर्थोंऽपि द्विविधो ज़्ञेयो वस्तुनोडन्यस्य दीपकः ॥२४॥

तरुण्याने अवसर घटानेके लिये बहानेसे पथिकको यह [सवके सोनेका स्थान और व्यवस्था आदिका पृथक् विवरण] कहा ।

तरुण्याने अवसर घटानेके लिये बहानेसे पथिकको यह [सवके सोनेका स्थान और व्यवस्था आदिका पृथक् विवरण] कहा ।

यहाँ तरुणीकी सम्भोगेच्छा और अनिवेद्यंश यथेष्ट सम्भोगके अवसरका सूचनरूप जो व्यङ्ग्य है उसको कविने ‘अवसरव्याहतिलोल्याजपूर्वेम्‌’ में अपने शब्दोंमें ही कह दिया इसलिए यह संलक्ष्य क्रम अथवा असंलक्ष्यक्रमलयकृतच्यवनिका उदाहरण नहीं रहा, अपितु व्यङ्गयके गुणीभूत और अलङ्कारके प्रधान हो जानेसे स्लेषका उदाहरण बन गया है ।

यहाँ तरुणीकी सम्भोगेच्छा और अनिवेद्यंश यथेष्ट सम्भोगके अवसरका सूचनरूप जो व्यङ्ग्य है उसको कविने ‘अवसरव्याहतिलोल्याजपूर्वेम्‌’ में अपने शब्दोंमें ही कह दिया इसलिए यह संलक्ष्य क्रम अथवा असंलक्ष्यक्रमलयकृतच्यवनिका उदाहरण नहीं रहा, अपितु व्यङ्गयके गुणीभूत और अलङ्कारके प्रधान हो जानेसे स्लेषका उदाहरण बन गया है ।

[इसी प्रकार] उमय शक्तिसे [आक्षित उमयशक्त्युत्थ ड्यङ्ग्य जहाँ शब्दसे कधित होनेसे गुणीभूत और इलेषालङ्कार प्रधान हो गया है उसका उदाहरण] जैसे ‘दृष्ट्या केशव गोपरागहतया’ इत्यादि [पृष्ट १२४ पर पूर्वं उदधृत व्या्र्यात स्लोक]में ।

[इसी प्रकार] उमय शक्तिसे [आक्षित उमयशक्त्युत्थ ड्यङ्ग्य जहाँ शब्दसे कधित होनेसे गुणीभूत और इलेषालङ्कार प्रधान हो गया है उसका उदाहरण] जैसे ‘दृष्ट्या केशव गोपरागहतया’ इत्यादि [पृष्ट १२४ पर पूर्वं उदधृत व्या्र्यात स्लोक]में ।

‘दृष्ट्या केशव गोपराग’ इत्यादि उमयशक्त्युद्भव ड्यङ्गयच्यवनिमें उभयशक्त्युक्तताका समन्वय लोचनकारने इस प्रकार किया है कि गोपरागादि पदोंमें स्लेष होनेसे उस अंशमें शब्दशक्त्युत्पत्तिता और प्रकरणवशात् अर्थशक्त्युत्पत्तिता आनेसे यह उमयशक्त्युद्भवका उदाहरण होता है । परन्तु नवीन आचार्य ऐसे स्लेषोपर उमयशक्त्युल्यस्ताका समन्वय शब्दपरिवृत्तिसहत्व तथा शब्दपरिवृत्त्यसहत्वके आधारपर करते हैं ।

‘दृष्ट्या केशव गोपराग’ इत्यादि उमयशक्त्युद्भव ड्यङ्गयच्यवनिमें उभयशक्त्युक्तताका समन्वय लोचनकारने इस प्रकार किया है कि गोपरागादि पदोंमें स्लेष होनेसे उस अंशमें शब्दशक्त्युत्पत्तिता और प्रकरणवशात् अर्थशक्त्युत्पत्तिता आनेसे यह उमयशक्त्युद्भवका उदाहरण होता है । परन्तु नवीन आचार्य ऐसे स्लेषोपर उमयशक्त्युल्यस्ताका समन्वय शब्दपरिवृत्तिसहत्व तथा शब्दपरिवृत्त्यसहत्वके आधारपर करते हैं ।

उनके मतसे यहाँ ‘केशव गोपरागहतया’ में ‘केशव गोपराग’ शब्दोंके रहतेपर ही ध्वनिकी सत्ता रहती है और यदि उनको बदलकर रागके पर्यायवाचक स्लेहादि शब्द रख दें तो ध्वानिकी सत्ता नहीं रह सकती, इसलिए शब्दपरिवृत्तिसह होनेके कारण यह ध्वनि शब्दशक्त्युत्थ है ।

उनके मतसे यहाँ ‘केशव गोपरागहतया’ में ‘केशव गोपराग’ शब्दोंके रहतेपर ही ध्वनिकी सत्ता रहती है और यदि उनको बदलकर रागके पर्यायवाचक स्लेहादि शब्द रख दें तो ध्वानिकी सत्ता नहीं रह सकती, इसलिए शब्दपरिवृत्तिसह होनेके कारण यह ध्वनि शब्दशक्त्युत्थ है ।

परन्तु आगे ‘स्वलितास्ति’’ इत्यादिमें शब्दका परिवर्तन करके ‘पतितासि’ आदि रख देनेपर भी व्यङ्ग्यमें कोई बाधा नहीं पड़ती इसलिए उस अंशके परिवर्तनसह होनेसे अर्थशक्त्युत्थ व्यङ्ग्य होता है ।

परन्तु आगे ‘स्वलितास्ति’’ इत्यादिमें शब्दका परिवर्तन करके ‘पतितासि’ आदि रख देनेपर भी व्यङ्ग्यमें कोई बाधा नहीं पड़ती इसलिए उस अंशके परिवर्तनसह होनेसे अर्थशक्त्युत्थ व्यङ्ग्य होता है ।

अतः एक अंशमें शब्दशक्त्युत्थ और दूसरे अंशमें अर्थशक्त्युत्थ होनेसे यह उमयशक्त्युत्थका उदाहरण है ।

अतः एक अंशमें शब्दशक्त्युत्थ और दूसरे अंशमें अर्थशक्त्युत्थ होनेसे यह उमयशक्त्युत्थका उदाहरण है ।

इस प्रकार शब्दपरिवर्तनोंको सहन न कर सकनेवाले गुण, अलङ्कार, ध्वनि आदिको शब्दनिष्ठ, तथा शब्दपरिवर्त्तनोंको सहन करनेबालोंको अर्थनिष्ठ मानकर शब्दपरिवृत्ति असहत्व और शब्दपरिवृत्तिसहत्वके आधारपर ही नवीन आचार्य शब्दनिष्ठता या अर्थनिष्ठताका निर्णय करते हैं ॥२३॥

इस प्रकार शब्दपरिवर्तनोंको सहन न कर सकनेवाले गुण, अलङ्कार, ध्वनि आदिको शब्दनिष्ठ, तथा शब्दपरिवर्त्तनोंको सहन करनेबालोंको अर्थनिष्ठ मानकर शब्दपरिवृत्ति असहत्व और शब्दपरिवृत्तिसहत्वके आधारपर ही नवीन आचार्य शब्दनिष्ठता या अर्थनिष्ठताका निर्णय करते हैं ॥२३॥

अर्थशक्त्युद्भव ध्वानिकी भेद

अर्थशक्त्युद्भव ध्वानिकी भेद

इस प्रकार संलक्ष्यक्रमलयकृतच्यवनिके शब्दशक्त्युत्थ, अर्थशक्त्युत्थ और उमयशक्त्युत्थ तीन भेद प्रदर्शित किये, उनमेंसे शब्दशक्त्युत्थका सविस्तर विवेचन हो चुका ।

इस प्रकार संलक्ष्यक्रमलयकृतच्यवनिके शब्दशक्त्युत्थ, अर्थशक्त्युत्थ और उमयशक्त्युत्थ तीन भेद प्रदर्शित किये, उनमेंसे शब्दशक्त्युत्थका सविस्तर विवेचन हो चुका ।

अब अर्थशक्त्युत्थवके स्वतःसम्भवी और [कविप्रौढोक्तिसिद्ध तथा कविनिबद्धवक्तृ-

अब अर्थशक्त्युत्थवके स्वतःसम्भवी और [कविप्रौढोक्तिसिद्ध तथा कविनिबद्धवक्तृ-

अन्य वस्तु [अलङ्कार या वस्तु] का अभियोजक अर्थ भी स्वतःसम्भवी तथा प्रौढोकिमात्रसिद्ध [इसमें कविप्रौढोक्तिसिद्ध तथा कविनिबद्धवक्तृमेद सम्मलित हैं] इस प्रकारसे दो प्रकारका [वास्तवमें तीन प्रकारका] होता है ॥२५॥

अन्य वस्तु [अलङ्कार या वस्तु] का अभियोजक अर्थ भी स्वतःसम्भवी तथा प्रौढोकिमात्रसिद्ध [इसमें कविप्रौढोक्तिसिद्ध तथा कविनिबद्धवक्तृमेद सम्मलित हैं] इस प्रकारसे दो प्रकारका [वास्तवमें तीन प्रकारका] होता है ॥२५॥

Page 183

ध्वन्यालोक

अर्थशक्त्युद्भवासूरणनिरूपणयत्नकृतये ध्वनौ यो व्यङ्गयकोर्डर्थे उत्तत्तस्यापि द्वौ प्रकारौ, कवे:, कविनिबद्धस्य वा वक्तु: प्रौढोक्तिमात्रनिष्पन्नशरीर एक:, स्वतः सम्भवी च द्वितीय: । कविप्रौढोक्तिमात्रनिष्पन्नशरीरौ यथा— सज्झोहि सुरहिमासो ण दाव अप्पेह जुअइजणलटक्खमुहे । अहिणवसहआरमुहे पवपल्लवपत्तले अणंगस्स झारे ॥ [सज्जात सुरभिमासो न तावद् अप्येति यौवनलक्षणमुखे । अभिनवसहारमुखे नवपल्लवपत्त्रलताङ्गस्य झारान् ॥ इति च्छाया ] कविनिबद्धवक्तृप्रौढोक्तिमात्रनिष्पन्नशरीरौ यथोदाहृतमेव—‘शिखरिणी’ इत्यादि ।

ये तीन प्रकारके व्यङ्ग्यार्थ, वस्तु तथा अलङ्कारभेदसे दो प्रकारके होकर ३ × २ = ६ व्यङ्ग्य अर्थ, और उमी प्रकार ६ व्यङ्ग्यार्थ, कुल मिलाकर [६ + ६ = १२] अर्थशक्त्युद्भवके वारह भेद हो जाते हैं । इन बारह भेदोंका वर्णन नवीन आचार्योंने अधिक स्पष्ट रीति से किया है । अर्थशक्त्युद्भवरूप संलक्ष्यक्रमव्यङ्गयध्वनिनिमें जो व्यङ्ग्य अर्थ कहा है उसके भी दो भेद होते हैं । एक [तो] कवि या कविनिबद्धवक्ताकी प्रौढोक्तिमात्रसे सिद्ध और दूसरा स्वतःसम्भवी ।

कविप्रौढोक्तिमात्रमिद्ध [का उदाहरण] जैसे— [कामदेवका श्लोक] वसन्त मास युवतिजनोंको लक्ष्य बनाने [विद्ध करने] वाले मुखों [अग्रभाग—फलभाग] से युक्त नवपल्लवोंवाले पत्र [आपके पिँछले भागमें लगे पंखोंसे] युक्त, सहकार प्रभृति कामदेवके वाणोंका निर्माण करता है [परन्तु] अभी प्रहारार्थे उसके] देता नहीं है । यहाँ वसन्त वाण बनानेवाला है, कामदेव उनका प्रयोग करनेवाला धन्वी या योद्धा है, आम्र-मञ्जरी आदि वाण हैं और युवतियाँ उनका लक्ष्य हैं इत्यादि अर्थ कविप्रौढोक्तिमात्रसे सिद्ध है । लोकमें इस प्रकारका न कोई धानुक दीखता है, न उसके वाण । इसीप्रकार कविप्रौढोक्तिमात्रसिद्ध वस्तुसे मदनोन्मथनका प्रारम्भ और उत्तरोत्तर उसका विजृम्भणरूप वस्तु व्यङ्ग्यका उदाहरण है ।

कविनिबद्धवक्तृप्रौढोक्तिका उदाहरण ‘शिखरिणी’ इत्यादि [श्लोक] पहले ही [पृ ५६ पर] दे चुके हैं । उसमें जो चमत्कारजनक व्यङ्ग्य अर्थ है उसकी प्रतीति कविनिबद्ध साहित्याप तरुणरूप वक्ताकी विशेषतासे ही होती है । अन्यथा उमी बातको केवल कविके शब्दमें अधरके समान बिम्बफल-को तोता काट रहा है इस रूपमें कह दिया जाय तो उसमें कोई चमत्कार नहीं आता है । इसीलिए सहृदय पुरुष कविप्रौढोक्तिसिद्धसे कविनिबद्धवक्तृप्रौढोक्तिसिद्धको अधिक चमत्कारजनक मानते हैं और उसकी गणना कविप्रौढोक्तिसिद्धसे अलग करते हैं । कविमें स्वतः रागाद्याविष्टता नहीं होती परन्तु कविनिबद्धमें रागाद्याविष्टता होती है । इसीलिए उसका वचन अधिक चमत्कारजनक होता है ।

१. ‘उदाहृतमेव’ पाठ ति० दी० में नहीं है । २. ‘द्वित्यादौ’ नि० ।

Page 184

ध्वन्यालोक:

यथा वा’—

As said

सअरवइविर्णणजोअव्वणहस्थालम्भं समुण्णमन्तेहिं । अण्णुद्धारणं वि अस्समहस्स दिण्णं तुढ़ थणेहिं ॥ [सादरावइविर्णणजोअव्वणणहस्तावलम्भं सअसुअमद् भ्याम् । अभ्युत्थानमिव मनसथस्य दत्तं तथा स्तनाभ्याम् ॥ इति छाया]

सारविंद इव र्णण जो अव्वणण हस्थालम्भं समुण्णमन्तेहिं । अण्णुद्धारणं वि अस्समहस्स दिण्णं तुढ़ थणेहिं ॥ [सादरावइविर्णणजोअव्वणणहस्तावलम्भं सअसुअमद् भ्याम् । अभ्युत्थानमिव मनसथस्य दत्तं तथा स्तनाभ्याम् ॥ इति छाया]

Like a respectful welcome with hands, similarly with breasts.

स्वतःसम्भवी य ओचित्येन वअहिरपि सम्भाव्यमानसदृशाभिः ने केवलं भणितिवश- नैवाभिनवप्रत्नशरीरः । यथोदाहृतम्—‘पदंव आदिनि’ इत्यादि ।

यथा वा—

As said

सिहिंपिच्छकरणपूरा जआ वाइरस गभीरओ भमइ । मुक्काफलरइअअपमअहणाणं मज्झे सवत्ताणं ॥ [शिवपिच्छकरणपूरा जाया व्याधस्य गविंणी अभवति । मुक्ताफलरचितप्रसाधनानां मध्ये सप्तनीनाम् ॥ इति छाया ॥ २८ ॥]

सिहिंपिच्छकरणपूरा जआ वाइरस गभीरओ भमइ । मुक्काफलरइअअपमअहणाणं मज्झे सवत्ताणं ॥ [शिवपिच्छकरणपूरा जाया व्याधस्य गविंणी अभवति । मुक्ताफलरचितप्रसाधनानां मध्ये सप्तनीनाम् ॥ इति छाया ॥ २८ ॥]

The peacock's feather decoration is complete, the hunter's wife is deeply engrossed. Among the seven, the pearl ornament is the most beautiful.

अथवा जैसे [कविनिबद्धवचनेत्प्रौढोक्तिसिद्धका दूसरा उदाहरण]—

Or as another example of poetic expression

आदरपूर्वक सहारा देते हुए यौवनके सहारे उठनेवाले तुम्हारे स्तन [उठ कर] कामदेवको [स्वागतमैं] अभ्युत्थान-सा प्रदान कर रहे हैं ।

Your breasts, rising with the support of youth, are offering a welcome like a respectful rise.

[कवि और कविनिबद्धकी कल्पनाके लोकसे] बाहर भी उचित रूपसे जिनके आस्तित्वकी संभावना हो, केवल [कवि या कविनिबद्धकी] उक्तिमात्रसे ही सिदृ न होना हो वह स्वतःसम्भवी [कहलाता] है । जैसे [१३२ पृष्ठपर] ‘पदंव आदिनि देवयौं’ इत्यादि उदाहरण दिये चुके हैं ।

Those whose existence is possible beyond the imagination of poets and poetry, not just by the statement of poets or poetry, are called inherent. Examples like ‘पदंव आदिनि देवयौं’ have been given earlier.

अथवा [कविनिबद्धवचनेत्प्रौढोक्तिसिद्धका तीसरा उदाहरण] जैसे— [केवल] मोरपंखका कर्णपूर पहनने हुए दयाधकी [नवीन] एत्थी मुक्ताफलौंकेआ आभूषणोंसे अलंकृत सपत्नियोंके बीच अभिमानसे फूली हुई फिरती है ।

Or as another example of poetic expression—wearing only a peacock feather ear ornament, the young wife is proud among her co-wives adorned with pearl ornaments.

यहाँ अलंकार वस्तु केवल कविकलपनासिद्ध नहीं हैं, अपितु वास्तवमें लोकमें भी उसका अस्तित्व सम्भव है, अतएव वह स्वतःसम्भवी है । गर्दनका कारण यह है कि वह सपत्नियोंके दिन से तब तो व्याघ हार्थी आदरकर लाता था जिससे मुक्त भूपण बनते थे । परन्तु अब मेरीं पाकशे तां निक- लनेका अवकाशो ही नहीं मिलता है । यह संभाव्यतिद्र्वाय व्यंग्य है ।

Here, the poetic figure is not just a product of the poet's imagination, but is also possible in reality. The reason for the neck is that it used to be adorned with ornaments made from the tusks of elephants, etc., but now there is no opportunity to wear them. This is a suggested meaning.

इस प्रकार स्वतःसम्भविके ‘पदंव आदिनि०’ तथा ‘शिविपिच्छ०’ दो, कविनिबद्धचनेत्प्रौढोक्ति- सिद्धके ‘शिवसरिणि०’ और ‘शादर०’ दो तथा कविप्रौढोक्तिसिद्धका एक ‘सज्जयति०’ ये कुल पाँचउदाहरण दिये । इन सबमें वस्तुतः वस्त्ववयव है, आगे अलंकारसे अलंकारातिद्र्वयव्यञ्जकका निरूपण करते हैं ॥२४॥

Thus, there are five examples in total: two of inherent possibility, ‘पदंव आदिनि०’ and ‘शिविपिच्छ०’; two of poetic expression, ‘शिवसरिणि०’ and ‘शादर०’; and one of poetic suggestion, ‘सज्जयति०’. In all these, there is a literal meaning, and further, the expression of the suggested meaning through poetic figures is explained.

१. द्वितीयने 'यथा वा' और उसके आगे उद्धृत उदाहरण नहीं दिया है ।

  1. The second section does not provide an example under 'यथा वा'.

Page 185

कारिका २५-२६ ] तृतीय उद्योतः १३९

अर्थ प्रकरणलङ्कारो व्यङ्ग्याप्यनुगः प्रतीयते ।

अनुस्वानोपमद्गुणस्य स प्रकटोरसरो ध्वने: ॥२५॥

वाच्यालङ्कारस्य तिरस्को वाच्यान्योलङ्कारोदयेऽर्थसामर्थ्याद् प्रतीममानोद्भासनं

प्रतीममानोदवभासने

तस्य प्रविरलविरलत्वमाश्रित्य ये तमुच्यते—

रूपकादिरलङ्कार्यो यो वाच्यतां त्रिलत: ।

स सर्वो गम्यमानत्वं विधृत्य भुङ्क्ते प्रदर्शित: ॥२६॥

अन्यच्च वाच्यलङ्कारैरप्रसिद्धो यो हृपकादिरलङ्कार: सोऽन्यत्र प्रतीममानतया वाह्य-

ल्येन प्रदर्शितस्तत्र भवद्भिरहेतूत्प्रातिभिः । तथा च सन्देहादिप्रकाशमारूपकार्तिसंयोक्कीनां

प्रकाशमानत्वं प्रदर्शितमित्यलङ्कारान्तरस्यालङ्कारान्तरे व्यङ्ग्यत्वं न यत्नप्रतिपाद्यम् ॥ २६॥

इयत् पुनरुच्यते एव—

अर्थशक्त्युद्भव अलङ्कारध्वनि

जहाँ अर्थशक्तिसे [वाच्यालङ्कारसे भिन्न] दूसरा अलङ्कार प्रतीत होता है वह

ध्वनि [काव्य] का दूसरा [अलङ्कारसे अलङ्कारव्यङ्ग्य] संलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य [नामक]

भेद है ॥२'५॥

जहाँ वाच्य अलङ्कारसे भिन्न दूसरा अलङ्कार अर्थसामर्थ्यसे व्यङ्ग्यरूपसे प्रतीत

होता है वह संलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्यरूप अर्थशक्त्युद्भव ध्वनि [का अलङ्कारसे अलङ्कार-

व्यङ्ग्य] भेद है ॥२५॥

अलङ्कारध्वनिका विषय बहुत हैं

उस [अर्थशक्तिमूल अलङ्कारसे अलङ्कारव्यङ्ग्य ध्वनि]का विषय बहुत ही कम

होगा ऐसी आशङ्कासे [ही आगे] यह कहते हैं कि—

[साधारणत:] वाच्यरूपसे प्रतीत होनेवाला जो रूपक आदि अलङ्कारसमूह है

वह [दूसरे स्थलोंपर, दूसरे उदाहरणमें] सब गम्यमानरूपमें [बहुतेक्रटादिने] मचुर

मात्रमें दिखलाया है ॥ २५॥

अन्य उदाहरणोंमें वाच्यरूपसे प्रसिद्ध जो रूपकादि अलङ्कारसमूह है वह अन्य

स्थलोंपर प्रतीममानरूपसे भट्टोद्भटादिने बहुत [विस्तारसे] दिखलाया है। इस्से

सन्देहादि [अलङ्कारों]में रूपक, उपमा, अतिशयोक्ति आदि [अलङ्कारान्तरों]का प्रतीम-

मानत्व [व्यङ्ग्य-वस्तु]

[अलङ्कारसे अलङ्कारव्यङ्ग्य-] हो सकता है इसका प्रतिपादन प्रयत्नसाध्य [कठिन]

नहीं हैं ॥२५॥

अलङ्कारध्वनिमें अलङ्कारकी प्रधानता

[फिर भी केवल] इतनी बात [विशेष रूपसे] कहते ही हैं कि—

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ध्वन्यालोकः

अलङ्कारान्तरस्यापि प्रनीलौ यत्र भासते । तत्परत्वं न वाच्यस्य नासौ मार्गो ध्वनेर्मतः ॥२७॥

'अलङ्कारान्तरेपु त्वनुरणनंपालङ्कारप्रतीतां सत्यामपि यत्र वाच्यस्य व्यङ्ग्य-प्रतिपादनौमुख्येन चारुत्वं न प्रकाशते नासौ ध्वनेर्मार्गः । तथा च दीपकालङ्कारे' उपमाया गम्यमानत्वेऽपि तत्परत्वेन चारुत्वस्याव्यवस्थाना[न्न] ध्वनित्वप्रदेशः । यथा— जलधरपङ्क्तौँ जिसा णहिरि कमलणिहँ कुसुमगुच्छणिहाँ लइआ । हंसेइँ सरअसोहा कव्वकहा सज्जणेइँ करइ गरुइ ॥ [च-न्रमयूखोंविंशा नॉलिनी कमलें कुसुमगुच्छेल्लेता । हंसेइँशारदशोभा काव्यकथा सज्जनैः क्रियते गुरुभिः ॥ इति छाया] इत्यादिपूर्वमागर्भेऽपि सति वाच्यालङ्कारसुखेनैव चारुत्वं व्यतिरिक्त्ते न व्यङ्ग्यालङ्कारतांस्पृशेत् । तस्मात्त्र वाच्यालङ्कारसुखेनैव काव्यस्य पदेशोः न्याय्यः । यत्र तु व्यङ्ग्य-चपरत्वेनैव वाच्यस्य व्यवस्थानं तत् व्यङ्ग्य-नमुखेनैव व्यपदेशो युक्तः ।

यथा—

[पक्ख वाच्य अलङ्कारस हूअरे] अलङ्कारान्तरकी प्रतीति होनेपर भी जहाँ वाच्य [अलङ्कार] तत्पर नहीं [प्रतीयमान अलङ्कारको प्रधानतया बोधित नहीं करता] है [हमारे मतमें] वह ध्वनिका विपय नहीं माना जा सकता है ॥२७॥ [दीपक आदि] दूसरे अलङ्कारोंमें सङ्लक्ष्य-क्र-व्यङ्ग्य [उपमादि] दूसरे अलङ्कारकी प्रतीति ध्वानपर भी जहाँ वाच्य [दीपक आदि अलङ्कार]की व्यङ्ग्य [उपमादि] प्रतिपादन-प्रवणतासे ही चारुत्वका प्रतिभास नहीं होता है वह ध्वनिकका मार्ग नहीं है । इसीसे दीप-कादि अलङ्कारमें उपमान गम्यमान ध्वानपर भी उस [उपमा]ले प्राधान्यसे चारुत्वकी व्यवस्था न होनेसे [वहाँ उपमालङ्कारमें] ध्वनिक्यवधार नहीं होता है । जैसे— चन्द्रमाकी किरणोंसे रात्रि, कमललुप्पोंसे नलिनी, पुष्पतवकोंसे लता, हंसोंसे दारदुके सौन्दर्य, ओर सज्जनोंसे काव्यकथाकी गौरवृद्धि होती है । इत्यादि [दीपक अलङ्कारके उदाहरणमें] [गुरुकरणरूप एकगधमाभिसम्बन्ध-सादृश्यक कारण] उपमानके मध्यपतित ध्वानपर भी याध्य [दीपक] अलङ्कारके कारण ही चारुत्व स्थित होता है, व्यङ्ग्य [उपमं] अलङ्कारक तत्पर्य [प्राधान्य]स नहीं । इसलिए यहाँ वाच्य [दीपक] अलङ्कारके द्वारा ही काव्यस्यज्यङ्कार करना उचित है । और जहाँ वाच्य [अलङ्कार] की स्थिति व्यङ्ग्य [अलङ्कार] परतया [व्यङ्ग्यकी प्रघानतापरक] ही हो वहाँ व्यङ्ग्य [अलङ्कार]के अनुसार ही व्यवधार [नामकरण] करना उचित है । जैसे—

१. 'अलङ्कारान्तरस्य यत्रकादेरलङ्कारयत्नतो' नि०, दी० । २. 'दीपकादावलङ्कारे' नि०, दी० । ३. 'यथा' दी० ।

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कारिका २९ ] द्वितीय उद्योतः ९५९

प्रातश्रीरेष कुसुम पुनरपि मयि तं मन्यरुहं विदध्यानिद्रामत्यस्य पूर्वोक्तनलसमनसो तेन्व सम्भाव्यामि । सेतुं बध्नाति भूः किमिति च सकलद्वोपनाथानुयातस्वध्याययाते वितर्कानिति दधत इवाभाति कम्पः पयोधे: ॥ यथा वा ममैव—

यहाँते आगे ध्वन्यालङ्कारेके अनुसार नामकরণ अर्थात् ध्वनिध्वहार होना चा़हिये इसको स्पष्ट करनेके लिये अलङ्कारश्वनिके ९९ उदाहरणोंको देकर विस्तृतपूर्वक इस विषयकी विवेचना की है ; ऐसे अलङ्कारश्वनिके प्रसङ्गमें जहाँ वाच्य अलङ्कार ध्वन्य अलङ्कारको व्याप्त करता है वहाँ अलङ्कारसे अलङ्कारव्यङ्गव्य हाँता है । कहहीं-कहीं वाच्य अलङ्कार रहता ताँह परन्तु वह व्यङ्गक नहीं हाँता और कहहीं वाच्यालङ्कार हाता ही नहीँ । इन दानों स्थितयोमे अलङ्कारसे भिन्न, वस्तुमात्र अभिप्र्यङ्गक हाता है । अतएव उन उदाहरणोंमें वस्तुंञ अलङ्कार व्यङ्गव्य माना जाता है । आगे दिये गये अलङ्कारश्वनिके म्यारह उदाहरणोंमें दानों प्रकारके उदाहरण हें । फिर उस व्यङ्गक्य साधीमें स्वतःसम्भवी, कविभ्रौढोक्तिसिद्ध आँर कविनिबद्धवस्तुप्रसूतसिद्धका भी भेद होता है । आलङ्कारिकोंने उदाहरणोंका समन्वय करते समय इन भेदोंका समन्वय नहीं किया है । परन्तु फिर भी समन्वय करते समय उनका ध्यान रस्बना अच्छा ही हागा ! इसी आधारपर नवीन आचार्योंने अर्थशास्त्रसिद्धवके ९२ भेद किये हैं ।

९. इसको [नेने पाटने थी] लक्ष्मी प्राप्त हैं , फिर यह सुना यह पूर्वाज्ञात मन्थन [जन्म] हुंञ्श्र कयों देता । [इस समय] आलस्यरहित मनक कारण इसक पहिले जैसी [दीर्घकालीन] निद्राकी भी कौँइ सम्भावना नहीं जान पड्ती । सान्द द्वीपाँक राजा [तों] इसक अनुचर हो रहें हैं । फिर यह हुंञ्श्रा सेतुबन्धन कयों करेगो । हे राजन्, तुम्हार [समुद्रतटपर] आनेसे मानो इस प्रकारके सन्दहोंके धारण करनेस ही समुद्र कॉंप रहा है ।

यहाँ समुद्रके सामानिक या चन्द्राद्यादिनिमित्तक जलचाञ्चल्यरूप कम्पमें, विशाल सेना समेत समुद्रतटपर आये हुए राजाको देख्कर मथन या सेतुबन्ध्यादि सन्देहनिमित्तक भयाञ्चलसूत वेपथुरूप कम्पता उप्रेक्षा की गयी है । इस्सलिए यहाँ सन्देह आँर उप्रेक्षाका आङ्गाङ्गिभावसदृरालङ्कार [कविभ्रौढोक्तिसिद्ध] वाच्यालङ्कार है, उससे राजाकी शसुदेवचक्रुपता अर्थातू राजामें वासुदेवका आरोपमूलक रूपक अलङ्कार व्यङ्गव्य है । इस प्रकार यह कविप्रौढोक्तिसिद्ध अलङ्कारसे अलङ्कारव्यङ्गव्य रूपकध्यानिके उदाहरण है ।

यहाँ यह धाकू हाँ सकती है कि वासुदेवकी अपेक्ष्रा राजामें प्राप्तश्रीकत्व, अनलसमनस्कत्व, और द्वीपनाथानुगतत्व आदि धर्मोंका आधिक्य प्रतीत होनेसे वासुदेवाभेदरूप रूपकालङ्कार नहीं अपितु व्यतिरेकालङ्कार व्यङ्गव्य हो सकता है । परन्तु यह व्यतिरेक वास्व नहीं है । वासुदेवका जो स्वरूप वर्तमानमें प्रसिद्ध है उसमें उनके साथ भी प्राप्तश्री आदि यह सब धर्म विद्यमान् ही है, अतः व्यतिरेकके अवलास्व होनेसे और अभेदारोपमें कौइ वाचक न होनेस यहाँ रूपकध्यनि ही है । व्यतिरेकालङ्कार

अथवा जैसे मेरा ही— ९०

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ध्वन्यालोक:

लावण्यकान्तिपरिपूरितदिङ्मुखवेदस्मिन् स्मेरेडघुनातवमुचव तरलायताक्षि । क्षोभं यदेतिन मनागपि तेन मन्ये मुख्यतत्तमेव जलराशिरयं पयोऽधि: ॥ 'अनुरणनरूपकाश्रयेण' काव्यचारुत्वव्यवस्थाना्द्रूपकध्वनि-

रिति व्यपदिशो न्याय्य: ।

उपमाध्वनिर्नैय्या-

वीगणं वमइ घुसिणहुणणम्मि ण तहा पिआहणुवल्खइ ।

विट्ठो रिउगअंकुम्भस्थलम्मि जइह बहुलसिन्दूरेइहि ।

[वीगणं गमने घुसणारुणे ण तथा पियासतणोत्तमडए ।

हट्ठी गिपुगजकुम्भस्थले यथा बहुलसिन्दूरेइहि ।। इति च्छाया]

२. [प्रसिद्धता के कारण चक्षुता और विकारासे युक्त अतपचव] हे चक्खल और वीप्सान्त्रध्वनिभरिणी [भरी], अथ [कोपकातिशयक वाद प्रसादोन्मुख मुखके] लावण्य [संस्थान-

सौन्दर्य] और कान्तिमें द्विदृगन्तरका [पूर्णिमाके चन्द्रमे समनन] परिपूर्ण कर देनेवाले तुम्हारे मुखके मदनमथनसुखातिरेक होने [करने] पर भी इस [समग्र] में तनिक भी चञ्चलता दिखाई नहीं पडती है, इससे यह स्पष्ट प्रतीत होता है कि यह पयोऽधि [निरा] जलराशि

[जडपुन्ज तथा जलसमुद्रमात्र] है ।

यदि यह जड नहीं, महद्ज्ञान हत्ना तो पूर्णचन्द्रसदृशा तुम्हारे मुखको देखकर उसमें मदनविकार-

रूप क्षोभ और समुद्रमें यथेष्ट चञ्चलता ओर मुखारें मुखके सादृश्यंगत तारतम्यकों समझनेकी बुद्धि होती

तो उसमें चन्द्रमें भी अधिक सुन्दर तुम्हारे मुखको देनेंकर जलाश्रयनिरूप शोम अवलय होता ।

अथ कविनिबन्धनायिकाकी उक्ति है । जनश्रदिंअं वलेगालद्दवार वाच्य है, उससे नायिकाके मुखपर

पूर्णिमाचन्दद्रका आंगभूत रुपक अलङ्कार व्यङ्ग्य है । इसलिये यह कविनिबन्धकवतुप्रबोधनिसिद्ध

अलङ्करे अलङ्कार्यनिरूपण-न्यायका उदाहरण है ।

रूपकध्वनि

इस प्रकारके उदाहरणों [विपय], में सङ्केत्यक्रमव्यङ्ग्य रूपकके आश्रयसे ही

काव्यकला चारुत्व व्यवस्थित हाता है, इसलिये [यहाँ] रूपकध्वनि व्यवह्हार [नामकरण]

ही उचित है ।

उपमाध्वनि [के उदाहरण] जैसे-

३. वीरोंकी हडप्ति प्रियतमाके कुडङ्कुमगण्ठित उरोजोंमें उतनी नहीं रमता जितनी

सिन्दूरसे पुते हुए शत्रुंक हृदयियाके कुम्भस्थलांमें [रमती है] । यहांपर वीरहिंसक प्रियाके स्तनोत्तम्भे रमणकी अपेक्षा रिपुगणोंके कुम्भस्थलरमण करनेमें

अतिशय प्रतिपादनमें स्त्रतःसम्भवी व्यतिरेकालङ्कारसे गजकुम्भस्थलमानुयोगिक प्रियाके

१. 'अनुरणनरूपकाश्रयेण' नि०, वी० ।

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कारिका २९ ] द्वितीय उद्योतः १४२

यथा वा समैव विषयवणॅललीलायामशुरपराक्रमे' कामदेवस्य—

तं ताण सिरिसहोअरअणाहरणणमि हिअअमेकरसम्म । विम्वाहरे पिआणं णिवेसिओं कुसुमवाणेण ॥ [नत्तणं धीसहोदररत्नाहरणे हृदयमेकरसम् । विम्वाधरे प्रियांणां निवेशितं कुसुमवाणेन ॥ इति च्छाया]

कुन्तोक [पियाकुन्तकुहरुमलप्रतियोगिक] साहचर्यलुप उपमा व्यज्जय है । उसके कारण उन कुम्भस्थलोंके मदनमें वीरोंका अधिक आनन्द आता है । इस प्रकार व्यज्जय उपमा अलंकार वीरता तिदर्शयके नम्तकारजनक होनेसे यह स्वतःसम्भवी अलङ्कारसे भलङ्कार रसात्मक व्यङ्ग्य उपमालंकारिका उदाहरण है ।

अथवा जैसे 'विपमवाणलीलायां' [नामक स्वरचित काव्यमें] [जैलोक्यविजयी] कामदेवके [असुरविपयक पराक्रमके] वर्णन [कं प्रसङ्गमे] मेरा ही [बनाया निम्नलिखित श्लोक उपमा'ध्यानिका दूसरा उदाहरण] है ।

४. लक्खणोक सहोअर [अस्यान्त उत्कृष्ट] रत्नके आहारणमें तत्पर उन [असुरोंके] उस [संदेइ गुझोदयत] हृदयको कामदवने प्रियाओंकं अधरविधम्व [के रसास्वाद] में तत्पर कर दिया ।

यहाँ अतिशयोक्ति अलङ्कार वाच्य है और उससे प्रियाका अधरविम्व सकलरलसारूप कौस्तुभमणिके समान है यह उपमालङ्कार व्यङ्ग्य है । अतः कविमागोदोक्तिसिद्ध अलङ्कारसे अलङ्कार व्यङ्ग्य उपमालंकारिका उदाहरण है ।

काव्यप्रकाश' कारने पर्यायो अलङ्कारके उदाहरणरूपमें इस श्लोकको उद्धृत किया है और उसके टीकाकारोंने इसका अर्थ भी अन्य प्रकारसे किया है । 'श्रीमहोदररत्नाअरणे' के स्थानपर उन्होंने 'श्रीमहोदररत्नाभरेग' यह छायानुवाद किया है, परन्तु मूल प्राकृत श्लोकमें 'रअणाहरणणिमि' यही पाठ रखा है । इस प्राकृत पाठका छायानुवाद तो 'रत्नाहरणे' ही हो सकता है, 'रत्नाभरणे' नहीं । इसलिए 'काव्यप्रकाश'के टीकाकारोंका छायानुवाद ठीक नहीं है । इसीलिए उसने आधारपर जो व्याख्या उन्होंने की है वह भी ठीक प्रतीत नहीं होती । उन्होंने श्लोकका अर्थ इस प्रकार लगाया है कि 'श्रीमहोदररत्न अर्थात् कौस्तुभमणि जिनका आभरण है ऐसे विष्णुंमें एकरस एकाग्र देतोंका मन, मोदिनीरूपपधारिणी प्रियाके अधरविधम्वके पानमें कामदेवने प्रवृत्त कर दिया' । यह अर्थ भी ठीक नहीं है । मूलमें 'प्रियांणां' यह स्पष्ट ही बहुवचन है, उससे एक मोहनीक साथ उसकी सङ्क्रति नहीं हो सकती है । वह स्पष्ट ही उनकी अपनी प्रियाओंका वाचक है, मोहनीका नहीं । फिर विष्णुंमें असुरोंके हृदयकी एकाग्रता एकरसता भी असङ्कत है । टीकाकाराने यह सब अनर्थ पर्यायोक्तका लक्षण समन्वित करनेके लिए किया है । असुरोंका हृदय पहिले विष्णुमें एकरस था, कामदवने उसका प्रियाओंके अधरविम्वमें लगा दिया । इस प्रकार 'एऋं क्रमेण अनेकगां कियंते' इस पर्याय अलङ्कार लक्षणका समन्वय करनेका प्रयत्न उन्होंने किया है । परन्तु उनका और स्वयं काव्यप्रकाशकार मम्मटाचार्यंका यह प्रयत्न लोचनकार और इस पचके निर्माता स्वयं ध्वन्या लोककार—जिन्होंने इसे उपमा'ध्यानिका उदाहरण माना है—के अभिप्रायके विरुद्ध है । लोचनकारकी प्रामाणिक व्याख्या स्वीकंने रहते हुए भी इन लोगोंने अपने हठ्ठिकोणसे इस प्रकारका भिन्न अर्थ किया है !

१. 'पराकमे' दी० ।

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कारिका २७ ] द्वितीय उद्योत:

द्वितीयस्योदाहरणं यथा—

हिअअटू बिअमणं अवरुण्णमुहं हि में पसआन्त । अवरदस्स वि ण हु दे पहुजाणअ रोसिअं सक्कम् ॥

[हृदयस्थापितमन्युमपरोषसुखीऽस्मि मां प्रासादयत् । अपराद्धस्यापि न स्त्रुत ते बहुज्ञ रोचितं शक्यम् ॥ इति च्छाया]

अत्र हि वाच्यविशेषण सापराधस्यापि वहुज्ञस्य कोप: कतुमशक्य इति समर्थनं

'सामान्यमन्वितमन्यत्तात्पर्येण प्रकाशते ।

व्यतिरेकध्वनिरप्युस्यरूप: सम्भवति । तत्रास्योदाहरणं प्राक् प्रदर्शितमेव ।

द्वितीयस्योदाहरणं यथा—

जाएअ वणुहेसे खुद जि बिअ पाओवो गडिअवत्तो । मा माणुसण्णि लोए ताइकरसो दरिद्धो अ ॥

अप्रस्तुतात् प्रस्तुतं चेदं गम्यते पद्याभा ततः । अप्रस्तुतपदार्थानां स्वातु"

यह अर्थान्तरन्यास तथा अप्रस्तुतप्रशंसाके लक्षण हैं।

अप्रस्तुत रसशोक ऋक्षके विलापतनेसे लोकोत्तर . प्रयत्न करनेपर भी निफल होनेवाले किसी व्यक्ति.की प्रचंासरूप प्रस्तुतकी प्रतीति होनेसे अप्रस्तुतप्रशंसाका अलंकार होता है । परन्तु फल शब्दसे

भाम्यवद्रा होनेवाली निफलताका समयंक पहिले ही प्राप्त हो जाता है । इसलिए यहाँ फलरूप शब्दकी

वृत्तिसे सामान्यसे विरोध समर्थनरूप अर्थान्तरन्यास अलंकार व्यक्ङ्गय होता है और उसकी पदसे प्रथम प्रतीति हो जानेसे यह अर्थान्तरन्यासध्वनिका ही उदाहरण है, वाच्यगम्य अप्रस्तुतप्रशंसासाच्वनिका नहीं।

ध्वनिके जितने भेद किये गये हैं .वे पदप्रकाश्य और वाक्यप्रकाश्य हाँते हैं यह आगे कहेंगे—यहाँ

अर्थान्तरन्यासध्वनिके पदप्रकाश्य और अप्रस्तुतप्रशंसाका वाक्यप्रकाश्य है, इधरलिए विरोध नहीं है ।

दूसरे [अर्थशास्त्रिमूल संलक्ष्यध्वनिकमध्येऽन्य]का उदाहरण—

७. हृदयमें क्रोध भरा होनेपर भी मुखपर उसका [क्रोधका] भाव प्रकट न करने-

वाली मुखको भी तुम मना रहे हो इसलिए [प्रकट भावसे व्यतिरिक हृदयस्थित भावको भी जाननेवाले] हे वञ्ज्ञ, तुम्हारे अपराधी होनेपर भी तुमसे क्रोध नहीं किया जा सकता ।

यहाँ .वाच्यार्थविशोषसे, वहुज्ञके सापराध होनेपर भी [उसपर] क्रोध करना

सम्भव नहीं है यह समर्थनक अर्थ सामान्य तात्पर्यसे सम्बन्ध बनाये विरोषका अभिव्यङ्गक

करता है [अतः अर्थान्तरन्याससच्वनि है] ।

व्यतिरेकध्वनिरपि [शब्दशक्त्युत्थ और अर्थशक्त्युत्थ] दोनों प्रकारका हो सकता

है । उनमेंसे प्रथम [शब्दशक्त्युत्थका] उदाहरण [सं येडत्युज्झवल्यन्ति० इत्यादि पृष्ठ १३०

पर] पहिले दिखा ही चुके हैं । दूसरे [अर्थशक्त्युत्थका] उदाहरण जैसे—

८. [एकान्त निर्जन] वनमें पत्त्तरहित कुबड़ा वृक्ष बनकर भले ही पैदा हो जाऊँ

परन्तु दानकी रुचियुक्त आँख दरिद्र होकर मनुष्यलोकमें पैदा न होऊँ !

९. ‘अर्थसामान्य’ नि०, दी० ।

२. ‘गडिअवत्तो’ = ‘वडितपत्र:' नि०, दी० ।

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ध्वन्यालोक:

[जायेय नोहेरे कुंज एव पादपो गलितपत्रः । मा मानुषे लोके त्यागैकरसो दरिद्रदृशः ॥ इति छाया]

अत्र हि त्यागैकरसस्य दरिद्रस्य जन्माभिनन्दनं कुटिलतपत्रकुटजपादपजन्माभिनन्दनं च साक्षाच्छब्ददवाच्यम् । तथाविधादपि पादपात् तादृशस्य घुंस उपमानोपमेयताप्रतीति-पूर्वकं शाङ्क्यताऽऽयामाधिक्यं तात्पर्येण प्रकाशयति ।

उत्प्रेक्षाऽऽध्वनिर्णयः—

चन्दनासक्तभुजगानि:श्वासानिलमूर्छितत् । मूर्छ्छाद्गते पथिकाननं मधौ मलग्नमारुतः ॥

अत्र हि मधौ मलग्नमारुतस्य पथिकमूर्छिताननर्तिंव मन्यथोनमार्थादित्यनेनैव । तत्-चन्दनासक्तभुजगानि:श्वासानिलमूर्छिततनेनैवोपक्षितमित्युक्तप्रेक्षा साक्षादुक्ताऽऽपि वाक्यार्थे-सामर्थ्यादन्तुरणानुरूपा लक्ष्यते । न चैनंविधे विषये इत्थादिगद्यप्रयोगमन्तरे णासम्भवदतैवति' शङ्क्यते वक्तुम् । गमकत्वादन्यत्रापि तद्र्थप्रयोगे तदर्थावगतिदर्शनात् । यथा—

यहाँ दानकी रूचिवाले दरिद्र [पुरुष] के जन्मकी निम्दा और पत्र-विरहित कुटज वृक्षके जन्मका अभिनन्दन शब्दोंमें साक्षात् वाच्य है । और वह [वाच्य] उस प्रकारके वृक्षसे भी उस प्रकारके पुरुषकी शोचनীয়ताके आधिक्यको वाक्यसे उपमानोपमेयभाव [सादृश्य] प्रतीतिपूर्वक तार्पर्यसे व्यङ्ग्यनाऽऽचष्टे । सङ्केतना द्वारा प्रकाशित करना है [अतएव यहाँ अर्थगतिमूल व्यतिरेक्वनि है । यहाँ वाच्य कोई अलङ्कार नहीं है अतएव सत्-सम्भवी वन्नुसहित व्यतिरेकालङ्कारध्वनि व्यङ्ग्य है] ।

उत्प्रेक्षाऽऽध्वनि [का उदाहरण] जैसे—

९. चन्दन [वृक्ष] में लिपटे हुए सर्पोंके नि:श्वासवायुसे मूर्छित यह मलयानिल वसन्त ऋतुमें पथिकोंको मुर्छित करता है ।

यहाँ, वसन्त ऋतुमें कामोद्दीपन द्वार पेड़ाकारी होनेसे ही मलयानिल पथिकोंको मूर्छाकारी होता है । परन्तु यह वह [मूर्छाकारित्व] चन्दनमें लिपटे हुए सर्पोंके नि:श्वासवायुसे मूर्छित—वृद्वित—होनेके कारण उतप्रेक्षित किया गया है । [विषाक्त वायके मिल जानेसे मलयानिल मूर्छाकारी होता है । अथवा पथिकोंमें एककी मूर्छा अन्योकी भी धैयच्युति द्वारा उनके मूर्छाका कारण बन सकती है] । इस प्रकार उत्प्रेक्षा साधार [उत्प्रेक्ष्यविषयक सादृश्यादि शब्दोंके] कथित न होनेपर भी वाक्यार्थसामर्थ्यसे संलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य-रूपमें प्रतीत होती है । [इसीप्रकार यहाँ कविप्रौढोक्तिसिद्ध वस्तुसे उत्प्रेक्षालङ्कारध्वनि व्यङ्ग्य है ।] इस प्रकारके उदाहरणों [विषयों] में [उत्प्रेक्षा-वाचक] 'ध्रुव' आदि शब्दोंके प्रयोगके बिना [उत्प्रेक्षा] आदिका सम्भव नहीं हो सकता यह नहीं कहा जा सकता है । [बोधककी प्रतिभाके सहयोगसे चन्दनासक्त इत्यादि विशेषणके उत्प्रेक्षा] बोधक होनेसे अन्य उदाहरणोंमें भी उन [ध्वनि]के प्रयोगके बिना भी उस [उत्प्रेक्षा]की प्रतीति देखी जाती है । जैसे—

९. 'जसमददेव' नि०, टी० । २. 'श्वास्यमू' नि०, टी० ।

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कारिका २७ ] द्वितीय उद्योतः १४९

ईसा कलुसस्स वि तुह मुहस्स ण एस पुण्णिमाचन्दो । अज्ज सरिसच्चं पाविऊण अज्ज वि ण माइ ॥ [ईदृशकलुषस्यापि तब मुखस्य नैवेष पूर्णिमाचन्द्रः । अद्य सदृशतयं प्राप्य अत्र ग एव न माति ॥ इति छाया]

यथा वा— ग्रासाकुलः परिपतन् पारितो निकटान् पुम्प्रान् कैश्चिदपि धन्विभिरन्व्वान्विथ । तस्थो तथापि न मुगः कविकृदृनाभिराकार्णपूर्णणयनेःपुटह्नेक्षणश्रीः ॥

शब्दार्थव्यवहारे च प्रसिद्धिरेव प्रमाणम्

आज यह पूर्णिमाचन्द्र तुम्हारे ईदृश्योसे मलिन मुखकी भी समानता पाकर मानों अपने जागीरमें सम्राट् ही नहीं है । यहां पूर्णिमाचन्द्रका सब दिशाओंको प्रकाशसे भर देना जो एक स्वाभाविक कार्य है वह मुखसादृश्यमाहिसहृतेकल्वेन उद्देक्षित है । यहांं प्राकृत श्लोकमें ‘वि’ पाठ है । उसका छायानुवाद पंक किया गया है । वैसे उसका इव अनुवाद भी हो सकता है । परन्तु यहां इस श्लोककी इसी वातके सिद्ध करनेके लिये तो उदाहणरूपमें प्रस्तुत किया गया है कि यहां ‘इव’ शब्दका प्रयोग न होनेपर भी उपेक्षा है । ‘वि’ के ‘एव’ अनुवाद करनेसे अर्थकी सङ्कृति आधक चलवती हो जाती है । फिर भी यदि कोई आपत्ति करे तो उसके सन्तोषके लिये प्रस्तुतकार ईदृशी प्रकारका दूसरा उदाहरण भी देते हैं—

अथवा [वाचकके अभावमें भी उपेक्षाका दूसरा उदाहरण] जैसे— भयसे नयाकुल, घरोंके चारों ओर घूमते हुए इस हरिणका किमपि घनुर्धारी पुरुषोंने पीछा नहीं किया, फिर भी किययोंके कारणोत्कं पड़े हुए नयनोंने वाणोंसे [अपनी सर्वस्वभूत] नयनश्रीके नष्ट कर दिये जानेके कारण ही मानों कहां उहर नहीं सका ।

शब्द और अर्थके व्यवहारमें [सहृदयानुरूप] प्रसिद्धि ही [अर्थप्रतीतिमें] प्रमाण है ।

यहां भी ‘इव’ वाचकके अभावमें हेतुहेतुमती प्रतीति होती है । ऐसी इवादि शब्दके अभावमें असम्भद्दार्थकता नहीं कही जा सकती । यहां फिर यह शङ्का की जा सकती है कि ‘चन्दनसक्त’ इत्यादि श्लोकमें इव शब्दके अभावमें उपेक्षाकी असम्भद्दार्थकताकी जो शङ्का हमने की थी उसका सङ्ङन करनेके लिये आपने यह उदाहरण दिया है, परन्तु यह उदाहरण भी तो उसी प्रकासका है । इसलिए यहां असम्भद्दार्थकता नहीं है इसमें ही क्या विनिगमक होगा । इस शङ्काके समाधानके लिये ग्रन्थकारने ‘शब्दार्थव्यवहारे च प्रसिद्धिरेव प्रमाणम्’ यह पंक्ति लिखीं है । इसका अभिप्राय यह है कि यहां इवादिके अभावमें भी सहृदय लोग उपेक्षाका अनुभव करते हैं । अतएव शब्दार्थव्यवहारे प्रसिद्धि अर्थात् सहृदयोंका अनुभव ही प्रमाण है । उस अनुभवसे वहां इवादिके अभावमें भी प्रतीति होनेते असम्भद्दार्थकता नहीं हो सकती ।

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ध्वन्यालोक:

अलङ्कारध्वनिनिर्यथा—

रम्या इति प्राप्तवती: पताका रागे' विविक्ता इति वर्धयन्ती: । यस्सामसेवन्त नमदृढलीका: समं वधूभिर्येलभ्रीयुजान: ॥

अत्र वधूभिः सह वलभीरसेवन्त इति वाक्ये 'प्रतीतिरनन्तरं वधू इव वलभ्य इति अलेषप्रतीतिरशाब्दाप्यर्थसामर्ध्यान्मुख्यतयैव वर्तते' ।

यथासंख्यध्वनिनिर्यथा—

अङकुरित: पल्लवित: कोरकित: पुष्पिततनु सहकार: । अङकुरित: पल्लवित: कोरकित: पुष्पिततनु रति मदन: ॥

अत्र हि यथोद्देशमुद्देशो यथारुत्वमनुरणनरूप मदनविशेषणभूताड्कुरितादिशब्दद्गतं तन्मदनसहकारयोस्तुल्ययोगितासमुच्चयलक्षणाद् वाच्यादतिरिक्त्यमर्थस्यते । एवमन्येऽप्यलङ्काराः यथायोगं योजनीयाः: ॥२७॥

अलेषध्वनि [का उदाहरण] जैसे—

१०. जिस [नगर]में नवयुवकगण, अपनी सुन्दरताके लिये प्रसिद्ध [अमुक सुन्दर है इस प्रकारकी प्रसिद्धि प्राप्तो, एकान्त अथवा शुद्ध उज्ज्वल [वेषभूषादि] होनेसे अनुरागको बढ़ानेवाला, त्रिवलीयुक्त [अपनी] वधूशोभासे सनाथ, रमणीयताको कारण पताकाओंसे अलंकृत, एकान्त होनेसे कामोद्दीपक और भुक्ते हुए छज्जोंसे युक्त, अपने छूटागागें [गज नदी कमल]का सेवन करते थे । यहाँ वधुओंके साथ [वलभियों] कूटागारोंका सेवन करते थे इस वाक्यार्थ-प्रतीतिमें वाद वधुओंके समान कूटागार इस अलेषकी प्रतीति श्री अर्थसामर्ध्यसे मुख्य-रूपमें होती है [अतः यहाँ स्वतःसम्भवी वस्तुमे अलङ्कारगणयक-रूप अलेषध्वनि है] ।

यथासंख्य [अलङ्कार] ध्वनि [का उदाहरण] जैसे—

११. आपके दृष्टिमें जैसे पहिले [पल्लवोंके] अङकुर निकले, फिर वह पल्लव वन गये, फिर वौर्फी कली आई और वह खिल गयी, इसी कमसे [उसीके साथ-साथ] हृदयमें कामदेव अङकुरित, पल्लवित, मुकुलित और विकसित हुआ । यहाँ [यथा उद्देष] प्रथम वाक्यपतित कमके अनुसार अङकुरित आदि शब्दों-को उसी क्रमसे [अनूदेश] कहनेसे मदन-विरोषणारूप अङकुरितादि शब्दोंमें जो संलक्ष्यक्रमभूतयकारत्व प्रतीत होता है वह कामदेव और आम्रवृक्षके तुल्ययोगिता या समुच्चयलक्षण वाच्यार्थतयसे उत्त्कृष्ट दिखलायी देता है । [अनयपक्षे यहाँ स्वतःसम्भवी अलङ्कारगणयक-रूप यथासंख्य अलङ्कारध्वनि स्पष्ट है ।]

इस प्रकार अन्य [ध्वनिरूप] अलङ्कार भी यथोचितरूपसे [स्वयं] समझ लेने चाहिये ॥२७॥

१. 'कामद'ं नि० ।

२. 'विवतते' नि०, दी० ।

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कारिका २८-२९ ]

द्वितीय उद्योत:

६५९

एवमलङ्कारध्वनिमार्गं व्युत्पाद्य तस्य प्रयोजनवतां म्यापयितुमिदमुच्यते—

शारीरिकरणं येषां वाच्यत्वे न व्यपाश्रयः ।

तेऽलङ्काराः परां छायां यान्ति ध्वन्यङ्गतां गनाः ॥ २८ ॥

ध्वन्यङ्गता चोभयत्र प्रकाशाभ्यां व्यज्जकत्वेन व्यज्ज्य-रत्नकेन च । ननु च प्रकारणाद्-

व्यज्ज्य-यत्नेनैतयवगन्तव्यम् ।

व्यज्ज्य-यत्नेऽलङ्काराणां प्राधान्य-विवक्षायामेव सति तत्रैव वनावन्नः-

पातः ।

एतस्माद् वु गुणीभूतव्यज्ज्य-वाच्यवर्ग प्रतिपादविष्यते ॥ ३ ॥

अकिंचित्वेन व्यज्ज्य-श्रतायामपि अलङ्काराणां द्वयी गतिः ।

कदाचिद् वस्तुमात्रेण व्यज्यन्ते कदाचिदलङ्कारेण ।

तत्र—

व्यज्यन्ते वस्तुमात्रेण यदलङ्कृतयस्तदा ।

भुवं ध्वन्यङ्गता तासाम्

अत्र हेतुः—

काव्यवृत्तेः सदाश्रयात्

॥ २९ ॥

अलङ्कारध्वनिका प्रयोजन

इस प्रकार अलङ्कारध्वनिके मार्गका [विस्तारपूर्वक] प्रतिपादन करके [अब]

उस [व्युत्पादन] की सार्थकता सिद्ध करनेके लिए यह कहते हैं कि [कटक-कुण्डलस्थानीय] जिन अलङ्कारोंकी वाच्यावस्थामें शरीररूपताप्राप्ति [भी] निश्चित नहीं है; व्यज्जकत्वप्राप्तिको प्राप्तकर वे अलङ्कार भी [न केवल साधारण शारीरको अपितु] परं चरुत्वको प्राप्त हो जाते हैं ॥ २८ ॥

अथवा 'वाच्यत्वेन' को एक पद मानकर, वाच्यलुपसे अशरीरिमूत कटक-कुण्डलस्थानीय जिन अलङ्कारोंका शरीरतापादनरूप शारीरिकरण सुवचियोंके [लिए अयत्नसाध्य होनेसे] सुनिश्चित है वे अलङ्कार भी व्यज्जकत्वप्राप्तिको प्राप्त कर अत्यन्त सौन्दर्यको प्राप्त हो जाते हैं ।

यह अर्थ भी हो सकताहै । [अलङ्कारोंकी] ध्वन्यङ्गता व्यज्जकलुप और व्यज्ज्यलुप दोनों प्रकालसे हो सकती है । उनमेंसे, यहां प्रकरणवशा व्यज्ज्यवत्सा ही [ध्वन्यङ्गता] समझनीचाहिये ।

अलङ्कारोंके व्यज्ज्य होनेपर भी [व्यज्ज्य-श्रयी] प्राधान्य विवक्ष होनेपर ही ध्वनिमें अन्तर्भाव हो-सकता है, नहीं तो [अपधान होनेकी दशा में] गुणीभूतव्यज्ज्यलत्त्व ही [प्रतिपादन किष्य] माना जायगा ॥ २८ ॥

अलङ्कारोंके प्राधान्यलुपसे व्यज्ज्य होनेमें भी दो प्रकारहैं । कभी वस्तुमात्रसे व्यक्त होते हैं और कभी अलङ्कारलसे ।

उनमेंसे—

जब अलङ्कार वस्तुमात्रसे व्यज्ज्य होते हैं तव उनकी ध्वन्यङ्गता [प्राधान्य] निश्चित है ।

इसका कारण [यह है कि]—

[यहाँ] काव्यवृत्तिका व्यापार ही उस [अलङ्कार] के आश्रित हैँ ॥ २९ ॥

१. 'काव्यवृत्तिस्थयाश्र्या' बालप्रियासं ।

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ध्वन्यालोकः

अलङ्कारानन्वरगयड्घ्यभावे

चारुत्वोक्तकार्थमो व्यक्ङ्ग्यप्राधान्यं यदि लक्ष्यते

पुत्र:—

ध्वनिग्रहणं भवेत् ।

उक्तं हि शेतन । चारुत्वोक्तकार्थनिवन्धना वाच्यार्थन्यक्क्ज्यो: प्राधान्यान्तरिवक्षा इति ।

वस्तुमात्रनयक्ङ्ग्यस्ये चालङ्काराणामनन्तरोपदर्शिते ऽस्य पवोदाहरणेष्यो विषय उन्नेय: । तदेवमर्थमात्रगत्या ड्घ्यविशेषपपेण वार्थन, अर्थान्तरस्यालङ्कारस्य वा प्रकाशने चारुत्वोक्तकार्ष-f वन्यते सति प्राधान्नेयड्घ्यशकत्युद्भवातुरणनरपचयक्ङ्ग्य यो ध्वनिरवगन्तव्य: ।

क्योंकि वहाँ उस प्रकारकं व्यक्ङ्ग्यथालङ्कारके वोधनके लिये ही काव्य प्रवृत्त हुवा है ! अन्यथा नो वह [वस्तुमात्रप्रतिपादक वमतकाररूपस्य] केवल वाक्यमात्र रह जायगा । [काव्य ही नहों रहगा ।]

उन्नी अलङ्कारोंकी—

दूसरे अलङ्कारोंसे व्यक्ङ्ग्य होनेपर,

फिर—

[व्यङ्ग्य अलङ्कार] ध्वनिरूपता [ध्वन्यत्ता] होती है ।

यदि चारुत्वके उत्कर्षसे व्यङ्ग्यन्यक्का प्राधान्य प्रतीत होता है तो

यह कह चुके हैं कि वाच्य और व्यङ्ग्यके प्राधान्यकी विवक्षा [उनके] चारुत्वके उत्कर्षके कारण ही होती है । वस्तुमात्रसे व्यङ्ग्य अलङ्कारों [उदाहरण अलग नहों दिखलाये हैं इसलिए उन]का विषय पूर्वप्रदर्शित उदाहरणोंमेंसे ही समझ लेना चाहिये !

[हमने 'ध्वालोकदीपिका' द्याख्यामें यथास्थान वस्तुव्यङ्ग्य अलङ्कारोंको प्रदर्शित कर दिखा है ।] इस प्रकार वस्तुमात्रसे अथवा अलङ्कारविशेषप अथवा दूसरे वस्तुमात्र अथवा अलङ्कारके प्रकाशनमे चारुत्वोक्तकार्षके कारण प्राधान्य होनेपर अर्थशकत्युद्भव-रूप संलड्घ्यप्रकमत्यक्ङ्ग्यच्चनि समज्झना चाहिये।

यहाँ यह स्पष्ट कर दिया है कि वस्तु और अलङ्कार दोनों व्यङ्ग्य और दोनों व्यक्ङ्ग्य हो सकते हैं । इसलिए १. वस्तुसे वस्तुव्यङ्ग्यता, २. वस्तुसे अलङ्कारव्यङ्ग्य, ३. अलङ्कारसे वस्तुव्यङ्ग्य और '४. अलङ्कारसे अलङ्कारव्यङ्ग्य ये चार भेद हो जाते हैं । पहिले स्वतःसम्मवी, कविप्रौडोक्तिसिद्ध और कविनिविडप्रौडोक्तिसिद्ध ये तीन भेद अर्थचमत्कृतद्वव ध्वनिके किये थे । उन तीनोंमेंसे प्रत्येक भेदके १. वस्तुं वस्तु, २. वस्तुसे अलङ्कार, ३. अलङ्कार से वस्तु ४. अलङ्कारसे अलङ्कारव्यङ्ग्य ये चार भेद होकर [४×४ = १६] कुल बारह भेद अर्थचमत्कृतद्वव ध्वनिके हो जाते हैं ।

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कारिका ३१ ]

द्वितीय उद्योतः

३५१

पृथ्वं ध्वने: प्रभेदान प्रतिपाद्य तद्भासविवेकं कर्तुमुच्यते—

यत्र प्रतीयमानोऽर्थः प्रतीयमानत्वेन भासते ।

वाच्यस्याऽऽदिनया वापि नास्यासौ गोचरौ ध्वने: ॥३१॥

द्विविधोऽपि प्रतीमान: स्फुटोऽस्फुटश्च । तत्र य स्फुट: स्फुट: शब्दशक्त्यार्थ-

शक्त्या वा प्रकाशते स एव ध्वनेर्मागों नंतर: स्फुटोऽपि योडभिथेयस्याऽऽत्वेन प्रतीमानोऽ-

भासते सोऽस्यान्तर्गतयकृत्स्य ध्वनेरगोचर: । यथा—

कमलारां पं मलिआ हंसाउड्उवि आ ण अ पिउक्ला ।

के ण वि गामस्तड्झे अत्थं उत्ताणउं फलिहुम् ॥

[कमलत्थग ण मलिना हंसा उड्डुयिता ण च पिउक्खस: ।

केणावि ग्रामटड्झे, अभ्रमुत्तानितं द्विसम् ॥ इति च्छाया]

अत्र हि प्रतीमानस्य सुरभध्वा जलधरप्रतिविम्बदर्शनस्य वाच्याऽऽत्वमेव ।

एडंविधे विपयेऽनुत्तापि यत्र व्यज्ज-यापेक्षया वाच्यस्य चाऽऽरुत्वोक्तर्षेप्रवीत्या प्राधान्या

शक्नुयत्के वस्तु तथा अलङ्काररूप दो भेद उभयप्रकाशकस्य तच्चा एक और अमलङ्कारकमध्यड्कय एक, इस

प्रकार कुल माल्लह भेद विवक्षितानपरवाच्य अभिधामूलध्वनिके और दो भेद अविवक्षितवाच्यअनिके

अर्थान्तरसंङ्क्रु मितवाच्य और अत्यन्ततिरस्कृतवाच्य के । सवको मिलाकर ध्वनिके कुल आठ भेद

हुए ।॥३०॥

अभिधामूल ध्वनिका गुणीभूतव्यङ्ग यत्व

इस प्रकार ध्वनिके प्रभेदोंका प्रतिपादन करके उस [व्‌यनि]के आभास [ध्वन्या-

भास गुणीभूतद्यज्यड्य]कों समजाने [पृथक् ज्ञान, मेदज्ञान करकने]के लिप कहते हैं—

जहाँ प्रतीमान अर्थ अस्फुट [प्रक्‍लष्‌ट] रूपसे प्रतीत होता है अथवा वाच्यका

अङ्ग बन जाता है वहाँ इस ध्वनिका विपय नहिं ड्आता ॥३५॥

[अविवक्षितवाच्य या लक्षणामूल और विवक्षितानयपरवाच्य या अभिधामूल-

ध्यनि] दोनों ही प्रकारका व्यज्ज-य अर्थ स्फुट और अस्फुट [थो प्रक्‌लरक] होता है ।

उनमेंसे शाब्दद्‌वाऽऽकिं अथवा अर्थशक्तिसे जो स्फुटरूपसे प्रतीत होता है वही ध्वनिका

विषय है । दूसरा [अस्फुटरूपसे प्रतीत होनेवाला ध्वनिका विषय] नहिं [अपितु व्‌यन्या-

भास] होता है । शुङ्ग [सङ्केत]में भी जो वाच्यका अङ्गरूपसे प्रतीत होता है वह इस

सङ्क्षयक्रमध्यड्क यत्वेन ध्वनिका विषय नहिं होता । जैसे—

अरी बुआजी [पित्‌ह्‌वस:] ! [देखो तो] न तालाव्‌ ही मैला हुआ और न हंस

ही उड़े । [फिर भी] इस गाँवके तालावमें किसने वादलको उलटा करके [कितनी

सफाईसे] रख दिया है ।

यहाँ बोली-माल्ली [ग्रामवधूका] मेघप्रतिविम्बदर्शननलरूप व्यज्ज-य वाच्यका अङ्ग

ही [बना हुआ गुणीभूत व्यज्ज-य] है ।

इस प्रकारके उदाहरणोंमें और जगह भी जहाँ चारुत्वोत्कर्षके कारण व्यज्ज-यकी अपेक्षा वाच्यका प्राधान्या फलित होता है वहाँ व्यज्ज-यकी अङ्ग [अमिभान] रूपमें प्रतीति

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ध्वन्यालोक:

मवसीयते, तत्र व्यङ्ग्यस्याऽऽलम्बन प्रतिपतेर्ध्वनेरविषयत्वम् । यथा—

वर्णरकुडं गोडइणासउणिकोलाहलं गुणंतिए ।

घरकम्मवावडाए वहुअ सीअंति अंगाइं ॥

[वार्णरकुजार्जोडणासकुनिकुलकोलाहलं श्रुणणत्था: ।

गृहकर्मव्यापृतया वध्वा: सीदन्त्यक्रूर गानि ॥ इति छाया]

एवंविधो हि विषय: प्रायेण गुणीभूतव्यङ्ग्यस्योदाहरणत्वेन निर्देश्यते ।

यत्र तु प्रकरणादिप्रतिपत्थ्या निर्घारितविषयेऽपि वाच्योऽर्थ: पुनः प्रतीममानाऽऽलम्बनैव-

भासते सोऽस्त्येवानुरणनरहपयडयङ्ग य ध्वनेर्मार्गः। यथा—

उविणसु पडिअ कुसुमं मा घुण सेहालीअं हालिअसुए ।

अहु दे विसमविरावो ससुरेण सुजओ वलअसद्दो ॥

[जविच्चु प पतितं कुसुमं मा धुनिहि शोकालिकां हालिक्नुये ।

एह ते विसमविराव: ससुरेण श्रुतो वलयकृतः ॥ इति छाया]

अत्र ध्वनिनयापतिना सह रममाणा सखी वही:श्रुतवलयकलकलया सल्या प्रती-

होनेके कारण [यह] ध्वनिका विषय नहीं होता । [अपितु वाच्यसिद्ध-यक्न नामक गुणी-

भूतव्यङ्गच्यक्नका भेद होता है ।] जैसे—

[अपने प्रणयसे मि'लनका स्थान और समय नियत करके भी समयपर नियत

स्थानपर न पहुँच सकनेवाली नायिकाएँ] चेतसस्तत्कुज्जके उड़ते हुए पक्षियोंके कोला-

हलको सुनकर घरके काममें लगी हुई बहके अज्ञ शिधिल हुए जाते हैं ।

इस प्रकारका विषय प्रायः गुणीभूतव्यङ्गच्यक्नके उदाहरणोंमें दिखलाया जायगा ।

इसी कारण काव्यप्रकाशकार तथा साहित्यदर्पणकारने इस ध्वनालोकको गुणीभूत-

व्यङ्गचक्नके उदाहरणरूप व्यक्जनारूक्न भेदका उदाहरण दिया है । यहाँ वाच्यसिद्धचक्न पुढल

उत्थाभूमें पहुँच गया यह व्यक्जक्न अर्थ है । परन्तु उसकी अपेक्षा 'वध्वा: सीदन्त्यक्रकृतिः'

यह वाच्यार्थमें ही विशिष्ट अलंकारका उदाहरण होता है । इत्थं च [प्रस्तुतचक्न व

नहीं; अपितु ध्वन्याभास अर्थात् असंलक्ष्यक्रमव्यक्जचक्नरूप गुणी-

भूतव्यङ्गच्यक्नका उदाहरण है ।

जहाँ प्रकरण आदिको प्रतीतिसे विशेष अर्थक्न निर्धारण करके वाच्यार्थ फिर

प्रतीममान अर्थके अज्ञरूवपसे भासता है वह इसी संलक्ष्यक्रमव्यङ्गचक्नक्न ध्वनिका विषय

होता है । जैसे—

हे कणक [की पुत्र] वधू ! [नीचे] गिरे हुए फूलोंको ही वीन, शोकालिका [हर-

सिक्कार्की डाल]को मत दिया । जोरसे बोलनेवाले तेरे कंकणकी आवाज ह्वसुरजीने

सुन ली है ।

यहाँ किसी जार [अविनयपति]के साथ सम्भोग करती हुई सखीको बाहरसे

उसके वलयक्नकी आवाज सुनकर सखी सावधान करती है । यह [व्यक्जचक्नार्थ] वाच्यार्थ-

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कारिका ३२-३३ ] द्वितीय उद्योतः

बोध्यते । एतदपेक्ष्यणीयं वाच्यार्थप्रतिपत्तये । प्रतिपन्ने च वाच्येऽर्थे तस्याविनयप्रच्छादन-

तात्पर्येणाभिधीयमानत्वात पुनर्‌व्यक्ज्ञाक्त्वमेवेत्यस्मिन्नगुरणानुरागरूपध्यानावन्तर्भावः॥ ३१ ॥

एवं विशकितवाच्यस्य ध्वनेस्तदाभासविवेके प्रस्तुते सति विवक्षितवाच्यस्यापि तं

कृत्वमाह--

अभ्युत्पत्तेरशक्तेरां निबन्धो यः स्वलद्रुगते: ।

शाब्दस्य स च न क्षेयः सूरिभिरविषयो ध्वने: ॥३२॥

स्वलद्रद्रतेःशपचतिस्य शाब्दस्य अत्युत्पत्तेरशक्तेरां निबन्धो यः स च न

ध्वनेर्विषयः ।

यत्‌:--

सर्वेष्वेव प्रभेदेषु स्फुटतरेवावभासनम् ।

यदृृङ्ग्रव्यस्याङ्गीभूतस्य तत्‌पूर्णं ध्वनिलक्षणम् ॥ ३३ ॥

तत्रोदाहृतत्वाद्विषयमेव ।

इति श्रीराजानकानन्दवर्धनाचार्यविरचite ध्वन्यालोके द्वितीय उद्योतः ।

की प्रतीतके लिप् अपेक्षित है । [उस]गद्यार्थकी प्रतीति दो जाननेपर उस [वाच्यार्थ]

के [सर्वीके परपुरुषोपमोगरूप] आविनयको छिपानेके अभिप्रायसे ही कथित होनेसे

फिर [अविनयप्रच्छादनरूप] इत्यङ्गकथा अङ्ग ही हो जाता है । अतपत्र यह सकलदृग्भि-

इत्यङ्गयचवनिमें ही अतभ्रूत होता है ॥३१॥

लक्षणामूल ध्वनिकाः गुणीभूतत्वयङ्गयत्व

इस प्रकार विवक्षितवाच्य [अभिधामूल] ध्वनिके ध्वन्याभास [गुणीभूतत्व]

आभासता [गुणीभूतत्व] विवेचन करनेके लिये कहने हैं--

प्रतिभा या शक्तिके अभावमें जो लक्ष्यणिक या गौण [सकलदृगति—याथित-

विषय—] शाब्दका प्रयोग हो उसको भी विद्वानोंको ध्वनिका विषय नहीं समझना

चाहिये ॥३२॥

सकलदृगति अर्थात् गौण शाब्दका प्रतिभा या शक्तिके अभावमें जो प्रयोग है वह

भी ध्वनिका विषय नहीं होता ॥३२॥

कथाहि --

[ध्वनिके] सर्वी मेदोंमें प्रधानभूत ध्वनिकी जो सकुटतरूपसे प्रतीति होती है वही

ध्वनिका पूर्ण लक्षण है।

उसके विषयमें उदाहरण दे ही चुके हैं ।

इति श्रीभदाचार्यविवृतश्रश्रसिद्धान्तशारामणिविरचितायाम् ‘आलोकदीपिकाख्यायां’

हिन्दीव्याख्यां [द्वितीय उद्यातः ।

१. नि० में ‘अर्थें’ पाठ नहीं है ।

२. ‘यतस्म’ नि०, दी० ।

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तृतीय उद्योतः

एवं व्यक्‍क्रमसुखेनैव ध्वनेः प्रदर्शिते सप्रभेदे स्वरूपे पुनरन्यैःकसुलेनैतत्‌ प्रकास्यते—

अविवक्षितवाच्यस्य पदवाक्यप्रकारता । तदन्यस्यानुरणनरूपव्यङ्ग्यस्य च ध्वनेः ॥१॥

अथ आलोकदीपिकायां तृतीय उद्योतः

इस प्रकार [गत उद्योतमें] व्यक्‍कक द्वारा ही [व्यक्‍क-व्यञ्जकके दृष्टिसे] भेदों सहित ध्वनिका स्वरूपनिर्धारण करनेके बाद व्यञ्जक द्वारा [व्यङ्ग्यकी दृष्टिसे यहाँ] फिर [उसके भेदोंका] निर्दरण करते हैं—

ध्वनिद्वे पदप्रकार्य तथा वाक्यप्रकारस्य भेद

अविवक्षितवाच्य [लक्षणामूल ध्वनि] और उससे भिन्न [विवक्षितान्यपरवाच्यका भेद] संलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्यध्वनि [अर्थात्‌ ध्वनिके १८ भेदोंमेंसे एक असंलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्यको छोड़कर शेष १७ भेद] पद और वाक्यसे प्रकाश्य होता है ॥१॥

द्वितीय उद्योतमें ‘आलोकदीपिका’ टीकाके पृष्ठ १५१ पर अविवक्षितवाच्य अर्थात्‌ लक्षणामूल-ध्वनिके १. अर्थान्तरसंक्रमितवाच्य तथा २. अत्यन्ततिरस्कृतवाच्य ये दो भेद, और विवक्षितान्यपरवाच्य अर्थात्‌ अभिधामूलकध्वनिके असंलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य एक + संलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्यके दो भेद + अर्थशक्त्युद्भवत्क्षयुत्क एक भेद, इस प्रकार २ अविवक्षितवाच्य + [१+२+१२+१] = १६ विवक्षितान्यपरवाच्यके कुल मिलाकर ध्वनिके १८ भेदोंकी गणना करा चुके हैं । इस तृतीय उद्योतमें उन भेदोंका और अधिक विचार करोगे । उनमेंसे एक उपमाशक्त्युत्कर्षको

छोड़कर शेष १७ भेद पद और वाक्यभेदसे दो प्रकारके भेद और होते हैं । अतएव ध्वनिके कुल दो १७ × २ = ३४ भेद बन जाते हैं उनमेंसे विवक्षितान्यपरवाच्यके अर्थशक्त्युद्भववके दो बारह भेद कहे हैं वे प्रबन्धव्यङ्ग्य भी होते हैं । उनकी प्रबन्धव्यङ्ग्यताके बारह भेद और मिल-कर ३४ + १२ = ४६ और एक उपमाशक्त्युत्कर्ष, जो केवल वाक्यमात्र व्यङ्ग्य हो सकता है, उसको मिलाकर ४६ + १ = ४७, और अर्थशक्त्युद्भवके १. पदांश, २. वर्ण, ३. रचना, और ४. प्रबन्धगत ४ भेद और मिलाकर ध्वनिके कुल ४७ + ४ = ५१ भेद हुए होते हैं । इस प्रकार ध्वनिके इस्थापन भेदोंकी गणना की गयी है । इस उद्योतमें उन्होंने पिछले भेदोंके प्रकारान्तरसे पद और वाक्य व्यङ्ग्यत्वमेदसे भेद प्रदर्शित करते हैं । गत उद्योतमें जो ध्वनिविभाग किया गया था वह व्यञ्जककी दृष्टिसे किया गया था, यहाँ पद-वाक्य-व्यङ्ग्यत्वके भेदसे जो विभाग इस उद्योतमें किया जा रहा है वह व्यङ्गकभेदकी दृष्टिसे किया गया विभाग है । इस प्रकार गत उद्योतके साथ इस उद्योतके विषय-

१. ‘तद्’ वि०, धी० ।

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ततीय उद्योतः

१—अविवक्षितवाच्यस्यात्यन्ततिरसकृतवाच्ये प्रमेदे पदप्रकाशता यथा महर्षे-

व्यासस्य—

'सतेवा: समिध: श्रिय: ।'

यथा वा कालिदासस्य—

'क: सन्नद्धे विरहविधुरां त्वय्युपेक्षेत जायाम् ।'

यथा वा—

'किमिव हि मधुराणां मण्डनं नाकृतिनाम् ।'

एतेषूपाहरणेषु 'समिध:' इति 'सन्नद्धे' इति 'मधुराणाम्' इति च पदानी व्याख्यात्वाभिप्रायेणैव कृतानि ।

१—अविवक्षितवाच्य [लक्षणामूलध्वनि] के अत्यन्ततिरसकृत वाच्य [नामक] भेदमें पदव्यकंण [का उदाहरण] जैसे महर्षि व्यासका—

'सतेवा: समिध: श्रिय: ।' यह सात लक्षणोंकी समिधाएँ हैं ।

अथवा जैसे कालिदासका—

'क: सन्नद्धे विरहविधुरां त्वय्युपेक्षेत जायाम् ।' तेरें आये विरहविधुरा कौन जायां न सेवे ?

अथवा—

'किमिव हि मधुराणां मण्डनं नाकृतिनाम् ।' 'मधुराकृतिको¹ जनको कौन विश्वास नाधि'

इन उदाहरणोंमें 'समिध:', 'सन्नद्धे' और 'मधुराणाम्' पदव्यंजकत्वके अभिप्रायसे ही [प्रयुक्त] किये गये हैं ।

महर्षि व्यासका पूरा श्लोक निम्नलिखित प्रकार है—

भ्रति: क्षमा दया शौचं कारुण्यं वागनिष्ठुरा ।

मित्राणां चानुमोद: सतेता: समिध: श्रिय: ॥

इस श्लोकमें आये 'सतेता: समिष: श्रिय:' इस चरणमें 'समिष:' शब्द अत्यन्ततिरसकृतवाच्य है । 'समिष:' शब्द मुख्यवाचक है; याकी समिषाएँँके लिये प्रयुक्त होता है । ये समिषाएँँ यक्षीय अग्निको बढ़ानेवाली—प्रकटित क्रियाने वाली होती हैं । 'वन्त्रा समिद्वरेभ्यो हव्यादिकं चर्ष्यामि' इस्यादि मन्त्रप्रतिपादित वर्णनसाधर्म्यसे यहाँ 'समिष:' शब्द लक्षणी अनयानपेक्ष दृढहेतुताको बोधित करता है । अतएव अत्यन्ततिरसकृतवाच्यव्यञ्जनिका उदाहरण होता है ।

'क: सन्नद्धे विरहविधुरां त्वय्युपेक्षेत जायाम्' यह दूसरा उदाहरण कालिदासके 'मेघदूत²' से लिया गया है । पूरा श्लोक इस प्रकार है—

स्वभर्त्तृदृण पवनपदवीदूरूगहीतार्द्रालकान्ता: प्रेक्ष्यन्ते पतिकवनिता: प्रत्यादर्शकस्त्य ।

१. 'स्वभर्त्तृदृण' मि० ।

२. 'मेघदूत' मि, टी० में श्लोक है ।

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ध्वन्यालोकः

२—तस्यैवार्थान्तरमङ्कृमितवाच्ये यथा—

'रामेण प्रियजीवितेन तु कृतं प्रेम्णा धिये नोचितम् ।'

अत्र रामेण इत्येतन् पदं साहसैकरसत्स्वादिल्यक्क याभिसङ्क्रमितवाच्यं ध्वन्यकम् ।

कः सन्नद्धे विरहविधुरां स्वव्युङ्केशित जायां वन स्यादन्योंड्यहमिव जनो यः पराधीनवृत्तिः ॥

अर्थात् हे मेघ ! वायुमार्गसे जाते हुए तुमको पथिकोंक्री प्राप्तभर्तृक कियों बालोंको हृाथसे धाम कर, अब उनके पति आते होंगे इस विश्वाससे श्रद्धै भारण करती हुइं देखंगी । क्योंकि मेरे समान पराधीनको छोड़कर तुम्हारे आ जाननेपर अपनी विरहपीडिता पत्नीक्री कौन उपेक्षा करेगा ।

इस श्लोकमें 'सन्नद्ध' शब्द अत्यन्तातिरसकृतवाच्यध्यव्यानिका उदाहरण है । सकृद्द शब्द 'गृह बन्धने' धातुसे बना है । उसका मुख्यार्थ कमर कसने हुए, कवचादि धारण किये हुए होता है । यहाँ उसका यह मुख्यार्थ अन्वित नहीँ होता है, अतएव यहाँ अपने मुख्यार्थको छोड़कर वह उदात्तत्वका बोधन करता है, इस प्रकार अत्यन्तातिरसकृतवाच्य है ।

तीसरा उदाहरण 'शकुन्तला'से लिया है । पूरा श्लोक निम्नलिखित प्रकार है—

सरसिजमनुविद्धं शैवलेनापि रम्यं मलिनमपि हिमांशोर्लक्ष्म लक्ष्मीं तनोति ।

इयमधिकमनोज्ञा वल्कलेऽपि तन्वी किमिव हि मधुराणां मण्डनं नाकुलीनाम् ॥

कमलका फूल सिवारमें लिपटा होनेपर भी सुन्दर लगता है । चन्द्रमाका काला कलंक भी उसकी शोभा बढाता है । यह तन्वी शकुन्तला इस वल्कलवस्रको धारण किये हुए होनेपर भी सुन्दरी दीख पडती है । मधुर श्राकृतिवालोंके लिये कौन-सी वस्तु आभूषण नहीँ है ।

इस श्लांकमें मधुरसका वाचक 'मधुर' शब्द अपने उस अर्थको छोड़कर 'सुन्दर' अर्थका बोधक होनेसे अत्यन्तातिरसकृतवाच्यध्यव्यानिका उदाहरण है ।

२—उस्सी [अविचक्षितवाच्य लक्षणामूलध्वनि]के [नामक भेदके उदाहरण]में जैसे—

हे प्रिये वैदेहि ! अपने जीवनके लोभी गमने प्रेमके अनुरूप [कार्य] नहीँ किया ।

इस [श्लोक]में 'राम' यह पद साहसैकरसत्स्व [मत्ग्रसनरसत्स्व] आदि व्यङ्ग्य [विशिष्ट रामरूप अर्थान्तर]में सकृकमित वाच्य [रूपसे अर्थान्तरसङ्कृमितवाच्य] व्यङ्गक है ।

पूरा श्लोक इस प्रकार है—

प्रस्यास्यानरुपः कृतं समुचितं मूरेण ते रक्षसा

संध त्वन्न तथा स्व्या कुलजनो धत्ते यथोचैः शिरः ।

व्यथ्ये सम्प्रति बि्रदता धुनुरिंदं स्वदूश्यपादः शाक्षिणा

रामेण प्रियजीवितेन तु कृतं प्रेम्णा प्रिये नोचितम् ॥

कूर राक्षस रावणने तुम्हारे अस्वीकार करनेपर उस निपेधजन्य क्रोधके अनुरूप ही तुम्हारे साथ व्यवहार किया और तुमने भी उसके कूर व्यवहारको इस प्रकार वीरतापूर्वक सहन किया कि आज भी कुल्टुद्धैँ उसके कारण अपना वीर ऊँचा उठाये है । इस प्रकार तुम दोनोंने अपने-अपने

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कारिका ९ ]

तृतीय उद्योत:

९५९

यथा वा---

परमार्थविचारे पुनरचन्द्रश्चन्द्र एव वराकः । इति छाया]

अत्र द्वितीयशब्दोऽर्थान्तरसङ्क्रमितवाच्यः ।

३---अविवक्षितवाच्यस्यात्यन्ततिरसृतवाच्यस्ये प्रमेदे वाक्यप्रकाशता यथा---

या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी ।

यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा परयतो मुनेः ॥

अनेन वाक्येन निशार्थी न व' जागरणार्थः कश्चिद् विवक्षितः । किं तर्हि ?

तत्त्वज्ञानाबहितत्वम् अतत्त्वपराड्मुखत्वं च मुनेः प्रतिपाद्य इति तिरसृतवाच्यस्यास्त्य

व्यञ्जकत्वम् ।

४---तस्यैवार्थान्तरसङ्क्रमितवाच्यस्य वाक्यप्रकाशता यथा---

अनुरूप कार्य किया परन्तु तुम्हारी विपत्तिके साक्षी बनकर भी आज वयं ही इस धनुपको धारण करनेवाले---अपने जीवनके लोमो इसको रोमन् है । प्रिय वेदाङ्ग : अपने प्रमेय योग्य कार्य नही किया ।

अथवा जैसे---

उसके गालोंकी उपमा में लोग [उपमानरूपमें] चन्द्रविम्बको यों ही रख देते हैं ।

'वास्तविक' विचार करनेंपर तो विचारा 'चन्द्रमा' चन्द्रमा ही है !

यहाँ 'चूसग' 'चन्द' शब्द [क्षयित्व, चिलासरूप्यत्व, मलिनत्वादिविशिष्ट चन्द्र अर्थमें] अर्थान्तरसङ्क्रमितवाच्य हैं !

३---अधिवक्षितवाच्यस्य [लक्षणामूलध्वनि]के अत्यन्ततिरसृतवाच्यप्रेमेदे वाक्यप्रकाशता [का उदाहरण] जैसे---

जो अन्य सव प्राणियोंकी रात्रि है उसमें संयमी [तस्वज्ञानी जितेन्द्रिय पुरुष] जागता [रहता] हैं । और जहाँ सव प्राणी जागते हैं, वह तत्त्वज्ञानी मुनिकी रात्रि है ।

इस वाक्यमें निशा [पहुँ] और जागरण [वोधक 'जागृति' तथा 'जाग्रति' शब्द]

का वह काक्षित अर्थ [मुख्या्थे] विवक्षित नहीं है । तो [फिर] क्या [विवक्षित] है ? [तत्त्व-

ज्ञानी] मुनिकी तत्त्वज्ञाननिष्ठता और अतत्त्वपराड्मुखता प्रतिपादित हैं । इसलिये अत्यन्त-

तिरसृतवाच्य [निशा तथा जागर्ति, जाग्रति आदि धनक शब्दरूप वाक्य]की व्या्जकता है ।

५---उसी [अविवक्षितवाच्यध्वनि अर्थात् लक्षणामूल ध्वनि]के अर्थान्तर-सङ्क्रमितवाच्य [भेद]की पदमकाशता [का उदाहरण] जैसे---

९. '(न) निशार्थी न (व) जागरणार्थ:' दी० 'न जागरणार्थ:' नि० ।

१२

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ध्वन्यालोक:

विसमइज्झो' काण वि काण वि बालेउ अमिआणिम्माओ। काण वि विसामिअओ काण वि अविसामओ कालो॥ [विस्मयित:? केशामपि केशामपि यात्यमृततामिषां।] केशामपि विषामृतमय: केशामप्यविषामृत: काल:॥ इति छाया]

अत्र हि वाक्ये 'विषामृत' शब्दार्थ्यां दुःखसुखरूपसङ्क्रमितवाच्याभ्यां व्ययद्धार इत्यर्थोऽन्तरसङ्क्रमितवाच्यस्य व्यङ्ग्यत्वम्।

१—विवक्षिताविमेयस्यार्थानुरणनरूपव्यञ्जकत्वे शब्दशक्त्युद्भवे प्रमेये पदप्रकाशता यथा—

किन्हींका समय विषमय [दुःखमय], किन्हींका अमृतरूप [सुखमय], किन्हींका विष और अमृतमय [सुखदुःखरहित] व्यतित होता है। इस वाक्यमें विष और अमृत शब्द दुःख और सुखरूप अर्थान्तरसङ्क्रमितवाच्य-रूपमें व्ययद्धारमें आये हैं। इसलिए अर्थान्तरसङ्क्रमितवाच्य [अनेकपदरूप वाक्य] का ही व्यङ्ग्यत्व है।

'या निशा०' और 'केशामपि०' इन दोनों श्लोकोंमें अनेक पदोंके व्यञ्जक होनेसे वे वाक्यगत व्यञ्जकत्वके उदाहरण हैं। विस्मयित: 'विस्मयतां प्राप्त:', विस्मयित शब्दका अर्थ विस्मयताको प्राप्त है। इस श्लोकमें कालक्री चार अवस्थाएँ प्रतिपादित की हैं। एक विषरूप, दूसरी अमृतरूप, तीसरी उभयात्मक अर्थात् विषामृतरूप और चौथी अनुभयात्मक अभविषामृतरूप। पापी और अतिविवेकियोंके लिए अयमृतमय दुःखमय, किन्हीं पुण्यात्माओं अथवा अत्यन्त विवेकियोंके लिए अमृतमय सुखरूप, किन्हीं मिश्रकर्म और विवेकाविवेकरूप मिश्रज्ञानवालोंके लिए उभयात्मक सुख-दुःखरूप और किन्हीं अत्यन्त मूढ़ अथवा योगभ्रष्टमात्रको प्राप्त लोगोंके लिए अनुभयात्मक अर्थात् सुख दुःखसे रहित हैं। प्रत्येक अवस्थाके साथ उत्तमता और निःश्रेष्ठताकी चरम सीमा सम्भद्ध है। अत्यन्त पापीके लिए पापोके फलरूप दुःखभोगके कारण काल दुःखमय है और अत्यन्त विवेकी भी पूर्ण वैराग्ययुक्त होनेसे कालको दुःखरूप मानता है। यहाँ विष और अमृत शब्द दुःखसुखमयताको बोधन करते हैं; इसलिए अर्थान्तरसङ्क्रमितवाच्यके उदाहरण हैं।

अविवक्षितवाच्य अर्थात् लक्षणामूलघटितनिके अर्थान्तरसङ्क्रमितवाच्य और अत्यन्ततिरस्कृतवाच्य-रूप दोनों भेदोंके पदप्रकाशता तथा वाक्यप्रकाशताभेदसे कुल चार भेद हुए। उन चारोंके उदा-हरण देकर अब विवक्षितवाच्य अर्थात् अभिधामूलध्वनिके संलक्ष्यक्रममेदके १५ अवान्तर भेदोंमेंसे कुछ उदाहरण आगे देते हैं—

१—विवक्षितानन्यपरवाच्य [अर्थात् अभिधामूलध्वनि]के [अन्तर्गत] संलक्ष्य-क्रमव्यङ्गच्ये शब्दशक्त्युद्भव [नामक] भेदमें पदप्रकाशता [का उदाहरण] जैसे—

१. 'विसमइज्ज्ओ किअ' वि०। २. 'अमिआणिम्माओ' मि०। ३. 'विषमय इअ' वि०। ४. 'अमृतमय:' नि०।

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कारिका १ ] तृतीय उद्योतः १५९

प्राप्तं धनैरथिजनस्य वाञ्छां दैवेन सृष्टो यदि नाम नास्मि । पथि प्रसन्नबुधरस्तडागः कूपोदपथवा किन्न जडः कूपोज्जम् ॥

अत्र हि ‘जडः’ इति पदं निर्विघ्नेन वक्त्रात्मसममानाधिकरणतया प्रयुक्तमहतुरणत्रूपतया कूपसममानाधिकरणतां स्वशकत्या प्रतिपद्यते ।

२—तस्यैव वाक्यप्रकाशतां यथा हर्षंचरिते सिंहनादवाक्येऽपु— ‘वृत्तडास्मन् महाप्रलये घरणीधारणायाधुना त्वं घोषः ।’

यदि दैवने मुझको धनोंसे याचकजनोंकी इच्छा पूर्ण करने योग्य नहीं बनाया तो स्वच्छ जलसे परिपूर्ण रास्तेका तालाब या जड [परदुःखानुमित्, किसको किस वस्तुकी आवश्यकता है इसके समझनेकी चाक्षिसे रहित अतपत्र जड और शीतल अर्थात् निर्वेद-सन्तापादिसे रहित] कुहाँ क्यों न बना दिया ।

यहाँ क्रिय् [डुप्] वकाने ‘जड’ शब्दका प्रयोग [आत्मसममानाधिकरणतया, अर्थात् अपनेको बोध करानेवाले ‘अहम्’ पदके साथ ‘जडोडहम्’ इस रूपमें समानविमक्ति, समानवचनमें अपने लिए किया था परन्तु संलक्ष्यक्रमरूपसे [शक्ति या शब्दमें ‘शक्ति’ अर्थात् अभिधामूलकव्यजना] द्वारा वह [कूपसममानाधिकरण] कूपका विशेषण वन जाता है ।

वृत्तिकारका आशय यह है कि वक्ताने जड शब्दको ‘जडोडहम्’ इस प्रकार अपनेको बोध करानेवाले ‘अहम्’ पदके साथ समानाधिकरण समानविमक्ति, समानवचनमें प्रयुक्त किया’ या ।

तिरिक्तस्य नामार्थद्रव्यस्य अभेदातिरिक्तसमभेदेनावयोद्योत्पत्तेः" इस वेदान्तके अनुसार विशेषणका अभेदान्वय ही होता है । जैसे ‘नीलम् उत्पलम्’ इन दोनों प्रातिपदिकार्योका अभेदसमभन्वये अन्वय होकर ‘नीलाभिधमुत्पलम्’ ‘नीलगुणवदभिमुत्पलम्’ इस प्रकारका शाब्दबोध होता है । इसी प्रकार यहाँ ‘जडः’ पदका ‘अहम्’ और ‘कूपः’ के साथ अमेदान्वय होगा । दरिद्रताके कारण याचक जनोंकी इच्छापूर्तिमें असमर्थ अतपत्र किन्तु हुए वक्ताने, मुझको जड अर्थात् याचकाँकी आवश्यकवता

समझनेमें असमर्थ अतएव निर्वेद-सन्तापसे रहित अर्थमें जड शब्द अपने लिए प्रयुक्त किया था परन्तु शाब्दशक्ति [ अभिधामूल व्यजना ] से वह ‘जड’ पद कुहाँका विशेषण बन जाता है ।

और शीतल जलसे युक्त, अतपत्र शीतल जलसे युक्त, प्रतिपक्षीके हिताहितक, प्रतिपक्षी उभयम्, इस अर्थको व्यक्त करता है ।

२. उक्त [विक्षितानन्यपरवाच्य अर्थात् अभिधामूलकव्यजना के अन्तर्मंत संलक्ष्यक्रमव्यक्त-व्यके शाब्दशक्युत्यमेद] की वाक्यप्रकाशतां [का उदाहरण] जैसे [वाणमदृदृशत] हर्षंचरित [कं पष्ट उच्छवास] में [सेनापति] सिंहनादके वाक्यमें—

इस [अर्थात् तुम्हारे पिता प्रभाकरवर्धन और ज्येष्ठ भ्राता राज्यवर्धनकी मृत्युरूप] महाप्रलयके हो जानेपर पृथिवी [अर्थात् राज्यभार] को धारण करने के लिए अब तुम ‘घोष’ [घोषणानाग] हो ।

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ध्वन्यालोक:

हरिविजये

एतद्वि वाक्यमनुरणनहुपमरथान्तरं शब्दशक्त्या सकुट्मेव प्रकाशयति !

३—अस्त्येव कविप्रौढोक्तिमात्रनिष्पन्नशरीरस्यार्थशक्त्युन्नवे प्रभेदे पदप्रकाशता यथा

चूडामणिरवचांसं 'छणमप्पसरमहघ्घमणाहरसुरामोऽस्म् । असमरिथं पि गाहिरं कुसुमसरेण बहुमासलचिछसुदहम् ॥'

[चूआड कुरवतंसं 'क्षणप्रसरमहघ्घंसनोहरसुरामोदस्म् । असमपिंतसपि ग्यीतंसं कुसुमशरेन मधुमासलक्मीसुसम् ॥' इति च्छाया]

अत्र ह्यसमर्पितमपि कुसुमशरेन मधुमासलक्म्या मुखं गृहीतसित्यसमर्पितमपित्ये- तदवस्थाभिघाति पदमर्थशक्त्या कुसुमशरस्य वलात्कारं प्रकाशयति ।

यह वाक्य [इस महाप्रलयके हो जानेएर पृथिवीके धारण करनेके लिये अकेले शेषनागके समान] संलक्ष्यचक्रमदृश्यच्य [शेषनागरूढ] अर्थान्तरको स्वशाक्तिसे स्पष्ट ही प्रकाशित करता है ।

विवक्षितवाच्य अर्थात् अभिधामूलचचनिसे १. शब्दशक्त्युत्थ, २. अर्थशक्त्युत्थ और ३. उभयशक्त्युत्थ ये तीन भेद किये ये । उनमें शब्दशक्त्युत्थ प्रथम भेदके पदप्रकाशता और वाक्यप्रकाशताके दो उदाहरण ऊपर दिखला दिये हैं । अब दूसेरे अर्थशक्त्युत्थदवभेदके उदाहरण

दिखायेंगे । इस अर्थशक्त्युत्थदवभचवचनिसके भी १. स्वतःसम्भवी, २. कविप्रौढोक्तिसिद्ध और ३. कविनिबद्धप्रौढोकिसिद्ध ये तीन भेद होते हैं । इनमेंसे कविनिबद्धप्रौढोक्तिसिद्धको कविप्रौढोक्ति- सिद्धमें अन्तर्भूत मानकर उसके अल्मा उदाहरण नहीं दिये हैं । आगे कविप्रौढोक्तिसिद्धकी पदप्रकाशता और वाक्यप्रकाशताके उदाहरण देते हैं—

३—इसी [विवक्षितानन्यपरवाच्य अर्थात् अभिधामूलचचनि]के कविप्रौढोक्ति- मात्रसिद्ध अर्थशक्त्युद्भवभेदमें पदप्रकाशता [का उदाहरण] जैसे [प्रवरसेनकृत प्राकृत- रूपक] 'हरिविजयमें—

आञ्जमरजरीयोस विभूषित, क्षण [अर्थात् वसन्तोत्सवके प्रसारसे अत्यन्त मनो- हरः, सुर [अर्थात् कामदेव]के वलात्कारसे युक्त, [पक्षान्तरमें वहुमूल्य सुन्दर सुराकी सुगन्धिसे युक्त] वसन्ती लक्म्म्मके मुख [प्रारम्मको] कामदेवने बिना दिये हुए भी [वलात्कार जवरदस्तीसे] पकड़ लिया ।

यहाँ कामदेवने बिना दिये हुए भी वसन्तलक्म्म्मका मुख पकड़ लिया इसमें बिना दिये हुए भी इस [नवोढा नायिकाकी] अवस्थाका सूचक शब्द, अर्थशक्तिसे कामदेवके [इड कामुक चयवहाररूए] वलात्कारको प्रकाशित करता है [इसीलिप यह कविप्रौढोक्ति- सिद्ध वस्तुतः वस्तुत्वप्रचय अर्थशक्त्युद्भवदवभचवचनिका उदाहरण है] ।

१. 'छणमप्पसरमहं घणमहुरामोऽस्म' नि० १

२. 'इहदुपणमघुरामोदस्म' नि०, द्दो ।

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कारिका १ ] तृतीय उद्योत: १६१

४—अत्रैव प्रभेदे वाक्यप्रकाशता यथोदाहरतं प्राक्—

"सज्जेदि सुरहिमासो" इत्यादि ।

अत्र सज्जयति सुरभिमासो न तावदर्पंयत्यानक्ज्ञाय शाब्दित्यर्थं वाक्यार्थे: कविप्रौढोक्तिमात्रनिष्पन्नशाब्दरीयो 'मन्यथोन्माथकदनावस्थां' वसन्तसमयस्य सूचयति ।

५—स्वत:सम्भवीशब्दार्थशक्त्युद्भववभेदे पदप्रकाशता यथा—

वागिजय हतिदन्ता कुता अह्माण वाघकिन्ती उअ । जाव लुलिआलअमुही घरम्मि परिसक्खे सुरअ ।

[वाणिक हस्तिदन्तता: कुतोडस्माकं व्याघ्रकृततयश्र । यावलुअलितालकमुही गिहे परिभक्खए सुठ्ठा li इति छाया]

अत्र 'लुलितालकमुही' इत्येतत् पदं व्याघवध्वा: स्वत:सम्भावितशब्दीरार्थशक्त्या सुरतक्रिडासक्ति 'सूचयतदीयस्य' भर्तु: सततसम्भोगक्षामतां प्रकाशयति ।

६—तस्यैव वाक्यप्रकाशता यथा—

सिहिअणकलणऊरा बहुआ वाहअस्स गविररी भमइ । मुक्ताफलरइअपासाहणाणं मज्झे सबत्तीअम् ।

७—इसी [विवक्षितान्यपरवाच्य अर्थात् अभिधामूल्यनिके अर्थशक्त्युद्भव संलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य] भेदमें वाक्यप्रकाशता [का उदाहरण] जैसे "सज्जयति सुरभिमासो" इत्यादि पहिले [पृ० २९ पर] उदाहरण दे चुके हैं ।

यहाँ वसन्त मास [चैत्र मास] वाणोंको वनाता है परन्तु कामदेवको दे नहीं रहा है यह कविप्रौढोक्तिमात्रसिद्ध वाक्यार्थ वसन्तसमयकी कामोदीपनातिरायजन्य [विरहिजनोकी] दुरवस्थाको सूचित करता है ।

५—[विवक्षितान्यपरवाच्य अर्थात् अभिधामूल्यनिके] स्वत:सम्भवी अर्थ-शक्त्युद्भववभेदके पदप्रकाशता [का उदाहरण] जैसे—

हे वणिक् , जवतक छेअल अक्खों [लदं]से जुग्‌क मुहावली पुणवधू घरमें घुमती है तबतक हमारे यहाँ हाथीदांत और व्याघ्रचर्म कहाँसे आये ।

यहाँ 'लुलितालकमुही' यह पद स्वत:सम्भवी अर्थशक्तिकसे व्याघवधू [पुत्रवधू] की सुरतकी क्रिडासक्ति को सूचित करता हुआ उसके पति [व्याघपुत्र] की निरन्तर सम्भोगसे उत्पन्न कुब्जलताको प्रकाशित करता है ।

६—इसी [संलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्यके अर्थशक्त्युद्भव स्वत:सम्भवी वस्तुसे वस्तु-व्यङ्ग्य] की वाक्यप्रकाशता [का उदाहरण] जैसे—

१. 'मन्यथोन्मादकतापादनावस्थानम्' नि०, दी० ।

२. 'सूचयत्क्षदीयस्य' नि०, दी०, वा० ।

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ध्वन्यालोक:

[कारिका ९

[शिल्पिपिच्छकर्णीपुरा भार्या व्याधस्य गविंष्ठों भ्रमति |

मुक्ताफलरचितप्रसाधनां मध्ये सपत्नीनाम्॥ इति च्छाया]

अनेनापि वाक्येन व्याघ्रबद्धा: शिल्पिपिच्छकर्णंपूूराया नवपरिणीताया: करुणाश्रिलु

सौभाग्यातिशय: प्रकाशयितवे |

'तत्सम्बोगैकृतो मयूरमात्रमाराणसमर्थे: पतिज्ञात इत्यर्थप्रकाशनात् । तदन्यासां

चिरपरिणीतानां मुक्ताफलरचितप्रसाधनानां दौर्भाग्योतिशय: स्याप्यते ।

तत्सम्बोगैकाले स एव व्याध: करीरवधव्यापारसमर्थे आसीदित्यर्थप्रकाशनात् ।

ननु ध्वनि: काव्यविशेष इत्युक्तं तत्कयं तस्य पदप्रकाशता ? काव्यविशेषो हि

विशिष्टार्थप्रतिपत्तिहेतु: शब्दसन्दर्भविशेष: । तद्‌द्वारवक्ष पदप्रकाशत्वे नोपपद्यते । पदातां

स्मारकत्वेनावाचकत्वात् ।

[कैवल्य] मोरपंखका कर्णपूर पहिने हुए व्याधकी [नवपरिणीता] पत्नी, मुक्ता-

फलोंके आभूषणोंसे अलंकृत सपत्नियोंके बीच अभिमानसे पूली हुई फिरती है ।

इस वाक्यसे मोरपंखका कर्णपूर धारण किये हुए नवपरिणीता किसी व्याधपत्नी-

का सौभाग्यातिशय सुझचित होता है । [रात-दिन हर समय] उसके साथ सम्भोगमें रत

उसका पति [अब] केवल मयूरमात्रके मारनेमें समर्थ रह गया है इस अर्थके प्रकाशनसे ।

पहिले वह ध्याही कुर्री मोतियोंके आभूषणोंसे सजी अन्य पत्नियोंके सम्भोगकालमें तो

वही व्याध रहे-बड़े साधियोंके मारनेमें समर्थ था इस अर्थके प्रकाशनसे उनका दौर्भा-

ग्योतिशय प्रकाशित होता है ।

इस तृतीय उद्योतकी प्रथम कारिकामें अविवक्षितवाच्य और विवक्षितवाच्यमें संलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य

नामक भेदके अन्तर्गत पदप्रकाश और वाक्यप्रकाशरूपसे दो भेद किये गये । और तदनुसार अविवक्षितवाच्यके अर्थान्तरसङ्क्रमितवाच्य तथा अत्यन्ततिरस्कृतवाच्य दोनों भेदोंके और विवक्षितवाच्यके

द्वन्द्वशक्त्युत्थमेदके तथा अर्थचातुर्ययुक्तके कविप्रौढोक्तिसिद्ध तथा स्वतःसंभवी भेदोंके उदाहरण दिखला

चुके हैं । अब व्यङ्गयक्रमुत्थके किये गये पदप्रकाश्य और वाक्यप्रकाश्य इन दो भेदोंके विषयमें पूर्वपक्षकी

यह शङ्का है कि ध्वनिकी वाक्यप्रकाश्यता तो ठीक है परन्तु ध्वनिको पदप्रकाश्य नहीं माना जा सकता

क्योंकि ध्वनि तो काव्यविशेषका नाम है । जैसा प्रथम उद्योतकी “यत्‍‌नार्थ: शब्दो वा तमर्थमुपसर्जनी-

कृतस्वार्था: | व्यङ्गच: काव्यविशेष: स ध्वनिरिति सूरिभि: कथित:॥१-१३॥' में कहा गया है । इसका

समाधान करनेके लिए पूर्वपक्ष उठाते हैं—

[प्रश्न 'काव्यविशेष स ध्वनि:' इत्यादि कारिकांशमें] काव्यविशेषको ध्वनि कहा

है तो वह [काव्यविशेषो‌ऽपध्वनि] पदप्रकाश्य कैसे हों सकता है । [वाच्य और

व्यङ्गचरूप] विशिष्ट अर्थकी प्रतीतिफे हेतुभूत शब्दसंसुदायको काव्य कहते हैं ।

[ध्वनिके] पदप्रकाशात्व [पक्षमें] [विशिष्टार्थप्रतिपत्तिहेतु शब्दार्थसन्दर्भतयारूप] काव्यत्व

नहीं वन सकता । क्योंकि पदोंके स्मारक होनेसे उनमें वाचकत्व नहीं रहता । [पद

केवल पदार्थस्मृतिके हेतु हो सकते हैं । इसीलिये यह पदार्थसंसर्गरूप वाक्यार्थके वाचक

नहीं होते हैं । तव ध्वनिकाव्यमें पदप्रकाशात्व कैसे रहेगा ?]

१. नि०, दी० में यह मुख्‍खेद नहीं है ।

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कारिका ९ ] तृतीय उद्योतः १६२

उच्यते । स्यादेव दोषो यदि वाचकत्वं प्रयोजकं' ध्वनिव्यवहारे स्यात् । न त्वेवम् । तस्य व्यङ्ग्यत्वेन व्यवस्थाना॥ किंच काव्यां शरीरेणाविमव संस्थाविशेषावच्‍छिन्नसमुदायसाध्यापि चारुत्व- प्रतीतिरन्वयव्यतिरेकाभ्यां भागेपु कल्‍यतत इति पदनानामपि व्यङ्ग्यत्वमुगुनन व्यवस्थितो ध्वनिव्यवहारो न विरोषी॥ अनन्रस्य श्रुतियेद्रदापरवति दुष्‍स्त्रताम् । श्रुतिदुष्टश्रादिपु व्यक्तं तद्रदृष्टस्त्र्यतिगुणम् ॥ पदानां स्मारकत्वेऽपि पदमात्रावभासिनः । तेन ध्वने: प्रभेदेपु सर्वेष्वेवास्ति रम्यता ॥ विच्छित्तिशोमिनैकेन भूषणेनैव कामिनी । पदव्योतयेन सुकवेर्‍व्वनिना भाति भारती ॥

[उत्तर] कहते हैं। आपका कहा दोष [पदोंके अवाचक होनेसे ध्वनिमें पद-­प्रकाशताकी अनुपपत्ति] तब आता यदि वाचकत्वको ध्वनिव्यवहारका प्रयोजक माना जाय । परन्तु ऐसा तो है नहीं । ध्वनिव्यवहार तो व्यङ्ग्यत्वससे व्यवस्थित होता है । तब तो यह है कि यदि वाचकत्वके कारण ध्वनिव्यवहार होता तब तो यह कहा जा सकता था कि पदोंके वाचक न होनेसे ध्वनि, पदप्रकाश नहीं हो सकता । परन्तु ध्वनिव्यवहारका नियामक तो वाचकत्व नहीं, व्यङ्गयत्व है । इसलिये पद भले ही सारकमात्र रहें, वाचक न हों तो भी वह ध्वनिके व्यङ्गय तो हो ही सकते हैं । इसलिये आपका दोष ठीक नहीं है । यह यथार्थ उत्तर नहीं अपितु प्रतिवन्दी उत्तर है । लोचनकारने इसे 'छलोत्तर' कहा है । अतः दूसरा यथार्थ उत्तर देते हैं—

इसके अतिरिक्त जैसे शरीरधारियों [नायक-नायिकादि]में सौन्दर्‍यकी प्रतीति अवयवसहटटनाविरोषरूप समुदायसाध्य होनेपर भी अन्वयव्यतिरेकसे [मुखादिरूप] अवयवोंमें मानी जाती है। इसी प्रकार व्यङ्गचत्वमुखसे पदोंमें ध्वनिव्यवहारकी व्यवस्था माननेमें [कोई] विरोध नहीं है। जैसे ['पाणिपादादय:' इत्यादि उदाहरणोंमें पेलव आदि शब्दोंके असमभ्यार्थके वाचक न होनेपर भी व्यङ्गचकमात्र होनेसे] श्रुतिदुष्टादि [दोषस्थलों]में अनिष्ट अर्थोंके अभिव्यञ्जकमात्र [अनिष्ट वाच्यार्थकी सूचकतामात्र]से [काव्यमें] दुष्टता आ जाती है । इसी प्रकार [ध्वनिश्शलमें] पदोंसे इष्टार्थकी स्मृति भी गुण [ध्वनिव्यवहारपर्यन्तक] हो सकती है । हस्लिप पदोंके स्मारक होनेपर भी एकपदमात्रवश प्रतीत होनेवाले ध्वनिके सभी प्रभेदोंमें समप्रता रह सकती है । [और] विरोध शोभाशाली एक [ही अङ्कमें धारण किये हुए रूप] आभूषणसे भी जैसे कामिनी शोभित होती है हसी प्रकार पदमात्रसे व्योतित होनेवाले ध्वनिसे भी सुकचिकी भारती शोभित होती है ।

१. 'प्रयोजकं न' नो । २. 'विरोषी' नो, 'वाच्यभिया' ।

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ध्वन्यालोक:

परिकरश्लोका:

यस्त्वलङ्कारमवगङ्क्यो ध्वनिनिर्वर्णपदादिशु । वाक्ये सङ्कटनायां च स प्रबन्धेऽपि दीप्यते ॥२॥

तत्र वर्णोक्तिमर्थकलहाद् ध्वोत्कत्वसम्भवे इत्याशङ्क्योदमुख्यते । शषौ सरेफसयोगौ हकारश्वापि भूरसा । विराधिनः स्युः श्रृङ्गारतन्न वर्णा रसच्युतः ॥३॥

असंलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्यके चार भेद

न एव तु निवेद्यन्ते वीभत्सादौ रसे यदा । तदा तं दीपयन्त्येव ते न वर्णा रसच्युतः ॥४॥

हृलोकद्रयेनान्वयलयतिरेकाभ्यां वर्णानां ध्वोत्कत्वं दर्शितं भवति ।

ये परिकरश्लोक हैं ॥१॥

अविवक्षितवाच्यशब्दनिके दोनों अवान्तर भेदोंके और उसके बाद विवक्षितवाच्यध्वनिनिके संलक्ष्य-क्रमव्यङ्ग्यके अवान्तर भेदोंके व्यञ्जकमुखसे पदप्रकाश और वाक्यप्रकाश दोनों भेद सौदान्त प्रदर्शित कर दिये । अब विवक्षितवाच्यध्वनिनिके दूसरे भेद अर्थात्‌ असंलक्ष्य-क्रमव्यङ्ग्यके १. वर्णपदादि, २. वाक्य, ३. सङ्घटना और ४. प्रबन्ध आदि चार भेद दिखलाते हैं । यहाँ 'वर्णपदादि' को एक ही भेद माना है ।

वैसे प्रकृतिप्रत्यय आदि भेदसे इसके अनेक भेद हो सकते हैं । परन्तु सम्प्रदायके अनुसार इन पदपदार्थोंकी गणना एक ही भेदमें की जाती है । अतः असंलक्ष्य-क्रमव्यङ्ग्यके चार भेद ही परिगणित होते हैं । इस उद्योतके प्रारम्भमें श्लोकार्द्धमें ५? भेदोंकी गणना कराते हुए इन्होंने इन चारोंको दिखा दिया था । मूल कारिकाकार इन चारोंको दिखलाते हैं— और जो असंलक्ष्य-क्रमव्यङ्ग्य [अभिधामूलध्वनिका भेद] है यह १. वर्णपदादि, २. वाक्य, ३. सङ्घटना और ४. प्रबन्धमें भी प्रकाशित होता है ॥२॥

१. वर्णोंकी रसघोतकता

उनमेंसे वर्णोंके अनर्थक होनेसे उनका ध्वनियोग्योत्कत्व असम्भव है इस आक्षेपसे [संभव है कोई प्रश्नी आशङ्का करे इसलिये] यह कहते हैं— रेफके संयोगसे युक्त हा, य और हकारका बहुलप्रयोग रसच्युत [रसापकर्षक] होनेसे श्रृङ्गाररसमें विरोधी होते हैं । [अथवा लोचनमें 'ते न' को दो पद और 'रसच्युत:' को एक पद मानकर, वे वर्ण रसको प्रवाहित करनेवाले नहीं होते, यह व्याख्या भी की है] ॥३॥ और जब वे ही वर्ण वीभत्सादि रसमें प्रयुक्त किये जाते हैं तो उस रसको दीप्त करते ही हैं । वे वर्ण रसहीन नहीं होते । [अथवा 'तेन' को एक पद और 'रसच्युत:' को एक पद मानकर, इसलिए वह वर्ण रसके क्षरण करनेवाले प्रवाहित करनेवाले होते हैं, यह व्याख्या भी लोचनमें की है ।]

यहाँ इन दोनों श्लोकोंसे पदोंकी ध्वोतकता अन्वय-व्यतिरेकसे प्रदर्शित की है ।

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कारिका ४

आचार्य आनन्दवर्धन

श्रीनिवास शास्त्री

मोतीलाल बनारसीदास

तृतीय उद्योतः

पदे चालक्ष्य्यक्रमव्यङ्ग्यस्य ध्वननं' यथा—

उत्कम्पितासि भयपरिस्खलितां शु कान्ता ते लोचने प्रतिदिशं विधुरे क्षिपन्ती । क्रोरे ण दारणतया सहसैव दग्धा धूसानिधितेन दहनेन न वीक्ष्यिवासि ॥

अत्र हि 'ते' इत्येतत् पदं रसमयत्वेन स्फुटमेवावभासते सहृदयानाम् ।

२. पदव्यङ्ग्य असंलक्ष्यक्रमव्यङ्गय

पदमें असंलक्ष्यक्रमव्यङ्गयक ध्वोतनका [उदाहरण] जैसे—

लस्मराज उदयन अपनी पत्नी वासवदत्ता के आगें जल्कर मर जाने का सामाचार सुनकर विलाप कर रहे हैं, उसी प्रमादक्रमसे यह इलोक है । राजा कह रहे हैं—

[आगके डंगसे] कॉम्पती हुई, भयसे विगलितवसना, उल [कातर] नेत्रों को [रक्षा-की आशाएं] सब दिशाओं में फेंकती हुई, तुम्हको, अत्यन्त निष्पुर पर्व धूमान्ध अग्निने [एक वार] देखा भी नहीं और निर्दयतापूर्वक एकदम जला ही डाला ।

यहाँ 'ते' यह पद सहृदयोंको स्पष्ट ही रसमय प्रतीत होता है ।

यहाँ 'उत्कम्पिनों' पदसे वासवदत्ताके भयानुभावोंका उल्लेख है । 'ते' पद उसके नेत्रों के स्वसंवेद्य, अनिर्वाचनीय, विग्रहैकायतनत्वादि अनन्त गुणगणकी स्मृतिका धोतक होनेसे रसाभिव्यक्तिका आलम्बन निमित्त हो रहा है । और उसका स्मयमाण सौन्दर्य इस समय अतिशय शोकावेशमें विभावरूपताको प्राप्त हो रहा है ।

इस प्रकार 'ते' पदके विशेष रूपसे रसाभिव्यञ्जक होनेसे यहाँ शोक-रूप स्थायिभाववाला करुणरस प्रधनतया इस 'ते' पदसे अभिव्यक्त हो रहा है । रसप्रतीति यद्यपि मुख्यतः विभावादिसे ही होती है । परन्तु वे विभावादि जब किसी विशेष शब्दसे असहायारण रूपसे प्रतीत होते हैं तब वह पदव्यङ्गयव्यप्ति कहलाती है ।

लस्मिति कनकचिते तत्र हृश्टे खरद्र्शे रम्भसनि कसितास्ते हृश्पिताताः प्रियायाः । पलाश-पवनविलुलितानमुलानां प्रकारमिव किरतां स्मरं माणा दहन्ति ॥

उस विचित्र वनक्रम्रुगको वहाँ देखते ही वेगसे खिल उठनेवाले और पवनविकम्पित उत्पलोंके पत्तसमूह-से चारों ओर बिखेरते हुए प्रिया [सीता] के वे दृश्यात याद आकर आज जलाते हैं ।

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ध्वन्यालोक:

पदावयवेन ध्वोतनं यथा——

श्रीडायोगान्नतवदनया सम्रिधाने गुरूणां वद्योत्कमपं कुचकलशयोमेन्युन्मन्त्रनिगृह्य । तिष्ठेत्युक्तं किमिव न तया यत् समुत्सृज्य वाष्पं मप्यत्सकृक्षालितदरिणीदारिने त्रिभागः ॥

इत्यत्र ‘त्रिभाग’ शब्दः । वाक्यरुपशाब्द्यस्य क्रमयज्ज्ञयो ध्वनि: शुद्धोडलङ्कारसदृश्रीणद्वेधा मतः । तत्र शुद्धस्योदाहरणं यथा रामाश्रयुदये——“कृतककुपिते” इत्यादि लोके ।

यहाँ ‘ते’ शब्द अलंकार्यमध्यज्यका चोतक है । लोचनकारने इस श्लोकपर कोई टिप्पणी नहीं की है । अतः यह मूलपाठ नहीं जान पड़ता । इधरसे हमने मूलपाटमें उसका स्थान नहीं दिया है ।

पदांशध्वोत्य असंलक्ष्यक्रमध्यानी

पदांशसे [असंलक्ष्यस्यकेपके] ध्वोतन [का उदाहरण] जैसे—— गुरूजनों [सासु-स्वसुर आदि]के समीप होनेके कारण लज्जासे सिर झुकाये, कुचकलशोंको विकसिपत करनेवाले मन्यु [दुःखावेग]को हृदयमें [ही] दबाकर [भी] आँसू टपकाते हृप चकित हरिणी [के इन्द्रियाँत]के समान हृदयाकर्षक नेत्रत्रिभाग [से जो कटाक्ष] जो मुझपर फेंका सों क्या उससे ‘तिष्ठ’ ठहरो, मत जाओ—, यह नहीं कहा?

यहाँ ‘त्रिभाग’ द्वाद्द । [गुरूजनोंकी उपेक्षा करके भी जैसे-तैसे अभिलाष, मन्यु, दैन्य, गर्वादिसे मथित जो मेरी ओर देखा था उसके स्मरणसे, प्रवास-विप्रलम्भका उद्दीपन मुख्यतः लक्ष्य समस्तपदके अवयवरूप ‘त्रिभाग’ शब्दके सद्योगसे होता है । अतः यह [पदांशध्वोत्यध्वनि है] ।

३. वाक्यध्वोत्य असंलक्ष्यक्रमध्यानी

वाक्यरुपेऽसंलक्ष्यक्रमप्रधयज्ज्ञ-ध्वनि शुद्ध और अलङ्कारसदृश्रीण दो प्रकारका होता हैं । इनमें शुद्धका उदाहरण जैसे रामाश्रयुदयमें “कृतककुपिते” इत्यादि श्लोक । पूर्ण श्लोक इस प्रकार है —

हृतेतककुपितवाष्पसम्भ्रमैः मदनस्यावलोकितैः, वनमपि गता यस्य प्रीत्या धृतापि तथा डम्भया । नवजलधरश्रयामा: पदयनं दिशो भवर्ती विना, कटिनहृदयो जीवतयेव प्रियैः स तव प्रियः ॥ [रामाश्रयुदये]

माता [कौगल्या]के उस प्रकार रोकनेपर भी जिस [राम]के प्रेमके कारण तुम [सीता]ने वन जानेका कष्ट भी उठाया । हे प्रिये ! तुम्हारा यह कटोरहृदय प्रिय [राम] अभिनव जलधरौसे ध्यामवर्ण डिंडिमण्डलको बनावर्ती क्रोधयुक्त, अश्रुपूर्ण और दीन नेत्रोंसे देखता हुआ जी ही रहा है । द्वीर्धितकारने प्रथम चरणके ‘वचन्मपि गता’के साथ जोड़ा है । अर्थात् बनावटी क्रोध आदि हेतुओंसे वनको भी गयी —यह अर्थ किया है ।

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कारिका ५ ] तृतीय उद्योतः १६७

एतद्वि वाक्यं परिपोषप्राप्तं परस्परतुरागं प्रदर्शयेत् सर्वत एव परं रसवस्वं प्रकाशयति ।

अलङ्कारान्तरसंकीर्णो यथा “स्मरनवनदीपूरेपोढा:” इत्यादि श्लोक: । अनत्र हि रूपकेण यथोक्तन्यङ्ककलक्षणानुगतेन प्रसाधितो रस: सुतरां भिन्यज्यते ॥४॥

अलङ्कारकमलव्यझ्घ: य: सङ्कटनाया' भासते ध्वनिरितियुक्तम्, तत्र सङ्कटनास्वरूपमेव तावत्रिलुप्यते—

यह वाक्य परिपुष्टिको प्राप्त [सीता और रामके] परस्परतुरागको प्रदर्शित करता हुआ सब ओर [सव शाब्दोंसे, सम्पूर्ण वाक्यरूपसे] ही रसवस्वको अभिव्यक्त कर रहा है ।

अलङ्कारान्तरसे सदूषीर्ण [मिश्रित वाक्यप्रकाश्य असंलङ्कारकमलव्यझ्घ-यचवनिका उदाहरण] जैसे—‘स्मरनवनदीपूरेपोढा:' इत्यादि श्लोक । पूरा श्लोक इस प्रकार है— स्मरनवनदीपूरेपोढा: पुनरगुसतेमुविः, यदपि विधृता स्थितिग्न्यारादपुर्णम्‍नोरथा: । तदपि लिखितप्रायेयेधै: परसरमनुस्खा:, नयननोल्लोलनीलाननैत विभान्त रस प्रिया: ॥ [अमरकोशतक, ९८]

'काम'रूप अभिवननदीको वादमें बहते हुये [परन्तु गुरु आयं, माता-पिता, सास-श्वसुर आदि गुरुजन और पति] गुरुजनरूप विशाल बाँधोंसे रोके गये अपूर्णकाम प्रिय [प्रिया और प्रिय] यचपि दूर-दूर [अलग-अलग या पास-पास । 'आयाद दूरसमीपयो:' आचार् पद दूर और समीप दोनों अर्थोका बोधक होता है ।] बैठे रहते हैं परन्तु चित्रमिलित सदृशा [निश्शल] अझोंसे [उपलक्षणे तृतीया] एकदूरेको निहारते हुये नेत्ररूप कमलनाल द्वारा लाये गये [लोँचे जाते हुये] रसका पान करते हैं ।

यहाँ व्यङ्गजक [अलङ्कार] के-यथोक्त [दूसरे उद्योतकी १८वीं कारिकामें कहे हुये विवक्षातत्परत्वेन नाति निर्वहणौधिता इत्यादि] लक्षणोंसे युक्त, [अनिव्यूढ़ रूपक

[अलङ्कार] से अलङ्कृत [विभावादिके अलङ्कृत होनेसे रसको भी अलङ्कृत कहा है] रस भली प्रकार अभिव्यक्त होता है ।

यहाँ 'स्मरनवनदी'से रूपक प्रारम्भ हुआ और 'नयननोल्लोलनीलाननैत विभान्त रस प्रिया:' से समाप्त । परन्तु वीचमें नायकयुगलपर हंसादिका आरोप न होनेसे रूपक अनिव्यूढ़ रहा॥धा

सङ्कटनाव्यङ्कत्वके प्रसङ्गमें सङ्कटनाके तीन भेद असंलङ्कारकमलव्यझ्घयचवनि सङ्कटनामें [भी] अभिव्यक्त होता है यह [पृ १६४, का० २ में] कह चुके हैं । उसमें [से ९ कारिकातक] सङ्कटनाके स्वरूपका ही सवसे पहिले निरूपण करते हैं—

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ध्वन्यालोक:

कारिका '५

असमासा समासेन मध्यमेन च भूपिता । तथा दीर्घैसमासेति त्रिधा सङ्कटनोदिता ॥५॥

कैश्चित् ॥५॥

१. [सर्वथा] समासरहित, २. मध्यम [श्रेणीके, छोटे-छोटे] समासोंसे अलंकृत, और ३. दीर्घ समासयुक्त [होनेसे] सङ्कटनार [रीति] तीन प्रकारकी मानी है ॥*॥

[वामन, उद्भट आदि] कुछ [विद्वानों] ने रीतिसम्प्रदाय साहित्यका एक विशेष सम्प्रदाय है । इस सम्प्रदायके मुख्य प्रतिष्ठापक वामन हैं । उन्होंने अपने 'काव्यालङ्कारसूत्रमें' 'रीति'को काव्यका आत्मा माना है । 'रीतिरात्मा काव्यस्य' [का० ऋ० २,६] यह उनका प्रसिद्ध सूत्र है । 'रीति'का लक्षण 'विशिष्टपदरचना रांति:' [का० ऋ० २,७] और विदोषाका अर्थ 'विशेषो गुणात्मा' [का० ऋ० २,८] किया है । अर्थात् विशिष्ट-पदरचनाका नाम 'रीति' है । पदरचनाका वैदभ्य उसकी गुणात्मक्ता है । इस प्रकार गुणात्मक पदरचनाका नाम 'रीति' है । यह 'रीति'का लक्षण हुआ ।

'स्या त्रिधा, वैदर्भी, गौडिया, पाञ्चाली चेति' [का० ऋ० ३:०:] यह रीति तीन प्रकारकी मानी गयी है—१. वैदर्भी, २. गौडी और ३. पाञ्चाली । 'विदर्भादिपु हृदयालु तत्समाख्या' [का० ऋ० ३,९०] विदर्भादि प्रदेशोंके कवियोंमें विशेषरूपसे प्रचलित होनेके कारण उनके वैदर्भी आदि देशसंघामूलक नाम रखे दिये गये हैं । उनमेंसे 'समग्रगुणा वैदर्भी' [का० ऋ० ३, ११] ओज: प्रसादादि समग्र गुणोंसे युक्त रचनाको वैदर्भी रीति कहते हैं । 'ओजः कान्तिमती गौडी' [का० ऋ० ३, १२] ओज और कान्ति गुणोंसे युक्त रीति गौडी कहलाती है । इसमें माधुर्य और सौकुमार्यंका अभाव रहता है, समासवहुल उग्र पदोंका प्रयोग होता है । 'माधुर्यसौकुमार्यौपपन्ना पाञ्चाली' [का० ऋ० ३,१३] माधुर्य और सौकुमार्यंसे युक्त रीति पाञ्चाली कहलाती है । 'सापि समासभावे च्छृद्रा वैदर्भी', जिसमें सर्वथा समासका अभाव हो उसे विशेषरूपसे च्छृद्रा वैदर्भी कहते हैं । इस प्रकार वामनने रीतियोंका विवेचन किया है ।

वामनसे पूर्व इस 'रीति' शब्दका प्रयोग नहीं मिलता है । दण्डीने इसको 'मार्ग' नामसे व्यवहृत किया है परन्तु आभिक प्रचलित न होनेसे उसका लक्षण नहीं किया है । और दण्डीके पूर्ववर्ती साहित्यग्रन्थके आचार्य आचार्य मम्मटने तो 'मार्ग' अथवा 'रीति' शब्दका उल्लेख ही किया है और न कोई लक्षण आदि । इस प्रकार रीतिसम्प्रदायके आदि प्रतिष्ठापक वामन ही ठहरते हैं । दण्डी उसको 'मार्ग' नामसे कहते हैं । आघुनिक हिन्दीमें उसको 'शैली' कहते हैं । आनन्दवर्धनाचार्यने उसको 'सङ्कटना' नामसे निर्दिष्ट किया है ।

वामनने तीन रीतियाँ मानी थीं । आनन्दवर्धनाचार्यने भी १. 'असमासा'से वैदर्भी, २. 'समासेन मध्यमेन च भूपिता'से पाञ्चाली और ३. 'दीर्घैसमासा'से गौडीका निरूपण करते हुए तीन ही सङ्कटनाप्रकार या रीतियाँ मानी हैं । राजशेखरने यद्यपि 'कपूरमञ्जरी' की नान्दीमें 'मार्गद्वय रीति'का भी उल्लेख किया है परन्तु वैसे तीन ही रीतियाँ मानी हैं । फिर भी चौथी मागधी रीतके निर्देशसे उसके माने जानेकी प्रवृत्ति परिलक्षित होता है । भोजराजाने उन चारमें एक 'अवन्तिका रीति'का नाम और जोड़ दिया और इस प्रकार पाँच रीतियाँ मानी हैं । यों हर देशकी रीतिमें कुछ वैलक्षण्य हो सकता है । उस दृष्टिसे विभाग करें तो अनन्त विभाग हो जायँगे । इसलिए मुख्यतः तीन ही रीतियाँ मानी गयी हैं, उनका निर्देश यहाँ भी किया है ।

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कारिका ६ ]

वृत्तीय उद्योत:

१६९

तां केवलमनूदितमुख्यते—

गुणानाश्रित्य निष्ठन्ती माधुर्यादीन व्यनक्ति सा । रसान्'

यच्यपि आनन्दवर्धनाचार्य रीतिसम्प्रदायके माननेवाले नहीं हैं अपितु वे ध्वनिसम्प्रदायके संस्थापक हैं; वे 'रीति' को नहीं अपितु ध्वनिको काव्यकला आस्म मानते हैं फिर भी उन्होंने रीतियोंका विवेचन बड़े विस्तारके साथ किया है । 'रीति'का सम्बन्ध ध्वनित मभय॑ रहता है । इस दशवकका विवेचन आनन्दवर्धनने ही सर्वप्रथम किया है । प्रकृत प्रमेयमें 'सहृदयहृदयसंवेदन' तादृशदृश्यो॑तेनै मे हृदयत्ना अथवा 'रीति'के विवेचनका आरम्भ करनेकी प्रतिज्ञा कर, बहुत विस्तारप॑क उक्ती विवेचना प्रारम्भ करते हैं ॥६॥

४. सहृदयताका रक्षणकत्व

उक्त [पूर्ववर्ती वामन आदि प्रतिपादित रीति अथवा सङ्कृटन]का केवल अनुवाद करके यह कहते हैं—

माधुर्यादि गुणोंको आश्रय करके स्थित हुई वह [सहृदयता] रसोंको अभिव्यक्त करती है ।

'गुणानाश्रित्य' कारिकाके इन शब्दोंसे सहृदयता और गुणोंका सम्बन्ध प्रतीत होता है । इन सम्बन्धके विषयमें तीन विकल्प हो सकते हैं । वामनने 'विशिष्टपदरचना रीति:' और 'विशेषो गुणात्मा' लिखा है । इससे 'विशिष्टपदरचना'रूप रीतिका गुणात्मककत्व अर्थात गुणोंसे अभेद वामनको अभीष्ट प्रतीत होता है । इसलिए पहले पक्षमें, गुण और रीतिका 'अभेद' पक्ष वनता है । इस पक्षमें कारिकाके 'आश्रित्य' तिङन्ती सहृदयता रसादीन व्यनक्ति' अर्थात अपने स्वरूपभूत माधुर्यादि गुणोंके आश्रित स्थित

सहृदयता रसोंको व्यक्त करती है । इस पक्षमें गुण और सहृदयताके अभेद होनेपर भी होनेवाला आश्रितत्वव्यवहार गौण है ।

दूसरे पक्षमें गुण और रीति भिन्न-भिन्न मानी गयी हैं । इन भिन्नताज्ञापकप्रमेयोंमें भी दो विकल्प हो जाते हैं । एक 'सहृदयताश्रया गुणा:' अर्थात सहृदयताके आश्रित गुण रहते हैं और दूसरा 'गुणाश्रया वा सहृदयता' सहृदयता गुणोंके आश्रित रहती है । इन दोनों मेदोंमेंसे 'सहृदयताश्रया गुणा:' यह पक्ष भट्टोद्भट आादिका है । उन्होंने गुणोंको सहृदयताका धर्म माना है । धर्ममें सदा धर्मिक आश्रित रहते हैं इसलिये गुण सहृदयताके आश्रित रहते हैं । अर्थात गुण आधेय और सहृदयता आधाररूप है । इस पक्षमें 'गुणानाश्रित्य तिङन्ती' इस कारिकाकी 'आधेयवृत्तान् गुणान् आश्रित:' अर्थात आधेयरूप गुणोंके आश्रयसे, सदृयोगसे सहृदयता रसादिको व्यक्त करती है—इस प्रकार व्याख्या होगी।

तीसरा 'गुणाश्रया सहृदयता' अर्थात 'सहृदयता गुणोंके आश्रित रहती है' यह सिद्धान्तपक्ष है । यही आनन्दवर्धनाचार्यका अभिमत पक्ष है । इसमें 'गुणानाश्रित्य तिङन्ती' अर्थात आधारभूत गुणोंके आश्रित स्थित होनेवाली सहृदयता रसादिको व्यक्त करती है । इस प्रकार यच्यपि अन्तिम पक्ष हो, आलोककारका अभिमत पक्ष है । फिर भी उन्होंने तीनों पक्षोंमें कारिकाकी सङ्क्ति लगाने और तीनों मतोंके अनुसार सहृदयताका रसाभिव्यक्तिके साथ घनिष्ठ सम्बन्ध दिखलानेका यत्न किया है । यही उपरकी मूल पंक्तियोंका सारांश है । उनका ध्वनानुवाद इस प्रकार है—

१. नि० सा० संस्करण में 'रसादन्' की जगह 'रस:' पाठ है और पूरी कारिका एक साथ छपी है ।

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ध्वन्यालोक

'सा सङ्कटनारसादीनंध्वयनक्तिगुणानाश्रित्य विषयान्न्तीलाअत्र च विकल्प्यम्, गुणानां सङ्कटनायाश्रयैवैक्यं व्यतिरेको वा । व्यतिरेकेऽपि द्वयोरगतेः । गुणाश्रया सङ्कटना, सङ्कटनाश्रया वा गुणा इति ।

तत्रैक्यपक्षे सङ्कटनाश्रयगुणपक्षे च गुणानात्मभूतान, आघेयभूतान वाश्रित्य तिष्ठन्ती सङ्कटना रसादीनंध्वयनक्तीत्यस्मृतेः । यदातु नानात्वपक्षे' गुणाश्रयसङ्कटनातिष्ठन्ती सङ्कटना रसादीनंध्वयनक्तीत्यस्मृतेः ।

पक्षः', तदा गुणानाश्रित्य तिष्ठन्ती गुणपरतन्त्रतया भावान्न तु गुणैरपवस्तव्यः । कि पुनरेकं विकल्पनस्य प्रयोजनमिति ?

अभिधीयते । यदि गुणाः सङ्कटना चेत्येकं तत्वं सङ्कटनाश्रया वा गुणाः, तदा सङ्कटनाया एव 'गुणानामनियतविषयत्वप्रसङ्गः । गुणानां हि माधुर्यप्रसादप्रकर्षः करुण-विप्रलम्भशृङ्गारविषय एव । रौत्रादिसू तादिविषयमोजः । माधुर्यप्रसादौ रसभावतदाभास-

गुण और सङ्कटनाके सम्बन्धविषयक तीन पक्ष

यह सङ्कटना गुणोंके आश्रित होकर रसादिको अभिव्यक्त करती है । यहाँ [इस प्रकार] विकल्प करने [चाहिये] । गुणोंका और सङ्कटनाका [ऐक्य] अभेद है अथवा भेद [व्यतिरेक] । [व्यतिरेक] भेदपक्षमें दो मार्ग हैं । गुणाश्रित सङ्कटना [है] अथवा सङ्कटनाश्रित गुण [है] ।

इनमेंसे १. 'अभेदपक्ष' में और २. 'सङ्कटनाश्रित गुणपक्ष' आत्मभूत ['अभेद-पक्ष'] में अथवा आघेयभूत ['सङ्कटनाश्रित पक्ष'] में गुणोंके आश्रयसे स्थित होती हुई सङ्कटना रसादिको ध्यकत करती है—यह अर्थ होता है । उन [गुण और सङ्कटनाके] भेदपक्षमें 'गुणाश्रित सङ्कटनापक्ष' [सिद्धान्तपक्ष] लें तब गुणोंके आश्रित स्थित [अथोत्] गुणोंके श्राश्रयेन स्वभाववाली—गुणस्वरूप ही नहीं—(सङ्कटना रसोंको अभिव्यक्त करती है] यह अर्थ होगा ।

गुणोंको सङ्कटनाश्रित या सङ्कटनारूप माननेमें दोष

[प्रश्न] इस प्रकार विकल्प करनेका क्या प्रयोजन है? [उत्तर] बताते हैं । यदि गुण और सङ्कटना एकतत्व हैं [इनका अभेद है यह उत्तर] अथवा सङ्कटनाके आश्रित गुण रहते हैं, [यह पक्ष मानें] तो सङ्कटनाके समान गुणोंका भी अनियतविषयत्व हो जायगा । गुणोंका [विषय नियत है 'विषय-नियमो व्यवस्थितः' । इन आगेके शब्दोंसे अन्वय है] तो विषयनियम निश्श्चित है । जैसे, करुण और विप्रलम्भशृङ्गारमें ही माधुर्य और प्रसादका प्रकर्ष [होता है], ओज, गाम्भीर्य और अनृत विषयमें [ही प्राशनत: रहता है], माधुर्य और प्रसाद, रस, भाव

१. 'सा' नि० तथा वी० में नहीं है ।

२. 'यदातु नानात्वपक्षे' नि०, द्वा० ।

३. 'गुणाश्रयः सङ्कटनाप्रश्र्च' नि० । गुणाश्रयससङ्कटनापक्षश्च द्वी० ।

४. 'गुणानामनियतविषयत्वप्रसङ्गः' द्वी० ।

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कारिका ६ ]

तृतीय उद्योत:

३७९

विषयावेव, इति विषयनियमो व्यवस्थितः। सङ्घटनायास्तु स विघटते। तथाहि श्रृङ्गारेऽपि दीर्घसमासा हरयते', रौद्रादिष्वसमासा' चेति।

तत्र श्रृङ्गारे दीर्घसमासा यथा, —“मन्दारकुसुमरेणुपिञ्जरितालका” इति।

यथा वा—

अनवरतनयनजललवावनिपतनपरिप्लुतपतत्रलेखं ते। करतलनिषण्णमबले बदनमिदं कं न तापयति॥

इत्यादौ।

तथा रौद्रादिष्वसमासा हरयते'। यथा—“यो यः शस्त्रं बिभर्ति स्वभुजगुरुमदः”

इत्यादौ।

दस्मात्त्र सङ्घटनास्वरूपा:, न च सङ्घटनाश्रया गुणा:।

और तदभावश्चियक ही होते हैं। [इस प्रकार गुणोंका विषयनियम बना हुआ है। परन्तु] सङ्घटनामें वह विगड़ जाता है। क्योंकि श्रृङ्कारमें भी दीर्घसमासा [रचना-सङ्घटना- ] पायी जाती है और रौद्रादि रसोंमें भी समासरहित [रचना पायी जाती है]।

उनमेंसे श्रृङ्गारमें दीर्घसमासवाली [रचना-सङ्घटनाका उदाहरण] जैसे—'मन्दारकुसुमरेणुपिञ्जरितालका' यह पद। [यह उदाहरण श्रृङ्कारमें दीर्घसमासवाली रचनाका दिया है। परन्तु पूर्ण प्रकरण सामने न होनेसे यहाँ श्रृङ्कारकी कोई प्रतीति नहीं होती। इसलिये यह उदाहरण ठीक नहीं है, यदि कोई पेसो आकार करे तो उनके सन्तोषके लिये दूसरा उदाहरण देते हैं।]

अथवा जैसे—

हे अवले, निरन्तर अश्रुविन्दुओंके गिरनेसे मिट्टी हुई पत्रावलीवाला और हस्तेलीपर रखा हुआ [दुःखका अभिव्यञ्जक] तुम्हारा मुख किसको सन्तप्त नहीं करता। इत्यादिमें।

और रौद्रादिमें भी समासरहित [रचना—सङ्घटना] पायी जाती है। जैसे—'यो यः शस्त्रं बिभर्ति स्वभुजगुरुमदः' इत्यादि [पृ० ९८ पर पूर्व उदाहरण श्लोक]में [समासरहित सङ्घटना है]।

यदि गुणोंको सङ्घटनासे अभिन्न या सङ्घटनापर आश्रित मानें तो जैसे असमास और दीर्घ-समास रचनाकी विषयव्यवस्था नहीं पायी जाती है उसी प्रकार गुणोंको भी विषयनियमसे रहित मानना होगा। परन्तु गुणोंका विषयनियम व्यवस्थित है।

इसलिये गुण, न तो सङ्घटनारूप हैं और न तो सङ्घटनाश्रित हैं।

१. 'हरयते' नि०, दी०।

२. 'असमासाइचैति' नि०, दी०।

३. 'पत्रलेखान्तम्' नि०, दी०।

४. 'हरयन्ते' दी०।

५. नि० तथा दी० में इस 'गुणा:' पदको 'दस्मात्त्र'के बाद रखा है।

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ध्वन्यालोकः

कारिका ६

न तु यदि सङ्कटना गुणानां नाश्रयस्तन्न 'किमालम्बनं एते परिकलप्यन्ताम्' । उच्यते । प्रतिपादितमेवैषामालम्बनम् । 'तमर्यमवलम्बन्ते येड्‌डिनं ने गुणाः स्मृता: । अज्ञाथितास्त्वलङ्कार मन्तव्या: कटकादिवत््' ।

अथवा भवन्तु शब्दाश्रया एव गुणा: । न चैषामुप्रासादितुल्यत्वम् । यस्माद्‌ध्वप्रासादि नपेक्षशब्दधर्मा एव प्रतिपादिता: । गुणास्तु व्यङ्ग्यैवैशेष्यविश्रान्तिभा-

गुणोंका वास्तविक आश्रय

[प्रश्न] यत्रि सङ्कटना गुणोंका आश्रय नहीं हैं तो फिर इन [गुणों]को किसके आश्रित मानेंगे?

[उत्तर] इनका आश्रय [द्वितीय उद्योतकी छठीं कारिकामें] बता ही चुके हैं।

[वह्‌ कारिका नीचे फिर उद्धृत कर दी है। जैसे]-जो उस प्रधानभूत [रस]का अवलम्बन करते हैं [रसके आश्रय रहते हैं] वे 'गुण' कहलाते हैं और जो उसके अङ्क [शब्द्‌ तथा अर्थ]के आश्रित रहते हैं वे कटक, कुण्डल आदिके समान अलङ्कार कहलाते हैं।

प्रश्नकर्त्ता का अभिप्राय यह है कि शब्द्‌, अर्थ और सङ्कटना ये तीन ही गुणोंके आश्रय हो सकते हैं। उनमेंसे शब्द्‌ या अर्थको गुणोंका आश्रय माननेसे तो वे शब्दालङ्कार-

रूप ही हो जायेंगे। गुणोंका अलङ्कारोवे अलम अस्तित्व बनानेके लिए एक ही प्रकार है कि उनका सङ्कटना रूप अथवा सङ्कटनाश्रित माना जाय ! यदि आप उनका भी खण्डन करते हैं तो फिर गुणोंका आश्रय और क्या होगा ?

इसके उत्तरका आशय यह है कि गुणोंका आश्रय मुख्यतः रस है। जैसे कि दूसरे उद्योतकी छठीं कारिकामें कहा जा चुका है। और गौणरूपसे उनको शब्द्‌ तथा अर्थका धर्म भी कह सकते हैं।

अथवा [उपचारसे] गुण शब्दाश्रित ही [कह्‌दे जा सकते] हैं। [फिर भी] वे अनुगासादि [शब्दालङ्कार]के समान नहीं [समझे जा सकते] हैं। क्योंकि अनुगासादि,

अर्थनिरपेक्ष शब्दसामके धर्म हैं ही बताये गये हैं। और गुण तो [शब्दापादिरस रूप] व्यङ्ग्यार्थविशेषके अभिव्यङ्जक, व्यङ्ग्यार्थके प्रतिपादनमें समर्थ शब्द्‌ [अर्थसापेक्ष शब्द्‌]के

१. 'तद्‌' दी० ।

२. 'परिकल्प्यन्ते' नि० ।

३. इसके बाद 'शङ्कनीयम्' पाठ दी० में अधिक है ।

४. 'अनपेक्षिता र्थविश्रान्तः शब्दधर्माः पूर्व' नि०, दी० ।

५. नि० दी० में 'प्रतिपादिता:' नहीं है ।

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ध्वन्यालोक

आचार्य आनन्दवर्धन

महामहोपाध्याय पण्डित बलदेव उपाध्याय

चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन

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ध्वन्यालोकः

[कारिका ६

अभ्युपगते वा वाक्यचयकृत्-पत्ते रसादीनां न नियतां काचित् सकृटना वेधामाश्रयत्वं प्रतिपघते इत्थं नियतसकृटना: शबदा एव गुणानां व्यक्‍क-विशेषाश्रयतां युगपद आश्रया: । नतु माधुर्यें यदि नामैवमुख्यते तदुच्यताम्। ओजस: पुन: कथमेतदनियतसकृटन-शब्दाश्रयत्वम्। तद्यसमासा सकृटना कदाचिदोजस आश्रयतां प्रतिपघते ।

मतानुसार 'अङ्कारराङ्गमिवैकक्‍क्‍क-वाच्य-प्रतिपादनकमता ही शब्दका माधुर्यें है । इसलिए रसाभिव्यक्ति के लिए अर्थकी अपेक्षा है । और यह वाचकत्व, सकृटना शब्दरूप वाक्यमें ही रहता है, न केवल वर्णों या पदोंमें नहीं; क्योंकि केवल वर्ण तो अनर्थक हैं और केवल पद स्मारकमात्र हैं, वाचक नहीं । इसलिए वाचकत्व केवल सकृटना शब्दों अर्थात् वाक्यमें ही रह सकता है । और जहाँ वाचकत्व रह सकता है वहीं उप्चारसे माधुर्यादि गुणोंकी स्थिति हो सकती है । इसलिए वाचकत्वके शब्दरूप वाक्यनिष्ठ होनेसे माधुर्यादि गुण भी उपचारसे सकृटनाश्रित ही हैं। इसलिए सकृटनाश्रित गुणवादका सर्वथा खण्डन नहीं किया जा सकता है । वह भट्टोद्भटके मतका चार है ।

इस मतके अनुसार भट्टोद्भट भी पदोंको अवाचक केवल स्मारकमात्र मानते हैं । इस स्मारकवादकी चर्चा इसी उच्योतमें हो चुकी है । परन्तु वहाँ भी पदोंके 'स्मारकत्व' और 'वाचकत्व' पक्षके निर्णायको ग्रन्थकारने टाल दिया था । अब वही प्रश्न यहाँ फिर उपस्थित हो जाता है । परन्तु यहाँ भी ग्रन्थकारने उसका निर्णय करनेका प्रयत्न नहीं किया है । इसका अभिप्राय यह है कि पदोंका वाचकत्व है, या ध्वनिकत्व, अथवा स्मारकत्व, यह एक अलग प्रश्न है उसके निर्णयको छोड़कर भी गुणोंके रसघर्मत्व और उपचारसे शब्दधर्मत्वका निश्चय किया जा सकता है । अतएव उस लम्बे और गौण प्रश्नको यहाँ भी छोड़ दिया है ।

अब रह जाता है भट्टोद्भटके सकृटनाश्रय गुणवादके औचित्य या अनौचित्यके निर्णयका प्रदान । उसके विषयमें ग्रन्थकार यह कहते हैं कि यदि 'दुर्जनतोषण्याय'से भट्टोद्भटके अनुसार शब्दोंके स्मारकत्व और केवल वाक्यके वाचकत्वको भी मान लिया जाय तो भी नियत सकृटनावाले सभी शब्द अर्थात् वाक्य, अर्थके वाचक हो सकते हैं । परन्तु असमासा रचनाशैली शृङ्गारके समान ओजके आश्रय रौद्रादिकी भी अभिव्यक्ति हो सकती है और समासबहुला या दीर्घसमासा सकृटना रौद्रादिके समान शृङ्गारादिकी भी अभिव्यक्ति हो सकती है । इसलिए शृङ्गारादिकी अभिव्यक्तिके लिए किसी नियतसकृटनाका नियम न होनेसे माधुर्यादि गुणोंको नियतवकृटनाश्रित धर्म नहीं माना जा सकता है ।

[दुर्जनतोषण्यायसे] यदि रस आदिको वाक्यार्थकृत्‍क्‍क न माना जाय] तो भी कोई नियतसकृटना [जैसे असमासा या दीर्घसमासा आदि] उन [रसों]का आश्रय नहीं होती, इसलिए व्यक्‍क-विशेषसे अनुगत [शृङ्गारादि] अनियतसकृटनावाले शब्द ही गुणोंके आश्रय हैं [अर्थात् गुण सकृटनाश्रित नहीं हैं]।

[प्रश्न—अनियतसकृटनावाले शब्द ही गुणोंके आश्रय होते हैं] यह बात यदि आप माधुर्यके विषयमें कहें तो कह सकते हैं परन्तु ओज तो अनियतसकृटनाश्रित कैसे हो सकता है ? क्योंकि [ओजकी प्रकाशक तो दीर्घसमाससकृटना नियत ही है] असमासा [अर्थात् समासरहित] सकृटना कभी ओजका आश्रय नहीं हो सकती है ।

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कारिका ६ ] द्वितीय उद्योत: १३९

उद्यते । यदि ना प्रसिद्धिमात्रप्रहदूषितं चेतस्तदत्रापि न नं' ईमः । ओजसः कथमसमासा सङ्ङटना नाश्रयः । यतो रौद्रादीन् हि प्रकाशयतः काव्यस्य दीप्तिरोज इति प्राक् प्रतिपादितम् । तञ्चेजो यथासमासायामपि सङ्ङटनायां स्यात् , तत्कथं दोषो भवेत् । न चाचारुत्वं सहृदयहृदयसंवेधमस्ति । तस्मादनियतसङ्ङटनस्ववश्रयत्वे गुणानां न काविन् क्षतिः । तेषां तु च्छुरुरादीनामिव यथास्वं विषय नियतस्य स्वरूपस्य न कदाचिद् व्यभिचारः । तस्मादनये गुणाः अन्याः न च सङ्ङटना । न च सङ्ङटनाश्रिता गुणाः, इत्थेकं दर्शानम् । अथवा सङ्ङटनारूपा एव गुणाः । यत्कत्कम् 'सङ्ङटनावद् गुणानामप्यनियतविषयत्वं प्राप्नोति लक्ष्ये व्यभिचारदर्शनात्' इति । तत्राप्येतदच्युच्यते—यत्र लक्ष्ये परिकलिप्तविषय-व्यभिचारस्तद् विलेप्सितवस्तु । कथमारुत्वं तादृशे विषये सहृदयानां नावभाति३ चेत ?

[उत्तर] कहते हैं यदि केवल प्रसिद्धिमात्रके आपग्रहसे [आपका] मन दूषित न हो तो वहाँ³ भी हम [ओजकी प्रतीति असमासा रचनासे] नहीं [होती यह] नहीं कह सकते हैं [अर्थात् केवल प्रसिद्धिकी बात छोड़कर विचारें तो असमास रचनासे ओजकी प्रतीति होती है ]। असमासा रचना ओजका आश्रय क्यों नहीं होती [अर्थात् अवश्य होती है] क्योंकि रौद्रादि रसोंको प्रकाशित करनेवाली काव्यकी दीप्तिरूप ओज है। यह बात पहिले कह चुके हैं। और वह दीप्तिरूप ओज यदि समासरहित रचनासें भी रहे तो क्या दोष है ? [अर्थात् कोई दोष नहीं है ]। उस समासिरहित रचना-से ओजःप्रकाशनमें किसी प्रकारका अचारुत्व सहृदयहृदयके अनुभवमें नहीं आता । इसलिए गुणोंको अनियतसङ्ङटनावाले शब्दोंका धर्म यदि [उपचारसे] मान लिया जाय तो कोई हानि नहीं है। और च्छुरुरादि इन्द्रियोंके समान उनके अपने-अपने विषय-नियमित स्वरूपका कभी व्यभिचार नहीं होता। इसलिए गुण अलग है, सङ्ङटना अलग है और गुण सङ्ङटनाके आभ्रित नहीं रहते यह एक सिद्धान्त है [ यह स्वाभिमत सिद्धान्तपक्षका उपसंहार किया ]। अथवा [वामनमतानुसारी प्रथम पक्षमें] सङ्ङटनारूप ही गुण हैं। [अर्थात् गुणोंको सङ्ङटनारूप माननेवाले इस वामनमतमें भी कोई हानि नहीं है ]। इस पक्षमें जो दोष दिया था उसका समाधान करते हैं ] और जो यह कहा था कि 'लक्ष्य [अथोत् 'यो शाब्दं' तथाऽ 'अनवरतनयनजललब.' आदि उदाहरणों] में [सङ्ङटनानियमका] व्यभिचार पाये जानेसे सङ्ङटनाके समान गुणोंमें भी अनियतविषयत्व प्राप्त होगा उसका भी समाधान यह है कि जिस उदाहरणमें [सङ्ङटनाके] परिकल्पित विषयनियम-का व्यभिचार पाया जाय उसकी [सङ्ङटना]को [विलूप] दूषित ही मानना चाहिये ।

[प्रदान—यदि 'यो यः शाब्दं विभर्ति' इत्यादिकी सङ्ङटना दूषित है तो] उस प्रकारके विषयोंमें सहृदयोंको अचारुत्वकी प्रतीति क्यों नहीं होती ? [यह शङ्का हो तो]

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ध्वन्यालोक:

परिकरदेवलोकवृत्ति

कविप्रतिभितिरोधितत्वान् । द्विविधो हि दोषः, कवेरङ्ग्युत्पत्तिकृतो, अशक्तिकृतस्तरच ।

तत्राङ्ग्युत्पत्तिकृतो दोषः शक्तितिरसृततत्त्वान् कदाचिन्न लक्ष्यते । यस्त्वशक्तिकृतस्तस्य' स झटिति प्रतिभासते �

अङ्ग्युत्पत्तिकृतो दोषः शकत्या सञ्च्रियते कवे: ।

यस्त्वशक्तिकृतस्तस्य' स झटित्यवभासते ॥

तथाहि — महाकवीनामङ्ग्युत्पत्तिदेवताविश्रयप्रसिद्धसम्भोगशृङ्गारादिवन्धनोद्यानाचित्त्य

शक्तितिरसृततत्त्वाद्' ग्राम्यत्वेन न प्रतिभासते । यथा कुमारसम्भवे देवीसम्भोगवर्णनम् । एवमादौ च विषयेऽयथौचित्यानत्यागस्तथा दर्शितमेवाम्रे ।

[उत्तर] कविकी प्रतिभा [शक्तिके बल]से दब जानेसे [तिरोधित हो जानेसे वह अग्राह्यत्व रूपसे प्रतीत नहीं होता]। दो प्रकारके दोष [कार्यमे] हो सकते हैं—१. [कविकी] अङ्ग्युत्पत्तिकृत और २. [कविकी] अशक्तिकृत ।

—वर्णनीय वस्तुके नये-नये ढंगसे वर्णन कर सकनेकी प्रतिभाको 'शक्ति' कहते हैं । और उसके उपयोग्य समस्त वस्तुओके पौर्वापर्यके विवेचनकौशलको व्युत्पत्ति कहते हैं । इन्हीं शक्ति या व्युत्पत्तिकी न्यूनतासे काव्यमें दोष आ सकते हैं] उनमेंसे अङ्ग्युत्पत्तिकृत दोष शक्ति [प्रतिभाके प्रभाव]से दब जानेके कारण कभी-कभी अनुभवमें नहीं आता ।

परन्तु जो अशक्तिकृत दोष है वह तुरन्त प्रतीत हो जाता है। इस विषयमें परिकर-रलोक भी है—

अङ्ग्युत्पत्तिके कारण होनेवाला दोष कविकी शक्तिके बलसे छिप जाता है । परन्तु कविकी अशक्तिके कारण जो दोष होता है वह तुरन्त प्रतीत हो जाता है ।

जैसे कि [कालिदास आदि] महाकवियोंके उन्नमदेवताविषयक प्रसिद्ध सम्भोग-शृङ्गारादिके वर्णनका [माता-पिताके सम्भोगवर्णनके समान अत्यन्त अनुचित होते हुए भी] अनौचित्य भी शक्तिसे दब जानेके कारण ग्रास्यरूपसे प्रतीत नहीं होता है । जैसे कुमारसम्भवमें देवी [पार्वती] के सम्भोगका वर्णन ।

इस प्रकारके उदाहरणोंमें यद्यौचित्यके अत्यागकारा [उपादान] कैसे किया जाय यह आगे [इसी उद्योतमें १० से १६ कारिकातक] दिखलाया ही है ।

यहाँ कवि कालिदासने प्रतिभावलसे शिव और पार्वतीके सम्भोगशृङ्गारका वर्णन इस सुन्दरता-से किया है कि पाठकका हृदय उसके रसास्वादमें ही मग्न हो जाता है और उसके औचित्य-अनौचित्यके विचारका अवसर ही नहीं पाता है । जैसे महाभुद्र या खेल आदिकी किसी प्रतिद्वन्द्वितामें साधुवादके स्थानपर आशीर्वादके योग्य किसी छोटे व्यक्ति के कौतुकको देखकर प्रेक्षाके मुँहसे हठात् साधुवाद निकल पड़ता है और उसका अनौचित्य प्रतीत नहीं होता, उसी प्रकार कविकी प्रतिभावशा सङ्घदय

१. 'यस्त्वशक्तिकृतस्तस्य' नि० ।

२. 'शक्तितिरसृत' नि० ।

३. 'यथौचित्यानत्याग:' नि० ।

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शक्तितिरस्कृतत्वं ध्वन्यभङ्यतिरेकाश्र्यामवसीयते ! तथाहि शक्तिरहितेन कविना

एवंविधे विषये श्रुजार्थ उपनिबन्ध्यमानः स्कुटमेव दोषत्वेन प्रतिभासते ।

नन्वस्मिन् पक्षे 'यो यः शास्त्रं विभर्ति' इत्यादौ किमचारलवम् ?

अपृतीमानेवारोप्यमाणः ।

उस श्रुजारमें इतना तन्वय हो जाता है कि उसे औचित्य-नौचित्यकी मीमांसा का अवलम्ब नहीं मिलता ।

यहाँ शक्तिरहित होने दोषका तिरस्कृत हो जाना अर्थवा धनु ल्यना है ।

यहाँ वृत्तिकार लिख रहे हैं 'दर्शितमेवामि', अर्थात् आगे दिखलाया जायगा, परन्तु भूतार्थक 'क' प्रत्ययका प्रयोग कर रहे हैं। इसकी सङ्क्ति इस प्रकार लगानी चाहिये कि ग्रन्थकार वृत्तिके पूर्वं कारिकाओंका निर्माण कर चुके थे।

इसी आशयसे वृत्तिमें 'दर्शितम्' पदच्ये भूतकालका निर्देश किया है ।

[अन्युत्पत्तिुहत दोषका] शक्तितिरस्कृतत्व अन्यथाऽन्यतिरेकासे सिद्ध होता है !

क्योंकि शक्तिरहित कवि यदि पेस [उत्तम वेदतात्पर्ये] विषयमें श्रुजारका वर्णन करे तो [माता-पिताके सम्मोगवर्णनके समान] स्पष्ट ही दोषरूपसे प्रतीत होता है [और महाकवि कालिदास जैसे प्रतिभावान्का किया हुवा, पार्वतीका सम्मोगवर्णन दोषरूपपमें प्रतीत नहीं होता, अतः अन्यथाऽन्यतिरेकसे दोषका शक्तितिरस्कृतत्व सिद्ध होता है]।

[प्रथम—गुणों को सङ्कुटनाका, मानेमें, विषयनियमका अतिक्रमण करनेवाली सङ्कुटना को दृष्टान्तका जो मत आपने स्थिर किया है उसके अनुसार]

इस पक्षमें 'यो यः शास्त्रं विभर्ति' इस उदाहरणमें क्या अचाहुत्व है ?

[उत्तर—वास्तवमें कोई अचाहुत्व अनुसरणमें नहीं आता फिर मी] हम लोग [व्यर्थ ही] अविद्यमान अचाहुत्वका आरोप करते हैं ।

अविद्यमान अप्रतीमान अचाहुत्वके मी आरोप करनेका भाव यह है कि सङ्कुटना और गुणको अमिश्र माननेवाले वामनके पक्षमें 'यो यः शास्त्रं विभर्ति' इत्यादि उदाहरणोंमें वौदादि रसमें मी समासरहित अतएव ओजोविहीन रचनाके पाये जानेक कारण सङ्कुटनाके विषयनियमकी अनुपपत्ति आती है और उसके कारण 'माधुर्यप्रसादप्रकः करणविग्रहभयस्य विषय पव् ।

रौद्राद्‌सुतादिविषयमोजः l' इत्यादि गुणोंका जो निर्धारित विषय है वह भी अव्यवस्थित होने लगता है, तब गुणोंके विषयनियमकी रक्षाके लिये इस प्रकारके उदाहरणोंको दोषभ्रष्ट मानना ही अच्छा है ।

इस प्रकारके अव्यवस्थालोंके हट जानेसे गुण और सङ्कुटना दोनोंका विषयनियम व्यवस्थित हो सकता है ।

गुण और सङ्कुटना दोनोंके विषयनियमको व्यवस्थित करनेका यह एक प्रकार है !

इस प्रकारमें व्यवस्थाका नियामक रसतत्त्वको मानते हैं । फिर मी इस प्रकारमें, 'यो यः दासं विभर्ति' इत्यादि कुछ उदाहरणोंको दोषक प्रतीति न होनेपर मी भ्रूषित मानना पड़ता है ।

वह कुछ श्रेष्ठ कविकर वात नहीं हैं । इसीलिए ग्रन्थकार विषयनियमकै व्यवस्थापक अन्य तत्त्वोंकी चर्चा आगे कर रहे हैं जिससे उन नियामक तत्त्वोंकी हष्टिसे गुण और सङ्कुटनाको एक माना वाध या अलग प्रत्येक दशामें विषयनियमका उपपादन किया जा सके ।

इसी हष्टिसे रसादिरिक नियामक तत्त्वोंकी चर्चा प्रारम्भ करते हैं ।

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ध्वन्यालोकः

[कारिका ६

तस्माद् गुणव्यतिरिक्ते गुणरूपतये व सक्रटनाया अन्यः कश्चिन्नियमहेतुरवश्यं वक्तव्यः।

'तत्रियमे हेतुरौचित्यं वक्तृवाच्ययोः॥६॥

तत्र वक्ता कविः, कविनिबद्धो वा । कविनिबद्धाश्रयी रसभावादिरहितो रसभावसमन्वितो वा । रसोऽपि कथानायकाश्रयस्तद्विपक्षाश्रयो वा । कथानायकाश्रयो धीरोदात्तादिर्भेदभिन्नः । पूर्वस्तदनन्तरो वाच्यो वा, अभिनेयार्थमनभिनेयार्थं वा, उत्तमप्रकृत्याश्रयस्तदितराश्रयश्चेति बहुप्रकारम् ।

सक्रटनाका नियामक तत्त्व

इसलिए [सक्रटनाके गुणव्यतिरिक्त माननेपर सक्रटनानियामक कोई हेतु ही न होते और सक्रटनारूप माननेमें रसको ठीक तरहसे नियामक नहीं माना जा सकता है], क्योंकि 'यो यः' इत्यादिमें उसका व्यवचार दिखाया जा चुका है। अतएव गुणव्यतिरिक्तत्व और गुणरूपत्व [दोनों ही पक्षों]में सक्रटनाके नियमानार्थ कोई और ही हेतु वतलाना चाहिये। इसलिए कहते हैं—

उसे [सक्रटना]के नियमानका हेतु वक्ता तथा वाच्यका औचित्य [ही] है।

उनमेंसे वक्ता कवि या कविनिबद्ध [दो प्रकारका] हो सकता है। और कविनिबद्ध [वक्ता] में रसभाव [आदि] रहित अथवा रसभाव [आदि] युक्त [दो प्रकारका] हो सकता है। [उसमैं] रस भी कथानायकनिष्ठ अथवा उसके विरोधी [प्रतिनायक] निष्ठ [दो प्रकारका] हो सकता है। कथानायक भी धीरोदात्तादि [धर्मयुक्तवीरप्रधानो धीरोग्रेध्दत:। वीररौद्रप्रधानो धीरोद्धत:। दानधर्मवीरशान्तप्रधाना धीरप्रशान्तः। इति चत्वारो नायका: क्रमेण सात्त्वती—आंग भटीकाशिकीभारतीलक्षणद्रुतिप्रधानाः। १—'दशारूपक' टीकामैं] मेदसे भिन्न, मुख्य नायक अथवा उसके वाचक [उपनायक—पीठमर्द] हो सकता है। इस प्रकार [वक्ताके अनेक] विकल्प हैं।

वाच्य [अर्थ] ध्वनिरूप [प्रधान] रसका अंग [अभिनेयअंक], अथवा रसाभासक अंक [अभिनेयक], अभिनेयार्थ, या अनभिनेयार्थ, उत्तम प्रकृतिमैं आश्रित, अथवा उससे भिन्न [मध्यम, अधम] प्रकृतिमैं आश्रित। इस तरह नाना प्रकारका हो सकता है।

अभिनेयार्थ और अनभिनेयार्थ ये दोनों वाच्यके भेद हैं, अतएव यहाँ उसके विशेषण हैं। साधारणत: बहुविधि समास 'अभिनेय: अर्थो यस्मादभिनेयार्थ:' के अनुसार अर्थ करनेसे 'यस्य' पद तो वाच्यका ही परामर्शक होगा। उस दशामैं 'वाच्य' और 'अर्थ' दोनोंके एक हो जानेसे 'राहो: धीर:' इत्यादि प्रयोगके समान व्यपदेशशिवदत्तात्रवकी कल्पना करनी होगी। अतएव इसकी व्याख्या

१. नि० में ह्रस्व कारिकाभागदो यहाँ द्रुतिरूपमें छापा है और परिशिष्ट कारिका एक साथ रखी है।

२. 'कश्चिन्नि०' में अधिक है।

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द्वितीय उद्योतः

तत्र यदा कविकल्पतरसमासो वाक्का तदा रचनायाः कामचारः। यदा हि कविनिबन्धो वाक्का रसभावसमन्वितो, रसाद्र प्रधानाश्रिततया² ध्वन्यात्मभूततादा³ नियमेनैव तत्रासमाससमध्य-समासे एव सकृटने।

कथमिति चेत्, उच्यते। रसो यदा प्राधान्येन प्रतिपाद्यतदा वल्मवतीवौ व्यवधायकविरोधिनश्च सङोक्तनौ, समाधानानमन्यत्कारसम्भावनया, काविद्ध रसप्रतीति³ न्यबदधातीति तस्यां नात्यन्तमभिनिवेशः शोभते। विशेषतोऽभिनेयार्थे काव्ये। ततोऽन्यत्र च विशेषतः करणविप्रलम्भशृङ्गारयोः। तयोर्हि सुकुमारतरत्वात् स्वल्पयामप्यसहिष्णुता³ शब्दार्थयोः प्रतीतिमन्यरीभवति।

'अभिनेयो वाग्वदरसत्त्वाह्यैः अभिमुख्य शाब्दलकारप्रायं नेयोड्यो व्यङ्ग्यरूपो ध्वनिस्वभावो यस्तद्भिनेयार्थे वाक्यम्' इस प्रकार करनी चाहिये। इसका भाव यह हुआ कि वाच्य, आभिधानिक, सात्त्विक और आहार्य-आरोपित चेष्टादि द्वारा अभिमुख्य अर्थात् शाब्दलकाररूपता को निष्फल करने वाला व्यङ्ग्य या ध्वनिरूप अर्थ हो उसे वाच्यको अभिनेयार्थक वाक्य कहना चाहिये। इस प्रकार सकृटना के नियामक वाक्यके अनेक भेद प्रदर्शित कर अब उनके औचित्यसे सकृटना के नियमका निरूपण करते हैं—

उन [अनेकविध-वाक्यों] में से जब रसभावरहित कवि [शुद्ध कवि] वाक्का हो तब रचनाकी स्वतन्त्रता है। और जब रसभावरहित कविनिबद्ध वाक्का हो तब भी वही [कामचार] स्वतन्त्रता है। जब कि कवि अथवा कविनिबद्ध वाक्का रसभावसमन्वित हो और रस भी प्राधान्याश्रित होने से ध्वन्यात्मभूत हो तब वहां नियमसे ही असमास अथवा मध्यमसमासवाटी रचना ही करनी चाहिये। करुण और विप्रलम्भशृङ्गारमें तो समासरहित ही सकृटना होनी चाहिये।

क्यों ? यदि यह कहा हो तो, उत्तर यह है कि जब रस प्रधनरूपसे प्रतिपाद्य है तब उसकी प्रतीति में विभिन्न डालनेबाले और उसके विरोधियोंका पूर्ण रूप से परिहार-ही करना चाहिये। इस प्रकार [एक समस्त पदमें] अनेक प्रकारके समास [विग्रह] की सम्भावना होने से द्वीर्घसमासवाटी रचना रसप्रतीतिमें कदाचित् बाधक हो इसलिए उस [द्वीर्यसमासरचना] के विषय में अत्यन्त आसक्ति अच्छी नहीं है। विशेष रूप से अभिनेयार्थक काव्यमें। [क्योंकि द्वीर्यसमासवाले पदोंको अलग किये बिना उनका अभिनय ठीक तरह से नहीं हो सकता है। और न काकुसे श्लेष अर्थ, और बीच-बीच में प्रसादार्थक दास्य, गद्य आदिकी शक्ति ही ठीक होती है। इसलिए अभिनेय व्यक्न-काव्यमें भी द्वीर्यसमासा रचना ठीक नहीं होती] और उससे मिन्न [काव्य] में विशेषतः करुण तथा विप्रलम्भशृङ्गारमें [द्वीर्यसमासरचना उचित नहीं है। क्योंकि] उनके

१. 'प्रधानाश्रिततया' मि० टि० । २. 'वल्मवतीवौ' मि० टि० ।

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ध्वन्यालोकः

कारिका ६

रसान्तरे पुनः प्रतिपाद्ये रौद्रादौ मध्यमसमासापि सङ्क्रुटना कदाचिद् घोरोद्भटनायकसम्वन्धगुणापाराश्रयेण, दीर्घसमासापि वा तद्रक्षेपाविनाभाविरसौचित्यवाच्यापेक्षया न विरुणा भवतीति साधु नात्यन्तं परिहायौ।

सर्वत्र च सङ्क्रुटनासु प्रसादाख्यो गुणो व्यार्पी। स हि सर्वरससाधारणः सर्वः सङ्क्रुटनोसाधारणप्रचेत्युक्तम्। प्रसादाधिकमे ह्रसमासापि सङ्क्रुटना करुणप्रलम्भशृङ्गारौ न छ्यनक्ति। तदपेक्ष्यागे च मध्यमसमासापि न नः प्रकाशयति। तस्मात् सर्वत्र प्रसादोऽनुसर्तव्यः।

अत एव च ‘यो यः शास्त्रं निर्भर्त्स’ इत्यादौ यद्योजसः स्थितिनेऽयते तत् प्रसादाख्य एव गुणो न माधुर्येण। न वाच्यार्थम्। अभिप्रेतरसप्रकाशनार्थम्।

अत्यन्त सुकुमार [रस] होनेसे शब्द और अर्थकी तनिक-सी भी अस्पष्टता होनेपर [रसकी] प्रतीति नष्ट हो जाती है। और रौद्रादि दूसरे रसोंके प्रतिपादनमें तो घोरोद्भत नायकके सम्वन्ध या व्यापारादिके सद्भावे मध्यमसमासा सङ्क्रुटना अथवा दीर्घसमासा रचना भी उस [दीर्घ-समासा रचना]के विना प्रतीत न हो सकनेवाले किन्तु रसोद्भित वाच्यार्थप्रतीतिकी आवश्यक्तावशा [इस पदका समास इस प्रकार करना चाहिये, ‘तस्या दीर्घसमास-सङ्क्रुटनाया य आकांक्षे, तेन विना यो न भवति व्यङ्ग्याभिव्यङ्गकः, तादशो रसोद्भवितो रसस्याङ्कतयोद्भाव्यमानो वाच्यस्तस्य यथावश्यकं यावदपेक्षा दीर्घसमाससङ्क्रुटनां प्रति सा अवैगुण्य हेतु:’] अतिकुल नहीं होती है, इसलिये उसका भी अत्यन्त त्याग नहीं कर देना चाहिये।

प्रसाद नामक गुण सब सङ्क्रुटनाओंमें व्याप्त है। वह रचनाऑमें समान रूपसे रहनेवाला साधारण गुण है यह [ प्रथम उद्योतमें] कहा जा चुका है। [वह कथनमात्र कदाचित् प्रयोक्त न समझा जाय इसलिये अन्वयव्यतिरेकसे भी प्रसाद गुणकी सर्वरस और सर्वरचनासाधारणता सिद्ध करते हैं] प्रसादके बिना समासरहित रचना भी करुण तथा विप्रलम्भशृङ्गारकों अभिव्यञक नहीं करती हैं [यह अन्वय है--‘तदभावे तदभावो व्यतिरेकः’] और उस [प्रसाद गुण] के रहनेपर मध्यमसमासवाली रचना भी [करुण या विप्रलम्भशृङ्गारकों] नहीं प्रकट करती है यह बात नहीं हैं। [अथवा् प्रकाशित करती ही है यह अन्वयव्यतिरक हुआ।] इसलिये प्रसादका सर्वत्र [सब रसों और सब रचनाऑमें] अनुसरण करना चाहिये।

इसलिये ‘यो यः शास्त्रं निर्भर्त्स’ इत्यादि [उदाहरण]में [दीर्घसमासा रचना न होनेके कारण] यदि ओज गुणकी स्थिति अभिमत नहीं है तो [उसमे] प्रसाद गुण ही है, माधुर्य नहीं। और [सर्वरससाधारण उस प्रसाद गुणके रहनेसे] किसी प्रकारका माधुर्य नहीं। और [प्रसाद गुणसे भी] अभिप्रेत [रौद्र] रसकी अभिव्यक्ति हो सकती है।

१. नित्योऽत्र ‘न न’ पाठ नहीं है।

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ध्वन्यालोक

आचार्य उद्योतकर

तस्माद् गुणान्यतिरिक्ते वा सदृटनाया यथोक्तादौचित्याद् विषयनियमोऽस्तीति तस्या अपि रसाङ्गकत्वम्। तस्याश्र रसाभिव्यक्तिनिमित्तभूताया योडयमनन्तरोको नियमहेतुः स पदं गुणानां नियतो विषय इति गुणाश्रयेण व्यवस्थानमप्यविरुद्धम्॥ ६॥

विषयाश्रयमप्यनन्यदौचित्यं तां निगच्छति। काव्यप्रभेदाश्रयितः स्थिता भेदवतो हि सा॥ ७॥

वक्तृवाच्यगतौचित्ये सत्यपि विषयाश्रयमनन्यदौचित्यं सदृटनां नियमच्छति। यतः काव्यस्य प्रभेदा मुक्तकं संस्कृतप्राकृतापभ्रंशानिबन्धनं सन्निवेशक-विशेषक-कलापक

इसलिए [सदृटनाकी] गुणोंसे अभिन्न मानीं या भिन्न [दोनों अवस्थाओंमें] उक्त [वक्ता तथा वाच्यके] औचित्यसे सदृटनाका विषयनियम [धन ही जाता] है इसलिए वह भी रसकी अभिव्यक्तिरूपक होती है। रसकी अभिव्यक्तिमें हेतुसूत उक्त [सदृटनाका] नियामक जो यहां [वक्ता और वाच्यका औचित्यरूप] हेतु अभी [ऊपर] कहा है वही गुणोंका नियत चिपय है। इसलिए [सदृटनाकी] गुणाश्रयरूपमें व्यवस्थां भी विरोध नहीं है।

इस प्रकार यदि गुण और सदृटन एकरूप अर्थात् अभिन्न हैं तो गुणोंका जो विपयनियम है वही सदृटनाका भी विपयनियम होगा इसलिए वामनोक्त अभेदपक्षमें कोई दोप नहीं है। इसी प्रकार गुणाधीन सदृटनापक्ष अर्थात् स्वाभिमत मिदान्तपक्षमें भी गुणोंके नियामक हेतु ही सदृटनानियामक होंगे अतएव वह भी निःश्रित पक्ष है। अब रहा तीसरा भट्टोद्भटत्कृत सदृटनाश्रित गुणपक्ष, उसमें भी वक्ता-वाच्यका औचित्य सदृटनाका नियामक वन सकता है, इसलिए इस पक्षकी सङ्गति भी लग सकती है। इस प्रकार हम कारिकाके प्रारम्भमें उठाये गयं तीनों विकल्पोंकी सङ्गति हो जानेमें सदृटनाकी रसाभिव्यक्तता भी वन जाती है॥ ६॥

काव्यप्रकारोंका [विषयगत] औचित्य सदृटनानियामक

[वक्ता तथा वाच्यके औचित्यके अतिरिक्त] विषयाश्रित औचित्य [अर्थात् काव्यवाच्यकी समुदायरूपमें स्थिति आदि, जैसे सेनारूप समुदायके अन्तर्गत कापुरुप भी उस सैनिक मर्यादाका पालन करता हुआ उचित रूपमें स्थित रहता है] उसी प्रकार सन्निवेशक आदि आगे कहे गये समुदायात्मक काव्यवाच्यका औचित्य भी उस [सदृटनाका] नियामण करता है। काव्यके [मुक्तक आदि] भेदोंसे भी उस [सदृटनाके] भेद हो जाते हैं॥ ७॥

वक्ता तथा वाच्यगत औचित्यके [सदृटनानियामक] होनेपर भी दूसरा विषयाश्रित औचित्य भी उस सदृटनाका नियमन करता है। अन्योनि काव्यके संस्कृत, अपभ्रंशोंमें निबद्ध १. मुक्तक [स्वयंमें परिपूर्ण स्फुट इलोक जैसे अमरुकशतक,

१. 'सत्यपि' पाठ वी० में नहीं है।

२. 'मुक्तकं इलोक पृथक्प्रबन्धकाव्यारम्भः सताम्' ।

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ध्वन्यालोक:

आचार्य आनन्दवर्धन

डॉ. महावीर सरन जैन

मोतीलाल बनारसीदास

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कारिका ७ ]

तृतीय उद्योतः

१८२

(२) पर्यायबन्धे पुनरस्समासामध्यमसमासे एव सक्कटने । कदाचिदप्यौचित्याप्रयेण दीर्घेसमासायामपि सहरूटनायां परुषा ग्राम्या च वृत्ति: परिहर्त्तव्या ।

(३) परिकथायां कामचारः ।

तत्रेतिवृत्तमात्रोपन्यासेन नात्यन्तं रसबन्धाभिनिवेशात् ।

(४) खण्डकथासकलकथयोसु प्राकृतप्रसिद्धयोः कुलकादिनिवन्धनभूयस्त्वाद्

यहाँ प्रबन्धकाव्यके अन्तर्गत मुक्तक भी समझ लेना चाहिये । शास्त्रकाव्यके प्रबन्धकाव्य और खण्डकाव्य भेद किये जाते हैं । इनमेंसे प्रबन्धकाव्य और मुक्तकभेद तो बन्ध या रचनाके आधारपर किये गये हैं और महाकाव्य तथा खण्डकाव्यभेद विषयके आधारपर हैं । 'पूर्वापरनिरपेक्षाणि हि येन रसचर्वणा क्रियते तन्मुक्तकम्', मुक्तकका प्रत्येक श्लोक परिपूर्ण स्वतन्त्र होता है । 'अमरुकशतक' का प्रत्येक पद्य स्वयंमें परिपूर्ण है । विधारीके दोहे भी स्वयंमें परिपूर्ण हैं । 'मालासमसती' और 'आर्यासमसती' के पद्य भी स्वतः परिपूर्ण हैं । ये सब मुक्तक-काव्य हैं । प्रबन्धकाव्यके पद्य मुक्तक पद्योंकी भाँति स्वतन्त्र नहीं हैं । उनका पूर्वापरसम्बन्ध होता है । उस पूर्वापरसम्बन्धके बिना जाने उनके रसकी अनुभूति नहीं हो सकती । यह प्रबन्ध और मुक्तक काव्योंका भेद हुआ । अब रह जाते हैं महाकाव्य और खण्डकाव्य । ये दोनों पूर्वोक्त प्रबन्धकाव्यके अन्तर्गत हैं और उनकी परस्पर भेद विषयकी व्यापकताके आधारपर किया जाता है । जो जीवनके किसी एक भागका निरूपण करे वह खण्डकाव्य कहलाता है, 'खण्डकाव्यं भवेत् काव्यस्यैकदेशानुसारि च'[सा० द० ३,१३९] और महाकाव्य एक व्यक्तिअथवा एक वृत्तान्तके समस्त जीवनचित्रणको प्रस्तुत करनेवाला; शास्त्रीय मर्यादाके अनुसार भिन्न भिन्न पद्योंमें निर्मित; कमसे कम आठ सर्गोंसे अधिक; शृङ्गार, वीर अथवा शान्तरसमेंसे एक रसको प्रधान बनाकर, सन्या, सूर्य, रजनी, चन्द्रमाः, प्रभात, मध्याह्न आदिके प्रकृतिवर्णनोसे युक्त काव्य महाकाव्य कहलाता है । खण्डकाव्य और महाकाव्य दोनों प्रबन्धकाव्यके अन्तर्गत हैं । मुक्तक उमसे अलग स्वतन्त्र स्वतः परिपूर्ण काव्य है । लोचनकारने यहाँ प्रबन्धकाव्योंके भेद भी 'त्वामलिक्य प्रणयकुपितां धातुरागैः शिलायाम्' [उत्तरमेघ, ४२] को मुक्तक माना है ।

(२) पर्यायबन्ध

['वस्तुर्वणनादिरेकवर्णननीयोगेहेन श्लेन प्रकृष्टः पर्यायबन्धः' वसन्तादि किसी एक ही विषयके वर्णनके उद्देश्यसे प्रवृत्त काव्यविशेषको पर्यायबन्ध कहते हैं ।

इस पर्यायबन्ध नामक काव्यभेद] में [सादरणतः] वसन्तसमासा तथा मध्यमसमासा सक्कटना ही होनी चाहिये । [परन्तु] कभी अर्थके औचित्यके कारण दीर्घेसमासा सक्कटना होनेपर भी परुषा और ग्राम्या वृत्तिको बचाना ही चाहिये ।

(३) परिकथा

['पकं धर्मादिपुरुषार्थमुद्दिश्य प्रकारवैचित्र्येणालं तद्वृत्तान्तवर्णन-कथायोः वर्णन परिकथा', धर्म, अर्थ आदि किसी एक पुरुषार्थको लेकर अनेक प्रकारसे बहुत-सी कथाओंका वर्णन परिकथा कहलाता है ।

उस परिकथा नामक काव्यभेद] में कामचार [स्वतन्त्रता] है । क्योंकि उसमें केवल कथांश [इतिवृत्त-शाब्दयानवस्तु] का वर्णन [मुख्य] होनेसे रसबन्धका विशेष आग्रह नहीं होता ।

(४) प्राकृत [भाषा] में कुलकादि ['तदूष्यं कुलकं स्मृतम्', चारसे अधिक

१. नो पी० में नु नहीं है ।

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ध्वन्यालोक:

आचार्य आनन्दवर्धन

प्रो. महावीर सरन जैन

दिल्ली : मोतीलाल बनारसीदास

दीर्घसमासायामपि न विरोधः । वृत्त्यौचित्यान्तु यथारसमतुसरत्नम् ।

परमार्थतस्तु वृत्तिशोका यसके अनुसार औचित्य अवश्य अनुसरण करना चाहिये । इस प्रसङ्गमें वृत्ति शब्दका प्रयोग किया गया है । अलङ्कारशास्त्रमें वृत्ति नामसे अनेक काव्यतत्त्वोंका उल्लेख मिलता है । शब्दकी अभिधा, लक्षणा, तात्पर्या और व्यञ्जना शक्तियोंको भी वृत्ति नामसे कहा जाता है । 'वर्तन्तेऽनुप्रासमेदा आमु इति इत्तयः' इस विग्रहके अनुसार अनुप्रासप्रकारोंको भी वृत्ति कहा जाता है । भट्टोद्घटने इन्हीं अनुप्रासप्रकारोंको परुषा, उपनागरिका और ग्राम्या तीन वृत्तियोंके रूपमें माना है और उनके लक्षण इस प्रकार किये हैं—

नाट्यशास्त्र आदि में नाट्योपयोगी कैशिकी आदि चार प्रकारकी वृत्तियोंका निरूपण किया गया है ।

तत्र [नायक] व्यापारालात्किका वृत्तिरुच्यते तत् कैशिकी ।

विततत्वसविलासाच्चैर्मुद्रः

विदग्धा सात्वती सत्त्वशौर्यादिगुणदर्शने ।

एतद्रहेश्वेतद्रव्यं सात्वत्यारभटी पुनः ।

भारती संस्कृतप्रायो वाग्व्यापारो नटाश्रयः ।

शृङ्गारे कैशिकी वीरे सात्वत्यारभटी पुनः ।

रसे रौद्रे च वीभत्से वृत्तिः सद्भिर्निर्भत्सिता ।

इस प्रकार सात्वत्यादिका 'वृत्ति' शब्द अनेक अर्थमें परिभाषित होनेसे बड़ा सन्देहजनक है । उसकी यह सन्देहजनकता रीति और रचना शब्दोंके साथ मिलकर और भी अधिक बढ़ जाती है । प्रकृत प्रकरणमें आचार्य आनन्दवर्धनने जो 'वृत्ति' शब्दका प्रयोग किया है वह भट्टोद्घटकी परिभाषा, उपनागरिका और ग्राम्या, जिसका दूसरा नाम कोमला भी है, के लिये ही किया है यह तो स्पष्ट है । परन्तु यहाँ उसका सन्देहनाके साथ सम्बन्ध निरुपित होनेसे वृत्ति, सन्धि, पदककी दृष्टिसे दो भागों में विभक्त किया जा सकता है । पदोंकी दृष्टिसे रचनाके असमासा, मध्यमसमासा और दीर्घसमासा ये तीन भेद किये जा सकते हैं । आलङ्कारिकोंने इन्हीं तीनों भेदोंको सन्धि, रचना और वृत्ति कहा है । परन्तु वर्णोंके प्रयोगकी दृष्टिसे रचनाके परुषा, उपनागरिका और ग्राम्या या कोमला शब्दसे कहा है । परन्तु वर्णोंके प्रयोगकी दृष्टिसे रचनाके परुषा, उपनागरिका और ग्राम्या या कोमला शब्दसे कहा है । ये तीन विभाग भट्टोद्घट आादिने किये हैं और उनका 'वृत्ति' कहा है । इसका अर्थ यह हुआ कि

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कारिका ७ ] तृतीय उद्योत: ७८.

(४) सर्गंवन्धे तु रसतात्पर्यं यथारसमौचित्यम्, अन्यथा तु कामचारः। द्वयोरपि मार्गयोः सर्गंवन्धविधायिनां दशैनादू रसतात्पर्यं साधीयः ।

(६) अभिनेयार्थ तु सर्वथा रसवन्धेऽभिनिवेशः कार्यः ।

(७) आख्यायिकाकथयोसतु गद्यनिबन्धनवाहुल्यादू गद्ये च छन्दोवन्थभिन्न-प्रस्थानत्वादिह नियमोऽतिरक्तपुर्वोंडपि मनाक् क्रियते ॥ ७॥

पदविन्यासप्रधान रचनाओं के लिए ‘संघटना’ शब्द तथा वर्गावस्थितप्रधान रचनाओं के लिए वृत्ति शब्दका प्रयोग किया गया है । वामनने रचनाप्रकारके प्रसंगमें रीति शब्दका प्रयोग किया है । उन्होंने अपनी रीतियोंका सम्बन्ध माधुर्य आदि गुणोंसे जोड़ा है । गुणोंकी अभिव्यक्तिमें पद और वर्ण दोनोंकी विशेष उपयागिता है । अतएव वामनकी रीतिमें संघटना तथा वृत्ति दोनोंका अन्तर्भाव हो जाता है । इधरले ‘वामनके’ बाद जो रीतियोंका विवेचन किया गया है उसमें रीतियोंके प्रत्येंक भेदमें रचनाका एक वर्णगत और एक पदगत भेद स्पष्ट रूपसे जुड़ा हुआ है । जैसे कदाचित् रीतियोंके लक्षण इस प्रकार किये हैं—

असमस्तैकसमस्ता युक्ता दशाभिगुणैरेश वैदभर्गी । वर्गादृतियचहुला स्वल्पप्राणाक्षरा च सुविधेया ॥

इसमें ‘असमस्तैकसमस्ता’ पद आनन्दवर्धनकी संघटनाके प्रयथम भेद असमासाका आहक है और यह रचनाके पदगत वैशिष्ट्यसे सम्बन्ध रखता है । इस वैदर्भीका दूसरा भाग ‘वर्गादृतियचहुला स्वल्पप्राणाक्षरा’ है । यह भट्टोंडूभटटकी वृत्तिका स्थानीय प्रतीत होता है । रचनाके इन दोनों भागोंका सम्बन्ध गुणोंके स्वरूपसे है । इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि वृत्ति और संघटना ये दोनों रीतिके अङ्ग हैं और उन दोनोंकी समष्टिका नाम रीति है ।

(४) सर्गंवन्ध [महाकाव्य] में रसप्रधान होनेपर रसके अनुसार औचित्य होना चाहिये अन्यथा [कैवल इतिवृत्तप्रधान महाकाव्य, जैसे भट्टिकाव्यका कादम्बरीकथासार होनेपर] तो कामचार [स्वतन्त्रता] है । ‘रसप्रधान और इतिवृत्तमा|त्रप्रधान] दोनों प्रकारके महाकाव्यनिर्माता देखे जाते हैं, [उनमेंसे] रसप्रधान [महाकाव्य] श्रेष्ठ है ।

(६) अभिनेयार्थ [नाटकों] में तो सर्वथा रसयोजनापर पूर्ण वल देना चाहिये ।

(७) आख्यायिका और कथामें तो गद्यरचना की [ही] प्रचुरता रहने और गद्यमें छन्दोवन्थ रचनानसे भिन्न मार्ग होनेसे उसके विषयमें कोई नियामक हेतु इसके पूर्व निश्चित न होनेपर भी कुछ थोड़ा-सा [निर्देश] करते हैं ।

‘द्वयोरपि मार्गयोः’की व्याख्या कुछ लोगोंने ‘संस्कृतमा|कृतयोरपि’ की । परन्तु यह व्याख्या उचित नहीं है क्योंकि उनमेंसे ‘रसतात्पर्यं साधीयः’ रसप्रधानको श्रेष्ठ ठहराया गया है । इसकी सङ्क्ति तो तभी ठीक लगती है जब ‘द्वयोः’ से रसप्रधान और इतिवृत्तमा|त्रप्रधान इन दो भेदोंका ग्रहण किया जाय । उन दोनोंमें रसप्रधान महाकाव्य अधिक श्रेष्ठ है । इसलिये ‘द्वयोर मार्गयोः’ का ‘संस्कृतप्राकृत-मार्गयोः’ यह अर्थ करना ठीक नहीं है ॥७॥

१. ‘रसतात्पर्येण’ नि० ।

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ध्वन्यालोक:

एतद् यथोक्तमौचित्यमेव तस्या नियमकम्‌ । सर्वत्र गद्यबन्धेऽपि 'छन्दोनियमवर्जिते ॥८॥

यदेतदौचित्यं वक्तृवाच्यगतं सङ्कुटनाया नियामकमुत्तमप्रतिदेव गद्ये छन्दोनियमवर्जितेऽपि विषयापेक्षं नियमहेतु: । तथाह्यत्रापि यदा कविः कविनिबद्धा वा वक्ता रसभावहितस्तदा कामचारः । रसभावसमन्विते तु वक्तरि पूर्वोक्तमेवानुसर्तव्यम्‌ । तत्रापि च 'विषयौचित्यमेव । आख्यायिकाम्बुनिधौ मध्ये समाससमासिनोऽर्थे समास एव सङ्कुटन । गद्यस्य 'विकटबन्धाश्रयेण' छायावस्तात । तत्र च तस्य प्रकार्यमाणत्वात । कथायान्तु विकटबन्धप्राचुर्येऽपि गद्यस्य रसबन्धोचित्यमनुसर्तव्यम्‌ ॥८॥

रसबन्धोक्तमौचित्यं भाति सर्वत्र संश्रिता । रचना विषयापेक्षं तत्तु किञ्चिद् विभेदवत्‌ ॥९॥

अथवा पदबद्‌ गद्यबन्धेऽपि रसबन्धोक्तमौचित्यं सर्वत्र संश्रिता रचना भाति" तत्तु रचना विषयापेक्षं तत्तु किञ्चिद् विभेदवत्‌

गद्यकाव्योंमें भी उत्क औचित्य आवश्यक है

यह पूर्वोर्णित औचित्य ही, छन्दके नियमसे रहित गद्यरचनामें भी सर्वत्र उस [सङ्कुटना] का नियामक होता है ॥८॥ सङ्कुटनाका नियामक वक्तृगत और वाच्यगत जो यह औचित्य बतायो है, छन्दोनियमरहित गद्यमें भी 'विषयगत [औचित्य] सहित वही नियामक हेतु होता है । इसलिये जब यहाँ [गद्यमें] श्री कवि या कविनिबद्ध वक्ता रसभावरहित होता है तब स्वतन्त्रता [कामचार] है । और वक्ताके रसभावयुक्त होनेपर तो पूर्वोक्त [नियमों] का ही पालन करना चाहिये । उसमें भी विषयगत औचित्य होता ही है । आख्यायिकामें रचनासे गद्यमें सौन्दर्य आ जाता है । और उस [विकटबन्ध] में रचनासौन्दर्यका प्रकार्ष [विशेषता] होनेसे । कथामें गद्यकी कठिन [विकट] रचनाका बाहुल्य होनेपर भी रसबन्ध-समबन्धी औचित्यका पालन करना ही चाहिये ।

रसबन्धका औचित्य सर्वत्र आवश्यक

रसबन्धमें उत्क [नियमनार्थ प्रतिपादित] औचित्यका आश्रय करनेवाली रचना सर्वत्र [गद्य और पद्य दोनोंमें] शोभित होती है । विषयगत [औचित्य] की दृष्टिसे उसमें कुछ [थोड़ा] भेद होता है ॥९॥

१. 'छन्दोनियम' नि० । २. 'वा' नि० । ३. 'विकटबन्धाश्रयेण छायावस्तात' नि० । ४. 'भाति' बालक्रिया ।

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कारिका ९ ]

तृतीय उद्योतः

१८९

विषयापेक्षं किञ्चिद् विशेषवद् भवति । न तु सर्वांकारम् । तथा हि रसवन्धेडपि अतीदीर्घसमासा रचना न विप्रलम्भशृङ्गारकुणारण्योराध्या यद् कायामलि शोभते । नाटकादावप्यस्मासैव सङ्क्रुटना । रौद्रवीरादिवर्णने विषयापेक्षं त्वौचित्यं प्रमाणतोडपकृष्णते प्रकृत्यते च । तथा झाङ्ख्यायिकायां नात्यन्तसमसमासा स्वविषयेडपि, नाटकादौ नातिदीर्घसमासा चेति सङ्क्रुटनाया दिङ्नुसतेऽया ॥ ९॥

लेनवाली रचना शोभित होती है । वह [औचित्य] विषय [गत औचित्य] की दृष्टिसे कुछ विशेष हो जाता है [परन्तु] सर्वथा नहीं । उदाहरणार्थ गद्यरचनाओं में भी करुण और विप्रलम्भशृङ्गारमें अत्यन्त दीर्घसमासवाली रचना अच्छी नहीं लगती । नाटकादिमें भी असमास सङ्क्रुटना ही होनी चाहिये । [नाटकादिमें] रौद्र, वीर आदिके वर्णनमें विपयकी अपेक्षा करनेवाला औचित्यप्रमाण[रसवन्धोक्त औचित्यरूप प्रमाण] के वलसे घट-बढ़ जाता है । जैसे शृङ्गारिकामें स्वविषय [करुण-विप्रलम्भ-शृङ्गार] में भी अत्यन्त दीर्घसमासा रचना नहीं होनी चाहिये । सङ्क्रुटनाके इसी मार्गका [सर्वत्र] अनुसरण करना चाहिये ॥९॥

इति काव्यार्थविवेको योडयं चेतश्चमत्कृतिविषधारी । सुरिभिरनुसृतससिरसदुपज्ञो न विस्मायंः ॥ इति ।

५. प्रवन्धव्यञ्जकता

दूसरी कारिकामें असंलक्ष्यक्रमव्यञ्जनके पाँच व्यञ्जक बतलाये ये । उनमें १. वर्ण, २. पदादि, ३. वाक्य और ४. सङ्क्रुटनाका विवेचन यहाँतक हो चुका है । अब आगे ५. प्रवन्धव्यञ्जकताका निरूपण प्रारम्भ करते हैं—प्रबन्धान्तर्गत रसाभिव्यक्तिके लिये निम्नलिखित पाँच बातोंका ध्यान रखना आवश्यक है—(१) सबसे पहले एक सुन्दर मूलकथाका निर्धारण, (२) दूसरे उस कथाका रसानुकूल संस्करण, (३) तीसरे कथाविस्तारमें अपेक्षित रसभि तथा रसव्यञ्जककी रचना, (४) चौथे (अ) वीचिमें यथास्थान रसका उद्दीपन-प्रशमन और (५) प्रबन्धमें प्रधान रसका आदिके अनन्तक अनुसन्धान अर्थात् अविस्मरण, (५) पाँचवें उचित मात्राओं में ही और उचित स्थानोंपर ही अलङ्कारोंका सन्निवेश ।

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ध्वन्यालोक:

इदानोमलक्ष्यक्रमव्यज्झ्यो ध्वनि: प्रवन्धात्मा रामायणमहाभारतादौ प्रकाशमान: प्रसिद्ध एव । तस्य तु यथा प्रकाशन तत् प्रतिपाद्यते—

(९) विभावभावानुभावसच्वार्यौचित्यचारुण: । विधि: कथाशरीरस्य वृत्तस्योत्तप्रेक्षतस्य वा ॥१०॥

(१) प्रथमं तावद्, विभावभावानुभावसञ्चार्यौचित्यचारुण: कथाशरीरस्य विधि: ।

(२) इतिवृत्तवकाशायानां त्यक्वाडनतिरुग्णां स्थितिम् । उद्भटानन्तरभाविभिस्तत्कथाक्षेपकृतोऽन्वयम् ॥११॥

२. पेटिहासिक क्रमसे प्राप्त होनेपर भी रसके प्रतिकूल स्थितिको छोड़कर, वीचमें अभीष्ट रसके अनुकूल नवीन कल्पना करके भी कथाका संस्करण ।

(३) सन्धिसन्ध्यङ्गवर्तनं रसाभिव्यक्तिपेक्षया । न तु केवलया शास्त्रस्यतिसम्पादनेच्छया ॥ १२॥

३. केवल शास्त्रीय विभावनदे परिपालनकी इच्छासे नहीं; अपितु [गूढ़] रसाभिव्यक्तिकी दृष्टिसे सन्धि और सन्ध्यङ्गकी रचना ।

(४) उद्दीपनप्रशमने यथावसरमन्तरा । रसस्थायिरघविश्रान्तेरनुसन्धानमड़ि: ॥१३॥

४. (अ) यथावसर [रसोंके] उद्दीपन तथा प्रशमन [की योजना] और (ब) विश्रान्त होते हुए प्रधान रसका अनुसन्धान [स्मरण रखना] ।

(५) अलङ्कृतीनां शक्तावप्यानुरूप्येण योजनम् । प्रवन्धस्य रसादीनां व्यज्जकत्वे निवन्धनम् ॥१४॥

५. [अलङ्कारोंके यथेच्छ प्रयोगकी पूर्ण] शक्तिदोनेपर भी [रसके] अनुरूप ही [परिमित मात्रामें] अलङ्कारोंकी योजना । [यह पाँच] प्रवन्धगत-रसके अभिव्यञ्जक हेतु हैं ॥१४॥

प्रवन्धोडपि रसादीनां व्यज्जक इत्युक्तं तस्य व्यज्जकत्वे निवन्धनम् ।

प्रबन्ध [काव्य] भी रसादिका व्यञ्जक होता है यह [इसी उद्योतकी दूसरी कारिकामें] कहा है । उसके व्यज्जकत्वके हेतु [निम्नलिखित पाँच हैं] ।

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कारिका १४ ] तृतीय उद्योत: १८९

यथायर्थं प्रतिपिपादयिषितरसभावाव्यपेक्षया य औचितो विभावो भावोडनुभाव: सज्ञारी वा तदौचित्यचारुण: कथाशरीरस्य विधिवद्येजकत्वे नित्रन्धनमेकम् ।

तत्र विभावौचित्यं तावन् प्रसिद्धम् । भावौचित्यं तु प्रकृत्यौचित्यात् । प्रकृतिहि, उत्तममध्यमाधमभावेन दिव्यमानुपादिभावेन च विभेदिनी । तां यथायथमनुसृत्यैवसंदीर्णः: स्थायी भाव उपनिबध्यमान औचित्यभागो' भवति । अन्यथा तुकेवलमानुपाश्रयेण दिव्यस्य, केवलदिव्याश्रयेण वा केवलमानुषस्य: उत्तमादिरूपनिवन्धनानाम् अनुचितो भावान्ति । तथा च केवलमानुपस्य राजादेवर्णनं समर्पणवद्धानदिलिलक्षणा व्यापाराः उपनिबध्यमानाः: सौदर्यवृत्तोदपि नीरसात्व नियमेन भवन्ति । तत्र स्वानौचित्यमेव हेतुः ।

ननु नागलोकगमनादय: सातवाहनप्रभृतीनां श्रूयन्ते, तद्लोकसामान्यप्रभावातिशय-वर्णने' किमनौचित्यं सर्वोऽभरणाक्षमाणां क्षमासुजामिति ।

(९) सब से पहिले विभाव, [स्थायी] भाव, अनुभव और सञ्चारिभावके औचित्यसे सुन्दर कथाशरीरका निर्माण [है] । उचित प्रकारसे प्रतिपादनाभिमत रसभाव आदिकों हप्रिसे जो उचित विभाव, [स्थायी] भाव, अनुबाव; या सञ्चारिभाव उनके औचित्यसे सुन्दर कथाशरीरका निर्माण [रसका] अभिप्रायक पहिला कारण है । उनमेंसे विभावका औचित्य तो [लोक तथा भरतनाट्यशास्त्र आदिमें] प्रसिद्ध ही है । [स्थायी] भावका औचित्य प्रकृतिके औचित्यमें होता है । प्रकृति उत्तम, मध्यम, अधम और दिव्य तथा मानुप्रमेदसे भिन्न प्रकारकी होती हैं । उसकां यथोचित रूपसे अनुसरण करते हुए [विना मिलावटकें, शुद्ध] रूपसे उपनिबद्ध स्थायिभाव औचित्ययुक्त माना जाता है । नहीं तो केवल मानुप [प्रकृति] के आश्रय, दिव्य [प्रकृति] [उत्साहादि], अथवा केवल दिव्य [प्रकृति] के आश्रयेण उपनिबध्यमान केवल मानुपके [उत्साहादि] [स्थायिभाव] अनुचित होते हैं । इमलिये देवल मानुप [प्रकृति] राजा आदिके वर्णनमें, सात समुद्र पार करने आदिके उत्साहके वर्णन सुन्दर होनेपर भी निश्चित रूपसे नीरस ही [प्रतीत] होते हैं । इसका कारण अनौचित्य ही है ।

यहाँ 'व्यापारा' उपनिबध्यमानाः' में व्यापार हेतुसे स्थायिभावोंचित उत्साहका ग्रहण करना नाहिये । क्योंकि यहाँ स्थायिभावके औचित्यकी चर्चां हो रही है; अनुभावके औचित्यकी नहीं । अतएव ध्यान द्वार हृदय स्थायिभावोचित स्थायि-भाव उद्बोधका ही ग्रहण है ।

[प्रभु] सातवाहन आदि राजाओंके नगालोकगमन आदिका वर्णन मिलता है तो समस्त पृथिवीके धारणमें समर्थ राजाओंके अलौकिक प्रभावातिशयके वर्णनमें क्या अनौचित्य हैं ?

१. 'वानु' मि०, दी० । २. 'मानुषस्य' ति०, दी० । ३. 'भान्ति' मि०, दी० । ४. 'प्रभावादतिशयवर्णने' ति०, दी० । ९८

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ध्वन्यालोक:

आचार्य आनन्दवर्धन

महामहोपाध्याय डॉ० प्र० के० गोडे एम० ए०

मोतीलाल बनारसीदास

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कारिका १४ ] तृतीय उद्योतः १९१

क्रियताम् । रत्यादौ तु किन्तया प्रयोजनम् । रतिहिं भावतवशोचितेनैव व्यवहारेण दिव्य नामपि वर्ण्यते येतिस्थितिः । नैवम् । तत्रौचित्यतिक्रमेण सुतरां दोषः । तथा ह्यघमप्रकृत्यौचित्येनोत्तमप्रकृते: श्रृङ्गारोपनिबन्धने का भवेत्कोपहास्यता । 'त्रिविधं प्रकृत्यौचित्यं भारते वर्षेऽप्यस्ति श्रृङ्गारविषयम् । यतु दिव्यमौचित्यं तत्र तत्रोपकथितमेव चेत् ! न वर्ष दिव्यमौचित्यं श्रृङ्गारविषयमन्यत्रिकृतेऽपि तत्रः । किं तर्हिं ? भारतवर्षविषये यथोत्तमनायकेषु राजादिपु श्रृङ्गारोपनिबन्धस्तथा दिव्याश्रयोडपि शोभते । न च राजादिपु प्रसिद्धमास्यश्रृङ्गारोपनिबन्धनं प्रसिद्धं नाटकादौ, तथैव देवेषु तत् परिहर्तव्यम् ।

[प्रकृति]के औचित्यकी परीक्षा करते हैं तो करें, परन्तु रत्यादि [स्थायिभावके वर्णन]में उस [परीक्षा]से क्या लाभ ? रति तो भारतवर्षोचित व्यवहारसे ही [दिव्यों] देवताओंकी भी वर्णन करनी चाहिये यह [भरतके नाट्यशास्त्र २०, १९१ का] सिद्धान्त है ।

[उत्तर] यह बात नहीं है । वहाँ [रतिविषयमें] भी औचित्यकका उल्लेख करनेमें दोष ही है । क्योंकि उत्तमप्रकृति [के नायक-नायिका]के अधमप्रकृतिके उचित श्रृङ्गारादि-के वर्णनमें कौन-सी उपादेयता नहीं होगी ?

[प्रश्नकर्ता—] भारतवर्षमें भी तीन प्रकारका श्रृङ्गारविषयक प्रकृतिका औचित्य पाया जाता है । [उनसे भिन्न] जो [कौई और] दिव्य औचित्य हैं वह उस[रसाभिव्यक्ति] में अनुपकारक ही है [क्योंकि उस दिव्य रति आदि विषयक संस्कार न होनेसे प्रेक्षकोंको उससे रसातुभूति नहीं होगी] ।

[उत्तर] हम श्रृङ्गारविषयक दिव्य औचित्य [भारतवर्षोचित औचित्यसे] अलग कुछ और नहीं बतलाते हैं ।

[प्रश्नकर्ता—] तो फिर [आप क्या कहते हैं] ?

[उत्तर] भारतवर्ष[क्] विषयमें उत्तम नायक जैसे राजा आदिमें जिस प्रकारका श्रृङ्गारका वर्णन होता है वह दिव्य [नायक आदिके] आश्रित भी शोभित होता है । [और जैसे] राजा आदि [उत्तम नायकादि]में प्रसिद्ध ग्रन्थ श्रृङ्गारका वर्णन नाटकादिमें प्रचालित नहीं है उस्सी प्रकार देवोंमें भी उसको वच्याना चाहिये [यह हमारे कहनेका अभिप्राय है] ।

१. 'विविधं' नि० । २. 'वर्षेऽपि' नि० । ३. 'तत्र' नि० ।

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ध्वन्यालोकः

आचार्य आनन्दवर्धन

महामहोपाध्याय डॉ० श्रीपति पण्डितराज

चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन

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कारिका १४ ] तृतीय उद्योतः १९३

अनुभावौचित्यं तु भरतादौ प्रसिद्धमेव । इत्यतूच्यते । भरतादिविरचितां स्वीयर्तिं' चातुर्वर्गमानेन महाकविभ्रबन्धांश्र पर्यालोचयता स्वप्रतिभां चानुसरता कविनाडवहितचेतसा भूत्या विभावादौचित्यांशपरित्यागे परः प्रयत्नो विधेयः ।

औचित्यवतः कथाशरीरस्य वृत्तस्योभेक्षितस्य वा ग्रहो लक्ष्य इत्येनैतत् प्रति पादयति यदितिहासादिषु कथासु रसवतीषु विविघासु सत्कविप्रणीत यत्तत्र विभावादौचित्य-वत् कथाशरीरं तदेव ग्राह्यं नेतत् । वृत्तादिषु च कथाशरीरादुभयोरेषिते विशेषण-वता भवितव्यम् । तच्च ह्नानवधानात् स्वलत्कवेरन्युपपत्तिसम्भावना महती भवति ! परिकरालोकेन—

कथाशरीरमुत्पाद्य वस्तु कार्यं तथा तथा । गृथाः रससमयं सर्वमेव तत्प्रतिभासते ॥

तत्र चाभ्युपायः सम्यग् विभावाद्यौचित्यानुसरणम् । तच्च दर्शितमेव । किञ्च—

अनुभावादिकां औचित्य ततो भरतादि [के नाट्यशास्त्रादि] में प्रसिद्ध होइ है । केबल इतना तो [विरोध रूप से] कहना है कि भरतादि मुनियों द्वारा निर्धारित मर्यादा का पालन करते हुये, महाकाव्योंके प्रवन्धों [काव्य] का पर्यालोचन करते हुये और अपनी प्रतिभाका अनुसरण करते हुये, कविकों सावधान होकर विभावादि औचित्य से पतित होने से बचने के लिये पूर्ण प्रयत्न करना चाहिये ।

पेतिहासिक अथवा कल्पित औचित्ययुक्त कथाशरीरका ग्रहण करना [रसकार] अभियंषक होता है; इससे [कारिकाकार] यह प्रतिपादन करते हैं कि इतिहासादिकं [साधारण जनांके अमिप्राय से] रसवती नाना प्रकार की कथाओं के होने पर भी उनमें जो विभावादिके औचित्य से युक्त कथावस्तु है उसींका ग्रहण करना चाहिये, अन्यांको नहीं । और पेतिहासिक कथावस्तुमें भी अधिक कल्पित कथावस्तुमं [सावधान रहनेक] प्रयत्न करना चाहिये । वहाँ [कल्पित कथावस्तुमें] असावधानोंने भूल कर जाने पर कविकी अद्युत्पत्ति [पदार्थों] की यहुत सम्भावना रहती है ।

इस चिपय में परिकरालोक [यह] है--

कल्पित कथावस्तु का इस प्रकार निर्माण करना चाहिये कि जिससे वह सब का सव रसमय ही प्रतीत हो ।

उसका उपाय विभावादिके औचित्यक भली प्रकार अनुसरण करना [ही] है । और उसे दिखला ही चुके हैं ।

और भी [कहा है]—

१. 'भरतादिविरचितां' नि०, दी० । २. 'रसवतीषु कथासु' नि०, वृ० । ३. 'सर्वमेव तत्' नि०, दी० ।

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ध्वन्यालोक:

सन्ति सिद्धरसप्रख्या ये च रामायणादया: ।

तेषु हि कथाश्रयेपु तावत् स्वेच्छैव न योज्या ! यदुक्तम् “कथामार्गे न चात्मोद्यतिः” इति स्वेच्छापि यदि योज्या तद्रसविरोधिनी न योज्या ।

(१) इदमपरं प्रवन्धस्य रसाभिव्यञ्जकत्वे निवन्धनम् । इतिवृत्तवशायातां कथाविद्रसनिरुगुणां स्थितिं चेच्छा पुनर्हेतुरेक्यायितरसाविच्छेत्याभिप्राय: । यथा कालिदासप्रबन्धेषु यथा च सर्वसेनविरचिते हरिविजये । यथा च मदीय एवाजुनचरिते महाकाव्ये । कविना 'काव्यमुपनिबद्धनता सर्वोत्मना रसपरतन्त्रेण भवितव्यम् । तत्रेतिवृत्ते यदि रसानुरुगुणां स्थितिं पर्येत यत् तदेमां भड्क्त्वापि स्वतन्त्रतया रसानुरुगुणं कयान्तरमुत्पादयेत् । नहि कवेरीतिवृत्तमात्रानिर्वहणेन किश्चित् प्रयोजनम्, इतिहादेव तत्सिद्धेः ।

सिद्ध रसोंके समान [सद्य: आस्वादमात्र योग्य न कि भावनीय या परिकल्पनीय] कथाओंके आश्रय जो रामायनादि [इतिहास] हैं उनके साथ रसविरोधिनी स्वेच्छाका प्रयोग नहीं करना चाहिये ।

(२) इदमपरं प्रवन्धस्य रसाभिव्यञ्जकत्वे निवन्धनम् ।

पहिली बात तो यह कि उन कथाओंमें स्वेच्छा लगानी हवी नहीं चाहिये । जैसा कि कहा है—‘कथामें थोड़ा भी हेर-फेर न करे’ । और यदि [प्रयोजनवश] स्वेच्छाका प्रयोग करे भी तो रसविरोधिनी स्वेच्छाका प्रयोग न करे ।

(२) प्रवन्ध [काव्य] के रसाभिव्यञ्जकत्वका यह भी [दूसरा] और कारण है कि ऐतिहासिक परम्परासे प्राप्त [होनेपर भी] किसी प्रकार [से भी] रसविरोधिनी स्थिती [कथांश]को छोड़कर और वीचमें कल्पना करके भी अभीष्ट रसोदित कथा का निर्माण करना चहिये ।

जैसे कालिदासकी रचनाओंमें [रघुवंशमें आदि राजाओंका विवाह-वर्णन और 'अभिज्ञानशाकुन्तलम्' नाटकमें शकुन्तलाका प्रत्या ख्यान आदि इतिहासमें उस रूपमें वर्णित नहीं है किन्तु कथाको रसानुगुण और रजा दुष्यन्तको उद्दात्तचरित बनानेके लिये उनकी कल्पना की गयी है]। और जैसे सर्वसेनविरचित 'हरिविजय' [महाकाव्य]में [कान्तके अनुयायके लिये पारिजातहरणकावर्णन] । और जैसे मेरे ही 'अर्जुनचरित' महाकाव्यमें [अर्जुनका पातालविजयादि, उस कल्पने इतिहासमें वर्णित न होनेपर भी कथाको रसानुगुण बनानेके लिये कल्पित किया गया है] । काव्यकानिर्माण करते समय कविको पूर्णरूपसे रसपरतन्त्र बन जाना चहिये ।

१. 'न चात्मोद्यतिः' मि०, दी० ।

२. 'प्रवन्धस्य' वि० ।

३. 'तावत्' मि०, दी० ।

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कारिका १४ ] तृतीय उद्योतः १९५

(३) रसादिव्यङ्ग्यकत्से प्रभञ्जनस्य वेदमन्यनुसरुयं निवन्धनम्, यत्तु सन्धीना मुखगर्भोन्मेषनिर्वहणालङ्कारान् तद्वद्वानां चोपक्षेपादीनां घटनं रसाभिव्यक्त्यपेक्षया । न तु केवलं शास्त्रस्थितिसम्पादनेच्छया यथा वेणीसंहारेऽस्य प्रतिमुखसन्ध्यङ्गस्य प्रकृतरसानिबन्धनानुरुणमपि द्वितीयेङ्केऽपि भरतमतानुसरणमात्रेच्छया घटनम् ।

इसी नियमके अनुसार कालिदासने 'शाकुन्तला' नाटकमे दुर्वासाके शाप, मत्तव्यावतारमें अङ्गूठीका गिरना, शापप्रसुतविभ्रममूलक शकुन्तलाप्रत्याख्यान आदिकी कल्पना कर इतिहास [महाभारत] के भरमरत्वि दु:ख्यनत्को उद्दात्त नायक बना दिया है । और इसीके अनुसार महाकवि भवभूति ने 'उत्तररामचरित' के तृतीय अङ्कमें 'छायासीता' की कल्पना कर पथ्थरोंको रुलाने और वज्रको गलानेंमें समर्थ करण ऋषिकी शक्ति की है—'अथु ग्राम गे दित्यपि द्रवति वज्रस्य हृदयम् ।'

(३) प्रवन्ध [काव्य] के रसादिव्यङ्ग्यकत्वकका यह और [तीसरा] मुख्य कारण है कि [नाट्यशास्त्रोक्त] मुख, प्रतिमुख, गर्भ, विमर्श, और निर्वहण नामक [पाँच] सन्धियों और उनके उपक्षेपादि [५४] अङ्गोंका रसाभिव्यक्तिकी दृष्टिले जोड़ना । जैसे 'रत्नावली' [नाटिका] में। न कि केवळ शास्त्रमर्यादाका पालन करनेभात्रकी इच्छासे, जैसे 'वेणीसंहार' [नाटक] में, 'प्रतिमुख' सन्धिके 'विलास' नामक अङ्कको, प्रकृतरस [वीररस] के विरुद्ध होनेपर भी भरतमतके अनुसरणमात्रकी इच्छासे द्वितीय अङ्कमें [दुर्वोधन और भानुमतीके शृङ्गारवर्णनके रूपमें] जोड़ना है ।

(४) इदं चापरं प्रभञ्जनस्य रसादिव्यङ्ग्यकत्वं निमित्तं यथु दीप्तिमप्रतिहते राधावत्स- मन्त्रारौ। रसस्य, यथा रत्नावल्यामेव । पुनराराधदविश्रान्ते रसस्याक्किनोदनु सन्धिषु, यथा तापसवत्सराजे ।

(४) प्रवन्धविशेष नाटकादि की रसाभिव्यक्तिका यह और [पाँचवाँ] निमित्त समझना चाहिये कि [अलङ्कारों के यथेष्ट प्रयोगकी पूर्ण] शान्तिक रहनेपर भी [रसके] अनुरूप ही अलङ्कारोंकी योजना करना । [अलङ्काररचनामें] समर्थ कवि कभी-कभी अलङ्काररचनामें ही मग्न होकर रसवन्धकी परवाह न करके ही प्रवन्धरचना करने

१. निर्णयसा० सं०—'ये यथावसरं' 'रसस्य' के बीचमें पाठ छूटा हुआ है । द्विचि० कारने 'द्वि- घ्येयाताम्' लिखकर उसकी पूर्ति की है । बा० लि० में 'अन्तरा' पाठ रखा है ।

२. 'छायागमव्यथम्' नि०, वृ० ।

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ध्वन्यालोक:

किश्त्

संलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्ययुक्त प्रबन्ध भी रसादिव्यज्जक

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कारिका १५ ]

तृतीय उद्योतः

यथा वा ममैव कामदेवस्य सहचरसमागमे विषमबाणलीलायाम् । यथा च गृध्रगोमायु-

संवादादौ महाभारते ।

किन्हीं काव्योंमें व्यङ्ग्य होता है [और असंलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य रसादि ध्वनिका व्यङ्गक

भी होता है] जैसे 'मधुमथनविजय' [नामक महाकाव्य]में पात्रजन्यकी उक्तियोंमें ।

अथवा जैसे मेरे ही 'विषमबाणलीला' [नामक महाकाव्य]में कामदेवके सहचर [यौवन]

के समागम [के प्रसङ्ग]में। और जैसे 'महाभारत'में 'गिद्ध और श्रृगालके संवाद'

व्यादिमें ।

१. 'मधुमथनविजय'की पात्रजन्योक्तिमें—

लीलादादाशुध्द्यासअलमभिहिमण्डलसदिच्व अज्ज ।

कीस्मुणालहर तुज्जजाइ अण्णभिमि ॥

[लीलादाद्दोअदृश्यतसकलमहहीमण्डलसदैवाध ।

कस्साण्मुणालभरणणोत्ति तव गुरु भवत्यण्णे ॥—इति छायाः]

वासुदेवके प्रति यह 'पात्रजन्य'की उक्ति है। इसका अभिप्राय यह है कि वराहावतारके

समय जिन वासुदेवने अपनी दाढ़के अभिभागपर सारी पृथिवीका भार उठा लिया था, आज [रुक्मिणी-

के वियोगमें] मृणालके आभरण धारण कर सकना भी उनके लिए क्यों भारी हो गया है ? यहाँ

रुक्मिणीके विरहमें रुक्मिणीके प्रति वासुदेवका अम्भिलाषरूप अभिप्राय संलक्ष्यतामरूपते व्यङ्ग्य होकर

विप्रलम्भशृङ्गाररसे असंलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्यको अभिव्यक्त करता है ।

२. 'विषमबाणलीला'में कामदेवके सहचर यौवनके समागमप्रसङ्गमें—

हुम्मि अवहत्तियअरेहो निरअकुओ आह विवेकरहिओविण ।

सिरिणेओ तुज्झमि पुणो मत्ति ण पहुंभण्णभि ॥

[भवामयपहसितरेल्लो निरअकुओज्जय विवेकरहिओप्पि ।

स्वन्डओत्ति तव पुनर्भत्तिं ण प्रस्सम्भि ॥—इति छायाः]

यह कामदेवके प्रति यौवनकी उक्ति है। इसका आशय यह है कि मैं मर्यादाका अतिक्रमण

करनेवाला ['अपहल्विता रिखा मर्यादा येन सः', रिखा अर्थात् मर्यादाका विगाहनेवाला] भले ही हूँ ।

लोग चाहे भले ही कहें कि यह यौवन निरअकुल्ला है याँ विवेकरहित है । परन्तु मैं [यौवन] स्वप्नमें

भी तुम्हारी [कामदेवकी] मत्तिको नहीं भूलता हूँ । इस यौवनकी उक्ति में यौवनका कामोपचायक

स्वभाव व्यक्त होता है और उसका पूर्ववासन प्रकट शृङ्गाररसस्यव्यक्तच्यवनिक्या

अभिव्यक्तिमें होता है ।

३. महाभारतके 'गृध्रगोमायुुसंवाद'में कुछ लोग मरे हुए बालकको लेकर रमस्थानमें जाते

हैं । रमशानचारी गिद्ध और श्रृगाल दोनों उस समय वहाँ उपस्थित हैं । ऋमभग सन्यासका समय है ।

गिद्ध चाहता है कि ये लोग इस मरे बालकको छोड़कर अभी चले जायँ तो मुझे खानेको मिले ।

श्रृगाल चाहता है कि ये लोग जबा देर और रुकें, जिससे सन्ध्याकृत हो जाय । तो फिर रातमें गिद्ध तो

चला जायगा और हम निर्विघ्न रूपसे उसका मक्षण करेंगे । इस प्रकार दोनोंकी इच्छा एक-दूसरेसे

मिश्र है । वह दोनों मरे बालकको लानेवालोंको अपने-अपने स्वार्थसे समझाते हैं । यही संवाद

'गृध्रगोमायुुसंवाद' नामसे प्रसिद्ध है । उसके श्लोक निम्नलिखित हैं—

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ध्वन्यालोकः

सुप्ततिद्रुचचनसम्बन्धवैस्तथां कारकशक्तिभिः । कृततद्धितसमासैश्च ध्वन्योज्ज्वलदृश्यकमः कवचित् ॥१५॥

यथा वाच्य— अयं शिल्वा रम्यानेवसिन् यत्रगोमायुरसृरहले । कङ्कालवलले घोरे सर्वप्राणिभयङ्कुरे ॥ न चेह जीवतः कश्चित् कालधर्ममुपागतः । प्रियो वा यदि वा द्वेष्यः प्राणिनां गतिरेव हि ॥

गिद्ध बोला—‘गिद्ध और शृगालोंसे व्याप्त, कङ्कालोंसे भरे हुए, सब प्राणियोंको भयभीत करनेवाले इस भयङ्कर रम्यानेमें बैठनेसे क्या लाभ ? जो मर गया वह जीता तो सकता नहीं । फिर चाहे वह अपना प्रिय हो अथवा शत्रुु हो । जो मर गया सो तो मर ही गया । सब प्राणियोंकी यही हालत होती है । इसलिए अब आप लोग अपने घर जाओ ।’ यही गिद्धका अभिप्राय संलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्यव्यञ्जक अभिव्यक्त होता है । तथा शृगाल बोला— आदित्योदयं स्थितो मुहुः स्नेहं कुरुत साप्ततम् । बहुविश्नो मुहुर्नोदयं जीचेदपि कदाचन ॥ अयं कनकवर्णानां बालमप्रातायौवनम् । युवावकायात् कथम् मदालस्यजडभावविषक्तिः ॥

'अरे अभी सूर्यं निकलना हुआ है, इस बच्चेको प्यारे करो । यह मुहूर्त्त बड़ा विध्नमय है, सम्भव है यह बालक जी ही उठे । अरे मूरखों, खाने जैसे रख्खे और अप्राप्तयौवन इस सुन्दर बालकको इस गिद्धके कहनेसे बिना किसी बाधाके छोड़ कर कैसे चले जाना चाहते हो ?' रात्रिमें अपना काम साध सकनेवाले शृगालकी यह उक्ति उसके अभिप्रायको व्यक्त करती है । और उसका भी पर्यवसान प्रकृत ध्वान्तररूप असंलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्यकी अभिव्यक्ति में होता है ।

इस प्रकार ‘मधुमतन्मनविजय’, ‘विषमबाणलीला’ और ‘महाभारत’ के इन तीनों उदाहरणोंमें प्रवन्धसे साक्षात् तो संलक्ष्यक्रम वस्तुध्वनि व्यक्त होता है परन्तु उसका पर्यवसान प्रकृत रस रूप असंलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्यकी अभिव्यञ्जनारूपमें होता है । अतः संलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्यव्यञ्जक भी असंलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्यव्यञ्जनिका अभिव्यञ्जक होता है, यह अभिप्राय हुआ ॥१५॥

सुप्रतिबोधादि पदांशेभ्यो व्यञ्जकता

द्वितीय कारिकामें वर्णं, पदादि, वाक्य, संहृटना और प्रवन्ध इन पाँचको असंलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्यका व्यञ्जक कहा था । इन पाँचोंकी व्याख्या हो गयी । इनमेंसे पदादि पदांशव्यपेक्ष ध्वनिका केवल एक उदाहरण गृध्र १६६ पर दिया था । उसकी विशेष व्याख्या सुवादिक्की व्यञ्जकता दिखला कर यहाँ करते हैं—

ध्वरे [अर्थात् प्रथमा आदि विभक्तियाँँ], तिङ् [अर्थात् कियादि विभक्तियाँँ], वचन [एक, द्वि, बहुवचन], सम्बन्ध [षष्ठी विभक्ति], कारकशक्ति, छत्व [घान्तुसे विशिष्ट तिङ्मिन्न प्रत्यय], तद्धित [प्रातिपदिकसे विशिष्ट सुप् मिन्न प्रत्यय] और समाससे भी कहीं-कहीं असंलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्यव्यञ्जक अभिव्यक्त होता है ॥१६॥

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कारिका १६ ]

अलङ्क्यक्रमो ध्वनिरात्मा रसादिः' सुभिविशेषैः, तिङ्विशेषैः, वचनविशेषैः, सम्बन्ध-

विशेषैः, कारकशक्तिभिः, क्रतुविभेषैः, वृत्तिविशेषैः, समासैरेचेति । च शब्दानुपातोप-

सर्गकालादिभिः प्रयुक्तैरभिव्यञ्ज्यमानो हृद्यते । यथा—

न्यक्कारो ह्यायमेव मे यदऱ्यस्तत्राप्यसौ तापसः

सोढ्यतेऽपि निहन्ति राक्षसकुलं जीवत्यहो रावणः ।

धिग्धिग्धिक् शत्रुजितं प्रवाधितवतां कि कुम्भकर्णनं वः

स्वर्गप्राप्तिकविविघ्नटननद्योचच्दने: किमेमिमुजैः ॥

लोचनकारने पूर्वकारिकामें दिखलायी

इस कारिकाके साथ सङ्कतिको ध्यानमें रखते हुए यहाँ भी "सुवादिमिः योजनस्वानुपमो भासते वक्त्रभ्रियादिरुपपोडस्यापि सुवादिमिरभिव्यक्तस्यनुस्वानोप-

मस्य असंलक्ष्यक्रमव्यङ्गयो ध्वनेः: कचिदिति पूर्वकारिकया सह सम्बन्धः सङ्क्तितिरिति" यह डक्ति लिखी

है । अर्थात् सुवादिसे अभिव्यक्त जो संलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य वक्ताका अभिप्रायादिरूप ध्वनि है उससे भी

असंलक्ष्यक्रमव्यङ्गच्य रसादिध्वनि अभिव्यक्त होता है इस प्रकार पूर्वकारिकाके साथ मिलाकर इसकी सङ्क्ति लगायी है । पर वह कुछ झूठ-तान-सी जान पड़ती है । काव्यग्रन्थके अनुयूल भी नहीं

है । सुवादिसे भी अलङ्क्याक्रमव्यङ्गच्य ध्वनित होता है यह अर्थ अधिक सीधा और अच्छा है ।

ध्वनिका आत्मभूत [प्रधानभूत] अलङ्क्यक्रमव्यङ्गच्य रसादि, सुभविरोष, तिङ्-

विरोष, वचनविशेष, सम्बन्धविशेष, कारकशक्तियो, क्रतुविभेष, वृत्तिविशेष और

समासविशेषसे [व्यक्त होता है ।] च शब्दसे [सङ्गृहीत] निपात, उपसर्ग, कालादिके

प्रयोगसे अभिव्यक्त होता देखा जाता है । जैसे—

मेरे राक्षस हों यही [बड़ा भारी] अपमान है । उनमें भी यह [विचारा मित्रक]

तापस ! वह भी यहाँ [लङ्कामें मेरी नाकके नीचे] ही राक्षसकुलका नाश कर रहा है

और [यह देखकर भी] रावण जी रहा है ! यह बड़ा आघार्य है ! इन्द्रको विजय करनेवाले मेघनादको भी कुम्भकर्णको जगानेसे भी क्या लाभ हुआ ? और

[दूसरोंकी बात छोड़ो] सर्गकी उस छोटी-सी गड़उटियाकी टूटकर अभिमानसे व्यर्थ

ही फूली हुई मेरी इन्त मुजायोंसे ही क्या लाभ है ?

अपने वीरोंकी मरस्ना करने [और शत्रुकी तुच्छता आदि सूचित करते हुए अपने सैनिकोंको

उत्साहित करनेके लिये यत्र रावणकी रावणपर्ण क्रोधोक्ति है जो प्रतिपाद्य व्यङ्गच्यसे परिपूर्ण है । पहिले तो

शत्रुओंका होना ही मेरे लिये अपमानजनक है । जिसने इन्द्र जैते देवोंको भी कैद कर लिया हो,

यमराज भी जिसने काँपते हों उसके शत्रु हों और जीते रहें । कितना आश्चर्य और अनौचित्य है !

यह भाव 'मे' पदसे व्यक्त होता है । 'अस्मद्' शब्द्दसे वक्ता रावणके पूज्यत इन्द्रविषयादि लोकोत्तर-

चरित, तथा सम्बन्धबोधक पञ्चमी विभक्तिसे शत्रुओंके साथ अपने सम्बन्धका अनौचित्य ध्वनित होता

है । और उससे रावणके हृदयका क्रोध अभिव्यक्त होता है । 'अरयः' का बहुवचन उचसी सम्बन्धनौ-

चित्यके अतिशयको बोधन करता है । 'वत्रापि' इस निपातसमुदायके असम्माननीयता और 'तापस

शब्दके.मतवर्थीय ण प्रत्ययसे पुरुषार्थोदीका अभाव सूचित होता है । पुरुषार्थहीन, क्षीणदेह, तापस

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ध्वन्यालोक

अत्र हि म्लोके भूयसा सर्वेषामप्येषां सङ्कटमेव व्यङ्ग्यकत्नं हृयते। तत्र ‘मे यदरय:’ इतनेनैव सुप्तसर्पन्थवचनानाममिध्यारकञ्जकत्वम्। ‘वत्राप्यसौ तपस:’ इत्यत्र उदितनिपातयो:। ‘शोङ्प्यत्रैव निहन्ति राक्षसकुलं जीवत्यहो रावण:’ इत्यत्र तिङ्कारकशफीनाम्। ‘धिङ् धिक् शत्रुजितम्’ इत्यादौ इलोकार्धे कुप्तद्वितसमासोपसर्गणाम्।

एवंविधस्य व्यङ्ग्यकभूयस्त्वे च घटमाने काव्यस्य सर्वोत्तिशायिनी बन्यच्छाया समुन्मीलिति। यत्र हि व्यङ्ग्यं शाब्दबोषित: पदस्थ्यक्षरतत्कार्यनिमित्तत्वाति काव्य किमुत बन्यच्छाया। किन्तु यत्र तेषां वहूनां समवाय:। यथात्रानन्तरोदितश्लोके। अत्र हि ‘रावण’ इत्यस्मिन् पदेऽर्थान्तरसङ्क्रमितवाच्येन ध्वनिप्रभेदेनालङ्कृतेऽपि पुनरनन्तरोक्तावां व्यङ्ग्यकप्रकारणासुध्दासनम्।

लोकरावण संसारको भयभीत करनेवाले रावणका द्योतक हो यह कैसी असम्भव-सी बात इस समझ प्रत्यक्ष हो रही है। ‘असौ’ से विशेष हीन अवस्था सूचित होती है। वह भिखमङ्गा जिसे पिताने घरसे निकाल दिया है, जिसके न पेटको रोटी न तनको कपड़ा जुड़ता है, और जो वन-वन मारा-मारा फिरता है वह [असौ] मेरा द्योतक है। यह और भी अनुचित है। फिर वह कहाँ दूर नहीं [शोङ्प्यत्रैव] मेरे सिरपर खड़ा है। और है ही नहीं, [निहन्ति राक्षसकुलं] राक्षसवंश नाश कर रहा है।

फिर भी यह रावण जी रहा है। ‘रावण’ ‘रावयतीति रावण:’ सद्देशासुर समस्त जगत्को कम्पित करनेवाले रावणके जीते जी यह सब हो रहा है। ‘शक्रं जितवान् इति शत्रुजित्’ इन भूतकालिक ‘क्विप्’ प्रत्यथे मेघनादके इन्द्रविजयमें अनास्था सूचित होती है। ‘ग्रामटिका’ का ‘क्’ रूप तद्धित स्वर्गकी अत्यन्त तुच्छताका और ‘अभि:’, ‘धुषा’, ‘उच्द्रूण:’ आदि पद वैचित्र्यतिशयको अभिव्यक्त करते हैं।

इस श्लोकमें भाय: इन सब ही पदोंका व्यङ्ग्यकत्व स्पष्ट प्रतीत होता है। उनमेंसे ‘मे यदरय:’ इससे छुपे, सम्बन्ध और वचनका अभिव्यञ्जकत्व [प्रदर्शित होता है]। ‘वत्राप्यसौ तपस:’ यहाँ तद्धित [‘तपस्’ पदका अण् प्रत्यय] और निपात [तत्र अपि], का, ‘शोङ्प्यत्रैव निहन्ति राक्षसकुलं जीवत्यहो रावण:’ यहाँ [निहन्ति और जीवति पदोंमें] तिङ् और [राक्षसकुलं तथा रावण: पदोंमें कर्म तथा कर्तारूप] कारकराक्तियों-

का, ‘धिङ् धिक् शत्रुजितम्’ इत्यादि श्लोकार्धमें कुप्त [‘शत्रुजितका कृप प्रत्यय], तद्धित [‘ग्रामटिकाका ‘क्’ प्रत्यय], समास [स्वर्गग्रामटिका], और उपसर्गों [विलुप्तनका वि उपसर्ग] का [व्यञ्जकत्व है]।

और इस प्रकारका व्यङ्ग्यकवाचुलस्य हो जानेपर काव्यकला सर्वोत्त्कृष्ट रचनासौन्दर्य अभिव्यक्त होता है। जहाँ व्यङ्गच्यसे प्रकारामात्र एक भी पदका आकारभाव हो सके उस काव्यमें भी कुछ अनिवर्चनीय सौन्दर्य आ जाता है तो फिर जहाँँ ऐसे बहुतसे पदोंका एकत्र सङ्क्षिवेश हो उाय उसका तो कहना ही क्या। जैसे इसी ऊपर कहे श्लोकमें। इसमें ‘रावण’ इस पदके अर्थान्तरसङ्क्रमितवाच्य [लक्षणामूल] ध्वनिप्रभेदसे अलङ्कृत होनेपर भी [उसमे] अनन्तरोक्त व्यङ्ग्यकप्रकारणका [भी[ उद्भासन होता है।

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कारिका १६ ] तृतीय उद्योतः २७१

हृदयेन्ते च महात्मनां प्रतिभाविशेषभाजां वाहुल्येनैवविधा वन्वप्रकारा: । यथा महर्षेर्व्योसस्य—

अतिक्रान्तसुखा: कालाः प्रत्युपस्थितदारुणा: । एवः स खु: पापीगदिवसा पृथिवी गतयौबना ।।

अत्र हि कुन्तीगितवचनैरलक्ष्यक्रमङ्ग्यङ्ग्य् । 'पृथिवी गतयौबना' इत्थनेन चात्यन्त-

तिरस्कृतवाच्यो ध्वनि: प्रकाशित: । एषां च सुबादीनामैकर: समुदितानां च व्यङ्ग्यक्त्वं महाकवीनां प्रवन्धेषु प्रयेण' हृदयते ।

सुवन्तस्य व्यङ्ग्यक्त्वं यथा— ताले: शिखडिलयसुभगे कान्तया नर्तितो मे यामध्यासते दिवससविगमे नीलकण्ठ: सुहृद् व: ।।

विरोष प्रतिभाशाली महाकवियों [महाकवियॉ] की इस प्रकारकी रचनाशैलियाँ बहुतायतसे पायी जाती हैं। जैसे महर्षि वेदव्यासका—

[अत्रे] समय सुहाविरहित और दुःखसे परिपूरित हो गये हैं और गतयौवनापृथिवीके उत्तरार्धे कुरुदिनेश्रा हो रहे हैं ।

इस [उदाहरण]में ['अतिक्रान्त' और 'प्रत्युपस्थित' पदोंमें 'क' प्रत्ययतत्पुरुष] हेतु, ['पापीय'में 'ईय' प्रत्ययतत्पुरुप] तद्धित, [ और 'कालाः'का बहुतवचनरूप] वचन [इन सब]से [निर्वेदको सूचित करते हुए शान्तरस रूप] असंलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य [रसध्वनि] और 'पृथिवी गतयौबना' इस [में 'गतयौवन' पद]से अत्यन्ततिरस्कृतवाच्य [अविवक्षित-

वाच्य] ध्वनि प्रकाशित होता है।

इस सुवादिका अलग-अलग और मिलकर [दोनों तरहसे] व्यङ्ग्यक्त्व महाकवियाकी रचनाआंमें पाया जाता है।

सुवक्तका व्यङ्ग्यक्त्व [का उदाहरण] जैसे— वजते हुप करुणों [कोई मधुर ध्वनि]से मनोहर तालियोंसे मेरी प्रिया द्वारा नचाया जानेवाला हमारा मित्र नीलकण्ठ [मयूर] दिनके समाप्त होनेपर [रात्रिको] जिसपर बैठता है ।

यह श्लोकका उत्तरार्धभाग ही यहाँ उद्धृत किया गया है। 'मेघदूत'के उत्तरभागका १६ वाँ श्लोक है। उसका अवशिष्ट पूर्वार्ध इस प्रकार है—

तन्वङ्गे च स्फटिकफल्लका काञ्चनी वासयष्टि- mूलेने बद्धा मणिमिरनतिप्रौढवन्धप्रकारै: ।

उस [क्रीडाद्रैल] के वीचमें स्फटिककी चौकीवाली और नीचे जड़में कच्चे बाँसके समान [हरिदर्ण] मालूम पड़ती हुयी, [मरकत] मणियोंसे जड़ी हुयी, सोनेकी छतरी है जिसपर बजते हुए

१. 'प्रायेणान्यथापि' नित्य ।

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ध्वन्यालोक

२०२

[ कारिका १६

तिडन्तस्य यथा—

अवसर रोदूं वि अणिम्मिआइं मा पुंसं मे ह अच्छीअं ।

दंसणमज्झभत्तेहिं जाहिं हिअअं तुहु प पाइअं ॥

[ अवसर रोदितुमेव निमित्ते 'मा पुंसय हते अक्षिणी मे ।

दर्शनमाझोनमत्ताभ्यां याभ्यां तथ 'हृदयमेवस्तुप न ज्ञातम् ॥

यथा वा—

मा पन्थे रन्धीओ अवेहि बालअ अहोसी अहिरीओ ।

अण्हेअ णिरिच्छाओ सुण्णघरं रक्खिदव्वं णो ॥

[ मा पन्थानं रुष: अपेहि बालक अहो असि अह्रीक: ।

वयं निरिच्छा: शून्यगृहं रक्षितव्यं न: ॥

कड़कणों [की मधुर ध्वनि] से मनोहर तालियोंसे मेरी प्रिया द्वारा नचाया जानेबाला तुम्हारा मित्र मयूर दिनके समास होनेपर [शत्रिकों] बैठता है ; यहाँ 'ताले:' यह बहुवचन प्रियतमाके बहुविध वैदग्ध्यसूचन द्वारा विप्रलम्भकका उद्दीपक होता है । अतः यह 'सुबन्त'के व्यञ्जकत्वका उदाहरण है ।

तिडन्तका [व्यञ्जकत्वका उदाहरण] जैसे—

हटो, रोकनेक हू लिप बने हुप इण दुष्ट णेअण्को [अपने दंसणसे फिर] विकसित [करनेका प्रयास] मत करो । जिन्दोण तुम्हारे दर्शनमात्रसे उन्मत्त होकर तुम्हारे पेसें [निष्ठुर] हत्यको भी न जानां ।

यहाँ 'अपसर' और 'मा पुंसय' ये तिङन्त पद मुख्यतः अभिव्यञ्जक हैं । अन्य पदोंके सहकारसे मुख्यतः तिङन्त पदों द्वारा, उन्मत्त कुछ समझ नहीं सकता इसलिए नेत्रोंका कोई अपराध नहीं है । हमारे भाग्यमें यही तुम्हारी निष्ठुरता भोगना लिखा था, उसे कौन बदल सकता है । इस अर्थके सूचन द्वारा ईर्ष्याविप्रलम्भ अभिव्यक्त होता है ।

अथवा [तिङन्तके व्यञ्जकत्वका दूसरा उदाहरण] जैसे—

घरे [नासमझे] लड्के, रास्ता न रोको । आश्चर्य है तुम [अब भी नहीं मानते] इतने निर्लज्ज हो ! हम [तो] परतन्त्र हैं [क्योंकि हमको तो [विकले बैठकर] घरकी रखवाली करनी पड़ती है ! [मन ही तब] उस धूनियं घरमें भी जाओ, यहाँ रास्तेंम क्यूं छेड़ते हो] ।

यहाँ 'अपेहि' और 'मा रुष:' यह तिङन्त पद सम्भोगेच्छाके प्रकाशन द्वारा सम्भोगशृङ्गारको अभिव्यक्त करते हैं । पहले श्लोकमें विप्रलम्भशृङ्गार व्यञ्जित था इसलिए यह सम्भोगशृङ्गारका दूसरा उदाहरण दिया है ।

९. 'मोक्ष्यन्स्य' नि०, दी० ।

९. 'हृदयं तथ न ज्ञातम्' दी० ।

३. 'वयं परतन्त्रा: यतः भ्रूभङ्गुरया मातकं रक्षणीयं वतन्ते ।' बालक्रिया, नि० ।

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कारिका ९६ ] तृतीय उद्योत: २०३

सम्बन्धस्य यथा—

अण्णत्त वच्च बालक अन्धआन्ति किं में पुलोसिपरअम् । हो जआमीहुअर्ण तहँं विअ ण होड़इ ॥

[ अन्यत्र ब्रज बालक स्नान्ती किं मां 'भलोकयस्पृशेत्' तु ? भो जायाभीलकाणां तटमेव न भवति ॥ —इति छाया ]

अत्र— 'क' -प्रत्ययेन प्रकृतिपु तद्धितविषयकं व्यत्कतत्वमावेदितं एव । अवक्ृपातिशय 'क:'' । समासान्त च वृत्त्यौचित्येन विनियोगेन ।

निपातानां व्यत्कत्वं यथा— अयमेकपदे तथा वियोगः प्रियया चोपनत: शुद्र:सहो मे । नववारिरोदयादहोभिरेविनयं च निरातपत्रंन्यै: ॥

इत्यत्र 'च' शब्द ।

सम्बन्धकका [व्यत्कत्कका उदाहरण] जैसे— अरे लड़के, तुम कहाँ जाओ, नहाती हुई मुझको [सस्पृश्] क्यों देख रहे हो ।

[अपनी] पत्तौसे डरनेवालोंके मतलबका यह टट नहीं है । यहाँ जलाप्सक तटपर नहाती हुई मृगतृष्णीको सदृश नेत्रोंवाले देवनेश्वाले विवादिनि तन्वक् के प्रति उसको चाहितनेवाली स्तैणपुकी यह उक्ति है ; उसमें 'जायाभीलकाणं' इस सम्बन्धपद्वारते उस प्रच्छन्न कामुक्कीका इंश्यार्थंतद्रूप सुचित होता है । और वह इंष्यार्थ विप्रलम्भशृङ्गारको अभिव्यक्त करती है । साथ ही भीक पदमें जो अवशार्थ 'क' प्रत्यय तदितत्का है वह भी अवक्ृपातिशय द्वारा इंष्यार्थौप्रलम्भको परिपुष्ट करता है ।

'क' प्रत्ययके प्रयोगते युक्त प्राकृत पदोंमें तद्धितविषयक व्यत्कतत्व भी सुचित होता ही है । [जैसे यहाँ] अवक्ृपातिशयमें क-प्रत्यय [इंश्याविप्रलम्भकका व्यक्जक] है । वृत्तिके अनुरूप [समासोंकी] योजन होनेपर समासोंका [व्यत्कतत्व होता है । उसके उदाहरण यहाँ नहीं दिये हैं] ।

निपातोंका व्यत्कतत्व [का उदाहरण] जैसे— एक साथ ही उस [हृदयेश्वरी] प्रियके साथ यह असकृद् वियोग आ पड़ा और उसपर नये बाधालोक उमड़े आते अतिपरिहत मनोहर [वराक्]ने] दिन होते थे ।

[अब यह सब कैसे सहा जायगा] । यहाँ 'च' शब्द [व्यत्कजक है] ।

यहाँ दो बार 'च' का प्रयोग किया गया है । वह इस बातको सुचित करता है कि उसके वियोगके साथ काकतालीयन्यायसे जो ये वर्षॉके दिन आ पड़े वे जलेबन नसकके समान प्राणहरणके

१. 'अन्यत्र ब्रज बालक तृष्णायास्नान: कथमालोक्यस्पृश्येत् । भो जायाभीशिकाणां युष्माकं सम्बन्ध एव न भवति ॥—च्री०

२. 'अवक्ृपातिशये क:' यह पाठ निः०, द्वी० में नहीं है ।

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ध्वन्यालोक:

यथा वा—

सुहृदकुलिशसंवृताधरोष्ठं प्रतिपेधाक्षररविक्लृवाविरामम्‌ ।

मुखमंसविवर्तिंपक्ष्मलाक्ष्या कथमप्युन्रमितं न चुम्बितं तु ॥

अत्र तु शब्दः ।

निपातानां प्रसिद्धमपीह व्योतकत्वं रसापेक्षयायोक्तमिति दृश्यव्यम्‌ ।

उपसर्गाणां व्यञ्जकत्वं यथा—

नीवाराः सुहृद्गर्भकोटरसुरवप्रस्थास्तरुणाश्च,;

प्रस्तिगधा: कचविडङ्गुदीफलभिदः सूच्यन्त एवोपला: ।

विश्वासोपगमादभित्रगतयः शब्दं सहन्ते मृगाः;,

तोयाधारपथाश्र वल्कलशिलानिष्यन्दरेखाक्रिता: ॥

इत्यादौ ।

लिए प्रयुक्त हैं । अतएव 'रस' पदसे उद्दीपनविभावत्व सूचित होता है । इस प्रकार निपातद्रयका प्रयोग विप्रलम्भशृङ्गारको अभिव्यक्त करता है । यह 'विक्रमोर्वशीय' नाटकमें पुरुरवाकी उक्ति है ।

अथवा [निपातके व्यञ्जकत्वका दूसरा उदाहरण] जैसे—

[मेरे जबर्दस्ती खुलवानेको प्रयत्न करनेपर] चारचाह अँखियोंसे हाते हाए अधरोष्ठवाला और [मान जाओ, जाने दो इत्यादि] निपेधपरक शब्दोंकी विकलतासे मनोहर तथा कन्धेकी ओर मुड़ा हुआ, सुन्दर पलकोंवाली [प्रियममा शाकुन्तला]—

का मुख किसी प्रकार ऊपर उठा तो लिया परन्तु चूम नहीं पाया ।

यहाँ 'तु' यह शब्द [पद्योक्ततापव्यञ्जक और उस चुम्बनमात्रसे कृतकृत्यताका सूचक होनेसे शृङ्गाररसको अभिव्यक्त करता है]।

निपातोंका व्यञ्जकत्व [हमारे उपजीव्य वैयाकरण मतमें] प्रसिद्ध होनेपर भी यहाँ रसकी द्योतिसे [फिरसे ] कहा है यह समझना चाहिये ।

वैयाकरण सिद्धान्तमें निपात अर्थके द्योतक ही होते हैं, वाचक नहीं । 'द्योतका: प्रादयो येन निपातास्तश्चादयो' [द्र० म०]। उनको वाचक न मानकर केवल द्योतक माननेका कारण यह है कि उनका स्वतन्त्र प्रयोग नहीं होता । इस प्रकार द्योतकत्व प्रसिद्ध होनेपर भी वह द्योतकत्व केवल अथवा प्रति विवक्षित है । इसीलिए यहाँ विशेष रूपसे रसकी द्योतकत्व प्रतिपादन किया गया है ।

उपसर्गोंका व्यञ्जकत्व [का उदाहरण ]जैसे—

शुकयुक्त कोटरोंके मुखसे गिरे हुए नीवारकण वृक्षोंके नीचे बिखरे पड़े हैं ।

कहीं-कहीं चिकने पत्थर हैं जो इस बातकी सूचना देते हैं कि उनसे इड्रगुदीफल तोड़ने—

का काम लिया जाता है । सर्वथा आभ्वस्त होनेसे, आनेवालोंके शब्दको सुनकर भी मृगोंकी गतिमें कोई परिवर्तन नहीं होता है और जलाशयोंके मार्ग [स्नानोत्तर मीले] वल्कलवस्त्रोंसे टपकती हुई बूँदोंकी रेखाओंसे आङ्कित हैं ।

इत्यादिमें ।

यहाँ 'प्रस्तिगधा:'में 'प्र' उपसर्ग 'प्रकर्षण सङ्गधा: प्रस्तिगधा:' इस प्रकार प्रकर्षको सूचित

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कारिका १६ ] तृतीय उद्योत: २०५

द्वित्राणां चोपसर्गाणामेकत्र पदे यः प्रयोगः सोऽपि रसव्यकृत्यतुरगुणतयैव निर्दोषः । यथा—

"प्रभ्रष्टयस्युत्तरीयत्विषि तमसि समुद्धीक्ष्य वीतात्रुन्तीन् द्राग् जन्तून्"—इत्यादौ ।

यथा वा—

"मनुष्यद्रुत्या समुपाचरन्तम् ।" इत्यादौ ।

करता हुआ इड्रुदीपलोचनों संसक्ताक्षां तक हृद्कर आश्रमंके सौन्दर्यादितयको व्यक्त करता है । कोक-काकी यहाँ 'तापस्य फलंवपय' अभिलषितंकारकं खलु यतते तापसक फलंवपयक आभिलषका अतिशय यहाँ ध्वनित होता है यह व्याख्या करते है । परन्तु उनहिं यह व्याख्या सदृक्त नहीं है क्याकि 'अभिज्ञानधाकुन्तल' नाटकमें यह रचना दुष्यन्तकी उक्ति है । तापसकी नहीं। आलंकारिकोंने यहाँ 'चुकरामंकान्तरमुखप्रहृतः' यह पाठ रखा है । परन्तु दूसरी जगह 'चुककान्तरामंकमुखप्रहृतः' पाठ पाया जाता है । वह पाठ अधिक अच्छा जान पड़ता है ।

दो-तीन उपसर्गोंका जो एक पदमें प्रयोग होता है वह भी रसाभिव्यक्तिके अनुकूल होनेसे ही निर्दोष हैं । जैसे—

उत्तराय [दुपट्ट] के समान असृधकारके गिर जाने [गतिके अन्यकारके दूर हो जानेपर आचरणाद्वित जन्तुओंको देखकर [मर्यादितक] ।

इत्यादि ['समुद्धीक्ष्य' पदमें एक साथ 'सम्, उत् और वि' इन तीन उपसर्गोंका प्रयोग सूर्यदेवकी ऋषांक अतिशयका द्योतक और रसाभिव्यक्तिके होनेसे निर्दोष है] ।

अथवा जैसे—

'मनुष्यद्रुत्या समुपाचरन्तम् ।' यहाँ सम, उप और आड् इन तीन उपसर्गोंका प्रयोग भगवानके लोकानुप्रवेश्छाके अतिशयका अभिव्यञ्जक है ।

निर्णयसागरं तथा द्वौर्द्धातियुक्त संस्करणमें इस श्लोकके बाद एक श्लोक और दिया है । परन्तु लोचनमें उसका उल्लेख नहीं है । अतएव वलदप्रियांले संस्करणमें उसे मूल पाठमें नहीं रखा है । इसीलिए हमने भी उसे यहाँ मूल पाठमें नहीं रखा है । फिर भी उसकी व्याख्या टिप्पणी-

कपमें कर रहे हैं—

मदमुक्तवरकपोतसमुन्मयूरं प्रविगलितामनवद्यवपुर्निवेशम् ।

वनमिदमवगाहमानभीमे व्यसनमिवोगरि दारुणतामेति ॥

मदमुक्त कपोतों और ऊपरको मुख उठाये मयूरों अथवा उनमत्त मयूरोंसे युक्त, बहुत छोटे-छोटे और विरल वृक्षोंसे युक्त यह वन आपत्तिके समान या रोगके समान प्रवेष्ट करते समय [प्रारंभं] भयानक [लगता] और आगे चलकर दारुण दुःखदायक बन जाता है ।

१. नि० सा० सं० में 'यः स्वधर्मे सदुपनततस्य इत्यादौ व' इतना अधिक पाठ है ।

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ध्वन्यालोकः

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कारिका १५ ] तृतीय उद्योतः

हा धिक् कष्टमहो कव यामि शरणं तेषां जनानां कते नीतानां प्रलयं शठेन विधिना साधुधिषः पुष्टयता इ इत्यादौ ।

शरीर [आनन्दसे] रोमाञ्चित हो उठता है; हा धिक् है, सज्जन पुरुपोंके द्वारियोंका पोषण करनेवाले दुष्ट तैवने उनका अत्यन्त विनाश कर दिया यह वड़े दु खकी बात है, उनके [प्राप्त करनेके] लिप में किसकी शरणमें जाऊँ ।

पदपौनरुक्त्यं च व्यङ्ग्यकत्वापेक्ष्यैव कदाचित् प्रयुज्यमानं शोभामावहति । यथा— वच्म्रनाहितमतिर्वहु नाटुगं कार्योन्मुखः खलजनः ऋतकं त्वरिति ।

इत्यादिमें— यहाँ 'हा धिक्' इस निपातद्वयमें गुणियोंकी अभिवृद्धि में प्रमाणता अनुभव करनेवाले महापुरुषोंका श्लाघातिशय और देवकी असमर्थ्यका संचारताके कारण 'निर्वेदातिशय' स्वानित होता है ।

तत् साध्वसो न न विदन्ति, विदन्ति किन्तु कुतकं वृथा प्रणयमस्य न पारयन्ति ॥

इस स्थलके 'रोगन' टीकाकार पाठ, निर्णयसागरीय और वाराणसेय दोनों संस्करणों में शुद्ध है । निर्णयसागरीय संस्करणमें तो 'हा धिक्' के बाद कुछ पाठ हटा होनेसे सूचक विन्दियों दो हुए हैं । वारणसेय संस्करणमें पाठ इस प्रकार छपा है—'श्लाघातिशयो निर्वेदातिशयश्र स्वानिते च छवन्यते' । यह पाठ भी शुद्ध है । इसमें 'अहो वतासि स्फूर्जनीय वीर्य्य:' से सम्बन्ध रखता है । उस उदाहरणके नोचे दिये हुए 'इत्यादि'की व्याख्यामें 'अहो वतेति' लिसा गया है । जिसका अभिप्राय यह है कि उस उदाहरणमें 'अहे! वत' इन दो निपातोंका प्रयोग व्यञ्जक है । इस प्रकार सबसें पहिले 'अहं वत' पाठ, और उसके अन्तमें विरामाचिह्न छापना स्वाचित्ये था । उसके बाद 'हा धिगिति च श्लाघातिशयो निर्वेदातिशयश्र ध्वन्यते' यह पाठ देना चाहिये । इस अंशका सम्बन्ध प्रकृत उदाहरणसे है । अर्थात् इस उदाहरणमें 'हा' और 'धिक्' ये निपात क्रमशः श्लाघातिशय और निर्वेदातिशयका व्यञ्जक करते हैं । अतएव संबोधित पाठ इस प्रकार होना चाहिये—

'अहो वतेति । हा धिगिति च श्लाघातिशयो निर्वेदातिशयश्र स्वनिते ।' यह संशोधन दोनों संस्करणोंके पाठकी त्रुटियोंको पूर्ण कर देता है ।

कभी-कभी व्यङ्ग्यकत्वकी दृष्टिसे ही प्रयुक्त पदोंकी पुनरक्ति भी शोभाजनक होती है । जैसे — [डसरोंको] धोखा देनेवाला [और अपना] काम निकालनेवाला दुष्ट पुरुप जो खुराफुदकी बनावटो यातें करता है उसे सज्जन पुरुप नहीं समझते यह [बात] नहीं हैं, खूब समझते हैं, किन्तु उसके आग्रहको अस्वीकार करनेमें समर्थ नहीं होते !

इत्यादिमें ।

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ध्वन्यालोक

आचार्य आनन्दवर्धन

महामहोपाध्याय डॉ० बलदेव उपाध्याय

चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन

काव्यस्य व्यङ्ग्यकत्वं यथा—

समविषमाणितविसेसेमा समन्तओ मन्दमन्दस्संआरा । अइराअ हंअन्ति पहा मणोरहाणं पि दुल्लंधिआ ॥ [ समविषमाणितविरिसेसेमा तमन्तओ मन्द-मन्दस्संचारा । अचिराद् भविष्सन्ति पन्थानो मणोरथानमपि दुल्लंधिआ ॥

—इति छाया]

अत्र हि 'अचिराद् भविष्सन्ति पन्थानो' इत्यत्र भविष्यन्तीत्यस्मिन् पदे प्रत्ययः काल-विशेषाभिधायीरसपरिपोषपहेतुः प्रकाशते । अर्यं हि गाथार्थः प्रवासविफलम्भशृङ्गारविभाव-तया विभाव्यमानारसवान् ।

यथात्र प्रत्ययांशो व्यङ्ग्यकस्तथा कचित् प्रकृत्यंशोऽपि दृश्यते यथा—

यहाँ पहिले 'न न विदन्ति' नहीं जानने है ऐसी बात नहीं है अर्थात् जानते ही हैं । इस नञ्-हस्की वृत्तिस्थ 'विदन्ति' इस अर्थका स्फुटन किया है । और हुरारा फिर साक्षात् 'विदन्ति'का प्रयोग किया है । यह 'न न विदन्ति'की वक्रोक्ति और उससे प्राप्त 'विदन्ति' पदकी पुनरुक्ति उनके ज्ञातव्यका अभियक्त करती है ।

यहाँपर "पदम्हं च वाक्यादरेण यथा:सम्भावमुअलक्खणं" लिलकार लोचनकारने पदक वाक्यक भी उपलक्षण माणं है । अर्थात वाक्यक पुनरुक्त भी ध्वनिक हाती है । इसका उदाहरण 'रत्नावलि' नाटिकाका निम्नलिखित इलोक दिया है—

दीपादनिस्सादपि मधादपि जलनिरुद्धेस्सोडपञ्ञत्त । आनीअर क्खत्तिति घट्टिय वि धीरभिमतं मभिस्सुहीभूत ॥

यहाँ इस इलोककी आखुत्ति इसलामकी अवरधम्मभाविताको व्यक्त करती है ।

कालक व्यङ्गकत्व [का उदाहरण] जैसे—

[वर्षाकालमें सव रास्तोंमें पानी भर जानेसे]सम-विरसम [ऊँचे-नीचे]की विशेषता-से रहित, चारोंओरसे अत्यन्त मन्दस्संहारयुक्त [अत्यन्त नयून संखया और मन्दगतिके सञ्चारसे युक्त] सारे मार्ग शीघ्र ही मणोरथसे भी अगस्य हो जायँगे ।

यहाँ "अचिराद भविष्सन्ति पन्थानो" मार्स शीघ्र ही [अगस्य] हो जायँगे इसमें 'भविष्यन्ति' इस पदमें कालविशेष [भविष्यतकाल]का वाचक [स्य] प्रत्यय [वर्षाकालकी कल्पना भी विरही जनोंमें कम्प पैदा कर देती है, साक्षात् उसका तो कहना ही क्या

इस व्यङ्गच-वर्थके बोधन द्वार] रसका परिपोषक हेतु प्रतीत होता है । गाथाका यह अर्थे प्रवासविफलम्भशृङ्गार [उद्दीपन] विभावरूपसे प्रतीत होकर [विशेष रूपसे] रस-मुक्त प्रतीत होता है ।

जैसे यहाँ प्रत्यय अंश व्यङ्गक है ऐसे ही प्रकृतिभाग भी [व्यङ्गकरूपमें] देखा जाता है । जैसे—

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तद् गेहं नवभित्ति मन्दिरमिदं लघ्वावकाशं दिवः सा धेनुर्जरती चरान्ति करिणीमेता घनाभा घटा: । स क्षुद्रो मुसलध्वनि: कलमिदं सन्नीतकं योपिता-माश्रयं दिवसैर्द्रिजोऽप्यजोड्यमियर्वी मूर्मि समारोपित: ॥ अन्र श्लोके 'दिवसै:' रित्यसिन्न पदे प्रकृत्यंशोडपि धोतक: । सर्वनाम्नां न व्यङ्जकत्वं यथासंस्तरोक्ते: इलोके । अन्र च संहननान्मक एव व्यङ्ग्योऽर्थो लक्ष्यते । हृदि व्यवस्थाप्य कविता केत्यादिशब्दप्रयोगो न कृत: । अनया दिशा सहृदयैरन्येऽपि व्यङ्जकविशेषा: स्वयमुपलक्षणीया: । एतच सर्वं पदवाक्यरचनायोतनोक्त्यैव गत्तार्थमपि वैचिच्येण व्युत्पत्तये पुनरुक्तम् ।

[कहाँँ ] वह टूटी फूटी दीवारोंका घर, और [कहाँँ आऊ] यह आाकाराशचुम्बी महल, [कहाँँ इसकी] वह बुढिया गाय [और कहाँँ आज] ये मेघोंके समान [काली-काली और ऊँच्री] हाथियोंकी पंक्तियाँ झूम रही है । [कहाँँ] वह मूसलकी क्षुद्र ध्वनि, और [कहाँँ आज सुनाई देनेबालो] यह सुन्दरियोंका मनोहर सन्नीत । आाश्चर्य है, इन [योंड़ेसे] दिनोंमें ही इस [दरिद्र] ब्राह्मण [सुदाम]की इतनी अच्छी हालत हो गयी । इस इलोकमें 'दिवसै:' इस पदमें प्रकृत्यंश [दिवस शब्द] भी [इस प्रतिपादित अर्थकी अभिव्यक्ति] असंप्रदान्माध्यमानताका] अभिध्यञ्जक है । सर्वनाम भी प्रभित्यङ्जक होते हैं जैसे अभी कहे गये [तद् गेहं] श्लोकमें । यहाँ सर्वनामोंके व्यङ्जकत्चको मनमें रखकर ही कविने 'क' इत्यादि शब्द्का प्रयोग नहीं किया है ।

यहाँँ 'तद् गेहं नवभित्ति' में 'तत्' यह सर्वनाम 'नवभित्ति'के प्रकृत्यंशके साथ मिलकर घरकी अत्यन्त दरिद्रताका सूचक, मूषकादिजर्जिर्न दुर्दशाके व्यक्त करता है । यहाँँ केबल 'तत्' सर्वनाम ही व्यञ्जक नहीं है । क्योंकि अकेले सर्वनामसे तो घरका उत्कर्ष भी प्रकट हो सकता था । परन्तु 'नवभित्ति'के सहकारसे वह घरकी दीन अवस्थाका अभिव्यञ्जक होता है । इसी प्रकार 'सा धेनुर्जरती' इत्यादिमें भी प्रकृत्यंश स महत्त्व सर्वनामको ही व्यञ्जक मानना चाहिये, केवल सर्वनामको नहीं । वहाँ 'तत्' शब्द 'अनुभूता यंसरकारत्चेन व्यञ्जक है । इसलिए कमश: स्मृति और अनुभबके सूचक 'तत्' और 'इदं' शब्द्के द्वारा स्मृति और अनुभबकी असंप्रदान्त विरोधौंपपत्तिके सूचनसे आाश्र्यकका उद्दीपन प्रतीत होता है । 'तत्' और 'इदं' शब्द्के अभावमें यह विरोध अर्थ प्रतीत नहीं हो सक्ता है इसलिए वे सर्वनाम पद ही प्रभानतया व्यञ्जक है । इसी प्रक्रारसे अन्य व्यङ्जकोंको भी सहृदय पुरुष स्वयं समझ लें ।

यह सब [सुप्, तिङ् आदिकी व्यक्जकता जो १६वीं कारिकामें कही है, दूसरी कारिकामें कहे हुए] पद, वाक्य, रचना आदिकी च्योतनोक्तिसे ही गत्तार्थ हो सक्ता है फिर भी मिन्न प्रक्रारसे व्युत्पत्ति [ज्ञानबुद्धि या बुद्धिवैशारद्य]के लिये ही दुबारा कहा है ।

१. 'यथात्नैवाचमन्तरोक्ते' नि० १

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ध्वन्यालोक:

न तु चार्थेसामर्थ्यांक्षेप्या रसादय इत्युक्तम्, तथा च सुवादीनां व्यङ्ग्यकत्ववैचि-व्यङ्गकथनमनन्वितमेव ।

उक्तमत्र पदान्य व्यञ्जकोक्त्यवसरे ।

किंच, अर्थविशेषाक्षेप्यत्वेडपि रसादीनां विशेषार्थविशेषणां व्यञ्जकशब्दाविनाभाव-वित्त्वाद् यथा प्रदर्शितं व्यङ्गचकसारूपपरिज्ञानं विभज्योपयुज्यत एव । शब्दविशेषणां वान्यत्रैव वाक्यं तद्विभागानुपदर्शितं तदपि तथा व्यङ्गकत्वनावस्थितोऽन्त्यवगन्तव्यम् ।

यत्रापि 'तत्' सम्प्रति न प्रतिभासते तत्रापि व्यञ्जक रचनान्तरे यत् हृदयं सौष्ठवं

सुवादिकी व्यङ्गकताका उपपादन

[प्रश्न] अर्थकी सामर्थ्यसे ही रसादिका आक्षेप हो सकता है यह पहले कहा जा चुका है । उस दशामें [केवल सुवादिके वाचक न होनेसे] सुवादिका नानाप्रकारसे व्यङ्ग्यकत्व वर्णनं करना असङ्कृत ही है ।

[उत्तर] पदोंकी व्यङ्गकताके प्रतिपादनके अवसरपर इस विषयमें [उत्तर] कह चुके हैं ।

इसका यह उत्तर दे चुके हैं कि ध्वनिविवहारमें वाचकत्व प्रयोजक नहीं है अपितु व्यङ्गकत्व प्रयोजक है । पदोंकी व्यङ्गकताके प्रसङ्गमें यह शङ्का उठायी थी कि पद तो केवल अर्थस्मारक हैं वाचक नहीं, तब अवाचक पदोंसे व्यङ्ग्यकी प्रतीति कैसे होगी ? वहाँ उसका समाधान यह किया था कि व्यङ्गकताका प्रयोजक वाचकत्व नहीं है इसलिए अवाचक पदोंमें भी व्यङ्गकता रहनमें कोई बाधा नहीं है । इस प्रकार एक बार इस विषयका निर्णय हो चुका था, परन्तु सूत्रानिखननननयायसे हृद्‌ करनके लिये फिर दुबारा यहाँ कहा है ।

साथ ही [यह हेतु भी है] अर्थविशेषसे ही रसकी अभिव्यक्ति माननेपर भी उनकी अर्थविशेषके व्यञ्जक साध्योंके बिना प्रतीति नहीं हो सकती है । अतएव जैसा कि दिखलाया गया है [उस प्रकार] व्यञ्जकके स्वरूपका अलग-अलग करके ज्ञान [रसादिकी प्रतीतिमें] उपयोगी है ही । और अन्यत्र ['भामहविवरण' में महोदयटने] साध्य-विशेषोंका जो चारुत्व अलग-अलग प्रदर्शित किया है वह भी उनके अर्थव्यञ्जकत्वके कारण हों व्यव्यस्थित होता है यह समझना चाहिये ।

और जहाँ [जिस शब्दमें] वह [चारुत्व] इस समय [शब्दार्थदेव्यतिरिक्त स्थल-में प्रयोगकालमें] प्रतीत नहीं होता वहाँ [उस शब्दमें] भी व्यञ्जक दूसरी रचनाओं समुदायमें प्रयुक्त उन साध्योंका जो सौष्ठव [चारुत्व] देखा था उन शब्दोंके उस [व्यञ्जक]

१. 'न तु' नि०, टी० ।

२. 'व्यङ्गककथनम्' टी० ।

३. 'तत्राप्यत्र' च नि०, टी० ।

४. 'न तत्र प्रतिभासते' नि०, टी० ।

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ध्वन्यालोक

आचार्य आनन्दवर्धन

डॉ. जगन्नाथ पथक

मुकुल प्रकाशन

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ध्वन्यालोकः

आचार्य आनन्दवर्धन

श्री महेश्वर दत्त शर्मा

चौखम्बा विद्याभवन

कारिका १७-१८

एवं रसादीनां लज्जाकसरूपमभिधाय तेषामेव विरोधिरूपं लक्ष्यतितुमिदमुपक्रम्यते—प्रबन्धे मुक्तके वापि रसादीन् बन्धुधुभिच्छता । यत्नः कार्यः सुमतिना परिहारे विरोधिनाम् ॥१७॥

हेतु उक्त [शब्दों] के अर्थकी अपेक्षा होनेपर प्रसाद [गुण] ही उनका भेदक है । और अर्थकी अपेक्षा न होनेपर अनौपचारिक ही [अन्य साधारण शब्दोंसे विशेष—भेदक हैं] !

प्रबन्धे मुक्तके वापि रसभावनिबन्धनं प्रत्युद्भततनाः कवयः परिहारपरिहारेऽपि यत्न—मादधीत । अन्यथा तस्य रसमयः इलोक एकोऽपि सम्यक् न सम्पद्यते ॥ १७ ॥

अर्थात् जहाँ ध्वन्युक्त रसादिका उपयोग नहीं होता, जैसेल वाचक शब्दोंसे ही चारुत्व प्रतीत होता है, वहाँ चारुत्वके बोधक शब्दोंमें अन्य शब्दोंसे जो विशेषता होती है वह वाचकके आश्रित ही रहती है और उसके भी दो रूप होते हैं । १. जहाँ केवल शब्दनियत चारुताकी प्रतीति हो और उसमें अर्थज्ञानकी कोई आवश्यकता न हो; ऐसे शब्दनियत चारुतायुक्त शब्दोंका अन्य शब्दोंसे भेद करनेवाला विशेष धर्म अनुप्रासादि शब्दालङ्कार हैं । और २. जहाँ चारुत्वप्रतीतिमें अर्थज्ञानकी सहायता भी अपेक्षित होती है यहाँ प्रसाद गुण चारुतायुक्त शब्दोंका अन्य शब्दोंसे भेद करता है ।

कोति पुनस्तान् विरोधींस्ति याति वस्तुतः कवे: परिहृत्यव्यात्युद्यत—विरोधिरससम्पत्तिनिबन्धनविभावादिपरिग्रहः । विसरणेऽनवततस्यापि वस्तुनोऽन्यस्य वर्णनम् ॥१८॥

इस उक्तांतक दोहरी कारिकामें १. वर्ण, २. पदवाक्य, ३. वाक्य, ४. सङ्घटना और ५. प्रबन्ध द्वारा असंलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य अभिव्यक्त हो सकता है यह बात कही थी । उक्तका विस्तारपूर्वक विवेचन इस १७वीं कारिकातक किया गया है । इस प्रकार वर्णादिकी व्यञ्जकताका यह प्रकरण समाप्त हुआ ॥१६॥

रसके विरोधी और उनका परिहार

इस प्रकार रसादिके अभिव्यञ्जकौके स्वरूपका प्रतिपादन करक [अब] उन्हीं [रसादि] के विरोधियोंके स्वरूपका प्रतिपादन करनेके लिये यह [अगला प्रकरण] प्रारम्भ करते हैं ।

प्रबन्ध्यकाव्य अथवा मुक्तक [काव्य] में रसादिके निबन्धनकी इच्छा रखनेवाले कविद्विजन [कविको रसके] विरोधियोंके परिहारके लिये प्रयत्न करना चाहिए ॥१७॥

प्रबन्ध [काव्य] अथवा मुक्तक [काव्य] में रसवश्यके लिये समुत्सुक कवि विरोधियोंके परिहारके लिये पूर्ण प्रयत्न करे । अन्यथा उसका एक भी इलोक रसमय नहीं हो सकता है ॥१७॥

रस्के विरोधी पाँच प्रकारके होते हैं । कारिकाके आधे-आधे भागमें एक-एकका वर्णन किया गया है । इस प्रकार यह ढाई कारिका इस विषयकी होती है । परन्तु संख्या देते समय इनपर १८ तथा १९ दो ही कारिकाओंकी संख्या दी गयी है जिससे १९ कारिका कलेञ्जर तीन पंक्तिका हो गया है । एक विषयसे सम्बद्ध होनेसे और आगेकी कारिकाओंमें गड़बड़ न हो इसीलिए यह संख्याक्रम रखा गया है । अन्य सक संस्करणोंमें ऐसा ही क्रम है ।

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अकाण्ड एव विच्छित्तिरकाण्डे च प्रकाशानम् । परिपोषं गतस्यापि पौनःपुन्येन दीपनम् । रसस्य सङ्गाद् विरोधाय वृत्त्यनौचित्यमेव च ॥१९॥

(९) प्रस्तुतरसापेक्षया विरोधी यो रसस्तस्य सम्भावनिधानां विभावभावानुभावानां परिपोष रमतिरोगधहेतुतः' सम्भावनीयः । तत्र विरोधिपरिपोषपरिहो यथा, शान्तरसविभावस्य तद्विभावतयैव तिरोहित-स्वननतरमेव शृङ्गारादिविभाववर्णनं । विरोधिरसभावपरिपोष यथा प्रियं प्रति प्रणयकलहकुपितासु कामिनीसु वैराग्य-कथाभिरतुने । [रमादिके] ये विरोधी, जिनको यत्नपूर्वक कविको वचाना वादिये, कौन-से हैं, यह वतलाते हैं - १. चिगेधी रसके मञ्चनतथी विभावादिका ग्रहण कर लेना । २. [रसमें] मुख्यत् होनेपर भी अन्य वस्तुक अधिक विस्तारसे वर्णन करना । ३. असमयमें रसका समात कर देना अथवा असमयमें उसका प्रकाशन करना । ४. [रसका] पूर्ण परिपोष हो जानेपर भी वार-बार उसका उद्दीपन करना । ५. और हदयहारकका अनौचित्य । [ये पाँचों] रसके विरोधककारण होते हैं ॥१८, १९॥

रसोंका विरोध तीन प्रकारमें होता है—१. किन्हींका आलम्बन ऐक्यमें, २. किन्हींका आश्रय ऐक्यमें, और ३. किन्हींका नैरन्तर्यसे । १. (क) वीर और शृङ्गारका; (ख) हास्य, रौद्र और बीभत्सके साथ सम्भोगशृङ्गारका; और (ग) वीर, करुण तथा रौद्रादिके साथ विप्रलभ्यशृङ्गारका विरोध आलम्बन ऐक्यके ही होता है । २. आश्रय ऐक्यसे वीर और भयानकका तथा ३. नैरन्तर्य तथा विभाव ऐक्यसे शान्त और शृङ्गारका विरोध होता है । (९) प्रस्तुत रसकी दृष्टिसे जो विरोधी रस हो उससे सम्बन्ध रखनेवाले विभाव, अनुभाव तथा व्यभिचारी भावोंका वर्णन [सबसे पहिल] रसविरोधी हेतु समझना चाहिये । क. उनमें चिगेधी रसके विभावपरिग्रह [काँ उदाहरण] जैसे शान्तरसके विभावोंका उसके विभावनुरूपमे ही वर्णन करनेके बाद तुरन्त ही शृङ्गारके विभावोंका वर्णन करने लगना [शान्त और शृङ्गारका नैरन्तर्येण विरोध हानसे ऐसा वर्णन दोषाधायक है] । ख. विरोधी रसके भाव [व्यभिचारी भाव]के परिग्रहका [उदाहरण] जैसे, प्रियके प्रति प्रणयकलहमे कुपित कामिनियोंके वैराग्यचर्या द्वारा अनुनयवर्णनमें ।

१. 'हेतुरेक' नि०, दी० । २. 'शृङ्गारादिविभावनं' नि० ।

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ध्वन्यालोक:

विरोधिरसानुभावपरिहारो यथा प्रणयकुपितायां प्रियायामप्रसीदन्त्यां नायकस्य कोपावेशविवक्षस्य रौद्रानुभाववर्णनं।

ग. विरोधी रसके अनुभावके परिग्रह [का उदाहरण] जैसे प्रणयकलहमें कुपित मानिनीके प्रसन्न न होनेपर कापाविष्ट नायकके रौद्रानुभावका वर्णन करना।

(२) अयं चान्यो रसभङ्कहेतुर्यत् प्रस्तुतरसापेक्षया वमतुनोद्न्यस्य कथाङ्गतदन्व-तस्यापि विस्तारेण कथनम्। यथा विप्रलम्भशृङ्गारे नायकस्य कस्यचिद् वर्णंयितुमुपक्रान्ते, कवेच्छैमकाऽऽलङ्कारनिबन्धनरसिकतया महता प्रवन्धेन परंवातिदवर्णनं।

(२) यह [दूसरा] रसभङ्कका हेतु औरत है कि प्रस्तुत रससे किसी प्रकार सम्बन्ध होनेपर भी [रससे भिन्न] किसी अन्य वस्तुका विस्तारपूर्वक वर्णन। जैसे किसी नायकके विप्रलम्भशृङ्गारका वर्णन प्रारम्भ कर कविकाक यथेच्छ रचनाके ध्वनुरागसे अत्यन्त विस्तारके साथ पर्यन्तादिका वर्णन करने लगना [जैसे ‘किरातार्जुनीय’ काव्यमें शुराङ्गनाविलासादि स्थलवत् ‘हृदयप्रबोध’ में हृदयप्रबोधका अति विस्तृत वर्णन]।

(३) अयं चापरो रसभङ्कहेतुरनुयत्तयो यत्काव्यं हि विच्छित्तिं रसस्य काण्ड एव च प्रकाशनम्‌।

(३) अङ्काण्ड [अनवसर] में रसको विच्छित्ति कर देना अथवा अनवसरमें ही उसका विस्तार [करने लगना] यह भी [तीसरा] रसभङ्कका हेतु है।

१. ‘उपकान्त्य’ नि०, वी०। २. ‘विच्छित्तिः’ वा० प्रे० । ३. ‘प्रकाशनम्’ नि०, वी० ।

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ध्वन्यालोक

आचार्य आनन्दवर्धन

श्रीनिवास राव

मोतीलाल बनारसीदास

तत्रानवसरे विरामो यथा नायकस्य कस्यचिद् स्मृहणीयसमागमया नायिकया कयाचिद् परं परिपोषपदवीं प्राप्ते शृङ्गारे, विदिने च परस्परानुरागे, समागमोपायचिन्तोचितं व्यवहारमुत्सृज्य स्वतन्त्रतया व्यापारान्तरर्वर्णने ।

अनवसरे च प्रकाशनं 'रसस्य यथा प्रबन्धे' प्रबन्धद्विविधवीरमन्त्र्यये कल्पसङ्क्रयकल्पे सकृदामे 'रामदेवप्रायस्यापि तावन्नायकस्यातुनुपकान्तविप्रलब्धशृङ्गारस्य निमित्तमुचितमन्त्रणैव शृङ्गारकोपाभिव्यक्तिरवर्णने ।

नचैवंविधे विषये दृश्यव्यासोहितत्वं कथापुरुपस्य परिहारः, यतौ रसवत् एव कवे: प्राघान्येन 'प्रधृतिनिबन्धनं युक्तम् । इतिवृत्तवर्णनं तदुपाय एवेत्युक्तं प्राक् 'आलोकार्थी यथा दीपशिखाभ्यां यत्नवान् जन:' इत्यादिना ।

क. उसमें अवकाशमें विराम [का उदाहरण] जैसे किसी नायकका, जिसके साथ समागम उसका अभीष्ट है पैसो नायिकाके साथ [किसी प्रकार] शृङ्गार [रति] के परिपुष्ट हो जाने और [उनके] परस्पर अनुरागका पता लग जानपर उनके समागमके उपायके चिन्तनयोग्य व्यापारको छोड़कर स्वतन्त्र रूपसे किसी अन्य व्यापारका वर्णन करने लगना [जैसे 'रत्नावली' नाटिकामें वासवदत्ता ज्ञात हो जानपर सागरिकाकी विस्मृति] ।

ख. अनवसरमें रसके प्रकाशन [का उदाहरण] जैसे नाना वीरोंके विनाशक कल्पप्रलयकं समान प्रोषण सङ्ग्रामके प्रारम्भ हो जानपर विप्रलम्भशृङ्गारके प्रसङ्गके बिना और बिना किसी उचित कारणके रामचन्द्र सर्गेऽले देवपुरुषका भी शृङ्गारकथायां पठु जानेका वर्णन करनेमें [भी रसभङ्ग होता है जैसे 'वेणीसंहार' के द्वितीय अङ्कमें महाभारतका युद्ध प्रारम्भ हो जानपर भी भानुमती और दुर्योधनके शृङ्गारवर्णनमें] ।

इस प्रकारके विषयमें [यहाँ दुर्योधननने दैववर्या व्यामोहमें पड़कर वह सब कुछ किया इस प्रकार] कवितानायकके दैवी व्यामोहसे उस दोषका परिहार नहीं हो सकता है, किओंकि रसबन्धन ही कविकी प्रवृत्तिका मुख्य कारण है और इतिवृत्तसवर्णनं तो उसका उपायमात्र ही है ।

इत्यादिसे [प्रथम उद्योतकी नवम कारिकामें] पहिले ही [पृ० ३८ पर] कह चुके हैं । इसलिये केवळ इतिहसके वर्णनका प्राधान्य होनेपर अथ और अर्थी भावका विचार किये बिना ही रस और भावका निबन्धन करनेसे कवियोंसे इस प्रकारके [सब] दोष हो जाते हैं अतः रसादिरूप व्यङ्ग्य-स्थतत्परत्व ही उनके लिये उचित है ।

१. 'रसस्य' नि० में नहीं है ।

२. 'प्रबन्ध' बा० मि० ।

३. 'देवप्रायस्य' नि०, वी० ।

४. 'स्वप्रबुद्धि' नि०, 'स्वबुद्धि' वी० ।

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ध्वन्यालोक:

विषयनि स्वलिखितानि भवन्तीति रसादिरूपण्यङ्क-यतात्पर्यमेवैषां युक्तिमिति यत्नोद्यस्साभिरारूढो न ध्वनिप्रतिपादनमात्राभिनिवेशेन ।

(४) पुनरुचायमान्यो रसमझहेतुरवधारणीयो यत् परिपोषं गतस्यापि रसस्य पौनःपुन्येन दीपनम् । उपमुक्तो हि रसः स्वसामग्रीलुघपरिपोषः पुनः पुनः परामृश्यमानः परिम्लानकुसुमकल्पः कल्पते ।

(५) क. तथा वृत्त्यनुरथरसा तदनौचित्य तद्वैप रसमझहेतुः । यथा नायिकाप्रति नायिकाया: कस्याश्चिदुचितां 'भज्जिमन्तरेण स्वयं सम्भोगामिलाषकथने ।

ख. यदि वा कृत्स्नां भरतप्रसिद्धां कैशिक्यादीनां काव्यालङ्कारान्तरप्रसिद्धान- सुपनागरिकायानां वा यदनौचित्यमविषये निवन्धनं तदपि रसमझहेतुः ।

इसो दृष्टिसे हमने यह [ध्वनिनिरूपणकार] यत्न प्रारम्भ किया है, केवल ध्वनिके प्रतिपादनके आग्रहके कारण हो नहीं ।

(५) फिर ग्रह [चौथा] और रसमझका हेतु समझना चाहिये कि रसके परिपुष्टिको प्राप्त हो जानेपर भी बार-बार उसको उद्दीस करना । अपनी [विभावादि] सामग्रीसे परिपुष्ट और उपमुक्त रस वार-बार स्पर्शो करनेसे मुरझाये हुए फूलके समान मझिन होता जाना है ।

(५) क. और वृत्तिहारका जो अनौचित्य है वह भी रसमझका हो [पाँचवाँ] हेतु होता है । जैसे नायकके प्रति किसी नायिकाका उचित हाव-भावके बिना स्वयं [शब्दतः] सम्भोगामिलाष कहनेमें [ञ्रवहारका अनौचित्य हो जानसे रसमझ होता है ] ।

ख. अथवा भरतप्रसिद्ध कैशिकी आदि वृत्तियोंका अथवा दूसरे [भामहादृत] 'काव्यालङ्कार' [और उसपर भट्टोद्ट्टहृत 'भामहविवरण'] में प्रसिद्ध उपनागरिक आदि वृत्तियोंका जो अनौचित्य अर्थात् अविपयमें निवन्धन है वह भी रसमझका [पाँचवाँ] हेतु है ।

भर्तके नाट्यशास्त्रमें कैशिकी, सात्वती, भारती तथा आरभटी चार वृत्तियोंका वर्णन किया गया है । उनके लक्षण इस प्रकार दिये गये हैं—

कैशिकीलक्षणम्— या नृत्यनेयाविपोषिता नृभंगीभुता वन्दनृत्यगीता । कामोपभोगप्रमुखोपचारा तां कैशिकीं वृत्तिमाहरन्ति ॥

सात्वतीलक्षणम्— या सत्त्वजेनैह गुणेन युक्ता न्यायेन वृत्तेन समन्विता च । हर्षोत्कटता संहृतशोकभावा सा सात्वती नाम भवेच्च वृत्तिः ॥

भारतीलक्षणम्— ya वाक्प्रधाना पुरुषप्रयोज्या छीवर्जिता संस्कृतवाक्ययुक्ता । स्वनामधेयैर्मरतैः प्रयुक्ता सा भारती नाम भवेच्च वृत्तिः ॥

१. 'अक्रमकृत्' नि० ।

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कारिका १९ ] तृतीय उद्योत: २१९

एवमेषां रसविरोधिनामन्येषां चान्यानुगतानां दिशा स्वसुखावलोकितानां परिहारेऽसत्कविविभ्रवहितैरमेव वितन्व्यम् । पिकरलोलोकाश्रयत्—मुख्यया व्यापारविषया: सुकवीनां' रसादय: । तेऽपां निवन्धने भाव्यं तै: सदैवाप्रमादिभि: ॥ नीरसस्लु प्रवन्धो य: सोऽपलावदो महान् कवे: । तं तेनोक्तिपरत्वं स्वादेनानास्वादलक्षण: ॥ पूर्वं विशृङ्खलगीर: कवय: प्राप्तप्रकारतया । तान् समाश्रित्य न त्याजा नीतिरंषा मन्नापिगा ॥ वाल्मीकिकालिदासमुख्याश्रये प्रयताता: कवय: परवरा: । तदभिप्रायवाह्योडयं नाम्माभिदर्शितो नय: ॥इति॥ ९८, ९९॥

आरम्भे लक्षणं श्रद्धारहितलक्—या चित्रयुद्धेऽप्रमाणप्रमातमयो: चञ्चलत्प्रतिभिर्निर्वाताक्या । अथ चिन्मात्रवृत्तेर्यन्धकाराडा जेय: कुत्रे: मारभट्टा:त क्रुत्त: ॥ इनकी उद्भ्रान्त भरतादि:नें चारं; वंदोंसे इस प्रकार बतलार्ची है—कुछेकादाद भारती काव्ये:न वृत्तदत्त मातृती । कांश्चनां सामवेदाच्च देवा: वार्थवृङ्गी तथा ॥ इन वृत्तियोंके अनुकृत प्रयोंगसे, अथवा महाकाव्यप्रतिगादित उपनागरिका आदि वृत्तियाँ—जिनका कि वर्णन हम—पहले वृत्त ९८ पर कर चुके हैं—के अनुकृत प्रयोंगसे भी रसभङ्ग होता है, यह अभिप्राय है ।

इस प्रकार इन रसविरोधियों [पाँचों हेतुओं] का और इसी भांगसे स्वयं उत्प्रेक्षित अन्य रसवृत्तहेतुओंका परिहार करनेमें सत्कवियोंको सावधान रहना चाहिये । इस विषयकें संप्रदायालोक [इस प्रकार] हैं—१. सुकवियोंके व्यापारकें मुख्य विषय रसादि हैं, उनके निवन्धनमें उन सत्कवियोंको सदैव प्रमादरहित [जागरूक] रहना चाहिये । २. कविका जो नीरस काव्य है वह [उसके लिये] महान् अपयशद है । उस नीरस काव्यमें वह कवि ही नहीं रहता । [कविरूपमें] कोई उसका नाम भी यदि नहीं करता ।

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ध्वन्यालोक:

आचार्य आनन्दवर्धन

महामहोपाध्याय डा० बलदेव उपाध्याय

चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन

विवक्षिते रसे लुघप्रतिष्ठे तु विरोधिनाम्‌ । बाध्येनामङ्झभावं वा प्राक्तनासूक्तिरङ्क्षला ॥२०॥

स्वसामग्र्या' लङ्घपरिपोषे तु विवक्षिते रसे विरोधिनां विरोधिरसाक्षानां बाध्य- नामङ्झभावं वा प्राक्तनासूक्तिरङ्क्षला ॥२०॥

तथा च तदसूक्ति: प्रस्तुतरसपरिपोषायैव सम्पद्यते ।

तथा च विरोधावस्थां निवर्त्तते । 'अक्ङ्भावप्राप्तिहि तेषां स्वाभाविकी समारोप्यते वा । तत्र येषां नैसर्गिकी तेषां तादृक्ताविरोध एव' इतना पाठ निबन्धे नहीं है ।

महाभाष्यमें व्याकरणशास्त्रके प्रयोजनोंका प्रतिपादन करते हुए महर्षि पतञ्जलिने 'टेडसुरा:' प्रतीकसे 'अपक्वाब्द'से बच्चन भी एक प्रयोजन बतलाया है । 'टेडसुरा हेलयो हेलय इति कुर्वन्तः परावमूर्खः । तस्माद् ऋद्धणेन न म्लेच्छितवैष नापभाषितवैष । म्लेच्छो ह वा एस यदपशब्दः । म्लेच्छा मा भूमेत्यष्यं ध्याकरणम्‌ [म० भा० पस्पशाहिक] ।

विरोधी रसादियोंके निबन्धनके नियम

इस प्रकार सामान्यतः विरोधियोंके परिहारकके निरूपण करके उस नियमके अपवादरूप जहाँ विरोधियोंका साथ-साथ वर्णन भी हो सक्ता है उन स्थितियोंका निरूपण करते हैं—

१. 'स्वसामग्री' नि०, दी० । २. 'अलङ्घ्या' नि०, निर्दोंषा दी० । ३. नि०, दी० में 'तथा च' नहीं है । ४. 'तदुक्ताविरोध एव' नि० । ५. 'अक्ङ्भावप्राप्तिहि तेषां स्वाभाविकी समारोप्यते वा । तत्र येषां नैसर्गिकी तेषां तादृक्ताविरोध एव' इतना पाठ निबन्धे नहीं है ।

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ध्वन्यालोक

आनंदवर्धन

साहित्यदर्पणकार

कारिका २० ]

ध्वनीयोद्द्योतः

२१९

स्वभाविकी समरोपपत्तिर् वा तत्र येषां नैसर्गिकी तेपां तावदुक्ताविरोध एव । यथा विप्रलम्भशृङ्गारे तद्वानां व्याध्यादीनाम् । 'तेपां च तद्व्वानमेवादोषो नातद्व्वाननाम् ।'

अङ्गभावकौ प्राप्त विगैरौौ रसके वर्णनमे भी कांई हानि नहीं है ] उन [विरोधी रमाक्रौं] का अङ्गभाव भी स्वाभाविक अथवा समारोपित [ते] रूपमे हो मकता है । उनमे [जिनका स्वाभाविक अङ्गभाव है उनके वर्णनमे तो अविरोध ही है । जैसे विप्रलम्भशृङ्गारमे [उसके अङ्गभूत] व्याधि आदि [अविरगौथ हैं । उन [व्याधि आदि व्व निश्चारी भावों] मे उन [विप्रलम्भशृङ्गार] के अङ्गभूत [व्यभिचारियों] का वर्णन ही दोषरहित है, उससे भिन्न [जो] उस [विप्रलम्भभृङ्गार] के अङ्ग नहीं हैं, उनका नहीं ।

'विप्रलम्भशृङ्गारे तद्वानां व्याध्यादीनाम् । तेषां च तद्व्वानमेवादोषो नातद्व्वाननाम् ।'

इस पंक्ति का आशय यह है कि रसांकें व्यभिचारी भाव सम्मिलित रूपसे ३३ माने गये हैं । साहित्यदर्पणकारने उनका संग्रह इस प्रकार किया है—

निर्वेदवेगदैन्यश्रमसदजडता औद्धत्यमोहौ च विवोधः ।

स्तम्भास्सारगर्वौौ मरणमलसता मर्पनिद्रावहित्था ।

औत्सुक्यामदशङ्का स्मृतिमतिसहिता व्याधि शिसन्त्रासलज्जा

हर्षासूयाविषादः स्फुरितचपलता ग्लानिनि्चिन्तावितर्काः ॥

—सा० द० ३, १४१

चिन्ताविषादमो भावः समासोक्तिस्थ नो भवेत् ।

—का० प्र० ४, ३८

इनमेसे उग्रता, मरण, आलस्य और जुगुप्सा को छोड़कर जो शेष शृङ्गाररसके व्यभिचारी भाव होते हैं । 'तक्यसूयामरणालस्यजुगुप्सा व्यभिचारिणः' [सा० द० ३, १८६] और करुणरसमें निर्वेद, मोह, अपस्मार, व्याधि, ग्लानि, स्मृति, श्रम, विषाद, जड़ता, उन्माद और चिन्ता ये व्यभिचारी भाव होते हैं । 'निर्वेदमोहापस्मारव्याधिग्लानिनिस्मृतिश्रमा । विषादजड़तोन्मादचिन्ताद्या व्यभिचारिणः ।'

[सा० द० ३, २२९] इस प्रकार व्याधि आदि शृङ्गार और करुण दोनोंके समान व्यभिचारी भाव हैं । करुण और विप्रलम्भशृङ्गारका आलम्बनके भेदसे विरोध ऊपर पृ० २१३ पर दिखलाया जा चुका है । व्याधि आदि व्यभिचारी भाव दोनोंके अङ्गमें पड्त है अतः दोनोंके अङ्ग हो सकते हैं और दोनोंके विराधी करुणरके अङ्गभूत हैं वे विप्रलम्भशृङ्गारके विरोधी हैं । परन्तु उन व्याधि आदिका शृङ्गारके साथ भी स्वाभाविक अङ्गाङ्गिभावसम्बन्ध है । इसलिये वो व्याधि आदि विप्रलम्भशृङ्गारके विरोधी नहीं हैं । परन्तु उन व्याधि आदिका वर्णन करनेमें कोई दोष नहीं । परन्तु आलस्य, उग्रता, जुगुप्सा आदि जिन व्यभिचारियोंका शृङ्गारमे अङ्गभाव नहीं है परन्तु करुणरसमें है, उनका विप्रलम्भशृङ्गारमे वर्णन दोषघायक ही होगा । यह उक्त पंक्ति का अभिप्राय है । 'विप्रलम्भशृङ्गारे तद्व्वानां व्याध्यादीनाम् ।'

का भाव यह हुआ कि व्याधि आदि करुणरस्के अङ्ग होनेसे विप्रलम्भशृङ्गारके साथ उनका विरोध हो सकता है परन्तु वह शृङ्गारके भी अङ्ग हैं इसलिये तद्व्वानां अर्थात् 'विप्रलम्भशृङ्गाराङ्गानां व्याध्यादीनामविरोधः । परन्तु 'व्याध्यादि'-

१. 'तेषां च' नो, व्दी में नहीं है ।

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ध्वन्यालोक:

आलोककारने

तदृक्ते च सम्भवत्यपि मरणस्योपन्यासो न क्यायान्न'। आश्रयविच्छेदे रसस्यात्यन्तविच्छेदप्राप्ते:। करुणस्य हि तथाविधे विषये परिपोषो भविष्यति निति चेतू, न । तस्याप्रस्तुतत्वात्, प्रस्तुतस्य च विच्छेदात्। यत्र तु 'करुणरसयैव काठ्यार्थैवं वत्राविरोध:।

लिखकर यह सूचित किया कि जो व्याधि आदि शृङ्गारके भी अङ्ग हैं उनका वर्णन हो सकता है, जो शृङ्गारके अङ्ग नहीं केवल करुणके अङ्ग हैं, उनका वर्णन तो दोपजनक ही होगा। अतएव उनका वर्णन नहीं करना चाहिये।

शृङ्गारे वा मरणस्यादोर्घंकालप्रत्यापत्तिसम्भवे कदाचिदुपनिबन्धो नात्यन्तबिरोधी। द्वीर्घकालप्रत्यापत्तौ तु तस्यान्तरा: प्रवाहोपरिच्छेद एवत्यवैविध्यात्प्रस्तोपनिबन्धनेऽनन्तनिबन्ध-प्रधानेन कविना परिहर्तव्यम्।

मरणके उस [विप्रलम्भशृङ्गार] का अङ्ग हो सकनेपर भी उसका वर्णन करना उचित नहीं है। क्योंकि आधार [आलम्बनादिभाव] का ही नाश हा जानने रसका अत्यन्त विनाश हो जायगा। यदि यह कहो कि पेस स्थानमें करुणरसका परिपोषण होगा [रसका सर्वथा नाश तो नहीं हुवा तो] यह कहना उचित नहीं है, क्योंकि करुणरस प्रस्तुत नहीं है और जो [विप्रलम्भशृङ्गार] प्रस्तुत है उसका अत्यन्त विनाश हो जाता है [हो] जहाँ करुणरस काविकल्पना मुख्य है वहाँ तो [मरण-वर्णनमें भी] विरोध नहीं है।

अथवा शृङ्गारे जहां शृङ्गार ही उनका समागम फिर हो सके यैसे स्थानपर मरणका वर्णन भी अत्यन्त विरोधी नहीं है। [परन्तु जहां] दीर्घकाल बाद पुनः सम्भलने हो सके वहां तो बीचमें रसप्रवाहका विच्छेद हो ही जाता है अतपव रस-प्रधान कविको इस प्रकारके इतिवृत्तके वर्णनको वचाना ही चाहिये।

यहाँ आलोककारने लिखा है कि मरण विप्रलम्भशृङ्गारका अङ्ग हो सकता है परन्तु ऊपर 'त्यक्वैग्र्यमरण!रसयुगुप्सा व्यभिचारिण:' [सा० द० ३, १८६] जो उद्धृत किया है उसमें मरणको शृङ्गारका अङ्ग या व्यभिचारिभाव नहीं माना है।

आलम्बनोयुगुप्साभयुगुप्साभिभावैस्तु परिवर्जिता:। उद्बव्यनित शृङ्गारं सर्वे भावाः स्वस्वज्ञया।।—ना० शा० ७१०८.

भरतमुनिके नाट्यशास्त्रके इस इलोकमें मरणको भी शृङ्गारमें वजित नहीं किया है। अतः प्रतीत होता है कि नवीन आचार्योंने नायिका या नायकमें किसौकी मृत्यु हो जानेपर विप्रलम्भकी सीमा समाप्त होकर करुणकी सीमा आ जानेके प्रवाहके विचारसे मरणको विप्रलम्भका अङ्ग नहीं माना है। परन्तु उनकी यह कल्पना भरतमुनिके अभिप्रायके विरुद्ध प्रतीत होती है।

आलोक-विप्रलम्भशृङ्गारमें भी व्यभिचारिभाव माना है वह इसी अदीर्घकालीन प्रत्यापत्तिक आधारपर माना

१. 'न्यास:' नि०, वी०। २. 'करुणस्यैव' नि०, वी०।

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तृतीय उद्योत:

है और उसका वर्णन भी उक्त रूपमें कालिदास आदिके ग्रन्थोंमें मिलता है । कालिदासने 'रघुवंश' में लिखा है—

"तृतीयं तोयव्यतिकरभवे जहुकन्यासरथ्यां: देहत्यासादमरगणनालेखमात्राच्छ वः । पूर्वाकाराषिकचतुरस्र सक्त्तः कान्तयासौ, लीलागारेष्वरमत पुनर्नन्दनाभ्यतरेशु ॥"

'अन्न सूटतै रत्यजत्ता मरणस्य' लिखकर लोचनकारने उसकी रत्यजत्ताका पोषण किया है ।

यह श्लोक 'रघुवंश' के आठवें सर्गका अन्तिम श्लोक है । इन्दुमतीके मर जानेपर आठ वर्षकी बांमारीके बाद अजने गज्झा और सरयूके सङ्गमपर हारिर त्यागकर देवभावको प्राप्त किया और उस देवलोकमें पहिले ही पहुँची हुई, पहिलेसे अधिक चतुर कान्ता इन्दुमतीके साथ नन्दनवनमें भीतर बने लीलागारोंमें रमण किया । यह श्लोकका भाव है । यहाँ वर्णित मरण इसी श्लोकमें वर्णित रतिके अन्न है । इस रूपमें मरणको शृङ्गारका अन्न माना गया है ।

परन्तु मूल ग्रन्थ तो विप्रलम्भशृङ्गारसे चला था; मरण विप्रलम्भशृङ्गारका अन्न हो सकता है या नहीं । इस उदाहरणसे उसकी विप्रलम्भशृङ्गारके प्रति अज्ञता सिद्ध नहीं होती है । सम्भोग-शृङ्गारके प्रति अज्ञता प्रतीत होती है और वह भी विलकुल काल्पनिक है ।

अर्थात् मरण जैसी स्थिति और 'चेतस्या आकाङ्क्षित मरण', दो रूपसे मरणके वर्णनका विधान किया है । जैसे—

"दयितस्य गुणानुस्मरणतां ह्यायने सम्प्रति ता विलोकितासीत् । अधुना खलु हन्त ता कुआँझी गिरिमृगक्रीडिते न भजित्वापि ॥"

इसमें 'जातप्राय मरण' जैसी स्थितिका और निम्नलिखित श्लोकमें मनसे आकाङ्क्षित मरणका वर्णन किया है ।

"रोमस्बा: परिपूरयन्तु हरितो झङ्कारकोलाहलै:, स्रदं मन्दसुपीत चन्दनवनज्योत्स्नां नभस्वानपि । माद्यन्तः कलयन्तु चूतबिसिशे फेलिपिकाः; पञ्चभम, प्राणाः; सत्वरमेवशररतिना गच्छन्तु गच्छन्तु मे ॥"

इस प्रकार जातप्राय, मनसा आकाङ्क्षित तथा अचिर प्रत्यापतियुक्त इन तीन रूपोंमें शृङ्गार-रसमें भी मरणका वर्णन प्राचीन कविपरम्परामें पाया जाता है और भरतमुनिको भी अभिप्रेत जान पड़ता है । परन्तु वाच्यार्थक आत्यन्तिक मरणको किसीने अभिप्रेत नहीं । भरतकै साहित्यदर्पणकार आदि

जिन आचार्योंने मरणको शृङ्गारमें विभावनिभाव नहीं माना है उनका अभिप्राय वाच्यार्थक आत्यन्तिक मरणके निषेधसे ही—ऐसा समझना चाहिये ।

इस प्रकार नैष्ठिक अज्ञभावका निरूपण किया । नैष्ठिकके भिन्न अज्ञता समारोपित अज्ञता समझनी चाहिये, इसकेलिये उसका लक्षण यहाँ नहीं किया है । उदाहरण आगे देंगे । विरोधी रसाङ्कोंके १. वाच्यरूप तथा २. अज्ञाक्षिभावमें २. नैष्ठिक अज्ञाक्षिभाव तथा ३. समारोपित अज्ञाक्षिभाव

इस प्रकार तीन रूपोंमें निरूपणमें दोष नहीं है यह ऊपरका सारांश हुआ । इन तीनोंके उदाहरण आगे देते हैं ।

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ध्वन्यालोक:

तत्र लव्धप्रतिष्ठे तु विवक्षिते रसे विरोधिरसाझानां वाध्यत्वेनोक्तावदोषः । यथा—

काकायं शशलक्षणः क व कुलं भूयोडपि हरेयित सा

दोषाणां प्रशमाय मे श्रुतमधो कोपेऽपि कान्तं सुखम् ।

किं वस्तुन्यपकल्मषः ऋतधियः स्वप्नेऽपि सा दुल्लभा

चेतः स्वार्थ्यसुपैधि कः खलु युवा धन्योडधरं पास्यति ॥

यथा वा पुण्डरीकस्य महाशयस्य प्रति प्रहसितामुखरागस्य तत्रीच्यमानमुखाम्बुज-

पदेशवर्णने ।

विरोधी रसाझोंके वाध्यत्वेन अविरोधकं उदाहरण

उनमें प्रधानरसके लव्धमतिष्ठ [परिपुष्ट] हो जानेपर वाध्यरूपसे विरोधी रसाझों-

के वर्णनमें दोष नहीं होता [इसका उदाहरण] जैसे—

अन्य अप्सराओंके साथ उवेशोके स्वर्ग चले जानपर विरहोत्कण्ठित राजा पुत्रवाके मनमें

उठते हुए अनेक प्रकारके विचारोंका इस पद्यमें यथाक्रम वर्णन है । अर्थ इस प्रकार है—

१. कहाँ यह मनुचित कार्य और कहाँ उज्ज्वल चन्द्रवंश !

[वितर्क]

२. क्या वह फिर कभी दर्शनको मिलेगी ?

[शौत्सुक्य]

३. अरे ! मैंने तो [कामादि] दोषोंका दमन करनेके लि‌पे शास्त्रोंका श्रवण

[मति]

किया है ।

४. क्रोधमें भी कैसा सुन्दर [उसका] मुख [लगता था] ।

[स्मरण]

५. [मेरे इस दयवहारको देखकर] धर्मात्मा विद्वान लोग क्या कहेंगे ?

[शङ्का]

६. वह तो अब स्वप्नमें भी दुल्लभा हो गयी ।

[दैन्य]

७. अरे चित्त, धीरज धरो ।

[धृति]

८. न जाने कौन सौभाग्यशाली युवक उसके अधरामृतका पान करेगा ।

[चिन्ता]

यहाँ शृङ्गार रसके व्यभिचारी भाव हैं और मम संच्यवाले अर्थात् २. शौत्सुक्य, ४. स्मरण, ६. दैन्य और ८. चिन्ता ये

चारों भाव हैं और मम संच्यवाले अर्थात् १. वितर्क, ३. मति, ५. शङ्का, ७. धृति ये शृङ्गाररसेके व्यभिचारी भाव हैं । शान्त और शृङ्गाररसके नैरन्तर्य तथा आलम्बन ऐक्यमें विरोध

होता है । यहाँ इन दोनोंका नैरन्तर्य मी है और आलम्बन ऐक्य भी है । इसलिये सामान्य नियमके

अनुसार उनका एकत्र वर्णन रसविरोधी होना चाहिये था । परन्तु उसमें विषम संख्यावाले व्यान्तररके

व्यभिचारी भावोंका समन्वयावाले शृङ्गाररके व्यभिचारी सात्विक भावोंके साथ बाधितवाले हैं । अर्थात वितर्कका

'वाध्यत्वेन कथन' हानेके कारण दाष नहीं है ।

'काव्यप्रकाश'की टीकाओंमें कमलाकर, भीमसेन आदिने इस पद्यको देवयानिको देखनेपर

राजा ययातिकी उक्ति माना है किन्तु वह ठीक नहीं है ।

अथवा जैसे [कादम्बरीमें] महाशयेताके ऊपर पुण्डरीकके अत्यन्त र‌गेहित हो

जानेपर दूसरें मुनिकुमारके उपदेशवर्णनमें [प्रदर्शित शांतरसके अङ्ग, मुख्य शृङ्गार-

रसके अङ्गोंसे वाधित हो जाते हैं और रति स्थिर रहती है । इसलिप 'वाध्यत्वेन' उनका

प्रतिपादन दोष नहीं है ।

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कारिका २० ] वतीय उद्योत: २२३

स्वाभाविक्यामज्ञुभावप्राप्ताविरोधो यथा—

(९) भ्रमिमरविमलसहद्रयतां प्रलयं मूर्छां तमः शरीरसादम् । मरणं च जलद्रुमुर्गदं प्रसह्य कुरते विरिं वियोगिनीनाम् ॥ इत्यादौ । समारोपितायामप्यविरोधो यथा—‘पाण्डुश्रामामित्यादौ’ । यथा वा— ‘कोपातु कोमललोचनेत्राहुलीभूतिकापाशन इत्यादौ ।

२. विरोधो रसाझोंकी अज्ञरुपतामें अविरोधके उदाहरण— [विरोधी रसाझोंकी] स्वाभाविक अज्ञरुपताप्राप्तिमें अदोपता [का उदाहरण] जैसे—

१. भ्रममर्रति [इसकी व्याख्या पृष्ठ १२१ पर भी कर चुके हैं]। क. मेघरूप भुझकसे उत्पन्न चिप [जल तथा चिप] वियोगिनियोंको वक्कर, बेचैनी, अलसहृदयता, प्रलय [चेतनारूप ज्ञान और चेष्टाका अभाव], मूर्छा, मोह, शरीरसत्ता और मरण उत्पन्न कर देता है । इत्यादिमें । यहाँ करुणरसचित व्याधिके अतुभाव भ्रम आदिका विप्रलम्भमें भी सम्भव होनेसे नैसर्गिकी अज्ञता होनेसे अविरोध है ।

समारोपित अर्थातमें भी अविरोध [होता है] जिसका उदाहरण] जैसे—‘पाण्डु-क्षामम्’ इत्यादिमें । २. अथवा जैसे ‘कोपातु कोमललोचनबहुलतनिकापाशोन’ इत्यादिमें ।

‘पाण्डुक्षामं’ आदि पूरा श्लोक इस प्रकार है— हे सखि, तेरा पाण्डुवर्ण मुरदाया हुआ चेहरा, सरस हृदय शौर अलस देह तेरे हृदयमें स्थित नितान्त अस्वास्थ्य रंगकी सूचना देते हैं [क्षेत्रिय रोग उसको कहते हैं जिसकी इस शरीरमें चि˚क्रत्सा सम्भव न हो अर्थात् अत्यन्त असाध्य । [—क्षेत्रियं पररक्षेत्रे चिकित्स्यः [?] ।

इस श्लोकमें करुणरसोचित व्याधिका वर्णन है परन्तु इलेपवश वहाँ विप्रलम्भशृङ्गारमें भी नायिकामें उनका आरोप कर लिया है । अतएव उनकी शृङ्गारके प्रति सनारोपित अज्ञता होनेसे शृङ्गारमें करुणरसोचित व्याधिका वर्णन दूषण नहीं है !

दूसरा ‘कोपातु कोमल’ इत्यादि पूरा श्लॆ॒ अथ् अग्र पृष्ठ ११६ पर दिया जा चुका है । यहाँ ‘कोपातु’, ‘वधूया’, ‘हन्यते’ इत्यॆदि सौद्रररस्के अनु॑ग॒वोंको नपकवलशे शृङ्गारमें आरोपित कर और रूपकका ‘नातिनिदॆहँगेपिता’के अनुसार अतथ्यन्त निवाँह न करनसे ही उसके अज्ञोंकी शृङ्गारके प्रति समारोपित अज्ञता होती है । इस समारोपित अज्ञताके कारण ही शृङ्गारमें उनका वर्णन निर्दोष है ।

एक वाध्यरुपता और नैसर्गिक तथा समारोपित रूपसे दो प्रकारको अज्ञता, इस प्रकार विरोधी रसाझोंके अविरोधसम्पादक तीन हेतु ऊपर वतलाये हैं । अब एक प्रघानके अन्तर्गत अज्ञभूत दो विराधी रसाझोंके अविरोधका चौथा उपाय अथवा अज्ञरुपताका तीसरा भेद और दिखलाते हैं ।

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ध्वन्यालोक:

इयं चाझभावप्रामित्यन्या यदाधिकरिकत्वात् प्रधान एकस्मिन् वाक्यार्थे रसयोर्वयोर्वा परस्परविरोधिनोर्द्वैयोरक्भावगमनम्, तस्यामपि न दोषः । यथोक्तं “क्षिप्तो हस्तावलग्नः” इत्यादौ ।

कथं तत्राविरोध इति चेत्, द्वयोरपि तयोरन्यपरत्वेन व्यवस्थानात् । अन्यपरत्वेऽपि विरोधिनोः कथं विरोधानिवृत्तिरिति चेत्, उच्यते—विधौ विरुद्धसमावेशस्य दुष्टत्वं 'नानुवादे । यथा—

पहि गच्छ पतोतिष्ठ वद मौनं समाचर । एवं नाशयमहरस्ते: कीडन्नि घनिनोर्धिभि: ॥

इत्यादौ ।

अत्र हि विधिप्रतिषेधयोरनूद्यमानत्वेन समावेशो न विरोधस्तथेहापि भविष्यति ।

यह [आगे वक्ष्यमाण] अझभावप्राप्ति दूसरे प्रकारकी है कि जहाँ आधिकारिक होनेसे एक प्रधान वाक्यार्थमें परस्पर विरोधी दो रसों या भावोंकी अझरूपता प्राप्त हो । उस [प्रकारकी अझ्तामें भी विरोधी रसाझोंके वर्णन] में दोष नहीं है । जैसे कि—

२. पहिले [प्रकृ ८९ पर] 'क्षिप्तो हस्तावलग्न:' इत्यादिमें कह चुके हैं ।

वहाँ कैसे अविरोध होता है? वह पूछें; तो उत्तर यह है कि उन [ईष्योविप्रलम्भ और करुण] दोनोंके अन्य [भावप्रभावातिशयमूलक भक्ति]के अझरूपमें व्यवस्थित होनेसे [अविरोध है] ।

[प्रष्न] अन्यके अझ होनेपर भी उन विरोधी रसोंके विरोधकी निवृत्ति कैसे होती है, यह पूछते हो तो, समाधान यह कि विधि अंधारमें दो विरोधियोंका समावेश करनेमें दोष होता है, अनुवादमें नहीं । जैसे—

४. आझारूप ग्रहकके चक्करमें पड़े हुए याचकोंके साथ घनी लोग 'जाओ, आओ, पड़ो जाओ, खड़े हो जाओ, बैठो, चुप रहो', इस प्रकार [कहकर] खेल करते हैं [अर्थात् कभी कुछ, कभी कुछ, मनमानी बात कहकर उनसे खिलवाड़ करते हैं] ।

इत्यादि [उदाहरण] में [विरोधी बातें अनुवादरूपमें कही गयी हैं । अतः दोष नहीं है] ।

यहाँ [पहि गच्छ आदि में जैसे] विधि और प्रतिषेधके केवल अनूद्यमानरूपमें ससिवेश करनेसे दोष नहीं है । इसी प्रकार यहाँ ['क्षिप्तो हस्तावलग्न:' इत्यादि] इलोक [क्षिप्तो हस्तावलग्न: इत्यादि] में ईष्योविप्रलम्भ और करुण विधीयमान नहीं है । त्रिपुरारि शिवके प्रभावातिशयके मुख्य वाक्यार्थ होने और

१. 'अधिकरिकत्वाद' नि० ।

२. 'व्यवस्थापनात्' नि०, वृ० ।

३. 'नानुवादे' नि०, वाक्यमिया ।

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कारिका २० ] तृतीय उद्योतः २२९

अलोके ह्यस्मिन् ईष्योऽपि मलम्भसदृशंकरुणवस्तुनोरपि विधीयमानत्वम् । तिपुरहरीप्रमभाव-तिशयस्य वाक्यार्थत्वात् तद्व्यक्त्वेन च तयोर्य्यवस्थानात् ।

[ईष्योऽपिमलम्भ तथा करुण] इन दोनोंके उसके अङ्गरूपमें स्थित होनेसे [उनका परस्पर विरोध नहीं है] । यहाँ 'पहि' और 'गच्छ' ये दोनों विरोधी हैं । इसी प्रकार 'वद' और 'उत्तिष्ठ' तथा 'वद' और 'मौनं समाचर' ये विरोधी वाक्य हैं । परन्तु यहाँ इनका विधान नहीं किया गया है अपितु अन्वयके याचकके साथ इस प्रकारके व्यवहारका अनुवादमात्र किया गया है । विधि अंशमें यदि इस प्रकार विरोधियोंका समावेश होता तो वह दोष होता परन्तु यहाँ अनुवाद अंशमें उनका समावेश दोषावह नहीं है ।

एक प्रधानभूत अर्थके अन्तर्गत अनेक अप्रधान अर्थान्तर गौण अर्थोंका परस्पर सम्बन्ध किस प्रकार होता है इसका विचार मीमांसकोंके 'आरण्याधिकारण' में किया गया है । ज्योतिष्टोम यागके प्रकरणमें 'अरण्या पिङ्गाक्ष्या एकहायन्या गवा सोमं कीणाति' यह वाक्य आता है । इस वाक्यमें ज्योतिष्टोम यागमें प्रयुक्त होनेवाले सोम अर्थात् सोमलताके क्रय करनेके लिए अरण्यवर्णकां, पिङ्गलवर्णके नेत्रवाली और एक वर्षकी गौ देकर सोम क्रय करनेका विधान किया गया है । शब्दबोधकी प्रक्रियामें नैयायिकोंने 'प्रथमान्तार्थमुख्यविशेष्यक', वैदिकरणोंने 'धात्वर्थमुख्यविशेष्यक' और मीमांसकोंने 'भावनामुख्यविशेष्यक' शब्दबोध माना है । तदनुसार यहाँ मीमांसकमतसे भावनामुख्य विशेष्य है अतएव अरण्यादिका प्रथम भावनाके साथ अन्वय होता है । अरण्या, पिङ्गाक्ष्या, एकहायन्या, इन सबमें तृतीया विभक्ति करणत्व-बोधिका है । अतएव तृतीयाश्रुति बलात् इन सबका क्रयकरणक भावनामें प्रथम अन्वय होता है । और पीछे वाक्यमयोदासे उनका परस्पर सम्बन्ध होता है । इसी प्रकार 'पहि गच्छ' इत्यादिमें मुख्य क्रियार्थके अङ्गरूपसे 'पहि', 'गच्छ' आदिका सम्बन्ध 'राजनिकटव्यवस्थित आत्तामिदं' त्यादिसे प्रथम मुख्यार्थके साथ होता है । जनतक प्रधानके साथ उनका सम्बन्ध नहीं हो जाता है तबतक उसका दूसरेके साथ सम्बन्धका अवसर ही नहीं आता और पीछे परस्पर सम्बन्ध होनेपर भी, मुख्यार्थसे प्रभावित होनेके कारण, उनका विरोध अकिञ्चित्कर रहता है ।

इसी प्रकार 'द्विषतो हस्तावलम्बन:' इत्यादिमें करण और विप्रलुब्धभत्कार दोनों शिवके प्रभावाति-शयके अङ्गरूपमें आभिवत होते हैं, इसलिए उनमें विरोध नहीं आता ।

विधि भाग अर्थात् प्रधान अंशमें विरोध होनेपर तो दोष होता है । जैसे उपयुक्त ज्योतिष्टोमके प्रकरणमें 'अतिरात्ने पोढित्ने रहाति' और 'नातिप्रपदे पोढित्ने रहाति' ये दो विरुद्ध वाक्य मिलते हैं । यहाँ विधि अंशमें ही दोनोंका विरोध होनेसे उनका विरोध मानना पड़ता है । यही दोष हो जाता है । परन्तु गौण अंश अर्थात् अनुवादभागमें जैसे 'पहि गच्छ' इत्यादि इलोकमें अनुवाद-भाग गौण अंशमें विरोध रहनेपर भी कोई दोष नहीं होता । इसी प्रकार 'द्विषो हस्तावलम्बन:' इत्यादि-

का विरोध प्रधान अंशमें नहीं अपितु अङ्गभूत अर्थात् गौण अनुवाद अंशमें होनेसे दोषावह नहीं है ।

[प्रश्न] विधि और अनुवाद मीमांसाके पारिभाषिक शब्द हैं । उनके यहाँ 'अज्ञातार्थज्ञापको वेदभागो विधि:' अज्ञात अर्थका ज्ञापक वेदभाग विधि कहलाता है । और उनके मतमें 'आज्ञायस्य क्रियार्थत्वादानुरूप्यकमतद्र्यनाम्' [मी० सू० १ पा० २ सू० १] में निर्धारित सिद्धान्तके अनुसार

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ध्वन्यालोक:

आचार्य आनन्दवर्धन

डॉ. हरिदत्त शर्मा

चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन

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कारिका २० ] तृतीय उद्योतः २२९

सहकारिणो विधीयमानांशाद्वाविशेषप्रतीतिहेतुत्वात् । सततश्र न कश्चिद् विरोधः । हृश्यते हि विरुद्धोभयसहकारिणः कारणात् कार्यविशेषोत्पत्तिः । विरुद्धफलोत्पादनहेतुत्वं हि युगपदेकस्य कारणस्य विरुद्धं न हुविरुद्धोभयसहकारित्वम् । 'एवंविधविरुद्धपदार्थविषयः कथंभिन्नयः प्रयोक्तव्य इति चेत् ? अनुगमानैवविधवाच्यविषये या वार्ता सात्रापि भविष्यति । एवंविध्यनुवादनयाश्रयेणात्र श्लोके परिहृतत्वाद् विरोधः ।

शृङ्गाररूप रसवस्तु [रसजातीय तत्व] यह जिसका सहकारी है पेसें विधीयमान अंश [शाम्भवसाराग्निजान्य दुरितदाह] से भावविशेष [रतिवृन्दाविप्रियया भावः-प्रेयोल्लासदार-विषय - शिवके प्रतापनिश्रयमूलक भक्ति] की प्रतीति उत्पन्न होती है । इसलिये कोई विरोध नहीं है । दो विरुद्ध [जल और अग्निरूप शीतोष्ण] जिसके सहकारी हैं पेसें [मुख्य] कारणसे कार्यविरोध [आदान, भात आदि] की उत्पत्ति देखी जाती है । तव तो फिर विरोधका कोई अर्थ ही नहीं रहा, वह सर्वथा अकिञ्चित्कर हो जाता है । यह नहीं समझना चाहिये क्योकि एक कारणका एक साथ [युगपत्] विरुद्ध फलोके उत्पदनका हेतुत्व [मानना यहाँ] विरुद्ध है, दो विरोधियोंको उसका सहकारी माननेमें कोई विरोध नहीं हो । अच्छा इस प्रकार अपने काव्यमें तो करण और शृङ्गारके विरोधका परिहार कर दिया । परन्तु प्रश्न यह रह जाता है कि यदि अभिनेय नाटकमें इस प्रकारका वाक्य आ जाय तो उसका अभिनय करते समय इस प्रकारके विरुद्ध पदार्थका अभिनय कैसे किया जाय ? इसका उत्तर यह है कि अनुगमान गौण वाच्यार्थके विषयमें 'पहि, गच्छ, पत्, उत्तिष्ठ' आदिके अभिनयमें जो प्रकार अवलम्बन किया जाय वही 'क्षिप्तो हस्तावलम्बनः' आदिके विषयमें भी अवलम्बन करना चाहिये । इसका अर्थ यह हुआ कि 'क्षिप्तो हस्तावलम्बनः' इत्यादिमें शिवके प्रभावका चोतन करनेमें करुणके अधिक उपयोगी होनेसे वह अधिक प्राकरणिक अर्थ है । विप्रलम्भशृङ्गार तो 'कामीवद्रांपाराचः' इत्यादि उपमानल्से आता है और प्रभावातिशयचोतनमें उसका कोई उपयोग नहीं है इससे वह द्वारस्य अर्थ है । अतएव अभिनय करते समय करुणरसको प्रधान मानकर पहिले 'चाश्रुनेत्रोत्पलाभिः' तकका अभिनय करणोपयोगी अभिनसे नटत्के समान भय, शबराइष्ट, विप्लुत दृष्टि, अश्रु आदिका प्रदर्शन करते हुए, 'कामीवद्रांपाराचः'पर तनिक-सा प्रणयकोपोचित अभिनय करके फिर 'स दहत् दुरितं'पर उद्गतापूर्ण सातोप अभिनय करके महेश्वरके प्रभावातिशयके चोतनमें अभिनयको समाप्त करना चाहिये । इसी निषयको अगली पंक्तियोंमें स्पष्ट करते हैं—

इस प्रकारके विरुद्धपदार्थविषयक अभिनय कैसे करना चाहिये ? यह प्रश्न हो तो इस प्रकारके [विरुद्ध] अनुगमान वाच्य [पहि, गच्छ, पत, उत्तिष्ठ इत्यादि] के विषयमें जो बात है वही यहाँ भी होगी । [अर्थात् पहि, गच्छ, पत, उत्तिष्ठ आदिका अभिनय जिस प्रकार किया जायगा उसी प्रकार 'क्षिप्तो हस्तावलम्बनः' में भी करुण और शृङ्गारका अभिनय किया जा सकता है] इस प्रकार विधि और अनुवादकी नीतिका आश्रय लेकर इस श्लोक ['क्षिप्तो हस्तावलम्बनः'] में विरोधका परिहार हो गया ।

१. 'पूर्वविरुद्धपदार्थविषयः' वि०, वी० ।

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ध्वन्यालोक:

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कारिका २० ] तृतीय उद्योत: २२९

तदत्र त्रिपुरयुवतीनां शम्बव: शराग्निराद्रौपराघ: कामी यथा व्यवहरति' तथा व्यवहरतवानित्यनेनापि प्रकारेणास्त्येव निर्विरोधत्वम् । तस्माद् यथा यथा निरूप्यते तथा तथा दोषाभाव: ।

इत्थं च—

कामन्त्य: क्षतकोमलाङ्गुलिगलद्रक्तै: सदर्भों: स्थली: पौद: पातिततयावकोरिव पतद्राष्पाम्‍पुद्धोतनानन: । भीता भृङ्करावलम्वितकरास्त्वदैरिनार्योऽशुनाद्वाग्नि: परितो भ्रमन्ति पुनरन्यद्रुदिवाहा इव ।। इत्येवमादीनां सर्वेषामेव निर्विरोधत्वमवगन्तव्यम् ।

महाभारतके युद्धमें भूविश्ववाके-मर जाननेपर युद्धक्षेत्रमें उसके कटे हुए अलग पड़े हाथको देखकर उसकी पत्नीकें विलापके प्रसङ्गमें यह श्लोक आया है । यहाँ भूविश्ववाकें मर जुदनेसे नायिका-गत करुणरस प्रधान है । पूर्वावस्यानुभूत शृङ्गारका वह सरण कर रही है । अत: संशयमाण वह शृङ्गार यहाँ करुणरसका और अधिक उद्दीपक हो जाता है । इसी प्रकार 'श्रिय: इस्तावलप्न:'मे अग्निने त्रस्त त्रिपुरयुवतियोंका करण, प्रधानरूपसे वाक्यार्थ है । परन्तु शम्बव द्वाराग्निकी चेष्टाओंके अवलोकनसे पूर्वानुभूत प्रणयकलहके चित्तान्तका सरण शोकका उद्दीपनभाव बनकर उसको और परिपुष्ट करता है ।

इसलिए यहाँ आद्रौपराघ कामी जैसा व्यवहार करता है, शम्बव शराग्निने त्रिपुरयुवतियोंके साथ उसी प्रकारका व्यवहार किया । [अतएव सयंमान कामी-व्यवहार वर्तमान करणरसका परिपोषक होता है।] इस प्रकारसे भी निर्विरोधत्व है ही । मत: इसपर जितना-जितना अधिक विचार करते हैं उतना ही उतना अधिक दोषाभाव प्रतीत होता है ।

और इस प्रकार—

दे. घायल कुदे कोमल अँगुलियोंसे रक्त टपकाती हुईं, अतपक मानो महावर लगें हुए पैरोंसे, कुशादृकुरयुक्‍त भूमिपर चलती हुईं; गिरते हुए आँसुओंसे मुखको धोये हुए, भयभीत होकर हाथोंमें हाथ पकड़िये हुए, तुम्हारे शत्रुओंको लखिये इस समय फिर दुबारा विवाहके लिये उद्यत-सी द्वाग्निके चारों ओर घूम रही हैं ।

इस प्रकारके सभी [उदाहरणोंमें विरुद्ध प्रतीत होनेवाले रसादिकों] का अविरोध समझना चाहिये ।

यहाँ विवाहकी स्मृति शत्रुभियोंके वर्तमान विपत्तिमूलक शोकरूप स्थायिभावका उद्दीपन-विमाव बनकर शोकातिशायको व्यञ्जक करती है । यहाँ 'पतद्राष्पाम्‍पुद्धोतनानन:' में विवाहकालमें वात्सल्यमुखका सम्भव होमादिके धूमसे अथवा परिवार और घरसे त्यागजन्य दुःखके कारण सम्भ्रच चाहिए ।

१. 'स्म' पाठ वा० प्रि० में अधिक है ।

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ध्वन्यालोक:

एवं तावद्वादीनां विरोधिरसादिभिः समावेशसमावेशयोरविषयविभागो दर्शितः ॥२०॥

इदानीं तेषामेकप्रबन्धविनिवेशने न्याय्यो यः क्रमस्तं प्रतिपादयितुमुच्यते—

प्रसिद्धौडपि प्रबन्धानां नानारसनिबन्धने । एको रसोदृङ्कर्त्तव्यस्तेषामूलकर्षमिच्छता ॥ २१ ॥

प्रबन्धेषु महाकाव्यादिषु नाटकादिषु वा विप्रकीर्णतया अज्ञात्किभावेन 'बह्वृो रसा उत्पन्निवध्येनैतयत् प्रसिद्धौ सत्यामपि यः प्रबन्धानां छायाविशययोगमिच्छति.' तेन तेषां रसानामनन्यतयः कश्चिद्धि विवक्षितो रसोदृङ्कित्रेन विनिवेशिततयैव इत्ययं युक्ततरौ मार्गः ॥ २१ ॥

नतु रसान्तरेऽपु बहुधु प्राप्तपरिपोषेऽपु भत्सु कथमेकस्याझिता न विरुध्यत इत्याशङ्क्येदमुच्यते—

इस प्रकार रसादिका विरोधी रसादिके साथ समावेश और असमावेशका विषयविभाग प्रदर्शित कर दिया ॥ २० ॥ काव्यादिमें एक ही रसकी मुख्यता होनी चाहिये अब उन [रसों] के एक प्रबन्धमें सङ्िवेशनके विषयमें जो उचित व्यवस्था है उसका प्रतिपादन करनेके लिये कहते हैं—

प्रबन्धों [ महाकाव्य या नाटकादि ] में अनेक रसोंका समावेश प्रसिद्ध [भरतमुनि आदिसे प्रतिपादित तथा प्रचलित] होनेपर भी उनके उत्कर्षको चाहनेवाले [कवि] को किसी एक रसको अङ्ङी [प्रधान] रस [अभिधेय] बनाना चाहिये ॥ २१ ॥

महाकाव्यादि [अनभिनेय] अथवा नाटक आदि [अभिनेय] प्रबन्धोंमें [नायक, प्रतिनायक, पताकानायक, प्रकरणानायक आदि निष्ठत्वेन] विभिन्न [विप्रकीर्ण] रूपमें अज्ञात्किभावसे अनेक रसोंका निबन्धन किया जाता है, इस प्रकारकी प्रसिद्धि [परिपाटी] होनेपर भी जो [कवि] प्रबन्धके सौन्दर्यान्वितत्वको चाहता है उसे उन रसोंमेंसे किसी एक प्रतिपादनाभिमत रसको ही प्रधनरूपसे समाविष्ट करना चाहिये । यही अधिक उचित मार्ग है ॥ २१ ॥

एक रसकी मुख्यताका उपपादन

प्रबन्धमें अनेक रस होते हुए भी एक रसकी अङ्ङी बनानी चाहिये यह ऊपर कहा है । परन्तु प्रश्न यह है कि वह अन्य रस यदि परिपोषप्राप्त हैं तब तो वे अङ्ङ नहीं हो सकते, प्रधान ही होंगे और यदि परिपोषप्राप्त नहीं हैं तब वे रस नहीं कहे जा सकते । ऐसी दशामें रसत्व और अङ्ङत्व ये दोनों बातें विरद्ध हैं । अतः अन्य रसोंके होनेपर वह अङ्ङी हैं और एक रस अङ्ङी बन जाय यह कैसे हो सकेगा ? इस प्रश्नका समाधान करते हैं—

अथ्य अनेक रसोंके [पक साथ ] परिपोषप्राप्त होनेपर [उनमेंसे किसी] एकका अङ्ङी होना विरोधी क्यों नहीं होगा इस बातकी आशाङ्का करके यह कहते हैं —

१. 'वा' पाठ अधिक है नो, श्री० । २. 'छायाविशययोगमिच्छति' नो ।

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कारिका २२-२३ ]

तृतीय उद्योतः

२३१

रसान्तरसमावेशः प्रस्तुतस्य रसस्य यः । नोपहन्यपद्वितां सोज्ज्वस्य स्थायित्वेनावभासिनः ॥२२॥

प्रबन्धेषु प्रथमस्तरं प्रस्तुतः सन् पुनः पुनरनुसन्धीयमानस्तेन स्थायी यो रसस्तस्य सकलवन्यापिनो¹ रसान्तरैरन्तरालवर्तिभिः समावेशो यः स नाक्षिवामुपहन्ति ॥२२॥

In a narrative, when the primary rasa is repeatedly revisited, the inclusion of other rasas that pervade the entire narrative and occur in the intervals does not harm the primary rasa.

एतदेवोपपादयितुमुच्यते—

कार्यमेक यथा न व्याघ्नि प्रबन्धस्य विधीयते । तथा रसस्यापि विधौ विरोधो नैव विच्यते ॥२३॥

Just as a single plot does not hinder the narrative, similarly, there is no contradiction in the method of rasa.

सन्ध्यादिमयस्य प्रवन्धझरीरस्य तथा कार्यमेकमतुयायि व्यापकं, कल्प्यते न च तत् कार्यान्तरैरपि सदूशीयते, न च तैः सदृशीयमानस्यापि तस्य प्राधान्यानुपचीयते, तथैव रस- स्थायिकस्य सम्रिवेशे कियमाणे विरोधो न करिचित् । प्रत्युक्तं प्रत्युदितविवेकानामनुसन्धानवतां सचेतसां त्वविधे विषये प्रह्लादादित्ययः: प्रवर्तत इति ॥२३॥

For those who are skilled in the analysis of counterarguments and rejoinders, and are attentive, the discussion on the subject proceeds with delight, just as it does for those who are well-versed in the narrative structure and its elements.

[अप्रधान] अन्य रसोंके साथ प्रस्तुत [प्रधान] रसका जो समावेश है वह स्थायी [प्रबन्धव्यापी] रूपसे प्रतीत होनेवाले इस [प्रस्तुत प्रधानरस] की अख्तिा [प्राधान्य] का विघातक नहीं होता है ॥२२॥

The inclusion of other rasas with the primary rasa does not harm the dominance of the primary rasa that pervades the narrative.

प्रबन्धों [काव्य या नाटकादि] में [अन्योकी अपेक्षा] प्रथम प्रस्तुत और बार-बार उपलब्ध होनेसे जो स्थायी रस है, सम्पूर्ण प्रबन्धमें [आध्यात्म] वर्तमान, उस रसका बीच-बीचमें आये हुए अन्य रसोंके साथ जो समावेश है, वह [उसके] प्राधान्यका विघातक नहीं होता है ॥२२॥

In a narrative, the primary rasa is presented first and repeatedly occurs, pervading the entire narrative, and its inclusion with other rasas that occur in between does not harm its dominance.

इसको उपपादन करनेके लिप कहते हैं—

जैसे प्रबन्धमें [आद्योपान्त] व्यापक [प्रासङ्गिक अवान्तर कार्ये अथवा आल्यान- वस्तुते परिपुष्ट] एक प्रधान कार्य [विपय आल्यान वस्तु] गृहीता जाता है [और अवान्तर अनेक कार्य उसको परिपुष्ट करते हैं] इसी प्रकार रसके विधान [एक प्रबन्धव्यापी रसके साथ अझ्भूत अवान्तर रसोंके समावेश] में भी विरोध नहीं है ॥२३॥

Just as a primary plot is adopted in a narrative and supported by many subsidiary plots, similarly, there is no contradiction in the inclusion of subsidiary rasas with the primary rasa.

सन्धि आदिोसे युक्त प्रबन्ध [मुख, प्रतिमुख, गर्भ, विमर्श तथा निर्वहण सन्धि- रूप पञ्चसन्धियुक्त प्रबन्ध अर्थात् नाटकादि] शरीरमें जैसे समस्त प्रबन्धमें व्यापक निरन्तर विधमान एक [आधिकारिक वस्तु] कार्यकी रचना की जाती है। वह आधि- कारिक वस्तु [कार्ये] अन्य [प्रासङ्गिक] कायोंसे सदृशी नहीं होती हो सो बात नहीं है । [अन्य प्रासङ्गिक वस्तुओंसे आधिकारिक वस्तुका सम्बन्ध अवश्य होता है] परन्तु उनसे सम्बन्ध होनेपर भी उस [आधिकारिक मुख्या क्यावस्तु] का प्राधान्य कम नहीं होता है । इसी प्रकार [अझ्भूत रसोंके साथ प्रधानभूत] एक रसका [अख्तित्येन] सकिवेश करनेमें कोई विरोध नहीं होता । अपितु विवेकी और पारखी सहृदयोंको इस प्रकार-

Just as a narrative with five sandhis has a primary plot that pervades the entire narrative and is related to subsidiary plots, similarly, the dominance of the primary rasa is not diminished by its relation to subsidiary rasas.

१. 'सकलरसङ्यापिनः' नो० 'सकलसन्निग्न्यापिनः' दी० ।

Page 277

ध्वन्यालोकः

अभिरोधी विरोधी वा रसोद्वद्विनि रसान्तरे । परिपोषं न नेतव्यस्थां स्यादविरोधिता ॥२५॥

वध्य-घातकविरोधम आर्ज्जिताका उपपादन

ननु येषां रसानां 'परस्परविरोधः यथा वीरशृङ्गारयोः, शृङ्गारहास्ययोः, रौद्रशृङ्गारयोः, वीररौद्रयोः, रौत्रकरणयोः, शृङ्गारदुतयोर्वा तत्र भवत्कृज्जभावः । तेषां तु सह कर्थ भवेद् येषां परस्परं वाध्यवाधकभावो यथा शृङ्गारवीभत्सयोः, वीरशयानकयोः, शान्तरौद्रयोः, शान्तशृङ्गारयोर्व इत्याशङ्क्येदमुच्यते—

विरोध दो प्रकार का हो सकता है—एक 'सहानवस्थान विरोध' और दूसरा 'वध्य-घातकभाव विरोध' । 'सहानवस्थान' विरोधमें दो पदार्थ समान रूपसे बराबरी की स्थितिमें एक जगह नहीं रह सकते हैं और 'वध्य-घातकभाव' विरोधमें तबतक वध्यका वध नहीं हो सकता जबतक घातकका उदय नहीं होता । अर्थात् घातकके उदय हो जानेके बाद ही अगले क्षणमें वध्यका नाश हो सकता है । इन दोनों प्रकारके विरोधोंमें वध्य-घातक विरोध ही मुख्य विरोध है । सहानवस्थान पक्क गौण होनेसे अविरोधकल्प है । रसोंमें भी कुछ रसोंका परस्पर सहानवस्थानादिमें विरोध है अर्थात् वे समान स्थितिमें एक साथ नहीं रह सकते हैं और कुछका वध्य-घातक विरोध है । तो जिनका केवल सहानवस्थान विरोध है उनका तो परस्पर अज्ञात्किभाव हो जानमें कोई कठिनाई नहीं है परन्तु जिनका वध्य-घातक विरोध है उनमें परस्पर अज्ञात्किभाव नहीं बन सकता । इस द्दष्टिसे यहाँ आाशङ्का करके उसके समाधानके लिये आगयी कारिका लिखी गयी है । इसी भावको लेकर अवतरनिका करते हैं—

जिन रसोंका परस्पर अविरोध है [वध्य-घातकभाव विरोध नहीं है] जैसे वीर और शृङ्गारका [युद्धनीति, पराक्रम आदिसे, कल्याणार्थकके लाभमें], शृङ्गार और हास्य-का [हास्यके सत्व पुष्टार्थ न होने और अनुरंजनात्मक होनेसे], रौद्र और शृङ्गारका [भरतके नाट्यशास्त्रमें 'शृङ्गाररच है: प्रसभं सेव्यते' में, तैहि रौद्रप्रभृतिभि रक्षोदान-वेदतननुष्टै: सेव्यते] इस व्याख्य्यसे रौद्र और शृङ्गारका कथञ्चित् अविरोध है । केवल नायिकाविषयक उग्रता बचान्नी चाहिये । वीर और अद्भुतका [वीरस्य वैै यत्कर्म्म सङ्कीर्त्तः, भव ना]०, रौद्र और करुणका [रौद्राद्भैव च यत्कर्म्म स शेषः करुणेा रसः], भय या शृङ्गार और बीभत्सका [जैसे 'रत्नावली' में पैन्ट्रजालिकके वर्णनप्रसङ्गमें], वदां अज्ञात्किभाव भले ही हो जाय, परन्तु उनका वह [अज्ञात्किभाव] कैसे होगा जिनका वाध्यवाधकभाव [विरोध] है । जैसे शृङ्गार और बीभत्सका [आत्मवनरूप नायिकामें अनुरक्तिसे रतिकी, और आत्मम्भनसे जुगुप्सा की उत्पत्ति होती है इसलिये आत्मवनैक्यमें रति और जुगुप्सा दोनोंका वध्य-घातकभाव विरोध है], वीर और भयानकका [भय और उत्साहका आाश्रयैक्यमें वध्य-घातकभाव विरोध है], शान्त और रौद्रका [नेरत्सर्थ्य और विभावैक्य दोनों रूपमें वध्य-घातकभाव विरोध है], अथवा शान्त तथा शृङ्गारका [विभावैक्य तथा नेरत्सर्थ्यमें विरोध है], इनमें अज्ञात्किभाव कैसे बनेगा । इस आाशङ्कासे यह कहते हैं—

दूसरे रसके प्रधान होनेपर उसके अविरोधी अथवा विरोधी [किसी भी] रसका [अत्यन्त] परिपोष नहीं करना चाहिये । इससे उनका अविरोध हो सकता है ॥२५॥

Page 278

कारिका २४ ] तृतीय उद्योत: २३३

अत्र हि रसान्तरे शृङ्गारादौ प्रधानवृत्त्यचयः ये सति, अविरोधी विरोधी वा रसः परिपोषं न नेतव्यः । तत्राविरोधिनो रसस्याङ्गतासापेक्ष्ययात्यन्तमाधिक्यं न कर्तव्यमित्ययं प्रथमः परिपोषपरिहारः । उत्कर्षेणैवेऽपि तयोः विरोधासंभवात् । यथा— एकतां किउअ पिआ अण्णंतो समरनूरुणिग्योसो । णहि ण रणरसे ण अ भडेस्स दोआइरिअ हिअअ ॥ [ एकतो रोदिति प्रिया अन्यतः नमनरुर्यानुगम्भः । स्नेहेन रणरसेन च मटन्य दोलायितं हृदयम् ॥—एतत् क्षेमे ] तथा वा— कण्ठाच्छिल्त्वाक्ष्मालम्बलयगीतविमल करं द्वारमार्त्तव्यान्तं कृत्वा पर्यङ्कासनं विषघरपतिना मेखलाया गुणेप । शृङ्गारामन्त्राभिजापसुरधरपुढव्याक्रिताज्ञायकच्हासा देवी सन्ध्यास्यसूच्याहसितपतुपतिस्तत्र त्वां वो ल्य्यात् ॥

प्रधानभूत शृङ्गारादि रसके प्रवन्धव्यचयः होनेपर उसके अविरोधी अथवा विरोधी रसका परिपोषण नहीं करना चाहिये [उस परिपोषणके तीन प्रकारके परिहार क्रमसे कहते हैं]।

१. उनमेंसे अविरोधी रसका अङ्गी प्रधानभूत रसकी अपेक्षा अत्यन्त आधिक्य नहीं करना चाहिये यह प्रथम परिहार है । उन दोनोंका समान उत्कर्ष हो जाने [तक] पर भी विरोध सम्भव नहीं है । जैसे— एक ओर प्रियतमा रो रही है और दूसरी ओर युद्धके बाजेका घोष हो रहा है । अतः स्नेह और युद्धोत्साहसे वीरका हृदय दोलायमान हो रहा है । [यहाँ वीर और शृङ्गारका साम्य होनेपर भी अविरोध है !] अथवा [दो रसोंमें साम्य होनेपर भी अविरोधका दूसरा उदाहरण] जैसे— गलेमेंसे हारको तोड़ [निकाल] कर हाथमें उपमालके समान उसको फेरती हुई, नागराजके स्थानपर मेखलासूत्रसे पर्यङ्कासन बाँधकर शृङ्गमूठ मन्त्रजपके कारण हिळते हुए अधरपुटसे अभिज्ञक हासको प्रकट करती हुई, सन्ध्या नामक [सपत्नी] के प्रति ईर्ष्यावश, महादेवका उपहास करती हुई देवी गयी, देवी पार्वती तुम्हारी रक्षा करें । इसमें [प्रकृत रौद्रौत्प्रलम्भ और तद्विरोधी मन्त्रजपादिसे व्यक्त शृङ्गार, इन दोनों रसोंका साम्य होनेपर भी विरोध नहीं है]।

Page 279

ध्वन्यालोक:

अज्ञात

अज्ञात

अज्ञात

Page 280

कारिका २४ ]

तृतीय उद्योत:

२३५

एतच्चापेक्ष्यं प्रकाशयोगित्वमेकस्य रसस्य वहुरसेषु प्रवन्धेषु रसानामकाक्षिभावमन- स्थायिप्रकृत्याद्वशकवेःप्रतिपक्षे पमित्येन्त प्रकारेगाविरोधिनां विरोधिनां च रसानामकाक्षिभावेन समावेशे प्रवन्धेपु स्ताद्विरोधः ।

एतच्च सर्वं येयां रसौ रसान्तरस्य व्यभिचारी भवति इति दर्शनेन तन्मतेनोच्यते ।

मनन्तरे तु रमाश्रयिनो भावाः उपचाराद् रसशब्देनोक्तास्तेषामङ्गतया तन्निर्विरोधमेव ।

अनेक रसाश्रयैः प्रवन्धाभिधाने रसैक परस्पर अङ्गाङ्गिभावको न माननेवाले भी इस आपेक्षिक [प्रधानरसो को अधिक और गौण रसोंको कम] प्रकारसे भी प्रवन्धोंमें अविराधों और विरोधी रसोंके अङ्गाङ्गिभावसे समावेश करनेंमें अचिरोध हो सकता है ।

जो लोग रसोंका अङ्गाङ्गिभाव या उपकार्योपकारकभाव नहीं मानते हैं उनका कहना यह है कि रस तो उचिका नाम है तो स्वयं चमत्काररूप है। यदि उसकी स्वचमत्काररूपमें विश्रान्ति नहीं होती है तो वह रस ही नहीं है । अङ्गाङ्गिभाव अथवा उपकार्योपकारकभाव माननेमें तो अङ्गभूत या उपकारक रसकी स्वचमत्कारमें विश्रान्ति नहीं होती है अतः वह रस नहीं कहला सकता है । रस वह तभी होगा जब स्वचमत्कारमें ही उसकी विश्रान्ति हो जाय । उस दशामें वह किसी दूसरेका अङ्ग नहीं हो सकता है । इसलिए रसोंमें अङ्गाङ्गिभाव सम्भव नहीं है । जिनका यह मत है उनको भी अनेक रसवाले प्रवन्धोंमें किसी तारतम्यको मानना ही होगा । इसी तारतम्यका दूसरा रूप अङ्गाङ्गिभाव है । इसलिए नोंमत्सं व मते ही अङ्गाङ्गिभाव ने माने परन्तु तारतम्यत्मकने मानते ही हैं । अन्यथा काव्यस्तु [इतिवृत्तसज्जीकरणा] का निर्माण ही नहीं हो सकेगा ।

यह सब बात उनके मतसे कही गयी है जो एक रसको दूसरें रसमें व्यभिचारी [अङ्ग] होनेका सिद्धान्त मानते हैं । दूसरे [रसका रसान्तरमें व्यभिचारित्व अर्थात् अङ्गत्व न माननेवाले] मतमें रसके स्थायिभाव उपचारीसे रस शब्दसे कहे गये हैं [पसा स्थायिभावोंको अङ्ग माननेमें उनको भी कोई आपत्ति नहीं है जो रसोंका अङ्गत्व स्वीकार नहीं करतें हैं] ।

रसोंके परस्पर अङ्गाङ्गिभावके विषयमें ऊपर जिन दो मतोंका उल्लेख किया गया है उनका आधार भरत नाट्यशास्त्रके 'भावव्यञ्जक' नामक सप्तम अध्यायके लगभग अन्तमें पठित निम्नलिखित इलोक है—

स मन्तव्यो रसः स्थायी शेषाः सङ्क्षारिमाव मतः ।

—म० ना० ७, १९९

उक्त दोनों मतवाले इस इलोककी मिन्न-मिन्न प्रकासे व्याख्या करतें हैं । रसोंमें अङ्गाङ्गिभाव या स्थायी सङ्क्षारिमाव माननेवालोंके मतमें इसका अर्थ इस प्रकार होवह है, कि, चिच्चर्व्यतिरूप अनेक

१. 'निदर्शने' नि० ।

२. 'मतान्तरेऽपि' नि० ।

३. 'तेषामङ्गत्वे' निर्विरोधित्वमेव' नि०, 'तेषामङ्गत्वे निर्विरोधित्रमेव' वी० ।

Page 281

ध्वन्यालोकः

एवमविरोधिनां विरोधिनां च प्रबन्धस्थ्येनाऽऽक्लिन्ना रसेऽन ममावेशे साधारणमविरोधो-

पायं प्रतिपाद्येदानीं विरोधिविषयमेव' तं प्रतिपादयितुमिदमुच्यते—

भावो॑म॑से जि॑स॒क॒ र॒स्प बहुत आय॑तं अ॑धिक प्रब॑न्धव्याप॒क हो उ॑सको स्था॑यी र॒स म॑ान॑ना चा॑हिये और

दो॑यको व॑भि॑चा॒री र॒स । इस म॑तम॑में 'र॒सः स्था॑यि॒' यह अ॑ल॒ग-अल॒ग प॒द ह॑ैं । व॑ह र॒स स्था॑यी अ॑र्था॑त॑

अ॑ञ्जी र॒स हो॑ता ह॑ै श॒ेष र॒स स॑ञ्चा॒री अ॑यवा अ॑ञ्जर॒स हो॑ते ह॑ैं । क॑िसी-कि॑सी ज॒गह 'र॒सः स्था॑यी' इस

प्र॒का॑र॑े वि॑स॑र्गा॑न्त पो॒ाठ॑क स्था॑या॒र र॒स॒ स्था॑य॒ी ए॑सा वि॑ल॑ग॒र॑ही॒त पा॒ठ है । उ॑स द॒शा॑में इ॑स म॑तव॑ाले

'ल॒ङ्ग॑द॒ धा॑रि' इस वा॑त॑क॑रे वि॑स॑र्गा॑का वै॑क॑ल्पि॒क ला॑प म॑ान॑कर स॑ञ्ज्ञ॑ति ब॑न॑ाते ह॑ैं । इस प्र॒का॑र॑े इस म॑त॑से

भर॑तमु॑नि॑ने र॒सों॑के स्था॑यी अ॑र्था॑त॑ अ॑ञ्जीरू॑प और स॑ञ्चा॒री अ॑र्था॑त॑ अ॑ञ्ज॒रूप दो॑नों॑ स्वीक॑ार किये ह॑ैं ।

लो॑च॑नक॑र॑ने भा॑गुरि॑मु॑निक॑े र॒सों॑के स्था॑यी स॑ञ्चा॑री म॑ान॑नेव॑ाले प॑क्॒षका सम॑र्थ॒क बत॑ाते हु॒ए लि॑खा ह॑ै

कि "त॑था च भा॑गुरि॑रि॒प, कि र॒सना॑म॑पि स्था॑यि॑स॑ञ्चा॑रि॑ता॑स्ति॒ति आ॑ख्षि॑प्या॑भ्युपग॑मे॑नै॑वो॑त॑रम॑वो॑च॑दू

वा॑द॑मि॒त ।" अ॑त॑ः र॒सः॑का स्था॑यी स॑ञ्चा॑री भा॑व अ॑र्था॑त॑ अ॑ञ्जा॑ऽभि॑भाव हो॑ता ह॑ै यह भा॑गुरि॑मु॑निको

भी अ॑भि॑मत ह॑ै । अ॑त॑एव इस म॑तको ही प्र॑धा॑न म॑ान॑कर आ॑लो॑क॑रने भी वि॑स्ता॑रपूर्॑व॑क उ॑सके

उ॑पपाद॑नका प्रय॑त्न कि॒या है ।

दू॑सरे म॑तव॑ाले र॒सस्थायी॑को ए॑क स॑म॑स्त प॒द म॑ान॑ते ह॑ैं और उ॑समे॑ "द्वि॑तीया॑श्रि॑ता॑ती॑तप॑ति॑ग॑ता-

त्य॑स्त॑प्रा॑स॑प॑न्नैः" इस पा॑रणि॑सू॑त्र॑में स्॑थित "गा॑मि॑ग॑म्या॑दीनाऽचुप॑सं॑ख्या॑नम्" वा॑र्तिक॑ते स॑मा॑स म॑ान॑कर

'र॒सां॑ र॒खेधु वा स्था॑यी र॒सस॑थ्या॑यी' ए॑सा वि॑ग्र॑ह क॑रते ह॑ैं । व॑ह र॒सों॑क॑े न॒हीं उ॑न॑के स्था॑यि॑भाव॒का अ॑ञ्ज्ञा-

ऽभि॑भाव अ॑थवा स्था॑यि॑स॑ञ्चा॑रि॑भाव म॑ान॑ते ह॑ैं । ए॑क॑के र॒समें स्था॑यि॑भाव हो॑ने॑पर भी व॑ह दू॑सरे र॒सको

उ॑त्पा॑रि॑भाव हो स॑कता ह॑ै । जै॑से क्रो॑ध रौ॑द्रर॒सका स्था॑यि॑भाव हो॑ने॑पर भी वी॑रर॒समें व॑भि॑चा॑रि॑भाव

हो॑ता ह॑ै । अ॑थवा ए॑क॑में जो व॑भि॑चा॑रि॑भाव ह॑ै व॑ही दू॑सरे र॒समें स्था॑यि॑भाव हो स॑कता ह॑ै, जै॑से

त॑त्त्व॑ज्ञा॑नवि॑ष॑यक नि॑र्वे॑द, शा॑न्तर॒समें स्था॑यि॑भाव हो॑ता ह॑ै य॑द्य॑पि अ॑न्य ज॒गह व॑ह व॑भि॑चा॑रि॑भाव ही ह॑ै ।

अ॑थवा क॑हीं ए॑क व॑भि॑चा॑रि॑भाव भी दू॑सरे व॑भि॑चा॑रि॑भाव॑की अ॑पे॑क्षा स्था॑यी हो जा॑ता ह॑ै जै॑से

'वि॑क्रमो॑र्व॑शी॑य' ना॑टक॑में च॑तु॑र्थ अ॑ङ्क॑में उ॑न्मा॑द उ॑त्पा॑द क॑रने॑के लि॑ए भर॑तमु॑नि॑ने यह श्लो॑क लि॑खा ह॑ै । यह इस म॑तव॑ाले॑का कह॑ना ह॑ै

प॑दों॑का स॑मन्व॑य इस प्र॒का॑र क॑रते ह॑ैं कि चि॑त्तवृत्ति॑रूप अ॑ने॑क भा॑वों॑में॑ [जि॑सका आ॑धिक वि॑स्तृ॑त र॒प

उ॑पल॑ब्ध हो॑ता ह॑ै व॑ह स्था॑यी भा॑व हो॑ता ह॑ै और व॑हीं र॒सी॑करण य॑ोग्य हो॑ता ह॑ै, इ॑सी॑से उ॑सको र॒सस्थायी

क॑हते ह॑ैं । श॒ेष स॑व व॑भि॑चा॑री हो॑ते ह॑ैं । अ॑तः ए॑क र॒सका स्था॑यि॑भाव दू॑स॑रे॑का व॑भि॑चा॑री अ॑थवा ए॑क

र॒सका व॑भि॑चा॑रि॑भाव दू॑स॑रे॑का स्था॑यि॑भाव हो जा॑ता ह॑ै ।

इ॑स प्र॒का॑र प॑ह॑ले म॑त॑में शा॑न्त र॒सका और दू॑सरे म॑त॑में उ॑न॑के स्था॑यी भा॑वो॑का शा॑न्त अथवा

प॑रम॑परा या ल॑क्षणा॑ते र॒खों॑का अ॑ञ्जा॑ऽभि॑भाव या उ॑पका॑र्यो॑पका॑रक॑भाव हो स॑कता ह॑ै । इ॑सलिए

दो॑नों॑ ही म॑तों॑में वि॑रो॑धी र॒सों॑के अ॑वि॑रो॑धक उ॑पपाद॑न कि॒या जा स॑कता ह॑ै ॥२४॥

एकाश्रयमें विरोधी रसोंका अविरोधसम्पादन

इ॑स प्र॒का॑र प्रब॑न्ध॑स्थ प्र॑धा॑न र॒सके सा॑थ उ॑सके अ॑वि॑रो॑धी तथा वि॑रो॑धी र॒सों॑के

समा॑वे॑शमें सा॑धा॑रण अ॑वि॑रो॑धो॑पा॑यक॑का प्रत॑िपाद॑न क॑रके अ॑ब [वि॑शे॑ष रू॑पसे] वि॑रो॑धी

र॒सके ही उ॑स [अ॑वि॑रो॑धा॑पा॑दक उ॑पा॑य] का प्रत॑िपाद॑न करने॑के लि॑प यह क॑हते ह॑ैं—

'वि॑तो॑धि॑वि॑ष॒ये' नि॑०, दृ०।

Page 282

विरुद्धधैर्याश्रयो यस्तु विरोधी स्थायिनों भवेत् । स विरुद्धाश्रयः कार्यस्तस्य पोषेऽप्यदोषता ॥२५॥

प्रवन्धस्थेन स्थायिनादिना रसेनौचित्यापेक्षया विरुद्धधैर्याश्रयो यो विरोधी यथा वीररम्भयानकः स विभिन्नाश्रयः कार्यः । तस्य वीरस्य य आश्रयः कथानायककलत्रिपक्षविषये सन्निवेशायित-न्यः । तथा सति च तस्य विरोधिनोऽपि यः परिपोषः 'स निर्दोषः' । विपक्षविषये हि भयानकिशयवर्णनं नायकस्य नयपराक्रमादिसम्पत्तु सुतरामुज्ज्वलिता भवति । पतच्च मदीयेऽर्जुनचरितेऽर्जुनस्य पातालावतरणप्रसङ्गे वैश्येन प्रदर्शितम् ॥ २५ ॥

एवमैकाधिकरण्यविरोधिनः प्रवन्धस्थेन स्थायिना रसेनाद्भावगमने निर्विरोधित्वं यथा तथा दर्शितम् । द्वितीयस्य तु तत्वतिपादनमुख्यते—

स्थायी [प्रधान] रसका जो विरोधी ऐकाधिकरण्य रूपसे विरोधी हो उसको विभिन्नाश्रय कर देना चाहिये, [फिर] उसके परिपोषमें भी कोई दोष नहीं है ॥२५॥

विरोधी [रस] दो प्रकारके होते हैं, १. ऐकाधिकरण्यविरोधी और २. नैरन्तर्य-विरोधी । [ऐकाधिकरण्यविरोधीके भी फिर दो भेद हो जाते हैं, आलम्बनके ऐक्यमें विरोधी और आश्रयके ऐक्यमें विरोधी] इनमेंसे प्रवन्धके प्रधानरसकी दृष्टिसे जो एकाधिकरण्यविरोधी रस हो, जैसे वीरसे भयानक, उसका भिन्न आश्रयमें कर देना चाहिये । [अर्थात्] उस वीरका जो आश्रय कथानायक, उसके विपक्ष [प्रतिनायक] में [उस भयानकरसका] सन्निवेश करना चाहिये । ऐसा होनेपर उस विरोधी [भयानक] का परिपोषण भी निर्दोष है । [क्योंकि] विपक्ष [रात्रु] विषयक भयके अतिशयके वर्णनसे नायककी नीति और पराक्रम आदिका बाहुल्य प्रकाशित होता है । यह बात मेरे 'अर्जुनचरित' [नामक काव्य] में अर्जुनके पातालावगमनके प्रसङ्गमें स्पष्टरूपसे प्रदर्शित की गयी है।

ऐकाधिकरण्यविरोधीका अर्थ यह है कि समान अधिकरण या आश्रयमें दोनों रस न रह सकें, जैसे वीर और भयानक । ये दोनों रस एक आश्रय अर्थात् एक नायकमें एक साथ नहीं रह सकते हैं । वीरका स्थायिभाव 'उत्साह' और भयानकका स्थायिभाव 'भय' ये दोनों एक कालमें सम्भव न होनेसे इन दोनोंका आश्रय एकके एकमें विरोध है । इसका परिहार करनेका सीधा उपाय यह है कि वीरको नायकनिष्ठ और भयानकको प्रतिनायकनिष्ठरूपसे उपनिबद्ध किया जाय । ऐसा करनेसे उस वीर-विरोधी भयानकका परिपोष न केवल निर्दोष होगा अपितु वीररसका उत्कर्षवर्धक होगा ॥२५॥

नैरन्तर्यविरोधी रसोंका अविरोधसम्पादन

प्रवन्धस्थं प्रधानरसके साथ ऐकाधिकरण्यरूप विरोधीका, अकृत्रिम आविर्भाव होकर जिस प्रकार अविरोध हो सकता है वह प्रकार दिखला दिया । अब दूसरे [अर्थात् नैरन्तर्यविरोधी रसोंके] भी उस [अविरोधोपपादक प्रकार] को दिखलानेके लिये यह कहते हैं—

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एकाश्रित्यत्वे निर्दोषो नैरन्तर्ये विरोधवान् । रसान्तरग्यवधिना रसो व्यङ्गयोऽसुमेधसा ॥२६॥

यः पुनरेकाधिकरणत्वे निर्विरोधो नैरन्तर्ये तु विरोधी स रसान्तरग्यवधानानेन प्रवन्धे निवेशयितव्यः यथा शान्तशृङ्गारौ नागानन्दे निवेशितौ ।

जिस [रस] के एक आश्रयमें निवन्धनमें दोष नहीं है [परन्तु] निरन्तर [पास-पास व्यवहिततरूप] समावेशमें विरोध आता है, उसके [बीचमें] अविरोधी रसके वर्णनसे व्यवहित करके बुद्धिमान् कविको वर्णन करना चाहिये ॥२६॥ और जो [रस] एक अधिकरणमें अविरोधी है परन्तु नैरन्तर्यमें विरोधी है उसका दूसरे रसके.व्यवधानसे प्रवन्धमें समावेश करना चाहिये । जैसे 'नागानन्द'में शान्त और शृङ्गार का [बीचमें दोनोंके अविरोधी अद्भुतरसके समावेशसे व्यवहित करके] समावेश किया गया है ।

शान्तरसकी स्थिति.

'नागानन्द'में "रागास्पदस्यपद्मितयैवै न च मे घृंसीति न प्रयोजः" इत्यादिसे लेकर परार्थ- हारिकवितरणरूप निर्देशंणपर्यन्तं शान्तरस है । और उसका विरोधी शृङ्गार है । इन दोनोंके बीचमें दोनोंके अविरोधी अद्भुतरसका "अहो गीतमहो वादित्रं" आदिसे समावेश और उसकी पुष्टि के लिए "व्यतिक्रमव्यवधानशोभतनु" आदिका समावेश किया गया है । इस प्रकार नैरन्तर्य- विरोधी रसोंके बीचमें अविरोधी रसका समावेश कर देनेसे उनका अविरोध हो सकता है । यहां ग्रन्थकारने 'नागानन्द'के शान्त और शृङ्गाररसका उदाहरण दिया है । परन्तु कुछ लोग शान्तरस्को अलग रस ही नहीं मानते हैं । और न 'नागानन्द'को शान्तप्रधान नाटक मानते हैं, अपितु उसका मुख्य रस दयावीर मानते हैं । इस विषयका विशेष रूपसे उपपादन श्री धनञ्जयके 'दशारूपक' और उसकी ध्वानिकांवरचित टीकामें पाया जाता है । यहां आलोककारने इस मतका खण्डन करके शान्तरस्को अलग रस सिद्ध करनेका प्रयत्न किया है । शान्तरस्को न माननेवाले धनिकके लेखका सारांश यह है कि—

कुछ लोग कहते हैं कि भरतमुनिने शान्तरसके विभावादिका प्रतिपादन नहीं किया है अतएव शान्तरस नहीं है । दूसरे लोग कहते हैं कि अनादिकालीन रागद्वेषके प्रवाहका सर्वथा उच्छेद असम्भव होनेसे रागद्वेषोच्छेदातमक शान्तरस सम्भव नहीं है । तीसरे लोग शृङ्गार आदि रसमें 'शान्तरसका अन्तर्भाव करते हैं । इनमेंसे कोई पक्ष माना जाय या न माना जाय इसमें धनिकको कोई आपत्ति नहीं है । उनका कहना-तों यह है कि नाटकमें शान्तरसकी पुष्टि नहीं हो सकती है । क्योंकि 'शान्तकी स्थितिमें समस्त व्यापारोंका विलय हो जाता है । उस समस्तव्यापारशून्यतारूप शान्तरसका अभिनय हो ही नहीं सकता है, अतएव धनिक और धनञ्जय नाटकमें 'शमके स्थायिभावत्वका निषेध करते हैं—

"निवेदादिरितारूपयादेश्यादि स्वदते कथम् । वैरस्यायिव तत्पोषस्तेनाऽऽधैः स्थायिनो मता: ॥"—दशारू० ४, ३६

१. 'न्यास्य:' वि० । 'व्यङ्ग्यः [न्यास्यः]' नि० ।

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कारिका २६ ] तृतीय उद्योत: २३९

शान्तरक्ष तृष्णाक्षयसुखस्य यः परिपोषस्तत्कक्षणो रसः प्रतीत एव । तथा चोक्तम्—

यच्च कामसुखं लोके यच्च दिव्यं महत् सुखम् । तृष्णाक्षयसुखस्यैते नाहेतू शोकशान्ति कलाम् ॥

यदि नाम सत्वेनानुभवगोचरता तस्य नास्ति नैतावता डSसावलोकसामान्यमहानुभाव-वितत्निगूढीयः। प्रतीयते तु स कथ्यः। 'न च वीरे तस्यास्तिभावः' कथम् नुक् । तस्याभिमान-नमयत्नेव न क्यवस्थापन्नः । अस्य चाद्धारप्रश्नैर्मकरुपतया स्थितेः । तयोरेवैविधविशेष-

सद्दावैर्‌डप यद्रेकं परिकलप्यते तद्वीररौद्र्योरपि तथा प्रसङ्गः । दयावीरादीनां तु चित्त-वृत्तिविशेषाणां सतांकारमकरुद्धितवैतन शान्तरसप्रभेदत्वम्, इतरे तु वीररसप्रभेदत्व—

अथांत् स्थायिभावा जो यह लक्षण किया गया है कि—

विरदैरिविरदैर्विभावैरविच्छिद्यते न यः । आत्मभावं नयत्यन्यान् स स्थायी लवणाकरः ॥—दशरू० ४, ३६

वहु 'निबंधनं' नहीं घटता है। इसलिए वह स्थायिभाव नहीं, केवल विभावादिमाव है और सचयस्वापारैर्यातत्सप होनेसे उसका परिपोष भी नाटकमें नहीं हो सकता है। यदि किया जायेगा तो वह वीरोचित ही होगा। अतः निबंध स्थायिभाव नहीं है और न शान्तरस ही कोई रस है। यही 'नायान्तरं'की वात है। में! उसमें शान्तरस बताना ठीक नहीं है क्योंकि उसमें मलयवतीके प्रति अनुराग और अन्तमें विरहादरनकृतित्वकी प्राप्तिका जो वर्णन है वह शान्तरशके सर्वथा प्रतिकूल है। अतएव उसमें शान्तरस सद्दैव अंगित दयावीरके अनुकूल उत्साह उसका स्थायिभाव होनेसे वीररस है। इस प्रकार शान्तरसा

तृष्णानाशसे उत्पन्न सुखका जो परिपोष तत्करूप शान्तरस प्रतीत होता ही है [अर्थात् उसका आप्लाव, निषेध नहीं किया जा सकता है] इसीलिए कहा है—

संसारमें जो काम-सुख है और जो अलौकिक महान् सुख है ये दोनों तृष्णाक्षय [सन्तोषजन्य] सुखके सोलहवें कलाके बराबर भी नहीं हैं।

यदि [शान्तरस] सर्वसाधारणके अनुभवका विषय नहीं है तो इससे असाधारण महापुरुषोंके चित्तवृत्तिविशेषरूप शान्तरसका निषेध नहीं किया जा सकता है। और न वीररसमें उसका अन्तर्भाव करना उचित है। क्योंकि वीरंग अहङ्कारमयरूपसे स्थित होता है और इस शान्तकी सिद्धि अहङ्कारप्रधामरूपसे होती है। उन [शान्त और वीर]

दोनोंमें इस प्रकारके भेद होते हुए भी यदि ऐक्य माना जाय तो फिर वीर और रौद्रको भी एक ही मानना होगा। दयावीर आदि चित्तवृत्तिविशेष यदिदि सब प्रकारके अहङ्कारसे रहित हो तब तो उसको शान्तरसका भेद कह सकते हैं यद्यथा [अहङ्कारमय

१. 'विशेषवत्' मि०, वी० ।

२. 'वीरे च तस्यास्तिभावः कथम् नुक्‌:' मि० ।

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ध्वन्यालोक

मनदेव स्वर्गीकृतुमिदमुच्यते—

न च विरोधः । तदेवममिन ज्ञात्वा रसः । तस्य चाविरोध एव व्यवस्थादिमाने न कश्चिद् विरोधः । तथैवममिन ज्ञात्वा रसः । तस्य चाविरुद्ध-समर्थवच्यानन्त पदन्धे विरोधिरसमावेशे मत्वा निर्विरोधत्वम् । यथा प्रबन्धे त्रिपथे ॥२५॥

रसाल्नरान्नरनिरोधे कवाक्यस्थयोगोरपि । निर्वृत्ते हि रसौः समावेशे विरोधिता ॥२६॥

रसाल्नतरसवहृत्योरे कवाक्यस्थयोः । विरोधिता निवर्तते इत्यन्न न काचिद् भान्तिः । गम्भीरैकवाक्यस्थयोः रसयोः रसत्वात् नीत्या विरुद्धता निवर्तते । यथा—

भूरेणुविग्रहान्नवपारिजातमालारजोवासिततनुमध्या । गाढं शिवाभि परिरभ्यमाणान्न सुराज्ञी न चिरस्थिरशुजान्तराला ॥ सशोणितैः कृत्यमुखा स्फुरद्रदः पद्मैः खगाननसुपवृज्यमानान् संवीजिताश्र्वनदनवारिसेकैः सुगन्धिभिः कल्पलतादुकूलैः ॥ विमानपर्यङ्कतले निषण्णाः कुतूहलाविष्टतया तदान्तौप् । निर्वीर्यममानं हलनाद्गुलीभिरवार्ः स्वदेहान् पतितानुपरयन्त ॥

चित्रवृत्ति होतेपरि विरोधरचना ग्रेगा पेसी द्वव्यवस्था करनेसे उनमें कोई विरोध नहीं होगा । इस प्रकार शान्तरस है । और विरोधी रसोंका समावेश रहनेपर भी अविरोध रसके व्यवधानसे प्रदन्धमें उनका समावेश करनेसे विरोध नहीं रहता, जैसा ऊपर दिखलाये हुए [‘नागानन्द’ के] विप्रमें है ॥२६॥

विरोधी रसोंमें व्यवधान द्वारा अविरोधसम्पादन इसको स्थिर करनेके लिये यह कहते हैं— एक वाक्यमें स्थित होनेपर भी दूसरे [दोनोंके अविरोधी] रससे व्यवहित रूप दो [विरोधी] रसोंका समावेश होनेपर उनका विरोध समाप्त हो जाता है ॥२७॥

दूसरे रससे व्यवधान हो जानेकपर एक प्रदन्धमें स्थित [विरोधी] रसोंका विरोध मिट जाता है इसमें किसी प्रकारका अमम नहीं है, क्योंकि उपर्युक्त नीतिसे पक- वाक्यस्थ रसोंका भी विरोध नहीं रहता है । जैसे—

नवीन परिजातमालाके परागसे शुरमित वक्षःस्थलवाले, वन्दनउदयसे सिक्त सुगन्धित कल्पलताके [बचे] दुकूलों [वस्त्रों] द्वार संका किये जाते हुए, विमानके पढंगोपर बैठे हुए, [युद्धमें मारे गये] वीरोंने, क्रोधहदवश ललःलालों, [अप्सराओं स्ववन्द्याओं] द्वारा प्रदमुग्धी [के सदृशत] से दिसलाये जाते हुए, पृथ्वीकी धूलमें सने हुए, भगालितयोंसे गाढ आलिङ्गित और मांसाहारी पक्षियोंके रक्तमें सने हुए तथा दिसलते हुए पंखोंसे हत्स किये जाते, और [युद्धभूमिमें] पड़े हुए अपने शरीरोंको देखा ।

  1. ‘विरदयोर्विरोधिता’ नि०, दी० ।

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कारिका २८-२९ ]

द्वितीय उद्योतः

२५१

इत्यादौ। अन्न हि शृङ्गारवीभत्सयोस्तद्वद्विरोधार्थवाच्यवाचकतया समावेशो न विरोधी ॥२७॥

विरोधविरोधं च सर्वत्रैस्थं निष्पादयेत् ।

विशेषणतस्तु शृङ्गारे शृङ्कुमारतरमो व्यसौ ॥२८॥

यथोक्तलक्षणाद्वारेण विरोधविरोधौ सर्वेऽपि रसेऽपि प्रध्वंयेद्न्यत्र च निष्पयेत्

सहृदयः । विशेषतस्तु शृङ्गारे। अत्र हि रतिकोपिपातलक्षिताविरोधौ, रतेः स्वःनिष्पत्तौ निमित्त-

तेन भङ्गसम्भवात्, शृङ्कुमारतमः सर्वेऽप्यो रसेऽप्यो मनागपि विगेधिसमावेशां न

सहते ॥२८॥

अवधानातिशयवान् रसे तत्रैव सत्कवि:

भवेत् तसिन् प्रमादो हि झटित्येवोपलब्धुंते ॥२९॥

तत्रैव च रसे सर्वेऽप्योडपि रसेऽप्यः सौकुमार्यांतिशययोगिनि कविरवधानवान् प्रयत्न-

वान् स्यात् । तत्र हि प्रमाद्यतस्तस्य सहृदयस्यैव त्रिप्रमेयवावज्ञाविषयता भवति ॥२९॥

इत्यादिमें। यहाँ शृङ्गार और वीभत्सरस अथवा उनके स्थायिभावों—रति तथा जुगुप्सा]का वीररसके व्यवधानसे समावेशो विरुद्ध नहीं है ।

यहाँ 'वीर' कथा और 'स्वदेहान' कृत है । सारे वाक्यमें अनुचिततस्पते उनकी प्रतीति होती है

और समस्त वाक्यमें ही शृङ्गार तथा वीभत्स अथवा उनके स्थायिभाव, रति और जुगुप्सा, व्याप्त है ।

इसीलिए वीररसके बीचमें व्यवधानकी प्रतीति नहीं जान पड़ती है । फिर भी 'स्वेऽनुदितान' इस विशेषणके बोषसे वीभत्स, और 'नकपारिजातमालारजोवसितनाहृद्मध्या:' इस विशेषणके बोषसे शृङ्गार, और इन

दोनोंके बीच विशेष्य बोधके रूपमें वीररसकी प्रतीति होती है । इस प्रकार शृङ्गार तथा वीभत्सके

बीचमें वीरका व्यवधान होनेसे उनका समावेश उचित है ॥२७॥

विरोध तथा अविरोधका सर्वत्र इसी प्रकार निरूपण करना चाहिये । विशेषकर

शृङ्गारमें, क्योंकि, वह सबसे अधिक शृङ्कुमार होता है ॥२८॥

उपर्युक्त लक्षणोंके अनुसार प्रवृत्तकाव्यमें और अन्यत्र [मुक्तकांमे] सहृदयोंको

सब रसोंमें विरोध अथवा अविरोधको पहिचानना चाहिये । विशेषकर शृङ्गारमें।

क्योंकि वह रतिके परिपोषरूप होनेसे, और रतिके तनिकसे भी कारणसे भटित् हो

जानेसे, सब रसोंसे अधिक शृङ्कुमार है और विरोधीके तनिकसे भी समावेशको सहन

नहीं कर सकता है ॥२८॥

सत्कविको इसी [शृङ्गार] रसमे अत्यन्त सावधान रहना चाहिये [क्योंकि]

उसमे [तनिकसा भी] प्रमाद तुरन्त प्रतीत हो जाता है ॥२९॥

सब रसोंसे अधिक शृङ्कुमार उसौ रसमे कविको सावधान [और] प्रयत्नशील

होना चाहिये । उसमें प्रमाद करनेवाला वह [कवि] सहृदयोंके बीच श्रीहीन तो तिरस्कार-

का पात्र हो जाता है ॥२९॥

१-२. 'शृङ्कुमारतर:' नि०, दी० ।

३. 'झटित्येवाभासते' दी० । 'झटित्येवोपलक्ष्यते' नि० ।

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ध्वन्यालोकः

[ कारिका ३० ]

शृङ्गाररसो हि संसारिणां नियमेनानुभवविषयत्वात् सर्वैरसेव्यः कमनीयतया प्राधान्यतः । एवं च सति—

विनेयानुरुपवीकृतं कार्यशोभार्थमेव च ।

तद्विरुद्धरसरसपर्शोंस्तद्ज्ञानां न तु हृश्यति ॥३०॥

शृङ्गारविरुद्धरसरस्पर्शः शृङ्गाराज्ञानां' यः स न केवलमविरोधलक्षणयोगे सति न विरोधी रसोंमं भी शृङ्गारकः पुष्टः

शृङ्गाररस समस्त सांसारिक पुरुपोंके अनुभवका विषय अवश्य होता है अतः सौन्दर्यकी दृष्टिसे प्रधानतम है । ऐसा होनेसे—

शिष्योंकों [शिक्षणीय विषयमें] प्रवृत्त करनेकी दृष्टिसे अथवा काव्यककी शोभाके लिये उस [शृङ्गार]के विरोधी [शान्त आदि] रसोंमें उस [शृङ्गार]के अङ्गों [व्यभिचारिभावादि]का स्पर्शो दृष्टिगोचर नहीं होता ॥३०॥

जैसे, लोचनकारनिर्मित स्तोत्रमें—

त्वां चन्द्रचूड सहसा स्मरशन्तीं प्राप्योभ्वरं गाढवियोगतप्ता ।

सा चन्द्रकान्ताकृतिपुत्रिकेव संविद्दू विलीयापि विलीयते मे ॥

इस इलोकमें चन्द्रचूड शिवकी स्तुति है । शृङ्गारकी पद्धतिमें चन्द्रचूड शिवको पत्नी, और अपनी बुद्धितुष्टिको चन्द्रकान्तमणिसे निर्मित पुत्रीके समान सुन्दर, अपनी अर्थात् स्तोत्ररचिताकी

पुत्री तथा शिवकी पत्नीत्व माना है । वह बुद्धितुष्टि अपने प्रियतम शिवसे बहुत कालसे वियुक्त होनेके कारण अत्यन्त वियोगसन्तप्त है । शिवके ध्यानमें तनिक देरके लिये चित्त एकाग्र होनेसे चन्द्रचूड

शिवका स्पर्शो पाकर वह तदाकारापन्न होनेमें स्वरूपविहीन, पतितके आलिङ्गनमें सर्वाङ्गीना विलीन-सी

होकर चन्द्रचूडके स्पर्शोसे प्रवृत्त होकर चन्द्रकान्तपुत्रिकाके समान विलीन हों जाती है ।

यहाँ शान्तरसके विभाव, अनुभाव आदिका भी शृङ्गाररसकी पद्धतिसे निरूपण किया गया

है । यदि सीधी शान्तरसकी ढंगसे इस वातको कहा जाय तो वह, 'सब सहृदयोंकों उतनी रुचिकर नहीं होगी, जितनी इस प्रकार हो जाती है । यहाँ शृङ्गाररसके विरोधी शान्तरसमें भी शृङ्गारका पुष्टि लङ्ग जाननेसे काव्यमें चमत्कार आ गया है इसलिए काव्यशोभाके इस प्रकारके पुटका एक

दूसरा मुख्य प्रयोजन शिष्योंकी शिक्षणाय विषयमें प्रवृत्ति करना है । इसीलिए उपदेशप्रद

चन्द्रादिकों शब्दप्रधान होनेसे 'प्रसादचन्द', इतिहासपुराणादिको अर्थतात्पर्यप्रधान होनेसे 'सुधाचन्द'

तथा काव्यनाटकादिको रसाद्यर्थप्रधान होनेसे 'कान्तासब्द'के समान माना है । जिनमें 'कान्ता-

शब्दसम्भृत' काव्यनाटकादिद्वारे शिष्योंकों रसास्वादनपूर्वक शिक्षा प्राप्त होनेसे विनेयोंका उन्मुखीकरण

ननका मुख्य प्रयोजन है ।

शृङ्गारके अङ्गोंका जो शृङ्गारविरुद्ध रसोंके साथ स्पर्शो है वह केवल पूर्वोक्त

रसदिङ्मललक्षणोंके होतेपर ही निर्दोष हो यह बात नहीं है अपितु शिष्योंकों उन्मुख

१. 'शृङ्गाराज्ञानां' बा० प्र० ।

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कारिका ३१ ] तृतीय उद्योत २५३

दुष्यति, यावद् विनेयायनुसूचीतं काव्यशोभार्थमेव वा क्रियमाणो न दुष्यति । शृङ्गार-

करने अथवा काव्यशोभाकी दृष्टिसे किया जानेपर [मी] दूषित नहीं होता है । शिष्य-

रसादेरनुसूचीता: सन्तो हि विनेया: सुतरां विनयोपदेशं वहन्ति । सदाचारोपदेश-

गण शृङ्गारतस्के अज्ञों द्वारा प्रचुर कराये जानेपर सदाचारके उपदेशोंको आनन्दपूर्वक ग्रहण कर लेते हैं ।

रूपा हि नाटकादिगोष्ठी, विनेयजनचित्तार्थमेव सुनिभिरवतारित ।

[भरतादि] मुनियोंने दिक्षणीय जनोंके हितके लिये ही सदाचारो-पदेशरूप नाटकादि गोष्ठी [मण्डली] की अवतारणा की है ।

किं शृङ्गारस्या सकलजनमनोहराभिरामत्वात् तद्वशसमावेश: काव्ये शोभातिशय-

और शृङ्गारके सब लोगोंके मनको हरण करनेवाला और सुन्दर होनेसे उसके

पुष्यतीत्यननापि प्रकारण विरोधिनि' रसे शृङ्गाराज्ञसमावेशो न विरोधी । ततश्च—

अज्ञोंका समावेश काव्यमें सौन्दर्यके अतिरायकी वृद्धि करनेवाला होता है, इस प्रकारसे भी विरोधी रसमे शृङ्गारका समावेश विरोधी नहीं है ।

सत्यं रस्यां विभूतिषु: ।

इसलिए—

किन्तु मत्ताझनापाझभझोलं हि जीवितम् ।

यह ठीक है कि [पेशव्य] विभूति वड़ी सुन्दर होती है, किन्तु [उनका भोग करनेवाला वह] जीवन [तो] मत्त कौतुके

इत्यादिपु नास्ति रसविरोधदोष: ॥३०॥

कटाक्षके समान अत्यन्त अस्थिर है ।

विज्ञायेत्थं रसादीनामविरोधविरोधयो: ।

इत्यादिमें [शान्तमें शृङ्गार द्वारा] रसविरोधका दोष नहीं है ॥३०॥

विषयं सुकावि: काव्यं कुर्वन् मुह्यति न कचित् ॥३१॥

यहाँ सब जातकी अनित्यतारूप शान्तरस्के विभावका वर्णन करते हुए 'त्वं चन्द्रचूड' इत्यादिके समान किसी विभावका शृङ्गारपददृष्टिसे वर्णन नहीं किया है ।

किन्तु 'सत्यं' वाक्येसे मनों परहदयमें प्रवेश कर कवि कहना चाहता है कि हम मिथ्या ही वैराग्यकी बात नहीं करते अपितु यह 'रामा:' और 'रस्यान् विभूतय:' जिसके लिए वह जीवन ही इतना व्यर्थर है ।

'मत्ताझनापाझभझ' शृङ्गाररस्का विभावरूप अङ्ग है । मत्ताझनाके सर्वाङ्गमिलषणीय कटाक्षकी अस्थिरतासे विल्क्षणके 'विभूति' और 'रामा' आदि विभयोंकी अस्थिरताकी उपमा देनेके वैराग्यक विलय सरलतासे समझ

लिया जाता है ॥३०॥

इस प्रकार रस आदिके अविरोध और विरोधके विपयको समझकर काव्य-रचना करनेवाला कवि कहीं भ्रममें नहीं पड़ता है ॥३१॥

इस प्रकार अभी कही रीति, रस आदि अर्थोंत् रस भाव और तदाभासोंके

१. 'सकलजनमनोऽभिरामत्वात्' दी० ।

२. 'विरोधिरस' नो, दी० ।

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ध्वन्यालोकः

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कारिका ३२ ] तृतीयोऽध्यायः २४९

व्यवहारो हि वृत्तिरित्युच्यते । तत्र रसादिगुण औचित्यवान् वाच्याश्रयो यो व्यवहारस्ता एताः कौशिकाद्याः वृत्तयः । वाचकाश्रया श्चोपनागरिकाद्याः वृत्तयो हि रसादितात्पर्येण सन्निवेशिताः कामपि नाट्यस्य काव्यस्य च छायामावहन्ति । रसाद्यो हि दृश्योरपि तद्योर्जीवभूताः । इति तद्वत्तादि तु शृङ्गारभूतमेव ।

अत्र केचित्‌ : 'गुणगुणितोऽव्यवहारो रसादीनामिति तद्वादिभिः सह युक्तं, न तु जीवाश्रयादिव्यवहारः । रसादिमयं हि वाच्ये प्रतिभासते, न तु रसादिभिः पृथग्भू-तम्‌' इति ।

अत्रोच्यते, यत्‌ रसादिमयेन वाच्येन यथा गौरत्वमयं शरीरम्‌, एवं सति यथा शरीरे प्रतिबिम्बमाने नियमेनैव गौरत्वं प्रतिबिम्बने । सर्वस्य तथा वाच्येन सहैव रसाद-योऽपि सहृदयस्यासहृदयस्य च प्रतिबासेरण्‌ । न चैवम्‌ । तथा चेतन्‌ प्रतिपादितमेव प्रथमोध्योते ।

व्यवहारको ही 'वृत्ति' कहते हैं । उनमें रसानुगुण औचित्ययुक्त जो वाच्यका व्यवहार है वे कैशिकी आदि वृत्तियाँ हैं । और वाचक [शब्द]के आश्रित जो व्यवहार है वे उपनागरिकादि वृत्तियाँ हैं । रसादिपरतया [रसादिके अनुकूल्‌, रसादिको प्रधान मानकर] प्रयुक्त की गयीं [कैशिकी आदि तथा उपनागरिकादि‌] वृत्तियाँ नाटक और काव्यमें [क्रमशः:] कुछ आनर्वचनीय सौन्दर्य उत्पन्न कर देती हैं । रसादि उन दोनों प्रकारकी वृत्तियोंकें आधारभूत हैं और कथा-वस्तु आदि शृङ्गारभूत है ।

जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है, 'वृत्ति' शब्द साहित्यमें अनेक अर्थोंमें प्रयुक्त होता है ! यहाँ भरतके नाट्यशास्त्रकी कैशिकी आदि और भट्टनायक आदि की अभिमत उपनागरिकादि वृत्तियोंक एक अर्थव्यवहार और शब्दव्यवहाररूपसे सुन्दर और सुवोष भेद किया है । शब्दव्यवहारमें भी शब्द-रचनाकी दृष्टिसे उपनागरिकादि और अर्थबोधानुकूल व्यापारकी दृष्टि से अभिधा, लक्षणा आदिकों 'वृत्ति' कहा जाता है । हम प्रकारकी व्यवस्थासे वृत्ति शब्दके तीन अर्थ बिल्कुल अलग-अलग और स्पष्ट हो जाते हैं ।

रसकी आत्मरूपताका उपपादन

[पूर्वपक्ष] कुछ लोगोंका कहना है कि इति वृत्त [कथावस्तु] के साथ रसादिको गुण-गुणितव्यवहार होता है, और तभी [वृत्तिमें] रसादिका [शृङ्गारादि] सौन्दर्यं निहित्‌ रहता है । [किञ्चित्‌] वाच्य [कथा-वस्तु गुण, रसादिरूप गुणोंसे युक्त होनेसे] रसादिमय प्रतीत होता है, [आत्मासे भिन्न शरीरके समान] रसादिमय प्रतोत नहीं होता है ।

[सिद्धान्तपक्ष] इसपर हम यह कह सकते हैं कि यदि वाच्य [कथावस्तु] गौरत्वमय शरीरके समान 'रसादिमय हीं होता' तो जैसे शरीरकी प्रतीति होनेपर हर एक्‌ व्यक्तिको] गौरत्वकी प्रतीति अवश्य होती है इसी प्रकार वाच्यकें साथ हीं सहृदय, असहृदय सबको रसादिकी प्रतीति भी होनी चाहिये । परन्तु ऐसा होता नहीं है, इसका प्रथम उद्योतमें ['शब्दार्थशासन' इत्यादि कारिका ७ पृष्ठ ३५२ में] प्रतिपादन कर चुके हैं ।

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ध्वन्यालोक:

स्थानमतम्, रत्नानामिव जात्यत्वं प्रतिपत्तृविशेषत: संवेद्यं वाच्यानां रसादिरूपत्वमिति । नैवम्, यतो यथा जात्यत्वेन प्रतिभासमाने रत्त्ने रत्नस्वरूपादनतिरिक्तत्वमेव तस्य लक्ष्यते, तथा रसादीनामपि विभावानुभावादिरूपवाच्याल्यतिरिक्तत्वमेव लक्ष्यते । न चैवम् । नहि विभावानुभावस्यमिचारिण एव रसा इति कस्यचिदवगमः । अत एवं च विभावादिप्रतिभातत्वादीनां रसादीनां प्रतीतौ तत्वतया: कार्यकारणभावेन व्यवस्थानात् कमोदयस्यम्भावी । स तु लाघवान्न प्रकादयते इत्यलक्ष्यक्रम एव सन्तो व्यज्जंया रसादय: इत्युक्तम् । नतु शब्द एव प्रकरणाद्यवच्छिन्नो वाच्यव्यज्जकथयो: सममेव प्रतीतिमुपजनयतीति

[पूर्वपक्ष] जिस प्रकार रत्नोंका उत्कर्ष [जात्यत्व, उत्कृष्टजातीयत्व] विशेषज्ञ [जौहरी] ही जान सकता है [हर एक व्यक्तिको वह प्रतीत नहीं होता] इसी प्रकार वाच्य [कथावस्तु] का रसादिरूपत्व [रसादिमयत्वरूप गुणोत्कर्ष] विशेषज्ञ [सहृदय] को ही प्रतीत होता है [सर्वसाधारणको नहीं] यदि यह अभिमत हो तो, [उत्तर यह है कि]—

[सिद्धान्तपक्ष] यह ठीक नहीं है। क्योंकि जैसे उत्कृष्टजातीयरूपसे प्रतीत होनेवाले रत्नमें वह [उत्कर्ष] रत्नके स्वरूपसे अभिन्न [रत्नस्वरूपागत] ही प्रतीत होता है। इसी प्रकार रसादिकी भी विभावानुभावादिसे अभिन्न [विभावादिरूप] में ही प्रतीति होनी चाहिये । परन्तु ऐसा नहीं है । विभाव, अनुभाव, व्यमिचारी भाव ही रस है ऐसा किसको अनुभव नहीं होता । अतएव विभावादिप्रतीतके अविनाभूत [परन्तु उससे पृथक् ] रसादिम्रतीति होती है । अतः उन दोनों [विभावादि तथा रसादिकी] प्रतीतियोंके कार्यकरणभावसे स्थित होनेसे [उनमें] क्रम अवश्यस्भावी है । परन्तु [उत्पत्तौ शतपत्रव्यतिभेदवत्, जैसे कमलके सौ पत्तोंमें हुए छेदोंसे वह प्रत्येक पत्रको कमसे ही छेदेगी परन्तु प्रतीत ऐसा होता है कि एक साथ सब पत्तोंको पार कर गयी । इसी प्रकार] शीघ्रताके कारण वह [क्रम] दिखलाई नहीं देता है । इसीलिये रसादि असंलक्ष्य-क्रमरूपसे ही व्यङ्ग्य होते हैं यह कहा गया है ।

रसकी अक्रमता नहीं, अलक्ष्यक्रमव्यङ्गयताका उपपादन

[पूर्वपक्ष प्रकरणादिसहकृत शब्द ही वाच्य और व्यङ्ग्य दोनोंकी एक साथ ही प्रतीति उत्पन्न कर देता है, उसमें क्रमकी कल्पना करनेकी क्या आवश्यकता है । शब्दके वाच्य [अर्थ] की प्रतीति का [सम्बन्ध] परामर्श ही व्यङ्ग्यत्वका कारण हो तो है नहीं । इसीलिये [वाच्यार्थके सम्बन्ध या ज्ञापके बिना केवल स्वररागादिके अनुसार ही] गीत आदिके शब्दोंसे भी रसादिकी अभिव्यक्ति होती है । [आदि शब्दसे श्लोक या

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कारिका ३३ ] तृतीय उद्योतः २५९

किं तत्र कमकल्पनया । नहि शब्दस्य वाच्यप्रतीतिपरामर्श एव व्यङ्ग्यकत्वे निबन्धनम् । तथा हि गीतादिशब्देऽपि 'रसाभिव्यक्तिरस्ति । न च तेषामन्तरा वाच्यपरामर्शः । अत्रापि तत्रमः । प्रकरणाद्यवच्छेदेन व्यङ्ग्यकत्वं शब्दानुमित्यनुमतेवैतदसाकम् । किन्तु तदू व्यङ्ग्यकत्वं तेषां कदाचित् स्वरूपविशेषणतिव्रष्णं कदाचिद् वाचकशक्ति-निबन्धनम् । तत्र येषां वाचकशक्तिनिबन्धनं तेषां यदिवाच्यप्रतीतिमन्तरेणैव स्वरूप-प्रतीत्या निष्पन्नं तद्वाच्य तर्हि वाचकशक्तिनिबन्धनम् । अथ तद्विनन्धनं वाच्यमेव तत्रियनैव 'वाच्यवाचकभावप्रतीत्युत्तरकालत्वं व्यङ्ग्यप्रतीतेः प्राप्तमेव । स तु कथमो यदि लाघवात् 'उच्यते तत्किं क्रियते'३ ।

यदि च वाच्यप्रतीतिमन्तरेणैव प्रकरणाद्यवच्छिन्नशब्दमात्रस्याध्या रसादिप्रतीतिः स्यात्, तदनवघारितप्रकरणानां वाच्यवाचकभावे च स्यमानव्युत्पत्तीनां प्रतिपत्तृणां विलापादिके रागद्वेषादिके ग्रहण होता है। उन [गीतादि शब्दोंके श्रवण और रसाभिव्यक्ति] के बीचमें वाच्य और अर्थका ज्ञान [परामर्श] नहीं होता है [अतः शब्द बिना किसी कमके वाच्य और व्यङ्ग्यकी प्रतीति एक साथ ही करा सकते हैं]।

[सिद्धान्तपक्ष] १. इसमें हमारा कहना यह है कि प्रकरण आदिके सहित शब्द अर्थके व्यङ्गक होते हैं यह बात हमें अभिमत ही है । परन्तु वह व्यङ्गकत्व उन [शब्दों] में कहीं स्वरूपविशेषके कारण और कहीं वाचकशक्तिके कारण होता है । उनमें जिन [शब्दों] में वाचकशक्तिमूलक [व्यङ्गकत्व] है उनमें यदि वाच्यप्रतीतिके बिना ही स्वरूपकी प्रतीतिमात्रसे ही वह [व्यङ्गकत्व] पूर्ण हो जाय तो वह वाचकशक्तिमूलक नहीं हुआ । और यदि वाचकशक्तिमूलक है तो व्यङ्ग्यप्रतीतिः अवश्य ही वाच्यवाचक-प्रतीतिके उत्तरकालमें ही होगी यह सिद्ध ही है । वह क्रम शीघ्रताके कारण यदि प्रतीत नहीं होता तो क्या किया जाय ।

व्यङ्ग्यप्रतीति भले ही वाच्यप्रतीतिके बाद हो परन्तु वाच्यप्रतीति उस व्यङ्ग्यप्रतीतिमें उपयोगिनी नहीं है, जैसे गीतादि शब्दोंमें बिना वाच्यप्रतीतिके उपयोगके ही रसादिप्रतीति हो जाती है इसी प्रकार यहां होगी । इस पूर्वपक्षकी शङ्काको मनमें रखकर सिद्धान्तपक्षी फिर कहता है—

[सिद्धान्तपक्ष] २. यदि वाच्यप्रतीतिके बिना ही प्रकरणादिसहित शब्दमात्रसे रसादिप्रतीति साक्ष्य हो तो [किसी वाच्यविशेषमें] वाच्य-वाचक न समझने [और सब प्रकरण भी न जानने] परन्तु [किसीके द्वारा] प्रकरणका ज्ञान कर लेनेवाले ज्ञातकके भी काव्यके श्रवणमात्रसे रसादिप्रतीति होनी चाहिये [जैसे गीतादि शब्दोंसे बिना वाच्यादिके ज्ञातके प्रकरण आदि सहित श्रवणमात्रसे रसादिप्रतीति होती है] । वाच्य और व्यङ्गयप्रतीतिके साथ होनेपर [व्यङ्गकत्वमें] वाच्यप्रतीतिका कोई उपयोग

१. 'रसाभिव्यक्तिरस्ति' नि०, दी० । २. 'वाच्यवाचकप्रतीतिस्यत्तरकालत्वं' दी० । ३. 'क्रियताम्' दी० ।

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ध्वन्यालोकः

अनन्तरदास

पण्डित दामोदर झा

काशी संस्कृत सीरिज

काव्यमात्रश्रवणादेवासौ भवेत्। सहभावे च वाच्यप्रतीतेऽनुपयोगः, उपयोगे वा न सहभावः।

यों है। और यदि उपयोग है तो सहभाव नहीं हो सकता [इसेलिए जिन शब्दोंमें व्याक्तिमूलक व्यञ्जकत्व रहता है उनमें वाच्य और व्यङ्ग्यप्रतीतिमें क्रम अवश्य होता है]।

यहाँ 'अनवघारितप्रकरणानाँ' यह पाठ अशुद्ध और सन्दिग्ध-सा प्रतीत होता है। परन्तु निर्णय-सागरीय तथा बनारसी दोनों, अर्थात् मुद्रित तीनों संस्करणोंमें यही पाठ पाया जाता है। इसलिए मूल पाठ तो यही मानना चाहिए। परन्तु उसक्री व्याख्या विशेष ध्यानमे ममझनी चाहिए।

जैसे गीत आदिके शब्दोंमैँ वाच्यार्थकी प्रतीतके बिना भी केवल प्रकरण आदिके सहकारसे रसादिकी अनुभूति हो जावी है उसी प्रकार काव्यमें भी वाच्यप्रतीतिके बिना भी प्रकरण आदिके सहकारसे रसादिकी प्रतीति हो सकती है। इसलिए रसादिकी प्रतीतिमें वाच्यप्रतीतिका कोई उपयोग नहीं है। इस शङ्काके समाधानका प्रयत्न इस प्रसङ्गमें किया जा रहा है।

प्रस्तुत पङ्क्तियोंका भाव यह है कि यदि वाच्यप्रतीतिके बिना ही प्रकरण आदिसहकृत शब्दमात्रसे रसादिकी प्रतीति सिद्ध हो तो 'अनवघारितप्रकरण' अर्थात् प्रकरणको न जाननेवाले और स्वयं वाच्यवाचकभावको न समझनेवाले श्रोताओंको भी काव्यके शब्दोंके श्रवणमात्रसे रसादिकी प्रतीति होनी चाहिए।

शङ्कामें वाच्यप्रतीतिके बिना केवल प्रकरण आदिके साहायता रसप्रतीति दिखलायी थी इसलिए उत्तर देते समय प्रकरणसहकारको सुचित करनेके लिए 'अवघारितप्रकरणानाँ' पाठ होना चाहिए था। उसे दशामें जिनको स्वयं वाच्यवाचकभावका ज्ञान नहीं है। परन्तु प्रकरणका ज्ञान है ऐसे श्रोताओंको भी काव्यशब्दोंसे रसादिकी प्रतीति होनी चाहिए यह समाधानकी सङ्गति ठीक लग जाती है।

'अनवघारितप्रकरणानाँ'की सङ्गति सरलतासे नहीं लगती है। इसीलिए 'बालप्रिया' टीकामें 'अवघारितप्रकरणानाँ' यही पाठ मानकर इस प्रकरणकी व्याख्या की है। 'तदवघारित इति । तत्-अर्हि, अवघारितं शातं प्रकरणं यैस्तैःऽम्', इस व्याख्यासे स्पष्ट प्रतीत होता है कि बालप्रिया टीकाकार दीक्षितिकरण प्रकरणको ज्ञातसुत् नहीं अपितु स्वरूपसत् उपयोगी मानकर सङ्गति लगानेके प्रयत्न किया है।

अर्थात् शाब्दपक्षमें प्रकरणकी स्वरूपसत्ता ही रसाविम्प्रतीतिमें उपयोगी मानी है, ज्ञानको नहीं। काव्यशब्दोंमें प्रकरण स्वरूपतः तो विद्यमान है ही, चाहे उसके ज्ञानकी आवश्यकता नहीं है; इसीलिए 'अनवघारितप्रकरणानाँ' अर्थात् जिन्होंने प्रकरणको ग्रहण नहीं किया है और स्वयं 'वाच्यवाचकभाव'को भी नहीं जानते उनको भी काव्यशब्दोंके 'श्रवण' प्रत्यक्षमार्गसे रसादिकी प्रतीति होनी चाहिए।

इस प्रसङ्गमें दीक्षितिकारका हेतु इस प्रकार है—

यदि सर्वेषु रसादिव्यञ्जकप्रतीतौ शब्दश्रवणप्रत्यक्षस्यैव कारणत्वं स्यात् तर्हि ये: काव्यशब्दा: श्रुता: किन्तु तेषां प्रकरणादिग्रहो वाचकशब्दनिरूपणाभिप्रायश्रु न ज्ञात: तेषां वाच्यार्थप्रतीतित्यंभावेन व्यवस्थितैरप्रतीतिरपि कुत्रो न स्यात्। भवन्तु ते वाच्यार्थप्रतीतेःसन्त्कारणात्वान्नैष दोष:।

तदिह रसादीनामभिव्यक्तिरन्वितानां प्रत्यक्षमात्रकारणस्य तत्त्रापि जानाम: कुलवध्वा । न च प्रकरणादिज्ञानमात्रान्वितस्य भवन्त: कारणत्वमवधारयिष्याम:। स्वरूपसत: प्रकरणादेश्रान्नान्वितकारणत्वात्। तस्मात् काव्यजयघन्र्जयप्रतीतौ वाच्यप्रतीतेः कारणत्वमवश्यमीमिति भावः।

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कारिका ३५ ] तृतीय उद्योतः २५९

येषामपि स्वरूपविशेषप्रतीतिनिमित्तं व्यङ्ग्यकत्वं यथां गीतादिशब्दानां वेषामपि स्वप्रतीतेर्देव्यङ्क यप्रतीतेक्ष नियमभावी' क्रमः । तत्रु' शब्दस्य क्रियापौर्वापर्येमनन्य-साध्यत्वस्फुटघटनास्वाघुभाविनीधु वाच्येनाविरोधिन्यमिधेयान्तरचिल्लक्षणे रसादौ न प्रतीयते ।

इस प्रकार दीधितिकारने मूलके 'अनवधारितप्रकरणानां' पाठकी सङ्ज्ञति लगानेके लिये यह कल्पना की है कि पूर्वपक्षी गीत आदि शब्दोंमें केवल प्रकरणकी स्वरूपसत्ताका उपयोग मानते हैं, उसके ज्ञानका नहीं । परन्तु दीधितिकारकी यह कल्पना निश्चितरूपसे न्याय्य कल्पना नहीं कही जा सकती । पूर्वपक्षी प्रकरणको स्वरूपसत् ही उपयोगी मानता है इसका विनिगमक कोई युक्ति या प्रमाण नहीं है । दीधितिकारने केवल 'अनवधारितप्रकरणानां' पाठकी सङ्ज्ञति लगानेके लिये ऐसी कल्पनां कर ली है ।

लोचनकारकी इस स्थलकी व्याख्या भी बहुत स्पष्ट नहीं है । उन्होंने लिखा है—

"नतु गीतशब्ददेव वाच्यशक्तित्रात्प्रनुपयोगिनि, यत्नु कचिच्चू तेऽपि कार्ये रसप्रतीतिनं भवति तत्रोचितः प्रकरणावगमादः सहकारी नास्तीत्यादृशक्याह—यदि चेति । प्रकरणावगमो हि क उच्यते, किं वाक्यान्तरसहायातम्, अथ वाक्यान्तराणां समर्पितविश्वाच्यमुप । उभयपरिकल्पनेऽपि न भवति प्रकृतवाक्यार्थावेदने रसोदयः । स्त्यंवमिति । प्रकरणमात्रमेव परेण केनचिद्वेषां व्याख्यातमिति भावः । न चानव्यवस्थितैकवाक्यप्रतीतिमुपपाद्य, अतएवतत्सहभावो हि रसनारसनात्रितौ मात्सर्यादधिकं किचित् पुष्णीत इत्यभिप्रायः ।"१

इस व्याख्यामें लोचनकारने मूलके 'स्वयं' पदको मिलाकर उसे 'अनवधारितप्रकरण-ज्ञानां'के साथ जोड़कर सङ्ज्ञति लगानेका प्रयत्न किया है । अर्थात् जिनको स्वयं काव्यशब्दोंके वाच्यवाचकभावका ज्ञान नहीं है, जो काव्यशब्दोंके अर्थको नहीं समझते, और अर्थ न समझनेके कारण स्वयं प्रकरण भी नहीं समझ सकते परन्तु किसी दूसरोंने उनको प्रकरण बता दिया है—'प्रकरणमात्रमेव परेण केनचिद्वेषां व्याख्यातम्', उनको अर्थ न समझनेपर भी रसकी प्रतीति होनी चाहिये । परन्तु होती नहीं है । इसलिये रसप्रतीतिमें वाच्यप्रतीतिकी भी उपयोग है । इस प्रकारकी व्याख्या लोचनकारने की है । उनके अभिप्रायके अनुसार हमने अनुवाद किया है । क्योंकि अन्य सब व्याख्याओंकी अपेक्षा यह व्याख्या अधिक सरल और स्वारसिक व्याख्या है ।

और [दूसरे प्रकारके शब्दोंमें] जहाँ [गीतादिमें] स्वरूपविशेषप्रतीतिमूलक व्यङ्ग्यकत्व है, जैसे गीतादि शब्दोंमें, उनके यहाँ भी स्वरूपविशेषकी प्रतीति और व्यङ्ग्यकत्चं अवचय रहता है । किन्तु शब्दकी [वाचकत्वं और व्यङ्गयकत्वरूप अथवा अमिधाज्ञानारूप] क्रियाओंका पौर्वापर्य [क्रम], प्रकारान्तरासाध्यफलक क्षिप्रभाविनी रचनाओंमें वाच्यके अविरोधी तथा अन्य वाच्योंसे विलक्षण रसादि [रूप व्यङ्गचके बोधनमें] वह क्रम प्रतीत नहीं होता है ।

'तत्ु' से लेकर 'प्रतीयते' पर्यन्त पंक्तिकी व्याख्या लोचनकारने इस प्रकार की है । नतु

१. 'नियमभावक्रम:' नि० । २. 'तत्र तु' नि० ।

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ध्वन्यालोकः

कारिका ३५

कचित् लक्ष्यत एव । यथालुरणनखरुपचयक्रमप्रतीतिवशु । तत्रापि कथमिति चेद्व्यत्थे । अर्थशक्तिमूलालुरणनखपदयक्रमये? ध्वननौ तावदभिधेयस्य तत्त्सामध्योक्षिप्तस्य वार्थस्य, अभिधेयान्तरविलक्षणतया, अत्यन्तविलक्षणे ये प्रतीतौ तयोरेक्ष्यनिर्दवो संक्षेप्त् क्रमः किं न लक्ष्यते इत्याशङ्क्याह । तत्त्वश्ति । क्रियापौर्वापर्यभिस्तनेन क्रमस्य स्वरूपमाह । 'क्रियते इति क्रिये वाच्यव्यत्‍‌ययप्रतीतिः, यदि वाभिधाव्यापारो व्यज्जनापरव्याप्यो ध्वननस्यापारक्षेति क्रिये? । 'क्रियते इति क्रिये' यह 'क्रिये' शब्दकी व्युत्पत्ति है । 'जो की जाये' वे दोनों क्रियाएँ 'क्रिये' हूँ । इसमें वाच्य और व्यङ्गयप्रतीतिरूप दो क्रियाएँ अथवा अभिधाव्यापार और व्यज्जना नामक ध्वननव्यापार ये दो 'क्रिये' शब्दसे ग्रहण की जा सकती हैं । 'तयोः पौर्र्वापर्य न प्रतीयते ।' उनका पौर्वापर्य क्रम प्रतीत नहीं होता है । 'क? रसादौ विषयेः । कीडशि, अभिधेयान्तराद्‌ विलक्षणे सरव्यधैवानभिधेये, अननय भवितव्यं तावत् क्रमेणयुक्तम्‌ । तथा वाच्येनाभिधेयविशेषौगद् विलक्षणे सरव्यधैवानभिधेये, विरोधिनी, विरोधिनी तु लक्ष्यत एवेत्यर्थः ।' कहाँँ प्रतीत नहीं होता ? रसादि-विषयमें । कैसे रसादि-में ? अभिधेयान्तर अर्थात् अभिधेय विशेषसे भिन्न, अर्थात् सर्वथा अनभिधेय रसादिमें । इससे यह सूचित किया कि क्रम अवश्य होना चाहिये । तथा वाच्यसे अविरोधी रसादिमें क्रम लक्षित नहीं होता । इसका अर्थ हुआ कि विरोधीमें लक्षित होता है । 'कुतो न लक्ष्यते इति निमित्तसंशयमनिर्दिश्य हेतुंनतरगमेहेतुमाह । वाच्य भावनाविनिर्भिति? क्यों नहीं लक्षित होता है । इस विषयमें निमित्त शसयैसे निर्देश करते हैं— 'आश्रयभावनाद्‌व । 'अननयसाध्यंनतत्फलस्ङ्घटनाद्‌व, रसस्ङ्घटनात् पूर्वमाधुर्यादिलक्षणा: प्रतीपादिता गुणविनिर्णयावमरे । तात्क्ष तत्कला:, रसादिप्रतीति: फलं यार्श्व तथा अननयत् तदेव साध्यं यासां न हि ओजोघटनायाः करुणादि्र्रतीतेः साध्या ।' घटनायेः माधुर्यादिका ग्रहण करना चाहिये यह वात पहले गुणविनिर्णयपक्षके अवसरपर कह चुके हैं । 'तत्कला:' का अर्थ रसादि-प्रतीति जिसका फल है अर्थात् ओजंक अनुगुणघटनारूप करण आदिकी प्रतीति नहीं हो सकती, यह सूचित किया । 'ननु भवत्वेवं सङ्घटनानां स्थितिः, क्रमस्तु किं न लक्ष्यते ? अत आह—आश्रयभावनिनिपुण । वाच्यप्रतीतिकालप्रतीक्षणेन विनैव हि स्फुटति ता रसादीन्‌ । भावयन्ति तदास्वादं विदघतीत्यर्थः ।' रसादिकासौँ स्थिति जैसे आप कहते हैं वैसी हो परन्तु क्रम क्यों नहीं मालूम होता ? इसके उत्तरके लिये 'आश्रयभावनिनिपुण' कहा है । वाच्यप्रतीतिकी

संलक्ष्यक्रम शब्दशक्तिमूलेमें क्रम

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कारिका ३३ ] तृतीय उद्योतः २५१

निमित्तानिमित्तिभाव इति स्कुटमेव तत्र पौर्वापर्यम् । यथा प्रथमोद्योते प्रतीममानार्थ्य-सिद्धयर्थमुदाहृतासु गाथासु । तथाविधे च विषयेऽवाच्यत्वेऽप्योरत्यन्नविचक्षणत्वाद् यैव एकस्य प्रतीति: सैवेतरस्येति न शक्यते वक्तुम्।

शब्दशक्तिमूलालंकाररूपव्यङ्ग्‍ये तु ध्वनौ— "गावो वः पावनानां परम्परिमितां प्रीतिमुत्पादयन्तु"1 इत्यादौ चेह्यप्रतीतौ

शब्द्यसमर्थेऽद्वैतस्योपमानोपमेयभावप्रतीतिरूपंवाचकपदविरहे सति, अर्थेसामध्यादाक्षिप्यते, तत्रापि 'मूलक्ष्ममिघे यथा यालक्‍क्‍ारप्रतीत्योः पौर्वापर्यम् ।

पदप्रकाशशब्दशक्तिमूलालंकाररूपव्यङ्ग्‍व्येयेपि ध्वनौ विशेषणपदस्योपमेयार्थसम्बन्ध-योग्यस्य योजकं पदमनुसन्धान योजनमशाब्दमप्यर्थादौ स्थितमित्यत्रापि पूर्ववदविघेयत्वात्‌सा-

विलक्षण [वाच्य और व्यङ्ग्‍यरूप] प्रतीतियाँ हैं । उनके कार्यकारणभावको डिपाया नहीं जा सकता है, इसलिए उनमें पौर्वापर्य [क्रम] स्पष्ट ही है । जैसे प्रथम उद्योतमें प्रतीममान अर्थंककी सिद्घिके लिये उदाहृत ['भ्रम' ध्वामिक् इत्यादि] गाथाओंमें । ऐसे स्थलोंमें वाच्य और व्यङ्ग्‍यके अत्यन्त मिन्न होनेसे जो एक [वाच्य या व्यङ्ग्‍य] की प्रतीति है वही दूसरे [व्यङ्ग्‍य या वाच्यद्‌री] प्रतीति है यह नहीं कहा जा सकता है [अतपव अर्थशक्तिमूल संलक्ष्याक्रमध्यङ्ग्‍यध्वनिनमें क्रम अवश्य ही मानना होगा] ।

संलक्ष्यमक्रम अर्थशक्तिमूलमें क्रम

[संलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्‍यध्वनिके दूसरे भेद] शब्दशक्तिमूल संलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्‍य ध्वनिनमें "गावो वः पावनानां परम्परिमितां प्रीतिमुत्पादयन्तु" इत्यादि [पृष्ठ १२७ पर उदाहृत] उदाहरणमें, शब्दतः दो अर्थोंकी [शाब्दी] प्रतीति होनेपर भी, उस अर्थद्‌व्यके उपमानोपमेयभावकी प्रतीति उपमानवाचक पदके अभावमें [वाच्यार्थकी प्रतीतिके बाद] अर्थ-सामध्यंसे व्यङ्ग्‍य ही होती है । इसलिए वहाँ भी अविघेय [वाच्य] और व्यङ्ग्‍य

[उपमा] अलङ्कारकी प्रतीतिमें पौर्वापर्य [क्रम] स्पष्ट दिखलाइ देता है ।

[संलक्ष्यकमव्यङ्ग्‍यध्वनिके शब्दशक्तिमूल प्रभेदके अन्तर्गत वाक्यप्रकाश्यके पद-प्रकाश्य शब्दशक्तिमूल संलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्‍यध्वनिनमें भी [जिसका उदाहरण "प्राप्तं धनैरर्थिजनसि । वाच्यां ददृशे नु स्त्रियो यदि नाम नास्सि । पथि प्रसक्ताम्बुगलरस्तद्‌गण-कृपोद्यवा किम् जडः कर्तोऽहम्1" पृष्ठ १५९ पर दिया जा चुका है, उसमें] दोनों अर्थों

[कृप और अहम्] के साथ सम्बन्ध योग्य विशेषण [जड़] को, जोडनेवाले शब्दके बिना भी [दोनों ओर] योजनाअशाब्द हेतवे रूप भी अर्थशक्तिसे निष्पन्न होती है । इसलिए यहाँ भी पूर्व [अर्थात वाक्यगत शब्दशक्तिमूलके उदाहरण 'गावो वः'] के समान वाच्य अर्थ [यहाँ जड़त्वका दोनों ओर अन्वय होनेसे दीपकाळ्‍कार वाच्य है । 'अभामि-

  1. 'मूलक्ष्म' नि०, दी० ।

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ध्वन्यालोकः

अभिनवगुप्त

श्रीनिवासमल्होत्रा

२५२

[ कारिका ३३ ]

मध्येऽपिसालङ्कारमात्रप्रतीत्योंः सुश्लिष्टमेव पौर्वापर्य्यम् । आर्थींऽपि च प्रतिपत्तिष्लथाविधेविषये 'उभयार्थसम्बन्धयोग्यशब्ददासामर्थ्यप्रसाधितेति शब्दशक्तिमूला कल्प्यते ।

अविवक्षितवाच्यस्य तु ध्वनेः प्रसिद्धस्वविषयवैमुख्यप्रतीतिपूर्व्वकमेवार्थान्तरप्रकाशनमिति नियमभावी क्रमः । । तत्राविवक्षितवाच्यत्वादेव वाच्येन सह व्यङ्ग्य वस्य क्रमप्रतीति-विचारो न कृतः । तस्मादविभावनाविघटानामिधेयप्रतीत्योरिव वाच्यव्यङ्ग्य यप्रतीत्योर्निमित्तानिमित्त-भावानियमभावी क्रमः । । न च तदुक्तत्वात् ।

घेयालङ्कारो दीपकं जडस्योभयत्रान्वयात् । तत्रालङ्कार्योक्षिता ध्वोपमा] और उसकी सामर्थ्यसे आध्र्रिस अलङ्कारकी प्रतीतियोंमें पौर्वापर्य्य [क्रम] निश्चित् ही है । जैसे श्लोकार्द्ध-

यहाँ निर्णयसागरीय संस्करणमें 'ध्वनिदासामर्थ्यप्रतिप्रसवभूतेति' और वनारसके संस्करणमें 'प्रसाविता' पाठ है । इनमें निर्णयसागरीय संस्करणमें 'प्रति' शब्द अधिक जान पड़ता है । उससे तो अर्थ भी उलटा हो जाता है । 'प्रसव' का अर्थ उत्पत्ति और 'प्रतिप्रसव' का अर्थ प्रलय होता है । इसलिए 'प्रतिप्रसव' पाठ तो असङ्कत है ।

इस प्रकार विवक्षितान्यपरवाच्य [अभिधामूल] ध्वनिके संलक्ष्य क्रमव्यङ्गच्यमेदके अवान्तर भेद शब्दशक्तिमूल तथा अर्थशक्तिमूल दोनोंमें क्रम संलक्षित होता है और असंलक्ष्यक्रम रसादिमें नहीं, यह दिखला चुके । अब अविवक्षितवाच्य [लक्षणामूल ध्वनि]में भी क्रम

दिखलाते हैं—

अविवक्षितवाच्य [लक्षणामूल ध्वनि] में भी क्रम

अविवक्षितवाच्यस्यभ्वनि [के अत्यन्ततिरस्कृतवाच्यके उदाहरण 'निःश्वासैर्‌ इवादर्शः' और अर्थान्तरसङ्क्रमितवाच्यके 'रामोऽपि सदृशं सहे' उदाहरण 'पहिले दयें जा चुके हैं उन]में अपने प्रसिद्ध अर्थकी प्रतीतिसे विलक्षण होकर ही अर्थान्तरका प्रकाशन होता है । अतःएव क्रम अवधेयसम्मावी है । परन्तु वाच्यके अविवक्षित होनेसे ही वाच्यके साथ व्यङ्गच्यके क्रमकी प्रतीतिका विचार नहीं किया गया है ।

इसलिए वाच्य [शब्द और अर्थ]की प्रतीतियोंके समान वाच्य और व्यङ्गच्यकी प्रतीतियोंमें कारणकार्यभाव होनेसे क्रम अवधेयसम्मावी है । [किन्तु]उक प्रकारसे वह [क्रम] कहाँ लक्षणित होता है और कहाँ [असंलक्ष्यक्रमव्यङ्गच्यथरासादि स्वनियोंमें] संलक्षित नहीं होता है ।

१. 'उभयार्थसम्बन्धयोग्यशब्ददासामर्थ्यप्रसाधितेति' नि, दी० । प्रसविता वा० मि० ।

२. 'तत्र स्वविवक्षितवाच्यत्वादेव' नी० । 'वाच्यापि विवक्षितवाच्यत्वादेव' नि० ।

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कारिका ३२ ]

तृतीय उद्योत:

२५३

तदेवं व्यङ्ग्यैकमुखेन ध्वनिप्रकारेयु निरूपितेपू काचिद्रू दृश्यताम् , किंमिदं व्यङ्ग्यकव्वं नाम ? व्यङ्गचर्थप्रकाशनम् ? तहि व्यङ्ग्यकत्वं व्यङ्गच-रथं चारुत्वं । व्यङ्ग्यकावसिद्ध च-धीनं व्यङ्गच्यत्वम् , व्यङ्गचयापेक्षया च व्यङ्गकत्वसिद्धिरिति नेदनमर्थाद्‌व्यवस्थानम् । नतु वाच्यकच्यतिरिक्तस्य च व्यङ्गच-यस्य सिद्धिः प्रागेव प्रतिपादिता । तथासिद्धचयोनि वयक्षतवसिद्धिरिति कः पर्यनुयोगावसरः ? सत्यमेवैतत् । प्रागेव व्यङ्कक्यप्रकाशनानुप्रविष्टतया तन्निष्ठा सिद्धिर् इदानीं ह्रुता, स तस्यै व्यक् ख्यातयैव कस्माद् व्यपदिश्यते ? यत् च प्राधान्चेनैववस्थानं तत् वाच्यतयैववाचो व्यपदेश्यं युक्तः । तत्प्रस्तावाद् वाक्यस्य । अतएव तद्वृत्तौ निर्दिष्टा वाक्यस्य वाचकत्वमेव व्यापारः, किन्तस्य व्यापारान्तरवलयस्या ? तस्मात् , तात्पर्याधिष्ठयो बोध्यः स तावन्मुख-

पुनः व्यङ्गच-व्यङ्गकभावकी सिद्धि

इस उद्योतके प्रारम्भमें 'तदेव व्यङ्गचप्रधानत्वेन वचनेः वर्ण्गिले मप्रनेदृं स्वलपे, पुनरप्यङ्क-

मुखेन प्रकाशन्ते' यह प्रतिज्ञा की थी, तदनुसार यहाँतक रअअंकमुखेन ध्वनिम्रनेदृं का निरूपण

किया ! अब उपसंहार करते हुए प्रथम उद्योतमें सम्भाषित व्यङ्गच-व्यङ्गकभावकं 'सध्वाःपिस्ववनमव्याय'-ते हृदृ करानेके लिये फिर पूर्वपक्ष करने हैं ;

[पूर्वपक्ष] इस प्रकरण व्यङ्गकत्वकी हेतिसे यत्निचे येत्तंकला विस्मृतिका करनेको हैं

कहा जा सकता है कि यह व्यङ्गकत्व क्या पदार्थ है ? व्यङ्गच्य अर्थका प्रकाशन 'धी व्यङ्गकत्व

है] ? [सो ठीक नहीं है, क्योंकि] अर्थका व्यङ्गकत्व अर्थका व्यङ्गच्यत्व [सिद्ध] नहीं हो

सकता । व्यङ्गकत्वकी मिद्धिके अर्थीत् व्यङ्गच्यकी [सिद्धि] और व्यङ्गच्यकी दृप्तिस

[व्यङ्गकत्ववाद्दी उत्त्तरपक्ष] यद्यपसे अनिर्वचच व्यङ्गच्यकी सिद्धि पह्लेे ही

[प्रथम उद्योतमें] प्रतिपादित कर चुकें हैं ! उसकी मिद्धिके द्वार व्यङ्गकत्वकीं प्रसोद्ध

हो जायगी इस प्रकार म्रदर्शन करने [पर्यनुयोग] का कौन-सा अवसर है ? [अर्थात् कोई

अवसर नहीं है] ।

[व्यङ्गकत्वप्रतिपेधक श्रीमान्कक आदिका पुनःपक्ष] एक है, पहिले करी हुईं

युक्तियोंसे वाच्यदृ्य भी व्यङ्गच्य क्यों न्हीं कहते ? अर्थात् व दोनॉ अर्थ समान ही हैं] जहाँ

[वह अर्थ] प्रधानरुपसे स्र्थित हुँ वहाँ उसका वाच्य कहना ही उच्तित है क्योंकि वाक्य

मुख्यतः उस्कीा प्रतिपादन करना है ! इस्मीलप् उस [अर्थ] कें प्रकाशक वाक्यका

१. 'चार्थैस्यापि' नि०, टी० ।

२. 'वाचकंवस्य' नि०, टी० ।

१९

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ध्वन्यालोकः

[ कारिका ३३

ख्याततया वाच्यः। या त्वन्तरा तथाविधे विषये वाच्यान्तरप्रतीति: सा तत्सत्तानुरू-पायमान्त्रम्, पदार्थप्रतीतिरिव वाक्यार्थप्रतीति:।

अत्रोच्यते—चत्र शब्दः स्वार्थंभिवधानोऽर्थानन्तरमवगमयति तत्र यत्सस्य स्वार्थो-भिधायित्वं यच्च तदथानन्तरावगमहुतुत्वं तयोरविशेषो विशेषो वा ? न तावद्विशेषः।

यस्मात्तौ द्वौ व्यापारौ भिन्नरूपौ च प्रतीयते एव। तथाहि वाचकत्वलक्षणो

नामक] अलग व्यापारकी कल्पना करनेकी क्या आवइयकता है। इसलिये [वाचकका]

तात्पर्यविषयौभूत जो अर्थ है वह मुख्यार्थ होनेसे वाच्य अर्थ है। और इस प्रकारके

स्थलोंमें वीचमें जो दूसरें वाच्यार्थकी प्रतीति होती है वह उस [मुख्य] प्रतीतिका

उपायमात्र है, जैसें पदार्थप्रतीति वाक्यार्थप्रतीतिकी [उपायमात्र होती है]।

यहाँ कुमतिलभट्टु तथा वैैयाकरण आदिकी ओरसे यह सामान्य पूर्वपक्ष किया जा सकता

है। इस विषयमें 'श्लोकवार्तिक'के 'वाक्याधिकरण'में दी हुइ निम्नलिखित कारिकामें 'भटृमत' इस

प्रकार दिखलाया है—

"वाक्यार्थमितये तेभां प्रवृत्तौ नान्तरीयक्रम्।

पाकके लिये इन्धनके उजालरूप अवान्तर व्यापारके समान वाक्यार्थबोधके लिये शब्दोंका

पदार्थप्रतिपादनरूप अवान्तर व्यापार नान्तरीयक उपायमात्र है। अर्थात् शब्दोंसे उपस्थित होनेवाले

पदार्थोंसें, तात्पर्यहेतुपरिस अथंका प्रतीपादन होता है वही वाक्यार्थ है और वह वाच्य ही है।

प्रभाकरके मतमें भी पदार्थ और वाक्यार्थमें 'निमित्तनिमित्तिभाव' है। और "सोडयमिथोरिव

द्वयेऽप्यन्तरौडमिधाध्यापारः'के मिद्धान्तके अनुसार एक ही अभिधाव्यापारसे वाच्य और व्यङ्गच्य

दोनों अर्थोंकी प्रतीति हो होती है। *विशेष यात यह है कि प्रभाकर 'अन्विताभिधानवादी' हैं इसलिए

उनके मतमें पदार्थ और वाक्यार्थका निमित्तनिमित्तिभाव केवल उत्पत्तिकी दृष्टिसे ही है, ज्ञप्तिकी

हृष्टिसे तां प्रथम वाक्यार्थकी ही प्रतीति हाती है, पदार्थकी नहीं, कयिंकि उनके अन्विताभिधानवाद-

की सङ्ङति इसीमें लग सकती है। प्रभाकर जिस प्रकार उत्पत्तिमें पदार्थ और वाक्यार्थका कारण-

कार्यभाव मानते हैं उसी प्रकार वैैयाकरण भी मानते हैं। परन्तु प्रभाकरमतका कार्यकारणभाव

पारमार्थिक है और 'स्फोटवादी' वैैयाकरणके यहाँ वह अपारमार्थिक है। इस प्रकार इन तीनों मतोंकी

आरातें यह व्यङ्गचतत्‌वरोंधी सामान्य पूर्वपक्ष किया जा सकता है। आगे इसका उत्तर देते हैं।

[सिद्धान्तपक्ष]—इस [पूर्वपक्षके होने] पर यह [सिद्धान्तपक्ष] कहलाते हैं। जहाँ

शब्द अपने अर्थंका अभिधान करके, दूसरें अर्थका बोध कराता है, वहाँ उस

[शब्द का] जो स्वार्थका अभिधान करना और परार्थका बोध कराना है, उन दोनोंमें

अभेद है अथवा भेद ? अभेद तां कह नहीं सकते हैं। कयोंकि वे दोनों व्यापार

विभिन्नलिपयक और मिन्नरूप [अलग] प्रतीत होंते ही हैं, जैसे कि शाब्दका

वाचकतरूप व्यापार अपने अर्थंक दिपयमें और ग़कतच्त्वरूप व्यापार दूसरें अर्थंक

विषयमें हाता है। वाच्य और व्यङ्गच्य अर्थके विषयमें [शब्दकें] स्व ओर पर [अर्थ-

[तिपयक] व्यवच्हारक नहीं किया जा सकता है। [कयोंकि] एक [वाच्यार्थ]की [शब्द-

के साथ साक्षात्] सम्बन्धित रूपसे प्रतीति होती है और दूसरेकी [शब्दकें] सस्बन्न्धी

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कारिका २३ ]

नर्त्तीय उद्योत:

२५५

व्यापारः शाब्दस्य स्वार्थविषयः, गमकत्वनिरासंगनु अर्थान्तरविषयः । 'न च स्वपरतद्वारो वाच्यतयाऽऽकाङ्क्ष्योऽपहृतोऽनुमः' इति । एकस्य सम्मतनिधत्वेन प्रतीतरपरस्य सम्मानिधसम्वन्धत्वेन । वाच्यो हार्थः साक्षान्निरदस्य सम्मन्धी, तदितरसत्वभिधेयसामर्थ्याक्षिप्तः सम्वन्धनिषसम्वन्धी । यदि च स्वसम्वन्धित्वं साक्षात्स्य स्यात् तदर्थान्तरस्यवद्वार एव न स्यात् । तस्मात् विषयभेदस्तावन् तयोः व्यापारः सुप्रसिद्धः ।

रूपभेदोप प्रसिद्ध एव । नहि यत्राभिधानशक्तिः सैवावगमनशक्तिः । अवाचकस्यापि चेष्टादेर्यविशेषकस्यापि गीतशब्दादेरसादिलक्षणार्थंगमदर्शनात् । अशब्दस्यापि चेष्टादेर्यविशेषप्रकाशनप्रसिद्धे । तथाहि "श्रीडायोगान्नतवदनया" इत्यादिश्लोके चेष्टाविशेषः सुकविनार्थप्रकाशनहेतुः प्रदर्शित एव । तस्माद् भिन्नविषयत्वाद् भिन्नरूपत्वाच स्वार्थाभिधाचित्त्वमथान्तरावगमहुत्वं च शाब्दस्य यत्, तयोः स्पष्ट एव भेदः ।

न तर्हीदानीमवगमनस्य , अभिधेयसामर्थ्याक्षिप्तस्य्यार्थान्तरस

[अर्थ] के सम्नन्धी [परम्पर-सम्वन्धित] रूपसे प्रतीति होती है । वाच्यार्थ साक्षात् शाब्दका सम्नन्धी है और उससे भिन्न दूसरा अर्थ तो वाच्यार्थकी सामर्थ्यसे आक्र्षित सम्वन्धी-सम्वन्ध [परम्परा या शाब्दसे सम्वद्ध] हैं । यदि उस [वाच्यार्थसे भिन्न अर्थ] का [शब्दके साथ] साक्षात् स्वसम्वन्धित्व [शब्दसम्बन्धित्व] हो तो उसमें [अर्थान्तर, वाच्यार्थसे भिन्न] दूसरा अर्थ, यह व्यवहार ही न हो । इसलिये [स्वार्थविषयमें वाच्यव्यवहार और परार्थविषयमें व्यङ्ग्यव्यवहार दानसे] उन दोनों व्यापारोंका विषयभेद प्रसिद्ध ही है ।

स्वरूपभेद भी व्यवक्तसाधक

[वाच्य और व्यङ्ग्यका स्वरूपभेद भी प्रसिद्ध ही है ।] जो [शाब्दकी] अभिधान [वाचक] शक्त है वही अवगमनं [व्यञ्जक] शक्त नहीं है । कयोंकि जा गीत आदिके शब्द वाचक नहीं [अभिधाशक्तिसे रहित] हैं, उनसे भी रसादिरूप अर्थकी अवगति होती है । और [न केवल अभिधानरहित अपितु] सादृश्यप्रयोगरहित कव्वल चेष्टादिसे भी अर्थविनिरोषका प्रकाशन प्रसिद्ध है । जैसे "श्रीडायोगान्नतवदनया" [पृष्ठ ९८०] इत्यादि इलोकमें सुकविने चेष्टाविशेषको अर्थप्रकाशनका हेतु दिखलाया ही है । इसलिये भिन्न-विषय और भिन्नस्वरूप होनेसे शाब्दके जो 'अर्थाभिधायित्त्व' और 'अर्थान्तरावगमहुतुत्त्व' हैं उनका भेद स्पष्ट है [इसलिप शाब्दके स्वार्थाभिधायित्त्व तथा परार्थावगमहुतुस्वरूप वाच्यार्थमें] यदि विशेष [भेद]

१. 'यत्: स्वपरतद्वारो वाच्यगम्योऽपहृतोऽनुमतः' निः । 'तन्नः स्वपरतद्वारो वाच्यगम्योऽप रहो-तुमशक्य:' निः ।

२. 'अवगमनंस्य' नी ।

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ध्वन्यालोक

भट्टान्दिकृत पदाथेाँचकाराथे न्यायकाखण्डन

वाच्यत्वेन यद्यपवेद्यतैव, शब्दच्यापारगोचरत्वं तु तस्यास्माभिरविष्यात एव, तत्र व्यकृ यत्वेनैव, न वाच्यत्वेन ! प्रसिद्धाभिधानान्तरसन्नद्धच्ययोगत्वेन तु तम्यार्थान्तरस्य प्रतीते: शब्दान्तरेगण स्वार्थाभिधायिना यद्विषयीकरणं तत् प्रकाशनोक्तिरेव युक्ता ।

है तो फिर अभिधान [अर्थात् वाचक] और रूप, व्यतिरेक्य सामर्थ्येन आक्षिप्त दूसरे अर्थके वाचक क्यों न बनाया जाय ? [उस वाच्यसामर्थ्योक्षित] अर्थका शब्दव्यापारक! विषय होना तो हमें अभिमत ही है, परन्तु व्यङ्गच्यरूपसे न कि वाच्यरूपसे ! क्योंकि उस दूसरे [वाच्यव्यतिरिक्त] अर्थकी प्रतीति [जिस व्यङ्गच्य-प्रतिपादक वाचकसे इस समय उसका बोध कराया गया है उससे भिन्न, अन्य] प्रसिद्ध वाचक शब्दके समन्वयसे भी हो सकती है । इसलिये [किसी अर्थको अपने वाचक शब्दसे न कहकर] अभिधाशक्तिसे अपने दूसरे अर्थके वाचक [अर्थात् जिसका मुख्यार्थ कुछ और हो! इस प्रकारके किसी] दूसरे शब्द द्वारा जो [व्यङ्गच्यार्थको] बोघक विषय वनाना है उसके लिए 'प्रकाशन' कहना ही उचित है [वाच्य या वाचक आदि कहना उचित नहीं है ! इसलिये व्यङ्गच्य-वाचक शब्दका प्रयोग ठीक ही है ]!

भट्टान्दिकृत पदाथेाँचकाराथे न्यायकाखण्डन

अभी ऊपर ग्रन्थ २५४ पर 'वाक्यार्थश्रितये इत्यादि कारिका उद्भूत करके वाच्य और व्यङ्गच्य अर्थका पद? दार्शनिकै: विवरण किया था ; जैसे पाकधे. उपपादनमें काव्यशास्त्रज्ञलोक अपेक्षादर्शन व्यापार हेतु, है उससे प्रकार और तथाकथित 'व्यापार' का वोध तात्पर्याम्ना शक्ति द्वारा ही नकला है ! पदोंमें वाक्यार्थबोध येतेनेमे पदाथे बोध अवांतर व्यापारमात्र है । तात्पर्याशक्या अभिधानव्यापारनादि: भट्टनयायवाची भट्टुतर्के इस मतका खण्डन करनेके लिए पण्डित पदाथे-वाक्यार्थन्यसकर है। अभी अन्तिम करणं है। नयडमें पण्डित! वात तो यह है कि 'स्पोटवादी' वैयाकरण तः इस नदपदार्थी और वाक्याथे नैयायिकों है। उनने—आप्ततमैक मानते हैं---

पदे न वया विद्रतेतेऽतो वदध्वनं न च । वाक्यादतु नयान्मयन्ते प्रविभजै कान कधनन् ।।—वै० सू०

यह सम पद पदाथेकथनका अमतव्य है। केवल वाक्यके विर्दशनके लिए ही उनका उपयोग है। अन्वय 'रसनादि' ही सव्य है । इसीलिये नैवाकारमतेऽनुसार 'पदाथे नाक्यार्थनयाय' नहीं बन सकता है ! जो कुमारिलभट्ट आदि इस पदपदार्थी आदि व्यूहको असत्य नहीं मानते हैं उनके मतमें भी वट और नैयायिक उपपादन अथवा हमारा विवरणका त्याग यहाँ ला होगा । पदके उपपादन-कारण या मफेद;निकरण कत्नल अलंम प्रदर्शित नही होते; इस प्रकार वाक्य वन जाननेपर पदोंको, और वाक्यार्थप्रतीतिमें पदाथोको प्रीति अन्वित नहीं होते ! यह भी अभीष्ट नहीं है इसलिये भट्ट, नैयायिक, प्रभावकर आदि के मतमें 'पदाथे वाक्यार्थन्वयाय' नहीं वन सकता है । बौद्धदर्शन शून्यभद्रवादी है । उसमें पदोंका अन्वय नहीं ही ! नहं मतला है इधर कतिपयन्धदर्शनोंमें भी वाक्यार्थप्रतीतिकालमें पदाथे तिरोभूत हो जाते हैं ! इस प्रकार किया द्वारेदिक मतमें 'पदाथे वाक्यार्थन्वयाय' नहीं जन सकता है यह वात कहने हैँ—

१. 'तस्यार्थान्तरस्य च प्रतीते:' वृ०, मि०

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कारिका ३३ ] द्वितीय उद्योत: २४,३

न च पदार्थोऽकार्योऽर्थन्यायो वाच्यवाचकक्रियायुगः । यत्रः पदार्थोऽर्थतः निरतसन्देहवृत्तिः केदिचिद् विशिष्टद्रव्यरस्थितम् । यैरव्यसन्यकृत्स्नसमग्रं तत्रोपेतेन मेन्धकार्येद्रव्यार्थद्वार्घचर्यततदुपपादनकारणन्यायोऽत्रोपगन्तव्यः । यथाऽत्र हि घटे नित्यसत्ते तदुपादानकारणानां न दृश्यगुणानुसम्भवः । श्रैव वाच्ये तद्रूपं वा द्रव्यादौ पदार्थनाम । नेदं तथा विभक्ततयोः पदलम्ने वाक्यार्थच्युद्भिरेव दृश्यते । न त्वेष वाक्यवद् कृत्स्नोऽन्यायः ! स रे हि वाक्य कृत् स प्रधानकान्ते वाच्यवाचकक्रियाभ्यां भवति । वाच्यवाचकभावस्थितः । स च तस्य प्रकृतान्तः ।

तस्माद् घटप्रदीपरदर्थस्याः ! यद्येव हि पदोद्देशेन क्रतनीलादिकुरुतादयं न प्रदीपप्रकाशो निवर्त्तनं नहि दृश्याद् घटकृत् कृत्नोग्रं सन्निपतितः ।

यत्नु प्रथमोद्योते 'यथा पदार्थोऽर्थः' ह्यन्यगुणैः 'तदुपादानत्वं' सन्निविभया ।

वाच्य औीर वाचकत्वका पदार्थों साक्षार्थनयान मी नहीं है । क्योंकि कृत्स्न विवचन [यैयाकरण] पदार्थप्रतीतिका अन्यथैवि मानते हैं । जो [मद् यैयायिक आादिन्] इसको अन्यमन्य नहीं मानते हैं उनके वाच्यार्थ नय पदाथोंमें हत औीर उसके उपादान [समवायिकारण] का न्याय मानना हंगा! जैसे घटकेे चन जानीयेर उसके उपादानकारणों [समवायिकारण करणं] की अन्यथा प्रतीतन नहीं होरीी इसी प्रकार वाक्य अधचा वाक्यार्थकं प्रतीत होने [कमलादि' पद औीर पदाथोंककी एकता प्रतीयात् नहां होती ।

तत्र पदाथे वाक्यार्थ न्याय कैसे चनगा ?] उस समय 'वाक्यप्रतीतिकालेग पदौ औीर वाक्यार्थकं प्रतीत होनपर वाक्यार्थबुद्धि ही नहीं रहंगी । [क्योंकि मक् समपूर्ण अथंका योज्ञात करनचाहे पदेसमुदायका ही वाक्य कहते है । 'अन्धकवृन्दक नकचयम्' ह्यादि जैस्मिनीय सूचकें अनुमार अर्थका एकत्व होनेपर ह्री वाक्यन्व होता है । इसनलपि पदाथों औीर वाक्यार्थककी अन्य प्रतीतन नहीं सानी जा सकती हैं । औीर जय अलसा प्रतीतन नहीं होती हैं तब 'पदार्थ-वाक्यार्थन्याय' मी नहां चन सकता है ।] वाच्य औीर वयकक्में यह वात तर्ही है । वयककृदृती प्रतिति होनेपर वाच्यप्रतीति दूर हहै; जय मना नहां हहै । व्यककृप्रतीतन वाच्यप्रतीतनकी अविनाभादिनि [वाच्यप्रतीतिको धित्सा वयकृप्रतीतीन हहो नहां सकतनी हहै] करपमें प्रकाशन हानी है ।

सिद्धान्तपक्षमें घट-प्रदीप-न्याय इस्लिए उस दानों [वाच्य और वयकृप्रतीतनियों] में हत-प्रदीप न्याय लागू होता है ! [अर्थात्] जैसे प्रदीप द्वारा घटकी प्रतीतन हहो जानपर मी ह्घटैंककी प्रतीतन नष्ट नहीं हहो जाती [चद् मी हाती रहती हैं] इस्सी प्रकार वयकृवर्था प्रतीतन हहो जानपर मी वाच्यर्की प्रतीतन होती रहती है ।

यहाँ ग्रन्थ यह हाता है कि 'यथा पदाथोंद्रार्ण वाक्यार्थः सम्प्रतीयते ! वाच्यार्थपूर्व्विका तत्तत् प्रतिपत्तस्य वस्तुनः' प्रथम उद्योतकी इस कारिकाके

१. 'अस्म्यंवंत' नि, दी० १ २. 'तदुपादानत्वमात्रस्य विवक्ष्या' नि, दी० ।

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ध्वन्यालोकः

नन्वेवं युगपदर्थद्वययोगित्वं वाक्यस्य प्राप्तं, तद्रावे च तस्य वाक्यतैव विघटते । तस्या एकार्थैकलक्षणत्वात् ।

नैष दोषः ! युगपदर्थभावेन तयोरव्यवस्थानात् । व्यङ्ग्य-स्य हि कचित् प्राधान्यं वाच्यस्योपर्जनभावः । कचिद्वाच्यस्य प्राधान्यान्यमपरस्य गुणभावः । तत्र व्यङ्ग्य-प्रधान्ये ध्वनिरित्युक्तमेव । वाच्यप्रधान्ये तु प्रकारान्तरं निदर्श्यते । तस्मात् स्थितमेतत् व्यङ्ग्य-प्रतिपेधेऽपि काव्यस्य न व्यङ्ग्य-स्याभिधेयत्वमपितु व्यङ्ग्य-त्वमेव ।

किञ्च व्यङ्ग्य-स्य प्राधान्येनाविवक्षितां वाच्यत्वं तावद् भवद्भिरंशुगुन्तव्यममतत्परत्वाच्छन्दस्य । तदसि तावद् व्यङ्ग्य-स्य शब्दानां कश्चिद्दू वियोग इति । यत्रापि तस्य प्राधान्यानि तत्रापि विमिति तस्य स्वरूपमपहूयते । एवं तावद् वाचकत्वादन्यदेव व्यङ्ग्यत्वम् ।

वाक्य और व्यङ्ग्य-में पदार्थवाक्यार्थश्रेण्याय आपके मतसे भी प्रतीत होता है । फिर यहाँ उश्का खण्डन कैसे किया है । इसका समाधान करते हैं] प्रथम उद्योतमें जो 'तथा पदार्थध्वनन' इत्यादि कहा है वह केवल [जैसे पदार्थबोध, वाक्यार्थबोधकका उपाय होता है इस] प्रकार वाच्यार्थबोधक, व्यङ्ग्यार्थप्रतीतिका उपाय होता है इस] उपायस्वरूप साध्यसाधकका कथन करनेकी इच्छासे ही लिखा था [हैसे पदार्थनिरूपणपरकशास्त्रनिबन्धनाय हेतोः यहाँ अभिप्रेत नहीं है] ।

यह 'पदार्थ-वाक्यार्थ न्याय'का पूर्वपक्ष तात्पर्यशक्तितस्ते व्यङ्ग्यबोधके निराकरणके अभिप्रायसे उठाया है । इसके पूर्व अभिधाशक्तितस्ते वाक्यार्थे बाघकं निराकरण किया था । पदार्थसे वाक्यार्थबोध तात्पर्यशक्तिसे होता है, उसके निराकरणके लिए इस पक्षको उठाकर निरूपण किया है ।

[प्रथन—पूर्वपक्ष यदि हट-प्रदोषो-न्यायसे] वाच्यार्थ और व्यङ्ग्यार्थ दोनोकी प्रतीति मानेंगे तो] इस प्रकार वाक्यके एक साथ दो अर्थ होने लगेंगे और ऐसा होनेपर उसका वाक्यत्व ही नहीं रहेगा, क्योंकि एकार्थत्व ही उस [वाक्य] का लक्षण है ।

[उत्तर] यहाँ दोष नहीं आता है, क्योंकि उन [वाक्य तथा व्यङ्ग्य अर्थ] की गुण और प्रधानरूपसे व्यवस्था है । कहीं व्यङ्ग्य-का प्राधान्य और वाच्यार्थ उपसर्जन [गौण] रुप होता है और कहीं वाच्य अर्थका प्राधान्य तथा व्यङ्ग्य अर्थका गुणभाव होता है । उनमेंसे व्यङ्ग्य-का प्राधान्य होनेपर 'ध्वनि [काव्य]' होता है यह कहा ही चुके हैं । और वाच्यका प्राधान्य होनेपर दूसरा प्रकार [गुणीभूतव्यङ्ग्य] होता है यह आगे कहेंगे । इसलिये यह सिद्ध हो गया है कि काव्यके व्यङ्ग्यप्रधान होनेपर भी व्यङ्ग्य अर्थ अभिधेय नहीं अपितु व्यङ्ग्य-त्व ही होता है ।

इसके अतिगिक्त जहाँ व्यङ्ग्य-का प्राधान्य विवक्षित नहीं है वहाँ शाब्दके तत्पर [गुणीभूतव्यङ्ग्य-के प्रतिपादनपरक] न होनेसे उस [गुणीभूतव्यङ्ग्य अर्थ] को आप वाच्यार्थ नहीं मानेंगे । उस दशामें [यह मानना ही होगा कि] शाब्दका कोई व्यङ्ग्य अर्थ भी है [जो शब्दके तत्पर न होने, अर्थात् गुणीभूत होनेसे, वाच्य नहीं है अतः व्यङ्ग्य हैं] और जहाँ उस [तत्परत्व] का प्राधान्य है वहाँ उसके स्वरुपका निषेध किस लिप करते हैं । इस प्रकार वाचकत्वसे व्यङ्गकत्व अतग ही हैं ।

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कारिका ३३ ]

तृतीय उद्योतः

२५९

इतरच्च वाचकत्वाद् व्यङ्जकत्वस्यान्यत्वं, यद्वाचकत्वं शब्दैकाश्रयमितरत्तु शब्दाश्रयमर्थाश्रयं च । शब्दार्थोऽर्थो हि योरपि व्यङ्जकत्वस्य प्रतिपादितत्वात् । गुणवृत्तिस्तूपचारेण लक्षणया चोभयाश्रयापि भवति । किन्तु ततोडपि व्यङ्जकत्वं स्वरुपतो विषयतश्च भिद्यते । रूपभेदस्तावद्यत्, यद्मुख्यतया व्यापारो गुणवृत्ति: प्रसिद्धा । यद्यङ्कत्वेन तु मुख्यतयैव शब्दस्य व्यापारः । न त्वार्थोऽपि व्यञ्ज यत्नप्रतीतिर्यों तस्या अमुख्यत्वेन मनागपि लक्ष्यते ।

आश्रयभेदसे व्यङ्जकत्वकी सिद्धि

इसलिए भी वाचकत्वसे व्यङ्जकत्व भिन्न है, क्योंकि वाचकत्व केवल शब्दके आश्रित रहता है और व्यङ्जकत्व शब्द और अर्थ दोनोंमें रहता है । [क्योंकि] शब्द और अर्थ दोनोंका व्यङ्जकत्व प्रतिपादन किया जा चुका है । लक्षणा तथा गौणीवृत्तिसे व्यङ्जकत्वका भेद

इस प्रकार यहाँतक यह सिद्ध किया कि अभिधाशक्ति और तात्पर्याशक्तिमें भिन्न व्यङ्जकत्व या ध्वननध्वापार अलग ही है । आगे लक्षणा और गौणीवृत्तिसे उसके भेदका प्रतिपादन करते हैं ।

मुख्य वाचक शब्दमें व्यङ्जक शब्दका भेदनिरूपण करके, अब अमुख्यार्थक शब्दसे भी व्यङ्जक शब्दका भेद दिखलाते हैं । मुख्य ज्ञानदयवदार, मुख्यार्थ बाधित होनेपर सादृश्येतर सम्बन्धसे लक्षणा द्वारा, अथवा सादृश्यसम्बन्धसे उपचार द्वारा, दोनों प्रकारसे होता है । अतएव अमुख्यसे भेद दिखलानेमें लक्षणा और गौणीवृत्तिसे भेद दिखलाना अभीष्ट है । अभिधा और तात्पर्याश्रयादृत्तिसे इसके पूर्व भेद दिखला चुके हैं । इस प्रकार अन्य सब वृत्तियोंसे व्यङ्जकत्वका भेद सिद्ध हो जानसे व्यङ्जकत्वको अलग मानना ही होगा यहाँ अभ्याकारका अभिप्राय है ।

वाचकत्वसे व्यङ्जकत्वका भेद दिखलाते हुए जो अन्तिम युक्ति दी थी कि वाचकत्व केवल शब्दाश्रित रहता है और व्यङ्जकत्व शब्द तथा अर्थ दोनोंमें आश्रित रहता है वहाँसे गुणवृत्तिका सम्बन्ध जोड़कर पृथकपक्ष उठाते हैं कि गुणवृत्ति या लक्षणा तां शब्द और अर्थ दोनोंमें रहती है तथा उससे व्यङ्जकत्वका क्या भेद है? उसका उत्तर यह करते हैं कि उपचार तथा लक्षणाद्वारे शब्द तथा अर्थ उभयमें आश्रित होनेपर भी स्वरूपभेद तथा विषयभेदसे व्यङ्जकत्व उनसे भिन्न ही है ।

ग्रन्थकारने 'गुणवृत्तिस्वरूपचारण लक्षणया वाङ्मात्राश्रयात् । स्वलक्षणा' इस पङ्क्तिके अर्थमें थोड़ी श्रान्ति हो सकती है । उसके अनुसार 'उभयाश्रया' के अर्थका उपचार ईश्वर लक्षणा इन दोनोंका ग्रहण

हो सकती है । उसके अनुसार 'उभयाश्रया' के अर्थका उपचार ईश्वर लक्षणा इन दोनोंका ग्रहण हो सकती है । उसके अनुसार 'उभयाश्रया' के अर्थका उपचार ईश्वर लक्षणा इन दोनोंका ग्रहण हो सकती है । उसके अनुसार 'उभयाश्रया' के अर्थका उपचार ईश्वर लक्षणा इन दोनोंका ग्रहण हो सकती है ।

उभय शब्दसे किया जा सकता है । परन्तु वास्तमें 'उभय' शब्दसे 'द्वन्द्व' और 'अर्थका ग्रहण अभीष्ट है । इसलिए लोचनकारने 'उभयाश्रयापि वाङ्मात्राश्रया' लिखकर उसकी व्याख्या की है ।

गुणवृत्ति तो उपचार [सादृश्येतर सम्बन्धसे अमुख्यार्थमें प्रयोग] तथा लक्षणा [सादृश्यसम्बन्धसे मुख्यार्थमें प्रयोग] से दोनों [शब्द तथा अर्थ उभय] में आाश्रित होती है, किन्तु उससे भी स्वरुपत: और विषयत: व्यङ्जकत्वका भेद है । स्वरूपभेद

होती है, किन्तु उससे भी स्वरुपत: और विषयत: व्यङ्जकत्वका भेद है । स्वरूपभेद तो यह है कि अमुख्यतया [अर्थका वोढन करानेवाला] शब्दव्यापार गुणवृत्ति [नामसे] प्रसिद्ध है, और व्यङ्जकत्व मुख्यतया [अर्थवोधक] व्यापार है, जो तीन प्रकारके

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ध्वन्यालोकः

[कारिका ३३

अयं चान्यः स्वरूपमेदः, यद् गुणदृत्तिनिरुपयितव्यान् व्यङ्ग्यक्त्वं तु वाचकत्वादित्यन्तं विभिन्नमेव । एतत् प्रतिपादितम् ।

अयं चापरो भेदो यद् गुणवृत्तौ 'यदर्थोऽर्थान्तरमुपलक्ष्यति, तदोपलक्षणीय-यदर्थोऽर्थान्तरं श्रोतव्यत तदा स्वरूपं प्रकाशयन्नेवास्य व्यङ्ग्यस्य प्रकाशकः प्रतीयते प्रतीयमान् । यथा "लीलाकमलपत्राणि गणयामास पार्वती" इत्यादौ ।

यदि च यत्रातिरिक्तमेवमप्रतीतिरर्थोऽर्थान्तरं लक्ष्यति तत्र लक्ष्यणानुगवहारः

[रसादृश्यनि, वम्तु व्यनि तथा आलङ्कारिकध्वनि] व्यङ्ग्यार्थकी प्रतीति होती है उसका अर्थ [वाच्यार्थ]से किसी प्रकार तनिक भी अनुचित नहीं दिखाई देता है ।

अथ "गणयामास पार्वती" यहाँ [पहिले मुख्यार्थका बोध होता है और उसके बाद वह वाच्यार्थ, व्यङ्ग्य या लक्षित अथवा अवहित्थारूप श्रृङ्गारारक-

और दूसरा स्वरूपभेद यह है कि अमुख्य रूपसे स्थित वाचकत्व ही गुणवृत्ति है और व्यङ्ग्यक्त्व वाचकत्वसे अत्यन्त भिन्न होता हैं । यह कह चुके हैं !

लक्षणा में भी अचेतनस्वार्था अथवा उपादानलक्षणा नामक एक भेद होता है कि जिसमें शब्द अपने मुख्यार्थका बोधक न होकर परित्याग [विना] ही अर्थान्तरका बोधक होता है । इसलिए

और [तीसरा] रूपभेद यह है कि 'गुणवृत्ति' में जब एक अर्थ [का वाचक शब्द] दूसरे अर्थको लक्षणा द्वारा योधित करता है तब [जहानुस्वार्थों या लक्षण-लक्षणा में]

नहतस्वार्था अर्था उसपर आक्षित अत्यन्तर/तरसकृतवाच्यध्वनिनि में गुणवृत्ति और व्यङ्ग्यक्त्वके स्वरूपको छिन्न भिन्न हो जाने पर भी परन्तु अजहनस्वार्था लक्षणा और उसपर आक्षित अर्थान्तर सकृत्मित-

लक्षणीय अर्थस्वपमें परिणत होकर ही लक्ष्यार्थ होता है । जैसे 'गणयां घोष.' में [गण्या पद अपने अर्थो को छोड़कर तटस्थरूपमें परिणत होकर ही तट अर्थका बोधन करता हैं ।] व्यङ्ग्यार्थकी पदोंमें यह तीसरा भेद है ।

वाच्यध्वनिनिं तो गुणवृत्ति और व्यङ्ग्यक्त्व अमिन्न या एक ही हैं । इस पूर्वशंका उटाकर उसका समाधान करते हैं—

और [अभिधाके भी स्थानपर] लक्षणा ही

और यदिह जहाँ [अभिधातस्वार्थों उपादानलक्षणा अथवा अर्थान्तरसङ्कमित-

वाच्यध्वनिनिमें] अर्थो, अपनी प्रतीतिका परित्याग किये विना अर्थान्तरको लक्षित करता है

वहां लक्षणाsनुगवहार [हो] करें तब तो फिर [अभिधाके भी स्थानपर] लक्षणा ही

९. 'व्यवधान्त' नि०, टी० । २. 'पद्यार्थो' नि०, टी० ।

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कारिका ३२ ] तृतीय उद्योतः २३१

क्रियने, तदेवं सति लश्रणैव मुख्यः शाब्दो व्यापार इति प्राप्तम् । यस्मात् प्राप्तं प्रायोज्ञ वाक्यतां वाच्यवयतिरिकतात्पर्यविषयार्थावभासितवम् ।

ननु स्वतन्त्रेऽपि यदार्थों व्यञ्जक-यत्रयं प्रकाशयति तदा शब्दस्य कीदृशो व्यापारः ? उच्चते—प्रकारणाद्वाच्यादिच्छन्नशब्दवशेनैवार्थस्य तथाविधं व्यज्जकत्वमिति शब्दस्य तत्नोपयोगः । अस्वलद्रतितवं समयानुपयोगित्वं पृथगवभासितत्वंचैति न्रयं कथमपहृद्यते ।

[प्रश्न] आपके मतमें भी जन अर्थ [गवादि, अलङ्कार तथा वस्तुरूप] व्यङ्गचयत्रय-

[उत्तर] प्रकारण आदि सहरुन शब्दकी सामर्थ्यसे ही अर्थमें उस प्रकार [गवादि] का व्यज्जकत्व होता है, इसलिये उसमें शाब्दका उपयोग होता है । [और उसमें] अस्वलद्रतित्व, समय अर्थात् सङ्केतग्रहक अनुपयोगित्व और पृथगवभासितत्वको किस प्रकार लिपाया जा सकता है ?

प्रशनकर्ताका अभिप्राय है कि शाब्दके, अङ्क योषनमें, दो ही प्रकारके व्यापार हो सकते हैं, एक तो मुख्य और दूसरे उपचार असल्य । आपके मतमें जन 'अर्थ' व्यक्त होता है वहाँ भी शाब्दका या तो मुख्य या अमुख्य इनमें ही कोई एक व्यापार होगा । जब अङ्के प्रकाशनमें मुख्य व्यापार होता है उसको वाचकत्व कहते हैं और जब अमुख्य व्यापार होता है उसको गुणवृत्ति कहते हैं । इसलिए आपके अभिमत अर्थके प्रकाशनमें भी या तो वाचकत्व अथवा गुणवृत्ति इन दोनोंमेंसे ही कोई एक प्रकारका व्यापार मानना होगा । इनके अतिरिक्त व्यज्जकत्वादिरूप और कोई तीसरा प्रकार नहीं हो सकता है ।

उत्तरकारा अभिप्राय यह है कि वह व्यापार तो मुख्य ही होता है परन्तु साममीमेदसे वद्ध वाचकत्वसे अल्गा है । यहाँ प्रश्न जितना स्पष्ट है उत्तर उतना ही अस्पष्ट है । लोचनकारने जो 'मुख्य एवासौ व्यापारः साममीमेदाच्च वाचकादतिरिक्त इत्यभिप्रायेणाह उच्चते इति' लिखकर जो व्याख्या की है वह पूर्ण स्पष्ट समाधानकारक नहींहै । मेदको स्पष्ट करनेके लिए गुणवृत्ति और व्यज्जकत्वमें मुख्यत: तीन प्रकारके रूपभेद प्रतिपादित किये हैं ।

१—अमुख्य व्यापार गुणवृत्ति और मुख्य व्यापार व्यज्जकत्व है । यहाँ मुख्य अमुख्यका

अभिप्राय अस्वलद्रतत्व और स्वलद्रतत्वसे है । इसका आशय यह है कि गुणवृत्तिमें स्वलद्रति अर्थात् वाच्यार्थ होकर शब्द हमें अर्थका बोधक होता है परन्तु व्यज्जकत्वमें स्वलद्रतित्त अथवा वाच्यितार्थ होना आवश्यक नहीं है । यह गुणवृत्ति और व्यज्जकत्वका पहला रूपभेद है । गुणवृत्तिके अन्तर्गत उपचार और लक्षणा दोनों आ जाते हैं । लावण्यादि शवलद्रपर शाब्दश्रित सादृश्यमूलक गौण व्यापार उपचार लक्षणारूप, ये दोनों गुणवृत्त हैं । इन दोनोंमें वाच्यार्थ स्खलद्रति होता है और व्यञ्जनमें नहीं, इस कारण व्यज्जकत्व उन दोनोंसे भिन्न है ।

१. 'प्रायोज्ञेव' नि०, की० ।

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ध्वन्यालोक:

विषयभेदेऽपि गुणवृत्तिव्यङ्ककत्वयोः स्पष्ट एव । यतो व्यङ्ग्यकत्वस्य रसादयो अलङ्कारविशेषा व्यङ्ग्यरूपावच्छिन्नं वस्तु चेति त्रयं विषयाः । तत्र रसादिप्रतीति-गुणवृत्तिरिति न केनचिदुच्यते, न च शक्यते वक्तुम् । व्यङ्ग्यथालङ्कारप्रतीतिरपि तथैव । वस्तु चारुत्वप्रतीये स्वशब्दानभिधेयत्वेन यत् प्रतिपादयितुमिष्यते तद् व्यङ्ग्यम् । तथा तथोक्तं गुणवृत्तेर्विषयाः । प्रसिद्ध-पथुरोधाभ्य्यामपि गौणानां शब्दानां प्रयोगदर्शनात् । तथोक्तं प्रकृतम् । तदोक्तं च गुणवृत्ताविषयत्वस्यापि न व्यङ्गयकत्वानुप्रवेशन । तस्माद् गुणवृत्तेरपि व्यङ्ग्यकत्वस्यात्यन्तविलक्षणत्वम् । वाचकत्वगुणवृत्तिविलक्षणस्थापि च तस्य तदुभयाश्रितत्वेन व्यवस्थानम् ।

२—गुणवृत्ति और व्यङ्ग्यकत्वका दूसरा भेद यह दिखलाया कि अमुख्य रूपसे स्थित वाचकत्व ही गुणवृत्ति होता है । अर्थात् उसमें किसी-न-किसी रूपसे मुख्येतरशब्दका प्रयोग होता है । इसीसे लक्षणाको ‘अमुख्यपुच्छभूता’ कहा है । परन्तु व्यङ्ग्यकत्वमें मुख्येतरशब्दका उपयोग नहीं होता है ।

३—गुणवृत्ति और व्यङ्ग्यकत्वका तीसरा भेद यह दिखलाया है कि गुणवृत्तिमें शक्यार्थ और लक्ष्यार्थका अभेद प्रतीत होता है, और व्यङ्ग्यकत्वमें वाच्य ‘और व्यङ्ग्यका अभेद नहीं, भेद होता है ।

इस प्रकार इन तीन रूपोंसे गुणवृत्ति तथा व्यङ्ग्यकत्वका स्वरूपभेद प्रतिपादन कर अब विषय-भेदसे भी उन दोनोंका भेद दिखलाते हैं ।

गुणवृत्ति और व्यङ्ग्यकत्वका विषयभेद भी स्पष्ट हो ही है । क्योंकि व्यङ्ग्यकत्वके विषय ‘रसादि’, ‘अलङ्कार’ और व्यङ्ग्यरूप ‘वस्तु’ ये तीन हैं । उनमेंसे रसादिकी प्रतीतिको कोई भी गुणवृत्ति नहीं कहता है, और न कह ही सकता है । व्यङ्ग्य अलङ्कारकी प्रतीति भी ऐसी ही है [अर्थात् उसको न कोई गुणवृत्ति कहता है और न कह सकता है] । चारुत्वकी प्रतीतके लिये वाच्यमिश्र [शब्दानभिधेयत्वेन] रूपसे जिसका प्रतिपादन इष्ट हो वह ‘वस्तु’ व्यङ्ग्य है । वह सब गुणवृत्तिका विषय नहीं है । क्योंकि प्रसिद्ध [अर्थात् रूद्रटकृत लावण्य आदि शब्द] और अनुरोध [अर्थात् व्यवहारके अनुरोधसे ‘वदति विसिनीवक्त्रशयनम्’ आदिमें] भी गौण शब्दोंका प्रयोग देखा जाता है । जैसा कि पहिले कह चुके हैं । और जहाँ [‘गङ्गायां घोषः’ इत्यादि प्रयोजनवती लक्षणमें औपचारिकत्वका अतिशय] गुणवृत्तिका विषय होता भी है वहाँ व्यङ्ग्यकत्वके अनुगमके वश [वस्तुतः या व्यङ्ग्य गुणवृत्तिका विषय] होता है । इसलिये गुणवृत्तिसे भी व्यङ्ग्यकत्व अत्यन्त मिन्न है । वाचकत्व तथा गुणवृत्तिसे विलक्षण [भिन्न] होनेपर भी उन दोनों [वाचकत्व तथा गुणवृत्तिके] आश्रय ही उस [व्यङ्ग्यकत्व]की स्थिति होती है ।

१. ‘भस्मललितं’ समग्रानुपयोगिनिर्वं पृथगभासितवं चेति त्रयम्’ इतना पाठ नि० वी०में अधिक है ।

२. ‘वस्तुचारुत्वप्रतीतचे’ वा० प्रि० ।

३. ‘प्रतिपाद्यितुम्’ वा० प्रि० ।

४. ‘गुणवृत्ते:’ यह पाठ नि० में नहीं है ।

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कारिका ३२ ] तृतीय उद्योतः २६३

व्यङ्जकत्वं हि कविं वाचकत्वाश्रये ण व्यङ्ग्यतिष्ठते, यथा विवक्षितान्यपरवाच्ये ध्वनौ । कचित् गुणवृत्त्याश्रये ण यथा अविवक्षितवाच्ये ध्वनौ । तदुभयाश्रयत्वप्रतिपाद-

इस अनुच्छेदमें 'वस्तु चेतित चयं विषय:' इसके बाद निर्णयसागरीय संस्करणमें 'अस्वलद्रतित्वं समयानुपयोगित्वं पृथग्वभासितत्वं चेतित चयम्' इतना पाठ और मिलता है । परन्तु उसकी सङ्क्ति यहाँ नहीं लगती है । इस स्थलपर यह पाठ अनावश्यक और असङ्कत है । उसके बीचमें आ जानसे अगले वाक्यकी पूर्ववाक्यसे जो स्पष्ट सङ्क्ति है उसमें बाधा पड़ती है । अतएव यहाँ तो यह निश्चय रूपसे प्रमाणपाठ 'लोचनकार'ने इसकी व्याख्या 'उच्यते'के बाद और 'विषयभेदोद्भि' इमसे पूर्व करते हुए लिखा है—“एवमस्सलिद्धतित्वात्, कथमपि समयानुपयोगात् पृथग्भानममानतश्चेति त्रिभिः प्रकारैः: प्रकाशकत्वस्तद्विपरीतत्वस्थाप्याश्रय गुणवृत्तेः स्वरूपमेदं व्यवस्थाय विषयभेदमप्याह । विषयभेदोद्भिती १“ इससे प्रतीत होता है कि 'लोचनकार' दो वाक्य पहले इस पाठको मानते हैं । द्विचित्कारने यहाँ इस पाठको रखकर उसकी व्याख्या की है । उनका यह प्रयत्न 'लोचनकार'के दिपरीत भी है ओर सुमद्रत भी नहीं है । वाराणसेय दूसरे संस्करणमें इस पाठको कहाँ स्थान नहीं दिया गया है । यह वात भी लोचनकारकी व्याख्याके प्रतिकूल होंनेसे अनुवित है । अतएव लोचनकारकी व्याख्याका ध्यान रसते हुए 'तत्रोपयोग:'के बाद और 'कथमपि ह्नूयते' से पूर्व इस पाठको रस्बना चाहिये । तब 'उच्यते'से आगे वाक्य इस प्रकार बनेगा ।

उच्यते, प्रकारणादिवाच्यच्युतशब्दादर्शनेनैवार्थस्य तथाविधे व्यङ्ककत्वर्मित शब्दस्य तत्नोपयोगः, अस्वलद्रतित्वं समयानुपयोगित्वं चेतित कथमपि ह्नूयते । इस प्रकारके पाठकी व्याख्या निम्नलिखित प्रकार होगी । इसके पूर्व प्रश्नकर्ताका प्रश्न यह था कि तुम्हारे अर्थात् व्यङ्जकत्ववादिके मतमें जब शब्द व्यङ्ग्यप्रत्ययको प्रकाशित करता है तब शब्दका व्यापार मुख्य या अमुख्य कैसा होगा । यदि मुख्य व्यापार होगा तो वाचकत्वके अन्तर्गत होगा और अमुख्य होगा तो गुणवृत्तिके अन्तर्गत होगा । इनके अतिरिक्त तीसरा कोई प्रकार सम्भव नहीं है । इस प्रश्नका उत्तर 'उच्यते'से दिया है । उत्तरका आशय यह है कि प्रकरणादिसहकृत शब्दसामर्थ्यसे ही अर्थकका उस प्रकारका व्यङ्जकत्व बनता है इसलिए व्यङ्जकत्वस्थलमें शब्दके व्यापारको मानना ही होगा, साथ ही वहाँ शब्दके अस्वलद्रतित्व, समयानुपयोगित्व और पृथग्वभासितत्वको भी मानना ही होगा । इसके विपरीत लक्षणा या गुणवृत्तिमें स्वलद्रतात्व, समय अर्थात् सङ्केतग्रहका उपयोगित्व और वाच्य तथा लक्ष्यका पृथग्वभासित्व प्रतीत होता है । अतएव व्यङ्जकत्व गुणवृत्तिते सर्वथा भिन्न है । इसलिए रसादि तथा अलङ्कार और वस्तु तीनों व्यङ्ग्य अर्थ शब्दव्यापारके विषय होनेपर भी समयानुपयोगित्व अर्थात् सङ्केतग्रहका उपयोग न होनेसे वाचकत्वसे भिन्न, और अस्वलद्रूगतित्वके

कारण लक्षणासे भिन्न, तथा पृथग्वभासित्वके कारण उपचारसे भिन्न व्यङ्जकत्वव्यापारके विषय होते हैं यह मानना होगा । इस प्रकारकी व्याख्या करनेसे उस स्थलकी पंक्तिमें उत्तरमें वो असङ्कता आती है वह भी दूर हो जाती है । और इस पाठकी सङ्क्ति भी लग जाती है । इसलिये मैंने इस पाठको उचित स्थानपर स्थानान्तरित कर दिया है ।

व्यङ्जकत्व कहीं वाचकत्वके आश्रित रहता है जैसे विवक्षितान्यपरवाच्य [अभिधामूल] ध्वनिमें और कहीं गुणवृत्तिके आश्रयसे, जैसे अविवक्षितवाच्य [लक्षणामूल] ध्वनिमें । उस [व्यङ्जकत्व]के उभय [अर्थात् वाचक तथा गुणवृत्तिमें] आश्रितत्वके प्रतिपादनके लिये ही सबसे पहिले ध्वानिके [अविवक्षितवाच्य और

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ध्वन्यालोक:

लोचनकारने

नायैव च ध्वने: प्रथमतरं द्वौ प्रभेदावुपन्यासतौ तदुभयाश्रितत्वाच्च तदेकलुपत्वं तस्य न शक्यते वक्तुम् । यसमात् तदू वाचकत्वैकलक्षणैरलं कचिल्लक्षणाश्रयेण वृत्तो: न च लक्षणैक-करुपमेव, अन्यत्र वाचकत्वाश्रयेणैव व्यवस्थानात् । न चोभयधर्मसंकरत्वेनैव तदेककरूपं न भवति, यावद्वाचकत्वलक्षणादिरूपरहितशब्दधर्ममात्रवेनापि । तथाहि गीतध्वनिनीनामपि व्यङ्ग्यक्त्वमस्ति रसादिविषयम् । न च तेषां वाचकत्वं लक्षणं वा कचिल्लक्ष्यते । शब्दादन्यत्रापि व्यङ्ग्यक्त्वस्य दर्शनेन वाचकत्वादिशब्दधर्ममात्रकारत्वमयक्तं वक्तुम् । यदि च वाचकत्वलक्षणादीनां शब्दप्रकाराणां प्रसिद्धप्रकारचिल्लक्षणत्वेऽपि व्यङ्ग्यक्त्वं प्रकारत्वेन परिकल्यते तच्छब्दत्वस्यैव प्रकारत्वेन कसान्न परिकल्प्यते ।

विवक्षितान्यपरवाच्यं दो भेद किये गये हैं। उभयाश्रित होनेके कारण ही वह [व्यङ्ग्यक्त्व] उन [वाचकत्व और गुणवृत्ति]के साथ एकरूप [वाचकत्व या गुणवृत्ति-रूप—उनसे अभिन्न] नहीं कहा जा सकता है। [अपितु उन दोनोंसे भिन्न है] क्योंकि [अभिवक्षितवाच्य लक्षणामूलध्वनिमें] लक्षणाके आश्रय भी रहनेसे वह [व्यङ्ग्य-क्तव्य वाचकत्वरूप ही नहीं हो सकता है। और कहीं [विवक्षितान्यपरवाच्यध्वनिमें] वाचकत्वाश्रय भी रहनेसे लक्षणरूप भी नहीं हो सकता है। और न केवल उभय [वाचकत्व तथा गुणवृत्ति] का धर्म दोनोंसे ही तदेकरूप [वाचकत्व तथा गुणवृत्तिरूप न होनेका] केवल अर्थात् व्यङ्ग्यक्त्वके वाचकत्व अथवा गुणवृत्तिरूप न होनेका एक ही कारण नहीं है अपितु आगे बतलाये हुये और भी कारण उसको वाचकत्व तथा गुणवृत्तिसे भिन्न करते हैं] अपितु याचकत्व और लक्षणा आदि व्यापारसे रहित [गीत आदिके] शब्दोंका धर्म होनेसे भी [व्यङ्ग्यक्त्व, वाचकत्व तथा गुणवृत्तिसे भिन्न है] जैसे गीतकी ध्वनिमें भी रसादिविषयक व्यङ्ग्यक्त्व रहता है परन्तु उनमें वाचकत्व अथवा लक्षणा किसी प्रकार भी दिखाई नहीं देती। [इसके अतिरिक्त] शब्दसे भिन्न [चेष्टा आदि] विषयमें भी व्यङ्ग्यक्त्वके पाये जानसे उसे वाचकत्व आदि रूप कहना उचित नहीं हैं। और यदि प्रसिद्ध वाचकत्व आदि रूप शब्दधर्मों[चित्रों] अतिरिक्त होंनपर भी व्यङ्ग्य-क्त्वको वाचकत्व और लक्षणा आदि शब्दधर्मों[प्रकारधर्मों] का विरोध प्रकार मानना चाहते हैं तो उस [व्यङ्ग्यक्त्व] को शब्दका ही [प्रकार] विशेष भेद कयों नहीं मान लेते [जन्त्र प्रवलतर युक्तियोंसे वाचकत्व तथा गुणवृत्तिसे व्यङ्ग्यक्त्वका भेद स्पष्ट सिद्ध हों गया है फिर भी आप उस व्यङ्ग्यक्त्वको वाचकत्व या गुणवृत्तिके भेदोंमें ही परिणत करनेका असङ्गत प्रयत्न कर रहे हैं तो उसका एक अलग प्रकार माननमें आपको क्या आपत्ति हैं]।

लोचनकारने इस पंक्तिकी व्याख्या करते हुए लिखा है “व्यङ्ग्यक्त्वं वाचकत्वमिति यदि पर्यांै कल्प्यते तर्हि व्यङ्ग्यक्त्वं शब्‌द इत्यपि पर्यायतां कसान्न कल्प्यते, इह्‌चाया अङ्गान् आहन्‌ ।” अर्थात्

१. च नि०, दी० में अधिक है ।

२. नि० में च नहीं है ।

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कारिका ३३ ] तृतीय उद्योत: २५३

तदेवं शाब्दे व्यवहारे त्रयः प्रकाराः; वाचकत्वं गुणवृत्तिनिरपेक्षत्वं च । तत्र व्यङ्ग्यत्वे यदा व्यङ्ग्यप्राधान्यं तदा ध्वनिः, तस्य चाविवक्षितवाच्यं विवक्षितान्यपरवाच्यं चेत्य द्वौ प्रभेदावतुक्रान्तौ प्रथमतरं तौ सविशेषौ निगदितौ । अन्यो न्रयाणाम् । ननु विवक्षितान्यपरवाच्ये ध्वनौ गुणवृत्तितः नास्ति इति यदुच्यते तथुक्तम् । यस्माद् वाच्यवाचकप्रतीतिपूर्विका यत्रार्थान्तरप्रतीतिस्तत्र कथम् गुणवृत्ति-

यादृशं कचिदन्यत्रापि तादृशमेव । कथम् अन्यथा सङ्केतविकल्पो नास्ति इति यदुच्यते । ननु सङ्केतः कथमपि न मान्यते । कयमपि आप्तैः इह तु अभिहितं हैः वह कथम् न गृहीते । नहि जाः गृह्णते ।

इसी प्रकार वाचकत्वका पर्याय मानना युक्तिमत् नहि है । उसी प्रकार व्यङ्ग्यत्वका पर्याय मानना युक्तिविरुद्ध है । यदि व्याख्या इमे रुचिकर प्रतीत नहि शन्ति । उक्तञ्च । तात्पर्यलक्ष्यैः प्रकारैर् वाक्यार्थ परिकल्प्यते नकाः अर्थः उक्तः लक्ष्यते ।

ही एक अलग प्रकार या धर्म क्यों नहीं मान लेते, अर्थात् व्यङ्ग्यत्वकाः शब्दका एक अलग धर्म मान लेना अधिक युक्त कसैत है । यह व्याख्या अधिक युक्तिमत् प्रतीत होती है । इसका भाव यह हुआ कि प्रबल युक्तियोंसे वाचकत्व और व्यङ्ग्यत्वकाः भेद सिद्ध है । जानना पर भी उसे वाचकत्वरूप मानना तो अत्यन्त अनुचित है, उसके वाच्याद् वाचकत्व और गुणवृत्ती आदिसे भिन्न तत्त्व शब्दधर्म मान लेना अधिक युक्तिसङ्गत है । अतः उमके माननेमें कोंह आपत्ति नहि हांनि नहिये ।

इसी प्रकार अनुमानाद्वयका रूप इस प्रकार बनेगा—“व्यङ्ग्यत्वम् अभिधालक्षणान्यतरत्वाद् वाच्यवाचकत्ववदिति । गीताकाव्यमेदवत्” ।

इस तरह शब्द व्यवहारके तीन प्रकार होते हैं; वाचकत्व, गुणवृत्ति और व्यङ्ग्यत्व । उनमेंसे व्यङ्ग्यत्वकाः [मेद] में जव व्यङ्ग्यका प्राधान्य होता है तत्र ध्वनि [काव्य] कदलान्त है । और उस [ध्वनि] के अविवक्षितवाच्य [अभिधामूल] ये दो मेद किये गये हैं और पहिले हीं उनका वर्णन किया जा चुका है ।

यथोक्त उपेत्य, प्रकरणं अभिधा, लक्षणा और वाच्यतादृशी सिद्ध क्री तां चुद्धी है फिर भी अर्वाचीनवाच्य अर्थात् लक्षणामूलक्यांके अर्थान्तरसंश्रितवाच्य मेदमें साक्षादमूलक है कि अभिधामूल् अथवा विवक्षितान्यपरवाच्यनिमें वाचकत्व और गुणवृत्तिते मेद स्पष्ट है, परन्तु अविवक्षितवाच्य अथवा लक्षणामूलस्यनि, गांणी तथा लक्षणामें मिन्न नहिं है ।

[पूर्वपक्ष] अनय [कोई] कह सकना है कि विवक्षितान्यपरवाच्यस्थलनिर्में गुणवृत्ति नहिं होति यह जो कहतें हैं सो ठीक है । कयांकि जहां [विवक्षितान्यपरवाच्यस्थलनिर्में] वाच्य-वाचक [अर्थ और शाब्द] की प्रतीतिपूर्वक [व्यङ्ग्यरूप] अर्थान्तरकी प्रतीति

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ध्वन्यालोक:

व्यवहार:। नहि गुणवृत्तौ यदा निमित्तेन केनचिद् विषयान्तरे शब्द आरोप्यतेsध्यान्त-तिरस्कृतस्वार्थों यथा 'अग्निमाणवक:' इत्यादौ, यदा वा स्वार्थमशेनापरित्यज्यस्तत्सम्बन्ध-द्वारेण विषयान्तरमाक्रामति यथा 'गजायां घोष:' इत्यदौ तदा विवक्षित च्यतवमुपपद्यते। अत एवं च विवक्षितान्यपरवाच्ये ध्वनौ वाच्यवाचकयोरेव स्वरूपप्रतीतिरर्थाव-गमनं च हृदयत इति व्यक्कक्तवण्यवद्वारो युक्त्यतुरोधी। स्वरूपं प्रकाशयन्नेव पराव-भावको व्यज्जक इत्युच्यते। तथाविधे विषये वाच्यत्वस्यैव व्यङ्ग्यक्त्वमिति गुणवृत्ति-व्यवहारो नियममनेनैव न शक्यते कर्तुम्

। अविवक्षितवाच्यस्यैव ध्वनिरगुणवृत्ते: कथम् सिध्यते। तस्य प्रभेदद्वये गुणवृत्तिप्रभेद-द्वयलुप्ता लक्ष्य एव यत:'।

होती है वहाँ गुणवृत्तिव्यवहार हो ही कैसे सकता है? [क्योंकि वहाँ वाच्य और व्यङ्गच्यकी अलग-अलग और कमसे प्रतीति होती है। इसीलिप विवक्षितान्यपरवाच्य ध्वनिमें गुणवृत्ति नहीं रह सकती है। इसी प्रकार आगे कदह हेतुसे गुणवृत्तिमें विवक्षितान्यपरवाच्यध्वनि नहीं रह सकती है।] गुणवृत्तिमें जब किसी विरोध कारणसे विषयान्तरमें [उसके वाचक] शब्‍दका अपने अर्थको अत्यन्त तिरस्कृत कर आरोप [मूलक व्यवहार] किया जाता है जैसे 'अग्निमाणवक:' इत्यादिमें [अग्नि शब्दका अपने

अर्थको छोड़कर तेजादितादि साधद्रश्यसे बालकमें आरोपित व्यवहार किया जाता है तब यहाँ अत्यन्ततिरस्कृतवाच्य या जहत्स्वार्थी लक्षणा तो मानी जा सकती है परन्तु विवक्षितान्यपरवाच्यध्वनि नहीं] अथवा कुछ अंशमें अपने अर्थको छोड़कर [सामीप्यादि] सम्बन्ध द्वारा [गङ्गा आदि शब्द जब] अर्थान्तर [तट आदि रूप अर्थ]

का बोध कराता है, जैसे 'गङ्गायां घोष:' इत्यादिमें। तब ऐसे स्थलोंपर अविवक्षित-वाच्य [लक्षणामूलध्वनि] हो सकता है। [परन्तु विवक्षितान्यपरवाच्य नहीं हो सकता है। अतएव जहाँ विवक्षितान्यपरवाच्यध्वनि होता है वहाँ गुणवृत्ति न रहनसे, और जहाँ गुणवृत्ति रहती है वहाँ विवक्षितान्यपरवाच्यध्वनि न रहनसे उन दोनोंकी एक-विषयता नहीं हो सकती है यह कहना तो ठीक ही है।] इसीलिए विवक्षितान्यपरवाच्य-ध्वनिमें वाच्य और वाचक दोनोंके स्वरूपकी प्रतीति और व्यङ्गच्य

अर्थका ज्ञान पाया जाता है, इसलिए व्यङ्गच्यव्यवहार युक्तिसङ्गत है। [क्योंकि अपने रूपको प्रकाशित करते हुए दीपकादिके समान] परकं रूपको प्रकाशित करनवाला ही व्यङ्गच्य कहलाता है। [ऐसे उदाहरणोंमें वाचकत्व और व्यङ्गच्यत्व स्‍वरूपसे अलग-अलग प्रतीत होते हैं अत:] वाचकत्वका ही व्यङ्गच्यत्वरूप है इस प्रकारका गुणवृत्ति [मूलक]

व्यवहार निश्चितरूपसे नहीं किया जा सकता है [इसलिए विवक्षितान्यपरवाच्य-स्वान गुणवृत्तरूप नहीं है यह ठीक है]।

परन्तु अविवक्षितवाच्य [लक्षणामूल] ध्वनि गुणवृत्तिसे कैसे अलग हो सकता है? उसके दोनों भेदों [अर्थान्तरसङ्क्रमितवाच्य तथा अत्यन्ततिरस्कृतवाच्य] में

१. 'वचसुधा' नि०।

२. नि०, वी० मे० बत्; के भगेले वाक्यके साथ जोड़कर "यतोऽयमपि न वेशः" पाठ रखा है।

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कारिका ३३ ] तृतीय उद्योत: २६७

अथयमपि न दोषः । यस्यादविवक्षितवाच्यो ध्वनिरगुणवृत्तिमार्गोऽश्रियोऽपि भवति, न तु गुणवृत्तिरूप एव । गुणवृत्तिरहि व्यङ्ग्यकतवशोन्यापि टङ्क्यते । व्यङ्ग्यकतवं च यथोक्तचारुत्वहेतुं व्यङ्ग्यं विनाऽपि व्यङ्गतिष्ठते । गुणवृत्तिस्तु वाच्यधर्माश्रयेगपि व्यङ्गयथामात्राश्रयेग चामेदोपचाररूपा सम्भवति, यथा ‘तीक्ष्णत्वादग्निसंघर्षवकः’, ‘आह्लादकत्वाच्चन्दनैवास्या मुखम्’ इत्यादौ । यथा च ‘प्रिये जने नास्ति पुनरुक्तम्’ इत्यादौ ।

गुणवृत्तिके दोनों भेद [उपचार और लक्षणारूप स्पष्]े दिखलाऐ जाते ही हैं । [अर्थोऽन्तर-सङ्क्रमितवाच्यध्वनि उपादानलक्षणा अथवा अजहत्स्वार्था लक्षणा और अत्यन्त-तिरस्कृतवाच्यध्वनि उपचारलक्षणा या लक्षणलक्षणारूप या गुणवृत्तिस्वरूप प्रतीत होती है । अतपव वह लक्षणा या गुणवृत्ति से कैसे भिन्न हो सकती है ? यह प्रश्नकर्ता का आशय है] ।

[उत्तर] यह दोष भी नहीं हो सकता है । क्योंकि अविवक्षितवाच्यध्वनि गुण-वृत्ति, लक्षणाके मार्गका आश्रय भी लेता है किन्तु वह गुणवृत्ति लक्षणास्वरूप नहीं है । क्योंकि गुणवृत्ति व्यङ्ग्यकतवरहित भी हो सकती है । [जैसे लावण्ययादि पदोंमें व्यङ्गच्य प्रयोजकके अभावमें भी गुणवृत्ति या केवल रूढिमूलक लक्षणा पायी जाती है । यहाँ ंगुणवृत्ति है नतु व्यङ्गयकत्व नहीं] और व्यङ्ग्यकत्व पूर्वक चारुत्वहेतु ‘व्यङ्गच्य’ के बिना नहीं रहता है [इसलिए गुणवृत्ति और अविवक्षितवाच्यध्वनि एक नहीं हैं । ] ।

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ध्वन्यालोक:

आचार्य आनन्दवर्धन

महामहोपाध्याय डॉ० बलदेव उपाध्याय

चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन

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कारिका ३३ ] तृतीय उद्योतः २६९

असम्भाविनः चार्थेन यत्र व्यवहारः, यथा ‘सुवर्णपुष्पां पृथिवीम्’ इत्यादौ, तत्र चातल्वरूपपण्यकृतप्रतीतिरेव प्रयोजिकेति वथाविघेष्टपि विषयेऽपि गुणवृत्तौ सत्यामपि ध्वनि-व्यवहार एव मुक्तिरुपरोषी । तस्माद्विवक्षितवाच्ये ध्वनौ, द्वयोरपि प्रभेदयोर्यंकजकत्व-विशेषाविशिष्टा गुणवृत्तिरिति तदेकरूपा सहृदयहृदयाह्लादिनी । ‘प्रतीयमानाप्रतीतिविहेतुत्वाद् विषयान्तरे तद्रूपपशून्याया:’ दर्शयिष्यत् । एतद सर्वं प्राक् सूचितमपि स्कुटतरप्रतीतये पुनरुक्तम् ।

जहाँ असंभव अर्थ [आरोपमूलक गुणवृत्ति] से व्यवहृत होता है जैसे ‘सुवर्ण-पुष्पां पृथिवीम्’ इत्यादि [पृ० ‘५६’ पर उदाहृत] में, वहाँ चातल्वरूप व्यङ्ग्यकी प्रतीति ही उस [आरोपमूलक गुणवृत्तिव्यवहार] का हेतु है, इसलिये इस प्रकारके उदाहरणोंमें गुणवृत्ति होनेपर भी [अनायास प्रभूत घनोपर्जनरूप चमत्कारी व्यङ्गयशोके कारण ही गुणवृत्तिव्यवहार होनेसे] व्यतिरेकव्यवहार ही मुक्तिसक्त है । इसलिये अविवक्षित-वाच्य [लक्षणामूल] व्यनिमें [अथन्तरसङ्क्रमितवाच्य और अत्यन्ततिरस्कृतवाच्य] दोनों भेदोंमें व्यङ्गयकृतविशेषसे युक्त गुणवृत्ति सहृदयहृदयाह्लादिनी होती है । तदेक-रुपा नहीं [अर्थात गुणवृत्ति और व्यङ्गचकत्व एक नहीं हैं] क्योंकि [गुणवृत्ति] प्रतीय-मान [वार्त्त्वहेतुक व्यङ्गच] की प्रतीति हेतु नहीं है । दूसरे स्थानोंपर [अग्नि-माणवक: आविमे] उस [गुणवृत्ति] को उस [व्यङ्गचकत्व] से रहित पाते हैं । [अग्नि-माणवक:, सध्य व्याप्ति पुनरुक्तम, आदि उदाहरणोंमें गुणवृत्ति व्यङ्गचकत्वशून्य पायी जाती है । इसलिये ‘सुवर्णपुष्पां पृथिवीम्’ आदिमें भी व्यङ्गचकके द्वारा ही चारुत्वरूप प्रतीति होती है । गुणवृत्तिरुपसे नहीं । अतः अविवक्षितवाच्यच्वनिसे भी गुणवृत्ति अलग है] ये सब बातें पहले [प्रथम उद्योतमें] सूचित [स्फुटमकरुपसे] की जा चुकी हैं । फिर भी अधिक स्पष्टरूपपस प्रतिपादनार्थ यहाँ फिर कही हैं [स्वरुप-भेद और निमित्तनिमित्त प्रतिपादनके कारण पुनरुक्त नहीं हैं] ।

यहाँ निर्णयसागरीय संस्करणमें ‘प्रतीयमाना’के बाद विराम रखा है और शेष वाक्यको अलग रखा है । यह उचित नही है । लोचनकारने ‘प्रतीयमानाप्रतीतिविहेतुत्वात्’को सम्मिलित मानकर ही ‘नहि गुणवृत्तेश्चारुत्वप्रतीतिहेतुत्वमस्ति’ति दर्शयिष्यति’ लिखा है ।

दीपिकाकारने ‘सहृदयहृदयाह्लादिनी’में से ‘नी’का हटा कर ‘सहृदयहृदयाह्लादि’को प्रतीयमान-का विशेषण बनाकर एक समस्तपद कर दिया है । उनका यह प्रयत्न भी ठीक नहीं है । व्यङ्गचकत्व विशेषाविशिष्टा गुणवृत्ति ही सहृदयहृदयाह्लादिनी हो सकती है स्वयं गुणवृत्ति न सहृदयहृदयाह्लादिनी होती है और न प्रतीयमानकी प्रतीतिका हेतु, यह अभिप्राय है । लोचनके टीका बालप्रिया में ‘यतो गुणवृत्तिः सहृदयहृदयाह्लादिनी प्रतीयमाना च न भवति अन्तं न तदेकरूपेति सम्बन्धः’ लिखा है । यहाँ बालप्रियाकारने निर्णयसागरीय पाठके अनुसार प्रतीयमाना’के आगे विराम मानकर अर्थ किया जान पड़ता है । इसलिये उन्हें लोचनकी ऊपर उद्धृत हुई पंक्ति की संगति लघानेका विशेष प्रयास करना पड़ा है ।

१. ‘प्रतीयमाना’ नि० १ ‘सहृदयहृदयाह्लादादिमती यमानामप्तविहेतुत्वाद्’ दी० १ । २. ‘तद्रूपपशून्याया:’ नि० दी० १ ।

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ध्वन्यालोक:

आचार्य आनन्दवर्धन

डॉ. महावीर सरन जैन

मोतीलाल बनारसीदास

अपि न व्यञ्जकत्वलक्षणो यो: शब्दार्थयोरेव स प्रसिद्धसम्बन्धतरोषितीति न कस्यचिद् विमतिविषयतामहंती । शब्दार्थयोरेव हि प्रसिद्धो यः सम्बन्धो वाच्यवाचकभावव्यस्तमनुरुन्धान एव व्यञ्जकत्वलक्षणो व्यापारः सामप्रयन्तरसम्बन्धादौपाधिकः प्रवर्तते ।

अत एव वाचकत्वातस्य विशेषः । वाचकत्वं हि शब्दविशेषस्य नियत आत्मा । व्युत्पत्तिकालादारम्य तद्विनाभावेन तस्य प्रसिद्धत्वात् । स त्वनियतः, औपाधिकत्वात् । प्रकरणादवच्छेदेन तस्य प्रतीतिवरितरथा त्वप्रतीतः ।

इस प्रकार अधिवक्षितवाच्यश्वनिको गुणवृत्तिस्थिते पृथक् सिद्ध कर चुकनेके उपरान्त दूसरे प्रकारसे अभिधा [वाचकत्वव्यापार] ये उसका भेद दिखलानेके लिये अभिधाम प्रकरणकी अवतारणा करते हैं । इसमें वाचकत्वको स्वाभाविक या नियत धर्मी और व्यञ्जकत्वको औपाधिक धर्मी मानकर दोनोंका भेदप्रतिपादन किया है ।

और शब्द तथा अर्थका व्यञ्जकत्वरूप जो धर्म है वह प्रसिद्ध सम्बन्ध [वाचकत्व]का अनुसरण करता है, इसमें किसका मतभेद नहीं है दोना वाञ्छिते । शब्द और अर्थेका जो वाच्यवाचकभावसम्बन्ध प्रसिद्ध है उसका अनुसरण करते हुए ही अन्य सामग्री [प्रकरणादि]पैश्र्चित्यरूप] के सम्बन्धसे व्यञ्जकत्व नामक [शब्द] व्यापार औपाधिक रूपसे [व्यङ्ग्यार्थवोधनार्थ] प्रभूत होता है ।

'उप स्वसमीपवर्तिनि स्वस्मादघाताति उपाधि:'१ जो अपने समीपवर्ती, अपनेषे सम्बद्ध, पदार्थमें अपने धर्मका आधान करता है वह 'उपाधि' कहलाता है । यह उपाधिका लक्षण है । जैसे जवाकुसुम [गुढ़हल] एक लाल रक्क़का फूल है, उसको जव दर्पणके पास रख दिया जाय तो उसका आभास्य दर्पणमें प्रतीत होने लगता है । जवाकुसुमने अपना आभास्य धर्मं समीपवर्ती स्फटिक अथवा दर्पणमें आधान कर दिया इसलिये जवाकुसुम 'उपाधि' कहलाता है और दर्पण या स्फटिकमें आभास्य 'औपाधिक' कहलाता है । इसी प्रकार प्रकरणादि[पैश्र्चित्य]रूप अन्य सामग्रीके समवधानसे शब्द अर्थको 'व्यञ्जक' करता है इसलिए प्रकरणादिरूप अन्य सामग्री 'उपाधि' हुई और उसके सङ्कारसे शब्दमें प्रतीत होनेवाला व्यञ्जकत्व धर्म 'औपाधिक' हुवा ।

इसीप्रकार वाचकत्वसे उसका भेद है । वाचकत्व शब्दविशेषका निश्चित स्वरूप [यथवा आत्माके समान नियत धर्म] है । [क्योंकि] सङ्केतग्रहणके समयसे टेकर वाचकत्व शब्दसे अविनाभूत [सदैव साथ रहनेवाला] प्रसिद्ध है । और वह [व्यञ्जकत्व] वो 'औपाधिक' [प्रकरणादि सामग्रीन्तर समवधानजन्य] होनेसे [शब्दका] नियत धर्म नहीं हैं । प्रकरणादिकं वैशिष्यसे उस [व्यञ्जकत्व] की प्रतीति होती है अन्यथा नहीं ।

१. मि० में इसके आगे 'सम्बन्धी' पाठ अधिक है । द्वि० में आत्माके बाद विराम देकर 'सम्बन्धसमुत्प्रेक्षालादारम्य' पाठ रखा है ।

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कारिका ३३ ]

वतीक उज्योतः

नतु यथानियतत्वं तस्य स्वरूपपरীক্ষया । नैष दोषः । यतः शब्दात्मनि तस्य नियतत्वम्, न तु स्त्रे विषये व्यङ्गच-पलक्षणे ।

[प्रश्न] अब यदि वह [व्यङ्ग्यकत्व] नियत धर्में नहीं है [औपाधिक अर्थात् औपाधिक, कल्पित धर्में है] तो उसके स्वरूपकी परीकषाले ही क्या लाभ है? ['कपुष्य' वा 'कन्या-पुत्र'की स्वरूप-परिकषाके समान व्यङ्ग्यकत्वके स्वरूपकी परीक्षा भी व्यर्थ है, वह मङ्गलकारकाँका भाव है]।

[उत्तर] यह दोष नहीं है । क्योंकि शब्दरूप [अंश] में ही उस [व्यङ्ग्यकत्व] का अनिश्चय है परन्तु व्यङ्ग्यरूप अपने विषयमें [अनियत] नहीं है ।

अयं तु अभिधा तो शाब्दक शब्दोंमें नियत है परन्तु व्यङ्गचना किसी शब्दविशेषका नियत धर्में नहीं है, प्रकरणादिके वैशिष्ट्यसे किसी भी शब्दमें व्यङ्गयकत्व आ सकता है । इसलिए शब्दस्वरुपमें तो व्यङ्गयकत्व अनियत है । परन्तु अपने विषय व्यङ्गच्यार्थके बोधनमें व्यङ्गयकत्व-का ही उपयोग होनेसे वह नियत है । अतः उसके स्वरूपकी परीकषाका प्रयास 'कपुष्य' अथवा 'कन्या-पुत्र'की स्वरूप-परिकषाके प्रयासके समान व्यर्थ नहीं है ।

औपाधिकत्व अपने व्यङ्गयकत्वका अभिधायें मेद सिद्ध कर अब 'लिङ्गत्वन्याय' से भी अभिधाये व्यङ्गयकत्वका मेद सिद्ध करते हैं । लिङ्गत्वन्यायका अभिप्राय यह है कि न्यायशास्त्रप्रतिपादित अनुमान-को प्रक्रियाओं धर्मी अवधारणा 'लिङ्ग' और वही आधेयका 'लिङ्गी' कहा जाता है । 'लिङ्ग' शब्दका अर्थ होता है 'धीने अर्थका बोधक हो उसको 'लिङ्ग' कहते हैं । धूम पर्वतपर स्थित, परन्तु प्रत्यक्ष दिखाई न देनेवाले अर्थका बोधक हो वहाँका बोध कराता है । धुवाँ उठता हुआ देखकर दुरसे ही यह ज्ञान हो जाता है कि 'पर्वतो वह्निमान् धूमवत्त्वात्'" पर्वतपर अभि है क्योंकि पर्वतपर धुवाँ दिखलाई दे रहा है । इस प्रकार धूम 'वह्नि' कहलाता है, वही 'साध्य' और पर्वत 'पक्ष', लिङ्ग और साध्यच्यवहार चैवल अनुमानकी इच्छा अनुमित्सा या लिङ्गसाध्यव्यवहारके ऊपर निर्भर है । इसकिये इच्छा प्रकार शाब्दको व्यङ्गयकत्व प्रतीतिका इच्छापर निर्भर है । इसलिये शाब्दकत्वमे लिङ्गत्वकी सादृश्य है ।

इसके अतिरिक्त धूमादि लिङ्ग व्यतिरेकरूप अन्य सामग्रिके सहयोगसे ही अर्थका अनुमापक होते हैं । 'व्यासिबलेन अर्थेगमकं लिङ्गम्' यह भी लिङ्गका लक्षण है । धूमते वाद्दिका बोध करानेमें 'यत्र यत्र धूमस्तत्र तत्र वह्निः' इस व्याप्तिके ग्रहणकी आवश्यकता होती है । उसके बिना धूम वाद्दिका अनुमापक नहीं हो सकता है । इसी प्रकार व्यङ्गच शाब्दको व्यङ्गच्य अर्थका बोध करानेके लिये प्रकरणादिवैशिष्ट्यरूप सामग्रिककी सहाय्यता आवश्यक होती हैं । यह भी लिङ्गत्व और व्यङ्गयकत्वकी एक समानता हो सकती है । परन्तु इसको लिङ्गत्वन्यायका प्रवर्तक नहीं मानना चहिये, क्योंकि नैया-विक अपने लिङ्गत्वको औपाधिक धर्में नहीं, अपितु स्वाभाविक सम्बन्ध कहता है । इसलिये आलोककारने यहाँ केवळ इच्छाधीनत्वको ही लिङ्गत्वन्यायका प्रवर्तक माना है ।

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ध्वन्यालोकः

लिखितवान्यायाश्रयस्य व्यङ्ग्यैकभावस्य लक्ष्यते । यथा' लिखितवमाश्रयेऽप्यनियताव-

भासम्, इच्छाधीनत्वात्, स्वविषयान्यभिचारि च, तथैवेदं यथा दर्शितं व्यङ्क्य कतवम् ।

शब्दात्मनि नियतत्वादेव' च तस्य वाचकत्वप्रकारता न शक्या कल्पयितुम् । यदि हि वाचकत्वप्रकारता तस्य अभवेत् तच्छब्दात्मनि नियततापि स्याद् वाचकत्ववत् ।

अथ व्यङ्ग्यैकभावका लिखितवान्याय [लिखितवसाम्य] भी दिखलाई देता है ।

जैसे लिखितत्व आश्रयों [धूमादि] ने इच्छा [अनुमित्सा] के अधीन होनेसे अनियतत्व [सदा न प्रतीत होनेवाला] होता है और अपने विषय [साथ्य वन्हि आदि] में अभ्य-

मिच्छारि [सदा नियत] होता है । इसौ प्रकार, जैसे कि ऊपर दिखलाया जा चुका है,

यह व्यङ्ग्यक्त्व [अपने आश्रय शब्दोंमें इच्छाधीन होनेसे अनियत और स्वविषये अर्थात्

वाच्य या अर्थके बोधनमें नियत [अव्यभिचारि] है ।

शब्दस्वरूपमें अनियत होनेसे ही उस [व्यङ्ग्यक्त्व] को वाच्यत्वका भेद नहीं माना जा सकता है । यदि वह [व्यङ्ग्यक्त्व] वाचकत्वका भेद [प्रकार ही] होता तो वाचकत्वके समान शब्दस्वरूपमें नियत भी होना चाहिये [परन्तु वह शब्दस्वरूपमें

नियत नहीं है । प्रकरणादिसहकारसे ही व्यङ्ग्यक्त्व होता है । अतः व्यङ्ग्यक्त्व

वाचकत्वसे भिन्न है ।

मीमांसकमतमें व्यङ्ग्यक्त्व अप्रियहाय

वाचकत्वसे व्यङ्ग्यक्त्वका भेद सिद्ध करनेके लिए अभी व्यङ्ग्यक्त्वको औपाधिक धर्म बतलाया गया है, अर्थात शब्द और अर्थका व्यङ्ग्यक्त्वरूप औपाधिक सम्बन्ध भी होता है । यह बात मीमांसा-

दर्शनके "औपत्तिकस्तु शब्दस्यार्थेन सम्बन्धः" इत्यादि [अ० १, पा० १, सू० ५] के विरुद्ध है ।

उस सूत्रमें शब्द और अर्थका नित्य सम्बन्ध माना है । औपत्तिकका अर्थ नित्य करते हुए सूत्रके भाष्यकार शबरस्वामिने लिखा है कि "औपत्तिक इति नित्यं वूमः । उत्पत्तिहिं भावो नित्यते लक्षणया ।

अविच्छेदः शब्दार्थयोः सम्बन्धः । नोत्पत्तयोः पश्चाद् अपि सम्बन्धः ।" शबरस्वामिके इस भाष्य और

मीमांसासूत्रके साथ व्यङ्ग्यक्त्वरूप शब्द अर्थके औपाधिक सम्बन्धके विरोधका परिहार करते हुए

पौरपेय तथा अपौरपेय वाक्योंमें भेद माननेवाले मीमांसकके लिए भी औपाधिक व्यङ्ग्यक्त्वकी

अनिवार्यता प्रतिपादन करने' लिए अगला प्रकरण प्रारम्भ करते हैं ।

मीमांसाके सिद्धान्तमें वेद 'अपौरपेय' हैं और उनका स्वतःप्रामाण्य माना जाता है । लौकिक

वाक्य पुरुषनिर्मित होनेसे अपौरपेय हैं, उनका प्रामाण्य वक्ताके प्रामाण्यकी अपेक्षा रखनेचे परतः है ।

वैदिक वाक्य स्वतः प्रमाण हैं और लौकिक वाक्य परतः प्रमाण हैं । 'ज्ञानग्राहकातिरिक्तापेक्षत्वं

स्वतःसत्वम् ।' 'ज्ञानग्राहकातिरिक्तापेक्षत्वं परतःसत्वम् ।' अर्थात् जहाँ ज्ञानकी ग्राहक सामग्रीके ग्रहण करनेके लिए अपेक्षित हो वहाँ 'परतःप्रामाण्य' होता है और जहाँ ज्ञान

ग्राहक सामग्रीसे ही प्रामाण्यका भी ग्रहण ज्ञानके ग्रहणके साथ ही हो जाता है वहाँ 'स्वतःप्रामाण्य'

होता है । लौकिक वाक्य पुरुषनिमित्त होते हैं । पुर्पषमें भ्रम, प्रमाद, विप्रलिप्सा आदि दोष हो सकते

१. 'तथाहि लिखितवमाश्रयेऽपि नियतावभासम्' नि० । '(अ)नियतावभासं' दी० ।

२. 'शब्दात्मनि नियतत्वादेव' चि० । '(अ)नियतत्वादेव' दी० ।

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कारिका ३३ ] प्रतोत्पाद्योतः २७३

स च तथाविध औपाधिको धर्मः शाब्दानामौत्पत्तिकशाब्दार्थसम्बन्धवादिना वाक्यतत्त्वविदा पौर्वापौरेयापौरेययोर्वाक्ययोरविनाभेषसममिदघता नियमेनाभ्युपगन्तव्यः । वेदनाभ्युपगमे हि तस्य शाब्दार्थसम्बन्धनित्यत्वे सत्यप्यपौरेयेपौरेययोर्वाक्ययोरस्यप्रतिपादने

हैं, अतएव पुरुषके दोषोंके सम्बन्धसे लौकिक या 'पौरुषेय' वाक्योंमें आप्रामाण्य आ जाता है । परन्तु वेद 'अपौरुषेय' हैं, उनमें 'पुन्दोष'के संसर्गकी सम्भावना न होनेसे वे स्वतः प्रमाण हैं, यह मीमांसकोंका सिद्धान्त है ।

मीमांसक शब्द और अर्थका नित्यसम्बन्ध मानते हैं । इसलिए उनके यहाँ शब्द भी नित्य है । परन्तु शब्दोंके समूहरूप लाङ्गिक वाक्य पुरुषनिर्मित और अनित्य है । जैसे मालाकार पुरुषोंका उत्पादक नहीं होता फिर भी उसके क्रमिक सन्निवेशरूप मालाका निर्माण होता है, इसी प्रकार पुरुष नित्य शब्दोंका उत्पादक न होनेपर भी उनके क्रमबद्ध वाक्यस्वरूपका निर्माता होता है, अतः लौकिक वाक्य 'पौरुषेय' अर्थात् पुरुषनिर्मित होते हैं ।

इस प्रकार शब्द और अर्थका नित्यसम्बन्ध होनेसे उनके मतमें वाक्यकों कमी निरयंक अथवा मिध्यार्थक नहीं होना चाहिये । इसलिए लौकिक वाक्य भी वैदिक वाक्यके समान स्वतःप्रमाण ही होने चाहिये । फिर भी मीमांसक लौकिक वाक्योंमें पुरुषदोषके सम्बन्धसे आप्रामाण्य मानते हैं । इस

हो सकता है, क्योंकि वाक्यार्थकी बोधकता तो पौरुषेय-अपौरुषेय दोनों प्रकारके वाक्योंमें समान ही है । किन्तु तात्पर्यबोधकत्वके आधारपर ही उन दोनों वाक्योंका भेद सम्भव है । वाक्यनिमित्ता पुरुषकी इच्छा ही तात्पर्य है । पुरुषके असद्वृत्त और आभान्ति आदि दोष युक्त होनेके कारण उसके तात्पर्यविषयीभूत

अथवा इच्छाके विषयीभूत अर्थमें मिध्यात्व भी सम्भव हो सकता है । इसलिए पौरुषेय लौकिक वाक्योंमें वक्ताके भ्रम, प्रमाद, विप्रलिप्सा आदि दोषयुक्त होनेसे मिध्यार्थकता हो सकती है । वैदिक वाक्य कतिपय पुरुष [यहाँ पुरुष शब्दसे ईश्वरका ग्रहण होता है] के निर्मित नहीं हैं । अतएव उनमें मिध्यार्थकता सम्भव नहीं है । यही पौरुषेय-अपौरुषेय वाक्योंका अन्तर है ।

इस प्रकार 'पौरुषेय' वाक्योंका तात्पर्यार्थ उन्हें 'अपौरुषेय' वाक्योंसे मिल्न करता है । यह तात्पर्यार्थ अभिधाते प्रतीत नहीं हो सकता, क्योंकि वह सक्केलित अर्थ नहीं है और न लक्षणासे प्रतीत हो सकता है, क्योंकि वहाँ लक्षणाकी मुख्यार्थबाध आदिरूप सामग्री नहीं है । अतएव इस तात्पर्यार्थंका

बोध अभिधा और लक्षणासे भिन्न व्यञ्जनाबुद्धिते ही हो सकता है । इसलिए मीमांसकके न चाहनेपर भी उसे व्यञ्जनादृष्टि स्वीकार करनी ही होगी । इसलिए शब्दमें तात्परयरूप 'औपाधिक' धर्म उसे भी स्वीकार करना होगा । उस औपाधिक धर्मके सम्बन्धघटित पदार्थके स्वभावमें परिवर्तन देखा जाता है ।

इस युक्तिक्रमसे ग्रन्थकार मीमांसकोंके लिए औपाधिक धर्म व्यक्जकत्वकी अनिवार्यता इस प्रकरणमें सिद्ध करते हैं ।

और इस प्रकारका वह [व्यञ्जकतवरूप] औपाधिक धर्म शब्द और अर्थके नित्यसम्बन्धको माननेवाले और पौरुषेय तथा अपौरुषेय वाक्योंमें भेद माननेवाले वाक्यके तत्त्वको जाननेवाले [अथवा वाक्यमें शक्तिं माननेवाले मीमांसक] को अवश्य मानना पड़ेगा । उसके स्वीकार किये विना शब्द और अर्थका नित्यसम्बन्ध होनेपर भी पौरुषेय

तथा अपौरुषेय वाक्योंके अर्थबोधनमें समानता होगी । [वेदका उपपादन नहीं हो

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ध्वन्यालोक:

निर्विशेषत्वं स्यात् । तदस्युपरगमे हि व पौढशेयाणां वाक्यानां पुरुषेच्छानुविषयासंमारोपि-तौपाधिककलयापारान्तराणां सत्यपि स्वाभिधेयसम्बन्धापरित्यागे मिध्यार्थींतापि भवेत् ।

हृद्यते हि भावानामपरित्यक्तस्वभावानामपि सामग्र्यन्तरसम्मातसम्पादितौपाधिक-व्यापारान्तराणां विरुद्धक्रियत्वम् । यथा हि हिममयूखप्रभृतितीनां निरोपितसकलजीवलोकं शीतलत्वसुखदहतामेव प्रियाविरहदहदहनदह्यमानमानसैरंज नैरालोक्यमानानां सतां सन्तापकारित्वंप्रतिसिद्धमेव । तस्मात् पुरुषेच्छया वाक्यानां सत्यपि नैसर्गिकेडर्थसम्बन्धे मिध्यार्थत्वं समस्त-चितुमिच्छतया वाचकत्वन्यतिरिकं किमिदं पुमौपाधिकं व्यक्तमेवाभिधानेयम् । तथा व्यक्त-क्त्वादते नान्यत् । व्यक्त-क्त्वप्रकाशनं हि व्यक्तकत्वम् । पौढशेयाणि च वाक्यानि प्राधान्येन पुरुषाभिप्रायमेव प्रकाशयन्ति । स च व्यक्त-क्त्व एव न त्वमिधेयः । तेन सद्धान्त्वनेन न्यायेन सवेंपामेव लौकिकानां वाक्यानां ध्वनित्यवधारः प्रसक्तः । सवें-

शाम्यनेन न्यायेन व्यक्तकत्वात् ।

सदैव] और उस [व्यक्तकत्वरूप औपाधिक धर्म]का स्वीकार कर लेनेपर पौढशेय वाक्योंमें अपने वाच्यवाचकभाव [रूप नित्य] सम्बन्धका परित्याग किये बिना भी पुरुषकी इच्छा [तात्पर्य]का अनुसरण करनेवाले दूसरे औपाधिक [व्यक्तकत्वरूप] व्यापारयुक्त वाक्योंकी मिध्यार्थता भी हो सकती है । अपने स्वभावका परित्याग किये बिना भी अन्य व्यापारोंको प्राप्त करनेवाले पदार्थोंमें विपरीत क्रियाकारित्व देखा जाता है । जैसे समस्त संसारको शान्ति प्रदान करनेवाले शीतल स्वभावसे युक्त होनेपर भी, प्रियके विरहदाहसे सन्तप्त चित्तवाले पुरुषोंके दर्शनगोचर चन्द्रमा आदि [शीतल] पदार्थोंका सन्तापकारित्व प्रसिद्ध ही है । इष्टिप [शब्द और अर्थका] स्वाभाविक [लैक्प].सम्बन्ध होनेपर भी पौढशेय वाक्योंकी मिध्यार्थताका समर्थन करनेकी इच्छा रखनेवाले [भोमांसक] को वाचकत्वसे अतिरिक्त [वाक्योंमें] कुछ औपाधिकरूप अध्यस्य ही मानना पड़ेगा । और वह [औपाधिकरूप] व्यक्तकत्वके स्वीकार और कुछ नहीं [हो सकता] है । व्यक्तकत्व ही है । पौढशेय वाक्य मुख्यरूपसे [त्का] पुरुषके अमिप्रायको ही [व्यक्तकत्वरूपसे] प्रकाशित करते हैं । और वह [पुरुषाभिम्राय] व्यक्त-क्त्व ही होता है, वाच्य नहीं । [क्योकि] उस [पुरुषाभिप्राय]के साथ वाचक वाच्यका वाच्यवाचकभावसम्बन्ध [सड़केतग्राह] नहीं होता है [एतद्विपरीतमीमांसकको वक्ताके अभिप्रायरूप औपाधिक अर्थके बोधके लिये वाक्यमें व्यक्तकत्व अवश्य मानना होगा] ।

[प्रश्न] इस प्रकार तो सभी लौकिक वाक्योंका [पुरुषाभिप्रायरूप व्यक्तक्वके. सम्बन्धके कारण] ध्वनित्यवधार हो जायगा [सभी लौकिक वाक्य ध्वनि कहलाने लगेंगे] ।

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कारिका ३३ ]

द्वितीय उद्योत:

२५९

सत्यमेतत्, किन्तु वक्त्रामिप्रायप्रकाशनेन 'यदि व्यङ्ग्योऽनजकत्वे तत्तद्वे षामेव लौकिकानां वाक्यानामविशिष्टम्, तत्तु' वाचकत्वाभ्र सिध्यते । व्यङ्गयं हि चत्र नान्तरीयकत्वा व्यव-स्थितम् । न तु विवक्षितत्वेन । 'यस्य तु विवक्षितत्वेन व्यङ्गयं न स्याद् विशिष्टद्योऽनङ्गकत्वं ध्वनिल्यवहारस्य प्रयोजकम् ।

'युक्तमिप्रायविवक्षारूपं व्यङ्गयं शब्दार्थयोभ्यां' प्रकाशते तदुक्तावि विवक्षितं तात्पर्येण प्रकाशयमानं सत् । किन्तु तदेव केवलमपरिमितव विषयस्य ध्वनिल्यवहारस्य न प्रयोजकमन्यापकत्वात् । तथाहि दर्शितमेवत्रयात्मकं तात्पर्येण ध्वोत्यमानमभिप्रायरूपमनभिप्राय-रूपं च सर्वमेव ध्वनिल्यवहारस्य प्रयोजकमिति यथोक्तव्यङ्गकत्वविशेषे ध्वनिलक्षणे नातिव्याप्तिमिर् चाव्याप्तिः ।

[उत्तर]

यहाँ ठीक है । वक्त्रके अभिप्रायके प्रकाशनसे जो व्यङ्गकत्व आता है वह तो सब लौकिक वाक्योंमें समान है । किन्तु वह वाचकत्वसे मिन्न नहीं है । क्योंकि उनमें व्यङ्गच, वाच्यके अभिधाभूतार्थरूपमें स्थित है, विवक्षितरूपमें नहीं । [व्यङ्गचके विवक्षित न होनेसे उसमें ध्वनिल्यवहार नहीं किया जाता है] और जिस व्यङ्गचकी स्थिति तो [प्रघानरूपसे] विवक्षिततरूपमें है वही व्यङ्गकत्व ध्वनिल्यवहारका प्रयोजक होता है [अतः सब लौकिक वाक्य ध्वनि नहीं हैं] ।

जो अभिप्रायविशेषरूपसे व्यङ्गच, शाब्द और अर्थसे प्रकाशित होता है वह तात्पर्य-रूप [प्रधानरूप] से प्रकाश्यमान हो तो विवक्षित [व्यङ्गच] कहलाता है । किन्तु केवल वह ही, अपरिमित [स्थूलतया होनेवाले] ध्वनिल्यवहारका कारण नहीं है [ध्वनिल्यवहारकी अपेक्षा] अव्यापक होनेसे । जैसे कि ऊपर दिखलाये हुए मेदत्रय [रसादि, वस्तु तथा अलङ्काररूप] तात्पर्यसे ध्वोत्यमान अभिप्रायरूप [रसादि] और अनभिप्रायरूप [वस्तु तथा अलङ्काररूप] सभी ध्वनिल्यवहारके प्रयोजक हैं । अतएव [सङ्केतः शाब्दो वा तात्पर्यमुपसर्जनीकृतसार्थौ व्यङ्गकः काव्यविशेषः स व्यनिरिति सूरिभिः कथितः । १,१३ । इत्यादि कारिकाओंमें] पूर्वोक्त व्यङ्गकत्वविशेषरूप ध्वनिलक्षण माननेमें न मतिभेद्योति होती है और न अव्याप्ति ।

१. 'यदि व्यङ्गकत्व' नि० । 'यदिदं व्यङ्गकत्व' दी० ।

२. 'ततु' नि० ।

३. 'यस्य तु' यह पाठ नि० में नहीं है । 'न तु विवक्षितत्वेन व्यङ्गयं स्याद् विशिष्टद्योऽनङ्गकत्वं ध्वनिल्यवहारस्य प्रयोजकं' ऐसा पाठ रखा है नि० ।

४. 'शब्दार्थाभ्यामेव' दी० ।

५. 'तत्' नि० ।

६. 'न प्रयोजकम्, अव्यापकत्वात्' दी० । नि० में 'प्रयोजकं' के बाद विराम है ।

७. 'ततु' दी० ।

८. 'यथोक्तव्यङ्गकत्वविशेषे ध्वनिलक्षणे' नि०, दी० ।

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ध्वन्यालोकः

[कारिका रेहे

तस्माद्वाक्यतत्त्वविदां मतेन' तावद् व्यञ्जकत्वलक्षणः शब्दो न' व्यापारो न' विरोधी

प्रत्युतानुगुण एव लक्ष्यते ।

परिनिश्चितनिरप्रेक्षशब्दार्थाभिधान विप्रतिप्रतां मतमाश्रित्यैव प्रधृतोडयं ध्वनिनिर्णयवधार

इति तैः सह किं विरोधविरोधौ चिन्त्येते ।

कृतिमशब्दार्थसम्बन्धवादिनां तु युक्तिविदामनुमवसिद्ध पवायं व्यञ्जकभावः

शब्दानामर्थान्तराणामिविरोधरचनेत न प्रतिक्षेप्यपदवीमतवरति ।

ध्वननि कहने वाले लोगेंगे यह जो अतिव्याप्ति अभी दिखलायी थी, और उधरके आधारपर अभिप्रायरूप जो नहीं है ऐसे वस्तु या अलंकारके व्यङ्ग्यमें ध्वनिसंवहार नहीं हो सकेगा यह अस्याप्ति, यह दोनों दोष तब हो सकते हैं जब सामान्यतः अभिप्रायव्यङ्गयत्वकत्वको ध्वनिका लक्षण मानें । परन्तु अभिप्राय-व्यङ्गयत्वके प्राधान्यमें ध्वनिसंवहार माना गया है अतएव उक्त कारिकामें कहे ध्वनिलक्षणमें न अतिव्याप्ति है और न अव्याप्ति है ।

इसलिए वाच्यतत्त्ववेदकों [मीमांसकों] के मतमें व्यङ्गयकत्वरूप [वाचकत्व तथा

गुणवृत्तितः सिध्य] शब्द व्यापार मानना विरोधी नहीं अपितु अनुकूल ही प्रतीत

होता है ।

वैचाकरणमतेऽपि ध्वानिसिद्धान्तेऽनुकूल

इस प्रकारके प्रारम्भमें मीमांसक, वैचाकरण और नैयायिक आादि की ओरसे एक सामान्य

व्यङ्गयत्वविरोधी पूर्वपक्ष उठाया गया था । अब उसका खण्डन कर उपसंहार करते हैं । उस

उपसंहारमें मीमांसकमतमें व्यङ्गयकत्ववापार विरोधी नहीं अपितु अनुकूल जान पड़ता है—यह कहा ।

आगे वैचाकरण सिद्धान्तके साथ ध्वनिसंवहारका अविरोध इस प्रकार दिखलाते हैं कि हम आचार्य्योने तो ध्वनि शब्द ही वैचाकरणोंसे लिया है, अतएव उनके सिद्धान्तके साथ ध्वनिसिद्धान्तके

विरोधकी चर्चा करना ही व्यर्थ है ।

['निरपेक्षं' गलितभेदप्रपञ्चतया अविद्यासंस्काररहितम्' इति लोचनकारः]

अविद्यासंस्काररहित 'शाब्दबोधका निश्चय करनेवाले [वैचाकरण] विद्वानोंके मतका

आश्रय लेकरे ही [हमारे शास्त्रमें] यह ध्वनिसंवहार प्रचलित हुआ है, इसलिये उनके

साथ विरोध-अविरोधकी चिन्तासकी आवश्यक्ता ही क्या है? [अथवा्‌ उनका विरोध

हो ही नहीं सकता है] । अतः उसके परिहारकी चिन्ता भी व्यर्थ है ।

न्यायमत व्यङ्गयकत्वके अनुकूल

शब्द और अर्थका कृतिम [आनित्य] सम्बन्ध [सदेतरत वाच्य-वाचकत्वरूप]

माननेवाले प्रमाणचिन्तकों [नैयायिकों] के मतमें तो [दीपक आदि] अन्य अर्थोंके [व्यङ्ग्य-

कत्वके] समान शाब्दका व्यङ्गयकत्व अनुभवसिद्ध और निर्विरोध [ही] है, अतः [नैया-

यिकमतमें व्यङ्गयकता] निराकरण [खण्डन] करने योग्य नहीं है ।

१. 'मते न' नि०, दी० १

२. '(न)' नि० ।

३. 'तैः' बा० प्रि० ।

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कारिका ३२ ]

रत्नीय उद्योतः

३५७

वाचकत्वे हि तार्किकाणां विप्रतिपत्तयः प्रवर्तन्तेऽत्राप्, किमिं स्वाभाविकं शब्दानामाहोस्वित् सामयिकमित्यादिः। व्याख्यातत्वे तु तत्वप्रकाशाविनि 'भावान्तर साधारणे लोके प्रसिद्ध एवानुगम्यमाने को विमवीनामवसरः।

अलौकिके ह्यर्थे तार्किकाणां विमतयो निखिला: प्रत्रत्नेन न तु लोकिके। न तु नीलमधुरादिष्वशेषलोकेन्रियगोचरे वाच्यार्थिते तत्त्वे परस्परं विप्रतिपत्तिरह्रयन्ते। न हि वाध्यारहितं नीलं नीलमिति कुतश्च परेण प्रतिपाद्यते नैतद्वीलं गीतमेवद्विति। तथैव व्यकुजकत्वं वाचकत्वान्माचकत्वानां च गीतध्वनितीनामशब्दरूपाणां च चेष्टादीनां यत्सर्वेषामनुभवसिद्धमेव तत्केनापह्नुयते।

अशब्दमर्यं मणीनियं हि सूचयन्नो व्याहारास्तथा न्यायापे निवद्धाक्षानिबद्धाक्ष" विदग्धपरिपत्सु विविधा विभाव्यन्ते। 'तारुपदस्यमानमानातमनः परिहरन कोऽतिसन्- गीतं सचेता:।

तार्किकां [नैयायिकों] को वाचकत्वके विषयमें, क्या शब्दोंका वाचकत्व स्वाभा- विक है अथवा सङ्केतादिहत इत्यादि प्रकारकी विप्रतिपत्तियाँ भले ही हों परन्तु उस [वाचकत्व] के वाद आनेवाले, और [दीपक आदि] अन्य पदोंके समान लोकप्रसिद्ध अननुभूयमान व्यङ्गचकके विषयमें तो मतभेदका अवसर ही कहाँ है [अर्थात् न्याय- शास्त्रनतको भी यहाँ एकमतविरोधी सिद्धान्त नहीं मानना चाहिये]।

तार्किकां [नैयायिकों] को [आत्मा आदि] अलौकिक [लोकप्रत्यक्षके अगोचर] अर्थोंके विषयमें सारी विप्रतिपत्तियाँ होती हैं, लेकिन [प्रत्यक्षादिसिद्ध] अर्थके विषयमें नहीं। नील, मधुर आदि [मन्त्रे निर्धारणे सास्त्रम्] सर्वलोकप्रत्यक्ष और अबाधित पदार्थ- के विषयमें परस्पर मतभेद नहीं दिखाई देता है। वाच्यार्थहित नीलको नील कहनेवाले किसीको [दूसरा] निषेध नहीं करता है कि यह नील नहीं है, यह पीत है। इसी प्रकार वाचक शब्दोंका, अवाचकराब्दरूप गीत आदि क्रियाओंका और [अर्थशब्दरूप] चेष्टा आदि [तीनों] का व्यङ्ग्यक्त्व जो सबके अनभुवसिद्ध ही है, उसका अपलाप कौन कर सकता है?

विद्वानोंकी शास्त्रियोंमें शब्दसे अनभिप्रेत [अभिधा द्वारा शबसे कथित न किये जा सकनेवाले] शन्द [कमत्कारजनक] अर्थको अभिव्यक्त करनेवाले अनेक प्रकारके वचन और व्यापार [शब्दरूपमें] निवद्ध अथवा अनिबद्ध पाये जाते हैं। अपने आपको उपहास्यतासे बचानेवाला कौन बुद्धिमान् उनको स्वीकार नहीं करेगा?

१. 'भावान्तरासाधारणे' नि० ।

२. 'विमतयो निखिला:'के स्थानपर नि०, दी० में 'अभिनिवेशाः' पाठ है ।

३. 'तु' पद नि० में नहीं है ।

४. 'तत्केनापह्नुयते [पह्नुयते ?]' पैंसा पाठ नि० में है ।

५. 'तथा व्याघारतिबन्धाइच' नि०, दी० ।

६. 'नतु' नि० ।

७. 'कोऽतिसन्- गीते' नि० । 'कथमभिसन्धीगोत' दी० ।

Page 323

ध्वन्यालोक:

नूयातां ! अस्लयतिसन्वयानुसारः । व्यञ्जकत्वं शब्दानां गमकत्वम् तथा लिङ्गत्वम् ।

अतस्मिन् व्यक्जयप्रतीतिबिलेक्रियमतीतिरेवेति लिङ्गलिङ्गिभाव एव तेषाम्, व्यक्जयगयणकभावो नापरः कथञ्चित् । अतस्मैरेतरद्व्यतिरेक्यमेव बोद्धव्यं यस्यादृकत्वमिञ्राप्यापेक्षया व्यञ्जकत्वमिदानीमेव त्वया प्रतिपादितम् । वक्त्रभिप्रायरचनानुबेयरूप एव ।

'अनुबीयते, अन्वेभवमपि यदि नाम स्यात् । तत्तिअदिध्वननम् । वाचकत्वगुणवृत्ति-व्यतिरिको व्यञ्जकत्वलक्षणः शब्दोऽयमुपोद्वाल्यसामर्थ्यमुपगतम् । तस्य चैकत्वान्न काचित् क्षति: । तदिदे व्यञ्जकत्वं लिङ्गत्वमस्मु अन्यद्रा । सर्वेभ्यः प्रसिद्धशब्दप्रकारविच्छरणत्वं शब्दद्वयापरविषयत्वं च तस्यास्तीति नास्त्येवावयोरिववादः ।

अनुमितिवादका निराकरण

[पूर्वपक्ष] कोष कह सकता है कि [व्यञ्जकत्वको] अस्तीकार करनेका अवसर है । शब्दोंके [अन्यार्थे] बोधकत्व [गमकत्व] का नाम ही व्यञ्जकत्व है । और वह [गमकत्व] लिङ्गत्व [रूप] है । इसलिये व्यक्जयकी प्रतीति लिङ्गकी प्रतीति ही है । अतएव लिङ्ग-लिङ्गिभाव ही उन शब्दोंका व्यक्जय-व्यञ्जकभाव है और [लिङ्ग-लिङ्गिमावसे] अलग कुछ नहीं है । और इसलिये भी ऐसा अवधय मानना वाहिये कि वक्ताके अभीप्रायकी दृष्टीसे व्यञ्जकत्वका प्रतिपादन [अर्थात् व्यञ्जक और लिङ्गका लिङ्ग-लिङ्गिभाव] तुमने [व्यञ्जकत्ववादिने] अभी [मीमांसकके खण्डनके प्रसङ्गमे] किया है । और वक्ताका अभीप्राय अनुमेयरूप ही होता है [अतएव जिसे व्यञ्जकत्ववादी व्यञ्जनान्वयापारका विषय मानना चाहता है वह अनुमानका विषय है । अतः व्यञ्जना अनुमितिके अन्तर्गत है । यह पूर्वपक्षका अभिप्राय है] ।

[उत्तरपक्ष] इसका उत्तर यह है कि यदि [थोड़ी देरके लिप प्रौढिवादसे] ऐसा भी मान लें तो हमारी क्या हानि है । हमने तो यह स्वीकार किया है कि वाचकत्व और गुपडृत्तिसे अतिरिक्त व्यञ्जकत्वरूप [अथवा तीसरा] शब्दव्यापार है । उस [सिद्धान्त] को ऐसा [व्यञ्जक-व्यञ्जकभावको लिङ्ग-लिङ्गिभावरूप] माननेपर भी कोई हानि नहीं [होती] । वह व्यञ्जकत्व [चाहे] लिङ्गत्वरूप हो, अथवा अन्य 'कुछ', प्रत्येक दशामें प्रसिद्ध [अभिधा तथा गुणवृत्तिरूप] शब्दव्यापारसे भिन्न और शब्दव्यापारका विषय बना रहता ही है, इसलिये हमारा तुम्हारा कोई झगड़ा नहीं है ।

यह 'प्रौढिवाद' से उत्तर हुवा । अपनी प्रौढता या पाण्डित्यको प्रकट करनेके लिये किसी अनभिमत बातको कुछ समयके लिये स्वीकार कर लेना 'प्रौढिवाद' कहलाता है । यहाँ व्यञ्जय-व्यञ्जकभावका लिङ्ग-लिङ्गीलप होना सिद्धान्तपक्षको वास्तवमें इष्ट नहीं है । फिर प्रौढता प्रदर्शनके लिये योंडी देरके लिये मान लिया है । अतः यह उत्तर प्रौढिवादका उत्तर है । वास्तविक उत्तर आगे देते हैं—

१. '(अयात्) अस्लयतिसन्वयानुसारः' नि०, वी० ।

२. 'अनुबीयते' पाठ निः० में नहीं है ।

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कारिका ३३ ] द्वतीय उद्योत: २७९

न पुनरयं परमार्थो यद् व्यञ्जकत्वं लिङ्गत्वमेव सर्वत्र, व्यक्‍ृप्रतीतिरेवति लिङ्ग-प्रतीतिरेवेति । यदपि स्पष्टसिद्धयेडस्मदुक्तमनूदितम्, त्वया वक्त्राभिप्रायस्य व्यक्‍ृकत्वेनाभ्युपग-मान् तत्प्रकाशने शास्त्राणां लिङ्गत्वमेवेति तदेतथयास्माभिरमिहितं तदिमन्य प्रविपाद्यते, श्रूयताम् ।

द्विविधो विषयः : शब्दज्ञानम् । अनुस्मेयः प्रतिपाद्यः । तत्रादिमेयो विवक्षाद्विविधा विषयः । विवक्षा च शब्देनार्थप्रकाशनेच्छा चेत् द्विप्रकार । तत्राद्या न शाब्दव्यवहाराङ्गम् । सा हि प्राणितमात्रप्रतिपत्तिफला । द्वितीया तु शब्दविशेषावधारणवसतियेवंहि 'शब्दकरणव्यवहारान्निर्बन्धनम् । ते तु द्वे अप्यनुस्मेयो विषयः शब्दज्ञानाम् प्रतिपाद्यतु प्रयोक्‍ृस्यैतदनुसन्धीयकुलोद्यतः । स च द्विविधो, वाच्यो

वास्तवमे तो यह बात ठीक नहीं हैं कि व्यञ्जकत्व सब जगह लिङ्गत्वरूप और व्यक्‍ृव्यको प्रतिति सर्वत्र [अनुमिति] लिङ्गप्रतीतिरूप ही हो । और अपने पक्षकी सिद्धि करनेके लिऐ जो हमारे कथनका अनुवाद किया है तमने [व्यञ्जकत्ववादीने] वक्ताके अभिप्रायको व्यक्‍ृ माना है और उस [वक्ताके अभिप्राय] के प्रकाशनमें शब्दोंका लिङ्गत्व ही है । सो इस विषयमें जो हमने कहा है उसको अलग-अलग खोलकर कहते हैं, [अच्छी तरह] सुनो !

वासतवमे तो यह बात ठीक नहीं हैं कि व्यञ्जकत्व सब जगह लिङ्गत्वरूप और व्यक्‍ृव्यको प्रतिति सर्वत्र [अनुमिति] लिङ्गप्रतीतिरूप ही हो । और अपने पक्षकी सिद्धि करनेके लिऐ जो हमारे कथनका अनुवाद किया है तमने [व्यञ्जकत्ववादीने] वक्ताके अभिप्रायको व्यक्‍ृ माना है और उस [वक्ताके अभिप्राय] के प्रकाशनमें शब्दोंका लिङ्गत्व ही है । सो इस विषयमें जो हमने कहा है उसको अलग-अलग खोलकर कहते हैं, [अच्छी तरह] सुनो !

शब्दोंका विषय दो प्रकारका होता है, एक अनुस्मेय और [दूसरा] प्रतिपाद्य । उनमेंसे [अर्थको कहनेकी इच्छा] 'विवक्षा' अनुस्मेय है । विवक्षा भी शब्दके [ज्ञानपूर्वी] उनमेंसे [अर्थको कहनेकी इच्छा] 'विवक्षा' अनुस्मेय है । विवक्षा भी शब्दके [ज्ञानपूर्वी] स्वरूपके प्रकाशनकी इच्छा, और श्रोद्वारा अर्थप्रकाशनकी इच्छारूप दो प्रकारकी होती है । उनमेंसे पहिली [शब्दके स्वरूपप्रकाशनकी इच्छा] शाब्दव्यवहार [शब्दबोध] का हॆ । उनमेंसे पहिली [शब्दके स्वरूपप्रकाशनकी इच्छा] शाब्दव्यवहार [शब्दबोध] का हॆ । [शब्दका स्वरूपमात्र अर्थात् अर्थहीन व्यक्‍ृ या अव्यक्‍ृ च्वनि कोई प्राणी कर सकता है, अचेतन नहीं । इसलिऐ शब्दके स्वरूपमात्र प्रकाशनसे प्राणीका ज्ञान तो अवश्य हो सकता हॆ, परन्तु उससे किसी प्रकारके अर्थका ज्ञान न हो सकनेसे वह शाब्दबोध वा शाब्दव्यवहारमें अनुपयोगी हॆ] । दूसरी [अर्थप्रकाशनेच्छारूप] शब्दविशेष शाब्दव्यवहारमें अनुपयोगी हॆ] । दूसरी [अर्थप्रकाशनेच्छारूप] शब्दविशेष [वाचकादि]के अवधारणसे व्यवहित होनेपर भी शाब्दकरणक व्यक्‍ृहार अथवा शाब्द-बोध व्यक्‍ृहारका यक्‍ृ होता हॆ । ये दोनों [शब्द सम्बन्धी इच्छाएँ] शब्दोंका अनुस्मेय विषय हॆ [विशेष प्रकारके शब्दको सुनकर शाब्दस्वरूपप्रकाशनकी इच्छा अथवा अर्थप्रकाशनकी इच्छाका अनुमान होता हॆ । इसलिऐ ये दोनों इच्छाएँ शब्दोंका

The actual meaning is not that the suggestive power is the same as the indicative power everywhere, and that the revealed meaning is not just the indicated meaning. The commentator explains that the suggestive power is not always the same as the indicative power, and that the meaning is not always inferred. The text discusses the different aspects of word meaning and how it is conveyed.

अनुस्मेय विषय हॆ] । [शब्द] प्रयोक्‍ृताकी अर्थप्रतिपादनकी इच्छाका विषयीभूत अर्थ [शब्दका] प्रतिपाद्य विषय होता हॆ । और वह वाच्य तथा व्यक्‍ृय दो प्रकारका हॆ । प्रयोक्‍ृता कदाचित्

[शब्दकरणव्यवहारान्निर्बन्धनम् । ते तु द्वे अप्यनुस्मेयो विषयः शब्दज्ञानाम् प्रतिपाद्यतु प्रयोक्‍ृस्यैतदनुसन्धीयकुलोद्यतः । स च द्विविधो, वाच्यो

The subject of the word is two-fold: the meaning to be conveyed and the meaning that is inferred. The text discusses the different aspects of word meaning and how it is conveyed.

१. 'शब्दकरणव्यवहारान्निबन्धनम्' वि०, दी० ।

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ध्वन्यालोक:

व्यङ्गचमत् । प्रयोक्ता हि कदाचित् स्वशब्देनार्थ प्रकाशयितुं समीहते, कदाचित् स्वशब्दान-

मिधेयत्वेन प्रयोजनापेक्षया कयाचित् । स तु द्विविधोऽपि प्रतिपाद्यो विषय: शब्दानां न

लिङ्गितया स्वरूपेण प्रकाशते, अपितु कृतrimेणाकृतrimेण वा सम्बन्धान्तरेण । विवक्षा-

विषयत्वं हि तस्यार्थस्य शब्दैरिङ्गितया' प्रतीयते न तु स्वरूपम् ।

यदि हि लिङ्गितया तत्र शब्दानां व्यापार:' स्यात् तच्छब्दार्थे सम्पड़रुमिध्यात्वादि-

विवादा एव न प्रवर्तेरन्, भूमादिलिङ्गितानुमितानुमेयान्तरत्वात् ।

अपने [शाब्दक] शब्दसे अर्थको प्रकाशित करना चाहता है जब कभी किसी प्रयोजन-

विशेष [गोপনकृत सौन्दर्योत्कर्षादिरूप तात्पर्यादिके बोधन] की दृष्टिसे स्वशब्द [वाचक शब्द]

से अनभिधेयरूपसे,

स्वशब्दानभिधेय अर्थ क्यकृत्य अर्थ होता है । शब्दोंका यह दोनों प्रकारका प्रतिपाद्य

विषय अनुमेयरूपसे स्वरूपत: प्रकाशित नहीं होता, अपितु [न्यायिकमतमें सड्ङेतादि-

रूप] कृतrim [अनित्य] अथवा [मीमांसकमतमें नित्यशब्दार्थसम्बन्ध] अकृतrim

[अभिधा व्यापारूप] अन्य सम्बन्धसे [प्रकाशित होता है]। [वक्ताके शब्दोंको सुन-

कर, टिप्पणी उन] शब्दोंसे उस अर्थका विवक्षाविषयत्व [वहा अमुक अर्थे कहना

चाहता है यह बात] तो अनुमेयरूपमें प्रतीत हो सकता है परन्तु [अर्थका] स्वरूप

[अनुमेयरूपसे] नहीं [प्रतीत होता]।

यहाँ अनुमानका स्वरूप यह होगा—‘अयमर्थोऽस्य विवक्षाविषय:', एतदुचritशब्दबोध्य-

त्वात् ।' इस अनुमानसे विवक्षाविषयत्व ही साध्य है, अर्थका स्वरूप नहीं । अर्थका स्वरूप तो 'पक्ष'रूप

होनेसे 'साध्य' नहीं हो सकता । अतएव अनुमानसे विवक्षाविषयत्वकी ही सिद्धि होनेसे वही उसका

विषय हो सकता है । और अर्थका स्वरूप 'पक्ष' होनेसे अनुमितविषय नहीं हो सकता है । 'पक्ष'का

लक्षण 'सन्दिग्धसाध्यवान् पक्ष:' है—जिसमें साध्यकी सिद्धि की जाय उसको 'पक्ष' कहते हैं । यहाँ

'अयमर्थ:' में 'विवक्षाविषय:', विवक्षाविषयत्व सिद्ध किया जा रहा है, अतः अर्थका स्वरूप यहाँ पक्ष

है, अनुमेय नहीं ।

यदि उस [अर्थ] के विषयमें लिङ्गीरूपसे शाब्दका व्यापार हो [अर्थात् शब्दोंसे

अनुमान द्वारा अर्थकी सिद्धि हो] तो धूम आदि लिङ्गोंसे अनुमित' दूसरे [यदि आदि]

अनुमेयोंके समान शब्दके अर्थके विषयमें भी यह ठीक है अथवा मिथ्या इस प्रकारके

विवाद में उठें ।

'नानुपलब्धे न निर्णीतेडयं न्याय: प्रवर्तते किन्तर्हि संशयितेडयं'—इस न्यायसिद्धान्तके अनुसार

सद्वेद होनेपर ही अनुमानकी प्रवृत्ति होती है और अर्थके व्यभिचारी व्यतिरेक्युक्त हेतुतसे शाब्दकी सिद्धि

की जाती है । अतएव इश्वर हेतुतसे अनुमान द्वारा जो अर्थकी सिद्धि होती है वह प्राय: यथार्थ ही

होती है, उसमें सन्देहका अवसर होना है और न मिथ्यात्वकी सम्भावना । इसी प्रकार यदि शब्दसे

उत्पन्न होनेवाला ज्ञान अनुमितिरूप हो तो उस अर्थके विषयमें भी सम्यकत्व अथवा मिथ्यात्वके

विषयमें विवाद नहीं हो ।

१. 'लिङ्गितया' नो०, व्दी० ।

२. 'व्यवहार:' नो०, व्दी० ।

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कारिका ३३ ] तृतीय उद्योतः २८१

व्यक्त-प्रतिपाद्यो वाच्यसामर्थ्योक्षिप्ततया वाच्यवचछच्द्रुतस्य सम्बन्धी भवत्येव । साक्षादसाक्षाद्रावो हि सम्बन्धस्य प्रयोजकः । वाच्यावाचकभावप्रयुक्तं च व्यवत्कतत्स्य प्रागेव दर्शितम् । तथाहि लक्षणाभिप्रायरूप एव व्यक्तये लिखितया वद्‌दानां व्यापारः । तद्रिशयीक्षते तु प्रतिपाद्यतया । प्रतीयमाने तु सन्नाभिप्रायरूपेऽनुप्रायिते च वाचकत्वेनैव

वैदुषिकदर्शनोंमे दाबका अनर्थक अनुमानमे किया गया है और उसका हेतु 'समनवधित्व' दिया गया है। 'ध्वनदायिनमप्यनुमानेऽन्तर्भावः समनवधित्वात्' अर्थात् जिस प्रकार अनुमानमें पहिले १. व्याप्तिग्रह, २. लिङ्‌गदर्शन, ३. व्याप्तिस्मृति और उसके बाद ४. अनुमिति होती है, ठीक इसी प्रकार ध्वनमें भी पहिले १. सादृश्यग्रह, २. पदर्शन, ३. पदर्थस्मृति के बाद ४. शब्दबोध होता है । इस प्रकार दोनोकी विधि समान होनेसे दाब्द अनुमान ही है, यह वैदुषिकका मत है ! न्याय आदिर्मे इनका खण्डन अन्य प्रकारसे किया गया है । परन्तु यहाँ आलोककारने जो युक्ति दी है वह उनसे बिल्कुल भिन्न नई युक्ति है।

[यहाँ व्यक्त अर्थका शब्द द्वारा बोध होनेके विषयमें यह शाङ्का हो सकती है कि व्यक्त अर्थका इद्वारा कोई साक्षात् सम्बन्ध नहीं है इसलिए शब्दसे उसकी प्रतीति नहीं हो सकती है] और व्यक्त अर्थ वाच्य अर्थकी सामर्थ्यसे आक्रियमाणे वाच्यके समान शब्दका सम्बन्धी होता ही है। साक्षाद्राव अथवा असाक्षाद्राव सम्बन्धका प्रयोजक नहीं है। [अर्थात् साक्षात् सम्बन्ध भी हो सकता है और असाक्षात् परम्परासे भी सम्बन्ध हो सकता है] इसीलिए न्यायप्रकरणों, विशेषत: इष्टिसिद्धि तथा अर्थका रूढि प्रकारका सम्बन्ध माना गया हैं। उन छः सम्बन्धोंमें १. संयोग और २. समवायसम्बन्ध तो साक्षात् सम्बन्ध होते हैं और दोष ३. संयुक्तसमवाय, ४. सेयुक्त-समवेत-समवाय, ५. समवेत-समवाय और ६. विशेष्य-विशेषणभाव आदि परम्परासम्बन्ध माने गये हैं।

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ध्वन्यालोकः

व्यापारः सम्बन्धान्तरेण वा। न तावद्वाचकत्वेन यथोक्तं प्रकू। सम्बन्धान्तरेण व्यङ्जकत्वमेव।

न च व्यङ्जकत्वं लिङ्गित्वरूपमेव, आलोकादिष्वनयथा रक्ष्यताम्। तस्मात् प्रतिपाद्यो विषयः शब्दानां न लिङ्गित्वेन सम्बन्धी वाच्यवत्। यो हि 'लिङ्गित्वेन' तेषां सम्बन्धी यथा दर्शितो विषयः, स न वाच्यत्वेन प्रतीते, आप्तौपाधिकत्वेन। प्रतिपाद्यस्य च विषयस्य 'लिङ्गित्व' द्विविध्येन विप्रतिपत्तीनां लौकिकैरनुमानाभासः प्रसज्यतेति । पतज्जकोक्तमेव ।

व्यङ्ग्य कहा है यहाँ 'उमामुखे' जैसे उदाहरणोंमें शिवके आभिप्राय आदिका प्रहण है। इस वाक्यमें शिवका चुम्बनाभिलाष व्यङ्ग्य हो है। वाच्य या अनुमेय नहीं। इस प्रकार विषयभेदसे विरोधका परिहार हो जाता है] उनमें वाचकत्वसे तो बनता नहीं जैसा कि पहिले कह चुके हैं। क्योंकि व्यङ्ग्य अर्थके साथ सकृतेग्राह नहीं। और सम्बन्धान्तर [मानने] से व्यङ्जकत्व ही होता है।

[धीपकके] आदि लोक आदि में अभ्यथा [अर्थात् लिङ्गत्वके अभावमें भी घटादिका व्यङ्जकत्व] देखे जानेसे, व्यङ्जकत्व [सदा] लिङ्गत्वरूप ही नहीं होता है। [प्रकाश घटादिकाअभिव्यङ्यक तो होता है, परन्तु वह घटादिका अनुमितिहेतु न होनेसे लिङ्ग नहीं होता। इसीलिए व्यङ्जकत्व लिङ्ग ही होना आवश्यक नहीं है। इसीलिए प्रतिपाद्य [व्यङ्ग्य] विषय वाच्यकी तरह ही लिङ्गित्वेन शब्दसे सम्बद्ध नहीं है। [अर्थात् जैसे वाच्य अर्थ शब्दसे अनुमेय नहीं है इसी प्रकार व्यङ्ग्य अर्थ भी शब्दसे अनुमेय नहीं है]। और जो लिङ्गी रूपसे उन [शब्दों] का सम्बन्धी [शब्दोंसे अनुमेय] है जैसा कि [ऊपर] दिखलाया हुआ [वाक्यका अभिप्राय या विवक्षारूप] विषय, वह वाच्यरूपसे प्रतीत नहीं होता है, अपितु औपाधिक [वाच्यादि अर्थमें विशेषणीभूत] रूपसे प्रतीत होता है। प्रतिपाद्य विषयको लिङ्गी [अनुमेय] माननेपर उसके विषयमें लौकिक पुरुषों द्वारा ही की जानेवाली विप्रतिपत्तियोंका अभाव प्राप्त होगा। यह कह ही चुके हैं [पृष्ठ २८० पर कह चुके हैं कि अनुमेय अर्थ निश्चित ही होता है, उसमें सम्यक्, मिथ्यात्व आदि विप्रतिपत्तियोंका अवसर नहीं है]।

ज्ञानके प्रामाण्यके विषयमें दो प्रकारके दार्शनिक मत हैं। एक मीमांसकका 'स्वतःप्रामाण्यवाद' और दूसरा नैयायिकका 'परतःप्रामाण्यवाद'। 'स्वतःप्रामाण्य'का अर्थ है 'ज्ञानग्राहकप्रतीतिपेक्षत्व स्वतस्त्वम्' । अर्थात् ज्ञानग्राहक और प्रामाण्यग्राहक सामग्री यदि एक ही हो तो स्वतःप्रामाण्य होता है। मीमांसकमतमें ज्ञान और प्रामाण्य दोनोंका ग्रहण 'ज्ञाततान्यथानुपपत्तिप्रसूला अर्थापत्ति' से होता है, इसलिए स्वतःप्रामाण्य है। 'ज्ञाततान्यथानुपपत्ति' का आशय यह है कि पहिले 'अयं घटः' यह ज्ञान होता है। इस ज्ञानके घटमें ज्ञातता नामक एक धर्म उत्पन्न होता है।

१. 'लिङ्गित्वेन' नि०, दी०। २. 'तेषां' पाठ नि०, मैं नहीं है। ३. 'औपाधिकत्वेन' नि०, दी०। ४. 'विप्रतिपत्तीनां' के बाद 'लौकिकानां' नि०। 'लौकिकानां' दी० पाठ अधिक है।

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कारिका ३८ ]

आचार्य आनन्दवर्धन

डा० रा० गणेश

मोतीलाल बनारसीदास

तृतीय उद्योतः २८३

इष्ट धर्मंका मीमांसक 'शान्ता' धर्ममें कहता है । यह ज्ञातता धर्म 'अयं घट:' इस ज्ञानसे पहिले नहीं था, 'अयं घट:' इस ज्ञानके बाद घटमें उत्पन्न हुआ है । इसलिये वह ज्ञानकृत् ही होता है अर्थात् उसका कारण ज्ञान ही होता है । ज्ञातता धर्मकी प्रतीति वादमें होनेवाले, 'कुतो मया घट:' इत्यादि रूपमें होती है । इस 'ज्ञातो मया घट:'में, घटमें रहनेवाली ज्ञातता प्रतोति होती है । यह ज्ञातता अपने कारण ज्ञातके बिना घटमें नहीं आ सकती थी । इसलिये अन्यथा अर्थात् अपने कारणसम्बन्धी ज्ञातके अभावमें अनुपपत्ति ढोकर अपने उपपादक अर्थज्ञानकी कल्पना कराती है । इसको 'ज्ञाततान्यथानुपपत्ति:सप्रतिपत्ता अर्थापत्ति:' कहते हैं । इस प्रकार 'ज्ञाततान्यथानुपपत्तिप्रसूता अर्थापत्ति:'से ज्ञानका ओर उसके साथ ही ज्ञानमें रहनेवाले 'प्रामाण्य' दोनोंका ग्रहण एक ही वास्प्रतीति' हो जाने और 'ज्ञानप्राहकातिरिक्तज्ञानपेक्षारूप' स्वतस्त्व बन जाननेसे ज्ञानको 'स्वतःप्रामाण्य' ही मानना चाहिये, यह मीमांसकका मत है ।

नैयायिक इस 'ज्ञत:प्रामाण्यवाद'की आधारभूत 'ज्ञातता'को ही नहीं मानता है । उसका कहना है कि यदि 'ज्ञातो मया घट:' इस प्रतीतिका वलपर घटमें आप एक 'ज्ञातता' धर्म मानते हैं तो फिर 'दृष्टो मया घट:'के आधारपर 'दृष्टता' धर्म, 'कुतो मया घट:'के आधारपर 'कुतता' धर्म, 'इष्टो घट:'के आधारपर 'इष्टता' आदि धर्म भी मानने चाहिये ।

इस प्रकार नये-नये धर्मोंकी कल्पना की जाय तो बड़ा गौरव होगा, इसलिए 'ज्ञातता' नामका कोई धर्म नहीं है । मीमांसक यदि यह कहे कि विषयनियमके उपपादनके लिये ज्ञातताका मानना आवश्यक है तो उसका उत्तर यह है कि विषयनियमका उपपादन ज्ञातताके आधारपर नहीं होता है अपितु घट आदि शाब्दका विषयनियमकेलिये स्वाभाविक है ।

मीमांसक इस प्रकार मानता है कि 'अयं घट:' इस ज्ञानका विषय घट ही होता है, पट नहीं होता । इसका क्या कारण है ? नैयायिक यदि यह कहे कि 'अयं घट:' यह ज्ञान 'घट:'से पैदा होता है इसलिए इस ज्ञानका विषय घट ही होता है पट नहीं, तो यह ठीक नहीं होगा, क्योंकि 'अयं घट:' ज्ञान जैसे घटसे पैदा होता है इसी प्रकार आलोक और चक्षु भी तो उसकी उत्पत्तिके कारण होते हैं । तब फिर घटके ही समान आलोक तथा चक्षुको भी 'अयं घट:' इस ज्ञानका विषय मानना चाहिये । इसलिए नैयायिकके विषयनियमके उपपादनका कोई मार्ग नहीं है । हम मीमांसकके मतमें ज्ञातता ही इस विषयनियमका उपादान करती है ।

'अयं घट:' इस ज्ञानसे उत्पन्न होनेवाले ज्ञातता धर्ममें ही रहती है, इसलिए 'अयं घट:' इस ज्ञानका विषय घट ही होता है, पट नहीं । इस प्रकार विषयनियमका उपपादन करलेके लिये 'ज्ञातता'का मानना आवश्यक है । उसी 'ज्ञातता'के द्वारा उसके कारणसम्बन्धी ज्ञानका और ज्ञानगत धर्ममें 'प्रामाण्य' का एक साथ ही ग्रहण होनेकेलिये 'स्वतःप्रामाण्य' मानना ही उचित है । यह मीमांसक मत है ।

इसपर नैयायिकका कहना है कि 'ज्ञातता'के आधारपर विषयनियम माननेमें दो दोष आ जायेंगे । एक तो 'अतीतानागतयोर्विपर्ययत्वेन न स्वात:' और दूसरा 'अनवस्थाऽ च स्वात:' । इसका अभिप्राय यह है कि मीमांसकके कहनेके अनुसार घटादि पदार्थ, ज्ञानका विषय इष्टसिद्ध होते हैं कि उनमें ज्ञातता धर्म रहता है । धर्म उसी पदार्थमें रह सकता है जो विद्यमान हो । यदि धर्मी पदार्थ ही विद्यमान न हो तो 'ज्ञातता' धर्ममें कहाँ रहेगा ? परन्तु अतीत इत्यादि पदार्थके चाक्षुष, चन्द्रगुप्त आदि अतीत व्यक्तियोंका और ज्योतिष आदि शास्त्र सुत्रग्रंथण आदिका ज्ञान इसको होता है । अर्थात् यह अतीत और अनागत पदार्थ हमारे ज्ञानके विषय होते हैं । यह अतीत और अनागत

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ध्वन्यालोकः

पदार्थ निश्चितमान नहीं हैं इसलिए उनमें ज्ञातता धर्म नहीं रह सकता है। यदि ज्ञातता धर्म के रहने से ही विषय माना जाय तो फिर अतीत और अनागत पदार्थ विषय नहीं हो सकेंगे। यह एक दोष होगा।

दूसरा दोष - अनवस्था है। उसका आशय यह है कि ज्ञातता का भी हमको ज्ञान होता है तो ज्ञातता उस ज्ञान का विषय होती है। इसलिए ज्ञातता में ज्ञातता मानी होगी। और वह दूसरी ज्ञातता भी ज्ञान का विषय होती है। इसलिए उसमें तीसरी, इसी प्रकार चौथी आदि अनन्त ज्ञातताएँ माननी होंगी और इस प्रकार अनवस्था होगी। इसलिए इन दो महादोषों के कारण ज्ञातता के आधार पर विषय नियम मानना उचित नहीं है।

अपितु घट और ज्ञान का विषयविषयिभाव स्वाभाविक है। अतः ज्ञातता के मानेने की कोई आवश्यक्ता नहीं। यह ज्ञातता ही मीमांसक के स्वतः प्रामाण्यवाद का मूल आधार थी। जब उसका ही खण्डन हो गया तब 'छिन्ने मूले नैव पादपः न शाखा' न्याय के अनु सार स्वतः प्रामाण्यवाद का स्वयं ही खण्डन हो जाता है। इस प्रकार मीमांसक के स्वतः प्रामाण्य वाद का खण्डन कर नैयायिक अपने परतः प्रामाण्यवाद को निम्नलिखित प्रकार से स्थापित करता है।

'परतः प्रामाण्य' का लक्षण 'ज्ञानग्राहकसामग्री तद्विरुद्धपेक्षत्वं परतस्त्वम्' है, अर्थात् ज्ञानग्राहक और प्रामाण्यग्राहक सामग्री एक न होकर अलग-अलग होने पर परतः प्रामाण्य होता है। नैयायिक मत में ज्ञानग्राहक सामग्री तो 'अनुभवसाध्य' है और प्रामाण्यग्राहक सामग्री 'प्रवृत्तिसाफल्यमूलक अनुमान' है।

'अयं घटः' ज्ञान के बाद 'घटमहं जानामि' यह ज्ञान होता है। 'अयं घटः' इस प्रथम ज्ञान का विषय घट होता है और उसके बाद 'घटज्ञानवान् अहम्' या 'घटमहं जानामि' आदि द्वितीय ज्ञान का विषय 'घटज्ञान' होता है। इस ज्ञान विषयक द्वितीय ज्ञान को नैयायिक 'अनुव्यवसाय' कहते हैं।

इसकी उत्पत्ति, प्रथम 'अयं घटः' इस ज्ञान से ही होती है और नैयायिक के 'अनुव्यवसाय' मी उत्पत्ति इसी से होती है। परन्तु उन दोनों में भेद यह है कि मीमांसक की 'ज्ञातता' घट में रहने वाला धर्म है, और नैयायिक का 'अनुव्यवसाय' आत्मा में रहने वाला धर्म है।

नैयायिक के मत में ज्ञान का ग्रहण तो इस 'अनुव्यवसाय' से होता है और उसके प्रामाण्य का ग्रहण पीछे 'प्रवृत्तिसाफल्यमूलक अनुमान' से होता है। कि पहिले मनुष्य को चल आदि किसी पदार्थ का ज्ञान होता है। उसके बाद वह उसके ग्रहण आदि के लिए प्रवृत्त होता है।

इस प्रवृत्ति के होने पर यदि उस की प्रवृत्ति सफल होती है तो वह अपने ज्ञान को प्रमाण समकता है। और असफल होने पर अप्रामाण्य का ग्रहण होता है। इस प्रकार प्रवृत्तिसाफल्यमूलक अनुमान से प्रामाण्य और अप्रामाण्य वैलक्षण्य मूलक अनुमान से प्रामाण्य का ग्रहण होता है।

अतः ज्ञान और प्रामाण्य के ग्राहक सामग्री अलग-अलग होने से प्रामाण्य और अप्रामाण्य दोनों परतः हैं। मीमांसक प्रामाण्य को स्वतः और अप्रामाण्य को परतः मानता है। नैयायिक का कहना है कि यह 'अर्थजरतीय'-- 'आषाढ़ बतेरे' वाला न्याय ठीक नहीं है।

अतः या तो प्रामाण्य और अप्रामाण्य दोनों को स्वतः मानो या फिर दोनों को परतः ही मानना मानो और इन दोनों पक्षों में से दोनों को परतः मानना ही ठीक है।

इस प्रकार प्रामाण्य और अप्रामाण्य के निर्णय में मीमांसक जिस अर्थापत्ति को प्रमाण कहता है वह भी नैयायिक के मत में अनुमान ही मानी जाती है। इसलिए दोनों के ग्रहण में अनुमान का सम्बन्ध आवा है। अतः प्रामाण्य और अप्रामाण्य, सत्त्व और असत्त्व के ग्रहण के लिये भी अनुमान की आवश्यक्ता होगी ही। अतः व्यावृत्त अर्थ भी

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कारिका ३३ ] द्वितीय उद्योतः २८५

यथा च वाच्यविषये प्रमाणान्तरादुगमेन सम्यक्स्वप्रतीतौ स्वचित् क्रियमानायां तस्य प्रमाणान्तरविषयत्वे सत्यपि न शब्दव्यापारविषयतांन्वितस्य वाक्यस्यप्रतीतौ सत्यासत्यनिर्णयस्त्वप्रयोजकत्वमेवेति तत्र काव्यविषये च व वाक्य-्यप्रतीतानां सत्यासत्यनिर्णयस्त्वप्रयोजकत्वमेवेति तत्र प्रमाणान्तरडयापारपरिष्कोपहासायैव सम्पघते । तस्माद्विक्रिप्रतीतिरेव सङ्क्र वाक्य-्यप्रतीतिरिति न शक्यते वक्तुम् ।

'यत्रवस्तुनेयरूपं वाक्य-र्थो विषयः' शब्दानां व्यञ्जकत्वं, तद् व्वानिश्चयवहारस्याप्रयोजकम् । अपि तु व्यञ्जकत्वलक्षणः शब्दानां व्यापार औपत्यिकशाब्दार्थसम्बन्धवादिनाम्युपगन्तव्य .

अनुमानका विषय होता ही है । मिर सिद्धान्तपक्ष में आरसे उस वाक्य-र्थकी अनुमानपरता का जो खण्डन किया गया है वह उचित नहीं है । हम वाक्य-र्थको मनमें रखकर अगला प्रकरण आरम्भ करते हैं । जैसे वाच्य [शब्दों] के विषयमें अन्य [अर्थापत्ति, अनुमान आदि] प्रमाणोंके सम्वन्धसे प्रामाण्यक प्रग्रह होनेपर कहने उस [वाच्य अर्थके] प्रमाणान्तर [अर्थापत्ति, अनुमान आदि] का विषय होनेपर भी शब्दव्यापारकें. शाब्दव्याधका विषय माना ही जाता है] । इसी प्रकार व्यङ्ग्यार्थमें भी [प्रामाण्य और अप्रामाण्यके निश्चयमें अर्थापत्ति अथवा अनुमान आदि प्रमाणोंका उपयोग होनेपर भी] उस व्यञ्जनारूप शब्दव्यापारका विषय माननेमें हानि नहीं है यह] समझना चाहिये ।

[अन्य लौकिक तथा वैदिक वाक्योंके अनुगमान आदि पथक होनेसे उनमें प्रामाण्य या अप्रामाण्यके ज्ञानका उपयोग है, परन्तु काव्यशाब्दोंका उपयोग तो केवल चमत्का-रिंक प्रतीति करगना ही है । उसमें प्रामाण्य-अप्रामाण्यंक ज्ञानका कोई उपयोग नहीं है इसलिये । यहाँ इस हेतुसे अनुमानका प्रवेश माननेकी भी भावश्यकता नहीं है] काव्यके विषयमें व्यङ्ग्य-्यप्रतीतके सत्यत्व और असत्यत्वके निरूपणका अप्रयोजकत्व होनेसे उनमें प्रमाणान्तरं; व्यपारका विचार [यह केवल शुष्क तर्कवाद है रसिक नहीं, इस प्रकार] उपहासजनक ही होगा । इसलिए सर्वत्र अनुगुमिति [लैङ्कि-प्रतीति] ही व्यक्-्यप्रतीति होती है यह नही कहां जा सकता है । और जो अनुमेयरूप व्यङ्ग्य [विलक्षण आदि] के विषयमें शब्दोंका व्यञ्जकत्व है, वह स्वानिश्चयवहारका प्रयोजक नहीं है । अपितु शब्द अर्थका नित्यसम्बन्ध माननेवाले [मीमांसकके मतके प्रसङ्गमें] दिखलाया था । वह व्यञ्जकत्व कहीं अनुमानरूपसे [वास्तवमें अनुमेय परन्तु अभिधा और गुणवृत्तिसे विलक्षण शब्दव्यापारके कारण वाक्यके अभिप्रायकके विषयमें शब्दोंका व्यञ्जकत्वव्यापार] यह मीमांसकके मतके प्रसङ्गमें] दिखलाया था । वह व्यञ्जकत्व कहीं अनुमानरूपसे [घटादिकी अभिधा के अभिप्रायके रूपसे व्यङ्गयकं बोधनमें] और कहीं अन्य रूपसे [घटादिकी अभि-

१. 'यत्रवस्तुनेयर्थं' नि०, बृ० । २९

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ध्वन्यालोकः

इति प्रदर्शेऽर्थेऽुपनयसाम्। तद्धि व्यङ्क्यं कतद्विचिलक्षणत्वेन कदाचिद्विरूपान्तरेण इ वाचकानामवाचकानां च सर्वव्वादिभिरपतिक्षेप्यमित्ययमस्माभिर्येत्न आरब्धः।

तदेवं गुणवृत्तिवाचकत्वादिभ्यः शब्दप्रकारेभ्यो नियमेंनैव वावदिलक्षणं त्वम्। तदन्तःपातित्वेऽपि तस्य 'न प्रहादमिधीयमानस्मैतद्विशेषस्य ध्वनेर्यात्प्रकाशानं f पत्निनिरासाय सद्धद्रव्ययुक्तत्तये वा तत्रियामाणमनतिसन्धेयमेव'। नहि सामान्यलक्षणेनोपयोगिनि विशेलक्षणानां प्रतिक्षेपः शक्यः कर्तुम्। एवं हि मति मत्सामञ्ञकुते सकलसद्रसुतक्षणानां पौनरुक्त्यप्रसङ्गः॥३३॥

विप्रतिपत्त्या य आसीनमन्योषिणां सततमविदितसतत्त्वः । ध्वनिसंज्ञितः प्रकारः काव्यस्य व्यवस्थितः सोऽ्यम्॥३४॥

व्यङ्किमें दीपादिकी प्रत्यक्षदृरुपसे व्यङ्कक्ता, अवाचाचक गीतध्वनिनि आदिकी रस विषयमें स्वरूपप्रत्यक्षेण व्यङ्कक्ता, विवादितान्यपरवाच्यच्वनिनमें अभिधासह व्यङ्कक्ता, अविवक्षितवाच्यच्वनिनमें गुणवृत्तिके सहयोगसे व्यङ्कक्ता इत्यादि रूपमें] वाचक-अवाचक [सभी प्रकारके] शब्दोंका, सभी वादियोंको स्वीकार कर पड़ेंगे इसीलिए हमने यह यत्न प्रारम्भ किया है।

इस प्रकार गुणद्रव्यानदि शब्दप्रकारसे व्यङ्क्येकत्व ही मिलता है। हटपूरक उस [व्यङ्क्यक्त्व] को उस [अभिधा अथवा गुणवृत्ति] के अध माननेपर भी, उसके विशेष प्रकार ध्वनिका विप्रतिपत्तियोंके निराकरण करनेके अथवा सहदयोंकी च्युत्त्पत्ति [परिचय] के लिये जो प्रकाशन [प्रन्थकारके द्वारा] जा रहा है उसको अस्वीकार नहीं किया जा सकता है। [किसी पदार्थके] स लक्षणमानसे [उसके अवान्तर] उपयोगी विशेष लक्षणोंका निषेध नहीं हो जात यदि ऐसा [निषेध] हो तब तो [वैशेषिकमतमें द्रव्य, गुण, कर्म इन तीनोंमें रहने जाति] सामान्यमात्रका लक्षण कर देनेपर [उसके अन्तर्गत पृथिव्यादि नौ द्रव्य, रस आदि २४ गुण और उत्क्षेपणादि पञ्चविभ कर्म आदि] सब सद् वस्तुओंके स ही व्यर्थ [पुनरुक्त] हो जायेंगे। [इसलिप लक्षणा और गुणवृत्तिसे भिन्न व्यङ्क्य ध्वनिके बोधके लिये व्यञ्जनाको अलग वृत्ति मानना ही होगा]॥३३॥

इस प्रकार ध्वनि नामक जो काव्यभेद [तार्किक आदि] विद्वानोंकी विमति [मतभेद विषय [अतिप्रसङ्ग अवतकु] निरन्तर अवविदितसदश्श रहा उसको हमने इस प्रकार निरूपित किया॥३४॥

गुणीभूतव्यङ्ग्यका निरूपण

इस प्रकार ध्वनि नामक प्रधान काव्यमेदका सविस्तर और सप्रमेद निरूपण करके

१. 'न प्रहादमिधीयमानस्मैतद्विशेषस्य' नि०, 'न प्रहादमिषीयमानं तद्विशेषस्य' वी०।

२. 'अनभिसन्धेयमेव' वी०।

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प्रकारोऽन्यो गुणीभूतव्यङ्ग्यः काव्यस्य हृद्यते । यत्र वच्यते यान्तव्यं वाच्यचारुत्वं स्वात् प्रकार्षवत् ॥३५॥

नव्यशास्त्रोदयों ललनावण्यप्रस्यो यः प्रतिपादितस्तस्य प्राधान्ये ध्वनिरित्युच्यम् । तस्य' तु गुणीभावेन वाच्यचारुत्वप्रकर्षे गुणीभूतव्यङ्ग्यो नाम काव्यप्रभेदः प्रकाश्यते । तत्र वस्तुमात्रस्य व्यङ्ग्यस्य तिरस्कृतवाच्येsप्येषः प्रतीयमानस्य वेदाचिद्ध्याच्चरुपवाक्यार्थ-पक्षेsपि गुणीभावे सति गुणीभूतव्यङ्ग्यकवयता ।

यथा—लावण्यसिन्धुरणद्रव हि केयमत्र यत्रोत्पलानि शशिना सह सम्प्लवन्ते । उन्मज्जति द्विरदकुम्भतटी च यत्र यत्रापरे कदलीकाण्डमृणालदण्डाः ॥

गुणीभूत व्यङ्गयरूप दूसरे काव्यभेदका निरूपण प्रारम्भ करते हैं । जहाँ व्यङ्ग्य अर्थसे वाच्य अर्थ अधिक चमत्कारी हो जाय उसे गुणीभूतव्यङ्गच कहते हैं । गुणीभूतव्यङ्ग्यके आठ भेद माने गये हैं—१. इतराsज्ञतव्यङ्गच, २. काकुसे आक्षित व्यङ्गच, ३. वाच्यार्थैकदेशतिरस्कृतव्यङ्गच, ४. सन्दिग्ध-प्राधान्यव्यङ्गच, ५. तुल्यप्राधान्यव्यङ्गच, ६. अस्फुटव्यङ्गच, ७. अप्रौढव्यङ्गच और ८. असुन्दर-व्यङ्गच । इनकी निरूपण आगे करेंगे ।

जहाँ व्यङ्गचर्थका सम्बन्ध होनेपर वाच्यका चारुत्व अधिक प्रकर्षयुक्त हो जाता है वह गुणीभूतव्यङ्गच-व्यञ्जक नामका काव्यका दूसरा भेद होता है ॥३५॥

[प्रतीयमानं पुनरन्यदेव वस्तुस्वति वाणीषु महाकवीनाम् । वचतु प्रसिद्धावय-वातिरिक्तं विभाति लावण्यभिवाज्चनासु ॥ १, ४ कारिकामें] ललनावयोंके लावण्य-के समान जिस ध्वचच अर्थका प्रतिपादन किया है उसका प्राधान्य होनेपर ध्वनि [काव्य] होता है यह कह चुके हैं । उस [व्यङ्गच] का गुणीभाव हो जानेसे वाच्य [अर्थ] के चारुत्वकी वृद्धि हो जानेपर गुणीभूतव्यङ्गच-व्यञ्जक नामका काव्यभेद माना जाता है । उनमें [अविवक्षितवाच्य, लक्षणामूलेsचवचिनके अत्यन्ततिरस्कृतवाच्य प्रभेदमें] तिरस्कृत-वाच्य [वाले] शब्दोंसे प्रतीयमान वस्तुमात्र व्यङ्गचचके कर्मे वाच्यरूप वाक्यार्थकी अपेक्षा गुणीभाव [अप्राधान्य] होनेपर गुणीभूतव्यङ्गच [काव्य] होता है ।

जैसे—[नदीके किनारे स्नानार्थ आयी हुई किसी तरुणीको देखकर किसी रसिक जनकी यह उक्ति है । इसमें युवतीका स्वयं नदीरूपमें वर्णन है ।] यहाँ यह नदी कौन-सी लावण्यकी नदी या नायिका है जिसमें चन्द्रमा के साथ कमल तैरते हैं, जिसमें हाथीकी गण्डस्थली उभर रही है और जहाँ कुछ और ही प्रकारके कदलीकाण्ड तथा मृणाल-दण्ड दिखाई देते हैं ।

१. 'तस्यैव' मि०, टी० । २. 'कदाचिद्ध्याच्च' पाठ वि०, टी० में अधिक है ।

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ध्वन्यालोक:

अतिरसृतवाच्येsपि शब्देsपि प्रतीममानस्य व्यङ्ग्यस्य पदावच्‍छेद्यप्राधान्यनियेन 'काव्यचारुत्वापेक्षया गुणीभावे सति गुणीभूतव्यङ्गयत्वता' । यथोदाहृतम् 'अनुरागवती सन्ध्या' इत्येवमादि ।

तस्यैव स्वयमुक्त्या प्रकाशीकृतत्वेन गुणीभावो' यथोदाहृतम् 'शृङ्गेतकाञ्जनसम्' इत्यादि ।

रसादिरूपल्यकृत्क्षय गुणीभावो रसवदलङ्कारे' दर्शितः । तत्र च तेषामाधिकरिकतया उपपत्त्या गुणीभावो 'विभावनप्रकृतस्‍मृत्यनुध्यारैरजते' ।

यहाँ सिन्धु शब्दसे परिपूर्णता, उत्पल शब्दसे कटाक्षछटा, द्राक्षा शब्दसे मूल, दिरदकुम्भतटी धावद्‍धे स्तनयुगल, कदलीकाण्ड धावद्‍धे ऊरुयुगल और मृणालदण्ड धावद्‍धे भुजारूप अर्थ अभिव्यक्त होता है । इन सब शब्दोंका मुख्यार्थ यहाँ सर्वथा अनुपपन्न होनेसे 'निःश्‍वासान्ध इवातिस्‍थादर्शचन्द्रमा न प्रकाशते' इत्यादि उदाहरणके समान उनका अन्यन्त तिरस्कार हो जानेसे, वह व्यङ्गय अर्थका प्रकाशन करते हैं । इसलिए अत्यन्ततिरस्कृतवाच्यवस्‍वस्वान् है । परन्तु उसका 'भाव्यसिन्धुरपपैव हि केयमत्न' से वाच्य अंशकी घोमावृत्तिमें ही उपयोग होता है । अतएव वह वाच्यसिद्धयङ्करूप गुणीभूतव्यङ्गय है ।

कभी अतिरसृतवाच्यके शब्दोंसे प्रतीममान व्यङ्गयका वाच्यके चारुत्वकी अपेक्षा-जैसे, 'अनुरागवती सन्ध्या' इत्यादि उदाहरण [पृ० ४७ पर] से ज्ञात हैं ।

यहाँ 'अनुरागवती सन्ध्या' आदि श्‍लोकमें अतिरसृतवाच्यके सन्ध्या-दिवस शब्दसे व्यङ्गय नायक-नायिकाकास्‍वहारकी प्रतीति वाच्यके ही नमत्वकारक हेतु है, अतः इतराsपि व्यङ्गयकृत् गुणीभूतव्यङ्गय है ।

उसी [व्यङ्गय वस्‍तु] के स्वयं [अपने वचन द्वारा] प्रकाशित कर देनेसे [वाच्य-सिद्धयङ्करूपच] गुणीभाव होता है । जैसे 'शृङ्गेतकाञ्जनसम्' इत्यादि उदाहरण [पृ० १३२ पर] दिया जा चुका है ।

रसादिरूप व्यङ्गयका गुणीभाव रसवदलङ्कार [को प्रसङ्ग] में दिखला चुके हैं । वहाँ [रसवदलङ्कारमें] उन [रसादि] का आधिकारिक [मुख्य] वाक्यकी अपेक्षासे विवाहमें प्रस्तुत [वरस्‍वर] भूत्यके अनुहार्य राजाके समान गुणीभाव होता है ।

इसका अभिप्राय यह है कि यद्यपि व्यङ्गय हाँनेसे रस ही सर्वप्रधान होता है । परन्तु जैसे राजा यदि कभी अपने किसी प्रयोजन संशकुछेक विद्वानों सम्मिलित हो, तो वे करोड़ों होनेसे लोकतक प्राधान्य होगा और राजा उसका अनुहार्य होनेसे गौण ही होगा । इसी प्रकार रसवदलङ्कार आदिकी स्थितिमें रसके प्रधान होते भी उस समय मुल्यता किसी अन्यकी ही होनेसे रसादि उसके अङ्ग अर्थात गुणीभूत होते हैं ।

'आधिकरिक' शब्दका लक्षण दर्षालुरकमें इस प्रकार किया गया है—

१. 'काव्य' पद नि०, बी० में नहीं है ।

२. 'गुणीभाव:' नि०, बी० ।

३. 'गुणीभावे रसवदलङ्कारविषय: प्राक् दर्शित:' बी० 'गुणीभावे रसवदलङ्कारो दर्शित:' नि० ।

४. 'विवाह' नि० ।

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व्यक्त ध्वन्यालोकारस्य गुणीभावे दीपकादिविषयः

तथा— प्रसन्नगम्भीरपदा: काव्यबन्धाः सुम्नावहाः। ये च तेषु प्रकारोऽयमेव' योग्यः सुमेघसा ॥३५॥

अधिकारी: फलवत्यमधिकारी च तत्स्मुः। तद्रिवर्त्येऽमभिलष्यापि दृष्टं स्वादाधिकारीकम् ॥

फलके स्वामिलों अधिकार और उस फलके भोक्ताको अधिकारी कहते हैं। उस अधिकारी द्वारा सम्पादित ध्यापक वृत्तको ‘अधिकारीक’ वस्तु कहते हैं।

व्यक्त ध्वन्यालोकारके गुणीभावकका विषय दीपक आदि [अलंकार] हैं।

प्रस्तुत और अप्रस्तुत पदाथोंमें एक धर्मका सम्बन्ध होनेपर दीपकालंकार होता है—‘प्रस्तुतोऽप्रस्तुतोपकनु निगयते’१ द्वितीय उद्योतमें [पृ० १८० पर] ‘चन्द्रमसि णिसा’ इत्यादि इलोक उद्धृत करक यह दिखलाया है कि उसमें चन्द्रमयूखैः, कमलैः, कुसुमगुच्छैः और सजने: में तथा निशा, नलिनी, लता और काव्यद्योतनाभमें साधस्य व्यक्त है परन्तु वह साधस्य या उपमा चमत्कारजनक नहीं है अपितु दीपकत्व अर्थात एकधर्मोभिमिसमबन्धष्के ही चमत्कारजनक होनेसे दीपक नामसे ही अलंकार्यवद्वार होता है, उपमा नामसे नहीं। अर्थात् उपमा व्यक्त होनेपर भी वाच्य दीपकालंकारका अज्ञ है अतएव गुणीभूतव्यङ्गच है। दीपकादि में आदि पदसे उक्ती प्रकारके रूपक, परिणाम आदि अलंकारोंका भी ग्रहण कर लेना चाहिये। इस प्रकार व्यक्‍कचके वस्तु, अलंकार तथा रसादि ये तीनों भेद गुणीभूत हो सकते हैं ॥३५॥

वैसे ही—

प्रस्तुत [प्रस्तादगुणयुक्त] और गम्भीर [स्वभावत: सङ्गतथसे अर्थगाम्भीर्ययुक्त] जो आनन्ददायक काव्यरचनाएँ [हों], उनमें बुद्धिमान् कविको इसी प्रकारका उपयोग करना चाहिये [स्वनिके सम्भव न होनेपर गुणीभूतव्यङ्गचकी योजनासे भी कविको कविपदकी प्राप्ति होती है अन्यथा कविता उपहासयोग्य ही होती है ।] वैसे ही

और जो यह नाना प्रकार [अपरिमितस्वरूपा] की उस [अलौकिक व्यक्तथके संस्पर्शो] प्रकारके अर्थसे रमणीय प्रकाशमान रचनाएँ चित्रान्के लिये आनन्ददायक होती हैं उन सभी काव्यरचनाओंमें गुणीभूतव्यक्त य नामका यह प्रकार उपयोगमें लाना चाहिये। जैसे—

१. 'प्रकारोऽयमेव' नो, दी० १ २. 'परिमितस्वरूपा' नि०, दी० १ ३. 'तथा रमणीय:' नि०, दी० ।

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ध्वन्यालोकः

आचार्य आनन्दवर्धन

डॉ. श्यामदेव पराशर

प्रथमावृत्ति २०७५

लक्ष्मी बुद्धिदा जामादओ हरि तंस घरिणिआ गंगा ।

वाच्यालङ्कारवर्गोऽयं व्यङ्ग्यार्थानुगमे सति ।

अमिअमिअहा च सुआ अहो कुडुंबं महोअहिओ ॥

वाच्यालङ्कारवर्गोऽयं व्यङ्ग्यार्थानुश्यालङ्कारस्य वस्तुमात्रस्य वा' यथायोगमनुगमे सति ।

[लक्ष्मीदृन्हिता जामाता हरिसतस्य गृहिणी गङ्गा ।

सत् च्छायातिशयं विश्रलक्षणकारंरेकदेशनिर्दिष्टः । स तु तथारूपः प्रायेण सर्व एव पव

अमतमगाहड कों च सतावहो कुडस्सं महोदधे: ॥

परिक्ष्यमाणो लक्ष्ये निरोध्यते । तथा हि दीपकसमासोक्त्यादिवदनन्यैड्यलङ्कारा: प्रायेण व्यङ्ग्यालङ्कारान्तर वस्तु

—इति च्छाय ॥३६॥]

लक्ष्मी [ समुद्रकी ] पुत्री है, विष्णु जामातार हैं, गंगा उसकी पत्नी है, अमृत और चन्द्रमा [सरोहा] उसके पुत्र हैं । अहो महोदधिका पेसा [उत्तम] परिवार है :

वाच्यालङ्कारवर्गोऽयं व्यङ्ग्यार्थानुगमे सति ।

यहाँ 'लक्ष्मी' पदसे मत्वर्थीयता, 'विष्णु' पदसे परमेश्वर्य, 'गङ्गा' पदसे परमपावनत्व तथा सकलमनोरञ्जनशक्तिमत्व, 'अमृत' पदसे मरणभयंनोपशामकत्व और 'मुगाढ़' पदसे लोकोत्तराह्लादजनकत्वादि रूप ध्यज्यमान वस्तु व्यङ्गच्य है, और यह 'अहो कुडुम्बं'से वाच्य विषयका पोषक होकर गुणीभूतव्यङ्गयरूपसे वमत्कारजनक होती है ।

प्रायेणैव परां च्छायां विभ्रल्लक्ष्ये निरीक्ष्यते ॥३७॥

लोचनकारने यहाँ 'अमृतपदका' अर्थ वारणी किया है और उसे गङ्गास्तान तथा हरिचरणाराधन आदि शास्त्रः उपायरोंमें उपलभ्य लक्ष्मीका चन्द्रोदयपानयोग्य आदि रूपमें उपयोग ही मुख्य फल है । इसलिए वहु लक्ष्मी जैलोक्यमारभूत प्रतीत होकर 'अहो' शब्द वाच्य विषयका अभ्न होकर गुणीभूतव्यङ्गयक्वयताकां उपादान करती है, इस प्रकारकी व्याख्या की है । यह व्याख्या पाछुपत सम्प्रदायके अनुकूल प्रतीत होती है ॥३६॥

यह [वस्तिध] वाच्य भलङ्कारोंका वर्ग व्यक्य अंशाके संसर्गोंसे काव्योंमें प्रायः अत्यन्त शोभातिशयफो प्राप्त होता हुवा देखा जाता है ॥३७॥

यह [वस्तिध] वाच्य अलङ्कारोंका समुदाय व्यङ्गच्योऽपे अलङ्कृत अथवा वस्तुका संसर्ग होनेपर अत्यन्त शोभातिशययुक्त होता हुवा लक्षणकारोंने स्थालीपुलाकन्यायसे [एकदेशेन] दिखलाया है । [अर्थात् व्यङ्गच्य उपमादि अलङ्कारके संसर्गोंसे दीपक तथा व्यक्य नायक-नायिकादि व्यङ्गच्यहादि वस्तुके संसर्गोसे समासोक्ति आदि अलङ्कारोंमें शोभा-

त्पिके जो कतिपय उदाहरण दिये हैं वह स्थालीपुलाकन्यायसे ही दो-तीन उदाहरण दे दिये हैं] परन्तु विशेष परिक्षा करनेपर तो प्रायः सभी अलङ्कार उल्सी रूपमें [व्यङ्गच्य-

के संसर्गोंते शोभातिशयको प्राप्त] काव्योंमें देखे जा सकते हैं ।

जैसे, दीपक और समासोक्ति [जिनके उदाहरण इस रूपमें दिये जा चुके हैं ]

१. 'वा' नि० में नहीं है ।

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कारिका ३७ ] तृतीय उद्योत: २३१

नतरसंस्पर्शिनो' हृदयेन्ते । यतः प्रथमं तावदतिशयोक्किगर्भैता सर्वालङ्कारेषु शक्यक्रिया । कृतैव च सा महाकविभिः कामपि काव्यच्छविं पुष्णति' । अर्थः कविताश्रययोगिता स्वविषयौचित्येन क्रियमानः सती काव्ये नोत्कर्षमावहेत् । भामहेनाप्यतिशयोक्किलक्षणे यदुक्तम्—

सैषा सर्वत्र' वक्रोक्तिरनयार्द्धां विभाव्यते । यत्रोक्तिः काव्यनोः कार्यः कवेरड्गीकृतनया विना ॥ इति

तत्रातिशयोक्तिर्यमलङ्कारमधितिष्ठति कविप्रतिभावशातस्तस्य चारुत्वातिशययोगो- न्यस्य त्वलङ्कारमात्रतैवैति सर्वालङ्कारशरीरस्वीकरणयोग्यत्वेनाभेदोपचारात् सैव सर्वालङ्कार- रूपा, इत्यमेवार्थोंड्वगन्तव्यः !

आदिके समान अन्य अलङ्कार भी प्रायः व्यङ्ग्य अन्य अलङ्कार अथवा वस्तुके संसर्गसे गुप्त दिखाई देते हैं । क्योंकि सबसे पहिले नो सभो अलङ्कार अतिशयोक्तिगर्भ हो सकते हैं। महाकवियों द्वारा विरचित यह [अन्य अलङ्कारोंको अतिशयोक्तिगर्भता ] काव्यकों आनिर्यवचनोच शोभा प्रदान करती हो हैं । अपने विषयके अनुसार उचित रूपमें किया गया अतिशयोक्तिका सम्बन्ध काव्यमें उत्कृष्ट क्यों नहीं लाया/उपयुक्त बनाया जायगा [अवश्य लाया/बनाया जायगा]

भामहने भी अतिशयोक्तिके लक्षणमें जो कहा है कि—

[जो अतिशयोक्ति पहले कही जा चुकी है सब अलङ्कारोंकी चमत्कारजननी] यह सब वही वक्रोक्ति है । इसके द्वारा [पुराने] पदार्थों [भी विशेषणतया 'वर्णित किये जानेसे] चमत्कार उत्पन्न होता है । [अतःः] कविको इसमें [विशेष] यत्न करना चाहिये । इसके बिना [और] अलङ्कार [ही] क्या है।

उसमें कविकी प्रतिभावशा अतिशयोक्ति जिस अलङ्कारको प्रभावित करती है उसको [ही] शोभातिशय प्राप्त होता है । अन्य तो [वमत्कारविरहित केवल]

अलङ्कार हो रह जाते हैं । इससे सब अलङ्कारोंका रूप धारण कर सकनेकोi क्षमताके कारण अमेदोपचारसे वही सर्वालङ्काररूप है, यही अर्थ समझना चाहिये [भामहने जो कहा है उसका यह अर्थ समझना चाहिये इस प्रकार वहाँ वड़ा लम्बा अन्वय होता है] ।

निर्णयसागरीय संस्करणमें 'सैषा वक्रोक्तिः' के स्थानपर 'सैवत्र वक्रोक्तिः' पाठ है । परन्तु यहाँ वृत्तिकारने जो 'सैषा सर्वालङ्काररूपा' व्याख्या की है उससे 'सैवत्र वक्रोक्तिः' यही पाठ उचित प्रतीत होता है । परन्तु भामहके काव्यालङ्कारके मुद्रित संस्करणमें 'सर्वत्र' पाठ हो पाया जाता है और अन्य प्राचीन ग्रन्थोंमें भी जहाँ-तहाँ भामहको यह कारिका उद्धृत हुईं है उनमें 'सर्वत्र' पाठ हो रस्सा गया है । इससे भामहका मूल पाठ तो 'सर्वत्र' हो जान पड़ता है परन्तु वृत्त्यालोङ्कारने उसके स्थानपर

१. 'व्यङ्ग्यालङ्कारवस्तुनरसंस्पर्शिनो' नि०, दी० ।

२. 'पुष्णतीति' नि०, दी० । ३. 'सर्वत्र' नि०, वी० ।

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ध्वन्यालोक:

आचार्य आनन्दवर्धन

महामहोपाध्याय डॉ० बलदेव उपाध्याय

चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन

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कारिका ३७ ] द्वितीय उद्योत: २९३

और दूसरे लोग 'वन्दे हव सुखम्' इत्यादि स्थलोंमें आह्लादविशेषात्मकृतलरूप साधर्म्यको व्यकञ्य मानकर उसका समन्वय करते हैं । और तीसरे लोग उपमा ध्वनसे उपमानरूपक अलङ्कारोंका ग्रहण करके सङ्कृति लगाते हैं । समासोक्तिमें आदिमें तो व्यकञ्य अंशके बिना उनका स्वरूप ही नहीं बनता है अतः गुणीभूतव्यङ्गयता स्पष्ट ही है ।

यहाँ प्रस्तुत किये गये अलङ्कारोंके लक्षणादि इस प्रकार हैं—

१—सपकं रुपितारोपो विषयेऽनिरपेक्षे ।

तत्तत् परस्परितं शाब्दं निरङ्कुशमिति च निषा । —सा० द० २, १०, २८

जैसे, मुखचन्द्र इत्यादिमें मुख और चन्द्रका आह्लादकलाप्रसिद्ध शाब्दस्य व्यकञ्य होता है । परन्तु वह वाच्य रूपकके चारुत्वातिशयका ही हेतु होता है अतः गुणीभूतव्यङ्गय होता है ।

२—सम्भवन्तु वस्तुसम्भवनोडस्मभवचपि कुत्सचित् ।

यत्र विम्बानुभिम्बतं वोध्येत तत्र निदर्शना ।। —सा० द० २, १०, ४९

जैसे—

क्व सूर्यप्रभवो वंशः क्व चालविचित्रा मति ।

तितीक्षुध्वस्तरं मोहादुदुपेनास्मि सागरम् । —कुवंश, १, २

यहाँ सूर्यवंशका वर्णन धारके पार करनेके समान कठिन और मेरी मन मति चञ्चला [ छोटी नौका ] के समान है । यह शाब्दस्य व्यकञ्य होनेपर भी वह विम्बानुभिम्बत्वरूप निदर्शना के नास्त्वका हेतु होनेसे गुणीभूतव्यङ्गयार्थ है ।

३—पदार्थानां प्रस्तुतानामन्येपां वा यदा भवेत् ।

एकधर्माभिसम्बन्धो स्यात तदा तुल्ययोगिता ।। —सा० द० १, १०, ४७

जैसे—

दानं वित्तादृतं वाचः कीर्त्यादुपः ।

परोपकारणं कायादसारात्स्थमाराहरेत् ।

यहाँ वित्तका दान, वाणीका सत्य, आत्माका कीर्ति और धर्मं तथा शरीरका परोपकारकरण धारके सदृश है यह व्यकञ्य साधस्य, दान आदिके साथ 'असारात् समाहरेत्' रूप एकधर्मके सम्वन्धसे होनेवाले वाच्य तुल्ययोगितालङ्कारका पोषक होनेसे गुणीभूतव्यङ्गय है ।

४—समासोक्तिः समासैव कार्यालङ्कारविशेषणैः ।

व्यवहारसमरोपः प्रकृतन्यास्य वस्तुनः ।। —सा० द० १, १०, ५६

जैसे—

असमासज्जिगोषस्य सीचिन्ता का मनस्विनः ।

अनाक्रम्य भगत्स्वेनो सन्ध्यां भजते रवि ।।

यहाँ रवि और सन्ध्यामें नायक-नायिकाके व्यवहारका आरोप गम्यमान है । परन्तु वह वाच्य समासोक्तिका अविनाभूत है । उसके बिना समासोक्ति बन ही नहीं सकती है, अतएव वह गुणीभूत होनेसे व्यङ्गय है ।

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ध्वन्यालोक:

आचार्य आनन्दवर्धन

महामहोपाध्याय डा० बलदेव उपाध्याय

चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन

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कारिका ३७ ] तृतीय उद्योत: २९५

केशाक्षिदलकदाराणां परस्परगर्मतापि सम्भवति, यथा दीपकोपमयोः । तत्र दीपकसमुपमार्गर्मत्बेन प्रसिद्धम् । उपमापि कदाचिद्दीपकच्छायानुगायिनी । यथा मालोपमा । तथा हि 'प्रभामहत्या शिखयेव दीप:' इत्यादौ सुप्रसिद्ध दीपकच्छाया लक्ष्यने । तदेवं व्यङ्ग्यांशसंस्पर्शे सति चारुत्वातिशययोगिनो रूपकाद्योङ्काराः सर्वे एव कान्तामुक्तानां सामान्म् । तल्लक्षणे सर्वे एवैते सुलक्षिताः भवन्ति ।

एषु तावत् किमाकार्न्नहिप्रवन्होर्मार्वति पुनःममालोक्याजो त्वां विद्धि निबर्हणं प्रतिबिभटा: ॥

इत्यादि सन्देहालङ्कारके उदाहरणोंमें उपमा नियमितः वर्गमें रहते हैं । वैसे तो उपमा भी एक अलङ्कारविशेषका ही नाम है । अतएव इसको भी अलङ्कारविशेषगर्मताके नियमितवाले वर्गमें ही रखना चाहिये था । परन्तु उपमामें नाना अलङ्कारोंका रूप धारण करनेकी सामर्थ्य है, इसलिए उसे अलङ्कार-सामान्य मानकर ही अलङ्कारमात्रगर्मताका उदाहरण माना है ।

किन्हीं अलङ्कारोंमें परस्परगर्मता भी हो सकती हैं, जैसे दीपक और उपमा में । उनमेंसे उपमार्गमें दीपक प्रसिद्ध ही है, परन्तु कभी-कभी उपमा भी दीपककी छायानुगायिनी होती है, जैसे मालोपमामें । इससे 'प्रभामहत्या शिखयेव दीप:' इत्यादिमें दीपककी छाया स्पष्ट ही प्रतीत होती है ।

प्रभामहत्या शिखयेन दीप इवाग्निदेवस्य मार्गः । संस्कारवत्येव गिरा मनीषी तथा स पूर्तश्री विभूषितक्श ॥—कुमारसं०, ?, २८

यह 'कुमारसम्भव' का श्लोक है । इसमें मालोपमा अलङ्कार है । मालोपमाका लक्षण है—'मालोपमा यदेकस्योपमानं बहु ह्रस्यते ।' यदि एक उपमेयके अनेक उपमान हों तो मालोपमा अलङ्कार होता है । यहाँ पार्वतीके जन्मसे हिमालय ऐंसे पवित्र और सुशोभित हुआ जैसे प्रभामयुक्त दीपकशिखावले दीपक, अथवा जैसे त्रिभारगा गङ्गासे आकार, अथवा जैसे उञ्छारवती वाणीस विद्वान् पुरुष पवित्र और अलङ्कृत होता है । यहाँ एक उपमेयके तीन उपमान होनेसे मालोपमा है । परन्तु मालोपमाके गर्भमें दीपक अलङ्कार है । प्रस्तुत और अप्रस्तुत पदाथोंमें एक-धर्मोंमिसमबन्ध होनेसे दीपक अलङ्कार होता है । यहाँ पार्वतीके समबन्धसे हिमाल्यक्का पवित्र होना प्रस्तुत है और उसके उपमानभूत तीनों अर्थ अप्रस्तुत हैं । उन चारोंमें 'गुणत्व' और 'विभूषितत्व' रूप एकधर्मका समबन्ध होनेसे दीपकालङ्कार हुआ । अतएव यह दीपकगर्भ उपमाका उदाहरण हुआ ।

इस प्रकार व्यङ्ग्यांशका संस्पर्श होनेपर धर्मातिशयक्श प्रीत होनेवाले रूपक आदि सब ही अलङ्कार गुणीभूतव्यङ्ग्य-थक् के मार्ग हैं । और गुणीभूतव्यङ्ग्य-यक्-यक् उस प्रकारके [व्यङ्ग्य यथसंस्पर्शे चारुत्वोपयोगी] कहे गये [दीपक, तुल्ययोगिता आदि] या न कहे हुए [सन्देह आदि] उन सभी अलङ्कारोंमें सामान्म् रूपसे रहता है । उस [गुणीभूतव्यङ्ग्ययक्] का लक्षण हो जाननेपर [या समझ लेनेसे] यह सच ही [अलङ्कार] सुलक्षित हो जाते हैं ।

इसका अभिप्राय यह है कि विभिन्नलिङ्गविशेषके आधायक व्यङ्ग्यांशके अभावमें, 'गौरिव गवय:' यहाँ उपमा, 'शादिस्मो रुः:' इत्यादिमें रूपक, 'स्वागुरुर्व पुरुबो वा' इत्यादिमें सन्देह, शुक्तिमें

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ध्वन्यालोक

आचार्य आनन्दवर्धन

श्रीनिवास शास्त्री

मोतीलाल बनारसीदास

एकेनस्य 'स्वरूपविशेषकथनेन तु सामान्यलक्षणरहिते प्रतिपदपाठनेव' शब्दा न शक्यन्ते तत्त्वतो निरीक्षितुम् । आनन्त्यात् । अनन्ता हि वाग्विकल्पास्तत्त्वकाराः । एवं चालद्धाराः ।

गुणीभूतव्यङ्ग्यस्य च प्रकारान्तरेणापि व्यञ्जनश्रार्थानुगमलक्षणेन विषयत्वमस्त्येव ।

सामान्य लक्षण रहित प्रत्येक अलंकारके अलग-अलग स्वरूपकथनसे तो प्रतिपदपाठले [अनन्त] शब्दोंके [ज्ञान] के समान उन [अलंकारों] का, अनन्त होनेसे, पूर्ण ज्ञान नहीं हो सकता । कथनकी अनन्त शाखाएँ हैं और वे ही अनन्त अलंकारके प्रकार हैं ।

सामान्य लक्षण दिये ही उनका ज्ञान हो सकता है । अलग-अलग प्रत्येक अलंकारके समस्त भेदोपभेद आदिका ज्ञान सम्भव नहीं है जैसे प्रतिपदपाठसे । शब्दोंका ज्ञान असम्भव है । यह 'प्रतिपदपाठ' शब्द महाभाष्यमें आये हुए प्रकरणकी ओर संकेत करता है । महाभाष्यमें शब्दानुशासन-

'अथेतस्मिन् शब्दोपदेशे कर्तव्ये शति किं शब्दानां प्रतिपत्तौ प्रतिपदपाठः कर्तव्यः, गौरवात् पुरुषो हि शक्तिनिर्मुक्तो ग्रास्यते । इत्येवमादयः शब्दाः पठितव्याः ? नैतद् । अनभ्युपायः शब्दानां प्रतिपत्तौ प्रतिपदपाठः । एवं हि भूयते वृहस्पतिरिन्द्राय दिव्यं वर्षसहस्रं प्रतिपदोक्तानां शब्दानां शब्द-पारायणं प्रोबाच, न चान्तं जगाम । बृहस्पतिरहि प्रवक्ता, इन्द्रश्चाध्येता, दिव्यं वर्षसहस्रमध्ययनकालेऽपि न चान्तं क्वाम । किं पुनरव्य यः सर्वथा चिरं बीवति स वर्षव्यतं जीवति ।

और गुणीभूतव्यङ्ग्यत्वका विषय [केबल एक अलंकारमें दूसरे व्यङ्ग्य अलंकारके सम्बन्धसे ही नहीं अपितु वस्तु अथवा रसादिरूप- अर्थके सम्वन्धसे

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कारिका ३८ ]

तद्वयं ध्वनिनिष्थानदूषो द्वितीयोऽपि महाकविविषयोडतिरमणीयो लक्षणीय: सहृदयै: । सर्षेऽथा नास्त्येव सहृदयहृदयहारिण: काव्यस्य स प्रकारो यत्र न प्रतीयमानार्थै:संस्पर्शेन सौभाग्यम् । तदिदं काव्यरहस्यं परामिति सूरिभिरविभावनीयम् ॥ ३७॥

श्रुर्या महाकविगिरामलड्कृतिभूतामपि । प्रतीयमानच्छायैषा मूषा लज्जेव योषिताम् ॥३८॥

अनया श्रुमसिद्धोऽर्थ: किमपि कामनीयकमानीयते । तद्वथा—विस्मम्भोत्था मनस्थायाविधाने ये मुग्धाद्या: केडपि लोळाविलेषा: । अक्षुण्णास्ते चेतसां केवलैन्ते सन्ततं भावनीयाः ॥

अन्य प्रकारसे भी होता ही है । इसलिये अति रमणीय महाकविविषयक यह दूसरा ध्यानप्रबाध भी सहृदयोंको समझ लेना चाहिये । सहृदयोंके हृदयको मुग्ध करनेवाले काव्यकला पेसा कोई भेद नहीं है, जिसमें व्यङ्गच अर्थके सम्बन्धसे सौन्दर्ये न आ जाता हो । इसलिये विद्वानोंको यह समझ लेना चाहिये कि यह [व्यङ्गच्य, और केंवल व्यङ्गच्य-संस्पर्शी ही] काव्यकला परम रहस्य है ।

यहाँ गुणीभूतव्यङ्गच्यको ध्वनिका निष्थान्द कहा है । उसका अर्थ उसकी दूसरी धारा या उससे उत्थन्न वस्तु प्रवाह भी हो सकता है । उसका सार नहीं समझना चाहिये । दधिका सार नवनीत है । इस प्रकार गुणीभूतव्यङ्गच्यको ध्वनिका सार नहीं कहा जा सकता है । उसे अधिकसे अधिक 'आमिक्षा' छेनाका स्थान दिया जा सकता है । गर्म दूधमें दधੀ डाल देनेसे वह फट जाता है, उसका जो धना अंश दधना है उसे 'आमिक्षा' कहते हैं—'तत्ते पयसि दध्यानयति सा वैश्वदेवस्यामिक्षा भवति' । गुणीभूतव्यङ्गच्य अधिकृतेऽधिक आभिक्षास्थानीय ही होता है, न तु नवनीतस्थानीय । इसी प्रकार उसके गुणीभूतव्यङ्गच्य काव्यमें 'अतिरमणीयता' ध्वनिकी अपेक्षा नहीं, अपितु चित्र-काव्यादिकी दृष्टि से ही हो सकती है । प्रथम उद्योतमें ध्वनिको 'सकललताकविकाल्प्योपनिषद्रूप' कहा था, उसीका उपसंहार 'काव्यरहस्य' शब्दसे यहाँ किया है । इसी बातको अगली कारिकामें उपमा द्वारा समर्पित करते हैं ॥३७॥

मल्लहार यदिसे युक्त होनेपर भी जैसे लज्जा ही कुलवधूयोनका मुख्य अलंकार होती है, उसी प्रकार [उपमादि अलंकारोंसे] श्रुमित होनेपर भी यह व्यकृ-यार्थोंकी छाया या महाकवियोंकी वाणीका मुख्य अलंकार है ॥३८॥

इष [प्रतीयमानकी छाया या व्यकृ-यकें संस्पर्शों] से श्रुमसिद्ध [बहुवर्णित होनेसे विलासवती रूप] अर्थमें भी कुछ अनिर्वचनीय [नूतन] सौन्दर्ये या जाता है । जैसे—[अनुल्लसद्वयचालन] कामदेवकी आज्ञापालनमें मुग्धाक्षी [वामलोचना सुन्दरी] के विश्वास [परिचय, तथा मदनोद्रेकजन्य लज्जा, सांवल्स आदि जैसे श्वास] से उत्पन्न और केवल चित्तसे [भी] अभुग्ण प्रतिबिम्ब नवीन जो कोई अनिर्वचनीय द्वाव-भाव [होते] हैं, वह पकान्तमें बैठकर [तन्मय होकर] चिन्तन करने योग्य होते हैं ।

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ध्वन्यालोक:

इत्यत्र केऽपिस्त्वनेन पदेन वाच्यमस्पष्टममिद्धतता प्रतीयमानं वस्त्वविशिष्टमनन्त-मरपैयता का छाया नोपापदिता ॥३८॥

अर्थान्तरगति: काक्चा या चैषा परिदीयते । सा व्यङ्ग्यस्य गुणीभावे प्रकारमिममाश्रिता ॥३९॥

या चैषा काक्चा क्वचिदर्थोऽन्तरप्रतीतिदृश्यते सा व्यङ्ग्यस्यार्थस्य गुणीभावे सति । गुणीभावैकनिष्ठा हि काव्यप्रयोजनसाधनरता ।

सथा— 'स्वस्था भवन्ति मथि जीवति धातेरराष्ट्र:'

काव्याक्षित गुणीभूतव्यङ्गय

इस उदाहरणमें वाच्य अर्थको स्पष्ट रूपसे न कहनेवाले 'केऽपि' इस पदने अनन्त और अकिञ्चित्कर व्यङ्गचका बोधन कराते हुए कौन-सा सौन्दर्य नहीं उत्पन्न कर दिया है ॥३८॥

आगे काव्याक्षित गुणीभूतव्यङ्गचका निस्पन करते हैं— काव्य द्वारा जो यह [प्रसिद्ध] अर्थान्तर [विलकुल स्पष्ट अर्थ, अथवा उसी अर्थका वैशिष्टच, अथवा उसका आभासरूप अन्य अर्थ] की प्रतीति दिखलाई देती है वह, व्यङ्गचके गौण होनेसे इसी [गुणीभूतव्यङ्गच] मेवके अन्तर्गत होती है ।

लक्ष्यार्थाह्नलविकारसमाप्रवेदै: प्राणेभ्यु वित्तनिचयेभ्यु च न: प्रहृद्य । आक्रुश्य पाण्डववधूभिरपि धिकनिन्द्यै: स्वस्था भवन्ति मथि जीवति धातेरराष्ट्र: ॥

दृष्टान्तग्रहमे आग लङ्काकर, विपकान अञ्जलि सिकलाकर, यूतसमां द्वारा हमारे प्राणों और धनसम्पत्तिपर प्रहार कर और पाण्डवोंकी स्त्री भी द्रोपदीके वस्ख खोंचनेवाली दुष्टचेष्टां करके भी, मुक्त भीमसेनके जीते-जी धृतराष्ट्रके पुत्र निःचिन्त होकर बैठ जायँ । यहाँ 'यह असम्भव है' यह अर्थ काकुसे अभिव्यक्त होता है ।

बोलनेके ढंग या लहजेको 'काकु' कहते हैं— 'भिन्नकण्ठध्वनिनिर्धैः काकृत्यभिधीयते ।' काकु शब्द 'कक लोल्ये' भावसे बना है । साकाक्ष या निराकाक्षरूपमें विशेष ढंगसे बोला जानेवाला काकु-

१. मि०, श्री० में 'वस्तु' पद नहीं है ।

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द्वितीय उद्योत:

यथा वा—

आम असइओ ओरम पइब्बए ण तुए मलिनिहिं सीलम् । किं उण जणस्य जाइ व्व चन्दिळं तं ण कामेमो ॥ [आम असत्यः, उपरम पतित्रते न त्वया मलिनितं शीलं । किं पुनर्जनस्य जायेव नापितं तं ण कामयामहे ॥ —कवि छाया]

शब्दशक्तिव हि स्वाभिधेयससामध्योक्षिकाकाकुसहाया सती, अर्थविशेषप्रतिपत्तिद्योतुर्य काकुमात्रं । विषयानन्तरे स्वेच्छाचालितात् काकुमात्रे तथाविधार्थप्रतिपत्त्यसम्भवात् । स वार्थः काकविशेषसहायशब्दद्योत्यपरोपाहडोऽर्थेऽभिहित इति व्यक्ज्य-रूप एव । वाच्य-कत्वादुगुणेनैन तु यदा तद्दिशिष्टवाच्यप्रतीतिस्तदा गुणीभूतव्यङ्ग-यतया तथाविधार्थद्योतिनः काक्यस्य व्यपदेशः । स च्यङ्ग-द्विशिष्टवाच्यामिधायिनो हि गुणीभूतव्यङ्ग-यत्वम् ॥ ३९॥

युके वाक्य प्रकृत वाच्यार्थ्यसे अतिरिक्त अन्य अर्थकी भी आकांक्षा करता है यहाँ उसका लक्ष्य है । इस्की कारण उसे 'काकु' कहते हैं ।

अथवा जैसे— मच्छा ठीफ है, हम असती हैं, पतिव्रता महारानी, पर आप चुप रहिये ! आपने तो अपना चरित्र आप नहीं किया । इस क्या साज्ञार अनिकी निअण्णे समाण उसे णारिक्की कामणा ण करे ।

यहाँ 'स्वयं नीच नापितपर अनुरक्त होकर भी हमारे ऊपर आक्षेप करती है' इत्यादि अनेक व्यक्जय, अनेक पदोंमें, काकु द्वारा प्रतीत होते हैं । अतपव यह गुणीभूतव्यजक्यका उदाहरण है ।

[काकुके उदाहरणोंमें] शब्दकी [अभिधा] शक्ति ही अपने वाच्यार्थकी सामर्थ्यसे आक्षित, काकुकी सदायतातसे अर्थविशोप [व्यजक्य]की प्रतीति कारण होती है, अकेली काकुमात्र [हि] नहीं । क्योंकि अन्य स्थलोंमें स्वेच्छाचारित काकुमात्रसे उस प्रकारके अर्थकी प्रतीति असम्भव है । और वह [काकुसे आक्षित] अर्थ काकु-विशेषकी सदायतातसे शब्दच्यापार [अभिधा] में उपारुढ होनेपर भी अर्थकी सामर्थ्यसे लभ्य होनेसे व्यजक्य-रूप ही होता है । उस [आक्षित अर्थ]से विशिष्ट वाच्यार्थकी प्रतीति जब वाचकत्व [अभिधा] की अनुगामिनी [गुणीभूत] रूपमें होती है तब उस अर्थके प्रकट-कारणोंमें, अभिधानकाकुलक्षणे, सदायात होता है । व्यक्जक्याविरिष्ट वाच्यका कथन करनेवाले [काव्य] का गुणीभूतद्योतकक्यत्व [होता] है ।

इधर उनतालीसवें कारिकामें 'सा व्यक्जयस्य गुणीभावे प्रकारणममाश्रिता' पाठ आया है । इस्से कुछ लोग यह अर्थ लगाते हैं कि काकुसे जो अर्थान्तरकी प्रतीति होती है उसका गुणीभाव होनेपर व्यक्जय होता है । अर्थात् उसका प्राधान्च होनेपर ध्वनिकाव्य भी हो सकवा है । इस प्रकार काकुमें ध्वनि और गुणीभूतव्यजक्य दोनों प्रकार मानते हैं । और उन दोनों अर्यांत् 'काकु-ध्वनि' और 'काकुगुणीभूतद्योतकव्य'की विपयव्यवस्था इस प्रकार करते हैं कि जहाँ काकुसे आक्षित अर्थके बिना भी वाच्यार्थकी प्रतीति पूर्ण हो जाय और प्रकरणादिकी पयालोचनाके बाद व्यक्जय

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प्रभेदस्यास्य विषयो यक्ष युक्त्या प्रतीष्यते ।

विषयात्वया सहदयैस्तन ध्वनियोजना ॥४०॥

सदृशोर्हि कवित्वे ध्वनेर्गुणौौभूतन्यत्र यस्य च लक्ष्ये हृदये मार्गे । तत्र यस्य युक्तिसहायता तत्र तेन न्यपदेशः कर्तव्यः । न सर्वत्र ध्वनिरागिणा भवितव्यम् । यथा—

अर्थकां बोध हो वहाँ काकुचचन होती है । और जहाँ काकुत्से आक्षित अर्थके विना, वाच्यार्थकी प्रतीति ही समाप्त न हो वहाँ 'गुणीभूतव्यङ्गचकाकु' होता है । ऐसे लोगोंोंने—

तथाभूतां हृश्रा उपसदति पाण्डालतनयां बने व्याधः साधु विचिन्तयतिर्न वल्कलधरेः । विराटस्यावासे स्थितमनुचितारम्भनिमित्तं तु गुरुः खेदं निखिदेऽपि भजति नायापि कुरुःु ॥

इत्यादि श्लोकको 'काकुबचन' का उदाहरण माना है । यह श्लोक भी पूर्व उदाहरण श्लोकके समान 'वेणीसंहार' नाटकमें भीमसेनके द्वारा कहा गया है । उसका भाव यह है कि राजा भूतनाश्रकी समामें नंगी की नाती हुर्ई द्रौपदीको देखकर गुरु युधिष्ठिरको दुःख नहीं हुआ । हम वल्कल धारण-

कर त्याजौंक साथ वर्षो वर्षमें रहें, इससे भी उनको खेद नहीं हुया । और विराटके यहाँ ब्रह्मलशा तथा पांचक आदिका अनुचित वेष धारणकर जब हम सब पाण्डव छिपकर रहें तब भी उनको क्रोध नहीं आया । पर जब अर्जुन जब में कारुवापर क्रोध करता हुं तब वह भर ऊपर नाराज होते हैं ।

यह वाच्य अर्थ यहाँ वाच्चक्य अर्थके विना भी परिपूर्ण हो जाता है । परन्तु इसके बाद प्रकरण आदिकी आलोचना करनेपर 'मेरे ऊपर नाराज होना उचित नहीं है, कारुवोंपर ही क्रोध करना चाहिये' इस, काकुत्से आक्षित अर्थकी प्रतीति होती है । इसलिये इसको 'काकुबचन' का उदाहरण

मानते हैं और पिछले 'स्वस्था भवन्ति मयि जीवति धार्तराष्ट्राः:' इत्यादिको 'गुणीभूतव्यङ्गचकाकु' का उदाहरण मानते हैं ।

परन्तु लोचनकार काकुमें ध्वानि माननेके लिए तैयार नहीं हैं। वे काकूको सदैव गुणीभूत-व्यङ्गच्य ही मानते हैं—'काकुप्रयोगे सर्वत्र शब्दस्युष्टलैने व्यङ्गचतयोनिमीलितस्यापि गुणीभावात् ।' काकूके प्रयोगमें प्रतीयमान व्यङ्गच्य भी सदा वाच्यद्वसे शुष्ट होनेये गुणीभूत ही रहता है । अतएव 'काकुबचन' -

मन्नना उचित नहीं है । इस मतके अनुार कारिकामें 'गुणीभावे' पदकी सप्तमी, 'चाति सप्तमी' नर्हीं, अपितु 'निमित्ते सप्तमी' है ॥३९॥

और जो [काव्य] तकै से [युक्त्या] इस [गुणीभूतव्यङ्गचय] मेंक विषय प्रतीत होता है, सहदयोंको उसमें ध्वानिको नहीं जोडना चाहिये ॥४०॥

ध्यनि और गुणीभूतव्यचकथके सदृशकक श्री कोई मार्गे उदाहरणोंमें दिखलार्ई देता है । उनमें जो [पक्ष] तरफसे समर्धित होता है उसके अनुसार नामकरण [व्यवहार] करना चाहिये । सब जगह स्वनिका अनुरागी नहीं होना चाहिये [बिना युक्तिके

छानिके अनुरागमें गुणीभूतव्यचक्यको भी ध्वनि नहीं कहने लगाना चाहिये] । जैसे—

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कारिका ४० ] तृतीय उद्योतः ३०९

पत्युः शिरश्चन्द्रकलामनेन सृशोति सख्या परिहासपूर्वम् । सा रख्यियत्था चरणौ ऋताशर्मोऽलयेन तां निर्वाचनं जघान ॥ यथा च— प्रयच्छतोश्च्चैः कुसुमानि मानिनी विपक्षगोत्रं दयितेन लम्भिता । न किंचिदूचे चरणेन केवलं लिखे वाष्पाकुललोचना सुवम् ॥ इत्थं 'निर्वाचनं जघान', 'न किंचिदूचे' इति प्रतिषेधसूचेन व्यङ्ग्यपसत्यार्थस्यो- कस्या किंचिद्विषयोत्कतत्वाद् गुणशीभाव एव शोमते । 'यदा वक्रोक्तिः बिना व्यङ्ग्यार्थे थेष्टातिशयेन प्रतीयते 'तदा तस्य प्राधान्यम् । यथा 'पर्वंबादिनि देवर्षौ' इत्यादि । इह पुनरक्ति भङ्ग यास्विति वाच्यस्यापि प्राधान्यम् । तस्मात्त्रातात्रणगरुपनयक यथावनिलयप- देशो विधेयः ॥४०॥

यह कुमारसम्भवके सर्ग १९ वाँ श्लोक है । सखीने पार्वतीके चरणोंको [लाक्षारागसे] रञ्जित कर [यह आशीर्वाद दिया कि] इस वरपसे [घरतके किसी बन्धुविषेशमें, अथवा सपत्नी होनेसे] पति [शिव] के सिरपर स्थित चन्द्रकलाका स्पर्श करना, इस प्रकार परिहासपूर्वक आशीर्वादप्राप्त प्रावर्त्तीने बिना कुछ बोले माथसे उस [सखी]को मारा । और जैसे— यह 'किरात' के अष्टम सर्गमें अर्जुनके तपोभङके लिये आयी हुई अप्सराओंके वर्णनमुखमें किसी अप्सराके वर्णनका श्लांक है ।

ऊँचे [उस अवसरकी पहुँचनेसे अधिक ऊँचारैश्वर ठगे गुप्त, यथवा उत्कृष्ट] फूलोंको [तोड़कर] देते हुए प्रियकें द्वारा अन्य अवसरा [विपक्ष]के नामसे सम्बोधित की गयी मानिनी अप्सरा कुछ बोली नहीं, आँखोंमें आँसू भरकर केवल पैरसे अमीनको कुचेष्टती रही ।

यहाँ [इन दोनों श्लोकोंमें क्रमशः] 'निर्वचनं जघान' बिना कुछ कहे मारा, और 'न किंचिदूचे' कुछ कहा नहीं, इस प्रतिषेध द्वारा, व्यङ्गय अर्थ [प्रथम श्लोकमें ढङ्गा, अवाहित्या, हर्षे, ईर्ष्ये, सौभाग्य, अभिमान आदि और दूसरे श्लोकमें सातिशय शून्य- सम्भार] किसी अंशमें अभिधा [उक्ति]का ही विषय हो गया है । अतः [उसका] गुणभीभाव ही उत्तम प्रतीत होता है । और जब उसके बिना तात्पर्यरूपसे व्यङ्गय अर्थ प्रतीत होता है तब उस [व्यङ्गय]का प्राधान्य होता है । जैसे 'पर्ववादिनि देवर्षौ' [पृ० १३२] इत्यादिमें । यहाँ [ 'पत्युः शिरशचन्द्रकलाम' तथा 'प्रयच्छतोश्च्चैः' इत्यादि दोनों श्लोकोंमें] तो कथनकी ढङ्गीसे [व्यङ्गयकी प्रतीति] है, इसलिए वाच्यका भी प्राधान्य है । इसलिये यहाँ संलक्ष्यक्रमव्यङ्गनियवहार उचित नहीं है [अर्थात ये दोनों गुणभीमतनव्यङ्गयकं ही उदाहरण हैं । संलक्ष्यक्रमव्यङ्गनिके उदाहरण नहीं हैं]

१. 'तस्माद् यथोक्ति विना' दी० । २. 'तथा' दी० । ३. 'अस्ति' नि० ।

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ध्वन्यालोकः

प्रकारोऽयं गुणीभूतव्यङ्ग्योऽपि ध्वनिरूपताम्‌ । घटते रसादितात्पर्यपर्यालोचनया पुनः ॥४१॥

गुणीभूतव्यङ्ग्यकाव्यका ध्वनिरूपमें पर्यवसान

यथा च——

दुराराध्या राधा सुहृदयं यद्वेतसोऽपि गृहीत- स्ववैवत्स्राणेशाजघनवसनेनाश्रु पतितम्‌ । कठोरं कीचेतस्तदलमुपचारैरर्विरम हे कियात्कल्याणि वो हरितनुयेष्येवसुमदितः ॥

यह गुणीभूतव्यङ्ग्यकार प्रकार भी रस आदिके तात्पर्यका विचार करनेसे फिर ध्वनि [काव्य] हो जाता है । [‘गुणीभूतव्यङ्गयक्रमव्युत्क्रमव्यतिकराद्‌विधेस्तु पुनः’ इत्यादि] यहाँ ध्वनिरूपमें माना जा सकता है] ॥४१॥

गुणीभूतव्यङ्ग्य नामक काव्यकका भेद रस आदिके तात्पर्यका विचार करनेसे फिर ध्वनिरूप हो हो जाता है । जैसे ऊपर उदाहृत [‘पत्युः शिरसि रत्नकलापं’ तथा ‘प्रेयः-कृतोऽसौ’] दोनों लोकोंमें [पदद्वयसे गुणीभूतव्यङ्ग्यकाव्यका पर्यवसान रसकाव्य प्राधान्य होनेसे ध्वनिकाव्यमें ही है] ।

[दूसरा उदाहरण] जैसे— हे सुमग [कृष्ण, मुझसे भिन्न अपनी किसी और] प्राणेश्वरीकी [सुरतोत्सरकालमें भ्रूलते स्वयं धारण की हुर्ई] इस सादृसीसे [मेरे] गिरते हुए आँसुओंको पोंछनेपर भी [सौन्दर्य-सौभाग्यादिविभिमानशालिनि यह कृष्णभाजनुसुता] यह राधा [मैं] तुमसे प्रसन्न न कर सकनेवाला वृथा [दुराराधा] है । श्रीका चित्त [सपल्लीसम्योगादिरूप षपमानको सहन न कर सकनेवाला वृथा] कठोर होता है, इसलिये तुम्हारे ये सब [मानापनोदनके षिप किये जानेवाले] चाटु [रूप] उपाय व्यर्थ हैं; उनको रहने दो । मनानेके अवसरों [अनुनयेषु] पर [सङ्गा द्वारा] इस प्रकार कहे जानेवाले कृष्ण तुम्हारा कदापि करें ।

‘यहाँ ‘सुभग’ विशेषणसे बहुवहलभत्स्व और उन अनेक षियोंसे अमुक्तत्व, अन्य श्रीकी सादृसी [जघनवसन] के प्रत्यक्ष होनेसे उसका अपनहवनीयत्व तथा समप्रेधारणीयत्व, विपक्षनायिकाके प्रति कोपका औचित्य, उसके षिपानेचे प्रयत्नसे उसके प्रति आदराधिक्य, राधा इस अपने नामके उच्चारणसे परिमवादिसंघणुब्‌, दुराराधा पदसे मानकी हदत्सा और अपराधकी उम्रता, चित्तकी कठोरतासे स्वाभाविक सौदृमाव्यका परित्याग सहज और प्रसादनाहेत्‌, ‘उपचारैः’के बहुवचनसे नायकका चाटुकुपटपाटवत्व, ‘अनुनयेषु’के बहुवचनसे नायककी इस प्रकारकी अवस्स्थाकी बहुतता

१. ‘यथात्रैवानन्तरोदाहते’डन्र्तरश्कोकद्रये । यथा’ दी० ।

२. ‘हरितनुयेष्येवसुमदितः’ नि० ।

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कारिका ४१ ] द्वितीयोत्तरः ३०३

एवं स्थिते व 'न्यक्कारो ह्यायमेव' इत्यादिरिलोकेन निर्दिष्टानां पद्यानां ठ्यङ्क्कथयविशिष्टवाच्यप्रतिपादने ड्यैवेतद्वाक्यार्थीभूतरसापेक्षया व्यङ्क्ककत्वमुच्यम् । न तेषां पदाथैनामर्थान्तरसङ्क्रमितवाच्यध्यानिर्म्मो विघातव्यः। विवक्षितवाच्यत्वात् तेषाम् । तेषु हि व्यङ्क्क्यविशिष्टत्वं वाच्यस्य प्रतीयते न तु व्यङ्क्क्यरूपपरिणतत्वम् । तस्माद्वाक्यं तत्र ध्वनिः, पद्यनि तु गुणीभूतव्यङ्क्कथयानि ।

न च केवलं गुणीभूतव्यङ्क्कथयान्येव पदान्यलक्ष्यक्रमव्यङ्क्क्यथ्यध्वने ड्यङ्क्ककानि, यावदर्थान्तरसङ्क्रमितवाच्यानि ध्वनिप्रबेधरूपाण्यपि । यथात्रैव र्लोके 'रावणः' इत्यस्य 'प्रबेधान्तरसङ्क्रमितवाच्यानि ध्वनिकाव्यम् । यत्र तु वाक्ये रसादिवात्पयं नास्ति गुणीभूतव्यङ्क्क्यं तैः पदैरूद्रसादितेऽपि तत्र गुणीभूतव्यङ्क्क्यतैव समुदायधर्मः ।

और नायिकाका सौभाग्यतिशय आदि, व्यङ्क्क्य होनेपर भी, वाच्यके ही उपकारी होते हैं, इसलिए उसकी दृष्टिसे यह गुणीभूतव्यङ्क्क्यकाव्य है । परन्तु इसमें अर्थान्तरप्रकाशनकी प्रधनारूपसे अभिव्यक्तना हो रही है इसलिए उसदृष्टिसे यह ध्वनिकाव्य है । इसलिए यहाँ भी गुणीभूतव्यङ्क्क्यकका ध्वनिमें पर्यवसान होता है ।

इस प्रकार [ध्वनि और गुणीभूतव्यङ्क्क्यके विषयविभागकी व्यवस्था हो जानेसे], 'न्यक्कारो ह्यायमेव' इत्यादि श्लोकमें निर्दिष्ट पदोंके व्यकृयविशिष्ट वाच्यके प्रतिपादक [उस दृष्टिसे गुणीभूतव्यङ्क्क्य] होने पर भी समस्त इलोकके प्रधान व्यङ्क्क्य [वीर] रसकी दृष्टिसे [उसका] ध्वनि [व्यङ्क्ककाव्य] कहा है । उन [इलोकके व्यङ्क्कक वाच्य पदों] में अर्थान्तरसङ्क्रमितवाच्यध्वनिका अंश नहीं करना चाहिये, क्योंकि उनमें वाच्य विवक्षित है । [अर्थान्तरसङ्क्रमितवाच्यध्यनि, रक्षणामूल अविवक्षितवाच्यका भेद होता है । यहाँ श्लाकलक्ष्य व्यङ्क्कक पदोंमें वाच्य अविवक्षित नहीं, विवक्षित है । अतः भेद डाला है । यहाँ श्लाकलक्ष्य व्यङ्क्कक पदोंमें वाच्य अविवक्षित नहीं, विवक्षित है । अतः

व्यङ्क्क्यविशिष्टत्व प्रतीत होता है । व्यङ्क्क्यरूपमें परिणतत्व नहीं [अर्थान्तरसङ्क्रमितवाच्यके] उनमें वाच्यार्थका व्यकृथयरूपसे परिपतया परिणत हो जाता है] इसलिए उस ['न्यक्कारो' आदि] उदाहरणोंमें वाच्यार्थ व्यकृथयपतया परिणत हो जाता है] इसलिये उस ['न्यक्कारः' आदि] उदाहरणोंमें वाच्यार्थ व्यकृथयरूपमें परिणत नहीं होता । 'करिलाजकरः करिलाजकृत्' इत्यादि उदाहरणोंमें वाच्यार्थ व्यकृथयरूपमें परिणत होता है] इसलिये उस ['न्यक्कारः' आदि] उदाहरणोंमें वाच्य [सम्पूर्ण रलोक] ध्वनिरूप है और पद तो गुणीभूतव्यङ्क्क्यतरवूप हैं ।

और केवल गुणीभूतव्यङ्क्क्य पद ही असंलक्ष्यक्रमव्यङ्क्क्य [रसादि] ध्वनिके व्यङ्क्कक नहीं होते हैं अपितु अर्थान्तरसङ्क्रमितवाच्यध्यनिरूपवाले पद भी [रसादि ध्वनिके अभिव्यञ्जक होते हैं] जैसे इसी श्लोकमें 'रावणः' इस [पद] का, ध्वनिके दूसरे प्रभेद [अर्थान्तरसङ्क्रमितवाच्य] द्वारा [वीर रसका] व्यङ्क्ककत्व है । जहाँ गुणीभूतव्यङ्क्क्य पदोंसे [रसादिके] प्रकाशित होनेपर भी, व्यङ्क्क्य रसादिपर नहीं होता वाच्य गुणीभूतव्यङ्क्क्यतता ही समुदाय [वाक्य] का भी धर्मे होती है ।

१. 'न तेषां' दी० ।

२. 'ध्यनिप्रबेधान्तरसङ्क्रमितवाच्यस्य' नि०, दी० ।

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ध्वन्यालोक:

राजानप्रति सेवन्ते विषमप्युपभुज्जते । रमन्ते च सह स्त्रीभि: कुशला: खलु मानवाः ॥

वाच्यल्यक्क ययोदच प्राधान्या प्राधान्य विवेके परः प्रयत्नो विधातव्यः । येन ध्वनिगुणीभूतव्यङ्गयोः चासदृशोर्नो विषयः सुक्शातो भवति । अन्यथा तु प्रसिद्धालङ्कारविषय एव व्यासङ्गः प्रवर्त्तते । यथा—

'लावण्यद्रवपिण्डययो न गण्यते क्लेशो महान स्वीकृतः' 'स्वच्छन्दमस्य सुरेन्द्र जनस्य वसतिरिच्छान्नतलो दीपितः । एषापि स्वयमेव तुल्यरमणाभावाद्राकी हता कोटिस्र्चेतसि वेधसा विनिहिततल्लन्यासतलुं तन्वता ॥'

जैसे— चतुर मनुष्य [असत्य भी दुःसाध्य] राजाक्री सेवा भी कर सकते हैं, [सत्यः प्राणविनाशक] विष भी खा सकते हैं, और [स्त्रियाचरितन्वाली] स्त्रियोंके साथ रमण भी कर सकते हैं । इत्यादिमें।

यहाँ 'राजाक्री सेवा, विप्रका भरण और स्त्रियोंके साथ विहार अत्यन्त कष्टसाध्य और विपरीत परिणामजनक होते हैं' इत्यादि व्यङ्ग्यवशे विशिष्ट वाच्य अर्थ चमत्कारयुक्त हो जाता है । अतः यहाँ गुणीभूतव्यङ्गयकृत अलङ्कार होता है । साथ ही ध्वनतरङ्गके अज्ञ निर्वेद स्थायिभावकी भी अभिव्यक्ति उनसे होती है । फलतः उसका प्राघान्य निश्चित न होनेसे पद और वाक्य दोनों ही गुणीभूतव्यङ्गयकक्व हैं ।

वाच्य और व्यङ्गचवके प्राधान्य अप्राधान्यके परिज्ञानेके लिये अत्यन्त यत्न करना श्राहिये जिससे ध्वनि, गुणीभूतव्यङ्गचक्व और अलङ्कारोंका सङ्कररहित विषय भली प्रकारसे समझमें आ जाये । [अन्यथा तु] उसके बिना तो प्रसिद्ध [वाच्य] अलङ्कारोंके विषयमें ही भ्रम हो जाता है । जैसे—

[इसके ध्येयोत्पादनमें] विधाताने लावण्यरसस्पर्शिके ध्ययकी चिन्ता भी नहीं की, [स्वयं] महान कृत उछाया, स्वच्छन्द और सुरतपूर्वक बैठे हुए [सम्रङ्गणी] लोगोंके लिये चिन्तामणि प्रदीप कर दिया और अनुरूप वरके भावमें यह विचारी भी मारी गयी । मालूम नहीं, विधाताने इस सुन्दरीके शरीरकी रचना करनेमें कौन लाभ सोचा था ।

इसमें व्याजस्तुति अलङ्कार है पेटी व्याख्या किसने की है, वह ठीक नहीं है ।

१. 'तथाहि' नि०, दी० । २. 'आङ्कितः' नि० । ३. 'स्वच्छन्दं करत जनस्य हृदये चिन्तामणिर्निमितः:' नि० । 'सखीजनस्य' दी० । ४. 'धृति । मदन' दी० ।

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कारिका ४९ ] तृतीय उद्योतः ३०५

मिधेयस्य, पतदलकद्रारूपमात्रपर्यवसायित्त्वे 'न सुमिद्धष्टता । यतो न तावदयं रसिषः कस्यचिद्रिकल्प्यः । तत्तः 'प्यापि ख्यमेव तुल्यरमणाभवावादूबराकी हता' इत्येवंबविधोक्त्व-नुपपत्तेः । नापि नीरागस्य । तस्यैवंविधविकल्पपरिहारैकव्यापारत्वात् । न वायं इलोकः क्वचित् प्रबन्ध इति भ्रूयते, येन वत्मकरणानुगतार्थींवास्य परिकलप्येत ।

तस्मादप्रस्तुतप्रशंसाश्रयम् । तस्मादनये वाक्येन गुणाभूतत्वेन निःसामान्यगुणवैच-पाध्यातस्य निजमहिमोत्कर्षजनितसमत्सरजनज्वरस्य विशेषेऽभिमत्पनो न कविन्देवापरं

इसके अर्थका केषल व्याजस्तुतिके स्वरूपमें पर्यवसान माननेसे वह [रसका वाच्यार्थ] गुसकृत नहीं होता । क्योंकि यह किसी रागी [उस सुन्दरीमें अनुरक्त, अथवा मलिन वासनावाले पुरुष] का वितर्क [विचारधारा] नहीं है । क्योंकि उस [अनुरागयुक्त अथवा वासनायुक्त] की [ओरसे] 'अनुरूप पति के न मिलनेसे यह विचारी भी मारी गयी' इस प्रकारका कथन सङ्कत नहीं जान पडता । [अनुरक्त पुरुष तो अपनेको ही उसके योग्य समझता है । उसके मुँहसे स्वयं अपनी निन्दा अनुपपन्न है । और मलिन वासनावाले पुरुषकी ओरसे यह कारणयुक्त सम्भव नहीं हो सकती] और न किसी रागरहित पुरुषकी [यह उक्ति है] क्योंकि उस [वीतगग पुरुष] का इस प्रकारके [गगदन्य] चित्प्रपञ्चका परिहार ही प्रधान व्यापार है [वीतगग पुरुष जवसे अन्तवन्त उदासीन होता है, वह इस प्रकारके विपयका विचार भी नहीं कर सकता] ।

यहाँ निप्कल ओर असङ्कत कार्य करनेवाले विधाताकी निन्दा वाच्य है । उसने अन्यन्यसामान्य चौन्दर्यशालिनी रमणीक निर्माणकौशलकी सगत्ति द्वारा, स्यङ्गाररूपसे विधाताकी स्तुति सूचित होनेसे, व्याजस्तुति हो सकती है। यह व्याजस्तुति माननेवालेका आशय है । सङ्कन करनेका आशय यह है कि इसमें असाधारण चौन्दर्यशालिनी रमणीक निर्माणसे जो विधाताकी स्तुति गम्य मानी जा सकती है, वह तभी, तब कि यह किसी अनुरक्त पुरुषकी उक्ति हो । परन्तु अनुरक्त पुरुष कुरूप होने-पर भी कामवेदश्राम अपनेको ही उसके योग्य समझता है, उसके मुँहसे 'तुल्यरमणाभवावादूबराकी हता' यह उक्ति उचित नहीं प्रतीत होती । इसलिए यहाँ विधाताकी स्तुति गम्य न होनेसे यह व्याजस्तुति अलङ्कार नहीं ।

और यह इलोक किसी प्रबन्ध [काव्य] में हैं, यह श्री नहीं सुना है जिससे उसके प्रकरणके अनुकूल अर्थकी कल्पना की जा सके [और उसके आधारपर व्याज-स्तुति अलङ्कारकी सङ्कति लगायी जाय] ।

इसलिए यह अप्रस्तुतप्रशंसा [अलङ्कार] है । क्योंकि इस [गुणीभूतव्यङ्गच] अप्रस्तुत वाच्य [अर्थ] से अलोकसामान्य [लोकोत्तर शानादि] गुणोंके द्वारा गर्वित, अपने [पाण्डित्य आदि] महिमाके उत्कर्षसे ईश्यालु, प्रतिपक्षियोंके मनमें ईश्र्याज्चर उत्पन्न कर देनेवाले और किसीको अपने [ग्रन्थादिका] विरोधपथ न समजनेवाले, किसी [धर्मंकीर्ति सरस्वे महाविद्वान्] का यह निर्वेदसूचक वचन है । वेसा प्रतीत होता है !

  1. 'पर्यवसायितत्वे' नितो ।

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ध्वन्यालोकः

अनन्ध्यवसितावगाहनमनल्पधीशक्तिना-

इत्थनेनापि ध्वनिकेनैवंधियोद्भिप्रायः प्रकाशित एतत् ।

पर्यतः परिदेवितमेतदिति प्रकार्यते । तथा चाथ धर्मकीर्तिंः ध्वनालोक इति प्रसिद्धिः । सम्भाव्यते च तस्यैव । यस्मात्—

श्रीमद्‌ग्रपरमार्षतत्स्वमधिकाभिरोगैरपि । मतं मम जगत्यलंघ्यसदृशश्रुतिभाहकं प्रत्यासत्तौ पयोनिधौ पय इव सङ्क्षये जायम् ॥

जैसा कि यहाँ धर्मकीर्तिंका ध्वनालोक है, यह प्रसिद्धि भी है । [ध्वमेन्त्रदने अपनी ‘औचित्य-विचारचर्चा’में लिखा है कि ‘ध्वावण्यद्रविणडययो न गणितः’ इत्यादि ‘धर्मकीर्तिंः’]

और उसका ही हो भी सकता है । क्योंकि— अनल्प—प्रशस्त—शौराशक्ति [बुद्धि] वाले पुरुष भी जिस मेरे दार्शनिक मतको

न कर सकें और अत्यन्त ध्यान देनेपर भी जिसके रत्नोंको न देख सकें, ऐसे समुद्रके

जलके समान अपने [धर्मकीर्ति अथवा समुद्रके] शरीरमें ही डूब जायगा ।

इस इलोकमें भी इसी प्रकारका [अपने अनन्यसदृशा पाण्डित्यका गर्व और योग्य प्राहिता न मिलनेसे अपने ज्ञानके निष्फलतत्वसे उत्पन्न निवेंदरूप] अभिप्राय प्रकट किया ही गया है ।

यहाँ पहिले इलोकमें प्रथम चरणके वाच्य ‘ध्वावण्यद्रविणस्य’के गणनामाव और क्लेशातिशय-स्रीकारते परिदेवक धर्मकीर्ति अथवा उसकी कृतिके अदःसुतगुणमण्डितत्व, द्वितीय चरणके वाच्य

अप्रस्तुत स्वच्छन्द जन्तुके चिन्तानलोत्पादनसे अपने अथवा अपनी कृतिके उत्कर्षके कारण प्रतिस्पर्धी

वित्‌द्रान्तोंमें ‘ध्व्योन्द्रोद्भावनशप्’ और तृतीय चरणके वाच्य अप्रस्तुत ‘तुत्स्यरमणाभाचाद्‌वबराकी हता’ आदिसे

सर्वाङ्गचमत्कृत्य और विशिष्टाके तन्न्यनिमित्तानिष्फलतत्व, तदुत्थे चरणके अप्रस्तुत वाच्यसे अपने

अथवा अपनी कृतिके निर्माणके निष्फलतत्वसे निवेंदरूप प्रस्तुतत्की प्रतीति होनेसे ‘अप्रस्तुतात्प्रस्तुतं’

चेत् गम्यते । इत्यादि‌रूप असङ्कर है ।

अथवा ‘अनध्यवसितावगाहन’ आदि इलोक भी धर्मकीर्तिंका इलोक है । ‘उसममें भी इसी प्रकार- का निवेद अभिव्यक्त होता है । धर्मकीर्ति बौद्ध दार्शनिक हुए हैं ।

विन्दु’ ग्रन्थ बौद्ध न्यायके उत्त्कृष्ट ग्रन्थ हैं और अत्यन्त प्रसिद्ध हैं । इस इलोकमें उन्होंने इस बातपर

दुःख प्रकट किया है कि उनके मतको यथार्थरूपमें समझनेवाला कोई नहीं मिलता है । समझ सकने- वाले योग्य विद्वान्‌के अभावमें उनका मत समुद्रके पानीके समान उनके भीतर ही पड़ा-पड़ा जराको

प्राप्त हो जायगा । इस इलोकके समानाार्थ ही पूर्वोक्त ‘ध्वावण्यद्रविण’ आदि इलोक भी धर्मकीर्तिंका ही

इलोक प्रतीत होता है और उसमें अपस्तुतप्रशंसा अलङ्कार ही मानना उचित है । व्याजस्तुति मानना

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कारिका ४२ ]

ध्वनीय उद्योतः

३०७

अप्रस्तुतप्रशंसायां च यद्वाच्यं तस्य कदाचिद्विवक्षितत्वं कदाचिदविवक्षितत्वं कदाचिद्विवक्षिताविवक्षितत्वमिति त्रयी वन्धचछाया । तत् त्रिविधक्षितत्वं यथा—

परार्थे य: पीडामनुभवति भडृडपि मधुरो यदीयै: सर्वेषामिह खलु विकारोडप्यभिमत: । न सम्प्राप्तो वृद्धि यदि स शुश्रूषक्षेत्रप्रपतित: किमिक्षोऽडौडसौ न पुनरगुणाया मरसुव: ।।

यथां वा ममैव—

अमी ये हरयन्ते न तु सुभगरूपा: सफलता यस्य क्षणमुपगतानां त्रिपयताम् । निरालोके लोके कथं मिदमहो चञुरघुना समं जातं सर्वैरं सममथवानैरवरवयै: ।।

अनयोर्हि दृश्यो: श्लोकयोरिदृशचकृषा विवक्षितस्वरूप एव, न व' प्रस्तुते । महा-

अप्रस्तुतप्रशंसायां जो वाच्य होता है वह यहाँ [अनुपपद्यमान होनेसे] अविवक्षित, और यहाँ [उपपद्यमान होनेसे] विवक्षित, कहिं [अनुपपद्यमान होनेसे] अविवक्षित और कहिं [अंशतः उपपद्यमान होनेसे] विवक्षिताविवक्षित होता है । इस प्रकार तीन प्रकारकी रचनाशैली होती है । [अप्रस्तुतप्रशंसाके पाँच भेदोंमेंसे अन्तिम तुल्य अप्रस्तुततस् तुल्य प्रस्तुतकी प्रतीतिरूप जो पञ्चम भेद है उसके ही ये तीन भेद होते हैं । शेष चारोंके नहीं] उनमेंसे [वाच्य अप्रस्तुत] के विवक्षितत्वका [उदाहरण] जैसे—

['परार्थे य: पीडाम्' इत्यादि श्लोक प्रथम उद्योतमें पृष्ठ ६१ पर आ चुका है । वहाँ से उसका अर्थ देखिये । यहांँ अप्रस्तुत विवक्षित वाच्य रूढ यदसे प्रस्तुत महापुरुषकी प्रतीति होनेसे अप्रस्तुतप्रशंसा अलङ्कार है और वाच्यार्थ भी उपपद्यमान होनेसे विवक्षित है ।]

अथवा जैसे मेरा ही—

यह जो सुन्दर आङ्गतिवाले [मनुष्योंके हाथ, पैर, मुख आदि अवयव] दिखलाई देते हैं इन [अङ्गों] की सफलता जिस [वृक्ष] के क्षणसङ्के विपय होने [दिखलाई देने] के कारण होती है, आश्चर्य है कि [इस समय] इस अन्धकारमय जगतमें यह वृक्ष भी कैसे अन्य सब अवयवोंके समान [व्यर्थ] अथवा समान भी नहीं [अपितु उनसे भी गया-बीता] हो गया है [क्योंकि अन्धकारमें भी हाथ, पैर आदि अवयवोंसे काम लिया जा सकता है परन्तु वृक्ष तो विरङ्कुल ही वेकार है । यहांँ अप्रस्तुत वृक्षसे किसी अत्यन्त कुराल महापुरुषकी, निरालोक-विवेकहीन स्वाम्री आदिके सम्प्रध्वंससे अन्य अवयवों के साथ वृक्षका भी विनाश होनेसे अप्रस्तुतप्रशंसा है और उसमें वाच्यार्थ उपपन्न होनेसे विवक्षित है ।]

इन दोनों ['परार्थे य: पीडाम्' इत्यादि तथा 'अमी ये' इत्यादि श्लोकों] में वृक्ष

१. हु. नि. दी. !

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ध्वन्यालोक:

गुणस्याविषयपतितत्वादग्राम्यपरभागस्य कस्यचित्स्वरूपमुपवर्ण्येतद्वयं द्वयोरपि ध्वनोक्योस्तात्पर्येण प्रस्तुतत्वात्।

अविवक्षितत्वं यथा—

कस्त्वं भोः ! कथयतां दैवहतकं मां विधि शाङ्कोटकं वैराग्यादिव वक्ष्यि साधु विदितं कुस्मादितं कुर्याम् । वामेनाव वदनसुभगाजनेः सन्निधाने सति नेह न च्छायादपि परोपकारकरणे मार्गस्थितस्यापि मे ॥

न हि दृशाविशेषेण सद्योऽप्रत्युक्तिसम्भवत इत्यविवक्षितामधेेयेनैवाननेन भलोकेन सङ्केतसप्तपुढवसमौपवर्तिनो निर्घृणस्य कस्यचिन्मनस्विनः परिदेवितं तात्पर्येण वाक्यध्र्क्तमिति प्रतীয়ते ।

विवक्षितत्वाविवक्षितत्वं यथा—

उपहुनआए असोधिणिअँ फलकूसुमपत्तरहिआइ । वेरिअँ वइँ देन्तो पामर हो ओहसिज्जहसि ॥

और वचू दोनों विवक्षितस्वरूप और अप्रस्तुत हैं। अभिधान [निर्देश्य स्वामी क्रिया] के सम्बन्धवशे उत्कर्षको प्राप्त न हो सकनेवाले किसी महा गुणवान् पुरुषके स्वरूपकी प्रंशाके लिये ही दोनों श्लोक तात्पर्यरूपसे प्रस्तुत हैं [अप्रस्तुत इषु तथा वचूसे प्रस्तुत महापुरुषकी प्रशंसा करना ही दोनों श्लोकोंका तात्पर्य है, अतः यहाँ अप्रस्तुत-

अविवक्षितवाच्य [का उदाहरण] जैसे—

अरे तुम कौन हो? बताता हूँ; मुझे भाग्यका मारा [अभागा] शाखोट [सिद्धोत नामक वृक्षविशेष] जानो। कुछ वैराग्यसे कह रहे हो ऐसा जान पड़ता है। ठीक समझे ! ऐसे क्यों कह रहे हो ? [क्या बात है]। यहाँसे वायीं [रास्तेसे हटकर उलटी] ओर वड़ा वटका वृक्ष है। पथिक लोग [उसके नीचे लेटने, बैठने, रोटी बनाने, सोने आदिमें] सब प्रकारसे उसका सहाग लेते हैं और ठीक रास्तेमें वड़ा होनेपर भी मेरी छायासे भी किलोक्का उपयोग नहीं होता [इस वृक्षकी वातका मुझे दुःख है]।

वृक्षाविरोध[शाखोट] के साथ प्रह्लोषकर नहीं हो सकते हैं इसलिए अविवक्षित-वाच्य [जिसका वाच्य अप्रस्तुत अर्थ शाखोट और प्रह्लोक्ता पथिक आदि अर्थ विवक्षित नहीं हैं] इस श्लोकमें समृद्ध दुष्ट पुरुषके समीप रहनेवाले किसी निर्घृण मनस्वी पुरुषके दुःखोद्गारकको तात्पर्यरूपसे वाक्यार्थे बनाया है ऐसा प्रतीत होता है ।

विवक्षिताविवक्षित [वाच्य अप्रस्तुतप्रशंसाका उदाहरण] जैसे—

कुमार्गे [इसरे पङ्क्तिमें नीच कुल] में उत्पन्न हुई, क्रूर [वृक्षपक्षमें काँटोली और स्त्रीपक्षमें बदसूरत], फल, फूल और पत्तोंसे रहित [वृक्षपक्षमें सन्तान आदिसे रहित]

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ध्वन्यालोक

आचार्य आनन्दवर्धन

डॉ. महावीर सरन जैन

मोतीलाल बनारसीदास

[उत्सर्जनाताया अशोभनाया; फलकुसुमपतत्ररहिताया: | बदर्या कृतिं ददतू पामर भो अवहमिश्रयसे ॥] इति च्छाया ।

अत्र हि वाच्यार्थो नात्यन्तं सम्भवी न वासम्भवी।

तस्माद्वाच्यन्यज्झ्यथयो: प्राधान्याप्राधान्ये यत्ततो निरूपणीये ॥४१॥

गुणप्रधानभावाभ्यां यदृश्य-यसैवं उभयवस्थिते । काव्ये उसे तत्क्षोभज्ञात् तच्चित्रसमिधीयते ॥४२॥

चित्रं शाब्दार्थमेदेन द्विविधं न व्यवस्थितम् ।

तत्र केचित्छब्दचित्रं वाच्यचित्रमत: परम् ॥४२॥

व्यक्तं यस्यान्तरार्थस्य प्राधान्ये ध्वनिसंस्कृतकाव्यप्रकार; गुणवावे तु गुणीभूतव्यङ्गयता ।

ततोडन्यद्रसभावादिवात्पर्यरहितं यदृश्य-यथार्थविशेषप्रकाशनशक्तियं च काव्यं केवलवाच्य-

बेरी [दूसरे पक्षमें पेषी किसी कही] की वाद लगाते हुऐ [काव्यकमे उसकी रक्षा करते या घरमें बसाते हुऐ] खरे मूर्ख, तेरा सघ लोग उपहास करेंगे ।

यहाँ [अप्रस्तुत बेरीकी वाद लगाना अनुचित होनेसे वाच्य अविवक्षित और प्रस्तुत काव्यकमे किसी प्रकार बुद्धि-चारण-करना या घरमें बसाना आदि रूपसे उपयोगी होनेसे वाच्य विवक्षित हो सक्ता है । इस प्रकार विवक्षिताविवक्षितवाच्य अप्रस्तुत-

प्रसंसाकाआ उदाहृरण है] वाच्य अर्थ न सर्वथा सम्भवी है और न अत्यन्त असम्भवी है । इसलिये वाच्य और व्यक्तवके प्राधान्य और अप्राधान्यका यत्नपूर्वक निरीक्षण करना चाहिये ॥४१॥

इस प्रकार ध्वनि और गुणीभूतव्यङ्गयके निरूपणका उपसंहार कर अब आगे काव्यके तीसरे भेद चित्रकाव्यका निरूपण प्रारम्भ करते हैं ।

चित्रकाव्यका निरूपण

इस प्रकार व्यक्तवके प्रधान और गुणभावसे स्थित होनेपर वे दोनों [ध्वनि और गुणीभूतव्यङ्गच] काव्य होते हैं । और उनसे भिन्न जो [काव्य रह जाता] है उसे होनेसे] 'चित्र' [काव्य] कहते हैं ॥४२॥

शब्द और अर्थके भेदसे चित्र [काव्य] दो प्रकारका होता है । इनमेंसे कुछ शव्दचित्र होते हैं और उन [शब्दचित्र] से मित्र अर्थचित्र [काव्यालंकार] हैं १ध्रे।

व्यक्तव्य अर्थका प्राधान्य होनेपर ध्वनि नामका काव्यभेद [होता है] और गौण होनेपर गुणीभूतव्यङ्गयत्व होता है । उन [ध्वनि तथा गुणीभूतव्यङ्गच दोनों] से भिन्न रस, भाव आदिमें तात्पर्यसे रहित, और व्यक्त-यार्थविशेषके प्रकाशनकी शक्तिसे

रहित, केवल वाच्य और वाचक [अर्थ और शब्द] के वैचित्र्यके आघारपर निर्मित, जो

१. मि०, दी० में 'न वासम्भवी' इतना पाठ नहीं है ।

२. 'ध्वनिसंस्कृत:' दी० । 'ध्वनिसंस्कृत काम्यप्रकार:' मि० ।

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ध्वन्यालोक:

वाचकवैचित्र्यमात्राश्रये णोपनिबद्धमालेख्यप्रधयं यदाभासते तच्चित्रम् । न तन्मुख्यं काव्यम् । कान्यानुकारो ह्यसौ । तत्र किञ्चिच्छब्दचित्रं, यथा दुष्करयमकादि । वाच्यचित्रं ततः शब्दचित्रादन्यद् व्यङ्ग्य-व्यङ्ग्यार्थसंस्पर्शंरहितं प्राधान्येन वाक्यार्थेतया स्थितं रसादितात्पर्यरहि-तमुत्प्रेक्ष्यादि ।

काव्य आलेख्य [चित्र] के समान [तात्विक रूपरहित प्रतिक्षितिमात्र] प्रतीत होता है उसको 'चित्र' [काव्य] कहते हैं । वह मुख्यरूपसे [यथार्थ] काव्य नहीं है अपितु काव्यक की अनुकृति[नकल] मात्र है । उनमेंसे कुछ शब्दचित्र होते हैं जैसे दुष्कर यमक आदि । और अर्थचित्र उस शब्दचित्रसे भिन्न, व्यङ्ग्य-व्यङ्ग्यार्थसंस्पर्शरहित, रसादि-तात्पर्यसे शून्य, प्रधान वाक्यार्थरूपसे स्थित उत्प्रेक्षा आदि [अर्थचित्र या वाच्यचित्र] होते हैं ।

अथ किमिदं चित्रं नाम ? यत्र न प्रतीमाने ऽर्थे संस्पर्शः । प्रतीमाने ह्यर्थेऽभेदः नैक पदार्थैकतरं वा व्यङ्ग्य नोक्तं मु नाम चित्र्य कल्प्यते विषयः । यत्र तु रसादीनामविषयत्वं स काव्यप्रकारो न सम्भाव्यतेव । यस्मादवस्तुसंस्प-र्शिता काव्यस्य नोपपद्यते । वस्तु च सर्वमेव जगदूगतंवस्तु यं कस्चिदू रसस्य 'भावस्य

'चित्रकाव्य'को रसादितात्पर्यरहित और व्यङ्ग्यार्थविवोशषके प्रकाशनकी शक्तिसे शून्य कहा है । ये दोनों विकोपण रसादिके अविवक्षितत्व और व्यङ्ग्य-व्यङ्ग्यार्थविवोशषके अविवक्षितत्वको मानकर ही सङ्केत हैं । वस्तुतः प्रत्येक पदार्थका काव्यमें किसी-न-किसी रससेकुछ-न-कुछ सम्बन्ध होता ही है । क्योंकि अन्ततः विभावत्व तो सभी पदार्थोंमें आ सकता है । इसलिए उनका सर्वथा रसादिरहित होना सम्भव नहीं है । अतः 'रसादितात्पर्यरहित'का अर्थ यही है कि व्यङ्ग्य अर्थ होनेपर भी यदि वह विवक्षित नहीं है तो 'चित्रकाव्य' होगा । इसी प्रकार व्यङ्ग्यार्थविवोशषप्रकाशनशक्तिशून्यता भी व्यङ्ग्य वस्तु आदिके अविवक्षित होनेपर ही समझनी चाहिये ।

[पूर्वपक्ष—] अच्छा यह 'चित्रकाव्य' क्या है ? जिसमें प्रतीमान [व्यङ्ग्य] अर्थका सम्बन्ध न हो ? [उसको चित्रकाव्य कहते हैं, न ?] प्रतीममान अर्थे [वस्तु, अलङ्कार और रसादिरूप] तीन प्रकारका होता है इसका पहले प्रतिपादन कर चुके हैं । उनमेंसे जहाँ वस्तु अथवा अलङ्कारादि-व्यङ्ग्य न हो उससे उसे 'चित्रकाव्य'-का विषय भले ही मान लो, [परन्तु] जो रसादिके विषय न हो ऐसा कोई काव्यभेद सम्भव नहीं है । क्योंकि काव्यमें किसी वस्तुका संस्पर्शो [पदार्थवाचकत्व] न हो यह युक्तिसङ्गत नहीं है । और संसारकी सभी वस्तुपँ किसी रस या भावका अङ्ग अवश्य ही बन जाती हैं [अन्य रूपसे रससम्बन्ध न सम्भव हो सके तो भी] अन्ततः विभाव-रुपसे [प्रत्येक वस्तुका किसी-न-किसी रससे सम्बन्ध हो जाता है] । रसादि-[के. अनुभावात्मक होनेसे और अनुभावके चेष्टवृत्तिरूप होनेसे] चेष्टवृत्तिविशेषरूप-ही है । और [संस्कारमें] ऐसी कोई वस्तु नहीं है जो किसी प्रकारकी चेष्टवृत्तिको उत्पन्न न करे । अथवा यदि वह [वस्तु] उस [चेष्टवृत्ति] को उत्पाद नहीं करती है तो वह कविका विषय ही नहीं हो सकती है ।[क्योंकि सांख्य, योग आदि दर्शनोंके सिद्धान्तमें

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कारिका ४२ ]

तृतीय उद्योतः

३११

वाङ्त्वं प्रतिपद्यते, 'अनत्तो विभाव्यतेन । चित्तश्रुतिविशेषा हि रसादयः ! न च तद्वस्ति वस्तु किंचिद् यन्न चित्रश्रुतिविशेषोऽपुपजनयति । तदनुत्पादने वा कविविषयतैव तस्य न स्यात् । कविविषयत्वे चित्रतया कदिचिद्रिरूप्यते । अत्रोच्यते । सत्यं न तात्कं काव्यप्रकारोऽस्ति यत्र रसादीनामप्रतीति:³ । किन्तु यदा रसभावादिविवक्षाशून्यः कविः शाब्दालङ्कारमर्थालङ्कारैर्वोपनिवन्धति तदा तद्विवक्षापेक्षया रसादिविवक्ष्यतार्थस्य परिकल्प्यते । विभाव्योपारुह्यैव हि काव्ये शाब्दालङ्कारः । वाच्यस्यास्पष्टार्थवशेन च कविविवक्षाविरहेsपि तथाविधे विषये रसादिप्रतीतिरपि भवति-

त्यनेनापि प्रकारेण नीरसत्वं परिकल्‍प्य चित्रविषयो व्यवस्थाप्यते । तदिदमुक्तम्—

रसभावादिविपयविवक्षाविरहे सति | अलङ्कारनिबन्धनो यः स चित्रविषयो मतः ॥ रसादिपु विवक्षा तु स्यात्तात्पर्यवती यदा । तदा नास्त्येव तत्काव्यं³ ध्वनेनैत्र' न गोचरः ॥

इन्द्रियप्रणालिका अध्यव्‍स्रोत्‍ आदि द्वारा चित्तका विषयके साथ सम्बन्ध होनेपर चित्तका अर्थाकार जो परिणाम होता है उसीको चित्तवृत्ति कहते हैं । और उसीसे पुरुषको बोध होता है । चित्तवृत्ति प्रमाण अर्थात् प्रमाणका साधनरूप होती है । और उससे पुरुषको जो बोध होता है वही प्रमा या उसका फल कहलाता है । इसीलो ज्ञान कहते हैं । इसलिये यदि चित्तवृत्ति उत्पन्न न हो तो उस पदार्थका ज्ञान ही नहीं हो सकता है । अतः वह कविका ज्ञानका विषय नहीं हो सकती है । कविका विषय [मूल] कोई पदार्थ ही चित्र [काव्य, कविकर्म] कहलाता है ।

[सिद्धान्तपक्ष] इसका उत्तर देते हैं—ठीक है, ऐसा कोई काव्यप्रकार नहीं है जिसमें रसादिकी प्रतीति न हो । किन्तु रस, भाव आदिकी विवक्षा से रहित कवि जब अर्थालङ्कार अथवा शाब्दालङ्कारकी रचना करता है तब उसकी विवक्षाकी दृष्टिसे

[काव्यमें] रसादिशून्यताकी कल्पना करते हैं । काव्यमें विवक्षित अर्थ ही शब्दका अर्थ होता है । उस प्रकारके [चित्रकाव्य] के विषयमें कविकी [रसादिविषयक] विवक्षा न होनेपर भी यदि रसादिकी प्रतीति होती है तो वह दुर्वच होती है । इसलिये भी उसकी नीरस मानकर चित्रकाव्यका विषय माना है । सो ऐसा होना भी है—

[काव्य] का विषय माना गया है । और जब रस, भाव आदिकी तात्पर्यरूप [प्रधानरूप] से विवक्षा हो तब यहा कोई काव्य नहीं हो सकता है जो ध्वनिका विषय न हो ।

१. 'अनत्तो' पाठ निअ० में नहीं है । २. 'रसादीना[म्‌]च[न‌]प्रतिपत्तिः' नि० । ३. 'यत्नु' वी० ।

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ध्वन्यालोकः

एतच्चित्रम्

विभिन्नकुलगिरां रसादितात्पर्यैमनपेक्ष्यैव काव्यप्रवृत्तिदर्शनेनादस्पामिः परिकलिप्तम् । इदानीन्तनानां तु न्याय्ये काव्यनयेऽव्यवस्थापने क्रियमाणे नास्त्येव ध्वनि-व्यतिरिक्तः काव्यप्रकारः । यतः परिपाकवतां कवीनां रसादितात्पर्यविरहेहैव्यापार एव न शोभते । रसादितात्पर्यैव नास्त्येव तद्रस्तु यद्भिमतरसाकाङ्क्षतां नीरमानं न प्रपुणीभवति । अचेतना अपि हि भावा यथायथसुचितरसविभावतया' चेतनवदन्तर्‌योजनया वा न संत्येव ते ये यान्ति न रसाकाङ्क्षिताम् ।

अपारे काव्यसंसारे कविरेकः प्रजापतिः । यथालमै रोचते विद्धं तथेदं परिवर्तते ॥ मृक्छागी चेतकवि: काव्ये जांतु रसमयं जगत्‌ । स एव वीतरागश्चेन्नीरसं सर्वमेव तत्‌ ॥ भावानचेतनानुपि चेतनवच्चेतनानचेतनवत्‌ । व्यवहारयति यथेष्टं सुकवि: काव्ये स्वतन्त्रतया ॥

विभिन्नकुल वाणीवालों कवियोंकी, रसादिमें तत्परताकी अपेक्षा किये बिना ही काव्य [रचनाकी] प्रकृति देखनेयोग्य ही हमने इस चित्र [काव्य] की कल्पना की है । उचित काव्यमार्गका निर्धारण कर दिये जानेपर [ध्वनिप्रस्थापनके बादके] आधुनिक कवियोंके लिये तो ध्वनिसे भिन्न और कोई काव्यप्रकार है ही नहीं । रसादितात्पर्यके बिना परिपाकवान कवियोंका व्यापार ही शोभित नहीं होता [यत्प्रकाशनि त्यजन्त्येव परिपुष्टिसहिणुता] । तं रसादन्यासनिष्णातः साक्षादपाकं प्रचक्षते ॥

रसादिको दृष्टिसे उचित शब्द और अर्थकी, जिसमें एक भी शब्दको इधर-उधर अथवा परिवर्तन करने का अवकाशा न हो—इस प्रकारकी रचनाका जिनको अभ्यास हो गया है वह कवि परिपाकयुक्त कवि होते हैं] । रसादि [में] तत्पर होनेपर तो कोई वस्तु ऐसी नहीं है जो अभिमत रसका अङ्ग न बनानepre चमक न उठे [प्रतिभागुणयुक्त न हो जाय] । अचेतन पदार्थ भी कोई ऐसे नहीं हैं जो कि ढङ्गसे, उचित रसके विभावरूपसे अथवा [उनके साध] चेतन व्यवहारके सम्बन्ध द्वारा रसका अङ्ग न बन सकें । जैसा कि कहा भी है—

अनन्त काव्यजगतमें [उसका निर्माता] केवल कवि ही एक प्रजापति [ब्रह्मा] है । उसे जैसा अच्छा लगता है यह चित्र उसी प्रकार बदल जाता है । यदि कवि रसिक [शृङ्गारप्रधान] है तो यह सारा जगत् रसमय हो जाता है और यदि वह वैरागी है तो यह सब ही नीरस हो जाता है । सुकवि [अपने] काव्यमें अचेतन पदार्थोंको भी चेतनके समान जैसा चाहता है वैसा व्यवहार कराता है ।

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ध्वन्यालोक

वृत्तीय उद्योतः

तस्माद्रस्ल्येव तद्रस्तु यस्सर्वोत्कृष्टना रसतात्मक्येऽतः कवेस्तदिच्छया तदनिमित्तरंसाज्जातां न घत्ते । तथोनिवन्ध्यमानं वा न चारुत्वाविशयं पुष्णाति सर्वमेव महाकवीनां काव्येपु हृदयते । अस्माभिरपि स्वेषु काव्यप्रबन्धेषु यथायथं दर्शितमेव । स्थिते चैवं सर्व एव काव्यप्रकारो न ध्वनिनिर्धर्मतामतिपतति । रसाद्यपेक्ष्यां कवेरगुणीरूढतयैक्य लक्षणोदपि प्रकारस्तदुक्त्वामवलम्ब्यते, इत्युक्तं प्राक्।

यदा तु चादृशु देवतास्तुतिषु वा रसादीना‌मकृत्वया व्यवस्थापनं, हृदयवतीषु च 'सप्‍रकगाथासु कासुचिद् व्यक्‍क्यविशिष्टवाच्यैः' प्राघान्यं तदपि गुणीरूढतयैक्य लक्षणोदपि प्रकारस्तदुक्त्वामवलम्ब्यते, इत्युक्तं प्राक्।

तदेवमिदानीन्तकविकाव्यनयोपदेशे क्रियामाणे प्राथमि कानामभ्यासार्धिनां यदि परं चित्रेण ब्यवहारः । प्रातिपरिणताना‌न्तु ध्वनिरेव काव्यसिद्धौ स्थितमेतत् ।

इसलिए पूर्णरूपसे रसमें तत्पर कविकी ऐसी कोई वस्तु नहीं हो सकती है जो उसकी इच्छासे उसके अभिमत रसका बाघ न वन जाय, अथवा इस प्रकार [रसाक्षतया] उपनिबद्ध होकर चारुत्वातिशयको पोषित न करे । यह सब कुछ, महाकवियोंके काव्योंमें वडिंगोचर होता है। हमने भी अपने काव्यप्रबन्धों ['विप्रलम्भलीला', 'अर्जुनचरित', 'देवीशतक' आदि]में उचितरूपसे दिखलाया है । इस प्रकार सर्व पदायोंका रसके साथ सम्वन्ध स्थित हो जानेपर [सर्व पद] कोई भी काव्यप्रकार ध्वनिरूपताका अतिक्रमण नहीं करता। कविको रसादिकी अपेक्षा होनेपर गुणीरूढतयैक्यरूप मेव भी इस [ध्वनि] का बाध वन जाता है, यह पहिले कह चुके हैं।

जब राजा आदिकी स्तुतियोंमें रसादिकी अकृत्रिमरूपसे [भावरूपसे] स्थित हों, और तादृशकी स्तुतियोंमें 'हृदयललिलया' नामसे प्रसिद्ध विद्वोप प्रकाशक] हृदयकती [नामक] सहृदयों की गोष्ठीमें 'सहृदया योग्यतां' इति लोचनम्] की किञ्चित् गाथाओंमें व्यवक्‍क्यविशिष्ट वाच्यमें प्राधान्य हो तब भी गुणीरूढतयैक्य, ध्वनिकी विशेप धारारूप ही होता है यह बात पहिले कह आये हैं [वृत्तिकारने सप्‍रकगाथा की जगह 'पटप्रकाश' पाठ मान्य है—धर्मार्थकाममोक्षेपु लोकतत्त्वारण्योरपि । पदतसु प्रभालिति वस्तुचैः पटप्रकाश रति संस्‍कृतः ॥ इति चित्रमण्डरोप] ।

इस प्रकार [ध्वननिके ही प्रधान होनेपर] आभ्यन्तर कवियोंके लिये काव्यनीतिके उपदेश [शिक्षण] करनेमें [स्थिति इस प्रकार है कि] केवल अभ्यासार्थी मले ही 'चित्रकाव्य' का च्यवहार कर लें, परन्तु परिपक [सिद्धहस्त] कवियोंके लिये तो ध्वनि ही [एकमात्र] काव्य है, यह सिद्ध हो गया ।

१. 'इत्युक्तं' नितो, दी० में नहीं है ।

२. 'सप्‍रकप्रादिगाथासु' नितो, 'पटप्रकप्रादिगाथासु' दी० ।

३. 'व्यक्त्यविशिष्टवाच्यैः' नितो, दी० ।

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ध्वनयालोक:

तदयमत्र संग्रहः-

यस्मिन् वसो वा भातो वा तात्पर्येण प्रकाशते । संवृत्याविहितं वस्तु यत्रालङ्कार एव वा ॥ काव्याध्वनि ध्वनिर्यत्र प्राधान्येनैकनियतध्वनिः । सर्वत्र तत्र विषयी रेयः सहृदयैर्जनेैः ॥४३॥ सगुणीभूतव्यङ्गयस्ते सा᳚लङ्कारेः सहृदयैः स्वैः । सङ्करसंस्तृटिष्व्यां पुनरप्युपोतते बहुधा ॥४४॥

तस्य च ध्वनेः स्वप्रभेदैः, गुणीभूतव्यङ्गयेन, वाच्यालङ्कारैरेव सङ्करसंस्तृटिषु-वस्त्वाद्यो᳚ क्रियामाणायां वहुप्रभेदत्वा लक्ष्ये इष्यते । तथा हि स्वप्रभेदस᳚ङ्घैः स्वप्रभेद-संस्तृशो गुणीभूतव्यङ्गय᳚स्यस᳚क्रीणो गुणीभूतव्यङ्गय᳚थ᳚संस्तृशो वाच्यालङ्कारान्तरसं᳚क्रीणां वाच्यालङ्कारान्तरसं᳚क्रीणां संसृष्टालङ्कारास᳚क्रीणः संसृष्टालङ्काराम᳚संप्रच्येति चहुधा ध्वानिः प्रकाशते ।

इसलिए इस विषयमें यह सरांश [संग्रह] हुआ-- जिस काव्य-मार्गमें रस अथवा भाव तात्पर्य [प्रधान] रूपसे प्रकाशित हों, अथवा जिसमें गोप्यमानरुपसे [कामिनी-कुचकलशावत् सौन्दर्योतिशयहेतुत्से] वस्तु अथवा अलङ्कार प्रकाशित हो, उन सयमें कवि᳚ल वृत्ति॰्यैक॰ प्राधान्य॰ कारण सहृदयजन, ध्वानिको विपयी [तोंनें प्रकारको ध्वानि जिसका विषय है ऐसा अथवा] प्रधान समझें॥४५॥

सङ्कर तथा संसृष्टि

अलङ्कारों सहित, गुणीभूतव्यङ्गय᳚त᳚के साथ, और अपने भेदोंके साथ सङ्कर तथा संसृष्टि [ध्वानि] फिर अनेक प्रकारका प्रकाशित होता है ॥४५॥

उस ध्वानिके अपने भेदोंके साथ, गुणीभूतव्यङ्गय᳚त᳚के साथ, और वाच्यालङ्कारोंके साथ, सङ्कर और संसृष्टि [तो या अधिक भेदोंकी परस्परनिर्पेक्ष स्वतन्त्र रूपसे एक जगह स्थितिको संसृष्टि कहते हैं । और अज्ञात्किभाव आदि रूपमें स्थिति होनेपर सङ्कर होता है । सङ्करके 'अज्ञात्किभावसङ्कर', 'पकारथानुप्रवेशालङ्कर' और 'सन्देहसङ्कर' ये तीन भेद होते हैं।] की व्यवस्था करनेपर लक्ष्य [काव्यों] में बहुत भेद दिखाई देते हैं । इस प्रकार—१. अपने भेदों [ध्वानिके मुख्य भेदों] के साथ सङ्कीर्ण [त्रिविध सङ्कर-युक्त], २. अपने भेदोंके साथ संशृङ्त [अनपेक्षतया स्थित], ३. गुणीभूतव्यङ्गय᳚त᳚के साथ सङ्कीर्ण, ४. गुणीभूतव्यङ्गय᳚त᳚के साथ संसृङ्त, ५. वाच्य अन्य अलङ्कारोंके साथ सङ्कीर्ण, ६. वाच्य अन्य अलङ्कारोंके साथ संसृङ्त इस रूपमें बहुत प्रकारका ध्वनि प्रकाशित होता है ।

१. 'संवृत्याविहितं' वा० प्रि० १ २. 'ध्वनेर्या᳚ङ्यप्राधान्या᳚नियतध्वनि:' नि०, टी० १

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लोचनकारके अनुसर ध्वनिके ३५ भेदोंकी गणना

लोचनकारने द्वितीय उद्योतकी ३१ वीं कारिका तथा तृतीय उद्योतकी इस तैंतीसवीं कारिकाकी स्वारस्य करते हुए दो तरह ध्वनिके प्रभेदोंकी गणना की है। पहली तरह 'एवं ध्वनेः प्रभेदान् प्रतिपाद्य' इस मूल ग्रन्थकी व्याख्या करते हुए ध्वनिके पैंतीस भेदोंकी गणना इस प्रकार की है—

"अविचक्षितवाच्यो विवक्षितान्यपरवाच्यश्चेति द्वौ मूलभेदौ। आद्यस्य द्वौ भेदौ, अत्यन्ततिरस्कृतवाच्योऽर्थान्तरसङ्क्रमितवाच्यश्च। द्वितीयो द्विविधः, शब्दशक्तिमूलोऽर्थशक्तिमूलश्च। पञ्चमस्मिन्नविच्छेदः कविप्रौढोक्तिकृतशरीरः, कविनिबद्धवक्त्रप्रौढोक्तिकृतशरीरः, स्वतःसम्भवी च। ते च प्रत्येकं व्यङ्ग्यव्यञ्जकभेदेन मेदनीयेन चतुर्धेति द्वादशविधोऽर्थशक्तिमूलः। आद्यौ शक्तितरो भेदाविति पोद्दश्य मूलभेदाः। ते च पदवाक्यप्रकाशितेन प्रत्येकं द्विविधा वाच्यन्ते। अलङ्क्यतत्स्थ तु वर्णपदवाक्यरूढसङ्कटनप्रायवचनप्रकाशयैवेन पक्वत्रिषद् भेदाः।"

अर्थात् ध्वनिके अविचक्षितवाच्य [लक्षणामूल] और विवक्षितान्यपरवाच्य [अभिधामूल] ये दो मूल भेद हैं। उनमेंसे प्रथम अर्थात् अविचक्षितवाच्यके अर्थान्तरसङ्क्रमितवाच्य और अत्यन्त-तिरस्कृतवाच्य ये दो भेद होते हैं। द्वितीय अर्थात् विवक्षितान्यपरवाच्य [अभिधामूल] ध्वनिके अभिधा-शक्तिमूल और संलक्ष्य क्रमव्यङ्ग्य ये दो भेद होते हैं। इनमेंसे प्रथम अर्थात् अलङ्क्ष्य क्रमव्यङ्ग्य [रसादिध्वनि] के अनन्त भेद हैं। इसलिये वह सब मिलाकर एक ही माना जाता है। दूसरे अर्थात् संलक्ष्य क्रमव्यङ्ग्यके शब्दशक्तिमूल और अर्थशक्तिमूल इस प्रकार दो भेद होते हैं। इनमेंसे अन्तिम अर्थात् अर्थशक्तिमूलके स्वतःसम्भवी, कविप्रौढोक्तिसिद्ध तथा कविनिबद्धवक्त्रप्रौढोक्तिसिद्ध ये तीन भेद होते हैं। इन तीनोंमेंसे प्रत्येक, व्यङ्ग्यव्यञ्जकभेदेन और वाच्यवाचकभेदेन उत्तमेद [रस्तु और अलङ्कार] नीतिसे चार भेद होकर कुल बारह प्रकारका अर्थशक्तिमूल ध्वनि होता है। इन बारह भेदोंमें पहले चार भेद अर्थात् अविवक्षितवाच्यके दो भेद, दूसरा अर्थात् अलङ्क्ष्य क्रमव्यङ्ग्य और चौथा शब्दशक्तिमूल भेद मिला देनेसे बारह और चार मिलाकर सोलह भेद हुए। यह सब पदगत और वाक्यगत होनेसे दो प्रकारके होकर ३२ भेद हुए। असंलक्ष्य क्रमव्यङ्ग्य पद और वाक्यगत अतिरिक्त रूप, रूढिमता तथा प्रबन्धमें भी प्रकाश्य होनेसे उसके तीन भेद और जुड़कर ध्वनिके कुल ३५ भेद हो जाते हैं। इनमें जहाँ 'व्यङ्ग्यव्यञ्जकयो-रुक्तभेदनयेन चतुर्धेति' लिखा है वहाँ कुछ पाठ भ्रष्ट हो गया जान पड़ता है।

काव्यप्रकाशकृत ५१ ध्वनिभेद

जहाँ लोचनकारने ध्वनिके कुल ३५ भेद माने हैं, वहाँ 'काव्यप्रकाश'ने ५१ गुद भेदोंकी गणना की है। उनकी गणनाका ढाँचा इस प्रकार है—

अविचक्षितवाच्यो यस्तत्र वाच्यं भवेद् ध्वनौ । अर्थन्तरे सङ्क्रमितमतलयं वा तिरस्कृतम् ॥ २४ ॥ विदक्षितान्यपरं वाच्यं यचापरस्तु ध्वनिः । कौत्स्थल्यलङ्क्ष्यक्रमविवक्षितोऽव्यवच्‍छेदक्रमः परः ॥ २५ ॥ रसभावतदभावभावाद्यादिरक्रमः । मित्रेा रसादलङ्कारादलङ्कार्यतथा स्त्रियः ॥ २६ ॥ अनुस्थानाभवसंलक्ष्य क्रमव्यङ्ग्यस्यतिस्थित स्त यः ॥ २७ ॥

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ध्वन्यालोक:

शब्दाथोंभयशक्यत्वस्यलल्षा स कवितो ध्वनि: | अलङ्कारोऽथ वस्त्वेव शब्दाद्यत्रावमासते ॥ ३८ ॥

प्रधानत्वेन स जेय: शब्दशक्त्युद्भवो दृशा | अर्थशक्त्युद्भवोऽप्यध्यों व्यङ्ग्य: सम्भवी स्वत: ॥ ३९ ॥

प्रौढोक्तिमात्रासिद्धो वा कवेसतेनोन्मिततस्य वा | वस्तु वालङ्कृकृतिवेंति पद्मेदोऽङ्गौ ध्यानक्ती यतत् ॥ ४० ॥

वस्त्वलङ्कारमथवा तेनायं द्वादशात्मक: |

शब्दाथोंभयशक्योऽपि:; मेदा अष्टादशास्य वतत् ॥ ४१ ॥

रसादीनामनन्तलावाद् मेद एको हि गण्यते ।

अर्थात् अविवक्षितवाच्यमें अर्थान्तरसङ्क्रमितवाच्य के तथा अलन्ततिरसकृतवाच्य के ये दो मेद उभयशक्यस्य एक मेद और अन्नरङ्क्षक्रमध्यङ्ग्यका एक मेद, इस प्रकार विवक्षितान्यपरवाच्यके २+१=३, तथा अविवक्षितवाच्यके दो, कुल मिलाकर आठारह मेद हुए ।

वाक्ये दृश्यत्थ:; पदेऽप्यन्ये, प्रबन्धगतेऽप्यर्थशक्तिभू: ॥ ४२ ॥ पदैकदेशरचनावोंश्वपि रसादय: |

मेदास्तदेकपदाश्रित........ || ४३ ||

अर्थात् ऊपर जो १८ मेद दिखलाये ये उनमेंसे उभयशक्यस्युभेद केवल पदमें होनेसे एक, और दोष सङ्ग्रह मेद पद तथा वाक्यमें होनेसे ३४ और अर्थशक्त्युद्भवके बारह मेद प्रबन्धगत मी होनेसे बारह और मिलकर १+३४+१२=४७ और रसादि असङ्ख्याक्रमके १. पदकदेक्श, २. रचना, ३. वर्ण, तथा आपि शब्दसे ४. प्रबन्धगत चार मेद और मिलाकर ४७+४=५१ मेद होते हैं । साहित्यदर्पणादिमें भी यही ५१ मेद प्रकारान्तरसे दिखलाये हैं । 'साहित्यदर्पण' के मेदोंका वह प्रकार हम इस उद्योतके प्रारम्भमें दिलला चुके हैं ।

'लोचन' तथा 'काव्यप्रकाश'के मेदोंकी तुलना

ऊपर दिये हुये विवरणके अनुसार 'लोचन'में ध्वनिके कुल ३५ मेद दिखलाये हैं और 'काव्यप्रकाश' तथा 'साहित्यदर्पण' आदिमें उनके स्थानपर ५१ मेद दिखलाये गये हैं । इस प्रकार 'लोचन' तथा 'काव्यप्रकाश' आदिके मेदोंमें १६ मेदोंका अन्तर है । अर्थात् 'काव्यप्रकाश' आदिमें 'लोचन'से छः मेद अधिक दिखलाये गये हैं । यह छःहों मेदोंका अन्तर विवक्षितान्यपरवाच्यके अर्थात् अभिधामूल ध्वनिके मेदोंमें ही हुआ है । जिनमें मुखय मेद तो अर्थशक्त्युद्भव ध्वनिके मेदोंमें है । लोचनकारने अर्थशक्त्युद्भव ध्वनिके बारह मेद दिखलाकर फिर उनके पद और वाक्यगत मेद

दिखलाये हैं । इस प्रकार अर्थशक्त्युद्भव ध्वनिके २४ मेद हो जाते हैं । काव्यप्रकाशकारने पद और वाक्यके अतिरिक्त प्रबन्धमें मी अर्थशक्त्युद्भवके बारह मेद माने हैं जो लोचनकारने नहीं दिललाये । इस प्रकार 'लोचन'के मतसे अर्थशक्त्युद्भवके २४ मेद और 'काव्यप्रकाश' के अनुसार ३६ मेद होते हैं । अर्थात् बारह मेदोंका अन्तर तो इसमें है । इसके अतिरिक्त ध्वनिके केवल पदगत तथा वाक्यगत ये दो मेद किये हैं, वस्तु और अलङ्कारके मेदसे मेद नहीं किये हैं । 'काव्यप्रकाश' में शब्दशक्त्युद्भवके वस्तु और अलङ्कारव्यङ्ग्यके मेदसे दो मेद करके फिर उनके पदगत तथा वाक्यगत मेद किये गये हैं । अतः काव्यप्रकाशमें ध्वनिके चार मेद होते

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कारिका ४५ ]

तृतीय उद्योतः

३१०

हैं और लोचनमें केवल दो भेद । अतः दो भेदोंका अन्तर यहाँ आता है । इसके अतिरिक्त 'लोचन' में उभयशक्त्युत्थ नामका कोई भेद परिगणित नहीं किया है । 'काव्यप्रकाश' में उभयशक्त्युत्थको भी एक भेद माना है । इसलिये 'काव्यप्रकाश' में एक भेद यह बढ़ जाता है । इस प्रकार ध्वनिध्वन्युत्तम- में वस्तु तथा अलङ्कारके दो भेद, अर्थशक्त्युत्थमें प्रवन्धगत वारह भेद और उभयशक्त्युत्थका एक भेद यह सब मिलकर १५ भेद तो संलक्ष्यत्रमव्यङ्गचके अन्तर्गत 'काव्यप्रकाश' में अधिक दिखलाये हैं और शोलहवाँ भेद असंलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्यकी गणनामें अधिक है । असंलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य रसादिव्यञ्जनिका जैसे 'लोचन' तथा 'काव्यप्रकाश' दोनों जगह एक ही भेद माना है । परन्तु 'लोचन' में उस असंलक्ष्य-क्रमव्यङ्गचके ९ पद, २. वाक्य, ३. वर्ण, ४. संहितुना तथा ५. प्रवन्धमें व्यङ्गच इन्होंने पांच भेद माने हैं । 'काव्यप्रकाश' में इन पाँचोंके अतिरिक्त पदैकदेश अभूत प्रकृति-प्रत्यादिगत एक भेद और माना है । अतः 'काव्यप्रकाश' में असंलक्ष्यक्रमव्यङ्गचके भेदोंमें भी एक भेद अधिक होनेसे 'लोचन' की अपेक्षा कुल सोलह भेद अधिक हो जाते हैं । इसलिये जहाँ 'लोचन' में ध्वनिके शुद्ध ३५ भेद दिखलाये हैं, वहाँ 'काव्यप्रकाश' में ध्वनिके शुद्ध ५१ भेद दिखलाये गये हैं ।

संस्कृति तथा सकीरमेदसे लोचनकारकी गणना

न केवल इन शुद्ध भेदोंकी गणनामें ही यह अन्तर पाया जाता है । अपितु उन शुद्ध भेदोंका संस्कृति तथा सकीरमेदसे जब आगे विस्तार किया जाता है तो उम विस्तारमें भी साहित्यशास्त्रके विविध ग्रन्थोंमें अत्यन्त महास्पूर्ण भेद पाया जाता है । लोचनकारने गुणीभूतव्यङ्गच, अलङ्कार तथा ध्वनिके अपने भेदोंके साथ संस्कृति तथा सकीरसे ध्वनिके ७४२० भेद दिखलाये हैं । काव्यप्रकाशकारने केवल ध्वनिके एक्योनि शुद्ध भेदोंकी संख्या १०८० दिखलाये हैं । और साहित्यदर्पणकारने सकीर तथा संस्कृतिसहित ५३०४ और उनमें ५१ शुद्ध भेदोंको जोड़कर १०८५५ भेद दिखलाये हैं । और साहित्यदर्पणकारने सकीर तथा संस्कृतिसहित ५३०४ तथा ५१ शुद्ध भेदोंको जोड़कर ५३५५ भेद दिखलाये हैं ।

पूर्व ये पञ्चनिष्ठाद्द्वै उदयास्ते गुणीभूतव्यङ्गचस्यापि मन्तव्या: स्वप्रभेदास्त्ववन्त: । अलङ्कार दूत्येकसत्ततिं संश्रय्य च गुणने द्वे जाते चतुर्थश्लोयधिके [२८४]। तावत्त पञ्चनिष्ठतो मुख्या भेदा: सप्त वहस्राणि चत्वारि शतानि विशत्यधिकानि [७४२०] भवन्ति ।

— लोचन० उद्योत ३, का० ४३

मेदास्तदेकपञ्चाशन् तेभ्यां चान्योन्यवोजने । सकूरे त्रिरुपेण संसृष्ट्या चैकरुपया ॥ वेदाक्षाधिविधचन्द्रन्र: [१०८०५] शरेङ्गुपगणितदश: ।

—काव्यप्रकाश, सूल ६२, ५५

तद्वे मेकपञ्चाशान्द्वैस्तस्तस्य चैकत: सदृशं त्रिरुपेण संसृष्ट्या चैकरुपया ।। वेदाक्षामिन्दुना [५३०४] शुद्धैरियुत्वान्निगणितक: [५३५५] ।

—साहित्यदर्पण, चतुर्थ परिच्छेद, १२

इन तीनोंमें यद्यपि लोचनकार सदृशे अधिक प्राचीन और सबसे अधिक आंनक प्रामाणिक है, परन्तु इस विषयमें उनकी गणना सदृशे अधिक चिन्त्य है । उन्होंने ध्वनिके शुद्ध ३५ भेद, उतने ही [३५ हैं] गुणीभूतव्यङ्गचके और अलङ्कारोंका मिलाकर एक भेद, इस प्रकार कुल ७१ भेदोंकी संसृष्टि तथा सदूर दिखलानेके हेतु ७१ को चारमें गुणाकर ७१ × ४ = २८४ भेद किये । और उनको फिर

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ध्वन्यालोक:

लोचनकार

काव्यप्रकाशकार

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तृतीय उद्योतः

निकाली गयी है उसमें दोनों ग्रन्थोंमें बहुत भेद है । 'काव्यप्रकाश'में संसृष्टिसंकरकृत भेदोंकी संख्या १०७०४ तथा 'साहित्यदर्पण'में ५३०४ संख्या दी गयी है । इस संख्यामेदका कारण वस्तुतः गणना-शैलियोंका भेद है । 'साहित्यदर्पण'ने 'सङ्कुलनप्रक्रिया'चे और 'काव्यप्रकाश'ने 'गुणनप्रक्रिया'चे भेदोंकी गणना की है । इसीलिए इन दोनोंमें संख्याका इतना भेद आता है ।

'काव्यप्रकाश'की गुणनप्रक्रिया

इसका अभिप्राय यह है कि छत्तीस ४९ मेदोंमें से प्रत्येक मेदके साथ संख्या करते समय प्रत्येक भेदका एक अपने सजातीय और पच्चास विजातीय मेदोंके साथ मिश्रण हो सकता है । उदाहरणके लिये अर्थान्तरसङ्क्रमितवाच्यभानिके उसी उदाहरणमें दूसरे अर्थान्तरसङ्क्रमितवाच्यभानिके भी निर-पेक्षतया स्थिति हो सकती है । उस दशामें 'मिश्रणपेक्षावैगां स्थिति: संसूच्यते तु ।' एक उदाहरणमें दो जगह अर्थान्तरसङ्क्रमितवाच्यभानिके रहनेसे उनकी सृष्टि हो सकती है । यह तो सजातीय भेदके साथ संसृष्टि हुई । इसी प्रकार उनकी पच्चास अन्य भेदोंके साथ जो संसृष्टि होगी, वह विजातीय भेदोंकी संसृष्टि कहलायेगी । इस प्रकार एक भेदके संसृष्टि+अन्य इत्यादि भेद हो सकते हैं ।

ध्यानके शुद्ध इत्यादि भेदोंमेंसे प्रत्येकके ये इत्यादि भेद हो सकते हैं । परन्तु उन सबका योग क्या होगा । इस प्रश्नपर जब विचार करते हैं तब वहां सङ्कलन और गुणनकी प्रक्रियाओंका भेद उपस्थित होता है । साधारणतः इत्यादि भेदोंमेंसे प्रत्येकके इत्यादि भेद होते हैं इसीलिए इत्यादि भेदका इत्यादि भेद गुणा कर देनेपर ४९×४९=२४०१ भेद संसृष्टिजन्य हो सकते हैं । यह परिणाम 'गुणनप्रक्रिया'से निकल सकता है । इसीलिए यहां हमने 'गुणनप्रक्रिया' कहा है । इस संख्याके अतिरिक्त १. अज्ञातक्रियासङ्कर, २. सन्देहसङ्कर और ३. एकाश्रयानुप्रवेशसङ्कर यह तीन प्रकारका सङ्कर भी हो सकता है । इसलिए इसके तीन गुणने अर्थात् २४०१×३=७२०३ सङ्कर-कृत

भेद हो सकते हैं । संसृष्टि तथा सङ्कर-कृत इन कुल भेदोंको जोड़ देनेसे २४०१+७२०३=१०७०४ भेद होते हैं । यही संख्या 'काव्यप्रकाश'में ध्वनिभेदोंकी दी है । इससे ४९ शुद्ध भेदोंको और जोड़ देनेसे १०४९९ भेद काव्यप्रकाशके अनुसार हो जाते हैं । इस प्रक्रियामें संसृष्टिके भेद उदाहरणके लिये इत्यादि इत्यादि भेदका गुणा किया गया है इसलिए हमने इस प्रक्रियाको 'गुणनप्रक्रिया' कहा है और 'काव्यप्रकाश'ने इस गुणनप्रक्रियाको ही यहां अपनाया है ।

'काव्यप्रकाश'में सङ्कुलनप्रक्रिया

यहां ध्वनिभेदोंकी गणनमें काव्यप्रकाशकारने 'गुणनप्रक्रिया'का अवलम्बन किया है । परन्तु 'काव्यप्रकाश'के दशम उल्लासमें विरोधालङ्कारके प्रकरणमें उन्होंने इसको भिन्न प्रक्रियाका अवलम्बन किया है ।

जातिस्तद्भ्रंशजांत्या द्वविरोधा सविभः । क्रिया द्व्यस्यामपि द्रव्यं द्रव्येप्येति ते दश ॥

इसका अभिप्राय यह है कि १. जाति, २. गुण, ३. क्रिया और ४. द्रव्य इन चारोंका फलस्वर विरोधवर्णन करनेपर विरोधालङ्कार होता है और उसके दस भेद होते हैं । शाब्दरम्भः वाचिक क्रिया द्वार्यामपि द्रव्यं द्रव्येप्येति ते दश । जाति आदिके चारोंके साथ विरोध हो सकता है । इसलिए उसके विरोधालङ्कारके चार भेद हुए, एक सजातीयके साथ और तीन विजातीयके साथ । इस प्रकार गुणका भी एक सजातीय और तीन विजातीयके साथ विरोध होकर चार भेद हो सकते हैं । इसी प्रकार क्रिया और द्रव्यके भी चार-चार

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ध्वन्यालोक

आचार्य आनन्दवर्धन

डॉ. महावीर सरन जैन

मोटी लाल बनारसी दास

मेद हो सकते हैं। इसलिए यदि ध्वनिस्थलवाली ‘गुणनप्रक्रिया’का अवलम्बन किया जाय तो वाच्यो श्री चार और चकारा गुणाकरके विरोधके शोलह मेद होने चाहिये। परन्तु काव्यप्रकाशकारने यहाँ केवल दस मेद माने हैं। और उनका परिगणन इस प्रकार किया है कि यद्यपि चारोंके चार-चार मेद ही होते हैं परन्तु जातिका गुणके साथ जो विरोध है उसकी गणना जातिविरोधवाले चार मेदोंमें या चुकी है। इसलिए गुणके जातिके साथ मेदकी गणनाओंमें विवादमान उस मेदको सबका हिसाब करते समय कम कर देना चाहिये। अन्यथा वह एक मेद दो जगह जुड़ जानेभे संख्या ठीक नहीं रहेगी। इसकिये जातिके विरोधके चार मेद होंगे परन्तु राणके विरोधमें तीन ही मेद रह जायेंगे। क्योंकि एक मेदकी गणना पहिले आ चुकी है। इसी प्रकार क्रियाविरोधके मेदमें एक और कम होकर दो और द्रव्यके विरोधके मेदोंमें कमशः एक और कम होकर केवल एक ही मेद गणनायोग्य रह जायगा। इसलिये विरोधके मेदोंकी कुल संख्या जाननेके लिये चार और चकार गुण नहीं करना चाहिये अपितु एकके लेकर चारतककी संख्याओंको जोड़ना चाहिये। क्योंकि जातिकें ४, गुणके ३, क्रियाके २ और द्रव्यका १ मेद ही गणनाओं सम्मिलित होने योंन्य रह जाता है। अतएव एकके लेकर चारतक जोड़ देनेसे विरोधके १० मेद होते हैं। इस प्रकार विरोध अलङ्कारके दस मेद होते हैं। इस प्रक्रियामें एकके लेकर चारतकका सङ्कुलन या जोड़ किया गया है। इसलिये इस प्रकारको हमने ‘सङ्कुलनप्रक्रिया’ कहा है।

'साहित्यदर्पण'की सङ्कुलनप्रक्रियाकी शैली

साहित्यदर्पणकारने ध्वनिप्रभेदोंकी गणनाओंमें इसी सङ्कुलनप्रक्रियावाली शैलीका अवलम्बन किया है। ध्वनिके मुख्य मेद तो ‘काव्यप्रकाश’ तथा ‘साहित्यदर्पण’ दोनोंमें इष्टमान हैं। परन्तु उनके सङ्कृष्ट तथा सङ्कुलित मेदोंकी संख्याओंमें बहुत अधिक अन्तर हो गया है। इसका कारण यही गुणन तथा सङ्कुलनप्रक्रियावाली शैलियोंका मेद हैं। काव्यप्रकाशकारने विरोधालङ्कारके स्थलमें जिस शैलीका अवलम्बन किया है, साहित्यदर्पणकारने ध्वनिप्रभेदोंकी गणनाओंमें उसी शैलीका अवलम्बन किया है। इस प्रक्रियाके अनुसार ध्वनिके प्रथम मेदकी एक सजातीय और पञ्चाशत् विजातीय मेदोंके साथ मिल सकनेसे ५१ प्रक्रतकी सृष्टि होगी। इसी प्रकार दूसरे मेदकी भी ५१ प्रक्रतकी सृष्टि होगी। परन्तु उनमेंसे एककी गणना पहिले मेदके साथ हो चुकी है। इसलिए दूसरे मेदकी केवल ५० प्रक्रतकी सृष्टि परिगणनीय रह जायगी। इसी प्रकार तीसरे मेदकी ४९, चौथे मेदकी ४८ इत्यादि कमसे एक-एक घटते-घटते अन्तिम मेदकी केवल एक प्रक्रतकी सृष्टि गणनायोग्य रह जायगी। इसलिये सृष्टिके कुल मेदोंकी संख्या जाननेके लिये इक्यावनके इक्यावन गुणा न करके एकके लेकर इक्यावनतककी संख्याओंको जोड़ना उचित है। साहित्यदर्पणकारने एकके इक्यावनकी संख्याओंको जोड़कर ही १३२६ प्रक्रतकी सृष्टि और उससे तिगुने १३२६ × ३ = ३९७८ सङ्कृष्टमेदोंको जोड़कर यह १३२६ + ३९७८ = ५३०४ संख्या निकाली है। इसलिये 'साहित्यदर्पण'की सङ्कुलनको लघु प्रक्रिया

सङ्कुलनप्रक्रियाके अनुुसार एकके लेकर इक्यावनतककी संख्याओंको जोड़नेके लिये गणितशास्त्रकी प्राचीन संस्कृत पुस्तक 'लीलावती' में एक विशेष प्रकार दिया है—

एको राधिकाऽस्थाप्य एकमेकाधिकं कुरुः। समाधेनासमो गुण्य पतत्कुलिते कृतम् ॥

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कारिका ३५ ]

द्वितीय उद्योतः

३२१

अर्थात् एकसे लेकर यहाँतक जोड़ करना है। उस अन्तिम राशिको दो जगह लिख लो, और उनमेंसे एक संख्यामें एक और जोड़ दो। ऐसा करनेसे एक संख्या सम हो जायगी और एक विषम। इनमें जो सम संख्या हो उसका आधा करके उससे विपम संख्याको गुणा कर दो। जैसे यहाँ एकमे लेकर इत्यावनतक जोड़ना है तो एक जगह इत्यावन और दूसरी जगह उसमें एक जोड़ कर भावन लिखा जाय। इसमें भावन संख्या सम है इसलिए उसका आधा कर छेदमें विपम संख्या इत्यावनको गुणा कर देनेसे ५१ × २६ = १३२६ संख्या आती है। यही एकसे लेकर इत्यावनतकका जोड़ होगा। इसीको गुणा कर देनेसे ५३२६ × ५ = ६६३० संख्या तथा सङ्कीर्णवते भेद हुए और उनमें ५१ शुद्ध भेदोंको मिला देनेसे 'साहित्यदर्पण'के मतानुसार ध्वनिके ५३८९ भेद होते हैं।

इस प्रकार 'काव्यप्रकाश' तथा 'साहित्यदर्पण'में ध्वनिभेदोंकी गणनामें जो यह भेद पाया जाता है इसका कारण दोनों जगह अपनायी गयी गुणनप्रक्रिया और शक्कलनप्रक्रियावाली शैलियोंका भेद है, यह स्पष्ट हो गया।

'काव्यप्रकाश'की द्विविध शैलीका कारण

'काव्यप्रकाश' और 'साहित्यदर्पण'में ध्वनिके भेदोंकी संख्यामें जो अन्तर पाया जाता है उसका कारण ज्ञात हो जानपर भी एक प्रश्न यह रह जाता है कि काव्यप्रकाशकारने ध्वनि तथा विरोधालङ्कारकी गणनाके प्रसङ्गमें अलग अलग दो शैलियोंका अवलम्बन क्यों किया? साधारणतः विरोधालङ्कारके स्पष्टीकरण में उन्होंने जो 'शकुन्तलाप्रक्रिया'का अवलम्बन किया है वही उक्त प्रतोत होता है। उसके अनुसार ध्वनिभेदोंकी गणना यहाँ होकरनी चाहिए थी। जैसे 'साहित्यदर्पण'में की गयी है। परन्तु काव्यप्रकाशकारने ध्वनिके प्रसङ्गों में उस शैलीका अवलम्बन नहीं किया है। यद्यपि उन्होंने इस भेदका कोई कारण स्वयं नहीं दिया है परन्तु उनके टीकाकारोंने उसकी सङ्केति स्पष्ट करनेका प्रयत्न किया है।

ऊपर यह दिखलाया था कि ध्वनिके ५१ शुद्ध भेदोंमेंसे प्रत्येकके इत्यावन प्रकारकी संृष्टे हो सकती है। परन्तु गणनाका योग करते समय प्रत्येक भेदके इत्यावन प्रकारके बाद दूसरे भेदके ५० प्रकार ही माने जायेंगे क्योंकि दूसरे भेदके साथ प्रथम भेदकी जो संृष्टि होगी उसकी गणना तो प्रथम भेदकी गणनामें ही आ चुकी है। इसी प्रकार अगले भेदोंमें एक-एक संख्या घटते-घटते अन्तिम भेदकी केवल एक ही प्रकारकी संृष्टि गणनायोग्य रह जायगी। इसलिए शक्कलनप्रक्रियावाली शैलीमें एकसे लेकर इत्यावनतकका जोड़ किया जाता है। परन्तु गुणनप्रक्रियावाली शैलियोंमें एक-एक भेद घटते-बढ़ते क्रम नहीं रहता है। उसमें प्रत्येक भेदकी इत्यावन प्रकारकी ही संृष्टि होती है। इसलिए ५१से ५१का गुणा ही किया जाता है। गुणनप्रक्रियामें जो एक एक भेदको घटाया नहीं जाता है इसका कारण उन संृष्टियोंमें वैजात्यकी कल्पना है। अर्थान्तरसङ्क्रमितवाच्यके साथ जो संृष्टि है वह इन दोनोंके भेदोंमें आयेगी। इसलिए शक्कलनप्रक्रियामें उसको केवल एक ही जगह सम्मिलित किया जाता है। परन्तु यह भी हो सकता है कि अर्थान्तरसङ्क्रमितवाच्यकी अत्यन्ततिरस्कृतवाच्यके साथ जो संृष्टि हो वह अत्यन्ततिरस्कृतवाच्यके साथ अर्थान्तरसङ्क्रमितवाच्यकी संृष्टिसे भिन्न प्रकारकी हो। एकमें अर्थान्तरसङ्क्रमितका और दूसरमें अत्यन्ततिरस्कृतका प्राधान्य होनेसे वह दोनों संृष्टियाँ अलग-अलग ही हों। इसलिए उन दोनोंकी ही गणना होना आवश्यक है। अतः उसको छोड़नेकी आवश्यकता नहीं है। ऐसा मानकर ही कदाचित् काव्यप्रकाशकारने ध्वनिभेदोंमेंसे प्रत्येकके ५१ संृष्टिप्रकार माने हैं। और उनका

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ध्वन्यालोक:

तत्र स्वप्रभेदसङ्घीर्णत्वं कदाचिदतुमात्रानुमात्रकभावेन, यथा ‘एवं वादिनि देवर्षौ’ इत्यादौ । अत्र व्यर्थशब्द्युद्बुबुत्सुरणरूपपश्यद्ध य ध्वनिप्रभेदनालक्ष्यक्रमध्यगत् यध्वनिप्रभेदोऽ-

नुगृक्षमाणः प्रवर्त्तीयते । एवं कदाचित्प्रभेदद्वयसम्पातसन्नदेहन यथा— स्वणपाहुणिआ देवर् एस जाइए किंपि ते भणिदा । कहाणु पडोहरवड्ढहोविराम्भि अणुणिज्जड वराइ ॥

[क्षणप्राधान्यिका देवर् एपा जायया किमपि ते भणता । रोदिति शून्यवलब्भो गृहे जणुनियतां वराकी ॥इति च्छाया]

अत्र ध्वननीयतातिमित्येतत् पदमर्थान्तरसंस्कृक्रमितवाच्यत्वेन विवक्षितानन्यपरवाच्यत्वेन च सम्भाव्यते । न चान्यतरपक्षनिर्णये प्रमाणमस्ति ।

गुणा कर ५१ × ५१ = २६०१ संसृष्टिके तथा उससे तिगुने २६०१ × ३ = ७८०३ सक्करमेदोंको मिलाकर २६०१ + ७८०३ = १०४०४ संसृष्टिड़क्कत् मेदोंमाने हैं ।

टीकाकारोंने 'काव्यप्रकाश'की गुणनप्रक्रियाके समर्थनके लिए यह एक प्रकार दिखलाया है । उससे यहींकी गुणनप्रक्रियावाली दौहिका समर्थन तो कथचित् हो जाता है । परन्तु विरोधालङ्कारवाले स्थल्म भी इसी प्रक्रिकार वजायत् क्यों नहीं माना, इसका कोई विनिगमक हत्थ् नहीं दिया है । इसलिए मूल शाङ्काका निवारण नहीं हो पाता है ।

उनमेंसे अपने मेदोंके साथ सक्कर् [तीन प्रकारसे होता है] जिसमें पहिला प्रकार] कमी अनुग्राह्य-अनुप्राहकभावसे [होता है] जैसे ‘एवं वादिनि देवर्षौ’ [पृष्ठ १३२] इत्यादिमें । यहाँ अर्थशक्युद्भुत् 'संलक्ष्यक्रमध्यगत् य' [रूज्या तथा अवहित्थया] मेदसे असंलक्ष्यक्रमध्यगत् य [अभिलापहेतुक् विप्रलम्भभृङ्गार] अनुग्रुण्यमान [पोष्यमाण]

प्रतीत होता है । [रूज्या यहाँ व्यभिचारिभावरूपसे प्रतीत हो रही है । इसलिये भाव-रूप न होनेसे संलक्ष्यक्रमन्यगत् य है । और यह अभिलापहेतुक् विप्रलम्भभृङ्गारका पोषण कर रही है । इस प्रकार यहाँ अज्ञात् िभावसक्कर् है ।]

कमी दो मेदोंके या जानेसे सद्देहहैसे [सन्देहसक्कर् हो जाता है] जैसे— हे देव्, तुम्हारी पत्निने [क्षण] उत्सवकी पाहणी [व्रतकथा, उत्सवमें आशी हुदै]

उससे कुछ कह दिया है [जिससे] वह शून्य वल्भीगृहमें रो रही है । उस विचारोंको मना ठेना चादिये ।

यहाँ ‘अजुनियतां’ यह पद [उपमोगप्रकर्षमूचककरूप प्रयोजनसे, तात्पर्यगत् उपपत्तिमूलक् लक्षणा द्वारा] अर्थान्तरसंस्कृक्रमितवाच्य [रूप अविवक्षितवाच्य तथा रोदिन-

वृत्तिजनक् व्यापाररूप अजुनय अभिधा द्वारा बोधित होनेसे] और विवक्षितानन्यपरत्- वाच्ये [व्यनि दोनों] रूपसे सम्भवव है । और [दोनों ही पक्षोंमें उपमोग व्यकृृ्य होनेसे]

किसी पक्षमें निर्णय करनेमें कोर्इ [विनिगमक] प्रमाण नहीं है [अतः यहाँ सन्देह सक्कर् है] ।

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ध्वन्यालोक

आचार्य आनन्दवर्धन

महामहोपाध्याय डा० रेवा प्रसाद द्विवेदी

मोतीलाल बनारसीदास

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ध्वन्यालोकः

आचार्य आनन्दवर्धन

महामहोपाध्याय डॉ० श्यामदेव शास्त्री

मोतीलाल बनारसीदास

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कारिका ४५ ] वृतीय उद्योतः ३२५

अथ एत च पदाथाश्रयत्वे गुणीभूतव्यङ्ग्यस्य, वाक्याथाश्रयत्वे च ध्वने: सङ्कीर्णतायामपि' न विरोध: स्वप्रभेदान्तरत्वात् । यथा हि ध्वनिप्रभेदान्तराणि परस्परं सङ्कीर्णयन्ते, पदाथौवाक्याथाश्रयत्वेन च न विरुध्यते ।

इन इलोकोंमें गुणीभूतव्यङ्गच और ध्वनि अर्थात् प्रधानव्यङ्गचका [ विविध ] सङ्कर दिखलाया है । इसमें यह शङ्का हो सकती है कि एक ही इलोकमें अभिव्यक्त होनेवाला व्यङ्गच्य अर्थ प्रधान ध्वनिरूप भी रहे और गुणीभूतव्यङ्गच भी वन जाय यह कैसे हो सकता है ? आगे इसका समाधान करते हैं । समाधानका आधार यह है कि गुणीभूतव्यङ्गच पदोंमें रहता है और ध्वनि या प्रधान व्यङ्गच वाक्यमें रहता है । अतः उन दोनोंका आश्रयभेद जाननेसे उनमें कोई विरोध नहीं होता है ।

इसीलिए [उदाहरणोंमें ध्वनि और गुणीभूतव्यङ्गच्य दोनोंके एक साथ पाये जाननेसे] ध्वनिके अपने प्रभेदोंके समान, गुणीभूतव्यङ्गच्यको पदार्थमें आक्षित और ध्वनिको वाक्यार्थमें आक्षित माननेपर [उनका] सङ्कर होनेपर भी कोई विरोध नहीं आता । जैसे ध्वनिके अन्य प्रभेदोंका परस्पर सङ्कर होता है और [एकके] पदाथौ और गुणीभूतव्यङ्गच्यको भी कमशः वाक्यार्थ और पदार्थमें आक्षित माननेसे उनके सङ्करमें कोई विरोध नहीं होता]।

यहाँ किसी पुस्तकमें 'तयाहि' पाठ मिलता है और किसीमें 'यथाहि' । यह पाठभेद लोचनकारके समयमें भी था । और वे स्त्रयं भी ठीक पाठका निश्चय नहीं कर सके, इसलिए उन्होंने "तदेव याचष्टे यथाह्हीति । तथाहि इति वा पाठ: |" यह लिखा है । अर्थात् यदि 'तथाहि' यह पाठ माना जाय तव तो 'तथा अत्रापि' इतने पदका अध्याहार करना चाहिये । अथवा फिर 'तयाहि' यह पाठ होना चाहिये । इसकें प्रतीत होता है कि लोचनकारको 'यथाहि' पाठ ही मिला था । और 'तयाहि' पाठका उनका' सुझाव है । कदाचित्

ध्वनि और गुणीभूतव्यङ्गच्यको कमशः वाक्याश्रित और पदाश्रित मानकर उन दोनोंके सङ्करका जो उपपादन ऊपर किया है वह 'अज्ञात्विभावसङ्कर' और 'सन्देहसङ्कर'में तो ठीक हो जाता है, परन्तु 'एकाश्रयानुप्रवेशसङ्कर'में तो दोनोंका एक ही आश्रय होगा अतएव आधयभेदश्व ध्वनि और गुणीभूतव्यङ्गच्यकी सङ्घटना जो अविरोध निर्णय किया था, वह वहाँ लागू नहीं हो सकेगा । क्योंकि एकाश्रयमें ध्वनि और गुणीभूतव्यङ्गच्य दोनों कैसे रह सकेंगे ? यह शङ्का है, इसका समाधान आगे करते हैं । समाधानका आधार यह है कि पहिल्या परिहार व्यङ्गचभेदसे किया था, उसी प्रकार यहाँ वाक्याथौमेदसे परिहार हो सकता है । अर्थात् एकाश्रयमें रहनेवाले दो अलग-अलग व्यङ्गच्य हैं, एक प्रधान ध्वनिरूप और दूसरा गुणीभूत । ये दोनों मिल-बिल व्यङ्गच्य एक जगह रह सकते हैं । इसमें कोई विरोध नहीं है । यदि एक ही व्यङ्गच्यका ध्वनि और उसीको गुणीभूत कहा जाय, तव तो विरोध होगा । परन्तु दोनों व्यङ्गच्योके भिन्न होनेसे विरोध नहीं है । यह समाधान 'एकाश्रयानुप्रवेशसङ्कर'में प्रतीत होनेवाले विरोषका परिहार तो करता ही है, उसके द्वारा 'अज्ञात्विभाव' और 'सन्देहसङ्कर'में भी लागू हो सकता है । क्योंकि उन दोनों मेदोंमें भी व्यङ्गच्य अलग-

१. 'सङ्कीर्णातायामविरोध:' नो, वी० ।

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ध्वन्यालोक:

किंत्रै कतिपयैः शाब्दयत्वे तु प्रधानगुणभावो विरुद्ध्यते न तु व्यङ्ग्यप्रेदापेक्षया, ततोऽप्यस्य न विरोधः ।

अयं च सद्दरसंसृष्टिर्यवधारो बहूनामेकत्र वाच्यवाचकभाव एव व्यङ्ग्यप्रत्ययज्ञक-भावेऽपि निर्विरोध एव मन्तव्यः ।

यत्र तु पदानी कानिचिदविवक्षितवाच्यान्यनुरणनरूपकृत्यवाच्यानीति वा, तत्र व्यङ्ग्यप्रतीतिभञ्जनकचयोः संसृष्टत्वम् ।

यथा ‘तेषां गोपवधूविलाससुहृदाम्’ इत्यादौ । अत्र हि ‘विलाससुहृदाम्’ ‘राघवहःसाक्षिणां’ इत्येते पदे ध्वनिप्रभेदतलेपे । ‘ते’, ‘जाने’ इत्येते च पदे गुणीभूतव्यङ्ग्यधरुपे ।

अत्र ‘विलाससुहृदाम्’ और ‘राघवहःसाक्षिणां’ इत्येते पदे ध्वनिप्रभेदतलेपे । ‘ते’, ‘जाने’ इत्येते च पदे गुणीभूतव्यङ्ग्यधरुपे । अलग होनेसे ध्वनि और गुणीभूतव्यङ्ग्यके ‘अज्ञातत्क्षोभ’ अथवा ‘सदेहस्कुर’में कोई विरोध नहीं आता है । इसी बातको सूचित करनेके लिये मूलमें ‘ततोऽप्यस्य न विरोधः’ कहा है । यहाँ ‘अपि’ शब्द पूर्वपरिहारकी अपेक्षा इसका सर्वतोमुखत्व सूचित करता है । और एक ही व्यङ्ग्यमें आश्रित प्रधान और गुणभाव तो विरुद्ध हो सकते हैं परन्तु व्यङ्ग्यप्रेक्षककी अपेक्षासे [भिन्न-भिन्न व्यङ्ग्यमें स्थित प्रधान गुणभाव विरोधी] नहीं । इसलिये श्री हर्ष [ध्वनि और गुणीभूतव्यङ्ग्यके सदृश] का विरोध नहीं है ।

[सदृश और संसृष्टि प्रायः वाच्य अलङ्कारोंमें ही प्रसिद्ध हैं, परन्तु वे व्यङ्ग्य अर्थोंमें भी हो सकते हैं पूर्वोक्त उपपादन करते हुए] वाच्यव्याचकभावके [वाच्यालङ्काररूपके] में बहुतसे [अलङ्कारों] का सदृश और संसृष्टिर्यवधार जिस प्रकार होता है उसी प्रकार व्यङ्ग्यप्रत्ययज्ञकभाव [व्यङ्ग्यरूप अनेक ध्वनिप्रभेदों अथवा ध्वनि और गुणीभूतव्यङ्ग्य] में भी उसे निर्विरोध समझना चाहिये ।

[ध्वनि और गुणीभूतव्यङ्ग्यके सदृशका प्रदर्शन कर अब उनकी संसृष्टिका उपपादन करते हुए उदाहरण देते हैं] जहाँ कुछ पद अविवक्षितवाच्य [लक्षणामूल घ्वनिपरक] और कुछ पदानी [कानिचित् पदानी] दोनोंकी निरपेक्षताके सदृशरका अवकाश नहीं रहता । संलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्यपरक ही वहाँ [वाच्यसे व्यङ्ग्य] ध्वनि और [उस प्रधान वाक्यार्थीभूत ध्वनिकी अपेक्षासे गुणीभूत अविवक्षितवाच्य अथवा संलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य] गुणीभूतव्यङ्ग्यकी संसृष्टि है । जैसे ‘तेषां गोपवधूविलास-सुहृदाम्’ इत्यादिमें । यहाँ ‘विलाससुहृदाम्’ भर ‘राघवहः साक्षिणां’ ये दोनों पद [लक्षणामूले विशोषणरूप हैं । परमु अचेतन हताश्रयोंमें ‘मैत्री’ और ‘साक्षित्व’ जो कि वस्तुतः चेतनधर्मा हैं, नहीं रह सकते हैं । अतपश्च उनमें अत्यन्त तिरसृतवाच्यध्वनित होनेसे] ध्वनि [अविवक्षितवाच्यध्वनिके मेद] रूप हैं । और ‘ते’ तथा ‘जाने’ ये दोनों पद [वाक्यके उपकारक अनुत्रभावैकगोचरत्व और उत्पेक्ष्यविषयीभूतत्व रूप] गुणीभूतव्यङ्ग्य [के बोधक] रूप हैं [इस प्रकार वाक्यार्थीभूत प्रचासहुतुक विप्रलम्भशृङ्गारके साथ ‘विलाससुहृदाम्’ और ‘राघवहःसाक्षिणां’ पदोंसे घोत्थ अत्यन्ततिरसृतवाच्य-ध्वनिके यहाँ गुणीभूत हो जानसे गुणीभूतव्यङ्ग्यकी निरपेक्षतया स्थिति होनेके कारण ध्वनि और गुणीभूतव्यङ्ग्य दोनोंकी संसृष्टि है] ।

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कारिका ४५ ] द्वितीय उद्योतः ३२९

वाच्यालङ्कारसङीर्णत्वमलङ्कयक्रमलङ्कृत्यापेक्षया रसवति सालङ्कारे काव्ये सर्वत्र सुव्यवस्थितम् । प्रभेदान्तराणामपि कदाचित्सदृशीपरत्वं अवस्तुतः । यथा चापरवती रसान् रसयितुं कवित्तं करीनां नवा दृष्टिरो परिनिष्ठितार्थविषयोन्मेषा । व वैपरीचती । ते द्वे अप्यवलम्ब्य विशेषमनिशं निर्वर्णेयान्तो वयं श्रान्ता नैव च लघुमन्विधावन ! त्वदृक्तितुल्यं सुतराम् ॥

इस्तैन विरोषालङ्कारैर्यान्तरसङ्क्रमितवाच्यस्य ध्वानिप्रदेशे सदृशीकरणत्वम् । वाच्यालङ्कारसंसृष्टत्वं च पदापेक्षयैव । यत्र हि कानिचित्पदानि वाच्यालङ्कारभाजि कानिचिच्च ध्वनिप्रभेदयुक्तानि ।

इस प्रकार गुणीभूतव्यङ्ग्यके साथ ध्वनिकी संरृष्टि और सदृशीकरण उपादान कर आगे वाच्यालङ्कारोंके साथ भी उनका उपादान करते हैं ।

रसध्वनियुक्त और [रसवत्] अलङ्कारयुक्त सभी काव्योंमें असंलङ्कयक्रमव्यङ्ग्य [रसादियङ्ग्यकी अपेक्षाके साथ] वाच्य अलङ्कारोंका [अथवा अलङ्कारव्यङ्ग्य अलङ्कार नहीं] अलङ्कारके व्यङ्ग्य होनेपर तो यदि वह अलङ्कारप्रधान होनेपर गुणीभूतव्यङ्ग्यका सदृश हो जायगा ।

अतएव [वाच्य विरोध रक्खा है] सदृश सुनिर्मित हो ही है । [रसादिध्वनिसहिते मिश्र वस्‍तुनि तथा अलङ्कारध्वनिरूपे अन्य प्रभेदोंका भी कचि [वाच्य अलङ्कारोंके साथ] सदृश हो ही जाता है ।

हे समुद्रशायी [विष्णुमगवान्] ! रसोंके आस्वादके हित [शब्दयोजनामें] प्रयत्नशील कवियोंकी [प्रतिपलंवदनोमेषशालिनी] जो कुछ अपूर्व दृष्टि है, और प्रमाणसिद्ध अर्थोंको प्रकाशित करनेवाली जो विद्वानोंकी वैपरीत्यै दृष्टि है, उन दोनोंके द्वारा इस विश्वको रात-दिन देखते-देखते हम थक गये, परन्तु आपकी मक्किके समान सुच्य [अन्यत्र] कहीं नहीं मिला ।

यहाँ विरोधालङ्कारके साथ अर्थान्तरसङ्क्रमितवाच्यस्य च्यनि श्रेदका सदृश है । यहाँ कविकी प्रतिभा और दार्घनिककी परिणत बुद्धिसे 'निर्वर्णन' अर्थात् 'वाच्यपुष्ट ज्ञान' वा 'निर्वर्णन' पदका 'सामान्यज्ञान' देखना सम्भव नहीं है, अतएव विरोध उपस्थित होता है । परन्तु 'निर्वर्णन' पदार्थ का चाक्षुष ज्ञानेके सामान्यज्ञानरूप अर्थान्तरमें सदृशक्षित हो जानेसे अर्थान्तरसङ्क्रमितवाच्यस्यनि भी होता है, ऐसा मानकर विरोधालङ्कार तथा अर्थान्तरसङ्क्रमितवाच्यच्यनि एकाश्रयानुप्रवेशरूप सदृश होता है ।

वाच्य अलङ्कारोंकी [ध्यनिके साथ] संरृष्टि [निरपेक्षतया स्थित] पदोंकी हदिसे ही होती है [वक्यसे प्रकाशित समासोक्ति आदि अलङ्कार तो ध्वनिरूप प्रधान व्यङ्ग्यके परिपोषक ही होते हैं, निरपेक्ष नहीं । अतएव उनका सदृश ही बन सकता है । संरृष्टि नहीं]। जहाँ कुछ पदवाच्य अलङ्कारसे युक्त हों और कुछ ध्वनिके प्रभेदसे युक्त हों [वहाँ ध्वनि और वाच्यालङ्कारकी संरृष्टि होती है] जैसे—

१. 'रसवति रसालङ्कारे च काव्ये' नि०, दी० ।

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ध्वन्यालोकः

आचार्य आनन्दवर्धन

महामहोपाध्याय डॉ० बलदेव उपाध्याय

चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन

एवं ध्वने: प्रभेदा: प्रभेदभेदाश्र कैश् चाश्रयन्ते ।

संघतां दिङ्मात्रं तेशामिदमुक्तमस्माभिः ॥४५॥

अनन्ता हि ध्वने: प्रकाराः । सहृदयानां व्युत्पत्तये तेषां दिङ्मात्रं कथितम् ॥ ४५ ॥

अर्थात् सहृदय सामाजिकों की जानकारी के लिये ध्वनि के प्रभेदों का केवल दिग्दर्शन कराया गया है ।

इत्युक्तलक्षणो यो ध्वनिरिविवेच्यः प्रयत्नतः सद्भिः ।

सकलया कविं ता ज्ञातुं वा सम्यगनुविधातुं ॥४६॥

उत्कृष्टालंकारपदविनिर्हपणानुप्राणा हि सत्कवयः सहृदयाश्र नियतमेव काव्यविषये परां प्रकरर्षपदवीमासादयन्ति ॥४६॥

अस्फुटस्फुरितं काव्यतत्त्वमेतयोदितम् ।

अथावनुविध्यव्यतिकतं रीतयः सम्भवर्तिता: ॥४७॥

अब 'पथिकासामानिकेउ' पथिका एवं सामाजिक:' इस प्रकार रूपक हो सकता है । और यहाँ 'पथिकासामानिकेउ' जैसी छाया माननेपर 'पथिका एवं सामाजिक:' इस प्रकार पदोंके परस्पर सापेक्ष न होनेते दोनोंकी संश्रष्टी है ।

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कारिका ४७ ]

तृतीय उद्योत:

३३१

पतदूर्ध्वनिर्पवर्तनेन' निर्जीतं काव्यतत्त्वमस्फुटमकुर्वितं सदृशमनुवादे: प्रतिपादयितुं वैदर्भी गौडी पाञ्चाली चेति रीतय: प्रवर्तिता: । रीतिलक्षणविचारिणां हि काव्यतत्त्वमेतदम्फुटतया मनाक् मुपरितमासीदिति लक्ष्यते' । वदन्ति स्मुफुटतया सम्यदर्शितमित्यनेन' रीतिलक्षणेन न किञ्चिद् ।।४७।।

ध्वनिनतत्त्वके बाद रीतियोंकी अनुपयोगिता

इससे 'ध्वनिका' प्रतिपादनसे [अथवा स्पष्टतापूर्वक] निश्चित [व्यक्ततया रीतिरूपतैक] ध्वनिनका प्रतिपादन कर सकनेमें असमर्थ [वामन आदि आचार्यों] ने वैदर्भी, गौडी, पांचाली आदि रीतियाँ प्रचलित कीं। रीतिकारोंको यह [ध्वनिरूप] काव्यतत्त्व अस्पष्टरूपसे कुछ थोड़ा-थोड़ा भासता [अवश्य] था पेसा प्रतीत होता है। उसका [अब हमने] यहां स्पष्टरूपसे प्रतिपादन कर दिया। इसलिये अब [ध्वनिसे भिन्न] अन्य रीतिलक्षणोंकी कोई आवदयकता नहीं है।

जत्र ध्वनिका कांई स्पष्ट चित्र लोगोंके सामने नहीं था, केवल एक अस्पष्ट धुंधली छाया प्रतीत होती थी और उस समयके आचार्योंमें ध्वनिकी उस अस्पष्ट रूपरेखाको स्पष्टरूपसे चित्रित करनकी प्रतिभाका अभाव था, उस समय काव्यसौन्दर्यंक' उस मूल तत्वका उन्होंने रीतिरूपमें प्रतिपादन करनेका प्रयत्न किया। अब हमने काव्यके आत्मभूत उस मूल ध्वनितत्त्वका अत्यन्त स्पष्ट और विस्तृत रूपमें प्रतिपादन किया है। इसलिए उन रीतियोंके लक्षण आदि करनेकी आवद्यकता नहीं है। ध्वनिका क्षेत्र बहुत विस्तृत है, रीतियोंका बहुत परिमित। इसलिये रीतियोंमें ध्वनिका नहीं, अपितु ध्वनिमें रीतियोंका अन्तर्भाव हो सकता है। इसलिये रीतियोंके लक्षणकी आवद्यकता नहीं है, यह ग्रन्थकारका अभिप्राय है ।।४७।।

ध्वनिनतत्त्वके बाद वृत्तियोंकी अनुपयोगिता

रीतियोंके अतिरिक्त शब्द और अर्थके उचित व्यापारकी प्रवृत्तंक दो प्रकारकी वृत्तियोंका उल्लेख प्राचीन ग्रन्थोंमें पाया जाता है। भरतके नाट्यशास्त्रमें 'वृत्यो नाट्यमातृका:' तथा 'स्वेच्छामेव काव्यनां वृतयो मातृका: स्मृता:' इत्यादि वचन मिलते हैं। नाट्यशास्त्रमें मुख्यत: नाट्यांपयोगी भारती, सात्वती, कैशिकी और आरभटी इन चार प्रकारकी रीतियोंका उल्लेख किया है। दशरूपककारने 'तद्भयापारस्थितिका वृत्ति:' कहकर नाट्यिकादिके व्यवहाारको ही वृत्ति बतलाया है। ध्वन्याालोककारने भी 'वृत्तिहरो हि वृत्तिस्थितुच्यते' [३,३७] लिखकर काव्यव्यवहारको ही वृत्ति बतलाया है।

वृत्तियोंका निरूपण हम पहिले कर चुके हैं। भरतकी चारों वृत्तियोंका समन्वय रसोंसे है और-वे व्यवहााररूप हैं, इसलिये ध्वन्याोलोककारने उनको 'अर्थांश्रित वृत्ति' कहा है। इसके अतिरिक्त उद्भट आदिने जिन उपनागरिका आदि चार वृत्तियोंका प्रतिपादन किया है उनका वर्णन भी हम कर आये हैं। इन उपनागरिका आदि वृत्तियों-

१. 'वर्णनेन', नो प्र०।

२. 'लक्ष्यते' पाठ नो, दो० में नहीं है।

३. 'सम्प्रदर्शितेन' था प्र०।

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ध्वन्यालोक:

आचार्य आनन्दवर्धन

डॉ० बलदेव उपाध्याय

चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन

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कारिका ४८ ]

तृतीय उच्योत:

३३३

तद्युक्तमिति 'नामिधेयतामहंति' । यतः शब्दानां 'स्वरूपप्राश्रयस्लावदकिलष्टत्वे सत्यप्रयुक्तप्रयोगः, वाचकाश्रयस्तु प्रसादो व्यज्जकत्वं चेति विशेषः । अर्थानां च मकुटत्बेनावभासनं व्यञ्जक-धपरत्वं 'व्यञ्जकांशाविशिष्टत्वं' चेति विशेषः । तौ च विशेषौ व्यास्यातुं शक्येते न्यास्यातौ च बहुप्रकारम् ।

तदुक्त्यतिरिक्तानाश्रेयविशेषसम्भावना तु विवेकावसादभावमूलतैव । यस्यादनाश्रये-पत्वं 'सर्वशब्दार्थगोचरत्वेन न करचित्सम्भवति' । अन्ततोऽनाश्रयेयशब्देन तस्याभिधान-सम्भवात् ।

में घ्यानिकव्यवहार होता है' किसने यह जो ध्वनिका लक्षण किया है, वह अयुक्त और इसलिए कहने योग्य नहीं है । [अर्थात्‌ 'अभिधेयतां' की जगह 'अवघेयतां' पाठ रखा है । इसके अनुसार ध्यान देने योग्य नहीं है, यह अर्थ होगा] क्योंकि शब्दोंका स्वरूपगत विशेष अकिञ्चित्कत्व [श्रुतिकटु आदि दोषराहिल्य] होनेपर अपनुरक्तत्व तथा [शब्दोंका ही दूसरा] वाचकत्व [बोधकत्व] गत विशेष प्रसाद [गुण] तथा व्यज्जकत्व, [ये दो शब्दके विशेष धर्म हैं हो सकते हैं इसीलिए] और अर्थोंकी स्पष्ट प्रतीति, व्यकञ्ज्यपरता तथा व्यकञ्ज्याविशिष्टता ये विशेष [धर्म] हो सकते हैं । वे दोनों [शब्दगत तथा अर्थगत] विशेष [धर्ममें] व्याख्या करने योग्य हैं । और [उनकी हानि] अनेक प्रकारसे व्याख्या की [मेँ] है ।

इन [शब्द और अर्थनिष्ठ विशेष वाच्यत्वहेतुओं] के अतिरिक्त किसी अद्वर्णनीय विधेयकी सम्भावना [कल्पना] विवेकके अत्यन्ताभावसे [अप्राप्त मुख्खतावश] ही हो सकती है । क्योंकि अनाश्रेयत्व [अवर्णनीयत्व] का अर्थ समस्त शब्दोंका अवाच्यत्व ही है । [और वह सर्वशब्दगोचरत्वेन अनाश्रेयत्व] किसी [भी पदार्थ] का सम्भव नहीं है । [क्योंकि प्रत्येक पदार्थका कोई न कोई नाम होगा ही, उसी नामसे वह आख्याेय होगा । और कुत्रजन्तोऽपि नग्नयातसे पेषा कोई संज्ञारहित पदार्थ मान भी लें तो भी] अस्तातः 'अनाख्येय' इस शब्दसे तो उसका अभिधान [कथन] सम्भव होगा ही [इसलिए किसी पदार्थको अनाख्येय नहीं कहा जा सकता । अतएव ध्वनिको अनाख्येय कहना उचित नहीं है ।]

१. 'नामिधेयतामहंति' मि०, दी० ।

२. 'स्वरूपमेदास्तावदकिलष्टत्वे' नि० ।

३. 'व्यञ्जक-२विशिष्टत्वं' मि०, दी० ।

४. 'व्याख्यातुमशक्यो व्याख्यातो बहुप्रकारम्' नि०, दी० ।

५. 'विवेकावसादभावमूलतैव' नि०, दी० ।

६. 'शब्दार्थगोचरत्वेन न करचिदसम्भवति' दी०, सर्वशब्दार्थगोचरत्वेन न करचिदसम्भवति' नि० ।

७. 'तद्नभिधानाव्' श्री० ।

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ध्वन्यालोक:

सामान्यसंस्पर्शिविकलपशब्दागोचरत्वे सति प्रकाशमानत्वे हि 'यदनालम्ब्येतत्समुच्चये कवचित्, तदपि काव्यविशेषाणां रत्नविशेषाणामिव न सम्भवति । तेषां लक्षणकारैव्याकृतत्वात्पत्वात् । रत्नविशेषाणां च सामान्यसम्भावनयैव मूल्यस्थितिपरिकल्पनादर्शनेनैव नाशः । उभयेषामपि तेषां प्रतिपत्तृविशेषसंवेद्यत्वमस्यैव । वैकटिकः एव हि रत्नतत्त्वविद्: सहृदयः एव हि काव्यानां रसज्ञा इति कस्यात्र विप्रतिपत्ति: ।

एतद्विधैरेषां तत्र लक्षणविषयत्वं बौद्धानां प्रसिद्धं तत् तत्त्वतस्तद्विधैरपि लक्ष्यते न तु लक्ष्यविधया इह तु मन्त्रान्तरश्रवणालवप्रकाशं सहृदयवैमल्यप्रदायीत न प्रक्रियते । बौद्धमतान्न वा यथा प्रत्यक्षादिलक्षणं तथाऽऽत्मकं ध्वनिलक्षणं भाष्यिष्यति ।

सामान्य [जात्यादि] को ग्रहण करनेवाला जो विकलप शब्द [सविकल्पक ज्ञान, नामजात्यादियोजनास्तहितं सविकल्पकम्] उसका विषय न होकर [अर्थात् निर्विकल्पक ज्ञानके रूपमें] प्रकाश्यमानतारूप जो अनालम्ब्येतत्व [का लक्षण] कहीं बताया गया है वह भी रत्नविशेषोंके समान काव्यविशेषमें सम्भव नहीं है । क्योंकि लक्षणकारोंने उनकी व्याख्या कर दी है [अनपेक्ष रत्न और काव्य दोनों ही विकलपज्ञानके अविषय नहीं अपितु विषय होनेसे अनालम्ब्येय नहीं हो सकते हैं] ।

और रत्नोंमें तो सामान्य [रत्नत्व] सम्भावनासे ही मूल्य स्थितिकी कल्पना देखी जाती है । और ये दोनों [रत्न और काव्य] विशेषज्ञों द्वारा सवेद्य हैं । क्योंकि [वैकटिक] जौहरी रत्नोंके तत्त्वको समझते हैं और सहृदय काव्यक रसज्ञ होते हैं । उसमें किसका मतभेद हो सकता है ।

बौद्धदर्शन क्षणभङ्गवादी दर्शन है । उसके मतमें सभी पदार्थ क्षणिक हैं । इसलिए उनके लक्षण नहीं किये जा सकते हैं । अतएव ध्वनि पदार्थका भी लक्षण सम्भव नहीं है । और वह अनालम्ब्येय ही है । यह पूर्वपक्ष होनेपर उत्तर देते हैं—

बौद्धोंके मतमें समस्त पदार्थोंका जो अलक्षणीयत्व [अनिर्वचनीयत्व] प्रसिद्ध है उसका विवेचन हम अपने दूसरे ग्रन्थ ['विनिश्चय' नामक बौद्धग्रन्थकी 'धर्मोत्तमा' नामक विशिष्टिप्रन्थ] में उनके मतकी परीक्षणके अवसरपर करेंगे [जिसका सार यह होगा कि बौद्धोंका क्षणभङ्गवादका सिद्धान्त ही ठीक नहीं है । अतएव उसके आधारपर अलक्षणीयत्वका सिद्धान्त भी नहीं बन सकता है] ।

यहाँ तो [उस अत्यन्त गूढ़ और कठिन] दूसरे ग्रन्थके विषयकी तनिक-सी चर्चा [प्रकाशन] भी सहृदयोंके लिये वैमनस्यदायिनी होगी, इसलिए [हम उसको इस समय] नहीं कर रहे हैं । [फिर भी इतना कह देना तो उचित होगा कि बौद्ध लोग सब वस्तुओंको क्षणिक और अलक्षणीय मानते हुए भी प्रत्यक्षादि प्रमाणोंको लक्षण करते हैं अतएव] बौद्धोंके मतमें [क्षणिकत्व और अलक्षणीयत्व होते हुए भी] प्रत्यक्षादिके लक्षणके समान हमारा ध्वनिलक्षण भी हो सकता है ।

१. 'तदनालम्ब्येतत्समुच्चये' नि० ।

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ध्वन्यालोके

आचार्य आनन्दवर्धन

श्रीमदाचार्यविश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि

आलोकदीपिकाभ्यां हिन्दीव्याख्याभ्याम्

तृतीय उद्योतः

तस्माल्लक्षणानन्तरस्याघटनादशब्दार्थैस्त्वाच तस्योक्तमेव ध्वनिलक्षणं साधीयः । तदिदमुक्तम्

अनाख्येयैरंशभासितवं निर्वाच्यार्थतया ध्वने । न हि लक्षणं लक्षण तु साधीयोऽस्य यथोदितम् ॥

इति श्रीराजकानकानन्दवर्धनाचार्यविरचिते ध्वन्यालोके तृतीय उद्योतः

इसीलिए [हमारे लक्षणके अतिरिक्त] अन्य कोई लक्षण न किये जाने, और उस [ध्वनि] के वाच्य अर्थ न [अशाब्दार्थ] होनेसे, पूर्वोक्त [हमारा किया हुआ] ध्वनि-लक्षण ही ठीक है ।

इसीको [संग्रहरूपमें] इस प्रकार कहा है—

ध्वनिके निर्वाचनीय अर्थ होनेसे अनाख्येयैरंशभासितवं उसका लक्षण नहीं है । उसका ठीक लक्षण जैसा हमने कहा है वही है ॥४८॥

इति श्रीमदाचार्यविश्वेश्वरसिद्धान्तशिरोमणिविरचितायाम् 'आलोकदीपिकाभ्यां' हिन्दीव्याख्याभ्यां तृतीय उद्योतः समाप्तः

तृतीय उद्योत समाप्त हुआ

'तस्माल्लक्षणानन्तरस्याघटनादशब्दार्थैस्त्वाच तस्योक्तमेव' मि० १

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चतुर्थ उद्योतः

एवं ध्वनिं सप्रमाणं विप्रतिपत्तिनिरासार्थं नयुत्पाद, तद्वद्युत्पादने प्रयोजनान्तरमुख्यते—

ध्वनेनैः स गुणीभूतव्यङ्ग्यस्याथवा प्रदर्शितः । अनेनानन्त्यमायाति कवीनां प्रतिभागुणः ॥१॥

इस प्रकार विप्रतिपत्तियोंके निराकरणके लिप भेदोपमेद सहित ध्वनिका निरूपण करके, उसके प्रतिपादनका दूसरा प्रयोजन [भी] बतलाते हैं । गुणीभूतव्यङ्गच्य सहित ध्वनिका जो मार्ग प्रदर्शित किया गया है इस [मार्गका अवलम्बन करने] से कवियोंकी प्रतिभाशक्ति अनन्तताको प्राप्त कर लेती है ॥१॥

य एष ध्वनेर्गुणीभूतव्यङ्गचस्य च मार्गः प्रकाशिततस्तस्य फलान्तरं कविप्रतिभाननत्यम् ॥ १ ॥

यहाँ जो ध्वनि और गुणीभूतव्यङ्गच्यका पथ प्रदर्शित किया है उसका दूसरा फल कविकी प्रतिभा [काव्योत्कर्षजनक शक्ति] का आननल्य [अविच्छिन्नसातत्य] है ॥१॥

कथमिति चेत्—

अतो ह्यनन्तमेनेपि प्रकारेण विभूषिता । वाणी नवत्वमायाति पूर्वैर्यान्वयवर्त्मनि ॥२॥

अथ आलोकदीपिकायां चतुर्थ उद्योतः। [प्रश्न] ध्वनि और गुणीभूतव्यङ्गच्य ये दोनों काव्यनिष्ठ धर्म हैं । अतः ये दोनों ध्वधिकरण धर्म हैं । अर्थात् इन दोनोंके अधिकरण आधार अलग-अलग हैं । कार्य-कारणभाव समानाधिकरण धर्मों में ही हो सकता है । व्यधिकरण धर्मोंमें कार्यकारणभाव माननेसे तो देवदत्तका कर्म यज्ञदत्तके फलभोगका, अथवा देवदत्तका ज्ञान यज्ञदत्तकी स्मृतिका कारण होने लगेगा । अतः व्यधिकरण धर्मोंमें कार्यकारणभाव नहीँ हो सकता । पैसी दशामें ध्वनि और गुणीभूत-व्यङ्गच्य, भिन्न अधिकरणमें रहनेवाली [व्यधिकरण] कविप्रतिभाके आननल्यके हेतु कैसे हो सकेंगे? यह प्रदानकर्ताका आक्षेप है । इसके उत्तरपक्षका आशय यह है कि ध्वनि और गुणीभूतव्यङ्गच्य नहीं अपितु उनका 'ज्ञान' कविप्रतिभाके आननल्यका हेतु होता है । 'ज्ञान' और 'प्रतिभा' दोनों कविनिष्ठ धर्म हैं । अतएव ज्ञानद्वारा काव्यनिष्ठ धर्मों को लेकर कार्यकारणभाव माननेमें कोई दोष नहीं है । इसी आश्रयसे पूर्वपक्ष उठाकर अगली कारिकामें उसका उत्तर देते हैं—

यदि कोर्ह पूछे कि [ध्वनि और गुणीभूतव्यङ्गच्य कविप्रतिभाके आननल्यके हेतु] कैसे [होंगे] तो [उत्तर यह है कि]—

यदि कोई पूछे कि [ध्वनि और गुणीभूतव्यङ्गच्य कविप्रतिभाके आननल्यके हेतु] कैसे [होंगे] तो [उत्तर यह है कि]—

इन [ध्वनि तथा गुणीभूतव्यङ्गच्य]मेंसे किसी एकसे भी विभूषित [कवि] की वाणी [ वाच्यौकि, व्यास आदि अन्य कवियों द्वारा प्रतिपादित अतपच्त्व ] पुराने अर्थोंसे युक्त [वार्घवाचकभावसे सम्बद्ध] होनेपर भी नवीनता [अभिनव चारुत्व] को प्राप्त हो जाती है ॥२॥

इन [ध्वनि तथा गुणीभूतव्यङ्गच्य]मेंसे किसी एकसे भी विभूषित [कवि] की वाणी [ वाच्यौकि, व्यास आदि अन्य कवियों द्वारा प्रतिपादित अतपच्त्व ] पुराने अर्थोंसे युक्त [वार्घवाचकभावसे सम्बद्ध] होनेपर भी नवीनता [अभिनव चारुत्व] को प्राप्त हो जाती है ॥२॥

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कारिका २ ] वतुर्थ उद्योतः ३३९

अतओ' ध्वनेरुक्तश्रवेदमध्यादन्यतमेनापि प्रकारेण विभूषिता सती वाणी पुरातनकविनिबद्धार्थैसंस्पर्शवत्यपि नवतामियाति । तथाऽऽश्रविवक्षितवाच्यस्य ध्वने: प्रकारद्वयसमाश्रयणेन नवत्वं पूर्वोक्तयुगमेडपि यथा—

विमतं किश्चित्सुगन्धं तरलमधुरो रसविभव: परिस्पन्दो वाचामभिनवविलासोर्मिसरस: । किमलयितलीलापरिमल: सुप्रशन्त्यास्तहार्यं किमिव हि न रम्यं सुगन्ध: ॥

तथ्यस्य— सुविभ्रमस्मितोद्गमे दा झोलालस्य: प्रस्खलदुमिगर: । निवत्स्बालंसगामिन्या: कामिन्या: कस्य न भ्रिया: ॥ हत्येवमादिषु म्लोकेषु सत्यस्यापि तिरसृतवाच्येऽपि निमिताश्रयेणापूर्वैवमेव प्रतिभासते ।

इन ध्वनिके उक्त भेदों [ध्वनि और गुणीभूतव्यङ्गच्य] में से 'किसी एक भी भेदसे युक्त [कविकी] पुरातन कविनिबद्ध अर्थोंका वर्णन करनेवाली वाणी [भी] नवीनता [अभिनव चारुत्व] को प्राप्त हो जाती है । पूर्व [कविवर्णित] अर्थोंका सम्बन्ध होनेपर भी अत्यन्त-आविदितार्थव्यामिश्र [रमणीयत्व] ध्वनिके होनेसे [अर्थात्‌वाच्यार्थके साथ ध्वन्यर्थके रहनेसे] अत्यन्त-तिरसृतवाच्य] प्रकारोंके आश्रयसे अर्थके पुराने होनेपर भी नवीनता [का उदाहरण] जैसे— नवयौवनका वर्षा करनेवाली [वय:सन्धिमें वर्तमान] मृगनयनीकी तनिक-सी मधुर मुसकान, चञ्चल और सुलक्षण भीरी दृष्टिका सौन्दर्य, नवीन [चिह्नास] पूर्ण उकियोंसे सरस वाणीका प्रयोग, विविध भाव-भङ्गियोंको विकसित करनेवाली गतियोंका उपक्रम [इत्यादिमेंसे] कौन-सी चीज मनोहर नहीं है? [सभी कुछ सुन्दर और रमणीय है]। इस [श्लोक] का— विभ्रम [श्रृङ्गारचेष्टाविशेष] से युक्त, जिनकी मन्द मुसकान खिल रही है, आँखें वच्चल और वाणी ललित-लहरी रही हैं और नितम्बों [के अतिभार] का कारण जो धीरे-धीरे चलनेवाली कामिनियाँ हैं, वे किसको प्रिय नहीं लगती हैं? इत्यादि [पूर्वकविरचित] श्लोकोंके रहते हुए भी [उसी भावको लेकर लिखे गये 'सितं किश्चित्सुगन्धं' इत्यादि नवीन श्लोकमें मुग्ध, मधुर, विभव, परिस्पन्द, सरस, किसलयित, परिमल आदि पदोंमें उन वाच्योंके मुख्यार्थके अत्यन्त बाधित होनेसे रक्षणामूल अत्यन्त-] तिरसृतवाच्यध्वनिके समन्वयसे नधीन चारुत्व प्रतीत ही होता है ।

१. 'अतो हि' नि०, बी० । २. 'विलासोर्मिसरस:' नि० । ३. 'परिकर*' नि०, बी० ।

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ध्वन्यालोकः

तथा——

यः प्रथमः प्रथमः स तु तथा हि इतहस्तिबहलपल्वाश्री । इत्थं—— इत्थं——

नवतत्वं

यथा

स्वतेजःकृतमहिमा केनान्येनातिशय्यते । सकलपदराशौ महाकविरूपे स्फुटतरे किं विस्मयेनूते ॥

इत्येवमादिशु श्लोकेषु सत्स्वप्यथोत्तरसड्गुमितवाच्यध्यवनीसमाश्रयेप नवत्वम् । विवक्षितान्यपरवाच्यस्यापि उक्तप्रकारसमाश्रयेप नवत्वं यथा——

तथा——

जो प्रथम है वह तो प्रथम [ही] है, जैसे हिरण प्राणियोंमें, मारे हुए हाथियोंके मांसको खानेवाला सिंह, सिंह ही है, उसे कौन नीचा [तरस्कृत] कर सकता है ?

इत्यादि [प्राचीन] श्लोकोंके होते हुए भी ['यः प्रथमः' इत्यादि नवीन श्लोकमें द्वितीय बार प्रयुक्त 'सिंहः' तथा 'प्रथमः' पदोंमें] अर्थान्तरसङ्कुमितवाच्यध्यच्वनिके आश्रयसे नवीनता आ गयी है ।

यहाँ 'यः प्रथमः' इत्यादि श्लोकके पूर्वार्द्धमें दूसरी बार प्रयुक्त 'प्रथम:' पद और उत्तरार्द्धमें दूसरी बार प्रयुक्त 'सिंहः' पद पुनरुक्त होनेसे, यथाश्रुत अव्वित न हो सकनेके कारण अजहत्स्वार्य लक्षणके द्वारा असाधारण्य, परानुभवनशीलत्व आदि विशिष्ट 'प्रथम' तथा 'सिंह' अर्थके बोधक होते हैं । अतः उनमें अर्थान्तरसङ्कुमितवाच्यध्यच्वनिके सम्बन्धसे यह नवीनता प्रतीत होने लगती है ।

अविवक्षितवाच्यध्यच्वनिके सम्पर्कसे नूतन चारुत्वकी प्राप्तिके दो उदाहरण दिखलाकर अब विवक्षितान्यपरवाच्यध्यच्वनिके असंलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य भेदके संस्पर्शसे नवीन वाचकत्वकी प्राप्तिका उदाहरण देते हैं ।

विवक्षितान्यपरवाच्य [अभिधामूल ध्वनि] के भी पूर्वोक्त [संलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य तथा असंलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य] प्रकारों [मेंसे असंलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य ध्वनिकल्प प्रकार] के समाश्रयसे नवीनता [प्राप्ति] का [उदाहरण] जैसे——

१. 'केकामिभूयते' नि०, टी०। २. 'तनूभवक्रमप्रकारसमाभ्रयणाभ्यस्तावस्थः' नि०, टी० में 'तथा'के पूर्वं इतना पाठ अधिक है ।

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कारिका २ ] चतुर्थ उद्योत: ३३९

निद्राकैतविनः प्रियस्य बदने विन्यास्य वक्त्रं वधू-बोंधत्रासनिकटचुम्बनरसाड्न्यामोयोगोऽलं स्थिता । वैलक्ष्याद्विमुखीभवेदिति पुनस्तस्याप्यनारम्भपः साकांक्षप्रतिपत्तिनाम हृदयं यातं हु पारं रतेः ॥ 'इत्यादे श्लोके— शून्यं वासगृहं विडोक्य शयनादुत्थितौ कीडितच्छले-निर्द्राव्याजमुपागतस्य सुचिरं निर्वर्ण्ये पत्युरसुखम् । विक्षिप्यं परिछुम्ब्य जातपुलकामालोक्य गण्डस्थलीं लज्जानप्रमुखी प्रियेण हसता बाला चिरं चुम्बिता ॥ इत्यादिषु श्लोकेषु सत्क्वापि नवत्वम् ।

[नवपरिणीता] वधू नायिका बहाना करके ठेटे हुए पतिके मुखपर अपना मुख रखकर उनके जग जाननेके डरसे अपनी चुम्बनकी इच्छाको रोककर भी [ग्रासोग] चुम्बनेच्छाके प्रतिक्षण बढ़नेके कारण चञ्चल [अथवा बार-बार निद्राकी परीक्षा करते हुए चञ्चल] क्रीड़ा है। और [मेरे चुम्बन कर लेनेसे] लज्जाके कारण यह कहीं विमुख न हो जाय, यह सोचकर [चुम्बनेच्छापरिकर] औरम्भ न कर सकनेवाले उसे [नायिक] का भी हृदय [मनोरथपूर्ति न हो पानेसे साकांक्ष भले ही हो, परन्तु] रति [रसास्वाद] के पार पहुँच गया।

इत्यादि इलोककी— वासगृह [अपने सोनेके कमरे] को [अन्य सखी आदिसे] शून्य [खाली, एकान्त] देखकर, धीरेसे पलंगपरसे थोड़ा सा उठकर, नायिका बहाना किये हुए पतिके मुखको बहुत देरतक [कहीं जाग तो नहीं रहे हैं इस दृष्टिसे] देखनेके बाद [वास्तवमें सा रहे हैं पेसा समझकर] दिव्यभावपूर्वक चुम्बन करकै, उनके कपोलोंको [चुम्बनके कारण] , रोमाञ्चयुक्त देखकर, लज्जासे नम्रमुखी उस नवोढ़ा वधूका हँसते हुए पतिनं बहुत देर-तक चुम्बन किया।

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ध्वन्यालोक:

यथा वा ‘तर्काभासौ’ इत्यादि[नलोकस्य ‘नानास्क्रियमदृश्योः’ इत्यादि-श्लोकापेक्षया]न्यत्वम् ॥२॥

‘युक्त्यनयानुसर्तव्यो रसादिर्षडुविचारः’ ।

बहुविचारोडयं रसभावतदाभासतत्प्रशमलक्षणो मार्गो यथास्वं विभावानुभावप्रसिद्ध-

कलनेन, यथोक्त प्राप्तुं से संबन्ध एवानयायुक्त्यनुसर्तव्यः । येषां रसादिराश्रयो ‘काव्य-

मार्गो: पुरातनै: कविमि: सहृदयसंल्यैरसंल्यैर्वा बहुप्रकारं शुणन्त्वान्मतोऽप्यननत्तामेति । रसभावादीनां हि प्रत्येकं विभावानुभावव्यभिचारिसामग्रयादपरिमिततत्वम् । तेषां चैकैकप्रभेदापेक्ष्यापि तावज्जगदृत्तसुपनिबन्ध्यमानं सुकविमिरविच्छायाशादनयथा स्थित-

मध्यनयथैव विवर्तते । प्रतिपादितं चैतच्चित्रविचारावसरे ।

विषय बनती है । और उस रसके आस्वादमें कोई प्रतिबन्धक नहीं है । अतएव असंलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य-

ध्वनिके साम्राज्यके कारण इसमें अपूर्र्वता प्रतीत होती है ।

अथवा जैसे ‘तरकाभासौ’ इत्यादि [पृ० ९२ पर दिये हुए] श्लोककी ‘नाना-

भक्ति[श्रमदृश्योः’ इत्यादि [प्राचीन]श्लोककी अपेक्षा[असंलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्यध्वनिके प्रभावसे]

अपूर्वता प्रतीत होती है ॥

इसी प्रकार अत्यन्त विस्तृत रसादिका अनुसरण करना चाहिये । जिसके

आश्रयसे परिमित काव्यमार्ग भी अनन्तताको प्राप्त हो जाता है ॥३॥

जैसा कि पहिले कह चुके हैं, रस, भाव, तदाभास और तत्प्रशमलुप [रसादि]

मार्ग अपने विभाव, अनुभाव, व्यभिचारिभावके आश्रयसे अनेक प्रकारसे अत्यन्त विस्तृत हो जाता है ।

अथवा असंलक्ष्य प्राचीन कवियों द्वारा नाना प्रकारसे शुण्ण होनेसे परिमित काव्यमार्ग

भी अनन्तताको प्राप्त हो जाता है ।

रस, भावादिमेंसे प्रत्येक [अपने-अपने] विभाव, अनुभाव, व्यभिचारिभावके

आश्रयसे अपरिमित हो जाता है । उनमेंसे एक-एक भेदकी हदिसे भी सुकवियों द्वारा वर्णित जगदृश्यान्त, [वस्तुतः] अन्य रूपमें स्थित होते हुए भी उन [कवियों] के रृ्छा-

नुसार अन्य रूपसे प्रतीत होता है । यह बात चित्र [काव्य] के विचारके अवसरपर

[ततीय उच्यते धर धीं कारिकाके ‘भावान्चेतनान् चेतनवत्’ इत्यादि परिकर-

श्लोकमें] कह चुके हैं ।

१. ‘दृशा’ नि०, श्री० ।

२. ‘रसादिद्वहुविचार:’ नि० ।

३. ‘मियो’ बा० मि० ।

४. ‘दृशा’ नि०, श्री० ।

५. ‘मितोडप्यननत्तामेति’ बा० मि० ।

Page 384

कारिका ४ ]

चतुर्थ उचोतः

३४९

गाथा वात्र कवितैव महाकविना— अतहिठ्ठिए वि तहसंठिए व्व हिअअम्मि जा पिवेसेइ । अत्यविसेसेण सा जइअ विकटविगोचरा वाणी ॥ [यथा स्थितानापि तथात्स्थामिनव हृदये या निवेधयति । अर्थविश्लेषणान् सा जयति विकटविवोचरा वाणी ॥ इति च्छाया] तदित्थं रसभावाद्याश्रयेण काव्यार्थानामाननत्यं सुप्रतिपादितम् ॥३॥ एतदेवोपपादयितुमुख्यते— हस्तप्रेक्ष्योऽपि अर्थः काव्ये रसपरिग्रहान्न । सर्वे नवा इवाभान्ति मधुमास इव द्रुमाः ॥४॥ तथा हि विवक्षितान्यपरवाच्यस्यैव शब्दशक्त्युद्भवात्परुणनहपठ्यकृत्प्रकारसमाश्र- येण नवताम् । यथा— ''घरणीघारणायधुना त्वं शेष'' इत्यादेः, शेषो हिमगिरिस्थवडच्च महान्तो गुरवः स्थिराः । यदलंकिस्तमर्यादारचचन्न्ती 'विश्रथ्य भुवम्' ॥ इति विषयमे महाकवि [राघववह्न अथवा किसी अन्य ] ने गाथा भी

बनायी है— जो उस [रमणीय] रूपमें [वस्तुतः] स्थित न होकर [मुख मादि] पदार्थ- विशेषोंको भी उस [लोकोत्तररमणीय] रूपमें स्थित-सा हृदयमें जमा देती है । महा- कवियोंकी वह वाणी सर्वोत्कृष्ट है । इस प्रकार रस, भाव आदिके आश्रयसे काव्यार्थ अन्त हो जाते हैं यह बात भली प्रकार प्रतिपादित हो गयीं ॥३॥ इसीका उपपादन करनेके लिप कहतत हैं— वसन्त ऋतुमें वृक्षोंके समान काव्यमें रसको पाकर पूर्वदृष्ट सारे पदार्थ मी नये-से प्रतीत होने लगते हैं ॥४॥ उदाहरणके लिये विवक्षितान्यपरवाच्यव्युत्पत्तिरूप संलक्ष्यक्रम- व्यङ्ग्य मेदसे' आश्रयसे नवीनता [की प्रतीति का उदाहरण], जैसे— 'शृण्वीके धारण करनेके लिये अब तुम 'शेष' हो !' इसीका व्याख्या—पृ० १२४ पर हो चुकी है । यहाँ यथानुरूप राजाकी उपमा शेष- शान्तुनुबन्ध अलङ्काररपनि रूपमें व्यक्तव्य है । उसके कारण यहीं, लगभग इसी भावके प्रतिपादक अगले प्राचीन श्लोककी अपेक्षा नवीन प्रतीत होता है । शोभनाग, धिमालय और तुम महान् [विपुल आकारवाले तथा महत्त्वशाली] गुरु [भूभारसाहनक्षम और प्रतिष्ठित] और स्थिर [अवड तथा हदप्रतिष्ठ] हैं । क्योंकि मर्यावाका अतिक्रमण न करते हुए, चलायमान [कम्पायमान और सामाजिक मर्यावासे न्युत तोलो हु] पृथ्वीको धारण [तथा पालन] करते हैं ।

१. 'विश्रथ्य' बा० मि० । २. 'स्थितिस्' मि०, बी० ।

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ध्वन्यालोक:

इत्यादिषु सत्स्वपि ।

तस्यैवार्थशक्त्युद्भवातुरणनरूपकयुज्‍नयसमाश्रयेण नवत्वम्, यथा—

"पर्ववादिनि देवर्षौ" इत्यादि श्लोकस्य,

कृते वक्रोक्त्यालापे कुमार्यः पुलकोद्गमैः ।

सूच्यन्ति स्मृहामन्तर्लज्ज्जयावनततananा: ॥

इत्यादिषु सत्सु ।

अर्थशक्त्युद्भवातुरणनरूपकयुज्‍नय यस्य कविप्रौढोक्तिनिर्भितशरीरत्वेन नवत्वम्,

यथा—

"सज्जइ सुरहिमासो" इत्यादि;

सुरभिसमये प्रहत्ते सहसा प्रादुर्भवन्ति रमणीयाः ।

रागवतासुल्ललिताः सहैव सहकारललिताभिः ॥

इत्यादिपु सत्स्वपूर्ववत्समेव ।

इत्यादिके होनेपर भी [पूर्वोक्त 'धारणाधारणायाधुना त्वं शोष:' इत्यादि उदाहरणों में नूतनता प्रतीत होती है, क्योंकि उसमें शब्दशक्त्युद्भवा अलंकारच्‍वनिका कारण अभिनव चारुत्व आ गया है]।

उसी [विवक्षितान्यपरवाच्य] के अर्थशक्त्युद्भवरूप संलक्ष्यपक्रमवयवकृत्य [मेद] के आश्रय से नवीनता [का उदाहरण] जैसे—

'पर्ववादिनि देवर्षौ' इत्यादि [पृष्ठ १३५पर दिये हुए श्लोक] की,

वर्गकी चर्चाके अवसरपर रज्‍जासे मुख नीचा किये हुए कुमारियाँ पुलकोंके

उद्र्रमसे ही आन्तरिक इच्छाको अभिव्यक्त करती हैं ।

इत्यादिके रहनेपर भी [इस श्लोकमें रज्जा और स्मृहा वाच्यरूपमें कथित होनेसे उतनी चमत्कारजनक नहीं प्रतीत होती हैं । 'पर्ववादिनि' इत्यादि श्लोकमें वे ही

अर्थशक्त्युद्भवच्‍वनिरूप व्यङ्‍ग्यके सम्बन्धसे, विशेष चमत्कारजनक होनेसे, अपूर्व प्रतीत होती हैं]।

अर्थशक्त्युद्भवसंलक्ष्यपक्रमवयवकृत्य कविप्रौढोक्तिसिद्ध मेदसे नवीनता । जैसे—

'सज्जयति सुरभिमासो' इत्यादि [पृष्ठ १३७ पर उद्धृत] श्लोको—

वसन्त ऋतुके आननेपर आश्रमझाड़ियोंके साथ ही प्रणयीजनोंकी रम्य उत्कण्ठापाँ

सहसा आविर्भूत होने लगती हैं।

इत्यादिके रहनेपर भी अपूर्वत्व ही होता है [यहाँ कविप्रौढोक्तिसिद्ध वस्तुले

मदनविजृम्भणरूप वस्तु व्यङ्‍ग्य दोनोंके कारण नवीन वासना आ जाती है]।

१. 'सत्स्वपि' नि०, द्वि० ।

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कारिका ४ ] चतुर्थ उद्योतः ३४३

अर्थशक्त्युद्भववैचित्र्यनिरूपणपरपय॑स्य कविनिबद्धवक्रोक्तिप्रौढोक्तिनिष्पन्नशरीरतये सति, नवत्वं यथा—

"वाणीअ हत्थियदन्ता:" इत्यादिगाथार्थस्य, करिणीवेहवअरो महं पुंतो एककाण्डविनिबाइड़ । हुअसोहणहिँ तहु कहिँ जइ कण्हकरणिँ वइइ ॥ [करिणीवेधवश्रो मम पुत्र एककाण्डाविनिपाति । हस्तनुस्त्रिया तथा कृतो यथा काण्डकर्णकं वहति ।]एति च्छाया] एवमादिष्वर्थेषु सत्त्वख्यनालोच्यतेव । यथा व्यक्कथंमेदसमाश्रयेण ध्वने: काव्यार्थानां नवत्वंसुप्यते, तथा व्यक्‍कथंमेदसमाश्रयेणापि । तत्तु ग्रन्थविस्तरभयान्न लिख्यते । स्वयमेव सहदयैरम्युद्यम् ॥४॥

अर्थशक्त्युद्भव संलक्ष्यक्रमध्वन्यत्वके कविनिबद्धवक्रोक्तिमौदक्‍किसिद्धरूप होनेपर अभिनवत्व [चारुताप्रतीतिका उदाहरण] जैसे:-- 'वणिजक हस्तिदन्ता:' [पृष्ट १६१ पर उदाहरण] इत्यादि गाथाके अर्थंको— [केवल] एक ही वाणके प्रयोगसे [प्रमत्त हाथियोंको मार्गकर] हस्तिनियोंको विविधा करुणभावने नेते पुतकको उस अवलोकनमें पुणनधून [तिरस्कार, सम्भोग द्वाग] ऐसा [क्षीणवींर्यं] कर दिया है कि [अब वह साज] तृणैर लादे घुमता है । इत्यादि अर्थों [समनार्थंक श्लोकके रहते हुए भी ['वणिजक हस्तिदन्ता:' इत्यादि श्लोकमें कविनिबद्धवक्रोक्तिप्रौढोक्तिसिद्ध व्यक्‍कथ्यके प्रभावसे] नूतनता हो है । जैसे छानिके व्यक्‍कथ्यमेदके आश्रयसे काव्यार्थोंमें नूतनता आ जाती है उसी प्रकार व्यक्‍कथ्यमेदके आश्रयसे भी [हो सकती है], ग्रन्थविस्तारके भयसे उसे नहीं लिख रहे हैं । सहदय [पाठक] उसीको स्वयं ही समझ लें । निर्णयसागरीय तथा दीधिति टीकावाले संस्करणमें 'वणिजक' इत्यादि उदाहरणके पूर्व निम्न-लिखित पाठ और दिया है—

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ध्वन्यालोक:

अन्न च पुनः पुनरुक्तमपि सारतयेदमुख्यते— व्यज्जकव्यङ्ग्ययोरैकभावेऽस्मिन्नविभागे सम्भवत्यपि । रसादिमय एकस्मिन्नकवि: स्पादवधानवान् ॥५॥

अस्मिन्नर्थानन्तराहेतो व्यङ्क्त्र-व्यङ्ग्यैकभावे 'विचित्र शब्दानां' सम्भवत्यपि कविपूर्व- थेलाभार्थीं रसादिमय एकस्मिन् व्यङ्क्त्र-व्यङ्ग्यैकभावे यत्नादवदधाति । रसभावतदाभासरूपे हि व्यङ्क्त्र-यतदूत्रव्यङ्ग्यशु च यथानुपदिष्टश्रुतु वाङ्पदवाक्यवाक्यांशवाक्यार्थहितमनसः कवेः सर्वमपूर्वं काव्यं सम्पद्यते । तथा च रामायणमहाभारतादिषु सकृदामोदय पुनः पुनर- मिहिता अपि तवनवः प्रकाशन्ते । प्रबन्धे चात्र रस एक एवोपनिबध्यमानोऽर्थविशेषलभ्यैः ह्लादातिशयैः च पुष्टिमति । कस्मिंश्चिदेति चेत्, यथा रामायणे यथा वा महाभाग्नेते । रामायणे हि करुणो रसः

"कैश्चिद्वचसे शोमायमान बालिकाओंके स्तन क्यों-ज्यों बढ़ते है त्यों-त्यों अवशप्राप्त कामदेव हृदयमें प्रवृष्ट हो जाता है ।"

इस गाथाके अर्थके साथ पुनरुक्ति नहीं होती है । यहाँ द्वितीय इलोकमें वाच्योप्रेक्षा द्वारा यौवनारम्भमें बालिकाओंके हृदयमें मदनके प्रवेशका वर्णन है । परन्तु प्रथम इलोकमें वही अर्थ कवि- निबद्धवक्त्रप्रौढोक्तिसिद्ध वक्र्यरूपसे प्रतीत होनेसे अधिक चमत्कारजनक प्रतीत होता है । काव्यके वाच्यार्थी, अपूर्व [लोकोत्तर चमत्कारपूर्ण काव्य] अर्थकी सिध्दिके लिये, कवि केवल एक रसादिमय वक्रोक्त्यव्यङ्क्यैकभावमें प्रयत्नपूर्वक ध्यान दे । रस, भाव और तदाभास [रसाभास तथा भावाभास] रूप वक्रोक्ति और उसके व्यङ्गयक पूर्वोक्त वर्ण, पद, वाक्य, रचना तथा प्रबन्धमें सावधान कविका सारा ही काव्य अपूर्व वन जाता है । इसीलिये रामायण, महाभारत आदिमें संग्राम आदि अनेक बार वर्णित होनेपर भी [सब जगह] नये-नये-से प्रतीत होते हैं ।

प्रबन्ध [काव्य] में एक ही प्रधान रस उपनिबद्ध होकर अर्थविशेषकी सिध्दि तथा सौन्दर्योतिशयकी पुष्टि करता है । जैसे कहाँ ? यह पूछो तो [उत्तर यह है कि]

१. 'विचित्र' वा० प्रे० । २. 'सकृदामोदय' निः, दी० में नहीं है । ३. 'अपूर्वोल्लासायै' निः, दी० ।

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कारिका '५ ] चतुर्थ उद्योतः ३५९

महाभारतेपि शास्त्रकाव्यतुलुपच्छायान्वयिनि दृश्यते

द्वायिनीसमा्सिमुपनिबन्धनता महामुनिना वैराग्यजननतात्पर्यं प्राधान्येन स्वप्रबन्धस्य दर्शयेताम् मोक्षलक्षणं पुरुषार्थः शान्तो रसस्तत्र मुख्यतया विवक्षाविषयत्वेन सूचितः । एतच्चांशेन विवृतमेवान्यैर्योंऽग्राविधेयत्वादिमि । स्वयं चोदरीणं तेनोदरीणमहामोहमतनसझिहीर्षता लोकमतिविमलङ्कानालोकदायिना लोकेनाथेन—

यथा यथा विप्रयेण्ति लोकतन्त्रमसारवत् । तथा तथा विरागोऽत्र जायते नात्र संशयः ॥ इत्यादि बहुशः कथयता । ततस्तु शान्तो रसो रसान्तरेर्‌, मोक्षलक्षणं पुरुषार्थः पुरुषार्थान्तरैरस्तदुपसर्जनत्वेनानुगम्यमानोऽङितत्वेन विवक्षाविषय इति महाभारतात्पर्ये मुख्यत्वमेवावभासते । अङाङिभावश्र यथा रसानां तथा प्रतिपादितमेव । पारमार्थिकान्तस्तत्त्वानपेक्षया

जैसे 'रामायण' में अथवा जैसे महाभारतमैं । रामायणमै 'शोकः श्लोकत्वमागतः' कहनेवाले आदिकवि [वाल्मीकि] ने कविता ही करुणरस [का स्वाद्य, प्राघान्य] सूचित किया है और सीताके अत्यन्त वियोगपर्यन्त ही काव्यकी रचना करके उसका निर्वाह भी किया है ।

शास्त्र और काव्यरूप [दोनों] की छायासे युक्त 'महाभारत'में भी यादवों और पाण्डवोंके वीरस विनाशके कारण वैराग्योत्पादनरूप तात्पर्यको मुख्यतया प्रदर्शित करते हुप [व्यास] ने अपने काव्यके वैराग्योत्पादनरूप तात्पर्यको मुख्य रूपसे [इस 'महाभारत' काव्यक] विवक्ष्याका विषय है यह सूचित किया है । अन्य व्यासादिकों भी किसी अंशमें यही द्याख्या की है । और उक्ते हुप घोर अज्ञानाघकारमें निमग्न संसारका उद्धार करनेकी हचछासे उज्जवल ज्ञानरुप प्रकाशको प्रदान करनेवाले विद्वद्ग्राता [व्यासदेव] ने स्वयं भी—

जैसे-जैसे रस विभप्रपञ्चकी असारता और मिथ्यारुपताकी प्रतीति होती जाती है, वैसे वैसे उसके विषयमें वैराग्य होता जाता है इसमें कोई सन्देह मही है । अनेक स्थानोंपर इस प्रकार कहकर प्रकट किया है । इसलिये गुणीभूत अन्य रसोंसे अनुगत शान्तरस तथा गुणीभूत अन्य पुरुषार्थों [धर्म, अर्थ, काम] से अनुगत मोक्षरुप पुरुषार्थ ही मुख्यतया वर्णनीय है यह 'महाभारत'का तात्पर्य स्फुटरुपसे प्रतीत होता है !

[प्रधानरसके साथ अन्य] रसोंका अङाङिभाव जैसे होता है वह प्रतिपादन कर ही चुके हैं । वास्तविक आन्तरगत तत्व [आत्म] की उपेक्षा करके [गौण] अङ्गैरेक प्राधान्यके समान [महाभारत'में वास्तविक प्रधानभूत शान्तरस तथा मोक्षरुप

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ध्वन्यालोक:

शरीयस्येवाऽऽश्रूतस्य रसस्य व स्वप्राधान्येन चारुत्वमप्यविरुद्धम्।

नतु महाभारते यावान्निवक्ष्याविषयः सङ्नतुक्रमण्यां सर्वे एवानुक्रान्तो न चैतत्तत्र हृद्यते, प्रत्युत सर्वपुरुषार्थप्रयोगहेतुत्वं सर्वैरसरगर्भत्वं च महाभारतस्य तस्मिन्नुदेशे स्वशब्दनिवेदितत्वेन प्रतीयते।

अत्रोच्यते—सत्यम्, शान्तस्यैव रसस्याऽऽश्रितत्वं महाभारते, मोक्षस्य च सर्वपुरुषार्थेषु प्राधान्येनैवततत्र स्वशब्दाभिधेयत्वेनोक्तम्, उक्तं च ह्यवलोकने—

'भगवान्वासुदेवश्च कीर्त्यतेनेडत्र सनातनः।'

इत्यस्मिन् वाक्ये।

अनेन ह्यमर्थो व्यङ्ग्यार्थवैन विवक्षितो यदत्र महाभारते पाण्डवादिचरितं यत्कीर्त्य्यते कीर्त्यते। तत्र स देहवसानविरसमविधाप्रपञ्चरुपत्व, परमार्थसत्स्वरुपत्वं भगवान् वासुदेवोऽत्र कीर्त्यते। तम्मात् तस्मिन्नेव परमेश्वरे भगवति भवत भावितवित्तसो, मा भूत विभूतिषु निःसाराशु रागिणो गुणेषु वा नयविनयपराक्रमादिष्वङ्गितु केवलेषु केपुचित्सर्वावितमनःप्रतिनिविष्टधियः। तथा चापे—पद्रयते निःसारतां संसारस्येलगुमेवार्थं योतयन्‌।

पुरुषार्थकी उपेक्षा करके शृङ्गार आदि रस तथा धर्म आदि पुरुषार्थ] रस तथा पुरुषार्थके अपने प्राधान्यसे भी चारुत्व माननेमें भी कोई विरोध नहीं है [परन्तु पारमार्थिक रूपमें वह मूक विचारके सदृश ही होगा]।

[प्रश्न] 'महाभारत'में जितना प्रतिपाद्य विषय है वह सब ही [उसकी] अनुक्रमणीमें क्रमसे [सर्व ही] लिख दिया गया है। परन्तु वहाँ यह [शान्तरस तथा मोक्ष पुरुषार्थका प्राधान्य] दिखाई नहीं देता है। इसके चिपरीत 'महाभारत'का सब पुरुषार्थके ज्ञानका हेतुत्व और सर्वरसयुक्तत्व उस स्थान [अनुक्रमणी] में स्वयं शब्दोंसे सुचित प्रतीत होता है।

[उत्तर] इस विपयमें हम यह कहते हैं कि यह ठीक है, 'महाभारत'में शान्तरसका ही मुख्यत्व और [अन्य] सब पुरुषार्थोंकी अपेक्षा मोक्षका प्राधान्य, ये [दोनों] अनुक्रमणीमें अपने वाचक शब्दोंसे नहीं दिखलाये हैं, परन्तु व्यङ्ग्यार्थरूपसे दिखलाये हैं।

'इस ['महाभारत'] में नित्य वासुदेव भगवान्की कीर्ति गायी गयी है।'

इस वाक्यमें

इस [वाक्य] से यह अर्थ व्यङ्ग्यार्थरूपसे विवक्षित है कि इस 'महाभारत'में पाण्डव आदिके चरित्रका वर्णन जो किया जा रहा है वह सब विरसावसान और अधिच्याप्रपञ्चरूप है। परमार्थ सत्स्वरूप भगवान् वासुदेवकी ही यहाँ कीर्ति गायी गयी है। इसलिए उस परम ऐश्वर्यशाली भगवान्में ही अपना मन लगाओ।

१. 'तत्र सदैवसनविरसमविधाप्रपञ्चरुपत्व, परमार्थसत्स्वरुपपस्तु भगवान् वासुदेवोऽत्र कीर्त्यते' इतना पाठ नि०, की० में नहो है।

२. 'तत्त्व' नि०।

३. 'योत्यवत्' नि०, की०।

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कारिका ४ ] चतुर्थ उद्योतः ३४७

मेवावभासते व्यङ्गचकस्यनुगृहीततरच शब्दः । एवंविधमेवार्थं गभ्भीकृतं सन्दर्शयन्न्तोऽनन्तर-

ललोका लक्षणान्ते । 'स हि सत्यम्' इत्यादयः ।

अयं च निगूढमणीयोडर्थो महाभारतावसानेऽ हरिवंशवर्णनैन समाप्नि विदधता

तेनैव कविवेधसा कृष्णद्वैपायनेन सम्यक् स्फुटीकृतः । अननेन वार्थन संसारातीतं तत्वान्तरे

भक्त्यतिशयं प्रवर्त्तयता सकल एव सांसारिको व्यवहारः पूर्वपक्षीकृतोऽध्यक्षरणं प्रकाशने ।

देवताविशेषाणां च प्रभूतानां च प्रभावातिशयवर्णनेन तस्यैव परत्रदर्शनः प्रास्तुपायत्वेन तादृभूत-

त्वेनैव देवताविशेषणामन्येषां च । पाण्डवादिचरितवर्णनस्यापि वैराग्यजननतत्परत्वेन्त

विभूतियौमें अनुरक्त मत हो । अथवा नीति, विनय, पगक्रल आदि केवल इन क्रिन्द्रों

गुणामें पूर्णरूपसे अपने मनको मत लगाओ । और आगे—'संसारको दिस्मार्गनाद्दो

देवो' इसी अर्थको व्यक्नयङ्गक शक्तिसे युक्त रान्द्र अभिव्यक करत हुए प्रनीत

होते हैं। इसी प्रकारके अनन्तनिहित अर्थकां प्रकट करनवाले आगेके 'स हि सत्य'

इत्यादि श्लोक दिखलाई देते हैं ।

अनुक्रमणीके वें वेदाः योंगः सविज्ञाना धर्मात्म्यं काम एव च ।

लोकयात्राविधानां च सर्वे तदु द्रष्टवान् ऋषिः ।

इतिहासाः सर्वशास्त्रस्य विविधाः श्रुतयोऽपि च ।

इहु सर्वमनुक्रान्तमुच्युक्त ग्रन्थस्य लक्षणम् ॥

इत्यादिमें सर्वपुरार्थकें प्रतिपादनका वर्णन है। वे प्रन्थकर्त्तक अभिमत श्लोक हैं। उत्तर-

पक्षकी ओरसे निर्दिष्ट श्लोक निम्नलिखित हैं—

स हि सत्यमृतं नैव पवित्रम् पुण्यमेव च ।

शाश्वतं व्रतं परमं ध्रुवं ज्योति: सनातनम् ।

यस्य दिव्यैः कमैः कध्यन्ति मन्त्राणि: ॥

इस निगूढ यौर्थ और रमणीय अर्थको 'महाभारत'के अन्तमें हरिवंशक वर्णनसे समाप्ति-

की रचना करते हए उन्हीं कविप्रजापति कृष्णद्वैपायन [व्यास] ने ही भली प्रकार

स्पष्ट कर दिया है। और इस अर्थसे लोकोंत्तर भगवत् तत्वमें प्रगाढ भक्तिको प्रवृत्त

करते हए [महाकवि व्यास] ने समस्त सांसारिक व्यवहारको ही पूर्वपक्षरूप [प्रतिपादित

विषय] बना दिया है यह वात प्रत्यक्ष प्रतीत होती है। देवता, तीर्थ और तप आदिके

प्रतिपायक प्रभावक वर्णन उसी परब्रह्मक्री प्रातिका उपाय होनेसे ही और उसकी

विभूतिरूप होनेसे देवताविशेषोंका वर्णन [महाभारतमैं किया गया] है। पाण्डव

आदि के चरित्रक वर्णनका भी वैराग्योत्पादनमें तात्पर्य होनेसे और वैराग्यक मोक्षहेतु

१. 'व्यपेक्षण' वा० प्रि० — ।

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ध्वन्यालोक:

वैराग्यस्य व मोक्षमूलत्वान्मोक्षस्य व भगवद्भक्त्युपायत्वेन मुख्यत्वया गीताविषु प्रदर्शितत्वात् परमार्थप्रतिपाद्यत्वमेव परम्परया।

तद्वासुदेवादिसंक्रामणप्रधियेत्वेन चापरिमितशक्त्यास्पदं परं ब्रह्म गीतादिप्रदेशन्तरेषु तद्विषयानत्वेन लड्धप्रसिद्धं माधुरप्रादुर्भावानुचृतसकलस्वरूपं विवक्षितं न तु माधुरप्रादुर्भावांश एव, सनातनशब्दविशोषितत्वात्। रामायणादिषु चान्या संज्ञा या भगवन्मूर्त्यन्तरे व्यवहारदर्शनेनात्। निपीततर्वायामर्थ: शाब्दतत्त्वविदांद्रिेव।

तदेवमभुक्कर्मणानिर्दिष्टेन वाक्येन भगवद्वैशिष्ट्यमेकिण: सर्वस्व्यान्यस्यैनित्यतां प्रकाशयतता मोक्षलक्षण एवैक: पर: पुरुषार्थ: शाशनये, काल्यनये व ऋषणाक्षयसुख-परिपोषलक्षण: शान्तो रसो महाभारतस्याधिक्येन विवक्षित इति सुप्रतिपादितम्।

अत्यान्तसारभूतत्वाच्चायमर्थों ध्यकृत्प्रसिद्धेनैव दर्शितो, न तु वाच्यत्वेन। सारभूतो ह्यार्थ: स्वशब्दानभिधेयत्वेन प्रकाशित: सुतरामेव शोभामावहति। प्रसिद्धिरचेयंस्त्येय तथा नेक्षिक्ने मुख्यत: परद्रष्ट्रिक्या प्रामिका उपायरूपसे गीतादिमें प्रतिपादन होनेसे परम्परया [पाण्डवदि:चरितवर्णनं भी] परद्रष्ट्रिक्या प्रामिके उपायरूपमें ही है।

'वासुदेव' आदि इन संज्ञाओंका वाच्यार्थ, गीतादि अन्य स्थलोंमें इस नामसे प्रसिद्ध, अपनिमित शक्तियुक्त, मधुरगिरि प्रादुर्भूत [कृष्णावतार] द्वारा धारण किये [रामादि] समस्त रूपयुक्त, परद्रष्ट्र हि अभिप्रेत है। केवल मथुरामें प्रादुर्भूत [वासुदेवके पुत्र ऋषण] नहीं। क्योंकि उसके साथ सनातन विशेषण दिया हुआ है। और रामायण आदिमें इस [वासुदेव] नामसे भगवान्के अन्य स्वरूपोंका भी व्यवहार दिखलाते देता है। शाब्दतत्वके विदोषकों [वैयाकरणों] ने इस विषयका निर्णय भी कर दिया है।

'कृथ्यन्थकवृणिकुरुम्प्रस्च' इस पाणिनिसूत्रके भाष्यपर 'महाभाष्य'के टीकाकार कैयटनने लिखा है—

"कथम् पुननिर्यानां ध्वादानामनित्यानांशकादिवंशाश्रयेगान्वाख्यानं मुज्यते ? अन्र समाधि: । त्रिपुरुषान्कु नाम कुयादिति न्यायेनाशकादिवंशा अपि नित्या एव । अथवाॅडनित्योपाश्रयेगांपि नित्यान्वाख्यान हर्यते। यथा दाकाश्रयेण कालस्य।"

इसी सूत्रपर काशिकाकारतने लिखा है कि—

"ध्वान्दा हि नित्या एव सन्तोडनन्तरं काकतालीयवशात् तथा सङ्केतिता:"

इस प्रकार भगवान्को छोड़कर अन्य सब वस्तुमोंकी अनित्यता प्रकाशित करनेवाले अनुकमणीनिर्दिष्ट वाक्यसे, शांतरसइसे केवल मोक्षरूप परम पुरुषार्थ [ही 'महाभारत'का मुख्य पुरुषार्थ], और काव्यदृष्टिसे ऋषणाके क्षयसे जन्य सन्तोपसुखके परिपोषरूप शान्तरस ही 'महाभारत'का प्रधान रस अभिप्रेत है। यह मती प्रकार प्रतिपादन कर दिया गया।

अत्यन्त साररूप होनेसे यह अर्थ ['महाभारत'में शान्तरस यौर मोक्ष पुरुषार्थका प्राधान्य] ध्यकृत [व्यनि] रूपसे ही प्रदर्शित किया है, वाच्यरूपसे नहीं। सारभूत अर्थ

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कारिका ५ ] चतुर्थे उद्योत: ३४९

विदग्धाविदग्धतपरिषत्सु यद्भिमततयां वस्तु व्यक्तं यत्प्रकाशयते न साक्षाच्छब्दवाच्यत्वेनैव । तस्मातिशयितमेतत्—अर्थीभूतरसाश्रयेण कार्ये क्रियमाणे नवनवार्थीभोभवति बन्धच्छायां च महती सम्पघते इति ।

अत एव च रसादिगुणार्थविशेषोपनिवन्धनमलङ्कारान्तरविहितेऽपि छायातिश्रययोगिलक्षणे हरयते । यथा—

सुनिर्जयति योगीन्द्र्रो महात्मा कुम्भसंभवः । येनैकचुलुके दृष्टौ तौ मत्स्यकच्छपौ ॥

इत्यादौ । अत्र हृदयसुत्तरसादिगुणमेकचुलुके मत्स्यकच्छपदर्शनं छायातिश्रयपुष्टनाति । तत्र श्रेकचुलुके सकळजलनिधिसन्निधानादपि दिव्यमत्स्यकच्छपदर्शनंमाक्षुण्णत्वाद्दुसुतरसादिगुणतयां । क्षुण्णं हि वस्तु लोकप्रसिद्धयादुसुतमपि नाश्रयैककारिभवति । न चाक्षुण्णं वस्तूपनिबध्यमानमदुसुतरसयैवानुग्रणं यावद्रसान्तरस्यापि ।

तद् यथा—

सिजइ रोमञ्चिअ वेइअ रच्छआतुलगपडिलग्गो । सो पासो अण्ण वि' सुहअ तीहु जेणासि बोलीओ ॥ [सिध्यति रोमाञ्च्यते वेपते रथ्याग्रप्रतिलग्नः । स पासोऽन्योऽपि शुभस्त्रीभिर्येनास्यतिक्तान्तः ॥ इति छाया ]

अपने वाचक शब्दोंसे वाच्यार्थरूपमें उपस्थित न होकर [व्यङ्गच-रूपसे] प्रकाशित होता है तो अत्यन्त शोभाको प्राप्त होता है । चतुर विद्वानोंकी मण्डलीमें यह प्रसिद्ध है ही कि अधिक अभिमत वस्तु व्यक्त-रूपसे ही प्रकाशित की जाती है, साक्षात् वाच्यरूपसे नहीं। इसलिये यह सिद्ध हुआ कि प्रधानभूत रसादिवके आश्रयसे काव्यककी रचना करनेपर नवीन अर्थकी प्राप्ति होती है और रचनाका सौन्दर्य बहुत अधिक बढ़ जाता है ।

इसीलिए अन्य अलङ्कारोंके अभावमें भी रसके अनुरूप अर्थविशेषकी रचनाकाव्योंमें सौन्दर्यातिशयशालिनी दिखाई देती हैं । जैसे—

योगिराट् महात्मा अगस्त्य मुनि [की जय हो] सर्वोत्कृष्ट हैं, जिन्होंने एक ही चुल्लुमें उन दिव्य मत्स्य और कच्छप [अवतारों] का दर्शन कर लिया ।

इत्यादिमें । यहाँ अद्भुतरसके अनुचूल पक चुल्लुमें मत्स्य और कच्छपका दर्शन [अद्भुतरसके] सौन्दर्यको सत्क्षण बढ़ाता है । उसमें पक चुल्लुमें सम्पूर्णसमुद्रके समा जाननेसे भी अधिक दिव्य मत्स्य और कच्छपका दर्शन चित्तकुल अपूर्व्होनेसे अद्भुतरसके अधिक अनुचूल है । लोकप्रसिद्धिसे अत्यन्त अद्भुत होनेपर भी अनेक वार्तिकी देखी-दृश्े वस्तु आश्चर्योत्पादक नहीं होती । अपूर्व वस्तुका दर्शन न केवल अद्भुतरसके अपितु अन्य रसोंके मी अनुचूल होता है । जैसे—

हे शुभग, उस सङ्करी गढ़ीमें [तुलाप्रेण, फक्तालीयेन], अकस्मात् उस [मेरी सखी, नायिका] के जिस पार्श्वसे लगकर तुम निकल गये थे वह पार्श्व अब भी स्वेदयुक्त, रोमाञ्चित और कम्पित हो रहा है ।

१. 'सह भतीह' मि०

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ध्वन्यालोक:

पतदूगाथार्थोद्भाग्यमानादूया रसप्रतीतिरमेवति, सा त्वदृशा स्फुट्यति रसाभासते वेपते इत्येवंविधादर्थात् प्रतीयमानान्नमनागपि नो जायते ।

तदेवं ध्वनिप्रभेदसमाश्रयेण यथा काव्यार्थोऽनवतं जायते तथा प्रतिपादितम् । गुणीभूतव्यङ्ग्यञ्च यस्यापि त्रिमेदव्यङ्ग्यापेक्षया ये प्रकारास्तत्समाश्रयेणापि काव्यवस्तूनां नवत्वं भवत्येव ।

तत्रवतिविस्तारकारीति नोदाहृतम्, सहृदयैः स्वयमुल्लेखनीयम् ।।५।। ध्वनिविवृत्य गुणीभूतव्यङ्ग्यप्रकरस्य च समाश्रयात् । न काव्यार्थोऽरामोदस्ति यदि स्यात्प्रतिभागुणः ।।४।।

सत्त्वपि पुरातनकविप्रबन्धेषु यदि स्यात्प्रतिभागुणः । तस्सिसृक्षसति न किश्चित्कदेवकवेरस्त्वसति । वन्यश्च्छायार्थद्यदयानुरूपशब्दसन्निवेशे दर्थप्रतिभानाभावे कथञ्चुपपद्यते ।

एवं हि सत्त्वर्थोऽनपेक्षितार्थविशेषापेक्षारचनैव वन्यच्छायोति नेदं नेदीयः सहृदयानाम् ।

इस गाथाके अर्थकी भावना करनेसे जो रसकी प्रतीति होती है वह, तुमको देखकर [साक्षात् पाट हो भी है, डरकर] वह [नायिका] स्वेदयुक्त, पुलकित और कम्पित होती है, इस प्रकारके प्रतीयमान अर्थसे बिल्कुल नहीं होती है । [तयं दृष्ट्वा स्फुट्यति इत्यादि अर्थ चिरपरिचित है और] उसके व्यङ्गच होनेपर भी उतना चमत्कार नहीं प्रतीत होता [जितना उपरके श्लोकमें वर्णित नवीन कल्पनायुक्त अर्थके व्यङ्गच होनेपर प्रतीत होता है] ।

इस प्रकार ध्वनिभेदोंके आश्रयसे जिस प्रकार काव्यार्थोंमें नवीनता आ जाती है वह प्रतिपादन कर दिया । तीन प्रकारके व्यङ्गच [रसादि, वस्तु तथा अलङ्कारकी] दृष्टिसे गुणीभूतव्यङ्गचके भी जो भेद होते हैं उनके आश्रयसे भी काव्यवस्तुओंमें नवीनता आ जाती है । वह [उदाहरण देनेपर] अत्यन्त विस्तारजनक है । इसलिये उसके उदाहरण नहीं दिये हैं । सहृदयोंको स्वयं समझ लेना चाहिये ।।५।।

यदि [कविमें] प्रतिभागुण हो तो इस प्रकार ध्वनि और गुणीभूतव्यङ्गचके आश्रयसे काव्यके [वर्णनीय रसणीय] अर्थोंकी कभी समासि ही नहीं हो सकती है ।।६।।

प्राचीन कवियोंके प्रबन्धों [काव्यों] के रहते हुए भी, यदि [कविमें] प्रतिभागुण है [तो नवीन वर्णनीय रसणीय] तत्त्वोंकी समासि नहीं हों सकती हैं । और उस [प्रतिभा] के न होनेपर तो कविको [पास] कोई वस्तु नहीं है [जिससे वह अपूर्व चमत्कारयुक्त काव्यक निर्माण कर सके] । दोनों अर्थों [ध्वनि तथा गुणीभूतव्यङ्गच] के अनुरूप शब्दोंके सन्निवेशरूप, रचनाका सौन्दर्य भी [आवश्यक] अर्थकी प्रतीति [प्रतिभा, प्रतिभान] के अभावमें कैसे आ सकता है ? [ध्वनि अथवा गुणीभूतव्यङ्गच] अर्थकी अपेक्षाकं बिना ही अक्षरोंकी रचनामात्र ही रचनाका सौन्दर्य [रचना सौन्दर्यजनक] है यह बात सहृदयोंके [हृदयके] समीप नहीं पहुँच सकती । पेसा होनेपर [ध्वनि अथवा गुणीभूतव्यङ्गचके

१. 'प्रतीयमानान्नमनान्ना' क्त्रा ।

२. 'सन्निवेशोऽर्थ' बा प्रि० ।

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ध्वन्यालोक

आचार्य आनन्दवर्धन

डॉ. महावीर सरन जैन

मोतीलाल बनारसीदास

कारिका ७ ]

चतुर्थ उद्योतः

३४९

नपेक्ष्यचतुरसधुरवचनतचानाथामपि काव्यव्यपदेशः प्रवर्तते। शब्दार्थयोः साहित्येन काव्यत्वं कथं तथाविधे विषये काव्यव्यवस्थेति चेत्, परोपनिबद्धार्थविरचने यथा तत्त्काव्यत्वव्यवहारस्तथा तथाविधानां काव्यसन्दर्भाणाम्॥६॥

न वार्थान्त्यं व्यङ्ग्यार्थापेक्षयैव, यावद्वाच्यार्थापेक्षयापि प्रतिपादयितुमुच्यते—

अवस्थादेशकालादिविशेषैरपि जायते ।

आनन्त्यमेव हि वाच्यस्य शब्दस्यापि स्वभावतः ।६७॥

शब्दस्यापेक्षितव्यङ्ग्यस्यापि स्वभावतः । स्वभावो हृदयसंवादीत्युक्तं वाच्यस्यानन्त्यमेव जायते स्वभावतः । स्वभावो हृदयसंवादिनामचेतनानां चेतनानां च वच् यदवस्थामेदादेशमेदात्मलक्षणयमेदाद्वा—

ननुता भवति । तैश्च तथा व्यवस्थितैः सङ्कीर्णः प्रसिद्धानेकस्वभावालुसरणहरूपया स्वभावो—

कस्यापि तावदुपनिबध्यमानैर्निबन्धैः काव्यार्थः सम्पद्यते । तथा ह्वावस्थामेदादन्नवर्तं यथा—

विना भी अक्षररचनामात्रद्वे रचनामें सौन्दर्य माननेसे] तो अर्थहीन [ध्यनि, गुणीभूत-व्यङ्ग्य अर्थसे रहित] चतुर [समास आदि रूपसे सुसंस्कृत] और मधुर [मृदुलोक्तिमल अक्षरोंसे परिपूर्ण] रचनाओंमें भी काव्यत्ववयवहार होने लगेगा । शब्द और अर्थ दोनोंके सहयोग [साहित्य] में ही काव्यत्व होता है इसलिये उस प्रकारके [अर्थहीन, चतुर, मधुर रचना] विषयमें काव्यत्वकी व्यवस्था कैसे होगी [अर्थात् काव्यव्यवहार प्राप्त नहीं होगा] यह कहैं तो [उत्तर यह है कि] दूसरेके [मतमें] उपनिबद्ध [शब्दानिरपेक्ष उत्तम् शुद्धस्यापेक्षितव्यङ्ग्यस्यापि स्वभावतः ।६७॥

केवल व्यङ्ग्य अर्थके कारण ही अर्थोंमें सन्नतता [विचित्रता, नूतनता] नहीं आती है अपितु वाच्य अर्थ विशेषकी अपेक्षासे भी [अर्थकी अनन्तता, नूतनता] हो सकती है। इसका प्रतिपादन करनेके लिये कहते हैं—

शुद्ध [व्यङ्ग्य-वाच्य-निरपेक्ष] वाच्य अर्थकी भी अवस्था, देश, काल आदि के वैशिष्ट्यसे अनन्तता हो ही जाती है ।६८॥

शुद्ध अर्थात् व्यङ्ग्य-निरपेक्ष वाच्य [अर्थ] का भी स्वभावतः आनन्त्य हो ही जाता है । चेतन और अचेतन वाच्य अर्थोंका यह स्वभाव है कि अवस्थामेद, देशमेद, कालमेद और स्वरूपभेदसे [उनकी] अनन्तता हो जाती है। उन [वाच्यार्थों] के उस प्रकार [अवस्थादि भेदसे नये-नये अर्थोंके प्रकाशनरूपमें] व्यवस्थित होनेपर अनेक प्रकारके प्रसिद्ध स्वभावोंके वर्णनरूप स्वभावविशिष्टे भी [वाच्यार्थोंकी] रचना करनेपर काव्यार्थी अनन्तरूप हो जाता है। इनमेंसे अवस्थामेदके कारण नवीनता, जैसे—

१. 'प्रवर्तते' नि० ।

२. 'तत्त्काव्यत्वव्यवस्था व्यवहार:' नि० ।

३. 'च' दी० में नहीं है ।

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ध्वन्यालोक:

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वतुर्थ उद्योत:

दृशिंतिमेव चैतन्यशमवाणलीलायाम—

ण अ ताण घडइ ओही ण अ ते दीसन्ति कह वि पुनरुत्ता ।

जे विममा पिआणं अत्था वा सुकइवाणीणम् ।

[ण च तेसिं घटतेहवधिरिण च ते हत्थन्ते कथमपि पुनरुक्कः ।

ये विम्रमा: प्रियाणामर्था वा सुकविबाणीणाम् । इति च्छाया]

अयमपरआवस्थामेदककारो यद्चेतनातां सर्वेषां चेतनं द्वितीयं रूपसमभिव्यनित्व-

प्रसिद्धं हिमवद्गिरिकादिनाम् । तच्चोचितचेतनविषयस्वरूपयोजनयोपनिबध्यमानन्यदेव

सम्पद्यते । यथा कुमारसम्भव एव पर्वतस्वरूपतय हिमवतो वर्णनं; पुनः समासिर्गिरियोक्कियु

चेतनतत्स्वरूपापेक्षया प्रदर्शितं तद्पूर्वमेव प्रतिभाति । प्रसिद्धश्रया सत्कवीनां मार्गः । इदं

च प्रस्थातं कविभिर्युप्तत्तये विधमवाणलीलायां सप्रपञ्चं दृशिंतम् ।

चेतनानां च वाल्याद्यावस्थाभिरनन्यतं सत्कवीनां प्रसिद्धमेव । चेतनानामवस्थाभेदे

व्यक्तान्तरावस्थाभेदाभानात्वम् । यथा कुमारीराणं कुसुमशरभिन्नहृदयानमन्यासों च ।

तत्रापि विनीतानामभिनीतानां च ।

यह एक विरोध वाक्य द्वारा प्रतिपादित कर दिया है । इसके बाद जो ‘विपमवाणलीला’ का उदाहरण दिया है उसका सम्बन्ध इस वाक्यसे नहीं अपितु पूर्ववाक्यसे है, यह समझना चाहिये । तभी उसकी सङ्गति ठीक होगी । इसीलिए हमने उसे अलग-अलग अनुच्छेदके

स्पष्टमें रखा है । पहिले अनुच्छेदके साथ मिलाकर पाठ नहीं रखा है ।

यह हम ‘विपमवाणलीला’ में दिखला ही चुके हैं—

प्रियतमाओं [अथवा प्रियजनों] के जो हाव-भाव और सुकवियोंकी वाणीके जो

अर्थ हैं इनकी न कोई सीमा ही वन सकती है और न ये [किसी भी दर्शामें] पुनरुक्त

प्रतीत होते हैं ।

अवस्थाभेदक यह और [दूसग] प्रकार भी है कि हिमालय, गिरि आदि सभी

अचेतन पदार्थोंका [अभिमानी देवता] रूपमें दूसग चेतनरूप भी प्रसिद्ध है । और वह

उचित चेतन विषयके स्वरूपयोजनसे उपनिबद्ध [प्रथित] होकर [अचेतन रूपसे भिन्न]

कुछ और ही हो जाता है । जैसे ‘कुमारसम्भव’ में ही [आरम्भमें] पर्वतरूपसे हिमालय

का वर्णन [है], फिर सर्षपियोंके प्रिय वचनों [जातृकियों] में उस [हिमालय] के चेतन

स्वरूपकी द्योतन प्रदर्शित वह [हिमालयका] चेतन [कुमार] योनि [अथवा सा प्रतीत

होता है । और सत्कवियोंमें यह मार्ग [अचेतनोंके चेतनस्वरूप वर्णनका मार्ग] प्रसिद्ध ही

है । कवियोंकी सृयत्पत्तिके लिप ‘विपमवाणलीला’ में इस मार्गको हमने विस्तारपूर्वक

प्रदर्शित किया है ।

चेतनोंका वाल्य आदि अवस्थाभेदसे भेद सत्कवियोंमें प्रसिद्ध ही है । चेतनोंके

अवस्थाभेदके [वर्णन] में अवान्तर अवस्थाभेदसे भी भेद हो सकता है । जैसे कामके

वाणसे विद्ध हृदयवाटी तथा अन्य [स्वस्थ] कुमारियोंका [व्यक्त अवस्थाभेदसे] भेद

होता है । उनमें भी विनीत [नम्र] और उद्दृड्कूल [कन्याओं] का [अवान्तर अवस्था आदिके

भेदसे नानात्व हो जाता है] ।

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ध्वन्यालोक:

अचेतनानांच भावानामारम्भसाधवस्थामेदभिदानामेकैकशः स्वरूपसुपनिबध्यमानमानमान्न्यमेवोपयाति । यथा—

हंसानां निनदेषु यैः कवलितैरासज्यते कूजतामन्यः कोकिल कषायकण्ठकलुठितनादाघर्षैरौ विद्रुमः ।

ते सम्र्रत्यपठोरवारणवधून्तनादकुचरस्चिनो नियतार* कमलाकरेषु निमित्तीकृतद्विप्रसक्तया ।। एवमन्यत्रापि विश्नानयातुसरत्वव्यम् ।

देशभेदाज्जानात्वमचेतनानां तावत्, यथा वायूनां नानादिग्देशचारिणामनन्यैः सलिलकुसुमादीनां प्रतिसंमेदम् । चेतनानामपि मानुषप्रभुपक्षिप्रभृतीनां प्रामाणण्यसलिलादिसंमेदितानां परस्परं महाविशेषः सङुपलक्ष्यत एव । स च विविच्य यथायथमुपनिबध्यमानस्तयैवावनत्यमायाति । तथा हि—मानुषाणामेव तावदिग्देशादिभिन्नानां ये व्यवहारेप्यापारादिपु विचित्रा विशेषास्तेषां केनान्तः शक्यते गन्तुम्, विशेषतयोध्यताम् । उपनिबध्यते च तत्सर्वमेव मुखविमिययथाप्रतिभम् । कालभेदाद्वा नानात्वम् । यथतुंभेदादिगुणोमसिलिलादीनामचेतनानाम् । चेतनानाम्

आरम्भ आदि अवस्थाभेदसे भिन्न अचेतन पदाथोंका स्वरूप [भी] अलग-अलग वर्णनसे अनन्तताको प्राप्त हो ही जाता है । जैसे—

जिनके झानेंसे कूजते हुए हंसोंके निनादोंमें, मधुर कण्ठके संयोगसे, घर्घर ध्वनि युक्त कुछ नया ही [अपूर्व ही] विभ्रम उत्पन्न हो जाता है, करिणीके नये कोमल वन्त्राकुरोंसे स्पर्धा करनेवाली मृणालकी वे नवीन ग्रन्थियाँ इस समय तालावोंमें वादिर निकल आयी हैं।

यहाँ मृणालकी नवीन ग्रन्थियोंके आरम्भका वर्णन होनेंते अवस्थाभेदमूलक चमत्कार प्रतीत होता है ।

इस प्रकार और जगत् भी इस मार्गका अनुसरण किया जाना चाहिये । देशभेदसे पहिले अचेतनोंका भेद जैसे [मधय आदि देशा और दक्षिण विशाओं]

विमिश्र विशाओंों, अथत् स्थानों संस्कारों करनेंवाली पवनाके और अन्य एल तथा पुष्प आदिका भी भेद प्रसिद्ध ही है । चेतनोंमें भी ग्राम, अरण्य, जल आदिमें पले हुए मृपु, पशु, पक्षी प्रभृतिमें परस्पर भेद् विश्लष्त ही वेता है । वह भी विचारपूर्वक ठीक ढंगसे वर्णित होनेंपर उसी प्रकार अनन्त हो जाता है । जैसे नाना दिग्‌, देश भादिसे

विमिश्र मषुयोंके ही व्यवसाय और ब्यापार आदिमें जो नाना प्रकारके भेद पाये जाते हैं उन सबका पार कौन पा सक्ता है ? विशेषकर स्रियोंके [विषयमें पार पाना असम्भव ही है]। सुकवि लोग अपनी प्रतिभाके अनुसार उस सबका वर्णन करते ही हैं ।

कालभेदसे भी भेद [होता है]। जैसे ऋतुओंके भेदसे विग‌, आकाश, जल आदि अचेतनका [भेद होता है] और काल [वसन्तादि] विशेषके आभ्यसे चेतनोंके औत्सुक्य

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कारिका ७ ] चतुर्थ उद्योत:

चतुस्तुक्यादयः कालविशेषाश्रयिणः प्रसिद्धा एव । स्वालक्षण्यप्रभेदाश्र्च सकलजगद्वतां वसूनां विनिबन्धनं प्रसिद्धमेव । तस्म यथावस्थितमपि तावत्प्रनिबध्यमानमननततामेव काव्यार्थेस्यापादयति ।

अत्र केचिदाचक्षिरे । यथा सामान्यात्मना वस्तूनि वाच्यतां प्रतिपद्यन्ते, न विशेषात्मना । तानि हि स्वमतुमूर्तानां सुखादीनां तथाभिमित्तानां च स्वरूपमन्यत्रारोपयन्निद्रः 'स्वपरानुभवरूपसामान्यमात्राश्रयेपानिबध्यान्ते कविभिः । न हिु तैरसीतननागतम्‌ वर्तमानमनु च परचित्तादिस्वलक्षणं योगिभिरिव प्रत्यक्षीक्रियते । तस्यानुभाव्यानुभावकसामान्यं सर्व-प्रतिपत्तृसाधारणं परिमितत्वात्पुरातनतमानामेव गोचररीभूतम्‌ । तस्य विषयत्वानुपपत्तेः । अत एव स प्रकारविशेषो यैरध्यतनैरभिनवत्वेन प्रतीत्यते तेषां भ्रममात्रमेव, भणितिकृतं वैचित्र्यमात्रमनास्तीति

तद्रोच्यते । यत्किं सामान्यमात्राश्रयेप काव्यप्रवृत्ति;, तस्य च परिमितत्वेन प्रागेव गोचररीकृतत्वाप्राप्ति नवत्वं काव्यवस्तूनामिति । तद्युक्तम्‌ ।

यतो यदि सामान्य-आदि प्रसिद्ध ही हैं । समस्त संसारकी वस्तुओंमें अपने स्वरूप [स्वालक्षण्य] भेदसे [काव्यमें] विशेष वर्णन प्रसिद्ध ही है । और वह [स्वरूप] जैसा कुछ है उसी रूपमें उपनिबद्ध होकर भी काव्यके विषयकी अनन्वताको उत्पन्न करता है । [पूर्वपक्ष] यहाँ [स्वालक्षण्ययुक्त भेदक विषयमें] कुछ लोग कह सकते हैं कि—कस्तुपाँ सामान्य रूपसे ही वाच्य होती हैं, विशेष रूपसे नहों । कवि लोग उन स्वंयं अनुभूत सुखादि वस्तुओं और उन [सुखादि]के साधनों [राग, चन्दन, वनिता आदिके स्वरूपको अन्यत्र [नायकादिमें] आरोपित करके अपने और दूसरों [नायकादि]के अनुभूत सामान्यमात्रके आश्रयसे उन [नायकादिके सुखादि और उसके साधनों]का वर्णन करते हैं। वे [कवि लोग] योगियोंके समान अतीत, अनागत, वर्तमान दूसरॉंके चित्त [व्यकियों और उनमें रहनेवाले सुख-दुःख] आदिका प्रत्यक्ष नहीं कर सकते हैं । और समस्त देखनेवालोंको एक क्रमसे प्रतीत होनेवाले वे अनुभाव्य [सुखादि] तथा अनुभावक [उस सुखादिके साधन राग, चन्दन चनितादि] सामान्य, परिमित होनेसे प्राचीनों [कवियों]को ही ज्ञात हो चुके हैं। अन्यथा वे [जनक]े विषय हो नही सकते थे । इसलिये उस [स्वालक्षण्यरूप] प्रकारविशेषको जो आाजकलके लोग अभिनव रूपमें अनुभव करते हैं, वह उनका अभिमानमात्र हो है । या केवल उक्तिवैचित्र्य ही है [वस्तुमें नवीनता नहीं है, उक्तिवैचित्र्यके कारण ही नवीनताका भ्रम या अभिमान होने लगा है । यह पूर्वपक्षका आशय है] ।

[उत्तरपक्ष] उस विषयमें हमारा कहना है कि [आपने] जो यह कहा है कि सामान्यमात्रके आश्रयसे काव्यरचना होती है और उस [सामान्य]का ज्ञान पहिले ही [कवियों]को हो चुका है अतएव काव्यवस्तुओंमें नवीनता नहीं हो सकती है । यह [कथन] उचित नहीं है । क्योंकि यदि सामान्यमात्रके आश्रयसे काव्यक रचना होती है तो

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ध्वन्यालोक:

मात्रामात्रित्य काव्यं प्रवर्त्तते किं कृतस्तर्हिं महाकविनिबन्ध्यमानानां काव्यार्थोनामतिशय: । वाल्मीकिकृतयतिरिक्तस्यान्यस्य 'कविक्रियापदेश एव वा । सामान्यान्यतिरिक्तस्यान्यस्य काव्य-थैस्याभावात् । सामान्यकस्य चारिकविनैव प्रदर्शितत्वात् ।

उक्तिवैचित्र्याद्वैष दोष इति चेत् । किमिव सुकृतिवैचित्र्यम् ? उत्कर्हि वाच्यविशेषप्रतिपादि वचनम् । तदैवैचित्र्ये कथं न वाच्यवैचित्र्यम् ? वाच्यवाचकयोरविनाभावेन प्रवृत्तत्वे: वाच्यानां च काव्ये प्रतिभासमानानां यथ्रूतत्वे 'ग्राह्यविशेषाभेदेनैव प्रतीतते । तेनोक्तिवैचित्र्यवादिना वाच्यपैचि-घ्यमनिच्छताsप्यवश्यमुपगन्तव्यम् ।

महाकवियों द्वारा वर्णित काव्यपदार्थोंमें विशेष तारतम्य किस [कारण] से होता है? अथवा वाल्मीकि [आदिकवि]को छोड़कर अन्य किसेको कवि ही किस आधारपर कहा जाता है? क्योंकि [आपके मतमें] सामान्यकै अतिरिक्त और कोई काव्यकै वर्ण्ये विषय नहीं हो सकता है और सामान्यकका प्रदर्शन आदिकवि [वाल्मीकि] ही कर चुके हैं [इसलिए अन्य किसेके पास वर्ण्ये नवीन विषय न होनेसे अन्य कोई कवि, न कवि हो सकतै है और न वाल्मीकिसे भिन्न इसकी रचनामें कोई नवीनता ही आ सकती है ।

[यह सिद्धान्तपक्षकी ओरसे पूर्वपक्षपर प्रहण है। पूर्वपक्षी उक्तिवैचित्रयकै आधारपर इसका उत्तर दैता है] जत्किके उक्तिवैचित्र्यकै कारण यह दोष नहीं आ सकतै है [अर्थात उक्ति-कथनशैली-के विभिन्न होनेसे महाकवियोंकी रचनाओंमें तारतम्य होता है और इस उक्तिवैचित्रयकै आधारपर अन्य कवियोंकों कवि कहा जा सकतै है] ।

[आगे सिद्धान्तपक्षकी ओरसे इसको अपने नवीनतापक्षका साधक वनाया जाता है] यह कहो तो, यह उक्तिवैचित्र्य क्या [पदार्थ] है? वाच्यविशेषका प्रतिपादन करनेवाले वचनका नाम ही उक्ति है। उस [वचन]में वैचित्र्य माननेपर [उसके] वाच्यार्थमें वैचित्र्य न होगा? वाच्य और वाचककी तो अविनाभावसम्बन्धसे प्रवृत्ति होती है [इसलिए वाचक उक्तिमें वैचित्र्य होनेसे वाच्यमें भी वैचित्र्य होना आवश्यक है]। काव्यमें प्रतीत होनेवालै वाच्योंका जो स्वरूप है वह [कविके स्वयं अनुभूत ग्राह्यविशेष [प्रतीकारक प्रमात्से कवि द्वारा स्वयं ग्रहीत सुखादि तथा उसके साधनादि]से अभिन्न रूपमें ही प्रतीत होता है [इसलिए केबल सामान्यमात्रकै आश्रयसे ही नहीं अपितु स्वयं अनुभूत विशेषके भी आश्रयसे काव्यरचना होती है । अतपव उसमें अनन्वता होना अनिवार्यैं हैं] । इसलिए उक्तिवैचित्र्य माननेवालेकी इच्छा न रहते ह्रुप भी वाच्यकै वैचित्र्य अवश्य ही मानना होगा ।

१. 'कवि...' एवं वा' मि० । २. 'वाच्यविशेषप्रतिपादनवचनम्' मि० । ३. 'वैचित्र्येण' मि० । ४. 'ग्राह्य' नि० ।

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कारिका ७ ] चतुर्थ उद्योतः ३५०

तदयमत्र संक्षेप: —

वाल्मीकिफिटयतिरिक्तस्य यघेकस्यापि कस्यचिद् । इह्यते प्रतिभार्थेषु' तत्तद्वान्त्यमक्ष्यम् ॥

किञ्च, उक्तिवैचित्र्यं यत्काव्यनवत्वे? नितरां धनमुख्यते तदस्मत्पक्षे तु गुणमेव । यतो यावानयं काव्यार्थोन्त्यमेवहेतुतः प्रकारः प्राग्दर्शितः स सर्व एव पुनरुक्तिवैचित्र्याद्दिगुणतामापद्यते । यथाऽयं सुप्रसिद्धश्लोकैरुदाहृतैरल्लङ्कारवर्गः: प्रासङ्गिके: स भणितिवैचित्र्यादुपनिबध्यमानः स्वयमेवादर्शिषुचे पुनः शतशक्तितां । भणितिमात्र 'स्वभावाभिन्ने न व्यय-क्षितां सती प्रतिनियतभाषागोचरार्थवैचित्र्यनिबन्धनं पुनरपि काव्यार्थानामानन्त्यमापादयति ।

यथा ममैव—

"माह ह महे इत्ति भणन्तो वज्जदि कालो जणस्स । तोसु ण देहो जणहणु गोअरी भोदि मणसो ॥ [मम मम इति भणतो त्रसति कालो जनस्य । तथापि न देवो जनादनो गोचरीभवति मनसः ।। इति छाया]

अतएव इस विषयका सारांश यह हुआ कि— यदि वाल्मीकिके अतिरिक्त किसी एक भी कविके पद्योंमें प्रतिभा [का सम्बन्ध] मानना असंगत है तो वह आनन्त्य [स्रोत] अवश्य ही है । और उक्ति वैचित्र्यको जो काव्यमें नवीनता लानेका हेतु कहते हैं वह तो हमारे पक्षके अनुकूल ही है । क्योंकि काव्यार्थके आनन्त्यके हेतुरूपमें यह [अवस्था, कालदोष आदि] जितने प्रकार पहले दिखलाये हैं ये सब उक्तिके वैचित्र्यसे फिर विशिष्ट [अनन्त] हो जाते हैं । और जो ये उपमा, श्लेप आदि वाच्य अलङ्कारवर्ग प्रसिद्ध हैं ये स्वयं ही अपरिमित होनेपर भी उक्तिवैचित्र्यसे उपनिबद्ध होकर फिर सैकड़ों शाखाओंसे युक्त हो जाते हैं । और अपनी भाषाओंके भेदसे व्यवस्थित [विशिष्ट] उक्ति [भणिति] भी विशेष भाषा [प्रतिभात, उस विशेष भाषा] [विषयक अर्थोंके वैचित्र्य कारण काव्यार्थों-में फिर और भी आनन्त्य उत्पन्न कर देती है । जैसे मेरा ही—

[यह] मेरा [वह] मेरा कहते-कहते ही मम मुख्य [के जीवन] का [सारा] समय निकल जाता है । परन्तु मनमें जनार्दन भगवान्का साक्षात्कार नहीं हो पाता । यहाँ प्रतिक्षण जनार्दनको मेरा-मेरा कहनेवालोंको भी जनार्दन प्रत्यक्ष नहीं होते यह विरोध-छाया 'मह मह' इस सांशवभावश्रेणी भणितिसे विचित्रतायुक्त हो जाती है ।

१. 'प्रतिभामन्त्य' नि० ।

२. 'काव्यनवत्वे' नि० ।

३. 'अलङ्कारवर्ग:' नि० ।

४. 'काव्येरेन' नि० ।

५. 'बहुमह इन्ति भणन्तो व' मोदं ककिण्णगस्स ते हूणदे । मो जाणहणुब्भोगो करिसो तिसिण्णं ......'सा इत्यसू' नि० में यह पाठ दिया है और उसका छायाद्वाद नहीं दिया है ।

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ध्वन्यालोकः

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कारिका ११-१२ ]

चतुर्थ उद्योतः

३५९

यथा हि जगत्प्रकृतिरतरतकल्पपरम्पराविभूतविचित्रवस्तुप्रपञ्च सत् पुनरिदानीं 'परिक्षीणापरपदार्थनिमोणशक्तिरिति न शक्यतेऽविधातुम् । तद्रदेवेयं काव्यस्थितिननन्ताभिः कविमतिभिरुपक्रमापि नेदानीं परिहीयते प्रतुत नवनवाभिनवयुत्पत्तिभिः परिवर्धते ॥१०॥

इत्यं स्थितेऽपि,

संवादादस्तु नवन्येव बाङ्मयोऽपि समेष्यते । स्थितं ह्येतत् संवादिन्यं 'एव मेधाविनां बुद्धयः । किं तु नैकरूपतया सर्वे ते मन्तव्या विप्रकृष्टा ॥११॥

संवादो ह्यान्यसादृश्यं तत्पुनः प्रतिबिम्बवत् । आलेख्याकारवत्तुल्यदेहिवच्च शरीरिणाम् ॥ १२ ॥

संवादो हि काव्यार्थयोच्यते यदन्येन काव्यवस्तुना साधरश्यम् । तत्पुनः शरीरिणां प्रतिबिम्बवदालेख्याकारवत्तुल्यदेहिवच्च त्रिधा व्यवस्थितम् । किक्विविधि काव्य-

जैसे विगत कल्प-कल्पान्तरोंमें विविध वस्तुमय प्रपञ्चकी रचना करनेवाली जगत्की प्रकृति [मूल कारण] होनपर भी, अन्य पदार्थों निर्मित होनेसे चतुरधिक होने गयीं है, यह नहीं कहा जा सकता है। इसी प्रकार यह काव्यस्थिति, अनन्त [असंख्य] कविचुद्धियोंसे उपभुक्त [वर्णित] होनेपर भी इस समय दाक्षिहीन नहीं है अपितु [जन कवियोंके वर्णनौसे] नयी-नयी व्युत्पत्ति [प्राप्त करने]से और वृद्धिको प्राप्त हो रही है ॥१०॥

पेसा [देश, काल, अवस्था आदि भेदसे आननल्य] होनेपर भी, प्रतिभाशालियोंमें संवाद [समान शक्तियों] तो बहुतायतसे होते ही हैं। यह तो सिद्ध ही है कि प्रतिभाशालियोंकी बुद्धियाँ एक-दूसरीसे मिलती हुर्द होती हैं।

परन्तु, विद्वान् पुरुष उन सब [संवादों]को एक रूप न समक्षें ॥११॥

क्यों [न समक्षें] यह [प्रश्न] हो तो [उत्तर यह है कि], अन्यके साथ साधदयको ही संवाद कहते हैं। और वह [सादृश्य] प्राणियोंके प्रतिबिम्बके समान, विचित्रके आकारके समान और दूसरे देहधारी [प्राणी]के समान [तीन प्रकारका] होता है ॥१२॥

दूसरी काव्यवस्तुके साथ काव्यार्थका साधदय ही संवाद कहा जाता है। फिर वह [सादृश्य] प्राणियोंके प्रतिबिम्बके समान, अथवा विचित्र आकारके समान और

१. 'परिक्षीणापरपदार्थनिमोणशक्तिरिति' नि० ।

२. 'संवादिन्यो मेधाविनां' नि० ।

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३६७ ध्वन्यालोकः [ कारिका १३-१४

वस्तु वस्त्वन्तरस्य शरीरिणः प्रतिबिम्बकल्पम्, अन्यदालम्ब्यप्रखयम्, अन्यतुल्येन शरीरिणा सदृशम् ॥ १२॥

तत्र पूर्वमनन्यात्म तुच्छात्म तदनन्तरम् । तृतीयं तु प्रसिद्धात्म नान्यसाम्यं त्यजेत्कविः ॥१३॥

तत्र पूर्वं प्रतिबिम्बकल्पं काव्यवस्तु परिहर्तव्यं सुमतिना । यतस्तदनन्यात्म तात्विकशरीराश्रयत्वात् । तदनन्तरमालम्ब्यप्रखयमन्यसाम्य शरीरान्तराश्रयकल्पनापि तुच्छात्मवस्तुन त्यक्तव्यम् । तृतीयन्तु 'विभिन्नकमननोयशरीरसदृशावे सति संसवादमपि काव्यवस्तु न त्यक्तव्यं कविना । न हि शारीरी शरीरिणानन्येन सदृशोऽप्येक एवेतिक श्क्यते वक्तुम् ॥१३॥

एतदेवोपपादयितुच्यते— आत्मनोऽन्यस्य सन्नावै पूर्वस्थित्यनुयाय्यपि । वस्तु भातितरां तन्व्या रशिश्छायामिवाननम् ॥१४॥

तुल्य देहीके समान तीन प्रकारसे होता है। कोई काव्यवस्तु, अन्य शरीर [काव्य-वस्तु]के प्रतिबिम्बके सदृश [होती है]। दूसरी चित्रके समान और तीसरी तुल्य देहीके समान [दूसरे काव्यवस्तुके सदृश होती.] है ॥१३॥

उनमेंसे पहिला [प्रतिबिम्बकल्प साध्र्श्य, पूर्ववर्णित स्वरूपसे भिन्न] अपने अलग स्वरूपसे गर्हित [अतः त्याज्य है]। उसके बादका [दूसरा चित्राकारतुल्य साध्र्श्य] तुच्छ स्वरूप [होनेसे वह भी परित्याज्य] है। और तीसरा [तुल्यदेहिवत्] तो प्रसिद्ध स्वरूप है [अतः] अन्य वस्तुके साथ [इस तृतीय प्रकारके] साम्यका कवि परित्याग न करे ॥१३॥

बुद्धिमान्को उनमेंसे पहिले प्रतिबिम्बरूप काव्यवस्तुको छोड़ देना चाहिये । क्योंकि वह अनन्यात्म अर्थात् तात्विक स्वरूपसे रहित है । उसके बाद चित्रतुल्य साम्य, शरीरान्तर [स्वरूपान्तर]से युक्त होनेपर भी तुच्छरूप होनेसे परित्याज्य ही है । [सदृश होनेपर भी] भिन्न [और] सुन्दर शरीरसे युक्त तीसरे [प्रकार]की काव्यवस्तु अन्यसे मिलती हुई होनेपर भी कविको नहीं छोड़नी चाहिये । क्योंकि एक दृश्य-धारी [मनुष्य या प्राणी] दूसरे देहधारोके समान होनेपर भी भिन्न [अभिन्न] ही है ।

इसीका उपपादन करनेके लिऱप कहते हैं— [प्रसिद्ध वाक्यादिसे विलक्षण व्यङ्ग्य रसादि रूप] अन्य आत्माके होनेपर, पूर्वस्थिति [प्राचीन कविवर्णित पदायों]का अनुसरण करनेवाली वस्तु भी चन्द्रमा की आभा-

से युक्त कामिनीके मुखमण्डलके समान अधिक शोभित होती है ॥१४॥

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तत्त्वस्य सारभूतस्यात्मन्: समग्रावेदप्यन्यास्य पूर्वस्थित्यनुरूप्येऽपि वस्तु भातिराम् । पुराणरमणीयच्छायानुगृहीतं हि वस्तु शरीरकत्वेन शोभां पुष्टयति । न तु पुनरुक्तवेनाव-

भासते । तद्‌व्यतिरेकाद्‌वस्तुनोऽभिवाननम् ॥१४॥

एवं तावत्संवादिनां 'समुदायरूपाणां वाक्यार्थानां विभक्ता: सीमานः । पदार्थ-

रूपाणां च वस्त्वन्तरसंघशानां काव्यवस्तूनां नास्त्येव दोष इति प्रतिपादयितुमिदं सूच्यते—

अक्षरोदाहरिष्यते

योग्यते यत्र वस्तुरचना पुरातनी ।

नूनने स्फुरति काव्यवस्तुनि यक्तुमेव बलवत् सा न तु दुष्यति ॥१५॥

न हि वाचस्पतिनाप्यक्षराणि पदানি वा कानिचद्‌पूर्वोणि घटयितुं शक्यन्ते । तानि

तु तान्येवोपनिबद्धानि न काव्यादिपु नवतां विरोधयन्ति । तथैव पदार्थरूपाणि श्लेषादि-

मयानर्थेतत्स्वानि ॥ ९५॥

तस्मात्—

सार [रसादिरूप व्यक्तः‌] आत्मभूत अन्य तत्वके होनेपर भी, पूर्वस्थितिका अनुसरण करनेवाली [प्राचीन कवियों द्वारा वर्णित] वस्तु भी अधिक शोभित होती है ।

पुरातन रमणीय छायासे युक्त [अन्य कवियों द्वारा पूर्ववर्णित] वस्तु [तथ्य] शरीरके समान अत्यन्त शोभाका होती है। वस्तुतः कविकी प्रतिभा ही होती है। पुनरुक्त-स

प्रतीत नहीं होती । ऐसे शोषित

पुरातन रमणीय छायासे युक्त कामिनीका मुखमण्डल [पुनरुक्त-सा प्रतीत नहीं होता

इस प्रकार [अवतक] समुदायरूप [अर्थात्‌] वाक्यों द्वारा प्रतिपादित 'साधदय-

युक्त [काव्यार्थों]की सीताका विभाग किया गया । [अब आगे] अन्य [पुराने पदार्थ-

रूप] वस्तुओंसे मिलती हुई 'पदार्थरूप' काव्यवस्तुओं [की रचना]में कोई दोष है ही

नहीं, इसका प्रतिपादन करनेके लिये कहते हैं—

[जहाँ जिस काव्यमें] नवीन स्फुरण होनेवाले काव्यार्थ [काव्यवस्तु]में पुरानी [प्राचीन कविनिबद्ध कोर्ई] वस्तु रचना अक्षर आदि [आदि पदसे पदका ग्रहण]की

[पुरातनी] रचनाके समान निबद्ध की जाती है वह निश्चयत:दूषित नहीं होती यह

स्पष्ट ही है ॥१५॥

[स्वयं] वाचस्पति भी नवीन अक्षर अथवा पदोंकी रचना नहीं कर सकते । और

काव्य आदिमें बार-बार उन्हीं-उन्हींको उपनिबद्ध करनेपर भी [जैसे थे] नवीनताके

विरुद्ध नहीं होते, इसी प्रकार पदार्थरूप या श्लेषादिमय अर्थतस्व [भी नवीन नहीं यनाये

जा सकते हैं और अक्षरादि योजनाके समान उनको उपनिबद्ध करनेसे नवीनताका

विरोध नहीं होता । अर्थात्‌ नवीनता आ ही जाती है] ॥१५॥

इसलिए—

१. 'वाक्यवेदितानां काव्यार्थानां विभक्ता: सीमาน:' नि०

२. 'तु' नि० में नहीं है ।

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ध्वन्यालोकः

आचार्य आनन्दवर्धन

श्रीनिवास शास्त्री

मोतीलाल बनारसीदास

यदपि तदपि रम्यं यत्र लोकस्य किश्चिन्

स्फुरितमिदमितीयं बुन्दिरभ्युज्जिहीते ।

`स्फुरणेयं काव्यदिति सहृदयानां चमत्कृतिरुत्पद्यते—

अनुगतमपि पूर्ववेच्छायया वस्तु तादृक्

सुखविरपमिवबन्धनचिन्यानां नोपंयोनि ॥१९॥

`तदनुगतमपि पूर्ववेच्छायया वस्तु तादृक् तादृक्षं सुखाविवक्षीतस्येव वाच्यार्थ-

समर्पणसमर्थेशब्दरचनालक्ष्यया वन्पचायोपनिबन्धनचिन्यानां नैव याति ॥१६॥

जहाँ [जिस वस्तुके विपयमें] लोगों [सहृदयों]को 'यह कोई नयी सूझ [स्फुरणा] है' इस प्रकारकी अनुभूति होती है [नयी या पुरानी] जो भी हो, वही वस्तु रम्य [कहलाती] है।

जिसके विपयमें 'यह कोई नयी सूझ [स्फुरणा] है' इस प्रकारकी चमत्कृति सहृदयोंको उत्पन्न होती है—

पूर्व [कवियोंके वर्णन]की छायासे युक्त होनेपर भी उस प्रकारकी वस्तुका वर्णन करनेवाला कवि निन्दनीयताको प्राप्त नहीं होता ॥१६॥

पूर्व [कवियोंके वर्णित विपयोंकी] छायासे युक्त होनेपर भी उस प्रकारकी वस्तुको जिसमें वग्यर्थ विवक्षित हो ऐसे वाच्यार्थके समर्पणमें समर्थ शब्दरचनारूप सङ्केतविशेष-

सौष्ठवसे उपनिबद्ध करनेवाला कवि कभी निन्दाको प्राप्त नहीं होता ॥१६॥

१. इस कारिकाके पूर्वार्द्ध और उत्तरार्द्धके वीचमें वृत्तिकी एक पंक्ति, जैसी कि हमने मूल पाठमें दी है, वालप्रसादजी संस्करणमें पायी जाती है, परन्तु द्विचिति तथा नि० सा० संस्करणमें नहीं पायी जाती। लोचनकारके 'वृत्ति कारिका लक्षणीकृत्य वृत्तौ पठिता' इस लेखके अनुसार शेष भागोंको अलग करनेवाली यह पंक्ति वीचमें होनी ही चाहिये। इसलिए हमने मूल पाठमें इसे रखा है।

२. 'यदपि तदपि रम्यं काव्यधारीं यस्लोकस्य किञ्चिस्फुरितमिदमितीयं बुन्दिरम्युज्जिहीते स्फुरणेयं

काव्यदिति सहृदयानां चमत्कृतिरुत्पद्यते' वुतना। पाठ वाक्यारम्भमें आधक है नि० ।

३. 'स्थितमे' नि० ।

Page 406

नतुर्थ उच्यन्त

प्रतायन्तां वाचो निमित्तंविधार्थीमतंरसात न साधु: कतश्चय: कविराभरणवधे स्वविषये । सन्ति नवाः काव्यार्थाः, परोपनिदृथैर्विरचने न कदिचत कबेरगुण इति भात्रयित्त्वा—

परखादानेच्छाविरतमनसो वस्तु सुकवे: सरसत्वयेधा घटयति यथेष्टं भगवनी ॥१७॥

परखादानेच्छाविरतमनस: सुकवे: सरस्वत्या भगक्ती यथेष्टं घटयति वस्तु । येधां सुकवीतां प्राप्तनुपुण्याभ्यासपरिपाकवशेन प्रथिततिस्लेषां परोपरचितार्थपरिग्रह्हत:-म्पृक्ताणां स्वक्यापारो ना कचितुपयुज्यते । सैव भगवती सरस्वती स्वयमभितममश्रेभात्र-्भावयति । एतदेव हि महाकवित्त्वं महाकवीनामिल्योम् ।

[कविगण] विविध अर्थोंके अमृतरससे परिपूर्ण वाणियोंका प्रसार करें । अपने [कल्पनासे प्रासूत] विषयमें कवियोंको किसी प्रकारका सङ्कोच या प्रमाद नहीं करना चाहिये ।

नवीन काव्यार्थ बहुत हैं, इनके वर्णित अर्थोंकी रचनामें कविका कोई [प्रयासंसा] लाभ नहीं होता ऐसा सोचकर—

दूसरेके अर्थको ग्रहण करनेकी इच्छासे रहित सुकविके लिये सरस्वती देवी स्वर्यं ही यथेष्ट वस्तु उपस्थित कर देती है ॥१७॥

दूसरे [कवि] के अर्थको ग्रहण करनेकी इच्छासे विरत मनवाले सुकविके लिप यह भगवती सरस्वती यथेष्ट वस्तु सङ्क्ष्षित कर देती है । पूर्वजन्मोंके पुण्य और अभ्यासके परिपाकवशे जिन सुकवियोंकी [काव्यनिर्माणमें] प्रृत्ति होती है, दूसरोंके विरचित अर्थग्रहणमें निःस्पृह उन [सुकवियों]को [काव्यनिर्माणमें] अपना प्रयत्न करनेकी कोर्दे आवश्यक्ता नहीं होती । यहीं भगवती सरस्वती अभिव्यक्त अर्थोंको स्वर्यं ही प्रकट कर देती है । यहीं महाकवियोंका महाकवित्य [महत्त्व] है ।

इत्योम्

यह 'इत्योम्' वाक्य वृत्तिग्रन्थकी समाप्तिका सूचक प्रतीत होता है। अतः आगेभे उपसंहारात्मक दोनों इलोक कारिकाग्रन्थके अंश समझने चाहिये, परन्तु उनका अर्थ स्पष्ट होनेसे उनपर कोई वृत्ति लिखनेकी आवश्यक्ता न समझकर हि वृत्ति नहीं लिखी गयी है और वृत्तिभागको यहीं समाप्त कर दिया गया है । सभी संस्करणोंमें उनको वृत्तिभागवाले टाइपमें छापा है । उभी परम्पराके अनुसार हम भी उनको वृत्तिवाले टाइपमें दे·रहे हैं । इन श्लोकोंमें ग्रन्थके विषय, सम्बन्ध, प्रयोजन आदिका पुनः प्रदर्शन करते हुए ग्रन्थकार अपने ग्रन्थकी समाप्ति कर रहे हैं ।

  1. 'वाद:' नि० ।

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ध्वन्यालोकः

आचार्य आनन्दवर्धन

श्रीदिवालाल स्वामीमहोदयैः

पीलीभीत

इत्यभिख्यष्टरसाश्रयप्रोचितगुणालङ्कारव्योमास्तुतो

यस्मादस्तु समीक्ष्यतां सुकृतिभिः सर्वं समासाद्यते ।

काव्यालोयेडभिख्यष्टसौभग्यभाजि विविधौघाने ध्वानिर्दशितः

सौदयं कल्पतरुपमानमहिमा भोग्योस्तु भगव्यात्मनां ।

सत्काव्यतस्त्वनयवत्सु चिरप्रसूत-

कल्पं मनस्सु परिपक्वधियं यदासीत् ।

तद्ध्वारोत्करोत्साहदययोग्यलभहेतो-

रत्नप्रकरवचैन इति प्रतिहिताभिधानः ॥

इति श्रीराजानकानन्दवर्धनाचार्यविरचिते ध्वन्यालोके

चतुर्थ उद्योतः ॥

समाप्तोऽयं ग्रन्थः ॥

इस प्रकार सुन्दर [अभिख्यष्ट] और रसके आश्रयसे उचित गुण तथा अलंकारोंकी शोभासे युक्त जिस [ध्वानिरूप कल्पतरु] से सौभाग्यशाली कविजन मनोवाञ्छित सब वस्तुपँ प्राप्त कर लेते हैं, सर्वज्ञनरपतिरीक्षित विद्वज्जनोंके काव्य नामक उद्यानमें कल्पवृक्षके समान महदिमावाला वह ध्वनि [इमने यहँ ] प्रदर्शित किया । वह उत्तम काव्य [रत्नप्रकर] का तत्त्व और नीतिका जो मार्ग परिपक्व बुद्धिवाले [सहृदय विद्वानों] के मनोंमें चिरकालसे प्रसुतकं समान [अत्यन्त रूपमें] स्थित था, सहृदयोंकी अभिवृद्धि और लाभके लिप, आनन्दवर्धन इस नामसे प्रसिद्ध मैंने उसको प्रकाशित किया ।

श्रीराजानक आनन्दवर्धनाचार्यविरचिते ध्वन्यालोके

चतुर्थ उद्योत समाप्त हुआ

प्रीतिस्वकाग्रसाभ्यां द्विसहस्रेऽष्टशतकोत्तरे ।

ध्वन्यालोकस्य व्याख्येयं पूरितालोकदीपिका ।।

उत्तरप्रदेशस्य 'पीलीभीत' मण्डलान्तर्गत 'मकतुल' ग्रामनिवासिनः

श्रीदिवालालस्वामीमहोदयैः तनुजतनुषा,

वृन्दावनस्थगुरुकुलविश्वविद्यालयाधीतविज्ञेन, तत्त्वाचार्यपद्मभितिष्ठता,

एम० ए० इत्युपपदधारिणा, श्रीमद्वाचार्यंकितदेश्वरदिग्दन्तशिरोमणिना

विरचितायाम् 'आलोकदीपिकाख्यायां' हिन्दीव्याख्यायां

चतुर्थ उद्योतः समाप्तः ।

समाप्तोऽयं ग्रन्थः ।

१. 'इत्यभिख्यष्ट' मि० ।

२. 'शोमाहतो' मि० ।

Page 408

प्रथम परिशिष्ट

ध्वन्यालोकीकारिकादर्शची

कारिका पृष्ठ कारिका पृष्ठ

कारिकाअकाण्ड एव विच्छित्तिःअक्नाश्रितास्वलड्कारा:अक्षरादिरचनव योज्यतेअतिव्याप्तिरथवाव्याप्ते:अतो ध्वन्यतменापिअनुगतमपि पूर्वंछ्छाय्याअनुस्वानोर्मन्यकृच्अनुस्वानोपमात्मापिअनेना नन्वयमायातिअन्वीयते वस्तुगतिअप्रथयत्लनिवृत्त्यै:अर्थशक्तेरलड्कार:अर्धान्तरगत: काकाअर्थान्तरे सकृन्मितंअथोंडपि द्विविधो जेय:अलङ्कारान्तरव्यङ्ग्यअलङ्कारान्तरस्नापिअलङ्कृतिनां शक्तावपिअलोकसामान्यमविभयनक्तिकअवधानातिर्यववान्अवस्यादिविभिन्नानांअवस्यादेशकालादिअविरोधी विरोध वा

२९३असूत्रस्फुरितं काव्यं३६१आत्मनोडन्यासु सद्भाने५०आनन्वयमेव वाच्यस्य३३६आलेढ्याकारवसुल्यं३६२आलोकार्थी यथा दीप३९इतिदत्तवधायातां१९६इत्यसकलधराश्रयो३३६इत्युक्तकलक्षणा य:३४८उक्लयन्तरणाशकं यत६९उद्रेक्ष्याप्यनन्तराभीष्ट१३९उद्दोपनप्रसामने१३१एकाश्रयत्वे निर्दोष:२९८एको रसोडनुजी कर्तव्य:६९एतद्योक्तमौचित्यं१३६एवं ध्वने: प्रभेदा:१५०औचित्यवान् यस्ता एता:६७कस्चिद् ध्वनिनिमेदस्य१८कार्यमेकं यथा व्यपे३१काले च अग्रहणत्यागो२४१काव्यप्रबोधाश्रयत:३५८काव्यस्थात्मा ध्वनिरिति बुधै:३५१काव्यस्थात्मा स एवार्थे:३६४काव्याभ्रिडवल्लभायै३०९काव्ये उमे ततोऽन्यद्८काव्ये तसिललड्कार:१५३कुतादितरसामाश्र१२कैचिद् वाचां स्थितप्रविषये७४क्रमेण प्रतिबाल्यातमा१९८कैश्चिदन्ववियोगोत्य:२९

Page 409

३३६

कारिका

ध्वन्यालोके:

कारिका

गुणप्रधानामवाप्यां गुणानभ्रित्य तिष्ठन्ती चारुत्वोत्कर्षतो व्यङ्ग्यः।

पृ० ३०९

न तु केवल्या शाब्दा

चित्रं शाब्दार्थमात्रेण त एव तु निवेश्यन्ते।

१६९

निबन्धावपि क्षयं नैति निवेश्यंहावपि चारुत्वे

तत्परत्वं न वाच्यस्य तत् किचिच्छब्दचित्रं

१४०

निवर्तन्ते हि रसयोः

तत् पूर्वमनन्यतया

३६०

परम्पादानेच्छाविरतमनसः

तत् वाच्यः प्रसिद्धो यः

. ९२

परिपोषं गतः स्यापि

तथा दीर्घसमायोति तथा रसस्यापि विच्छौ।

१६८

परिपोषं न नेतव्यः

तदन्यस्यानुरूप

१४८

प्रकारोडन्यो गुणीभूत

तदा वं दीप्यन्येव

१६८

प्रतीयन्तां वाचो निमित्त

तदुपायतया तद्वत्

३८

प्रतीयमानं पुनरन्यदेव

तदत्स्वचेत्सां सौड्यः

३६

प्रतीयमानस्यायम्पा

तदिरुंदररसप्यः

२८२

प्रधानेन्यातर वाक्यार्थे

तदृश्यक्तिहेतु शाब्दार्यो

९८

प्रबन्धस्य रसादीना

तद् व्याकरोति सहृदय

३६८

प्रबन्धे मुक्तके वापि

तत्स्थ्यं काव्यमाश्रित्य

०८

प्रभेदस्यास्य विपयो

तस्मादासां प्रभेदा ये

१०९

प्रस्तुतगभीरपदा:

तृतीयन्तु प्रसिद्धात्म

३६०

प्रसिद्धेऽपि प्रवन्धानां

तेऽलकू(रा): परां छायां

१४९

मायेऽणैव परां छायां

तेषामानन्यान्नयोऽन्य

१०९

प्रौढोक्तिमात्रनिष्ठस्य

दिङ्मात्रं तु भ्यते येन

१०२

बहुधा व्याकृतः सेभ्यैः

एषुत्रां अपि श्रार्याः

३४९

वाक्यानामकण्ठभावं वा

कत्ते रसादिलातर्थ

३०२

उद्दीर्यादितालोका

भुवं ध्वन्यक्तया वाच्यां

१४९

उद्दो तत्वार्थदर्शिन्यां

ध्यानि(नि)ष्कृतः प्रकारः

२८६

भक्त्या विभर्ति नैकर्य

ध्यानरेसंप्रबन्धेषु

१९६

प्रवेतस्मिन् प्रभादो हि

ध्यनेरात्मादिमावेन

७५

मूनेनै हस्यते लक्ये

ध्यनेरित्यं गुणीभूत

३५०

साधुयेऽमार्द्रतां याति

ध्यने्यः स गुणीभूत

३३६

मितोडप्यनन्ततां प्राप्तः

ध्यन्यातमन्ये शक्कारे

१००

सुख्यां दृश्तिं परित्यज्य

ध्यन्यात्मभूते शक्कारे यमकादि

१०३

सुख्या महाकविगिराम

ध्यन्यात्भूते शक्कारे शमीष्य

१०८

वस्त्वाविद्यावयवावातिरिक्त

न काव्यार्थाविरामोक्तिः

३५०

बलः कार्यः ध्वमतिना

Page 410

कारिका

प्रथम परिच्छेद

पृ‌ठ

कारिका

यतत: प्रत्यभिज्ञेयौ

३३

लक्षणेऽन्यै: कृते चास्य

६७

यत्र प्रतीपममानोऽर्थ:

भाव्याभाव्या: प्रयुक्तात्ते

६२

यत्र व्यङ्ग्यार्थान्वये वाच्य

२८७

वस्तु भावितरां तम्याह:

३५०

यत्रार्थे शब्दो वा तमर्थे

३७

वाक्ये सङ्कटनायां च

३८४

यत्राव्यभिचियते स्वोक्स्या

१३४

वाचकत्वाश्रयेणैव

६४

यथा पदांरांश्रयणं

३१

वाच्यप्रतीमसहाणां

१५०

यथा व्यपारनिष्पत्तौ

३६२

वाच्यवाचकतारुत्व

८४

यदपि तदपि रम्यं यत्र

६२

वाच्यस्यैवतया वापि

१५८

यदु‌हितस्य फलं तत्र

वाच्यानां वाचकानाझ

२४८

यदूस्र्यङ्गयस्याङ्कितस्य

१३९

वाच्यार्थपूर्विका तद्वत्

३४

यस्मात्प्रपञ्चं वस्त्वन्यद्

९६४

वाच्यालङ्कारवर्गोऽयं

२९०

यस्वलक्षणमव्यङ्ग्य:

९१९

वाणी नवलवभायाति

३३६

यस्मिन्ननुक्त: शब्देन

२४०

विजयेतेऽर्थे रसादीनां

२८३

युक्त्या णनयानुरतस्य:

२८०

विषयतया भहूद्रयै:

३००

ये च तेपु प्रकारो‌ऽयं

१८

विधि: कथा‌चारैरमश्य

२१८

यो‌ङ्ग: सहृदयसल्लाङ्ग्य

१८५

विनेयान् गुणुलोकनं

२८२

रचना निपुणोपेक्षा

२१८

विभावभावानु भाव

२८८

रमवन्धोक्तमौचित्यं

विमतिविपयो य

२८३

रमभावतदाभाम

८५

विरुदैवकारयो यस्तु

३३०

रमभावादिसम्बद्धा

९८८

विरोधमविरोधष्ण

२४१

रसस्यारङ्गविभान्ते:

२१३

विरोधिन: स्थू: शृङ्गारे

१६४

रसाक्षिसतया यस्य

१०८

विरोधिरससन्निब्ध

२९२

रमादिपरता यत्र

८५

विवक्षा तत्रतत्वेन

१०९

रसादिमय एकस्मिन्

३४८

विवक्षितामिधेयस्य

८८

रसादिविप्रयेएणेतत्

२४८

विवक्षिते रसे ह्रष्य

२९८

रमाचानुगुणत्वेन

२४९

विचो‌षतस्तु शृङ्गारे

२४९

रसाने तदियं हृद:

१५९

विभवं मकर: काङ्ख्यं

२७३

रसान्तरेऽयवभिना

२३८

विषयाभ्रियमनन्यत्

१८१

रसान्तरसम्भावेध:

२३९

विस्तरे‌णानिवतस्यापि

२१२

रसान्तरान्तरितयो:

२४०

दृष्टयौडपि प्रकाइते

३३२

रू‌द्धा ये विप्रयेऽन्यात्त्र

६२

वेच्यते स तु काव्यार्थ

३२

रूपकादिरलङ्कारवग:

१०८

व्यङ्ग: काव्यविशेष: स

३९

रूपकादेरलङ्कारवगांस्य

१३९

व्यङ्गव्यङ्गकमावेतस्मिन्

३८४

रौद्रादयो रसाद दीप्या

८०

व्यङ्गकलैकमूलस्य

६५

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ध्वन्यालोकः

कारिका पृष्ठ

कारिका

पृष्ठ

रक्तावपि प्रमादितवं शब्दतत्त्वाश्रया: काश्चित्

सङ्करसंस्तुतिाभ्यां

१०३

शब्दतत्त्वाश्रया: काश्चित्

सकाव्यं कर्तुं वा शास्तुं

३३२

शब्दस्य स च न श्रेय:

सकाव्यतत्त्वनयः

१५३

शब्दार्थशक्तिमूलनात्

सविषयं चक्रघटनम्

११८

शब्दार्थशक्त्या वाचितोड

म प्रसादो गुणो श्रेय:

१३४

शब्दार्थशासनज्ञान

सरसकत्वं काव्यस्य

३२

शब्दो व्यञ्जकतां विप्रट्

सरस्वती स्वादु तदर्थवस्तु

६१

शरीरीकरणं येषां

सर्वत्र गद्यवन्धेऽपि

१४९

रषै चरेफलंयोगौ

सर्वे नवा इवाभान्ति

१६४

शृङ्गारस्याक्षिनो यलाद्

सर्वथेव प्रभेदेषु

१०२

शृङ्गार एव मधुरः

सविभिन्नाश्रयः कार्यः

९५

शृङ्गारेऽङ्गप्रलम्भाय्ये

म सर्वो रसयमानत्वं

९७

श्रुतिबुद्धदयो दोषा:

सा च व्यञ्जयस्य गुणीभावे

१००

मक्यादि दिड्मात्रं

सुबन्ध्ववचसम्बन्धे:

३३०

संवादास्तु भवत्येव

सोऽर्थस्तद्रव्यक्तिसामर्थ्य

३५९

संवादोऽन्यसादृश्यं

स्वसामग्रीवशेनैव

३५९

च गुणीभूतलकृत्यै:

स्वेच्छाकवेसारिणः स्वच्छ

३१४

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द्वितीय परिशिष्ट

ध्वन्यालोकी उदाहरणादि-द्वची

इ्लोक

अङ्कुरितः पल्लवितः

अजाए पहारो

अण्णत्त वन्धे बालेअ

अतहड्ढसिह वि तहसंठिअ

अतिक्रान्तसुखाः कालाः

अत्ता पत्थ [गाथा ७, ६७]

अन्नान्तरे कुषमयुग

अनध्यवसितावगाहन [धमे]

अनवरतनयनजलल्क्ष्य

अनिक्ष्म्य श्रुतियदत् [परि०]

अनुरागवती सन्ध्या

अनौचित्याहते [आ०व]

अपारे काव्ये [आ०व०]

अमी ये हश्यन्ते [आ० व०]

अम्बा झोटेडन्ति बुद्धा

अयं स रसनोत्कर्षी [महा०]

अयमेकपदे तथा [विक्रमो०]

अवसर रोड़िउँ विआ

अव्‍युतपचि‍कुतो [परि०]

अभिणअपओअर सिउक्खु

आहो बतासि सुठु० [कुमार०]

आंकान्दा: स्तनितै:

आम अवलेखा आरम्म

आहूतोंपि साहयै:

इत्यक्षरद्रसा० [आ०व०]

इत्यलक्ष्यकमा एव

ईंशाकडवस्स वि

उच्चिणतु पविअ कुसुमं

उत्कमिनि भय०

उद्दामोत्कलिकां [रत्ना०]

उतत: प्रोद्‍वहदार:

उपोढररेण [पाणिनि:]

उपहजजाइँ असोहिणिअँ

एकन्तो रहइ पिआ

एसेश जणो तिस्सा

एतस्मादिनि [कु० सं०]

पहि गच्छ पतोलिच्छ [व्यास]

क्रण्ठाचिद्धत्लाक्ष्माला

कथागारैरमृत्याध [परि०]

कपोले पत्तालिअ

कमलअरा णं मलिकिआ

करिणीवेहअरो

कर्णों दलसंसारं [वीर०]

करता छूतेउलालणं [भवाव०]

कस्त्व मो: कथयामि

कस्स व ण होइ [गाथास०]

काव्यादृश्‍वनि [संप्रः]

किमिव हि मधुराणि [शाकु०]

कि हास्येन न मे प्रयास्यसि

कुविआम्हो पसन्नाओ

कते वरकथालापे

कोपात्कोमल [अमर०]

कमललक्ष्मी: सत्कविकल्पनालिअ

काकार्य काष्ठ० [विक्रमो०४]

किसो हस्‍तवक्‍कन्: [अमरक]

सं येउज्जुअक्खयन्ति

सणपाहुणिआ देखार

राणं च मत्तमोह [गोबवरो]

गामो वः पावनानां

चक्रामिवातप्रसभाकुलयै

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आचार्य आनन्दवर्धन

डॉ. महावीर सरन जैन

मोतीलाल बनारसीदास

व्याख्यालोक:

चन्द्रसुधाभ्रमित [वेणीसं०]

९८

पापशुधास्मि बदनं

चन्दनास्तकयुग

१४६

परिम्लानं पीन्स्तन [रत्ना०]

चन्द्रमउरुहि भ्रुया

१३०

पूर्वविश्रूलगिर

चमदिघमाणस

१२१

प्रभामहत्या [कु० सं०]

चलापाञां हत्थि [यादु०]

१०९

प्रभवयतुजरीयत्विषि

जमिजइँ वहुत्तं

६०

प्राथुं जनेयार्धिजनस्य

चूडाइँकुरावभंसं [हरिविजय]

१६०

प्रासभैरेप कसमात

जाएज्ज वजुदेसि [गा० सं०]

१४५

प्रयत्नक्खतोत्नैः कुरू [माष०]

ण अ ताण घडइ ओहिअ

३५३

त्रिये जने नास्ति पुनरुक्तक्म्

हँ ताण दिसिरहो [वि० वा०]

१४३

पूर्वं विश्रूलगिरः [परि०]

वदुगेइँ नतमित्ति

२०१

भगवान वासुदेवस्त्व [महा०]

तन्वी मेघक्लार्द्र [विक्रमो०]

९३

भम धरिमभ [गा० सं० था०]

तसपरावेव सान्दायो [परि०]

५२

मावान्चेतनानपि चेतनवद

तमर्यवहहवत्ते [कन्या०]

१७२

भूरेऽपिदग्धावपारिजात

तस्स भूइक्का [विक्रमो०]

९२

अभिमरतिमरु सह्हदयतां

तस्या विनापि द्वारेण

१२०

मनुष्यद्वस्ता समुपाचरन्तं

ताहा णिआन्ति गुणा [विसम]

७२

मन्दारकुहरेणपिञ्जरिता

ताहे: सिअदुक्कलय [मेघ०]

२०१

महो मह इति भणन्त

तेशां गोपवधूविलाससुहृदां

९३

मा पथ्ये करन्धीओ [गा० सं० था०]

ग्राआकुल: परिपतन [माष]

१४७

मा निपात प्रतिष्ठां [वा० रामायण०]

दत्तानन्दा: प्रभानं

१२७

मुख्यया व्यापार [परि०]

दन्तक्खत्ताणि करजेसु

३२९

मुनिर्ज्जयति योगीन्द्रो

दीर्घइडुबन्ध पड मदसहलं [मेघ०]

३२८

मुहुरकुलिस्खड्गूता [शाकु०]

दुराराधा राधा शुभगा

३०२

यमकादिनिवन्धे तु [संग्रह]

हट्ठिआ केण्वाव गोपाग

११४

य: प्रयम: प्रयमः

दे आ पसिअ णिवचड्ढु

१६

यत्र च मातकृ [हर्ष०]

देक्का दसण्णि फले

१४८

यच्च कामसुलं लोके

धारणी धारणाया [हर्ष]

१५९, ३४१

यथा यथा विपर्यंन्ति

निद्दाकेतविन: प्रियस

३३९

यदक्ष्णनाहितमति [कुमार०]

नीवाराः शुचक० [शाकु०]

२०४

यक्ष्मणासित न वस्तु [मनो०]

नीरकस्तु प्रभण्चो यः [परि०]

२१०

यक्षिन्त सो वा [आ० व०]

नो कल्लापाय [वर्य०]

११४

या निश्या सर्वमूतानां [गीता]

न्यक्कारो दायमेव मे [हत्थ०]

१९९

या व्यापारवती रक्षान्

फत्थु: गिरिभन्द्र [कु० सं०]

३०९

ये जीवन्त न मान्ति ये

पदानां स्मारकत्वेऽपि [परि०]

१६३

येन प्वस्तमनसो [चन्द्र०]

पत्तयें व: पीड़ां [महा० था०]

६१, ३०७

यो यः इहास्रं [वेणी०]

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रक्तस्त्वं नवपल्लवै:

११२

शिल्शरिण रस तु नाम

५६

रम्या इति प्राप्तवती: [मा०]

१४८

शुन्यं वाच्यगतं [अम०]

३३९

रविचक्रान्तरौभाम्य [वा०]

१७३

रोषो हिमगिरिस्त्वं [मामह]

३४९

रसभावादिविषय

३१९

ध्वोक: स्फो़टत्व [राम०]

३४५

रसभावादितात्पर्यं [ध्वे०]

८८

शृङ्गारी चेत् कवि: काव्ये

३१२

रसादिसु विषयास्तु

३१९

इत्यादिस्तुं चकित [मेव०]

१९६

रसवन्ति हि वस्तूनि [संग्रह]

१०८

इलाध्यागोष्ठततं

१३३

राजानमपि चेष्टन्ते

३०४

सङ्केतकल्पनंस्त्र

रसाभासाक्षमभाव [संग्रह]

१०८

सज्जेधि दुरहिमाचो

१३७, १६९, ३४२

रामेण प्रियजीवितेन ठ

१५६

सत्वकाव्यततवतनय [आ० व०]

३५७

लच्क्षी दूषिता जामदग्नो

२९०

सत्यं मनोरमा रमा:

२४३

लावण्यकान्ति [जयवर्धन]

१४२

सन्ति सिध्दरहप्रस्थ्या:

१९४

लावण्यद्रविणस्ययो न

३०४

सत्तेताः समिष: [म्याध]

१४५

लावण्यसिन्धुपरिप्लेव

२८७

समविषमणिब्विसेवा

२०८

कीलाकमलपत्राणि [कु० श०]

२६०

सर्वैकचारणमक्षयम

१२०

वच्च मह ह्विअ [गा०]

१५

स वक्तुमशकिलानं धाक:

१४८

वत्से मा गा विषादं

१३५

सविभ्रमालसद्गोचरनारिके

३३७

वसन्तपुष्पाभरणं [कु० सं०]

३५२

सम्पोणिते: कल्पयुजां

२८०

वाणीरमण हत्यकदन्ता

१६१

स हरिनान्ना देव:

११३

वाणीरकुटजकादम्बडीन

१५२

सा आरविहरणजोवण्णा

१३८

वाल्मीकव्यतिरिक्तस्य

३५७

सिज्जाह रोमविस्खड

३४९

वाल्मीकिर्यथा [परि०]

२१७

सिहिपिस्सहक्खणउज्जए

१३८, १६९

विच्छित्तिर्यथोभि० [परि०]

१६३

दुरमिस्समये प्रभाते

३४२

विमानपर्यङ्कुले निपुणता:

२४०

सुवर्णपुष्पा पृथिवी

५६

विसमईओ च्चियह काण वि

१४८

तैषा सर्वेषां कफोकी: [मामह]

२११

विस्मयोत्था मन्यमायाशा

२१०

स्लिगकस्यामक [महानाटक]

७१

वीराणं रसह शुठिण

१४२

सरसवन्दीपुरेणोदए

१६७

इत्ते0सिन् महाप्रलये [हर्ष०]

१५९

सिस्से किहिसुंगुरे

२२०

श्रीडायोगाश्रय [चार्य० प्र०]

१६६

स्वतेनःश्रीतमोSमा

३१८

व्यङ्क्रयव्यज्जक [परि०]

३८

स्वस्या भवन्ति [वि०पी०]

२९८

व्यङ्क्रयस्य यत्रा [परि०]

५२

हंसानां निनदेषु

३४८

व्यङ्क्रयस्य प्रतिभा [परि०]

५२

हिलहरट्टावियाम्पण्णुं

१८४