1. Dhvanyaloka Traravati Vyakhya Ram Sagar Tripathi MLBD (Third and fourth Udyota) 1963
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DHVANYĀLOKA
of
SHRI ANANDVARDHANACHARYA
with the
LOCHAN COMMENTARY
by
SHRI ABHINAVA GUPTA
along with
FULL HINDI TRANSLATION OF BOTH THE TEXTS
and
TARAWATI VYAKHYA
by
Dr. RAM SAGAR TRIPATHI,
M. A., P. H.D., Āchārya
SECOND PART (III & IV Udyot)
Moti Lal Banarsi Das
DELHI - VARANASI - PATNA
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ध्वन्यालोकः
श्रीमदानन्दवर्धनाचार्यविरचितः
श्रीमदभिनवगुप्त-विरचित 'लोचन' व्याख्यासहितः
सम्पूर्णेन हिन्दीभाषानुवादेन तारावती-
समा ख्या व्याख्यया च परिगतः
Dr. ca .Urcis sid St. -is risda, व्याख्यालेखकः—
डॉ रामसागर त्रिपाठी
CHECKED 194* एमऐ ए०, पीएच० डी०, आचार्यः
तृतीयः खण्डः
( ३-४ उद्योतौ )
प्रकाशकः—
मोतीलाल बनारसीदास
दिल्ली :: वाराणसी :: पटना
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प्रकाशक— श्री सुन्दरलाल जैन (१) मोतीलाल बनारसीदास पो० ब० ७५, नेपालोखपरा वाराणसी
मुद्रक— सोमाराम गौरीशंकर प्रेस, वाराणसी।
प्रथम संस्करण १९६३ ई० मूल्य १३)
सव प्रकार की पुस्तकें निम्नलिखित स्थानों से प्राप्त करें—
१. मोतीलाल बनारसीदास, बँगलोरोड, जवाहर नगर, दिल्ली
२. मोतीलाल बनारसीदास, पो० ब० ७५, नेपालोखपरा, व
३. मोतीलाल बनारसीदास, माहेश्वरी मार्केट, बांकीपुर
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समर्पण
वत्सलता-प्रतिस्पर्धि स्नेहमयी जननी श्रीमती फूलमती देवी को दिवङ्त आत्मा के परितोष के निमित्त यह अभिनव तारावती समर्पित है ।
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वक्तव्य
चतुर्थ उद्योत उपसंहारात्मक है । इसका प्रारम्भ ध्वनि और गुणीभूतव्यङ्ग्य के उपयोग से होता है जिससे काव्य में अनन्तता तथा नवीनता आ जाती है । रसध्वनि फिर भी सर्वाधिक प्रधान होती है और जहाँ अनेक रसों का उपादान किया जाता है वहाँ एक रस को अङ्गी बनाना भी अत्यावश्यक बतलाया गया है । इस प्रसङ्ग में रामायण तथा महाभारत के अङ्गी रसों पर विस्तारपूर्वक हक्पात किया गया है । काव्य में अक्षुण्ण वस्तु से ही नवीनता आती है । इस दिशा में
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सर्वाधिक उपयाग कवि-प्रतिभा का होता है । व्यञ्जनयाैर्थ से ही नहीं और न केवल व्यञ्जना दृष्टि के उपयोग से अपितु वाच्य-वाचक भाव में भी काव्य अनन्तता का प्रयोजक हो जाता है । अवस्थादि भेद भी क्षुण्ण अर्थ को नवीनता प्रदान करने वाले हो जाते हैं । दो कवियों के भाव प्रायः मेल खा जाते हैं । किन्तु सर्वत्र अपराध का ही आरोप संजीवन नहीं होता । इसे दृष्टि से संवाद ( मेल ) का वर्गीकरण किया गया है और सदोषता निर्दोषता पर निर्णय दिया गया है ।
उपर्युक्त दिग्दर्शन से प्रकट होता है कि प्रस्तुत खण्ड ध्वनि के छात्र के लिये अनिवार्यरूप से उपयोगी है । विशेष रूप से ततीय उद्योत तो काव्यशास्त्र के प्रत्येक छात्र के लिये अनिवार्य आवश्यकता है । डाॅ० नगेन्द्र प्रस्तुत कृति के प्रेरणाकेन्द्र तो रहे ही हैं उन्होने आग्रह लिख कर भी अनुग्रहीत किया है, इसके लिये आभार प्रदर्शित कर मैं उनकी सतत प्राप्य अनुकम्पा का मूल्यांकन नहीं करूंगा । इसके प्रसृत करने में मुझे अपने पुत्रों श्री योगेश्वर त्रिपाठी और श्री ज्ञानेश्वर त्रिपाठी से यथेष्ट सहायता मिली है । उन्होंने प्रेस कापी तैयार करने, मूल से मिलाने, विषय सूची तैयार करने और वर्णानुक्रमणी बनाने का बहुत ही श्रमसाध्य कार्य सम्पादित किया है । प्रेस कापी तैयार करने और मूल से मिलाने में मेरे अनुज श्री रामशरण त्रिपाठी से भी मुझे पर्याप्त सहायता मिली है । मैं 'मातीलाल बनारसी दास' प्रकाशन के अध्यक्षता श्री सुन्दरलाल जैन का अन्तस्तल से आभारी हूँ जिन्होंने मेरे श्रम को प्रकाश मे लाने की उदारता दिखलाकर कृतार्थ किया है और इसका श्रेय श्री किशोर चन्द्र जी जैन को दिया जा सकता है जिनकी देख रेख में मुद्रण कार्य सम्पादित किया गया है । श्री जनार्दन जी पाण्डेय का आभार प्रदर्शित न करना भी एक कृतघ्नता होगी जिन्होंने प्रुफ देखने का स्वयं भार वहन कर पुस्तक के शीघ्र प्रकाशन में सुलभ सहयोग प्रदान किया है । पुस्तक बनारस में 'मुद्रित हुईं और दिल्ली में उसका प्रुफ देखने में अनावश्यक विलम्ब हो जाता । ऐसी दशा में मुद्रण की कतिपय अशुद्धियों का रह जाना स्वाभाविक. हो है । उदाहरण के लिये अभिनवगुप्त के गुरु का नाम भट्टेन्दु राज है किन्तु पूर्वार्ध के प्राक्कथन के ६ वें पृष्ट पर महेन्द्रराज छप गया है । आशा है कि सहृदय पाठक ऐसे स्थलों को विवेक पूर्वक स्वयं सम्हाल लेंगे ॥
अन्त में पाठकों की सेवा में कालिदास का निम्नलिखित पद्य निवेदित कर मैं पाठकों से त्रुटियों के लिये क्षमा प्रार्थना करूंगा :- यच्चत् क्वाच न चित्रे स्यात्क्रियते तत्तदन्यथा । तथापि तस्याः लावण्यं रेखया किम्निदुष्कृतम् । शास्त्र द्वितीया संबत् २०२०
रामसागर त्रिपाठी
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विषय-सूची
तृतीय उद्योत
१—लोचनकार का मङ्गलाचरण
२—द्वितीय उद्योत से विषय वस्तु की सङ्झति
३—प्रथम कारिका में 'च' की योजना और उसका आशय
४—अविवक्षितवाच्य के भेद अत्यन्ततिनिरसकृतवाच्य का पद प्रकाशयत्व
५—अर्थान्तर सङ्क्रमित वाच्य की पदप्रकाश्यता
६—दूसरा उदाहरण
७—अत्यन्त तिरसकृतवाच्य की वाक्यप्रकाश्यता
८—अर्थान्तरसङ्क्रमितवाच्य की वाक्यप्रकाश्यता
९—विवक्षितवाच्य के शब्दशक्त्युद्भव की पद प्रकाश्यता
१०—शब्दशक्त्युद्भव की वाक्यप्रकाश्यता
११—सकलार्थ क्रमव्यङ्ग्य में अर्थशक्त्युद्भव के कविप्रौढोक्तिमात्र निष्पन्न शरीर नामक भेद की पदप्रकाशयता
१२—उक्त भेद की वाक्यप्रकाश्यता
१३—कविनिबद्धवक्तृप्रौढोक्तिमात्र निष्पन्न शरीर नामक कल्पित भेद की पद-वाक्यप्रकाशयता
१४—स्वतः सम्भवी भेद की पदप्रकाशयता
१५—स्वतः सम्भवी भेद की वाक्यप्रकाशयता
१६—ध्वनि की पदप्रकाशयता पर शङ्का और उसका समाधान
१७—असंलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य की व्यञ्जकता का उपक्रम
१८—अर्थों की व्यञ्जकता का समर्थन
१९—इस विषय मे सङ्गीत शास्त्र का उदाहरण
२०—पद से अलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य का व्योतन
२१—पद के द्वारा व्योतकता पर विवाद
२२—पदांश के द्वारा असंलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य का व्योतन
२३—'असंलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्यो ध्वनि:' के सामानाधिकरण्य पर विज्ञापन
२४—वाक्यरूप शुद्ध अलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य ध्वनि
२५—अलङ्कारान्तरसङ्कीर्ण वाक्यरूप अलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य ध्वनि
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२६-सङ्कटना के द्वारा असंलक्ष्यक्रम व्यङ्गच के ध्वनित होने का उपक्रम
२७-इस प्रसङ्ग में रीतियों का संक्षिप्त दिग्दर्शन
२८-आनन्दवर्धन की रीति-विषयक धारणा और उसके प्रसङ्ग में वैकल्पिक पद्धतों पर विचार
२९-सङ्कटना की रसव्यञ्जकता पर विचार
३०-वैकल्पिक पद्धतों की उद्भावना का प्रयोजन तथा पक्षों की स्थिति पर विचार
३१-सङ्कटना और गुणों के ऐक्य तथा गुणों के सङ्कटना|श्रितत्व पर विचार
३२-गुणों के आश्रय पर विचार
३३-इस दृष्टि से गुण और अलङ्कार का भेद
३४-शब्द|श्रितत्व की दृष्टि से गुण और सङ्कटना के ऐक्य पर विचार
३५-रस|संभव्यञ्जना में सङ्कटना के अनिश्चय का प्रतिपादन
३६-इस विषय में दूसरा पक्ष और दोनों के ऐक्य का प्रतिपादन
३७-उत्तम देवताविषयक शृङ्गार वर्णन के अनौचित्य विचार
३८-एकत्व पक्ष मे औचित्य के दूसरे नियामक
३९-वकता और वाच्य के भेदोपभेद
४०-व्यङ्गचार्थ की ही अभिनेयता का समर्थन
४१-वक्तृ वाच्य भेदों पर आधारित औचित्य पर विचार
४२-इस पर आधारित सङ्कटना पर विचार
४३-प्रस्तुत पद्य का उपसंहार
४४-सङ्कटना में विषय|आश्रय औचित्य
४५-प्रस्तुत प्रसङ्ग में काव्य|भेदों पर विचार
४६-मुक्तक का स्वरूप, प्रबन्ध से उसका सम्बन्ध और भाषाओं में निबन्धन
४७-काव्य के दूसरे भेद
४८-मुक्तक में सङ्कटना का औचित्य
४९-सन्दानितक इत्यादि में सङ्कटना का औचित्य
५०-विषय|आश्रित सङ्कटना के औचित्य का उपसंहार
५१-प्रबन्ध के द्वारा असंलक्ष्यक्रम|व्यङ्गच की व्यञ्जना
५२-कथा परीक्षा में विभाव|औचित्य
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४३—भावौचित्य तथा इस प्रसङ्ग में प्रकृतियों पर विचार
४४—लोकोत्तर कृत्यों के औचित्य पर विचार
४५—प्रस्यात वृत्त के उपादान का औचित्य
४६—विनेय व्यक्तियों के प्रति रक्षण की आवश्यकता
४७—रति इत्यादि में प्रकृत्यौचित्य पर विचार की आवश्यकता
४८—उपसंहार
४९—अभ्ययन और प्रतिभा का उपयोग
६०—सिद्ध रस काव्यों में स्वेच्छा सन्निवेश का निषेध
६१—कथा में रसानुकूल परिवर्तन
६२—शास्त्र-मर्यादा पालन के लिये काव्यक्रिया का निषेध
६३—शिक्षा के विभिन्न रूप और काव्यशिक्षा की उत्कृष्टता
६४—नाटक सन्निधयों का विवेचन
६५—अर्थप्रकृतियों का सन्निधयों में अन्तर्भाव
६६—‘रत्नावली’ का उदाहरण
६७—शास्त्र स्थिति सम्पादनेच्छा का निषेध और वेणीसंहार का उदाहरण
६८—अवसर के अनुकूल उद्दीपन और प्रशमन
६९—अङ्गी रस के अनुसन्धान की आवश्यकता और इस विषय में तपस्वी वत्सराज का उदाहरण
७०—रसानुकूल अलङ्कार योजना पर विचार
७१—प्रबन्ध के द्वारा अनुरणनात्मक ध्वनि के माध्यम से रस व्यञ्जना
७२—इस विषय में दीधितिकार की योजना की समीक्षा
७३—उच्च विषय में मध्यमथन-विजयकार का उदाहरण
७४—विषमवाण लोला से उदाहरण
७५—महाभारत से उदाहरण
७६—रसध्वनि के व्यञ्जकों पर सूक्ष्म विचार
७७—सुप इत्यादि की व्यञ्जकता का उदाहरण
७८—दूसरा उदाहरण
७९—सुव्रत की व्यञ्जकता का उदाहरण
८०—तिडन्त की व्यञ्जकता का उदाहरण
८१—सम्बन्ध की व्यञ्जकता का उदाहरण
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८२—तद्धित की व्यञ्जकता का उदाहरण
८३—समास वृत्ति की व्यञ्जकता
८४—निपात इत्यादि की व्यञ्जकता
८५—निपात की व्यञ्जकता का दूसरा उदाहरण
८६—उपसर्गों व्यञ्जकता
८७—उपसर्ग इत्यादि की अनेकता की व्यञ्जकता
८८—पादपौनरुक्त्य की व्यञ्जकता
८९—वाक्य इत्यादि के पौनरुक्त्य की व्यञ्जकता
९०—प्रकृत्यंश की व्यञ्जकता
९१—सर्वनाम की व्यञ्जकता
९२—वाचकत्व के अभाव में भी व्यञ्जकता का प्रतिपादन
९३—शृङ्गारेतर विषयों में शृङ्गार परक वणों के प्रयोग से चावता निष्पादन पर विचार
९४—सहृदय संवेदन सिद्धि में व्यञ्जना को आवश्यकता
९५—रस विरोध का उपक्रम
९६—रसाभिव्यञ्जक तत्वों का विलोम और विरोधी तत्त्व
९७—रस विरोध पर सामान्य दृष्टिपात
९८—विरोधी उपकरणों का उपादान रसविरोधी होता है
९९—विप्रकृष्टसम्बन्धवधावाली वस्तु का विस्तार पूर्ववत् वर्णन
१००—अकाण्ड विन्छेद
१०१—विना अवसर के विस्तार
१०२—पुनः पुनः दोपन
१०३—वृत्ति का अनौचित्य
१०४—विरोध परिहार का उपक्रम
१०५—विरोध परिहार की शर्तें
१०६—शृङ्गार में करुणरस के संचारी भावों के समावेश पर विचार
१०७—शृङ्गार रस में मरण के वर्णन पर विचार
१०८—विरोधी रस की प्रकृत रस पोषकता के तीन रूप तथा उसके उदाहरण
१०९—दो परस्पर विरोधी रसों का प्रकृत रस में समावेश, इसमें दोष तथा उसका परिहार
११०—रस के विषय में विधि और अनुवाद शब्दों का आक्षेप
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१९१—विरोध के स्थलों का निरूपण ।
९८३
१९२—विरोधियों के अभिनय पर विचार ।
९८८
१९३—विरोध परिहार के अन्य प्रकार
९८६
१९४—रसको अंगी बनाने का निर्देश
९८७
१९५—रस का अंगांगिभाव किस प्रकार संभव है ? इस पर विचार
९२६
१९६—नाट्य वस्तु की संक्षिप्त रूप रेखा
९३०
१९७—अविरोधी रसों का विवेचन
९३९
१९८—विरोधी रसों का विवेचन
९३४
१९९—परिस्थिति के अनुसार रस विरोध परिहार का निर्देश
९३६
१२०—विरोध परिहार के तीन प्रकारों की व्याख्या
९३५
१२१—दो रसों के परस्पर समावेश के अन्य प्रकार
९४५
१२२—रसों के अज्ञात भाव के द्वारा विरोध-परिहार, इस विषय में शंका समाधान
९४६
१२३—एकाश्रय के विभिन्नाश्रय में कर देने पर विरोध परिहार का निर्देश
९५४
१२४—नैरन्तर्य में रसान्तर व्यवधान का निर्देश
९५७
१२५—इस विषय में नामानन्द का उद्धाहरण
९५८
१२६—शान्त रस विषयक प्रश्नोत्तर, उसकी सत्ता तथा अन्यच अन्तर्भाव पर विचार
९६६
१२९—एक वाक्य में भाव व्यवधान में विरोध निवृत्ति
९६९
१२८—रस विरोध की दृष्टि से शृङ्गार रस में विशेष सावधानता की आवश्यकता
९५०
१२९—अन्य रसों में शृङ्गार का समावेश उतना सदोष नहीं होता
९५२
१३०—काव्य का जाया सम्मितत्व
१३१—रस विरोध का उपसंहार
९८९
१३२—रस प्रकरण में वाच्य-वाचक पर विचार की आवश्यकता और औचित्य का निर्देश
९९०
१३३—इस प्रकरण में द्विविध वृत्तियों का निरूपण
९९२
१३४—हति हेतु और रस का सम्बन्ध
९९६
१३५—रसप्रतीति में क्रमकल्पना पर विचार
१००९
१३६—रसप्रतीति में क्रम की संलक्ष्यता
१०१७
१३७—वययचना वृत्ति पर पुनः विचार का उपक्रम
१०२४
१३८—इस विषय में बिम्बप्रतिबिम्ब
१०२७
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वैय्याकरणों और मीमांसकों की विप्रतिपत्ति (१०३७) कुमारिल भट्ट के कथन का आशय (१०३८) प्राभाकर दर्शान वादियों का मत (१०३०) वैय्याकरणों के स्फोटवाद का आशय (१०३१)
१३९—पूर्वपक्ष की आलोचना और स्वमत स्थापन १०३२
१४०—तात्पर्य वृत्ति से निर्वाच्य न हो सकने का प्रतिपादन तथा इस विषय में अनेक दार्शनिक मत वादों की समीक्षा १०४०
१४१—पदार्थ-वाच्यार्थ न्याय तथा प्रदीप-घटन्याय के विषय में यज्ञा समाधान १०४८
१४२—‘यत्परः शब्दः स शब्दार्थः’ की विशेष मीमांसा १०७९
१४३—लक्षणा और व्यञ्जना का भेद-स्वरूप भेद १०८९
१४४—विषय भेद १०४६
१४५—व्यञ्जकत्व का उपपत्ति और गुण वृत्ति दोनों से भेद १०५३
१४६—लक्षणा और व्यञ्जना के भेद पर पुनः हृष्टिपात १०५६
१४७—व्यञ्जना वृत्ति को सिद्ध करने के लिये अन्य हेतु १०७५
१४८—उक्त विषय में अनुमान पद्धति पर सन्द्धित हृष्टिपात १०८१
१४९—विमिन्न दर्शनों में व्यञ्जना वृत्ति के स्वीकार की आवश्यकता १०८४ मीमांसकों के मत में व्यञ्जना व्यापार की आवश्यकता (१०८४) वैय्याकरणों के मत में व्यञ्जना व्यापार की आवश्यकता (१०९४) तार्किकों के मत में व्यञ्जना व्यापार की आवश्यकता (१०९६) व्यञ्जना की अनुमानगम्यार्थता का निराकरण (११०८)
१५०—गुणीभूतव्यङ्गच्य ११२३
परिचय (११२४) अत्यन्ततिरस्कृत वाच्य का गुणीभाव (११२५) वाच्यार्थ के तिरस्कृत न होने पर गुणीभाव (११३०) उक्ति के द्वारा कथन में गुणीभाव (११३१) इस इत्यादि दूसरे तत्त्वों का गुणीभाव (११३१) विभिन्न तत्त्वों के ‘गुणीभूत होने के रूप (११३१) गुणीभूतव्यङ्गच्य का महत्व (११३३) गुणीभूतव्यङ्गच्य के द्वारा अलङ्कार वर्ग में सौन्दर्य का आधान (११३७) वक्रोक्ति और गुणीभूतव्यङ्गच्य (११४४) अतिशयोक्ति से भिन्न अन्य अलङ्करों में व्यञ्जना का योग (११५०) गुणीभूत व्यङ्गच्य के अलङ्कारों को कृतार्थ करने के तीन प्रकार (११५३) गुणीभूतव्यङ्गच्य के अनन्त में कोई अलङ्कार अलङ्कार नहीं हो
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सक्तता ( ११५८ ) गुणीभूतव्यङ्ग्य से ही सभी अलङ्कारों की गतार्थता ( ११६१ ) गुणीभूतव्यङ्ग्य का लक्षण ( ११६४ ) गुणीभूतव्यङ्ग्य ध्वनि का निष्यान्त्र होता है ( ११६५ )
१५९—प्रतीयमान अर्थ का महत्त्व
१६०—प्राधान्याप्राधान्य विवेचन का महत्त्व और इसमें व्योमोह की सम्भावना 'छावण्यद्रविणययो न गणित:' की व्याख्या और उसमें व्याजस्तुति की सम्भावना ( १२०१ ) इस पद्य में अप्रस्तुतप्रशंसा का समस्तं ( १२०६ ) अप्रस्तुतप्रशंसा के विभिन्न रूप ( १२०९ )
१६१—चित्र काव्य स्वरूप, नामकरण और भेद ( १२२० ) चित्र काव्य और भाव पक्ष ( १२२२ ) चित्र काव्य के निरूपण की आवश्यकता ( १२२७ ) काव्य में शब्दों की परिवर्तनीयता का आशय ( १२२८ )
१६२—काव्य में अचेतन वस्तु के समावेश का प्रकार
१६३—कवि का महत्त्व
१६४—ध्वनि और गुणीभूतव्यङ्ग्य के विवेचन का उपसंहार
१६५—ध्वनि की अनन्तता और उसके भेदोपभेदों का विचार
१६६—लोचन और काव्यप्रकाश की गणना प्रक्रिया
१६७—साहित्य दर्पण की गणना प्रक्रिया
१६८—आलोक में संसृष्टि और सङ्कर का दिग्दर्शन
१६९—स्वगत भेदों का अनुग्राहक भाव सद्कर
१७०—सन्देह सद्कर
१७१—एकव्यङ्गकानुप्रवेश सद्कर
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१७२—संस्कृति
१७३—गुणीभूतव्यङ्ग्य से साक्ष्य और संसृष्टि
१७४—प्रधानता और गुणीभाव पर विचार
१७५—ध्वनि की गुणीभूतव्यङ्गय से संसृष्टि
१७६—अलङ्कारों से साक्ष्य और संसृष्टि
विमिश्र प्रकार के साक्ष्य और संसृष्टि का साधारण निर्देश
(१२६३) अन्य मेदों से रसध्वनि के साक्ष्य का एक उदाहरण
(१२६५) वाच्यालङ्कार की ध्वनि से संसृष्टि (१२७४)
१७७—संस्कृति और सक्कीर्ण में मेदों का साक्ष्य और संसृष्टि
१७८—ध्वनिभेदों की अपरिमिति का उपसंहार
१७९—काव्य के मूल तत्व के रूप में रीतियों का प्रवर्त्तन और ध्वनि
१८०—रीतियों का संक्षिप्त परिचय
१८१—वृत्तियाँ और ध्वनि
१८२—वृत्तियों का संक्षिप्त परिचय
१८३—रीतियों और वृत्तियों में ध्वनि के अन्तर्भाव का उपसंहार
१७४—अशक्य वक्रोक्त्यंश पद् का खण्डन
१८५—अनिर्वाच्य पक्ष का उपसंहार
१८६—लोचन के समाप्तिनिर्देश
चतुर्थ—उद्योत
१८७—लोचन का मङ्गलाचरण
१८८—वृत्तीय उद्योत से सङ्ज्ञति तथा ध्वनि निरूपण का प्रयोजनान्तर
१८९—पुरानी उक्तियों में ही ध्वनि के द्वारा नवीनता का सञ्चार हो जाता है
१९०—अत्यन्ततिरसकृतवाच्य के कारण नवीनता का उदाहरण
१९१—अर्थान्तर सङ्क्रमितवाच्य के कारण नवीनता का उदाहरण
१९२—विवक्षितान्यपरवाच्य से नवीनता का उदाहरण
१९३—ध्वनिमार्ग से काव्य की अनन्तता का प्रतिपादन
९४—रस परिग्रह से पुराने अर्थों में नवीनता शब्दशक्त्युद्भव
९५—विवक्षितान्यपर वाच्य अनुरणन रूप ध्वनि के मेदों से काम में नवीनता लाने का उदाहरण
१९६—अर्थशक्तिमूलक अनुरणन रूप व्यङ्ग्य ध्वनि से नवीनता के उदाहरण
१९७—रसध्वनि की प्रधानता
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१९८—रामायण तथा महाभारत में अंगोरस का विवेचन
१९९—उक्त विषय में निष्कर्ष
२००—अंगी रस के विवेचन की आवश्यकता
२०१—रचना के रसप्रवण होने पर अलङ्कार के अभाव में भी काव्य उपादेय हो जाता है इस बात का उदाहरण
२०२—अश्लील वस्तु से रस की दृष्टि
२०३—गुणीभूतव्यङ्ग्य से प्रतिभा की अनन्तता और नवीनता का विवेचन
२०४—प्रस्तुत प्रकरण का उपसंहार
२०५—प्रतिभा के गुण से काव्य में किस प्रकार अनन्तता आती है इस बात का विवेचन
२०६—वाच्यार्थ की अपेक्षा भी काव्य में नवीनता आ जाती है
२०७—अवस्था भेद इत्यादि का विवेचन
२०८—उक्त विषय में प्रश्न
२०९—वस्तुयें अपने विशिष्ट अर्थ में ही प्रयुक्त की जाती हैं सामान्य के साथ विशिष्ट का भी योग रहता है जिससे एक ही वस्तु अनेक रूपों में आया करती है
२११—प्रत्येक दार्शनिक की दृष्टि में शब्द का विशिष्ट अर्थ ही मन्ना पडेगा
२११—काव्य की अनन्तता में उक्ति वैचित्र्य का योग
२१२—अवस्था इत्यादि भेद की शोभा रस और औचित्य से होती है।
२१३—काव्य की अनन्तता का उपसंहार
२१४—काव्यों में 'कवियों के भाव मिलजाने का हेतु
२१५—दो कवियों के भावों में जो संवाद (मेल) होता है उसके प्रकार
२१६—प्रकारों की उपादेयता पर विचार
२१७—पूर्वस्थिति का अनुकायी भी काव्य आत्मतत्व के मिश्रण होने पर सदोष नहीं माना जा सकता
२१८—वस्तु योजना के मेल में तो दोष होता ही नहीं
२१९—प्रस्तुत प्रकरण का उपसंहार
२२०—कवियों को निःशङ्क होकर कविता करने का उपदेश
२२१—उपसंहारात्मक कारिकाओं में ग्रंथ के विषय इत्यादि का उल्लेख
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२२२—आनन्द वर्धन नाम पर विशेष प्रकाश
२२३—लोचन के उपसंहारात्मक पद्य
२२४—अत में मंगलाचरण
२२५—लोचन की विशेषता
२२६—अपनी गुरु परंपरा का निर्देश
२२७—सज्जन प्रशंसा तथा दुर्जन निंदा
२२८—शिवपर विश्वास और सब कुछ शिवमय होने की प्रशंसा
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अविवक्षितवाच्यस्य पदवाक्यैकप्रकाश्यता । तदनुसारनरूपपथ्यङ्ग्यस्य च ध्वने: ॥ १ ॥
(अनु०) इस प्रकार व्यङ्ग्य-मुख से भेदोपभेदों सहित ध्वनि के स्वरूप को दिखलाया दिये जाने पर अब व्यञक-मुख से यह दिखला रहे हैं :- ‘अविवक्षितवाच्य के ध्वनि का प्रकाशन पद और वाक्य से होता है उससे भिन्न अनुरणनरूप व्यङ्ग्य ध्वनि का प्रकाशन भी पद और वाक्य से ही होता है’ ॥ १ ॥
लोचन स्मरामि स्मरसंहारलीलापाटवशालिन: । प्रसद्यशश्मोद्देशार्ध हरन्तीं परमेश्वरीम् ॥ उद्योतान्तरसङ्गति कविमहृत्तिकार:--एवमित्यादि । तत्र वाच्यमुखेन तावद्विवक्षितवाच्यादयो भेदा:, वाच्यश्र यद्यपि व्यञ्जक एव । सन्धोक्तम्--‘यत्रार्थ: शब्दो
स्मरामि स्मरसंहारलीलापाटवशालिन: । प्रसद्यशश्मोद्देशार्ध हरन्तीं परमेश्वरीम् ॥
'कामदेव के संहार की लीला की चतुरता से शोभित होनेवाले शङ्कर की आधी देह को वलात् हरनेवाली परमेश्वरी को मैं स्मरण करता हूँ ।'
दूसरे उद्योत की सङ्गति करने के लिये वृत्तिकार करते हैं—‘इस प्रकार’ इत्यादि । उसमें वाच्यमुख से तो ‘अविवक्षितवाच्य’ इत्यादि भेद ( होते हैं ) और वाच्य यद्यपि व्यञ्जक हो होता है । जैसा कहा गया है—‘जहाँ अर्थ अथवा शब्द
तृतीय उद्योत के प्रारम्भ में लोचनकार ने पुनः मङ्गलाचरण किया है । यह भी ग्रन्थ का मध्यगत मङ्गलाचरण ही है और बार-बार किया हुआ मङ्गलाचरण विशेष रूपसे मङ्गल-प्रवण होता है । यहाँ पर लोचनकार ने अपने सम्प्रदाय के अनुसार भगवती पार्वती का स्मरण किया है । लोचनकार कह रहे हैं—‘भगवान् शङ्करजी बड़े ही निपुण हैं । उन्होंने खेल-खेल में ही कामदेव के संहार की लीला दिखला दी । उन अत्यन्त समर्थ तथा निपुण भगवान् शङ्कर के आधे शरीर को भगवती पार्वती ने वलात् हर लिया और भगवान् शङ्कर कुछ कर भी न सके । इस प्रकार भगवती पार्वती भगवान् शङ्कर की अपेक्षा कहीं अधिक निपुण तथा समर्थ हैं । इसीलिये
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वे'ति । तत्थश् व्यङ्ग्यमुखेनैव भेद उक्तः, तथापि स वाच्योऽर्थो व्यङ्ग्यमुखेनैव भिद्यते । तथा ह्यविवक्षितो वाच्यो व्यङ्ग्येन न्यग्भावितः, विवक्षितान्यपर्यो वाच्य इति व्यङ्ग्यार्थप्रवण एवोच्यते । इत्येवं मूलभेदयोरेव यथास्वमवान्तरभेदसहितयोर् व्यङ्ग्यकरूपो भेद उच्यते ।
लोचन
तत्थश् व्यङ्ग्यमुखेनैव भेद उक्तः, तथापि स वाच्योऽर्थो व्यङ्ग्यमुखेनैव भिद्यते । तथा ह्यविवक्षितो वाच्यो व्यङ्ग्येन न्यग्भावितः, विवक्षितान्यपर्यो वाच्य इति व्यङ्ग्यार्थप्रवण एवोच्यते । इत्येवं मूलभेदयोरेव यथास्वमवान्तरभेदसहितयोर् व्यङ्ग्यकरूपो भेद उच्यते ।
स व्यङ्ग्यमुखप्रेक्षितान्तरणत एव भेदमासादयति । अत एवाह—व्यङ्ग्यमुखेनेति । किं यद्यप्यर्थो व्यङ्गकस्तथापि व्यङ्ग्यतायोग्योऽप्यसौ भवतीति, शब्दस्य न कदाचिदपि व्यङ्गक एवेति । तदाह—व्यङ्गकमुखेनेति । न च वाच्य-स्याविवक्षितादिरूपेण यो भेदस्तत्र व्यङ्ग्यकत्वं नास्तीति पुनः शब्देनाह । व्यङ्गकमुखेनापि भेदः सर्वथैव न न प्रकाशितः किन्तु प्रकाशितोऽप्यधुना पुनः व्यङ्गक-मुखेन । तथाहि व्यङ्ग्यमुखप्रेक्षितया विना पदं वाक्यमिति स्वरूपत एव व्यङ्गकानां भेदः, न चैषामर्थवृत्तदाचिदपि व्यङ्ग्यतां सम्मव-तीति व्यङ्गकैकनियतं स्वरूपं यत्तन्नमुखेन भेदः प्रकाश्यते इति तात्पर्यम् ।
स व्यङ्ग्यमुखप्रेक्षितान्तरणत एव भेदमासादयति । अत एवाह—व्यङ्ग्यमुखेनेति । किं यद्यप्यर्थो व्यङ्गकस्तथापि व्यङ्ग्यतायोग्योऽप्यसौ भवतीति, शब्दस्य न कदाचिदपि व्यङ्गक एवेति । तदाह—व्यङ्गकमुखेनेति । न च वाच्य-स्याविवक्षितादिरूपेण यो भेदस्तत्र व्यङ्ग्यकत्वं नास्तीति पुनः शब्देनाह । व्यङ्गकमुखेनापि भेदः सर्वथैव न न प्रकाशितः किन्तु प्रकाशितोऽप्यधुना पुनः व्यङ्गक-मुखेन । तथाहि व्यङ्ग्यमुखप्रेक्षितया विना पदं वाक्यमिति स्वरूपत एव व्यङ्गकानां भेदः, न चैषामर्थवृत्तदाचिदपि व्यङ्ग्यतां सम्मव-तीति व्यङ्गकैकनियतं स्वरूपं यत्तन्नमुखेन भेदः प्रकाश्यते इति तात्पर्यम् ।
इत्यादि । इससे व्यङ्गक-मुख से भी भेद कह दिया गया। तथापि वह वाच्य अर्थ व्यङ्गक-मुख के ही द्वारा भेद को प्राप्त होता है । यह इस प्रकार-अविवक्षित वाच्य इत्यादि रूप में जो भेद विवक्षितान्यपरवाच्य यह व्यङ्ग्यार्थ-प्रवण को प्राप्त कर लेता है। इस प्रकार अपनी सत्ता के अनुसार अवान्तर भेदों का ही व्यङ्गकरूप जो अर्थ वह व्यङ्ग्यमुख प्रेक्षणरूप अङ्गारणतया से ही भेद को प्राप्त कर लेता है। अत एव कहलाते हैं—'व्यङ्ग्यमुख के द्वारा' यह। और भी यद्यपि अर्थ व्यङ्गक ( होता है ) तथापि वह व्यङ्गजकता के योग्य भी होता है, अतः शब्द से'। पुनः शब्द से यह कहते हैं कि वाच्य के अविवक्षितत्वादि रूप में जो भेद यहाँ सर्वथा व्यङ्गजकत्व नहीं होता यह बात नहीं है । व्यङ्गक-मुख से भी भेद सर्वथा प्रकाशित नहीं किया यह बात नहीं किन्तु प्रकाशित भा इस समय शुद्ध व्यङ्गक-मुखसे ( प्रकाशित किया जारहा है )। वह इस प्रकार-व्यङ्ग्यमुख प्रेक्षण के बिना पद, वाक्य, पदभाग सङ्घटना महावाक्य के स्वरूप से ही व्यङ्गकों के भेद हैं । नकी अर्थ के समान व्यङ्ग्यता कभी सम्भव नहीं है । इस प्रकार एकमात्र व्यङ्गक नियत जो स्वरूप है उसके दृष्टिकोण से भेद प्रकाशित किया जा रहा है, यह तात्पर्य है ।
वे परम ईश्वरी हैं । उन भगवती पार्वती के ऐश्वर्य का क्या कहना जिन्होंने योगीश्वर भगवान् शङ्कर के हृदय में भी सरसता का सम्पादन कर दिया । मैं इस तृतीय उद्योत के प्रारम्भ में उन परम ईश्वरी भगवती पार्वती जी का स्मरण करता
तारावती
वे परम ईश्वरी हैं । उन भगवती पार्वती के ऐश्वर्य का क्या कहना जिन्होंने योगीश्वर भगवान् शङ्कर के हृदय में भी सरसता का सम्पादन कर दिया । मैं इस तृतीय उद्योत के प्रारम्भ में उन परम ईश्वरी भगवती पार्वती जी का स्मरण करता
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तारावती
यहाँ पर कविप्रतिभा की ओर भी संकेत किया गया है जो कि नीरस से नीरस हृदय में भी सरसता का सम्पादन कर देती है ।
द्वितीय उद्योत में व्यङ्ग्य के रूपमें ध्वनि के स्वरूप का भी निरूपण किया जा चुका और उसके भेद भी दिखलाये जा चुके । अब पुनः व्यञ्जक के रूपमें स्वरूप और भेद दिखलाये जा रहे हैं । ( प्रश्न ) द्वितीय उद्योत में व्यङ्ग्य के भेदों के साथ वाच्य के भी अविवक्षितवाच्य और विवक्षितान्यपरवाच्य नामक दो भेद दिखलाये थे । यह भी प्रथम उद्योत में ही बतलाया जा चुका है कि वाच्यार्थ व्यञ्जक होते हैं । जैसे कि प्रथम उद्योत की ‘यत्रार्थः शब्दो वा’ इस कारिका से स्पष्ट है । अतएव वाच्य के भेद करने के साथ ही व्यञ्जक के भी भेद होगये । फिर यह कथन किस प्रकार सङ्गत हो सकता है कि द्वितीय उद्योत में व्यङ्ग्य के भेद दिखलाये गये थे और इस तृतीय उद्योत में व्यञ्जक के भेद दिखलाये जायेंगे ?
( उत्तर ) पहली बात तो यह है कि अविवक्षितवाच्य और विवक्षितान्यपरवाच्य ये दोनों वाच्यार्थ के भेद नहीं हैं किन्तु व्यङ्गच्य के ही भेद हैं--एक व्यङ्गच्य ऐसा होता है जिसमें वाच्यार्थ की विवक्षा होती है और दूसरा व्यङ्ग्य वह होता है जिसमें वाच्यार्थ की विवक्षा नहीं होती । इस प्रकार ये व्यङ्गच्य के ही भेद हैं वाच्यार्थ के नहीं । अविवक्षितवाच्य शब्द का अर्थ है--जिसमें वाच्य को अविवक्षित कर दिया जावे अर्थात् व्यङ्गच्य के द्वारा नीचा कर दिया जावे। इसी प्रकार विवक्षितान्यपरवाच्य शब्द का अर्थ है जिसमें वाच्य की विवक्षा अन्यपरक रूपमें हो अर्थात् वाच्यार्थ व्यङ्ग्यपरक हो । इस प्रकार अविवक्षितवाच्य और विवक्षितान्यपरवाच्य ये दोनों भेद व्यङ्गच्य के ही हैं ।
यह और बात है कि अपने विस्तार के अनुसार व्यङ्गच्य के मूलभेद और अवान्तर भेदों के दिखलाने के प्रसंग में व्यञ्जकत्प बाच्यार्थ के भी भेद हो जाते हैं । किन्तु ये भेद सर्वथा व्यङ्गयार्थ के ही मुखापेक्षी हैं और स्वतः नहीं किन्तु व्यङ्गय के अधीन होकर इन्हें भेदों को प्राप्त कर लेना पड़ता है । मानों इस क्रिया में अपने भेदोपभेद कराने के लिये वाच्यार्थ को पराधीन हो जाना पड़ता है । दूसरी बात यह है कि व्यञ्जक एक तो अर्थ होता है और दूसरा शब्द । अर्थ में व्यङ्गय हो सकने की भी योग्यता होती है । आशय यह है कि अर्थ केवल वाच्यार्थ के रूप में ही व्यञ्जक होता हो ऐसी बात नहीं है किन्तु व्यङ्गय अर्थ भी दूसरे व्यङ्गय अर्थ का व्यञ्जक होता है । एक ही अर्थ एक स्थान पर वाच्य होता है और दूसरे स्थान पर व्यङ्गय हो जाता है । इस प्रकार अर्थ में व्यङ्गय होने की क्षमता होती है शब्द में नहीं । शब्द कभी भी व्यङ्गय नही होता अपितु व्यञ्जक ही होता है । इसीलिये वृत्तिकार ने कहा है कि व्यङ्गय-मुख से
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यस्तु व्याचष्टे—‘व्यङ्ग्यां वस्त्वलङ्काररसांमुखेन इति’ स एवं प्रष्टव्य: एतत्तावत्त्विभेदत्वं न कारिकाकारण कृतम् । वृत्तिकारेण तु दर्शितम् । न चेदानीं यु कारो भेदप्रकटनं करोति । ततश्चेदं कृतमिदं क्रियत इति कर्तृभेदे का सङ्गति: ? न चै वता सकलप्राक्तनग्रन्थसङ्गतिः कृतैषा भवति । अनिवक्षिताभिधानलीलामति दर्शिततत्त्वादित्यलं निजपूज्यजनसङ्ग्रे: साकं विवादेन ।
जिसने तो व्याख्या की—‘व्यङ्ग्य अर्थात् वस्तु, अलङ्कार और रस के मुख से' इस एवं प्रष्टव्य: एतत्तावत्त्विभेदत्वं न कारिकाकारण कृतम् । वृत्तिकारेण तु दर्शितम् । न चेदानीं यु कारो भेदप्रकटनं करोति । इत्थं चेदं कृतमिदं क्रियत इति कर्तृभेदे का सङ्गति: ? न चैव वता सकलप्राक्तनग्रन्थसङ्गतिः कृतैषा भवति । अनिवक्षिताभिधानलीलामति दर्शिततत्त्वादित्यलं निजपूज्यजनसङ्ग्रे: साकं विवादेन ।
जिसने तो व्याख्या की—‘व्यङ्ग्य अर्थात् वस्तु, अलङ्कार और रस के मुख से’ इस प्रकार कहकर एवं प्रश्न करना चाहिये—ये तीन भेद कारिकाकार ने नहीं किये, वृत्तिकार ने दिखला दिये । इस समय वृत्तिकार भेदों का प्रकटन नहीं कर रहे हैं । ‘यह किया’ ‘यह कर रहे हैं’ यह कर्ता के भेद में कैसे संगत होता है। यह नहीं जा सकता कि इतने से सभी पुराने ग्रन्थों की संगति की हुयी हो जाती है । कयम् अविवक्षितवाच्य इत्यादि प्रभेदों को भी दिखलाया जा चुका है । बस अपने पूज्यों के संगतियों से विवाद करने की आवश्यक्ता नहीं ।
तारावती भेद दिखलाये जा चुके अब व्यञ्जक-मुख से भेद दिखलाये जा रहे हैं । अवतरण का आशय यह है कि जिसमें व्यङ्ग्य हो सकने की क्षमता होती है । उक्त भेद द्वितीय उद्योत में दिखलाये जा चुके, अब उसके भेद दिखलाये जा रहे हैं जो केवल व्यञ्जक ही होता है व्यङ्ग्य कभी नहीं हो सक्ता । आशय यह है यह बात नहीं है कि द्वितीय उद्योत में व्यञ्जक के रूप में ध्वनि के भेद किये नहीं गये थे । यद्यपि वाच्यात्मिक व्यञ्जक के भी भेद किये जा चुके हैं किन्तु शब्द व्यञ्जक के ही भेद किये जा रहे हैं । पद वाक्य वर्ण, पद भाग, सन्धिरूटन महावाक्य मे स्वरूप से ही व्यञ्जक होते हैं । अर्थ के समान ये कभी वाचक और कभी व्यङ्गय नहीं होते । अतएव यहाँ पर यही तात्पर्य है कि जो स्वरूप से वे व्यञ्जक के रूप में ही नियत है उनको हृदयङ्गम रखते हुए ध्वनि के भेदोपभेदो निरूपण किया जा रहा है ।
भेद दिखलाये जा चुके अब व्यञ्जक-मुख से भेद दिखलाये जा रहे हैं । अवतरण का आशय यह है कि जिसमें व्यङ्ग्य हो सकने की क्षमता होती है । उक्त भेद द्वितीय उद्योत में दिखलाये जा चुके, अब उसके भेद दिखलाये जा रहे हैं जो केवल व्यञ्जक ही होता है व्यङ्ग्य कभी नहीं हो सक्ता । आशय यह है यह बात नहीं है कि द्वितीय उद्योत में व्यञ्जक के रूप में ध्वनि के भेद किये नहीं गये थे । यद्यपि वाच्यात्मिक व्यञ्जक के भी भेद किये जा चुके हैं किन्तु शब्द व्यञ्जक के ही भेद किये जा रहे हैं । पद वाक्य वर्ण, पद भाग, सन्धिरूटन महावाक्य मे स्वरूप से ही व्यञ्जक होते हैं । अर्थ के समान ये कभी वाचक और कभी व्यङ्गय नहीं होते । अतएव यहाँ पर यही तात्पर्य है कि जो स्वरूप से वे व्यञ्जक के रूप में ही नियत है उनको हृदयङ्गम रखते हुए ध्वनि के भेदोपभेदो निरूपण किया जा रहा है ।
भेद दिखलाये जा चुके अब व्यञ्जक-मुख से भेद दिखलाये जा रहे हैं । अवतरण का आशय यह है कि जिसमें व्यङ्ग्य हो सकने की क्षमता होती है । उक्त भेद द्वितीय उद्योत में दिखलाये जा चुके, अब उसके भेद दिखलाये जा रहे हैं जो केवल व्यञ्जक ही होता है व्यङ्ग्य कभी नहीं हो सक्ता । आशय यह है यह बात नहीं है कि द्वितीय उद्योत में व्यञ्जक के रूप में ध्वनि के भेद किये नहीं गये थे । यद्यपि वाच्यात्मिक व्यञ्जक के भी भेद किये जा चुके हैं किन्तु शब्द व्यञ्जक के ही भेद किये जा रहे हैं । पद वाक्य वर्ण, पद भाग, सन्धिरूटन महावाक्य मे स्वरूप से ही व्यञ्जक होते हैं । अर्थ के समान ये कभी वाचक और कभी व्यङ्गय नहीं होते । अतएव यहाँ पर यही तात्पर्य है कि जो स्वरूप से वे व्यञ्जक के रूप में ही नियत है उनको हृदयङ्गम रखते हुए ध्वनि के भेदोपभेदो निरूपण किया जा रहा है ।
कतिपय विद्वानों ने ‘व्यङ्ग्य के रूप में ध्वनि के भेद दिखलाये जा चुके हैं ।’ किन्तु वस्तु अलङ्कार और रस रूप में के भेद दिखलाये जा चुके हैं ।’ किन्तु वस्तुतः आनन्दवर्धन ने दिखलाये हैं कारिकार ( ध्वनिकार ) ने ये भेद किये । अतएव कारिका के लिये इस अवतरण की संगति किसी प्रकार भी हो सक्ती । क्योंकि कारिका का कर्ता दूसरा है और भेदों का कर्ता दूसरा । भेद होने पर ‘हम यह कर चुके और अब हमें यह करना है’ इस ग्रन्थ की संगति नहीं हो सक्ती ।
कतिपय विद्वानों ने ‘व्यङ्ग्य के रूप में ध्वनि के भेद दिखलाये जा चुके हैं ।’ किन्तु वस्तु अलङ्कार और रस रूप में के भेद दिखलाये जा चुके हैं ।’ किन्तु वस्तुतः आनन्दवर्धन ने दिखलाये हैं कारिकार ( ध्वनिकार ) ने ये भेद किये । अतएव कारिका के लिये इस अवतरण की संगति किसी प्रकार भी हो सक्ती । क्योंकि कारिका का कर्ता दूसरा है और भेदों का कर्ता दूसरा । भेद होने पर ‘हम यह कर चुके और अब हमें यह करना है’ इस ग्रन्थ की संगति नहीं हो सक्ती ।
कतिपय विद्वानों ने ‘व्यङ्ग्य के रूप में ध्वनि के भेद दिखलाये जा चुके हैं ।’ किन्तु वस्तु अलङ्कार और रस रूप में के भेद दिखलाये जा चुके हैं ।’ किन्तु वस्तुतः आनन्दवर्धन ने दिखलाये हैं कारिकार ( ध्वनिकार ) ने ये भेद किये । अतएव कारिका के लिये इस अवतरण की संगति किसी प्रकार भी हो सक्ती । क्योंकि कारिका का कर्ता दूसरा है और भेदों का कर्ता दूसरा । भेद होने पर ‘हम यह कर चुके और अब हमें यह करना है’ इस ग्रन्थ की संगति नहीं हो सक्ती ।
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अविवक्षितवाच्यस्यात्यन्ततिरस्कृतवाच्ये प्रभेदे पदप्रकाश्यता यथा महर्षेर्व्यासस्य—“स्मैता: समिध: श्रीय:,” यथा वा कालिदासस्य—“क: सन्नद्धे विरहविधुरां त्वयि प्रेम्णेत जायाम्,” यथा वा ‘किमिच हि मधुराणां मण्डनं नाकृतिनाम्’ । एतेषूदाहरणेषु ‘समिध’ इति ‘सन्नद्ध’ इति ‘मधुराणा’मिति च पदानी व्यङ्ग्यकत्वाभिप्रायेणैव कृतानि ।
अनु० अविवक्षितवाच्य के उपभेद अत्यन्ततिरस्कृतवाच्य के पद के द्वारा प्रकट होने के उदाहरण जैसे भगवान् व्यास का—‘यह समिधि की सात समिधायें होती हैं ।’ अथवा कालिदास का—‘तुम्हारे ( मेघ के ) सन्नद्ध होने पर विरहविधुर प्रियतम की कौन उपेक्षा कर सकता है ?’ अथवा ‘मधुर आकृतियों के लिये क्या आभूषण नहीं होता ?’ इन उदाहरणों में ‘समिध’ शब्द ‘सन्नद्ध’ शब्द और ‘मधुर’ यह शब्द व्यङ्गयक्त्व के अभिप्राय से ही प्रयुक्त किये गये हैं ।
चकार: कारिकायां यथासंख्यशब्दानतिक्रम्यर्थ: । तेन विवक्षितवाच्यस्यो द्विप्रभेदोऽपि प्रत्येकं पदवाक्यप्रकाश इति द्विधा । तदनयस्य विवक्षिताभिधेयस्य सम्वन्धी यो भेद: क्रमद्योत्थयो नाम समेतदसहित: सोऽपि प्रत्येकं द्विधैव । अनुगणनेन रूपं रूपणसादृश्यं तस्य तादृग्व्यङ्ग्य' यत्स्येयर्थ: । महर्षेरिस्यानेन तदनुसन्धत्ते यत्प्रागुक्तम्, अथ च रामायणमहाभारतप्रभृतिनि लक्ष्ये दर्शयति इति ।
कारिका में ‘च’ यथासंख्य की शाखा की निवृत्ति के लिये है । इससे दो प्रकार का विवक्षितवाच्य भी प्रत्येक पद और वाक्य द्वारा प्रकट ( होकर ) दो प्रकार के ( होते हैं ) । उससे भिन्न विवक्षिताभिधेय सम्वन्धी जो भेद क्रमद्योत्थनामवाला अपने प्रभेद के सहित, वह भी दो प्रकार का होता है । अर्थात् अनुरणन से रूपण -या स्वरूप की जिसकी समानता है उसका । ‘महर्षे:’ शब्द से उसका अनुसन्धान करते हैं जो पहले कहा है कि रामायण महाभारत प्रभृति लक्ष्य में देखा जाता है, यह ।
नहीं हो सकती । यह भी नहीं कहा जा सकता कि सभी पुराने ग्रन्थों की संगति के लिये यह अवतरण दिया गया है क्योकि दूसरे उद्योत में वस्तु इत्यादि भेदों के अतिरिक्त अविवक्षितवाच्य इत्यादि भेद भी दिखलाये गये हैं । मैं समझता हूँ कि न्थ की संगति के लिये इतना कहना पर्याप्त है । अपने पूजनीय व्यक्तियों के समक्ष ग्रन्थों की अधिक आलोचना करना ठीक नहीं ( सम्मवतः अभिनव गुप्त के रजनों में किसी ने अथवा तत्समक्ष किसी आचार्य ने ग्रन्थ की इस प्रकार संगति
तारावती
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धृति: क्षमा दया शौचं कारुण्यं वागनिष्ठुरा । मित्राणां चानभिद्रोह: सत्त्वता समिध: श्रिय: ॥
धृति, क्षमा, दया, शौच, कारुण्य, अनिष्ठुरवाणी और मित्रों से द्रोह न करना ये सम्पत्तियाँ हैं ७ समिधायें हैं ।
लगाई होगी । इसीलिये अभिनवगुप्त ने उनके लिये ‘निजपूज्यजनसगोत्रै:' यह विशेषण दिया । यहाँ पर लोचनकार का कहना यही है कि द्वितीय उद्योत में अर्थ के रूप में ध्वनि के भेद दिखलाये गये थे जो कि कबहूँ व्यंग्य भी हो सकता है । किन्तु इस उद्योत में वर्ण इत्यादि के रूप में भेद दिखलाये जा रहे हैं जो केवल व्यञ्जक ही होते हैं व्यंग्य कबहूँ नहीं होते ।)
कारिका का आशय यह है—‘अविवक्षितवाच्य नामक ध्वनि पद और वाक्य से प्रकाशित होती है और उससे भिन्न अनुरणनरूप व्यङ्ग्यध्वनि भी पद और वाक्य से प्रकाशित होती है ।’
इस कारिका में ‘च’ ‘और’ शब्द का प्रयोग यथासंख्या की शङ्का की निवृत्ति के लिये किया गया है । आशय यह है कि यहाँ पर और शब्द का प्रयोग इसलिये किया गया है जिससे यह ज्ञात हो सके कि अविवक्षितवाच्य और अनुरणनरूप व्यङ्ग्य दोनों प्रकार की ध्वनियों के व्यञ्जक पद और वाक्य दोनों होते हैं ।
यदि वह कहा जाता है कि अविवक्षितवाच्य और अनुरणनरूप व्यङ्ग्य ध्वनि पद और वाक्य के द्वारा प्रकाशित होती है तो कदाचित् उसका आशय यह हो जाता है कि अविवक्षितवाच्य ध्वनि पद के द्वारा प्रकाशित होती है और अनुरणनरूप व्यङ्ग्यध्वनि वाक्य के द्वारा प्रकाशित होती है । इस प्रकार अविवक्षितवाच्य के दोनों भेदों में प्रत्येक के दो भाग होते हैं पदप्रकाश्य और वाक्यप्रकाश्य ।
उससे भिन्न अर्थात् विवक्षितवाच्य से सम्बन्ध रखनेवाला जो भेद है जो कि क्रमव्योत्पत्ति कहलाता है अपने भेदों के सहित उसके भी ( प्रत्येक के ) दो भेद होते हैं । उसे अनुरणनरूप कहते हैं । अनुरणनरूप शब्द का अर्थ है अनुनाद या अनुगमन से जिसके रूप या स्वरूप की समानता है । अर्थात् जिस प्रकार पहले घण्टानाद सुनाई पड़ता है और बाद में उसकी प्रतिध्वनि, इसी प्रकार जिसमें पहले वाच्यार्थ की प्रतीति होती है और बाद में प्रतिध्वनि के समान व्यंग्यार्थ प्रतीत होता है ।
अविवक्षितवाच्य का पहला भेद है अत्यन्ततिरस्कृतवाच्य । उसके दो भेद बतलाये गये हैं पदप्रकाश्य और वाक्यप्रकाश्य । अविवक्षितवाच्य के उपभेद अत्यन्ततिरस्कृतवाच्य की पदप्रकाश्यता का उदाहरण जैसे महर्षि व्यास का इलोक-यहाँ पर महर्षि शब्द से उसी का अनुसन्धान किया जाता है जो कि पहले
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समिच्छन्दस्यात्र सर्वथा तिरस्कारः असम्भवात् । समिच्छन्देन च न्यक्कृत्योदथोर्नपेक्षलक्ष्युद्दीपनक्षमत्वं सस्यानां वक्त्राभिप्रेतं ध्वनितम् । यद्यपि 'निःश्वासान्धश्रः' इत्याद्युदाहरणाद्यमर्थो लभ्यते तथापि प्रसङ्घाद् बहुलक्ष्यव्यापित्वं दर्शयितुं रणान्तराण्युक्तानि । अत्र च वाच्यस्यात्यन्ततिरस्कारः पूर्वोक्तमनुसृत्य योजनीयः न तु तेन । सन्नद्धपदेन च वाच्यसंभवत्स्वार्थेन नोद्यततत्वं लक्ष्यतां वक्त्राभिप्रेता निष्करणप्रतिकार्यत्वापेक्षापूर्वंकारित्वादयो ध्वन्यन्ते । तथैव मधुरशब्देन सर्वविषयरञ्जनैकत्वादिकं लक्ष्यतां सातिरायामिलाषविषयत्वं नात्रैवंमिति वक्त्राभिप्रेतं रे ।
समिच्छन्दस्यात्र सर्वथा तिरस्कारः असम्भवात् । समिच्छन्देन च न्यक्कृत्योदथोर्नपेक्षलक्ष्युद्दीपनक्षमत्वं सस्यानां वक्त्राभिप्रेतं ध्वनितम् । यद्यपि 'निःश्वासान्धश्रः' इत्याद्युदाहरणाद्यमर्थो लभ्यते तथापि प्रसङ्घाद् बहुलक्ष्यव्यापित्वं दर्शयितुं रणान्तराण्युक्तानि । अत्र च वाच्यस्यात्यन्ततिरस्कारः पूर्वोक्तमनुसृत्य योजनीयः न तु तेन । सन्नद्धपदेन च वाच्यसंभवत्स्वार्थेन नोद्यततत्वं लक्ष्यतां वक्त्राभिप्रेता निष्करणप्रतिकार्यत्वापेक्षापूर्वंकारित्वादयो ध्वन्यन्ते । तथैव मधुरशब्देन सर्वविषयरञ्जनैकत्वादिकं लक्ष्यतां सातिरायामिलाषविषयत्वं नात्रैवंमिति वक्त्राभिप्रेतं रे ।
'समिधे' शब्द के अर्थ का सर्वथा त्याग हो जाता है क्योंकि असम्भव है । शब्द के द्वारा व्यंग्यार्थ ( निकलता है ) अन्य की बिना अपेक्षा किये हुये वाक्त्रा को अभिप्रेत है ध्वनित की गई वप्ति 'निःश्वास से अन्धे आदर्श के समान' इत्यादि उदाहरण से भी यह अर्थ खो जाता है तथापि प्रसङ्घदश बहुलक्ष्यव्यापित्व दिखलाने के लिये दूसरे ग दिये गये हैं । यहाँ पर वाच्य का अत्यन्त तिरस्कार पूर्वोक्त का अनुसरण प्रोजित कर लिया जाना चाहिये पुनरुक्त की क्या आवश्यकता ? यहाँ पर स्वार्थवाले और उद्यतत्व को लक्षित करानेवाले सन्नद्ध पद से वक्ता के निष्करणत्व अप्रतिकार्यत्व और अपेक्षापूर्वंकारित्व इत्यादि ध्वनित किये जाते सी प्रकार सर्वविषयरञ्जकत्व तपंकत्व इत्यादि को लक्षित करानेवाले मधुर वक्ता का अभिमत अतिशयतापूर्वं अभिलाषविषयत्व इत्यादि इस विषय में आकाश्यर्हीं है यह ध्वनित करता है ।
भा कि रामायण महाभारत प्रभृति लद्य्यों में इसको सत्ता पाई जाती है । श्लोक का अर्थ यह है— , क्षमा, दया, शौच, कारुण्य, अनिष्ठुर वाणी और मित्रों से द्रोह न करना की सात समिधायें हैं ।
भा कि रामायण महाभारत प्रभृति लद्य्यों में इसको सत्ता पाई जाती है । श्लोक का अर्थ यह है— , क्षमा, दया, शौच, कारुण्य, अनिष्ठुर वाणी और मित्रों से द्रोह न करना की सात समिधायें हैं ।
तारावती 'समिधे' शब्द के अर्थ का यहाँ पर सर्वथा परित्याग हो जाता है क्योंकि रक्षा की होती हैं लक्ष्मी की समिधाओं का हो सकना असम्भव है । मेधा शब्द के अर्थ का बाघ हो जाता है और उससे लक्ष्यार्थ निकलता गाली ।' लक्क्षणा का प्रयोजन यह प्रकट करना है कि 'ये सातों गुण लक्ष्मी दाते हैं, इन्हें इस कार्य के लिये किसी वाह्य सहायता की अपेक्षा नहीं उमिधायें अमि को स्वतः बढाती हैं-उन्हें किसी अन्य पदार्थ की अपेक्षा
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नहीं होती।) यही ध्वनि है। यद्यपि 'निःश्वासान्ध इवादर्शः' इत्यादि उदाहरण से भी इस अर्थ की उपलब्धि हो जाती है अर्थात् यह उदाहरण भी अविवक्षितवाच्य के उपभेद अत्यन्ततिरस्कृतवाच्य की पद-प्रकाश्यता का हो सकता है तथापि दूसरा उदाहरण प्रसंगानुकूल यह सिद्ध करने के लिये दिया गया है कि 'अत्यन्त तिरस्कृतवाच्य के एक नहीं अनेक उदाहरण हो सकते हैं। यह तथा दूसरे उपभेद अनेक लक्ष्यों में व्याप्त हैं।' यहाँ पर वाच्य का अत्यन्त तिरस्कार किस प्रकार होता है इसकी योजना पहले के समान कर लेनी चाहिये। बार-बार एक ही बात के पिष्टपेषण की क्या आवश्यकता? (यहाँ पर यद्यपि उपमा भी अभिव्यक्त होती है—'जिस प्रकार शुष्क इन्धन अग्नि को प्रदीप्त करता है उसी प्रकार धृति इत्यादि गुण लक्ष्मी को प्रदीप्त करते हैं।' तथापि पहले यहाँ पर सारोपा लक्षणा ही होती है और समिध् शब्द के लक्ष्मी के साथ वाधित होने के कारण उनसे लक्ष्यार्थ निकलता है 'बढ़ानेवाले' और उससे व्यंग्यार्थ निकलता है कि 'धृति इत्यादि गुण लक्ष्मी को इतना अधिक बढ़ाते हैं जितना कोई और वस्तु नहीं बढ़ाती। इस प्रकार यह उदाहरण अत्यन्ततिरस्कृतवाच्य ध्वनि का ही है उपमाध्वनि का नहीं। यहाँ पर इन्धन अर्थ की सर्वथा अविवक्षा भी स्पष्ट है और व्यंग्यार्थप्रतीति के लिये केवल समिध् शब्द का पर्याप्त होना भी स्पष्ट ही है। अतः यह पदलक्षण्या अत्यन्ततिरस्कृतवाच्य ध्वनि है।)
इसी का दूसरा उदाहरण जैसे कालिदास के मेघदूत में यक्ष मेघ से कह रहा है—'जब तुम पवनपदवी पर आरूढ़ होकर आगे बढोगे तब परदेशियों को वे ललनायें, जो कि स्नान (ऋतुस्नान) कर अपने केशों को सुखा रही होंगी, विश्वास के कारण अपने प्रियतमों के लौटने की आशंसा करती हुई तुम्हारी ओर सतृष्ण दृष्टि से देखेंगी। क्योंकि जब तुम सन्नद्ध हो रहे हो तब क्रियोग-विधुर वृत्तिवाला न हो।' यहाँ पर सन्नद्ध शब्द को लीजिये यह शब्द सम्पूर्ण उपसर्ग नघातु से क प्रत्यय होकर बना है। 'नह' धातु का अर्थ होता है कवच पहिनना। इसीलिये अमरकोष में लिखा है 'सन्नद्धो वीर्यतः सज्जो दंशितः' मेघ का कवच पहिन सकना स्वार्थ में वाधित है। अतः उसका लक्ष्यार्थ निकलता है 'उद्यत होना'। इससे प्रयोजन के रूप में व्यंग्यार्थ निकलता है कि 'जब तुम वियोगियों पर प्रहार करते हो तब तुम्हारे अंदर करुणा बिल्कुल ही नहीं रहती, न साधारण व्यक्ति की इतनी शक्ति होती है कि वह तुम्हारा प्रतिकार कर सके और न तुम सूझबूझ के साथ प्रहार करते हो।'
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स्यैवार्थान्तरसङ्क्रमितवाच्ये यथा—‘रामेण प्रियजीवितेन तु कृतं प्रेम्णा रोचितम्’ । अत्र रामेणित्येतत्पदं साहसेकरसत्वादि व्यङ्ग्याभिसङ्क्रमितव्यङ्ग्यकम् ।
उसी का अर्थान्तरसङ्क्रमितवाच्य में जैसे—‘हे प्रिये जीवन को प्रिय वाले राम ने प्रेम के उपयुक्त कार्य नहीं किया ।’ यहाँपर ‘राम ने’ इस पद के का सङ्क्रमण साहसेकरसत्व इत्यादि व्यङ्ग्यार्थ में हो जाता है ( अतः यह यङ्गक है ।
एयैवति । अविवक्षितवाच्यस्य यो द्वितीयो भेदस्तस्येदशर्थः । प्रत्याख्यानरुषः कृतं समुचितं क्रूरेण ते रक्षसा ! सोढुं तच्च तथात्वया कुलजनो धत्ते यथोचैः शिरः ।। व्यर्थं सम्प्रति बिभ्रता धनुरिदं त्वद्द्व्यापदः साक्षिणा’ इति ।
अविवक्षितवाच्य का जो दूसरा भेद है उसका । ‘राक्षस ने प्रत्याख्यान के क्रोध के योग्य ( व्यवहार ) तुमसे किया । और नको इस प्रकार सह लिया जिससे कुलवान् ऊँचा सिर धारण करते हैं । इस समय इस धनुष को व्यर्थ ही धारण करनेवाले के प्रेमी राम ने प्रेम का उचित व्यवहार नहीं किया ।
सिपाही बन्नकर आता है उसमें सिपाहियों को विशेषतायें होनी ही इसीलिये निष्कर्षणत्व इत्यादि की व्यञ्जना यहाँ पर होती है ।) यही का को अभीष्ट है और इसी अर्थ के प्रतिपादन के लिये वक्ता ने वाधित द्व का प्रयोग किया है । यहाँ पर कवच धारण करने के अर्थ का सर्वथा हो जाता है । अतएव यहाँ पर शब्दव्यङ्गया अत्यन्ततिरस्कृतवाच्य
इसका तात्पर्य यह है कि यहाँ पर सिपाही शब्द वाधित होकर सभी को अनुरञ्जित करना,
उदाहरण जैसे कालिदास ने ही अभिज्ञान शाकुन्तल में दुष्यन्त के तत्रा का वर्णन करते हुये लिखा है—‘सिवार में फँसा हुआ भी कमल णीय होता है; चन्द्रमा का मलिन भी चिह्न शोभा को ही बढ़ाता है, वल्कल से भी अधिक मनोज्ञ मालूम पड़ रही है । मधुर आकृतियों वस्तु आभूषण नहीं बनती।’यहाँ पर आकृति को मधुर कहा गया है । स होता है जो गुड, शकर, शार्द इत्यादि में तो सम्भव है पर आकृति सकता । अतः यह शब्द वाधित होकर सभी को अनुरञ्जित करना,
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रक्षःस्वभावादेव यः क्रोधनतिलकड्ययशासनस्वदुम्मेदतया च प्रसह्य निराक्रियमााणः क्रोधान्धः तस्यैतत्तावत्स्वचित्तवृत्तिसमुचितमनुधानं यन्मूर्धकर्त्तं नाम, मान्योऽपि कश्चिन्नमाज्ञां लडूयिष्यति ति। त इति यथा तादगापि तय। न गाणितस्तस्यास्तवेव्यर्थे। तदोऽपि तथोआविकारजात्स्वपितकुबुद्धया नेत्रविस्फारितमुखप्रसादादिलक्ष्येमाणियासोढम्। यथा येन प्रकारेण कुलजन इति यः कश्चित्पामरप्रायोऽपि कुलवधूःशब्दवाच्यः। उच्चैः शिरो धृते एवंविधाः किल वयं कुलवध्वो भवाम इति। अथ च धीरःकर्त्तनावसरे स्वया शीघ्रं कृत्यतामिति तथा सोढं तथोचैः शिरो धृतं यथान्योऽपि कुलब्जोजनः उच्चैः शिरो धृते नित्यप्रवृत्ततया। एवं रावणस्य तव च समुचितकारित्वं निगूढम्। मम पुनः सर्वमेवानुचितं पर्थवसितम्। तथाहि राज्यनिर्वासनादि निरवकाशीकृतधनु-
राक्षस स्वभाव से ही जो क्रूर ( है और ) अधिक अनुशड्यनीय शासन की दुम्मेदता के कारण वलात् निराकरण किया हुआ क्रोध से अन्वा ( हो गया ) (यह) जो कि तुम्हारा सिर कातना उसका तो अपनी चित्तवृत्ति के अनुकूल ही अनुष्ठान है और भी कोई मेरी आज्ञा का उल्लड्यन न कर बैठे ।
तुम्हारा अर्थात् जिससे उस प्रकार का भी उसके ( सीता के ) द्वारा नहीं गिना गया इस प्रकार का तुम्हारा । उसको भी उस प्रकार अर्थात् विकाररहित तथा उत्सव की प्राप्ति की दृष्टि से नेत्रविस्फारण तथा मुखप्रसाद इत्यादि के द्वारा लक्षित होनेवाली ने सहलिया । जिससे अर्थात् जिस प्रकार से कोई पामरप्राय कुलवती भी कुलवधू शब्द की वाच्य हो जाती है । 'ऊँचा सिर धारण करती है?' कि इस प्रकार की हम कुलवती हैं । और भी सिर काटने के अवसर पर तुमने 'शीघ्र ही काटो' इस आशय से ऊँचा सिर कर लिया जिससे नित्य प्रवृत्त होने के कारण अन्य भी कुल-क्रियाँ ऊँचा सिर धारण कर लेती हैं । इस प्रकार रावण का और तुम्हारा समुचितकारित्व असंदिग्ध है । मेरा तो फिर सब कुछ अनुचित ही परिथवसितम् । तथाहि राज्यनिर्वासन इत्यादि के कारण निरवकाश किये हुये धनु-
तृप्त करना इत्यादि धर्मों को लक्षित कराता है । उससे व्यंग्यार्थ निकलता है कि शकुन्तला का रूप यदि बहुत वढी-चढी अभिलाषा का विषय बन जाए तो इसमें आश्रय की बात कुछ नहीं । यही ध्वनि है । यह ध्वनि 'मधुर' इस पद से निकलती है, अतः पदव्यग्य अत्यन्तातरसङ्कृतवाच्य ध्वनि है । क्योंकि मधुर शब्द के वास्तविक अर्थ मधुर रस का सर्वथा परित्याग हो जाता है ।
तृप्त करना इत्यादि धर्मों को लक्षित कराता है । उससे व्यंग्यार्थ निकलता है कि शकुन्तला का रूप यदि बहुत वढी-चढी अभिलाषा का विषय बन जाए तो इसमें आश्रय की बात कुछ नहीं । यही ध्वनि है । यह ध्वनि 'मधुर' इस पद से निकलती है, अतः पदव्यग्य अत्यन्तातरसङ्कृतवाच्य ध्वनि है । क्योंकि मधुर शब्द के वास्तविक अर्थ मधुर रस का सर्वथा परित्याग हो जाता है ।
अविवक्षितवाच्य के अर्थान्तरसङ्क्रमितवाच्य नामक भेद की पदप्रकाश्यता का उदाहरण--
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व्यापारस्यापि कलत्रमात्ररक्षणप्रयोजनमपि यच्चापमभूत्तत्संप्रति स्वव्ययरक्षिततद्योगापन्नाया-मेव निष्प्रयोजनम्, तथापि च तद्वारयामि। तद्वान् निजजीवितरचैवास्य प्रयोजनत्वेन सम्भाव्यते। न चैतद् युक्तम्। रामेणोति। समसाहससमध्वसत्यसं धृतयोचितकारित्वादिव्यङ्ग्यधर्मान्तरपरिणतिनेतव्यर्थः:। ‘कापुरुषादि धर्मपरिग्रहस्त्वादिशब्ददत्’ इति यद्व्याख्यातम्, तदसत्, कापुरुषस्य ह्येतदेव प्रयुतोचितं स्वात। प्रिय इति शब्दमात्रमेवैतदिदानां संवृत्तम्। प्रियशब्दस्य प्रवृत्तिनिमित्तं यथ्रेमनाम तद्योग्यानौचित्य-कलङ्कितमिति शोकालम्बनोद्दिपनाविभावयोगाल्कुंरणरसौ रामस्य स्फुटीकृत इति।
( मेरा ) जो धनुष कलत्र-रक्षण प्रयोजनमात्र था इस समय तुम्हारे अरक्षित रूप में मारे जाने पर निष्प्रयोजन रह गया। तथापि उसे धारण कर रहा हूँ। अतः निःशङ्कदेह अपने जीवन की रक्षा ही इसके प्रयोजन के रूप में सम्भावित की जा सकती है। यह उचित नहीं है। ‘राम के द्वारा’ अर्थात् समानरूप में साहससमध्वसत्यसंधत्व और उचितकारित्व इत्यादि दूसरे धर्मों में परिणत ( राम के द्वारा )। आदि शब्द से कायर इत्यादि ‘धर्म’ परिग्रह हो जाता है’ यह जो व्याख्या की गई है-वह ठीक नहीं है क्योंकि प्रत्युत कायर के लिये तो यही उचित होता। ‘प्रिय’ यह इस समय शब्दमात्र ही हो गया। प्रिय शब्द का जो प्रवृत्तिनिमित्त प्रेम वह भी अनौचित्य से कलङ्कित है। इस प्रकार शोक के आलम्बन और उद्दीपन विभाव योग से राम का करुण रस स्पष्ट कर दिया गया है यह।
तारावती
रावण ने राम को निराश और युद्ध से विरत करने के लिये माया के द्वारा सीता की मूर्ति बनवाकर ( मेघनाद के द्वारा ) उसका सिर कटवा लिया। श्रीरामचन्द्रजी सीताजी को वस्तुतः मरी हुई जानकर उनके वियोग में विलाप करते हुये कह रहे हैं—
‘क्रूर राक्षस ने तुम्हारे द्वारा प्रत्याख्यात होकर क्रोध में भरकर वही किया जो उसके लिये उचित था। तुमने भी उसको उसी प्रकार सह लिया जिससे कुलजनों का सिर ऊँचा हो जाता है। हे प्रिये इस समय तुम्हारी आपत्ति को साक्षी के रूप में देखते हुये इस धनुष को व्यर्थ ही धारण करनेवाले राम ने, जिसका अपना जीवन ही प्यारा है, प्रेम के योग्य कार्य नहीं कर पाया।’
‘क्रूर राक्षस होने के कारण स्वभावतः क्रूर है, वह एक बुरे मद से भरा हुआ है कि कोई भी उसके शासन का उल्लङ्घन नहीं कर सकता। अतएव जब उसका बलात् निराकरण किया गया तब उसका क्रोधातिशय होना स्वाभाविक ही था। उसके लिये यह बात अपनी चित्तवृत्ति के अनुकूल ही थी कि उसने सिर काट लिया
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जिससे फिर कभी कोई उसकी आज्ञा के उल्लङ्घन करने का साहस न कर बैठे। उसने आज्ञा का उल्लङ्घन करनेवाली सीता का सिर काटकर अपनी क्रूरता का निर्वाह कर दिया। 'तुम्हारा सिर काट लिया' मैं 'तुम्हारा' शब्द से ध्यक्त होता है कि तुम इतनी महान् हो कि उतने प्रभावशालिनी तथा क्रूर राणा को भी कुछ नहीं समझा। इतनी महत्त्वशालिनि भी तुम्हारा सिर रावण ने काट ही लिया। उस आपत्ति को भी सीता ने उत्सव समझकर आनन्दपूर्वक सहन कर लिया। नेत्र विस्फुरण और मुख की प्रसन्नता से यह बात प्रकट हो रही थी कि सिर काटे जाने के अवसर पर भी सीता जी के चित्त में आनन्द था। सीता जी के कर्त्तव्य-पालन में इतनी उचचता थी कि दूसरी पामर भी कुलवधुओं का सिर स्वाभिमान से ऊँचा हो जाता है। कुलवधुओं में ही यह शक्ति है कि वे कर्त्तव्य-पालन के लिये अपना सिर भी दे देती हैं। दूसरा आशय यह है कि सिर काटने के अवसर पर सीताजी ने अपना सिर इस मन्तव्य से ऊँचा कर दिया कि शीघ्र काटों। नित्य ही कुलवधुओं के सामने कर्त्तव्य-पालन तथा सतीत्व-रक्षा की दिशा में सिर कटवाने का अवसर आता है और वे सीता के उदाहरण से ही अपना सिर ऊँचा कर देती हैं। इस प्रकार रावण ने अपने क्रूरता के कर्त्तव्य का निर्वाह कर दिया और सीता ने अपने पातिव्रत्य धर्म को निभा दिया। किन्तु राम के लिये तो सभी कुछ अनुचित ही रहा। राज्य से निर्वासित हो जाने इत्यादि के बाद धनुष के कार्यों का अवसर आता ही रहा। केवल उसका एक ही प्रयोजन रह गया था कि पत्नी की रक्षा की जाती। जव पत्नी का सिर काटा गया तब राम उस सब हृश्य को एक साक्षी के समान ही देखते रह गये, कोई भी प्रतीकार न कर सके। बिना ही रक्षा के सीता जी के मर जाने पर धनुष का पत्नी-रक्षा रूप प्रयोजन भी जाता रहा। फिर भी राम धनुष को धारण किये हुए हैं जिसका एक मात्र यही प्रयोजन हो सकता है कि वे अपने शरीर की रक्षा करें। राम को अपना जीवन प्यारा है, जो बात उचित नहीं है।
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यथा वा— एस्से जणो तिस्सा देउ कवोओपमाइ ससिविस्सम् । परमत्थविआरे उण चन्दो चन्दो विॡ वराओ ॥ अन्न द्वितीयश्रान्द्रशब्दोऽर्थान्तरसङ्क्रमितवाच्य:? ।
अथवा जैसे— 'यों ही लोग उसके कपोल की उपमा में चन्द्रविम्ब को दिया करते हैं । वास्तविक विचार करने पर बेचारा चन्द्र चन्द्र जैसा ही है ।' यहाँ पर दूसरा चन्द्र शब्द अर्थान्तरसंक्रमितवाच्य है ।
लोचन एस्से इति । एवमेव जनस्तस्या ददाति कपोलोपमायां शशिविस्वम् । परमार्थविचारे पुनश्रन्द्रश्रन्द्र एव वराकः ॥ (इति छाया ) 'यों ही' 'लोग उसके कपोलों की उपमा में यों ही चन्द्रविम्ब को दे दिया करते हैं । पुनः वास्तविक विचार करने पर तो बेचारा चन्द्र चन्द्र हो है ।' तारावती नहीं होता क्योंकि वस्तुतः राम धनुष धारण किये हुये ही हैं । इस प्रकार यहाँ पर राम शब्द का व्यङ्ग्य धर्मान्तर परिणत अर्थ लिया जाता है । अतएव यहाँ पर अर्थान्तरसङ्क्रमितवाच्य ध्वनि है जो कि पद के द्वारा प्रकाशित होती है । कुछ लोगों ने यहाँ पर कायरता इत्यादि व्यङ्ग्य धमों में संक्रान्तवाच्य की व्याख्या की है । ( प्रदीपकार ने लिखा है—‘जो राम कायर हैं उन्होंने.......’ नटकर्त्ताओं ने लिखा है—‘जो राम छलपूर्वक स्नेह करनेवाले हैं ।’ भट्ट गोपाल ने लिखा है—‘जो राम पुरुषार्थ से विमुख है ।’ ) किन्तु ये व्याख्यायें ठीक नहीं हैं । क्योंकि यदि राम में कायरता इत्यादि धमों को स्वीकार कर लिया जावे तो रक्षा न कर सकने में अनुचित क्या हो ? यहाँ पर आशय यही है कि जिन राम में साहस है, शौर्य है, सत्यसन्धत्व है उन राम ने भी अपने कर्त्तव्य का पालन नहीं कर पाया यह बात अनुचित हुई । अतएव यहाँ पर साहस इत्यादि धमों की ही व्याख्या करनी चाहिये । राम का सीता के लिये 'प्रिय' सम्बोधन तो अब शब्दमात्र ही रह गया । प्रिय का प्रवृत्तिनिमित्त प्रेम होता है । प्रिय वही होता है जिसमें प्रेम हो और वह उसका निर्वाह भी कर सके । राम का प्रेम अनौचित्य से कलङ्कित हो गया है । इस प्रकार यहाँ पर शोक के आलम्बन और उद्दीपन विभाव के योग से राम का करुण रस स्फुट कर दिया गया है ।
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एवमेवेति स्वयमविवेकान्धतया । जन इति लोकप्रसिद्धगतानुगतिकतामात्रशारण: । तस्यैत्यसाधारणगुणगणमहाघंवपुष: । कपोलोपमायामिति निर्ःअ्याजलावण्यसर्वस्वभूतमुखमध्यवर्ति प्रधानभूतकपोलस्योपमायां प्रयुत तदधिकवस्तुकर्तृकं ततो दूरे निकृष्टं शशिबिम्बं कलङ्क्याजिह्रीकृतम् । एवं यद्यपि गुरुरिकाप्रवाहपतितो लोक:, तथापि यदि परीक्षक: परीक्षणे तद्रुसारक: कुपेकमाजनं यक्षनन्द्र इति प्रसिद्ध: स चन्द्र एव क्षयित्वविलासशून्यत्वमलिनत्वधर्मान्तर सदक्रान्तो योडर्थ: । अत्र च यथा व्यञ्जनधर्मान्तरसङ्क्रान्तिसतथा पूर्वोक्तमनुसन्धेयम् । एवमुत्तरत्रापि ।
यों ही अर्थात् स्वयं अविवेक से अंधा होने के कारण । ‘जन’ का अर्थ है लोक में प्रसिद्ध केवल गतानुगतिकता का सहारा लेनेवाला । उसका असाधारण गुणगणों से महान् शरीरवाले का । ‘कपोल की उपमा में’ अर्थात् बिना बनावट के लावण्यसर्वस्वभूत मुख के मध्यवर्ती प्रधानभूत कपोल की उपमा में प्रत्युत उससे अधिकवस्तु की जानी चहिये उससे दूर गिरा हुआ शशिबिम्व कलंक के व्याज से कुटिल कर दिया गया है । इस प्रकार यद्यपि भेड़चाल के प्रवाह में लोक पड़ा हुआ है तथापि परीक्षक यदि परीक्षा करें तो बेचारा एकमात्र कृपापात्र जो चन्द्र नाम से प्रसिद्ध है वह चन्द्र ही है । अर्थात् क्षयित्त्व, विलासशून्यत्व, मलिनत्व इत्यादि दूसरे धर्मों में संक्रान्त जो अर्थ ( ऐसा चन्द्र है ) । यहाँ पर जिस प्रकार व्यञ्जनयधर्मोंचर की संक्रान्ति होती है वैसा पहले कहे हुये के समान समझ लिया जाना चाहिये । ऐसा ही आगे भी ।
तारावती — ( उस नायिका ) के कपोलों की उपमा में लोग यों ही चन्द्रबिम्ब का उल्लेख कर दिया करते हैं। वास्तविक रूप में विचार करने पर बेचारा चन्द्र-चन्द्र ही है । 'यों ही' से व्यञ्जना निकलती है कि लोग प्राय: अज्ञान से अन्धे हैं वे अधिकतर बिना सोचे समझे ही बात किया करते हैं। ‘लोग’ कहने का आशय यह है कि सर्वसाधारण व्यक्तियों का केवल यही सहारा होता है कि वे लोकप्रसिद्ध गतानुगतिकता के आधार पर बात किया करें सामान्यतया जैसा प्रसिद्ध होता है लोग वैसी ही बात किया करते हैं । शोभाधीन कर बोलने सर्वसाधारण के वश की बात नहीं । 'उसके' का आशय यह है कि उस नायिका का शरीर असाधारण गुणों के कारण अत्यन्त महत्वपूर्ण है । कपोल की उपमा में कहने का आशय यह है कि नायिका स्वयं ही लावण्यमयी है उसे लावण्य के लिये प्रसाधनों की भी आवश्यकता नहीं होती। उस लावण्य का सर्वस्वभूत है उसका मुख और उस मुख के मध्य में भी
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अविवक्षितवाच्यस्यात्यन्ततिरसकृतवाच्ये प्रभेदे वाक्यप्रकाशयता यथा---या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी । यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः ॥
अविवक्षितवाच्य के उपभेद अत्यन्ततिरस्कृतवाच्य की वाक्यप्रकाश्यता का उदाहरण जैसे-'जो सब प्राणियों के लिये रात्री है उसमें संयमी जागता है । जिसमें प्राणी जागते हैं वह देखनेवाले मुनि के लिये रात्री है ।'
निस्सन्देह इस वाक्य से न तो निशा का कोई अर्थ और न जागरण का कोई अर्थ विवक्षित है । तो क्या ? मुनि का तत्वज्ञान में अवहित होना और अतस्त्व से पराड्मुख होना प्रतिपादित किया जाता है । इस प्रकार यह तिरसकृतवाच्य का व्यङ्ग्यक हो जाता है ।
लोचन
एवं प्रथमभेदस्य द्वारपि प्रकारौ पदप्रकाशकत्वेनोदाहृत्य वाक्यप्रकाशकत्वेनोदाहरणरति-या निशेति । विवक्षित इति । तेन ह्युक्तेन न कश्चिदुपदेश्यं प्रत्युपदेशः:सिद्धयति । निशायां जागरितडयमव्यभ्रात्रिवदासितच्यमिति किमनेनोच्यते । तस्माद्वाधितस्वार्थमेतद्द्वाक्यं संयमिनो लोकोत्तरतालक्षणेन निमित्तेन तत्ववटष्ट्रावचवस्थानं मिथ्यादृष्टौ च पराज्ञुखत्वं च ध्वनति । सर्वशब्दार्थस्य चापेक्षितयाऽप्युपपद्यमानतेति न सर्वशब्दस्यार्थेऽनुपपत्त्याड्यमर्थो मन्तव्यः । सर्वेषां ब्रह्मादिस्थावरान्तानां चतुर्दशानामपि भूतानां या निशा व्यामोहजननी तत्वदृष्टिस्तस्यां संयमी जाग्रति कथमिति प्राप्येतेति ।
न तु इस प्रकार प्रथम भेद के दोनों प्रकारों को पदप्रकाश्य के रूप में उदाहरण देकर वाक्यप्रकाश्य के रूप में उदाहरण देते हैं—'जो रात्री' । 'कहा गया है' यह ! इस कहे हुए से उपदेशयोग्य व्यक्ति के प्रति कोई उपदेश सिद्ध नहीं होता । रात में जागना चाहिये अन्यत्र रात्री के समान रहना चाहिये इस कथन से क्या ? इससे वाधितस्वार्थवाला वह वाक्य संयमी के लोकोत्तरता लक्षण निमित्त से तत्वदृष्टि में अवधान और मिथ्यादृष्टि से पराड्मुखत्व को ध्वनित करता है । सर्वशब्द के अर्थ को सापेक्षिक रूप में भी उपपत्ति हो जाती है अतः यह नहीं मानना चाहिये कि सर्वशब्द को अन्यथानुपपत्ति से इस अर्थ का आक्षेप हो जाता है । ब्रह्म से लेकर स्थावर पर्यन्त समस्त १४ भूतों की जो रात्रि अर्थात् व्यामोह को उत्पन्न करनेवाली तत्वदृष्टि, उसमें संयमी जागृत रहता है कि यह कैसे प्राप्त हो ? अर्थात्
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विषयवर्जनमात्रादेव संयमोति यावत् । यदि वा सर्वभूतनिशाम्यां मोहिनीन्यां जागर्ति कथंचिद् हेयेति । यस्यां तु मिथ्यादृष्टौ सर्वाणि भूतानि जाग्रति अतिशयेन सुप्रबुद्धरूपाणि सा तस्य रात्रिप्रबोधविषयः । तस्यां हि चेष्टां नासौ प्रभुञ्जः । एवमेव लोकोत्तराचारनयवस्थितः परशति मन्यते च । तस्यैवान्तर्बहिष्करणवृत्तिश्श्ररितार्था । एवं च अन्यस्तु न पश्यति न च मन्यत इति । तस्सदृष्टिपरेण भाद्यमिमिति तात्पर्येण । एवं च पश्यदित्यपि मुनेरित्यपि च न स्वार्थमात्रविश्रान्तम् । अपि तु व्यङ्ग्य एव विश्रान्ति स्यात् । यतश्च्छन्दयोहक्श न स्वतन्त्रार्थतैति सर्व एवायमाख्यातसहारः पदसमूहो व्यङ्ग्यपरः । तदाह—अनेन हि वाक्येनैति । प्रतिपाद्यत इति ध्वन्यत इत्यर्थः ।
केवल विषय-वर्जन से ही कोई संयमी नहीं हो जाता । अथवा मोहिनी सब भूतों की रात्रि में जागता है कि यह कैसे छोड़ी जाये । जिस मिथ्यादृष्टि में तो सत्र प्राणी सुप्रबुद्ध रूपमें जागते हैं वह उसकी रात्रि अर्थात् प्रबोध का अवविषय होता है । उस चेष्टा में वह प्रभुब्ध नहीं होता । लोकोत्तर आचार में प्रतृत ( व्यक्ति ) इसी प्रकार का देखता है और मानता है । तात्पर्य यह है कि तत्त्वदृष्टिपरायण होने चाहिये । इस प्रकार 'देखनेवाले' यह और 'मुनि' यह भी स्वार्थविश्रान्त नहीं है । अपितु व्यंग्य में ही विश्रान्त होता है । 'यत्' और 'तत्' शब्दों की स्वतन्त्रार्थता नहीं होती । इस प्रकार क्रिया की सहायता से युक्त यह सत्र व्यंग्यपरक है । वही कहते हैं—'इस वाक्य से' प्रतिपादित किया जाता है अर्थात् ध्वनित किया जाता है ।
तारावती कपोलतल हो सवसे अधिक प्रधान हैं । उन कपोलों की उपमा में कोई ऐसी वस्तु लानी चाहिये जो उनकी अपेक्षा अधिक हो । रशिविम्व तो उसकी अपेद्रा कहीं अधिक निकृष्ट है और कलङ्क के बहाने से वह और अधिक निकृष्ट बना दिया गया है । इस प्रकार यदि भेड़ाचाल का अनुसरण करते हुये संसार नाथिका के कपोलतलों को चन्द्र की उपमा दे देता है तथापि यदि परीक्षक लोग परीक्षा करें तो वेचारा चन्द्रमां दया का पात्र बन जाता है । क्योंकि जो प्रसिद्ध चन्द्रमां है वह आखिर है तो चन्द्रमां ही । यहाँ पर दूसरे चन्द्र शब्द में उसके धर्मों का सङ्क्रमण हो जाता है, वे धर्म हैं—चन्द्रमां क्षयी है, विलासघून्य है, मलिन है इत्यादि । इन धर्मों से सङ्क्रान्त होकर जो अर्थ आता है वही यहाँ पर दूसरे चन्द्र शब्द का अर्थ हो जाता है । यहाँ पर वाच्यातिरिक्त दूसरे व्यङ्गयधर्मों की सङ्क्रान्ति किस प्रकार होती है इसकी व्याख्या पहले ( दूसरे उद्योत के प्रारम्भ में ) की जा चुकी है । उसी के अनुसार यहाँ भी समझ लेना चाहिये । इसी प्रकार आगे के उदाहरणों में भी समझ लेना चाहिये ।
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( ३ ) ध्वनि का प्रथम भेद है अविवक्षितवाच्य । उसके दो भेद होते हैं अत्यन्ततिरस्कृतवाच्य और अर्थान्तरसंक्रमितवाच्य । इन दोनों प्रकारों में पदप्रकाशकत्व के उदाहरण दे दिये गये अतः इनमें वाक्य के प्रकाशकत्व के उदाहरण दिये जा रहे हैं । ( यहाँ पर लौचनकार ने पदप्रकाशकत्व और वाक्यप्रकाशकत्व इन शब्दों का प्रयोग किया है । प्रकाशक वाक्य में पद और वाक्य ही होते हैं, ध्वनिभेद तो प्रकाश्य होते हैं । अतः यहाँ पर ठीक प्रयोग होगा—‘पदप्रकाश्यत्वेन’ और ‘वाक्यप्रकाश्यत्वेन’ । सम्भवतः यह मुद्रण प्रमाद हो । किन्तु यदि स्थित का समर्थन करना हो तो यह अर्थ करना चाहिये—‘पद की प्रकाशकता को दिखलाने के रूप में दोनों भेदों के उदाहरण दे दिये, अब वाक्य की प्रकाशकता को दिखलाते हुये लेखक उदाहरण दे रहा है ।’)
जो सब प्राणियों के लिये रात है उसी में संयमी व्यक्ति जागता है और जिसमें संसारी लोग जागते हैं वहाँ ज्ञानीवान् मनुष्य के लिये रात होता है । यह भगवान् कृष्ण गीता में अर्जुन को उपदेश देते हुए कह रहे हैं । यदि इसमें रात तथा जागने का यथाश्रुत अर्थ लिया जाये तो उपदेश्य के प्रति कोई उपदेश ही सिद्ध न हो । इस उपदेश का क्या आशय कि रात्री में जागना चाहिये तथा और समय में रात्रि के समान रहना चाहिये । इस प्रकार इस वाक्य के वाच्यार्थ का बाध हो जाता है और रात्री का लक्ष्यार्थ हो जाता है मिथ्यादृष्टि और जागने का लक्ष्यार्थ हो जाता है तत्त्वदृष्टि । इस लक्षणा में निमित्त है संयमी व्यक्ति की लोकोत्तरता । इससे व्युत्पत्ति निकलती है कि ‘तत्त्वदृष्टि की ओर ध्यान देना चाहिये और मिथ्यादृष्टि से पराङ्मुख रहना चाहिये ।’ यहाँ पर कहा जा सकता है कि ‘सब प्राणियों के लिये जो रात है’ में सब शब्द के द्वारा संयमी भी आजाते हैं फिर उनका ‘रात में जागना’ कहना अनुपपन्न हो जाता है । अतः सर्व शब्द की उपपत्ति के लिये अर्थापत्ति से उक्त अर्थ प्राप्त हो सकता है उसके लिये लक्ष्यणामूलक व्युत्पत्ति की आवश्यकता नहीं किन्तु इसका उत्तर यह है कि सर्व शब्द आपेक्षिकरूप में भी उपपन्न हो जाता है । एक ओर हैं सब प्राणी और दूसरी ओर हैं संयमी । ‘संयमी से भिन्न सभी व्यक्तियों के लिये जो रात है उसमें संयमी व्यक्ति जागता है’ यह अर्थ करने से अनुपपत्ति नहीं होती । अतः उक्त अर्थ आक्षेपगम्य नहीं हो सकता । उसके लिये लक्षणामूलक व्युत्पत्त्ति ही माननी पड़ती है । आशय यह है कि ब्रह्म से लेकर स्थावर पर्यन्त ८४ प्रकार के प्राणियों के लिये जो रात्रि अर्थात् व्यामोह उत्पन्न करनेवाली तत्त्व दृष्टि है उसमें संयमी जागता है कि यह तत्त्वदृष्टि कैसे प्राप्त हो सके । आशय यह है कि संयमी बनने
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तस्यैवार्थान्तरसङ्क्रमितवाच्यस्य वाक्यप्रकाशयता यथा—विसमिओ काण वि विसामिअमओ काण वि अविसामओ कालो ॥ ( विषमयितः केपामपि केपामपि प्रथयत्यभृतान्निमित्तंः । केषामपि विषामृतमयः केपामप्यविषामृतः कालः ॥ इति छाया । )
उसी के ( अर्थान्तर-सङ्क्रमितवाच्य के ) वाक्यप्रकाशन का उदाहरण—
'किसी के लिये समय विषमय होता है; किसी के लिये अमृत निर्माणवाला होता है, किसी के लिये विषामृतमय और किसी के लिये अविषामृतमय होता है ।' निस्सन्देह इस वाक्य में विष और अमृत शब्दों के द्वारा व्यवहार किया गया है जिनके वाच्यार्थों का संक्रमण सुख और दुःख में हो गया है । अतएव यह अर्थान्तरसङ्क्रमितवाच्य का व्यञ्जक है ।
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के लिये केवल इतना ही आवश्यक नहीं है कि विप्रय-वासनाओं का परित्याग कर दिया जावे । उसके लिये यह भी आवश्यक है कि तत्त्वदृष्टि के प्रति जागरूक रहा जावे और अतत्त्वदृष्टि के प्रति उदासीनता रहे । अथवा यहाँ पर यह अर्थ हो सकता है कि सव प्राणियों को मोहित करनेवाली जो रात अर्थात् मिथ्यादृष्टि है उसके प्रति संयमी क्योंकि जागरूक रहता है कि इसका परित्याग कैसे किया जा सके । जिस मिथ्यादृष्टि के प्रति सभी प्राणी जागते हैं अर्थात् उसके स्वीकार करने तथा उपभोग करने में अत्यन्त ही प्रबुद्ध अर्थात् सावधान रहते हैं कि कहीं कोई वस्तु उपभोग से छूट न जावे वह मिथ्यादृष्टि संयमी के प्रबोध का विषय नहीं होती । मिथ्यादृष्टि की चेष्टाओं में संयमी व्यक्ति प्रबुद्ध नहीं होता । लोकोत्तर आचरण में व्यवस्थित ( संयमी व्यक्ति ) ऐसा ही समझता है और ऐसा ही मानता है ।उसी की अन्तःकरण की वृत्ति चरितार्थ होती है और उसी की बाह्य इन्द्रियों की वृत्ति भी चरितार्थ होती है । दूसरे लोग न तो देखते ही हैं और न मानते ही हैं ।
तत्त्व यह है कि तत्त्वदृष्टि-परिपाक होना चाहिये । इस प्रकार 'देखनेवाले' और 'मुनि के' इन दोनों शब्दों का भी पर्यवसान स्वार्थ में ही नहीं होता । ( 'पश्यतः' 'मुनेः' इन दोनों शब्दों का लध्दार्थ है 'तत्त्वदृष्टि तथा मिथ्यादृष्टि को समझनेवाला और मुनि का अर्थ है—संयमी तथा मननशील कोई भी व्यक्ति )
इन दोनों शब्दों के द्वारा यह समझ में आता है कि तत्त्वदृष्टि का परिपाक होना चाहिये । इस प्रकार 'देखनेवाले' और 'मुनि' इन दोनों शब्दों का अर्थ स्वार्थ में नहीं है । ('पश्यतः' और 'मुनेः' का अर्थ है तत्त्वदृष्टि और मिथ्यादृष्टि को समझने वाला और मुनि का अर्थ है संयमी और मननशील व्यक्ति)।
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विषमयितो विषमयतां प्राप्तः । केशादिदुष्टकृतिनामतिविवेकिनां वा । केशादिदुष्टकृतिनामत्यन्तमविवेकिनां वा अतिक्रामस्यमृतमयनिर्माण । केशादिनिमित्तश्रकरमेणां विवेकवतां वा विषामृतमयः । केशामपि मूढप्रायाणां धाराप्राप्तयोगभूमिकारूढानां वा अविषामृतमयः कालोदितिकमतोति सस्वन्धः । विषामृतपदे च लावण्यादिविशब्दवाच्य-रूढलक्षणारूपतया सुखदुःखसाधनयोरवर्त्तते । यथा विषं निम्बममृतं कपिस्थमिति । न चात्र सुखदुःखसाधने तन्मात्राविश्रान्ते, अपि तु स्वकर्त्तव्यसुखदुःखपर्यवसिते । न च ते साधने सर्वथा न विवक्षिते । निरसाधनयोरस्तयोरभावात् । तदाह—सङ्क्रमितवाच्याभ्यामिति । केशादिदुष्टि चास्य विशेषे सङ्क्रान्तिः । अतिक्रान्तोत्यस्य च क्रियामात्रसङ्क्रान्तिः । काल इत्यस्य च सर्वव्यवहारसङ्क्रान्तिः । उपलक्षणार्थेन्तु विषामृतग्रहणमात्रसङ्क्रमाणां वृत्तिकृता व्याख्यातम् । तदाह—वाक्य इति ।
‘विषमयित’ अर्थात् विषमतता को प्राप्त । कुछ का अर्थात् पापियों और अविवेकियों का । कुछ का अर्थात् पुण्यात्माओं का अथवा अत्यन्त अविवेकियों का अमृत का रचनावाला व्यतित होता है । मिले हुये कमवाले अथवा ज्ञान और अज्ञानी वाले कुछ लोगों का ( समय ) विष और अमृतमय होता है । मूढप्राय अथवा धारा से प्राप्त योगभूमिका पर आरूढ कुछ लोगों का काल विष और अमृतमयता से रहित व्यतित होता है, यह सम्बन्ध है । विष और अमृत पद लावण्य इत्यादि शब्द के समान निरूढ लक्षणारूप होने से सुख और दुःख के साधन में वर्तमान रहते हैं । जैसे नीम विष है और कथा अमृत है । यहाँ पर सुख और दुःख के साधन स्वमात्र विश्रान्त नहीं हैं अपितु अपने द्वारा किये जाने योग्य सुख और दुःख में पर्यवसित होते हैं । उन साधनों की विवक्षा सर्वथा नहीं होती यह बात नहीं क्योंकि निरसाधन तो वे हो ही नहीं सकते । वे कहते हैं—‘सङ्क्रमितवाच्यो’ से यह । किसी का संक्रमण विशेष में हो जाता है । अतिक्रान्त होता है का क्रियामात्र में सङ्क्रमण हो जाता है और ‘काल’ इसका सङ्क्रमण सब व्यवहारों में हो जाता है । उपलक्षण के लिये तो विष और अमृत शब्दों के संक्रमण की व्याख्या वृत्तिकार ने करदी । वह कहते हैं—‘वाक्य में’ यह ।
तारावती
अथों का पर्यवसान पूर्वोक्त व्यज्ज्यार्थ में ही होता है । इस प्रकार पूरे वाक्य में ‘यत्’ और ‘तत्’ शब्द ही छूट जाते हैं । इनका स्वतन्त्र अर्थ नहीं होता । अतएव क्रिया के सहित पूरा पदसमूहरूप वाक्य व्यज्ज्यार्थपरक ही है । इसीलिये वृत्तिकार ने लिखा है कि ‘इस वाक्य के द्वारा रात्रि का या जागने का कोई अर्थ विवक्षित नहीं है । मुनि के तत्त्वज्ञान के प्रति अवहित होने और अतत्त्व की ओर से पराड्मुख होने का प्रतिपादन किया जाता है ।’ यहाँ पर प्रतिपादन किया जाता है कहने का अर्थ है ध्वनित किया जाता है ।
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( ४ ) अविवक्षितवाच्य के भेद अर्थान्तरसंक्रमितवाच्य की वाक्यप्रकाश्यता का उदाहरण—
'किन्हीं लोगों का समय विषमय व्यतीत होता है, दूसरे लोगों के लिये समय का परिपाक अमृतमय होता है, और लोगों के लिये विष और अमृत से युक्त होता है तथा दूसरों के लिये न विषमय ही होता है न अमृतमय ही ।' यहाँ पर विष और अमृत शब्दों का अर्थ सुख और दुःख में संक्रान्त हो गया है । इस प्रकार इस वाक्य का अर्थ हो जाता है—'पापियों का समय दुःखमय ही होता है और अत्यन्त ज्ञानीजनों का समय भी दुःखमय ही होता है ( क्योंकि पापी पाप का फल भोगते हैं और ज्ञानीजों के लिये स्वयं संसार ही समय सुखमय व्यतीत होता है । जो लोग न तो बहुत पापी ही हैं और न बहुत पुण्यात्मा ही हैं अथवा जो न तो पूर्ण ज्ञानी ही हैं और न बहुत अज्ञानी ही हैं उनका समय दुःख और सुख से मिला हुआ व्यतीत होता है । इसके प्रतिकूल जो अत्यन्त मूढ़ हैं अथवा जो योग की पूरी भूमिका को प्राप्त कर चुके हैं उनका समय न तो दुःखमय ही होता है न सुखमय ही । मूढ़ लोग सुख और दुःख के अनुभव की क्षमता ही नहीं रखते और योगी लोगों को अनुभव होता ही नहीं है । लावण्य इत्यादि शब्दों के समान विष और अमृत इन शब्दों की दुःख और सुख में निरूढ़ लक्षणा है । जैसे नीम विष होता है, कपित्थ अमृत होता है । अन्तर यह है कि 'नीम विष होता है और कपित्थ अमृत होता है' इस वाक्य में दुःख और सुख के साधन में लक्षणा होती है, किन्तु प्रस्तुत उदाहरण 'किन्हीं लोगों का अमृतमय ही' में लक्षणा का पर्यवसान स्वसाध्य सुख और दुःख में होता है । साथ में उन साधनों का अन्वय बिल्कुल न होता हो ऐसी बात नहीं है। साधनों का भी अन्वय साथ में हो ही जाता है । क्योंकि बिना साधन के साध्य हो ही नहीं सकता । सुख और दुःख के साधन के रूप में अमृत और विष का भी अन्वय हो जाता है । इसीलिये यह अत्यन्ततरसंकृतवाच्य का उदाहरण न होकर अर्थान्तरसंक्रमितवाच्य का उदाहरण है । इसीलिये वृत्तिकार ने लिखा है कि विष और अमृत के वाच्यार्थों का संक्रमण सुख और दुःख में हो जाता है । जिस प्रकार विष और अमृत की लक्षणा दुःख और सुख में होती है उसी प्रकार 'कुछ लोगों का' की लक्षणा पापी इत्यादिकों में होती है । 'व्यतीत होता है' की लक्षणा, जीवन की सभी क्रियाओं में हो जाती है तथा 'काल' की लक्षणा सभी व्यवहा्रों में हो जाती है । इस प्रकार यह अर्थान्तरसंक्रमितवाच्य की वाक्यप्रकाश्यता का
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उदाहरण है। वृत्तिकार ने केवल विष और अमृत के वाच्यार्थों के संक्रमण की व्याख्या की है। वस्तुतः इस पद्य की क्रिया, काल तथा सर्वनाम इत्यादि के अर्थों का भी अर्थान्तर में संक्रमण हो जाता है। वृत्तिकार की विष और अमृत शब्दों के वाच्यार्थ की अर्थान्तरसंक्रमणपरक व्याख्या उपलक्षणमात्र है। इसीलिये वृत्तिकार ने लिखा है कि ‘वाक्य में’ ठ्यङ्जकता है। (यहाँ पर दीधितिकार ने लिखा है कि विष और अमृत शब्दों का सुख और दुःख के अर्थों में निरुढ़ लक्षणा के रूप में प्रयोग नहीं होता। अतएव यहाँ पर अर्थान्तरसंक्रमितवाच्य न मानकर अत्यन्ततिरस्कृतवाच्य मानना चाहिये। किन्तु शब्दों के अर्थ का सङ्कोच-विस्तार प्रायः होता ही रहता है। सम्भव है आनन्दवर्धन तथा अभिनवगुप्त के समय में विष और अमृत इस प्रकार का प्रयोग होता रहा हो। इस दृष्टि से यह उदाहरण असङ्गत नहीं है। दूसरी बात यह है कि यदि विष और अमृत शब्दों की निरुढ़लक्षणापरक व्याख्या न भी की जावे तो भी विष और अमृत शब्दों की लक्षणा दुःखदायक वस्तुओं तथा सुखदायक वस्तुओं में हो जावेगी। विष और अमृत का सामवेश भी दुःखदायक और सुखदायक वस्तुओं में है ही।
ऐसी दशा में ‘काकेभ्यो धिङ् रक्ष्यताम्’ के समान यहाँ पर भी उपादान लक्षणा ही होगी लक्षणलक्षणा नहीं। अतएव यहाँ पर अत्यन्ततिरस्कृतवाच्य न होकर अर्थान्तरसंक्रमितवाच्य ही होगा। दीधितिकार ने लिखा है कि पीयूषवर्ष का ‘कदली कदली करभः करभः करिराजकरः करिराजकरः’ यह वाक्य ठ्यङ्ज्य अर्थान्तरसंक्रमितवाच्य का ठीक उदाहरण होगा किन्तु यहाँ पर ‘अस्ति’ का अध्याहार करने से ‘कदली अस्ति’ इत्यादि पृथक् वाक्य बन जाते हैं और इनमें व्यङ्ग्यार्थ केवल पदव्योत्पत्तिमात्र रह जाता है। इसीलिए काव्यप्रकाशकार ने ‘जिसके मित्र मित्र हैं; शत्रु शत्रु हैं और कृपाभाजन कृपाभाजन हैं वही वास्तव में उत्पन्न हुआ है और वही वास्तव में जीवित है।’ यह उदाहरण पदव्योत्पत्तिमात्र अर्थान्तरसंक्रमितवाच्य का दिया है। वस्तुतः वाक्यव्यङ्ग्य अर्थान्तरसंक्रमितवाच्य का काव्यप्रकाशकार का दिया हुआ यह उदाहरण अधिक समीचीन होगा—विद्वानों की सभा में जाननेवाले किसी व्यक्ति के प्रति कोई आँख कह रहा है—‘मैं तुमसे कह रहा हूँ कि यहाँ विद्वानों का समुदाय एकत्र है। अतएव तुम अपनी बुद्धि को ठोक रखकर सावधानतापूर्वक वहाँ स्थित होना चाहिये।’ यहाँ पर (१) मैं तुमसे कह रहा हूँ’ यह वाक्य अनुपपन्न है। क्योंकि बात कह देने से ही मालूम पड़ सकता है कि उसने बात कही। अतः इसकी कोई आवश्यकता नहीं रह जाती और ‘मैं तुमसे कह रहा हूँ’, इसकाः बाध हो जाता है। उससे दूसरा लक्ष्यार्थ निकलता है
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विवक्षिताभिधेयस्यानुरणनरूपव्यङ्ग्यस्य शब्दशक्त्युद्भवे प्रभेदे पदप्रकाश्यता यथा—
प्रातुं धनैरर्थिजनस्य वाच्छां दैवेन सृष्टो यदि नाम नास्मि । पथि प्रसन्नाम्बुधरस्तटागः कूपोऽथवा किंश्र जड इति क्रोडीदम् ॥
(अनु०) विवक्षितवाच्य के भेद अनुरणनरूप व्यङ्ग्य के उपभेद शब्दशक्त्युद्भव की पदप्रकाश्यता का उदाहरण—
‘धनों से याचकों की आकांक्षा को पूरा करने के लिये यदि दैव के द्वारा मैं उत्पन्न नहीं किया गया हूँ तो मार्ग में निर्मल जल को धारण करनेवाला तडाग अथवा जड कूप ही क्यों नहीं बना दिया गया हूँ ।’
यहाँ पर ‘निर्झरण’ क्रिया के द्वारा अपने समानाधिकरण के रूप में प्रयोग किया गया ‘जड’ यह शब्द अनुरणनरूप में अपनी शक्ति से कूप के समानाधिकरणत्व को प्राप्त हो जाता है ।
लोचन
एवं कारिकाप्रथमार्थेलक्षितांशतुरः प्रकारानुदाहस्य द्वितीयकारिकार्धस्वीकृतान् षड्- न्यान् प्रकारान् क्रमेणोदाहरति-विवक्षिताभिधेयस्येल्यादिना । प्रातुमिति पूरयितुम् ।
इस प्रकार कारिका के प्रथमार्थ में लक्षित चार प्रकारों का उदाहरण देकर द्वितीय कारिकार्ध में स्वीीकृत छः अन्य प्रकारों के क्रमशः उदाहरण दिये जा रहे हैं—‘विवक्षिताभिधेय का’ इत्यादि के द्वारा । ‘प्रातुमु’ का अर्थ है पूरा करने के लिये ।
तारावती
‘मैं तुम्हें उपदेश दे रहा हूँ ।’ ( २ ) जब विद्वान् लोग सामने ही हैं तव इसकी भी आवश्यकता नहीं रह जाती कि ‘यहाँ पर विद्वानों का समुदाय एकत्र है ।’ इस प्रकार इसका वाध होकर लक्ष्यार्थ निकलता है कि ‘यहाँ जो विद्वान् आये हैं वे सर्वशास्त्रविशारद हैं ( ३ ) इसी प्रकार जब बुद्धि का सहारा सर्वथा लिया ही हो जाता है तव बुद्धि का सहारा लेने का परामर्श व्यर्थ ही हो जाता है । इससे वाध होकर लक्ष्यार्थ निकलता है कि ‘तुम अपनी बुद्धि को प्रमाणों के आधीन ठीक रखो’ इस सबसे यह व्यङ्ग्यार्थ निकलता है कि—‘इस स्थानपर ऐसे ऐसे विद्वान् एकत्र हुए हैं जो सव शास्त्रों में निष्णात हैं और उनके सामने अपनी बात को प्रमाणों से सिद्ध कर सकना अत्यन्त दुष्कर है । तुम भलीभाँति अपनी बुद्धि को ठीक रख्खो और जो भी बात कहो वह प्रमाण से भरी हुयी हो । यह तुम्हारे लिये
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धनैरिति बहुवचनं यो येनार्थी तस्य तेनैति सूचनार्थम्। अत एवंार्थिग्रहणम्। जनस्यैति बाहुल्येन हि लोको धनार्थी, न तु गुणेऽपकारार्थी। दैवेनेति। अशक्यपर्यनुयोगेनैत्यर्थः। अस्मीति। अन्यो हि तावद्वश्यं कश्चित् सृष्टो न स्वह्मितिनिर्वेदः। प्रसन्नं लोकोपयोगी अम्भो धारयति। कूपोऽथवाति। लोकरस्यलक्षणमात्रं इत्यर्थः। आत्मसममानाधिकरणतयैति। जडः कर्तृंध्यातामूढ इत्यर्थः। अथ च कूपो जडोऽर्थितां कस्मै कीर्तयित्यसम्भवद्विवेक इति। अत एव जडः शीतलो निवेदसन्तापरहितः। तथाऽ जडः शीतलजलयोगितया परोपकारसमर्थः। अननेन तृतीयार्थेनैवायं जडशब्दः स्वट्ठाकार्थेन पुनरुक्तसम्बन्ध इत्यमिप्रायेणाह—कूपसममानाधिकरणतामिति। स्वतन्त्रशक्त्यैति शब्दशक्त्युद्भवत्वं योजयति।
'धनैः' में बहुवचन 'जो जिसका प्रार्थी है उसका उसके द्वारा' यह सूचित करने के लिये। अतएव अर्थी शब्द का प्रयोग किया गया है। 'जन का' इसका व्यत्कृद्यार्थ है—बहुलता से लोक धन का अर्थी होता है न कि गुणों से उपकार को अर्थी 'दैव के द्वारा' यह। अर्थात जिससे भलीभाँति प्रश्न किया ही नहीं जा सकता। मैं यह। अन्य कोई इस प्रकार का अवश्य उत्पन्न किया गया है, मैं नहीं, यही निर्वेद है। प्रसन्न अर्थात् उपयोगी जल को जो धारण करता है। 'अथवा कूप'। अर्थात् लोक के द्वारा न देखा जाता हुआ। 'आत्मसममानाधिकरण के रूप में' यह 'जड़' अर्थात् कर्तृंध्यातमूढ। और यह कि कूप अर्थात् जड़ अर्थात जिसका विवेक ही न हो कि किसी प्रार्थना किस प्रकार की है। अतएव जड़ अर्थात् शीतल अर्थात् निवेदसन्ताप रहित। उसी प्रकार जड़ अर्थात् शीतल जल से संयुक्त होने से परोपकारसमर्थः। इस तृतीय अर्थ के द्वारा यह 'जड शीते जडोग्रे' के अर्थ के साथ पुनरुक्त सम्बन्धवाला है। इस अभिप्राय से कहते हैं—'कूपसममानाधिकरणता को'। 'अपनी शक्ति से' यह शब्दशक्त्युद्भव की योजना करता है।
तारावती
मेरी शिक्षा है। यदि तुम मेरा कहना मानोगे तो तुम्हारा हित होगा नहीं तो तुम उपहास के योग्य हो जाओगे।
प्रथम कारिका के प्रथम दल में अविवक्षितवाच्य के दो भेद बतलाये गये थे—पदप्रकाश्य और वाक्यप्रकाश्य। अविवक्षितवाच्य के दोनों पूर्वोक्त भेदों के साथ इन दोनों भेदों को गुणित करने पर इसके चार भेद हो जाते हैं—पदप्रकाश्य अत्यन्त तिरस्कृतवाच्य, पदप्रकाश्य अर्थान्तरसंक्रमितवाच्य, वाक्यप्रकाश्य अत्यन्ततिरस्कृतवाच्य और वाक्यप्रकाश्य अर्थान्तरसंक्रमितवाच्य। यहाँ तक इन चारों भेदों की व्याख्या की जा चुकी और उनके उदाहरण दिये जा चुके। अब कारिका
प्रथम कारिका के प्रथम दल में अविवक्षितवाच्य के दो भेद बतलाये गये थे—पदप्रकाश्य और वाक्यप्रकाश्य। अविवक्षितवाच्य के दोनों पूर्वोक्त भेदों के साथ इन दोनों भेदों को गुणित करने पर इसके चार भेद हो जाते हैं—पदप्रकाश्य अत्यन्त तिरस्कृतवाच्य, पदप्रकाश्य अर्थान्तरसंक्रमितवाच्य, वाक्यप्रकाश्य अत्यन्ततिरस्कृतवाच्य और वाक्यप्रकाश्य अर्थान्तरसंक्रमितवाच्य। यहाँ तक इन चारों भेदों की व्याख्या की जा चुकी और उनके उदाहरण दिये जा चुके। अब कारिका
तारावती
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के उत्तरार्ध की व्याख्या प्रारम्भ की जाती है। इसमें कहा गया है कि विवक्षित-न्यपरवाच्य का अभेद अनुगुणनलुप्तध्यक्ष्य भी पद और वाक्य के द्वारा प्रकाशित हुआ करता है। इसके छह भेद हो सकते हैं जिनके उदाहरण नीचे दिये जा रहे हैं—
(१) विवक्षितन्य के अनुरणनरूप व्यंग्य ( संसृष्टिमलव्यंग्य ) में शब्द-शक्त्युद्भव की पदप्रकटप्रतीति का उदाहरण—
यदि मैं दैव के द्वारा धनो से याचक-जनों की आकांक्षाओं को पूरा करने के लिये नहीं पैदा किया गया तो मार्ग में निर्मल जल को धारण करनेवाला तड़ाग, कुआँ या जड़ ही क्यों नहीं बना दिया गया?
यहाँ पर ‘प्रातु’ धातु का प्रयोग किया गया है जिसका अर्थ है पूरा करना। इससे व्यंग्यार्थ निकलता है कि वक्ता तत्काल सन्तुष्ट होना नहीं चाहता जब तक वह याचकों को उतना न दे दे जितना याचक चाहते हों। (प्रातुं के ‘तुमुन्’ प्रत्यय का व्यंग्यार्थ है कि वक्ता अपने जन्म की सफलता इसी में समझता है कि वह याचकों की आकांक्षा पूरी कर सके।) ‘धनों से’ में बहुवचन से सूचित होता है कि जो व्यक्ति जो भी चाहता हो उसको वही मिलना चाहिये। अर्थों या याचक शब्द के ग्रहण का भी यही आशय है। ‘याचक-जन’ में ‘जन’ शब्द का व्यंग्यार्थ यह है कि अधिकतर लोग धनो की आकांक्षा ही रखते हैं, गुणों के द्वारा उपकृत होने की इच्छा बहुत कम लोगों को होती है। ‘दैव के द्वारा’ की व्याख्या यह है कि दैव सर्वथा स्वतन्त्र होता है वह हस्तिगोचर भी नहीं होता। उसने मुझे जैसा बना दिया है मुझे वैसा ही स्वीकार करना पड़ेगा। मैं उससे किसी प्रकार का कोई ऐकव भी नहीं कर सकता। ‘अस्मि’ ‘हूँ’ में उत्तमपुरुष तथा एक वचन का गम्यार्थ यह है कि परमात्मा ने ऐसा मुझे नहीं वनाया और लोगों को बनाया है।
तड़ाग निर्मल अर्थात् लोकोपयोगी जल को धारण करता है जिससे वह निरन्तर लोक की आकांक्षा पूरी करता रहता है। (इस वाक्य के द्वारा लोचनकार ने तड़ाग से वैपश्य वतलाया है, यह ‘अस्मद्भार’ की व्युत्पत्ति नहीं है जैसा कि कुछ लोगों ने समझा है।) ‘अथवा कूप’ की व्युत्पत्ति यह है कि या तो मैं लोक का उपकार कर सकता या लोक के द्वारा मैं देखा ही न जा सकता।
वक्ता इस बात से बहुत विरक्त हो गया है कि लोक तो उससे धन की अभिलाषा रखता है किन्तु उसमें इतनी शक्ति नहीं है कि वह उनकी आकांक्षा पूरी कर सके। अतएव उसने अपने लिये जड़ शब्द का प्रयोग किया है। जो कि वक्ता के समान-धर्मिकरण होने के कारण उसे ‘जड़त्व के अभेद’ का परिचायक है।
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तस्यैव वाक्यप्रकाशता यथा हर्षचरिते सिंहनादवाक्येषु 'वृत्तेडस्मिन्महाप्रलये धरणीधारणायाधुना त्वं शेषः ।'
उसी की वाक्यप्रकाश्यता जैसे हर्षचरित में सिंहनाद के वाक्यों में— 'इस महाप्रलय के हो जाने पर पृथ्वी को धारण करने के लिये तुम शेष हो ।' यह वाक्य निस्सन्देह अनुरणनरूप अर्थान्तर को स्फुट रूप में शब्दशक्ति के द्वारा प्रकाशित करता है ।
एतद्वि वाक्यमनुरणनरूपमर्थान्तरं शब्दशक्त्या स्फुटमेव प्रकाशयति ।
तारावती पदिकार्थ में प्रथमा विभक्ति होती है वहाँ दोनों शब्दों में अभेद के अतिरिक्त अन्य कोई सम्बन्ध नहीं हो सकता । ) इस प्रकार वाच्यार्थ का पर्यवसान वाक्यार्थ और जड़ के समानाधिकरण में ही होजाता है । इसके बाद 'जड़' शब्द के अर्थ के बल पर अनुरणनरूप में रूप से भी समानाधिकरण व्यक्त होता है । जड़ शब्द के तीन अर्थ हो सकते हैं—(१) किञ्चिद्वयविमूढ़ (२) शीतल और (३) जल से युक्त । वाक्य और रूप का इन तीनों अर्थों के बल पर सामानाधिकरण्य इस प्रकार होगा—
तारावती
(१) जिस प्रकार अचेतन होने के कारण कुआँ अपने कर्तव्य को समझ नहीं सकता क्योंकि उसे इस बात का ज्ञान ही नहीं हो पाता कि किसकी क्या याच्ञा है उसी प्रकार वक्ता भी ज्ञानशून्य वन जाने की कामना कर रहा है जिससे उसे न तो याचकों की याच्ञा का अनुभव ही हो और न उसके कारण वेदना ही उत्पन्न हो । (२) रूप सदा शीतल रहता है उसे निर्वेद और सन्ताप का अनुभव ही नहीं होता । उसी प्रकार वक्ता भी कामना करता है कि वह सदा शीतल रहे और उसे निर्वेद तथा सन्ताप का अनुभव ही न हो । (३) जिस प्रकार शीतल जल से युक्त होने के कारण कुआँ परोपकार करने में लगा रहता है उसी प्रकार वक्ता भी कामना कर रहा है किन्तु वह भी धन से सम्पन्न हो, जिससे वह भी दूसरों का उपकार कर सके।यद्यपि इस 'जड़' शब्द का अन्वय तड़ाग के साथ भी हो सकता है किन्तु उसका तीसरे अर्थ के साथ सम्बन्ध उचित प्रतीत नहीं होता । क्योंकि तड़ाग के लिये 'निर्मल जल धारण करनेवाला' यह विशेषण दिया ही जा चुका है । अतएव जड़ के तीसरे अर्थ के साथ उसकी पुनरुक्ति की सम्भावना हो जाती है । अतः 'जड़' शब्द का रूप के साथ ही सम्बन्ध ध्वनित होता है । इसीलिये रूपसमानाधिकरणता ध्वनि है । 'अपनी शक्ति से रूपसमानाधिकरणता को प्राप्त हो जाता है' मैं अपनी शक्ति से कहने का अर्थ है शब्दशक्त्युद्भवत्व के द्वारा ।
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महाप्रलय इति। महस्य उत्सवस्य आसन्नतात्मप्रलयो यत्र तत्र शोककारणभूते वृत्ते धरण्या राज्यधुराया धारणायाश्वासनाय तु शेष: शिष्यमाणः। इत्थीयता पूण्र वाक्यार्थे कल्पावसाने भूपीठमारोद्रहानक्ष्म एको नगाराज एव दिग्दन्तिप्रभृतिष्वपि प्रलीनेपविचर्यर्थान्तरम्।
महाप्रलय यह। मह अर्थात उत्सव का चारों ओर से जहाँ प्रलय उस प्रकार शोककारणभूत वृत्त में धरणी अर्थात राजधुर के धारण करने के लिये अर्थात आश्वासन के लिये तुम शेष अर्थात बचे हुये हो। इस इतने वाक्यार्थ के पूर्ण हो जाने पर दूसरा अर्थ यह (आ जाता है)—कल्पावसान में दिग्गज इत्यादि के प्रलीन हो जाने पर भी भूपीठभार के उद्धहन में समर्थ केवल नागराज ही है।
तारावती
( २ ) उक्त शब्दशक्त्युद्भव ध्वनि की वाक्यप्रकाश्यता का उदाहरण जैसे—वाण रचित हर्षचर्चित में प्रभाकर वर्धन की श्री मृत्त्यु हो चुकी है और राजकुमार हर्ष को भी गौडाधिप ने मिथ्या विश्वासों से जाल में फँसाकर एकान्त में मार डाला है। उस समय हर्ष का सेनापति हर्ष को समझाते हुये कह रहा है कि—'इस महाप्रलय के हो जाने पर पृथ्वी को धारण करने के लिये तुम शेष हो।' इस वाक्य का वाच्यार्थ 'इस' शब्द के प्रयोग के कारण प्राकरणिक अर्थ में नियंत्रित हो जाता है। वाच्यार्थ इस प्रकार है—'इस मह अर्थात उत्सव के आप्रलय अर्थात चारों ओर से पूर्ण प्रलय के उपस्थित होने पर केवल तुम्हीं शेष बचे हुये हो जो पृथ्वी की मर्यादा को अथवा राज्यधुर को निस्चर रख सकते हो।' (क्योंकि राज्य का भार संभालने वाले तुम्हारे पिता तथा बड़े भाई दोनों का मरण हो चुका है जिससे राज्य का आनन्दोत्सव पूर्णरूप से समाप्त हो गया।) इसके बाद महाप्रलय तथा शेष शब्दों के बल पर दूसरा अर्थ निकलता है। इन दोनों अर्थों का उपमानोपमेय भाव हो जाता है। 'जिस प्रकार महाप्रलय होने पर पृथ्वी को धारण करनेवाले वाराह ध्रुकर इत्यादि सभी नष्ट हो जाते हैं, उस समय केवल शेष नाग ही पृथ्वी को धारण कर सकता है, उसी प्रकार उत्सव को समाप्त करनेवाले अपने पूर्वजों के महानाश के उत्पन्न होने पर केवल तुम्हीं शेष रह गये हो जिन पर पृथ्वी की रक्षा के लिये विश्वास किया जा सकता है। इस प्रकार यहाँ पर सम्पूर्ण वाक्य से अनुरणनन्याय से शब्दशक्तिमूलक ध्वनि निकलती है, यह बात स्पष्ट ही है।
( २ ) उसी शब्दशक्त्युद्भव ध्वनि की वाक्यप्रकाश्यता का उदाहरण जैसे—वाण रचित हर्षचरित में प्रभाकर वर्धन की श्री मृत्त्यु हो चुकी है और राजकुमार हर्ष को भी गौडाधिप ने मिथ्या विश्वासों से जाल में फँसाकर एकान्त में मार डाला है। उस समय हर्ष का सेनापति हर्ष को समझाते हुये कह रहा है कि—'इस महाप्रलय के हो जाने पर पृथ्वी को धारण करने के लिये तुम शेष हो।' इस वाक्य का वाच्यार्थ 'इस' शब्द के प्रयोग के कारण प्राकरणिक अर्थ में नियंत्रित हो जाता है। वाच्यार्थ इस प्रकार है—'इस मह अर्थात उत्सव के आप्रलय अर्थात चारों ओर से पूर्ण प्रलय के उपस्थित होने पर केवल तुम्हीं शेष बचे हुये हो जो पृथ्वी की मर्यादा को अथवा राज्यधुर को निस्चर रख सकते हो।' (क्योंकि राज्य का भार संभालने वाले तुम्हारे पिता तथा बड़े भाई दोनों का मरण हो चुका है जिससे राज्य का आनन्दोत्सव पूर्णरूप से समाप्त हो गया।) इसके बाद महाप्रलय तथा शेष शब्दों के बल पर दूसरा अर्थ निकलता है। इन दोनों अर्थों का उपमानोपमेय भाव हो जाता है। 'जिस प्रकार महाप्रलय होने पर पृथ्वी को धारण करनेवाले वाराह ध्रुकर इत्यादि सभी नष्ट हो जाते हैं, उस समय केवल शेष नाग ही पृथ्वी को धारण कर सकता है, उसी प्रकार उत्सव को समाप्त करनेवाले अपने पूर्वजों के महानाश के उत्पन्न होने पर केवल तुम्हीं शेष रह गये हो जिन पर पृथ्वी की रक्षा के लिये विश्वास किया जा सकता है। इस प्रकार यहाँ पर सम्पूर्ण वाक्य से अनुरणनन्याय से शब्दशक्तिमूलक ध्वनि निकलती है, यह बात स्पष्ट ही है।
( ३ ) इसी संल्लक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य में अर्थशक्त्युद्भव के कविप्रौढोक्तिमात्र निष्पन्न शरीर नामक भेद की पदप्रकाश्यता का उदाहरण—
( ३ ) इसी संल्लक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य में अर्थशक्त्युद्भव के कविप्रौढोक्तिमात्र निष्पन्न शरीर नामक भेद की पदप्रकाश्यता का उदाहरण—
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अस्यैव कविप्रौढोक्तिमात्रनिष्पन्नशरीरीरसार्थेशक्लयुद्धवप्रभेदे पदप्रकाशातायथा हरिविजये-- चूअडुरावअंसं छणमध्यसरसहव्घणमणहरसुरामोअम् । असमपिअं पि राहिअं कुसुमशरेहि ण महुमालिलिच्छुअअम् ॥
अनु० इसी ( विशिष्टतान्यपरवाच्य ) के उपभेद कविप्रौढोक्तिमात्र निष्पन्न शरीर की पदप्रकाश्यता का उदाहरण जैसे हरिविजय में— 'बहुमूल्य महोत्सव के प्रसार के कारण मनोहर सुरामोदवाले आम्रमञ्जरी के आभूषणों से युक्त वसन्त मास की लक्ष्मी के मुख को कामदेव ने बिना किसी के प्रदान किये हुये स्वयं ग्रहण कर लिया ।' यहाँ पर 'विना दिये हुये ही कामदेव ने मधुमासलक्ष्मी के मुख को ग्रहण कर लिया' में बिना दिये हुये यह अवस्था का कहनेवाला पद अर्थशक्ति से कामदेव के बलात्कार को प्रकाशित करता है ।
लोचन चूताडुरावत्सं क्षणप्रसरमहाघेमनोहरसुरामोदम् । महाघेण उत्सवप्रसरेहि मनोहरसुरस्य मन्मथदेवस्य आमोदश्रमत्कारो यत्र तत् । अत्र महाघशब्दस्य परनिपातः, प्राकृतेभाषावात् । क्षण इत्युत्सवः । असमपिंतमपि गृहीतं कुसुमशरेहि मधुमासललक्ष्मीसुखम् ॥ मुखं प्राक्रम्य वक्त्रं च । तत्र सुरामोदयुक्तं भवति । मध्वारस्मिन् कामचित्तवृत्ति- माक्षिपतीत्यक्षेतावानयमर्थः कविप्रौढोक्त्यार्थान्तरद्योतकः सम्पादितः । 'बहुमूल्य उत्सव के प्रसार से मनोहर सुरामोदवाले आम्रमञ्जरी के आभूषण से युक्त'
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अत्रैव प्रभेदे वाक्यप्रकार्यता यथोदाहतम् प्राक्-‘सज्जयति सुरभिमांसो न तान्गरपेयस्यनज्ञाय शरात’ इत्यादि । अत्र ‘सज्जयति सुरभिमांसो न तान्गरपेयस्यतज्ञाय शरा’ निष्पन्नं वाक्यार्थः कविप्रौढोक्तिमात्रनिष्पन्नशरीररो मन्मथोन्माथमदनावस्थां वसन्तसमयस्य सूचयति ।
अनु० इसी में ( विशिष्टवाच्य के ) उपभेद ( कविप्रौढोक्ति निष्पन्न शरीर ) की वाक्य-प्रकाश्यता जैसी कि पहले उदाहरण दिया गया है—‘सज्जयति सुरभिमांसो’ इत्यादि । यहाँ‘पर वसन्तमास वाण तैयार कर रहा है; किन्तु कामदेव को प्रदान नहीं कर रहा है’ यह वाक्यार्थ कविप्रौढोक्तिनिष्पन्नशरीर है और वसन्तसमय की ( की हुई ) कामदेव द्वारा उन्मथन और मदन की अवस्था को सूचित करता है ।
‘वहुमूल्य महोत्सव के प्रसार के कारण मनोहर सुरामोदकाले आभ्रमञ्जरी के आभूषणों से युक्त वसन्त मास की ललित के मुख को कामदेव ने विना किसी के प्रदान किये हुये स्वयं ही ग्रहण कर लिया ।’
तारावती
यहाँ पर ‘क्षणप्रसर महार्थमनोहर सुरामोदम्’ का अर्थ है महाघ अर्थात् बहुमूल्य बहुत बड़े उत्सव के द्वारा ‘मनोहर सुर’ अर्थात् कामदेव का आमोद अर्थात् चमत्कार जहाँ विद्यमान है । महार्थ शब्द ‘क्षणप्रसर’ शब्द का विशेषण है । अतः यहाँ पर महार्थ का पूर्व प्रयोग होकर ‘महार्थक्षण प्रसर’ यह रूप होना चाहिये । किन्तु प्राकृत में पूर्व निपात का ऐसा कोई हठ नियम नहीं है । क्षण शब्द का अर्थ है उत्सव ।
‘मनोहर सुरामोद’ शब्द के दो अर्थ हैं ( १ ) जिसमें मनोहरदेव कामदेव का आमोद अर्थात् चमत्कार विद्यमान हो और ( २ ) जो मनोहर मोदिरा की मधु से युक्त हो । इसी प्रकार मुख शब्द के भी दो अर्थ हैं प्रारम्भ और मुख । वसन्त के प्रारम्भ में कामदेव का नवमकार विद्यमान होता है और नायिका के मुख में मदिरा की सुगन्ध आ रही है ।
इस वाक्य का केवल यही अर्थ है कि वसन्त के प्रारम्भ में चित्त में कामदेव का जागरण हो जाता है । यहाँ पर कामदेव का मदनुमासलल्क्ष्मी के मुख को पकड़ लेना एक कविकल्पित वस्तु है । मदनुमासलल्क्ष्मी ने मुख समर्पित नहीं किया है फिर भी कामदेव ने पकड़ लिया है । इससे नायिका की नवोढ़ा दशा की अभिव्यक्ति होती है । और नायक ( कामदेव ) पर हठी कामुक के व्यवहार का समारोप हो आता है । इस कविकल्पित वस्तु से नायक के नायिका पर बलात्कार को स्वान्ति निकलती है । इस ध्वनि में ‘विना किसी के दिये हुये’ इस पद का
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अत्र कविनिबद्धवक्त्रप्रौढोक्तिशरीरार्थशक्त्युद्भवे पदवाक्यप्रकाशतायामसुदाहरणद्वयं न दत्तम् । 'प्रौढोक्तिमात्रनिष्पन्नशरीरः सम्भवी स्वतः' इति प्राच्यकारिकाया इयतेवोदाहरणत्वं भवेदित्यसिप्रायेण । तत्र पदप्रकाशता यथा—
यहाँ पर कविनिबद्धवक्त्र-प्रौढोक्तिशरीर अर्थशक्त्युद्भव में पद और वाक्य द्वारा प्रकाश्यता के अन्तर्गत दो उदाहरण नहीं दिये । 'प्रौढोक्तिमात्रनिष्पन्न शरीर सम्भवी स्वतः' इस प्राच्य कारिका का इतने से ही उदाहरणत्व हो जावे इस अभिप्राय से । उसमें पदप्रकाश्यता जैसे—
सत्यं मनोरमा काऽपि सत्या विरूषिताः । किन्तु मत्ताङ्गनापाङ्गभङ्गलोलं हि जीवितम् ॥
'काम सचमुच मनोरम (होते हैं) विभूतियाँ भी सचमुच रमणीय होती हैं किन्तु मत्त अङ्गनाओं के अपाङ्गभङ्ग के समान जीवन चल रहा है ।'
अथ हि वङ्गजकु है । अतएव यहाँ पर कविप्रौढोक्तिसिद्ध वस्तु से पद से प्रकाशित होनेवाली अर्थशक्तिमूलक ध्वनि है ।
इसी कविप्रौढोक्तिनिष्पन्न शरीर नामक भेद की वाक्यप्रकाश्यता का उदाहरण जैसे-द्वितीय उद्योत में एक उदाहरण दिया गया था—'वसन्त अभिनव आम्रमञ्जरी इत्यादि अनङ्ग के शरों को सज्जित कर रहा है किन्तु दे नहीं रहा है । ये अनङ्गशर नवीन पल्लव और पत्तों को देनेवाले हैं और इनके मुखों का लदय युवतियों का समूह ही है ।' वहाँ बतलाया जा चुका है कि 'वसन्त केवल कामदेव के वाणों को तैयार ही कर रहा है अभी दे नहीं रहा है' इस कवि-प्रौढोक्तिसिद्ध वस्तु से वसन्तसमय में कामदेव की क्रमशः प्रगाढ़ावस्था ध्वनित होती है । यह ध्वनि समस्त वाक्य से निकलती है । अतएव यहाँ पर कविप्रौढोक्तिसिद्ध वस्तु से वाक्यप्रकाश्य अर्थशक्तिमूलक ध्वनि निकलती है ।
यहाँ पर कविनिबद्धवक्त्रप्रौढोक्तिनिष्पन्नशरीर नामक भेद की पदप्रकाश्यता हो सकता है कि 'प्रौढोक्तिमात्रनिष्पन्नशरीरः सम्भवी स्वतः' इस प्राचीनों की कारिका में अर्थशक्त्युद्भव ध्वनि के मूलभेद दो ही माने गये हैं—(१) प्रौढोक्तिमात्रनिष्पन्न शरीर और (२) स्वतः सम्भवी । इसी आधार पर यहाँ पर केवल दो भेदों के ही उदाहरण दिये गये हैं । किन्तु इस अर्थशक्त्युद्भव ध्वनि का कविनिबद्धवक्त्रप्रौढोक्तिसिद्ध नामक एक भेद और होता है । उसके दोनों उदाहरण इस प्रकार दिये जा सकते हैं—
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इस्यत्र कविना यो विरागी वक्ता निवद्धस्त शक्ति:पौढोकृत्या जीवितशब्दनोऽर्थमूलतयेदं ध्वनयति—सर्व एवामी कामा विभूतयश्च स्वजीवितमात्रोपयोगिनः , तदभावे हि सद्धिरपि तैर सदूपताप्यते, तदेव च जीवितं प्राणधारणरूपत्वात्तेश्र चाञ्चल्याद-नास्थापदंमिति विषयेषु वराकेऽपि किं दोषोद्वोषणदौर्जन्येन निजमेव जीवितमुपालभमम, तदपि च निसर्गंचाञ्चलमिति न सापराधमित्येतावता नाढं बैराग्यमिति । वाक्यप्रकाशता यथा ‘शिखरिणी’त्यादौ।
यहाँ पर कविने जो विरागी वक्ता निवद्ध किया है उसकी प्रौढोक्ति से अर्थशक्ति-मूलतया जीवित शब्द यह ध्वनित करता है—ये सभी कामनायें और विभूतियाँ स्वजीवन मात्र की उपयोगिनी हैं उसके अभाव में निःसन्देह होते हुये भी वे न होने का रूप ही प्राप्त कर लिया करती हैं । वही जीवन प्राणधारण रूप होने से और प्राणवृत्ति की चञ्चलता से आस्था का स्थान नहीं है । इस प्रकार बेचारे विषयों के दोषोद्वोषण के दौर्जन्य से क्या अपने ही जीवन को उपालम्भ देना चाहिये । वह भी स्वभावत: चञ्चल है इसे प्रकार वह भी अपराधी नहीं इतने से तो गाढ बैराग्य ( ध्वनित होता है ) । वाक्यप्रकाश्यता जैसे—‘शिखरिणी’ इत्यादि ।
( क ) कविनिवद्धवक्तृ-प्रौढोक्तिसिद्ध नामक भेद में पदम्र काश्यता का उदाहरण—
‘यह् सच है कि काम्य वस्तुयें मनोरम होती हैं, यह भी सच है कि सम्पत्तियाँ भी मनोरम होती हैं, किन्तु जीवन तो मत्त अंगनाओं के अपांगों के भंग के समान चञ्चल है ।’
यह सच है कि काम्य वस्तुयें मनोरम होती हैं, यह भी सच है कि सम्पत्तियाँ भी मनोरम होती हैं, किन्तु जीवन तो मत्त अंगनाओं के अपांगों के भंग के समान चञ्चल है ।
यहाँ पर विरागी व्यक्ति एक कविनिवद्ध वक्ता है । ‘जीवन उँगनाओं के अपांगभंग के समान चञ्चल है’ यह उसी विरागी व्यक्ति की प्रौढोक्ति है । उससे अर्थशक्ति से यह ध्वनि निकलती है—‘जितनी भी सांसारिक कामनायें और विभू-तियाँ हो सकती हैं उनका एकमात्र उपयोग जीवन के लिये ही है । जीवन न होने पर उनका रहना भी न रहने के समान हो जाता है । प्राणों का धारण करना ही जीवन है और प्राणवृत्ति चञ्चल होती है । अतएव जीवन का कोई विश्वास नहीं किया जा सकता । फिर बेचारे दोषों के उद्धोषण का दौर्जन्य ही क्यों दिखलाया जावे ? अपने जीवन को ही दोष देना चाहिये । अथवा वह जीवन भी स्वाभाविक रूप में चञ्चल है । अतः उसका भो क्या अपराध ? यही कारण है कि जीवन के प्रति प्रगाढ बैराग्य उत्पन्न हो जाता है । अतएव कविनिवद्धवक्तृप्रौढोक्ति सिद्ध वस्तु से पदगतध्यध्वनि का यह उदाहरण है ।
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स्वतः सम्भविशारीरार्थशक्त्युद्भवे प्रमेये पदप्रकाशता यथा— वाणिअअ हत्थिदन्त्ता कुतो अज्जाण वाघकित्ती अ । जाव लुलिआलअमुहो घरम्मि परिसक्कए मुहा ॥ अत्र लुलितालकमुखीत्यतत्पदे व्याधिवधू: स्वत:सम्भावितशरीरोपचारार्थशक्त्या सुरतक्रिडासक्तिं सूचयन्सतदीयस्य भर्तु: सततसम्भोगक्षामतां प्रकाशयति ।
स्वतः सम्भविशारीरार्थशक्त्युद्भवे प्रमेये पदप्रकाशता यथा— वाणिअअ हत्थिदन्त्ता कुतो अज्जाण वाघकित्ती अ । जाव लुलिआलअमुहो घरम्मि परिसक्कए मुहा ॥ अत्र लुलितालकमुखीत्यतत्पदे व्याधिवधू: स्वत:सम्भावितशरीरोपचारार्थशक्त्या सुरतक्रिडासक्तिं सूचयन्सतदीयस्य भर्तु: सततसम्भोगक्षामतां प्रकाशयति ।
(अनु०) स्वतः सम्भवी शरीर अर्थशक्त्युद्भव नामक उपभेद में पदप्रकाश्यता का उदाहरण—
'हे व्यापारी ? हमारे घर में हाथीदाँत और व्याघ्रचर्म तक कहाँ जाव तक कि चूर्णकुन्तल से सुशोभित मुखवाली हमारी पुत्रवधू घर में विलास के साथ घूम रही है ।' यहाँ पर 'लुलितालकमुखी' यह पद स्वतः सम्भावित शरीरवाली अर्थशक्ति से व्याधिवधू की सुरतक्रिडासक्ति की सूचित करते हुए उसके पति की निरन्तर सम्भोगजन्य क्षीणता को प्रकाशित करता है ।
'हे व्यापारी ? हमारे घर में हाथीदाँत और व्याघ्रचर्म तक कहाँ जाव तक कि चूर्णकुन्तल से सुशोभित मुखवाली हमारी पुत्रवधू घर में विलास के साथ घूम रही है ।' यहाँ पर 'लुलितालकमुखी' यह पद स्वतः सम्भावित शरीरवाली अर्थशक्ति से व्याधिवधू की सुरतक्रिडासक्ति की सूचित करते हुए उसके पति की निरन्तर सम्भोगजन्य क्षीणता को प्रकाशित करता है ।
लोचन वाणिजक हस्तिदन्ता: कुतोडस्माकं व्याघ्रकृत्तयश्र । यावल्लुलितालकमुखी गृहे परिष्वक्ते स्नुषा ॥ इति छाया सविभ्रमं चडक्रम्यते । अत्र लुलितेति स्वरूपमात्रेण विशेषणमवलिसतया च हस्तिदन्तायपाहरणं संभाव्यमिति वाक्यार्थस्य तावस्येव न काचिदनुपपत्ति: ।
'ऐ वनिये ( व्यापारी ) कहाँ से हमारे ( यहाँ ) हाथीदाँत और व्याघ्रचर्म जाव तक मुख पर केशों को छिटकाये हमारी पुत्रवधू घरमे विचरण कर रही है । पूर्वंक इधर-उधर घूम रही है । यहाँ लुलित इत्यादि विशेषण स्वरूप से और अवलेप के गर्व ( तथा प्रमाद ) से हस्तिदन्त इत्यादि के अनाहरण की सम्भावना को जा सकती है । अतः वाक्यार्थ के उतने से ही ( विरत हो जानेपर ) कोई अनुपपत्ति नहीं होती ।
'ऐ वनिये ( व्यापारी ) कहाँ से हमारे ( यहाँ ) हाथीदाँत और व्याघ्रचर्म जाव तक मुख पर केशों को छिटकाये हमारी पुत्रवधू घरमे विचरण कर रही है । पूर्वंक इधर-उधर घूम रही है । यहाँ लुलित इत्यादि विशेषण स्वरूप से और अवलेप के गर्व ( तथा प्रमाद ) से हस्तिदन्त इत्यादि के अनाहरण की सम्भावना को जा सकती है । अतः वाक्यार्थ के उतने से ही ( विरत हो जानेपर ) कोई अनुपपत्ति नहीं होती ।
(ख) उसी की वाक्यप्रकाश्यता का उदाहरण—जैसे पहले आया हुआ उदाहरण 'शिखरिणि क नु नाम--' इत्यादि पद्य । इसमें रसिक व्यक्ति कविनिबद्धवक्ता है । विश्वफल का तपस्या करना केवल उसी कविनिबद्धवक्ता की प्रौढोक्ति सिद्ध वस्तु है । उससे उस व्यक्ति की अधरचुम्बन विषयक अभिलाषा ध्वनित होती है । अतएव यह कविनिबद्धवक्तृ—प्रौढोक्तिसिद्ध वस्तु से वाक्यप्रकाश्य ध्वनि का उदाहरण है ।
तारावती 'शिखरिणि क नु नाम--' इत्यादि पद्य । इसमें रसिक व्यक्ति कविनिबद्धवक्ता है । विश्वफल का तपस्या करना केवल उसी कविनिबद्धवक्ता की प्रौढोक्ति सिद्ध वस्तु है । उससे उस व्यक्ति की अधरचुम्बन विषयक अभिलाषा ध्वनित होती है । अतएव यह कविनिबद्धवक्तृ—प्रौढोक्तिसिद्ध वस्तु से वाक्यप्रकाश्य ध्वनि का उदाहरण है ।
तारावती 'शिखरिणि क नु नाम--' इत्यादि पद्य । इसमें रसिक व्यक्ति कविनिबद्धवक्ता है । विश्वफल का तपस्या करना केवल उसी कविनिबद्धवक्ता की प्रौढोक्ति सिद्ध वस्तु है । उससे उस व्यक्ति की अधरचुम्बन विषयक अभिलाषा ध्वनित होती है । अतएव यह कविनिबद्धवक्तृ—प्रौढोक्तिसिद्ध वस्तु से वाक्यप्रकाश्य ध्वनि का उदाहरण है ।
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तस्यैव वाक्यप्रकाशता यथा--सिहिपिच्छकर्णूरा वहुआ वाहस्य गव्विरी भमइ । मुक्ताफलरअपसाहणाणं मज्झे सवत्तीणाम् ॥
उसी की वाक्यप्रकाशता जैसे--सिहिपिच्छकर्णूरा वहुआ वाहस्य गव्विरी भमइ । मुक्ताफलरअपसाहणाणं मज्झे सवत्तीणाम् ॥
अन्वयः--'वाक्येन व्यावृत्या' शिखिपिच्छकर्णूरूपया नवपरिणीतया कस्याश्चित्सौभाग्यातिशयः प्रकाश्यते । तत्सम्भोगैकर्तो मयूरमात्रमारणसमर्थे पतिजाते इत्यर्थप्रकाशनात् । तदन्वयाद् चिरपरिणीतानां मुक्ताफलरचितप्रसाधनानां दौर्भाग्यातिशयः व्यङ्ग्यते । तत्सम्भोगकाले स एव न्यायः करिवरवधव्यापारसमर्थे आसीदित्यर्थप्रकाशनात् । (अनु.) उसी की वाक्यप्रकाश्यता जैसे--'मयूर पिच्छ के कर्णपूर को धारण किये हुए व्याघ्रवधू के मुक्ताफल के द्वारा प्रसाधन को बनाये हुये स्वपत्नियों के बीच में गर्व के साथ घूम रही है ।' इस वाक्य के द्वारा भी किसी नवपरिणीता, मयूरपिच्छ का कर्णपूर धारण करनेवाली, व्याघ्रवधू के सौभाग्य की अधिकता प्रकट की जाती है । क्योंकि इससे यह अर्थ प्रकाशित होता है कि एकमात्र उसके सम्भोग में ही लगा हुआ पतिः केवल मयूर मारने की शक्तिवाला वन गया । उससे भिन्न मुक्ताफल का प्रसाधन करनेवाली चिरपरिणीता सौतों के दुर्भाग्य की अधिकता प्रकट होती है । क्योंकि इससे यह अर्थ निकलता है कि उनके सम्भोग काल में वही व्याध बड़े-बड़े हाथियों के वध के कार्य में समर्थ था ।
लोचन
सिहिपिच्छेति । पूर्वमेव योजिता गाथा । 'सिखि पिच्छे' इति । इस गाथा की योजना तो पहले ही की जा चुकी ।
(४) अनुरणनरूप व्यङ्गच्य में स्वतः सम्भवी भेद की पदप्रकाश्यता का उदाहरण--किसी व्यापारी ने किसी वृद्ध व्याध से हांथी दाँत और व्याघ्रचर्म को देने के लिये कहा, इसपर वह वृद्ध व्याध कहने लगा--
'हे वणिक् ? जव तक हमारे घर में हमारी पुत्रवधू अपने मुख पर केशों को फहराती हुई घूम रही है तब तक हमारे घर में कहाँ से हाथी दाँत आये और कहाँ से व्याघ्रचर्म आया ?' यहाँ पर व्याघ्रवधू का अपने मुख पर केशों को फहराते हुये घूमना वाच्य वस्तु है जो कि लोक में स्वतः सम्भव है । इससे अर्थशक्ति से यह ध्वनित होता है कि
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व्याध का पुत्र अपनी पत्नी के सौन्दर्य पर रीझकर उसके विलासों को देखता रहता है और सहवास में ही अपना मन लगाये रहता है जिससे वधू के केश निरन्तर छूटे रहते हैं तथा मुखपर मंडराते रहते हैं। व्याध का पुत्र निरन्तर संभोग के कारण अत्यन्त क्षीण हो गया है और वह हाथियों और वधों को मार नहीं सकता। जिससे घर में हाथीदांत और व्याघ्रचर्म मिल सके। केशों का छूटे रहना और मुख पर मंडराना यह विशेषण स्वरूपमात्र ( स्वभावोक्ति के रूप में ) भी हो सकता है और हाथी दांत इत्यादि का न लाना उदाहरण से भी सम्भव है। अतएव वाच्यार्थ की विश्रान्ति इतने में ही हो जाती है और इसमें कोई अनुपपत्ति नहीं रह जाती। अतः संभोगदशामता इत्यादि व्यङ्गच्य ही है। इस प्रकार यहाँ पर स्वतःसम्भवी वस्तु से पदप्रकाश्य अर्थ-शक्तिमूलक ध्वनि निकलती है।
( ६ ) उसी स्वतः सम्भवी भेद की वाक्यप्रकाश्यता का उदाहरण— 'मयूरपिच्छ के करणाभरण बनाये हुए व्याध की वधू मुक्ताफलों के आभूषणों का शृङ्गार करनेवाली अपनी सौतों के मध्य में अभिमानपूर्वक घूम रही है।'
इस गाथा की योजना पहले ही की जा चुकी है। इस वाक्य से भी मयूरपिच्छ का करणाभरण धारण करनेवाली नव परिणीता व्याधवधू के सौभाग्य की अधिकता ध्वनित होती है क्योंकि इससे यह प्रकट होता है कि उस नवपरिणीता वधू के संभोग का आनन्द लेने के कारण उसके पति में केवल इतनी ही शक्ति रह गई है कि वह मयूरों को मार सके। उसकी बहुत दिनों की व्याही हुई सौतों को यह सौभाग्य प्राप्त नहीं हुआ था। उस समय उसका पति उन सपत्नियों में इतना अधिक अनुरक्त नहीं हुआ था और उसमें हाथियों के मारने की शक्ति बना रही थी। वह हाथियों को मारकर मुक्ताफल लाकर दिया करता था। अतएव यद्यपि नायिका की सपत्नियाँ मुक्ताफल धारण किये हुए हैं और नायिका को मयूर पिच्छ ही मिल सके हैं किन्तु फिर भी नायिका का सौभाग्य प्रकट होता है और सपत्नियों का दुर्भाग्य प्रकट होता है। नायिका का मयूरपिच्छ धारण करना और सौतों में अभिमानपूर्वक घूमना स्वतः सम्भवी वस्तु है। उससे नायिका के सौभाग्य रूप में वाक्यप्रकाश्यध्वनि निकलती है।
( ऊपर वाक्यप्रकाश्य तथा पदप्रकाश्य ध्वनि भेदों के उदाहरण दिये गये। यहाँ पर अब यह प्रश्न उठाया जा रहा है कि ध्वनि पदसमूह की ही बोधक होती है। फिर यह कहना किस प्रकार सङ्गत हो सकता है कि ध्वनि एक पद के द्वारा प्रकाशित होती है ?
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ननु ध्वनिः काव्यविशेष इत्युक्तं तत्कथं तस्य पदप्रकाशात्। काव्यविशेषो हि विशिष्टार्थप्रतिपत्तिहेतुः शब्दसन्नदर्भविशेषः। तद्रावश् पदप्रकाशत्वे नोपपद्यते। पदान्यास्मारकत्वेनावचिकत्वात्। उच्यते—स्यादप दोषः यद् वाचकत्वं प्रयोजकं ध्वनित्ववहारे स्यात्। न त्वेयम्। तस्य व्यङ्कत्वेन व्यवस्थानात्। किश्च काव्यानां शाब्दराश्रितं संस्थानविशेषाविच्छिन्नासमुदायसाध्यापि चारुत्वप्रतीतिरव्यङ्यतिरेकाभ्यां भागेषु कल्प्यत इति पदान्यासपि व्यङ्ककत्वमुखेन व्यवस्थितो ध्वनित्ववहारो न विरोधी।
पद के द्वारा प्रकाशित होना कैसे हो सकता है ? निस्सन्देह विशेष प्रकार के अर्थ की प्रतिपत्ति में कारण विशेष प्रकार का शब्द-सन्दर्भ ही विशेष प्रकार का काव्य होता है । पदप्रकाशात्व में उसका होना सिद्ध नहीं होता । क्योंकि स्मारक होने के कारण पद वाचक नहीं होते । (इसके ) उत्तर में कहा जा रहा है—यह दोष होता यदि वाचकत्व ध्वनि-व्यवहार में प्रयोजक होता। किन्तु ऐसा नहीं है । उसकी व्यवस्था तो व्यङ्गकत्व के द्वारा होती है । दूसरी बात यह है कि शाब्दराश्रित अवयवसंस्थान से अविच्छिन्न समुदाय के द्वारा ही चारुत्वप्रतीति विशेष प्रकार के अव्यङ्य-व्यतिरेक से भागों में कल्पना कर ली जाती है । इस प्रकार व्यङ्गकत्व के द्वारा व्यवस्थित पदों का ध्वनित्वव्यवहार व्यवस्थित नहीं है ।
तन्न्विति। समुदाय एव ध्वनिरस्ति यत्तत् तद्रावश्चेतित्। काव्यविशेषत्वमित्यर्थः। अवाचकत्वादिति यदुक्तं सोऽप्यमप्रयोजको हेतुरिति छलेन तात्रिशयति—स्यादप दोष इति। एवं छलेन परिहारस्य वस्तुवृत्तेनापि परिहरति—किं तु इत्यादि। यदि परो व्यूयात्—न चया अवाचकत्वं ध्वनित्ववहारे हेतुकृत किं तु काव्यं ध्वनिः।
'ननु' इति । समुदाय में ही ध्वनि होती है इस पक्ष में यह प्रश्न उठता है । 'तद्राव' इति । अर्थात् काव्यविशेषत्व । 'अवाचक होने से' जो यह कहा है अप्रयोजक हेतु है यह छल से दिखलाते हैं—'यह दोष होता' इत्यादि । इस प्रकार छल से परिहार करके वस्तुवृत्त से भी परिहार कर रहे हैं—'किंच'-यदि दूसरा कहे कि 'मैंने अवाचकत्व को ध्वनि के अभाव में हेतु नहीं बनाया किन्तु यह कहा है कि काव्य ध्वनि है और काव्य आकांक्षादारहित प्रतिपत्ति करानेवाला वाक्य होता है पद नहीं' इस विषय में कहते हैं—यह सच है, तथापि हमलोगों ने यह नहीं कहा
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ध्वनिरित्यस्माभिरुक्तम्। अपि तु समुदाय एव, तथा च पदप्रकाशो ध्वनिरिति प्रकाशपदेनोक्तम्। ननु पदस्य तत्र तथाविधं सामर्थ्यमिति कुतेऽखण्ड एव प्रतीतिरूप इत्याशङ्क्याह काव्यात्मत्वमिति। उक्तं हि प्रागिवेकेकाले विभागोपदेश इति। कि पदध्वानौ है। आप्तु समुदाय होइ ( ध्वनि है )। इसीलिये 'ध्वनि पदप्रकाश होता है' यह प्रकाश शास्त्र के द्वारा कहा गया है। 'यदि वहाँ पर पद का इस प्रकार का सामर्थ्य है तो अखण्ड प्रतीति किस प्रकार होगा?' यह शङ्का करके कहते हैं—'काव्यों का' यह। निःसन्देह पहले ही कहा गया है कि विवेककाल में विभाग का उपदेश होता है।
( प्रश्न ) आपने यह बतलाया है कि वाचक, वाच्य और व्यङ्ग्य के समुदाय को ध्वनि कहते हैं। यह एक विशेष प्रकार का काव्य होता है। काव्य एक विशेष प्रकार के शब्दों के समूह को कहते हैं जो विशेष प्रकार के अर्थ की प्रतिपत्ति करानेवाला होता है। दूसरी ओर आप कह रहे हैं कि ध्वनि शब्द के द्वारा प्रकाशित होती है। यदि ध्वनि का शब्द के द्वारा प्रकाशित होना मान लिया जावे तो शब्दसमूह के द्वारा सत्ता में आनेवाला काव्यतत्त्व ध्वनि में किस प्रकार सिद्ध हो सकेगा? पद केवल स्मारक होते हैं वाचक नहीं होते। फिर ध्वनि का पदप्रकाश्यत्व किस प्रकार सङ्गत हो सकता है? यह प्रश्न इस पक्ष को मानकर किया गया है कि ध्वनि समुदाय को कहते हैं। पहले ध्वनि के अनेक अर्थ बतलाये थे और यह सिद्धान्तित किया था कि ध्वनि सभी के समूह को कहते हैं।
( उत्तर ) सिद्धान्ती ने यहाँ पर दो उत्तर दिये हैं—एक तो पूर्वपक्षी की निरुत्तर करने के लिये उसकी बात काटने के मन्तव्य से छलपूर्वक दिया गया है जिससे सिद्धान्त की बात छिपा ली गई है। प्रश्नकर्त्ता के प्रश्न का सारांश यह था कि ध्वनि पद के द्वारा इसलिये प्रतीत नहीं हो सकती कि पद वाचक नहीं होते। ( सिद्धान्ततः वाक्यस्फोट ही मुख्य होता है। जिस प्रकार शब्द में प्रत्येक अक्षर का कोई अर्थ नहीं होता उसी प्रकार वाक्य में प्रत्येक शब्द का कोई अर्थ नहीं होता। ) वैैयाकरणों का सिद्धान्त है कि जिस प्रकार 'घट' शब्द में 'घ' का पृथक् कोई अर्थ नहीं है उसी प्रकार 'घटो भवति' में 'घट' शब्द का भी कोई अर्थ नहीं है। सम्पूर्ण वाक्य का ही अर्थ होता है किन्तु समस्त वाक्यों का अर्थ बतलाना असम्भव है इसीलिये वाक्यगत पदों की कल्पना कर ली जाती है और पदों में भी वर्णों की कल्पना कर ली जाती है। यही बात वैैयाकरण-भूषणसार को निम्नलिखित कारिका में कही गई है :—
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पदे न वर्णा विद्यन्ते वर्णेष्ववयवा न च ।
पद में वर्ण नहीं होते और वर्णों में अवयव नहीं होते ।
अर्थात् पद में वर्ण नहीं होते जैसे ‘ए’ ‘ओ’ इत्यादि वर्णों में ‘अ + ई’ ‘अ + उ’ इत्यादि अवयव परमार्थिक नहीं होते । वाक्य से पदों का कोई भी पृथक् विवेक ( भेद ) नहीं होता ।
वाक्यात्पदनिमित्त्यन्तं प्रविवेको न कश्चन ॥
वाक्य से पद का कोई भेद नहीं है ।
वैद्याकरण ‘भवति’ इत्यादि शब्दों में ‘भू + अ + ति’ इत्यादि विभाजन कल्पित उपायमात्र मानते हैं :-
उपाय: शिक्ष्यमाणानां बालानामुपलालनम् ।
उपाय: यह बालकों को समझाने का तरीका है ।
असत्सु वस्तुषु स्थितत्वा तत् सत्यं समीहते ॥ असत्य मार्ग पर स्थित होकर फिर सत्य की आकांक्षा करता है ।
असत्सु वस्तुषु स्थितत्वा तत् सत्यं समीहते ॥
असत् वस्तुओं में स्थित होकर उस सत्य की आकांक्षा करता है ।
शिक्षण प्राप्त करने वाले बालकों के लिये व्याकरण के उपाय लालनमात्र हैं । ( जैसे खेल में बालक ) असत्य मार्ग पर स्थित होकर फिर सत्य की आकांक्षा करता है ।
उत्तरपक्षी का कहना है कि यह सच्च है कि पद अवाचक होते हैं किन्तु ध्वनि का प्रयोजक वाचकत्व होता भी तो नहीं । ध्वनि का प्रयोजक तो व्यङ्गजकत्व होता है । यदि व्यङ्गजकत्व विद्यमान है तो पद वाचक हों या न हों ध्वनि तो हो ही सकती है । इस प्रकार हेतूप्रवक उत्तर देकर वस्तुतत्त्व के द्वारा अर्थात् वास्तविकता को प्रकट करते हुये उत्त्तर दिया जा रहा है । उक्त उत्तर पर प्रश्नकर्ता कह सकता है कि मेरा आशय यह नहीं है कि पद इसलिये ध्वनित नहीं हो सकता कि वह वाचक नहीं होता किन्तु मेरा कहने का आशय यह है कि ध्वनि काव्य को कहते हैं । काव्य एक ऐसे पदसमूहरूप वाक्य को कहते हैं जिसमें आकांक्षा विद्यमान न रह जाये अर्थात् जिससे पूर्ण अर्थ की प्रतीति हो सके । पद अकेला काव्य नहीं हो सकता ।
( प्रश्न ) जब पद काव्य नहीं हो सकता तब पद ध्वनन कैसे हो सकता है ? ( उत्तर ) मैं यह नहीं कहता कि पद ध्वनि या काव्य होता है । मैं ध्वनि तो समुदाय को ही मानता हूँ । किन्तु मेरा कहना यह है कि ध्वनि पद के द्वारा प्रकाशित हुआ करती है । इसीलिये प्रकाश शब्द का विशेष रूप से प्रयोग किया गया है । समुदाय में होते हुये भी ध्वनि पद के द्वारा प्रकाशित तो हो ही सकती है । ( प्रश्न ) जब ध्वनि पद के द्वारा प्रकाशित हो सकती है, तो शेष काव्य वाक्य से उसका क्या सम्बन्ध रह जाता है ? उसी पद को काव्य क्यों नहीं मान लिया जाता ? ( उत्तर ) यह पहले ही बतलाया जा चुका है कि काव्य एक शरीर है । शब्द इत्यादि उसके अङ्ग होते हैं । जिस प्रकार यद्यपि शरीर में चेतनता की प्रतीति विशेष प्रकार के सन्निवेश से युक्त समुदाय के द्वारा
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अनिष्टस्य श्रुतितिरद्वादापादयति दुष्टताम् । श्रुतिदुष्टादिषु व्यकत्कं तद्रदिष्टश्रुतिगुणम् ॥ पद्यानां स्मारकत्वेऽपि पद्मात्रावभासिनः । तेन ध्वने: प्रभेदेषु सर्वेध्वेवावस्थिति रच्यता ॥ विच्छित्तिशोभिनैकेन भूषणेनैव कामिनी । पदद्योतयेन सुकवेध्वनिना भाति भारती ॥
इति परिकरश्लोका:। (अनु.) श्रुतिदुष्ट इत्यादि दोषों में अनिष्ट का श्रवण जिस प्रकार दुष्टता का सम्पादन स्पष्टरूप में करता है उसी प्रकार इष्टस्मरण गुण का सम्पादन कर सकता है ॥ १ ॥ 'इस कारण पदों के स्मारक होते हुये भी केवल पद से प्रकाशित होनेवाली ध्वनि के सभी भेदों में रमणीयता होती है ॥ २ ॥ 'जिस प्रकार विच्छित्ति के द्वारा शोभित होनेवाले एक ही भूषण से कोई कामिनी शोभित होने लगती है उसी प्रकार पद के द्वारा द्योत्य ध्वनि से अच्छे कवि की वाणी शोभित होती है ॥ ३ ॥
लोचन ननु भागेषु पदरूपेपु कथं सा चारुत्वप्रतीतिरोप्यते शक्या ? तानि हि स्मारकाण्येव । ततः किम् ? मनोहारिरयड्यार्थस्मारकत्वादिचारुत्वप्रतीतिनिवन्धनत्वं केन वार्यते ? यथा श्रुतिदुष्टानां पेलवादिपदानाभसभ्यपेलादयः प्रति न वाचकत्वमपि तु स्मारकत्वम् । तद्रहाच चारुस्वरूपं काव्यं श्रुतिदुष्टम् । तच्च श्रुतिदुष्टत्वमन्वयव्यतिरेकाभ्यां भागेषु व्यवस्थाप्यते तथा प्रकृतेऽपि तत्साह--अनिष्टस्यैव । अनिष्टार्थस्मारकस्यैत्यर्थः । दुष्टतामित्यचारुत्वम् । गुणवमिति चारुत्वम् । एवं दृष्टान्तस्समिधाय पादत्रयेण तुयैष दार्शान्तिकार्थ उक्तः । अधुनोपसंहरति--पदानामिति ।
( प्रश्न ) पदरूप भागों में उस चारुत्वप्रतीति का आरोप कैसे किया जा सकता है ? वे तो स्मारक ही होते हैं ( उत्तर ) इससे क्या ? मनोहर गम्यार्थ को स्मरण कराने के कारण निःसन्देह वे चारुत्वप्रतीति में निमज्जन होते हैं इसको कौन रोक सकता है ? जैसे श्रुतिदुष्ट 'पेलव' इत्यादि पदों में असभ्य 'पेल' इत्यादि अर्थ के प्रति वाचकत्व नहीं होता । अपितु स्मारकत्व ही होता है । उसके वश से चारुस्वरूप काव्य श्रुतिदुष्ट होता है और वह श्रुतिदुष्टत्व अन्वय-व्यतिरेक से भागों में स्थापित किया जाता है वैसा ही प्रकृत में भी है । वेही कहते हैं--'अनिष्ट का' अर्थात् अनिष्ट अर्थ के स्मारक का । दुष्टता का अर्थ है अचारुत्व । गुण का अर्थ है चारुत्व । तीन पादो से कहकर चौथे से दार्शन्तिक अर्थ कहा है । अब उपसंहार
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स्मृतिश्रुत्यादिवाहहति तेन हेतुना सर्वेपु प्रकारेषु निरूपितस्य पदमात्रावभासिनोडपि पदप्रकाशस्यापि ध्वने रस्यतास्वित स्मारकत्वेऽपि पदनामिति समन्वयः। अपिशब्दः काकाक्षि- न्यायेनोमयत्रापि सम्वध्यते। अधुना चारुत्वप्रतीतेऽपि पदनामन्वयव्यतिरेकौ दर्शयति—विच्छित्तीति॥९॥
इस हेतु से सभी प्रकारों में निरूपित तथा पदमात्र से अवभासित होने- वाले भी अर्थात् पदप्रकाश भी ध्वनि की रस्यता पदों के स्मारक होते हुये भी होती है, यह समन्वय है। अपिशब्द कौवे की आँख के न्याय से दोनों ओर सम্বद्ध हो जाता है। इस समय चारुत्वप्रतीति में पद के अन्वय-व्यतिरेकौ को दिखलाते हैं—‘विच्छित्ति’ इत्यादि॥९॥
हे हो सकती है तथापि शरीर में कोई एक विशेष अवयव ऐसा होता है जिसके होने से चारुता की प्रतीति होती है और न होने से चारुता की प्रतीति नहीं होती। अतएव उस व्यक्ति के सौन्दर्य की कल्पना उसी अंग में कर ली जाती है। उसी प्रकार काव्य में भी चारुता सम्पूर्ण वाक्य में ही होती है किन्तु उसमें हेतु किसी एक पद की उपस्थिति ही हो जाती है। अतएव व्यञ्जकत्व के द्वारा पदों के लिये भी ध्वनि शब्द का व्यवहार किया जा सकता है। उसमें कोई विरोध नहीं आता।
हे हो सकती है तथापि शरीर में कोई एक विशेष अवयव ऐसा होता है जिसके होने से चारुता की प्रतीति होती है और न होने से चारुता की प्रतीति नहीं होती। अतएव उस व्यक्ति के सौन्दर्य की कल्पना उसी अंग में कर ली जाती है। उसी प्रकार काव्य में भी चारुता सम्पूर्ण वाक्य में ही होती है किन्तु उसमें हेतु किसी एक पद की उपस्थिति ही हो जाती है। अतएव व्यञ्जकत्व के द्वारा पदों के लिये भी ध्वनि शब्द का व्यवहार किया जा सकता है। उसमें कोई विरोध नहीं आता।
( प्रश्न ) पदरूप भागों में उस चारुता की प्रतीति का आरोप हो ही किस प्रकार सकता है ? पद तो केवल अर्थ के स्मारक होते हैं इससे क्या हुआ ?
( प्रश्न ) पदरूप भागों में उस चारुता की प्रतीति का आरोप हो ही किस प्रकार सकता है ? पद तो केवल अर्थ के स्मारक होते हैं इससे क्या हुआ ?
( उत्तर ) पदे अर्थ के स्मारक होते हैं इससे क्या हुआ ? वे मनोहर व्यङ्ग्यार्थ का स्मरण कराते हैं ! अतएव ये चारुताप्रतीति में कारण होते हैं इस बात में किस को आपत्ति हो सकती है ? उदाहरण के लिये श्रुतिदुष्ट पेलव शब्द को लीजिये। यह शब्द कोमल अर्थ का वाचक है, असभ्य पेल ( वृषण ) का वाचक नहीं है, केवल उस अर्थ का स्मरण कराता है। इसी स्मरण करा देने के कारण ही सुन्दर स्वरूपवाला यह काव्य भाग होता है। श्रुतिदुष्ट दोष से दूषित हो गया है।
( उत्तर ) पदे अर्थ के स्मारक होते हैं इससे क्या हुआ ? वे मनोहर व्यङ्ग्यार्थ का स्मरण कराते हैं ! अतएव ये चारुताप्रतीति में कारण होते हैं इस बात में किस को आपत्ति हो सकती है ? उदाहरण के लिये श्रुतिदुष्ट पेलव शब्द को लीजिये। यह शब्द कोमल अर्थ का वाचक है, असभ्य पेल ( वृषण ) का वाचक नहीं है, केवल उस अर्थ का स्मरण कराता है। इसी स्मरण करा देने के कारण ही सुन्दर स्वरूपवाला यह काव्य भाग होता है। श्रुतिदुष्ट दोष से दूषित हो गया है।
जहाँ पर इस प्रकार के असभ्य अर्थ के स्मारक भाग होते हैं वहाँ पर श्रुतिदुष्ट इत्यादि दोष होते हैं, जहाँ पर इस प्रकार के भाग नहीं होते वहाँ ये दोष भी नहीं होते। इस प्रकार अन्वय-व्यतिरेक से श्रुतिदुष्ट इत्यादि दोष भागों में ही माने जाते हैं। इसी प्रकार अन्वय-व्यतिरेक के नियम से ही चारुता की प्रतीति में हेतुता भी भागों में ही मानी जाती है। यही बात इस परिकर श्लोक में कही गई है—
जहाँ पर इस प्रकार के असभ्य अर्थ के स्मारक भाग होते हैं वहाँ पर श्रुतिदुष्ट इत्यादि दोष होते हैं, जहाँ पर इस प्रकार के भाग नहीं होते वहाँ ये दोष भी नहीं होते। इस प्रकार अन्वय-व्यतिरेक से श्रुतिदुष्ट इत्यादि दोष भागों में ही माने जाते हैं। इसी प्रकार अन्वय-व्यतिरेक के नियम से ही चारुता की प्रतीति में हेतुता भी भागों में ही मानी जाती है। यही बात इस परिकर श्लोक में कही गई है—
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यस्त्रलदचक्रभङ्ग्यादृचो ध्वनिनिर्णपादिषु । वाक्ये संघटनतायाश्र स प्रवन्धेडपि दीप्यते ॥ २ ॥
(अनु०) 'जोकि अलक्ष्यक्रमव्यंग्य ध्वनि होती है वह वर्ण पद इत्यादि में वाक्य में संघटना में और प्रवन्ध में भी दीप्ति होती है' ॥ २ ॥
'जिस प्रकार श्रुतिदुष्ट इत्यादि दोषों में अनिष्ट का श्रवण दुष्टता का आपादन करता है उसी प्रकार दुष्ट का स्मरण गुण का स्फुट रूप में आपादन करता है ।' 'अनिष्ट का श्रवण' शब्द में अनिष्ट शब्द का अर्थ है अनिष्ट का स्मरण करानेवाला शब्द । दुष्टता का अर्थ है अनौचित्य । गुण का अर्थ हैं चातुर्य । इस प्रकार तीन चरणों में हृदयान्त कहा और चौथे चरण में दार्ष्टान्तिक कह दिया । अब दूसरे श्लोक में उपसंहार कर रहे हैं— 'अतएव यद्यपि पद स्मारक होते हैं तथापि केवल पद से प्रकट होनेवाले ध्वनि के समस्त उपभेदों में रमणीयता विद्यमान रहती ही है ।' क्योंकि इष्ट का स्मरण चारुत्व का आह्वाहन करनेवाला होता है इसी कारण केवल पद के द्वारा अवभासित होनेवाले भी ध्वनि के उन समस्त उपभेदों में जिनका निरूपण पहले किया जा चुका है रमणीयता विद्यमान रहती ही है । यद्यपि पद होते स्मारक ही हैं । इस कारिका का समन्वय इसी रूप में करना चाहिये । कारिका में आया हुआ अपि शब्द उसी प्रकार दोनों ओर लग जाता है जिस प्रकार कौवे की दोनों आँखों में एक हो पुतली घूमती रहती है । इस प्रकार 'अपि' शब्द का 'स्मारकत्व' के साथ भी अन्वय होता है और पद्मान्तरावभासिनः के साथ भी । अब तृतीय श्लोक में चारुत्वप्रनीति में पद का अन्वय-अव्यतिरेक दिखलाया जा रहा है—'जैसे किसी कामिनी का कोई एक ही आभूषण ऐसा होता है जो कि सभी से पृथग्भूत होकर शोभा का परिपोष किया करता है और उससे कामिनी का सारा शरीर जगमगा उठता है किन्तु उस भूषण की शोभा सर्वोपरि अवगत होती रहती है । उसी प्रकार कवि की भारती में भी कोई एक पद ही इतना अच्छा होता है कि वह विच्छित्तिविशेष का परिपोष करनेवाले किसी ऐसे अर्थ को अभिव्यक्त कर देता है जो कि चमत्कारपर्यवसायी होने के कारण श्रोत्रि का रूप धारण कर लेता है और उससे कवि की वाणी एकदम जगमगा उठती है ।'
उपर प्रथम कारिका की व्याख्या की गई । इस कारिका से अविवक्षितवाच्य ध्वनि के उपभेदों और विवक्षितवाच्य के संलक्ष्यचक्रमव्यंग्य के उपभेदों की व्यङ्जकता का निरूपण कर दिया गया कि ये सब ध्वनियाँ पद और वाक्य से
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एवं कारिकां व्याख्याय तदसङ्ग्रहीतलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्यं' प्रपञ्चयितुमाह-यस्ल्वति । तुशब्दः पूर्वमेदेश्योदस्य विशेष्योत्कः । वर्णसमुदायश्र पदम् । तत्समुदायो वाक्यम् । सङ्घटना पदगता वाक्यगता च । सङ्घटितवाक्यसमुदायः प्रवन्धः इत्यभिप्रायेण वर्णादीनां यथाक्रममुपादानम् । आदिशब्देन पदैकदेशपदद्वितीयादीनां ग्रहणम् । समस्ता निमित्तत्वमुक्तम् । दीप्यतेsवभासते सकलकाव्यावभासकतयैते पूर्ववत्काव्यविशेषत्वं समर्पितम् ॥ २ ॥
इस प्रकार कारिका की व्याख्या करके उसके द्वारा असंगृहीत असंल्लद्धक्रम व्यङ्ग्य को प्रपञ्चित करने के लिये कहते हैं—यस्ल्वति । ‘तु’ शब्द पूर्वमेदों से इसकी विशेषता का द्योतक है । वर्णसमुदाय को पद कहते हैं, उसके समुदाय को वाक्य कहते हैं । सङ्घटना पदगत भी होती है और वाक्यगत भी । सङ्घटित वाक्यसमुदाय को प्रवन्ध कहते हैं इस अभिप्राय से वर्णों का यथाक्रम उपादान किया गया है । आदि शब्द से पद के एक देश दो पद इत्यादि का ग्रहण होता है । समस्तो से निमित्तत्व कहा गया है । सकल काव्य के अवभासक के रूप में दीप्त किया जाता है; इस प्रकार पूर्ववत् काव्यविशेष का समर्थन कर दिया गया ॥ २ ॥
अथ ध्वनेः उपमेदों में शेष रह जाता है, असंल्लक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य विवक्षितान्यपरवाच्य नामक उपमेद । उसके व्यङ्जक तत्वों को दूसरी कारिका में विस्तारपूर्वक बतलाया जा रहा है— ‘जो कि असंल्लक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य नामक ध्वनि भेद है वह तो वर्ण और पद इत्यादि में तथा वाक्य में, संघटना में और प्रवन्ध में भी दोष होता है । यहाँ पर तो का अर्थ यह है कि असंल्लक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य से भिन्न जिन ध्वनिभेदों का पहली कारिका में उल्लेख किया गया था उन भेदों से इसमें कुछ विलक्षणता होती है । यहाँ पर व्यङ्जकतत्वों का क्रम एक विशेष मन्तव्य से रखा गया है—असंल्लक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य का सबसे छोटा व्यङ्जक वर्ण होता है । इसीलिये वर्ण का उल्लेख सबसे पहले किया गया है । वर्णसमुदाय को पद कहते हैं, पदसमुदाय को वाक्य कहते हैं । अतएव वर्ण के बाद पद और पद के बाद वाक्य का उल्लेख किया गया है । संघटना दो प्रकार की होती है पदगत और वाक्यगत । अतएव संघटना का उसके बाद उल्लेख है । संघटित वाक्यसमूह ही प्रवन्ध कहलाता है । इसी अभिप्राय से वर्ण इत्यादि का यथाक्रम उल्लेख हुआ है । ‘पद इत्यादि में’ इत्यादि का आशय यह है कि असंल्लक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य की
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तत्र वर्णानामनर्थकत्वाद् द्योतकत्वमसम्भवीत्याशङ्क्येदमुच्यते-- शषौ सरेपसयोगो टकारश्वापि भूयसा । विरोधिनः स्युः शृङ्गारे तेन वर्णा रसच्युतः ॥ ३ ॥
तत्र वर्णानाम् अनर्थकत्वात् द्योतकत्वम् असम्भवीति आशङ्क्येदम् उच्यते -- शषौ सरेफसयोगो टकारश्वापि भूयसा । विरोधिनः स्युः शृङ्गारे तेन वर्णा रसच्युतः ॥ ३ ॥
(अनु०) उसमें वर्णों के अनर्थक होने के कारण द्योतकता असम्भव है यह शङ्का करके कहा जा रहा है— 'अधिक संख्या में 'ष' और 'ष्' 'रेफ' के अधिक संयog से युक्त वर्ण, टकार की अधिकता ये शृङ्गार में विरोधी होते हैं । अतएव वर्ण रस को प्रवाहित करने- वाले ही जब वीभत्स इत्यादि रस में निविष्ट किये जाते हैं तत्र उसको दीप्त करते ही हैं । अतः वर्ण रस के प्रकट करनेवाले होते हैं ॥ ४ ॥ दो श्लोकों के द्वारा अन्वय-व्यतिरेक से वर्णों की द्योतकता दिखाई गई है ।
तद् एवं तु निवेश्यन्ते वीभत्सादौ रसे यदा । तदा तें दीप्यन्त्येव तेन वर्णा रसच्युतः ॥ ४ ॥ श्लोकद्वयेनान्वय-व्यतिरेकाभ्यां वर्णानां द्योतकत्वं दर्शितं भवति ।
तद् एवं तु निवेश्यन्ते वीभत्सादौ रसे यदा । तदा तें दीप्यन्त्येव तेन वर्णा रसच्युतः ॥ ४ ॥
लोचन भूयसेति प्रत्येकममिसंबध्यते । तेन शकारो भूयसेत्यादि व्याख्याततव्यम् । रेफ- प्रधान संयog: केंहीदृं इत्यादि: । 'भूयसा' इसका अभिसम्बन्ध प्रत्येक के साथ होता है । इसलिये 'शकार अधिकता से' इत्यादि व्याख्यां को जाननी चाहिये । रेफप्रधान संयog-कें हैं द्रे इत्यादि ।
लोचन भूयसेति प्रत्येकममिसंबध्यते । तेन शकारो भूयसेत्यादि व्याख्याततव्यम् । रेफ- प्रधान संयog: केंहीदृं इत्यादि: ।
'भूयसा' इसका अभिसम्बन्ध प्रत्येक के साथ होता है । इसलिये 'शकार अधिकता से' इत्यादि व्याख्यां को जाननी चाहिये । रेफप्रधान संयog-कें हैं द्रे इत्यादि ।
तारावती अभिव्यक्तिं पद.के एक देश दो पद इत्यादि से भी होती है । 'पदादिषु' में सप्तमी निमित्त में है । अर्थात् वर्ण पद इत्यादि असंल्लक्ष्यक्रमव्यंग्य ध्वनि में निमित्त होते हैं । 'दीप्यते' का अर्थ हैं अवभासित होता है । अवभासित कहने का आशय यह है कि वर्ण इत्यादि एक देश में स्थित होकर नवीन वृत्तिच्छक्ति के साथ ध्वनि का प्रत्यायन कराते हुये समस्त काव्य को अवभासित कर देते हैं । इस प्रकार पहले जैसे पद की अवभासकता के द्वारा काव्य विशेष का समर्थन किया गया था उसी प्रकार यहाँ पर वर्ण इत्यादि की अवभासकता का समर्थन हो गया ॥ २ ॥
तारावती अभिव्यक्तिं पद.के एक देश दो पद इत्यादि से भी होती है । 'पदादिषु' में सप्तमी निमित्त में है । अर्थात् वर्ण पद इत्यादि असंल्लक्ष्यक्रमव्यंग्य ध्वनि में निमित्त होते हैं । 'दीप्यते' का अर्थ हैं अवभासित होता है । अवभासित कहने का आशय यह है कि वर्ण इत्यादि एक देश में स्थित होकर नवीन वृत्तिच्छक्ति के साथ ध्वनि का प्रत्यायन कराते हुये समस्त काव्य को अवभासित कर देते हैं । इस प्रकार पहले जैसे पद की अवभासकता के द्वारा काव्य विशेष का समर्थन किया गया था उसी प्रकार यहाँ पर वर्ण इत्यादि की अवभासकता का समर्थन हो गया ॥ २ ॥
अभिव्यक्ति पद के एक देश, दो पद इत्यादि से भी होती है । 'पदादिषु' में सप्तमी निमित्त में है । अर्थात् वर्ण, पद इत्यादि असंल्लक्ष्यक्रमव्यंग्य ध्वनि में निमित्त होते हैं । 'दीप्यते' का अर्थ है अवभासित होता है । अवभासित कहने का आशय यह है कि वर्ण इत्यादि एक देश में स्थित होकर नवीन वृत्तिच्छक्ति के साथ ध्वनि का प्रत्यायन कराते हुए समस्त काव्य को अवभासित कर देते हैं । इस प्रकार पहले जैसे पद की अवभासकता के द्वारा काव्य विशेष का समर्थन किया गया था उसी प्रकार यहाँ पर वर्ण इत्यादि की अवभासकता का समर्थन हो गया ॥ २ ॥
अब यहाँ पर यह शङ्का उत्पन्न होती है कि वर्ण तो सर्वथा निरर्थक होते हैं वे असंल्ललक्ष्यक्रमव्यंग्य के द्योतक किस प्रकार हो सकते हैं? इसका उत्तर निम्नलिखित दो कारिकाओं में दिया जा रहा है—
अब यहाँ पर यह शङ्का उत्पन्न होती है कि वर्ण तो सर्वथा निरर्थक होते हैं वे असंल्ललक्ष्यक्रमव्यंग्य के द्योतक किस प्रकार हो सकते हैं? इसका उत्तर निम्नलिखित दो कारिकाओं में दिया जा रहा है—
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विरोधिन इति । पुरुषवृत्तिविरोधिनी श्रृङ्गारस्य यतस्ते वर्णा भूयस्ता प्रयुज्यमानाः न रसांशच्योतनित स्वन्ति । यदि वा तेन श्रृङ्गारविरोधित्वेन हेतुना वर्णा रसादयो रसाच्छायाराच्चयन्ते तं ने व्यञ्जयन्तीति व्यतिरेक उक्तः । अन्वयमाह—त एव तमिति वीभत्सादिकं रसम् । दीपनिति घोेतयन्ति । कारिकाद्वयं तात्पर्येण व्याचष्टे—श्लोकद्वयेनैति । यथासङ्ख्यप्रसङ्गपरिहारार्थं श्लोकोकाभ्यामिति न कृतम् । पूर्वश्लोकेन हि व्यतिरेक उक्तो द्वितीयेनान्वयः । अस्मिन् विषये श्रृङ्गारलक्षणे रसादिप्रयोगः सुकवित्वमभिवाञ्छता न कर्तव्य इत्येवं फलत्वादुपदेशस्य कारिकारणं पूर्वं व्यतिरेक उक्तः। न च सर्वथा न कर्तव्योदपि तु वस्मादौ कर्तव्य एवेति पश्चादन्वयः । वृत्तिकारेण स्वन्वयपूर्वको व्यतिरेक इति शैलीमनुसतुंमन्वयः पूर्वमुपात्तः ।
'विरोधिन्' इति । पुरुषा वृत्ति श्रृङ्गार की विरोधिनी है । क्योंकिं वे वर्ण अधिकता से प्रयोग किये हुये रस को स्ववित नहीं करते । अथवा श्रृङ्गारविरोधित्व हेतु से ये वर्ण रसादयः श्रृङ्गार से च्युत हो जाते हैं अर्थात् उसको ठयक्त नहीं करते । यह व्यतिरेक कहा गया है । अन्वय कहते हैं—'ते ही तो' यह । 'घ' चोतित करते हैं अर्थात् दीप्त करते हैं। दो कारिकाओं की तात्पर्य के द्वारा व्याख्या करते हैं—'दो श्लोकों के द्वारा' यह । यथासङ्ख्या के प्रसङ्ग के परिहार के लिये 'श्लोकोकाभ्याम्' यह नहीं लिखा । पूर्वश्लोक से व्यतिरेक कहा द्वितीय से अन्वय । श्रृङ्गार लक्षण इस विषय में ष ष इत्यादि प्रयोग सुकवित्व की इच्छा करनेवाले के द्वारा नहीं किया जाना चाहिये । उपदेश के इसी फल के कारण कारिकार ने पह्हले व्यतिरेक कहा । वह सर्वथा नहीं किया जाना चाहिये यह नहहा वीभत्स इत्यादि में किया ही जाना चाहिये यह वाद में अन्वय ( कहा गया है ) । वृत्तिकार ने अन्वयपूर्वक व्यतिरेक इस शैली का अनुसरण करने के लिये पह्हले अन्वय का उपादान किया गया ।
तारावती
अधिक संख्य में ष और ष का प्रयोग, रेफ के संयोग से युक्त वर्ण, टकार ये श्रृङ्गार रस में विरोधी होते हैं । अनएव वर्ण रस को प्रवाहित करनेवाले होते हैं ॥ ३ ॥
वे ही जब वीभत्स इत्यादि रस में निवेश्ट किये जाते हैं तब उसको दीप्त ही करते हैं । अतएव वर्ण रस को प्रवाहित करनेवाले होते हैं ॥ ४ ॥
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सिद्ध की गईं है। 'भूयसा' ( अधिकता से ) इस शब्द कम अन्वय प्रत्येक के साथ हो जाता है। अथांत् अधिकता से श का प्रयोग, अधिकता से ष का प्रयोग इत्यादि वर्ण शृंगार रस को प्रवाहित करनेवाले नहीं होते। यही व्याख्या करनी चाहिये। (दीधितिकार ने 'सरेफसंयोगौ' यह पाठ मान कर र के संयोग के साथ श और ष शृंगाररसोपघातक होते हैं यह अर्थ किया है। किन्तु यह अर्थ ठीक नहीं हैं। क्योंकि रेफ का बहुलता से किसी वर्ण के साथ संयोग शृंगार का उपघातक होता ही है।) 'सरेफसंयोग' का अर्थ है रेफप्रधान संयोग जैसे क हैं द्र इत्यादि। ये वर्ण शृंगार रस के विरोधी हैं कहने का आशय यही है कि परुषा वृत्ति शृंगाररस की विरोधिनी होती है। (भट्टोद्ट्ट ने परुषा वृत्ति की परिभाषा ही यह की है कि 'श और ष, रेफ संयोग तथा ट वर्ग से संयुक्त हुई वृत्ति को परुषावृत्ति कहते हैं।') कारिका में रसच्युत शब्द का प्रयोग किया गया है। इसकी व्याख्या दो प्रकार से की जा सकती हैं—( १ ) रस को च्युत या स्वांवित करनेवाले। क्योंकि बाहुल्य से श इत्यादि का प्रयोग शृंगार रस को स्ववित नहीं करता अतः सिद्ध होता है कि वर्ण रस को प्रवाहित करनेवाले होते हैं। अथवा ( २ ) उस शृंगारविरोधी हेतु से ष इत्यादि वर्ण शृंगार रस से च्युत हो जाते हैं अर्थात् उसे अभिव्यक्त नहीं करते इससे सिद्ध होता है कि वर्ण रस के अभिव्यंजन में निमित्त होते हैं। तीसरी कारिका में व्यतिरेक के द्वारा साध्य सिद्ध की गई है। व्यतिरेकी हेतु का स्वरूप यह होगा—'जहाँ पर रस के अविरोधी वर्णों का अभाव होता है ( ओर विरोधी वर्णों की सत्ता होती है ) वहाँ पर रस का भी अभाव होता है। जैसे शृंगार रस के विरोधी श इत्यादि के बहुल प्रयोग से रस च्युत या छटित नहीं होता अथवा वह काव्य रस से च्युत हो जाता है। इससे सिद्ध होता है कि वर्ण रस के व्यञ्जक होते हैं। इस प्रकार तीसरी कारिका में व्यतिरेकी हेतु दिखलाकर चौथी कारिका में अन्वय दिखलाया जा रहा है—अन्वयव्याप्ति का रूप यह है—जहाँ रस के अविरोधी वर्ण होते हैं वहाँ रस च्युत या छटित होता है। जैसे वीभत्स इत्यादि कठोर रसों के अविरोधी वर्ण वही श इत्यादि जहाँ वाहुल्य के साथ आते हैं वहाँ वीभत्स इत्यादि रस अभिव्यक्त होता है। इससे सिद्ध होता है कि वर्ण रस के व्यञ्जक होते हैं। 'वे ही वर्ण' अर्थात् 'श' इत्यादि। 'उसको' अर्थात् वीभत्स इत्यादि को। 'दीप्त करते हैं' अर्थात् च्योतित करते हैं।
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एतदुक्तं भवति-यद्यपि विभावानुभावव्यभिचारिप्रतीतिसम्पदेव रसास्वादे निवन्धनम् । तथापि विशिष्टश्रुतिकशब्दसामर्थ्यमाणास्ते विभावादयस्तथा भवन्तीति स्वसंवित्सिद्धमदः । तेन वर्णानामपि श्रुतिसमयोपलक्ष्यमाणार्थानुपेक्ष्यापि श्रोत्रैकग्राह्यो मृदुपुरुषात्मा स्वसावो रसास्वादे सहकार्येव । अत एव च सहकारितामेवासौ मिधातुं निमित्तसक्षमो कृतो वर्णप्रपदादिद्विति । न तु वर्णैरेक रसाभिव्यक्ति:, विमावादिसंयोगादि रसनिष्पत्तिरियुक्तं बहुश: । श्रोत्रग्राह्योदपि च स्वभावो रसनिष्पत्तौ व्यापार्यत एव, अपदगीतध्वनिवत् पुष्टकरवाद्यानियमितविशिष्टजातिकरणग्राणानुकरणशब्दवच ।
यह बात कही हुयी है—यद्यपि विभाव अनुभव और व्यभिचारी भाव की प्रतीति की सम्पत्ति ही रसास्वादन में हेतु है । तथापि यह तो स्वसंवेदनासिद्ध है कि विशिष्ट श्रुतिवाले शब्दों से समर्थित किये जाते हुये वे विभाव इत्यादि वैैसे होते हैं । इससे वर्णों का भी सुनने के समय में उपलब्ध किये जाते हुये अर्थ की विना ही अपेक्षा किये हुये भी केवल श्रोत्र से ही ग्रहण करने योग्य मृदुपुरुष इत्यादि आत्मावाला स्वभाव रसास्वाद में सहकारी हो होता है । और इसीलिये सहकारिता को कहने के लिये ‘वर्ण पद इत्यादि में’ इसमें निमित्त सत्तमी की गयी है । वर्णों से ही रसाभिव्यक्ति नहीं होती, विभाव इत्यादि के संयोग से ही रस की निष्पत्ति होती है यह बहुत बार कहा जा चुका है । केवल श्रोत्र के द्वारा ग्राह्य भी स्वभाव रसास्वादन को व्याप्त कर ही लेता है जैसे अपद गीतध्वनि और पुष्कर वाद्य से नियमित विशिष्ट जाति करण ग्राण इत्यादि के अनुकरण शब्द ।
तारावती
तारावती इसका कारण यह है कि यदि ‘दो श्लोकों से अन्वय-व्यतिरेक के द्वारा’ यह लिखा होता तो इसका अर्थ यह हो सकता था कि प्रथम श्लोक में अन्वय दिखलाया गया है और दूसरे श्लोक में व्यतिरेक । इसीलिये ‘श्लोकद्वय’ शब्द का प्रयोग किया गया है जिससे उक्त दोष नहीं आता । वास्तविकता इससे विपरीत है । वस्तुत: पहली कारिका में व्यतिरेक बतलाया गया है और दूसरी में अन्वय । परम्परानुसार पहले अन्वय दिखला कर ही व्यतिरेक दिखलाया जाना चाहिये । किन्तु कारकार ने यह परिवर्तन इसलिये कर दिया है कि कारिका लिखने का प्रयोजन यह उपदेश देना है कि यदि सुकवि बनने की इच्छा हो तो इस श्रृंगार रस के क्षेत्र में श ष इत्यादि का प्रयोग नहीं करना चाहिये । यही उपदेश देने के लिये कारिकार ने पहले व्यतिरेक बतलाया है । फिर अन्वय यह दिखलाने के लिये बतलाया है कि इस कथन का आशय यह नहीं है कि श ष इत्यादि का प्रयोग कहीं करना
इसका कारण यह है कि यदि ‘दो श्लोकों से अन्वय-व्यतिरेक के द्वारा’ यह लिखा होता तो इसका अर्थ यह हो सकता था कि प्रथम श्लोक में अन्वय दिखलाया गया है और दूसरे श्लोक में व्यतिरेक । इसीलिये ‘श्लोकद्वय’ शब्द का प्रयोग किया गया है जिससे उक्त दोष नहीं आता । वास्तविकता इससे विपरीत है । वस्तुत: पहली कारिका में व्यतिरेक बतलाया गया है और दूसरी में अन्वय । परम्परानुसार पहले अन्वय दिखला कर ही व्यतिरेक दिखलाया जाना चाहिये । किन्तु कारकार ने यह परिवर्तन इसलिये कर दिया है कि कारिका लिखने का प्रयोजन यह उपदेश देना है कि यदि सुकवि बनने की इच्छा हो तो इस श्रृंगार रस के क्षेत्र में श ष इत्यादि का प्रयोग नहीं करना चाहिये । यही उपदेश देने के लिये कारिकार ने पहले व्यतिरेक बतलाया है । फिर अन्वय यह दिखलाने के लिये बतलाया है कि इस कथन का आशय यह नहीं है कि श ष इत्यादि का प्रयोग कहीं करना
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ही नहीं चाहिये । अपितु वीभत्स इत्यादि में इन वर्णों का प्रयोग करना ही चाहिये । वृत्तिकार ने स्वाभाविक शैली का अनुसरण करने के लिये पहले अन्वय शब्द का प्रयोग किया और वाद में व्यतिरेक का ।
यहाँ पर कहने का आशय यह है कि रसास्वादन में विभाव अनुभाव और व्यभिचारी भाव की प्रतीति ही कारण होती है तथापि यह स्वसंवेदन सिद्ध ही है कि विशेष प्रकार की श्रुतिवाले शब्दों से जब विभाव इत्यादि का समर्थन होता है तब वे काव्य-रस के विशेष रूप से पोषक होते हैं। यही कारण है कि जब वर्ण श्रवण-गोचर होते हैं उस समय वर्ण तो उपलब्ध हो जाते हैं किन्तु उनका अर्थ शीघ्र ज्ञात नहीं होता । उस समय जिन कोमल या कठोर वर्णों का कानों से प्रत्यक्ष किया जाता है वे बिना ही अर्थ की अपेक्षा किये हुये रसास्वादन के सहकारी हो जाते हैं । अर्थात् यह ज्ञात हो जाता है कि अमुक स्थान पर अमुक रस है । इसी सहकारिता के अर्थ को पकट करने के लिये कारिका में तिरिमित्त संज्ञा का प्रयोग किया गया है—'वर्णपदादिशु' । आशय यह है कि वर्णों से रस-निष्पत्ति नहीं होती, वर्ण तो रस-निष्पत्ति में निमित्त मात्र होते हैं । रस निष्पत्ति के लिये विभावादि संयोग की अपेक्षा होती है यह कई बार बतलाया जा चुका है । किन्तु वर्णों का कोमल या कठोर रूप से अपना भी एक स्वभाव होता है जिसका ग्रहण केवल श्रोत्र से ही होता है। वह स्वभाव भी रस के अभिव्यञ्जन को व्याप्त कर लेता है ।
जिस प्रकार ऐसे गाने को सुनकर जिसमें पद विद्धमान न हो अथवा ढोल इत्यादि वाद्यों के लिये नियोजित विशिष्ट प्रकार के जाति और करण ग्रहण इत्यादि के अनुकरण को सुनकर यह प्रतोत हो जाता है कि अमुक गान अमुक रस सम्वन्धी ही है उसी प्रकार अन्यारों के माध्यम इत्यादि के आधार पर बिना ही अर्थ जाने इतना मालूम पड़ जाता है कि अमुक पद्य अमुक रस प्रवण है । अतएव वर्णों की अभिव्यञ्जकता सर्वथा अक्षुण्ण है ।
[ ऊपर वर्णों की रसाभिव्यञ्जकता सिद्ध करने के लिये संगीत शास्त्र के कुछ उदाहरण दिये गये हैं । यहाँ पर अनुमान की प्रक्रिया इस प्रकार होगी—वर्ण, रस के अभिव्यञ्जक होते हैं, क्योंकि अर्थ इत्यादि इतर तत्व की बिना ही अपेक्षा किये हुये रस-प्रत्यायन करा देते हैं, जैसे अपदगीत ध्वनि या पुष्कर वाद्य नियन्त्रित जाति करण ग्रहण इत्यादि के अनुकरण शब्द । व्याप्ति यह होगी—जो तत्व अर्थ इत्यादि इतर तत्व को बिना ही अपेक्षा किये हुये रसप्रत्यायन करा देते हैं वे रस के अभिव्यञ्जक होते हैं । अपदगीत ध्वनि इत्यादि तत्व अर्थ इत्यादि इतर तत्व की बिना ही अपेक्षा किये हुये रसप्रत्यायन करा देते हैं अतः वे रस के अभिव्यञ्जक होते हैं।
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माने जाते हैं, इसी प्रकार वर्ण भी अर्थ इत्यादि इतर तत्त्वों की विन किये रस का प्रत्यायन करा देते हैं अतः वे भी रसाभिव्यङ्गक होते हैं । संगीत शास्त्र की रचना स्वरो के आधार पर हुई है । स्वर के यह है :- श्रुत्यन्तरभावी यः सिन्धोघटुरणनात्मकः । स्वतो रञ्जयति श्रोत्रद्वृत्तिं स स्वर उच्यते ॥
अर्थात् ‘श्रुति के बाद उत्पन्न होनेवाली अनुरणनात्मक जो सिन्धु घ है और जो बिना किसी अपेक्षा के स्वतः सुननेवाले के चित्त को देते है उसे स्वर कहते हैं । इससे स्पष्ट है कि स्वरों का निर्माण श्रुतियों से होता है । श्रुति यह दी हुई है :- प्रथमश्रवणाच्छन्दः श्रूयते ह्रस्वमात्रकः । सा श्रुतिः सम्परिज्ञेया स्वरावयवलक्षणा ॥
'जब हम पहले किसी शब्द को सुनते हैं तब वह केशल ह्रस्व ही है । इस श्रुतिगोचर होनेवाली ध्वनि को श्रुति कहते हैं, इसका लक्षण अवयव होना ।' एक दूसरे ग्रन्थ में श्रुति का यह लक्षण दिया हुआ है कि नित्यं गीतोपयोगित्वमभिज्ञेयत्नमप्युत । लक्षणे प्रोक्तं सम्प्रायेणं संगीतश्रुतिलक्षणम् ॥ 'जो संगीत के लिये नित्य उपयोगी हो और जो प्रतीतिगोचर हि योग्य हो तथा जिसका निरूपण पर्याप्त रूप में लक्षण की दृष्टि से किया संगीत-श्रुति का लक्षण है ।'
ऊपर की परिभाषाओं से स्पष्ट है कि प्रथम श्रुतिगोचर होनेवाले संगीत में श्रुति कहते हैं । इन श्रुतियों के विभिन्न प्रकार के संयोग से हैं । श्रुतियाँ तो साधारण ध्वनियाँ हैं, किन्तु जब उनकी अनुरणनात्मक रुप ) आवृत्ति इस रूप में की जाती है कि उनमें सिन्गधता उत्पन्न हो ज श्रुति को अनुरञ्जित करने की शक्ति आ जाती है तथा उसे स्वर कहने 'स्व' का अर्थ है स्वपद और 'र' का अर्थ है अनुरञ्जन करना । अर्थात् का विभिन्न प्रकार का संयोग अनुरञ्जन योग्य वन जाता है तब उसे हैं । विभिन्न स्वरों के लिये श्रुतियों की विभिन्न संख्या भी नियत प्रकार है :- षड्जमध्यमपञ्चमाः ।
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द्वे द्वे निषादगान्धारौ त्रिस्री ऋषभधैवतौ ।
'षड्ज मध्यम और पञ्चम में चार-चार श्रुतियाँ होती हैं, निषाद और गान्धार में दो-दो तथा ऋषभ और धैवत में तीन-तीन श्रुतियाँ होती हैं ।' षड्ज और पञ्चम को छोड़कर अन्य स्वर दो-दो प्रकार के होते हैं । मृदुता ( कोमल ) और विकृत (वैक्रता) । इसी दृष्टि से लोचनकार ने लिखा है कि वर्णों का भी कोमल कठोरात्मक एक विशेष प्रकार का स्वभाव होता है जो अर्थ की अपेक्षा नहीं करता तथा उसको श्रुति समय के द्वारा लक्षित किया जा सकता है ।
These are the characteristics of the notes in the octave.
यथा कुड्येषु: सर्वेडप्यकाभूता वसन्त हि । तथा स्वराणां सन्दोहो ग्राम इत्यभिधीयते ।।
जैसे अनेक कुड्यभिधयों के मिलकर रहने को ग्राम कहते हैं उसी प्रकार स्वर-सप्तस्वरासत्रयो ग्रामाम मूर्छनाश्रैकविन्यति ।
This verse explains the concept of a 'grāma' in music.
एक स्वर से आरम्भ करके क्रमशः सातवें स्वर तक आरोह करने के पश्चात् उसी मार्ग से अवरोह करने को मूर्छना कहते हैं । हर एक ग्राम में हर एक स्वर से प्रारम्भ करने पर एक ग्राम में सात मूर्छनाये सम्पन्न हो जाती हैं । तीन ग्रामों के आधार पर इन मूर्छनाओं की संख्या २१ मानी जाती है । वादी और संवादी में विभिन्नता होने पर भी एक ही मूर्छना से उत्पन्न रागों में कई लक्षण एक ही प्रकार के होते हैं । उन लक्षणों में न्यासरूप में ग्रहण करनेवाली जाति की उत्पत्ति हो सकती है । जिस जाति में षड्जन्यास स्वर होता है उसका नाम षाड्जी है । इसी प्रकार आर्षभी गान्धारी इत्यादि जातियाँ बन जाती हैं ।
This explains the concept of mūrcchanā in Indian classical music.
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गया है। जब इनका नियमन वाच्यों के द्वारा होता है तब पद और अर्थ न होते हुये भी रसाभिव्यक्ति हो जाती है।
संगीतज्ञों में आज भरत का जाति-ज्ञान प्रचलित नहीं है किन्तु इसमें सन्देह नहीं कि उसकी मूर्ध्ना पद्धति ने भारतीय संगीत को निश्रयात्मक रूप से प्रभावित किया होगा। भरत वर्णित श्रुति स्वर ग्राम और मूर्ध्ना से जातियों का निकट का सम्बन्ध है। भरत ने १८ जातियों का विवेचन तो किया है किन्तु नाट्यशास्त्र में जाति का स्वरूप तथा उसकी व्युत्पत्तिमूलक व्याख्या कहीं नहीं दी गई है। मत्तकृ्त वृहद्देशीय में जाति शब्द की तीन प्रकार की व्युत्पत्तिमूलक व्याख्या दो हुई है। (१) श्रुति और ग्राह्यादि के समूह से जो जन्म पाती है वह जाति है। (२) सब रागों के जन्म का जो हेतु है उसे जाति कहते हैं। (३) रस की प्रतीति या जन्म जिसके द्वारा होता है उसे जाति कहते हैं। मूर्ध्ना और जाति में अन्तर यह है कि मूर्ध्ना स्वरसंच का ढाँचा मात्र होती हैं किन्तु जाति से राग तथा रस की निष्पत्ति होती है। इस प्रकार यह स्पष्ट है कि बिना ही पद पदार्थों की प्रतीति के जाति रसनिष्पत्ति में कारण होती है।
जिस प्रकार वाचिक अभिनय में संगीत का उपयोग होता है उसी प्रकार आंगिक अभिनय में करण और अंगहार का प्रयोग किया जाता है। विभिन्न रसों के अनुकूल अङ्गों की स्थापना करण कहलाती है। इन्हीं करणों से अंगहार बनते हैं। इनमें पदसंच्चार हस्तसंच्चार इत्यादि पर विचार किया जाता है। इस प्रकार नेत्र-सञ्चालन भू-सञ्चालन कर-व्यवस्था पाद-व्यवस्था इत्यादि से भावाभिनय किया ही जाता है। वहाँ शब्द न होते हुये भी भावानुभूति हो जाती है। इसी प्रकार पद-पदार्थों के अवगमन के अभाव में भी भावानुभूति हो सकती है। यहाँ पर ग्राण का अर्थ अधिक स्पष्ट नहीं किया है वहाँ ग्राण के अभिनय का विवेचन नहीं किया। सम्भवतः: लोचनकार ने ग्राण शब्द से यहाँ पर नासाकर्म की ओर सङ्केत किया होगा। भरतमुनि ने अष्टम अध्याय में नासिका का ६ प्रकार का विनियोग बतलाया है तथा विस्तारपूर्वक इस बात का प्रतिपादन किया है कि निर्वेद औत्सुक्य चिन्ता इत्यादि विभिन्न भावों के अभिनय में नासिका की किस प्रकार की स्थिति होनी चाहिए। यहाँ पर सारांश यही है कि बिना शब्द और अर्थ के भी रसाभिव्यक्ति हो सकती है। अतः वर्णों को रसाभिव्यञ्जक मानने में तो अनुपपत्ति होनी ही नहीं चाहिए। कहीं कहीं ग्राण शब्द के स्थान पर ‘प्रभाव’ यह पाठ पाया जाता है-‘करणप्रभावाग्रनुहारशब्दवत्’। यह पाठ कुछ अधिक संगत प्रतीत होता है क्योंकि इसमें करणों के प्रभावाभिनय का स्पष्ट उल्लेख किया गया है।
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पदे चालद्यकमस्य चोतनं यथा-- उत्कम्पिनी भयपरिस्खालितांशुकान्त्ता ते लोचने प्रतिदिशं विधुरे चिपन्ती । कृ रण दारुणतया सहसा दूश्यो धूसान्निधितेन दहनेन न वोक्षितासि ॥
(अनु०) पद में अलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य का चोतन जैसे-- 'काँपननेवाली तथा भय के कारण स्वलित वस्त्र के छोरवाली और उन विधुर नेत्रों को प्रत्येक दिशा में दौड़ानेवाली ( वह वासरदत्ता ) कूर तथा धुयें के कारण अन्धी अग्नि के द्वारा देखी नहीं गई अपितु अपनी दारुणता के कारण सहसा जला डाली गई ।'
लोचन पदे चेति । पदे च सतोत्यर्थः । तेन च रसप्रतीतिविंभावादेरेव । ते विभावादयो यदा विशिष्टेन केनापि पदेनाऽऽख्यायं मानाः रसचमत्कारविधायिनो भवन्ति तदा पदसैयैवासौ महिमा सम्प्रयंत इति भावः । 'और पद में' अर्थात पद के होने पर । इससे रसप्रतीति विभाव इत्यादि से ही होती है । भाव यह है कि वे विभाव इत्यादि जब किन्हीं विशिष्ट पदों से अर्पण किये जाते हुये रसचमत्कार-विधायक होते हैं तनु पद की ही यह महिमा समर्पित की जाती है । तारावती विमिन्न वर्णों की रसाभिव्यञ्जकता पर रसगंगाधर तथा वक्रोक्तिजीवित इत्यादि ग्रन्थों में विस्तार प्रकाश डाला गया है । वहीं देखना चाहिए । ] पद में भी अलक्ष्यक्रम व्यंग्य का चोतन होता है । यहाँ पर 'पद में' यह सप्तमी विभक्ति भावलक्षणा सति सप्तमी है । इसका अर्थ होता है 'पद के होने पर' । इससे यह सिद्ध होता है कि रस की प्रतीति विभाव इत्यादि से ही होती है । वे विभाव इत्यादि जब किसी विशिष्ट पद के द्वारा समर्पित किये जाते हैं और इस प्रकार रस के चमत्कारविधायक बन जाते हैं तनु रस की चमत्कृ्ति का श्रेय उस पद को ही दिया जाता है और पद की ही यह महिमा मानी जाती है । अब पद के द्वारा असंलक्ष्यक्रम व्यंग्य के चोतन का उदाहरण लीजिये--
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अत्र हेतिः । वासवदत्तादाहाकारगणप्रबुद्धशोकनिर्भररस्य वत्सराजस्येदं परिदेवितवचनम् । तत्र च शोको नामेष्टजनविनाशप्रभव इति तस्म जने सये भ्रूवेपकटाक्षप्रभृतयः पूर्वं रतिभिमावतामवलम्बन्ते स्म त एवात्यान्तविनष्टाः सन्त इदानीं स्मृतिगोचरतया निरपेक्षमात्रस्वप्रागं करुणरसोदयमनुत्तम् स्थिततम् । तेन लोचनं हेतिः । तच्च्छब्ददस्तल्लोचनगतस्वसंवेद्याव्यपदेश्ययानन्तगुणगणानुस्मरणाकारद्योतको रसस्यासाधारणनिमित्ततां प्राप्तः । तेन हृदयेन चिच्छेदिनः परिहृतं च तन्निमित्तमेव । तथा हि चोद्यम्—प्रकान्तपरामर्शकस्य तच्छब्ददस्य कथं सिय्यति सामर्थ्यमिति । उत्तरं च—रसाविष्टोदत्र परामृष्टेति तदुभयमनुसस्थानोपहतम् । यत्न ध्यानूद्दिश्यमानधर्मान्तररसाहित्ययोग्यधर्मंयोगित्वं वस्तुनो यच्छब्देनामिधाय तद्वद्विस्थधर्मान्तररसाहित्यं तच्छब्देन निर्वोच्यते—
अत्र हेतिः । वासवदत्तादाहाकारगणप्रबुद्धशोकनिर्भररस्य वत्सराजस्येदं परिदेवितवचनम् । तत्र च शोको नामेष्टजनविनाशप्रभव इति तस्म जने सये भ्रूवेपकटाक्षप्रभृतयः पूर्वं रतिभिमावतामवलम्बन्ते स्म त एवात्यान्तविनष्टाः सन्त इदानीं स्मृतिगोचरतया निरपेक्षमात्रस्वप्रागं करुणरसोदयमनुत्तम् स्थिततम् । तेन लोचनं हेतिः । तच्च्छब्ददस्तल्लोचनगतस्वसंवेद्याव्यपदेश्ययानन्तगुणगणानुस्मरणाकारद्योतको रसस्यासाधारणनिमित्ततां प्राप्तः । तेन हृदयेन चिच्छेदिनः परिहृतं च तन्निमित्तमेव । तथा हि चोद्यम्—प्रकान्तपरामर्शकस्य तच्छब्ददस्य कथं सिय्यति सामर्थ्यमिति । उत्तरं च—रसाविष्टोदत्र परामृष्टेति तदुभयमनुसस्थानोपहतम् । यत्न ध्यानूद्दिश्यमानधर्मान्तररसाहित्ययोग्यधर्मंयोगित्वं वस्तुनो यच्छब्देनामिधाय तद्वद्विस्थधर्मान्तररसाहित्यं तच्छब्देन निर्वोच्यते—
'यहाँ निःसंदेह' यह । वासवदत्ता के दहन के सुनने से प्रबुद्ध शोक से भरे हुये वत्सराज का यह विलाप-वचन है । वहाँ शोक इष्टजन विनाश से उत्पन्न हुआ है इसलिये उस व्यक्ति के जो भ्रूवैषम्य कटाक्ष इत्यादि पहले रतिभाव को विभावता का अवलम्बन लेते थे वे ही अत्यन्त विनष्ट होते हुये इस समय स्मृतिगोचर होने के कारण निरपेक्षमात्रस्वप्रागं करुण रस को उद्दीप्त करते हैं जिसका प्राण है निरपेक्षभाव, यह स्थिति है । 'वे लोचन' में 'वे' शब्द उन लोचनों में विद्यमान स्वसंवेद्य तथा अवर्णनीय अनन्त गुण गणों के स्मरणाकार के द्योतक होकर रस की असाधारण निमित्तत्ता को प्राप्त हुआ है । इससे जो किसी ने प्रश्न किया और उत्तर दिया वह मिथ्या ही है । उत्तर—यहाँ पर दर्शक रसाविष्ट है । ये दोनों ( प्रश्न और उत्तर ) अनुत्थान से ही उपहत हैं । जहाँ वस्तु की वाद में उद्दिष्ट किये जानेवाले दूसरे धर्म के साहित्य के योग्य धर्म की संयुक्तता 'यत्' शब्द के द्वारा कहकर उस बुद्धिस्थ दूसरे धर्म के साहित्य को तत् शब्द के द्वारा कहा जाता है ।
तारावती
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महाराज उदयन बिकार खेलने गये थे। मन्त्रियों ने राजनीति को आवश्यकता के अनुसार वासवदत्ता को छिपा दिया और लावाणक नगर में आग लगा दी तथा महाराज के लौटने पर उन्हें यह समाचार दे दिया कि वासवदत्ता जलकर मर गई है । यह सुनकर महाराज उदयन विलाप करते हुये कह रहे हैं—
"जिस समय तुम्हें आग ने जलाया उस समय तुम काँप रही होगी, तुम्हारा अक्ल भय के कारण नीचे सरक गया होगा ( अस्त-व्यस्त हो गया होगा ) तुम्हारे वे तेङ व्याकुल हो गये होंगे और उनको तुम चारों ओर ( सहायता के लिये या मेरे दर्शान के लिये ) दौड़ा रही होगी । आग अत्यन्त क्रूर थी । उसने अपनी
"जिस समय तुम्हें आग ने जलाया उस समय तुम काँप रही होगी, तुम्हारा अक्ल भय के कारण नीचे सरक गया होगा ( अस्त-व्यस्त हो गया होगा ) तुम्हारे वे तेङ व्याकुल हो गये होंगे और उनको तुम चारों ओर ( सहायता के लिये या मेरे दर्शान के लिये ) दौड़ा रही होगी । आग अत्यन्त क्रूर थी । उसने अपनी
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यत्रोच्यते—‘यत्नदोनित्यसम्बन्धध्व’मिति; तत्र पूर्वं क्रान्तपरामर्शकत्वं तच्छब्दस्य । यत्न पुनर्निमित्तोपनतस्मरणविशेषाकारस्ृचकत्वं तच्च्छब्दस्य ‘स वट’ इत्यादौ यथा तत्र का परामर्शकत्वकथेयास्तामलोकपरामर्शकै: पण्डिततन्मन्यै: सह विवादेन ।
लोचन—‘यत्नदोनित्यसम्बन्धध्व’मिति; तत्र पूर्वं क्रान्तपरामर्शकत्वं तच्छब्दस्य । यत्न पुनर्निमित्तोपनतस्मरणविशेषाकारस्ृचकत्वं तच्च्छब्दस्य ‘स वट’ इत्यादौ यथा तत्र का परामर्शकत्वकथेयास्तामलोकपरामर्शकै: पण्डिततन्मन्यै: सह विवादेन ।
जहाँ कहा जाता है—'यत्न और तत् की नित्य सम्वन्धता होती है' वहाँ पर तन्न शब्द का पूर्वप्रकान्त परामर्शकत्व हुआ करता है । जहाँ पर तो तन्न शब्द का निमित्त से आये हुये आकार-विशेष का सूचकत्व होता है जैसे 'यह घड़ा' इत्यादि में वहाँ परामर्शकत्व की बात ही क्या ? बस, असत्य परामर्श देनेवाले अपने को पण्डित समझनेवाले लोगों से अधिक विवाद की आवश्यकता नहीं ।
दारुणता के साथ तुम्हें जलाया डाला वह नि:सन्देह धुयें के कारण अन्धी होगई थी जिससे उसने तुम्हें देख नहीं पाया । ( नहीं तो तुम्हारे सौन्दर्य पर रीझ कर वह तुम्हें कदापि न जलाती । )
दारुणता के साथ तुम्हें जलाया डाला वह नि:सन्देह धुयें के कारण अन्धी होगई थी जिससे उसने तुम्हें देख नहीं पाया । ( नहीं तो तुम्हारे सौन्दर्य पर रीझ कर वह तुम्हें कदापि न जलाती । )
वासवदत्ता के दाह को सुनकर वत्सराज का शोक एकदम जागृत हो गया है और उनका हृदय उस शोक से भरा हुआ है । उस समय विलाप करते हुये वे ये शब्द कह रहे हैं । उसमें शोक इष्टजन ( वासवदत्ता ) के विनाश से उत्पन्न हुआ है । अतएव उस वासवदत्ता के जो भ्रूक्षेप कटाक्ष इत्यादि पहले सम्भोग-शृङ्गार की विभावरूपता ( उद्दीपनरूपता ) को धारण करते थे वे ही अब अत्यन्त विनष्ट होगये हैं और इस समय पर स्मृतिगोचर होने के कारण उस करुण रस का उद्दीपन कर रहे हैं जिस कारण रस का प्राण है निरपेक्षभावत्व अर्थात् अनुभूत वस्तु की प्राप्ति की आशा न रहना। यहाँ पर स्थित हैं ।
यहाँ पर ‘वे लोचन’ जिनकी रमणीयता केवेल स्वसंवेदन सिद्ध ही हो सकती है उनका वर्णन नहीं किया जा सकता। इस प्रकार ‘वे’ शब्द रसका असाधारण निमित्त बन गया है ।
यहाँ पर ‘वे लोचन’ जिनकी रमणीयता केवेल स्वसंवेदन सिद्ध ही हो सकती है उनका वर्णन नहीं किया जा सकता। इस प्रकार ‘वे’ शब्द रसका असाधारण निमित्त बन गया है ।
यहाँ पर ‘वे लोचन’ में ‘वे’ शब्द लोचनगत गुणगणों के स्मरण स्वरूप का अभिव्यञ्जक है। यहाँ पर किसी ने जो प्रश्नोत्तर लिखे हैं वे मिथ्या ही हैं । प्रश्न इस प्रकार है—( प्रश्न ) ‘वह’ सर्वनाम अथवा सकृतवाचक विशेषण प्रसिद्धि का परामर्श होता है । उसमें इतनी शक्ति कहाँ से आ गयी कि वह इतने बड़े अर्थ को प्रकट कर सके ? इस प्रश्न का उत्तर यह दिया है ( उत्तर ) यहाँ पर ‘वे लोचन’ में ‘वे’ इसे सकृतवाचक विशेषण का प्रयोग वक्ता ने लोचन के गुणगणों को अपनी बुद्धि में रखकर रसावेश के साथ किया है और श्रोता को भी उसकी प्रतिपत्ति उसी रूप में होती है । अतएव यहाँ पर प्रसिद्धि का परामर्श साधारण रूप में नहीं होता अपितु रसावेश के साथ होता है ।
ये दोनों प्रश्नोत्तर असङ्गत हैं । कारण
ये दोनों प्रश्नोत्तर असङ्गत हैं । कारण
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उत्कम्पिनोत्यादिना तदीयभयानुभावोत्रेक्षणम् । मयानिर्वाहितप्रतीकारमिति शोकावेशस्य विभावः । ते इति सातिशयविवृमैकायतनतरूपे अपि लोचने विधुरे कान्ति-
उत्कम्पिनः-आदिना तदीय-भय-अनुभावः-त्रेक्षणम् । मया-निर्वाहित-प्रतीकारम् इति शोक-आवेशस्य विभावः । ते इति सातिशय-विवृत-मैकायतन-तरूपे अपि लोचने विधुरे कान्ति-
'मेरे द्वारा जिसके प्रतीकार का निर्वाह नहीं किया जा सका' यह शोकावेग का विभाव है । 'वे' अर्थात सातिशय विलास का जो एकमात्र आयतन है इस प्रकार के रुपवाले भी विधुर नेत्रों को भयातिरेक से बिना ही लक्ष्य के इधर-उधर डालती हुईं कि 'कौन रक्षक है?' 'कहाँ आर्यपुत्र हैं' उन नेत्रों की वैंसी अवस्था नितान्त रुप में शोक का उद्दीपन है । 'कुरू के द्वारा' । उसका यह स्वभाव हो है । क्या किया जावे ? तथापि भूमि से अन्धा किया हुआ, देखने में असमर्थ, विवेकशील के इस प्रकार के अनुचितकारित्व की सम्भावना नहीं की जा सकती । इस प्रकार स्मरण किया हुआ उसका सौन्दर्य इस समय पर शोकावेश की सातिशयविभावता को प्राप्त हुआ है । 'वे' इस शब्द के होने पर यह सारा अर्थ पूरा हो जाता है । इसी प्रकार विभिन्न स्थलों पर व्याख्या कर ली जानी चाहिये ।
स्थति सुतस्तं शोकोदीपनम् । करुणेतितस्यायं स्वभाव एव । किं कुरुतां तथापि न भूमेर्नन्धीकृतो दृष्टुमसमर्थ इति न तु स विवेकस्येडाशुचितकारित्वं सम्भाव्यते, इति स्मर्यमाणं तदीयं सौन्दर्यमिदानीं शोकावेशविभावतां प्राप्तमिति । ते शब्दे इति सर्वोंडयमर्थो निर्बूढः । एवं तत्र तत्र व्याख्यातव्यम् ।
तारावती यह है कि न तो यह प्रश्न ही उठता है और न इसका उत्तर ही समीचीन है । 'वह' शब्द प्रसिद्ध या प्रक्रान्त का परामर्श वहाँ पर होता है जहाँ पर पहले 'जो' शब्द के द्वारा किसी वस्तु में किसी ऐसे धर्म का योग वतलाया जा चुक हो जो कि वाद में निर्दिष्ट किये जानेवाले किसी दूसरे धर्म के साथ रहने की योग्यता रखता हो और वाद में 'वह' (तत्) शब्द के द्वारा उस बुद्धिस्थ दूसरे धर्म के साथ का निर्वचन कर दिया जावे । जैसे 'जो पुरुष विद्वान् है वह पूज्य है' इस वाक्य में पहले पुरुप के अन्दर विद्वत्त्व धर्म का योग वतलाया गया है । इस विद्वत्त्व धर्म में एक दूसरे धर्म पूज्यत्व के साथ रहने की योग्यता है । वाद में 'वह पूज्य है' कह कर उस दूसरे बुद्धिस्थ धर्म का निर्वचन भी कर दिया गया है । ऐसे हो स्थान पर 'तत्' शब्द प्रसिद्ध या प्रक्रान्त का परामर्शक होता है । जहाँ यह कहा जाता है कि यत् और तत् का नित्य सम्बन्ध हुआ करता है वहाँ पर तत् शब्द पूर्व प्रक्रान्त का परामर्शक होना है । इसके प्रतिकूल जहाँ पर तत् शब्द किसी निमित्तवश प्राप्त हुये स्मरण के द्वारा किसी विशेष आकार का सूचक होता
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पदावयवेन द्योतनं यथा-- त्रीडायोगान्नतदनया सन्निधाने गुरूणाम कुचकलशयोमन्मथनुन्मथनिगृह्य । तिष्ठत्ययुक्तं कलिकान न तथा यत्समुत्सृज्य वाष्पं सम्यगसक्तशकितहरिणीहारिनेत्रत्रिभागः ॥
इत्यत्र त्रिभाग-शब्दः । (अनु०) पदावयव के द्वारा द्योतन जैसे:- गुरुओं के सन्निकट लज्जा के योग से नीचे को मुख किये हुये, कुचकलशों में कम्पन उत्पन्न करनेवाले मन्यु को अन्दर ही रोके हुये उसने जो कि आँसू गिराकर चञ्चल हरिणी के समान आकर्षक नेत्र के तिहाई भाग को मेरी ओर गड़ा दिया, तो क्या उसने यह नहीं कह दिया कि रको ( मत जाओ ) । यहाँ पर त्रिभाग शब्द ।
लोचन त्रिभागशब्द इति । गुरुजनमवधीर्यापि सा मां यथा तथापि सामिलाषमन्युर्दैन्य- गरवंमन्थरं विलोकितवतीतयेवं स्मरणेन परस्परहेतुत्वप्राप्तविप्रलम्भोद्दीपनं त्रिभाग- शब्दसन्निधौ स्फुटं भातोति । 'त्रिभाग शब्द' । गुरुजनों की अवधीरणा करके भी उसने मुझे जैसे तैसे, अभिलाष, मन्यु, दीनता और गर्व के साथ मन्थर दृष्टि से देखा इस प्रकार स्मरण करने से परस्पर हेतुता ही जिसका प्राण है इस प्रकार के प्रवास-विप्रलम्भ का उद्दीपन त्रिभाग शब्द के निकट स्फुट प्रतीत होता है । तारावती है जैसे 'वह घड़ा' इत्यादि में, वहाँ पर तत् शब्द के प्रकृतपरामर्शकत्व की बात ही कैसे उठ सकती है ? बस इतना पर्याप्त है, मैं उन पण्डिततम मन्यों से अधिक विवाद की आवश्यक्ता नहीं समझता, जो झूठा परामर्श दिया करते हैं । 'काँपनवाली' इस विशेपण से वासवदत्ता के भय के अनुभव की कल्पना की गई है । 'मैं उस भयं का प्रतीकार नहीं कर सका' इसीलिये यह उनके शोकावेश का उद्दीपक है । 'वे नेत्र' में 'वे' का अर्थ है कि जिन नेत्रों में विलास अत्यधिक मात्रा में निवास किया करता था, असहाय होकर वे भी व्याकुल होगये और उस समय वे नेत्र अत्यन्त भय के कारण चारों ओर बिना ही लक्ष्य के इसलिये पड़ रहे थे कि 'कौन हमारा रक्षक आजावे' 'आर्यपुत्र कहाँ मिल जावें' । नेत्रों की इस प्रकार की दुर्दशा शोक को उद्दीस करती है । क्रूर होना तो अग्नि का स्वभाव ही
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है, इस विषय में किया ही क्या जा सकता है । किन्तु कोई भी सहृदय व्यक्ति इस प्रकार के सौन्दर्यं को जान-बूझकर नष्ट नहीं कर सकता था । अग्निदेव ने उसे इसीलिये नष्ट कर दिया कि धुएँ के कारण उसकी आँखें अन्धी हो गई थीं । यदि उसने वासवदत्ता का सौन्दर्यं देख पाया होता तो ऐसा अनुचित कार्य करने की सम्भावना उससे कभी नहीं हो सकती थी । इस प्रकार यहाँ पर वासवदत्ता के सौन्दर्यं का स्मरण ध्वोकावेश के आधिक्य को प्रकट करते हुये श्लोक का उद्दीपन विभाव बन गया है । यह सारा अर्थ 'वे' इस शब्द के होने पर ही पुष्ट होता है । इसी प्रकार की व्याख्या विभिन्न स्थानों पर करनी चाहिये ।
पदांश के द्वारा असंलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य ( रस ) के ध्वनित होने का उदाहरण— कोई नायक प्रवास के लिये प्रस्तुत था । उस समय नायिका ने उसकी ओर देखकर जो चेष्टायें की हैं उनका वर्णन वह अपने अन्तरङ्ग मित्र से कर रहा है—
'एक तो उसका स्वभाव ही लजाशील है दूसरे वह उस समय गुरुजनों के पास बैठी थी । मेरे प्रस्थान के विचार से उसके हृदय में मन्यु की एक आँधी सी उठ रही थी जिससे उसके प्रवास-प्रवास विशेष तीव्र होकर उसके कुचकलयों को काँपा देते थे । वह अपने उस मन्यु को अपने अन्दर ही रोके हुये थी और मुझे रोकने के लिये न कुछ कह सकती थी और न मेरे प्रस्थानजन्य शोक से भरे हुये रोष को प्रकट ही कर सकती थी । आँसू गिरा रही थी; उसके नेत्र चञ्चल हरिणी के समान बड़े हो आये थे । उन नेत्रों के एक तिहाई भाग को उसने मेरी ओर ऐसा गड़ा दिया कि उसने मानों यह कह ही दिया कि तुम मत जाओ ।'
यहाँ पर 'चकितहरिणी-हारिनेत्रत्रिभाग' एक पद है । उसका एक अंश है त्रिभाग शब्द । इससे सिद्ध होता है कि उसने पूरी निगाह से नायिक की ओर नहीं देखा अपितु नेत्र के तृतीय भाग से तिरछी चितवन के द्वारा देखा । इस त्रिभाग शब्द से अभिलाषा, मन्यु, दैन्य और गर्व अभिव्यक्त होता है । 'गुरुजनों की अवधीर्रणा करके भी उसने मेरी ओर जैसे तैसे अभिलाषा मन्यु दैन्य और गर्व के कारण मन्थर दृष्टि से देखा' इस प्रकार स्मरण करने से त्रिभाग शब्द की निकटता में प्रवास विप्रलम्भ का उद्दीपन सूक्ष्म रूप में प्रतोत होता है । इस प्रवास-
विप्रलम्भ का प्राण है परस्पर आस्थावन्ध । नायिका का प्रेममय आस्थावन्ध नेत्र के त्रिभाग से देखने के कारण अभिव्यक्त होता है और नायक का आस्थावन्ध उस चितवन के स्मरण से व्यक्त होता है । इस प्रकार यहाँ पर विप्रलम्भ श्रृंगार की ध्वनि में त्रिभाग यह पदांश ही निमित्त है ।
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वाक्यरूपाश्रालद्यक्त्रमध्वनि: शुद्धोडलङ्कारसङ्कीर्णश्चेति द्विधा मतः ।
तत्र शुद्धस्योदाहरणं यथा रामाभ्युदये—‘कृतककुपिते:’ इत्यादि श्लोकः ।
एतद् वाक्यं परस्परानुरागं परिपोषयति प्रदर्शयत् सर्वत्र एव परं रसतात्त्वं प्रकाशयति ।
वाक्यरूप असंल्लक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य ध्वनि दो प्रकार की मानी गई है शुद्ध और अलङ्कारसङ्कीर्ण ।
उनमें शुद्ध का उदाहरण जैसे रामाभ्युदय में ‘कृतककुपिते:’ इत्यादि श्लोक ।
यह वाक्य निस्सन्देह परिपोष को प्राप्त परस्पर अनुराग को प्रदर्शित करते हुये चारों ओर से रसतात्त्व को प्रकाशित करता है ।
लोचन
वाक्यरूपाश्रयेऽति ।
प्रथमा निर्देशे श्रोत्र्यतिरेकनिर्देशेऽस्यायं मिमांसायः ।
वर्णपदत-ज्ञागादिषु सत्वेवलक्ष्यक्रमो व्यङ्गयो निर्माणसमनानोडपि समस्तकाव्यव्यापक पत्व निर्मासते, विभावादिसंयोगप्राणत्वात् ।
तेन वर्णादीनां निमित्तत्वमात्र मेव ।
वाक्यं तु ध्वनेरलक्ष्यक्रमसत्व न निमित्ततामात्रेण वर्णंवदुपकारि, किन्तु समग्रविभावादिप्रतिपत्तिद्योत्प्रतिपत्त्यात्मकत्वात् रसादिमथ्यमेव तन्निमित्तमासत इति वाक्यम् इत्येतत्कारिकायां न निमित्तसत्वमात्रं आप्ति स्वनन्यातन सासविषयार्थमपोति ।
और वाक्यरूप प्रथमा निर्देश के द्वारा अभेदबोध का यह अभिप्राय है—वर्ण, पद और पदांश के होते हुये ही अलक्ष्यक्रम व्यङ्गय निर्माण होता हुआ भी समस्त काव्यव्यापक ही शोभित होता है क्योंकि उसका प्राण विभाव इत्यादि का संयोग है ।
इससे वर्ण इत्यादि की निमित्तत्वमात्रता ही है ।
वाक्य तो वर्ण इत्यादि के समान अलक्ष्यक्रम ध्वनि का केवल निमित्तता से ही उपकार करनेवाला नहीं होता ।
किन्तु समग्र विभाव इत्यादि की प्रतिपत्ति में लगे होने से वह रसादि-मय ही शोभित होता है ।
है अपित अन्वयत सम्भव न होना रूप विषय के अर्थवाला भी है ।
तारावती
‘वाक्यरूपं असंल्लक्ष्यक्रम व्यङ्ग्य ध्वनि दो प्रकार की होती है—शुद्ध और अलङ्कारसङ्कीर्ण ।’
वृत्तिकार के इस वाक्य में ‘वाक्यरूपं’ में भी प्रथमा का निर्देश किया गया है ।
‘अलक्ष्यक्रमव्यङ्गयो ध्वनि:’ इसमें भी प्रथमा निर्देश किया गया है ।
इस प्रकार इन दोनों शब्दों में सामानाधिकरण्य है ।
‘दो प्रातिपदिकार्थों का अभेद के अतिरिक्त अन्य कोई सम्बन्ध नहीं होता’ इस नियम के अनुसार वाक्य-रूप’ तथा ‘अलक्ष्यक्रमव्यङ्गय ध्वनि’ इन दोनों शब्दों में अभेद-सम्बन्ध की स्थापना हो जाती है ।
इस प्रथमा निर्देश तथा अभेद-सम्बन्ध के निर्देश का अभिप्राय यह है—यद्यपि वर्ण, पद और पद का भाग इनके होने पर ही अलक्ष्यक्रमव्यङ्गय निर्माण होता है तथापि उसका निर्भास समस्त वाक्य में व्यापक रूप में निर्भासित हुआ करता है ।
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शुद्ध इत्यर्थालङ्कारेण केनाप्यसंस्मिश्रः । कृतककुपिततैवैषास्मोचि: सदैन्यविलोकितै- वैनमपि गता यस्य प्रीत्या धृतामपि तथा्स्वभा ।
नवलकलधरशशाङ्कः पथ्याविन्दुश्रो सवत्सों चिता कठिनहृदयो जीवत्येव प्रिये स तव प्रियः ॥ अन्न तथा तैस्तैः प्रकारैर्मन्त्रा धृतमपीत्यानुरागपरवशत्वेन गुरुवचनोऽलङ्कृतनमि स्वया कृतमिति । प्रिये प्रिय इति परस्परजीवितसर्वस्वाभिमानात्मको रतिस्थायिभाव उक्तः । नवलकलधरेत्यसोऽपूर्वप्रातृक्षेण्यजलदालोकानं विप्रलम्भोद्दोपनविभावत्वेनोक्तम् ।
शुद्ध का अर्थ है किसी अर्थालङ्कार से असंस्मिश्र ।
'चनावटी कोपों से, आँखुओं से और दैन्यपूर्ण अवलोकनों से माता द्वारा रोकी हुई भी जिसकी प्रीति से वन को भी गयी कठिन हृदयवाला वह तुम्हारा प्रिय तुम्हारे वियोग में नव जलधरों से श्याम दिशाओं को देखते हुये जीवित ही है ।'
यहाँ पर उस प्रकार विभिन्न उपायों से माता द्वारा रोकी हुई भी अनुराग की परवशता से तुमने गुरुचचन का उल्लङ्घन भी किया । 'हे प्रिये !' 'हे प्रिय !' इससे परस्पर जीवितसर्वस्वाभिमानात्मक रतिस्थायिभाव कहा गया है । 'नवजलधर...' से पहले न सहे हुये मेघ का अवलोकन विप्रलम्भ के उद्दीपन विभाव के रूप में
ही होता है । कारण यह है कि अलङ्क्यक्रमव्यङ्ग्य का प्राण है विभाव इत्यादि का संयog । अत एव रसनिष्पत्ति समस्त काव्य में होती है किन्तु वर्ण इत्यादि निमित्तमात्र हो जाते हैं । किन्तु वाक्य के विषय में यह बात नहीं है । वाक्य वर्ण इत्यादि के समान अलङ्क्यक्रमव्यङ्ग्य ध्वनि की उपेक्षा करके केवल निमित्तमात्र होकर के ही नहीं होता अपितु समग्र विभावादि की प्रतिपत्ति में लगा रहता है ।
अतएव वाक्य रसादिमय ही निर्भरचित होता है । (आशय यह है कि वर्ण पद इत्यादि रस की पूरी सामग्री नहीं जुटा पाते । रस की पूरी सामग्री दो काव्य के दूसरे भागों से प्राप्त होती है वर्ण इत्यादि उस अभिव्यक्त रस में एक विशेष चमत्कार उत्पन्न कर देते हैं । इसके प्रतिकूल जहाँ वाक्य व्यञ्जक होता है वहाँ रस की सामग्री अन्यत्र से नहीं आती अपितु वाक्य ही सारी सामग्री जुटा देता है । इस प्रकार वाक्य अलङ्क्यक्रमव्यङ्ग्य से अभिन्न होता है । यही प्रथमा तथा अभेद निर्देश का आशय है । ) कारिका में 'वर्णपदादिशु' की सप्तमी को निमित्तसप्तमी बतलाया था किन्तु 'वाक्य' इवमें केवल निमित्तसप्तमी नहीं है अपितु इसका आशय ऐसे विषय से भी है जो अन्यत्र सम्भव न हो । (अर्थात् 'वाक्य' इस शब्द में सप्तमी निमित्तसप्तमी नहीं है अपितु विषयसप्तमी है । )
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एवेतिसापेक्षभावता एककारेण करुणावकाश निराकरणायोक्का। सर्वत्र एवेति। यतस्य पदस्याधिकं किचिद्रसव्यक्तिहेतुत्वमित्यर्थः। रसतात्प्र्यमिति। विप्रलक्ष्यारात्तत्प्वम्।
‘जीवित ही है’ में सापेक्षभावता (एक दूसरे की अपेक्षा करते हुये रहने की सत्ता ) ‘ही’ के प्रयोग से करुण रस के अवकाश के निराकरण के लिये है। ‘चारों ओर से हो’ अर्थात् यहाँ पर किसी एक पद का रसात्मकत्व में कुछ भी अधिक हेतुत्व नहीं है। ‘रसतत्त्व’ अर्थात् विप्रलम्भ-शृङ्गार ।
तारावती
अ) शुद्ध का अर्थ है किसी भी अर्थालङ्कार से न मिला हुआ। इसका रञ्जन जैसे रामाभुदय काव्य की यह पंक्ति—
अ) शुद्ध का अर्थ है किसी भी अर्थालङ्कार से न मिला हुआ। इसका रञ्जन जैसे रामाभुदय काव्य की यह पंक्ति—
वनावटी कोपों के द्वारा, अश्रुजलों के द्वारा और दैन्यपूर्णों अवलोकनों के द्वारा रोकी हुई भी जिसके प्रेम से तुम वन को चली गई थीं, हे प्रिये वही कठोर हृदयवाला प्रियतम इस समय नवीन जलधरों के कारण स्यामायमान ओं को देखते हुये भी तुम्हारे अभाव में भी जीवन धारण किये हुये है।
वनावटी कोपों के द्वारा, अश्रुजलों के द्वारा और दैन्यपूर्णों अवलोकनों के द्वारा रोकी हुई भी जिसके प्रेम से तुम वन को चली गई थीं, हे प्रिये वही कठोर हृदयवाला प्रियतम इस समय नवीन जलधरों के कारण स्यामायमान ओं को देखते हुये भी तुम्हारे अभाव में भी जीवन धारण किये हुये है।
यद्यपि विभिन्न उपायों से माता ने वन जाने से रोका तथापि तुम न मानी मेरे साथ वन को चली ही आई। इस प्रकार तुमने अनुरागपरवशता में गुरु-
यद्यपि विभिन्न उपायों से माता ने वन जाने से रोका तथापि तुम न मानी मेरे साथ वन को चली ही आई। इस प्रकार तुमने अनुरागपरवशता में गुरु-
f का उल्लेखन भी करदिया। अतएव ऐसी प्रेमिका के वियोग में नायक को छोड़ देने चाहिये थे किन्तु नायक नवजलधररूप उद्दीपनो के होते हुये भी छ सह रहा है और अपने प्राण नहीं छोड़ता। इस प्रकार यह वाक्य नायक-
f का उल्लेखन भी करदिया। अतएव ऐसी प्रेमिका के वियोग में नायक को छोड़ देने चाहिये थे किन्तु नायक नवजलधररूप उद्दीपनो के होते हुये भी छ सह रहा है और अपने प्राण नहीं छोड़ता। इस प्रकार यह वाक्य नायक-
म्भ शृङ्गार को प्रकट करता है। इस ध्वनि में किसी एक शब्द की प्रधनता है। प्रिय शब्द में एक दूसरे के जीवनसर्वस्व होने का अभिमान छिपा ही है। अतएव ‘प्रिये’ इस सम्बोधन तथा ‘प्रिय’ इस प्रथमान्त से रति स्थायी-
म्भ शृङ्गार को प्रकट करता है। इस ध्वनि में किसी एक शब्द की प्रधनता है। प्रिय शब्द में एक दूसरे के जीवनसर्वस्व होने का अभिमान छिपा ही है। अतएव ‘प्रिये’ इस सम्बोधन तथा ‘प्रिय’ इस प्रथमान्त से रति स्थायी-
प्रकट किया गया है। नवीन जलधर इत्यादि शब्दों का आशय यह है कि वे रहे हैं जिनका सहन करना सर्वथा असम्भव है और जिनका पहले कभी
प्रकट किया गया है। नवीन जलधर इत्यादि शब्दों का आशय यह है कि वे रहे हैं जिनका सहन करना सर्वथा असम्भव है और जिनका पहले कभी
किया भी नहीं गया है। ‘यह विप्रलम्भ शृङ्गार का उद्दीपन विभाव है।’ धारण किये हुये ही हैं। यह सापेक्षभाव का शब्द है जिससे नायिका के जीवित होने की सम्भावना पाई जाती है। अतएव आलम्बनविच्छेद न होने के
किया भी नहीं गया है। ‘यह विप्रलम्भ शृङ्गार का उद्दीपन विभाव है।’ धारण किये हुये ही हैं। यह सापेक्षभाव का शब्द है जिससे नायिका के जीवित होने की सम्भावना पाई जाती है। अतएव आलम्बनविच्छेद न होने के
कारण यहाँ पर करुण रस को अवकाश नहीं रहता किन्तु विप्रलम्भ शृङ्गार ही पुष्ट
कारण यहाँ पर करुण रस को अवकाश नहीं रहता किन्तु विप्रलम्भ शृङ्गार ही पुष्ट
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अलङ्कारान्तरसङ्कीर्णो यथा—‘स्मरनवनदीपूरेरणोढा:' इत्यादि श्लोकः। अत्र हि रूपकेण यथोक्तव्यङ्ग्यकाव्यगतेन भ्रसाधितो रसः सुतरां भिव्यज्यते।
अलङ्कारान्तरसङ्कीर्ण जैसे ‘स्मरनवनदीपूरेरणोढा:' इत्यादि श्लोक । यहाँ पर व्यङ्ग्यक के वत्तलाये हुये लक्षणों का अनुसरण करनेवाले रूपक के द्वारा उपस्कृत होकर रस ठीक रूप में अभिव्यक्त होता है ।
लोचन
स्मरनवनदीपूरेरणोढा: पुनर्गुरुसेतुभिः यदपि विशिष्टता; तिष्ठस्यारादपूर्णंमनोरथा: । तदपि लिखितप्रायैरङ्कैः परस्परमुखा: नयननलिनीपलाशानीतं पिबन्ति रसं प्रिया: ॥
'कामदेवरूपी नदी के प्रवाह से लाये हुये फिर भी जो कि गुरुरूपी सेतु के द्वारा विशेषरूप से रोके हुये अतएव निकट ही अपूर्णंमनोरथवाले बैठे हुये हैं; फिर भी लिखे हुये जैसे अङ्कों से एक दूसरे की ओर उन्मुख पयारे चञ्चल नेत्रकमलिनी की नाल से लाये हुये रस का पान कर रहे हैं ।'
रूपके णति। स्मर पुङ्ख नवनदीपूर: प्रातृपेण्यप्रवाह: सरभसमेंव प्रवृद्धंवात तेनोढा: परस्परासामुख्य्यसदृक्तिपूर्वमेव नीता। अथ च गुरुवोढृकृत्या: सेतवस्ते विशिष्टता प्रतिबध्नतेच्छा: । भत एवंपूर्णंमनोरथास्तिष्ठन्ति । तथापि परस्परोन्मुखतारक्षणेनान्योन्यतादात्म्येन स्वदेहे सकलवृत्तिनिरोधादिलिखितप्रायैर्द्योन्यनयानायैव नलिनीपलाशानि तैरानीतं रसं परस्परामिलाषलक्षणमास्वाद्यन्ति परस्पराभिलाषात्मक हृदृइच्छटा मि श्रीकारयुक्त्यापि कालमतिवाहयन्तीति ।
'रूपक के द्वारा'। कामदेव ही है, नवीन नदी का पूर अर्थात् उद्धत सङ्कोभ का प्रवाह, सहसा बन्दे होने के कारण उसके द्वारा बहाकर लाये हुये अर्थात् बिना ही बुद्धि के एक दूसरे की सम्मुखता को प्राप्त किये हुये । बाद में गुरु अर्थात् श्वास इत्यादि ही सेतु हैं क्योंकि इच्छा के प्रसार को रोकनेवाले हैं । और भी गुरु अर्थात् अलङ्ग्य स्थित हैं । तथापि परस्पर उन्मुखतावाले एक दूसरे के तादात्म्य से अपने शरीर में समस्तवृत्तियों के निरोध से लिखितप्राय अङ्कों से नयन ही हैं कमलिनी नाल, उनके द्वारा लाये हुये परस्पर अभिलाष लव्धणवाले रस को आस्वादित कर रहे हैं—परस्पर अभिलाषात्मक हृदृइच्छटाओं के मिलाने की युक्ति से कालयापन कर रहे हैं ।
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ननु नात्र रूपकं निःशङ्कं हंसचक्रवाकादिरूपेण नायकयुगलस्यारूपितत्वात् । ते ( प्रश्न ) यहाँ पर रूपक पूरा नहीं किया गया है क्योंकि नायक-युग्म का हंस चक्रवाक इत्यादि रूप में आरोप नहीं किया गया है । नि:शङ्केह वे हंस इत्यादि
तारावती ( आ ) अलङ्कारान्तरसङ्कीर्ण वाक्य रूप असङ्क्षयक्षम व्यङ्ग्य का उदाहरण—'कामदेवरूपी नवीन नदी के प्रवाह के द्वारा बहाकर लाये हुये, गुरुस्त्रूपी सेतु के द्वारा रोके हुये अपूर्ण मनोरथवाले जो प्रेमीजन दुःख के साथ निकट ही बैठे हुये हैं और जो लिखे हुये से अज्ञों के द्वारा एक दूसरे की ओर उन्मुख प्रतीत हो रहे हैं वे नयनरूपी नलिनी की नाल से लाये हुये रस का पान कर रहे हैं ।'
आशय यह है कि यद्यपि उनको सहवास-सुख प्राप्त नहीं हो रहा है तथापि वे प्रेमीजन परस्पर प्रेमपूर्ण अवलोकन के द्वारा ही अपना समय बिता रहे हैं ।
The idea is that although they are not getting the pleasure of cohabitation, still they are spending their time by looking at each other with love.
बहाँ पर कामदेव पर नवीन नदी की धारा का आरोप किया गया है । गुरुजन पर सेतु का और नेत्रों पर कमलिनी नाल का आरोप किया गया है। अतः यह रूपक अलङ्कार है । इसके द्वारा प्रसाधित होकर रस भली भाँति अभिव्यक्त होता है ।
The flow of the new river is attributed to Kamadeva. The bridge is attributed to the elders and the lotus stalk to the eyes. Hence, it is a Rupaka figure. Through this, the rasa is well expressed.
कामदेव को नवीन-नदीपूर कहा गया है नदीपूर का अर्थ है वर्षा का प्रथम प्रवाह । जब वर्षा का प्रथम प्रवाह आता है तब क्योंकि वह एकदम बढ़ा होता है अतः तृणलता इत्यादि जिस किसी वस्तु को पाता है वहाँ वह लियें चला जाता है । इसी प्रकार कामदेव के इस नवीन प्रवाह में भी प्रेमीजन वहतें हुये चले गये हैं, उनमें एक दूसरे की ओर प्रधक्ति बुद्धिपूर्वक उत्सन्न नहीं हुई है ।
Kamadeva is called Nadi-poor, which means the first flow of the rainy season. When the first flow of the rainy season comes, it is very strong and carries away whatever it encounters. Similarly, in this new flow of Kamadeva, the lovers are swept away, and they are not aware of each other's presence.
वहाँ जैसे धारा के साथ बहनेवाले तृण इत्यादि को कोई सेतु बीच में पड़कर रोक देता है और आगे नहीं बढ़ने देता उसी प्रकार सास इत्यादि गुरुजन सेतु हैं क्योंकि वे इच्छा के प्रसर को रोकनेवाले हैं। अथवा 'गुरुसेतु' का अर्थ बड़े सेतु भी अर्थात् उनकी इच्छाओं को प्रतिहत कर दिया गया है इसीलिये वे अपूर्ण मनोरथ होकर बैठे हुये हैं ।
Just as a bridge in the middle of the flow stops the grass etc. from flowing further, similarly, the elders like mothers-in-law etc. are like bridges that prevent the desire from spreading. Or, 'Guru-setu' means a big bridge, and their desires are obstructed, that's why they are sitting with unfulfilled desires.
इससे ज्ञात होता है कि उनमें एक दूसरे की एकरूपता उत्पन्न हो गई है । देह की सारी वृत्ति निरुद्ध हो गईं है यह इस बात से ज्ञात होता है कि उनके अज्ञ चित्र लिखे हुये के समान विकल्कुल निरुद्ध हो गये हैं । उनके नेत्र ही कमलिनी की नाल हैं ।
From this, it is understood that a oneness has been created between them. All the activities of the body have ceased, and this is evident from the fact that their ignorant minds have become completely still, like written pictures. Their eyes are like the stalk of a lotus.
उनके द्वारा लाये हुये परस्पर अभिलाषपूर्ण दृष्टिच्छटारूपी रस का आस्वाद ले रहे हैं । आशय यह है कि अपनी अनुरागपूर्ण दृष्टि की छटा के मिश्रण की युक्ति से ही अपना समय बिता रहे हैं ।
They are enjoying the rasa of the glance, which is full of mutual longing, brought by them. The idea is that they are spending their time by mixing their loving glances.
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अलङ्क्रमङ्ग्यज्ञ्च: सङ्घटनायां भासते ध्वनिरितियुक्तं तत्र सङ्घटनास्वरूपमेव तावत्रिरूप्यते—
अनु० अलङ्क्य क्रम में पड़ने वाला ध्वनि सङ्घटना में भासित होती है । यह कहा गया है । उसमें सङ्घटना स्वरूप का ही पहले निरूपण किया जा रहा है—
लोचन हि हंसाद्या: एकनलिनी नलान्त सलिल लिपानकौण्डादिपूचिता इत्यादि आह—याह—यथोक्त-व्यझक॑ति । उक्तं हि पूर्वे ‘विवक्षातत्परत्वेन’ इत्यादौ ‘नातिनिबर्हणौषिता’ इति । प्रसाधित इति । विभावादिभूषणद्वारेण रसोडपि प्रसाधित इत्यर्थ: ॥ ३, ४ ॥ सङ्घटनाया मिति भावे प्रयस्य:, वर्णादिवच्च निमित्त मात्रे सस्मी । उक्त मिति निरूप्यत इति गुणेभ्यो विविक्ततया विचार्यत इति यावत् । एक कमलिनी नाल से लाये हुये जलपान की क्रोडी में अभ्यस्त हैं यह ज्ञा करके ( उत्तर ) देते हैं—‘यथोक्त व्यझक’ यह । ‘विवक्षा तत्परत्वेन’ इत्यादि में पहले कहा गया था कि अत्यन्त निर्वाह की इच्छा नहीं होनी चाहिये । ‘प्रसाधित’ यह । अर्थात् विभाव इत्यादि भूषण के द्वारा रस भी विभूषित किया गया है ॥ ३, ४ ॥ ‘सङ्घटना में’ यह भाव में प्रत्यय है, वर्ण इत्यादि के समान केवल निमित्त में ससमी है । ‘कहा गया है’ अर्थात् कारिका में । ‘निरूपित किया जाता है’ अर्थात् गुणों से पृथक् रूप में विचार किया जाता है ।
( प्रश्न ) यहाँ पर रूपक निर्वहण ( पूर्णता ) को प्राप्त नहीं हुया है क्योंकि नायक और नायिका पर हंसमिथुन चक्रवाक इत्यादि आरोप नहीं किया गया है । निःसन्देह वे हंस इत्यादि एक कमलिनी की नाल से लाये हुये जलपान इत्यादि में अभ्यस्त होते ही हैं । इस प्रकार नायक और नायिका पर हंसमिथुन का बिना आरोप किये रूपक में पूर्णता किस प्रकार आसक्ती है ? रूपक रस का परिपोषक और अलङ्कारक किस प्रकार हो सकता है ?
तारावती ( प्रश्न ) यहाँ पर रूपक निर्वहण ( पूर्णता ) को प्राप्त नहीं हुया है क्योंकि नायक और नायिका पर हंसमिथुन चक्रवाक इत्यादि आरोप नहीं किया गया है । निःसन्देह वे हंस इत्यादि एक कमलिनी की नाल से लाये हुये जलपान की क्रीड़ा इत्यादि में अभ्यस्त होते ही हैं । इस प्रकार नायक और नायिका पर हंसमिथुन का बिना आरोप किये रूपक में पूर्णता किस प्रकार आसक्ती है ? रूपक रस का परिपोषक और अलङ्कारक किस प्रकार हो सकता है ?
( उत्तर ) यह ‘विवक्षातत्परत्वेन’ इत्यादि कारिकाओं में रस में अलङ्कार प्रयोग की प्रक्रिया पर विचार करने के प्रकरण में पहले ही बतलाया जा चुका है कि वही अलङ्कार रस का पोषक होता है जिसके अत्यन्त निर्वहण की ओर कवि का ध्यान न हो । ( नहीं तो अलङ्कार प्रधान हो जाता है और रस दच जाता है ।) इसीलिये वृत्तिकार ने लिख दिया है कि व्यझक अलङ्कार की बतलाई हुयी प्रक्रिया का अनुसरण करते हुये यहाँ रूपक रस का पोषक हो रहा है । रूपक के द्वारा रस प्रसाधित किया गया है कहने का आशय यह है कि रूपक विभाव इत्यादि को आभूषित करते हुये रस का भी आभूषित करनेवाला बन गया है ॥ ३, ४ ॥
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असमासा समासेन मध्यमेन च भूपिता । तथा दीर्घसमासेति त्रिया सङ्घटनोदिता ॥ ५ ॥
(अनु०) 'समास-रहित, मध्यम समास से भूपित तथा दीर्घं समासवाली तीन प्रकार की संघटना बतलाई जाती है ॥ ५ ॥'
तारावती
यह दूसरी कारिका में कहा गया था कि 'अलक्ष्यक्षमग्यद्रूच्य ध्वनि संघटना में भासित होती है ।' इस पर विचार करने के पहले कि संघटना किस प्रकार रस को अभिव्यक्त करती है, संघटना के स्वरूप पर प्रकाश डाल लेना उचित प्रतीत होता है । संघटना शब्द में सम् उपसर्ग 'घट्' धातु से ल्युट् प्रत्यय होता है । यह भावार्थक प्रत्यय है । जिस प्रकार वर्ण इत्यादि में निमित्तसत्समी मानकर व्यास्या की गईं थीं उसी प्रकार 'संघटनायाम्' में भी निमित्त सत्समी ही है । अर्थात् संघटना भी वर्ण इत्यादि के समान रस इत्यादि की अभिव्यक्तना में निमित्त ही होती है । 'कहा गया था' का आशय है द्वितीय कारिका में कहा गया था कि संघटना भी अभिव्यञ्जक होती है । 'निरूपण किया जा रहा है' कहने का आशय यह है कि यह विचार किया जा रहा है कि गुणों से संघटना में क्या भेद होता है ?
[ यहाँ पर आननदवर्धन ने संघटना शब्द का प्रयोग रीति के अर्थ में किया है । अब यह विचार उठाया जा रहा है कि संघटना या रीति किस प्रकार रस के अभिव्यञ्जन में सहायक होती है ? रीति सम्प्रदाय का विस्तृत परिचय तृतीय उद्योत के अन्त में टिप्पणी के रूप में दिया जायेगा । यहाँ पर आवश्यकतानुसार संक्षिप्त परिचय प्राप्त कर लेना उचित होगा ।—वैसे तो शैली व्यक्तिसापेक्षिणी होती है और प्रत्येक कलााकार के अनुसार इसमें कुछ न कुछ विशेषता अवश्य रहती है तथापि एक प्रदेश के व्यक्तियों में कुछ न कुछ साम्य रहता ही है । यह बात केवल काव्यशैली के क्षेत्र में ही नहीं लागू है अपितु मानव-साधना के प्रत्येक क्षेत्र में इसकी सत्ता पाई जाती है । इसी आधार पर हम कहते हैं कि पंजावी लोगों की अमुक प्रथा है, बंगालियों की अमुक परम्परा है; दाक्षिणात्यों की विचार धारा इस प्रकार होती है, अंग्रेज लोग वादे होते हैं इत्यादि । यदि इसी प्रकार देश-भेद के आधार पर काव्यशैलियों की व्याख्या की जावे तो देश-भेद की अनन्तता के आधार पर काव्यशैलियाँ भी असीमित हो जावेंगी । किन्तु विभिन्न देशों की
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व्रिभिन्न परम्पराओं में भी साम्य के बीज खोजे जा सकते हैं और इसी आधार पर उनका एक नामकरण कर दिया जाता है ।
सर्व प्रथम काव्य शैलियों का विचार दण्डी ने किया । उन्होंने समस्त काव्य-क्षेत्र को दो मार्गों में विभाजित कर दिया एक तो विदर्भ का मार्ग और दूसरा गौड या बंगाल का मार्ग । शैलो के लिये उन्होंने प्रयोग भी मार्ग शब्द का ही किया । दण्डी ने शैली के अन्दर केवल वर्णविन्यास पर ही विचार नहीं किया अपितु प्रत्येक क्षेत्र में दोनों शैलियों का अन्तर दिखलाया । इसके बाद देश-भेद के आधार पर रीतियों का विचार आचार्य वामन ने किया । उन्होंने ही सबसे पहले रीति शब्द का प्रयोग किया । उन्होंने दण्डी के द्विविध मार्गों में एक तीसरा और जोड़ कर रीतियों की संख्या तीन कर दी—वैदर्भी, गौडी और पांचाली । वामन ने गुणात्मक पदरचना का नाम रीति रखकर गुण और रीति दोनों के सम्बन्ध की ओर इंगित किया और विभिन्न रीतियों की परिभाषा में भी गुणों का उल्लेख किया । इस प्रकार वामन के मत में रीति और गुण का अनिवार्यं सम्बन्ध है । आचार्य वामन ही रीति सम्प्रदाय के प्रतिष्ठापक और उसके सबसे बड़े आचार्य माने जाते हैं । उन्होंने रीति को काव्य की आत्मा माना और तीनों रीतियों की परिभाषायें इस प्रकार दीं—
‘जिसमें दोष की मात्राओं का बिल्कुल स्पर्श न हो, जो कि समस्त गुणों से गुम्फित हो और जिसको वीणा के स्वर का सौभाग्य प्राप्त हो उसे वैदर्भी रीति कहते हैं ।’
‘जिसमें शिथिलता के भाव का प्रवेश हो, जो पुरानी छाया से युक्त हो और मधुर तथा शुुकुमार हो उसे कवि लोग पांचाली रीति कहते हैं ।’
‘जिसमें समासगर्भित अत्यन्त उत्कट पद हों जो ओज और कान्ति से समन्वित हो, रीति के निपुण वेत्ता उसे ‘गौडी रीति’ कहते हैं ।’
यहीं तीन रीतियाँ वामन ने मानी हैं । इन्हीं से मिलती जुलती उपनागरिका, परुषा और कोमला ये तीन वृत्तियाँ भी हैं । आनन्दवर्धन से पूर्व की रीति और वृत्तियों की यही स्थिति है । आनन्दवर्धन ने रीति को संघटना इस नाम से अभिहित किया है । इन्होंने यहां पर विस्तार पूर्वक रीतियों के स्वरूप का विवेचन करते हुये दो प्रश्नों पर प्रमुख रूप में प्रकाश डाला है—रीति और गुण का क्या सम्बन्ध है ? रीतियाँ रस की अभिव्यंजक किस प्रकार होती हैं ?
आनन्दवर्धन ने भी अपने प्राचीनों की मान्यता के आधार पर रीति या संघटना तीन ही प्रकार की मानी है—( १ ) समासबहुल संघटना ( २ ) मध्यम समास
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से भूषित जंघटना और ( ३ ) वीपं समास से युक्त संघटना । प्रथम प्रकार की संघटना को हम वैदर्भी रीति कह सकते हैं, दूसरे प्रकार की संघटना को पाञ्चाली और तीसरे प्रकार की संघटना को गौडी यह नाम दिया जा सकता है । संघटनाओं के इन भेदों का ५ वीं कारिका में केवल अनुवाद कर दिया गया है । इसके बाद ६ ठी कारिका में गुण और संघटना तथा संघटना और रस के सम्बन्ध पर विचार प्रारम्भ कर दिया गया है । गुण और संघटना का परस्पर क्या सम्बन्ध है ? इस विषय में दो बातें कही जा सकती हैं—( १ ) गुण और संघटना दोनों एक ही वस्तुयें हैं—गुणों का ही दूसरा नाम संघटना रख दिया गया है । ( २ ) ये दोनों एक दूसरे से भिन्न हैं । यदि दूसरा पक्ष माना जावे तो एक प्रश्न यह उठता है कि क्या संघटना गुणों के आश्रित रहती है या गुण संघटना के आश्रित रहते हैं ?
इस प्रकार संघटना और गुणों के सम्बन्ध के विषय में, तीन मत हो गये ( १ ) गुण और संघटना दोनों एक ही चीजें हैं इनमें कोई भेद नहीं । ( २ ) संघटना गुणों पर आश्रित रहती है । ( ३ ) गुण संघटना पर आश्रित रहते हैं । यह तो हुई संघटना और गुणों के परस्पर सम्बन्धविषयक वैकल्पिक पक्षों की बात । दूसरा प्रश्न यह है कि संघटना और रस का परस्पर क्या सम्बन्ध है ? इसके उत्तर में कहा जा सकता है कि संघटना अभिव्यञ्जक होती है और रस अभिव्यज्य होते हैं । ६ ठी कारिका में कहा गया है कि ‘संघटना माधुर्य इत्यादि गुणों का आश्रय लेकर रसों को अभिव्यक्त करती है ।’ संघटना और गुणों के परस्पर सम्बन्ध विषयक तीनों वैकल्पिक पक्षों को लेकर प्रस्तुत कारिका की व्याख्या इन तीन प्रकार होगी—( १ ) यदि यह मानें कि संघटना और गुण दोनों एक ही चीजें हैं तो इस कारिका का अर्थ होगा—संघटना इन गुणों का आश्रय लेकर रसों को अभिव्यक्त किया करती है जो गुण संघटना की आत्मा ही हैं । यद्यपि संघटना और गुण दोनों एक ही वस्तुयें हैं तथापि देख जाता है कि विचारक लोग विचार के निमित्त एक ही वस्तु के स्वभाव में भेद की कल्पना करलिया करते हैं । इसी काल्पनिक भेद को लेकर कह दिया गया है कि संघटना गुणों का आश्रय लेकर रसों को अभिव्यक्त करती है।
( २ ) गुण संघटना के आशीत रहते हैं इस पक्ष को लेकर इस कारिका का अर्थ होगा—संघटना ऐसे गुणों को आश्रय लेकर रसों को व्यञ्जना करती है जो गुण संघटना का आधेय होते हैं । ( ३ ) भेदवाद में इस पक्ष को लेकर कि संघटना गुणों के आधीन रहती है इस कारिका का अर्थ होगा-‘संघटना ऐसे गुणो का आश्रय लेकर रसों को अभिव्यक्त करती है जिन गुणों के वह आधीन रहती है । यही आनन्दवर्धन के विवेचन का सार है । ]
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तां केवलमनूद्येदमुच्यते—
गुणानाश्रित्य तिष्ठन्ती माधुर्यादीन् व्यनक्ति सा ।
रसान्—
सा सङ्घटनारसादीन् व्यनक्ति गुणानाश्रित्य तिष्ठन्तीति ।
अत्र च विकल्प्यं गुणानां सङ्घटनाश्रयैक्यं व्यतिरेको वा । व्यतिरेकेऽपि द्वयोरगतिः गुणाश्रया सङ्घटनाश्रया वा गुणा इति ।
तत्रैक्यपक्षे सङ्घटनाश्रयगुणपक्षे च गुणानात्मनानात्मपक्षे गुणाश्रयसङ्घटनापक्षः ।
तदैव गुणानाश्रित्य तिष्ठन्ती गुणपरतन्त्रस्वभावा न तु गुणरूपैवेत्यर्थः ।
( अनु० ) उसका केवल अनुवाद कर यह कहा जा रहा है—
'माधुर्य इत्यादि गुणों का आश्रय लेकर स्थित होनेवाली वह ( सङ्घटना ) रसों को अभिव्यक्त करती है ।'
वह सङ्घटना गुणों का आश्रय लेकर स्थित होती हुई रसादियों को अभिव्यक्त करती है ।
यहाँ पर विकल्प करने योग्य यह है कि—गुण और सङ्घटना दोनों की एकरूपता है या भेद है ? भेद होने पर भी दो अवस्थायें हो सकती हैं—गुण के आधीन सङ्घटना हो या सङ्घटना के आधीन गुण हों ।
उनमें एकता के पक्ष में सङ्घटना के अधीन गुण इस पक्ष में यह अर्थ होता है—अपनी आत्मा के रूप में स्थित गुणों या अपने आधेयभूत गुणों का आश्रय लेकर स्थित होनेवाली सङ्घटना रसादिको को अभिव्यक्त किया करती है ।
जैवकि गुण और सङ्घटना के नानात्व पक्ष में सङ्घटना गुणों के आधीन रहती है यह पक्ष मानें तो अर्थ होगा—गुणों का आश्रय लेकर स्थित होनेवाली अर्थात् गुणों के परतन्त्र स्वभाववाली, गुणरूप ही नहीं ।
लोचन
रसानिति कारिकायां द्वितीयार्धस्याद्यं पदम् ।
'रसांस्वक्रिये हेतुरौचिल्यं वक्तृवाच्ययोः' इति कारिकार्धम् ।
'रसान्' यह कारिका में द्वितीयार्ध का प्रथम पद है ।
'रसास्त्रितये हेतुरौचिल्यं वक्तृवाच्ययोः', यह कारिका का आधा भाग है ।
तारावती
छठी कारिका की व्याख्या आनन्दवर्धन ने दो खण्डों में की है—प्रथम खण्ड में कारिका का प्रथम दल और द्वितीय दल का प्रथम शब्द रखा गया है ।
'रसान्' यह छठी कारिका के द्वितीय दल का प्रथम शब्द है । पूरा द्वितीय दल इस प्रकार है—'रसांस्वक्रिये हेतुरौचिल्यं वक्तृवाच्ययोः:' ।
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बहुवचनेनार्थः संघ्रहीतः इति दर्शयति—रसादीनीति । अत्र चेतिअस्मिन्नेव कारिकार्थे । विकलपेनद्रर्थजातं कल्पयितुं न्याय्यतां शङ्कयते, किं तदाह—गुणानामिति । त्रयः पक्षाः ये सम्भाव्यन्ते ते !ड्याख्यातुं शङ्क्याः । कथमित्याह—तत्रैक्यपक्ष इति । आत्मभूतानिति । स्वभावस्य कल्पनया प्रतिपादनार्थं प्रदर्शितभेदस्य स्वाश्रयवाचो युक्तिदर्शयते शिंशपाश्रयं वृक्षत्वमिति । आधेयभूतानिति । संघटनाया धर्मा गुणा इति भट्टोद्भटादयः । धर्मोऽर्थो धर्म्याश्रिता इति प्रसिद्धो मार्गः । गुणपरतन्त्रेति । अत्र नाधाराधेयभाव आश्रयार्थः । न हि गुणेषु संघटना तिष्ठतीति । तेन राजाश्रयप्रकृतिवर्ग इत्यत्र यथा राजाश्रयतन्त्रस्वभावा तदायत्ता तन्मुखप्रेक्षिणी संघटनेयस्मर्थो लभ्यते इति भावः ।
बहुवचन से अर्थ का संग्रह किया गया है यह दिखलाते हैं—‘रसादीन् इति ।’ यहाँ पर चेतिअर्थात् उसी कारिका के आधे भाग में । विकल्प से अर्थ समूह की कल्पना अर्थात् व्याख्या की जा सकती है—वह क्या है यह कहते हैं—‘गुणा इत्यादि का’ यह। तीन पक्ष, जिनकी सम्भावना की जाती है उनकी व्याख्या की जा सकती है। किस प्रकार? यह कहते हैं—‘उसमें ऐक्यपक्ष में’ इत्यादि । ‘आत्मभूतों का’। स्वभाव के प्रतिपादन के लिये कल्पना के द्वारा कथन देखा जाता है शिंशपा के आश्रयवाला वृक्ष । ‘आधेय भूतों को’ । संघटना के आश्रित गुण होते हैं यह भट्टोद्भट इत्यादि कहते हैं । धर्म धर्मी के आश्रित होते हैं यह प्रसिद्ध मार्ग है । ‘गुणपरतन्त्र’ इति । यहाँ पर आधाराधेय भाव आश्रय का अर्थ नहीं है । गुणों में संघटना रहती नहीं है । उससे ‘राजाश्रय प्रकृतिवर्ग’, इसमें जैसे राजाश्रय तन्त्रस्वभाववाली उसके आधीन अर्थात् उसके मुख को देखनेवाली संघटना यह अर्थ प्राप्त होता है, यह भाव है ।
तारावतीयह बहुवचनान्त पाठ है। इस बहुवचन का अर्थ है—संघटनारसों को भी अभिव्यक्त करती है और भाव रसाभास भावाभास इत्यादि रसवर्ग के दूसरे असंलक्ष्यक्रमव्यङ्गयों को भी अभिव्यक्त करती है । इसी मन्तव्य से वृत्तिकार ने ‘रसादीन्’ की व्याख्या करते हुये ‘रस इत्यादिकों को’ यह लिखा है । ‘यहाँ पर विकल्प यह है’ इस वाक्य में ‘यहाँ पर’ का अर्थ है इस आधी कारिका में । विकल्प का अर्थ है त्रिकल्प से इस अर्थ समूह की कल्पना की जा सकती है अथवा व्याख्या की जा सकती है । वह अर्थसमूह क्या है?—गुण और संघटना की एकता या भेद, और भेद में भी गुणाश्रित संघटना या संघटनाश्रित गुण ये तीन पक्ष हैं जिनकी सम्भावना की जा सकती है। इन तीनो पक्षों के आधार पर
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किं पुत्रेवं विकल्पनस्य प्रयोजनमिति ? अभिधीयते—यदि गुणाः सङ्घटनाचेत्येकं तत्त्वं, सङ्घटनाश्रया वा गुणाः; तदा सङ्घटनाया एव गुणानाम नियतविषयत्वप्रसङ्गः । गुणानां हि माधुर्यप्रसादाद्रकषे: करुणादिप्रलम्भशृङ्गारविषय एव । रौद्रादिविप्रलम्भमोजः । माधुर्यप्रसादौ रसभावतदाभासविषयावेवेति विषयनियमो व्यस्तस्थितः । सङ्घटनासु तु विशिष्टत ।
( अनु० ) फिर इस विकल्प का प्रयोजन क्या है ? बतलाया जा रहा है—यदि गुण और संघटना दोनों एक तत्त्व हैं अथवा संघटना के अधीन गुण रहते हैं तो संघटना के समान गुणों में भी अनियत विषयता आजाने का दोष होगा । निस्सन्देह गुणों में माधुर्य और प्रसाद की अधिकता करण और विप्रलम्भ शृङ्गार के विषय में ही होती है । ओज का विषय रौद्र और अद्भुत इत्यादि ही होते हैं । माधुर्य और प्रसाद का विषय रस भाव तथा उनके आभास ही होते हैं । इस प्रकार गुणों के विषयका नियम व्यवस्थित है । संघटनाओं में वह विशिष्ट होता है ।
तारापत्ति
कारिका की व्याख्या की जा सकती है । किस प्रकार ? इसका उत्तर दे रहे हैं—एक ही पक्ष में आत्मभूत गुणों का आश्रय लेकर स्थित होनेवाली संघटना, यह अर्थ किया जा सकता है । यहाँ पर प्रश्न यह उठता है कि जब गुण और संघटना एक ही वस्तु हैं तब संघटना गुणों का आश्रय लेती है इस कथन का क्या अर्थ होगा ? इसका उत्तर यह है—प्रायः देखा जाता है कि किसी बात को समझाने के लिये किसी के स्वभाव में भेद की कल्पना कर ली जाती है और उस दिखलाये हुये भेद में यह कह दिया जाता है कि अमुक वस्तु अमुक के आश्रित है ।
उदाहरण के लिये शिशुपाल और वृत्त्त्व में भेद नहीं है फिर भी कह दिया जाता है कि वृत्त्त्व शिशुपाल में रहता है । दूसरे पक्ष में भेद को ! इस भेदवाद में यदि संघटना के आश्रित गुण रहते हैं यह पद्धति मानी जाती है तब उस पक्ष में इस कारिका का अर्थ होगा—संघटना ऐसे गुणों का आश्रय लेकर रसों को अभिव्यक्त करती है जो कि संघटना के आधेयभूत होते हैं ।
उदाहरण के लिये शिशुपाल और वृत्त्त्व में भेद नहीं है फिर भी कह दिया जाता है कि वृत्त्त्व शिशुपाल में रहता है । दूसरे पक्ष में भेद को ! इस भेदवाद में यदि संघटना के आश्रित गुण रहते हैं यह पद्धति मानी जाती है तब उस पक्ष में इस कारिका का अर्थ होगा—संघटना ऐसे गुणों का आश्रय लेकर रसों को अभिव्यक्त करती है जो कि संघटना के आधेयभूत होते हैं ।
मम्मटोक्त इत्यादि ने लिखा है कि गुण संघटना के धर्म होते हैं । यह तो प्रसिद्ध मार्ग ही है कि धर्मी धर्मों के आश्रित रहा करते हैं । यदि तीसरे पक्ष के अनुसार यह माना जावे कि संघटना गुण के आश्रित रहती है तब उस पक्ष में इस कारिका का अर्थ होगा—संघटना जो कि गुणों का आश्रय लेकर स्थित होती है ।
मम्मटोक्त इत्यादि ने लिखा है कि गुण संघटना के धर्म होते हैं । यह तो प्रसिद्ध मार्ग ही है कि धर्मी धर्मों के आश्रित रहा करते हैं । यदि तीसरे पक्ष के अनुसार यह माना जावे कि संघटना गुण के आश्रित रहती है तब उस पक्ष में इस कारिका का अर्थ होगा—संघटना जो कि गुणों का आश्रय लेकर स्थित होती है ।
अर्थात् जिसका स्वभाव गुणों से पराधीन होता है तथा जो गुण रूप ही नहीं होती वह संघटना रसों को अभिव्यक्त करती है । ‘गुण से पराधीन’ कहने का आशय यह है कि ‘गुण के आश्रित संघटना होती है’ इस वाक्य में
अर्थात् जिसका स्वभाव गुणों से पराधीन होता है तथा जो गुण रूप ही नहीं होती वह संघटना रसों को अभिव्यक्त करती है । ‘गुण से पराधीन’ कहने का आशय यह है कि ‘गुण के आश्रित संघटना होती है’ इस वाक्य में
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सङ्घटनाया इवेति । प्रथमपक्षे तादात्म्येन समानयोगाच्चेमत्वादितरत्र तु धर्मत्वेनेति भावः । मचत्वनियतविषयतेऽत्याश्रद्धयाह—गुणानां होती । हिरण्यदस्तुनत्वे वस्मुपपद्यते आपद्यते तु न्यायवलादित्यर्थः । स इति योज्यं गुणेष्वानियम उत्कोऽसावित्यर्थः ।
लोचन
'संघटन के समान' । यह भाव है कि प्रथम पक्ष में तादात्म्य के कारण उनका योगक्षेम समान होता है इसलिये अन्यत्र धर्म के कारण । 'अनियत विषयता हो' यह शक्का करके कहते हैं—'नि:संदेह गुणों का' । यहाँ 'हि' शब्द 'तु' शब्द के अर्थ में है । यह सिद्ध तो नहीं होता किन्तु न्याय के बल पर आ जाता है । 'वह' अर्थात् जो यह गुणों के लिये नियम वतलाया गया है वह ।
आश्रय का अर्थ आधाराधेयभाव नहीं है क्योंकि गुणों में संघटना रहती नहीं है । अपितु यहाँ पर आश्रय का प्रयोग उसी प्रकार का है जिस प्रकार का प्रयोग 'प्रकृति वर्ग राजा के आश्रय में रहता है' यह है । 'राजाश्रित भृत्य वर्ग का अर्थ है राजा के आश्रय के औचित्य से अमात्य इत्यादि प्रकृति होती है उसी प्रकार गुणों में परतन्त्र स्वभाववाली अर्थात् गुणों के अधीन या गुणमुखप्रेक्षिणी संघटना होती है, यह अर्थ प्राप्त हो जाता है ।
तारावती
अब प्रश्न उठता है कि इन वैकल्पिक पक्षों का विवेचन करने से लाभ क्या है ? इसी पर प्रस्तुत प्रकरण में विचार किया जा रहा है । पहला पक्ष लीजिये 'गुण और संघटना एक ही हैं या इनका तादात्म्य है' ऐसी दशा में इन दोनों का योगक्षेम एक सा ही होगा । जो बात संघटना में होगी वही बात गुणों में भी होगी ।
यदि दूसरा पक्ष लिया जावे अर्थात् यह स्वीकार किया जावे कि गुण संघटना के आधीन होते हैं तो गुणों को धर्म मानना पड़ेगा और संघटना को धर्मी । धर्मी की विशेषतायें धर्म में भी होना अनिवार्य है । ऐसी दशा में भी जो विशेषता संघटना में होगी वही गुणों में आ जावेगी । संघटना का विषय नहीं होता । असमासा, मध्यमसमासा और दीर्घसमासा तीनों प्रकार की संघटना कोमल और कठोर दोनों प्रकार के रसों को अभिव्यक्त करती है । यही बात गुणों में आ जावेगी अर्थात् माधुर्य और ओज दोनों गुण दोनों प्रकार के रसों के अभिव्यञ्जक माने जाने लगेंगे । अतएव उक्त दोनों पक्षों को मानने पर गुणों का विषय भी अनियत हो जावेगा । ( प्रश्न ) यदि गुणों का विषय भी अनियत हो ही जावे तो इसमें दोष क्या है ? ( उत्तर ) इसमें तो सन्देह नहीं कि गुणों का विषय नियत होता है। माधुर्य और प्रसाद का प्रकाश करुण तथा विप्रलम्भ श्रृङ्गार के विषय में ही होता है । ओज का प्रकाश रौद्र और अद्भुत इत्यादि के विषय में ही होता है ।
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तथाहि शृङ्गारेपि दीर्घसमासा दृश्यते रौद्रादिष्वसमासा चेति। तत्र शृङ्गारे दीर्घसमासा यथा—‘मन्दारकुसुमरेणुपिञ्जरितालका’ इति। यथा वा— अनवरतनयनजलनिपतनपरिमुषितपत्त्रलेखं ते। करतलनिपण्णमबले बदनमिति कं न तापयति॥ इत्यादौ। तथा रौद्रादिष्वसमासा दृश्यते। यथा—‘यो यः शस्त्रं विभर्ति स्वभुजगुरुमदः’ इत्यादौ। तस्माद् गुणदोषनास्वरूपा न च सङ्घटनाश्रया गुणाः॥
(अनु०) वह इस प्रकार—शृङ्गार में भी दीर्घसमासवाली संघटना देखी जाती है और रौद्र इत्यादि में भी समासरहित संघटना होती है। उसमें शृङ्गार में दीर्घ समास जैसे—‘मन्दारपुष्प रेणुसे पिञ्जरित अलकोंवाली’ अथवा— ‘निरन्तर नयनजल निपतन से नष्टपत्त्ररचनावाला, करतल पर निषण्ण तुम्हारा बदन हे अबले किसे सन्तप्त नहीं करेगा।’
तथा रौद्र इत्यादि में भी समासरहित संघटना देखी जाती है जैसे—‘यो यः शस्त्रं विभर्ति स्वभुजगुरुमदः’ इत्यादि। अतएव न गुण संघटना का रूप हैं न संघटना पर आश्रित।
तथास्ने लक्ष्यदर्शनमेव हेतुर्वेनाह—तथाहीति। दृश्यत इत्युक्तम्। दर्शनस्थानसुदाहरणमासूत्रयति—तत्रेति। नात्र शृङ्गारः कश्चिदित्याश्रितो द्वितीयसुदाहरणमाह—यथेति। एषा हि प्रणयकुपितनायिकाप्रसादनायोक्तिरन्याय्यस्येति। तस्मादिति। नैतदृश्याद् द्वयोरप्यनदूयं कारिकयां युक्तमिति यावत्।
‘तथा हि’ इत्यादि । एषा होने पर लक्ष्यदर्शन को ही हेतु के रूप में कहते हैं—‘तथाहि’ इत्यादि । ‘देखा जाता है’ हम कहे हुए वचनसमाथान उदाहरण को दिखलाते हैं—‘वहाँ जैसे’ । यह यहाँ पर कोई शृङ्गार नहीं है यह शङ्का करके दूसरा उदाहरण देते हैं—‘अथवा जैसे’ । यह प्रणयकुपिता नायिका के प्रसादन के लिये नायक की उक्ति है । ‘इससे’ अर्थात् ये दोनों व्याख्यान कारिका में उचित नहीं हैं ।
लोचन
और प्रसाद रस और रसाभास, भावाभास इत्यादि के विषय में ही होते हैं। कहने का आशय यह है कि गुणों का विषयनियम व्यवस्थित है। यहाँ पर ‘गुणानां हि’ में हि शब्द का अर्थ है ‘तु’ अर्थात् गुणों का तो विषयनियम व्यवस्थित है। यह बात तर्क के बल पर सिद्ध नहीं की जाती किन्तु अनेक लच्छ्यों पर विचार करने से सामान्य न्याय के बल पर स्वतः यह निष्कर्ष निकल आता है। गुणों में जो विषय की व्यवस्था बतलाई गई है संघटना में उसका व्यभिचार मिलता है अर्थात् संघटना में विषय की व्यवस्था ठीक रूप में लागू नहीं होती। संघटना में विषय-व्यवस्था
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किस प्रकार विघटित हो जाती है इसमें तर्क के रूप में लक्ष्य ही दिखलाये जा रहे हैं जहाँ यह व्यवस्था लागू नहीं होती। वह इस प्रकार कि नियमानुकूल शृङ्गार रस में समास नहीं होने चाहिये और रौद्र इत्यादि रसों में लम्बे समास होने चाहिये। किन्तु देखा जाता है कि 'कहा-कहीं शृङ्गार रस में लम्बे समास होते हैं' और रौद्र रस में समास होते हो नहीं। 'देखे जाते' हैं यह कहा गया था। अब जिन उदाहरणों में देखे जाते हैं उन स्थानों को सूत्ररूप में बतलाया जा रहा है।
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उसमें शृङ्गार रस में दीर्घ समास का उदाहरण जैसे 'मन्दारकुसुमरेणुपिञ्जरितालका' में दीर्घ समास है। इसका अर्थ है कि 'मन्दार पुष्प की धूल से नायिका के अलक पिङ्गल वर्ण के हो गये थे' यह शृङ्गार रस है। इस वाक्य में शृङ्गार रस की आलम्बनभूत नायिका के केशपाश के सौन्दर्य की प्रशंसा की गई है। अतः यह शृङ्गार रस है और इसमें दीर्घ समास विद्यमान हो है। अतः यह नहीं कहा जा सकता कि संघटना का विषय नियत होता है।
इस पर कोई कह सकते हैं कि प्रस्तुत वाक्य में भले ही नायिका के सौन्दर्य की प्रशंसा की गई हो किन्तु केवल इतने से वाक्य से ही शृङ्गार रस की कोई प्रतीति तो होती नहीं। शृङ्गार रस की पूर्ण प्रतीति के निमित्त पूरे प्रकरण के सामने होने की आवश्यकता है। अतः इस वाक्य से हो यह सिद्ध नहीं किया जा सकता कि संघटना का विषय नियत नहीं होता।
इस पर वृत्तिकार दूसरा उदाहरण दे रहे हैं—'अनवरत..................तापयति'। इस पद्य में पूरे प्रथम दल में शब्द को छोड़छाड़ एक लम्बा समास किया गया है। इसका अर्थ यह है— 'हे अवले तुम्हारा यह करतल पर रख्खा हुआ मुख किसके हृदये में सन्ताप उत्पन्न न करेगां जिसकी पत्तरचना निरन्तर जलविन्दुओं के गिरने से घुलकर नष्ट हो रही है।
यह प्रणय कुपिता नायिका के अभिव्यक्ति होती है। नायक की उक्ति है। अतएव यहाँ पर मान विप्रलभ शृङ्गार की अभिव्यक्ति होती है। नियमानुकूल सबसे अधिक समास सहित संघटना विप्रलभ शृङ्गार में हो होनी चाहिये। यहाँ पर दीर्घ समास होते हुये भी विप्रलभ शृङ्गार की अभिव्यक्ति हो जाती है।
अतः यह नहीं कहा जा सकता कि समास रहित संघटना ही विप्रलभ शृङ्गार की व्यञ्जना करती है। दूसरी व्यवस्था यह है कि दीर्घसमासा संघटना रौद्र इत्यादि रस को अभिव्यक्त करती है। किन्तु इस नियम का भी व्यभिचार देखा जाता है।
'यो यः शस्त्र विभर्ति स्वभुजगुरुमदः पाण्डवोनां चमूनाम्' इत्यादि वेणी संहार का पद्य कुपित भीमसेन की उक्ति है। यहाँ पर समास बिल्कुल नहीं किया गया है और समास का न करना ही रौद्र रस का विशेष रूप से अभिव्यञ्जक हो रहा है। अतः यह सिद्ध होगया कि संघटना का विषय नियत नहीं
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ननु यदि संघटनागुणानां नाश्रयस्तत्किमालम्बनं परिकल्प्यताम् । उच्यते प्रतिपादितमेवालम्बनम् ॥ तमर्थमवलम्बन्ते येऽलङ्कारास्ते गुणाः स्मृताः । अर्थमर्थिनामलङ्कारमन्त्रयाः कण्टकादिवत् ॥
अनु० (प्रश्न) यदि संघटनागुणों का आश्रय नहीं होती तो फिर इनके किस आलम्बन की कल्पना की जावे ? (उत्तर) कहा जा रहा है-इनके आलम्बन का प्रतिपादन तो पहले ही किया जा चुका है—‘उस अज्ञी अर्थ (रस) का जो अवलम्बन लेते हैं वे गुण माने जाते हैं । कटक इत्यादि के समान अलङ्कार अज्ञाश्रित माने जाने चाहिये ।
लोचन किमालम्बनमिति । शब्दार्थालम्बनत्वे हि तदलङ्काराभ्यः को विशेष इत्युक्तं चिन्त्यते । प्रतिपादितमेवेति । अस्मन्मूलकृतेऽर्थः । ‘किस सद्दारे से’ । भाव यह है कि शब्द और अर्थ का सहारा होने से उनके अलङ्कारों से क्या विशेषता है ? यह प्राचीनों ने कहा है । ‘प्रतिपादित ही किया गया है’ अर्थात् हमारे मूलकार के द्वारा । तारावती होता किन्तु गुणों का विषय नियत होता है । अतएव यदि संघटनागुणों की एकता मानी जावेगीं या संघटनाके आश्रित गुण माने जावेंगे तो यह दोष होगा कि संघटनाका धर्म गुणों में भी मानना पड़ेगा और गुणों को भी अनियत विषय ही माना जाने लगेगा । इस प्रकार ये दोनों पक्ष ठीक नहीं हैं और न इनके अनु-सार की हुई कारिका की व्याख्या ही ठीक है । (प्रश्न) यदि संघटनागुणों का आश्रय नहीं है तो गुणों के किस आश्रय की कल्पना की जावे ? प्रश्नकर्ता का आशय यह है कि गुण निराश्रय तो हो ही नहीं सकते, इनका कोई न कोई आधार तो मानना हो पड़ेगा । आधार के रूप में तीन ही तत्व माने जा सकते हैं शब्द, अर्थ और संघटन । शब्द और अर्थ गुणों का आश्रय माने नहीं जा सकते क्योंकि प्राचीनों ने कह दिया है कि यदि शब्द और अर्थ गुणों का आश्रय माने जावेंगे तो शब्दालङ्कार और अर्थालङ्कार से गुणों में भेद क्या रह जावेगा ? आशय यह है कि शब्दाश्रित काव्यतत्व शब्दालङ्कार कहलाते हैं, अर्थाश्रित काव्यतत्व अर्थालङ्कार कहलाते हैं । अब संघटन ही शेष रह जाती है जो कि गुणों का आश्रय मानी जा सकती है । यदि आप संघटनाको भी गुणों का आश्रय नहीं मानेंगे तो फिर गुणों का दूसरा आश्रय रह क्या जावेगा ? (उत्तर) इस शङ्का का समाधान तो हमारे मूल-कार (कारिका-कार) ने ही दे दिया है—
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अथवा भवन्तु शब्दाश्रया एव गुणा:; न चैषामनुप्रासादितुल्यत्वम् । यस्मादनुप्रासादयोऽनपेक्षितशब्दधर्माः एव प्रतिपादिताः। गुणास्तु व्यङ्ग्यविशेषावभासिवाच्यप्रतिपादनसमर्थशब्दधर्माः एव। शब्दधर्मत्वं चैषामनाश्रयत्वेऽपि शरीराश्रयत्वेनैव शौर्यादीनाम् ।
( अनुः ) अथवा शब्दाश्रय ही गुण होवें। इनका अनुप्रासादितुल्यत्व नहीं हो सकता। क्योंकि अनुप्रास इत्यादि शब्द के अर्थ की अपेक्षा न करनेवाले धर्म ही हैं यह प्रतिपादित किया जा चुका है। गुण तो विशेष व्यङ्ग्य के द्वारा अवभासित होनेवाले वाच्यार्थ के प्रतिपादन में समर्थ शब्दधर्म ही हैं। इनकी शब्दधर्मता शौर्य इत्यादि के शरीराश्रयत्व के समान दूसरे का आश्रय होते हुये भी मानी जाती है ।
अथवेति। न ध्वनकाश्रितत्वादेक्यं, रूपस्य संयोगस्य चैक्यप्रसङ्गात् । संयोगे द्वितीयसम्प्रधारणपक्षे चेद् । इहापि व्यङ्ग्योपकारकत्वाभ्युपगमेsसति समानता । न चायं मम स्थितः पक्षः, अपितु भवत्वेशामविचेकिनामभिप्रायेणापि शब्दधर्मत्वं शौर्यादीनामिव शरीरधर्मत्वम् । आविवेकी हि औपचारिकत्वविभागं विवेक्तुमसमर्थः। तथापि न कश्चिद्धोष इत्येवं परमतदुक्तमित्येतदाह--शब्दधर्मत्वमिति । अनाश्रयत्वेऽपोती ।
लोचन 'अथवा' । एक में आश्रित होने के कारण एकता नहीं कही जा सकती क्योंकि रूप और संयोग की भी एकता प्रसक्त हो जावेगी। यदि कहो कि 'संयोग में दूसरे की अपेक्षा होती है' तो यहाँ पर भी व्यङ्ग्य के उपकारक वाच्य की अपेक्षा है ही इस प्रकार यह पहले के समान है । यह मेरा पक्ष स्थित नहीं है, अपितु अविवेकियों के अभिप्राय से भी शौर्य इत्यादि के शरीरधर्म के समान इनका शब्दधर्मत्व मान लिया जावे । निस्सन्देह अविवेकी औपचारिकत्व ( गौणत्व ) का विभेद करने में असमर्थ होता है । तथापि कोई दोष नहीं है इस आशय से यह कहा है यह कहते हैं---'शब्दधर्मत्व' इत्यादि । 'अनाश्रयत्व में भी' अर्थात् आत्मनिष्ठत्व में भी ।
'उस अङ्गी अर्थ ( रस ) का जो आश्रय लेते हैं वे गुण माने गये हैं। कटक इत्यादि के समान अलङ्कार अङ्गाश्रित माने जाने चाहिये ।'
तारावती आश्रय यह है कि अलङ्कारों का आश्रय शब्द और अर्थ होते हैं और गुणों का आश्रय रस होते हैं । अतः संघटना गुणों का आश्रय नहीं मानी जा सकती । अथवा गुणों को शब्द के आश्रय में रहनेवाला भी माना जा सकता है ।
( प्रश्न ) यदि गुण रसाश्रित ही होते हैं तो वे अनुप्रास इत्यादि के समान क्यों
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नतु यदि शाब्दाश्रया गुणास्तत्सङ्घटनारूपत्वं तदाश्रयत्वं वा तेषां प्राप्तमेव । न ह्यसङ्घटिताः शब्दा अर्थविशेषप्रतिपादनपरसङ्घटनाश्रितानां गुणानामवाचकत्वादाश्रया भवन्ति । नैवम् । वर्णपदव्यञ्जनचत्वस्य रसादीनां प्रतिपादितत्वात् ।
(अनु०) (प्रश्न) यदि गुण शब्दाश्रय होते हैं तो उनका संघटनारूपत्व अथवा संघटनाश्रयत्व प्राप्त ही हो गया । निस्सन्देह असंघटित शब्द वाचक न होने के कारण अर्थविशेष के द्वारा प्रतिपाद्य रस इत्यादि के आश्रित गुणों के कमी आश्रय नहीं होते । (उत्तर) यह बात नहीं है । क्योंकि इस बात का प्रतिपादन किया ही जा चुका है कि रस इत्यादि की व्यञ्जना वर्ण और पद इत्यादि से होती है ।
तारावती
नहीं हो जाते ? (उत्तर) अनुप्रास इत्यादि शब्द का ऐसा धर्म होते हैं जिसमें अर्थ की अपेक्षा नहीं होती यह बात पहले ही बतलाई जा चुकी है । इसके प्रतिकूल गुण शब्द का ऐसा धर्म होते हैं जो व्यङ्ग्यार्थ को प्रकट करनेवाले वाच्यार्थ के प्रतिपादन में समर्थ हों । (प्रश्न) गुण भी शब्दाश्रित होते हैं और अनुप्रास इत्यादि भी शब्दाश्रित ही होते हैं फिर एकाश्रय होने के कारण दोनों की तुल्यता क्यों नहीं हो जाती ? (उत्तर) एकाश्रय में रहने के कारण कमी दो वस्तुयें एक नहीं हो जातीं । यदि एकाश्रय में रहने के कारण दो वस्तुयें एक हो जाती हैं तो रूप और संयोग भी एक हो जावेंगे । क्योंकि एक ही द्रव्य कचक इत्यादि में रूप भी रहता है और संयोग भी । (प्रश्न) संयोग को दूसरे पदार्थ की अपेक्षा होती है रूप को नहीं । फिर दोनों एक कैसे हो सकते हैं ? (उत्तर) यहां पर भी तो गुण को शब्द के अतिरिक्त व्यङ्ग्य के उपकारक वाच्य की अपेक्षा होती है । यह बात दोनों में एक सी हो है । यहां पर ध्यान रखने की बात यह है कि गुण शब्दाश्रित नहीं होते फिर भी शब्द के आश्रित उसी प्रकार कहे जाते हैं जिस प्रकार शौर्य इत्यादि शरीर के धर्म नहीं होते वे आत्मा के धर्म होते हैं किन्तु कहे शरीर के धर्म जाते हैं । आश्रय लोग शौर्य इत्यादि को शरीर का धर्म न होते हुये भी शरीर का धर्म कहने लगते हैं (उसे ज्ञानी लोग भी औपचारिक या लाक्षणिक प्रयोग मानकर सहन कर लेते हैं ।)
नहीं हो जाते ? (उत्तर) अनुप्रास इत्यादि शब्द का ऐसा धर्म होते हैं जिसमें अर्थ की अपेक्षा नहीं होती यह बात पहले ही बतलाई जा चुकी है । इसके प्रतिकूल गुण शब्द का ऐसा धर्म होते हैं जो व्यङ्ग्यार्थ को प्रकट करनेवाले वाच्यार्थ के प्रतिपादन में समर्थ हों । (प्रश्न) गुण भी शब्दाश्रित होते हैं और अनुप्रास इत्यादि भी शब्दाश्रित ही होते हैं फिर एकाश्रय होने के कारण दोनों की तुल्यता क्यों नहीं हो जाती ? (उत्तर) एकाश्रय में रहने के कारण कमी दो वस्तुयें एक नहीं हो जातीं । यदि एकाश्रय में रहने के कारण दो वस्तुयें एक हो जाती हैं तो रूप और संयोग भी एक हो जावेंगे । क्योंकि एक ही द्रव्य कचक इत्यादि में रूप भी रहता है और संयोग भी । (प्रश्न) संयोग को दूसरे पदार्थ की अपेक्षा होती है रूप को नहीं । फिर दोनों एक कैसे हो सकते हैं ? (उत्तर) यहां पर भी तो गुण को शब्द के अतिरिक्त व्यङ्ग्य के उपकारक वाच्य की अपेक्षा होती है । यह बात दोनों में एक सी हो है । यहां पर ध्यान रखने की बात यह है कि गुण शब्दाश्रित नहीं होते फिर भी शब्द के आश्रित उसी प्रकार कहे जाते हैं जिस प्रकार शौर्य इत्यादि शरीर के धर्म नहीं होते वे आत्मा के धर्म होते हैं किन्तु कहे शरीर के धर्म जाते हैं । आश्रय लोग शौर्य इत्यादि को शरीर का धर्म न होते हुये भी शरीर का धर्म कहने लगते हैं (उसे ज्ञानी लोग भी औपचारिक या लाक्षणिक प्रयोग मानकर सहन कर लेते हैं ।)
उसी प्रकार यदि कोई अविवेकी चाहे तो गुणों को शब्दों का धर्म कह सकता है । क्योंकि अविवेकी वही होता है जो औपचारिक का भेद न कर सके अर्थात् यह न जान सके कि मुख्य क्या है और गौण क्या है ? मुख्य पक्ष यही है कि गुण आत्मभूत रस के धर्म होते हैं । किन्तु यदि कोई उन्हें शब्दधर्म भी मानता है तो औपचारिक प्रयोऽ मानकर उसमें भी कोई दोष नहीं आता । इसी आश्रय से वृत्तिकार
उसी प्रकार यदि कोई अविवेकी चाहे तो गुणों को शब्दों का धर्म कह सकता है । क्योंकि अविवेकी वही होता है जो औपचारिक का भेद न कर सके अर्थात् यह न जान सके कि मुख्य क्या है और गौण क्या है ? मुख्य पक्ष यही है कि गुण आत्मभूत रस के धर्म होते हैं । किन्तु यदि कोई उन्हें शब्दधर्म भी मानता है तो औपचारिक प्रयोऽ मानकर उसमें भी कोई दोष नहीं आता । इसी आश्रय से वृत्तिकार
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शब्दाश्रया इति । उपचारेण यदि शब्देषु गुणास्तलेदं तात्पर्यम्——शृङ्गारादिरसाभिव्यञ्जकवाच्यप्रतिपादनसामर्थ्यमेव शब्दस्य माधुर्यम् । तच्च शब्दगतं विशिष्ट-घटनयैव लभ्यते । अथ सङ्घटनान व्यतिरिक्ता काचित्, अपितु सङ्घटितित एव शब्दा-स्तदाश्रिततं तथाशब्दधर्मामिति सङ्घटनाधितरमेवतथ्युक्तमवेत्यविति तात्पर्यम् । नतु शब्दधर्मत्वं शब्दैकात्मकत्वं वा तावतास्तु, किमयं मध्ये सङ्घटनानुप्रवेश इत्याशङ्क्य स एव पूर्वपक्षवाद्याह——न हीति । अर्थविशेषैरेव तु पदान्तरनिरपेक्षशुद्धपद-'शब्दाश्रय' इत्यादि । उपचार से यदि शब्दों में गुण होते हैं तो यह तात्पर्य
है——शृङ्गाररसाभिव्यञ्जकवाच्यप्रतिपादन सामर्थ्य ही शब्द का माधुर्य है । और शब्दगत वह ( माधुर्य ) विशिष्ट सङ्घटना से ही प्राप्त होता है, यदि कहो कि सङ्घटना कोई व्यतिरिक्त वस्तु नहीं है अपितु सङ्घटित शब्द ही ( सङ्घटना है ) तात्पर्य यह है उन ( सङ्घटित शब्दों ) के आश्रित वह पूर्वोक्त सामर्थ्य सङ्घटनाश्रित हो है यह बात कही हुई कहो जाती है ।
'शब्दधर्मत्व अथवा शब्दैकाश्रयत्व उतने से ही ( गुणों के शब्दाश्रयत्व से ही ) सिद्ध हो जावें यह बीच में सङ्घटना का क्या अनुप्रवेश ?' यह शङ्का करके वही पूर्वपक्षवादी कहता है——'नहि' इत्यादि । भाव यह है कि पदान्तरनिरपेक्ष शुद्ध पद
ने लिखा है कि 'अन्याश्रित होते हुये भी जिस प्रकार शौर्य इत्यादि शरीर के आश्रित कहे हैं उसी प्रकार गुण भी शब्दधर्म कहे जाते हैं ।' यहाँ पर अन्याश्रित का अर्थ है आत्मनिष्ठ । अर्थात् जैसे आत्मनिष्ठ होते हुये भी शौर्य इत्यादि शरीर का धर्म कहे जाते हैं उसी प्रकार रसादि आत्मनिष्ठ होते हुये भी गुण शब्दधर्म कहे जाते हैं ।
( प्रश्न ) यदि गुण शब्दाश्रित होते हैं तो उनका सङ्घटनालुप्तत्व या सङ्घटनाश्रयत्व स्वभावतः सिद्ध हो गया । आशय यह है कि जब आप यह कहते हैं कि शब्दों में गुणों का औपचारिक प्रयोग होता है तब उसका तात्पर्य यही माना जा सकता है कि शब्द की मधुरता शब्दों के उस सामर्थ्य को ही कहते हैं जिसके द्वारा ऐसे वाच्यार्थ का प्रतिपादन किया जा सके जो कि शृङ्गार इत्यादि रसों का अभिव्यञ्जक हो । यदि शब्दों में इस प्रकार के वाच्यार्थ को प्रकट करने की शक्ति नहीं होती तो वहाँ पर शब्दों का माधुर्य भी नहीं माना जा सकता । शब्द के अन्दर वाच्यार्थ
को कहने की शक्ति सङ्घटना के द्वारा ही आती है । कचोंकि सङ्घटना कोई पृथक् वस्तु तो है नहीं अपितु सङ्घटित शब्दों को ही सङ्घटना कहते हैं । शब्दों में व्यङ्ग्यार्थाभिव्यञ्जक वाच्यार्थ को प्रकट करने के सामर्थ्य का तात्पर्य यही है सङ्घटनाश्रित सामर्थ्य । ( प्रतिप्रश्न )
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वाच्यै: सामान्यै: प्रतिपद्या व्यङ्ग्या ये रसभावतदाभासतत्प्रशमास्तदाश्रितानां चुरुतया तत्र्रिष्ठानां गुणानामसहृटितै: शब्दै: न भवन्त्युपचारेगापीतित भाव: । भत्र हेतु:-अवाचकत्वादिति । न ह्यसहृटितै: व्यङ्गचोपयोगिनिराकाड्क्षरुपवाच्यमाहुरित्यर्थ: । एतद्वारिहित—नवविधाविति । वर्णव्यङ्गचया हि यदत्रद्र्घ उत्कृष्टावचवाचकस्यापि पदस्य श्रवणमात्रावसेयेन स्वसौभाग्येन वर्णव्यदेव यद्र्सामिव्यक्तिहेतुत्वं स्फुटतमेव लभ्यत इति तदेव माधुर्यादिति किं सङ्घटनया। तथा च पदन्यङ्गच्यो यावद्वानिरुक्तस्तावच्चुच्द- स्प्यापि पदस्य स्वार्थस्मारकत्वेनापि रसामिव्यक्तियोग्यार्थावभासकत्वमेव माधुर्यादिति तत्रापि क: संघटनाया उपयोग: ? वाच्य सामान्यो के द्वारा नहिं अपितु अर्थविशेषों के द्वारा रस, भाव, उनके आभास और उनके प्रशम ये जो व्यङ्गच्य, उनके आश्रित अर्थात् मुख्य रूप से उनमें रहने- वाले गुणों के आश्रय असंघटित शब्द उपचार के द्वारा भी नहीं हो सकते । इसमें हेतु है—‘अवाचकत्व के कारण’ । निस्सन्देह असंघटित ( शब्द ) व्यङ्गच्योपयोगी निराकाङ्क्ष रूप वाच्य को नहीं कहाते । इसका उत्तर देते हैं—‘ऐसा नहीं है—’ क्योंकि जब वर्णव्यङ्गच्य भी रस बतलाया गया है तब अवाचक भी पद के श्रवणमात्र से ज्ञात होने योग्य अपने सौभाग्य से वर्ण के समान ही जो रसाभिव्यक्ति हेतुत्व स्पष्ट ही उपलब्ध होता है वही माधुर्य इत्यादि है । संघटन का क्या आवश्यकता ? और भी जब पदव्यङ्गच्य भी ध्वनि कही गई है तो शुद्ध भी पद के स्वार्थस्मारकत्व के द्वारा भी रसाभिव्यक्ति के योग्य अर्थ का अवभासन करना माधुर्य इत्यादि है, उसमें भी संघटन का क्या उपयोग ?
वाच्य सामान्य के द्वारा नहीं अपितु अर्थ विशेषों के द्वारा रस, भाव, उनके आभास और उनके प्रशम ये जो व्यङ्ग्य हैं, उनके आश्रित अर्थात् मुख्य रूप से उनमें रहने वाले गुणों के आश्रय असंघटित शब्द उपचार के द्वारा भी नहीं हो सकते । इसमें हेतु है—‘अवाचकत्व के कारण’ । निस्सन्देह असंघटित ( शब्द ) व्यङ्ग्योपयोगी निराकाङ्क्ष रूप वाच्य को नहीं कहाते । इसका उत्तर देते हैं—‘ऐसा नहीं है—’ क्योंकि जब वर्णव्यङ्ग्य भी रस बतलाया गया है तब अवाचक भी पद के श्रवणमात्र से ज्ञात होने योग्य अपने सौभाग्य से वर्ण के समान ही जो रसाभिव्यक्ति हेतुत्व स्पष्ट ही उपलब्ध होता है वही माधुर्य इत्यादि है । संघटन का क्या आवश्यकता ? और भी जब पदव्यङ्ग्य भी ध्वनि कही गई है तो शुद्ध भी पद के स्वार्थस्मारकत्व के द्वारा भी रसाभिव्यक्ति के योग्य अर्थ का अवभासन करना माधुर्य इत्यादि है, उसमें भी संघटन का क्या उपयोग ?
तारावती शब्दाश्रितत्व और सङ्घटनाश्रितत्व दोनों एक ही वस्तुत्व हैं ( अर्थात् एक ही पदार्थ हैं या तो संघटन और गुण एक ही तत्त्व हैं या गुण सङ्घटना के अधीन रह कर करते हैं—एक प्रश्न और उत्पन्न होता है । ) गुणों को हम शब्दधर्म मान सकते हैं या शब्दाश्रित मान सकते हैं । यह बीच में सङ्घटना क्यों सम्मिलित की जा रही है ? ( प्रतिपक्षी ) ( उक्त प्रतिप्रश्न के उत्तर में प्रतिपक्षी अपने प्रश्न को और अधिक हृदयतथा स्पष्टता के साथ प्रस्तुत कर रहा है । ) 'रसों की निष्पत्ति विशेष प्रकार के वाच्यार्थ द्वारा होती है । वे रस ही गुणों का आश्रय होते हैं । अतः रसों पर आश्रित रहने वाले गुण कभी भी असंघटित शब्दों को अपने आश्रय के रूप में स्वीकार नहीं कर सकते । क्योंकि गुणों का आश्रय वे ही शब्द हो सकते हैं जिनमें वाच्यार्थ का पर्यवसान होकर रसनिष्पत्ति की भूमिका सम्पन्न हो सके । वाच्यार्थ का पर्यवसान कभी भी असंघटित शब्दों में नहीं होता । अतः गुणों के आश्रय भी असंघटित शब्द नहीं हो सकते । प्रतिपक्षी का मन्तव्य यह है कि रस, भाव, रसाभास, भाव-
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भास, भावप्रधान इत्यादि सर्वदा व्यङ्ग्यार्थ ही होते हैं । इनकी व्याख्या विशेष प्रकार के अर्थों से ही होती है । ( उस विशेष अर्थ को कहनेवाले सङ्केतित तथा साकांक्ष पद ही होते हैं । ) रस इत्यादि की व्यञ्जना ऐसे शब्दों से कभी नहीं होती जिनको दूसरे पदों की अपेक्षा बिल्कुल न हो । जिनको केवल शुद्ध पद की संज्ञा प्रदान की जा सके और जो सामान्य रूप में अर्थ के बोधक हों अर्थात् जो केवल पदमात्र के अर्थ के परिचायक हो । इस प्रकार के व्यङ्ग्यार्थों को अभिव्यक्त करनेवाले वाच्यार्थ के बोधक शब्दों के आश्रित ही गुण मुख्य रूप में माने जाते हैं । इस प्रकार उन शब्दों में रहनेवाले गुणों के आश्रय असङ्केतित शब्द उपचार से भी नहीं होते । उपचार से भी असङ्केतित शब्दों के गुणों के आश्रय न होने का हेतु है उन शब्दों का वाचक न होना । इसका अर्थ यह है कि असङ्केतित शब्द व्यङ्ग्योपयोगी निराकांक्ष वाच्यार्थ को कभी प्रकट नहीं कर सकते । इस प्रकार शब्दसङ्केतना को या तो गुणों से अभिन्न मानना चाहिये या गुणों का आश्रय मानना चाहिये । ( प्रतिपत्ती की इस लम्बी-चौड़ी स्थापना का सार यही है कि सङ्केतित शब्द ही वाचक होकर व्यङ्ग्य रस की अभिव्यक्ति में निमित्त होते हैं और वे ही गुणों का आश्रय-औपचारिक रूप में ही सही, माने जाते हैं । असङ्केतित शब्द न वाचक होते हैं न व्यञ्जक । अतः गुण शब्दधर्म होते हैं कहने का स्पष्ट अर्थ यही है कि गुण और सङ्केतना या तो एक ही वस्तु हैं या गुण सङ्केतना के आश्रित रहते हैं । ) अब इसका उत्तर दिया जा रहा है । ( उत्तर ) जब यह सिद्ध ही किया
जा चुका कि वर्ण और पद से भी रस इत्यादि की व्यञ्जना होती है तथ सङ्केतना निरपेक्ष गुणों के द्वारा रसाभिव्यक्ति के मानने में आपत्ति ही क्या रह गयी ? वर्ण के द्वारा रसाभिव्यक्ति मानने से यह सिद्ध हो जाता है कि व्यङ्ग्यार्थप्रतिपत्ति में अर्थ की बिल्कुल अपेक्षा नहीं होती और पद के द्वारा रसाभिव्यक्ति के सिद्धान्त से यह बात स्पष्ट हो जाती है कि पदान्तरनिरपेक्ष केवल स्वार्थ का बोधक भी पद अभिव्यञ्जक होता है । जब केवल वर्ण के द्वारा रसाभिव्यक्ति अज्ञीं कृ त की जा चुकी है तब यह स्पष्ट हो जाता है कि वह अवाचक पद भी रसाभिव्यक्ति में हेतु हो जाता है जिसका सौभाग्य वर्ण के समान श्रवणमात्र से ज्ञात हो रहा हो । वही पद माधुर्य गुण की सीमा में आता है उसके लिये सङ्केतना की क्या आवश्यकता ? इसी प्रकार जब पद को भी ध्वनि का अभिव्यञ्जक माना जा चुका है तब शुद्ध भी पद अपने अर्थ का स्मरण कराते हुये रस की अभिव्यक्ति के योग्य अर्थ को प्रकट कर देता है और उसी को माधुर्य इत्यादि गुणों के नाम से पुकारने लगते हैं उसमें भी सङ्केतना का क्या उपयोग ? ( उक्त विस्तृत विवेचन का निष्कर्ष यह है—
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अभ्युपगते वा वाक्यव्यतिरिच्यतवे रसादीना न नियता काचित् सङ्घटना तेषामाश्रयत्व प्रतिपद्यत इत्यनियतसङ्घटनाश्रयदा एव गुणाना वयङ्ग्यविशेषानुगता आश्रया: ।
( अन० ) रस इत्यादि की वाक्यव्यतिरिच्यता के अज्ञान कर लेने पर भी कोई भी निश्चित सङ्घटना उनके आश्रयत्व को प्राप्त नहीं होती । अतएव अनियत सङ्घटनावाले शब्द ही विशेष प्रकार के व्यङ्गच्य से अनुगत होकर गुणों का आश्रय हो जाते हैं ।
लोचन ननु वाक्यव्यतिरिच्य ध्वनौ तद्य्वश्यमजुप्रवेष्टव्य सङ्घटनया स्वसौन्दर्य वाच्यसौन्दर्य वा तथा विना कुत इत्याशङ्कयाह-अभ्युपगते इति । वा शब्दोऽपिशब्दार्थे, वाक्यव्यतिरिच्यत्वेऽपोच्यते योस्य: एतदुचुनं भवति--अनुप्रविशतु तत् सङ्घटना न हि तस्या: सविधानं प्रत्यवकृमहे । किन्तु माधुर्येस्य न नियता सङ्घटना आश्रयो वा स्वरूपं वा 'तो वाक्यव्यतिरिक्त ध्वनि में अवश्य ही सङ्घटना को प्रविष्ट होना चाहिये, स्वसौन्दर्य या वाच्यसौन्दर्य उसके बिना कैसे ?' यह शङ्का करके कहते हैं--'अभ्युपगते इति ।' वा शब्द अपि शब्द के अर्थ में है । यहाँ पर वाक्यव्यङ्गचत्व में भी यह योजना की जानी चाहिये । यह बात कही गई है-- सङ्घटना उसमें प्रवेश करे, उसकी निकटता का हम प्रत्याख्यान नहीं करते । किन्तु नियत सङ्घटना न माधुर्य का आश्रय है और न स्वरूप । क्योंकि उसके बिना
तारावती ( १ ) गुणों का आश्रय मुख्यरूप में रस ही होते हैं किन्तु औपचारिक रूप में उन्हें शब्दाश्रित भी माना जा सकता है । ( २ ) गुणों का आश्रय वनने के लिये इस बात की आवश्यकता नहीं कि शब्द सङ्घठित ही हों, वर्ण और पद के समान असङ्घठित पद भी रसाभिव्यक्ति में हेतु हो सकते हैं और वे ही माधुर्य इत्यादि गुणों के नाम से पुकारे जा सकते हैं । ( ३ ) इस प्रकार वामन का यह मत ठीक नहीं कि सङ्घटना और गुण दोनों एक ही हैं । ( ४ ) इसी प्रकार भट्टोद्डट का यह मत भी ठीक नहीं कि गुण सङ्घटना पर आधारित होते हैं ।
( प्रश्न ) पदव्यङ्गचध्वनि में सङ्घटना न भी मानें तब भी वाक्य से व्यक होनेवाली रसध्वनि में सङ्घटना का प्रयोग होना ही चाहिये । बिना सङ्घटना के वाक्य में अपना सौन्दर्य किस प्रकार हो सकता है और वाच्यार्थ का भी सौन्दर्य किस प्रकार हो सकता है ? ( उत्तर ) रसध्वनि की वाक्य से अभिव्यक्ति मानने पर भी कोई निश्चित सङ्घटना रसादिकों का आश्रय नहीं वनती । अतएव ऐसे शब्द जिनकी कोई सङ्घटना नियत न हो जब किसी विशेष प्रकार के व्यङ्गच्य का अनुगमन
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ननु माधुर्ये यदि नामैवमुच्यते तदुच्यताम्; ओजसः पुनः कथमनियतसङ्घटनशब्दाश्रयत्वम् । न ह्यसमासा सङ्घटनैव कदाचिदोजस आश्रयतां प्रतिपद्यते । उच्यते यदि न प्रसिद्धिमात्रग्रहणदूषणितं चेतस्तदत्रापि न न ब्रमः । ओजः कथंसमासा सङ्घटनाश्रयः ? यतो रौद्रादीन् हि प्रकाशयतः काव्यस्य दीप्तिरोज इति प्राक्प्रतिपादितम् । तचौजो यद्यसमासायामपि सङ्घटनायां स्यात्तत्को दोषो भवेत् । न चाचारुत्वं सहृदयहृदयसवेद्यमस्ति । तस्मादनियतसङ्घटनशब्दाश्रयत्वे गुणानां न काचित् हानिः । तेषां तु चक्षुरादीनामिव यथास्वं विषयनियमितस्य न कदाचिदून्याभिधारः । तस्मादन्ये गुणाः अन्य च सङ्घटनाः । न च सङ्घटनाश्रिता गुणा इत्येकं दूषणम् ।
( अनुः० ) ( प्रश्न ) यदि माधुर्य के विषय में ऐसा कहा जाता है तो कहा जावे किस प्रकार अनियत संघटनावाले शब्द ओज के आश्रय हो सकते हैं ? समासरहित संघटना कभी ओज के आश्रयत्व को प्राप्त नहीं हो सकती । इस पर कहा जा रहा है—यद्य प्रसिद्धिमात्र के ग्रहण का दोष ( चित्त में न न उत्पन्न हो गया हो तो वहाँ पर भी हम ' न ' नहीं कह सकते ( अर्थात् वह नहीं कह सकते कि असमासा संघटना से ओज की अभिव्यक्ति नहीं होती ! ) असमासा संघटना ओज का आश्रय क्यों नहीं हो सकती । क्योंकि रौद्र इत्यादि को प्रकाशित करनेवाली दीप्ति को निस्सन्देह ओज कहते हैं यह पहले ही प्रतिपादित किया जा चुका है । वह ओज यदि असमासा संघटना में भी हो तो क्या दोष आजावेगा । यहाँ पर अचारुता सहृदयसंवेद्य है ही नहीं । अतएव गुणों का आश्रय अनियत संघटना को मानने पर कदापि दोष नहीं आता । चक्षु इत्यादि के समान उन गुणों का स्वरूप सर्वदा विषय के द्वारा नियमित होता है और उसमें कभी व्यभिचार नहीं आता । इस प्रकार यह सिद्ध हो गया कि गुण अन्य वस्तु हैं और संघटना अन्य वस्तु । संघटना के आश्रित गुण नहीं होते यह एक सिद्धान्त हुआ ।
तथा विना वर्णपदन्यद्ये रसादौ भावान्माधुर्यादौः वाक्यगत्प्रयोडपि तादृशः सङ्घटनां विहायापि वाक्यस्य तद्रसग्यस्स्कतवाक्सङ्घटना सन्निहितापि रसगत्कावप्रयोजिकेति । तस्मादौपचारिकत्वेऽपि शब्दाश्रया एव गुणाः । इत्युपसंहरति—शब्दा एवेति । वर्णपदव्यतिरिक्त रस इत्यादि में भी माधुर्य इत्यादि होता है । वाक्यव्यतिरिक्त में भी वाक्य की उस प्रकार की संघटना को छोड़कर भी वाक्य के उस रस को व्यक्त करनेवाले के कारण सन्निहित भी संघटना रसाभिव्यक्ति में प्रयोजिका नहीं होती । इसलिये औपचारिकत्व में भी शब्दाश्रय ही गुण होते हैं । यह उपसंहार कर रहे हैं—' शब्द ही ।
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ननिवृति । वाक्यव्यङ्ग्यध्वन्यिमप्रायेणदं मन्तव्यमिति केचित् ।
वयं तु ब्रूमः—वर्णपदव्यङ्ग्येऽङ्योजसि रौद्रादिस्वभावे वर्णपदानामेकाकिनां स्वसौन्दर्यमपि न तादृगुण्मीलति ताव्यावत्तानि सङ्घटनाद्धितानि न कृतान्निति सामान्यान्नैवाय पूर्वपक्ष ईति । प्रकाश्यते हि—'लक्षण हेतवो हि शत् प्रत्ययः । ननु इति !'
कुछ लोग यह कहते हैं कि वाक्य व्यङ्ग्य ध्वनि के अभिप्राय से यह माना जाना चाहिये । हम तो कहते हैं—वर्ण पद व्यङ्ग्य भी रौद्र इत्यादि स्वभाववाले ओजमें एकाकी वर्ण तथा पदों का स्वसौन्दर्य भी उतना तव तक नहीं होता जव तक संघटना से अध्कित न किये गये हों इस प्रकार सामान्यरूप से ही यह पूर्वपक्ष है । 'लक्षण हेतवो:' से शत्प्रत्यय हो जाता है ।
करते हैं तब वे शब्द ही गुणों का आश्रय हो जाते हैं । यहाँ पर 'अभ्युपगते वा वाक्यव्यङ्गयत्वे' में 'वा' का प्रयोग 'अपि' के अर्थ में हुआ है । इसीलिये यहाँ पर अर्थ क्रिया गया है 'वाक्यव्यङ्गयत्वस्य के स्वीकार कर लेने पर भी' । आश्रय यह है कि हम वाक्य में सङ्घटना का तो खण्डन करते ही नहीं । वाक्य में संघटना सन्निहित रहे; उसके सन्निधान में हमें कोई आपत्ति नहीं ।
किन्तु कोई भी निश्चित संघटना न तो माधुर्य का आश्रय होती है और न उसका स्वरूप ही होती है । क्योंकि जवकि बिना संघटना के वर्ण और पद से व्यक् होनेवाले रस इत्यादि में माधुर्य इत्यादि देखा जाता है तथा वाक्य के द्वारा व्यक् होनेवाले रस इत्यादि में भी उस प्रकार की संघटना को छोड़कर अन्य प्रकार से भी वाक्य को संघटित कर देने पर भी वह वाक्य उस रस को अभिव्यक् करता ही रहता है;
इससे मानना ही पड़ेगा कि सन्निहित भी संघटना रसाभिव्यक्ति में प्रयोजिका नहीं होती । अतएव इसीलिये वृत्तिकार ने उपसंहार करते हुए लिखा है कि 'शब्द ही विशेष प्रकार के व्यङ्गय से अनुगत होकर गुणों का आश्रय बनते हैं ।' ( इस विवेचन का आश्रय यही है कि वर्ण और पद के द्वारा अभिव्यक्त होनेवाली रसध्वनि में संघटना का प्रश्न उठता ही नहीं ।
वाक्यव्यङ्गय रसध्वनि में संघटना विधमान होती है । किन्तु वह अभिव्यञ्जना की प्रयोजिका नहीं होती क्योंकि यदि वाक्य की संघटना को बदल कर उस वाक्य को अन्य प्रकार से संघटित कर दिया जावे तो भी रसध्वनि बनी ही रहती है । इससे निष्कर्ष यह निकलता है कि असंघटित शब्द ही गुणों का आश्रय होते हैं ।)
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लोचन रौद्रादि प्रकाशनालक्षणमोज इति भावः। न चेतिच। च शब्दो हेतौ। यस्मात् 'यो यः शास्त्रे' इत्यादौ नञ्चारुत्वप्रतिभाति तस्मादित्यर्थः। तेषां तत्रिति। गुणानाम् यथास्वमिति 'शृङ्गार एव परमो मनःप्रह्लादनो रसः' इत्यादिना च विषय नियम उक्त एव। अर्थात् ओज रौद्र इत्यादि के प्रकाशन से भलीभाँति लक्षित होता है। 'न च' इति। 'च' शब्दो हेतौ में है। अर्थात् क्योंकि 'यो यः शास्त्रं' इत्यादि में अचाछुत्वप्रतीत नहीं होती इसलिये। 'तुका तो' अर्थात् गुणों का। 'यथास्वम्' इति। 'शृङ्गार ही मनका परम प्रह्लादन रस है' इसके द्वारा विषयनियम कह ही दिया गया है।
( प्रश्न ) यदि आप माधुर्य के विषय में यह बात कहन चाहते हैं कह भी सकते हैं। ( क्योंकि शृङ्गार की व्यञ्जना अधिकतर तो समासरहित संघटना से ही होती है; किन्तु कभी-कभी दीर्घसमासवाली संघटना से भी शृङ्गार रस की अभिव्यक्ति हो जाती है। अतः माधुर्य गुण के विषय में संघटना के नियत होने का नियम नहीं रहता। ) किन्तु ओज गुण के लिये आप यह किस प्रकार कह सकते हैं कि ओज ऐसे शब्दों के आधीन रहता है जिनकी संघटना नियत नहीं होती? किन्हीं लोगों ने ( चन्द्रिकाकार ने ) माना है कि यह पूर्वपक्ष वाक्यव्यङ्ग्य रस इत्यादि के विषय में ही है ( क्योंकि संघटना वाक्य में ही सम्भव है। ) इस पर हमारा ( लोचन-कार का ) कहना यह है कि यह बात आप केवल वाक्यव्यङ्ग्य ध्वनि के विषय में ही नहीं सकते किन्तु यही बात आप वर्ण और पद व्यङ्ग्य ध्वनि के विषय में भी कह सकते हैं। कारण यह है कि रौद्रादि स्वभाववाला ओज गुण जहाँ पर वर्ण या पद के द्वारा प्रकाशित होगा वहाँ पर अकेला वर्ण या अकेला पद किसी प्रकार भी अपनी उतनी सुन्दरता प्रकट नहीं कर सकेगा। आशय यह है कि ओजगुण सर्वदा संघटना के ही आश्रित होता है वह माधुर्य इत्यादि के समान कभी संघटना से पृथक् रह ही नहीं सकता। इस प्रकार यह पूर्वपक्ष सामान्यतया ओजगुण के विषय में ही है। केवल वाक्यव्यङ्ग्य रसध्वनि के विषय में नहीं।
( उत्तर ) यदि प्रसिद्धिमात्र को मानने यह बात नहीं। ( आशय यह है कि यह बात प्रसिद्ध हो गई है कि ओजगुण में दीर्घसमास का होना अनिवार्य है। प्रतिपक्षी केवल उसी प्रसिद्धि को लेकर अपनी बात पर डटा हुआ है और जैसे-तैसे उस पुरानी बात को सिद्ध करना चाहता है। किन्तु विचार उन्मुक्त होने चाहिये। पुरानी लकीर का फकीर होना भी एक दोष है। यदि दाप को छोड़ दिया जावे तो सरलतापूर्वक समझ में आ सकता
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अथवा सङ्क्षटनारूपा एव गुणाः । यत्कथम्—‘सङ्क्षटनावद्गुणानामध्यनियमविषयत्वं प्राप्तोति । लक्ष्ये व्यभिचारदर्शनात्’ इति । तत्रोयेतदुच्यते—यत्र लक्ष्ये परिकलिप्ताविषयत्वस्याभिचारस्तद्रूपमेवास्तु । कथमचारुत्वं ताहशे विषये सहृदयैर्नाभिमत इति चेत् ? काव्यशक्त्यतिरोहितत्वात् । द्विविधो हि दोषः—कवेर- युत्पत्तिकृतोऽशक्तिकृतश्च । तत्रायुत्पत्तिकृतो दोषः शक्तितिरस्कृतस्याल्कदाच्चित्र लभ्यते । यस्तु शक्तिकृतो दोषः स भवति प्रतीतः । परिकलोकस्वात्त्र्य-
(अनु०) अथवा सङ्क्षटनारूप ही गुण होते हैं । जोकि यह कहा गया था कि ‘सङ्क्षटना के समान गुणों की भी अनियमविषयता प्राप्त हो जावेगी क्योकि लक्ष्य में व्यभिचार देखा जाता है ।’ उस पर यह कहा जा रहा है कि जिस लक्ष्य में परिकलिप्त विषय का व्यभिचार देखा जावे उसको विशिष्ट ही मान लिया जाना चाहिये । उस प्रकार के विषय में सहृदयों को अचारुत्व का अवभास क्यों नहीं होता इसका उत्तर यह है । दो प्रकार का दोष होता है—कवि की अयुक्तिपत्ति से उत्पन्न और कवि की अशक्ति से उत्पन्न । उसमें अयुक्तिपत्तिकृत दोष कवी की शक्ति से तिरोहित होकर प्रतीत नहीं होता । किन्तु अशक्तिकृत दोष तो शीघ्र हो प्रतीत हो जाता है । इस विषय में एक परिकर इलोक भी है—
लोचन
अथ वेति । रसादिव्यक्तावेतदेव सामर्थ्यं शब्दानां यत्तथा तथा संघटनामात्र- मिति भावः ।
'अथवा' यह । भाव यह है कि रसाभिव्यक्ति में शब्दों का इतना ही सामर्थ्य है कि उस प्रकार से संघटित कर दिये जावें ।
तारावती
है कि ओज के लिये दीर्घ समास का होना अपरिहार्य नहीं है । असमासा संघटना ओज को प्रकाशित क्यों नहीं कर सकती? यह पहले ही बतलाया जा चुका है कि रौद्र इत्यादि रसों को प्रकाशित करनेवाली दीप्ति को ओज कहते हैं । यहाँ पर ‘प्रकाशयतः’ इस शब्द में णत्वप्रत्यय ‘लक्षणहेतुयोः’ इस पाणिनिसूत्र से हुआ है । इसका अर्थ यह है कि रौद्र इत्यादि के प्रकाशन से ही ओज लक्षित होता है । यदि वह ओज समास रहित सङ्क्षटना के द्वारा भी हो तो क्या दोष हो जावेगा ? ‘यो यः शास्त्रं बिभर्ति स्वभुजगुरुमदः’ इत्यादि पद्य में कोई अचारुता तो प्रतीत नहीं होती । अतएव यदि गुणों को असङ्क्षटित शब्दों के आश्रित मानें तब भी कोई दोष नहीं होता । गुणों के विषय तो उसी प्रकार नियत हैं जिस प्रकार इन्द्रियों के
है कि ओज के लिये दीर्घ समास का होना अपरिहार्य नहीं है । 2) असमासा संघटना ओज को प्रकाशित क्यों नहीं कर सकती? यह पहले ही बतलाया जा चुका है कि रौद्र इत्यादि रसों को प्रकाशित करनेवाली दीप्ति को ओज कहते हैं । यहाँ पर ‘प्रकाशयतः’ इस शब्द में णत्वप्रत्यय ‘लक्षणहेतुयोः’ इस पाणिनिसूत्र से हुआ है । इसका अर्थ यह है कि रौद्र इत्यादि के प्रकाशन से ही ओज लक्षित होता है । यदि वह ओज समास रहित सङ्क्षटना के द्वारा भी हो तो क्या दोष हो जावेगा ? ‘यो यः शास्त्रं बिभर्ति स्वभुजगुरुमदः’ इत्यादि पद्य में कोई अचारुता तो प्रतीत नहीं होती । अतएव यदि गुणों को असङ्क्षटित शब्दों के आश्रित मानें तब भी कोई दोष नहीं होता । गुणों के विषय तो उसी प्रकार नियत हैं जिस प्रकार इन्द्रियों के
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विषय नियत होते हैं। जैसे इन्द्रियों के विषयों में कभी व्यभिचार नहीं आता उसी प्रकार गुणों के विषयों में भी कभी व्यभिचार नहीं आता। (आशय यह है कि जिस प्रकार नेत्र का विषय है रूप और कान का त्रिषय है शब्द। ये विषय नियत हैं। कभी ऐसा नहीं हो सकता कि कानों का कानों आँख करने लगे और आँख के विषय रूप को कान देखने लगे। इसी प्रकार गुणों का विषय व्यवस्थित है। माधुर्य का स्थान ओज नहीं ले सकता और ओज का स्थान माधुर्य नहीं ले सकता।) इन गुणों का अपना क्षेत्र नियत होता है यह बात-‘शृङ्गार एवं परमः परः प्रह्लादनो रसः’ इत्यादि कारिकाओं में कह दी गई है और वहाँ पर गुणों के विषय नियत कर दिये गये हैं। अतएव गुण अन्य होते हैं और सन्धि एक पक्ष।
(२) दूसरे मत के अनुसार सन्धि और गुण दोनों एक ही वस्तु हैं। गुण सन्धि का रूप ही होते हैं। आशय यह है कि रसाभिव्यक्ति में शब्दों की यही सामर्थ्य है कि शब्द विभिन्न रूप में सङ्कटित हों तभी वे रसाभिव्यञ्जक हो सकते हैं। विरोधियों की ओर से जो यह कहा गया था कि यदि सन्धि और गुण एक ही होते हैं तो जिस प्रकार सन्धि का विषय नियत नहीं होता उसी प्रकार गुणों में भी अनियतविषयता आ जावेगी। किन्तु वास्तव में ऐसा नहीं होता। अपितु लक्ष्य में इसका अपवाद देखा जाता है। इत्यादि। इस पर मेरा उत्तर यह है कि सन्धि का भी विषय नियत होता है और गुणों का भी। जहाँ कहीं किसी विषय में व्यभिचार देखा जाये वहाँ कमो ही समझो जानी चाहिये। इस प्रकार के विषय में सहृदयों को अचाहता का आभास क्यों नहीं मिलता? इसका उत्तर यही है कि ऐसे स्थलों पर दोष कवि की शक्ति से तिरोहित हो जाता है। दोष दो प्रकार का होता है-(१) व्युत्पत्ति की कमी से होनेवाला और (२) शक्ति की कमी से होनेवाला। शक्ति उस प्रतिभा को कहते हैं जिससे कवि में वर्णनीय वस्तु के विषय में नवीनरूप में उल्लेख करने की क्षमता आ जाती है और व्युत्पत्ति निपुणता को कहते हैं जिससे वर्णनीय वस्तु के उपयोग में आनेवाली समस्त वस्तु ये पौर्वापर्य के परामर्श करने की योग्यता उत्पन्न हो।
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ध्वन्यालोकः
'अभ्युत्पत्तिकृतो दोषः शक्त्या संत्रियते कवे: । यस्तु शक्तिकृतस्तस्य स भङ्गित्यवभासते ॥'
तथा हि -महाकवीनाम?युतमदेवताविषयप्रसिद्धसंभोगशृङ्गारनिबन्धनलाञ्छनौचित्येन शाङ्क्तोतरसकृतत्वात् न प्रतिबिम्बते । यथा कुमारसम्भवे देवो-
सम्भोगवर्णनम् ।
(अनु०) 'अभ्युत्पत्तिकृतदोष कवि शक्ति से सङ्कृत हो जाता है; किन्तु जो उसकाअशक्तिकृतदोष होता है वह शीघ्र ही अवभासित होने लगता है ।'
वह इस प्रकार—महाकवियों को भी उत्तमदेवताविषयक प्रसिद्ध संभोग-शृङ्गार के निवन्धन इत्यादि का अनौचित्य शक्ति के द्वारा तिरस्कृत होने के कारण ग्राम्यत्व के रूप में प्रतिबिम्बित नहीं होता । जैसे कुमारसम्भव में देवी का
लोचन
शक्ति: प्रतिबिम्बं वर्णनीयवस्तुविशयनूतनोल्लेखशालित्वम् । व्युत्पत्तिरस्तदुपयोगिसमस्तवस्तुपौर्वापर्यपरामर्शकौशलम् । तस्योक्ति कवे: । अनौचित्यमिति । आस्वाद-
चित्तूणां य: चमत्काराविधात्सदेव रससर्वस्वम्, आस्वादयत्तथ्वाल् । उत्तमदेवतासम्भोगपरामर्शो च पितृसम्भोग इव लज्जातदृशादिनाक्षमत्वकारवकाश इत्यर्थ: ।
शक्तितिरस्कृततयादिति । संभोगोदपि व्यासौ वर्णितस्तथा च प्रतिभानवता कविना यथा तथैव विश्रान्तं हृदयं पौर्वापर्यपरामर्शं कर्तुं न ददाति यथा निर्जोजपराक्रमस्य पुरुष-
स्याविषयेऽपि युद्धयमानस्य तावत्तस्मिन्नवसरेऽसाधुवादो वितीयंते न तु पौर्वापर्य-
परामर्शं, तथाडनौपपत्ति मत्व: ।
शक्ति अर्थात् प्रतिभा अर्थात् वर्णनीय वस्तु के विषय में नूतन उल्लेखशाली होना । व्युत्पत्ति अर्थात् उसमें उपयोगी समस्त वस्तु के पौर्वापर्य परामर्श की कुशलता । उसका अर्थात् कवि का । 'अनौचित्य' अर्थ यह कि आस्वाद करने-
वालों के चमत्कार का विधात न होना वही रस का सर्वस्व है क्योंकि आस्वाद के अधीन होता है । उत्तमदेवता के संभोग के परामर्श में पिता के संभोग के
समान लज्जा और आतङ्क इत्यादि से चमत्कार का अवकाश ही क्या है ?
'शक्तितिरस्कृत होने से' यह संभोग भी प्रतिभाशाली कवि के द्वारा ऐसा वर्णित किया गया है जैसे उसी में विश्रान्त हृदय पौर्वापर्य परामर्श करने नहीं देता
जैसे व्याजरहित पराक्रमवाले तथा बिना अवसर युद्ध करनेवाले पुरुष को उस अवसर पर साधुवाद दे दिया जाता है किन्तु पौर्वापर्य परामर्श में नहीं, वैसा ही यहाँ पर यह
भाव है ।
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एवमादौ विषये यथौचित्यतयाsस्तथा दर्शितमेवाग्रे । शक्तितिरस्कृततवं चान्वयतिरेकाभ्यामवसीयते । तथा हि शक्तिरहितेन कविना एतद्विधे विषये श्रृङ्गारोपनिवन्ध्यमानः स्फुटमेव दोषत्वेन प्रतिभासते । ननुग्रसिनः पचे 'यो यः शब्धं विभर्ति' इत्यादौ किमचारुत्वम् ? अप्रतीयमानमेवारोप्यामः ।
( अनु० ) इत्यादि विषय में जिस प्रकार औचित्य का त्याग नहीं होता वैसा आगे दिखलाया हो गया है । शक्तितिरस्कृतत्व का निर्णय अन्वय-तिरेक के द्वारा होता है । वह इस प्रकार कि शक्तिरहित कवि के द्वारा इस प्रकार के विषय में निवद्ध किया हुआ श्रृङ्गार स्फुटतया दोष के रूप में अनुभवित होता है । ( प्रश्न ) इस पक्ष में 'यो यः शब्धं विभर्ति' इत्यादि में क्या अनचारुता है ? ( उत्तर ) हम तो प्रतीत न होनेवाली अनचारुता का ही आरोप करते हैं ।
दर्शितमेवेति । कारककारकाति भूतप्रत्ययः । वेद्यते हि 'अनौचित्यादतेनान्यद्रसमझस्य कारणम्' इत्यादि । अप्रतीयमानमेवेति । पूर्वापरपरामर्शदिवेकशालिभिरपोत्यर्थः ।
'दिखलाया ही है' यह कारककारक ने अतः भूत अर्थ में प्रत्यय ( क ) है । निस्सन्देह कहेंगे—'अनौचित्य के अतिरिक्त रसभङ्ग का कोई कारण नहीं इत्यादि । 'अप्रतीयमान नहीं' अर्थात् पूर्वापर निवेशालियों के द्वारा भी ।
'अभ्युत्पत्ति से होनेवाला दोष कवि की शक्ति से संबृत हो जाता है; किन्तु अशक्ति से उत्पन्न दोष शाब्द हो प्रकट हो आया करता है ।'
उदाहरण के लिये एक सामान्यनियम है कि उत्तम देवता के विषय में सम्भोग-वर्णन अनुचित हुआ करता है । किन्तु महाकवियों ने जहाँ उत्तम देवताविषयक सम्भोगश्रृङ्गार का वर्णन किया है वह न तो अनुचित हो मालूम पड़ता है और न उसमें ग्राम्यता हो आती है । कुमारसम्भव में देवी का सम्भोगवर्णनम् भी इसी प्रकार का है । उसमें अनौचित्य का प्रतिभास नहीं होता। इसमें यही प्रमाण है कि आस्वाद लेनेवालों को चमत्कार के विषय में की यहाँ पर प्रतिति नहीं होती । यही एक सबसे बड़ा प्रम ण है; क्योंकि रसका सर्वस्व आस्वाद के ही आधीन हुआ करता है । जहाँ कहाँ उत्तम देवता के सम्भोग श्रृङ्गार का विस्तृत निवन्धन उपस्थित किया जाता है वह माता-पिता के सम्भोग के समान लज्जा और आतंक इत्यादि को उत्पन्न करनेवाला होता है । अतः उसमें चमत्कार का अवकाश ही कहाँ होता है ? 'शक्ति से तिरस्कृत होने के कारण' कहने का आशय यह है कि
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प्रतिभाशाली कवि ( कालिदास ) ने शिवपार्वती के सम्भोग का वर्णन इतनी निपुणता से किया है कि सहृदयों का हृदय उसी वर्णन में विश्रान्ति होकर रह जाता है और पाठकों को उचकाश ही प्राप्त नहीं होता कि वे पौर्वापर्य का परामर्श कर सकें तथा उसके अनौचित्य पर ध्यान दे सकें। जैसे-यदि कोई पराक्रमशाली व्यक्ति किसी अनुचित पद को लेकर युद्ध कर रहा हो तो भी उस अन्तर पर एकबार साधुवाद निकल ही जाता है। पौर्वापर्य के परामर्श में वह बात नहीं होती। वैसा ही यहाँ पर समञ्ज्ञना चाहिये। इस प्रकार के विषयों में जिस प्रकार औचित्य का त्याग नहीं होता—उसकी व्याख्या आगे कर दी गई है। यहाँ पर वृत्तिकार ने ‘कर दी गई है’ इस भूतकाल का प्रयोग किया है क्योंकि ‘की जायेगी’ इस भविष्यत्काल का प्रयोग होना चाहिये। भूतकाल का प्रयोग करने का कारण यह है कि कारिकाकार ने तो पहले ही व्याख्या कर दी थी। वृत्तिग्रन्थ का प्रणयन बाद में हुआ। धनिक्कार ने कारिकायें पहले बनाईं थीं। अतः कारिका के प्राक्तनत्व को लेकर यहाँ पर भूतकाल का प्रयोग कर दिया गया है। आगे चल कर कारिका आवेगी—‘अनौचित्यादते नान्यद्रसभङ्गस्य कारणम् ।’ वहीं पर बतलाया जायेगा कि ऐसे विप्रयों में औचित्य का त्याग क्यों नहीं होता? अन्य-उयतिरेक से इस बात का निश्चय किया जाता है कि कहाँ पर अनौचित्य शक्ति के द्वारा तिरस्कृत हुआ है, कहाँ पर नहीं। वह इस प्रकार कि यदि शक्तिरहित कवि उत्तमदेवता के विषय में शृङ्गार रस का उपनिवन्धन करने लगे तो वहाँ पर स्फुट रूप में दोष मालूम पड़ने लगेगा। ( अन्वय इस प्रकार होगा—‘जहाँ अच्छा कवि वर्णन करता है वहाँ अदोषता होती है ।’ व्यतिरेक इस प्रकार होगा—‘जहाँ कवि अच्छा नहीं होता वहाँ अदोषता भी नहीं होती ।’ यहाँ पर ग्रन्थकार का आशय यह है कि कविवर कालिदास ने इतनी प्रौढ़ता के साथ भगवती पार्वती के सम्भोग शृङ्गार का वर्णन किया है। कि जब हम उसे पढ़ने लगते हैं तब काव्य की प्रौढ़ता में इतने निमग्न हो जाते हैं कि हमें ध्यान ही नहीं रहता कि हम उत्तमदेवता(विषयक) शृङ्गार का आस्वादन कर रहे हैं। जब हमें कोई विशेष रूप से स्मरण दिल्याता है कि यह वर्णन तो उत्तमदेवता के विषय में है अतः माता पिता के समान सवर्था अनुचित है तब हमारा ध्यान उस ओर जाता है। इस प्रकार के विषय में समञ्ज्ञनी चाहिये। नियमानुकूल शृङ्गार में असमासोक्तिः सङ्क्रुटना ही होनी चाहिये, रौद्र रस में दीर्घसमासा सङ्क्रुटना ही होनी चाहिये। जहाँ इस नियम का अतिक्रमण किया जाता है वहाँ अनौचित्य तो होता है, किन्तु कवि की प्रतिभा के
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तस्माद् गुणव्यतिरिक्तत्वे गुणरूपत्वे च सङ्क्रवटनाया अन्यः कश्चिद्विधियम-हेतुरवक्तव्य इत्युच्यते-- तन्नियमें हेतुरौचित्यं वक्तव्याश्रयोः ॥ ६ ॥
अतएव सङ्क्रवटनना के गुणों के व्यतिरिक्त होने पर अथवा गुणरूप होने पर नियम का कोई और हेतु कहा जाना चाहिये । अतः कहा जा रहा है-- 'उसके नियम में वक्ता और वाच्य का औचित्य हेतु होता है' ॥ ६ ॥
गुणव्यतिरिक्तत्व इति । व्यतिरेकपक्षे हि सङ्क्रवटनाया नियमहेतुरेव नास्ति । ऐक्य-पक्षेऽपि न रसो नियमहेतुस्तत्र्यनयो वक्तृवध्यः । तन्नियं इति कारिकावशेषः । कथा नयति स्वकर्तृक्याझावमिति कथानायकः यो निर्वहणे फलभागी । 'गुण व्यतिरिक्तत्व में' । व्यतिरेकपक्ष में सङ्क्रवटनना का नियम हेतु ही नहीं होता अतः अन्य कहना चाहिये । ऐक्य पक्ष में भी रस नियम का हेतु नहीं होता । 'तन्नियं' यह कारिका का अवशेष अंश है । कथा को अपने कर्तृव्य के अद्धभाग के रूप में ले चलता है वह कथानायक ( होता है ) अर्थात् निर्वहण में फलभागी ।
तारावती
प्रभाव से वह अनौचित्य लक्षित नहीं होता । ) ( प्रश्न ) इस पक्ष में 'यो यः शास्त्रं विरम्भति' इस पद्य में क्या अनाचारुता है ? ( उत्तर ) यहाँ पर कोई न कोई अचाहता तो है ही; किन्तु वह कविप्रतिभा से ऐसी दब गई है कि पूर्वोपर विवेचन का विवेक रखने वाले भी उसे जान नहीं पाते । यदि हम इस पद्य को सिद्ध हो करना चाहते हैं कि सङ्क्रवटनना और गुण एक ही है या सङ्क्रवटननाश्रित गुण होते हैं । तो 'यो यः शास्त्रं विरम्भति' में ऐसी अचाहता का आरोप करना ही पड़ेगा जो प्रतीतिगोचर नहीं हो रही है । (•किन्तु यह अच्छी बात नहीं.है कि एक ठीक निर्दुष्ट पद्य को हम बलात् केवल इसलिये दूषित कह दें कि हमें एक अपना पक्ष सिद्ध करना है और वह दोष भी ऐसा है जो किसी की भी समझ में नहीं आता । ) अतएव यदि आपको इस बात का आग्रह ही है कि सङ्क्रवटनना और गुण की एकता या व्यतिरेक में सङ्क्रवटननाश्रितत्व सिद्ध हो जावे तो औचित्य का नियामक रस को न मानकर किसी दूसरे तत्व को मानना पड़ेगा । क्योंकि यदि सङ्क्रवटनना और गुण दोनों पृथक् पृथक् तत्त्व हैं तब तो नियम का कोई हेतु है ही नहीं तो रस नियम पड़ेगा । अतः छठी कारिका के उत्तरार्ध से औचित्य के दूसरे निमित्तों पर प्रकाश डाला जा रहा है--
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प्रतिभाशाली कवि ( कालिदास ) ने शिवपार्वती के सम्भोग का वर्णन इतनी निपुणता से किया है कि सहृदयों का हृदय उसी वर्णन में विश्रान्ति होकर रह जाता है और पाठकों को उत्कण्ठा हो प्राप्त नहीं होती कि वे पौर्वापर्य का परामर्श कर सकें तथा उसके अनौचित्य पर ध्यान दे सकें। जैसे-यदि कोड़े पराक्रमशाली व्यक्ति किसी अनुचित पद को लेकर युद्ध कर रहा हो तो भी उस अवसर पर एकवार साधुवाद निकल ही जाता है। पौर्वापर्य के परामर्शो में वह बात नहीं होती।
वैसा ही यहाँ पर समझना चाहिये। इस प्रकार के विषयों में जिस प्रकार औचित्य का त्याग नहीं होता—उसकी व्याख्या आगे कर दी गई है। यहाँ पर वृत्तिकार ने 'कर दी गई है' इस भूतकाल का प्रयोग किया है।
जैसे 'की जावेगी' इस भविष्यत्काल का प्रयोग होना चाहिये। भूतकाल का प्रयोग करने का कारण यह है कि कारिकार ने तो पहले ही व्याख्या कर दी थी। वृत्तिग्रन्थ का प्रणयन बाद में हुआ। ध्वनिकार ने कारिकाएँ पहले बनाई थीं। अतः कारिका के प्राक्तनत्व को लेकर यहाँ पर भूतकाल का प्रयोग कर दिया गया है। आगे चल कर कारिका आवेगी—'अनौचित्यादते नान्यद्रसभङ्गस्य कारणम्' ।
वहाँ पर यह बताया जायेगा कि ऐसे विषयों में औचित्य का त्याग क्यों नहीं होता? अन्य-अन्य तिरेक से इस बात का निश्चय किया जाता है कि कहाँ पर अनौचित्य शक्ति के द्वारा तिरस्कृत हुआ है, कहाँ पर नहीं। वह इस प्रकार कि यदि शृङ्गार रस का उपनिबन्धन करने लगे तो वहाँ पर स्फुट रूप में दोष मद्दूम पड़ने लगेगा।
(अथवा इस प्रकार होगा—'जहाँ अच्छा कवि वर्णन करता है वहाँ अदोष्यता होती है ।' व्यतिरेक इस प्रकार होगा—'जहाँ कवि अच्छा नहीं होता वहाँ अदोष्यता भी नहीं होती।' यहाँ पर ग्रन्थकार की आशङ्का यह है कि कविवर कालिदास ने इतनी प्रौढ़ता के साथ भगवती पार्वती के सम्भोग शृङ्गार का वर्णन किया है कि जब हम उसे पढ़ने लगते हैं तब काव्य की प्रौढ़ता में इतने निमग्न हो जाते हैं कि हमें ध्यान ही नहीं रहता कि हम उत्तमदेवता विषयक शृङ्गार का आस्वादन कर रहे हैं।
जब हमें कोई विशेष रूप से स्मरण दिलाता है कि यह वर्णन तो उत्तमदेवता के विषय में है। अतः माता पिता के सम्भोगवर्णन के समान सर्वथा अनुचित है तब हमारा ध्यान उस ओर जाता है। इस प्रकार के विषय में समझनी चाहिये।
नियमातिकूल शृङ्गार में असमासा सङ्घटना ही होनी चाहिये, रौद्र रस में दीर्घसमासा सङ्घटना ही होनी चाहिये। जहाँ इस नियम का अतिक्रमण किया जाता है वहाँ अनौचित्य तो होता है, किन्तु कवि की प्रतिभा के
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तस्माद् गुणवद्यतिरिक्त्वे गुणरूपत्वे च सङ्घटटनाया अन्यः कश्चिच्च्रियमहेतुवृत्त्यनयोरुच्यते— तन्नियमें हेतुरौचित्यं वक्तृवाच्ययोः ॥ ६ ॥
अतः सङ्घटना के गुणों के व्यतिरिक्त होने पर अथवा गुणरूप होने पर नियम का कोई और हेतु कहा जाना चाहिये। अतः कहा जा रहा है— 'उसके नियम में वक्ता और वाच्य का औचित्य हेतु होता है' ॥ ६ ॥
गुणवद्यतिरिक्त्व इति। व्यतिरेकपक्षे हि संघटनाया नियामहेतुरेव नास्ति। ऐक्यपक्षेऽपि न रसो नियामहेतुस्तद्न्यो वक्तृवाच्योः। तन्नियं इति कारिकावशेषः। कथा नयति स्वकर्तृग्याझ्झावमिति कथानायको यो निर्वहणे फलभागी।
तारावती
प्रभाव से वह अनौचित्य लक्षित नहीं होता।) (प्रश्न) इस पक्ष में 'यो यः शास्त्रं विभर्ति' इस पद्य में क्या अनौचित्य है? (उत्तर) यहाँ पर कोई न कोई अनौचित्य तो है ही; किन्तु वह कविप्रतिभा से ऐसी दब गयी है कि पूर्वापर विवेचन का विवेक रखने वाले भी उसे जान नहीं पाते। यदि हम इस पद्य को सिद्ध हो करना चाहते हैं कि सङ्घटना और गुण एक ही हैं या सङ्घटनाश्रित गुण होते हैं? तो 'यो यः शास्त्रं विभर्ति' में ऐसी अनौचित्य का आरोप करना ही पड़ेगा जो प्रतीतिगोचर नहीं हो रही है। (किन्तु यह अच्छी बात नहीं है कि एक ठीक निर्दुष्ट पद्य को हम गलत कहें केवल इसलिये दूषित कह दें कि हमें एक अपना पक्ष सिद्ध करना है और वह दोष भी ऐसा है जो किसी की भी समझ में नहीं आता।)
अतः यदि आपको इस बात का आग्रह ही है कि सङ्घटना और गुण की एकता या व्यतिरेक में सङ्घटनाश्रितत्व सिद्ध हो जावे तो औचित्य का नियामक रस को न मानकर किसी दूसरे तत्व को मानना पड़ेगा। क्योंकि यदि सङ्घटना और गुण दोनों पृथक्-पृथक् तत्व हैं तब तो नियम का कोई हेतु ही नहीं हो सकता। इसीलिये औचित्य का नियामक कोई दूसरा तत्व मानना पड़ेगा। अतः छठी कारिका के उत्तरार्ध से औचित्य के दूसरे निमित्तों पर प्रकाश डाला जा रहा है—
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तत्र वक्ता कविः कविनिबद्धो वा, कविनिबद्धेऽपि रसभावरहितो रसभावसमन्वितो वा, रसोंडप कथानायकाश्रयस्तद्रिपक्षाश्रयेऽपि वा। कथानायकधीरोरात्रादिभेदभिन्नः पूर्वंस्तदनन्तरो वेतिचिकल्पा। याच्यं च ध्वन्यात्मरसाङ्गं रसाभासाङ्गं वा, आभनेयार्थमनभिनेयार्थं वा, उत्तमप्रकृत्याश्रयं तदितराश्रयं वेति वहुपकारम्। तत्र यदा कविरपगतरसभावो वक्ता तदा रचयितव्यः कामचारः। यदापि कविनिबद्धो वक्ता रसभावरहितस्तदा स एव। यदा तु कविः कविनिबद्धो वा वक्ता रसभावसमन्वितो रसस्र प्रधानाश्रिततवाद् ध्वन्यात्मभूतस्तदा नियमेनैव तत्रासमासमध्यसमासैः एव सङ्घटनम्।
(अनु०) उसमें वक्ता या तो कवि होता है या कविनिबद्ध कोई पात्र। कविनिबद्ध भी या तो रसभाव से रहित होता है या रसभावसमन्वित। रस भी कथानायक के आश्रित होता है या उसके विपक्ष के आश्रित। कथानायक भी धीरोदात्त इत्यादि भेद से भिन्न प्रथम होता है या उसके बाद का—यहाँ विकल्प हैं। वाच्य भी ध्वन्यात्मक रस का अङ्ग होता है या रसाभासाङ्ग, वाच्य अभिनेयार्थ होता है या अनभिनेयार्थ, उत्तम प्रकृत्याश्रय होता है या तादृश प्रकृत्याश्रय—इस प्रकार वाच्य बहुत प्रकार का होता है। उसमें यदि कवि रसभावरहित वक्ता है तब रचना में स्वेच्छाचार होता है और जब कविनिबद्ध वक्ता रसभावरहित होता है तब भी वही बात होती है। इसके प्रतिकूल जब कवि या कविनिबद्ध वक्ता नियम से रसभाव से युक्त हो और रसप्रधानाश्रित होने के कारण ध्वनि का आत्मभूत हो हो तब नियम से ही असमास या मध्यसमासवाली सङ्घटना ही (अपेक्षित होती है।)
लोचन—धीरोदात्तादिति। धर्मयुद्धवीरप्रधाना धीरोदात्तः, वीररौद्रप्रधानो धीरोद्रत; वीरशृङ्गारप्रधानो धीरललितः, दानधर्मवीरशान्तप्रधानो धीरप्रशान्त इति चत्वारो नायका: क्रमेण सातत्यारमटिकौशिकीमारतीनोलक्षणवृत्तिप्रधाना:। पूर्वं कथानायकस्तदनन्तर उपनायकः। विकल्पा इति वक्तृभेदा इत्यर्थः। वाच्यमिति। ध्वन्यात्मा ध्वनिस्वभावो यो रसस्तस्याङ्गकमित्यर्थः। धीरोदात्त इत्यादि। धर्म और युद्ध वीर प्रधान धीरोदात्त (होता है) वीर और रौद्र प्रधान धीरोद्रत (होता है।) वीर शृङ्गार प्रधान धीरललित (होता है) दानवीर, धर्मवीर और शान्त प्रधान धीर शान्त (होता है।)। इस प्रकार चार नायक क्रमशः सात्वती, आरभटी, कौशिकी और भारती नामक वृत्तियों में प्रधान होते हैं। पहला कथानायक और उसके बाद का उपनायक (होता है।)। ‘विकल्पा’ अर्थात् वक्ता के भेद। ‘वाच्य यह’ ध्वन्यात्मक अर्थात् ध्वनि स्वभाववाला जो रस उसका अङ्ग अर्थात् व्यङ्ग्यक।
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'वक्रो और वाच्य का औचित्य सङ्घटना के नियम में हेतु होता है' ॥ ६ ॥
'वक्रो और वाच्य का औचित्य सङ्घटना के नियम में हेतु होता है' ॥ ६ ॥
तारावती 'वक्रो और वाच्य का औचित्य सङ्घटना के नियम में हेतु होता है' ॥ ६ ॥ 'तन्नियम' इत्यादि भाग छठी कारिका का शेष अंश है । वक्रो और वाच्य के औचित्य के आधार पर सङ्घटना के नियमों पर विचार करने के पहले सङ्घटना के दृष्टिकोण से वक्रो और वाच्य के भेदोपभेद कर लेना उचित प्रतीत होता है । उसमें वक्रो दो प्रकार का हो सकता है या तो कवि या कविनिबद्ध कोई पाठ । कविनिबद्धपात्र भी दो प्रकार का हो सकता है—रस और भाव से रहित तथा रस और भाव से युक्त । रस भाव युक्त वक्रो भी दो प्रकार का हो सकता है—कथानायक के आश्रित रस से युक्त और कथानायक के विरोधी व्यक्ति में रहनेवाले रस से युक्त । कथानायक शब्द का अर्थ होता है कथा को अपने कर्तव्य का अङ्गभूत बनानेवाला व्यक्ति जो कि निर्वहण में फल का भागी हो । कथानायक के धीरोदात्त इत्यादि भेद होते हैं—नायक चार प्रकार का होता है—( १ ) धीरोदात्त उसे कहते हैं जिसमें धर्मवीर तथा युद्धवीर की प्रधानता हो । ( २ ) धीरोद्धत उसे कहते हैं जिसमें वीररस और रौद्र रस की प्रधानता हो । ( ३ ) धीरललित उसे कहते हैं जिसमें वीररस और शृङ्गार रस की प्रधानता हो । ( ४ ) धीरप्रशान्त उसे कहते हैं जिसमें दानवीर, धर्मवीर और शान्तरस की प्रधानता हो । इन चारों नायकों में क्रमशः सात्त्वती, आरब्धी, कैशिकी और भारती नामक वृत्तियों की प्रधानता होती है । इनके लक्षण अन्यत्र दिये गये हैं वहीं देखना चाहिये । शृङ्गाररस के नायक चार प्रकार के होते हैं—अनुकूल, दक्षिण, शठ और धृष्ट । इनमें प्रत्येक के तीन तीन भेद होते हैं—उत्तम, मध्यम और अधम । इनके भी लक्षण रसशास्त्रीय ग्रन्थों में दिये गये हैं वही देखना चाहिये । यह नायक भी दो प्रकार का होता है—या तो पहला या बाद का । पहला कथानायक होता है और बाद का उपनायक होता है । यह या तो कथानायक के अनुकूल हो सकता है या विरोधी । अनुकूल नायक या उपनायक कहलावेगा और प्रतिकूल होगा तो प्रतिनायक । नायकभेद के यही विकल्प हैं अर्थात् वक्रो के यही भेद हैं । इसी भाँति वाच्य भी कई प्रकार का होता है । एक तो ऐसा वाच्य जो ध्वनिस्वभाववाले रस का अङ्ग अर्थात् व्यङ्ग्यक हो, दूसरा ऐसा वाच्य जो रसाभास का व्यञ्जक हो । वाच्यार्थ के पुनः दो भेद होते हैं—अभिनेयार्थ और अनभिनेयार्थ । इनके अतिरिक्त उसके दो भेद और होते हैं—उत्तम प्रकृति का आश्रय लेनेवाला वाच्यार्थ और उससे भिन्न प्रकृति का आश्रय लेनेवाला वाच्यार्थ । इस प्रकार वाच्यार्थ के बहुत से प्रयोग होते हैं । यहाँ पर अभिनेयार्थ शब्द का अर्थ समझ लेना चाहिये ।
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अभिनेयो वाङ्गसत्त्वाहारैराभिमुख्यं साक्षात्कारप्रायं नेयोडर्थो व्यङ्गचरूपो ध्वनिस्वभावो.यस्य तदभिनेयार्थं वाच्यम्, स एव हि काव्यार्थ इत्युच्यते । तस्यैव चाभिनयन योगः । यदाह मुनि:—‘वाङ्गसत्वोपेतान् काव्यार्थान् भावयन्ति’ इत्यादि तन्त्र तन्त्र । रसाभिनयनान्तरीयकतया तु तद्रूपावादिरूपतया वाच्याडर्थोंडमिन्नीयत इति वाच्यमभिनेयार्थमित्यैव युक्ततरा वाचोयुक्तिः। न त्वत्त्र व्यपदेशिवद्रावो व्याख्येयः, चथान्यैः । तदितरैरति । मध्यमप्रकृत्याश्रयमधमप्रकृत्याश्रयं चेत्यर्थः । एवं वक्तृभेदाद्वाच्यभेदाद्वाश्रयविधाय तद्गतमौचित्यं नियामकमाह—तत्रैति॥
अभिनेय अर्थात् वाणी अङ्ग सत्त्व और आहार्य के द्वारा आभिमुख्य अर्थात् साक्षात्कार की ओर ले जाया जानेवाला व्यङ्गचरूप अर्थात् ध्वनि स्वभाव वाला है अर्थ जिसका वह अभिनेयार्थ अर्थात् वाच्य । वही काव्यार्थ कहा जाता है । उसी का अभिनय से योग होता है । जैसा कि मुनि कहते हैं—‘वाणी अङ्ग और सत्त्व से उपेत काव्यार्थों को भावित करते हैं’ इत्यादि विभिन्न स्थानों पर । रसाभिनय में अवश्यकरत्वता के रूप में तो उसके विभावादि रूपता के कारण वाच्य अर्थ अभिनीत किया जाता है इसलिये वाच्य अभिनेयार्थ है यह्ी अधिक उपयुक्त कथन है । यहाँ पर व्यपदेशिवद्रावो की व्याख्या नहीं की जानी चाहिये जैसी औरों ने की है । ‘उससे भिन्न’ मध्यमप्रकृत्याश्रय और अधमप्रकृत्याश्रय । इस प्रकार वक्ता के भेदों और वाच्य के भेदों को कहकर तद्गत औचित्य के नियामक को कहते हैं—वहाँ पर ।
तारावती
यह शब्द वाच्यार्थ का विशेषण है और इसमें बहुत्वही समास है। इस प्रकार इसका उत्पत्तिलभ्य अर्थ यह होगा—‘अभिनय है अर्थ जिसका’ अर्थात् अभिनेयार्थवाच्य उसे कहते हैं जिस वाच्यार्थ का अर्थ अभिनेय हो । अभिनेय शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है अभि + नेय । ‘अभि’ का अर्थ है सामने और ‘नेय’ का अर्थ है ले आना । आशय यह है कि जिस वाच्यार्थ का अर्थ दर्शकों के सामने ले आया जावे उस वाच्यार्थ को अभिनेयार्थ वाच्य कहते हैं । कोई भी अर्थ चार प्रकार के अनुभवों के द्वारा सामने लाया जाता है—वाचिक, आङ्गिक, सात्त्विक और आहार्य । इनके द्वारा सामने लाया जानेवाला या प्रत्यक्ष कराया जानेवाला अर्थ व्यङ्गच्यार्थ ही होता है जिसका स्वभाव ध्वन्यात्मक हो अर्थात् जिस व्यङ्गच्यार्थ में ध्वनिरूपता को धारण करने की क्षमता हो । अतएव अभिनेयार्थ वाच्यार्थ का निष्कृष्ट अर्थ यह हुआ कि जिस वाच्यार्थ के द्वारा अभिव्यक्त होनेवाला ध्वनि के स्वभाववाला व्यङ्गच्यार्थ वाचिक, आङ्गिक,
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सात्त्विक और आहार्य इन चार प्रकार के अनुभवों के द्वारा प्रत्यक्ष रूप में ( दर्शनीय रूप में ) सामने लाया जावे उस वाच्यार्थ को अभिनेयार्थ कहते हैं। उसी वाच्यार्थ की संज्ञा कार्यार्थ भी होती है और उसी वाच्यार्थ का अभिनय से योग भी होता है। भरत मुनि ने विभिन्न स्थानों पर सङ्केत दिया है कि अभिनय वाच्यार्थ का ही होता है। जैसा कि उन्होंने भावों की परिभाषा लिखते हुये लिखा है—“वाणी अङ्ग और सत्व से युक्त काव्यार्थों को ये भावित करते हैं।” अन प्रश्न यह उठता है कि क्या वाच्यार्थ का योग अभिनय से सर्वथा नहीं होता? इसका उत्तर यह है कि होता है। किन्तु होता इसी रूप में है कि रस अथवा भाव का अभिनय तब तक सम्भव नहीं हो सकता जब तक कि रस के विभाव इत्यादि का भी अभिनय न किया जावे। इस प्रकार रसाभिनय के लिये विभाव इत्यादि के रूप में वाच्य का अभिनय भी अपरिहार्य ही है; अतएव वाच्यार्थ का भी अभिनय किया ही जाता है। यहाँ पर सारांश यह है कि यद्यपि वाच्यार्थ का भी अभिनय से योग होता है तथापि वाच्यार्थ को अभिनेयार्थ इसीलिये कहते हैं कि वाच्यार्थ के अर्थ ( व्यङ्ग्यार्थ ) का अभिनय किया जाता है—यही व्याख्या करनी चाहिये; क्योंकि यही अधिक उचित तर्क है अर्थात् बहुव्रीहि का अर्थ इसी व्याख्या में ठीक बैठता है। कुछ लोगों ने ( चन्द्रिकाकार ने ) यह अर्थ किया है कि ‘अभिनेय है अर्थ अर्थात् वाच्यार्थ जिसका’ इस प्रकार की व्याख्या करने में दोष यह आता है कि ‘जिस वाच्यार्थ का वाच्यार्थ अभिनेय है’ इस अर्थ का क्या अभिप्राय होगा? ‘वाच्यार्थ का वाच्यार्थ’ कहने का क्या अभिप्राय!
इसका उत्तर चन्द्रिकाकार ने यह दिया है कि यहाँ पर व्यपदेशिवद्भाव से भेद की कल्पना कर ली जावेगी अर्थात् व्याख्याताता लोग किसी एक ही वस्तु में भेद की कल्पना कर उसे समझाया करते हैं। जैसे ‘राहु का शिर’ यद्यपि ‘राहु’ वास्तव में शिर को ही कहते हैं; राहु और शिर दोनों एक ही वस्तु हैं फिर भी समझाने के लिये भेदकल्पना की गई है। इसी प्रकार ‘वाच्यार्थ का वाच्यार्थ’ इसमें भी भेद की कल्पना कर लेनी चाहिये। किन्तु यह व्याख्या ठीक नहीं है। ( क्योंकि एक तो व्यपदेशिवद्भाव अगतिकगति है दूसरे अभिनय भाव इत्यादि का ही होता है। अतः जब व्यङ्ग्यार्थ के अभिनयपरक अर्थ करने से सन्दर्भ ठीक बैठ जाता है तब व्यपदेशिवद्भावपरक व्याख्या करना ठीक नहीं। ) ‘वाच्य के दो और भेद होते हैं—उत्तम प्रकृति के आश्रित और उससे भिन्न के आश्रित।’ यहाँ पर उससे भिन्न का आश्रय है मध्यम प्रकृति के आश्रित या अधम प्रकृति के आश्रित।
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रचनाया हृत्ति:संवटनाया: । रसभावहीनोडनाविष्टस्तापसादिरुदासीनोडपोति-वृत्ताकृतया यद्यपि प्रधानरसानुयाय्येव, तथापि तावति रसादिहीन इत्युक्तम् । स एवंवति कामचार: । एवं शुद्धवक्रोचित्यं विचार्ये वाच्योचित्येन सह तदेवास्त—यदो तत्राति । कवियेष्टपि रसाविष्ट एव वक्ता युक्त: । अनन्यथा 'स एव पुत्र वीतरागश्चेत्'
रचना का अर्थात् सृज्ंटना का रसभावहीन तापस इत्यादि उदासीन भी इतिवृत्ताकृ्त होने के कारण प्रधान रस का अनुयायी ही होता है तथापि उतने में रसभावहीन यह कह दिया गया । 'वहीं' अर्थात् कामचार । इस प्रकार वक्ता के शुद्ध औचित्य पर विचारकर वाच्यौचित्य के साथ उसी को कहते हैं—'जन तो' । कवि का यद्यपि रसाविष्ट वक्ता होना ही उचित है, नहीं तो 'यदि वह वीतराग हो'
इस प्रकार वक्ता के भेदों और वाच्य के भेदों का अभिधान कर दिया गया । अब उनके औचित्य के नियामक पर विचार किया जा रहा है—'जन तो कवि में रस भाव इत्यादि का समावेश न हो तथा कवि ही वक्ता हो तत्र स्वेच्छानुसार रचना किसी प्रकार की भी हो सकती है अर्थात् उसमें सृज्ंटना का कोई विशेष नियम नहीं है ।' 'कवि रसभावहीन वक्ता हो' में रसभावहीन का आशय यह है कि जब कवि में किसी प्रकार के रस भाव इत्यादि का समावेश न हुआ हो ।
इस प्रकार वक्ता के मेदों और वाच्य के मेदों का अभिधान कर दिया गया । अब उनके औचित्य के नियामक पर विचार किया जा रहा है—'जन तो' । कवि में रस भाव इत्यादि का समावेश न हो तथा कवि ही वक्ता हो तत्र स्वेच्छा-नुसार रचना किसी प्रकार की भी हो सकती है अर्थात् उसमें सृज्ंटना का कोई विशेष नियम नहीं है ।' 'कवि रसभावहीन वक्ता हो' में रसभावहीन का आशय यह है कि जब कवि में किसी प्रकार के रस भाव इत्यादि का समावेश न हुआ हो ।
(उदाहरण के लिये सूर तुलसी इत्यादि ने भक्ति-परक काव्य लिखा है और उनमें भक्ति का आवेश भी था । किन्तु कुछ ऐसे कवियों ने भी भक्ति-परक रचनायें की हैं जिनमें वस्तुत: भक्तिभावना विद्यमान नहीं थी । अथवा भक्त कवियों को भी प्रकार वश ऐसे रसों का अभिव्यक्त्तन करना पडता है जिनमें उनकी अन्तरात्मा आनन्द नहीं लेती थी । ऐसे अवसर पर यदि कवि में रस का अभाव न हो तो उसे अधिकार है कि वह सृज्ंटना के किसी भी प्रकार को अपना सकता है ।
(उदाहरण के लिये सूर तुलसी इत्यादि ने भक्ति-परक काव्य लिखा है और उनमें भक्ति का आवेश भी था । किन्तु कुछ ऐसे कवियों ने भी भक्ति-परक रचनायें की हैं जिनमें वस्तुतः भक्तिभावना विद्यमान नहीं थी । अथवा भक्त कवियों को भी प्रकरण वश ऐसे रसों का अभिव्यक्त्तन करना पडता है जिनमें उनकी अन्तरात्मा आनन्द नहीं लेती थी । ऐसे अवसर पर यदि कवि में रस का अभाव न हो तो उसे अधिकार है कि वह सृज्ंटना के किसी भी प्रकार को अपना सकता है ।
आशय यह है कि कुछ तो प्रकरण ऐसे होते हैं जिनको कवि पूर्ण तन्मयता के साथ लिखता है और उनका प्रभाव पाठकों या श्रोताओं पर भी जमाना चाहता है तथा कुछ प्रकारण ऐसे होते हैं जिनको कवि प्रकरण-वश लिखता तो है किन्तु उसका पूर्ण अभिनिवेश उसमें नहीं होता । यदि कवि इस प्रकार प्रकरण को चलते हुये रूप में लिख रहा हो तो उसे अधिकार है कि चाहे जैसी शैली अपना सकता है । ) रसभावहीन का अर्थ है रसाभिनिवेश से रहित तपस्वी इत्यादि कोई उदासीन कवि ।
आशय यह है कि कुछ तो प्रकरण ऐसे होते हैं जिनको कवि पूर्ण तन्मयता के साथ लिखता है और उनका प्रभाव पाठकों या श्रोताओं पर भी जमाना चाहता है तथा कुछ प्रकरण ऐसे होते हैं जिनको कवि प्रकरण-वश लिखता तो है किन्तु उसका पूर्ण अभिनिवेश उसमें नहीं होता । यदि कवि इस प्रकार प्रकरण को चलते हुये रूप में लिख रहा हो तो उसे अधिकार है कि चाहे जैसी शैली अपना सकता है । ) रसभावहीन का अर्थ है रसाभिनिवेश से रहित तपस्वी इत्यादि कोई उदासीन कवि ।
यद्यपि इस प्रकार का भी इतिवृत्त काव्य का अङ्ग होने के कारण प्रधान रस का अनुयायी होता है ( अतः उसे रसभावहीन कवि नहीं कह सकते ) तथापि उतने अंश में अर्थात् अप्रधान रस में वह रसभावहीन होता ही है
यद्यपि इस प्रकार का भी इतिवृत्त काव्य का अङ्ग होने के कारण प्रधान रस का अनुयायी होता है ( अतः उसे रसभावहीन कवि नहीं कह सकते ) तथापि उतने अंश में अर्थात् अप्रधान रस में वह रसभावहीन होता ही है
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इति स्थितौ तु नीरसमेव कार्यं स्यात् । तथापि यदा यमकादिचित्रदर्शनप्रधानोऽसौ मवति, तदा रसादिहीन इत्युक्तम् । नियमेन रसभावसमन्वितो वक्ता न तु कथाव्रिदापि तटस्थः । रसश्र ध्वन्यात्मभूत एव न तु रसवदलङ्कारप्रायः । तदसमासामध्यसमासे एव संग्रहे, अन्यथा तु द्वेषसमासाधेयसं योजने । तेन नियमशब्दस्य द्वयाश्रयकारयो: पौनरुक्त्यमनाशङ्क्यम् ।
इस स्थिति में तो काव्य नीरस ही होना चाहिए । तथापि जब यहाँ ( कवि ) यमक आदि चित्र-दर्शन प्रधान होता है तब रसभावादिहीन कहा गया है । नियमपूर्वक वक्ता रसभाव इत्यादि से समन्वित ही होना चाहिये, किसी प्रकार भी तटस्थ नहीं । रस भी ध्वन्यात्मभूत ही होना चाहिये रसवदलङ्कारप्राय नहीं । तब असमासा और मध्यसमासा ही सङ्क्रुटनायें ( होती हैं ), अन्यथा तो द्वेषसमासा भी हो सकती है—इस प्रकार की योजना करनी चाहिये । इससे नियम शब्द और दोनों प्रकारों के पौनरुक्त्य की शङ्का नहीं करनी चाहिये ।
इसीलिये उसे रसभावहीन कहा गया है । ( उदाहरण के लिये सूर का प्रधान अभिनिवेश कोमल रसों के लिखने में है । प्रसङ्ग-वश उन्होंने अवासुर-वध इत्यादि में कठोररस-परक भी रचना की है तथापि उसमें उनका पूर्ण अभिनिवेश नहीं था । अतः यद्यपि सूर साहित्यशिरोमणि कहे जाते हैं तथापि कठोर रसों के विषय में वे रसभावहीन ही कहे जावेंगे और यदि उस प्रकार की रचना में उन्होंने सङ्क्रुटना के औचित्य का उल्लङ्घन किया हो तो वह आलोचकों की उपेक्षा का ही विषय होगा । किन्तु तुलसी के विषय में यह बात नहीं कही जा सकती, क्योंकि उनका अभिनिवेश प्रायः सभी प्रकार के काव्य के विषय में था ।
इसीलिए उसे रसभावहीन कहा गया है । ( उदाहरण के लिए सूर का मुख्य झुकाव कोमल रसों की रचना की ओर था । प्रसंगवश उन्होंने 'अवासुर-वध' आदि में कठोर रसों से संबंधित रचना भी की है, तथापि उसमें उनकी पूरी रुचि नहीं थी । अतः यद्यपि सूर 'साहित्यशिरोमणि' कहे जाते हैं तथापि कठोर रसों के संदर्भ में वे रसभावहीन ही कहे जाएंगे और यदि उस प्रकार की रचना में उन्होंने संकरता के औचित्य का उल्लंघन किया हो तो वह आलोचकों की उपेक्षा का ही विषय होगा । किन्तु तुलसी के संदर्भ में यह बात नहीं कही जा सकती, क्योंकि उनकी रुचि प्रायः सभी प्रकार के काव्य में थी ।
इसी प्रकार जब कविनिबद्ध वक्ता रसभाव रहित हो तब वही बात अर्थात् रचना स्वेच्छानुसार कैसी भी हो सकती है । यहाँ तक शुद्धवक्ता के दृष्टिकोण से सङ्क्रुटना के औचित्य का विचार कर दिया गया । अब वाच्यार्थ के औचित्य के साथ वक्ता के औचित्य पर विचार किया जा रहा है—‘जब कवि या कविनिबद्ध वक्ता नियम से रस और भाव से युक्त हो और रस प्रधान में आक्षित होने के कारण ध्वनि की आत्मता के रूप में ही स्थित हो तब सङ्क्रुटना असमास या मध्यसमास वाली ही होती है। किन्तु करुण और विप्रलम्भ शृङ्गार में सङ्क्रुटना समासरहित ही होती है ।’
इसी प्रकार जब कवि द्वारा निवद्ध वक्ता रसभाव से रहित हो तब वही बात अर्थात् रचना स्वेच्छानुसार कैसी भी हो सकती है । यहाँ तक शुद्ध वक्ता के दृष्टिकोण से सङ्क्रुटना के औचित्य का विचार कर दिया गया । अब वाच्यार्थ के औचित्य के साथ वक्ता के औचित्य पर विचार किया जा रहा है—‘जब कवि या कवि द्वारा निवद्ध वक्ता नियम से रस और भाव से युक्त हो और रस के प्रधान होने के कारण ध्वनि की आत्मता के रूप में ही स्थित हो तब सङ्क्रुटना असमास या मध्यसमास वाली ही होती है। किन्तु करुण और विप्रलम्भ शृंगार में सङ्क्रुटना समासरहित ही होती है ।’
यद्यपि कवि का सर्वदा रसाविष्ट वक्ता होना ही उचित है । नहीं तो जैसा कि कहा गया है कि ‘यदि कवि वीतराग हो तो सारा काव्य नीरस हो जावेगा’ इसके अनुसार काव्य में नीरसता आ जावेगी तथापि कभी-कभी कवि का अभिनिवेश प्रधान-
यद्यपि कवि का सर्वदा रस से आविष्ट वक्ता होना ही उचित है । नहीं तो जैसा कि कहा गया है कि ‘यदि कवि वीतराग हो तो सारा काव्य नीरस हो जाएगा’ इसके अनुसार काव्य में नीरसता आ जाएगी तथापि कभी-कभी कवि की रुचि प्रधान-
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करणविप्रलम्भयोस्त्वसमासैव सङ्घटना । कथमिति चेदुच्यते—रसौ यदा प्राधान्येन प्रतिपाद्यस्तदात्प्रतीतोतौ न्याय- धायकौ विरोधिनस्तत्समनैव परिहार्यौ ।
(अनु०) करण और विप्रलम्भ में तो असमासा सङ्घटना ही होती है । किस प्रकार ? यदि यह कहो तो कहा जा रहा है—जब प्रधा नतया रस का प्रतिपादन करना हो तब उसकी प्रतीति में व्यवधान डालनेवालों तथा विरोधियों का सभी प्रकार से परिहार करना च्चहिये ।
लोचन
कथमिति चेदिति । किं धर्मंसूत्रकारवचनमेतदिति भावः । उच्यते इति । न्यायोपपच्येर्थ्यः । तत्प्रतीताविधि । तदास्वादे ये व्यवधायकौ आस्वादविध्नरूपौ विरोधिनस्तद्विपरीतौ स्वादमयौ इत्यर्थः ।
'यदि कहो किस प्रकार' यह । भाव यह है कि क्या यह धर्म-शास्त्रकार का वचन है ? 'कहा जाता है' अर्थात् न्याय्य उपपत्ति से । 'उसकी प्रतीति में' अर्थात् उसके आस्वाद में जो व्यवधायक अर्थात् आस्वाद विध्नस्वरूप विरोधी उससे विपरीत आस्वादमय ।
तारावती
तथा रसोन्मुख न होकर यमक इत्यादि अथवा चित्रकाव्यप्रदर्शनपरक हो जाता है उसी दशा में कवि रसभावहीन कहा जाता है। (इसके अतिरिक्त कवि अपने प्रधान रस से भिन्न जब ऐसे विषय में लिखने लगता है जिसका उससे चलता हुआ वर्णन करना है तब भी वह रसभावाभिनिवेश हीन ही कहा जाता है ।
आलोककार ने 'यदा तु कवि……….सङ्घटने' इस वाक्य के अन्त में लिखा है 'नियमेनैव तथासमासे एव सङ्घटने'। इस वाक्य का सीधा अर्थ यह होगा—नियम से ही असमास या मध्यसमास ही सङ्घटनायें होती हैं । यहाँ पर एक तो नियम शब्द दूसरे दो वार 'ही' (एव) का प्रयोग पुनरुक्त हो जाते हैं और इनका कोई उपयोग नहीं रहता ।
अतः इस पुनरुक्ति को दूर करने के लिये इन शब्दों को वाक्य में विभिन्न स्थानों पर जोड़ देना चाहिये । नियम का अन्वय वक्ता से करना चाहिये अर्थात् जो वक्ता नियमपूर्वक रसमाव से युक्त हो । अर्थात् किसी प्रकार भी तटस्थ न हो । प्रथम 'एव' शब्द को ध्वन्यात्मभूत के साथ जोड़ना चाहिये । इसका अर्थ यह हुआ कि रस ध्वन्यात्मभूत हो हो किसी प्रकार भी रसवदलङ्कारप्राय न हो । दूसरा 'एव' अपने ठीक स्थान पर ( प्रयोग के स्थान पर ) लग जाता है । उसका अर्थ हो जाता है—'तथा सङ्घटना असमास या मध्यसमासवाली
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एवं च दीर्घसमासा सङ्घटनासमासानामनेकप्रकारसम्भावनया कदाचिद्रसप्रतीतिं व्यवदधातीति तस्यां नात्यन्तमभिनिवेशः शोभते । विशेषतोऽभिनेयार्थे काव्ये । ततोऽनयत्र च विशेषतः करुणविप्रलम्भशृङ्गारयोः । तयोर्हि सुकुमारतरत्वात्स्वल्पपायामप्यस्खलितया शब्दार्थयोः प्रतीतिरम्न्थरीभवति । रसान्तरे पुनः प्रतिपाद्ये रौद्रादौ मध्यसमासा सङ्घटना कदाचिद्वीरौद्रत्नायकाश्रयेण दीर्घसमासापि वा तदाच्चेपाविनाभाविरसचित्तवृत्त्यापेक्षया न विगुणा भवतीति सापि नात्यन्तं परिहार्या। सर्वासु च सङ्घटनासु प्रसाद-
ख्यो गुणो व्यापी । स हि सर्वरससाधारणः सर्वसङ्घटनासाधारणत्वाच्चेहत्युक्तम् । प्रसादातिशये ह्यस्मासापि सङ्घटना करुणविप्रलम्भशृङ्गारौ न व्यनक्ति । तद्परित्यागे च मध्यमसमासापि न प्रकाशयति । तस्मात्सर्वत्र प्रसादोऽनुसतव्यः ।
(अनु०) और इस प्रकार समासों की अनेक प्रकार की सम्भावना के कारण दीर्घसमासा सङ्घटना कदाचित् रसप्रतीति में व्यवधान भी उपस्थित कर देती है । अतः उस दीर्घसमास में अत्यन्त आग्रह शोभित नहीं होता है । विशेष रूप से अभिनेयार्थ काव्य में । उससे भिन्न ( श्रव्य काव्य में ) विशेष रूप से करुण और विप्रलम्भ शृङ्गार में । उन दोनों के अधिक सुकुमार होने के कारण थोड़ी भी अस्खलितता में शब्द और अर्थ की प्रतीति मन्थर हो जाती है । पुनः रौद्र इत्यादि दूसरे रस के प्रतिपादनीय होने पर मध्यसमासवाली सङ्घटना अथवा कदाचित्
और इस प्रकार समासों की अनेक प्रकार की सम्भावना के कारण दीर्घसमासा सङ्घटना कदाचित् रसप्रतीति में व्यवधान भी उपस्थित कर देती है । अतः उस दीर्घसमास में अत्यन्त आग्रह शोभित नहीं होता है । विशेष रूप से अभिनेयार्थ काव्य में । उससे भिन्न ( श्रव्य काव्य में ) विशेष रूप से करुण और विप्रलम्भ शृङ्गार में । उन दोनों के अधिक सुकुमार होने के कारण थोड़ी भी अस्खलितता में शब्द और अर्थ की प्रतीति मन्थर हो जाती है । पुनः रौद्र इत्यादि दूसरे रस के प्रतिपादनीय होने पर मध्यसमासवाली सङ्घटना अथवा कदाचित्
वीरोद्दत्नायकाश्रयेण दीर्घसमास भी आक्षेप बिना दीर्घसमास के हो हो न सकें गुणहीन नहीं होता अतएव उसका भी अत्यन्त परिहार नहीं होना चाहिये । (जहाँ वाच्य बिना दीर्घ समास के रस को अभिव्यक्त हो न कर सके वहाँ दीर्घसमास विगुण नहीं होता । अतः उसका भी परित्याग करना उचित नहीं है । ) सब प्रकार की सङ्घटनाओं में प्रसाद नामक गुण व्यापक होता है । यह बताया जा चुका है कि वह सभी रसों में साधारण होता है
तथा सभी सङ्घटनाओं में भी साधारण होता है । प्रसाद गुण का अतिक्रमण करने पर समासरहित सङ्घटनना भी करुण तथा विप्रलम्भ शृङ्गार को अभिव्यक्त नहीं करती । प्रसाद गुण के परित्याग न करने पर मध्यम समासवाली सङ्घटना भी ( कोमल रसों को ) प्रकट करे—ऐसा नहीं होता । अतः सर्वत्र प्रसाद गुण का अनुसरण करना चाहिए ।
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सम्भावनयेतिति । अनेकप्रकारः सम्भाव्यते संवर्तनातु सम्भावनायां प्रयोक्त्रीणि द्वे णिचौ । विशेषतोडभिन्नेयार्थेति। अनूदितेतेन व्यङ्ग्येन तावत्समासार्थीभिनयो न शक्य; कतुंम् । काक्वाद्योऽन्तरमसादगानादिपक्षे । तत्र हुष्क्रोजा वहुत्तरसन्देहप्रसरा च तत् प्रतिपत्तिषु नोद्भेदनुन्नताह । स्तात् । प्रत्यक्षहेतुविचारस्थ्था इति भावः । अनन्यत्र चोति अनभिनेयार्थेडपि । मन्थरीभवतीति । आस्तादो विधिनतत्प्रतिहन्यत इत्यर्थः । तस्या दीर्घसमाससङ्घटनाया: य आचेपस्तेन विना यो न भवति व्यङ्ग्याभिनयङ्ककुसता-दर्शो रसोत्कितो रसव्यञ्जकतयाम्पादीयमानो वाच्यस्तत्स्य यासावपेक्षा दीर्घसमास-सङ्घटनां प्रति सा अवैगुण्ये हेतुः । नायकस्याचेपो व्यपार इति यद्ग्रन्थकार्यतं तत् शिल्प्यतीवेद्यलम् ।
'सम्भावना के द्वारा' अनेक प्रकार की सम्भावना की जाती है और सङ्घटनातो सम्भावना में प्रयोजिका होती है इस प्रकार दो णिच् (किये गये हैं ) 'विशेषरूप से अभिन्नेयार्थ काव्य में' । बिना टूट हुए व्यङ्ग्य के द्वारा तो समासार्थ का अभिनय नहीं ही किया जा सकता । और काकु इत्यादि तथा प्रसादन के लिये अन्तर्गान इत्यादि । उसमें कठिनता से प्रयोग करने योग्य तथा वहुत्तर सन्देह-प्रसारवाली प्रतिपत्ति नास्य के अनुरूप नहीं होगी । क्योंकि उसका रूप प्रत्यक्ष (हो जाता है ) यह भाव है । 'और अनन्यत्र' अर्थात् अनभिनेय अर्थ (वस्तु ) में भी । 'मन्थर हो जाती है' अर्थात् विद्धिनत आस्वाद प्रतिहत हो जाता है । उसका अर्थात् दीर्घसमास सङ्घटनाका जो आक्षेप उसके बिना जो व्यङ्ग्य का अभिव्यञ्जक नहीं होता उस प्रकार का रसोत्कित अर्थात् रसव्यञ्जकता के लिये ग्रहण किया हुआ जो वाच्य उसकी जो दीर्घसमाससङ्घटनाके प्रति अपेक्षा वह अवैगुण्य में हेतु है । नायक का आक्षेप अर्थात् व्यापार जो यह व्याख्या की गई वह ( हृदय में ) जमती ही नहीं वस इतना पर्याप्त है ।
तारावती .
ही होती है नहीं तो दीर्घसमासवाली भी हो सकती है । इसी प्रकार की योजना करनी चाहिये जिससे नियम शब्द तथा दोनों 'एव' शब्दों की पुनरुक्ति की आशङ्का न की जा सके । 'करण तथा विप्रलम्भ श्रृङ्गार में सङ्घटनासमाहोती होनी चाहिये । ( प्रश्न ) यह कैसे ? क्या यह धर्मशास्त्र का वचन है जोकि इसका निर्देश मानना अनिवार्य हो ? ( उत्तर ) यह बात तो न्यायानुकूल ही सिद्ध हो जाती है जब प्रधानतया रस का प्रतिपादन किया जा रहा हो तब उसकी प्रतीति में व्यवधायक हो अर्थात् जातत्व रसास्वादन में विघ्नकारक हों अथवा विरोधी हो अर्थात् उससे विपरीत आस्वाद को उत्पन्न करनेवाले हों उनका तो पूर्ण रूपमें
ही होती है नहीं तो दीर्घसमासवाली भी हो सकती है । इसी प्रकार की योजना करनी चाहिये जिससे नियम शब्द तथा दोनों 'एव' शब्दों की पुनरुक्ति की आशङ्का न की जा सके । 'करण तथा विप्रलम्भ श्रृङ्गार में सङ्घटनासमाहोती होनी चाहिये । ( प्रश्न ) यह कैसे ? क्या यह धर्मशास्त्र का वचन है जोकि इसका निर्देश मानना अनिवार्य हो ? ( उत्तर ) यह बात तो न्यायानुकूल ही सिद्ध हो जाती है जब प्रधानतया रस का प्रतिपादन किया जा रहा हो तब उसकी प्रतीति में व्यवधायक हो अर्थात् जातत्व रसास्वादन में विघ्नकारक हों अथवा विरोधी हो अर्थात् उससे विपरीत आस्वाद को उत्पन्न करनेवाले हों उनका तो पूर्ण रूपमें
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परित्याग ही करना चाहिये । अब ऐसी सङ्कुटना की बात लीजिये जिसमें लम्बे समास किये गये हों । समास में अनेक प्रकार की सम्भावना की जा सकती है । ( जैसे 'लोकनाथ' शब्द में वहुब्रीहि भी हो सकत है, कर्मधारय भी और मध्यमपदलोपी समास भी । ) अतः कभी-कभी वाच्यार्थ के निर्णय में विवेचन करना पड़ सकता है जिससे रस की प्रतीति में एक व्यवधान उपस्थित हो सकत है । यह वात विशेष रूप से लम्बे समासों में होती है । अतः लम्बे समासों का अधिक आग्रह अच्छा नहीं लगता । यहाँ पर सम्भावना शब्द सम् + उपसर्गं भू धातु से दो बार णिच् प्रत्यय होकर संज्ञा अर्थ में ल्युट् प्रत्यय होने से बना है । एक णिच् के बाद जन्त द्वारा णिच् प्रत्यय होता है तब एक णिच् का लोप हो जाता है । दो बार णिच् होने से यह अर्थ हो जावेगा—समास में अनेक प्रकार सम्भव होते हैं, कोई परिशीलक व्यक्ति उनकी सम्भावना करता है और उसकी सम्भावना में प्रयोजक होती है सङ्कुटना । इस प्रकार दीर्घसमासगर्भित सङ्कुटना में अनेक प्रकार की सम्भावना से वाच्यार्थ व्यवहित हो जाता है और उससे रसप्रतीति भी व्यवहित हो जाती है । यह वात विशेष रूपसे ऐसे काव्य में होती है जिसमें अभिनय के लिये लिखा जता है और नट लोग उस काव्य का अभिनय कर उसका प्रत्यक्षीकरण पाठकों के सामने करते हैं । यदि अभिनेय काव्य में लम्बे समास हुये तो उस समासगर्भित वाक्य का अभिनय बिना वाक्य को तोड़े हुये सम्भव नहीं होता । ऐसी दशा में व्यङ्गयार्थ भी टूट-टूट कर ही परिशीलकों के सामने आता है जिससे रसप्रतीति में बिघ्न पड़ता है ।
दूसरी बात यह है कि अभिनय में अभिनेता को विशेष प्रकार की कण्ठध्वनि बनाकर ( काकु के द्वारा ) किसी शब्द या वाक्य का उच्चारण करना पड़ता है । यदि लम्बे समास हुये तो कण्ठध्वनि किस प्रकार बनाई जा सकेगी ? इसी प्रकार अभिनय में बीच-बीच में जनता के अनुरंजन के लिये गाने भी होते हैं । यदि गानों में लम्बे समास हुये तो उनका स्वर-संयोग किस प्रकार ठीक किया जा सकेगा? आशय यह है कि उस अभिनेय काव्य में ऐसी प्रतिपत्ति जिसका प्रयog ( अभिनय ) कठिनाई से किया जा सके तथा जो सन्देह को बहुत अधिक प्रचार देनवाली हो नाट्य के अनुकूल नही होती । क्योंकि उसमें नाट्यप्रतीति प्रत्यक्षरूपिणी ही होती है । दूसरे स्थान पर अर्थात् ऐसे काव्य में जिसका प्रयोजन अभिनय न हो विशेषरूप से दीर्घसमास के परित्याग का ध्यान करुणरस तथा वीरलभ्भशृङ्गार में रखना चहिये। क्योंकि निस्सन्देह ये
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व्यापीति । या काचिस्संघट्टना सा तथा कर्तव्या यथा वाच्ये स्फुटति भवति मतीतिरिति यावत् । उच्यते । 'समर्पकत्वं काव्यस्य यतु' इत्यादिना । न व्यतिरिकोऽभिहितवाच्यार्थस्वकपठनान्वयव्यतिरेकाभुक्तौ । 'व्यापी' इति । अर्थाय यह है कि जो कोई भी संघट्टना हो वह ऐसी की जानी चाहिये जिससे वाच्य में शीघ्र ही प्रतीति हो जावे । 'कहा गया है' 'काव्य का ( सभी रसों के प्रति ) जो समर्पकत्व' इत्यादि के द्वारा । 'व्यक्त नहीं करता है' । भाव यह है कि कविकुल अपने वाच्य का ही प्रयत्न नहीं करता । 'वह' यहाँ प्रसाद के अपरित्याग में अभीष्ट होने के कारण, इस विषय में रचकगण से अवश्यमव्यतिरेक कह दिये गये हैं ।
लोचन
तारावती
दोनों रस अन्य रसों की अपेक्षा अधिक सुकुमार होते हैं । अतः इनमें यदि स्वल्पमात्र भी असंच्छता आती है तो शब्द और अर्थ की प्रतीति मन्त्र पड़ जाती है जिससे आस्वादन में विध्न पड़ जाता है और उसकी क्रिया ही नष्ट हो जाती है । यदि दूसरे रौद्र इत्यादि रसों का प्रतिपादन करना हो तो मध्यमसमासा संघट्टना भी गुङ्गहीन नहीं होती और यदि कदाचित् उन रौद्रादि रसों में घोरोदात्त नायक से सम्वद्ध व्यङ्ग्यार का आश्रय लिया जावे तो ऐसी दशा में दीर्घसमासा संघट्टना भी बुरी नहीं होती । दीर्घसमासा संघट्टना वहाँ पर भी अनुचित नहीं होती जहाँ पर दीर्घसमासा संघट्टना में अनुपपत्ति के कारण नवीन अर्थ को योजना कर ली जाती हो तथा उस नवीन अर्थ की योजना के अभाव में वाच्यार्थ अपने व्यङ्ग्यार्थ को अभिव्यक्त ही न कर सके ।
इस प्रकार रस की अभिव्यक्ति के लिये जिस वाच्यार्थ का उपादान किया जावे उस वाच्यार्थ को यदि दीर्घसमासघटित संघट्टना की अपेक्षा हो तो वहाँ पर दीर्घसमास दूषित नहीं होता । इसमें कारण यही है कि वहाँ पर दीर्घसमास के अभाव में रौद्रादि रस की अभिव्यक्ति हो ही नहीं सकती और अभिव्यङ्गक वाच्यार्थ को उस दीर्घसमास की अपेक्षा होती है । वृत्तिकार ने इन शब्दों का प्रयोग किया है-‘उसके आक्षेप के बिना न होनेवाले रस में उचित वाच्य की अपेक्षा होने के कारण दीर्घसमासा संघट्टना दूषित नहीं होती ।’ कुछ लोगों ने ‘उसके आक्षेप’ का अर्थ किया है नायक का आदर्श, किन्तु यह व्याख्या सङ्गत नहीं होती । यहाँ पर ठीक व्याख्या यही है कि जहाँ पर रसाभिव्यक्ति के लिये दीर्घसमासवाली संघट्टना का आक्षेप अनिवार्य हो और उसके बिना वाच्यार्थ रसाभिव्यक्ति कर ही न सके, वहाँ पर चूँकि वाच्यार्थ रसाभिव्यक्ति के लिये दीर्घसमासा संघट्टना की अपेक्षा रखता है, अतः दीर्घसमासा संघट्टना
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अतएव च 'यो यः शाखां बिभर्ति' इत्यादौ यथोजसः स्थितिनेष्यते तत्प्रसादाख्य एव गुणो न माधुर्यम् । न चाचारुत्वम्, अभिप्रेतरसप्रकाशनात् । तस्माद्गुणाव्यतिरिक्तत्वे गुणव्यतिरिक्तत्वे वा संघटनाया यथोक्तौचित्याद्विषय-नियमोदस्तीति तस्या आपे रसव्यक्तिकत्वम् । तस्याद्रिरसाभिव्यक्तिनिमित्तभूताया योड्यमननतरोक्ते नियमहेतुः स एव गुणानां नियतो विषय इति गुणाश्रयेण व्यवस्थानमप्यविरुद्धम् ।
अतएव च 'यो यः शाखां बिभर्ति' इत्यादौ यथोजसः स्थितिनेष्यते तत्प्रसादाख्य एव गुणो न माधुर्यम् । न चाचारुत्वम्, अभिप्रेतरसप्रकाशनात् । तस्माद्गुणाव्यतिरिक्तत्वे गुणव्यतिरिक्तत्वे वा संघटनाया यथोक्तौचित्याद्विषय-नियमोदस्तीति तस्या आपे रसव्यक्तिकत्वम् । तस्याद्रिरसाभिव्यक्तिनिमित्तभूताया योड्यमननतरोक्ते नियमहेतुः स एव गुणानां नियतो विषय इति गुणाश्रयेण व्यवस्थानमप्यविरुद्धम् ।
(अनु०) अतएव 'ये यः शाखं बिभर्ति' इत्यादि में यदि ओज की स्थिति का मानना अभीष्ट न हो तो वहाँ पर प्रसाद नामक गुण ही माना जाना चाहिये, माधुर्य नहीं । वहाँ अचारुता नहीं आतो; क्योंकि उससे अभिप्रेत रस प्रकाशित हो जाता है । अतः चाहे सङ्घटना को गुणों से अभिन्न मानें चाहे भिन्न, बतलाये हुये औचित्य के कारण विषय नियम होता है अतः सङ्घटना में रस की व्यञ्जकता होती है । रस की अभिव्यक्ति में निमित्तभूत उस सङ्घटना को जो अभी नियमहेतु वतलाया गया है वही गुणों का भी नियत विषय है, अतः गुणों के आश्रय से सङ्घटना की व्यवस्था करना भी विरुद्ध नहीं है ।
न माधुर्यमिति । ओजोमाधुर्ययोर्हि ओजोऽन्या-भावरूपत्वं प्राधान्यिरूपितमिति तयोः सङ्घरोऽस्त्यन्तं श्रुतिबाधात् इति भावः । अभिप्रेति । प्रसादेनैव स रसः प्रकाशितः न न प्रकाशित इत्यर्थः । तस्मादिति । यदि गुणाः संघटनैक रूपास्त्थापि गुणनियम एवं सङ्घटनाया नियमः । गुणाधीनसङ्घटनापक्षेऽप्येवम् । सङ्घटनाश्रयगुणपक्षेऽपि सङ्घटनाया नियमकत्वेन यदुक्तं रसव्यक्तिहेतुत्वेनोक्तं तद् गुणानामपि नियमहेतुरिति पक्षत्रयेऽपि न कश्चिद्विप्लव इति तत्पर्यम् ॥ ५, ६ ॥
न माधुर्यमिति । ओजोमाधुर्ययोर्हि ओजोऽन्या-भावरूपत्वं प्राधान्यिरूपितमिति तयोः सङ्घरोऽस्त्यन्तं श्रुतिबाधात् इति भावः । अभिप्रेति । प्रसादेनैव स रसः प्रकाशितः न न प्रकाशित इत्यर्थः । तस्मादिति । यदि गुणाः संघटनैक रूपास्त्थापि गुणनियम एवं सङ्घटनाया नियमः । गुणाधीनसङ्घटनापक्षेऽप्येवम् । सङ्घटनाश्रयगुणपक्षेऽपि सङ्घटनाया नियमकत्वेन यदुक्तं रसव्यक्तिहेतुत्वेनोक्तं तद् गुणानामपि नियमहेतुरिति पक्षत्रयेऽपि न कश्चिद्विप्लव इति तत्पर्यम् ॥ ५, ६ ॥
'माधुर्य नहीं' अर्थात् ओज और माधुर्य का अन्योन्याभावरूपत्व पहले ही निरूपित कर दिया गया, इस प्रकार उनका सङ्कर अन्यन्त श्रुतिबाध है । 'अभिप्रेत' अर्थात् प्रसाद के द्वारा ही वह रस प्रकाशित कर दिया गया, प्रकाशित न कर दिया गया हो ऐसी बात नहीं । 'इसे' यदि गुण और सङ्घटना एक रूप है तथापि गुण का नियम ही सङ्घटना का नियम है । गुण के अधीन सङ्घटना पक्ष में भी सङ्घटना के नियामक होने के कारण जो वक्ता और वाच्य का औचित्य हेतु के रूप में वतलाया गया है वह गुणों का भी नियमहेतु होता है—इस प्रकार तीनों पक्षों में कोई विप्लव नहीं है यह तात्पर्य है ॥ ५, ६ ॥
ऐसे स्थान पर दूषित नहीं होती । इतना कहना पर्यास है अधिक की क्या आवश्यकता ?
तारावती
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सभी प्रकार की संघटनाओं में प्रसाद नामक गुण व्यापक होता है, अर्थात् कोई भी किसी प्रकार की भी संघटना हो उसको ऐसे रूप में बनाना चाहिये जिससे वाच्य के विषय में एकदम प्रतीति हो जावे । यह तो पहले बतलाया ही जा चुका है कि प्रसाद नामक गुण सामान्यतया सभी रसों में आता है और सभी संघटनाओं में सामान्यतया अपेक्षित होता है । यह बात 'सम्पर्कतवं काव्यस्य यस्तु सर्वरसात् प्रति' इत्यादि कारिका में कही गई है । यदि प्रसाद गुण का अतिक्रमण कर दिया जावे तो समासरहित संघटना भी करुणरस तथा विप्रलम्भशृङ्गार को अभिव्यक्त नहीं कर सकतीं; क्योंकि वाच्यार्थ व्यङ्ग्य होता है और प्रसाद गुण के अभाव में उस वाच्यार्थ का ही प्रत्यायन नहीं हो सकता । यदि प्रसाद गुण का परित्याग न किया गया हो तो मध्यमसमासवाली संघटना भी करुणरस तथा विप्रलम्भशृङ्गार को अभिव्यक्त नहीं कर सकती—यह बात नहीं है; अतः सर्वत्र प्रसाद गुण का अनुसरण करना चाहिये । इसीलिये यद्यपि 'यो यः शस्त्रं बिभर्ति' इत्यादि पद्य रौद्ररसपरक है, किन्तु इसमें समास नहीं किया गया है । इस समास न करने के कारण यदि इसे हम ओज के अन्दर सन्निविष्ट नहीं करना चाहते तो भी माधुर्य में सन्निविष्ट नहीं कर सकते । इसे हम प्रसाद गुण के अन्दर ही सन्निविष्ट करेंगे । आशय यह है कि यहाँ पर वाच्यार्थ तो उद्भट है और संघटना समास न करने के कारण माधुर्यप्रधान है । इस प्रकार यहाँ पर ओज और माधुर्य का सङ्कर है । किन्तु पहले इस बात का निरूपण किया जा चुका है कि ओज के अभाव को माधुर्य कहते हैं और माधुर्य के अभाव को ओज कहते हैं । इस प्रकार ये दोनों एक दूसरे के अभावरूप ही होते हैं । अतः इनका सङ्कर तो श्रवणगोचर भी नहीं हो सकता । यहाँ पर यह नहीं कहा जा सकता कि ओजस्विनी संघटना के अभाव में 'यो यः शस्त्रं बिभर्ति' इत्यादि में अच्छता आ गई है । कारण यह है कि यहाँ पर प्रसाद गुण ही रौद्ररस के प्रकाशन के ओज का कार्य कर देता है । वह रौद्र का प्रकाशन नहीं करता ऐसी बात नहीं है । अतः चाहे हम संघटना को गुणों के साथ अभिन्न मानें या भिन्न मानें जो ऊपर औचित्य का नियम बतलाया गया है उसके अनुसार उनके विषय का नियम है ही । अतः संघटना भी रस की व्यञ्जक होती है । इसी प्रकार गुणों के आधीन संघटना की व्यवस्था भी विरुद्ध नहीं है; क्योंकि संघटना रस में निमित्त होती है और जो उसके नियमहेतु अभी बतलाये गये हैं वे गुणों के भी निश्चित विषय हो सकते हैं । आशय यह है कि यदि गुण और संघटना दोनों को एक ही मान तो गुण के नियम संघटना में भी लगू हो सकते हैं ।
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विषयाश्रयमप्यन्यदौचित्यं तां नियच्छति ।
काव्यप्रभेदाश्रयतः स्थिता भेदवती हि सा ॥ ७ ॥
वक्तृवाच्यगतौचित्ये सत्यपि विषयाश्रयमन्यदौचित्यं संघटनां नियच्छति ।
वक्ता और वाच्य में रहनेवाले औचित्य के होते हुये भी विषय के आधीन एक दूसरा औचित्य भी संघटनना को नियन्त्रित करता है ।
यतः काव्यस्य प्रभेदौ मुक्तकं ससंदर्भाश्रिताप्रशंसितदूषणम् । संदर्भान्तर्गतावशेषकलङ्कापककुलकानि ।
क्योंकि काव्य के भेद हैं संस्कृत प्राकृत और अपभ्रंश में निवद्ध मुक्तक, संदर्भान्तर्गत, अवशेषक, कलङ्कापक और कुलक ।
पर्यायबन्धः, परिकथा खण्डकथासकलकथे सर्गबन्धन्योडस्मिन्नेयार्थमाख्यायिकाकथे इत्येवमादयः ।
पर्यायबन्ध, परिकथा, खण्डकथा और सकलकथा, सर्गबन्ध, अभिनेयार्थ, आख्यायिका और कथा ।
तदाश्रयेपि संघटनाविशेषवती भवति ।
इनके आश्रय से भी संघटनाविशेषतावाली हो जाती है ।
नियामकान्तरमप्यस्तीत्याह—विषयाश्रयमिति ।
विषयशब्देन सङ्घातविशेष उक्तः ।
विषयशब्देन सङ्घातविशेष उक्तः ।
विषय शब्द से संघातविशेष उक्तः ।
यथा हि सेनाद्यशकसङ्घातानिवेशी पुरुषः कतरोडपि तदौचित्यादनुगुणतये-
यह कहते हैं—‘विषयाश्रय’***इत्यादि । विषय शब्द से विशेष प्रकार का संघात बतलाया गया है ।
उक्तः । यथा हि सेनाद्यशकसङ्घातानिवेशी पुरुषः कतरोडपि तदौचित्यादनुगुणतयै-
जिस प्रकार निस्संदेह सैन्य आदि संघातविशिष्ट कातर पुरुष भी उसके औचित्य से अनुपगुणरूप में ही त्मक संघात में निविष्ट कातर पुरुष भी उसके औचित्य से अनुपगुणरूप में ही
तारावती
संघटनां को माने तो भी यहीं बात होगी अर्थात् गुणों के ही नियम संघटना में भी लागू होजावेंगे ।
यदि संघटना के आधीन गुणों को मानें तो संघटना नियामक होगी ।
ऐसी दशा में वक्ता और बोद्धव्य का जो औचित्य संघटना में हेतु के रूप में बतलाया गया है वह गुणों का भी नियमहेतु हो सकता है ।
इस प्रकार तीनों पक्षों में किसी प्रकार का कोई विरोध नहीं आता ॥ ५, ६ ॥
अथ यह बतलाया जा रहा है कि संघटना के दूसरे भी नियामक हैं—‘एक दूसरे प्रकार का भी औचित्य होता है जो कि संघटना को नियन्त्रित करता है।
काव्य के भेदोपभेदों के आधार पर संघटना में भी भेद हो जाया करता है ।’
विषय शब्द का अर्थ है एक प्रकार का संघात या समूह ।
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वास्ते, तथा काव्यवाक्यमपि सङ्ङातविशेषात्मकसन्दानितकादिमध्यानिविष्टं तदौचित्येन वर्तते । मुक्तकं तु विषयशब्देन यदुक्तं तत्रसङ्घाताभावेन स्वातन्त्र्यमात्रं प्रदर्शयितुं स्वप्रतिष्ठितमकार्षीत् यथा । अपिशब्देनैदमाह—सत्यपि वक्तृवाच्यौचित्यं निर्वार्यंत इति । मुक्तक्रमिति । मुक्तमन्येनानालिङ्ङितं तस्य संज्ञायां करणेन स्वतन्त्रतया परिसमाप्तनिराकाङ्क्षार्थमपि प्रवन्धमध्ये वर्त्तं न मुक्तकमित्युच्यते । मुक्तकस्यैव विशेषणं संस्कृतंत्यादि । क्रमभावित्वासथैव निर्देशः । द्वाभ्यां क्रियारहता है उसी प्रकार काव्यवाक्य भी काव्यविरोषात्मक सन्दानितक इत्यादि के मध्य में निविष्ट होकर उसके औचित्य से वर्तमान रहता है । मुक्तक तो विषय शब्द से जो कहा गया है उसके सङ्घात के अभाव के कारण केवल स्वातन्त्र्य को प्रदर्शित करने के लिये ( यहाँ पर आहा है ) जैसे स्वप्रतिष्ठित आकाश । 'अपि' शब्द से यह कहता है—वक्ता और वाच्य के औचित्य के होते हुये भी विषय का औचित्य केवल तारतम्य के भेद से प्राप्त है; विषयौचित्य के द्वारा वक्ता और वाच्य का औचित्य निवारित नहीं किया जाता । 'मुक्तक' मुक्त अर्थात् अन्य से अनालिङ्ङित
वास्ते, तथा काव्यवाक्यमपि सङ्ङातविशेषात्मकसन्दानितकादिमध्यानिविष्टं तदौचित्येन वर्तते । मुक्तकं तु विषयशब्देन यदुक्तं तत्रसङ्घाताभावेन स्वातन्त्र्यमात्रं प्रदर्शयितुं स्वप्रतिष्ठितमकार्षीत् यथा । अपिशब्देनैदमाह—सत्यपि वक्तृवाच्यौचित्यं निर्वार्यंत इति । मुक्तक्रमिति । मुक्तमन्येनानालिङ्ङितं तस्य संज्ञायां करणेन स्वतन्त्रतया परिसमाप्तनिराकाङ्क्षार्थमपि प्रवन्धमध्ये वर्त्तं न मुक्तकमित्युच्यते । मुक्तकस्यैव विशेषणं संस्कृतंत्यादि । क्रमभावित्वासथैव निर्देशः । द्वाभ्यां क्रियारहता है उसी प्रकार काव्यवाक्य भी काव्यविरोषात्मक सन्दानितक इत्यादि के मध्य में निविष्ट होकर उसके औचित्य से वर्तमान रहता है । मुक्तक तो विषय शब्द से जो कहा गया है उसके सङ्घात के अभाव के कारण केवल स्वातन्त्र्य को प्रदर्शित करने के लिये ( यहाँ पर आहा है ) जैसे स्वप्रतिष्ठित आकाश । 'अपि' शब्द से यह कहता है—वक्ता और वाच्य के औचित्य के होते हुये भी विषय का औचित्य केवल तारतम्य के भेद से प्राप्त है; विषयौचित्य के द्वारा वक्ता और वाच्य का औचित्य निवारित नहीं किया जाता । 'मुक्तक' मुक्त अर्थात् अन्य से अनालिङ्ङित
उसका संज्ञा में करण । इससे स्वतन्त्ररूप में परिसमाप्त तथा निराकाङ्क्ष अर्थवाला प्रवन्धमध्ये वर्त्ती मुक्तक यह नहीं कहा जाता । मुक्तक का ही विशेषण है संस्कृत इत्यादि । क्रमभावी होने के कारण वैसा ही निर्देश है । द्वो से क्रिया
उसका संज्ञा में करण । इससे स्वतन्त्ररूप में परिसमाप्त तथा निराकाङ्क्ष अर्थवाला प्रवन्धमध्ये वर्त्ती मुक्तक यह नहीं कहा जाता । मुक्तक का ही विशेषण है संस्कृत इत्यादि । क्रमभावी होने के कारण वैसा ही निर्देश है । द्वो से क्रिया
तारावती काव्यर मनुष्य भी सेना इत्यादि रूपसमूह के अन्दर पहुँच कर सेना के औचित्य से उसी प्रकार के गुणोवाला हो जाता है, उसी प्रकार काव्यवाक्य भी सन्दानितक इत्यादि विशेष प्रकार के समूह में पड़कर उसी के औचित्य का अनुसरण करने लगता है। मुक्तक में कोई समूह नहीं होता किन्तु उसके लिये विषय शब्द का प्रयोग कर दिया गया है । यह इस वात को प्रकट करने के लिये किया गया है कि मुक्तक स्वतन्त्र होता है इसमें कोई समूह नहीं होता। जैसे यदि कोई यह प्रश्न करे कि पृथ्वी इत्यादि चार तो आकाश में स्थित हैं और आकाश कहाँ स्थित है ? तो इसका उत्तर यही होगा कि आकाश अपने में ही स्थित है । यही बात मुक्तक के विषय में भी समझनी चाहिये । उपयुक्त कारिका में 'भी' शब्द का प्रयोग किया गया है, इसका आशय यह है कि इस विषयाश्रित औचित्य से पूर्वोक्त वक्तृवाच्य का औचित्य निवृत्त नहीं होता, उसमें केवल तारतम्य का अन्तर हो जाता है । आशय यह है कि वक्तृ-गत औचित्य और वाच्यगत औचित्य रसाभिव्यक्ति के लिये अनिवार्य हैं । इसके अतिरिक्त विषयगत औचित्य का जितना अधिक निर्वाह किया जाता है उतनो
तारावती काव्यर मनुष्य भी सेना इत्यादि रूपसमूह के अन्दर पहुँच कर सेना के औचित्य से उसी प्रकार के गुणोवाला हो जाता है, उसी प्रकार काव्यवाक्य भी सन्दानितक इत्यादि विशेष प्रकार के समूह में पड़कर उसी के औचित्य का अनुसरण करने लगता है। मुक्तक में कोई समूह नहीं होता किन्तु उसके लिये विषय शब्द का प्रयोग कर दिया गया है । यह इस वात को प्रकट करने के लिये किया गया है कि मुक्तक स्वतन्त्र होता है इसमें कोई समूह नहीं होता। जैसे यदि कोई यह प्रश्न करे कि पृथ्वी इत्यादि चार तो आकाश में स्थित हैं और आकाश कहाँ स्थित है ? तो इसका उत्तर यही होगा कि आकाश अपने में ही स्थित है । यही बात मुक्तक के विषय में भी समझनी चाहिये । उपयुक्त कारिका में 'भी' शब्द का प्रयोग किया गया है, इसका आशय यह है कि इस विषयाश्रित औचित्य से पूर्वोक्त वक्तृवाच्य का औचित्य निवृत्त नहीं होता, उसमें केवल तारतम्य का अन्तर हो जाता है । आशय यह है कि वक्तृ-गत औचित्य और वाच्यगत औचित्य रसाभिव्यक्ति के लिये अनिवार्य हैं । इसके अतिरिक्त विषयगत औचित्य का जितना अधिक निर्वाह किया जाता है उतनो
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अधिक चारुत्वा उस काव्य में बढ़ जाती है। (यहाँ पर विषय का अर्थ काव्य का स्वरूप या काव्य का भेद है। अतः विषयगत औचित्य पर प्रकाश डालने से पहले लेखक काव्य के भेदोपभेदों का संक्षिप्त परिचय दे रहा है।) काव्य का सबसे छोटा भेद मुक्तक होता है। यह संस्कृत प्राकृत और अपभ्रंश में निवद्ध किया जाता है। मुक्तक शब्द मुक्त शब्द से संज्ञा में क्त प्रत्यय होकर बना है। मुक्त शब्द का अर्थ है जिसका आलिङ्गन कोई दूसरा न कर रहा हो अर्थात् यदि केवल एक पद्य परतः निरपेक्ष भाव से अर्थसामाप्ति में पर्याप्त हो तो उसे मुक्तक कहते हैं। मुक्तक के आलिङ्गन कोर्हैं दूसरा पद्य न कर रहा हो। इसीलिये यदि प्रवन्ध के अन्दर कोई ऐसा पद्य आजावे जिसका अर्थ पूर्णतया उस पद्य में ही समाप्त हो रहा हो और उसे अर्थसमाप्ति केलिये किसी अन्य की आकांक्षा न होतो भी उसे मुक्तक नहीं कहेंगे। (क्योंकि
इस पर द्वीधितिकार ने लिखा है—‘यह कहना ठीक नहीं है कि प्रवन्धान्तर्गत स्वतन्त्र पद्यों को मुक्तक नहीं कहते क्योंकि यद्यपि अन्ततः उन्हें पदान्तर की अपेक्षा होती है तथापि अनेकशः वे स्वतन्त्र रूप में शब्द प्रतीति तो उत्पन्न ही कर देते हैं और कहीं कहीं रसास्वादपर्यन्त उनमें स्वतन्त्र सत्ता पाई जाती है, अतः मुक्तकत्व की स्वीकृति के लिये कोई बाधा नहीं आती।’ किन्तु वास्तविकता यह है कि प्रबन्धान्तर्वर्ती पद्यों में अर्थ की परिसमाप्ति स्वतन्त्र होती ही नहीं। प्रबन्ध के कारण पाठक की एक भावना वन जाती है और एक प्रकार की विचारधारा से पाठक ओतप्रोत जाता है। जब कोई भी स्वतन्त्र पद्य प्रवन्ध के अन्दर आ जाता है। एवं प्रबन्ध
प्राप्त विचारधारा तथा भावना के प्रकाश में ही हम उस पद्य को भी देखते हैं और उसी वातावरण में हम उसका आस्वादन भी करते हैं। उदाहरण के लिये तुलसी जासि भवितव्यता तैसी मिले सहाय। आपु न आवै ताहि पै ताहि तहाँ लै जाय।। दोहावली में भी आया है और रामचरितमानस में भी। दोहावली की स्वतन्त्र सत्ता है और नीतिवाक्य के अतिरिक्त यह और कुछ नहीं मालूम
किन्तु जब हम रामचरितमानस में इसे पढ़ते हैं तो मतापभानुक की अतित, दैववश कपटमुनि के आश्रम में पहुँचना और भविष्य की उसकी विनाश की
कथा—ये सारी बातें हमारी आँखों के सामने नाच उठती हैं तथा इस दोहे में नीति-सूक्ति के अतिरिक्त बहुत बड़ा प्रसंग और तज्जन्य निर्वेद हमारे
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समासौ सन्दानितकम् । त्रिभिर्विशेषकम् । चतुर्भिः कलापकम् । पञ्चप्रभृतितिमिः कुलकम् । इति क्रियासमासिकृताभेदा इति द्वन्द्वेन निर्दिष्टा । अवान्तरक्रियां समासावपि वसन्तवर्णनादिरेकवर्णनीयोद्देश्येन प्रवृत्तः पर्यायबन्धः । एकं धर्ममिदंपुरुषार्थमुद्दिश्य प्रकरणचेष्टयोंऽपान्तवर्णनप्रकारा परिकथा । एकदेशवर्णनात सकलकथा । द्वयोरपि प्राकृतप्रस्तावद्वाद् द्वन्द्वेन निर्देशः ।
समासौ सन्दानितकम् । त्रिभिर्विशेषकम् । चतुर्भिः कलापकम् । पञ्चप्रभृतितिमिः कुलकम् । इति क्रियासमासिकृताभेदा इति द्वन्द्वेन निर्दिष्टा । अवान्तर क्रियासमासि में भी वसन्तवर्णन इत्यादि एक उद्देश्य से प्रवृत्त पर्यायबन्ध ( कहलाता है ) । धर्म इत्यादि एक पुरुषार्थ के उद्देश्य से प्रकार-वैचित्र्य से अनन्त वृत्तान्त वर्णन के प्रकार परिकथा ( कहलाते हैं ) । एकदेश का वर्णन खण्डकथा । अन्त में फलों वाले समस्त इतिवृत्त का वर्णन सकलकथा । दोनों के प्रकृत में प्रसङ्ग होने के कारण द्वन्द्व का निर्देश किया गया है । पहले आस्वादन में निमित्त हो जाता है । अतः यह दोहा वहाँ पर अपनी स्वतन्त्र सत्ता खो देता है । अतः मुक्तक कहलाने का अधिकारी नहीं रहता । हम अनेक प्रकार के सिनेमा के गीत सुना करते हैं किन्तु वातावरण के प्रकाश में जब अभिनय के साथ वह गीत हमें सिनेमाघर में सुनाया जाता है तब उसका प्रभाव और ही प्रकार का होता है । अतः प्रवन्धान्तर्वर्ती स्वतन्त्र पद्य को मुक्तक नहीं कह सकते । यहाँ पर यह भी ध्यान रखना चाहिये कि दण्डी प्रभृति आचार्य प्रवन्धान्तर्वर्ती परिसमाप्तार्थ पद्य को ही मुक्तक कहा करते थे । इसीलिये उन्होंने मुक्तक की पृथक परिभाषा लिखने की आवश्यकता नहीं समझी थी । 'सर्गबन्धांशरूपपतदनुक्तवाक्यविसतंरः ।' इसी मान्यता का खण्डन यहाँ पर अभिनवगुप्त ने किया है । अभिपुराण में मुक्तक की यह परिभाषा दी हुई है—'मुक्तक एक ही इलोक को कहते हैं जो सज्जनों को चमत्कृत करने में समर्थ हो । ) 'संस्कृत प्राकृत और अपभ्रंश से निवद्ध' यह विशेषण मुक्तक का ही है।(क्योंकि दोनों में प्रथमान्त का निर्देश है ।) इन भाषाओं की उत्पत्ति के आधार पर इनका क्रम रखा गया है । संस्कृत से प्राकृत उत्पन्न हुई है, प्राकृत से अपभ्रंश ।( इनका संक्षिप्त परिचय काव्यादर्श में दण्डी ने दिया है । ) मुक्तक काव्य इन तीनों भाषाओं में लिखे जाते थे । यह तो स्वतन्त्र पद्य की बात हुई । कभी-कभी कई पद्यों में एक ही क्रिया होती है, अतः क्रिया की एकता के आधार पर काव्य के ४ भेद किये गये हैं— ( १ ) यदि दो पद्यों में क्रिया समास हो तो उसे सन्दानितक कहते हैं ( उसी को मुक्तक भी कहते हैं ) । ( २ ) यदि तीन पद्यों में क्रिया समास हो तो उसे विशेषक कहते हैं । ( ३ ) यदि चार पद्यों में
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पूर्वेषां तु मुक्तकादीनां भाषायामनियमः । महाकाव्यरूपः पुरुषार्थेफलः समस्तवस्तुवर्णनानप्रबन्धः सर्गबन्धः संस्कृत एव । अभिनेयार्थ दशरूपकं नाटिकाटोटक-रासकप्रकराणिकाद्यवान्तरप्रबन्धसहितमनेकभाषाभ्यामिश्ररूपम् । आख्यायिकोच्छ्वासादिनिबन्धश्च वक्त्रापवक्त्रादिन च युक्तः । कथा तद्वद्राहित । उभयोरपि गद्यपद्यस्वरूपतया द्वन्द्वेन निर्देशः । आदिग्रहणाच्चम्पूः । यथा दण्डी—‘गद्यपद्यमयी चम्पूः’ इति ।
के मुक्तक इत्यादि का भाषा में नियम नहीं है । महाकाव्यरूप पुरुषार्थ फलवाला समस्तवस्तु-वर्णनपरक प्रबन्ध सर्गबन्ध संस्कृत में ही (होता है ) । अभिनेयार्थ दशरूपक ‘नाटिका ट्रोटक, रासक, प्रकरणिक इत्यादि अवान्तर प्रबन्ध सहित अनेक भाषा से मिले हुये रूपवाला ( होता है ) । आख्यायिका उच्छ्वास इत्यादि से और वक्त्र तथा अपवक्त्र इत्यादि से युक्त होती है । कथा उसीसे रहित होती है । दोनों के गद्यपद्यस्वरूप होने के कारण द्वन्द्व से निर्देश किया गया है । आदिग्रहण से चम्पू । जैसा दण्डी कहते हैं—‘गद्यपद्यमयी चम्पूः’ यह ।
क्रिया की परिसमाप्ति हो तो उसे कलापक कहते हैं । ( ४ ) यदि पाँच या पाँच से अधिक पद्यों में क्रिया की समाप्ति हो तो उसे कुलक कहते हैं । इन चारों भेदों में वृत्तिकार ने द्वन्द्व समास का योग किया है । इसका आशय यह है कि ये भेद इस आधार पर किये गये हैं कि इनमें कई पद्यों में एक ही क्रिया का प्रयोग होता है । ( ये चारों प्रकार भी सभी भाषाओं में मिलते हैं । इसीलिये लोचनकार ने लिखा है कि मुक्तक इत्यादि का भाषा में कोई नियम नहीं है । हेमचन्द्र ने भी यहाँ कहा है कि ये सब भेद सभी भाषाओं में होते हैं । ) अब इन भेदों का उल्लेख किया जाता है । जो अनेक वाक्यों का समूह होते हैं तथा जिनका कलेवर अपेक्षाकृत विस्तृत होता है । पर्यायबन्ध उसे कहते हैं जिसमें यद्यपि अवान्तर क्रियायें समाप्त हो जाती हैं परन्तु उनका उद्देश्य वस्तु इत्यादि किसी एक वस्तु का वर्णन ही होता है । ( आधुनिक काल की अनेक कवितायें इसी नाम से अभिहित की जा सकती हैं । ) परिकथा उसे कहते हैं जिसमें धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष इन चारों पुरुषार्थों में किसी एक को लेकर ( अथवा इन्हीं से सम्बद्ध किसी तत्त्व को लेकर ) अनेक प्रकारों के द्वारा अनेक ह्रस्वान्तों का वर्णन किया जावे । कथा के एक भाग का वर्णन खण्डकथा कहलाती है । ( इसे ही खण्डकाव्य भी कह सकते हैं । साहित्यदर्पण में खण्डकाव्य की परिभाषा इस प्रकार लिखी है—‘खण्डकाव्य उसे कहते हैं ज
क्रिया की परिसमाप्ति हो तो उसे कलापक कहते हैं । ( ४ ) यदि पाँच या पाँच से अधिक पद्यों में क्रिया की समाप्ति हो तो उसे कुलक कहते हैं । इन चारों भेदों में वृत्तिकार ने द्वन्द्व समास का योग किया है । इसका आशय यह है कि ये भेद इस आधार पर किये गये हैं कि इनमें कई पद्यों में एक ही क्रिया का प्रयोग होता है । ( ये चारों प्रकार भी सभी भाषाओं में मिलते हैं । इसीलिये लोचनकार ने लिखा है कि मुक्तक इत्यादि का भाषा में कोई नियम नहीं है । हेमचन्द्र ने भी यहाँ कहा है कि ये सब भेद सभी भाषाओं में होते हैं । ) अब इन भेदों का उल्लेख किया जाता है । जो अनेक वाक्यों का समूह होते हैं तथा जिनका कलेवर अपेक्षाकृत विस्तृत होता है । पर्यायबन्ध उसे कहते हैं जिसमें यद्यपि अवान्तर क्रियायें समाप्त हो जाती हैं परन्तु उनका उद्देश्य वस्तु इत्यादि किसी एक वस्तु का वर्णन ही होता है । ( आधुनिक काल की अनेक कवितायें इसी नाम से अभिहित की जा सकती हैं । ) परिकथा उसे कहते हैं जिसमें धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष इन चारों पुरुषार्थों में किसी एक को लेकर ( अथवा इन्हीं से सम्बद्ध किसी तत्त्व को लेकर ) अनेक प्रकारों के द्वारा अनेक ह्रस्वान्तों का वर्णन किया जावे । कथा के एक भाग का वर्णन खण्डकथा कहलाती है । ( इसे ही खण्डकाव्य भी कह सकते हैं । साहित्यदर्पण में खण्डकाव्य की परिभाषा इस प्रकार लिखी है—‘खण्डकाव्य उसे कहते हैं ज
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काव्य के एकदेश का अनुसरण करनेवाला हो ।') सकलकथा उसे कहते हैं जिसमें अनेक इतिवृत्तों का वर्णन किया जावे और वे समस्त इतिवृत्त फलपर्यन्त दौड़नेवाले हों । वृत्तिकार ने खण्डकथा और सकलकथा इन दोनों में द्वन्द्व समास का निर्देश किया है । इसका आशय यह है कि ये दोनों भेद प्राकृत में ही प्रसिद्ध थे । इनसे पहले जितने भी मुक्तक इत्यादि भेद बतलाये गये हैं उनका भाषा में कोई नियम नहीं है । सर्गबन्ध उसे कहते हैं जो कि महाकाव्य रूप हो, कोई भी पुरुषार्थ जिसका फल हो और जिससे प्रवन्धात्मक रूप में सम्पूर्ण जीवनवृत्त का वर्णन किया गया हो । ( इसके विस्तृत लक्षण साहित्यदर्पण में दिये हुये हैं वहीं देखना चाहिये । ) सर्गबन्ध ( महाकाव्य ) केवल संस्कृत में ही लिखा जाता है । कुछ काव्य अभिनय के मन्तव्य से लिखे जाते हैं । ( ये दृश्यकाव्य कहलाते हैं । ) इनके भेद हैं—दृश रूपक ( नाटक, प्रकरण, भाण, व्यायोग, समवकार, डिम, ईहामृग, अङ्क, वीथी और प्रहसन। इनका विस्तृत परिचय साहित्यदर्पण में देखना चाहिये ।) इन दृश रूपकों का अवान्तर विस्तार भी होता है, जैसे—नाटिका, त्रोटक, रासक, प्रकरणिक इत्यादि । ( ये उपरूपक कहलाते हैं । इनके १८ भेद हैं—नाटिका, त्रोटक, गोष्ठी, सट्टक, नाट्यरासक, प्रस्थान, उल्लाप्य, काव्यप्रेक्षण, रासक, संलापक, श्रीगदित, शिल्पक, विलासिका, दुर्मल्लिका, प्रकरणी, हल्लीश और भाणिका । इनके भी लक्षण साहित्यदर्पण में दिये गये हैं । ) ये दृश-
रूपक तथा इनका समस्त अवान्तर प्रपञ्च अभिनेयार्थ काव्य होता है । इसका स्वरूप अनेक भाषाओं से मिला हुआ रहता है । ( नाटक इत्यादि में किसकी क्या भाषा होनी चाहिये इसका विस्तृत विवेचन नाट्यशास्त्र के विभिन्न ग्रन्थों में किया गया है । वहीं देखना चाहिये । ) अब यहाँ काव्यों को लीजिये—प्रभानतया इसके दो भेद होते हैं—आख्यायिका और कथा । आख्यायिका उसे कहते हैं जिसका विभाजन उच्च्वास इत्यादि के द्वारा किया गया हो तथा उसमें वक्त्र तथा अपवक्त्र का समावेश हो । कथा उसे कहते हैं जिसमें ये दोनों वक्तें नहीं अर्थात् न उसका विभाजन उच्च्वास इत्यादि के द्वारा हो और न वक्त्र तथा अपवक्त्र का प्रयोग हो । ( साहित्यदर्पण में इनका विशेष परिचय दिया गया है । ) अग्निपुराण में गद्य काव्य के पाँच भेद किये गये हैं—आख्यायिका, कथा, खण्ड कथा, परिकथा और कथानिका । इनके लक्षण भी वहाँ पर दिये गये हैं । ) वृत्तिकार ने आख्यायिका तथा कथा में द्वन्द्व का निर्देश किया है । इसका कारण यह है कि ये दोनों ही गद्यबन्ध रूप में होते हैं । वृत्तिकार ने 'इत्यादि' शब्द का प्रयोग किया है । इस इत्यादि से चम्पू का ग्रहण हो जाता है । जैसा
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तत्र मुक्तकेषु रसवन्धाभिनिवेशिनः कवेः स तदाश्रयमौचित्यम् । तत्र दर्शितमेव । अन्यत्र कामचारः। मुक्तकेषु प्रवन्धे।ऽभव रसवन्धाभिनिवेशिनः कवयो हृदयस्थे । यथा ह्यमरुकस्य कवेरमुक्तकाः श्रृङ्गाररसस्यान्तः प्रवन्धायमानाः प्रसिद्धा एव ।
( अनुः ) उनमें मुक्तकों में रसवन्धाभिनिवेशी कवि का उसी के आश्रित औचित्य होता है और वह दिखलाया ही जा चुका है । अन्यत्र कवि को स्वतन्त्रता होती है कि वह यथेच्छ रचना कर सकता है । निस्सन्देह प्रवन्धों के समान मुक्तकों में भी रसवन्धाभिनिवेशी कवि देखे जाते हैं । जैसे अमरुक कवि के श्रृंगार रस को प्रवाहित करनेवाले मुक्तक प्रवन्धरूपता को धारण करनेवाले प्रसिद्ध ही हैं ।
अन्यत्रेति रसवन्धाभिनिवेशे ! ननु मुक्तके विभावादिसंघटनै कथम् यत्तद्-यत्तो रसः स्वादितश्रावक्वादि ! अमरुकस्यैव । कथमपि कृतप्रत्यपत्तौ प्रिये सकलितोत्तरेऽसहन्सखीश्रोत्रप्राप्तौ विरहकृशाया कृतव्या न्यायप्रकल्पितसमश्रुतम् । असहन्सखीश्रोत्रप्राप्तौ विरहकृशाया कृतव्या न्यायप्रकल्पितसमश्रुतम् । असहन्सखीश्रोत्रप्राप्तौ विशाल्लया समस्त्रमम्भ विवलितदश गूञ्जे गेहे समुच्चलितं ततः ॥
अन्यत्रेति रसवन्धाभिनिवेशे ! ननु मुक्तके विभावादिसंघटनै कथम् यत्तद्-यत्तो रसः स्वादितश्रावक्वादि ! अमरुकस्यैव । कथमपि कृतप्रत्यपत्तौ प्रिये सकलितोत्तरेऽसहन्सखीश्रोत्रप्राप्तौ विरहकृशाया कृतव्या न्यायप्रकल्पितसमश्रुतम् । असहन्सखीश्रोत्रप्राप्तौ विशाल्लया समस्त्रमम्भ विवलितदश गूञ्जे गेहे समुच्चलितं ततः ॥
'अन्यत्र' अर्थात् रसवन्ध का अभिनिवेश न होने पर । 'मुक्तक में' यह । जैसे अमरुक का— 'किसी न किसी प्रकार प्रियतम के लौटने पर तथा सखी को न सुनने की कल्पना करके सम्भ्रमपूर्वक असहिष्णु सखी को श्रोत्रप्राप्ति की आशङ्का करके शून्यघर में दृष्टि घुमाकर फिर गहरी श्वास ली ।'
कि दण्डी ने कहा है—'गद्यपद्यमयं काव्य को चम्पू कहते हैं ।' ( आदि ग्रहण से ही उन अनेक प्रकारों का भी समावेश हो जाता है जो कि अभिनव गुप्त के बाद प्रकाश में आये हैं और आधुनिक काल तक अनेक प्रकार के काव्यभेदों की कल्पना की जाती रही है । उन सबका समावेश भी इसी इत्यादि शब्द के द्वारा हो जाता है । तथा जो प्रकार भविष्य में भी प्रवर्तित किये जावेंगे उन सबका यहाँ समावेश समझा जाना चाहिये । ) इन भेदोपभेदों के आधीन भी संघटना में विशेषता आ जाती है ।
कि दण्डी ने कहा है—'गद्यपद्यमयं काव्य को चम्पू कहते हैं ।' ( आदि ग्रहण से ही उन अनेक प्रकारों का भी समावेश हो जाता है जो कि अभिनव गुप्त के बाद प्रकाश में आये हैं और आधुनिक काल तक अनेक प्रकार के काव्यभेदों की कल्पना की जाती रही है । उन सबका समावेश भी इसी इत्यादि शब्द के द्वारा हो जाता है । तथा जो प्रकार भविष्य में भी प्रवर्तित किये जावेंगे उन सबका यहाँ समावेश समझा जाना चाहिये । ) इन भेदोपभेदों के आधीन भी संघटना में विशेषता आ जाती है ।
तारावत्ती
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इत्यन्न हि श्लोके स्पुटैव विभावादिसम्प्रतीति:।
यहाँ पर श्लोक में स्फुट ही विभाव इत्यादि सम्पत्ति की प्रतीति होती है।
उपर काव्य के भेदोपभेदों का दिग्दर्शन कराया गया है। अब इनके औचित्य पर विचार किया जा रहा है। सर्वप्रथम मुक्तक को लीजिये। यदि मुक्तक की रचना करनेवाले कवि में रस को निवद्ध करने का आग्रह हो तो कवि को उन्हीं सब औचित्यों का पालन करना चाहिये जिनका विवेचन पहले किया जा चुका है। मुक्तक के क्षेत्र में भी रस के अनुकूल औचित्य तथा वकता और वाच्य पर आश्रित औचित्य उसी रूप में होते हैं। अन्यत्र अश्र्यत। यदि मुक्तक रचना करनेवाले कवि को रसनिबन्धन करना अभीष्ट न हो तो कवि चाहे जिस प्रकार की संघटना का प्रयोग कर सकता है। (प्रश्न) रसनिष्पत्ति के लिये विभाव इत्यादि की संघटना अनिवार्य होती है। मुक्तक के छोटे से कलेबर में विभाव इत्यादि की संघटना हो सके यह सम्भव ही किस प्रकार है? इसी प्रश्न का उत्तर दे रहे हैं—(उत्तर) प्रायः देखा जाता है कि जिस प्रकार कवियों का अभिनिवेश रसमय प्रवन्ध रचना में होता है उसी प्रकार मुक्तकों में भी हुआ करता है। उदाहरण के लिये अमरुक के मुक्तक शृङ्गार रस को प्रवाहित करनेवाले हैं और यह प्रसिद्ध है कि उनमें प्रवन्ध के जैसे तत्त्व विद्यमान हैं। (कहा ही जाता है कि ‘अमरुक का एक पद्य सौ प्रवन्धों के समान है।’) उदाहरण के लिये अमरुक का एक पद्य लीजिये—
यत्र प्रियतम: किञ्चिन न किंश्चिदप्रकार लौटकर आया और उससे संयोगवश गोत्रस्खलन हो गया, उस समय विरह के कारण कृष्ण नायिका ने बहाने से यह प्रकट किया कि उसने उस गोत्रस्खलन को सुना नहीं पाया। उस समय उसे यह आभास हुई कि कहीं असहनशील सखी ने सुना तो नहीं लिया। अतएव उसने सम्भ्रमपूर्वक शून्य घर में अपनी दृष्टि घुमाई और फिर गहरी श्वास ली।
जब प्रियतम कुछ इस प्रकार लौटकर आया और उससे संयोगवश गोत्रस्खलन हो गया, उस समय विरह के कारण कृष्ण नायिका ने बहाने से यह प्रकट किया कि उसने उस गोत्रस्खलन को सुना नहीं पाया। उस समय उसे यह आभास हुई कि कहीं असहनशील सखी ने सुना तो नहीं लिया। अतएव उसने सम्भ्रमपूर्वक शून्य घर में अपनी दृष्टि घुमाई और फिर गहरी श्वास ली।
इस पद्य में स्पष्ट रूप से विभाव इत्यादि रस की सारी सामग्री पाई जाती है। (नायक आलम्बन है; उसका किसी न किसी प्रकार घर आना, गोत्रस्खलन इत्यादि उद्दीपन हैं; अनसुना करना, शून्य घर में चारों ओर दृष्टि घुमाना और गहरी श्वास लेना इत्यादि अनुभाव हैं; ग्लानि, शङ्का, असूया, त्रास, वितर्क, दैन्य इत्यादि संचारी भाव हैं; इसे पुष्ट होकर रति स्थायीभाव ने शृङ्गार रस का रूप धारण किया है। इस प्रकार एक पद्य में ही रस की सारी सामग्री उपलब्ध हो रही है।)
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सन्दानितकादिषु तु विकटवन्धौचित्यान्नध्यससमासाद्दीर्घसमासे एव रचने। प्रबन्धाश्रयेषु यथोक्तप्रबन्धौचित्यमेवानुसर्तव्यम् । पर्यायवन्धे पुनरससमासामध्ये समासे एव सङ्घटने । कदाचिदर्थौचित्याश्रयेण दीर्घसमासायामपि सङ्घटनायां परुषा ग्राम्या च वृत्तिः परिहर्तव्या । परिकथायां कामचारः । तत्रेतिवृत्तमात्रोपन्यासेन नात्यन्तरससम्बन्धाभिनिवेशात् । खण्डकथासकलकथयोस्तु प्राकृतप्रसिद्धयोः कुलकादिनिबन्धनभूयस्त्वाद्दीर्घसमासायामपि न विरोधः । वृत्त्यौचित्यं तु यथारसमनुसर्तव्यम् । सर्गवन्धे तु रसतात्पर्ये यथारसमौचित्यमन्यथा तु कामचारः; द्वयोरपि मार्गयोः सर्गवन्धविधायिनां दर्शिताद्रसतात्पर्यं साधीयः । अभिनेयार्थे तु सर्वथा रसवन्धेऽभिनिवेशः कार्यः । आख्यायिकाकथयोस्तु गद्यनिबन्धनबाहुल्याद् गद्ये च छन्दोवन्धभिन्नप्रस्थानत्वादिह नियमे हेतुरकृतपूर्वोंऽडपि मनाक्क्रियते ।
( अनु० ) सन्दानितक इत्यादि में तो विकट निवन्धन के औचित्य के कारण मध्यसमास और दीर्घसमास घटित रचनायें ही उपयुक्त हैं । यदि ये प्रबन्ध के आश्रित हों तो पहले कहे हुये प्रबन्ध के औचित्य का ही अनुसरण करना चाहिये । पर्यायवन्ध में तो असमास और मध्यसमास परक सङ्घटनायें ही ठीक हैं । यदि कदाचित् अर्थ के औचित्य का आश्रय लेकर दीर्घसमासा सङ्घटना का उपयोग करना पड़े तो परुषा और ग्राम्या वृत्तियों का तो परित्याग कर ही देना चाहिये । परिकथा में इच्छानुसार किसी भी सङ्घटना हो सकती है । क्योंकि उसमें इतिवृत्त मात्र का उपन्यास किया जाता है और रस के सम्बन्ध का अधिक अभिनिवेश नहीं होता । प्राकृत में प्रसिद्ध खण्डकथा और सकल कथाओं में तो कुलक इत्यादि के निबन्धन की अधिकता होने के कारण दीर्घसमासा सङ्घटना में भी कोई विरोध नहीं आता । वृत्ति के औचित्य का अनुसरण तो रस के अनुसार करना चाहिये । रस के तात्पर्य से लिखे हुये सर्गवन्ध में रस के अनुकूल औचित्य का पालन करना चाहिये नहीं तो इच्छानुसार चाहे जैसी संघटना का प्रयोग किया जा सकता है । सर्गबन्ध लिखनेवालों की प्रवृत्ति दोनों प्रकार के मार्गों में देखी जाती है; किन्तु रसतात्पर्य से लिखना अधिक अच्छा है । अभिनेयार्थ काव्यों में सब प्रकार से रसवन्ध में ही आग्रह रखना चाहिये । आख्यायिका और कथा में गद्यनिबन्धन की बहुलता होती है और गद्य का मार्ग छन्दोवन्ध से भिन्न हुआ करता है । अतः इस विषय में नियमों में हेतु यद्यपि पहले नहीं बनाये गये थे तथापि यहाँ पर संक्षेप में बनाये जा रहे हैं--
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विकटेति । असमासायां हि संघटनायां मन्थररूपा प्रतीति: साकाङ्क्षा सती चिरेण क्रियापदं दूरवर्त्यनुधावन्ती वाच्यप्रतीतावेव विश्रान्ता सती न रसतत्त्वचर्वणा योग्य स्यादिति भाव:। प्रवन्धाश्रयेऽपि सन्दानितकादिषु कुलकान्तेषु । यदि वा प्रवन्धेऽपि मुक्तकस्यास्तु सत्त्वाव:। पूर्वापरनिरपेक्षेऽपि हि येन रसचर्वणा क्रियते तदेव मुक्तकम् । यथा ‘त्वामालिख्य प्रणयकुपिता’म् इत्यादि श्लोक: ।
विकट आदि । असमासा संघटना में मन्थररूपिणी प्रतीति साकांक्ष होते हुये दूरवर्ती क्रिया-पद तक देर में अनुदर्शन करती हुई वाच्यप्रतीति में ही विश्रान्त होती हुई रसतत्त्व की चर्वणा के योग्य हो ही न सके यह भाव है । 'प्रवन्धाश्रयों में' यह । सन्दानितक इत्यादि से लेकर कुलक पर्यन्त । अथवा प्रवन्ध में भी मुक्तक की सत्ता मान ली जावे । पूर्वापरनिरपेक्ष जिस ( पद्य ) से रस चर्वणा की जाती है वही मुक्तक ( होता ) है । जैसे—‘प्रणयकुपिता तुम्हें लिखकर’ इत्यादि ( मेघदूत का ) श्लोक ।
सन्दानितक इत्यादि में तो विकट निवन्धन ही उचित होता है, अतएव उसमें संघटना या तो मध्यसमासवाली होनी चाहिये या दीर्घसमासवाली । क्योंकि सन्दानितक इत्यादि में कई पद्यों में एक ही क्रिया होती है । यदि उसमें समास नहीं किया जावेगा तो शब्दों की संख्या बहुत बढ़ जावेगी, प्रतीति बहुत ही मन्द होगी, प्रत्येक प्रतीतिगोचर होनेवाले शब्द को बहुत देर तक साकांक्ष रहना पड़ेगा । क्रिया बहुत दूर पड़ जावेगी और उस क्रिया तक प्रत्येक प्रतीति को बड़ी लम्बी और बड़ी देर की दौड़ लगानी पड़ेगी । ( कभी-कभी तो शब्दों का इतना व्यवधान हो जावेगा कि किसी एक पद के प्रतीतिगोचर होने पर पहले के पद दृष्टि से ओझल भी हो जावेंगे । ) इस प्रकार जैसे तैसे मन्दगति से आगे बढ़नेवाली प्रतीति वाच्यार्थ के प्रत्ययान में ही विश्रान्त हो जावेगी और रसतत्त्व के वर्ण करने के योग्य नहीं हो सकेगी । अतः सन्दानितक इत्यादि में दीर्घसमासंकर कुलकपर्यन्त काव्यभेद प्रवन्ध के अन्दर आवें तो प्रवन्ध के वत्लाये हुये औचित्य का ही पालन करना चाहिये । अथवा यहाँ पर यह भी अर्थ किया जा सकता है कि यदि मुक्तक से लेकर कुलक तक काव्यभेद प्रवन्ध के अन्दर आवें तो प्रवन्ध के औचित्य का पालन किया जाना चाहिये । कारण यह है कि प्रवन्ध में भी मुक्तक की सत्ता मानी जा सकती है, मुक्तक उसे ही कहते हैं जिसमें पूर्वापर की अपेक्षा न करते हुये एक पद्य के द्वारा ही रस-चर्वणा की जावे ।
त्वामालिख्य प्रणयकुपिताम् इत्यादि श्लोक: ।
‘प्रणयकुपिता तुम्हें लिखकर’ इत्यादि ( मेघदूत का ) श्लोक ।
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सन्दानितक इत्यादि में तो विकट निवन्धन ही उचित होता है, अतएव उसमें संघटना या तो मध्यसमासवाली होनी चाहिये या दीर्घसमासवाली । क्योंकि सन्दानितक इत्यादि में कई पद्यों में एक ही क्रिया होती है । यदि उसमें समास नहीं किया जावेगा तो शब्दों की संख्या बहुत बढ़ जावेगी, प्रतीति बहुत ही मन्द होगी, प्रत्येक प्रतीतिगोचर होनेवाले शब्द को बहुत देर तक साकांक्ष रहना पड़ेगा । क्रिया बहुत दूर पड़ जावेगी और उस क्रिया तक प्रत्येक प्रतीति को बड़ी लम्बी और बड़ी देर की दौड़ लगानी पड़ेगी । ( कभी-कभी तो शब्दों का इतना व्यवधान हो जावेगा कि किसी एक पद के प्रतीतिगोचर होने पर पहले के पद दृष्टि से ओझल भी हो जावेंगे । ) इस प्रकार जैसे तैसे मन्दगति से आगे बढ़नेवाली प्रतीति वाच्यार्थ के प्रत्ययान में ही विश्रान्त हो जावेगी और रसतत्त्व के वर्ण करने के योग्य नहीं हो सकेगी । अतः सन्दानितक इत्यादि में दीर्घसमासंकर कुलकपर्यन्त काव्यभेद प्रवन्ध के अन्दर आवें तो प्रवन्ध के वत्लाये हुये औचित्य का ही पालन करना चाहिये । अथवा यहाँ पर यह भी अर्थ किया जा सकता है कि यदि मुक्तक से लेकर कुलक तक काव्यभेद प्रवन्ध के अन्दर आवें तो प्रवन्ध के औचित्य का पालन किया जाना चाहिये । कारण यह है कि प्रवन्ध में भी मुक्तक की सत्ता मानी जा सकती है, मुक्तक उसे ही कहते हैं जिसमें पूर्वापर की अपेक्षा न करते हुये एक पद्य के द्वारा ही रस-चर्वणा की जावे ।
सन्दानितक इत्यादि में तो विकट निवन्धन ही उचित होता है, अतएव उसमें संघटना या तो मध्यसमासवाली होनी चाहिये या दीर्घसमासवाली । क्योंकि सन्दानितक इत्यादि में कई पद्यों में एक ही क्रिया होती है । यदि उसमें समास नहीं किया जावेगा तो शब्दों की संख्या बहुत बढ़ जावेगी, प्रतीति बहुत ही मन्द होगी, प्रत्येक प्रतीतिगोचर होनेवाले शब्द को बहुत देर तक साकांक्ष रहना पड़ेगा । क्रिया बहुत दूर पड़ जावेगी और उस क्रिया तक प्रत्येक प्रतीति को बड़ी लम्बी और बड़ी देर की दौड़ लगानी पड़ेगी । ( कभी-कभी तो शब्दों का इतना व्यवधान हो जावेगा कि किसी एक पद के प्रतीतिगोचर होने पर पहले के पद दृष्टि से ओझल भी हो जावेंगे । ) इस प्रकार जैसे तैसे मन्दगति से आगे बढ़नेवाली प्रतीति वाच्यार्थ के प्रत्ययान में ही विश्रान्त हो जावेगी और रसतत्त्व के वर्ण करने के योग्य नहीं हो सकेगी । अतः सन्दानितक इत्यादि में दीर्घसमासंकर कुलकपर्यन्त काव्यभेद प्रवन्ध के अन्दर आवें तो प्रवन्ध के वत्लाये हुये औचित्य का ही पालन करना चाहिये । अथवा यहाँ पर यह भी अर्थ किया जा सकता है कि यदि मुक्तक से लेकर कुलक तक काव्यभेद प्रवन्ध के अन्दर आवें तो प्रवन्ध के औचित्य का पालन किया जाना चाहिये । कारण यह है कि प्रवन्ध में भी मुक्तक की सत्ता मानी जा सकती है, मुक्तक उसे ही कहते हैं जिसमें पूर्वापर की अपेक्षा न करते हुये एक पद्य के द्वारा ही रस-चर्वणा की जावे ।
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कदाचिदिति। रौद्रादिविषये। नात्यन्तमिति। रसबन्धे यो नात्यन्तमभिनिवेशस्तत्स्मादिति सङ्कति: वृत्त्यौचित्यमिति। परुषोपनागरिकाग्राम्याणां वृत्तीनामौचित्यं यथाप्रबन्धं यथारसं च। अन्यथेति। कथमात्रतात्पर्ये वृत्तिष्वपि कामचार:। द्वयोरपीति सप्तमी। कथमात्रतात्पर्ये संगवन्धे यथा मेघेजयन्तकस्य कोडम्बर.कथासारम्। रसतत्पर्ये यथा रघुवंशादि। अन्ये तु संस्कृतप्राकृतयोर्द्वयोरिति व्याचक्षते। तत्र तु रसतत्पर्यं साधीय इति यदुक्तं तर्किमपेक्षयेतित नेयार्थं स्यात्॥ ७ ॥
'कदाचित्' अर्थात् रौद्र इत्यादि के विषय में। 'अत्यान्त नहीं…' ( यहाँ पर ) सङ्कति इस प्रकार है—'रसबन्ध में जो अत्यन्त अभिनिवेश नहीं उसके कारण'। 'वृत्तिका औचित्य…' परुषा, उपनागरिका और ग्राम्या इन वृत्तियों का औचित्य प्रवन्ध के अनुसार और रस के अनुसार। 'अन्यथा' यह। कथमात्र तात्पर्य में वृत्तियों में भी कामचार ( स्वेच्छाचारवहार ) ही है। 'दोनों में भी' यह सप्तमीहै। कथमात्रतात्पर्य में संगवन्ध, जैसे मेघेजयन्ते का कोडम्बर.कथासार। रसतात्पर्यवाला, जैसे रघुवंश आदि। दूसरे लोग तो 'संस्कृत और प्राकृत इन दोनों में, यह व्याख्या करते हैं। उसमें तो 'रसतात्पर्यं अधिक अच्छा होता है यह जो कहा गया है वह किस अपेक्षा से? यह नेयार्थ हो जावेगा॥ ७ ॥
पद्य प्रबन्ध के अन्दर भी आता है तो मुक्तक की संज्ञा प्राप्त कर सकता है। जैसे मेघदूत में यक्ष मेघ के द्वारा अपनी पत्नी को सन्देश मेज रहा है—'मैं धातुओं की लाली से शिलाओं के ऊपर तुम्हारा उस समय का चित्र वनाता हूँ जब तुम प्रणय में ही क्रुद्ध हो जाया करती थीं। फिर मैं तुम्हें मनाने के लिये अपने को तुम्हारे चरणों पर गिरा हुआ जैसे ही चिच्चित करना चाहता हूँ कि एकदम वढे हुये आँसुओं से मेरी दृष्टि भर आती है। कूर विधाता हमारे तुम्हारे सङ्कम को उस चित्र में.भी देखना सहन नहीं करता।' यहाँपर एक ही पद्य में रस की सारी सामग्री उपस्थित हो गई है। यद्यपि यह पद्य मेघदूत के प्रबन्ध के मध्य में आया है तथापि यदि चाहें तो इसे हम मुक्तक कह सकते हैं। ( पहले लोचनकार ने प्रबन्धाश्रयेषु सममी का बहुवचन है और उससे निकटवर्ती 'संदानितकादिषु' का ही योग हो सकता है मुक्तक का नहीं। दूसरी बात यह है कि लोचनकार ने 'यदि वा' लिखकर अरुचिपूर्ण पक्ष की व्याख्या की है। 'यदि वा' का आश्रय यही है कि 'यदि दूजनतोपन्यास से इस पक्ष को मान भी लें तो भी कोई विशेष क्षति नहीं होती। वस्तुतः प्रबन्धान्तर्वर्ती स्वतःपर्यवसित पद्यों का
तारावती
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मुक्तक न मानना ही मुक्तक पद्य है । यही आनन्दवर्धन को भी मान्य है और यही अभिनवगुप्त का भी अभिमत है । यदि प्रवन्धाश्रित पद्यों को मुक्तक संज्ञा प्रदान ही करनी हो तो ऐसे पद्यों को सम्मिलित किया जा सकता है जो मुक्तक रचना के क्षेत्र में तो आते हैं किन्तु प्रवन्ध की हल्की सी छाया लेकर लिखे जाते हैं । जैसे सूरसागर के गीत इत्यादि प्रवन्धाश्रित मुक्तक माने जा सकते हैं ।
पर्यायबन्ध में तो नियमपूर्वक समासरहित ही अथवा मध्यसमासवाली ही संघटना अपनाई जानी चाहिये । यदि कदाचित् रौद्र इत्यादि रसों में अर्थ के औचित्य के कारण दीर्घसमासा संघटना का प्रयोग करना पड़े तो सावधानी से परुषा और ग्राम्या वृत्तियों को बचाना चाहिये ।
परिकथा में चाहे जैसी संघटना का उपयोग किया जा सकता है; क्योंकि उसमें प्रधानतया इतिवृत्त का प्रस्तुत करना ही अभीष्ट होता है, अतः उसमें रसवन्ध का अत्यन्त अभिनिवेश नहीं होता ।
खण्डकथा तथा सकलकथा ये दोनों प्रकार प्राकृत में ही प्रसिद्ध हैं और उनमें कुलक इत्यादि का निवन्धन बहुत अधिक पाया जाता है । अतः उसमें दीर्घसमास करने में भी कोई विरोध नहीं आता ।
किन्तु उनमें वृत्ति के औचित्य का पालन रस के अनुसार करना चाहिये । आशय यह है कि परुषा, उपनागरिका और ग्राम्या इन तीनों वृत्तियों का औचित्य प्रवन्ध के अनुसार तथा रस के अनुसार होता है ।
यदि सर्गबन्ध ( महाकाव्य ) रस के मन्तव्य से लिखा गया हो तो रस के अनुकूल ही उसमें औचित्य का पालन करना चाहिये ।
यदि सर्गबन्ध ( महाकाव्य ) का प्रणयन केवल कथा के मन्तव्य से हो तो चाहे जैसी संघटना का प्रयोग किया जा सकता है ।
यदि केवल कथा के तात्पर्य से सर्गबन्ध लिखना अभीष्ट हो तो वृत्तियों के प्रयोग में भी स्वेच्छाचारिता अपनाई जा सकती है ।
सर्गबन्ध लिखने वालों की प्रवृत्ति दोनों ही मार्गों में देखी जाती है, किन्तु रसतात्पर्य से लिखना अधिक अच्छा है ।
'द्रयोः मार्गयोः' में सप्तमी विभक्ति है, अतः दोनों ही मार्गों में यह अर्थ किया गया है ।
आशय यह है कि सर्गबन्धकाव्य रसतात्पर्य से भी लिखा जाता है और कथामात्रतात्पर्य से भी ।
कथातात्पर्य से लिखा हुआ सर्गबन्ध जैसे भट्टि जयंतक का कादम्बरी-कथासार और रसतात्पर्य से लिखा हुआ जैसे रघुवंश इत्यादि ।
कुछ लोगों ने 'दोनों मार्गों में' इस वाक्य का अर्थ किया है संस्कृत और प्राकृत दोनों में सर्गबन्ध लिखा जाता है ।
किन्तु यह अर्थ करने में जो कि यह कहा गया है कि 'किन्तु रसतात्पर्य से लिखना अधिक अच्छा है ।' इस वाक्य की क्या संगति होगी ?
और इसका क्या उत्तर दिया जावेगा कि किसकी अपेक्षा रसतात्पर्य से लिखना अधिक अच्छा होता है ।
इस प्रकार यहाँ पर 'नेयार्थ' दोष होगा । अतः 'दोनों मार्गों में' यहाँ रस और कथा का ही अर्थ उचित है ।
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एतद्यथोक्तमौचित्यमेव तस्य नियामकम् । सर्वत्र गद्यवन्धेडपि छन्दोनियमवर्जिते ॥ < ॥ यदेतदौचित्यं वक्तृवाच्यगतं सङ्घटनाया नियामकमुक्तमेतदेव गद्ये छन्दो- नियमवर्जितेऽपि विषयापेक्षानियमहेतुः । तथा ह्यत्रापि यद्ा कविः कविनिवद्वो वा वक्ता रसभाववरहितस्तदा कामचारः । रसभावसन्निवीतु तु वक्तरि पूर्वोक्तमेव- तुर्सतद्वयम् । तत्रापि च विषयौचित्यमेव । आख्यायिकायां तु भूयसा मध्यमसमासा- दीर्घसमासा एव सङ्घटने । गद्यस्य विकटवन्धाश्रयेण छायावत्त्वात् । तत्र च तस्य प्रकार्यमाणत्वात् । कथायां तु विकटवन्धप्राचुर्येडपि गद्यस्य रसवन्धोक्त- मौचित्यमनुसतद्वयम् ।
( अनु० ) यह् जैसे कि औचित्य बतलाया गया है यह् छन्दोनियम से रहित गद्यवन्ध में भी सर्वत्र उस ( संघटन ) का नियामक होता है ॥ ५ ॥ यह् जो वक्तृगत तथा वाच्यगत औचित्य संघटन का नियामक बतलाया गया है यह्ही छन्दोनियम से रहित गद्यवन्ध में भी विषय की अपेक्षा करते हुये नियम में हेतु होता है । वह् इस प्रकार—जब कवि या कविनिवद्व वक्ता रसभाववरहित हो तो यथेच्छ संघटना होती है । वक्ता के रसभावसन्निवीत होने पर पहले बतलाये हुये औचित्य का अनुसरण करना चाहिये । उसमें भी विषयानुरूप हो औचित्य होता है । आख्यायिकायें तो अधिकता के साथ मध्यम समास या दीर्घसमासवाली संघटना ही होती है; क्योंकि गद्य में छायावत्ता विकटवन्ध के आश्रय से ही आती है । क्योंकि उसमें उसकी अधिकता आ जाती है । कथा में तो विकटवन्ध की प्रचुरता होते हुये भी गद्य के रसवन्ध में कहे हुये औचित्य का ही अनुसरण करना चाहिये ।
लोचन विषयापेक्षामिति । गद्यवन्धस्य भेदा एव विषयत्वेनानुमन्तव्या: । 'विषयापेक्ष' यह । गद्यवन्ध के भेद ही विषय के रूप में पाये जाने चाहिये ॥५॥ तारावती मागों में' का अर्थ 'रस तात्पर्य तथा कथामात्र तात्पर्य इन दोनों मागों में' यह्ह करना चाहिये । अभिनेयार्थ काव्य में तो सर्वथा रसवन्ध में ही अभिनिवेश करना चाहिये अर्थात् उसमें रसमय रचना के औचित्य का पालन करना चाहिये ॥ ७ ॥ आख्यायिका और कथा इन दोनों प्रकार के काव्यों में गद्य के निबन्धन का बाहुल्य होता है । गद्य का मार्ग छन्दोवद्र रचना से सर्वथा भिन्न हुआ करता है । किन्तु इस दिशा में नियमपालन के कौन-कौन से हेतु होने चाहिये-इसका निश्वयं
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ध्वन्यालोकः
रसबन्धोचितमौचित्यं भाति सर्वत्र संश्रिता । रचना विषयापेक्षं तत्तु किश्चित्विभेदवत् ॥ ९ ॥
( अनु० ) 'रचना रसबन्ध में कहे हुये औचित्य का आश्रय लेकर ही सर्वत्र शोभित होती है । किन्तु विषय की अपेक्षा करते हुये वह ( औचित्य ) भेदवाला हो जाता है ॥ ९ ॥
किसी भी आचार्य ने अभी तक नहीं किया है । यहाँ पर मैं भी बहुत ही संक्षेप मे प्रकाश डाल रहा हूँ । यह दिग्दर्शनमात्र है । इसी के आधार पर दूसरे तत्त्व भी समझने लिये जाने चाहिये ।
'उपर जिस औचित्य का विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है वह जिस प्रकार छन्दोवद्ध रचना के क्षेत्र में संघटना का नियामक होता है उसी प्रकार छन्दोवद्ध के नियमों से रहित गद्यबन्ध में भी उसे संघटना का नियामक होता है ।
संधटना के नियामक के रूप में जिन वक्तृगत तथा वाच्यगत औचित्यों का निरूपण पहले किया जा चुका है यही औचित्य छन्दोव्यवस्था से रहित गद्य में भी विषय की अपेक्षा करते हुये नियम में हेतु होता है । यहाँ पर विषय शब्द से गद्य बन्ध के भेदों का ग्रहण किया जाना चाहिये । आशय यह है कि पद्य और गद्य में एक से ही औचित्यों का पालन किया जाता है किन्तु गद्य में माध्यम के रूप में स्वीकृत गद्य के प्रकार के आधार की भी अपेक्षा उसमें रहती अवश्य है ।
वह इस प्रकार कि पद्य के समान गद्य में भी कवि या कविनिबद्ध वक्ता रस और भाव मे रहित हो तो स्वेच्छानुसार किसी भी प्रकार की संघटना का पालन किया जा सकता है । यदि वक्ता रसभाव से युक्त हो तो पहले बतलाये हुये औचित्यों का अनुसरण ही करना चाहिये । उनमें भी प्रधानतया विषय के औचित्य-पालन का आग्रह होना चाहिये । आख्यायिका में प्रचुरता से मध्यम्संमासं और दीर्घसंमासं वाली संघटनायें ही होनी चाहिये । क्योंकि गद्य में छाया अर्थात् काव्य-सौन्दर्य विकटबन्ध के आश्रय से ही आता है । क्योंकि विकटबन्ध के कारण गद्य में काव्य सौन्दर्य अधिक प्रकृष्ट कोटि का हो जाता है। कथा में यद्यपि विकटबन्ध की प्रचुरता अपेक्षित होती है तथापि उसमें रसबन्ध में कहे हुये औचित्य का ही अनुसरण करना चाहिये ॥ ५ ॥
यहाँ तक विषयाश्रित संघटना के औचित्य पर विचार कर चुकने के बाद जो निष्कर्ष निकलता है और उससे जो सिद्धान्तपक्ष बनता है उसका अभिधान ५ वीं कारिका में किया जा रहा है—
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अथवा पद्यवदू गद्यवन्धेऽपि रसवन्धोक्तमौचित्यं संश्रिता रचना भवति ।
तत् तु विषयापेत्तं किञ्चिद्विभेदपद्घतति, न तु सर्वाकारम् ।
तथा हि गद्यवन्धेऽप्यनदीर्घ- समासा रचना न विप्रलम्भशृङ्गारकरुणयोः कार्यामपि शोभते ।
नाटकादाविति ।
स्थितपदं तु दर्शयति—रसवन्धोक्तमिति ।
वृत्तौ वा शब्दोऽस्यैव पक्षस्य स्थितिद्योतकः ।
यथा—स्त्रियो नरपतिश्चेहिविषयं युक्त्या निप्रेक्षितम् ।
स्वार्थाय यदि वा दुःखसम्भारायैव केवलम् ॥ इति ।
रचना सङ्क्रवतना ।
तर्हि विषमौचित्यं सर्वथैव त्यक्तं नेयाय—तदेव रमौचित्यं विषयं सहकारितयापेक्ष्य किञ्चिद्विभेदोऽवान्तरविध्यं विद्यते यस्मिन् सम्पाद्यत्नेन तादृशं सत्ति ।
एतद्व्याचष्टे—तन्निष्ठिति ।
सर्वकारमिति ।
क्रियाविशेषणम् ।
असमासैवेति ।
सर्वत्रै- वेतिशेषः ।
तथा हि वाक्याभिनयलक्षणे ‘चूर्णपादैः प्रसन्नैः’ इत्यादि मुनिरभ्यधात् ।
अत्रापवादमाह—न चेति ।
नाटकादाविति ।
सत्रविषयेऽपि तत्सम्बन्धः ॥ ५ ॥
स्थित पदं को तो दिखला रहे हैं—‘रसवन्धोक्त···’ इत्यादि ।
और वृत्ति में ‘वा’ शब्द इसी पद की स्थिति का द्योतक है । जैसे—
‘स्त्रियः, राजा, अग्नि विष ये युक्ति के साथ सेवन किये हुये या तो स्वार्थ साधन के लिये या केवल दुःखसम्भार के लिये ही ( होते हैं ) ।
रचना अर्थात् संघटना ‘तो क्या विषय का औचित्य सर्वथा ही छोड़ दिया गया ?’ कहते हैं—नहीं ।
वहीं रस का औचित्य विषय की सहकारो के रूप में अपेक्षा करके—कुछ विभेद अर्थात् अवान्तर वैचित्र्य सम्पाद्य के रूप में जिसमें विद्यमान है इस प्रकार का हो जाता है । इसकी व्याख्या करते हैं—‘वह तो’
यह । ‘सर्वाकारम्’ यह क्रियाविशेषण है । ‘असमासैव’ ही इतना विशेष है । वह इस प्रकार वाक्याभिनय के लक्षण में मुनि ने कहा—‘प्रसन्न चूर्णपादः···’ इत्यादि ।
उसमें अपवाद कहते हैं—‘न च’ इत्यादि । ‘नाटक इत्यादि में’ अपने विषय में भी यह सम्वन्ध है ॥ ६ ॥
‘रचना सर्वत्र रसवन्ध के योग्य औचित्य का आश्रय लेकर शोभित होती है,
किन्तु विषय की अपेक्षा से उसमें कुछ भेद हो जाता है ॥ ८ ॥
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दावन्यसमासैव सङ्घटना। रौद्रवीरादिवर्णने विषयापेक्षं त्वौचित्यं प्रमाणतोडपकृष्यते प्रकृष्यते च। तथा व्याख्यायिकायां नात्यन्तमसमासा स्वविषयेडपि नाटकादौ नातिदीर्घंसमासा चेति सङ्घटनेत्या दिगनुसृतैव्या।
रौद्र, वीर आदि के वर्णन में औचित्य विषय की अपेक्षा करते हुए प्रमाण में घट भी जाता है और बढ़ भी जाता है। वह इस प्रकार के आख्यायिका में अपने विषय में भी अत्यन्त समासहीन संघटना नहीं होना चाहिये। नाटक इत्यादि में अत्यन्त दीर्घं समास वाली नहीं होनी चाहिये। इस प्रकार संघटना की दिशा का अनुसरण करना चाहिये।
तारावती
अथवा पद्य के समन गद्य में भी रसबन्ध के लिये कहे हुये औचित्य का आश्रय लेकर रचना सङ्घटने शोभित होती है। वृत्तिकार द्वारा प्रयोग किया हुआ 'वा' ( अथवा ) शब्द यहाँ पर विकल्पार्थक नहीं है, किन्तु इसी पक्ष की मुख्यता को सिद्ध करता है। कभी कभी अथवा शब्द मुख्य पद का द्योतक भी होता है। जैसे—
अथवा पद्य के समान गद्य में भी रसबन्ध के लिये कहे हुये औचित्य का आश्रय लेकर रचना शोभित होती है। वृत्तिकार द्वारा प्रयोग किया हुआ 'वा' ( अथवा ) शब्द यहाँ पर विकल्पार्थक नहीं है, किन्तु इसी पक्ष की मुख्यता को सिद्ध करता है। कभी कभी अथवा शब्द मुख्य पद का द्योतक भी होता है। जैसे—
'स्त्रियाँ, राजा, अमि और विष युक्ति से सेवन किये जाने पर स्वार्थसाधन के लिये होते हैं अथवा केवल दुःखसंबार के लिये ही होते हैं।'
यहाँ पर 'अथवा' शब्द मुख्य पद का ही द्योतक है। इस कारिका में रचना शब्द का अर्थ है सङ्घटना। आशय यह है कि रसबन्ध में कहे हुये औचित्य का आश्रय लेने वाली सङ्घटना ही सर्वत्र शोभित होती है।
यहाँ पर 'अथवा' शब्द मुख्य पद का ही द्योतक है। इस कारिका में रचना शब्द का अर्थ है सङ्घटना। आशय यह है कि रसबन्ध में कहे हुये औचित्य का आश्रय लेने वाली सङ्घटना ही सर्वत्र शोभित होती है।
तथा प्रश्न यह उठता है कि क्या इस सिद्धान्तनिरूपण में विषय के औचित्य का सर्वथा प्रत्याख्यान कर दिया गया है? उत्तर है—नहीं। किन्तु वही रस का औचित्य सहकारिता के रूप में विषय के औचित्य की अपेक्षा करता है और इस प्रकार उस रसौचित्य में ही विषयौचित्य के आधार पर कुछ विभेद अर्थान्तर अवान्तर वैचित्र्य हो जाता है। इस वैचित्र्य का सम्पादक विषय का औचित्य होता है और सम्पाद्य वैचित्र्य होता है जो कि रसौचित्य में हुआ करता है।
तथा प्रश्न यह उठता है कि क्या इस सिद्धान्तनिरूपण में विषय के औचित्य का सर्वथा प्रत्याख्यान कर दिया गया है? उत्तर है—नहीं। किन्तु वही रस का औचित्य सहकारिता के रूप में विषय के औचित्य की अपेक्षा करता है और इस प्रकार उस रसौचित्य में ही विषयौचित्य के आधार पर कुछ विभेद अर्थान्तर अवान्तर वैचित्र्य हो जाता है। इस वैचित्र्य का सम्पादक विषय का औचित्य होता है और सम्पाद्य वैचित्र्य होता है जो कि रसौचित्य में हुआ करता है।
आशय यह है कि रसौचित्य मुख्य होता है, काव्य-प्रकारों से उसमें कुछ विशेषता आ जाती है। इसी बात को वृत्तिकार ने इस प्रकार कहा है—'वह तो विषय की अपेक्षा कुछ विशेषता वाला हो जाता है सर्वाकार नहीं।' यहाँ पर सर्वाकार यह क्रियाविशेषण है।
आशय यह है कि रसौचित्य मुख्य होता है, काव्य-प्रकारों से उसमें कुछ विशेषता आ जाती है। इसी बात को वृत्तिकार ने इस प्रकार कहा है—'वह तो विषय की अपेक्षा कुछ विशेषता वाला हो जाता है सर्वाकार नहीं।' यहाँ पर सर्वाकार यह क्रियाविशेषण है।
आशय यह है कि विषय का औचित्य रस के औचित्य में विशेषता उत्पन्न अवश्य करता है; किन्तु वह विशेषता परिमाण में बहुत थोड़ी होती है, पूर्ण रूप से नहीं।
आशय यह है कि विषय का औचित्य रस के औचित्य में विशेषता उत्पन्न अवश्य करता है; किन्तु वह विशेषता परिमाण में बहुत थोड़ी होती है, पूर्ण रूप से नहीं।
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इदानोमलक्ष्यक्रमयज्ज्ञयो ध्वनिः प्रवन्धात्मा रामायणमहाभारतादौ प्रकाशमानः प्रसिद्ध एव । तस्य तु यथा प्रकाशानं तत्प्रतिपाद्यते—
( अनु० ) प्रवन्धात्मक अलक्ष्यक्रमयज्ज्ञय ध्वनि रामायण महाभारत इत्यादि में प्रकाशित होती हुई प्रसिद्ध हो गई है । उसका जैसे प्रकाशन होता है अव उसका प्रतिपादन किया जा रहा है—
पूर्वं सङ्घटनायां चालक्ष्यक्रमो दीप्यत इति निर्णयः । प्रबन्धे दीप्यत इति तु निर्विवादसिद्धोऽर्थ इति नात्र वक्तव्यं किन्तिदस्ति । केवलं कविशहृदयान् न्युपादयितुं रससङ्घ्यत्न यत्नकर्तव्यता प्रबन्धस्य स निर्बन्धोऽस्यास्त्यसावेनाह—इदानोमिति । इस प्रकार सङ्घटना में अलक्ष्यक्रम दीप्त होता है यह निर्णय कर दिया गया । प्रबन्ध में दीप्त होता है यह निर्विवाद सिद्ध अर्थ ( है ) अतः इस विषय में कुछ भी कहना नहीं हैं । केवल कविशहृदयों को व्युत्पन्न करते के लिये प्रबन्ध की जो इति-कर्तव्यता है इसका निरूपण किया जाना चाहिये इस आशय से कहते हैं 'इस समय' ।
तारावती
नहीं होती । यदि विषय के आधार पर रसौचित्य में पूरी विशेषता ही आ जावे तो रसौचित्य का महत्व ही क्या रहे और रसौचित्य को प्रधानता ही किस प्रकार दी सके ? इसको इस प्रकार समझिये—गद्यबन्ध में नियमनुकूल अतिदीर्घ समास वाली रचना ही शोभित होती है । यदि आख्यायिका भी लिखी जा रही हो, किन्तु उसमें विप्रलम्भ श्रृङ्गार अथवा करुण रस प्रतिपाद्य हों तो आख्यायिका में भी दीर्घसमासा सङ्घटना अधिक अच्छी नहीं मालूम पड़ेगी । आशय यह है कि रस का औचित्य ही प्रभुख रूप में प्रयोजनीय होता है । नाटक इत्यादि में भी सर्वत्र ही असमासा रचना ही होनी चाहिये; क्योंकि सुनि ने वाक्याभिनय के लक्षण में लिखा है—पृथक्-पृथक् स्पष्ट शब्दों के द्वारा अभिनय करना चाहिये । तथापि कहीं नाटक में समास किये ही न जावें यह बात नहीं है । रौद्र इत्यादि के अभिनय में नाटक में भी समास का प्रयोग किया जा सकता है । रौद्र वीर इत्यादि के वर्णन में औचित्य विषय की विशेषता के आधार पर प्रमाण में घट भी जाता है और बढ़ भी जाता है । वह इस प्रकार—यदि आख्यायिका में रौद्र इत्यादि रस लिखे जा रहे हों तो बिल्कुल ही समास-रहित रचना नहीं होगी और उसमें बड़े समासों का प्रयोग किया जावेगा । इसके प्रतिकूल यदि नाटक में दीर्घ समास का विषय भी आ जावे तो भी अत्यन्त दीर्घ समासों का उसमें प्रयोग नहीं होगा । इस प्रकार सङ्घटना का दिग्दर्शन करा दिया गया है । इसी का अनुसरण करना चाहिये ॥ ६ ॥
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विमावभावानुभावसञ्चारिभिर्चित्यचारुणः ॥ ९० ॥विधिः कथााशरीरेस्य वृत्तस्योत्त्रेक्षितस्य वा ॥ ९० ॥
इतिवृत्तवशायातां त्यकत्वानतुगुणां स्थितिम् ।उत्प्रेक्योड्यन्तराभीष्टरसां चमत्कथोन्नयः ॥ ९१ ॥
( अनु० ) 'विमाव, भाव, अनुभव और सञ्चारी भाव के औचित्य से युक्त वटित या केवल कविकल्पित कथा के शरीर का विधान ( पहला हेतु है ) ॥९०॥, इतिवृत्त के कारण आई हुई अननुकूल स्थिति को छोड़कर उत्प्रेक्षा करके भी अन्दर अभीष्ट रस के योग्य कथा का उदयन करना ( दूसरा हेतु है ) ॥९१॥
इदानीं तत्प्रकारजातं प्रतिपघत इति सम्वन्धः ।प्रथमं तावदिति । प्रबन्धस्य व्यङ्जकत्वे ये प्रकारास्ते क्रमेणैवोपयोगिनः । पूर्वं हि कथाापरीक्षा ।
पहले कथाापरीक्षा, उसमें अधिकता की प्राप्ति, फलपर्यन्त ले जाना, रस के प्रति जागरण और उसके लिये उचि्त विभाव इत्यादि के वर्णन में अलङ्कारो का औचित्य ( ये पाँच प्रकार हैं ) ! इसी क्रम से इस पन्थक की व्याख्या कर तारावती
उपर यह निर्णय कर दिया गया कि संघटना के द्वारा अलङ्क्यक्रम व्यङ्ग्य दोत होता है। 'प्रबन्ध अलक्ष्यक्रम व्यङ्ग्य का व्यङ्जक होता है' इसमें किसी को सन्देह हो ही नहीं सकता ।
यहाँ तक इस बात की पूर्ण व्याख्या की जा चुकी कि संघटना के द्वारा असंलक्ष्य-क्रम व्यङ्ग्य की व्यङ्जना होती है । अब प्रबन्ध के द्वारा असंलक्ष्यक्रम व्यङ्ग्य की व्यङ्जना पर विचार करना है । यह विचार दो प्रकार से किया जा सकता है— एक तो यह सिद्ध करना कि प्रबन्ध के द्वारा भी व्यङ्जना हो सकती है । किन्तु इस विषय में किसी को विप्रतिपत्ति है ही नहीं । अतः स्वतःसिद्ध तथा सर्वजन- सम्मत विषय को सिद्ध करने के लिये तर्क देना व्यर्थ ही है । इसीलिये ध्वनि- कारने यहाँ पर प्रबन्ध की व्यङ्जकता के लिये तर्क नहीं दिये हैं । दूसरा तत्त्व है यह बतलाना कि वे कौन सी विशेषतायें हैं जिनसे प्रबन्ध व्यङ्जक होता है । यहाँ पर इसी बःत की व्यास्या की जा रही है । कारिकाकारने प्रबन्ध को व्यङ्जक बनाने
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सन्धिसन्ध्यद्धयवटने रसाभिव्यक्त्यपेक्षया। न तु केवलया शास्त्रस्थितिसम्पादनेच्छया ॥ १२ ॥
( अनुः ) 'केवल शास्त्रीय मर्यादा परिपालन की दृष्टि से ही नहीं, अपितु रस व्यञ्जना के उपयोग की दृष्टि से सन्धि तथा सन्धि के अङ्गों की संघटना करना ( प्रवन्धव्यञ्जकता का तीसरा हेतु है । ) ॥ १२ ॥
की दृष्टि से पाँच बातों पर ध्यान रखने की आवश्यकता पर बल दिया है। इसके लिये पाँच कारिकायें लिखी गई हैं। प्रथम चार कारिकाओं में प्रत्येक में एक तत्त्व का निर्देश किया गया है। पाँचवीं कारिका के पूर्वार्ध में पाँचवाँ तत्त्व निर्दिष्ट है और उत्तरार्ध में उपसंहार है। ये पाँचों प्रकार अक्रम नहीं हैं। किन्तु क्रमबद्ध ही हैं। अर्थात् पहले प्रथम तत्त्व का ध्यान रखना चाहिये फिर दूसरे का, फिर तीसरे का। इसी क्रम से इन तत्त्वों का ध्यान रखना चाहिये। पाँचों प्रकार क्रमशः ये हैं ( १ ) सर्वप्रथम कथानक के कलेवर की रचना पर ध्यान देना चाहिये। कथानक चाहे घटित हुआ हो अर्थात् प्रमाणप्रसिद्ध कोई घटना हो या केवल कल्पनाप्रभूत हो, दोनों प्रकार के कथानकों में विभाव, भाव, अनुभव और सञ्चारी भाव के औचित्य का सर्वथा ध्यान रहना चाहिये; क्योंकि इससे कथानक की शोभा बढ़ जाती है। यहाँ पर भाव का अर्थ है अपरिपुष्ट स्थायी; क्योंकि सञ्चारियों का पृथक् उपादान किया ही गया है और परिपुष्ट स्थायी भाव न रह कर रस बन जाता है। यदि इनका औचित्य कथानक में न हो तो वह कथानक दूषित माना जाता है। इसी लिये विभाव और अनुभव की कष्ट कल्पना, रस के विरोधी तत्त्वों का उपादान तथा दूसरे प्रकार के अर्थानौचित्य रसदोष के अन्दर आते हैं।
उद्दोपनप्रशमनेऽपि यथास्वरमनन्तरा। रसस्यारम्भविश्रान्तिरन्तरुसन्धानमौज्झिनः ॥ १३ ॥
मध्य में अवसर के अनुकूल रस का उद्दोपन तथा प्रशमन करना तथा प्रवन्ध के आरम्भ से अवसानपर्यन्त अङ्गों रस का अनुसन्धान करना ( प्रवन्धव्यञ्जकता का चौथा हेतु है । ) ॥ १३ ॥
अलङ्कारैरपि शक्तावप्यनुरूप्येण योजनम्। प्रवन्धस्य रसादीना व्यञ्जकत्वे निवन्धनम् ॥ १४ ॥
( अलङ्कारयोजना की ) शक्ति होते हुये भी रस की अनुरूपता का ध्यान रखते हुये ही अलङ्कारों की योजना करना ( प्रवन्धव्यञ्जकता का पञ्चम हेतु है । ) ( यही पञ्चक ) प्रवन्ध की रस इत्यादि के प्रति व्यञ्जकता में निवन्धन है ॥ १४ ॥
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प्रसिद्ध घटना का उपादान किया गया हो और उसमें कोई ऐसी स्थिति आ जावे जो प्रस्तुत रस के अनुकूल न हो तो उसका परित्याग कर देना चाहिये या मध्य में भी कल्पना के द्वारा अभोष्ट रस के अनुकूल कथा का उदयन कर लेना चाहिये।
(आशय यह है कि यदि प्रसिद्ध कथानक में रसचर्वणा के लिये अनावश्यक कोई आधिक तत्व हो तो उसका परित्याग कर देना चाहिये। और यदि कोई विरोधी तत्व हो तो उसको तो कहना ही नहीं चाहिये। यदि उसके बिना कथानक का निर्वाह न हो रहा हो तो उसको ऐसे रूप में बदल देना चाहिये जिससे वह रस के अनुकूल वन जावे।)
( ३ ) कथानक की रचना के लिये जिन सन्धियोंों तथा सन्थ्यङ्गों का शास्त्र में निरूपण किया गया है उनका पालन करना चाहिये।
किन्तु यह ध्यान रखना चाहिये कि यदि उनका पालन रसव्यञ्जना के अनुकूल हो और उनसे रसाभिव्यक्ति में सहायता मिल रही हो तभी उनका पालन करना चाहिये, केवल इस दृष्टि से ही उनका पालन नहीं करना चाहिये कि शास्त्र में उनका प्रतिपादन किया गया है और शास्त्रीय मर्यादा की रक्षा करनी ही है।
( शास्त्र में इन अङ्गों का उल्लेख इसीलिये किया गया है कि इनके अनुसार कथानक संघटित करने से रसव्यञ्जना सुन्दर बन पडती है।
यदि इनके पालन करने से रसव्यञ्जना से कोई सहायता न मिले अथवा रस में व्याघात उपस्थित हो तो इनके पालन करने की आवश्यकता नहीं है।)
( ४ ) कथानक के बीच में आवश्यकतानुसार रस का उद्दीपन और प्रशमन होना चाहिये।
अर्थात् इस बात का ध्यान रखना चाहिये कि जहाँ आवश्यक कता हो वहाँ रस को तीव्रता प्रदान कर दी जावे और जहाँ रस के प्रशान्त कर देने से रस को पुष्ट होना सम्भव हो वहाँ पर उसे प्रशान्त कर देना चाहिये।
यदि उसकी विभ्रान्ति प्रारम्भ हो गई हो तो उसका अनुसन्धान कर लेना चाहिये।
( दोषस्थितिकार ने यहाँ पर दो पृथक् पृथक् तत्व माने हैं—एक तो रस का उद्दीपन और प्रशम तथा दूसरा अन्त में अङ्गी रस का अनुसन्धान। यह व्याख्या लोचन के विरुद्ध होने से त्याज्य है।)
( ५ ) कवि अलङ्कारयोजना में कितना ही निपुण क्यों न हो उसे रसानुकूल ही अलङ्कारयोजना करनी चाहिये।
रस इत्यादि के प्रति प्रवन्ध को व्यज्जकता के यही ५ निर्वन्धन है। इन पाँचों प्रकारों को संक्षेप में इस प्रकार कहा जा सकता है—कथापरीक्षा, अधिकतासम्पादन, रस को फलपर्यन्त लेजाना, रस के प्रति जागरूक रहना, उचित विभाव इत्यादि के वर्णन में अलङ्कार के औचित्य का ध्यान रस्खना।
अब इन्हीं पाँचों की क्रमशः व्याख्या की जा रही है—
( १ ) सर्वप्रथम कथापरीक्षा को लीजिये। कथा ऐतिहासिक भी हो सकती है, पौराणिक भी और सर्वथा कल्पनिक भी।
किन्तु सभी प्रकार के कथानकों में
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प्रबन्धोऽपि रसादीनां व्यङ्कक इत्युक्तं तस्य व्यङ्कत्वे निवन्धनम् । प्रथमं तावद्विभावभावानुभावसंश्रायौचित्यचारुणः कथाशरीररस विधिरियथायं प्रतिपादयिषितरसभावाद्यपेच्यया य उचिनो विभावो भावोऽनुभावः सन्धारी वा तदौचित्यचारुणः कथाशरीररस विधिव्यङ्कत्वे निवन्धनमकम् । तत्र विभावचिन्यं तावत्प्रसिद्धम् ।
( अनुः० ) प्रबन्ध भी रस इत्यादि का व्यङ्जक ( होता है ) यह कहा गया है । उसकी व्यङ्ककता में निवन्धन ( यह है ) । सर्वप्रथम विभाव, भाव ( स्थायी भाव ) अनुभाव और सन्धारी भाव के औचित्य से सुन्दर प्रतीत होनेवाले कथाशरीर का विधान अर्थात् ठीक रूप में प्रतिपादन के लिये अभीष्ट रस और भाव इत्यादि की अपेक्षा से जो उचित विभाव भाव अनुभाव और सन्धारी भाव हो उसके औचित्य से सुन्दर मालूम पड़नेवाले कथाशरीर का विधान व्यङ्ककता में निवन्धन होता है यह एक है । उनमें विभावौचित्य तो प्रसिद्ध ही है ।
लोचन तदौचित्येति । शृङ्गारवर्णनेच्छुना तादृशी कथा संश्रयणीय यस्यास्मृतुमाल्यादेरिव भावस्य लोला देरनुभावस्य हर्षाद्यतादे: सन्धारणः स्फुट एव सन्धाव इत्यर्थः । प्रसिद्धमिति । रहे हैं—विभाव इत्यादि ग्रन्थ के द्वारा । ‘तदौचित्यमपम्’ शृंगार वर्णन के इच्छुक द्वारा उस प्रकार की कथा का आश्रय लिया जाना चाहिये जिसमें मृत्तुमाल्य इत्यादि विभाव का लीला इत्यादि अनुभाव का और हर्ष धृति इत्यादि सन्धारी की स्फुट ही सन्धावना हो यही अर्थ है । ‘प्रसिद्धमम्’ यह लोक में और भरतशास्त्र में ।
तारावती इस बात का ध्यान रखना चाहिये कि उसमें रस के जिन तत्त्वों को निवद्ध किया जाये वे सर्वथा उचित ही होने चाहिये । उदाहरण के लिये यदि शृंगाररससमय रचना करनी है तो उसके अनुकूल ही परिस्थिति का निर्माण करना होगा । शृंगाररससमय रचना के लिये कवि को ऐसी कथा का आश्रय लेना चाहिये जिसमें स्पष्ट रूप में मृत्तु माला इत्यादि का वर्णन सन्निहित हो, जिस में लीला इत्यादि अनुभावों के वर्णन का पर्याप्त अवसर हो और हर्ष, धृति, इत्यादि सन्धारिभाव स्पष्ट रूप में प्रतीत हो रहे हों । रचोपकरणों के औचित्य का यही अभिप्राय है । इस औचित्य को हम कई भागों में विभाजित कर सकते हैं—विभावौचित्य, भावौचित्य, अनुभावौचित्य और सन्चार्यौचित्य । विभावौचित्य लोक में भी प्रसिद्ध है और भरत इत्यादि आचार्यों ने निरूपण भी विशेष रूप में कर दिया है ।
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उचित माने जाते हैं और कुछ उचित नहीं होते । कहीं क्रोध प्रशंसनीय होता है कहीं निन्दनीय । इसी प्रकार अन्य भावों के विषय में भी समझना चाहिये ।) भरत मुनि ने नाट्य को शैलोक्यानुकृति कहा है तथा उसे धीरोदात्ताद्यवस्थानुकृति बतलाया है । भरत के मत में नाट्य लोकधर्मी होता है और लोकप्रवृत्ति के अन्तर्गत विभिन्न प्रकार के प्रादेशिक राष्ट्रीय तथा जातीय चरित्रों का अध्ययन कार्यंकलाप और वाक्यादि को दृष्टि से किया है । प्रकृति के अन्दर विभिन्न प्रकार के व्यक्तियों, मस्तिष्कों और स्वभावों का वर्णन किय गया है । तथा उनको रसानुकूल रखने का आदेश दिया गया है । भरत का कहना है—
‘एतद्विभूषणं नार्या आकेशादानखादपि । यथा भाववसास्थंव विज्ञायैवं प्रयोजयेत् ॥
अर्थात् केश से नख तक यह स्त्री का विभूषण है । इस प्रकार इनको जानकर भाव और रस की अवस्था के अनुसार इनका प्रयोग करना चाहिये । किन्तु प्रकृ-तियों और प्रवृत्तियों की इयत्ता नहीं हो सकती । भरत ने कहा है कि प्रकृतियाँ नाना शील वाली होती हैं, शील में ही नाट्य की प्रतिष्ठा होती है । लोकसिद्ध ही सिद्ध माना जाता है; शास्त्र लोकस्वभाव से उद्भूत होता है; अतः नाट्यप्रयोग में लोक ही प्रमाण है । जो शास्त्र हैं, जो धर्म हैं जो शिल्प हैं, जो क्रियायें हैं; लोक-धर्म द्वारा सञ्चालित होने पर ही वे नाट्य सञ्चार की अधिकरिणी होती हैं । स्थावर और नर लोक का शास्त्र के द्वारा इयत्ता के रूप में निर्णय कर सकना असम्भव है अतः मैंने जो नहीं कहा वह भी लोक से ही समझ लिया जाना चाहिये ।’ इस प्रकार भरत लोक के औचित्य को प्रमुखता देते हैं । वस्तुतः धर्म और अधर्म तथा उचित और अनुचित की भावना प्रत्येक समझदार व्यक्ति के हृदय में स्वतः होती है । अतः लोकप्रवृत्त व्यक्ति अपनी अन्तरात्मा से ही उचित अनुचित का निर्णय कर लेता है । शास्त्रकार केवल दिग्दर्शन कराते हैं । साहित्यदर्पणकार ने विभावानौचित्य
का दिग्दर्शन इस प्रकार कराया है—‘उपनायकविषयक, सुगुरुस्त्री आदि के प्रति विध्यमान तथा अनुभयनिष्ठरति और प्रतिनायकनिष्ठ तथा अधम पात्र तिर्यक् इत्यादि के प्रति श्रृंगार में अनौचित्य होता है । गुरु इत्यादि के प्रति कोप, हीन-निष्ठ शान्त, गुरु इत्यादि को आलम्बन बनाकर हास्य, ब्रह्मवध इत्यादि के लिये उत्साह, अधम पात्रगत वीर और उत्तम पात्रगत भयानक ये अनुचित होते हैं तथा ऐसे दूसरे स्थानों पर भी समझना चाहिये ।’ इसी प्रकार उद्दीपन के औचित्य का भी दिग्दर्शन कराया जा सकता है । आशय यह है रसनिष्पत्ति के उद्देश्य से कथानक ऐसे चुना जाना चाहिये जो सहृदयों को अनुचित प्रतीत न हो और जिस
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भावौचित्यं तु प्रकृत्यौचित्यात् । प्रकृतिहृदन्तमध्यसाधमभावेन दिव्यमानुषादिभावेन च विभेदितो । तां यथायथमनुसृत्यसादृश्यर्णः स्थायी भाव उपनिवध्यमानौचित्यमागभवति । अन्यथा तु केवलमानुपाश्रयेण दिव्यस्य केवलदिव्याश्रयेण वा केवलमानुपस्यत्सादृश्य उपनिवध्यमानौचित्यं भवन्ति । तथा च केवलमानुपस्य राजादिवर्णने सम्पूर्णवलड्घनादिलक्षणा व्यापार उपनिवध्यमानाः सौष्ठवभृतोडपि नीरस एव नियमेन भवन्ति, तत्र स्वानौचित्यमेव हेतुः ।
(अनु०) भाव का औचित्य तो प्रकृति के औचित्य से ( होता है ) । प्रकृति निस्संदेह उत्तम मध्यम और अधम भाव से तथा दिव्य मानुप इत्यादि भाव से विभेदवाली ( हो जाती है ) । उसको ठीक रूप में अनुसरण करते हुए उपनिवद्ध किया हुआ असंकर्ण स्थायी भाव औचित्यवाला हो जाता है । नहीं तो केवल मानव के आश्रय से दिव्य के और केवल दिव्य के आश्रय से केवल मनुष्य के उपनिवद्ध किये हुये उदाहरण अनुचित होते हैं । अतएव राजा इत्यादि केवल मानव के वर्णन में सातों समुद्रों के लंघन इत्यादि रूप व्यापार उपनिवद्ध किये हुये सुन्दरता से भरे हुये भी नियमतः नीरस ही होते हैं । उसमें अनौचित्य ही हेतु है ।
लोके भरतशास्त्रे च । व्यापार इति । तद्रिष्योत्साहोपलक्षणमेतत् । स्थाय्यौचित्यं हि व्याख्येयत्वेनोपकान्तं नानुसवौचित्यम् । सौष्ठवभृतोडपि । वर्णनासहिम्नेत्यर्थः ! तत्र द्विति । नीरसत्वे । 'व्यापार' यहाँ । यह तद्रिष्यादिक का उदाहरण है । क्योंकि वर्णनीय के रूप में स्थाय्यौचित्य का उपक्रम किया गया है अनुभावौचित्य का नहीं । 'सुन्दरता से युक्त भी' अर्थात् वर्णन की महिमा से । 'वहाँ पर तो' अर्थात् नीरसत्व में ।
व्यक्ति के प्रति जो भाव दिखलाया गया हो उसके पात्र रसाभास उत्पन्न करें और न परिस्थितियाँ ही सादृश्य में खिचाव उत्पन्न करने वाली हों ।
उपर विभावौचित्य का वर्णन किया गया है। कथनक के औचित्य की कल्पना में कवि को जिस दूसरे तत्व का विचार करना है वह है भावौचित्य। (वैसे तो भावौचित्य में विभावों का औचित्य भी प्रयोजनीय होता है । तथापि भावौचित्य के लिये कतिपय अतिरिक्त तत्व भी आवश्यक होते हैं । ) भाव का औचित्य प्रकृतियों के औचित्य पर आधृत होता है । प्रकृतियों का विभागन दो प्रकार से किया जा सकता है—प्रथम भेदकल्पना के अनुसार प्रकृतियाँ तीन प्रकार की होती हैं—
तारावती
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उत्तम, मध्यम और अधम । द्वितीय उपभेद कल्पना के अनुसार उसके तीन भेद होने हैं दिव्य, अदिव्य और दिव्यादिव्य। समान परिस्थिति में प्रकृतिभेद के आधार पर भावना का भेद भी हो जाता है। एक ही परिस्थिति में उत्तम प्रकृतिवाले व्यक्ति के हृदय में जैसी भावनायें उठेंगी अधम प्रकृतिवाले व्यक्ति के हृदय में सर्वथा विपरीत भावनायें होंगी। अतः भावाभिव्यक्ति में प्रकृति का सर्वथा ध्यान रखना चाहिये अन्यथा प्रकृतिविपर्यय दोष के कारण रसानुभूति अकुत्स नहीं हो सकती।
( साहित्यदर्पण में प्रकृतिभेद के विषय में लिखा है कि—प्रकृतियाँ तीन प्रकार की होती हैं—दिव्य अर्थात् देवताओं की प्रकृति, अदिव्य अर्थात् मानव इत्यादि की प्रकृति और दिव्यादिव्य अर्थात् महापुरुषों की प्रकृति जो कुछ देवता और कुछ मनुष्यत्व की ओर झुकी हुई होती है। उनके भी उत्तम मध्यम और अधम ये भेद होते हैं। उसमें जो जिस प्रकार का हो उसका उसीसे मिलते जुलते रूप में वर्णन करना प्रकृतिविपर्यय दोष कहलाता है। जैसे धीरोदात्त राम का धीरोदात्त के समान वात्सल्य अथवा जैसे कुमारसम्भव में उत्तम देवता पार्वती और परमेश्वर का सम्मोगशृङ्गार वर्णन ( ‘यह मातापिता के सम्मोगवर्णन के समान अत्यन्त अनुचित है’ यह कुछ लोग कहते हैं ।) उस प्रकृति उपनिबन्धन इस रूप में किया जाये कि वह न किसी विरोधी भाव से सङ्घोर्ण हो और न किसी अनुकूल अथवा उदासीन भाव के प्रति गौण हो रहा हो वह स्थायी भाव ही औचित्यशाली कहा जा सकता है। इसके प्रतिकूल यदि प्रकृति का उलट-फेर हो जाता है जैसे देवता के जो उत्साह इत्यादि भाव होते हैं उनको केवल मानव के आश्रय से वर्णन किया जाये अथवा जो उत्साह इत्यादि भाव केवल मानव के हो सकते हैं उनका आश्रय केवल देवताओं को बनाया जावे तो.इस प्रकार के का अर्थ है कि जो पाण्डव इत्यादि देवों और मानवों की मिश्रित प्रकृति के होते हैं उनके आश्रय में दिव्य या मानुष किसी प्रकार के औचित्य का पालन किया जा सकता है ।) इस प्रकार राजा इत्यादि जो केवल मानव है उनके वर्णन के प्रसङ्ग में सातों समुद्रों को लांघ जाने इत्यादि ‘कायों का’ उपनिबन्धन किया जाता है तो वह उपनिबन्धन ( कलात्मक दृष्टि से ) कितनी ही अच्छी क्यो न हो किन्तु नियमितः नीरस हो जाता है। इस नीरसता का कारण अनौचित्य ही होता है। यहाँ पर ‘कायों का उपनिबन्धन’ अनुचित बतलाया गया है। रसप्रकरण में कार्य या व्यापार को सर्वदा अनुत्पाद कहा जाता है। किन्तु यहाँ पर भाव के औचित्य का प्रकरण
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ननु नागलोकगमनादयः सातवाहनप्रभृतीनां श्रुतान्ते, तदलोकसामान्यप्रभावातिशयवर्णने किमनौचित्यं सर्वोर्ज्जिभरणक्ष्मापां त्रामभुजामिति? नैतदस्ति, न वयं तु मो यत्नप्रभावातिशयवर्णनमनुचितं राज्ञाम्, किन्तु केवलमनुपाश्रयेण योत्पाद्यवस्तुकथा क्रियते तस्या दिव्यमौचित्यं न योजनीयम्। दिव्यमानुष्याभ्यां तु कथाभ्यामुभयौचित्ययोजनमविरुद्धमेव। यथा पाण्डवादिकथायाम्। सातवाहनगमन इत्यादि ( अनुः ) ( प्रश्न ) निस्सन्देह सातवाहन इत्यादि ( राजाओं ) के नागलोकगमन इत्यादि ( लोकोत्तर कार्य ) सुने जाते हैं; अतः समस्त पृथ्वीर के भरण-पोषण में समर्थ पृथ्वीर का भोग करनेवाले ( राजाओं ) के अलोकसामान्य प्रभावातिशय वर्णन करने में क्या अनौचित्य है? ( उत्तर ) यह नहीं है। हम यह नहीं कहते कि राजाओं का प्रभावातिशय वर्णन अनुचित होता है; किन्तु केवल मनुष्य के आश्रय से जो उत्पाद्यवस्तु की कथा की जाती है उसमें दिव्य औचित्य की योजना नहीं करनी चाहिये। दिव्य मनुष्य ( दोनों प्रकृतिवाली ) के आश्रय से की हुई कथा में दोनों के औचित्य की योजना अविरुद्ध ही है। जैसे पाण्डु इत्यादि की कथा में। सातवाहन इत्यादि में तो जितना कमंकृत सुना जाता है केवल उतने
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है अनुभव के औचित्य का नहीं। अतः व्यापार शब्द का अर्थ करना चाहिये सात समुद्रों के लांघ जाने इत्यादि कायों से उपलक्षित उत्साह इत्यादि। यहाँ पर यह प्रश्न उपस्थित होता है कि राजा लोग सर्वसाधारण जनता के समान सीमित शक्ति वाले तो होते नहीं उनमें लोकोत्तर शक्ति होती है। वे समस्त पृथ्वीर के रक्षण करने की शक्ति रखते हैं और भूमि का भोग भी करते हैं। यदि उनके आश्रय से अलोकसामान्य प्रभाव की अतिशयता का वर्णन करें तो क्या अनुचित होगा? उदाहरण के लिये सातवाहन इत्यादि का नागलोकगमन इत्यादि सुना जाता है। ( विक्रम की द्वितीय शताब्दी के आस पास सातवाहन नामक राजा कुंतल राज्य में हुआ था। इसकी राजधानी प्रतिष्ठान ( वर्तमान पैठान ) में थी। इन्होंने का चलाया हुआ शक संवत् है और इन्होंने ने प्रसिद्ध मुक्तक कोश गाथासप्तशती की रचना को थी। ये अपने दान मान और ऐश्वर्य के कारण जनसाधारण में अलौकिक शक्तिसम्पन्न माने जाने लगे थे। ऐसे व्यक्तियों के विषय में किवदन्तियाँ प्रायः चल पड़ती हैं। सम्भवतः इनके विषय में भी पातालगमन जैसी किवदन्तियाँ चल पड़ी हों और वे आनन्दवर्धन के समय तक तथा उसके बाद तक प्रसिद्ध रही हों। विक्रमादित्य के विषय में ऐसी ही किवदन्तियाँ आज भी प्रसिद्ध हैं। यह भी सम्भव है कि ये कोई दूसरे सातवाहन हों।) आशय यह है कि राजाओं के लोकोत्तर
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दिपु तु चेपु यावदपदानं श्रूयते तेषु तावन्मात्रमजुगम्यमानमनुगुणतया प्रतिभासते । व्यतिरिक्तं तु तेऽपामेवोपनिबन्धनमनुचितम् । तदयमत्र परमार्थः—अनौचित्यादते नान्यद्रसभङ्गस्य कारणम् । प्रसिद्धौचित्यवन्धस्तु रसेनैवोपनिबन्धनतया ॥
गुणों की अनुकूलता के अनुसार प्रतिभासित होता है उसके अतिरिक्त तो उन्हीं के विषय में उपनिबन्धन अनुचित होता है । तो यह यहाँ पर सारार्थ है—‘अनौचित्य को छोड़कर रसभंग का और कारण नहीं होता । प्रसिद्ध औचित्य का उपनिबन्धन रस की से बड़ी परा विद्या है ॥’
लोचन व्यतिरिक्तं त्विति । अधिकमित्यर्थः । तारावती कृत्य सम्भव है अतः उनकी प्रभाव की अधिकता का वर्णन क्यों अनुचित कहा जावेगा ? ( उत्तर ) इस प्रश्न का उत्तर यह है कि जो कुछ प्रतिभाषी ने कहा है वह वास्तव में ठीक नहीं है । हमारे कहने का आशय यह नहीं है कि राजाओं के प्रभाव की अधिकता का वर्णन नहीं करना चाहिये । सामान्य जनों की अपेक्षा राजा में प्रभाव की जितनी अधिकता सम्भव हो सकती है उसका वर्णन करना दोष नहीं कहा जा सकता, अतः उसका तो वर्णन करना ही चाहिये । किन्तु यह ध्यान रखना चाहिये कि कथायें दो प्रकार की होती हैं—एक तो लोक में परम्परागत रूप में प्रसिद्ध और दूसरी काल्पनिक । परम्पराप्राप्त कथाओं के समान कल्ङ्ङित कथाओं के प्रति सर्वसाधारण की भावना पहले से ही बनी नहीं रहती । अतः यदि ऐेसी कल्ङ्ङित कथा को लेकर नाट्य या काव्य की रचना की जावे उसके पात्र सर्वथा लौकिक तथा अप्रमिद्ध हो और उनके विषय में सर्वसाधारण की कोई पुरानी धारणा बनी हुई न हो तो उनके चित्रण में मानव औचित्य का ध्यान रखना चाहिये, दिव्य औचित्य की योजना उनके साथ नहीं करनी चाहिये । प्रसिद्ध कथा में कुछ पात्र ऐसे होते हैं जो होते तो हैं वस्तुतः लौकिक, किन्तु उनके साथ परम्परागत रूप में दिव्यता जुड़ जाती है, उन्हें हम दिव्यादिव्य प्रकृति का नायक कह सकते हैं उनके चरित्रों में दिव्य और अदिव्य दोनों प्रकार की प्रकृतियों की योजना विरुद्ध नहीं कही जा सकती । जैसे पाण्डव इत्यादि के चरित्र ।
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अत एव च भरते प्रख्यातवस्तुविषयत्वं प्रख्यातोदात्तनायकत्वं च नाटक-
(अनु०) अतएव भरत में नाटक का प्रख्यात वस्तुविषयत्व और प्रस्यात उदात्त-नायकत्व अवश्यकतत्त्वता के रूप में रखा गया है ! इसे नायक के औचित्य
तारावती
पाठ की श्रृङ्खता के कारण आ गया है। क्योंकि पाण्डवों की कथा में किसी लोकोत्तर कृत्य का वर्णन नहीं है। पाण्डवों की कथा सभी लोकोत्तर कृत्यों से भरी हुई है । ) इसमें भी इतना ध्यान रखना चाहिये कि प्रसिद्ध दिव्यादिव्य प्रकृति
वाले राजाओं के लोकोत्तर कृत्यों की जो सीमा लोक में प्रतिष्ठित हो चुकी हो यदि उतने तर्क का ही अनुगमन किया जाता है तो वह अनुगमन रस के अनुकूल होता है। यदि लोकप्रतिष्ठा का अतिक्रमण करके उससे अधिक का वर्णन किया जाये तो वह सर्वथा अनुचित ही होता है।
यहाँ पर सारांश इतना ही है—
'अनौचित्य को छोड़कर रसभङ्ग का और कोई कारण नहीं होता। प्रसिद्ध औचित्य का निवन्ध रसा की सबसे बड़ी उपनिषद् है ।' ( उपनिषद् शब्द के दो अर्थ होते हैं—गुरा विद्या और निकट पहुँचना। आशय यह है कि औचित्य का
निबन्धन रस की परा विद्या है और रसनिष्पत्ति के सबसे अधिक निकट पहुँचना भी औचित्य का उपनिबन्ध ही है । )
भरतमुनि ने नाटक के अन्दर प्रख्यात वस्तु का कथानक के रूप में उपादान करना और इतिहास प्रसिद्ध व्यक्ति को नाटक का नायक बनाना कवि का अनिवार्य कर्तव्य माना है । इसका कारण ही यह है कि प्रसिद्ध कथानक के पात्रों के चरित्र
तथा उनकी शक्ति की सीमा कवि के सामने सदैव सन्निहित रहती है, अतः कवि उनका चित्रण करने में व्यामोह में नहीं पड़ता और पाठकों की भी उनके पात्रों के विषय में एक भावना बनी रहती है, अतः पाठक न तो उनकी सम्भावना में सन्देह करते हैं और न उनका आस्वादन ही प्रतिहत होता है । इसके प्रतिकूल
काल्पनिक नाटकादि की रचना में कवि को किसी पात्र के चरित्र की कल्पना स्वयं करनी पड़ती है और परिशीलक जय उस नई घटना को पढ़ता है या उसका अभिनय देखता है तब किसी विशिष्ट पात्र के विषय में उसकी धारणा चित्रण के अनुकूल वन जाती है। न तो कवि के मस्तिष्क में उस नवीन पात्र के विषय में
कोई धारणा बद्धमूल होती है और न पाठकों के सामने उनकी कोई चित्र-रूय होती है। ऐसी दशा में यह बहुत सम्भव है कि कवि सकलित चरित्र के ठीक ठीक निर्वाह करने में भूल कर जाये। वहाँ कवि को विशेष रूप से चरित्रचित्रण में
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स्यावश्यकरत्व्यातयोपन्यास्यस्तम् । तेन हि नायकौचित्यानौचित्यविषये कविना व्यामुह्यति । यस्तूपन्यास्यवस्तु नाटकादि कुर्त्तस्याप्रसिद्धानुचितनायकस्वभाववर्णने महान् प्रमादः ।
अनौचित्य के विषय में कवि व्यामोह में नहीं पड़ता । और जो नाटक को उत्पाद्य ( कल्पित ) वस्तु वाला बनावे उससे अप्रसिद्ध और अनुचित नायक के स्वभाव-वर्णन में बहुत बड़े प्रमाद की सम्भावना है ।
तदुक्तं मवति—यत्र विनेयानां प्रतीतिखण्डना न जायते तादृग् वर्णनीयम् । तत्र केवलमानुषस्य एकपदे सम्भाव्यवेलङ्घनमसम्भान्यमानतयानृतमिति हृदये स्फुरदुपदेशस्य चतुर्वर्गो|पायस्याश्र्यलौकिकतां बुद्ध्वा निवेशयति । रामादेष्टु तथाविधमपि चरितं पूर्वप्रसिद्धिपरम्परोपचितत्सम्प्रत्ययोपारूढमसत्यतया न चकास्ति । अतएव तस्यापि यदा प्रभावान्तरमुखप्रेक्ष्यते तदा तादृशमेव । न त्वसंभावनापदं वर्णनीयमिति । तेन हीति ।
प्रख्यातोदात्तनायकवस्तुत्वेन । व्यामुह्यतीति । कि वर्णयेयमिति । यस्त्वति कवि: । ( यहाँ पर ) यह कहा गया है—जहाँ उपदेश दिये जानेवाले ( सहृदय व्यक्तियों ) की प्रतीति का खण्डन हो रहा हो उस प्रकार की वस्तु का वर्णन करना चाहिये । उसमें केवल मानव का अकस्मात् सातों समुद्रों का लांघ जाना असम्भव होने से असत्य है यह उपदेश (उपदेश के योग्य ) व्यक्ति के हृदय में स्फुरित होते हुये बुद्धि में चतुर्वर्ग फलप्राप्ति के उपाय की भी असत्यता को निविष्ट कर देता है । राम इत्यादि का तो उस प्रकार का भी चरित्र पूर्वप्रसिद्धि-परम्परा से बढ़े हुये विश्वास के कारण ( हृदय पर ) चढ़ा हुआ असत्य के रूप में प्रकट नहीं होता । अतएव 'जिन उनके भी दूसरे प्रभाव की कल्पना की जाती है तब वैसा ही होता है । आशय यह है कि असम्भावना के स्थान का वर्णन नहीं करना चाहिये । 'इससे निस्सन्देह' अर्थात् प्रख्यात उदात्त नायक विषयक वस्तु होने से । 'व्यामोहित होता है' अर्थात् क्या वर्णन करूँ यह ( व्यामोह ) । 'जो' अर्थात् जागरूक रहना पड़ता है । यदि वहाँ पात्र के चित्रण में कवि प्रकृति के औचित्य का पालन करने में समर्थ हो जाता है तो भावौचित्य के कारण प्रवन्ध रसाभिव्यक्तज्ञान में समर्थ होता है ।
लोचन
ऊपर जो कुछ कहा गया है उसका सार यही है कि कवि को सर्वदा ऐसा वर्णन करना चाहिये जिससे विनेय व्यक्तियों की प्रतीति का खण्डन न हो ( आशय यह है कि काव्य का मुख्य प्रयोजन होता है सुकुमार प्रकृति के राजकुमार इत्यादि
तारावती
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महान् प्रमाद इति । तेनोत्पाद्यवस्तु नाटकादि न निरूपितं मुनिनेत्य न कर्तव्यमिति तात्पर्यम् । आदिशब्दः प्रकारे, हिमादेः प्रसिद्धदेवचरितस्य सङ्ग्रहार्थः ।
लोचन महान् प्रमाद इति । तेनोत्पाद्यवस्तु नाटकादि न निरूपितं मुनिनेत्य न कर्तव्यमिति तात्पर्यम् । आदिशब्दः प्रकारे, हिमादेः प्रसिद्धदेवचरितस्य सङ्ग्रहार्थः ।
दूसरा तो 'उक्त बहुध्रीहि' उपलक्षण है इसलिये प्रकरण यहाँ पर कहा गया है यह कहता है । अथवा 'नाटिकादि' यह पाठ है । उसमें आदिग्रहण प्रकारसूचक है । इससे मुनि के द्वारा निरूपित नाटिकालक्षण में प्रकरण और नाटक के योग से उत्पाद्य वस्तु और नायक नृपति होता है' यहाँ पर क्रम का अनुसरण करते हुये प्रख्यात उद्दात्त नृपति नायक समझा जाना चाहिए—यह भाव है ।
भन्यस्तु—उपलक्षणमुत्तो बहुब्रीहीरिति प्रकरणमन्रोक्त्यमित्याह । 'नाटिकादि' हति वा पाठः । तत्रादिग्रहणं प्रकासूचकम् , तेन मुनिनिरूपिते नाटिकालक्षणे 'प्रकरण-नाटकयोगादुपपाद्यं वस्तु नायको नृपति:' इत्यत्र यथासङ्ख्येन प्रसङ्यातोदात्तनृपतिनायक-कवं बोद्धव्यमिति भावः ।
को ठीक मार्ग पर ले आया जावे । यह तभी सम्भव है जब कि उनके हृदय में असत्यता का प्रतिभास न हो । यदि नाटकादि में ऐसा वातावरण उत्पन्न किया जाता है जिसको विनेय व्यक्ति सत्य समझने लगते हैं तभी उनकी आस्था जमती है और तभी वे उपदेश को ग्रहण कर सकते हैं । ( अतः मान लीजिये कोई ऐसा पात्र है जो शुद्ध मानव की सीमा से पार नहीं जा सकता, यदि एकदम उसका सातों समुद्रों का लांघ जाना दिखला दिया जावेगा तो सहृदयों के हृदयों में असम्भावनोक्तिजन्य असत्यता स्फुरित होने लगेगी और जिस चतुर्वर्ग के उपाय का उपदेश देना कवि को अभीष्ट होता है असम्भव प्रकृति उस उपाय के मिथ्यात्व को बुद्धि में निविष्ट कर देती है ( जिससे कवि का अभीष्ट सिद्ध नहीं होता । ) राम इत्यादि का तो यदि वैसा भी चरित्र चित्रित किया जावे अर्थात् समुद्र पर पत्थरों को तैराना, एक वाण से समुद्र को शुष्क कर देना इत्यादि असम्भव घटनाओं को यदि राम इत्यादि पात्रों के विषय में दिखलाया जावे तो पूर्वप्रसिद्धि की परम्परा से बढ़े हुये विश्वास के हृदय पर जमे होने के कारण ये घटनायें असत्य के रूप में प्रतीत नहीं होतीं । अतएव यदि उन राम इत्यादि के भी प्रसिद्धि से भिन्न दूसरे प्रकार के प्रभावों का वर्णन किया जावे तो उनकी भी वही
तारावती को ठीक मार्ग पर ले आया जावे । यह तभी सम्भव है जब कि उनके हृदय में असत्यता का प्रतिभास न हो । यदि नाटकादि में ऐसा वातावरण उत्पन्न किया जाता है जिसको विनेय व्यक्ति सत्य समझने लगते हैं तभी उनकी आस्था जमती है और तभी वे उपदेश को ग्रहण कर सकते हैं । ( अतः मान लीजिये कोई ऐसा पात्र है जो शुद्ध मानव की सीमा से पार नहीं जा सकता, यदि एकदम उसका सातों समुद्रों का लांघ जाना दिखला दिया जावेगा तो सहृदयों के हृदयों में असम्भावनोक्तिजन्य असत्यता स्फुरित होने लगेगी और जिस चतुर्वर्ग के उपाय का उपदेश देना कवि को अभीष्ट होता है असम्भव प्रकृति उस उपाय के मिथ्यात्व को बुद्धि में निविष्ट कर देती है ( जिससे कवि का अभीष्ट सिद्ध नहीं होता । ) राम इत्यादि का तो यदि वैसा भी चरित्र चित्रित किया जावे अर्थात् समुद्र पर पत्थरों को तैराना, एक वाण से समुद्र को शुष्क कर देना इत्यादि असम्भव घटनाओं को यदि राम इत्यादि पात्रों के विषय में दिखलाया जावे तो पूर्वप्रसिद्धि की परम्परा से बढ़े हुये विश्वास के हृदय पर जमे होने के कारण ये घटनायें असत्य के रूप में प्रतीत नहीं होतीं । अतएव यदि उन राम इत्यादि के भी प्रसिद्धि से भिन्न दूसरे प्रकार के प्रभावों का वर्णन किया जावे तो उनकी भी वही
तारावती को ठीक मार्ग पर ले आया जावे । यह तभी सम्भव है जब कि उनके हृदय में असत्यता का प्रतिभास न हो । यदि नाटकादि में ऐसा वातावरण उत्पन्न किया जाता है जिसको विनेय व्यक्ति सत्य समझने लगते हैं तभी उनकी आस्था जमती है और तभी वे उपदेश को ग्रहण कर सकते हैं । ( अतः मान लीजिये कोई ऐसा पात्र है जो शुद्ध मानव की सीमा से पार नहीं जा सकता, यदि एकदम उसका सातों समुद्रों का लांघ जाना दिखला दिया जावेगा तो सहृदयों के हृदयों में असम्भावनोक्तिजन्य असत्यता स्फुरित होने लगेगी और जिस चतुर्वर्ग के उपाय का उपदेश देना कवि को अभीष्ट होता है असम्भव प्रकृति उस उपाय के मिथ्यात्व को बुद्धि में निविष्ट कर देती है ( जिससे कवि का अभीष्ट सिद्ध नहीं होता । ) राम इत्यादि का तो यदि वैसा भी चरित्र चित्रित किया जावे अर्थात् समुद्र पर पत्थरों को तैराना, एक वाण से समुद्र को शुष्क कर देना इत्यादि असम्भव घटनाओं को यदि राम इत्यादि पात्रों के विषय में दिखलाया जावे तो पूर्वप्रसिद्धि की परम्परा से बढ़े हुये विश्वास के हृदय पर जमे होने के कारण ये घटनायें असत्य के रूप में प्रतीत नहीं होतीं । अतएव यदि उन राम इत्यादि के भी प्रसिद्धि से भिन्न दूसरे प्रकार के प्रभावों का वर्णन किया जावे तो उनकी भी वही
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तारावती
दशा होगी। सारांश यह है कि असम्भव का वर्णन नहीं करना चाहिये। (आचार्य शुक्ल ने लिखा है कि आज कल या तो नवीनता की झोंक में या पुरातन के खण्डन करने की मिथ्या वीर भावना से कुछ कवि प्राचीन प्रतिष्ठित चरित्रों में गड़बड़ किया करते हैं। कोई मेघनाद को नायक बनाते हुए दिखाई देता है कोई दूसरे प्रकार की कल्पनाओं से प्राचीन चरित्रों की बुद्धिगम्यता प्रतिपादित करते हैं। आचार्य शुक्ल के अनुसार प्राचीन नवीन कल्पना के लिये अपरिमित अवकाश होते हुये भी यह सरस्वती के मन्दिर को व्यर्थ कलंकित करना है।) भरत मुनि का आशय यही है कि प्रख्यात और उदात्त नायक विषयक वस्तु होने से कवि इस व्यामोह में नहीं पड़ता कि क्या वर्णन करना चाहिये या क्या नहीं करना चाहिये।यहाँ पर कहा गया है कि जो उत्पाच्य वस्तु वाले नाटक इत्यादि की रचना करे उसे अपसिद्ध अनुचित नायक के स्वभाववर्णन में बहुत बड़े प्रमाद की सम्भावना रहती है। इसमें यह प्रश्न उठता है कि नाटक तो कल्पित वस्तु वाला होता ही नहीं फिर यह क्यों कहा गया कि 'जो कल्पित वस्तु वाले नाटक की रचना करे'? अतः इस प्रश्न का उत्तर देने के लिये इस सन्दर्भ की व्याख्या इस प्रकार की गई है कि यदि नाटक भी कल्पित विषय वाला रखा जावे तो कवि से बहुत बड़े प्रमाद हो जाने की सम्भावना हो सकती है। इसीलिये उत्पाच्य वस्तु वाले नाटक इत्यादि की रचना नहीं करना चाहिये। और इसीलिये मुनि ने नाटक को उत्पाच्य वस्तु को लेकर लिखने का आदेश नहीं दिया है और न उसका निरूपण ही किया है। 'नाटकादि' में आदि शब्द प्रकारवाचक है अर्थात् नाटक के ढंग पर ही लिखे हुये और भी अभिनेय काव्य जिनमें प्रख्यात वस्तु को नाट्य वस्तु के रूप में ग्रहण किया जावे। इससे डिम इत्यादि का संग्रह हो जाता है जिसमें प्रसिद्ध देवचरित को नाट्य वस्तु के रूप में ग्रहण किया जाता है। (नाट्य शास्त्र में रूपक के दस भेद किये गये हैं—नाटक, प्रकरण, भाग, व्यायोग, समवकार, डिम, ईहामृग, अङ्क, वीथी और प्रहसन। इसी प्रकार १८ उपरूपक होते हैं। इनमें कुछ रूपक और उपरूपक प्रख्यात वस्तु को लेकर चलते हैं और कुछ कल्पित वृत्त को लेकर। नाटक प्रथम प्रकार का रूपक होता है जिसमें प्रख्यात वृत्त का आश्रय लिया जाता है। लोचन के अनुसार यहाँ पर वृत्तिकार (आनन्दवर्धन) ने जो 'नाटकादि' की कल्पित वृत्ता में कवि के महान् प्रमाद की सम्भावना का उल्लेख किया है उसका आशय यह है कि यदि प्रख्यात वृत्त पर आधृत नाटक इत्यादि को कल्पितवस्तुविषयक माना गया होता तो कवि के महान् प्रमाद की सम्भावना थी, इसीलिये भरतमुनि ने नाटक इत्यादि को कल्पित वृत्त-गत माना नहीं है और उसकी
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ननु यद्युत्साहादिभाववर्णने कथचिद्दिव्यमानुष्यादौचित्यपरिक्षा क्रियते तत्कियताम्, रत्यादौ तु किं तथा प्रयोजनम्? रीतिरहि भारतर्षोचितैनेैय व्यवहारेण (अनु०) (प्रश्न) यद्युत्साह इत्यादि के वर्णन में दिव्य, मानुष इत्यादि के औचित्य की परीक्षा की जाती है तो की जावे। रति इत्यादि में, तो उससे क्या प्रयोजन! स्थिति यह है कि रति भारतवर्षोचित व्यवहार से ही दिव्यों की भी वर्णित
तृतीय उद्योतः
रचना करनी भी नहीं चाहिये।) कुछ लोग ‘नाटकादि’ शब्द की व्याख्या इस प्रकार करते हैं—इस शब्द में बहुव्रीहि है, यह बहुव्रीहि उपलक्षणपरक हो जाता है। (उपलक्षण का अर्थ है एक भाग के ग्रहण करने पर सम्पूर्ण का ज्ञान हो जाना। यहाँ नाटक शब्द के ग्रहण से सभी रूपकों और उपरूपकों का ग्रहण हो जाना उपलक्षण है।) अतः नाटकादि के द्वारा प्रकरण इत्यादि कल्पितवस्तुपरक रूपकों का ग्रहण हो जाता है। इस अवस्था में आनन्दवर्धन के उक्त कथन का यही आशय है कि जिन प्रकरणादिकों में वस्तु उत्पाद्य होती है उसमें प्रमाद हो जाना अधिक सम्भव है। अथवा यहाँ पर ‘नाटकादि’ यह पाठ न मानकर ‘नाटिकादि’ यह पाठ मानना चाहिये। यहाँ पर ‘आदि’ का ग्रहण प्रकार का सूचक है। अर्थात् ‘जिस प्रकार की नाटिका होती है उस प्रकार के रूपकों में...’ इत्यादि। मुनि ने नाटिका का लक्षण यह लिखा है—(‘नाटिका में) प्रकरण और नाटक के योग से उत्पाद्य वस्तु और नायक राजा होता है।’ यहाँ पर यथासंख्य अर्थात् क्रम के अनुसार व्याख्या करनी चाहिये। अर्थात् नाटिका में प्रकरण और नाटक तीनों
के तत्व मिले रहते हैं—प्रकरण के अनुसार वस्तु उत्पाद्य होती है और नाटक के अनुसार नायक नाटक नायिक होता है। आशय यह है कि नाटिका की वस्तु भी कल्पित ही होती है और उसी को लेकर आनन्दवर्धन ने लिख दिया है कि कल्पित वस्तु वाली नाटिका इत्यादि में प्रमाद का हो जाना बहुत स्वाभाविक है। (साहित्यदर्पण में नाटिका का लक्षण यह लिखा है—‘नाटिका कल्पितवृत्त वाली, अधिकतर स्त्रीपात्रों से युक्त, चार अङ्कों वाली होती है। इसमें प्रसिद्ध नायक होता है।’ आशय यह है कि नाटिका में किसी प्रसिद्ध नायक का कल्पित चित्र रहता है।)
ऊपर बतलाया है कि प्रकृतियों के औचित्यका पालन भावौचित्य में हेतु होता है। यहाँ यह प्रश्न उपस्थित होता है कि उत्साह इत्यादि के वर्णन में तो दिव्य मानव इत्यादि प्रकृतियों के भेद का परिमाण मृदु कहा जा सकता है—देवों में उत्साह का परिणाम मानवों की अपेक्षा भिन्न अवश्य होता है। अतः उत्साह इत्यादि के क्षेत्र में दिव्य मानव इत्यादि औचित्यों की परीक्षा यदि कोई करता है तो किया करे, इसमें किसी को आपत्ति नहीं हो सकती। किन्तु रति इत्यादि में उस परीक्षा का क्या
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दृश्यमानमपि वर्णनीयेत स्थितिः नैवम् तत्कौचित्यातिक्रमेण सुतरां दोषः । तथा ह्याधमप्रकृत्यौचित्येनोत्तमप्रकृतेः शृङ्गारोपनिबन्धने का भवेतोपहास्यता ? त्रिविधं प्रकृत्यौचित्यं भारत वर्षस्यास्ति शृङ्गारविषयम् । यतु दिव्यमौचित्यं ततस्त्रानुपपत्तेरवति चेत्—न यत्र दिव्यमौचित्यं शृङ्गारविषयमन्यत्किश्चिद् व्रतम् । किं तर्हि ? भारतवर्षविषये यथोत्तमनायकेषु राजादिषु शृङ्गारोपनिबन्धनस्थौ दिव्याश्रयोडपि शोभते । न च राजादिषु प्रसिद्धग्राम्यशृङ्गारोपनिबन्धनं प्रसिद्धं नाटकादेरभिनेयत्वादभिनयस्य च सम्भोगकादौ; तथैव देवेषु तत्प्रतीहार्यत्वम् ।
लोचन कथं तर्हि सम्भोगशृङ्गार: कविना निबध्यतामित्याशङ्क्याह—न चेतित । तथैवेतित । मुनिनापि स्थाने स्थाने प्रकृत्यौचित्यमेव विभावानुभावादिषु बहुत्तरं प्रमाणीकृतम् 'स्थैर्येणोत्तममध्यमाधमानां नीचतां सम्भ्रमेण' इत्यादि वदता । तदुक्तं कवि के द्वारा सम्भोग शृङ्गार कैसे निबद्ध किया जावे यह शङ्का करके कहते हैं—'और नहीं' यह । 'उस प्रकार से' यह । मुनिन ने भी विभाव अनुभाव इत्यादि में स्थान-स्थान पर प्रकृत्यौचित्य ही बहुत अधिक प्रमाणित किया है —‘उत्तम और मध्यम का स्थैर्य के द्वारा तथा नीचों का अपसर्पण के द्वारा’. यह कहते हुये ।
तारावती योजन ? प्रेम, सम्भोग इत्यादि जैसे देवों में होते हैं वैसे ही मानवों में भी होते हैं। यदि कोई कवि भारतीय व्यक्तियों के प्रेम के औचित्य के ही आधार पर दिव्य प्रेम का भी वर्णन करता है तो उसमें अनौचित्य क्या होगा ? आशय यह है कि प्रेम तो सभी का एक-सा होता है उसमें औचित्य-अनौचित्य का क्या अर्थ ? इसका उत्तर यह है कि यह कथन ठीक नहीं । यदि प्रेम के क्षेत्र में भी औचित्य का अतिक्रमण किया जाता है तो उसमें भी दोष होगा । वह इस प्रकार——यदि अधम प्रकृति वाले व्यक्तियों के औचित्य का प्रयोग उत्तम प्रकृति वाले व्यक्तियों के शृङ्गारोपनिबन्धन में किया जावेगा तो वह अवश्य ही उपहासनीय होगा ।
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शृङ्गारविर्यस्यासभ्यत्वाच्चतत्र परिहार इति चेत्, न; तस्याभिनयस्यैवं त्रिविषयस्याभ्यतां तत्काङ्ग्यस्यैवं विषयस्य स केन निगृद्येत ? तस्मादभिनेयार्थेऽनभिनेयार्थे वा काव्ये यदुतमप्रकृते रजादेरुतमप्रकृतिभिन्नाधिकाभिः सह ग्राम्यसम्भोगवर्णनं तत्रैव । सभ्याभिधानेऽपि च सूत्रकारैर्मध्यम् । तथैश्चोत्तमदेवताविषयेऽपि । इत्यादि में राजा इत्यादि के विषय में ग्राम्य शृङ्गार का भी उपनिबन्धन प्रसिद्ध नहीं है उसी प्रकार देवताओं के विषय में भी उसका त्याग करना चाहिये । ( यदि कहों कि ) नाटक इत्यादि के अभिने्य होने से और सम्भोगशृङ्गारविषयक अभिनय के असभ्य होने से उसका परिहार ( किया जाता है ) तो ( इसका उत्तर यह है कि ) यह बात नहीं हैं । यदि इस विषय के अभिनय में असभ्यता है तो इस विषय के काव्य में उसे ( असभ्यता को ) कौन रोक लेगा ? अतः अभिने्य अर्थ या अभिनय भिन्न अर्थवाले काव्य में जो उत्तम प्रकृतिवाले राजा इत्यादि का उत्तम प्रकृतिवाली नायिकाओं के साथ ग्राम्य सम्भोग का वर्णन वहाँ मुनियों के विषय में भी ।
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और मध्यम व्यक्तियों की रति भाव के द्वारा मानी है और नीचों की सम्भ्रम के द्वारा । ) स्वयं भारतवर्ष में ही शृङ्गार के विषय में उत्तम मध्यम और अधम प्रकृति के अनुसार औचित्य का विचार किया ही जाता है । अतः यह नहीं कहा जा सकता कि प्रकृत्यौचित्य का विचार उत्साह इत्यादि में ही किया जाना चाहिये, शृङ्गार इत्यादि में नहीं । यहाँ पर कोई विचारक यह भी कह सकते हैं कि शृङ्गार के विषय में उत्तम मध्यम इत्यादि प्रकृतियाँ ही प्रयोजक होती हैं—प्रकृतियों का दिव्य, अदिव्य और दिव्यादिव्य यह विभाजन इस दिशा में अकिञ्चित्कर है । किन्तु यह वास्तविकता नहीं है । शृङ्गार को दृष्टि से दिव्य औचित्य और कुछ नहीं है और न हम उसे कोई पृथक् तत्त्व कहते ही हैं । तो फिर है क्या ? भारतवर्ष के विषय में एक प्रकार का प्रकृत्यौचित्य होता अपितु उत्तम, मध्यम और अधम इन तीन प्रकारों का औचित्य माना जाता है । यदि देवताओं के शृङ्गार का वर्णन करना हो तो भारतवर्ष के उत्तम राजा इत्यादि के जिस प्रकार के औचित्य का पालन किया जाता है और उनकी रति का जिस प्रकार का वर्णन किया जाता है उसी प्रकार का वर्णन दिव्य पात्रों का भी करना चाहिये । राजा इत्यादि के विषय में प्रसिद्ध ग्राम्य शृङ्गार का उपनिबन्धन नाटक इत्यादि में प्रसिद्ध नहीं है । ( नाटक में दन्तच्छेद्य, नखच्छेद्य तथा अन्य लज्जानक तत्त्वों का समावेश नाट्य
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न च सम्भोगशृङ्गारस्य सुरतलक्षण एवैकः प्रकारः, यावदन्यैरडपि प्रसिद्धैः परस्परप्रेमदर्शनाद्यैः सम्भवन्ति, ते कस्मादुक्तमप्रकृतिविषये न वर्ण्यन्ते ?
तारावती शास्त्र के अनुसार भी वजित है और व्यवहार में भी नाटक में वैसा प्रयोग किया नहीं जाता । ) यहाँ पर पूर्वपक्षी यह कह सकता है कि नाटक की तो बात ही और है । नाटक में अभिनय किया जाता है; सम्भोग का अभिनय अत्यन्त असभ्यता प्रकट करने वाला होगा । अतः सम्भोग का अभिनय नहीं किया जाता । किन्तु श्रव्य काव्य को प्रयोजन तो अभिनय होता नहीं है । अतः श्रव्य काव्य में इस प्रकार के अनौचित्य का परित्याग क्यों किया जाना चाहिये ?
(अनु०) सम्भोग शृङ्गार का सुरत रूप एक ही प्रकार नहीं होता। (उत्तर) परस्पर प्रेमपूर्वक दर्शन इत्यादि और भी भेदोपभेद हो सकते हैं, उत्तम प्रकृति के विषय में उनका वर्णन क्यों नहीं किया जाता ?
तारावती शास्त्र के अनुसार भी वजित है और व्यवहार में भी नाटक में वैसा प्रयोग किया नहीं जाता । ) यहाँ पर पूर्वपक्षी यह कह सकता है कि नाटक की तो बात ही और है । नाटक में अभिनय किया जाता है; सम्भोग का अभिनय अत्यन्त असभ्यता प्रकट करने वाला होगा । अतः सम्भोग का अभिनय नहीं किया जाता ।
किन्तु श्रव्य काव्य को प्रयोजन तो अभिनय होता नहीं है । अतः श्रव्य काव्य में इस प्रकार के अनौचित्य का परित्याग क्यों किया जाना चाहिये ?
(उत्तर) यदि अभिनेय के अनौचित्य का परित्याग क्यों किया जाना चाहिये ?
यदि अभिनेय के इस ग्राम्य शृङ्गार को रहन नहीं किया जा सकता तो श्रव्य काव्य में इस प्रकार के अनौचित्य का निवारण किस प्रकार तथा किसके द्वारा किया जा सकता है ?
आशय यह है कि अभिनय में जिस प्रकार असभ्य व्यवहार चित्तसङ्कोच उत्पन्न करता है उसी प्रकार असभ्य व्यवहार का वर्णन सुनकर भी चित्तसङ्कोच होता ही है । अतः काव्य चाहे अभिनेय हो चाहे अनभिनेय, श्रव्य हो अथवा पाठ्य दोनों प्रकार के काव्यों में उत्तम प्रकृतिवाले राजा इत्यादि का उत्तम प्रकृतिवाली नायिकाओं के साथ ग्राम्य सम्भोग का वर्णन उसी प्रकार अनुचित है ।
यह तो सर्वथा अनुचित ही है । ( यही व्यवस्था दिव्य शृङ्गार के विषय में भी स्थापित की जा सकती है । ) उत्तम देवताओं के विषय में भी ग्राम्य सम्भोग वर्णन अनुचित ही होता है । ( आशय यह है कि दिव्य अदिव्य इत्यादि प्रकृतियों का विचार शृङ्गार के क्षेत्र में ही किया ही जाता है । )
यहाँ प्रश्न यह उठता है कि यदि सम्भोगवर्णन असभ्य है तो उसका वर्णन तो काव्य के क्षेत्र से बाह्य ही हो जावेगा, नहीं तो उसका वर्णन किया ही किस प्रकार हो सकेगा ?
(उत्तर) सम्भोग शृङ्गार का केवल सुरतरूप एक ही प्रकार तो नहीं है; किन्तु उसके और भी बहुत से प्रकार हो सकते हैं जैसे प्रेमपूर्वक एक दूसरे को देखना ( मिलना, बातचीत करना ) इत्यादि । उत्तम प्रकृतिवालों के विषय में यदि इन शालीन प्रेमचेष्टाओं का वर्णन किया जाने तो उसमें दोष क्या होगा ?
इस समस्त कथन का निष्कर्ष यह है कि जिस प्रकार उत्साह इत्यादि
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तस्मादुत्साहवद्रतावपि प्रकृत्यौचित्यमनुसर्तव्यम् । तथैव विस्मयादिषु । यच्चेवंविधे विषये महाकवीनामप्यसमोच्यकारिता लभ्ये हृश्यते स दोष एव । स तु शक्तितिरसृतत्वाच्चेपां न लभ्यते इत्युक्तमेव । अनु भावौचित्यं तु भरतादिप्रसिद्धमेव ।
तस्मादुत्साहवद्रतावपि प्रकृत्यौचित्यमनुसर्तव्यम् । तथैव विस्मयादिषु । यच्चेवंविधे विषये महाकवीनामप्यसमोच्यकारिता लभ्ये हृश्यते स दोष एव । स तु शक्तितिरसृतत्वाच्चेपां न लभ्यते इत्युक्तमेव । अनु भावौचित्यं तु भरतादिप्रसिद्धमेव ।
रति में भी प्रकृति के औचित्य का अनुसरण करना चाहिये । उसी प्रकार विस्मय आदि में भी । जोकि इस प्रकार के विषय में महाकवियों के भी बिना सोचे-समझे ( रचना ) करने की ( प्रकृति ) देखी जाती है वह दोष ही है । यह पहले ही कहा ही जा चुका है कि शक्ति से तिरस्कृत होने के कारण वह (दोष) लक्षित नहीं होता। अनुभव का औचित्य तो भरत में प्रसिद्ध ही है ।
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में प्रकृति के औचित्य का विचार आवश्यक होता है उसी प्रकार रति में भी प्रकृति के औचित्य का अनुसरण अपरिहार्य हो जाता है । मुनि ने विभिन्न प्रकरणों में विभाव अनुभाव इत्यादि के वर्णन के प्रसंग में प्रकृति के औचित्य का बहुत अधिक विवेचन किया है और प्रमाणित भी कर दिया है, जैसे प्रेमप्रसंग में—उत्तम और मध्यम के आभय से जिस प्रेम को काव्यविषय बनाया जावे उसमें स्थिरता होनी चाहिये, नीचों के प्रसद्ध में सम्भ्रम होना चाहिये इत्यादि । यही बात विस्मय इत्यादि के विषय में भी गतार्थ होती है (अपनी प्रकृति के अनुसार कुछ लोगों का विस्मय परिमाण में अधिक होता है, कुछ का कम, कोई विस्मय को एकदम प्रकट करने लगता है और कोई गम्भीरता से अपनी आकृति को छिपाये रहता है । यह सब प्रकृत्यौचित्य ही है । ) यहीँ यह प्रश्न उपस्थ होता है कि इस विषय में महाकवियों ने भी सूझबूझ से काम नहीं लिया है ( कालिदास ने भी मेघर-पार्वती के तमोग का वर्णन कर ही दिया है । ) उसकी क्या व्यवस्था होगी? इसका उत्तर यह है कि महाकवियों का वह विवेक-शून्य कार्य दोष ही माना जावेगा । यह पहले ही कहा जा चुका है कि उसमें ऐसी कलात्मक प्रौढता विद्यमान रहती है जिससे उस अनौचित्य का तिरस्कार हो जाता है और परिशीलकों के सामने वह दोष के रूप में नहीं आता । अनुभव का औचित्य तो भरत इत्यादि में प्रसिद्ध ही है । (नाट्य
में अनुभव का औचित्य तो भरत ने विभिन्न भावों का विभिन्न रूप में अभिनय दिखलाया है यह सब अनुभावौचित्य ही है । यहाँ पर स्थायिभावों के औचित्य का उल्लेख नहीं किया गया । उसको भी उसी प्रकार समझ लेना चाहिये जिस प्रकार दूसरे औचित्य बतलाये गये हैं । अनुभावौचित्य का उदाहरण यह होगा कि यदि कोई व्यक्ति शोक का अभिनय सुख-विकास के द्वारा करे अथवा भ्रम की परिस्थिति
में अनुभव का औचित्य तो भरत ने विभिन्न भावों का विभिन्न रूप में अभिनय दिखलाया है यह सब अनुभावौचित्य ही है । यहाँ पर स्थायिभावों के औचित्य का उल्लेख नहीं किया गया । उसको भी उसी प्रकार समझ लेना चाहिये जिस प्रकार दूसरे औचित्य बतलाये गये हैं । अनुभावौचित्य का उदाहरण यह होगा कि यदि कोई व्यक्ति शोक का अभिनय सुख-विकास के द्वारा करे अथवा भ्रम की परिस्थिति
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इयत्तचयते-भरतादिविरचितां स्थितिं चानुवर्तमानेन महाकविप्रबन्धोदय्र पर्यालोचयता स्वप्रतिभां चानुसरता कविनाहितचेतसा भूत्वा विभावादौचित्यभ्रंशापरित्यागे परः प्रयत्नो विधेयः। औचित्यवतः कथाशरीरस्य वृत्तस्योत्पत्तौ तस्य वा ग्रहणं क्यज्ज्ञके इत्यननननतेतत् प्रतिपाद्यतित-यदितहसो-(अनु.) इतना तो कहा जा रहा है—भरत इत्यादि विरचित स्थिति का अनुसरण करते हुये, महाकवियों के प्रबन्धों की पर्यालोचना करते हुये और अपनी प्रतिभा का अनुसरण करते हुये कवि को सावधानचित्त होकर विभाव इत्यादि के औचित्य के भ्रंश को बचाने का बहुत बड़ा प्रयत्न करना चाहिये। औचित्यवान् घटित या कल्पित कथाशरीर का ग्रहण क्यज्ज्ञक होता है। इससे यह प्रतिपादन करते
लोचन इयत्तति। लक्षणज्ञत्वं लक्ष्यपरिशीलनमदृष्टप्रसादोदितस्वप्रतिभालिलिवं चानुसत्न्योमिति सच्वप्। 'इतना तो'। लक्षण का जानना, लक्ष्य का परिशीलन करना, अदृष्ट और प्रसादन से उत्पन्न अपनी प्रतिभा से युक्त होना—इनका अनुसरण करना चाहिये। यह संक्षेप है।
तारावती में गम्भीरता धारण करे तो यह अनुचित होगा। इसी प्रकार यदि कोई नायिका किसी कामी द्वारा सम्वाधित किये जाने पर क्रोधजन्य उद्दामता का हर्षपूर्ण मुद्रा में अभिनय करे तो यह भी अनुचित ही होगा। सन्धारी का औचित्य जैसे वेश्यागत लज्जा और कुलवती की लज्जाहीनता अनुचित कही जायगी। इसी प्रकार उत्तम प्रकृतिवालों में जो लज्जाशीलता होगी वह अधम प्रकृतिवालों में नहीं होगी। इस प्रकार उस परिस्थिति में भी भाव का तारतम्य होगा ही। इन सब औचित्यों का निर्वाह करते हुये कथाशरीर की रचना करना प्रबन्धौचित्य का प्रथम रूप है।
लोचन इयत्तति। लक्षणज्ञत्वं लक्ष्यपरिशीलनमदृष्टप्रसादोदितस्वप्रतिभालिलिवं चानुसत्न्योमिति सच्वप्। 'इतना तो'। लक्षण का जानना, लक्ष्य का परिशीलन करना, अदृष्ट और प्रसादन से उत्पन्न अपनी प्रतिभा से युक्त होना—इनका अनुसरण करना चाहिये। यह संक्षेप है।
तारावती में गम्भीरता धारण करे तो यह अनुचित होगा। इसी प्रकार यदि कोई नायिका किसी कामी द्वारा सम्वाधित किये जाने पर क्रोधजन्य उद्दामता का हर्षपूर्ण मुद्रा में अभिनय करे तो यह भी अनुचित ही होगा। सन्धारी का औचित्य जैसे वेश्यागत लज्जा और कुलवती की लज्जाहीनता अनुचित कही जायगी। इसी प्रकार उत्तम प्रकृतिवालों में जो लज्जाशीलता होगी वह अधम प्रकृतिवालों में नहीं होगी। इस प्रकार उस परिस्थिति में भी भाव का तारतम्य होगा ही। इन सब औचित्यों का निर्वाह करते हुये कथाशरीर की रचना करना प्रबन्धौचित्य का प्रथम रूप है।
ऊपर कथाशरीर के विधान में परिपालनीय औचित्यों का दिग्दर्शन कराया गया है। उपसंहार के रूप में इतना कहा जा सकता है—कथाविधान में तीन तत्त्वों का प्राधान्य—लक्षणज्ञान, लक्ष्यपरिशीलन और अपनी प्रतिभा। १—भरत इत्यादि लक्षणशास्त्रकारों ने विस्तारपूर्वक नाट्यवस्तु रचना पर विचार किया है। उन्होंने अपने ग्रन्थों में जिस स्थिति का विवेचन किया है उसका पूर्णरूप में अनुसरण करना चाहिये। (इसी प्रकार वात्स्यायन मुनि इत्यादि ने जिन विभिन्न परिस्थितयों और तज्जन्य मनोविकारों का विस्तृत विवेचन किया है उसका भी पालन करना चाहिये और साथ ही लोकवृत्त को भी देखना
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दिशु कथासु रसवतीषु विध्यासु सतीर्ष्यपि यत्तत्र विभाव्यौचित्यवत् कथाशरीरं तदेव ग्राह्यम्, नेतरत्। वृत्तादपि च कथाशरीरादुत्प्रेक्षिते विशेषतः प्रयत्नवता भवितव्यम्। तत्र व्यननव्यधानात्स्वलत: केवेरन्युत्पत्तिसम्भावना महती भवति।
कथाओं में जो रसयुक्त हों, विधाओं में जो सत्कार्य हों ऐसी स्थिति में भी जिस कथा के शरीर में विभाव आदि के औचित्य का निर्वाह हुआ है वही ग्राह्य है, अन्य नहीं। और कथा के शरीर से भी जो उत्प्रेक्षा की गई है उसमें विशेष रूप से प्रयत्न होना चाहिए। वहां पर ध्यान न देने से कवि की बहुत बड़ी अव्युत्पत्ति की सम्भावना हो जाती है।
लोचन रसवतीष्विति नादरे सस्मो। रसवत्वं चाविवेचकजनाभिमानासिप्रायेण मन्तव्यम्। विमावाद्यौचित्येन हि विना का रसवत्ता। कवेर्लिङ्गम्। न हि तत्नेतिहासवंशादेव सत्या निबद्धमिति जाध्योत्तरमपि सम्भवति।
‘रसवतीषु’ में अनादर में सप्तमी है। और रसवत्ता तो अविवेचक जनों के अभिमान के अभिप्राय से माना जाना चाहिये। विभाव इत्यादि के औचित्य के बिना रसवत्ता ही क्या ? ‘कवि का’ यह। वहां पर इतिहास के कारण ही मैंने ऐसा निबद्ध कर दिया है—यह असमीचीन उत्तर भी सम्भव नहीं है।
तारावती चाहिये। क्योंकि शास्त्रकार दिग्दर्शनमात्र कराते हैं; औचित्य का पूर्ण परिचय तो लोक से ही मिलता है।
२—महाकवियों के बनाये हुये प्रबन्धों का मनोयोगपूर्वंक अध्ययन करना चाहिये और उनकी पर्यालोचना करनी चाहिये। अर्थात् यह देखना चाहिये कि महाकवियों ने कथा का उपादान किस प्रकार किया है और उनकी संघटन का निर्वाह भी किस प्रकार किया है? इससे कथाशरीर के निर्माण में निपुणता आ जाती है।
३—कवि को अपनी प्रतिभा का अनुसरण भी करना चाहिये। प्रतिभा का उदय अदृष्ट अर्थात् सुक्त और प्रसाद अर्थात् देवता की कृपा हुआ करता है। इस प्रतिभा के बल पर अनुचित के निराकरण के लिये नवीन अर्थों और उसके योग्य नवीन शब्दों का स्फुरण होता है। प्रतिभा के द्वारा उचित कथाभागों की संघटना और अनुचित भागों का त्याग या उचित रूप में परिवर्तन कथाशरीर के निर्माण के लिये अत्यन्त आवश्यक है। कवि को चाहिये कि अपने मन को भले प्रकार अवधान से युक्त बनाकर उत्तम तत्वों की सहायता से विभाव इत्यादि में जो औचित्यग्रंथ हैं उनका निराकरण का बहुत बड़ा प्रयत्न करे।
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कथाशरीरमुत्पाद्यवस्तु कार्यं तथा तथा । यथारसमयं सर्वमेव तत्प्रतिभासते ॥
इस विषय में एक परिकर श्लोक भी है— 'उत्पाद्यवस्तु कथाशरीर को उन उन प्रकारों से बनाना चाहिये जिससे वह सब रसमय हो प्रतीत होने लगे ।'
तारावती औचित्ययुक्त कथाशरीर का ग्रहण व्यञ्जक होता है' इस कथन से यह प्रतिपादित किया गया है कि—चाहे इतिहास इत्यादि में विविध प्रकार की रसमय कथायें भरी पड़ी हों, किन्तु काव्यवस्तु के लिये ऐसे कथाशरीर का ही उपादान किया जाना चाहिये जिसमें विभाव इत्यादि का औचित्य विद्वमान हो । उससे भिन्न (अनौचित्य वाला) कथाशरीर काव्य वस्तु के रूप में नहीं ग्रहण किया जाना चाहिये । 'रसवती कथाओं में' यहाँ पर सप्तमी अनादर के अर्थ में हैं । अर्थात् इतिहास आदि में भरी हुई रसवती कथाओं का अनादर (उपेक्षा) करके केवल विभाव इत्यादि के औचित्य वाली कथायें ही ग्रहण की जानी चाहियें । वस्तुतः कथाओं में रसवत्ता तो विभाव इत्यादि के औचित्य से ही आती है । जिन कथाओं में इस प्रकार का औचित्य विद्वमान नहीं होता उनमें रसवत्ता ही क्या ? किन्तु फिर भी अविवेकी जन उन कथाओं में भी रसवत्ता का अभिमान कर सकते हैं । इसी लिये उन कथाओं को भी रसवती कह दिया गया है जिनमें औचित्य नहीं होता और उनके अनौचित्य के लिये अनौदर के अर्थ में सप्तमी विभक्ति का प्रयोग कर दिया गया है । यह तो इतिहासप्रसिद्ध कथा की बात हुईं । काल्पनिक कथाओं में उससे भी अधिक ध्यान रखने की आवश्यकता होती है जितना ध्यान वृत्त (घटित) कथाओं में रखा जाता है । यदि कवि उस प्रकार की कल्पित कथा की संघटना लापरवाही से करे तो उसके स्वल्कन की सम्भावना बहुत अधिक रहती है जिससे कवि अत्युत्पत्ति के लाञ्छन से ग्रस्त हो सकता है । क्योंकि यदि कल्पित कथा में किसी प्रकार की रसविषयिणी कल्पषता आ जाती है तो कवि को यह बहाना करने का भी अवसर नहीं रहता कि मैंने इतिहास के अनुरोध से ऐसा लिख दिया । यद्यपि यह बहाना है असमीचीन ही; क्योंकि कवि को रचानुकूल परिवर्तन करने की छूट तो रहती ही है । इसी विषय में यह एक प्रसिद्ध श्लोक है— 'उत्पाद्य वस्तु विषयक कथाशरीर की संघटना इस रूप में की जानी चाहिये कि कथा का प्रत्येक भाग रसमय ही प्रतीत हो ।'
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तत्र चाभ्युपायः सम्प्रयोगविभावाद्यौचित्यानुसरणम् । तद् दर्शितमेव । किम्बा सन्ति सिद्धरसप्रख्यया ये च रामायणादयः । कथाश्रया न तैर्योंज्या स्वेच्छा रसविरोधिनी ॥
अनु०) उपर्युक्त है कि रसों में विभाव इत्यादि के औचित्य का अनुसरण करना । और वह दिखला ही दिया गया है । और भी—‘सिद्ध रसों से प्रसिद्धि प्राप्त करनेवाले जो रामायणादि कथाश्रय (प्रबन्ध) हैं उनके साथ रसविरोधिनी स्वेच्छा की योजना नहीं करनी चाहिये ।’
लोचनतत्र चेति । रसमयत्वसम्पादने । सिद्धः आस्वादनमात्रशेषो न तु भावनीयो रसो येषु; कथानामाश्रया इतिहासाः, तैरितिहासार्थैः सह स्वेच्छा न योज्या । सहार्थश्श्रान्त ‘और उसमें’ अर्थात् रसमयता के सम्पादन में । ‘सिद्ध’ यह । सिद्ध अर्थात् आस्वादनमात्र रूप में अवशिष्ट तथा भावनीयों के योग्य नहीँ हैं रस जिनमें । कथा के आश्रय अर्थात् इतिहास । उन इतिहासार्थों के साथ अपनी इच्छा का योग नहीं;तारावतीसभी कुछ रसमय बना देने का उपाय है विभाव इत्यादि के औचित्य का पालन करना, जिसका विस्तृत परिचय पिछले पृष्ठों पर दिया जा चुका है । और भी—‘कथा को लेकर लिखे हुये रामायण इत्यादि जो प्रबन्ध सिद्ध रस वाले तथा प्रतिष्ठित हैं उनमें रसविरोधिनी स्वेच्छा का प्रयोग नहीं करना चाहिये ।’रस की दो अवस्थायें होती हैं सिद्ध और साध्य । सिद्ध रस वह होता है जिसकी आस्वादनमात्र हो अवशिष्ट रह गयी हो और भावना के द्वारा जिसमें आस्वादनीयता उत्पन्न करने की आवश्यकता न हो । रामायण इत्यादि सिद्धरस काव्य हैं उनमें भावना के द्वारा आस्वादनीयता सम्पादित करने की आवश्यकता नहीं (प्रख्या शब्द का अर्थ है तुल्य अर्थात् जिस प्रकार लोक में कोई पदार्थ पूर्णरूप से तैयार करके रख दिया जावे, उसका रस पूर्णतया निष्पन्न हो चुका हो केवल आस्वादन ही शेष हो । इसी प्रकार के रामायण इत्यादि सिद्धरस काव्य हैं। उनका भी आस्वादन लिया जा सकता है उनमें अपनी नवीन भावना के समावेश से रस-नयिता उत्पन्न करने की चेष्टा व्यर्थ है ।) ‘तैः’ यह तृतीया है जो कि ‘साथ’ के अर्थ में हुई है अर्थात् उन इतिहासार्थों के साथ अपनी इच्छा की योजना नहीं करनी चाहिये । यहाँ पर साथ का अर्थ विषयविषयिभाव है । (अधिकरण के चार अर्थों में ‘वैषयिक’ अर्थ एक है जिसमें सप्तमी हुआ करती है । अतः यहाँ पर विषय-विषयिभाव में सप्तमी हो गयी है ।) इसीलिये वृत्ति में इसकी व्याख्या
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तेषु हि कथाश्रयेपु तावत्स्वेच्छैव न योज्या । यदुक्तम्—‘कथामार्गे न चाल्पोड्यत्निक्रम्:’ । स्वेच्छापि यदि योज्या तद्रसविरोधिनी न योज्या ।
उन कथाश्रित ( प्रबन्धों ) में तो स्वेच्छा का योग करना ही नहीं चाहिये । जैसा कि कहा गया है—कथामार्ग में स्वल्प भी अतिक्रम नहीं होना चाहिये । यदि स्वेच्छा का भी योग करना हो तो रसविरोधिनी स्वेच्छा का योग नहीं करना चाहिये ।
लोचन तेष्विति ससत्या । स्वेच्छा तेषु न योज्या । कथविषयविषयिमाव इति न्याचष्टे—तेप्विति ससत्या । स्वेच्छा तेषु न योज्या । यथा रामस्य धीरललिततत्त्वयोजनेऽनाटिकानायकत्वं कश्चित्कुर्यादिति स्वयन्नतासमन्वजसमम् । यदुक्तमिति । रामाकरणा चाहिये । यहाँ ग्रन्थ का अर्थ है विषयविषयीभाव इसलिये ‘उनमें’ इस सप्तमी के द्वारा व्यास्या की है । स्वेच्छा उनमें नहीं जोड़ी जानी चाहिये । यदि कथाश्रितू जोड़ी जानी न चाहिये तो उन्हें उन प्रसिद्ध रसों के विरुद्ध नहीं जोड़ी जानी चाहिये । जैसे कोई राम के धीरललिततत्व की योजना के द्वारा ( उन्हें ) नाटिका का नायकत्व ( प्रदान ) करे तो यह अत्यन्त असमीचीन होगा । ‘जैसा कहा गया है’—रामाभ्युदय में यशोवर्मा के द्वारा—
तारावती में ‘उनमें’ इस सप्तमी का प्रयोग किया गया है । इसका सार यही है कि कथाश्रित काव्यों में प्रथम तो अपनी इच्छा का उपयोग करना ही नहीं चाहिये जैसा कि रामाभ्युदय में यशोवर्मा के द्वारा कहा गया है कि ‘कथामार्ग में थोड़ा सा भी अतिक्रम नहीं होना चाहिये । और यदि इच्छा का उपयोग करना ही हो तो इच्छा रसानुकूल ही होनी चाहिये; विभिन्न प्रकृत रसों के विपरीत तो इच्छा का कभी प्रयोग करना ही नहीं चाहिये । उदाहरण के लिये राम की धीरोदात्तता प्रसिद्ध है । यदि कोई कवि स्वेच्छा से राम को धीरललित बना कर,उनके जीवन को शृङ्गारमय चित्रित कर दे और उन्हें नाटिका का नायक बना दे तो यह बहुत ही अनुचित बात होगी । ( इसके प्रतिकूल कृष्ण में धीरोदात्तता के साथ धीरलालित्य का योग अनुचित नहीं कहा जा सकता । )
(वृत्तिकार ने ‘कथामार्गे न चाल्पोड्यत्निक्रम्:’ को उद्धृत किया है । यह एक प्रसिद्ध पद्य के दूसरे चरण का अन्तिम खण्ड है । पद्य यह है—
(वृत्तिकार ने ‘कथामार्गे न चाल्पोऽप्यत्निक्रम्:’ को उद्धृत किया है । यह एक प्रसिद्ध पद्य के दूसरे चरण का अन्तिम खण्ड है । पद्य यह है—
औचित्यं वचसां प्रकृत्यनुगतं सर्वत्र पात्रोचितम्, पुष्टिः स्ववशे रसस्य च कथामार्ग न चातिक्रमः । बुद्धिः प्रसृतसंविधानकविधौ पौढिश्र शृङ्गारयोः, विदग्धः परिभाव्यतामवहितैरैतरावदेवास्तु नः ॥
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इदमपरं प्रवन्धस्य रसव्युत्कतवे निबन्धनम् । इतिवृत्तवशायातां कथाम्रिद्रसनत्कुणां स्थितिं त्यक्तवा पुनरुत्प्रेक्ष्याप्यनन्तराभीष्टरसोचितकथोत्रयो विधेयः यथा कालिदासप्रबन्धेषु । यथा च सर्वसेनरचिते हरविजये । यथा च मर्दीय एवाअर्जुनचरिते महाकाव्ये ।
अनु० प्रबन्ध की रसव्यञ्जकता में यह दूसरा निबन्धन है कि इतिवृत्तदर्श आई हुई किसी प्रकार रस की प्रतिमूल स्थिति को छोड़कर पुनः कल्पना करके अभीष्ट रस के उचित कथा का उद्भयन कर लेना चाहिये । जैसे कालिदास के प्रबन्धों में या जैसे सर्वसेनरचित हरिविजय में या मेरे ही अर्जुनचरित महाकाव्य में ।
भूदये यशोवमेपा—‘स्थितमिति यथा श्याम्’ । कालिदासेति । रघुवंशेऽजदार्नां राज्ञां विवाहादिवर्णनं नेतिहासेषु निरुपितम् । हरिविजये कान्तानुनयाख्येन पारिजात- हरगादिनिरूपितमितिहासे स्वेच्छयाऽऽमि । तथाअर्जुनचरितेऽर्जुनस्य पातालविजयादिवर्णित- मितिहासप्रसिद्धम् ।
‘स्थित’ यहाँ । कथायोजना के अनुसार ‘कालिदास इत्यादि’ । रघुवंश में अज इत्यादि राजाओं के विवाह इत्यादि का वर्णन इतिहासों में निरूपित नहीं किया गया है । हरिविजय में कान्ता के अनुनय के अथ के रूप में पारिजातहरण इत्यादि इतिहासों में न देखे हुये ( कथानक ) का निरूपण किया गया है । उसी प्रकार अर्जुनचरित में अर्जुन के पातालविजय इत्यादि का वर्णन इतिहास में प्रसिद्ध नहीं है ।
('प्रकृतियों के अनुकूल वाणी का औचित्य, सर्वत्र पात्रानुकूल तथा अपने अवसर पर रस की पुष्टि, कथा मार्ग का अतिक्रमण न करना, प्रस्तुत का साम्योक्तिनामक्ति और शब्द तथा अर्थ की प्रौढता, ध्यान देकर विद्वान लोग परिभावन कर सकें बस यह इतना ही हमें चाहिये ।')
यह पद्य भोज के श्रृंगारप्रकाश में दिया है । इसके दूसरे चरण का अन्तिम भाग 'कथामार्ग न चातिक्रम:' आनन्दवर्धन ने उद्धृत किया है और इसपर टिप्पणी करते हुये लोचनकार ने लिखा है कि यह भाग यशोवर्मन् के रामाभ्युदय से लिया गया है । डा० राघवन के अनुसार यही एक ऐसा प्रमाण है जिससे यह प्रकट होता है कि यह पद्य यशोवर्मा के रामाभ्युदय में आया है । यह पुस्तक इस समय उपलब्ध नहीं होती । इच्छा की अश्म चाति के प्रथमार्ध में यशोवर्मा कन्नौज के राजा थे और उनके आश्रय में ही प्रसिद्ध नाटककार भवभूति भी रचना करते थे।
('प्रकृतियों के अनुकूल वाणी का औचित्य, सर्वत्र पात्रानुकूल तथा अपने अवसर पर रस की पुष्टि, कथा मार्ग का अतिक्रमण न करना, प्रस्तुत का साम्योक्तिनामक्ति और शब्द तथा अर्थ की प्रौढता, ध्यान देकर विद्वान लोग परिभावन कर सकें बस यह इतना ही हमें चाहिये ।')
यह पद्य भोज के श्रृंगारप्रकाश में दिया है । इसके दूसरे चरण का अन्तिम भाग 'कथामार्ग न चातिक्रम:' आनन्दवर्धन ने उद्धृत किया है और इसपर टिप्पणी करते हुये लोचनकार ने लिखा है कि यह भाग यशोवर्मन् के रामाभ्युदय से लिया गया है । डा० राघवन के अनुसार यही एक ऐसा प्रमाण है जिससे यह प्रकट होता है कि यह पद्य यशोवर्मा के रामाभ्युदय में आया है । यह पुस्तक इस समय उपलब्ध नहीं होती । इच्छा की अश्म चाति के प्रथमार्ध में यशोवर्मा कन्नौज के राजा थे और उनके आश्रय में ही प्रसिद्ध नाटककार भवभूति भी रचना करते थे।
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कविना काव्यमुपनिबन्धनता सर्वात्मना रसपरतन्त्रेण भवितव्यम् । तत्रेतिवृत्ते यदि रसानुरुणां स्थितिः पश्येतदेमां भङ्क्त्वापि स्वतन्त्रतया रसानुरुणं कथान्तरमुत्पादयेत् । नहि क्वेरितिवृत्तमात्रनिर्वाहेण किचिद्रिप्रयोजनम् ; इतिहासादिवत् तदसद्धेतोः ।
(अनु०) काव्य का उपनिबन्धन करनेवाले कवि को पूरी आत्मा से रसपरतन्त्र होना चाहिये । उसमें यदि इतिवृत्त में रस के प्रतिकूल स्थिति देखे तो इसे तोड़कर भी स्वतन्त्र रूप में रस के अनुकूल दूसरी कथा का सृजन कर ले। केवल इतिवृत्त के निर्वाह से कवि का कोई प्रयोजन नहीं; क्योंकि उसकी सिद्धि इतिहास से हो जाती है।
पितृदेव युक्तमित्याह——कविनेतिः । यहाँ ठीक है यह कहते हैं——‘कवि के द्वारा’ यह । तारावती भवभूति ने अपने नाटकों की प्रस्तावनाओं में ‘कुछ आलोचनाश्रित सम्बन्धी पद्य लिखे हैं । प्रस्तुत पद्य की विवरणद्वारा भवभूति के उन पद्यों से मेल खाती है । ज्ञात होता है कि प्रस्तुत पद्य भी रामाभ्युदय की प्रस्तावना में ही लिखा गया होगा । लोचन में ‘जैसा कहा गया है’ का उद्धरण देकर ‘रामाभ्युदये यशोवर्मणा’ इन शब्दों के बाद ‘स्थितिमिति यथाश्रुयाम्’ यह लिखा है और इन शब्दों को उद्धरणचिह्न से चिह्नित कर दिया गया है । यहाँ पर इन शब्दों का कोई सम्बन्ध समझ में नहीं आता । उदाहरणचिह्न से ऐसा ज्ञात होता है कि ये शब्द भी रामाभ्युदय के हो हैं। किन्तु रामाभ्युदय के उपलब्ध न होने से इस विषय में कुछ कहा नहीं जा सकता । सम्भव है प्रस्तुत पद्य में पठित ये शब्द रामाभ्युदय में पहले आये हों । फिर भी केवल इतने शब्दों से अर्थ की संगति लगा सकना दुस्साध्य है । दूसरी बात यह हो सकती है कि यहाँ पर उद्धरणचिह्न लेखक के प्रमाद से लग गया हो और यहाँ पर ‘स्थितिमिति’ के स्थान पर ‘स्थितिमिति’ यह पाठ हो । ऐसी दशा में ‘स्थितिं त्वक्त्वा’ के ‘स्थिति’ शब्द का यह प्रतीकनिर्देश हो सकता है। डा० राघवन् ने यही सम्भव माना है, और यही पाठ सबसे अधिक शुद्ध प्रतीत होता है । ऐसी दशा में ‘स्थितिमिति यथा श्रुयाम्’ यह भाग प्रवन्ध के दूसरे औचित्य की व्याख्या करनेवाला सिद्ध होता है । (‘स्थिति’ का अर्थ है कथा की योजना ।) प्रबन्ध की रसाभिव्यक्तता का दूसरा निर्वचन यह है कि यदि इतिवृत्त के कारण कथा की कोई ऐसी योजना सामने आ जावे जो रस के अनुकूल न हो तो उस योजना को छोड़कर पुनः नई कल्पना करके अभीष्ट रस के अनुकूल कथा का उद्भावन कर लेना चाहिये । जैसा कि कालिदास के प्रवन्धों में किया गया है ।
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उदाहरण के लिये अज इत्यादि राजाओं के विवाह का वर्णन इतिहासग्रन्थों में निरूपित नहीं किया गया है, किन्तु कालिदास ने रघुवंश में इसका वर्णन किया है । ( इसी प्रकार दुष्यन्त के शाप की कल्पना कालिदास ने रसानुरूपता की दृष्टि से ही की है और अपने नाटकों में दूसरे परिवर्त्तन भी इसी प्रकार कर लिये हैं कि पात्रों के आदर्शों-परिवर्तन न करते हुये भी सदोष परिस्थतियों का सर्वथा निराकरण कर दिया है । तुलसीदास ने कैकेयी के दोषपरिमार्जन के लिये सरस्वती का उनकी जवान पर बैठ जाना लिखा है । परशुरामजी राम को वारात से लौटने के अवसर पर मार्ग में मिले थे—अनेक रामकथा काव्यों में ऐसा ही वर्णन मिलता है । किन्तु राम के अभ्युदय का उत्कर्ष दिखलाने के लिये तुलसी ने उनको समस्त राजाओं के सामने ही धनुष-यज्ञ की रङ्गशाला में लाये हैं । विदेहराज की प्रतिज्ञा थी कि जो धनुष की प्रत्यञ्चा चढ़ा देगा उसी से सीता का विवाह हो जावेगा । राम ने प्रत्यञ्चा चढ़ाने में धनुष को तोड़ भी दिया; यह प्रतिज्ञापूर्त्ति नहीं थी । किन्तु राम के चरित्र का एक दोष था जिसके निराकरण के लिये तुलसी ने धनुष तोड़ने की ही प्रतिज्ञा कराई है । ) इसी प्रकार सर्वसेनरचित हरिविजय में प्रिवतमा सत्यभामा के अनुनय के अथ्ँ होने के कारण पारिजातहरण इत्यादि का निरूपण कर दिया गया है, जो कि ऐतिहासिक कथाओं में नहीं देखा गया । स्वयं आनन्दवर्धन ने अर्जुनचरित नामक एक महाकाव्य लिखा था । इस नाटक में अर्जुन के पाताल-विजय इत्यादि का वर्णन किया गया है जो कि इतिहास में प्रसिद्ध नहीं है । यही काव्यरचना में कवि को सर्वथा रस के आधीन रहना चाहिये ।
यदि इतिवृत्त में कोई प्रतिकूल परिस्थिति दिखलाई पड़े तो उसे सर्वथा मिटा कर स्वतन्त्रतापूर्वक किसी दूसरी ऐसी कथा की कल्पना कर ले जो प्रकृत रस के अनुकूल हो । काव्य का फल कवि की दृष्टि से यही है कि उसे महाकवि का पद प्राप्त हो जावे और सहृदय की दृष्टि से उसका प्रयोजन है अनुरंजन के साथ उपदेश प्राप्त होना । ये प्रयोजन कथामात्र के निर्वाह से तो सिद्ध नहीं हो सकते । क्योंकि जो प्रयोजन किसी अन्य उपाय से सिद्ध हो जाता है उसके लिये नवीन साधन की कल्पना नहीं की जाती । इतिवृत्त का निर्देश तो इतिहास इत्यादि से ही हो जाता है, उसके लिये काव्य का उपादान अनावश्यक है । अतः यदि इतिवृत्त रसनिष्पत्ति का उपघातक हो तो उसे छोड़कर नई कल्पना द्वारा उसे ठीक कर लेना चाहिये ।
अब प्रवन्ध की रसाभिव्यञ्जकता का तीसरा तत्व लीजिये-प्रबन्ध की रसा-भिव्यञ्जकता में यह एक अन्य प्रमुख निबन्धन है कि काव्यशास्त्र में रचना के
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रसादित्यज्जकत्वे प्रवन्धस्य चेदस्मिन्मुखयं निर्वन्धनं, यत्सन्धीगोर्नां मुखप्रतिमुखगर्भोंविमर्शानिवहणायां तदङ्गतानां चोपच्तोपदीपीनां वटनं रसाभिव्यक्त्यपेच्चया,
रस इत्यादि के व्यङ्ग्जकत्व में प्रवन्ध का यह दूसरा मुख्य निर्वन्धन है कि मुख, प्रतिमुख, गर्भ, विमर्शा और निर्वहण नामवाली सन्धियों का और उपच्तोपदीप नामवाली तदङ्गतानां का वर्णन रसाभिव्यक्ति की अपेक्षा से किया जाता है।
सन्धीनामिति । इह प्रभुसम्मितेषु: श्रुतिस्मृतिप्रभृतिभ्य: कर्तृग्यमिदमिलित्याज्ञानात्रपरमार्थेभ्य: शास्त्रेभ्यो येन न व्युत्पत्तिः:, न चाप्यस्येदं वृत्तमसुखमालकर्मण इत्थ्येवं युक्तियुक्तकर्मफलसम्वन्धप्रकटनकारिभ्यो मित्रसम्मितेषु इतिहासशास्त्रेभ्यो लब्धव्युत्पत्तयः; अथ चावश्यं व्युत्पाद्या: प्रजार्थसम्पादनयोग्यताक्रान्ता: राजपुत्रप्रायास्तेषां हृदयानुप्रवेशमुखेन चतुर्वर्गोपायव्युत्पत्तिराधेया । हृदयानुप्रवेशश्र रसास्वादमय एव । स च रसशास्त्रुर्यगोंपायव्युत्पत्तिनान्तरीयककविभावादिसंयोगप्रसादोपनत इत्येवं रसाचितविमवादाद्युपनिबन्धे रसास्वादबैचस्यमेव स्वरसभाविन्यां व्युत्पत्तौ प्रयोजकमिति प्रीति-रेव व्युत्पत्तेः प्रयोजिका । प्रीतिात्मा च रसस्तदेव नाऽऽच्यं, नाऽऽत्म्यमेव वेद इत्यस्मदुपाग्याय । न चैते प्रीतिच्युत्पत्ती मिल्नरूपे एव, द्वयोरप्येकविषयत्वात् । विभावादीनां तद्रसांचितानां यथास्वरूपवेदनं फलपर्यन्तीभूततया व्युत्पत्तिर-
'सन्धियों का' यह। यहाँ पर 'यह करना नाहिये' इस आज्ञामात्र परम अर्थवाले श्रुति स्मृति इत्यादि शास्त्रों से जो व्युत्पत्ति नहीं हैं और नहीं ही 'यह इनकी बात अमुक से करमं हृदय' इस युक्तियुक्त कर्मफलसम्वन्ध को प्रकट करनेवाले मित्रसम्मित इतिहास-शास्त्रों व्युत्पत्ति को प्राप्त करनेवाले हैं और प्रजा के प्रयोजनसम्पादन की योग्यता से आक्रान्त जो राजपुत्र अवश्य व्युत्पन्न करने ही हैं उनके अन्दर हृदय में प्रवेश के मध्यम से व्युत्पत्ति का आधार करना चाहिये ।
'सन्धियों का' यह। यहाँ पर 'यह करना नाहिये' इस आज्ञामात्र परम अर्थवाले श्रुति स्मृति इत्यादि शास्त्रों से जो व्युत्पत्ति नहीं हैं और नहीं ही 'यह इनकी बात अमुक से करमं हृदय' इस युक्तियुक्त कर्मफलसम्वन्ध को प्रकट करनेवाले मित्रसम्मित इतिहास-शास्त्रों व्युत्पत्ति को प्राप्त करनेवाले हैं और प्रजा के प्रयोजनसम्पादन की योग्यता से आक्रान्त जो राजपुत्र अवश्य व्युत्पन्न करने ही हैं उनके अन्दर हृदय में प्रवेश के मध्यम से व्युत्पत्ति का आधार करना चाहिये ।
और हृदयानुप्रवेश रसास्वादमय ही होता है । और वह रस चतुर्वर्ग में उपाय-भूत व्युत्पत्ति के लिये अनिवार्य विभाव इत्यादि के संयोग की कृपा से प्राप्त हुआ है। इस प्रकार रस के योग्य विभाव इत्यादि के उपनिबन्धन में रसास्वाद को विशेषता ही परिणमामरूप में होनेवाली व्युत्पत्ति में प्रयोजिका है। रसम प्रीतिस्मक होता है, वही नाट्य है और नाट्य ही वेद है यह हमारे उपाध्याय ( का कथन है ) । ये दोनों प्रीति और व्युत्पत्ति भिन्न रुपवाली नहीं है; क्योंकि दोनों का विषय एक है । यह हमने कई बार कहा है कि विभाव इत्यादि का औचित्य ही सन्मात्र प्रीति का निदान है ।
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लोचन
व्युच्यते । फलं च नाम यदृष्टष्टश्रादेवताप्रसादादन्यतो वा जायते । नच तदुपदेश्यम्, तत् उपाये व्युत्पत्तियोगात् । तेनोपायक्रमेण प्रवृत्तस्य सिद्धिः; अनूपायद्वारेण प्रवृत्तस्य नाश इत्येवं नायकप्रतिनायकगतत्वेनार्थान्थोंपायव्युत्पत्तिः कार्यां । उपायश्र कर्त्र-श्रीयमानः पञ्चावस्था सज्जते । तद्यथा-स्वरूपम्, स्वरूपाविक्रिदृश्यनताम्, कार्य-सम्पादनयोग्यताम्, प्रतिबन्धोपनिपातेनाशङ्क्यमानताम्, निश्चितप्रतिपक्षतां वाधक-बाधनेन सुट्ठफलपर्यन्तताम् । एवमातिंसहिष्णूनां विप्रलम्भस्मारूणां प्रेक्षापूर्वकारिणां तावदेवं कारणोपादानम् । ता एवंबिधा: पञ्चावस्था: कारणगता मुनिनोदृत्ता:—
उचित है । 'फल' यह नाम इसलिये है कि वह इष्ट देवता के प्रसाद से अथवा अन्य कारण से उत्पन्न होता है । वह (फल) उपदेश देने योग्य नहीं होता; क्योंकि उससे उपाय में व्युत्पत्ति होती है । इसलिये उपाय के क्रम से युक्त होने पर सिद्धि होती है; और अनुपाय से प्रवृत्ति होने पर नाश होता है । इस प्रकार नायक और प्रतिनायक के गत अर्थ तथा अन्य उपायों की व्युत्पत्ति करनी चाहिये । कर्ता के द्वारा आश्रय लिये जाने पर उपाय पाँच अवस्थाओं को प्राप्त कर लेता है । वह इस प्रकार—स्वरूप, स्वरूप का अविकृत होना, कार्य सम्पादन की योग्यता, प्रतिबन्ध के आ पड़ने से आशङ्का का होना, प्रतिपक्ष के निवृत्त हो जाने पर बाधक के बाधन द्वारा सुट्ठ फलपर्यन्तता । इस प्रकार धैर्य धारण करनेवालों (लोगों का) विप्रलम्भस्मारूण प्रेक्षापूर्वकारिणां कारण का उपादान होता है । ये कारणगत पाँच अवस्थायें मुनि ने कहीं हैं—
संस्कृते फलयोगे तु व्यापार: कारणस्य य: । तस्यानुपूर्व्या विज्ञेया: पञ्चावस्था: प्रयोक्तृभिः ॥ तस्यानुपूर्व्या विज्ञेया: पञ्चावस्था प्रयोक्तृभिः । प्रारम्भश्र प्रयत्नश्र तथा प्राप्तिश्र सम्भव: । नियता च फलप्राप्ति: फलयोगश्र पञ्चमः ॥ इति ।
संस्कृते फलयोगे तु व्यापार: कारणस्य य: । तस्यानुपूर्व्या विज्ञेया: पञ्चावस्था: प्रयोक्तृभिः ॥ तस्यानुपूर्व्या विज्ञेया: पञ्चावस्था प्रयोक्तृभिः । प्रारम्भश्र प्रयत्नश्र तथा प्राप्तिश्र सम्भव: । नियता च फलप्राप्ति: फलयोगश्र पञ्चमः ॥ इति ।
फल की प्राप्ति में जो कारण का व्यापार है उसकी अनुपूर्वी से प्रयोक्काओं के द्वारा पाँच अवस्थायें ज्ञात की जानी चाहिये । प्रारम्भ, प्रयत्न तथा प्राप्ति के हेतु की सम्भावना, फलप्राप्ति का नियत होना और पाँचवा फलयोग ।
विभिन्न रसों के योग्य विभाव इत्यादि का फलप्राप्तिपर्यन्त ठीक स्वरूपज्ञान व्युत्पत्ति कहा जाता है । और फल अदृष्टष्टश्र देवताप्रसाद से अथवा अन्य कारण से उत्पन्न होता है वह उपदेश देने योग्य नहीं होता; क्योंकि उससे उपाय में कोई व्युत्पत्ति होने का योग नहीं होता । इससे उपाय क्रम से प्रवृत्त की सिद्धि और अनुपाय द्वारा प्रवृत्त का नाश इस प्रकार नायक और प्रतिनायक गत अर्थ और अनर्थ की व्युत्पत्ति करा दी जानी चाहिये । कर्ता के द्वारा आश्रय लिये जाने पर उपाय पाँच अवस्थाओं को प्राप्त कर लेता है । वह इस प्रकार—स्वरूप, स्वरूप का कुछ परिपोष, कार्य सम्पादन की योग्यता, प्रतिबन्ध के आ पड़ने से आशङ्का, प्रतिपक्ष के निवृत्त हो जाने पर बाधक के बाधन द्वारा सुट्ठ फलपर्यन्तता । इस प्रकार कष्ट को सहन करनेवाले (लोगों का) इस प्रकार कारण का उपादान होता है । ये कारणगत पाँच अवस्थायें मुनि ने कहीं हैं—
'फल योग के सिद्ध किये जाने में कारण का जो व्यापार उसकी अनुपूर्वी से प्रयोक्काओं के द्वारा पाँच अवस्थायें ज्ञात की जानी चाहिये । प्रारम्भ, प्रयत्न तथा प्राप्ति के हेतु की सम्भावना, फलप्राप्ति का नियत होना और पाँचवा फलयोग ।'
तारावती
विषय में जो सिद्धान्त तथा मानदण्ड स्थापित किये गये हैं उनको मानना तो चाहिये और उनका पालन भी करना चाहिये । किन्तु आत्मसम्मानपालन कभी भी लक्ष्य नहीं होना चाहिये । यदि उन व्यवस्थाओं से रसाभिव्यक्ति में सहायता मिलती हो तो उनका पालन करना ठीक है, अन्यथा नहीं ।
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उपायों का निरूपण किया करते हैं जिनसे अधिक से अधिक रसनिष्पत्ति हो सके; फिर परिस्थितियों की वैचित्र्यक्ता अवशिष्ट ही रह जाती है जिसका इयत्तया प्रकथन तथा परिगणन अशक्य है । अतः कलाकार का यह कर्तव्य है कि शास्त्रीय व्यवस्थाओं से उपकृत होते हुए भी वैचित्र्यक्ता पर विचार करके हो उसे संयोजना करे । ) लोकव्यवस्था के लिये यह अत्यन्त आवश्यक है कि राजपुत्र इत्यादि जिन व्यक्तियों से समाज स्वार्थसाधन की अपेक्षा करता है और जिनका प्रजा के प्रयोजनसम्पादन की योग्यता से युक्त होना अत्यावश्यक होता है उनको कर्तव्य की शिक्षा दी जावे । इसका एक उपाय है वेद और शास्त्रों द्वारा उनको उनका कर्तव्य बतलाना । किन्तु वेद शास्त्र इत्यादि समस्त उपदेशप्रधान शास्त्रों का परम अर्थ होता है 'ऐसा करना चाहिये'—यह आज्ञामात्र प्रदान करना । ( किन्तु आज्ञा का अनुवर्तन सरल नहीं होता, एक तो तुष्टि वृत्तियाँ बलवती कुपथगामिनी बनी रहती हैं और शास्त्रविधाओं से दूर हो रखी रह जाती है, दूसरे अपने को बुद्धिमान समझने और दूसरे की आज्ञा का पालन करने में हीनभाव अनुभव करने की मनुष्य की दुर्बलता राजपुत्र इत्यादि को शास्त्र की आज्ञा का पालन करने से रोकती रहती है और इस उपाय से बहुत कम इन्द्रियजयजी लोग ही कर्तव्य-पालन की ओर अग्रसर हो सकते हैं ) सामान्तः राजपुत्र इत्यादि को वेदशास्त्र के विधान से कर्तव्यज्ञान नहीं होता । दूसरा उपाय है इतिहास और दर्शनशास्त्रों से व्युत्पत्ति उत्पन्न करना । इनका निर्देश मिश्रसमित्त उपदेश जैसा होता है । इनका कार्य होता हैं यह ज्ञान करा देना कि अमुक व्यक्ति की अमुक दशा अनुकूल कर्म से हुई है । इस प्रकार युक्तियुक्त कर्म तथा मूल कारण को प्रकट करनेवाले इतिहास तथा दर्शनशास्त्र के वाक्य मिश्रसमित्त उपदेश जैसे होते हैं । उनसे भी राजपुत्रादिकों को व्युत्पत्ति की प्राप्ति नहीं होती । ( कारण यह है कि जिस प्रकार राजसम्मित वेदशास्त्र वाक्यों का राजा के आदेश के समान अपना अपमान समझकर प्रत्याख्यान किया जा सकता है उसी प्रकार इतिहास पुराण दर्शन इत्यादि मित्रसमित्त वचनों को मित्र की सम्मति के समान टकराया जा सकता है । ) उन राजपुत्रादिकों को कर्तव्य का उपदेश देना अनिवार्य होता है और वेद-शास्त्रादि तथा इतिहास-पुराणादि के वचन अक्िषत्कर हो जाते हैं तब उनको अन्दर हृदय में प्रवेश के द्वारा चतुर्वर्ग के उपायों की व्युत्पत्ति ( योग्यता ) का आधान करना उचित होता है । हृदय में प्रवेश रसास्वादमय ही होता है तथा आनन्दसाधना ही उसमें प्रधान होती है । ( इसीलिये काव्यप्रकाशकारने रसास्वादमय काव्य को
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कान्तासम्मित उपदेश कहा है । ) आनन्दसाधना या रसास्वाद विभाव, अनुभाव और सञ्चारी भाव के संयोग से ही प्राप्त होता है और वह विभावादि संयोजग जव तक सम्पन्न नहीं होता तव तक चतुर्वर्गों की व्युत्पत्ति भी नहीं हो सकती । इस प्रकार विभावादिसंयोग चतुर्वर्गव्युत्पत्तौ में अवश्यम्भावी होता है और विभावादि-संयोग रसास्वादन का भी प्रवर्तक होता है । इस प्रकार रसास्वादन के योग्य विभाव इत्यादि का जव उपनिबन्धन किया जाता है तव उसका परिशीलन करनेवाला मनो विवश होकर रसास्वादन करने लगता है । विभावादिसंयोग के परिशीलन से हमारे हृदय में वलात् रसास्वादन की प्रवृत्ति हो जाती है और न चाहते हुये भी हम आनन्दानुभव करने लगते हैं । उसी आनन्दसाधना के साथ परिणाम स्वरूप वाद में व्युत्पत्ति का अवगम होता है, उस व्युत्पत्ति में रसास्वादन हो प्रवर्तक का रूपधारण करता है । इस प्रकार व्युत्पत्ति की प्रयोजिका भी प्रीति होती है । रस की आत्मी प्रीति ही है, उसी को निष्ठ कहते हैं और निष्ठ ही वेद कहलाता है । आशय यह है कि कवि को विभावादि की संयोजना करनी पड़ती है जिससे स्वाभाविक रूप में आस्वादन प्रवृत्त हो जाता है; काव्यरसास्वादन के साथ ही आनुषङ्गिक रूप में धर्मादि चतुर्वर्गों की व्युत्पत्ति भी हो जाती है; उस व्युत्पत्ति की प्रयोजिका प्रीति ही होती है । राजपुत्र इत्यादि विनेय व्यक्ति जब विभाव इत्यादि का परिशीलन करते हैं तव कवि अनायास ही उनके हृदय में प्रवृष्ट होकर रससञ्चार करता है और वे परवश-से होकर उस रस का आस्वादन करने के लिये वाध्य हो जाते हैं । उसके साथ ही उनके अन्दर उचित-अनुचित कर्तव्याकर्तव्य की व्युत्पत्ति भी उत्पन्न हो जाती है । इस प्रकार व्युत्पत्ति को उत्पन्न करनेवाली प्रीति ही होती है । ( क्योंकि विनेय व्यक्ति रस के माध्यम से सम्पादित व्युत्पत्ति को ग्रहण करने के लिये वाध्य होता है अतः व्युत्पत्तिसम्वादन का यह प्रकार वेदादि तथा पुराणादि दोनो साधनों से अधिक अच्छा होना है ।) प्रीति और व्युत्पत्ति मिन रूपवाली नहीं होती; क्योंकि दोनों का विषय एक ही होता है । यह तो हम कई वार वतला चुके हैं कि वास्तव में प्रीति का मूलकारण विभाव इत्यादि का औचित्य ही है । व्युत्पत्ति भी कोई अन्य वस्तु नहीं है अपितु विभिन्न रसों में जो विभाव इत्यादि उचित होते हैं उनके स्वरूप को ठीक-ठीक समझ लेना और उन समस्त उपकल्पनाओं को फलपर्यवसान ले जाना ही व्युत्पत्ति कहलाता है । विभावादि का परिपोष ही रसरूपता में परिणत होता है, अतः प्रीति और व्युत्पत्ति दोनों का रूप भिन्न नहीं होता । अव काव्य द्वारा सम्पादनीय फल के विषय में विचार कर लेना चाहिये । लोक में फल अनेक
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साधनों से प्राप्त हो सकता है। कभी फल भाग्यवश ही प्राप्त हो जाता है; कभी देवाराधन से देवताओं की कृपा के रूप में फलप्राप्ति होती है; कभी अन्य कोई साधन उपस्थित हो जाता है ( जैसे किसी मित्र की सांयोधिक सहायता आदि । )
ये समस्त फल काव्य के विषय नहीं होते और न कवि का उद्देश्य इस प्रकार के फल का उपदेश देना ही होता है। कारण यह है कि, जैसा कि बतलाया जा चुका है, काव्य का प्रमुख प्रयोजन होता है विनेय व्यक्तियों को सन्मार्ग का उपदेश देना जिससे वे उचित मार्ग को समझ सकें। भाग्य इत्यादि से जो फलप्राप्ति होती है उससे किसी प्रकार के साधन की शिक्षा नहीं मिलती। अतः ऐसी व्युत्पत्ति का उपदेश देना चाहिये कि जो व्यक्ति ठीक उपायों का क्रमबद्ध रूप में आश्रय लेता है उसे सफलता मिल सकती है और जो व्यक्ति ऐसे उपायों का सहारा लेता है, जो सफलता में कारण नहीं हो सकते, उसका नाश हो जाता है। नायक में उपाय दिखला कर उसकी सफलता दिखलाई जानी चाहिये और प्रतिनायक में मिथ्या उपाय दिखलाकर उनसे उद्दृूत अनर्थ दिखलाये जाने चाहिये। इससे परिशीलकों को उचित तथा अनुचित उपायों की व्युत्पत्ति हो जाती है।
( यहाँ पर बतलाया गया है कि देवाराधन से उद्दृूत फल काव्य का विषय नहीं होता। इसके प्रतिकूल कुछ काव्यों में देताप्रसाद से सफलता होती हुई दिखलाई जाती है। यहाँ पर यह समझ लेना चाहिये कि यदि कोई व्यक्ति माला जपते हुये ही सफलता प्राप्त कर ले उस प्रकार का फल काव्य का विषय नही होता। आस्तिकता स्वयं एक सन्मार्ग है। यदि कोई गुणवान व्यक्ति अन्यायों से पराङ्मुख होकर अच्छे मार्ग को न छोड़ते हुये भगवत्सहायता को भी प्राप्त कर लेता है तो उसका निषेध करना आचार्य का लक्ष्य नहीं है।) कर्ता जिस उपाय का आश्रय लेता है वह पाँच अवस्थाओं में विभक्त किया जाता है। वे पाँच अवस्थायें
(१) सर्वप्रथम उपाय का स्वरूप प्रदर्शित करना अर्थात् यह निर्देश करना कि अमुक उपाय अमुक कार्य के साधन में प्रयुक्त किया गया है। (२) स्वरूप से कुछ आगे बढ़ना अर्थात् उपाय का कार्यसाधन की दिशा में परिपोष। (३) उपाय में कार्यसम्पादन की योग्यता का प्रदर्शन। (४) प्रतिवन्धक के आ जाने से जहाँ कार्यसिद्धि सन्दिग्ध हो जावे और (५) प्रतिबन्ध के निवृत्त हो जाने पर बन्धक के बाधन के द्वारा सुस्थिर फल पर्यन्त (बोज को ले जाना। (लोचन के प्रस्तुत पाठ से यही पाँच अवस्थायें सिद्ध होती हैं। किन्तु इस व्याख्या से पाँचों सन्धियों की सज्ज्ञति ठीक नहीं बैठती। उक्त विभाजन के अनुसार तृतीय अवस्था में कार्यसम्पादन की योग्यता और चतुर्थ अवस्था में साधनसिद्धि का सन्दिग्ध
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एवं या एता: कारणस्यावस्थास्तत्सम्पादकं यत्कतुरिति चृग्रतं पद्चधा विमक्तम् । त एव मुखप्रतिमुखगर्भावमर्शनिवहणाख्या अन्वर्थनानमान: पद्च सन्धय इत्युक्तखण्ड: सन्धीयन्त इति कृत्वा । तेषामपि सन्धीनां स्वनिर्वाच्यां प्रति तथा क्रमदर्शनादचान्तरमिन्ना इत्युक्तमागा: । सन्धियोजना 'उपक्षेप: परिकर: परिन्यासो विलोमनम्' इत्यादिानि ।
इस प्रकार जो कार्य की अवस्थायें हैं उनका सम्पादन करनेवाला जो कर्ता का इतिवृत्त पाँच भागों में विभक्त किया गया है वही मुख, प्रतिमुख, गर्भ, अवमर्श और निर्वहण नामक अन्वर्थ संज्ञावाली पाँच सन्धियाँ अर्थात् इतिवृत्तखण्ड परिन्यास, विलोमन इत्यादि ।
तारावती इस प्रकार जो कार्य की अवस्थायें हैं उनका सम्पादन करनेवाला जो कर्ता का इतिवृत्त पाँच भागों में विभक्त किया गया है वही मुख, प्रतिमुख, गर्भ, अवमर्श और निर्वहण नामक अन्वर्थ संज्ञावाली पाँच सन्धियाँ अर्थात् इतिवृत्तखण्ड परिन्यास, विलोमन इत्यादि ।
इस प्रकार जो कार्य की अवस्थायें हैं उनका सम्पादन करनेवाला जो कर्ता का इतिवृत्त पाँच भागों में विभक्त किया गया है वही मुख, प्रतिमुख, गर्भ, अवमर्श और निर्वहण नामक अन्वर्थ संज्ञावाली पाँच सन्धियों अर्थात् इतिवृत्तखण्ड ( होती हैं ) 'जिनका सन्धान किया जाता है' इस व्युत्पत्ति के आधार पर । उनके सन्धियों का भी अपने निर्वाच्य ( फल ) के प्रति उस प्रकार के क्रम के देखे जाने अवान्तरभिन्न इतिवृत्तभाग ( होते हैं । ) सन्धि के अङ्ग हैं—उपक्षेप, परिकर, परिन्यास, विलोमन इत्यादि ।
होना सिद्ध होता है जबकि काव्यशास्त्रीय विवेचन के अनुसार तृतीय सन्धि में ही कार्यसिद्धि की सन्धिदर्शता प्रस्तुत की जानी चाहिये । इसी प्रकार उपयुक्त विभाजन में सफलता का निश्चय यह चौथी अवस्था और सफलता की प्राप्ति—इन दोनों को एक कर दिया गया है जो कि प्रसिद्धविभाजन के प्रतिकूल भी है और तर्कसङ्ङत नहीं है ।
प्रतापरुद्रटि में इस प्रकार व्याख्या की गई है—प्रथम अवस्था में स्वरूप का कुछ आगे बढना, द्वितीय अवस्था में कार्यसम्पादन की योग्यता, तृतीय अवस्था में प्रतिबन्धक की उपस्थिति से फल का सन्दिग्ध होना, चतुर्थ में प्रतिबन्धक की निवृत्ति से कार्य का निश्चय और पञ्चम में वाधक के बाधन के द्वारा सुहृद् फल पर्यन्तता ।
यह विभाजन प्रसिद्धि के अनुकूल भी है और तर्कसङ्ङत भी । इसमें 'स्वरूपकम्' यह सामान्य शब्द रखा गया है, 'स्वरूपात् किञ्चिदुच्छूनताम्' यह प्रथम अवस्था मानी गई है । 'निवृत्तप्रतिपक्षतायाम्' के बाद 'कार्यस्य निश्चय-वस्थाम्र' इतना और जोड़ कर चतुर्थ अवस्था मानी जा सकती है और 'सुहृद् फल पर्यन्तता' यह पञ्चम अवस्था ।
श्रम तथा विधनों को सहन करनेवाले, कार्य की असफलता से भयभीत तथा समझ-बूझकर काम करनेवालों का कारणों का उपादान इसी प्रकार का हुआ करता है । वे कारण में रहनेवाली ५ प्रकार की अवस्थायें मुनि ने इस प्रकार कही हैं
'कारण का फल से योग ( काव्य और नाट्य में ) साध्य होता है । उसमें कारण का जो व्यापार होता है, प्रयोक्का लोगों को चाहिये कि आनुपूर्वी अर्थात् क्रमिकता के द्वारा पाँच अवस्थाओं को समझ ले ।
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‘आरम्भ, प्रयत्न, प्राप्ति की सम्भावना ( अथवा असम्भावना ) नियतफलप्राप्ति और पाँचवा फल योग ( ये क्रमशः ५ अवस्थायें होती हैं ) ।
इस प्रकार जो ये ५ कारण की अवस्थायें हैं उनका सम्पादककर्ता का इतिवृत्त होता है । वह इतिवृत्त ५ भागों में विभक्त किया गया है । इन भागों को ५ सन्धियों के नाम से अभिहित किया जाता है । सन्धि शब्द सम् + उपसर्ग ‘धा’ धातु से कर्म में ‘कि’ प्रत्यय होकर बना है । ) इस व्युत्पत्ति के अनुसार इसका अर्थ होगा जिसका सन्धान किया जावे उन्हें सन्धि कहते हैं । सन्धान इतिवृत्त का किया जाता है । अतः इतिवृत्त-खंडों को सन्धि कहते हैं । इन पाँच सन्धियों के नाम हैं—मुख, प्रतिमुख, गर्भ, विमर्श और निर्वहण । ये अन्वर्थ संज्ञायें हैं अर्थात् इनकी परिभाषा शब्दार्थ से ही अवगत हो जाती है । ( मुख का अर्थ है प्रारम्भ । अतः प्रारम्भ में बीज की उत्पत्ति को मुखसन्धि कहते है । प्रतिमुख शब्द का अर्थ है जिसमें प्रतिष्ठित किया जावे या आगे बढ़ाया जावे अथवा मुख के प्रतिकूल बढ़ा जावे । प्रतिमुखसन्धि में एक तो मुखसन्धि के निर्दिष्ट बीज को आगे बढ़ाया जाता है दूसरे प्रयत्न के प्रारम्भ हो जाने से कभी बीज प्रकट रहता है कभी अप्रकट । यह स्थिति मुख के प्रतिकूल होती है क्योंकि मुखसन्धि में बीज प्रकट ही रहता है ।
गर्भ शब्द ‘ग्रु’ धातु से भन् प्रत्यय होकर बनता है जिसका अर्थ है निगरण कर लेना गुम कर लेना या कृति में छिपा लेना’। इस सन्धि में बीज गर्भित हो जाता है अतः इसे गर्भसन्धि कहते हैं । विमर्श शब्द में ‘वि’ उपसर्ग का अर्थ है छानवीन अतः जहाँ छानवीन से बीज का परिज्ञान हो और छानवीन से ही सफलता भी प्रतीत हो वहाँ विमर्शसन्धि होती है । निर्वहण का अर्थ है निर्वाह । इसमें बीज का निर्वाह कर दिया जाता है । अतः इसे निर्वहणसन्धि कहते हैं । इस प्रकार सन्धियों की ये अन्वर्थ संज्ञायें हैं । ) इन सन्धियों के द्वारा फल का निर्वाह किया जाता है । उस फल के प्रति इन सन्धियों में एक-एक के अन्दर अवान्तर क्रम भी देखा जाता है । अतः इन सन्धियों के अवान्तर भेद के रूप में भी इतिवृत्त के टुकड़े कर लिये जाते हैं । सन्धियों के इन अवान्तर भेदों को सन्ध्यङ्ग कहते हैं । वे हैं—उपक्षेप परिकर, परिन्यास, विलोचन इत्यादि । ( मुखसन्धि के उपक्षेप इत्यादि १२ भेद होते हैं प्रतिमुख के विलास इत्यादि १३ भेद होते है । गर्भ सन्धि के अमूर्ताहरण इत्यादि १२ भेद होते हैं । विमर्श के अपवाद, संकेत इत्यादि १३ भेद होते हैं और निर्वहण के सन्धि-विवोध ग्रंथन इत्यादि १४ भेद होते हैं । इनके लक्षण और उदाहरण नाट्यशास्त्र के ग्रन्थों में विस्तारपूर्वक दिये हुए हैं । इनको वहीं देखना चाहिये । अप्रासङ्किक विस्तार-भय से यहाँ पर विवेचन नहीं किया जा रहा है । )
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अर्थप्रकृतयोऽत्रैवान्तर्भूता: । तथा हि स्वायत्तसिद्धेरर्थोऽयं विन्दु: कार्यमिति तिस्र: । वीजेन सर्वव्यापारा: विन्दुनानुसन्धानं कार्येण निर्वाह: सन्दर्शनप्रार्थनाव्यवसायरूपा होतासित्थोडथे सम्पाद्ये कर्थ: प्रकृतय: स्वभावविशेषा: । सचिवायत्तसिद्धौ तु सचिववस्त्वदर्थमेव वा स्वार्थमेव वा स्वार्थमपि वा प्रवृत्तत्वेन प्रख्यात्वप्राप्तत्वाभ्यां अर्थप्रकृतयोऽप्यी इन्हीं में अन्तर्भूत ( हो जाती हैं । ) वह इस प्रकार—स्वायत्तसिद्धिवाले ( नायक ) के लिये वीज, विन्दु, और कार्य ये तीन । वीज से सभी व्यापार, विन्दु से अनुसन्धान और कार्य से निर्वाह; सन्दर्शन प्रार्थना और व्यवसाय रुपवाली ये तीन अर्थ अर्थात् सम्पादनीय में कर्ता की प्रकृति अर्थात् स्वभावविशेष । सचिवायत्तसिद्धि में तो सचिव का उसके लिये ही अथवा अपने लिये ही अथवा अपने लिये भी प्रवृत्त होने से प्रकट और प्रसिद्ध रुपों में
अर्थप्रकृतयः अत्र इवैव अन्तर्भूताः । तथा हि स्वायत्तसिद्धेः अर्थः अयं विन्दुः कार्यम् इति तिस्रः । वीजेन सर्वव्यापाराः विन्दुन अनसन्धानं कार्येण निर्वाहः सन्दर्शनप्रार्थनाव्यवसायरूपा होतासित्थोऽथे सम्पाद्ये कर्थः प्रकृतयः स्वभावविशेषाः । सचिनायत्तसिद्धौ तु सचिववस्त्वदर्थमेव वा स्वार्थमेव वा स्वार्थमपि वा प्रवृत्तत्वेन प्रख्यात्वप्राप्तत्वाभ्यां अर्थप्रकृतयः अप्यी इन्हीं में अन्तर्भूत ( हो जाती हैं । ) वह इस प्रकार—स्वायत्तसिद्धिवाले ( नायक ) के लिये वीज, विन्दु, और कार्य ये तीन । वीज से सभी व्यापार, विन्दु से अनुसन्धान और कार्य से निर्वाह; सन्दर्शन प्रार्थना और व्यवसाय रुपवाली ये तीन अर्थ अर्थात् सम्पादनीय में कर्ता की प्रकृति अर्थात् स्वभावविशेष । सचिवायत्तसिद्धि में तो सचिव का उसके लिये ही अथवा अपने लिये ही अथवा अपने लिये भी प्रवृत्त होने से प्रकट और प्रसिद्ध रुपों में
तथा हि स्वायत्तसिद्धेरर्थोऽयं विन्दु: कार्यमिति तिस्र: । वीजेन सर्वव्यापारा: विन्दुनानुसन्धानं कार्येण निर्वाह: सन्दर्शनप्रार्थनाव्यवसायरूपा होतासित्थोडथे सम्पाद्ये कर्थ: प्रकृतय: स्वभावविशेषा: । सचिवायत्तसिद्धौ तु सचिववस्त्वदर्थमेव वा स्वार्थमेव वा स्वार्थमपि वा प्रवृत्तत्वेन प्रख्यात्वप्राप्तत्वाभ्यां अर्थप्रकृतयोऽप्यी इन्हीं में अन्तर्भूत ( हो जाती हैं । ) वह इस प्रकार—स्वायत्तसिद्धिवाले ( नायक ) के लिये वीज, विन्दु, और कार्य ये तीन । वीज से सभी व्यापार, विन्दु से अनुसन्धान और कार्य से निर्वाह; सन्दर्शन प्रार्थना और व्यवसाय रुपवाली ये तीन अर्थ अर्थात् सम्पादनीय में कर्ता की प्रकृति अर्थात् स्वभावविशेष । सचिवायत्तसिद्धि में तो सचिव का उसके लिये ही अथवा अपने लिये ही अथवा अपने लिये भी प्रवृत्त होने से प्रकट और प्रसिद्ध रुपों में
अर्थप्रकृतियों का अन्तभाव भी इन्हीं में हो जाता है । वह इस प्रकार—नायक तीन प्रकार का होता है—स्वायत्तसिद्धि, सचिवायत्तसिद्धि और उभयायत्तसिद्धि । स्वायत्तसिद्धिवाला नायक वह होता है जिस की सफलता स्वयं उसके हाथ में हो । इस प्रकार के नायक की अर्थप्रकृतियाँ तीन होती हैं—वीज, विन्दु और कार्य । अर्थप्रकृति यान्द का अर्थ है प्रयोजन की सिद्धि में हेतु । स्वायत्तसिद्धि वाले नायक की यही तीन अर्थ प्रकृतियाँ बतलाई गईं हैं । वीज का अर्थ है सभी व्यापार । विन्दु का अर्थ है अनुसन्धान और कार्य का अर्थ है निर्वाह । ( कार्य को सिद्ध करने वाला जो हेतु प्रारम्भ में बहुत ही सूक्ष्म मात्रा में निर्दिष्ट किया गया हो और जिसका नाटक के अग्रिम भाग में विशेष विस्तार होने वाला हो उसे वीज कहते हैं । प्रारम्भ में वीज बहुत छोटा होता है और बाद में विस्तृत होकर वृक्ष का रूप धारण कर लेता है उसी प्रकार नाट्यबीज प्रारम्भ में बहुत संक्षिप्त होता है किन्तु बाद में अनेक प्रकार से विस्तृत होकर नाटक इत्यादि का रूप धारण कर लेता है । ) विन्दु सम्प्रार्थना रूप होता है । इसमें वीज को फल से मिलने की सम्प्रार्थना या आकांक्षा की जाती है । ( जिस प्रकार तैलविन्दु जल में बहुत प्रकार से फैल जाता है उसी प्रकार नाट्यविन्दु भी अग्रिम कथाभाग में फैलता जाता है । नाटक में प्राय: छोटे-छोटे प्रयोजन होते हैं और इनकी पूर्ति भी थोड़ी-थोड़ी दूर पर होती चलती है तब कथा भाग रुकता-सा जान पड़ता है, वहाँ पर कोई ऐसा तत्त्व ( Point ) आ जाता है जो कथाभाग को आगे बढ़ा देता है यही विन्दु कहलाता है । ) कार्य का रूप होता है व्यवसाय । ( कार्य नाट्यफल को कहते हैं यह फल धर्म, अर्थ और काम इन तीनों में कोई एक दो
अर्थप्रकृतियों का अन्तभाव भी इन्हीं में हो जाता है । वह इस प्रकार—नायक तीन प्रकार का होता है—स्वायत्तसिद्धि, सचिवायत्तसिद्धि और उभयायत्तसिद्धि । स्वायत्तसिद्धिवाला नायक वह होता है जिस की सफलता स्वयं उसके हाथ में हो । इस प्रकार के नायक की अर्थप्रकृतियाँ तीन होती हैं—वीज, विन्दु और कार्य । अर्थप्रकृति यान्द का अर्थ है प्रयोजन की सिद्धि में हेतु । स्वायत्तसिद्धि वाले नायक की यही तीन अर्थ प्रकृतियाँ बतलाई गईं हैं । वीज का अर्थ है सभी व्यापार । विन्दु का अर्थ है अनुसन्धान और कार्य का अर्थ है निर्वाह । ( कार्य को सिद्ध करने वाला जो हेतु प्रारम्भ में बहुत ही सूक्ष्म मात्रा में निर्दिष्ट किया गया हो और जिसका नाटक के अग्रिम भाग में विशेष विस्तार होने वाला हो उसे वीज कहते हैं । प्रारम्भ में वीज बहुत छोटा होता है और बाद में विस्तृत होकर वृक्ष का रूप धारण कर लेता है उसी प्रकार नाट्यबीज प्रारम्भ में बहुत संक्षिप्त होता है किन्तु बाद में अनेक प्रकार से विस्तृत होकर नाटक इत्यादि का रूप धारण कर लेता है । ) विन्दु सम्प्रार्थना रूप होता है । इसमें वीज को फल से मिलने की सम्प्रार्थना या आकांक्षा की जाती है । ( जिस प्रकार तैलविन्दु जल में बहुत प्रकार से फैल जाता है उसी प्रकार नाट्यविन्दु भी अग्रिम कथाभाग में फैलता जाता है । नाटक में प्राय: छोटे-छोटे प्रयोजन होते हैं और इनकी पूर्ति भी थोड़ी-थोड़ी दूर पर होती चलती है तब कथा भाग रुकता-सा जान पड़ता है, वहाँ पर कोई ऐसा तत्त्व ( Point ) आ जाता है जो कथाभाग को आगे बढ़ा देता है यही विन्दु कहलाता है । ) कार्य का रूप होता है व्यवसाय । ( कार्य नाट्यफल को कहते हैं यह फल धर्म, अर्थ और काम इन तीनों में कोई एक दो
अर्थप्रकृतियों का अन्तभाव भी इन्हीं में हो जाता है । वह इस प्रकार—नायक तीन प्रकार का होता है—स्वायत्तसिद्धि, सचिवायत्तसिद्धि और उभयायत्तसिद्धि । स्वायत्तसिद्धिवाला नायक वह होता है जिस की सफलता स्वयं उसके हाथ में हो । इस प्रकार के नायक की अर्थप्रकृतियाँ तीन होती हैं—वीज, विन्दु और कार्य । अर्थप्रकृति यान्द का अर्थ है प्रयोजन की सिद्धि में हेतु । स्वायत्तसिद्धि वाले नायक की यही तीन अर्थ प्रकृतियाँ बतलाई गईं हैं । वीज का अर्थ है सभी व्यापार । विन्दु का अर्थ है अनुसन्धान और कार्य का अर्थ है निर्वाह । ( कार्य को सिद्ध करने वाला जो हेतु प्रारम्भ में बहुत ही सूक्ष्म मात्रा में निर्दिष्ट किया गया हो और जिसका नाटक के अग्रिम भाग में विशेष विस्तार होने वाला हो उसे वीज कहते हैं । प्रारम्भ में वीज बहुत छोटा होता है और बाद में विस्तृत होकर वृक्ष का रूप धारण कर लेता है उसी प्रकार नाट्यबीज प्रारम्भ में बहुत संक्षिप्त होता है किन्तु बाद में अनेक प्रकार से विस्तृत होकर नाटक इत्यादि का रूप धारण कर लेता है । ) विन्दु सम्प्रार्थना रूप होता है । इसमें वीज को फल से मिलने की सम्प्रार्थना या आकांक्षा की जाती है । ( जिस प्रकार तैलविन्दु जल में बहुत प्रकार से फैल जाता है उसी प्रकार नाट्यविन्दु भी अग्रिम कथाभाग में फैलता जाता है । नाटक में प्राय: छोटे-छोटे प्रयोजन होते हैं और इनकी पूर्ति भी थोड़ी-थोड़ी दूर पर होती चलती है तब कथा भाग रुकता-सा जान पड़ता है, वहाँ पर कोई ऐसा तत्त्व ( Point ) आ जाता है जो कथाभाग को आगे बढ़ा देता है यही विन्दु कहलाता है । ) कार्य का रूप होता है व्यवसाय । ( कार्य नाट्यफल को कहते हैं यह फल धर्म, अर्थ और काम इन तीनों में कोई एक दो
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प्रकरो़पताकाव्यपदेश्यतथोभयप्रकारसम्बन्धी व्यापारविशेष: प्रकरो़पताकाव्याख्येति । एंवं प्रस्तुतफलनिर्वाहान्तस्याधिकारिकस्य वृत्तस्य पञ्चसन्धित्वं पूर्ण च सर्वंजनव्युत्पत्तिदायिनीं निवृंधनोया । प्रासङ्किके हि वृत्तान्ते नायं नियम इति । 'प्रासङ्किके परार्थत्वाच्च ह्येष नियमो न चैवते ।' इति मुनिना ।
प्रकरो़पताकाव्यपदेश्यतथोभयप्रकारसम्बन्धी व्यापारविशेष: प्रकरो़पताकाव्याख्येति । एंवं प्रस्तुतफलनिर्वाहान्तस्याधिकारिकस्य वृत्तस्य पञ्चसन्धित्वं पूर्ण च सर्वंजनव्युत्पत्तिदायिनीं निवृंघनोया । प्रासङ्किके हि वृत्तान्ते नायं नियम इति । 'प्रासङ्किके परार्थत्वाच्च ह्येष नियमो न चैवते ।' इति मुनिना ।
एवं स्थिते रत्नावल्यां धीरललितस्य नायकस्य धर्म- होने से प्रकरी और पताका इस नामकरण से दोनों प्रकारों का सम्बन्धी विशेष प्रकरी और पताका शब्दों से कहा गया है।इस प्रकार प्रस्तुत फल के पर्यन्त आधिकारिक वृत्त की पाँच सन्धियों का होना और पूर्ण सन्धियों होना सभी व्यक्तियों को व्युत्पत्ति देनेवाला निवद्ध किया जाना चाहिये गया है कि प्रासङ्किक इतिवृत्त में यह नियम नहीं है-- 'प्रासङ्किके परार्थ होने के कारण यह नियम नहीं होता ।' यह तारावती
या तीन हो सकते हैं । इस फल को सिद्ध करने के लिये जो व्यवसाय कि है उसे ही कार्य कहते हैं । ) इस प्रकार ये तीन अर्थ अर्थात् सम्पादनीयं में कर्ता की प्रकृतियाँ अर्थात् विशेष स्वभाव होते हैं । यह तो हुई स्वायत्। नायक की बात । अब सचिवायत्तसिद्धि को लीजिये । सचिवायत्त या तो उस राजा के लिये ही प्रवृत्त होता है, या अपने लिये ही अपने लिये भी ( अर्थात् दोनों के लिये ) प्रवृत्त होता है । अतः उसका तो प्रकरण ( अर्थात् सजीवट से युक्त फेंका हुआ या कथा में मिलाया हुआ ) या प्रसिद्ध । यदि प्रकरण होता है तो उसे प्रकरी कहते हैं और यदि प्रसिद्ध है तो उसे पताका कहते हैं । इस प्रकार आधिकारिक कथावस्तु में प्रस्तुत फल के निर्वाहण पर्यन्त पाँचों सन्धियाँ और सभी सन्धियों के अङ्ग दि निवद्ध दिये जाने चाहिये जिससे सभी व्यक्तियों को व्युत्पत्ति प्राप्त हो सके यह नियम प्रासङ्किक इतिवृत्त में नहीं लागू होता । यह बात मुनि ने कही 'प्रासङ्किक में परार्थ होने के कारण यह नियम नहीं लगता ।'
या तीन हो सकते हैं । इस फल को सिद्ध करने के लिये जो व्यवसाय कि है उसे ही कार्य कहते हैं । ) इस प्रकार ये तीन अर्थ अर्थात् सम्पादनीयं में कर्ता की प्रकृतियाँ अर्थात् विशेष स्वभाव होते हैं । यह तो हुई स्वायत्। नायक की बात । अब सचिवायत्तसिद्धि को लीजिये । सचिवायत्त या तो उस राजा के लिये ही प्रवृत्त होता है, या अपने लिये ही अपने लिये भी ( अर्थात् दोनों के लिये ) प्रवृत्त होता है । अतः उसका तो प्रकरण ( अर्थात् सजीवट से युक्त फेंका हुआ या कथा में मिलाया हुआ ) या प्रसिद्ध । यदि प्रकरण होता है तो उसे प्रकरी कहते हैं और यदि प्रसिद्ध है तो उसे पताका कहते हैं । इस प्रकार आधिकारिक कथावस्तु में प्रस्तुत फल के निर्वाहण पर्यन्त पाँचों सन्धियाँ और सभी सन्धियों के अङ्ग दि निवद्ध दिये जाने चाहिये जिससे सभी व्यक्तियों को व्युत्पत्ति प्राप्त हो सके यह नियम प्रासङ्किक इतिवृत्त में नहीं लागू होता । यह बात मुनि ने कही 'प्रासङ्किक में परार्थ होने के कारण यह नियम नहीं लगता ।'
उपर्यरेचन में इतिवृत्ते को निर्वाह को सचित दिग्दर्शन कर है अब रत्नावली का उदाहरण लीजिये । रत्नावली के नायक हैं महाराज उदयन । सम्भोग का सेवन धीरललित नायक का अनुचित है । अतः ऐसे सम्भोग का सेवन जो धर्म के विरुद्ध नहीं है ( धर्म और काम का सन्तुलन ओर अविरोध पैहलौकिक और पारलौकिक
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सम्भोगसेवायामनौचित्यभावात् प्रत्युत न निस्सुखः स्यादिति श्लाघ्यत्वात् पृथ्वीराज्यमहाफलान्तरानुबन्धकन्या लाभोद्देशेन प्रस्तुतावनुपक्रमे पञ्चापि सन्ध्योदवस्थापञ्चक सहिताः समुचितसन्ध्यर्थपरिपूर्णा अर्थप्रकृतियुक्ता दर्शिता एव । ‘प्रारम्भमेडस्मिन् स्वामिनो वृद्धिहेतोः’ इति हि वाजिदेव प्रभृतौ ‘विजिगीषावग्रहकथां’ इति हेतु राज्य निजित शत्रु’ इति च वचोभिः ‘उपमोगसेवावसरोगध्यम्’ इत्युपचेत्प्रभृति हि निरुपितम् ।
ऐसी स्थिति में धीरललित नायक का सम्भोग सेवन में अनौचित्य न होने से प्रत्युत ‘सुखरहित नहीं होना चाहिये’ इस (नियम से) प्रशंसनीय होने के कारण पृथ्वी के राज्यरूप महाफल के अनुसन्धी कन्यालाभ के उद्देश्य से प्रस्तुतवनुपक्रम में पाँचों सन्धियों पाँचों अवस्थाओं के साथ, समुचित सन्ध्यर्थों से परिपूर्ण और अर्थप्रकृतियों से युक्त दिखलाई ही गयी हैं । ‘स्वामी के वृद्धिहेतु इसके प्रारम्भ करने पर’ इस बीज मे ही लेकर ‘जिसमें विग्रह की कथा शान्त हो गयी है’ तथा ‘शत्रुओं से जीता हुआ राज्य’ इन वचनों से ‘यह उपभोग सेवा का अवसर है’ एकमात्र साधन है ।
तारावती ( जीवन में धर्म के साथ अर्थ और काम का भी उतना ही महत्त्व हैं । ) धर्मशास्त्र का नियम है कि ‘जीवन सुख रहित नहीं होना चाहिये ।’ इस नियम के अनुसार वत्सराज का श्रृङ्गार सेवन अनुचित नहीं कहा जा सकता । उनका वह श्रृङ्गारसेवन श्लाघ्य ही है । एक तो उसमें कन्यारत्न की प्राप्ति एक बहुत बड़ा फल है दूसरे पृथ्वी के राज्य की प्राप्ति का एक दूसरा बहुत बड़ा लाभ और सम्भिलित है । उसी उद्देश्य से नाटक की प्रवृत्ति हुई है । उसमें प्रस्तुतवनुपक्रम में ( बीज को प्रस्तुत कर उसके कम बढ़ता के साथ फलपर्यन्त ले जाने में ) पाँचों कार्यावस्था और पाँचों अर्थ प्रकृतियों के संयोग से पाँचों सन्धियाँ दिखलाई गयी हैं और जहाँ तक सम्भव हो सका है उन सन्धियों के अङ्ग भी दिखलाये गये हैं । ‘यह कार्य स्वामी की वृद्धि के लिये प्रारम्भ किया गया……..’ इस कथन में बीज सन्निहित है; ‘विग्रह की कथा शान्त हो गयी…. ‘राज्य में शत्रु जीत लिये गये…..’ इत्यादि वचनों के द्वारा ‘यह उपभोग सेवा का अवसर है’ यहां से मुखसन्धि के उपक्षेप नामक ( प्रथम ) अङ्ग से ही प्रारम्भ करके सभी प्रकार की सन्धियों और अधिक से अधिक सन्ध्यङ्गों को दिखलाया गया है ।
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यथा रत्नावलयाम्; न तु केवलं शास्त्रस्थितिसम्पादनेच्छया । यथा वेणीसंहारे विलासाङ्ख्यस्य प्रतिमुखसन्ध्यङ्गस्य प्रकृतरसनिबन्धानुगुणमपि द्वितीयेडङ्के भरतमतातुसरणमात्रेच्छया घटनम् ।
इत्यादि उनके अङ्गों का रसाभिव्यक्ति की अपेक्षा करते हुये ग्रहण, जैसे रत्नावली में । केवल शास्त्रस्थिति सम्पादन की इच्छा से तो नहीं, जैसे वेणीसंहार में विलास नामक प्रतिमुखसन्धि के अङ्ग की घटना प्रकृत रस के प्रतिकूल होते हुये भी भरत मत के अनुसरणमात्र की इच्छा से की गई है ।
एतत्तु समस्तसन्ध्यङ्गस्वरूपं तत्त्वाठ्यग्रेऽपि प्रदर्श्यमानमतितमां ग्रन्थगौरवभावाह्हति । प्रत्येकेन तु प्रदर्श्यमानं पूर्वापरानुसन्धानबन्ध्यतया केवलं संमोहदायि भवतीति न विततम् । अस्यार्थस्य यत्नावबोधेत्यनेनैव स्वकथनं यो व्यतिरेक उत्तोऽन तु केवलया
इति तस्योदाहरणमाह—न तु त्वाति । केवलशब्दमिच्छाशब्दं च प्रयुञ्जानस्यायमाशय:- मरतमतिना सन्ध्यज्ञानरसाङ्गभूतमितिवृत्तप्राशस्त्योत्पादनमेव प्रयोजनमुक्तम् । न तु पूर्वापरददृष्टसम्पादनं विध्नादिवारणं वा । यथोक्तमू—
इने रङ्गों से उपलक्ष्य से ही लेकर निरूपण किया गया है । यह समस्त सन्ध्यङ्गों का स्वरूप उसके पाठ के आधार पर दिखलाया जाने पर अत्यन्त ग्रन्थगौरव को धारण कर लेता । प्रत्येक रूप में दिखलाये जानेपर पूर्वापर अनुसन्धान में व्यर्थ होने के कारण केवल संमोहदायक होगा । अतः विस्तृत रूप में नहीं दिखलाया ।
अर्थ के यत्नपूर्वक अवधान देने योग्य होने से स्वकथन से जो व्यतिरेक उत्तो ‘न तु केवलया’ ( शास्त्रस्थितिसम्पादन की इच्छा ) से नहीं’ इन शब्दों से कहा गया उसका उदाहरण देते हैं —‘न तु त्वाति’ । ‘केवल’ शब्द और ‘इच्छा’ शब्द को प्रयुक्त करने वाले का आशय यह है—भरतमुनि ने सन्ध्यङ्गों के रसाङ्गभूत इतिवृत्त का प्राशस्त्योत्पादन ही प्रयोजन कहा है । पूर्वापर के समान अदृष्टसम्पादन या विध्न इत्यादि का वारण नहीं । जैसा कहा गया है—
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साथ नहीं समझा रहा हूँ । ( दशरूपक इत्यादि नाट्यशास्त्रीय ग्रन्थों में अधिकतर रत्नावली से ही उदाहरण दिये गये हैं । अतः वहीं देखना चाहिये । ) यहाँ पर कहने का मत्लव्य यही है कि जिस प्रकार रत्नावली में सन्धि और सन्ध्यङ्गों का निर्वाह प्रकृति के औचित्य और रस की मर्यादा को ध्यान में रखकर किया गया है उसी प्रकार यदि इन अङ्गों का समावेश किया जाता है तब तो प्रबन्ध रसाभिव्यक्तिक होता है यदि इन्हें प्रतिकूल रस और प्रकृतियों का विचार छोड़कर केवल शास्त्र-
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इष्टस्यार्थस्य रचना वृत्तान्तस्यानुपक्षयः । रागप्राप्तिः प्रयोगस्य गुह्यानां चैव गूहनम् ॥ आश्रयाणांवदभिष्यानां प्रकाश्यानां प्रकाशनम् । सङ्केतानां घडनविधिं ज्ञातृ ज्ञेयं शास्त्रे प्रयोजनम् ॥
इष्ट अर्थ की रचना, वृत्तान्त का अपक्षीण न होना, प्रयोग की रागप्राप्ति, गोपनीयों का गोपन, चमत्कारकारक कथन और प्रकाश्यमियों का प्रकाशन—शास्त्र में अज्ञों का यह छः प्रकार का प्रयोजन देखा गया है ।
मयादापरिपालन के लिये ही इन सदके सन्निवेश की चेष्टा की जाती है और उसमें केवल शास्त्रस्थितिसम्पादन की इच्छा ही प्रयोजक होती है तो वह प्रबन्ध रसाभिव्यक्तजन न करके केवल रसभङ्ग का ही साधन बन जाता है । शास्त्रमर्यादा-पालन करने न करने का प्रश्न इतना महत्वपूर्ण है कि इसका यत्नपूर्वक ध्यान रखना अभीष्ट होता है। इसीलिये धनिकार ने नियम भी वतलाया और उसके अभाव के स्थान का भी निर्देश इन शब्दों में किया कि ‘केवल शास्त्रस्थिति-सम्पादन की इच्छा से सन्धि तथा सन्ध्यङ्गों का पालन नहीं करना चाहिये ।’ तथा आलोककारने जहां नियम का उदाहरण दिया वहां चपतिरेक का भी उदाहरण दिया है। ‘केवल शास्त्रस्थिति सम्पादन की इच्छा से नहीं’ इस वाक्य में केवल शब्द और इच्छा शब्द के प्रयोग का आशय यह है—शास्त्रों में प्रायः समस्त-विधियां दो प्रकार की होती हैं एक तो कर्मकाण्डस्तर की, जिनका पालन करना अनिवार्य होता है । ( जैसे गौरीपूजन के नवग्रह इत्यादि के लिये जितनी शास्त्रीय विधि होती है उसका अनिवार्य रूपमें पालन किया जाता है ।) भरतमुनि ने पूर्वरङ्ग का इसी प्रकार का विधान किया है जिसका फल होता है अदृष्टसम्पादन और विघ्न इत्यादि का निवारण । अतः पूर्वरङ्ग की समस्त विधि अनिवार्य है । दूसरे प्रकार की विधि ऐसो होती है जिसके पालन करने के लिये प्रयोक्ता स्वतन्त्र होता है। उन विधियों की शास्त्र में चर्चा इसीलिये की जाती है कि वे कुछ ऐसे तत्त्व होते हैं जिनके आधार पर गुणागुणों की परीक्षा तथा विचार किया जा सकता है और सामान्यतया उनका पालन श्रेयस्कर होता है । ( जैसे धर्मशास्त्रों में विस्तारपूर्वक विचार किया गया है कि कैसी कन्या से विवाह करना चाहिये । यदि उन वतलाये हुये गुणों में कुछ व्यक्तिगतर परिस्थाति के अनुकूल न हों तो उनका पालन नहीं करना चाहिये । शास्त्रकार का वहां यही आशय होता है कि ऐसा करना प्रशस्त होता है ।) भरतमुनि द्वारा वतलायी हुई सन्धि और सन्ध्यङ्गों की विधि
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ततश्च-- 'समीहा रतिभोगार्था विलास: परिकीर्तित: १' इति प्रतिमुखसन्ध्यादौविलासलक्षणे । रतिभोगशब्द आाधिकारिकरसरसस्थायिमावोपनयैकविभावाद्युपलक्षणार्थ्च्चेन प्रयुक्तः, यथा तत्त्वं नाधिगतार्थं इति । प्रकृतो ध्वन्र वीररसः ।
इसके बाद-- 'रतिभोग के प्रयोजनवाली इच्छा को विलास कहते हैं ।' यह प्रतिमुख सन्धि के अङ्ग विलास के लक्षण में कहा गया है । रतिभोग शब्द आधिकारिक रस के स्थायी भाव के उपनयक विभाव इत्यादि के उपलक्षण के रूप में प्रयुक्त किया गया है; ( वेणीसंहारकार ने ) ठीक तत्त्व को प्राप्त नहीं कर पाया । यहाँ पर प्रकृत वीररस है ।
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पूर्वरङ्ग के समान अनिवार्य नहीं, अपितु रसाङ्गभूत इति द्वित्तक में प्राशस्त्य का सम्पादन करनेवाली ही है । यह बात भरतमुनि ने स्वयं कही है-- 'शास्त्र में अङ्गों का यह छः प्रकार का प्रयोजन देखा गया है । इष्ट अर्थ की रचना, वृत्तान्त का क्षोभ न होना, अभिनयदर्शन से सामाजिकों के मनोरञ्जन की समृद्धि, गोपनीय तत्त्वों का गोपन, चमत्कार कारक कथन और प्रकाशनोय तत्वों का प्रकाशन ।'
यदि ये अभिप्राय सिद्ध न हो रहे हों प्रत्युत अङ्गों से रस में व्याघात उत्पन्न हो रहा हो तो शास्त्रमर्यादापालन के लिये ही काव्य या नाट्य में उनका समावेश नहीं करना चहिये । जैसा कि वेणीसंहार में किया गया है । वेणीसंहार में अनेक वीरों का संक्षय उपस्थित है; महाभारत का युद्ध होने जा रहा है उसी प्रसङ्ग के अन्दर दुर्योंधन अन्तःपुर में जाते हैं और वहाँ उनकी भानुमती से श्रृङ्गार का विस्तार वर्णित किया जाने लगता है । कवि ने यह सब अप्रासङ्गिक तथा अवसर के प्रतिकूल इसलिये किया है कि उसे प्रतिमुखसन्धि के अङ्गविलास की पूर्ति करनी है । विलास की भरतमुनि ने यह परिभाषा दी है-- 'रतिभोग के प्रयोजनवाली इच्छा को विलास कहा जाता है ।'
वस्तुतः वेणीसंहार के लेखक भट्टनारायण ने इस प्रकरण का ठीक अर्थ समझ नहीं पाया है । यहाँ पर 'रतिभोग के प्रयोजनवाली इच्छा' का यथाश्रुत अर्थ नहीं है, अपितु यह शब्द उपलक्षणपरक है । अतः इसका अर्थ हो जाता है—जिस रस का अधिकारिक के रूप में उपादान किया गया हो उसका स्थायिभाव। अतः श्रृङ्गार
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इदं चापरं प्रवन्धस्य रसव्यञ्जकत्वे निमित्तं यदुत्तीपनप्रशमनने यथावसरमनतरां रसस्य यथा रत्नावल्यामेव ।
(अनु०) यह दूसरा प्रवन्ध की रसव्यञ्जकता में निमित्त है कि अवसर के अनुसार रस के बीच में उद्दीपन और प्रशमन ( होने चाहिये ।) जैसे रत्नावली में ही।
लोचन उद्दोपन इति । उद्दोपनं विभावादिपरिपूरण्या । यथा 'अयं स राआ उदयणो ति' इत्यादि सागरिकाया: । प्रशमनं वासवदत्तात: पलायने । पुनरुद्दीपनं चित्रफलकोटिलेखे । प्रशमनं सुसज्जताप्रवेशे इत्यादि । गाढं ध्यानवरतपरिस्मृतिदितो रस: सुकुमारमालतीकुसुमवज्ज्झटित्येव म्लानिमवलम्बते । विशेषतस्तु शृङ्गार: । यदाह मुनि:-
यद्वामाभिनिवेशश्लक्ष्णं यतत्क्षणं विनिवार्यते ! दुर्लभत्वं यतो नार्या कामिन: सा परा रतिः ॥ इति ।
वीररसादावपि यथावसरुद्दीपनप्रशमनाभ्यां विना शृङ्गारादित्येवादृृतफलकल्पे साध्ये लब्धे प्रकटीचिकीर्षित उपायोपेयभावो न प्रदर्शित एव स्वभाव: । 'उद्दोपन' यह।यह विभावादि परिपूरण के द्वारा उद्दीपन जैसे सागरिका का 'यह वह राजा उदयन है' इत्यादि । प्रशमन जैसे वासवदत्ता से पलायन में । फिर उद्दीपन जैसे चित्रफलक के उल्लेख में ।प्रशमन सुसज्जता के प्रवेश में इत्यादि ।गाढ़रूप में निरन्तर मसला हुआ रसकुमार मालती कुसुम के समान शीघ्र ही म्लानता को प्राप्त हो जावे और विशेषरूप में शृङ्गार । जैसा कि मुनि ने कहा है— 'जो कि विपरीत अभिनिवेश होता है, जो कि मन किया जाता है जो कि नारी दुर्लभ होती है कामियों की वह बहुत बड़ी रीति है ।'
वीररस इत्यादि में भी अवसर के अनुसार उद्दीपन और प्रशमन के बिना शृङ्गार आदि में ही अद्भुत फल के समान साध्य के प्राप्त हो जाने पर जिस उपायोपेयभाव के प्रकट करने की इच्छा है वह प्रदर्शित हो ही नहीं सकता ।
तारावती का प्रयोजन रतिभोग की इच्छा है और वीररस का प्रयोजन उत्साह की इच्छा है । वेणीसंहार में वीररस प्रकृत है अतः विलास की पूर्ति के लिये रतिभोगेच्छा का नहीं अपितु उत्साहेच्छा का विस्तार किया जाना चाहिये ।
प्रबन्ध की रसव्यञ्जकता का चौथा निमित्त हैं अवसर को समझकर बीच-बीच में रस को उद्दीस करना और बीच-बीच में धान्त करना । जो आधिकारिक रस प्रकान्त किया गया हो उसको निरन्तर प्रगाढ़ रूपमें परिपुष्ट करते रहने की चेष्टा नहीं करनी चाहिये । रस को बीच-बीच में उद्दीस करने का अर्थ है इसमें उचित
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विभाव इत्यादि की पूर्ण योजना करते हुये प्रकाशित करना ( प्रशमन का अर्थ है उसको विशिष्टित कर आस्वाद की धारा को विच्छिन्न कर देना) इसका भी उदाहरण रत्नावली से ही दिया जा सकता है। रत्नावली में मदनपूजन के अवसर पर उदयन का नाम सुनकर सागरिका कहती है कि ‘ये वहाँ राजा उदयन हैं।’ यहाँ पर सागरिका की शृङ्गारभावना उद्दीत होती है फिर वासवदत्ता के भय से जब सागरिका भागने लगती है तब उस भावना का प्रशमन हो जाता है। फिर चित्रफलक के उल्लेख में उस भावना का पुनः उद्दीपन होता है; सागरिका का तन्मयतापूर्वक राजा का चित्रचित्रण, सखी के सामने कामदेव के चित्र बनाने का बहाना, सखी का निकट ही रति के रूप में सागरिकानामधारिणी रत्नावली का चित्र बना देना, वानर के सम्भ्रम से चित्र का छूट जाना और वह राजा द्वारा प्राप्त करना इत्यादि समस्त प्रकरण में पुनः शृङ्गारभावना का उद्दीपन होता है पुनः वासवदत्ता की सखी सुसज्जता के प्रवेश करने पर इस भावना का प्रशमन हो जाता है। (फिर सागरिका की सखी से सङ्केतस्थान नियत करने में शृङ्गारभावना की उद्दीप्ति और सागरिका के वेश में वासवदत्ता के आ जाने से उस भावना का प्रशमन, यही क्रम चलता रहता है।) इस प्रकार ठीक अवसर पर उद्दीपन और ठीक अवसर पर प्रशमन होने से शृङ्गार रस के अन्दर नीरसता नहीं आने पाती और बार-बार उद्दीप्त तथा प्रशान्त होकर शृङ्गारभावना परिशीलकों का अनुरंजन करने में सर्वथा समर्थ हो जाती है। यदि एक ही रस का निरन्तर परिमर्दन किया जाये तो वह उसी प्रकार मलिन हो सकता है जैसे सुकुमार मालती का पुष्प निरन्तर मसलने से मलिन हो जाता है। यह बात शृङ्गार के विषय में विशेष रूप से कही जा सकती है; क्योंकि शृङ्गार में तो प्रच्छादनपूर्वक निर्वाह ही आनन्ददायक होता है। मुनि ने कहा है—
‘स्त्रियों की वामाचरण की अभिलाषा होती है अर्थात् स्त्रियों की यह सामान्य प्रवृत्ति होती है जो व्यक्ति या वस्तु उन्हें सर्वाधिक प्रिय होती है उसके प्रेम को वे सहसा प्रकट नहीं करती, प्रत्युत उसके प्रति वे अधिक से अधिक विपरीत आचरण करती हैं। दूसरी बात यह है कि स्त्रियों का मिलना जुलना समाज में ठीक नहीं माना जाता और सामान्यतया उसका निवारण किया जाता है। स्त्रियाँ प्रायः सुलभ नहीं होतीं। कामियों के लिये रति की सबसे बड़ी भूमिका यही है।’ वीररस में भी अवसर के अनुसार उद्दीप्त और प्रशमन करना ही पड़ता है। यदि ऐसा न किया जावे और एक बार के उद्योग में ही सफलता मिल जावे तो वह सफलता ऐसी ही होगी जैसे इन्द्रजाल इत्यादि में कोई कार्य दिखला दिया जाता
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पुनरारुद्धविश्रान्ते रसस्याङ्गिनोऽतुसन्धिषु । यथा तापसवत्सराजे ।
(अनु०) पुनः जिसका विश्राम आरम्भ हो गया हो उस अङ्गी रस का पुनः अनुसन्धान करना जैसे तापसवत्सराज में ।
पुनररिति । इत्यितिवृत्तवशादारुढाSSशङ्क्यसमाप्तप्राया न तु सर्वथैवोपनता विश्रान्तविच्छेदो यस्स स तथा । रसस्येति । रसाङ्गभूतस्य कस्यापि तत्त्वस्य यावत् । तापसवत्सराजे 'पुनः' यह । इत्यितिवृत्तवश्य जिसकी विश्रान्ति अर्थात् विच्छेद आरम्भ किया गया हो अर्थात् केवल आश्रय का विषय ही बना हो सर्वथा उपनत न हुआ हो उस प्रकार से । 'रस का यह' । आशय यह है कि रस के अङ्गभूत किसी भी तत्त्व का । निस्सन्देह तापसवत्सराज में वासवदत्ता विषयक, जीवितस्वाभिमानात्मक
तारावती
है तथा उसका हेतु दिखाने की कोशिश की समष्टि में नहीं आता । ऐसी दशा में कवि का यह दिखलाने का अभिप्राय कभी सिद्ध नहीं हो सकता कि अमुक उपाय से अमुक फल की सिद्धि हुई । कवि को प्रवन्धयोजना में जिस दूसरे तत्त्व का ध्यान रखना पड़ता है वह यह है कि यदि अङ्गीरस का विच्छेद प्रारम्भ हो गया हो तो उसका पुनः अनुसन्धान कर लेना चाहिये । आशय यह है कि अङ्गी रस कभी बहुत समय के लिये दृष्टि से ओझल नहीं होना चाहिये । यदि इतिवृत्त का निर्वाह करने के लिये अङ्गीरस को बहुत समय तक छोड़ देना अनिवार्य हो जावे तो बीच-बीच में उसका अनुसन्धान करते चलना चाहिये । 'विच्छेद आरम्भ हो गया हो' का आशय यह है कि जिस समय कथा-प्रवाह में अङ्गीरस के विच्छेद की आशङ्का उत्पन्न हो जाने उस समय उसका अनुसन्धान कर लेना नाहिये उसका सर्वथा तिरोधान तो होने ही नहीं देना चाहिये । 'रस का अनुसन्धान कर लेना चाहिये' में रस का आशय है रस के अङ्गभूत किसी तत्त्व का, अर्थात् यह आवश्यक नहीं है कि सर्वत्र अङ्गी रस का पूरा परिपोष ही किया जावे । रस के विभाव इत्यादि किसी तत्त्व का उल्लेख ही पर्याप्त होता है । उदाहरण के लिये 'तापसवत्सराज' नामक नाटक को लीजिये
( दीधितिकार ने लिखा है कि 'तापसवत्सराज' नामक नाटक उपलब्ध नहीं होता, किन्तु सुना जाता है कि यह नाटक विन्ध्याचल के पास के किसी गाँव में मिला है । बालप्रियाकार ने तापसवत्सराज के अनुपलब्ध होने की बात नहीं लिखी है, प्रत्युत लोचन में जिन श्लोकों का सङ्केत किया गया है उन श्लोकों के पूरे-पूरे भाग मूल पुस्तक के आधार पर लिख दिये हैं । इससे सिद्ध होता है कि सम्भवतः बालप्रिया-कार को यह पुस्तक देखने को मिल गई होगी । प्रतीत होता है कि यह नाटक
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हि वासवदत्ताविषयो जीवलत्सर्वस्वाभिमानात्मा प्रेमबन्धस्तद्विभावाद्यौचित्याल्कहण- विप्रलम्भादिभूमिका गृह्णन् समस्तेरितिवृत्तच्यापी । राज्यप्रस्त्यापल्या हि सचिननीति- प्रेमबन्धन उन विभावों के औचित्य से ये करण विप्रलम्भ की भूमिकाओं को ग्रहण करते हुये समस्त इतिवृत्त में व्यापक है। सचिननीति की महिमा से आई हुई उसके
भासरचित ‘स्वप्नवासवदत्तम्’ के आधार पर लिखा गया होगा ।) इस नाटक में वासवदत्ता के प्रति प्रेमबन्धन समस्त इतिवृत्त में व्यापक है। इस प्रेमबन्धन की आत्मा है दोनों का एक दूसरे को जीवनसर्वस्व मानना। ( कूटनीतिक कारणों से जव मन्त्री लोग वासवदत्ता को छिपाकर उसके आग में जलकर मर जाने की घोपणा कर देते हैं उस समय ) उन विभावों के औचित्य से ( अनुकूल परिस्थितियों को प्राप्त कर ) वह वासवदत्ता के प्रति प्रेमबन्ध करण विप्रलम्भ का रूपधारण कर लेता है। ( विप्रलम्भ शृङ्गार और करुण दोनों वेदनाप्रधान रशे हैं। इनमें भेद यह है कि यदि आलम्बन का विन्धेद न हो गया हो और दोनों के पुनः सम्भिलन की आशा बनी हुयी हो तो विप्रलम्भ शृङ्गार होता है, यदि मरण हो गया हो और पुनः सम्भिलन की आशा दोष न हो तो उस अवस्था में जो दुःख होता है वह करुण रस कहलाता है। यदि मरण के बाद पुनः सम्भिलन की आशा बनी हुयी हो जैसा की दैवी शक्ति के प्रभाव से प्रायः सम्भव हो सकता है तो वहाँ पर करुण विप्रलम्भ होता है। वासवदत्ता के मरण के समाचार से वस्तुतः उदयन का करुण रस है करुणविप्रलम्भ नहीं; क्योंकि पुनः सम्भिलन की आशा उदयन को नहीं है। किन्तु एक तो पाठकों को पुनः सम्भिलन की आशा बनी हुयी है जिससे वे उस दुःख को करुण विप्रलम्भ समझकर ही आस्वादित करते हैं, दूसरे स्वप्नदर्शन इत्यादि घटनाओं से वासवदत्ता के पुनः मिलन की तीव्र आशा उदयन के हृदय में भी कभी-कभी जागृत होती रहती है। इसीलिये यहाँ पर उदयन के दुःख को करुण विप्रलम्भ कहा गया है ( करुण रस नहीं।) इस प्रकार वासवदत्ता का वदां-चढ़ा प्रेमबन्धन करुण विप्रलम्भ इत्यादि करुण इत्यादि की और विप्रलम्भ इत्यादि की भूमिकाओं को ग्रहण करते हुये समस्त इतिवृत्त में व्याप्त है। ( अङ्गी रस की दूसरी विरोषता यह होती है कि में उसका फल से योग करा दिया जावे ।) तव स्वप्तस्सराज का फल ही है वासवदत्ता की प्राप्ति। साथ ही मन्त्रियों की नीति की महिमा से राज्य की पुनः प्राप्ति हो जाती है और साथ ही उसमें अज्ञभूत पज्ञावती का लाभ भी सम्मिलित है। इस प्रकार वासवदत्ता की प्राप्ति में प्राणों का सञ्चार करनिवाली हैं राज्य की पुनः प्राप्ति और साथ में पज्ञावती का लाभ। इन सब फलों में देवी वासवदत्ता की प्राप्ति
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महिमोपनतया तद्भूतप्रभावतैलानुगतया डनुप्राण्यमानरूपा परमाममिलषणीयतमतां प्राप्ता वासवदत्ता धिगतरेयं तन्र फलम्। निर्वहणं हि 'प्राप्ता देवी भूतधात्री च भूयः सम्बन्धोडभूदर्शनेन' इत्येवं देवीलाभप्रधानं निर्वाहितम्। इत्यन्त चेतिवृत्तवैचित्र्यायिने भित्तिस्थानीयो वासवदत्ताप्रेमबन्धः।
महिमा से युक्त होने के कारण उस (वासवदत्ता) के भाव के प्रभाव से अनुरंजित होने के कारण तथा अनुप्राणित होने के कारण अत्यन्त मनोरम होकर वासवदत्ता ने धिक् इस कथा को प्राप्त किया । यहाँ निर्वहण में 'देवी भूतधात्री पुनः प्राप्त हुई और दर्शक के साथ सम्बन्ध स्थापित हुआ' इस प्रकार देवी के लाभ को प्रधानता देकर निर्वहण किया गया है । इस प्रकार चेतिवृत्त के वैचित्र्य के लिए वासवदत्ता का प्रेमबन्ध भित्तिस्थानीय है ।
लोचन
तेन स एव वासवदत्ताविषयः प्रेमबन्धः कथावस्तुदारकः्यमानविच्छेदैरुद्भयनुसंधितः। तथा हि प्रथमे तावदृष्टं स्फुटं स एतदोपनिबद्धः अद्भुतपद्मावती के लाभ से अनुगत राज्य की पुनः प्राप्ति से अनुप्राणित होनेवाली और परम अभिलषणीयतां को प्राप्त वासवदत्ता की प्राप्ति ही वहाँ पर फल है ।
इसलिए वही वासवदत्ता विषयक प्रेमबन्ध कथा के वस्तु विस्तार के हेतु है, जो विच्छेदों से युक्त है । जैसे कि पहले स्पष्ट रूप से ही वासवदत्ता के प्रेम को उपनिबद्ध किया गया अद्भुतपद्मावती के लाभ से अनुगत राज्य की पुनः प्राप्ति से अनुप्राणित होनेवाली और परम अभिलषणीयता को प्राप्त वासवदत्ता की प्राप्ति ही वहाँ पर फल है ।
तारावती
निर्वहण में निस्सन्देह 'प्राणियों की रक्षा करनेवाली देवी पुनः प्राप्त हो गई और दर्शक के साथ सम्बन्ध हो गया' इस प्रकार देवी लाभ के प्राधान्य का निर्वाह कर दिया गया । और इतने इतिवृत्त के वैचित्र्यरूप चित्र में वासवदत्ता का प्रेमबन्ध भित्तिस्थानीय है क्योंकि प्रथम मन्त्रणा से परिसमाप्त कर पण्डितवति-विवाहादौ, तस्यैव व्यापरारात् ।
निर्वहण में निस्संदेह 'प्राणियों की रक्षा करनेवाली देवी पुनः प्राप्त हो गई और दर्शक के साथ सम्बन्ध हो गया' इस प्रकार देवी के लाभ का ही निर्वाह किया गया । और इतने इतिवृत्त के वैचित्र्यरूप चित्र में वासवदत्ता का प्रेमबन्ध भित्तिस्थानीय है क्योंकि प्रथम मन्त्रणा से लेकर पण्डितवती के विवाह आदि में उसी की क्रिया (दृष्टिगत होती है । )
इत्यादि में उसी की क्रिया ( दृष्टिगत होती है । ) इससे वही वासवदत्ताविषयक उस प्रेमबन्धन का, जिसके विच्छेद की कथा के कारण आशाङ्का हो रही थी, अनुसन्धान कर लिया गया। वह इस प्रकार—पहले अङ्क में तो स्पष्ट रूप में ही उपनिबद्ध किया
इससे वही वासवदत्ताविषयक उस प्रेमबन्धन का, जिसके विच्छेद की कथा के कारण आशंका हो रही थी, अनुसंधान कर लिया गया । वह इस प्रकार—पहले अङ्क में तो स्पष्ट रूप में ही उपनिबद्ध किया
ही प्रधान है क्योंकि 'प्राणियों की रक्षा करनेवाली देवी पुनः प्राप्त हो गई और दर्शक से सम्बन्ध हो गया ।' इन शब्दों में निर्वहण में देवी के लाभ का ही निर्वाह किया गया है । यह इतिवृत्त का वैचित्र्य एक इतना बड़ा (विशाल) चित्र है जिसमें फलक का काम देता है वासवदत्ता का प्रेमबन्ध ।
ही प्रधान है क्योंकि 'प्राणियों की रक्षा करनेवाली देवी पुनः प्राप्त हो गई और दर्शक से सम्बन्ध हो गया ।' इन शब्दों में निर्वहण में देवी के लाभ का ही निर्वाह किया गया है । यह इतिवृत्त का वैचित्र्य एक इतना बड़ा (विशाल) चित्र है जिसमें फलक का काम देता है वासवदत्ता का प्रेमबन्ध ।
क्योंकि जब सर्वप्रथम मन्त्रणादि में आपस में मन्त्रणा होती है वहाँ से लेकर पण्डितवती के विवाह इत्यादि में उसी वासवदत्ता के प्रेमबन्ध की क्रिया ही (दिखलाई देती है ।) जब कथा आगे बढ़ती है और दूसरे इतिवृत्त खण्डों का विस्तार होने लगता है तब ऐसी सम्भावना उत्पन्न हो जाती है वह प्रमुख प्रेमबन्ध विच्छिन्न हो जाएगा ।
क्योंकि जब सर्वप्रथम मन्त्रणा आदि में आपस में मन्त्रणा होती है वहाँ से लेकर पण्डितवती के विवाह इत्यादि में उसी वासवदत्ता के प्रेमबन्ध की क्रिया ही (दिखलाई देती है । ) जब कथा आगे बढ़ती है और दूसरे इतिवृत्त खण्डों का विस्तार होने लगता है तब ऐसी सम्भावना उत्पन्न हो जाती है वह प्रमुख प्रेमबन्ध विच्छिन्न हो जाएगा ।
(क्योंकि जब वासवदत्ता गुप्त वास करने लगती है और उदयन उसे मरी हुई समझते हैं उनका पण्डितवती से पुनः विवाह हो जाता है तब वासवदत्ता के प्रेम का अवसर ही नहीं रह जाता ।) उद्भव विच्छिन्न प्रेमबन्धन का अनुसन्धान कवि बार-बार प्रत्येक अङ्क में करता चलता है जिससे प्रधन कार्य आँखों से सर्वथा तिरोहित न होजावे ।
(क्योंकि जब वासवदत्ता गुप्त वास करने लगती है और उदयन उसे मरी हुई समझते हैं उनका पण्डितवती से पुनः विवाह हो जाता है तब वासवदत्ता के प्रेम का अवसर ही नहीं रह जाता । ) उद्भव विच्छिन्न प्रेमबन्धन का अनुसन्धान कवि बार-बार प्रत्येक अङ्क में करता चलता है जिससे प्रधान कार्य आँखों से सर्वथा तिरोहित न हो जाए ।
वह इस प्रकार समझिये—प्रथम अङ्क में तो वासवदत्ता का प्रेमस्फुट रूप में ही उपनिबद्ध किया गया है । यहाँ पर लोचनकार ने तापसवत्सराज के प्रथम अङ्क के एक श्लोक के प्रथम और अन्तिम चरण लिखे हैं। बालप्रियांकार के अनुसार पूरा पद्य इस प्रकार होगा—
वह इस प्रकार समझिये—प्रथम अङ्क में तो वासवदत्ता का प्रेमस्फुट रूप में ही उपनिबद्ध किया गया है । यहाँ पर लोचनकार ने तापसवत्सराज के प्रथम अङ्क के एक श्लोक के प्रथम और अन्तिम चरण लिखे हैं । बालप्रियांकार के अनुसार पूरा पद्य इस प्रकार होगा—
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तदुक्तमेन्दुविलोकेन दिवसो नीतः प्रदोषस्तथा तद्गोष्ठ्यैव इत्यादिना 'वद्दोल्कण्ठमिदं मनः किमथ वा प्रेमासमासोल्सवम्' इत्यन्तेन । द्वितीयेऽपि 'दृष्टिनामृतवर्षिणी स्मितमधुप्रस्यान्दि वक्त्रं न किम्' इत्यादिना स एव विच्छेदोऽनुसन्धितः । तृतीयेऽपि ।
उसके मुखचन्द्र के अवलोकन के द्वारा दिन और उसकी गोष्ठी से ही प्रदोष विताया' यहाँ से 'क्यों मेरा मन उत्कण्ठा से भरा है अथवा प्रेम असमास उत्सव वाला है?' यहाँ तक । 'क्या दृष्टि अमृत की वर्षानेवाली नहीं है ? क्या मुख मुस्कुराहट रूप मधु को प्रवाहित करनेवाला नहीं है ?' इत्यादि से उसी विच्छेद का अनुसन्धान कर लिया गया । तीसरे में भी—
तारावती मैंने अपने दिन वासवदत्ता के मुख कमल के अवलोकन के द्वारा विताये हैं, अपने सन्ध्या काल वासवदत्ता से बात-चीत का आनन्द लेते हुये विताये हैं । वह वासवदत्ता कामवासनाजन्य आनन्दातिरेक में भरकर उत्साह के साथ अपने अज्ञ अर्पित किया करती थी; मैं उन्हीं आनन्दानुभावों में अपनी रात्रियाँ विताया करता था। ( इस प्रकार उसके सहवास में कोई कमी नहीं रह गई और मैं भरपूर आनन्द लेता रहा हूँ । फिर भी.) इस समय वह मार्ग में निगाह गड़ाये बैठी होगी और उसको देखने के लिये मेरे इस मन में पूरी उत्कण्ठा भरी हुई है, न जाने यह क्या बात है, अथवा प्रेम का उत्सव तो कभी समाप्त ही नहीं होता । ( सम्भवतः उदयन ने ये शब्द मृगया से लौटने के अवसर पर कहे हैं । ) द्वितीय में भी राजा वासवदत्ता की याद करते हैं । यहाँ पर भी पद्य का एक ही चरण दिया गया है।
तदुक्तमेन्दुविलोकेन दिवसो नीतः प्रदोषस्तथा, तद्गोष्ठ्यैव निशापि मन्मथकृतोत्साहेस्तद्ग्रापणैः । तां सम्प्रत्यपि मार्गदस्तनयनां हष्टुं प्रवृत्तस्य मे, बद्दोल्कण्ठमिदं मनः किमथ वा प्रेमासमासोल्सवम् ॥
दृष्टिनामृतवर्षिणी स्मितमधुप्रस्यान्दि वक्त्रं न किम्, नो ध्वान्तं हृदयं न चन्दनरसरस्पर्शान्ति चाझ्ञानि वा । कस्यन्न लब्धपदेन ते कृतमिदं क्रूरेण पीतामिना, नूनं वञ्जमयोद्नयं दहनसस्थेयेदमाचेष्टितम् ॥
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सर्वत्र ज्वलितेषु वेश्मसु भयादालीजने चिन्तुते, श्वासोच्छ्वासम्पविहस्तया प्रतिपदं देङ्ग्रा पतन्स्या तथा । हा नाथेति सुहुः प्रलापपरया दग्धं वराक्या तथा, शान्तेनापि कियं तु तेन हृदनेतापि दह्यामहे इत्यादिना ।
नि:श्वास कम्प और घबराहट से भरी हुई और उस प्रकार प्रतिपद गिरती हुई 'हा नाथ' इन शब्दों के साथ वार-चार प्रलाप में लगी हुई वह बेचारी देवी जल गई। किन्तु शान्त भी उस अग्नि से हम तो आज भी जले जा रहे हैं ।' इत्यादि के द्वारा ।
चतुर्थेऽपि—देवीस्वीकृतमानसस्य नियतं स्वप्नायमानस्य मे, तदृगोत्रप्रहरणादियं सुवदना यायात्कयं न ब्यथाम् ।
देवीस्वीकृतमानसस्य नियतं स्वप्नायमानस्य मे, तदृगोत्रप्रहरणादियं सुवदना यायात्कयं न ब्यथाम् ।
'देवी के द्वारा मेरा मन स्वीकार कर लिया गया है ( अतः ) निश्चितरूप से स्वप्न देखने लगने पर उसके नाम का ग्रहण करने से यह सुमुखी ( पद्मावती ) तारावती
( आशय यह है कि तुम्हारे सभी अङ्ग इस प्रकार के थे कि अग्नि उन्हें जला ही नहीं सकती थी । नेत्रों में अमृत भरा था, मुख स्मित का मधु बरसाता था, हृदय आर्द्र था और सारे अङ्ग चन्दनरस से लिपे जैसे थे । ) न जाने किस अङ्ग में पैर जमाकर अग्नि ने यह कर डाला ? तुम कूर अग्नि के द्वारा पी ही ली गई। निस्सन्देह यह वज्र की वनी हुई कोई दूसरी ही आग होगी जिसका यह कार्य हुआ है । ( साधारण आग की इतनी शक्ति ही नहीं थी कि तुम्हारे मधुर अङ्गों को जला सकती ।)
फिर तृतीय अङ्क में भी स्मरण करते हैं—
'जिस समय सारे भवन चारों ओर से जलने लगे होंगे और भय के कारण सारी शक्तियाँ इधर उधर भागने लगी होंगी उस समय वह देवी ( राक्षवदत्ता ) चबचरा गई होगी, उसकी गहरी श्वासें चलने लगी होंगी, वह काँपने लगी होगी और प्रतिपद गिर रही होगी । 'हाय नाथ !' यह बार बार कहती हुई विलाप कर रही होगी । वह बेचारी इसी प्रकार जल गई होगी । वह आग यद्यपि शान्त हो गई है किन्तु उस आँच से हम आज भी जले जा रहे हैं ।'
'मेरे मन को देवी ने स्वीकार कर लिया है, यदि मैं सो गया तो निश्चित रूप
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इत्थं यन्निर्णयाकथंकथमपि क्षीणा निशा जाग्रते, दाक्षिण्योपहतेन सा प्रियतमा स्वप्नेऽपि नासादिता ।
लोचन
इत्यादिना । पञ्चमेडपि समागमप्रत्याशया करुणेऽपि वृत्ते विप्रलम्भेऽङ्किते—तथाभूते तस्मिन् सुनिवृत्तौ जातागसि सति, प्रयत्नान्तगूढां ऋषमुपगता मे प्रियतमा । प्रसादेति प्रोक्ता न खलु क्रुपितेत्युक्षितमधुरम्, समुद्रिज्ञा पीतैर्ननयनसलिलैः स्थास्यति पुनः ॥
इत्यादिना । पञ्चमेडपि—क्यों व्यथा को प्राप्त न होगी । इस प्रकार यन्निर्णयापूर्वक जैसे-तैसे जागते हुये रात बीत गई । दाक्षिण्य के द्वारा उपहत मैं उस प्रियतमा को स्वप्न में भी प्राप्त नहीं कर पाया ।
इत्यादि के द्वारा । पञ्चम में भी समागम की प्रत्याशा से करुण के निवृत्त हो जाने पर और विप्रलम्भ के अंकुरित होने पर—मुनि वचन के उस प्रकार ( समक्ष ) होने पर, मेरे अपराध करते पर प्रयत्नपूर्वक सन्दर छिपाये हुये क्रोध को प्राप्त हुयी मेरी प्रियतमा ‘प्रसन्न हो’ यह कही हुयी ‘मैं निस्सन्देह कुपित नहीं हूँ’ यह मधुर उक्ति में कहकर छिपे हुये नयन-जल के साथ पुनः स्थित होगी ( अथवा नेत्रजल के द्वारा प्रकाशित प्रेम वाली स्थित होगी । )
इत्यादि के द्वारा । छठे में भी—
तारावती
से मैं देवी वासवदत्ता को स्वप्न में अवश्य देखूँगा और उसका नाम लेकर बढ़-बढ़ाने लगूँगा जिससे सुन्दर मुखवाली यह पद्मावती अवश्य व्यथित हो जावेगी, इस प्रकार यन्निर्णय के साथ जागते हुये हैं । जैसे-तैसे रात बीत गई । मैं दाक्षिण्य के द्वारा ऐसा मारा गया हूँ कि प्रियतमा मुझे स्वप्न में भी प्राप्त नहीं होती ।
पञ्चम में भी जब समागम की प्रत्याशा उत्पन्न हो जाती है और करुणरस निवृत्त हो जाता है तथा शुद्ध विप्रलम्भ अंकुरित हो जाता है, तब उदयन कहते हैं—
‘मुनि ने जो कुछ कहा है वह जब उसी रूप में घटित हो जावेगा (सम्भवतः मुनि ने पुनःसम्भिलन की भविष्यवाणी की होगी । ) अर्थात् जब मुनि के कथनानुसार मेरा वासवदत्ता से पुनः सम्भिलन हो जावेगा तब पुनः यह स्थिति आवेगी कि मैं अपराध करूँगा और मेरी प्रियतमा प्रयत्नपूर्वक अपने क्रोध को छिपाये हुये कुपित नहीं हूँ” । वह आँसुओं को पी गई होगी तथा उन आँसुओं से भरी हुयी होगी और पुनः इस रूप में स्थित होगी ।’ ( कहीं कहीं ‘समुद्रिज्ञपीतैः नयनसलिलैः
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‘त्वत्सम्प्रासिविलोभितेन सचिनैः प्राणा मया धारिताः’ इत्यादिना । अलंकृतोनामिति योजनापेक्षया कर्मणि षष्ठी । हरशते चेति । तथास्वप्नवासवदत्तारये नाटके—
‘त्वत्सम्प्रासिविलोभितेन सचिनैः प्राणा मया धारिताः’ इत्यादिना । अलंकृतोनामिति योजनापेक्षया कर्मणि षष्ठी । हरशते चेति । तथास्वप्नवासवदत्तारये नाटके—
स्वकृतपक्ष्मकपाटं नयनद्वारं स्वरूपताडनेन । उद्घाट्य सा प्रविश्टा हृदयगृहं मे नृपतनूजा ॥ इति ॥ ९४ ॥ 'सचिवों ने तुम्हारी सम्पत्ति का लोभ दिखला कर मुझसे प्राण धारण करवाये ।' इत्यादि के द्वारा । 'अलंकृतोनाम्' इसमें योजना की दृष्टि से कर्म में षष्ठी हो जाती है 'और देखे जाते हैं' यह । जैसे स्वप्नवासवदत्ता नामक नाटक में— 'भलोभाँति जड़े हुये पलकलहरी कियाकियेवाले नेत्रद्वार को सौन्दर्यशाली ताड़न के द्वारा खोलकर वह राजकुमारी हृदयरूपी घर में प्रविष्ट हो गई' ॥ ९५ ॥
स्वकृतपक्ष्मकपाटं नयनद्वारं स्वरूपताडनेन । उद्घाट्य सा प्रविश्टा हृदयगृहं मे नृपतनूजा ॥ इति ॥ ९४ ॥
'सचिवों ने तुम्हारी सम्पत्ति का लोभ दिखला कर मुझसे प्राण धारण करवाये ।' इत्यादि के द्वारा ।
'अलंकृतोनाम्' इसमें योजना की दृष्टि से कर्म में षष्ठी हो जाती है 'और देखे जाते हैं' यह । जैसे स्वप्नवासवदत्ता नामक नाटक में—
'भलोभाँति जड़े हुये पलकरूप कियाकियेवाले नेत्रद्वार को सौन्दर्यशाली ताड़न के द्वारा खोलकर वह राजकुमारी हृदयरूपी घर में प्रविष्ट हो गई' ॥ ९५ ॥
तारावती यह पाठ भी देखा जाता है । इसका अर्थ है—नेत्राजल से उसका प्रेम प्रकट हो रहा होगा ।)
पञ्च अङ्क में भी राजा ने कहा है—( यहाँ पर भी लोचनकारने केवल प्रथम चरण ही उद्धृत किया है । बालप्रिय के अनुसार पूरा पाठ यह होगा )— t्वत्सम्प्रासिविलोभितेन सचिनैः प्राणा मया धारिताː, तन्मत्वाड्लयतः शरीरकमिदं नैवास्ति निस्स्नेहता । आसक्तोऽस्मि रसस्तवातुगमने जाता धृतिː किन्नु यत्, सेधो यत् तवापगां न हृदयं तल्संविद् ऋणो द्वारुणम् ॥
तुम्हारी प्राप्ति का लोभ दिखाकर मन्त्रियों ने मेरे प्राण बचाए । उसीको ठीक मान कर मैंने इस तुच्छ शरीर का परित्याग नहीं किया । अतः यह मेरी स्नेह-हीनता नहीं कही जा सकती । जब तुम्हारे पीछे जाने का अवसर निकट आया तब मुझे धैर्यं उत्पन्न हो गया था क्योंकि उस समय मुझे तुम्हारे पुनः मिलने की सम्भावना हो गई थी ।
उस समय तुम्हारा अनुगामी नहीं वन गया । ( आशय यह है मैं तुम्हारे वियोग में मर न⁓ गया यह कोई आश्रये की बात नहीं; क्योंकि मुझे मन्त्रियों से तुम्हारे पुनः सम्भिलन का आश्वासन प्राप्त हो गया था, किन्तु मेरा हृदय आश्वासन मिलने के समय तक रुक्का रहा, विदीर्ण नहीं हो गया । ) इस प्रकार कथाप्रसङ्ग में यद्यपि अङ्गी रस विच्छिन्न हो गया था, किन्तु कवि ने प्रत्येक अङ्क में उसका अनुसन्धान कर लिया है जिससे वह रस पाटकों की दृष्टि से ओझल नहीं होता ।
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प्रबन्धविशेषस्य नाटकादे रसव्यक्तिनिमित्तमिदं चापरमवगन्तव्यं यदत्कृतीनां शक्तावप्यानुरूपेण योजनम्। शक्तो हि कविः कदाचिदङ्कारनिबन्धने तदाक्षिप्ततयैवानपेक्ष्यतरस्वभावः प्रबन्धमारभते, तदुपदेशार्थमिदमुक्तम्। हृदयेन्त चे करुणादिलक्षणनिबन्धनकरुणाद्यनुप्रविष्टरसः प्रबन्धभुत्।
(अनु.) नाटक इत्यादि विशेष प्रकार के प्रबन्ध का रसाभिव्यक्ति में निमित्त यह दूसरा (तत्व) समझा जाना चाहिये कि यक्ति होते हुये भी (रस की) अनुरूपता के साथ अलङ्कारों की योजना (की जावे)। समर्थ कवि निस्सन्देह कभी रसवन्धन की परवाह न करके अलङ्कारनिबन्धन के अवसर पर केवल उसी में अपना मन लगाकर तथा तत्क्षीन होकर प्रबन्ध का प्रारम्भ करता है उसके उपदेश के लिये यह कहा गया है। प्रबन्धकाव्यों में केवल अलङ्कारनिबन्धन में ही आनन्द लेनेवाले तथा रस की अपेक्षा न करनेवाले कवि देखे जाते हैं।
तारावतीः अब अलङ्कार योजना को लीजिये। कुछ कवि इतने प्रतिभाशाली तथा कल्पनाशील होते हैं कि उनकी बुद्धि में अलङ्कार स्फुरित होते ही चले जाते हैं। नाटक इत्यादि प्रबन्धों की रसाभिव्यञ्जकता का यह एक अन्य निमित्त है कि कवि अलङ्कारयोजना में कितना ही समर्थ क्यों न हो उसे अलङ्कारयोजना करने में रस की अनुरूपता का ध्यान अवश्य रखना चाहिये। समर्थ कवि निस्सन्देह कभी अपनी रचना करने में केवल अलङ्कारयोजना पर ही ध्यान केन्द्रित रखता है और उसी आधार पर प्रबन्ध लिख डालता है तथा रस की सर्वथा उपेक्षा कर देता है। उनकी उपदेश देने के लिये ही यह कहा गया है (जो कवि स्वयं रस की दृष्टि से ही अलङ्कारों का निबन्धन करते हैं उनकी तो कोई बात ही नहीं।) ऐसे भी कवि देखे जाते हैं जो अपने प्रबन्धकाव्यों में केवल अलङ्कारयोजना में ही आनन्द लेते हैं और रस की सर्वथा उपेक्षा कर देते हैं। जैसे स्वप्रवासवदत्तम् के इस कथन में—
'मेरे नेत्ररूपी दरवाजे पर पलकरूपी किराड़ी भली भाँति जड़े हुये थे। वह राजकुमारी सौन्दर्यरूपी ताड़न से (उसे खोलकर) मेरे हृदयरूपी घर में प्रविष्ट हो गई।'
यह कथन केवल रूपक के व्यसन से ही लिखा गया है। इसमें रसपरिपोष में सङ्केत केवल इतना अङ्ग है कि ‘राजकुमारी मेरे हृदयरूपी घर में नेत्र द्वारा से प्रविष्ट हो गई’। शेष अलङ्कार अनावश्यक है। इस दोष से महाकवि भी वचते हुये नहीं दिखलाई देते। हिन्दी के कतिपय मूद्र्धन्य कवियों ने भी कहीं-कहीं रूपक
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अनुस्वानोपमात्मापि प्रभेदो य उदाहृतः । ध्यानेऽस्य प्रवन्धेषु भासते सोऽपि केषुचित् ॥९४॥
(अनु०) और भी — 'ध्वनि का अनुस्वानोपमात्मक जो उपमेद बताया गया है कुछ प्रवन्धों में वह भी इस ( रसध्वनि ) का भासित होता है ।' ॥९४॥
न केवलं प्रवन्धेन साक्षाद्यस्ज्ज्यो रसो यावत्परम्पर्येणापोति दर्शयितुमुपक्रमते— किञ्चेति । अनुस्वानोपमः शब्दशक्तिमूलोऽर्थशक्तिमूलश्च, यो ध्वने: प्रभेद उदाहृतः प्रवन्ध से केवल साक्षात् रस व्यङ्ज्य नहीं होता अपितु परम्परा के द्वारा भी यह दिखलाने के लिये उपक्रम करते हैं—‘किञ्च’ यह । अनुस्वानोपम का अर्थ है शब्दशक्तिमूल और अर्थशक्तिमूल जो ध्वनि का उपमेद उदाहृत किया गया है वह न होकर अलङ्कारमात्र रह गया है । माघ, किरात इत्यादि में अलङ्कारों के व्यसन से ही प्रकृत कथा की उपेक्षा कर अपकृत पर्वतवर्णन इत्यादि का विस्तार किया गया है । नैषध में भी केवल उक्तिचमत्कार के मन्तव्य से ही कई स्थानों पर अनावश्यक विस्तार दिया गया है । ऐसे प्रवन्ध, रस की उपेक्षा के कारण, प्रशस्त नहीं कहे जा सकते ।
( ऊपर १४ वीं कारिका तक व्यङ्जकों का परिचय दिया जा चुका । सर्वप्रथम अविवक्षितवाच्य के व्यङ्जक बतलाये गये, फिर विवक्षितान्यपरवाच्य संलक्ष्यक्रम व्यङ्ज्य के व्यङ्जक बतलाये गये और अन्त में असंलक्ष्यक्रम व्यङ्ज्य रसध्वनि के व्यङ्जक वर्ण से लेकर प्रवन्ध तक वतला दिये गये । अब १५ वीं कारिका में यह बतलाया गया है कि प्रवन्ध भी संलक्ष्यक्रम अनुरणनरूप व्यङ्ज्य का भी व्यङ्जक होता है । इसके बाद १६ वीं कारिका में असंलक्ष्यक्रम व्यङ्ज्य के व्यङ्जक बतलाये गये हैं । यहाँ पर एक प्रश्न यह उपस्थित होता है कि जब १४ वीं कारिका में रसध्वनि के व्यङ्जक बतलाये गये और १६ वीं कारिका में भी रसध्वनि के व्यङ्जकों का ही निरूपण किया गया फिर १५ वीं कारिका में संलक्ष्यक्रम के व्यङ्जकों का निरूपण करने में क्या तर्क है ! अतः इसक्री सङ्गति के लिये लोचनकार ने इस १५ वीं कारिका को भी रसध्वनिविषयक ही माना है और यह दिखलाया है कि १४ वीं कारिका तक प्रत्यक्ष रसव्यङ्जक लिखे गये हैं तथा
( ऊपर १४ वीं कारिका तक व्यङ्जकों का परिचय दिया जा चुका । सर्वप्रथम अविवक्षितवाच्य के व्यङ्जक बतलाये गये, फिर विवक्षितान्यपरवाच्य संलक्ष्यक्रम व्यङ्ज्य के व्यङ्जक बतलाये गये और अन्त में असंलक्ष्यक्रम व्यङ्ज्य रसध्वनि के व्यङ्जक वर्ण से लेकर प्रवन्ध तक वतला दिये गये । अब १५ वीं कारिका में यह बतलाया गया है कि प्रवन्ध भी संलक्ष्यक्रम अनुरणनरूप व्यङ्ज्य का भी व्यङ्जक होता है । इसके बाद १६ वीं कारिका में असंलक्ष्यक्रम व्यङ्ज्य के व्यङ्जक बतलाये गये हैं । यहाँ पर एक प्रश्न यह उपस्थित होता है कि जब १४ वीं कारिका में रसध्वनि के व्यङ्जक बतलाये गये और १६ वीं कारिका में भी रसध्वनि के व्यङ्जकों का ही निरूपण किया गया फिर १५ वीं कारिका में संलक्ष्यक्रम के व्यङ्जकों का निरूपण करने में क्या तर्क है ! अतः इसक्री सङ्गति के लिये लोचनकार ने इस १५ वीं कारिका को भी रसध्वनिविषयक ही माना है और यह दिखलाया है कि १४ वीं कारिका तक प्रत्यक्ष रसव्यङ्जक लिखे गये हैं तथा
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अस्य त्रिवाच्यतान्यपरवाच्यस्य ध्वनेररुणणनरूपव्यङ्ग्यखोदपि यः प्रभेद उदाहृतो द्विप्रकारः सोऽपि प्रबन्धेषु केषुचिद् व्योतते । तथैव मधुमथनविजये (अनु ) इस द्विवक्षितान्यपरवाच्य ध्वनि का जो अनुरणनरूप व्यङ्ग्य प्रभेद भी दो प्रकार का बताया गया है वह भी कुछ प्रबन्धों में व्योतित होना है । वह
सः केषुचिद्प्रबन्धेषु निमित्तभूतेषु व्यङ्जकेपु सत्त्सु व्यङ्ज्यतया स्थितः सन् । अस्येति रसादिध्वने: प्रकृतस्य मासते व्यङ्जकतयैति शेषः । वृत्तिग्रन्थोऽप्येवमेव योड्यः । अथ वानुस्वानोपमः प्रभेद उदाहृतो यः प्रबन्धेषु मासते अस्यापि ‘ध्योत्योऽलक्ष्यक्रमः कव्वचित्’ इत्युत्तरश्लोकेन कारिकावृत्योः सङ्ज्झति । निर्मित्तभूत कुह् व्यङ्जक प्रबन्धों के होते हुये व्यङ्गयरूप में स्थित । ‘इसका’ अर्थात् प्रकृत रसध्वनि का व्यङ्जक के रूप में भासित होता है । यहाँ पर ‘व्यङ्जकतया’ यह शब्द वृत्तिग्रन्थ की योजना भी इसी प्रकार करनी चाहिये । अथवा अनुस्वानोपम जो बताया हुआ प्रभेद कुछ प्रबन्धों में भासित होता है इस का भी ‘ध्योत्य कहाँ-कहीं अलक्ष्य क्रम होता है’ इस वाक् चाले श्लोक से कारिका और वृत्ति की सङ्ज्झति हो जाती है ।
६५वीं और सोलहवीं कारिकाओं में परम्परा के द्वारा व्यङ्जक प्रकट प्रबन्ध के द्वारा साक्षात् रसाभिव्यक्ति तो होती ही है परम्परा के द्वारा भी प्रबन्ध रस का अभिव्यञ्जक होता है इसी बात को दिखलाने के लिये आलोककार ने ६५वीं कारिका का उपक्रम दिया है ‘किञ्च’ । जिसका अर्थ है ‘कवल इतना ही नहीं किन्तु और भी’ अर्थात् प्रबन्ध साक्षात् ही रस का व्यञ्जक नहीं होता किन्तु परम्परा से भी होता है । इस पक्ष में कारिका का अर्थ इस प्रकार होगा—‘अनुस्वानोपम’ अर्थात् अनुरणनरूप सङ्क्षयक्रम शब्दशक्तिमूल और अर्थशक्तिमूल इ। हवीं का प्रभेद कहा गया है वह निमित्तभूत व्यङ्जक प्रबन्धों के होते हुये व्यङ्ग्य के रूप में स्थित होकर ‘इस’ अर्थात् प्रकृत रसादि ध्वनि के व्यङ्जक के रूप में भासित होता है ।
तारावती ६५वीं और सोलहवीं कारिकाओं में परम्परा के द्वारा व्यङ्जक दिखलाये गये हैं । प्रकट प्रबन्ध के द्वारा साक्षात् रसाभिव्यक्ति तो होती ही है परम्परा के द्वारा भी प्रबन्ध रस का अभिव्यञ्जक होता है इसी बात को दिखलाने के लिये आलोककार ने ६५वीं कारिका का उपक्रम दिया है ‘किञ्च’ । जिसका अर्थ है ‘कवल इतना ही नहीं किन्तु और भी’ अर्थात् प्रबन्ध साक्षात् ही रस का व्यञ्जक नहीं होता किन्तु परम्परा से भी होता है । इस पक्ष में कारिका का अर्थ इस प्रकार होगा—‘अनुस्वानोपम’ अर्थात् अनुरणनरूप सङ्क्षयक्रम शब्दशक्तिमूल और अर्थशक्तिमूल इ। हवीं का प्रभेद कहा गया है वह निमित्तभूत व्यङ्जक प्रबन्धों के होते हुये व्यङ्ग्य के रूप में स्थित होकर ‘इस’ अर्थात् प्रकृत रसादि ध्वनि के व्यङ्जक के रूप में भासित होता है । (इसको इस प्रकार समझिये—‘प्रबन्धेषु’ में निमित्त-स्वानियो की व्यङ्जकता में निमित्त अर्थात् व्यङ्जक होते हैं । इस प्रकार सङ्क्षयक्रम व्यङ्ज्य-व्यञ्जक भाव होता है । वे व्यङ्ज्य-व्यञ्जक-स्वानियाँ प्रकृत रसध्वनि की व्यङ्जक-भया होती है । इस प्रकार प्रकट से व्यक्त होकर सङ्क्षयक्रम व्यङ्ज्य-व्यञ्जक-भाव रस को
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प्तदुक्तं भवति-प्रबन्धेन कदाचिदनुरणनलरूपव्यङ्ग्यध्वनिः साक्षाद्व्यज्यते स तु रसादिध्वनौ पर्यवस्यति। यदि तु स्पष्टमेव व्यङ्ग्यायते ग्रन्थस्य पूर्वोत्तररसालक्ष्यक्रमविषयस्य मध्ये तदा ग्रन्थोऽयमसङ्कत: स्यात्। नीरसत्वं च पाञ्चजन्योक्त्यादिसुक्तं स्यादित्यलम्।
यहाँ पर यह बात कही गई है—प्रबन्ध से कदाचित् अनुरणनरूप व्यङ्ग्यध्वनि साक्षात् व्यक्त होती है, वह तो रस इत्यादि ध्वनियों में पर्यवसित होती है। यदि इसकी स्पष्ट हो व्याख्या की जाने तो अलक्ष्यक्रमविषयक पूर्वोत्तर ग्रन्थ के मध्य में यह ग्रन्थ असङ्कत हो जावेगा और पाञ्चजन्य इत्यादि की उक्तियों का नीरसत्व भी कहा हुआ हो जावेगा।
ताराब्दी
ध्वनित कर ती हैं—यह अर्थ करते में ‘ध्वने:' और ‘अस्य' इन दोनों शब्दों का विशेषणविशेष्यभाव न मानकर पृथक् पृथक् योजना करनी चाहिये और ‘व्यङ्ग्यतया स्थित:' तथा ‘व्यङ्जकतया' इन शब्दों का अध्याहार कर लेना चाहिये।
ध्वनित करती हैं—यह अर्थ करते में ‘ध्वने:' और ‘अस्य' इन दोनों शब्दों का विशेषणविशेष्यभाव न मानकर पृथक् पृथक् योजना करनी चाहिये और ‘व्यङ्ग्यतया स्थित:' तथा ‘व्यङ्जकतया' इन शब्दों का अध्याहार कर लेना चाहिये।
इस कारिका का अन्वय इस प्रकार करना चाहिये—‘ध्वने: अनुस्वानोपमात्मा य: प्रभेद उदाहरणतः सः केशुचित् प्रबन्धेषु ( अभिव्यञ्जननिमित्तेषु सस्तु ) ( व्यङ्ज्यतया स्थितः अस्य ( प्रकृतस्य रसादिध्वने: ) व्यङ्जकतया भासते। ) इसी प्रकार वृत्ति ग्रन्थ की भी योजना करनी चाहिये।
( वृत्तिग्रन्थ इस प्रकार है—‘इस विवक्षितान्यपरवाच्य ध्वनि का जो अनुरणनरूप व्यङ्ग्य नामक दो प्रकार का प्रभेद कहा गया है वह भी कुछ प्रबन्धों में च्योतित होता है।’ यहाँ ‘प्रबन्धों में’ को इस प्रकार कर लेना चाहिये—‘प्रबन्धों को व्यङ्जक के रूप में निमित्त मान कर स्वयं व्यङ्ग्य होकर रस के व्यङ्जक के रूप में शोभित होता है।’
( वृत्तिग्रन्थ इस प्रकार है—‘इस विवक्षितान्यपरवाच्य ध्वनि का जो अनुरणनरूप व्यङ्ग्य नामक दो प्रकार का प्रभेद कहा गया है वह भी कुछ प्रबन्धों में च्योतित होता है।’ यहाँ ‘प्रबन्धों में’ को इस प्रकार कर लेना चाहिये—‘प्रबन्धों को व्यङ्जक के रूप में निमित्त मान कर स्वयं व्यङ्ग्य होकर रस के व्यङ्जक के रूप में शोभित होता है।’
अथवा इस कारिका को अग्निम कारिका से मिलाकर अर्थ करना चाहिये—अग्निम कारिका के इन शब्दों को कि ‘अलक्ष्यक्रम व्यङ्ग्य होता है’ इस कारिका में लाना चाहिये और अर्थ इस प्रकार करना चाहिये—‘इस ध्वनि का जो वक्तलाया हुआ अनुस्वानोपम प्रभेद प्रबन्धों में शोभित होता है कहीं उसका भी व्यङ्ग्य अलक्ष्यक्रम हुआ करता है।’
इस प्रकार अग्निम कारिका से मिलाकर इस कारिका और वृत्ति की सङ्ज्ञति बैठानी चाहिये।
इस प्रकार अग्निम कारिका से मिलाकर इस कारिका और वृत्ति की सङ्ज्ञति बैठानी चाहिये।
यहाँ पर यह बात कही गई है कि प्रबन्ध से कदाचित् अनुरणनरूप व्यङ्ग्यध्वनि साक्षात् व्यक्त होती है और उसका पर्यवसान रस इत्यादि की ध्वनि में होता है। यद्यपि यह कारिका का सीधा अर्थ नहीं है, कारिका का सीधा अर्थ है केवल यह बतलाना कि प्रबन्ध से सङ्लक्ष्यक्रम को भी व्यञ्जना होती है, तथापि कारिका
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को तोड़कर तथा घुमा-फिरा कर यह अर्थ करना पड़ता है। वस्तुतः यह अर्थ करना सर्वथा अनिवार्य है। क्योंकि यथाश्रुत व्याख्या करने पर यह ग्रन्थ अलक्ष्यक्रम के प्रकरण के मध्य में पड़ जायेगा। पहले भी अलक्ष्यक्रम के व्यञ्जक बतलाये गये हैं और वाच्य की कारिका में भी वही प्रकरण चलेगा। वाच्य में अलक्ष्यक्रम का आ जाना असङ्गत हो जायेगा और पाञ्जन्य इत्यादि की उक्तियों का नीरसत्व सिद्ध हो जायेगा जो कि एक दोष होगा।
[ दीधितिकारने उक्त लोचन का आशय लिखकर अपनी अरुचि प्रदर्शित की है। दीधितिकार का सार यह है—“कुछ लोग ‘चोत्प्य लक्ष्यक्रमः कचित्’ को लक्ष्यक्रमपरक मानकर पुनरुक्ति की शङ्का करते हैं, पाञ्जन्य इत्यादि की उक्तियों में नीरसता आ जाने का दोष बतलाते हैं और अलक्ष्यक्रम के प्रकरण में संलक्ष्यक्रम के आ जाने का दोष भी बतलाते हैं तथा इन दोषों को दूर करने के लिये कारिका को परामर्श से अलङ्कारपरक सिद्ध कर देते हैं। यहाँ पर विचार करना यह है कि अग्रमि कारिका में ‘अलक्ष्यक्रमः’ यही पाठ है, अतः यहाँ पुनरुक्ति दोष नहीं आता। क्योंकि यह कारिका लक्ष्यक्रम के विषय में हैं और अगली कारिका अलक्ष्यक्रम के विषय में। पाञ्जन्य इत्यादि की उक्तियों में नीरसता भी प्रकट नहीं होती। क्योंकि वहाँ पर वस्तुरूप संलक्ष्यक्रम के कथन से रसरूप अलक्ष्यक्रम का प्रतिषेध नहीं हो जाता। प्रकरण की असङ्गति भी नहीं आती। क्योंकि रस प्रवन्धव्युत्पत्ति होता है, उसके बाद ‘संलक्ष्यक्रम भी प्रवन्धव्युत्पत्ति होता है’ इस कथन की भी उपेक्षा नहीं की जा सकती, अतः उसका कथन भी प्राकरणिक ही हो जाता है। अतः ग्रन्थ की अन्यथायोजना ठीक नहीं। इसीलिये काव्यप्रकाश में प्रबन्ध की व्यञ्जकता में गृध्रगोमायु संवाद का ही उदाहरण दिया गया है।
दीधितिकार के उक्त कथन पर यदि विचार किया जाये तो ज्ञात होगा कि लोचन में प्रसक्ति का दोष तो दिया ही नहीं गया है। दीधितिकार ने यह उल्लेख नहीं किया कि पुनरुक्ति की बात किसने कही है। इतना तो स्पष्ट हो है कि लोचन में कहीं भी पुनरुक्ति दोष नहीं बतलाया गया है। रही शेष दो दोषों की बात।
में सबसे बड़ी आपत्ति तो लोचन में यही उठाई गई है कि असंलक्ष्यक्रम के में यह प्रकरणान्तर कैसे हो गया? इस पर दीधितिकार का उत्तर है कि की व्याख्यक्ता का प्रकरण है अतः अपाकरणिक होने का दोष नहीं आ सकता। किन्तु इस तृतीय उद्योत में इस रूप में प्रकरण नहीं चलाये गये हैं कि शब्द किनका व्याख्यक होता है, वाक्य किनका व्याख्यक होता है इत्यादि। अपितु प्रकरण इस प्रकार के हैं कि अविवक्षित वाच्य के व्याख्यक कौन कौन होते हैं इत्यादि।
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लीलादाढ़ गूढ़युद्धासहलमहिमण्डलसश्चित्र अज्ज । कोस्मसुणालाहरतुज्जभाइ अज्जम्मि ॥
'लील से दाढ़ के अग्रभाग में समस्त महीमण्डल को उठानेवाले तुम्हारे ही अज्ज में आज मृणाल का आभरण भी क्यों गुरु हो रहा है ?'
तारावतो पहले अविवक्षित वाच्य के व्यञ्जक दिखलाये गये, फिर संलक्ष्यशक्रम के और अवसंलक्ष्याक्रम रसध्वनि के व्यञ्जकों का प्रकरण १६ वीं कारिका तक चलता है फिर १५ वीं कारिका वीच में संलक्ष्याक्रम व्यङ्ग्य के व्यञ्जक बतलाने के लिये क्यों लिखी गई ? यह असङ्गति स्पष्ट है । पाञ्चजन्य इत्यादि की उक्तियों की नीरसता का जो दोष दिया गया है उसमें भी लोचनकार का आशय यही है कि वस्तुतः वहाँ पर भी रस विद्यमान होता ही है, अतः वहाँ पर व्यङ्ग्य वस्तु को रस की व्यञ्जक माने लेने से प्रकरण की असङ्गति जाती रहती है । अतः यहाँ पर लोचनकार की व्याख्या ही ठीक है कि १४ वीं कारिका तक रस के उन व्यञ्जकों का उल्लेख किया गया जो रस को साक्षात् स्वतः व्यक्त कर देते हैं । अब १५ वीं और १६ वीं कारिका में ऐसे व्यञ्जक दिखलाये जा रहे हैं जो स्वयं वस्तु की व्यक्खना करते हैं और वह व्यक्त हुई वस्तु रस की व्यञ्जक होती है । इस प्रकार ये तत्त्व साक्षात् नहीं अपितु परम्परा से रस के व्यञ्जक होते हैं । इनमें सुप्त तिङ् वचन इत्यादि अनेक तत्त्व आ जाते हैं । किन्तु पहले प्रवन्ध की व्यञ्जकता का निरूपण इसलिए किया गया है कि साक्षात् रसव्यञ्जकों में अन्त में प्रवन्ध की व्यञ्जकता ही आती है । अतः इस प्रकरण के आदि में ही उसकी चर्चा कर देने से परम्परागत पूर्वोपर की सङ्ङति बैठ जाती है ।
प्रबन्ध की परम्परा से आलोककार ने रसव्यञ्जकता के तीन उदाहरण दिये हैं— ( १ ) मधुमथनविजय नामक काव्य में पाञ्चजन्य को उक्तियों में । ( यहाँ पर लोचन में मधुमथनविजय का एक पद्य उद्धृत किया गया है जिसकी संस्कृत छाया इस प्रकार होगी—
लीलान्दष्ट्राग्रोदृततसकलमहीमण्डलस्यैवाय । कसमनमृणालाभरणमपि तव गुरु भवत्वज्जे ॥ )
मधुमथनविजय के प्रस्तुत पद्य का अर्थ यह है कि हे भगवान् आन ने (वाराहावतार में) खेल खेल में ही अपनी दाढ़ की नोक पर समस्त पृथ्वीमण्डल को धारण कर लिया । न जाने क्यों उन्हीं आप के लिये आज मृणाल का आभूषण भी भारी हो रहा है ?'
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पादनजन्योक्तिपु । यथा वा ममैव कामदेवस्य सहचरसमागमे विप्रलवाणलीलायाम् ।
जैसे—मधुमथनविजय में पाद्जन्य की उक्तियों में; अथवा मेरी ही विप्रलवाणलीला में कामदेव का सहचर से समागम होने पर ।
इत्यादयः पाद्जन्योक्तयो रुक्मिणीविप्रलब्धध्वासुदेवाक्षयप्रतिभेदनाभिप्रायमभिव्यल्जयन्ति । सोऽस्मिञ्जन्यतः प्रकृतरसस्वरूपपर्यवसायी ।
सहचराः वसन्तयौवनमलयानिलादयस्ते: सह समागमे । मइअहणिडअरोओणिरड्ढसो अविवेअरहिओ वि । सव्विण वि तुमसिम्म पुणोवन्न्ति अ अतन्न्ति पंसुसिसिम्म ॥
सहचर हैं वसन्त यौवन मलयानिल इत्यादि । उनके साथ समागम में । 'मैं मर्यादा का अतिक्रमण करनेवाला, निरङ्कुश और विवेकरहित हो जाता हूँ। किन्तु तुम्हारी भक्ति को स्वप्न में भी स्मरण नहीं करता हूँ ।'
इत्यादि पाद्जन्योक्त्यः सङ्केतैः द्वारा विप्रलब्ध भगवान् वासुदेव के आशय के प्रतिभेदनरूप अभिप्राय को अभिव्यक्त करती हैं । वह अभिव्यक्त हो कर प्रकृत रस के स्वरूप में पर्यवसित होता है ।
तारावती
इस प्रकार यहाँ से व्यक्त होता है कि भगवान् कृष्ण रुक्मिणी के वियोगी हैं उनकी रुक्मिणी को प्राप्त करने की उत्कट अभिलाषा है । उसी अभिलाषा को यह वक्ता प्रकट कर रहा है । यह अभिव्यक्त वस्तु है जो कि प्रकरणगत विप्रलम्भ श्रृङ्गार की व्यञ्जिका हो गई है ।
( २ ) दूसरा उदाहरण आनन्दवर्धन की लिखी हुई विप्रलवाणलीला से दिया गया है । इसमें कामदेव का अपने वसन्त, यौवन, मलयानिल इत्यादि सहचरों से मिलना दिखलाई गया है । यौवन की उक्ति यहाँ पर उद्धृत की गई है । इसकी संस्कृत छाया इस प्रकार होगी—
भवाम्यपहस्ततरेखो निरङ्कुशोऽथ विवेकरहितोऽपि । स्वप्नेऽपि तव पुनर्भक्ति न प्रस्मरामि ॥
'मैं मर्यादा का अतिक्रमण करनेवाला हो जाता हूँ; निरङ्कुश हो जाता हूँ और विवेकरहित भी हो जाता हूँ। और फिर स्वप्न में भी तुम्हारी ( कामदेव की ) भक्ति को विस्मृत नहीं करता हूँ ।'
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यथा च गुङ्गोमायुसंवादादौ महाभारते । और जैसे महाभारत में गुङ्गोमायुसंवाद इत्यादि में । लोचन
इत्यादशो यौवनस्योत्कर्षतस्तन्विजेषु स्वभाववैचित्र्याधिकः; स तु स्वभावः प्रकृतरसपर्यवसायी । यथा चेत् । श्मशानावर्तिनं पुत्रदाहार्थमुद्योगिनं जनं विप्रलभ्य गृध्रो दिवा शावशरीरभक्षणार्थं शीघ्रमेवापसरत् यूथमिथ्याह । अलं स्थित्वा श्मशानेऽस्मिन्न् गृध्रगोमायुरटले । कङ्कालवलले घोरे सर्वश्राणिभयङ्करे ॥ न तेन जीवितः कश्चिदधर्मैसुपगतः । प्रियो वा यदि वा द्वेष्यः प्राणिनां गतिरीदृशी ॥ इत्याद्यवोचत् ।
इत्यादि यौवन की उक्तियाँ अपने विभिन्न स्वभावों की व्यञ्जना करनेवाली है । उस स्वभाव का पर्यवसान प्रकृत रस में होता है । 'और जैसे' यह । श्मशान में आये हुये पुत्रदाह के लिये उद्योग करनेवाले व्यक्ति को ठगने के लिये दिन में शवशरीर के भक्षण करने की इच्छावाला गृध्र 'आप लोग शीघ्र चले जावें' यह कहता है । 'गृध्र और शृगालों ( आदि ) से घिरे हुये कङ्कालों से घने, घोर और सब प्राणियों को भय देनेवाले इस श्मशान में स्थित होने की आवश्यकता नहीं है । कालधर्म ( मरण ) को प्राप्त हुआ कोई भी चाहे वह प्रिय हो या द्वेष्य यहाँ जीवित नहीं हुआ । प्राणियों की गति ही ऐसी है ।' इत्यादि कहा ।
तारावती यहाँ पर यौवन की इन उक्तियों से यौवन के विभिन्न स्वभावों को अभिव्यञ्जना होती है जैसे यौवन के उत्कट होने पर लोकमर्यादा का सर्वथा प्रत्याख्यान कर कामदेव का ही अनुसरण किया जाता है । इत्यादि । ( यह स्वभावव्यञ्जना वस्तुश्रयनि कही जा सकती है । ) इसका पर्यवसान प्रकृत शृङ्गार रस में होता है ।
( ३ ) तीसरी उदाहरण महाभारत से दिया गया है । ( यह उदाहरण काव्यप्रकाश में प्रवृत्त्य से वस्तुच्यञ्जना के उदाहरण के रूप में उद्धृत किया गया है । यहाँ पर भी प्रवृत्त्य से रहपर्यवसायी वस्तुच्यञ्जना ही दिखाई गई है । महाभारत
( ३ ) तीसरी उदाहरण महाभारत से दिया गया है । ( यह उदाहरण काव्यप्रकाश में प्रवृत्त्य से वस्तुच्यञ्जना के उदाहरण के रूप में उद्धृत किया गया है । यहाँ पर भी प्रवृत्त्य से रहपर्यवसायी वस्तुच्यञ्जना ही दिखाई गई है । महाभारत
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गोमायुरुद्ध निशोदयावधि अमौ तिष्ठन्तु, ततो गृध्रादपहत्या हि मक्षयिष्यामीदृश्यमि-प्रायेणावोचत्—
आदित्योदयं स्थिततो मूढा: स्नेहं कुलत साम्प्रतम् । बहुविच्छ्नो मूर्हूर्तोंयं जीवेदपि कदाचन ॥ असु कनकवर्णाभि वाल्मकप्रभाच्चिननम् । गृध्रवाक्यार्थं वालास्वक्यार्थध्वमविश्राद्धिता: ॥ इत्यादि । स चामिप्रायो व्यक्त: शान्तरस एव परिणिष्ठिततां प्राप्त: ॥ १५ ॥
शृगाल ने तो ‘ये निशा के उदयपर्यन्त स्थित रहें, ततः गृध्र से छीनकर मैं खा लूँगा’ इष्ष अभिप्राय से कहा—
'हे मूर्खों ! यह रात्रि स्थित है, इस समय स्नेह कर लो । यह मुहूर्त बहुत विघ्नों वाला है, सम्भवतः जी भी जावे । सोने के समान वर्णवाले, यौवन को न प्राप्त हुये इस बालक को हे वच्चपन करनेवालो ! गृध्र के कहने से ही शङ्कारहित हो कर कैसे छोड़ दोगे ?' इत्यादि । और वह व्यक्त अभिप्राय शान्त रस में ही पूर्ण स्थिरता को प्राप्त हुआ है ॥ १५ ॥
में शान्तिपर्व के अन्तर्गत आपद्धर्मपर्व में गृध्र और गोमायु का संवाद आया है । कुछ नागरिक एक नदी में एक मृत बालक के शव का विसर्जन करने आये हैं । ( लोचन में ‘जलाने आये हैं’ यह लिखा है । यह ठीक नहीं है । एक तो छोटे बालकों के शव जलाये नहीं जाते दूसरे जला देने पर गृध्र या गोमायु को खाने की आशा ही क्या रह जायगी ? अतः विसर्जन करने आये हैं यही अर्थ करना चाहिये । ) वे मोह के कारण उस बालक को जल्दी छोड़ नहीं रहे हैं । उनको देखकर एक गृध्र कह रहा है—
'इस स्मशान में गृध्र जैसे मांसाहारी भयानक पशु और सियार जैसे भयानक मांसाहारी पशु मेरे पड़े हैं । चारों ओर हड्डियों के कंकाल बहुतायत से दिखलाई पड़ रहे हैं । यह स्थान बड़ा ही घोर और सब प्राणियों को भय देने वाला है । हाँ दुम्हारा रहना अच्छा नहीं । संसार की गति ही ऐसी है । यहाँ जो कोई भी त्यु को प्राप्त हो जाता है चाहे वह कितना ही प्यारा अथवा कैसा ही द्वेष्य हो कभी भी पुनः जीवित नहीं हो सकता वह तो सभी प्राणियों की गति है । इसलिये मोह में पड़कर अधिक शोक नहीं करना चाहिये । अतएव तुम भी संसार की इस दशा को देखते हुए मोह छोड़कर लौट जाओ ।'
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इस प्रवन्ध में वर्ण्य विषय एकवस्तु है और उससे एक दूसरी वस्तु ध्वनित होती है कि ग्रन्थ यह प्रयत्न कर रहा है कि किसी प्रकार ये लोग बालक के शव को छोड़कर जल्दी ही घर को लौट जायें तो मैं इसे खा लूँ । यदि मोह और शोक में कहीं इन लोगों को काफी देर हो गई और सूर्य अस्त हो गया तो मैं इस बालक को न खा सकूँगा क्योंकि मेरी गति दिन में ही है; अतः रात हो जाने पर यह शव मेरे हाथ से निकल जायेगा । इसी लिये वह उन सब व्यक्तियों को जल्दी ही घर लौट जाने की सम्मति दे रहा है ।
( इसको सुन कर वे सब लोग लौटने के लिये उद्यत हो जाते हैं ) तब राक्षस उनसे कहता है—
'तुम लोग तो हमें बड़े ही मूर्ख मालूम पड़ रहा हो । अभी तो यह सूर्य स्थित है ( जब इतना दिन शेष है तब ) हिंसक वन्य पशुओं का भय ही क्या ? ) एक बात और है—यह समय बहुत अधिक विघ्नों से भरा हुआ है । ( यह समय ऐसा है जबकि बहुत से राक्षस भूत प्रेत पिशाच इत्यादि मारे मारे फिरते हैं । सम्भव है कि किसी राक्षस इत्यादि के आवेश के कारण इसकी मृत्यु हुई हो । यदि यह बात हो तो ) यह भी सम्भव है कि इस अवसर के टल जाने के बाद ( राक्षस इत्यादि की बाधा के शान्त हो जाने पर ) यह जी ही उठे । देखो इस बालक का रंग कैसा सोने के समान चमचमा रहा है ! ( अभी इसका वर्ण बिल्कुल नहीं बिगड़ा है और न इसके अन्दर कोई मृत्यु का चिह्न मालूम पड़ रहा है । ) यह अभी बालक ही तो है ! अभी इसकी जवानी भी तो नहीं आई है, न यह लोग तो मुझे बिल्कुल मूर्खमलूम पड़ रहे हो जो केवल किसी सुन्दर बालक है ! तुम्हारे कहने से ही ऐसे सुन्दर बालक को छोड़ कर चले जाना चाहते हो । और तुम्हें इसके छोड़ने से बिल्कुल रक्खा नहीं हो रही है ।'
यह गोमायु का कथन भी एक वस्तु है । इससे एक दूसरी वस्तु ध्वनित होती है कि—सियार दिन में तो उस बालक का मांस खा नहीं सकता क्योंकि उसे पड़ोस में ही स्थित ग्रन्थ से भय है। वह यह चाहता है कि "यदि कहीं सूर्यास्त पर्यन्त शव के सम्बन्धी लोग सक जावें तो रात हो जाने पर ग्रन्थ को दिखाई ही न पड़ेगा और उस शव 'मांस को खाने की ग्रन्थ की कुछ भी शक्ति न रह जावेगी । तब मैं स्वच्छन्दतापूर्वक उसका मांस खा सकूँगा ।' इसलिए वह उन मनुष्यों को इधर-उधर से लौटने से रोक रहा है और उनसे बालक के सौन्दर्य की प्रशंसा कर तथा उसके पुनः जीवित होने की सम्भावना प्रकट कर यही प्रयत्न कर रहा है कि वे इतने समय तक रुके रहें कि सूर्य अस्त हो जावे ।"
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सुप्तिडवचनसम्बन्धैस्तथा कारकशक्तिभिः । कृततद्धित समासैश्च ध्वोत्पत्तिलक्ष्यक्रमः क्रचित् ॥ ३६॥
सुप्तिडवचनसम्बन्धैस्तथा कारकशक्तिभिः । कृततद्धित समासैश्च ध्वोत्पत्तिलक्ष्यक्रमः क्रचित् ॥ ३६॥
(अनु०) सुप्तिड्वचनन, सम्बन्ध, कारकशक्ति, कृत्, तद्धित और समास से कृत् अलक्ष्यक्रम में ध्वोत्य होता है ।१।
एवमलक्ष्यक्रमोऽप्यस्य रसादिध्वनेः क्रियते यदपि वर्णेभ्यः प्रभृत्यपि प्रबन्धपर्यन्ते व्यञ्जकवर्गोऽभिहितः । न च तेभ्योऽन्यत्रमविशिष्यते तथापि, कविसहृदयाना शिक्षां दातुं पुनरपि सूक्ष्मतरशान्वयव्यतिरेकावश्रित्य व्यञ्जकवर्गमाह—सुप्तिङ्डित्यादि । यद्नुस्वानोपसर्गमातते वक्त्रभिप्रायादिरूपम् । अस्यापि सुवचादिसिद्धयैव स्यादनुस्वानोपसर्गयालक्ष्यक्रमोऽप्यस्य ध्वोतः । पूर्वकारिकया सह सम्मिल्य सङ्गिरिरति । सर्वत्र हि सुबादीनामभिधायविशेषासिद्ध्यक्षरत्वसैव । उदाहरणे स त्वभिष्यक्तोंऽसिप्रायो यथास्व विभावादिरूपताद्वारेण रसादीन् व्यनक्ति ।
एवमलक्ष्यक्रमोऽप्यस्य रसादिध्वनेः क्रियते यदपि वर्णेभ्यः प्रभृत्यपि प्रबन्धपर्यन्ते व्यञ्जकवर्गोऽभिहितः । न च तेभ्योऽन्यत्रमविशिष्यते तथापि, कविसहृदयाना शिक्षां दातुं पुनरपि सूक्ष्मतरशान्वयव्यतिरेकावश्रित्य व्यञ्जकवर्गमाह—सुप्तिङ्डित्यादि । यद्नुस्वानोपसर्गमातते वक्त्रभिप्रायादिरूपम् । अस्यापि सुवचादिसिद्धयैव स्यादनुस्वानोपसर्गयालक्ष्यक्रमोऽप्यस्य ध्वोतः । पूर्वकारिकया सह सम्मिल्य सङ्गिरिरति । सर्वत्र हि सुबादीनामभिधायविशेषासिद्ध्यक्षरत्वसैव । उदाहरणे स त्वभिष्यक्तोंऽसिप्रायो यथास्व विभावादिरूपताद्वारेण रसादीन् व्यनक्ति ।
इस प्रकार अलक्ष्यक्रम व्यङ्ग्य रस इत्यादि की ध्वनन के यद्यपि वर्णों से लेकर प्रबन्धपर्यन्त व्यञ्जकवर्ग के निरूपित कर दिये जाने पर अन्य कुछ निरूपण करने योग्य दोष नहीं रह जाता है तथापि कवि और सहृदयों को शिक्षा देने के लिये फिर भी सूक्ष्म दृष्टि से अन्वयव्यतिरेक का आश्रय लेकर व्यङ्जकवर्ग को कहते हैं—‘सुप्तिङ्’ इत्यादि । हम तो इस के बाद इस प्रकार सत्त्वृत्तिकं वाक्य का समझने हैं । ‘सुप्’ इत्यादि के साथ जो अनुस्वानोपसर्ग ( ध्वनि ) वक्ता की अभिप्रायरूप भासित होती है वह वक्त अनुस्वानोपसर्ग इस ध्वनि का भी अलक्ष्यक्रम ध्वोत्य होता है ।१’ ‘कहीं’ यह । पूर्वं कारिका से मिलाकर सङ्गति होनी है । सुप् इत्यादि का सर्वत्र अभिधव्यक्त अभिप्राय विशेषोप व्यङ्जकत्व ही होता है । उदाहरण में वह अभिव्यक्त अभिप्राय अपनी शक्ति के अनुसार विभाव इत्यादि की रूपता के द्वारा रस इत्यादि को व्यक्त् रखता है ।
यह अभिप्राय व्यक्त होकर शान्त रस में ही परिपूर्णता को प्राप्त होता है । इस प्रकार प्रबन्ध वन्तु की व्यञ्जना के द्वारा रस का व्यङ्ग्य हो जाता है ॥ १५ ॥
यह अभिप्राय व्यक्त होकर शान्त रस में ही परिपूर्णता को प्राप्त होता है । इस प्रकार प्रबन्ध वन्तु की व्यञ्जना के द्वारा रस का व्यङ्ग्य हो जाता है ॥ १५ ॥
प्रथम उद्योत में विप्रतिपत्तियाँ, उनपर विचार और ध्वनि का सामान्य स्वरूप बतला दिया गया । द्वितीय उद्योत में व्यङ्ग्यार्थ की दृष्टि से ध्वनि के स्वरूप पर विचार किया गया । तृतीय उद्योत में अविवक्षितवाच्य विवक्षितान्यपरवाच्य, अनुरणनरूप तथा असंल्लक्ष्यक्रम व्यङ्ग्य इन सभी के व्यङ्गकों का निरूपण कर दिया गया और यह
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अलङ्क्यक्रमो ध्वनेरात्मा रसादि: सुविभेषै: स्थितडविशेषैर्वचनविशेषै: सम्बन्धविशेषै: कारकशक्तिभि: कृतप्रसयैरस्ताद्द्वितविभेषै: समासैश्चैवेत । चशब्दादानुपातोपसर्गकालादिभि: प्रयुक्तैरभिव्यङ्यमानो हश्यते ।
ध्वनि की आत्मा अलङ्क्यक्रम रस इत्यादि सुप् की विशेषताओं से, तिङ् की विशेषताओं से, वचन की विशेषताओं से, कारकशक्तियों से, कृतप्रसय की विशेषताओं से, तद्धित की विशेषताओं से और समासों से ( व्यक्क होता है । ) 'च' शब्द से अनुपात, उपसर्ग और काल इत्यादि से अभिव्यक्त होता हुआ देखा जाता है ।
एतदुक्तं भवति—वर्णादिमि: प्रवन्धान्तै: साक्षाद्वा रसोऽसौ व्यज्यते विभावादिव्यञ्जनद्वारेण यद्वा विभावादिव्यञ्जनद्वारेण परम्परयैति तत्त्र वन्धस्यैवत्परम्परया व्यङ्ककत्वं हृश्यत इत्यादौ च वाक्यशेषोऽध्याहार्य: 'अभिव्यङ्यमानो हृश्यते' इति । व्यङ्ककत्वं हृश्यत इत्यादौ च वाक्यशेषोऽध्याहार्य: विभावादिव्यञ्जनद्वारतया पारम्पर्येणैतदेवंरूप: । यहाँ यह कहा गया है—वर्ण आदि से प्रवन्धपर्यन्त के द्वारा विभाव इत्यादि के प्रतिपादन के माध्यम से या तो साक्षात् रस अभिव्यक्त होता है या विभाव इत्यादि की व्यञ्जना के द्वारा परम्परा से । उसमें प्रवन्ध का रस की परम्परा से व्यञ्जकत्व प्रथमं विवृतम् पहले कह दिया गया । इस समय तो वर्ण इत्यादि का कहा जा रहा है । इससे दृष्टि में भी 'अभिव्यक्त होता हुआ देखा जाता है:' 'व्यञ्जकत्व देखा जाता है' इत्यादि में 'विभाव इत्यादि के व्यञ्जन के माध्यम के रूप में परम्परा से' इस प्रकार के वाक्यशेष का अध्याहार कर लेना चाहिये । वतला दिया गया कि वर्णों से लेकर प्रवन्धपर्यन्त विभिन्न तत्त्व किस प्रकार असंलक्ष्यक्रम व्यङ्ग्य रसादिध्वनि के व्यञ्जक होते हैं । इस प्रकार अब कुछ निरूपण करने योग्य नहीं रह गया तथापि कवियों और सहृदयों को बोध देने के लिये व्यञ्जक वयों पर पुन: सूक्ष्म दृष्टि से विचार किया जा रहा है जिसमें अन्वय-व्यतिरेक का सहारा लिया जावेगा । अर्थात् कोई विशेष तत्त्व किस प्रकार व्यञ्जक होता है और किस प्रकार व्यञ्जक नहीं होता--इसी आशय से यह १६वीं कारिका लिखी गई है। इसका आशय यह है कि ध्वनि का आत्मा अलङ्क्यक्रम रस इत्यादि की अभिव्यक्ति कहीं-कहीं सुप् अर्थात् शब्दविभक्तियों तिङ् अर्थात् क्रियाविभक्तियों, वचन की विशेषताओं, सम्बन्ध
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की विशेपताओं कारकशक्तियों, कप्रत्ययों, तद्धितप्रत्ययों और समासगत विशेपताओं के द्वारा भी होती है। कारिका में 'च' शब्द का प्रयोग किया है। इसका आशय यह है कि विशेप रूप में प्रयोग किये जाने पर निमित्त, उपसर्ग और काल इत्यादि के द्वारा भी अभिधानकम की अभिव्यक्ति होती है। यहाँ पर लोचनकार ने कहा कि हम तो इसके बाद वृत्ति के सहित वाक्य को समझते हैं। इसका आशय यह है कि पिछली कारिका में इस कारिका को जोड़कर अर्थ करना चाहिये। पिछली कारिका की क्रिया 'भासते' के सुप् इत्यादि तृतीयान्त करण हैं और उस कारिका के 'अस्य ध्वने:' इस शब्द का 'स्य' इस शब्द से सम्बन्ध हो जाता है। इस प्रकार दोनों कारिकाओं का मिलाकर यह अर्थ होगा--कहा हुआ अनुस्वानोपमात्मक जो प्रभेद कुछ प्रवन्धों में तथा कहीं-कहीं सुप् इत्यादि के द्वारा भासित होता है। इस ध्वनि का चोत्प अलक्ष्यक्रम होता है। जहाँ तक इस इस कारिका का सम्बन्ध है इसका आशय यही है सुप् इत्यादि के द्वारा जो अनुस्वानोपम ध्वनि भासित होती है और जो वाक्य के अभिप्राय इत्यादि के रूप में होती है सुप् इत्यादि के द्वारा अभिव्यक्त अनुस्वारोपम इस ध्वनि का भी अलक्ष्यक्रम वाच्य चोत्प होता है। आशय यह है कि सर्वत्र सुप् इत्यादि विशेप अभिप्राय के ही व्यञ्जक होते हैं। किन्तु प्रस्तुत कारिका के उदाहरण के दोप में वे स्थल आते हैं जहाँ विशेप प्रकार का अभिप्राय व्यक्त होकर अपनी सत्ता प्रकरण और आवश्यकता के अनुसार पहले विभाव इत्यादि रूपता को प्राप्त होता है। और फिर उसी विभावादि रूपता के द्वारा रस इत्यादि को व्यक्त करता है।
उक्त विवेचन का आशय यह है कि वर्ण इत्यादि से लेकर प्रवन्धपर्यन्त दूसरी अभिव्यक्ति दो प्रकार की होती है--कहीं तो विभाव इत्यादि का प्रतिपालक साक्षात् अभिधानवृत्ति से ही हो।ा है और वह विभावादिसंयोग रस को अभिव्यक्त करता है तथा कहीं वर्ण इत्यादि निमित्त व्यञ्जकों से विभाव इत्यादि की अभिव्यक्ति होती है और अभिव्यक्त होकर विभाव इत्यादि रस को अभिव्यक्त करते हैं। प्रथम प्रकार की रसाभिव्यक्ति का विवेचन पहले किया जा चुका कि किस प्रकार वर्ण इत्यादि से साक्षात् रस की अभिव्यक्ति होती है। उस प्रकरण के अन्त में प्रवन्ध से रसाभिव्यक्तता का विवेचन किया गया था। अतः प्रकरण की समरसता बनाये रखने के लिये परम्परा से रसाभिव्यक्ति प्रकरण में पहले प्रवन्ध की ही अभिव्यक्तता दिखलाई गई। अब वर्ण और पद इत्यादि की परम्परा से रसव्यक्तता दिखलाई जा रही है। अतः वृत्ति में भी जहाँ पर यह आया है कि 'अभिव्यक्त होते हुये देखा जाता है' वहाँ पर 'विभाव इत्यादि की अभिव्यञ्जना के द्वारा' यह
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न्यक्कारो ह्यायमेव मे यदरयस्त्राण्यसौ तापसः सोऽप्यत्रैव निहन्ति राक्षसकुलं जीवत्यहो रावणः । धिक् धिक् शङ्कितं प्रवोधितचता किं कुंभकर्णेन वा स्वर्गेऽग्रामटिकाविलुठनवृथोच्चैः किमेघनादेन ॥
अनु० जैसे— 'निस्सन्देह यही धिक्कार है कि मेरे शत्रु, उनमें भी! यह तपस्, वह भी यहीं राक्षस कुल को मारता है, आश्चर्य है कि रावण जीवित है । इन्द्रजित ( मेघनाद ) को धिक्कार है, प्रवोध को प्राप्त होनेवाले कुंभकर्ण से भी क्या ? स्वर्गरूपी छोटे से ग्राम को नष्ट करने में वृथा फूली हुई इन सुजाओं से भी क्या ?'
'ममारय' इति । मम शत्रुसद्भावो नोचित इति सम्वन्धानौचित्यं क्रोधविभावव्यनक्ति अरय इति बहुवचनम् । तपो विद्यते यस्मिन्निति तद्धितेन मत्स्थथोऽयंनाभिधेयत्वम् । तत्रापि शाब्देन निपातसमुदायेनात्यन्तासंभवनीयत्वम् । सकर्तृक यदि जीवनक्रिया तदा हननक्रिया तावदनुचिता । तस्यां च सकर्ता अपि शाब्देन मनुज्यमानत्रकम् । अत एवेति । मर्दयिषितो देशेऽधिकारणम्, निःशेषण हन्यमानताया राक्षसव्यमानत्रकम् ।
'मेरे शत्रु' यह । मेरे शत्रुओं का होना उचित नहीं है यह सम्बन्ध का अनौचित्य क्रोध के विभाव को अभिव्यक्त करता है 'अरय:' यह बहुवचन । 'तपो विद्यमान है' इस निपातसमुदाय से अत्यन्त असम्भवता ( प्रकट होती है । ) यदि मेरी की हुई जीवन क्रिया तो हनन की क्रिया तो अनुचित है । उसमें भी वह कर्ता है—'भी' इस पद से केवल तुच्छ मनुष्य की (अभिव्यक्त होती है ) 'यहाँ पर' यह ।
जोड़ देना चाहिये और जहाँ पर यह आया है कि 'व्यञ्जकत्व देखा जाता है' वहाँ पर 'परस्परा' के द्वारा इस वाक्यशेष का अध्याहार कर लेना चाहिये । सुप् इत्यादि की व्यक्जकता का उदाहरण हनुमन्नाटक के १८ वें अंक से लिया गया है । रामरावण्युद्ध चल रहा है । रावण वीर दर्प में उन्मत्त है । किन्तु राम के शौर्य को देखकर कह रहा है— 'यही तिरस्कार है कि मेरे शत्रु हों, उसमें भी यह तपस् ? वह भी यहीं पर राक्षस कुल को मार रहा है, आश्चर्य है कि रावण जीवित है । इन्द्र को जीतनेवाले
तारावती जोड़ देना चाहिये और जहाँ पर यह आया है कि 'व्यञ्जकत्व देखा जाता है' वहाँ पर 'परस्परा' के द्वारा इस वाक्यशेष का अध्याहार कर लेना चाहिये । सुप् इत्यादि की व्यक्जकता का उदाहरण हनुमन्नाटक के १८ वें अंक से लिया गया है । रामरावण्युद्ध चल रहा है । रावण वीर दर्प में उन्मत्त है । किन्तु राम के शौर्य को देखकर कह रहा है— 'यही तिरस्कार है कि मेरे शत्रु हों, उसमें भी यह तपस् ? वह भी यहीं पर राक्षस कुल को मार रहा है, आश्चर्य है कि रावण जीवित है । इन्द्र को जीतनेवाले
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अत्र हि श्लोके भूरिसा सर्वेषामप्येषां स्फुटमेव व्यङ्ग्यकत्वं हृश्यते । तत्र 'मे यदृशं' इत्यनेन सुप्सम्बन्धनवचनानामभिधयैकत्वम् । 'तत्राप्यसौ तापस' इत्यत्र तद्धितनिपातयोः । 'सोड्यत्रैव निहन्ति राक्षसकुलं जीवत्यहो रावणः' इत्यत्र तिङ्कारकशक्तिनाम् । 'धिक् धिक् शक्तीनाम्' इत्यादौ श्लोकावृत्तौ कृतोद्द्बोधनिस्सन्देह इष श्लोकेऽधिकतया एतेषां स्फुटं व्यङ्गकत्वं दृश्यते ।
निस्सन्देह इस श्लोक में अधिकता से इन सभी का स्फुट व्यङ्गकत्व दिखाई देता है । उसमें 'मेरे शत्रु' इससे सुप् सम्बन्ध और वचन की अभिधव्यङ्गकता है । 'उसमें भी यह तापस' इसमें तद्धित और निपात की । 'वह भी यहीं राक्षस कुल को मारता है, आश्चर्य है कि फिर भी रावण जीवित है' यहाँ तिङ् और कारक की शक्तियों की ( व्यङ्गकता है । ) 'इन्द्रजित को धिक्कार धिक्कार' इत्यादि आधे श्लोक में कृतप्रत्यय तद्धित प्रत्यय समास और उपसर्गों की ( व्यञ्जकता है । )
लोचन मेरे द्वारा अधिष्ठित देश परिपूर्णरूप से मारे जाने का आधिकरण है । और 'राक्षसकुल' यह कर्म है । इस प्रकार यह असम्भव बात प्राप्त हुई है । इस प्रकार 'तिङ्' तथा कारकशक्ति प्रतिपादक शब्दों से पुरुषार्थ की असम्पत्ति ध्वनित होती है । 'रावण' इस अर्थान्तरसङ्क्रमित वाच्यत्व को पहले ही व्याख्या को जा चुका है । 'धिक् धिक्' इस निपात की ( व्यङ्गकत्व ) 'इन्द्र को जीत लिया' यह आस्वादनिका हो है, उपपद समास से सहकृत स्वर्ग इत्यादि समास का स्वपौरुषानुसरण के प्रति व्यङ्गकता है । स्त्रीप्रत्यय के सहित 'ग्रामटिका' इस स्वार्थिक तद्धित प्रयोेग की अनवहुमानता ।
तारावती ( मेघनाद ) को धिक्कार है धिक्कार है, प्रबोध को प्राप्त होनेवाले कुम्भकर्ण से भी क्या ? अथवा स्वर्ग जैसे तुच्छगाँव को नष्ट करने में वृथा फूली हुई इन शूराओं से भी क्या ।
इस श्लोक में इन सबकी बहुत अधिक मात्रा में स्पष्टता है । व्यङ्गकत्व देखिए । वह इस प्रकार—'मेरे शत्रु हो' में विभक्ति, सम्बन्ध और वचन अभिव्यञ्जक हैं । 'मेरे' एकवचनवाचक विभक्ति की व्यञ्जना है कि मैं जगत् का एक वीर हूँ, विश्व विजय के लिये मुझे किसी अन्य की अपेक्षा नहीं । 'मेरे' भी शत्रु
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पसगर्णाम् । एवंविधस्य व्यङ्ककभूयस्त्वे च घटमान्ते काव्यस्य सर्वातिशायिनी वन्धच्छाया समुन्मीलति । यत्र हि व्यङ्ग्यावभासिनः पदस्यैकस्यैव तावद्रविभावसत्रापि काव्ये कापि वन्धच्छाया, किमुत यत्र तेऽपि वहुतां समग्र यः । यथात्राङ्गनतरोगहितश्लोके । अत्र हि रावण इत्यस्मिन् पदेऽर्थान्तरसङ्क्रमितवाच्येन व्यङ्ग्येन ध्वनिप्रभेदेनालङ्कृतेऽपि पुनरनन्तरोक्कानां व्यङ्गकप्रकाराणामुद्रासनम् । दृश्यन्ते च महात्मनां प्रतिभाविशेषभाजां बाहुल्येनैवंविधा वन्धप्रकाराः ।
पसगर्णाम् । इस प्रकार के व्यङ्ग्यप्रधान काव्य में वन्धन की सर्वश्रेष्ठ छटा प्रकट होती है । जहाँ व्यङ्ग्यार्थ को प्रकाशित करने वाले एक ही पद में काव्य में कोई वन्धन की छाया होती है, वहाँ तो कहना ही क्या जहाँ वे भी बहुतों का समूह हो । जैसे कि यहाँ अभी उदाहरण दिये श्लोके में । यहाँ निस्सन्देह 'रावण' इस पद में ध्वनि के अवान्तर भेद अर्थान्तरसङ्क्रमितवाच्य के द्वारा अलङ्कृत होने पर भी पुनः अभी कहे हुए व्यङ्गकप्रकारों का भी उद्भासन होता है । विशेष प्रतिभा को प्राप्त करने वाले महात्माओं के इस प्रकार के वन्धनप्रकार बहुत अधिक देखे जाते हैं ।
विशब्दस्य निर्देयावस्कन्दनं मति व्यङ्ककत्वम् । वृथाशब्दस्य निपातस्य स्वात्मपौरुषतिलहासितलक्षोदपि विमृद्यमानेष्टत्र श्लोके सर्व एवांशो व्यङ्ककत्वेन भाति किम्नवत् । पूतिदर्थपदर्शनस्य फलं दर्शयति—एवङ्गमिति । एकस्य पदस्येष्ट यदुक्तं तदुदाहरति—स्पदस्व इति । स्पदस्व के प्रति व्यङ्ककता है । 'विलुङठन' शब्द में 'वि' शब्द की निर्देयतापूर्वक विनाश करने के प्रति व्यङ्ककता है । निपात 'वृथा' शब्द की आत्ममौष निन्दा के प्रति व्यङ्ककता है । 'शत्रुओं से' में बहुवचन के द्वारा व्यक्त होता है कि प्रस्तुत ये भारमात्र ही है । इससे तिल तिल करके इस श्लोक के विभक्त करने पर सभी अंश व्यङ्ककत्व के रूप में शोभित होते हैं । अधिक कहने से क्या ?
विलुङठनं तेन नत । मुजैरिति बहुवचनेन म्रयुत मारमात्रमेतदिति व्यज्यते । तेन तिलहासितलक्षोदपि विमृद्यमानेष्टत्र श्लोके सर्व एवांशो व्यङ्ककत्वेन भाति किम्नवत् । पूतिदर्थपदर्शनस्य फलं दर्शयति—एवङ्गमिति । एकस्य पदस्येष्ट यदुक्तं तदुदाहरति—स्पदस्व के प्रति व्यङ्ककता है । 'विलुङठन' शब्द में 'वि' शब्द की निर्देयतापूर्वक विनाश करने के प्रति व्यङ्ककता है । निपात 'वृथा' शब्द की आत्ममौष निन्दा के प्रति व्यङ्ककता है । 'शत्रुओं से' में बहुवचन के द्वारा व्यक्त होता है कि प्रस्तुत ये भारमात्र ही है । इससे तिल तिल करके इस श्लोक के विभक्त करने पर सभी अंश व्यङ्ककत्व के रूप में शोभित होते हैं । अधिक कहने से क्या ? इस अर्थ के
विलुङठनं तेन नत । मुजैरिति बहुवचनेन म्रयुत मारमात्रमेतदिति व्यज्यते । तेन तिलहासितलक्षोदपि विमृद्यमानेष्टत्र श्लोक में सर्व एवांशो व्यङ्ककत्वेन भाति किम्नवत् । पूतिदर्थपदर्शनस्य फलं दर्शयति—एवङ्गमिति । एकस्य पदस्येष्ट यदुक्तं तदुदाहरति—स्पदस्व के प्रति व्यङ्ककता है । 'विलुङठन' शब्द में 'वि' शब्द की निर्देयतापूर्वक विनाश करने के प्रति व्यङ्ककता है । निपात 'वृथा' शब्द की आत्ममौष निन्दा के प्रति व्यङ्ककता है । 'शत्रुओं से' में बहुवचन के द्वारा व्यक्त होता है कि प्रस्तुत ये भारमात्र ही है । इससे तिल तिल करके इस श्लोक के विभक्त करने पर सभी अंश व्यङ्ककत्व के रूप में शोभित होते हैं । अधिक कहने से क्या ?
बने रहें यह अकृत भी है और अलंकृत भी । 'मेरे' में समस्तव्य कारक है, इसका व्यङ्ग्यार्थ यह है कि मेरा कोई भी शत्रु विद्धमान रहे जिससे मेरा व्यङ्ग्य और वाच्य भाव का सम्बन्ध हो ऐसा सम्भव ही नहीं है क्योंकि मुझसे शत्रुता करके भी कोई जीवित बचा ही नहीं । 'शत्रु हो' में बहुवचन का व्यङ्ग्यार्थ यह है कि मेरे एक
लोचन
तारावती
बने रहें यह अकृत भी है और अलंकृत भी । 'मेरे' में समस्तव्य कारक है, इसका व्यङ्ग्यार्थ यह है कि मेरा कोई भी शत्रु विद्धमान रहे जिससे मेरा व्यङ्ग्य और वाच्य भाव का सम्बन्ध हो ऐसा सम्भव ही नहीं है क्योंकि मुझसे शत्रुता करके भी कोई जीवित बचा ही नहीं । 'शत्रु हो' में बहुवचन का व्यङ्ग्यार्थ यह है कि मेरे एक
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भी शत्रु का रह सकना आश्चर्यजनक है फिर बहुत से शत्रुओं का तो कहना ही क्या ? इस प्रकार विभक्तिसम्बन्ध और वचनसम्बन्ध के अनौचित्य की व्यञ्जना करते हुए क्रोध के भाव को व्यक्त करते हैं। 'उसमें भी यह तपस' यहाँ पर तद्धित और निपात व्यञ्जक हैं। 'तपस' में तद्धित अण् प्रत्यय और 'आप' ( अपि ) यह निपात है। तपस में अण् मतुर्थोंय है, अतः इसका अर्थ है कि तप जिसके अन्दर विद्यमान हो। इससे व्यञ्जना निकलती है कि ऐसे शत्रु जिनके पौौरुष की बातचीत भी सम्भव न हो। मैं यदि जीवित हूँ तो शत्रुओं द्वारा मेरे वर्ग का संहार अनुचित है और उस संहार का कर्ता भी वह है केवल 'तुच्छ मनुष्य' । 'वह यहाँ पर राक्षस कुल को मारता है और आश्चर्य है कि रावण जीवित है' यहाँ पर तिङ् और कारक शक्तियाँ व्यञ्जक है। 'मारता है' और 'जीवित है' की क्रियाविभक्तियाँ व्यञ्जक हैं, 'यहाँ पर' का अधिकरण कारक और 'राक्षस कुल को' का कर्म कारक ये कारक शक्तियाँ व्यञ्जक हैं। 'यहाँ पर' का अर्थ है जहाँ मैं विद्यमान हूँ और मेरा एकच्छत्र प्रभुत्व है। 'निहन्ति' में 'नि' उपसर्ग से व्यक्त होता है कि निःशेष रूप में राक्षसों का संहार कर रहे हैं। 'राक्षसकुलम्' में कर्म कारक से व्यञ्जना निकलती है कि समस्त राक्षस वंश का संहार ही भगवान राम की संहार क्रिया का लक्ष्य है। 'रावण' शब्द में अर्थान्तरसंक्रमितवाच्य की पहले ही व्याख्या की जा चुकी है। अर्थात् रावण का स्वयं ही रावण कहना वाधित होकर अनुपम पराक्रम शाली इत्यादि गुणों को अभिव्यक्त करता है। इसी प्रकार 'एव' 'जीव धातु' 'अहो' यह अव्यक्त ये भी व्यञ्जक हो सकते हैं। समिष्टि में इसका व्यङ्ग्यार्थ यह होगा कि रावण आश्चर्योत्पादक पराक्रमी तथाः समस्त जगद्विजेता है। यही आश्चर्य है कि उस रावण का भी कोई शत्रु होकर बना रहे। यदि वह शत्रु अकेला हो तो भी कुछ समझ में आ सकता है किन्तु बहुत बड़ी संख्या में शत्रु विद्यमान हों यह और भी आश्चर्यजनक है वे शत्रु भी यदि कहीं दूर प्रदेश में स्थित हो जहाँ रावण विद्यमान न हो तो भी कोई बात है किन्तु यहाँ ये राम इत्यादि शत्रु तो ऐसे प्रदेश में स्थित है जहाँ रावण विद्यमान ही नहीं है अपितु उसका पूर्णप्रसूत है फिर स्थित होते हुए यदि चुप रहें तो भी कुशल है।
भी शत्रु का रह सकना आश्चर्यजनक है फिर बहुत से शत्रुओं का तो कहना ही क्या ? इस प्रकार विभक्तिसम्बन्ध और वचनसम्बन्ध के अनौचित्य की व्यञ्जना करते हुए क्रोध के भाव को व्यक्त करते हैं। 'उसमें भी यह तपस' यहाँ पर तद्धित और निपात व्यञ्जक हैं। 'तपस' में तद्धित अण् प्रत्यय और 'आप' ( अपि ) यह निपात है। तपस में अण् मतुर्थोंय है, अतः इसका अर्थ है कि तप जिसके अन्दर विद्यमान हो। इससे व्यञ्जना निकलती है कि ऐसे शत्रु जिनके पौौरुष की बातचीत भी सम्भव न हो। मैं यदि जीवित हूँ तो शत्रुओं द्वारा मेरे वर्ग का संहार अनुचित है और उस संहार का कर्ता भी वह है केवल 'तुच्छ मनुष्य' । 'वह यहाँ पर राक्षस कुल को मारता है और आश्चर्य है कि रावण जीवित है' यहाँ पर तिङ् और कारक शक्तियाँ व्यञ्जक है। 'मारता है' और 'जीवित है' की क्रियाविभक्तियाँ व्यञ्जक हैं, 'यहाँ पर' का अधिकरण कारक और 'राक्षस कुल को' का कर्म कारक ये कारक शक्तियाँ व्यञ्जक हैं। 'यहाँ पर' का अर्थ है जहाँ मैं विद्यमान हूँ और मेरा एकच्छत्र प्रभुत्व है। 'निहन्ति' में 'नि' उपसर्ग से व्यक्त होता है कि निःशेष रूप में राक्षसों का संहार कर रहे हैं। 'राक्षसकुलम्' में कर्म कारक से व्यञ्जना निकलती है कि समस्त राक्षस वंश का संहार ही भगवान राम की संहार क्रिया का लक्ष्य है। 'रावण' शब्द में अर्थान्तरसंक्रमितवाच्य की पहले ही व्याख्या की जा चुकी है। अर्थात् रावण का स्वयं ही रावण कहना वाधित होकर अनुपम पराक्रम शाली इत्यादि गुणों को अभिव्यक्त करता है। इसी प्रकार 'एव' 'जीव धातु' 'अहो' यह अव्यक्त ये भी व्यञ्जक हो सकते हैं। समिष्टि में इसका व्यङ्ग्यार्थ यह होगा कि रावण आश्चर्योत्पादक पराक्रमी तथाः समस्त जगद्विजेता है। यही आश्चर्य है कि उस रावण का भी कोई शत्रु होकर बना रहे। यदि वह शत्रु अकेला हो तो भी कुछ समझ में आ सकता है किन्तु बहुत बड़ी संख्या में शत्रु विद्यमान हों यह और भी आश्चर्यजनक है वे शत्रु भी यदि कहीं दूर प्रदेश में स्थित हो जहाँ रावण विद्यमान न हो तो भी कोई बात है किन्तु यहाँ ये राम इत्यादि शत्रु तो ऐसे प्रदेश में स्थित है जहाँ रावण विद्यमान ही नहीं है अपितु उसका पूर्णप्रसूत है फिर स्थित होते हुए यदि चुप रहें तो भी कुशल है।
पन्तु ये तो क्रियाशील हो नहीं किन्तु संहार कर रहे हैं; फिर किसी एक का मारा जाना भी बड़ी बात नहीं है ये तो समस्त राक्षस वंश के विनाश पर ही उतारू हैं। भी यदि कोई वीर हो तो भी एक बात है किन्तु ये तो बेचारे तपस्वी है। यदि परम पराक्रमी के रूप में प्रसिद्ध मैं मर गया होता और तब यह सब कुछ होता तो इतना बड़ा आश्चर्य नहीं होता किन्तु सबसे बड़ी आश्चर्य की बात तो यही है
पन्तु ये तो क्रियाशील हो नहीं किन्तु संहार कर रहे हैं; फिर किसी एक का मारा जाना भी बड़ी बात नहीं है ये तो समस्त राक्षस वंश के विनाश पर ही उतारू हैं। भी यदि कोई वीर हो तो भी एक बात है किन्तु ये तो बेचारे तपस्वी है। यदि परम पराक्रमी के रूप में प्रसिद्ध मैं मर गया होता और तब यह सब कुछ होता तो इतना बड़ा आश्चर्य नहीं होता किन्तु सबसे बड़ी आश्चर्य की बात तो यही है
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कि रावण अब तक जीवित है । ( केवल मेरा पराक्रम ही व्यर्थ नहीं हो रहा है अपितु दूसरे भी परमपराक्रमी महावीरों का पराक्रम व्यर्थ ही जा रहा है । ) धिक् इस निपात ( तथा इसकी वीप्सा ) से परम गर्हणीयता की व्यञ्जकता होती हैं ।
शत्रुजित् अर्थात् शत्रु को जीतनेवाला इस उपपद समास से व्यक्त होता है कि मेघनाद का शत्रु को जीत लेना तो एक कल्पित कथा सी जान पड़ती है । ( शत्रु शब्द 'शाक्' धातु से 'रम्' प्रत्यय होकर बनता है । इसका अर्थ है जो शत्रुओं को जीतने में समर्थ हो )
मेघनाद ने ऐसे शत्रु को भी अनायास ही जीत लिया अतः राम को जीतना तो उनके लिये बड़ी बात ही नही थी । किन्तु उन मेघनाद की शक्ति भी कुण्ठित हो गई । यह व्यञ्जना उपपद समास तथा उसके साथ किप् इस कृदन्त प्रत्यय से निकलती है ।
( प्रबोधितवता में 'प्र' उपसर्ग 'बुध' धातु से 'क्तिच्' प्रत्यय होकर 'क्तवत्' प्रत्यय होता है । 'प्र' का अर्थ है प्रकर्ष 'क्तिच्' का अर्थ है प्रेरणा और 'क्तवत्' का अर्थ है भूत काल । इससे व्यञ्जना निकलती है कि कुम्भकर्ण से बड़ी आशा थी; उन्हें जगाने के लिये बहुत अधिक उद्योग किया गया, वे जागे भी किन्तु उन्होंने कर क्या लिया । अब तो उनकी आशा और उठकर उनके पराक्रम सब अतीत की कथा बन गये है ।
मेघनाद और कुम्भकर्ण की आशा तो दूर की बात रही मैं ही क्या कर पाया । शत्रुजित् के किप् प्रत्ययान्त उपपद समास के साथ 'स्वर्ग ही ग्रामटिका' यह कर्मधारय समास भी व्यञ्जक है । ग्रामटिका में स्वार्थिक तद्धित प्रयोग है ।
( ग्रामटिका में अल्प अर्थ में तद्धित 'टिकच्' प्रत्यय हो जाता है । इसका अर्थ है तुच्छ ग्राम । इससे व्यञ्जना निकलती है कि मैंने स्वर्ग को एक तुच्छ गाँव के समान बड़ी ही सरलता से जीत लिया था और उस के अभिमान से मेरी भुजायें फूली हुई थीं; किन्तु यह सब अभिमान व्यर्थ ही था ।
जव से साधारण तपस्वी मेरे सामने ही मेरे वंश का नाश कर रहे है तब स्वर्ग जैसे तुच्छ ग्राम के जीत लेने का क्या दर्प । विलुङ्घन शब्द में 'वि' उपसर्ग की व्यञ्जना है निर्दयता-पूर्वक नष्ट भ्रष्ट करना ।
'वृथा' इस निपात की व्यञ्जना है अपने पौरुष की निन्दा । 'भुजाओं से' में बहुवचन से व्यक्त होता है इन में कोई शक्ति नहीं ये मेरी भुजायें तो भाररूप ही हैं । अधिक कहने की क्या आवश्यकता यदि इस पद्य को तिल तिल करके तोड़ा जावे तो इसका सभी अंश व्यञ्जक के रूप में प्रकाशित होते हैं ।
( यहाँ पर प्रकृति, प्रत्यय, अव्यय इत्यादि प्रत्येक तत्त्व व्यञ्जक ही है । ऊपर दिग्दर्शन मात्र कराया गया है । ) यदि इस प्रकार के काव्य से सम्बद्ध व्यञ्जक बहुतुलता से सज्जित किये जावें तो ऐसे काव्य में एक ऐसा उच्चकोटि का सङ्घटन सौन्दर्य विद्यमान होगा जो कि सभी सौन्दर्यों का अतिक्रमण कर
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यथा महर्ष्यसस्य— अतिक्रान्ततुखा: काला: प्रत्युपस्थितदारुणा: । एव: एव: पापीयदिवसा पृथिवी गतयौवनना ॥
जैसे महर्षि व्यास का— ‘जिसमें सुख अतिक्रान्त हो गये हैं और दारुण ( दुःख ) विपरीत रूप में उपस्थित हैं इस प्रकार के काल और कल कल ( उत्तरोत्तर ) अधिक पापियों के दिनों वाली गतयौवना पृथ्वी है ।’
अतिक्रान्तं न तु कदाचन वर्तमानामवलम्बमानं सुखं येषु ते काला इति, सर्वै- पेव न तु सुखं मति वर्तमान: स कोडपि काललेश हृस्यर्थ: । मतीपान्युपस्थितानि वृत्तानि मृत्यावर्तमानानि तथा दूरभावी न्यपि मृत्युपस्थितानि निकटतया वर्तमानानि सवन्ति दारुणानि दुःखानि येषु ते । दुःखं बहुमकारमेव मर्तिवर्तमान: सर्व कालेशो हेत्यननु कालस्य तावब्रिवेंदमभिव्यज्यते: ज्ञान्तरस्य व्यज्जकत्वम् । देशस्याप्याह—पृथिवी दिखलाने का फल दिखलाते हैं—‘इस प्रकार यह’ ‘एक पद का’ जो यह कहा उसका उदाहरण दे रहे हैं—‘जैसे यहाँ पर’ यह । वीता हुआ, कभी वर्तमानता का अवलम्बन लेनेबाला नहीं है । सुख जिनमें ऐने काल, सभी ( काल ) सुख के प्रति वर्तमान कोई एक भी काल काललेश नहीं यह अर्थ है । विपरीत रूप में उपस्थित वीते हुये और पुनः लौटकर आनेवाले तथा भविष्य में अतिदूर होनेवाले भी प्रत्युपस्थित अर्थात निकटता से वर्तमान हो जाते हैं दारुण अर्थात दुःख जिनमें । सभी प्रकार के कालांश बहुत प्रकार के दुःखों को लौट रहे हैं इस कथन के द्वारा निर्वेद को अभिव्यक्त करनेवाले काल की ज्ञान्तरस्य व्यज्जकता ( सिद्ध हो जाती है । ) देश की भी बतलाते हैं—पृथिवी जावेगा । ( क्योंकि जत्र व्यज्जकों की संख्या अधिक होगी तो व्यंग्यों की संख्या भी असीमित हो जावेगी । व्यज्ज्यों का सौष्ठव हो सौन्दर्य का एकमात्र निदान होता है । ) यदि व्यंग्य को अवभासित करनेवाले किसी एकपद का प्रत्यक्षीकरण हो जावे वहाँ भी काल्प का सादृश्य सौन्दर्य प्रत्यत्त सिद्ध हो जाता है फिर जहाँ इस प्रकार के इंद्रियक व्यञ्जकों की भरमार हो और प्रत्येक पद तथा उस पद का प्रत्येक खंड ‘न चारित’ लिये हुये हो वहाँ के सौन्दर्य का तो कहना ही क्या । उदाहरण के लिये अभी उद्धृत किये हुये ‘न्यक्कारो ह्यात्ममेव’ इत्यादि पद्य में प्रधान व्यंग्यार्थ है ‘दारुण’ पद से अभिव्यक्त होनेवाला अर्थान्तरसंक्रमितवाच्य ।
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अत्र हि कृताद्दुतवचनैरलक्ष्यक्रमव्यङ्गच्यः; ‘पृथिवी गतयौवना’ इत्यनेन चात्यन्ततिरस्कृतध्वाच्चयो ध्वनि: प्रकाशितः ।
यहाँ पर निस्सन्देह कृतप्रसृत्य, तद्धितप्रत्यय और वचन से अलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य और ‘गतयौवना पृथिवी’ से अत्यन्त तिरस्कृत वाच्यध्वनि प्रकाशित की गई है ।
श्व: श्व: मात: मातर्दिनादिनं पापीयदिवसा: पापानां सम्बन्धिन: पापिष्ठजनस्वामिकादिवसा यस्मां सा तथोक्ता । स्वभावत एव तावत्कालो हु:खमय:, तत्रापि पापिष्ठजनस्वामिकपृथिवीलक्षणदेशदूरात्य्याद्विशेषतो दु:खमय इत्यर्थ: । तथा हि श्व: श्व इति दिनादिनं गतयौवना वृद्धखी इवदृशोभाज्यमानसंयोगा गतयौवनतया हि यो यो दिवस आगच्छति स स पूर्वोक्तेश्य पापीयान् निष्कृष्टस्वात् । यदि वियसुनन्तोऽयं शब्दो मुनिनैवं जयुक्को णिजन्तो वा । अत्यन्तेति । सोऽपि मकारोडस्यैवाङ्गमेतोति भाव: ।
कल-कल अर्थात् प्रात: प्रात: अर्थात् एक दिन से दूसरे दिन पापीय दिनवाले अर्थात् अत्यन्त पापियों से सम्बन्धित जिसके दिनों के स्वामी हैं इस प्रकार की हो गई है । स्वभाव से ही काल दु:खमय है उसमें भी अत्यन्त पापी लोगों के स्वामित्ववाले पृथ्वीरूप देश की दुरातमता से विशेष रूप से दु:खमय ( हो गया है ) यह अर्थ है ।
वह इस प्रकार कल कल अर्थात् एक दिन से दूसरे दिन गतयौवना वृद्धा स्त्री के समान यौवन के गत हो जाने से जिसके सम्बोग की सम्भावना नहीं की जा सकती जो दिन आता है वह वह पहले की अपेक्षा निष्कृष्ट होने के कारण अधिक पापवाला है । अथवा यह शब्द ईयसुन् अन्तवाला मुनि ने प्रयुक्त किया है अथवा णिजन्त है। ‘अत्यन्त’ यह। भाव यह है कि वह भी प्रकार इसी की अज्ञता को प्राप्त होता है ।
बाधित होकर धर्मान्तर परिगत ‘रावण’ को अभिव्यक्त करता है । ) उस अर्थान्तर संक्रमित वाच्य का सौन्दर्यं उन समस्त व्यञ्जकों के व्यङ्ग्यार्थों के द्वारा वट जाता है जिन पर पिछले पृष्ठों में विस्तृत प्रकाश डाला गया है ।
तारावती
यह नहीं समझना चाहिये कि प्रत्येक पद को व्यञ्जक बनाकर कविता करना असम्भव है । विशेष प्रतिभाशाली महात्माओं के इस प्रकार के वर्णनप्रकार प्राय: देखे जाते हैं ।
बाधित होकर धर्मान्तर परिगत ‘रावण’ को अभिव्यक्त करता है । ) उस अर्थान्तर संक्रमित वाच्य का सौन्दर्यं उन समस्त व्यञ्जकों के व्यङ्ग्यार्थों के द्वारा वट जाता है जिन पर पिछले पृष्ठों में विस्तृत प्रकाश डाला गया है ।
एक उदाहरण लीजिये—महर्षि वेदव्यास ने बुरे समय के आने को वर्णन करते हुए लिख्खा है—
यह नहीं समझना चाहिये कि प्रत्येक पद को व्यञ्जक बनाकर कविता करना असम्भव है । विशेष प्रतिभाशाली महात्माओं के इस प्रकार के वर्णनप्रकार प्राय: देखे जाते हैं ।
‘ये ऐसे समय हैं जव कि सुख व्यतीत हो चूका है, दारुण ( दु:ख ) प्रतिकूल रूप में उपस्थित हैं, पृथिवी का यौवन व्यतीत हो चुका है और जो भी
एक उदाहरण लीजिये—महर्षि वेदव्यास ने बुरे समय के आने को वर्णन करते हुए लिख्खा है—
‘ये ऐसे समय हैं जव कि सुख व्यतीत हो चूका है, दारुण ( दु:ख ) प्रतिकूल रूप में उपस्थित हैं, पृथिवी का यौवन व्यतीत हो चुका है और जो भी
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दिन आता है वह पहले की अपेक्षा अधिक पापियों से अधिकृत होता जाता है ।' यौवन किसी स्त्री का ही समात्त होता है; पृथ्वी की यौवनसमाप्ति बाधित हो जाती है और उससे लक्ष्यार्थ निकलता है—उपभोग के अयोग्य होना । उससे व्यञ्ज्यार्थ के रूप में पृथ्वीतलोगत अनेक हीनतायें प्रतिबिम्बित होती हैं । यौवन का अर्थ बिल्कुल लूट जाता है अतः यह अत्यन्त तिरस्कृत वाच्यध्वनि हुई । इस ध्वनि का सौन्दर्यप्रकर्ष कृतप्रत्यय तद्धितप्रत्यय वचन के व्यञ्ज्यार्थों के द्वारा बढ़ जाता है तथा उनसे अलक्ष्यक्रम रसध्वनि आस्वादगोचर हो जाती है ।
( कृतप्रत्यय तीन शब्दों में है—अतिक्रान्त, प्रत्युपस्थित और गत शब्दों में क प्रत्यय । ) अतिक्रान्त में कृतप्रत्यय भूतकालार्थक है इससे व्यञ्जना होती है कि यह काल ऐसा है जिसमें सुख सर्वथा व्यतीत हो गया है किसी प्रकार भी वर्तमान नहीं है । इससे काल की अत्यन्त भीषणता व्यक्त होती है । 'प्रत्युपस्थित' शब्द में भी भूतकालार्थक 'क्' प्रत्यय है, इसकी व्यञ्जना यह है कि दारुण परिस्थितियाँ कुछ पहले से ही आई हुई हैं अतः उनके वर्तमान होने में किसी प्रकार की शङ्का नहीं रह गई । विगत भीषण परिस्थितियाँ लौट आई हैं और जिन भीषणताओं की बहुत समय बाद आने की सम्भावना थी वे अभी आ गई हैं और निकट ही वर्तमान रूप में मालूम पड़ती हैं । इस प्रकार इस क प्रत्यय से व्यञ्जित होता है कि एक तो इनका आना सन्निकर्ष नहीं रहा दूसरे इनका निराकरण भी अशक्य प्रतीत होता है ।
('गत' में क प्रत्यय से यही व्यञ्जित होता है कि पृथिवी का यौवन व्यतीत ही हो गया अब उसके पुनरागमन की कोई आशा नहीं । अतः पृथिवी निःसार है और सर्वथा परित्याग के योग्य है ।) तद्धित प्रत्यय 'पापीय' में 'छ' है इसका अर्थ है पापियों से सम्बन्ध रखनेवाले । इस 'छ' प्रत्यय से व्यञ्जना निकलती है कि अब इन दिनों पर अधिकार पापियों का ही रह गया है । भले आदमियों की तो बात पूछनेवाला भी कोई नहीं । स्वभाव से ही काल दु:खमय है उसमें भी देश-गत बुराइयाँ और अधिक बढ़ गई हैं कि पृथिवी के सभी शासक पापी ही हो गये हैं।
अतः यह समय और अधिक दुःखदायक हो गया है । वह इस प्रकार कि जैसे किसी वृद्ध स्त्री का जो भी दिन आता है वह पिछले दिन की अपेक्षा उसे और अधिक यौवनशून्य बना देता है, उनके अन्दर आकर्षण, सम्भोग की सम्भावना त्यादि सभी कुछ प्रतिदिन क्षीण होते जाते हैं । इसी प्रकार पृथिवी का जो भी दिन बीत रहा है वह पहले की अपेक्षा अधिक निकृष्ट ही होता है जिससे न पृथिवी में कोई आकर्षण रह गया है और न वह सम्भोगयोग्य ही रह गई है । 'पापीय' में ईयसुन् प्रत्यय भी माना जा सकता है जिसका अर्थ होता है अपेक्षाकृत अधिक
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एषां च सुवादीनामेकैकशः समुदितानां च व्यङ्ककत्वं महाकवीनां प्रवन्धेषु प्रायेण दृश्यते । सुवन्तस्य व्यङ्ककत्वं यथा—ताले: शृङ्खावलयसुभगे कान्तया नर्तितो मे यामध्यास्स्ते दिवसावशेषे नोलिकण्ठः सुहृद्वैः ॥
(अनु०) इन सुप् इत्यादिकों का एक एक रूप में ( पृथक् पृथक् ) और समुदाय के रूप में व्यङ्ककत्व महाकवियों के प्रवन्धों में प्रायः देखा जाता है । सुवन्त का व्यङ्ककत्व जैसे—‘झङ्झार से परिपूर्ण वलयों से सुन्दर मालूम पड़नेवाली तालियों द्वारा मेरी प्रियतमा द्वारा नचाया हुआ तुम्हारा मित्र नीलकण्ठ दिवस के अन्त में जिसके ऊपर बैठता है ।’
लोचन
सुवन्तस्येति । समुदितख्वे तु उदाहरणं दत्तं व्यस्तत्वे च औचित्यत इति भावः । ताले-रिति बहुवचनमनेकरिव्यं वैदग्ध्यं ध्वनत् विमलस्सोद्दीपकतामेति ।
‘सुवन्त का’ यह समुदित होने पर तो उदाहरण दे दिया गया, पृथक् होने पर दिया जा रहा है यह भाव है । ‘ताले:’ में बहुवचन अनेक प्रकार के वैदग्ध्य को ध्वनित करते हुये विप्रलम्भ की उद्दीपकता को प्राप्त होता है ।
तारावती
ऐसी दशा में यहाँ यह प्रश्न हो सकता है कि इसका शुद्धरूप ‘पापीयोद-वसा:’ होगा, ‘स’ का लोप कैसे हो गया ? इसका उत्तर यह है कि यह मुनि का प्रयोग है अतः ‘स’ का लोप आर्ष है । अथवा ईयसुन् प्रत्यय करके नामधातु का णिच् प्रत्यय कर दिया जावे । ‘जो लोगों को ‘पापीयः’ बनाता है उसके लिये णिच् होकर क्रिया होगी ‘पापीयति’ फिर कर्ता में अच् प्रत्यय करके ि और णिच् का लोप करके ‘पापीय’ यह अदन्त शब्द वन सकता है इस प्रकार कृत्प्रत्यय और तद्धित प्रत्यय की व्यञ्जकता दिखला दी गई ।
‘काला:’ में बहुवचन से व्यक्त होता है कि काल का कोई भी अंश सुखमय नहीं रहा सभी कालांश दारुण व्याधियों के देने वाले बन गये हैं । इस प्रकार प्रथम पंक्ति में काल की भीषणता वतलाई है और दूसरी पंक्ति में स्थान की अस्मृणीयता । जब देश और काल दोनों विपरीत हैं तब ममत्व ही किससे किया जावे ? इस प्रकार असंल्लयव्यङ्ग्यश्लोकम् व्यङ्ग्यश्लोक्ते रस यहाँ पर ध्वनित होता है और उसका अङ्ग बन गया है ‘मत्स्यौवनम्’ की अत्यन्त तिरस्कृत वाच्यव्यञ्जना ।
प्रस्तुत कारिका में सुप् इत्यादि की व्यञ्जकता वतलाई गई है । यह व्यञ्जकता दोनों प्रकार की हो सकती है—समुद्दित रूप में मिलकर सभी की एक साथ
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तिड्न्तस्य यथा— अवसर रोउं चिअ णिम्मिआईं मा पुंस मे हत अच्छोईं । दंसणमेत्तुम्भत्तोहिं जहिं हिअअं तुहु ण पगाअम् ॥
तिडन्त का जैसे— 'दूर हटो; रोने के लिये ही निर्मित मेरे इन हत नेत्रों को विकसित मत करो जिन्होंने दर्शनमात्र से ही उन्मत्त होकर तुम्हारे हृदय को भी नहीं जाना ।'
लोचन अपसर रोदितुंमेव निमिते मा पुंसय हते अक्षिणी मे । दर्शनमात्रोन्मत्ताभ्यां याभ्यां तव हृदयमेव न ज्ञातम् ॥ उन्मत्तो हि न किञ्जानातोति न कस्याप्यन्रापराधः । दैवेनैवस्थमेव निर्माणं कृत- मिति । अवसर मा वृथा म्रियासं कार्योः दैवस्य विपरिवर्त्योतुमशक्यत्वादिति तिड्न्तो व्यञ्जकः तदनुगृहीतानि पदान्यरण्यपीति भावः । की छाया संस्कृत में दी गई है । इसका अनुवाद ऊपर दिया जा चुका है । ) उन्मत्त निस्पन्देह कुछ नहीं जानता; अतः यहाँ पर किसी का अपराध नहीं है । दैव ने ही इस प्रकार का निर्माण किया है । 'हटो; व्यर्थ में प्रयास मत करो; क्योंकि दैव का बदलना अशक्य है ।' इस प्रकार तिडन्त व्यञ्जक है और उससे अनुगृहीत और पद भी व्यञ्जक हैं ।
तारावती व्यञ्जकता और इनकी पृथक् व्यञ्जकता । सुप इत्यादि की व्यञ्जकता के प्रायः दोनों रूप प्रवन्ध काव्यों में देखे जाते हैं । सामूहिक रूप में व्यञ्जकता के उदाहरण पिछले प्रकरण में दिये जा चुके । अब पृथक् पृथक् तत्वों की व्यञ्जकता बतलाई जा रही हैं । सुवन्त की व्यञ्जकता का उदाहरण मेघदूत से दिया गया है । पूरा पद्य इस प्रकार है—
तारावती व्यञ्जकता और इनकी पृथक् व्यञ्जकता । जैसे 'सुप' आदि की व्यञ्जकता के प्रायः दोनों रूप प्रबंध काव्यों में देखे जाते हैं । सामूहिक रूप में व्यञ्जकता के उदाहरण पिछले प्रकरण में दिये जा चुके । अब पृथक् पृथक् तत्वों की व्यञ्जकता बतलाई जा रही हैं । सुवन्त की व्यञ्जकता का उदाहरण मेघदूत से दिया गया है । पूरा पद्य इस प्रकार है—
तन्मध्ये च स्फटिकफलका काञ्चनीवासयष्टिः मूले बद्धा मणिमिरनतिप्रौढवंच्चप्रकाशैः । ताले चिज्जद्लयसुभगे कान्तया नर्तितो मे यामध्यास्मे दिवसविगमे नीलकण्ठः तुहिनदः ॥
'यक्ष मेघ को अपने घर की पहिचान बतलाते हुये कह रहा है कि—( मेरे राजे पर माधवी का मंडप है जिसके चारों ओर कुरवक का घेरा बना हुआ है, उसके समीप ही लाल अशोक और वकुल के वृक्ष खड़े हैं । ) उन दोनों वृक्षों के मध्य में सोने की वासयष्टि ( एक प्रकार की छतरी जिस पर पालतू पक्षाँ रहा
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करते हैं।) है जिसका उपरी फलक स्फटिक मणि का बना हुआ है और नीचे की ओर प्रौढ़ वांसों के समान चमकने वाली मणियां जड़ी हुई हैं। दिन के व्यतीत होने पर (सायं काल में) तुम्हारा मित्र मयूर उस वासयष्टि पर आकर बैठता है। यह वही मयूर है जिसकी मेरी प्रियतमा तालियां बजाकर नचाया करती है जो तालियां मृदंग करनेवाले वलयों से बहुत ही सुन्दर मालूम पड़ती है।
यहाँ पर सुवन्तपद 'ताली' तृतीया का बहुवचन है जिससे ध्वनित होता है कि 'मेरी प्रियतमा अनेक प्रकार से ताल बजा लेती है, वह विलास नृत्य और संगीत में बहुत निपुण है।' यह व्यञ्जना अलम्बन के गुणों का स्मरण कराने के कारण विप्रलभ्भ का उद्दीपन करती है। इस प्रकार सुवन्त से वस्तुव्यञ्जना के द्वारा रस-ध्वनि होती है।
तिडन्त से व्यञ्जना का उदाहरण—
किसी नायक ने अपराध किया है; नायिका रो रही है, नायक उसे मनाना चाहता है; इस पर नायिका कहती है—
'तुम यहाँ से चले जाओ; भगवान् ने मेरी हतभागिनी आँखें रोने के लिये ही बनाई हैं अतः तुम इन्हें बढ़ाने की चेष्टा मत करो। ये आँखें तुम्हारे दर्शनमात्र से उन्मत्त हो गई और इन्होंने तुम्हारे हृदय को नहीं जान पाया।'
आशय यह है कि नायिका कह रही है कि मेरी आँखों का ऐसा भाग्य कहाँ कि अपने प्रियतम के त्रुटिकारक मुख के अवलोकन का आनन्द ले सकें। परमात्मा ने तो इनके भाग्य में रोना ही दिया है। सबसे बड़ा अपराध तो इनका यही था कि इन्होंने तुम्हारे बाझ्य रूप को ही देखा और उन्मत्त हो गये; इन्होंने तुम्हारे कपटो हृदय को नहीं देखा। जो उन्मत्त हो जाता है वह निस्सन्देह कुछ समझ ही नहीं पाता। अतः रूप पर उन्मत्त होकर मैंने जो कुछ किया उसमें अपराध किसका है ?
परमात्मा ने ही ऐसी रचना कर दी थी। यहाँ 'दूर हटो' यह क्रिया है। इससे व्यञ्जना निकलती है कि 'तुम्हारा मुझे मनाने की चेष्टा करना व्यर्थ है'; जब देव ने ही ऐसा विधान कर दिया तो उसे बदल कौन सकता है ? इस व्यञ्जना के द्वारा नायिका नायक से अपनी हृदयवेदना निवेदित कर उसके हृदय में सद्भावना जगाना चाहती है। इस प्रकार यहाँ तिडन्त व्यञ्जक है और उसके साथ दूसरे शब्द भी व्यञ्जक हैं। ('एव' ही) शब्द से व्यञ्जना निकलती है कि तुम्हारी अनुयायिनी होने का यही फल मिला कि मुझे जीवन भर रोना पड़ेगा। 'हतभागी नेत्र' से सौभाग्य का अभाव और 'तुम्हारे हृदय को नहीं देखा' में हृदय शब्द से नायक की दुष्टता व्यक्त होती है।)
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यथा वा— मा पन्थं रुन्धीओ अवेहि बालअ अहोसि अहिरोओ । अम्हेअ णिरिच्छाओ सुण्णघरं रक्खिदव्वं णो ॥
अथवा जैसे— 'अरे अप्रोढ बालक ! दूर हटो, मेरे मार्ग को मत रोको, आशङ्का है कि तुम निलज्ज हो; हम परतन्त्र हैं क्योंकि हमें शून्य घर की रक्षा करनी है ।'
मा पन्थानं रुधः अपेहि बालक अमौढ अहो असि अहिकः । यत् परतन्त्रा यतः शून्यगृहं मामकं रक्षणीयं वर्तते ॥ इत्यमापेहीति तिडन्तमिदं ध्वनति-त्वं तावदमौढ लोकमध्ये यदेवं प्रकाशयसि । आस्ते तु सङ्केतस्थां शून्यगृहे तावन्मामेवध्यासिति ॥ 'अन्यत्र ब्रज बालक' अमौढबुद्धे स्नान्तीं मां किं मृग्षेणालोकयस्येतत् । मो इति सोल्लङ्घनमादधानम् । जायाभीक्ष्णां सम्वन्धितडमेव न मवति । अत्र जायातो ये भीरव- सोऽलङ्घनमादधानम् ।
लोचन ( गाथा का अनुवाद वृत्ति के अनुवाद में दिया गया है ।) यहाँ पर 'दूर हटो' यह तिडन्त यह ध्वनित करता है है——'तुम तो प्रौढ नहीं हो जो लोक के मध्य में इस प्रकार प्रकाशित करते हो । सूना घर सङ्केत स्थान तो है हीं वहाँ तुम्हें आ जाना चाहिये ।' 'हे बालक ! अर्थात् अप्रोढ बुद्धिवाले अन्यत्र जाओ । स्नान करती हुई मुझको प्रकटे के साथ ( घूर घूर कर ) क्यों देख रहे हो ?' 'अरे' ( अहो ) यह सम्बोधन
अथवा तिडन्त की व्यञ्जना का दूसरा उदाहरण— किसी नायक ने किसी नायिका को मार्ग में घेरा है । नायिका सङ्केतस्थल का निर्देश करती हुई कह रही है— 'tुम्हारी चेष्टायें तो बालकों जैसी हैं; तुम सामने से हट जाओ । तुम तो विलकुल निलज्ज हो । लोग तुम्हारी चेष्टाओं को देख रहे हैं और तुम्हें लोक निन्दा का भी भय नहीं लगता । मैं तुम्हारी तरह बेकार और स्वतन्त्र थोड़े ही होऊँ । मेरा घर सूना पड़ा है और मुझे उसकी रखवाली करनी है ।'
तारावती यहाँ पर दूर 'हट जाओ' यह तिडन्त ( क्रिया ) पद है । इससे व्यञ्जना निकलती है कि—'तुम प्रौढ नहीं हो जो लोक में इस प्रकार प्रच्छन्न प्रेम को प्रकाशित कर रहे हो । मेरा घर सूना पड़ा है जो कि सङ्केतस्थान है वहाँ आ जाना ।
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अण्णत्त वच्च वलअ हआ अन्ति किं मं पुलोएसि अअम् । भो जआभीरुअआणं तडं विअण होइ ॥ कृतकप्रेयोगु प्राकृतेषु तद्द्वितविषये व्यङ्जकत्वमावेद्यत एव । अवज्ञातिशये (अनु०) सम्वन्ध का जैसे—
सम्वन्धस्य यथा—
'हे बालक ! दूर जाओ । स्नान करती हुई मुझे देख रहे हो यह क्या बात है ? पत्नियों से डरनेवाले के लिये ( यह ) तट नहीं है ।' जहाँ 'क' का प्रयोग किया गया हो वहाँ प्राकृत में तद्धित के विषय में व्यङ्जकत्व कहा ही जाता है । अवज्ञा की अधिकता में 'क' प्रत्यय होता है । समासों का व्यङ्जकत्व वृत्ति के औचित्य के द्वारा विनियोजन में होता है ।
स्थेषामेतत्स्थानमिति दूरापेतः सम्वन्ध इत्यनेन सम्वन्धेनेष्ट्यतिशयः मच्छछकामिन्या-मिल्यक्तः । कृतकेति 'क'ग्रहणं तद्धितोपलक्षणार्थम् । कृतकः कमप्रत्ययमचोगो येषु काव्यवाक्येषु यथा जायाभीरकाणामिति । ये द्वारसज्ञा धर्मपत्नीषु मेमपरतन्नास्तेभ्यो कोडन्यो जगति कुलस्तः स्यादिति कमलस्योदवज्जातिशयद्योतकः । समासानां चेति । केवलानामेव व्यङ्ककत्वमावेद्यत इति सम्वन्धः ।
लोचन
यहाँ पर 'जाया से जो डरे हुये हैं उनका यह स्थान यहा सम्वन्ध बहुत दूर चला गया' इस सम्वन्ध से प्रच्छन्न कामियों के द्वारा ईर्ष्या की अधिकता अभिव्यक्त की गई । 'कृतक' में क का ग्रहण तद्धित के उपलक्षण के लिये है । किया गया है 'क' प्रत्यय का प्रयोग जिन काव्यवाक्यों में जैसे 'जायाभीरकाणाम्' में । जो रसज्ञ नहीं हैं और धर्मपत्नियों के प्रेम के आभीन हैं उनसे अधिक कुत्सित कौन होगा ? इस प्रकार क प्रत्यय अवज्ञा की अधिकता का द्योतक है । 'समासों का' अर्थात् केवल
समासों का व्यङ्जकत्व निवेदित किया जा रहा है ।
तारावती
सम्वन्ध की व्यङ्जकता का उदाहरण— कोई नायिका किसी विवाहित पुरुष से प्रेम करती है और वह नायक भी नायिका को चाहता है । किन्तु अपनी पत्नी के सामने वह उस नायिका से प्रेम करते हुये डरता है । नायिका चाहती है कि वह अपनी पत्नी की उपेक्षा कर और उसे अपमानित कर नायिका से प्रेम करे । इस समय नायिका सरोवर तट पर
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अकेले में स्नान कर रही है और नायक उसे देख रहा है। नायिका ताने के साथ कह रही है—
'अरे लड़के ! ( अपढ़ बुद्धिवाले ) कहीं और जाओ। मैं स्नान कर रही हूँ मुझे क्या देख रहे हो ? जो लोग अपनी स्त्रियों से डरते हैं उनके लिये यह तट नहीं हैं।'
आशय यह है कि मैं ऐसा प्रेम पसन्द नहीं करती कि तुम वहाँ सामने तो डर जाओ और यहाँ छिप-छिप कर मुझे देखो। यदि प्रेम करना है तो तुम्हें खुलकर प्रेम करना चाहिये। यहाँ पर 'भोः' (अरे) यह सम्बोधन का शब्द अपमानजनक रूप में प्रयुक्त किया गया है। यहाँ पर 'जो अपनी पत्नी से डरे हुये हैं उनका यह तट नहीं है' इसमें 'उनका तट' यह सम्बन्ध सर्वथा असम्भव है। (यदि तुम वहाँ नहीं बोलते तो यहाँ भी बात नहीं कर सकते।) इस प्रकार सम्बन्धप्राप्ती से ईर्ष्या की अधिकता अभिव्यक्त होती है।
प्राकृत भाषाओं में जहाँ 'क' प्रत्यय का प्रयोग किया जाता है वहाँ तद्धित के विषय में व्यञ्जकता प्रसिद्ध ही है। 'क' प्रत्यय अधिक अनादर के अर्थ में होता है। 'क' का ग्रहण दूसरे तद्धित प्रत्ययों का उपलक्षण है। अर्थात् जिस प्रकार 'क' प्रत्यय व्यञ्जक हो सकता है उसी प्रकार अन्य तद्धित प्रत्यय भी व्यञ्जक हो सकते हैं। 'क' प्रत्यय का उदाहरण है— 'जाया भीरुकाणाम्' यहाँ 'भीरु' शब्द से 'क' प्रत्यय किया गया है जो अवज्ञातिशय अर्थ में होता है। इसका व्यञ्ज्यार्थ है कि जो रसज्ञ नहीं होते और धर्मपत्नी के प्रेम के आाधीन होते हैं उनसे निकृष्ट संसार में और कौन हो सकता है ? (यहाँ जाया शब्द का व्यञ्ज्यार्थ है कि तुम्हारी पत्नी में न सौन्दर्य है और न आकर्षण उससे सन्तान पैदा करने का उपयोग भले ही हो, सरसता और सद्धदयता की आशा तो हो ही नहीं सकती। फिर भी तुम उससे डरते हो यह तुम्हारी हीनता है जो कि तुम मेरे रूपसौन्दर्य की आकर्पंकता की भी उसके डर से उपेक्षा कर देते हो। यही हीनता, अरसिकता और अज्ञान 'वालक' इस सम्बोधन से व्यक्त होते हैं भय अनौचित्य की सीमा तक पहुँच गया है, जो बहुत ही बुरा है। अत. तुमसे यह आशा ही नहीं की जा सकती कि मैं तुमसे अपना सम्बन्ध करूँ और बाद में डर कर तुम मेरा साथ नहीं छोड़ जाओगे। ये सब व्यञ्जनीय कुत्सार्थक प्रत्यय तथा सम्बन्धानौचित्य के कारण निकलती हैं।)
समास भी वृत्ति के औचित्य के साथ विनियुक्त करने पर व्यञ्जक होते हैं। यह केवल समासों की व्यञ्जकता का ही कथन किया गया है। (यह पहले ही बतलाया जा चुका है कि उपनागरिका इत्यादि वृत्तियों का निर्णय समास के
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निपातानां व्यञ्जकत्वं यथा—
अयमेकपदे तया वियोगः प्रियया चोपनतः सुदुस्सहो मे । नववारिधरोदयादहोभिरेवितत्कयं च निरातपैरम्ये: ॥
इत्यत्र चशब्दः ।
(अनु०) निपातों का व्यञ्जकत्व जैसे—
'उस प्रियतमा से सुदुस्सह वियोग एकदम आ पड़ा और नवीन जलधरों के उदय से दिन भी आतपाभाव से रमणीय हो जावेंगे ।'
यहाँ पर 'च' ( और ) शब्द ।
लोचन
च शब्द इति जातिवेकवचनम् । द्वौ च शब्दावेवमाहतु:-काकतालीयन्यायेन गणडस्योपरि स्फोट इवितस्तद्वियोगाश्र वर्षासमयाश्र सममुपनतौ एतदर्थं माणहरणाय ।
अत एव रसपदेन सुतरां उद्दीपनविभावत्वमुक्तम् ।
'च शब्द' यह ।
जाति में एकवचन है ।
दो 'च' शब्द यहाँ कहते हैं—काकतालीय न्याय से फोड़े पर ( दूसरा ) फोड़ा इसके समान उसका वियोग और वर्षा समय एक साथ आये।
यह प्राणहरण के लिये पर्याप्त है ।
अत एव 'रस' शब्द से उद्दीपन विभावत्व तो कह ही दिया गया ।
तारावती
आधार पर भी होता है ।
ये वृत्तियाँ वीर रौद्र श्रृङ्गार इत्यादि की व्यञ्जना करती हैं ।
इस प्रकार केवल समासों की व्यञ्जकता का पहले ही प्रतिपादन किया जा चुका, अतः यहाँ पर उनके उदाहरण देने की आवश्यकता नहीं है ।)
यहाँ तक उन व्यञ्जकों का परिचय दिया जा चुका जिनका उल्लेख कारिका में किया गया था ।
कारिका में 'च' शब्द का भी प्रयोग किया गया है ।
अतः उससे निपात इत्यादि दूसरे तत्त्वों का भी उपादान हो जाता है ।
अब उनकी व्याख्या की जा रही है ।
निपातों की व्यञ्जकता का उदाहरण—
विक्रमोर्वशीय में राजा पुरुरवा उर्वशी के साथ गन्धमादन पर्वत पर विहार करने गये हैं ।
वहाँ मोत्रस्खलन के कारण उर्वशी रुष्ट होकर कुमारवन में चली गई जिसमें किसी भी का जाना निषिद्ध था और उसके लिये यह नियम बना हुआ था कि यदि कोई स्त्री नियम का अतिक्रमण करके उस वन में चली जाती तो वह लता बन जाती ।
उर्वशी भी लता बन गईं ।
राजा उसके वियोग में विलाप करते हुये घूम रहे हैं वे इसी अवसर पर कह रहे हैं ।
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यथा वा— मुहुरङ्गुलिसंवृताधरोष्ठं प्रतिषेधाद्रविकृतवाभिरामम् । मुखमंसविवर्तिंपचमलालस्या: कथमप्युन्रमितं न चुम्वितं तु ॥
अत्र तुशब्दः । अथवा जैसे— 'बार बार अङ्गुलि से रोके हुए अधरोष्ठवाले, प्रतिषेध के अक्षरों की विकृतता के कारण अभिराम, कन्थे की ओर घूसे हुये उस सुन्दर पद्म-युक्त नेत्रोंवाली ( शकुन्तला ) के मुख को जैसे तैसे ऊपर को उठाया किन्तु चूम तो नहीं पाया । यहाँ पर 'तु' ( तो ) शब्द ।
लोचन पश्चात्तापसूचकस्सन् तावन्मात्रपरिलुब्धनलाभेनापि कृतकृत्यता स्पादिति ध्वनितोऽत्र भावः । 'tु शब्द' यह, भाव यह है कि पश्चात्तापसूचक होते हुये केवल उतने परि-चुम्बन की प्राप्ति से ही कृतकृत्यता हो जाती यह ध्वनित करता है । तारावती 'उस प्रियतमा से वह अत्यन्त असह्य वियोग एक दम आ पड़ा और नवीन जलधरों के उदय से घनरहित हो जाने के कारण दिन अधिक रमणीय हो जाने च:हिये ।' इस पद्य में दो बार 'च' शब्द आया है 'चोपनत:' 'भवितव्यं च' इन दोनों चकारों के लिये एक साथ ही वृत्ति में 'च शब्द' कहकर निर्देश किया गया है । यहाँ पर एकवचन जाति के अर्थ में हुआ है इससे एकवचन से दोनों चकारों का ग्रहण हो जाता है । 'च' यह निपात है । इन दोनों 'च' शब्दों से व्यञ्जना होती है—जैसे फोड़े पर दूसरा घाव हो जावे उसी प्रकार काकतालीय न्याय से अर्थात् संयोगवश प्रियतमा का वियोग और वर्षाकाल एक साथ आये हैं । इससे मेघों की अत्यन्त उद्दीकता, उनसे मलिन दिवसों के यापन करने की कठिनता और विरहवेदना की असह्यता का उत्कर्ष ध्वनित होता है । आशय यह है यह संयोग हमारे प्राण लेने के लिये पर्याप्त है । ( यदि कुछ ब्यवधान से उद्दीपक मेघ स्वाये होते तो उनकी सहृ लिया गया होता और वे अधिक पीड़ित नहीं करते । ) इसीलिये 'रस' शब्द से उद्दीपकता ठीक ठीक बतला दी गई है । निपात की व्यञ्जकता का दूसरा उदाहरण अभिज्ञानशाकुन्तल से दिया गया है । राजा का शकुन्तला से एकान्त सम्भिलन हो चुका है । गौतमी के आ जाने
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निपातानां प्रसिद्धमपोह व्योतकत्वं रसापेक्षयोक्कमिति दृश्यम् ।
निपातों का प्रसिद्ध भी व्योतकत्व यहां पर रस की अपेक्षा से गाया है ।
प्रसिद्धमपोहति । वैयाकरणादिगृहीतेषु हि प्राक्म्रयोगास्वातन्वयम्रयोगाभावात् प्राथ श्रवणादिलिङ्गसङ्ख्याविरहाच्च वाचकबैलक्षण्येन व्योतका निपाता इत्युद्रोष्यते भावः । 'प्रसिद्ध भी' यह । भाव यह है वैैयाकरणों के घरों में निस्सन्देह पहले प्रयोग-नैयस प्रयोग का अभाव, पश्चात् इत्यादि का आश्रयण और लिङ्गसंख्या का अभाव ( कारणों ) से वाचक की विलक्षणता से निपात व्योतक हैं यह घोषित किया ही है ।
कुन्तला राजा को छोड़ कर चली गई हैं तथा उनका सहवास नहीं हो सका राजा पश्चात्ताप करते हुए कह रहे हैं—
कुन्तला राजा को छोड़ कर चली गई हैं तथा उनका सहवास नहीं हो सका राजा पश्चात्ताप करते हुए कह रहे हैं—
शाकुन्तला वार वार अपनी अंगुलियों से अपने अधरोष्ठ को छिपाने का प्रयत्न थी ( जिससे मैं उसका चुम्बन न कर सकूँ ) । बार बार मना करने के जो उसके मुख से निकलते थे और जिनके कारण उसकी व्याकुलता आभव्यक्त थी उनसे उसका मुख बड़ा ही सुन्दर प्रतीत होता था । चुम्बन को बचाने ये उसने अपना मुख कन्धे की ओर घुमा लिया था । उसके नेत्रलोच नेत्र बड़े ही सुन्दर प्रतीत हो रहे थे । मैंने उसके मुख क्मे ऊपर को उठाया चुम्बन तो नहीं कर पाया ।
शाकुन्तला वार वार अपनी अंगुलियों से अपने अधरोष्ठ को छिपाने का प्रयत्न थी ( जिससे मैं उसका चुम्बन न कर सकूँ ) । बार बार मना करने के जो उसके मुख से निकलते थे और जिनके कारण उसकी व्याकुलता आभव्यक्त थी उनसे उसका मुख बड़ा ही सुन्दर प्रतीत होता था । चुम्बन को बचाने ये उसने अपना मुख कन्धे की ओर घुमा लिया था । उसके नेत्रलोच नेत्र बड़े ही सुन्दर प्रतीत हो रहे थे । मैंने उसके मुख क्मे ऊपर को उठाया चुम्बन तो नहीं कर पाया ।
यहाँ पर 'तो' शब्द पश्चात्ताप का सूचक है और उससे ध्वनित होता है कि और कुछ न सही उतना भर मुझे चुम्बन ही मिल जाता तो मैं कृतकृत्य ता । ('चूम तो नहीं पाया' की व्यञ्जना यह है कि मैंने सभी कुछ कर लिया किन्तु उसका चुम्बन नहीं ले सका, वस्तुतः उसका चुम्बन नहीं है ।)
यहाँ पर 'तो' शब्द पश्चात्ताप का सूचक है और उससे ध्वनित होता है कि और कुछ न सही उतना भर मुझे चुम्बन ही मिल जाता तो मैं कृतकृत्य ता । ('चूम तो नहीं पाया' की व्यञ्जना यह है कि मैंने सभी कुछ कर लिया किन्तु उसका चुम्बन नहीं ले सका, वस्तुतः उसका चुम्बन नहीं है ।)
यहाँ पर एक प्रश्न यह उपस्थित होता है कि वैैयाकरणों के मत में निपातों रेई अर्थ नहीं होता । इन लोगों का मत है कि उपसर्ग और निपात किसी के वाचक नहीं होते किन्तु व्योतक ( व्यञ्जक ) होते हैं । उदाहरण के लिये नवति' में 'अनु' का कोई अर्थ नहीं है ।' 'भवति' में ही 'अनुभव' इत्यादि अर्थ सन्निहित है । 'अनु' का प्रयोग उस सन्निहित अर्थ को अभिव्यक्तमात्र ता है । यही निपातों के विषय में भी कहा जा सकता है । वैैयाकरण लोग
यहाँ पर एक प्रश्न यह उपस्थित होता है कि वैैयाकरणों के मत में निपातों रेई अर्थ नहीं होता । इन लोगों का मत है कि उपसर्ग और निपात किसी के वाचक नहीं होते किन्तु व्योतक ( व्यञ्जक ) होते हैं । उदाहरण के लिये नवति' में 'अनु' का कोई अर्थ नहीं है ।' 'भवति' में ही 'अनुभव' इत्यादि अर्थ सन्निहित है । 'अनु' का प्रयोग उस सन्निहित अर्थ को अभिव्यक्तमात्र ता है । यही निपातों के विषय में भी कहा जा सकता है । वैैयाकरण लोग
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उपसर्गाणां व्यञ्जकत्वं यथा— नीवाराः शुक्तगर्भकोटरमुखश्रश्रास्तस्तरणासंधः । प्रस्तिग्धा कचिद्गुदीफलभिदः सूच्यन्त एवोपला: ॥ विश्वासोपगमाभिलाषाभिमुखीगतयः शब्दं सहन्ते मृगाः— स्तोयाधारपथाश्र वल्कलशिखानिष्यन्दलेलाझिता: ॥
अनु० उपसर्गों की व्यञ्जकता जैसे— ‘शुकों से युक्त कोटरों के मुख से गिरे हुये नीवार वृक्षों के नीचे (पड़े हैं) । कहीं इञ्जुदी के फलों को फोड़नेवाले चिकने उपल दिखाई ही पड़ रहे हैं; विश्वास के उत्पन्न हो जाने से स्वलनरहित गतिवाले मृग शब्द को सहते हैं और जलों के आधार के मार्ग वल्कल शिखाओं के प्रवाह की रेखाओं से आङ्कित हैं ।’
लोचन प्रकर्षं सनिग्धा इति श्रयते: प्रकर्षं वोत्यसविद्धीफलान्तं सरसत्वसाचच्क्षाण आश्रम- मस्य सौन्दर्योतिशयं ध्वनयति । ‘तापसस्य फलविषयोडमिलाषातिरेको ध्वन्यते’ इति त्वसत् । अभिज्ञानशाकुन्तले हि राझ इयमुक्तिर् तापसस्येत्यलम् । द्वित्राणामित्यनेना- भिक्यं निरस्यति । सम्यगुच्चैर्विशेषेणैक्षित्वल्वे भगवतः कृपातिशयोऽभिव्यक्तः । ‘प्रकर्षं सनिग्धा’ इसमें ‘प्र’ शब्द प्रकर्ष को व्योतित करते हुये इञ्जुदी फलों की सरसता वतलाते हुये आश्रम के सौन्दर्य के आधिक्य को ध्वनित करता है । ‘तापस की फलविषयक अभिलाषातिशयता को प्रकट करता है’ यह कहना तो ठीक नहीं । अभिज्ञानशाकुन्तल में यह राजा की उक्ति है तापस की नहीं वस इतना पर्याप्त है । ‘दो-तीन’ कहने से आधिक्य का निराकरण करते हैं । ठीक रूप में अधिकता से विशेष रूप में देखने में भगवान् की कृपा की अधिकता अभिव्यक्त होती है ।
तारावती इन के वाचक न होने के कई कारण वतलाते हैं— ( १ ) वाचक शब्दों के प्रयोग का कोई नियम नहीं होता । ‘घटम् आनय’ ‘आनय घटम्’ इत्यादि किसी रूप में योग किया जा सकता है, किन्तु ‘प्र’ इत्यादि उपसर्गों और ‘च’ इत्यादि निपातों १ स्थान नियत होता है । उपसर्गों का प्रयोग नियमतः धातुओं के पहले ही होता है । ( २ ) वाचक शब्दों का स्वतन्त्र प्रयोग हुआ करता है किन्तु उपसर्गों और निपातों का प्रयोग दूसरे शब्दों में जुड़कर ही होता है । ‘प्र’ ‘अनु’ इत्यादि का एकांकी होने पर कोई अर्थ ही नहीं होता और न इनका प्रयोग ही हो सकता है । ( ३ ) वाचक शब्दों के साथ सम्बन्ध इत्यादि में षष्ठी इत्यादि का प्रयोग होता है
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जैसे—‘देवस्य पुत्रः’ इत्यादि; किन्तु ‘इव’ इत्यादि निपातों के साथ सम्बन्ध इत्यादि में पष्ठी इत्यादि का भी प्रयोग नहीं होता । ( ४ ) वाचक शब्दों में लिङ्ग संख्या इत्यादि का योग होता है किन्तु उपसर्गों और निपातों में लिङ्ग संख्या इत्यादि का योग नहीं होता । इन कारणों से उपसर्गों और निपातों में अन्य वाचकों से विलक्षणता होती है । अतः उपसर्ग और निपात वाचक नहीं किन्तु द्योतक हो माने जाते हैं । फिर इनकी द्योतकता का पृथक् प्रतिपादन करने का क्या प्रयोजन ? इसका उत्तर यह है कि यद्यपि इनका द्योतकत्व वैयाकरणों में प्रसिद्ध है तथापि यहाँ पर पृथक् उल्लेख रस इत्यादि की दृष्टि से किया गया है । आध्याय यह है कि उपसर्ग और निपात सामान्यतया द्योतक तो होते ही हैं वे रस इत्यादि के भी द्योतक होते हैं ।
उपसर्गों की द्योतकता का उदाहरण—जैसे अभिज्ञानशाकुन्तल में मृगयाविहार के प्रसङ्ग में तपोवन के निकट जाकर अपने साथी को बतला रहे हैं कि यह प्रदेश ज्ञात हो रहा है ।
वृक्षों के नीचे नीवार धान्य कण बिखरे पड़े हैं जिनको वृक्षों के कोटरों में बैठे हुए तोतों ने कुतर-कुतर कर खा डाला है । ( मुनि लोग अपने जीवननिर्वाह के लिये नीवार वो लेते हैं । अतः नीवार-कण आश्रम के निकट ही सम्भव हैं । ) कहीं-कहीं इङ्गुदी फल को पीसनेवाले बहुत अधिक चिकने पत्थर दिखाई पड़ रहे हैं । ( मुनि लोग इङ्गुदी फलों को पीस पीस कर अपने तेल का काम चलाया करते हैं । वे इङ्गुदी फलों को तोड़ कर उनको पत्थर से पीस लेते हैं अतः इस प्रकार के चिकने पत्थर आश्रम के निकट ही मिल सकते हैं । ) रथ का घर्घर रव हो रहा है किन्तु हिरणों को विश्वास हो गया है कि आश्रम के निकट उन्हें कोई मारेगा नहीं । अतः वे शब्द की परवाह नहीं करते तथा किसी भय के होने पर भी अपनी चाल में अन्तर नहीं भरने देते ( भागते नहीं ) । कहाँ-कहीं जलाशय बने हैं, उन जलाशयों को जाननेवाले मार्गों पर वल्कल वृक्षों के छोर से निकली हुई जळधाराओं की रेखायें बनी हैं ( जिससे ज्ञात होता है कि जलाशयों में स्नान कर मुनि लोग इन मार्गों से निकलते होंगे और उनके वल्कल के छोरों से जल बहता जाता होगा जिसकी रेखायें मार्गों में बन गयी हैं । ( इन बातों से ज्ञात होता है कि हम आश्रम के निकट हैं ।
यहाँ पर ‘प्रसन्नघ’ शब्द में ‘प्र’ उपसर्ग का अर्थ है प्रकर्ष, इससे व्यञ्जना होती है कि यहाँ के इङ्गुदी फल बहुत ही चिकने हैं और उनमें तेल बहुत अधिक निकलता है जिससे उनके पीसनेवाले पत्थर घिस गये हैं । अतः यह स्थान बहुत ही सुन्दर है । कुछ लोगों ने यहाँ पर यह व्याख्या की है कि—‘तपस्वी लोग विशेष
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इत्यादौ। द्वित्राणां चोपसर्गाणामसे कत्र पदे यः प्रयोगः स एवं रसाभिव्यक्त्यनुगुणतयैव निर्देशः। यथा—‘प्रभ्रश्यत्युत्तरीयाथिपि समासि समुद्धृत्य वीतावृततीन्द्रियजन्तून’ इत्यादौ। यथा वा ‘मनुष्यवृत्या समुपाचरन्तम्’ इत्यादौ।
इत्यादि में। दो तीन उपसर्गों का एक पद में जो प्रयोग वह भी रसाभिव्यक्ति के अनुगुण होने से ही निर्देश होता है। जैसे—‘उत्तर की प्रभा के समान अंधकार के प्रभ्रष्ट होने पर शीघ्र ही वीत भावरणवाले जन्तुओं को देखकर…….’ इत्यादि में। अथवा जैसे ‘मनुष्य की वृति से ठीक आचरण करनेवाले को…….’ इत्यादि में।
मनुष्यवृत्या समुपाचरन्तं स्वबुद्धिसामान्यन्यकृतानुमानः। योगीश्वरैरप्यसुपोधमीक्ष त्वां वोढुमिच्छन्त्यनन्यबुधाः स्वतर्के॥ सम्यग्भूतमुपांशुकृत्या आसन्नन्ताचरन्तमिल्यनेन लोकानुविदघक्षणातिशयस्तत्तदाचरत्परमेश्वरस्य ध्वनितः।
हे ईश ! अपनी सामान्य बुद्धि के आधार पर अनुमान करनेवाले मूर्खं लोग मनुष्य वृत्ति में आचरण करनेवाले, योगीश्वरों के द्वारा भी सरलतापूर्वंक न समझे जाने योग्य आपको अपने तकों से जानना चाहते हैं ? ठीक रूप में छिपकर ‘आ’ अर्थात चारों ओर से चरण ( विचरण ) करनेवाले इससे लोक के प्रति दिन्न्द काःयों को करनेवाले भगवान् के अनुग्रह की अतिशयता ध्वनित होती है !
फल की अभिलाषा से खून तेल निकाल निकाल कर अपने वालों को चिकना किया करते हैं यह व्यञ्जना होती है ! किन्तु यह व्याख्या ठीक नहीं; क्योंकि अभिज्ञान शाकुन्तल में यह कचन राजा का है तपस्वी का नहीं। (आशय यह है कि ‘प्र’ उपसर्गं आश्रम के प्रति अनुराग की अधिकता को व्यक्त करते हुये शान्तरस में पर्यवसित होता है।)
कहीं कहीं एक ही पद में दो तीन उपसर्गों का प्रयोग देखा जाता है। यह भी दोपरहित तभी माना जा सकता है जब यह रसाभिव्यक्ति के अनुकूल है। जैसे सूर्यशतक में मयूर कवि ने सूर्य की प्रशंसा करते हुये लिखा है—‘व सूर्य ने देखा कि जो अंधकार उत्तरवस्त्र के समान समस्त जन्तुओं को ढके हुये था वह एकदम हट गया और समस्त जन्तु आवरणरहित हो गये ( तब उसने किरणों को तन्तुओं के रूप में फैलाकर उन सबको माय आवरण दे दिया )।’
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निपातानामपि तथैव । यथा 'अहो वतासि स्फुरणीयवीर्यः' इत्यादौ । यथा वावये जीव्न्ति न मान्ति ये स्वपुषि प्रीत्या प्रतियन्ति च प्रस्न्यन्दिप्रसादाश्रवः पुलकिता हृष्टे गुणिन्युर्जिते । हृा धिक्कष्टमहो न यासि शरणं तेषां जनानां कृते नीतानां प्रलयं शठेन विधिना साधुर्द्रिषः पुष्यता ॥
निपातों का भी उसी प्रकार ( व्यञ्जकत्व होना है ) । जैसे 'अहो वतासि स्फुरणीयवीर्यः' इत्यादि में; अथवा जैसे—'वे जीवित होते हैं, जो अपने शरीर में फूले नहीं समाते, जो प्रेम के साथ नाचने लगते हैं जिनके आँसुओं का प्रवाहित होना लगता है जिनका शरीर रोमांचित होने लगता है—हाय, धिक्कार है कष्ट की बात है आश्चर्य की बात है कि सज्जनों के विरोधियों का रोषण करनेवाले दुष्ट देव के द्वारा सर्वथा प्रलय को प्राप्त किये हुये उन ( लोगों ) के लिये मैं किसकी शरण जाऊँ ?'
तथैवति । रसव्यञ्जकत्वेन द्वित्राणामपि प्रयोगो निर्दोष इत्यर्थः । श्लाघातिशयो नेर्वेदातिशयो बहो वतेति हा भिगिति च ध्वन्यते ।
'उसी प्रकार' यह । अर्थात् रस की व्यञ्जकता में दो तीन का भी प्रयोग 'अहो वत' यह और 'हा धिक्' यह श्लाघातिशय और निर्वेदातिशय ध्वनित करता है ।
यहाँ पर 'देखकर' के लिये 'समुद्रीचय' का प्रयोग किया गया है । इसमें 'सम्', 'उत्' और 'वि' ये तीन उपसर्ग हैं; सम का अर्थ है भलीभाँति, 'उत्' का अर्थ उत्तमता के साथ और 'वि' का अर्थ है विशेषरूप से । इस प्रकार सूर्य के भलीभाँति, उत्तमता के साथ और विशेष रूप से प्राणियों को देखने में भगवान् सूर्य की प्रीति, उत्कर्ष की अधिकता व्यक्त होती है कि भगवान् सूर्य प्राणियों से इतना प्रेम करते हैं
कि भगवान् सूर्य प्राणियों से इतना प्रेम करते हैं
कि भगवान् सूर्य प्राणियों से इतना प्रेम करते हैं
दूसरा उदाहरण—'अपनी सीमित बुद्धि से । अनुमान करनेवाले मूर्ख लोग मनुष्य वृत्ति से चरण करनेवाले योगीश्वरों के द्वारा भी भलीभाँति न जानने योग्य तुझे देश को अपने तर्कों से जानना चाहते हैं ।'
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यहाँ पर विचरण के लिये 'समुपाचरन्तमः' यह प्रयोग किया गया है। 'सम्' का अर्थ है भलीभाँति, 'उप' का अर्थ है 'गुप्त रूप में' और 'आ' का अर्थ है चारों ओर। इससे ध्वनित होता है कि भगवान् व्यामोह रहित होकर लोक कल्याण के लिये सर्वत्र विचरण करते हैं। वे जिस रूप में विचरण करते हैं वह उनका रूप गुप्त अतः दुर्ज्ञेय होता है। इससे विभिन्न कार्यों को करने वाले भगवान् की लोकानुग्रहेच्छा की अधिकता ध्वनित होती है।
जो बात उपसर्गों के विषय में कही गई है वह निपातों के विषय में भी लागू होती है। अर्थात् रसव्यञ्जक के रूप में यदि दो-तीन उपसर्गों का प्रयोग किया जावे तो उसमें दोष नहीं होता। जैसे 'अहो बत ! तुम स्फुटहृणीय पराक्रम वाले हो।' यहाँ पर 'अहो' और 'बत' ये दो निपात प्रयुक्त किये गये हैं जिनसे प्रशंसा की अधिकता ध्वनित होती है।
दूसरा उदाहरण— 'कुछ लोग इतने सज्जन होते हैं कि जब वे किसी ऊर्जस्वीत गुणवत्त् व्यक्ति को देखते हैं तो जी उठते हैं, अपने अञ्जनों में नहीं समाते, आनन्दित हो जाते हैं, उनके आनन्दाश्रु एकदम प्रवाहित होने लगते हैं और वे रोमाञ्चित हो जाते हैं; किन्तु धिक्कार है, अत्यन्त खेद की बात है कि दुष्ट दैव ऐसे लोगों का विल्कुल नाश कर देता है और सज्जनों से द्रोह करने वालों को पुष्ट करता है। जब दैव ही सज्जनों का घातक है तब हम उनके प्राण के अतिरिक्त किसकी शरण जावें ?'
यहाँ पर 'हा' 'धिक्' ये दो निपात एक साथ आये हैं; इनसे विधि के प्रति असूया और लोक की विपरीत की निन्दा की व्यञ्जना से निवेद की अधिकता ध्वनित होती है।
यहाँ पर यह बतलाया गया है कि सुप् तिङ् इत्यादि तो व्यञ्जक होते ही हैं कभी-कभी एक साथ दो-दो, तीन-तीन उपसर्ग निपात इत्यादि आ जाते हैं; उनका दो-तीन बार प्रयोग भी व्यञ्जक हो सकता है। केवल कारक में आये हुये तत्व ही दो बार कहे जाने पर व्यञ्जक नहीं होते। अपितु शब्द इत्यादि भी व्यञ्जक हो जाते हैं। पुनरुक्ति भी व्यञ्जक हो सकती है। इस प्रसङ्ग से दूसरी पुनरुक्तियों की गूढ्जकता का भी निर्देश किया जा रहा है कि यदि पदपौनरुक्त्य का व्यञ्जकत्व दृष्टि से प्रयोग किया गया हो तब भी वह शोभा को घारण करती है।
(आशय यह है कि वैसे पुनरुक्ति तो दोष ही होती है, किन्तु यदि व्यञ्जकत्व की दृष्टि से उसका प्रयोग किया जावे तो वह रसापकर्ष के स्थान पर रसोत्कर्ष ही करती है। यही बात साहित्यदर्पण में बतलाये हुये विहित के अनुवाद इत्यादि स्थलों के विषय में कही जा सकती है।) पद के पौनरुक्त्य से व्यञ्जना का उदाहरण—
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पदपौनरुक्त्यं च व्यङ्कत्वापेक्षयैव कदाचित्प्रयुज्यमानं शोभामावहति । यथा— यद्वचनाहितमतिव्यबहुचाटुगरं कायोंन्मुखः खलजनः कृतकं नवीनीति । तत्र साधवो न न विदन्ति विदन्ति किन्तु कृतं व्यथा प्रणयमस्य न पारयन्ति ॥
पदपौनरुक्त्य तो कभी व्यङ्जकत्व की अपेक्षा से ही प्रयुक्त किया हुआ शोभा को धारण करता है । जैसे— 'जो कि वचनना में अपने मन को लगाये हुये कार्य की ओर उन्मुख दुष्ट लोग बहुत सी खुशामद की बातों से भरी हुई बनावटी बातें किया करते हैं उसका सज्जन लोग नहीं जानते ऐसा नहीं है अपितु जानते हैं किन्तु इसके प्रणय को व्यर्थ करने में समर्थ नहीं होते ।'
प्रसङ्घात्पौनरुक्त्यान्तरमपि व्यङ्ककत्वस्याह-पदपौनरुक्त्यमिति । पदग्रहणं वाक्यादेरपि यथासम्भवसुपलक्षणम् । विदुन्तीति । त एव हि सवं विदन्ति सुतरांमिति ध्वन्यते । वाक्यपौनरुक्त्यं यथा—‘परस्य द्वीपादन्यस्मादपि’ इति वचनान्तरं ‘कः प्रसङ्गवशा दूसरे व्यङ्कक पौनरुक्य को कहते हैं—‘पदपौनरुक्य’ यह । पदग्रहण यथासम्भव वाक्य इत्यादि का भी उपलक्षण है । 'जानते हैं' । 'वे ही सब भली बातें जानते हैं' यह ध्वनित होता है । वाक्यपौनरुक्त्य जैसे—‘देखो दूसरे 'दुष्ट लोग वञ्चना को अपने मन में रख्खे हुये और स्वार्थ साधन को ही अपना लक्ष्य समझते हुये जो कि चाटुकारिता से भरी हुई बहुत सी बनावटी बातें किया करते हैं उनको सज्जन लोग जान नहीं जाते ऐसा नहीं है, वे जान जाते हैं; किन्तु फिर भी ( अपनी सज्जनता के कारण ) उनमें इतनी शक्ति ही नहीं होती कि वे दुष्टों को अभ्यर्थना को व्यर्थ कर सके ।'
यहाँ पर 'नहीं जान जाते ऐसा नहीं' इस कथन से ही हृद्यता आ जाती है क्योंकि दो बार 'न' का प्रयोग प्रकट अर्थ को हृदय कर देता है । तथापि पुनः 'जानते हैं' यह कह दिया गया है । इस पुनरुक्ति से व्यञ्जना निकलती है कि और कोई जाने या न जाने सज्जनों में इतनी निपुणता होती है कि ठीक ठीक तो वे ही जान पाते हैं ।
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सन्देह: दीपादन्यस्मादपि' इत्यनेनेप्सितमप्राप्तिरविघ्नतैव ध्वन्यते । 'किं किम् ? स्वस्था मवन्ति मयि जीवति' इत्यनेनामर्षातिशय: । 'सर्वक्षि तिभृतां नाथ हृ्टा सर्वाङ्गसुन्दरी' इत्युन्मादातिशय: ।
दीप से भी' इन वचनों के वाच्य 'क्या सन्देह है दूसरे दीप से भी' इससे इष्ट की विघ्नरहित ही प्राप्ति ध्वनित होती है । 'क्या क्या मेरे जीवित रहते धातृराष्ट्र स्वस्थ हों' इससे अमर्ष की अधिकता । 'समस्त पर्वतों के स्वामी ! क्या तुमने सर्वाङ्गसुन्दरी को देखा है ?' इससे उन्माद की अधिकता ।
यहाँ पर 'पद-पौनरुक्त्य' यह उपलक्षणपरक है, इससे वाक्य इत्यादि के पौनरुक्त्य में भी व्यङ्ग्यकता सिद्ध हो जाती है । वाक्य-पौनरुक्त्य में व्यङ्ग्यकता का उदाहरण—(१) रत्नावली में सूत्रधार कहता है—'दूसरे दीप से भी, समुद्र के मध्य से भी रत्नाकर के द्वार से भी अभिमत को लेकर अभिमुख विधाता उसे सद्य:ष्टित कर देता है ।' सूत्रधार के इस कथन को लेकर 'क्या सन्देह है ? दूसरे दीप से भी' इत्यादि वाक्य को कहते हये पात्रप्रवेश होता है । वाक्य के इस पौनरुक्त्य से ध्वनित होता है कि अभीष्ट की प्राप्ति बिना विघ्न के ही हो जावेगी । ( रत्नावली के प्रवहण मेञ्ज, पुन: रत्नाकरों के हाथ में पड़ना, सागरिका के रूप में उदय के अन्त:पुर में निवास इत्यादि ऐसी घटनायें थीं जिनको अनुकूल विधाता ने स्वयं सन्निकट कर दिया और रत्नावली के रूप में अभीष्ट प्राप्ति होकर ही रही । ) ( २ ) वेङ्कटनाथ के वर्णनसंधार में भीमसेन वार-वार यह वाक्य बोलते हैं कि 'मेरे जीवित रहते धृतराष्ट्र के पुत्र स्वस्थ हों !' इस वाक्य से भीमसेन के क्रोध की अधिकता ध्वनित होती है । ( ३ ) विक्रमोर्वशीय में उर्वशी के वल्तारूप में परिणत हो जाने पर राजा पर्वत से पूछते हैं—'हे समस्त पर्वतों के स्वामी ! क्या तुमने इस वन के अन्दर मेरे द्वारा विमुक्त सर्वाङ्गसुन्दरी रमणी को देखा है ?' 'देखा' की प्रतिध्वनि सुनकर फिर वहाँ कहनें हैं । यहाँ वाक्य का पुन: कहना राजा के उन्माद की अधिकता को ध्वनित करता है ।
तिडन्त के अर्थसमूह में कारक, काल, संख्या, उपग्रह (कर्तृत्वाच्यताकर्मवाच्यता) व आ जाते हैं, तिडन्त पद के अन्दर इन सबका अनुप्रवेश हो जाता है ।
कारक, काल, संख्या, उपग्रह (कर्तृत्वाच्यताकर्मवाच्यता) इन सबका अनुप्रवेश तिडन्त पद में प्रत्येक पर पड़ने अमुख्य और व्यतिरेक की दृष्टि से सूक्ष्मतया विचार किये जाने अर्थात् यह देखा जावे कि कौन अर्थ किस शब्द के होने पर व्यक्त होता है और उसके हटाने पर हट जाता है तो भागों में रहनेवाला व्यङ्ग्यकत्व भी अनुभवगोचर हो जावेगा । उदाहरण के लिये काल की व्यञ्जकता को लीजिये ।
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कालस्य व्युङ्कत्वं यथा— समविसमणिथविसेसा समन्तओ मन्दमन्दसञ्चारा । अडिरा होइन्ति पहा मणोरहाणं पि दुल्लड्ढा ॥
काल की व्युङ्कता जैसे— 'सम और विषम में विशेषता से चारों ओर मन्द मन्द संचरण करने वाले मार्ग क्षणभर में मनोरथों द्वारा भी अलड्ढनीय हो जावेंगे ।'
लोचन कालस्येति । तिड्न्तपदादुभविवक्षितस्वात्यर्थकलापस्य कारककालसंख्योपग्रहाद्रूपस्य मध्ये डन्वयाद्यतिरेकाभ्यां सूक्ष्ममदृशा मागगतमपि व्युङ्कत्वं विचार्यंमिति भावः । 'काल का' यह । भाव यह है कि तिडन्त पद में अन्वित, कारक काल संख्या वाच्यरूप अर्थकलाप के सन्धि में भी अन्वय व्यतिरेक से सूक्ष्म दृष्टि से भाग में रहनेवाले व्युङ्कतव का भी विचार करना चाहिये । तारावती कई नायक परदेश को जा रहा है, वर्षाकाल सन्निकट है । नायिका उससे कह रही है— 'शीघ्र ही वर्षाकाल आ जावेगा समान तथा ऊँचे नीचे सभी प्रदेश पानी भर जाने से एक जैसे हो जावेंगे । चारों ओर पिच्छलता आ जाने से इनमें सञ्चरण बहुत ही मन्द हो जावेगा । शीघ्र ही मार्ग मनोरथों के लिये भी दुल्लड्ढ्य हो जावेंगे ।'
आशय यह है कि हे प्रियतम ! आप तो परदेश जा रहे हैं, एक तो वर्षा का उद्दीपन काल आयेगा, दूसरे हमारे लिये सन्देश भेजना भी कठिन हो जावेगा । अतः मेरी प्राण रक्षा के लिये तुम्हें ऐसे समय में परदेश नहीं जाना चाहिये । यहाँ पर 'शीघ्र ही हो जावेगा' इस भविष्यत्काल का प्रयोग किया गया है यहाँ पर भविष्यत् में ल्य प्रत्यय भविष्यत्काल का वाचक है । जिससे व्यञ्जना निकलती है 'जब मैं वर्षाकाल की कल्पना करती हूँ तथा भी मेरा शरीर कॉप उठता है फिर जब वर्षाकाल वर्तमान होगा तब मेरी क्या दशा होगी यह तो कहना ही कठिन है ।' यह व्यञ्जना यहाँ पर रस की परम परिपोषक हो जाती है । जब हम इस गाथा के अर्थ को विप्रलम्भ श्रृंगार के विभाव के रूप में समझते हैं तब यह रसमय हो जाता हैं । इस प्रकार तिडन्त इत्यादि के अवान्तर भाग भी व्यञ्जक होते हैं ।
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ध्वन्यालोकः अत्र ह्याचिराद्विच्छ्यन्ति पन्थान इत्थं भविष्यन्तीत्यस्मिन् पदे प्रत्ययः कालविशेषाभियायी रसपरिपोपहेतुः प्रकाशते । अयं हि गाथार्थः प्रवासविप्रलम्भशृङ्गारविभावतया विभाव्यमानो रसवान्।
(अनु.) यहाँ पर निस्सन्देह ‘शीघ्र ही मार्ग हो जावेंगे’ यहाँ पर ‘हो जावेंगे’ इस पद में कालविशेष का अभिधान करनेवाला रसपरिपोष हेतु प्रत्यय प्रकाशित होता है । निस्सन्देह यह गाथा का अर्थ प्रवास विप्रलम्भ शृङ्गार के विभाव के रूप में विभावित किये जाने पर रसवाला होता है ।’ लोचन रसपरिपोपेति । उत्तमेश्यमाणो वर्षासमयः कम्पकारी किसृत वर्तमान इति ध्वन्यते । ‘रसपरिपोप’ यह । उत्त्प्रेक्षा किया हुआ वर्षा समय कम्पन पैदा करनेवाला है वर्तमान का तो कहना ही क्या ? यह ध्वनित किया जाता है । तारावती यहाँ प्रकरण अंशांशी की व्यञ्जकता का चल रहा है । इसी प्रसङ्ग में यह भी समझ लिया जाना चाहिये कि जिस प्रकार प्रत्ययरूप अंश व्यञ्जक होता है उसी प्रकार प्रकृतिरूप अंश भी व्यञ्जक हो सकता है अर्थात् पूरा पद तो व्यञ्जक होता ही हैं दोनों प्रधान ( प्रकृति और प्रत्यय ) व्यञ्जक होते हैं । उदाहरण—अहरहर्न् है कि नह तृणाणि ( तृणानि कुछ ) दिनों में ही इतना अधिक उत्पत्ति का नरकाटा को पहुँचा दिया गया । वह झुकी दीवारोंवाला घर और ये आकाश चूमनेवाले विद्याल भवन, वह झुकी गाय और ये हाथियों की घनघोर घटायें, वह मूसल का तुच्छ शब्द और यह ब्ৰियों का ललित सङ्गीत । आश्चर्य है कि कितना बड़ा अन्तर हो गया है । यहाँ पर ‘दिवसः’ शब्द की प्रकृति है ‘दिवस’ । इससे व्यञ्जना होती है कि इस ब्राह्मण को इतनी अधिक उत्पत्ति करने में न वर्ष लगे न महीने । कुछ ही दिनों में यह सत्र हो गया । एक तो इतना बड़ा परिवर्तन ही आश्चर्यजनक है, दूसरी बात यह है कि यह सब दिनों में ही सम्पन्न हो जावे, वर्षों की तो बात ही दूर रही महीने भी न लगे यह तो सर्वथा अत्यन्त असम्भव है । इस प्रकृति ( शब्द ) का अर्थ वस्तु की अत्यन्त असम्भवनीयता को ध्वनित करता व्यञ्जकता विरोध रूप से होतीहै । यहाँ यह शङ्का हो सकती है कि जब प्रकृतिरूप अंश में व्यञ्जकता वतलायी दी तव सर्वनाम में पृथग्भूत व्यञ्जकता वतलाने में पौनरुक्त्य दोष है । इसका उत्तर यह है कि सर्वनाम सामान्य प्रकृति से मिलकर ( भी )
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यथात्र प्रत्ययांशो व्यञ्जकस्तथा कचित्सकृत्यशोडपि दृश्यते । यथा—तद्रोहं नतमित्तिमन्दिरमिदं लब्धावगाहं दिवः सा वेतर्जरती चरान्ति करिणीमतेव वनस्था घटाः ॥ स छुद्रो मुसलध्वनि कलमिदं सङ्गीतकं योपिता-माश्रयेँ दिवसैकरोडयमियतां भूमि समारोपितः ॥
अत्र श्लोके दिवसैरित्यस्मिन् पदे प्रकृत्यंशोडपि बोतकः ।
( अनु० ) जिस प्रकार यहाँ पर प्रत्यय का अंश व्यञ्जक है उसी प्रकार कहीं प्रकृति का अंश भी देखा जाता है । जैसे— 'झुकी दीवालोंवाला वह घर और आकाश में अवकाश पानेवाला यह ( विशाल ) भवन । वह बुढ़डी गाय और ये बादलों के समान हाथियों की घटायें । वह तुच्छ मूसल का शब्द और यह क्रियों का मधुर संगीत । आश्चर्य है कि यह ब्राह्मण दिनों में ही इतनी बडी भूमिका पर पहुँचा दिया गया ।' यहाँ श्लोक में 'दिनों में ही' इस पद में प्रकृति का अंश भी बोतक है ।
अन्नाशिकमसझादेवाह--यथात्र ते । दिवसार्थोऽन्त्रान्तासम्मेल्यमानतामस्यार्थस्य ध्वनति ।
अंशाशी के प्रसङ्ग से ही कहते हैं—'जैसे यहाँ' । दिवस का अर्थ यहाँ पर इस अर्थ की अत्यन्त असम्भाव्यमानता को वतलाता है ।
लोचन व्यञ्जक होता है । ( सामान्य सर्वनाम भी व्यञ्जक हो सकता है । इसके उदाहरण अन्यत्र दिये गये हैं । ) इसीलिये पौनरुक्त्य नहीं होता । उदाहरण के लिये प्रस्तुत 'तद्रोहें नतमित्तिम्' इत्यादि पद्य को ही लीजिये—'वह घर' यहाँ 'वह' इस सर्वनाम से घर की जीर्ण-शीर्णता और बहुत ही निकृष्टता व्यकत होती है । किन्तु केवल 'वह' की व्यञ्जना उत्कृष्टतापरक भी हो सकती है । इसीलिये 'नतमित्तिम्' ( झुकी हुई दीवालोंवाला ) इस शब्द का प्रयोग किया गया । अब इस नतमित्ति शब्द के सहकार में 'तत्' की व्यञ्जना से दौर्भाग्यातिशय का ख्यापन हो जाता है । यदि केवल 'नतमित्तिम्' शब्द का प्रयोग किया गया होता 'तत्' यह सर्वनाम न होता तो उस घर के समस्त दौर्भाग्यों का आयतन होने की सूचना नहीं मिलती । इसी प्रकार 'वह गाय' 'मूसल की वह झुद्र ध्वनि' इत्यादि में भी समझा जाना चाहिये । 'यतू' और 'तत्' शब्द का नित्य सम्बन्ध हुआ करता है किन्तु 'ते लोचने प्रतिदर्शं
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तद्वनन्त्रां च व्यङ्ककत्वं यथानन्तरोक्ते श्लोके । अन्र च सर्वनाम्नामेव व्यङ्ककत्वं हृदि व्यवस्थाप्य कविना कवेत्यादिशब्दप्रयोगो न कृतः ।
अनुष्टु और सर्वनामों का व्यङ्ककत्व जैसे अभी उदाहरण दिये हुए श्लोक में । यहाँ पर सर्वनामों के व्यङ्ककत्व को ही हृदय में रखकर कवि ने 'क' इत्यादि शब्दों का प्रयोग नहीं किया ।
सर्वनाम्नां चेतति । प्रकृत्यांशस्य चेत्यर्थः । तेन प्रकृत्यंशेन संभूय सर्वनामव्यङ्कंक दृश्यत इत्युर्क मततीति न पौनरुक्त्यम् ।
लोचन सर्वनामों में चेतनता है । प्रकृति के अंश की चेत्यता । तात्पर्य यह है कि प्रकृति के अंश से युक्त सर्वनामों से ध्वनन होता है । इसलिए केवल मुख्य-मुख्य अर्थों से युक्त न होकर पौनरुक्त्य नहीं होता ।
तदतिपदं नतभित्तीयेतत्प्रकृत्यंश- शासहार्यं समस्तामङनिधानभूतां नृपकाद्याकीर्णतां ध्वनति ।
तथा हि--तदिति पदं नतभित्तीत्येतत्प्रकृत्यंश- शासहार्यं समस्तामङनिधानभूतां नृपकाद्याकीर्णतां ध्वनति ।
तदतिहि केवलमुख्य- माने मधुक्पांतिरसायोऽपि सम्न्निधीयते । न च नतभित्तिशब्देनाप्येते दौर्भाग्यायाततनस्व- सुचक्ना विरशेपा उन्नतिः ।
माने मधुरपांतिरसायोऽपि सम्न्निधीयते । न च नतभित्तिशब्देनाप्येते दौर्भाग्यायाततनस्व- सुचक्ना विरशेपा उन्नतिः । एवं तत्र मो कच रह ।
अर्थात् प्रकृति के अंश का भी । इससे प्रकृति अंश से विशिष्ट सर्वनाम दृढतक देखा जाता है । यह बात कही हुई हो जाती है । अतः मिद्धरे सर्वनाम दृढतक देखा जाता है ।
अर्थात् प्रकृति के अंश का भी । इससे प्रकृति अंश से विशिष्ट सर्वनाम दृढतक देखा जाता है । यह बात कही हुई हो जाती है । अतः मिद्धरे सर्वनाम दृढतक देखा जाता है । पुनरपि दोष नहीं आता ।
वह इस प्रकार--'तत्' यह शब्द 'नतभित्ति' इस प्रकरण-प्रसङ्ग की सहायता के साथ समस्त अमङ्गल के निधानरूप मूषक इत्यादि 'क' आकाङ्क्षता को ध्वनित करता है ।
वह इस प्रकार--'तत्' यह शब्द 'नतभित्ति' इस प्रकरण-प्रसङ्ग की सहायता के साथ समस्त अमङ्गल के निधानरूप मूषक इत्यादि 'क' आकाङ्क्षता को ध्वनित करता है । केवल 'तत्' यह कहे जाने पर उत्कर्ष के
केवल 'तत्' यह कहे जाने पर उत्कर्ष के अथवा अपकर्ष का भी सम्बन्ध कही जा सकती । 'नतभित्ति' शब्द से ही दौर्भाग्य की अधिकता की सूचक ये विरोधतायें नहीं कही गई होतीं ।
केवल 'तत्' यह कहे जाने पर उत्कर्ष के अथवा अपकर्ष का भी सम्बन्ध कही जा सकती । 'नतभित्ति' शब्द से ही दौर्भाग्य की अधिकता की सूचक ये विरोधतायें नहीं कही गई होतीं । इसी प्रकार 'वह गाथ' इत्यादि में भी योजना कर ली जानी चाहिए ।
तारावती विशिष्ट चिह्न्तां में जैसा बतलाया जा चुका है ऐसे अवसरों पर 'तत्' शब्द को यत्न शनैः कपी अपेक्षा नहीं होती अपितु 'तत्' शब्द स्मरण के आकार का द्योतक होता है ।
विविध चिह्न्तां में जैसा बतलाया जा चुका है ऐसे अवसरों पर 'तत्' शब्द को यत्न शनैः कपी अपेक्षा नहीं होती अपितु 'तत्' शब्द स्मरण के आकार का द्योतक होता है । वह दर 'वह गाथ' 'वह कथा मुसलश्वानि' से सुबोध के अतीत दौर्भाग्य की अभिव्यकता वक्त की गई है ।
और 'इदम्' शब्द अनुभव का वाचक है । 'यह गगन-जुम्भो भवति' 'वह हरिणों को घनघोर घटायें' 'यह रमणियों का कलमधुर सङ्कीत' ये अनुत्तर नोच्वर हैं ।
और 'इदम्' शब्द अनुभव का वाचक है । 'यह गगन-जुम्भो भवति' 'वह हरिणों को घनघोर घटायें' 'यह रमणियों का कलमधुर सङ्कीत' ये अनुत्तर नोच्वर हैं । स्मृति और अनुभव में अत्यन्त विरुद्ध विप्रतिपत्ति को सूचित किया जा रहा है ।
जिससे आाश्र्य के विभाव की योजना की गई है । यदि 'तत्' और 'इदन्' शब्द न होते तो सभी कुछ अस्फुट हो जाता ।
जिससे आाश्र्य के विभाव की योजना की गई है । यदि 'तत्' और 'इदन्' शब्द न होते तो सभी कुछ अस्फुट हो जाता । अतः यहाँ पर काव्य सौन्दर् का मान नहीं 'तत्' और 'इदम्' अंश ही है ।
प्रस्तुत ग्रन्थ की योजना इसी प्रकार करनी चाहिये । यहाँ पर प्रकृतियों और सर्वनामों को मिलाकर जो व्यङ्ककता दिखाई गई है वह एक उपलक्षणपरक शब्द है जिससे निष्पर्य निकलता है कि
प्रस्तुत ग्रन्थ की योजना इसी प्रकार करनी चाहिये । यहाँ पर प्रकृतियों और सर्वनामों को मिलाकर जो व्यङ्ककता दिखाई गई है वह एक उपलक्षणपरक शब्द है जिससे निष्पर्य निकलता है कि
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अनया दिशाऽऽह्द्यैरन्येडपि व्यङ्ककविशेषा: स्वयमुक्तप्रेक्षणीया: । एतच्च सर्वं पदवाक्यरचनाच्योतनोक्लिष्टं गतार्थमपि वैचित्र्येण न्युपत्त्यये पुनरुक्तम् ।
( अनुः ) इस दिशा से सहृदयों द्वारा और भी व्यङ्गक विशेष स्वयं समझ लिये जाने चाहिये । यह सब पद वाक्य और रचना द्वारा चोतन की उक्ति से ही गतार्थ भी वैचित्र्य के साथ व्युत्पत्ति के लिये पुनः कहा गया ।
लोचन व्याकारघोतकता तच्चछब्दस्त्व । न तु यच्छछब्दसमवेततैल्युक्तं माक् । अत एवात्र तदिदं-शब्दादिना स्मृत्यनुभयोदयेन्तविरुद्धविषयतादृशनेनैवाश्र्यंविषावता योजिता । तदिदं-शब्दाद्भावे तु सर्वमसंगतं स्यात्प्रति तदिदमेक्योरेव प्राणत्वं योज्यम् । एतच्च द्विशः सामस्त्यं त्रिशः सामस्त्यामिति व्यङ्ककसिद्ध्युपलक्षणपरम् । तेन लोष्ट्रप्रस्तारन्यान्येनानन्त-वैचित्र्यमुक्तम् । यदृक्ष्यतन्येडपोऽपि ।
अतिविक्षिसतया शिथिलबुद्धिसमाधानां न मवेदित्यसिम्रादर्शन संक्षिपतैतच्च्येति । वितत्यामिधानेऽपि प्रयोजनं स्मारयति—वैचित्र्यणाति ।
यह पहले कहा जा चुका है । अतएव यहाँ पर ‘तत्’ ‘इदम्’ शब्द इत्यादि से स्मृति और अनुभव की अत्यन्त विरुद्धविषयता की सूचना के द्वारा आश्चर्य की भावना योजित की गईं है । ‘तत्’ और ‘इदम्’ इत्यादि शब्दों के अभाव में तो सब असङ्गत हो जाता, अतः ‘तत्’ और ‘इदम्’ शब्दों में ही प्राणत्व की योजना करनी चाहिये । और यह दो दो से समस्तता और तीन तीन से समस्तता यह उपलक्षणपरक है । इसे लोष्ट्रप्रस्तारन्याय से अनन्त वैचित्र्य कहा गया है । जैसा कि कहेंगे कि ‘अन्य भी’ इत्यादि ।
अस्यान्त विशिष्ट ( विशेष हुआ ) होने के कारण शिथ्ध-बुद्धि का समाधान नहीं होगा इस अभिप्राय से संक्षेप करते हैं—‘और यह ।’ फैलाकर कहने में भी प्रयोजन का स्मरण कराते हैं—‘वैचित्र्य से’ यह ।
व्यङ्ककत्व में परिपूर्णता दो दो करके भी आ सकती है तीन तीन करके भी आ सकती है । यह तो सिद्ध ही है कि यहाँ पर कवि ने सर्वनामों का प्रयोग व्यङ्कक के रूप में किया है । यदि कवि का लक्ष्य सर्वनामों के द्वारा व्यञ्जना करना न होता तो कवि सर्वनामों का प्रयोग न कर वैपम्य दिखलाने के लिये—‘कहाँ तो झुकी दीवालों वाला घर और कहाँ विशाल भवन’ इस प्रकार ‘कहाँ तो’ इन शब्दों का प्रयोग करता । इसका प्रयोग न कर सर्वनामों का प्रयोग किया गया है ।
तारावती व्यङ्ककत्व में परिपूर्णता दो दो करके भी आ सकती है तीन तीन करके भी आ सकती है । यह तो सिद्ध ही है कि यहाँ पर कवि ने सर्वनामों का प्रयोग व्यङ्कक के रूप में किया है । यदि कवि का लक्ष्य सर्वनामों के द्वारा व्यञ्जना करना न होता तो कवि सर्वनामों का प्रयोग न कर वैपम्य दिखलाने के लिये—‘कहाँ तो झुकी दीवालों वाला घर और कहाँ विशाल भवन’ इस प्रकार ‘कहाँ तो’ इन शब्दों का प्रयोग करता । इसका प्रयोग न कर सर्वनामों का प्रयोग किया गया है ।
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सिद्ध होता है कि कवि सर्वनाम का प्रयोग व्यङ्ग्य के रूप में कर रहा है और दो दो शब्द मिलकर पूर्ण व्यङ्ग्य बनते हैं। यदि इस प्रकार दो दो तीन तीन को मिलाकर व्यङ्ग्यक माना जावे और एक दूसरे से उनके साक्ष्य की विवेचना की जावे तो लोष्टप्रस्तार के द्वारा व्यङ्गकों की संख्या अनन्त हो जावेगी और उनकी विशेषताओं की भी कोई सीमा न रहेगी। अतः यहां मार्गमात्र दिखलाया है। समस्त व्यङ्गकों का उल्लेेख सर्वथा असम्भव है। सहृदयों को चाहिये कि वे इसी प्रकार अन्य व्यङ्गकों की स्वयं कल्पना कर लें। यहां पर यह विषय बहुत ही विस्तार गया है। अतः सम्भव है कि शिष्यों को कुछ व्यामोह हो जावे और वे ठीक रूप में उसको हृदयङ्गम न कर सके इसीलिये अन्त में संक्षेप में वतला दिया गया है कि यह सव पद वाक्य और रचना के चोतन के कथन से ही गतार्थ तथा अपनी विचित्रताओं के साथ ठीक रूप में समझ में आ जावेगा। इसलिये पुनः कथन कर दिया गया। विचित्रता को समझाने के लिये ही पृथक-पृथक निर्देश किया गया। (आशय यह है कि पिछली कारिकाओं में पद इत्यादि की व्यङ्गकता बतलाई जा चुकी थी। पद के अन्दर ही उसके विभिन्न अवयव सुप्ति इत्यादि भी आ जाते हैं। किन्तु इतने से बात स्पष्ट नहीं होती थी अतः स्पष्ट करने के मन्तव्य से ‘सुतिरु’ इत्यादि प्रस्तुत कारिका लिखी गई है।)
यहाँ पर एक प्रश्न यह उपस्थित होता है कि व्यङ्ग्यार्थ या तो अभिधेयार्थ-मूलक होता है या लक्षणार्थमूलक। लक्षणार्थ भी अभिधा की पुछछभूत ही होती है। अतः यह सिद्ध हो जाता है कि रस इत्यादि जितने भी व्यङ्ग्यार्थ होते हैं उन सबका उद्रम सर्वदा वाच्यार्थ से ही होता है और वाच्यार्थ में ही रस इत्यादि का आक्षेप किया जा सकता है। इसका आशय यही है कि जहाँ कहीं वाच्यार्थ होगा वहीं व्यङ्ग्यार्थ हो सकेगा, जहाँ वाच्यार्थ नहीं होगा वहाँ व्यङ्ग्यार्थ हो ही नहीं सकेगा। अर्थ समपूर्ण पद का होता है उसके किसी अंश का नहीं। सुप् इत्यादि पदांश हैं पूर्ण पद नहीं। अतः जब सुप् इत्यादि में वाच्यार्थ ही नहीं होता तो उससे व्यङ्ग्यार्थना किस प्रकार हो सकती है और सुप इत्यादि को रसाभिव्यञ्जक किस प्रकार माना जा सकता है? प्रश्नकर्त्ता का आशय यह है कि सुप् इत्यादि का व्यङ्गकत्ववैचित्र्यप्रतिपादन असङ्गत ही है। यद्यपि इस प्रश्न का उत्तर पदों की व्यङ्गकता के निरूपण के अवसर पर दिया जा चुका है तथापि यहाँ पर प्रश्न दो मन्तव्यों से पुनः उठाया है। एक तो इस मन्तव्य से कि पाठक पहले कही हुई बात को भूल न जावे, दूसरे यह कि उसी प्रतिपादन में कुछ अधिक कहना है। (पदों की व्यङ्गकता के निरूपण के अवसर पर यह प्रश्न उठाया गया था कि
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ननु चार्थेसामर्थ्यादेव्या रसादय इत्युक्तम्, तथा च सुवादीनां व्यङ्कत्ववैचित्र्यकथनमनुन्वितमेव । उक्तमत्र पद्यानां व्यङ्कत्वोक्त्यवसरे । किन्त्रार्थविशेषादेव्यत्वेडपि रसादीनां तेषामर्थविशेषाणां व्यङ्ककशाब्दाविनाभावित्वाद्यथानुपूर्वी(अनु० )
( अनु० ) ( प्रश्न ) यह कहा गया है कि रस इत्यादि अर्थसामर्थ्य से आक्षेप करने योग्य होते हैं । अतः सुप् इत्यादि का व्यङ्कत्व वैचित्र्यकथन-अनुचित है । ( उत्तर ) इस ( ग्रन्थ ) में ( ही ) पदों के व्यङ्कत्व के कथन के अवसर पर कहा गया है । ( इस प्रश्न का उत्तर दिया जा चुका है । ) दूसरी बात यह है कि रस इत्यादि के अर्थविशेष के द्वारा आक्षेप करने योग्य होने पर भी उन अर्थ-
लोचन न्निवति । पूर्वनिर्णीतामध्येतद्विस्मरणार्थमधिकामसिध्यर्थं चाक्षिसमम् । उक्तमत्र । नैवैचिकत्वं ध्वनिनिचयबहुलोभियोगैर्येनोच्यते(च)व्यक्तिकत्वं प्रागेवोक्तम् । ननु न गीतादिवदरसाभिव्यक्तकत्वेडपि शब्दस्य तत् त्वापारोऽस्त्येव; स च व्यञ्जनात्कमैवति भावः । एतचास्माभिः प्रथमोद्योते निर्णयत्चरम् । न चेदमस्माभिर
'ननु' यह । पूर्वनिर्णीत में भी यह विस्मरण न होने के लिये और अधिक कहने के लिये आक्षिप्त किया गया है । 'यहीं यह कहा गया' वाचकत्व ध्वनिव्यवहार का उपयोगी नहीं है जिससे अवाचक का व्यङ्कत्व न हो यह पहले ही कहा जा चुका है । भाव यह है गीत इत्यादि के समान शब्द के रसाभिव्यङ्कत्व में भी वहाँ पर व्यापार नहीं ही होता ऐसा नहीं है और वह व्यञ्जनात्मक ही होता है ।
तारावती वस्तुतः वाक्यं सार्थक होते हैं, वाक्यगत पद उसी प्रकार निरर्थक होते हैं । अतः पदों की व्यञ्जकता सिद्ध नहीं होती । ) निरपेक्ष ) शब्द का व्यापार रसाभिव्यञ्जन में न हो ऐसी बात नहीं है । इसका निरूपण प्रथम उद्योत में ही किया जा चुका है । शब्द यह व्यापार व्यञ्जना के अतिरिक्त और कुछ नहीं होता । जब केवल वर्ण माध्यम्य इत्यादि गुणों की व्यञ्जना करते हैं तब केवल वर्णरूप सुप् इत्यादि रस की व्यञ्जना क्यों नहीं कर सकते ?
वस्तुतः वाक्य सार्थक होते हैं, वाक्यगत पद उसी प्रकार निरर्थक होते हैं । अतः पदों की व्यञ्जकता सिद्ध नहीं होती । ) निरपेक्ष ) शब्द का व्यापार रसाभिव्यञ्जन में न हो ऐसी बात नहीं है । इसका निरूपण प्रथम उद्योत में ही किया जा चुका है । शब्द यह व्यापार व्यञ्जना के अतिरिक्त और कुछ नहीं होता । जब केवल वर्ण माध्यम्य इत्यादि गुणों की व्यञ्जना करते हैं तब केवल वर्णरूप सुप् इत्यादि रस की व्यञ्जना क्यों नहीं कर सकते ?
दूसरी बात यह है कि कहीं कहीं अर्थविशेष के द्वारा भी रस इत्यादि की अभिव्यक्ति होती है, वे वाच्यार्थविशेष किन्हीं विशेष शब्दों के द्वारा ही अभिहित किये जा सकते हैं । जब तक उन विशेष शब्दों का प्रयोग नहीं किया जाता तब तक वे विशेष अर्थ भी निष्पन्न नहीं हो पाते और न रस इत्यादि की व्यञ्जना ही कर
दूसरी बात यह है कि कहीं कहीं अर्थविशेष के द्वारा भी रस इत्यादि की अभिव्यक्ति होती है, वे वाच्यार्थविशेष किन्हीं विशेष शब्दों के द्वारा ही अभिहित किये जा सकते हैं । जब तक उन विशेष शब्दों का प्रयोग नहीं किया जाता तब तक वे विशेष अर्थ भी निष्पन्न नहीं हो पाते और न रस इत्यादि की व्यञ्जना ही कर
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प्रदर्शितं व्यङ्कस्वरूपपरिज्ञानं विभज्योपयुज्यत एव । शब्दविशेषाणां चानुरञ्जनचञ्चारुत्वं यद्विभागोन्नोपदर्शितं तदपि तेनैव व्यङ्ककत्वेनात्र स्थितमित्यवगन्तव्यम् ।
वैसे व्यङ्कस्वरूप का परिज्ञान विभक्त करके उपयुक्त हो ही जाता है । और जो शब्दविशेषों का चारुत्व विभक्त करके अन्यत्र दिखलाया गया है वह भी उनके व्यङ्जकत्व से ही अवस्थित होता है—यह समझना चाहिये ।
लोचन
पूर्वं सुक्तमित्याह — शब्दविशेषाणां चेति । अन्यत्रेति । भामहविवरणे । विभागोनेति । सक्च्चननादय इति । रसाद् श्रृङ्गारे चारुत्वं बीभत्से त्वचारुत्वमिति रसकृत एव विभागः । रसं प्रति च शब्दस्य व्यङ्जकत्वमेवेयुक्तं प्राक् ।
यह हमने नथम उद्योत में प्रायः निर्धारित ही कर दिया है । यह हमने कुछ अपूर्व नहीं कहा! यह कहते हैं—‘शब्द विशेषों का’ यह । ‘अन्यत्र’ भामह विवरण में । होते हैं यह रसकृत विभाग ही है । रस के प्रति शब्द का व्यङ्जकत्व ही है यह पहले कहा जा चुका ।
तारावती
सकते हैं । इससे यह निद्ध हो जाता है कि जहाँ अर्थ से रसादि की व्यञ्जना होती है वहाँ भी शब्द निमित्त अवश्य होता है । अतः शब्द को तोड़ कर उसके मुख्य पृथक् अथचों में जो व्यङ्जक के स्वरूप (व्यङ्जकता) का परिज्ञान कराया गया है वह भी सङ्गत ही है । न्ति है । यह बात हमें कोई नई नहीं कह रहे हैं । भामह विवरण में (उद्भट) ने विशेष शब्दों की चारुता-अचारुता का निरूपण विभाग के साथ किया है ( शब्द-वैणयों की चारुता-अचारुता का निरूपण किया है। ) यह व्यञ्जकता स्वीकार कर ली जावे ।
सकृन्, चन्दन इत्यादि शब्द शृङ्गार में चारु होते हैं और वीभत्स में अचारु होते हैं यह विभाग रस की दृष्टि से ही किया जा सकता है । रस को दृष्टि से भी यह विभाग तभी सङ्गत हो सकता है जब कि अर्थनिरपेक्ष शब्द की व्यञ्जकता मान ली जावे । इन सबका विस्तारपूर्वक निरूपण पहिले किया जा चुका है । ( अर्थात् यहाँ है कि जहाँ कहीं अर्थमूलक व्यञ्जना होती है वहाँ भी शब्द का सहकार अनिवार्य होता है और जहाँ शब्द-मूलक व्यञ्जना होती है वहाँ तो शब्द में कारणता होती ही है । ) यहाँ पर एक प्रश्न यह भी विचारणीय है कि वहाँ तो ठीक है जहाँ शृङ्गारपरक रचना होती है ।
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यत्रापि तत्सम्प्रति न प्रतिभासते तत्रापि व्यङ्कके रचनान्तरे यद् वश्रं सौष्ठवं तेषां प्रवाहपतितानां तदेवाभ्यासादपोदृतानामप्यवभासत इत्यवसातव्यम् ।
( अनुः ) जहाँ पर वह इस समय प्रतिभासित नहीं होता वहाँ पर भी दूसरी व्यङ्जक रचना में जो सौष्ठव देखा गया प्रवाहपतित अभ्यासवश वहाँ अवभासित होता है यह समझना चाहिये ।
यत्रापीति । सक्चन्दनादिशब्दानां तदानीन् श्रृङ्गारादिर्यत्र कतवामावेदपि व्यञ्जकशक्तेभूयसा दर्शनात्तद्विवाससुन्दरीभूतमर्थं प्रतिपादयितुं सामर्थ्यमस्ति । तथा हि—‘तटी तारं ताम्यति’ इत्यत्र तटशब्दस्य पुंस्त्वानपुंसकत्वे अनादृत्य स्त्रीत्वमेवाश्रितं सहदयैः ‘स्त्रीति नामापि मधुरम्’ इति कृत्वा । यथा वास्मदुपाध्यायस्य विद्वत्कविसहृदयचक्रवर्तिनो मट्टेन्दुराजस्य— स्युविंस्मयैकसहृदोदस्य यदा विलासः । स्याद्वाम पुण्यपरिणामवशात्थापि किं कपोलतलकोमलङ्कान्तिरिन्दुः ॥
'जहाँ पर भी' यह । सक्चन्दन इत्यादि शब्दों का उस समय श्रृङ्गार इत्यादि के व्यञ्जकत्व के अभाव में भी व्यञ्जकत्व शक्ति के बहुत अधिक देखने से उसके अधिवास के कारण अधिक सुन्दरता को प्राप्त अर्थ को प्रतिपादित करने के लिये शक्ति है । वह इस प्रकार—‘तटी तारं ताम्यति’ यहाँ पर तट शब्द के पुंस्त्व और नपुंसकत्व का अनादर करके 'स्त्री यह नाम भी मधुर है' यह समझ कर सहृदयों के द्वारा स्त्रीत्व का ही आश्रय लिया गया । अथवा जैसे हमारे उपाध्याय विद्वत्कवि सहृदयचक्रवर्ती मट्टेन्दुराज का— 'यदि पुण्य-परिणामवश चन्द्र इन्दीवर के समान श्याम कान्तिवाले चिह्न को न धारण करे, यदि इसके विलास एकमात्र मित्र बन जावें तथापि वह चन्द्रमा क्या कपोलतल के समान कोमल कान्तिवाला हो सकेगा ?'
वहाँ शब्द श्रृङ्गार के व्यञ्जक होते हैं । किन्तु कुछ स्थान ऐसे भी होते हैं जहाँ श्रृङ्गार की अभिव्यञ्जना नहीं होती, किन्तु श्रृङ्गारपरक शब्दों के प्रयोग से चोदित हो सकती तो फिर चारुता में निमित्त दूसरा तत्व क्या माना जा सकता है ? वही तत्व श्रृङ्गार स्थल में भी क्यों निमित्त नहीं माना जा सकता ? उसके लिये व्यञ्जना को
तारावती
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निमित्त मानने की क्या आवश्यकता ? इसका उत्तर यह है कि जहाँ इसकी अभिव्यक्ति नहीं होती वहाँ भी चाहता में हेतु व्यञ्जना ही होती है। होता ऐसा है कि हम प्रायः शृङ्गाररससमयी रचनायें पढ़ते रहते हैं और तदनुकूल रसाभिव्यञ्जनजन्य शब्दसौष्ठव का आस्वादन करते रहते हैं। इससे हमारी अन्तरात्मा में एक भावना वन जाती है कि उन शब्दों में सौष्ठव विद्यमान है। यह सौष्ठव का परिज्ञान व्यञ्जना के कारण ही होता है। फिर जब हम किसी ऐसे रचना को देखते हैं जहाँ उन शब्दों से किसी विशेष प्रकार के रस की अभिव्यक्ति नहीं होती वहाँ अभ्यास, वासना और संस्कारवश उन शब्दों में सौष्ठव की प्रतीति होती ही रहती है। अतः सिद्ध है कि व्यञ्जनाजन्य सौष्ठवप्रतीति ही संस्कारवश उन स्थलों पर भी अवभासित होती रहती है जहाँ उन शब्दों से व्यञ्जना नहीं होती। उस अवभास में भी मूलभूत व्यञ्जना ही निमित्त होती है।
उदाहरण के लिये तट शब्द पुलिङ्ग भी है, स्त्रीलिङ्ग भी और नपुंसकलिङ्ग भी। तटः, तटी और तटम् तीनों शब्दों का समानार्थक प्रयोग होता है। 'टटी अत्यधिक पीड़ित ( विदीर्ण ) हो रही है' हाँ पर तट शब्द के पुलिङ्ग और नपुंसकलिङ्ग का अनादर करके स्त्रीलिङ्ग का योग किया गया है, कारण यह है कि 'स्त्री यह नाम भी मधुर होता है' इस उक्ति ; आधार पर यद्यपि यहाँपर माधुर्य की कोई अभिधव्यञ्जना नहीं होती तथापि संस्कारवश तट शब्द के स्त्रीलिङ्ग रूप में पुंलिङ्ग और नपुंसकलिङ्ग की अपेक्षा कुछ विशेष सौष्ठव आ ही गया हैं। इसी लिये सहृदय कवि ने यहाँ पर स्त्रीलिङ्ग रूप का ही प्रयोग किया है। दूसरा उदाहरण जैसे अभिनवगुप्त के उपाध्याय विद्वत्कवि मद्रदराजदेव का पद्य—
'जब चन्द्र इन्दीवर के समान कान्तिवाले चिन्ह ( कलङ्क ) को न धारण करे, जब उसमें विस्मय के एकमात्र सहचर विलास भी उत्पन्न हो जावें तो भी पुण्य परिनाम वश वह चन्द्र क्या कोमल कान्ति वाला हो सकता है ?' यहाँ पर कलङ्क को इन्दीवरवत् वतलाया गया है। यद्यपि यहाँ कोई माधुर्य-भाव की व्यञ्जना नहीं होती तथापि 'इन्दीवर' शब्द में संस्कार जन्य माधुर्याभिव्यञ्जनक्षमता विद्यमान है हो। उसी के कारण यहाँ पर सौष्ठव का प्रतिभास होता अवश्य है। इसी प्रकार लक्ष्य, विस्मय, सुदृढ़त, विलास, नाम, परिणाम, कोमल इत्यादि शब्दों के विषय में भी समझा जाना चाहिये। इन से सौष्ठव का प्रतिभास इसीलिये होता है कि शृङ्गार रस क्षेत्र में इनकी माधुर्याभिव्यञ्जन की शक्ति देखी जा चुकी है। यह तो माना ही पड़ेगा क्योंकि यदि यह नहीं माना जावेगा तो शब्द-वाचकता तो सभी अर्थों में एक जैसी होती है फिर किसी विशेष अवसर पर किसी
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कोड्न्यथा तुल्ये वाचकत्वे शब्दानां चारुत्वविषयो विशेषः स्यात्? अन्यै सहृदयसंवेद्य इति चेत् किंमिदं सहृदयस्य नाम? किं रसभावादिप्रेच्चकाव्य-मयविशेषाभिज्ञत्वम्? उत रसभावादिमयकाव्यस्य रूपपरिज्ञाननैपुण्यम्? अनयोः तथाविधसहृदयतयवस्थापितानां शब्दविशेषाणां चारुत्वनियमो नास्ति । अन्यथा वाचकत्व के समान होने पर शब्दों की चारुता (प्रियता) क्या हो? यदि कहो यह (विशेषता) और ही हृदयसंवेद्या होती है तो दयसंवेद्य क्या वस्तु है? क्या रस और भाव की अपेक्षा न करते हुये काव्य-संकेत-विशेष का ज्ञान? अथवा रसभावादिमय काव्यस्वरूप के परिज्ञान की ता? पहले पक्ष में उस प्रकार के सहृदयों द्वारा व्यवस्थापित शब्दविशेषों का नियम (सिद्ध) नहीं होगा। क्योंकि दूसरे संकेतों के द्वारा अन्यथा भी
लोचनभतृ हृदयदीवरविस्मयसुहृद्विलासानामपरिणामकोमलादयः शब्दाः श्रृङ्गारादिमियत्तन-कथोदत्र परं सौन्दर्यमावहन्ति । अथ रस्यं चैतद्वगन्तव्यतयमित्याह-काव्यन्यथेति । अनियतत्रपुरुपेच्छायत्तो हि समयः कथं नियतः स्यात्। पुनरपि । अनियन्त्रितपुरुषेच्छेच्छायत्तो हि समयः कथं नियतः स्यात्। पुनरपि । अनियन्त्रितपुरुषेच्छेच्छायत्तो हि समयः कथं नियतः स्यात्। इत्याशय इत्याशये-सहृदय इत्यादि 'पुनः' पदं निस्सन्देह इन्दीव, लक्षण, विस्मय, सुहृद्, विलास, नाम, परिणाम, कोमल दे शब्द जिनकी शक्ति श्रृङ्गार रसके अभिव्यञ्जन में देखो जा चुकी है। यहाँ सौन्दर्य को धारण करते हैं। और यह अवश्य ही समझा जाना चाहिये—यह कहते हैं—‘अन्यथा क्या ।' क्य तो वह नहीं ठीक है। इस आशय से कहते हैं—‘सहृदय' इत्यादि 'पुनः' पुरुष की अनियन्त्रित इच्छा के अधीन संकेत नियत कैसे हो सकता है!
तारावतीशब्दे विशेष चारता के मानने का क्या आधार होगा? यहाँ पर यह कहा जाता है कि सौष्ठव के प्रतिभास के लिये व्याख्या को घसीटने से क्या लाभ? नोऽपि अन्य ही तत्व है जो कि सहृदयसंवेदनासिद्ध कहा जा सकता ग्रस्तु इस तत्व को सिद्ध करने के लिये कोई अन्य प्रमाण नहीं दिया जा सकता। यह अनिर्वाच्य होता है। इसके लिये तो यही कहा जा सकता है कि यह रससंवेद्या है। ) इसके उत्तर में निवेदन है कि यहाँ पर पूर्वपक्षी ने दो शब्दों का प्रयोग किया है संवेदना और सहृदय । इनमें संवेदना पर तो हमें कोत्स नहों। कोई भी सौष्ठव-सम्पादक तत्त्व अवेद्य तो हो हो नहीं सकता । रही सहृदय की बात । आप सहृदय किसे कहते हैं? क्या काव्यगत ऐसे
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स्थान्। पुनः समयान्तरेणान्यथापि व्यवस्थापनसम्भवात्। द्वितीयसिंस्तु पचे रसज्ञतैव सहृदयत्वमिति। तथाचिदैः सहृदयैः संवेद्यो रसादिसमर्पणसामर्थ्यमेव नैसर्गिकं शब्दानां विशेष इति व्यङ्ककत्वाश्रययैव तेषां मुख्यं चारुत्वम्। वाचकत्वाश्रयणान्तु प्रसाद एवाथापेक्षया तथा विशेषः । अर्थानपेक्षया त्वनुप्रासादिरेव।
स्थान। पुनः समयान्तरेण अन्यथा अपि व्यवस्थापन सम्भवात्। द्वितीयसिंस्तु पक्षे रसज्ञता एव सहृदयत्वमिति। तथाचिद्धैः सहृदयैः संवेद्य रसादि समर्पण सामर्थ्यमेव नैसर्गिक शब्दानां विशेष इति व्यङ्ककत्व आश्रयैव तेषां मुख्यं चारुत्वम्। वाचकत्वाश्रयणान्तु प्रसाद एव अथापेक्षया तथा विशेषः । अर्थानपेक्षया तु अनुप्रासादिरेव।
व्यवस्थापन की सम्भावना की जा सकती है। दूसरे पक्ष में तो रसज्ञता ही सहृदयत्व है। उस प्रकार के सहृदयों के द्वारा संवेद्य रसादि समर्पण का नैसर्गिक सामर्थ्य ही शब्दों की विशेषता होती है। इस प्रकार व्यङ्ककत्व के आश्रित ही उनका मुख्य चारुत्व होता है। वाचकत्व का आश्रय लेनेवाले उन शब्दों के अर्थ की अपेक्षा करने पर प्रसाद ही उनकी विशेषता है। अर्थ की अपेक्षा न करने पर तो अनुप्रास इत्यादि ही।
मुख्यं चारुत्वमिति। विशेष इति पूर्वोक्तः सम्बन्धः। अर्थापेक्षयामिति। वाच्याअनुप्रासादिरेवेति। शब्दान्तरेण सह या रचना तदपेक्षोऽसौ विशेष इत्यर्थः। आदिग्रहणाच्छब्दगुणालङ्काराणां संग्रहः। अत एव रचनया प्रसादेन चारुत्वेन चोपब्रृंहिता एव शब्दाः काव्ये योज्या इति तात्पर्यम्॥ १५, १६ ॥
मुख्यं चारुत्वमिति। विशेष इति पूर्वोक्तः सम्बन्धः। अर्थापेक्षयामिति। वाच्यानुप्रासादिरेवेति। शब्दान्तरेण सह या रचना तदपेक्षोऽसौ विशेष इत्यर्थः। आदिग्रहणाच्छब्दगुणालङ्काराणां संग्रहः। अत एव रचनया प्रसादेन चारुत्वेन चोपब्रृंहिता एव शब्दाः काव्ये योज्या इति तात्पर्यम्॥ १५, १६ ॥
‘मुख्यचारुत्व’ इसका सम्बन्ध पहले आये हुए विशेष शब्द से है। अर्थ की अपेक्षा में अर्थात् वाच्य की अपेक्षा में ‘अनुप्रासादि ही।’ दूसरे शब्दों के साथ जो रचना उसकी दृष्टि से यह विशेषता है यह अर्थ है। ‘आदि’ शब्द के ग्रहण से शब्द गुण और अलङ्कारों का संग्रह हो जाता है। अत एव रचना के द्वारा प्रसाद और चारुत्व से उपब्रृंहित शब्दों की ही काव्य में योजना करनी चाहिए ॥ १५, १६ ॥
विशेष संकेत का समझना ही सहृदयत्व कहलाता है जिसमें रस भाव इत्यादि की कोई अपेक्षा न हो? अथवा रसादिमय काव्यस्वरूप के परिज्ञान की निपुणता ही सहृदयत्व की प्रयोजिका होती है? (सहृदय शब्द के ये ही अभिप्राय सम्भव है!) यदि प्रथम पक्ष के अनुसार यह मानें कि सहृदय बनने के लिये रस, भाव इत्यादि के परिज्ञान की कोई अपेक्षा नहीं होती; काव्य के शब्द नवीन अर्थ देते हैं उन अर्थों को पहिचानना ही सहृदयत्व है तो इस पर मेरा कथन यह है—कि यदि रस इत्यादि से अनभिज्ञ को ही सहृदय माना जावेगा तो उनके द्वारा शब्दों की जो भी व्यवस्था की जावेगी कि अमुक शब्द चारु है, अमुक शब्द अचारु है वह व्यवस्था नियमित नहीं हो सकेगी क्योंकि दूसरे सहृदय आकर दूसरे प्रकार की व्यवस्था कर देंगे। आशय यह है कि यदि व्यक्तियों की इच्छा को ही नियामक माना जावेगा
विशेष संकेत का समझना ही सहृदयत्व कहलाता है जिसमें रस भाव इत्यादि की कोई अपेक्षा न हो? अथवा रसादिमय काव्यस्वरूप के परिज्ञान की निपुणता ही सहृदयत्व की प्रयोजिका होती है? (सहृदय शब्द के ये ही अभिप्राय सम्भव हैं!) यदि प्रथम पक्ष के अनुसार यह मानें कि सहृदय बनने के लिये रस, भाव इत्यादि के परिज्ञान की कोई अपेक्षा नहीं होती; काव्य के शब्द नवीन अर्थ देते हैं उन अर्थों को पहिचानना ही सहृदयत्व है तो इस पर मेरा कथन यह है—कि यदि रस इत्यादि से अनभिज्ञ को ही सहृदय माना जावेगा तो उनके द्वारा शब्दों की जो भी व्यवस्था की जावेगी कि अमुक शब्द चारु है, अमुक शब्द अचारु है वह व्यवस्था नियमित नहीं हो सकेगी क्योंकि दूसरे सहृदय आकर दूसरे प्रकार की व्यवस्था कर देंगे। आशय यह है कि यदि व्यक्तियों की इच्छा को ही नियामक माना जावेगा
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तृतीय उच्यौतः
तारावती
तो संसार में एक प्रकार के तो व्यक्ति होते नहीं और न उनकी इच्छायें ही नियत्नित होती है । अतः एक ही शब्द को कुछ लोग चारु कहेंगे दूसरे लोग अचारु । ऐसी दशा में कोई वयवस्था नहीं वन सकेगी । अतः यह माना ही पड़ेगा कि चारुता का नियामक वस्तुतः रस इत्यादि ही होता है क्योंकि वही आद्दतीय आस्वाद का प्रवर्तक होता है । अतः रस की दृष्टि से जो भी व्यवस्था की जावेगी वह् स्थिर हो जावेगी, उसमें मनमानी व्यवस्था के लिये अवसर नहीं रहेगा । यदि रसभावादि दृष्टि सहृदयता की व्यवस्थापक मानी जाती है तो सहृदयता का अर्थ ही हुआ रसश्रयतां । अतः ‘सहृदयस्नेव्य शव्दविशेष’ का अर्थ यह हुआ कि—रस और भाव इत्यादि को समर्पण करने को स्वभाविक शक्ति ही शब्दों की विशेषता होती है जिसको सहृदय ही परख पाते हैं । अतः मुख्य चारुता वयञ्जकत्व पर ही अवलम्बित होती है । यदि शब्दों को वाचकता तक ही सीमित रखना हो तो उनकी दो परिस्थितियाँ हो सकती हैं एक तो अर्थ की अपेक्षा करते हुये चारुता का निरूपण किया जावे दूसरे अर्थ की अपेक्षा न करते हुये चारुता का निरूपण किया जावे । यदि अर्थ की अपेक्षा करते हुये चारुता का निरूपण करना हो तो उसकी सबसे बड़ी विशेषता प्रसाद गुण ही होगी अर्थात् वहाँ शब्दप्रयोग का मन्तव्य अपना अभिप्राय दूसरे को समझा देना मात्र होता है । यह प्रयोजन जिस शब्द के प्रयोग से सबसे अधिक सिद्ध हो जावे वही शब्द उस अर्थ के प्रति विशिष्ट माना जावेगा और शब्द की सबसे बड़ी विशेषता मानी जावेगी अर्थ का एकदम प्रत्यायन करा देना । यह विशेषता आपेक्षिक ही मानी जा सकती है—यदि वही अर्थ दूसरे शब्दों से कहे जाने पर उनसे शीघ्रता से अर्थ न पकड़ करे तो जिन शब्दों से अर्थ एक दम प्रकट हो जावे उन शब्दों में अर्थ को प्रकट करने की विशेषता ही मानी जावेगी । यदि सौष्ठव का प्रत्यायन वाच्यार्थ की दृष्टि से न करना हो तो शब्दों का सौष्ठव अनुप्रास इत्यादि की संज्ञा का अधिकारी होगा । इसमें भी आपेक्षिक सौष्ठव हो रहता है । यदि दूसरे शब्दों का उसी अर्थ में प्रयोग करने पर अनुप्रास इत्यादि की निष्पत्ति न हो तो अनुप्रास निष्पादन ही प्रयुक्त शब्दों की विशेषता होगी । अनुप्रास आदि में आदि शब्द से शब्दगुणों और शब्दालङ्कारों का संग्रह हो जाता है । तात्पर्य यह है कि ऐसे शब्दों का प्रयोग किया जाना चाहिये जो रचना प्रसाद और चारुता के द्वारा उपरुब्ध हो । ( सारांश यह है कि मुख्य रूप में व्यङ्जना की दृष्टि से सौष्ठवपूर्ण शब्दों का प्रयोग करना चाहिये । यदि व्यङ्जनाजन्य सौष्ठव अपेक्षित न हो तो वाच्यार्थ की दृष्टि से अथवा स्वयं वाचक शब्द की दृष्टि से सौष्ठव पर विचार कर शब्दों का प्रयोग करना चाहिये । ) ॥ १५, १६ ॥
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एवं रसादीना व्यङ्क्यस्वरूपमभिधाय तेषामेव विरोधिरूपं लक्षितुमिदमुपक्रम्यते-
प्रबन्धे मुक्तके वापि रसादीं वन्धुमिच्छता । यत्नः कार्यः सुमतिना परिहारे विरोधिनाम् ॥ ७७॥
प्रबन्ध अथवा मुक्तक में रस इत्यादि के निबन्धन की इच्छा करने वाले बुद्धिमान् व्यक्ति को विरोधियों के परिहार में यत्न करना चाहिये । प्रबन्ध अथवा मुक्तक में भी रसभावनिबन्धन के प्रति आहत मन वाला कवि विरोधपरिहार में परम् प्रयत्न को भली भाँति धारण करे। नहीं तो इसका एक भी इलोक रसमय सम्पन्न नहीं होता ।
प्रबन्धे मुक्तके वापि रसभावनिबन्धनं प्रत्याहतमना कविविरोधपरिहारे परं यत्नमादधौत । अन्यथा त्वस्यरसमयः इलोक एकोडपि सम्यङ् न सम्पद्यते ।
लोचन
रसादीना यद्व्यक्तिक वर्णपदादिप्रबन्धान्त तस्य स्वरूपममिधायेतिं सम्बन्धः । उपक्रम्यते इति । विरोधिनामपि लक्षणकरणे प्रयोजनमुख्यते शक्यहानत्व नाम अनया कारिकया । लक्षण तु विरोधिरससम्बन्धीत्यादितना भविष्यतीत्यर्थः ।
तारावती
जैसे १६ वीं कारिकापर्यन्त व्यङ्क्य तत्वों पर विचार किया गया और यह बताया दिया गया कि ध्वनि के विभिन्न भेद वर्ण से लेकर प्रबन्धपर्यन्त किस किस में अभिव्यक्त होते हैं । १५वीं कारिका से इस बात पर विचार किया जावेगा कि विरोध किसे कहते हैं । १५ वीं और १६ वीं कारिकाओं में रसविरोध के स्वरूप पर विचार किया जावेगा । प्रस्तुत १७ वीं कारिका में यह विचार किया गया है कि यहाँ पर रसविरोध का प्रकरण लिखने का प्रयोजन क्या है ? वस्तुतः इस प्रकरण का प्रयोजन यही है कि पाठकगण यह समझ जावें कि जो रसविरोधी तत्व हैं उनका परिहार भी सम्भव है । इसीलिये सर्वप्रथम विरोधस्थलों को दिखलाकर बाद में परिहार का प्रकार दिखलाया गया है । प्रस्तुत कारिका में कहा गया है
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कानि पुनस्तानि विरोधीति यानि यत्नतः कवेः परिहर्तव्यानीत्यूच्यते—विरोधिरससम्बन्धिविभावादिपरिग्रहः । विस्तरेणान्वितस्यापि वस्तुनोऽन्यस्य वर्णनम् ॥९८॥
( अनु० ) फिर वे विरोधी हैं कानि जो यत्नपूर्वक कवि के परिहरणीय हैं यह कहा जा रहा है—‘विरोधी रस सम्बन्धी विभाव इत्यादि का परिग्रह अन्वित भी अन्य वस्तु का वर्णनम् ॥९८॥
लोचन ननु ‘विभावभावानुभावसञ्चारिचित्यचारणः’ इति यदुक्तं तत् पूर्व च व्यतिरेक-मुखेनैतद्रस्यवरांस्यते, नैवम्; व्यतिरेकेण हि तदभावमात्रं प्रतीयते न तु तद्विरुद्धम् । तदभावमात्रं च न तथाऽदूषकं यथा तद्विरुद्धम् । पथ्याऽनुपयोगो हि न तथाऽव्याधिजनयति यदुक्तपथ्योपयोगः । तदाह—यत्नत इति । विभावेत्यादिना श्लोकेन यदुक्तं तद्विरुद्धं विरोधीरससम्बन्धिविभावादिनार्थश्लोकेनाह । इतिवृत्तेत्यादिना श्लोकैकवचन यदुक्तं तद्विरुद्धं विस्तरेणेत्यर्धश्लोकेनाह । उद्दीपनेऽत्यर्धश्लोकोक्तस्य विरुद्धं अकाण्ड इत्यर्धश्लोकेन । ( प्रश्न ) ‘विभावभावानुभावसञ्चारिचित्यचारणः’ यह जो कहा गया । उसी से व्यतिरेक मुख से यह भी ज्ञात हो जायेगा । ( उत्तर ) ऐसा नहीं । व्यतिरेक से उसका अभावमात्र प्रतीत होता है विरुद्ध नहीं । केवल उसका अभाव वैसा दूषक नहीं है जैसा विरुद्ध । पथ्य का अनुपयोग उतना व्याधि को नहीं उत्पन्न करता जितना अपथ्य का उपयोग । वह कहते हैं—‘यत्न से’ ‘विभावभावानुभाव’ इत्यादि श्लोक से जो कहा गया उसके विरुद्ध ‘विरोधी’ इत्यादि आधे श्लोक से कहते हैं । ‘इतिवृत्ति’ इत्यादि दो श्लोकों में जो कहा गया उसके विरुद्ध ‘विस्तरेण—’ इत्यादि दो श्लोकों में जो कहा गया उसके विरुद्ध ‘विस्तरेण—’ इस आधे श्लोक से
कि कवि चाङ्गे जिस प्रकार की रचना में प्रवृत्त हो चाहे मुक्तक यदि उसके मन में रस निबन्धन की कामना विद्यमान है तो उसे इस वात के लिये अत्यन्त सावधान तथा जागरूक रहना चाहिये कि उसके अभीष्ट रस में विरोधी रस का रञ्जमात्र भी समावेश न हो पावे । यदि वह यदि ध्यान नहीं रख्खेगा तो उसका एक पद्य भी रसमय नहीं हो सकेगा ॥ ९८ ॥
तारावती अब इस विषय में विचार किया जा रहा है, कि जिन विरोधियों का परित्याग करना कवि का कर्तव्य है वे विरोधी हैं कौन ? वस्तुतः प्रबन्ध की रसाभिव्यञ्जकता के अवसर पर विस्तारपूर्वक उन तत्त्वों पर विचार किया जा चुका है जो रस के अभिव्यञ्जक होते हैं । इससे अर्थतः सिद्ध हो जाता है कि उन तत्त्वों का
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अकाण्डे एव विच्छिन्नतिरकाण्डे च प्रकाशनम् । परिपोषं गतस्यापि पौनःपुन्येन दीपनम् ॥
रसस्य स्त्यानिरोधाय वृत्त्यनौचित्यमेव च ॥९॥
दिन्तरगृहीतक वर्णन, बिना अवसर विच्छेद और बिना अवसर के प्रकाशन, परिपोष को प्राप्त भी ( रस ) का वार-वार दीपन और वृत्तियों का अनौचित्य रस विरोध के लिये होता है ॥ १८, १८ ॥
रसस्येत्यधेशलोकोक्तस्य विरुद्धं परिपोषं गतस्येत्यर्धेशलोकेन । 'अलंकृतिनामित्यनेन यदुक्तं तद्विसदृशमन्यदपि च विरुद्धं वृत्त्यनौचित्यमित्यनेन । पृथक् क्रमेण व्याचष्टे--
कहते हैं 'उद्दीपन' इत्यादि आधे श्लोक में कहे हुये का विरुद्ध 'अकाण्ड' इस आधे श्लोकने । 'रसस्य' इस आधे श्लोक में कहे हुये के विरुद्ध 'परिपोषं गतस्य' इस आधे श्लोक के द्वारा । 'अलंकृतिनाम्' इस श्लोक से जो कहा गया उसके विरुद्ध तथा और भी
अभाव रसविरोधी होता है । अतः यह प्रश्न किया जा सकता है कि जब पूर्वोक्त तत्वों के व्यतिरेक के द्वारा ही विरोधी तत्व भी अवगत हो सकते हैं तब पृथक् रूप में विरोधियों का प्रकारण लिखने की क्या आवश्यकता ? किन्तु इसका उत्तर स्पष्ट है । व्यतिरेक से अनुकूल का अभाव ही व्यक्त होता है स्वतन्त्र विरोधियों का समावेश व्यतिरेक में नहीं होता । दोष दोनों प्रकार से उत्पन्न होता है अनुकूल परिस्थितियों का प्रयोग न करने से और विरोधियों का समावेश करने से । किन्तु अनुकूल के समावेश न करने से दोष इतना तीव्र नहीं होता जितना विपरीत परिस्थितियों के प्रयोग से । पथ्य का अनुपयोग व्याधि को उतना अधिक नहीं बढ़ाता जितना कुपथ्य का सेवन । इसीलिये यहां पर कहा गया है कि विरोधियों के परिहार में बहुत अधिक प्रयत्न की आवश्यकता होती है । इस दिशा में बहुत अधिक जागरूक रहना चाहिये । पहले १० से १४ तक कारिकाओं में बतलाया जा चुका है कि रस के व्यञ्जक कौन से तत्व होते हैं । उनके प्रतिकूल तत्व स्वभावतः रसविरोधी होते हैं । उनको कमचः इस प्रकार समझना चाहिये--( १ ) (क) घटित या कल्पित कथाशरीर का इस रूप में सम्पादन करना कि उसमें विभाव, भाव अनुभाव और सञ्चारी भावों के औचित्य से सौष्ठव आ गया हो रस का व्यञ्जक होता है । ( ख ) इसके प्रतिकूल
विरोधी रस से सम्बद्ध विभाव इत्यादि का ग्रहण करना रसविरोधी होता है । ( २ ) ( क ) इतिवृत्तवश आई हुई प्रतिकूल स्थिति को छोड़कर कल्पना से मध्य में ऐसी कथा का उन्नयन कर लेना जो रस के अनुकूल हो तथा केवल शास्त्रस्थिति-
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सम्पादन की इच्छा से न हो अपितु रसाभिव्यक्ति की दृष्टि से सन्धि तथा सन्ध्यङ्गों की सङ्कूटना रसाभिव्यञ्जक होती है। (ख) इसके प्रतिकूल समवद्र भी किसी अन्य वस्तु का अत्यन्त विस्तार से वर्णन करना प्रकृत रस का उपघातक होता है। (३)(क) मध्य में अवसर के अनुकूल उद्दोपन और प्रशमन रस के व्यञ्जक होते हैं। (ख) इसके प्रतिकूल बिना अवसर के विच्छेद और बिना अवसर के प्रकाशन रस के विरोधी होते हैं। (४)(क) जिस अङ्गी रस का विश्रान्ति प्रसक्त हो गया उसका अनुसन्धान करते चलना रस-साधना में उपकारक होता है। (ख) इसके प्रतिकूल परिपोषक को प्राप्त भी रस का बार बार उद्दोपन रसविरोधी होता है। (५)(क) अलङ्कारों की रसानुरूप योजना रस के लिये सात्त्विक होती है। (ख) इसके प्रतिकूल वृत्तियों का अनौचित्य रसविरोधी होता है। प्रस्तुत प्रकरण में इन पाँचों की यथाक्रम व्याख्या की जावेगी।
[ प्रस्तुत प्रकरण को समझने के लिये रस-विरोध पर संक्षिप्त प्रकाश डाल लेना आवश्यक प्रतीत होता है। कुछ रस परस्पर विरोधी होते हैं कुछ अविरोधी । साहित्यदर्पण में विरोधी रसों का -इस प्रकार परिगणन किया गया है—(१) श्रृङ्गार रस के विरोधी होते हैं करुण, बीभत्स, रौद्र, वीर और भयानक। (२) करुण के विरोधी होते हैं हास्य और श्रृङ्गार। (३) वीर रस का विरोध भयानक और शान्त के साथ होता है। (४) वीर, श्रृङ्गार, रौद्र, हास्य और भयानक के साथ शान्त का विरोध होता है। (५) हास्य के विरोधी भयानक और करुण होते हैं। (६) रौद्र के विरोधी हास्य श्रृङ्गार और भयानक रस होते हैं। (७) भयानक के विरोधी श्रृङ्गार, वीर, रौद्र, हास्य और शान्त होते हैं। (८) बीभत्स का विरोधी श्रृङ्गार होता है। इनके विरोध और अविरोध की व्यवस्था पर मञ्च आचार्यों ने विचार किया है। पण्डितराज ने लिखा है कि विरोध दो प्रकार का होता है—स्थितिविरोध और ज्ञानविरोध। साहित्यदर्पणकार ने विरोध और अविरोध की व्यवस्था पर इस प्रकार प्रकाश डाला है—‘रसों के विरोध और अविरोध की व्यवस्था पर इस प्रकार प्रकट किया है—‘रसों के विरोध और अविरोध की व्यवस्था पर इस प्रकार प्रकाश डाला है—‘रसों के विरोध और अविरोध की
अवस्था तीन प्रकार की होती है—(१) कहीं दो रसों का विरोध आलम्बन की एकता में होता है अर्थात् एक ही व्यक्ति के प्रति विरोधी रसों का प्रतिपादन दृष्टित होता है, यदि विभिन्न व्यक्तियों के प्रति उन रसों का प्रतिपादन किया जावे तो दोष नहीं होता। (२) जैसे वीर और श्रृङ्गार आलम्बन की एकता में विरोधी होते हैं। जिस व्यक्ति के प्रति रति हो और उसी को जीतने तथा पराभूत करने की इच्छा का वर्णन किया जावे यह विरोध होगा। किन्तु सीता के प्रति रति और रावण के प्रति विजय की इच्छा का वर्णन तो हो ही सकता है। (३) कहीं
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प्रस्तुतरसापेक्षया विरोधी यो रसस्तस्य सम्बन्धिनां विभावभावानुभावानां परिग्रहो रसविरोधहेतुकः सम्बवन्तीयः । तत्र विरोधिरसविभावपरिग्रहो यथा शान्तरसविभावेषु तद्विमावतयैव निरूपितेष्वनन्तरमेव प्रृङ्गारादिविभाववर्णने ।
( अनुवाद ) प्रस्तुत रस की दृष्टि से विरोधी जो रस उसके सम्बन्धी विभावभाव और अनुभवों का परिग्रह रसविरोध के हेतु के रूप में सम्भावित किया जाना चाहिये । उसमें विरोधी रस के विभाव का परिग्रह जैसे शान्त रस के विभावों में उसके विभाव के रूप में निरूपित किये जाने पर बाद में ही शृङ्गार इत्यादि का
लोचन प्रस्तुतरसापेक्ष्येत्यादिना । हास्यशृङ्गारयोर्वीरोद्भुतयो रौद्रकरुणयोर्मेयानकवीभत्सयोर्नं विभावविरोध इत्यमिप्रायेण शान्तशृङ्गारावुपन्यासस्तौ, प्रशमरागयोर्विरोधात् । तारावती दो रसों का विरोध आश्रय की एकता में होता है अर्थात् एक ही व्यक्ति के हृदय में दो विरोधी भावों का वर्णन दूषित होता है । जैसे एक ही व्यक्ति में उत्साह और भय इन दोनों तत्वों का वर्णन दूषित होता है किन्तु राम में उत्साह और रावण में भय का वर्णन दूषित नहीं होता । ( ३ ) किन्हीं दो रसों का विरोध नैरन्तर्य में होता है । वीर और शृंगार का विरोध आलम्बन की एकता में होता है । इसी प्रकार सम्भोग शृंगार का विरोध हास्य, रौद्र और वीभत्स से तथा विप्रलम्भ का विरोध वीर करुण और रौद्र से आलम्बन की एकता में ही होता है । वीर और भयानक का विरोध आलम्बन की एकता में और, आश्रय की एकता में होता है । शान्त और शृंगार का विरोध नैरन्तर्य और विभाव की एकता में होता है । वीभत्स अद्भुत और रौद्र से, शृंगार का अद्भुत से और भयानक का वीभत्स से विरोध तीनों प्रकार से होता है । इसी प्रकार अन्य स्थानों के विषय में भी समझ लेना चाहिये ।
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विरोधिरसभावपरिग्रहो यथा प्रियं प्रति प्रणयकलहकुपितासु कामिनोषु वैराग्यकथाभिरतुनये। विरोधिरसानुभावपरिग्रहो यथा प्रणयकुपितायां प्रियायामप्रसीदन्त्यां नायकस्य कोपावेशविवशस्य रौद्रानुभाववर्णने।
विरोधी रस के भावों के परिग्रह का उदाहरण जैसे प्रिय के प्रति प्रणय कलह में कुपित कामिनियों के विषय में वैराग्य की बातचीत से अनुराग करने में। विरोधी रस के अनुभावों के परिग्रह का उदाहरण जैसे प्रणय कुपित तथा प्रसन्न न होनेवाली नायिका के विषय में कोपावेशविवश नायक के रौद्र रस के अनुभावों के वर्णन करने में।
लोचन विरोधिनो रसस्य यो भावो व्यभिचारी तस्य परिग्रहः, विरोधिनस्तु यः स्थायीस्थायितया तत्परिग्रहोऽसम्भवनीय एव तद्नुजस्थानप्रसङ्गात्। व्यभिचारितया तु परिग्रहो भवत्येव। अतः सामान्यान्तेन भावग्रहणम्। विरोधिकथाभिरतौ तु वैराग्यविरोधः। विरोधी रस का जो भाव अर्थात् व्यभिचारी उसका परिग्रह; विरोधी का जो स्थायी, स्थायी के रूप में उसका परिग्रह ही असम्भव है क्योंकि उसके उत्थान का प्रसङ्ग ही नहीं आता। व्यभिचारी के रूप में तो उसका परिग्रह हो ही जाता है। इसीलिये 'सामान्यतः' भाव शब्द का उपादान किया गया है। 'वैराग्य की बातों के द्वारा' यहाँ वैराग्य शब्द से शान्त का जो स्थायी निवेद वह कहा
तारावती नायक इत्यादि में नहीं होता! दुसरी बात यह है कि रस अद्वितीयानन्दमय होता है, उसमें विरोध असम्भव है। विरोध के विषय में रसगज्ञाधरककार का कहना है कि यदि प्रकृत रस के विरोधी रसांगों का निबन्धन किया जावेगा तो विरोधी प्रकृत रस का बाध कर लेगा अथवा दोनों उसी प्रकार नष्ट हो जायेंगे जैसे सुन्दर और उपसुन्दर परस्पर लड़कर दोनों नष्ट हो गये।
तारावती नायक आदि में नहीं होता! दूसरी बात यह है कि रस अद्वितीय आनन्दमय होता है, उसमें विरोध असम्भव है। विरोध के विषय में रसगज्ञाधरककार का कहना है कि यदि प्रकृत रस के विरोधी रसांगों का निबन्धन किया जाएगा तो विरोधी प्रकृत रस का बाध कर लेगा अथवा दोनों उसी प्रकार नष्ट हो जाएंगे जैसे सुन्दर और उपसुन्दर परस्पर लड़कर दोनों नष्ट हो गए।
रस के उपकण तीन होते हैं विभाव, भाव, और अनुभाव। विरोधी रस से सम्बद्ध इन तीनों का उपादान नहीं करना चाहिये। उदाहरण के लिये यदि शान्त रस के विभावों के रूप में ही वर्णन किया गया हो और उसके तत्काल बाद शृङ्गार रस के विभावों का वर्णन प्रारम्भ कर दिया जावे तो विरोधी रस के विभाव परिग्रह का दोष होगा।
रस के उपकरण तीन होते हैं विभाव, भाव, और अनुभाव। विरोधी रस से सम्बद्ध इन तीनों का उपादान नहीं करना चाहिए। उदाहरण के लिए यदि शान्त रस के विभावों के रूप में ही वर्णन किया गया हो और उसके तत्काल बाद शृंगार रस के विभावों का वर्णन प्रारंभ कर दिया जाए तो विरोधी रस के विभाव परिग्रह का दोष होगा।
(पहिले बतलाया जा चुका है कि हास्य और शृंगार, वीर और अद्भुत रौद्र और करुण, भयानक और बीभत्स इनके विभावों का विरोध नहीं होता। इन रसों का विरोध तभी होता है जब एक ही आलम्बन के प्रति दोनों भाव हों। यदि हास्य और शृंगार के पृथक् पृथक् आलम्बनों का एक साथ
(पहले बतलाया जा चुका है कि हास्य और शृंगार, वीर और अद्भुत, रौद्र और करुण, भयानक और बीभत्स इनके विभावों का विरोध नहीं होता। इन रसों का विरोध तभी होता है जब एक ही आलम्बन के प्रति दोनों भाव हों। यदि हास्य और शृंगार के पृथक् पृथक् आलम्बनों का एक साथ
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शब्देन निवेदः शान्तस्य यः स्थायि स उत्तः । यथा ‘प्रसादे वर्तमान प्रकटयसुरं सन्त्यज रुषम्’ इत्याद्यूह्यप्रक्रम्यार्थोन्तरन्यासो ‘न मुग्धे प्रत्येतुं प्रभवति गतः काल-
शब्द से निवेदन करने पर शांत रस का जो स्थायी भाव है वह उत्तम कहा गया है। जैसे 'हे मुग्धे ! बीता हुआ कालहरिण पुनः आने में समर्थ नहीं होता' यहाँ पर 'प्रसादे वर्तमान प्रकट करो और क्रोध छोड़ दो' यह उपक्रम करके---हे मुग्धे ! बीता हुआ कालहरिण पुनः आने में समर्थ नहीं होता। यहाँ थोड़े भी निवेदन के अनुप्रवेश में रति का विच्छेद हो जाता है।
तात्पर्य यह है कि ज्ञातविषयसतत्त्वो हि जीवितसर्वस्वासिमानं कथम् भजेत । न हि ज्ञातशुक्तिकारजततत्स्वस्तदुपादेयाधियर्जते किलेऽसौ तत्रैवावृतिमात्राव् । कथामिरिति बहुवचनं शान्तरसस्य व्यभिचारिणो धृति-मतिप्रश्रुतान् संगृह्णाति ।
हरिणः’ इति । सनागपि निवेदानुप्रवेशे सति रतेविच्छेदः । ज्ञातविषयसतत्त्वो हि जीवितसर्वस्वासिमानं कथम् भजेत । न हि ज्ञातशुक्तिकारजततत्स्वस्तदुपादेयाधियर्जते किलेऽसौ तत्रैवावृतिमात्राव् । कथामिरिति बहुवचनं शान्तरसस्य व्यभिचारिणो धृति-मतिप्रश्रुतान् संगृह्णाति ।
वर्णन किया जावेगा तो दोष नहीं होगा । एक में रौद्र और दूसरे में करुण का होना तो स्वाभाविक ही है ।) इसीलिये यहाँ पर विभाव विरोध में शांत और शृंगार का उदाहरण दिया गया है। शम और रति एक दूसरे के विरोधी होते हैं। शम का वर्णन करते करते यदि कोई कवि रति के विभावों का उपादान कर ले तो यह दोष ही होगा। यह तो हुई विरोधी रस के विभावों के उपादान की बात ।
गया है । जैसे—‘प्रसन्नता में वर्तंमान होओ, आनन्द प्रकट करो और क्रोध छोड़ दो’ यह उपक्रम करके---‘हे मुग्धे ! बीता हुआ कालहरिण पुनः आने में समर्थ नहीं होता ।’ यहाँ थोड़े भी निवेदन के अनुप्रवेश में रति का विच्छेद हो जाता है ।
अब विरोधी रस के उपादान को लीजिये—भाव शब्द का अर्थ है व्यभिचारी भाव और स्थायी भाव। यहाँ पर भाव शब्द से तात्पर्य व्यभिचारी भाव से ही है। स्थायी भाव से नहीं। क्योंकि यदि विरोधी रस के स्थायी भाव का उपादान किया जावेगा और उसका परिपोष भी स्थायी भाव के ही रूप में किया जावेगा तो प्रकृत रस तो समाप्त ही हो जावेगा और उसके स्थान पर विरोधी रस सत्ता में आ जावेगा ।
तात्पर्य यह है कि ज्ञातविषयसतत्त्वो हि जीवितसर्वस्वासिमानं कथम् भजेत । न हि ज्ञातशुक्तिकारजततत्स्वस्तदुपादेयाधियर्जते किलेऽसौ तत्रैवावृतिमात्राव् । कथामिरिति बहुवचनं शान्तरसस्य व्यभिचारिणो धृति-मतिप्रश्रुतान् संगृह्णाति ।
अतः विरोधी रस के सञ्चारी भावों का उपादान दोष होता है । यदि स्थायी भावों का भी उपादान व्यभिचारी भावों के रूप में किया जावेगा तो उनका उपादान भी दोष होगा । इसीलिये सामान्यतया भावों के विरोधी होने की बात कह दी गयी है । उदाहरण के लिये प्रणयकुपिता नायिकाओं को मनाने के लिये कोई वैराग्य कथायें करने लगे ।
वैराग्य ( निवेद ) यद्यपि शान्त रस का स्थायी भाव है किन्तु जब मानिनी के अनुनय के प्रसंग में उसका उपादान किया जावेगा तब वह
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प्रसादे वर्तमान प्रकटय मुदं सन्त्यज रुषं, प्रियेऽङ्गन्यास्येऽपि नियमृतिमव ते सिक्तु वचः । निधानं सौख्यानां क्षणमभिमुखं स्थापय मुखं, न मुध्ने प्रत्येकं प्रभवति गतः कालहरिणः ॥
प्रसन्नता में वर्तमान होओ, आनन्द प्रकट करो, क्रोध छोड़ दो, हे प्रिये मेरे सुकवते हुये अङ्गों को तुम्हारे वचन अमृत के समान सींचने लगें, सुखों के निधान अपने मुख को अभिमुख स्थापित करो, हे मुध्ने ! गया हुआ कालरूपी हरिण पुनः आ ही नहीं सक्ता ।
यहाँ मानिनी के प्रसादन के लिये उच्च शब्दों का प्रयोग किया गया है । किन्तु अन्तिम पङ्क्ति में जो अर्थान्तरन्यास का प्रयोग किया गया है वह शास्त्रसम्मत है । इस प्रकार शृंगार के भाव के अन्दर शम का सञ्चारी के रूप में उपादान कर दिया गया है जो कि शृंगार का विरोधी है । अतः यह दोष है । ( यदि शृंगार में निर्वेद का थोड़ा सा भी प्रवेश कर दिया जावे तो रति का तो विच्छेद हो ही जाता है क्योंकि जिस व्यक्ति को संसार की नश्वरता का पता है जो विषय वासनाओं की अकिञ्चित्करता तथा तुच्छता जान लेगा वह विषयों के सेवन में क्यों प्रवृत्त होगा ? जो समस्त स्थावर जङ्गम जगत् को ब्रह्ममय जानता है वह अपने प्रेमी को जीवित सर्वस्व कैसे मान सक्ता है जब कि माया का संवर्र्ण विद्वान् हो ? वेदान्त में केवल ब्रह्मतत्व ही सत्य माना जाता है, जगत् उसी प्रकार मिथ्या माना जाता है जैसे स्वप्न में देखे हुये दृश्य मिथ्या होते हैं और जिस प्रकार जगत् जाने के बाद स्वप्न का बाध हो जाता है उसी प्रकार जगत् रूप दीर्घ स्वप्न का बाध ब्रह्मज्ञान से हो जाता है । सत्य ब्रह्म में मिथ्या जगत् की प्रतीति मायाजन्य होती है । इसके लिये अधिकतर दो दृष्टान्त दिये जाते हैं—रज्जु में सर्प का भान और शुक्ति में रजत का भान । जो व्यक्ति रजत को जानता है जब वह रजत की चमक शुक्ति में देखता है तब अज्ञान के कारण शुक्ति को रजत कहने लगता है और सत्य रूप में तब तक शुक्ति को रजत ही कहता जाता है जब तक उसे सत्य ज्ञान नहीं करा दिया जाता । इसी प्रकार ब्रह्म में जगत् का सत्यरूप में भान होता है । इस भान में कारण है माया । माया की दो शक्तियाँ होती हैं—आवरण और विक्षेप । आवरणशक्ति के द्वारा वास्तविक तत्व संवृत हो जाता है और विक्षेपशक्ति के द्वारा मिथ्या तत्व प्रतिबिम्बित होने लगता है । जब तक शुक्ति का वास्तविक तत्व
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अयं चान्यो रसमङ्गहेतुर्यत्प्रस्तुतरसापेक्षया वस्तुनोऽन्यास्य कथचिद्विवस्त्यापि विशेषेण कथनम् । यथा विप्रलम्भशृङ्गारे नायकस्य कस्यचिद्वर्णनमितुमुपक्रान्ते कवेर्यमकाद्यलङ्काररविन्द्धनरचितया महता प्रबन्धेन पर्वतादिवर्णने ।
( अनु० ) यह दूसरा रसमङ्गहेतु है कि प्रस्तुत रस की अपेक्षा किसी न किसी प्रकार अन्वित भी अन्य वस्तु का विशेष रूप में कथन करना । जैसे किसी नायक के विप्रलम्भ शृङ्गार के वर्णन के उपक्रम होने पर यमक इत्यादि की अलङ्कारों की रसिकता के कारण बहुत बड़े प्रबन्ध के द्वारा पर्वत इत्यादि के वर्णन में ।
नन्वन्यदनुन्मत्तः कथं वर्णयेत, किमिति विस्तरत इत्याह—कथचिद्विवस्तस्येति । अनुनमत्त कौन वृत्तिक अन्य का वर्णन करेगा, विस्तार से तो कहना ही क्या ? इसपर कहते हैं—किस्मादन्विते ।
आदृत अथना संवृत न हो जावे और विशेष शक्ति से उसमें रजत का भान न होने लगे तब तक कोई भी ऐसा व्यक्ति जिसका शक्ति और रजत दोनों का ज्ञान हो शक्ति ब्रह्मतत्त्व का संबरण और जगत् तत्त्व का विशेष न हो जावे तब तक जगत् को सत्य मानकर व्यवहार के लिये कोई व्यक्ति उसका उपादान कर ही नहीं सकता । यही बात प्रस्तुत प्रसङ्ग में समझनी चाहिये । जो व्यक्ति संसार की असारता को समझता है वही किसी अन्य व्यक्ति को तब तक अपनी जीवितश्वरस्र्व कैसे मान सकता है जब तक उसकी असारता-बुद्धि का संबरण और जीवितश्वरस्र्व भावना का स्फुरण न हो जावे । एसी दशा में उत्तम प्रसङ्ग सदोष ही कहा जावेगा । 'कथाओं के द्वारा' इस वाक्यचन से श्रुति मति इत्यादि दूसरे सन्नारियों का समावेश हो जाता है । विरोधी रस के अनुभवों के उपादान में भी दोष होता है । जैसे यदि नायक के प्रयत्न करने पर भी प्रणयकुपिता मानिनी प्रसन्न न हो तो नायक क्रोध के आवेश से विवच होकर नायिका को मारने पीटने लगे । मारना पीटना रौद्र रस का अनुभव है । रौद्र रस शृङ्गार का विरोधी है । अतः शृङ्गार में रौद्र के अनुभव का वर्णन दोष होगा ।
तारावती
रसभङ्ग का दूसरा हेतु यह होता है कि कोई वस्तु प्रकृत वस्तु से संबद्ध तो है किन्तु उनका सम्बन्ध बहुत ही कठिनाई से स्थापित किया जा सकता है । प्रकृत रस की अपेक्षा उस वस्तु का अधिक विस्तार से वर्णन करना दोष माना जाता है
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और उससे रसभंग हो जाता है। जो वस्तु सर्वथा असम्बद्ध है उसका वर्णन तो कोई उन्मत्त व्यक्ति ही करेगा किन्तु समबद्ध वस्तु का भी अधिक विस्तार से वर्णन दोष ही होता है। ( शिगभूपाल ने अंग रस को अंगी रस से अधिक महत्व देने में रसाभास माना है। शारदातनय इत्यादि दूसरे आचार्यों की भी कुछ ऐसी ही सम्मति है। काव्यप्रकाशकारने भी रसदोष-प्रकरण में 'अंगिनोडनुसन्धानम्'......तथा 'अनंगस्याभिधानम्र'—ये दो दोष माने हैं। साहित्यदर्पणकारने भी रसदोष लिखा है—'अंगिनोडनुसन्धानमण्जस्य च कीर्तनम्'। रसगङ्गाधर में इस तत्व का कई खण्डों में प्रतिपादन किया गया है—'समन बलवाले, अधिक बलवाले या प्रतिकूल रसों का निवन्धन प्रकृत रस का विरोधी होने से दोष होता है।'
'इसी प्रकार अप्रधान प्रतिनायक इत्यादि के नाना प्रकार के चरित्रों का और अनेक प्रकार की सम्पत्ति का नायक के उन तत्वों की अपेक्षा अधिक का वर्णन नहीं करना चाहिये। क्योंकि ऐसा करने पर वर्णन के लिये अमोष्ट नायक का उत्कर्ष सिद्ध नहीं होगा और तत्वमयुक्त रसपरिपोष भी नहीं हो सकेगा। अतः प्रतिनायक के चरित्रों का उतना ही वर्णन करना चाहिये जितना नायक के चरित्रोत्कर्ष में सहायक हो। यदि प्रतिनायक का अधिक उत्कर्ष दिखला दिया जाविगा तो किसी विषवाण से शवर द्वारा महाराज के मारे जाने के समान नायक का विजय सांयोगिक ही रह जांवेगा और प्रतिनायक का चरित्र नायक के उत्कर्ष में हेतुभूत नहीं हो सकेगा।' इसी प्रकार 'प्रकृत रस की अनुपकारक वस्तु का भी वर्णन प्रकृत रस के विराम में हेतु होने के कारण दोष होता है।'
जैसे किसी नायक के विप्रलम्भ श्रृंगार का वर्णन प्रारम्भ किया हो और कवि यमक इत्यादि अलङ्कारों का विशेष प्रेमी होने के कारण उस विप्रलम्भ का वर्णन छोड़कर पर्वत इत्यादि का वर्णन करने लगे। ( विप्रलम्भ श्रृंगार में पर्वत इत्यादि की रमणीयता भी उद्दीपन विभाव के अन्दर आ सकती है। यदि कवि इतने ही समबन्ध को लेकर विप्रलम्भ श्रृंगार को छोड़कर पर्वत इत्यादि वर्णन से प्रवृत्त हो जावे तो वह दोष ही होगा। पहले कहा जा चुका है यमक इत्यादि का निवन्धन विप्रलम्भ श्रृंगार में विशेष रूप से विध्न उत्पन्न करता है अप्रकृत-वर्णन के उदाहरण के रूप में किरातार्जुनीय का वह प्रकरण उपस्थित किया जा सकता है—जब अर्जुन तपस्या करने जाते हैं और उनकी तपस्या में विध्न डालने के लिये किन्नर, गन्धर्व और अप्सरायें भेजी जाती हैं। कवि वर्णन के प्रलोभन में पड़कर पर्वत, ऋतु, जलक्रीडा इत्यादि के वर्णन में ऐसा लगता है कि प्रकृत वर्णन दृष्टि से सर्वथा तिरोहित हो जाता है। इसी प्रकार शिशुपालवध में भगवान् कृष्ण युधिष्ठिर के यज्ञ में भाग लेने जा रहे हैं जहाँ उन्हें
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अयं चापरो रसभङ्गहेतुरवगन्तव्यो यदकाण्ड एव विच्छित्तिः रसस्याकाण्ड एव च प्रकाशनम् । तत्रानवसरे विरामो रसस्य यथा नायकस्य कस्यचिन्मृगहणीयसमागमया नायिकया क्रियाविन्तौ परस्परपरिपोषिताव् आप्ते श्रृङ्गारे विदिते च परस्परनुरागे समागमोपायचिन्तोचितं व्यव हारमुत्सृज्य स्वतन्त्रतया व्यापारान्तरर्वर्णने ।
(अनु०) यह दूसरा रसमङ्गहेतु समझा जाना चाहिये कि बिना अवसर रस का विच्छेद और बिना अवसर प्रकाशन। उनमें बिना अवसर इसका विराम जैसे किसी नायक के किसी स्रग्धणीय समागम वाली नायिका के साथ श्रृङ्गार के बहुत बड़ी परिपोष पदवी को प्राप्त हो जाने पर और परस्पर अनुराग के विदित हो जाने पर समागमोपायकी चिन्ता के योग्य व्यवहार को छोड़कर स्वतन्त्ररूप में दूसरे व्यापारों का
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व्यापारान्तरस्येति । यथा वत्सराजचरिते चतुर्थेऽङ्के—रत्नावलीनामधेयमप्य-गृृृदृतेो विजयवर्मवृत्तान्तवर्णने । अपि तावदिति शब्दास्यां दूयोर्धनादेशद्वर्णनं दूरे-'दूसरे व्यापार का' । जैसे वत्सराज चरित चतुर्थ अङ्क में रत्नावली का नाम भी लेने वाले विजयवर्मी के वृत्तान्त वर्णन में । 'अपि तावत्' इन शब्दों से दूयोर्धन
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शिशुपाल का वध करना है । कवि वर्णन के व्यामोह में इतना अधिक पड़ जाता है कि कृष्ण के मार्गवर्णन के प्रसंग में रैवतक पर्वत, पड्कृत्रु, जलक्रीडा, सन्ध्या, रात्रि, प्रभात इत्यादि के वर्णन में आठ, नौ सर्ग लगा देता है तथा पाठक सर्वथा भूल जाता है कि कथा कहाँ जा रही है । इस प्रकार के वर्णन सर्वथा सदोष होते हैं । अप्रासङ्गिक का थोड़ा बहुत वर्णन सह्य हो सकता है किन्तु इतना अधिक विस्तार अनुचित ही कहा जावेगा ।)
रसभङ्ग का तीसरा हेतु यह होता है कि रस को ऐसे स्थान पर छोड़ देना जहाँ उसका छोड़ना उचित न हो और पाठक को रसविच्छेदजन्य अनुत्स्ति तथा खेद का अनुभव होता रहे । इसी प्रकार रस का ऐसे स्थान पर प्रकाशित करना जहाँ उसका प्रकाशन उचित न हो दोष ही कहा जावेगा ।
( काव्यप्रकाश—'अकाण्डे प्रथनच्छेदौ' । रसगङ्गाधर—'विभिन्नरसों का प्रस्तावना के अयोग्य स्थान पर प्रस्ताव और विच्छेद के अयोग्य स्थान पर विच्छेद । जैसे सन्ध्यावन्दन देवयजन इत्यादि धर्मवर्णन के प्रसंग में किसी कामिनी के साथ किसी कामुक के अनुरागवर्णन में और जैसे—महायुद्ध में दुर्मंट प्रतिभटों के उपस्थित होने पर और मर्मभेदी वचनों के बोलने पर नायक का सन्ध्यावन्दन करना इत्यादि' ।) बिना अवसर के रसविराम का उदाहरण जैसे—
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अनवसरेऽपि प्रकाशनं रसस्य यथा प्रवृत्तेऽपि विधवधीरसङ्कचये कलयसङ्क्षयकलये सङ्ग्रामे रामदेवभायस्यापि तावश्रायस्यानुपकृतविप्रलम्भशृङ्गारस्य निमित्तमुचितमन्तरेणैव शृङ्गारकथायामवतारवर्णने । न चैतद्विधे विषये दैवव्यामोहितत्वं कथापुरुषस्य परिहारो यतस्तु रसबन्ध एव कवेः प्राथान्यान्न प्रवृत्तिनिबन्धनं युक्तम् । इतिवृत्तवर्णनं तदुपाय एवेत्युक्तं प्राक्- 'आलोकार्थी यथा दीपशिखायां यत्नवान् जनः' इत्यादिना ।
विना अवसर के रस का प्रकाशन जैसे जिस संग्राम में अनेक वीरों का संक्षय प्रारम्भ हो गया हो और जो कल्पनाओं के समान उपस्थित हो उस संग्राम के प्रारम्भ हो जाने पर रामदेव के समान भी किसी नायक का, जिसका विप्रलम्भ शृङ्गार प्रारम्भ न किया हो, किसी उचित निमित्त के बिना ही शृङ्गार में प्रवेश के वर्णन में । इस प्रकार के विषयों में कथापुरुष का दैवव्यामोहितत्व परिहार ठीक नहीं है क्योंकि कवि की प्रधानता से रसबन्ध ही होता है न कि प्रवृत्ति-निबन्धन । इतिवृत्त का वर्णन उसका उपाय है—यह पहले ही कहा जा चुका है कि 'इतिवृत्तवर्णन तो उसका उद्यममात्र है—जैसे 'प्रकाश की इच्छा करनेवाला व्यक्ति दीपशिखा में यत्नवान् होता है' इत्यादि के द्वारा ।
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पास्त्वमिति वेणीसंहारे द्वितीयाङ्कमेवोदाहरणत्वेन ध्वनति । अत एव वक्ष्यति 'दैवव्यामोहितत्वम्' इति । पूवं तु सन्ध्याद्वासमप्रायेण प्रत्युदाहरणमुक्तम् । कथापुरुषस्येति यावत् ।
इत्यादिका वह वर्णन दूर से ही परित्यक्त है इस प्रकार वेणीसंहार का द्वितीय अङ्क ही उदाहरण के रूप में ध्वनित करता है । इसीलिये कहेंगे—'दैवव्यामोहितत्व' । पहले तो सन्ध्याद्व के अभिप्राय से प्रत्युदाहरण दे दिया । 'कथापुरुष का' अर्थात् प्रतिनायक का ।
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यदि किसी नायक के हृदय में किसी नायिका के समागम की स्पृहा उत्पन्न हो गई हो, शृङ्गार रसपरिपोष पथवी को प्राप्त हो गया हो और एक दूसरे का अनुराग मुक्त हो चुका हो क्योंकि रति के उभयनिष्ठ हुए बिना शृङ्गार का पूर्ण परिपोष कहा ही नहीं जा सकता । आशय यह है कि शृङ्गार रस पूर्वराग के रूप में स्थित हो ऐसी दशा में उचित व्यवहार यही हो सकता है समागम-उपाय सोचा जावे—दूतीसंप्रेषण, पत्रलेखन, संकेतनिर्धारण इत्यादि की चेष्टा की जावे-किन्तु इसके प्रतिकूल यदि कोई कवि इन व्यवहारों को छोड़कर दूसरे कायों का विस्तारपूर्वक
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वर्णन करने लगे तो यह दोष होगा। जैसे ‘तापसवत्सराज’ में रत्नावली और उदयन के पूर्वराग उत्पन्न होने के बाद चतुर्थ अङ्क में विजयवर्मा के वृत्तान्त का विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है, विजयवर्मा रत्नावली का नाम तक नहीं लेते इस प्रकार प्रकृत रस उदयन और रत्नावली के अनुराग को अतिक्रमण कर तथा उसको बीच में ही छोड़कर दूसरे कार्यव्यापारों का वर्णन प्रारम्भ कर दिया गया है। यह बिना अवसर के रस को छोड़ देने में दोष की व्याख्या की गई है।
दूसरा दोष तब होता है जब रस का बिना अवसर के विस्तार किया जाता है। उदाहरण के लिये जब कि महासमर का प्रारम्भ हो चुका हो, अनेक वीरों का संक्षय भी प्राप्त हो और प्रलय का दृश्य उपस्थित हो उस समय नायक की शृङ्गार चेष्टाओं का वर्णन किया जाने लगे तो यह शृङ्गार का बिना अवसर विस्तार अत्यन्त अनुचित होगा।
फिर नायक चाहे रामदेव के समान ही क्यों न हो यदि उसके विप्रलम्भ शृङ्गार का उपक्रम नहीं किया गया होगा और शृङ्गार चेष्टाओं का कोई कारण भी उपस्थित नहीं होगा तो उस दशा में उस नायक का शृङ्गारचेष्टाओं का वर्णन सर्वथा अनुचित ही कहा जायेगा।
‘रामदेव जैसे का भी’ यहाँ पर ‘भी’ कहने का आशय यह है कि भगवान् राम के लिये युद्ध तो एक साधारण बात है; उनके भृकुटिविलास से ही सारी सृष्टि का लय हो सकता है। उनके लिये युद्ध की चिन्ता क्या? अतः युद्ध की विभीषिका से त्रस्त होना और आमोद प्रमोद में न पड़ना उनके लिये कोई अनिवार्य बात नहीं।
किन्तु वह राम के विषय में भी यदि महान् वीरों के सन्धाय के अवसर पर शृङ्गारकीडा का वर्णन किया जाने तो वह भी अनुचित ही होगा।
फिर द्यूतोंधन इत्यादि के विषय में तो कहना ही क्या? उनके विषय में शृङ्गार का विस्तार तो अनुचित होगा ही।
वेणीसंहार के द्वितीय अङ्क में दुर्योंधन का शृङ्गारप्रथन इसी का उदाहरण है। ‘रामदेव जैसे का भी’ कहने से उसी उदाहरण की व्याख्या होती है। हाँ यदि विप्रलम्भ का उपक्रम हो या शृङ्गारप्रथन का कोई निमित्त उपस्थित हो तो इस प्रकार के वर्णन का अनुचित्य दूर हो सकता है।
यहाँ यह तर्क प्रस्तुत किया जा सकता है कि इस प्रकार के विषय में प्रतिनायक के शृङ्गार-विस्तार के द्वारा लेखक का मत्लब यह व्यक्त करना होता है कि ‘प्रतिनायक की बुद्धि ही दैववश मारी गई थी, अतः ऐसे अवसरों पर भी जब कि उसे सतर्क होना चाहिये था वह व्यर्थ की शृङ्गारचेष्टाओं में लगा हुआ था, फिर उसका विनाश क्यों न होता?’
किन्तु यह समाधान ठीक नहीं, क्योंकि कवि का प्रधान प्रतिपत्ति-निमित्त रचवनधन ही होता है यहीं कहना ठीक है।
इतिवृत्तवर्णन तो एक
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अतएव चेतिवृत्तमात्रवर्णनप्राधान्येडङ्गाङ्गिभावरहितरसभावनिवन्धन्वये च कवीनामेवविधानि स्वलितानि भवन्तीति रसादिरूपव्यङ्गचतत्पयेमेवैषां युक्तिमिति यत्नोडस्माभिरारन्धो न ध्वनिप्रतिपादनमात्राभिनिवेशन ।
अत एव चेति । यतो रसबन्ध एव मुख्यः कविचर्यापारविषयः इतिवृत्तमात्रवर्णनप्राधान्ये सति यदङ्गाङ्गिभावरहितानामविचारितगुणप्रधानभावानां रसभावानां निवन्धनं तत्रिमित्तानि स्वलितानि सवैं दोषा इत्यर्थः । न ध्वनिप्रतिपादनमात्रेति । व्यङ्गचोद्योऽर्थो न भवतु मा वा भूत्कृतान्त्राभिनिवेशः । काकदन्तपरिक्षात्रिमव तत्प्राधीतति सारः । 'इसलिये' यह । क्योंकि रसवन्ध ही कवि के व्यापार का मुख्य विषय है । इतिवृत्तमात्र वर्णन के प्रधान होने पर जो अङ्गाङ्गिभावरहित अर्थात् गौण और प्रधान भाव का बिना विचार किये हुये रसों और भावों का निवन्धन तत्रिमित्त स्वलित ही सब दोष ( होते हैं ) यह अर्थ है । 'ध्वनिप्रतिपादनमात्र' यह । व्यङ्ग्य अथे हो या न हो उसमें क्या अभिनिवेश? वह काकदन्तपरिक्षा के समान ही होगा यह भाव है ।
लोचनतारावती
तारावती
तारावती
उपायमात्र होता है जैसे कि प्रथम उद्योत में कहा जा चुका है—‘जिस प्रकार आलोक का इच्छुक व्यक्ति दीपपिखा में यत्नवान् होता है ।...' इत्यादि । वेणीसंहार के द्वितीय अङ्क में दुर्योधन के श्रृङ्गारप्रधान का उदाहरण पहले भी आ चुका है किन्तु वहाँ पर सन्ध्यभ्र की पूर्ति के लिये कथा-भाग के समावेश को अनुचित बतलाने के उदाहरण के रूप में दुर्योधन और भानुमती के श्रृङ्गारप्रथन का उल्लेख किया गया था और यहाँ पर बिना अवसर के श्रृङ्गारप्रथन के प्रसङ्ग में 'रामदेव जैसे का भी' इस 'भी' शब्द से उसकी व्यञ्जना की गई है। अतः विषयभेद होने से यहाँ पर पुनरुक्ति नहीं है । यहाँ पर 'कथापुरुष का देवव्यमोहितत्व' में कथापुरुष का अभिप्राय है प्रतिनायक, प्रधान नायक नहीं; क्योंकि प्रधान नायक तो सफलता की ओर ही अग्रसर होता है उसका देवव्यामोहित होकर कार्य विगाड़ लेना उचित नहीं । रसनिबन्धन ही कवि का प्रधान कार्य क्षेत्र होता है । यदि कवि ऐसा काव्य
उपायमात्र होता है जैसे कि प्रथम उद्योत में कहा जा चुका है—‘जिस प्रकार आलोक का इच्छुक व्यक्ति दीपपिखा में यत्नवान् होता है ।...' इत्यादि । वेणीसंहार के द्वितीय अङ्क में दुर्योधन के श्रृङ्गारप्रधान का उदाहरण पहले भी आ चुका है किन्तु वहाँ पर सन्ध्यभ्र की पूर्ति के लिये कथा-भाग के समावेश को अनुचित बतलाने के उदाहरण के रूप में दुर्योधन और भानुमती के श्रृङ्गारप्रथन का उल्लेख किया गया था और यहाँ पर बिना अवसर के श्रृङ्गारप्रथन के प्रसङ्ग में 'रामदेव जैसे का भी' इस 'भी' शब्द से उसकी व्यञ्जना की गई है। अतः विषयभेद होने से यहाँ पर पुनरुक्ति नहीं है । यहाँ पर 'कथापुरुष का देवव्यमोहितत्व' में कथापुरुष का अभिप्राय है प्रतिनायक, प्रधान नायक नहीं; क्योंकि प्रधान नायक तो सफलता की ओर ही अग्रसर होता है उसका देवव्यामोहित होकर कार्य विगाड़ लेना उचित नहीं । रसनिबन्धन ही कवि का प्रधान कार्य क्षेत्र होता है । यदि कवि ऐसा काव्य
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पुनर्रायमन्यो रसमङ्गहेतुरवधारणीयो यत्परिपोषकृतस्यापि रसस्य पौनः पुन्येन दीपनम् । उपयुक्तो हि रसः स्वसामग्रीलव्ध्यपारिपोषः पुनः पुनः परामृश्यमानः परिम्लानकुसुमकल्पः कल्पते ।
फिर यह दूसरा रसमङ्ग हेतु समझ लिया जाना चाहिये जो कि परिपोष को प्राप्त भी रस का पुनः पुनः दीपन । निस्सन्देह अपनी सामग्री से परिपोष को प्राप्त होनेवाला उपयुक्त रस बार-बार परामर्श किये जाने पर अत्यन्त मलिनकुसुम के समान कल्पित होता है ।
तारावती लिख रहा हो जिसमें केवल इतिवृत्त की प्रधानता हो तो वह कभी कभी अपने काव्य को ग्राह्य बनाने के मन्तव्य से उसमें रसभाव इत्यादि की संयोजना करता चलता है—उस निबन्धन में न वह अनुवद्ध रसभावों के अज्ञाज्ञिभाव का ध्यान रखता है और न उनके गौण तथा प्रधान होने की ही कोई परवाह करता है । इस कारण रसभावनिबन्धन के क्षेत्र में पद पद पर उसके प्रमादस्खलित होते हैं और वे ही सब दोष हो जाते हैं । अतः समस्त प्रदर्शनों का तात्पर्य एकमात्र रस और भाव इत्यादि हो होना चाहिये और उसमें आनेवाले दोषों को बचाना चाहिये यह दिखलाने के लिये ही हमने प्रस्तुत प्रकरण प्रारम्भ किया है, हमारा अभिनिवेश केवल ध्वनि का प्रतिपादन करना ही नहीं है । आशय यह है कि यहां पर कोई प्रस्तुत प्रकरण को ध्वनि से असम्बद्ध कहकर अप्रासंगिकता का दोषारोपण कर सकता है । उस पर आनन्दवर्धन का कहना है कि इस प्रकरण को लिखने का हमारा मन्तव्य उन छूटियों की ओर संकेत करना है जो रसभावनिबन्धन में प्रायः कवियों से हो जाती है । इसका ध्वनि से भी सम्बन्ध है । किन्तु केवल ध्वनि का प्रतिपादन तक काव्य में ध्वनि हो या न हो इसमें हमारा क्या आग्रह ? वह तो काकदन्त परीक्षा के समान सर्वथा व्यर्थ ही है । दूसरा रसमङ्गहेतु यह समझना चाहिये कि कोई रस विभाव, अनुभाव और व्यभिचारी भावों की उचित सामग्री के बल पर पूर्णतया परिपोष को प्राप्त हो गया हो फिर भी उसका पुनः पुनः दीपन किया जावे । यदि किसी उचित रस के परिपुष्ट हो जाने के बाद उसका उपभोग किया जा रहा हो उस समय उसका बार बार परामर्श किया जावे तो म्ले हुये पुष्पों के समान उसमें मलिनता आ जाती है । जैसे कुमारसम्भव में रतिविलाप के अवसर पर कवि बार बार कहता चलता है कि 'रति विलाप करने लगी' 'रति छाती पीट कर रोने लगी' इत्यादि । इस प्रकार
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तथा वृत्तेर्यवहारस्य यदनौचित्यं तदपि रसभङ्गहेतुरेव । यथा नायकं प्रति नायिकाया: कस्याश्चिदुचितां भङ्गिमन्तरेण स्वयं सम्भोगाभिलाषकथने । यदि वा वृत्तीनां भरतप्रसिद्धानां कैशिक्यादीनां काव्यालङ्कारान्तरप्रसिद्धानामुपनागरिकाद्यानां वा यदनौचित्यमविपये निवर्त्यतां तदपि रसभङ्गहेतुः । एवमेषां रसविरोधिनामन्येषां चानया दिशास्वयमुपचितानां परिहारेसत्कविभिरवहितैर्भवितव्यम् ।
उसी प्रकार वृत्ति अर्थात् व्यवहार का जो अनौचित्य वह भी रसभङ्गहेतु ही होता है जैसे किसी नायक के प्रति किसी नायिका का उचित भङ्गिमा के बिना स्वयं सम्भोग की अभिलाषा के कथन करने में । अथवा भरतप्रसिद्ध कैशिकी वृत्तियों या दूसरे आलङ्कारिकों में प्रसिद्ध उपनागरिका इत्यादि का जो अनौचित्य अर्थात् अविषय में योजना वह भी रसभङ्गहेतु ही होता है । इस प्रकार इन रसविरोधियों और इसी दिशा में स्वयं कल्पित किये हुये दूसरे ( रसविरोधों ) का परिहार करने में अच्छे कवियों को सावधान रहना चाहिये ।
वृत्त्यनौचित्यमेव चेतिवहुधा व्याचष्टे तदप्येनैवकारस्य कारिकागतस्य मिन्नक्रमत्वमुपक्रम् । रसस्य विरोधायैव वेद्यर्थः । नायकं प्रतीति । नायकस्य हि धीरोदात्तादिभेदमिन्नस्य सर्वथा वीररसानुवेधेन भवितव्यमिति तं प्रति कातरपुरुषोचितमधेयंयोजनं दुष्टमेव । 'वृत्त्यनौचित्य भी' इसकी बहुधा व्याख्या की है। 'वह भी' से कारिका में आये हुये 'च' शब्द को व्याख्या करते हैं । 'रसभङ्गहेतु ही' इसके द्वारा कारिका में आये हुये 'एव' शब्द का मिन्नक्रमत्व कहा गया है । अर्थात् 'रस के विरोध के लिये नुवेध ही होना चाहिये अतः उसके प्रति कातर पुरुष के योग्य अधेयं की योजना दूषित ही है ।
वार वार मसलने से पुष्प के समान रस मलिन पड़ जाता है और सहृदयों को उस ओर से विराग हो जाता है ।
बार बार मसलने से पुष्प के समान रस मलिन पड़ जाता है और सहृदयों को उस ओर से विराग हो जाता है ।
वृत्ति का अनौचित्य एक दूसरा तत्व है जो रसभङ्ग में हेतु ही होता है । वृत्ति के अनौचित्य के यहाँ पर तीन अर्थ है—१—वृत्ति अर्थात् व्यवहार का अनौचित्य । उदाहरण के लिये सामान्यतया कोई नायिका किसी पुरुष के सामने अपनी सम्भोग की अभिलाषा शब्दों के द्वारा प्रकट नहीं करती। प्रेमप्रवृत्ति सर्वप्रथम
वृत्ति का अनौचित्य एक दूसरा तत्व है जो रसभङ्ग में हेतु ही होता है । वृत्ति के अनौचित्य के यहाँ पर तीन अर्थ है—१—वृत्ति अर्थात् व्यवहार का अनौचित्य । उदाहरण के लिये सामान्यतया कोई नायिका किसी पुरुष के सामने अपनी सम्भोग की अभिलाषा शब्दों के द्वारा प्रकट नहीं करती। प्रेमप्रवृत्ति सर्वप्रथम
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मुख्या व्यापारविषया: सुकवीनां रसादय: ।
तेऽपां निवन्धने भाव्यं तै: सदैवाप्रमादिभि: ॥
नोरसस्तु प्रवन्ध्यो य: सादरश्रव्धो महान् कवे: ।
स तेनाकविरेव स्यादन्येनास्मृतलक्षण: ॥
तैरिति रसादिविषम् । तैरिति सकविमि: । सोऽपशब्द इति दूयेऽर्थे । न तु कालिदास: परिपोषं नतस्यापि करुणस्य रतिविलासेषु पुन:पुन्येन दीपनमकार्षीं त,
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'उनका' अर्थात् रस इत्यादि का । 'उनके द्वारा' अर्थात् अच्छे कवियों के द्वारा । 'यह अपशब्द है' अर्थात् अनुपयुक्त है । (प्रस्तुत) कालिदास ने परिपोष को प्राप्त हुये भी करुण रस का रतिविलासों मे पुन: पुन: दीपन किया है तो यह रस-
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शब्दों द्वारा प्रकट करना पुरुष का काम है । यदि नायिका प्रेम प्रकट करना चाहती है तो वह विलासचेष्टाओं और संकेतों के द्वारा अपना कार्य पूरा करती है । इस सामान्य व्यवहार का अतिक्रमण कर यदि किसी नायक के प्रति नायिका के
सम्भोगाभिलाष का कथन कराया जावे और संकेतों तथा विलासचेष्टाओं का माधयम न स्वीकार किया जावे तो यह व्यवहार का अनौचित्य होगा। २—इस विषय का दूसरा उदाहरण यह हो सकता है कि नायक के धीरोदात्त इत्यादि भेद किये
गये हैं; धीरोदात्ता इत्यादि नायक में तभी आती है जब कि उसके अन्दर वीररस का अनुवेध हो । इसके प्रतिकूल यदि धीरोदात्त इत्यादि में कातर पुरुष के योग्य अधिक दृश्यलाया जावे तो वह व्यवहार का अनौचित्य होगा और वह
दोष ही होगा । २—भरत मुनि ने जिन कैशिकी इत्यादि वृत्तियों का उल्लेख किया है उनकी यथास्थान योजना रसाभिव्यक्ति में हेतु होती है । किन्तु इसके प्रतिकूल उनका अनौचित्य रसम्भ्र में हेतु होता है जहाँ कैशिकी इत्यादि वृत्तियों की योजना नहीं की जानी चाहिये वहाँ उनकी
योजना करना । ३—उद्भट इत्यादि दूसरे आलङ्कारिकों ने जिन उपनागरिका इत्यादि वृत्तियों का निरूपण किया है उनकी अविषय में योजना भी रसभङ्ग में हेतु
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होती है। (वृत्तियों का विस्तृत परिचय ३२वीं कारिका की व्याख्या में दिया जावेगा।) १६वीं कारिका का उत्तरार्ध इस प्रकार है—‘रसस्य स्यादिरोघाय वृत्त्यनौचित्यमेव वा’ यहाँ पर ‘एव’ शब्द ‘वृत्त्यनौचित्य’ के बाद जुड़ा है। किन्तु व्याख्या करते में इसका योजन ‘विरोधीय’ के साथ कर लेना चाहिये। इसका अर्थ यह है कि कारिकाओं में कहे हुये तत्त्व रसविरोध के लिये ही होते हैं। इसी बात को प्रकट करने के लिये आनन्दवर्धन ने ‘एव’ शब्द को ‘शब्दहेतुः’ के साथ लगाया है। इस प्रकार जिन विरोधी तत्त्वों का उल्लेख प्रस्तुत कारिकाओं में किया गया है उनका परित्याग करने के लिये अच्छे कवियों को सदा प्रयत्नशील रहना चाहिये। इसी दिशा में दूसरे रसविरोधियों की स्वयं कल्पना कर लेनी चाहिये और उनका परिहार करने की भी चेष्टा करनी चाहिये। इस विषय में निम्नलिखित कतिपय परिष्कर श्लोक भी प्रसिद्ध हैं—
‘अहो, कवीनां कुसृतं व्यापृतं विषय रस इत्यादि हि होते हैं अर्थात् सत्कवियों की क्रियाशीलता का सबसे बड़ा फल यहीं है कि रस इत्यादि की अभिव्यक्ति हो जावे। अतः उन अच्छे कवियों का सबसे बड़ा कर्तव्य यही है कि रस इत्यादि के निर्वन्धन में कभी प्रमाद न करें।
‘रससरहित प्रतनन्धरचना कवि का बहुत बड़ा अपयश है अर्थात् कवि का सबसे बड़ा अपयश यही है कि रसदीन प्रबन्ध की रचना करे। (‘नीरस प्रबन्ध भाव में लत्त्यणा है’ अर्थात् नीरस काव्य कवि के अपयश का सबसे बड़ा जनक होता है।) इससे तो अच्छा यही है कि वह कवि ही न बने जिससे उसके नाम को कोई याद ही न करे। (यदि नीरस काव्य लिखने वाले कवि का कोई नाम लेगा तो उसकी निन्दा ही करेगा। अतः अच्छा तो यही है कि वह कवि ही न बने और न कोई उसका नाम ही स्मरण करे।)
(प्रश्न) कालिदास ने रतिविलापों में परिपोष को प्राप्त भी करुण रस का पुनः पुनः दीपन किया है। इस प्रकार महाकवियों के भी ये रस-दोष देखे ही जाते हैं। (वेणीसंहार इत्यादि के दोष दिखलाये ही जा चुके हैं।) फिर आजकल के कवियों पर यह अधिक जोर क्यों दिया जा रहा है कि रसविरोध का परिहार करना ही चाहिये? जब महाकवि भी इस प्रकार की च्युतिाँ करते हैं तब आजकल के सामान्य कवियों से यदि ऐसी ही भूलें हों तो क्या आश्चर्य?
(उत्तर) ‘पुराने कवियों की वाणी स्वच्छन्दतापूर्वक प्रवृत्त होती थी; उनको यश प्राप्त हो गया था। अतः यदि उनसे कहीं भूल हो गई हो तो उसका उनको यश प्राप्त हो गया था।
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पूर्वं विशिष्टलिंगः कवयः प्राप्यकीर्तयः । तान् समाश्रित्य न त्याज्या नीतिरेषा मनोषिभिः ॥ वाल्मीकिकव्यासमुख्यैस्त्र ये प्रथ्यन्ते कवीश्वराः । तद्भिम्रप्रायचर्योदयं नाम्माभिमताश्रितो नयः ॥
(अनु०) ‘कीर्ति को प्राप्त करनेवाले पुराने कवि ( यथिद् ) विशिष्टलिंग वाणीवालें ( हो गये हों ) तो उनका सहारा लेकर मनोषी को यह नीति नहीं छोड़नी चाहिये । ‘वाल्मीकि व्यास प्रभृति जो प्रख्यात कवीश्वर हो गये हैं हमने उनके अभिप्राय से नाथ्य यह मार्ग नहीं दिखलाया है ।’
लोचन तत्कोडयं रसविरोधिनां परिहारनिबन्ध इत्याख्यायते—पूर्व इति । विरोषिष्यादिमिः कथंवित् स्मृतिमार्गस्यक्तकस्तद्यमपि तथा त्वजामः । अचिन्त्यहेतुकत्वादुपारिचरितानामिति भावः । ‘इति’ शब्देन परिकरश्लोकसमाप्ति सूच्यते ॥ १३ ॥
तारावती
महाकवियों की चरितियाँ उनकी महत्ता में ही ढँक जाती हैं । उनका सहारा लेकर किसी मनोषी को रसविरोध का परिहारसम्बन्धी नीति का परित्याग नहीं करना चाहिये । आशय यह है
उनका सहारा लेकर साधारण व्यक्ति यदि वैसी भूलें करने लगे तो उसको ज्ञान प्राप्त नहीं हो सकता । महाभाष्यकार ने भी लिखा है कि मूर्ख व्यक्ति अशुद्ध शब्द बोलकर दूषित हो जाता है । किन्तु जो विशेष विद्वान् होता है उसकी दत्ता का सहारा मिल जाता है और पाठकों का ध्यान महापण्डितों की सामान्य टिप्पणियों को ओर नहीं जाता ।) उदाहरण के लिये विशिष्ट इत्यादि धर्मशास्त्र के महान् आचार्य तथा प्रतिष्ठित स्मृतिप्रणेते थे । यदि उन्होंने कहीं धर्ममार्ग की अवहेलना कर दी हो तो साधारण जन का यह कर्तव्य नहीं है कि वे महान् ऋषियों का निदर्शन लेकर धर्म मार्ग का परित्याग करने लगे । महान् लोगों के चरित्र लोकोत्तर होते हैं । सामान्य वृत्ति उनके हेतु की कल्पना भी नहीं कर सकता ।
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विवक्षिते रसे लब्धप्रतिष्ठे तु विरोधिनाम् । स्वसामग्र्या लब्धपरिपोषे तु विवक्षिते रसे विरोधिनां विरोधिरसाज्ञानां वाध्यानामज्जभावं वा प्राप्तानामुक्तिरच्छला ॥२०॥
(अनु०) 'विवक्षित रस के लब्धप्रतिष्ठ हो जाने पर तो वाध्य अथवा अङ्गभाव को प्राप्त विरोधियों की उक्ति दोषरहित होती है' ॥ २० ॥ विवक्षित रस के अपनी सामग्री से परिपोष को प्राप्त हो जाने पर विरोधियों की अर्थात् विरोधी रसाद्रों की वाध्य अथवा अङ्गभाव को प्राप्त होने पर उक्ति दोषरहित होती है ।
एवं विरोधिनां परिहारे सामान्येनोक्ते प्रतिप्रसवं नियतविषयमाह-विवक्षित इति । वाध्यानामिति । वाध्यत्वविमिमायेणाङ्गत्वामिप्रायेण वेत्त्यर्थः । अच्छला निदोषवेत्यर्थः । इस प्रकार सामान्य रूप में विरोधियों के परिहार कह दिये जाने पर निश्चित विषयवाले प्रतिप्रसव ( विपरीतनिदोंषपिता ) कहते हैं—विवक्षित इत्यादि । 'वाघ्या-नाम्र' यह। अर्थात् वाध्यत्व के अभिप्राय से अथवा अङ्गत्व के अभिप्राय से। अच्छला का अर्थ है निर्दोष ।
अनुकरण पर न तो नीति-मार्गं का (ही परित्याग करना चहिये और न कला-जगत् में निश्चित सिद्धान्तों और मान्यताओं का ही अतिक्रमण करना चहिये ।'
( प्रश्न ) रसविरोध तथा रसदोष के विषय में आपने जो मान्यतायें स्थापित की हैं उनमें प्रमाण क्या है ? क्या आपके कथन से ही इन मान्यताओं पर विश्वास कर बन्धन स्वीकार कर लिया जावे ? उत्तर—'बहुत से प्रभ्यात कवीश्वर साहित्य-जगत् में प्रतिष्ठित हैं जिनमें व्यास और वाल्मीकि मुख्य हैं । उनके काव्यों का अध्ययन करने से स्पष्ट प्रतीत होता है कि हमने जो मान्यतायें निर्धारित की हैं वे सब इन मूर्धन्य कवियों को मान्य हैं और उनका अभिप्राय भी इन मान्यताओं के पत्ते में हो है । अतः हमने कोई बात मनमानी नहीं कही है ।'
॥१५६॥
॥१५६॥ उपर रसविरोधी तत्वों का उल्लेख सामान्यरूप में किया जा चुका । अब उन तत्वों का परिचय दिया जावेगा जिनमें विरोधी तत्व विरोधी न रहकर पोषक के रूप में परिणत हो जाते हैं—
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वाध्यत्वं हि विरोधिनां शाक्याभिवक्तव्ये सति नान्यथा। तथा च तेषा युक्तिः प्रस्तुतरसपरिपोषायैव सम्पद्यते। अङ्गभावं प्राप्तानां च तेषां विरोधित्वमेव निवर्तते।
(अनु०) विरोधियों का वाध्यत्व रसाभिव्यक्तिरूप लक्ष्य होने पर ही होता है, अन्यथा नहीं। अतः एवं उनका कथन प्रस्तुत रस के परिपोष के लिये ही हो जाता है। अङ्गभाव को प्राप्त होने पर उनका विरोध ही निवृत्त हो जाता है।
वाध्यत्वाभिप्रायं व्याचष्टे—वाध्यत्वं हि इति।
वाध्यत्व के अभिप्राय की व्याख्या करते हैं—‘वाध्यत्वं हि’ इत्यादि।
'कवि जिस रस की अभिव्यक्ति करना चाहता है यदि वह रस प्रतिष्ठा को प्राप्त हो गया हो और उसका विरोधी रस अङ्ग बन कर आवे तो इस प्रकार के विरोधी रस का उपादान सदोष नहीं कहा जा सकता' ॥ २० ॥
रस की भाव आदि सामग्री रस का पोषक तत्त्व होती है। विरोधी रस के उपादान में विरोध को दूर करने की पहली शर्त यह है कि मुख्य रस की सामग्री में किसी प्रकार की कमी न रह जाये और उस सामग्री से मुख्य रस का पूर्णरूप में परिपोष हो जाये। दूसरी शर्त यह है कि मुख्य रस के जिस विरोधी रस का उपादान किया गया हो वह अपनी दुर्बलता के कारण वाध्य हो जाये अर्थात् मुख्य रस अपने विरोधी को अपनी शक्ति से दबा ले अथवा विरोधी रस मुख्य रस का अङ्ग बन जाये ऐसी दशा में विरोधी रस तथा उसके अङ्गों का उपादान दोष नहीं होता। कोई भी रस अपने विरोधियों का बाध तो तभी कर सकता है जब उसमें इतनी शक्ति हो कि वह विरोधी को दबा सके, अन्यथा एक रस दूसरे का बाध नहीं कर सकता। एक रस में दूसरे को दबाने की शक्ति तभी आती है जब दबानेवाले रस की सामग्री पूर्ण हो और वह परिपोष को प्राप्त हो गया हो तथा दबने वाले रस की सामग्री न्यून हो और वह परिपोष को भी न प्राप्त हुआ हो। इस प्रकार जब मुख्य रस अमुख्य रस को दबा लेता है तब अमुख्य रस मुख्य रस का परिपोषक ही हो जाता है। (जैसे शत्रु पर विजय प्राप्त कर लेने पर ही किसी नायक की वास्तविक शोभा होती है उसी प्रकार विरोधी रस दबा कर अपने आघीन कर लेने से ही मुख्य रस की शोभा बढ़ती है और इस प्रकार वह परिपुष्ट होता है।) यह तो हुआ वाध्य होनेपर विरोधी रस के समावेश में निर्दोषिता की बात।
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अङ्गभावप्राप्तिहिं तेषां स्वाभाविकी समारोपकृता वा । तत्र येषां नैसर्गिकी तेषां तावदुक्ताविरोध एव । यथा विप्रलम्भशृङ्गारे तदङ्गानां व्याध्यादीनाम् । तेषाम्न तदङ्गानामेवादोषो नातदङ्गानाम् । तदङ्गत्वे च सम्भवत्यपि मरणस्योपन्यासो न ज्यायान् । अश्रयविवक्षेद रसस्याल्पान्तर्विवक्षेऽपि ।
(अनु०) उनकी अङ्गभावप्राप्ति या तो स्वाभाविक होती है या आरोपकृत होती है । उसमें जिनकी नैसर्गिक ( अङ्गभावप्राप्ति ) होती है उनकी उक्ति में तो अविरोध ही होता है । जैसे विप्रलम्भ शृङ्गार में उसके अङ्गव्याधि इत्यादि का । और उन ( व्याधि आदि ) का उस ( शृङ्गार ) के अङ्गों का ही अदोष होता है अतदङ्गों का नहीं । तदङ्गता के सम्भव होते पर भी मरण का उपन्यास ठीक नहीं । क्योंकि आश्रय के विवक्षित होने पर रस का सर्वथा विच्छेद प्रसक्त हो जाता है ।
लोचन
अङ्गभावाभिप्रायसमुचयस्था निरुपणाय तत्र प्रथमं स्वाभाविकत्वकृतं तिरूपणम्—तदङ्गानामिति । निरेक्षभावतया सापेक्षभावविप्रलम्भशृङ्गारविरोधिन्यपि करुणे ये व्याध्यादयस्तत्रैवथाझत्वेन दृष्टा: तेऽपि करुणे भवन्त्येव त एव च भवन्तीति । शृङ्गारे तु भवन्त्येव नापि त एवति । अतदङ्गानामिति यथालस्यौग्र्यजुगुप्सानामित्यर्थ: । तदङ्गत्वे चेति ‘सर्व एव शृङ्गारे व्यमिचारिण’ इत्युक्तत्वादिति भाव: । आश्रयस्य श्रीपुरुषान्यतरस्याधिष्ठानस्यापये रतिरेवोच्छिद्येत तस्यां जीवितसर्वस्वाभिमानरूपत्वेनो-
मयाधिष्ठानत्वात् ।
अङ्गभाव के अभिप्राय को दो प्रकार से कहते हैं, उसमें प्रथम स्वाभाविक प्रकार का निरूपण करते हैं—‘उसके अङ्गों का’ यह । सापेक्ष भाव में होनेवाले विप्रलम्भ शृङ्गार के निरपेक्ष भाव में होने के कारण विरोधी भी करुण में जो व्याधि इत्यादि सर्वथा अङ्ग के रूप में देखे गये हैं उनका यह ( आश्रय है ) । वे निस्सन्देह करुण में होते ही हैं और वे ही होते हैं । शृङ्गार में तो होते ही हैं और वे ही नहीं ( होते ) । ‘अतदङ्गानाम्’ इति । अर्थात् जैसे आलस्य औग्र्य और जुगुप्सा का । ‘तदङ्गत्वे चेत्’ । भाव यह है कि क्योंकि यह कहा गया है कि ‘शृङ्गार में भी व्यभिचारी होते हैं । आश्रय का अर्थात् अधिष्ठानरूप स्त्री पुरुष दो में एक का विनाश हो जाने पर रति ही उच्छिन्न हो जावे । क्योंकि वह ( रति ) जीवितसर्वस्वाभिमानरूपत्व होने के कारण उभयनिष्ठ होती है ।
तारावती
मुख्य रस का पोषक उत्तम समय भी हो जाता है जब कि वह मुख्य रस का अङ्ग बन जावे । इस प्रकार भी विरोधी रस के समावेश में दोष-सहित्य आ जाता है । एक रस
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दूसरे का अङ्ग दो रूपों में वनता है या तो उसमें अंग वन जाने की स्वाभाविक योग्यता हो या उस पर अङ्गभाव का आरोप कर दिया जावे। उसमें जो रस या उसके अङ्ग स्वाभाविक रूप में अंग हो जाते हैं उनके कथन में तो विरोध का प्रश्न ही नहीं उठता। उदाहरण के लिये काव्यशास्त्र में निर्वेद इत्यादि ३३ सञ्चारी माने जाते हैं। उनमें ३६ सञ्चारी तो शृङ्गार रस में हों ही सकते हैं, उग्रता, मरण, आलस्य और जुगुप्सा ये चार सञ्चारी परवर्ती आचार्यों के मत में शृङ्गार में नहीं होते। भरत ने केवल तीन सञ्चारियों का शृङ्गार में निषेध किया है आलस्य और जुगुप्सा। भरत ने मरण का निषेध शृङ्गार में नहीं किया है।
इस प्रकार तीन या चार सञ्चारी शृङ्गार में नहीं होते शेष ३३ सञ्चारियों शृङ्गार में होते हैं। शृङ्गार का विरोधी है करुण। आलम्बन के एक होने पर शृङ्गार और करुण का विरोध होता है। करुण रस के व्यभिचारी भाव निर्वेद, मोह, अपस्मार, व्याधि, ग्लानि, स्मृति, श्रम, विपाद, जड़ता, उन्माद और चिन्ता इत्यादि होते हैं। इस प्रकार व्याधि इत्यादि सञ्चारियों की स्थिति दो प्रकार की हो गई—एक तो व्याधि-इत्यादि शृङ्गार के सञ्चारी भाव के रूप में आते हैं। दूसरे ये शृङ्गार के विरोधी करुण में आते हैं। शृङ्गार और करुण का विरोध है इसमें तो सन्देह हो ही नहीं सकता। क्योंकि शृंगार रस (विप्रलम्भ शृङ्गार) सापेक्ष भाव में होता है और करुण निरपेक्ष भाव में। आशय यह है कि जहाँ आलम्बन के विद्यमान होने का निश्चय होने से पुनर्मिलन की अपेक्षा वनी रहे वहाँ विप्रलम्भ शृङ्गार होता है और जहाँ मरण के निश्चय होने से पुनर्मिलन की अपेक्षा समाप्त हो जावे वहाँ करुण होता है। सापेक्ष भाव और निरपेक्ष भाव में विरोध होता है। अतएव करुण के व्यभिचारी भाव व्याधि इत्यादि शृङ्गार के विरोधी सिद्ध हुये।
इन व्याधि इत्यादि सञ्चारियों का प्रयोग शृङ्गार में भी होता ही है (क्योंकि व्याधि इत्यादि को तो काम दशाओं में गिनाया गया है।) अतः शृङ्गार रस के अंग के रूप में यदि व्याधि इत्यादि का प्रयोग किया जाता है तो दोष नहीं होता। इसके प्रतिकूल यदि (इन व्याधि इत्यादि का करुण के अंग के रूप में अथवा) उन उग्रता इत्यादि सञ्चारियों का, जो शृङ्गार के अंग नहीं वन सकते, उपनिबन्ध किया जाता है तो वह दोष होता है। क्योंकि व्याधि इत्यादि के विषय में ये नियम बनाये जा सकते हैं—(१) व्याधि इत्यादि करुण में होते ही हैं। (२) करुण में व्याधि इत्यादि ही होते हैं। (३) शृङ्गार में व्याधि इत्यादि होते ही नहीं होते।
इस प्रकार यदि शृङ्गार के अंग के रूप में व्याधि इत्यादि विरोधी करुण के अंगों का उपनिबन्ध किया जाता है तो वह दोष नहीं होता। यदि
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करुणस्य तु तथाविधे विषये परिपोषो भविष्यति ति चेतं न; तस्याप्रस्तुतत्वात्, प्रस्तुतस्य च विच्छेदात् । यत्र तु करुणरसस्यैव काव्यार्थतयैव तत्सादृश्यरोधः । शृङ्गारे चा मरणस्यादिर्घकालप्रत्युपनिबन्धनसम्भवे कदाचिदुपनिबन्ध्यो नात्यन्तविरोधी । दीर्घकालप्रत्युपपत्तौ तु तस्यानन्तरा प्रवाहविच्छेद एव चैवंविधोऽतिनोपनिबन्धनं रसबन्धप्रधानेन कविना परिहर्तव्यम् ।
(अनु०) यदि कहो कि इस प्रकार के विषय में करुण का परिपोष हो जनेगा तो ऐसा नहीं होगा; क्योंकि वह प्रस्तुत नहीं है और प्रस्तुत का विच्छेद हो चुका है । जहाँ करुण का ही काव्यार्थत्व हो वहाँ विरोध नहीं होता । अथवा शृङ्गारे में मरण के शीघ्र ही प्रत्यावर्त्तन सम्भव होने पर कदाचित् उपनिबन्धन अन्यन्न विरोधी नहीं होता । अधिक समय में प्रत्यावर्त्तन होने पर उसका मध्य में प्रवाहविच्छेद हो ही जाता है अतः रसबन्ध को प्रधान बनाकर चलनेवाले कवि के द्वारा इस प्रकार के इतिवृत्त का उपनिवन्धन छोड़ ही दिया जाना चाहिये ।
प्रस्तुतस्येति । विप्रलम्भस्यैतदर्थः । काव्यार्थत्वमिति । प्रस्तुतत्वमित्यर्थः । नन्वेवं सर्व एव व्यभिचारिण इति विधयतितमित्यादिराह—शृङ्गारे वेति । अर्द्धाङ्ककाले यत्र मरणे विरान्तपदबन्ध एव नोपपद्यते तत्रास्य व्यभिचारित्वम् । कदाचिदिति । यद्य तादृशो भङ्गो घटयितुं सुकवे: कौशलं भवति यथा—
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( प्रश्न ) इस प्रकार सभी व्यभिचारी होते हैं यह बत कद जाती है यह गद्या करके कहते है—‘अथवा शृङ्गार में’ यह । अर्द्धाङ्ककालवाले मरण में जहाँ विराम शून्य का प्रयोग ही नहीं होता वहाँ यह व्यभिचारी होता है । ‘कदाचित्’ यह । यदि तादृशो भङ्गिमा को घटित करने का कवि का कौशल होता है । जैसे—
व्याधि इत्यादि का करुण के अंग के रूप में उपनिबन्ध किया जाता है या उग्रता इत्यादि शृङ्गारविरोधी अंगों का उपनिबन्धन किया जाता है । तो वह दोष होता है । एक सिद्धान्त यह भी है कि शृङ्गार में सभी व्यभिचारी होते हैं । ( शृङ्गार में उग्रता आलस्य, जुगुप्सा और इन सञ्चारियों का निषेध किया गया है । आलस्य के प्रति उग्रता निषिद्ध है, किन्तु सपत्नी के प्रति उग्रता शृङ्गार का पोषक ही करती है । आलस्य प्रेम-व्यवहार में निषिद्ध है, किन्तु रति-जन्य आलस्य शृङ्गार का पोषक होता है । आलम्बन के प्रति जुगुप्सा निषिद्ध है, किन्तु प्रतिनायक अथवा सपत्नी के प्रति जुगुप्सा दूषित नहीं होती । इस प्रकार प्रायः सभी सञ्चारी शृङ्गार के
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तीथे तोयन्त्रतिकरमवे जडूंकन्या सरस्यो-दैन्यन्यासादमरगणनालेख्यमासाङ्ग्य सध्यः । पूर्वाकाराधिक्तुरया सड्तः कान्तयासौ लीलागारेष्वरमत पुत्रनन्दनेन्यान्तरधु ॥
जाह्नवी और सरयू के जल-सम्पिलन से उत्पन्न तीर्थ में शरीर त्यागने से अमर गणना के आलेख्य को शीघ्र हो प्राप्त होकर पहले आकार की अपेक्षा अधिक चतुर कान्ता से संगत होकर वे (अज) नन्दन के अन्दर लीलागारों में रमण करने लगे ।
यहाँ पर स्पष्ट हो मरण रति कं अंग हो रहा है । इसीलिये कवि ने मरण में पदवन्धनमात्र ( भी ) नहीं किया । क्योंकि अनुवाद के रूप में ही उसका उपनिबन्ध किया गया है । पदवन्ध के निवेश में तो अत्यन्त परिमित काल में ही पुनः प्राप्त हो जाने पर भी सत्वरया शोक का तो उदय हो ही हो जीवेगा ।
अथ दूरपरामर्शकसहृदयसामाजिकामिप्रायेण मरणस्यादिर्घकालप्रस्यापत्तेरझत्तोच्यते, हन्त तापसवत्सराजेडपि यौगन्धरायणादिनीतिमार्गाकार्णन् नृसकृतमतोनाम वासवदत्ता-मरणखुद्देरेवामावात् करुणस्य नामापि न स्यादित्यलमवान्तरेण वहुना । तस्मादिर्घकाल-तात् पदवन्धलास एवेति मन्तव्यम् । एवं नैसर्गिकाङ्गता व्याख्याता । समारोपितञ्चे तद्विपरीतस्यैतयोल्लधनस्वाद् स्वकृण्ठेन न स्याख्योता ।
यदि दूर का परामर्श करनेवाले सहृदय सामाजिकों के अभिप्राय से मरण की अदिर्घकालीीन प्रत्यापत्ति का अंग होना स्वीकार किया जाता है तब तो ‘तापस-वत्सराज’ में भी यौगन्धरायण इत्यादि के नीति मार्ग को सुनने से संस्कृत बुद्धिवाले ( सहृदयों ) में वासवदत्ता के मरण की बुद्धि न होने से करुण का तो नाम भी नहीं होगा। वस ! अवान्तर अधिक विस्तार की क्या आवश्यकता ? अतः यहाँ दीर्घकालता तो पदवन्ध के लाभ में ही समझी जानी चाहिये । इस प्रकार नैसर्गिक अंगता की व्याख्या की गई । समारोपित होने पर उसके विपरीत होती है; अतः अर्थ प्राप्त होने के कारण स्वकृण्ठ स्व व्याख्या नहीं की ।
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सम्वन्ध में प्रयुक्त किये जा सकते हैं । इस प्रकार यदि विरोधी उग्रता इत्यादि वच्वारियों का शृङ्गार में उपादान सम्भव हो तो भी मरण का उपन्यास श्रेयस्कर
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नहीं कहा जा सकता । क्योंकि जब आश्रय ही नहीं रहेगा तब शृङ्गार का तो अत्यन्त विच्छेद हो जावेगा । अतः मरण का वर्णन शृङ्गार के अनुकूल किसी भी अवस्था में नहीं पड़ता । शृङ्गार का स्थायी भाव है रति, रति तभी होती है जब स्त्री पुरुष दोनों एक दूसरे को जीवनसर्वस्व मानने लगों । इस प्रकार रति उभयनिष्ठ होती है । अतः रति-आश्रय स्त्री पुरुष दोनों होते हैं । यदि इनमें एक का भी मरण हो गया तो रति ही उच्छिन्न हो जावेगी । यहाँ पर यह कहा जा सकता है कि शृङ्गार का न सही, मरण के बाद करुण का तो परिपोष हो जावेगा । किन्तु यह कहना ठीक नहीं है । इस प्रकार के प्रकरण में सहृदयों की प्रवृत्ति शृङ्गार का आस्वादन करने के लिये होती है करुण के आस्वादन के लिये नहीं । अतः प्रस्तुत शृङ्गार रस ही है करुण नहीं । प्रस्तुत का विच्छेद दोष होगा ही । जहाँ पर करुण ही प्रस्तुत होता है तथा वही काव्यप्रवृत्ति का प्रयोजक होता है तथा उसी का आस्वादन करने के लिये सहृदयों को प्रस्तुत किया जाता है वहाँ मरण का वर्णन सदोष नहीं कहा जा सकता । यहाँ पर पूछा जा सकता है कि जब मरण का वर्णन शृङ्गार में निषिद्ध ही है तब यह कहने का क्या आशय कि शृङ्गार में सभी सञ्चारी होते हैं ? इसका उत्तर यह है कि विशेष अवस्थाओं में मरण भी शृङ्गार का पोषक होता है । यदि मरण के बाद शीघ्र ही पुनःसम्भिलन की सम्भावना .उत्पन्न हो जावे तो कदाचित् उसका उपनिबन्ध अधिक सदोष नहीं माना जा सकता । मरण के बाद पुनः प्रत्यापत्ति का वर्णन इतना शीघ्र होना चाहिये कि पाठकों और दर्शकों की बुद्धि में रति का विच्छेद न होने पावे और न उनके हृदय में शृङ्गार की प्रतीति ही विश्रान्त हो सके । किन्तु इसमें शर्त यह है कि कवि के अन्दर इतनी कुशलता होनीं चाहिये कि वह वस्तु की सज्जावटों ऐसे रूप में कर दे जिससे शृङ्गार की बुद्धि का विच्छेद न होने पावे । उदाहरण के लिये रघुवंश में अज की मृत्यु का वर्णन करते हुये महाकवि कालिदास ने लिखा है कि अपने दीर्घ रोग से परितप्त होकर
अज ने प्रायोपवेशन प्रारम्भ कर दिया तब—
'जहाँ पर भगवती जाह्नवी और सरयू जैसी पवित्र नदियों का जल एक दूसरे से मिलता है और इसीलिये जहाँ पर तीर्थ बन गया है वहाँ पर शरीर का न्यास करने से अज को शीघ्र ही अमरों में गणना प्राप्त हो गई । उधर इन्दुमती भी अपने लौकिक रूप से अधिक सुन्दर रूप धारण कर वहाँ आई । अपनी उस प्रेयसी से मिलकर अज नन्दन उद्यान के अन्दर बने हुए कीडागृहों में विहार करने लगे ।'
यहाँ पर अज की मृत्यु उनके प्रेयसीसम्भिलन और सम्भोग शृङ्गार में हेतु होने से रति का अञ्जन है यह बात स्पष्ट ही है । ( यहाँ पर ध्यान देनेवाली बात यह
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तत्र लब्धप्रतिष्ठे तु विवक्षिते रसे विरोधिरसाङ्गानां बाध्यत्वेनोक्तावदोषो यथा—
स्वाकायं शशाङ्कदर्शनः कच च कुलं भुयोडपि हर्षयेत सा दोषाणां परिहाराय मे श्रुतमयी कोपि दोपि कान्त मुखम् ।
किं वद्यन्त्यपकल्मषा: कृतधिय: स्वप्नेऽपि सा दुर्लभा चेतः स्वस्थयुमुपैहि कः स्वलु युवा धन्योऽद्य धरां पास्यति ॥
(अनु०) उसमें विवक्षित रस के लब्धप्रतिष्ठ हो जाने पर विरोधी रसाङ्गों के बाध्यत्व के रूप में कथन में अदोष जैसे—
‘कहाँ तो दुष्कृत्य और कहाँ शशाधर ( चन्द्र ) का वंश ? एक बार वह पुनः दिखाई पड़ जाती ? हमारा शास्त्र तो दोषों की शान्ति के लिये होना चाहिये ! आश्रर्य है कि उसका मुख क्रोध में भी कमनीय प्रतीत होता है । कल्मषरहित कुशल बुद्धिवाले क्या कहेंगे ? वह तो स्वप्न में भी दुर्लभ है । हे चिन्ते ! स्वस्थ हो जाओ । न जाने कौन धन्य युवक उसका अधरपान करेगा !’
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पूर्वं प्रकरणत्रयं न्याख्याय क्रमेणोदाहरति-तत्रेत्यादिना । कचाकार्योमिति । वितर्कोऽत्सुक्येन, मति: स्मृत्या, शङ्का दैन्येन, धृति: श्रुततया च वाध्यते । पेतच्च द्वितीयोद्योतारम्भ पवोक्तमस्माभिः ।
इस भाँति तीनों प्रकारों की व्याख्या करके क्रमशः उदाहरण देते हैं—
‘वहाँ पर’ इत्यादि के द्वारा । ‘कहाँ तो अकाङ्क्ष’ यहाँ वितर्क औत्सुक्य से, मति स्मृति से, शङ्का दैन्य से और धृति श्रुतता से बाधित की जाती है । और यह हमने द्वितीय उद्योत के आरम्भ में ही कह दिया है ।
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है कि आठ वर्ष पूर्व इन्दुमती की मृत्यु हो चुकी है और प्रियतम के शोक में अज एक की तो मृत्यु हो चुकी है । अतः दूसरे को भी जीवितस्ववस्व होने का अधि-कारी कोई दिखलाई नहीं देता । अतएव अष्टम सर्ग का आजविलाप सर्वथा करुण-रसपरक ही है । उमी शोक से अभिमूर्छ होकर अज भी रोगग्रस्त हो जाते हैं और अन्त में व्याधि के अतिकृत्स्य हो जाने पर अपने प्राण तनुत्य कर अनशन करते हुए प्राणों का त्याग कर देते हैं । इस प्रकार यह सारा वर्णन विप्रलम्भशृङ्गारपरक न होकर करुणरसपरक ही है । किन्तु मरने के पहले लिखा गया है कि ‘यद्यपि अज का वह रोग वैद्यों से असाध्य तथा प्राणान्त में हेतु था
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तथापि प्रियतमा के पीछे जाने में शीघ्रता कराने के कारण अज ने उस रोग को लाभ ही समझा ।
इन शब्दों के द्वारा कालिदास ने मरण के द्वारा सम्भिलन की आशा प्रत्युज्जीवित कर दी है । इसके बाद ही अज की मृत्यु और उसके बाद प्रियतमा के सहवास की प्राप्ति का वर्णन किया गया है । प्रस्तुत प्रकरण यह है कि जहाँ दो में किसी एक की मृत्यु हो जाने पर आलम्बनविच्छेद हो जाने से रसविच्छेद की सम्भावना उत्पन्न हो जावे वहाँ प्रत्युज्जीवन के भी तत्काल दिखला दिये जाने पर रसविच्छेद नहीं होता ।
इस प्रकरण में रघुवंश का जो पद्य उदाहृत किया गया है वह ठीक नहीं बैठता । क्योंकि एक की मृत्यु तो बहुत पहिले हो चुकी है, यहाँ दूसरे की मृत्यु के बाद स्वर्ग में दोनों के पुनः समागम का वर्णन किया गया है । अतः करुण के बाद शृङ्गार के तत्त्व दिखलाए हैं । यहाँ पर आचार्य का अभिप्राय केवल इतना ही है कि मरण भी शृङ्गार का उपकरण हो सकता है । इसी का यह उदाहरण है, सम्पूर्ण प्रकरण का उदाहरण नहीं ।
इस प्रकरण का ठीक उदाहरण होगा कालिदास का महाश्वेतावलोकान्त । महाश्वेता कपिञ्जल की अभ्यर्थना पंर अपने प्रियतम पुण्डरीक से मिलने चलती हैं; पुण्डरीक का वियोगव्यथा से देहावसान हो चुका है ।
महाश्वेता का विप्रलम्भ भली-भाँति करुणरूपता धारण नहीं कर सका है कि इतने में ही चन्द्रमण्डल से एक व्यक्ति निकलकर पुण्डरीक के शव को उठा ले जाता है और आकाशवाणी हो जाती है कि महाश्वेता का पुण्डरीक से इसी शरीर में सम्भिलन होगा ।
इस आकाशवाणी के बाद विदेर्शगमन के समान पुनः सम्भिलन की आशा में विप्रलम्भ सुरक्षति रहता है ।
( कतिपय आचार्यों ने इस प्रकार को पुथक ही करुणविप्रलम्भ की संज्ञा प्रदान की है । ) मरण को शृङ्गार रस का अङ्ग बनाने के मन्तव्य से ही महाकवि कालिदास ने ऐसे किसी भी शब्द का प्रयोग नहीं किया जिससे मरण की स्पष्ट प्रतीति हो और शृङ्गार की बुद्धि का ही विच्छेद हो जावे ।
यहाँ पर मरण के लिए ‘देहन्यास’ शब्द का का उल्लेख इसीलिए किया गया है कि शृङ्गारानुकूल बुद्धि का व्यवच्छेद न होने पावे ।
यदि मरणपरक किसी ऐसे पदबन्ध का प्रयोग कर दिया जाता है जिससे बुद्धि का व्यवच्छेद हो जाने की सम्भावना हो तब चाहे कितना ही शीघ्र प्रत्युज्जीवन का वर्णन कर दिया जावे किन्तु शोक का उदय तो हो ही जाता है ।
यदि प्रत्युज्जीवन का बहुत समय बाद वर्णन किया जाता है तो बीच में शृङ्गार रस के प्रवाह का विच्छेद हो ही जाता है ।
अतः यदि कवि प्रधान रूप में शृङ्गाररस बन्ध के लिये प्रवृत्त हुआ हो तो उसे ऐसे इतिवृत्त का परित्याग ही करना चाहिए जिससे
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श्रृंगार रस की भावना के विच्छिन्न होने की सम्भावना हो। यहाँ पर प्रवाह-विच्छेद न होने देने का आशय यही है कि कवि को किसी ऐसे शब्द का प्रयोग नहीं करना चाहिए जिससे प्रसज्जागत रसबुद्धि विच्छिन्न हो जावे। कुछ लोगों ने अद्दीर्घकाल प्रत्यापत्ति इत्यादि ग्रन्थों को व्याख्या इसे प्रकार की है—'मरण की प्रत्यापत्ति में जहाँ शीघ्र ही प्रत्युज्जीवन की सम्भावना होती है वहाँ मरण श्रृंगार का अङ्ग बन जाता है और यह शीघ्र ही प्रस्तुज्जीवन की सम्भावना सामाजीक की दृष्टि से होती है। सहृदय सामाजीक दूर की बात को समझ लेता है। अतः वर्णन इस प्रकार का होना चाहिए कि सहृदय सामाजीक की श्रृंगार रसानुकूल बुद्धि में विच्छेद न होने पावे और उसे मरण के बाद शीघ्र ही पुनरुज्जीवन की सम्भावना अवभासित हो जावे।'
किन्तु यह व्याख्या ठीक नहीं है तापसवत्सराज में यौगन्धरायण के नीतिमार्ग को सहृदय पाठक सुनते ही हैं और पाठकों की बुद्धि उससे संस्कृत हो ही जाती है। अतः पाठकों की यह शङ्का ही रहती है कि अभिज्ञान-शाकुन्तल की दुष्यन्त मरी नहीं है—राजा मिथ्या प्रचार पर विश्वास करने के कारण भ्रम में है। अतः वहाँ पर करुण का नाम भी नहीं होगा। किन्तु पाठक करुण रस का आस्वादान्तर वस्तु के विस्तार की क्या आवश्यकता? अतः यहाँ पर निष्कर्ष यह निकलता है कि जहाँ ऐसे शब्दों का प्रयोग कर दिया जाता है जिनसे बुद्धि-विच्छेद हो सके तब बुद्धिविच्छेद हो जाता है और जब ऐसे शब्दों का प्रयोग नहीं किया जाता तब बुद्धिविच्छेद नहीं होता। अतः दीर्घकाळता कवि की वाणी पर आघारित होती है समय पर नहीं।
इस प्रकार इस बात की व्याख्या की जो चुकि कि जो रस या रसाङ्ग विरोधी रस में भी होते हैं और प्रकृत रस के परिपोषक हो सकते हैं उनको किसी प्रकार प्रकृत रस का अङ्ग बनाया जाता है। दूसरे प्रकार के वे रस या रसाङ्ग होते हैं जो प्रकृत रस में कबहूँ आते ही नहीं। वे सर्वदा प्रकृत रस के विरोधी ही होते हैं। उनको भी कवि अपनी वाणी की कुशलता से प्रकृत रस का अङ्ग बना देता है। इस विषय में कुछ अधिक कहना नहीं है। जो कुछ स्वाभाविक रसाङ्गों की अंगता के विषय में कहा गया है उसके विपरीत सर्वथा विरुद्ध रसाङ्गों के विषय में समझना चाहिए।
(स्वाभाविक रसाङ्गों के विषय में कहा गया था कि वे प्रकृत रस के अङ्ग होकर ही उसका पोषण करते हैं। इसके विपरीत आरोपित रसाङ्गों के विषय में कहा जा सकता है कि वे विरोधी रस के रसाङ्ग होकर ही प्रकृत रस का परिपोष करते हैं।) इस प्रकार किसी विरोधी रस या रसाङ्ग के प्रकृत रस के पोषक होने के तीन रूप हो सकते हैं—
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यथा वा पुण्डरीकस्य महाश्वेतां प्रति प्रवृत्तिनिर्मेरानुरागस्य द्वितीयमुनिकुमारोपदेशवर्णने ।
(अनु०) अथवा जैसे महाश्वेता के प्रति निर्भर अनुराग के प्रारम्भ होने पर पुण्डरीक के लिये दूसरे मुनिकुमार के उपदेशवर्णन में ।
द्वितीयेति । विपक्षीभूतवैराग्यविमाव्याध्यवधारणेडपि न रसस्यविरहेदत्वे न दाक्ष्यमेवानुरागस्योक्कं भवतीति भावः ।
'द्वितीय' यह । भाव यह है कि त्रिपत्न रूप में स्थित वैराग्य के विभाव इत्यादि के अवधारण में भी विच्छेद के अशक्य होने से अनुराग की दृढ़ता ही कही हुई होती है ।
तारावती
कर दिया जावे, ( २ ) यद्यपि कोई तत्त्व विरोधी रस में भी सम्भव हो और प्रकृत रस में भी सम्भव हो तो उस तत्त्व का विरोधी के अंग के रूप में उपादान न कर प्रकृत रस के अंग के रूप में ही उपादान किया जावे और ( ३ ) सर्वथा विरोधी रस-तत्त्व का प्रकृत रस पर आरोपकर उसे प्रकृत रस का अंग बना दिया जावे । अन्यत्र इन तीनों के उदाहरण दिये जा रहे हैं ।
उक्त तीनों रूपों के साथ यह शर्ते अनिवार्य है कि प्रकृत रस का पूर्ण परिपाक हो जाना चाहिए । तभी वह या तो दूसरे रस का बाध करता है या उसे अपना अंग बनाता है । ( १ ) जब विरोधी रस बाध्य रूप में निवद्ध किया जाता है उसका उदाहरण जैसे 'काकायं शशलक्षणः......' इत्यादि पद्य जो कि द्वितीय उद्योत में भावशवलता के उदाहरण के रूप में लोचन में उद्धृत किया जा चुका है
और वहीं उसकी व्याख्या भी की जा चुकी है । वहाँ पर प्रकृत रस शृंगार है । उसके व्यभिचारी भाव औत्सुक्य, स्मृति, दैन्य तथा चिन्ता की अभिव्यक्ति होती है । साथ ही शृंगार के विरोधी शान्त रस के व्यभिचारी वितर्क, मति, शङ्का, और धृति की भी अभिव्यक्ति होती है । वितर्क का बाध औत्सुक्य द्वारा होता है । इसी प्रकार मति का स्मृति के द्वारा, शङ्का का दैन्य के द्वारा और धृति का चिन्ता के द्वारा बाध हो जाता है । पर्यवसान में चिन्ता में ही विश्रान्ति होनी है । इस प्रकार शृंगार रस का पूर्ण परिपाक हो जाता है । विरोधी रस के व्यभिचारी वितर्क इत्यादि का सर्वथा बाध हो जाता है । अतः (विजित चित्त के सन्नान ) वे व्यभिचारी (विजिता) शङ्कार को पुष्ट ही करते हैं ।
अथवा दूसरा उदाहरण जैसे कादम्बरी में अच्छोद सरोवर के निकट महाश्वेता को पुण्डरीक का प्रथम दर्शन
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स्वाभाविक्यामज्ञभावप्राप्तावदोषो यथा-- अ्रमिमरतिमलसहृदयतां प्रलयं मूर्छ्छां तमः शरीररसादम् । मरणं च जलदशुगजं प्रसह्य कुरुत इविं वियोगिनीनाम् ॥
स्वाभाविक अज्ञान की प्राप्ति में अदोष जैसे— अग्नि, रति, मलिनता, हृदयता, प्रलय, मूर्छा, तम, शरीर का अवसाद । मरण को भी जल रूपी गरुड़ जैसे वियोगिनियों के लिए चक्ररारति आलस्य पूर्ण हृदयता चेतना ज्ञान का अभाव मूर्छा अंधकार मोह शरीर का अवसाद और मरण उत्पन्न करता है ।
लोचन समारोपितायामिति । अज्ञभावप्राप्ताविति भावः । पाण्डुक्षामं वक्त्रं हृदयं सरसं तवासं च कपुः । आवेदयति नितान्तं चेट्रियारोगं सखि हृदन्ततः ॥ अज्ञ करुणोचितो व्याधिः श्लेषभड्ग्या स्थापितः । कोपादिति बढ्वेति हन्यत इति रौद्रानुसावानां रूपकबालदारोपितानां तदनिवृत्तिहादेवाङ्गितम् । तच्च पूर्वमेवोक्तं 'नाति-निवृंहणेष्टिता' इत्यत्रान्तरे । समारोपिता में । 'अंगभाव प्राप्ति में' इतना शेष है । 'हे सखि तुम्हारा पीला और क्षीण मुख सरस हृदय और अलस शरीर तुम्हारे हृदय के अंदर असाध्य रोग की सूचना देते हैं ।' यहाँ करुण के योग्य व्याधि श्लेष की भंगिमा से स्थापित की गई है । 'कोप से' यह 'बाँधकर' यह और 'मारा जाता है' यह इन रूपकों के बल पर आरोपित भावों का रूपक के निर्वहण करने से अंगत्व हो जाता है । वह पहले ही कहा गया है 'अत्यन्त निर्वहण की इच्छा न होना' इसके बीच में ।
तारावती हो गया और पुण्डरीक ने सुगन्धित मञ्जरी तथा महाश्वेता ने एकावली एक दूसरे को प्रणय-निवेदन के संकेत के रूप में प्रदान कर दी । यहाँ से परस्पर सहृदय सर्वस्वाभिमान रूप रति दोनों के हृदयों में जागृत हो गई । पुण्डरीक की विरह-वेदना के अपनोदन के मन्तव्य से उसके सहचर कपिञ्जल ने वैराग्य का उपदेश दिया । वह वैराग्य का उपदेश शृङ्गार के प्रसंग में आया था । यह विरोधी रस
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तारावती
का समावेश था। किन्तु उस विरोधी रस का बाधकर श्रृंगार ही प्रमुख वन गया और वह विरोधी रस ( शान्त ) श्रृंगार के परिपोषक के रूप में ही परिणत हो गया। शान्त रस की श्रृंगार-परिपोषक के रूप में परिणति इस प्रकार हुई कि उससे यह सिद्ध हो गया कि यद्यपि विरोधी वैराग्य के विभाव इत्यादि का अवगाहन किया गया तथापि अनुराग इतना दृढ़ था कि वैराग्य की कथाओं से भी उसका उद्घम नहीं हो सका। इस प्रकार अनुराग की दृढ़ता को सिद्ध करना ही शान्त रस के उपादान का प्रयोजन है। अतः यहाँ पर शान्त का श्रृंगार में समावेश दोष अपितु गुण ही है।
( २ ) स्वाभाविक रूप में अंगभाव प्राप्ति में दोष न होने का उदाहरण जैसे—
'जलदरूपो भुजंगम से उद्दूत विष ( जल और गरल ) वियोगिनियों के लिये वलात् चक्कर, अरति, हृदय में आलस्य, चेष्टाशून्यता, अन्धकार, शरीर का टूटना और मरण उत्पन्न कर रहा है।' उद्दोमान होने के कारण वर्षा का जल वियोगिनियों के लिये सर्प-विष जैसा हो है। जल की वर्षा करनेवाले काले बादल काले सापों के समान हैं।विष शब्द के दो अर्थ हैं हो जल और गरल । अतः बादलों से छोड़ा हुआ जल सर्पों से छोड़े हुये विष के समान है। जिस प्रकार सर्पों के विष के प्रभाव से चक्कर आने लगते हैं, संसार की सारी वस्तुयें अच्छी नहीं लगतीं, शरीर ढीला पड़ जाता है, चेष्टा शक्ति जाती रहती है, मूर्छा आने लगती है, शरीर टूटने लगता है, आँखों के सामने अंधेरा छा जाता है। यहाँ सब बातें वर्षा में वियोगिनियों के लिये होतीं हैं। यहाँ पर प्रस्तुत रस है विप्रलम्भ श्रृंगार। उसके विरोधी करुण के अंगभवम इत्यादि हैं। किन्तु ये भ्रमि इत्यादि विप्रलम्भ के भी स्वाभाविक रूप में अङ्ग बनने की क्षमता रखते हैं। अत एवं कवि ने इसको स्वाभाविक रूप में ही विप्रलम्भ का अङ्ग बना दिया है।
( ३ ) तीसरा प्रकार है ऐसे विरोधियों का प्रकृत पर आरोपकर उनको अंग-रूपता प्रदान करना जो स्वाभाविक रूप में अङ्ग नहीं वन सकते। इसका उदाहरण—
हे सखि ! तुम्हारा मुख पीला तथा क्षीण पड़ गया है; हृदय सरसता से भरा हुआ है और शरीर आलस्य से परिपूर्ण है, ये सब बातें बतलातीं हैं कि तुम्हारे हृदय के अन्दर ऐसा रोग घुस गया है जिसकी चिकित्सा दूसरे ही शरीर में सम्भव है। यहाँ पर रोग का अन्तःकरण में प्रविष्ट हो जाना, मुख का पीला पड़ जाना इत्यादि विरोधी रस करुण के अंग है और अर्थ इलेष की भागिनि से अर्थात् ऐसे अनुभवों से जो उभयनिष्ठ सम्भव हैं इनका आरोप श्रृंगार पर किया गया है। आरोप
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इयं चाङ्गभावप्राप्तिरन्या यद्राधिकरिकत्वात् प्रधान एकस्मिन् वाक्यार्थे रस-योर्भावयोरेवां परस्परविराधिनोर्द्रैरङ्गभावगमनं तस्यासपि न दोषः । यथोक्तम्-'क्षितो हस्तावलम्ब:' इत्यादौ । कथम् ? तत्राविरोध इति चेत्-ड्ययोरपि तयोरन्य-परत्वेन व्यवस्थानेन । अन्यपरत्वेऽपि विरोधिनोः कथं विरोधानुद्भवोत्तरत्वात् चेत्-उच्यते । विधौ विरुद्धसमावेशस्य दुष्टत्वं नातुवादे ।
इस प्रकार प्रधान एक वाक्यार्थ में परस्पर विराधी दो रसों अथवा भावों की अङ्गभावप्राप्ति दूसरी है । क्योंकि उन दोनों को अन्यपरक के रूप में ही व्यवस्थित किया जाता है । यदि कहो अन्यपरक होने पर भी विरोधियों की विरोधनिवृत्ति किस प्रकार होती है तो कहते हैं कि विधान में ही विरुद्धों का समावेश दुष्ट होता है अनुवाद में नहीं ।
(अनु०) और यह अङ्गभावप्राप्ति दूसरी है जो कि आधिकारिक होने से किसी एक प्रधान वाक्यार्थ में परस्पर विरोधी दो रसों या दो भावों की अङ्गभावप्राप्ति हो जाती है उसमें भी दोष नहीं होता । जैसाकि कहा गया है-‘क्षितो हस्तावलम्ब:' इत्यादि में । यदि कहो कि वहाँ अविरोध कैसे होता है तो ( इसका उत्तर यह है कि ) क्योंकि उन दोनों को अन्यपरक के रूप में ही व्यवस्थित किया जाता है । यदि कहो अन्यपरक होने पर भी विरोधियों की विरोधनिवृत्ति किस प्रकार होती है तो उस पर कहते हैं-विरुद्धों का समावेश विधि में दुष्ट होता है अनुवाद में नहीं ।
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( यह उदाहरण काव्यप्रकाश में भी आया है । काव्यप्रकाशकार ने लिखा है कि चेष्टा का पोषण इत्यादि करुण के ही अंग ( अनुभाव ) नहीं होते अपितु शृङ्गार के भी अंग हो सकते हैं । अतः इनका कथन विरुद्ध नहीं माना जा सकता । काव्यप्रकाशकार का यह मत समीचीन ही प्रतीत होता है क्योंकि भरत ने भी व्यभिचारी भावों को केवल करुण का ही नहीं अपितु शृङ्गार का भी अंग माना जाता है । सम्भवतः इसी अरुचि के कारण ध्वनिकार ने दूसरा उदाहरण दिया है । ) दूसरा उदाहरण जैसे-‘कोपात्कोमललोलवाहुलतिका' इत्यादि ।
यह उदाहरण काव्यप्रकाश में भी आया है । काव्यप्रकाशकार ने लिखा है कि चेष्टा का पोषण इत्यादि करुण के ही अंग ( अनुभाव ) नहीं होते अपितु शृङ्गार के भी अंग हो सकते हैं । अतः इनका कथन विरुद्ध नहीं माना जा सकता । काव्यप्रकाशकार का यह मत समीचीन ही प्रतीत होता है क्योंकि भरत ने भी व्यभिचारी भावों को केवल करुण का ही नहीं अपितु शृङ्गार का भी अंग माना जाता है । सम्भवतः इसी अरुचि के कारण ध्वनिकार ने दूसरा उदाहरण दिया है । दूसरा उदाहरण जैसे-‘कोपात्कोमललोलवाहुलतिका' इत्यादि ।
यह उदाहरण काव्यप्रकाश में भी आया है । काव्यप्रकाशकार ने लिखा है कि चेष्टा का पोषण इत्यादि करुण के ही अंग ( अनुभाव ) नहीं होते अपितु शृङ्गार के भी अंग हो सकते हैं । अतः इनका कथन विरुद्ध नहीं माना जा सकता । काव्यप्रकाशकार का यह मत समीचीन ही प्रतीत होता है क्योंकि भरत ने भी व्यभिचारी भावों को केवल करुण का ही नहीं अपितु शृङ्गार का भी अंग माना जाता है । सम्भवतः इसी अरुचि के कारण ध्वनिकार ने दूसरा उदाहरण दिया है । दूसरा उदाहरण जैसे-‘कोपात्कोमललोलवाहुलतिका' इत्यादि ।
इस पद्य की विस्तृत व्याख्या पहले की जा चुकी है । वहाँ पर यह कहा गया था कि वही अलङ्कार रस का पोषक होता है जिसके निर्वहण की इच्छा ह्रदय में न हो रही हो । इसी मान्यता के उदाहरण के रूप में प्रस्तुत पद्य को उद्धृत किया गया था यहाँ पर इसको उद्धृत करने का आशय यह है कि ‘कोप से' ‘बाँध कर' और ‘मारा जाता है' ये ऐसे तत्व हैं जो शृङ्गार में नहीं अपितु उसके विरोधी रौद्र में ही सम्भव हैं । इसमें वाहुलतिका पर बन्धनपाशों का आरोप किया गया है किन्तु बधू इत्यादि पर व्याध इत्यादि का आरोप नहीं किया गया । रूपक के अनिर्व्यूढ रहने से रौद्र का पूर्ण परिपाक नहीं हो सका है । इसके प्रतिकूल प्रकृत शृङ्गार का पूरा परिपाक हो गया है । इसीलिये शृङ्गार का अंग होकर ही रूपक आया है और रूपक के बल पर विरोधी का प्रकट पर आरोप करने का यह ठीक उदाहरण है ।
इस पद्य की विस्तृत व्याख्या पहले की जा चुकी है । वहाँ पर यह कहा गया था कि वही अलङ्कार रस का पोषक होता है जिसके निर्वहण की इच्छा ह्रदय में न हो रही हो । इसी मान्यता के उदाहरण के रूप में प्रस्तुत पद्य को उद्धृत किया गया था यहाँ पर इसको उद्धृत करने का आशय यह है कि ‘कोप से' ‘बाँध कर' और ‘मारा जाता है' ये ऐसे तत्व हैं जो शृङ्गार में नहीं अपितु उसके विरोधी रौद्र में ही सम्भव हैं । इसमें वाहुलतिका पर बन्धनपाशों का आरोप किया गया है किन्तु बधू इत्यादि पर व्याध इत्यादि का आरोप नहीं किया गया । रूपक के अनिर्व्यूढ रहने से रौद्र का पूर्ण परिपाक नहीं हो सका है । इसके प्रतिकूल प्रकृत शृङ्गार का पूरा परिपाक हो गया है । इसीलिये शृङ्गार का अंग होकर ही रूपक आया है और रूपक के बल पर विरोधी का प्रकट पर आरोप करने का यह ठीक उदाहरण है ।
इस पद्य की विस्तृत व्याख्या पहले की जा चुकी है । वहाँ पर यह कहा गया था कि वही अलङ्कार रस का पोषक होता है जिसके निर्वहण की इच्छा ह्रदय में न हो रही हो । इसी मान्यता के उदाहरण के रूप में प्रस्तुत पद्य को उद्धृत किया गया था यहाँ पर इसको उद्धृत करने का आशय यह है कि ‘कोप से' ‘बाँध कर' और ‘मारा जाता है' ये ऐसे तत्व हैं जो शृङ्गार में नहीं अपितु उसके विरोधी रौद्र में ही सम्भव हैं । इसमें वाहुलतिका पर बन्धनपाशों का आरोप किया गया है किन्तु बधू इत्यादि पर व्याध इत्यादि का आरोप नहीं किया गया । रूपक के अनिर्व्यूढ रहने से रौद्र का पूर्ण परिपाक नहीं हो सका है । इसके प्रतिकूल प्रकृत शृङ्गार का पूरा परिपाक हो गया है । इसीलिये शृङ्गार का अंग होकर ही रूपक आया है और रूपक के बल पर विरोधी का प्रकट पर आरोप करने का यह ठीक उदाहरण है ।
ऊपर उन तीन प्रकारों का वर्णन किया जा चुका जिनमें एक विरोधी रस दूसरे प्रकृत रस का अङ्ग हो सकता है और उस विरोधी का प्रकृत के साथ सङ्घि-
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अन्येति । चतुर्थोंदयं प्रकार इत्यर्थः । पूर्वं हि विरोधिनः प्रस्तुतरसान्तरे डङ्कृतोन्ना, अङ्गुना तु द्वयोविरोधिनोश्च्वनतरेडङ्गभाव इति शेषः । क्षित इति । व्याख्यातमेतन्न-‘प्रधानेडन्यत्र वाक्यार्थे’ इत्यत्र । नन्वन्यपरत्वेडपि स्वभावो न निवर्त्तते, स्वभावकृत विरोधश्च विरोऽपि डङ्ग्यभिप्रायेणाह—अन्यपरत्वेडपि ति विरोधिनोरिति । तत्वभावयो-रिति हेतुत्वाभिप्रायेण विशेषणम् । उच्यत इति । अयं भावः—सामग्रीविशेषपत्तितत्वेन भावानां विरोधाविरोधौ न स्वभावमात्रनिवर्ह्यनौ शीतोष्णयोरपि विरोधाभावात् । विधाभिति । तदेव कुरु मा कार्षीरिति यथा । विधिशब्देनात्रैकदा प्राधान्यमुच्यते । अत एवातिरात्रे प्रोङ्कशिनं गृह्लान्ति न गृह्लन्तीति विरुद्धविधिविकल्पपर्यवसायीति वाक्य-विदः । अनुवाद इति । अङ्गतायामित्यर्थः ।
अन्येति । यह चौथा प्रकार है । पहले निष्पदेह विरोधी को प्रस्तुत करके दूसरी वस्तु में अंगभाव बतलाया जा रहा है' यह शेष है । 'क्षित' यह । इसकी व्याख्या 'प्रधानेडन्यत्र वाक्यार्थे' इत्यादि । 'अन्यपरत्व में भी' यहाँ । इस कारिका में तो बात चुकी है । अन्यपरत्व में भी स्वभाव निह्न नहीं होता और विरोध स्वभावकृत ही होता है' इस अभिप्राय से प्रश्न करके कहते हैं—‘अन्यपरत्व में भी' इत्यादि । 'विरोधियों का' यह । विरुद्ध स्वभाववालों का इस हेतुत्व के अभिप्राय से विशेषण है । 'कहा जा रहा है' यह । भाव यह है कि विशेष सामग्री में पड़े हुये भावों का ही विरोध या अविरोध होता है; केवल स्वभाव के ही आधीन नहीं होता । क्योंकि शीत और उष्ण का भी विरोध नहीं होता । 'विधि' में यह । जैसे 'वही करो' 'मत करो' इसमे । विधि शब्द से यहाँ पर एक-समय प्राधान्यता कही जा रही है अतएव अतिरात्र में प्रोङ्कशी को ग्रहण करते हैं नहीं ग्रहण करते हैं यह विरुद्धविधि विकल्प में पर्यवसित होती है यह वाक्यज्ञों का मत है । 'अनुवाद में यह' । अर्थात अंगता में ।
तारावतीचेश दूषित नहीं माना जाता । इनके अतिरिक्त एक चौथा प्रकार और होता है । पूर्वोक्त तीन प्रकारों से इस चौथे प्रकार में भेद यह होता है कि पूर्वोक्त तीन प्रकारों में विरोधी रस प्रकृत का पोषक किस प्रकार होता है यह दिखलाया गया है । इस चौथे प्रकार में यह दिखलाया जा रहा है कि दो परस्पर विरोधी रस प्रकृत रस में सन्निविष्ट किस प्रकार होते हैं । वह प्रकार यह है कि यदि आधिकारिक होने के कारण एक वाक्यार्थ ( रस ) प्रधान हो और परस्पर विरोधी दो रस या भाव उस वाक्यार्थ के अंग होने से उन दोनों के अङ्गरूपता धारण करने से एक आधिकारिक को ही पुष्टि कर रहे हों तो उन दोनों में भी कोई दोष नहीं होता । आशय यह है कि विरोधमूलकदोष तो तभी हो
तारावतीचेश दूषित नहीं माना जाता । इनके अतिरिक्त एक चौथा प्रकार और होता है । पूर्वोक्त तीन प्रकारों से इस चौथे प्रकार में भेद यह होता है कि पूर्वोक्त तीन प्रकारों में विरोधी रस प्रकृत का पोषक किस प्रकार होता है यह दिखलाया गया है । इस चौथे प्रकार में यह दिखलाया जा रहा है कि दो परस्पर विरोधी रस प्रकृत रस में सन्निविष्ट किस प्रकार होते हैं । वह प्रकार यह है कि यदि आधिकारिक होने के कारण एक वाक्यार्थ ( रस ) प्रधान हो और परस्पर विरोधी दो रस या भाव उस वाक्यार्थ के अंग होने से उन दोनों के अङ्गरूपता धारण करने से एक आधिकारिक को ही पुष्टि कर रहे हों तो उन दोनों में भी कोई दोष नहीं होता । आशय यह है कि विरोधमूलकदोष तो तभी हो
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सक्ता है जब दो विरोधी परस्पर संवद्ध हों। जहाँ विरोधियों का परस्पर सम्बन्ध ही नहीं होता, उनमें प्रत्येक किसी दूसरे को पुष्ट करता है वहाँ न तो उनका विरोध ही होता है और न विरोधमूलक दोष ही वहाँ पर होता है। जब दोनों पृथक् प्रस्तुत रस का परिपोषण कर देते हैं फिर यदि वे संवद्ध भी होते हैं तो भी उनका विरोध अकिञ्चित्कर होता है। यह तो हो ही सकता है कि दो विरोधी राजा किसी तीसरे अपने से बड़े राजा के हितसाधक हों। उदाहरण के लिये ‘क्षीरो हस्तावलम्बम्’ इत्यादि अमरसुक के पद्य को लीजिये! इसकी व्याख्या ‘प्रधानेदन्यत्र वाक्यार्थे—’ इस कारिका में की जा चुकी है। यहाँ पर प्रधानीभूत वाक्यार्थ है—त्रिपुरारि का प्रभावातिशय और उसके अङ्ग हैं करुण तथा श्रृङ्गार। ये दोनों परस्पर विरोधी रस हैं किन्तु दोनों ही भगवान् शङ्कर के प्रभाव की अधिकता को ख्यापित करने में सहयोग देते हैं अतः दोनों का परस्पर समावेश दूषित नहीं माना जा सकता। यहाँ पर यह प्रश्न किया जा सकता है कि जो सर्वथा विरोधी होते हैं उनके विरोध की निवृत्ति हो ही किस प्रकार सकती है? इसका उत्तर यह है कि उस स्थल पर विरोधी रस स्वतन्त्र नहीं होते अतः वे अपने विरोध का निर्वाह भी नहीं कर सकते। वे अन्यपरक होते हैं और स्वयं विरोधी होते हुये भी विरोध का पालन नहीं कर सकते और दोनों ही स्वामी का कार्य वनाते ही हैं। इस पर यह पूछा जा सकता है कि विरोधी अनुचर अपने स्वामी का ही कार्य बनाते हैं, स्वयं तो नहीं बन जाते। अन्यपरक होते हुये भी किसी का स्वभाव तो कहीं नहीं चला जाता। विरोध में कारण तो स्वभाव ही होता है। ऐसी दशा में उनकी विरोधनिवृत्ति की बात करना कैसे सङ्गत हो सकता है? यहाँ पर मूल में जो ‘विरोधिनोः’ यह विशेषण दिया गया है उसका अर्थ है विरोधी स्वभाववाला होना। यह विशेषण हेतुगर्भित है। अर्थात् क्योंकि उनका स्वभाव ही विरोध रखना है फिर वे अन्यपरक होकर भी विरोध का परित्याग कैसे कर सकते हैं? इसका उत्तर यह है कि विधि में विरोधी का समावेश दूषित होता है, अनुवाद में नहीं। इसे इस प्रकार समझिये यह समझना ठीक नहीं है कि दो विरोधियों के विरोध का आधार केवल स्वभाव ही होता। है। दो वस्तुओं का विरोध या अविरोध स्वभाव के आधार पर भी होता है और विशेष प्रकार की सामग्री में पड़ना भी उनके विरोध या अविरोध का आधार होता है। उदाहरण के लिये शीतस्पर्श और उष्णस्पर्श में परस्पर विरोध है। यह स्वाभाविक विरोध इस रूप में होता है कि शीतस्पर्श और उष्णस्पर्श दोनों एक अधिकरण में नहीं रह सकते। इसी प्रकार शीतस्पर्श या उष्णस्पर्श द्रव्यत्व के साथ या रूप इत्यादि गुणों के साथ एक अधिकरण में रह सकता है। यह उनका
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स्वाभाविक अविरोध है। इसी प्रकार शीतस्पर्शों से उत्पन्न होनेवाले द्रव्य में उष्णस्पर्श की उत्पत्ति प्रतिबद्ध हो जाती है यह उनका द्रव्यविशेष में सन्निविष्ट होने से विरोध का उदाहरण है।
इसी प्रकार शीतस्पर्शों और उष्णस्पर्शों का सामर्थ्यविशेषजन्य अविरोध वहाँ पर हो सकता है जो द्रव्य शीत तथा उष्ण दोनों प्रकार के उपकरणों से बनाया जाता हो। आशय यही है कि भावों का विरोध या अविरोध सामग्रीविशेष से संयुक्त होने के कारण होता है, शीत और उष्ण के समान केवल स्वभाव से ही उनका विरोध या अविरोध नहीं होता। वाक्य में दो भाग होते हैं—एक तो ज्ञात तत्व जिनके विषय में कोई बात कही जाती है, उसे वाक्य का उद्देश्य अथवा अनुवाद भाग कहते हैं। दूसरा अंग होता है अज्ञात अंग जो कि बतलाया जाता है, उसे विधि अंग अथवा विधेय अंग कहते हैं। विधेय में विरोधियों का उपादेश दूषित होता है उदाहरण में नहीं। क्योंकि दो विरोधी कार्य एक साथ किये ही नहीं जा सकते किन्तु दो विरोधियों से सम्बन्ध रखनेवाली कोई अन्य कार्य ही हो तो किआ ही जा सकता है। उदाहरण के लिये—'यह कार्य करो' 'मत करो' इन दो विरोधी आदेशों का पालन नहीं किया जा सकता क्योंकि इन दोनों में विधेय में ही विरोध है।
किन्तु विधेय में विरोध के विषय में इतना और समझ लेना चाहिये कि विरोधी विधेयों का समावेश वहीं पर दूषित होता है जहाँ एक ही स्थान पर एक हो समय में दो विरोधियों की प्रधानता बतलाई जाती है। यदि कहीं शास्त्र में इस प्रकार के परस्पर विरुद्ध तत्वों का एक साथ विधान होता है तो उनका एक ही में समावेश नहीं हो सकता अपितु उनका पर्यवसान विकल्प में होता है। उदाहरण के लिये ज्योतिष्टोम यज्ञ का विधान स्वर्ग के उद्देश्य से किया गया है। ज्योतिष्टोम में १२ स्तोत्र आते हैं। इन स्तोत्रों का विभिन्न क्रम से गान किया जाता है। अन्त में जो स्तोत्र आता है उसी के आधार पर ज्योतिष्टोम का भेद किया जाता है। इस भाँति ज्योतिष्टोम चार प्रकार का हो जाता है—अग्निष्टोम, उक्थ्य, पोड़शी और अतिरात्र। ज्योतिष्टोम यज्ञों में सोम को रखने लिये जिस पात्र को काम में लाया जाता है उसे 'पोड़शी' कहते हैं।
ज्योतिष्टोम के प्रकरण में लिखा हुआ है कि—'अतिरात्र ( नामक ज्योतिष्टोम के प्रकार ) में पोड़शी की ग्रहण करता है।' फिर लिखा है कि—'अतिरात्र में पोड़शी को ग्रहण नहीं करता है।' इस प्रकार अतिरात्र के विषय में दो विरुद्ध विधान पाये जाते हैं। शास्त्र-विधि व्यर्थ तो हो ही नहीं सकती। अतः दोनों की चरितार्थता के लिये विकल्प में अर्थ का पर्यवसान हो जाता है। दोनों को एक साथ मेद नहीं हो सकते। अतः विकल्पपरक अर्थ हो जाता है। दोनों को एक साथ करना पड़ता है। आशय यह है कि अतिरात्र में पोड़शी को ग्रहण न करने का
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एतद् गच्छ पतोत्तिष्ठ घद् मौनं समाचर । एवंमाश्रयमुपस्थैः क्रीडन्ति ध्वनिनोर्ध्वर्थिभिः ॥
यथा—— एतद् गच्छ पतोत्तिष्ठ घद् मौनं समाचर । एवंमाश्रयमुपस्थैः क्रीडन्ति ध्वनिनोर्ध्वर्थिभिः ॥
इत्यादौ । अत्र हि विधिप्रतिषेधयोरनूद्यमानत्वेन समाश्रये न विरोध्यस्त्व- द्वापि भविष्यति । श्लोके हासिमन्नोध्वर्थियाविप्रलम्भशृङ्गारकरुणवस्तुनोर् विधोयमानत्वम् । तिपुररिपुप्रभावातिशयस्य वाक्यार्थस्वातातदङ्कत्वेन च तयोर्व्यवस्थानात् । (अनु०) जैसे—‘आओ, जाओ, गिरो, उठो, कहो, चुप रहो इस प्रकार आशारूपी ग्रह से ग्रस्त याचकों के साथ धनी लोग क्रिडा करते हैं ।’ इत्यादि में । यहाँ निस्सन्देह विधि और निषेध के अनुवादरूप होने के कारण विरोध नहीं है उसी प्रकार यहाँ पर भी हो जावेगा । निस्सन्देह इस श्लोक में ईर्ष्याविप्रलम्भ और करुण इन दो वस्तुओं का विधीयमानत्व नहीं है । क्योंकि त्रिपुरारि के प्रभावातिशय के वाक्यार्थ होने के कारण उसके अङ्ग के रूप में उन दोनों की व्यवस्था होती है ।
क्रीडाङ्कवेन हि विरुद्धानामर्थानामसिधानमिति राजनिकरङ्यवस्थिताततायी-द्वयन्यायेन विरुद्धानामप्यन्यमुखप्रेक्षितापरतन्रीकृतानां श्रौतेन क्रमेण स्वात्मपरामर्शे-प्यचिराम्यताम्, का कथा परस्परुपचिन्तितायां येन विरोधः स्यात् । केवलं विरुद्धत्वाद्रुणाभिकरणस्थितया यो वाक्यीय एषां पाश्र्वात्यः सम्बन्धः सम्भाव्यते स विघटताम् ।
क्रीडाङ्कवेन हि विरुद्धानामर्थानामसिधानमिति राजनिकरङ्यवस्थिताततायी-द्वयन्यायेन विरुद्धानामप्यन्यमुखप्रेक्षितापरतन्रीकृतानां श्रौतेन क्रमेण स्वात्मपरामर्शे-प्यचिराम्यताम्, का कथा परस्परुपचिन्तितायां येन विरोधः स्यात् । केवलं विरुद्धत्वाद्रुणाभिकरणस्थितया यो वाक्यीय एषां पाश्र्वात्यः सम्बन्धः सम्भाव्यते स विघटताम् ।
यहाँ पर निस्सन्देह क्रिडा के अङ्ग के रूप में विरुद्ध भी अर्थों का अभिधान किया गया है इस प्रकार राजा के निकट बैठे हुये दो आततायियों के न्याय से विरुद्ध भी अन्यमुखप्रेक्षी होने के कारण परतन्त्र किये हुये श्रुतिक्रम से अपने परामर्शो में भी विश्राम ना पानेवाले (तत्वों का क्रिडा में अङ्ग के रूप में अन्वय होता है । ) परस्पर रूप चिन्तित के विषय में तो कहना ही क्या जिससे विरोध हो । विरुद्ध होने के कारण केवल करणाधिकरणस्थिति से जो इसके बाद वाक्यीय सम्बन्ध की सम्भावना की जाती है वह विघटित हो जावेगी ।
दोषो न भवति । यतः न ग्रहण करने की विधि भी मौजूद है । इस प्रकार विधेय में दो विरोधियों की समान कोटि की प्रधनता दूषित होती है । ऊपर विधेय में दो विरोधियों के समावेश में सदोषता का परिचय दिया गया है । अब उद्देष्ट में विरोधियों के समावेश में दोष नहीं होता यह बतलाया जा रहा है । निम्नलिखित उदाहरण लीजिये—
तारावती दोषो न भवति । यतः न ग्रहण करने की विधि भी मौजूद है । इस प्रकार विधेय में दो विरोधियों की समान कोटि की प्रधनता दूषित होती है । ऊपर विधेय में दो विरोधियों के समावेश में सदोषता का परिचय दिया गया है । अब उद्देष्ट में विरोधियों के समावेश में दोष नहीं होता यह बतलाया जा रहा है । निम्नलिखित उदाहरण लीजिये—
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लोकारावती
'आशा रूपी ग्रह से ग्रस्त याचकों से धनी लोग इस प्रकार क्रिड़ा करते हैं कि-आओ-जाओ, उठो गिरो, बोलो-चुप रहो इत्यादि ।' आशय यह है कि धनी लोगों का याचकों को अपनी क्रिड़ा का साधन बनाना एक सामान्य स्वभाव होता है । कभी वे उनसे कहते हैं आओ, कभी जाओ, कभी कहते हैं उठो और कभी कहते हैं गिरो, कभी कहते हैं बोलो और कभी कहते हैं चुप रहो । यह सब उनका खिलवाड़ ही होता है । वे जैसा चाहते हैं वैसी ही आज्ञा देते हैं और चूँकि याचक आज्ञा-करणा पड़ता है ।
यहाँ पर 'आओ', 'जाओ' 'गिरो' 'उठो' 'बोलो' 'चुप रहो' ये सब परस्पर विरुद्धार्थक शब्द हैं । किन्तु ये सब अनुवाद ही हैं क्योंकि धनियों की भाषा का इनमें अनुवाद किया गया है । विषय है 'क्रिड़ा' करना । क्रिड़ारूप विषय के ये सब परस्पर विरोधी तत्व अंग बनकर आये हैं । अतः विरोधियों का एकत्र समावेश यहाँ पर दोष नहीं है । यह ऐसे ही होता है जैसे दो विरोधी एक दूसरे के प्राण लेने पर उतारू हों किन्तु जब वे राजा के निकट पहुँचते हैं तब एक दूसरे के साथ चुपचाप बैठ जाते हैं, वहाँ वे अन्यमुखप्रेक्षी होते हैं इसीलिये उनकी स्वतन्त्रता जाती रहती है । इसी प्रकार यहाँ पर भी 'आओ' 'जाओ' इत्यादि परस्पर विरोधी तत्व 'क्रिड़ा' रूप विषय के मुख्यप्रेदी हैं । अतः ये उसके आशीतन ही हो गये हैं । जब हम इनको सुनते हैं तब सुनने के क्रम से ही इनके अर्थ का परामर्श होता है ।
किन्तु क्योकि ये दूसरे अर्थ के साथक के रूप में आये हैं, अतः इनका विश्राम अपने शान्दिक अर्थ में ही नहीं होता अपितु ये क्रिड़ा का अंग बन जाते हैं । इनके परस्पर स्वभाव-चिन्तन का तो प्रश्न ही नहीं उठता, अतः इनका विरोध भी नहीं होता । क्योंकि विरोध तो तभी होता है जब परस्पर स्वरूप का चिन्तन किया जावे । केवल इतना अन्तर अवश्य पड़ जाता है कि साधारण वाक्यों में समस्त उददेश्य पहले तो विषय का प्रतिपादन करते हैं और बाद में स्वयम् परस्पर संयुक्त हो जाते हैं । उदाहरण के लिये ज्योतिष्योम प्रकरण में अरुणा-पिङ्गाक्षी, एक वर्षवाली के द्वारा श्यामा खरीदता है । अर्थात् सोम को एक वर्ष की गाय से खरीदना चाहिये । जिसका रंग लाल हो और आँखें पीली हों । मीमांसकों के मत में शब्द-बोध में भावना प्रधान रहती है । 'अरुणया' 'पिङ्गाक्ष्या' और 'एकहायन्या' इन तीनों शब्दों में करण में तृतीया है । अतः क्रमरूप आख्यात ( क्रिया ) जन्य भावना के साथ इनका अन्वय करण के रूप में पृथक्-पृथक् होता है । बाद में इनका
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न च रसेषु विध्यनुवादव्यवहारो नास्तीति शक्यं वक्तुम्, तेषां वाक्यार्थ- त्वेनाभ्युपगमात् । वाक्यार्थस्य वाच्यस्य च यौ विध्यनुवादौ तौ तद्वाक्षिप्तमानां रसानां कथमभ्युपगम्यते । येषां साक्षात्काव्यार्थता रसादीनां नाम्भ्युपगम्यते तेषां तन्निमित्तता तादृशवश्यमभ्युपगन्तव्या ।
यह नहीं कहा जा सकता कि रसों में विधि और अनुवाद का व्यवहार नहीं होता, क्योंकि उन्हें वाक्यार्थ के रूप में माना गया है। वाक्यार्थ और वाच्य के लिए जो विधि और अनुवाद होते हैं, वे रसों के लिए कैसे लागू हो सकते हैं? जिन लोगों का मानना है कि रसादि की साक्षात् काव्यार्थता नहीं है, उन्हें उनकी निमित्तता अवश्य स्वीकार करनी चाहिए।
तथाप्यत्र श्लोके न विरोधः । यस्मादनूद्यमानाझनिमित्तोऽभ्यतरसवस्तुसहकारिजो विधीयमानांशाद्वाविशेषप्रतिपादितिहेतुपद्यते तत्कथं न कश्चिद्विरोधः । हृश्यते हि विरुद्धोभयसहकारित्वं कारणात्कार्यविशेषो- त्पत्तेः ।
फिर भी इस श्लोक में कोई विरोध नहीं है। क्योंकि यहाँ अनूदित रसों की निमित्तता और अन्य रसों के वस्तु-सहकारिता के कारण विशेष कार्य की उत्पत्ति होती है, जो विधीयमान अंश से प्रतिपादित होती है। यह देखा जाता है कि विरुद्ध दोनों के सहकारिता से कार्यविशेष की उत्पत्ति होती है।
विरुद्धफलोत्पादनहेतुत्वं हि युगपदेकस्य कारणस्य विरुद्धं न तु विरुद्धोभयसहकारित्वम् । एवंविधविरुद्धपदार्थविषय: कथमभिनय: प्रयोक्तव्य इति चेत्—अनूद्यमानैर्विध्यनुवादनयाश्रयेणात्र श्लोके परिहृतस्तावद्विरोधः ।
विरुद्ध फल की उत्पत्ति का हेतु होना एक ही कारण के लिए युगपत् विरुद्ध नहीं होता, लेकिन विरुद्ध दोनों के सहकारिता में होता है। इस प्रकार के विरुद्ध पदार्थों के विषय में अभिनय कैसे किया जाए? यह प्रश्न उठता है, लेकिन अनूद्यमान विधि और अनुवाद के आश्रय से इस श्लोक में विरोध का परिहार हो जाता है।
(अनु०) रसों में विधि और अनुवाद का व्यवहार नहीं होता यह नहीं कहा जा सकता क्योंकि उन (रसादिकों) को वाक्यार्थ के रूप में माना गया है । वाच्यार्थ के और वाच्य के जो विधि और अनुवाद उनका उस (वाच्य) के द्वारा आक्षित होनेवाले रसों के विषय में निवारण कौन कर सकता है ?
रसों में विधि और अनुवाद का व्यवहार नहीं होता यह नहीं कहा जा सकता क्योंकि उन (रसादिकों) को वाक्यार्थ के रूप में माना गया है। वाच्यार्थ के और वाच्य के जो विधि और अनुवाद उनका उस (वाच्य) के द्वारा आक्षित होनेवाले रसों के विषय में निवारण कौन कर सकता है?
अथवा जो लोग रस इत्यादिकों की साक्षात्काव्यार्थता को स्वीकार नहीं कर सकते हैं उनको रसों की तन्निमित्तता (वाच्यनिमित्तता) अवश्य माननी पड़ेगी तथापि यहाँ पर श्लोक में विरोध नहीं है क्योंकि भावविरोध की प्रतीति ऐसे विधीयमानांश से उत्पन्न होती है जिसमें अनुवाद किये जानेवाले अङ्गों को निमित्त मानकर उत्पन्न होनेवाली दोनों प्रकार की रसवस्तुसहकारिता के रूप में रहतीं हैं ।
अथवा जो लोग रस इत्यादिकों की साक्षात्काव्यार्थता को स्वीकार नहीं कर सकते हैं उनको रसों की तन्निमित्तता (वाच्यनिमित्तता) अवश्य माननी पड़ेगी तथापि यहाँ पर श्लोक में विरोध नहीं है क्योंकि भावविरोध की प्रतीति ऐसे विधीयमानांश से उत्पन्न होती है जिसमें अनुवाद किये जानेवाले अङ्गों को निमित्त मानकर उत्पन्न होनेवाली दोनों प्रकार की रसवस्तुसहकारिता के रूप में रहतीं हैं।
निस्सन्देह दोनों विरोधी सहकारी कारणों से कार्यविशेष की उत्पत्ति देखी जाती है । एक कारण का विरुद्धफलोत्पादन में हेतु बनना विरुद्ध होता है; दोनों विरोधियों का सहकारी होना विरुद्ध नहीं होता ।
निस्सन्देह दोनों विरोधी सहकारी कारणों से कार्यविशेष की उत्पत्ति देखी जाती है। एक कारण का विरुद्धफलोत्पादन में हेतु बनना विरुद्ध होता है; दोनों विरोधियों का सहकारी होना विरुद्ध नहीं होता।
यदि कहो कि इस प्रकार के विरुद्ध पदाथों के विषय में अभिनय का प्रयोग कैसे किया जावे तो अनुवाद किये जानेवाले इस प्रकार के वाच्य के विषय में जो बात होगी वह यहाँ भी हो जावेगी ।
यदि कहो कि इस प्रकार के विरुद्ध पदाथों के विषय में अभिनय का प्रयोग कैसे किया जावे तो अनुवाद किये जानेवाले इस प्रकार के वाच्य के विषय में जो बात होगी वह यहाँ भी हो जावेगी।
इस विधि और अनुवाद के आश्रय से यहाँ विरोध परिहार हो गया ।
इस विधि और अनुवाद के आश्रय से यहाँ विरोध परिहार हो गया।
तारावती
तारावती
परस्पर भी सम्बन्ध हो जाता है । ‘अरुण’ और ‘विदग्धी’ ये गुण हैं और ‘एक हयानी’ यह द्रव्य । द्रव्य और गुण का विरोध नहीं होता ।
परस्पर भी सम्बन्ध हो जाता है। ‘अरुण’ और ‘विदग्धी’ ये गुण हैं और ‘एक हयानी’ यह द्रव्य। द्रव्य और गुण का विरोध नहीं होता।
अतः इन सब के पृथक्पृथक् क्रम रूप भावना से सम्बन्ध होने पर भी परस्पर अन्वय हो जाता है और उसका अर्थ यह निकल आता है जो एक वर्ष की गाय लाल हो तथा पीले नेत्रों वाली हो उससे सोमलता के क्रय की भावना करनी चाहिये ।
अतः इन सब के पृथक्पृथक् क्रम रूप भावना से सम्बन्ध होने पर भी परस्पर अन्वय हो जाता है और उसका अर्थ यह निकल आता है जो एक वर्ष की गाय लाल हो तथा पीले नेत्रों वाली हो उससे सोमलता के क्रय की भावना करनी चाहिये।
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ननु प्रधानेतया यद्वाच्यं तत्र विधि: । अप्रधानेत्वे तु वाच्येऽनुवाद: । न च रसस्य वाच्यत्वं त्वयैव सेत्स्यमित्याशङ्कमान: परिहरति—न चेतति । प्रधानाप्रधानत्वमात्रकृतौ विध्यनुवादौ। तौ च व व्यङ्ग्यतायामपि भवत एवेति भाव: । मुख्यतया च तत्र वाच्यत्वाकार्यार्थमित्युक्तम् । तेनामुख्यतया यत्र सोऽर्थ: स त्रिविधमानत्वेन रसस्यापि युक्तम् । यदि वानूयमानविभावादिसमाक्षिसल्वाद्रसस्यानूयमानता तदाह—
प्रधानेतया जो वाच्य हो वहाँ विधि होती है। अप्रधानेरूप में वाच्य में अनुवाद होता है। रस का वाच्यत्व तो तुमने ही सहन नहीं किया, यह शङ्काकर उत्तर देते हैं—
'ऐसा नहीं' यह । विधि और अनुवाद प्रधान और अप्रधान मात्र से सम्पन्न किये जाते हैं और वे व्यङ्ग्यतया में होते ही हैं यह भाव है । यह कहा गया है कि मुख्य रूप में रस ही वाक्यार्थ होता है । इससे अमुख्य रूप में जहाँ वह अर्थ हो वहाँ रस की अनुवादरूपता उचित ही है । अथवा अनुवाद किये जानेवाले विभाव इत्यादि से आक्षित होने के कारण रस की अनुवादरूपता होती है ।
तारावती
वह होता है जहाँ पृथक-पृथक सम्बद्ध होनेवाले अनुवाद रूप शब्द एक-दूसरे के विरोधी नहीं होते । यह बात ऐसे स्थलोंपर लागू नहीं होती जहाँ भावना के सम्बद्ध तत्त्व नहीं होते । यह वात परस्पर विरुद्ध होते हैं । वहाँ पर वे तत्त्व पृथक-पृथक भावना से तो सम्बद्ध होते हैं किन्तु उनका परस्पर सम्बन्ध नहीं होता । यही बात यहाँ पर भी होती है कि आओ जाओ इत्यादि विरोधी क्रियारूप भावना से तो अन्वित हो जाते हैं किन्तु वाद में उनका परस्पर अन्वय नहीं होता केवल इतना ही अन्तर पड़ता है वैसे दो विरोधियों द्वारा एक ही भावना को पुष्ट करने में कोई विरोध नहीं ।
( प्रश्न ) विधि और अनुवाद ( उद्देश्य और विषयेय ) ये दोनों शब्द वाक्यार्थबोध में प्रयुक्त किये जाते हैं और इनका विशेष प्रयोग मीमांसा दर्शन में होता है । जो प्रधान रूप में वाच्य हो उसे विधि कहते हैं और जो अप्रधान रूप में वाच्य हो उसे अनुवाद कहते हैं । विधि और अनुवाद की यही परिभाषा है । आप स्वयं ही इस बात को सहन नहीं करते कि रस कभी भी वाच्य हो सकता है । जब रस कभी वाच्य होता ही नहीं तब रस में विधि और अनुवाद शब्दों का प्रयोग कहाँ उचित कहा जा सकता है? ये दोनों शब्द वाच्यार्थविषयक ही हैं ।
( उत्तर ) विधि और अनुवाद का प्रयोजक तत्त्व केवल यही है कि उनमें प्रघानता और अप्रधानता का विचार किया जावे और जो प्रधान हो उसे विधि तथा जो अप्रधान हो उसे अनुवाद कह दिया जावे । विधि और अनुवाद होने के लिये ऐसा कोई
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वाक्यार्थस्यैति । यदि वा अभूदनूद्धमानतया विरुद्धयो रसयोः समावेशः, सहकारितया तु भविष्यतीति सर्वथा विरुद्धयोर्युक्तियुक्तोऽङ्गाङ्गिभावो नात्र प्रयासः कश्चिदिति दर्शयति यैवेति । तत्रिमित्ततेति । काव्यार्थों विभावादिनिमित्तं येषां रसादीनां ते तथा तेषां कहते हैं—‘वाक्यार्थ कर’ यह । अथवा अनुवाद रूप में विरुद्ध रसों का समावेश न हो सहकारी के रूप में तो हो जावेगा इस प्रकार विरुद्धों का अङ्गाङ्गिभाव सर्वथा उचित ही है; इस विपय में कोई प्रयत्न अपेक्षित नहीं यह दिखलाते हैं—‘अथवा जिनके द्वारा’ यह ‘तत्रिमित्तता’ यह। ‘वे’ अर्थात् काव्यार्थी विभाव इत्यादि निमित्त हैं जिन रसादिकों के वे उस प्रकार के अर्थात् ‘तत्रिमित्त’ होते हैं । उनकी भाव-
नियम नहीं है कि ये दोनों वाच्य में ही होते हैं । अतः यह नहीं कहा जा सकता कि वाच्य न होने से रसों के विषय में विधि और अनुवाद इन शब्दों का प्रयोग नहीं किया जा सकता । वाक्यार्थ दोनों हो सकते हैं—वाक्यार्थ भी और व्यङ्ग्यार्थ भी। यदि वाच्यार्थ के विषय में विधि और अनुवाद का प्रयोग किया जा सकता है तो व्यङ्ग्यार्थ रस के विषय में भी वह प्रयोग क्यों नहीं हो सकता ? यह पहले हो बताया जा चुका है कि मुख्य रूप में रस ही वाक्य का अर्थ होता है क्योंकि तात्पर्य का पर्यवसान रस में ही होता है । अतः यह ठीक ही है कि जहाँ रसरूप पर्यवसित अर्थ मुख्य न हो वहाँ रस भी अनुवादरूपता को धारण कर सकता है यह उचित ही है । आशय यह है कि रस भी वाक्यार्थ होता है अतः रस के विषय में भी गौण मुख्य यह व्यवहार अथवा विधि और अनुवाद यह व्यवहार उचित ही कहा जा सकता है। ( यहाँ पर यह प्रश्न हो सकता है कि यह वाक्य सर्वसमाप्त नहीं है कि काव्यवाक्यों द्वारा रसों का ही प्रतिपादन होता है और इसीलिये रस ही मुख्य वाक्यार्थ होते हैं ऐसी दशा में रसों के विषय में विधि और अनुवाद के प्रतिपादन की क्या व्यवस्था होगी ? इसी प्रश्न का उत्तर देने के लिये पण्डितान्तरों की व्याख्या की जा रही है । ) अथवा यहाँ पर यह समझना चाहिये कि रसों का आक्षेप विभाव इत्यादि से होता है। यदि विभाव इत्यादि अनुचित हों तो रसों को अनूदित मानने में भी कोई विप्रतिपत्ति नहीं हो सकती । जब रसों का आक्षेप वाक्यार्थ और वाच्य के द्वारा होता है तब उन आक्षेप करनेवाले तत्त्वों में जो विधि और अनुवाद-
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भावस्तत्ता । अनूयमानाथ ये हस्तक्षेपादयो रसाङ्गभूत* विभागाद्यस्तत्रमित्तं यदुभयं करणविप्रलम्भात्मकं रसवस्तु रससजातीयं तत्रसहकारि यस्मै विधीयमानस्य शाम्भव-शारवद्धिजनितदुरितदाहलक्षणस्य तस्माद्धावविशेषे प्रेयोलङ्कारविषये भगवत्प्रभावातिशयलक्षणे प्रतीतिरितिसङ्कति: । विरुद्धं यदुभयं वारितेजोगतं शीतोष्णं तत्सहकारि यस्मै तदुलादे: कारणस्य तस्मात्कार्यविशेषस्य कोमलभक्तकरुणलक्षणस्योत्पत्तिदर्शयते । सर्वत्र हेत्यमेव कार्यकारणभावो बीजाङ्कुरादौ नान्यथा ।
लोचन भाव की स्थिति यह है कि अनुयायी (शृङ्गारादि रस के) जो हस्तक्षेप आदि (विभावादि के साथ) रस के अंगभूत हैं, विभाग आदि से सीमित हैं, दोनों (विभावादि और रसाङ्गभूत हस्तक्षेपादि) करण विप्रलम्भात्मक रसवस्तु (स्थायी भाव) रससजातीय (रस के समान जातिवाले) हैं, उस (रसवस्तु) के सहकारी (अर्थात् विभावादि के साथ मिलकर रस की उत्पत्ति में सहायक होते हैं) जिन (विभावादि) के लिये शाम्भव (शिवसम्बन्धी) और शारवद्धि (शर आदि से उत्पन्न तेज) से जनित पाप के दाह लक्षणवाले उस (विभावादि रूप) विशेष में प्रेयोलङ्कार के विषय में भगवान् के प्रभाव की अधिकता रूप प्रतीति होती है, यह सङ्कति है । दोनों (उष्ण और शीत) परस्पर विरुद्ध तेज और जल में रहनेवाले जिन (विभावादि) के लिये शीतोष्ण तत्सहकारी (रसवस्तु के सहकारी) होते हैं, उन (विभावादि) से कार्यविशेष (करुण रस) की उत्पत्ति के कारण रूप कोमल भक्त (शरणागत) में करुणा लक्षण की उत्पत्ति को दिखलाते हैं । सर्वत्र कार्य-कारण भाव बीजाङ्कुर आदि के समान ही होता है, अन्यथा नहीं ।
दीधितिकार का मततव्य यहाँ पर यह है कि वाक्यार्थ या तो रस हो सकता है या वाच्यार्थ । रस से यहाँ अभिप्राय हो ही नहीं सकता क्योंकि यहाँ पर रस के आक्षेप करनेवाले तत्वों का उल्लेख किया गया है । यदि वाच्यार्थ ही यहाँ पर अभीष्ट है तो वाक्यार्थ ही वाच्य होता है । अतः वाक्यार्थ और वाच्य कहने का क्या अभिप्राय ? किन्तु यहाँ पर यह ध्यान रखना चाहिये कि न तो वाच्य केवल वाक्यार्थ ही होता है और न केवल वाक्यार्थ रस का आक्षेप करनेवाला होता है वाच्य पदार्थ के द्वारा भी रस का आक्षेप हो ही जाता है । यहाँ पर आचार्य का मततव्य यही है कि रस का आक्षेप चाहे वाक्यार्थ के द्वारा हुआ हो चाहे किसी दूसरे वाच्यार्थ के द्वारा, आक्षेपक तत्वों में रहनेवाला विधि और अनुवाद का व्यवहार रस के विषय में भी घटित हो ही सकता है । ) अथवा यदि आप इस बात को नहीं मानना चाहते कि अनुवादरूप होने के कारण विरुद्ध रसों का समावेश दूषित नहीं होता तो न मानिये, यह तो आप मानेंगे ही कि सहकारियों होने के कारण रस के विषय में विधि और अनुवाद इन शब्दों का व्यवहार अनुचित नहीं कहा जा सकता । अतः सर्वथा विरुद्धों का अज्ञाझिभाव उचित ही है इस विषय में प्रयास (जबरदस्ती) कोई नहीं किया जा रहा है । जो लोग यह नहीं मानते कि रस साक्षात् काव्यार्थ
तारावती दीधितिकार का मततव्य यहाँ पर यह है कि वाक्यार्थ या तो रस हो सकता है या वाच्यार्थ । रस से यहाँ अभिप्राय हो ही नहीं सकता क्योंकि यहाँ पर रस के आक्षेप करनेवाले तत्वों का उल्लेख किया गया है । यदि वाच्यार्थ ही यहाँ पर अभीष्ट है तो वाक्यार्थ ही वाच्य होता है । अतः वाक्यार्थ और वाच्य कहने का क्या अभिप्राय ? किन्तु यहाँ पर यह ध्यान रखना चाहिये कि न तो वाच्य केवल वाक्यार्थ ही होता है और न केवल वाक्यार्थ रस का आक्षेप करनेवाला होता है वाच्य पदार्थ के द्वारा भी रस का आक्षेप हो ही जाता है । यहाँ पर आचार्य का मततव्य यही है कि रस का आक्षेप चाहे वाक्यार्थ के द्वारा हुआ हो चाहे किसी दूसरे वाच्यार्थ के द्वारा, आक्षेपक तत्वों में रहनेवाला विधि और अनुवाद का व्यवहार रस के विषय में भी घटित हो ही सकता है । ) अथवा यदि आप इस बात को नहीं मानना चाहते कि अनुवादरूप होने के कारण विरुद्ध रसों का समावेश दूषित नहीं होता तो न मानिये, यह तो आप मानेंगे ही कि सहकारियों होने के कारण रस के विषय में विधि और अनुवाद इन शब्दों का व्यवहार अनुचित नहीं कहा जा सकता । अतः सर्वथा विरुद्धों का अज्ञाझिभाव उचित ही है इस विषय में प्रयास (जबरदस्ती) कोई नहीं किया जा रहा है । जो लोग यह नहीं मानते कि रस साक्षात् काव्यार्थ
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होते हैं वे इतना तो मानेंगे ही कि साक्षात् काव्यार्थ विभाव इत्यादि वाच्यार्थ ही होते हैं और उन वाच्यार्थों द्वारा रस इत्यादि का आक्षेप होता है । इस प्रकार यह सिद्ध हो गया कि उनको इतना तो मानना पड़ेगा कि काव्यार्थ विभाव इत्यादि रस में निमित्त होते हैं । ऐसी दशा में भी प्रस्तुत पद्य ‘दिवो हस्तावलग्नः’ इत्यादि में कोई विरोध नहीं आता । इस पद्य में त्रिपुरासुर आलम्बन है, त्रिपुर-युवतियाँ आश्रय हैं और उनके द्वारा हाथ से क्षित कर देना इत्यादि अनुभाव हैं । ये जो रसाङ्गभूत विभाव इत्यादि हैं उनको निमित्त मानकर करुण और विप्रलम्भ इन दोनों रसों की अभिव्यक्ति होती है । ये दोनों ही रसरूप वस्तु हैं अर्थात् ध्वनिरूप पूर्ण रस नहीं अपितु दूसरे तत्त्व को पुष्ट करनेवाले रस-सजातीय तत्त्व हैं । शम्भु की शराग्नि से जो दूषित-दग्ध होता है वही विधीयमान अंश है । उस विधीयमान अंश के ये दोनों करुण और विप्रलम्भ रस सहकारी हो जाते हैं । उस विधीयमान अंश से एक विशेष भाव में, जोकि भगवान् के प्रभावातिशय रूप में प्रेयोलङ्कार कहा जा सकता है, प्रतीति हो जाती है । यही इस ग्रन्थ की संगति है आशय यह है कि हस्तक्षेप इत्यादि वाच्यसामग्री से करुण और विप्रलम्भ इन दोनों की मिश्रित प्रतीति होती है जो कि भगवान् के प्रभावातिशय को पुष्ट करने के कारण उसकी सहकारिणी है । भगवान् का प्रभावातिशय प्रेयोलङ्कार के क्षेत्र में आ जाता है ।
( यहाँ पर दीधितिकार ने लिखा है—‘लोचनकार ने जिस प्रेयोलङ्कार को समझा है वह यहाँ पर नहीं होता, क्योंकि शिवविषयक रति भाव की ही यहाँ सभी ओर से प्रधानता है और प्रेयोलङ्कार वहाँ पर होता है जहाँ भाव अप्रधान हो । किन्तु यदि अलङ्कार में ही पढ़पात हो तो श्रृङ्गार और करुण के अंग होने के कारण रसवत् अलङ्कार का निर्णय कर लिया जावे ।’ यहाँ पर निवेदन यह है कि लोचनकार ने कविगत शिवविषयक रति भाव को प्रेयोलङ्कार नहीं कहा है और शिवविषयक रति प्रेयोलङ्कार हो भी नहीं सकती क्योंकि वह तो ध्वनि रूप में स्थित है । करुण और विप्रलम्भ के द्वारा शङ्कर जी के प्रभावातिशय की पुष्टि होती है और प्रभावातिशय के द्वारा कविगत रतिभाव की। इस प्रकार प्रभावातिशय ( शिव जी का उत्साह जो भावरूप में स्थित है ) अपरांग होकर प्रेयोलङ्कार बन गया है इसमें किसी प्रकार की अनुपपत्ति नहीं हो सकती । यह भी ठीक ही है कि करुण और विप्रलम्भ ये दोनों रसवत् अलङ्कार हो गये हैं । ) दो विरोधी सहकारी कारणों से विशेष कार्य की उत्पत्ति देखी ही जाती है । उदाहरण के लिये जल शीतस्पर्शवाला होता है और अभि उष्णस्पर्शवाली । दोनों एक दूसरे के विरोधी हैं किन्तु दोनों ही मिलकर सहकारी कारण बनकर भात पकाने का काम करते हैं और इनसे कोमल भात पक
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ननु विरोधस्तर्हि सर्वत्राकिञ्चित्करः स्यादित्याशङ्काह—चिरुद्धकरेति । तथा चाहु:-‘नोपादानं विरुद्धस्य’ इति । नन्वभिलेयार्थे काव्ये यद्वाादर्शे वाक्यं सवेतद्रा यदि समस्ताभिनय: क्रियते तदा विरुद्धार्थविषय: युगपदभिलय: कृतं शास्त्र इत्याशये-नाशङ्कमान आह—एतद्विरहति—अनूद्यमानविरुद्धाकारं वाक्यं यत्तादृशो यो विषय: ‘पृथि गच्छ पटोचिछ’ इत्यादिसत्न या वार्ता सात्रापीति ।
तब तो विरोध सर्वत्र अकिञ्चित्कर होगा—यह शङ्का कर के (उत्तर रूप में ) कहते हैं—‘विरुद्ध फल इत्यादि’ । इसीलिये कहते हैं—( प्रश्न ) अभिलेयार्थक काव्य में यदि इस प्रकार का वाक्य हो तब यदि समस्ताभिनय किया जाये तो विरुद्ध विषय का एक साथ किस प्रकार अभिनय किया जा सकता है यह शङ्का करते हुये कहते हैं—‘इस प्रकार’ यह । इसका परिहार करते हैं—‘अनूद्यमान’ यह । अनूदित किया जाननेवाला विरुद्ध आकार का इस प्रकार का वाक्य जहाँ पर हो उस का ‘आओ, जाओ, गिरो, उठो’ इत्यादि जो विषय उसमें जो बात ( होती है ) वह यहाँ पर भी ( हो जावेगी । )
जाना रूप विशेष कायँ की उत्पत्ति हो जाती है । इसी प्रकार बीज के उगाने के लिये शीतल जल और भूमिगत उष्णता दोनों का सहकार अपेक्षित होता है यही बात सभी कायँ-कारण भावों के विषय में समझनी चाहिये । प्रस्तुत पद्य में भी विरोधी करण और विमलभ्भ सहकारी बनकर शिव के प्रभावातिशय रूप कायँ को पुष्ट करते हैं ।
तारावती
( प्रश्न ) इस प्रकार का परिहार तो सर्वत्र सम्भव है । फिर विरोध कहाँ रह गया ? विरोध तो सर्वत्र इसी प्रकार अकिञ्चित्कर हो जावेगा । ( उत्तर ) कारण का विरोध वहाँ पर आवेगा जहाँ एक ही कारण एक ही साथ दो विरोधी फलों को उत्पादन करें । दो विरोधियों का सहकार विरोधी नहीं माना जाता । आचायँ यह है कि एक ही वस्तु एक ही साथ दो विरोधियों को जन्म नहीं देती जैसे जल एक ही साथ शीत और उष्ण इन दोनों फलों को उत्पन्न नहीं कर सकता। किन्तु दो विरोधी तत्व एक ही कायँ के सहयोगी तो हो ही सकते हैं । यही वात ‘विरुद्ध का उपादान•••’ इत्यादि में कही गई है । ( लोचनकार ने यहाँ पर ‘नोपादानं विरुद्ध-स्य•••’ केवल इतना ही अंश उद्धत किया है । पूरी कारिका का पता नहीं है । सम्भवतः इस कारिका का अर्थ यही होगा कि सहकारी के रूप में विरोधी का उपादान सदोष नहीं होता।)
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एतदुक्तं मतवति—'क्षितो हस्तावलम्ब:' इत्यादौ प्राधान्येन भूतविप्लुतादि दृश्यताम्। पपादनक्रमेण प्राकरणिकस्तावदर्थ: प्रदर्शयितव्य:। यदपयान्न करुणोदपि पराङ्मुखं तथापि विप्रलम्भापेक्षया तस्य लांवधिकृतं कारुणिकवं महेश्वरप्रभावं प्रति सोऽपयोगस्तावत्। विप्रलम्भस्य तु कारुणिकेयुप्रेक्ष्योऽनावलेनायातस्य दूरत्वात्। एवं च साक्षान्नेत्रोत्पलाभिरस्यान्तं प्राधान्येन करुणोपयोगाभिनयक्रमेण लेशतस्तु विप्रलम्भस्य करुणेन साधारण्यासूचनां कृत्वा। कारुणिकेयत्र यद्यपि प्रणयक्रोधोऽप्यनय: कृतस्तथापि तत: प्रतीतमानोडस्यसौ विप्रलम्भ: समनन्तराभिनीयमाने स दृश्यतु दुरितमित्यादौ सारोपामिनयसमर्पितो यो भगवत्प्रभाववस्तुनाझातायां पर्यवस्यतीति न कश्चिद्विरोध:। एवं मति।
यह कहा गया है—'क्षितो हस्तावलम्ब:' इत्यादि में प्रधानतया भयभीत के भागने इत्यादि के उपपादन क्रम से प्राकरणिक अर्थ दिखलाया जाना चाहिए। यद्यपि यहाँ पर करुण भी पराङ्मुख ही है तथापि विप्रलम्भ की अपेक्षा उसकी प्राकरणिकता निकट है क्योंकि महेश्वर के प्रभाव के प्रति उसका उपयोग होता है और 'कामी के समान' इस उत्प्रेक्षा और उपमा के वलपर आया हुआ विप्रलम्भ तो दूर है। इस प्रकार 'साक्षान्नेत्रोत्पलाभि:' यहाँ तक प्रधानतया करण के उपयोगी अभिनय के क्रम से और करुण के साधर्र्य के कारण लेशमात्र विप्रलम्भ की सूचना करके ( अभिनय किया गया है । ) यद्यपि 'कार्मिके:' यहाँ पर प्रणयक्रोध के योग्य अभिनय किया गया है तथापि उससे प्रतीमान भी वह विप्रलम्भ दूषित वाक्य में ही 'वह पाप को जलावे' इसके अभिनय किये जाने पर जोरदार अभिनय से सर्मपित जो भगवान् का प्रभाव उसकी अज्ञता में पर्यवसित होता है इस प्रकार कोई विरोध नहीं है। इस विरोधपरिहार का उपसंहार करते हैं—'इस प्रकार' यह।
तारावती में आवे जो अभिनय के मन्तव्य लिखा गया हो और उस समस्त वाक्य का अभिनय करना हो तो एक साथ ही दो विरोधियों का अभिनय कैसे किया जा सकेगा ? ( उत्तर ) वाक्य में जब दो विरोधी तत्त्व उद्देश्य रूप में आ जाते हैं उनका भी तो अभिनय किया ही जाता है। जैसे 'आओ, जाओ, उठो, गिरो,' इत्यादि वाक्य में उद्देश्य रूप में दो-दो विरोधी तत्त्व आये हैं। अभिनय तो इनका भी किया ही जाता है। वहाँ जो बात अभिनय के लिये होती है वही यहाँ पर भी हो सकती है। ऊपर अभिनय के विषय में जो कुछ कहा गया है उसका आशय यह है —यदि 'क्षितो हस्तावलम्ब:' इत्यादि पद का अभिनय करना हो तो सर्वप्रथम भीत और विप्रलुत दृष्टि के उपपादन के द्वारा प्राकरणिक अर्थ का अभिनय किया जाना चाहिए।
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किन्छु नायकस्याभिनन्दनीयोदयस्य कस्याचिच्चित्प्रभाचमत्कारविशयवर्णने तन्र्रप्रतिपक्षाणां यः करुणो रसः स तु परीक्ष्यकराणां न वैक्लव्यसाक्षात्कारि प्रयुक्त प्रोत्प्रतीतिरसायनिमित्ततां प्रतिपद्यत इत्यतस्तस्य कुष्टशक्तिकत्वान्नाद्विरोषविधायिना न कचिद्दोषः । तस्माद्वाक्यार्थीभूतस्य रसस्य भावस्य वा विरोधी रसविरोधीति चकतुं न्याय्यः, न त्वङ्ङभूतस्य कस्यचित्।
तारावती यहाँ पर वस्तु का विभाजन इस प्रकार किया जा सकता है— ( १ ) शङ्कर जी के प्रभावातिशय से परिपुष्ट कविगत शङ्करविपयक रति ( भक्ति ) भाव । ( २ ) शङ्कर जी के प्रभाव को पुष्ट करनेवाला त्रिपुरयुवतियों का करुण रस । ( ३ ) ‘कामोऽर’ इस उपमा के बल पर आया हुआ रौद्रार रस । शङ्कर जी का प्रभावातिशय सर्वप्रमुख है, और करुण तथा रौद्रार दोनों गौण हैं, क्योंकि दोनों ही शङ्कर जी के प्रभावातिशय को पुष्ट करनेवाले होने के कारण असरांग हो गये हैं । किन्तु इन दोनों में विप्रलम्भ श्रृंगार को अपेक्षा करुण शङ्कर जी के प्रभावातिशय के अधिक निकट पड़ता है क्योंकि उसका उपयोग शङ्कर जी के प्रभावातिशय के चोतन में अधिक होता है, अतः प्राकरणिकता उसे अधिक है; श्रृंगार तो बहुत दूर है क्योंकि उसका शङ्कर जी के प्रभावातिशय में बहुत ही कम उपयोग होता है, ‘कामो के समान’ इस उपमा के बल पर ही उसका उपादान हुआ है, अतः प्राकरणिक अर्थ को चमत्कारपूर्ण बनाने में ही उसका उपयोग है, मुख्यार्थ को परिपुष्ट करने में उसका उपयोग नहीं है।अत: जब प्रस्तुत पद्य का अभिनय किया जावेगा तब ‘शालुनेऽ्रोपलामि:’ यहाँ तक करुण रस का उपयोगी अभिनय ही किया जावेगा और सः सः बहुत थोड़े रूप में विप्रलम्भ से करुण के साहचर्य की सूचना भी की जावेगी । ( दोनों विरोधियों का एक साथ अभिनय सम्भव नहीं है, अतः पहले करुण का अभिनय किया जावेगा और बाद में विप्रलम्भ की सूचना दी जावेगी ! ) ‘कामो के समन’ यहाँ पर यद्यपि प्रणयकोप के लिये उचित अभिनय किया गया है तथापि उससे जिस विप्रलम्भ की अभिव्यक्ति होतो है वह मुख्य नहीं हो पाता अपितु ‘वह शङ्कर की धारामि
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विष्यान्तरे तु प्रकारान्तरेण विरोधपरिहारमाह—किञ्चेति । परीक्षकाणामिति सामाजिकानां विदग्धाशालिनाम् । न वैक्लव्यमिति । न तादृशे विषये चित्तद्रुति-रुत्पघते करुणादिस्वादविश्रान्त्यभावात् । किन्तु वीरस्य योडसौ क्रोधो व्यभिचारिता प्रतिपघते तत्फलरूपोडसौ करुणरसः स्वकारणासंचार्यन्वन्द्धारेण वीरास्वादातिशय पर्यवस्यति । यथोक्तम्—‘रौद्रस्य चैव यत्कर्म स धेयः करुणो रसः’ इति । तदाह—प्रीत्यतिशयेतित । अत्रोदाहरणम्—
विषयान्तर में तो प्रकारान्तर से विरोध परिहार बतलाते हैं—‘और भी’ यह । परीक्षकों का अर्थात् विदग्धशाली सामाजिकों का ‘वैक्लव्य नहीं’ यह । उस प्रकार के विषय में चित्तद्रुति उत्पन्न नहीं होती क्योंकि करुण के आस्वाद में विश्रान्ति नहीं होती। किन्तु जो यह क्रोध वीररस के व्यभिचारी भाव का रूप धारण करता है उसका फलरूप यह करुण रस अपने कारण के अभिव्यञ्जन के द्वारा वीररस के आस्वाद की अधिकता में ही पर्यवसित होता है । जैसा कहा गया है—‘और रौद्र का जो कर्म है वह करुण रस समझना चाहिये ।’ वही कहते हैं—‘प्रीति की अधिकता’ यह । यहाँ उदाहरण—
आपके पापों को जला डाले' इस वाक्य से जो बहुत ही जोरदार अभिनय होता है और उससे रङ्कर जी के जिस प्रभावोत्कर्ष का समर्थन होता है उसमें विप्रलम्भ अंग बनकर पर्यवसित होता है । इस प्रकार विधि और अनुवाद का आश्रय लेने से अर्थात् यह मान लेने से कि दो विधियों का विरोध ही दूषित होता है, दो उद्देश्यों का जो एक ही विधि को पुष्ट कर रहे हों विरोध दूषित नहीं होता, यहाँ पर ऊपर जो विरोध-परिहार के प्रकार बतलाये गये हैं उनसे भिन्न एक दूसरा प्रकार भी विरोध-परिहार का है—यदि किसी नायक का उदय हो चुका हो और उसके उस उदय का अभिनन्दन करना हो तो उसके प्रभाव की अधिकता का वर्णन किया जाता है यदि उसके साथ ही उसके विरोधी राजाओं के करुण रस का वर्णन किया जावे तो उनसे न तो विवेकशील पाठक ही उद्विग्न होंगे और न आलोचक ही उसे अनुचित बतलावेंगे । कारण यह है कि अनौचित्य वहाँ पर होता है तथा पाठकों को वैक्लव्य वहीं पर उत्पन्न होता है जहाँ चित्तवृत्ति की दशा परस्पर विरुद्ध हो। उदाहरण के लिये करुण रस में चित्तवृत्ति में द्रवण-शीलता उत्पन्न होती है और रौद्र में चित्तवृत्ति दीप्त हो जाती है । दीप्ति और द्रवणशीलता दोनों परस्पर विरोधी हैं । अतः दोनों रूप एक साथ चित्तवृत्ति में कभी उत्पन्न नहीं हो सकते ।
आपके पापों को जला डाले' इस वाक्य से जो बहुत ही जोरदार अभिनय होता है और उससे रङ्कर जी के जिस प्रभावातिशय का समर्थन होता है उसमें विप्रलम्भ अंग बनकर पर्यवसित होता है । इस प्रकार विधि और अनुवाद का आश्रय लेने से अर्थात् यह मान लेने से कि दो विधियों का विरोध ही दूषित होता है, दो उद्देश्यों का जो एक ही विधि को पुष्ट कर रहे हों विरोध दूषित नहीं होता, यहाँ पर ऊपर जो विरोध-परिहार के प्रकार बतलाये गये हैं उनसे भिन्न एक दूसरा प्रकार भी विरोध-परिहार का है—यदि किसी नायक का उदय हो चुका हो और उसके उस उदय का अभिनन्दन करना हो तो उसके प्रभाव की अधिकता का वर्णन किया जाता है यदि उसके साथ ही उसके विरोधी राजाओं के करुण रस का वर्णन किया जावे तो उनसे न तो विवेकशील पाठक ही उद्विग्न होंगे और न आलोचक ही उसे अनुचित बतलावेंगे । कारण यह है कि अनौचित्य वहाँ पर होता है तथा पाठकों को वैक्लव्य वहीं पर उत्पन्न होता है जहाँ चित्तवृत्ति की दशा परस्पर विरुद्ध हो।उदाहरण के लिये करुण रस में चित्तवृत्ति में द्रवण-शीलता उत्पन्न होती है और रौद्र में चित्तवृत्ति दीप्त हो जाती है । दीप्ति और द्रवणशीलता दोनों परस्पर विरोधी हैं । अतः दोनों रूप एक साथ चित्तवृत्ति में कभी उत्पन्न नहीं हो सकते ।
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कुरचक कुचाघातक्रीडासुखेन वियुज्यसे वकुलविटपिन् स्मर्तव्यं ते मुखासवसेचनम् । चरणघटनाशून्यो यास्यस्यशोकं सशोकता- मिति निजपुरस्याग्ने यस्य द्विषां जगद् धियः ॥
हे कुरवक ? कुचाघात के क्रीडासुख से त्रियुक्त हो रहे हो, हे वकुलवृक्ष ? मुखासव के सेवन का तुम्हें स्मरण करना होगा । हे अशोक ? चरणघटना शून्य कह रही थीं ।' 'अथवा भाव का' ।उस रस में प्रधान स्थायी या प्रधानभूत व्यभिचारी का जैसे विप्रलम्भ में औत्सुक्य का ।
भावस्य वेति । तस्मिन् रसे स्थायिनः प्रधानभूतस्य व्यभिचारिणो वा यथा विप्रलम्भशृङ्गार औत्सुक्यस्य ।
अब यदि किसी नायक के उदय का अभिनन्दन करना है और उसके लिये उसके विरोधियों के करुण रस का उपादान किया गया है तो इस प्रकार के विप्रलम्भ में अर्थ की परिसमाप्ति करुण रस में नहीं होती क्योंकि करुण रस ऐसे स्थान पर साध्य वन कर नहीं अपितु साधन बनकर ही आता है । ऐसी दशा में चित्त में द्रवणशीलता ही उत्पन्न नहीं हो पाती जिससे विरोध की सम्भावना की जा सके । अपितु होता यह है कि ऐसे स्थान पर पाठकों का पूरा ध्यान नायक के उत्कर्ष में ही केन्द्रित रहता है और उनके अन्दर प्रतिपक्षी से सहानुभूति ही उत्पन्न नहीं हो पाती जिससे उनका हृदय प्रतिपक्षियों के प्रति द्रवित हो ही नहीं पाता । वहाँ पर प्रतिपक्षियों का उपादान तो अभिनन्दन के रूप में ही होता है आश्रय के रूप में नहीं । अतः उनके भाव से तादात्म्य का प्रश्न ही नहीं उठता । वहाँ पर नायक वीर रस का आश्रय होता है । युद्धवीर में क्रोध व्यभिचारी के रूप में आता है । क्रोध का फल ही शोक होता है । आचार्यों की ऐसी ही मान्यता है । कहा गया है कि—रौद्र का जो कर्म ( फल ) होता है वही करुण रस समझना चाहिये । नायकों की क्रोधपूर्ण चेष्टाओं का ही यह फल होता है कि उनके शत्रुओं की दयनीय हो जाती है । इस प्रकार ऐसे स्थल पर करुण रस अपने कारणों की ( रौद्र रस की ) अभिव्यञ्जना करते हुये वीररस में पर्यवसित हो जाता है । इस प्रकार करुण रस वीर के पोषण में आनन्द का कारण वन जाता है। अतः करुण की शक्ति से कुण्ठित हो जाने के कारण उस विरोधी का विधान करनेवाले रस में कोई दोष नहीं आता।
एक उदाहरण लीजिये--
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अथवा वाक्यार्थीभूतस्यापि करुणादिरसविषयस्य तद्हरेण शृङ्गारवस्तुनो भङ्गिविशेषाश्रयेग संयोजनं रसपरिपोषायैव जायते । यतः प्रकृतिमधुरा: पदार्थाः शोचनীয়तां प्राप्ताः प्रागवस्थाभाविभिः संस्कर्मभाणैविलासैरधिकतरं शोकावेशमुपजनयन्ति ।
अथवा वाक्यार्थरूप में स्थित किसी करुण रस के विषय का उस प्रकार शृङ्गार वस्तु के साथ विशेष भङ्गिमा का आश्रय लेकर जो संयोजना की जाती है वह रस परिपोष के लिये ही होती है । क्योंकि स्वभावतः मधुर पदार्थ शोचनीयता को प्राप्त होकर इस प्रकार पुरानी अवस्था में होनेवाले तथा स्मरण किये जाते हुये विलासों से शोक के आवेश को अधिक उत्पन्न करते हैं ।
तारावती
'किसो राजा ने रञ्जुओं को पराजित कर दिया है । रञ्जु अपनी प्रियतमाओं को लेकर अपनी राजधानियों से भाग खड़े हुये हैं । उस समय रञ्जुओ की स्त्रियाँ करुणापूर्ण स्वर में कहती हैं कि—हे कुरवक् ? अभी तक तुम हमारे स्तनों के आघात की कृडा का आनन्द लिया करते थे, अब वह आनन्द तुम्हें कहाँ मिलेगा ? हे वकुल वृक्ष ? अब तुम हमारे मुखासव के सेवन का स्मरण किया करना । हे अशोक ? अब तुम्हें हमारे चरणों के प्रहार का सुख नहीं मिल सकेगा, अतः तुम अशोक नहीं रह सकोगे अपितु तु शोक हो जाओगे ।' ( ये कविसमयसिद्ध्यर्थं तियै हैं कि अशोक सौभाग्यवती स्त्रियों के चरणाघात से फूलता है; कुरवक् आलिङ्गन से और वकुल मुख का कुथ्स मारने से खिलता है ।)
'किसी राजा ने रञ्जुओं को पराजित कर दिया है । रञ्जु अपनी प्रियतमाओं को लेकर अपनी राजधानियों से भाग खड़े हुये हैं । उस समय रञ्जुओं की स्त्रियाँ करुणापूर्ण स्वर में कहती हैं कि—हे कुरवक् ? अभी तक तुम हमारे स्तनों के आघात की कृडा का आनन्द लिया करते थे, अब वह आनन्द तुम्हें कहाँ मिलेगा ? हे वकुल वृक्ष ? अब तुम हमारे मुखासव के सेवन का स्मरण किया करना । हे अशोक ? अब तुम्हें हमारे चरणों के प्रहार का सुख नहीं मिल सकेगा, अतः तुम अशोक नहीं रह सकोगे अपितु तु शोक हो जाओगे ।' ( ये कविसमयसिद्ध्यर्थं तियै हैं कि अशोक सौभाग्यवती स्त्रियों के चरणाघात से फूलता है; कुरवक् आलिङ्गन से और वकुल मुख का कुथ्स मारने से खिलता है ।)
यहाँ पर कुन्तलादित्यादि से शृङ्गार की पुष्टिरचना होती है, वह रञ्जुओं की करुणा का पोषक होकर उसका अंग बन जाता है । मुखवर्ण्य विषय है राजा का प्रभावातिशय । उस प्रभावातिशय को रञ्जुओं की करुणा पुष्ट करती है । इस प्रकार विरोधियों का परस्पर सम्मिलन पाठकों के हृदय में विश्रब्धोत्पन्न नहीं करता अपितु प्राकरणिक अर्थ की शोभा बढ़ाता है । अतः यह निष्कर्ष निकला कि वाक्यार्थरूप में स्थित चाहे रस हो चाहे भाव हो और वह भाव भी चाहे उस रस का स्थायी भाव हो चाहे प्रधानभूत व्यभिचारी हो उसका अर्थात् प्रधान रस का विरोधी ही वास्तविक विरोधी होता है यही कहना ठीक है जैसे यदि विप्रलम्भ शृङ्गार में औदास्य प्रधानभूत व्यभिचारी भाव हो तो उसका विरोधी वास्तविक विरोधी कहा जावेगा । किन्तु यदि कोई रस या कोई भाव अंग रूप में स्थित हो तो उसका अविरोधी होना अकिश्चित्कर होता है ।
यहाँ पर कुन्तलादित्यादि से शृङ्गार की पुष्टिरचना होती है, वह रञ्जुओं की करुणा का पोषक होकर उसका अंग बन जाता है । मुखवर्ण्य विषय है राजा का प्रभावातिशय । उस प्रभावातिशय को रञ्जुओं की करुणा पुष्ट करती है । इस प्रकार विरोधियों का परस्पर सम्मिलन पाठकों के हृदय में विश्रब्धोत्पन्न नहीं करता अपितु प्राकरणिक अर्थ की शोभा बढ़ाता है । अतः यह निष्कर्ष निकला कि वाक्यार्थरूप में स्थित चाहे रस हो चाहे भाव हो और वह भाव भी चाहे उस रस का स्थायी भाव हो चाहे प्रधानभूत व्यभिचारी हो उसका अर्थात् प्रधान रस का विरोधी ही वास्तविक विरोधी होता है यही कहना ठीक है जैसे यदि विप्रलम्भ शृङ्गार में औदास्य प्रधानभूत व्यभिचारी भाव हो तो उसका विरोधी वास्तविक विरोधी कहा जावेगा । किन्तु यदि कोई रस या कोई भाव अंग रूप में स्थित हो तो उसका अविरोधी होना अकिश्चित्कर होता है ।
ऊपर यह दिखलाया जा चुका है कि 'श्विस्नो हस्तावलग्ना' इस पद्य में विरोधी
ऊपर यह दिखलाया जा चुका है कि 'श्विस्नो हस्तावलग्ना' इस पद्य में विरोधी
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अथुना पूर्वंस्मलोके श्लोके 'दिस्स इत्यादौ प्रकारान्तरेण विरोधं परिहरति-अथुनेति । अरयं चात्रभावः--पूर्वं विप्रलम्भकरणयोःरन्योन्यत्राझभावगमनाङ्गिरिरोधस्वमुक्तम् । अथुना तु स विप्रलम्भः करुणस्यैवाङ्गतां प्रतिपद्यः कथं विरोधीति व्यवस्थाप्यते—तथाहि करुणो रसौ नामेष्टजनविनिपातादेःविभावादिसंयुक्तम् । इष्टता च नाम स्मर्णीयतामूला । तत्कृत् कामीवाद्रौपराध इत्युपरि श्लोकयदेसुक्तम् । शृङ्गारवेशवधिष्ठिताविलोकने प्राक्तनप्रणयकलहद्रुतान्तः स्मर्यमाण इदानीं विध्वस्ततया श्लोकविभावतां प्रतिपद्यते । तदाह-भङ्गिविशेषेऽन्त । अग्रम्यतया विभावानुभावादिरूपताप्रापणया ग्राम्योक्तिरहितयेत्यर्थः ।
इस समय तो ‘दिस्स’ इत्यादि पहले श्लोक में ही प्रकारान्तर से विरोध का परिहार करते हैं—‘अथवा’ इत्यादि। यहाँ पर यह भाव है—पहले अन्यत्र अंगभाव को प्राप्त होने के कारण विप्रलम्भ और करुण का निर्विरोधत्व कहा गया। इस समय तो वह विप्रलम्भ करण की अंगता को प्राप्त होनेवाला विरोधी कैसे यह व्यवस्थित किया गया है । वह इस प्रकार—यह कहा गया है कि करुण रस इष्टजनों के विनिपात इत्यादि विभाव से होता है और इष्टता तो स्मरणीयता से ही उद्भूत होती है । इससे ‘कामीवाद्रौपराध’ इस उदाहरण से यह कहा गया है—शङ्कर जी की शृङ्गारवेशवधिष्ठिताविलोकने प्राक्तनप्रणयकलहद्रुतान्तः स्मरण किया जाता हुआ इस समय विध्वस्त हो जाने के कारण श्लोकविभावता को प्राप्त हो जाता है । वह कहते हैं—‘भङ्गिविशेषेऽन्त’ यह । अग्रम्य विभाव अनुभाव इत्यादि की प्राप्ति के साथ ग्राम्योक्ति रहित ।
तारावती का समावेश सर्वत्र नहीं होता अब यह दिखला रहे हैं कि उसी पद्य में विरोधपरिहार दूसरे प्रकार से भी सम्भव है और केवल दोष-परिहार हो नहीं अपितु उसमें गुणरूपता भी आ सकती है । पहले यह बतलाया गया था कि प्रस्तुत पद्य में विप्रलम्भ और करुण दोनों ही एक तीसरी रसवस्तु शृङ्गारविषयक भक्तिभाव का पोषण करते हैं अतः पराङ्ग होने के कारण दोनों का परस्पर विरोध नहीं होता । अब यह सिद्ध किया जा रहा है कि विप्रलम्भ स्वयं करुण का अंग बन गया है अतः उनके विरोध का प्रश्न ही उत्पन्न नहीं होता । यदि करुण रस का विषय वाक्यार्थ हो गया हो अर्थात् वाक्यरचना में करुण रस को प्राधान्य प्राप्त हो गई हो और उस प्रकार की विरोधी शृङ्गारवस्तु के साथ उसकी संयोजना विशेष भङ्गिमा के साथ की जावे तो वह विरोधियों की सहसंयोजना रसपरिपोषक ही होती है रसविरोधी नहीं । इसको इस प्रकार समझाइये--करुण रस का विभाव अर्थात् कारण होता है इष्टजनविनिपात, क्योंकि इष्टजनविनिपात से ही करुण रस सम्भव होता है ।
लोचन
तारावती
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यथा-अयं स रसनोत्कर्षी पीयस्तनचिमर्दनः । नाम्यपूरुजघनस्पर्शी नीचैर्विस्रंसनः करः ॥
जैसे—यह वह रसना को ऊपर खींचनेवाला, स्थूलस्तनों का मर्दन करनेवाला, नाभि, ऊरु तथा जंघाओं का स्पर्श करनेवाला और
इत्यादि में । अतः यहाँ पर त्रिपुरयुवतियों से षड्दर की शराग्नि ने वै व्यवहरति स्म तथा व्यचहृतवानित्यनेनापि प्रकारेणास्येव निर्विरोधत तस्माद्यथा यथा निरूप्यते तथा तथा तत्र दोषाभावः ।
इत्यादौ । तदत्र त्रिपुरयुवतीनां शास्त्रभवः शराग्निराद्योपराधः कामव्यवहरति स्म तथा व्यचहृतवानित्यनेनापि प्रकारेणास्येव निर्विरोधत तस्माद्यथा यथा निरूप्यते तथा तथा तत्र दोषाभावः ।
अत्रैव दृशान्तमाह - यथा अयमिति । अन्र भूरिश्रवसः समरशुचि निवाहं द्रष्टा तत्कान्तानामेतदवशोचनम् । रसनां मेखलां सम्यो गावसरपृध्वं कर रसनोत्कर्षी ।
अत्रैव दृशान्तमाह - यथा अयमिति । अन्र भूरिश्रवसः समरशुचि निवाहं द्रष्टा तत्कान्तानामेतदवशोचनम् । रसनां मेखलां सम्यो गावसरपृध्वं कर रसनोत्कर्षी ।
इसी विषय में दृशान्त कहते हैं—‘जैसे यह’ । यहाँ पर युद्धभूमि में पड़ मूरिश्रवा की वाहु को देखकर उनकी कान्ताओं का यह अनुशोचन है । सम्भे अवसरों पर रसना अर्थात् मेखला को ऊपर को खींचनेवाला रसनोत्कर्षी ।
यह बात कहो जा चुकी है और इस विषय में किसी का मतभेद नहीं है। वस्तु इष्ट बनती है जव उसमें रमणीयता विद्यमान होती है । क्योंकि रमणीयत किसी वस्तु को हष्ट बनानेबाली होती है । सामान्यतया जव हम किसी भी की दुर्गति देखते हैं तो हमें दुःख होता ही है, किन्तु यदि वह वस्तु रमणीर हो तो हमारा दुःख और अधिक बढ़ जाता है कि जो पदार्थ स्वभाव से ही थी वह कैसी शोचनीय दशा को प्राप्त हो गयी ? इस प्रकार जिनके हो हम ड पुरानी गौरव-पूर्र्ण आनन्ददायक दशा का स्मरण करते हैं उतना ही हमारा यो वेश अधिकाधिक वढता चला जाता है । इस प्रकार विरोधी होते हुये भी शृ की व्यतीत हुई आनन्दमय दशा का स्मरण शोक को बढ़ाता ही है किन्तु शर्त य कि उसकी संयोजना नवीन भंगिमा के साथ करुण के परिपोषक के रूप में की
यह बात कहो जा चुकी है और इस विषय में किसी का मतभेद नहीं है। वस्तु इष्ट बनती है जव उसमें रमणीयता विद्यमान होती है । क्योंकि रमणीयत किसी वस्तु को हष्ट बनानेबाली होती है । सामान्यतया जव हम किसी भी की दुर्गति देखते हैं तो हमें दुःख होता ही है, किन्तु यदि वह वस्तु रमणीर हो तो हमारा दुःख और अधिक बढ़ जाता है कि जो पदार्थ स्वभाव से ही थी वह कैसी शोचनीय दशा को प्राप्त हो गयी ? इस प्रकार जिनके हो हम ड पुरानी गौरव-पूर्र्ण आनन्ददायक दशा का स्मरण करते हैं उतना ही हमारा यो वेश अधिकाधिक वढता चला जाता है । इस प्रकार विरोधी होते हुये भी शृ की व्यतीत हुई आनन्दमय दशा का स्मरण शोक को बढ़ाता ही है किन्तु शर्त य कि उसकी संयोजना नवीन भंगिमा के साथ करुण के परिपोषक के रूप में की
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इत्थं च— क्रामन्त्यः क्रतकोमलाड्गुलिवलद्रक्तैः सदृभिः स्थलीःः पादैः पातितयैकैरिव पतद्व्राशाम्बुधैरताननाः । भोता भृङ्गकरावलम्बितकरास्तद्दैरिरराटीरुडध्वजा दाराम्भः परितो भ्रमन्ति पुनरप्युद्र्रियमाणा इव ॥ इत्येवमादीनां सङीर्णपामेव निर्विघ्निरोधत्वसमवगततद्यम् । एवं ताद्रसादीनां विरोधिरसादिभिः समावेशासमावेशयोरधिपयविभागो दर्शितः ।
(अनु०) और इस प्रकार— 'घायल कोमल उँगलियों से प्रवाहित होनेवाले रक्त से भरे हुये अतः महावर लगाये हुये के समान पैरों से दर्भ-परिपूर्ण स्थलियों को पार करती हुई, प्रवहमान अश्रुओं से घुले हुये मुखवाली, डरी हुई अतः अपने हाथों को प्रियतमों के हाथों में पकड़ाये हुये तुम्हारे वधियों को खियाँ इस समय दावानिळ के चारों ओर घूम रही हैं मानों उनके विवाह सन्निहित हों ।' इत्यादि सभी का निर्विरोध समझा जाना चाहिये । इस प्रकार रक्षादिकों का विरोधी रसादिकों के साथ समावेश और असमावेश का विषय-विभाग दिखला दिया गया ।
तारावती
हो ! यह परिपोषकता शृङ्गार रस में तत्र आता है जव वर्णन में ग्राम्यता न आने पावे, शृङ्गार रस कदण के विभाव अनुभाव इत्यादि रूपों में परिणत हो जावे और उसमें ग्राम्य उक्तियों का अभाव हो । एक उदाहरण—महाभारत के स्त्रीपर्व में हताहत सैनिकों को आलम्बन मानकर शोक का वर्णन किया गया है । शोक का पूर्ण परिपाक स्त्रीपर्व में ही होता है । भूरिश्रवा की स्त्रियाँ अपने मरे हुये पति का कटा हुआ हाथ देखती हैं और विलाप करती हुई कहती हैं— 'यह वही हाथ है जो सहवास के लिये हमारी रसना को ऊपर उठाया करता था, जो हमारे स्थूल स्तनों का विमर्दन किया करता था और हमारी नाभि ऊरु तथा जङ्घाओं का स्पर्श किया करता था ।' यहाँ पर करुण के प्रसङ्ग में शृङ्गार काल को सम्बोधनचेष्टाओं का वर्णन किया गया है । ये चेष्टायें करुण का अग वन गई हैं क्योंकि शोक को अधिक तीव्रता प्रदान कर देती हैं । इसी प्रकार दिती हतपुत्रालम्बन' में 'मानो अपराध में आर्द्र कामी हो' इस उत्प्रेक्षा का प्रयोग किया गया है । इस उत्प्रेक्षा से भी शोक की
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अभुनातिविरोधोद्भरणप्रकारेण बहुतरं लक्ष्यमुपपादितं सवतोत्यसिम्प्रायेणाह—इत्यं चेति । होमाग्रिस्मृकृतं वाप्पाम्बु यदि वा वन्ध्याग्रिहत्यागदुःखोद्वसु । मथं कुमारीजनोंचितः साध्वसः । एतदियताडनाभावं प्राप्तालामुत्तिकरच्छलेति कारिकाभागोपयोगि निरुपितमित्युपसंहरति—एवमिति । तावद्ग्रहणेन वाक्यस्यान्तरमप्यस्तीति सूच्यति ॥२०॥
उस विरोधोद्भरण के प्रकार से बहुत अधिक लक्ष्य उपपादित हो जाते हैं इस अभिप्राय से कहते हैं—‘और इस प्रकार’ । होमाग्नि के धूम से उत्पन्न अश्रुजल या वन्ध्याग्रिहत्या के दुःख से उत्पन्न भय का अर्थ है कुमारीजनोंचित साध्वस। इस प्रकार इतने से ‘अद्भुत भाव को प्राप्त होनेवालों की उक्ति छलरहित होती है’ इस कारिका भाग का उपयोगी निरूपण कर दिया गया यह उपसंहार करते हैं—‘इस प्रकार’ । तावत् शब्द से सूचित करते हैं कि और भी कुछ कहना है ॥ २० ॥
भावना अधिक तीव्र हो जाती है। जब उन त्रिपुर-युवतियों ने शङ्कर जी के बाण की अग्नि का उपद्रव देखा तब उन्हें अपने पूर्वानुभूत प्रियतम समागम का स्मरण हो आया । कहाँ तो उनके प्रियतमों की वह चाटुकारिता जव कि अपनी प्रियतमाओं से तिरस्कृत होकर भी वे उनकी चाटुकारिता ही करते थे और कहाँ उनकी यह दुर्दशा । जैसी भी किसी की दुर्दशा करुणाजन ही जागृत करती है; किन्तु जव यह ज्ञात होता है कि दुर्दशा-ग्रस्त व्यक्ति पहले कितना आनन्दपूर्ण सम्पन्न जीवन व्यतीत करता था और अब उसके समस्त आनन्द समाप्त हो गये तब करुणाभाव और अधिक तीव्र हो जाता है । इस प्रकार जितना अधिक निरूपण किया जावे उतना ही प्रस्तुत पद्य निर्दोष ही सिद्ध होता है । यह विरोध का उद्धार केवल एक ही पद्य में नहीं किया जा सकता । अनेक लक्ष्य ऐसे हो सकते हैं जहाँ इस प्रकार विरोध का उद्धार किया जा सकता है । एक और उदाहरण लीजिये— किसी राजा ने अपने समस्त शत्रुओं को उच्छिन्न कर दिया है । वे शत्रु अपनी प्रियतमाओं को लेकर जंगल को भाग गये हैं । उस समय कवि का वर्णन करते हुये कवि कहता है कि—वे शत्रु दावाग्नि के चारों ओर घूम रही हैं । उस समय ऐसा मादन पड़ता है मानों उनका पुनः विवाह हो रहा हो । ( विवाह में अग्नि की परिक्रमा की ही जाती है । वे ऐसे स्थलों को पार कर रही है जहाँ कुछ विखरे हुये हैं । कुशों से उनके पैर लाल हो गये हैं तब उनकी ऐसी शोभा हो गई है मानों उनके माथे पर लगाया गया है । (विवाह में भी कुछ विछाकर उन पर
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इदानीं तेषामेकप्रबन्धनिवेशने न्याय्यो यः क्रमस्तं प्रतिपादयितुमुच्यते—प्रसिद्धेऽपि प्रवन्धानां तानरसानियन्त्रने । एको रसोडङ्गीकृतस्तत्र पामुख्येनाभिच्छता ॥ २१ ॥
इस समय उनके एक प्रवन्ध में निवेशने में जो उचित क्रम है उसके प्रतिपादन के लिये कहते हैं—‘प्रबन्धों का नाना रस निबन्धन प्रसिद्ध होने पर भी उनका उत्कर्ष चाहनेवाले के द्वारा एक रस अंग बना दिया जाना चाहिये’ ॥ २१ ॥
तदेवावतारयति—इदानीमित्यादिना । तेषां रसानां क्रम इतीयोजना । प्रसिद्धेऽ-पीति । भरतमुनिनिप्रवृत्तिनिरूपितेऽप्यर्थे । तेषामिति प्रवन्धानाम् । महाकाव्यादिष्वित्यादिशब्दः प्रकारे । अनभिनेयान् भेदानाह, द्वितीयस्त्वभिनेयान् । विप्रकीर्णेत्यादिना । नायकप्रतिप्रकृतिप्रकरोन्नायिकादीनतिशयितयैः । अङ्गीभावस्थैवैकनायकप्राधान्येन निवेशः । युक्ततर इति । यद्यपि समवकारादौ पर्यायबन्धादौ च नैकरसत्वं तथापि नायुक्तता तस्याप्येवंविधो यः प्रबन्धः ।
प्रबन्धेषु महाकाव्यादिषु नाटकोद्भवु वा । विप्रकीर्णेत्यादिभावेन बहुरसा उपनिबन्ध्यन्त इत्यत्र प्रसिद्धौ सत्यामपि यः मुख्यवृत्या रसोऽङ्गीकृतस्तेन निवेशयितव्य इत्ययं युक्ततरौ मार्गः ।
प्रबन्धों में अर्थात् महाकाव्य इत्यादि में अथवा नाटक इत्यादि में विरखरे हुए रुप में अङ्गाङ्गि भाव से बहुत से रसों का उपनिबन्धन किया जाता है इस प्रसिद्धि के होते हुये भी जो मुख्य वृत्य से रस को अङ्गी के रुप में सन्निविष्ट कर दिया जाना चाहिये यह अधिक उचितमार्ग है ।
वहीं अवतारित करते हैं—‘इस समय’ इत्यादि के द्वारा। उन रसों का क्रम यह योजना है । ‘प्रसिद्ध होने पर भी’ यह । अर्थात् भरतमुनि इत्यादि के द्वारा निरुपित होने पर भी।उनका अर्थात् प्रबन्धों का । ‘महाकाव्य इत्यादि में’ यहाँ आदि शब्द प्रकारवाचक है।अनभिनेय भेदों को कहता है; द्वितीय तो अभिनेयों को।‘विप्रकीर्ण रुप में’ यह । अर्थात् नायक, पताका और प्रकरी नायक इत्यादि में रहने के कारण।अङ्गीभाव के द्वारा अर्थात् एकनायकप्रधान होने के कारन । यद्यपि समवकार इत्यादि में और पर्यायबन्ध इत्यादि में एक का अङ्गित्व नहीं होता तथापि उसकी भी अयुक्तता नहीं होती इस प्रकार का जो प्रबन्ध होता है जैसे नाटक या महाकाव्य वह अधिक उत्कृष्ट होता है यह तर शब्द का अर्थ है ॥ २१ ॥
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तारावती
भंवरों में पैर रख्खे जाते हैं और पैरों में महावर लगाया जाता है । ) उन पर जो आपत्ति पड़ी है उसके कारण उनके आँसू वह रहे हैं जिससे उनके मुख धुल गये हैं । ( विवाह में भी एक तो होम के धुयें के कारण कुमारियों के आँसू बहते हैं दूसरे उन्हें अपने बन्धुजनों के परित्याग का दुःख होता है इससे भी उनके आँसू बहते हैं । ) वे डरी हुई हैं क्योंकि राजमहलों को छोड़कर पहले पहल उन्हें वनों के भयानक दृश्यों का सामना करना हुआ है । ( विवाद में भी कुमारियों का स्वभाव ही डरना होता है । पहले पहल अपने प्रियतमों के सम्पर्क में उन्हें भय का अनुभव होता है । ) उन्होंने अपने हाथ अपने पतियों के हाथों में दे दिये हैं क्योंकि वनों में बिना हाथ का सहारा लिये चलना उनके लिये अशक्य है । ( विवाह में भी पतियों के हाथ में वधुओं का हाथ दिया जाता है । ) इस प्रकार दाराग्निरूपी विवाह-होमाग्नि के चारों ओर शत्रुसैन्य भूम रही है ।
यहाँ पर राजाओं और उनकी पत्नियों का करुण रस अङ्गी है । उस करुण रस को पुष्ट करनेवाला है उनका विवाहोत्सव के समय का आनन्द का स्मरण । ऐसे अवसरों पर सर्वत्र ही निर्विरोध को समझ लेना चाहिये । इस प्रकार रस इत्यादि का विरोधी रस इत्यादि के साथ समावेश और असमावेश का विषय-विभाग तो दिखला दिया गया । 'तो' का अर्थ है कि इस विषय में और भी बहुत कुछ कहा जा सकता है ॥ ०?॥
उपर की कारिका की वृत्ति में 'तावत्' शब्द का प्रयोग कर यह सङ्केत दिया गया था कि इस विषय में और भी कुछ कहना शेष है । वह क्या है ? इसी प्रश्न का उत्तर २? वाँ कारिका से दिया जा रहा है । इस कारिका में यह दिखलाया गया है कि यदि कई रस किसी एक प्रवन्ध में आ जावें तो उनके एक में सन्निविष्ट करने का क्रम क्या होना चाहिये ? कारिका का आशय यह है—'यद्यपि यह बात प्रसिद्ध है कि प्रवन्धों में अनेक रसों का निवन्धन किया जाता है तथापि यदि कवि अपने प्रवन्ध को उत्तम बनाना चाहे तो उसका कर्तव्य है कि वह एक रस को अंगी रस बना दे ।'
'प्रसिद्ध है' कहने का आशय यह है कि भरतमुनि इत्यादि आचार्यों ने इस बात का निरूपण किया है ( और काव्य-परम्परा के परिशीलन से भी यही तथ्य प्रकट होता है । ) कि चाहे काव्य अभिनेय हो, जैसे महाकाव्य इत्यादि और न हो, जैसे नाटक इत्यादि, सभी प्रकार के काव्यों में अनेक रस आते हैं वे समस्त रस समस्त काव्य में व्याप्त होते हैं और उनमें कोई अंगी होते हैं तथा कोई अंग । कोई रस नायकगत होता है कोई प्रतिनायक गत, कोई पताका ( व्यापक
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नतु रसान्तरेषु बहुषु प्राप्तपरिपोषेषु सत्सु कथं सेक्याज्जिता न विरुध्यत इत्याशङ्क्येते—
रसान्तरसमावेशः प्रस्तुतस्य रसस्य यः । नोपहन्त्यडितां सोऽस्य स्थायित्वेनावभासितः ॥ २२ ॥
प्रवन्धेषु प्रथममतरं प्रस्तुतः सन् पुनः पुनरनुसन्धीयमानत्वेन स्थायी यो रस-स्तस्य सकलप्रवन्धध्व्यापिनो रसान्तरैरन्तरालवर्तिभिः समावेशो यः स नाझिता-मुपहन्ति ।
(अनु०) परिपोष को प्राप्त होनेवाले बहुत से दूसरे रसों के होते हुये भी एक का अङ्गी होना विरुद्ध क्यों नहीं होता ? यह शङ्का कर कह रहे हैं—
‘प्रस्तुत रस का जो दूसरे रसों के साथ समावेश वह स्थायी के रूप में अभासित होनेवाले इस रस के अङ्गीभाव को नष्ट नहीं करता ॥ २२ ॥
प्रबन्ध में पहले ही प्रस्तुत तथा बार-बार अनुसन्धान किये जाने के कारण स्थायी जो रस उस समस्त प्रबन्ध में व्यापक रस का अन्तरालवर्ती दूसरे रसों के साथ जो समावेश वह उसकी अङ्गिता को उपहत नहीं करता ॥
तारावती
प्रासङ्गिक इतिवृत्त) के नायक से सम्बद्ध होता है और कोई प्रकरी (प्रदेशस्थ प्रासङ्गिक इतिवृत्त ) के नायक से सम्बद्ध । आशय यह है कि एक नायक में रहनेवाला कोई रस अपने नायक की सत्ता के अनुसार ही महत्त्व को प्राप्त होता है । यदि प्रधान नायक गत ( आधिकारिक कथावस्तु के नायक गत ) होता है तो अंगी होता है नहीं तो अङ्ग । यह सब प्रसिद्ध है तथापि यदि कवि की कामना हो कि उसका काव्य अत्यन्त रमणीयताशाली हो तो उसे उन समस्त रसों में किसी एक अभोग्य रस को अंगी अवश्य बनाना देना चाहिये यही अधिक अच्छा भाग है । ‘अधिक अच्छा’ कहने का आशय यह है कि ऐसे भी काव्य होते हैं जिनमें किसी एक रस की प्राधान्यता नहीं होती । उदाहरण के लिये श्रृङ्गार काव्य में पर्यायबन्ध और हर्ष काव्यों में समवकार ऐसे ही काव्य होते हैं जिनमें विभिन्न रस विखरे हुये होते हैं और उनमें किसी एक को अंगी के रूप में यदि प्रतिष्ठित न किया जावे तो कुछ अनुचित नहीं होता तथापि नाटक या महाकाव्य में एक रस को अंगी बनाना तो अनिवार्य ही होता है । यही कारण है कि पर्यायबन्ध, समवकार इत्यादि की अपेक्षा महाकाव्य और नाटक अधिक उत्कृष्ट माने जाते हैं । अतः यह स्वीकार करना ही चाहिये कि अनेक रसों में किसी एक को अंगी बनाना अधिक समीचीन होता है ॥२१॥
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नन्विति । स्वयं लङ्घपरिपोषत्वे कथमङ्गत्वम् ? अलङ्घपरिपोषत्वे वा कथम् रसस्वमङ्गत्वं चान्योन्यविरुद्धं तेषां चाङ्गाङ्गियोगे कथमेकस्याङ्गित्वमुक्तंमिति माचः । प्रसुतुतस्य समस्तेतिवृत्तस्याप्यपिनस्तत एव विततस्यापि कवेर्नाङ्गिमायोचिततस्य रसान्तरैरितिवृत्तवृत्तशायातत्स्वेन परिमितकथाशकलङ्गयापीयते समावेशः समुपचयङ्गणं स तस्य स्थायित्वेनैतिवृत्तस्यापितया भासमानस्य नाङ्गितामुपहन्ति, अङ्गितां पोषयत्येवेत्यर्थः ।
'ननु' यह । स्वयं परिपोष को प्राप्त होने पर अङ्गत्व कैसे ? अथवा परिपोष को न प्राप्त होने पर रसत्व कैसे ? इस प्रकार रसत्व और अङ्गत्व के सिद्ध न होने पर कैसे एक का अङ्गी होना कहा गया है ? यह प्रश्न का भाव है । 'रसान्तर' यह । प्रस्तुत तथा समस्त इतिवृत्त में व्यापक और इसीलिये विस्तृत व्याप्तिवाला होने के कारण अङ्गी होने के अधिकारी ( किसी ) रस का इतिवृत्त वंश होने के कारण परामित कथाखण्डों में व्याप्त दूसरे रसों के साथ जो समावेश अर्थात् उसका अभिवर्धन वह उस स्थायी होने से इतिवृत्त में व्यापक होने के कारण शोभित होनेवाले ( रस ) को मुख्यता को उपहत नहीं करता अर्थात् अङ्गिता को पुष्ट ही करता है ।
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( प्रश्न ) रस की निरनुबन्धं होने आचायों ने लिखा है कि रस उसे कहते हैं जो वेदान्तरस्पर्शंशून्य हो अर्थात् जिसके आस्वादन के अवसर पर अन्य सभी प्रकार के संवेदनों पदाथों का तिरोभाव हो जावे जो स्वप्नाद्यननुचिन्मय हो और जिसका स्पष्ट अखण्ड हो उसे रस कहते हैं । रस की इस परिभाषा को स्वीकार कर लेने पर उनका अंगाङ्गभाव तो दूर रहा उनक एक साथ समावेश भी कठिन प्रतीत होता है, वह न तो दूसरे का अंग ही हो सकता है और न अंगी ही । यदि स्वमान्ग्रीसम्बन्धन में ही उसका परिपोष हुआ है तो वह अंग किस प्रकार हो सकता है ? यदि उसका परिपोष दोष नहीं हो गया है तो वह रस ही किस प्रकार कहा जा सकता है ? इस प्रकार अनेक रसों के परिपुष्ट हो जाने पर एक को ही अंगी कह देना क्यों सिद्धान्तविरुद्ध नहीं है ? आशय यह है कि रस कभी अंग नहीं हो सकता और अंग कभी रस नहीं हो सकता । रसत्व और अंगत्व परस्पर विरुद्ध हैं । जन अंगत्व रस में आही नहीं सकता तो कोई एक अंगी भी कैसे हो सकता है ? ( उत्तर ) —
( प्रश्न ) रस की निरन्तरता के विषय में आचार्यों ने कहा है कि रस वह है जो अन्य संवेदनाओं से रहित हो और जिसका आस्वादन अखण्ड रूप से किया जा सके । यदि इस परिभाषा को स्वीकार किया जाए, तो यह समझना मुश्किल हो जाता है कि कैसे विभिन्न रस एक साथ मौजूद हो सकते हैं या एक दूसरे के अंग और अंगी हो सकते हैं । यह प्रश्न उठता है कि यदि एक रस की प्रधानता है, तो वह अन्य रसों के साथ कैसे संबंधित हो सकता है? और यदि उसका पोषण अन्य रसों द्वारा होता है, तो क्या वह अभी भी रस कहला सकता है? यहाँ यह तर्क दिया गया है कि रस और अंगत्व परस्पर विरोधी हैं, इसलिए एक ही समय में कोई एक रस अंगी नहीं हो सकता ।
'प्रस्तुत रस स्थायी के रूप में अवभासित होता है ( और वही अंगीरस कहा जाता है । ) यदि उसमें ( प्रसंगदश ) अन्यरसों का समावेश हो जावे तो उसके अंगी होने में कोई उपघात नहीं होता ॥१२२॥
'प्रस्तुत रस स्थायी भाव के रूप में प्रकट होता है ( और वही प्रधान रस या अंगीरस कहलाता है ) । यदि उसमें अन्य रसों का समावेश प्रसंगवश हो जाए, तो भी उसके प्रधान ( अंगी ) होने में कोई बाधा नहीं आती ।'
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प्तदुक्तं भवति—अङ्गभूतान्यपि रसान्तराणि स्वविषयावाङ्मात्रामपि स्वावस्थायां यथापि लङ्घपरिपोषाणि चमत्कारगोचरतां प्रतिपद्यन्ते, तथापि स चमत्कारस्तत्रैव न परितुष्य विश्वास्यति किन्तु चमत्कारान्तरमनुभावति । सर्वैरङ्गाङ्गिभावेऽप्यनयोः सन्नः । यथाह तत्नभवान्—
गुणः कृतमसंस्कारः प्रधानं प्रतिपद्यते । प्रधानस्योपकारे हि तथा भूयसी वलतेते ॥ इति ॥ १२२॥
गुणः कृतमसंस्कारः प्रधानं प्रतिपद्यते । प्रधानस्योपकारे हि तथा भूयसी वलतेते ॥ इति ॥ १२२॥
यह कहा गया है—अङ्गभूत भी दूसरे रस अपनी विषय—विमिश्र इत्थादि की सामग्री से अपनी अवस्था में यथापि परिपोष को प्राप्त होकर चमत्कार—गोचरता को प्राप्त कर लेते हैं तथापि वह चमत्कार उतने से ही सन्तुष्ट नहीं होता, किन्तु दूसरे चमत्कार की ओर दौड़ता है । अङ्गाङ्गिभाव में भी उभयत्र यह सन्निहित घटना होती है । जैसा कि श्रीमान् जी ने कहा है—
'गुण अपना संस्कार करके प्रधान को प्राप्त हो जाता है, और प्रधान के उपकार करने में अधिकता में वतमान होता है' यह ॥ १२२ ॥
तारावती आचार्य यह है कि वही रस काव्य में अङ्गीभूत होकर धारण करता है जो नाटक के बीज के साथ ही सर्वप्रथम उपस्थित हो और काव्य जितना ही आगे बढ़ता वह रस भी साथ साथ परिपोष को प्राप्त होता रहे तथा उसका वार वार अनुसन्धान भी कर लिया जाता रहे । इस प्रकार के रस को हम काव्य का स्थायी रस सकते हैं; क्योंकि यह रस समस्त प्रवन्ध में व्याप्त होता है और प्रारम्भ से सम पर्यन्त स्थिर बना रहता है । बीच बीच में और रस भी आते रहते हैं । उनके समावेश से इस व्यापक रस में होता चलता है । अन्य रसों से मिल जाने के कारण उसकी अंगिता ( प्रधानता ) नष्ट नहीं होती। सारांश यह है कि किसी रस के समस्त इतिहास में व्याप्त होने के ही कारण अंगी होने की योग्यता प्राप्त होती है । इतिहास में कोई एक ही रसा हो ऐसा तो कोई नियम नहीं है । कुतः कहाँ है । इतिहास में कोई एक ही कथा होती है और उसके साथ छोटी-छोटी कथाओं के खण्ड मुंथे हुये से चलन रहते हैं । उन छोटी छोटी कथाओं में स्वतन्त्र रसों की सत्ता विद्यमान रहती है । इस प्रकार वे छोट-छोटे रस उसी व्यापक रस को बढ़ाते हैं और वह धीरे धीरे में ही बढ़ता चला जाता है। उसकी अंगिता नष्ट नहीं होतीं अमित पुष्ट होती रहती है ।
यहाँ पर जो कुछ कहा गया है उस सबका सार यहाँ है कि खण्ड रसों का विभाव इ.यादि सामग्री भी पूर्ण होती है और उनका परिपोष भी अनन्या अवस्था से हो ही जाता है तथा वे भी चमत्कार—गोचरता को प्राप्त हो हो जाते हैं । किन्तु
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एतदेवोपपादयितुमुच्यते—कार्यमेकं यथा वयापि प्रवन्धस्य विधीयते । तथा रसस्यापि विधौ विरोधो नैव विद्यते ॥२३॥
(अनु०) इसको सिद्ध करने के लिये कह रहे हैं—‘जिस प्रकार प्रवन्ध के एक व्यापक कार्य का विधान किया जाता है उसी प्रकार रस की विधि में भी विरोध नहीं होता ॥ २३ ॥
लोचन उपपादयितुमिति । दृष्टान्तस्य समुचितत्व निरूपणेनेति भावः । न्यायेन चैतदेवोपपाद्यते । कार्यं हि तत्रदेकसेवाधिकारिकं व्यापकं प्रासङ्गिककार्यान्तरोपक्रियमाणमवश्यमझकार्यंस्य । तत्प्रध्वर्तिनीनां नायकचित्तवृत्तीनां तद्बलादेवाझाझिमावः प्रवाहपतित इति किमत्रापूर्वेर्मिति तात्पर्यम् । तथैति व्याप्तितया । यदि वा एकारो मिन्नक्रमः । तथैव तैरेव प्रकारेण कार्याझाझिमावारूपेण रसानामपि बलादेवासावापत्तीर्थः । तथा च वृत्तौ वक्ष्यति ‘तथैव’ इति । तारावती वह चमत्कार अपने स्वरूप में ही नहीं रक जाता अपितु दूसरे ( प्रधान रस के ) चमत्कार की ओर दौड़ता है । अंगाङ्गिभाव में सवत्र यही बात लागू होती है । यही बात निम्नलिखित कारिका में कही गई है :- ‘गौण ( तद्य ) अपने संस्कार कर लेने के बाद प्रधान को प्राप्त हो जाता है और प्रधान के बहुत बड़े उपकरण में वर्तमान हो जाता है ।। इस प्रकार गौण रसों का प्रधान रस में समावेश दूषित नहीं कहा जा सकता और उनका विरोध भी अकिञ्चित्कर हो जाता है ॥ २२ ॥ २२ वीं कारिका में जो बात कही गई है उसको सिद्ध करने के लिये २३ वीं कारिका में एक समुचित दृष्टान्त का निरूपण किया गया है । कारिका का आशय यह है :-
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सन्ध्यादिमयस्य प्रबन्धशरीरस्य यथैकस्मानुयायि वाक्यं कल्प्यते न च तत्कार्यान्तरैरिति संज्ञीयते, न च तैः संज्ञीयमानस्यापि तथ्य प्राधान्यमपचीयते, तथैव रसस्याप्येकस्य सत्रिवेशे क्रियमाणे विरोधे न कश्चित् । प्रत्युत रसस्याहित-त्रिवेकानमनुसन्धावतां सचेतसां तथाविधे विषये प्रह्लादातिशायः प्रवर्तते ।
जिस प्रकार सन्धि इत्यादि से युक्त प्रबन्ध-शरीर के अन्ततक जानेवाले व्यापक कार्य की कल्पना की जाती है और ऐसा नहीं होता कि उसका सादृश्य दूसरे कायों से न हो। यह भी नहीं होता कि उनके द्वारा सङ्ङीय हो जाने पर भी उसकी प्रधानता जाती रहती हो। उसीप्रकार सत्रिवेश किचे जाने पर रस का भी कोई विरोध नहीं होता। इसके प्रतिकूल उदय हुये विवेकवाले अनुसन्धान करनेवाले सद्धदयों का उस प्रकार के विषय में अत्यन्त आनन्द प्रकट हो जाता है।
कार्यमिति । ‘स्वल्पमात्रं समुद्धिष्टं बहुधा योजयिष्यति’ इति लक्षणे बीजम् । बीजावप्रृक्तिं प्रयोजनानि विच्छेदे यदविच्छेदकारणं यावत्समाप्तिवन्धं स तु विन्दुः । इति विन्दुरुपयार्थप्रकृत्या निर्वहणपर्यन्तं व्याप्नोति तदाह-अनुयायिति । अनेन बीजं हति विन्दुरुपयर्थप्रकृती सङ्गृह्ङीते । कार्यान्तरैरिति । ‘आनन्दादिविमर्शाद्धा पताका विनिवर्तते’ इति प्रासङ्कितं यत्प्राप्तकालक्षणार्थप्रकृतिनिष्ठं कार्यं यानि च तत्तोड्यूनन्यास्तया प्रकारोल्लक्षणानि कार्याणि तैरित्येवं पञ्चानामर्थप्रकृतीनां वाक्यैकरूपाक्यतया निवेश उत्कः । तथाविध इति । यथा तपस्वत्सराजे । एवमनने श्लोकेनाझाझितायां दृष्टान्तनिरूपणमिति द्वृत्तत्वलापतितत्वं च रसाझाझिमावस्येति दृश्यं निरुपितम् । वृत्ति-ग्रन्थोद्युमयोरभिप्रायणकथनं नैत् ।। २३ ।।
‘कार्य यह’। जो थोड़ी मात्रा में समुद्धिष्ट होकर बहुत प्रकार से फैलता है’ यह बीज लक्षित किया गया। बीज से लेकर प्रयोजनों के विच्छिन्न हो जाने पर जो अविच्छेद का कारण हो वह तो विन्दु होता है। इस विन्दुरूप अर्थ प्रकृति से निर्वहण पर्यन्त व्यापक कर लेता है—वह कहते हैं—‘अनुयायी’ यह। इससे बीज और विन्दु इन दो अर्थप्रकृतियों का संग्रह हो गया। ‘दूसरे कायों से’ यह। ‘गर्भ तक या विमर्श तक पताका निवृत्त हो जाती है’ इस प्रकार पताका-रूप जो अर्थप्रकृति में रहनेवाला कार्य और जो उससे क्रम व्यापकवाला होने के कारण प्रकरी रूप कार्य उनके द्वारा’ इस प्रकार पाँचों ही अर्थप्रकतियों का वाक्यैकवाक्यता के रूप में निवेश कहा गया है। ‘उस प्रकार का’ यह। जैसे तपस्वत्सराज में। इस प्रकार इस श्लोक के द्वारा अज्ञाझिभाव में दृष्टान्त निरूपण तथा रस के अज्ञाझिभाव में इतिवृत्त के बलपर आना इन दोनों का निरूपण किया गया है। वृत्ति ग्रन्थ की योजना भी इसीप्रकार करनी चाहिये ।। २३ ।।
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"जिस प्रकार प्रवन्ध के एक व्यापक कार्य का विधान किया जाता है वही प्रकार रस की विधि में भी अवनाया जा सकता है उसमें कोई विरोध नहीं होता।" प्रस्तुत कारिका का आशय ठीक रूप में समझने के लिये यह आवश्यक है कि नाट्य-वस्तु-विधान की निश्चित रूपरेखा समझ ली जाये। चाहिये। वस्तुतः दो प्रकार की होती है—आधिकारीक और प्रासङ्गिक। प्रत्येक काव्य का एक फल होता है। उस फल पर स्वामित्व अधिकार कहलाता है। उस अधिकार को लेकर चलनेवाली कथावस्तु को आधिकारिक कथावस्तु कहते हैं। प्रासङ्गिक कथावस्तु का उद्गादान आधिकारिक के उपकार के लिये ही होता है। आधिकारिक कथावस्तु समस्त प्रवन्ध में व्याप्त होती है और प्रासङ्गिक काव्य के थोड़े भाग में। प्रवन्धनिर्वाह के लिये पाँच कार्यावस्थाओं, पाँच अर्थप्रकृतियों और पाँच सन्धियों पर विचार किया जाता है। पाँच कार्यावस्थायें होती हैं—आरम्भ, यत्न, प्रत्याशा, नियताप्ति और फलागम। पाँच अर्थप्रकृतियाँ होती हैं—बीज, विन्दु, पताका, प्रकरी और कार्य, तथा पाँच सन्धियाँ होती हैं—मुख, प्रतिमुख, गर्भ, विमर्श और निर्वहण। इन सन्धियों में प्रत्येक के अनेक अङ्ग भी होते हैं। इन समस्त तत्त्वों के लक्षण और सन्ध्यङ्गों के लक्षण तथा परिभाषायें नाट्यशास्त्रीय ग्रन्थों में विस्तारपूर्वक दी गई हैं। इस कारिका का आशय यह है—इस विषय में कोई सन्देह नहीं हो सकता कि सन्धि इत्यादि से युक्त कथाशरीर में एक व्यापक कार्य स्वीकार करना अनिवार्य है जो कि प्रवन्ध के अन्त तक चला जाता है। आधिकारिक नाट्यवस्तु का प्रवर्तक होता है बीज। बीज की परिभाषा की गई है—'जो बहुत ही थोड़ी मात्रा में उद्देश्य के रूप में स्वीकार किया गया हो और नाट्यवस्तु में बहुत प्रकार से व्याप्त हो जाने उसे बीज कहते हैं।' जैसे छोटे से बीज से विशाल वटवृक्ष तैयार हो जाता है। उसीप्रकार छोटे से नाट्यबीज से कथानक का विशाल कलेवर तैयार हो जाता है। जैसे रत्नावली में 'द्रोपादन्यास्मादपि' इत्यादि कथन नाट्यबीज है। बीज को लेकर वस्तु जब आगे बढ़ती है तब कथासूत्र के प्रवाह में पड़कर कोई ऐसा स्थल आ जाता है जहाँ कथा-प्रयोजन विच्छिन्न हुआ सा दिखाई पड़ने लगता है। उस समय कोई ऐसा तत्त्व आ जाता है जो उस वस्तु को और आगे बढ़ा देता है तथा वस्तु को अन्त तक अग्रसर करता रहता है, उस तत्त्व को विन्दु कहते हैं। विन्दु का कार्य कथावस्तु में विच्छेद न उत्पन्न होने देना है। इस प्रकार आधिकारिक कथावस्तु बीज और विन्दु इन दो अर्थप्रकृतियों के महयोग से प्रारम्भ से अन्त तक चली जाती है। (कार्य के विषय में पहले ही बतलाया जा चुका है कि वह एक व्यापक तत्त्व होता है जो प्रारम्भ से अन्त तक चलता रहता है
"जिस प्रकार प्रवन्ध के एक व्यापक कार्य का विधान किया जाता है वही प्रकार रस की विधि में भी अवनाया जा सकता है उसमें कोई विरोध नहीं होता।" प्रस्तुत कारिका का आशय ठीक रूप में समझने के लिये यह आवश्यक है कि नाट्य-वस्तु-विधान की निश्चित रूपरेखा समझ ली जाये। चाहिये। वस्तुतः दो प्रकार की होती है—आधिकारीक और प्रासङ्गिक। प्रत्येक काव्य का एक फल होता है। उस फल पर स्वामित्व अधिकार कहलाता है। उस अधिकार को लेकर चलनेवाली कथावस्तु को आधिकारिक कथावस्तु कहते हैं। प्रासङ्गिक कथावस्तु का उद्गादान आधिकारिक के उपकार के लिये ही होता है। आधिकारिक कथावस्तु समस्त प्रवन्ध में व्याप्त होती है और प्रासङ्गिक काव्य के थोड़े भाग में। प्रवन्धनिर्वाह के लिये पाँच कार्यावस्थाओं, पाँच अर्थप्रकृतियों और पाँच सन्धियों पर विचार किया जाता है। पाँच कार्यावस्थायें होती हैं—आरम्भ, यत्न, प्रत्याशा, नियताप्ति और फलागम। पाँच अर्थप्रकृतियाँ होती हैं—बीज, विन्दु, पताका, प्रकरी और कार्य, तथा पाँच सन्धियाँ होती हैं—मुख, प्रतिमुख, गर्भ, विमर्श और निर्वहण। इन सन्धियों में प्रत्येक के अनेक अङ्ग भी होते हैं। इन समस्त तत्त्वों के लक्षण और सन्ध्यङ्गों के लक्षण तथा परिभाषायें नाट्यशास्त्रीय ग्रन्थों में विस्तारपूर्वक दी गई हैं। इस कारिका का आशय यह है—इस विषय में कोई सन्देह नहीं हो सकता कि सन्धि इत्यादि से युक्त कथाशरीर में एक व्यापक कार्य स्वीकार करना अनिवार्य है जो कि प्रवन्ध के अन्त तक चला जाता है। आधिकारिक नाट्यवस्तु का प्रवर्तक होता है बीज। बीज की परिभाषा की गई है—'जो बहुत ही थोड़ी मात्रा में उद्देश्य के रूप में स्वीकार किया गया हो और नाट्यवस्तु में बहुत प्रकार से व्याप्त हो जाने उसे बीज कहते हैं।' जैसे छोटे से बीज से विशाल वटवृक्ष तैयार हो जाता है। उसीप्रकार छोटे से नाट्यबीज से कथानक का विशाल कलेवर तैयार हो जाता है। जैसे रत्नावली में 'द्रोपादन्यास्मादपि' इत्यादि कथन नाट्यबीज है। बीज को लेकर वस्तु जब आगे बढ़ती है तब कथासूत्र के प्रवाह में पड़कर कोई ऐसा स्थल आ जाता है जहाँ कथा-प्रयोजन विच्छिन्न हुआ सा दिखाई पड़ने लगता है। उस समय कोई ऐसा तत्त्व आ जाता है जो उस वस्तु को और आगे बढ़ा देता है तथा वस्तु को अन्त तक अग्रसर करता रहता है, उस तत्त्व को विन्दु कहते हैं। विन्दु का कार्य कथावस्तु में विच्छेद न उत्पन्न होने देना है। इस प्रकार आधिकारिक कथावस्तु बीज और विन्दु इन दो अर्थप्रकृतियों के महयोग से प्रारम्भ से अन्त तक चली जाती है। (कार्य के विषय में पहले ही बतलाया जा चुका है कि वह एक व्यापक तत्त्व होता है जो प्रारम्भ से अन्त तक चलता रहता है
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और अन्त में जहाँ बीज का फल से योग होता है वहाँ दृश्यों और पाठकों को कार्य की प्रत्यक्ष प्रतीति होती है । इस प्रकार बीज, बिन्दु और कार्य इन तीन अर्थप्रकृतियों का सम्वन्ध आधिकारिक कथावस्तु से होता है और उसमें बीज तथा बिन्दु के सहयोग से अनुयायी कार्य व्यावृत्त रूप में कलित कर लिया जाता है ।
यह तो हुई आधिकारिक वस्तु की बात । वह आधिकारिक वस्तु प्रासङ्गिक वस्तु से साक्षात् को न प्राप्त होती हो ऐसा नहीं होता आशय यह है कि आधिकारिक वस्तु के कार्य के साथ अन्य कार्य भी आते हो हैं । ये कार्य दो प्रकार के होते हैं—एक तो ऐसे कार्य जो आधिकारिक कार्य के साथ कुछ दूर तक चलते हैं और उन्हें पताका नाम से अभिहित किया जाता है और दूसरे वे कार्य जो किसी एक देश में आकर वहीं समाप्त हो जाते हैं । उन्हें प्रकरी कहते हैं ।
पताका या तो गर्भसन्धि तक चलती है या फिर अधिक से अधिक विमर्शसन्धि पर्यन्त जाती है । उसके बाद निबृत्त हो जाती है । इस प्रकार विस्तृत पताका या स्वल्प देश गत प्रकरी को बीज बिन्दु इत्यादि से मिलाकर कथाशरीर का निष्पादन होता है । इस प्रकार मुख्य-वस्तु के साथ प्रासंगिक वस्तु के सन्निवेश से मुख्य-रस का प्राधान्य समाप्त नहीं हो जाता ।
इसी प्रकार मुख्य ( अंगी ) रस में अप्रधान रसों का समावेश करने में कोई विरोध नहीं होता । इसके प्रतिकूल कहा जा सकता है कि जो सहृदय विवेकशील हैं और ठीक रूप में अपेक्षा का अनुसन्धान करते हैं उन सहृदयों को दूसरे रसों से सङ्घर्षण मुख्य रस के आस्वादन में प्रमोद की मात्रा बहुत अधिक बढ़ जाती है । जैसे तपस्वत्सराज में ।
( इसकी व्याख्या पहले की जा चुकी है । ) इस कारिका में दो बातें कही गई हैं—( १ ) इतिवृत्त के हृदयान्त से यह सिद्ध किया गया है कि जिस प्रकार इतिवृत्त में मुख्य वस्तु के साथ अमुख्य वस्तु का समावेश दूषित नहीं होता और न मुख्य वस्तु की मुख्यता को ही व्याघात लगता है उसी प्रकार अमुख्य रसों के समावेश से मुख्य रस की न तो मुख्यता नष्ट होती है और न किसी प्रकार का विरोध आता है ।
( २ ) मुख्य इतिवृत्त का रस मुख्य रस होता है और अमुख्य इतिवृत्त का रस अमुख्य होता है । अतः उनका अंगांगिभाव असंगत नहीं माना जा सकता । वृत्ति ग्रन्थ की योजना भी इन्हीं दो दृष्टिकोणों से की जानी चाहिये ।
ऊपर यह सिद्ध किया जा चुका है कि दो रसों का अंगांगिभाव सम्भव है । यहाँ पर यह प्रश्न उपस्थित होता है कि कुछ रस तो ऐसे हैं जिनका एक में सन्निवेश सम्भव है और कुछ रस ऐसे हैं जिनका परस्पर सन्निवेश सम्भव नहीं हैं । जिन रसों का परस्पर सन्निवेश सम्भव है इन रसों का तो अंगांगिभाव बन जाता है ।
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ध्वन्यालोके
ननु येषां रसानां परस्पराविरोधः यथा वीरशृङ्गारयोः शृङ्गारहास्यशृङ्गारवीभत्सयोर्वीररौद्रयो रौद्रकरुणयोः शृङ्गाराद्भुतयोर्[वा] तत्र भावः तेषां तु कथं वाध्यबाधकभावः ? यथा शृङ्गारवीरभयानकयोः शान्तरौद्रयोः शान्तशृङ्गारयोर्[वा] ।
(अनु०) (प्रश्न) जिन रसों का परस्पर अविरोध है जैसे वीर शृङ्गार हास्य का, शृङ्गार रौद्र का, वीर अद्भुत का, वीर रौद्र का, रौद्र करुण शृङ्गार और अद्भुत का, उनमें अंगाङ्गिभाव हो उनका तो कैसे परस्पर बाध्यबाधक भाव है जैसे शृङ्गार वीभत्स का, वीर भयानक का अथवा शान्त-शृङ्गार का ?
लोचन
शृङ्गारादिविरोध्युत्तनयपराक्रमादीनां कन्यकत्कन्यकादौ । स्फुटमेव तदङ्गत्वम् । हास्यस्य स्वयमपुरुषार्थस्वभावत्वेऽपि समधिकतरतर शृङ्गाराङ्गतयैव तथात्वम् । रौद्रस्यापि तेन कथञ्चिदविरोधः । यथोक्तम् - ‘प्रसभं सेवते’ इति रौद्रप्रश्रितिमः रक्षोदानवोद्धतमनुष्यैरिल्वर्थः । है विषयमुद्यं तत् परिहर्तव्यम् । असम्मानजपृथिवीसमर्[ज्जनादिज]नितानिर्वी वीराद्भुतयोः समावेशः । यथाह सु[नि] - ‘वीरस्य चैव यत्कर्म सो[ऽ]द्भुतः’ रौद्रयोर्धोरोदत्ते मीमांसकौ समावेशः क्रोधो[द्साह]योर्विरोधात् । रौद्रकरु नैवोक्तः - ‘रौद्रस्यैव च यत्कर्म स ज्ञेयः करुणो रसः ।’
शृङ्गार से वीर का अविरोध युद्धनय पराक्रम इत्यादि के द्वारा व इत्यादि में । हास्य का तो उसका अङ्ग होना स्पष्ट ही है । अपुरुषार्थ स्वभाव होते हुये भी अपेक्षाकृत बहुत अधिक रख्खन के उत्क कारण शृङ्गार के अंग के रूप में ही पुरुषार्थ स्वरूप प्राप्त होती है किसी प्रकार उससे अविरोध होता है । जैसा कहा गया है - ‘उनक शृङ्गार का सेवन किया जाता है । उनके द्वारा अर्थान्तर रौद्र प्रक दानव और उद्दत मनुष्यों द्वारा वहाँ पर केवल नायिकाविषय परित्याग कर दिया जाना च[हिये] । असम्मान पृथिवीसम्भाजन इत विस्मय के कारण तो वीर और अद्भुत का समावेश होता है । जैस कहा है - ‘वीर का जो कर्म वह अद्भुत’ यह । वीर रौद्र का भी इत्यादि में समावेश होता है; क्योंकि क्रोध और उत्साह का विरो रौद्र और करुण का भी मुनि ने ही कहा है - ‘रौद्र का ही जो कम धमसा जाना चाहिये ।’
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तारावती
किन्तु जिनका परस्पर संकरवेश सम्भव नहीं है उनका अंगांगिभाव कैसे बनेगा ? आचार्यों के कथन के अनुसार कुछ रस परस्पर विरोधी होते हैं कुछ अविरोधी । वीर और शृंगार परस्पर अविरोषी रस होते हैं । ( वीर का आलम्बन होता है विजेतव्य व्यक्ति और शृंगार का आलम्बन होता है प्रेम-पात्र व्यक्ति । एक ही व्यक्ति को आलम्बन मानकर वीर शृंगार दोनों की निष्पत्ति नहीं की जा सकती । क्योंकि जिससे प्रेम करने की इच्छा हो उसी पर विजय प्राप्त करने की कामना नहीं हो सकती । किन्तु यदि आलम्बन भेद हो तो दोनों रसों में विरोध नहीं होता । ) जब कन्या-रत्न का लाभ युद्ध नीति अथवा पराक्रम के द्वारा होता है तो शृंगार का वीर से विरोध नहीं होता । ( रुक्मिणी की प्राप्ति युद्ध के द्वारा हुई थी, वाग्वदत्ता को उदयन ने योगन्धरायण के नीति-जन्य उत्साह से प्राप्त किया था और राक्षस विधि से कन्यापहरण में पराक्रमजन्य उत्साह से कन्या प्राप्त होती है । ) स्पष्ट तो यह है कि शृंगार का अंग होता है हास्य । ( दोष ने शृंगार की प्रकृति को हो हास्य कहा है । ) समस्त रसों में आश्रय के उपनिवन्धन का अनिवार्य नियम है अर्थात् रसों में यह अवश्य ही दिखलाया जाता है कि अमुक भाव किसमें उद्भूत हुआ । यदि शकुन्तला की रति का वर्णन किया जावेगा तो उस रति का आश्रय दुष्यन्त है यह अवश्य दिखलाया जावेगा । किन्तु हास्य रस में हास्य की परिस्थिति ( आलम्बन-मात्र ) का चित्रण किया जाता है । यह अनिवार्यता नहीं दिखलाया जाता कि उसका आश्रय कौन है अर्थात् उस परिस्थिति से हँसी किसको आई । ( उसका आश्रय या तो समस्त सहृदय होते हैं या सहृदयों द्वारा कल्पित कोई व्यक्ति ) । तथापि हास्य रस में यह विशेषता होती है कि वह अनुरंजन बहुत अधिक मात्रा में उत्पन्न करता है और इस प्रकार शृंगार रस के होने को अधिकोप्ति करता है । अतः हास्य को शृंगार का अंग होकर ही आश्रय प्राप्त होता है । अतः उसी रूप में हास्य के अवयवों की पूर्ति होती है और उसे रसस्वता प्राप्त हो जाती है । इस प्रकार हास्य और शृंगार का भी परस्पर विरोध नहीं है । रौद्र और शृंगार परस्पर विरोधी कहे जाते हैं । किन्तु उनका अविरोध भी किसी न किसी रूप में स्थापित किया जा सकता है । भरत ने कहा है कि राक्षस दानव और उद्धत स्वभाववाले मनुष्य शृंगार का सेवन बलपूर्वंक किया करते हैं । किन्तु इतना ध्यान रखना पड़ता है कि जिस नायिका के प्रति उनमें प्रेमप्रवृत्ति दिखलाई जाती है उस नायिका के प्रति क्रोध और उम्रति नहीं दिखलानी पड़ती । प्रेम में व्याघात डालनेवाले तथा अन्य व्यक्तियों के प्रति उनकी उग्रता का वर्णन किया जाता है । शृंगार एक ऐसा रस है
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शृङ्गाराद्भुतयोरिति । यथा रत्नावल्यामैन्द्रजालिकदर्शने । शृङ्गारवीभत्सयोरिति । ययोर्हि परस्परमुन्मूलनात्मकतयैवोद्वस्तुनः कोडाऽऽडिमावः ? आलम्बननिमग्नरूपतया च रतिरुत्पत्तिष्यति ततः पलायमानरूपतया जुगुप्सेति समानाश्रयत्वे तयोरन्योन्यसंस्कारोन्मूलनतस्तद्विरोध एव । भयोत्साहाविप्रकर्षविमुखतया च वाच्यौ । शान्तस्यापि तथाविज्ञानसंस्कारोन्मूलनत्वेऽपि ।
लोचन शृङ्गार और अद्भुत का' यह । जैसे रत्नावली में ऐन्द्रजालिक के दर्शाँन में । 'शृङ्गार और वीभत्स का' यह । निस्सन्देह जिनका उद्वत परस्पर उन्मूलनात्मक रूप में ही होता है उसमें क्या अज्ञाऽऽडिभाव ? आलम्बन में निमग्न रूप में रति का उत्थान होता है और उससे पलायन रूप में जुगुप्सा का उत्थान होता है इस प्रकार समानाश्रयत्व वे एक दूसरे के संस्कार का उन्मूलन करनेवाले होते हैं । इसी प्रकार भय और उत्साह के विरोध को भी कहना चाहिये । शान्त भी तत्त्वज्ञानजन्य समस्त संसार के विषयों से विराग ही प्राण होने के कारण चारों ओर से निरीह स्वभाववाला होता है उसका ( उन ) रति और क्रोध से विरोध ही होता है जिनका जीवन ही है विषयासक्ति ।
तारावती जो सभी के लिये हृदय होता है । अतएव जहाँ दानव इत्यादि के उद्दत स्वभाव का वर्णन होता है वहाँ साथ ही यदि किसी सुन्दरी से उसकी प्रेमलीला का भी वर्णन किया जावे तो किसी न किसी प्रकार शृङ्गार और रौद्र का परस्पर समावेश हो सकता है । वीर और अद्भुत भी परस्पर विरोधी नहीं होते । क्योंकि जहाँ वीरों के असम्भव कृत्यों का वर्णन किया जाता है वहाँ वीर और अद्भुत का परस्पर समावेश हो जाता है । मुनि ने कहा ही है कि वीर का जो कर्म वही अद्भुत होता है। धीरोदत्त स्वभाववाले भीमसेन इत्यादि में वीर और रौद्र का समावेश हो सकता है क्योंकि क्रोध और उत्साह दोनों का विरोध तो है ही नहीं । रौद्र और करुण भी विरोधी नहीं होते क्योंकि इनके सम्बन्ध को भी मुनि ने ही बतलाया है—‘रौद्र का ही जो कर्म होता है उसी को करुण रस समझा जाना चाहिये ।’ हाँ आश्रय की एकता में दोनों का विरोध होता है । यदि एक में क्रोध हो और उसके विरोधी दूसरे व्यक्ति में करुण हो तो कोई विरोध नहीं होता । शृङ्गार और अद्भुत भी परस्पर विरुद्ध नहीं होते । उदाहरण के लिये रत्नावली नाटिका में रागी और सागरिका का संमिलन ऐन्द्रजालिक की अद्भुत क्रियाओं के द्वारा हुया है और उसी के द्वारा सागरिका से वासवदत्ता की ईर्ष्या निवृत्ति हुयी है । अतः शृङ्गार और अद्भुत भी परस्पर अविरोधी होते हैं ।
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इत्याशङ्क्ये दमुच्यते— अचिरोधी विरोधी वा रसोद्भिन्नि रसान्तरे। परिपोषं न नेतव्यस्थास्यादविरोधिता ॥ ८ ॥
इत्याशङ्क्ये दमुच्यते— अविरोधी विरोधी वा रसोद्भिन्नि रसान्तरे । परिपोषं न नेतव्यस्थास्यादविरोधिता ॥ ८ ॥
(अनु०) यह आशङ्का करके यह कहा जा रहा है— 'दूसरे अङ्गीरस में अविरोधी या विरोधी रस को परिपोष को नहीं प्राप्त कराना चाहिये । इससे अविरोधिता होती है' ॥ ८ ॥ तारावती कपर उन रसों का दिग्दर्शन कराया गया है जिनका परस्पर मिल सकना सम्भव होता है और जो एक दूसरे के विरोधी नहीं होते । इसके प्रतिकूल कुछ रस ऐसे भी होते हैं जिनकी उत्पत्ति या सत्ता ही एक दूसरे को उन्नूलित करनेवाली होती है । उदाहरण के लिये श्रृङ्गार और बीभत्स को लीजिये । श्रृङ्गार का स्थायी भाव है रति और बीभत्स का स्थायी भाव है जुगुप्सा । रति का तो उद्भव होता है सब होता है जब आश्रय का मन आलम्बन के प्रति ललकने लगता है और उनमें मग्न जाता है । इसके प्रतिकूल जुगुप्सा का उदय तभी होता है जब आश्रय आलम्बन की ओर से दूर भागने के लिये आतुर हो जाता है । इस प्रकार श्रृङ्गार के संस्कारों का उन्मूलन करता है और बीभत्स श्रृङ्गार के संस्कारों का उन्मूलन करता है । अतः एक ही आश्रय में एक साथ उन दोनों का कथन संगत नहीं कहा जा सकता । इसी प्रकार भय में आलम्बन से भागने की प्रवृत्ति होती है और उत्साह में आलम्बन को अभिभूत करने के लिये उसकी ओर वढने को प्रवृत्ति होती है । अतः दोनों विरोधी हैं और दोनों का एक साथ उद्भावन ठोक नहीं कहा जा सकता । शान्तरस का प्राण होता है निर्वेद जो कि तत्त्वज्ञान से उत्पन्न होता है । संसार के समस्त विषयों से पृथक् होने की प्रवृत्ति उत्पन्न करता है । अतः समस्त ओर से स्वभाव का इच्छारहित हो जाना हो शान्त रस है । इसके प्रतिकूल रसों का जीवन है विषयों में आसक्ति । क्रोध भी विषयासक्ति से ही उत्पन्न होता है क्योंकि जब विषयों के प्रति तीव्र अनुराग होता है तभी विध्न डालनेवालों के प्रति क्रोध उत्पन्न हुआ करता है । इस प्रकार विषयों के प्रति विराग और चित्तों के प्रति अनुरक्ति इन दोनों में स्वाभाविक विरोध होने के कारण शान्तरस स्वाभाविक रूप में श्रृङ्गार और रौद्र का विरोधी है । यह पूर्वपक्ष का प्रश्न है । इसका आशय यह है कि रस का विरोध दो प्रकार का होता है—एक तो समानाधिकरण्य का विरोध और दूसरा उन्मूल्य-उन्मूलक रूप में विरोध । समानाधिकरण्य का विरोध कहों आलम्बन की एकता में होता है,
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अविरोधी विरोधी वेति । वाङ्ग्रहणस्थायिसंविदग्रायः-आङ्गिरसापेक्षया यस्य रसान्तरस्योत्कर्षो निबध्यते तदा तद्विरुद्धोऽपि रसः निबद्धाङ्गौच्यवह । अथ तु युक्यार्जनिरसेनड्यभावतायेनोपपत्तिवृत्तत इत्तद्विरुद्धोऽपि रसो वक्ष्यमाणेन विषयभेदादियोजननोपरिनिबध्यमानो न दोषावह इति विरोधाविरोधाविकचिद्विक्करौ । विनिवेशनप्रकार एव त्वच-धातव्यमिति ।
लोचन
'विरोधी अथवा अविरोधी' यह । वा ग्रहण का यह अभिप्राय है—अंगीरस की अपेक्षा जिस दूसरे रस का उत्कर्ष निबद्ध किया जाता है तब निबद्ध किया हुआ उसका अविरुद्ध रस भी प्रश्न उठानेवाला होता है । और यदि युक्तिपूर्वक अंगीरस में अङ्गभाव की प्राप्ति के द्वारा उपपत्ति घटित होती है तो विरुद्ध भी रस आगे कहे जाने योग्य विषयभेद इत्यादि की योजना के द्वारा उपनिबद्ध किया हुआ दोषावह नहीं होता । इस प्रकार विरोध और अविरोध अविकचिद्विक्कर होते हैं । विनिवेशन के प्रकार में ही तो ध्यान देना चाहिये ।
कहीं आस्वाद्य की एकता में और कहीं अधिकरण की एकता में । अतः जिन परिस्थितियों से विरोध होता है उनसे भिन्न परिस्थितियों में न तो विरोध होता है और न उनका एक साथ वर्णन दूषित ही कहा जा सकता है । किन्तु जिनका उन्मूल्य-उन्नूलक भाव में विरोध होता है उनका विरोध तो अत्यन्तिक होता है अतः उनका एकत्र समावेश दूषित क्यों नहीं होता ? इस प्रश्न का उत्तर २५वीं कारिका में दिया गया है । कारिका का आशय यह है कि-
तारावती
यदि किसी प्रकरण में कोई एक अङ्गी रस विद्यमान हो तो उसके साथ कोई भी दूसरा रस आ सकता है चाहे वह विरोधी हो चाहे अविरोधी । किन्तु शर्त यह है कि दूसरे रस को पुष्ट नहीं करना चाहिये । यदि अंगी रस पूर्णरूप से पुष्ट कर दिया जाता है और दूसरा रस पुष्ट नहीं किया जाता तो विरोध नहीं होता ॥२४॥
सारांश यह है कि श्रृंगार इत्यादि रस यदि प्रवन्ध के द्वारा व्यंग्य हो रहे हों तो अविरोधी या विरोधी किसी दूसरे रस को पुष्ट नहीं करना चाहिये । 'या' कहने का आशय यह है कि यदि अंगी रस के सामने किसी ऐसे दूसरे रस को अधिक उत्कृष्ट बना दिया जाता है जो विरोधी नहीं हैं तो वह भी एक दोष ही होगा और सन्धियों के अङ्गुलि-निर्देश का विषय बन जायेगा । इसके प्रतिकूल यदि अंगी रस
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अङ्गिनि रसान्तरे मृङ्गारादौ प्रवन्धल्यङ्ग्ये सति अविरोधिनो विरोधिनो वा रसः परिपोषं न नेतव्यः । तत्राविरोधिनो रसस्याङ्गिरसापेक्ष्याल्पत्वान्नमाधिक्यं न कर्तव्यमित्ययं प्रथमः परिपोषपरिहारः । उत्कर्षसाम्येडपि तयोरविरोधासम्भवान् ।
अङ्गी दूसरे रस श्रृङ्गार इत्यादि के प्रवन्ध व्यङ्ग्य होने पर अविरोधी या विरोधी रस परिपोष को नहीं प्राप्त किया जाना चाहिये । उसमें अविरोधी रस का अङ्गी रस की अपेक्षा अत्यन्त आधिक्य नहीं करना चाहिये । यह परिपोष का पहला परिहार है; क्योंकि उत्कर्ष साम्य में भी उनका विरोध असम्भव होता है ।
अङ्गिनोति ससमन्वादरे । अङ्गविनं रसविशेषमनादृत्य न्यक्कृत्याहुरभूयोन् न पोषयितव्य इत्यर्थः । अविरोधतेति । निदर्शयतेत्यर्थः । परिपोषपरिहारे त्रिविधः प्रकारः—तत्रेश्यादिना तृतीय इत्यनेन । न च न्यूनत्वं कर्तव्यमितिवाच्ये आधिक्याज्य कासम्मावनायेनोक्कमाधिक्यं न कर्तव्यमित्याश्रित्याह—उत्कर्षे साम्य इति ।
'अङ्गिनि' में ससमञ्जस्य है । अर्थात् अङ्गी रस विशेष को न मानकर (अर्थात् नीचे गिराकर) अङ्गभूत को पुष्ट नहीं करना चाहिये । 'अविरोधिता' अपन्न । अर्थात् 'निदर्शयते' इत्यादि में 'निर्देष्टव्य' अर्थ । परिपोष परिहार में तीन प्रकारों को कहते हैं—'उसमें' इत्यादि में 'तृतीय' यहाँ तक । 'निस्सन्देह न्यूनत्व करना चाहिये' इस कथन के उक्त होने पर आधिक्य की क्या सम्भावना (जिससे कहा गया है कि आधिक्य नहीं करना चाहिये ? यह शङ्का करके कहते हैं —'उत्कर्ष साम्य में' इत्यादि ।
के साथ किसी ऐसे रस को लाया जाता है जो उसका विरोधी है—'किन्तु वह रस एक तो पुष्ट नहीं किया जाता; दूसरे हुक्किपूर्वक उसके अन्दर अग्निस्नताकी सिद्धि सङ्कटित कर दी जाती है तो उनका एक साथ निबन्धन सद्यः नहीँ होता । विरोध परिहार के उनको आगे चलकर बतलाये जायेंगे । उन्हीं का आश्रय लेकर विरोधियों का परस्पर सङ्कटन करना चाहिये । आशय यह है कि निवेशन के प्रकार के प्रति ही जागरूक रहना चाहिये।
यदि निपुणतापूर्वक किन्हीं भी दो रसों का एक साथ सङ्कटन कर दिया जाये तो दोष नहीं रह जाता । कारिका में 'अङ्गिनि' शब्द का प्रयोग किया गया है । यहाँ पर सप्तमी अनादर के अर्थ में हुई है । आशय यह है कि विशेष प्रकार के अङ्गी को अनादरपूर्वक दबाकर तथा तिरस्कृत करके ऐसे रस को पुष्ट नहीं करना चाहिये जो अङ्गमात्र हो ।
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यथा— एकन्तो हिअइ पिआ अणणन्तो समरतूरइणघोसो । णेहेण रणरसेण अ भडस्स दोलाइअ हिअअम् ॥
(अनु.) जैसे— 'एक ओर प्रिया रो रही है दूसरी ओर युद्धवाद्यों का शब्द हो रहा है । प्रेम तथा युद्धरष से वीर का हृदय दोलायमान हो रहा है ।'
लोचन एकतो रोदिति प्रिया अन्यतः समरतूर्यनिघोषः । स्नेहेन रणरसेन च भटस्य दोलायितं हृदयम् ॥
इतिच्छाया। रोदिति प्रियेत्यतस्तत्कृप्षः। समरतूयंरिति भटस्येति घोत्साद्दोस्कर्षः। दोलायितमिति तयोरन्यूनाधिकतया साम्यमुक्तम्।
'एक तो रोदिति' यह इच्छा है । 'प्रिय:' इससे 'रति' का उत्कर्ष । 'समरतूय' इससे और 'भट:' इससे उत्साह का उत्कर्ष । 'दोलायमान' इससे उन दोनों की न न्यूनता न अधिकता इससे साम्य कहा गया है ।
तारावती दो रसों के परस्पर समावेश में दोष किस प्रकार नहीं आता और उनके विरोध का नरेहार किस प्रकार हो जाता है? अब इस पर विचार किया जा रहा है । विरोधानिवृत्ति के तीन प्रकार हो सकते हैं । ( १ ) पहला प्रकार यह है—यदि अविरोधी रस को किसी अंगी रस के साथ कहना हो तो उस अविरोधी रस को प्रस्तुत रस के सामने बहुत अधिक नहीं बढ़ाना चाहिये । यह ध्यान देने की बात है कि आचार्य ने यहाँ यह नहीं कहा कि अंगीरस की अपेक्षा अविरोधी रस न्यून होना चाहिये । यदि न्यून होना कहा गया होता तो अधिक की सम्भावना ही क्या रह जाती । किन्तु न्यून न कहने का कारण यह है कि यदि रस विरोधी न हो तो उसको अंगीरस के समकक्ष समान उत्कर्षवाला बना देते में भी विरोध नहीं होता । जैसे—
'कोई वीर व्यक्ति युद्ध के लिये प्रस्थान कर रहा है—एक ओर वियोगजन्य पीड़ा से उसकी प्रियतमा रो रही है और दूसरी ओर युद्ध के ढोल इत्यादि बाजे बज रहे हैं जिनका शब्द वीर के कानों में पड़ रहा है । एक ओर प्रियतमा का स्नेह है और दूसरी ओर युद्ध का आनन्द हृदय में उमड़ रहा हैं। इस प्रकार वीर का हृदय भूले पर भूल-सा रहा है । एक ओर निश्चय नहीं कर पाता कि प्रियतमा के प्रेम का स्वागत किया जाय या युद्ध का आनन्द लिया जाय ।'
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कण्ठाच्छलशाक्षमालावलयमिवकरे हारमणिरत्नों कृत्स्नोपि दृशो वन्धं विशङ्करपतिमिव मेखलया गुणेन । मिथ्यामन्त्राभिजापस्फुरदधरपुटलयस्थितालव्यक्तहासा देवी सन्ध्याभ्यसूयाहसितपशुपतिस्ततत्र दृष्टा तु वोऽन्यत्र ॥ इत्यत्र ।
(अनु०) अथवा जैसे— 'मोतियों की माला को गले से उतारकर रुद्राक्षमाला के समान घुमाती हुई, मेखला के सूत्र से सर्पराज के द्वारा पर्यङ्कबन्ध बनाकर मिथ्यामन्त्र जप से फड़कने- वाले अधरपुट के द्वारा गूढ़ हास को व्यक्त करती हुई सन्ध्या की अदृश्य से पदुपति को हँसनेवाली वहाँ देवी हुई देवी (पार्वती) आपलोगों की रक्षा करें ।' यहाँ पर ।
तारावती
वह प्रियतमा है; केवल पत्नी नहीं । उसका रुदन रति को बढ़ा रहा है जिसके लिये 'स्नेह' शब्द का प्रयोग किया गया है । यह रति श्रृङ्गार रस का स्थायी भाव है । युद्ध वाच्य तथा अपने 'भट' होने की भावना से उसके अन्दर उत्साह का उत्कर्ष अभिव्यक्त होता है । जोकि वीर रस का स्थायीभाव है । रति का आलम्बन प्रियतमा है और उत्साह का आलम्बन शत्रु । अतः आलम्बनभेद होने से ये दोनों वीर और श्रृङ्गार 'विरोधी रस नहीं हैं । वीर एक ओर निश्चित कर पा रहा है । उसका हृदय दोनों ओर झूल-सा रहा है । भूले की पैंठ दोनों ओर बराबर जाती है । अतः वीर और श्रृङ्गार दोनों की प्रधानता एक सी ही है । दोनों के समावेश में कोई विरोध नहीं है ।
दूहरा उदाहरण- एक बार सन्ध्या प्रमदा की आकृति बनाकर भगवान शङ्कर के पास आई और शङ्कर जी ने उसे स्त्रीकार किया । इस पर भगवती पार्वती को ईर्ष्या उत्पन्न हुई और उन्होंने शङ्कर जी की हँसी उड़ाई । उसी का इस पद्य में वर्णन है । 'पार्वती ने अपने कण्ठ से हार को उतार कर उसे रुद्राक्ष माला के वलय के समान घुमाना प्रारम्भ कर दिया । पर्यङ्कबन्ध (वीरासन) बाँध लिया (जिसमें दाहिने पर वायाँ ऊरु पर रखा जाता है और वायाँ पैर दाहिने ऊरु पर रखा जाता है । ) इस पर्यङ्कबन्ध में शङ्कर जी के नागराज का कार्य उन्होंने मेखला के सूत्र से चलाया । उस समय वे शङ्करजी के जप का अनुकरण करने के लिये ओठों को फड़क रहीं थीं
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पृथच्च मुक्तकविषयमेव भवति न तु प्रबन्धविषयमिति केचिदाहुःतचासत् ; आधिकारिकेपीवितिवृत्तेपु त्रिवर्गफलसमप्राधान्यस्य सम्भवात् । तथाहि रसनावल्या सचि-
लोचन
कुछ लोग कहते हैं कि यह मुक्तकविषय में ही होता है प्रबन्ध विषय में नहीं—यह ठीक नहीं है; क्योंकि आधिकारिक इतिवृत्तों में त्रिवर्ग फल का समप्राधान्य सम्भव है । वह इस प्रकार—रत्नावली में सचिवायत्
तारावती
और जप के लिये वे किसी मन्त्र का उच्चारण नहीं कर रही थीं अपितु मिथ्या ही जप करती हुई जान पड़ रही थीं । उनके ओठों में गुप्तरूप से हँसी छिपी हुई थी जो ओठों के काँपने से कुछ-कुछ प्रकट हो रही थी । इस प्रकार देवी पार्वती सखी की असूया से पशुपति की हँसी उड़ा रही थीं । अपने भक्तों के द्वारा इस रूप में देखी हुई देवी आप सब लोगों की रक्षा करें ।
( यहाँ पर सखी के प्रति असूया शङ्कर के प्रति पार्वती के रतिभाव को अभिव्यक्त करती है । इस रतिभाव ने विभाव, अनुभाव और संचारीभाव के संयोग से शृङ्गार-रस का रूप धारण कर लिया है । साथ ही शङ्कर जी की सन्ध्योपासनकालिक चेष्टाओं के अनुकरण तथा अधरपुट में हास की अभिव्यक्ति से हास्य रस भी व्यक्त होता है । यहाँ हास्य और शृङ्गार दोनों समान बलवाले हैं । शङ्कर जी का सन्ध्यादुरागविषयक अनुकरण ईर्ष्यां को पुष्ट करता है जोकि रतिभाव की पोषिका है । साथ ही प्रेम की अधिकता शङ्कर जी की हँसी उड़ाने में पर्यवसित हुई है । अतः दोनों रस शृङ्गार और हास्य एक दूसरे के पोषक हैं । अतः समान बलवाले होते हुए भी सन्दोष नहीं माने जा सकते । वीरधितिकार ने लिखा है कि अक्षमाला जप इत्यादि से शान्तरस की अभिव्यक्ति होती है । अतः शान्त और शृङ्गार का एकत्र समावेश है । किन्तु यह व्याख्या ठीक नहीं है । क्योंकि एक तो इस पद्य में पार्वती का वैराग्य व्यक्त नहीं होता । शान्तरस की चेष्टाओं का अनुकरण हास्य को ही अभिव्यक्त करता है । दूसरी बात यह है कि शान्त और शृङ्गार एक दूसरे के विरोधी रस हैं । प्रस्तुत प्रकरण अविरोधी रसों के समबल होने पर एकत्र समावेश की व्याख्या करनेवाला है । अतः शान्तरस को मानने में प्रकरण की संगति भी नहीं लगती । बालप्रिया में हास्यरस ही माना गया है और वही ठीक है । )
कुछ आचार्यों ने लिखा है कि यह नियम मुक्तकं के विषय में ही लागू होता है प्रबन्ध के विषय में नहीं । किन्तु वह ठीक नहीं है । प्रबन्ध काव्य में भी दो रसों का प्राधान्यं समकोंटि का हो सकता है । प्रबन्धकाव्यों में आधिकारिक वस्तु का
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यत्तसिद्धित्स्वामिप्रायेण पृथिवीराज्यलाभं आधिकारिकं फलं कन्या रत्नलाभं प्रासङ्गिकं फलं नायकस्य प्रयोजनं तु विपर्ययेण इतिस्थिते मन्त्रिबुद्धौ नायकबुद्धौ च स्वाम्यमात्यमुख्यबुद्धये कत्स्वात्फलमिति नील्या एकीक्रियमाणायां समप्राधान्यमेव पर्यवस्यति । यथोक्तं— ‘कवे: प्रयत्नाचेतनां युक्तानाम्’ इत्यलमभवान्तरेण बहुला ।
सिद्धि के लिये स्वामी के अभिप्राय से पृथिवी राज्य का लाभ आधिकारिक फल है और रत्नलाभ प्रासङ्गिक फल है; नायक के अभिप्राय से तो विपरीत है ऐसी स्थिति में, स्वामी और मन्त्री की बुद्धि की एकता से ही फल होता है इस नीति से मन्त्री की बुद्धि के एक किये जाने पर समप्राधान्य में ही पर्यवसान होता है । जैसा कि कहा गया है—‘कवि के प्रयत्न से काम में लगे हुये नेताओं का’ इत्यादि—वस अधिक अवान्तर की आवश्यकता नहीं ।
फलं हि प्रधानं फलं कथ्यते । और उसी को उद्देश्य प्रधान्त होता है । काव्य का फल हो सकता है धर्म, अर्थ और काम इन तीनों में किसी एक दो या तीन का साधन । अतः यह असम्भव नहीं है कि किसी प्रवन्ध काव्य के दो उद्देश्य हों और दोनों की प्रधानता समान कोटि की हो । उदाहरण के लिये रत्नावली में कथावस्तु के बदने का एक मात्र निमित्त है कि यौगन्धरायण मन्त्री ने रत्नावली को सागरिका के रूप में राजा के अन्तःपुर में रखवा है । नीतिशास्त्र के अनुसार सिद्धियाँ तीन प्रकार की होती हैं—मन्त्री के दृष्टिकोण से, राजा के दृष्टिकोण से और दोनों के दृष्टिकोण से । रत्नावली में यौगन्धरायण का दृष्टिकोण है पृथिवीराज्य की प्राप्ति । यही मन्त्री की दृष्टि से आधिकारिक फल है और कन्यारत्न का लाभ प्रासङ्गिक फळ है । अतः पृथिवीराज्य लाभि के लिये सचेष्ट होने के कारण यौगन्धरायण का उत्साह अभिव्यक्त होता है जो वीर रस अभिव्यक्त होता है । नीति यह है कि फल वही कहा जा सकता है जिसमें स्वामी और अमात्य दोनों की बुद्धि एक ही हो । अतः जब यौगन्धरायण और उदयन दोनों की बुद्धि को एक किया जाता है तब यौगन्धरायण के उत्साह और उदयन की रति दोनों की प्रधानता समान ही सिद्ध होती है । अतः दो अविरोधी रसों का समकोटिक होना प्रवन्ध में भी सम्भव है, केवल मुक्तक में नहीं ।
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फलं हि प्रधानं फलं कथ्यते । और उसी को उद्देश्य मानकर प्रवन्ध काव्य प्रकृत्त होता है । काव्य का फल हो सकता है धर्म, अर्थ और काम इन तीनों में किसी एक दो या तीन का साधन । अतः यह असम्भव नहीं है कि किसी प्रवन्ध काव्य के दो उद्देश्य हों और दोनों की प्रधानता समान कोटि की हो । उदाहरण के लिये रत्नावली में कथावस्तु के बदने का एक मात्र निमित्त है कि यौगन्धरायण मन्त्री ने रत्नावली को सागरिका के रूप में राजा के अन्तःपुर में रखवा है । नीतिशास्त्र के अनुसार सिद्धियाँ तीन प्रकार की होती हैं—मन्त्री के दृष्टिकोण से, राजा के दृष्टिकोण से और दोनों के दृष्टिकोण से । रत्नावली में यौगन्धरायण का दृष्टिकोण है पृथिवीराज्य की प्राप्ति । यही मन्त्री की दृष्टि से आधिकारिक फल है और कन्यारत्न का लाभ प्रासङ्गिक फळ है । अतः पृथिवीराज्य लाभि के लिये सचेष्ट होने के कारण यौगन्धरायण का उत्साह अभिव्यक्त होता है जो वीर रस अभिव्यक्त होता है । नीति यह है कि फल वही कहा जा सकता है जिसमें स्वामी और अमात्य दोनों की बुद्धि एक ही हो । अतः जब यौगन्धरायण और उदयन दोनों की बुद्धि को एक किया जाता है तब यौगन्धरायण के उत्साह और उदयन की रति दोनों की प्रधानता समान ही सिद्ध होती है । अतः दो अविरोधी रसों का समकोटिक होना प्रवन्ध में भी सम्भव है, केवल मुक्तक में नहीं ।
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अङ्गीरसविरुद्धानां व्यभिचारिणां प्राचुर्येणानिवेशानम् , निवेशने वा चिप्रमेवाङ्गीरसत्याभिचारयतुत्तिरिति द्वितीयः ।
(अनु०) अंगीरस के विरोधी व्यभिचारियों का निवेश करना अथवा निवेश करने पर चीत्की ही असक्ति करना । यह दूसरा प्रकार है ।
पूर्वं प्रथमं प्रकारं निरूप्य द्वितीयमाह-अङ्गीति । अनिवेशनमिति । अङ्गभूते रस इति शेषः । नन्वेतं नासौ परिपुष्टो मतोऽद्यापि शङ्क्य मतान्तरमाह—निवेशने वेति । भत एतद वा ग्रहणमुत्तरपदाद्वयं सूच्यति न विकल्पपम् । तथा चैक एवायं प्रकारः । अन्यथा द्वौ स्याताम् अङ्गिनो रसस्य यो व्यभिचारी तस्यानुरूत्तिरनुसन्धानम् । यथा—‘कोपात्कोमललो ल’ इति श्रलोकेडङ्गिभूतायां रतावड्लवेन यः क्रोध उपनिबद्धस्तत्र ‘बद्धवा इदम्’ इत्यमुष्य निवेशनस्य चिप्रमेव रसदत्यये हर्षोद्वेगौ च रत्यनुसन्धेयौ—अनुसन्धानम् ।
इस प्रकार प्रथम प्रकार का निरूपण कर दूसरे को कहते हैं—‘अंगी रस’ इत्यादि । ‘न निवेष्ट करना’ यहाँ पर अंगभूत रस में यह शेष है । फिर तो निस्सन्देह यह परिपुष्ट नहीं होगा यह शङ्का करके दूसरा मत कहते हैं—‘अथवा निवेशन में’ यह । इसीलिये ‘वा’ ग्रहण उत्तर पक्ष को हटाता को सूचित करता है विकल्प को नहीं । अतएव यह एक ही प्रकार है नहीं तो दो.हो जायें । अंगीरस का जो व्यभिचारी उसकी अनुरक्ति अर्थात् अनुसन्धान जैसे ‘कोपात्कोमललोल’…
इस श्लोक में अङ्गीभूत रति में अंगभूत जिस क्रोध का उपनिबन्धन किया गया था उसमें ‘बाँध कर’ ‘दृढ़ता से’ इन शब्दों से निवेष्टित अमर्ष का शीघ्र ही ‘रोती हुई के द्वारा’ इससे और ‘हँसते हुये’ इससे रति के योग्य ईष्या औत्सुक्य और हर्ष का अनुसन्धान किया गया है ।
अंगी रस के विरुद्ध किसी अन्य रस को काव्य में सन्निविष्ट किया जावे तो अंगीरस के विरोधी व्यभिचारियों का बहुत अधिकता से निवेश नहीं करना चाहिये और यदि विरोधी व्यभिचारियों का सन्निवेश अनिवार्य ही हो जावे तो उनका उपादान कर उन्हें ऐसे रूप दे देना चाहिये कि वे शान्त ही अंगी रस के व्यभिचारियों का अनुसरण करने लगें । यह दूसरा प्रकार है जो कि अंगी रस के साथ हैं ( १ ) अंगी रस से विरुद्ध व्यभिचारियों का प्रचुरता से सन्निवेश करना ही नहीं
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चाहिये और ( २ ) सचिकवेश कर देने पर स्त्रीगण ही उन्हें अंगीरस के व्यभिचारियों का अनुयायी बना देना चाहिये । इस दूसरे खण्ड के उत्पत्ति का कारण यह है कि पहिले खण्ड के अनुसार यह प्रश्न उठ खड़ा होता है कि यदि विरोधी रस के व्यभिचारियों का सम्यक् उपादान नहीं किया जायेगा तो विरोधी रस का परिपोष किस प्रकार हो सकेगा? यदि विरोधी रस का परिपोष न हुआ तो उस अग्निपुष्ट अविकसित अवस्था को रस की संज्ञा ही किस प्रकार प्राप्त हो सकेगी? इसी प्रश्न का समाधान करने के लिये द्वितीय खण्ड को स्वीकार किया गया है जिसका आशय यह है कि यदि विरोधी रस को पुष्ट करने के लिये व्यभिचारियों का उपादान अपरिहार्य ही हो जाये तो उनका उपादान करना तो चाहिये किन्तु उन व्यभिचारियों को मुख्य रस के व्यभिचारियों का अनुयायी अवश्य बना देना चाहिये । अतएव यहाँ पर द्वितीय खण्ड के उल्लेख के लिये जिस 'अथवा' शब्द का प्रयोग किया गया है उसका अर्थ वैकल्पिक पक्ष को सूचित करना नहीं है जैसा कि अथवा शब्द का प्रायः अर्थ हुआ करता है । अपितु उसका आशय है कि 'अच्छा तो यही है कि विरोधियों के व्यभिचारियों का उपादान किया ही न जाये । परन्तु यदि करना अनिवार्य ही हो तो उसे मुख्य रस की अपेक्षा गौण तथा मुख्य रस का पोषक वनना देना चाहिये ।' अतः दोनों खण्डों को मिलाकर यह एक ही प्रकार है । परिपोष की सङ्घति भी इसीप्रकार हो जाती है। अंग रस का परिपोष निषिद्ध नहीं है अपितु रससङ्घा के लिये उसका परिपोष आवश्यक ही है, उसके परिपोष के लिये यदि विरोषी व्यभिचारियों के उपादान की आवश्यकता पड़े तो निःसंकोच भाव से उनका उपादान करना चाहिए । किन्तु तत्काल ही अंगीरस के अनुकूल व्यभिचारियों का परिशीलन कर लेना चाहिए । यह है मुख्य पक्ष इस प्रकार इस पक्ष के दो तत्व हैं ( १ ) विरोधियों में उपादान करना और उपादान करके अंगी का अनुरणन कर लेना । इन दोनों में दूसरा तत्व ( विरोधियों का उपादान करके अंगों का अनुरणन कर लेना ) मुख्य पक्ष है । यदि 'अथवा' शब्द विकल्प-परक माना जायेगा तो ये पृथक्-पृथक् दो प्रकार हो जायेंगे । अंगी के व्यभिचारी की अनुवृत्ति का आशय यह है यदि विरोधी गौण रस का अधिक विस्तार हो रहा हो और उससे अंगी रस दृष्टि से ओझल होता जा रहा हो तो अंगी रस के व्यभिचारियों का बीच-बीच में इस प्रकार स्मरण कर लेना चाहिए कि विरोधी रस के व्यभिचारी उस मुख्य रस का अनुसरण करते हुए ही जान पड़ें और पाठकों या दर्शकों को मुख्य रस को प्रतीति भी हो जाये । उदाहरण के लिये—'कोपात्कोमललोचनेहहु—' इत्यादि पद्य को लीजिये । इस पद्य का अंगीरस है शृंगार । नायिक के अपराध के प्रमाणित होने
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अङ्गत्वेन पुनः पुनः प्रत्यवेक्षा परिपोषं नीषमानस्याङ्गभूतस्य रसस्येति तृतीयः । अनन्या दिशा अन्येऽपि प्रकारा उप्रेक्षणीयाः ।
(अनु०) परिपोष को प्राप्त भी अंगभूत रस का अङ्ग के रूप में पुनः पुनः पर्यवेक्षण यह तीसरा प्रकार है। इसको दिशा से अन्य प्रकारों की भी उपेक्षा कर लेनी चाहिये ।
तृतीयं प्रकारमाह—अङ्गत्वेनैति। अङ्ग च तपसवत्सराजे वत्सराजस्य पद्मावती विषयः सम्भोगशृङ्गार उदाहरणं कर्तव्यः: । अन्येऽपि इति । विभावानुभावानां चापि उत्कर्षो न कर्तव्योऽङ्गिरसविरोधिनां निवेशानमेव वा न कार्यम्, कृतमपि चाङ्गिरसविभावानुभैरपतद्वृंहणीयम् । परिपोषिता अपि विरुद्रसविभावानुभावा अङ्गत्वं प्रतिजागरयितव्या इत्यादि स्वयम् श्क्यमत्योक्षिकतुम् ।
तृतीय प्रकार को कहते हैं—अङ्गत्व के रूप में यह और यहाँ पर तपसवत्सराज में वत्सराज के पद्मावती विषयक सम्भोग श्रृङ्गार का उदाहरण देना चाहिये । 'दूसरे भी' यह । विभावों और अनुभावों का उत्कर्ष नहीं करना चाहिये अथवा अंगीरस के विरोधियों का निवेश ही नहीं करना चाहिये, किये हुये को भी अंगीरस के विभाव अनुभाव इत्यादि के द्वारा बढ़ा दिया जाना चाहिये । परिपोषित किये हुये भी विरुद्ध रस के विभाव और अनुभावों को अंगत्व के प्रति जागृत कर देना चाहिये इत्यादि की कल्पना स्वयं कर लेना चाहिये ।
तारावती के कारण नायिका को क्रोध आगया है जो रौद्र रस का स्थायी भाव है । रौद्र को पुष्ट करने के लिये उसके 'बाध कर' 'पाश' 'मजबूती से' इन अनुभावों का उपदान किया गया है । जिससे क्रोध के व्यभिचारी अमर्ष की प्रतीति होती है । रौद्र श्रृङ्गार का विरोधी है । अतः अङ्गी श्रृङ्गार का कवि ने तत्काल परिशीलन कर लिया है और उसी निमित्त 'नायिका रो रही थी' 'नायक हँस रहा था' इन अनुभावों का उल्लेख कर दिया है । ये अनुभाव रति के व्यभिचारी ईर्ष्यी, औत्सुक्य और हर्ष का अनुसन्धान करते हैं और अमर्ष रति के इन व्यभिचारियों का अनुयायी बन गया है ।
नायिका को तारावती के कारण क्रोध आया, जो रौद्र रस का स्थायी भाव है। रौद्र को पुष्ट करने के लिए 'बाध कर', 'पाश', 'मजबूती से' जैसे अनुभावों का प्रयोग किया गया है, जिससे क्रोध के व्यभिचारी अमर्ष की प्रतीति होती है। रौद्र, श्रृंगार का विरोधी है, इसलिए कवि ने श्रृंगार रस को प्रमुखता देते हुए 'नायिका रो रही थी', 'नायक हँस रहा था' जैसे अनुभावों का उल्लेख किया है, जो रति के व्यभिचारी ईर्ष्या, औत्सुक्य और हर्ष को दर्शाते हैं।
( यहाँ पर 'नन्वैवं नासौ परितुष्टो भवेत्' यही पाठ सभी पुस्तकों में पाया जाता है । रस का परितोष होना कोई स्वाभाविक बात नहीं जान पड़ती । अतः यहाँ पर 'परिपुष्टो भवेत्' यह पाठ किर लिया गया है । यदि 'परिपुष्टो भवेत्' यही पाठ माना जाये तो भी आशय वही होगा । रस का परितोष उसका परिपोष ही है । इस दशा में यहाँ पर लक्षणिक प्रयोग माना जायेगा । )
(यहाँ पर 'नन्वैवं नासौ परितुष्टो भवेत्' यही पाठ सभी पुस्तकों में पाया जाता है । रस का परितोष होना कोई स्वाभाविक बात नहीं जान पड़ती । अतः यहाँ पर 'परिपुष्टो भवेत्' यह पाठ किर लिया गया है । यदि 'परिपुष्टो भवेत्' यही पाठ माना जाये तो भी आशय वही होगा । रस का परितोष उसका परिपोष ही है । इस दशा में यहाँ पर लक्षणिक प्रयोग माना जायेगा । )
अब तृतीय प्रकार को बतलाते हैं—यदि अंगीरस कोई अन्य हो और किसी अन्य रस को उसके अंग के रूप में अभिव्यक्त किया जा रहा हो ।
अब तृतीय प्रकार को बतलाते हैं—यदि अंगीरस कोई अन्य हो और किसी अन्य रस को उसके अंग के रूप में अभिव्यक्त किया जा रहा हो ।
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विरोधिनस्तु रसस्याङ्गिरसापेदतया कस्यचिन्न्यूनतां सम्पादनीयात् । यथा शान्तेऽङ्गिनि श्रृङ्गारस्य श्रृङ्गारे वा शान्तस्य । परिपोषरहितस्य रसस्य कथमिति चेत्—उक्तमत्राङ्गिरसापेक्षयेति । अङ्गिनो हि रसस्य यावान् परिपोषस्तावांसतस्य न कर्तव्यः, स्वतस्तु सम्भवी परिपोषः केन वायते ।
(अनु०) विरोधी तो किसी रस को अङ्गी रस की अपेक्षा न्यूनता न्यायतां कर देनी चाहिये । जैसे शान्त के अङ्गी होने पर श्रृङ्गार की अथवा श्रृङ्गार में शान्त की । परिपोषरहित रस का रसत्व कैसा ? तो यहाँ यह कहा गया है कि अङ्गीरस की अपेक्षा । निस्सन्देह अङ्गीरस का जितना परिपोष है उतना उसका नहीं करना चाहिये । स्वतः सम्भवी परिपोष तो किसके द्वारा मना किया जा सकता है ।
तारावती ( अप्रधान ) रस को पूर्ण रूप से परिपुष्ट भी कर दिया हो तो वह रस अङ्ग है । इस तथ्य की ओर परिशीलकों का ध्यान वार-वार आकृष्ट करते चलना चाहिये । यदि इस नियम का पालन किया जाता है तो एक रस में दूसरे का समावेश सदोष नहीं माना जाता । उदाहरण के लिये तापसवत्सराज में अङ्गी रस है उदयन का वासवदत्ता के प्रति श्रृङ्गार । वासवदत्ता के मरण के समाचार के बाद उदयन परिस्थितियों से प्रभावित होकर पद्मावती से विवाह कर लेते हैं । पद्मावती को आलम्बन मानकर उदयन के सम्भोग श्रृङ्गार का वर्णन अङ्गी रस वासवदत्ता और उदयन के प्रेम का अङ्ग बन गया है । पद्मावती के साथ सम्भोग श्रृङ्गार वर्णन पूर्ण रूप से परिपुष्ट हो गया है किन्तु कवि बीच-बीच में उदयन की वियोग-वेदना का वर्णन करता चलता है जिससे वासवदत्ता के प्रति रतिभाव भी परिशीलक की दृष्टि से सर्वथा ओझल नहीं होता । ऐसी दशा में अङ्ग रस का परिपोष भी दोषित नहीं माना जा सकता ।
ऊपर तीन प्रकार बतलाये गये हैं जिनसे दो रसों का एकत्र समावेश दूषित नहीं होता । ये प्रकार केवल दिग्दर्शन मात्र हैं । इन्हीं का अनुसरण कर दूसरे प्रकारों की भी कल्पना करलेनी चाहिये । संक्षेप में जिन दूसरे प्रकारों की कल्पना की जा सकती है उनमें कुछ ये हैं—( १ ) अंगीरस से भिन्न किसी दूसरे रस के विभावों और अनुभवों में उत्कर्ष नहीं आने देना चाहिये । ( २ ) अथवा अंगी रस के विरोधी रस से सम्बद्ध विभावों और अनुभवों का विनिवेश करना नहीं चाहिये । ( ३ ) यदि विरोधी रस के विभावों और अनुभवों का सन्निवेश किया गया हो तो उनका पोषण अंगीरस के विभावों और अनुभवों के द्वारा करदेना चाहिये । ( ४ ) विरद्ध रस के जिन विभावों और अनुभवों को परिपुष्ट भी कर
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एवं विरोध्यविरोधिसाधारणप्रकारमभिधाय विरोधिविष्यासाधारणदोष परिहारप्रकारगत्ल्वेनैव विशेषान्तरमप्याह--विरोधिन इति । सम्भवीति । प्रधाना विरोधित्वेनैतिशेष: ।
इस प्रकार विरोधी और अविरोधी में सर्वसाधारण प्रकार को कहकर विरोधी विषयक असाधारण दोष के परिहार प्रकार के सम्बन्ध में ही दूसरी विशेषता भी कहते हैं—‘विरोधी का’ यह । ‘सम्भवी यह’ । यहाँ पर प्रधान के अविरोधी के रूप में यह शेष है ।
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दिया हो उन्हें भी जागरूक कर देना चाहिये कि वे कहीं अपने अप्रधान रूप को छोड़कर प्रधान न बन जायें । इसी भाँति के दूसरे प्रकारों की भी कल्पना कर लेनी चाहिये और उनका संगमन उदाहरणों में भी कर लेना चाहिये ।
उपर दो रशों के परस्पर सन्निवेश के जो प्रकार वतलाये गये हैं वे सामान्यतया विरोधियों और अविरोधियों में एक समान लागू होते हैं । किन्तु विरोधी रसों के संयोजन में कुछ विलक्षण अवश्य होती है । अतः दोष परिहार के साधारण नियमों के साथ उनके कुछ असाधारण परिहार प्रकार अवश्य होते हैं ।
अत: उदाहरण के रूप में एक दूसरी विशेषता भी वतलाई जा रही है—यदि किसी अंगी रस के साथ अंगरूप में किसी विरोधी रस को सन्निविष्ट करना हो तो अंगी रस की अपेक्षा विरोधी रस को कुछ न्यून अवश्य कर देना चाहिये । जैसे यदि शृंगार रस अंगी हो और शांत रस को उसका अंग बनाना हो तो शृंगार को शांत रस से कुछ न्यून कर देना चाहिये और यदि शृंगार अंगी हो तो उसकी अपेक्षा शांत को कुछ न्यून कर देना चाहिये ।
यहाँ प्रश्न यह उत्पन्न होता है कि रस स्वप्रकाशानन्द चिन्मय तथा वेद्यान्तर स्पर्शं शून्य होता है । रस का अर्थ है रसनया आस्वादन । किसी भी तत्व में रसनीयता तभी उत्पन्न होती है । जब उसका पूर्ण परिपाक हो जाता है । यदि उसमें थोड़ी सी भी न्यूनता रह जाती है तो न तो उसमें रसनीयता ही उत्पन्न होती है और न उसे रस ही कहा जा सकता है ।
फिर उसका रस ही मानकर हम कैसे कह सकते हैं कि एक रस का दूसरे में समावेश हुआ है? इसका उत्तर यह है कि हमने यह नहीं कहा कि उसके परिपोष में कमी रखनी चाहिये किन्तु हमने यह कहा कि अङ्गी रस की अपेक्षा उसे कम रखना चाहिये । जितना परिपोष अङ्गी रस का करना चाहिये उतना अङ्गी या अप्रधान रस का परिपोष नहीं करना चाहिये ।
किन्तु यदि उसका परिपोष स्वतः हो रहा हो और उससे अङ्गी का विरोध न हो रहा हो तो उसके परिपोष को कौन रोक सकता है ? कुछ लोग यह आक्षेप करते हैं कि
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एतच्चापेक्षिकं प्रकर्षयोगित्वमेकस्य रसस्य वहुरसेषु प्रवन्धेषु रसानामङ्ङाङ्गिभावेन मनसि न भ्युपगच्छतात्प्रतिद्वेपमित्यनेन प्रकारेणाविरोधिनां च रसानामङ्ङाङ्गिभावेन समावेशे प्रवन्धेषु स्यादविरोधः।
(अनु.) बहुत रसवाले प्रवन्धों में एक रस का यह आपेक्षिक प्रकर्षयोगित्व रसों के अङ्ङाङ्गिभाव को न माननेवालों के द्वारा भी खण्डित नहीं किया जा सकता; अतः इस प्रकार से प्रवन्धों में अविरोधी और विरोधी रसों के अङ्ङाङ्गिभाव के द्वारा समावेश करने में विरोध न हो।
प्तच्चेति। उपकार्योपकारकभावो रसानां नास्ति स्वचमत्कारविश्रान्तत्वात् ; अन्यथा रसत्वायोगात् । तद्मावें च कथमङ्गित्वेऽपि येषां मतं तैरपि कस्यचिद्रसस्य-प्रकृष्टत्वं भूरः प्रवन्धव्यापकत्वमन्येषां चाल्पप्रवन्धानुगामित्वमिति वृत्तसङ्कटनाया एतान्यथाङ्गुपपत्तेः; भूरः प्रवन्धव्यापकस्य च रसस्य रसान्तरैर्येन्ति न कोचिल्लङ्गानुप्रविष्टतद्वित्त्वस्यापि न स्यादङ्गगतिरेवचेदयमुपकार्योपकारकभावः । न च चमत्कारविश्रान्तेर्विरोधः कश्चिदिति समनन्तरमेवोक्तम् । तदाह—अनङ्ग्युपगच्छताचमत्कारविश्रान्तेर्विरोधः।
अपने चमत्कार में विश्रान्त होने के कारण रसों का उपकार्योपकारक भाव नहीं होता नहीं तो रसत्व होना ही न बने और उसके अभाव में अङ्गिता कैसी ? यह भी जिनका मत है उन्हें भी किसी रस का प्रकृष्टत्व अर्थात् अधिक प्रवन्ध में व्यापकत्व और दूसरों का थोड़े प्रवन्ध का अनुगामित्व मानना पड़ेगा क्योंकि नहीं तो इतिकृत्स की सङ्कटना ही सिद्ध नहीं होती।
अधिक प्रवन्ध में व्यापक रस का यदि अन्य रसों से कोई संगति नहीं होती तो इतिकृत्स की भी कोई सङ्घटना नहीं होती। यदि ऐसा मत वालों तो यही उपकार्योपकारक भाव होता है। चमत्कार विश्रान्ति से कोई विरोध नहीं होता यह अभी कहा गया है।
वह कहलते हैं—‘न विश्रान्ति से कोई विरोध नहीं होता’ यह । वह केवल शब्द से नहीं मानता। आशय यह है कि बिना ही इच्छा के उनको स्वीकार कराया जाना चाहिये।
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रस अखण्ड चर्वर्णात्मक शुद्धचिन्मयानन्द स्वरूप होता है तथा उसमें अङ्गाङ्गिभाव की कल्पना व्यर्थ है। क्योंकि कोई भी रस तभी रस कहलाने का अधिकारी होता है जब उसमें स्वमात्रविश्रान्त चमत्कार विदयमान हो।
यदि उसे अपने चमत्कार के लिये अपने क्षेत्र से भिन्न किसी अन्य तत्त्व को अपेक्षा हुई तो न तो उसमें आनन्द देने की शक्ति ही उत्पन्न हो सकती है और न उसे रस की संज्ञा ही प्राप्त हो सकती है।
ऐसी दशा में यह कहना किसी प्रकार
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भो संगत नहीं हो सकता कि रस में अज्ञाझिभाव होता है। आशय यह है कि कतिपय आचार्य रस को अखण्ड चर्वणात्मक स्वमान्तविश्रान्त चमत्कारपरक मानते हैं उनके मत में रस की कोटियाँ होती ही नहीं। उनको भी इतना तो मानना ही पड़ेगा कि जिन प्रवन्धों में अनेक रसों का उपादान किया जाता है उनमें कोई रस अधिक प्रवन्ध को घेरता है और दूसरा कम प्रदेश में ही समाप्त हो जाता है। जो रस अधिक प्रवन्ध में व्यापक होता है वह अधिक उत्कृष्ट माना जाता है और जो कम प्रदेश को व्यापत करता है वह कम महत्वपूर्ण माना जाता है। इस प्रकार आपेक्षिक महत्व योग का तो प्रतिवाद रस की अखण्डता और अंगांगिभाव के असम्भव माननेवाले भी नहीं कर सकते। क्योंकि अनेक रसोंवाले प्रवन्ध में किसी कथानक का विस्तृत होना और किसी का अल्प होना अनुभसिद्ध ही है और यदि उन कयथानकों को एक दूसरे से सर्वथा असम्बद्ध माना जायेगा तो इतिवृत्त की सङ्घटना भी सिद्ध नहीं हो सकेगी। यह तो उनको भी मानना ही पड़ेगा कि जो विभिन्न इतिवृत्त एक प्रवन्ध में गुँथे हुये हैं वे एक दूसरे से असम्बद्ध नहीं हैं। उनमें एक दूसरे का उपकायोंपकारक भाव विद्यमान है। अधिक प्रवन्ध में व्यापक इतिवृत्त उपकार्य है और कम देश में व्यापक इतिवृत्त उपकारक है। जिस तर्क के आधार पर इतिवृत्तों का उपकायोंपकारक भाव माना जाता है उसी तर्क के आधार पर उनसे अभिव्यक्त होनेवाले रसों का भी उपकायोंपकारक भाव माना जा सकता है। यदि रसों में उपकायोंपकारक भाव नहीं माना जायेगा तो वह इतिवृत्तों में भी सिद्ध नहीं हो सकेगा और इतिवृत्त के विभिन्न सन्धि-विसन्धि-लक्षण हो जायेंगे। चाहे इसे आप उपकायोंपकारक भाव कहें या अंगांगिभाव, इतिवृत्त और प्रवन्ध दोनों में यह सिद्ध हो ही जाता है। किसी एक रस में चमत्कार का विश्राम हो जाना या उस रस का स्वतः पर्यवसित होना कोई ऐसी बात नहीं है जो इस मान्यता में विरोध उत्पन्न करे। कोई रस स्वतः पर्यवसित और चमत्कारविश्रान्त होकर भी दूसरे रस का अंग हो सकता है यह अभी सिद्ध किया जा चुका। जो लोग रसों के अंगांगिभाव नहीं मानते उनका यह शाब्दिक विरोध ही है वस्तुतः आन्तरिक विरोध नहीं। अतः उनसे यह उनके न चाहने पर भी तर्क के आधार पर स्वीकृत करा लेना चाहिये।
कुछ लोगों ने इस वृत्तिग्रन्थ की व्याख्या दूसरे प्रकार से की है। वृत्तिग्रन्थ में यहाँ पर दो मत दिखलाये गये हैं १—रसों का उपकायोंपकारक भाव होता है और २—रस शब्द का यहाँ पर अर्थ है स्थायीभाव तथा स्थायीभाव में श्रेणी-विभाजन हो सकता है। उसी को मानकर रसों के उपकायोंपकारक भाव की
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एतच्च सर्वं येषां रसे रसान्तरस्य व्यभिचारिभावति इति दर्शितं तन्मतेनोच्यते । मतान्तरे तु रसानां स्थायिनो भावाः उपचाराद्रसशब्देनोक्तास्तेषामङ्गत्वं निर्विरोधमेव ॥ २४ ॥
अनु०) यह सब उनके मत से कहा गया है कि जिनका सिद्धान्त है कि रस दूसरे रस का व्यभिचारी होता है । दूसरे मत में तो रसों के स्थायीभाव औपचारिक रूप में रस शब्द से अभिहित किये गये हैं । उनका अङ्गत्व तो निर्विरोध ही है ।
लोचन अन्यस्तु व्याचष्टे—एतच्चापेक्षिकमित्यादिग्रन्थो द्वितीयमतमभिम्रेल्य यत्र रसानामुपकार्योपकारकता नास्ति तत्रापि हि भूयः कृतत्वव्याप्तत्वमेवाङ्गित्वमिति । एतच्चासत्; च यो द्वितीयपक्षोपक्रमः सोऽतीव दृढःश्लिष्ट इत्यलं पूर्ववंश्यैः सह बहुना संलापेन । दूसरे ने तो कहा—'यह आपेक्षिक-'इत्यादि ग्रन्थ द्वितीय मत लेकर (लिखा गया है) कि 'जहाँ रसों की उपकार्योंपकारकता नहीं होती वहाँ अधिक कथानक में व्याप्त होना ही अङ्गित्व होता है' । यह ठीक नहीं है—ऐसे तो एक पक्ष के विषय में 'यह सब' इत्यादि जो उपसंहार किया गया है और दूसरे मत में इत्यादि के द्वारा जो द्वितीय पक्ष का उपक्रम किया गया है उसकी योजना बहुत कठिन हो जायेगी; वस, अपने पूर्ववंशवालों के साथ अधिक विवाद की आवश्यकता नहीं । तारावती व्याख्या की जा सकती है । इन लोगों का कहना है कि प्रस्तुत वृत्ति-ग्रन्थ द्वितीय मत को मानकर लिखा गया है कि जहाँ रसों का उपकार्योपकारक भाव नहीं होता वहाँ भी उसे अङ्गी कथने लगते हैं जो अधिक कथानक में व्याप्त हो । यह इन लोगों की व्याख्या ठीक नहीं है । ये हमारे पूर्ववंशज हैं अतः इनसे हम (अभिनवगुप्त) अधिक विवाद तो नहीं करेंगे। हाँ इतना अवश्य कहेंगे कि इस प्रकरण को द्वितीय मत में लगाने से इस ग्रन्थ की संगति नहीं बैठती । वृत्तिकार ने प्रस्तुत वाक्य को लिखकर इस प्रकरण का उपसंहार करते हुये लिखा है"यह सब 'रस दूसरे रस का व्यभिचारी होता है' इस मत को मान कर लिखा गया ।" यहाँ पर सब शब्द का प्रयोग ही सिद्ध करता है कि इसके पहले जो कुछ लिखा गया है वह प्रथम मत को मानकर ही लिखा गया है । उसके बाद लिखा है कि 'दूसरे मत में भी...' । यदि उस कथन द्वितीय मत से सम्बद्ध माना जायेगा तो सारा कथन अस्त-व्यस्त हो जायेगा । अतः उक्त कथन प्रथम मत से सम्बद्ध ही माना जाना चाहिये ।
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येषांति मामिवध्यायसमासावस्थितश्लोकः- वहूनां समवेतानां रूपं यस्माद् भवेद् बहु । स मन्त्रच्यो रसः स्थायी शेषाः सञ्चारिणो मताः ॥ इति ।
तत्रोक्तक्रमेणाधिकारिकेतिवृत्तव्यापिका चित्तवृत्तिरवश्यमेव स्थायित्वेन माति प्रासङ्गिकवृत्तान्तर्गतामिनी तु व्यमिचारितयैव रस्यमानता समये स्थायित्व्यभिचारिमावस्य न कश्चिद्विरोध इति केचिद्व्याचचक्षिरे । तथा च भागुरिरपि किम् रसानामपि स्थायिसञ्चारितास्तीत्याक्षिप्योत्तरमवोचद्वामसतीति ।
'जिनका' यह । भावाध्याय की समाति में श्लोक है— 'एकत्र बहुतों में जिसका रूप बहुत हो वह स्थायो रस माना जाना चाहिये । शेष सञ्चारी माने जाते हैं ।'
उसमें उत्त क्रम से आधिकारिक इतिवृत्त में व्यापक चित्तवृत्ति अवश्य ही स्थायी रूप में शोभित होती है और प्रासङ्गिकवृत्त में रहनेवाली तो व्यभिचारी रूप में इस प्रकार रसास्वादन के समय में स्थायी और व्यभिचारी भाव का कोई विरोध नहीं होता । यह कुछ लोगों ने व्याख्या की है । उसी प्रकार भागुरि ने 'क्या रसों की स्थायी-रूपता और सञ्चारी-रूपता होती है ?' यह आक्षेप करके स्वीकृति के द्वारा ही उत्तर दिया है— 'हाँ निस्सन्देह है ।' यह ।
तारावती
उपर जो कुछ कहा गया है वह उन लोगों का मत दृष्टिगत रखते हुये कहा गया है जो यह मानते हैं कि एक रस दुसरे में व्यभिचारी होता है । अर्थात जिस प्रकार किसी रस की निष्पत्ति में स्थायिभाव का परिपोष सञ्चारियों के द्वारा होता है उसी प्रकार किसी एक रस को अन्य दूसरे रस पुष्ट किया करते हैं । नाट्यशास्त्र में भावाध्याय की समाति में एक श्लोक आया है जिसका आशय यह है—
'जहाँ बहुत से रस मिले हुये हों उन रसों में जिस भाव का रूप बहुत अधिक व्यापक हो वह रस स्थायी होता है; शेष रस व्यभिचारी होते हैं ।'
भावाध्याय में जो क्रम बतलाया गया है उस पर विचार करने से अवगत होता है कि किसी प्रबन्ध काव्य में कोई एक चित्तवृत्ति ऐसी होती है जो समस्त प्रबन्ध में व्याप्त रहती है और आधिकारिक इतिवृत्त की चित्तवृत्ति कही जाती है । ऐसी चित्तवृत्ति स्थायी-रूप में आभासित होने के कारण स्थायी चित्तवृत्ति कही जाती है और प्रासङ्गिक इतिवृत्त में रहनेवाली चित्तवृत्ति व्यभिचरित अथवा परिवर्तित होनेवाली होती है । अतः वह चित्तवृत्ति व्यभिचारिणी चित्तवृत्ति कही जाती है । आधिकारिक इतिवृत्त से सम्बन्ध रखनेवाली चित्तवृत्ति उपकरणों के संयोग से
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॥ स्थायितया पठितस्थापि रसस्य रसान्तरे व्यभिचारितवमस्ति। यथा क्रोधस्य वारितया पठितस्यापि स्थायितवमेव रसान्तरे, यथा तत्त्वज्ञाननिवेदभावकस्य तन्ते, व्यभिचारिणो वा सत् एव व्यसंचार्यन्तरापेक्षया स्थायितवमेव, यथा शृङ्गारामुन्यास्य चतुर्थेऽङ्क इतीयान्तरमर्थंश्चमत्करोधितुमयं श्लोक: बहूनां चित्तवृत्ति-वानां मध्ये यस्य बहुलं रूपं यथोपलभ्यते स स्थायी भावः। स च रसो नयः; शेषास्तु सञ्चारिण इति व्यावकशते न तु रसानां स्थायिसञ्चारिभाव-
१। अतएवान्ये रसस्थायीरिति षष्ठ्या ससम्या द्वितीयया वाऽऽश्रितादिषु गम्य-मेतिसमासं पठन्ति। तदाह--मतान्तरेऽपीति। रसशब्देनेति। 'रसान्त-स्तुतस्य रसस्य य:' इत्यादि प्राक्तनकारिकानिविष्टेनेत्यर्थ:॥ २४ ॥
अतएव अन्य आचार्य 'रसस्थायी' इस समास को षष्ठी तत्पुरुष, सप्तमी तत्पुरुष और द्वितीया तत्पुरुष के रूप में पढ़ते हैं। इसलिए कहा गया है - 'मतान्तरेऽपि' अर्थात् अन्य आचार्यों के मत में भी। 'रसशब्देनेति' का अर्थ है कि रस शब्द के द्वारा। यहाँ प्राक्तन कारिका में 'रसान्तस्तुतस्य रसस्य य:' इत्यादि का उल्लेख है। ॥ २४ ॥
यहाँ पर 'रसस्थायी' इस समास के विभिन्न रूपों का वर्णन किया गया है। कुछ आचार्य इसे षष्ठी तत्पुरुष, सप्तमी तत्पुरुष और द्वितीया तत्पुरुष के रूप में व्याख्या करते हैं।
तारावली
को प्राप्त होकर स्थायी रस का रूप धारण कर लेती है और प्रासंगिक व्यभिचारी रस का रूप धारण कर लेती है जिस प्रकार आस्वादन के अवसर पर स्थायीभाव का सञ्चारियों से विरोध नहीं होता अपितु सञ्चारियों से स्थायी की पुष्टि ही होती थी प्रकार स्थायी रस की पुष्टि सञ्चारी रसों से हो जाती है। थं भागुरि ने भी प्रश्न उठाया है कि क्या रसों में स्थायी और सञ्चारियों था होती है? इसका उत्तर उन्होंने स्वीकार करते हुए दिया है तथा कहा है कि मैं यह अवश्य मानता हूँ कि कुछ रस स्थायी होते हैं और कुछ सञ्चारी।
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'वहूनां समवेमानां'...''सच्वारिणो मता:' इस इलोक की एक व्याख्या ऊपर दी गई है। दूसरे लोग उस व्याख्या को नहीं मानते। वे कहते हैं कि इस पद्य में यह सिद्धान्त माना गया है कि एक स्थान पर जो रस स्थायी के रूप में स्वीकृत किया जाता है वही अन्यत्र व्यभिचारी हो जाता है। भरत मुनि ने भावों की संख्या कुल ४८ बतलई है। उनमें केवल ८ स्थायी भाव बतलाये गये हैं। वस्तुत: वे ८ स्थायिभाव सर्वदा स्थायी ही रहें ऐसा नहीं होता। जो भाव एक स्थान पर स्थायी होता है वही अन्यत्र व्यभिचारी भी हो सकता है और जो एक स्थान पर व्यभिचारी होता है वह दूसरे रस में स्थायी हो सकता है। उदाहरण के लिये वीर रस में क्रोध व्यभिचारी के रूप में आता है और वही रौद्र रस में स्थायी वन जाता है। निर्वेद को सञ्चारियों में गिनाया गया है। यह भाव अनेक रसों में सञ्चारी होता भी है। किन्तु यहीं भाव उस समय स्थायी बन जाता है जब निर्वेद को विभावादि बनाकर शान्त रस की निष्पत्ति की जाती है। यह तो दूसरे प्रसिद्ध रसों की बात। जो भाव शास्त्रीय ग्रन्थों में स्थायी की श्रेणी में नहीं रख्खे गये हैं केवल सञ्चारी ही होते हैं वे भी जब इतिवृत्त में व्यापक रूप धारण कर लेते हैं तब वे स्थायी भाव ही हो जाते हैं चाहे वे शास्त्रीय ग्रन्थों में स्थायी के रूप में परिगणित न भी किये गये हों। उदाहरण के लिये विक्रमोर्वशीय के चौथे अङ्क में जब कि रक्ष होकर उर्वशी ललनाओं के निषिद्ध उपवन में प्रवृष्ट होकर शाप के अनुसार लता वन जाती है तब उसके वियोग में पीड़ित पुरुरवा उन्मत्त हो उठते हैं और कहीं नदियों को कहीं मेघों को अपनी प्रेयसी के रूप में देखने लगते हैं। यह उन्माद इतना तीव्र हो गया है कि सामान्य सञ्चारी न रहकर स्थायी बन गया है।
इस प्रकार सामान्य सञ्चारी भी बहुप्रबन्धव्यापी बनकर स्थायी बन जाते हैं। इसी अर्थ को कहने के लिये यह कारिका 'वहूनां समवेमानां'...''सच्वारिणो मता:' लिखी गई है। इस प्रकार इस कारिका का अर्थ यह होगा—'जहाँ बहुत से समवेत हों' का अर्थ है जहाँ बहुत सी चित्तवृत्तियाँ जिनका पारिभाषिक शब्द है 'भाव' एक साथ मिली हुई हों उन चित्तवृत्तियों में जिस चित्तवृत्ति का स्वरूप अन्यो की अपेक्षा अधिक व्यापक और विस्तृत हो उसे स्थायी भाव कहते हैं। वही रस होता है अर्थात् रसन या आस्वादन की योग्यता उसी में होती है। शेष सञ्चारी होते हैं। आशय यह है कि इस भावाध्याय की कारिका में रसों का एक दूसरे के प्रति स्थायित्व और सञ्चारित्व नहीं बतलाया गया है अपि तु यह बतलाया गया है कि भावों में कौन स्थायी होता है और कौन सञ्चारो।
( भावाध्याय की प्रस्तुत कारिका 'वहूनां...मत्ता:' में यह स्पष्ट नहीं है कि यह कारिका रसों की परस्पर स्थायिता और सञ्चारिता का प्रतिपादन करती है या
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भावों में कौन सा भाव स्थायी होता है यह बतलाती है । कारिका की प्रथम पंक्ति में न रस शब्द का उपयोग किया गया है और न स्थायी का । किन्तु द्वितीय पंक्ति में ‘स रसस्थायी’ यह आया है । ‘रसस्थायी’ शब्द का सन्धि विच्छेद दो प्रकार से किया जा सकता है ( १ ) ‘रस: + स्थायी’ इसमें ‘खरपरे हरि’ इसने विसर्गों का लोप हो जाता है । ( २ ) ‘रस स्थायी’ दोनों शब्दों में समास मानकर मेध्यवर्णोत्तरी विभक्ति का लोप हो गया है । यदि पहले सन्धिविच्छेद को मानकर ‘रसः’ और ‘स्थायी’ ये दो स्वतन्त्र शब्द माने जायें तो इनकी योजना दो प्रकार से हो सकती है—‘जहाँ कई एक मिले हुये हों वहाँ जिसका रूप अधिक हो वह रस ( स रसः ) स्थायी होता है और शेष सञ्चारी होते हैं । यह योजना उन लोगों के मत में है जो रसों का परस्पर उपकार्योपकारक भाव मानते हैं और यह स्वीकार करते हैं कि रसों में भी कोई स्थायी और कोई सञ्चारी हुआ करते हैं । दूसरे प्रकार की योजना यह होगी—‘कईँ एक समवेत ( भावों ) में जिसका रूप अधिक होता है ( सः स्थायी ) और वही रस वनता है, अन्य भाव सञ्चारी होते हैं ।’ यह योजना उन लोगों के मत में है जो यह मानते हैं, कि रस अखण्ड चर्वणात्मक होता है इसमें परस्पर उपकार्योपकारक भाव नहीं होता ।
जो लोग ‘रसस्थायी’ में रस शब्द को स्वतन्त्र न मानकर समासगर्भित मानते हैं उनके मत में तीन प्रकार की द्योत्पत्ति हो सकती है ( १ ) ‘रस का स्थायी’ यहाँ षष्ठी समास है । ( २ ) ‘रस में स्थायी’ यहाँँ ‘सतमी’ इस योग विभाग से समास किया गया है और ( ३ ) ‘रसेँ स्थायी’—‘रस के प्रति स्थायी’ यहाँँ द्वितीया-तत्पुरुष ‘आश्रितादिपु गमिगमादीनामुपसंख्यानम्’ इस वार्तिक से हो जाता है । इन तीनों मतों में रस का स्थायी कहकर रस शब्द से स्थायी भाव के ग्रहण की ओर संकेत किया गया है ।
अतएव ‘रसान्तरसमावेशः प्रस्तुतस्य रसस्य यः’ इस कारिका में जो रस शब्द आया है उसकी व्याख्या ये लोग यह कहकर करते हैं कि यहाँ पर रस शब्द का अर्थ है स्थायी भाव । इस प्रकार इस मत में विरोधी रसों के समावेश का अर्थ है विरोधी स्थायी भावों का परस्पर समावेश । स्थायीभावों के परस्पर उपकार्योपकारक भाव में कोई विरोध आता ही नहीं । अतः इस मत में कोई अनुपपत्ति है ही नहीं । इस प्रकार यहाँ ये तीन मत हैं । ( आनन्दवर्धन और अभिनवगुप्त प्रथम मत से सहमत प्रतीत होते हैं क्योंकि एक तो इन्होंने प्रथम मत का विस्तारपूर्वक निरूपण किया है और उसी के आधार पर अपने निष्कर्ष भी निकाले हैं, दूसरी बात यह है कि ‘मतान्तरे तु’ तथा अभिनवगुप्त ने ‘अन्ये तु’ में ‘तु’ शब्द के द्वारा उक्त मतों से अपनी अरुचि प्रकट की है । अतः इन आचार्यों के मत का सार यह है कि स्वतन्त्र रसों का स्वतः परिपोष तो होता ही है किन्तु वे रस किसी प्रवन्ध में दूसरें रस को अङ्गी भी हो सकते हैं ) ।। २४ ।।
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एवमविरोधिनां विरोधिनां च प्रवन्धस्थेनाङ्गीना रसेन समावेशे साधारणमविरोधोपयं प्रतिपादयेदानीं विरोधिविषयमेव तं प्रतिपादयितुमिदमुच्यते— विरुद्धैकाश्रयो यस्तु विरोधी स्थायिनो भवेत्। सर्वाभिन्नाश्रयः कोऽपिस्थायिपोषकद्रव्योपेतो वा न स्यात्॥२४॥
(अनु.) इस प्रकार अविरोधियों और विरोधियों का प्रबन्धस्थ अङ्गी रस के साथ समावेश करने में साधारण अविरोध का उपाय प्रतिपादित कर विरोधी के विषय में ही उसको प्रतिपादित करने के लिये यह कहा जा रहा है— 'जो एक आश्रय में विरोध रखनेवाला स्थायी का विरोधी हो वह विभिन्न आश्रयवाला बना दिया जाना चाहिये उसके परिपोष में भी दोष नहीं होता'॥२४॥
अथ साधारणं प्रकारमुपसंहरन्नसाधारणमासूत्रयति—एवमिति। तमित्यविरोधोपायम्। विरुद्धेति विशेषणं हेतुगर्भम्। यस्तु स्थायी स्थाय्यन्तरेणासंभाव्यमानैकाश्रयस्वाविरोधी स्ववेद्यथोत्साहेन तं विभिन्नाश्रयत्वेन नायकविपक्षादिगामित्वेन कार्यः। तस्येति। तस्य विरोधिनोडपि तथाकृतस्य तथानिबद्धस्य परिपुष्टताया: मत्युत्त निदोंषता नायकोत्कर्षादिगानात्। अपिशब्दो मिन्नक्रमः। एवमेव वृत्तावपि व्याख्यानात्।
तारावती
तारावती
२४वीं कारिका में यह सिद्ध किया गया है कि अङ्गी रस के साथ अन्य रसों का समावेश होता है तथा यह भी दिखलाया गया है कि एक रस में दूसरे के समावेश के प्रकार कौन से हैं। वहाँ जो प्रकार बतलाये गये हैं वे सामान्य प्रकार हैं और विरोधियों तथा अविरोधियों के अङ्गी रस में सन्निविष्ट होने की साधारण व्याख्या करते हैं। अब इस पचीसवीं कारिका में यह दिखलाया जा रहा है कि
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विरोधी रस के अंगी में सन्निविष्ट होने के विशिष्ट नियम क्या हैं ? यह कहने की आवश्यकता इसलिये पड़ जाती है कि अविरोधी रसों का किसी रस में सन्निविष्ट होना एक साधारण बात है, किन्तु विरोधी के विषय में यह प्रश्न अवश्य उपस्थित होता है कि उसका विरोध परिहार किस प्रकार होता है और वह अंगी का अंग किस प्रकार बनता है ?
सामान्यतया विरोध दो प्रकार का हो सकता है एक तो दो रसों का एक ही अधिकरण में रहने पर विरोध हो, दूसरे एक के तत्काल बाद दूसरे के आ जाने पर विरोध होना । ( एक ही अधिकरण में विरोध दो प्रकार का होता है—एक ही आलम्बन के प्रति दो विरुद्ध रसों का होना और एक ही आश्रय में दो विरुद्ध रसों का होना । जैसे प्रेम और उत्साह दोनों का एक ही आलम्बन नहीं हो सकता । यह सम्भव नहीं कि जिसके प्रति रति हो उसी को विजय करने की आकांक्षा भी विद्यमान हो । इसी प्रकार उत्साह और भय दोनों का आश्रय एक नहीं हो सकता । यह सम्भव नहीं कि जो व्यक्ति शत्रु पर विजय प्राप्त करने के लिये उत्साहित भी हो और शत्रु से डरे भी । ) प्रस्तुत कारिका प्रथम प्रकार के विरोध के निराकरण का प्रकार बतलाती है अर्थात् इसमें यह बतलाया गया है कि एक ही अधिकरण में विरोध होने पर उसका परिहार किस प्रकार करना चाहिये—
'जो रस एक आश्रय में होने के कारण एक दूसरे के विरोधी हों उनमें स्थायी रस को तो उसी रूप में रहने देना चाहिये किन्तु उसके विरोधी रस के आश्रय को बदल देना चाहिये । आश्रय के बदल देने पर यदि विरोधी रस का परिपोष भी कर दिया जाय तो भी कोई दोष नहीं होता ।'
आश्रय यह है कि एक रस के स्थायी भाव का यदि दूसरे रस के स्थायी भाव के साथ एक आश्रय में रहना किसी प्रकार भी सम्भव न हो और इस कारण उन दोनों रसों में परस्पर विरोध हो जैसे भय और उत्साह एक ही व्यक्ति में रहे हो तब ही नहीं सकते इसीलिये दोनों परस्पर विरोधी हैं । ऐसी परिस्थिति में उनके आश्रय को बदल देना चाहिये । मान लो यदि कथानायक में वीर रस का परिपोष हुआ है तो उसके शत्रु में भय दिखला दिया जाना चाहिये । ऐसी दशा में यदि भय का परिपोष भी कर दिया जाता है तो शत्रु का भय नायक के उत्साह का पोषक ही होता है और नायक में उत्साह के आधिक्य करने के कारण उसमें दोष तो नहीं होता अपि तु गुण हो जाता है । इसके प्रतिकूल उसका पुष्ट न करना ही दोष होता है ।
कारिका में 'अपि' शब्द 'पोषे' के साथ आया है 'तस्य पोषेऽप्यदोषता' । किन्तु इस 'अपि' शब्द का क्रम बदलकर 'तस्यापि' लगाना चाहिये—
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ऐकाधिकरण्यविरोधी नैरनन्तर्यविरोधी चेति द्विविधो विरोधी । तत्र प्रवन्धस्थानस्थायिनाऽऽडिनारसेनौचित्यापेक्षया विरुद्धैकाश्रयो यो विरोधी यथा वीरेण भयानकः स विभित्नाश्रयः कार्यः । तस्य वीरस्य य आश्रयः कथानायकस्तद्विपक्षविषये सन्निवेशयितव्यः । तथा च तस्य विरोधिनोऽपि यः परिपोषः स निर्दोषः । विपक्षविषये हि भयानकतिशयवर्णनंने नायकस्य नयपराक्रमादिसम्पत्त्सुतरां मुद्योतिता भवति । एतच्च मदोद्धरर्जुनचरितेऽर्जुनस्य पातालावतरणप्रसङ्गे वैशद्येन प्रदर्शितम् ॥२५॥
दो प्रकार का विरोधी होता है ऐकाधिकरण्य विरोधी और नैरनन्तर्य विरोधी । उसमें प्रवन्धस्थ स्थायी अङ्गीरस के साथ औचित्य की दृष्टि से विरुद्ध एक आश्रयवाला जो विरोधी, जैसे वीर से भयानक, वह विभिन्न आश्रयवाला किया जाना चाहिये । उस वीर का जो आश्रय कथानायक उसके विपक्ष के विपय में सन्निविष्ट किया जाना चाहिये । ऐसा होने पर उस विरोधी का भी जो परिपोष से वह निर्दोष होता है । विपक्ष के विषय में भय के अतिशय वर्णन करने में नायक की नय प्रराक्रम इत्यादि की सम्पत्ति बहुत अधिक प्रकाशित हो जाती है । यह मेरे अर्जुनचरित में अर्जुन के पाताल अवतरण के प्रसङ्ग में विशदतापूर्वंक दिखलाया गया है ॥२५॥
ऐकाधिकरण्यमेकाश्रयेण सम्वन्धमात्रं, तेन विरोधी यथा--भयेनोत्साहः, एकाश्रयत्वेऽपि सम्मवति कचित्त्विरन्तत्व्वेन निश्चित्यवधानेन विरोधी यथा रत्या निर्वेदः । 'समुत्थिते धनुर्ध्वनिना मयेनैव किरीटिना महानुपप्लेवे डभवत्पुरन्दरद्विषाम्' इत्यादिना ॥ २५ ॥
पोषः । अर्थात् उस विरोधी के भी परिपोष में । वृत्तिकार ने यहीं व्याख्या की है । ( किन्तु इसकी कारिका के ठीक क्रम में योजना अधिक संगत प्रतीत होती है । इसका आशय यह हो जाता है कि 'यदि विरोधी को पुष्ट भी कर दिया जाए तो भी दोष नहीं होता ।' यही अर्थ अधिक संगत है । )
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ध्वन्यालोकः
प्रथमैकाधिकरणेऽधिरोधिनः प्रवन्धवस्थेन स्थायिनो रसेऽनाझभावगमने निर्विरोधित्वं यथा तथा द्वितीयेऽत्र तु तत्त्वतिपाद्यितमुच्यते— एकाश्रयत्वे निर्द्धोपो नैरन्तर्ये विरोधवान् । रसान्तरव्यवचिन्ना रसो व्यङ्गः स चमेधसा ॥ ३६॥
(अनु०) यः पुनरेकाधिकरणत्वे निर्विरोधी नैरनन्तर्ये तु विरोधी स रसान्तरव्यव-धानेन प्रवन्धे निवेश्यनीयत्व । यथा शान्तशृङ्गारौ नामानने निवेशितौ ।
क, अजुननाचरित प्रबन्धस्थ स्थायी रस के साथ एकाधिकरण्य विरोधी (रस) के, अङ्गीकृत को प्रथम होने में 'जम प्रकार निर्भररोधित्व होता है वह दिखला दिया गया । जिस का तो (निरूपण) प्रतिपादन करने के लिये कहा जा रहा है— उक्तप्रायं में निरूपित और नैरनन्तर्य में विरोधवाला रस बुद्धिमान् के द्वारा अभिप्रेत है; जिनका भाव क्या है; यह जानना चाहिये ॥३६॥
तारावती
उक्तप्रायं का अर्थ है एक आश्रय से सम्बन्ध होना । भय और उत्साह का एक आश्रय में रहना उचित है । किन्तु उनके आश्रय को बदल देने से उनका स्वरूप बदल जाता है । यथा—रघुवंश के तृतीय आनन्दवर्धन के लिखे हुये अजुनचरित में भय और उत्साह को एक साथ दिखलाया गया है । यहाँ पर कहा गया है कि 'जब किरीट- मुकुट के दबाव से दुसरे रस के आ जाने में विरोध होता है । जैसे रति और वैराग्य का विरोध । ये दोनों भाव किसी व्यक्ति में एक साथ नहीं रह सकते । किन्तु कालान्तर में तो एक के बाद दूसरा भाव आया ही करता है । इस
प्रकार एक आश्रय में जिन रसों का मिश्रण असम्भव हो उनको विभिन्न आश्रयों में रख देने से काम बन जाता है । यथा—किरण नहीं का वध ॥ ३६ ॥
३६ । यहाँ रसों के विरोध परिहार का उपाय वतलाया गया है जिनका एक आश्रय में मिलना असम्भव हो । अब दूसरे प्रकार का विरोध लो—कतिपय रस ऐसे होते हैं जिनका एक आश्रय में रहना तो विरुद्ध नहीं होता किन्तु एक के बाद दुसरे रस के आ जाने में विरोध होता है । जैसे
रति और वैराग्य का विरोध । ये दोनों भाव किसी व्यक्ति में एक साथ नहीं रह सकते । किन्तु कालान्तर में तो एक के बाद दूसरा भाव आया ही करता है । इस
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द्वितीयस्येति । नैरन्तर्यविरोधिनः । तदिति । निर्विरोधित्वम् । एकाश्रयत्वेन निमित्तेन यो निर्दोषः न विरोधी किन्तु निरन्तरत्वेन निमित्तेन विरोधमेति स तथाविधविरुद्धरसद्वयाविरुद्धेन रसान्तरेण मध्ये निवेशितेन युक्तः कार्य इति कारिकार्थः । मुक्तकेऽपि कदाचिदेवं ‘प्रबन्ध इति’ बाहुल्यापेक्षया, मुक्तकङ्गापेक्षया च वेदितव्यम् । यद्वृत्तान्ते ‘प्रकृतवाक्यस्थ-योरपि’ इति ।
लोचन
'द्वितीय का' अर्थात् नैरनत्न्यविरोधी का । 'वह' अर्थात् निर्विरोधित्व । एकाश्रयत्व निमित्त से जो निर्दोष अर्थात् विरोधी नहीं किन्तु निरन्तरत्व निमित्त से विरोध को प्राप्त होता है उसके उस प्रकार के दोनों विरोधी रसों के अविरुद्ध तथा मध्य में निवेशित किये हुये अन्य रस से युक्त कर दिया जाना चाहिये यह कारिका का अर्थ है । 'प्रबन्ध में' यह वाहुल्य की अपेक्षा से कहा गया है । मुक्तक में भी कभी ऐसा हो भी जाए।जैसा कि करेंगे—'एक वाक्य में स्थित भी दो का'.... इत्यादि ।
तारावती
प्रकार इन रसों का एक साथ वर्णन करना ही विरुद्ध है क्योंकि वैराग्य रति से उपहत हो जाता है और रति वैराग्य से । एक के बाद दूसरे रस पर एकदम आने से पाठक की मनोदत्तक्ति उसके आस्वादन के लिए सन्नद्ध नहीं रहती । ऐसे अवसरों पर क्या करना चाहिये यह इस २६ वीं कारिका में बतलाया गया है—
'जिन रसों का एक आश्रय में होना तो दूषित नहीं होता किन्तु उनकी निरन्तरता विरोध उत्पन्न करनेवाली होती है—बुद्धिमान् कवि को चाहिए कि ऐसे रसों की व्यञ्जना किसी अन्य रस को बीच रख कर करें ॥२६॥
आशय यह है कि जिन रसों के विरोध को निमित्त होने उनको एक साथ आना है उन रसों का विरोध तब दूर होता है जब उन दोनों के वीच में कोई ऐसा तीसरा रस रख दिया जाए जो दोनों का विरोधी न हो और दो दो से मेल खा सके । यह बात आधिकतर प्रबन्ध काव्यों में ही होती है क्योंकि प्रबन्ध काव्यों में ही इतना अवकाश होता है कि अनेक रसों का परिपोष हो सके । किन्तु मुक्तक में यह बात बिल्कुल सम्भव न हो ऐसी बात नहीं है। अग्निम कारिका में यही दिखलाया जायगा कि एक वाक्य में भी दो रसों के मध्य में तीसरा रख देने से उनका विरोध जाता रहता है ।
यहाँ पर उदाहरण के रूप में नaganand में शान्त और श्रृङ्गार का अभुत को मध्य में रखकर मिलना बतलाया गया है । अभिनवगुप्त ने नागानन्द की प्रायः सम्पूर्ण कया पर प्रकाश डाला है । अतः यहाँ पर नागानन्द का कथानक समक्ष लेना आवश्यक है । नागानन्द की वस्तु बौद्ध साहित्य से सम्बद्ध है और बृहत्कथा
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तृतीय उद्योतः
तारावती
से ली गईं है । विद्याधरों का युवराज जीमूतवाहन स्वभावतः उदासीन है और अपने पिता जी का राज्य इत्यादि सभी कुछ छोड़ देता है तथा अपने घर के कल्पवृक्ष को भी दानकर माता-पिता की सेवा को ही परम कर्तव्य मानकर माता-पिता को सेवा को ही परम कर्तव्य मानकर माता-पिता के साथ तपोवन को जाता है । विदूषक के साथ जब वह मलय पर्वत पर किसी निवासोपयोगी स्थान की खोज में जाता है तब उसे वहाँ का प्राकृतिक सौन्दर्य आकृष्ट कर लेता है । वहीं वह गीतध्वनि सुनता है और सङ्गीत की शास्त्रीय विशेषताओं पर ऐसा मुग्ध हो जाता है कि उस सङ्गीत का अनुसरण करते हुये देवमन्दिर की ओर जाता है जहाँ मलयवती अपनी चेरी के साथ भगवती गौरी की प्रार्थना में गाना गा रही है । मलयवती का रूप और भी आकर्षक है और जीमूतवाहन उसपर एकदम रीझ जाता है । चेरी के साथ वार्तालाप में यह प्रकट हो जाता है कि मलयवती एक कन्या है । अतः कन्याओं को देखना बुरा नहीं होता यह समझकर जीमूतवाहन को और अधिक प्रोत्साहन मिलता है । मलयवती अपनी चेरी से अपने स्वप्न की कथा कहती है कि गौरी ने उन्हें स्वप्न में विद्याधर चक्रवर्ती को पति के रूप में प्रदान किया है । इस पर जीमूतवाहन और विदूषक मलयवती के सामने आ जाते हैं और दोनों का परस्पर अनुराग व्यक्त हो जाता है । इसी समय मलयवती को एक तपस्वी घर को बुला ले जाता है । दोनों एक दूसरे के वियोग में दुःखी हैं । संयोगवश जिस समय चेरी के साथ मलयवती प्रच्छन्नरूप में सुन रही होती है उस समय जीमूतवाहन विदूषक से अपने प्रेम का वर्णन करते हैं और स्मृति से अपनी प्रेमिका का चित्र बनाते हैं । मलयवती निश्चय नहीं कर पाती कि यह प्रेमिका स्वयं वही है या कोई और । इसी समय मित्रावसु आकर अपनी वहन मलयवती के विवाह का प्रस्ताव जीमूतवाहन से करते हैं । जीमूतवाहन को यह पता नहीं है कि उनका प्रेम वस्तुतः मलयवती से हो है । अतः जीमूतवाहन अपने अन्य प्रेम की बात कहकर मलयवती के प्रेम को ठुकरा देते हैं और विदूषक के निर्देश पर मित्रावसु जीमूतवाहन के माता-पिता से जीमूतवाहन के विवाह की अभ्यर्थना करने चले जाते हैं । मलयवती निराश होकर फाँसी लगाकर आत्महत्या करने पर उतारू हो जाती है । तब चेरी के चिल्लाने पर जीमूतवाहन उसे छुड़ाने जाते हैं जहाँ दोनों का परिचय होता है और राजा अपने प्रेम का प्रमाण अपने बनाये हुये चित्र के द्वारा देते हैं । फिर गुरुजनों की अनुमति से दोनों का विवाह हो जाता है । यहाँ पर दोनों के श्रृङ्गार का विस्तार किया गया है । विदूषक को वहाँ की क्रियाँँ उपहास के रूप में कई सुगन्धित रंगों से रंग
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देती हैं। सुनान्वि की ओर आकृष्ट होकर भौंरे विदूषक की ओर आने लगते हैं। तत्र विदूपक भागने के लिये क्रियोन के वत्र पहनकर और घूँघट काढ़कर चलता है। शंखरंक और दास शराव के नशे में चूर होकर विदूषक को अपनी प्रेयसी समझ कर श्रृंगार चेष्टयें करते हैं। जब कि विदूषक की प्रेयसी आकर दोषों को खूब बनाती है। यहाँ हास्य का पुट मिल जाता है।
जिस समय जीमूतवाहन मलयवती के प्रेम में मस्त हैं उसी समय मित्रावसु आ जाते हैं और मलयवती वहाँ से चली जाती है। मित्रावसु सूचना देते हैं कि मतङ्ग ने विद्याधरों का राज्य छीन लिया है और जीमूतवाहन से युद्ध को आज्ञा मागते हैं। जीमूतवाहन को राज्य छिन जाने की प्रशनता ही होती है। 'किन्तु मित्रावसु क्रोध से भरे हुये हैं। अतः जोमूतवाहन समय टाल देते हैं।
जीमूतवाहन सहुद्रतट पर घूमने जाते हैं और वहाँ नागों के कड़ाह देखकर अपना शरीर देखकर भी नागों की रक्षा करने का निश्चय कर लेते हैं। उधर शंखचूड अपनी पारी में गरुड़ के भोज्य के रूप में उपस्थित होता है। जीमूत- वाहन सत्र रहस्य जानकर अपने प्राण देने के लिये उद्यत हो जाता है और जब शंखचूड दधिण गोकर्ण की परिक्रमा करने जाता है तब तक जीमूतवाहन अपना शरीर गरुड़ को अर्पित कर देते हैं। गरुड़ उनको लेकर उड़ जाता है। शंखचूड भी उनका अनुसरण करता है तथा जोमूतवाहन के माता-पिता उनकी पत्नी मलयवती भी उस स्थान पर पहुँचते हैं जहाँ गरुड़ जीमूतवाहन को लिये उपस्थित हैं। किन्तु जीमूतवाहन अन्त समय में स्वजनों से मिलकर दिवङ्गत हो जाते हैं। गरुड़ पश्चात्ताप से आक्रान्त होकर प्रत्युज्जीवन के लिये अमृत लेने चले जाते हैं उसी समय गौरी आकर अपने कमण्डल के जल से जीमूतवाहन को जीवित कर देती हैं। उधर गरुड़ अमृत वर्पा के द्वारा अवशिष्ट नागों को जिला देते हैं और फिर कभी नागवंश का संहार न करने का व्रत लेते हैं।
इस नाटक में निम्नलिखित रसों का उपादान किया गया है :-
१—सर्वस्वदान कर पितृचरण सेवा में तत्परता और परार्थ जीवन का उत्सर्ग इसमें जीमूतवाइन के शान्त रस की अभिव्यक्ति होती है।
२—मलयवती की संगीतपटुता में अद्भुत रस निष्पन्न होता है।
३—जीमूतवाहन और मलयवती की प्रणयलीला में शृङ्गार रस है।
४—शङ्करंक के वृत्तान्त में हास्य रस है।
५—मित्रावसु द्वारा युद्ध की प्रेरणा में वीर रस है। जिसमें क्रोध सञ्चारी के रूप में चित्रिहत है।
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यथेति । तत्र हि 'रागस्यास्पदं मिथ्यैवमि नहि मे ध्वंसोऽस्ति न प्रत्ययः' इत्यादिनो-पच्चेपादप्रमृत्ति परार्थश्शरीरावितरणान्तकनिर्वहणपर्यन्तं शान्तो रसस्तस्य विरुद्धो मलयवतीविषय: शृङ्गारस्तदु मयाविरुद्धमध्युतसुत्तरीकृत्य क्रमप्रसारसम्भवाभिप्रायेण कविना निबद्ध: 'अहो गोतमहो वादितत्रम्' इति । एतदर्थमेव 'व्यञ्जन धातु के अभिजनधातुना' इत्यादि नीरसप्रायमप्यन्त निबद्धमध्युतरसपरिपोषकतया ध्यान्तसरसतावहमिति 'निर्दोषदर्शना: कन्यका:' इति च क्रमप्रसरो निबद्ध: । यथाहु: - 'चित्तवृत्तिप्रसङ्घानं ध्वना: सांध्या: पुरुषार्थहेतुकर्मिदं निमित्तनैमित्तिकप्रसङ्गोनेति । अनन्तरं च निमित्तनैमित्तिकप्रसङ्गोनेति । अनन्तरं च निमित्तनैमित्तिकप्रसङ्ग-गलो य: शेखरकृत्यान्तोदितहास्यरसोपकृत: शृङ्गारस्तस्य विरुद्वो यो वैराग्यशमपोषको नागीयकलेवरास्थजालावलोकनादिवृत्तान्त: स मित्रावसो: प्रविश्षस्य मलयवतीनिगर्भनकाणि: 'संशय: समन्तात्' इत्यादिकाड्योपनिबद्धक्रोधव्यभिचारियुपकृतवीररसान्त-रितो निवेदित: ।
'जैस' यह । वहाँ पर निस्सन्देह 'राग' का स्थान है यह जानता हूँ, मुझे यह ध्वंस होनेवाला है यह विश्वास न हो ऐसा नहीं' इत्यादि के द्वारा उपक्शेप से लेकर दूसरे के लिये शरीरदान रूप निर्वहण पर्यन्त शान्त रस है; उसके विरुद्ध मलयवती-विषयक शृंगार है उन दोनों के अविरुद्ध मलयवती के अनुराग को मध्य में रखकर क्रमिक प्रसार की सम्भावना के अभिप्राय से कवि ने निबद्ध किया है—'आश्रर्यजनक गीत, आश्रर्यजनक वाद्य' इसके द्वारा । इसी निमित्त 'व्यञ्जन धातु के द्वारा अभिव्यक्ति' इत्यादि प्राय: नीरस ही निबद्ध किया गया है जो कि अद्भुत रस का परिपोषक होने के कारण अत्यन्त सरसता का सम्पादक है; इस प्रकार 'कन्या में निर्दोष दर्शनेवाली होती हैं' इसके द्वारा क्रमप्रसर का निर्वन्धन किया गया है । जैसे कि सांख्य लोग चित्तवृत्ति के प्रसार के विवेचन को ही धन समझते हैं—यह निमित्त-नैमित्तिक के प्रसंग से पुरुषार्थहेतुक होता है ।' इसके बाद निमित्त-नैमित्तिक प्रसंग से आया हुआ जो कि शेखरक वृत्तान्त से अभिव्यक्त हास्यरस से उपकृत होनेवाला शृंगार रस है उसके विरुद्ध जो वैराग्य और शम का पोषक नागों के शरीर के अवश्थजाल के अवलोकन इत्यादि का वृत्तान्त वह मलयवती के निर्गमन करनेवाले प्रविशष्ट हुए मित्रावसु के 'चारों ओर विचरणशील विभावों के द्वारा इत्यादि वचनों से उपनिबद्ध क्रोध व्यभिचारी से उपकृत वीररस को मध्य में करके निविष्ट किया गया है ।
तारावती ६—माता पिता और मलयवती के विलाप तथा शंखचूड और उसकी माता के संवाद में करुण रस है ।
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यहां अंगी रस शान्तरस है । क्योंकि अङ्गी रस वही होता है जिसका उपकक्षेप नाट्यवोज के रूप में किया गया हो तथा जो निर्वहण में विद्रामान हो । उपकक्षेप मुखसन्धि का पहला सन्ध्यङ्ग है और इसमें बीज का उपन्यास किया जाता है । इस उपोद्घात में बीजमूतवाइन कहते हैं—
'मैं जानता हूं कि यौवन राग का प्रमुख स्थान है । यह विनश्वर है यह मुझे न मद्दम हो न मान्द्यम हो ऐसा भी नहीं है । यह कौन नहीं जानता कि यौवन कर्तव्याकर्तव्य-निवेचन में अश्रम होता है । किन्तु यदि मेरा यह निन्दनीय यौवन भी इस प्रकार माता-पिता की सेवा करते हुये व्यतीत हो जाए तो यह अभीष्ट फल को प्रदान करनेवाला ही होगा ।'
यहां यौवन की गर्दा वैराग्यपरक है । इस प्रकार नाट्य का बीज शान्त पर्यवसायी ही है । निर्वहण में दूसरों के लिये जीवन का उत्सर्ग दिखलाया गया है जो कि वैराग्यपरक ही है । इस प्रकार बीज और फल दोनों वैराग्यपर्यवसायी हैं । अतः शान्तरस अङ्गी है । शान्तरस के बाद जिस रस का सङ्घोधिक विस्तार हुआ है वह है शृङ्गार । यह रस प्रथम तीन अङ्कों में व्याप्त है । किन्तु शान्त और शृङ्गार दोनों विरोधी रस हैं । अतः शान्त से एकदम शृङ्गार पर जाना एक दोष हो जाता । इसीलिये कवि ने "क्या ही सुन्दर गीत है क्या ही सुन्दर वाद्य है ?" कह कर अद्भुत रस को बीच में निवद्ध कर दिया है । इसीलिये 'व्यक्किरव्यञ्जनधातुतना— ' इत्यादि के द्वारा सङ्कीर्त्तन की साम्प्रदीक विशेषताओं का उल्लेख किया गया है जो न तो प्राशस्त्य ही है और न वरस्य ही । किन्तु उसका उपयोग यही है कि वीचि में अद्भुत रस की निष्पत्ति कर दी जाए । यह अद्भुत रस न तो शृङ्गार का विरोधी है न शान्त का । अतः बीच में अङ्कर दोनों के जोड़ने का महत्त्वपूर्ण कार्य करता है जिससे संगीत शास्त्र की नीरस भी साहित्यता सरस हो उठती है । क्रमशः जीवमूतवाइन मनिदर की ओर जाते हैं और यह जानकर कि संगीतपरायणा युवती एक कन्या है उनके हृदय में यह भावना उत्पन्न होती है कि कन्याओं का दर्शन अनुचित नहीं होता ! इस प्रकार उनकी तीव्र शान्तरससमयी चित्तवृत्ति में पहले आश्रयं का प्रसार होता है फिर कन्या के सम्मिलन की उत्कण्ठा और उसके बाद शृङ्गार रस । यहां इस क्रमिक प्रसार के लिये ही मध्य में अद्भुत रस को लाया गया है ।
यहां पर चित्त के प्रसार को समझाने के लिये अभिनव गुप्त ने सांख्य शास्त्र के दो सिद्धान्तों का उल्लेख किया है—चित्तवृत्ति का प्रसार और लिङ्गशरीर का अनेक रूप धारण करना । अतः इन दोनों तत्वों पर प्रकाश डालना आवश्यक प्रतीत होता है—
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सांख्य शास्त्र के अनुसार दो तत्व होते हैं पुरुष और प्रकृति । पुरुष चेतन होता है और प्रकृति में क्रियाशीलता । पुरुष में क्रियाशीलता नहीं होती और प्रकृति में चेतना नहीं होती । किन्तु जिस प्रकार एक दूसरे के सामने रखखे हुये दो दर्पणों में एक दूसरे की प्रतिक्छविया स्फुरित हो जाती है उसीप्रकार पुरुष और प्रकृति की निकटता से एक दूसरे के धर्मों का संक्रमण एक दूसरे में प्रतीत हो जाता है जिससे पुरुष क्रियाशील और प्रकृति चेतन प्रतीत होने लगती है ।
प्रकृति में तीन गुण होते हैं सत्व, रज और तम । सत्व का कार्य है प्रकाशित होना, रज का काम है क्रियाशील होना और तम का काम है स्थितिरता । प्रारम्भ में तीनों गुणों की साम्यावस्था रहती है और प्रकृति में तीनों गुण विद्यमान रहते हुये भी पूर्ण क्रियाशील नहीं रहते । उस अवस्था को मूल प्रकृति कहा जाता है । यह किसी से उत्पन्न नहीं होती किन्तु स्वयं अनेक तत्वों को जन्म देनेवाली होती है । अतः यह केवल प्रकृति ही कही जाती है ।
अदृष्ट इत्यादि के प्रभाव से रजोगुण की क्रियाशीलता के कारण सत्वगुण प्रकाश में आ जाता है तब उसे महत्तत्व या बुद्धि की संज्ञा प्राप्त हो जाती है । बुद्धि में जब रजोगुण का अंश तीव्र हो जाता है तब अहंकार या विभाजक तत्व का आविर्भाव होता है । इसी क्रम से अहंकार से पञ्चतन्मात्रायें, पञ्चतन्मात्राओं से स्थूलभूत तथा ११ इन्द्रियों का आविर्भाव होता है । महत् से पञ्चतन्मात्राओं तक समस्त तत्व अपने पूर्ववर्तियों की प्रकृति हैं और पूर्ववर्तियों की विकृति । ११ इन्द्रियाँ और स्थूल भूत केवल विकृतियाँ हैं, प्रकृति किसी भी तत्व की नहीं । पुरुष न प्रकृति है और न विकृति । इस प्रकार सांख्याभिमत पदार्थ चार प्रकार के होते हैं । सांख्य के मत में सत्कार्य-वाद माना जाता है ।
बाह्येन्द्रियां विषय को ग्रहणकर अन्तःकरण को समर्पित करती हैं । उन विषयों के प्रभाव से अन्तःकरण की जो परिणमवृत्तियाँ उद्भूत होती हैं उन सबके समूह को चित्त कहते हैं । अन्तः करण के दो धर्म होते हैं प्रस्थ्य और संस्कार । प्रख्या और प्रवृत्ति को प्रत्यय कहते हैं और स्थिती को संस्कार । प्रख्या, प्रवृत्ति और स्थिती, इन तीनों में पांच-पांच वृत्तियां होती हैं । प्रख्या की ५ वृत्तियां होती हैं—प्रमाण, स्मृति, प्रत्वृतिविज्ञान, विकल्प और विपर्यय । चित्त की भी प्रवृत्तियां ५ प्रकार की होती हैं—संकल्प, कल्पन, कृति, विकल्पन और विपर्यस्त चेष्टा । स्थिती रूप संस्कार के ५ प्रकार हैं—प्रमाण संस्कार, स्मृति संस्कार, प्रवृत्तिसंस्कार, विकल्प-संस्कार और विपर्य्याससंस्कार । इस प्रकार चित्तवृत्ति का प्रसार ही प्रमाणादि समस्त तत्वों को आच्छादित कर लेता है
( चित्तवृत्ति के प्रमाणादि रूप में प्रसार की विस्तृत व्याख्या के लिये देखिये—स्वामी हरिहरानन्द आरण्य कृत सांख्यतत्वालोक )
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इसलिये अभिनव गुप्त ने लिखा है कि सांख्यों का धन चित्तवृत्ति के प्रसार की व्याख्या करना ही है। इसलिये नित्तवृत्ति का निरोध ही योग माना गया है। पुरुष की योगप्राप्ति और निर्वाणप्राप्ति के निमित्त प्रकृति सचेष्ट होकर उसके लिये एक लिङ्गशरीर की रचना करती हैं। इस लिङ्गशरीर में महत् ( बुद्धि ), अहङ्कार, पञ्चतन्मात्रायें और ११ इन्द्रियाँ ये मिलाकर १७ पदार्थ होते हैं और इसमें ८ भावों की अधिवासना होती है। वे ८ भाव हैं—धर्म, अधर्म, ज्ञान, अज्ञान, वैराग्य, अवैराग्य, ऐश्वर्य और अनैश्वर्य। यह लिङ्गशरीर सूक्ष्म होता है और भोग तथा अपवर्ग के लिये पुरुष को आवेष्टित किये रहता है। किन्तु यह लिङ्गशरीर तब तक अकिञ्चित्कर होता है जब तक स्थूल भूतों से बने हुये शरीर से इसका संयोग नहीं हो जाता। जिस प्रकार नट अनेक भूमिकायें करने के लिये कभी परशुराम, कभी अजात शत्रु कभी वस्त्रराज बन जाता है उसीप्रकार यह लिङ्गशरीर भी अनेक योनियों में भटकता फिरता हैं। स्थूल भौतिक शरीरों के नष्ट हो जाने पर भी इस लिङ्गशरीर का नाश नहीं होता और यह अपने कमों के अनुसार शरीरान्तर में प्रवेश करता है। यह क्रम तब तक चलता रहता है जब तक ज्ञान के द्वारा चित्तवृत्ति का निरोध नहीं हो जाता जो कि अपवर्ग की एक आवश्यक शर्त है। यही सांख्य के सिद्धान्तों का सार है। इस प्रसंग में अभिनवगुप्त ने सांख्य की निम्नलिखित कारिका उद्धृत की है—
पुरुषार्थहेतुकमिदं निमित्तनैमित्तिकप्रसङ्गेन । प्रकृतेर्विभुत्वयोगादवटवदद्रव्यवत्प्रतिष्ठते नित्यम् ॥ [ पुरुष के प्रयोजन ( भोग और अपवर्ग ) को निमित्त मानकर बना हुआ यह लिङ्गशरीर निमित्त ( धर्म इत्यादि ) और नैमित्तिक ( भौतिक शरीर ) के प्रसंग - से प्रकृति की व्यापकता के कारण नट के समान अनेक रूपों को धारण कर व्यवदार करता है। ]
नागानन्द में उसी कामिक चित्तवृत्ति के प्रसार के कारण शान्त से अद्भुत पर होती हुई चित्तवृत्ति श्रृङ्गार पर आती है फिर निमित्तनैमित्तिक प्रसङ्ग से ही शृङ्गारक, वीदूषक और नवमालिका विषयक हास्यरस उपस्थित होता है। यह हास्य प्रस्तुत शृङ्गार का विरोधी नहीं है, अपितु शृङ्गार की भावना की अभिवृद्धि ही करता है। इस हास्यरस से उपकृत होकर नायक-नायिका का शृङ्गार रस पुष्ट हो जाता है। ( किन्तु वह शृङ्गार रस है अङ्ग ही, क्योंकि पहले सिद्ध किया जा चुका है कि नागानन्द में शान्तरस ही अङ्गी है। नायक का नवीन परिणय इस शान्ति की भावना को अधिक महत्वपूर्ण बना देता है। ) अब कवि को शृङ्गार से पुनः शान्त पर
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शान्तस्तृणाक्षयसुखस्य यः परिपोषस्तल्लक्षणो रसः प्रतीत एव । तथाचोक्तम्--
यच्च काम सुखं लोके यच्च दिव्यं महत्सुखम् । तृणाक्षयसुखस्यैते नाहृतः षोडशी कलाम् ॥
अनु० और तृणाक्षय सुख का जो परिपोष उस लक्षणवाला शान्तरस प्रतीत ही होता है । इसीलिये कहा गया है— 'लोक में जो कामना का सुख है जो दिव्य महान् सुख है, ये तृणाक्षय सुख की षोडशी कला के भी अधिकारी नहीं ।'
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आना है । एकदम आया नहीं जा सकता क्योंकि दोनों का नैरन्तर्य विरोधी तथा सदोष माना जाता है । इसीलिये कवि ने जिस प्रकार पहले शान्त से श्रृङ्गार पर आने के लिये बीच में अद्भुत रस को रख दिया था उसी प्रकार श्रृङ्गार से पुनः शान्त पर आने के लिये कवि ने बीच में वीर रस को सन्निविष्ट कर दिया है । जब मित्रावसु आते हैं तब मलयवती चली जाती है जिससे श्रृङ्गार में विराम लग जाता है । मित्रावसु युद्ध का प्रस्ताव करते हुये कहते हैं—
संसर्पद्रिः समन्तात् कृतसकलवितानमध्यायानैर्विमानैः कुवाणाः प्रावृषीव स्थगितरविरुचः श्यामतां वसुधास्य । एते याताक्षा सद्यः सततवचनमितः प्राप्य युद्धाय सिद्धाः सिद्धश्रोत्रीवचच्छत्रुङ्कषणभयविनमद्राजकं ते स्वराज्यम् ॥
[ चारों ओर से विचरणशील तथा समस्त आकाश में गमन करनेवाले विमानों से वर्षा काल के समान सूर्य के प्रकाश को रोककर दिन को काला करते हुये ये सिद्ध तुम्हारे वचनों को प्राप्तकर यहाँ से युद्ध के लिये प्रस्थान करें और तुम्हारा अपना राज्य उद्दत शत्रुओं के क्षणिक भय के दूर हो जाने से नम्र राजाओं- वाला वन जाए । ]
इसके बाद मित्रावसु अकेले ही शत्रुओं पर विजय प्राप्त कर लेने का उत्साह दिखलाते हैं । यह उत्साह क्रोध से मिला हुआ है । क्रोध वीररस की संचारिणी भाव है । इस वीररस को बीच में डालकर कवि अनायास ही श्रृङ्गार से शान्त डाल देने से दोनों विरोधियों का विरोध मिट जाता है ।
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नजु नास्त्येव शान्तो रसः तस्य तु स्थाय्येव नोपदिष्टो मुनिनेत्र्याश्रद्धयाह—शान्तश्रेति । तृष्णानां विषयामिलापाणां यः क्षयः स चेतो निवृत्तिरूपो निर्वेदः तदेव सुखं तस्य रसत्वाभूतस्य यः परिपोषो रस्यमानता ऋतस्तदेव लक्षणं यस्मात् स शान्तो रसः । प्रतीत एवेति । स्वालुसवेनापि निवृत्तमोजनाद्यशेषविषयेच्छाप्रसरत्काले सम्भाव्यत एव ।
नहीं, शान्त रस है ही नहीं, ऐसा नहीं है । उसका तो स्थायी भाव ही आचार्यों द्वारा 'शान्त' इस नाम से उपदिष्ट नहीं किया गया है—यह कहकर कहते हैं—'और शान्त' । तृष्णाओं का अर्थात् विषयाभिलाषों का क्षय अर्थात् सभी ओर से निवृत्तिरूप निर्वेद वही सुख; स्थायी-भूत उसका जो आस्वादनीयता से उत्पन्न परिपोष वही जिसका लक्षण ( लक्षित करानेवाला ) हो वह शान्तरस होता है । 'प्रतीत ही होता है' । भोजन इत्यादि समस्त विषयों की इच्छाओं के प्रसार की निवृत्ति के काल में सम्भावित होता है ।
( प्रश्न ) उपर शान्त और श्रृङ्गार के नैरन्तर्य विरोध का उदाहरण दिया गया है । यह तभी सङ्गत हो सकता है जब दोनों रसों की सत्ता स्वीकार कर ली जाए ! शान्त नाम का तो कोई रस ही नहीं है । भरतमुनि ने रसों के प्रसङ्ग में शान्तरस के स्थायी भाव का उल्लेख ही नहीं किया है । फिर शान्त और श्रृङ्गार के विरोध का उदाहरण कैसे सङ्गत हो सकता है ?
( प्रश्न ) उपर शान्त और श्रृङ्गार के निरन्तर रहनेवाले विरोध का उदाहरण दिया गया है । यह तभी सङ्गत हो सकता है जब दोनों रसों की सत्ता स्वीकार कर ली जाए ! शान्त नाम का तो कोई रस ही नहीं है । भरतमुनि ने रसों के प्रकरण में शान्तरस के स्थायी भाव का उल्लेख ही नहीं किया है । फिर शान्त और श्रृङ्गार के विरोध का उदाहरण कैसे सङ्गत हो सकता है ?
( उत्तर ) शान्तरस की प्रतीति होती ही है ( उसका अपलाप किसी प्रकार भी नहीं किया जा सकता । जहाँ पर तृष्णाक्षय के सुख का परिपोष हो वहीं पर शान्तरस हुआ करता है । यही शान्तरस का लक्षण है । विषयाभिलाष से चारों ओर से निवृत्त हो जाना ही निर्वेद या वैराग्य कहलाता है । उस निर्वेद में एक अभूतपूर्व आनन्द आया करता है । यह निर्वेद रूप आनन्द ही शान्तरस का स्थायी भाव है । जब उसका परिपोष आस्वाद में हेतु हो जाता है तब भी शान्तरस कहा जाता है ।
( उत्तर ) शान्तरस की प्रतीति होती ही है ( उसका अपलाप किसी प्रकार भी नहीं किया जा सकता । जहाँ पर तृष्णाक्षय के सुख का परिपोष हो वहीं पर शान्तरस हुआ करता है । यही शान्तरस का लक्षण है । विषयाभिलाष से चारों ओर से निवृत्त हो जाना ही निर्वेद या वैराग्य कहलाता है । उस निर्वेद में एक अपूर्व आनन्द आया करता है । यह निर्वेद रूप आनन्द ही शान्तरस का स्थायी भाव है । जब उसका परिपोष आस्वाद में हेतु हो जाता है तब भी शान्तरस कहा जाता है ।
यही शान्तरस का लक्षण है । इसका अनुभव एक साधारण व्यक्ति को भी हुआ करता है । जब मनुष्य की पूर्ण तृप्ति हो जाती है और उसकी भोजन इत्यादि सभी विषयों की ओर से इच्छा जाती रहती है उस समय उसे एक अपूर्व आनन्द का अनुभव हुआ करता है । इस प्रकार तृष्णाक्षय के सुख में भी एक अभूतपूर्व आनन्द की प्रतीति होती है । यही आनन्द शान्तरस का स्थायी भाव होता है । यह बात कही भी गयी है :-
यही शान्तरस का लक्षण है । इसका अनुभव एक साधारण व्यक्ति को भी हुआ करता है । जब मनुष्य की पूर्ण तृप्ति हो जाती है और उसकी भोजन इत्यादि सभी विषयों की ओर से इच्छा जाती रहती है उस समय उसे एक अपूर्व आनन्द का अनुभव हुआ करता है । इस प्रकार तृष्णाक्षय के सुख में भी एक अपूर्व आनन्द की प्रतीति होती है । यही आनन्द शान्तरस का स्थायी भाव होता है । यह बात कहीं भी कही गयी है :-
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अन्ये तु सर्वचित्रदृत्तिमशम एवास्य स्थाशिति मन्यन्ते। तृष्णासद्भावस्य प्रसज्यप्रतिषेधरूपस्चे चेतोवृत्तित्वाभावेन भावत्वयोगात्। पर्युदासे तु सद्भावपक्ष एवायम्।
दूसरे लोग तो सब प्रकार की चित्तवृत्तियों का प्रशम ही इसका स्वरूप मानते हैं। क्योंकि सद्भाव के प्रसज्यप्रतिषेध रूप होने पर चित्तवृत्ति के अभाव से भावत्व ही सिद्ध नहीं होता। पर्युदास में तो यह हमारा ही पक्ष है। और लोग तो—
लोक में कामना से जो सुख प्राप्त होता है और जो स्वर्गीय महान् सुख होता है, वे दोनों प्रकार के सुख तृष्णाक्षय से उत्पन्न होने वाले सुख का सोलहवाँ भाग भी नहीं होते।
‘लोक में कामना से जो सुख प्राप्त होता है और जो स्वर्गीय महान् सुख होता है, वे दोनों प्रकार के सुख तृष्णाक्षय से उत्पन्न होने वाले सुख का सोलहवाँ भाग भी नहीं होते।’
कतिपय आचार्यों का मत है कि सब प्रकार की चित्तवृत्ति का प्रशम ही शान्तरस का स्थायी भाव होता है। यहाँ पर मुझे यह पूछना है कि ‘चित्तवृत्ति के न होने’ में जो ‘न’ का प्रयोग किया गया है उसका क्या अर्थ है, निषेधवाचक ‘न’ के दो अर्थ हुआ करते हैं—(१) प्रसज्यप्रतिषेध, यह प्रतिषेध वहाँ पर होता है जहाँ ‘न’ क्रिया के साथ लगता है, जैसे ‘यहाँ पुरुष नहीं है’ इस वाक्य में क्रिया के साथ ‘न’ लगा हुआ है और इसका अर्थ यह हो जाता है कि ‘न’ यहाँ पुरुष है और न तत्सदृश कोई अन्य।’(२) पर्युदासप्रतिषेध, जहाँ संज्ञा के साथ ‘न’ जुड़ता है जैसे——यहाँ ‘अपुरुष है’ इसका अर्थ है कि यहाँ पुरुष नहीं है किन्तु तत्सदृश कोटि का कोई व्यक्ति विद्यमान है। अब प्रश्न यह है कि चित्तवृत्ति के निषेध में प्रसज्यप्रतिषेध है, या पर्युदासप्रतिषेध। यदि आप प्रसज्यप्रतिषेध मानते हैं तो इसका अर्थ यह हुआ कि आप किसी प्रकार की चित्तवृत्ति मानते ही नहीं। इस प्रकार आ तृष्णा की सत्ता का सर्वतोभावेन अभाव मान लेते हैं। ऐसी दशा में अभाव किसी प्रकार के भाव के अन्तर्गत किस प्रकार आ सकता है? अतः अभाव को स्थायी भाव कहना वदतोव्याघात दोष है। यदि आप पर्युदासप्रतिषेध मानते हैं तो इसका अर्थ होगा कि तृष्णा से भिन्न तत्सदृश किसी अन्य प्रकार की चित्तवृत्ति। ऐसी दशा में मेरा ही पक्ष सिद्ध हो जाता है। क्योंकि हम निर्वेद एक विशेष प्रकार की चित्तवृत्ति मानते हैं और तृष्णाक्षय को शान्त का लक्षण स्वीकार करते हैं। पर्युदासप्रतिषेध का यही अर्थ है।
कतिपय आचार्यों का मत है कि सब प्रकार की चित्तवृत्ति का प्रशम ही शान्तरस का स्थायी भाव होता है। यहाँ पर मुझे यह पूछना है कि ‘चित्तवृत्ति के न होने’ में जो ‘न’ का प्रयोग किया गया है उसका क्या अर्थ है, निषेधवाचक ‘न’ के दो अर्थ हुआ करते हैं—(१) प्रसज्यप्रतिषेध, यह प्रतिषेध वहाँ पर होता है जहाँ ‘न’ क्रिया के साथ लगता है, जैसे ‘यहाँ पुरुष नहीं है’ इस वाक्य में क्रिया के साथ ‘न’ लगा हुआ है और इसका अर्थ यह हो जाता है कि ‘न’ यहाँ पुरुष है और न तत्सदृश कोई अन्य।’(२) पर्युदासप्रतिषेध, जहाँ संज्ञा के साथ ‘न’ जुड़ता है जैसे——यहाँ ‘अपुरुष है’ इसका अर्थ है कि यहाँ पुरुष नहीं है किन्तु तत्सदृश कोटि का कोई व्यक्ति विद्यमान है। अब प्रश्न यह है कि चित्तवृत्ति के निषेध में प्रसज्यप्रतिषेध है, या पर्युदासप्रतिषेध। यदि आप प्रसज्यप्रतिषेध मानते हैं तो इसका अर्थ यह हुआ कि आप किसी प्रकार की चित्तवृत्ति मानते ही नहीं। इस प्रकार आ तृष्णा की सत्ता का सर्वतोभावेन अभाव मान लेते हैं। ऐसी दशा में अभाव किसी प्रकार के भाव के अन्तर्गत किस प्रकार आ सकता है? अतः अभाव को स्थायी भाव कहना वदतोव्याघात दोष है। यदि आप पर्युदासप्रतिषेध मानते हैं तो इसका अर्थ होगा कि तृष्णा से भिन्न तत्सदृश किसी अन्य प्रकार की चित्तवृत्ति। ऐसी दशा में मेरा ही पक्ष सिद्ध हो जाता है। क्योंकि हम निर्वेद एक विशेष प्रकार की चित्तवृत्ति मानते हैं और तृष्णाक्षय को शान्त का लक्षण स्वीकार करते हैं। पर्युदासप्रतिषेध का यही अर्थ है।
दूसरे लोग कहते हैं कि शान्त एक सामान्य प्रकार की प्राकृत चित्तवृत्ति होती है और रति इत्यादि वैकृत चित्तवृत्तियाँ हैं। यही बात भरतमुनि ने छठे अध्याय के अन्तिम भाग में कही है :—
दूसरे लोग कहते हैं कि शान्त एक सामान्य प्रकार की प्राकृत चित्तवृत्ति होती है और रति इत्यादि वैकृत चित्तवृत्तियाँ हैं। यही बात भरतमुनि ने छठे अध्याय के अन्तिम भाग में कही है :—
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स्वं स्वं निमित्तमासाद्य शान्ताञ्जाव: प्रवर्त्तते । पुनर्निमित्तापाये तु शान्त एव प्रलीयते ॥
इति भरतवाक्यं दृढयन्तः सर्वरससामान्यस्वभावं शान्तसाचक्षाणा अनुपजातचित्रवृत्तिविशेषान्तररूपं शान्तस्य स्थायित्वमावं मन्यन्ते । एतच्च नातिवासमत्पक्षाद्दूरम् । प्रागभावप्रध्वंसाभावकृतस्तु विशेषः । युक्तिश्र मध्वंस एव तृपणानाम् । यथोक्तम्—‘वीतरागजन्मादर्शनात्’ इति ।
'अपने-अपने निमित्त को प्राप्तकर शान्त से भाव प्रवृत्त होता है फिर निमित्त के अभाव में शान्त में ही प्रलीन हो जाता है ।'
इस भरतवाक्य को देखे हुये सर्वरससामान्य स्वभाववाले शान्त को कहते हुये दूसरी चित्तवृत्ति की विशेषता की अनुपलब्धि को शान्तरस का स्थायी भाव मानते हैं । यह हमारे पक्ष से बहुत दूर नहीं है । प्रागभाव और प्रध्वंसाभाव की उत्पन्न की हुई विशेषता तो है। तृष्णाओं का प्रध्वंस ही उचित है। जैसा कहा गया है—‘वीतराग का जन्म न देखने से ।' यह ।
'रति इत्यादि विकृत भाव होते हैं और शान्त उनकी प्रकृति होता है । विकार प्रकृति से ही उत्पन्न होता है और प्रकृति में ही लीन हो जाता है ।'
इस भरतवाक्य का सहारा लेनेवालों का मत है कि शान्त रस सभी रसों के मूल में रहता है, सभी रसों की शान्तावस्था ही शान्त रस कहलाती है। अत एव शान्त रस का स्थायी भाव वही चित्तवृत्ति होती है जिसमें किसी अन्य प्रकार की चित्तवृत्ति की विशेषता का आविर्भाव न हुआ हो । यह सिद्धान्त भी लगभग वही है जिसे मैं मानता हूँ । विशिष्ट भावनाओं का अभाव हो हम दोनों के मत में शान्तरस का प्रयोजक होता है । अन्तर केवल यह है कि मेरे मत से तृष्णा का प्रध्वंसाभाव ( नष्ट होने के बाद का अभाव ) शान्तरस कहलाता है और इन लोगों के मत से तृष्णा का प्रागभाव (उत्पत्ति के पहले का अभाव ) शान्तरस कहलाता है । उचित यहाँ है कि तृष्णा का प्रध्वंसाभाव ही शान्तरस माना जाए । न्यायसूत्रकार ने तृतीय अध्याय के प्रथम आहिक में कहा है कि ‘वीतराग का जन्म नहीं देखा जाता ।' वीतराग का यही आशय है कि जिसकी तृष्णा का प्रध्वंस हो गया हो ।
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तैयत एवेति । मुनिना प्रयत्नीक्रियत एव 'कवचिच्छम्' इति वदता। न च मध्येन्तावस्था वर्णनीया येन सर्वचेष्टोपरमादनुभवाभावेनाप्रतीममानता स्यात् । रूपि फलभूभाववर्णननीततैव पूर्वभमौ तु 'तस्य शान्तवाहिता संस्कारात् । इति मत्यान्तराणि संस्कारेभ्य:' इति सूत्रदृढनिश्चया चित्रकारा यमनियमादिजधुोरोद्वहनादिलक्षणा वा ज्ञानतस्यापि जनकादेश्रेष्ठेवल्रयनुभावसद्भावाच्च मध्यसम्भाव्यमानभुवो व्यभिचारिसद्भावाच्च प्रतीतत एव । होत होता ही है' । 'कहीं शम' यह कहते हुये मुनि के द्वारा भी अंगीकृत ही गया है ।
उसकी पर्यन्तावस्था तो नहीं वर्णनीय है जिससे समस्त के उपरम से अनुभव के अभाव से ही अप्रतीममानता हो । शृंगार इत्यादि भूमि में अवर्णनीय ही होते हैं पूर्वभूमि में तो '( निरोध ) संस्कार से शान्तवाहिता होती है; उसके चित्तों में संस्कारों से दूसरे प्रत्यय होते हैं' सूत्रों की नीति से विचित्र प्रकार की यम नियम इत्यादि चेष्टा अथवा राज-र इत्यादि की चेष्टा शान्तजनक की भी देखी ही गई है । अतः अनुभवों से और यम नियम इत्यादि के मध्य में सम्भावित अनेक व्यभिचारियों के प्रतीत होता ही है ।
अन्तरम की प्रतीति होती ही है' कहने का आशय यह कि विषयों से पूर्ण वाद उनके परित्याग में उसी प्रकार का आनन्द आता है जिस प्रकार से तृस होने के बाद एक प्रकार के आनन्द का अनुभव हुआ करता है । जन्य आह्लाद सर्वजनानुभव सिद्ध है । साथ ही इस प्रतीति का यह भी सकता है कि भरत मुनि ने भी इसे अझीक़ार किया है । मुनि ने कहा है 'कहीं भावों का प्रशम भी होता है ।' (शान्त रस के पत्त्, विपक्ष, सिद्धान्त उसके स्थायीभाव पर अभिनव भारती में विस्तारपूर्वक विचार किया I अतः वहीं देखना चाहिये । ) कुछ लोगों का कहना यह है कि शान्त-नत्र कि चेष्टाओं का उपरम हो जाता है तब न तो उसकी प्रतीति ही होती न उसकी आभनय हो सम्भेव हैं । इस विषय में मुनों यह कहना है कि की इतनी पर्यन्तावस्था का वर्णन करना ही नहीं चाहिये जिससे समी ही चेष्टाओं का उपरम हो जाए और अनुभवों के अभाव में उसकी प्रतीति सके । शान्तरस की ही पर्यन्तावस्था का वर्णन करना निषिद्ध नहीं है शृंगार इत्यादि दूसरे रसों की पर्यन्तावस्था का वर्णन भी निषिद्ध ही है ।
तारावती
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स्वं स्वं निमित्तमासाद्य शान्ताञ्जाव: प्रवर्त्तते । पुनर्निमित्तापाये तु शान्त एव प्रलीयते ॥
इति भरतवाक्यं दृश्यन्तः सर्वरससामान्यस्वभावं शान्तसाचक्षाणा अनुपजात-चित्रद्वृत्तिविशेषान्तररूपं शान्तरस स्थायित्वावं मन्यन्ते । एतच्च नातिवासमत्पक्षाद्दूषयिष्यामः । यथोक्तम्-‘वीतरागजन्मादर्शनात्’ इति ।
'अपने-अपने निमित्त को प्राप्तकर शान्त से भाव प्रवृत्त होता है फिर निमित्त के अपाय में शान्त में ही प्रलीन हो जाता है ।'
इस भरतवाक्य को देखे हुये सर्वरससामान्य स्वभाववाले शान्त को कहते हुये दूसरी चित्तवृत्ति की विशेषता की अनुपलब्धि को शान्तरस का स्थायी भाव मानते हैं । यह हमारे पक्ष से बहुत दूर नहीं है । प्रागभाव और प्रध्वंसाभाव की उत्पत्ति की हुई विशेषता तो है । तृष्णाओं का प्रध्वंस ही उचित है । जैसा कहा गया है—‘वीतराग का जन्म न देखने से ।'यह ।
'रति इत्यादि विकृत भाव होते हैं और शान्त उनकी प्रकृति होता है । विकार प्रकृति से ही उत्पन्न होता है और प्रकृति में ही लीन हो जाता है ।'
‘अपने अपने कारणों को लेकर शान्त से ही दूसरे भावों का जन्म होता है और जब कारण जाता रहता है तब वह भाव शान्त में ही लीन हो जाता है ।’
इस भरतवाक्य का सहारा लेनेवालों का मत है कि शान्त रस सभी रसों के मूल में रहता है, सभी रसों की शान्तावस्था ही शान्त रस कहलाती है । अत एव शान्त रस का स्थायी भाव वही चित्तवृत्ति होती है जिसमें किसी अन्य प्रकार की चित्तवृत्ति की विशेषता का आविर्भाव न हुआ हो । यह सिद्धान्त भी लगभग वही है जिसे मैं मानता हूँ । विशिष्ट भावनाओं का अभाव हो हम दोनों के मत में शान्तरस का प्रयोजक होता है । अन्तर केवल यह है कि मेरे मत से तृष्णा का प्रध्वंसाभाव ( नष्ट होने के बाद का अभाव ) शान्तरस कहलाता है और इन लोगों के मत से तृष्णा का प्रागभाव (उत्पत्ति के पहले का अभाव ) शान्तरस कहलाता है । उचित यहाँ है कि तृष्णा का प्रध्वंसाभाव ही शान्तरस माना जाए । न्यायसूत्रकार ने तृतीय अध्याय के प्रथम आह्निक में कहा है कि ‘वीतराग का जन्म नहीं देखा जाता ।' वीतराग का यही आशय है कि जिसकी तृष्णा का प्रध्वंस हो गया हो ।
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प्रतीयत एवेति । मुनिना अप्यङ्गीक्रियत एव ‘कवचिच्छ्रम’ इति वदता । न च तदोया पर्यन्तावस्था वर्णनीया येन सर्वचेष्टोपरमादनुभवाभावेनाप्रतीयमानता स्यात् । शृङ्गारादेरपि फलभूमाववर्णनीयतैव पूर्वभूमौ तु ‘तस्य ग्रहणत्वाहितात् संस्कारात् । तद्च्छेद्रेणु प्रत्ययान्तरेण संस्काराभ्यः’ इति सूत्रद्वयेनोक्तौ चित्रकारादि यमनियमादि-चेष्टा राजगुरोरद्धहनादिलक्षणा वा शान्तस्यापि जनकादेः श्वेत्यनुभावसद्भावाच्च प्रतীয়त एव ।
प्रतीयमान होता ही है । मुनि के द्वारा भी अंगीकृत किया गया है, जो 'कहीं थकान' ऐसा कहते हैं । और उस ( शान्त रस ) की अंतिम अवस्था का वर्णन नहीं करना चाहिए, जिससे सभी चेष्टाओं के समाप्त हो जाने से अनुभव के अभाव के कारण प्रतीति न हो । शृंगार आदि की भी फलभूमि का वर्णन नहीं करना चाहिए, पूर्वभूमि में तो 'उसके ग्रहण करने से संस्कार पड़ने के कारण और उस ( संस्कार ) के नाश से अन्य प्रत्यय के द्वारा अन्य संस्कार होने से' इन दो सूत्रों द्वारा कहे गये चित्रकार आदि की चेष्टा अथवा नियम आदि चेष्टा अथवा राजगुरु के उद्धार आदि लक्षण वाली चेष्टा अथवा शान्त रस के भी उत्पादक के श्वेत आदि अनुभाव के सद्भाव से प्रतीत होता ही है ।
‘प्रतीत होता ही है’ । ‘कहीं श्रम’ यह कहते हुये मुनि के द्वारा भी अंगीकृत किया ही गया है । उसकी पर्यन्तावस्था तो नहीं वर्णनीय है जिससे समस्त चेष्टाओं के उपरम से अनुभव के अभाव से ही अप्रतीयमाना हो । शृङ्गार इत्यादि भी फलभूमि में अवर्णनीय ही होते हैं पूर्वभूमि में तो ‘( निरोध ) संस्कार से उसकी प्राशन्तवाहिता होती है; उसके हृद्रों में संस्कारों से दूसरे प्रत्यय होते हैं’ इन दो सूत्रों की नीति से विचित्र प्रकार की यमनियमादि-चेष्टा अथवा राज-घुरोद्वहन इत्यादि की चेष्टा शान्तजनक की भी देखी ही गई है । अतः अनुभवों के होने से और यम नियम इत्यादि के मध्य में सम्भावित अनेक व्यभिचारियों के योग से प्रतीत होता ही है ।
'प्रतीत होता ही है' । 'कहीं श्रम' यह कहते हुए मुनि के द्वारा भी अंगीकृत किया गया है । उसकी अंतिम अवस्था वर्णनीय नहीं है जिससे सभी चेष्टाओं के समाप्त होने से अनुभव के अभाव के कारण अप्रतीत हो । शृंगार आदि भी फलभूमि में वर्णनीय नहीं होते हैं । पूर्वभूमि में तो निरोध संस्कार से उसकी शांति होती है; उसके हृदय में संस्कारों से अन्य प्रत्यय होते हैं' इन दो सूत्रों के अनुसार विचित्र प्रकार की यम नियम आदि चेष्टा अथवा राजगुरु के उद्धार आदि की चेष्टा शान्त रस के उत्पादक की भी देखी गई है । अतः अनुभवों के होने से और यम नियम आदि के मध्य में अनेक व्यभिचारियों के समावेश से प्रतीत होता ही है ।
तारावती
तारावती
‘शान्तरस की प्रतीति होती ही है’ कहने का आशय यह कि विषयों से पूर्ण तृप्ति के बाद उनके त्याग में उसी प्रकार का आनन्द आता है जिस प्रकार भोजन से तृप्त होने के बाद एक प्रकार के आनन्द का अनुभव हुआ करता है । यह तृप्ति अन्य आहारादि संज्ञानानुभव सिद्ध है । शायद इसे प्रतीति का अर्थ हो सकता है कि भरत मुनि ने भी इसे अङ्गीकार किया है । मुनि ने कहा है कि ‘कहीं कहीं भावों का प्रशम भी होता है ।’ ( शान्त रस के पक्ष, विपक्ष, सिद्धान्त पक्ष तथा उसके स्थायिभाव पर अभिनव भारती में विस्तारपूर्वक विचार किया गया है । अतः वहीं देखना चाहिये । ) कुछ लोगों का कहना यह है कि शान्त-रस में जब कि चेष्टाओं का उपरम हो जाता है तब न तो उसकी प्रतीति ही होती है और न उसका अभिनय ही सम्भव है । इस विषय में मुझे यह कहना है कि शान्तरस की इतनी पर्यन्तावस्था का वर्णन करना ही नहीं चाहिये जिससे सभी प्रकार की चेष्टाओं का उपरम हो जाए और अनुभवों के अभाव में उसकी प्रतीति ही न हो सके । शान्तरस की ही पर्यन्तावस्था का वर्णन करना निषिद्ध नहीं है अपितु शृङ्गार इत्यादि दूसरे रसों की पर्यन्तावस्था का वर्णन भी निषिद्ध ही है । यदि शृङ्गार की फलभूमि का वर्णन किया जाए तो सुरत का ही वर्णन होगा जो ;
'शान्तरस की प्रतीति होती ही है' कहने का अर्थ यह है कि विषयों से पूर्ण तृप्ति के बाद उनके त्याग में उसी प्रकार का आनन्द आता है जिस प्रकार भोजन से तृप्त होने के बाद एक प्रकार का आनन्द अनुभव होता है । यह तृप्ति अन्य आहार आदि से प्राप्त अनुभव से सिद्ध है । शायद इसका अर्थ यह भी हो सकता है कि भरत मुनि ने भी इसे स्वीकार किया है । मुनि ने कहा है कि 'कहीं कहीं भावों का शमन भी होता है ।' ( शान्त रस के पक्ष, विपक्ष, सिद्धान्त आदि पर अभिनव भारती में विस्तार से विचार किया गया है, अतः वहीं देखना चाहिए । ) कुछ लोगों का कहना है कि शान्त रस में जब चेष्टाओं का उपरम हो जाता है तब न तो उसकी प्रतीति होती है और न उसका अभिनय ही संभव है । इस विषय में मेरा कहना है कि शान्त रस की इतनी अंतिम अवस्था का वर्णन नहीं करना चाहिए जिससे सभी प्रकार की चेष्टाओं का उपरम हो जाए और अनुभवों के अभाव में उसकी प्रतीति न हो सके । शान्त रस की ही अंतिम अवस्था का वर्णन करना निषिद्ध नहीं है, अपितु शृंगार आदि अन्य रसों की अंतिम अवस्था का वर्णन भी निषिद्ध ही है । यदि शृंगार की फलभूमि का वर्णन किया जाए तो केवल सुरत का ही वर्णन होगा जो ;
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क्रियासाहित्य में कभी समीचीन नहीं कहा जा सकता। इसी प्रकार रौद्र की पर्यन्तावस्था ह्रास है जो कि शास्त्र में निषिद्ध मानी जाती है। पूर्वभूमि में किसी भी रस का वर्णन अनुचित नहीं होता और यही बात शान्तरस के विषय में भी लागू होती है। और शान्तरस में भी पूर्व भूमि में चेष्टायें सर्वथा समाप्त नहीं हो जातीं। इस विषय में योग के दो सूत्रों का उल्लेख असंगत न होगा। योगदर्शन के तृतीय पाद का एक सूत्र है—‘तस्य प्रशान्तवाहिता संस्कारात्’ इसका आशय यह है—‘जव चित्तवृत्ति की क्षिस, मूढ़ और विच्छिन्न भूमिकायें समाप्त हो जाती हैं तब व्युत्थान रूप ( सांसारिक ) ज्ञानों का अवसर ही नहीं रहता। उस समय निरोध संस्कार से चित्तवृत्ति का प्रवाह प्रशान्त भाव की ओर चल देता है।’
चतुर्थ पाद में एक दूसरा सूत्र और है—‘तच्छिद्रेषु प्रत्ययान्तराणि संस्कारेभ्यः।’ इसका आशय यह है कि जिस समय जीव समाधि में स्थित हो जाता है उस समय भी बीच-बीच में कुछ ऐसे विघ्न स्वरूप अवसर आते रहते हैं जिनमें दूसरे प्रकार के प्रत्ययों का आविर्भाव होता रहता है और उनमें पुराने संस्कार कारण होते हैं। आशय यह है कि समाधि की दशा में आने से पहले जिन व्युत्थान रूप ज्ञानों का अनुभव किया था उनसे संस्कार बन जाते हैं। वे संस्कार समाधि में आने पर भी पीछा नहीं छोड़ते। बीच-बीच में विघ्न उपस्थित होते रहते हैं और उन अवसरों पर पुराने संस्कारों के बल पर व्युत्थानात्मक ज्ञानों का उद्रेक होता ही रहता है। यह शान्तरस की पूर्व भूमि का वर्णन है। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि शान्त रस की पूर्वावस्था में भी चेष्टायें होती ही हैं। ( शान्तरस के उत्पन्न हो जाने पर भी विषयों में अभ्यस्त हमारी मनोवृत्तियाँ उसी प्रकार की भावनाओं का अनुभव करने लगती हैं। केवल उनका विषय बदल जाता है। लौकिक अनुभूति में भौतिक वस्तुओं के प्रति मन में ललक रहती है, किन्तु वैराग्य के उत्पन्न हो जाने पर लौकिक वस्तुओं से वैमुख्य उत्पन्न हो जाता है तथा उसके स्थान पर मनोवृत्तियाँ परमात्मतत्त्व की ओर उन्मुख हो जाती हैं।) यही बात जनक इत्यादि के अन्दर भी देखी जाती है। उनकी भी समाधि अवस्था में यम-नियम इत्यादि की चेष्टायें और व्युत्थान काल में राज्य के भार का वहन करना प्रसिद्ध ही है।
इस अनुभव के बल पर कहा जा सकता है कि यम-नियम इत्यादि के मध्य में बहुत से व्यभिचारियों की सम्भावना की जा सकती है। अतएव शान्तरस की प्रतीति का अपलाप नहीं किया जा सकता।
(प्रश्न) हम आपके इस तर्क से तो सहमत हो सकते हैं कि व्युत्थान काल की मनोवृत्तियाँ प्रशान्त अवस्था में भी होती हैं। हम यह भी मान सकते हैं कि उन
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यदि नाम सर्वजनानुभवगोचरता तस्य नास्ति नैतावतासावलोकसामान्यमहानुभावचित्तवृत्तिविशेषः प्रतिपेष्टुं शक्यः।
यदि कहो कि उस ( शान्त ) की सर्वजनानुभवगोचरता नहीं होती तो इतने से ही अलोकसामान्य महानुभावों की विशेष प्रकार की चित्तवृत्ति का परित्याग किया जा सकता है।
ननु न प्रतीयते नास्य विभावा: सन्तोति चेत न; प्रतीयत एव तावदसौ तस्य च भवितव्यमेव प्रकृततद्भुरालपरिपाकपरमेश्वरानुग्रहाध्यात्मरहस्यशास्त्रवीतरागपरिशीलनादिभिरविभावैरितरैरित्यैव विस्मयादनुभावचर्यमिचारिसद्भावः स्थायी च दर्शितः । ननु तत्र हृदयसंवादाभावाद्रस्मानतैव नोपपन्ना । क एवमाह स नास्तीति, यतः प्रतीयत एवतस्मात् । ननु प्रतीयते सर्वस्य श्लाघावस्पदं न भवति । तर्हींवीतरागाणां मृग्यारो न श्लाघ्य इति सोऽपि रसत्वाच्च्युतामिति तदाह-यदि नामेति ।
निस्सन्देह नहीं प्रतीत होता है (क्योंकि) इसके विभाव नहीं होते यदि यह कहो तो (ऐसा) नहीं (क्योंकि) यह तो प्रतीत ही होता है और उसके पुराने शुभ कर्मों का परिपाक, परमेश्वरानुग्रह, अध्यात्म रहस्य शास्त्र, वीतरागपरिशीलनादि विभावादि होने ही चाहिये। इस प्रकार विभाव, अनुभव और व्यभिचारी भाव की सत्ता और स्थायी दिखलाया गया है। (प्रश्न) निस्सन्देह वहाँ पर हृदय संवाद के अभाव से रससिद्धता ही नहीं होती। (उत्तर) कौन ऐसा कहता है कि वह नहीं होती क्योंकि प्रतीत होती ही है ऐसा कहा जा चुका है।
निस्सन्देह नहीं प्रतीत होता है (क्योंकि) इसके विभाव नहीं होते यदि यह कहो तो (ऐसा) नहीं (क्योंकि) यह तो प्रतीत ही होता है और उसके पुराने शुभ कर्मों का परिपाक, परमेश्वरानुग्रह, अध्यात्म रहस्य शास्त्र, वीतरागपरिशीलनादि विभावादि होने ही चाहिये। इस प्रकार विभाव, अनुभव और व्यभिचारी भाव की सत्ता और स्थायी दिखलाया गया है। (प्रश्न) निस्सन्देह वहाँ पर हृदय संवाद के अभाव से रससिद्धता ही नहीं होती। (उत्तर) कौन ऐसा कहता है कि वह नहीं होती क्योंकि प्रतीत होती ही है ऐसा कहा जा चुका है।
"निस्सन्देह प्रतीत होता है (किन्तु) सभी की प्रशंसा का स्थान नहीं होता" तो वीतरागों को मृग्यार प्रशंसनीय नहीं होता अतः वह भी रसत्व से च्युत हो जाए, यह कह रहे हैं—'यदि नाम—' इत्यादि ।
"निस्सन्देह प्रतीत होता है (किन्तु) सभी की प्रशंसा का स्थान नहीं होता" तो वीतरागों को मृग्यार प्रशंसनीय नहीं होता अतः वह भी रसत्व से च्युत हो जाए, यह कह रहे हैं—'यदि नाम—' इत्यादि ।
मनोवृत्तियों की संवाहिका चेष्टायें (अनुभाव) भी सम्भव हैं। किन्तु केवल सत्त्व्वारी भाव और अनुभवों से ही रसनिष्पत्ति सम्भव नहीं होती। उसमें विभाव को भी योग अपेक्षित होता है। यदि कहो विभाव को उपादान नहीं भी किया जाता है तो भी उसका आक्षेप करके ही रसनिष्पत्ति होती है। किन्तु शान्त के विभाव सम्भव ही नहीं हैं। अतः वहाँ पर रसनिष्पत्ति किस प्रकार हो सकती है ? (उत्तर) शान्त रस की प्रतीति होती है यह तो दिखलाया ही जा चुका। पुराने
तारावती मनोवृत्तियों की संवाहिका चेष्टायें (अनुभाव) भी सम्भव हैं। किन्तु केवल सत्त्व्वारी भाव और अनुभवों से ही रसनिष्पत्ति सम्भव नहीं होती। उसमें विभाव को भी योग अपेक्षित होता है। यदि कहो विभाव को उपादान नहीं भी किया जाता है तो भी उसका आक्षेप करके ही रसनिष्पत्ति होती है। किन्तु शान्त के विभाव सम्भव ही नहीं हैं। अतः वहाँ पर रसनिष्पत्ति किस प्रकार हो सकती है ? (उत्तर) शान्त रस की प्रतीति होती है यह तो दिखलाया ही जा चुका।
मनोवृत्तियों की संवाहिका चेष्टायें (अनुभाव) भी सम्भव हैं। किन्तु केवल सत्त्व्वारी भाव और अनुभवों से ही रसनिष्पत्ति सम्भव नहीं होती। उसमें विभाव को भी योग अपेक्षित होता है। यदि कहो विभाव को उपादान नहीं भी किया जाता है तो भी उसका आक्षेप करके ही रसनिष्पत्ति होती है। किन्तु शान्त के विभाव सम्भव ही नहीं हैं। अतः वहाँ पर रसनिष्पत्ति किस प्रकार हो सकती है ? (उत्तर) शान्त रस की प्रतीति होती है यह तो दिखलाया ही जा चुका।
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न च वीरे तस्यान्तर्भावः कतुं युक्तः । तस्याभिमानमयत्वेन व्यवस्थापनात् । अस्य चाद्धारप्रशमैकलुप्तया सिथते: । तयोश्चैवंविधसदृशावेडपि यच्चैकं परिकलप्यते तद्वीररौद्र्योरपि तथा प्रसङ्गः ।
न तो वीर में उसका अन्तर्भाव करना उचित है । क्योंकि उसकी व्यवस्था अभिमानमयत्व के रूप में की गई है और इसकी स्थिति अहङ्कारप्रशम की एकरूपता के साथ होती है । उन दोनों की इस प्रकार की विशेषता के होते हुये भी यदि एकता की कल्पना की जाती है तो वीर और रौद्र की भी वही बात होगी ।
ननु धर्मप्रधानोऽसौ वीर एवेति सस्भावयसमान आह-न चेतित । तस्येति वीरस्य । अभिमानमयत्वेनेति । उत्साहो ह्याहमेवविध इत्येवं प्राण इत्यर्थः । अस्य चेति । शान्तस्य । तयोश्चेति । इहामियत्वेनिरहङ्कारत्वाभ्यामस्येन्तविरुद्धयोरपोति चशब्दार्थः । वीररौद्र्योस्वसत्व्यान्नविरोधेऽपि नास्ति । समानं रूपं च धर्मार्थीकामार्जनोपयोगित्वम् । निस्सन्देह धर्मप्रधान वह वीररस ही है यह सम्भावना करते हुये कहते हैं—‘और नहीं’ यह । उसका अर्थात् वीर का । ‘अभिमानमयत्व के द्वारा’ यह निस्सन्देह उत्साह का प्राण ही यह है कि मैं इस प्रकार का हूँ । ‘और इसका’ अर्थात् शान्त का ‘और उन दोनों का’ यह । ‘और’ शब्द का अर्थ है उन दोनों के इच्छा से युक्तत्व और इहङ्कारहितत्व के द्वारा अत्यन्त विरोधी होते हुये भी वीर और रौद्र इन दोनों का तो अत्यन्त विरोध भी नहीं है । और समानरूपत्व धर्मं, अर्थ और काम के अर्जन का उपयोगिता है ।
शुभ कर्मों का परिपाक, परमेश्वर का अनुग्रह, अध्यात्म शास्त्र के रहस्य का परिशीलन वीतरागों का सङ्सर्ग इत्यादि उसके विभाव भी होते ही हैं । इस प्रकार विभाव अनुभव के संयोग की सम्भावना और स्थायी भाव यह समस्त सामग्री दिखाई जा चुकी । इस प्रकार शान्त रस की प्रतिष्ठा में कोई सन्देह नहीं रह जाता ।
शुभ कमों का परिपाक, परमेश्वर का अनुग्रह, अध्यात्म शास्त्र के रहस्य का परिशीलन वीतरागों का सङ्सर्ग इत्यादि उसके विभाव भी होते ही हैं । इस प्रकार विभाव अनुभव के संयोग की सम्भावना और स्थायी भाव यह समस्त सामग्री दिखाई जा चुकी । इस प्रकार शान्त रस की प्रतिष्ठा में कोई सन्देह नहीं रह जाता ।
( प्रश्न ) परिशीलकों के हृदय का रञ्जन और वस्तु से सामञ्जस्य रसास्वादन का मूल है । शान्त रस परिशीलन करनेवालों के हृदय से मेल खाता ही नहीं, अतएव उसका आस्वादन किस प्रकार सङ्गत कहा जा सकता है ? ( उत्तर ) कौन कहता है कि शान्तरस हृदय से मेल नहीं खाता ? जब उसका प्रतीत होना सिद्ध हो चुका है तब उसका सहृदयों द्वारा आस्वादन स्वतः उपन्न हो जाता है ।
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द्यावीरादीनां च चित्तवृत्तिविशेषाणां सर्वाकारमहद्धाररहितत्वेन शान्तरसप्रभेदत्वम्, इतरथा तु वीररसप्रभेदत्वमिति व्यवस्थाप्यमाने न कश्चिद्विरोधः । तदेवमस्ति शान्तो रसः। तस्य चाविरुद्धरसव्यवधानेन प्रवन्धे विरोधिरससमावेशोऽस्ति निर्विरोधत्वम् । यथा प्रदर्शिते विषये ॥१४६॥
दयावीर आदि विशेष चित्तवृत्तियों का अङ्गकाररहित होने के कारण शान्तरस का प्रभेदत्व होता है अन्यथा वीररसप्रभेदत्व होता है, यह व्यवस्था किये जाने पर कोई विरोध नहीं होता । तो इस प्रकार शान्तरस है । और उसके अविरुद्ध रस के व्यवधान के द्वारा प्रवन्ध में विरोधीरस के समावेश के होने पर भी निर्विरोधत्व ही होता है । जैसा कि प्रदर्शित विषय में ॥१४६॥
( अनु० ) दयावीर इत्यादि विशेष चित्तवृत्तियों का अङ्गकाररहित होने के कारण शान्तरस का प्रभेदत्व होता है अन्यथा वीररसप्रभेदत्व होता है, यह व्यवस्था किये जाने पर कोई विरोध नहीं होता । तो इस प्रकार शान्तरस है । और उसके अविरुद्ध रस के व्यवधान के द्वारा प्रवन्ध में विरोधीरस के समावेश के होने पर भी निर्विरोधत्व ही होता है । जैसा कि प्रदर्शित विषय में ॥१४६॥
( प्रश्न ) यह तो मैं मान सकता हूँ कि शान्तरस प्रतीतिगोचर होता है । किन्तु सभी लोगों को प्रीतिपात्र नहीं होता और न सभी लोगों के हृदयों से उसका सामञ्जस्य ही होता है । इसीलिये उसकी रसनीयता सन्देहास्पद हो जाती है । ( उत्तर ) यह कोई तर्क नहीं कि जो रस सभी के लिये हृदय हो वही रस कहा जाता है । शृङ्गार भी तो वीतराग व्यक्तियों के आस्वादन और आदर का हेतु नहीं होता । तो क्या इसी आधार पर शृंगार भी रसत्व से च्युत हो जायेगा । शान्तरस सभी व्यक्तियों के अनुभगोचर नहीं होता तो केवल इतने से ही अलोकसामान्य महानुभावों की एक विशेष प्रकार की मनोवृत्ति का खण्डन नहीं किया जा सकता ।
( प्रश्न ) यह तो मैं मान सकता हूँ कि शान्तरस प्रतीतिगोचर होता है । किन्तु सभी लोगों को प्रीतिपात्र नहीं होता और न सभी लोगों के हृदयों से उसका सामञ्जस्य ही होता है । इसीलिये उसकी रसनीयता सन्देहास्पद हो जाती है । ( उत्तर ) यह कोई तर्क नहीं कि जो रस सभी के लिये हृदय हो वही रस कहा जाता है । शृङ्गार भी तो वीतराग व्यक्तियों के आस्वादन और आदर का हेतु नहीं होता । तो क्या इसी आधार पर शृंगार भी रसत्व से च्युत हो जायेगा । शान्तरस सभी व्यक्तियों के अनुभगोचर नहीं होता तो केवल इतने से ही अलोकसामान्य महानुभावों की एक विशेष प्रकार की मनोवृत्ति का खण्डन नहीं किया जा सकता ।
( प्रश्न ) यह तो मैं मान सकता हूँ कि शान्तरस प्रतीतिगोचर होता है । किन्तु सभी लोगों को प्रीतिपात्र नहीं होता और न सभी लोगों के हृदयों से उसका सामञ्जस्य ही होता है । इसीलिये उसकी रसनीयता सन्देहास्पद हो जाती है । ( उत्तर ) यह कोई तर्क नहीं कि जो रस सभी के लिये हृदय हो वही रस कहा जाता है । शृङ्गार भी तो वीतराग व्यक्तियों के आस्वादन और आदर का हेतु नहीं होता । तो क्या इसी आधार पर शृंगार भी रसत्व से च्युत हो जायेगा । शान्तरस सभी व्यक्तियों के अनुभगोचर नहीं होता तो केवल इतने से ही अलोकसामान्य महानुभावों की एक विशेष प्रकार की मनोवृत्ति का खण्डन नहीं किया जा सकता ।
( प्रश्न ) शान्तरस का धर्मवीर में अन्तर्भाव क्यों नहीं हो सकता ? ( उत्तर ) शान्तरस और धर्मवीर इन दोनों प्रकार की चित्तवृत्तियों में स्पष्ट-रूप में अन्तर है । वीर रस का स्थायी भाव उत्साह है । यह व्यवस्थित ही किया जा चुका है कि उत्साह अभिमानमय होता है । वस्तुतः उत्साह का प्राण ही अपनी महत्ता को स्वीकार करना है । जब तक अपनी शक्ति का अभिमान और शत्रु के अपमान की चेतना नहीं होती उत्साह का जन्म ही नहीं हो सकता । इसके प्रतिकूल शान्तरस में अभिमान का प्रश्न ही उसका एकमात्र स्वरूप होता है । इस प्रकार धर्मवीर ईहामय होता है और शान्तरस ईहामय । इस प्रकार इन में महान् वैषम्य है; अतः इन दोनों को एक माना ही नहीं जा सकता । यदि कोई व्यक्ति इनके एक मानने को दुग्रह करता ही चलिजीय तो कहनां होगा कि युद्धवीर तथा रौद्र में तो इतना भी अन्तर नहीं है; फिर युद्धवीर और रौद्र को एक मानना तो और भी अधिक युक्तियुक्त नहीं होगा । इनकी समानरूपता का आशय यही है कि धर्मं
( प्रश्न ) शान्तरस का धर्मवीर में अन्तर्भाव क्यों नहीं हो सकता ? ( उत्तर ) शान्तरस और धर्मवीर इन दोनों प्रकार की चित्तवृत्तियों में स्पष्ट-रूप में अन्तर है । वीर रस का स्थायी भाव उत्साह है । यह व्यवस्थित ही किया जा चुका है कि उत्साह अभिमानमय होता है । वस्तुतः उत्साह का प्राण ही अपनी महत्ता को स्वीकार करना है । जब तक अपनी शक्ति का अभिमान और शत्रु के अपमान की चेतना नहीं होती उत्साह का जन्म ही नहीं हो सकता । इसके प्रतिकूल शान्तरस में अभिमान का प्रश्न ही उसका एकमात्र स्वरूप होता है । इस प्रकार धर्मवीर ईहामय होता है और शान्तरस ईहामय । इस प्रकार इन में महान् वैषम्य है; अतः इन दोनों को एक माना ही नहीं जा सकता । यदि कोई व्यक्ति इनके एक मानने को दुग्रह करता ही चलिजीय तो कहनां होगा कि युद्धवीर तथा रौद्र में तो इतना भी अन्तर नहीं है; फिर युद्धवीर और रौद्र को एक मानना तो और भी अधिक युक्तियुक्त नहीं होगा । इनकी समानरूपता का आशय यही है कि धर्मं
( प्रश्न ) शान्तरस का धर्मवीर में अन्तर्भाव क्यों नहीं हो सकता ? ( उत्तर ) शान्तरस और धर्मवीर इन दोनों प्रकार की चित्तवृत्तियों में स्पष्ट-रूप में अन्तर है । वीर रस का स्थायी भाव उत्साह है । यह व्यवस्थित ही किया जा चुका है कि उत्साह अभिमानमय होता है । वस्तुतः उत्साह का प्राण ही अपनी महत्ता को स्वीकार करना है । जब तक अपनी शक्ति का अभिमान और शत्रु के अपमान की चेतना नहीं होती उत्साह का जन्म ही नहीं हो सकता । इसके प्रतिकूल शान्तरस में अभिमान का प्रश्न ही उसका एकमात्र स्वरूप होता है । इस प्रकार धर्मवीर ईहामय होता है और शान्तरस ईहामय । इस प्रकार इन में महान् वैषम्य है; अतः इन दोनों को एक माना ही नहीं जा सकता । यदि कोई व्यक्ति इनके एक मानने को दुग्रह करता ही चलिजीय तो कहनां होगा कि युद्धवीर तथा रौद्र में तो इतना भी अन्तर नहीं है; फिर युद्धवीर और रौद्र को एक मानना तो और भी अधिक युक्तियुक्त नहीं होगा । इनकी समानरूपता का आशय यही है कि धर्मं
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नन्वेवं दयावीरो धर्मवीरो दानवीरो वा नासौ कश्चित्, शान्तसैयैवेदं नामान्तरकारणम्। तथा हि मुनिभिः— दानवीरं धर्मवीरं युद्धवीरं तथैव च । रसत्वेनैव प्राहुर्वह्ना विविधरससम्मितम् ॥
निस्सन्देह इस प्रकार दया-वीर, धर्म-वीर अथवा दान-वीर यह कुछ नहीं है । शान्त का ही यह दूसरा नामकरण है । ऐसा निस्सन्देह मुनि कहते हैं । 'ब्रह्मा जी ने दानवीर, धर्मवीर और उसी प्रकार युद्धवीर इन तीन विधाओं में विभक्त वीररस को कहा है ।
इस प्रकार आगम के साथ तीन प्रकार ही कहे हैं । वही कहते हैं—दयावीर इत्यादि का इसमें आदिप्रहरण से धर्मवीर और दानवीर लेलिये जाते हैं ) विषयों के जुगुप्सारूप होने से वीभत्स में इसके अन्तर्भाव की शङ्का की जाती है । वह तो इसकी व्यभिचारिणी होती है स्थायिता को प्राप्त नहीं होती । पर्यन्तनिरोध में तो उसका मूल से ही विच्छेद हो जाता है । आधिकारिक रूप में शान्तरस को निवद्ध नहीं करना चाहिये । हमने यहाँ पर उसकी पर्यालोचना नहीं की क्योंकि वह दूसरा प्रसङ्ग था । और यह मोक्षफलत्वाला होने से परम पुरुषार्थनिष्ठ होने के कारण सब रसों से सर्वाधिक प्रधान है । इसके पूर्वपक्ष तथा सिद्धान्तपक्ष का हमारे उपाध्याय भट्टतौत ने काव्यकौतुक में और हमने उसके विवरण में बहुत अधिक निर्णय किया है, बस इतना कथन पर्याप्त है ।
इत्यागमपुरस्सरं त्रिविधमेवाभ्यधात् । तदाह—दया वीरादीनां चेत्यादि ग्रहणेन । विषयजुगुप्सासरुपत्वाद्विभीमत्सेऽन्तर्भावः शङ्क्यते । सा त्वस्य व्यभिचारिणी भवति न तु स्थायितामेति, पर्यन्तनिरोधे तस्या मूलत एव विच्छिद्यते । आधिकारिकत्वेन तु शान्तो रसो न निवद्धव्य इति चान्द्रिकाकारः । तच्चेहास्माभिः पर्यालोचितं प्रसङ्गान्तरात् । मोक्षफलत्वेन चायं परमपुरुषार्थनिष्ठत्वात् सर्वरसेेभ्यः प्रधानतमः । न चास्मदुपाध्यायभट्टतौतेन काव्यकौतुके, अस्माभिश्च तद्विवरणे बहुतरकृतपूर्वपक्षसिद्धान्त इत्यलं बहुना ॥२८॥
तारावतो— अर्थ और काम के उपार्जन की उपयोगिता का समान होना। इस दृष्टि से युद्धवीर और रौद्र दोनों की उपयोगिता एक जैसी है । धर्मवीर और शान्त में तो इस दृष्टि से भेद भी किया जा सकता है कि धर्मवीर में अभिमान की परिपुष्टि भी उसका उपयोग हो सकती है किन्तु शान्तरस में तो शुद्ध धर्मोंपार्जन का ही उपयोग होता है । अतः जिस तर्क के आधार पर युद्धवीर और रौद्र एक नहीं माने जासकते उसी तर्क के आधारपर धर्मवीर और शान्त भी एक नहीं हो सकते ।
अर्थ और काम के उपार्जन की उपयोगिता का समान होना। इस दृष्टि से युद्धवीर और रौद्र दोनों की उपयोगिता एक जैसी है । धर्मवीर और शान्त में तो इस दृष्टि से भेद भी किया जा सकता है कि धर्मवीर में अभिमान की परिपुष्टि भी उसका उपयोग हो सकती है किन्तु शान्तरस में तो शुद्ध धर्मोंपार्जन का ही उपयोग होता है । अतः जिस तर्क के आधार पर युद्धवीर और रौद्र एक नहीं माने जासकते उसी तर्क के आधारपर धर्मवीर और शान्त भी एक नहीं हो सकते ।
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( प्रश्न ) भरतमुनि ने वीररस के उपभेदों का परिगणन करते हुये लिखा है-'ब्रह्मा जी ने वीररस के तीन भेद बतलाये हैं--दानवीर, धर्मवीर और युद्धवीर ।'
इस कारिका में केवल तीन प्रकार को ही वीररस बतलाया गया है और उसमें भी आगम की सम्भति दी गई है कि यह कथन ब्रह्मा जी का है । इन भेदों में दयावीर को सम्मिलित नहीं किया गया है । अतएव या तो दयावीर को ही शान्तरस की संज्ञा प्रदान की जा सकती है अथवा दयावीर धर्मवीर और दानवीर को अलग न मानकर शान्तरस स्वीकार किया जा सकता है और इन तीनों को शान्तरस का ही भेद माना जा सकता है । पृथक्रूप में शान्तरस को मानने की क्या आवश्यकता? ( उत्तर ) दयावीर इत्यादि शान्तरस का प्रभेद उस समय होते हैं जब उनमें सब प्रकार के अहङ्कार का अभाव हो । यदि उनमें उत्साह के साथ अहङ्कार को भी समावेश किया जाता है तो वे सब वीररस के ही प्रभेद माने जाते हैं । ऐसी व्यवस्था करने में किसी को अनुपपत्ति हो ही नहीं सकती । ( मूल में 'दयावीरादीनांच...' यह पाठ आया है । इस प्रतीक को लेकर अभिनवगुप्त ने लिखा है--'दयावीरादीनाऽऽदित्यादिप्रहणेन ।' इस 'आदिप्रहणेन' के बाद विराम लगा दिया गया है । स्पष्ट ही है कि यह वाक्य पूरा नहीं होता । ज्ञात होता है कि यहाँ पर 'दानवीरधर्मवीरयोरग्रहणम्' यह छूट गया है । यही मानकर उक्त व्याख्या की गई है और यह मान्यता बालप्रिया इत्यादि टीकाकारों को भी अभिमत है ।)
कुछ लोग शान्तरस को अन्तर्भाव वीभत्सरस में करते हैं । क्योंकि शान्तरस में भी विषयों की ओर से घृणा होती ही है । किन्तु यह मत भी ठीक नहीं । क्योंकि घृणा शान्तरस में स्थायी भाव नहीं हो सकती अपितु व्यभिचारी भाव ही होती है । जिस समय शान्तरस का पर्यन्त निर्वाह किया जाता है उस समय घृणा का मूल से ही विच्छेद हो जाता है । ( शान्तरस के विषय में और भी अनेक प्रश्न उठाये जा सकते हैं । इसका विस्तृत विवेचन प्रकरानुकूल अभिनव भारती में किया गया है । वहाँ रति इत्यादि प्रत्येक स्थायी भाव में शान्तरस का अन्तर्भाव क्यों नहीं होता यह दिखलाया गया है ।) इसी से सम्वद्ध मत चन्द्रिकाकार का भी है । उनकी मत है कि शान्तरस को उपानवन्धन आधिकारिक रस के रूप में न लेना चाहिये । किन्तु अभिनव गुप्त का कहना है कि यह इस विषय का प्रकरण नहीं है । अतः यहाँ पर उसका विवेचन नहीं किया जारहा है । इस विषय में अभिनव गुप्त के उपाध्याय भट्टतौत ने अपने काव्यकौतुक नामक ग्रन्थ में पूर्वपक्ष
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रसांतरान्तरितयोरेकवाक्यस्थयोरपि । निवर्तते हि रसयोः समावेशे विरोधिता ॥२७॥
रसान्तरव्यवहितयोरेकप्रबन्धयोर्विरोधिता निवर्तते इत्यत्र न काचिद्भ्रान्तिः । यस्मादेकवाक्यस्थयोरपि रसयोरुक्त्या नीत्या विरुद्धता निवर्तते । यथा—
भूरेणुद्विग्रधान नवपारिजातमालारजोवासितवाहुमध्या: । गाढं शिवाभिः परिरभ्यमाणान सुराङ्गनाश्लिष्टमुजान्तरालाः ॥ सशोणितैः क्रतुभुजां स्कुरद्रद्रिः पञ्चैः खगानामुपवीज्यमानान् । संवेजिताक्रन्दनवारिसेकैः सुगन्धिभिः कल्पलतादुकूलैः ॥ विमानपर्यङ्कतले निषण्णाः कुतूहलाविष्टतया तदानीम् । निर्दिश्यमाणानन ललनाड़गुलिभिः वीराः स्वदेहान पतितानुपश्यन् ॥ इत्यादौ । अत्र हि शृङ्गारवीभत्सयोसतदङ्ग्योर्वा वीररसस्थयवधानेन समावेशो न विरोधी ॥२७॥
(अनु.) इसी को सस्थिर करने के लिये यह कहा जा रहा है— 'दूसरे रस से अन्तरित, एक वाक्यस्थ भी दो रसों के समावेश में विरोधी भाव जाता रहता है' ॥२७॥ दूसरे रस से व्यवहित एक प्रबन्धस्थ ( दो रसों ) की विरोधिता निवृत्त हो जाती है इस विषय में कोई भ्रान्ति नहीं है । क्योंकि उत्त्क नीति से एक वाक्यस्थ भी दो रसों की विरुद्धता निवृत्त हो जाती है । जैसे— 'उस समय पर विमानपर्यङ्कतल में विराजमान वीर लोग जिनकी बाहुओं के मध्यभाग नवीन पारिजात की माला की रज से सुवासित हो रहे थे, जिनकी भुजाओं के आन्तरिक भाग का आलिङ्गन देवताओं की स्त्रियाँ कर रहीं थीं और जिनके ऊपर चन्दन जल से सिञ्चे हुये सुगन्धित कललता के वस्त्रों से पंखा किया जा रहा था, कौतूहल से आविष्ट होने के कारण समरभूमि में पड़े हुये अपने ऐसे शरीरों को देख रहे थे जोकि पृथ्वी की धूल से सने हुये थे, श्रृङ्गालियाँ जिनके शरीर का गाढ आलिङ्गन कर रहीं थीं, मांसाहारी पक्षियों के खून से सने हुये पंखों से जिन पर हवों को वी जा रहीं थीं और लललनाय अगुलियों से जिनकी ओर संकेत कर रहीं थीं ।' इत्यादि में । यहाँ पर निस्सन्देह शृङ्गार और वीभत्स का अथवा उसके अंगों का वीररस के व्यवधान से समावेश विरोधी नहीं है ॥२७॥
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स्थिरीकर्तुमिति । शिष्यबुद्धाविल्यर्थः । अपिशब्देन प्रबन्धविषयतया सिद्धो-
'स्थिर करने के लिये' यह । अर्थात् शिष्यबुद्धि में । अपिशब्द से प्रबन्ध-
दयमर्थ इति दर्शयति-भूरेर्णिति । विशेषणैरतीवदूरापेतत्वमसम्भावनावस्पदसुक्तम् !
विषयता के रूप में यह अर्थ सिद्ध है यह दिखलाते हैं 'भूरे ...' इत्यादि । विशेषणों
स्वदेहानिलच्वेन देहत्वाभिमानादेव तादात्म्यसम्भावनानिष्पत्तिरेकाश्रयत्वमाप्ति,
के द्वारा अत्यन्त दूर होना ( और एकता का ) असम्भावनास्पदत्व कहा गया है ।
अन्यथा विभिन्नविषयत्वात्को विरोधः । ननु वीर एवात्र रसो न शृङ्गारो न बीभत्सः
निष्पत्ति से ही एकआश्रयत्व होता है, नहीं तो विभिन्न विषय होने से क्या विरोध हो ?
किन्तु रतिजुगुप्से हि वीरे प्रति व्यभिचारिसूते । भवस्वेवम्, तथापि प्रकृतोदाहरणता
( प्रश्न ) निस्सन्देह यह वीररस ही है न शृङ्गार न वीभत्स; किन्तु रति और जुगुप्सा
लाघवोपपन्ना । तदाह-तद्ज्ञयोग्र इति । तयोरद्भयोः तत्स्थायिभिसम्बन्धावित्यर्थः । वीररस इति ।
वीर के प्रति व्यभिचारी भाव हो गये हैं । हो ऐसा, तथापि प्रकृत का उदाहरण
'वीरः स्वदेहान्' इत्यादिना तदीयोत्साहाधयवगतया कर्तृकर्मणोः समस्तवाक्यार्थ-
होना तो सिद्ध ही हो जाता है । वह कहते हैं—'अथवा उसके दोनों अङ्गों का' ।
नुयायितया मतीतिरिति मध्यपाठाभावेऽपि सुतरां वीरस्य व्यवधायकतैतिमावः ॥२७॥
'वीररस' यह । भाव यह है कि न होने पर भी वीररस की तो व्यवधायकता (असदिग्ध रूप में ) विद्यमान है ही ॥
तारावती
तारावती
और सिद्धान्तपक्ष का विस्तृत विवेचन किया है । अभिनवगुप्त ने उस ग्रन्थपर
विवरण लिखा है जिसमें उन्होंने भी पर्याप्त प्रकाश डाला है । यहाँ उसके विस्तार
करने की आवश्यकता नहीं । संक्षेप में इतना कहा जा सकता है कि शान्तरस का
फल मोक्ष होता है जो कि सबसे बड़ा फल है । अतएव इस रस की निष्ठा पुरुषार्थ
में भी सदसे अधिक होनी चाहिये । इस प्रकार यह रस सम्भी अन्य रसों की अपेक्षा
सर्वाधिक प्रधान माना जा सकता है ।
इस प्रकार शान्तरस सिद्ध हो जाता है । यदि, उसको, अविरोधी रसों के
व्यवधान के द्वारा विरोधी रसों के साथ रखा जाय तो उनका परस्पर विरोध
ज्ञाता रहता है ॥ २६ ॥
२६ वीं कारिका में बताया गया है कि अविरोधी रस को बीच में रख देने
से दो विरोधी रसों का विरोध मिट जाता है । अब शिष्यों की बुद्धि में उसी
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बातको ठीक रूपमें जमा देने के लिये इस कारिका में यह बतलाया जा रहा है कि यह सिद्धान्त बहुत ही सस्थिरता तथा निश्चय के साथ लागू होता है । कारिका का भाव यह है—
'यदि दो विरोधी रस एक ही वाक्य में स्थित हों तो भी किसी अन्य रसको बीच में रख देने से उनका विरोध जाता रहता है ।' प्रायः देखा जाता है कि यदि दो विरोधी दूर दूर रहें तो न तो उनका विरोध अधिक तीव्र हो पाता है और न वे एक दूसरे को हानि ही पहुँचा सकते हैं । इसके प्रतिकूल जब वे एक दूसरे के अधिक निकट आ जाते हैं, तो उनका विरोध भी तीव्र हो जाता है और एक दूसरे को हानि पहुँचाने की उनकी क्षमता भी बढ जाती है । प्रबन्ध का कलेवर विशाल होता है । उसमें यदि दो विरोधी रसने भी रहें तो भी एक दूसरे को इतनी क्षति नहीं पहुँचा सकते । मुक्तक में केवल एक वाक्य होता है । यदि उसमें दो विरोधी एक साथ आ जाएँ तो वे एक दूसरे के अधिक हानिकार हो सकते हैं । बीच में एक तीसरे रस को रख देना एक ऐसा तत्व है जो एक वाक्य में आनेवाले दो रसों के विरोध को मिटा देता है । फिर यदि प्रबन्ध में दो विरोधियों के मध्य में एक तीसरे रस के आ जाने से उनका विरोध जाता रहे तो आश्चर्य ही क्या ? एक वाक्य में भी विरोध मिट जाता है यह बात तो स्वतः सिद्ध हो गई । एक वाक्य में विरोधनिवृत्ति का उदाहरण—
'युद्ध भूमि में अपने प्राण देकर वीर लोग देवत्व को प्राप्त हो गये हैं, वे देवशरीर में विमानों पर चढ़कर आकाश में पहुँच गये हैं और वहाँ से कौतूहल के साथ अपने मृत शरीरों को देख रहे हैं । जोकि युद्धभूमि में पड़े हुये हैं । उनके शव पृथ्वी को घूल से सने हुये हैं ।
जबकि उनके देवशरीरों में गले में पारिजात की मालायें हैं और उन देवपुष्पों की रज उनके वक्षस्थल को सुशोभित बना रही है । उनके शवों में सियारियाँ दूती माँति चिपटी हुई हैं ।
जबकि देवशरीरों में उनकी भुजाओं के मध्यभाग का आलिङ्गन देवों की अज्ञनायें कर रही हैं । उनके शवों पर मांसाहारी पक्षी अपने खून से सने हुये पंखों को फड़फड़ा कर हवा कर रहे हैं ।
जबकि उनके देवशरीरों पर कल्पलता के बने हुये रेशमी वस्रों से वायु की जा रही है जिन पर चन्दन का जल छिड़का हुआ है और वे वस्र सुगन्धित हो गये हैं । उस समय उनके शवों की ओर देवसुन्दरियाँ सक्रुध्दत कर रही हैं कि यह तुम्हारा शरीर पड़ा है और वे उसे कौतूहल तथा उसकण्ठा से देख रहे हैं ।'
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यहाँ पर ‘वीरः’ में कर्ता कारक है और ‘स्वदेहदान्’ में कर्मकारक, सभी पद्यों में प्रथमान्त तो कर्ता के विशेषण हैं और द्वितीयान्त कर्म के । इन विशेषणों से सिद्ध होता है कि दोनो का साम्य बहुत ही दूरवर्ती है और यह विश्वास करना असम्भव हो जाता है कि वस्तुतः दोनो एक ही हैं । जब वे वर्णन में बीभत्स रस का परिपाक होता है और देवशरीरों के वर्णन में शृङ्गार रस का, दोनो एक दूसरे के विरोधी रस हैं । इन दोनो विरोधी रसों के मध्य में वीररस का अव्यधान हो जाता है । अतएव यहाँ पर दोनो विरोधी रसों का एक साथ सन्निवेश दूषित नहीं कहा जा सकता ।
( प्रश्न ) यहाँ पर बीभत्स का विभाव है शव और शृङ्गार का विभाव है देवशरीर । इस प्रकार विभावभेद होने के कारण दोनो का विरोध सञ्जत ही नहीं होता । फिर वीररस को बीच में रखने से विरोध-निवृत्ति होती है यह कथन किस प्रकार सङ्जत कहा जा सकता है ?
( उत्तर ) यहाँ पर विशेषणों द्वारा यह व्यक्त हो रहा है कि उनकी दोनो दशाओं में इतना पार्थक्य था कि दोनो की एकता ही असम्भव प्रतीत हो रही थी । किन्तु वीर लोग देख रहे थे कि ‘ये मेरे शरीर हैं ।’ इस देहत्वाभिमान से ही उन स्वर्गत वीरों का उन शरीरों के साथ तादात्म्य सिद्ध हो रहा था । अर्थात् वे वीर उन शरीरों को ही अपना स्वरूप समझ रहे थे; इसीलिये उन्हें दोनो दशाओं में विरोध मालूम पड़ रहा था । अन्यथा शरीरों के पृथक् होने पर विषयभेद में विरोध की शङ्का ही निर्मूल हो जाती ।
( प्रश्न ) यहाँ पर एकमात्र वीररस की ही सत्ता मानी जानी चाहिये, शृङ्गार और बीभत्स ये दोनो वीररस के ही पोषक हैं; ये किस प्रकार स्वतन्त्र रस माने जा सकते हैं ?
( उत्तर ) मेरा यहाँ पर यह मन्तव्य नहीं है कि ये दोनो रस स्वतन्त्र हैं । चाहे हम इन्हें स्वतन्त्र रसों की दृष्टि से देखें और चाहे वीररस का व्यभिचारी भाव मानें, दोनो अवस्थाओं में यह उदाहरण तो अनुपपन्न हो ही नहीं सकता । यह तो सिद्ध ही हो जाता है कि किसी तटस्थ रस को मध्य में रख देने से दो विरोधी रसों का विरोध जाता रहता है । स्वतन्त्र रस मानने पर तो कोई आपत्ति हो ही नहीं सकती । वीररस का अङ्ग मानने पर शृङ्गार और बीभत्स के स्थायीभाव रति और जुगुप्सा के एक साथ समाविष्ट होने का यह उदाहरण हो सकता है ।
वीररस के समावेश की इस प्रकार की व्याख्या का सार यह है—इस पद्य में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि ‘वे वीर’…‘युद्धभूमि में पड़े हुये’…‘अपने शरीरों को देख रहे थे ।’ इन शब्दों से वीरों के उत्साह आदि की प्रतीति होती है । इससे वीररस पुष्ट हो जाता है । शेष पदखण्डों में देह के विशेषणों से बीभत्सरस व्यक्त होता है ।
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विरोधविरोधं च सर्वत्रैत्थं निरूपयेत् ।
विशेषतस्तु शृङ्गारे सुकुमारतमो रसः ।।२८।।
यथोक्तलक्षणानुसारेज विरोधाविरोधौ सर्वेषु रसेपु प्रवन्धेषु न्यायतश्च निरूपये-
त्सहृदयः; विशेषतस्तु शृङ्गारे । सेहि रतिपरिपोषात्मकत्वाद्रिततश्च स्वल्पनोऽपि
निमित्तेन भङ्गसम्भवात्सुकुमारतमः सर्वेष्यो रसेभ्यो मनागपि विरोधिसमावेशं
न सहते ।।२८।।
(अनु०) 'सर्वत्र इसौ प्रकार विरोध और अविरोध का निरूपण करना चाहिये और विशेषरूप से शृङ्गार में क्योंकि यह सुकुमारतम होता है ।'
यथोक्त लक्षणों का अनुसरण करते हुये समस्त रसों के विषय में प्रवन्ध में और
अन्यत्र विरोध और अविरोध का निरूपण करना चादिये । विशेष रूप से तो शृङ्गार में । निस्सन्देह उसके रतिपरिपोषात्मक होने से तथा रति का भङ्ग थोड़े
निमित्त से भी सम्भव होने के कारण वह ( शृङ्गार रस ) सुकुमारतम होता है
अर्थात् सभी रसों से थोड़ा भी विरोध समावेश नहीं सह सकता ।।२८।।
तारावती
होता है और दिव्य शारीरों के वर्णन से शृङ्गाररस व्यक्त होता है । 'वीर' देखना
क्रिया का कर्ता है और 'देह' कर्म । कर्ता और कर्म के विशेषण समस्त वाक्य में
विरखरे हैं जिनसे क्रमश: शृङ्गार और वीभत्स की अभिव्यक्ति होती है । जव उनके
वैषम्य के कारण का विश्लेषण किया जाता है तव उनका उत्साहरूप वीररस सामने
आ जाता है । इस प्रकार यद्यपि वीररस का मध्य में उपादान किया नहीं
गया है किन्तु मध्य में उसका आस्वादन करते हुये 'शृङ्गार' और 'वीभत्स'
का आस्वादन कर सकते हैं । अतएव इनका विरोध दोप के क्षेत्न से बाहर
हो जाता है । कालिदास ने निम्नलिखित एक हो पद्य में वीररस को मध्यमे रखकर
शृङ्गार और वीभत्स की योजना की है :-
क्ष्विद्रिदृष्ट्वाड्गडुत्कटोचकाझ: सद्यो विमानप्रहृतामुपेत्य ।
वामाझ्ंसङ्क्षतसुराझनन् स्वं नृत्यत्कबन्धं समरे ददर्श ।।
( इन्दुमती के विवाह के बाद अज उन्हें लेकर अपनी राजधानी की ओर आ
रहे हैं मार्ग में शत्रुओं ने घेर लिया है । उस समय जो महान् संहार हुआ उसका
वर्णन करते हुये कवि कहता है कि—‘किसी का मुस्तक शस्त्र की कृपाण से कट
गया था, वह तत्काल विमान के प्रसुत्व को प्राप्त हो गया । उस समय उसके
वामाझ् में देवार्जनासुयोमित हो रही थी और वह भूमि पर नाचते हुये अपने
कबन्ध को देख रहा था । )
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अवधानातिशयवान् रसे तत्रैव सत्कविः । भवेत्स्वस्मिन् प्रमादो हि भट्टिन्येवोपलक्ष्यते ॥२५॥
तत्रैव च रसे सर्वेभ्योडपि रसेम्यः सौकुमार्योतिशययोगिनि कविरवधानवान् प्रयत्नवान् स्यात् । तत्र हि प्रमाद्यतस्तस्यैवेहदयमध्ये चित्रविच्छेदानिविषयत्वात् भवति । शृङ्गाररसो हि संसारिणां नियमेनानुभवविषयत्वात् सर्वरसेम्यः कमनीयतया प्रधानभूतः ॥२५॥
(अनु०) 'सत्कविः उक्ती रस में अवधान की अतिशयतावाला हो । निस्सन्देह उसमें प्रमाद शीघ्र ही उपलब्ध हो जाता है' ॥२६॥
अनुवाद - वह श्रेष्ठ कवि उस रस में अवधान की अधिकता वाला हो । निस्संदेह उसमें प्रमाद ( दोष ) जल्दी ही उपलब्ध हो जाता है ।
सभी ही रसों की अपेक्षा सौकुमार्य की अधिकता से युक्त उसी रस में कवि अवधानवान् अर्थात् प्रयत्नवान् हो । निस्सन्देह उसमें प्रमाद करनेवाले उस ( कवि ) की सहृदयों के मध्य में शीघ्र ही अज्ञानविषयता हो जाती है । शृङ्गार रस निस्सन्देह संसारियों के लिये नियम से अनुभव विषय होने के कारण सर्व रसों की अपेक्षा कमनीय होने से प्रधानभूत होता है ॥२५॥
अन्यत्र चेति । मुक्तकादौ । स हि शृङ्गारः सुन्दरतम इति सम्बन्धः । सुन्दर-स्तावद्रसजातीयः ततोडपि करुणस्ततोडपि शृङ्गार इति तमप्रस्तुत्यः ॥२८-२९॥
'और अन्यत्र' यह । मुक्तक इत्यादि में । सम्बन्ध इस प्रकार होता है—वह शृङ्गार निस्सन्देह सुन्दरतम होता है । इसका कोई भी जातीय सुन्दर होता है । उससे भी करुण और उससे भी शृङ्गार, इसलिये तम् प्रयुक्त किया गया है ॥२८-२९॥
२८ वीं और २९ वीं कारिकाओं तथा उनकी वृत्ति का सार इस प्रकार है—
विरोध और अविरोध के लक्षण ऊपर बता दिये गये हैं किसी भी सहृदय व्यक्ति को उन्हीं का आश्रय लेकर सभी रसों में विरोध और अविरोध का निरूपण कर लेना चाहिये फिर ये रस चाहे प्रबन्धगत हों चाहे मुक्तकगत । यह बात शृङ्गार के विषय में विशेष ध्यान रखनी चाहिये । कारण यह है कि शृङ्गार रस की आत्मा रति का परिपोष ही है और रति स्वल्पतम विरोधी कारण के उपस्थित होते ही भङ्ग हो जाती है । इसीलिये रति सबसे अधिक सुकुमार मानी जाती है । कहा जाता है कि यों तो रसत्व जाति हो सुकुमार होती है; किन्तु उसमें भी करुण रस अधिक सुकुमार होता है और करुण से भी शृङ्गार रस अधिक सुकुमार होता है । दूसरे रस विरोधी को कुछ न कुछ तो सहन कर लेते हैं किन्तु शृङ्गाररस थोड़े से भी विरोधी को सहन नहीं कर सकता ।
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एवञ्च सति—विनेयानुन्मुखीकरतुं काव्यशोभार्थमेव वा । तद्विरुद्धरसस्पर्शस्तदङ्गानां न दुष्यति ॥१३०॥
अनु० ऐसा होने पर—‘अथवा विनेयों को उन्मुख करने के निमित्त काव्यशोभा के लिये ही उसके अंगों का उसके विरुद्ध रस से स्पर्श दूषित नहीं होता’ ॥१३०॥
लोचन यतोडसौ सर्वसंवाददीप्यर्थः । तदिति । शृङ्गारस्य विरुद्धा ये शान्ताद्यस्त्रथापि तदङ्गानां शृङ्गाराङ्गानां सम्बन्धाः स्पृहणीयो न दुष्टः । तथो भण्णत्या रसोन्तरगता अपि विभावानुभावाद्या वर्णनीयाः यथा शृङ्गाराङ्गभावमुपागमन् । ‘और ऐसा होने पर यह । अर्थात् क्योंकि यह सर्वसंवादी है । ‘तत्’ यह । शृङ्गार के विरोधी जो शान्त इत्यादि उसके अङ्गों का अर्थात् शृङ्गार के अङ्गों से सम्बद्ध स्पर्श दूषित नहीं होता । दूसरे रसों को प्राप्त भी विभाव अनुभाव इत्यादि उस भण्णत्या के साथ वर्णन किये जाने चाहिये जिससे वे शृङ्गार के अङ्गभाव को प्राप्त हो जाऐं ।
तारावती १३०वीं कारिका में कहा गया है कि सभी रसों की अपेक्षा अधिक सुकुमारता धारण करनेवाले उस शृङ्गाररस में कवि को विशेष ध्यान रखना चाहिये । अर्थात् शृङ्गार की रचना करते के अवसर पर प्रयत्नपूर्वक विरोध और अविरोध को समझ लेना चाहिये । उसमें प्रमाद करनेवाला कवि शीघ्र ही सद्ददयों के बीच
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यथा मसैव स्तोत्रे— स्वां चन्द्रचूडं सहसा स्पृशन्ती प्राणेश्वरं गाढवियोगतसा । सा चन्द्रकान्ताकृतिपुत्रिकेव संवृद्धिलीयापि विरलीयते मे ॥ जैसे मेरे ही स्तोत्र में— 'वह प्रगाढ वियोग से संतस चन्द्रकान्तामणि की बनी हुई आकृतिवाली पुतली के समान मेरी चेतना तुम प्राणेश्वर चन्द्रचूड का सहसा स्पर्श करती हुई विलीन होकर भी विलीन हो रही है ।'
अपमान तथा उपहास का पात्र बन जाता है । निस्सन्देह शृङ्गार रस सभी सांसारिक व्यक्तियों के लिये नियमितपूर्वक अनुभव का विषय वनता है । इसीलिए वह सभी रसों की अपेक्षा अधिक कमनीय होता है तथा अधिक प्रधान माना जाता है ॥ २५-२६ ॥
तारावती
अपमान तथा उपहास का पात्र बन जाता है । निस्सन्देह शृङ्गार रस सभी सांसारिक व्यक्तियों के लिये नियमितपूर्वक अनुभव का विषय वनता है । इसीलिए वह सभी रसों की अपेक्षा अधिक कमनीय होता है तथा अधिक प्रधान माना जाता है ॥ २५-२६ ॥
पिछली कारिका में बतलाया गया था कि शृङ्गार मधुरतम और सुकुमारतम होता है । उसमें किसी भी दूसरे विरोधी रस का स्पर्श उसे मलिन बना देता है और उसके विरोध अविरोध में थोड़ी सी असावधानी करने से कवि उपहासास्पद बन जाता है । अब इस कारिका में यह बतलाया जा रहा है कि शृङ्गार में तो किसी विरोधी रस का स्पर्श दूषित होता है किन्तु किसी भी विरोधी या अविरोधी रस में शृङ्गार का स्पर्श उस रस को अधिक हृदय बना देता है :-
पिछली कारिका में बतलाया गया था कि शृङ्गार मधुरतम और सुकुमारतम होता है । उसमें किसी भी दूसरे विरोधी रस का स्पर्श उसे मलिन बना देता है और उसके विरोध अविरोध में थोड़ी सी असावधानी करने से कवि उपहासास्पद बन जाता है । अब इस कारिका में यह बतलाया जा रहा है कि शृङ्गार में तो किसी विरोधी रस का स्पर्श दूषित होता है किन्तु किसी भी विरोधी या अविरोधी रस में शृङ्गार का स्पर्श उस रस को अधिक हृदय बना देता है :-
'( विरोध परिहार के जो उपाय पहले बतलाये गये हैं उनके अतिरिक्त एक यह बात भी है कि ) यदि कवि का मन्तव्य सहृदयों को अपनी ओर उन्मुख करना हो और इसके लिये कवि काव्यशोभा को अधिकान करना चाहे तो इस मन्तव्य से शृङ्गाररस के अंगों का अपने विरोधी रस से स्पष्ट दूषित नहीं कहा जा सकता ॥३०॥
'( विरोध परिहार के जो उपाय पहले बतलाये गये हैं उनके अतिरिक्त एक यह बात भी है कि ) यदि कवि का मन्तव्य सहृदयों को अपनी ओर उन्मुख करना हो और इसके लिये कवि काव्यशोभा को अधिकान करना चाहे तो इस मन्तव्य से शृङ्गाररस के अंगों का अपने विरोधी रस से स्पष्ट दूषित नहीं कहा जा सकता ॥३०॥
आशय यह है कि शृङ्गार रस ही एक ऐसा रस है जो सभी व्यक्तियों के अन्तःकरणों से मेल खाता है । यह मनुष्य जाति के लिये ही नहीं पशु-पक्षियों तक के लिये हृदय होता है । अतः इसकी ओर सर्वसाधारण की प्रवृत्ति स्वभाविक रूप में ही हो जाती है । वैराग्य, करुणा इत्यादि दूसरे तत्त्वों की ओर अवलेप के कारण राजपुत्रादिकों की प्रवृत्ति स्वाभाविक रूप में नहीं होती । अतः यदि उनको पहले शृङ्गार रस की ओर आकृष्ट कर लिया जाय और वे शृङ्गार का आस्वादन करने की वृद्धि से ही किसी काव्यशोभा की ओर उन्मुख हों तो उस साध्यम से उन्हें विनय के उपदेश देना सरल हो जाता है । ( यह उसी प्रकार होता है जैसे कड़ुई दवा को शहद इत्यादि किसी मधुर वस्तु से मिलाकर खिला दिया जाय । ) कहने
आशय यह है कि शृङ्गार रस ही एक ऐसा रस है जो सभी व्यक्तियों के अन्तःकरणों से मेल खाता है । यह मनुष्य जाति के लिये ही नहीं पशु-पक्षियों तक के लिये हृदय होता है । अतः इसकी ओर सर्वसाधारण की प्रवृत्ति स्वभाविक रूप में ही हो जाती है । वैराग्य, करुणा इत्यादि दूसरे तत्त्वों की ओर अवलेप के कारण राजपुत्रादिकों की प्रवृत्ति स्वाभाविक रूप में नहीं होती । अतः यदि उनको पहले शृङ्गार रस की ओर आकृष्ट कर लिया जाय और वे शृङ्गार का आस्वादन करने की वृद्धि से ही किसी काव्यशोभा की ओर उन्मुख हों तो उस साध्यम से उन्हें विनय के उपदेश देना सरल हो जाता है । ( यह उसी प्रकार होता है जैसे कड़ुई दवा को शहद इत्यादि किसी मधुर वस्तु से मिलाकर खिला दिया जाय । ) कहने
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इत्यत्र शान्तविभावानुभावानामपि शृङ्गारमङ्ग्य्या निर्हपणम् । विनेयानुन्मुखीकरणं या काव्यशोभा तदर्थं नैव दुष्यतीति सम्बन्धः । वाग्रहणेन पक्षान्तरमुख्यते—न केवलेति । वाशब्दस्यैतदर्थ्याख्यानम् । अविरोधलक्षणं परिपोषपरिहारादि पूर्वोक्तम् । विनेयानुन्मुखीकरणं या काव्यशोभा तदर्थमपि वाऽविरुद्धरससमावेशः न केवंल पूर्वोक्तमकारैः; न तु काव्यशोभा विनेयोन्मुखीकरणमन्तरेणास्ते व्यवधानाव्यवधानेऽपि केचित् लभ्यते यथान्यैव काव्याश्याते । सुखमिति । रत्नापुरःसरमित्यर्थः । न च काव्यं क्रीडारूपं कच च वेदादिगोचर उपदेशकथा इत्याद्राङ्ग्याह— सदाचार इति । मुनिभिरिति । प्रभुमित्रसमित्तेम्यः शास्त्रेतिहासेभ्यः प्रीतिपूर्वकं जायासम्मितत्वेन नाट्यकाव्यगतं न्युत्पत्तिकारित्वं पूर्वमेव निरूपितमस्माभिरिति न पुनरुक्तम्पयादिह लिखितम् ।
यहाँ पर शान्त के विभावानुभावों का शृंगार भङ्गिमा से निरूपण किया गया है । यहाँ सम्बन्ध इस प्रकार है—विनेयों को उन्मुख करने के लिये जो काव्यशोभा उसके लिये दूषित नहीं होती । ‘वा’ ग्रहण से पक्षान्तर कहा गया है । उसी की व्याख्या करते हैं—‘न केवलं’ यह । यह व्याख्या ‘वा’ शब्द की है । अविरोध लक्षण परिपोष परिहार इत्यादि पहले कहा गया है ‘अथवा विनेयों को उन्मुख करने के लिये जो काव्यशोभा उसके लिये भी विरुद्धरसमावेशः (दूषित नहीं होता ) केवल पूर्वोक्त प्रकारों से ही नहीं । काव्यशोभा विनेयों के उन्मुखीकरण के बिना नहीं होती । कोई व्यवधान और अव्यवधान भी उपलब्ध होते हैं जैसी कि दूसरों ने व्याख्या की है । ‘सुखपूर्वक’ यह । अर्थात् अनुरंजन के साथ । कहाँ तो क्रीडारूप काव्य और कहाँ वेदादिगोचर उपदेश कथा ?’ यह शङ्का करके कहते हैं—‘ सदाचार इत्यादि’। ‘मुनियों के द्वारा’ यह । अर्थात् भरत इत्यादि के द्वारा । शास्त्र और इतिहासों की अपेक्षा प्रीतिपूर्वकं जायासम्मित होने के कारण यह काव्यनाट्य-गत न्युत्पत्तिकारित्व हमने पहले ही निरूपित कर दिया है यहाँ पुनरुक्ति के भय से नहीं लिखा ।
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का सारांश यह है कि अन्य रसों के विभावानुभावादिकों का वर्णन ऐसी भंगिमा से करना चाहिये कि जिससे वे शृंगार के अंगभाव को प्राप्त हो सकें । एक उदाहरण लीजिये । शृंगार और शान्त दोनों सर्वथा विरोधी रस हैं । किन्तु अभिनवगुप्त ने अपने शृङ्गार स्तोत्र में शान्त का वर्णन शृंगार की भंगिमा के साथ किया है ।
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'मेरी चेतना चन्द्रकान्तामणि से बनी हुई पुतली जैसी रूपवती तरुणी के समान है; आप चन्द्र को अपने चूड़ा में धारण किये हुए हैं और आप उसके प्राणेश्वर हैं। आपके प्रगाढ़ वियोग से वह नितान्त सन्तप्त है और सहसा आपके संस्पर्श से प्रोत्कर विलीन होती हुई भी पुनः विलीन हो जाती है ।'
यहाँ पर कवि का आशय यह है कि जिस प्रकार कोई तरुणी अपने प्रियतम के वियोग में सांसारिक सन्तापों का अनुभव करती रहती है, फिर जब संयोगवश उसे अपने प्रियतम का संस्पर्श प्राप्त हो जाता है तब वह आनन्दातिरेक से अपने को भूल सी जाती है और प्रियतम में ही लीन हो जाती है; उसी प्रकार कवि की चेतना भी शिवरूप प्रियतम से चियुक्त होकर सांसारिक सन्तापों का अनुभव करती विस्तृत कर देती है और रुद्र जी में ही लीन हो जाती है । 'विलीन होकर भी विलीन हो जाती है;' का नायिका के पक्ष में अर्थ यह है कि नायिका का हृदय अपने प्रियतम के स्मरणमात्र से सर्वदा द्रवित हो जाता है जिससे नायिका प्रियतममय हो जाती है । रुद्र जी के पक्ष में इसका अर्थ यह है कि मेरी चेतना प्रायः सर्वदा ही आप में विलीन रहती है; किन्तु उससमय तन्मयता इतनी अधिक नहीं आती कि मैं ध्याता, ध्येय और ध्यान का भेद भूल जाऊँ । किन्तु जब मेरी चेतना किश्चित् भी आपका साक्षिध्य प्राप्त करती है तब वह अपने को सर्वथा आप में खो देती है । यहाँ पर ध्यान्तरस के विभावों और अनुभावों का निरूपण शृंगार की भंगिमा से किया गया है ।
यहाँ पर 'वा' शब्द की योजना कुछ जटिल है । 'विनियाननुमुखीकतुं काव्यशोभार्थमेव वा' में 'वा' शब्द की प्रत्यक्ष योजना इस प्रकार मालूम पड़ती है कि 'विनेयों को उन्मुख करने के लिये अथवा काव्यशोभा के लिये ।' किन्तु इस योजना में एक आपत्ति यह है कि सङ्ङदयों का उन्मुखीकरण और काव्यचोभा ये दो पृथक् प्रयोजन हो जाते हैं । वह काव्यशोभा कैसी जिसकी ओर सङ्ङदय उन्मुख न हों और सङ्ङदयों के उन्मुखीकरण के अतिरिक्त काव्यशोभा का दूसरा प्रयोजन ही क्या ? अतः ये दोनों प्रयोजन एक ही होने चाहिये कि 'सङ्ङदयों को उन्मुख करने के लिये जिस काव्यशोभा का सम्पादन किया जाता है.....' इत्यादि । अतः लोचनकार ने इस 'वा' शब्द को इस प्रकार संयोजित किया है--'वा' शब्द का सम्बन्ध पिछले प्रकरण से है । यह शब्द पिछले प्रकरण का पदान्तर उपस्थित करता है । पहले यह बताया गया है कि वे कौन सी अवस्थायें हैं जिनसे दो विरोधी रसों का विरोध निष्पन्न हो जाता है । 'वा' ग्रहण का आशय यह है किसी
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किन्तु शृङ्गारस्य सकलजनमनोहराभिरामत्वात्तदङ्गसमावेशः काव्ये शोभातिशयं पुष्टयतीत्यनेनापि प्रकारेण विरोधिनि रसे शृङ्गाराङ्गसमावेशो न विरोधी।
तत्थ—
सत्यं मनोरमा रामा: सत्यं रम्या विभूतयः ।
किन्तु मत्तड्गनापाङ्गभङ्गलोलं हि जीवितम् ॥
इत्यादिपु नास्ति रसविरोधदोषः ।
(अनु०) और भी शृङ्गार के सकलजन-मनोहर और अभिराम होने से काव्य में उसके अङ्गों का समावेश शोभातिशय को पुष्ट करता है। इस प्रकार से भी विरोधी रस में शृङ्गार के अङ्गों का समावेश नहीं होता। इससे—
'सच्चमुच रामायें मनोरम होती हैं; सच्चमुच विभूतियाँ रमणीय होती हैं; किन्तु जीवन मत्त अङ्गनाओं के अपाङ्गभङ्ग के समान चञ्चल होता है ।' इत्यादि में रसविरोध का दोष नहीं होता ॥३०॥
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रस का परिपोष न करना इत्यादि पुराने तत्व ही विरोधनिवृत्ति में कारण नहीं होते अपितु एक ओर तत्व ऐसा है जो विरोध को निवृत्त कर देता है। और वह यह है कि यदि अन्य रसों के साथ शृङ्गार की योजना कर दी जाय तो विरोध नहीं आता।
किन्तु शतं यह है कि शृङ्गार की योजना काव्य की शोभा में कारण हो और काव्य की शोभा सहृदयों को अपनी ओर आकृष्ट करने में कारण हो।
यदि यह बात पूरी हो जाती है तो शृङ्गार की अन्य रसों के साथ योजना सदोष नहीं मानी जा सकती।
यहाँ पर लोचन के 'व्यवधानाव्यवधानेऽपि केचित् लभ्येते यथान्यैरव्यास्याते' इन शब्दों का अर्थ स्पष्ट नहीं है।
सम्भवतः इनकी व्याख्या इस प्रकार की जा सकती है—विरोधपरिहार के पिछले प्रकरण में बतलाया गया था कि दो विरोधी रसों का यदि किसी तीसरे अविरोधी रस से व्यवधान हो जाता है तो विरोध का परिहार हो जाता है।
अव्यवधान में भी विरोधपरिहार होते देखा जाता है।
व्यवधान और अव्यवधान दोनों प्रकार के काव्य देखे जाते हैं।
व्यवधान की व्याख्या पहले की जा चुकी है।
अव्यवधान में किस प्रकार विरोधपरिहार होता है यह कारिका में कहा गया है।
यह व्याख्या अन्य आचार्यों ने की है जो लोचनकार के अनुसार बहुत असंगत नहीं है।
किन्तु पूर्णरूप से इसका समर्थन भी नहीं किया जा सकता।
क्योंकि इस कारिका में 'वा' शब्द पिछले पूरे प्रकरण की ओर संकेत करता है।
उसमें केवल व्यवधान में विरोधपरिहार की बात नहीं कही गई है।
अपितु अनेक और तत्व भी दिखलाये गये हैं।
'सहृदय सुखपूर्वक विनय के उपदेशों को ग्रहण कर लेते हैं' यहाँ सुखपूर्वक का अर्थ है अनुरञ्जन के साथ।
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ननु श्रृङ्गाराझतामङ्गया यदि द्विमावादिनिरूपणमेतावत्तैव किं विनेयोन् मुखीकरण ? न; असति प्रकारान्तरं, तदाह—किन्न्वेति । शोभातिशायामिति । अलङ्कारविशेषसुपमामश्रितिं पुष्ट्यति सुन्दरीकरोतीत्यर्थः । यथोक्तम्—‘काव्यशोभाया: कर्तारो धर्मा गुणास्तदतिशयहेतवस्त्वलङ्काराः’ इति । मत्ताज्ञनेति । अत्र हि शान्तविभावे सर्वस्यास्त्वनित्यत्वे वणर्यमाने न कस्यचिद्भावस्य श्रृङ्गारसमहस्रया निवन्धः कृतः किन्तु सत्यामिति परहदयाजुप्रवेशेनोक्तम् , न खल्वलङ्कारैराग्यकौतुकैरचि मकटयास:, अपितु यस्य कृते सर्वसमभ्यर्थ्यते तदेवेदं चलमिति, तत्र मत्ताज्ञनापाङ्गमडितस्य श्रृङ्गारं प्रति सम्मान्यमानविशावानुभावतेनाझस्य श्रोतॄयानुपमानतोक्केति प्रियतमाकटाक्षो हि सर्वस्यालमिलक्षणीय इति च तथ्रेत्या प्रहृष्टिमान् गुडजिहिकया मसक्तानुमसक्तवस्तुसंवेदनेच्चैराग्ये पर्यवस्यति विनेयः ॥ ३० ॥
( प्रश्न ) श्रृंगारता की भङ्गिमा से जो विभावादि निरूपण क्या इतने से ही विनेयो को अनुग्रहाकरण होता हैं—‘और भी’ यह । ‘शोभातिशय’ यह । अर्थात् अलङ्कार विशेष उपमा प्रभृति को पुष्ट करता है अर्थात् सुन्दर कर देता है । जैसा कहा गया है—काव्यशोभ के करनेवाले धर्मं गुण होते हैं और उसके अतिशय में हेतु अलङ्कार होते हैं । ‘मत्ताझ्जना’ यह । यहाँ निस्संदेह शान्त के विभाव सभी के अनित्यत्व के वर्णनीय है, किन्तु सचमुच इन वाक्यों से परहदयानुप्रवेश के द्वारा कहा गया है कि हम निस्संदेह अलौंक वैराग्य कौतुक की रुचि प्रकट नहीं कर रहे हैं अपितु जिसके लिये सब कुछ किया जाता है यह वह निश्चल है । उसमें मत्ताझनापाङ्गमडित् की चञ्चलता में उपमानता कही गई है और उस प्रकार प्रियतमा कटाक्ष निस्संदेह सभी का अभिलक्षणीय है इससे उसके प्रेम से प्रत्तिविला विनेय गुडजिहिका से प्रसक्त और अनुप्रसक्त वस्तु के संवेदन के द्वारा वैराग्य में पर्यवसित होता है ॥ ३० ॥
( प्रश्न ) काव्य तो किञ्चिद्रूप होता है और उपदेशकथा वेदादि सच्छास्त्रों से गहीत होती है । अतएव इन दोनों का सम्बन्ध हो तो किस प्रकार शक्यते हैं ? ( उत्तर ) भरत इत्यादि मुनियों ने काव्यगोष्ठी विनेयजनों के हित के लिये ही प्रवर्तित की थी और उसका प्रयोजन था विनेय व्यक्तियों को सदाचार का उपदेश। यह पहले ही बतलाया जा चुका है कि नाट्य और काव्य का उपदेश जायासम्भित
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होता है। यह प्रभुसम्मित और मित्रसम्मित शास्त्र और इतिहास की अपेक्षा अधिक महत्वपुर्ण है क्योंकि यह आनन्द के साथ व्युत्पत्ति को उत्पन्न करता है। यह विषय विस्तारपूर्वक पहले ही समझाया जा चुका है। अतः यहाँ पुनः उसका विवेचन पुनरुक्ति मात्र होता। अतएव इस वास्तविकता को उसी प्रकरण में समझना चाहिये।
( प्रश्न ) क्या काव्य में श्रृंगार के द्वारा विनेयों का उन्मुखीकरण इसी प्रकार सम्भव है कि विभाव और अनुभाव का निरूपण श्रृंगार के अंगों की मांगिमा के साथ किया जाय या और भी कोई उपाय सम्भव है (उत्तर) इसके लिये एक उपाय और है श्रृंगार रस सभी प्रकार के व्यक्तियों के मन को हरण करनेवाला होता है। अतएव काव्य में उसके अंगों का समावेश उपमाप्रभृति अलंकार विधोषों को भी पुष्ट कर देता है। यहाँ पर ‘शोभा-तिशयं पुष्यति’ इस वाक्य का प्रयोग किया गया है। शोभातिशय शब्द का अर्थ है अलंकार। कहा भी गया है कि काव्यशोभाकरक धर्मों को गुण कहा जाता है और उस शोभा को अधिक बढ़ानेवाले (अतिशय करनेवाले ) धर्मों को अलंकार माना जाता है। श्रृंगार रस अलंकार को अधिक सुंदर बना देता है जिससे काव्य की सुन्दरता बढ़ जाती है। इस रूप में भी विरोधी रस में श्रृंगार के अंग का समावेश विरोधी नहीं माना जा सकता। आशय यह है कि यदि विरोधी रस में श्रृंगार के अंग का समावेश विभाव, अनुभाव इत्यादि के रूप में न हो तो अलंकार के रूप में हो सकता है। इससे भी काव्य की शोभा बढ़ जाती है और रसास्वादन में किसी प्रकार का व्याघात उपस्थित नहीं होता।
अतएव—‘यह सच है कि रमणियाँ भी मनोरमा होती हैं और सम्पत्तियाँ भी रमणीय होती हैं, किन्तु जीवन तो मतवाली ललनाओं के अपराधभडुर ( कटाक्षपात ) की भाँति ही क्षणभंगुर होता है।’ यहाँ पर सभी की अनित्यता का वर्णन करना है जो कि शान्तरस का विभाव है। इसमें काव्यशोभा का आधान करने के लिये श्रृंगाररस की किसी भी भंगिमा का समावेश नहीं किया गया है। अपितु ‘यह सच है…..‘रमणीय होती हैं’ यह आधा वाक्य दूसरे के हृदय में अनुप्रविष्ट होकर कहा गया है। आशय यह है कि शान्तरस के विरोध में कोई रसिक व्यक्ति जो कुछ कह सकता है उसको शान्तरस के समर्थक ने पहले ही मान लिया और इस प्रकार अपने विरोधी के हृदय में प्रविष्ट हो गया। उसका कहना है कि जिन वस्तुओं में तुम रमणीयता के दर्शन करत हो उन्हें मैं भी अरमणीय नहीं कहता। मैं तुम्हारे अन्दर झूठे वैराग्य के कौतूहल की रंच उत्पन्न करना नहीं चाहता।
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विज्ञायेत्थं रसादीनामविरोधविरोधयोः । विपयं सुववि: काव्यं कुर्वन्न मुह्यति न कचित् ॥३१॥
इथमननानन्तरोक्केन प्रकारेण रसादीनां रसभावतदाभासानां परस्परं विरोधस्थाप्यवस्थं च विषयं विज्ञाय सुववि: काव्यविषयं प्रतिभातिशययुक्त: काव्यं कुर्वन्न न मुह्यति ।
(अनु०) इस प्रकार सुकवि रस इत्यादि के अविरोध और विरोध के विषय को जानकर काव्य करते हुये कभी मोहित नहीं होता ॥३१॥
तदेतदुपसंहरन्न अस्योक्तस्य प्रकरणस्य फलमाह—विज्ञायेत्थमिति ॥ ३१ ॥
अत: इसका उपसंहार करते हुये इस उक्त प्रकरण का फल कहते हैं—‘इस प्रकार जानकर’ यह ॥ ३१ ॥
जीवन के लिये चाही जाती हैं वह जीवन ही स्थिर नहीं है, तब इसकी रमणीयता किस काम आएगी । यहाँ पर रमणियों और विभूतियों की अस्थिरता के लिये उपमा दी गई है । मतवाली ललनाओं के कटाक्षपात की । इस उपमा को देखकर एकदम सम्भावना हो जाती है । कि यहाँ पर अलङ्कार के विभाव नायिका और नायिका का वर्णन किया गया होगा । मतवाली ललनाओं के कटाक्ष को कौन नहीं चाहेगा ? अतएव कटाक्ष के अनुराग से कोई विनेय व्यक्ति इस सूक्ति की ओर प्रवृत्त होगा और प्रसंग प्राप्त तथा उससे अनुगत वस्तु अनित्यता के ज्ञान के द्वारा वैराग्य में उसी प्रकार उसकी भावनाओं का पर्यवसान हो जाएगा जिस प्रकार कोई रोगी गुड के संयोग से किसी कडु औषधि को ग्रहण कर लेता है । अतएव इस प्रकार के पद्यों में रसविरोध का दोष नहीं होता ॥ ३० ॥
३० वीं कारिका तक रसों के परस्पर सम्बन्ध तथा उनके एक में समावेश के प्रकार पर विचार किया गया । ३१ वीं कारिका इस प्रकरण का उपसंहार है । इसमें कहा गया है कि :- 'यदि कवि काव्यरचना के अवसर पर उक्त व्यवस्था का ध्यान रखता है तो वह अपनी काव्य क्रिया में कभी व्यामोह को प्राप्त नहीं होता ॥३१॥'
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एवं रसादिषु विरोधाविरोधनिरूपणस्योपयोगित्वं प्रतिपाद्य व्यङ्ककवाच्यवाचकनिरूपणस्यापि तद्विपयस्य तत्प्रतिपाद्यते— वाच्यानां वाचकानां च यदौचित्येन योजनम्। रसादिविषयेण तत्क्रममुख्यं महाकवे:॥१३९॥
इस प्रकार रस आदि में विरोध और अविरोध निरूपण की उपयोगिता का प्रतिपादन करके व्यङ्ग्य वाच्य वाचक निरूपण के विषय में भी उसी का प्रतिपादन किया जा रहा है— वाच्यों और वाचकों का औचित्य के साथ जो योजन वह महाकवि का मुख्य कर्म है॥१३९॥
रसादिषु रसादिविषयस्य व्यङ्गकवाच्यवाचकनिरूपणस्य च यदौचित्येन यद्योजनमेतन्महाकवेः मुख्यं कर्म । अयमेव हि महाकवेः मुख्यो व्यापारो यद्रसादिविषयतया काव्यार्थीकृत्य तद्विषयकल्यानुगुणत्वेन शब्दानामर्थानां चोपनिबन्धनम्॥१३९॥
रसादिषु रसादिविषयस्य व्यङ्गकवाच्यवाचकनिरूपणस्य च यदौचित्येन यद्योजनमेतन्महाकवेः मुख्यं कर्म । अयमेव हि महाकवेः मुख्यो व्यापारो यद्रसादिविषयतया काव्यार्थीकृत्य तद्विषयकल्यानुगुणत्वेन शब्दानामर्थानां चोपनिबन्धनम्॥१३९॥
रसादिकों में अर्थात् रस आदि के विषय में व्यङ्ग्य जो वाच्य विभाव इत्यादि और वाचक जो सुप्ततिद् इत्यादि उनका जो निरूपण उसका। तद्विषय का अर्थात् उपयोगित्व। 'मुख्य' यह। 'आलोकार्थी' यहाँ पर जो कहा गया था उसी का उपसंहार कर दिया गया। 'महाकवि का' यह। यहाँ सिद्ध के समान फल का निरूपण है। निस्सन्देह इस प्रकार महाकवित्व होता है अन्यथा नहीं। 'इतिवृत्त विशेषों का' इतिवृत्त निस्सन्देह प्रबन्ध वाच्य होता है उसकी विशेषतायें पहले गਈ हैं— विभावानुभावसञ्चरियौचित्य—
रसादिषु रसादिविषयस्य व्यङ्गकवाच्यवाचकनिरूपणस्य च यदौचित्येन यद्योजनमेतन्महाकवेः मुख्यं कर्म । अयमेव हि महाकवेः मुख्यो व्यापारो यद्रसादिविषयतया काव्यार्थीकृत्य तद्विषयकल्यानुगुणत्वेन शब्दानामर्थानां चोपनिबन्धनम्॥१३९॥
सुसिद्धादीनि तेषां यथ्रिस्पप्णं तस्येति। तद्विषयस्येति। रसादिविषयस्य। तदिति मुखयमिति। आलोकार्थी इतिवृतं यदुक्तं तदेवोपसंहृततम्। महाकवेरिति सिद्धवत्फलनिरूपणम् एवं हि महाकवित्वं नान्यथेल्यर्थः। इतिवृत्तं हि प्रबन्धवाच्यं तस्य विशेषा: प्रागुक्ता:—‘विभावानुभावसञ्चारियोंचित्य—
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चारुणः । विधिः कथा शरीरोऽस्य' इत्यादिना । काव्यार्थोंऽकुल्येति अन्यथा लौकिकशास्त्रीयवाक्यार्थेभ्यः कः काव्यार्थस्य विशेषः ? एतच्च निर्णयांतमग्योद्योते-काव्यस्यात्मा स एवार्थः इत्यन्नान्तरे ॥३२॥
चारुणः । विधि कथा शरीरस्य' इत्यादि के द्वारा । 'काव्यार्थों करकै' यह अन्यथा लौकिक और शास्त्रीय वाक्यार्थों से काव्यार्थ की क्या विशेषता । यह प्रथम उद्योत में 'काव्यस्यात्मा स एवार्थः' इस कारिका के वीच में निरूपित किया गया है ।
रस इत्यादि में इत्यादि का अर्थ है रस, भाव, रसाभास और भावाभास । इनके परस्पर विरोध और अविरोध के विषय इसी पिछले प्रकरण में बतलाये जा चुके हैं । जब कोई अधिक प्रतिभाशाली व्यक्ति इनको समझकर काव्य रचना करता है तो उसमें चमत्कार नहीं होता ॥ ३१ ॥
रस इत्यादि में इत्यादि का अर्थ है रस, भाव, रसाभास और भावाभास । इनके परस्पर विरोध और अविरोध के विषय इसी पिछले प्रकरण में बतलाये जा चुके हैं । जब कोई अधिक प्रतिभाशाली व्यक्ति इनको समझकर काव्य रचना करता है तो उसमें चमत्कार नहीं होता ॥ ३१ ॥
तारावती
उपर यह बतला दिया गया कि रस इत्यादि के विषय में विरोध और अविरोध के निरूपण करने का उपयोग क्या है । रस के व्यंग्य स्वरूप के विषय में उतना निरूपण कर देने के बाद स्वभावतः उसके व्यंजक रूप पर विचार करने का प्रश्न सामने आ जाता है । व्यंजक दो होते हैं—वाच्य और वाचक । वाच्य और वाचक की योजना पर ३३ वीं कारिका में संक्षिप्त प्रकाश डाला जायगा । इस ३२ वों कारिका में यह दिखलाया जा रहा है कि रस इत्यादि के विषय और वाचक के निरूपण का उपयोग क्या है? यहाँ पर यह भी समझ लेना चाहिये कि रस इत्यादि के विषय में वाच्य तो विभाव इत्यादि होते हैं और वाचक रूप ( शब्द इत्यादि ) होते हैं । इनके निरूपण का क्या उपयोग है? वह इस कारिका में बतलाया गया है । कारिका का अभिप्राय यह है--
उपर यह बतला दिया गया कि रस इत्यादि के विषय में विरोध और अविरोध के निरूपण करने का उपयोग क्या है । रस के व्यंग्य स्वरूप के विषय में उतना निरूपण कर देने के बाद स्वभावतः उसके व्यंजक रूप पर विचार करने का प्रश्न सामने आ जाता है । व्यंजक दो होते हैं—वाच्य और वाचक । वाच्य और वाचक की योजना पर ३३ वीं कारिका में संक्षिप्त प्रकाश डाला जायगा । इस ३२ वों कारिका में यह दिखलाया जा रहा है कि रस इत्यादि के विषय और वाचक के निरूपण का उपयोग क्या है? यहाँ पर यह भी समझ लेना चाहिये कि रस इत्यादि के विषय में वाच्य तो विभाव इत्यादि होते हैं और वाचक रूप ( शब्द इत्यादि ) होते हैं । इनके निरूपण का क्या उपयोग है? वह इस कारिका में बतलाया गया है । कारिका का अभिप्राय यह है--
'कवि का सर्वाधिक प्रधान कर्म है ऐसे वाच्य और वाचक की योजना करना जिसमें रस इत्यादि को दृष्टिगत रखते हुए औचित्य का पूरा निर्वाह किया गया हो ।'
'कवि का सर्वाधिक प्रधान कर्म है ऐसे वाच्य और वाचक की योजना करना जिसमें रस इत्यादि को दृष्टिगत रखते हुए औचित्य का पूरा निर्वाह किया गया हो ।'
वाच्य का अर्थ है विशेष प्रकार के काव्यानुकूल इतिकर्त्त की विशेषतायें और वाचक का अर्थ है उस इतिकर्त्तविषयक शब्दों की योजना जिसमें रसादिविषयक औचित्य का ध्यान रखा गया हो । यह महाकवि का सर्वप्रसुख कर्तव्य है । यहाँ पर शब्द और अर्थ की योजना कवि का प्रसुख कर्तव्य बतलाया गया है । उससे यह भ्रम हो सकता है कि यहाँ पर रस की अपेक्षा शब्द और अर्थ को प्रधा-नता दे दी गई है । अतः यहाँ पर शब्द और अर्थ तथा रस इनके महत्व के
वाच्य का अर्थ है विशेष प्रकार के काव्यानुकूल इतिकर्त्त की विशेषतायें और वाचक का अर्थ है उस इतिकर्त्तविषयक शब्दों की योजना जिसमें रसादिविषयक औचित्य का ध्यान रखा गया हो । यह महाकवि का सर्वप्रसुख कर्तव्य है । यहाँ पर शब्द और अर्थ की योजना कवि का प्रसुख कर्तव्य बतलाया गया है । उससे यह भ्रम हो सकता है कि यहाँ पर रस की अपेक्षा शब्द और अर्थ को प्रधा-नता दे दी गई है । अतः यहाँ पर शब्द और अर्थ तथा रस इनके महत्व के
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रसानुगुणत्वेन औचित्यवान् व्यहारोडर्थशब्दयोः । औचित्यवान् न्यस्ता एता वृत्तयो द्विविधा: स्थिता: ॥१३३॥
अनु० और यह रसादि तात्पर्य से काव्यनिबन्धन भरत इत्यादि में भी सुप्रसिद्ध हो है यह प्रतिपादन करने के लिये कहते हैं— 'रस इत्यादि के अनुप्राणित होने के साथ जो औचित्यवाला शब्द और अर्थ का व्यवहार ने ये दो वृत्तियाँ स्थित हैं' ॥१३३॥
व्यवहारो हि वृत्तिरुच्यते । तत्र रसानुगुण औचित्यवाच्याश्रयो यो व्यवहारेा एत: कैशिक्याद्या वृत्तय: । वाचकाश्रयोपनागरिकाद्या । वृत्तयो हि रसादितात्पर्येण सन्निवेशिता कामपि नाट्यस्य काव्यस्य च्छायामावधान्ति । रसादयो हि दृयोऽपि तयो: जीवभूता: इतिवृत्तादि तु शरीरभूतमेव । तारावती
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एतच्चोक्तम्
लोचन
यद्ग्रस्माभिर्हक्कमित्यर्थः। भरतादिवाक्यादिग्रहणादलङ्कारशास्त्रेऽपि परुषाद्या वृत्तय इत्युक्तं भवति। दृव्योरपि तयोरिति। वृत्तलक्षणयोर्व्यवहार्योरित्यर्थः। जीवभूता इति। ‘वृत्तयः काव्यमातृका:’ इति न्यायेन सुकविना रसौचितेतिवृत्तसमाश्रयणादर्शनेन रसस्यानुत्तवसुत्तम्।
'और यह' यह।
इत्यादि शब्द से अलङ्कृत शास्त्रों में परुषा इत्यादि वृत्तियाँ होती हैं यह बात कही गई है। 'उन दोनों का' अर्थात् वृत्तिलक्षण दोनों व्यवहारों का। 'जीव भूत' यह। 'वृत्तियाँ काव्य की माताएँ होती हैं' यह कहनेवाले मुनि ने रस के लिये उपयुक्त इतिवृत्त के आश्रय लेने का उपदेश देने के द्वारा रस का ही जीवितत्त्व कहा है।
इतिवृत्त यह प्रवन्ध का वाच्य होता है। उसकी विशेषता पहले बतला दी गई है (देखें—तृतीय उद्योत की कारिका १० से १४ तक की व्याख्या)। सारांश यह है कि महाकवि का मुख्य व्यापार यही है कि रस इत्यादि को ही काव्यार्थ मानकर उसकी अभिव्यक्ति के अनुकूल शब्द और अर्थ का उपनिबन्धन करे। रस इत्यादि को काव्यार्थ बनाने का आशय यही है कि रस का होना ही काव्यवाक्यों की सबसे बड़ी विशेषता है। नहीं तो लौकिक तथा शास्त्रीय वाक्यों से काव्य का भेद ही क्या रहे। इसका निर्णय तो प्रथम उद्योत की ५वीं कारिका में ही कर दिया गया कि 'वही रसादि रूप अर्थात् काव्य की आत्मा है'॥ ३२ ॥
तारावती
रस इत्यादि के तात्पर्य से वाच्य और वाचक की योजना कोई कपोलकल्पित सिद्धान्त नहीं है। इसे तो भरत इत्यादि आचार्यों ने भी मान्यता दी है। अतः यह सिद्धान्त परम्परानुमोदित ही है। यही बात इस ३३वीं कारिका में कही गई है :- 'अर्थ और शब्द का इस रूप में व्यवहार करना कि उसमें रस के अनुप्रुण होने का सर्वथा ध्यान रखा गया हो और औचित्य का भी पालन किया गया हो, वृत्ति कविलाता है। ये वृत्तियाँ दो रूपों में स्थित हैं'॥ ३३ ॥
(वृत्तियों के विषय में कुछ अधिक विस्तार के साथ प्रकाश प्रस्तुत उद्योत की ४६वीं और ४७वीं कारिका में डाला जायगा। यहाँ इतना समझ लेना चाहिये कि आनन्दवर्धन से पहले नाट्यशास्त्र और काव्यशास्त्र ये दो पृथक्-पृथक् शास्त्र थे। जहाँ आनन्दवर्धन को काव्यशास्त्र की अनेक नवीन दिशाओं के उन्मीलन का श्रेय प्राप्त है वहाँ उनका एक महत्वपूर्ण योगदान यह भी है कि उन्होंने नाट्य-
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स्वादुकाव्यरसोन्मिश्रं वाक्यार्थमुपसुज्यते । मथसालोढमध्ववः पिबन्ति कटुभेषजम् ॥
लोचन इत्यादिना रसोपयोगोजीवितः शब्दवृत्तिलक्षणो व्यवहार उक्तः । शरीरभूतमिति । 'इतिवत्सं हि नाट्यस्य शरीरम्' इति सुन्तिः । नाट्यां च रस एवैकत्वेन प्राक् । 'स्वादु काव्यरस से मिश्रित वाक्यार्थ का उपयोग करते हैं । पहले शब्द को चाटकर कड़वी दवा पी लेते हैं ।' इत्यादि के द्वारा शब्दवृत्ति लक्षणवाला ऐसा व्यवहार बतलाया है जिसका जीवन रस ही है । 'शरीरभूत' यह । सुनि ने कहा है 'इतिवत्स नाट्य का शरीर होता है ।' यह हम पहले ही कह चुके कि नाट्य तो रस ही होता है ।
तारावती शास्त्र और काव्यशास्त्र दोनों के एकीकरण का महत्वपूर्ण कार्य सम्पन्न किया । वृत्तियों के विषय में भी आनन्दवर्धन के पहले दो प्रकार की वृत्तियाँ चले आ रही थीं एक तो भरत की नाट्यवृत्तियाँ जिनमें कैशिकी इत्यादि आर्ती थीं और दूसरी उद्भट इत्यादि की उपनागरिका इत्यादि वृत्तियाँ जो कि काव्यवृत्तियाँ कही जा सकती थीं । इनके साथ ही काव्य में वैदर्भी इत्यादि रीतियाँ भी चल रही थीं । आनन्दवर्धन और अभिनवगुप्त ने इन काव्यरीतियों को रसोन्वित शब्दद्वयवहार कहकर वृत्तियों से इनके अद्धैत की स्थापना की । इसीलिये आगे चलकर मम्मट और पण्डितराज का 'वैदर्भी वृत्ति' शब्द का प्रयोग उपपन्न हो सका । सारांश यह है कि आनन्दवर्धन के पहले वृत्तियाँ दो प्रकार की थीं कैशिकी इत्यादि नाट्यवृत्तियाँ और उपनागरिका इत्यादि काव्यवृत्तियाँ ।
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अत्र केचिदाहुः—‘गुणगुणिलव्यवहारो रसादीनामितिवृत्तादिभिः सह युक्तः न तु जीवशरीरव्यवहारः । रसादिमयं हि वाच्यं प्रतिभासते न तु रसादिभिः पृथग्भू-तम्’ इति । अत्रोच्यते—यदि रसादिमयमेव वाच्यं यथोक्तं न तु गौरवमय शरीरम् । एवं सति यथा शरीर प्रतिभासमाने नियमेनैव गौरवं प्रतिभासते सर्वस्य तथा वाच्येन सहैव रसादयोऽपि सहृदयस्यासहृदयस्य च प्रतिभासेरन् । न चैवम्, तथा चैतत्स्यातिपादितमेव ग्रथमोद्योते ।
अनु० यहाँ कुछ लोग कहते हैं—‘रसादिकों का इतिवृत्त के साथ गुण-गुणी व्यवहार उचित है, जीव-शरीर व्यवहार नहीं । क्योंकि वाच्य निस्सन्देह रसादिमय ही प्रतिबिम्बित होता है रसादिकों से पृथग्भूत नहीं, यह । यहाँ पर कहा जा रहा है—यदि रसादिमय ही वाच्य होता है जैसे गौरवमय शरीर, ऐसी दशा में जैसे शरीर के प्रतिबिम्बित होते पर नियम से ही सभी के लिये गौरव भारत्व प्रतिबिम्बित होता है उसी प्रकार वाच्य के साथ हो रस इत्यादि भी सहृदय और असहृदय सभी के लिए प्रतिबिम्बित होने लगें । ऐसा है नहीं, वैसा यह प्रथम उद्योत में ही प्रतिपादित कर दिया गया ।
तारावती
तारावती
आनन्दवर्धन का यह मानना कि नाट्यवृत्तियाँ वस्तुतः अर्थवृत्तियाँ हैं, ठीक ही है । काव्यवृत्तियों का व्यवहार अधिकतर वृत्त्यनुप्रास के प्रसिद्ध लक्षण में किया जाता है जिसमें कोमल, कठोर इत्यादि वर्णों के आधार पर वृत्तियों का निरूपण किया जाता है । अतः यह स्पष्ट ही है कि ये शब्दवृत्तियाँ हैं । इसे प्रकार आनन्दवर्धन ने नाट्य और काव्यवृत्तियों का सफल तथा सुन्दर सामञ्जस्य स्थापित किया है । ) शब्द और अर्थ दोनों प्रकार के व्यवहा-रों का नाट्य और काव्य दोनों में यदि रस इत्यादि के तात्पर्य से संनिवेश किया जाता है तो दोनों की एक अनिर्वचनीय छाया उत्पन्न हो जाती है । आशय यह है कि दोनों वृत्तियाँ नाट्य और काव्य दोनों में समान रूप से उपयोगिनी होती हैं, ऐसा नहीं है कि कोई एक प्रकार की वत्ति नाट्य के लिये ही उपयोगी हो और दूसरे प्रकार की काव्य के लिये ही । दोनों प्रकार की वृत्तियों का जीवन रस ही है । इतिवृत्त तो केवल शरीर-स्थानीय ही होते हैं । मुनि ने लिखा है कि वृत्तियों की माता काव्य ( कविता ) ही है । मुनि ने यह भी कहा है कि इतिवृत्त नाट्य का शरीर होता है और ऐसे इतिवृत्त का आश्रय लेने का उपदेश दिया है जो रस के लिये उपयुक्त हो । नाट्य या अभिनय वस्तुतः रस ही होता है यह पहले समझाया जा चुका है । इस प्रकार भरत मुनि का मन्तव्य स्पष्ट हो जाता है कि इतिवृत्त काव्य का शरीर होता है, रस
आनन्दवर्धन का यह मानना कि नाट्यवृत्तियाँ वस्तुतः अर्थवृत्तियाँ हैं, ठीक ही है । काव्यवृत्तियों का व्यवहार अधिकतर वृत्त्यनुप्रास के प्रसिद्ध लक्षण में किया जाता है जिसमें कोमल, कठोर इत्यादि वर्णों के आधार पर वृत्तियों का निरूपण किया जाता है । अतः यह स्पष्ट ही है कि ये शब्दवृत्तियाँ हैं । इसे प्रकार आनन्दवर्धन ने नाट्य और काव्यवृत्तियों का सफल तथा सुन्दर सामञ्जस्य स्थापित किया है । ) शब्द और अर्थ दोनों प्रकार के व्यवहा-रों का नाट्य और काव्य दोनों में यदि रस इत्यादि के तात्पर्य से संनिवेश किया जाता है तो दोनों की एक अनिर्वचनीय छाया उत्पन्न हो जाती है । आशय यह है कि दोनों वृत्तियाँ नाट्य और काव्य दोनों में समान रूप से उपयोगिनी होती हैं, ऐसा नहीं है कि कोई एक प्रकार की वत्ति नाट्य के लिये ही उपयोगी हो और दूसरे प्रकार की काव्य के लिये ही । दोनों प्रकार की वृत्तियों का जीवन रस ही है । इतिवृत्त तो केवल शरीर-स्थानीय ही होते हैं । मुनि ने लिखा है कि वृत्तियों की माता काव्य ( कविता ) ही है । मुनि ने यह भी कहा है कि इतिवृत्त नाट्य का शरीर होता है और ऐसे इतिवृत्त का आश्रय लेने का उपदेश दिया है जो रस के लिये उपयुक्त हो । नाट्य या अभिनय वस्तुतः रस ही होता है यह पहले समझाया जा चुका है । इस प्रकार भरत मुनि का मन्तव्य स्पष्ट हो जाता है कि इतिवृत्त काव्य का शरीर होता है, रस
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गुणगुण्यवहार इति । अत्यन्तसम्मिमश्रतया प्रतिभासनादूर्धमिद्धयुक्तः । न त्विति । कमसंवेदनादिति भावः । प्रथमेति । 'शब्दार्थशासनमात्रेणैव न वेद्यते' इत्यादिना प्रतिपादितमदः ।
'गुण-गुणी व्यवहार' यह । अत्यन्त सम्मिमश्रित रूप में प्रतिबिम्बित कारण धर्म-धर्मी व्यवहार उचित है । 'नतु' यह । भाव यह है कि क्रम वेदन के कारण । 'प्रथम' यह । 'शब्दार्थ-शासनज्ञानमात्रेणैव न वेद्यते' इसका प्रतिपादन कर दिया गया ।
तारावती उसका जीवन है और वृत्तियों को आश्रय देनेवाला काव्य ही होता है । भरत मुनि ने कहाँ है वह भामह के इस कथन से भी सिद्ध होती है— 'जिस प्रकार पहले शब्द को छाटकर कड़वी औषधि पी लो जाती प्रकार स्वादिष्ट काव्यरस से मधुरभाँति मिले हुये वाक्यार्थ का उपभोग करते इसे भी यहीं सिद्ध होता है कि भामह शब्दवृत्तिरूप व्यवहार का रस के उपयोग को ही मानते हैं । इस प्रकार नाट्यशास्त्र और काव्यशास्त्र से सिद्ध हो जाता है कि रस जीवन है और इतिवृत्त शरीर । यहाँ पर एक यह विवाद उठ खड़ा हुशा है कि इतिवृत्त और रस सम्बन्ध है । दो प्रकार के सम्बन्ध सम्भव हैं ( १ ) गुण और गुणी का अथवा धर्म और धर्मी का सम्बन्ध, तथा ( २ ) जीव और शरीर का स आलोककार ने जीव और शरीर का सम्बन्ध माना है । इसपर पूर्वपक्षी क है कि काव्य के इतिवृत्त और रस में शरीर और जीव का सम्बन्ध मानना नहीं । क्योंकि शरीर पहले होता है और जीव का प्रवेश उसमें बाद में हो इसके अतिरिक्त एक समय ऐसा भी होता है जब शरीर तो होता है कि नहीं होता । इस प्रकार जीव से पृथक् शरीर रह सकता है और उसमें होता है कि पहले शरीर और बाद में जीव । किन्तु रस के प्रसङ्ग में ई होता । न उसमें पौर्वापर्य क्रम होता है और न पृथग्भाव । काव्य में प्रतीत सर्वदा रसादिमय ही होती है । रसादि से व्यतिरिक्त वाच्य क कभी नहीं होती । अतः जीव और शरीर का व्यवहार ठीक नहीं । सम्बन्ध को लीजिये—रस गुण अथवा धर्म है और इतिवृत्त गुणी अथवा है । यही सम्बन्ध ठीक जँचता है । गुण कभी गुणी से पृथक् नहीं रहता = कभी धर्मी से पृथक नहीं रहता । इनको प्रतीति अत्यन्त सम्मिम्लित रूप में है । यही बात रस के विषय में लागू होती है अत्यन्तसम्मिमश्रतारूप
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स्यान्नतं, रत्नानामिव जात्यत्वं प्रतिपत्तृविशेषतः संवेद्यं वाच्यानां रसादिरूपस्वमिति । नैवम् ; यतो यथा जात्यत्वेन प्रतिभासमाने रत्तने रत्नस्वरूपान्तिरिक्तत्वमेव तस्य लक्यते तथा रसादीनामपि विभावानुभावादिरूपवाच्याल्यातिरिक्तत्वमेव लक्येत । न चैवम् । न हि विभावानुभावव्यभिचारिण एव रसादितिकस्यचिदवगमः । अत एव च विभावादिप्रतीत्यविश्रान्ती रसादीनां प्रतीतिरिति तत्प्रतीत्योः कार्यकरणभावेन व्यवस्थानाॅत्मकोडवश्यभावी । स तु लाघवाश्र प्रकाइयते 'इत्यलदयक्रमैः' एवं सन्तो 'व्यझञ्च्या रसादयः' इत्युक्तम् ।
(अनु०) रत्नों के जात्यत्व के समान प्रतिपत्तृविशेष के आधार पर यद्य वाच्यों का रसादिमयत्व आपकका अभिमत हो तो ऐसा नहीं । क्योंकि जैसे जात्यत्व के रूप में प्रतिबिम्बित होनेवाले रत्न में उसका रत्नस्वरूपान्तिरिक्तत्व ही लक्षित होता है उसी प्रकार रसादिकों का भी विभावानुभावादि वाच्यान्तिरिक्तत्व ही लक्षित हो । किन्तु ऐसा होता नहीं । किसी के लिये यह अवरगम नहीं होता कि विभावानुभावव्यभिचारी ही रस होते हैं । और इसीलिए विभाव इत्यादि की प्रतीति से अविनाभाविनी रस इत्यादि की प्रतीति होती है इस प्रकार उन दोनों प्रतीतियों के कार्य-के कारण प्रकाशित नहीं होता अतः रस इत्यादि अलक्ष्यक्रम होते हुये ही व्यझञ्च्य होते हैं यह कहा गया है ।
लोचन ननु यचास्य धर्मेस्वरूपं तत्स्वरूपतिमाने सर्वस्य नियमेन भातीयथैकान्तिकमेतत् । माणिक्यधर्मो हि जात्यत्वलक्षणो विशेषो न तत्प्रतिभासेऽपि सर्वस्य नियमेन भातीय्यथा—स्वादु—स्वादिति । एवंप्रकारस्तु—नैवमिति । प्रतद्रकं सत्त्व—अत्यन्तोद्रमत्स्वभावत्वे सति तद्रूपवज्जात्यत्ववस्य, अत्यन्तलीनस्वभावत्वात् । रसादीनां चोन्मत्तास्त्येवेद्य केचिदेतत् ग्रन्थमनेऽपु: ।
ननु यस्यास्य धर्मरूपं तत्स्वरूपतिमाने सर्वस्य नियमेन भातीयथैकान्तिकमेतत् । माणिक्यधर्मो हि जात्यत्वलक्षणो विशेषो न तत्प्रतिभासेऽपि सर्वस्य नियमेन भातीय्यथा—स्वादु—स्वादिति । एवंप्रकारस्तु—नैवमिति । प्रतद्रकं सत्त्व—अत्यन्तोद्रमत्स्वभावत्वे सति तद्रूपवज्जात्यत्ववस्य, अत्यन्तलीनस्वभावत्वात् । रसादीनां चोन्मत्तास्त्येवेद्य केचिदेतत् ग्रन्थमनेऽपु: ।
निस्सन्देह जो जिसका धर्मरूप होता है वह उसके प्रतिभान में सभी के लिये नियमतः प्रतीत ही होता है यह अनैकान्तिक है । जात्यत्वलक्षण माणिक्य धर्म-विशेष उसके प्रतिभास में भी सभी के लिये नियमतः प्रतीत नहीं होता—'स्यात् मतम्' इत्यादि । इसका परिहार करते हैं—ऐसा नहीं यह । यहाँ यह कहा गया है—हमने 'अत्यन्त उन्मत्त स्वभाववाला होते हुये उसका धर्म होने के कारण यह विशेषण किया है । और उन्मत्तरूपता तो अत्यन्त लीन स्वभाव-वाला होने से रूप के समान जात्यत्व की नहीं होती । और रस इत्यादिकों की उन्मत्तता हो—कुछ लोगों ने इस ग्रन्थ को इस प्रकार लगाया है ।
निस्सन्देह जो जिसका धर्मरूप होता है वह उसके प्रतिभान में सभी के लिये नियमतः प्रतीत ही होता है यह अनैकान्तिक है । जात्यत्वलक्षण माणिक्य धर्म-विशेष उसके प्रतिभास में भी सभी के लिये नियमतः प्रतीत नहीं होता—'स्यात् मतम्' इत्यादि । इसका परिहार करते हैं—ऐसा नहीं यह । यहाँ यह कहा गया है—हमने 'अत्यन्त उन्मत्त स्वभाववाला होते हुये उसका धर्म होने के कारण यह विशेषण किया है । और उन्मत्तरूपता तो अत्यन्त लीन स्वभाव-वाला होने से रूप के समान जात्यत्व की नहीं होती । और रस इत्यादिकों की उन्मत्तता हो—कुछ लोगों ने इस ग्रन्थ को इस प्रकार लगाया है ।
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अनदर विद्वमान है जिससे ये गुण और गुणी अथवा सम्बन्ध और सम्बन्धी कहलाने के अधिकारी हो जाते हैं। (सिद्धान्ती) इस पर मेरा निवेदन यह है कि यदि आप इत्यादि को गुणी मानते हैं और रस को गुण मानते हैं, क्योंकि वाच्य सर्वदा 'सादृश्य ही होता है, तो जिस प्रकार शरीर के प्रतिबिम्बित होनेपर नियमपूर्वक ऐश्वर्य इत्यादि गुणों की प्रतीति अवश्य होती है उसी प्रकार वाच्य के प्रतिबिम्बित होने के साथ ही रस भी अवश्य हो प्रतिबिम्बासित होना चाहिये । उसमें यह नियम नहीं होना चाहिये कि रस की प्रतीति केवल सहृदयों को ही होती है असहृदयों को नहीं होती । गुण और गुणी की प्रतीति सभी व्यक्तियों को चाहे वे सहृदय हों चाहे असहृदय, एक जैसी होती है। किन्तु रस और इत्यादि की प्रतीति सभी को एक जैसी नहीं होती । इस बात का प्रतिपादन प्रथम उद्योत में किया जा चुका है—उस रसादिरूप व्यङ्गच्यार्थ को जानने केवल शब्दानुशासन और अर्थानुशासन के ज्ञान से ही नहीं होता उसका परिज्ञान तो काव्यार्थतत्ववेतत्ता ही कर सकते हैं ।
(प्रश्न) गुणी के साथ गुण का अथवा धर्मों के साथ धर्म का अवश्य ही भाव होता है इस हेतु में अनैकान्तिक सद्यमिचार हेत्वाभास है। गुण दो प्रकार के होते हैं—एक तो वे गुण होते हैं जिनका भाव गुणी के साथ अवश्य होता है जैसे तौरवर्ण का भान शरीर के साथ अवश्य होता है । दूसरे वे गुण होते हैं जिनका भान गुणी के साथ अनिवार्य रूप से अवश्य ही नहीं होता । जैसे माणिक्य का एक विशेष प्रकार का धर्म होता है जात्यत्व । इस धर्म के होने पर माणिक्य में उत्कृष्टता आ जाती है। माणिक्य के प्रतिबिम्ब होने पर उसके देखनेवाले सभी व्यक्ति उस जात्यत्व धर्म को नहीं जान पाते । उस धर्म को विशेष प्रकार के देखनेवाले ही जान पाते हैं। इसी प्रकार वाच्य के धर्म रस इत्यादि की प्रतीति सभी वाच्यार्थ-भेद व्यक्तियों को नहीं होती । उसे विशेष प्रकार के प्रतिपत्ता (सहृदय) व्यक्ति ही जान पाते हैं। इस प्रकार इनका धर्मों और धर्म का सम्बन्ध ही ठीक है । शरीर और जीव का सम्बन्ध ठीक नहीं । (उत्तर) किसी भी तत्व के गुण दो प्रकार के
होते हैं एक तो उन्मग्न स्वभाववाले और दूसरे निमग्न स्वभाववाले । उन्मग्न स्वभाववाले गुण केवल उसी द्रव्य में नहीं रहते जिसमें वे रहते हैं। जैसे गौरत्व इत्यादि ऐसे गुण हैं जो पुरुष में भी रहते हैं और अन्यत्र भी। अतः ये उन्मग्न स्वभाववाले गुण कहे जा सकते हैं। उसके प्रतिकल जात्यत्व ऐसा गुण है जो रत्न को छोड़कर अन्यत्र नहीं रहता, अतः यह निमग्नस्वभाववाला गुण है। जब हम यह कहते हैं कि गुणी के प्रतीत होने पर गुण की प्रतीति अवश्य होती है तब हमारा अभिप्राय यह होता है कि उन्मग्न
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अस्मद्गुरवस्वाहुः—अत्रोच्यत इत्यनेनैदमुख्यते—यदि रसादयो वाच्यानां धर्मास्तथा सति द्वौ पक्षौ रूपादिसदृशा वा स्युर्माणिक्यगतजात्यत्वसदृशा वा। न तावत्प्रथमः पक्षः, सत्त्वं हि प्रतिपत्तितथानुभावसामग्री। नापि द्वितीयः, जात्यत्ववदनतिरिक्त-त्वेनाप्रकाशनात्। एष च हेतुराधेःडपि पच्ये सङ्चिच्छत एव। तद्वाह—स्थानमतमित्यादिना न चैर्वामित्यनेन। एतदेव समर्थयति—न हीति। अत एव नेति। यतो न वाच्यधर्म-त्वेन रसादीनाں प्रतीति:, यतश्च तत्प्रतीतौ वाच्यप्रतीति: सर्वथानुपयोगिनी तत एव हेतो: क्रमेणावश्यं भाव्यं सहभूतयोरुपकारायोगात्। स तु सहृदयभावनाभ्याससाच्च लक्ष्यते अन्यथा तु लक्ष्येलापि शुक्तं माक्। यस्यापि प्रतीतिविशेषात्मकै रस इत्युक्तिः प्राक्तस्यापि व्यपदेशिवस्वाद्रसादीनाں प्रतीतिरित्येवमन्यत्र।
हमारे गुरु लोग तो कहते हैं—‘अत्रोच्यते’ इस प्रकरण के द्वारा यह कहा जा रहा है—यदि रस इत्यादि वाच्यों के धर्म हो तो ऐसे दो पक्ष हैं या तो रूप इत्यादि के सदृश हो या माणिक्यगत जात्यत्व के सदृश हों। प्रथम तो पक्ष नहीं हो सकता क्योंकि सबके प्रति वैसा अवभास नहीं होता। द्वितीय भी नहीं क्योंकि जात्यत्व के समान अनतिरिक्त रूप में प्रकाशन नहीं होता। और यह हेतु प्रथम पक्ष में भी सङ्कुचित हो जाता है। इसी का समर्थन करते हैं—‘नहि’ इत्यादि । ‘और इसीलिये’ यह । क्योंकि वाच्यधर्मत्व के रूप में रस इत्यादि की प्रतीति नहीं होती और क्योंकि उसकी प्रतीति में वाच्यप्रतीति सर्वथा अनुपयोगिनी नहीं होती इसी हेतु से क्रम अवश्य होना चाहिये, क्योंकि साथ में होनेवालों का उपकार का योग होता ही नहीं। वह सहृदयभावना के अभ्यास के कारण लक्ष्यित नहीं होती अन्यथा लक्षित भी हो यह पहले कहा गया है। जिसकी पहले को यह उक्ति है कि प्रतीतिविशेषात्मक ही रस होता है उसके भी मत में व्यपदेशिवद्वाव से (भेदारोप) से रस इत्यादि की प्रतीति कही जाती है। ऐसा ही अन्यत्र भी (समझना चाहिये)।
तारावती स्वभाववाले गुण द्रव्य के साथ अवश्य प्रतीत होते हैं। गौरत्व उन्मग्न स्वभाववाला होता है, अतः द्रव्य के साथ उसकी प्रतीति निश्चित ही है। जात्यत्व अत्यन्त लीन स्वभाववाला होता है जो रत्न से भिन्न अन्यत्र रहती ही नहीं। अतः रत्न की प्रतीति के साथ जात्यत्व की प्रतीति अपरिहार्य नहीं है। अतएव गौरत्व और जात्यत्व दोनों धर्मों में भेद हो गया। रस गौरस्व के समान उन्मग्नस्वभाववाला ही है। यदि रस जात्यत्व के समान इतिवृत्त का स्वरूपानतिरिक्त धर्म होता तो वह भी विभाव अनुभाव इत्यादि वाच्य से अत्यतिरिक्त ही प्रतीत होता। किन्तु ऐसा
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तारावती
होता नहीं है । विभावादि वाच्य से सर्वथा भिन्न ही प्रतीत होते हैं । अतएव यदि रस और इतिवृत्त का धर्म-धर्मी भाव सम्बन्ध माना जायगा तो उसमें यह बात सिद्ध न हो सकेगी कि रसानुभूति केवल सहृदयों को ही होती है । अतः मानना पड़ेगा कि वाच्यार्थ सदा रसादिमय हो होता है, यह सिद्धान्त ठीक नहीं है एवं इनके सम्बन्ध को जीव और शरीर का सम्बन्ध मानना ही ठीक है । यह कुछ लोगों के मत में इस ग्रन्थ की व्याख्या ।
'इसपर मेरा निवेदन है••मानना ठीक है' इस सन्दर्भ की व्याख्या आचार्य अभिनवगुप्त के गुरुओं ने इस प्रकार की है—'यदि रस इत्यादि वाच्य के धर्म माना जायेंगे तो वे या तो रूप इत्यादि के समान होंगे या माणिक्य के जात्यत्व गुण समान । रूप इत्यादि के समान हो ही नहीं सकते क्योंकि ऐसी दशा में उससे प्रतीति सबको होने लगेगी । माणिक्यगत जात्यत्व के समान भी नहीं हो सकते क्योंकि उनका प्रकाशन जात्यत्व के समान अनतिरिक्त या आभासरूप में नही होता । अनतिरिक्त रूप में प्रकाशित न होना एक ऐसा हेतु है जो रस को दोनों प्रकार के धर्मों से पृथक् सिद्ध कर देता है । जिस प्रकार जात्यत्व माणिक्य से भी नहीं रहता उसी प्रकार गौरत्व भी स्वाश्रय द्रव्य से पृथक् नहीं रहता । किन्तु रस इत्यादि का विभावानुभाव इत्यादि से वही अविच्छेद्य सम्बन्ध नहीं है । एवं प्रकार रस का इतिवृत्त से गुण-गुणी भाव या धर्म-धर्मी भाव सम्बन्ध सम्भव नहीं है अतएव इनका जीव और शरीर का सम्बन्ध मानना ही ठीक है ।
उपर जो जीव-शरीर व्यवहार स्वीकार किया गया है इसमें सबसे बड़ी अनुचित यह है कि शरीर कभी जीव से पृथग्भूत भी रहता है । शरीर पहले होता है और जीव बाद में उसमें प्रवेश करता है । यह पौर्वापर्य क्रम रस और इतिवृत्त में नहीं होता । रस और इतिवृत्त का प्रतिभास सर्वदा समकाल ही होता है । अतः इनका जीव-शरीर ब्यवहार ठीक नहीं है । इसका उत्तर यह है कि ऊपर सिद्ध किया जा चुका है कि विभाव इत्यादि का इत्यादि से अविच्छेद्य सम्बन्ध नहीं है । यह कोई नहीं समझता कि विभावानुभाव और व्यभिचारी भाव ही रस होते हैं । किन्तु रस इत्यादि प्रतीति विभाव इत्यादि की प्रतीति के बिना हो भी नहीं सकती । अतएव उनमें गुण-गुणीभाव अथवा धर्म-धर्मीभाव न मानकर कार्य-कारणभाव सम्बन्ध ही मानेंगे । कार्य-कारण भाव में क्रम मानना अनिवार्य है । अतः रस और इतिवृत्त में भी क्रम मानना ही पड़ेगा । सारांश यह है कि क्रम मानने में दो वारण हैं—एक तो रस इत्यादि की प्रतीति वाच्यधर्मत्व के रूप
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नतु शब्द एव प्रकारणाद्यवच्छिन्नो वाच्यव्यङ्ग्य-व्यो: सममेव प्रतीतिमुपजनयतीति । किं तत्र क्रमकल्पनया । न हि शब्दस्य वाच्यप्रतीतिपरामर्श एव व्यङ्ग्यकत्वे निवन्धनम् । तथा हि गीतादिशब्देभ्योडपि रसादिभिव्यङ्यतिरस्ति । न च तेषामत्तरा वाच्यपरामर्शः ।
( अनु० ) ( प्रश्न ) शब्द ही प्रकारण इत्यादि से संयुक्त होकर वाच्य और व्यङ्ग्य की एक साथ ही प्रतीति उत्पन्न कर देता है क्रमकल्पना की क्या आवश्यक्ता ? शब्द की वाच्यप्रतीति का परामर्श ही व्यङ्ग्यकत्व में निवन्धन नहीं है । इस प्रकार—गीत इत्यादि शब्दों से भी रस की अभिव्यक्ति होती है । उनमें बीच में वाच्य का परामर्श नहीं होता ।
तारावती
होती है और दूसरे रस इत्यादि की प्रतीति में वाच्य की प्रतीति का सर्वथा अनुपयोग नहीं होता । अतः क्रम मानना ही पड़ेगा क्योंकि जो तत्व एक साथ होते हैं उनमें न तो कार्यकारण भाव होता है और न उपकार्योपकारक भाव । यदि हम वाच्य और व्यङ्ग्य का उपकार्योपकारक भाव मानेंगे तो पौर्वापर्य क्रम मानने के लिये वाध्य हो जायेंगे ।
यह दूसरी बात है कि जिन लोगों ने सहृदय-भावना का अभ्यास किया है उनके उस अभ्यास के कारण वाच्य के वाद व्यङ्ग्य की इतनी शीघ्रता से प्रतीति होती है कि वे जान ही नहीं पाते कि उन दोनों तत्वों में कोई पौर्वापर्य क्रम है । उन्हें तो वाच्य और व्यङ्ग्य दोनों एक साथ होते हुये दिखाई देते हैं ।
जिन्होंने सहृदयता की भावना का अभ्यास नहीं किया है यदि वे सरस काव्य पढ़ें तो उन्हें पहले वाच्य की और फिर व्यङ्ग्य की प्रतीति हो भी सकती है । ( कभों कभों तो ऐसे व्यक्ति केवल वाच्यार्थ समझ पाते हैं और रसानुभूति के लिये उनका ध्यान आकर्षित करने की आवश्यक्ता पड़ जाती है । )
इन सब बातों की व्याख्या प्रथम तथा द्वितीय उद्योत में की जा चुकी है । जो लोग कहते हैं कि विशेष प्रकार की प्रतीति ही रस की आत्मा है अर्थात् वे लोग प्रतीति को ही रस कहते हैं उनके मत में 'रस की प्रतीति' यह भेदमूलक शब्द संगत नहीं होता ।
अतः उनके मत में व्यपदेशिवद्भाव से 'रस की प्रतीति' यह संगत हो जाता है । एक ही वस्तु में भेद का आरोप करके सम्बन्ध कारक का प्रयोग करना व्यपदेशिवद्भाव कहलाता है । जैसे राहु एक राक्षस के सिर को ही कहते हैं । किन्तु आरोपित भेद को लेकर 'राहु का सिर' इस शब्द का प्रयोग किया जाता है ।
इसी प्रकार रस की प्रतीति के विषय में भी समनना चाहिये ।
( प्रश्न ) यह मान भी लें कि रस इत्यादि वाच्यार्थ से व्यतिरिक्त होते हैं, किन्तु फिर भी अपने ही कहा है कि वाच्यार्थ और रसादि की प्रतीति में क्रम
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ननु भवन्तु वाच्यादतिरिक्ता रसादयस्तत्रापि क्रमो न लक्ष्यत इति तावच्चव्यैववक्तव्यम् । तत्कल्पने च प्रमाणं नास्ति । अन्वयव्यतिरेकाभ्यामर्थप्रतीतौ तावन्मन्तरेण रसप्रतीत्युदयस्तस्य पदाविरहितस्वरालापगीतादौ शब्दमात्रोपयोगकृतस्य दर्शनेनैव तत्सचैक्येन सामग्र्यै सहैव वाच्यं व्यङ्ग्याभिमतम् च रसादौ भान्तौ विचित्रनव्यपेक्षनचापारद्रयेन न किञ्चिदिति तदाह—नन्विति । यत्रापि गीतशब्दनानामर्थोऽस्ति तत्रापि तत्स्मृतौ तद्रूपयोगिनी ग्रामरागाद्युसारणाप्रहसिततथाच्यानुसारतया रसोदयदर्शनेनैव । न चापि स सर्वत्र भवन्तो दर्शयते, तदेतदाह—न चेति । तेषामिति गीतादिशब्दानाम् । आदिशब्देन वाच्यविलपितशब्दद्वयो निर्दिष्टः ।
प्रश्न - वाच्य से अतिरिक्त रस इत्यादि दो, वहाँ पर भी क्रम लक्षित नहीं होता यह तो कम से कम कहना ही पड़ेगा । और उसकी कल्पना में प्रमाण ( भी ) नहीं है । क्योंकि अन्वय-व्यतिरेक से अर्थप्रतीति के बिना ही पद से रहित स्वर आलाप गीत इत्यादि में शब्द-मात्र से उपकृत रस इत्यादि की प्रतीति देखी जाती है । इससे एक ही सामग्री से साथ ही व्यङ्ग्याभिमत वाच्य रसादि शोभित होते हैं; अतः वचन और व्यञ्जन इन दोनों व्यापारों से कोई प्रयोजन नहीं । वही कहते हैं—‘ननु’ इत्यादि । जहाँ पर भी गीत-शब्दों का अर्थ होता है वहाँ पर भी उनकी प्रतीति अनुयोगिनी होती है क्योंकि ग्रामराग के अनुसरण से वाच्यार्थ प्रतीति का तिरस्कार करके रसोदय देखा जाता है । वह ( वाच्य प्रतीति ) सर्वत्र होती हुई देखी भी नहीं जाती । यह वही कहते हैं—‘और नहीं’ । उनका अर्थात् गीत इत्यादि शब्दों का । आदि शब्द से वाच्य विलसित इत्यादि शब्द निर्दिष्ट किये गये हैं ।
तारावती - ऐमी दशा में क्रम की कल्पना करने में ही कया प्रमाण है? यदि अन्वय-व्यतिरेक के आधार पर परीक्षा की जाय तो सिद्ध होगा कि रस में क्रम का मानना आवश्यक नहीं है । अन्वय इस प्रकार होगा—‘रस इत्यादि के होने पर क्रम अवश्य होता है’ और व्यतिरेक इस प्रकार होगा—‘क्रम के न होने पर रस इत्यादि नहीं होते ।’ कभी कभी देखा जाता है जहाँ पर अर्थ की प्रतीति नहीं भी होती अथवा जहाँ पद भी नहीं होते वहाँ पर केवल स्वरालाप और गीत इत्यादि के द्वारा केवल शब्द के ही उपयोग से रस की प्रतीति हो जाती है । इस प्रकार जहाँ वाच्यार्थ विल्कुल नहीं होता वहाँ भी रसानुभूति देखी जाती है । इस प्रकार एक ही सामग्री से एक साथ वाच्यार्थ तथा व्यङ्ग्यार्थ के लिये अभिमत रस इत्यादि प्रतीत हो जाते हैं । फिर अभिधा और व्यञ्जना इन दो व्यापारों की पृथक् सत्ता मानने की भी क्या आवश्यकता? जिस सामग्री से वाच्यार्थ और
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अत्रापि ब्रमः—प्रकरणाद्यवच्छेदेन व्यङ्ग्यकत्वं शब्दानामित्यनुमतस्सेवैतदस्मि-कम् । किन्तु तद् व्यङ्गकत्वं तेषां कदाचित्स्वरूपविशेषणिवन्धनं कदाचिद्वाचक-शक्तिनिवन्धनम् । तत् येषां वाचकशक्तिनिवन्धनं तेषां यदि वाच्यप्रतीतिमन्त-रेणैव स्वरूपप्रतीत्या निष्पन्नं तद्वेव तर्हि वाचकशक्तिनिवन्धनम् । अथ तन्नि-वन्धनं तत्रियमेव वाच्यवाचकभावप्रतीत्युत्तरकालत्वं व्यङ्ग्यप्रतीतेः प्राप्तप्रायेव ।
हम यहाँ पर भी कहते हैं—यह तो हमारा अनुमत ही है कि प्रकरण इत्यादि की विशेषता के साथ शब्दों का व्यङ्गकत्व होता है । किन्तु वह उनका व्यङ्गकत्व कदाचित् स्वरूप विशेष के आधार पर होता है कदाचित् वाचक शक्ति के आधार पर । उसमें जिनका वाचक शक्ति के आधार पर होता है उनकी वह बात यदि वाच्यप्रतीति के बिना ही स्वरूपप्रतीति से ही हो हो जाय तो वह वाचक-शक्ति के आधार पर नहीं होती । यदि वाचकशक्तिनिवन्धन होता है तो नियम से ही व्यङ्ग्यप्रतीति की उत्तरकालता वाच्यप्रतीति की अपेक्षा प्राप्त हो जाती है ।
अनुमतमिति । ‘चत्रार्थः शब्दो वा’ इति ह्यवोचामेवेति भावः । न तर्हीति । तत्क्षो गीतवदेवार्थावगमं विनैव रसावभासः स्यात्काऽऽद्यशब्देभ्यः । न चैवमिति वाचक-शक्तिरपि तत्रापेक्षणीया । सा वाच्यनिष्ठैवैति प्राप्त्याच्ये प्रतिपत्तिरित्यभ्युपगन्तव्यम् । तदाह—अथैति । तदिति वाचकशक्तिः । वाच्यवाचक भावोति । सैव वाचकशक्तिरित्युच्यते ।
‘ अनुमत ही है’ यह । भाव यह है कि हमने यह कहा ही है—‘जहाँ अर्थ अथवा शब्द’ इत्यादि । ‘तो नहीं….’ इत्यादि । तो गीत के समान ही अर्थावगत के बिना ही रस का अवभास हो जाय । ऐसा होता नहीं अतः वाचक शक्ति भी उसमें अपेक्षणीय होती है और वह वाच्यनिष्ठा ही होती है । अतः पहले वाच्य में प्रतिपत्ति होती है यह समझना चहिये वह कहते हैं—‘यदि’ यह । वह अर्थात् वाचक शक्ति । ‘वाच्य-वाचक भाव’ यह । वही वाचक शक्ति होती हे यह कहा जाता है ।
व्यङ्ग्य्यार्थ दोनों की प्रतीति होती है वह है प्रकरणादि से अवच्छिन्न शब्द ।यह आप कह ही नहीं सकते कि वाच्यप्रतीति का परामर्श हो व्यङ्ग्य में निमित्त होता है । यह अभी सिद्ध किया जा चुका है कि गीत, वाध्य, विलाप इत्यादि शब्दों से भी रसाभिव्यक्ति देखी जाती है जिनमें वाच्यार्थ बिल्कुल नहीं होता । इसके अतिरिक्त जहाँ पर गीत इत्यादि के शब्दों का अर्थ भी हो वहां पर भी उन अर्थों की
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स तु क्रमो यदि लाघवात् लक्ष्यते तावत्क्रियते । यदि च वाच्यप्रतीतिमन्तरेणैव प्रकरणाद्यवच्छिन्नशब्दमात्रसाध्यया रसादिप्रतीतिः स्वात्तदनवधारितः प्रकारप्रकार्यवाचकभावे च स्वयमभ्युत्पन्नानां प्रतिपत्तॄणां काव्यमात्रश्रवणादेवासौ भवति । सहभावे च वाच्यप्रतीतोत्तरनुपयोगः, उपयोगे वा न सहभावः । येषामपि स्वरूपविच्छेदप्रतीविनिबन्धनं व्यङ्ग्यक्त्वं यथा गीतादिशब्दानां तेषामपि स्वरूपप्रतीतेर्व्यङ्ग्यथप्रतीतेर्हि नियमभवावी क्रमः । तत्तु शब्दस्य क्रियापौर्वापर्यमननन्यसाध्यतत्फलघटनास्वाशुभावनिष्पु वाच्येनाविरोधिन्यमिधेयान्तरविलक्षणे रसादौ न प्रतीयते ।
( अनु० ) यदि वह क्रम लाघव के कारण लक्षित न हो तो क्या किया जाय । और यदि वाच्यप्रतीति के बिना ही प्रकरण इत्यादि से अवच्छिन्न शब्दमात्र से ही रस इत्यादि की प्रतीति साध्य हो तो प्रकरण इत्यादि का अवधारण न करनेवाले और स्वयं वाचकभाव में अभ्युत्पन्न प्रतिपत्ताओं के वह ( रसादिप्रतीति ) काव्यश्रवणमात्र से ही हो जाय । और सहभाव में वाच्यप्रतीति का उपयोग नहीं होता और उपयोग होने पर सहभाव नहीं होता । जिनका स्वरूपविच्छेदप्रतीविनिबन्धनं व्यङ्ग्यक्त्वं यथा गीतादिशब्दानां तेषामपि स्वरूपप्रतीतेर्व्यङ्ग्यथप्रतीतेर्हि नियमभवावी क्रमः । वह शब्द का क्रिया-पौर्वापर्य दूसरे को सिद्ध न करनेवाली, शीघ्र ही भावित करनेवाली, उसके फलवाली संघटनाओं में वाच्य के अविरोधी तथा दूसरे अभिधेयों से विलक्षण रसादि में प्रतीत नहीं होता ।
तारावती
प्रतीति का कोई उपयोग नहीं होता क्योंकि ग्रमाराग के अनुसार वहाँ पर वाच्यार्थ के अपहरण का अनुसरण करते हुये रसाभिव्यक्ति देखी जाती है । सारांश यह है कि व्यङ्ग्यार्थप्रतीति में वाच्यार्थप्रतीति सर्वदा अनिवार्यं नह्ही होती । अतः क्रमकल्पना में कोई प्रमाण नहीं ( उत्तर ) इस विषय में हमारा कहना यह है कि यह तो हम मानते ही हैं कि प्रकरण इत्यादि से अवच्छिन्न होकर शब्द व्यङ्ग्य होते हैं । यह तो हमने प्रथम उद्योत की १३ वीं कारिक ( 'यत्रार्थः शब्दों वा—' ) में दिखला ही दिया है । किन्तु शब्दों का व्यङ्गयक्त्व दो प्रकार का होता है—कभी-कभी तो स्वरूपविच्छेद-निबन्धन होता है औ कभी वाचकशक्ति-निबन्धन । गीत इत्यादि में स्वरूप-निबन्धन रसनिष्ठपत्ति होता है और काव्य में वाचकशक्तिनिबन्धन । यदि काव्य में भी अर्थबोध के अभाव में ही गीत इत्यादि के समान रसनिष्पत्ति मान ली जाय तो वहाँ भी प्रथम प्रकार की अर्थात् स्वरूपनिबन्धन रसनिष्पत्ति ही मानों जायेगी । किन्तु ऐसा होता नह
प्रतीति का कोई उपयोग नहीं होता क्योंकि ग्रमाराग के अनुसार वहाँ पर वाच्यार्थ के अपहरण का अनुसरण करते हुये रसाभिव्यक्ति देखी जाती है । सारांश यह है कि व्यङ्ग्यार्थप्रतीति में वाच्यार्थप्रतीति सर्वदा अनिवार्यं नह्ही होती । अतः क्रमकल्पना में कोई प्रमाण नहीं ( उत्तर ) इस विषय में हमारा कहना यह है कि यह तो हम मानते ही हैं कि प्रकरण इत्यादि से अवच्छिन्न होकर शब्द व्यङ्ग्य होते हैं । यह तो हमने प्रथम उद्योत की १३ वीं कारिक ( 'यत्रार्थः शब्दों वा—' ) में दिखला ही दिया है । किन्तु शब्दों का व्यङ्गयक्त्व दो प्रकार का होता है—कभी-कभी तो स्वरूपविच्छेद-निबन्धन होता है औ कभी वाचकशक्ति-निबन्धन । गीत इत्यादि में स्वरूप-निबन्धन रसनिष्ठपत्ति होता है और काव्य में वाचकशक्तिनिबन्धन । यदि काव्य में भी अर्थबोध के अभाव में ही गीत इत्यादि के समान रसनिष्पत्ति मान ली जाय तो वहाँ भी प्रथम प्रकार की अर्थात् स्वरूपनिबन्धन रसनिष्पत्ति ही मानों जायेगी । किन्तु ऐसा होता नह
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प्तदुक्तं भवति—मा भूदाच्चर्य रसादिव्यञ्जकं, असतु शब्दादेव तत्रतद्वस्तथापि तेन स्ववाचकशक्तिस्थस्यां कर्तव्यायां सहकारितयावश्यकपेक्षणीयेल्यायातं वाच्यप्रतीते: पूर्वभावित्वमिति ।
तब कहा गया है—चमत्कार का कारण रसादि का व्यञ्जक न हो, असतु शब्द से ही उस ( रसादि ) की प्रतीति हो; तथापि उस ( शब्द ) के द्वारा उस ( रसप्रतीति ) के किये जाने योग्य होने पर अपनी वाचक शक्ति सहकारिता के रूप में अपेक्षित की जाती है । अतः वाच्यप्रतीति का पूर्वभावित्व आया ।
ननु गीतशब्दवदेव वाचकशक्तित्राप्यनुपयोगिनी । यत्तु क्वचिच्छुतेऽपि काव्ये-रसप्रतीतिनं सर्वत्र तत्रोच्यते: प्रकरणादगमादि: सहकारी नास्तीत्याशङ्क्याह—यदि वह कहा गया है—वाच्य रसादिव्यञ्जक न हो, शब्द से ही उसकी प्रतीति हो; तथापि उस ( शब्द ) के द्वारा उस ( रसप्रतीति ) के किये जाने योग्य होने पर अपनी वाचक शक्ति सहकारिता के रूप में अपेक्षित की जाती है । अतः वाच्यप्रतीति का पूर्वभावित्व आया । निस्संदेह गीत शब्द के समान ही वाचक शक्ति यहाँ पर भी अनुरयोगिनी है, और जो कि कहीं सुने हुये काव्य में भी रसप्रतीति नहीं होती है वहाँ उच्चत प्रकरणादगम इत्यादि सहकारी नहीं हैं? यह आशङ्का करके कहते हैं—‘प्तद् न’ है । वाचकशक्तिनिवन्धन व्यङ्ग्यार्थबोध के लिये वाचकशक्ति वाच्यार्थ में हो रहती है । अतएव पहले वाच्यार्थप्रतीति मानना ही उचित है । क्योंकि जब इतना सिद्ध हो गया कि व्यङ्ग्यार्थप्रतीति वाचकशक्ति निवन्धन होती है तब यह स्वतः सिद्ध हो जाता है कि कारणभूत वाच्यार्थ के बाद ही कार्यभूत व्यङ्ग्यार्थ की निष्पत्ति होती है । यहाँ पर आशय यह है कि यदि आप वाच्य को रसप्रतीति का अनिवार्य हेतु नहीं मानना चाहते तो न मानिये शब्द को ही रसप्रतीति का हेतु मान लीजिये । फिर भी शब्द गीत इत्यादि में तो स्वतः से ही रसाभिव्यञ्जन कर देता है किन्तु काव्य में उसे इस क्रिया में अपनी वाचक शक्ति की अपेक्षा अवश्य होती है । ऐसी दशा में भी वाच्यप्रतीति का पहले होना सिद्ध हो गया । रसादिप्रतीति के पहले वाच्यार्थप्रतीति भी होती है । यह दूसरी बात है कि हम शब्द सुनते जाते हैं उनका वाच्यार्थ समझते जाते हैं और उनसे रसास्वादन करते जाते हैं । इस समस्त क्रिया में एक पौर्वापर्य क्रम रहता है । किन्तु वह क्रम इतना सूक्ष्म होता है कि हमें मालूम पड़ने लगता है कि मानों सारी क्रियायें एक साथ हो रही हैं उनमें कोई क्रम है ही नहीं । आशय यह है कि शब्दों के सुनने के बाद ही अर्थ की प्रतीति होती है और अर्थ की प्रतीति के बाद ही रसानुभूति होती है। किन्तु वह क्रम इतना सूक्ष्म होता है कि विचारक और विवेचक तो उसे लक्षित कर पाते हैं; साधारण स्थिति में उसकी प्रतीति नहीं होती ।
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चेति । प्रकरणावगमो हि किमुच्यते ? किं वाक्यान्तरसहायत्वम् ? अथ वाक्यान्तराणां सम्वन्धित्वाच्यसम् । उभयपरिज्ञानेडपि न भवति प्रकृतवाक्यार्थावेदन रसोदयः । स्वयमिति । प्रकरणमात्रसैव परेण केनचिद् येषां व्याख्यातमितिभावः । न चान्वयव्यतिरेकवतो वाच्यप्रतीतिमपहृत्यादृष्टसदृशविमर्शो ध्वनित्वेनाश्रिता मात्सर्यादिकं किश्चित्पुष्णीत इत्यमिप्रायः ।
चेत् + इति । प्रकरणावगमः हि किम् उच्यते ? किं वाक्यान्तरसहायत्वम् ? अथ वाक्यान्तराणां सम्बन्धित्वात् च सम् । उभयपरिज्ञाने + अपि न भवति प्रकृतवाक्यार्थावेदन रसोदयः । स्वयम् + इति । प्रकरणमात्रसैव परेण केनचिद् येषां व्याख्यातम् + इति + भावः । न चान्वयव्यतिरेकवतः वाच्यप्रतीतिम् अपहृत्य अदृष्टसदृशविमर्शः ध्वनित्वेन आश्रितः मात्सर्यादिकं किञ्चित् पुष्णीत् इति + अमिप्रायः ।
इत्यादि । निस्सन्देह प्रकरणावगम कौन कहा जाता है ?' क्या-वाक्यान्तरसहायतत्व अथवा दूसरे वाक्यों का सम्वन्धी वाक्य ? दोनों के परिज्ञान में भी प्रकृत वाक्यार्थ के न समझने पर रस का उदय नहीं होता । 'स्वयम्' यह । भाव यह है कि जिनके सामने केवल प्रकरण की ही किसी दूसरे ने व्याख्या कर दी । अन्वय-व्यतिरेकसत्त् और उसका अभाव मात्सर्य से अधिक कुछ पुष्ट नहीं ही करते हैं यह अभीष्ट है ।
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साधारण व्यक्ति किसी तत्व को न समझ पायें तो उसका चारा ही क्या ? उससे किसी प्रमाणप्रतिपन्न वस्तु का अपलाप तो नहीं हो सकता ।
( प्रश्न ) जिस प्रकार गाने रोने इत्यादि के शब्दों से रसाभिव्यक्ति हो जाती है और उनमें वाचकशक्ति की अपेक्षा नहीं होती उसी प्रकार अन्यत्र भी वाचकशक्ति के उपयोग के बिना ही शब्दों से ही रसानुभूति हो सकती है उसमें वाचकशक्ति का उपयोग मानने की क्या आवश्यकता । ( उत्तर ) वाचकशक्ति के उपयोग के बिना ही यदि शब्दमात्र से ही आप रसानुभूति मानेंगे तो आप के मत में जिन्होंने वाच्यवाचकभाव की व्युत्पत्ति नहीं कर पाई है इस प्रकार के परिशीलकों को भी रसानुभूति होने लगेगी । किन्तु ऐसा होता नहीं है । रसानुभूति के केवल शब्द सुनने से ही नहीं होती अपितु अर्थ समझने से होती है । अतः वाच्यार्थ रसानुभूति का कारण अवश्य है ।
( पूर्वपक्ष ) जहाँ काव्य को सुनने पर भी रसप्रतीति नहीं होती वहाँ यही समझा जाता है कि वहाँ पर प्रकरण इत्यादि का उचित ज्ञान नहीं होता । रसप्रतीति में सहकारी अवश्य होता है । सहकारी के अभाव में रसानुभूति का न होना स्वाभाविक ही है । ( उत्तर ) प्रकरण के ज्ञान से आपका क्या अभीष्ट है ? इसके केवल दो ही अभिप्राय सम्भव हैं-जिस वाक्य से रसानुमूति हो रही है उसे सम्वन्धित दूसरे वाक्यों का ज्ञान होना प्रकरणज्ञान कहलाता है अथवा प्रकृत वाक्यार्थ से सम्बद्ध दूसरे वाक्यों का अर्थ जानना प्रकरण-
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ज्ञान कहलाता है। आप चाहे जो पक्ष मानें, चाहे आप यह स्वीकार करें कि प्रकृत वाक्य से सम्वद्ध दूसरे वाक्यों का ज्ञान होने पर प्रकरणज्ञान का होना कहा जाता है अथवा आप यह मानें कि प्रकृत वाक्य से सम्वन्धित वाक्यार्थ का ज्ञान ही प्रकरणज्ञान कहा जाता है। दोनों अवस्थाओं में प्रकरणज्ञानमात्र से तब तक रसानुभूति नहीं होती जब तक प्रकृत वाक्यार्थ का ज्ञान नहीं हो जाता।
(गीतम् में यह जान लेने मात्र से ही कि गीत शृंगारविषयक है या वीरविषयक, रसानुभूति हो जाती है। उसमें वाक्यार्थज्ञान न होने पर भी स्वर ताल और लय से ही रसानुभूति हो जाती है। किन्तु काव्य में वाक्यार्थज्ञान का होना रसानुभूति के लिये अनिवार्य है। उसमें केवल प्रकरणज्ञान से काम नहीं चलता।) जिन्होंने प्रकरणज्ञान तो कर लिया है किन्तु वाच्यचमत्कार को व्युत्पत्ति जिन्हें नहीं है उन्हें काव्य सुनकर रसानुभूति नहीं होती। अतः यह माना ही पड़ेगा कि केवल प्रकरणज्ञान रसानुभूति के लिये पर्याप्त नहीं है।
यदि कोई दूसरा व्यक्ति प्रकरणमात्र ही समझा दे और काव्य सुनाने लगे तो जो व्यक्ति उस काव्य की भाषा को नहीं समझता उसे कभी भी रसास्वादन नहीं हो सकेगा। किन्तु आपके मत में प्रकरणज्ञान होने पर वाच्यार्थप्रतीति न होने में भी रसास्वादन होना चाहिये।
[यहाँ पर आनन्दवर्धन का आशय यही प्रतीत होता है कि यदि वाच्यार्थज्ञान के अभाव में भी प्रकरणज्ञान से ही रसानुभूति मानी जायेगी तो जिनको केवल प्रकरण का ज्ञान है और वे स्वयं वाच्यार्थ को नहीं समझते उन्हें भी रसास्वादन होने लगेगा जोकि लोकसिद्ध तथ्य नहीं है।
इस आशय के अनुसार पाठ यही होना चाहिये—‘तद्वद्वारितप्रकरणानां वाच्यवाचकभावे च स्वयमवयुत्पन्नानां प्रतीततया काव्यमात्रश्रवणादेव सै भवेत्’ किन्तु इस मूल पाठ में एक ‘न’ और बढ़ गया है और ‘अवधारित’ के स्थान ‘अनवधारित’ पाठ हो गया है।
इससे अर्थ करने में भी श्रम हो गया है और प्रस्तुतोत्तर भी सङ्गत नहीं होते। किन्तु एक तो वह पाठ सभी पुस्तकों में पाया जाता है दूसरे बालप्रिया को छोड़कर सभी टीकाकारों ने यहो पाठ माना है। यहाँ तक कि अभिनवगुप्त को भी यही पाठ मिला था।
अतः ज्ञात होता है कि यह भूल या तो स्वयं अभिनवगुप्त की होगी या उनके तत्कालीन वर्त्तों किसी लेखक की। द्वोदधिकार ने इसकी योजना इस प्रकार लगाई है—‘आप प्रकरण को रसानुभूति का कारण मानते हैं। इससे आप का आशय यही सिद्ध होता है कि किसी प्रसङ्ग में प्रकरण का होना ही आपके मत में पर्याप्त है।
अथवा एक व्यक्ति ने प्रकरण को समझ भी नहीं पाया और अर्थ भी स्वयं उसकी समझ में
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नहीं आया है तो भी उसे रसानुभूति हो जानी चाहिये कयोंकि प्रकरण तो यहाँ पर विद्यमान है ही और आपके मत में प्रकरण ही कारण है प्रकरणज्ञान नहीं ।
किन्तु यह व्याख्या ठीक नहीं है इसका तो पूर्वपक्षी तक्काल यह कहकर खण्डन कर सकता है कि मैं प्रकरण को नहीं प्रकरणज्ञान को कारण मानता हूँ। अतः इसको तो सिद्धान्त का अभिमत सिद्ध नहीं होता। कि केवल प्रकरणज्ञान से नहीं अपि तु वाच्यार्थज्ञान से रसानुभूति होती है। अभिनवगुप्त ने उसकी व्याख्या इस प्रकार की है-‘जिस व्यक्ति ने स्वयं प्रकरण को भी समझ नहीं पाया और वाच्य-वाचकभाव की उत्पत्ति उसे है ही नहीं, उसे भी यदि कोई दूसरा व्यक्ति प्रकरण समझा दे तो रसानुभूति हो जानी चाहिये ।’ यह व्याख्या कुछ ठीक मालूम पड़ती है। क्योंकि ग्रन्थकार के ‘स्वयं’ शब्द को इस प्रकार की योजना सरलता से की जा सकती है और ‘स्वयं’ का यह अर्थ भी हो सकता है। इसका आशय भी यह हो सकता है कि मान लीजिये किसी ऐसी भाषा का काव्य पढ़ा जा रहा है जिसको श्रोता स्वयं नहीं समझता और उसे प्रकरण का भी ज्ञान नहीं है; उसे यदि कोई दूसरा व्यक्ति यह समझा दे कि यहाँ पर अमुक के प्रेम की चर्चा की जा रही है तो भी काव्य सुनकर उसे रसानुभूति नहीं हो सकेगी। किन्तु सबसे अच्छा तो यही है कि ‘अवधारितप्रकरणनाम्-
‘रसप्रतीति के होने में वाच्यप्रतीति होती है’। यह अन्वय और ‘वाच्यप्रतीति के अभाव में रसप्रतीति का अभाव होता है’ यह व्यतिरेक विद्यमान है। इस प्रकार अन्वय और व्यतिरेक दोनों के मिल जाने से रसप्रतीति की कार्यरूपता और वाच्यप्रतीति की कारणरूपता सिद्ध हो जाती है। फिर भी आप उसे छिपा रहे हैं और किसी अदृष्ट तत्व के अन्वय-व्यतिरेक को सिद्ध करने की चेष्टा कर रहे हैं। इससे केवल इतना ही सिद्ध होता है कि आप जो कुछ कहते हैं वह सब द्रेष्य बुद्धि तथा पक्षपात से पूर्ण है और आपका प्रतिपादन पूर्वग्रह-मस्त है। इसके अतिरिक्त और कुछ सिद्ध नहीं होता।
(सम्भवतः: अभिनवगुप्त के समसामयिक कतिपय विद्वान् किसों अदृष्ट तत्व की कल्पनाकर उसे रसास्वादन का कारण मानते होंगे और वाच्यप्रतीति की कारणता का निषेध करते होंगे। उन्हीं पर यह कटाक्ष किया गया है ।)
इस विषय में पूर्वपक्षी यह कह सकता है कि ‘हम इतना तो मान सकते हैं कि रसप्रतीति में वाच्यप्रतीति का उपयोग होता है। किन्तु हम यह नहीं मान सकते कि दोनों प्रतीतियाँ क्रमिक रूप में होती हैं और वाच्यप्रतीति पहले होती है तथा रसप्रतीति बाद में होती है।
यदि पूछा जाय कि वाच्यप्रतीति का उपयोग किस
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नन्वस्तु वाच्यप्रतीतेःपयोगः क्रमाश्रयेण किं प्रयोजनम्, सहभावसमात्रमेव ह्युपयोग एकसामध्याधीनतलक्षणमित्याशङ्क्याह—सहेति । एवं ह्युपयोग इति अनुपकारके संज्ञाकरणमात्रं वस्तुशून्यं स्यादिति भावः । उपकरणो हि पूर्वभावितेत्येव स्वव्यतिरिक्तमित्याह—यथोक्तमिति । तदुक्तमिति । तदुक्तश्लोकमन्त्रैव वाच्यप्रतीतिरूपं पूर्वभावितां समर्थयिष्याम इति भावः । ननु संशयेऽपि किं न लक्ष्यते ह्यत्याशङ्क्याह—तत्त्वत इति । क्रियापौरपौर्यमित्यनेन क्रमस्य स्वरूपमाह—क्रियेत इति । क्रिये वाच्यन्याय्यप्रतीती
लोचन
एक सामग्री के आधीन होना इस लक्षणवाला सहभावमात्र ही उपयोग हो' यह रीति करके कहते हैं—‘सहभाव में’ इत्यादि । भाव यह है कि इस प्रकार निस्संदेह अनुपकारक में उपयोग यह केवल संज्ञा करना ही वस्तुशून्य हो जायेगा । ‘उपकारी का तो प्रथम होना तुमने भी अज्ञात करलिया, यह कहते हैं—‘जिनका यह’ । भाव यह है कि उसके हट जाने से ही हम वाच्यप्रतीति की पूर्वभाविता का भी समर्थन कर देंगे । निस्संदेह होता हुआ क्रम लक्षित क्यों नहीं होता ?' यह शंका करके कहते हैं—‘वह तो’ यह । क्रियापौरपौर्यं इससे क्रम के स्वरूप को कहते हैं—‘जो दो क्रिये जाते हैं’ यह । दो क्रियाएँ अर्थात् वाच्य और न्याय की
तारावती प्रकार का होता है तो हम यही कहेंगे कि साथ-साथ उसका प्रतिभास होना ही उसका एकमात्र उपयोग है । जब हम किसी नाटक को देखते हैं या काव्य सुनते हैं तो हमें रसास्वादन तो होता ही है उसके साथ-साथ हम उस प्रकरण का वाच्यार्थ भी समझते जाते हैं, यही वाच्यप्रतीति का उपयोग है । दोनों की प्रतीति एक साथ होती है, अतः क्रम मानना ठीक नहीं ।' इसका उत्तर यह है कि यदि एक कार्य के लिये किसी वस्तु का उपयोग किया जाता है तो उपयुक्त को जाननेवाली वस्तु का पहले होना अनिवार्य होता है । ऐसा कभी नहीं होता कि उपयोग में आनेवाली वस्तु अपने द्वारा निर्मित वस्तु के साथ ही उत्पन्न हो । जब वह वस्तु पहले होगी ही नहीं तो उपकार कैसे करेगी? यदि निर्माण में उपकार नहीं करेगी तो ‘उपयोग’ इस नामकरण का क्या मन्तव्य होगा और उस शब्द के प्रयोग का लदय क्या होगा ? प्रत्येक शब्द से किसी वस्तु का बोध होता है किन्तु उपकार न करने पर उपयोग शब्द से किसी वस्तु का बोध नहीं होगा । अतएव साथ होना मानने पर वाच्यप्रतीति का उपयोगी होना सिद्ध नहीं होगा और उपयोगी होना मानने पर सहभाव सिद्ध नहीं हो सकेगा । यह तो प्रतिपक्षी भी मानता है कि उपकारक तत्व पहले होता है और उपकायं बाद में । उदाहरण के लिये गीत इत्यादि के
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यदि वामिधाव्यापारो व्यञ्जनापरपर्यायो ध्वननव्यापारश्चेति क्रिये तयोः पौर्वापर्यं न प्रतीयते । क्वेयाह—रसादौ विषये । कीदृशी ? अभिधेयान्तरात्तदभिधेयविशेषाधिलक्षणे सर्वथैवानभिधेये; अननेन भवितव्यं तावत्कमेणैतयुक्तम् । तथा वाच्येनाविरोधिनि, विरोधिनि तु लक्ष्यते एव्यर्थः। कुतो न लक्ष्यते इति निमित्तसप्तमीनिर्दिष्टं हेतुहेतुमाह—आश्रुभावविनिश्चिति । अनन्यासाध्यतत्फलघटनासु ध्वना: पूर्वं माधुर्यादिलक्षणा: प्रतिपादिता: गुणविनूपणावसरे ताश्र् तटफला: रसादिप्रतीति: फलं यासाम् । तथा अनन्यत्तदेव साध्यं यासाम् । न ध्वोज्घटना: करुणादिमतीति: साध्या ।
यदि वामिधाव्यापारो व्यञ्जनापरपर्यायो ध्वननव्यापारश्चेति क्रिये तयोः पौर्वापर्यं न प्रतीयते । क्वेयाह—रसादौ विषये । कीदृशी ? अभिधेयान्तरात्तदभिधेयविशेषाधिलक्षणे सर्वथैवानभिधेये; अननेन भवितव्यं तावत्कमेणैतयुक्तम् । तथा वाच्येनाविरोधिनि, विरोधिनि तु लक्ष्यते एव्यर्थः। कुतो न लक्ष्यते इति निमित्तसप्तमीनिर्दिष्टं हेतुहेतुमाह—आश्रुभावविनिश्चिति । अनन्यासाध्यतत्फलघटनासु ध्वना: पूर्वं माधुर्यादिलक्षणा: प्रतिपादिता: गुणविनूपणावसरे ताश्र् तटफला: रसादिप्रतीति: फलं यासाम् । तथा अनन्यत्तदेव साध्यं यासाम् । न ध्वोज्घटना: करुणादिमतीति: साध्या ।
प्रतीति अथवा अभिधाव्यापार और व्यञ्जना इस दूसरे नामवाला ध्वनननव्यापार ये दोनों क्रियायें उन दोनों का पौर्वापर्य प्रतीत नहीं होता । ‘कहाँ पर’ ? यह कहते हैं—रस इत्यादि विषय होने पर । किस प्रकार के ? अभिधेयान्तर से अर्थात् विशेष लक्षण सर्वथा अभिधान के अयोग्य--इससे क्रम तो होना ही चाहिए । उस प्रकार वाच्य के अविरोधी में ( क्रम लक्षित नहीं होता ) अर्थात् विरोधी में तो लक्षित होता ही है । क्यों नहीं लक्षित होता ? इसके लिये निमित्त सप्तमी के द्वारा निर्दिष्ट एक ऐसा हेतु बतला रहे हैं जिसमें दूसरा हेतु गर्भित है—‘आश्रुभावविनीचु’ यह । ‘अनन्यासाध्य तत्फल घटनाओं में’ अर्थात् माधुर्य इत्यादि लक्षणवाली घटनायें पहले ही गुण-निरूपण के अवसर पर प्रतिपादित कर दी गई ! वे उस फलवाली होती हैं अर्थात् जिनका रसादि की प्रतीति ही फल होता है इस प्रकार की होती हैं—तथा अनन्यासाध्य अर्थात् वही है साध्य जिनका इस प्रकार की होती हैं । ओजोघटना की साध्य करुणादि की प्रतीति नहीं होती ।
तारावती शब्द अपने स्वरूप से ही व्यञ्जक होते हैं; उनके अर्थ रस इत्यादि के व्यञ्जक नहीं होते । प्रतिपक्षी भी यह स्वीकार करता है कि रसानुभूति में निमित्त गीत इत्यादि के शब्दों की स्वरूपप्रतीति पहले होती है और रसप्रतीति बाद में । हम भी उसी दृष्टान्त के आधार पर कह सकते हैं कि जहाँ काव्य में वाच्यप्रतीति के आधार पर रसाभिव्यक्ति होती है वहाँ पर वाच्यप्रतीति पहले होती है; क्योंकि वह निमित्त है और व्यङ्ग्य रसानुभूति बाद में होती है; क्योंकि वह नैमित्तिक है । उपर यह सिद्ध किया जा चुका है कि काव्य में रसानुभूति में वाच्यप्रतीति निमित्त होती है तथा यह भी बतलाया जा चुका है कि रसानुभूति के पहले वाच्यप्रतीति अनिवार्य है । किन्तु इस पौर्वापर्य क्रम में सबसे बड़ी आपत्ति यह है कि यदि उनमें पौर्वापर्य क्रम विद्यमान है तो वह लक्षित क्यों नहीं होता ? इस प्रश्न का
शब्द अपने स्वरूप से ही व्यञ्जक होते हैं; उनके अर्थ रस इत्यादि के व्यञ्जक नहीं होते । प्रतिपक्षी भी यह स्वीकार करता है कि रसानुभूति में निमित्त गीत इत्यादि के शब्दों की स्वरूपप्रतीति पहले होती है और रसप्रतीति बाद में । हम भी उसी दृष्टान्त के आधार पर कह सकते हैं कि जहाँ काव्य में वाच्यप्रतीति के आधार पर रसाभिव्यक्ति होती है वहाँ पर वाच्यप्रतीति पहले होती है; क्योंकि वह निमित्त है और व्यङ्ग्य रसानुभूति बाद में होती है; क्योंकि वह नैमित्तिक है । उपर यह सिद्ध किया जा चुका है कि काव्य में रसानुभूति में वाच्यप्रतीति निमित्त होती है तथा यह भी बतलाया जा चुका है कि रसानुभूति के पहले वाच्यप्रतीति अनिवार्य है । किन्तु इस पौर्वापर्य क्रम में सबसे बड़ी आपत्ति यह है कि यदि उनमें पौर्वापर्य क्रम विद्यमान है तो वह लक्षित क्यों नहीं होता ? इस प्रश्न का
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उत्तर ‘तत्ु’... न प्रतीते’ इस वाक्य में दिया गया है। यदि इस वाक्य का विश्लेषणात्मक अध्ययन किया जाय तो ज्ञात होगा कि इसमें क्रम के लक्षित न होने रहकर ही अर्थात दूसरी संघटनाओं की परवा न करते हुए रसादि को अभिधेयत्व करती हैं।
( ९ ) सङ्घटनायें दूसरी संघटनाओं से असङ्जीर्ण रहकर ही अर्थात दूसरी संघटनाओं की परवा न करते हुए रसादि को अभिधेयत्व करती हैं। ( २ ) संघटनाओं का एकमात्र फल रसादि का प्रत्यायन ही होता है। ( ३ ) संघटनाओं की क्रिया अत्यन्त त्वरित होती है वह वाच्य वृत्ति की अपेक्षा नहीं करती।
( ४ ) वाच्यार्थ का रसादि से कोई विरोध नहीं होता और ( ५ ) रस इत्यादि दूसरे अभिधेयाथों से इस रूप में विलक्षण होते हैं कि उनका प्रत्यायन कभी भी अभिधावृत्ति का विषय नहीं हो सकता ! अब उक्त वाक्य को ले लीजिये—‘तत्ु शब्दस्य क्रियापौर्वापर्यम्’ इस वाक्य-खण्ड से क्रम का स्वरूप बतलाया गया है।
‘क्रिया’ शब्द की व्युत्पत्ति होगी—‘क्रियते इति क्रिये’ अर्थात शब्द के जो दो करणीय हों उन्हें दो क्रियायें कहते हैं। शब्द के दो करणीय होते हैं। एक तो अभिधेयापार और दूसरा तदङ्जनाभ्यापार भी है।
इन दोनों क्रियाओं का पौर्वापर्य अर्थात क्रम लक्षित नहीं होता। ‘रसादौ’ इस विशेष्य से बतलाया गया है कि रस इत्यादि के विषय में ही क्रम लक्षित नहीं होता। ‘रसादौ’ के विशेषण दिये गये हैं—‘अभिधेयान्तरविलक्षणे’ और ‘वाच्येन अविरोधिनी’।
प्रथम विशेषण के द्वारा क्रम न लक्षित होने का उपर्युक्त ५ वाँ हेतु निर्दिष्ट किया गया है कि रस इत्यादि अन्य अभिधेयाथों से विलक्षण होते हैं। विलक्षणता यही होती है कि अन्य अभिधेय अभिधावृत्ति से कहे जा सकते हैं किन्तु रसादि भूतिः अभिधादृत्ति से कहीं नहीं जा सकती।
अतः दोनों में भेद होने के कारण क्रम तो होना ही चाहिये। (किन्तु दोनों की कोटियाँ भिन्न हैं एक अभिधेय होता है दूसरा नहीं। अतः भिन्न कोटियोंवाले दो ज्ञानों में क्रम लक्षित नहीं होता।
यदि एक ही प्रकार के दो ज्ञान हों अर्थात या तो दोनों अभिधेय हों या दोनों अनभिधेय हों तो क्रम लक्षित होना अनिवार्य हो जाता है, क्योंकि जब हम एक ज्ञान के बाद उसी प्रकार का दूसरा ज्ञान करना चाहेंगे तो पहले ज्ञान का उपसंहार हो जायगा और उसके स्थान पर दूसरे ज्ञान की प्रतीति होगी।
इसके प्रतिकूल विभिन्न प्रकार की प्रतीतियों में विभिन्न तत्त्वों का उपयोग होगा। उदाहरण के लिये वाच्यप्रतीति मस्तिष्क के द्वारा होगी और रसानुभूति हृदय के द्वारा। अतः दोनों एक दूसरे से इतनी अव्यवहित हो सकती हैं कि उनसे क्रम की प्रतीति का न होना ही स्वाभाविक है।
( ४ ) ‘रसादौ का’ दूसरा विशेषण है—‘वाच्येन अविरोधिनी’ इसका आशय यह है कि रसानुभूति सर्वदा वाच्यार्थ के साथ विरोध न करती हुई ही हुआ करती है।
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एतदुक्तं भवति—यतो गुणवति काव्येऽसक्रीर्णविषयतया सकृटना प्रयुक्ता तत्क्रमो न लक्ष्यते । ननु मत्वेवं सकृटना स्थितिः क्रमस्तु किं न लक्ष्यते अत आह—आशुभाविनीषु वाच्यप्रतीतौ कालप्रतीक्षणेन विनैव शृङ्गारादीन् भावयन्ति सदास्वादविदग्धतया ।
यह बात कही गई है—क्योंकि गुणवान् काव्य में असङ्कीर्ण विषय के रूप में सङ्क्षटना प्रयुक्त की गई है, उससे क्रम लक्षित नहीं होता । ( प्रश्न ) सङ्क्षटना में ऐसी स्थिति हो, क्रम क्यों लक्षित नहीं होता? ( उत्तर ) अतः कहते हैं—‘आशुभाविनीषु’ वाच्यप्रतीति काल की प्रतीक्षा के बिना ही शृङ्गार आदि रसों को भावित कर देते हैं अर्थात् आस्वाद को उत्पन्न कर देते हैं ।
तारावती
वाच्य के अनुकूल ही होती है विरोध कभी नहीं होती। यदि वाच्यार्थ शृङ्गारपरक होगा तो शृङ्गार की अनुभूति होगी और यदि वाच्यार्थ रौद्रपरक होगा तो रौद्ररसानुभूति होगी। जब दोनों प्रतीतियाँ एक ही दिक में उद्द्बूत होनेवाली हैं तब उनमें क्रम लक्षित ही नहीं हो सकता। यदि दोनों एक दूसरे के विरुद्ध हों तो दोनों का क्रम लक्षित होना अनिवार्य हो जाय । इस प्रकार इस विशेषण के द्वारा ऊपर बतलाये हुये चौथे हेतु की ओर संकेत किया गया है। ‘आशुभाविनीषु’ में निमित्त में सप्तमी है। अतः यह हेतु का प्रत्यायक हो जाता है। इसका एक दूसरा विशेषण शब्द दिया गया है ‘अनन्यासाध्यतत्फलघटनासु’ यह भी हेतुवाचक सप्तमी परक ही है । इस प्रकार ‘आशुभाविनीषु’ की निमित्तसप्तमी दूसरे हेतु से गभित हेतु को प्रकट करती है ।
वाच्य के अनुकूल ही होती है विरोध कभी नहीं होती। यदि वाच्यार्थ शृङ्गारपरक होगा तो शृङ्गार की अनुभूति होगी और यदि वाच्यार्थ रौद्रपरक होगा तो रौद्ररस की अनुभूति होगी। जब दोनों प्रतीतियाँ एक ही दिशा में उत्पन्न होनेवाली हैं तब उनमें क्रम लक्षित ही नहीं हो सकता। यदि दोनों एक दूसरे के विरुद्ध हों तो दोनों का क्रम लक्षित होना अनिवार्य हो जाय । इस प्रकार इस विशेषण के द्वारा ऊपर बतलाये हुये चौथे हेतु की ओर संकेत किया गया है। ‘आशुभाविनीषु’ में निमित्त में सप्तमी है। अतः यह हेतु का बोधक हो जाता है। इसका एक दूसरा विशेषण शब्द दिया गया है ‘अनन्यासाध्यतत्फलघटनासु’ यह भी हेतुवाचक सप्तमी है । इस प्रकार ‘आशुभाविनीषु’ की निमित्तसप्तमी दूसरे हेतु से युक्त हेतु को प्रकट करती है ।
इन दोनों शब्दों में बहुव्रीहि समास है और ये दोनों शब्द घटना के विशेषण हैं । घटनाओं का निरूपण पहले किया जा चुका है कि कुछ घटनाएँ माधुर्यलक्षणवाली होती हैं कुछ परुष लक्षणवाली । वे घटनायें ‘तत्फल’ होती हैं अर्थात् उनका फल रसादि की प्रतीति ही होता है । वे घटनायें अनन्यासाध्य होती हैं अर्थात् उन घटनाओं का साध्य उनका अपना निश्चित साध्य ही होता है; किन्तु कोई अन्य साध्य नहीं । उदाहरण के लिये ओजोघटना के लिये रौद्ररस साध्यरूप में निश्चित है । उसका साध्य करुणरस कभी नहीं हो सकता ।
इन दोनों शब्दों में बहुव्रीहि समास है और ये दोनों शब्द घटना के विशेषण हैं । घटनाओं का निरूपण पहले किया जा चुका है कि कुछ घटनाएँ माधुर्यलक्षणवाली होती हैं और कुछ परुष लक्षणवाली । वे घटनायें ‘तत्फल’ होती हैं अर्थात् उनका फल रसादि की प्रतीति ही होता है । वे घटनायें अनन्यासाध्य होती हैं अर्थात् उन घटनाओं का साध्य उनका अपना निश्चित साध्य ही होता है; किन्तु कोई अन्य साध्य नहीं । उदाहरण के लिये ओजोघटना के लिये रौद्ररस साध्यरूप में निश्चित है । उसका साध्य करुणरस कभी नहीं हो सकता ।
आशय यह है कि काव्य में माधुर्य इत्यादि गुण तो रहते ही हैं । उस काव्य में जिन माधुर्य इत्यादिर गुणोंवाली संघटना का प्रयोग किया जाता है उसका फल रसादि प्रतीति ही होता है और उस संघटना से अपने निश्चित विषय के अतिरिक्त अन्य प्रकार की रसाभिव्यक्ति नहीं की जा सकती । इसीलिये क्रम
आशय यह है कि काव्य में माधुर्य इत्यादि गुण तो रहते ही हैं । उस काव्य में जिन माधुर्य इत्यादि गुणोंवाली संघटना का प्रयोग किया जाता है उसका फल रसादि प्रतीति ही होता है और उस संघटना से अपने निश्चित विषय के अतिरिक्त अन्य प्रकार की रसाभिव्यक्ति नहीं की जा सकती । इसीलिये क्रम
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एतदुक्तं भवति-संस्कारनव्याद्वाद्रसादीनामनुपयुक्तेऽप्यर्थविज्ञाने पूर्वमेवो-चित्रसंस्कारनाश्रवण एव यत आसूत्रितो रसास्वादस्तेन वाच्यप्रतीत्युत्तरकालमेवं परिस्फुटतास्वादयुक्तेऽपि पश्चादुत्पन्नत्वेन न माति । अभ्यस्ते हि विषयेऽविनाभावप्रतीतिक्रम इत्यमेव ने लक्षिते । अभ्यासाद्रियतेनैव शीघ्रनिधानादीनामपि विनव संस्कारस्य बलवत्त्वादेव प्रभुत्वसुतया अवस्थापनमित्येवं यत्र धूमस्तत्रामिरिति
यह बात कही गई है—रस इत्यादि के सन्निपातन द्वारा नव्याद्य होने के कारण अर्थ विज्ञान का उपयोग न होने पर भी पहले ही अभ्यस्त सन्निपातन के सुनने में ही जो कि रसास्वाद कुछ स्फुरित हो जाता है वह उसी कारण से वाच्यप्रतीति के उत्तर काल में होनेवाले परिपुष्ट आस्वाद से युक्त होते हुए भी पश्चात् उत्पन्न हुये के रूप में प्रतीत नहीं होता । अभ्यस्त विषय में निस्संदेह अनिवार्यं साहरचर्यं का प्रतीति क्रम इसी प्रकार लक्षित नहीं होता । अभ्यास यही होता है कि प्रणिधान इत्यादि के बिना ही संस्कार के बलवान् होने के कारण सद्य प्रतीति होने की इच्छा से स्थापित किया जाना । इस प्रकार जहाँ धुआँ होता है वहाँ आग होती है । इस
तारावती
लक्षित नहीं होता । प्रश्न किया जा सकता है कि क्रम के लक्षित किये जाने न किये जाने से संघटन का क्या सम्बन्ध ? घटनाओं की जो स्थिति आप मानते हैं वह माना करें क्रम क्यों लक्षित नहीं होता ? इसी प्रश्न का उत्तर देने के लिये 'आङ्गभाविनीपु' यह विशेषण दिया गया है । 'भाविनी' का अर्थ है 'भावन करना है शील जिसका' । अतः आङ्गभाविनी का अर्थ हुआ कि संघटनायें वाच्यप्रतीति काल की अपेक्षा किये बिना ही शीघ्र ही रस इत्यादि को भावित कर देती हैं
प्रश्न किया जा सकता है कि क्रम के लक्षित किये जाने न किये जाने से संघटन का क्या सम्बन्ध ? घटनाओं की जो स्थिति आप मानते हैं वह माना करें क्रम क्यों लक्षित नहीं होता ? इसी प्रश्न का उत्तर देने के लिये 'आङ्गभाविनीपु' यह विशेषण दिया गया है । 'भाविनी' का अर्थ है 'भावन करना है शील जिसका' । अतः आङ्गभाविनी का अर्थ हुआ कि संघटनायें वाच्यप्रतीति काल की अपेक्षा किये बिना ही शीघ्र ही रस इत्यादि को भावित कर देती हैं
अर्थात् उसके आस्वादन का विधान कर देती हैं ।
अर्थात् उसके आस्वादन का विधान कर देती हैं ।
ऊपर जो कुछ कहा गया है उसका सारांश यह है—यह पहले सिद्ध किया जा चुका है कि संघटनायें भी रस की अभिव्यञ्जना करती हैं । संघटन का अर्थ है विशेष प्रकार की रसानुकूल वर्णसंयोजना जैसे कोमल योजना से श्रृङ्गारादि रसों की व्यञ्जना होती है और कठोर योजना से रौद्र इत्यादि रसों की व्यञ्जना होती है । वर्ण रसाभिव्यञ्जन करने में अर्थ ज्ञान की अपेक्षा नहीं करते । जब हम किसी सुन्दर काव्य को सुनते हैं तो अर्थ को बिना ही समझे उस काव्य के सुनते ही हमारे हृदय में रस कुछ स्फुरित हो जाता है । बाद में हम अर्थ की प्रतीति होती है और तब रस का आस्वाद परिपुष्ट रूप में परिपूर्णता को प्राप्त हो जाता है । इस प्रकार काव्यश्रवण में वाच्यप्रतीति से पहले ही कुछ स्फुरित होकर रस वाच्यप्रतीति के बाद में परिपूर्णता को प्राप्त हो जाता है । अतः पहले से बाद
ऊपर जो कुछ कहा गया है उसका सारांश यह है—यह पहले सिद्ध किया जा चुका है कि संघटनायें भी रस की अभिव्यञ्जना करती हैं । संघटन का अर्थ है विशेष प्रकार की रसानुकूल वर्णसंयोजना जैसे कोमल योजना से श्रृङ्गारादि रसों की व्यञ्जना होती है और कठोर योजना से रौद्र इत्यादि रसों की व्यञ्जना होती है । वर्ण रसाभिव्यञ्जन करने में अर्थ ज्ञान की अपेक्षा नहीं करते । जब हम किसी सुन्दर काव्य को सुनते हैं तो अर्थ को बिना ही समझे उस काव्य के सुनते ही हमारे हृदय में रस कुछ स्फुरित हो जाता है । बाद में हम अर्थ की प्रतीति होती है और तब रस का आस्वाद परिपुष्ट रूप में परिपूर्णता को प्राप्त हो जाता है । इस प्रकार काव्यश्रवण में वाच्यप्रतीति से पहले ही कुछ स्फुरित होकर रस वाच्यप्रतीति के बाद में परिपूर्णता को प्राप्त हो जाता है । अतः पहले से बाद
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हृदयस्थिततत्त्वाद्व्याप्ते: पक्षधर्मताज्ञानमात्रमेवोपयोगि भवतीति परामर्शस्थानमाक्रामति । स्रितियुपपत्तौ हि धूमज्ञानं तद्र्याप्तिस्मृत्युपकृतं तद्विजातीयप्रतिघानानुसारप्रादुर्भावप्रतीत्यनतरानुपवेशाविरहाद्व्याप्तिज्ञानप्रतीतो क्रमो न लक्ष्यते तद्वदिहापि । यदि चुवाच्यविरोधी रसो न स्यादुचित्ता च घटना न सवेतल्लक्ष्यतेव क्रम इति ।
व्याप्ति के हृदय में स्थित होने के कारण पक्षधर्मता का ज्ञान ही उपयोगी होता है, अतः पक्षधर्मता के स्थान का अतिक्रमण कर जाता है । उसकी व्याप्ति की स्मृति के द्वारा उपकृत धूम ज्ञान के शीघ्र उद्भूत होने पर उसके विजातीय के प्रतिघान के अनुसरण इत्यादि की प्रतीति के अन्तः प्रवेश के बिना ही ही शीघ्र होनेवाली अग्निम प्रतीति में क्रम लक्षित नहीं होता । उसी प्रकार यहाँ पर भी । यदि रस वाच्य का अविरोधी न हो और उचित सङ्घटना भी न हो तो क्रम लक्षित ही हो जाये ।
तारावती
तारावती
तक प्राप्त रहने के कारण यह प्रतीत नहीं होता है कि रसास्वादन बाद में हुआ है । इसलिये सङ्घटना द्वारा यत्नपूर्वक होने के कारण क्रम लक्षित नहीं होता । यह केवल इसी विषय में नहींं समस्त अभ्यस्त विषयों में ऐसा ही होता है । जिन विषयों की अविनाभाव प्रतीति होती है उनमें भी अभ्यास हो जाने पर क्रमलक्षित नहीं होता । अविनाभाव का अर्थ है व्याप्तिज्ञान । जहाँँ कोई वस्तु किसी दूसरी वस्तु के बिना नहीं हो सकती वहाँ न हो सकनेवाली वस्तु को देखकर जिसके बिना वह नहीं हो सकती उसका अनुमान लगा लिया जाता है । यही व्याप्तिग्रह है । उदाहरण के लिये धूम को देखकर अग्नि का ज्ञान करना अविनाभाव प्रतीति है । यह व्याप्तिग्रह इस प्रकार होता है कि कोई परिशीलक कई बार जलती हुई आग से धुँआ उठते हुये देखता है; वह जब कभी आग जलाता है तो उसे धुएँ अवश्य दिखाई देता है ! उसके अतिरिक्त वह सरोवर इत्यादि को भी देखता है और वहाँ आग नहीं देखता तथा वहाँ धुएँ भी नहीं देखता । इस प्रकार महान् इत्यादि पक्षों और सरोवर इत्यादि विपक्षों को बार बार देखकर वह इस निष्कर्ष पर पहुँच जाता है कि 'जहाँ धुआँ होता है वहाँ आग होती है ।' यही व्याप्तिग्रह है । इस व्याप्ति को अपने हृदय में लिये हुये जब वह किसी ऐसे स्थानपर पहुँचता है जहाँ किसी झोपड़ी से उसे धुआँ उठता हुआ दिखाई देना है । तब उसे सर्वप्रथम व्याप्ति का स्मरण होता है कि जहाँ धुआँ होता है वहाँ आग होती है । न्यायदर्शन में 'प्रणिधाननिवन्धाभ्याससिद्धिः' इत्यादि लम्बे सूत्र में स्मरण के हेतुओं का परिगणन
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कराया गया है। उन्हीं से उसे व्याति का स्मरण होता है और फिर ‘झोपड़ी धुआंवाली है जो कि सर्वदा अग्नि का सहचारी है’ यह वितर्क उत्पन्न होता है। इस वितर्क को परामर्श कहते हैं। उससे यह ज्ञान उत्पन्न हो जाता है कि झोपड़ी में अग्नि है। इस ज्ञान को अनुमान ज्ञान कहते हैं। इस प्रकार लिङ्ग (धूम) से साध्य (अग्नि) का अनुमान करने में एक क्रम होता है। किन्तु जब बार-बार धुयें से अग्नि का अनुमान किया जाया जुकता होता है तो उसका इतना अधिक अभ्यास हो जाता है कि धुआँ को देखते ही अग्नि का बोध हो जाता है और प्रधान इत्यादि स्मरण हेतु, व्याप्ति स्मृति, परामर्श इत्यादि का क्रम लक्षित ही नहीं होता। अभ्यास का अर्थ ही यह है कि किसी ज्ञान की पुनः पुनः अभ्यावृत्ति से संस्कार इतने बलवान् हो जायँ कि प्रणिधान इत्यादि स्मरण हेतुओं का बिना ही अनुसरण किये हुए सर्वदा वह तत्त्व अपने को ज्ञात कर देने की इच्छा करते हुये ही अवस्थित रहे। आशय यह है कि अभ्यस्त व्यक्ति धुयें को देखकर इतनी सरलता और शीघ्रता से आग को जान जाता है मानों धूम को स्वयं इस बात की आकांक्षा बनी रहती है कि अभ्यस्त व्यक्ति हमें देखते ही आग को जान ले। जिस स्थान पर किसी वस्तु का अनुमान लगाया जाता है उसे पक्ष कहते हैं; वह तत्त्व जिसको देखकर अनुमान लगाया जाता है हेतु या पञ्चधर्म कहलाता है। उसकी भाववाचक संज्ञा ही पञ्चधर्मता है। जैसे यदि पर्वत में धुयें को देखकर अग्नि का अनुमान लगाना हो तो पर्वत पक्ष होगा; धूम पञ्चधर्म या हेतु होगा और धूमत्व को पञ्चधर्मता की संज्ञा प्राप्त होगी। पूर्ण अभ्यास कर लेने पर व्याति तो हृदय में स्थित ही रहती है। साध्य (अग्नि) का अनुमान लगाने में केवल पञ्चधर्मता (धूमत्व) का ही उपयोग होता है। ऐसा अनुमान परामर्श के स्थान का अतिक्रमण कर जाता है। धूमज्ञान व्यासिस्मृति से उपकृत हो रहता है; उस धूमज्ञान के शीघ्र उत्पन्न होने पर उन दोनों (पञ्चधर्मता और व्याप्तिज्ञान) से विजातीय प्रणिधान के अनुसरण इत्यादि की प्रतीति के अन्दर आये बिना ही अग्नि की प्रतीति एकदम हो जाती है और वहाँ पर क्रम लक्षित नहीं होता। वही बात यहाँ पर भी होती है कि अधिक अभ्यस्त हो जाने से वाच्यप्रतीति हो जाती है और क्रम लक्षित नहीं होता। यह तो हुई शीघ्र प्रतीति की बात। क्रम न लक्षित किये जा सकने का एक कारण यह भी है कि जैसी वाच्यप्रतीति होती है वैसी ही रसप्रतीति भी होती है। दोनों का विरोध नहीं होता यदि वाच्य से अविरोधी रस न हो और संघटना भी प्रस्तुत रस के विपरीत हो तो क्रम लक्षित हो जाय।
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चन्द्रिकाकारस्तु पठितमनुपठतोति न्यायेन गजनिमीलिकया व्याचचक्षे—तस्य शब्दस्य फलं तद्वा फलं वाच्यव्यङ्ग्यप्रतीतिरात्मकं तस्य घटना निष्पादना यतोऽनन्यसाध्यत्वात् । न वाच्यार्थसत्तत्त्वं व्याख्यानेऽपि किश्चित्प्रयोजनमित्यलं पूर्ववंशैः सह विवादेन बहुना ।
चन्द्रिकाकार ने तो 'पढ़े हुए को ही पुनः पढ़ता है' इस न्याय से गजनिमीलिका के ढंग से व्याख्या की है—'उसका अर्थात् शब्द का फल अथवा वह वाच्य-व्यङ्ग्य-प्रतीत्यात्मक फल; उसकी घटना अर्थात् निष्पादन करना क्योंकि अनन्यसाध्य होती है अर्थात् केवल शब्दव्यापारमात्र से जन्य होती है । इस व्याख्या में हमें अर्थ की कोई सङ्गति दिखलाई नहीं पड़ती, वस् अपने पूर्व वंश्यों के साथ अधिक विवाद की आवश्यकता नहीं ।
तारावती चन्द्रिकाकार ने 'अनन्यसाध्यतत्फलघटनासु' इस शब्द का अर्थ इस प्रकार किया है—'तत्काल' अर्थात् उस ( शब्द ) का फल ( तत्पुरुष समास ) अथवा 'वह फल' ( कर्मधारय समास ) दोनों अवस्थाओं में फल हुआ वाच्य-व्यङ्ग्यप्रतीति-रूप । उस वाच्य-व्यङ्ग्य-प्रतीतिरूप फल की घटना अर्थात् निष्पादन अन्य से साध्य नहीं होता अर्थात् केवल शब्दव्यापार से उत्पन्न होता है । आशय यह है कि वाच्य और व्यङ्ग्य की प्रतीति केवल शब्द से ही होती है, उसका साधन और कोई नहीं होता । इस व्याख्या का खण्डन करते हुए अभिनवगुप्त ने लिखा है कि चन्द्रिकाकार की यह व्याख्या मटिका के स्थान में मटिका जैसी हैं । ( चन्द्रिकाकार पर आक्षेप करने के लिये अभिनवगुप्त ने दो शब्दों का प्रयोग किया है—'पठितमनुपठति' और 'गजनिमीलिका' । 'पठितमनुपठति' का अर्थ यह है कि चन्द्रिकाकार ने जो शब्द जिस प्रकार देखे उनकी वैसी ही व्याख्या करदी । यह विचार करने की चेष्टा नहीं की कि क्या प्रस्तुत प्रकरण में सीधा सीधा अर्थ ठीक रहेगा ? 'गजनिमीलिका' का भी यही अर्थ है कि जैसे हाथी केवल सामने ही देखता है इधर-उधर ध्यान नहीं देता उसी प्रकार चन्द्रिकाकार ने भी सीधा-सीधा अर्थ करदिया प्रकरण पर विचार करने की आवश्यक्ता नहीं समझी । ) चन्द्रिकाकार ने अर्थ यह भी किया है कि 'उस शब्द का फल अथवा वह वाच्यव्यङ्ग्यप्रतीत्यात्मक फल उसकी संघटना शब्दव्यापारमात्रजन्य है । अन्य से उसका उद्भव नहीं होता । इस व्याख्या में यह समझ में नहीं आता कि प्रस्तुत प्रकरण तो वाच्य और व्यङ्ग्य के पूर्वापर्यप्रतीति के विषय में है । इस प्रकरण में इस कथन का क्या उपयोग कि शब्द से ही वाच्य और व्यङ्ग्य प्रतीतियाँ होती हैं । अतः
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क्वाचित्तु लक्यत एव । यथानुरणनरूपव्यङ्गच्यप्रतीतिषु । तत्रापि कथमिति चेदुच्यते—अर्थशक्तिमूलानुरणनरूपव्यङ्गच्ये ध्वनौ तावद्विधेयस्य तत्त्वासमध्या-
कहीं तो लक्षित ही होता है । जैसे अनुरणनरूप व्यङ्ग्य की प्रतीतियों में । उसमें भी कैसे ? यह कहा जा रहा है—अर्थशक्तिमूल अनुरणनरूप व्यङ्ग्य ध्वनि में अभिधेय के तथा उसके सामर्थ्य से आक्षिप्त अर्थ के दूसरे अभिधेयों से अत्यन्त विलक्षण होने के कारण अत्यन्त विलक्षण जो दो प्रतीतियाँ उनके निमित्त-निमित्तिभाव का छिपाया जाना असम्भव है । अतः उनका पौर्वापर्य स्फुट ही है ।
लोचन यत्र तु स्फुटतया व्यतिरिच्यते नास्ति तत्र लक्यत एवेत्य-क्वचिच्चित्ति । तुल्ये व्यङ्गयत्वे कुतो भेद इत्याशङ्कते—तत्रापीति । स्फुटमेवेति । अविवक्षितवाच्यस्य पदवाक्यमकार्यता । तदन्यस्यापु रगनरूपव्यङ्ग्यस्य च ध्वने: ॥
जहाँ पर स्फुटतया व्यतिरिक्तत्व नहीं होता वहाँ पर तो लक्षित होता ही है यह कहते हैं—‘कहीं तो’ यह । व्यङ्गयत्व के तुल्य होते हुए भेद क्यों ? यह शङ्का करते हैं—‘उसमें भी’ यह । स्फुट ही है यह—अविवक्षितवाच्य की और उससे भिन्न अनुरणनरूप व्यङ्ग्य की पद-वाक्य-प्रकाश्यता होती है ।’
तारावती इस वाक्य की वही व्याख्या करनी चाहिये जैसी कि ऊपर ५ प्रकारों के निर्देश के द्वारा बतलाई गई है । अभिनवगुप्त ने लिखा है कि बस इतना पर्याप्त है । हम अपने वंश के अपने पूर्वजों से अधिक विवाद करना उचित नहीं समझते । इससे ज्ञात होता है कि धन्त्रिका-कार अभिनवगुप्त के ही पूर्व वीराज थे ।
किन्तु यह क्रम सर्वत्र अस्फुट ही बना रहे यह बात नहीं है । असंलक्ष्यक्रम ध्यङ्गय में क्रम के लक्षित न होने का सबसे बड़ा कारण यह बतलाया गया है कि
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इति हि पूर्वं वर्णसंधट्टनादिकं नास्त्य व्यञ्जकत्वेनोक्तमितिभावः । गाथास्विति । भ्रम धम्मिअ इत्यादिकासु । ताश्र तत्नैव व्याख्य्याता:
भाव यह है कि इस प्रकार पहले वर्णसंधट्टना इत्यादि को उसके व्यञ्जकत्व के रूप में नहीं कहा । गाथाओं में—भ्रम धम्मिअ’ इत्यादि में उनकी वहीं व्याख्या की गई है ।
वह ध्वनि संधट्टना के द्वारा व्यक्त होती है । संघटना के द्वारा कुछ परिपुष्ट होकर बाद में वाच्यार्थ के द्वारा उसकी पूर्ति होती है । अतः वाच्यार्थ के दोनों ओर व्यापक रहने के कारण वाच्यार्थ की प्रथमिकता और व्यङ्ग्यार्थ की उत्तर-कालिकता की प्रतीति नहीं होती । इसके प्रतिकूल जिस ध्वनि की अभिव्यक्ति के लिये वर्णसंधट्टना अपेक्षित नहीं होती उस ध्वनि में व्यङ्ग्य और वाच्य अर्थों की प्रतीति में क्रम अवश्य लक्षित होता है क्योंकि उनमें वाच्यार्थ ही कारण होता है । जैसे अनुरणनरूप व्यङ्ग्य में क्रम की प्रतीति होती है । अनुरणन रूप व्यङ्ग्य ध्वनि के जो व्यञ्जक ‘अविवक्षितवाच्यस्य’ ( ३-९ ) इत्यादि कारिकाओं में गिनाये गये हैं उनमें वर्णसंधट्टना को ध्वनि का व्यञ्जक नहीं माना गया है । यहाँ पर यह प्रश्न उठ सकता है कि जब दोनों ही व्यङ्ग्यार्थ होते हैं तब यह मेंद कैसा कि रस इत्यादि की व्यञ्जना में क्रम लक्षित नहीं होता और अनुरणनरूप व्यङ्ग्य ध्वनि में लक्षित हो जाता है ? जब दोनों व्यङ्ग्यार्थ हैं तो या तो दोनों में क्रम लक्षित होना चाहिये या दोनों में नहीं होना चाहिये । इसका उत्तर यह है कि संलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य दो प्रकार का माना जाता है अर्थशक्तिमूलक और शब्दशक्तिमूलक । अर्थशक्ति-मूलक अनुरणनरूप ध्वनि में अभिधेयार्थ और उसके सामर्थ्य से आक्षित दोनों ही साधारण अभिधेयार्थ से कुछ विलक्षण होते हैं । साधारण अभिधेयार्थ में किसी व्यङ्ग्यार्थ को अभिव्यक्त करने की शक्ति नहीं होती जब कि व्यञ्जक अभिधेयार्थ में अर्थान्तर को अभिव्यक्त करने की शक्ति होती है । यह तो हुई वाच्यार्थ की विलक्षणता । व्यङ्ग्यार्थ तो वाच्यार्थ की अपेक्षा सर्वथा विलक्षण होता ही है । इस प्रकार जो दो अत्यन्त विलक्षण प्रतीतियाँ होती हैं उनमें एक ( वाच्यार्थ ) तो निमित्त होता है और दूसरा ( व्यङ्ग्यार्थ ) निमित्तिजन्य सार्थकताक्रम होता है । उनका यह निमित्त-निमित्तिभाव छिपाया नहीं जा सकता ।
उदाहरण के लिये प्रथम उद्योत में प्रतीममान अर्थ की सिद्धि के लिये जिन गाथाओं का उद्धरण दिया गया था उनको ले लीजिये । उस प्रकार के विषय में वाच्यार्थ और व्यङ्ग्यार्थ एक दूसरे से अत्यन्त विलक्षण होते हैं ।
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शब्दशक्तिमूलानुरणनरूपवच्यझ्झ्ये तु ध्वनौ— 'गावो वः पावनानां परमपरिमितां प्रीतिमुत्पादयन्तु' इत्यादावर्थद्वयप्रतीतौ शाब्द्यामर्थद्वयस्योपमेयभावप्रतीतिरुपमावाचकपदविरहे सत्यर्थसामर्थ्यद्योतिते तत्प्रति सुलक्षणमभियेयलयड्ङचालड्ङारप्रतीतिर्यो पौर्वापर्यम् ।
(अनु०) शब्दशक्तिमूल अनुरणनरूपवच्यध्वनि में तो— 'पवित्रों में सर्वोत्कृष्ट सूर्य किरणें और गायें आप में अपरिमित प्रेम पैदा करें ।' इत्यादि में दो अर्थों की प्रतीति के शाब्दिक होने पर ( भी ) उपमावाचक पद के अभाव में भी दो अर्थों की उपमानोपमेयभाव प्रतीति अर्थ सामर्थ्य से आक्षिप्त कर ली गई है अतः वहाँ पर भी अभिधेय और व्यङ्गच्यालङ्कार प्रतीतियों का पौर्वापर्य भलीभाँति सरलता से लक्षित किया जा सकता है ।
(अनु०) शब्दशक्तिमूल अनुरणनरूपवच्यध्वनि में तो— 'पवित्रों में सर्वोत्कृष्ट सूर्य किरणें और गायें आप में अपरिमित प्रेम पैदा करें ।' इत्यादि में दो अर्थों की प्रतीति के शाब्दिक होने पर ( भी ) उपमावाचक पद के अभाव में भी दो अर्थों की उपमानोपमेयभाव प्रतीति अर्थ सामर्थ्य से आक्षिप्त कर ली गई है अतः वहाँ पर भी अभिधेय और व्यङ्गच्यालङ्कार प्रतीतियों का पौर्वापर्य भलीभाँति सरलता से लक्षित किया जा सकता है ।
लोचन शाब्द्यामिति । शाब्द्यामपेत्यर्थः । उपमावाचकं यथेवादि । अर्थसामर्थ्योदिति । वाक्यार्थसामर्थ्यादिति यावत् । 'शाब्दी में' यह ! अर्थात् शाब्दी में भी । 'उपमा वाचक यथा इव इत्यादि । 'अर्थसामर्थ्य से' यह । अर्थात् वाक्यार्थ सामर्थ्य से ।
तारावती विधिपरक होता है तो व्यङ्गच्यार्थ निषेधपरक । यदि वाच्यार्थ निषेधपरक होता है तो व्यङ्गच्यार्थ विधिपरक, यदि वाच्यार्थ विधिपरक होता है तो निषेधार्थ अनुज्ञापरक । इस प्रकार की विलक्षणता वहाँ पर दिखलाई जा चुकी है । अतएव आप यह तो नहीं कह सकते कि जो एक की प्रतीति होती है वही दूसरे की भी होती है । इस प्रकार प्रतीतियों की विलक्षणता और कार्य-कारण भाव सम्बन्ध इन दोनों हेतुओं से क्रम संलक्षित होना स्वाभाविक हो जाता है ।
तारावती विधिपरक होता है तो व्यङ्गच्यार्थ निषेधपरक । यदि वाच्यार्थ निषेधपरक होता है तो व्यङ्गच्यार्थ विधिपरक, यदि वाच्यार्थ विधिपरक होता है तो निषेधार्थ अनुज्ञापरक । इस प्रकार की विलक्षणता वहाँ पर दिखलाई जा चुकी है । अतएव आप यह तो नहीं कह सकते कि जो एक की प्रतीति होती है वही दूसरे की भी होती है । इस प्रकार प्रतीतियों की विलक्षणता और कार्य-कारण भाव सम्बन्ध इन दोनों हेतुओं से क्रम संलक्षित होना स्वाभाविक हो जाता है ।
अब शब्दशक्तिमूलानुरणन रूप व्यङ्गच्यध्वनि को लीजिये—इसके दो भेद बतलाये गये थे वाक्यप्रकाश और पदप्रकाश । द्वितीय उद्योत में वाक्यप्रकाश शब्दशक्तिमूलक ध्वनि का उदाहरण दिया गया था—'दत्तानन्दा:......'......'प्रीति-मुत्पादयन्तु' । वहाँ पर दो अर्थ होते हैं—सूर्यकिरणपरक अर्थ और धेनुपरक अर्थ । सूर्य किरणपरक अर्थ प्रकारणिक होते से वाच्यार्थ है और धेनुपरक अर्थ व्यङ्गच्यार्थ है । यहाँ पर दोनों अर्थों की प्रतीति शब्दशक्तिमूलक है । इसके बाद दोनों अर्थों की असम्बद्धार्थकता का निवारण करने के लिये 'किरणों के समान गायें इस उपमानोंपमेय भाव की कल्पना करली जाती है । इस कल्पना में कोई ऐसा शब्द सहायक नहीं होता जोकि उपमावाचक कहा जा सके । आशय यह है कि
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पदप्रकाशशब्दशक्तिमूलानुरणनरूपव्यङ्ग्येडपि ध्वनौ विशेषणपदस्थ्योर्भग्यार्थसम्बन्धयोग्यस्य योजकपदमन्तरेपि योजनमशाब्दमप्यर्थादेव स्थितमित्यत्रापि पूर्ववदभिधेयतत्सामर्थ्याच्चिमालङ्कारमात्रप्रतीत्योः सुस्थितमेव पौर्वापर्यम् । आध्यापे च प्रतीपोक्तिस्थानीयोऽत्रिप्रियोपमेयार्थसम्बन्धयोग्यशब्दसामध्यप्रसृतचित्रेति शब्दशक्तिमूला कल्प्यते ।
(अनु०) पदप्रकाश्य शब्दशक्तिमूल अनुरणनरूपव्यङ्ग्य ध्वनि में भी दोनों अर्थों के सम्बन्ध के योग्य विशेषण पद की योजना ( किसी ) योजक पद के अभाव में भी शब्दरहित होते हुये भी अर्थ से ही अवस्थित होती है; अतः यहाँ पर भी पहले के समान ही अभिधेय तथा उसके सामर्थ्य से आक्षित अलङ्कारमात्र प्रतीतियों का पौर्वापर्य ठीक रूप में स्थित ही है । अर्थों प्रतीति भी इस प्रकार के विषय में दोनों अर्थों के सम्बन्ध के योग्य शब्दसामर्थ्य से प्रसूत की गई है, अतः शब्दशक्तिमूला की कल्पना की जाती है ।
एवं वाक्यप्रकाशशब्दशक्तिमूलं विचार्य पदप्रकाशं विचार्यते—पदप्रकाश इति । जड इत्यस्य । योजकमिति । रूप इति च अहमिति चोभयसम्बन्धिकरणतया संवलनम् । अभिधेयं च तत्सामर्थ्याच्च लयोरलङ्कारमात्रप्रतीती तयोः पौर्वापर्यंक्रमः सुस्थितं सुलक्षितमित्यर्थः । मात्रग्रहणेन रसप्रतीतिसत्नाप्यलक्ष्यक्रमैवेदिति दर्शयति । नन्वेवमार्थत्वं शब्दशक्तिमूलत्वं चैति विरुद्धमित्याशङ्का—आर्थी प्रतीति । नात्र विरोधः कश्चिदिति समाधान् । एतद्विषयं पूर्वमेवोक्तमिति न पुनरुच्यते ।
इस प्रकार वाक्यप्रकाश्य शब्दशक्तिमूल का विचार करके पदप्रकाश का विचार करते हैं—‘पदप्रकाश’ यह । ‘विशेषण पद का’ यह । ‘जड़’ इसका । ‘योजक’ यह। ‘रूप’ यह और ‘मैं’ यह इन दोनों के समानाधिकरण के रूप में संमिलन । अभिधेय और उसके सामर्थ्य से आक्षित उन दोनों का ( अर्थात् ) केवल दो अलङ्कारों का । जो दो प्रतीतियाँ उनका पौर्वापर्य क्रम । सुस्थित है अर्थात् वहाँ पर भी अलङ्क्य क्रम ही होता है । मात्र ग्रहण से यह दिखलाते हैं कि रस प्रतीति सत्नाप्यलक्ष्यक्रमैवेदिति दर्शयति । नन्वेवमार्थत्वं शब्दशक्तिमूलत्वं चैति विरुद्धमित्याशङ्का—आर्थी प्रतीति । नात्र विरोधः कश्चिदिति समाधान् । एतद्विषयं पूर्वमेवोक्तमिति न पुनरुच्यते ।
इस प्रकार वाक्यप्रकाश्य शब्दशक्तिमूल का विचार करके पदप्रकाश का विचार करते हैं—‘पदप्रकाश’ यह । ‘विशेषण पद का’ यह । ‘जड़’ इसका । ‘योजक’ यह। ‘रूप’ यह और ‘मैं’ यह इन दोनों के समानाधिकरण के रूप में संमिलन । अभिधेय और उसके सामर्थ्य से आक्षित उन दोनों का ( अर्थात् ) केवल दो अलङ्कारों का । जो दो प्रतीतियाँ उनका पौर्वापर्य क्रम । सुस्थित है अर्थात् वहाँ पर भी अलङ्क्य क्रम ही होता है । मात्र ग्रहण से यह दिखलाते हैं कि रस प्रतीति सत्नाप्यलक्ष्यक्रमैवेदिति दर्शयति । नन्वेवमार्थत्वं शब्दशक्तिमूलत्वं चैति विरुद्धमित्याशङ्का—आर्थी प्रतीति । नात्र विरोधः कश्चिदिति समाधान् । एतद्विषयं पूर्वमेवोक्तमिति न पुनरुच्यते ।
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यहाँ पर इव इत्यादि कोई ऐसा शब्द नहीं आया है जोकि उपमावाचक माना जाता है । केवल अर्थसामर्थ्य से ही उपमा का आक्षेप कर लिया जाता है । यद्यपि वहाँ पर प्रथम और द्वितीय अर्थों की प्रतीति ज्येष्ठ और कनिष्ठ की उत्पत्ति के समान होती है और उनमें कार्यकारण भाव के अभाव में पौर्वापर्य की कल्पना नहीं की जा सकती तथापि इन दोनों अर्थों की प्रतीति उपमा की कल्पना में कारण अवश्य होती है । अतएव अभिधेय और व्यङ्ग्य अर्थों की प्रतीति में तथा उपमालङ्कार की प्रतीति में कार्यकारण भाव सम्बन्ध होने से पौर्वापर्य क्रम उचित अवश्य होता है ।
उपर वाक्यप्रकाश शब्दशक्तिमूलक ध्वनि में क्रम के संलक्षित होने की व्याख्या की गई है, अब पदप्रकाश्य शब्दशक्तिमूलक को लीजिये—जहाँ पर शब्दशक्ति के आधार पर अनुरणनरूप व्यङ्ग्यध्वनि होती है । वहाँ पर कोई एक ऐसा विशेषण विधमान होता है जिसमें दोनों अर्थों से सम्बन्ध करने की योग्यता होती है । वहाँ पर कोई ऐसा योजक पद नहीं होता जो दोनों में संयोग उत्पन्न करे । इस प्रकार बिना ही शब्द के अर्थ सामर्थ्य से वहाँ पर उन दोनों अर्थों की योजना की जाती है । इस प्रकार वाक्यप्रकाश्य शब्दशक्तिमूलक ध्वनि के समान वाच्यार्थ और उसके सामर्थ्य से आक्षिप्त केवल अलङ्कार की प्रतीति में पौर्वापर्य क्रम सरलता पूर्वक लक्षित किया जा सकता है । उदाहरण के लिए इसी उद्योत के ‘प्रातः धनैः·····कृतोऽहम्’ इस पद्य को ले लीजिये । यहाँ पर ‘जड:’ यह विशेषण क्रूप के साथ भी लगता है और मैं के साथ भी । क्योंकि ‘जड:’ में प्रथमा है और ‘कूप:’ तथा ‘अहम्’ के साथ उसका सामानाधिकरण्य है । यहाँ पर कोई ‘यथा’ ‘वत्’ ‘इव’ इत्यादि वाचकशब्द विद्यमान नहीं है । फिर भी अर्थसामर्थ्य से उपमालङ्कार की अभिव्यक्ति हो जाती है । इस प्रकार वाच्यार्थ और व्यङ्ग्यार्थ उपमा की प्रतीति में पौर्वापर्य क्रम भली-भाँति लक्षित होता है । यहाँ पर यह भी ध्यान रखना चाहिये कि यदि ऐसे स्थान पर किसी रस की भी ध्वनि होती है तो वह असंलक्ष्यक्रम ही रहता है । इसी तथ्य को प्रकट करने के लिये ‘केवल अलङ्कार’ में ‘केवल’ शब्द का प्रयोग किया गया है । जैसे ‘प्रातः धनैः······कृतोऽहम्’ इस पद्य से ही उपमालङ्कार की ध्वनि तो संलक्ष्यक्रम है किन्तु उससे अभिव्यक्त होनेवाला करुण रस संलक्ष्यक्रम ही रहता है ।
( प्रश्न ) ‘गावो वः पावनानां परम्परिमितां प्रीतिमुत्पादयन्तु’ इस शाब्दी वाक्यव्यञ्जना में और ‘प्रातः धनैः·····कृतोऽहम्’ में शाब्दी पदव्यञ्जना में व्यङ्ग्यार्थप्रतीति को शब्दशक्तिमूलक कहा गया है, दूसरी ओर आप कहते हैं कि
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अविवक्षितवाच्यस्य तु ध्वने: प्रसिद्धस्वविषयवैमुख्यप्रतीतिपूर्वकमेवार्थान्तरप्रकाशनमिति नियमभावी क्रम: । तत्राविवक्षितवाच्यत्वादेव वाच्येन सहृव्यङ्ग्यस्य क्रमप्रतीतीविचारो न कृत: । तस्मादभिधानाभिधेयप्रतीत्योरिव वाच्यव्यङ्ग्यप्रतीत्योरिनिमित्तनिमित्तिभावात्रियनियमभावात् क्रम: । से तु युक्त्या कवचिद् लक्ष्यते कवचिन्न लक्ष्यते ।
अविवक्षितवाच्य ध्वनि का प्रकाशन तो अपने प्रसिद्ध विषय के वैमुख्य की प्रतीति के साथ ही होता है; अतः क्रम नियम से ही होनेवाला है । उसमें वाच्य के अविवक्षित होने के कारण ही वाच्य के साथ व्यङ्ग्य के क्रम की प्रतीति का विचार नहीं किया गया । अतएव अभिधान और अभिधेय की प्रतीति के समान वाच्य और व्यङ्ग्य की प्रतीतियों का निमित्त-निमित्तिभाव होने से नियमानुसार क्रम होनेवाला है । वह उक्त युक्ति से कहीं लक्ष्य होता है कहीं लक्षित नहीं होता ।
स्वविषयेऽति । अन्धशब्दादेरुपहतचक्षुष्कादि: स्वो विषय:, तत्र यद्वैमुख्यमनादर इत्यर्थ: । तन्न यदैसुख्यमनादर इत्यर्थ: । विचारो न कृत इति नामधेयनिरूपणद्वारेणेति शेष: । सहभावस्य शङ्कितुमन्त्रयुक्तत्वादितिमाव: । एवं रसादय: कैशिक्यादीनामितिवृत्तभागरूपाणां वृत्तीनां जीवीतसुपनागरिकादीनाऽपि सर्वस्यास्योभयस्यापि वृत्तिव्यवहारस्य रसादिनियन्न्र्तविषयत्वादिति यत्प्रस्तुतं तत्प्रसङ्गेन रसादीनां वाच्यातिरिक्तत्वं समर्थेयितुं क्रमो विचारित इत्यतदुपसंहारात्—तस्मादिति । अभिधानस्य वाचकस्य पदं प्रतीति-स्ततोडभिधेयस्य ।
यदाह तत्र सवान्न—
'अपने विषय' यह । अन्ध शब्द इत्यादि का फूटी हुई आँखोंवाला इत्यादि अपना विषय है, उसमें जो वैमुख्य अर्थात् अनादर यह अर्थ है । 'विचार नहीं किया गया' यह । यहाँ पर यह शेष है—'नामघेय निरूपण के द्वारा' । भाव यह है—क्योंकि यहाँ पर सहभाव की शङ्का करना उचित नहीं है । इस प्रकार इितवृत्त-भागरूप कैशिकी इत्यादि वृत्तियों के और उपनागरिका इत्यादि वृत्तियों के जीवन से नियन्त्रित होते हैं । इस प्रकार जो प्रस्तुत था उसके प्रसङ्ग से रस इत्यादि के वाच्यातिरिक्तत्व का समर्थन करने के लिये क्रम का विचार किया गया यह उपसंहार कर रहे हैं—'अतएव' इत्यादि । शब्दरूप अभिधान की पहले प्रतीति होती है तब अभिधेय की । जैसा कि श्रीमान् जी ने कहा है—
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'विषयत्वमनापन्नैः शब्दैरैर्थः प्रकाश्यते' इत्यादि । 'अतोनिर्जातरूपत्वात्किमहेत्यभिधीयते ।' इत्यत्रापि चाविनाभाववत् समयस्याभ्यस्तत्वात् कमो न लक्ष्येतापि ।
'विषयत्व को बिना प्राप्त हुए शब्दों से अर्थ का प्रकाशन नहीं होता:' इत्यादि । 'इससे रूप के अनिर्जात होने से क्या कहा ? यह कहा जाता है ।' यहां पर भी अविनाभाव के समान शब्दों के अभ्यस्त हो जाने से क्रम लक्ष्य हो न हो ।
तारावती
यहाँ पर अर्थसामर्थ्य से अलङ्कार का आरोप कर लिया जाता है । इस प्रकार ये दोनों कथन परस्पर विरुद्ध हैं । यदि अर्थशक्ति से उपमा की व्यञ्जना होती है तो यह उपमा शब्दशक्तिमूलक कैसे हुई? यदि शब्दशक्तिमूलक है तो अर्थसामर्थ्य से आरोप का क्या अर्थ ? अर्थशक्ति से आरोप और शब्दशक्तिमूलकता इनमें विरोध क्यों नहीं ?
( उत्तर ) इस प्रकार के विषय में ऐसे शब्दों का प्रयोग होता है जिनमें दोनों प्रकार के ( वाच्य और व्यङ्ग्य ) अर्थों से सम्बन्ध रखने की योग्यता हो । जब एक प्रकार का अभिधेय अर्थ प्रकरणादिवश नियत हो जाता है तब शब्दसामर्थ्य से दूसरा भी अर्थ ले लिया जाता है और उसी शब्दसामर्थ्य से अर्थप्रतीति भी प्रतिप्रसूत हो जाती है । अतएव वहाँ पर व्यङ्ग्यार्थप्रतीति शब्दशक्तिमूलक कही जाती है ।
आशय यह है कि अर्थसामर्थ्य का पुनरुज्जीवन शब्दशक्तिके बल पर ही होता है । अतः अर्थसामर्थ्य से आरोप और शब्दशक्तिमूलकता इन दोनों कथनों में परस्पर कोई विरोध नहीं । इस विषय की पहले शब्दशक्तिमूलक ध्वनि-निरूपण के प्रकरण में पर्याप्त व्याख्या की जा चुकी है, अतः यहां विशेष विवेचन अपेक्षित नहीं है ।
यह तो हुई विवक्षितान्यपरवाच्य ध्वनि की बात । अब अविवक्षितवाच्य ध्वनि को ले लीजिये—इस ध्वनि में, दूसरे अर्थ का प्रकाशन स्वविषयवैश्वर्य की प्रतीति के द्वारा हुआ करता है ।
आशय यह है कि अविवक्षितवाच्य ( लक्षणामूलक ) ध्वनियों में पहले तो अपने विषय ( वाच्यार्थ ) की प्रतीति होती है, फिर उसका बाध होता है जिसमें अपने विषय ( वाच्यार्थ ) से विमुख हो जाना पड़ता है, तब लक्ष्यार्थ की प्रतीति होती है और बाद में व्यञ्जनाजन्य बोध होता है ।
जैसे 'निःश्वासान्ध इवादर्शश्रन्द्रमा न प्रकाशते' में अन्ध शब्द का अर्थ है नेत्रहीन । फिर मलिनरूप लक्ष्यार्थ की प्रतीति होती है और तब कहाँ; अतिशयतालूप व्यङ्ग्यार्थ का बोध होता है ।
इस प्रकार इस प्रक्रिया में नियम से ही एक प्रकार का क्रम अवश्य विद्वानों रहता है जो कि लक्ष्यित भी किया जा सकता है ।
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कि यहाँ पर क्रम अवश्य लक्षित होता है तव आप इस भेद को संक्षेप्यक्रमगण्यदृश्य के भेदों में क्यों नहीं रखते? (उत्तर) यदि वाच्यार्थ अभिमत और विवक्षित हो तब तो उसके साथ व्यङ्ग्यार्थ का विचार करना ठीक हो सकता है, किन्तु जब वाच्यार्थ विवक्षित ही नहीं तब उसके साथ व्यङ्ग्यार्थ के सम्बन्ध का न तो विचार ही किया जा सकता है और न उसके आधार पर नामकरण ही किया जा सकता है। आशय यह है कि क्रम होता तो प्रत्येक व्यङ्ग्यार्थ प्रकाशन में है। किन्तु वह कहाँ लक्षित होता है कहाँ नहीं।
(प्रश्न) रस इत्यादि को वृत्तियों का जीवन बतलाने के लिये प्रकरण का उपक्रम किया गया था और उपसंहार ‘कहीं वाच्यार्थ और व्यङ्ग्यार्थ का क्रम लक्षित होता है कहाँ नहीं होता’ यह कहकर दिया गया। इस उपक्रम और उपसंहार की संगति किस प्रकार बैठती है? (उत्तर) प्रस्तुत प्रकरण यह दिखलाने के लिये उठाया गया है कि वृत्तियाँ दो प्रकार की होती हैं—कैशिकी इत्यादि अर्थवृत्तियाँ जो इतिवृत्त भाग रूप होती हैं और उपनागरिका इत्यादि शब्द वृत्तियाँ। इन दोनों प्रकार की वृत्तियों का जीवन रस इत्यादि ही होते हैं। इस प्रकार इस समस्त वृत्तिव्यवहार का नियन्त्रण रस इत्यादि के द्वारा ही होता है। इसीलिये वृत्तियों का जीवन रस मानें जाते हैं। यही प्रस्तुत प्रकरण है। इस प्रकरण में प्रसंगवश यह दिखलाया गया कि रस इत्यादि वाच्य से भिन्न होते हैं। इसी बात का समर्थन करने के लिये वाच्य और व्यङ्ग्य के क्रम पर विचार कर लिया गया। इस प्रकार यहाँ पर उपक्रम और उपसंहार का कोई विरोध नहीं।
ऐसा तो प्रायः होता है कि कार्य कारण का क्रम अभिक अभ्यस्त हो जाने पर प्रतीत नहीं होता। उदाहरण के लिये अभिधान और अभिधेय को ले लीजिये। शब्द अभिधान होता है। उसकी प्रथम प्रतीति होती है और अभिधेय (वाच्यार्थ) की प्रतीति बाद में, क्योंकि शब्द और अर्थ का निमित्त-निमिच्तभाव सम्बन्ध होता है। (इनमें भी एक क्रम होता है। पहले बालक वृद्ध व्यवहार में शब्द को सुनता है, फिर अवापोद्वाप से उसका अर्थ समझता है और तब प्रत्यभिज्ञा के बल पर अर्थबोध करता है। किन्तु जब अनेकशः व्यवहार के कारण उसे किसी अर्थ का पूर्ण ज्ञान होता है तब बिना ही क्रमप्रतीति के वह अर्थ को समझता जाता है।) शब्द और अर्थ के क्रम के विषय में भगवान् भर्तृहरि जी ने कहा है—‘जब तक शब्द श्रवण इत्यादि क्रिया-विषय को प्राप्त नहीं हो जाते तब तक वे अर्थ को प्रकाशित नहीं कर सकते।’ इसके बाद भर्तृहरि जी ने इसका प्रतिपादन करते हुये लिखा है—‘इसलिये ‘शब्द के रूप-ज्ञान न होने पर लोग पूछा करते हैं कि आपने
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तदेवं व्यङ्कक्रमुचेन ध्वनिप्रकारे पुनरुत्पादितेषु कवितात्वेन-किमिदं व्यङ्ककत्वं नाम ? व्यङ्ग्यार्थप्रकाशनम् ? नहि व्यङ्ककत्वं व्यङ्ग्यप्रकाशनं चाथंन्य व्यङ्ककसिद्ध्यर्थोनं व्यङ्ग्यप्रतं व्यङ्ग्यापेक्षया च व्यङ्ककतत्सिद्धिरित्यनयोः संप्रत्याद-व्यपेक्ष्यस्थानम् ।
तदेवं व्यङ्कक्रमुचेन ध्वनिप्रकारे पुनरुत्पादितेषु कवितात्वेन-किमिदं व्यङ्ककत्वं नाम ? व्यङ्ग्यार्थप्रकाशनम् ? नहि व्यङ्ककत्वं व्यङ्ग्यप्रकाशनं चाथंन्य व्यङ्ककसिद्ध्यर्थोनं व्यङ्ग्यप्रतं व्यङ्ग्यापेक्षया च व्यङ्ककतत्सिद्धिरित्यनयोः संप्रत्याद-व्यपेक्ष्यस्थानम् ।
(अनु०) वह इस प्रकार व्यङ्कक मूल से ध्वनि के प्रकारों के निलष्ति कर दिये जाने पर कोई कहे—यह व्यङ्ककत्व क्या है ? क्या व्यङ्ककथ्य था का प्रकारण ? अर्थ का व्यङ्जकत्व और व्यङ्ग्यत्व ( वनता) हु नहिं । व्यङ्ग्यप्रकाशन व्यङ्जकत्व को सिद्धि के आधीन होता है और व्यङ्ग्यप्र की अपेक्षा ते व्यङ्ककत्व ही नहिं होत है । इस प्रकार अन्योन्याश्रय दोषने से असंप्रत्यादोष हो जादै ।
उद्योतारम्भे युक्तं व्यङ्कनमुखेन हेतोः स्वरूपं प्रतिपाद्यत इति तद्देशीयमुपसंहरण व्यङ्ककभावं प्रयमोद्योते समर्यादसमपि शिष्याणामेकवाक्येन हृदि निवेशयितुं पूर्वपक्षमाराह—तदेवंसिद्धिः । कवितादिति । सीमांसकादिः । किमिदमिति । वाक्यमात्र-श्रोदकस्थामियायः ।
उद्योत के प्रारम्भ में जो कहा गया था कि 'व्यङ्ककमुख से ध्वनि के स्वरूप का प्रतिपादन किया जा रहा है' यह उसका इस समय उपसंहर करते हुए प्रयम उद्योत में समर्थित भी व्यङ्जकभाव को शिष्यों के हृदय में एक वाक्य के द्वारा निवेश करने के लिये पूर्वपक्ष को कहते हैं—वह इस प्रकार' यह । 'कोरे' यह । आगे कहा जादैतला पूर्वपक्षो-प्रस्तुतकर्ता का अभिप्राय है ।
उद्योत के प्रारम्भ में जो कहा गया था कि 'व्यङ्ककमुख से ध्वनि के स्वरूप का प्रतिपादन किया जा रहा है' यह उसका इस समय उपसंहर करते हुए प्रयम उद्योत में समर्थित भी व्यङ्जकभाव को शिष्यों के हृदय में एक वाक्य के द्वारा निवेश करने के लिये पूर्वपक्ष को कहते हैं—वह इस प्रकार' यह । 'कोरे' यह । आगे कहा जादैतला पूर्वपक्षो-प्रस्तुतकर्ता का अभिप्राय है ।
तारावती
क्या कहा ?' इस प्रकार जैसे अविनाभाव सम्बन्ध अथांत उच्यते ज्ञान में क्रम होते हुये भी अधिक अभ्यस्त हो जाने के कारण लक्षित नहीं होता, उसी प्रकार स्फुटतरज्ञान भी अधिक अभ्यस्त हो जाने के कारण लक्षित नहिं हुता । यहीं दशा व्यङ्कव्य और व्यङ्ग्य की है कि इनमें एक क्रम अवश्य विद्यमान रहता है । किन्तु जव विशेष अभ्यास हो जाता है तब उसकी प्रतीति नहीं होती ।
प्रस्तुत ( तृतीय ) उद्योत के प्रारम्भ में प्रतिज्ञा की गई थी कि इस उद्योत में ध्वनन की के रूप में ध्वनि का निरूपण किया जायगा । वह लगभग पूरी हो गई। अव उस प्रकरण का उपसंहार करते हुये व्यङ्ककना की स्थापना की जा रही है । यद्यपि यह कार्य तो प्रथम उद्योत में ही किया जा चुका है। तथापि शिष्यवृन्दद्वैश्यात् और विपक्षमुखमुद्रण के लिये उसका फिर एक बार समर्थन उचित प्रतीत होता है
प्रस्तुत ( तृतीय ) उद्योत के प्रारम्भ में प्रतिज्ञा की गई थी कि इस उद्योत में ध्वनन की के रूप में ध्वनि का निरूपण किया जायगा । वह लगभग पूरी हो गई। अव उस प्रकरण का उपसंहार करते हुये व्यङ्ककना की स्थापना की जा रही है । यद्यपि यह कार्य तो प्रथम उद्योत में ही किया जा चुका है। तथापि शिष्यवृन्दद्वैश्यात् और विपक्षमुखमुद्रण के लिये उसका फिर एक बार समर्थन उचित प्रतीत होता है
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तत्र वाच्यवयतिरिक्तस्य व्यङ्गच्यस्य सिद्धिः प्रागेव प्रतिपादिता तत्सिद्धचधीनां च व्यङ्ककसिद्धिरंति कः पर्यनुयोगावसरः । सत्यमेवतत्; प्रागुक्तयुक्तिनिर्यंचयतिरिक्तस्य वस्तुनः सिद्धिः कृतात, स स्वार्थों व्यङ्गचयतयैव कस्माद्वचपदर्श्यते? यत्न न प्राधान्येनावस्थातं तत्र वाच्यतयैवासौ व्यपदेष्टुं युक्तः, तत्परत्वाद्वाचक्यस्य । अतश्च तत्पकाशिनो वाक्यस्य वाचकत्वमेव व्यापारः । किं तस्य व्यापारान्तरकल्पनया ? तस्मात्तात्पर्यैविषयो योध्रः स तावन्मुख्यतया-वाच्यः । या स्वन्तरा तथाविधे विपये वाच्यान्तरप्रतीतिः सा तत्प्रतीतिरुपायमात्रं पदार्थप्रतीतिरिव वाक्यार्थप्रतीतेः ।
( अनु० ) ( प्रश्न ) वाच्यव्यतिरिक्त वस्तु की सिद्धि का प्रतिपादन तो पहले ही कर दिया; उसकी सिद्धि के आभीन व्यङ्कक की सिद्धि हैं तो परिप्रश्न का अवसर ही क्या ? ( उत्तर ) यह सच ही है । पहले कहीं हुई युक्तियों से वाच्य-व्यतिरिक्त वस्तु की सिद्धि की गई । वह अर्थ तो व्यङ्गच्य के रूप में ही क्यों व्यपदेष्ट ( नाम ) को प्राप्त होता है । और जहाँ पर प्राधान्य के रूप में अवस्थान नहीं होता वहाँ इसका नामकरण वाच्य के रूप में ही करना उचित हैं क्योंकि वहाँ पर वाचकत्व तात्पर्यक है । अतः उसको प्रकाशित करनेवाले वाक्य का वाचकत्व ही व्यापार है । उसके दूसरे व्यापार की कल्पना की क्या आवश्यकता? इससे तात्पर्यविषयक जो अर्थ होता है वह मुख्य रूप में वाच्य होता है । और जो बीच में उस प्रकार के विषय में दूसरे वाच्य की प्रतीति होती है वह उस प्रतीति का केवल उपाय उसी प्रकार पदार्थप्रतीति वाक्यार्थप्रतीति का उपायमात्र होती है । लोचन प्रागेवत् । प्रथमोद्योते अभिधावाद निराकरण । अतश्च न व्यङ्ककसिद्धचया तदाह–तत्सिद्धीत्येनान्योन्याश्रयः शङ्कचयेत, अपि तु हेत्वन्तरैरेतस्य साधितत्वादिति भावः । तत्सिद्धीति । 'पहले ही' यह । प्रथम उद्योत में अभिधावाद के निराकरण में । और इसीलिये व्यङ्कक की सिद्धि से उसकी सिद्धि नहीं होती जिससे अन्योन्याश्रय की आशङ्का की जाय, अपितु क्योंकि दूसरे हेतुओं से उसे सिद्ध कर दिया गया है यह भाव है ।
तारावती जिससे एक प्रवक्तृ में ही सारी वस्तु शिष्यों की बुद्धि में सन्निविष्ट हो जाय । सर्वप्रथम यहाँ पर पूर्वपक्ष की स्थापना की जा रही है । अतः यहाँ पर जो कुछ कहा जा रहा है वह इस प्रकरण को उठानेवाले प्रेरक व्यक्ति की ओर से ही समझा
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स तर्हि: अस्वससो द्वितीयोऽर्थ:; तस्य चंदि व्यङ्ग्य इति नाम कृतम्, वाच्यं चेत्यपि कंस्माद्व क्रियते ? व्यङ्ग्य इति वाच्याद्विमतस्यापि कस्माद्व क्रियते ? अवगम्यमानत्वेन हि शब्दार्थस्वं तदेव वाचकत्वम् । असिंचा हि यद्यच्यन्ता तदेवास्मच्छायको वसुचित्तम्, तदर्थतया नु प्रकाशाभिमुखे तावदर्थे—इति बुद्धौ विप्रतिपत्तिध्वनेरचंद्रूपं निरूपितं तत्रैवासिध्याद्व्यापारेण मतिविघं युक्तम् । तदाह—यत्र चैति । तत्प्रकाशिन इति । तद्वाच्याद्विमतं प्रकाश्यतयैवश्रयं तद्वाक्यं तस्येति ।
वह तो यह है । यह द्वितीय अर्थ हो । उसका वाच्य यह नाम किया गया है तो वाच्य यह भी क्यों नहीं किया जाता ? व्यङ्ग्य यह वाच्याद्विमत का भी कयों नहीं किया जाता ? अवगत होने के साथ जो शब्द का अर्थ वाच्य होता है । उसका पर्यन्त होना तो उस अर्थ के प्रधान होने पर होता है; इस प्रकार ध्वनि का जो रूप मृर्धाभिषिक्त रूप में निलुप्त किया गया या । उसी में अभिधाव्यापार का होना उचित है । वही कहते हैं—'जहाँ पर' यह । 'उसको प्रकाशित करनेवाला' यह । जो वाक्य उस व्यङ्ग्याभिमत को अवश्य प्रकाशित करे उसका यह ( अर्थ है ) ।
तारावती कतिपय दार्शनिक विचारधारायें इस प्रकार की हैं कि जो ऐसे अवसरों पर व्यङ्ग्यनव्यापार को स्वीकार नहीं करती । इसमें मीमांसक और वैयाकरण मुख्य हैं । वे लोग कह सकते हैं कि अपने यहाँ पर व्यञ्जकत्व के द्वारा ध्वनि का निरूपण तो कर दिया, किन्तु इस पर प्रकाश नहीं डाला कि व्यञ्जकत्व क्या वस्तु है ? क्या आप व्यञ्जकत्व की परिभाषा यह करते हैं कि व्यङ्ग्यार्थ को प्रकाशित करना ( व्यङ्ग्यार्थ को प्रकाशित करनेवाला तत्व ) व्यञ्जक कहा जाता है? यदि आप व्यञ्जकत्व की यह परिभाषा मानेंगे तो न तो अर्थ का व्यञ्जकत्व ही सिद्ध हो सकेगा और न व्यङ्ग्यार्थ ही । क्योंकि जब व्यङ्ग्यार्थ का पहले ज्ञान जायगा तभी व्यङ्ग्यार्थ को प्रकाशित करनेवाला तत्व व्यञ्जक कहा जा सकेगा । इस प्रकार व्यञ्जक की परिभाषा के अनुसार यदि पहले व्यङ्ग्यार्थ का ज्ञान नहीं हो जायेगा तो व्यञ्जक का ज्ञान हो ही न सकेंगा । तब प्रश्न उठेगा कि व्यङ्ग्य किसे कहते हैं और व्यङ्ग्य की परिभाषा यह की जायेगी कि व्यञ्जक शब्दों से उत्पन्न बोध के विषय को व्यङ्ग्य कहते हैं । इस प्रकार व्यङ्ग्य को समझने के लिये पहले व्यञ्जक को सम्झना अनिवार्य हो जायेगा । व्यञ्जक की सिद्धि व्यङ्ग्य के आधीन और व्यङ्ग्य की सिद्धि व्यञ्जक के आधीन, यह अन्योन्याश्रय दोष आ जायगा ।
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शास्त्र का नियम है कि अन्योन्याश्रय दोष जहाँ होता है वहाँ उसे शास्त्रीय मान्यता प्राप्त नहीं होती तथा दोनों का ही परित्याग कर दिया जाता है। अतः यहाँ पर अन्योन्याश्रय दोष आप जाने से न तो व्यङ्ग्यत्व ही सिद्ध हो सकेगा न व्यञ्जकत्व ही। इस प्रकार पूर्वपक्षी ने यह सिद्ध कर दिया कि व्यङ्जकत्व का स्वरूपनिर्धारण ही असम्भव है फिर उसके रूपमें ध्वनि के विवेचन का प्रश्न ही नहीं उठता। किन्तु पूर्वपक्षी को यह शङ्का है कि कहीं उसकी मान्यता का प्रत्याख्यान सिद्धान्ती एक दूसरे रूप में न कर दे। अतः वह सिद्धान्ती के सम्भावित उत्तर की कल्पना करके उसका निराकरण कर रहा है—इस पर यह कहा जा सकता है कि प्रथम उद्योत में अभिधावाद के निराकरण के अवसर पर व्यङ्गय की सत्ता पहले हो सिद्ध की जा चुकी है। अतः व्यङ्गय की सिद्धि में व्यञ्जक की सिद्धि की अपेक्षा नहीं है। इस प्रकार अन्योन्याश्रय दोष नहीं आता। क्योंकि व्यङ्गय तो पहले ही सिद्ध है। उस व्यङ्गय के आधीन व्यञ्जक सिद्ध हो सकता है। अतः कोई दोष नहीं। इस सम्भावित कथन पर पूर्वपक्षी का कहना है कि यह तो टीक ही है कि पहले इसकी सिद्धि की जा चुकी है। हमें इसमें विवाद नहीं कि वाच्य से भिन्न दूसरा और अर्थ होता है। किन्तु प्रश्न तो यह है कि उसका नामकरण 'व्यङ्गय' होना चाहिये इसमें आपके पास क्या प्रमाण है? हम उसे व्यङ्गय तभी कहेंगे जब व्यञ्जना नामक अतिरिक्त व्यापार सिद्ध हो जाय। उस व्यञ्जनाव्यापार को तो आपने सिद्ध ही नहीं किया, फिर आप उस वाच्यातिरिक्त अर्थ को व्यङ्गय यह नाम दे किस प्रकार सकते हैं? यदि आप अनुमान नाम रखते के लिये स्वतन्त्र हैं तो जिसे आप व्यङ्गय कहते हैं उसे हम वाच्य कह सकते हैं अथवा जिसे आप वाच्य कहते हैं उसे हम व्यङ्गय कह सकते हैं। इसके अतिरिक्त दोनों अर्थों को वाच्य कहने में तर्क भी अधिक है, क्योंकि वाचकत्व की परिभाषा यहीं तो है कि किन्हीं शब्दों का ऐसा अर्थ हो जो कि तत्व का बोध करा सके। जिस तत्व का बोध कराया जाता है उसी तत्व को वाच्य की संज्ञा प्राप्त हो जाती है। उचित यही है कि अभिधा का प्रसार जहाँ तक हो उसी अर्थ को अभिधेयार्थ माना जाय और उसे ही करेंगे जो शब्दप्रयोग से अन्तिम बोध होगा। अन्तिम बोध तक हो जाता है जो शब्द का अन्तिम अभिप्रेत अर्थ होता है। इस प्रकार जिस अर्थ को आप ध्वनि नाम से मूर्धाभिषिक्त करते हैं और जिसको आप ध्वनि का स्वरूप घोषित करते हैं वह और कुछ नहीं
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उपायभात्रक्रियत्पनेन यति । मात्रमते हि—
साधारणण्योक्त्या मातृं प्रामाकरं वैच्याकरणं च पूर्वपक्षं सूचयितुमेवेह तद्वते । मान्तरैक्यम् । पाके ज्वालवत् काष्ठानां पदार्थप्रतिपादनम् ॥
'उपायमात्र' इसकै द्वारा साधारण उक्ति से मातृ, प्रामाकर और वैच्याकरण के पूर्वपक्ष को सूचित करता है । निस्सन्देह मातृमत में—
'वाक्यार्थै की प्रतीति के लिये ही उनकी प्रष्ठत्ति में अविनाभाव सम्बन्ध से प्राप्त पदार्थ का प्रतिपादन पाक में काष्ठों की ज्वाला के समान होता है ।'
वाक्य का तात्पर्य मात्र है और उस अर्थ के प्रत्यायन के लिये भी स्वाभाविकतापन्न ही पर्याप्त है । पृथक् रूप में व्यञ्जनाव्यापार को मानने की क्या आवश्यकता? आशय यह है कि जहाँ वाच्यव्यतिरिक्त अर्थ प्रधान रूप में स्थित हो वहाँ भी उसे वाच्य का नाम देना ही उचित है क्योंकि वाक्य का तात्पर्य उसी अर्थ में होता है । अतएव जिस व्यञ्जनाव्यापार का आश्रय लेकर उस अर्थ का प्रकाशन किया जाता है उसे वाचकत्व या अभिधाव्यापार कहना ही ठीक है ।
उसके लिये पृथकभूत एक दूसरे व्यञ्जनाव्यापार को मानने की क्या आवश्यकता? इस प्रकार तात्पर्यविषयक जो अर्थ होता है मुख्यरूप में वही वाच्य कहा जाता है ।
उस पर दो अर्थों की प्रतीति होती है वहाँ एक अर्थ तो अन्तिम अर्थ होता है और दूसरा अर्थ मध्यवर्ती होता है । वह अन्तिम अर्थ की प्रतीति का एक उपाय-मात्र होता है । ( जहाँ पर व्यञ्जनाभिमत अर्थ अन्तिम तात्पर्य का विषय होता है वहाँ वाच्यार्थमात्र मध्यवर्ती होकर व्यञ्जनाभिमत अर्थ का उपाय हो जाता है और जहाँ व्यञ्जनार्थ गौण तथा वाच्यार्थ मुख्य होता है वहाँ व्यञ्जनार्थ मध्यवर्ती होकर वाच्यार्थ का उपाय हो जाता है । ) यह उसी प्रकार होता है जिस प्रकार पद का अर्थ वाक्य के अर्थ का उपाय हुआ करता है ।
ऊपर बतलाया गया है कि जिस प्रकार पदार्थ वाक्यार्थ का उपाय होता है उसी प्रकार वाक्यार्थ भी अन्तिम तात्पर्यार्थ का उपाय होता है । यहाँ पर यह नहीं बतलाया गया है कि प्रस्तुत पूर्वपक्ष किन लोगों के मत में है; किन्तु सामान्य रूप में उपाय का प्रतिपादन करने से यह संकेत मिलता है कि यह पूर्वपक्ष भामह, प्राभाकर और वैच्याकरणों के मत के अनुसार प्रतिपादित किया गया है । इन तीनों मतों में पदार्थ वाक्यार्थ का उपाय ही माना जाता है । श्लोक वार्तिक के वाक्याभकरण में इस विषय में लिखा है—
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इति शब्दावगते: पदार्थैस्तात्पर्येण योज्यर्थ उत्थाप्य्यते स एव वाक्यार्थ:। स एव च वाच्य इति। प्रथमकरदर्शनेऽपि दीर्घदीर्घतरव्यापारो निमित्तितो वाक्यार्थे, पदार्थानां तु निश्चिततया: पारमार्थिक एव। वैचाकरपानां तु सोऽपारमार्थिक इति विशेष:। एतच्चास्माभि: प्रथममध्याय एव विस्तरनिर्णीतमिति न पुनरायस्तत ग्रन्थयोजनैनैव क्रियते। तदेतन्मतत्रयं पूर्वपक्षे योज्यस्म।
इस प्रकार शब्दावगते: पदार्थों के तात्पर्य से युक्त अर्थ उत्पन्न होता है वही वाक्यार्थ होता है। और वही वाच्य होता है। प्रथम करदर्शन में भी दीर्घ-दीर्घतर व्यापार होता है जो वाक्यार्थ में निमित्त होता है, पदार्थों का निश्चित अर्थ पारमार्थिक ही होता है। वैयाकरणों के मत में वह अपारमार्थिक होता है यह विशेषता है। यह हमने पहले ही अध्याय में विस्तार से निर्णय किया है, इसलिए यहाँ ग्रन्थ की पुनरावृत्ति नहीं की जाती। यह तीनों मत पूर्वपक्ष में योजित हैं।
लोचन
इस प्रकार इन तीनों मतों की योजना पूर्वपक्ष में कर देनी थी। अत: पुन: कष्ट नहीं उठाया जा रहा है; केवल ग्रन्थयोजना की जा रही है। इस प्रकार इन तीनों मतों की योजना पूर्वपक्ष में कर देनी थी।
तारावती
जित प्रकार जलते हुए काष्ठों का मुख्य प्रयोजन पाक को तैयार कर देना ही है: किन्तु ज्वाला के अभाव में काष्ठ कभी भी पाक तैयार करने में समर्थ नहीं हो सकते, अत: ज्वाला का पाकक्रिया में अविनाभाव सम्बन्ध है जिसको नान्तरीयक हेतु कहते हैं—अर्थात् ज्वाला के बिना काष्ठ पाक तैयार नहीं कर सकता—इसीलिए मध्य में ज्वाला की कल्पना कर ली जाती है और यह मान लिया जाता है कि काष्ठ ज्वाला में हेतु है तथा ज्वाला पाक में। वस्तुत: काष्ठ का मुख्य प्रयोजन पाक ही है। इसी प्रकार अर्थबोध के लिये उच्चारण किये हुए शब्दों का मुख्य फल होता है वाच्यार्थबोध करना। किन्तु बिना शब्दार्थ के वाक्यार्थबोध नहीं हो सकता; इसीलिये मध्य में शब्दार्थ की कल्पना कर ले ली जाती है और पदार्थ का प्रतिपादन किया जाता है।
जैसे जलते हुए काष्ठों का मुख्य प्रयोजन भोजन पकाने के लिए होता है, लेकिन ज्वाला के बिना काष्ठ कभी भी भोजन पकाने में सक्षम नहीं होते। इसलिए ज्वाला और पाकक्रिया में अविनाभाव संबंध है, जिसे नान्तरीयक हेतु कहा जाता है। अर्थात् ज्वाला के बिना काष्ठ भोजन नहीं पका सकते। इसीलिए मध्य में ज्वाला की कल्पना की जाती है और यह माना जाता है कि काष्ठ ज्वाला का कारण है और ज्वाला पाक का। वास्तव में काष्ठ का मुख्य प्रयोजन पाक ही है। इसी प्रकार अर्थबोध के लिए उच्चारित शब्दों का मुख्य फल वाच्यार्थबोध होता है। लेकिन बिना शब्दार्थ के वाक्यार्थबोध नहीं हो सकता, इसलिए मध्य में शब्दार्थ की कल्पना की जाती है और पदार्थ का प्रतिपादन किया जाता है।
यह है कुमारिल भट्ट के अनुयायियों का कथन! इसका आशय यह है कि शब्दों से जिन अर्थों का अवगमन होता है वे अर्थ पदार्थ कहलाते हैं; वे मध्यवर्त्ती अर्थ होते हैं और तात्पर्य के रूप में एक नये अर्थ को उठाने में कारण बनते हैं। इस प्रकार जो नया अर्थ उठाया जाता है वही वाक्यार्थ कहलाता है और वही वाच्यार्थ होता है। इस प्रकार पदप्रयोग का मुख्य प्रयोजन वाच्यार्थ-ज्ञान होता है किन्तु अन्तरालवर्त्ती पदार्थ उसके सहायक या उपायमात्र होते हैं। यह है भट्टसदुपायो की मान्यता! प्राचीन दर्शनों में भी 'सोडयमिपोरिव'
यह कुमारिल भट्ट के अनुयायियों का कथन है! इसका अर्थ यह है कि शब्दों से जिन अर्थों का बोध होता है, वे पदार्थ कहलाते हैं; वे मध्यवर्ती अर्थ होते हैं और तात्पर्य के रूप में एक नए अर्थ को प्रकट करने में कारण बनते हैं। इस प्रकार जो नया अर्थ प्रकट होता है, वही वाक्यार्थ कहलाता है और वही वाच्यार्थ होता है। पदप्रयोग का मुख्य उद्देश्य वाच्यार्थ-बोध होता है, किन्तु मध्यवर्ती पदार्थ उसके सहायक या साधन मात्र होते हैं। यह भट्ट अनुयायियों की मान्यता है।
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अत्रोच्यते--यत्र शब्दः स्वार्थेऽभिधानोऽर्थान्तरसम्पगमयति तत्र यत्स्व स्वार्थाभिधायित्वं यच्च तदर्थान्तरावगमनहेतुत्वं तयोरविच्छेदो विशेषो वा? न तावद्विशेषः, यस्मात्तौ द्वौ व्यापारौ भिन्नविषयौ भिन्नरूपौ च प्रतीयते एव ।
अत्रोच्यते--यत्र शब्दः स्वार्थेऽभिधानोऽर्थान्तरसम्पगमयति तत्र यत्स्व स्वार्थाभिधायित्वं यच्च तदर्थान्तरावगमनहेतुत्वं तयोरविच्छेदो विशेषो वा? न तावद्विशेषः, यस्मात्तौ द्वौ व्यापारौ भिन्नविषयौ भिन्नरूपौ च प्रतीयते एव ।
(अनु०) यहाँ कहा जा रहा है—जहाँ शब्द अपने अर्थ को कहते हुये अर्थान्तर का अवगमन कराता है वहाँ जो उसका अपने अर्थ का कहना और जो दूसरे अर्थ के अवगम का हेतु होना उन दोनों में ( कोई ) विशेषता ( भेद ) नहीं है या है ? यह नहीं कि भेद नहीं है क्योंकि वे दोनों व्यापार भिन्न विषयवाले और भिन्न रूपवाले प्रतीत होते ही हैं । वह इसप्रकार—शब्द का वाचकत्व रूप व्यापार अपने अर्थ के विषय में होता है और अभिधानरूप व्यापार दूसरे अर्थ के विषय में होता है । वाच्य और व्यङ्ग्य का अपना और पराया यह व्यवहार छिपाया नहीं जा सकता क्योंकि एक की प्रतीति सम्वन्धी के रूप में होती है और दूसरे की सम्वन्धी के सम्वन्धी के रूप में ।
दीर्घदीर्घतरौ व्यापारः' का सिद्धान्त माना जाता है । इसका आशय यह है कि जिस प्रकार वाण का व्यापार सन्धान के बाद गात्रापघात और प्राणापहरण रूप में आगे-आगे बढ़ता जाता है; प्राणापहरण ही उसका मुख्य प्रयोजन होता है; मातृअपघात इत्यादि मध्यवर्त्ती कियायें उसका उपायमात्र होती हैं उसी प्रकार पद, पदार्थ और वाक्यार्थ के विषय में भी समझना चाहिये । वाक्यार्थ नैमित्तिक होता है और पदार्थ निमित्तमात्र । इस प्रकार प्राभाकर दर्शन में भी पदार्थ का वाक्यार्थ से उपायमात्र का सम्बन्ध माना जाता है । वैैयाकरण दर्शन में भी इसी प्रकार की मान्यता है । अन्तर केवल यह है कि प्राभाकर दर्शन में कार्यान्वित में शक्ति मानी जाती है, अतएव उसमें पृथक् रूप में तत्पर्य-बृत्ति के मानने की आवश्यकता नहीं होती और अन्तरालवर्त्ती पदार्थ तात्त्विक माने जाते हैं । किन्तु वैैयाकरण इन अन्तरालवर्त्ती अर्थों को उसी प्रकार आतत्त्विक मानते हैं जिस प्रकार वेदान्त में अविद्या कल्पित घट पट इत्यादि समस्त पदार्थ आतत्त्विक ही माने जाते हैं । वेदान्त उन सबको ब्रह्मरूप ही मानता है । उसी प्रकार वैैयाकरण
दीर्घदीर्घतरौ व्यापारः' का सिद्धान्त माना जाता है । इसका आशय यह है कि जिस प्रकार वाण का व्यापार सन्धान के बाद गात्रापघात और प्राणापहरण रूप में आगे-आगे बढ़ता जाता है; प्राणापहरण ही उसका मुख्य प्रयोजन होता है; मातृअपघात इत्यादि मध्यवर्त्ती कियायें उसका उपायमात्र होती हैं उसी प्रकार पद, पदार्थ और वाक्यार्थ के विषय में भी समझना चाहिये । वाक्यार्थ नैमित्तिक होता है और पदार्थ निमित्तमात्र । इस प्रकार प्राभाकर दर्शन में भी पदार्थ का वाक्यार्थ से उपायमात्र का सम्बन्ध माना जाता है । वैैयाकरण दर्शन में भी इसी प्रकार की मान्यता है । अन्तर केवल यह है कि प्राभाकर दर्शन में कार्यान्वित में शक्ति मानी जाती है, अतएव उसमें पृथक् रूप में तत्पर्य-बृत्ति के मानने की आवश्यकता नहीं होती और अन्तरालवर्त्ती पदार्थ तात्त्विक माने जाते हैं । किन्तु वैैयाकरण इन अन्तरालवर्त्ती अर्थों को उसी प्रकार आतत्त्विक मानते हैं जिस प्रकार वेदान्त में अविद्या कल्पित घट पट इत्यादि समस्त पदार्थ आतत्त्विक ही माने जाते हैं । वेदान्त उन सबको ब्रह्मरूप ही मानता है । उसी प्रकार वैैयाकरण
तारावती
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अत्रोक्तं पूर्वपक्षे--उच्यत इति सिद्धान्तः। वाचकत्वं गमकत्वं चेत् स्वरूपतो भेदः स्वार्थेभ्योऽन्तरे क्रियाभेदात् विप्रकर्षः। न तु तस्मिन्नेव कस्यचिद् भेदः। न चेत् तस्य न क्रियाभेदादि को विषयार्थ इत्याशङ्क्याह--न चेत्।
लोचन यहाँ पर अर्थात् पूर्वपक्ष में । 'कहाँ जो रहता है' अर्थात् शब्दान्तर वाचकत्व और गमकत्व यह स्वरूप से भेद है और क्रियाभेदः क्रियार्थ में तथा अर्थान्तर में वह विषय से भेद हैँ । यदि उसे अर्थ अवगत होता है तो अर्थान्तर क्यों कहा जाता है ? नहीं तो वह उसका कुछ नहीं होता तो विषय का क्या अर्थ ? यह शङ्का करके कहते हैं--न चेत् इत्यादि ।
तारावती होता उसी प्रकार 'घट लाओ' में प्रत्येक शब्द का कोई अर्थ नहीं । उनका अर्थ मानना केवल अविद्यकल्पित है । इसका विस्तृत विवेचन प्रथम उद्योत में किया जा चुका है । अतः यहाँ पर ग्रन्थयोक्तना के लिये संकेतमात्र कर दिया गया है । तारावती यह हैः कि यह पूर्वपक्ष का भाट्ट, प्रभाकर और वैय्याकरण इन तीनों के मत में सामान्यरूप में स्थापित किया गया है । अन सिद्धान्तपक्षी अपने मत का प्रतिपादन करने के लिये पूर्वपक्ष की आलोचना कर रहा है—यहाँ पर दृष्टि यह कहना है कि जहाँ पर शब्द अपने अर्थ को कहते हुये दूसरे अर्थ का अवगम कराता है वहाँ दो अर्थ हो जाते हैं एक स्वार्थ और दूसरा अर्थान्तर । वहाँ पर स्वार्थ और अर्थान्तर दोनों को प्रकट करने में शब्द के जो दो व्यापार होते हैं उनमें आप अभेद ( व्यापार की एकात्मकता ) मानते हैं या भेद ( विभिन्नरूपता ) । यहाँ आप कह दो नहीं सकत उनमें व्यापार का एकात्मकता होती है क्योंकि दोनों व्यापारों के विषयों में भी भेद होता है और रूप में भी भेद होता है तथा दोनों में भेद की प्रतीति प्रकट रूप में होती है । शब्द पहले स्वार्थ को प्रकट करता है फिर अर्थान्तर को, इस प्रकार इनकी प्रतांति भिन्न कालों में क्रम से होती है, अतः दोनों का विषयभेद मानना अनिवार्य हो गया । इसी प्रकार एक व्यापार को वाचकत्व ( अभिधा ) कहते हैं दूसरे को लक्ष्यक्त्व ( व्यञ्जना ) । यह इनके रूप में भेद हो गया । विषय और रूप दोनों में भेद होने के कारण हम इन दोनों व्यापारों को अभिन्न नहीं मान सकते । ( प्रश्न ) यदि आप यह मानते हैं कि शब्द से ही दूसरा अर्थ अवगत होता है तो आप उसे अर्थान्तर ( दूसरा अर्थ ) क्यों कहते हैं; वह तो शब्द का अपना ही अर्थ है—अर्थान्तर कैसे हुआ ? यदि आप यह मानते हैं कि वह अर्थ शब्द का नहीं है तो अरुन्द से बशका सम्बन्ध ही क्या ? ैैसी दशा में उस अर्थ को शब्द का विषयार्थ
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वाच्यो ह्यर्थः साकाच्छब्दस्य सम्वन्धी तदितरस्त्वविभेयसामर्थ्याद्विमः । सर्वान्धसरचनन्धी यदिच स्वसम्वन्धित्वं साक्षात्तस्य स्यादितदार्थान्तरस्य व्यवहारे च न स्यात् । तस्माद्विषयभेदस्तावत्तयोर्व्यापारोः सुप्रसिद्धः ।
(अनु०) निरन्वयेह वाच्यार्थ शब्द का साक्षात् सम्वन्धी होता है और उससे भिन्न तो अभिधेय सामर्थ्य से आक्र्षित सम्वन्धीसम्वन्धी होता है । यदि उसका साक्षात् स्वसम्वन्धित्व हो तो अर्थान्तरत्व व्यवहार नहीं ही हो । अतएव उन दोनों व्यापारों का विषयभेद तो सुप्रसिद्ध है ।
न स्यादिति । पृथकार्थ मिलनक्रमः, नैव स्यादित्यर्थः । यावता न साक्षात्सम्वन्धित्वं तेन युक्त एवार्थान्तरव्यवहार इति विषयभेद उक्तः ।
'नहो' यह । (यहाँ) 'एव' का प्रयोग मेद से होता है; अर्थात् नहीं ही हो । जिसने कि साक्षात् सम्वन्धित्व नहीं होता उससे अर्थान्तरत्व का व्यवहार उचित ही है । यह विषयभेद बतलाया गया ।
मानना तो और भी दूर की बात हो गई । जय शब्द से उनका सम्वन्ध हो नहीं तो उसको शब्द का विपययार्थ मानना किस प्रकार संगत हो सकता है ?
तारावती
(उत्तर) इस बात को तो आप अस्वीकार कर ही नहीं सकते और न आप उसे छिपा ही सकते हैं कि वाच्यार्थ शब्द का अपना अर्थ होता है और व्यङ्ग्यार्थ अर्थान्तर होता है । कारण यह है कि वाच्यार्थ तो शब्द से साक्षात् सम्वद्ध होता है और व्यङ्ग्यार्थ परम्परा से सम्वद्ध होता है—वाच्यार्थ वाच्यार्थ से सम्वद्ध होता है और वाच्यार्थ शब्द से सम्वद्ध होता है । इस प्रकार व्यङ्ग्यार्थ का प्रत्यक्ष सम्वन्ध शब्द से नहीं होता इसीलिये वह शब्द का साक्षात् अर्थ न कहा जाकर अर्थान्तर कहलाता है । वह शब्द का विषय इसलिये कहा जाता है कि परम्परा से उसका सम्वन्ध शब्द से होता तो है ही । सारांश यह है कि वाच्यार्थ शब्द का साक्षात् सम्वन्धी होता है और व्यङ्ग्यार्थ वाच्यार्थ सामर्थ्य से आक्र्षित होकर सम्वन्धी का सम्वन्धी हो जाता है । यह तो ठीक ही है कि यदि व्यङ्ग्यार्थ भी शब्द का साक्षात् सम्वन्धी होता तो अर्थान्तर कहा ही नहीं जाता । यहाँ पर 'व्यवहारे च न स्यात्' में 'च' शब्द
व्यवहार के साथ जुड़ा है किन्तु उसका अन्वय क्रम को बदल कर 'न' के साथ होता है । अतः यहाँ अर्थ होगा—कि यदि व्यङ्ग्यार्थ शब्द का साक्षात् सम्वन्धी हो तो उसके लिये अर्थान्तर का व्यवहार नहीं ही हो । अतः विषयभेद तो प्रसिद्ध ही है ।
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रूपभेदोऽपि प्रसिद्ध एव । नहि यैषाभिधानशक्तिः सैवावगमनशक्तिः । अवाचकस्यापि गतिशब्दादे रसादिलक्षणार्थौवगमदर्शनात् । अशब्दस्यापि चेष्टादेरर्थविशेषप्रकाशनप्रसिद्धेः । तथाहि—‘श्रीडा योगान्ततवदनया’ इत्यादिश्लोके चेष्टाविशेषः सुरैरदृष्टार्थप्रकाशनहेतुः प्रदर्शित एव ।
अनु० रूपभेद भी प्रवृद्ध हो है । जो अभिधानशक्ति है वही अवगमनशक्ति नहीं ही है । क्योंकि अवाचक भी गीत शब्द की रस इत्यादि लक्षणवाली अर्थ की प्रतीति देखी जाती है और शब्द से रहित भी चेष्टा इत्यादि की अर्थ विशेष प्रकाशन की प्रसिद्धि है ही । वह इस प्रकार—‘श्रीडा योगान्ततवदनया इत्यादि श्लोक में सुकवि ने विशेष प्रकार की चेष्टा को अर्थविशेष के प्रकाशन के रूप में प्रदर्शित ही किया है ।
लोचन ननु मिल्लेऽपि विषये अक्षशब्दादेर्वहर्थस्य एक एवासिध्दालक्षणो व्यापार इत्याशङ्क्य रूपभेदसुपपादयति-रूपभेदोऽपोति । प्रसिद्धिमेव दर्शयति--न होति । विप्रतिपन्नं प्रतिहेतुमाह--अवाचकस्यापीति । यदेव वाचकत्वं तदेव गमकत्वं यद्य स्यादवाचकस्य गमकत्वमपि न स्यात्, गमकत्वेनैव वाचकत्वमपि न स्यात् न चैतदुमयसपि गीतशब्दे शब्दव्यक्तिरिक्के वाध्यवक्तृत्वकुचकम्पनवाष्पावेशादौ तस्यावाचकस्याप्यवगमकारित्वदर्शनादवगमकारिणोऽप्यवाचकत्वेन प्रसिद्धत्वादिति तात्पर्यंम् । ‘निस्सन्देह मिन्न विषय में बहुत अर्थोंवाले अक्षर शब्द इत्यादि का एक ही अभिधारूप व्यापार होता है’ यह सोचकर रूपभेद का उपादान कर रहे हैं—यदि जो वाचकत्व है वही गमकत्व हो तो अवाचक का गमकत्व भी न हो और गमकत्व होने पर वाचकत्व नहीं है ऐसा भी न हो । यह दोनों ही बातें हैं क्योंकि गीत शब्द में तथा शब्दरहित मुख के झुकने, स्तनों के कम्पन, वाष्प के आवेश इत्यादि में उस अवाचक का भी अवगमकारित्व देखा जाता है अतः अवगमकारित्व की भी अवाचकत्व के रूपमें प्रसिद्धि है ।
तारावती ( प्रश्न ) जहाँ द्वयर्थक या अनेकार्थक शब्दों का प्रयोग किया जाता है वहाँ दो या अनेक अर्थों का शब्द से साक्षात् सम्बन्ध होता है । जैसे ‘अक्ष’ शब्द के इन्द्रिय इत्यादि अनेक अर्थ होते हैं । ऐसे स्थलों पर एक ही व्यापार से काम चल सकता है और उसे अभिधाव्यापार की संज्ञा प्रदान की जा सकती है । फिर व्यापारभेद मानने की क्या आवश्यकता ?
( उत्तर ) वाच्यार्थ और व्यङ्ग्यार्थ के
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तस्माद्विविषयत्वाद्विवरूपत्वाच स्वार्थाभिधायित्वमर्यादन्तरावगामहेतुत्वं च शब्दस्य यत्तयोः स्पष्ट एव भेदः । विशेषश्रेणीस्तहींदानीन्तनभङ्गामनोयस्याभिधेयसामर्थ्योद्भिक्ष्यार्थान्तरस्य वाच्यत्वव्यपदेश्यता । शब्दव्यापारगोचरत्वं तु तस्याभिधानभाजन एव, न तु व्यङ्ग्यत्वेन । प्रतिपदार्थाभिधानान्तरसम्बन्धयोग्यत्वेन च तस्यार्थान्तरस्य प्रतीतेः शब्दान्तरेण स्वार्थाभिधायित्वाद्विपरीकरणं तत्र प्रकाशानोक्तिरेव मुक्ता ।
(अनु०) इसलिये विषयभेद होने से और रूपभेद होने से शब्द का जो अपने अर्थ का कहना और दूसरे अर्थ के अज्ञगमन का हेतु होना उन दोनों में स्पष्ट ही भेद है । यदि भेद है तो अव अज्ञगमननीय अभिधेय सामर्थ्योद्भवित अर्थान्तर के लिये वाच्यत्व का नाम नहीं दिया जा सकता । हम लोग उसकी शब्दव्यापारगोचरता तो चाहते ही हैं । वह तो व्यङ्गचत्व के रूप में ही हो सकती है वाच्यत्व के रूप में नहीं । क्योंकि दूसरे प्रसिद्ध अभिधान के सम्बन्ध के योग्य होने के कारण उम अथान्तर की प्रतीति का जो अपने अर्थ को कहनेवाले दूसरे शब्द से विपर्य किया जाना है उसमें प्रकाशन की युक्ति ही ठीक है ।
तारावती
व्यापारों में केवल विप्रय भेद ही नहीं होता इनका रूप भेद भी होता है । और वह रूप भेद भी सुप्रसिद्ध ही है । यदि अभिधाव्यापार और व्यञ्जनाव्यापार दोनों एक ही वस्तु होते तो जहाँ वाचकत्व विद्यमान न होता वहाँ व्यञ्जना भी नहीं हो सकती और यदि व्यञ्जना व्यापार होता तो यहाँ कहा ही नहीं जा सकता वहाँ पर अभिधा व्यापार नहीं है । किन्तु ये दोनों बातें ही नहीं होती । जहाँ वाचकत्व नहीं होता वहाँ भी व्यञ्जनाव्यापार हो सकता है और जहाँ व्यञ्जना-व्यापार होता है वहाँ अवश्य ही अभिधा हो ऐसा नहीं होता । उदाहरण के लिये गीत नृत्य इत्यादि शब्दों में अभिधाव्यापार नहीं होता और न उनमें वाच्यार्थ ही होता है, फिर भी उनसे रस इत्यादि रूप व्यङ्गच्यार्थ की प्रतीति देखी जाती है । केवल इतना ही नहीं अपितु जहाँ शब्द भी नहीं होता वहाँ भी व्यञ्जनाव्यापार देखा जाता है । उदाहरण के लिये ‘त्रीदशयोगान्नतवदनया’ इत्यादि पद्य में नायिका का मुख नीचा हो जाना, स्तनों का काँपने लगना, आँसुओं का आना इत्यादि शब्द नहीं हैं; केवल चेष्टायें ही हैं । किन्तु इनसे भी विशेष अर्थ की व्यञ्जना होती ही है । इस प्रकार जहाँ शब्द होता है किन्तु वाचकत्व नहीं होता वहाँ भी व्यञ्जनाव्यापार देखा जाता है और जहाँ शब्द भी नहीं होता केवल चेष्टायें ही होती हैं वहाँ भी व्यञ्जनाव्यापार देखा जाता है । अतः यह स्वतः सिद्ध हो जाता है कि व्यञ्जना-
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पतदुपसंहरति - तस्मादिन्नेति । न तर्हीति । वाच्यत्वं ह्यभिधाव्यापारविषयत्ता न तु व्यापारमात्रविषयता, तथात्वे तु सिद्धसाधनमित्यतदाह - शब्दोव्यापार इति । ननु गीतादौ सांभ्रदाचकत्वसिह त्वर्थान्तरेsपि शब्दस्य वाचकत्वमेवोच्यते किं हि तद्वाचकत्वं सङ्जोच्यत इत्याशङ्क्याह—प्रसिद्ध्यैति ।
लोचन
इसका उपसंहार करते हैं—‘इसलिये......' इत्यादि । ‘तो नहीं’ यह--वाचकत्व निरसनद्वारा अभिधाव्यापार की विषयता को कहते हैं समस्त व्यापारों की विषयता को नहीं । ऐसा होने पर तो यह सिद्ध का साधन ही है यह कहते हैं—‘शब्द व्यापार’ इत्यादि । ‘गीत इत्यादि में वाचकत्व न हो यहाँ पर तो अर्थान्तर में भी शब्दवाचकत्व ही कहा जाता है । उस वाचकत्व का सङ्जोचन क्यों किया जा रहा है ? यह शङ्का करके उत्तर देते हैं प्रसिद्ध यह ।
तारावती
व्यापार न तो अभिधाव्यापार का पर्याय है और न इनका अनिवार्य साहचर्य ही है । इस प्रकार व्यञ्जना और अभिधा का द्विपय-भेद भी है और रूपभेद भी ।
अतः शब्द का अपना अर्थ प्रकट करना और अर्थान्तर के अवगम में हेतु होना इन दोनों तत्त्वों में स्पष्ट भेद है । अव दूसरे पक्ष को लीजिये कि आप स्वार्थे और अर्थान्तर के द्व्यव्ययन की क्रियाओं को भिन्न मानते हैं ।
फिर तो पूर्वपक्षी उसी बात को सिद्ध करने लगता है जोकि सिद्धान्तपक्ष की मान्यता है । यह तो सिद्धान्तपक्ष में भी स्वीकार किया जाता है कि जिस अर्थान्तर की प्रतीति होनी है वह शब्द के व्यापार का ही विषय होता है अर्थात् अर्थान्तर की प्रतीति में शब्द का व्यापार ही निमित्त होता है ।
वह शब्दव्यापार अभिधा से भिन्न होता है इतना मान लेने पर पूर्वपक्ष की दृष्टि से भी सिद्धान्ती का अभिमत व्यञ्जना व्यापार सिद्ध हो जाता है । निष्कर्ष यह निकलता है कि शब्द से प्रतीत होने वाले अर्थान्तर को वाच्यत्व की ही संज्ञा प्राप्त होनी चाहिये वाचकत्व की नहीं ।
( प्रश्न ) आपने गीत इत्यादि में वाचकत्व के अभाव में भी व्यञ्जकत्व को सिद्धकर वाचकत्व और व्यञ्जकत्व का विमेद प्राप्तपादित किया है । इस पर निवेदन यह
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शाब्दान्तरेषा तस्यार्थान्तरस्य यद्विपयोकरणं तत्र प्रकाशनोक्तिरेव युक्ता न वाचकशब्दोऽन्तरेण नापि वाच्यनोकिरर्थः स्व तत्न युक्ता । वाचकत्वं हि समयवशादृश्यवगवधा-नेन प्रतिपादकत्वं यथा तथैव शाब्दस्य स्वाथं, तदाह—स्वाऽऽश्रयाऽनेति । वाच्यत्वं हि समयवशात् नियतवाच्यांशं प्रतिपाद्यत्वं यथा तथैव वाच्यांशं शाब्दान्तरेण प्रति तदाह—प्रतिपाद्यत इति । प्राग्भेदेन वाचकत्वस्याभिधानानन्तरेण यत् सम्भाव्यते वाच्यत्वं तदेव तत् वा-च्योच्यते न चैवं विधं वाचकत्वमर्थं प्रति शाब्दस्येहास्ति नापि तं शाब्दं प्रति तस्यार्थस्यास्ति । न चैवं वाचकत्वस्याभिधानानन्तरेण यत् सम्भाव्यते वाच्यत्वं तदेव तत् वाच्यत्वम् । यदि नास्ति तादृशं कथम् तस्य विषयीकरण-सुखादिमद्यादृशं यथा—भर्तृहरिरिति । अथ च प्रतिपाद्यतं सोऽर्थो न च वाच्यवाचक-व्यापारेणैति विलक्षण एवासौ व्यापार इति यावत् ।
दूसरे शब्द के द्वारा या दूसरे अर्थ का विपर्यय बनाया जाना उसमें शब्द की प्रकाशन की उक्ति ही ठीक है न तो शब्द की वाचकता को उक्ति ठीक है और न अर्थ को वाच्यताके द्वारा । मुख्यतया अभिधान के रूप में प्रसिद्ध दूसरें अभिधान के साथ जो समन्वय अर्थात् अन्वय वृत्ति या उसी में जो योग्यता उस योग्यता के द्वारा उप-लब्धि ( अर्थात् तात्पर्यार्थ वृत्ति ) । निस्सन्देह यहाँ पर शब्द का इस प्रकार का अर्थ नहीं है, नदी ही उस शब्द के प्रति उस अर्थ का कहे हुये रूप-वाक्यांश में स्थित है । 'यदि अर्थ नहीं है, तो क्यों उसका विपरीतकरण कहा गया है?' यह कहा । मुख्यतया निस्सन्देह सङ्केत के बल पर व्यवधान होने को कहते हैं जैसे उभयो अर्थ का दूसरे शब्द के प्रति । वही कहते हैं—'प्रतीति का' यह । यदि वह अर्थ प्रतीत होता है किन्तु वाच्यवाचक व्यापार के द्वारा नहीं तो विलक्षण ही वह व्यापार है यह सब का सार है ।
तारावती—हे किजहाँ वाचकत्व निल्कुल नहीं होता उसकी बात जाने दीजिये । किन्तु जहाँ वाचकत्व होता है वहाँ अर्थान्तर में भी आप वाचकत्व ही क्यों नहीं मानते ? वहाँ पर वचचजकत्व स्वीकार करने से क्या लाभ ? ( उत्तर ) गीत इत्यादि में वाचकत्व के समावेश में भी व्यापारकत्व होता है केवल यहाँ हेतु नहीं है जिसमें हम वाचकत्व के साथ आनेवाले अर्थान्तर में वचचजकत्व स्वीकार करते हैं । किन्तु इसका एक दूसरा भी हेतु है—वचचजकव्यापार के द्वारा जिस अर्थान्तर को प्रतीति करना हमें अभीष्ट है वह अर्थान्तर दूसरे शब्दों से भी आभमहित किया जा सकता है ।
तारावती—हे किजहाँ वाचकत्व निल्कुल नहीं होता उसकी बात जाने दीजिये । किन्तु जहाँ वाचकत्व होता है वहाँ अर्थान्तर में भी आप वाचकत्व ही क्यों नहीं मानते ? वहाँ पर वचचजकत्व स्वीकार करने से क्या लाभ ? ( उत्तर ) गीत इत्यादि में वाचकत्व के समावेश में भी व्यापारकत्व होता है केवल यहाँ हेतु नहीं है जिसमें हम वाचकत्व के साथ आनेवाले अर्थान्तर में वचचजकत्व स्वीकार करते हैं । किन्तु इसका एक दूसरा भी हेतु है—वचचजकव्यापार के द्वारा जिस अर्थान्तर को प्रतीति करना हमें अभीष्ट है वह अर्थान्तर दूसरे शब्दों से भी आभमहित किया जा सकता है ।
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( उदाहरण के लिये 'गङ्गायां घोषः' को लीजिये । यहाँ पर गङ्गा शब्द के प्रयोग से तट में लक्षणा होती है और उससे शौच्य और पावनत्व की प्रतीति व्यङ्ग्य है । इस प्रकार शौच्य पावनत्व रूप व्यङ्ग्यजनाजन्य बोद्ध में 'शौच्य' और 'पावनत्व' रूप शब्दों के द्वारा अभिहित किये जाने की भी योग्यता विधमान है । आशय यह है कि शौच्य पावनत्व का प्रत्यायन दो प्रकार से हो सकता है, एक तो शौच्य पावनत्व इत्यादि शब्दों के प्रयोग के द्वारा और दूसरे इन शब्दों या इनके समानार्थक शब्दों का प्रयोग न करते हुये 'गङ्गा' शब्द के प्रयोग के द्वारा ही उनका प्रत्यायन किया जा सकता है । ) इस प्रकार जहाँ पर अन्य शब्द के द्वारा अन्य अर्थ को विषय बनाया जाता है ( जैसे उक्त उदाहरण में 'गङ्गा' शब्द के द्वारा शौच्य और पावनत्व को विषय बनाया गया है । ) वहाँ पर न तो शब्द को वाचकत्व का पद प्राप्त हो सकता है और न अर्थ को वाच्यत्व का पद दिया जाना ही उचित है । इसे क्रिया का व्यापारन का पद देना ही उचित है । क्योंकि वाचकत्व का यही अर्थ है कि जहाँ किसी अर्थ को बिना बीच में लाये सङ्केत के वल पर प्रत्यक्ष रूप में किसी अर्थंका प्रतिपादन कर दिया जाय इस प्रकार के अभिधायक शब्द को वाचक कहते हैं । जैसे उसी ( व्यङ्ग्यक ) शब्द का अपने अर्थ में प्रयोग ।
( गङ्गा शब्द का अपना एक स्वतन्त्र प्रवाहपरक अर्थ है । इस अर्थ के प्रत्यायन में मध्य में किसी अन्य अर्थ को नहीं लाना पड़ता । अतः प्रवाह अर्थ के कथन में गङ्गा शब्द वाचक है । ) इसी प्रकार वाच्यत्व की परिभाषा यह है कि वोच में किसी दूसरे अर्थ को बिना लाये हुये केवल सङ्केत के वल पर जो अर्थ प्रतिपादित कर दिया जाता है उसे वाच्य कहते हैं ( जैसे शौच्य और पावन इन अर्थों का प्रत्यायन कराने के लिये गङ्गा से भिन्न साक्षात् शौच्य और पावन शब्द । इन शब्दों के प्रति शौच्य और पावनत्व अर्थों की वाच्यता कही जायगी । ) आशय यह है कि व्यङ्ग्यक शब्द का अपना एक स्वतन्त्र अर्थ भी होता है । वही उसका वाच्यार्थ कहा जाता है । व्यङ्ग्यार्थ की भी एक स्वतन्त्र सत्ता होती है जोकि उस शब्द से भिन्न दूसरे शब्दों से अभिहित की जा सकती है । ( गङ्गा का स्वतन्त्र अर्थ होता है और शौच्य पावनत्व इत्यादि व्यङ्ग्यार्थों का अभिधान गङ्गा से भिन्न अन्य शौच्य पावनत्व इत्यादि शब्दों से भी किया जा सकता है । ) वाचक और वाच्य की यह परिभाषा मान लेने पर न तो इस प्रकार का वाच्यत्व गङ्गा शब्द में आता है और न इस प्रकार का वाच्यत्व शौच्य पावनत्व इत्यादि अर्थों में आता है । किन्तु उस वाच्यमिन्न अर्थ में किसी अन्य प्रसिद्ध शब्द के द्वारा कहे जाने की योग्यता होती है और शब्द अपने पृथक् अर्थ को कहा करता है ।
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न च पदार्थैवाक्यार्थेन्यायो वाच्यव्यङ्ग्ययोः । यतः पदार्थप्रतीतिरसत्प्रयैवैति कैश्चिद्द्विरदिरास्तितम् ।। यैरप्यसत्प्रतत्त्वमस्यां नाङ्गुपेयते तैरप्याक्यार्थपदार्थयोरेष्टतदुपादानकारणन्यायोडङ्गीगन्तव्यः । यथाहि घटे निष्पन्ने तदुपादानकारणानां न पृथगुपलब्धिरभवस्तथैव वाक्यं तद्वा प्रतीतः पदार्थेऽनुप्रविष्टम् । तेषां तद्व्यभक्ततयोः पदार्थे वाक्यार्थबुद्धिरेव दूरीभवेत् । न त्वेषा वाच्यव्यङ्ग्ययोर्न्याय्यः, नहि व्यङ्ग्ये प्रतीमाने वाच्यबुद्धिदूरे भवति, वाच्यावभासाविनाभावेन तस्यप्रकाशनात् । तस्माद्वटपीडन्यायस्तयोर्, यथैव हि प्रदीपद्वारेण घटप्रतीतिआकुत्स्नायां प्रदीपप्रकाशो निवर्तते तद्वद्धचङ्गयप्रतीतौ वाच्यावभासः । यत्तु प्रथमोद्योते ‘यथा पदार्थद्वारे’ इत्याद्युक्तं तदुपायमात्रात् साम्यविवक्षया ।
(अनु०) वाच्य और व्यङ्गच का पदार्थ-वाक्यार्थ न्याय नहीं हो है क्योंकि कुछ विद्वानों ने ‘पदार्थप्रतीति असत्य ही है’ यह सिद्धान्त माना है । जो इसके असत्यत्व को नहीं भी मानते हैं, उनको वाक्यार्थ और पदार्थ का घट तथा उसके उपादान कारण का न्याय स्वीकार करना चाहिये । जैसे घट के वन जाने पर उसके उपादान कारणों की पृथक् रूप में उपलब्धि नहीं होती उसी प्रकार वाक्य या उसके अर्थ के प्रतीत हो जाने पर पदों तथा उसके अर्थों का । उनकी उस समय विभक्त रूप में उपलब्धि होने पर वाक्यार्थबुद्धि ही दूर हो जाय । यह वाच्य और व्यङ्गच का न्याय नहीं है । व्यङ्गच के प्रतीत होने पर वाच्यबुद्धि दूर नहीं होती क्योंकि उसका प्रकाशन वाच्य के अवभास के साथ अविनाभाव सम्बन्ध से होता है । इससे उनका घट-प्रदीप न्याय है । जैसे प्रदीप के द्वारा घट की प्रतीति के उपस्थित हो जाने पर प्रदीप-प्रकाश निवृत्त नहीं होता उसी प्रकार व्यङ्गच प्रतीति में वाच्य का अवभास ( निवृत्त नहीं होता ) । जो प्रथम उद्योत में ‘जैसे पदार्थ के द्वारा’ इत्यादि कहा वह उपायमात्र से साम्यविवक्षा के आधार पर।
अन्य प्रतीति को जहाँ अन्य शब्द का विषय बनाया जाता है वहाँ वाच्य-वाचक शब्द का प्रयोग ठीक नहीं है । यहाँ पर यह पूछा जा सकता है कि जव वह अर्थ उस शब्द का वाच्य ही नहीं है तथा उस अर्थ को उस शब्द का विषय बनाया ही किस प्रकार जा सकता है ? इसी प्रश्न का उत्तर देने के लिये आलोककार ने ‘प्रतीते’ इत्यादि शब्द का प्रयोग किया है । इसका अर्थ यह है कि इस द्वितीय अर्थ की प्रतीति तो होती है । उसका अपवाद किसी प्रकार नहीं किया जा सकता । प्रतीति होना ही उसकी सत्ता और उसके शब्द का विषय होने का सब्से बड़ा प्रमाण है । वह अर्थ प्रतीति-गोचर तो होता ही है, किन्तु उसकी प्रतीति वाच्य-वाचक व्यापार के द्वारा होती नहीं अतः उसके लिये विलक्षण व्यापार ही मानना पड़ेगा ।
तारावती
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तन्नेवं माहूढ़वाचकत्वसथापि तात्पर्यशक्तिंरिव्याप्तीदारूढ्याह--न चैति । काचिद्रिति वैय्याकरणैः चैर्यपीतसदृप्रभृतिभिः । तमेव न्याय ऋाचष्टे---यथा हीति । तदुपादानकारणानामिति । समवायिकारणानि कपालानि अन्योन्यत्रा निस्रुपिसानि । संगतिकोपाधिर्न भवति तु यद्युपादानतिर्यघटकाल उपादानान्तरं सत्ता एकत्र दृश्यते---यित्वेन परत्र तिरोभूतस्यैव तथापि पृथक्तया नास्त्युपालम्भ इतीयत्यंशे दृष्टान्तः । दूरीभवेदिति । अर्थकदर्थ्यामावादिति भावः ।
निस्संदेह इस प्रकार वाचकचक्ति न हो तथापि तात्पर्यशक्ति हो जायगी, यह कहकर कहते हैं-‘न च’ इत्यादि । कुछ लोगों के द्वारा । यह-अर्थवैच्याकरणों के द्वारा । और जिनके द्वारा भी यह अर्थात् बहु इत्यादिकों के द्वारा । उसी न्याय की व्याख्या कर रहे हैं-‘यथाहि’ यह । ‘उसके उपादान कारणों का’ यह । इस उक्ति के द्वारा समवायिधि कारण कपाल इत्यादि का निरूपण किया गया है । संगति और कपोलिक के मत में तो द्वयाप उपादान किये जाने योग्य घटकाल में उपादानों की सत्ता नहीं होती क्योंकि एक स्थानपर क्षणस्थायित्व होता है और दूसरे स्थानपर तिरोभाव हो जाता है तथापि पृथक् रूप में उपलब्ध नहीं होती । बस इतने ही अंश में दृष्टान्त है । ‘दूर हो जाये’ यह । आशय यह है कि अर्थ की एकता के अभाव के कारण ।
तारावती
जैसे वह सिद्ध किया जा चुका है कि औत्स पावनत्व इत्यादि अर्थों की गाथा इत्यादि शब्दों से प्रतिपत्ति के लिये अभिधाव्यापार से भिन्न कोई अन्य व्यापार मानना पड़ेगा। इतना मान लेने पर भी यह प्रश्न उपस्थित होता है कि उस व्यापार को व्याख्यानव्यापार ही क्यों कहा जाना चाहिये ? जिस प्रकार शब्दों के अर्थों से भिन्न तथा उन से गर्तार्थ न होनेवाले वाक्यार्थ की प्रतीति के लिये तात्पर्यवृत्ति मानकर काम चल जाता है उसी प्रकार तात्पर्यवृत्ति से ही औत्स पावनत्व की प्रतीति भी हो जायगी । उसके लिये पृथक् वृत्ति की कल्पना व्यर्थ है । किन्तु इस विषय में कहा जा सकता है कि यहाँ पर पदार्थ और वाक्यार्थ की पद्धति लागू नहीं हो सकती । कारण यह है कि पदार्थ और वाक्यार्थ के विषय में सत्रो दर्श-निकों की एक जैसी सम्मति नहीं है । (केवल अभिहितान्वयवादी मीमांसक ही तात्पर्यवृत्ति स्वीकार करते हैं, अन्विताभिधानवादी मीमांसक उसे मानते ही नहीं । ) वैच्याकरण लोग पदार्थप्रतीति को सर्वथा असत्य मानते हैं । (वैयाकरण असण्ङड स्फोट को ही सत्य मानते हैं । उनके मत में वर्ण पद इत्यादि समस्त भेद-कल्पना असत्य ही है । पद में वर्ण भिन्न नहीं होते, वर्णों में अवयव भिन्न नहीं
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होते और वाक्य में पदों की भेदकल्पना भी प्रमाणप्रतिपन्न नहीं है ।' यह है वैद्याकरणों के मत का सार । ) इनके अनुसार जब पद-पदार्थ कल्पना ही ठीक नहीं तब उसका अनुसरण कर व्याख्या की तात्पर्य में गतार्थता स्वीकार ही किस प्रकार की जा सकती है ! कुछ आचार्य वैैयाकरणों के इस सिद्धान्तवाद को नहीं मानते उनके मत में पद-पदार्थ कल्पना सत्य है । किन्तु उनके मत में उसकी व्याख्या इस प्रकार करनी होगी—वाक्य अथवा वाक्यार्थ कार्य है और पद अथवा पदार्थ कारण हैं । यहाँ पर कारण शब्द का अर्थ है उपादान अथवा समवायी कारण । कार्य-कारण के लिये यह सामान्य नियम है कि समवायी कारण की प्रतीति पहले तो होती रहती है किन्तु जब कार्य बन चुकता है तब कारण की प्रतीति समाप्त हो जाती है । जैसे घट में समवायिकारण मिट्टी है । जब तक घट नहीं बनता तब तक तो मिट्टी की प्रतीति होती रहती है किन्तु जब घट बन चुकता है तब मिट्टी की पृथक् उपलब्धि नहीं होती । यही बात पद-पदार्थ तथा वाक्य-वाक्यार्थ के विपय में भी कही जा सकती है । पद-पदार्थ की प्रतीति पहले होती रहती है किन्तु वाक्य-वाक्यार्थ के निष्पन्न हो जाने पर पद-पदार्थ बुद्धि जाती रहती है । वाक्यार्थबोध के समय पद-पदार्थ बुद्धि के तिरोहित हो जाने का सबसे बडा प्रमाण यही है कि वाक्य की परिभाषा की गई है कि वाक्य उसे कहते हैं जिसमें एक अर्थ हो । यदि वाक्यार्थबोध काल में पदार्थबोध बना रहेगा तो वाक्य की यह परिभाषा घटेगी किस प्रकार ? ऐसी दशा में उसको वाक्य या वाक्यार्थ कहना ही असंगत हो जायगा ।
ऐसी दशा में यह मानना ही पड़ेगा कि कार्य-कारण भाव के समान ( घट तथा मृतिका के समान ) वाक्य और वाक्यार्थबोध में भी पद और पदार्थ का ज्ञान समाप्त हो जाता है । यह तो हुई मीमांसकों के अनुसार व्याख्या । वादी लोग क्षणिकतावादी होते हैं । उनके मत के अनुसार प्रत्येक पदार्थ क्षण-क्षण पर बदलता रहता है । इस प्रकार क्षणस्थायी होने के कारण कार्योत्पत्ति काल में समवायी कारण की सत्ता शेष ही नहीं रह जाती । इसी प्रकार ( संघों और ) कापालिकों के मत में कार्योत्पत्ति होने पर कारणसत्ता तिरोहित हो जाती है । ऐसी दशा में कार्यप्रतीति काल में कारणप्रतीति तिरोहित हो जाती है । आशय यह है कि चाहे हम वैयाकरणों के अनुसार पदार्थकल्पना को असत्य मानें, चाहे मीमांसकों के अनुसार कार्य-कारण भाव मानकर कार्यप्रतीति काल में कारण की अप्रतीति मानें, चाहे वादियों के अनुसार कारण के क्षणस्थायी होने में कार्यप्रतीति काल में कारण की असत्ता स्वीकार करें अथवा कापालिकों के अनुसार कार्य में कारण का तिरोधान मानें इतना तो निश्चित ही है कि किसी भी सिद्धान्त के अनुसार वाक्यार्थबोध-
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एवं पदार्थवाक्यार्थन्यायं तात्पर्यशक्तिसाधकं प्रकृते विषये निराकृत्याभिमतां प्रकाशशक्तिं साधयितुं तदुचितं प्रदीपघटन्यायं प्रकृते योजयन्नाह—तस्मादिति । यतोऽसौ पदार्थवाक्यार्थन्यायो नेह युक्तस्तस्मात् । प्रकृतं न्यायं व्याकरणपूर्वकं दृष्टान्तेन योजयति—यथैव हि । ननु द्विविधसुक्कुम्—वाक्यार्थपूर्विका तद्रप्रतिपत्तस्य वस्तुनः ॥ इति तर्कार्थं स एव न्याय इह यत्नेन निराकृत इत्याशङ्क्याह—यस्त्वति । तदिति । न तु सर्वथा साम्येनैत्थ्यर्थः ।
इस प्रकार पदार्थवाक्यार्थन्याय को तात्पर्यशक्ति का साधक मानकर प्रस्तुत विषय में निराकृत करके अभीष्ट प्रकाशशक्ति को सिद्ध करने के लिए उचित प्रदीपघटन्याय को प्रस्तुत विषय में योजित करते हुए कहते हैं—‘तस्मादिति’ । क्योंकि यह पदार्थवाक्यार्थन्याय यहाँ पर युक्त नहीं है इसलिए । प्रस्तुत न्याय को व्याकरणपूर्वक दृष्टांत के साथ योजित करते हैं—‘यथैव हि’ । (प्रश्न) यहाँ पर दो प्रकार के सुक्कुम होते हैं—वाक्यार्थपूर्वक और तद्रप्रतिपत्ति के साथ वस्तुनः ॥ इस प्रकार तर्क के अर्थ को ही यहाँ पर यत्नपूर्वक निराकृत किया गया है, ऐसी आशंका करके कहते हैं—‘यस्त्वति’ । ‘तदिति’ । यह नहीं कि सर्वथा साम्य से ही ऐसा होता है ।
तारावती
काले पदार्थावोध न होता। इसके प्रतिकूल वाच्य और व्यंग्य ये दोनों अर्थ एकसाथ प्रतीतिगोचर होते हैं। व्यंग्य के प्रतीतिगोचर होने के समय वाच्यबुद्धि दूर नहीं हो जाती; अपितु व्यंग्य प्रतीति का यह अनिवार्य तत्व है कि उसकी प्रतीति वाच्यप्रतीति के साथ ही होती है। इसी अन्तर के कारण व्यंग्य और वाच्य की प्रतीतियों के विषय में पदार्थवाक्यार्थ न्याय लागू नहीं हो सकता। अतः उस विषय में किसी अन्य न्याय का अन्वेषण करना होगा क्योंकि पदार्थवाक्यार्थ न्याय के निराकरण के साथ तात्पर्यशक्ति के द्वारा निर्वाह हो सकने का तो प्रश्न ही जाता रहा। अतएव कहना होगा कि वाच्य और व्यंग्य के विषय में प्रदीपघटन्याय लागू होगा। प्रदीप घट को प्रकाशित करता है और स्वयं भी प्रकाशित होता रहता है। पहले प्रदीप स्वयं प्रकाशित होता है और बाद में घट को प्रकाशित करदेता है। घट के प्रकाशित हो जाने के बाद प्रदीप का प्रकाशित
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नन्वेवं युगपदर्थद्वययोगित्वं वाक्यस्य प्राप्तं तद्रावे च तस्य वाक्यतैव विघटते, तस्यैकार्थ्यलक्षणत्वात्; नैष दोषः, गुणवप्रधानभावेन तयोः पदार्थयोरवस्थानात्। व्यङ्ग्यस्य हि कचित्प्राधान्यं वाच्यस्योपसर्जनभावः कचिद्वाच्यस्य प्राधान्म्यपरस्य गुणभावः। तत् व्यङ्ग्यप्राधान्ये ध्वनिरित्यक्कमेव, वाच्यप्राधान्ये तु प्रकारान्तरं निर्देश्यते। तस्मात् स्थितमेतत्—व्यङ्ग्यपरत्वेऽपि काव्यस्य न व्यङ्ग्यस्याभिधेयत्वमपितु व्यङ्ग्यत्वमेव।
(अनु०) (प्रश्न) निस्सन्देह इस प्रकार वाक्य का एक साथ दो अर्थों से युक्त होना सिद्ध हुआ, उसके होने पर उसकी वाक्यता ही विघटित हो गई क्योंकि उसका लक्षण एक अर्थ का होना है। (उत्तर) यह दोष नहीं है क्योंकि उन दोनों की व्यवस्था गौण और प्रधानभाव से हो जाती है और वाच्य की गौणरुपता होती है; कहीं वाच्य का प्राधान्म्य होता है और दूसरे की गौणरुपता होती है। उसमें व्यङ्ग्य की प्रधानता में ध्वनि (होती है) यह कहा ही गया है। वाच्य प्राधान्म्य में तो प्रकारान्तर का निर्देश किया जायगा। इससे यह स्थिति है—काव्य के व्यङ्ग्यपरक होने पर भी व्यङ्ग्य की अभिधेयरुपता नहीं होती अपितु व्यङ्ग्यरूपता ही होती है।
तारावती
इसी प्रकार अभिधेयार्थ प्रकाश के समान पहले प्रतीयमानार्थ व्यंग्यार्थ को प्रकाशित करता है; फिर जिस प्रकार प्रकाश घट को प्रकाशित करता है उसी प्रकार अभिधेयार्थ व्यंग्यार्थ को प्रकाशित करता है। बाद में जैसे घट के प्रकाशित हो जाने से प्रदीप प्रकाश निवृत्त नहीं हो जाता उसी प्रकार व्यंग्यार्थ प्रकाशन के बाद वाच्यार्थ निवृत्त नहीं हो जाता किन्तु दोनों ही साथ-साथ प्रतीतिगोचर होते रहते हैं। आशय यह है कि चाहे हम व्याकरण-दर्शन के अनुसार यह मानें कि पद-पदार्थ कल्पना असत्य है; चाहे मीमांसकों के अनुसार कार्यकारणभाव सम्बन्ध मानें, चाहे बौद्धों के अनुसार क्षणिकतावाद अंगीकार करें और चाहे कापालिकों के मत का अनुसरण करते हुये कार्योत्पत्ति के बाद कारण का तिरोभाव मानलें, प्रत्येक अवस्था में पद-पदार्थ और वाक्य-वाक्यार्थ की समसमायिक सत्ता स्वीकार नहीं की जा सकती जब कि वाच्यार्थ और व्यंग्यार्थ दोनों का समसमायिक होना अनिवार्य है। इसीलिये वाच्यार्थ और व्यंग्यार्थ के विषय में पदार्थ-वाक्यार्थ न्याय नहीं लागू हो सकता। इस विषय में यही कहना होगा कि वाच्यार्थ के द्वारा व्यंग्यार्थ प्रकाशित होता है; क्योंकि प्रकाशक और प्रकाश्य दोनों एक साथ रह सकते हैं।
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एवमिति । प्रदीपघटयुगपदुभयावभासप्रकारेगेऽस्यर्थः। तथ्या इति वाक्यतताया: । ऐकाध्यंलक्षणमर्थैकत्वादि, वाक्यमेकमित्युक्तम् । सकृत् श्रुतो हि शब्दो यत्रैव समय-
'इस प्रकार' यह । अर्थात् प्रदीपघट के समान एक साथ दोनों के अवभास के प्रकार के द्वारा । 'उसके' अर्थात् वाक्यता के । 'ऐकाध्यं लक्षण का आशय यह है कि अर्थ की एकता में वाक्य होता है यह कहा गया है । निस्सन्देह एक बार सुना हुआ शब्द जिस किसी स्थान पर सकृद् स्मरण करता है यदि वह इसी के द्वारा अवगत करा दिया जाय तो विरत होकर व्यापार ने होने के कारण बहुत से सकृद् स्मरणों का एक साथ होना सम्भव न होने से अर्थभेद का अवसर ही क्या ? भाव यह है कि यह पुनः सुना हुआ या स्मरण किया हुआ नहीं है । 'उन दोनों का' अर्थात् वाच्य और व्यंग्य का । 'वहाँ पर' यह । अर्थात् जहाँ पर दोनों प्रकारों के बीच में पहला प्रकार है । 'दूसरा प्रकार' यह । अर्थात् गुणीभूत व्यंग्य नामक । व्यंग्यत्व ही अर्थात् प्रकाशयत्व ही ।
स्तं करोति स चेदनैनावगमितः तद्विरम्य व्यापाराभावात् समयस्मरणानां बहूनां युगपद्ययोगात्कोड्थभेदस्यावसरः । तयोरिति वाच्यव्यंग्ययोः । तत्रैति । उमयोः प्रकारयोर्मंध्याच्चदा प्रथमः प्रकार इत्यर्थः । प्रकारान्तरमिति गुणीभूतव्यंग्यसंज्ञितम् । व्यंग्यत्वमेवेति प्रकाशयत्व-मेवेर्थः ।
( प्रश्न ) प्रथम उद्योत में व्यंग्याभिव्यक्ति के लिये पदार्थ-वाक्यार्थ न्याय की उपमा दी गई थी । वहाँ पर कहा गया था—
'जिस प्रकार पदार्थ के द्वारा वाक्यार्थ की प्रतीति होती है उसी प्रकार व्यंग्यवस्तु की प्रतिपत्ति वाक्यार्थपूर्वक होती है किन्तु यहाँ पर प्रयत्नपूर्वक यह सिद्ध कर दिया गया कि वाच्य व्यंग्य के विषय में पदार्थ-वाक्यार्थ न्याय लागू नहीं होता । इस पूर्वापरविरोध की संगति किस प्रकार बैठ सकती है?' ( उत्तर ) ( उपमा केवल साधर्म्य में होती है । उसमें वैधर्म्य नहीं लिया जाता । ) प्रथम उद्योत की उक्त कारिका में उपमान और उपमेय का साधर्म्य केवल इतना ही है कि एक अर्थ की प्रतीति में दूसरा अर्थ उपाय हो सकता है । इतने साम्य के आधार पर ही प्रथम उद्योत में पदार्थ-वाक्यार्थ की उपमा दे दी गई थी, पूरे साम्य के आधार पर नहीं।
( प्रश्न ) जब आप घट और प्रदीप की उपमा देते हैं और उसके द्वारा यह सिद्ध करने की चेष्टा करते हैं कि दोनों अर्थों की प्रतीति एक ही काल में होती है
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तृतीय उद्योतः
तारावती
तब उस वाक्य की वाक्यता ही जाती रहती है । कारण यह है कि आचार्यों ने वाक्य की यही परिभाषा की है कि जिसका एक अर्थ हो उसे वाक्य कहते हैं जैमिनि सूत्र में वाक्य की परिभाषा इस प्रकार दी हुई है—‘अर्थैकत्वादेकं वाक्यं साकाङ्क्षं चेद्विभागे स्यात्’ अर्थात् यदि विभक्त करने पर उसके पदरूप अवयव परस्पर साकाङ्क्ष हों और समस्त पदसमूह का एक अर्थ हो तो उसे वाक्य कहते हैं । ( प्रतिप्रश्न ) जब वाक्य के लिये आप एक अर्थ का होना अनिवार्य मानते हैं तब ऐसे स्थलों की क्या व्यवस्था होगी जहाँ श्लेष के कारण एक वाक्य के दो अर्थ हो जाते हैं ? ( समाधान ) ऐसे अवसरों पर भी वाक्य एकार्थक ही रहता है । दोनों अर्थों को मिलाकर एकरूपता स्थापित कर दी जाती है। वह इस प्रकार समझिये—मानलीजिये किसी शब्द का एक बार उच्चारण किया गया है, यदि वह शब्द एक से अधिक अनेक अर्थों का वाचक है । एक से भिन्न अनेक अर्थ उसी शब्द से ही निकलते हैं और उन अर्थों में उस शब्द की सङ्केत-स्मरण भी होता है । अब प्रश्न यह है कि उस एक शब्द से ही अनेक सङ्केतित अर्थ निकाल किस प्रकार सकते हैं ? क्या एक के बाद दूसरा इस क्रम से वे अर्थ निकलते हैं ? या सब अर्थ एक साथ ही निकलते हैं ? क्रमशः अर्थ निकल नहीं सकते क्योंकि शाब्द का नियम है कि शब्द की क्रिया रुक-रुक कर नहीं होती । एक अर्थ का प्रत्यायन कराकर अभिधा व्यापार समाप्त हो जाता है—उसका पुनरुज्जीवन हो ही नहीं सकता । सब अर्थों का अभिधान एक साथ भी नहीं हो सकता क्योंकि अर्थ के अभिधान के लिये सङ्केत-स्मरण एक अनिवार्यं तत्त्व है । अनेक अर्थों का एक साथ बुद्धि में उपारुढ़ होना असम्भव है । अतएव दोनों ही प्रकार से अर्थबोध की कल्पना असंभव असङ्गत है । शब्द न तो बार-बार सुना गया है न उसका स्मरण ही बार-बार किया गया है जिससे अनेकार्थता का प्रश्न उठे । अतएव वाक्य की यह परिभाषा असन्दिग्ध है कि एक अर्थ में पर्यवसित होनेवाले पदसमूह को वाक्य कहते हैं । तब यह प्रश्न उठता है कि यदि किसी पद समूह के दो अर्थ होगये हों एक वाच्यार्थ और दूसरा व्यङ्ग्यार्थ, वहाँ पर वाक्य का यह लक्षण किस प्रकार घट सकता है कि जहाँ एक अर्थ होता है उसे वाक्य कहते हैं । ( उत्तर ) वाच्यार्थ और व्यङ्ग्यार्थ की व्यवस्था गौण और मुख्य रूप में कर दी जाती है । एक अर्थ को गौण मान लिया जाता है और दूसरे को प्रधान । इस प्रकार एक ही अर्थ मुख्य होने के कारण वाक्य की परिभाषा ठीक रूप में घट जाती है । कहाँ-कहाँ व्यङ्ग्य प्रधान होता है और वाच्य गौण होता है । कहाँ-कहीं वाच्य प्रधान होता है और व्यङ्ग्य गौण होता है । यह विस्तार पूर्वक बतलाया जा चुका
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किं तु व्यङ्ग्यस्य प्राधान्येनाविवक्षितायां वाच्यत्वं तावद्वद्भिरनभ्युपगन्तव्यम् । तत्परत्वाच्छब्दस्य । तदुक्ति तावद्व्यङ्ग्यं शब्दानां कश्चिद्धिपय इति । यत्रापि तस्य प्राधान्यं तत्रापि किमिति तस्य स्वरूपमपपद्यते । एवं तावद्वाचकत्वादन्यदेव व्यङ्जकत्वस्य प्राधान्ये व्यतिरेकात् । यद्वाचकत्वं शब्दैकाश्रयमितरत् शब्दाश्रयमर्थाश्रयं च शब्दार्थयोर्हैयोरपि व्यङ्जकत्वस्य प्रतिपादितत्वात् ।
किं तु व्यङ्ग्यस्य प्राधान्येनाविवक्षितायां वाच्यत्वं तावद्वद्भिरनभ्युपगन्तव्यम् । तत्परत्वाच्छब्दस्य । तदुक्ति तावद्व्यङ्ग्यं शब्दानां कश्चिद्धिपय इति । यत्रापि तस्य प्राधान्यं तत्रापि किमिति तस्य स्वरूपमपपद्यते । एवं तावद्वाचकत्वादन्यदेव व्यङ्जकत्वादन्यदेव व्यङ्जकत्वस्य प्राधान्ये व्यतिरेकात् । यद्वाचकत्वं शब्दैकाश्रयमितरत् शब्दाश्रयमर्थाश्रयं च शब्दार्थयोर्हैयोरपि व्यङ्जकत्वस्य प्रतिपादितत्वात् ।
(अनु०) और भी व्यङ्ग्य की प्रधान्यरूप में विवक्षा न होने पर आपको वाच्यत्व स्वीकार नहीं करना चाहिये क्योंकि वहाँ पर शब्द तत्परक नहीं है । इससे व्यङ्ग्य शब्द का कोई विषय है । जहाँ पर उसका प्राधान्य भी है वहाँ पर भी उसका स्वरूप क्यों छिपाया जा रहा है । इस प्रकार वाच्यत्व से तो व्यङ्जकत्व अन्य ही है । इससे भी वाचकत्व की अपेक्षा व्यङ्जकत्व अन्य होता है जोकि वाचकत्व शब्द मात्र के आश्रित होता है और दूसरा शब्दाश्रित भी होता है और अर्थाश्रित भी, क्योंकि दोनों के व्यङ्जकत्व का प्रतिपादन किया गया है ।
ननु यत्परः शब्दः स शब्दार्थ इति व्यङ्ग्यस्य प्राधान्ये वाच्यत्वमेव न्याय्यम्, तद्व्यतिरेकाच्च किं युक्तं व्यङ्ग्यत्वमिति चेसिद्धो नः पक्षः, पत्तादाह—किंचैति । ननु प्राधान्ये मा भूदव्यङ्ग्यत्वं वमित्यादिकं—चाह—यत्रापीति । अर्थान्तरस्वं सम्बन्धिसम्बन्धित्वमत्नुपयुक्तसमयत्वमिति व्यङ्ग्यतया निवन्धनं तच्च प्राधान्येऽपि विद्यते इति स्वरूपनिस्सन्देहः ‘यत्परः शब्दो भवति है वह शब्दार्थ हुआ करता है’ इसलिये व्यङ्गच के प्राधान्य होने पर वाच्यत्व ही न्याय्य है ।
ननु यत्परः शब्दः स शब्दार्थ इति व्यङ्ग्यस्य प्राधान्ये वाच्यत्वमेव न्याय्यम्, तद्व्यतिरेकाच्च किं युक्तं व्यङ्ग्यत्वमिति चेसिद्धो नः पक्षः, पत्तादाह—किंचैति । ननु प्राधान्ये मा भूदव्यङ्ग्यत्वं वमित्यादिकं—चाह—यत्रापीति । अर्थान्तरस्वं सम्बन्धिसम्बन्धित्वमत्नुपयुक्तसमयत्वमिति व्यङ्ग्यतया निवन्धनं तच्च प्राधान्येऽपि विद्यते इति स्वरूपनिस्सन्देहः ‘यत्परः शब्दो भवति है वह शब्दार्थ हुआ करता है’ इसलिये व्यङ्गच के प्राधान्य होने पर वाच्यत्व ही न्याय्य है ।
ननु यत्परः शब्दः स शब्दार्थ इति व्यङ्ग्यस्य प्राधान्ये वाच्यत्वमेव न्याय्यम्, तद्व्यतिरेकाच्च किं युक्तं व्यङ्ग्यत्वमिति चेसिद्धो नः पक्षः, पत्तादाह—किंचैति । ननु प्राधान्ये मा भूदव्यङ्ग्यत्वं वमित्यादिकं—चाह—यत्रापीति । अर्थान्तरस्वं सम्बन्धिसम्बन्धित्वमत्नुपयुक्तसमयत्वमिति व्यङ्ग्यतया निवन्धनं तच्च प्राधान्येऽपि विद्यते इति स्वरूपनिस्सन्देहः ‘यत्परः शब्दो भवति है वह शब्दार्थ हुआ करता है’ इसलिये व्यङ्गच के प्राधान्य होने पर वाच्यत्व ही न्याय्य है । है, यदि यह कहा जाये तो हमारी पक्ष सिद्ध हो गया । यह कहते हैं—‘और भी’ इत्यादि । ‘निस्सन्देह प्राधान्य में व्यङ्ग्यत्व न हो’ यह आदि पक्ष खण्डन किया गया । ‘यहाँ पर………..भी’ इत्यादि । अर्थान्तरत्व, सम्बन्धि-सम्बन्धित्व और अनुपयुक्त सक्के तत्त्व यह व्यङ्ग यता में निवन्धन है और वह प्राधान्य में भी विद्वमान ही है,
तारावती है कि जहाँ वाच्य की अपेक्षा व्यङ्गच प्रधान होता है उसे ध्वनि कहते हैं । इसके प्रतिकूल जहाँ व्यङ्गच की अपेक्षा वाच्य प्रधान होता है उसे गुणीभूत व्यङ्गच कहते हैं । इस बात को निवेदन आगे चलकर किया जायगा । इस समस्त विवेचन से यह निष्कर्ष निकलता है कि यदि शब्द व्यङ्गचपरक भी हो ( और ‘यत्परः शब्दः स शब्दार्थः’ के अनुसार उसे ही वाच्य संज्ञा प्राप्त होनेवाली हो ) फिर भी वहाँ पर व्यङ्गच्यार्थ अभिधावृत्ति से गता र्थ नहीं होता अपितु उसके लिये व्यञ्जनावृत्ति मानना अनिवार्य हो जाता है ।
तारावती है कि जहाँ वाच्य की अपेक्षा व्यङ्गच प्रधान होता है उसे ध्वनि कहते हैं । इसके प्रतिकूल जहाँ व्यङ्गच की अपेक्षा वाच्य प्रधान होता है उसे गुणीभूत व्यङ्गच कहते हैं । इस बात को निवेदन आगे चलकर किया जायगा । इस समस्त विवेचन से यह निष्कर्ष निकलता है कि यदि शब्द व्यङ्गचपरक भी हो ( और ‘यत्परः शब्दः स शब्दार्थः’ के अनुसार उसे ही वाच्य संज्ञा प्राप्त होनेवाली हो ) फिर भी वहाँ पर व्यङ्गच्यार्थ अभिधावृत्ति से गता र्थ नहीं होता अपितु उसके लिये व्यञ्जनावृत्ति मानना अनिवार्य हो जाता है ।
तारावती है कि जहाँ वाच्य की अपेक्षा व्यङ्गच प्रधान होता है उसे ध्वनि कहते हैं । इसके प्रतिकूल जहाँ व्यङ्गच की अपेक्षा वाच्य प्रधान होता है उसे गुणीभूत व्यङ्गच कहते हैं । इस बात को निवेदन आगे चलकर किया जायगा । इस समस्त विवेचन से यह निष्कर्ष निकलता है कि यदि शब्द व्यङ्गचपरक भी हो ( और ‘यत्परः शब्दः स शब्दार्थः’ के अनुसार उसे ही वाच्य संज्ञा प्राप्त होनेवाली हो ) फिर भी वहाँ पर व्यङ्गच्यार्थ अभिधावृत्ति से गता र्थ नहीं होता अपितु उसके लिये व्यञ्जनावृत्ति मानना अनिवार्य हो जाता है ।
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महेयमेवेति भावः । एतदुपसंहरति—एतद्रमिति । विषयभेदेन स्वरूपभेदेन चेत्यर्थः । तावदिति वक्तव्यान्तरमासूत्रयति । तदेवाह--इतश्रेति । अनেন सामग्रिभेदात्कारणभेदोऽस्तीति दर्शयति । एतच्च विततत्य ध्वनिलक्षणे ‘यत्रार्थः शब्दो वा’ इति वाक्रहणं व्यड्क्तः । ‘इति’ द्विवचनं च व्याचक्षाणरसमामिः प्रथमोद्योते एव दर्शितवांस्ति पुनर्-विस्तार्यते ।
लोचन
अतः उसका स्वरूप नहीं हो छिपाया जा सकता—यह भाव है । इसका उपसंहार करते हैं—‘इस प्रकार’ यह । अर्थात् विषयभेद से और स्वरूप से । ‘तावत्’ इससे दूसरे वक्तव्य का उपक्रम करते हैं । वही कहते हैं—‘इसे भी’ यह । इससे यह दिखलाते हैं कि सामग्रिभेद से कारणभेद भी होता है । यह ध्वनिलक्षण में ‘यत्रार्थः शब्दो वा’ इस कारिका में ‘वा’ ग्रहण की और ‘व्यड्क्तः’ में द्विवचन की व्याख्या करते हुये हमने ही प्रथम उद्योत में ही विस्तारपूर्वक दिखला दिया है । अतः पुनः विस्तारपूर्वक नहीं दिखलाया जा रहा है ।
लोचन
( प्रश्न ) सामान्यतया नियम यही है कि शब्द का वही अर्थ होता है जिस अर्थ को कहने के लिये वह प्रयुक्त किया गया हो । यदि शब्द व्यञ्जनार्थ-प्रतीति के लिये प्रयुक्त किया गया है तो व्यञ्जनार्थ ही शब्द का अर्थ माना जायगा । ऐसी दशा में जहाँ व्यञ्जनार्थ की प्रधानता हो और वाच्यार्थ गौण हो वहाँ पर वाच्यार्थ की अपेक्षा शब्द व्यञ्जनार्थपरक ही होता है । अतः व्यञ्जनार्थ को मुख्य वाच्यार्थ कहना ही ठीक है । फिर आप उसे व्यञ्जय की संज्ञा क्यों प्रदान करते हैं ?
तारावती
( उत्तर ) व्यञ्जनार्थ और वाच्यार्थ के पारस्परिक सम्बन्ध के विषय में दो परिस्थितियाँ हो सकती हैं—एक तो ऐसी परिस्थिति जिसमें व्यञ्जनार्थ गौण हो और वाच्यार्थ मुख्य हो तथा मुख्य वाच्यार्थ की पुष्टि का उपकारक होकर ही व्यञ्जनार्थ आये । दूसरी परिस्थिति इसके प्रतिकूल होती है अर्थात् वहाँ पर वाच्यार्थ उपकारक होता है और उससे उपकृत होकर व्यञ्जनार्थ को ही प्रधानता प्राप्त होती है । ‘यत्परः शब्दः स शब्दार्थः’ के अनुसार प्रथम प्रकार की परिस्थिति में शब्द वाच्यपरक होता है और द्वितीय प्रकार की परिस्थिति में व्यञ्जनार्थपरक ।
तारावती
अब प्रश्न यह उठता है कि प्रथम प्रकार की परिस्थिति में जहाँ व्यञ्जनार्थ मुख्य नहीं होता और वह मध्यवर्ती ही रह जाता है वहाँ उसे वाच्य की संज्ञा नहीं दी जा सकती क्योंकि शब्द तत्परक नहीं है । ऐसी दशा में आप उसे व्यञ्जय ही कहने के लिये बाध्य होंगे । इससे हमारा यह पक्ष तो सिद्ध ही हो गया कि
तारावती
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व्यङ्ग्यार्थ कुछ न कुछ होता अवश्य है और वह शब्द का विषय भी होता है। अब यह परिस्थिति शेष रह जाती है जहाँ व्यङ्ग्य की प्रधानता होती है। उसे भी व्यंग्य कहना ही ठीक है वहाँ पर भी उसके स्वरूप का ढिपाया जाना उचित नहीं है। (कारण यह है कि सङ्केतित अर्थ न होने के कारण उसे हम वाच्यार्थ नहीं कह सकते।) व्यंग्य संज्ञा प्राप्त करने के लिये जिन शतों की आवश्यकता होती है वे सब शर्तें वहाँ पर भी पूरी ही हो जाती हैं जहाँ वाच्यार्थ गौण और व्यङ्ग्यार्थ मुख्य होता है। व्यंग्य संज्ञा प्राप्ति के लिये इन शर्तों की अपेक्षा होती है—
(१) अन्य अर्थ का होना अर्थात् व्यङ्ग्यार्थ वहाँ पर होता है जहाँ एक से अधिक अर्थ होते हैं। (२) समस्त शब्दों का सम्बन्धी होना अर्थात् शब्द का सम्बन्धी या तो वाच्यार्थ होता है। या लक्ष्यार्थ, उसे वाच्यार्थ या लक्ष्यार्थ का सम्बन्धी व्यङ्ग्यार्थ होता है। और (३) सङ्केत का अनुपयुक्त होना अर्थात् व्यङ्ग्यार्थ सङ्केत तिरित अर्थ नहीं होता अपितु तात्पर्य अर्थ होता है। यही तीनों शर्ते* व्यङ्ग्यार्थ की होती हैं। ये तीनों शर्तें वहाँ पर भी लागू हो जाती हैं जहाँ वाच्यार्थ गौण और व्यङ्ग्यार्थ मुख्य होता है। अतः वहाँ पर भी उसकी व्यंग्य संज्ञा का परित्याग नहीं किया जा सकता। इससे यह सिद्ध हो गया कि व्यङ्ग्यार्थ वाच्य से सर्वथा भिन्न ही हुआ करता है। इस भेद में दो कारण हैं (१) वाच्यार्थ और व्यङ्ग्यार्थ के स्वरूप में परस्पर भेद होता है। (वाच्यार्थ सङ्केतानुसारी होता है और व्यङ्ग्यार्थ में सङ्केत की अपेक्षा नही होती।)
(वाच्यार्थ का विषय सङ्केतित अर्थ होता है और व्यङ्ग्यार्थ का विषय रस, वस्तु तथा अलङ्कार ये तीन होते हैं।) केवल इतना ही नहीं अपितु वाच्यार्थ और व्यङ्ग्यार्थ में सामग्री का भी भेद होता है और सामग्रीभेद होने से कारण का भी भेद हू जाता है। कारण यह है कि वाच्यार्थप्रतीति के लिये केवल शब्द की ही सामग्री के रूप में अपेक्षा होती है; किन्तु जैसा कि पहले दिखलाया जा चुका है व्यङ्ग्यार्थ की प्रतीति के लिये शब्द और अर्थ दोनों का आश्रय सामग्री के रूप में लिया जाता है। इस प्रकार वाच्यार्थ में केवल शब्द ही कारण होता है किन्तु व्यङ्ग्यार्थ में शब्द और अर्थ दोनों कारण होते हैं। इस बात का प्रतिपादन किया ही जा चुका है कि शब्द और अर्थ दोनों व्यञ्जक होते हैं। इस विषय का विशेष निरूपण प्रथम उचोत में ‘यत्रार्थ: शब्दो वा’ इस कारिका में ‘वा’ ग्रहण तथा ‘व्यड्दृक्’ के द्विवचन की व्याख्या के अवसर पर किया जा चुका है। अतः वहीं देखना चाहिये।
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गुणवृत्तिसूपचारेण लक्षणया चोभयाश्रयापि भवति । किन्तु ततोडपि व्यञ्जकत्वं स्वरूपतो विषयतश्च मिद्यते । रूपभेदस्तावदयम्-यद्मुख्यतया व्यापारो गुणवृत्ति: प्रसिद्धा । व्यञ्जकत्वं तु मुख्यतयैव शब्दस्य व्यापारः । नह्यर्थादृच्यद्धच्यतयप्रतीतिस्तस्याऽमुख्यत्वं मनागपि लभ्यते ।
(अनु०) गुणवृत्ति तो उपचार और लक्षणा दोनों के आश्रयवाली होती है । किन्तु व्यञ्जकत्व उससे भी स्वरूप के द्वारा और विषय के द्वारा भिन्न हो जाता है । रूपभेद तो यह है——कि अमुख्यरूप में व्यापार गुणवृत्ति प्रसिद्ध है । व्यञ्जकत्व तो मुख्यरूप में ही शब्द का व्यापार होता है । अर्थ से जो तीन व्यञ्ज्यों की प्रतीति है उसका अमुख्यत्व थोड़ा भी लक्षित नहीं होता ।
लोचन एवं विषयभेदाद्रूपभेदाद्कारणभेदाद्वा वाचकत्वानुख्यात्प्रकाशकत्वस्य भेदं प्रतिपाद्योभयाश्रयत्वविशेषात्तर्हि व्यञ्जकत्वगौणत्वयो: को भेद इत्याशङ्क्यामुख्यादपि प्रतिपादयितुमाह—गुणवृत्तिरिति । उभयाश्रयापीति । उपचारलक्षणयो: प्रथमोद्योत एव विमृज्य निर्णयं स्वरूपमिति न पुनर्लिख्यते । मुख्यतयैवैति । अस्वलद्गतित्वेनैत्यर्थ: । व्यञ्ज्यात्र्यामिति । वस्तुलङ्काररसात्मकम् ।
इस प्रकार विषयभेद से, स्वरूपभेद से और कारणभेद से मुख्य वाचकत्व से प्रकाशकत्व के भेद का प्रतिपादनकर ‘तो उभयाश्रयत्व’ की विशेषता के कारण व्यञ्जकत्व और गौणत्व में क्या भेद है ?’ यह शङ्का करके अनुुख्य से भी प्रतिपादन करने के लिये कहते हैं——गुणवृत्तिरित्यादि । दोनों के आश्रयवाली भी । अर्थात् शब्द और अर्थ के आश्रयवाली भी । उपचार और लक्षणा का स्वरूप प्रथम उद्योत में ही विमृज्य करके निर्णय कर दिया गया अतः यहाँ पुनः नहीं लिखा जा रहा है। ‘मुख्यता के रूप में ही’ अर्थात् मुख्यार्थबाध होने के कारण ही । तीन व्यञ्ज्य अर्थात् वस्तु, अलङ्कार और रसरूप व्यञ्ज्य ।
तारावती ऊपर यह दिखलाया जा चुका है कि वाचकत्व मुख्य होता है तथा उसका प्रकाशकत्व से विषयभेद भी होता है और स्वरूपभेद भी होता है। इन्हीं हेतुओं से वाचकत्व और प्रकाशकत्व का भेद माना जाता है । अब प्रश्न यह उपस्थित होता है कि जो बातें व्यञ्जकत्व में होती हैं वे ही गौणीवृत्ति में भी होती हैं । व्यञ्जकत्व भी शब्द और अर्थ दोनों का आश्रय लेता है और गौणीवृत्ति भी दोनों का आश्रय लेती है ! फिर व्यञ्जकत्व का गौणीवृत्ति से क्या भेद हुआ ? इसी प्रश्न
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अयं ध्वान्यः स्वरूपभेदः-यद्गुणवृत्तिरमुख्यत्वेन व्यवस्थितं वाचकत्वमेवोच्यते । व्यङ्ग्यत्वं तु वाचकत्वादन्यत्सं विभिञ्जमेव । एतच्च प्रतिपादितम् । अयङ्ग्यापरो रूपभेदो यद्गुणवृत्तौ यदर्थोऽर्थान्तरमुपलक्ष्यते तदोपलक्षणीयार्थो-तन्नो परिणत एवासौ सम्पद्यते । यथा ‘गङ्गायां घोषः’ इत्यादौ । व्यङ्ग्यकत्वभाजो तु पदार्थोऽर्थान्तरं द्योतयति तदा स्वरूपं प्रकाशयन्नेवासावनन्यस्य प्रकाशकः प्रतीयते प्रदीपवत्। यथा ‘लीलाकमलपत्राणि गण्यामास पार्वती’ इत्यादौ। यदि च यत्रातिरसकृतस्वप्रतीतीरथैःर्ड्यर्थान्तरं लभ्यते तत्र लक्षणाव्यवहारः क्रियते तदेवं सति लक्षणैव मुख्यः शब्दव्यापार इति प्राप्नुम्। यस्माद्व्रायेण वाक्यानां वाच्यव्यतिरिक्ते तात्पर्यविषयार्थावभासितत्वम् ।
(अनु०) और यह दूसरा स्वरूपभेद है—जोकि गुणवृत्ति अमुख्यरूप में स्थित वाचकत्व ही कही जाती है । व्यङ्गयकत्व तो वाचकत्व से अत्यन्त भिन्न ही होता है । इसको तो प्रतिपादित किया ही जा चुका है । और यह दूसरा रूपभेद है जोकि गुणवृत्ति में जब अर्थ दूसरे अर्थ को लक्षित करता है तब उपलक्षणीय अर्थ की आत्मा के रूप में परिणत हुआ ही हो जाता है । जैसे ‘गङ्गायां घोष:’ इत्यादि में । व्यङ्गयकत्व के मार्ग में तो जब अर्थ दूसरे अर्थ को द्योतित करता है तब स्वरूप को प्रकाशित करते हुये ही यह दूसरे का प्रकाशक प्रतीत होता है जैसे ‘पार्वती लीलाकमलपत्रों को गिन रही थीं’ इत्यादि में । और अपनी प्रतीति का तिरस्कार न करते हुये जहाँ अर्थ दूसरे अर्थ को लक्षित करता है वहाँ लक्षणा व्यवहार किया जाय तो यह सिद्ध हो गया कि लक्षणा ही शब्द का मुख्य व्यापार है । क्योंकि वाक्यार्थ: वाच्यव्यतिरिक्त तात्पर्यार्थ के अवभासित होने हैं ।
लोचन वाचकत्वमेवेति। तत्रापि हि तथैव समयोपयोगोऽस्त्येवेत्यर्थः । प्रतिपादितमिति । इदानीमेव । परिणत इति । स्वेन रूपेणनिर्मासमान इत्यर्थः । ‘वाचकत्व ही’ यह । अर्थात् उसमें भी उसी प्रकार सङ्केत का उपयोग है ही । ‘प्रतिपादन किया गया है’ इसी समय ‘परिणत’ यह। अर्थात् अपने रूप में निर्भर
‘वाचकत्वमेवेति’ । यहाँ भी उसी प्रकार सङ्केत का उपयोग होता ही है । ‘प्रतिपादितमिति’ अभी-अभी । ‘परिणत इति’ अपने रूप में निर्भर होना यही अर्थ है ।
न होते हुये ।
तारावती पर विचार करने के लिये यहाँ यह प्रकरण उठाया जा रहा है । (लक्षणा द्वि० प्रकार की होती है—शुद्धा और गौणी । यहाँ आलोक में शुद्धा लक्षणा के लिये लक्षणा शब्द का प्रयोग किया गया है और गौणी के लिये उपचार शब्द का । ये दोनों ही अप्रधान अर्थ को कहनेवाली होती हैं । इसीलिये दोनों को मिलाकर
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तारावती
गुणवृत्ति (अप्रधानवृत्ति) शब्द का प्रयोग किया जाता है। इसमें सन्देह नहीं कि गुणवृत्ति चाहे लक्षणापरक हो चाहे उपचारपरक, दोनों अवस्थाओं में गुणवृत्ति शब्द और अर्थ दोनों का आश्रय लेती है; तथापि यह कहा नहीं जा सकता कि गुणवृत्ति और लक्षणा दोनों एक ही वस्तु हैं। कारण यह है कि लक्षणा और गुणवृत्ति दोनों एक दूसरे से स्वरूप के दृष्टिकोण से भी भिन्न होती हैं और विषय के दृष्टिकोण से भी भिन्न होती हैं। स्वरूपभेद को इस प्रकार समझिये—गुणवृत्ति उसे कहते हैं जहाँ अमुख्यरूप में शब्द का व्यापार हो। गुणवृत्ति में पहले वाच्यार्थबोध होता है; फिर तात्पर्यानुपपत्ति के कारण उस अर्थ का बाध हो जाता है। इस प्रकार शब्द अपने अर्थ के विषय में स्वलद्र्रति हो जाता है। तब उस मुख्यार्थ से सम्बन्ध रखनेवाला दूसरा अर्थ जहाँ पर ले लिया जाता है वहाँ वह गुणवृत्ति या लक्षणा कहलाती है। इस प्रकार स्वलद्र्रति होने के कारण लक्षणा या उपचार दोनों प्रकार की गुणवृत्तियों को अमुख्य व्यापार कहा जाता है। यह बात उसके गुणवृत्ति इस नाम से ही प्रकट होती हैं इसके प्रतिकूल यह कोई कह नहीं सकता कि व्यङ्ग्यार्थ भी गौण ही होता है, रस गौण होता है यह तो कहा ही नहीं जा सकता चमत्कारपर्यवसायी होने पर वस्तु और अलंकार भी मुख्य ही होते हैं वे कभी गौण कहे ही नहीं जा सकते। इस प्रकार तीनों ही प्रकार के व्यंग्यार्थ मुख्य ही होते हैं वे कभी गौण नहीं होते और लक्षणा सर्वदा अमुख्य हो होती है। यही इन दोनों का स्वरूपभेद है। (आशय यह है कि लक्षणा सर्वदा बाध-सापेक्षिणी कराती है। अतः अमुख्य वृत्ति व्यङ्ग्यना बाध-सापेक्षिणी नहीं होती। अतः व्यङ्ग्यना द्वारा प्रत्यायित अर्थ मुख्य ही होता है। यही इन दोनों का स्वरूपभेद है।)
दूसरे प्रकार का स्वरूपभेद यह होता है कि लक्षणा एक प्रकार की वाचकत्व वृत्ति ही कही जाती है अर्थात् वह एक प्रकार की अभिधा ही होती है; भेद केवल यह होता है कि अभिधा मुख्य संकेतित अर्थ का प्रत्यायन कराती है किन्तु लक्षणा अमुख्य अर्थ को कहती है। इसके प्रतिकूल यह सिद्ध ही किया जा चुका है कि व्यञ्जना अभिधा से सर्वथा भिन्न ही होती है। (विस्तृत विवेचन के लिये देखिये प्रथम उद्योत का भेदनिर्णयपरक प्रकरण।) आशय यह है कि लक्षणा सर्वदा शक्त्य-सम्बन्ध में ही होती है और वह अभिधापूर्वभूता कही जाती है। उसमें किसी न किसी रूप में संकेत का उपयोग होता ही है। किन्तु व्यङ्ग्यार्थप्रतीति के लिये संकेत की कोई अपेक्षा नहीं होती; व्यञ्जना शक्त्यसम्बन्ध में ही नहीं होती।
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ननु त्वत्पक्षेऽपि यदार्थो व्यङ्गच्यत्रयं प्रकाशयति तदा शब्दस्य कोऽरो व्यापारः ? उच्यते—प्रकरणाद्यवच्छिन्नशब्दद्वारेणैवार्थस्य तथाविधं व्यङ्ग्यत्वमिति शब्दस्य तात्पर्ययोगः कथं अपह्नयते ।
ननु त्वत्पक्षेऽपि यदार्थो व्यङ्गच्यत्रयं प्रकाशयति तदा शब्दस्य कोऽरो व्यापारः ? उच्यते—प्रकरणाद्यवच्छिन्नशब्दद्वारेणैवार्थस्य तथाविधं व्यङ्ग्यत्वमिति शब्दस्य तात्पर्ययोगः कथं अपह्नयते ।
(अनु०) (प्रश्न) निस्सन्देह तुम्हारे पक्ष में भी जब अर्थ तीन व्यङ्ग्यों को प्रकाशित करता है तब शब्द का किस प्रकार का व्यापार होता है? (उत्तर) बतलाया जा रहा है--प्रकरण इत्यादि से अवच्छिन्न शब्द के वश में ही अर्थ को उस प्रकार की व्यङ्जकता होती है, अतः यहाँ पर शब्द के उपयोग को कैसे छिपाया जा सकता है?
एक दूसरा स्वरूपभेद इस प्रकार का होता है कि गुणवृत्ति में जहाँ एक अर्थ दूसरे अर्थ को उपलक्षित करता है वहाँ वह अपने को बिल्कुल खो देता है और उपलक्षणीय अर्थ के रूप में पूर्णतया परिणत हो जाता है। (जैसे ‘गंगा में घर’ इस वाक्य में प्रवाहवाचक गंगा शब्द ‘तीर—’ अर्थ को व्यक्त करता है और पूर्णरूप से तीर अर्थ को ही कहने लगता है। प्रवाहरूप वाच्यार्थ अपने को तीर-रूप लक्ष्यार्थ में सर्वदा खो देता है।) किन्तु व्यङ्जकत्वमार्ग में ऐसा नहीं होता। उसमें जब एक अर्थ दूसरे को प्रकाशित करता है तब वह अपने को भी प्रकाशित करता रहता है और वह दूसरे को भी प्रकाशित कर देता है। वह दूसरे को प्रकाशित करने में अपने को खो नहीं देता। जैसे दीपक स्वयं प्रकाशित होता है और घट को भी प्रकाशित करता है। घट के प्रकाशन के अवसर पर दीपक का प्रकाश जाता नहीं रहता।
एक दूसरा स्वरूपभेद इस प्रकार का होता है कि गुणवृत्ति में जहाँ एक अर्थ दूसरे अर्थ को उपलक्षित करता है वहाँ वह अपने को बिल्कुल खो देता है और उपलक्षणीय अर्थ के रूप में पूर्णतया परिणत हो जाता है। (जैसे ‘गंगा में घर’ इस वाक्य में प्रवाहवाचक गंगा शब्द ‘तीर—’ अर्थ को व्यक्त करता है और पूर्णरूप से तीर अर्थ को ही कहने लगता है। प्रवाहरूप वाच्यार्थ अपने को तीर-रूप लक्ष्यार्थ में सर्वदा खो देता है।) किन्तु व्यङ्जकत्वमार्ग में ऐसा नहीं होता। उसमें जब एक अर्थ दूसरे को प्रकाशित करता है तब वह अपने को भी प्रकाशित करता रहता है और वह दूसरे को भी प्रकाशित कर देता है। वह दूसरे को प्रकाशित करने में अपने को खो नहीं देता। जैसे दीपक स्वयं प्रकाशित होता है और घट को भी प्रकाशित करता है। घट के प्रकाशन के अवसर पर दीपक का प्रकाश जाता नहीं रहता।
उदाहरण के लिये कुमारसम्भवम् में ‘जिमि ससम्भव में पार्वती के विवाह की चर्चाँ उनके पिता हिमाचल से कर रहे थे उस समय ‘पार्वती पिता के पास बैठी हुयी नीचे को मुख किये हुये लीला-कमल की पंखुडियों को गिन रहीं थीं।’ यहाँ पर पार्वती का सुखनमन इत्यादि वाच्यार्थ है और पार्वती की लज्जा इत्यादि व्यङ्ग्य है। पार्वती की लज्जा को अभिव्यक्त करने में मुखनमन रूप वाच्यार्थ अपने को खो नहीं देता किन्तु अभिजनञ्जा काल में स्वयं भी प्रकाशित बना रहता है। लक्षणा के लिये यह अनिवार्य है कि उसमें वाच्यार्थ का बाध अवश्य हो। यदि यह अनिवार्य शर्त नहीं मानी जायगी तो लक्षणा गौणीवृत्ति नहीं रह जायगी आप्त मुख्यवृत्ति बन जायगी। क्योंकि जितने भी वाक्य होते हैं, उनमें अधिकतर वाक्यों में शब्दार्थ की अपेक्षा तात्पर्यार्थ अतिरिक्त हुआ करता है और सभी शब्दार्थ मिलकर तात्पर्यार्थ का अवभासन करते हैं। यदि लक्षणा ऐसे स्थान पर मानी जायगी जहाँ शब्दार्थ अपनी प्रतीति का तिरस्कार नकर दूसरे अर्थ का
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कीटद्रश इति मुख्यो वा न वा प्रकारान्तराभावात्। मुख्यत्वे वाचकत्वमन्यथा गुण-वृत्ति:, गुणो निमित्तं सादृश्यादि तदुद्दारिका वृत्ति: शब्दस्य व्यापारो गुणवृत्तिरिति भाव:। मुख्य एवासौ व्यापार: सामग्रिभेदाद्वाचकत्वादन्यतिरिक्त्यत इत्यभिप्रायेणाह—उच्यत इति।
कीटद्रश इति मुख्यो वा न वा प्रकारान्तराभावात्। मुख्यत्वे वाचकत्वमन्यथा गुण-वृत्ति:, गुणो निमित्तं सादृश्यादि तदुद्दारिका वृत्ति: शब्दस्य व्यापारो गुणवृत्तिरिति भाव:। मुख्य एवासौ व्यापार: सामग्रिभेदाद्वाचकत्वादन्यतिरिक्त्यत इत्यभिप्रायेणाह—उच्यत इति।
'किस प्रकार का' यह। मुख्य है या नहीं है क्योंकि तीसरा प्रकार नहीं होता। मुख्य होने पर वाचकत्व होता है नहीं तो गुणवृत्ति होती है। भाव यह है कि जिसमें गुण निमित्त हो अर्थात् सादृश्य इत्यादि उसके द्वारा जो वृत्ति अर्थात् शब्द का व्यापार होता है उसे गुणवृत्ति कहते हैं। यह व्यापार मुख्य ही होता है किन्तु सामग्रीभेद से वाचकत्व से अतिरिक्त हो जाता है इस अभिप्राय से कहते हैं—'बतलाया जा रहा है' यह।
प्रत्यायन करा देता है तो प्रत्येक वाक्य का तात्पर्यार्थ लक्षणा-गम्य ही हो जायगा और लक्षणा मुख्य शब्द-वृत्ति वन जायगी वह गौणी-वृत्ति नहीं रहेगी। अतः लक्षणा वहीं पर मानी जा सकती है जहाँ मुख्यार्थ का बाध हो और मुख्यार्थ दूसरे अर्थ के प्रत्यायन में अपने को खो दे। व्यञ्जना में ऐसा होता नहीं। अतः व्यञ्जना-वृत्ति लक्षणा से सर्वथा भिन्न होती है।
प्रत्यायन करा देता है तो प्रत्येक वाक्य का तात्पर्यार्थ लक्षणा-गम्य ही हो जायगा और लक्षणा मुख्य शब्द-वृत्ति वन जायगी वह गौणी-वृत्ति नहीं रहेगी। अतः लक्षणा वहीं पर मानी जा सकती है जहाँ मुख्यार्थ का बाध हो और मुख्यार्थ दूसरे अर्थ के प्रत्यायन में अपने को खो दे। व्यञ्जना में ऐसा होता नहीं। अतः व्यञ्जना-वृत्ति लक्षणा से सर्वथा भिन्न होती है।
( प्रश्न ) आपके मत में उस स्थान पर शब्द की क्या व्यवस्था होगी जहाँ एक अर्थ दूसरे अर्थ को प्रकाञ्चित करता है? आप शब्द के दो ही प्रकार के व्यापार मान सकते हैं—या तो मुख्य या अमुख्य। यदि ऐसे स्थल पर शब्द का मुख्य व्यापार होता है तो उसको आप अभिधा की संज्ञा प्रदान कर सकते हैं। यदि अमुख्य व्यापार होता है तो उसे आप गुणवृत्ति (लक्षणा) कह सकते हैं। क्योंकि गुणवृत्ति शब्द का अर्थ ही अमुख्यवृत्ति होता है। गुणवृत्ति शब्द का अर्थ है गुणों के द्वारा कर्त्तमान होना। अर्थात् शब्द के प्रयोग में गुण निमित्त होकर आते हैं। ( जैसे 'देवदत्त बैल है' में बैल के गुणों के आधार पर देवदत्त के लिये बैल शब्द का प्रयोग किया गया है। ) इस प्रकार गुण-वृत्ति शब्द का अर्थ होगा—गुण अर्थात् सादृश्य इत्यादि निमित्त को माध्यम मानकर जहाँ 'वृत्ति' अर्थात् शब्द का व्यापार हो उसे गुणवृत्ति कहते हैं। आशय यह है कि जितने प्रकार के मुख्यार्थ होते हैं उन सब में अभिधा मानी जाती है और जितने प्रकार के अमुख्यार्थ होते हैं उन सब में गुण-वृत्ति या लक्षणा मानी जाती है। मुख्य और अमुख्य के अतिरिक्त तीसरा प्रकार ही कोई नहीं होता। अतः यदि आप इन दोनों वृत्तियों से भिन्न तीसरी व्यञ्जना नामक वृत्ति मानते हैं तो उसमें आप
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शब्द का व्यापार कैसा मानेंगे मुख्य या अमुख्य ? ( उत्तर ) व्यंजना में भी शब्द का मुख्य व्यापार ही होता है । किन्तु उस मुख्य व्यापार को हम अभिधा नहीं कह सकते । कारण यह है कि दोनों व्यापारों में सामग्री का भेद होता है । अभिधा की सामग्री है सङ्केत ग्रहण और व्यंजना की सामग्री है प्रकरण इत्यादि का ज्ञान । जब एक अर्थ दूसरे अर्थ का प्रत्यायन कराने के लिये ऐसे शब्द का सहारा लेता है जिसमें प्रकरण इत्यादि का सहकार भी सन्निहित रहता करता है तब उस अर्थ में व्यञ्जकता आ जाती है । उस व्यञ्जकता में शब्द का सहकार भी अपेक्षित होता है । अतः शब्द के उपयोग का अपलाप नहीं किया जा सकता । ( कहा भी गया है—‘शब्दबोध्य अर्थ व्यञ्जक होता है और शब्द भी अर्थान्तर का आश्रय लेकर व्यञ्जक होता है ।’ अतः एक की व्यञ्जकता में दूसरे का सहकार होता है । )
ऊपर गुणवृत्ति और व्यञ्जकता के स्वरूपभेद की व्याख्या तीन प्रकार से की गई है । इन तीनों प्रकारों का सार यह है कि ( १ ) व्यञ्जना में शब्द की गति स्खलित नहीं होती किन्तु लक्षणा में शब्द की गति स्खलित हो जाती है । अर्थात् लक्षणा में बाध होता है किन्तु व्यञ्जना में नहीं। ( २ ) व्यञ्जना में सङ्केत का किसी प्रकार भी उपयोग नहीं होता किन्तु लक्षणा में प्रयत्नद्रूप में सङ्केत का उपयोग होता है लक्षणा शक्यार्थबाध-सापेक्षिणी होती है, अतः लक्षणा में शक्यार्थज्ञान अपेक्षित होता है और ( ३ ) व्यञ्जना का प्रतिबिम्ब शक्यार्थ के साथ-साथ उससे पृथक्रूप में होता है किन्तु लक्षणा का प्रतिबिम्ब शक्यार्थ से पृथक् नहीं किन्तु शक्यार्थ से मिलकर एकसाथ एक रूप में हो होता है। यहाँ तीन प्रकार हैं जिन से गुणवृत्ति और व्यञ्जना के स्वरूप में भेद हो जाता है । ( निर्णयसागरीय संस्करण में आलोक में ‘व्यञ्ज्यस्वरूपाद्विच्छिन्नं वस्तु चेत्य नित्यविषयं:’ इस पंक्ति के बाद इतना पाठ और जोड़ दिया गया है—‘अस्वलद्द्रुतित्वं समयानुपयोगित्वं पृथग्वभासितत्वं चेति त्रयम् ।’
किन्तु इसकी यहाँ सङ्गति नहीं बैठती । इसीलिये कुछ लोगों ने इस पाठ की ‘कथमपह्नूयते’ के पहले कलमना कर ली है और लिखा है कि लोचन में इन्हीं शब्दों के आने की सङ्गति बैठाने के लिये इस पाठ का मानना अत्यावश्यक है । किन्तु ध्यान देनेवाली बात यह है कि यदि आलोक में यह पाठ विद्यमान ही होता तो लोचन में प्रतिपाद्य के रूप में इसका उपादान कर बाद में ‘इति’ शब्द का प्रयोग किया गया होता तथा इसकी व्याख्या में कुछ कहा गया होता । इसके प्रतिकूल लोचनकार ने ‘विषयमेदोपपत्ति’ के अवतरण के रूप में इन शब्दों का उपादान किया है । इससे स्पष्ट है कि यह पाठ लोचनकार का हो है । आलोककार का यह
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विषयभेदोऽपि गुणवृत्तिव्यङ्ग्यक्त्वयोः स्पष्ट एव । यतो व्यङ्ग्यक्त्वस्य रसादयोलल्कारविशेषा व्यङ्ग्यरूपावच्छिन्नं वस्तु चेतिं त्रयं विषयः । तत्त्र रसादिप्रतीतिगुणवृत्तिरिति न केनापि जुगुप्साते न च शक्यते वक्तुम् । व्यङ्ग्यालङ्कारप्रतीतिरपि तथैव । वस्तु चारुत्वप्रतीतये स्वशब्दानाभिधेयत्वेन यत्तत्पदार्थयितुमिच्छ्यते तद्व्यङ्ग्यथम् । तच्च न सर्वं गुणवृत्तेरविषयः प्रसिद्धचतुरोथाभिधामपि गौणानां शब्दानां प्रयोगदर्शनात् । तथोक्तम् प्राङ्क । यदपि च गुणवृत्तेरस्तदपि च व्यङ्ग्यक्त्वानुप्रवेशन । तस्माद्गुणवृत्तेरपि व्यङ्ग्यक्त्वस्यात्यान्तविलक्षणत्वम् । वाचकत्वगुणवृत्तिविलक्षणस्यापि च तस्य तदुभयाश्रयत्वेन व्यवस्थानम् ।
(अनु०) गुणवृत्ति और व्यङ्ग्यक्त्व का विषयभेद भी स्पष्ट हो है । क्योंकि व्यङ्ग्यक्त्व के तीन विषय हैं—रस इत्यादि अलङ्कार विशेष और व्यङ्ग्यरूप से अवच्छिन्न वस्तु । उनमें रस इत्यादि गुणवृत्ति हैं यह न किसी के द्वारा कही गयी है और न कहा जा सकता है । उसी प्रकार की व्यङ्ग्यालङ्कार-प्रतीति भी है । वस्तु की चारुता की प्रतीति के लिये अपने शब्द के द्वारा अभिधान न किये जाने के रूप में जिसके प्रतिपादन की इच्छा की जाती है वह व्यङ्ग्य होता है । वह सव गुणवृत्ति का विषय नहीं होता क्योंकि प्रसिद्धि और अनुरोध से भी गौण शब्दों का प्रयोग देखा जाता है । वैसा पहले कहा जा चुका है । और जो भी गुणवृत्ति के अनुप्रवेश से । उससे गुणवृत्ति का भी व्यङ्ग्यक्त्व से अत्यन्त विलक्षणत्व होता है । और वाचकत्व तथा गुणवृत्ति से विलक्षण उस व्यङ्ग्य को व्यावस्थित करनेवाले दोनों के आश्रय से ही होता है ।
एवमस्वलदृगतित्वात् कथमिदपि समयानुपयोगात् गृथगामासमानत्वाच्चेतिं त्रिमिः प्रकारैः प्रकाराकत्वयैतहिम्परीतरूपप्रत्नयायाश्रय गुणवृत्तेः स्वरूपभेदं व्याख्यात् विषयभेदमथ्याह—‘विषयभेदोऽपि’ति । वस्तुमात्रं गुणवृत्तेरपि विषय इत्यमिप्रायेण विशेषयति—‘व्यङ्ग्यरूपावच्छिन्नामिति’ । व्यङ्ग्यक्त्वस्य यो विषयः स गुणवृत्तेनं विषयः अन्यश्र प्रकारे गति के स्वलित न होने से ( मुख्यार्थबाध न होने से ), किसी प्रकार भी सङ्केत का उपयोग न होने से और पृथक् अवभास होने से इन तीन प्रकारों से प्रकाशकत्व की इससे विपरीत रूपोंवाली गुणवृत्ति के स्वरूपभेद की व्याख्या कर विषयभेद को भी कहते हैं—‘विषयभेद भी यह । वस्तुमात्र गुणवृत्ति का भी विषय होता है इस अभिप्राय से विशेषण देते हैं—‘व्यङ्ग्यरूपावच्छिन्न’ यह । व्यङ्ग्यक्त्व का जो विषय है वह गुणवृत्तेनं विषयः अन्यश्र
इस प्रकार गति के स्वलित न होने से ( मुख्यार्थबाध न होने से ), किसी प्रकार भी सङ्केत का उपयोग न होने से और पृथक् अवभास होने से इन तीन प्रकारों से प्रकाशकत्व की इससे विपरीत रूपोंवाली गुणवृत्ति के स्वरूपभेद की व्याख्या कर विषयभेद को भी कहते हैं—‘विषयभेद भी यह । वस्तुमात्र गुणवृत्ति का भी विषय होता है इस अभिप्राय से विशेषण देते हैं—‘व्यङ्ग्यरूपावच्छिन्न’ यह । व्यङ्ग्यक्त्व का जो विषय है वह गुणवृत्तेनं विषयः अन्यश्र
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तस्या विषयभेदो योऽस्य: । तत्र प्रथमं प्रकारमाह—तत्रेति । 'न च शक्यते' इति । लक्षणासामग्रीास्तनाविच्छमानत्वादिति पूर्वमेवोक्तम् । तथैवेत । न च तत्र गुणवृत्ति-युक्ते ल्यर्थ: । वस्तुनो यत्पूर्वं विशेषणं कृतं तद्र्याचष्टे—चारुत्वप्रतीतये इति । न सर्वमिति । किज्जित् मति । यथा—'निश्वासासव ह्नादर्श:' इति । यथोक्तम्—'कस्यचिद्ध्वनिभेदस्य स तु स्यादुपलक्षणम्' इति । प्रसिद्धतो लावण्यादय: शब्दा:, वृत्तानुरोधवयहारानुरोधादे: 'वदति विसिनीपत्रशयनम्' इत्येवमादय: । प्रागिति उस ( गुणवृत्ति ) का दूसरा है इस प्रकार विषयभेद की योजना की जानी चाहिये । इसमें प्रथम प्रकार को कहते हैं—'उसमें' यह । 'नहीं कहा जा सकता है' यह लक्षणा की सामग्री के वहाँ विद्यमान न होने से । यह पहले ही कहा जा चुका है । 'उसी प्रकार' यह । अर्थात् वहाँ पर गुणवृत्ति उपयुक्त नहीं है । वस्तु का जो पहले विशेषण दिया था उसकी व्याख्या करते हैं—'चारुत्व-प्रतीति के लिये' यह । 'मात्र नहीं' यह । कुछ तो होता ही है । जैसे 'निःश्वास से अन्ये श्वासो के समान' यह । जो कि कहा गया है—'किसी ध्वनिभेद का वह उपलक्षण तो हो सके' यह प्रसिद्ध से लावण्य इत्यादि शब्द; वृत्त के अनुरोध और व्यवहार के अनुरोध इत्यादि से 'विसिनी के पत्तों की शय्या कहती है' इत्यादि ।
पाठ नहीं है । किसी ने भ्रमवश इसे आलोक में सन्निविष्ट करदिया है । वस्तुतः लोचनकार ने आलोक के विस्तृत प्रकरण का इन शब्दों में समाहार किया है ।
उपर स्वरूपभेद की व्याख्या की जा चुकी । अब विषयभेद को लीलिये ! विषयभेद पर विचार करने से भी यह स्पष्ट हो जाता है कि गुणवृत्ति और व्यञ्जना ये दोनों वृत्तियाँ एक दूसरे से भिन्न ही हैं । व्यञ्जना के तीन विषय होते हैं—रस इत्यादि, विशेष प्रकार के अलङ्कार और व्यङ्गयत्व से युक्त वस्तु । यहाँ पर वस्तु के विशेषण के रूप में 'व्यङ्गयत्व से अवच्छिन्न' शब्द का उपादान विशेष प्रयोजन से किया गया है । यहाँ प्रकरण है गुणवृत्ति और व्यञ्जना के भेद-निरूपण का। रस और अलङ्कार केवल व्यञ्जना के विषय होते हैं; वे गुणवृत्ति का विषय होते ही नहीं । केवल वस्तु ही गुणवृत्ति और व्यञ्जना दोनों का विषय होती है इसीलिये कवि का जो विषय होता है वह गुणवृत्ति का विषय नहीं होता । गुणवृत्ति का विषय और ही होता है; वह व्यञ्जना का विषय नहीं होता । यही व्यञ्जना और गुणवृत्ति के विषयभेद की योजना है । न तो अब तक किसी ने कहा ही है और न कोई कह ही सकता है कि रसप्रतीति गुणवृत्ति के द्वारा होती है।यह तो निश्चित ही है कि गुणवृत्ति वहीं पर होती है जहाँ लक्षणा की सामग्री विद्यमान हो ।
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प्रथमोद्योते 'रुचा ये विषयेऽन्यत्र' इत्यत्रानन्तरे । न सर्वमिति प्रथामास्मिन्नोद्योद्यातं तथा स्फुटयति—यदपि चेति । गुणवृत्तेरिति पञ्चमी । अङ्गुनेतरसूपोपजीवकत्वेन तदितरदितररुपोपजीवकत्वेन च तदितरस्मादित्यनेन पर्यायेण वाचकत्वाद्गुणवृत्तेश्च द्वितयोरपि मिन्नं व्यङ्ग्यकलिप्त्युपपाद्यते—न वाचकत्वेति । नोदाहरणे मिन्नक्रमः, अपि तु श्राब्दबोधापि न केवलं पूर्वोक्तहेतुकलापो यावत्तदुमयाश्रयत्वेन मुख्योपचाराश्रयत्वेन व्यङ्ग्यव्यवस्थानात्तदुभयवैलक्षण्यमिते । तेनार्यं तात्पर्योर्थः—तदुभयाश्रयत्वे व्यस्तानाच्च तदुभयवैवलक्षण्यमिते ।
पहले उद्योत में 'जो शब्द अन्यत्र रूढ़ हों' इस कारिका के अन्दर कहा गया है । सब नहीं इसकी जैसी हमने व्याख्या की थी वैसा स्फुट कर रहे हैं—'यदपि' इति । 'गुणवृत्तेः' में पञ्चमी है । अब इतरेतर ( गुणवृत्ति ) का उपजीवक होने से उस इतरेतर ( गुणवृत्ति ) से और उससे भिन्न ( अभिधा ) की उपजीविका होने से उससे भिन्न से इस प्रकार पर्याय से वाचकत्व की अपेक्षा और गुणवृत्ति की अपेक्षा दोनों से ही व्यङ्ग्यकत्व भिन्न है यह सिद्ध करते हैं—'वाचकत्वादि' । 'च' यह अवधारण अर्थ में भिन्न क्रमवाला है और अपिशब्द भी । केवल पूर्वोक्त हेतु-समूह ही नहीं अपितु उन दोनों का आश्रय होने से अर्थात् मुख्य और उपचार का आश्रय होने से जो व्यवस्थित होना है वह भी वाचक और गुणवृत्ति से विलक्षण का ही हो सकता है यह व्याप्ति की सङ्घटना है । इससे यह तात्पर्यार्थ है—'उन दोनों के आश्रय के रूप में व्यवस्थित होने से उन दोनों से विलक्षणता है' यह ।
की सामग्री है मुख्यार्थवाध, मुख्यार्थसम्बन्ध और रूढ़िप्रयोगानन्तर । ये सब सामग्री रसप्रतीति में नहीं मिलती इसकी यथास्थान व्याख्या की जा चुकी है । रस केवल व्यङ्ग्यना का ही विषय होता है । इसी प्रकार व्यङ्ग्य अलङ्कारों की प्रतीति भी गुणवृत्ति के माध्यम से नहीं हो सकती क्योंकि वहाँ पर भी लक्षणा की सामग्री विद्यमान नहीं होती । अभङ्ग केवल वस्तु शेष रह जाती है जो गुणवृत्ति का भी विषय हो सकती है और व्यञ्जना का विषय वही वस्तु होती है जिसमें कवि चारुतां का आधान करना चाहे और इसीलिये उसे अपने वाचक शब्दों से ही आभिहित न कर दूसरे शब्दों से अभिव्यक्त करें । इस प्रकार की वस्तु ही व्यङ्ग्य होती है । ऐसी सभी वस्तु सर्वत्र गुणवृत्ति का विषय बन सके ऐसा नहीं होता । हाँ गुणवृत्ति के कतिपय स्थल ऐसे अवश्य हो सकते हैं जिनमें कवि चारुतां का आधान करना चाहे । उदाहरण के लिये 'निःश्वासान्ध
तारावती
की सामग्री है मुख्यार्थवाध, मुख्यार्थसम्बन्ध और रूढ़िप्रयोगानन्तर । ये सब सामग्री रसप्रतीति में नहीं मिलती इसकी यथास्थान व्याख्या की जा चुकी है । रस केवल व्यङ्ग्यना का ही विषय होता है । इसी प्रकार व्यङ्ग्य अलङ्कारों की प्रतीति भी गुणवृत्ति के माध्यम से नहीं हो सकती क्योंकि वहाँ पर भी लक्षणा की सामग्री विद्यमान नहीं होती । अभङ्ग केवल वस्तु शेष रह जाती है जो गुणवृत्ति का भी विषय हो सकती है और व्यञ्जना का विषय वही वस्तु होती है जिसमें कवि चारुतां का आधान करना चाहे और इसीलिये उसे अपने वाचक शब्दों से ही आभिहित न कर दूसरे शब्दों से अभिव्यक्त करें । इस प्रकार की वस्तु ही व्यङ्ग्य होती है । ऐसी सभी वस्तु सर्वत्र गुणवृत्ति का विषय बन सके ऐसा नहीं होता । हाँ गुणवृत्ति के कतिपय स्थल ऐसे अवश्य हो सकते हैं जिनमें कवि चारुतां का आधान करना चाहे । उदाहरण के लिये 'निःश्वासान्ध
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व्यङ्ककर्तवं हि कविविद्याचतुराश्रयेण व्यवतिष्ठते यथा विवक्षितान्यपरवाच्ये ध्वनौ। कचिच्चित् गुणवृत्त्याश्रयेण यथा अविवक्षितवाच्ये ध्वनौ। तदुभयाश्रयत्वप्रतिपादनायैव प्रथमतरं हि भेदाभुपन्यासतौ। तदुभयाश्रितत्वाच्च तदेकरूपत्वं तस्य (अनु०) व्यङ्ककर्तृं निस्सन्देहं कहीं वाचकत्व के आश्रय से व्यवस्थित होता है जैसे विवक्षितान्यपरवाच्य ध्वनि में। कहीं तो गुणवृत्ति के आश्रय से जैसे अविवक्षितवाच्य ध्वनि में। उन दोनों के आश्रयत्व का प्रतिपादन करने के लिये ही कुछ पहले दो भेदों को प्रस्तुत किया गया था। और उन दोनों के आश्रित होने से
तारावती इवादर्शः' में कवि ने आदर्श के लिये अनन्य विशेषण का बाधित प्रयोग चारुत्व के उद्देश्य से ही किया है। यही बात इस प्रकार एक कारिका में कही गई है कि 'लक्षणा किसी एक ध्वनि भेद का उपलक्षण हो सकती है।' आशय यह है कि रस तथा व्यङ्गय अलङ्कार तो कहीं गुणवृत्ति का विषय हो ही नहीं सकते। व्यङ्गयवस्तु के कुछ प्रकार ऐसे होते हैं जो गुणवृत्ति का विषय हो सकते हैं। किन्तु व्यङ्गयवस्तु के सभी प्रकार गुणवृत्ति का विषय नहीं हो सकते। इसी प्रकार सभी प्रकार की गुणवृत्ति व्यञ्जना का विषय नहीं हो सकती। प्रायः देखा जाता है कि बाधित शब्दों का प्रयोग केवल चारुत्व के आधार के ही लिये नहीं होता। ऐसे अनेक स्थान पाये जाते हैं जहाँ बाधित शब्दों का प्रयोग या तो प्रसिद्धि के आधार पर होता है; जैसे—लावण्य इत्यादि शब्दों का सौन्दर्य के अर्थ में प्रयोग प्रसिद्धि के बल पर ही होने लगा है अथवा किसी घटना के अनुरोध से या व्यवहार के अनुरोध से ही बाधित शब्दों का प्रयोग होने लगता है जैसे 'वदति विषिनीतपत्रशायिनम्' में वदति का प्रयोग। इस प्रकार व्यङ्गयवस्तु भी ऐसी होती है जो गुणवृत्ति का विषय नहीं हो सकती और गुणवृत्ति के ऐसे भी स्थल होते हैं जो व्यञ्जना का विषय नहीं हो सकते। यह सब 'रूढा ये विषयेष्टव्याप्त्र' इस कारिका की व्याख्या में प्रथम उद्योत में विस्तारपूर्वक बतलाया जा चुका है। अब वह वस्तु शेष रह जाती है जो गुणवृत्ति का विषय भी हो सकती है और व्यङ्गय की संज्ञा भी प्राप्त कर सकती है। ऐसे स्थानों पर भी लक्ष्यार्थ और होता है और व्यङ्ग्यार्थप्रयोजन और होता है। उस स्थान पर चारुत्व व्यञ्जना के अनुप्रवेश के कारण ही आती है। गुणवृत्ति के कारण नहीं। इस प्रकार व्यञ्जना का समस्त विषय गुणवृत्ति के क्षेत्र से बाहर हो जाता है। अतएव यह सिद्ध हो गया कि स्वरूपभेद तथा विषयभेद दोनों दृष्टियों से जिस प्रकार व्यञ्जना अभिधा से अत्यन्त विलक्षण है उसी प्रकार गुणवृत्ति से भी अत्यन्त विलक्षण ही है।
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न शक्यते वक्तुम् । यस्मात् तद्राचकत्वैक रूपमेव, कचिल्लक्षणाश्रयेण वृत्तेः । न च लक्षणैक रूपमेवान्यत्र वाचकत्वाश्रयेण व्यवस्थातः । न चोभयधर्मवतेनैव तदेकैकरूपं न भवति । यावद्राचकत्वलक्षणादिरूपरहि तश्रद्धर्मवतेनापि । तथाहि गीतध्वनिरानीमापि व्यङ्ग्यैकरूप्यमास्ते रसादिविषयम् । न च तथाविधं वाचकत्वं लक्षणा वा कथमपि लभ्यते । शब्दादन्यत्रापि विषये व्यङ्ग्यक्त्वस्य दर्शनेनाद्राचकत्वादिधर्मप्रकारत्वमयुक्तं वक्तुम् । यदि च वाचकत्वलक्षणादीनां शब्दप्रकाराणां प्रसिद्ध प्रकारविलक्षणतवे डपि व्यङ्ग्यक्त्वं प्रकृतत्वेन परिकल्प्यते तच्च्छब्दस्यैव प्रकृतत्वेन किमात्र परिकल्प्यते । तदेवं शाब्दे व्यवहारेऽत्रयः प्रकारा:-वाचकत्वं गुणवृत्ति-व्यङ्ग्यक्त्वं च । तत्र व्यङ्ग्यक्त्वे यदा व्यङ्ग्यप्राधान्यानि तदा ध्वनि । तस्य चाविवक्षितान्यपरवाच्यस्येति द्वौ प्रभेदावनुक्रान्तौ प्रथमतरं तौ सविषतरं निर्णयौ ।
उनकी एकरूपता नहीं कहीं जा सकती । क्योंकि वह वाचकत्व के साथ एकरूप नहीं होता क्योंकि कहीं लक्षणा के आश्रय से भी उसका व्यवहार होता है । लक्षणा से भी एक रूप नहीं होता क्योंकि अन्यत्र वाचकत्व के आश्रय से व्यवस्था होती है । उभयधर्म होने के कारण ही उन दोनों में प्रत्येक की एकरूपता न हो ऐसा नहीं है, अपितु वाचकत्व और लक्षणा इत्यादि रूपों से सहित शब्दधर्म होने के कारण भी । वह इस प्रकार—गीतध्वनियों का भी रस इत्यादि के विषय में व्यङ्गयैक रूपता नहीं होती । शब्द से अन्यत्र विषय में भी व्यङ्ग्यक्त्व के दिखलाई पड़ने से वाचकत्व इत्यादि शब्दधर्मों से विशिष्ट होने की कल्पना अनुचित है । और यदि वाचकत्व तथा लक्षणा प्रसिद्ध प्रकारों से विलक्षण होते हुये भी व्यङ्ग्यक्त्व को आप वाचकत्व और लक्षणा इत्यादि शब्दप्रकारों का ही एक प्रकार कल्पित करते हैं तो शब्द के ही प्रकार के रूप में क्यों कल्पित नहीं कर लेते । इस प्रकार शब्दव्यवहार में तीन प्रकार हैं—वाचकत्व, गुणवृत्ति और व्यङ्ग्यक्त्व । उसमें व्यङ्ग्यक्त्व में जव व्यङ्गयप्राधान्य हो तो ध्वनि होती है । उसके अविवक्षितवाच्य और विवक्षितान्यपरवाच्य इन दोनों भेदों का पहले ही उपक्रम किया गया था और विस्तारपूर्वक निरूपण कर दिया गया ।
तारावती
तारावती
ऊपर स्वरूपमेद और विषयमेद के आधार पर व्यङ्ग्यक्त्व का अभिधा तथा गुणवृत्ति से भेद सिद्ध किया गया है । अव यहाँ यह बतला रहे हैं कि एक हेतु ऐसा और है जिससे व्यङ्ग्यक्त्व अभिधा तथा गुणवृत्ति इन दोनों से मिलता है ।
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प्तदेव विशजते—व्यञ्जकत्वं हीति । प्रथमतरमिति । प्रथमोद्योते 'स च' इत्यादिना ग्रन्थेन । हेत्वन्तरमपि सूच्यति—न चेति । वाचकत्वगौणत्वोभयवृत्तान्तसीतात्पिलावद्वान्तनाम् । हेत्वन्तरमपि सूच्यति—रहस्यादन्वचेष्टि । वाचकत्वगौणत्वस्वाभ्यामन्यद्रव्यञ्जकत्वं शब्दादन्यत्रापि वर्त्मानत्वात् । प्रमेयत्ववदिति हेतुः सूचितः । नन्वन्यान्त्रावाचके यद्रव्यञ्जकत्वं तद्वतु वाचकत्वादेविलक्षणमेवास्विलव्याश्रयाह—यदोति । आदिपदेन गौणं गृह्यते । शब्दस्यैवोचति । व्यञ्जकत्वं वाचकत्वमिति यदि पर्यायौ कल्प्येते, इच्छाया अत्याहतस्वात् । व्यञ्जकत्वस्य तु विविक्तं स्वरूपं दर्शितं तद्विषयान्तरे कथम् त्रिपर्यस्यताम् । एवं हि पर्वतगतो धूमोऽनलसङ्ज्ञोजपि स्यादिति भावः । अधुना उपपादितं विभागमुपसंहरति—तदेवमिति । व्यवहारप्रहणे समुद्रोपादीन् व्युदस्यति !
इसको विभाजन करते हैं—'व्यञ्जकत्व निस्सन्देह' इत्यादि । पहले उद्योत में 'स च' इत्यादि ग्रन्थ के द्वारा । दूसरे हेतु को भी सूचित करते हैं—'न च' इत्यादि । वाचकत्व और गौणत्व इन दोनों के वृत्तान्त से विलक्षण होने के कारण यह हेतु सूचित किया गया है । उसीको प्रकाशित करते हैं—तथाहि इत्यादि के द्वारा । 'उनका अर्थात् गीतादि शब्दों का । दूसरे हेतु को भी सूचित करते हैं—'शब्द से अनन्य भी' यह । वाचकत्व और गौणत्व से भिन्न व्यञ्जकत्व होता है क्योंकि वह शब्द से अनन्य भी वर्तमान होता है जैसे प्रमेयत्व वह हेतु सूचित किया गया है । ( प्रश्न ) अन्यत्र अवाचक में जो व्यञ्जकत्व वह वाचकत्व इत्यादि से विलक्षण हो; वाचक में तो जो व्यञ्जकत्व वह उससे अविलक्षण ही हो यह शङ्का करके कहते हैं—'यदि' इत्यादि । यदि व्यञ्जकत्व और वाचकत्व को पर्याय के रूप में कल्पित किया जाता है तो व्यञ्जकत्व शब्द होता है यह पर्यायता भी क्यों नहीं कर लो जाती क्योंकि इच्छा में तो कोई प्रतिबिम्ब है नहीं । व्यञ्जकत्व का तो पृथक् स्वरूप दिखलाया गया है वह विषयान्तर में किस प्रकार विपर्यस्त हो जाय । इस प्रकार तो पर्वतगत धूम बिना अग्नि के ही हो जाय, यह भाव है । अब उपपादित विभाग का उपसंहार करते हैं—'वह इस प्रकार' यह । व्यवहार ग्रहण से समुद्र-गर्जन इत्यादि का निराकरण कर रहे हैं ।
हेतु यह है कि व्यञ्जकत्व अभिधा और गुणवृत्ति दोनों से विलक्षण होता है तथा इन दोनों के आश्रय से ही व्यवस्थित होता है।इसको इस प्रकार समझिये—व्यञ्जकत्व
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हेतु यह है कि व्यञ्जकत्व अभिधा और गुणवृत्ति दोनों से विलक्षण होता है तथा इन दोनों के आश्रय से ही व्यवस्थित होता है।इसको इस प्रकार समझिये—व्यञ्जकत्व
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अभिधा से इसलिये विलक्षण होता है क्योंकि वह अभिधा से इतर ( भिन्न ) गुणवृत्ति का सहारा लेता है और गुणवृत्ति से इसलिये भिन्न होता है क्योंकि गुणवृत्ति से इतर अभिधा का आश्रय लेता है । इस प्रकार यहाँ पर पर्याय ( क्रम ) से योजना करनी चादिये कि व्यञ्जकत्व एक से भिन्न इसलिये होता है कि वह एक के अतिरिक्त दूसरे का भी सहारा लेता है और दूसरे से भिन्न इसलिये होता है कि वह दूसरे से भिन्न पहले का भी सहारा लेता है । इस प्रकार अपने से भिन्न का सहारा लेने के कारण व्यञ्जकत्व दोनों से भिन्न हो जाता है । यहाँ पर वृत्ति में यह पंक्ति है—‘वाचकत्वगुणवृत्तिविलक्षणस्यापि च तस्य तदुभयाश्रयत्वेन व्यवस्थापनम्’ इसमें ‘अपि’ और ‘च’ इन दोनों शब्दों को क्रमभेद से स्थानान्तरित करके लगाना चाहिये । ‘च’ को ‘विलक्षणस्य’ के साथ और ‘अपि’ को ‘व्यवस्थानम्’ के साथ लगाना चाहिये । इस प्रकार यह पूरा वाक्य ऐसा हो जायगा—‘वाचकत्वं गुणवृत्तिविलक्षणस्य च तदुभयाश्रयत्वेन व्यवस्थानम्’ यहाँ पर ‘व्यवस्थानम्’ के साथ आप शब्द को लगाने का आशय है कि व्यञ्जना का अभिधा और गौणीवृत्ति से भेद सिद्ध करने के लिये पहले जो हेतुसमूह दिया गया है केवल वही उनके भेद को सिद्ध नहीं करता अपितु एक और हेतु ऐसा है जो उनके पृथक्त्व तथा स्वतन्त्र अस्तित्व को सिद्ध करता है और वह यह है कि व्यञ्जना अभिधा का भी आश्रय लेती है और गुणवृत्ति का भी आश्रय लेती है । इसलिये वह इन दोनों से एक रूप नहीं हो सकती । यहाँ पर व्याप्ति की संघटना हो जाती है । वह व्याप्ति दो प्रकार से बन सकती है—‘जो जिसका सहारा लेता है वह उससे भिन्न होता है ।’ व्यञ्जना अभिधा और लक्षणा का सहारा लेती है अतः दोनों से भिन्न होती है । ‘जो अपने से किसी अन्य का सहारा लेता है वह उससे भिन्न होता है ।’ व्यञ्जना अभिधा का सहारा लेने के कारण लक्षणा से भिन्न होती है और लक्षणा का सहारा लेने के कारण अभिधा से भिन्न होती है ।
कहीं-कहीं व्यञ्जकत्व की अवस्थिति अभिधा के आश्रय से होती है जैस की विवक्षितान्यपरवाच्य ध्वनि में हुआ करती है और कहीं-कहीं उसकी अवस्थिति गुणवृत्ति के आश्रय से होती है जैसी कि अविवक्षितवाच्य ध्वनि में हुआ करती है । ( दोनों के उदाहरण ‘पार्वती’ और ‘निःश्वासानव इवादर्शः’ में दिखलाये जा चुके हैं ।) व्यञ्जना इन दोनों के आश्रित होती है इसी बात का प्रतिपादन करने के लिये ही प्रथम उद्योत में ध्वनि के दो भेद बतलाये गये थे । इन दोनों के आश्रित होने के कारण यह बात नहीं कही जा सकती कि व्यञ्जना की अभिधा-लक्षणा से एकरूपता है । उसकी वाचकत्व से एकरूपता हो ही नहीं
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सकती क्योकि व्यञ्जनावृत्ति लङ्गणा के आश्रय से भी वर्तमान रहती है। इसी प्रकार लङ्गणा से भी एकरूपता नहीं हो सकती क्योकि व्यञ्जना वाचकत्व के आश्रय से भी व्यवस्थित होती है। यहाँ पर यह हेतु सूचित किया गया है कि व्यञ्जना में अभिधा तथा लक्षणा दोनों के वृत्तान्त से विलक्षणता होती है। केवल इतनी ही बात नहिं कि उपयधर्मता के कारण उनसे एकरूपता नहीं होती किन्तु यह भी बात है कि जहाँ पर शब्द तो होता है किन्तु अभिधा या लक्षणा कुछ भी नहीं होती वहाँ पर भी व्यञ्जना हो जाती है। इस प्रकार व्यञ्जना केवल अभिधालक्षणाधर्मिणी ही नहीं होती किन्तु शब्दमात्रधर्मिणी भी होती है।
उदाहरण के लिये गीत इत्यादि के शब्दों को लीजिये। गीत इत्यादि के शब्दों से अर्थ का विना ही अनुचित किये रसाभिव्यक्ति हो जाती है। वहाँ पर कोई नहीं कह सकता कि रसाभिव्यक्ति अभिधा या लक्षणा की अपेक्षिणी है! अतएव यहाँ पर व्यञ्जना को शब्दवृत्तिधर्ममात्र मानना पड़ेगा। यह कोई नहीं कहेगा कि व्यञ्जना वहाँ पर अभिधा या लक्षणाधर्मवाली है। इस व्यञ्जना को केवल शब्दधर्मिणी भी नहीं कहा जा सकता; क्योकि जहाँ पर शब्द बिल्कुल नहीं होता वहाँ पर भी चेष्टा इत्यादि से व्यञ्जना देखी जाती है। अतः यह कहना सर्वथा असङ्गत है कि व्यञ्जना वाचकत्वादि धर्मप्रकाशक ही होती है।
यहाँ पर आक्षाय यह है कि व्यञ्जना न तो केवल वाचकत्वधर्मिणी कही जा सकती है; न केवल शब्दधर्मिणी और न केवल शब्देतरधर्मिणी। केवल वाचकत्वधर्मिणी इसलिये नहीं कही जा सकती क्योकि यह वाचकत्व से भिन्न गुणवृत्ति शब्दमात्र शब्देतर स्थानों में भी रहती है। शब्दमात्रधर्मिणी इसलिये नहीं कही जा सकती क्योकि यह शब्दमात्र से भिन्न वाचकत्व गुणवृत्ति और शब्देतर स्थानों में भी रहती है। केवल शब्देतरधर्मिणी भी नहीं मानी जा सकती क्योकि शब्देतरभिन्न वाचकत्व गुणवृत्ति और शब्दमात्र में भी पाई जाती है।
इस प्रकार यह व्यञ्जना सर्वतन्त्रस्वतन्त्र स्वच्छन्दचारिणी ही है किसी प्रकार भी किसी दूसरे तक ही सीमित नहीं रहती। यह बात अनुमान प्रमाण से सिद्ध हो जाती है। अनुमान की प्रक्रिया यह होगी—व्यञ्जना में अभिधा और लक्षणा ( अथवा मीमांसक मत में गुणवृत्ति ) में से किसी एक का अभावरूप भेद विद्यमान रहता है क्योकि व्यञ्जना शब्द में भी रहती है और शब्दभिन्न में भी रहती है जैसे प्रमेयत्व।
इसकी अन्वयव्याप्ति इस प्रकार होगी—जो पदार्थ शब्द में भी रहता है और उससे भिन्न भी रहता है वह अभिधा और लक्षणा इन दोनों से भिन्न हुआ करता है जैसे प्रमेयत्व ( प्रमाण द्वारा प्रतिपन्न होनेवाला वस्तुत्व ) शब्द में भी रहता है और उससे भिन्न भी रहता है अर्थात् शब्द भी प्रमाण द्वारा प्रतिपन्न होता है और
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दूसरी वस्तुयें भी प्रमाण द्वारा प्रतिपन्न होती हैं; इसीलिये प्रमेयत्व हेतु को कोई भी अभिधा और लक्षणा में अन्तर्भुक्त नहीं करता । इसी प्रकार व्यञ्जना के विषय में भी समझना चाहिये । व्यञ्जना भी शब्द तथा तद्वृत्तिन् दोनों स्थानों पर रहती है; इसीलिये उसे भी अभिधा और लक्षणा के द्वारा गतार्थ नहीं माना जा सकता ।
( प्रश्न ) इतना स्वीकार किया जा सकता है कि जहाँ बिना ही शब्द के व्यञ्जना का उदय हो वहाँ व्यञ्जना एक पृथक् वृत्ति होती है । किन्तु जहाँ अभिधा लक्षणा और गौणी के आश्रय से व्यञ्जना का उदय होता है वहाँ व्यञ्जना को उन वृत्तियों से पृथक् मानने की क्या आवश्यकता ? वहाँ पर व्यञ्जना अभिधा और लक्षणा से अभिन्न ही क्यों न मानी जाय ।
( उत्तर ) वाचकत्व और लक्षणा ये शब्द के ही प्रकार हैं उनसे व्यञ्जना पृथक् होती है इस बात को बड़े विस्तार से अनेक रूपों में सिद्ध किया जा चुका है । अभिधा तथा लक्षणा इत्यादि को आश्रित करके जो व्यञ्जना प्रवृत्त होती है वह भी शब्द का एक विशेषण ही प्रकार है जिस प्रकार अभिधा और लक्षणा इत्यादि शब्द के प्रकार होते हैं ।
यदि इस प्रकार के विभेद होने पर भी आप व्यञ्जना को अभिधा और लक्षणा का ही भेद मानने को प्रस्तुत हैं तो फिर आप उसे शब्द का ही प्रकार क्यों नहीं मान लेते ?
( यहाँ पर वृत्ति में 'शब्दप्रकाराणा' 'प्रकारत्वेन' इन शब्दों में 'प्रकार' का प्रयोग धर्म के अर्थ में किया गया है । वृत्तिकार का आशय यह है कि अभिधा और लक्षणा ये शब्द के विशिष्ट धर्म हैं और व्यञ्जना को आप अभिधा और लक्षणा का धर्म मान लेते हैं, उससे अच्छा यहीं है कि आप उसे अभिधा और लक्षणा के समान शब्द का ही धर्म मान लें ।
यही अर्थ यहाँ पर ठीक है । किन्तु लोचनकार ने 'शब्दप्रकाराणां' के प्रकार शब्द को धर्मपरक तथा 'प्रकारत्वेन' को भेदपरक व्याख्या की है । उनकी व्याख्या इस प्रकार है— अनेक प्रमाणों के आधार पर अभिधा और लक्षणा से व्यञ्जना का भेद दिखलाया जा चुका, यह भी सिद्ध किया जा चुका कि अभिधा और लक्षणा के समान ही व्यञ्जना भी शब्द का व्यापार होती है तथा यह भी सिद्ध किया जा चुका कि व्यञ्जना कभी अभिधा का आश्रय लेती है और कभी लक्षणा का ।
इतना सत्य होते हुये यदि अभिधा को ही पर्यायवाचक मानते हैं तो आपको इस बात में भी सङ्कोच नहीं होना चाहिये कि शब्द और व्यञ्जना का भी अभेद मान लें तथा शब्द और व्यञ्जना को भी एक दूसरे का पर्याय कहने लगें । क्योंकि मन अपना है और मानना भी अपना है । इच्छा तो वेरोक-टोक सभी कुछ मान सकती है । वास्तविकता तो यह है कि
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अन्यो व्रयात्--नतु विवक्षितान्यपरवाच्ये ध्वनौ गुणवृत्तिता नास्तीति यदुच्यते तदुक्तम् । यस्त्राद्वाच्यत्राचकप्रतीतिपूर्विका यत्रार्थान्तरप्रतिपत्तिस्तत्र गुणवृत्तिन्यवहारः नो हि गुणवृत्तौ यदा निमित्तेन केनचिद्विषयान्तरे शब्द आरोग्यते अन्येन्तरैकत्वसिद्धेः यथा 'अग्निर्माणवकः' इत्यादौ, यदा वा स्वार्थसमनन्तरप्रतीत्यन्सतत्समबन्धधारण विषयान्तरमाक्रामति यथा 'गाङ्गायां घोषः' इत्यादौ तदा विवक्षितवाच्यत्वमुपपद्यते । अत एव च विवक्षितान्यपरवाच्ये ध्वनिो वाच्यवाचकयोद्रेयोरपि स्वरूपप्रतीतिरथावगमनं च हश्यते इति व्यङ्कत्वव्यवहारो युक्त्यनुरोधी । स्वरूपं प्रकाशयन्नेव परावभासको व्यङ्क इत्युच्यते, तथाविधे विषये वाचकत्वस्यैव व्यङ्ककत्वमिति गुणवृत्तिव्यवहारो नियमेनैव न शक्यते कर्तुम् ।
अन्य व्रात कहते हैं-- न तो विवक्षित अन्यपरवाच्य ध्वनि में गुणवृत्ति होती है यह जो कहा जाता है वह उचित है । क्योंकि वाच्य-वाचक की प्रतीति के साथ जहाँ अन्य अर्थ की प्रतीति होती है वहाँ गुणवृत्ति का व्यवहार किस प्रकार हो सकता है । गुणवृत्ति में जब किसी निमित्त से विषयान्तर में शब्द का आरोप किया जाता है जैसे 'अग्निर्माणवक:' इत्यादि में, अथवा जहाँ स्वार्थ को एक अंश में न छोड़ते हुये उसके सम्बन्ध के द्वारा ( शब्द ) विषयान्तर को आक्रान्त कर लेता है जैसे 'गाङ्गायां घोष:' इत्यादि में तत्र 'विवक्षितवाच्यत्व सिद्ध नहीं होता । इसीलिये विवक्षितान्यपरवाच्य ध्वनि में वाच्य-वाचक इन दोनों की स्वरूपप्रतीति और अर्थावगम देखा जाता है, अतः व्यङ्ककत्व का व्यवहार तर्कसङ्जत है । स्वरूप को प्रकाशित करते हुए ही व्यङ्जक दूसरे का अवभासक होता है यह कहा जाता है, उस प्रकार के विषय में वाचकत्व का ही व्यङ्ककत्व होता है, यह कहा जाता है, अतः नियम से ही गुणवृत्ति का व्यवहार नहीं किया जा सकता ।
तारावती व्यङ्जकत्व का स्वरूप सर्वथा पृथक् होता है यह दिखला दिया गया फिर उसका दूसरे विषय के द्वारा विपर्यास किस प्रकार किया जा सकता है । यदि इस प्रकार मनमाने ढंग से किसी के विषय के द्वारा हम स्वतन्त्र अस्तित्ववालों का विपर्य्यास करने लगेंगे तो सारी व्यवस्था ही उच्छिन्न हो जायगी । हम धूम के द्वारा अग्नि का अनुमान पर्वत में लगाते हैं, किन्तु इस प्रकार का विपर्य्यास मानने पर तो पर्वत से उठनेवाले धुयें से आग का अनुमान हो ही न सकेगा, क्योंकि तब तो यह भी कहा जा सकेगा कि पर्वत का धुआँ अग्नि से उद्भूत नहीं हुआ है । यहाँ तक जो कुछ भी प्रतिपादित किया जा चुका है उसका उपसंहार कर रहे हैं--इस प्रकार शब्द व्यवहार में तीन प्रकार होते हैं--( १ ) वाचकत्व, ( २ )
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ननु वाचकत्वोपजीवकत्वाद् गुणवृत्त्यनुजीवकत्वादिति च हेतुद्वयं यदुक्तं तद्-विवक्षितवाच्यभागे सिद्धं न भवति तस्य लक्षणैकशारोरत्वादित्यभिप्रायेोपक्रमे-अन्योऽत्रूयादिति । यद्यापि च तस्य तदुभयाश्रयत्वेन व्यवस्थानादिति श्रुत्वा निर्णयं-चरमवतत्वं, तथापि गुणवृत्तेरदिवक्षितवाच्यस्य च द्वैरूप्यं वाच्यं यत्: पश्चात्तं प्रत्याशङ्कानिवारणार्थोंयमुपक्रम:। अत एषाभेदस्याझीकरणपूर्वकमयं द्वितीयभेदाद्वेप । विवक्षितान्यपरवाच्य इत्यादिना पराभ्युपगमस्य स्वाझीकरणो दर्शयते । गुणवृत्तिर्यवहाराभावे हेतुर्दर्शयितुं तस्या एव गुणवृत्तेःसद्वृत्तान्तं दर्शयति--न
( प्रश्न ) निस्सन्देह 'वाचकत्व के उपजीवक होने से' और 'गुणवृत्ति के अनुजीवक होने से' ये जो दो हेतु बतलाये गये हैं वे अविवक्षितवाच्य भाग में सिद्ध नहीं होते इस अभिप्राय से उपक्रम करते हैं--'दूसरा कहा' यह । यद्यपि 'उसके उभयाश्रयत्व के रूपमें तद्वस्थित होने से' इन शब्दों के द्वारा इसका प्रायः निर्णय हो गया तथापि गुणवृत्ति और अविवक्षितवाच्य के निरूपण में अशङ्क्य विलक्षणता को जो समझता है उसके प्रति आशङ्का निवारण करने के लिये यह उपक्रम है । इसीलिये प्रथम भेद के अझ्झीकरण के साथ यह द्वितीय भेद का आक्षेप है । 'विवक्षितान्यपरवाच्य' इत्यादि ग्रन्थ के द्वारा दूसरे की मान्यता के प्रति अपनी स्वीकृति दिखला रहे हैं । गुणवृत्ति के अभाव में हेतु दिखलाने के लिये उसी गुणवृत्ति का वृत्तान्त पहले दिखला रहे हैं--'नहि' इत्यादि।
गुणवृत्ति और ( ३ ) व्यवङ्जना । इस व्यङ्जकत्ववृत्तिं में जव व्यङ्ग्यार्थ को प्रधानता हो तथो ध्वनिकाव्य होता है । उसे ध्वनिकाव्य के दो भेद बतलाये गये हैं--अविवक्षितवाच्य और विवक्षितान्यपरवाच्य । इन दोनों की पहले ही व्याख्या की जा चुकी है । यहाँ पर शब्द व्यवहार के तीन प्रकार बतलाये गये हैं और उसमें विशेष रूप से व्यवहार शब्द का प्रयोग किया गया है । इसका आशय यह है कि व्यवहार में आनेवाले शब्द की तीन वृत्तियाँ होती हैं । वैसे शब्द तो समुद्रगर्जन में भी होता हो है किन्तु उन सब शब्दों की वृत्तियाँ नहीं होती । इस प्रकार व्यवहार शब्द से समुद्रघोष इत्यादि शब्दों का निराकरण हो जाता है ।
यहाँ तक ध्वनि का अभिधामूलकत्व और लक्षणामूलकत्व सिद्ध किया जा चुका । इससे व्यञ्जना का अभिधा और लक्षणा से विमेदः स्वभावतः सिद्ध हो गई । तथापि विचारकों का एक वर्ग ऐसा भी है जो गुणवृत्ति और अविवक्षितवाच्य का विमेद मानने को तैयार ही नहीं । उनका आशय यह है कि व्यञ्जनावृत्ति को सिद्ध करने के लिये जो दो हेतु दिये गये हैं--( १ ) व्यञ्जना वाचकत्व
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हीति । गुणतया वृत्तिव्यपारो गुणवृत्तिः । गुणेन निमित्तेन साहश्यादिना च वृत्ति अर्थान्तरविषयेडपि शब्दस्य सामानाधिकरण्यमिति गौणं दर्शयति । यदा वा स्वार्थमिति लक्षणां दर्शयति । अनने भेदद्रयेन च स्वीकृतमविचक्षितवाच्य भेदद्रयात्मव गुण ( अप्रधान ) रूपं वृत्ति अर्थात् व्यापार गुणवृत्ति कहलाती है और गुण को निमित्त मानकर अर्थात् साहश्य इत्यादि के द्वारा वृत्ति अर्थात् अर्थान्तर के विषय में शब्द का सामानाधिकरण्य इस अर्थ के द्वारा गौण को ( गौणी वृत्ति को दिखलाते हैं । 'अथवा जब स्वार्थ को' इत्यादि के द्वारा लक्षणा को दिखलाते हैं इन दो भेदों के द्वारा अविवक्षितवाच्य दो भेदोंवाला स्वीकृत किया गया है
की उपजोवक होती है और ( २ ) व्यञ्जना गुणवृत्ति की अनुजीवक ( निकः सहचारिणी ) होती है— ये हेतु अभिधा और व्यञ्जना के विमेद को सिद्ध करनें के लिये तो पर्याप्त हैं किन्तु अविवक्षितवाच्य के विषय में लागू नहीं होते क्योंकि अविवक्षितवाच्य और लक्षणा का शरीर एक ही होता है। इसी मन्तव्य से अमिप्रकरण का प्रारम्म किया जा रहा है । 'यद्यपि व्यञ्जना गुणवृत्ति और अभिधा दोनों के 'आश्रय' से अवस्थित होती है' इन शब्दों के द्वारा उक्त प्रश्न का उत्तर दिया ही जा चुका है तथापि जो लोग यह समझते हैं कि गुणवृत्ति और अविवक्षित वाच्य का वैलक्षण्य सिद्ध ही नहीं किया जा सकता उनको समझाने के मन्तव्य से एक बार पुनः यह प्रकरण उठाया जा रहा है। इसमें सर्वप्रथम गुणवृत्ति और अविवक्षितवाच्य का अभेद माननेवाले की ओर से पूर्वपक्ष की स्थापना की जायगी और फिर सिद्धान्ती की ओर से उत्तर दिया जायगा। पूर्वपक्षी ने विवक्षितानन्यपरवाच्य के नाम से ध्वनिभेद को तो माना है किन्तु अविवक्षितवाच्य क अन्तर्भाव गुणवृत्ति में करने की चेष्टा की है। उसका कहना है कि आप विवक्षितान्यपरवाच्य नामक जो ध्वनि का भेद मानते हैं वह तो हम भी मानते हैं और उसका अन्तर्गत नहीं ला सकते । विवक्षितानन्यपरवाच्य में वाच्य-वाचक की शृङ्गार्ति भी होती रहती है और उसके साथ ही अर्थान्तर की भी प्रतीति हो जाती है । आशय यह है कि वहाँ पर मुख्यवृत्ति का प्रत्याख्यान नहीं होता, मुख्यवृत्ति ( वाच्य-वाचकभाव ) की प्रतीति साथ-साथ होती रहती है । अतः उसे हम गुणवृत्ति की संज्ञा दे नहीं सकते । गुणवृत्ति का अर्थ है गुणतत्र के रूप में ( गौणरूप में ) वृत्ति अर्थात् व्यापार तथा गुणों को निमित्त मानकर साहश्य इत्यादि के द्वारा वृत्ति अर्थात् क्रिया अन्य के अर्थ में शब्द का सामानाधिकरण्य। आशय यह है कि गुणवृत्ति वहीं पर है
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मिति सूचयति। अतः पूर्व अत्यन्ततिरस्कृतस्वार्थेन शब्देन विषयान्तरमाक्रामति चेत्यनेन शब्देन तदेव भेदद्वयं दर्शयति-अत एव चेति। यत एव न तत्रोक्तहेतुत्वलाद्गुणवृत्ति-व्यवहारो न्याय्यस्तत इत्यर्थः। युक्ति लोकप्रसिद्धिरूपामवाधितां दर्शयति—अविच्छित्तितः। उच्चयते हि प्रदीपादिः, इन्द्रियैदृष्टुं करणत्वादि व्यञ्जकत्वं प्रतिभासयद्भो। सूचित करते हैं। अतएव अत्यन्ततिरस्कृतस्वार्थ शब्द के द्वारा और विषयान्तर को आक्रान्त कर लेता है इस शब्द के द्वारा उन्हीं दो भेदों को दिखलाते हैं—‘अतएव च’ इत्यादि। अर्थात् उच्च हेतुओं के बल से वहाँ गुणवृत्ति का व्यवहार उचित नहीं है इसलिये। लोकप्रसिद्धि रूपवाली अवाधित युक्ति को दिखलाते हैं—‘स्वरूप’ यह। कहा जाता है अर्थात् प्रदीप इत्यादि। कारण होने से प्रतीति की उत्पत्ति में इन्द्रियों की कारणता नहीं होती।
तारावती
सकती है जहाँ पर या तो किसी निमित्त को लेकर किसी दूसरे अर्थ में शब्द का आरोप कर दिया जाय और उसके मुख्य वाच्यार्थ का सर्वथा परित्याग हो जैसे ‘बालक आग है’ में बालक और आग का समानाधिकरण्य निर्दिष्ट किया गया है जो कि सङ्गत नहीं होता, अतः ‘अग्नि’ के लक्ष्यार्थ की अन्वयानुपपत्ति हो जाती है और अग्नि का शान्तिक अर्थ सर्वथा परित्यक्त हो जाता है; उससे तेजस्वी में लक्षणा हो जाती है जिसका प्रयोजन है तेजस्विता की अधिकता। यही अत्यन्ततिरस्कृतवाच्य कहलाता है। अथवा जहाँ शब्द स्वार्थ का एक अंश में परित्याग नहीं करता और वाच्य सम्बन्ध के द्वारा वाच्य सम्बन्धी किसी अन्य अर्थ में आक्रान्त हो जाता है। जैसे ‘गङ्गा में घर’ यहाँ पर गङ्गा का वाच्यार्थ है धारा में प्रवाहित जलराशि। यह अपने अर्थ में बाधित होकर तीरसम्बद्ध तीर को लक्षित करा देता है। इसका प्रयोजन है गङ्गागत शैल्य पावनत्व की प्रतीति। (वस्तुतः गुणवृत्ति दो प्रकार की होती है गौणी और शुद्धा। गौणी में गुणों के सादृश्य के आधार पर एक शब्द का दूसरे शब्द के अर्थ में प्रयोग किया जाता है जैसे ‘बालक अग्नि है’ में तेजस्विता के सादृश्य के आधार पर अग्नि का बालक के समानाधिकरण्य के रूप में प्रयोग किया गया है। शुद्धा उसे कहते हैं जहाँ सादृश्य से भिन्न अन्य सम्बन्धों के आधार पर एक शब्द का अन्य अर्थ में प्रयोग किया जाता है। जैसे निकटवर्तिता के सम्बन्ध के आधार पर ‘गङ्गा में अट्टालिका का घर’ इस वाक्य में प्रवाहिवाचक गङ्गा शब्द का तट के अर्थ में प्रयोग किया गया है। ये दोनों प्रकार की लक्षणायें दो-दो प्रकार की होती हैं उपादानलक्षणा और लक्षणा-
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लक्षण। जहाँ शब्द के वाच्यार्थ का एक अंश में ग्रहण कर लिया जाता है और अर्थ की पूर्ति के लिये दूसरे अर्थ का उपादान किया जाता है वहाँ उपादानलक्षणा होती है, उसे ही अजहत्स्वार्थी भी कहते हैं। इसके प्रतिकूल जहाँ शब्द के अर्थ का सर्वथा परित्याग हो जाता है उसे लक्षितलक्षणा या जहत्स्वार्थी कहते हैं। इस हष्टि से विचार करने पर वृत्तिकार का दिया हुआ 'गङ्गायां घोष:' यह उदाहरण ठीक नहीं प्रतीत होता। यह उदाहरण अर्थान्तर-संक्रमितवाच्य का दिया गया है। किन्तु इसमें गङ्गा का वाच्यार्थ प्रवाह लक्ष्यार्थ तीर में अपने को अत्यन्त तिरस्कृत कर देता है। अतः यह उदाहरण भी अत्यन्त-तिरस्कृतवाच्य ( जहत्स्वार्थी ) का ही होना चाहिये। अतएव अजहत्स्वार्थी के उदाहरण होंगे—'छाते घार रहे हैं' 'कुओं से दही बचाना' इत्यादि। ज्ञात होता है वृत्तिकार ने यहाँ पर 'जहत्स्वार्थी' और 'अजहत्स्वार्थी' पर विचार न कर एक उदाहरण गौणी का दिया है और एक लक्षणा का। ऐसा मानने पर ही इस ग्रन्थ की सङ्गति बैठती है ( अन्यथा नहीं ! ) यद्यपि लक्षणा के और भी अनेक भेद हो सकते हैं तथापि यहाँ पर केवल दो का ही निर्देश किया गया है। इसका कारण यह है कि अविवक्षितवाच्य ध्वनि के केवल दो ही भेद किये गये हैं और उन भेदों से मिलते हुये भेद यहाँ पर दिखला दिये गये हैं। इसीलिये वृत्तिकार ने 'अत्यन्ततिरस्कृतस्वार्थ' और 'विषयान्तर को आक्रान्त कर लेता है' इन शब्दों का प्रयोग किया है और इन शब्दों के द्वारा उन्हीं दो भेदों की ओर इङ्गित किया है। सारांश यह है कि गुणवृत्ति इन्हीं दोनों स्थानों पर होती है। विवक्षितान्यपरवाच्य ध्वनि में ये दोनों तत्त्व आते ही नहीं। दयोकि उसमें वाच्य और वाचक दोनों के स्वरूप भी प्रतीत होते रहते हैं ओर साथ ही दूसरे अर्थ का भी अवगमन करा देते हैं। इसी विशेषता के कारण विवक्षितान्यपरवाच्य में गुणवृत्ति का व्यवहार नहीं हो सकता और हम उसके लिये व्यञ्जना कहने के लिये बाध्य हो जाते हैं। व्यञ्जना यह नामकरण भी अत्यन्त युक्तियुक्त है, इसमें एक लोकसिद्ध तर्क है जिसके स्वरूप का वर्णन हो ही नहीं सकता और वह तर्क यह है कि लोक में हम उसे ही व्यञ्जक कहते हैं जो अपने को प्रकाशित करते हुये दूसरे को प्रकाशित कर दे। जैसे दीपक अपने को भी प्रकाशित करता है और अन्य पदार्थों को भी व्यक्क कर देता है। प्रतीति की उत्पत्ति में इन्द्रियाँ व्यञ्जक नहीं कहीं जा सकतीं क्योंकि वे तो कारण होती हैं। आशय यह है कि विवक्षितान्यपरवाच्य में वाच्यार्थ अपने को प्रकाशित करते हुये व्यङ्ग्यार्थ को व्यक्त करता है, अतः उसके व्यापार को व्यञ्जनाव्यापार कहना ही उचित है।
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अविच्छितवाच्यस्य ध्वनिनिर्गुणवृत्ते: कथं भियते ? तस्य प्रभेदद्वये गुणवृत्तिद्वयरूपता लभ्यत एव यत: ।
अविच्छिन्न वाच्य वाले ध्वनि में जो निर्गुण वृत्ति है उसका भेद कैसे होता है ? उसके दो प्रभेदों में गुणवृत्ति के दो रूप प्राप्त होते ही हैं ।
लोचन एवमभ्रुपगमं प्रदर्श्य आरोपं दर्शयति——अविच्छितेत्यादि । तु शब्द: पूर्वस्माद्विशेषं ध्योतयति । तस्येत्यादि । अविच्छितवाच्यस्य यत् प्रभेदद्वयं तस्मिन् गौणलक्षणिकत्व-त्मकं प्रकारद्वयं लक्ष्यते निर्भास्यत इत्यर्थ !
इस प्रकार स्वीकार ( सहमति ) प्रदर्शित करके आरोप को दिखलाते हैं—अविच्छित इत्यादि । 'तु' शब्द पहले से विशेषता को योतित करता है । 'उसका' यह । अविच्छित वाच्य के जो दो प्रभेद उसमें गौण लक्षणिकत्वात्मक दो प्रकार लक्षित होते हैं अर्थात् भासित होते हैं ।
तारावती यहाँ तक तो हुई वह बात जिसमें पूर्वपक्षी और सिद्धान्ती दोनों एक मत हैं । मतभेद अविच्छितवाच्यस्य के विषय में है । इस विषय में पूर्वपक्षी का कहना यह है कि यह माना ही कैसे जा सकता है कि अविच्छितवाच्य भी ध्वनि की सीमा में आने का अधिकारी है । अविच्छितवाच्य में तो वह बात होती नहीं जो विवक्षितानन्यपरवाच्य में होती है । अर्थात् अविच्छितवाच्य में अर्थान्तर के प्रकाशन के अवसर पर वाच्यार्थ अपने को प्रकाशित ही नहीं करता रहता । दूसरी बात यह है कि अविच्छितवाच्य के दो भेद बतलाये गये हैं । अन्तत: तिरस्कृतवाच्य ओर अर्थान्तरसंंक्रमितवाच्य । इन दोनों का अन्तर्भाव सकलतापूर्वक गुणवृत्ति के उक्त दोनों रूपों में किधा ही जा सकता है ।
( वे दोनों रूप हैं उपादान अथवा अजहल्लक्षणा और लक्षणलक्षणा अथवा जहल्लक्षणा । लोचनकार ने गौण लक्षणिकत्वात्मक दो भेदों में अविच्छितवाच्य का अन्तर्भाव माना है । वह ठीक नहीं है क्योंकि गौणी और लक्षणा दोनों के उक्त दो भेद होते हैं । ) अतः अविच्छितवाच्य ध्वनि गुणवृत्ति ही है वह ध्वनि भेद के अन्तर्गत नहीं आती ।
( उत्तर ) यह दोष आप नहीं दे सकते । क्योंकि गुणवृत्ति का जो मार्ग है अर्थात् उसके जो दोनों भेद हैं वे अविच्छितवाच्य का आश्रय बनते हैं । आश्रय यह है कि अविच्छितवाच्य ध्वनि में गुणवृत्ति के दोनों भेद निमित्त होकर आते हैं और इसीलिये अविच्छितवाच्य ध्वनि से पहली कक्षा में उनका सन्निवेश हो जाता है । गुणवृत्ति-भेद कारण होते हैं और अविच्छितवाच्य कार्य । कारण
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अयमपि न दोषः। यम्माद्विवक्षितवाच्यो ध्वनिगुणा वृत्तिमार्गैकश्रयोऽपि भवति न तु गुणवृत्तिरूप एव । गुणवृत्तिहिं व्यङ्ग्यकत्वशून्यापि हृश्यते । व्यङ्ग्य-कतवं च यथोक्तचारुत्वहेतुं व्यङ्गयं विना न व्यवतिष्ठते । गुणवृत्तिस्तु वाच्य-वाचकश्रयणवै व्यङ्गयथामात्रश्रयण चारुदोपचाररूपा सम्भवति, यथा तौ लक्षणस्वादृभि-माणवकः आह्लादकत्वाच्चन्द्र एवास्त्या मुखमिल्यादौ । यथा च ‘प्रिये जाने नास्ति पुनरुक्तम्’ इत्यादौ । यापि लक्षणरूपा गुणवृत्ति: साक्ष्युपलब्धणीयार्थसम्बन्धधर्मात्राश्रयेण चारुत्वरूपव्यङ्गयप्रतीतिं विनापि सम्भवत्येव, यथा मञ्चाः क्रोशन्तीत्यादौ विषयेः ।
( अनु० ) यह भी दोष नहीं है । क्योंकि अविवक्षितवाच्यध्वननि निस्सन्देह गुणवृत्ति मार्ग का आश्रय लेनेवाली भी होती है, केवल गुणवृत्ति रूप ही नहीं होती । गुणवृत्ति तो निस्सन्देह व्यङ्गयकत्व से शून्य भी देखी जाती है । व्यङ्गयकत्व तो यथोक्तचारुत्व हेतु व्यङ्गय के बिना व्यवस्थित नहीं होता । गुणवृत्ति तो केवल वाच्यवाचकधर्म के आश्रय से ही और केवल व्यङ्गय के आश्रय से अमेद के आरोपरूप होती है । जैसे तीक्षण होने से ‘बालक आग है’, आह्लादक होने से चन्द्रमा ही इसका मुख है’ इत्यादि में । और जैसे ‘प्रियजन में पुनरुक्त नहीं होता’ इत्यादि में । और जो लक्षणारूप गुणवृत्ति है वह भी केवल उपलक्षणीय अर्थ के सम्बन्ध के आश्रय से चारुतारूप व्यङ्गय की प्रतीति के बिना भी सम्भव होती है जैसे ‘मञ्च शोर मचा रहे हैं’ इत्यादि विषय में ।
एतत्परिहरति अयमपोति । गुणवृत्तेयों मार्गः प्रभेदद्वयं स आश्रयो निमित्ततथा प्राक्कथ्यानिवेशी यस्येत्यर्थः । एतच्च पूर्वमेव निर्णयांतम् । तादृश्याभावे हेतुमाह—गुणवृत्तिरिति । गौणलक्षणिकोभयारूपी अपेक्ष्यर्थः । ननु व्यङ्गयकत्वं कथं शून्या गुण-वृत्तिरेवति, यतः पूर्वमेवकम्—मुख्यां वृत्तिं परित्यज्य गुणवृत्यार्थेदर्शनम् । यदुदिश्य फलं तत्र शब्दो नैव स्वलद्गति: ॥ इति ।
इसका परिहार कहते हैं—‘यह भी’ यह । अर्थात् गुणवृत्ति का जो मार्ग वह है आश्रय अर्थात् निमित्त के रूप में पूर्व कक्षा में निवेशित होनेवाला जिसका । इसका तो निर्णय पहले ही कर दिया गया । तादृश्य के अभाव में हेतु बतलाते हैं—‘गुणवृत्ति’ यह । अर्थात् गौण और लक्षणिक रूपवाली दोनों ही प्रकार की । ( प्रश्न ) गुणवृत्ति व्यङ्गयकत्व से शून्य कैसे हो सकती है । क्योंकि आप पहले ही कह चुके हैं—‘जिस फल का उद्देश्य लेकर मुख्यवृत्ति का परित्यागकर गुणवृत्ति से अर्थदर्शन किया जाता है उसमें शब्द की गति स्वलित नहीं होती ।’
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नाहि प्रयोजनशून्य उपचारः प्रयोजनांशेनिवेशी च व्यञ्जनाव्यापार इति भवति रेवाच्यधर्मेति। वाच्यविषयो यो धर्मः स एव तदुपपत्त्यर्थः। श्रुतार्थापत्त्या विवर्थान्तरस्यामिधेयार्थोंपपादन एव पर्यवसानादितिभावः। तत्र गौणस्योदाहरणमाह—यथेति। द्वितीयमपि प्रकारं व्यज्जकत्वशून्यं दर्शयितुमुपक्रमते—यापीति। चारुरूपं विश्रान्तिस्थानम्। तदभावे स व्यज्जकत्वव्यापारो नैवोन्मीलति, प्रत्युक्त्या वाच्य एव विश्रान्ते:, क्षणदृष्टनष्टदिव्यविभवप्राकृतपुरुषवत्।
उपचार कभी भी प्रयोजन से शून्य नहीं होता और यह आपने ही कहा है कि व्यञ्जनाव्यापार प्रयोजनांश में निवेशित होनेवाला होता है यह वाच्य करके यह कहते हैं कि विश्रान्तिस्थानरूप अभिमत व्यङ्गयकत्व यहां पर नहीं होता—‘और व्यङ्गयकत्व’ इत्यादि। ‘वाच्यधर्म’ यह। वाच्यविषयक जो धर्म अर्थात् अभिधेयार्थ के उपपादन में हो अर्थान्तर का पर्यवसान हो जाता है। उसमें गौण बतलाने का उपक्रम करते हैं—‘जैसे’ यह। द्वितीय प्रकार को भी व्यङ्गयकत्वशून्य बतलाने का उपक्रम करते हैं—‘जो भी’ इत्यादि। विश्रान्तिस्थान चारुतारूप होता है। उसके अभाव में व्यङ्गयकत्वव्यापार उन्मीलित नहीं होता क्योंकि लौटकर उसकी विश्रान्ति वाच्य में ही हो जाती है जैसे कोई प्राकृत पुरुष जिसका दिव्य विभव क्षण भर दिखाई पड़कर नष्ट हो गया हो।
कार्यं से पहले होता है, अतः लक्षणामेद पहले होते हैं और बाद में ध्वनिभेद । इस पौर्वापर्य के कारण गुणवृत्ति और ध्वनि में कार्य-कारण भाव सम्बन्ध है उनका तादात्म्य नहीं हो सकता। कारण कभी कार्य से रहित भी होता है, अतः गुणवृत्ति कभी व्यङ्गयजनक से रहित भी हो सकती है, फिर इनका तादात्म्य कैसा? ( प्रश्न ) यह कहना तो ठीक नहीं मालूम पड़ता कि गुणवृत्ति व्यङ्गयकत्व से शून्य भी हो सकती है। क्योंकि आपने स्वयं ही कहा है कि—
कार्य पहले होता है, इसलिए लक्षणा पहले होती है और बाद में ध्वनि भेद। इस क्रम के कारण गुणवृत्ति और ध्वनि में कार्य-कारण भाव संबंध है, उनका तादात्म्य नहीं हो सकता। कारण कभी कार्य से रहित भी होता है, इसलिए गुणवृत्ति कभी व्यंग्यजनक से रहित भी हो सकती है, फिर इनका तादात्म्य कैसा? (प्रश्न) यह कहना ठीक नहीं लगता कि गुणवृत्ति व्यंग्यकत्व से शून्य भी हो सकती है, क्योंकि आपने स्वयं ही कहा है कि—
तारावती
‘जिस फल के लिये मुख्यवृत्ति का परित्याग किया जाता है और अर्थबोध के लिये गुणवृत्ति का आश्रय लिया जाता है उस फल के प्रत्यायन में शब्द की गति कुठित नहीं होती।’ आशय यह है कि लक्षणा के प्रयोजन के प्रत्यायन में बाध की अपेक्षा नहीं होती। ऐसा कोई उपचार या लाक्षणिक प्रयोग नहीं होता जिसका कोई
‘जिस फल के लिए मुख्यवृत्ति का परित्याग किया जाता है और अर्थबोध के लिए गुणवृत्ति का आश्रय लिया जाता है उस फल के प्राप्त होने में शब्द की गति बाधित नहीं होती।’ आशय यह है कि लक्षणा के प्रयोजन की प्राप्ति में बाधा की अपेक्षा नहीं होती। ऐसा कोई उपचार या लाक्षणिक प्रयोग नहीं होता जिसका कोई
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प्रयोजन न हो और ऐसा कोई प्रयोजन नहीं होता जिसमें व्यञ्जनाव्यापार का सन्निवेश न हो, इतना तो आप भी मानते ही हैं। फिर आपके इस कथन का क्या आशय कि गुणवृत्ति व्यञ्जकत्वच्यून्य भी देखी जाती है ?
तारावती
( उत्तर ) ( अभिप्राय है, आचार्यों ने दो भेद किये हैं—निरुद्देश्य लक्षणा और प्रयोजनवती लक्षणा। जहाँ अनादि परम्परा के आधार पर रूढ़ि के समान लक्षणा का प्रयोग किया जाता है उसे निरुद्देश्य लक्षणा कहते हैं। इसमें कोई प्रयोजन नहीं होता, केवल अनादि परम्परा ही निमित्त होती है। जैसे लावण्य, कुशल, मण्डप, कुण्डल इत्यादि लक्षणामूलक शब्दों का शक्ति-प्रसाम से अभिधेयार्थ के समान प्रयोग हुआ करता है। ऐसे स्थानों पर प्रयोजन-प्रत्यायन की अपेक्षा नहीं होती। अब प्रयोजनवती लक्षणा को लीजिये—इसमें प्रयोजन-प्रत्यायन के लिये व्यञ्जना की अपेक्षा अवश्य होती है, किन्तु उसमें भी एक विशेषता है।) ठीक रूप में व्यञ्जकता वहीं पर कही जा सकती है जो विश्रान्तिस्थान हो अर्थात् अर्थ का पर्यवसान यदि व्यञ्जनाव्यर्थ में हो तभी वहाँ व्यञ्जनाव्यापार माना जा सकेगा। विश्रान्तिस्थान का आश्रय यह है व्यञ्ज्यार्थ चाहता-हेतु होना चाहिये, अर्थात् सौन्दर्य का पर्यवसान व्यञ्जना में ही होना चा:हये। गुणवृत्ति में भी कहीं-कहीं चाहता का पर्यवसान और अर्थ की परिपाक्ति व्यञ्ज्यार्थ में होती हैं। किन्तु गुणवृत्ति ऐसे स्थान पर सम्भव है जहाँ वाच्यविशेषक धर्म अर्थात् अभिधाव्यापार के आश्रय से ही केवल व्यञ्ज्य का सहारा ले लिया जाता है। वहाँ पर व्यञ्ज्यार्थ का सहारा लेने का प्रयोजन केवल वाच्यार्थ का उपबृंहण करना ही होता है। जैसे श्रुतार्थापत्ति या अर्थापत्ति में दूसरे अर्थ लेने का प्रयोजन केवल यही होता है कि अभिधेयार्थ का उपपादन कर दिया जाय। उदाहरण के लिये 'स्थूल देवदत्त दिन में भोजन नहीं करता।' बिना भोजन के स्थूलता उपपन्न हो ही नहीं सकती। अतः श्रुतार्थापत्ति या अर्थापत्ति से देवदत्त के रात्रिभोजन का आन्देप कर लिया जाता है। इस रात्रिभोजनरूप अर्थान्तर के आक्षेप का मन्तव्य केवल स्थूल के वाच्यार्थ को सिद्ध करना ही है, इसमें अर्थ का पर्यवसान आक्षिप्त अर्थ में नहीं होता। इसी प्रकार गुणवृत्ति के भी कुछ स्थान ऐसे होते हैं जिसमें व्यञ्ज्यार्थ का उपयोग वाच्यार्थ के उपकार के लिये ही होता है। पहले गुणवृत्ति को लीजिये—गुणवृत्ति वहाँ पर होती है जहाँ दो सर्वथा पृथक् तथा विभिन्न पदार्थों के अभेद का औपचारिक प्रयोग किया जाय। यह प्रयोग गुणों के साम्य के आधार पर होता है और गुण उसमें व्यञ्ज्य होते हैं। जैसे 'अम्बा और बालक दोनों सर्वथा विभिन्न पदार्थ हैं। इनका औपचारिक तादात्म्य 'बालक अम्बा है' में स्थापित किया गया है।
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एक गुण है और जिसकी प्रतीति व्यञ्जनावृत्ति के आधार पर होती है । यह व्यञ्जना तादात्म्य का हेतु वतलाकर ही विश्रान्त हो जाती है । इसी प्रकार 'मुखचन्द्र है' में आह्लादकत्व व्यक्क होकर वाच्य तादात्म्य का उपकार करता है । इसी प्रकार 'प्रयोजन में पुनरुक्त नहीं होती' में पुनरुक्त शब्द की गुणवृत्ति के विषय में भी समझना चाहिये । यह तो हुई गुणवृत्ति की बात । अब लक्षणा को लीजिये— इसमें गुणसाम्य के आधार पर अभेदस्थापन नहीं होता अपितु साहचर्य से भिन्न किसी अन्य सम्बन्ध से अन्यार्थक शब्द का अन्य अर्थ में प्रयोग किया जाता है । उसमें भी यह सम्भव है कि जिस प्रयोजन में व्यञ्जना होती है उसमें न तो अर्थ का पर्यवसान हो और न वाच्यता की परिसमाप्ति ही तदृत हो । जब कि चारुतारूप विश्रान्तिस्थान व्यञ्जनाव्यापार में होगा ही नहीं तब व्यञ्जना का उन्मीलन भी नहीं हो सकेगा । जैसे 'मधुर शोर मचा रहे हैं' में तटस्थ सम्बन्ध से बालकों के लिये 'मधुर' शब्द की प्रयोग किया गया है । प्रयोजन हेतु 'बहुत्व' की प्रतीति जो कि व्यञ्जनाव्यापारगम्य है। यह बहुत्व की प्रतीति लिङ्ग्यार्थ का बोध कराकर लौटकर हुआ करती है जिसका दिव्य वैभव क्षणभर के लिये देखा गया हो और तत्काल नष्ट हो जाय । इसी प्रकार कुछ गुणवृत्तियाँँ तथा लिङ्गणायेंँ ऐसी होती हैं जिनमें व्यञ्जना का तात्क्षणिक आभास मिलता है और फिर उसका पर्यवसान वाच्यार्थ के सिद्ध करने के लिये ही हो जाता है । ऐसे स्थलों के विषय में कहा जा सकता है कि गुणवृत्ति व्यञ्जनाशून्य है ।
('गुणवृत्तिस्तु वाच्येनाश्रयेत व्यङ्ग्यमात्रश्रयैव च' इन शब्दों को ठीक सङ्गति न लगा सकने के कारण टीकाकारों में प्रायः भ्रम उत्पन्न हो गया है । अधिकतर टीकाकारों ने 'वाच्यधर्माश्रयैरेव' की योजना निरुढलक्षणापरक लगाईं है और 'व्यङ्गव्यामात्राश्रयैव' की योजना प्रयोजनवतীলक्षणापरक लगाईं है । किन्तु यह अर्थ करने पर एक तो 'एव' का प्रयोग सङ्गत नहीं होता; दूसरे पूर्वोक्त ग्रन्थ की सङ्गति नहीं लगती, तीसरे उदाहरण भी निरुढलक्षणापरक नहीं दिये गये हैं और चौथी बात यह है कि लोचनकार ने स्पष्ट ही लिखा है कि श्रुतार्थापत्ति के समान वहाँ पर व्यङ्ग्यार्थ का प्रयोग अभिधाव्यापार के उपबृंहण के लिये ही होता है, ऐसे स्थलों पर व्यञ्जना की वही दशा होती है जो क्षणभर विभव को देखकर गरीबी में लौट जानेवाले व्यक्ति की हुआ करती है । इन सबकी सङ्गति विठाने से स्पष्ट हो जाता है कि यहाँ पर आलोककार ने ऐसे स्थलों का निर्देश किया है जहाँ व्यञ्जना अभिधा की साधक होती है ।
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यत्र तु सा चारुरूप्यड्यड्यप्रतीतिहेतुतस्तत्रापि व्यङ्ग्यकव्यानुप्रवेशेनैव वाच्य-कल्ववत्। असम्भाविनो वार्थेन यत्र व्यवहार:, यथा ‘सुवर्णपुष्पां पृथिवीं’ इत्यादौ तत्र चारुपलयड्यड्यप्रतीतिरेव प्रयोजिकेति तथाविधेडपि काव्ये गुणवृत्तौ सत्यामपि ध्वनित्ववहार एव मुख्यगुरुरोचि। तस्मादविवक्षितवाच्ये ध्वनौ द्वयोरपि प्रभेदयो-व्यङ्ग्यकावविशेषाविशिष्ट गुणवृत्तित्रन्न तु तदेकरूपा सहृदयहृदयाह्लादिनो प्रतीम-मानाः प्रतीतिहेतुत्वाद्द्रिर्षयान्तरेऽपि तद्रूपाशून्याया दर्शनेनात्। अतञ्च सर्व प्राक्सूचितमपि स्फुटतरप्रतिपत्तये पुनरुक्तम्।
(अनु०) जहाँ पर तो वह ( गुणवृत्ति ) चारुरूप व्यङ्ग्यप्रतीति में हेतु होती है वहाँ पर भी वाचककाव्य के समान व्यङ्ग्यकाव्य के अनुप्रवेश से ही ( उसमें चारुता आती है । ) और असम्भव अर्थ से जहाँ व्यवहार होता है जैसे ‘सुवर्णपुष्पां पृथिवीं’ इत्यादि में वहाँ चारुरूप व्यङ्ग्यप्रतीति ही प्रयोजिका होती है; अतः तस्मादविवक्षितवाच्ये ध्वनौ द्वयोरपि प्रभेदयो-व्यङ्ग्यकावविशेषाविशिष्ट गुणवृत्तित्रन्न तु तदेकरूपा सहृदयहृदयाह्लादिनो प्रतीम-मानाः प्रतीतिहेतुत्वाद्द्रिर्षयान्तरेऽपि तद्रूपाशून्याया दर्शनेनात्। अतञ्च सर्व प्राक्सूचितमपि स्फुटतरप्रतिपत्तये पुनरुक्तम्।
ननु यत्र व्यङ्ग्योऽर्थे विश्रान्तिस्तत्र किं कर्तव्यमिल्याशङ्क्याह—तत्र त्विति। वस्तुतत्रापरो व्यञ्जनव्यापार: परिस्फुट एवेष्टर्थ:।
ननु यत्र व्यङ्ग्योऽर्थे विश्रान्तिस्तत्र किं कर्तव्यमिल्याशङ्क्याह—तत्र त्विति। वस्तुतत्रापरो व्यञ्जनव्यापार: परिस्फुट एवेष्टर्थ:।
( प्रश्न ) जहाँ व्यङ्ग्यार्थ में विश्रान्ति होती है वहाँ क्या करना चाहिये ? इस शङ्का पर कहते हैं— ( उ० ) ‘वहाँँपर तो’ यह । अर्थात् वहाँ पर दूसरा व्यञ्जना-व्यापार परिस्फुट ही है । दूसरे के द्वारा स्वीकृत हुआ ही दृष्टान्त देते हैं—
तारावती
( प्रश्न ) जहाँ व्यञ्जना गुणवृत्ति की साधिका होकर आती है उसके विपय में आपने जो कुछ कहा वह ठीक हो सकता है किन्तुऐसे स्थलों के विषय में आप क्या करेंगे जहाँ व्यञ्ज्यार्थ में हो अर्थ की विश्रान्ति होती है और उसी में चारुता की परिसमाप्ति होती है ? ॠ ( उत्तर ) वहाँ पर स्पष्ट ही व्यञ्जना नामक एक अतिरिक्त व्यापार विद्यमान रहता है । इस बात को सिद्ध करने के लिये आनन्दवर्धन ने वही उदाहरण दिया है जो कि पूर्वपक्षियों ने स्वीकार कर लिया था । पूर्वपक्षियों ने विवक्षितान्यपरवाच्य नामक ध्वनिभेद का खण्डन नहीं किया अपितु उसका
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कल्यानदिति । वाचकत्वे हि स्यैयैवाझीकृतो व्यक्ननव्यापारः प्रथमध्वनिप्रभेदमप्रत्याचक्षाणेनैति भावः । किं तु वस्त्वन्तरे मुख्ये सम्मत्तवति सम्भवदेव वस्त्वन्तरं मुख्यमेवारोप्यते विषयान्तरमात्रतस्त्वारोप्यवहार इति जीवितमुपचरसि, सुवर्णपुष्पापां तु मूलत एवासम्भवात्तद्वचयनस्य कस्तन्र आरोग्यवहारः। ‘सुवर्णपुष्पां पृथिवीम्’ इति हि स्यादारोपः, तस्माद्र व्यक्नजनव्यवहार एव प्रधानभूतो नारोप्यवहारः, स परं व्यक्ननव्यापारानुरोधतयोचिष्तति । तदाह—असम्भविनैति । प्रयोजिकेति । व्यक्झ्य-
‘वाचकत्व के समान’ यह । भाव यह है कि प्रथम ध्वनि भेद का खण्डन न करते हुये तुमने ही वाचकत्व में व्यक्झनव्यापार अझ्झोकृत कर लिया । दूसरी बात यह है कि मुख्य दूसरी वस्तु के सम्भव होते हुये सम्भाव दूसरी मुख्य वस्तु का ही आरोप क्रिया जाता है; केवल त्रिपयान्तर होने से ही आरोप का व्यवहार क्रिया जाता है; यही उपचार का जीवन है । सुवर्ण पुष्पों का होना तो मूल से ही असम्भव है अतएव उनके चयग्न करने के आरोप का व्यवहार ही कैसा? ‘सुवर्णपुष्पा पृथिवी’ यह आरोप हो सके, इससे यहाँ पर व्यक्झनव्यापार ही प्रधान है आरोपव्यवहार नहीं । वह केवल व्यक्झनव्यापार के अनुरोध से हो उठता है । वही कहते हैं—‘असम्भव अर्थ के द्वारा’ इत्यादि ।
समर्थन हि क्रिया था । यहाँ पर कविकर का कहना है कि जिस प्रकार वाच्यार्थ के साथ प्रतीमान अर्थ चादृशता में हेतु होकर ध्वनिरूपता को धारण करता है और उसके लिये आने व्यक्झजनव्यापार स्वीकार क्रिया है उसी प्रकार गुणवृत्ति में भी नाकताप्रतीति में हेतु व्यक्झ्यार्थ का प्रत्यायन करानेवाली व्यक्झनावृत्ति हूी होती है अर्थात् वक्रोक्तत्व के अनुपवशों से हूी गुणवृत्तिमूलक ध्वनि में भी नाकताप्रतीति होती है । दूसरी बात यह है कि गुण साहदृय के आधार पर जहाँ पर दो विभिन्न वस्तुओं में तादात्म्य का आरोप क्रिया जाता है और विभिन्नवस्तुओं के मेद्र का सथग्न कर क्रिया जाता है उसे उपचार कहते हैं। इस उपचार का बीज यह्ही है कि मुख्यवस्तु सम्भव हो और उसपर ऐसी ही मुख्यवस्तु का आरोप क्रिया जाय जो स्वयं सम्भव हो। तभी उसे उपचार की संज्ञा प्राप्त हो सकती है । यहाँ यह पूक्छा जा सकता है कि जब दोनों वस्तुयें मुख्य भी होती हैं और दोनों ही सम्भव भी होती हैं तन उनका आरोप कैसे कहा जा सकता है ! इसका उत्तर यह है कि मुख्य वस्तु को निपयाग्न्तर में प्रधान होती है इसलिये उसे आरोप की संज्ञा दी जाती है । इससे यह सिद्ध हुवा कि जिस वस्तु का आरोप क्रिया जाय और जिसपर आरोप क्रिया गया हो दोनो वस्तुयें सम्भव अवश्य होनी चाहिये । इसके प्रतिकूल
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मेव हि प्रयोजनरूपं प्रतीतिविश्रान्तस्थानमारोपिते त्वसम्भवति प्रतीतिविभान्तरा- नीयापि न भवति । सत्यामपिति । व्यञ्जनव्यापारसम्पत्तये क्षणमात्रमवलम्बित मितिभावः । तस्मादिते । व्यञ्जकत्वलक्षणो यो विशेषस्तेनाविशिष्टा अविद्या विशिष्टं विशेषो भेदनं तस्याः व्यञ्जकत्वं न यस्याः भेद इत्यर्थः । यद्वा व्यञ्जक- लक्षणेन व्यापारविशेषेणाविशिष्टा न्यकृतस्वभावा आसमान्ताद्व्यासा । तदैके तेन व्यञ्जकत्वलक्षणेन सहैवं रूपं यस्याः सा तथाविधा न भवति । अविवक्षित- व्यञ्जकत्वं गुणवृत्ते: पृथक्चारुत्वप्रतीतिहेतुत्वात् विवक्षितवाच्यनिष्ठव्यञ्जकत्ववत्, गुणवृत्तेश्चारुत्वप्रतीतिहेतुत्वमस्तीति दर्शयति - विषयान्तर इति । अभिवंदुरित्य प्रागिति प्रथमोद्योते ।
'प्रयोजिका' यह । निस्सन्देह प्रयोजनरूप व्यङ्ग्य ही प्रतीति का विषय होता है। आरोपित के असम्भव होने पर प्रतीतिविश्रान्ति की जगह नहीं की जा सकती । 'होने पर भी' यह । भाव यह है कि व्यञ्जनव्यापार सम्पत्ति के लिये क्षणमात्र अवलम्बन की हुई होने पर भी । 'उससे' यह । व्यङ्कलक्षणवाला जो विशेष उससे अविशिष्ट अर्थात् तिरस्कृत स्वभाववाली, चारों ओर से व्याप्त । ' एकरूप' यह । उससे अर्थात् व्यञ्जकत्व लक्षण के साथ एकरूप नहीं है क्योंकि उस प्रकार की नहीं होती । अविवक्षितवाच्य में व्यञ्जकत्व गुणवृत्ति से पृथक् है क्योंकि चारुता की प्रतीति में हेतु होता है जिस प्रकार विवक्षितवाच्यनिष्ठव्यञ्जकत्व । गुणवृत्ति की चारुप्रतीतिहेतुता नहीं है यह दिखलाते हैं 'यान्तर में' यह । 'अभि ब्रह्मचारी है' इत्यादि में । 'पहले' यह अर्थात् उद्योत में ।
तारावती कुछ स्थल ऐसे होते हैं जहाँ एक वस्तु सर्वथा असम्भव होती है । उदाहरण है 'सुवर्णपुष्पां पृथिवीं' को लीजिये सुवर्ण के पुष्पों का होना तो मूलतः असम्भव है अतः वहाँ पर उनके आरोप का व्यवहार हो ही कैसे सकता है यहाँ आरोप किया जाता पृथिवीपर सुवर्णपुष्पा होने का आरोप हो सकता था सुवर्णपुष्पों के असम्भव होने से सर्वथा असद्धत हो जाता है । अतएव आरोप का व्यवहार प्रधान नहीं है अपितु व्यञ्जनाव्यापार ही प्रधान है । व्यापार के अनुरोध से ही आरोप के व्यवहार का आश्रय ले लिया जाता आश्रय यह है कि जहाँ व्यञ्जना गुणवृत्ति की साधिका न होकर स्वयं
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तथा चमत्कारपूर्ण होती है वहाँ गुणवृत्ति का उपयोग केवल व्यङ्ग्यजना के उपकारक के रूप में ही होता है । यही बात वृत्तिकार ने ‘असम्भविना चाथ्येन’
इन शब्दों के द्वारा व्यक्त की है । वृत्तिकार का आशय यह है कि जहाँ पर अर्थ असम्भव होता है वहाँ पर गुणवृत्ति के जिस प्रयोजन की व्यङ्ग्यजना की जाती है उसी में प्रतीति का पर्यवसान हो जाता है और उसी में चारुता परिनिष्ठित होती है । यह तो शङ्का भी नहीं की जा सकती कि जो आरोप असम्भव
है उसमें प्रतीति की विश्रान्ति होगी । ऐसे स्थलों पर व्यङ्ग्यव्यापार की पूर्ति के लिये तथा उसके सम्पन्न हो जाने के लिये गुणवृत्ति का लङ्क्षणभर के लिये आश्रय ले लिया जाता है; वस्तुतः वहाँ व्यङ्गना ही प्रमुख होती है, अतः ऐसे काव्य को ध्वनिकाव्य कहना ही उचित युक्तियुक्त प्रतीत होता है । इस समस्त निरूपण का निष्कर्ष यही निकलता है कि गुणवृत्ति और व्यङ्गना दोनों एकरूप कभी नहीं हो
सकता । अविवक्षितवाच्यध्वनिवाले वहाँ पर होते हैं जहाँ व्यङ्गना का उपकरण करने के लिये साधक के रूप में गुणवृत्ति का लङ्क्षणमात्र के लिये आश्रय ले लिया जाता है और उसमें व्यङ्गनावृत्ति ही प्रधान होकर स्थित होती है । आशय यह है कि अविवक्षितवाच्य के दोनों प्रभेदों में ( अर्थान्तरसङ्क्रमितवाच्य और अत्यन्ततिरस्कृत-
वाच्य इन दोनों प्रभेदों में ) गुणवृत्ति व्यङ्गकत्वविशेषाविशिष्ट होती है । लोहन में व्यङ्गकत्वविशेषाविशिष्ट के तीन अर्थ किये गये हैं—( १ ) व्यङ्गकत्वरूप विशेष से अविशिष्ट अर्थात् व्यङ्गकत्व एक विशेष तत्त्व है; गुणवृत्ति उससे विशिष्ट नहीं होती। आशय यह है कि गुणवृत्ति में व्यङ्गकत्वरूप विशेष या भेदकत्व विद्यमान नहीं
रहता अर्थात् व्यङ्गकत्व उसका भेद नहीं है । ( २ ) विशिष्ट का अर्थ है आदर, अविशिष्ट का अर्थ है अनादर। व्यङ्गकत्वरूप व्यापारविशेष के द्वारा जिसका अनादर कर दिया गया हो अर्थात् जहाँ गुणवृत्ति व्यङ्गनानुग्रापार के द्वारा दबा दी जाती है वह ध्वनि का विषय होता है और ( ३ ) व्यङ्गकत्वविशेषाविशिष्ट की सन्धि
इस प्रकार होगी—व्यङ्गक विशेष + आ + विशिष्ट । विशिष्ट का अर्थ हैं व्याप्त अर्थात् जो व्यङ्गकविशेष से चारों ओर से व्याप्त हो । इस प्रकार अविवक्षितवाच्य ध्वनि में गुणवृत्ति की स्थिति के विषय में बतलाया गया है कि इसमें गुणवृत्ति में व्यङ्गकत्व के द्वारा गुणवृत्ति दबा दी जाती है और व्यङ्गकत्व गुणवृत्ति में सभी ओर
व्याप्त रहता है । इस प्रकार व्यङ्गजना और गुणवृत्ति की तादात्म्य नहीं होती और गुणवृत्ति व्यङ्ग्यार्थ के प्रधान होनेपर ही अविवक्षितवाच्य ध्वनि का रूप धारण कर सद्दययों के हृदयों को आह्लाद देनेवाली होती है; इसके प्रतिकूल गुणवृत्ति
सद्दययों के हृदयों को आह्लाद देनेवाली नहीं होती । व्यङ्गना प्रतीममान होती
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अथ च व्यङ्ग्यकत्पलक्षणो यः शब्दार्थयोर्धर्मः स प्रसिद्धसम्बन्धातुरोधीति न कस्याचिद्धिमतिविप्रतिपत्तिमर्हति । शब्दार्थयोर्हि प्रसिद्धो यः सम्बन्धो वाच्यवाचकभावाख्यस्तमनुसन्धान एव व्यङ्ग्यकत्वलक्षणो व्यापारः सामग्र्यन्तर सम्बन्धादौपाधिकः प्रवर्तते । अत एव वाचकत्वातस्य विशेषः । वाचकत्वं हि शब्दपदार्थविशेषस्य नियत आत्मा व्युत्पत्तिकालादारभ्य तदविनाभावेन तस्य प्रसिद्धत्वात् । स त्वनियत औपाधिकत्वात् प्रकरणाद्यवच्छेदेन तस्य प्रतोतरितरथा त्वप्रतीतः ।
( अनु० ) और भी—शब्द और अर्थ का जो अनुसरण करनेवाला होता है यह बात किसी के मतभेद का विषय बनने के योग्य है ही नहीं । शब्द अर्थ का जो प्रसिद्ध वाच्यवाचक नामक सम्बन्ध उसका अनुसरण करते हुये ही दूसरी सामग्री के सम्बन्ध से व्यङ्ग्यकत्व नामक व्यापार औपाधिकरूप में प्रवृत्त होता है । इसीलिये वाचकत्व की अपेक्षा उसमें विशेषता होती है । निस्सन्देह वाचकत्व शब्दविशेष की निश्चित आत्मा होता है क्योंकि व्युत्पत्तिकाल से लेकर उससे अपृथग्रभाव में वह प्रसिद्ध होता है । वह ( व्यङ्ग्यकत्व ) तो अनियत होता है, क्योंकि औपाधिक होता है; प्रकरण इत्यादि से अवच्छिन्न होने पर उसकी प्रतीति होती है अन्यथा नहीं ।
तारावती
है किन्तु गुणवृत्ति प्रतीयमान नहीं होती । व्यञ्जना चारुताप्रतीति में हेतु होती है किन्तु गुणवृत्ति चारुताप्रतीति में हेतु भी नहीं होती; क्योंकि विषयान्तर में (‘बालक अमि है’ इत्यादि में ) गुणवृत्ति व्यङ्ग्यकत्व के रूप से शून्य भी देखी जाती है । यही सब कारण हैं जिनसे व्यञ्जनावृत्ति को गुणवृत्ति से पृथक् मानना ही पड़ता है । यहाँ पर व्यङ्ग्यकत्व और गुणवृत्ति का पृथकत्व अनुमान के आधार पर सिद्ध होता है । अनुमान की प्रक्रिया यह होगी—अविवक्षितवाच्य का व्यङ्ग्यकत्व गुणवृत्ति से पृथक् होता है ।’ ( प्रतिज्ञा ) ‘क्योंकि वह चारुताप्रतीति में हेतु होता है’ ( हेतु ) ‘जो जो चारुताप्रतीति में हेतु होता है वह गुणवृत्ति से भिन्न हुआ करता है जैसेऽविवक्षितान्यपरवाच्य में ’ ( उदाहरण ) ‘उसी प्रकार का यह भी है’ ( उपनय ) और ‘अतः उसी प्रकार का है’ ( निगमन ) । यद्यपि प्रथम उद्योत में यह सब सूचित किया जा चुका है तथापि यहाँ पर फिर से इसीलिये कह दिया गया है कि पाठक लोग अधिक स्पष्टता के साथ समझ सकें ।
यहाँ अब व्यञ्जना की सत्ता सिद्ध करने के लिये दो एक हेतु और दिये जा रहे हैं।इस विषय में तो किसी को मतभेद होना ही नहीं चाहिये कि वाच्यवाचकभाव शब्द और अर्थ का प्रसिद्ध सम्बन्ध है तथा उसी को उपजीव्य मानकर तथा उसी का आश्रय लेकर व्यञ्जनव्यापार प्रवृत्त हुआ करता है । वाच्यवाचकभाव तथा
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नियतस्वभावाच्च वाच्यवाचकत्वादौपाधिकत्वेनानियतं व्यङ्ग्यकत्वं कथं न भिन्ननिमित्तमिति दर्शयति—अपि चेत् । औपाधिक इति । व्यङ्ग्यकत्ववैचित्र्यं यत्पूर्वंमुक्तं तत्कृत ह्रस्वर्थः । अत एव समयनियताद्मिधाभिध्यापाराद्विलक्षण ह्रति यावत् । एतदेव स्पष्टीकरोति—अत एवोक्तम्—औपाधिकत्वं दर्शयति—प्रकरणादिति ।
नियत स्वभाव वाले वाच्य-वाचक भाव से औपाधिक होने के कारण अनियत व्यङ्ग्यत्व क्यों भिन्न निमित्त वाला नहीं है यह दिखलाते हैं—‘और भी’ इत्यादि । ‘औपाधिक’ अर्थात् जो व्यङ्ग्यकत्व वैचित्र्य पहले बतलाया गया है उसके द्वारा प्रयुक्त । इसीलिये सङ्केत में नियोजित अभिधाभिध्यापार से विलक्षण होता है । इसी का स्पषट कर रहे हैं—‘अतएव इत्यादि’ । औपाधिकत्व को दिखलाते हैं—‘प्रकरणादि’ इत्यादि ।
तारावती
तारावती
व्यञ्जनाभिध्यापार में एक बहुत बड़ा अन्तर यह होता है कि वाच्यवाचकभाव का स्वभाव निश्चित होता है तथा व्यञ्जनाभिध्यापार औपाधिक होता है । ( उपाधि शब्द ‘उप + आ’ उपसर्ग ‘धा’ धातु से ‘कि’ प्रत्यय होकर बना है इसका अर्थ है अपने धर्म को दूसरे के निकट ले जाना । वस्तु का स्वभाव एक सा ही होता है; किन्तु किसी विशेषतत्त्व को प्राप्तकर वह वस्तु अन्य प्रकार की प्रतिबिम्बित होने लगती है । किन्तु उस वस्तु में भेद नहीं होता । उदाहरण के लिये मुख की आकृति एक सी ही रहती है किन्तु दर्पण, तेल, खड्ग इत्यादि में उसकी आकृति विभिन्न प्रकार की दिसलाई देने लगती है । अतः दर्पण, तेल, खड्ग इत्यादि पदार्थ उपाधि हुये और उनमें दिसलाई पडनेवाली विभिन्न आकृतियाँ औपाधिक हुयीं । इसी प्रकार दर्पण इत्यादि वस्तुओं का रंग सफेद होता है किन्तु उनपर जिस प्रकार की क्रिजल्टी का प्रकाश डाला जाता है वे वस्तुयें भी उसी रंग की मालूम पड़ने लगती हैं । विभिन्न प्रकार के प्रकाश उपाधि कहे जायेंगे और उनसे प्रतीत होनेवाले विभिन्न प्रकार का वर्ण औपाधिक कहा जायगा । उपाधिभेद से वस्तु में भेद नहीं आता किन्तु उसकी प्रतीति भिन्नरूप में होने लगती है । ) व्यञ्जना और अर्थ का वाच्यवाचकभाव सम्बन्ध नित्य सम्बन्ध है; किन्तु व्यञ्जना-जन्य बोध औपाधिक होता है ( व्यञ्जना की उपाधियों का वर्णन काव्यप्रकाश की निम्नलिखित कारिकाओं में किया गया है—
व्यञ्जना व्यापार में एक बहुत बड़ा अन्तर यह होता है कि वाच्य-वाचक भाव का स्वभाव निश्चित होता है तथा व्यञ्जना व्यापार औपाधिक होता है । ( उपाधि शब्द ‘उप + आ’ उपसर्ग ‘धा’ धातु से ‘कि’ प्रत्यय होकर बना है इसका अर्थ है अपने धर्म को दूसरे के निकट ले जाना । वस्तु का स्वभाव एक सा ही होता है; किन्तु किसी विशेष तत्त्व को प्राप्त कर वह वस्तु अन्य प्रकार की प्रतिबिम्बित होने लगती है । किन्तु उस वस्तु में भेद नहीं होता । उदाहरण के लिये मुख की आकृति एक सी ही रहती है किन्तु दर्पण, तेल, खड्ग इत्यादि में उसकी आकृति विभिन्न प्रकार की दिखाई देने लगती है । अतः दर्पण, तेल, खड्ग इत्यादि पदार्थ उपाधि हुए और उनमें दिखाई पड़ने वाली विभिन्न आकृतियाँ औपाधिक हुईं । इसी प्रकार दर्पण इत्यादि वस्तुओं का रंग सफेद होता है किन्तु उन पर जिस प्रकार की क्रिजल्टी का प्रकाश डाला जाता है वे वस्तुयें भी उसी रंग की मालूम पड़ने लगती हैं । विभिन्न प्रकार के प्रकाश उपाधि कहे जायेंगे और उनसे प्रतीत होने वाले विभिन्न प्रकार का वर्ण औपाधिक कहा जायगा । उपाधि भेद से वस्तु में भेद नहीं आता किन्तु उसकी प्रतीति भिन्न रूप में होने लगती है । ) व्यञ्जना और अर्थ का वाच्य-वाचक भाव सम्बन्ध नित्य सम्बन्ध है; किन्तु व्यञ्जना-जन्य बोध औपाधिक होता है ( व्यञ्जना की उपाधियों का वर्णन काव्य प्रकाश की निम्नलिखित कारिकाओं में किया गया है—
‘वक्तृवोन्दुद्रव्यकाकुनां वाक्यवाच्यान्यसनिधे: । प्रस्तुतव्देशकालादे: श्रोष्यास्त्वतिभाजुषाम् ॥ योडन्यस्याऽऽर्थधीहेतुस्तव्यापारो व्यक्तिरेव सा ।’
‘वक्तृवोन्दुद्रव्यकाकुनां वाक्यवाच्यान्यसनिधे: । प्रस्तुतव्देशकालादे: श्रोष्यास्त्वतिभाजुषाम् ॥ योडन्यस्याऽऽर्थधीहेतुस्तव्यापारो व्यक्तिरेव सा ।’
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न तु यदानियतस्तत्स्तिं तस्य स्वरूपपररीक्ष्यत। नैष दोषः; यतः शद्ब्दात्मनि तस्यानियतत्वम्, न तु स्वे विर्धये व्यङ्ग्यलक्षणे।
किं तस्येत। अनियतस्वाद्याथारुचि कल्प्येत पारमार्थिकं रूपं नास्तीति; न चावस्तुनः परीरक्षोपपद्यत इति भावः। शद्ब्दात्मनीति। सङ्केतास्पदे पदस्खरूपमात्र इत्यर्थः।
वक्ता इत्यादि की विशिष्टताओं से जो अन्य अर्थ में अन्य अर्थ की बुद्धि वन जाती है उसे व्यञ्जना ही कहा जाता है। आशय यह है कि वाच्यवाचक भाव तो शबब्दविशेष की एक नियत आत्मा है। जब से हमें वाच्य-वाचक का ज्ञान होता है तब से जब कभी हम उस शबब्द को सुनते हैं तब हमें उसी अर्थ की प्रतीति होती है और जब कभी उस अर्थ को कहने की प्रवृत्ति होती है तब वह शबब्द सामने आ जाता है। इस प्रकार वाच्य और वाचक अपने ही रूप में सर्वदा एक दूसरे के साथ बने रहते हैं, उनमें कभी अन्तर नहीं आता है। पुस्तक शबब्द का एक निश्चित अर्थ होता है। जब व्यक्ति को उस अर्थ का ज्ञान हो जाता है तब से लेकर जब कभी पुस्तक शबब्द का प्रयोग किया जाता है वह व्यक्ति अनिवार्य रूप से पुस्तक शबब्द का वही वाच्यार्थ समझ जाता है। इस प्रकार वाच्यवाचकभाव सम्बन्ध नित्य होता है। इसके प्रतिकूल व्यङ्ग्य-व्यञ्जकभाव सम्बन्ध अनियत होता है। एक प्रकार में किसी एक शबब्द का कोई एक व्यङ्ग्यार्थ प्रतीत होता है, उस प्रकार के न रहने पर उसी अर्थ की प्रतीति नहीं होती, जब दूसरा प्रकार आ जाता है तब उसका दूसरा ही अर्थ हो जाता है। इस प्रकार व्यङ्ग्य-व्यञ्जक भाव अनियत तथा औपाधिक होता है। सारांश यह है कि वाच्यवाचक भाव सङ्केतित अर्थ में होता है और वह निश्चित भाव रहता है, इसके प्रतिकूल व्यङ्ग्यव्यञ्जकभाव उपाधि के आधार पर बदलता रहता है। जब दोनों में इतना अन्तर है तब इनको एक ही कैसे कहा जा सकता है ?
तारावती
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लिङ्गत्वन्यायाआस्यव्यङ्ग्यव्यङ्गकभावस्य लक्ष्यते, यथा लिङ्गत्वमाश्रयेऽव्य- नियतावभासम्, इच्छाधीनत्वात्, स्वविषयाल्याभिचारि च । तथैवेदं यथा दर्शितं व्यङ्गकत्वम् । शब्दात्मन्यनियतत्वादेव च तस्य वाचकत्वप्रकारता न शक्या कल्पयितुम् । यदि हि वाचकत्वप्रकारता तस्य भवेत्सच्छब्दत्वान्नियतत्वापि स्याद्वाचकत्ववत्।
(अनु०) और इस व्यङ्गयव्यङ्गकभाव का लिङ्गत्व न्याय भी लक्षित होता है । जैसे लिङ्गत्व का आश्रयों में अवभास अनियत होता है । क्योंकि वह इच्छाधीन होता है तथा अपने विषय का उसमें व्यभिचार भी नहीं होता । उसी प्रकार का यह व्यङ्गकत्व है जैसा दिखलाया गया है । शब्दात्मा में अनियत होने के कारण ही उसकी वाचकत्वप्रकारता की कल्पना नहीं की जा सकती । यदि उसमें वाचकत्वप्रकारता हो तो वाचकत्व के समान शब्दात्मा में उनकी नियतता भी हो ।
लोचन
आश्रयेऽश्रयति । न हि भूयेयवद्व्यगमकत्वं सदातनम्, अन्यगमकत्वस्य वद्यागम- करवस्य च दर्शानात् । इच्छाधीनत्वादिति । इच्छात्र पक्षधर्मत्वजिज्ञासालव्यासिसुस्मूर्षा- प्रभृति: । स्वविषयेऽति । स्वस्विन्त्र चिपये च गृहीते त्रैरुप्यादौ न व्यभिचरति ।
'आश्रयों में' यह । भूम में वद्धि का प्रत्यायकत्व सर्वदा रहनेवाला नहीं होता। क्योंक अन्यगमकत्व और वद्धि का अगमकत्व देखा जाता है । 'इच्छा के आधीन होने से' यह । यहाँ 'इच्छा' पक्षधर्मत्व की जिज्ञासा और व्यासक्ति के स्मरण की इच्छा इत्यादि है । 'अपने विषय में' यह । अपने ( लिङ्ग के ) और अपने विषय के ग्रहण कर लिये जाने पर त्रैरुप्य ( अनुमानाद्भुत सङ्क्षमस्त्व ) इत्यादि में उसका व्यभिचार नहीं होता ।
तारावती
व्यङ्गक भाव अनियत रहता है तब उसकी स्वरूपपरীক্ষा से क्या लाभ ? जब उसका कोई पारमार्थिक रूप ही नहीं, जब वह सर्वथा अनिश्चित है, तब जो जैसा चाहे वह वैसों कल्पना कर सक्ता है और अपनी रुचि के अनुसार उसको समझ सक्ता है, उसको स्वरूपपरिक्षा हो ही कैसे सकती है ? जो कोई वस्तु ही नहीं उसकी परोक्षा कैसे ? (उत्तर) यह दोष नहीं । 'वाच्यवाचक भाव नियत होता है किन्तु व्यङ्ग्यव्यञ्जना नियत नहीं होती' यह कहने का आशय केवल यही है कि जिस प्रकार अभिधा में शब्द का एक नियत सङ्केतित अर्थ होता है उस प्रकार का सङ्केतित नियत अर्थ व्यञ्जना का नहीं होता । यह अनिश्चय केवल शब्द की आशा में ही होता है, व्यञ्जना का अपना स्वतन्त्र विषय होता है
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जिसको व्यंग्यार्थ की संज्ञा दी जाती है । यह व्यंग्यार्थ अपने विषय में तो नियत होता ही है । ( व्यंग्यार्थ का विषय-विभाजन रस, वस्तु और अलङ्कार के रूप में किया ही गया है । इन सबका भी अपना-अपना विषय नियत रहता है । अतः उस पर विचार करना अयुक्तियुक्त नहीं । ) व्यञकत्व शब्दों में नियत नहीं होता किन्तु अपने विषय में नियत होता है इस बात को समझने के लिए एक दृष्टान्त लीजिये इस व्यञ्जक भाव में लिङ्गत्व न्याय भी देखा जाता है ।
( 'लिङ्ग' यह नैैयायिकों का एक पारिभाषिक शब्द है जो कि साधक हेतु के अर्थ में प्रयुक्त हुआ करता है । इस शब्द का अर्थ है—जो तत्त्व अपने में लीन वस्तु को अवगत करा दे उसे लिङ्ग कहते हैं—( 'लीनं गमयति' इति लिङ्गम् । पृथोदरादित्यात् सिद्धम् । ) लिङ्ग न्याय को समझने के लिये अनुमान की प्रक्रिया पर संक्षिप्त विचार कर लेना चाहिये । जब हम किन्हीं दो तत्त्वों को कईं बार साथ-साथ देखते हैं जैसे कई बार धुआँ और आग को साथ साथ देखकर हमें ज्ञान हो जाता है कि 'जहाँ धुआँ होता है वहाँ आग होती है ।' इस ज्ञान को अन्वयव्याप्ति कहते हैं ।
इसी प्रकार हमें यह भी ज्ञान हो जाता है कि 'जहाँ आग नहीं होती वहाँ धुआँ नहीं होता ।' इस ज्ञान को व्यतिरेकव्याप्ति कहते हैं । ये दोनों प्रकार के ज्ञान अनुमिति में कारण होते हैं तथा इन्हीं दोनों प्रकार के ज्ञानों को अनुमान कहते हैं । इन ज्ञानों को लेकर जब कोई व्यक्ति कहीं जाता है और उसे आग की तलाश होती है तब वह किसी मकान से उठते हुये धुएँ को देखता है और व्याप्ति का स्मरण करता है तथा निष्कर्ष पर पहुँच जाता है, कि इस मकान में आग है ।
यही अनुमान की संक्षिप्त प्रक्रिया है । इसमें जिस मकान से धुआँ उठता हुआ दिखाई देता है उसे पक्ष कहते हैं और 'इस मकान में आग है' यह निष्कर्ष अनुमिति कहलाता है । धुआँ लिङ्ग है और वही साध्य है । जिन स्थानों पर सपक्ष कहते हैं और जिन स्थानों पर नियत रूप से धुआँ और आग कुछ नहीं रहते उन्हें विपक्ष कहते हैं । ) आश्रयों में लिङ्गत्वप्रतीति अनिश्चित रहती है, समझिये—अनुमान के लिये, पक्षधर्मत्व ( पक्षता ) का ज्ञान नितान्त अपेक्षित होता है ।
आचार्यों ने पक्षता में दो तत्त्व माने हैं—एक तो सिद्धि का अभाव और दूसरे सिषाधयिषा अर्थात् सिद्ध करने की इच्छा । जो वस्तु स्वयं सिद्ध है उसे सिद्ध करने के लिये अनुमान का आश्रय नहीं लेना पितà । जैसे चौके में
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हमें प्रत्यक्ष आग दिखलाई पड़ती है अतः चौके में आग को सिद्ध करने के लिये अनुमान का आश्रय नहीं लिया जाता। दूसरी बात यह है कि जब तक सिद्ध करने की इच्छा नहीं होती तब तक भी अनुमान का अवसर नहीं आता। उदाहरण के लिये लोक व्यवहार में हम ओसों वस्तुओं पर ऐसी दिखलाई पड़ती रहती हैं जिनसे हम दूसरे पदार्थों का अनुमान लगा सकते हैं। किन्तु उनकी ओर हमारा ध्यान भी नहीं जाता और अनुमान की प्रक्रिया प्रसार पा ही नहीं सकती। कारण यह है कि अनुमान के प्रसार के लिये एक तो हमें व्याप्तिज्ञान होना चाहिये दूसरे व्याप्ति के स्मरण की इच्छा भी होनी चाहिये। यह इच्छा तभी हो सकती है जब उस ओर हमारा ध्यान हो। जब तक ये सब शर्तें पूरी नहीं होती अनुमान की प्रक्रिया प्रसार पा ही नहीं सकती। इसी प्रकार की और भी बातें हैं जिनसे अनुमान की प्रक्रिया प्रसार पाती है जैसे हेतु का सपक्ष में होने का ज्ञान इत्यादि। आश्रय यह है कि लिंग ( हेतु ) सपक्ष साध्य का प्रतिबन्धन नहीं करता रहता, उसके लिये अपेक्षित तत्वों का होना भी आवश्यक माना जाता है। किन्तु इसका यह अर्थ नहीं कि लिंग सर्वदा साध्य में नियत रहता और उसका कहीं अतिक्रमण हो जाता है। लिंग साध्य में नियत तो रहता ही है किन्तु विशिष्ट शर्तों के अभाव में उसकी प्रतीति नहीं होती। जब हेतु के स्वरूप और उसके विप्रय का महण हो जाता है अर्थात जब हेतु और साध्य के स्वरूप और उनकी व्याप्ति व्यापकता का परिज्ञान हो जाता है तब उसका व्यभिचार त्रैरूप्य इत्यादि में नहीं होता ) त्रैरूप्य का अर्थ है—हेतु की पक्ष में सत्ता, सपक्ष में सत्ता और साध्य की अनुपस्थिति और विपक्ष में उसकी अनुपस्थिति। इसी प्रकार अवाधितत्व इत्यादि वाले भी स्वतः सङ्घत हो जाती हैं और अनुमान की प्रक्रिया वहाँ पर ठीक बैठ जाती है। इस समस्त निरूपण का सारांश यही है कि जिस प्रकार लिङ्ग का व्यभिचार अपने साध्य में नहीं होता और न उन दोनों का व्यभिचार सपक्ष इत्यादि में होता है उसी प्रकार व्यंजना का विपय भी अव्यभिचरित तथा निश्चित ही होता है। किन्तु जिस प्रकार लिङ्ग के द्वारा साध्य की प्रतीति सार्वकालिक नहीं होती उस प्रकार व्यंजना की प्रतीति भी औपाधिक होती है। उपाधियों के ज्ञात होने पर व्यंग्यार्थ प्रतीत होता है—किन्तु उपाधियों के अभाव में उसकी प्रतीति नहीं होती। शब्द की आत्मा में वाचकत्व तो नियत होता है किन्तु व्यंजकत्व नियत नहीं होता। यही कारण है कि हम व्यंजकत्व को वाचकत्व की कोटि में नहीं ला सकते। यदि व्यंजकत्व भी शब्द की आत्मा में नियत हो तो वह भी वाचकत्व की कोटि में आ जाय। यह भी एक प्रमाण है जिसके आधार पर कहा
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स च तथाविध ओऔपाधिको धर्मः शब्दानामौत्पत्तिकशब्दार्थसम्बन्धनित्यत्वादित। वाक्यतत्त्वविदा पौरुषेयापौरुषेयोवाक्ययोविशेषसमभिदधतां नियमेनाभ्युपगतत्व्यः, तदनभ्युपगमे हि तस्य शब्दार्थसम्बन्धनित्यत्वे सत्यप्यपौरुषेयपौषेयोवाक्कियो-रुण्यप्रतिपादने निविशेषत्वं स्यात्। तदभ्युपगमे तु पौषेयाणां वाक्यानां पुरुषेच्छानुविधानसमारोपितौपाधिक्यापारान्तराणां सत्यपि स्वाभिधेयसम्बन्धापरित्यागे मिथ्यार्थतापि भवेत्।
और वह उस प्रकार का औपाधिक धर्म शब्दों के औत्पत्तिक शब्दार्थ सम्बन्ध के नित्य होने के कारण है। वाक्यतत्त्व को जाननेवाले, पौरुषेय और अपौरुषेय वाक्यों में विशेषता का प्रतिपादन करनेवाले, (मीमांसक) के द्वारा भी नियमपूर्वक स्वीकार किया जाना चाहिये। उसके न स्वीकार करने पर उसके शब्द और अर्थ के नित्य सम्बन्ध होते हुये भी पौरुषेय और अपौरुषेय वाक्यों में अर्थप्रतिपादन में कोई विशेषता न रहे। उसके मानने पर पुरुषेच्छा के अनुविधान के कारण जिनमें दूसरे औपाधिक व्यापारों का आरोप कर दिया गया है इस प्रकार के पौरुषेय वाक्यों की अपने-अपने अभिधेय के सम्बन्ध का परित्याग करते हुये भी मिथ्यार्थता भी हो जाय।
न कस्यचिद्विमतिमेति यदुक्तं तर्ककुण्डयतिस् चेति। व्यञ्जकत्वलक्षण इत्यर्थः। जन्मना द्वितीयो भावविकारः सत्त्वारूपः सामीप्याल्लक्ष्यते विपरीतौत्पत्तिकेति। जन्मना द्वितीयो भावविकारो यदुक्तं तर्ककुण्डलत्वप्रसङ्गवाली। औत्पत्तिक यह है। जन्म से जा सकता है कि व्यञ्जकत्व वाचकत्व की कोटि में नहीं आ सकता क्योंकि वह वाचकत्व के समान शब्द की आत्मा में नियत नहीं होता। ऊपर व्यञ्जकत्व का वाचकत्व से विमेद सिद्ध किया गया। इस प्रकरण के उपक्रम में कहा गया था कि इस व्यञ्जनाव्यापार को स्वीकार करने में किसी को मतभेद नहीं है। अब इसी कथन पर विस्तृत प्रकाश डाला जा रहा है। (शब्दवृत्तियों पर विशेष विचार मीमांसा दर्शनों, व्याकरण और न्यायशास्त्र में किया गया है। इन्हीं दर्शनों के आधार पर अब यह दिखलाया जायेगा कि इन दर्शनों के माननेवालों को भी अनिवार्य रूप से व्यञ्जना माननी ही पड़ेगी।) सर्व प्रथम मीमांसा दर्शन को लीजिये। मीमांसा दर्शन में शब्द और अर्थ का सम्बन्ध नित्य-
न कस्यचिद्विमतिमेति यदुक्तं तर्ककुण्डयतिस् चेति। व्यञ्जकत्वलक्षण इत्यर्थः। जन्मना द्वितीयो भावविकारः सत्त्वारूपः सामीप्याल्लक्ष्यते विपरीतौत्पत्तिकेति । जन्मना द्वितीयो भावविकारो यदुक्तं तर्ककुण्डलत्वप्रसङ्गवाली। औत्पत्तिक यह है। जन्म से
किसी की विमति को प्राप्त नहीं होता यह जो कहा गया था उसका स्पष्ट करते हैं—‘और वह’ यह। अभिप्राय यह है। ‘औत्पत्तिक यह है।’ जन्म से दूसरा भावविकार जो कि सत्त्वरूप है। सामीप्य के कारण लक्षित
जा सकता है कि व्यञ्जकत्व वाचकत्व की कोटि में नहीं आ सकता क्योंकि वह वाचकत्व के समान शब्द की आत्मा में नियत नहीं होता। ऊपर व्यञ्जकत्व का वाचकत्व से विमेद सिद्ध किया गया। इस प्रकरण के उपक्रम में कहा गया था कि इस व्यञ्जनाव्यापार को स्वीकार करने में किसी को मतभेद नहीं है। अब इसी कथन पर विस्तृत प्रकाश डाला जा रहा है। (शब्दवृत्तियों पर विशेष विचार मीमांसा दर्शनों, व्याकरण और न्यायशास्त्र में किया गया है। इन्हीं दर्शनों के आधार पर अब यह दिखलाया जायेगा कि इन दर्शनों के माननेवालों को भी अनिवार्य रूप से व्यञ्जना माननी ही पड़ेगी।) सर्व प्रथम मीमांसा दर्शन को लीजिये। मीमांसा दर्शन में शब्द और अर्थ का सम्बन्ध नित्य-
जा सकता है कि व्यञ्जकत्व वाचकत्व की कोटि में नहीं आ सकता क्योंकि वह वाचकत्व के समान शब्द की आत्मा में नियत नहीं होता। ऊपर व्यञ्जकत्व का वाचकत्व से विमेद सिद्ध किया गया। इस प्रकरण के उपक्रम में कहा गया था कि इस व्यञ्जनाव्यापार को स्वीकार करने में किसी को मतभेद नहीं है। अब इसी कथन पर विस्तृत प्रकाश डाला जा रहा है। (शब्दवृत्तियों पर विशेष विचार मीमांसा दर्शनों, व्याकरण और न्यायशास्त्र में किया गया है। इन्हीं दर्शनों के आधार पर अब यह दिखलाया जायेगा कि इन दर्शनों के माननेवालों को भी अनिवार्य रूप से व्यञ्जना माननी ही पड़ेगी।) सर्व प्रथम मीमांसा दर्शन को लीजिये। मीमांसा दर्शन में शब्द और अर्थ का सम्बन्ध नित्य-
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लक्षणातो वानुत्पत्तिः, रूढ्या वा औत्पत्तिकशब्ददो नित्यपर्यायौः तेन नित्यं यः शब्दार्थयोः शक्तिलक्षणं सम्वन्धमिच्छति जैमिनेयस्तेनैवर्थः। निर्विंशेषत्वमिति। ततस्तु पुरुषदोषानुप्रवेशास्याकिंचित्करत्वात्तद्विवरणं पौषपेयेधु वाक्येषु यदप्रामाण्यं तत्र सिद्ध्येत्। अतिपत्तुरेव हि यद् तथा प्रतिपत्तिस्तदाह वाक्यस्य न कश्चिदपरोध इति कथमप्रामाण्यम्। अपौरुषेये वाक्येऽपि प्रतिपत्तृदौात्म्यात्तथैव स्यात्।
लक्षण से या रूढ़ि से शब्द नित्य का पर्याय हो गया है। जैमिनि मतानुयायी शब्द और अर्थ के शक्तिरूप नित्यसम्बन्ध की इच्छा करता है उसके द्वारा। 'निर्विंशेषत्वम्' यह। इससे पुरुष दोष के अनुप्रवेश के अकिंचित्कर होने के कारण उसके आधीन जो पौषपेय में वाक्यों में अप्रामाण्य वह सिद्ध न हो। यदि प्रतिपत्ता (समझनेवाले) की ही वैसी प्रतिपत्ति मानी जाय तो वाक्य का कोई अपराध नहीं अतः अप्रामाण्य कैसे होता? अपौरुषेय वाक्यों में भी प्रतिपत्ति के दौरात्म्य के कारण वैसा हो जायगा।
माना जाता है। एक जैमिनि सूत्र है—'औत्पत्तिकस्तु शब्दस्यार्थेन सम्वन्धः' अर्थात् शब्द का अर्थ से सम्वन्ध औत्पत्तिक होता है। इसके विवरण में शाबर स्वामी ने लिखा है—औत्पत्तिक इति नित्यं बूः।
माना जाता है। एक जैमिनि सूत्र है—'औत्पत्तिकस्तु शब्दस्यार्थेन सम्वन्धः' अर्थात् शब्द का अर्थ से सम्वन्ध औत्पत्तिक होता है। इसके विवरण में शाबर स्वामी ने लिखा है—औत्पत्तिक इति नित्यं बूः।
उत्तरतिभाग्य् उच्चते लक्षणया। अवियुक्तः शब्दार्थयोर्भावः सम्वन्धे नोच्यते; पश्चात् सम्वन्धः। 'अर्थात् हमारे मत में औत्पत्तिक का अर्थ होता है नित्य। निस्संदेह लक्षणा से विशिष्ट का अर्थ होता है भाव। शब्द और अर्थ का भाव अर्थात् सम्वन्ध वियोगरहित (नित्य) होता है; उत्पन्न होने के बाद सम्वन्ध नहीं होता।'
उत्तरतिभाग्य् उच्चते लक्षणया। अवियुक्तः शब्दार्थयोर्भावः सम्वन्धे नोच्यते; पश्चात् सम्वन्धः। 'अर्थात् हमारे मत में औत्पत्तिक का अर्थ होता है नित्य। निस्संदेह लक्षणा से विशिष्ट का अर्थ होता है भाव। शब्द और अर्थ का भाव अर्थात् सम्वन्ध वियोगरहित (नित्य) होता है; उत्पन्न होने के बाद सम्वन्ध नहीं होता।'
औत्पत्तिक शब्द किस प्रकार नित्य का वाचक के छः विकार होते हैं—'जायते, अस्ति, वर्धते, विपरिणमते, अपक्षीयते, नश्यति, अर्थात् कोई द्रव्य उत्पन्न होता है, सत्ता में आता है, बढ़ता है विपरिणाम को प्राप्त होता है, क्षीण होता है और नष्ट हो जाता है। यहाँ पर उत्पत्ति के तत्काल बाद सत्ता आती है अतः समीप होने के कारण जन्म के बाद का दूसरा भाव विकार सत्तामात्र ही गृहीत होती है और उसका अर्थ हो जाता है कि शब्द का अर्थ से सम्वन्ध सत्तामात्र में ही रहता है उसके अन्दर और विकार उत्पन्न नहीं होते क्योंकि उत्पत्ति के बाद सत्ता ही आती है।
औत्पत्तिक शब्द किस प्रकार नित्य का वाचक के छः विकार होते हैं—'जायते, अस्ति, वर्धते, विपरिणमते, अपक्षीयते, नश्यति, अर्थात् कोई द्रव्य उत्पन्न होता है, सत्ता में आता है, बढ़ता है विपरिणाम को प्राप्त होता है, क्षीण होता है और नष्ट हो जाता है। यहाँ पर उत्पत्ति के तत्काल बाद सत्ता आती है अतः समीप होने के कारण जन्म के बाद का दूसरा भाव विकार सत्तामात्र ही गृहीत होती है और उसका अर्थ हो जाता है कि शब्द का अर्थ से सम्वन्ध सत्तामात्र में ही रहता है उसके अन्दर और विकार उत्पन्न नहीं होते क्योंकि उत्पत्ति के बाद सत्ता ही आती है।
किन्तु इस व्याख्या में एक आपत्ति यह है कि यहाँ सत्ता-मात्र ही उपलब्ध होती है, उससे यह मान लेना कि उनकी सत्ता सदा बनी ही रहती
किन्तु इस व्याख्या में एक आपत्ति यह है कि यहाँ सत्ता-मात्र ही उपलब्ध होती है, उससे यह मान लेना कि उनकी सत्ता सदा बनी ही रहती
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हे कुछ अधिक संगत प्रतीत नहीं होता, यह कोरी कल्पना ही है। अतः ( लोचनकार ने दूसरी व्याख्या यह दी है कि ) अथवा उसक्ति में विररीत लक्षणा कर ली जाती है और उससे यह सिद्ध हो जाता है कि शब्द और अर्थ के सम्बन्ध की उत्पत्ति ही नहीं होती, वह नित्य है। ( किन्तु इस व्याख्या में भी एक कष्टकल्पना है, अतः तीसरी व्याख्या दी गई है कि ) अथवा औरतत्क्ष शब्द का रूढ़ अर्थ ही है नित्य
( क्यों कि जैमिनि ने इसी अर्थ में इसका प्रयोग किया है और भाष्यों ने इसी रूप में इसकी व्याख्या भी की है )। आशय यह है कि जैमिनि के मत में शब्द और अर्थ का सम्बन्ध नित्य होता है। अब वाक्य को लीजिये। वाक्य में शब्द उसी प्रकार जोड़े जाते हैं जिस प्रकार माली पुष्पों को माला में गूंथता है। वह पुष्पों को बनाता नहीं अपितु उनको लेकर केवल संयोजना कर देता है। यही दशा वाक्यगत शब्दों की भी है। वाक्य का प्रयोकता शब्दों को बनाता नहीं अपितु बने बनाये शब्दों का योजना वाक्य में कर देता है। वाक्य दो प्रकार के होते हैं—अपौरुषेय और पौषेय । अगौरुषेय वाक्य पुरुष के बनाये नहीं होते
किन्तु पौषेय वाक्य पुष्प के बनाये होते हैं। अपौरुषेय वाक्य वैदिक वाक्य होते हैं और स्वतः प्रमाण माने जाते हैं। जिन वाक्यों को प्रामाणिक सिद्ध करने के लिये उन वाक्यों के ज्ञान की ग्राहक सामग्री ही पर्याप्त हो उन्हें स्वतः प्रमाण कहते हैं और जिन वाक्यों को प्रमाणित सिद्ध करने के लिये अन्य प्रमाण देने की आवश्यकता पड़े उन्हें परतः प्रमाण कहते हैं। आशय यह है कि मीमांसकों के मत से वेदवाक्य पुरुषनिर्मित न होने के कारण स्वयं ही प्रामाणिक होते हैं,
किन्तु लौकिक वाक्य पुरुषानुमित होने के कारण तभी प्रामाणिक माने जा सकते हैं जब उनमें कोई अन्य प्रमाण विद्यमान हो। अब प्रश्न यह उठता है कि वाक्यों में यह भेद कैसे ? जब शब्द भी नित्य होते हैं, उनके अर्थ भी नित्य होते हैं और शब्द तथा अर्थ का परस्पर समन्ध भी नित्य ही होता है तब उनकी संयोजना से जो अर्थ आयेगा वह भी नित्य तथा सर्वथा सत्य ही होगा उसमें यह भेद कैसे सिद्ध हो सकता है कि कुछ वाक्य तो स्वतः प्रमाण कुछ परतः प्रमाण । जब शब्दों का अर्थ सत्य तथा एकरूप, नित्य नित्य है तब उनकी आप्रामाणिकता का प्रश्न ही कैसे उठ सकता है। फिर उन वाक्यों की प्रामाणिकता में भेद कैसे सिद्ध हो सकता है। चाहे वे वाक्य पुरुष निर्मित हों चाहे सर्वथा अनिर्मित हों। यदि वहाँ पर शब्द जुड़े हुये हैं तो उनका कभी सन्देह का विषय हो ही नहीं सकता। अतः मीमांसकों के मत से पौरुषेय और अपौरुषेय वाक्यों में विशेषता सिद्ध करने के लिये क्यंजनव्यापार मानना
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ध्वन्यालोकः
हृश्यते हि भावानामपरित्यक्तस्वभावानामपि सामग्रयन्तरसम्पातसम्पादितौ-पाधिकव्यापारान्तराणां विरुद्धक्रियत्वम्। तथा हि—हिममयूखप्रभृतितीनां निरूपितसकलजीवलोकं शीतलत्वमुद्धततामेव प्रियाविरहदहनदहनमानमानसैर्जनेरालोक्यमानानां सन्तां सन्तापकारितया प्रसिद्धमेव। तस्मात् पौरुषेयाणां वाक्यानां सत्योपि नैसर्गिकेऽर्थसम्बन्धे मिथ्यार्थत्वं समर्थयितुमिच्छता वाचकत्वव्यतिरिक्तं किश्चित् त्वौपाधिकं व्यक्तमेवाभिधानीयम्। तच्च व्यङ्गचकत्वादते नान्यत्। व्यङ्गचकत्वप्रकाशनं हि व्यञ्जकत्वम्। पौरुषेयाणि च वाक्यानि प्राधान्येन पुरुषाभिप्रायमेव प्रकाशयन्ति। स च व्यङ्गच एव न त्वभिधेयः, तेन सहाभिधानस्य वाच्यवाचकभावलक्षणसम्बन्धाभावात्।
अनु०) निरसनदेह ऐसे भावों का विरुद्ध क्रिया करना देखा जाता है जिन्होंने अपने स्वभाव को न छोड़ा हो और दूसरी सामग्री के आ पड़ने से जिसमें दूसरे औपाधिक व्यापारों का समर्पण हो। गया हो। वह इस प्रकार—समस्त जीवलोक को शान्ति प्रदान करनेवाली शीतलता को धारण करते हुये भी प्रियतमा को वियोगाग्नि से जलते हुये मनवाले लोगों के द्वारा देखे जाने पर चन्द्रकिरण इत्यादि की सन्तापकारिता प्रसिद्ध ही है। अतएव पौरुषेय वाक्यों के नैसर्गिक अर्थं सम्बन्ध के होते हुये भी मिथ्यार्थत्व का समर्थन करने की इच्छा करानेवाले व्यक्ति के द्वारा वाचकत्व से व्यतिरिक्त किसी रूपवाले औपाधिक धर्म का स्पष्ट ही अभिधान करना चाहिये। और वह व्यङ्गजकत्व से भिन्न और कुछ नहीं होता। व्यङ्गचकत्व का प्रकाशन ही व्यञ्जकत्व होता है। और पौरुषेय वाक्य प्रधानतया पुरुष के अभिप्राय को ही प्रकाशित करते हैं। वह अभिधेय हो नहीं सकता है। क्योंकि उसके साथ शब्द का वाच्यवाचकभाव रूप सम्बन्ध हो ही नहीं सकता।
तारावती
व्यञ्जनाव्यापार के मान लेने पर पौरुषेय और अपौरुषेय वाक्यों का विभेद सिद्ध हो जाता है कारण यह है कि पौरुषेय वाक्य पुरुष की इच्छा का अनुविधान करते हैं। पुरुष के अपने दोष होते हैं। पुरुषों में भ्रम, प्रमाद इत्यादि दोष होते हैं, उनमें दूसरों को छलने की कामना होती है। ये सब पुरुष के दोष होते हैं। पुरुष के कहे हुये वाक्यों में ये सब दोष औपाधिक रूप में सन्निविष्ट हो जाते हैं। और उन वाक्यों पर दूसरों व्यापारों का आरोप कर दिया जाता है जो कि वाच्यवाचकभाव व्यापार से भिन्न होता है। अन्य व्यापारों के आरोप कर देने के कारण ही पुरुषके वाक्यों में अप्रामाणिकता आ जाती है। जो वाक्य पुरुषनिर्मित नहीं होते उनमें पुरुष के दोषों का भी आरोप नहीं होता। उनमें
व्यञ्जनाव्यापार के मान लेने पर पौरुषेय और अपौरुषेय वाक्यों का विभेद सिद्ध हो जाता है कारण यह है कि पौरुषेय वाक्य पुरुष की इच्छा का अनुविधान करते हैं। पुरुष के अपने दोष होते हैं। पुरुषों में भ्रम, प्रमाद इत्यादि दोष होते हैं, उनमें दूसरों को छलने की कामना होती है। ये सब पुरुष के दोष होते हैं। पुरुष के कहे हुये वाक्यों में ये सब दोष औपाधिक रूप में सन्निविष्ट हो जाते हैं। और उन वाक्यों पर दूसरों व्यापारों का आरोप कर दिया जाता है जो कि वाच्यवाचकभाव व्यापार से भिन्न होता है। अन्य व्यापारों के आरोप कर देने के कारण ही पुरुषके वाक्यों में अप्रामाणिकता आ जाती है। जो वाक्य पुरुषनिर्मित नहीं होते उनमें पुरुष के दोषों का भी आरोप नहीं होता। उनमें
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ननु धर्मान्तराभ्युपगमेऽपि कथं मिथ्यार्थता, नहि प्रकाशकत्वलक्षणं स्वधर्मं जहाति शब्द इत्याशङ्क्याह-तदुयत इति । प्राधान्येनैवेतिइ । यदाह-‘एवमयं पुरुथो वेदेति भवति प्रत्ययः नत्वेवमयमर्थः’ इति । तथा प्रमाणान्तरदर्शनमनन वाध्यते, न तु शब्दोऽन्वयप्रतिपत्त्युपायानुप्रविशदेवाद्वैतद्वैतयोरप्यवादितिमभावः । तेन सहू इति ।
लोचन
( प्रश्न ) धर्मान्तर के प्राप्त होने पर भी मिथ्यार्थता कैसे होगी ? प्रकाशकत्व रूप अपने धर्म को तो शब्द छोड़ता ही नहीं । यह शङ्का करके कहते हैं—‘देखा जाता है’ यह । ‘प्राधान्य के द्वारा’ यह । जैसा कि कहा गया है—‘यह सम्प्रत्यय होता है कि यह पुरुष ऐसा जानता है, यह सम्प्रत्यय तो नहीं होता कि यह ऐसा अर्थ है ।’ उस प्रकार से प्रमाणान्तर दर्शन ( प्रत्यक्ष आदि ज्ञान ) का बाध हो जाता है, शाब्दिक अन्वय का बोध नहीं होता । इसके द्वारा पुरुष के अभिप्राय के अन्तःप्रवेश से ही ‘अजुली के उपभाग में ( सौ कवि हैं)’ इत्यादि वाक्यों का मिथ्यार्थत्व कहा गया है । ‘उसके साथ’ यह । भाव यह है कि अनिश्चित होने के कारण स्वाभाविक न होने से ।
शब्द और अर्थ तथा उनके सम्बन्ध में रहनेवाला सत्य ही प्रयोजनীয় होता है । इस प्रकार औपाधिक धर्मों को अभिव्यक्त करने के लिये व्यंजनावृत्ति के मानने पर ही पौर्वेय वाक्य आगमानिक और अपौरुषेय वाक्य प्रमाणिक सिद्ध होते हैं और उनका विमेद व्यंजनावृत्ति के न मानने पर ही सङ्केत होता है । यदिं व्यंजनावृत्ति नहीं मानी जायगी तो पौर्वेय वाक्यों में पुरुष-दोषों का अनुप्रवेश भी नहीं हो सकेगा और उनके आधीन होनेवाला आगमान्य भी पौर्वेय वाक्यों में सिद्ध न हो सकेगा । यदि कहो कि वाक्य के दोषों का आरोप न सही सुननेवाले ( प्रतिपत्ता ) के दोषों का आरोप हो जायगा और यह मान लिया जायगा कि प्रतिपत्ता की प्रतिपत्ति ही सदोष है जिससे लौकिक वाक्य अप्रामाणिक हो जाता है तो इससे भी निस्तार न हो सकेगा। क्योंकि वह तो प्रतिपत्ता का दोष रहा, उसमें वाक्य का क्या अपराध जो उसे अप्रामाणिक माना जाय । दूसरी बात यह है कि प्रतिपत्ता का दोष तो अपौरुषेय वादिक वाक्यों में भी सम्भव है, फिर जिस आधार पर पौर्वेय वाक्यों को अप्रामाणिक माना जाता है उसी आधार पर अपौरुषेय वाक्यों को क्यों अप्रामाणिक नहीं माना जा सकताअतः व्यंजना के मानने पर ही यह विमेद सम्भव है कि पौर्वेय वाक्य परतः प्रमाण होते हैं और अपौरुषेय वाक्य स्वतः प्रमाण होते हैं ।
तारावती
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( प्रश्न ) एक धर्म में दूसरे धर्म का समावेश तभी सम्भव है जब कि पहले धर्म का सर्वथा तिरोभाव हो जाय । जैसे उष्णत्व का तिरोभाव हुये बिना शीतत्व का आरोप हो ही नहीं सकता । इसी प्रकार शब्द और अर्थ के नित्य सम्बन्ध में जो प्रामाणिकता का धर्म है वह जब तक समाप्त नहीं हो जाता तब तक पुरुष दोष के आरोप से मिथ्यार्थता कभी आ ही नहीं सकती । कारण यह है कि शब्द अपने वाच्यार्थ को प्रकाशित करने के धर्म का परित्याग तो कर ही नहीं देता । ऐसी दशा में व्यञ्जना के मान लेनेपर भी और धर्मान्तर की स्वी कृति में भी न तो पौर्व-पेय वाक्यों की मिथ्यार्थता ही सिद्ध हो सकती है और न पौर्वपेय तथा अपौर्वपेय वाक्यों की विरोषपता हो।
( उत्तर ) प्रायः देखा जाता है कि जब भावों ( पदार्थों ) में दूसरी मामग्री आ पड़ती है और उसे उनमें दूसरे औपाधिक ( नैमित्तिक ) व्यापार का सम्पादन हो जाता है तब वे अपने स्वाभाविक धर्म को न छोड़ते हुये भी विरुद्ध क्रिया करने लगते हैं । उदाहरण के लिये चन्द्र की शीतल मयूखों को लीजये । शीतलता उनका स्वाभाविक धर्म है और वे अपनी शीतलता के द्वारा समस्त जीव लोक के उद्धत सन्ताप को शान्तकर परा शान्ति प्रदान करती हैं । किन्तु जब ऐसे उद्धृत सन्ताप से जल रहे होते हैं तब वे ही चन्द्र की शीतल मयूखें उन व्यक्तियों को सन्ताप देनेवाली हो जाती हैं, इसमें किसी को आश्चर्य हो ही नहीं सकती क्योंकि
यह बात तो प्रसिद्ध ही है । इससे सिद्ध होता है कि विपरीत तथा विरुद्ध क्रिया के लिये यह आवश्यक नहीं है कि पदार्थ अपने स्वाभाविक धर्म को छोड़ दे । इसी प्रकार शब्द और अर्थ भी अपने नैसर्गिक सत्य तथा नित्य सम्बन्ध का परित्याग न करते हुये भी विरुद्ध क्रिया कर सकते हैं । अतएव पौर्वपेय वाक्यों में यद्यपि अर्थ का स्वाभाविक सम्बन्ध होता है और बना भी रहता है तथापि पुरुष-दोषों के प्रति-फलन से उनमें मिथ्यार्थकता आजाती है । उस मिथ्यार्थकता का समाधान करने के लिये यह नितान्त अपेक्षित है कि उनमें किसी प्रकार का औपाधिक धर्म आरोपित किया जाय । यह आरोपित धर्म व्यञ्जकत्व के अतिरिक्त और कुछ हो ही नहीं सकता । क्योंकि व्यञ्जकत्व का अर्थ होता है वाच्यार्थ को प्रकाशित करना । पौर्वपेय वाक्यों से भी मुख्य का अभिप्राय ही प्रकाशित होता है ।
भाष्य में स्पष्ट रूप से लिखा हुआ है कि जब कभी हम किसी पौर्वपेय ( लौकिक ) वाक्य को सुनते हैं तब हमें केवल इतना हो विश्वास होता है कि यह पुरुष जो कुछ
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नन्वनेन न्यायेन सर्वेषामेव लौकिकानां वाक्यानां ध्वनित्वव्यवहारः प्रसक्तः । सर्वेषामध्यनेन न्यायेन व्यङ्ग्यत्वात् । सत्यमेतत् ; किन्तु वक्त्रभिप्रायप्रकाशनेन यदू व्यङ्ग्यत्वं तत्सर्वेषामेव लौकिकानां वाक्यानामविशिष्टम् । तत् तु वाच्यत्वाश्र भिद्यते व्यङ्ग्यं हि तत् नान्तरीयकतया व्यवस्थितम् । नतु विरुद्धितत्वेन । यस्य तु विरुद्धितत्वेन व्यवस्थितत्वेन स्थितिः तद्रव्यङ्ग्यत्वं ध्वनित्वव्यवहारस्य प्रयोजकम् ।
इस न्याय से तो सभी लौकिक वाक्यों का ध्वनित्वव्यवहार प्रसक्त हो जायगा क्योंकि इसके द्वारा तो सभी व्यङ्ग्य हो जाते हैं । यह सच है; किन्तु वक्ता के अभिप्राय के प्रकाशन के द्वारा जो व्यङ्गयत्व है वह सभी वाक्यों में अविशिष्ट होता है; वह वाच्यत्व से भिन्न नहीं होता; क्योंकि व्यङ्गयत्व वहाँ पर अनिवार्य आवश्यकता के रूप में व्यवस्थित होता है; वह वहाँ वक्ता के कथनोद्देश्य के रूप में अभीष्ट नहीं होता । वह व्यङ्गयत्व ध्वनित्व्यवहार का प्रयोजक होता है जिसमें व्यङ्गय की स्थिति विरुद्धितरूप में होती है ।
तारावती
तारावती
कह रहा है वह उसको उसी रूप में जानता है । हमें किसी भी पौरुषेय वाक्य को सुनकर यह विश्वास नहीं होजाता कि अमुक व्यक्ति ने जो कुछ कहा है वह वैसा ही है । आशय यह है कि वैदिक वाक्यों का अर्थ तो सर्वथा विश्वसनीय होता है किन्तु लौकिक वाक्यों में अर्थं विश्वसनीय नहीं होता किन्तु उससे इतनी ही प्रतीति होती है कि जो कुछ कहा गया है वह वक्ता का अपना दृष्टिकोण है या वक्ता के ज्ञान की वही सीमा है । उसमें प्रयः ऐसा हो जाता है कि जो कुछ उसने कहा है उसके प्रत्यक्ष दर्शन् बाधित हो जाता है । अर्थात् जब हम उसके कथन की सत्यता प्रमाणित करने की चेष्टा करते हैं तब उसका प्रमाणप्रतिपन्न होना बाधित हो जाता है । किन्तु यह बाधा उसी में उत्पन्न होती है जोकि पुरुष का विचार समझा जाता है, शब्द और अर्थ का सम्बन्ध तो निर्भ्रान्त रहता है उसमें शब्द का अन्वय भी बाधित नहीं होता । इस कथन से यह बात सिद्ध हो जाती है कि ‘अजुली के अग्र भाग में १०० कवि हैं.’ इसमें अर्थ केवल इसी दृष्टि से मिथ्या हो जाता है कि उसमें पुरुष का अभिप्राय सन्निविष्ट हो गया है । अन्यथा शब्द और अर्थ का अपना स्वाभाविक सम्बन्ध तो सर्वथा अनुपहित ही रहता है । पुरुष का अभिप्राय तो व्यङ्ग्यार्थ हो होता है, वह कभी वाच्य नहीं हो सकता । क्योंकि पुरुष के अभिप्राय के साथ शब्द का वाच्य-वाचकभाव सम्बन्ध है ही नहीं । उसमें न तो सङ्केत ग्रहण होता है, न वह नियत होता है और न उस अर्थ में स्वाभाविकता ही होती है ।
कह रहा है वह उसको उसी रूप में जानता है । हमें किसी भी पौरुषेय वाक्य को सुनकर यह विश्वास नहीं होजाता कि अमुक व्यक्ति ने जो कुछ कहा है वह वैसा ही है । आशय यह है कि वैदिक वाक्यों का अर्थ तो सर्वथा विश्वसनीय होता है किन्तु लौकिक वाक्यों में अर्थ विश्वसनीय नहीं होता किन्तु उससे इतनी ही प्रतीति होती है कि जो कुछ कहा गया है वह वक्ता का अपना दृष्टिकोण है या वक्ता के ज्ञान की वही सीमा है । उसमें प्रयः ऐसा हो जाता है कि जो कुछ उसने कहा है उसके प्रत्यक्ष दर्शन् बाधित हो जाता है । अर्थात् जब हम उसके कथन की सत्यता प्रमाणित करने की चेष्टा करते हैं तब उसका प्रमाणप्रतिपन्न होना बाधित हो जाता है । किन्तु यह बाधा उसी में उत्पन्न होती है जोकि पुरुष का विचार समझा जाता है, शब्द और अर्थ का सम्बन्ध तो निर्भ्रान्त रहता है उसमें शब्द का अन्वय भी बाधित नहीं होता । इस कथन से यह बात सिद्ध हो जाती है कि ‘अजुली के अग्र भाग में १०० कवि हैं.’ इसमें अर्थ केवल इसी दृष्टि से मिथ्या हो जाता है कि उसमें पुरुष का अभिप्राय सन्निविष्ट हो गया है । अन्यथा शब्द और अर्थ का अपना स्वाभाविक सम्बन्ध तो सर्वथा अनुपहित ही रहता है । पुरुष का अभिप्राय तो व्यङ्ग्यार्थ हो होता है, वह कभी वाच्य नहीं हो सकता । क्योंकि पुरुष के अभिप्राय के साथ शब्द का वाच्य-वाचकभाव सम्बन्ध है ही नहीं । उसमें न तो सङ्केत ग्रहण होता है, न वह नियत होता है और न उस अर्थ में स्वाभाविकता ही होती है ।
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नान्तरीयकतयेतिः । गामानयेतिश्रुतेर्ड्याभिप्राये व्यक्ते तदभिप्रायविशिष्टोऽर्थ एवमभिप्रेतानयनादिक्रियायोग्यो न त्वभिप्रायमात्रेण क्रियाऽऽत्मकृत्यसमितिभावः । विशिष्टिततत्त्वनेति । प्राधान्येनैवर्थः । यस्मै त्वति । ध्वन्युदाहरणेऽपि तदभावः । काव्यवाक्ये म्यो हि न नयनानयनाद्युपयोगिनी मतोऽतिरम्यर्थ्यते, अपि तु तु प्रतीतिविश्रान्तिकारिणी, सा चाभिप्रायनिष्ठैव नासिप्रेतवस्तु पर्यवसानात् ।
नान्तरीयकतयेतिः । गामानयेति श्रुतेर्ड्याभिप्राये व्यक्ते तदभिप्रायविशिष्टोऽर्थ एवमभिप्रेतानयनादिक्रियायोग्यो न त्वभिप्रायमात्रेण क्रियाऽऽत्मकृत्यसमितिभावः । विशिष्टिततत्त्वनेति । प्राधान्येनैवर्थः । यस्मै त्वति । ध्वन्युदाहरणेऽपि तदभावः । काव्यवाक्ये म्यो हि न नयनानयनाद्युपयोगिनी मतोऽतिरम्यर्थ्यते, अपि तु तु प्रतीतिविश्रान्तिकारिणी, सा चाभिप्रायनिष्ठैव नासिप्रेतवस्तु पर्यवसानात् ।
'नान्तरीयक रूप में' यह।भाव यह है कि 'गाय लाओ' यह सुने जाने पर अभिप्राय के व्यक्त होने पर भी उस अभिप्राय से विशिष्ट अर्थ ही अभिप्रेत के आनयन इत्यादि की क्रिया के योग्य होता है; केवल अभिप्राय से कोई कार्य नहीं होता । 'विवक्षिततत्व के रूप में' अर्थात् प्राधान्यक के रूप में । 'जिसका तो' भाव यह है कि दृष्टान्तों में । काव्य वाक्यों से निस्सन्देह ले आने-ले जाने की उपयोगिनी प्रतीति की अभ्यर्थना नहीं की जाती किन्तु प्रतीति को विश्रान्ति देनेवाली प्रतीति हो चाही जाती है और वह अभिप्राय में रहनेवाली ही होती है; अभिप्रेत वस्तु में पर्यवसित होनेवाली नहीं होती ।
( प्रश्न ) यदि आप इस न्याय का समर्थन करेंगे कि पुरुष का अभिप्राय ठयड्यश्च हो होता है तब तो सभी लौकिक वाक्य ध्वनि के क्षेत्र मे आ जायेंगे क्योंकि इस न्याय से तो सभी वाक्य व्यंजक हो जायेंगे ।
( प्रश्न ) यदि आप इस न्याय का समर्थन करेंगे कि पुरुष का अभिप्राय ठयड्यश्च हो होता है तब तो सभी लौकिक वाक्य ध्वनि के क्षेत्र मे आ जायेंगे क्योंकि इस न्याय से तो सभी वाक्य व्यंजक हो जायेंगे ।
( प्रश्न ) यदि आप इस न्याय का समर्थन करेंगे कि पुरुष का अभिप्राय ठयड्यश्च हो होता है तब तो सभी लौकिक वाक्य ध्वनि के क्षेत्र मे आ जायेंगे क्योंकि इस न्याय से तो सभी वाक्य व्यंजक हो जायेंगे । ( उत्तर ) यह हम मानते हैं कि सभी वाक्य वाच्य के अतिरिक्त वक्ता के अभिप्राय की भी व्यंजना करते हैं और वाक्य ध्वनि की सीमा में सन्निविष्ट हो जायेंगे ।
( उत्तर ) यह हम मानते हैं कि सभी वाक्य वाच्य के अतिरिक्त वक्ता के अभिप्राय की भी व्यंजना करते हैं और वाक्य ध्वनि की सीमा में सन्निविष्ट हो जायेंगे । कारण यह है कि वक्ता के अभिप्राय को प्रकाशित करनेवाली व्यंजना तो सभी वाक्यों में एक जैसी ही होगी ।
( उत्तर ) यह हम मानते हैं कि सभी वाक्य वाच्य के अतिरिक्त वक्ता के अभिप्राय की भी व्यंजना करते हैं और वाक्य ध्वनि की सीमा में सन्निविष्ट हो जायेंगे । कारण यह है कि वक्ता के अभिप्राय को प्रकाशित करनेवाली व्यंजना तो सभी वाक्यों में एक जैसी ही होगी ।
अत: इसे व्यङ्गच्य को सत्ता में भी बिल्कुल वाच्यार्थ की सत्ता के समान ही होगी; इन दोनों में कोई भेद नहीं होगा । वहाँ पर वक्ता के अभिप्राय की व्यंजना केवल इसीलिये होती है कि वाक्यार्थबोध के लिये उसका मानना आवश्यक है । शब्दों से सङ्केतलभ्य वाच्यार्थ का बोध होता है और लौकिक वाक्य से वक्ता के तात्पर्य का बोध होता है ।
यदि वहाँ पर व्यंजना नहीं मानी जायगी तो वाक्यार्थपूर्ति ही न हो सकेगी । अतः वहाँ पर व्यङ्गच्यार्थ का प्रवेश अनिवार्य होने के कारण ही होता है । किन्तु इस प्रकार की व्यंजना ध्वनित्व की प्रयोजिका नहीं होती । ध्वनि वहाँ पर हो सकती है जहाँ पर व्यङ्गच्य विशेष रूप से वक्ता का विवक्षित-हो ।
यदि वहाँ पर व्यंजना नहीं मानी जायगी तो वाक्यार्थपूर्ति ही न हो सकेगी । अतः वहाँ पर व्यङ्गच्यार्थ का प्रवेश अनिवार्य होने के कारण ही होता है । किन्तु इस प्रकार की व्यंजना ध्वनित्व की प्रयोजिका नहीं होती । ध्वनि वहाँ पर हो सकती है जहाँ पर व्यङ्गच्य विशेष रूप से वक्ता का विवक्षित-हो ।
आशय यह है कि केवल व्यङ्गच्य होने से ही कोई वस्तु ध्वनि नहीं हो जाती । ध्वनि तभी होती है जब व्यङ्गयार्थ प्रधान हो । यद्यपि तात्पर्य तथा तद्विशिष्टक अर्थ व्यङ्गच्य होता है तथापि वह उसमें विच्छित्तिविशेष का आधान नहीं करता, अतः वह ध्वनि नहीं
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तारावती
हो सकता । इसको इस प्रकार समझिये, किसी ने 'गाय लाओ' यह ऐसी भङ्ङिमा से कहा कि उसका कोई विशेष अभिप्राय भी व्यक्त हो गया कि 'ग्राम हो गई है' गाय लाकर बाँध लो; कहीं गुम न हो जाय? 'बच्चों को दूध की आवश्यकता है, गाय लाकर दूध दुह लो' इत्यादि । सुननेवाले ने इस वाक्य को सुना भी और उस पर उसने वक्ता का अभिप्राय भी समझ लिया कि अमुक व्यक्ति अमुक मन्तव्य से गाय लाने को कह रहा है । किन्तु इस वाक्य में अभिप्रेत है ले आने की क्रिया । वह क्रिया उस द्रव्यगत ही हो सकती है जिसके विषय में कोई अभिप्राय व्यक्त किया गया है। आशय यह है कि आनयन क्रिया के योग्य गाय ही होगी यद्यपि उस गाय में वक्ता का विशेष प्रयोजन सन्निहित रहेगा। केवल अभिप्राय वहाँ पर कुछ भी न कर सकेगा। अतएव वहाँ पर वक्ता का विवक्षित अर्थ उसका अभिप्राय नहीं है अपितु वाच्यार्थ ही उसे अभिप्रेत है। इस प्रकार व्यङ्ग्य अभिप्राय केवल वाच्य का साक्षक होता है। स्वयं प्रधान नहीं होता। यही कारण है कि लौकिक वाक्य में व्यङ्ग्य होते हुये भी उसे प्रघानता प्राप्त नहीं होती। इसके प्रतिकूल ध्वनिविववहार का प्रयोजक वह व्यंग्य होता है जिसमें व्यंग्य वक्ता के अभीष्ट के रूप में स्थित होता है और वाच्य की अपेक्षा प्रधान हो जाता है। यह बात ध्वनि के उदाहरणों में पाई जाती है। काव्यवाक्यों में वक्ता का यह अभीष्ट नहीं होता कि जैसे लौकिक वाक्यों में गाय के ले आने-ले जाने इत्यादि क्रिया में अर्थ की परिसमाप्ति होती है उसी प्रकार किसी विशेष क्रिया में अर्थ की परिसमाप्ति हो। अर्थात् वहाँ पर कवि को यह अभीष्ट नहीं होता कि काव्यवाक्यों में जो कुछ कहा जा रहा है परिशीलन उसी के अनुसार कार्य करने लगे। वहाँ तो कवि को केवल यही अभीष्ट होता है कि परिशीलक की वाच्यार्थविषयक प्रतीति ही समाप्त हो जाय और उसकी अन्तरौतमा सर्वथा कवि के प्रतिपाद्य भाव से सर्वथा एकाकार हो जाय। कविता की सफल परिणति इसी में है कि कवि पाठकों के अन्तःकरणों को भावनामय बना दे तथा जो कुछ वह कह रहा है वह सब पाठकों की मनोदृष्टि से सर्वथा तिरोहित हो जाय। इस प्रकार भावनामय परिणति वस्तुतः कवि का अभिप्राय हो है। लौकिक वाक्यों के समान अभिप्रेत वस्तु में उसका पर्यवसान नहीं होता। सारांश यह है कि लौकिक वाक्यों में व्यंग्यार्थ वाच्य का पूरक होता है और वक्ता को वाच्य ही अभिप्रेत होता है; अतः हम उसे ध्वनि की संज्ञा प्रदान नहीं कर सकते। इसके प्रतिकूल काव्यवाक्यों में वाच्यवस्तु को तिरोधान ही कवि को अभीष्ट होता है तथा भावनामय परिणतिरूप अभिप्राय ही वहाँ पर मुख्य होता है। इसीलिये हम उसे ध्वनि की संज्ञा प्रदान करते हैं।
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यत्राभिप्रायविशेषरूपं व्यङ्ग्यं शब्दार्थाभ्यां प्रकाशते तद्रवति विवक्षितं तात्पर्येण प्रकाश्यमानं सत्। किन्तु तदेव केवलमपरिमितविषयस्य ध्वनिव्यवहारस्य न प्रयोजकमत्यापकत्वात्। तथा दर्शितभेदत्रयस्वरूपं तात्पर्यं चोत्यमानमभिप्रायरूपमेवाभिप्रायरूपं च संवेद्ये ध्वनिव्यवहारस्य प्रयोजकसाक्षात् स्याद् व्यङ्जकत्वलक्षणविशेषे ध्वनिलक्षणे नातिव्यामिन्नेच्चाव्यामि। तस्माद्वाक्यतत्त्वविदां मतेऽन तावद् व्यङ्जकत्वलक्षणः शब्दो व्यापारो न विरोधी प्रत्युतानुगुणा एव लभ्यते।
जहाँ अभिप्राय विशेष के रूप में व्यङ्ग्य शब्द और अर्थ के द्वारा प्रकाशित होता है वह विवक्षित हुआ करता है। किन्तु केवल वही अपरिमित विषयवाले ध्वनिव्यवहार का प्रयोजक नहीं होता है क्योंकि वह ( ध्वनि की अपेक्षा ) अत्यापक होता है। उस प्रकार से दिखलाये हुये तीन भेदोंवाला तात्पर्य के द्वारा चोतित किया जानेवाला अभिप्रायरूप और अनभिप्रायरूप सभी प्रकार का ध्वनिव्यवहार का प्रयोजक होता है। इस प्रकार जैसे बतलाया गया है उस प्रकार के व्यङ्जकत्वविशेषवाले ध्वनिलक्षण में न तो अतिव्याप्ति है और न अव्याप्ति है। इससे वाक्यतत्त्वज्ञों के मत से तो व्यङ्जकत्व नामवाले शब्द का व्यापर विरोधी नहीं है प्रस्तुत अनुगुण हो लक्षित होता है।
(अनु०) अभिप्राय विशेषरूप जो व्यङ्ग्य तात्पर्य के रूप में प्रकाशित होता हुआ शब्द और अर्थ के द्वारा प्रकाशित होता है वह विवक्षित हुआ करता है। किन्तु केवल वही अपरिमित विषयवाले ध्वनिव्यवहार का प्रयोजक नहीं होता है क्योंकि वह ( ध्वनि की अपेक्षा ) अन्यापक होता है। उस प्रकार से दिखलाये हुये तीन भेदोंवाला तात्पर्य के द्वारा चोतित किया जानेवाला अभिप्रायरूप और अनभिप्रायरूप सभी प्रकार का ध्वनिव्यवहार का प्रयोजक होता है। इस प्रकार जैसे बतलाया गया है उस प्रकार के व्यङ्जकत्वविशेषवाले ध्वनिलक्षण में न तो अतिव्याप्ति है और न अव्याप्ति है। इससे वाक्यतत्त्वज्ञों के मत से तो व्यङ्जकत्व नामवाले शब्द का व्यापर विरोधी नहीं है प्रस्तुत अनुगुण हो लक्षित होता है।
नन्वेवमभिप्रायस्यैव व्यङ्ग्यत्वेनात्र विधं व्यङ्ग्यमिति युक्तं तत्त्वमित्याह—
यह कहते हैं—‘जो तो’ यह ।
( प्रश्न ) इसप्रकार अभिप्राय के ही व्यङ्ग्यत्व के कारण जो कहा है कि तीन प्रकार का व्यङ्ग्य होता है वह कैसे ?
( प्रश्न ) जो कुछ अपने ऊपर कहा है उससे तो यही सिद्ध होता है कि केवल अभिप्राय ही व्यङ्ग्य होता है। किन्तु इसके पहले आप व्यङ्ग्य के तीन भेद कर चुके हैं रस, वस्तु और अलङ्कार। अतः इस कथन के प्रकाश में उक्त भेदों की सङ्गति कैसे बैठेगी ? ( उत्तर ) जहाँ कहीं व्यङ्ग्य हो वहाँ सर्वत्र ध्वनि होती है यह नियम नहीं है। नियम यह है कि जहाँ शब्द और अर्थ अपने को गौण बना देते हैं और व्यञ्जना के द्वारा जिस विशेष अभिप्राय को अभिव्यक्त करते हैं यदि उस अभिप्राय में विशेष रूप से चमत्कार के आधार की क्षमता हो तो वह विशेष अभिप्राय ही ध्वनि का रूप धारण करता है। कारण यह है कि काव्य का उद्देश्य ही है विशेष चमत्कार को उत्पन्न करनेवाली अभिप्रायरूप प्रतीति की उद्भावना करना। यहाँ पर यह ध्यान रखना चाहिये कि केवल शब्द और अर्थ से ही जहाँ चमत्कारपूर्ण अभिप्राय
( प्रश्न ) जो कुछ अपने ऊपर कहा है उससे तो यही सिद्ध होता है कि केवल अभिप्राय ही व्यङ्ग्य होता है। किन्तु इसके पहले आप व्यङ्ग्य के तीन भेद कर चुके हैं रस, वस्तु और अलङ्कार। अतः इस कथन के प्रकाश में उक्त भेदों की सङ्गति कैसे बैठेगी ? ( उत्तर ) जहाँ कहीं व्यङ्ग्य हो वहाँ सर्वत्र ध्वनि होती है यह नियम नहीं है। नियम यह है कि जहाँ शब्द और अर्थ अपने को गौण बना देते हैं और व्यञ्जना के द्वारा जिस विशेष अभिप्राय को अभिव्यक्त करते हैं यदि उस अभिप्राय में विशेष रूप से चमत्कार के आधार की क्षमता हो तो वह विशेष अभिप्राय ही ध्वनि का रूप धारण करता है। कारण यह है कि काव्य का उद्देश्य ही है विशेष चमत्कार को उत्पन्न करनेवाली अभिप्रायरूप प्रतीति की उद्भावना करना। यहाँ पर यह ध्यान रखना चाहिये कि केवल शब्द और अर्थ से ही जहाँ चमत्कारपूर्ण अभिप्राय
( प्रश्न ) जो कुछ अपने ऊपर कहा है उससे तो यही सिद्ध होता है कि केवल अभिप्राय ही व्यङ्ग्य होता है। किन्तु इसके पहले आप व्यङ्ग्य के तीन भेद कर चुके हैं रस, वस्तु और अलङ्कार। अतः इस कथन के प्रकाश में उक्त भेदों की सङ्गति कैसे बैठेगी ? ( उत्तर ) जहाँ कहीं व्यङ्ग्य हो वहाँ सर्वत्र ध्वनि होती है यह नियम नहीं है। नियम यह है कि जहाँ शब्द और अर्थ अपने को गौण बना देते हैं और व्यञ्जना के द्वारा जिस विशेष अभिप्राय को अभिव्यक्त करते हैं यदि उस अभिप्राय में विशेष रूप से चमत्कार के आधार की क्षमता हो तो वह विशेष अभिप्राय ही ध्वनि का रूप धारण करता है। कारण यह है कि काव्य का उद्देश्य ही है विशेष चमत्कार को उत्पन्न करनेवाली अभिप्रायरूप प्रतीति की उद्भावना करना। यहाँ पर यह ध्यान रखना चाहिये कि केवल शब्द और अर्थ से ही जहाँ चमत्कारपूर्ण अभिप्राय
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परिनिद्रितनिरपभ्रंशशाद्दद्वयव्राणां विप्रकृष्टां मतमाश्रित्यैव प्रवृत्तोडयं ध्वनि-व्यवहार इति तैः सह किं विरोषाविरोधौ चिन्त्येते ।
(अनु०) जिन्होंने अविद्या-संस्कार रहित शब्दब्रह्म का पूर्णरूप से निश्चय कर लिया है उन विद्वानों (वैयाकरणों) के मत का आश्रय लेकर ही यह ध्वनिव्यवहार प्रवृत्त हुआ है; अतः उनके साथ विरोध और अविरोधर विरोध पर क्या विचार किया जाय ।
तारावती
की अभिव्यक्ति होती है उत्ते ही ध्वनिसंज्ञा प्राप्त होती है । चेष्टा इत्यादि से भी व्यंजना होती है; किन्तु उस व्यंजना को ध्वनि की पदवी प्राप्त नहीं होती अपितु वह गुणीभूत व्यङ्गच्य के अन्तर्गत ही आता है । इसी बात को प्रकट करने के लिये वृत्तिकार ने 'शब्दार्थाभिध्याम्' शब्द का प्रयोग किया है। ( वृत्तिकार ने यहाँ 'एव' और जोड़ दिया है—शब्दार्थाभिध्यामेव ) यहाँ पर ध्वनि की जो परिभाषा की गई है वह वस्तुतः प्रथम उच्योत की ध्वनि-परिभाषा का अनुवाद मात्र है—
यथार्थः शब्दो वा तमर्थमुपसर्जनीकृतस्वार्थः । व्यस्तः काव्यविशेषः स ध्वनिरिति सूरिभिः कथितः ॥
किन्तु ध्वनिव्यवहार अपरिमित होता है । अतः केवल उस चमत्कारपूर्ण अभिप्राय को ध्वनि कहें ऐसा नहीं होता। अभिप्राय ध्वनि के समस्त भेदों में व्यापक नहीं हो सकता और न ध्वनि के समान अभिप्राय का क्षेत्र ही व्यापक है । अतः केवल अभिप्राय को ध्वनि नहीं कह सकते । पहले ध्वनि के तीन भेद दिखलाये जा चुके हैं; जब उन तीनों भेदों की अभिव्यञ्जना कवि के तात्पर्य के रूप में होती है ( और उसमें चमत्कार आधायक की शक्ति आ जाती है ) तब उसे ध्वनि कहने लगते हैं और फिर चाहे अभिप्रायरूप हो जैसे रसध्वनि या अभिप्राय से भिन्न रूपवाला हो जैसे वस्तु और अलङ्कार ध्वनि । जब हम ध्वनि का इतना क्षेत्र मान लेते हैं और जैसी व्यञ्जकता बतलाई गई है वैसी व्यञ्जकता को ध्वनि का प्रयोजक मानते हैं तब न तो कहीं अतिव्याप्ति होती है और न अव्याप्ति । ( यदि सभी प्रकार के अभिप्रायों को ध्वनि की संज्ञा दे दी जाय तो लौकिक वाक्यों में अति-व्याप्ति होगी; क्योंकि उनमें भी वक्ता का अभिप्राय सन्निहित रहता है । इसी प्रकार उन स्थलों में अव्याप्ति होगी जहाँ कवि का अभिप्राय तो पाठकों को चमत्कृत करना और रसमय बनाना है; किन्तु रचना के द्वारा वस्तु तथा अलङ्कार अभिव्यक्त होकर ध्वनि का रूप धारण कर लेते हैं । ध्वनि का उक्त स्वरूप मान लेने से न कहीं अतिव्याप्ति होती है और न अव्याप्ति । ) उपर जो कुछ कहा गया है
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एवं मीमांसकानां नात्र विमतिर्युन्नेयति प्रदर्शयैवैध्याकरणानां नैवात्र सास्तीति दर्शयंति—परिनिश्चितेति । परितः निश्चितं प्रमाणेन स्थापितं निरपेक्षंशं गलितमेदप्रपंचतया अविद्यासंस्काररहितं शब्दब्रह्म प्रकाशपरामर्शस्वभावं ब्रह्म कया;कवचेन वृंहितविशेषणनिर्भरतया च वृंहितं विधिनिर्णयप्राधान्याधिकलक्षणं वृंहयति-वैध्याकरणास्तावद् ब्रह्मपदेनान्यप्तिकथ्यिदिच्छन्ति तत् तु कथा वाचकत्वव्यतिरिक्तवयोः अविद्यापदे तु तैरपि व्यापारान्तरमभ्युपगतमेव । पृतच्च प्रथमोद्योते विततस्य निरूपितम् ।
इसप्रकार मीमांसकों की असहमति यहाँ पर उचित नहीं है यह दिखलाकर वैध्याकरणों की यहाँ पर वध ( असह्मति ) है ही नहीं यह दिखलाते हैं—‘परित निश्चित’ यह । चारों ओर से निश्चित किया गया है अर्थात् प्रमाणों से स्थापित किया गया है गलित भेदप्रपंचवाला अर्थात् अविद्या संस्कार से रहित प्रकाश परामर्शस्वभाववाला ब्रह्म क्या;कवचेन वृंहितविशेषणनिर्भरतया च वृंहितं विधिनिर्णयप्राधान्याधिकलक्षणं वृंहयति-वैध्याकरणास्तावद् ब्रह्मपदेनान्यप्तिकथ्यिदिच्छन्ति तत् तु कथा वाचकत्वव्यतिरिक्तवयोः अविद्यापदे तु तैरपि व्यापारान्तरमभ्युपगतमेव । पृतच्च प्रथमोद्योते विततस्य निरूपितम् ।
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उससे सिद्ध होता है कि वाक्यतत्त्ववेत्ता मीमांसकों के मत में शब्द का व्यंजकत्वरूप व्यापार विरोधी नहीं है अपितु उनके सिद्धान्तों से मेल ही खाता है ।
मीमांसकों को तो व्यंजनावृत्ति के स्वीकार करने में वैमत्य हो भी सकता है यद्यपि उनके वैमत्य का अवसर नहीं है किन्तु वैध्याकरणों को तो इस सिद्धान्त से वैमत्य है ही नहीं । कारण यह है कि उन्हीं वेदान्तियों के मत का अनुसरण करके ही तो हमने अपने इस ध्वनि-सिद्धान्त की स्थापना की है, फिर उनका वैमत्य हो ही किस प्रकार सकता है ? वैध्याकरणों ने पूर्णरूप से प्रमाणों के आधार पर शब्दब्रह्म की स्थापना की है। इस शब्दब्रह्म में समस्त भेदप्रपंच समाप्त हो जाता है और सारा अविद्या का संस्कार जाता रहता है ।
मीमांसकों को तो व्यंजनावृत्ति के स्वीकार करने में वैमत्य हो भी सकता है यद्यपि उनके वैमत्य का अवसर नहीं है किन्तु वैध्याकरणों को तो इस सिद्धान्त से वैमत्य है ही नहीं । कारण यह है कि उन्हीं वेदान्तियों के मत का अनुसरण करके ही तो हमने अपने इस ध्वनि-सिद्धान्त की स्थापना की है, फिर उनका वैमत्य हो ही किस प्रकार सकता है ? वैध्याकरणों ने पूर्णरूप से प्रमाणों के आधार पर शब्दब्रह्म की स्थापना की है। इस शब्दब्रह्म में समस्त भेदप्रपंच समाप्त हो जाता है और सारा अविद्या का संस्कार जाता रहता है । (वैध्याकरणों का मत अद्वैत वेदान्तियों के मत से बहुत कुछ मिलता-जुलता है । जिस प्रकार वेदान्ती सांसारिक भेदप्रपंच घट पट इत्यादि को मिथ्या मानते हैं और एक अखण्ड ब्रह्म की सत्ता को ही सत्य कहते हैं, उसी प्रकार अनेक वणों से निष्पन्न शब्दों को वैध्याकरण भी असत्य ही मानते हैं, उनके मत में भी अखण्ड शब्द ब्रह्म (स्फोट) ही सत्य है । यह सारा भेदप्रपंच अविद्या
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कृत्रिमशब्दार्थसम्बन्धवादिनां तु युक्तिविदामनुभवसिद्ध एवायं व्यञ्जकभाव: शब्दानामर्थान्तराणामिवविरोधेऽपि न प्रतिप्रेप्यपदवीमवतरति ।
(अनु० काँच्रम शब्दार्थ सम्बन्ध को माननेवाले तार्किकों का तो यह व्यञ्जकभाव अनुभव सिद्ध ही है और दूसरे पदार्थों के समान शब्दों का भी विरोध नहीं है अत: निराकरण की पदवी पर आरूढ नहीं होता ।
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के संस्कारों से प्रादुर्भूत हुआ है । यह शब्दब्रह्म स्वप्रकाशज्ञान स्वरूप है । जिस प्रकार वेदान्तियों का ब्रह्म सच्चिदानन्द चिन्मय होता है । ब्रह्म का अर्थ है व्यापक होने के कारण बृहत् ( वेदान्तियों का ब्रह्म समस्त वस्तुओं में व्यापक होता है और वैद्याकरणों का स्फोट समस्त वणों और शब्दों में व्यापक होता है । ) अथवा विशेष या व्यक्तिरूप पदार्थों की शक्तियों से परिपूर्ण होने के कारण वह उनसे बढाया हुआ होता है । ( वेदान्तियों का ब्रह्म जगत् के घट पट इत्यादि पदार्थों की शक्ति से वृद्धित होता है और वैयाकरणों का स्फोट पद-पदार्थों की मिलित शक्ति से वृद्धित होता है । ) अथवा विश्व की निर्मणकारिणी शक्तियों के कारण ईश्वर होता है । ( ब्रह्म संसार की रचना करता है और शब्दब्रह्म से वाच्यमय जगत् का निर्माण होता है । ) अथवा विश्व को निर्माण करनेवाली मायारूपिणी शक्ति पर वह ईश्वर होता है ।
( ब्रह्म माया का ईश्वर होता है और शब्दब्रह्म वाच्यमय की रचना करनेवाली वैखरी वाणी का ईश्वर होता है । ) यहाँ कहने का आशय यह है कि वैैयाकरण जब शब्द को ही ब्रह्म मानते हैं और ब्रह्मज्ञान की दशा में और किसी की सत्ता मानते ही नहीं ( जिधर जाने जग जाइ हेराई ) तब वाचकत्व और व्यङ्गयत्व का प्रश्न ही नहीं उत्पन्न होता । जब ब्रह्मज्ञान की दशा में कोई पदार्थ विद्यमान ही नहीं रहता तब वाचकत्व और व्यङ्गयत्व भी नहीं रह जाते यह कहने की कोई आवश्यकता ही नहीं । हाँ अविद्या दशा में वे अन्य पदार्थों की सत्ता स्वीकार करते हैं । उस दशा में वे अमिधा से भिन्न व्यञ्जना नामक दूसरा व्यापार मानते ही हैं ।
( वायुसंयोग स्फोट का व्यञ्जक होता है जिसे वैैयाकरण लोग ध्वनि कहते हैं । उन्हीं का अनुकरण कर साहित्यजों ने अपने ध्वनि-सिद्धान्त का प्रवर्त्तन किया है, अत: वैैयाकरणों से विरोध-अविरोध का प्रश्न ही नहीं उठता । ) वैैयाकरणों के सिद्धान्त का आधार लेकर किस प्रकार ध्वनि सिद्धान्त का प्रवर्त्तन हुआ है इसकी विस्तृत व्याख्या प्रथम उद्योत में की जा चुकी है । वहीं देखनी चाहिये ।
उपर यह दिखलाया जा चुका कि यह ध्वनि-सिद्धान्त मीमांसकों के मत में भी अनिवार्य है जो वाच्य-तत्त्व पर विशेष विचार करते हैं और वैैयाकरणों के मत
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पूर्वं वाक्यविदां पदविदां चाविभक्तिविषयत्वं प्रदर्श्यं प्रमाणतस्वविदां तार्किकाणामपि न युक्तात्र विमतिरिति दर्शयितुमाह—कृत्रिमेति । कृत्रिमम् सङ्केतमात्रस्वभाव: परिकल्पित: शब्दार्थयो: सम्बन्ध इति ये वदन्ति नैैयायिकसौगतातदय: । यथोक्रमू—‘न सामयिकस्वाच्छब्दार्थप्रत्ययस्ये'ति । तथा शबदा सङ्केतितं प्राहुरिति । अर्थान्तराणामिति । दीपादीनाम् । नन्वनुभवेन द्विचन्द्राद्यापि सिद्धं तच्च विमतिपद्मस्याशङ्क्याह—अविरोध्यरचेति । अविद्यमानो विरोधो निरोधो बाधकात्मको हृत्तौ येन ज्ञानेन यस्मै तेनानुमवसिद्धश्रावाधितश्चेर्थ:। अनुमवसिद्धं न प्रतिच्छेप्यं यथा वाचकत्वम् ।
इस प्रकार वाक्यज्ञों और पदज्ञों के अवैमत्य को दिखलाकर, प्रमाणतस्वज्ञ तार्किकों का वैमत्य भी यहाँ ठीक नहीं है, यह दिखलाने के लिये कहते हैं—‘कृत्रिम’ इत्यादि । जो लोग यह कहते हैं कि शब्द और अर्थ का सम्बन्ध कृत्रिम है अर्थात् सङ्केतमात्र स्वभाववाला तथा पूर्णरूप से कल्पित है वे नैय्यायिक और सौगत (बौद्ध) इत्यादि । जैसा (न्याय सूत्र में) कहा गया है—‘(शब्द लिङ्ङविद्या से अर्थबोधक होता है ऐसा) ‘नहीं क्योंकि शब्द और अर्थ का प्रत्यय सङ्केतिक होता है ।’ इसप्रकार (बौद्धोंने कहा है) ‘शब्द सङ्केतित को कहते हैं ।’ ‘दूसरे अर्थों (पदार्थों) का’ यह । दीप इत्यादि का । (प्रश्न) अनुभव से तो दो चन्द्र है इत्यादि का होना भी सिद्ध हो जाता है और वह तो विमति का स्थान हो जाता है । यह शङ्का करके कहते हैं—‘और अविरोध’ यह । नहीं विद्यमान है विरोध अर्थात् द्वितीय ज्ञान के द्वारा बाधकरूप प्रतिबन्ध जिसका । इससे यह अनुभवसिद्ध भी हो जाता है और आचार्यभिमत भी । अनुभवसिद्ध का प्रतिषेध नहीं हो सकता जैसे वाचकत्व का ।
में भी इसका कोई विरोध नहीं जो पद-तत्व की व्याख्या को लक्ष्य बनाकर चलते हैं । अब यह दिखलाया जारहा है कि प्रमाण तत्व को लक्ष्य माननेवाले और उसी का विशेष विवेचन करनेवाले सिद्धान्तियों की दृष्टि से भी इस ध्वनि के विषय में मतभेद का अवसर नहीं है और न उन्हें विरोध ही होना चाहिये, प्रत्युत उनके मत से भी ध्वनि-सिद्धान्त अनिवार्य ही है । इस प्रकार के सिद्धान्ती हैं नैय्यायिक बौद्ध इत्यादि । ये लोग शब्द और अर्थ के सम्बन्ध को नित्य नहीं अपितु कृत्रिम मानते हैं । इनका सिद्धान्त है कि ‘इस शब्द से यह अर्थ समझना चाहिये’ यह सङ्केत ही शक्ति है । (चाहे शब्दार्थ सङ्केत के विषय में ईश्वरेेच्छा को शक्ति कहा जाय या इच्छामात्र को शक्ति कहा जाय) उनके मत में यह सङ्केतत्व परिकल्पित ही माना जाता है । न्यायसूत्रों में यह पूर्वपक्ष स्थापित किया गया है कि शब्द
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वाचकत्वे हि तार्किकाणां विप्रतिपत्तयः प्रवर्तन्ताम्, किमिदं स्वाभाविकं शब्दानामाहोस्वित्सामयिकमित्याद्या: । व्यञ्जकत्वे तु तत्प्रसङ्गभाविनि भावान्तर-साधारणे लोकप्रसिद्ध एवानुगम्यमाने को विमतीनामवसरः । अलौकिके ह्यर्थे तार्किकाणां विमतयो निरर्थका: प्रत्यवत्न्ते न तु लौकिके । नहि नीलमधुरादिध्व-शब्दलोकेन्द्रियगोचरे वाधारहिते तत्त्वे परस्परं विप्रतिपन्ना दृश्यन्ते । नहि वाधार-रहितं नीलं नोलमिति क्रचनपरेण प्रतिषिध्यते नैतन्नीलं पीतमेतदिति । तथैव व्यञ्जकत्वं वाचकानां शब्दानामवाचकानां च गीतध्वनीनामशब्दरूपाणां च चेष्ट्रा-दीनां यत्स्वरूपामनुभवसिद्धमेव तत्तेनापहयते ?
वाचकत्व के विषय में तार्किकों की समस्त विप्रतिपत्तियाँ प्रवृत्त हों कि क्या यह शब्दों का स्वाभाविक ( धर्म ) है या सामयिक इत्यादि । किन्तु उस ( वाचकत्व ) की पीठ पर होनेवाले दूसरे भावों ( दीप इत्यादि पदार्थों ) में साधारणरूप में मिलतेवाले लोक प्रसिद्ध व्यञ्जकत्व के उपलब्ध होने में विमतियों का अवसर ही क्या है ? अलौकिक पदार्थ में तार्किकों की सभी विप्रतिपत्तियाँ प्रवृत्त होती हैं लौकिक पदार्थ में नहीं । नील, मधुर इत्यादि में समस्त लोक के इन्द्रियगोचर तथा वाधारहित तत्व के विषय में परस्पर विप्रतिपन्न (विरोधी विचारोंवाले) लोग नहीं देखे जाते । वाधारहित नील को नील कहनेवाला दूसरे के द्वारा मना नहीं किया जाता कि यह नील नहीं है यह तो पीत है । उसी प्रकार वाचक शब्दों का, अवाचक गीत ध्वनियों का और अशब्दरूप चेष्टा इत्यादिकों का जो व्यञ्जकत्व सभी का अनुभव सिद्ध तत्व है वह किसके द्वारा छिपाया जा सकता है ?
उसां प्रकार अथवावोधक होता है । जिस प्रकार लिङ्ग ( हेतु ) से साध्य का सिद्ध होता है । इसका उत्तर इस सूत्र में दिया गया है-‘न सामयिकत्वाच्छब्दार्थ-प्रत्ययस्य’ अर्थात् शब्द लिङ्ग विद्या से अर्थबोधक नहीं होता अपितु शब्दार्थप्रत्यय सामयिक होता है । इसी प्रकार बौद्धों ने भी कहा है कि शब्द सङ्केतित अर्थ को कहा करता है । आशय यह है कि माध्यमिक बौद्ध इत्यादि प्रमाणवादी शब्द और अर्थ का सम्बन्ध कृत्रिम ही मानते हैं । उनके मत में भी यह व्यञ्जकभाव अनुभव सिद्ध ही है । एक पदार्थ दूसरे की व्याख्या किया करता है । जैसे दीपक इत्यादि घट इत्यादि की व्याख्या करते हैं । उसी प्रकार शब्द तथा उसका अपना अर्थ भी दूसरे अर्थ की व्याख्या कर सकते हैं । इसमें किसी प्रकार की अनुपपत्ति नहीं आती ।
( प्रश्न ) जितने अनुभव होते हैं उनमें किसी प्रकार की अनुपपत्ति तथा असहमति न हो यह ठीक नहीं है । बहुत से ऐसे अनुभव होते हैं जिनसे सहमत
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ननु तत्राप्येषां विमति: । नैतत्, नहि वाचकत्वे हि सा विमति:, अपितु वाचकत्वस्य नैसर्गिकत्वकृत्रिमत्वादौ तदाह—वाचकत्वे हीति । नन्वेवं व्यञ्जकत्वस्यापि धर्मान्तरमुखेन विप्रतिपत्तिविषयतापि स्यादित्याशङ्क्याह—व्यञ्जकत्वे त्विति । भावान्तरेति ।
इस पर शंका करते हैं—'ननु तत्राप्येषां विमति:' । इसका समाधान देते हैं—'नैतत्' इत्यादि । यहाँ पर यह शंका नहीं करनी चाहिए कि यदि वाचकत्व में विवाद है तो व्यञ्जकत्व में भी विवाद होना चाहिए ।
लोचनकार यहाँ पर 'ननु तत्राप्येषां विमति:' इस शंका का समाधान प्रस्तुत कर रहे हैं। उनका कहना है कि वाचकत्व और व्यञ्जकत्व में भेद है, और व्यञ्जकत्व में विवाद नहीं होना चाहिए।
( प्रश्न ) उसमें भी इनका वैमत्य है । ( उत्तर ) ऐसा नहीं है । वह वैमत्य निस्सन्देह वाचकत्व के विषय में नहीं है अपितु वाचकत्व के नैसर्गिकत्व, कृत्रिमत्व इत्यादि के विषय में है ।
( प्रश्न ) उसमें भी इनका वैमत्य है । ( उत्तर ) ऐसा नहीं है । वह वैमत्य निस्सन्देह वाचकत्व के विषय में नहीं है अपितु वाचकत्व के नैसर्गिकत्व, कृत्रिमत्व इत्यादि के विषय में है ।
यहाँ पर प्रश्न उठाया गया है कि क्या वाचकत्व और व्यञ्जकत्व दोनों में वैमत्य है? इसका उत्तर देते हुए कहा गया है कि वैमत्य केवल वाचकत्व के नैसर्गिकत्व या कृत्रिमत्व के विषय में है, न कि वाचकत्व के विषय में ।
यह कहते हैं—'वाचकत्व में निस्सन्देह' यह । ( प्रश्न ) इस प्रकार दूसरे धर्मों के द्वारा व्यञ्जकत्व की भी विप्रतिपत्तिविषयता हो जाय यह शङ्का करके कहते हैं—'व्यञ्जकत्व में तो' यह । 'भावान्तर' यह । तारावती
यह कहते हैं—'वाचकत्व में निस्सन्देह' यह । ( प्रश्न ) इस प्रकार दूसरे धर्मों के द्वारा व्यञ्जकत्व की भी विप्रतिपत्तिविषयता हो जाय यह शङ्का करके कहते हैं—'व्यञ्जकत्व में तो' यह । 'भावान्तर' यह ।
यहाँ पर लोचनकार ने 'वाचकत्व में निस्सन्देह' यह कथन का अर्थ स्पष्ट किया है और व्यञ्जकत्व के विषय में शंका उठाई है।
नहीं हुआ जा सकता । जैसे आँखों में उँगली लगाकर देखने से दो चन्द्र दिखाई देते हैं । इस प्रकार दो चन्द्रों का होना अनुभव सिद्ध है । किन्तु उससे सहमत नहीं हुआ जा सकता ।
नहीं हुआ जा सकता । जैसे आँखों में उँगली लगाकर देखने से दो चन्द्र दिखाई देते हैं । इस प्रकार दो चन्द्रों का होना अनुभव सिद्ध है । किन्तु उससे सहमत नहीं हुआ जा सकता ।
यहाँ पर तारावतीकार एक उदाहरण के माध्यम से समझाते हैं कि अनुभवसिद्ध होने का अर्थ प्रामाणिक होना नहीं है।
ऐसे दशों में आप यह कैसे कह सकते हैं कि 'व्यञ्जकभाव अनुभवसिद्ध है अतः वह मान्य है'? ( उत्तर ) समस्त अनुभवसिद्ध वस्तुएँ प्रामाणिक ही होती हों ऐसा कोई नियम नहीं है । जिन अनुभवसिद्ध वस्तुओं का कोई विरोध विद्यमान होता है अथवा किसी अन्य प्रमाण से जहाँ अनुभवसिद्ध वस्तु का कोई बाधक उपस्थित हो जाता है और उससे अनुभवजन्य ज्ञान में प्रतिबन्ध उपस्थित हो जाता है वह अनुभवसिद्ध वस्तु प्रामाणिक नहीं मानी जाती ।
ऐसे दशों में आप यह कैसे कह सकते हैं कि 'व्यञ्जकभाव अनुभवसिद्ध है अतः वह मान्य है'? ( उत्तर ) समस्त अनुभवसिद्ध वस्तुएँ प्रामाणिक ही होती हों ऐसा कोई नियम नहीं है । जिन अनुभवसिद्ध वस्तुओं का कोई विरोध विद्यमान होता है अथवा किसी अन्य प्रमाण से जहाँ अनुभवसिद्ध वस्तु का कोई बाधक उपस्थित हो जाता है और उससे अनुभवजन्य ज्ञान में प्रतिबन्ध उपस्थित हो जाता है वह अनुभवसिद्ध वस्तु प्रामाणिक नहीं मानी जाती ।
यहाँ पर उत्तर दिया गया है कि अनुभवसिद्ध होने का अर्थ यह नहीं है कि वह प्रामाणिक है। यदि किसी अनुभवसिद्ध वस्तु का विरोध होता है या अन्य प्रमाण से उसका बाध होता है, तो वह प्रामाणिक नहीं मानी जाती।
किन्तु जिस वस्तु में कोई प्रतिबन्ध नहीं होता वह प्रामाणिक ही मानी जाती है । जैसे दो चन्द्रों के अनुभव में प्रत्यक्ष प्रतीति प्रतिबन्धक का कार्य करती है जिससे वह ज्ञान बाधित हो जाता है । किन्तु व्यतिरेकज्ञान के अनुभव में किसी प्रकार का प्रतिबन्ध उपस्थित नहीं होता, अतः उस ज्ञान को अप्रामाणिक नहीं माना जा सकता ।
किन्तु जिस वस्तु में कोई प्रतिबन्ध नहीं होता वह प्रामाणिक ही मानी जाती है । जैसे दो चन्द्रों के अनुभव में प्रत्यक्ष प्रतीति प्रतिबन्धक का कार्य करती है जिससे वह ज्ञान बाधित हो जाता है । किन्तु व्यतिरेकज्ञान के अनुभव में किसी प्रकार का प्रतिबन्ध उपस्थित नहीं होता, अतः उस ज्ञान को अप्रामाणिक नहीं माना जा सकता ।
यहाँ पर तारावतीकार समझाते हैं कि यदि किसी वस्तु में कोई प्रतिबन्ध नहीं होता है, तो वह प्रामाणिक मानी जाती है।
आशय यह है कि व्यङ्ग्यज्ञान की प्रतीति अनुभव सिद्ध भी है अवाधित भी है जो वस्तु सकता । जैसे वाचकत्व का कोई प्रतिषेध नहीं करता ।
आशय यह है कि व्यङ्ग्यज्ञान की प्रतीति अनुभव सिद्ध भी है अवाधित भी है जो वस्तु सकता । जैसे वाचकत्व का कोई प्रतिषेध नहीं करता ।
यहाँ पर लोचनकार का आशय है कि व्यङ्ग्यज्ञान की प्रतीति अनुभवसिद्ध और अवाधित दोनों है।
( प्रश्न ) वाचकत्व के विषय में भी तार्किक विप्रतिपत्ति उठाते हैं । ( उत्तर ) वह विप्रतिपत्ति उनकी इस विषय में नहीं होती कि शब्द का अभिधेयार्थ होता है या नहीं अथवा शब्द के वाचकत्व धर्म को स्वीकार किया जाय या नहीं । उनकी विप्रतिपत्ति इस विषय में होती है कि शब्द के वाचकत्व धर्म को नैसर्गिक मानें या कृत्रिम ।
( प्रश्न ) वाचकत्व के विषय में भी तार्किक विप्रतिपत्ति उठाते हैं । ( उत्तर ) वह विप्रतिपत्ति उनकी इस विषय में नहीं होती कि शब्द का अभिधेयार्थ होता है या नहीं अथवा शब्द के वाचकत्व धर्म को स्वीकार किया जाय या नहीं । उनकी विप्रतिपत्ति इस विषय में होती है कि शब्द के वाचकत्व धर्म को नैसर्गिक मानें या कृत्रिम ।
यहाँ पर प्रश्न उठाया गया है कि वाचकत्व के विषय में भी तार्किक विप्रतिपत्ति होती है। इसका उत्तर देते हुए कहा गया है कि यह विप्रतिपत्ति वाचकत्व के स्वरूप के विषय में नहीं है, बल्कि उसके नैसर्गिक या कृत्रिम होने के विषय में है।
वाचकत्व नित्य होता है या अनित्य इत्यादि विप्रतिपत्तियाँ होती हैं । शब्द के वाचकत्व धर्म की सत्ता स्वीकार करने में किसी को अनुपपत्ति है ही नहीं । आशय यह है कि वाचकत्व धर्मों में अनुपपत्ति नहीं है किन्तु उसके धर्मों के विषय में ही
वाचकत्व नित्य होता है या अनित्य इत्यादि विप्रतिपत्तियाँ होती हैं । शब्द के वाचकत्व धर्म की सत्ता स्वीकार करने में किसी को अनुपपत्ति है ही नहीं । आशय यह है कि वाचकत्व धर्मों में अनुपपत्ति नहीं है किन्तु उसके धर्मों के विषय में ही
यहाँ पर लोचनकार समझाते हैं कि वाचकत्व के नित्य या अनित्य होने के विषय में विप्रतिपत्तियाँ होती हैं, लेकिन वाचकत्व धर्म की सत्ता को स्वीकार करने में कोई समस्या नहीं है।
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अक्षिनिकोचादेः साङ्केतिकत्वं चक्षुरादिकस्यानादियोग्यतेति दृष्ट्वा काममस्तु संशयः शब्दस्याभिधेयप्रकाराने व्यञ्जकत्वं तु याडशमेकरूपं भावान्तरेषु तादृगेव प्रकृतेऽपि निश्वितैकलुपे कः संशयस्यावकाश इत्यर्थः। नैतद्रीलमिति नीले हि न विप्रतिपत्ति:, अपितु प्राधान्येनोत्पत्तिं परामृशतिरूपं ज्ञानमात्रं तुच्छमित्रमिति तदष्टौकिस्य एव विप्रतिपत्तयः। वाचकत्वमिति। ध्वन्युादाहरणेष्वतिमतभावः।
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विकास इत्यादि से उनकी संकेतवत्ता और नेत्र इत्यादि की अनादि योग्यता को देखकर शब्द के अभिधेयार्थ प्रकाशन में चाहे जितना सन्देह हो, किन्तु व्यञ्जकत्व तो दूसरे पदाथों में जिस प्रकार एकरूप होता है वैसा ही प्रकृत में भी है; इस प्रकार निश्चित एकरूप में सन्देह का अवसर ही कगा है ? यही यहाँ पर आशय है। नील में ‘यह नील नहीं है’ यह विप्रतिपत्ति किसी को नहीं होती, अपितु उसकी सृष्टि में अलौकिकता के विषय में ही विप्रतिपत्ति होती है कि क्या वह प्राधान (मूलाप्रकृति) से उत्पन्न हुआ है ? क्या यह परमाणुजन्म है ? क्या यह ज्ञानमात्र है ? क्या यह भूत्यमात्र है ? इत्यादि। ‘वाचकों का’ यह। भाव यह है कि ध्वनि के उदाहरणों में।
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अनुपपत्ति हो सकती है। (प्रश्न) जिस प्रकार वाचकत्व के धर्मों के विषय में विप्रतिपत्ति हो जाती है उसी प्रकार व्यञ्जकत्व के अन्दर भी दूसरे धर्मों का आशय लेकर उसे भी विप्रतिपत्ति का विषय क्यों नहीं बनाया जा सकता ? (उत्तर) वाचकत्व के विषय में अनेक धर्मों को लेकर तार्किकों को अनेक विप्रतिपत्तियाँ उत्पन्न हो सकती हैं; किन्तु उस प्रकार की विप्रतिपत्तियाँ व्यञ्जकत्व धर्म के विषय में नहीं हो सकतीं। शब्द का वाच्य अर्थ के साथ नैमित्तिक सम्बन्ध होता है या सांङ्केतिक इस विषय में सन्देह का पर्याप्त अवसर है। अर्थ के साथ सम्बन्ध के विषयमें दोनों प्रकार के उदाहरण मिलते हैं। जैसे आँखों का सिकोड़ना फैलाना इत्यादि के द्वारा अर्थ का अभिव्यक्त अभिधान किया जाता है। यह आँख सिकोड़ने इत्यादि इन्द्रियाँ घट इत्यादि अर्थ को स्वयं ग्रहण करती हैं। घट इत्यादि अर्थ को ग्रहण करने में इन्द्रियों में स्वाभाविक योग्यता विद्यमान है। तब यह सन्देह उत्पन्न हो जाता है कि शब्द का अभिधेयार्थ से किस प्रकार का सम्बन्ध है ? क्या अधि- सङ्केत इत्यादि दृष्टन्त के आधार पर यह कहना ठीक होगा कि उनका सांङ्केतिक सम्बन्ध है या नेत्रों से पदाथों के चाक्षुष ज्ञान के उदाहरण से यह कहना ठीक होगा कि शब्द और अर्थ का स्वाभाविक सम्बन्ध है ? दोनों प्रकार के उदाहरणों के मिलने से वाचकत्व के विषय में सन्देह उत्पन्न हो जाता है। किन्तु इस प्रकार का
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सन्देह व्यञ्जना के विषय में उत्पन्न नहीं होता । कारण यह है कि एक तो व्यञ्जना वाचकत्व के पीछे आती है; अतः उस विषय में किसी को सन्देह का अवसर है ही नहीं । दूसरी बात यह है कि व्यञ्जना सर्वत्र एक जैसी ही होती है । दीपक अपने को प्रकाशितकर घट को प्रकाशित करता है । जहाँ कहा एक वस्तु के द्वारा दूसरे या वाच्यार्थ पहले अपने को प्रकाशित करता है फिर किसी अन्य अर्थ को प्रकाशित कर देता है । इस विषय में अनुपपत्ति का कोई अवसर है ही नहीं । अतः जिस व्यञ्जना का रूप सर्वथा निश्चित है उसमें सन्देह का अवसर ही क्या हो सकता है ? तार्किकों में मतभेद सर्वदा अलौकिक वस्तु के विषय में हुआ करता है । लौकिक वस्तु के विषय में तो निश्चित होता है । अतः उस विषय में मतभेद कभी होता ही नहीं । जो वस्तु नील है सारे संसार की आँखें उसे नील ही समझती हैं अतः इस विषय में कभी विवाद उठता ही नहीं कि अमुक वस्तु नील है या नहीं । इसी प्रकार जो वस्तु मधुर होती है सारे संसार की जिह्वाएँ उसे मीठा ही समझती हैं । अतः यह विवाद कभी उठता ही नहीं कि अमुक वस्तु मधुर है या नहीं । कारण यह है कि नीलत्व में या मधुरत्व में किसी प्रकार की बाधा उपस्थित ही नहीं होती, फिर उसमें विवाद ही ! कस बात का ? यह तो हुई लौकिक तत्व की बात । अब अलौकिक तत्व को लीजिये । नील यह क्या वस्तु है ? सांख्य शास्त्र के आचार्य कहते हैं कि मूलप्रकृति प्रधानतत्व है; उससे महत्तत्व की उत्पत्ति होती है और उसी परम्परा में नील इत्यादि की भी उत्पत्ति होती है । इस प्रकार सांख्य के आचार्य नील को प्रधान का परिणाम मानते हैं । इसके प्रतिकूल न्यायशास्त्र के आचार्यों का कहना है कि संसार के समस्त पदार्थ परमाणुओं से बने हैं । अतः नैय्यायिकों के मत में नील यह परमाणुओं का कार्य है । इसके प्रतिकूल विज्ञानवादी संसार के सभी तत्त्वों को विज्ञानरूप मानते हैं । अतः उनके मत में नील भी विज्ञान रूप है । माध्यमिक बौद्ध संसार के समस्त तत्त्वों को शून्य रूप मानते हैं । अतः उनके मतमें नील भी शून्य का ही रूप है । इस प्रकार नील की उत्पत्ति के अलौकिक विषय में विप्रतिपत्तियाँ उठती हैं । यदि लौकिक नील को कोई नील कहे तो दूसरा व्यक्ति कभी उसका प्रतिषेध नहीं करेगा कि यह नील नहीं है यह तो पीत है । किन्तु यदि उसका अलौकिकता के विषय में कोई कुछ कहे कि नील प्रधान का परिणाम है तो दूसरा घट कहेगा कि नहीं यह तो परमाणुओं से बना है; तीसरा कहेगा 'नहीं यह तो विज्ञानरूप है' चौथा कहेगा कि 'नहीं यह तो शून्य का परिणाम है ।' आशय यह है कि लौकिक पदार्थों में सन्देह नहीं होता; अलौकिक में सन्देह
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अशब्दमर्थं रमणीयं हि सूचयन्तो व्यवहारास्तथा व्यापाराः निवद्धाश्चानिवद्धाश्च विदग्धपरिषत्सु विविधा विभाव्यन्ते । तानुपहास्यतामात्मनः परिहरणं कोटिसन्दर्भीत सचेताः ।
अशब्दमिति । अभिधाव्यापारेऽनासृष्टमित्यर्थः । रमणीयमिति । यद्गोण्यमानतयैव सुन्दरीमवतीर्यननेन ध्वन्यमानतायामसाधारणप्रतीतिलाभः प्रयोजनसुक्कम् । निवद्धाः प्रसिद्धाः । तानिति । तं व्यवहारम् । कः सचेताः । अतिसन्दर्भीति नाद्रियेतेऽर्थः । लक्षणे शास्त्रादेशः आत्मनः कर्मंभूतस्य योपहासनीयता तस्याः परिहारेणोपलक्षितस्तां परिजहिप्सुरित्यर्थः । 'अशब्द' यह । अर्थात् अभिधा व्यापार से अस्पृष्ट किया हुआ । 'रमणीय' यह । जो कि गोप्यमान रूप में ही सुन्दरता को प्राप्त होता है । इसके द्वारा ध्वन्यमान होने में असाधारण प्रतीति लाभ प्रयोजन के रूप में वतलाया गया है । निवद्ध का अर्थ है प्रसिद्ध । 'उनका' अर्थात् उक्तियों का । कौन सहृदय अत्यन्त सन्धान करे अर्थात् उनका आदर न करे । लक्षण में शास्त्र आदेश ( यह अर्थ देता है कि ) कर्मरूप में स्थित अपनी जो उपहासनीयता उसके परिहार के द्वार उपलक्षित होता है ।
तारावती
होता है । व्यंजकत्व भी लौकिक वस्तु ही है । व्यंजना वाचक शब्दों से भी होती है, अवेचक गतिध्वनियों से भी होती है और अशब्द रूप चेष्टा इत्यादि से भी होती है । सभी का यह अनुभावसिद्ध तत्त्व है । अतः इसे छिपा ही कौन सकत है ? अनेक प्रकार की उक्तियाँ और अनेक प्रकार के व्यापार ऐसे होते हैं कि शब्दों के द्वारा अभिधान करने में उनमें सुन्दरता नहीं आती, वे शब्द के द्वारा अभिहित किये ही नहीं जा सकते । जब उनको छिपाकर दूसरे शब्दों से अभिहित किया जाता है तद् उनमें अमृतपूर्व रमणीयता आ जाती है । इससे सिद्ध होता है कि ध्वनित होने में असाधारण प्रतीति की प्राप्ति हो जाती है । यह ध्वनि सिद्धान्त का एक बहुत बड़ा प्रयोजन है । इस प्रकार के रमणीय कथन और व्यापार मुख्क इत्यादि निबन्धों में भी होते हैं और गद्यकाव्यों में भी हो सकते हैं । विद्वानों की
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वृत्तौ—अस्त्यतिसन्धानावसरः व्यङ्ग्यकत्वं शब्दानां गमकत्वं तच्च लिङ्गत्वम्-तच्च व्यङ्ग्यप्रतीतिलिङ्गप्रतीतिरेवेति लिङ्गलिङ्गिभाव एव तेषां व्यङ्ग्यनव्यङ्गकभावो नापरः कश्चित् । अतश्रेतदवश्यमेव वोद्धव्यं यस्माद्वक्त्राभिप्रायापेक्षया व्यङ्ग्यकत्वमीदानीमेव तद्वया प्रतीपादितवक्त्राभिप्रायश्रुत्यनुरूप एव ।
(अनु०) ( कोई ) कहे—अतिसन्धान (अस्वीकृति ) का अवसर है—व्यङ्ग्यकत्व शब्दों के गमकत्व (अर्थप्रत्यायकत्व) को ही कहते हैं और वह लिङ्गत्व ( हेतु ) ही है; अतः व्यङ्गयप्रतीति लिङ्गी ( साध्य ) की प्रतीति ही है । इस प्रकार इनका लिङ्गलिङ्गिभाव ( साधनसाध्यभाव ) ही है व्यङ्ग्य-व्यङ्गकभाव कोई अन्य वस्तु नहीं । और इसलिये भी यह अवश्य ही समझा जाना चाहिये जिससे कि आपके द्वारा अभी प्रतिपादित किया गया है कि वक्ता के अभिप्राय की अपेक्षा करते हुये ही व्यङ्ग्यकत्व होता है । वक्ता का अभिप्राय तो अनुमान गम्य ही होता है ।
लोचन अस्तीति । व्यङ्ग्यकत्वं नापहूयते तत्त्वतिरिक्तं न भवति, अपितु लिङ्गलिङ्गभाव एवायम् । इदानीमेवेति जैमिनीयमतोपद्रेे । 'है' यह । व्यङ्ग्यकत्व छिपाया नहीं जा रहा है; किन्तु वह अतिरिक्त ( सिद्ध ) नहीं होता, अपितु यह लिङ्ग-लिङ्गिभाव ही है । अभी अर्थात् जैमिनीय मत के उपद्रेप में ।
तारावती सभा में इस प्रकार की सूक्तियों का प्रायः परिशीलन किया जाता है और उनकी आनन्द लिया जाता है । इतना सब होते हुये भी यदि कोई व्यक्ति अपने को सहृदय कहलाने का दावा करता हो और साथ में इस प्रकार के रमणीय अर्थ को छिपाने की चेष्टा करे तथा चातुर्यपूर्ण कथन के व्यापार व्यञ्जना को स्वीकार न करे तो विद्वद्व्रोष्ठी में उसकी हंसी ही होगी । यदि वह चाहता है कि उसकी हंसी न उड़ाई जाय तो उसे चाहिये कि इतने स्पष्ट और इतने आदृत व्यञ्जनाव्यापार के विरुद्ध प्रचार करने की चेष्टा न करे । यहाँ सहृदय का यही लक्षण बताया गया है कि जो व्यक्ति अपनी उपहासनीयता को बचाना चाहता है और आदरास्पद ध्वनि-सिद्धान्त के विरुद्ध नहीं जाता वही सहृदय है । इस लक्षण में 'परिहरन्' शब्द में 'शतृ' प्रत्यय किया गया है । यह 'शतृ' प्रत्यय वर्तमानकाल प्रथमा समानाधिकरण में हुआ करता है । यहाँ प्रथमा है 'सचेताः' शब्द में और 'परिहरन्' शब्द उसका समानाधिकरण है । 'परिहरन्' का कर्म है उपहास्यता और उपहास्यता का कर्म है ध्वनि का निरादर करनेवाले, जिनके लिये आत्मश्लाघा
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अत्रोच्यते—नन्वेवमपि यदि नाम स्यादतद्भिन्नम् । वाचकत्वगुणवृत्तिव्यतिरिक्तो व्यञ्जकस्वलक्षणः शब्दोऽव्यापारोडस्तीतस्यामिरभ्युपगतम् । तस्य चैवमपि न काचित् क्षति: तादृशं व्यञ्जकत्वं लिङ्गत्वमस्तु अन्यद्वा । सर्वथा प्रसिद्ध शब्दप्रकारवैलक्षण्ये शब्दव्यापारविषयत्वं च तस्यास्तीति नास्त्येव विवाद: न पुनरयं परमार्थो यदृच्छकत्वं लिङ्गत्वमेव सर्वत्र व्यङ्ग्यप्रतीतिष्वलिङ्गप्रतीतिरेवेति ।
यहाँ पर कहा जा रहा है—निस्सन्देह यदि ऐसा भी हो जाय तो हमारा क्या बिगड़ जायगा । हम लोगों ने यह स्वीकार किया है कि वाचकत्व और गुणवृत्ति से व्यतिरिक्त व्यञ्जकत्व लक्षणवाला शब्द का व्यापार होता है । उसके इस प्रकार होने में भी कोई दोष नहीं । निस्सन्देह वह व्यञ्जकत्व लिङ्गत्व हो जाय या कुछ और । हम दोनों का इस विषय में विवाद नहीं है कि वह शब्द प्रकारों से सर्वथा विलक्षण होता है और उसकी शब्दव्यापार विषयता होती है । किन्तु यह वास्तविकता नहीं है कि व्यञ्जकत्व सर्वत्र लिङ्ग ( हेतु ) ही होता है और व्यङ्ग्यप्रतीति सर्वथा लिङ्गी ( साध्य ) की ही प्रतीति होती है ।
तारावती
का प्रयोग किया गया है । आशय यह है कि लोग अपनी उपहास्यता का परिहार करते हुये ही हँसिग होते हैं अर्थात् अपनी उपहास्यता को उत्कट ही नहीं होने देते वे ही सहृदय हैं । यहाँ पर कुछ लोग कह सकते हैं कि हमें व्यञ्जकत्व के मानने में तो कोई आपत्ति नहीं और न हम उसे छिपाना ही चाहते हैं; किन्तु आप जो यह कह रहे हैं कि व्यञ्जना के प्रतिकूल वोला ही नहीं जासकता इससे हम सहमत नहीं । व्यञ्जना के प्रतिकूल बोलने का अवसर भी विद्वान् ही है । व्यञ्जकत्व कुछ और वस्तु नहीं है अपितु शब्दों के अन्यार्थ प्रत्ययान्त को ही व्यञ्जक कहते हैं । व्यञ्जक होते हैं शब्द और उनके अर्थ इत्यादि और व्यङ्ग्य होते हैं वस्तु, अलङ्कार तथा रस । ध्वनिवादी को भी इतना तो मानना ही पड़ेगा कि व्यङ्ग्य और व्यञ्जक का कोई सम्बन्ध अवश्य होता है । यदि बिना सम्बन्ध के व्यञ्जना प्रकाशित होने लगे तो चाहे जिस वाक्य से चाहे जो व्यञ्जना निकल सकती है । किन्तु ऐसा होता नहीं । अतः व्यञ्जक और व्यङ्ग्य के साहचर्य सम्बन्ध को मानना ही पड़ेगा । व्यञ्जक लिङ्ग ( हेतु ) है और व्यङ्ग्य लिङ्गी ( साध्य ) है । दोनों की व्याप्ति बन जाती है कि जहाँ व्यञ्जक होता है वहाँ व्यङ्ग्य भी होता है और जहाँ व्यङ्ग्य नहीं होता वहाँ व्यञ्जक भी नहीं होता । इन व्याप्तियों के आधार पर व्यञ्जक
का प्रयोग किया गया है । आशय यह है कि लोग अपनी उपहास्यता का परिहार करते हुये ही हँसिग होते हैं अर्थात् अपनी उपहास्यता को उत्कट ही नहीं होने देते वे ही सहृदय हैं । यहाँ पर कुछ लोग कह सकते हैं कि हमें व्यञ्जकत्व के मानने में तो कोई आपत्ति नहीं और न हम उसे छिपाना ही चाहते हैं; किन्तु आप जो यह कह रहे हैं कि व्यञ्जना के प्रतिकूल वोला ही नहीं जासकता इससे हम सहमत नहीं । व्यञ्जना के प्रतिकूल बोलने का अवसर भी विद्वान् ही है । व्यञ्जकत्व कुछ और वस्तु नहीं है अपितु शब्दों के अन्यार्थ प्रत्ययान्त को ही व्यञ्जक कहते हैं । व्यञ्जक होते हैं शब्द और उनके अर्थ इत्यादि और व्यङ्ग्य होते हैं वस्तु, अलङ्कार तथा रस । ध्वनिवादी को भी इतना तो मानना ही पड़ेगा कि व्यङ्ग्य और व्यञ्जक का कोई सम्बन्ध अवश्य होता है । यदि बिना सम्बन्ध के व्यञ्जना प्रकाशित होने लगे तो चाहे जिस वाक्य से चाहे जो व्यञ्जना निकल सकती है । किन्तु ऐसा होता नहीं । अतः व्यञ्जक और व्यङ्ग्य के साहचर्य सम्बन्ध को मानना ही पड़ेगा । व्यञ्जक लिङ्ग ( हेतु ) है और व्यङ्ग्य लिङ्गी ( साध्य ) है । दोनों की व्याप्ति बन जाती है कि जहाँ व्यञ्जक होता है वहाँ व्यङ्ग्य भी होता है और जहाँ व्यङ्ग्य नहीं होता वहाँ व्यञ्जक भी नहीं होता । इन व्याप्तियों के आधार पर व्यञ्जक
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यदि नाम स्यादिति। प्रौढ़िवादितयाभ्युपगमेऽपि स्वपक्षस्तावन्न सिद्ध्यतीति दर्शयति—शब्देति। शब्दस्य व्यापार: सन् विषय: शब्दव्यापारविषय:, अन्ये तु व्यापारस्तत्स्था विषयो विशेष इत्याहुः। न पुनरिति। प्रदीपालोकादौ लिङ्गलिङ्गिमभावोऽन्योदपि हि लिङ्गलिङ्गकभावोऽस्तीतिलिङ्गलिङ्गकभावस्य लिङ्गलिङ्गिमभावोदन्यापक इतिकथं तादात्म्यम्?
'यदि ऐसा हो' यह। प्रौढ़िवादी होने के रूप में स्वीकार करने पर भी अपना पक्ष तो सिद्ध नहीं होता यह दिखलाते हैं—‘शब्द’ यह। शब्दव्यापारविषय व्यापार उसका विषय अर्थात् उसकी विशेषता यह अर्थ करते हैं। 'किन्तु नहीं' यह है अतः व्यङ्ग्यार्थ-व्यञ्जकभाव का लिङ्गलिङ्गिभाव अव्यापक है। फिर तादात्म्य कैसे? (लिङ्गी या हेतु) को देखकर उससे अविनाभूत व्यङ्ग्य (लिङ्गी या साध्य) का अनुमान कर लिया जाता है। इस प्रकार व्यञ्जनाव्यापार अनुमितिव्यापार से भिन्न वस्तु नहीं है।
तारावती
और यह तो आपको मानना ही पड़ेगा क्योंकि अभी जैमिनीय मत की व्याख्या करने के अवसर पर आप ही इस सिद्धान्त का प्रतिपादन कर चुके हैं कि व्यञ्जकत्व वाक्य के अभिप्राय की अपेक्षा करते हुये होता है। वाक्य का अभिप्राय सर्वदा अनुमान का विषय ही होता है। अतः व्यञ्जना भी अनुमान से भिन्न सिद्ध नहीं होती।
और यह तो आपको मानना ही पड़ेगा क्योंकि अभी जैमिनीय मत की व्याख्या करने के अवसर पर आप ही इस सिद्धान्त का प्रतिपादन कर चुके हैं कि व्यञ्जकत्व वाक्य के अभिप्राय की अपेक्षा करते हुये होता है। वाक्य का अभिप्राय सर्वदा अनुमान का विषय ही होता है। अतः व्यञ्जना भी अनुमान से भिन्न सिद्ध नहीं होती।
कुछ लोगों के उक्त कथन पर हमारा कहना यह है कि यदि हम आपकी बात मान लें तो भी हमारा क्या बिगड़ जायगा। हमारा पक्ष तो केवल इतना है कि शब्द का एक तीसरा व्यापार भी होता है जो सामान्यतया माने हुये अभिधा और गुणवृत्ति इन दोनों शब्दव्यापारों से भिन्न होता है, इस व्यापार को हम व्यञ्जना व्यापार कहते हैं।
कुछ लोगों के उक्त कथन पर हमारा कहना यह है कि यदि हम आपकी बात मान लें तो भी हमारा क्या बिगड़ जायगा। हमारा पक्ष तो केवल इतना है कि शब्द का एक तीसरा व्यापार भी होता है जो सामान्यतया माने हुये अभिधा और गुणवृत्ति इन दोनों शब्दव्यापारों से भिन्न होता है, इस व्यापार को हम व्यञ्जना व्यापार कहते हैं।
उसको आप कहते हैं कि वह लिङ्ग-लिङ्गिव्यवहार से गतार्थ हो जाता है। मैं कहता हूँ—कोई बात नहीं आप उसे लिङ्ग-लिङ्गिव्यवहार से गतार्थ हुआ मान लीजिये या कुछ और मान लीजिये। कमसे कम आपने हमारी बात तो मानली कि एक ऐसा भी शब्दव्यापार होता है जो अभिधा और गुणवृत्ति में अन्तर्भूत नहीं हो सकता, वह प्रासिद्ध शब्दव्यापारों से विलक्षण होता है और होता शब्दव्यापार का ही एक प्रकार है, इस विषय में हमारा और आपका मतभेद नहीं है।
उसको आप कहते हैं कि वह लिङ्ग-लिङ्गिव्यवहार से गतार्थ हो जाता है। मैं कहता हूँ—कोई बात नहीं आप उसे लिङ्ग-लिङ्गिव्यवहार से गतार्थ हुआ मान लीजिये या कुछ और मान लीजिये। कमसे कम आपने हमारी बात तो मानली कि एक ऐसा भी शब्दव्यापार होता है जो अभिधा और गुणवृत्ति में अन्तर्भूत नहीं हो सकता, वह प्रासिद्ध शब्दव्यापारों से विलक्षण होता है और होता शब्दव्यापार का ही एक प्रकार है, इस विषय में हमारा और आपका मतभेद नहीं है।
यदि आप उसे अनुमान में अन्तर्भूत करना चाहते हैं तो इसमें हमें कोई आपत्ति नहीं। यहाँ पर व्यञ्जना के लिये 'शब्दव्यापारविषयत्व' शब्द का प्रयोग किया गया है। वस्तुतः व्यञ्जना शब्दव्यापार का विषय नहीं अपितु शब्द का
यदि आप उसे अनुमान में अन्तर्भूत करना चाहते हैं तो इसमें हमें कोई आपत्ति नहीं। यहाँ पर व्यञ्जना के लिये 'शब्दव्यापारविषयत्व' शब्द का प्रयोग किया गया है। वस्तुतः व्यञ्जना शब्दव्यापार का विषय नहीं अपितु शब्द का
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यदपि स्वपक्षसिद्धयेडस्मदुक्तमनूदितं त्वया वक्त्रभिप्रायस्य व्यङ्ग्यत्वेनाभ्युपगमान्तत्प्रकाशाने शब्दानां लिङ्गत्वमेवेति तदेतद्यथास्माभिरभिहितं तद्भङ्यप्रतिपाद्यते श्रयताम्—द्विविधो विषयः शब्दानाम्—अनुमेयः प्रतिपाद्यश्च । तत्रानुमेयो विवक्षावाचकः । विवक्षा च शब्दस्वरूपप्रकाशनेच्छा शब्दद्वार्यप्रकाशनेच्छा चेति द्विप्रकारा। ततश्च न शब्दद्वयवहारराज्यम्। सा हि प्राणित्यमात्रप्रतिपत्तिफला । द्वितीया तु शब्दविशेषावधारणावसितव्यवहारहितापि शब्दकरव्यवहारनिबन्धनम् । ते तु द्वे अप्यनुमेयो विषयः शब्दानाम्। प्रतिपाद्यस्तु प्रयोक्तुरर्थप्रतिपादनसमीहाविषयीकृतोऽर्थः ।
और जो अपने पक्ष को सिद्ध करने के लिये हमारा कहा हुआ तुमने अनूदित किया कि ‘व्यङ्ग्य के रूप में वक्ता के अभिप्राय को स्वीकार करने से उसके प्रकाशन में शब्दों का लिङ्गत्व ही होता है’ तो यह जो हमने कहा है विभागपूर्वक प्रतिपादित किया जा रहा है सुनो--शब्द का विषय दो प्रकार का होता है--अनुमेय और प्रतिपाद्य । उसमें अनुमेय विवक्षारूप होता है । और विवक्षा दो प्रकार की होती है शब्दस्वरूप प्रकाशन की इच्छा और शब्द से अर्थ प्रकाशन की इच्छा । उनमें प्रथम शब्दद्वयवहार का अंग नहीं होती । उसका फल निस्सन्देह प्राणित्वमात्र की प्रतिपत्ति ही होता है और दूसरी यद्यपि शब्दविशेष के निर्णय करने में अध्यवसित होकर व्यवहित हो जाती है तथापि उस व्यवहार में निमित्त होती है जिसका करण शब्द है । ये दोनों शब्दों का अनुमेय विषय हैं । प्रतिपाद्य तो प्रयोक्का के अर्थप्रतिपादन की इच्छा से विषय बनाया हुआ अर्थ होता है ।
विषय इति। शब्द उच्चरिते यावति प्रतिपत्तिस्तावान् विषय इत्युक्तः । तत्र शब्दप्रयुक्षारथंप्रतिपादविषया इत्युक्तः । तत्र शब्दप्रयुक्षारथंप्रतिपादविषया इत्युक्तः । तत्र शब्दप्रयुक्सा अर्थप्रतिपिपादिषा चेत्युमयपि विवक्षानुमेया तावत् । यस्तु प्रतिपिपादविषयां कमेऽर्थतोऽर्थस्तत्र शब्दः कारणत्वेन व्यवस्थितः न त्वसावनुमेयः । तद्विषया हि प्रतिपिपादयिषैव केवलमनुमीयते । न च तत् शब्दस्य करणत्वे यैव लिङ्गस्येति-हि प्रतिपिपादयिषैव केवलमनुमीयते । न च तत् शब्दस्य करणत्वे यैव लिङ्गस्येति-
विषय इति। शब्द उच्चरिते यावति प्रतिपत्तिस्तावान् विषय इत्युक्तः । तत्र शब्दप्रयुक्षारथंप्रतिपादविषया इत्युक्तः । तत्र शब्दप्रयुक्षारथंप्रतिपादविषया इत्युक्तः । तत्र शब्दप्रयुक्सा अर्थप्रतिपिपादिषा चेत्युमयपि विवक्षानुमेया तावत् । यस्तु प्रतिपिपादविषयां कमेऽर्थतोऽर्थस्तत्र शब्दः कारणत्वेन व्यवस्थितः न त्वसावनुमेयः । तद्विषया हि प्रतिपिपादयिषैव केवलमनुमीयते । न च तत् शब्दस्य करणत्वे यैव लिङ्गस्येति-हि प्रतिपिपादयिषैव केवलमनुमीयते । न च तत् शब्दस्य करणत्वे यैव लिङ्गस्येति-
विषय यह कहा गया है । उसमें शब्द के प्रयोग की इच्छा और अर्थ के प्रतिपादन की इच्छा यह दोनों प्रकार की विवक्षा तो अनुमेय ही होती है । और जो प्रतिपादन की इच्छा में कर्मरूप में स्थित अर्थ है उसमें शब्द कारण के रूप में व्यवस्थित होता है वह अनुमेय नहीं होता, तद्विषयक प्रतिपादन की इच्छा का ही केवल अनुमान लगाया जाता है । शब्द के कारण होने में लिङ्ग की जो पक्षधर्मता
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कर्त॑व्यता पक्षधर्म॑त्वग्रहणादिका सास्नि, अपि स्वन्यैव सड्ढेतसकुरणादिका तत्र तत्र शब्दो लिख्यम् । इतिकर्त॑व्यता च द्विधा—एकया ऽभिधाऽऽपारं करोति द्वितीयया व्यक्जनाऽव्यापारम् । तद्वाह—तत्रेत्यादिना ।
कर्तव्यता पक्षधर्मत्वग्रहणादिका सास्नि, अपि स्वन्यैव सड्ढेतसकुरणादिका तत्र तत्र शब्दो लिख्यम् । इतिकर्तव्यता च द्विधा—एकया ऽभिधाऽऽपारं करोति द्वितीयया व्यक्जनाऽव्यापारम् । तद्वाह—तत्रेत्यादिना ।
कर्त॑व्यता पक्षधर्म॑त्वग्रहणादिका सास्नि, अपि स्वन्यैव सड्ढेतसकुरणादिका तत्र तत्र शब्दो लिख्यम् । इतिकर्त॑व्यता च द्विधा—एकया ऽभिधाऽऽपारं करोति द्वितीयया व्यक्जनाऽव्यापारम् । तद्वाह—तत्रेत्यादिना ।
मथनादिक इतिकत॑व्यता होती है वह वहाँ पर नहीं होती, अपितु संकेतसकुरणादि रूप अन्य ही होती है, इसलिये शब्द वहाँ पर लिख नही होता । और इतिकर्त॑व्यता दो प्रकार की होती है—एक से अभिधाऽव्यापार करता है और दूसरे से व्यक्जना-व्यापार । वही कहते हैं—‘उसमें’ इत्यादि के द्वारा ।
मथनादिक इतिकत॑व्यता होती है वह वहाँ पर नहीं होती, अपितु संकेतसकुरणादि रूप अन्य ही होती है, इसलिये शब्द वहाँ पर लिख नही होता । और इतिकर्त॑व्यता दो प्रकार की होती है—एक से अभिधाऽव्यापार करता है और दूसरे से व्यक्जना-व्यापार । वही कहते हैं—‘उसमें’ इत्यादि के द्वारा ।
मथनादिक इतिकत॑व्यता होती है वह वहाँ पर नहीं होती, अपितु संकेतसकुरणादि रूप अन्य ही होती है, इसलिये शब्द वहाँ पर लिख नही होता । और इतिकर्त॑व्यता दो प्रकार की होती है—एक से अभिधाऽव्यापार करता है और दूसरे से व्यक्जना-व्यापार । वही कहते हैं—‘उसमें’ इत्यादि के द्वारा ।
एक व्यापार ही होती है, इस दृष्टि से शब्दव्यापार विषयत्व शब्द का प्रयोग उचित नहीं जान पड़ता । लोचन में इसकी योजना इस प्रकार की गई है—शब्द का व्यापार होते हुए जो उसका विषय होता है। अर्थात् व्यञ्जना शब्द का विषय होती है। लोचनकार का कहना है कि कुछ लोगों ने इस शब्द का अर्थ किया है —शब्द का जो व्यापार उसका विषय अर्थात् उसकी विशेषता। किन्तु यह अर्थ ठीक नही हैं क्योंकि व्यञ्जना शब्द का व्यापार होती है नकि शब्दव्यापार की विशेषता । यहाँ पर यह जो कहा गया है कि व्यञ्जना की
एक व्यापार ही होती है, इस दृष्टि से शब्दव्यापार विषयत्व शब्द का प्रयोग उचित नहीं जान पड़ता । लोचन में इसकी योजना इस प्रकार की गई है—शब्द का व्यापार होते हुए जो उसका विषय होता है। अर्थात् व्यञ्जना शब्द का विषय होती है। लोचनकार का कहना है कि कुछ लोगों ने इस शब्द का अर्थ किया है —शब्द का जो व्यापार उसका विषय अर्थात् उसकी विशेषता। किन्तु यह अर्थ ठीक नही हैं क्योंकि व्यञ्जना शब्द का व्यापार होती है नकि शब्दव्यापार की विशेषता । यहाँ पर यह जो कहा गया है कि व्यञ्जना की
एक व्यापार ही होती है, इस दृष्टि से शब्दव्यापार विषयत्व शब्द का प्रयोग उचित नहीं जान पड़ता । लोचन में इसकी योजना इस प्रकार की गई है—शब्द का व्यापार होते हुए जो उसका विषय होता है। अर्थात् व्यञ्जना शब्द का विषय होती है। लोचनकार का कहना है कि कुछ लोगों ने इस शब्द का अर्थ किया है —शब्द का जो व्यापार उसका विषय अर्थात् उसकी विशेषता। किन्तु यह अर्थ ठीक नही हैं क्योंकि व्यञ्जना शब्द का व्यापार होती है नकि शब्दव्यापार की विशेषता । यहाँ पर यह जो कहा गया है कि व्यञ्जना की
यदि आप अनुमान में अन्तर्भूत करना चाहते हैं उसमें भी हमें भी कोई आपत्ति नहीं यह सब प्रौढिवाद मात्र है । प्रौढिवाद उसे कहते हैं जहाँ दूसरे की कही हुई बात को मान करके भी अपने सिद्धान्त की स्थापना को जाय । यहाँ पर ग्रन्थकार का आशय यह है कि यदि हम थोड़ी देर के लिये तुम्हारे कथन को स्वीकार कर भी लें, तो भी बात हमारी ही सिद्ध होती है कि व्यञ्जना वृत्ति है अवश्य । इस प्रकार हमारी मान्यता के एक अंश से तो आप सहमत हो ही गये । अब उसका दूसरा अंश लाजिये कि हम उसका अन्तर्भाव अनुमान में कर सकते हैं। आपकी मान्यता का यही अंश ठीक नहीं है । आप अपने पत्त्न की तभी सिद्धि कर सकते हैं जब कि अन्वय व्याति और व्यतिरेक व्याप्ति दोनों घटित हो जायँ।यहाँ पर अन्वय व्याप्ति इस प्रकार बनेगी—‘जहाँ व्यञ्जना होती है वहाँ अनुमान की प्रक्रिया लागू होती है’ और व्यतिरेक व्याप्ति इस प्रकार की होगी—‘जहाँ अनुमान की प्रक्रिया लागू नहीं होती वहाँ व्यञ्जना भी नहीं होती ।’ ये दोनों व्याप्तियाँ व्यभिचारिणी हैं । क्योंकि प्रध्वंस
यदि आप अनुमान में अन्तर्भूत करना चाहते हैं उसमें भी हमें भी कोई आपत्ति नहीं यह सब प्रौढिवाद मात्र है । प्रौढिवाद उसे कहते हैं जहाँ दूसरे की कही हुई बात को मान करके भी अपने सिद्धान्त की स्थापना को जाय । यहाँ पर ग्रन्थकार का आशय यह है कि यदि हम थोड़ी देर के लिये तुम्हारे कथन को स्वीकार कर भी लें, तो भी बात हमारी ही सिद्ध होती है कि व्यञ्जना वृत्ति है अवश्य । इस प्रकार हमारी मान्यता के एक अंश से तो आप सहमत हो ही गये । अब उसका दूसरा अंश लाजिये कि हम उसका अन्तर्भाव अनुमान में कर सकते हैं। आपकी मान्यता का यही अंश ठीक नहीं है । आप अपने पत्त्न की तभी सिद्धि कर सकते हैं जब कि अन्वय व्याति और व्यतिरेक व्याप्ति दोनों घटित हो जायँ।यहाँ पर अन्वय व्याप्ति इस प्रकार बनेगी—‘जहाँ व्यञ्जना होती है वहाँ अनुमान की प्रक्रिया लागू होती है’ और व्यतिरेक व्याप्ति इस प्रकार की होगी—‘जहाँ अनुमान की प्रक्रिया लागू नहीं होती वहाँ व्यञ्जना भी नहीं होती ।’ ये दोनों व्याप्तियाँ व्यभिचारिणी हैं । क्योंकि प्रध्वंस
यदि आप अनुमान में अन्तर्भूत करना चाहते हैं उसमें भी हमें भी कोई आपत्ति नहीं यह सब प्रौढिवाद मात्र है । प्रौढिवाद उसे कहते हैं जहाँ दूसरे की कही हुई बात को मान करके भी अपने सिद्धान्त की स्थापना को जाय । यहाँ पर ग्रन्थकार का आशय यह है कि यदि हम थोड़ी देर के लिये तुम्हारे कथन को स्वीकार कर भी लें, तो भी बात हमारी ही सिद्ध होती है कि व्यञ्जना वृत्ति है अवश्य । इस प्रकार हमारी मान्यता के एक अंश से तो आप सहमत हो ही गये । अब उसका दूसरा अंश लाजिये कि हम उसका अन्तर्भाव अनुमान में कर सकते हैं। आपकी मान्यता का यही अंश ठीक नहीं है । आप अपने पत्त्न की तभी सिद्धि कर सकते हैं जब कि अन्वय व्याति और व्यतिरेक व्याप्ति दोनों घटित हो जायँ।यहाँ पर अन्वय व्याप्ति इस प्रकार बनेगी—‘जहाँ व्यञ्जना होती है वहाँ अनुमान की प्रक्रिया लागू होती है’ और व्यतिरेक व्याप्ति इस प्रकार की होगी—‘जहाँ अनुमान की प्रक्रिया लागू नहीं होती वहाँ व्यञ्जना भी नहीं होती ।’ ये दोनों व्याप्तियाँ व्यभिचारिणी हैं । क्योंकि प्रध्वंस
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उक्त व्याति से अन्वित नहीं हो जाते तब यह कहना ठीक नहीं कि व्यङ्ग्यत्व तो उज्ज्वलतया होता है और व्यञ्जना की प्रतीति लिङ्गी की प्रतीति है। अतएव व्यङ्ग्य और अनुमान का तादात्म्य नहीं हो सकता।
हमने जो प्रमाणकों का मत प्रतिपादित करते हुये यह कहा था कि वक्ता का अभिप्राय व्यङ्ग्य होता है उसका उदाहरण आपने अपने पक्ष को सिद्ध करने के लिये दिया और कहा कि वक्ता का अभिप्राय सर्वदा अनुमानगम्य ही होता है, इसी आधार पर आपने लिङ्ग-लिङ्गी भाव का समर्थन किया और अनुमान का व्यङ्ग्यत्व से तादात्म्य सिद्ध किया। अतः यह आवश्यक्ता प्रतीत होती है कि अपने कथन का मैं स्पष्टीकरण कर दूँ। अतः विभागपूर्वक दिखलाया जा रहा है कि कितने अंश में व्यङ्ग्य अनुमेय होता है और कितने अंश में वह शुद्ध वाक्यार्थ होता है।
शब्द के उच्चारण करने के बाद जहाँ तक प्रतिपत्ति होती है वह सब शब्द का विषय ही कहा जा सकता है। शब्द का विषय दो प्रकार का होता है—अनुमेय और प्रतिपाद्य। विवक्षारूप शब्द का विषय अनुमेय होता है। विवक्षा भी दो प्रकार की होती है—शब्दस्वरूप के प्रकाशन की इच्छा और शब्द के द्वारा अर्थप्रकाशन की इच्छा। अभिप्राय यह है कि जब कोई व्यक्ति शब्द का उदाहरण करता है तब उससे सर्वप्रथम यही प्रतीत होता है कि अमुक व्यक्ति कुछ कहना चाहता है। यह कथन की उसकी इच्छा दो प्रकार की होती है—एक तो शब्द के स्वरूप-प्रकाशन की इच्छा और दूसरे शब्द के द्वारा अर्थप्रकाशन की इच्छा।
शब्द के स्वरूपप्रकाशन की इच्छा से केवल इतना ही सिद्ध होता है कि शब्द का प्रयोक्ता प्राणवान् है क्योंकि शब्द का प्रयोग तो प्राणी ही कर सकता है प्राणहीन नहीं। अतः शब्दप्रकाशन की इच्छा कभी भी व्यवहार का अङ्ग नहीं हो सकती।
अब दूसरी विवक्षा के विषय में देखिये—जब वक्ता अपने अभीष्ट अर्थबोधन में समर्थ तथा उसके अनकूल शब्दसमूह रूप वाक्य का प्रयोग करता है तब श्रोता सर्वप्रथम उस वाक्य का अनुसन्धान करता है और अर्थबोध का अवसर बाद में आता है। इस प्रकार शब्दसमूह के प्रयोग और अर्थबोधान- कूल बुद्धि में उस वाक्य के समझने और उसका अनुसन्धान करने का व्यवधान पड़ जाता है, तथापि अर्थप्रकाशन की इच्छा में शब्द करण होता है और उसी के व्यवहार के आधीन अर्थप्रकाशन की इच्छा होती है।
ये दोनों प्रकार की विवक्षायें केवल अनुमेय होती हैं और इनको शब्द का अनुमेय विषय कह सकते हैं।
इस समस्त विवेचन का सार यही है—वक्ता शब्दों का उच्चारण करना चाहता है और उन शब्दों के द्वारा अपने मनोगत अर्थ को भी प्रकट करना चाहता है।
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तारावती
वक्ता की ये दो इच्छायें होती हैं । इन दोनों को विवक्षा कहते हैं । जब वक्ता के द्वारा उच्चारित शब्दसमूह को सुनता है तब उसे सर्वप्रथम तो ज्ञात होता है कि वक्ता कुछ शब्दों का उच्चारण करना चाहता है । और उनको दूसरों को सुनाना चाहता है । यह इच्छा परागत ( वक्ता के हृदय में मान ) है अतः श्रोता उस इच्छा का अनुमान ही लगा सकता है । किन्तु इस मान का कोई और फल नहीं होता । इसका केवल इतना ही फल होता है कि यह जान लेता है कि अमुक व्यक्ति चेतन है और शब्द का प्रयोग कर सकता है । इसके बाद वह प्रयोजित हुये शब्दविशेषों का निश्चय करता है और तब ध्यान के बाद उसे यह ज्ञात होता है कि सार्थक शब्दों के प्रयोग के द्वारा विशेष अर्थ का प्रतिपादन करना चाहता है । वक्ता को अर्थ का प्रतिपादन होता है । अतः प्रतिपादन की इच्छा में कर्म अर्थ ही होता है और उस के प्रतिपादन में शब्द करण होता है । शब्दप्रयोग की इच्छा और अर्थज्ञान अनुमान के द्वारा ही हो सकता है । अनुमान में शब्द करण है शब्दबोधनेच्छा तथा अर्थबोधनेच्छा साध्य होती है । शब्दबोधनेच्छा तो शब्द सीधे सम्बद्ध होती है किन्तु अर्थबोधनेच्छा में शब्द से वाक्यानुसन्धान का ध्यान पड़ जाता है तथापि हेतुता तो उसमें रहती ही है । यहाँ यह ध्यान रखना है कि वक्ता की केवल इच्छा ही अनुमान का विषय हो सकती है, जिस अर्थ का प्रतिपादन किया जाता है वह अर्थ स्वयं अनुमान का विषय नहीं हो सकता । अर्थ शब्द का प्रतिपाद्य विषय कहा जा सकता है अनुमेय नहीं । इस प्रतिपाद्य को हम अनुमान में अन्तभूत इसलिये नहीं कर सकते, क्योंकि जब लिङ्ग से निश्चिति की जाती है तब उस लिङ्ग की कुछ इतिकर्तव्यता होती है जैसे पक्ष में उपस्थिति, पक्षधर्मता का ग्रहण, व्याप्तिस्मृति इत्यादि । समस्त अनुमानों ऐसा ही हुआ करता है । किन्तु जब हम शब्द से अर्थ का बोध करते हैं हमें लिङ्ग की वह समस्त इतिकर्तव्यता उपलब्ध नहीं होती । अतः शब्द से बोध को हम अनुमान में अन्तभूत नहीं कर सकते । जब हम शब्द से अर्थ प्राप्त करते हैं तब उसमें लिङ्ग की नहीं शब्द की एक भिन्न ही इतिकर्तव्यता होती है । यह इतिकर्तव्यता होती है—सङ्केतस्मरण, प्रकरण आदि का इत्यादि ।
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स च द्विविधः—वाच्यो व्यङ्ग्यच । प्रयोक्ता हि कदाचित्स्वशब्देनार्थ प्रकाशयितु समीहते कदाचित्स्वशब्दानभिधेयत्वेन प्रयोजनापेक्षया कयाचित् । स तु द्विविधोऽपि प्रतिपाद्यो विषयः शब्दानां न लिङ्गितया स्वरूपेण प्रकाशते, अपितु कूत्रिमणाकूत्रिमण सम्बन्धान्तरेरण । विवद्यानिबन्धनं हि तस्यार्थस्य शब्दैर् लिङ्गतया प्रतीयते न तु स्वरूपम् । यदि हि लिङ्गितया तत् शब्दानां व्यापारः स्यात्तचछब्दार्थ सम्यक् मिथ्यात्वादि विवादोऽव न प्रवर्तेत धूमादिलिङ्गानुमितानुमेयान्तरवन् ।
और वह दो प्रकार होता है—वाच्य और व्यंग्य । प्रयोग करनेवाला निस्संदेह कभी स्वशब्द से अर्थ को प्रकाशित करने की इच्छा करता है कभी किसी अपेक्षा से अपने शब्द के द्वारा अनभिधेयरूप में । वह दोनों ही प्रकार का शब्दों का प्रतिपाद्य विषय लिङ्गी के रूप में स्वरूप से प्रकाशित नहीं होता अपितु कृत्रिम या अकृत्रिम सम्बन्ध के द्वारा । उस अर्थ को विवादनिबन्धनकल शब्दों के द्वारा लिङ्गी के रूप में प्रतीत होता है उसका स्वरूप नहीं । यदि वहाँ लिङ्गी के रूप में शब्दों का व्यापार हो तो शब्दोंके अर्थ के विषय में सम्यक् मिथ्यात्व इत्यादि विवाद ही प्रवृत्त न हों जैसे धूम इत्यादि लिङ्गी से अनुमित दूसरे अनुमेय ।
कयाचिदिति । गोपनकृतसौन्दर्यान् दिलासामिसन्धानादिकृतेऽर्थ्यर्थ् । शब्दार्थ इति । भवुमान् हि निश्रयस्वरूपमेवेतिभावः । ‘किसी अपेक्षा से’ यह । अर्थात् गोपन से उत्पन्न सौन्दर्य इत्यादि के लाभ के अनुसन्धान की अपेक्षा से । ‘शब्दार्थ’ यह । भाव यह है कि अनुमान निश्चय स्वरूपवाला ही होता है ।
व्यञ्जनाव्यापार । संकेतस्फुरण से अभिधाव्यापार होता है और वक्तृवैशिष्यात् इत्यादि से व्यञ्जनाव्यापार । इसी आधार पर प्रतिपाद्य अर्थ दो प्रकार का हो सकता है—वाच्य और व्यङ्गय । प्रयोग करनेवाले का लक्ष्य कभी तो केवल इतना ही होता है कि शब्द जो भी अर्थ दे रहे हों और उनका संकेत जिस अर्थ में नियत हो अर्थात् उतना ही अर्थ समझे । इसके प्रतिकूल कभी-कभी उसकी इच्छा होती है शब्द जो भी संकेतित अर्थ दे रहे हों उनसे भिन्न एक दूसरा अर्थ ही प्रतिपत्ति-गोचर हो । अन्य अर्थ को अन्य शब्दों द्वारा प्रकट करने में वक्ता का कुछ प्रयोजन भी होता है । छिपाकर किसी बात को कहने में एक सुन्दरता आ जाती है । अन्य
संकेतस्फुरण से अभिधाव्यापार होता है और वक्तृवैशिष्यात् इत्यादि से व्यञ्जनाव्यापार । इसी आधार पर प्रतिपाद्य अर्थ दो प्रकार का हो सकता है—वाच्य और व्यङ्गय । प्रयोग करनेवाले का लक्ष्य कभी तो केवल इतना ही होता है कि शब्द जो भी अर्थ दे रहे हों और उनका संकेत जिस अर्थ में नियत हो अर्थात् उतना ही अर्थ समझे । इसके प्रतिकूल कभी-कभी उसकी इच्छा होती है शब्द जो भी संकेतित अर्थ दे रहे हों उनसे भिन्न एक दूसरा अर्थ ही प्रतिपत्ति-गोचर हो । अन्य अर्थ को अन्य शब्दों द्वारा प्रकट करने में वक्ता का कुछ प्रयोजन भी होता है । छिपाकर किसी बात को कहने में एक सुन्दरता आ जाती है । अन्य
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व्यङ्ग्यच्यर्थो वाच्यसामर्थ्याक्षिमतया वाच्यवचछब्दस्य सम्बन्धी भवत्येव । सादृश्यासादृश्याद्दावो हि सम्बन्धस्य प्रयोजकः । वाच्यवाचकभावाश्रयत्वं च व्यङ्ग्यक्त्वस्य प्रागेव दर्शितम् । तस्माद्वक्त्रभिप्रायरूप एव व्यङ्ग्ये लिङ्गतया शब्दानां व्यापारः । तद्विषयैकचित्ते तु प्रतिपाद्यतया । प्रतिपाद्यमाने तस्मिन्नभिप्रायरुपेऽनभिप्रायरुपे च वाचकत्वेनैव व्यापारः सम्बन्ध्यान्तरेण वा । न तावद्वाचकत्वेन यथोक्तं प्राक् सम्बन्ध्यान्तरेण व्यङ्ग्यक्त्वमेव । न च व्यङ्ग्यक्त्वं लिङ्गत्वरूपमेव आलोकादिष्वन्यथा हृश्यते । तस्मात्प्रतिपाद्यो विषयः शब्दानां न लिङ्गित्बेन वाच्यत्वेन प्रतीते अपि तूपाधित्बेन । प्रतिपाद्यस्य च विषयस्य लिङ्गित्बे तद्विषयाणां विप्रतिपत्तीनां लौकिकैरेव क्रियमाणानामभावः प्रसज्येत इति । एतच्चोक्तमेव ।
अर्थात् वाच्यसामर्थ्याक्षम होने के कारण वाच्य के समान शब्द का सम्बन्धी होता ही है । सादृश्य या असादृश्य होने से ही सम्बन्ध का प्रयोजक नहीं होता । और वाच्य-वाचक भाव का आश्रय लेना व्यङ्ग्यक्त्व का पहले ही दिखलाया गया है । इससे वक्ता के अभिप्राय रूप में ही व्यङ्ग्य में लिङ्ग के रूप में शब्दों का व्यापार होता है । उन शब्दों का विषय बनाये हुये अर्थ में तो प्रतिपाद्य रूप में शब्दों का व्यापार होता है । अभिप्राय रूप या अनभिप्राय रूप उसके प्रतीत होने पर या तो वाचकत्व से ही व्यापार होता है या दूसरे सम्बन्ध से । वाचकत्व से नहीं होता जैसा कि पहले कहा गया है । दूसरे सम्बन्ध से तो व्यङ्ग्यक्त्व ही होता है । व्यङ्ग्यक्त्व लिङ्गत्वरूप नहीं होता क्योंकि आलोक इत्यादि में अन्यथा दिखलाया गया है । इससे शब्दों का प्रतिपाद्य विषय लिङ्गित्वेन वाच्य के रूप में प्रतीत नहीं होता अपितु औपाधिक रूप में । और प्रतिपाद्य विषय के लिङ्गीरूप में मानने पर लौकिकों द्वारा ही हुई तद्विषयक लौकिक विप्रतिपत्तियों का अभाव ही प्रसक्त हो जाय । यह तो कहा ही जा चुका है ।
उपाधित्बेनिति । वक्तृच्छा हि वाच्यादेरर्थस्य विशेषणत्वेन भाति । प्रतिपाद्यस्येतिं । अर्थाद्व्यङ्ग्यस्य । लिङ्गित्ब इति । अनुमेयत्व इत्यर्थः । लौकिकैरेवेति । इच्छयालौको न विमतिपद्यतेऽर्थ तु विप्रतिपत्तिमानित । 'उपाधित्व के रूप में' यह । वक्ता की इच्छा निस्सन्देह वाच्य इत्यादि के विशेषण के रूप में शोभित होती है । 'प्रतिपाद्य का' यह अर्थात् व्यङ्ग्य का 'लिङ्गित्व में' यह । अर्थात् अनुमेयत्व में । 'लौकिकों के द्वारा' यह । इच्छा में लोक को विप्रतिपत्ति नहीं होती अर्थ में तो लोक विप्रतिपत्तिवाला होता ही है ।
उपाधित्बेनिति । वक्तृच्छा हि वाच्यादेरर्थस्य विशेषणत्वेन भाति । प्रतिपाद्यस्येतिं । अर्थाद्व्यङ्ग्यस्य । लिङ्गित्ब इति । अनुमेयत्व इत्यर्थः । लौकिकैरेवेति । इच्छयालौको न विमतिपद्यतेऽर्थ तु विप्रतिपत्तिमानित । 'उपाधित्व के रूप में' यह । वक्ता की इच्छा निस्सन्देह वाच्य इत्यादि के विशेषण के रूप में शोभित होती है । 'प्रतिपाद्य का' यह अर्थात् व्यङ्ग्य का 'लिङ्गित्व में' यह । अर्थात् अनुमेयत्व में । 'लौकिकों के द्वारा' यह । इच्छा में लोक को विप्रतिपत्ति नहीं होती अर्थ में तो लोक विप्रतिपत्तिवाला होता ही है ।
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शब्दों से अन्य अर्थ को कहने में वक्ता का या तो यह प्रयोजन होता है कि किसी बात को छिपाकर कहने में जो सौन्दर्य आ जाता है उसका लाभ श्रोताओं और पाठकों को भी प्राप्त हो सके अथवा उसका कोई अन्य प्रयोजन होता है। इस प्रकार वक्ता का प्रतिपाद्य अर्थ दो प्रकार का होता है—शब्दों के अभिधेय के द्वारा प्रकाशित वाच्यार्थ और किसी प्रयोजन से प्रकाशित व्यंग्यार्थ। न तो यह दोनों प्रकार का प्रकाशित अर्थ लिंगी (साध्य) होता है, न इनका प्रकाशक लिंग (हेतु) होता है और न इनके प्रकाशन की क्रिया अनुमान कही जा सकती है। इनका प्रकाशन तो किसी अन्य सम्बन्ध के द्वारा ही होता है, वह सम्बन्ध मीमांसकों के अनुसार अक्रिम हो सकता है या नैय्यायिकों के अनुसार कृतिम (सांकेतिक) हो सकता है। कारण यह है कि अनुमान से जिस अर्थ (वस्तु) की साध्यरूप में प्रतीति होती है वह पदार्थज्ञान होता है। उसमें किसी प्रकार के संशय का अवसर नहीं रह जाता कि क्या यह ठीक हो सकता है, क्या यह मिथ्या हो सकता है इत्यादि। जैसे जब हम धूम को लिंग मानकर उससे अग्नि का अनुमान लगाते हैं तब अग्नि का हमें यथार्थज्ञान हो जाता है और यह सन्देह भी नहीं उठता कि क्या जहाँ से धूम उठ रहा है वहाँ आग हो सकती है या नहीं। ऐसा ही हेतु साध्य का साक्षक होता है जो अव्यभिचरित रूप में साध्य के साथ व्यापकभाव सम्बन्ध रखता हो। अतः साध्यसिद्ध हो जाने पर उसमें सन्देह का अवसर ही नहीं रह जाता।
अतएव यदि शब्द के प्रतिपाद्य अर्थ वाच्य और व्यंग्य को अनुमान में अन्तर्भूत करें तो वह ज्ञान भी निश्चित ज्ञान ही होगा। उसमें यह सन्देह ही नहीं उत्पन्न होगा कि क्या अमुक ज्ञान सम्पक् ज्ञान है? क्या मिथ्या ज्ञान है? इत्यादि। शब्दार्थ के विषय का ज्ञान होने में इस प्रकार के सन्देह तथा विकल्प उठते हैं। अतः हम उसे अनुमान में अन्तर्भूत नहीं कर सकते। यहाँ पर यह प्रश्न उठता है कि वाच्यार्थ तो शब्द का अर्थ होता ही है, व्यङ्ग्यार्थ तभी उस कोटि में आ सकता है जब कि उसका शब्द से सम्बन्ध सिद्ध हो जाय। वह सम्बन्ध सिद्ध नहीं होता। फिर आप यह कैसे कह सकते हैं कि व्यङ्ग्यार्थ भी शब्द का प्रतिपाद्य विषय है? इसका उत्तर यह है कि यह हम पहले ही सिद्ध कर चुके हैं कि व्यङ्ग्यार्थ वाच्यसामर्थ्य से आक्क्षिप्त होता है। वाच्य तो शब्द का सम्बन्धी होता ही है और वाच्य का सम्बन्धी व्यंग्य होता है। सम्बन्धी का सम्बन्धी भी शब्द का सम्बन्धी हो जाता है। इस प्रकार व्यंग्यार्थ भी शब्द का सम्बन्धी हो जाता है। (प्रभ) यह सम्बन्ध तो परम्परा सम्बन्ध हुआ।
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प्रत्यक्ष सम्बन्ध नहीं हुआ। फिर इनको सम्बन्धी कैसे माना जा सकता है? (उत्तर) शब्दार्थ के क्षेत्र में यह कोई नियम नहीं कि शब्द और अर्थ का प्रत्यक्ष ही सम्बन्ध हो। यदि परम्परा भी सम्बन्ध होता है तो वह भी सम्बन्ध ही माना जाता है। यहाँ वही अन्य सम्बन्धों के विषय में भी लागू होती है। (उदाहरण के रूप में प्रत्यक्ष को लीजिये। प्रत्यक्षज्ञान के लिये इन्द्रिय और विषय का सम्बन्ध होना चाहिये। नैय्यायिकों की भाषा में इन्द्रिय और विषय के सम्बन्ध को सन्निकर्ष कहते हैं। ये सन्निकर्ष ६ प्रकार के माने जाते हैं। यदि उन सब पर विचार किया जाय तो ज्ञात होगा कि उनमें से कुछ तो इन्द्रियों से साक्षात् सम्बद्ध होते हैं जैसे सयोगसन्निकर्ष और कुछ परम्परा सम्बद्ध होते हैं जैसे संयुक्तसमवायसन्निकर्ष इत्यादि। घट का प्रत्यक्ष इन्द्रिय और घट के साक्षात् सम्बन्ध से होता है और घट के गुणों का प्रत्यक्ष परम्परा सम्बन्ध से होता है। इस प्रकार कहा जा सकता है कि परम्परा सम्बन्ध से शब्द और व्यङ्गचर्थ का सम्बन्ध मानने पर भी उसे शब्दव्यापार मानने में कोई आपत्ति नहीं। ऊपर जो कुछ कहा गया है उसका सार कतिपय शब्दों में इस प्रकार दिया जा सकता है—वक्ता के अभिप्राय की जो व्यञ्जना होती है अर्थात् श्रोता को जो यह ज्ञान होता है कि वक्ता शब्दों का प्रयोग करना चाहता है अथवा उन शब्दों के माध्यम से कुछ अर्थ प्रकट करना चाहता है यह सब वक्ता की इच्छा अनुमान का विषय होती है। किन्तु वह जो कुछ कहना चाहता है वह शब्द का प्रतिपाद्य ही होता है उसका ज्ञान अनुमान के द्वारा नहीं हो सकता। जो कुछ वह कहना चाहता है वह अभिप्रायरूप (रसादिरूप) भी हो सकता है और उससे भिन्न (अलङ्कारादिरूप) भी हो सकता है। वह चाच्ये जिस व्यापार से वाच्य होता है उसके प्रत्यायन में या तो वाचकत्वव्यापार हो सकता है या वाचकत्व से भिन्न कोई और व्यापार हो सकता है। वाचकत्वव्यापार वहीं पर हो ही नहीं सकता, इस बात का विस्तृत विवेचन पहले किया जा चुका है। अतः उससे भिन्न कोई अन्य सम्बन्ध ही हो सकता है। यह अन्य सम्बन्ध और कुछ नहीं केवल व्यञ्जना ही है और उसी व्यञ्जना के द्वारा अभिप्रेत या अनभिप्रेत अर्थ का प्रत्यायन होता है। व्यञ्जकत्व संवेद्य लिङ्गत्व (हेतुता) रूप ही नहीं होता और न उसका समावेश संवेदा अनुमान में किया जा सकता है। क्योंकि यह देखा जा चुका है कि दीपादि-लोक में व्यञ्जकता तो होती है किन्तु उसे अनुमान में अन्तर्भूत नहीं किया जा सकता। जब सभी व्यञ्जनायें अनुमान में नहीं आ सकती तब अनुमान में उसके अन्तर्भाव का प्रश्न ही नहीं उठता। अतएव जिस प्रकार वाच्य शब्दों का प्रतिपाद्य होता है वैसे ही व्यङ्गच्य भी शब्दों का प्रतिपाद्य होता है जिस प्रकार वाच्य को हम
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यथा च वाच्यविपये प्रमाणान्तरानुगमेन सम्यक्स्वप्रतीतौ कवाचित्कियमाणायां तस्य प्रमाणान्तरचिपयत्वे सत्यपि न शब्दव्यापारविषयताह निस्सन्दृश्यदृश्यस्याप । काव्यविपये च व्यङ्ग्यप्रतीतीनां सत्यासत्यनिरूपणस्याप्रयोजकत्वमेवेति तत्र प्रमाणान्तरव्यापारपरिहारोऽपह्नासायैव सम्पद्यते । तस्माल्लिङ्गनिग्रतीतरव सर्वत्र ठ्यङ्गच्यप्रतीतिरिति न शक्यते वक्तुम ।
और जिस प्रकार वाच्य के विषय में दूसरे प्रमाण के अनुपगम के द्वारा कहीं सम्यकप्रतीति किये जाने में उसके प्रमाणान्तर विषय हो जाने पर भी शब्दव्यापार की विषयता नष्ट नहीं होती वह व्यङ्गच्य का भी होता है और काव्यविषय में व्यङ्गच्यप्रतীতियों का सत्यासत्य निरूपण अप्रयोजनीय ही होता है; अतः वहाँ पर प्रमाणान्तर व्यापार परीक्षा उपहास के लिये ही होती है । इसलिये यह नहीं कहा जा सकता है कि व्यङ्गच्य की प्रतीति सर्वत्र लिङ्गी की प्रतीति ही होती है ।
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शब्दों का सम्बन्ध मानते हैं उसीप्रकार व्यङ्गच्य को भी शब्दों का सम्बन्धी मानना पड़ता है । जिस प्रकार वाच्य को हम लिङ्गी ( साध्य ) की कोटि में नहीं रख सकते उसी प्रकार व्यङ्गच्य को भी हम लिङ्गी अर्थात् साध्य की कोटि में नहीं रख सकते । इस प्रकार नैैयायिकों को भी व्यङ्गच्य की स्वतन्त्र सत्ता माननी ही पड़ेगी । हाँ शब्दों का कुछ विषय ऐसा अवश्य होता है जो अनुमान के क्षेत्र में आता है । उसकी व्याख्या पहले की जा चुकी है कि वक्ता के शब्दप्रकाशन की इच्छा और उसके अर्थप्रकाशन की इच्छा अनुमान का ही विषय होती है । उस इच्छा की प्रतीति वाच्यरूप में नहीं होती किन्तु औपाधिक रूप में होती है । औपाधिक का अर्थ है विशेषण के रूप में प्रतीत होना । 'इस वक्ता का यह अर्थ विवक्षित है' इस मत में प्रथम मान्त विशिष्ट शाब्दबोध होता है । अतः उससे भिन्न तत्त्व प्रकार ( विशेषण ) के रूप में माने जाते हैं । ) यदि प्रतिपादनीय अर्थ को लिङ्गी (साध्य) की कोटि में रखा जायगा तो उसके विषय में लौकिक लोग ही अनेक प्रकार की विप्रतिपत्तियाँ किया करते हैं वे.किस प्रकार सिद्ध हो सकेंगी ? उनका तो अभाव ही हो जायगा । आशय यह है कि अनुमानजन्य ज्ञान यथार्थज्ञान होता है । उसमें किसी को कभी कोई विप्रतिपत्ति नहीं होती और न उसकी सच्चाई में कमी कोई सन्देह ही उठाता है । सांसारिक व्यक्ति किसी के कहे हुये वाक्य के अर्थ की सच्चाई में सन्देह भी करते हैं, उसका खण्डन भी करते हैं और उससे अथ-
शब्दों का सम्बन्ध मानते हैं उसीप्रकार व्यङ्गच्य को भी शब्दों का सम्बन्धी मानना पड़ता है । जिस प्रकार वाच्य को हम लिङ्गी ( साध्य ) की कोटि में नहीं रख सकते उसी प्रकार व्यङ्गच्य को भी हम लिङ्गी अर्थात् साध्य की कोटि में नहीं रख सकते । इस प्रकार नैैयायिकों को भी व्यङ्गच्य की स्वतन्त्र सत्ता माननी ही पड़ेगी । हाँ शब्दों का कुछ विषय ऐसा अवश्य होता है जो अनुमान के क्षेत्र में आता है । उसकी व्याख्या पहले की जा चुकी है कि वक्ता के शब्दप्रकाशन की इच्छा और उसके अर्थप्रकाशन की इच्छा अनुमान का ही विषय होती है । उस इच्छा की प्रतीति वाच्यरूप में नहीं होती किन्तु औपाधिक रूप में होती है । औपाधिक का अर्थ है विशेषण के रूप में प्रतीत होना । 'इस वक्ता का यह अर्थ विवक्षित है' इस मत में प्रथम मान्त विशिष्ट शाब्दबोध होता है । अतः उससे भिन्न तत्त्व प्रकार ( विशेषण ) के रूप में माने जाते हैं । ) यदि प्रतिपादनीय अर्थ को लिङ्गी (साध्य) की कोटि में रखा जायगा तो उसके विषय में लौकिक लोग ही अनेक प्रकार की विप्रतिपत्तियाँ किया करते हैं वे.किस प्रकार सिद्ध हो सकेंगी ? उनका तो अभाव ही हो जायगा । आशय यह है कि अनुमानजन्य ज्ञान यथार्थज्ञान होता है । उसमें किसी को कभी कोई विप्रतिपत्ति नहीं होती और न उसकी सच्चाई में कमी कोई सन्देह ही उठाता है । सांसारिक व्यक्ति किसी के कहे हुये वाक्य के अर्थ की सच्चाई में सन्देह भी करते हैं, उसका खण्डन भी करते हैं और उससे अथ-
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ननु यदा व्यङ्ग्योद्थः प्रतिपन्नास्तदासत्यस्वानिश्रयोऽस्यनुमानादेव प्रमाणान्तर क्रियत इति पुनरप्यनुमेय एवासौ । मैवम्, वाच्यस्यापि सत्यत्वनिश्चयोऽनुमानादेव । यदाहु:-‘आसवादाविसंवादसामान्यादन्र चेदनुमानता’ इति ।
न चैतावता वाच्यस्य प्रतीतिरनुमानिकी किन्तु तद्गतस्य तत्स्वोदधिकस्य मुख्य- स्वस्य तद्ध्यक्ष्ये न डपि भविष्यति । एतदाह-यथा चेत्यादिना । पतच्चाभ्युपगम्योक्तं न त्वनेन नः प्रयोजनमिति । काव्यविषये चेति । अप्रयोजकत्वमिति । नहि तेषां वाक्यानामप्रतीतौमादि वाक्यवत् सत्यार्थप्रवर्तकतद्वारेण प्रवर्तकत्- स्वाय मामाण्यमन्विध्यते, मोतिमात्रपर्यवसायित्वात्। मीतिरेव चालौकिकचमत्कार- रूपाया व्युत्पत्त्यङ्गत्वात् । एतच्चोक्तं विततस्य प्राक् । उपहासायैवेतित । नैयं सहदृयः केवलं शुष्कतर्कोऽपक्रमकर्कशहृदयः प्रतीतिं परामृशन् नालमित्येष उपहासः ।
( प्रश्न ) जब व्यङ्ग्य अर्थ की प्रतिपत्ति हो गई तब इसके सत्यत्व का निश्चय दूसरे प्रमाण अनुमान से ही किया जाता है । इस प्रकार फिर भी यह अनुमानगम्य ही हुआ । ( उत्तर ) ऐसा नहीं । वाच्य के भी सत्यत्व का निश्चय अनुमान से ही किया जाता है । जैसाकि कहते हैं—
‘यदि यहाँ पर आसवाद के अविसंवाद ( सत्यत्व ) रूप सामान्य हेतु से अनुमानता मानी जाय’ इत्यादि । केवल इतने से ही वाच्य की प्रतीति आनुमानिक नहीं हो जाती किन्तु उससे भी अधिक तद्गत सत्यत्व की ( प्रतीति आनुमानिकी की हो जाती है । ) वह व्यङ्ग्य में भी हो जायगा । यह कहते हैं—‘यथा च’ इत्यादि के द्वारा । और यह स्वीकार करके कह दिया गया है, इससे हमारा कोई प्रयोजन तो है ही नहीं । ‘और तद्वारा’ यह । उन वाक्यों का अभिप्रेतोम इत्यादि वाक्यों के समान सत्य अर्थ के प्रतिपादन के द्वारा प्रवर्तकत्व के लिये प्रमाण का अन्वेषण नहीं किया जाता क्योंकि वह प्रीतिमात्रपर्यवसायी होता है और क्योंकि अलौकिक चमत्कार रूप प्रीति ही हृदय को व्युत्पत्ति का अङ्ग होती है । यह विस्तारपूर्वक पहले समझा दिया गया । ‘उपहास के लिये ही’ यह । कर्कश हृदयवाला है और प्रतीति का परामर्श करने में समर्थ नहीं है :
तारावती हमत भी होते है । यदि वाक्य के व्यङ्ग्यार्थ को अनुमान का विषय माना जायगा तो इन अनुपपत्तियों की क्या होगी । इनका तो मुट्ठा ही मिट जायगी । ‘वक्ता कुछ कहना चाहता है’ इसमें किसी को न सन्देह होता है और न अनुपपत्ति । अतः यह अनुमान का विषय हो सकता है । यह दे प्रस्तुत प्रकरण का सार ।
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( प्रश्न ) व्यङ्ग्य्य अर्थ को हम माने लेते हैं । किन्तु व्यङ्ग्य्य अर्थ ठीक है या नहीं इसके लिये तो हमें फिर भी अनुमान का हो सहारा लेना पड़ेगा। अनुमान से हो यह सिद्ध किया जायगा कि जो कुछ व्यक्त किया गया है वह सत्य है या नहीं । ऐसी दशा में जिस अनुमान से पीठा छुड़ाया था वह पुनः गले पड़ गया । वाक्य के अर्थ में तभी प्रमाणिकता आती है जब वह दूसरे प्रमाणों के मेळ में ठीक बैठ जाय । अतः यह मान लेने पर भी कि प्रतिपाद्य व्यंग्यार्थ लिङ्गी तहँ नहीं हो सकता यह तो अनिवार्य्य ही है कि व्यक्त अर्थ की सत्यता प्रमाणित करने के लिये उसे लिङ्गी ( साध्य ) बनाया जाय । इस अनुमान से आप कैसे पीछा छुड़ायेंगे ?
( उत्तर ) यह कोई अनुपपत्ति नहीं कही जा सकती । वाच्यार्थ के भी सत्यत्व की परीक्षा तो अनुमान से ही होगी । पहले वाक्यार्थबोध हो जायगा, तत्पश्चात् ( लौकिक सत्य से मेल खानेवाले ) अनुमान की प्रवृत्ति होगी । वाक्यार्थ शब्द का विषय और उसकी सत्यता अनुमान का विषय । जिस प्रकार वाच्य के विषय में प्रमाणान्तर का अनुगमन करके उसके ठीक होने की परीक्षा की जाती है किन्तु उस प्रमाणान्तर की प्रवृत्ति से शब्दव्यापार की विषयता समाप्त नहीं हो जाती वैसे ही यहाँ पर भी व्यंग्यार्थ की परीक्षा दूसरे प्रमाणों से करने पर भी उसकी शब्द-विषयता समाप्त नहिं हो जाती । यही बात श्लोक वार्तिक की निम्नकारिकाओं में कही गई है—
‘आत्मवादविसंवाद सामान्याद्वृत्तेश्चेदनुमानता । निर्णयस्तावता सिद्धयेद्वृद्धैर्दूष्युत्पत्तीनां तत्कुला ॥ अन्यदेव हि सत्यत्वमासंवादाद्वृत्तिहेतुकम् । वाक्यार्थश्चान्य एवेति ज्ञातः पूर्वतरं ततः ॥ तत्र चेदास्वादेन सत्यत्वमनुमीयते । वाक्यार्थप्रत्ययस्तात् कथम् स्यादनुमानता ॥’ इति।
अर्थात् ‘यदि यह कहा जाय कि वाक्यार्थबोध में अनुमान की प्रक्रिया लगू होती है और उसमें आत्मवाद का सत्यरूप में सद्धित्तत हो जाना ही सामान्य हेतु होता है तो इस पर कहा जा सकता है कि उतने से अर्थ की सत्यता का निर्णय तो सिद्ध हो जाता है किन्तु वाक्यार्थ बुद्धि उस ( अनुमान ) के द्वारा उत्पन्न नहीं की जाती । सत्यत्व और वस्तु है जिसमें आत्मवादत्व हेतु के रूप में आता है और वाक्यार्थ अन्य ही वस्तु है यह उससे बहुत पहले जाना जा चुका है । अब उन दोनों व पृथक् वस्तुओं में यदि एक वस्तु सत्यत्व का आत्मवाद के द्वारा अनुमान किया जाता है तो यहाँ पर वाक्यार्थ प्रत्यय अनुमान के अन्तर्गत कैसे आयगा ?’
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इन कारिकाओं का आशय यही है कि वाच्यार्थ में अनुमान का उपयोग न हो यह बात नहीं है। उसमें अनुमान का योग होता है और वह अनुमान वाच्यार्थ की अपेक्षा अधिक तथा उससे अतिरिक्त अंश सत्यत्व का साधक होता है। इतने से ही यह तो नहीं कहा जा सकता कि वाच्यार्थप्रतीति ही अनुमानिक हो गइ। इसी प्रकार व्यङ्ग्यार्थप्रतीति अन्य वस्तु है और सज्जन सत्य की परीक्षा दूसरी वस्तु। सत्य की परीक्षा में अनुमान का उपयोग हो सकता है; किन्तु इतने से ही व्यङ्ग्यार्थ का अन्तर्भाव अनुमान में नहीं हो सकता। आपके प्रश्न के उत्तर में यहाँ तक जो कुछ कहा गया है वह सब आपकी इस बात को मानकर कहा गया है कि व्यङ्ग्यार्थ की सत्यता की परीक्षा करने के लिये अनुमान की आवश्यकता होती है। इस बात की आवश्यकता ही नहीं कि हम व्यञ्जना के सत्यत्व-असत्यत्व को सिद्ध करने पर विचार करें। व्यङ्ग्यार्थ के सत्यत्व-असत्यत्व की परीक्षा तो लोक में होती है जहाँ उस वाक्य को लेकर उसके सत्यत्व के आधार पर जनसमूह की प्रवृत्ति निर्दिष्ट कार्य में हुआ करती है। उदाहरण के लिये ‘अग्निष्टोमेन यजेत’ वाक्य को लीजिये। इसमें अग्निष्टोम यज्ञ करने का आदेश दिया गया है। यदि अग्निष्टोम से यज्ञ करना वस्तुतः लाभकर है तथा सत्य भी है तब तो जनता की प्रवृत्ति उस ओर होगी, अन्यथा लोग उस आदेश को नहीं मानेंगे। अतः अग्निष्टोम के सत्यत्व की परीक्षा के लिये दूसरे प्रमाणों का अन्वेषण उपपन्न तथा आवश्यक होगा। इसके प्रतिकूल काव्यवाक्यों का उद्देश्य किसी कार्य का आदेश देना नहीं होता। उनका मन्तव्य होता है वेद्यान्तरसंस्पर्शशून्य आनन्द मात्र में अवस्थिति। जब परिशीलकों के अन्तःकरण अलौकिक चमत्काररूप आनन्द में ही पर्यवसित हो जाते हैं तब वह आनन्दैकत्मक सत्ता ही व्युत्पत्ति का आदान करानेवाली होती है। अर्थात् परिशीलकों का अन्तःकरण पतिपाद्य आनन्द भावना से एक रूप होकर जिस उपदेश को ग्रहण कर लेते हैं काव्य की वही व्युत्पत्ति कही जाती है। अतएव काव्य में सत्यत्व असत्यत्व की परीक्षा ही मिथ्या है। काव्य का सत्यत्व तो परिशीलकों की अन्तरात्मा को आनन्दमय बना देना ही है। अतएव जो व्यक्ति काव्य के सत्यत्व की परीक्षा के लिये अनुमान का अन्वेषण करता है उसकी हँसी ही उड़ाई जाती है। हँसी की तो बात यही है कि जो व्यक्ति तर्क का सहारा लेकर काव्यानन्द का भी निरूपण करना चाहता है वह सहृदय नहीं कहा जा सकता। उसका हृदय शुष्क तर्कों के उपक्रम के कारण अल्पान्त करकश हो गया है। अतएव वह काव्यानन्द की प्रतीति का परामर्श करने में समर्थ हो ही नहीं सकता। बस यही उपहास की बात है। अतएव यह नहीं कहा जा सकता कि व्यङ्ग्यप्रतीति सर्वत्र लिङ्गी की प्रतीति ही होती है।
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यत्तवुनमेयरूपण्यज्ज्यविषयं शब्दानां व्यज्जकत्वं तदृश्वनित्यव्यवहारस्याप्रयोजकं। अपि तु व्यज्जकत्वलक्षणः शब्दानां व्यापार औत्पत्तिकशब्दार्थेसम्बन्धव्वादिनाडयभ्युपगन्तव्य इति प्रदर्शनार्थमुपन्यास्तम्। तद्धि व्यज्जकत्वं कदाचिल्लिङ्गत्बेन कदाचिद्रूपान्तरण शब्दानां वोचिकानामवाचिकानामित्थं सर्ववादिभिरेभिरप्रतिप्रध्यमित्यस्माभिर्यत्न आरब्धः। तदेवं गुणवृत्तिवाचकत्वादिभिः शब्दप्रकारेभ्यो निय मेनेव तादृशिलक्षणं व्यज्जकत्वम्। तदन्तःपातित्वेऽपि तस्य हृदादिभिधीयमाने प्रकाशनं विप्रतिपत्तिनिरासाय सहृदयहृदय्युत्पत्तये वा तत्त्रिय माणमनतिसन्धेयमेव। न हि सामान्यमात्रलक्षणेनोपयोगिविशेषलक्षणानां प्रतिनोेपः शक्यः कर्तुम्। एवं हि सति सन्तापमात्रलक्षणे कृते सकलसद्रवस्तुलत्न णानां पौनरुक्स्य प्रसङ्गः तदेवम्—विमतिविषयो य आसीन्मनीषिणां सततमविदितसतत्नः। ध्वनिसटि्ज्ञतिः प्रकारः काव्यस्य व्यज्यितः सोऽयम्॥३३॥
(अनु०) और जो शब्दों का व्यज्जकत्व अनुमेयरूप व्यज्ज्यविषयक होता है वह ध्वनि व्यवहार का प्रयोजक नहीं होता। अपितु ध्वनिकनाम रूपवाला शब्दों का व्यापार शब्दार्थ सम्बन्ध को औत्पत्तिक कहनेवाले के द्वारा भी स्वीकार किया जाना चाहिये यह दिखलाने के लिये प्रस्तुत किया गया है। वह वाचक और अवाचक दोनों प्रकार के शब्दों का व्यज्जकत्व निस्सन्देह कभी लिङ्ग के रूप में कभी दूषरे रूप में संभी वादियों के द्वारा खण्डन नहीं किया जा सकता यह प्रदर्शित करने के लिये हमने यह यत्न प्रारम्भ किया है। वह इस प्रकार गुणवृत्ति और वाचकत्व इत्यादि शब्दप्रकारों से व्यज्जकत्वं नियमपूर्वक् ही विशिष्टण होता है। हृदयपूर्वक् उस ( ध्वनि ) के उनमें अन्तःपातित्व के कहे जाने पर भी विप्रतिपत्ति का खण्डन करने के लिये अथवा सहृदयों की हृदय्युत्पत्ति के लिये ध्वनिरूप जो उनकी विशोपताओं का प्रकाशन वह किये जाने पर उसका अनादर नहीं किया जाना चाहिये। सामान्य लक्षणमात्र से ही उपयोगी विशेष लक्षणों का प्रतिपेध नहीं किया जा सकता। ऐसा करने पर निस्सन्देह सत्तामात्र का वद्धण कर देने पर समस्त वस्तु के लक्षणों की पुनरुक्ति का दोष होगा। अतः इस प्रकार—‘जो काव्य का ध्वनिनामक प्रकार मनीषियों के लिये आवेदित के समान अस्ह्मति का विषय था, वह यह लक्षित कर दिया गया है॥३३॥’
तारावती
( प्रश्न ) यदि आप व्यञ्जना को अनुमान रूप नहीं मानते और इस व्यास्ति को अंगीकार नहीं करते कि जहाँ जहाँ व्यञ्जना होती है वहाँ वहाँ अनुमान होता
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नन्वेवं तर्हि मा भूदत्र यत्र व्यञ्जकता तत्र तत्रानुमानत्वम्, यत्र यत्रानुमानत्वं तत्र तत्र व्यञ्जकत्वमिति कथमपह्नूयत इत्याशङ्क्याह— यत्रानुमेयेति । तद्व्यञ्जकत्वं ध्वनिलक्षणमभिमतायोर्यतिरिक्तविषयाङ्यापारादिति भावः । नन्वभिप्रायाविषयं यद्व्यञ्जनाकृतमनुमानकव्यापारं तदेव प्रयोजकं ध्वनिनियवहारस्य तर्हि किमर्थं तद्वदेव सहरूप्य निरूपयति —तद्वेति । यत एव हि क्वचिदनुमानेनाभिप्रायादौ क्वचित्प्रत्यक्षेण दीपालोकादौ कवचिद्वकरणेन गीतध्वन्यादौ क्वचिद्विवक्षितान्यपरैः कवचिद्गुणवृत्या अविवक्षितवाच्येऽप्यड्गुगृहीतमानं व्यञ्जकत्वं दृश्यं तत् एव तेभ्यः सर्वेभ्यो विलक्षणमस्य रूपं न सिद्ध्यति तदाह—तदेवमिति ।
( प्रश्न ) तो फिर इस प्रकार जहाँ जहाँ व्यञ्जकता वहाँ वहाँ अनुमान यह न माना जाय इसको कैसे छिपाया जाय कि जहाँ जहाँ अनुमान होता है वहाँ वहाँ व्यञ्जकत्व होता है यह कहा दृढ़के कह रहे हैं—‘जो कि अनुमेय’ इत्यादि । भाव यह है वह व्यञ्जकत्व ध्वनि का लदाण नहीं है क्योंकि उससे अतिरिक्त विषय में उसका व्यापार नहीं होता । ( प्रश्न ) अभिप्रायविषयक जो व्यञ्जनकत्व होता है और जिसका योगक्षेम अनुमान से ही एक रूप होता है यदि वह ध्वनिनियवहार का प्रयोजक नहीं होता तो उसका पहले ही प्रस्तुत क्यों किया ? यह शङ्का करके कहते हैं—‘अस्तु’ इत्यादि । इसी को सञ्चित करके निरूपित करते हैं— ‘वह निस्सन्देह’ यह । क्योंकि कहीं अभिप्राय इत्यादि में अनुमान के द्वारा, कहीं दीपालोक इत्यादि में प्रत्यक्ष के द्वारा, कहीं गीतध्वनि इत्यादि में करणत्व के द्वारा कहीं विवक्षितान्यपरवाच्य में अभिधा के द्वारा कहीं अविवक्षितवाच्य में गुणवृत्ति के द्वारा अनुगृहीत किया जाता हुआ व्यञ्जकत्व देखा गया है उसी से इसका रूप हमारे लिये उन सबसे विलक्षण सिद्ध होता है । वही कहते हैं—‘वह इस प्रकार’ इत्यादि ।
तारावती है तो जाने दीजिये । इसके विपरीत तो व्याप्ति बन ही सकती है कि जहाँ जहाँ अनुमान होता है वहाँ वहाँ व्यञ्जना होती है । इस व्याप्ति को आप कैसे छिपा सकते हैं ? यहाँ पर पूछनेवाले का आशङ्कय यह है कि हम इस बात को मान सकते हैं कि सब प्रकार की व्यञ्जनायें अनुमान नहीं कही जा सकतीं । किन्तु इस बात का तो प्रतिपादन ग्रन्थकार ने ही किया है कि शब्दों के अर्थ के अतिरिक्त वाक्यार्थ रूप जो वाक्य का अभिप्राय होता है वह अनुमानगम्य ही हुआ करता है । अतः यहाँ पर ऐसी व्याप्ति बनाई जा सकती है कि जहाँ जहाँ अभिप्रायरूप वाक्यार्थ में
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अनुमिति होती है वहाँ वहाँ व्यञ्जनाव्यापार होता है अर्थात् वक्ता का अनुमित अभिप्राय व्यङ्गय ही होता है। यदि समस्त व्यञ्जनायें अनुमान नहीं हो सकती ( क्योंकि प्रदीप इत्यादि बिना अनुमान के ही व्यञ्जक होते हैं ) तो अनुमित अभिप्राय में व्यञ्जना का निषेध कौन करेगा? ( उत्तर ) ( इस पर तो पहले ही विचार किया जा चुका है कि ) शब्दों की जिस व्यञ्जकता से अभिप्रायरूप ऐसे वाक्यार्थ की अभिव्यक्ति होती है जो अनुमान का विषय वनने की क्षमता रखता है वैसी अभिव्यक्ति ध्वनि की प्रयोजिका नहीं होती। कारण यह है कि उस प्रकार की व्यञ्जना का व्यापार अभिप्राय की अभिव्यक्ति तक ही सीमित रहता है। उसका प्रकाश अभिप्राय से अतिरिक्त अन्य वस्तु, रस और अलङ्कार की व्यञ्जनाओं तक नहीं हो सकता। इस प्रकार अभिप्राय की व्यञ्जना में अव्याप्ति दोष आ जाता है और वह व्यञ्जना का पूरा रूप नहीं मानी जा सकती तथा वह ध्वनि की प्रयोजिका नहीं होती।
( प्रश्न ) यदि अभिप्रायविषयक व्यङ्जकत्व ध्वनि व्यवहार की प्रयोजक नहीं होती तो फिर अपने इस ध्वनिनिरूपण के प्रकरण में उसका उल्लेख ही क्यों किया? आपका उल्लेख करना ही यह सिद्ध करता है कि अभिप्रायव्यङ्जना भी ध्वनिसिद्धान्त की प्रयोजिका होती है। यह अभिप्रायव्यङ्जना अनुमान से गतार्थ हो जाती है क्योंकि इसका योगक्षेम अनुमान का जैस्रा ही होता है। इस प्रकार अनुमान और व्यङ्जकत्व का व्याप्य-व्यापक भाव मानना अनिवार्य हो जाता है। इसका समाधान आपके पास क्या है?
( उत्तर ) हमने जो पिछले प्रकरण में अभिप्राय व्यञ्जना का उल्लेख किया है, उससे यह कहीं सिद्ध नहीं होता कि अभिप्रायव्यञ्जना ध्वनितत्त्व की प्रयोजिका होती है। अभिप्रायव्यञ्जना के उल्लेख का मन्तव्य केवल इतना ही है कि वहाँ पर व्यञ्जना सिद्ध की जा रही थी और मैं यह दिखलाना चाहता था कि व्यञ्जना के सिद्धान्त को वे लोग भी अस्वीकार नहीं कर सकते जो लोग शब्द और अर्थ के सम्बन्ध को नित्य नहीं मानते अपितु औपचारिक मानते हैं। इस प्रकरण के प्रारम्भ करने का मेरा मन्तव्य यही है कि कोई भी व्यक्ति किसी भी सिद्धान्त का माननेवाला क्यों न हो यह व्यञ्जना तो उसे माननी ही पड़ेगी, चाहे वह लिङ्ग और लिङ्गी ( हेतु और साध्य ) के रूप में माने या किसी और रूप में।
वाच्य शब्दों में भी व्यञ्जना होती है और अवाच्य शब्दों में भी। यह व्यञ्जना कहीं अनुमान के रूप में प्रकाशित होती है जैसे अभिप्राय की व्यञ्जना में ( इस व्यञ्जना को मानने के लिये नैय्यायिक बाध्य है। ) कहीं प्रत्यक्ष के द्वारा व्यञ्जना होती है जैसे दीपालोक वस्तुओं की व्यञ्जना करता है। कहीं कारण के रूप में व्यञ्जना होती है जैसे गीतध्वनि इत्यादि में रस की कारणता
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ननु प्रसिद्धस्य किमर्थं रूपसङ्कोच: क्रियते अभिधाव्यापारगुणवृत्त्यादे: । तस्यैव सामग्र्यन्तरोपनिपातायद्धिष्ठं रूपं तदेव व्यञ्जकत्वसुच्यतामिथ्याशङ्क्याह—तदन्तःपातित्वेडपिति । न चयं संज्ञानिवेशनादि निषेधाम इति भाव: । विप्रतिपत्तिस्थादिविशेषो नास्तीति कुतोऽपि: संशयोत्पत्तिनिरास: । न हि । उपयोगिपदेनानुपयोगिनां काकदन्तादीनां व्युदास: । एवं हि—त्रिपदार्थसङ्घरी सत्तेत्यनेनैव द्रव्यगुणकर्मणां लक्षणत्वाच्छु तिस्मृत्यायुवेंदधनुर्वेंदप्रभृतोनां सकडलेक्यात्रोपयोगिनमननारम्मः स्यादिति भाव: । विमतिविषयत्वे हेतु:-अविदितसतरत्त्व इति । अत एवाऽयुनात्र न कस्यचिद्विमतिरेतत्समान्क्षणात्मभ्रतीति प्रतिपाद्यितुम्—आसीत् इत्युक्तम् ॥ २३ ॥
प्रसिद्ध अमिधा और गुणवृत्ति इत्यादि का रूपसंकोच क्यों किया जा रहा है? दूसरी सामग्र के उपनिपात से जो विशिष्ट रूप ही व्यङ्जकत्व कह दिया जाय यह आक्षेप करके कहते हैं—उसके अंदर ही है । भाव यह है कि हम संज्ञानिवेशान आदि का निषेध नहीं कर रहे हैं । विप्रतिपत्तिस्थादिविशेषों के जो लक्षण हैं उनका । उपयोगी शब्द से अनुपयोगी काकदन्त इत्यादि का निराकरण हो जाता है । 'इस प्रकार निःसंदेह' इत्यादि । भाव यह है कि 'तीन पदार्थों से सङ्कीर्ण सत्ता' इतने से ही द्रव्यगुणकर्मों के लक्षण होने से श्रुति स्मृति आयुर्वेद इत्यादि सभी लोक्यात्रोपयोगी वस्तुओं का आरम्भ ही न हो । विमतिविषयत्वे हेतु, बतलाते हैं—'अविदितसतरत्त्व' यह । अतएव इसी तत्त्व से लेकर इस विषय में किसी की विमति नहीं है यह प्रतिपादन करने के लिये ही ‘था’ इस शब्द का प्रयोग किया गया ।
तात्पर्य यह है कि व्यञ्जना में अभिधाव्यापार गुणवृत्ति इत्यादि तो रह ही करते हैं । ये तत्व प्रसिद्ध ही हैं । इनका अपलाप किया ही नहीं जा सकता । आपने एक दूसरी
विद्यमान है । कहीं व्यञ्जना अभिधा से अनुपृहीत होती है जैसे विवक्षितान्यपरवाच्य ध्वनि में अभिधामूलक व्यञ्जना होती है । कहीं गुणवृत्ति के द्वारा व्यञ्जना अनुपृहीत होती है जैसे अविवक्षितवाच्य ध्वनि में लक्षणामूलक व्यञ्जना हुआ करती है । इस प्रकार अनुमान, प्रत्यक्ष, कारणता, अभिधा और लक्षणा ये सब व्यञ्जना के अनुग्राहक ही होते हैं । इससे यह सिद्ध हो गया कि व्यञ्जना नियम से सबका रूप नहीं अपितु इन सबसे विलक्षण होती है ।
( प्रश्न ) व्यञ्जना में अभिधाव्यापार गुणवृत्ति इत्यादि तो रह ही करते हैं । ये तत्व प्रसिद्ध ही हैं । इनका अपलाप किया ही नहीं जा सकता । आपने एक दूसरी
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वस्तु की और कल्पना कर ली और उसका नाम व्यञ्जना रख लिया । इस कल्पित वस्तु से प्रसिद्ध अभिधा इत्यादि व्यापारों के रूपसङ्कोच की क्या आवश्यकता ? उचित तो यह है कि स्वयं व्यञ्जना को यह परिभाषा कर दीजिये कि अभिधा और व्यञ्जना ही हमारी सामग्री के आगे पड़ने से जो विशिष्ट रूप धारण कर लेती हैं वही व्यञ्जना है । यह व्यञ्जना और कुछ नहीं विशेष प्रकार की अभिधा और विशेष प्रकार की गुणवृत्ति ही है । अपने ही विशिष्ट प्रकार के द्वारा किसी एक वस्तु का रूपसङ्कोच कैसे किया जा सकता है ?
तारावती
( उत्तर ) यदि आप इतःपूर्वं हमारी बतलाई हुई वस्तु ( व्यञ्जना ) की दूसरी संज्ञा ( विशिष्ट अभिधा और विशिष्ट व्यञ्जना ) ही रखना चाहते हैं तो हमें इसमें कोई आपत्ति नहीं । आप उसका यही नामकरण कर लीजिये । विप्रतिपत्ति तो वस्तुतः किसी तत्त्व के विषय में होती है । क्योंकि विप्रतिपत्ति शब्द का अर्थ है विरुद्ध प्रतिपत्ति या किसी तत्त्व के विषय में यह कहना कि जो विशेष बतलाया जा रहा है वह नहीं है । यही विप्रतिपत्ति शब्द का अर्थ है । जब आप उस तत्त्व को मानते ही हैं तब उस विषय में जो भी विरोध उत्पन्न होंगे उनका निराकरण करने के लिये आपको उसकी व्याख्या करनी ही होगी फिर आप नाम उसे चाहे जो दें ।
दूसरी बात यह है कि यदि आप उस तत्त्व को मानते हैं तो शङ्कदयों की व्युत्पत्ति के लिये भी आपको उसकी व्याख्या करनी ही होगी । व्युत्पत्ति का अर्थ है सन्देह और अज्ञान का निराकरण । शङ्कदयों को उस तत्त्व के विषय में सन्देह भी हो सकता है और उनके विषय में उनमें अज्ञान भी हो सकता है । उसका निराकरण तो आवश्यक है ही । इस प्रकार आप उस विशिष्ट तत्त्व को छलपूर्वक छिपा नहीं सकते और न आपको उसका विरोध ही करना चाहिये । आप यह भी नहीं कह सकते जब व्यञ्जना विशिष्ट प्रकार की अभिधा या विशिष्ट प्रकार की गुणवृत्ति ही है तब अभिधा और गुणवृत्ति का सामान्य लक्षण कर देने भर से वह विशिष्ट तत्त्व भी गतार्थ हो जायगा; उसकी पृथक् व्याख्या करने की क्या आवश्यकता ?
जब सामान्य का लक्षण बना दिया जाता है तब उस सामान्य के अन्दर बहुत से उपयोगी विशेष तत्त्व रह जाते हैं; उन तत्त्वों का लक्षण बनाना भी आवश्यक ही होता है । यह नहीं कहा जा सकता कि सामान्य का लक्षण बना देने के बाद विशेषों का लक्षण बनाना व्यर्थ होता है । हाँ यदि अनुपयोगी अकादन्त जैसी कोई वस्तु हो तो उसका लक्षण बनाना व्यर्थ भी हो सकता है । उदाहरण के लिये वैशेषिक दर्शन में पहले तो सातों पदार्थों और उनके अवान्तर मेदों का परिगणन किया गया; उसके बाद 'सदनित्यं...' इत्यादि सूत्र के द्वारा यह बतलाया गया कि द्रव्य, गुण और कर्म ये तीन पदार्थ सच्चे अनित्य इत्यादि होते हैं । सत्ता का होना इत्यादि सामान्य के लक्षण हैं।
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प्रकारोऽन्यो गुणीभूतव्यङ्ग्यः काव्यस्य हृश्यते । यत्र व्यङ्ग्योऽन्वयवये वाच्यचारुत्वं स्यात्प्रकर्षत ॥ ७४ ॥
काव्य का दूसरा प्रकार गुणीभूतव्यङ्ग्य नामक दिखलाई देता है जिसमें व्यङ्ग्य के साथ अन्वय करने में वाच्यचारुता अधिक प्रकृष्ट हो जाय
ललनालावण्य के समान जो व्यङ्ग्य अर्थ पहले प्रतिपादित किया गया था उसकी प्रधानता होने पर 'ध्वनि' यह कहा गया । उसके पौण हो जाने से वाच्यचारुता के प्रकर्ष में गुणीभूतव्यङ्ग्य नाम का काव्यप्रभेद प्रकल्पित किया जाता है । उसमें तिरसकृतवाच्य ( शब्द ) के द्वारा प्रतिभासित होनेवाली वस्तुमात्र व्यङ्ग्य के वाच्यरूप वाक्यार्थ की अपेक्षा गुणीभाव हो जाने पर गुणीभूतव्यङ्ग्यता होती है ।
तारावती
यदि कहो कि सामान्य के ल लक्षण बना देने के बाद विशेष के कहने की आवश्यकता नहीं रह जाती तो फिर द्रव्य इत्यादि के अवान्तर भेदों के लक्षण ही व्यर्थ हो जायँ और श्रुति स्मृति आयुर्वेद धानुवेद इत्यादि जो तत्त्व समस्त लोकजीवन के लिये उपयोगी हैं उनका तो प्रारम्भ ही न हो। अतः यह नहीं कहा जा सकता कि सामान्य का लक्षण बना देने के बाद विशेष का लक्षण बनाना व्यथ हो जाता है । अतएव सामान्य अभिधा और गुणवृत्ति का लक्षण बना देने पर भी उसमें विशिष्ट रूपसे रहनेवाली व्यञ्जना की व्याख्या निरर्थक नहीं कही जा सकती । इस प्रकार—
काव्य का यह प्रकार ध्वनि के नाम से प्रसिद्ध है । अमोघक विद्वानों की असहमत का यह इतना अधिक विषय था मानों यह लोगों को विदित ही न हो ।
यह यहाँ पर व्यक्त कर दिया गया ।
अविदित होने के समान होना असहर्मति का हेतु है ॥ यहाँ पर 'अन्वीत' इस भूतकाल की क्रिया का प्रयोग किया गया है । इसका आशय यह है कि अब जब कि मैंने बहुत ही साङ्गपाङ्ग रूपमें ध्वनि का विवेचन कर दिया है यह ध्वनि सिद्धान्त का विरोध इसी क्षण से अतीत की वस्तु बन गया । ( अब इसका विरोध करने का साहस किसी को भी न होगा )
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एवं यावदृृच्वनेरास्मीयं रूपं भेदोपभेदसहितं यच्च व्यङ्ग्यकभेद मुखेनरूपं तत्सवं प्रतिपाद्य प्राणभूतं वाच्यव्यञ्जकभावमेकम्रघटटकेन शिष्यबुद्धौ विनिवेशयितुं व्यङ्ग्यकवादस्थानं रचितमिति ध्वनिं प्रति यदुक्तं तदुक्तमेव । अधुना तु गुणीभूतोङ्ग्ययं व्यङ्ग्यः कविवाचः पवित्रयतिविमुना द्वारा तस्यवात्मककव्वं समर्थयितुमाह—प्रकार इति । व्यङ्ग्येनान्वयो वाच्यस्योपस्कार इत्यर्थः । प्रतिपादित इति । ‘प्रतीयमानं पुनर्न्यदेव’ इत्यत्र । उक्तमिति । ‘यत्रार्थः शब्दो वा’ इत्यत्रान्तरे व्यङ्ग्यं च वस्त्वादित्रयं तत्र वस्तुनो व्यङ्ग्यस्य ये भेदा उक्तास्तेषां क्रमेण गुणभावं दर्शयति—तत्रेति ।
इस प्रकार भेदोपभेदों के सहित ध्वनि के समस्त आत्मीयभेद और जो व्यङ्ग्यक भेद के द्वारा रूप उस सबका प्रतिपादन कर ( ध्वनि के ) प्राणरूप में स्थित व्यङ्ग्यव्यञ्जकभाव को एक प्रघट्टक में ही शिष्यबुद्धि में निविष्ट करने के लिये व्यङ्ग्यक के वादस्थान की रचना कर दी गई । इस प्रकार ध्वनि के विषय में जो कहना था वह कह ही दिया । अब तो गुणीभूत भी यह व्यङ्ग्य कविवाणियों को पवित्र करता है इसके द्वारा उसी के आत्मत्व का समर्थन करने के लिये कहते हैं—‘प्रकार••’ इत्यादि । व्यङ्ग्य के साथ अन्वय अर्थात् वाच्य का उपस्कार । ‘प्रतिपादन किया गया’ यह । ‘प्रतीयमानं पुनर्न्यदेव’ इस कारिका में । ‘कहा गया’ यह । ‘यत्रार्थः शब्दो वा’ इसके अन्दर । व्यङ्ग्य तो वस्तु इत्यादि तीन होते हैं, उसमें व्यङ्ग्यवस्तु के जो भेद बतलाये गये थे उनका क्रमशः गुणीभाव दिखलाते हैं—‘वहाँ पर’ यह ।
तारावती ध्वनि के विषय में जो कुछ कहना था वह सब यहाँ तक कह दिया गया । ध्वनि के विषय में सम्भावित वैमल्य, ध्वनि का स्वरूप, वैमल्यों का निराकरण, व्यङ्ग्य की दृष्टि से ध्वनि के भेदोपभेद और व्यङ्गक की दृष्टि से ध्वनि के भेद तथा उनके स्वरूप इन सब विषयों पर तो प्रकाश डाला ही गया, साथ ही ध्वनि का प्राणतत्व व्यङ्गनानव्यापार है यह समझकर व्यङ्गनना के विषय में बादविवाद उठाया गया और एक प्रघट्टक में ही शिष्यगण व्यङ्गनना का ठीक रूप समझ सकें इसके लिये अनेक पक्षों के द्वारा व्यङ्गनना की सत्ता सिद्ध कर दी गई । अब ध्वनि का जहाँ तक सम्बन्ध है कुछ कहने को शेष नहीं रहा । इस विषय में जो कुछ कहना था वह सब कह दिया । यह व्यङ्गनातत्व इतना महत्त्वपूर्ण है कि यदि कविगण इसका आश्रय लेकर इसे मुख्यरूप में निबद्ध कर सकें और इसे ध्वनि के प्रतिष्ठित पद पर आसीन कर सकें तब तो कुछ कहना ही नहीं; यदि वे इसका सहारा लेते हैं और इसको मुख्य नहीं बना पाते गौणरूप में. निबद्ध करके ही छोड़ देते हैं तब भी
तारावती ध्वनि के विषय में जो कुछ कहना था वह सब यहाँ तक कह दिया गया । ध्वनि के विषय में सम्भावित वैमल्य, ध्वनि का स्वरूप, वैमल्यों का निराकरण, व्यङ्ग्य की दृष्टि से ध्वनि के भेदोपभेद और व्यङ्गक की दृष्टि से ध्वनि के भेद तथा उनके स्वरूप इन सब विषयों पर तो प्रकाश डाला ही गया, साथ ही ध्वनि का प्राणतत्व व्यङ्गनानव्यापार है यह समझकर व्यङ्गनना के विषय में बादविवाद उठाया गया और एक प्रघट्टक में ही शिष्यगण व्यङ्गनना का ठीक रूप समझ सकें इसके लिये अनेक पक्षों के द्वारा व्यङ्गनना की सत्ता सिद्ध कर दी गई । अब ध्वनि का जहाँ तक सम्बन्ध है कुछ कहने को शेष नहीं रहा । इस विषय में जो कुछ कहना था वह सब कह दिया । यह व्यङ्गनातत्व इतना महत्त्वपूर्ण है कि यदि कविगण इसका आश्रय लेकर इसे मुख्यरूप में निबद्ध कर सकें और इसे ध्वनि के प्रतिष्ठित पद पर आसीन कर सकें तब तो कुछ कहना ही नहीं; यदि वे इसका सहारा लेते हैं और इसको मुख्य नहीं बना पाते गौणरूप में. निबद्ध करके ही छोड़ देते हैं तब भी
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लावण्यसिन्धुरपरे हि केयमत्र यत्रोत्पलानि शशिना सह सम्प्लवन्ते ।
उन्मज्जति द्विरदकुम्भटटी च यत्र यत्रापरे कदलिकलण्डमृणालदण्डा: ॥
व्यङ्ग्यार्थ कविवाणीं को पवित्र कर ही देता है । अतएव इस तत्व को काव्य में प्रमुखरूपता और काव्य की आत्मरूपता प्राप्त होनी ही चाहिये ।
इस चौंतीसवीं कारिका में गुणीभूत व्यङ्गच्य की परिभाषा दीगई है । इसका आशय यही है कि गुणीभूतव्यङ्गच्य भी जब इतना महत्वपूर्ण होता है तब प्रधानभूत व्यङ्गय पर आधृत ध्वनि का तो कहना ही क्या ?
कारिका का अर्थ यह है—जहाँ व्यङ्गच्यार्थ स्वयं प्रधानभूत ध्वनि न होतां किन्तु वाच्यार्थ के साथ अन्वय हो, ज्ञात होता है और व्यङ्गच्यार्थी की अपेक्षा वाच्यार्थ में ही चारुता का उत्कर्ष होता है उसे गुणीभूत व्यङ्गच्य कहते हैं ।
यह भी काव्य का एक दूसरा प्रकार है और यह भी कविवाणी में प्राय: दृष्टिगत हुआ करता है ।
प्रथम उद्योत में यह बतलाया जा चुका है कि जिस प्रकार आँख नाक-कान इत्यादि अङ्गसंस्थान में सम्मिलित न हो सकनेवाला ललनाओं का लावण्य एक पृथक् ही वस्तु है जो समस्त अङ्गसंस्थान को आप्यायित किया करता है उसी प्रकार वाच्य अर्थों में सन्निविष्ट न हो सकनेवाला व्यङ्गच्यार्थ एक पृथक् ही वस्तु है जो वाच्यार्थ को अपेक्षा अधिक उत्कृष्टता को प्राप्त होकर ध्वनि का रूप धारण कर लेता है ।
यदि वही व्यङ्गच्यार्थ वाच्यार्थ के साथ अन्वित हो जाय और व्यङ्गच्यार्थ की अपेक्षा वाच्यार्थ में चारुता का अधिक प्रकर्ष हो तो व्यङ्गच्यार्थ गुणीभूत हो जाता है जिससे इसका नाम गुणीभूत व्यङ्गय पड़ जाता है, यह काव्य का एक दूसरा ही भेद मान लिया जाता है ।
वाच्य के साथ व्यङ्गच्य का अन्वय होने का आशय यह है कि व्यङ्गय वाच्य का उपस्कार कर देता है और इस प्रकार उसका गुण बन जाता है ।
इसीलिये इसे गुणीभूत कहने लगते हैं । अब यहाँ पर यह दिखलाया जा रहा है कि व्यङ्गय के जितने भी भेद बतलाये गये हैं वे सब गुणीभूत हो जाते हैं ।
व्यङ्गय तीन प्रकार का होता है—वस्तु, अलङ्कार और रस । वस्तु व्यञ्जना दो प्रकार की होती है अविवक्षितवाच्य और विवक्षितान्यपरवाच्य ।
अविवक्षितवाच्य दो प्रकार का होता है अत्यन्ततिरस्कृतवाच्य और अर्थान्तरसंक्रमितवाच्य ।
सर्वप्रथम अत्यन्ततिरस्कृतवाच्य को लीजिये—इसमें तिरस्कृत वाच्यों के द्वारा प्रतीतिगोचर होनेवाले व्यङ्गयार्थ वस्तु का कदाचित् वाच्यार्थ की अपेक्षा गुणीभाव हो जाता है ।
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लावण्येति । अभिलाषविस्मयगमैयं कस्माचित्तरुणस्योक्तिः । अन्र सिन्धुशब्देन परिपूर्णता, उत्पलशब्देन कटाकश्छटा:, शशिशब्देन वदनं, द्विरदकुम्भमत्टोशब्देन स्तनयुगलं, कदलिका डशब्देनोरुयुगलं, मृणालदण्डशब्देन दोर्युग्रमिति ध्वन्यते । तत्र चैवं स्वार्थानुपपत्तेरङ्गशब्दानां न्यायेन तिरस्कृततद्वाच्यत्वात्तम् । स च प्रतोयमानोडप्यर्थविशेष: ‘अपरैव हि केयं’ इत्युक्तिगर्भोकृतो वाच्येन्दशे चारुतवच्छायां उक्ति है । यहाँ सिन्धु शब्द से परिपूर्णता, उत्पल शब्द से कटाक्ष की शोभा, शशि शब्द से मुख, द्विरदकुम्भमत्ती शब्द से दो स्तन, कदली काण्ड शब्द से दोनों ऊरु और मृणाल दण्ड शब्द से दोनों बाहें ध्वनित होती हैं । यहाँ इन शब्दों की स्वार्थ में सर्वथा अनुपपत्ति के कारण अङ्ग शब्द में बतलाये हुये न्याय से तिरस्कार वाच्यत्व होता है । वह प्रतीयमान भी अर्थ विशेष ‘यह दूसरी कौन है’ इस उक्ति
के गर्भ में आती है । किसी तरुण की यह अभिलाषा और विस्मय से गर्भित उक्ति है । यहाँ सिन्धु शब्द से परिपूर्णता, उत्पल शब्द से कटाक्ष की शोभा, शशि शब्द से मुख, द्विरदकुम्भमत्ती शब्द से दो स्तन, कदली काण्ड शब्द से दोनों ऊरु और मृणाल दण्ड शब्द से दोनों बाहें ध्वनित होती हैं । यहाँ इन शब्दों की स्वार्थ में सर्वथा अनुपपत्ति के कारण अङ्ग शब्द में बतलाये हुये न्याय से तिरस्कार वाच्यत्व होता है । वह प्रतीयमान भी अर्थ विशेष ‘यह दूसरी कौन है’ इस उक्ति के गर्भीभूत अर्थ को अभिव्यक्तवाच्यार्थत्वात्तम् ।
तारावती कोई तरुण किसी नायिका तरुणी के सौन्दर्य पर रीझ कर अभिलाषा और विस्मय के साथ कह रहा है— ‘यह कोई विचित्र प्रकार की एक भिन्न ही नदी विलसित हो रही है; नदी जल से परिपूर्ण होती है यह लावण्य से भरी हुई है, इसमें चन्द्रमा के साथ कमल तैर रहे हैं; इसमें हाथी की कुम्भमत्ती ऊपर को उठ रही है और इसमें दूसरे ही प्रकार के कदली स्तम्भ और मृणाल दण्ड दिखाई पड़ रहे हैं ।’ यहाँ सिन्धु ( नदी ) की उपमा से व्यञ्जित होता है कि नायिका लावण्य से पूर्ण है ( सिन्धु समुद्र को भी कहते हैं और विशाल नदी को भी । ) चन्द्रमा से मुख और कमलों से कटाक्ष की शोभा अभिव्यक्त होती है । ( चन्द्रमा और कमल साथ-साथ तैर रहे हैं इस कथन से व्यञ्जित होता है कि नायिका के कटाक्ष तथा मुख दोनों चञ्चल हैं । ) हाथी के कुम्भटट से दोनों स्तनों के विस्तार का, कदली स्तम्भों से
दोनों ऊरुओं का और मृणाल दण्डों से दोनों भुजाओं का अभिव्यञ्जन होता है । यहाँ पर वाच्यार्थ यही है कि यह लावण्य की नदी है; इसमें कमल और चन्द्र साथ तैर रहे हैं, हाथी का मस्तकतट उठता हुआ दिखाई देता है और इसमें कदली स्तम्भ तथा मृणाल दण्ड पड़े हुये हैं । यह वाच्यार्थ बाधित है क्योंकि नदी जल-परिपूर्ण होती है लावण्य से भरीहुई नहीं; नदी में चन्द्र और कमल साथ-साथ तैर ही नहीं सकते और न लावण्य के प्रवाह में हाथी का मस्तक कदली स्तम्भ-और
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विधत्ते वाच्यस्यैव स्वात्मोन्मज्जनया निमज्जितनव्यङ्ग्यजातस्य सुन्दरत्वेनावभानात् । सुन्दरत्वं चास्यासम्भानयमसमागममसकललोकसारभूतकुवलयादिभाववर्गोऽस्यातिसुभगैकाधिकारणविश्रान्तलडङससुच्चयरूपतया विस्मयविभावताम्राप्तिपुरस्कारेण व्यङ्ग्यार्थोपसृतस्य तथा विचित्रस्यैव वाच्यरूपोन्मज्जनेनामिलाषादिविभावस्वान् । अत एवेयति यदपि वाच्यस्य प्राधानं तथाsपि रसध्वनौ तस्यापि गुणतयैव सर्वस्य गुणीभूतव्यङ्ग्यस्य प्रकारे मन्तव्यम् । अत एव ध्वनेरेवात्मत्वमित्युक्तचरं बहुशः ।
वाच्य के ही अपने में डूबने से जिसकी व्यंग्य जाति डूब जाती है ऐसे ध्वनि का सुंदर रूप से ही प्रकाश होता है। सुंदरता भी इस ध्वनि की असंभवनीय, असंगत और अपूर्ण लोक सारभूत कुवलय आदि भाववर्ग के अत्यन्त सुंदर एकाधिकार में विश्रान्ति को प्राप्त लड़ङ्गस रूपता के द्वारा विस्मय विभावता की प्राप्ति को पुरस्कार के रूप में देने वाले व्यंग्यार्थ से युक्त होने के कारण तथा विचित्र वाच्यरूप के प्रकट होने से अभिलाषा आदि विभाव से युक्त होने के कारण ही है। इसलिए ही यह कहा जाता है कि यद्यपि वाच्य का प्राधान्य होता है तथापि रसध्वनि में उसका भी गुण रूप से ही सर्वत्र गुणीभूत व्यंग्य के प्रकार में समझना चाहिए। इसलिए ही बहुशः यह कहा गया है कि ध्वनि ही आत्मत्व को प्राप्त होता है।
मृणालदण्ड ही हृदय में छिपे हो सकते हैं। अतएव जिस प्रकार ‘निःश्वासान् इवादर्शे’ में दर्पण को अनङ्ग कहने में उसका अर्थ एकदम तिरस्कृत हो जाता है उसी प्रकार यहाँ पर भी चन्द्र, कमल इत्यादि शब्दों का वाच्यार्थ सर्वथा तिरस्कृत हो जाता है। अतएव यहाँ पर मुख कटाक्ष इत्यादि के सौन्दर्य को जो प्रतीति होती है वह अत्यन्त तिरस्कृत वाच्य व्यंजना कही जायेगी। ‘यह कोई दूसरी ही कौन नदी है अर्थात् यह किस प्रकार की नदी है यह समझ में नहीं आता।’ इस उक्ति में जो वाच्यांश है, व्यंग्यार्थ उसी में काव्यचर्चा की प्रतीति में हेतुभूत शोभा का आधार करता है। ‘इसमें लावण्य भरा हुआ है’ ‘इसका मुख चन्द्रम के समान सुन्दर है’ ‘इसके कटाक्ष कमलों के समान सुन्दर हैं’ इत्यादि व्यंग्यार्थ नौचा पड़ जाता है और वाच्यार्थ ‘लावण्य नदी में चन्द्रमा और कमल साथ-साथ तैर रहे हैं’ में अधिक चमत्कार की प्रतीति होती है। इस प्रकार वाच्यार्थ व्यंग्यार्थ को दबाकर अपनी आत्मा को ऊपर उठा देता है और उसी में चमत्कार का प्रतिभास होता है। वाच्यार्थ में सुन्दरत्व यही है कि चन्द्र और कमल ये दोनों तत्व संसार में सुन्दरता
मृणालदण्ड ही हृदयगत हो सकते हैं। अतएव जिस प्रकार ‘निःश्वासान् इवादर्शे’ में दर्पण को अनङ्ग कहने में उसका अर्थ एकदम तिरस्कृत हो जाता है उसी प्रकार यहाँ पर भी चन्द्र, कमल इत्यादि शब्दों का वाच्यार्थ सर्वथा तिरस्कृत हो जाता है। अतएव यहाँ पर मुख कटाक्ष इत्यादि के सौन्दर्य को जो प्रतीति होती है वह अत्यन्त तिरस्कृतवाच्य व्यंजना कही जायेगी। ‘यह कोई दूसरी ही कौन नदी है अर्थात् यह किस प्रकार की नदी है यह समझ में नहीं आता।’ इस उक्ति में जो वाच्यांश है, व्यंग्यार्थ उसी में काव्यचर्चा की प्रतीति में हेतुभूत शोभा का आधार करता है। ‘इसमें लावण्य भरा हुआ है’ ‘इसका मुख चन्द्रम के समान सुन्दर है’ ‘इसके कटाक्ष कमलों के समान सुन्दर हैं’ इत्यादि व्यंग्यार्थ नौचा पड़ जाता है और वाच्यार्थ ‘लावण्य नदी में चन्द्रमा और कमल साथ साथ तैर रहे हैं’ में अधिक चमत्कार की प्रतीति होती है। इस प्रकार वाच्यार्थ व्यंग्यार्थ को दबाकर अपनी आत्मा को ऊपर उठा देता है और उसी में चमत्कार का प्रतिभास होता है। वाच्यार्थ में सुन्दरत्व यही है कि चन्द्र और कमल ये दोनों तत्व संसार में सुन्दरता
मृणालदण्ड ही हृदय में छिपे हो सकते हैं। अतएव जिस प्रकार ‘निःश्वासान् इवादर्शे’ में दर्पण को अनङ्ग कहने में उसका अर्थ एकदम तिरस्कृत हो जाता है उसी प्रकार यहाँ पर भी चन्द्र, कमल इत्यादि शब्दों का वाच्यार्थ सर्वथा तिरस्कृत हो जाता है। अतएव यहाँ पर मुख कटाक्ष इत्यादि के सौन्दर्य को जो प्रतीति होती है वह अत्यन्त तिरस्कृत वाच्य व्यंजना कही जायेगी। ‘यह कोई दूसरी ही कौन नदी है अर्थात् यह किस प्रकार की नदी है यह समझ में नहीं आता।’ इस उक्ति में जो वाच्यांश है, व्यंग्यार्थ उसी में काव्यचर्चा की प्रतीति में हेतुभूत शोभा का आधार करता है। ‘इसमें लावण्य भरा हुआ है’ ‘इसका मुख चन्द्रम के समान सुन्दर है’ ‘इसके कटाक्ष कमलों के समान सुन्दर हैं’ इत्यादि व्यंग्यार्थ नौचा पड़ जाता है और वाच्यार्थ ‘लावण्य नदी में चन्द्रमा और कमल साथ-साथ तैर रहे हैं’ में अधिक चमत्कार की प्रतीति होती है। इस प्रकार वाच्यार्थ व्यंग्यार्थ को दबाकर अपनी आत्मा को ऊपर उठा देता है और उसी में चमत्कार का प्रतिभास होता है। वाच्यार्थ में सुन्दरत्व यही है कि चन्द्र और कमल ये दोनों तत्व संसार में सुन्दरता
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अन्ये तु जलक्रीडावतर्णंतरुणीजनलावण्यसुन्दरीकृतनदीविषयेयमुक्तिरिति सहदयाः । तत्रापि चोक्तप्रकारेणैव योजना । यदि वा नदीस्निग्धौ स्नानावतर्णयुवतिविषया । सर्वेधा तावद्विस्मयसुखेनेयतिश्यापाराद्गुणता व्यङ्ग्यस्य ।
दूसरे सहृदय तो कहते हैं कि जलक्रीडा के लिये अवतीर्ण तरुणीजनों के लावण्यद्रव से सुन्दर बनाई हुई नदी के विषय में यह उक्ति है, उसमें भी उक्त प्रकार की ही योजना की जानी चाहिये । अथवा नदी के निकट स्नान के लिये युवतियों के विषय में यह उक्ति है । सब प्रकार से विस्मय के द्वारा इतना होने के कारण व्यङ्ग्य को गुणभाव प्राप्त होता है ।
तारावती
का सार माने जाते हैं । किन्तु ये दोनों एकसाथ न तो कभी रहते हैं और न इनके रहने की सम्भावना ही की जा सकती है । किन्तु उनको एक अद्वितीय रमणीय नायिका का शरीर प्राप्त हो गया है जिससे वे अपने नैसर्गिक विरोध को छोडकर एक साथ हृद्विगत होने लगे हैं । इन दोनों का एकसाथ हृद्विगत होना विस्मय का विभाव बन गया है । यह विस्मय की विभावरूपता पहले आती है' फिर व्यङ्ग्यार्थ की अभिव्यक्ति होती है जिससे नायिका के मुख नेत्र इत्यादि का सौन्दर्यबोध होता है । वह विस्मय को उत्पादक विचित्र तत्व ही वाच्य से उपसृत हो जाता है । अर्थात् कवलय और चन्द्र इत्यादि का एक साथ होना एक विचित्र वाच्यत्व है, उसमें नायिका के मुख नेत्र इत्यादि के सौन्दर्य का समावेश हो जाता है । इस प्रकार व्यङ्ग्यार्थ वाच्यार्थ का ही उपकार करता है और वाच्यार्थ ऊपर उठा हुआ दिखाई देने लगता है जिससे हम कटाक्ष, वदन इत्यादि को कवलय और चन्द्र इत्यादि के रूप में देखने लगते हैं । तब नायिका का मुखचन्द्र तथा नेत्रकमल इत्यादि अभिलाषा का विभाव बन जाते हैं । यही वाच्य की सुन्दरता का आश्रय है और इसीलिये व्यङ्ग्य को केवल उपस्कारक और वाच्य का प्रधान माना गया है ।
का सार माने जाते हैं । किन्तु ये दोनों एकसाथ न तो कभी रहते हैं और न इनके रहने की सम्भावना ही की जा सकती है । किन्तु उनको एक अद्वितीय रमणीय नायिका का शरीर प्राप्त हो गया है जिससे वे अपने नैसर्गिक विरोध को छोडकर एक साथ हृद्विगत होने लगे हैं । इन दोनों का एकसाथ हृद्विगत होना विस्मय का विभाव बन गया है । यह विस्मय की विभावरूपता पहले आती है' फिर व्यङ्ग्यार्थ की अभिव्यक्ति होती है जिससे नायिका के मुख नेत्र इत्यादि का सौन्दर्यबोध होता है । वह विस्मय को उत्पादक विचित्र तत्व ही वाच्य से उपसृत हो जाता है । अर्थात् कवलय और चन्द्र इत्यादि का एक साथ होना एक विचित्र वाच्यत्व है, उसमें नायिका के मुख नेत्र इत्यादि के सौन्दर्य का समावेश हो जाता है । इस प्रकार व्यङ्ग्यार्थ वाच्यार्थ का ही उपकार करता है और वाच्यार्थ ऊपर उठा हुआ दिखाई देने लगता है जिससे हम कटाक्ष, वदन इत्यादि को कवलय और चन्द्र इत्यादि के रूप में देखने लगते हैं । तब नायिका का मुखचन्द्र तथा नेत्रकमल इत्यादि अभिलाषा का विभाव बन जाते हैं । यही वाच्य की सुन्दरता का आश्रय है और इसीलिये व्यङ्ग्य को केवल उपस्कारक और वाच्य का प्रधान माना गया है ।
हो जाता है । किन्तु यहाँ यह ध्यान रखना चाहिये कि वाच्य की प्रधानता इतने ही अंश में है कि कि वाच्य विस्मय का विभाव बनकर और व्यङ्ग्य से उपस्कृत होकर अभिलाषा का विभाव बन जाता है । इसके बाद जो नायक की रति अभिव्यक्क होकर शृङ्गाररस के रूप में ध्वनित होती है उसके प्रति तो यह वाच्य गौण बन जाता है । रसध्वननि ही प्रधान हो जाती है । जहाँ कहीं गुणीभूत व्यङ्ग्य होता है वहाँ सर्वत्र यही दशा होती है कि पहले एक व्यङ्ग्यार्थ वाच्य की अपेक्षा गौण होता है; फिर वह वाच्यार्थ रसध्वनि में आत्मसमर्पण कर देता है और पर्यवसान
हो जाता है । किन्तु यहाँ यह ध्यान रखना चाहिये कि वाच्य की प्रधानता इतने ही अंश में है कि कि वाच्य विस्मय का विभाव बनकर और व्यङ्ग्य से उपस्कृत होकर अभिलाषा का विभाव बन जाता है । इसके बाद जो नायक की रति अभिव्यक्क होकर शृङ्गाररस के रूप में ध्वनित होती है उसके प्रति तो यह वाच्य गौण बन जाता है । रसध्वननि ही प्रधान हो जाती है । जहाँ कहीं गुणीभूत व्यङ्ग्य होता है वहाँ सर्वत्र यही दशा होती है कि पहले एक व्यङ्ग्यार्थ वाच्य की अपेक्षा गौण होता है; फिर वह वाच्यार्थ रसध्वनि में आत्मसमर्पण कर देता है और पर्यवसान
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अतिरसकृतवाच्येऽपि शब्देऽर्थ: प्रतीममानस्य व्यङ्ग्यस्य कदाचिद्वाच्यप्राधान्येन काव्यचारुत्वप्रेच्छया गुणीभावे सति गुणीभूतव्यङ्ग्यता, यथोदाहृतम्—‘अनुरागवती सन्ध्या’ इत्येवमादि । तस्यैव स्वयमुक्त्या प्रकाशितत्वेन गुणीभावः, यथोदाहृतम्—‘मडितकालमनसमम्’ इत्यादि । रसादिरूपव्यङ्ग्यस्य गुणीभावो रसवदलङ्कारे दर्शितः; तत्र च तेषामाधिकारिकवाक्यापेक्षया गुणीभावो विव्हृतभृत्वानुयायिराजवत्। व्यङ्ग्यललङ्कारस्य गुणीभावे दीपकादिविषयः ।
अतिरसकृतवाच्येऽपि शब्देऽर्थ: प्रतीममानस्य व्यङ्ग्यस्य कदाचिद्वाच्यप्राधान्येन काव्यचारुत्वप्रेच्छया गुणीभावे सति गुणीभूतव्यङ्ग्यता, यथोदाहृतम्—‘अनुरागवती सन्ध्या’ इत्येवमादि । तस्यैव स्वयमुक्त्या प्रकाशितत्वेन गुणीभावः, यथोदाहृतम्—‘मडितकालमनसमम्’ इत्यादि । रसादिरूपव्यङ्ग्यस्य गुणीभावो रसवदलङ्कारे दर्शितः; तत्र च तेषामाधिकारिकवाक्यापेक्षया गुणीभावो विव्हृतभृत्वानुयायिराजवत्। व्यङ्ग्यललङ्कारस्य गुणीभावे दीपकादिविषयः ।
(अनु०) अतिरसकृतवाच्य शब्दों से भी प्रतीममान व्यंग्य की कदाचित् वाच्यचारुत्व की अपेक्षा गुणीभाव हो जानेपर गुणीभूतव्यङ्ग्यता हो जाती है, जैसे उदाहरण दिये हुये—‘अनुरागवती सन्ध्या’ इत्यादि में । उसी का अपनी उक्ति से प्रकाशित होने के कारण गुणीभाव जैसे उदाहरण दिये हुये ‘मडितकालमनसमम्’ इत्यादि में । रसादिरूप व्यंग्य का गुणीभाव रसवदलङ्कार में दिखलाया गया; और उसमें उनका आधिकारिक वाक्य की अपेक्षा गुणीभाव विवाह में प्रवृत्त भृत्य के अनुयायी राजा के समान होता है । व्यंग्य अलङ्कार के गुणीभाव में दीपक इत्यादि का विषय होता है ।
तारावती रसध्वनिनि में ही होता है । यही कारण है कि सामान्य व्यञ्जना को काव्य की आत्मा नहीं माना गया है अपितु अनेक बार यह कहा गया है कि काव्य की आत्मा ध्वनि हो होती है । कुछ लोगों ने इस पद्य का अवतरण इस प्रकार लगाया है कि युवतियों का समूह जलक्रीडा के लिये किसी सरोवर में उतरा है जिससे सुन्दरियों के लावण्यरूप द्रव से नदी अधिक सुन्दर बन गई है । उस नदी का ही इस पद्य में वर्णन किया गया है । इस अवतरण में भी इसी प्रकार की योजना करनी चाहिये । ( नदी का वर्णन मानने में ‘लावण्यसिन्धु’ का अर्थ करना पड़ेगा लावण्य से परिपूर्ण नदी अथवा लावण्य के कारण सुन्दरता को प्राप्त नदी । उत्पल इत्यादि शब्दों में तो पहले की बतलाई हुई परिपाटी ही लागू होगी, उसमें उसी प्रकार व्यञ्जनानयें मानी जावेंगी । किन्तु इस व्याख्या में यह दोष है कि एक तो सिन्धु का वर्णन प्रधान हो जाता है नायिका का नहीं । दूसरी बात यह है कुवळय और चन्द्र दोनों का एक में आना भी सिद्ध नहीं होता जो विस्मय का विभाव है । इस व्याख्या से सहृदय व्यक्ति का श्रोवर की ओर आकृष्ट होना सिद्ध होता है नायिका की ओर नहीं, अतः वाच्य अभिलाष का विभाव भी नहीं बनता। अतः यह व्याख्या त्याज्य है ।) अथवा नायिका नदी के निकट स्नान करने के लिये अवतरण हुई है, उसे नायिका का वर्णन हो प्रस्तुत पद्य में किया गया है । चाहे कोई व्याख्या क्यों न की
तारावती रसध्वनिनि में ही होता है । यही कारण है कि सामान्य व्यञ्जना को काव्य की आत्मा नहीं माना गया है अपितु अनेक बार यह कहा गया है कि काव्य की आत्मा ध्वनि हो होती है । कुछ लोगों ने इस पद्य का अवतरण इस प्रकार लगाया है कि युवतियों का समूह जलक्रीडा के लिये किसी सरोवर में उतरा है जिससे सुन्दरियों के लावण्यरूप द्रव से नदी अधिक सुन्दर बन गई है । उस नदी का ही इस पद्य में वर्णन किया गया है । इस अवतरण में भी इसी प्रकार की योजना करनी चाहिये । ( नदी का वर्णन मानने में ‘लावण्यसिन्धु’ का अर्थ करना पड़ेगा लावण्य से परिपूर्ण नदी अथवा लावण्य के कारण सुन्दरता को प्राप्त नदी । उत्पल इत्यादि शब्दों में तो पहले की बतलाई हुई परिपाटी ही लागू होगी, उसमें उसी प्रकार व्यञ्जनानयें मानी जावेंगी । किन्तु इस व्याख्या में यह दोष है कि एक तो सिन्धु का वर्णन प्रधान हो जाता है नायिका का नहीं । दूसरी बात यह है कुवळय और चन्द्र दोनों का एक में आना भी सिद्ध नहीं होता जो विस्मय का विभाव है । इस व्याख्या से सहृदय व्यक्ति का श्रोवर की ओर आकृष्ट होना सिद्ध होता है नायिका की ओर नहीं, अतः वाच्य अभिलाष का विभाव भी नहीं बनता। अतः यह व्याख्या त्याज्य है ।) अथवा नायिका नदी के निकट स्नान करने के लिये अवतरण हुई है, उसे नायिका का वर्णन हो प्रस्तुत पद्य में किया गया है । चाहे कोई व्याख्या क्यों न की
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उदाहरणमिति । एतच्च प्रथमोद्योत एव निरुपितम् । अनुरागशब्दस्य चाभिलाषे तदुपरक्तत्वलक्षणया लावण्यशब्दवत् प्रत्तितिरिल्यभिमायेणातिरसृतवाच्यत्वमुक्तम् । तस्यैवेतित । वस्तुमात्रस्य । रसादीति । आदिशब्देन भावादयः रसवच्च्छब्देन प्रेयस्विम्रुतयोरड्कार उपलक्षितः । नन्वस्यर्थं मुख्यानुभवस् रसादे: कथं गुणीभावे वा कथमचारुत्वं न स्यादित्यादृश्य प्रत्युत सुन्दरता भवति ति प्रसिद्धदर्शन्तमुखेन दर्शयति—तत्र चेति । रसवदाद्यङ्कारविषये । एवं वस्तुनो रसादेश्व गुणीभावं प्रदर्श्यालङ्कारात्मनोडपि तृतीयस्य व्यङ्ग्यप्रकारस्य तं दर्शयति-व्यङ्ग्यालङ्कारस्येति । उदाहरणे: ॥ ३४ ॥
'उदाहरण दिया गया' यह । यह तो प्रथम उद्योत में ही निरुपित कर दिया गया । और अनुराग शब्द की उसके उपरक्तत्व की लक्षणा से अभिलाष में लावण्य शब्द के समान प्रतीति होती है इस अभिप्राय से अतिरसृतवाच्यत्व कह दिया गया । 'उसी का' यह । वस्तुमात्र का । 'रसादि' यह । आदि शब्द से भाव इत्यादि और रसवत् शब्द से प्रेयस्वी इत्यादि अलङ्कार उपलक्षित होते हैं। ( प्रस्तुत ) अत्यन्त प्रधानभूत रस इत्यादि का गुणीभाव कैसे होता है ? अथवा गुणीभाव होनेपर अचारुता क्यों न हो ? यह शङ्का करके प्रसिद्ध दर्शन्त के द्वारा प्रकार वस्तु और रस इत्यादि का गुणीभाव दिखलाकर अलङ्कारात्मक तृतीय व्यङ्गय प्रकार के भी उसको ( गुणीभाव को ) दिखलाते हैं—'व्यङ्ग्यालङ्कार का' यह ।
तारावती जय यमकादिरात्नक व्यङ्गयार्थ के वाच्यार्थ के द्वारा अधिगत होता है । इसीलिये प्रत्येक पक्ष में व्यङ्गय को गुणीभूत ही मानना पड्ता । वस्तुव्यञ्जना का दूसरा प्रकार वह होता है जिसमें वाच्यार्थ का तिरस्कार नहीं होता । ऐसे शब्दों से जब व्यङ्गयार्थ की प्रतीति होती है तब कभी-कभी काव्यचारुता की दृष्टि से वह व्यङ्गय भी वाच्य की अपेक्षा गुणीभाव को प्राप्त हो जाता है। जैसा कि 'अनुरागवती सन्ध्या' इत्यादि में पहले उदाहरण दिया जा चुका है । यह उदाहरण प्रथम उद्योत में दिया जा चुका है और इसकी व्याख्या भी की जा चुकी है । ( यह समासोक्ति अलङ्कार का उदाहरण है । यहाँ सन्ध्या और दिवस का वर्णन किया गया है, किन्तु उनका बाघ नहीं होता । अपतु दम्पति-व्यवहार बना देती हैं । इसीलिये यह गुणीभूतव्यङ्गय है । ) अनुराग शब्द का अर्थ है वस्तु का उपरक्तत्व करना । इस शब्द का अभिलाषा में प्रयोग अनादि परम्परा से
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लावण्य के समान रूढ़ खप में होता है। सन्ध्या के अर्थ में उपरंजन प्रत्यक्ष सिद्ध है; किन्तु अभिलापा में उसका प्रयोग निरूढ़ लक्षणा के रूप में किया गया है। इसीलिये इसे अतिरसकृतवाच्य कह दिया गया है। वस्तुव्यंजनाद्दी कहीं-कहीं पर उस अवस्था में भी गुणीभूत हो जाती है जब कि उत्ती के द्वारा उसका स्वयं प्रकाशन कर दिया जाय। जैसे-‘यह जानकर कि विट सखेत काल को जानता चाहता है उस चतुर नायिका ने हँसते हुये नेत्रों से अभिप्राय को प्रकट करते हुये लीलाकमल को सिकोड़ लिया।’ यहाँ पर लीलाकमल को सिकोड़ने से सांयकाल की व्यंजना होती है तथापि कवि ने ‘आकृत’ (अभिप्राय) शब्द का प्रयोग कर उस व्यंजना की ओर स्वयं सङ्केत कर दिया है ‘अभिप्राय’ इस वाच्य अंश की व्याख्या करने के लिये ‘लीलाकमल निमोलन’ के व्यङ्ग्य को समझाना अनिवार्य है। अतएव वाच्यांग होने के कारण यह व्यङ्ग्य गुणीभूत हो गया है। रस इत्यादि व्यङ्ग्यों की गुणीभावरूपता रसवदलङ्कार में दिखलाई जा चुकी है। रसवत् शब्द उपलक्षण है। (रस के अलङ्कार होनेपर परक है। इससे प्रयस्त इत्यादि का उपलक्षण हो जाता है। रसवत् अलङ्कारभाव के अपरांग होनेपर प्रेयस्, रसाभास और भावाभास के अपरांग होनेपर ऊर्जस्वी, भावशान्ति के अपरांग होनेपर समाहित ये प्राचीन आलङ्कारिकों के बतलाये हुये अलङ्कार हैं। इसी प्रकार भावोदय, भावसन्धि, भावशवलता, शब्दशक्तिमूल और अर्थशक्तिमूल ध्वनियों की भी अपरांगता अलङ्कार की कोटि में आती है। इनका विस्तृत विवेचन काव्यप्रकाश के पांचवें उल्लास के प्रारम्भ में किया गया है।) (प्रश्न) अत्यन्त प्रधान रूप में स्थित रस इत्यादि का गुणीभाव कैसे हो सकता है ? यदि गुणीभाव हो जाय तो अनौचित्य क्यों न आयेगी ? यह शङ्का करके उत्तर के रूप में पूर्व यह कहा जा सकता है कि प्रस्तुत सुन्दर ही हो जाता है। इस विषय में यह एक प्रसिद्ध दृष्टान्त दिया जा सकता है कि जैसे यदि किसी नौकर का विवाह हो और उसकी बारात में राजा चला जाय तो राजा अपने नौकर की अपेक्षा वहाँ पर गौण ही होगा तथापि राजा के बारात में आ जाने से उस बारात की शोभा बढ़ ही जाती है। इसी प्रकार यदि किसी अर्थ में रस पोषक बन जाय तो उस काव्य का सौन्दर्य ही बढ़ जाता है। जब आधिकारिक (प्रधान) वाक्यार्थ के प्रति रसगुणीभूत हो जाते हैं तब उनमें गुणीभूतव्यंग्यता आ जाती है। आधिकारिक का अर्थ है वह वस्तु जिसे फल का स्वामित्व प्राप्त हो जाय (अधिकार: फले स्वाम्यमधिकारी च तत्प्रभुः)। इस प्रकार का फल किसी एक वाक्यार्थ को होता है। उसकी सहायता करनेवाले सभी तत्त्व गुणीभूत हो जाते हैं। यह तो हुई वस्तु और रसव्यंजनाओं के गुणीभूत होने की बात। अब
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तथा— प्रसन्नगम्भीरपदाः काव्यबन्धाः सुखावहाः । ये च तेषु प्रकारोऽयमेव योग्यः सुमेधसT ॥ ३३ ॥
उसी प्रकार— 'प्रसन्न और गम्भीर पदवाले जो सुखावह काव्यबन्ध हैं उनमें बुद्धिमान् मनुष्य को इसप्रकार ( काव्यमेद ) की योजना करनी चाहिये ॥ ३३ ॥
अलङ्कार व्यञ्जना को लीजिये—दीपक इत्यादि के विषय में व्यङ्ग्य अलङ्कार गुणीभाव को प्राप्त हो जाता है । ( दीपक अलङ्कार वहाँ पर होता है जहाँ प्रकृत और अप्रकृत के एक धर्म का निर्देश किया जाय; जैसे—‘कृपणों के धन, सर्पों के फन की मणि, सिंहों के केसर और कुलबालिकाओं के स्तन तब तक कौन छू सकता है जब तक वे मर न जायँ ।' यहाँ कुलबालिकाओं के स्तन प्रस्तुत वण्यँ विषय हैं और कृपणों के धन इत्यादि अप्रस्तुत । इससे उपमालङ्कार की व्यञ्जना होती है कि—कुलबालिकाओं के स्तन कृपणों के धन, सर्पों की फणमणियों और सिंहों के केसरों के समान स्पर्श में अशक्य होते हैं । इस प्रकार यहाँ व्यङ्ग्य अलङ्कार उपमा है और वाच्य दीपक । उपमा का मूलाधार होता है साधरम्यविधान और दीपक का मूलाधार है कई एक अप्रस्तुतों की लड़ी सी पिरो देना । यहाँ पर चमत्कार साहश्य में नहीं अपितु कई एक अप्रस्तुतों के उपादान में है अतः व्यङ्ग्य उपमा गौण हो गई है और वाच्य दीपक प्रधान । अतः यहाँ वाणीभूतव्यङ्ग्य का उदाहरण है । इसी प्रकार हस्त्रान्त इत्यादि दूसरे सादृश्यमूलक अलङ्कारों में भी उपमा गर्भित रहती है और गुणीभूत हो जाती है । इस प्रकार वस्तु, रस और अलङ्कार तीनों प्रकार के व्यङ्ग्यार्थों को गुणीभाव प्राप्त हो जाता है ।
अगूढमपरस्यादृश्य वाच्यसिद्धयङ्गमस्फुटम् । सन्दिग्धघतुल्यप्राधान्ये काक्षितममुन्दरम् ॥ व्यङ्ग्यमेवं गुणीभूतव्यङ्ग्यस्याष्टौ भिदा स्मृता: ॥
अर्थात् ( १ ) अगूढ ( २ ) अपरांग, ( ३ ) वाच्यसिद्धयङ्ग, ( ४ ) अस्फुट, ( ५ ) सन्दिग्धघतुल्यप्राधान्य, ( ६ ) तुल्यप्राधान्य, ( ७ ) काक्षितम और ( ८ ) अमुन्दर, ये ८ भेद गुणीभूतव्यंग के होते हैं ।
यद्यपि इसी रूप में ध्वन्यालय में नहीं गिनाया गया है तथापि विवेचन करने पर अवगत होता है कि इनमें प्रत्येक का मूल आधार ध्वन्यालय में विद्धमान है ।
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ये चैतेडपरिमितस्वरूपा अपि प्रकाशमानास्तथाविधार्थेरमणीयाः सन्तो विवेकिनां सुखावहाः काव्यवन्धास्तेषु सर्वेष्वेवायं प्रकारो गुणीभूतव्यङ्ग्यचो नाम योजनीयः । यथा—लच्छी दुहिदा जामाउअ हरिओ तस्स धारणाइअ गअणा । आमिअमिअअअ अ सुआ अहो कुडुम्बं महोअहिअो ॥
ये जो अपरिमित स्वरूपवाले भी प्रकाशमान और उस प्रकार के अर्थ से रमणीय होकर विवेकियों को सुख देनेवाले काव्यवन्ध हैं उन सर्वमें इसी गुणीभूत व्यंग्य नामक प्रकार की योजना करनी चाहिये । जैसे— 'उसकी पुत्री लक्ष्मी, जामाता हरि, गृहिणी गङ्गा, अमृत और मृगाक्षी ये पुत्र हैं; महासागर का कुटुम्ब आश्रर्यजनक है ।
एवं प्रकाशत्रयस्यापि गुणभावे प्रदर्श्ये बहुत्तरलक्ष्यच्यापकतास्येति दर्शयितुमाह—तथेति । प्रसन्नानि प्रसादगुण्ययोगाद्गभीराणि च व्यङ्ग्यार्थोंपेक्षकरत्वात्पदानि येषु । सुखावहा इति चारुत्वहेतुः । तत्राद्यमेव मकार इति भावः । सुमेधसेभि । यस्यैतत् प्रकारं तत्र योजयितुं न शक्तः स परमलीकसहृदयभावनामुकुलितललोचनोक्र्योपहसनीयः स्यादिति भावः ।
इस प्रकार तीनों प्रकारों के गुणीभाव को दिखलाकर इसकी व्यापकता बहुत अधिक लक्ष्यों में है यह दिखलाने के लिये कहते हैं—'तथा' यह । प्रसाद गुण योग से प्रसन्न और व्यङ्ग्यार्थ की अपेक्षा करते हुये गभ्भीर पद हैं जिनमें । सुखावहा इससे चारुताहेतु ( बताया गया है । ) भाव यह है कि उसमें इसी प्रकार की योजना करनी चाहिये । 'बुद्धिमान् के द्वारा' यह । जो इस प्रकार को उस ( काव्य ) में संयोजित करने में समर्थ नहीं है वह केवल मिथ्या 'सहृदयत्व की भावना से मुकुलित नेत्रवाला' इस उक्ति से उपहासनीय ही हो जाय ।
उपर यह सिद्ध किया गया है कि वस्तु, रस और अलङ्कार ये तीनों प्रकार के व्यंग्यार्थ गुणीभूत हो जाते हैं । अब इस ३५ वीं कारिका में यह बताया जा रहा है कि गुणीभूतव्यङ्गय का क्षेत्र कम नहीं है । यह भी बहुत अधिक क्षेत्र में व्याप्त है । साथ ही इसका महत्व भी कम नहीं है, काव्य की इस विधा का उपयोग तो उच्चकोटि के काव्यों में भी किया जा सकता है । इस कारिका का आशय यह है कि 'बुद्धिमान् कवि को चाहिये कि इस प्रकार की योजना ऐसे काव्यों में करे जिसमें पदयोजना प्रसाद गुण से परिपूर्ण होने के कारण बहुत स्पष्ट तथा संशयहीन हो
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प्रकारोद्यं गुणीभूतव्यंग्योऽपि ध्वनिरूपताम् । रसादितात्पर्यपर्यालोचनया पुनः ॥
तथा व्यंग्यार्थ का आश्रेप करते के कारण उनमें गम्भीरता आ गई हो; इस प्रकार के काव्यबन्ध गुरूतर होते हैं । इन काव्यों का स्वरूप अपरिमित होता है और व्यंग्यार्थ की रमणीयता से ओतप्रोत होकर तथा प्रकाश में आकर ये विवेकियों को मुख देते हैं । ( यहाँ पर ध्वनिकार का आशय यही है कि ध्वनिकार्य तो रमणीय होता ही है साथ ही गुणीभूतव्यंग्य का महत्व भी कम नहीं है । यहाँ पर दो प्रकार का पाठ अधिगत होता है—दीर्घिति में 'ये च तेषु प्रकारोड्यमेवं योज्यः सुमेधसा' इस पंक्ति में 'एवम्' पाठ रखा गया है और उसकी व्याख्या की गई है कि बतलाये हुये तीनों प्रकारों से योजना करनी चाहिये । इस व्याख्या में सबसे बड़ी अनुपपत्ति यह है कि गुणीभूतव्यंग्य की योजना के तीन प्रकारों का उल्लेख ध्वनिकार ( कारिकाकार ) ने नहीं किया है उसका उल्लेख तो आलोककार ने किया है । अतः ध्वनिकार के मत से यह बतलाना कि गुणीभूतव्यंग्य की योजना के तीन प्रकार होते हैं ठीक नहीं है । दूसरे पाठ निर्णयसागरमुद्रणालय प्रति का है जिसमें 'एवम्' के स्थान पर 'एव' रखा गया है । इसके अनुसार प्रस्तुत कारिका का सार यह है कि उत्तमकोटि के काव्यों में गुणीभूतव्यंग्य का ही योग करना चाहिये । इसमें भी यह आपत्ति आती है कि गुणीभूतव्यंग्य मध्यम कोटि का काव्य माना जाता है' उत्तम कोटि का नहीं । अतः उत्तम कोटि के काव्य में केवल इसकी ही योजना करनी चाहिये यह कहना कुछ संगत प्रतीत नहीं होता । यदि यह कहा गया होता कि इसकी भी योजना करनी चाहिये तब भी कोई बात नहीं थी । मेरी समझ में इस प्रकरण की व्याख्या इस प्रकार की जानी चाहिये—सर्वत्र व्यंग्यार्थ की ही प्रधानता होती है, अन्यथा किसी भी रचना को काव्यरूपता प्राप्त ही नहीं हो सकती । कारण यह है कि ध्वनि को ही काव्य की आत्मा स्वीकार किया गया है और किसी भी रचना को ध्वनिरूपता तभी प्राप्त होती है जब कि उसमें व्यंग्यार्थ की प्रधानता हो । स्वयं गुणीभूतव्यंग्य भी ध्वनिकाव्य के अन्तर्गत ही आता है जैसा कि ध्वनिकार ने स्वयं कहा है—
प्रकारोद्यं गुणीभूतव्यंग्योऽपि ध्वनिरूपताम् । रसादितात्पर्यपर्यालोचनया पुनः ॥
इस कारिका का आशय यही है कि किसी काव्य को गुणीभूतव्यंग्य केवल इसी दृष्टि से कहा जाता है कि उसमें एक व्यंग्यार्थ गौण हो जाता है । रसव्युत्पत्ति तो सर्वत्र प्रधान होती ही है । क्योंकि जबतक कवि का वर्ण्यविषय से भावात्मक सम्बन्ध नहीं होता अथवा कवि पाठकों का भावात्मक सम्बन्ध वर्ण्यविषय से स्थापित नहीं कर सकता तबतक रचना न तो सद्ददयददयाह्लादकारिणी होती है और न हृदयसंवादी ही होती है ।
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काव्यरूपता को ही धारण कर सकती है। अतः रसादि की प्रधानता सर्वत्र सिद्ध ही हो जाती है। अव काव्य के दो भेद किये जा सकते हैं—(१) जहाँ वाच्यार्थ में कोई विशेष सौन्दर्य नहीं होता और न कोई अन्य व्यङ्ग्यना वाच्यार्थ की सहा-
यिका होती है; केवल वाच्यार्थ ही रसादिव्यङ्ग्यना करने में समर्थ होता है। वहाँ पर प्रथम प्रकार का काव्य होता है। (२) दूसरे प्रकार का काव्य वह होता है जहाँ पर्यवसान में भावात्मक चमत्कार तो होता ही है और रस इत्यादि की व्यञ्जना सहृदयहृदयाह्लादन में समर्थ होती ही है, साथ में उसमें मधुरवर्तिनी एक और व्यङ्ग्यना होती है। इस प्रकार के काव्य में वाच्यार्थ या तो इतना उत्कृष्ट कोटि का होता है कि मङ्गयत्ना व्यङ्गय उसके सामने दब जाता है अथवा वाच्यार्थ की पूर्व्ति ही व्यङ्गयार्थ के द्वारा होती है। स्वाभाविक बात है कि इस प्रकार का काव्य प्रथम प्रकार की अपेक्षा अधिक उत्कृष्ट होता है। क्योंकि रसादि में पर्यवसान तो दोनों में एक जैसा होता है। प्रथम प्रकार में वाच्यार्थ अधिक उत्कृष्ट नहीं होता किन्तु इस प्रकार में वाच्यार्थ अधिक उत्कृष्ट होता है। प्रथम प्रकार में वाच्यार्थ में रमणीयता उत्पन्न करनेवाला कोई अन्य व्यङ्ग्यार्थ नहीं होता किन्तु इस प्रकार में कोई अन्य तत्त्व अभिव्यक्त होकर वाच्यार्थ में रमणीयता का आधार कर देता है। इसी मन्तव्य से यहाँ पर कहा गया है कि उच्चकोटि की रचनाओं में इसी प्रकार की योजना करनी चाहिये।
आशय यह है कि वही काव्य उत्कृष्ट माना जाता है जिसमें वाच्यार्थ चमत्कारपूर्ण हो और उसमें किसी व्यङ्गयार्थ के द्वारा नवीन रमणीयता का आधार किया जा रहा हो, साथ ही उसकी चरमपरिणति रसादि-ध्वनि में हो। यहाँ पर यह भी ध्यान रखना चाहिये कि ध्वनिकार ने कहीं पर भी ध्वनिकाव्य को उत्तम और गुणीभूतव्यङ्ग्य को मध्यम काव्य नहीं कहा है।
यही बात आलङ्कारिक और लोचनकार के मत से भी सिद्ध होती है। इन आचार्यों ने भी गुणीभूतव्यङ्ग्य को ध्वनिकाव्य का सारभूत तत्त्व माना है। साथ ही इन आचार्यों ने कहीं भी गुणीभूतव्यङ्ग्य के भेदों का उल्लेख नहीं किया है। यद्यपि भेदों के विभिन्न रूपों का परिगणन नहीं पाया जाता तथापि उसका मूल ध्वन्यान-
लोक में पाया जाता है। उनमें कुछ भेद तो रसप्रवण होकर वस्तुतः काव्योत्कर्ष का कारण होते हैं जैसे अपराङ्ग, वाच्यसिद्ध्यङ्ग, सन्दिग्धप्राधान्य, तुल्यप्राधान्य इत्यादि तथा कुछ भेद काव्यापकर्ष के भी परिचायक होते हैं जैसे अगूढ़, अस्फुट, असुन्दर इत्यादि गुणीभूतव्यङ्ग्य। इन पिछले प्रकार के गुणीभूतव्यङ्ग्यों को ही मध्यम-काव्य कहना ठीक होगा; प्रथम प्रकार के गुणीभूतव्यङ्ग्य तो उत्तम काव्य कहलाने के अधिकारी हैं, क्योंकि उनमें एक के स्थान पर दो व्यङ्ग्य होते हैं—एक
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लक्ष्मी: सकलजनाभिलाष्यभूमीमिदंहिता । जामाता हरि: य: समस्तभोगापवर्गदानसततौचमी । तथा गृहिणी गङा यस्या: समभिलषणीये सर्वस्मिन्वस्तुन्यनुपहत उपायभाव: । अमृतमृगाङ्कदौ च सुतौ, अमृतसिंहवारुणी । तेन गङ्गास्नानहरिचरणाराधनाद्यु पाय-प्रातलब्धया लक्ष्म्याश्रयत्नेऽप्यचानयोज्यप्रमोक्षलक्षण मुख्यफलमिति श्रेयोऽर्थसारमूर्तता प्रतीयमाना सती अहो कुटुम्बं महोदधेरित्यहो शब्दाच्छ गुणीभावमनुभवति ॥ ३५ ॥
सब लोगों को अभिलाषा का स्थान लक्ष्मी पुत्री है । दामाद हरि हैं जो समस्त भोग और अपवर्ग के देने में निरंतर उद्योग करनेवाले हैं तथा गृहिणी गंगा हैं जिनका अभिलषणीय सभी वस्तु में उपायभाव उपहत नहीं होता । अमृत और मृगांक दो पुत्र हैं, अमृत यहां पर वारुणी है । इससे गंगास्नान हरिचरणाराधान आदि सैकड़ों उपायों से प्राप्त लक्ष्मी का चन्द्रोदय पानगोष्ठी का उपभोग रूप मुख्य फल है इस प्रकार तीनों लोकों की सारभूतता प्रतीयमान होकर और 'अहो कुटुम्बं महोदधेः' इसके 'अहो' शब्द से गुणीभाव का अनुभव करता है ।
प्रधानीभूत होकर ध्वनिरूपता को धारण कर लेता है और दूसरा वाच्यार्थ में उत्कर्ष का आधान करता है । साथ ही उसमें वाच्यार्थ भी उत्कृष्ट कोटि का होता है । इसी दृष्टि से यह कहा गया है कि उत्तमतम काव्यों में इसी प्रकार की योजना करनी चाहिये । इसीलिये लोचन में अधिक बल देकर लिखा गया है—‘तत्रायमेव प्रकार इति भावः 'बुद्धिमान् कवि को इसकी योजना करनी चाहिये' इस कथन में बुद्धिमान् शब्द का आशय यह है कि वही कवि काव्यमर्मज्ञ कहा जा सकता है जो अपनी रचना में इस प्रकार की योजना करना जानता है । जो ऐसा नहीं करपाता उसके लिये सहृदय व्यक्ति यही कहेंगे कि उसका सहृदय कहना और अपने को सहृदय समझना बिल्कुल झूठा है और वह अपने को सहृदय समझने में इतना अन्धा हो गया है कि वह काव्य के वास्तविक सौन्दर्य को परखने की चेष्टा ही नहीं करता । इस प्रकार वह सहृदय समाज में उपहास पात्र ही बन जाता है । एक उदाहरण लीजिये—
'महासागर के कुटुम्ब को देखकर आश्चर्य होता है—लक्ष्मी तो उसकी पुत्री है, भगवान् विष्णु उसके दामाद है, गंगा उसकी गृहिणी है और अमृत तथा चन्द्रम ये दोनों उसके पुत्र हैं ।
( उक्त पद्य कहा । से लिया गया है । यह ज्ञात नहीं होता । लोचन में इसकी व्याख्या कुछ विचित्र प्रकार से की गई है । अन्य टीकाकारों ने सीधी-साधी व्याख्या कर दी है जो लोचन की व्याख्या से मेल नहीं खाती । लोचन की व्याख्या को देखने से ज्ञात होता है कि प्रस्तुत पद्य ऐसे व्यक्ति के विषय में कहा गया है जिसकी
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तृत्ति धार्मिक रही है और उस धार्मिकता की कृपा से उस व्यक्ति ने बहुत अधिक धन तथा ऐश्वर्य प्राप्त कर लिया है। अब वह अपने धन का उपभोग उन्मुक्त रूप में अपनी विषय-वासनाओं की तृत्ति के लिये करता है तथा उसके जीवन में आनन्द-प्रमोद की ही प्राधान्य है। उसे व्यक्ति के विषय में कोई तत्त्वज्ञ व्यक्ति साधारभियान से उच्च रसद कह रहा है।) 'लक्ष्मी उसकी पुत्री है' कहने का आशय यह है कि लक्ष्मी समस्त व्यक्तियों की अभिलाषा का एक बहुत बड़ा विषय होती है वह तो समुद्र को पुत्री रूप में ही प्राप्त है। भगवान् विष्णु दामाद हैं जो कि समस्त व्यक्तियों समुद्र को पुत्री रूप में ही प्राप्त है। भगवान् विष्णु दामाद हैं जो कि समस्त व्यक्तियों
को सभी प्रकार के भोग और मोक्ष देते में निरन्तर उद्योग करते रहते हैं। इसी प्रकार गङ्गा गृहिणी हैं जिनका कि एकमात्र व्रत समी व्यक्तियों की समी प्रकार की अभिलषणीय वस्तुओं को प्रदान करना है। गङ्गा जी का आश्रय कभी भी मिथ्या नहीं होता और जिस वस्तु की अभिलाषा की जाती है वह वस्तु गङ्गा जी की अनु-कम्पा से स्वयम् प्राप्त हो जाती है। जाता है। अमृत और मुग्धा उसके पुत्री हो हैं। (यहाँ पर अमृत का अर्थ है वारुणी। (क्योंकि अमृत सर्वजनसुलभ नहीं है। इसमें व्यङ्ग्यार्थ यह निकलता है कि गङ्गास्नान हरिचरण राघव इत्यादि सैकड़ों धार्मिक कृत्यों से जो लक्ष्मी प्राप्त की जाती है उसका एकमात्र यही मुख्य फल होता है कि चन्द्रोदय
का आनन्द लिया जाय और उसमें मदिरा पान गोष्ट्री का उपभोग किया जाय। यह उपभोगमय वन जाना ही तीनों लोकों का सारभूत तत्व है (और उसे अमुक व्यक्ति ने अत्यधिक मात्रा में प्राप्त कर लिया है।) यह व्यङ्ग्यार्थ बहुत ही सुन्दर है।) तथा प्रतीतिगोचर होकर 'समुद्र के कुभ्यम पर आश्रय है' इस वाक्य में जो वाच्यार्थ आश्रय है उसका यह अंग हो गया है और उसके प्रति गुणीभूत व्यङ्ग्य का अनुवेध करता है। ॥ ३५ ॥
३५ वीं कारिका में यह सिद्ध किया जा चुका है कि जिन काव्यों में अलङ्कार नहीं होता और उनमें काव्यार्थ अधिक स्फुट हो जाता है उनमें एक तो अलङ्कार का अभाव दूसरे काव्यार्थ की वाच्यरुपता; ये दोनों तत्व मिलकर काव्य को अत्यन्त तुच्छ बना देते हैं। यदि वहाँ पर इस गुणीभूतव्यङ्ग्य का योग हो जाता है तो वह गुणीभूतव्यङ्ग्य ही उस काव्य का अन्तरारिक तत्व अर्थात् उसकी आत्मा बन जाता है और इस प्रकार वह काव्य पवित्र हो जाता है। (वाच्यार्थ के निम्नस्तर पर होते हुए भी व्यङ्ग्यार्थ इसीलिये गुणीभूत हो जाता है कि वह वाच्यार्थ की पुष्टि में सहायक हो जाता है।) यह तो हुई ३५ वीं कारिका की बात। ३६ वीं कारिका में यह दिखलाया गया है कि अलङ्कारों में भी अधिकाधिक रमणीयता व्यङ्ग्यार्थ के योग से ही आती है। कारिका का आशय यह है—
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वाच्यालङ्कारवर्गोंडयन् व्यङ्ग्यांशानुगमे सति । प्रायेणैव परां छायां विभ्रल्लङ्कदये निरीक्ष्यते ॥३६॥
वाच्यालङ्कार वर्गोंडयन् व्यङ्ग्यांशस्यानुसालङ्कारस्य वस्तुमात्रस्य वा यथायोगमनुगमे सति—चछायानतिशायि विभ्रल्लङ्कदर्शनं दृश्यते। स तु तथारूपः प्रायेण सर्व एव परीक्ष्यमाणो लदये निरीक्ष्यते । तथा हि—दीपकसमासोक्त्यादिवदन्येडप्यलङ्काराः प्रायेण व्यङ्ग्यालङ्कारान्तर वस्त्वन्तरसंस्पर्शिनो दर्शयन्ते । यतः प्रथमं तावत्तिशयोक्किगर्भीभूता सर्वालङ्कारेषु शक्यक्रिया । कृतैव च सा महाकविभिः कामपि काव्यच्छायां पुष्णति, कथम् हातिशययोगिता स्वविषयौचित्येन क्रियामाणा सती काव्येनोत्कर्ष मावहेत् ।
(अनु०) 'यह वाच्यालङ्कार वर्ग व्यङ्ग्यांश के अनुगम करने पर प्रायः लद्न में परा छाया को धारण करते हुये देखा जाता है' ॥ ३६ ॥ यह वाच्यालङ्कार का समूह व्यङ्ग्यांश अलङ्कार या वस्तुमात्र के यथायोग्य अनुगमन होने पर छाया की अधिकता को धारण करते हुये एक देश के रूप में लक्षणकारों द्वारा दिखलाया गया है । वह उस प्रकार का तो परीक्षा किये जाने पर प्रायः सभी ही लद्न में देखा जाता है । वह इस प्रकार—दीपक समासोक्ति इत्यादि के समान अन्य भी अलङ्कार दूसरे व्यङ्ग्य अलङ्कार या दूसरी वस्तु का स्पर्श करते हुये देखे जाते हैं । क्योंकि पहले तो सव अलङ्कारों में अतिशयोक्तिगर्भीभूता काव्यचछाया को पुष्ट करती है । अपने विषय के औचित्य के साथ की हुई अतिशययोगिता काव्य में उत्कर्ष का आयाम क्यों न करे ?
एवं निरलङ्कारेऽप्यनतायां तुच्छतयैव भासमानमुनातःसारेण काव्यं पङ्कवत्-कृतमित्युकवाचलङ्कारस्याप्यनेनैव रम्यतरस्वमिति दर्शयति—वाच्येति । अंशतश्च गुणमात्रत्वम् । एकदेशेनैनेति । एकदेशविवर्तिनिरूपके—
लोचन इस प्रकार अलङ्काररहितों में ( अर्थ के ) उत्तान हो जाने पर ( ऊपर उठ जाने पर तुच्छ रूप में ही भासित होनेवाला काव्य अन्तस्तत्त्ववाले इस ( गुणीभूत व्यङ्ग्य ) के द्वारा पक्वित कर दिया गया है यह कहकर अलङ्कार की भी अधिक रमणीयता इसी के द्वारा होती है यह दिखलाते हैं—वाच्य इत्यादि । अंशतः का अर्थ है गुणमात्रत्व । 'एक देश के रूप में' यह । इसके द्वारा एकदेशविवर्ति रूपक दिखलाया गया है ।
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राजहंसैरवीज्यन्त शारदैव सरोरुपा: ।
इत्यत्र हंसानां वाच्यमरत्वं प्रतीयमानं तन्न्रपा इति वाच्येऽर्थे गुणतां प्राप्तमलङ्कारकारैर्या वदेव दर्शितं तावदसुना द्वारेग सूचितोऽयं प्रकार इत्यर्थ: । अन्ये त्वेकदेशेन वाच्यार्थमपैचित्र्यमात्रेणेतदनुदिश्रमेव व्यपेक्षिचकित्र । व्यङ्ग्यं यदलङ्कारान्तरं वस्त्वन्तरं संसृष्टशान्ति ये स्वात्मन: संस्कारायाश्लिष्यन्तीति ते तथा । महाकविविभ्रिति । कालिदासादिभि: । काव्यशोभां पुष्टयिति यदुक्तं तत्र हेतुमाह-कयं होति । हि-इब्दौ हेतौ ।
यहाँ पर हंसों का जो चामरत्व प्रतीत होता है वह 'तन्न्रपा' इति वाच्येऽर्थे में गुणता को प्राप्त हो गया है यह अलङ्कारकारों ने जितना कुछ दिखलाया है उतना इसके द्वारा यह प्रकार सूचित किया गया है । यह अर्थ है । अन्य लोगों ने तो 'एक देश से' अर्थात् वाच्यभागगैचित्र्य मात्र से यह अलङ्कार या हमारी वासना जो अपने संस्कार के लिये स्पष्ट करते हैं या आलिङ्गन करते हैं वे वैसे ही होते हैं । 'महाकवियों के द्वारा' अर्थात् कालिदास इत्यादि के द्वारा । 'काव्यशोभा को पुष्ट करता है' यह जो कहा गया उसमें हेतु वतलाते हैं—'क्यों' यह । 'हि' शब्द का प्रयोग हेतु के लिये
लोचन
'जातु के द्वारा ही सरोवररूपी राजाओं पर राजहंसों से पंखा किया जा रहा था ।' यहाँ पर हंसों का जो चामरत्व प्रतीत होता है वह 'राजाओं पर' इस वाच्य अर्थ में गुणता को प्राप्त हो गया है यह अलङ्कारकारों ने जितना कुछ दिखलाया है उतना इसके द्वारा यह प्रकार सूचित किया गया है । यह अर्थ है । लोगों ने तो 'एक देश से' अर्थात् वाच्यभागगैचित्र्य मात्र से यह अस्पष्ट व्यङ्गया की है। व्यङ्गय जो हमारा अलङ्कार या हमारी वासना उसको जो अपने संस्कार के लिये स्पष्ट करते हैं या आलिङ्गन करते हैं वे वैसे ही होते हैं । 'महाकवियों के द्वारा' अर्थात् कालिदास इत्यादि के द्वारा । 'काव्यशोभा को पुष्ट करता है' यह जो कहा गया उसमें हेतु वतलाते' हैं—'क्यों' यह । 'हि' शब्द का प्रयोग हेतु के
तारावती
'जितना भी वाच्य अलङ्कारों का समूह दिखलाया गया है यदि उसमें व्यङ्गय अर्थ का अनुयायक हो जाता है तो वह बहुत बड़ी छाया ( काव्यशोभा ) को धारण कर लेता है । लक्ष्य में यह बात प्राय: देखी जाती है ।' लक्षणकारों ने यह बात प्रकट देश के द्वारा दिखलाइ है कि व्यङ्गय अलङ्कार और व्यङ्गय वस्तु इन दोनों में कोई एक व्यङ्गय अंश जब वाच्य अलङ्कारों से मिल जाता है तब वाच्य अलङ्कारों में काव्य की अभूतपूर्व शोभा उत्पन्न हो जाती है । यहाँ पर एकदेशविवर्ति रूपक । लक्षणकारों ने रूपक दो प्रकार का माना है—साज्ञ के दो भेद माने गये हैं—समस्तवस्तुविपय और एकदेशविवर्ति । जहाँ पर रूपक के सभी अवयवों का उपादान शब्द के द्वारा वाच्यवृत्ति में किया जाता है उसे समस्तवस्तुविपय साज्ञरूपक कहते हैं और जहाँ रूपक के कुछ अंगों का वाच्य-वृत्ति में प्रकथन किया जाता है और कितिपय अंग अर्थात: समझ लिये जाते हैं उसे एकदेशविवर्ति साज्ञरूपक कहते हैं । इसका उदाहरण—
जितना भी वाच्य अलङ्कारों का समूह दिखलाया गया है यदि उसमें व्यङ्गय अर्थ का अनुयायक हो जाता है तो वह बहुत बड़ी छाया ( काव्यशोभा ) को धारण कर लेता है । लक्षण में यह बात प्राय: देखी जाती है । लक्षणकारों ने यह बात प्रकट देश के द्वारा दिखलाइ है कि व्यङ्गय अलङ्कार और व्यङ्गय वस्तु इन दोनों में कोई एक व्यङ्गय अंश जब वाच्य अलङ्कारों से मिल जाता है तब वाच्य अलङ्कारों में काव्य की अभूतपूर्व शोभा उत्पन्न हो जाती है । यहाँ पर एकदेशविवर्ति रूपक । लक्षणकारों ने रूपक दो प्रकार का माना है—साज्ञ के दो भेद माने गये हैं—समस्तवस्तुविपय और एकदेशविवर्ति । जहाँ पर रूपक के सभी अवयवों का उपादान शब्द के द्वारा वाच्यवृत्ति में किया जाता है उसे समस्तवस्तुविपय साज्ञरूपक कहते हैं और जहाँ रूपक के कुछ अंगों का वाच्य-वृत्ति में प्रकथन किया जाता है और कितिपय अंग अर्थात: समझ लिये जाते हैं उसे एकदेशविवर्ति साज्ञरूपक कहते हैं ।
'शरद् राजहंसों से सरोवररूपी राजाओं पर पंखा झल रही थी ।' यहाँ सरोवरों पर राजाओं का आरोप किया गया है जो कि वाच्य है और राजहंसों पर चमर ( या पंखे ) का आरोप अर्थात: समझ लिया जाता है । इस
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अतिशययोगिता कथं नोऽत्कर्षमावहेत् काव्ये नास्त्येवासौ प्रकार इत्यर्थः। स्वविषये यदौचित्यं तेन चेदर्थदयस्थितेन तामतिशयोक्तिं कवि: करोति।
अर्थ में हुआ है। 'अतिशय का योग क्यों उत्कर्ष को धारण न करे' अर्थात् काव्य में ऐसा प्रकार है ही नहीं। यदि अपने विषय में जो औचित्य उसको हृदय में रखकर उस अतिशयोक्ति को कवि करता है। जैसे भट्टेन्द्रुराज का—
तारावती
प्रकार यहाँ पर एकदेशविवर्ति सादृश्य रूपक है। प्राचीन आचार्यों के इस एकदेशविवर्ति रूपक के निदर्शन से सिद्ध होता है कि प्रतীয়मान अर्थ का कोई ऐसा भी रूप सम्भव है जो वाच्यार्थ का उपकारक होकर काव्यशोभा का आधार क्रिया करता है।
इस प्रकार इन आचार्यों ने मानों गुणीभूतव्यङ्ग्य की सत्ता स्वीकार ही कर ली। यदि अलङ्कारों की ठीक-ठीक परीक्षा की जाय तो ज्ञात होगा कि एकदेशविवर्ति रूपक के विषय में जो बातें कही गई हैं वे वहाँ प्रायः सभी अलङ्कारों के विषय में लागू होती हैं अर्थात् प्रायः सभी अलङ्कारों में व्यङ्ग्यार्थ का संसर्ग होता है।
इस प्रकार के लक्ष्य प्रायः पाये जाते हैं जिनमें वाच्यार्थ का अनुप्राणन व्यङ्ग्यार्थ के द्वारा होता है। कुछ लोगों ने 'एकदेश के द्वारा पुराने आचार्यों ने इस तथ्य की ओर संकेत किया है' इस सन्दर्भ की व्याख्या इस प्रकार की है—एकदेश का अर्थ है केवल वाच्यभाग का वैचित्र्य।
किन्तु यह व्याख्या बिल्कुल स्पष्ट नहीं है और इससे यह ज्ञात नहीं होता कि वाच्यवैचित्र्यमात्र की व्याख्या करने से व्यङ्ग्यार्थ की सत्ता कैसे सिद्ध होती है? अतः 'एकदेश के द्वारा' इस रीति को यहाँ व्याख्या को जानना चाहिए कि लक्षणकारों ने रूपक के एकदेश को व्यङ्ग्य मानकर यह संकेत दिया है कि प्रायः सभी अलङ्कारों में व्यङ्ग्य का अंश मिला रहता है।
अलङ्कारों में व्यङ्ग्यांश के समावेश की बात को इस प्रकार समझना चाहिए—कुछ अलङ्कार ऐसे होते हैं जिनमें दूसरा अलङ्कार व्यक्त हो जाता है जैसे दीपक अलङ्कार में उपमा व्यक्त होती है।
कुछ अलङ्कार ऐसे होते हैं जिनमें वस्तु अभिव्यक्त होकर उस अलङ्कार की सत्ता को पूरा करती है जैसे समासोक्ति में अप्रस्तुत अभिव्यक्त हुआ करता है। इस प्रकार ये अलङ्कार अपने संस्कार के लिये दूसरे व्यङ्ग्य अलङ्कार या व्यङ्ग्य वस्तु को सहारा लिया करते हैं।
केवल यहाँ अलङ्कार ऐसे नहीं हैं अपितु दूसरे अलङ्कार भी व्यङ्ग्य वस्तु या व्यङ्ग्य अलङ्कार का सहारा लेते हुए देखे जाते हैं। सबसे पहले अतिशयोक्ति अलङ्कार को लीजिये। यह एक ऐसा अलङ्कार है जिसके कार्यक्षेत्र का प्रसार सभी अलङ्कारों में दिखलाया
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यद्विश्रमस्य विलोकितेषु बहुशो निस्येमनी लोचने ।
यद्गात्राणि दरिद्रति मतिदिनं लूनावर्जनालवत् ॥
दूर्वांकुरडविडिम्बकक्श्र निबिडो यत्पाण्डिमा गण्डयोः ।
कृष्णे यूति सयौवनासु वनितास्वेषैव वेषस्थितिः ॥
अत्र हि भगवतो मनसि सभाविष्यः सम्भाव्यत एवायमतिशय ईति ।
तत्काल्प्ये लोकोत्तरैव शोभाल्लसति । अनौचित्येन तु शोभा लीयेत एव ।
यथा—अल्पं निमित्तमकारणमनालोच्यैव वेधसा ।
इदमेव विविधं श्रावि भवत्या: स्तनजृम्भणम् इति ।
वीच-वीच में रुक-रुककर होनेवाले दृष्टिपातों में जो कि नेत्र अस्थिरता को प्राप्त हो जाते हैं, काढी हुई कमलिनी की नाल के समान जो कि उसके सारे अंग सूखते चले जा रहे हैं, दूरवांकुरण्ड को भी तिरस्कृत करनेवाली घनी पोलीमा जो कि उसके कपोलों पर व्याप्त है, युवक कृष्ण के विषय में यौवनवती वानिताओं की नस यहाँ वेषस्थिति है ।
यहाँ पर निस्सन्देह कामदेव के समान शरीरवाले भगवान् का सौभाग्य-विषयक अतिशय सम्भावित ही किया जा सकता है, अतः उस काव्य में लोकोत्तर शोभा ही उल्लसति होती है । अनौचित्य से तो शोभा लीन ही हो जाती है। जैसे—'ब्रह्माजी ने तुम्हारे इस होनेवाले इस प्रकार के स्तनविस्तार का बिना ही विचार किये छोटा सा आकार बना दिया ।'
तारावती
महाकवि कालिदास इत्यादि जन किसी अलंकार की योजना जा सकता है । हम करते हैं कि उसमें अतिशयोक्ति गर्भित हो तब वह काव्य किसी विचित्र प्रकार के काव्यसौन्दर्य का पोषक हो जाता है । केवल एक शर्त है कि अतिशयता की योजना में कवि को औचित्य का ध्यान सर्वथा रखना चाहिये, अर्थात् उसे यह देखना चाहिये किस स्यान पर अलंकार व्यञ्जना उपयुक्त रहेगी और कहाँ पर वस्तुव्यञ्जना उचित होगी । इसी प्रकार कहाँ पर कौन अलंकार या कौन वस्तु उचित प्रतीत होगी इस बात का भी ध्यान रखना चाहिये । यदि इस प्रकार के औचित्य को हृदय में रखकर कवि अतिशयोक्ति का सुम्फन करता है तो उससे काव्य अत्यन्त उत्कृष्ट वन जाता है । उदाहरण के लिये भट्टेदुराज की निम्नलिखित उक्ति को लीजिये—
'कृष्ण तरुण है और युवतियाँ भी यौवन से परिपूर्ण है । कृष्ण के प्रति भावना से भरो होने से उनकी वेषस्थिति इस प्रकार की हो रही हैं कि वे रुक-
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भामहेनाप्यतिशयोक्तिलक्षणे यदुक्तम्— सैषा सैवं वक्रोक्तिरनयार्थो विभाव्यते । यत्नोडस्यां कविना कार्यः कोडलङ्कारोडनया विना ॥ इति ।
भामह के द्वारा भी अतिशयोक्ति के लक्षण में जो कहा गया है— वह यह सब वक्रोक्ति ही है; इसके द्वारा अर्थ का विभावन किया जाता है । कवि को इसमें यत्न करना चाहिये; इसके बिना अलङ्कार ही कौन होना है ?
तत्रातिशयोक्त्यमलङ्कारमधितिष्ठति कविप्रतिभाविश्रान्तस्य चारुत्वातिशयस्वलङ्कारमात्रतैवेति सर्चालङ्कारशरीरस्वीकरणयोग्यत्वेनाभेदोपचारात्सैव अलङ्कारान्तरस्यैवं कदाचिद्वाच्यत्वेन कदाचिद्धच्यत्वेन । न्यङ्गचत्वमपि कदाचित्प्राधान्येन कदाचिद्गुणभावेन । तत्र तु पथे वाच्यालङ्कारमार्गः । द्वितीये तु ध्वननावन्तर्भावः । तृतीये तु गुणीभूतव्यङ्गचरूपता ।
वहाँ पर अतिशयोक्ति जिस अलङ्कार को अधिष्ठित करती है कविप्रतिभा के वश में उसमें चारुत्व की अधिकता का योग हो जाता है और की तो अलङ्कारमात्रता ही रहती है—इस प्रकार सभी अलङ्कारों के शरीर को स्वीकार करने की योग्यता के कारण अभेदोपचार से वही सभी अलङ्कारों के रूपवाली होती है, वह कभी वाच्य के रूप में होता है और कभी व्यङ्ग्य के रूप में । व्यङ्ग्य भी कभी प्रधानरूप में और कभी गौण रूप में । उसमें प्रथम पक्ष में वाच्यालङ्कार का मार्ग है । द्वितीय का तो ध्वनि में अन्तर्भाव हो जाता है और तृतीय में तो गुणीभूत व्यङ्ग्यरूपता होती है ।
रुककर कृष्ण को बार-चार देखती हैं जिससे उनके नेत्र स्थिरता को प्राप्त नहीं हो पाते । उनके अंग प्रतिदिन काठी हुई कमलिनियों की नाल के समान क्षीण होते जाते हैं और कपोलों पर पीलीमा दूब के गुच्छे की जैसी फैलती जा रही है ।
तारावती यहाँ कृष्ण के प्रति कामना रखनेवाली वियोगिनी वनिताओं की दशा का अतिशयोक्तिपूर्ण वर्णन है । काठी हुई कमलिनियों के समान सूखना और दूर्वाकाण्ड के समान पाण्डुता यह सब अतिशयोक्तिपूर्ण ही है । किन्तु एक तो यह वर्णन मर्यादित है—अतिशयोक्ति को इतना अधिक नहीं खींचा गया है कि वह एक मजाक सी मालूम पड़ने लगे । दूसरी बात यह है कि इसमें भगवान् कृष्ण के प्रति अनेक स्त्रियों का आकर्षण दिखलाया गया है जोकि अनुचित नहीं है और इससे भगवान्
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नन्वतिशयोक्तिः सर्वालङ्कारेषु व्यङ्ग्यतयान्तर्लीनैवास्त इति यदुक्तं तत्कथम् ? यतो भामहोदतिशयोक्तिं सर्वालङ्कारसामान्यरूपामवादीत । न च सामान्यं शब्दादिप्रतीते: पृथग्भूतया पदार्थनरूढेन चकास्तीति कथमस्य व्यङ्ग्यत्वमित्याशङ्क्याह्—
( प्रश्न ) अतिशयक्ति सभी अलङ्कारों में व्यङ्ग्य रूप में अन्तर्लीन ही रहता है यह जो कहा है वह कैसे ? क्योंकि भामह ने अतिशयोक्ति को सभी अलङ्कारों की सामान्य रूपवाली बतलाया है । विशेष प्रतीति से पृथग्भूत होकर परवर्ती रूप में सामान्य प्रकाशित नहीं होता फिर इसका व्यङ्ग्यत्व कैसा ? यह शङ्का करके कहते
के लोकोत्तर सौभाग्य की व्यञ्जना होती है । भगवान् स्वयं ही कामदेव के समान रूपवान् हैं ! अतएव उनके विषय में जो कुछ कहा गया है वह सब उचित है । औचित्य को लेकर जो अतिशयोक्ति का गुम्फन किया गया है उससे काव्य में लोकोत्तर शोभा उद्भूत हो जाती है । किन्तु जव अनौचित्य का प्रतिबिम्ब होने लगता है तब अतिशयोक्ति सदोष हो जाती है और उसकी शोभा जाती रहती है । उदाहरण के लिये दण्डी की इस उक्ति को लीजिये ।
तारावती
के लोकोत्तर सौभाग्य की व्यञ्जना होती है । भगवान् स्वयं ही कामदेव के समान रूपवान् हैं ! अतएव उनके विषय में जो कुछ कहा गया है वह सब उचित है । औचित्य को लेकर जो अतिशयोक्ति का गुम्फन किया गया है उससे काव्य में लोकोत्तर शोभा उद्भूत हो जाती है । किन्तु जव अनौचित्य का प्रतिबिम्ब होने लगता है तब अतिशयोक्ति सदोष हो जाती है और उसकी शोभा जाती रहती है । उदाहरण के लिये दण्डी की इस उक्ति को लीजिये ।
'ब्रह्माजी ने जब आकाश की रचना की तब सम्भवतः इस वात नर निश्चित नहीं किया कि तुम्हारे स्तन वढ़कर इतने विशाल हो जायेंगे । इसीलिये ब्रह्माजी ने आकाश को इतना छोटा बना दिया ।'
'ब्रह्माजी ने जब आकाश की रचना की तब सम्भवतः इस वात नर निश्चित नहीं किया कि तुम्हारे स्तन वढ़कर इतने विशाल हो जायेंगे । इसीलिये ब्रह्माजी ने आकाश को इतना छोटा बना दिया ।'
यह उक्ति एक किलवाड़ जैसी मालूम पड़ती है और इसकी अतिशयता रमणीयता का दास करनेवाली ही है ।
यह उक्ति एक किलवाड़ जैसी मालूम पड़ती है और इसकी अतिशयता रमणीयता का दास करनेवाली ही है ।
( प्रश्न ) आपकी यह स्थापना कैसे विश्वास नीय हो सकती है कि सभी अलङ्कारों में अतिशयोक्ति व्यङ्ग्य के रूप में अन्तर्लीन रहती है ? भामह ने अतिशयोक्ति को सभी अलङ्कारों का सामान्य रूप माना है । सामान्य कभी भी व्यङ्ग्य नहीं कहा जा सकता । व्यङ्ग्य और सामान्य में यह अन्तर है कि व्यङ्ग्य में पहले तो शब्द से वाच्यार्थ का बोध होता है; फिर वाद में शब्द से ही पृथक् रूप में व्यङ्ग्यार्थ का बोध होता है । किन्तु सामान्य-विशेष के विपय में यह नियम लागू नहीं होता । सामान्य और विशेष दोनों की प्रतीति एकसाथ होती है; आगे पीछे नहीं । साथ ही सामान्य-विशेष दोनों की प्रतीति एकरूप में होती है पृथक् रूप में नहीं । ( जैसे 'यह देवदत्त है' इस वाक्य में देवदत्त का एक अर्थ है एक विशेष व्यक्ति और सामान्य अर्थ है मनुष्यत्व । मनुष्यत्व और विशिष्ट व्यक्ति दोनों का एक साथ एक ही रूप में बोध होता है । न तो यही प्रतीत होता है कि मनुष्यत्व
( प्रश्न ) आपकी यह स्थापना कैसे विश्वास नीय हो सकती है कि सभी अलङ्कारों में अतिशयोक्ति व्यङ्ग्य के रूप में अन्तर्लीन रहती है ? भामह ने अतिशयोक्ति को सभी अलङ्कारों का सामान्य रूप माना है । सामान्य कभी भी व्यङ्ग्य नहीं कहा जा सकता । व्यङ्ग्य और सामान्य में यह अन्तर है कि व्यङ्ग्य में पहले तो शब्द से वाच्यार्थ का बोध होता है; फिर वाद में शब्द से ही पृथक् रूप में व्यङ्ग्यार्थ का बोध होता है । किन्तु सामान्य-विशेष के विपय में यह नियम लागू नहीं होता । सामान्य और विशेष दोनों की प्रतीति एकसाथ होती है; आगे पीछे नहीं । साथ ही सामान्य-विशेष दोनों की प्रतीति एकरूप में होती है पृथक् रूप में नहीं । ( जैसे 'यह देवदत्त है' इस वाक्य में देवदत्त का एक अर्थ है एक विशेष व्यक्ति और सामान्य अर्थ है मनुष्यत्व । मनुष्यत्व और विशिष्ट व्यक्ति दोनों का एक साथ एक ही रूप में बोध होता है । न तो यही प्रतीत होता है कि मनुष्यत्व
और है तथा विशिष्ट व्यक्ति और है और न यही होता है कि पहले विशिष्ट व्यक्ति और है तथा मनुष्यत्व और है ।
और है तथा विशिष्ट व्यक्ति और है और न यही होता है कि पहले विशिष्ट व्यक्ति और है तथा मनुष्यत्व और है ।
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भामहेनेति। मामहेनापि यदुक्तं तत्नाऽडयमेवार्थोऽवगन्तव्य इति दूरेण सम्बन्धः। किं तदुक्तम्—सैषेति। यातिशयोक्तिरलक्षिताऽपि सैव सर्वा वक्रोक्तिरलङ्कारमकारः सर्वे। वक्रोभिधेयशब्दोक्तिरलङ्कारिष्ठा वाचामलङ्कृति:
इति वचनात्। शब्दस्य हि वक्तृवाच्ययोः वक्तृलोकोक्तिरूपेणावस्थितमित्ययमेवासावलङ्कारस्यालङ्कारभावः, लोकोत्तरतैव चातिशयः, तेनातिशयोक्तितः सर्वालङ्कारसामान्यम्। तथाहि—अनया अतिशयोक्त्या, अर्थः सकलजनोपभोगपुराणी—हैं—‘भामह के द्वारा’ यह। भामह के द्वारा भी जो कहा गया है वहाँ भी यही अर्थ समझा जाना चाहिए यह दूर से सम्बन्ध है। वह क्या कहा? ‘वह यह’। जो अतिशयोक्ति लक्षित की गई है वही सब वक्रोक्ति का सब प्रकार है।
‘अभिधेय और शब्द की वक्र उक्ति वाणी का अलङ्कार अभीष्ट है।’ इस वचन से। निस्सन्देह शब्द की वक्ता और अर्थ की वक्ता लोकोत्तर रूप में अवस्थित होना है इस प्रकार यहाँ वह अलङ्कारो का अलङ्कारभाव है और लोकोत्तर होना ही अतिशय है। इससे अतिशयोक्ति सब अलङ्कारों में सामान्य होती है। वह इस प्रकार इस अतिशयोक्ति के द्वारा सभी लोगों के उपभोग के
तारावती का बोध हो और बाद में मनुष्यत्व का।) आशय यह कि व्यङ्ग्यत्व का पौर्वापर्य तथा पृथक्रूपता सामान्य-विशेष भाव में लागू नहीं होते। अतिशयोक्ति और दूसरे अलङ्कारों का भी सामान्य-विशेष भाव सम्वन्ध है। अन्य अलङ्कार विशेष होते हैं और अतिशयोक्ति सामान्य। फिर यह कैसे कहा जा सकता है कि अन्य अलङ्कारों में भी अतिशयोक्ति व्यङ्ग्यरूप में सन्निहित रहती है? (उत्तर) भामह की आशय यह नहीं है कि अतिशयोक्ति सामान्य रूप है अन्य अलङ्कार विशिष्ट रूप। भामह के मत में भी अतिशयोक्ति एक स्वतन्त्र अलङ्कार है तथा दूसरे अलङ्कार भी अपनी स्वतन्त्र सत्ता रखते हैं। अतिशयोक्ति तथा अन्य अलङ्कारों का अभेद सम्वन्ध औपचारिक (लाक्षणिक) है। भामह ने यह कहा है—
‘जिस अतिशयोक्ति का लक्षण किया गया है वही सब वक्रोक्ति है अर्थात् सब अलङ्कारों के प्रकार वह अतिशयोक्ति ही है; क्योंकि इससे अर्थ रमणीयता को प्राप्त कराया जाता है; कवि को चाहिए कि इस अतिशयोक्ति की योजना की ही चेष्टा करे क्योंकि कोई अलङ्कार अतिशयोक्ति के बिना हो ही नहीं सकता।’
(भामह का परिष्कृत पाठ ‘सैषा सर्वत्र वक्रोक्ति:’ है। यही भामह की समस्त उपलबध प्रतियों में पाया जाता है और इसी को अन्य आचार्यों ने भी उद्धृत किया है। किन्तु यहाँ पर आनन्दवर्धन ने ‘सैषा सर्वैव वक्रोक्ति:’ पाठ रखा है और
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कृतोडपि विचित्रतया भास्यते । तथा प्रमोदाद्यनादि विभावतां नीयते । विशेषेण च भाव्यते रसमथोक्रियते इति तावच्चेनोक्तं, तत्र कोडर्थ इत्यत्राह-अभेदोपचारात्सैव सर्वालङ्काररुपेति । उपचार निमित्तमाह— सर्वालङ्कारेत्यादि । उपचार प्रयोजनमाह— अतिशयोक्तिरिव्यादिना अलङ्कारमान्रेत्येवेक्ष्यन्तेन । मुख्यार्थवाचोडप्यन्र च दर्शितः कविप्रतिभावशादिस्यादिना ।
लोचन
कारण पुराना वनाया हुआ भी अर्थ विचित्र रूप में भावित किया जाता है । उसी प्रकार प्रमदा और उद्यान इत्यादि को विभावरूपता प्राप्त कराई जाती है और विशेष रूप मे भावित किया जाता है अर्थात् रसमय वनाया जाता है यह निस्सन्देह उनके ( भामह के ) द्वारा कहा गया है इसमें वह कौन सा अर्थ है इसी विषय में कहते हैं—‘अभेदोपचार से वही सव अलङ्कारों की रूपवाली है’ यह । उपचार में निमित्त बतलाते हैं—‘सर्व अलङ्कार’ इत्यादि । उपचार में प्रयोजन बतलाते हैं—‘अतिशयोक्ति’ यहाँ से लेकर ‘अलङ्कारमान्रता हो’ यहाँ तक । यहाँ पर ‘कविप्रतिभावशात्’ इत्यादि के द्वारा मुख्यार्थवाच् भी दिखला दिया गया है ।
उस्सी के आधार पर व्याख्या भी की है । अतः आनन्दवर्धन और अभिनवगुप्त का सम्मत पाठ ‘सैषा सर्वैव वक्रोक्ति:’ हो ठहरता है । यह पर वक्रोक्ति का अर्थ किया गया है सभी अलङ्कार । भामह ने स्वयं ही कहा है—‘वाच्य और शब्द की वक्र शक्ति हो वाणी का अभीष्ट अलङ्कार है ।’
तारावती
वकृता शब्द का अर्थ है लोकोत्तर रूप में अवस्थित होना । यह लोकोत्तर रूप में अवस्थान शब्द का भी हो सकता है और अर्थ का भी हो सकता है । इसीलिये शब्द की वकृता और अर्थ की वकृता पर पृथक्-पृथक् विचार किया जाता है । आशय यह है कि अलङ्कार का अलङ्कारत्व इसी में है कि शब्द और अर्थ की स्थिति लोकोत्तर रूप में हो । लोकोत्तर होना ही अतिशय का अर्थ है । इस प्रकार अतिशयोक्ति सभी अलङ्कारों में सामान्य रूप में विद्यमान रहती है । सभी अलङ्कारों के मूल में अतिशयोक्ति के वर्तमान रहने का कारण यह है कि जो अर्थ सभी लोग सर्वदा प्रयुक्त करते रहते हैं और सभी के उपभोग के कारण जो अर्थ पुराना पड़ जाता है तथा अपना आकर्षण खो देता है उस अर्थ में भी यह अतिशयोक्ति नवीनता सुचार कर देती है और अतिशयोक्ति के समावेश से वह पुराना अर्थ भी विचित्र मालूम पड़ने लगता है जिससे उस अर्थ में एक आकर्षण उत्पन्न हो जाता है । इस अतिशयोक्ति का दूसरा महत्वपूर्ण कार्य यह होता है कि यह जगत् की प्रमदा उद्यान इत्यादि सामान्य
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अयं भाव:-यदि तावदतिशयोक्तौ: सर्वालङ्कारेषु सामान्यरूपता सा तहि तादृश्यपर्यवसायिनीति तद्रव्यतिरिक्तो नैवालङ्कारो दृश्यत इति कविप्रतिभानं न तत्रापेक्षनीयं स्यात् । अलङ्कारमात्रं च न किञ्चिद्दश्येत । अथ सा काव्यजीवितत्वेनैत्थं भाव यह है--यदि सव अलङ्कारों में अतिशयोक्ति की सामान्यरूपता है तो उसका तादात्म्य में पर्यवसान होता है, अतः उससे व्यतिरिक्त कोई अलङ्कार दिखलाई नहीं देता अत. उसमें कविप्रतिभा अपेक्षणीय नहीं होगी और केवल अलङ्कार भी कोई दिखलाई नहीं देगा । और यदि काव्यजीवन के रूप में वह
वस्तुओं को भावोद्दावक बनाकर उन्हें विभावरूपता प्रदान कर देती है जिससे उन वस्तुओं के प्रति एक अनुराग जागृत हो जाता है । साथ ही यह विशेष रूप से भावित करती है अर्थात् रसमय बनाती है । ( भामह ने कहा था ‘अनया अर्थ: विभाव्यते’ । यहाँपर ‘विभाव्यते’ के लोचनकार ने ३ अर्थ किये हैं— ( १ ) ‘वि’ अर्थात् विचित्र रूप में ‘भाव्यते’ अर्थात् भावित किया जाता है । ( २ ) विभावता को प्राप्त कराया जाता है और ( ३ ) ‘वि’ अर्थात् विशेष रूप में भावमय बनाया जाता है ( अर्थात् रसमय कर दिया जाता है । ) यह है भामह का कथन । इसमें कहा गया है कि ‘अतिशयोक्ति ही वक्रोक्ति ( सर्वालङ्काररूप ) का कथन । इसमें कहा गया है कि ‘अतिशयोक्ति ही वक्रोक्ति ( सर्वालङ्काररूप )
तारावती यहाँ पर शुद्धा सारोपा लक्षणा मानी जानी चाहिये जैसे ‘आयुग्रुं तम्’ में घी आयुग्रुृद्धि का कारण होता है किन्तु उनमें अमेद सम्बन्ध स्थापित करके ‘आयु ही घी है’ इसका प्रयोग कर दिया जाता है । यही वात यहाँ पर भी है कि अतिशयोक्ति ही वक्रोक्ति ( सामान्य अलङ्कार ) है । यहां पर भेद होते हुए भी अमेद की स्थापना की गईहै । अतः यह लाक्षणिक प्रयोग है । निष्पाद्य-निष्पादक भाव सम्बन्ध है । अतिशयोक्ति निष्पादक होती है; अन्य अलङ्कार निष्पाद्य । अतिशयोक्ति जिस अलङ्कार की पोषिका वनकर उसपर अधिष्ठित हो जाती है उसी अलङ्कार में रमणीयता आ जाती है । जिसकी पोषिका अतिशयोक्ति नहीं होती वह अलङ्कार मात्र ही रह जाता है अर्थात् उसमें अलङ्कार की जातीयता तो आ जाती है किन्तु उसका मूलतत्त्व रमणीयता नहीं आती । इसमें एक शर्त और है कि अतिशयोक्ति की योजना कवि-प्रतिभा से होनी चाहिये । यदि कवि-प्रतिभा से उसकी योजना नहीं होती तो कोई भी अलङ्कार अलङ्कार नहीं बनता । कहने का आशय यह कि अन्य अलङ्कारों की भी स्वतन्त्र सत्ता विद्यमान है और अतिशयोक्ति भी स्वतन्त्र होती है । दोनों में अमेद या तादात्म्य की स्थापना को लक्षणा के द्वारा सम्पादित किया जाता है । लक्षणा का निमित्त यह है कि अतिशयोक्ति में
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विवक्षितानौचित्येनापि निवध्यमाना तथा स्यात् । औचित्यवती जीवितमिति चेत्—औचित्यानिबन्धनं रसभावादि मुख्यवा नान्यस्मिक्क्वचिदस्तीति तदेवान्तर्यांमि मुख्यं जीवितमिल्यभ्युपगतवयं न तु सा । एतेन यदाहुः केचित्—औचित्यवृत्तिसुन्दरशब्दार्थमय काव्य किमन्येन ध्वनिनान्तर्मूतनैव भूतनोत्पत्तये स्ववचनमेव ध्वनिसद्भावाभेदोपचार एवायम् । तत्स्रोपपन्नमतिशयोक्तेर्यङ्ग्यस्वमिति । यदुक्तमलङ्कारन्तरसवीकरणं तदेव त्रिधा विशम्जयते—तस्यार्थचेतन । यद्यतवेनैति । सापि वाच्याभवति । यथा—‘अपरैव हि केयमत्र’ इति । अन्र रूपकेऽप्यतिशयः शब्दस्फुरणेव । अस्य त्रैविध्यस्य विषयविभागमाह—तत्रैति । तेधु प्रकारेषु मध्ये य आघः प्रकारस्तस्मिन् ।
इस प्रकार की विवक्षा है तथापि अनौचित्य के साथ निवद्ध किये जाने पर भी वैसी हो जायेगी । यदि कहो कि औचित्यवती जीवितमिति चेत्—औचित्यानिबन्धनं रसभावादि मुख्यवा नान्यस्मिक्क्वचिदस्तीति तदेवान्तर्यांमि मुख्यं जीवितमिल्यभ्युपगतवयं न तु सा । एतेन यदाहुः केचित्—औचित्यवृत्तिसुन्दरशब्दार्थमय काव्य किमन्येन ध्वनिनान्तर्मूतनैव भूतनोत्पत्तये स्ववचनमेव ध्वनिसद्भावाभेदोपचार एवायम् । तत्स्रोपपन्नमतिशयोक्तेर्यङ्ग्यस्वमिति । यदुक्तमलङ्कारन्तरसवीकरणं तदेव त्रिधा विशम्जयते—तस्यार्थचेतन । यद्यतवेनैति । सापि वाच्याभवति । यथा—‘अपरैव हि केयमत्र’ इति । अन्र रूपकेऽप्यतिशयः शब्दस्फुरणेव । अस्य त्रैविध्यस्य विषयविभागमाह—तत्रैति । तेधु प्रकारेषु मध्ये य आघः प्रकारस्तस्मिन् ।
इस प्रकार की विवक्षा है तथापि अनौचित्य के साथ निवद्ध किये जाने पर भी वैसी हो जायेगी । यदि कहो कि औचित्यवती जीवितमिति चेत्—औचित्यानिबन्धनं रसभावादि मुख्यवा नान्यस्मिक्क्वचिदस्तीति तदेवान्तर्यांमि मुख्यं जीवितमिल्यभ्युपगतवयं न तु सा । एतेन यदाहुः केचित्—औचित्यवृत्तिसुन्दरशब्दार्थमय काव्य किमन्येन ध्वनिनान्तर्मूतनैव भूतनोत्पत्तये स्ववचनमेव ध्वनिसद्भावाभेदोपचार एवायम् । तत्स्रोपपन्नमतिशयोक्तेर्यङ्ग्यस्वमिति । यदुक्तमलङ्कारन्तरसवीकरणं तदेव त्रिधा विशम्जयते—तस्यार्थचेतन । यद्यतवेनैति । सापि वाच्याभवति । यथा—‘अपरैव हि केयमत्र’ इति । अन्र रूपकेऽप्यतिशयः शब्दस्फुरणेव । अस्य त्रैविध्यस्य विषयविभागमाह—तत्रैति । तेधु प्रकारेषु मध्ये य आघः प्रकारस्तस्मिन् ।
तारावतो
ऐसी योग्यता विदग्धमान होती है जिससे वह अन्य अलङ्कारों की निष्पादिका बन सके तथा अन्य अलङ्कारों का रूप धारण कर सके । लक्षणा का प्रयोजन यह है कि अतिशयोक्ति किसी भी अलङ्कार में चरितार्थ हो देती है अन्यथा अलङ्कार अलङ्कार ही नहीं वन पाते । ‘अतिशयोक्ति ही वक्रोक्ति ( सामान्य अलङ्कार ) है’ यह लक्षणा है । लक्षणा में तीन शर्तें होती हैं—मुख्यार्थबाध, निमित्त और प्रयोजन । ऊपर निमित्त और
ऐसी योग्यता विदग्धमान होती है जिससे वह अन्य अलङ्कारों की निष्पादिका बन सके तथा अन्य अलङ्कारों का रूप धारण कर सके । लक्षणा का प्रयोजन यह है कि अतिशयोक्ति किसी भी अलङ्कार में चरितार्थ हो देती है अन्यथा अलङ्कार अलङ्कार ही नहीं वन पाते । ‘अतिशयोक्ति ही वक्रोक्ति ( सामान्य अलङ्कार ) है’ यह लक्षणा है । लक्षणा में तीन शर्तें होती हैं—मुख्यार्थबाध, निमित्त और प्रयोजन । ऊपर निमित्त और
ऐसी योग्यता विदग्धमान होती है जिससे वह अन्य अलङ्कारों की निष्पादिका बन सके तथा अन्य अलङ्कारों का रूप धारण कर सके । लक्षणा का प्रयोजन यह है कि अतिशयोक्ति किसी भी अलङ्कार में चरितार्थ हो देती है अन्यथा अलङ्कार अलङ्कार ही नहीं वन पाते । ‘अतिशयोक्ति ही वक्रोक्ति ( सामान्य अलङ्कार ) है’ यह लक्षणा है । लक्षणा में तीन शर्तें होती हैं—मुख्यार्थबाध, निमित्त और प्रयोजन । ऊपर निमित्त और
ऐसी योग्यता विदग्धमान होती है जिससे वह अन्य अलङ्कारों की निष्पादिका बन सके तथा अन्य अलङ्कारों का रूप धारण कर सके । लक्षणा का प्रयोजन यह है कि अतिशयोक्ति किसी भी अलङ्कार में चरितार्थ हो देती है अन्यथा अलङ्कार अलङ्कार ही नहीं वन पाते । ‘अतिशयोक्ति ही वक्रोक्ति ( सामान्य अलङ्कार ) है’ यह लक्षणा है । लक्षणा में तीन शर्तें होती हैं—मुख्यार्थबाध, निमित्त और प्रयोजन । ऊपर निमित्त और
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प्रयोजन दिखलाये जा चुके । अन मुख्यार्थवाध को भी समझ लीजिये - अतिशयोक्ति सामान्य अलङ्कार नहीं हो सकती क्योंकि यदि उसे सब अलङ्कारों का सामान्यरूप कहा जायगा तो उसका अलङ्कारों से तादात्म्य हो जायगा और उससे भिन्न कोई अलङ्कार हो नहीं रहेगा । ऐसे दशा में अतिशयोक्ति को अलङ्कार कहलाने लगेगी; अलङ्कारों की योजना में कवि-प्रतिभा की आवश्यकता ही न रह जायगी । साथ ही उससे भिन्न कोई सामान्य अलङ्कार रह ही नहीं जायगा । यदि कहो कि अतिशयोक्ति ही काव्य का जीवन मानी जाती है और आचार्यों का मन्तव्य उसे काव्यजीवन मानना ही है तो यदि अतिशयोक्ति अनौचित्यपूर्ण होगी तो भी वह काव्यजीवन वन जायेगी । यदि इस दोष को मिटाने के लिये यह माना जाय कि वह अतिशयोक्ति काव्यजीवन हो सकती है जो औचित्य के साथ निवद्ध की जाय तब तो हमारा कथन ही सिद्ध हो गया कि रस और भाव ही काव्य का जीवन होते हैं । क्योंकि केवल रस और भाव की ध्वनियों ही वे तत्व हैं जिनकी हृदय में रहते हुए औचित्य का निर्णय किया जाता है । औचित्य और कोई वस्तु नहीं है; वह तो केवल रस और भाव के अनुकूल रचना का ही दूसरा नाम है । क्या ? अतः रस और भाव अन्तर्यामी तत्व हैं । अतः उन्हें छोड़कर औचित्य और होगा ही क्या ? इससे उन लोगों को भी उत्तर मिल गया जो यह कहते थे कि जब हम काव्य मानते ही ऐसे शब्द-अर्थ के समूह को हैं जिनकी सङ्घटना औचित्य के साथ की गई हो; इस प्रकार हमने औचित्य के सिद्धान्त को मान ही लिया तब ध्वनि की गरज क्या ? कलpanा की गरज, आवश्यकता और उनमें भी ध्वनि को आत्मा मान लेना कहाँ तक ठीक है ? जो लोग ऐसा कहते हैं उनसे तो हमारा निवेदन बस इतना ही है कि आपके वचनों से ही ध्वनि की सत्ता सिद्ध हो जाती है । इतके लिये हमें पृथक् रूप में किसी साक्षी के अन्वेषण की आवश्यकता नहीं हैं । आपके वचन ही इस दिशा में साक्षी का काम देते हैं ।
आप औचित्य को मानते हैं रस और भाव से व्यतिरिक्त नहीं होता और रस और भाव सदा ध्वनित ही होते हैं । इस प्रकार औचित्य को मान लेना ही ध्वनि को मानने के लिये पर्याप्त है । उपर जो कुछ कहा गया है उसका सार यही है कि काव्य की आत्मा ध्वनि ही होती है । न तो औचित्य के साथ निवद्ध अतिशयोक्ति ही काव्य की आत्मा हो सकती है और न केवल अतिशयोक्ति । अतिशयोक्ति का अलङ्कारों से तादात्म्य भी नहीं हो सकत और न वह अलङ्कार का सामान्यरूप ही हो सकता है । इस प्रकार यह कहना किसी प्रकार भी
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अयं च प्रकारोऽन्येषामध्यलङ्काराणामस्ति तेऽपां तु न सर्वविषयः । अतिशयोक्तु सर्वालङ्कारविषयोऽपि सम्भवतीदृश्यं विशेषः । येषु चालयोरेपु साधर्म्यमुखेन तत्त्वप्रतिलम्भः यथा रूपकोपमातुल्ययोगितानिदर्शनादिषु तेषु गम्यमानधर्मसमुच्चयेनैव यत्सोऽहं शोमाश्रयविशिष्टशोभालि भवतीति ते सर्वेऽपि चारुत्वातिशययोगिनः सन्तो गुणीभूतव्यङ्गचस्यैव विषयाः । समासोक्त्यादौपपर्यायोक्तादिषु तु गम्यमानांशाविनाभावेनैव तत्त्वव्यवस्थानाद्गुणीभूतव्यङ्गचता निर्विवादैव । तत्र च गुणीभूतव्यङ्गचतायामलङ्काराणां केपाश्रितदलङ्कारविशेषगर्भेतायां नियमः । यथा व्याजस्तुतेः प्रेयोलङ्कारगर्भेतवे । केपाश्रितदलङ्कारमात्रगर्भेतायां नियमः । यथा सन्देहादीनामुपमागर्भेतवे । केपाश्रितदलङ्काराणां परस्परगर्भेतापि सम्भवति । यथा दीपकोपमायोः । तत्र दीपकसुपमागर्भेतवेन प्रसिद्धम् । उपमापि कदाचिद्दीपकच्छायानुयायिनी । यथा मालोपमा । तथा हि 'प्रभामहत्या शिवसेन दीपः' इत्यादौ स्फुटैव दीपकच्छाया लक्यते ।
(अनु०) और यह प्रकार और अलङ्कारों के लिये भी है किन्तु उनकी सर्वविषयता नहीं होती । अतिशयोक्ति की तो सर्वालङ्कारविषयता भी सम्भव है, यह विशेषता है । और जिन अलङ्कारों में साधर्म्य के द्वारा स्वरूपप्राप्ति होती है जैसे रूपक, उपमा, तुल्ययोगिता, निदर्शना इत्यादि में, उनमें गम्यमान धर्म के द्वारा ही जो सादृश्य वहाँ अतिशय शोभाशाली होता है इस प्रकार वे सव अतिशय चाहते से युक्त होकर गुणीभूतव्यङ्गच का ही विषय होते हैं । समासोक्ति, आक्षेप और पर्यायोक्त इत्यादि में प्रतीमान अंश के अविनाभाव ( अनिवार्यसत्ता ) में ही स्वरूप की व्यवस्था होने से गुणीभूतव्यङ्गच होने में कोई विवाद नहीं रहता । और उस गुणीभूतव्यङ्गचता में कुछ अलङ्कारों में विशिष्ट अलङ्कारों के गर्भित होने का नियम है । जैसे व्याजस्तुति की प्रेयोलङ्कारगर्भता का नियम है । कुछ का केवल अलङ्कार की गर्भता का ही नियम है । जैसे सन्देहादिकों की उपमागर्भता में । कुछ अलङ्कारों की परस्पर गर्भता भी सम्भव है । जैसे दीपक और उपमा में । उसमें दीपक उपमागर्भत्व के रूप में प्रसिद्ध है । उपमा भी कदाचित् दीपक की छाया की अनुगायिनी होती है । जैसे मालोपमा । वह इस प्रकार— 'प्रभा से महती शिवा से दीपक के समान' इत्यादि में दीपक की छाया स्फुटरूप में ही लक्षित होती है ।
तारावती
तारावती
सङ्केत नहीं हो सकता कि 'अतिशयोक्ति ही वक्रोक्ति है' । अतः इस कथन का वाध हो जाता है । निमित्त और प्रयोजन तो पहले ही दिखलाये जा चुके हैं ।
सङ्केत नहीं हो सकता कि 'अतिशयोक्ति ही वक्रोक्ति है' । अतः इस कथन का वाध हो जाता है । निमित्त और प्रयोजन तो पहले ही दिखलाये जा चुके हैं ।
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नन्वतिशयोक्किरेव चेदेवंभूता तत्त्किमपेक्षया प्रथमं तावदिति क्रमः सूचित इत्यादि शङ्क्याह-अयं चेतित । यदतिशयोक्तौ निरुपितोदलङ्कारान्तरेsनुप्रवेशाद्भकः ।
तारावती
( प्रश्न ) यदि अतिशयोक्ति ही इस प्रकार की है तो किसकी अपेक्षा से ‘पहले तो’ कहकर क्रम सूचित किया है? यह शङ्का करके उत्तर देते हैं—‘और यह’ इत्यादि । जो अतिशयोकि्ति में दूसरे अलङ्कारों में अनुप्रवेश रूप प्रकार निरुपित किया गया है वह ।
अतएव लद्रणा की तीनों शर्तें पूरी हो जाने से अतिशयोक्ति को वक्रोक्ति कहना एक औपचारिक ( लाक्षणिक ) प्रयोग हो जाता है । इस प्रकार अतिशयोक्ति की स्वतन्त्र स्थिति सिद्ध हो जाने से अन्य अलङ्कारों में उसकी अभिव्यक्ति हो मानी जायगी अलङ्कारों का सामान्य रूप नहीं ।
अतएव लद्रणा की तीनों शर्तें पूरी हो जाने से अतिशयोक्ति को वक्रोक्ति कहना एक औपचारिक ( लाक्षणिक ) प्रयोग हो जाता है । इस प्रकार अतिशयोक्ति की स्वतन्त्र स्थिति सिद्ध हो जाने से अन्य अलङ्कारों में उसकी अभिव्यक्ति हो मानी जायगी अलङ्कारों का सामान्य रूप नहीं ।
तारावती
आशय यह है कि अन्य अलङ्कारों में अभिव्यक्त होकर अतिशयोक्ति उनका पोषण करती है और इस प्रकार गुणीभूत व्यङ्ग्य का रूप धारण कर लेती है । यहाँ पर यह भी समझ लेना चाहिये कि अतिशयोक्ति किस प्रकार दूसरे अलङ्कारों का अङ्ग बनती है ? दूसरे अलङ्कारों से इसका सादृश्य तीन रूपों में होता है—( १ ) कभी-कभी यह अतिशयोक्ति वाच्य अलङ्कार है क्योंकि केवल उपमानों का ही उपादान किया गया है उपमेयों का नहीं ।
तारावती
उस रूपकातिशयोक्ति को ‘यह कोई दूसरो ही कौन है ?’ यह कहकर वाच्य बना दिया गया है । यह मार्ग वाच्यालङ्कार का है । ( २ ) कभी-कभी अतिशयोक्ति व्यङ्ग्य होती है और उस व्यङ्ग्य की ही वहाँ पर प्रधानता होती है । ऐसे अवसर पर ध्वनि कही जाती है । और ( ३ ) कभी-कभी अतिशयोक्ति व्यङ्ग्य होकर दूसरे अलङ्कारों के प्रति गौण हो जाती है ।
तारावती
यह दशा गुणीभूतव्यङ्ग्य की हुई ‘केलो कान्तदलिततस्य विभ्रममदोः……त्वमेकां कृतीः ।’ इत्यादि पद्य उद्धृत किया जा सकता है । इसकी विस्तृत व्याख्या द्वितीय उद्योत की २७ वीं कारिका में की जा चुकी है । गुणीभूत अतिशयोक्ति का उदाहरण ‘उपोदरागेण विलोलतारकम्’ इत्यादि पद्य है जिसकी व्याख्या प्रथम उद्योत की १३ वीं कारिका में की जा चुकी है ।
तारावती
( प्रश्न ) अतिशयोक्ति सभी अलङ्कारों में सामान्तया व्यङ्ग्य मानी जा सकती है । किन्तु यह एक ही अलङ्कार तो ऐसा है जो गुणीभूतव्यङ्ग्य होकर दूसरे अलङ्कारों में रमणीयता की अभिवृद्धि करता है ।
तारावती
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नन्वेवमपि प्रथममिति केनाशयेनोक्तमित्याशङ्क्याह--तेषामिति । एवमलङ्कारेषु तावदव्यङ्ग्य-स्पर्शोऽस्तीत्यक्या तत्र किं व्यङ्ग्यतया चेत् भातोति विभागं व्युत्पादयति--येषु चैत । रूपकादीनां पूर्वमेवोक्तं स्वरूपम् । निदर्शनायास्तु 'क्रिययैव तदर्थस्य विशिष्टस्योपदर्शनम् । इह निदर्शनं तु । उदाहरणम्--
( प्रश्न ) इस प्रकार भी 'पहले' यह किस अभिप्राय से कहा गया ? यह शङ्का करके कहते हैं--'उनका' यह । इस प्रकार अलङ्कारों में वाच्यस्पर्श तो होता है इस उक्ति से वहाँ पर व्यङ्ग्य के रूप में क्या प्रतीत होता है ? इस विभाग का व्युत्पादन करते हैं--'और जिनमें' इत्यादि । रूपक इत्यादि का स्वरूप पहले ही वतला दिया गया । निदर्शना का तो--'क्रिया के द्वारा ही उस ही विशिष्ट अर्थ को दिखलाना निदर्शना मानी जाती है' यह स्वरूप है । उदाहरण--
तारावती
में यह क्या कहा गया था कि 'पहले तो अतिशयोक्ति ही व्यङ्ग्य होती है ?' वहाँ पर 'पहले तो' का क्या अर्थ है ? इस कथन से ऐसा मालूम पड़ता है कि दूसरे अलङ्कार भी ऐसे होते हैं जो गुणीभूत होकर दूसरे अलङ्कारों का पोषण करते हैं वे दूसरे अलङ्कार कौन हैं ? ( उत्तर ) अतिशयोक्ति के विषय में इस प्रकार का निरूपण किया गया था वह दूसरे अलङ्कारों में अनुप्रविष्ट होकर उनका पोषण करती है । यह बात दूसरे अलङ्कारों के विषय में भी लागू होती है ।
( प्रश्न ) यदि सभी अलंकार दूसरे में अनुप्रविष्ट हो सकते हैं तो अतिशयोक्ति को प्रथमिक्ता क्यों प्रदान की गई और 'पहले तो' यह इस रूप में क्यों कहा गया मानो अतिशयोक्ति में कोई विलक्षणता हो तथा उसका अन्य अलङ्कारों में सन्निवेश असन्दिग्ध हो ? ( उत्तर ) निस्सन्देह अन्य अलङ्कारों की अपेक्षा इस दिशा में अतिशयोक्ति में कुछ विलक्षणता अवश्य होती है । अन्य अलङ्कार भी दूसरे अलङ्कारों में अनुप्रविष्ट होकर उनका पोषण करते हैं किन्तु अतिशयोक्ति सभी अल-ङ्कारों में सन्निविष्ट हो जाती है; अन्य अलङ्कार सभी में सन्निविष्ट नहीं हो सकते ।
अन्य अलङ्कारों की पोषकता कुछ सीमित होती है । यही इन दोनों में अंतर है और इसीलिये अतिशयोक्ति को प्राथमिकता दी गई है । यहाँ तक यह वतलाया जा चुका कि एक अलङ्कार भी दूसरे अलङ्कार का पोषक हो सकता है और यह पोषण व्यङ्ग्य के रूप में ही होता है । अब यहाँ पर यह दिखलाया जा रहा है कि अलङ्कारों में व्यङ्ग्य अलङ्कार का स्पर्शं किस प्रकार होता है जिससे व्यङ्ग्य अलङ्कार गुणीभूत होकर दूसरे अलङ्कार का पोषण कर सके । पहले सादृश्यमूलक अलङ्कारों को लीजिये रूपक, उपमा, तुल्ययोगिता, निदर्शना इत्यादि जितने भी सादृश्यमूलक
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अयं मन्दद्युतिरभास्वानस्तं प्रतियियासति । उदयः पतनायेतिं श्रीमतो बोधयन्नरान् ॥
'मन्द प्रकाशवाला' यह सूर्य उदय पतन के लिये ही होता है यह श्रीमान् व्यक्तियों को बतलाते हुये अस्ताचल की ओर जा रहा है ।
अलङ्कार होते हैं उनमें साहश्य या उपमानोपमेय भाव व्यङ्ग्य रहता है । इन सत्र अलङ्कारों में साहश्य की अभिव्यञ्जना तो होती है किन्तु रमणीयता का पर्यवसान उस व्यङ्ग्य साहश्य में नहीं होता । किन्तु अलङ्कारों की अपनी अपनी विशेषताओं में ही रमणीयता का पर्यवसान होता है । जैसे रूपक में साहश्य की अभिव्यक्ति तो होती है किन्तु रमणीयता भेदस्थगन में ही सन्निहित रहती है जो कि रूपक की अपनी विशेषता है । व्यङ्ग्य साहश्य केवल रूपक का सहायक हो जाता है । अतएव कहा जा सकता है कि रूपक में सवत्र उपमा व्यङ्गय होती है किन्तु वह गुणीभूत होकर रूपक को प्रधानता प्रदान कर देती है । यही बात दूसरे भी साहश्यमूलक अलङ्कारों के विषय में समझनी चाहिये । प्रस्तुत रचना के पिछले प्रसङ्गों में रूपक, उपमा और तुल्ययोगिता के स्वरूप और उनके उदाहरणों पर यथास्थान विचार किया जा चुका है । केवल निदर्शना दोष रह जाती है जिसपर अबतक विचार नहीं किया गया है । निदर्शना का लक्षण यह है — 'निदर्शना उसे कहते हैं जिसमें किसी विशिष्ट अर्थ को क्रिया के द्वारा दिखलाया जाये ।' उदाहरण— 'सूर्य की प्रकाश मन्द पड़ गया है और अब यह अस्ताचल की ओर जाने का विचार कर रहा है । यह सम्पत्तिशालियों को शिक्षा दे रहा है कि संसार में सभी का उदय पतन के लिये ही होता है ।'
यहाँ पर सूर्य अपने क्रियाकलाप के द्वारा श्रीमानों को उपदेश दे रहा है । अतः यह निदर्शना अलंकार है । इससे साहश्य की ध्वनना होती है कि जिस प्रकार सूर्य का उदय पतन के लिये हो होता है उसी प्रकार श्रीमानों का उदय भी पतन के लिये ही होता है । यहाँ पर यह साहश्य की व्यञ्जना चमत्कारपर्यवसायिनी नहीं हैं; चमत्कार तो क्रिया के माध्यम से सूर्य के उपदेश देने में ही है । अतः व्यङ्ग्य साहश्य गुण होकर वाच्य निदर्शना का पोषक होकर गुणीभूत हो गया है । इसी प्रकार साहश्यमूलक अन्य अलङ्कारों के विषय में भी समझना चाहिये । ( यहाँ पर व्यङ्ग्य साहश्य में उपमा का भी उल्लेख किया गया है । किन्तु उपमा में साहश्य व्यङ्ग्य नहीं अपितु वाच्य ही होता है । तथापि कुछ उपमायें ऐसी अवश्य
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प्रेयोऽलङ्कारेतिति । चादुपर्यवसायिस्वातस्याः । सा चोदाहृतैव द्वितीयोद्योते ऽस्माभिः । उपमागर्भत्वमित्युपमाशब्देन सर्व एव तद्विशेषा रूपकादयः, अथवौपम्यं सर्वसामान्यमिति तेन सर्वमाक्षिप्तमेव । स्फुटैवैति । ‘तथा स पूतश्र विभूषितश्र’ इत्येतैंदीपस्थानीयैंदीपनाद्दीप्यमानोऽनुप्रविष्टप्रतायमानतया, साधारणधर्माभिधानहेतदुपमानस्फुटेनाभिधाप्रकारेणैव ।
प्रेयोऽलङ्कारेतिति । चादुपर्यवसायिस्वातस्याः । सा चोदाहृतैव द्वितीयोद्योते ऽस्माभिः । उपमागर्भत्वमित्युपमाशब्देन सर्व एव तद्विशेषा रूपकादयः, अथवौपम्यं सर्वसामान्यमिति तेन सर्वमाक्षिप्तमेव । स्फुटैवैति । ‘तथा स पूतश्र विभूषितश्र’ इत्येतैंदीपस्थानीयैंदीपनाद्दीप्यमानोऽनुप्रविष्टप्रतायमानतया, साधारणधर्माभिधानहेतदुपमानस्फुटेनाभिधाप्रकारेणैव ।
'प्रेयोलङ्कार' यह । क्योंकि उसका पर्यवसान चादृक्ति में होता है । उसका तो उदाहरण द्वितीय उद्योत में हमने दे ही दिया । 'उपमागर्भत्वम्' इसमें उपमाग्रभ्द से रूपक इत्यादि उसके सब विशेष ले लिये जाते हैं । अथवा औपम्य सर्वसाधारण है उससे तो सभी आक्षिप्त ही हो जाता है । 'स्फुट ही है' यह । 'उसके द्वारा वह पवित्र भी हुआ और विभूषित भी' दीपस्थानीय इस कथन के द्वारा दीपन करने से प्रतीयमान के रूप में दीपक यहाँ अनुप्रविष्ट हुआ है । यह साधारण धर्म का अभिधान इस उपमा में अभिधा प्रकार के द्वारा ही है ।
तारावतीहोती है जिनमें साहश्य गम्य ही होता है जैसे आर्थी उपमा के भेद, वाचकलुप्तोपमा, वाचकधर्ममंडितोपमा इत्यादि । उपमा के उन्हीं भेदों को दृष्टिगत रखते हुये व्यङ्गच-सादृश्य में उपमा का उल्लेख भी कर दिया गया है । ) कुछ अलंकारऐसे होते हैं जिनका मूलाधार ही व्यङ्ग्यार्थ होता है । वस्तु व्यञ्जना को लेकर ही उन अलंकारों की प्रतिपत्ति हुआ करती है । इस प्रकार के अलंकारों में हैं समासोक्तिआक्षेप, पर्यायोक्त इत्यादि । इनमें व्यंग्यार्थ गौण होकर वाच्य चमत्कार का ही पोषण करता है । अतएव इनमें भी व्यंग्य गुणीभूत हो जाता है । इनका विस्तृतविवेचन प्रथम उद्योत में ध्वनिनिष्ठापन के प्रकरण में किया जा चुका है । वहीं देखना चाहिये । इस प्रकार यह बात तो निर्विवाद सिद्ध ही है कि समासोक्तिइत्यादि अलंकार भी व्यंग्यार्थमूलक ही होते हैं और उनका आधार भी गुणीभूतव्यंग्य ही होता है ।
तारावतीहोती है जिनमें साहश्य गम्य ही होता है जैसे आर्थी उपमा के भेद, वाचकलुप्तोपमा, वाचकधर्ममंडितोपमा इत्यादि । उपमा के उन्हीं भेदों को दृष्टिगत रखते हुये व्यङ्गच-सादृश्य में उपमा का उल्लेख भी कर दिया गया है । ) कुछ अलंकारऐसे होते हैं जिनका मूलाधार ही व्यङ्ग्यार्थ होता है । वस्तु व्यञ्जना को लेकर ही उन अलंकारों की प्रतिपत्ति हुआ करती है । इस प्रकार के अलंकारों में हैं समासोक्तिआक्षेप, पर्यायोक्त इत्यादि । इनमें व्यंग्यार्थ गौण होकर वाच्य चमत्कार का ही पोषण करता है । अतएव इनमें भी व्यंग्य गुणीभूत हो जाता है । इनका विस्तृतविवेचन प्रथम उद्योत में ध्वनिनिष्ठापन के प्रकरण में किया जा चुका है । वहीं देखना चाहिये । इस प्रकार यह बात तो निर्विवाद सिद्ध ही है कि समासोक्तिइत्यादि अलंकार भी व्यंग्यार्थमूलक ही होते हैं और उनका आधार भी गुणीभूतव्यंग्य ही होता है ।
गुणोभूत व्यंग्य अलंकारों को तीन प्रकार से इतार्थ करता है— ( १ ) कुछ अलंकार ऐसे होते हैं जिनमें कोई विशेष अलंकार ही गुणीभूत रूप में गर्भित रहता है । उदाहरण के लिये व्याजस्तुति में प्रेयोलङ्कार नियमतः गर्भित रहता है । ( व्याजस्तुति अलंकार का स्वरूप यह है कि जहाँ पर प्रकटरूप में निन्दा की गई हो किन्तु उसकी व्यञ्जना प्रशंसापरक हो अथवा जो प्रकटरूप में प्रशंसा हो और उसकी व्यञ्जना निन्दापरक हो । इसका उदाहरण काव्यप्रकाश में यह दिया गया है—
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'हेरिजनू ? जो लोग दूसरों के अनुरोध को ठुकराने के लिये सर्वथा रिक्तहृदय होगये हैं उनमें आपसे बढकर अन्य कोई मूढ़न्य नहीं है और लक्ष्मी से बढकर कोई निलंज्ज नहीं है । लक्ष्मी आप की शरण में आई और वह आपका सहारा चाहती है किन्तु आप कईयों मागों से उसका अतिमान्ना में त्याग ही किये जा रहे हैं । अतः ज्ञात होता है कि आपकी शरणागत की रक्षा का कोई ध्यान ही नहीं । उधर लक्ष्मी इतनी निलंज्ज है कि आप उसको कितना ही ठुकरायें और अपमानित करें किन्तु वह रहेगी तुम्हारे ही पास ।'
यहाँ पर राजा की निन्दा की गई है जो राजा की दानशीलता और सम्पन्नतारूप प्रशंसा में पर्यवसित होती है । अतः यहाँ पर व्याजस्तुति अलंकार है । व्याजस्तुति में प्रेयोलकार सर्वदा गर्भित रहता है । प्रेयोलंकार उसे कहते हैं जहाँ भावव्यज्जना किसी अन्य तत्व की सहायिका होकर आती है । मान लीजिये कोई कवि राजा की प्रशंसा में एसी बात कहता है जिसका वाच्यार्थ निन्दापरक होता है तो उस व्याजस्तुति में कविसात राजविषयक रतिभाव व्यंग्य रहता है जोकि भावव्यज्जना के क्षेत्र में आता है । इस प्रकार व्याजस्तुति में चाटुकारिता के गर्भित रहने के कारण व्याजस्तुति में पोषक रूप में प्रेयोलंकार सन्निहित रहता है । यह पहला प्रकार हुआ जिसमें विशिष्ट अलंकार दूसरे अलंकार में गर्भित रहता है ।
( २ ) दूसरा प्रकार यह होता है कि कुछ अलंकारों में सामान्य अलंकार पोषक रूप में सन्निहित रहता है । जैसे सन्देह अलंकार में उपमा गर्भित रहती है । ( सन्देह का उदाहरण काव्यप्रकाश में यह दिया गया है—
'हे राजन् ! तुम्हें युद्ध भूमि में देखकर तुम्हारी चिन्द्धा योद्धा इसे प्रकार संक्ल-विकल्स किया करते हैं कि 'क्या यह सूर्य है? किन्तु वह तो सात घोड़ों के रथपर चलता है । तो क्या यह अभि है ? किन्तु इसका विस्तार तो निश्चित रूप से सब दिशाओं की ओर नहीं हो रहा है । तव क्या यह यम है ? किन्तु वह तो साक्षात् महिपवाहन है ।'
यहाँ पर संशयात्मक प्रतीति के स्वरूप के साथ साधार्य की व्यज्जना होती है कि राजा सूर्य के समान दुर्निरीक्ष्य है अग्नि के समान तेजस्वी है और यमराज के समान सहारक है । इस प्रकार ससन्देह अलंकार में उपमा व्यंग्य रहती है । ) यद्यपि यहाँ पर भी उपमा को गर्भित कहा गया है और उपमा भी एक विशिष्ट अलंकार है । अतः सन्देह भी विशिष्ट अलंकार को गर्भित करता है सामान्य अलंकार को नहीं । अतः इसको भी प्रथम कोटि में ही रखना चाहिये । किन्तु उपमा शब्द से इसकी समस्त विशेषतायें आ जाती हैं । इसमें रूपक भी गर्भित माना जा
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सकता है ( अपह्नुति भी, व्यतिरेक भी । जैसे उक्त उदाहरण में 'यह राजा सूर्य है । यह रूपक; 'यह राजा नहीं है सूर्य है' यह अपह्नुति । 'राजा की अपेक्षा सूर्य विशेष है' यह व्यतिरेक । इस प्रकार प्रायः सभी साहश्यमूलक अलंकार गर्भित हो जाते हैं । ) अथवा अन्यत्र सर्वसामान्य अलंकार है । इसी दृष्टि से कहा गया है कि कभी-कभी सामान्य अलंकार भी दूसरे अलंकार में गर्भित होता है । ( ३ ) कभी-कभी अलंकार एक दूसरे में गर्भित होते हैं । जैसे दीपक में उपमा गर्भित होती है और उपमा में दीपक गर्भित होता है । ( दीपक का उदाहरण—
कृपणानां धनं नागानां फणमणिः केसराः सिंहानाम् । कुलवध्वलिकार्न स्तनाः कुतः स्पृश्यन्तेऽमृतानाम् ॥'
यहाँ कुलवधुओं के स्तन प्रस्तुत हैं और कृपणों के धन, नागों की फणमणि और सिंहों के केसर ये अप्रस्तुत हैं । इनका स्पर्श न किया जा सकना रूप एक क्रिया में अन्वय होता है । अतः यह दीपक अलंकार है । इसमें उपमा व्यंग्य है—जिस प्रकार कृपणों के धन का, नागों की फणमणियों का और सिंहों के केसरों का मृत्य के पहले स्पर्शं असंभव है उसी प्रकार कुलवधिकाओं के स्तनों का मृत्य के पहले स्पर्श असंभव है । ( यह तो हुई दीपक में उपमा के गर्भित होने की बात । ) उपमा में भी कभी कभी दीपक गर्भित होता है और उसमें भी दीपक की रमणीयता पाई जाती है । उदाहरण जैसे कुमारसम्भव में पार्वती से हिमालय की शोभा
बढ़ने के विषय में लिखा है--
प्रभामहत्तया शिखयैव दीप्तेः शिमार्गंयैव त्रिदिवस्य मार्गः । संस्कारवत्येक गिरा मनीषी तथा स पूतश्र विभूषितश्र ॥
जिस प्रकार प्रभा से बढ़ी हुई शिखा से दीपक की शोभा होती है; जिस प्रकार आकारामार्ग त्रिपथगा गङ्गा जी से पूत पोता है और जिस प्रकार संस्कारवती वाणी से मनीषी पवित्र होता है उसी प्रकार उस पार्वती से वह हिमालय पवित्र भी हुआ और विभूषित भी ।'
यहाँ पर मालोपमा है । मालोपमा में स्पष्ट रूप में साधारण धर्म का अभिधान किया जाता है और उस साधारण धर्म से सभी उपमेय जुड़े जाते हैं । जैसे उक्त उदाहरण में ही 'पूत' और 'विभूषित' होना साधारण धर्म है जिसका प्रकथन चतुर्थ पाद में किया गया है । उससे दीपशिखा इत्यादि सभी का सम्बन्ध हो जाता है । दीपक में भी यही होता है । जिस प्रकार दीपक एक स्थान पर रखा जाकर
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तदेवं व्यङ्ग्यांशासंस्पर्शे सति चारुत्वातिशययोगिनो रूपकादयोऽलङ्कारा: सर्वे एव गुणीभूतव्यङ्ग्यस्य मार्गः। गुणीभूतव्यङ्ग्यत्वं च तेषां तथाजातीयानां सर्वेषामेवोक्तानुक्तानां सामान्यम्। तल्लक्षणे सर्वे एवैते सुलक्षिताः भवन्ति। एकैकस्य स्वरूपविशेषकथनेन तु सामान्यलक्षणरहितेन प्रतिपादपाठनेन शब्दे न शक्यन्ते तत्वतो निर्जातुम्, आनन्यतः। अनन्ता हि वाचिकलपाः सततप्रकारा एव चालङ्कारा:। गुणीभूतव्यङ्ग्यस्य च प्रकारान्तरे णापि व्यङ्ग्यार्थानुगमलक्षणेन विप्रलम्भस्त्येव। तदयं ध्वनिनिष्ठयन्दनदूरूपो द्वितीयोऽपि महाकविविषयोऽतिरमणीयो रचणीय: सहृदयैः। सर्वथा नास्त्येव सहृदयहृदयहारीणः काव्यस्य स प्रकारो यत्र न प्रतीमानार्थसंस्पर्शेन सौभाग्यम्। तदिदं काव्यरहस्यं परमिति सूरिभिर्भावनीयम्।
( अन्० ) वह इस प्रकार व्यंग्यांश के स्पर्श होने पर चारुत्वातिशययोगी रूपकादि सभी अलङ्कार गुणीभूतव्यङ्ग्यस्य मार्ग हैं । उस प्रकार को जातिवाची उन सभी ही कहे हुये या न कहे हुये ( अलङ्कारों ) का गुणीभूतव्यंग्यत्व सामान्य ( लक्षण ) है । उसके लक्षण करने में ये सभी भली-भाँति लक्षित हो जाते हैं । सामान्य लक्षण से रहित एक के स्वरूप विशेष कथन के द्वारा तो अनन्त होने के कारण ( सभी ) तात्विकरूप में उसी प्रकार नहीं जाने जा सकते जिस प्रकार प्रतिपद पाठ के द्वारा शब्द नहीं जाने जा सकते । वाणी के विकल्न अनन्त होते हैं और उसी के प्रकार अलङ्कार हैं । गुणीभूतव्यङ्ग्य की तो व्यङ्ग्यार्थानुगमरूप प्रकारान्तर से विषयता है ही । वह इस प्रकार दूसरा भी महाकवियों का विषय अत्यन्त रमणीय होता है । जोकि सहृदयों के द्वारा लक्षित किया जाना चाहिये । सर्वथा सहृदयहृदय को आकर्षित करनेवाले काव्य का वह प्रकार नही है जहाँ प्रतीमान अर्थ के संस्पर्श से सौभाग्य नहीं होता । वह यह बहुत बड़ा काव्य का रहस्य है यह विद्वानों को समझ लेना चाहिये ।
तारावती बाहर और अन्दर दोनों ओर प्रकाश फैलाता है और दोनों ओर रखी हुई वस्तुओं का साक्षात्कार कराता है उसी प्रकार एक धर्म एक स्थान पर स्थित होकर जव प्रस्तुत और अप्रस्तुत दोनों से सम्बद्ध हो जाता है तब वहाँपर दीपक अलङ्कार माना जाता है । यहाँ पूत और विभूषित धर्म एक स्थान पर स्थित होकर प्रस्तुत पार्वती और अप्रस्तुत दीप-शिखा दोनों का दीपन करते हैं । अतः यह मालोपमा दीपकछायानुप्राहिणी है। दीपक का रूप यह होगा-‘महती प्रभा से दीपक, त्रिपथगा से साकाश मार्ग, संस्कारवती भारती से मनीषी और पार्वती से हिमालय पवित्र भी हुये
तारावती
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बाहर और अन्दर दोनों ओर प्रकाश फैलाता है और दोनों ओर रख्खी हुई वस्तुओं का साक्षात्कार कराता है उसी प्रकार एक धर्म एक स्थान पर स्थित होकर जव प्रस्तुत और अप्रस्तुत दोनों से सम्बद्ध हो जाता है तब वहाँपर दीपक अलङ्कार माना जाता है । यहाँ पूत और विभूषित धर्म एक स्थान पर स्थित होकर प्रस्तुत पार्वती और अप्रस्तुत दीप-शिखा दोनों का दीपन करते हैं । अतः यह मालोपमा दीपकछायानुप्राहिणी है। दीपक का रूप यह होगा-‘महती प्रभा से दीपक, त्रिपथगा से साकाश मार्ग, संस्कारवती भारती से मनीषी और पार्वती से हिमालय पवित्र भी हुये
बाहर और अन्दर दोनों ओर प्रकाश फैलाता है और दोनों ओर रख्खी हुई वस्तुओं का साक्षात्कार कराता है उसी प्रकार एक धर्म एक स्थान पर स्थित होकर जव प्रस्तुत और अप्रस्तुत दोनों से सम्बद्ध हो जाता है तब वहाँपर दीपक अलङ्कार माना जाता है । यहाँ पूत और विभूषित धर्म एक स्थान पर स्थित होकर प्रस्तुत पार्वती और अप्रस्तुत दीप-शिखा दोनों का दीपन करते हैं । अतः यह मालोपमा दीपकछायानुप्राहिणी है। दीपक का रूप यह होगा-‘महती प्रभा से दीपक, त्रिपथगा से साकाश मार्ग, संस्कारवती भारती से मनीषी और पार्वती से हिमालय पवित्र भी हुये
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तथा जातीयानामिति । चारुत्वातिशयवतामिस्यर्थः । सुलक्षितेति यत्किलैषां तद्धिनिर्मुक्तं रूपं न तत्त्वाद्येडभ्यर्थनीयम्। उपमा हि ‘यथा गौस्तथा गवय’ इति । रूपकं ‘खलेवाली यूप’ इति । श्लेषः ‘द्विवचनेऽचीति’ तन्त्रात्मकः । यथासंख्यं ‘तुदतीशालातुरे’ति । दीपकं ‘गोमश्वम्’ इति । ससंदेहः ‘स्थानुवां स्प्यात्’ इति । अपह्नुति: ‘नेदं रजतमि’ति । पर्यायोक्तं ‘पीयते दिवानात्तीति’ । तुल्ययोगिता ‘स्थाध्योरिच्च’ इति ।
अप्रस्तुतप्रशंसा सर्वाणि ज्ञापकानि यथा पदसंज्ञयामन्त्रवचनम्—‘अन्यत्र संज्ञाविधौ प्रत्ययग्रहणे तदन्तविधीन’ इति । आक्षेपश्रोमयत्र विभाषासु विकल्पात्मकविशेषाभिधित्स्या इष्टस्यापि विधेः पूर्वनिषेधनात् प्रतिषेधेन समीकृत इति—न्यायात् । अतिशयोक्तिः ‘समुद्रः कुण्डिका’ ‘विन्ध्यो वर्धितवानकंवर्म्माग्रुहात्’ इति एवमन्यत् ।
‘उस प्रकार की जातिवालों का’ यह । अर्थात् चारुताशयवाले । ‘सुलक्षित’ यह । निस्सन्देह इनका जो उससे विनिर्मुक्त रूप है वह काव्य में प्रार्थनीय नहीं होता । निस्सन्देह उपमा—‘जैसी गाय वैसा गवय’। रूपक ‘खलेवाली (खलिहान का स्तूप ) यूप है’ । श्लेष ‘द्विवचनेऽचीति’ में तन्त्ररूप । यथासंख्य—‘तुदी शालातुर’ इत्यादि । दीपक ‘गाय गोडा’ यह। ससंदेह—‘अथवा स्थानु हो’ यह । अपह्नुति—‘यह चाँदी नहीं है’ यह । पर्यायोक्त—‘स्थूल नहीं खाता है’ । तुल्ययोगिता—‘स्थाध्योरिच्च’ यह ।
अपस्तुत प्रशंसा सब ज्ञापक होते हैं जैसे पद संज्ञा में अन्त वचन—‘अन्यत्र संज्ञाविधि में प्रत्यय ग्रहण में तदन्तविधि नहीं होती’ यह । और आक्षेप उभय विभाषाओं में विकल्पात्मक विशेषों के कहने की इच्छा से इष्ट भी विधि का पहले निषेध के साथ प्रतिषेध से सम कर दिया गया इतिन्याय से । अतिशयोक्ति—‘समुद्र कुंडी’ है; ‘विन्ध्याचल बड़ा और सूर्य के मार्ग को ग्रहण कर लिया’ यह । ऐसे ही और भी ।
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और विभूषित भी’ इस भाँति से तीन प्रकार हैं जिनसे एक अलंकार दूसरे में व्यङ्ग्य होकर आता है ।
ऊपर जो कुछ विवेचन किया गया है उससे स्पष्ट है कि रूपक इत्यादि अलंकारों में चारुता की अतिशयता तभी आती है जब उनमें व्यङ्ग्यवांश का स्पर्श हो । इस प्रकार जितना भी अलंकार मार्ग है वह सब गुणीभूतव्यङ्ग्य का मार्ग ही कहा जा सकता है । जो अलंकार ऊपर बतलाये गये हैं जैसे दीपक उपमा तुल्ययोगिता इत्यादि और जो नहीं बतलाये गये हैं जैसे अर्थान्तरन्यास अप्रस्तुतप्रशंसा इत्यादि सभी अलंकारों में रमणीयता गुणीभूत व्यङ्ग्य के द्वारा ही होती है । अतः गुणीभूत व्यङ्ग्य सभी अलंकारों का सामान्य लक्षण है । गुणीभूत व्यङ्ग्य को ठीक रूप में
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समझ लेने से सभी अलंकार अनायास ही समझ में आ जाते हैं। यदि बिना गुणी-भूतवृत्तिद्वय के वैसे ही अलंकार की सत्ता मानी जाय तो निम्नलिखित स्थानोंपर भी अलंकार नाना जाने लगेगाः-
( १ ) उपमा उसे कहते हैं जिसमें दो वस्तुओं का सादृश्य बतलाया जाय। यह परिभाषा तो 'गाय के समान गवय होता है' इसमें लागू हो जाती है। अतः यह भी उपमा कही जायगी।
( २ ) रूपक में एक वस्तु का दूसरे पर आरोप किया जाता है। 'खलेवाली' खलिहान के खभे को कहते हैं और यूप यज्ञ के स्तम्भ को कहते हैं जिसमें पशु बाँधा जाता है। यदि कहा जाय कि 'खलेवाली यूप है' तो इसमें खलेवाली पर यूप का आरोप होने से रूपक का लक्षण लागू हो जाता है। अतः इसे भी रूपक कहा जाने लगेगा।
( ३ ) श्लेष उसे कहते हैं जिसमें एक शब्द के एक से अधिक अर्थ लिये जाय। व्याकरण में कई एक सूत्र ऐसे हैं जिनमें किसी शब्द का एक बार प्रयोग किया जाता है और अर्थ दो बार लिया जाता है। इस प्रक्रिया को व्याकरण में तन्त्र कहते हैं। उदाहरण के लिये एक सूत्र है 'द्विर्वचनेऽचि', इसका अर्थ है-
'यदि द्विर्वनिमित्तक अच् बाद में हो और द्वित्व करना हो तो स्वर के लिये कोई आदेश नहीं होता।' यहाँ पर 'द्विर्वचने' के दो अर्थ किये गये हैं। ( १ ) द्वित्व निमित्तक अच् बाद में होनेपर और ( २ ) द्वित्व के करने योग्य होनेपर। यह तन्त्र की प्रक्रिया है। यहाँ पर श्लेष का लक्षण लागू हो जाता है। अतः इसे भी श्लेष कहा जाने लगेगा।
( ४ ) यथासंख्य अलंकार वहाँ पर होता है जहाँ समान संख्यावालों का क्रमशः अन्वय होता है। व्याकरण में भी नियम बनाया गया है 'यथासंख्यमनुदेशः समानाम्' अर्थात् समान सम्नन्धवाली विधि क्रमशः होती है। लोचन में 'त्रुदीङ्ालातुर' यह उदाहरण दिया गया है। इसका अर्थ स्पष्ट नहीं है। किसी किसी पुस्तक में 'सूत्रीमाालान्तरेति' यह वाक्य पाया जाता है। सम्भवतः ये किसी प्रतिष्ठित शास्त्रीय ग्रन्थ के उदाहरण हैं जिनका पता नहीं। इसका अधिक स्पष्ट उदाहरण है- 'एचोऽयवायावः' अर्थात् 'ऐ, ओ, ऐ और औ को अय्, अव्, आय् और आव् आदेश हो जायँ।' 'ऐ ओ' इत्यादि चार हैं और अय् इत्यादि भी चार हैं। अतः इनका क्रमशः अन्वय होता है। ए को अय्, ओ को अव्, ऐ को आय्, और औ को आव् हो जाता है। इस लक्षण के अनुसार यथासंख्य अलंकार कहा जा सकता है।
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( ५ ) दीपक उसे कहते हैं जिसमें एक धर्म में बहुतों का अन्वय होता है । 'गाय, घोड़ा, पुरुष और पक्षी को लाओ' यहाँ लाना रूप धर्म के साथ गाय इत्यादि कई का अन्वय होता है । अतः इसमें दीपक का लक्षण घटित हो जाता है ।
( ६ ) ससंदेह अलंकार उसे कहते हैं जिसमें संदेह प्रकट किया जाय । 'यह पुरुष है या स्तम्भ है?' इसे भी ससंदेहालंकार कह सकते हैं ।
( ७ ) अपह्नुति उसे कहते हैं जहाँ प्रकृत का निषेध करके अप्रकृत को सिद्ध किया जाय । 'यह चाँदी नहीं है किन्तु शुक्ति है' इसमें अपह्नुति का लक्षण घट जाता है ।
( ८ ) पर्यायोक्त उसे कहते हैं जहाँ भङ्गिमा के साथ गम्य अर्थ को ही कहा जाय । 'स्थूल देवदत्त दिन में नहीं खाता' यहाँ भङ्गिमा से कहा गया है कि 'देवदत्त रात में खाता है ।' इस प्रकार यहाँ पर्यायोक्त का लक्षण घट जाता है ।
( ९ ) तुल्ययोगिता—यदि एक धर्म में सभी प्रस्तुतों या सभी अप्रस्तुतों का योग हो तो तुल्ययोगिता अलंकार होता है । दीपक और तुल्ययोगिता में अन्तर यह है कि दीपक में प्रस्तुतों और अप्रस्तुतों दोनों का एक धर्म में अभिसम्बन्ध होता है जब कि तुल्ययोगिता में केवल प्रस्तुतों का एक धर्म में सम्बन्ध होता है । पाणिनि जी का एक सूत्र है—'स्थाध्वोरिच' यह सूत्र लुट् लकार में स्था और धुसँ- झक ( दा और घा ) धातुओं में 'आ' को 'इ' करता है और सिच् को किट् करता है जिससे गुण नहीं होता तथा 'अदित्' यह रूप बनता है । यहाँ पर स्था और घु दोनों प्रस्तुत हैं और उनका एक धर्म 'इत्' आदेश तथा किट् में अभिसम्बन्ध होता है । अतः यहाँ पर तुल्ययोगिता अलंकार कहा जा सकता है ।
( १० ) अप्रस्तुतप्रशंसा—उसे कहते हैं जिसमें अप्रस्तुत का अभिधान किया जाय और इससे प्रस्तुत का आक्षेप हो जाय । जैसे यदि कार्य का वर्णन करना हो तो कारण का वर्णन कर दिया जाय, कारण का वर्णन करना हो तो कार्य का वर्णन कर दिया जाय, यदि सामान्य का वर्णन करना हो तो विशेष का वर्णन कर दिया जाय और यदि विशेष का वर्णन करना हो तो सामान्य का वर्णन कर दिया जाय । इसी प्रकार जिस वस्तु का वर्णन करना हो उसके समान किसी अन्य वस्तु का वर्णन कर दिया जाय । व्याकरण में जितने ज्ञापक हैं वे सब इसके उदाहरण हो सकते हैं । जैसे एक नियम है कि 'प्रत्ययप्रग्रहणे तदन्ता ग्राह्या:' अर्थात् जहाँ कहीं प्रत्यय ग्रहण हो वहाँ तदन्त का ग्रहण हो जाता है । इस नियम के अनुसार यदि पद संज्ञा का सूत्र इस प्रकार बनाया जाता—'सुप्तिङ् पदम्' तो प्रत्यय होने के कारण सुप् का अर्थ होना सुबन्त और तिङ् का अर्थ होना तिङन्त । इस प्रकार
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न चैवमादि काव्योपयोगीति, गुणीभूतव्यङ्ग्य्यतैवात्रालक्ष्यतारतायां ममैभूता लक्ष्यिता: तान् सुष्टु लक्ष्यति । यया सुपुर्णा कृत्बा लक्षणीता: संग्रहीता भवन्ति, अन्यथा स्ववश्यमव्याप्तिमवेत् । तदाह—एकैकस्यैति । न चातिशयोक्किवक्रोक्त्युपमादीनां सामान्यरूपत्वं इत्थादि । यहाँ 'सर्व काव्यप्रयोगी' नहीं होता अतः गुणीभूत व्यङ्ग्यता ही यहाँ पर ममैभूता है ( और ) वह लक्षित की हुई होकर भली भाँति उन ( अलङ्कारों ) को लक्षित करा देती है जिससे परिपूर्ण करके लक्षित किये ( अलङ्कार ) संगृहीत हो जाते हैं अन्यथा तो अव्याप्ति अवश्य ही हो जाय । वह कहते हैं—‘एक एक का’ यह । चारुताहीन अतिशयोक्ति, वक्रोक्ति, उपमा इत्यादि का सामान्य रूपत्व ही तारावती
सुवन्नत और तिङन्त की पद संज्ञा होती यह अर्थ हो ही जाता है फिर इस सूत्र में अन्तग्रहण कर ‘सुप्तिङन्तं पदम्’ सूत्र क्यों बनाया गया ? यह अन्तग्रहण व्यर्थ होकर शङ्कित करता है । कि ‘यदि अन्यत्र संज्ञाविधि में प्रत्यय ग्रहण हों तो तदन्त विधि नहीं होती ।’ इस प्रकार आचार्य को कहना तो यह सामान्य नियम है, किन्तु इस सामान्य को न कहकर विशिष्ट अन्त ग्रहण कर दिया गया है जिससे कथनीय सामान्य का आधिक्य हो जाता है । इस प्रकार यहाँपर अप्रस्तुत प्रशंसा का लक्षण घट जाता है ।
( १९ ) आक्षेप अलंकार उसे कहते हैं जहाँ किसी विशेष बात को कहने की इच्छा से निषेध कर दिया जाय । व्याकरण में ऐसे कई स्थल हैं जहाँ आचार्य विकल्प से किसी विधि को लागू करना चाहता है । वहाँ पर विकल्प का विधान न करके वह पहले तो अभीष्ट विधि का निषेध कर देता है और फिर उसे निषेध कर देता है जिससे दोनों विधियाँ सिद्ध हो जाती हैं और विकल्प भी सिद्ध हो जाता है । यहाँ पर विशेष बात कहनी है विकल्प । उसके लिये निषेध का विधान किया गया है । अतः यहाँ आक्षेप अलंकार हो सकता है ।
( १९ ) आक्षेप अलंकार उसे कहते हैं जहाँ किसी विशेष बात को कहने की इच्छा से निषेध कर दिया जाय । व्याकरण में ऐसे कई स्थल हैं जहाँ आचार्य विकल्प से किसी विधि को लागू करना चाहता है । वहाँ पर विकल्प का विधान न करके वह पहले तो अभीष्ट विधि का निषेध कर देता है और फिर उसे निषेध कर देता है जिससे दोनों विधियाँ सिद्ध हो जाती हैं और विकल्प भी सिद्ध हो जाता है । यहाँ पर विशेष बात कहनी है विकल्प । उसके लिये निषेध का विधान किया गया है । अतः यहाँ आक्षेप अलंकार हो सकता है ।
( १२ ) अतिशयोक्ति कई प्रकार की होती है । उसमें—
( १२ ) अतिशयोक्ति कई प्रकार की होती है । उसमें—
( क ) अभेदातिशयोक्ति जहाँ भेद में अभेद का प्रतिपादन किया जाय । जैसे कूंडी और समुद्र दोनों भिन्न पदार्थ हैं किन्तु जलबहुल्य को प्रदर्शित करने के लिये कूंडी को समुद्र कह दिया जाय । ( ख ) जहाँ असम्भन्ध में सम्भन्ध की कल्पना की जाय उसे समनन्धातिशयोक्ति कहते हैं । जैसे ‘विन्ध्याचल बड़ा और उसने सूर्य मार्ग को रोक लिया ।’ विन्ध्याचल के न तो बढ़ने का सम्बन्ध हो सकता है और न सूर्य मार्ग के रोकने का ही सम्बन्ध हो सकता है । किन्तु दोनों के सम्बन्ध की कल्पना की गई है । अतः यहाँपर सम्बन्धातिशयोक्कि का लक्षण घटित हो जाता है । इसी प्रकार अन्य अलंकारों के विषय में भी समझना चाहिये ।
( क ) अभेदातिशयोक्ति जहाँ भेद में अभेद का प्रतिपादन किया जाय । जैसे कूंडी और समुद्र दोनों भिन्न पदार्थ हैं किन्तु जलबहुल्य को प्रदर्शित करने के लिये कूंडी को समुद्र कह दिया जाय । ( ख ) जहाँ असम्भन्ध में सम्भन्ध की कल्पना की जाय उसे समनन्धातिशयोक्ति कहते हैं । जैसे ‘विन्ध्याचल बड़ा और उसने सूर्य मार्ग को रोक लिया ।’ विन्ध्याचल के न तो बढ़ने का सम्बन्ध हो सकता है और न सूर्य मार्ग के रोकने का ही सम्बन्ध हो सकता है । किन्तु दोनों के सम्बन्ध की कल्पना की गई है । अतः यहाँपर सम्बन्धातिशयोक्कि का लक्षण घटित हो जाता है । इसी प्रकार अन्य अलंकारों के विषय में भी समझना चाहिये ।
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चारुताहीनानामुपपद्यते, चारुता चैतदायचेत्येतदेव गुणीभूतव्यङ्ग्यत्वं सामान्यलक्षणम् । व्यङ्ग्यस्य च चारुत्वं रसाभिव्यक्तियोग्यतात्मकम्, रसस्य स्वात्मनैव विश्रान्तिधाम्नि आनन्दात्मकत्वमिति नानवस्था काचिदिति तात्पर्यम् । अनन्ता हीति ।
चारुताहीनानामुपपद्यते, चारुता चैतदायचेत्येतदेव गुणीभूतव्यङ्ग्यत्वं सामान्यलक्षणम् । व्यङ्ग्यस्य च चारुत्वं रसाभिव्यक्तियोग्यतात्मकम्, रसस्य स्वात्मनैव विश्रान्तिधाम्नि आनन्दात्मकत्वमिति नानवस्था काचिदिति तात्पर्यम् । अनन्ता हीति ।
प्रथमोद्योत एव व्यङ्ग्यातमेतत्त् ‘वाग्विकल्पानामानन्त्यात्’ इत्यन्तरान्तर । उपपन्न नहीं होता। नास्ति तो उसके आधीन ही होती है। इस प्रकार यहीं गुणीभूत व्यङ्ग्यत्व ( अलङ्कारों का ) सामान्य लक्षण है। व्यङ्ग्य का चारुत्व तो रसाभिव्यक्ति योग्यतात्मक होता है। रस अपने आप ही विश्रान्तिधाम होने से आनन्दात्मक होता है। अतः कोई अनवस्था नहीं है यह तात्पर्य है। ‘निस्सन्देह अनन्त’ यह । प्रथम उद्योत में ही इसकी व्याख्या कर दी गई-‘वाणी के विकलपों के अनन्त होने से’ इसके अन्दर ।
तारावती
तारावती
ऊपर जितने उदाहरण दिये गये हैं। उनमें निर्दिष्ट अलङ्कारों के लक्षण मिल जाते हैं। फिर भी उन्हें अलङ्कार नहीं माना जाता क्योंकि उनमें गुणीभूत व्यङ्ग्य का योग होकर रमणीयता उत्पन्न नहीं हुई है। सारांश यहीं है कि अलङ्कारता का सारभूत तत्व गुणीभूतव्यङ्ग्य ही है। यदि गुणीभूतव्यङ्ग्य को ठीक रूप में समझा जा सके तो अन्य अलङ्कार स्वयं ही भलीभाँति समझ में आ जायेंगे। गुणीभूतव्यङ्ग्य से परिपूर्ण कर यदि किसी अलङ्कार का प्रयोग किया जाता है तो वह अलङ्कार वास्तविक अलङ्कार बन जाता है और वह अलङ्कार ठीक रूप में लोकित तथा संगृहीत किया जा सकता है। यदि गुणीभूतव्यङ्ग्य का सामान्य लक्षण विद्वान न हो तो उपरिनिर्दिष्ट स्थानों पर भी अलङ्कारों के सामान्य लक्षण घटित हो जायेंगे और यह अतिव्याप्ति दोष होगा। सारांश यह है कि गुणीभूतव्यङ्ग्य का सामान्य लक्षण कर देने मात्र से ही अन्य अलङ्कार संगृहीत हो जाते हैं। विशिष्ट लक्षण बनाना न तो पर्याप्त हो है और न उससे काम ही चल सकता है। एक बात और है यदि एक एक को लेकर सभी अलङ्कारों के स्वरूप का प्रतिपादन किया जाय और सामान्य लक्षण पर निर्भर न रहा जा सके तो अलङ्कारों का पूरा वर्णन हो ही न सकेगा। कारण यह है जैसा कि प्रथम उद्योत के प्रारम्भ में दिखलाया जा चुका है वाणी के विकलप अनन्त होते हैं और उस वाग्विकल्प के ही प्रकार अलङ्कार हैं। अतः अलङ्कारों की भी इयत्ता नहीं हो सकती। जब अलङ्कार अनन्त होते हैं तब उनका एक एक करके विवेचन सम्भव ही कैसे हो सकता है। अलङ्कारों की दशा वैसी ही है जैसी प्रतिपद पाठ में
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शब्दों की होती है। प्रतिपद पाठ का आश्रय यह है कि वैैयाकरण महाभाष्यकार पतञ्जलि ने उपक्रम में लिखा है—
‘अब हमें शब्दों का उपदेश करना है। कैसे करें? क्या शब्दों की प्रतिपत्ति में प्रतिपद पाठ करें? गाय, घोड़ा, हाथी, पक्षी, मृग, ब्राह्मण इत्यादि अलग-अलग शब्दों को पढ़ दें? नहीं यह कहते हैं शब्दों की प्रतिपत्ति में प्रतिपद पाठ उपाय नहीं है। निस्संदेह ऐसा सुना जाता है कि बृहस्पति ने इन्द्र से सहस्र वर्ष पर्यन्त प्रतिपदोक्त शब्दों का शब्द पारायण कहा किन्तु अन्त तक पहुँचे। बृहस्पति तो कहनेवाले, इन्द्र अध्ययन करनेवाले, दिव्य सहस्र अध्ययन काल; फिर भी अन्त तक नहीं पहुँचने। फिर आज का तो क्या? जो पूर्ण चिरंजीवी हो वह १०० वर्ष जीवित रहता है। उसकी शब्दों को सुनते-सुनते समाप्त हो जायेगी। उसके बाद विद्या का उपयोग कैसे होगा? क्योंकि विद्या का उपयोग तो चार प्रकार से होता है—आगम स्वाध्याय काल, प्रवचन काल और व्यवहार काल। अतएव शब्दों की प्रतिपत्ति के लिये प्रतिपद पाठ कोई ठीक उपाय नहीं है। तो क्या करना चाहिये? कुछ लक्षण बना दिये जाने चाहिये—कुछ सामान्य हो कुछ विशेष। जैसे ‘कर्मण होने पर अण् प्रत्यय होता है’ यह नियम बना दिये जाने पर कुम्भकार, नाविक इत्यादि सैकड़ों शब्द बन जाते हैं।’ जो बात प्रतिपद पाठ के विषय में वैैयाकरण कहते हैं वही बात अलंकार विषय में लागू होती है। जितनी कवितायें हैं उतने ही अलंकार-भेद हो सकते हैं युगों से कविता होती चली आ रही है किन्तु उसका अन्त न तो हुआ और न होगा। इसी प्रकार अलंकार भी अनन्त हैं। उनका एक-एक विवेचन असम्भव है। अतः उनके सामान्य तत्व का निर्देश कर देना ही होगा और वह सामान्य तत्व है गुणीभूतव्यङ्ग्य। इसके समझ लेने से सभी समझे हुये हो जाते हैं।
(प्रश्न) अलंकारों में चारुता का आधान करानेवाला तत्व है रमणीयता, फिर गुणीभूतव्यङ्ग्य में चारुता का आधान करानेवाला कोई दूसरा होना चाहिये। उस तत्व में चारुता का आधान करनेवाला कोई और तत्व चाहिये। इस प्रकार अनवस्था नहीं है। यह तो सिद्ध ही है कि अतिशयोक्ति, वक्रोक्ति, उपमा आदि अलंकार हैं उनमें सामान्य धर्म रमणीयता ही है। यदि उनमें रमणीयता नहीं होगी तो उनका कोई सामान्य धर्म भी नहीं बनेगा।
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ननु सर्वेऽलङ्कारेषु नालङ्कारान्तरं व्यङ्ग्यं चकास्ति; तत्र किमयं गुणीभूतव्यङ्ग्येन लक्षणेन सर्वांल्लङ्कारान् संग्रहः । मैवम्, वस्तुमात्रं वा रसो वा व्यङ्ग्यः सदृशगुणीभूतं भवितव्यत् तदेवाह—गुणीभूतव्यङ्ग्य चेतिं । प्रकारान्तरेण वस्तुरसालमनोपलक्ष्यतस्य । यदि वेत्थमवतराणको—ननु गुणीभूतव्यङ्ग्येऽलङ्कारेति यदि लक्ष्यतास्तर्हि लक्षणं तस्य । यदि वेत्थमवतराणको—ननु गुणीभूतव्यङ्ग्येऽलङ्कारेति यदि लक्ष्यतास्तर्हि लक्षणं तस्य । वक्तव्यं किमितिनोक्तमित्याशङ्क्याह—गुणीभूत इति । विषयत्वमिति । लक्षणीयत्वमिति यावत् । केन लक्षणीयत्वं ध्वनिनव्यतिरिक्तो यः प्रकारो व्यङ्ग्यसेनार्थानुगमो नाम तदेव यावत् । लक्षणं तेनैवार्थः । व्यङ्ग्ये लक्ष्यते तद्गुणीभावे च निरूप्यते किमन्यदस्य लक्षणं क्रियतामिति तात्पर्यम् । एवं 'काव्यस्यात्माध्वानि'रिति निर्वाद्योपसंहरति—तद्भयमित्यादिना सौभाग्यमित्यन्वेति । प्रागुक्तं सकलसकत्विकाव्योपनिषद्भूतमिति तत् प्रतारणमात्रमर्यादरहुपं मन्तव्यमिति दर्शयितुम्—तदिदमिति ॥ ३६ ॥
लोचन
( प्रश्न ) सभी अलंकारों में दूसरा अलंकार व्यङ्ग्य रूप में प्रकाशित नहीं होता फिर किस प्रकार गुणीभूत व्यङ्ग्य के लक्षित करने से सबका संग्रह हो जाता है ? ( उत्तर ) ऐसा नहीं । वस्तुमात्र या रस व्यङ्ग्य होकर गुणीभूत हो जायँगे । वह कहते हैं-‘और गुणीभूत व्यङ्ग्य का’ यह । प्रकारान्तर का अर्थ है वस्तु रसात्मक रूप में उपलक्षित । अथवा अवतरण इस प्रकार का होगा—( प्रश्न ) यदि गुणीभूत व्यङ्ग्य द्वारा अलंकार लक्षित होगये तो लक्षण कहना चाहिए वह क्यों नहीं कहा ? यह शंका करके कहते हैं—‘गुणीभूत’ यह । विषयत्व’ यह । अर्थात् लक्षणीयत्व । किस के द्वारा लक्षणीयत्व ? ‘ध्वनि से व्यतिरिक्त जो व्यङ्ग्यत्व से अनुप्राणित रूप प्रकार वह लक्षण उसके द्वारा’ यह अर्थ है । तात्पर्य यह है कि व्यङ्ग्य के लक्षित कर देने पर और उसके गुणीभाव के निरुपित कर दिये जानेपर इसका और क्या लक्षण किया जाय ? इस प्रकार काव्य की आत्मा ध्वनि है इसका निर्वाह करके उपसंहार करते हैं—‘तो यह’ इत्यादि के द्वारा ‘सौभाग्य’ यहाँतक । पहले कहा हुआ ‘सकलसत्कविकाव्योपनिषद्भूत’ यह प्रतारण मात्र अर्थवाद रूप नहीं माना जाना चाहिए यह दिखलाने के लिये कहा है—वह इस प्रकार इत्यादि ।
तारावती
गुणीभूत व्यङ्ग्य के द्वारा ही होता है । अतः गुणीभूत व्यङ्ग्य होना ही अलङ्कारों का सामान्य लक्षण है । गुणीभूत व्यङ्ग्य में चारुता व्यङ्ग्य की होती है । व्यङ्ग्य की चारुता का आशय यही है कि उसमें ऐसी योग्यता हो कि वह रस की अभिव्यक्ति कर सके । रस की अभिव्यक्ति करना व्यङ्ग्य की चारुता का मूलाधार है। रस स्वयं ही आनन्दात्मक तथा हृदय की विश्रान्ति का धाम होता है जब वह स्वयं आनन्दरूप होता है । तत्र उसकी चारुता का मूलाधार वह स्वयं ही है । ऐसी दशा में अनवस्था दोष आता ही नहीं ।
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( प्रश्न ) यह तो हमने माना कि कुछ अलङ्कार ऐसे अवश्य होते हैं जिनमें दूसरे अलङ्कार व्यङ्ग्य होकर उनका पोषण करते हैं, किन्तु सभी अलङ्कार तो ऐसे नहीं होते जिनमें दूसरे अलङ्कार व्यङ्ग्य होकर अवश्य उनका पोषण करें । फिर आप यह कैसे कह सकते हैं कि गुणीभूत व्यङ्ग्य को लक्षित कर लेने से सभी अलङ्कार लक्षित हो जाते हैं ।
( उत्तर ) यह पहले ही सिद्ध किया जा चुका है कि अतिशयोक्ति अलङ्कार तो सभी अलङ्कारों में व्यङ्ग्य रहता है । इसके अतिरिक्त यह भी कहा जा सकता है कि गुणीभूत व्यङ्ग्य का तो दूसरा विषय भी हो सकता है और वह विषय हो सकता है वस्तुव्यञ्जना या रसव्यञ्जना का अनुगम रूप । आशय यह है कि गुणीभूत व्यङ्ग्य में केवल अलङ्कार ही व्यङ्ग्य होकर सहायक नहीं होते अपितु वस्तु या रस भी अभिव्यक्त होकर गुणीभूतव्यङ्ग्य का रूप धारण कर सकते हैं । अतः कोई भी अलङ्कार व्यङ्ग्य मुख्य नहीं होता । यह दूसरी बात है कि उसमें अलङ्कार व्यङ्ग्य न होकर वस्तु या रस व्यङ्ग्य हो ।
( प्रश्न ) आप ने यह तो कहा कि गुणीभूतव्यङ्ग्य लक्षण है और अलङ्कार ललित्य । किन्तु आपने गुणीभूत व्यङ्ग्य का लक्षण क्यों नहीं किया ?
( उत्तर ) गुणीभूतव्यङ्ग्य विषय है अर्थात् उसका लक्षण बनाना है । उसका लक्षण है प्रकारान्तर से व्यङ्ग्यार्थानुगम । अर्थात् यदि यह पूछा जाय कि वह कौन सा तत्व है जिसका लक्ष्य गुणीभूत होता है तो इसका उत्तर होगा व्यङ्ग्यत्व के रूप में जो अर्थानुगम होता है वह जहाँ कहीं मुख्य होकर ध्वनिरूपता को धारण करता है उसके अतिरिक्त जितना भी व्यङ्ग्यत्व होता है वह सब गुणीभूत व्यङ्ग्य का ही लक्षण कहा जा सकता है और उसी के द्वारा गुणीभूत व्यङ्ग्य लक्षित होता है । हमे गुणीभूत व्यङ्ग्य को ही लक्षण बनाना है । गुणीभूत व्यङ्ग्य में दो शब्द हैं—गुणीभूत और व्यङ्ग्य । व्यङ्ग्य का पूरा परिचय दे हो दिया गया और गुणीभूत की भी पूरी व्याख्या कर दी गई । अब गुणीभूत व्यङ्ग्य के विषय में कहने को शेष ही क्या रह गया । ऊपर जो कुछ कहा गया है उससे इस कथन का पूरा निर्वाह हो गया कि काव्य की आत्मा ध्वनि रूप है जो कि बहुत ही रमणीय होता है और महाकवियों का एक उत्तम विषय है । सद्धदयों को भलिभाँति इसका परिचय प्राप्त कर लेना चाहिये । काव्य सद्धदयों के हृदयों को आकृष्ट करनेवाला होता है । उस काव्य को ऐसी कोई जाति नहीं होती जिसमें व्यङ्ग्य का समावेश हो जाने पर रमणीयता नहीं आ जाती । यह जो पहले कहा गया था कि समस्त सत्कवियों के काव्यों का यह उपनिषद् है यह केवल वस्तुव्यञ्जना के लिये ही नहीं कहा गया था और न यह अर्थवाद ही
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था। अथर्वाद उसे कहते हैं जिसके सत्य होने की तो बात नहीं होती किन्तु दूसरों को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए बढ़ा-चढ़ाकर किसी की प्रशंसा कर दी जाती है। आशय यह है कि केवल प्रशंसा के लिए और दूसरों को अपनी ओर आकर्षित करने के लिये ही यह असत्यप्रलाप नहीं कर दिया गया है कि ध्वनि समस्त काव्यों का उपनिबद्धूत प्रधान सारभाग है यह जो कुछ कहा गया वह सर्वांश में सत्य है।
(यहाँ पर गुणीभूतव्यङ्ग्य को ध्वनि का निश्यान्त कहा गया है। निश्यान्त शब्द का अर्थ है थोड़ा-थोड़ा क्षरित होना या टपकना। किसी पदार्थ का जो सार तत्व थोड़ा-थोड़ा करके टपकता है उसे निश्यान्त कहते हैं। ध्वनिकार का आशय यह है कि ध्वनि एक महत्त्वपूर्ण पदार्थ है और उसका सारभूत तत्व गुणीभूतव्यङ्ग्य है। काव्य का जीवन ध्वनि है और ध्वनि का सारभूत तत्व गुणीभूतव्यङ्ग्य है। इस विषय में दीधितिकारने लिखा है कि यहाँ पर निश्यान्त का अर्थ नवनीत नहीं है अपितु आमिक्षा है। आमिक्षा का अर्थ है फटे हुये दूध से निकाला हुआ जलीय अंश। दीधितिकार का कहना है कि यदि निश्यान्त को ठीक अर्थ में नवनीत के समान सारभाग मान लिया जायगा तो इसका आशय यह होगा कि गुणीभूतव्यङ्ग्य ध्वनि की अपेक्षा भी अधिक उत्तम है जबकि वास्तविकता ऐसी नहीं है। अतः गुणीभूतव्यङ्ग्य को ध्वनि का नवनीत न मानकर उसे ध्वनि का फटा हुआ छेना ही कहना अधिक ठीक होगा। किन्तु यहाँ पर विचार यह करना है कि लेखक गुणीभूतव्यङ्ग्य की प्रशंस्ति लिख रहा है और महाकवियों को उपदेश दे रहा है कि वे उसे अपने विषय बनायें। आगे चलकर ग्रन्थकार इस बात का भी प्रतिपादन करेगा कि जहाँ गुणीभूतव्यङ्ग्य का अवसर हो वहाँ ध्वनि की योजना नहीं करनी चाहिये। पहले भी लेखक कह चुका है कि उच्चकोटि के काव्यों में इसी गुणीभूतव्यङ्ग्य की योजना करनी चाहिये।
ऐसी दशा में लेखक गुणीभूतव्यङ्ग्य को फटे दूध की उपमा देगा। यह कुछ समझ में नहीं आता। वास्तविकता यह है कि प्रत्येक काव्य की परिणति तो ध्वनि में ही होती है। जहाँ कहीं व्यङ्ग्यार्थ की अपेक्षा वाच्य को प्रधानता प्राप्त होती है वहाँ भी उसकी प्रधानता का एकमात्र कारण यही होता है कि उसमें चमत्कार तथा आनन्द प्रदान करने की शक्ति अधिक होती है। आनन्द स्वयं रसरूप है जो व्यङ्ग्य होता है। अतः उस काव्य को भी ध्वनिकाव्य ही कहेंगे। इस प्रकार ध्वनिकाव्य के दो भेद हो जाते हैं—(१) ऐसी ध्वनि जिसमें वाच्यार्थ निम्न हो और व्यङ्ग्यार्थ को प्रधानता प्राप्त हो जाय और (२) ऐसी ध्वनि जिसमें वाच्यार्थ उत्त्कृष्ट हो
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मुख्यामहाकविगिरामलड्कृतिभृतामपि । प्रतीममानच्छायैषा भूषा लज्जैव यानिताम् ॥ ३९ ॥
अनया सुप्रसिद्धोड्यर्थः किर्माे कामनीयकमानीयत । तय्यथा—विश्रम्भोक्त्या मन्मथज्ञाविधाने ये मुग्धाद्या: केडपि लीलाविलासेप: । अजुगणास्ते चेतसा केवलन स्थितैवै कान्ते सन्तं भावनीया: ॥ इत्यत्र केडपि लीलाविलासेन पदेन वाच्यमस्पष्टमभिदधता प्रतीममानं वस्त्वकिष्ट-मनन्तर्मर्पयता का छाया नोपपादिता ।
(अनु०) ‘अलङ्कारों को धारण करनेवाली भी महाकवियों की यह प्रतीममान के द्वारा सम्पादित छाया उसी प्रकार मुख्य होती है जिस प्रकार क्रियों का लज्जा आभूषण’ ॥ ३७ ॥ इसके द्वारा सुप्रसिद्ध भी अर्थ किसी ( अद्वितीय ) कामनीयता को प्राप्त करा दिया जाता है । वह इस प्रकार— ‘मन्मथ के आदेश पालन में मुग्धादि के जो विश्वासपूर्वंक उठे हुये कोई भी लीलाविलास हैं वे केवल चित्त से एकान्त में बैठकर निरन्तर भावन करने योग्य हैं ।’ वाच्य को अस्पष्टरूप में कहनेवाले ‘कोई भी’ इस शब्द के द्वारा अकिलष्ट और अनन्त प्रतीममान को अर्पित करते हुये कौन सी छाया उपादित नहीं कर दी ।
लोचन ‘मुख्यां भूषे’ति । अलङ्कृतिभृतामपिशद्दादलङ्कारशून्यारामपोत्थ्यर्थ: । प्रतीममान-कता छाया शोभा, सा च लज्जासहशी गोपनासारसौन्दर्यग्राणाह्वात । अलङ्कारभाजिना-मपि नायिकानां लज्जा मुख्यं भूषणम् । प्रतीममानच्छाया अन्तर्मंदनोद्रेकजहृदय-सौन्दर्यरूपा या, लज्जाद्यनन्तरूद्धद्रनमान्मथविकारजुगोपयिषारूपा मदनविजृम्भणैव । वीतराागां यतीनां कौपीनापसारणेडपि त्रपाकलड्कादर्शनात । तथा हि कस्यांप कवे:—‘मुख्य आभूषण’ यह । ‘अलङ्कार धारण करनेवाली भी’ भी का अर्थ है अलङ्कार शून्य भी । प्रतीममान के द्वारा की हुड़ई छाया अर्थात् शोभा और वह लज्जा के समान होती है क्योंकि उसका प्राण है ऐसा सौन्दर्य जिसका सार गोपन ही होता है । अलङ्कार धारण करनेवाली भी नायिकाओं का लज्जा मुख्य भूषण है । अन्दर मदन के उद्देम से हृदय की सुन्दरता का जो साक्षात् वह प्रतीममान है जिसके द्वारा निस्सन्देह लज्जा हृदय में उद्देमेद को प्राप्त होनेवाले काम विकार के गोपन करने की इच्छा रूप कामदेव का विजृम्भण ही है । क्योंकि वीतरााग यतियों के अन्दर कौपीन के अपसारण ये भी लज्जा रूप कलंक के दर्शन नहीं होते । वह इस प्रकार
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'कुरङ्गीवाङ्गानि' इत्यादि श्लोकः । तथा प्रतीममानस्य प्रियतमाभिलाषावुनाथनमान-प्रभृतेः छाया कान्तिः यथा । शृङ्गाररसतरङ्गिणी हि लज्जावृत्या निर्मितया तांस्तान् विलासान् नेत्रगात्रविकारपरम्परारूपान् प्रसूते इति गोपनासरसौन्दर्येलज्जाविजृम्भितमेतदिति भावः ।
किसी कवि का—‘कुरंगीवाङ्गानि' इत्यादि श्लोक । उसी प्रकार प्रतीममान की अर्थात् प्रियतम की अभिलाषा, प्रार्थना, मान इत्यादि की छाया अर्थात् कान्ति है जिसके द्वारा । निस्सन्देह शृङ्गार रस की नदी लज्जा से अवरुद्ध होकर नेत्र तथा शरीर के विकार रूप विभिन्न विलासों को उत्पन्न करती है । इस प्रकार जिस सौन्दर्य का सारभाव गोपन ही है इस प्रकार की लज्जा का यह सब विजृम्भण है ।
तारावती और उस वाच्यार्थ को कोई दूसरा व्यङ्ग्यार्थ अनुगृहीत कर रहा हो जिससे अलङ्कार की मधुरिमा भी आ गई हो तथा समस्त काव्य का पर्यवसान अन्तिम रसव्यञ्जना में हो । निस्सन्देह प्रथम प्रकार की अपेक्षा द्वितीय प्रकार का काव्य उच्चकोटि का होगा ही । यही आनन्दवर्धन का अभिप्राय हैः ।। ३६ ।।
३७वीं कारिका में प्रतीममान अर्थ का काव्य में महत्त्व बतलाया गया है । इसमें कहा गया है कि चाहे कोई कवी कितने ही आभूषण क्यों न पहनने हुये हो अथवा वह आभूषणों से सर्वथा शून्य हो ( अलङ्कारशून्यता का अर्थ ‘अलङ्कृतिभृतामपि' के अपिशब्द से प्राप्त होता है । ) किन्तु उसका मुख्य आभूषण लज्जा ही होता है क्योंकि उसमें प्रतीममान की छाया ( शोभा ) होती है । उसी प्रकार किसी कवि की वाणी में कितने ही अलङ्कारों का प्रयोग किया गया हो अथवा उसमें एक भी अलङ्कार न हो किन्तु उसका मुख्य आभूषण प्रतीममान की शोभा ही है । यहाँ पर प्रतीममान को त्रियों के लज्जा आभूषण की समता प्रदान की गई है । इसके दो कारण हैं एक तो लज्जाभाव गोपन की प्रवृत्ति होती है । लज्जा-शीलता से जब ललनाएँ अपने भाव को छिपाती हैं तब उसमें एक सौन्दर्य आ जाता है । यह सौन्दर्य भावगोपन का ही सौन्दर्य होता है और यही लज्जा का प्राण है । इसी प्रकार ध्वनि में भी गोपन का ही सौन्दर्य होता है । कवि जिस बात को कहना चाहता है उसे उस रूप में न कहकर गोपन के साथ कहता है । इसी सादृश्य के आधारपर प्रतीममानजन्य रमणीयता को ललनाओं की लज्जा से उपमित किया गया है । दूसरी बात यह है कि नायिकाएँ कितने ही आभूषण क्यों न पहिन लें जवतक उनमें लज्जाशीलता नहीं आयेगी तब तक वे आकर्षक हो ही नहीं सकती । दूसरी ओर यदि उनके पास एक भी आभूषण न हो किन्तु लज्जा-
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शीलता विदग्धमान होतों वे आकर्षण में हेतु बन जाती हैं। इसी प्रकार काव्य में अलंकारों का होना न होना कोई विशेष महत्व नहीं रखता। यहाँ पर प्रतीतमान छाया शब्द लज्जा का भी विशेषण हो सकता है। उस दशा में इसमें बहुत्रीहि समास होगा और इसका अर्थ हो जायगा—प्रतीतमान छाया जिसमें अर्थात जिस लज्जा में सौन्दर्य की प्रतीति होती है। जब अन्तःकरण में काम वासना अजुरित होती है तब हृदय में एक सरसता उत्पन्न हो जाती है। उस सरसता के कारण हृदय में एक रमणीयता उत्पन्न हो जाती है जोकि बाह्य चेष्टाओं को भी रमणीय बना देती है, लज्जा उसी रमणीयता का एक रूप है। लज्जा और है क्या? हृदय में जो कामविकार उद्भूत हुआ है उसको छिपाना ही तो लज्जा है। अतएव यह भी तो कामकला की ही एक चेष्टा है। फिर इसमें रमणीयता क्यों न आयेगी। जिनमें काम-विकार नहीं होता उनके अन्दर लज्जा भी नहीं होती। वीतिराग महापुरुषों की यदि काम-रहित भी हृदय की जाय तो भी उनमें लज्जा का कलंक दिखाई न देगा। किसी कवि ने कहा है—
कुरज्जीवाञ्ज्ञानी स्तिमितयति गीतध्वनिषु यत् । सखी कान्तोदन्तं श्रुतमपि पुनः प्रथयति यत् ॥ अनिद्रं यच्चान्तः स्वपिति तदहो वेद्यमपि मनवां। प्रवृत्तोऽस्या; सेकु हृदि मन्सिजः प्रेमलतिकाम् ॥
'जोकि यह नायिका गाने की ध्वनियों में अपने अंगों को हरिणी के समान स्थिर बनानेती है। वह अपने प्रियतम के विषय में सभी बातें सुन भी लेती है फिर भी सखी के द्वारा पुनः प्रवृत्त कराती है, बिना ही निद्रा के अन्दर ही अन्दर सोने लगती है, इन सब बातों से प्रकट होता है कि कामदेव ने इसके हृदय में नवीन प्रेमलता को सींचना प्रारम्भ कर दिया है।'
यहाँ पर नायिका का गीतों में अंगों को सिकोड़ने लगना, प्रियतम के विषय में सुनी हुई बात को बार-बार पूछना और विनाही निद्रा के अन्दर ही अन्दर सोने लगना लज्जा-जन्य चेष्टायें हैं जिनसे अनुमान होता है कि उसके अन्दर काम विकार का नवीन सञ्चार हुआ है और उसके हृदय की प्रेमलता धीरे-धीरे बढ़ती जा रही है। कहने का सारांश यही है कि लज्जा-जन्य चेष्टायें सर्वदा कामविकार से मुक्त होती हैं और उसी की परिचायिका होती हैं। इस लज्जा में जो काम विकार प्रतीत होता है उसके अनेक अनुवन्ध होते हैं। जैसे प्रियतम की अभिलाषा तथा उसकी आकांक्षा और प्रार्थना, मान इत्यादि। इन सबकी छाया अर्थात कान्ति उस लज्जा में सन्निहित रहती है। यह शृङ्गार रस भी एक नदी की धारा के समान
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विश्रम्भेति । मन्मथाचार्येण त्रिभुवनवनधामानशासनेन अत एव लज्जासाध्वसध्वंसिना दत्ता येयमलड्ननौयाज्ञा तदनुष्ठाने डवशयं कर्तव्ये सति साध्वसलज्जात्यागेन विश्रम्भसम्भोगकालोपनता: । मुग्धाक्ष्या इति । अकृतकसम्भोगपरिभावनोचितदृष्टिप्रसरपवित्रिता येडन्थे विलासगात्रनेत्रविकार:, अतएवाक्षुण्णा: नवननवरूपतया प्रतिक्षणमुनिमिषन्तस्ते, केवलेनान्यत्राभिग्रेणै कान्तावस्थानपूर्वं सर्वेन्द्रियोपसंहारे भ भावयितुं शक्या अर्ह: उचित: । यत: केनापि नान्येनोपायेन शक्यनिरूपण: ॥ ३७ ॥
'विश्रम्भ' यह । त्रिभुवन के द्वारा वन्दनीय शासनवाले अतएव लज्जा के साध्वस को ध्वस्त करनेवाले मन्मथ आचार्य के द्वारा जो यह अलड्ननीय आज्ञा दी गई है उसके अनुष्ठान के अवश्य करणीय होने पर साध्वस और लज्जा के त्याग के साथ विश्रब्ध सम्भोग काल में आये हुये ( जो लीलाविलास हैं ) मुग्धाक्षी होने के कारण वनावट रहित सम्भोग के आस्वाद के योग्य दृष्टि प्रसार से पवित्र किये हुये जो दूसरे विलास अर्थात् शरीर और नेत्र के विकार हैं अतएव अक्षुण्ण अर्थात् प्रतिक्षण नये नये रूप में उद्भूत होनेवाले ( लीलाविलास हैं ) वे केवल अर्थात् अनन्यत्र व्यग्र न होनेवाले ( चित्त ) से अर्थात् एकान्त में अवस्थानपूर्वक सर्व इन्द्रियों के उपसंहार के द्वारा भावित करने के योग्य हैं । क्योंकि किसी भी अन्य उपमा से निरूपण नहीं किया जा सकता ॥ ३७ ॥
तारावती है । जिस प्रकार नदी की धारा को रोक देने से उसमें इधर-उधर लहरें फैल जाती हैं उसी प्रकार जव इस श्रृङ्गार की नदी को लज्जा रूपी बाँध से रोक दिया जाता है तब उसमें अत्याधिक परिमाण में विलास उत्पन्न होने लगते हैं । जो अनेक प्रकार के होते हैं और जिनमें नेत्र, और शरीर के दूसरे अङ्गों के विकार सम्मिलित होते हैं । इस प्रकार लज्जा में ऐसा सौन्दर्य सन्निहित रहता है जिसका सार होता है भावगोपन और यह सारा क्रियाकलाप लज्जा का ही होता है । यह सत्त्व उसी का प्रसारमय चेष्टा-कलाप है । एक उदाहरण लीजिये— 'कामदेव की आज्ञा मानने में मुग्धाक्षी के जो लीलाविलास विश्ववपूर्वक उद्भूत हुये हैं वे नये-नये रूप में सामने आ रहे हैं और उनका भावन केवल चित्त से एकान्त में बैठकर के ही किया जा सकता है ।' कामदेव एक आचार्य है और ऐसा आचार्य है कि जिसकी आज्ञा की अवहेलना तीनों लोकों में कोई कर ही नहीं सकता । संसार के बड़े से छोटे तक सभी चेतन-
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अचेतन पदार्थ नतमस्तक होकर भगवान कामदेव की आज्ञा का अभिनन्दन करते हैं। उस कामदेव ने इस नायिका को भी आदेश दिया है कि यह भी अपने लीला-विलास प्रारम्भ करे। यह कामदेव की आज्ञा लज्जा को भी नष्ट करनेवाली है और भय को भी दूर कर देती है। यह आदेश अलङ्घनीय है और इसका अनुसरण करना अपरिहार्य है। सञ्जोगवश ऐसे व्यक्ति का सहवासकाल भी आ उपस्थित हुआ है जिससे विश्वास की मात्रा बढ़ गई है। अतः उस अवसर पर भगवान् कामदेव की आज्ञा का पालन करने के लिये जो लीलामय विलास, चेष्टायें उपनत होती हैं उनका उत्थान विश्वास के साथ होता है। नायिका सुग्धाक्षी है। उसकी आँखों में भोला-पन है; अतः सम्भोगजन्य आनन्द का अनुभव करने में जिस प्रकार के दृष्टिपातों का उसे अभ्यास है उसमें वनावट बिलकुल नहीं है जिससे उन विलासचेष्टाओं में पवित्रता आ गई है। ये विलास शरीर तथा नेत्र के अन्दर विकार उत्पन्न करनेवाले हैं। इसलिये ये अक्षणु हैं अर्थात् प्रतिक्षण ये नये-नये रूप में प्रफुटित होते जाते हैं। इनको समझ सकना और इनका आस्वादन कर सकना ऐसे वैसे सम्भव नहीं है। यह तभी हो सकताहै जब अपनी चित्तवृत्ति को चारों ओर से हटाकर एकनिष्ठ करके तथा एकान्त स्थान पर बैठकर उनकी भावना की जाय और सभी इन्द्रियाँ अपने-अपने विषयों से हटा ली गई हों। अन्य कोई उपाय नहीं है जिससे उनको समझा जा सके।
यहाँ पर कटाक्षों के लिये कहा गया है ‘कोई’ कटाक्ष। यहाँ कोई का अर्थ है जिनका निर्वचन करना अशक्य है। यहाँ पर वाच्य को अस्पष्ट रूप में कहा गया है; उससे अभिव्यञ्जना होती है कि उस नायिका के लीलाविलासों में कोई एक ऐसी विलक्षणता है कि उसका कथन कर सकना सर्वथा असम्भव है। उसके विलासों में इतने गुण है कि उनका परिसङ्ख्यान भी नहीं किया जा सकता। इस प्रकार विलासों की महत्ता, उत्तुङ्गता और अपरिमेयता इत्यादि अनेकों व्यञ्जनायें अनायास ही हो जाती हैं। क्या इससे कोई एक नई शोभा उद्भूत नहीं होती? अथवा ऐसी कौनसी रमणीयता है जो इस ‘केडपि’ शब्दसे उद्भूत नहीं होती? (यहाँ पर ‘केडपि’ का वाच्यार्थ स्फुट करने के लिये उक्त अभिव्यक्तियों की क्यास्टि करनी पड़ेगी। अतः यहाँ पर अभिध्यञ्जक अर्थ वाच्यसिद्धि का अंग होने से गुणीभूतव्यङ्ग्य की कोटि में आता है। यहाँ कारिका भी गुणीभूतव्यङ्ग्य की ही महत्ता बतलाती है। एक तो यह गुणीभूतव्यङ्ग्य के प्रकरण के मध्य में आई है; दूसरे ‘एषा प्रतायमानच्छाया’ में ‘एषा’ शब्द उसी ओर संकेत करता है।
गुणीभूतव्यङ्ग्य का एक दूसरा प्रकार और होता है जिसे काराक्षिस गुणीभूत-व्यङ्ग्य कहते हैं॥ ३७ ॥
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अर्थान्तरगति: काकू या चैषा परिदर्श्यते । सा व्यङ्ग्यस्य गुणीभावे प्रकारमिममाश्रिता ॥ ३८ ॥
या चैषा काकू कचिदर्थान्तरप्रतीतिहेतु: सा व्यङ्ग्यार्थस्य गुणीभावे सति गुणीभूतव्यङ्ग्यस्यैव प्रकारमाश्रिता । तथा ‘स्वस्था भवतु मतिर्धातृराष्ट्र:' ॥
( अनु० ) ‘काकु’ के द्वारा जो यह अर्थान्तरप्रतीति देखी जाती है वह व्यङ्ग्य के गुणीभूत होने से इस ( गुणीभूतव्यङ्ग्य ) के प्रकार का आश्रय लेती है । और जो यह काकु के द्वारा कहीं अर्थान्तरप्रतीति देखी जाती है वह व्यङ्ग्य अर्थ के गुणीभूत होनेपर गुणीभूतव्यङ्ग्यलक्षणवाले इस काव्यप्रभेद का आश्रय लेती है । जैसे ‘मेरे जीवित रहते धृतराष्ट्र के पुत्र स्वस्थ हो जायँ ।’
गुणीभूतव्यङ्ग्यस्यैव प्रकारणान्तरमाह—अर्थान्तरगाति: । ‘कक लोल्ये' इत्यस्य धातो: काकुरब्द: । तत्र हि साकांक्षनिरीकांक्षादिक्रमेण पद्यमानोदसौ शब्द: प्रकृतार्थ-तिरिक्तमपि वाच्छति लोल्यमस्यामिधीयते । यद्वा ईपदर्थे ‘कु' शब्द्रस्स्तस्य कादेश: । तेन हृदयस्य वस्तुप्रतीतेरीपद्भूमि: काकु: तथा यार्थान्तरगति: स काव्य-विशेष इयं गुणीभूतव्यङ्ग्यप्रकारमाश्रिता । तत्र हेतु: व्यङ्ग्यस्यैव तत् तु प्रतीतेर्न गुणीभूतव्यङ्ग्यत्वं वाक्यस्य प्रतीतिद्वारेण वा काव्यस्य निस्पित्तम् ।
गुणीभूत व्यङ्ग्य के दूसरे उदाहरण को कहते हैं—‘अर्थान्तर’ यह । ‘कक लोल्ये' इस धातु का काकु शब्द बनता है । उसमें साकांक्ष और निराकांक्ष इत्यादि क्रम से पढ़ा हुआ यह शब्द प्रकृत अर्थ के अतिरिक्त भी चाहता है अतः इसका लोल्य कहा जाता है । अथवा ईपद् अर्थ में ‘कु' शब्द है जिसको ‘का' आदेश हो जाता है । इससे हृदयस्थ वस्तु की प्रतीति का जो जोड़़ा स्थान है । उसके द्वारा जो दूसरे अर्थ की प्रतीति वह काव्यविशेष इसी गुणीभूतव्यङ्ग्य नामक प्रकार के आश्रित है । उसमें हेतु व्यङ्ग्य का वहाँ गौण हो जाना ही होता है । अर्थान्तर गति शब्द से यहाँ काव्य ही कहा जाता है, प्रतीति का तो यहाँ पर गुणीभूतव्यङ्ग्य नहीं कहा जा सकता । अथवा प्रतीति के द्वारा वह ( गुणीभूतव्यङ्ग्यत्व ) काव्य का निरूपित किया गया है ।
व्यङ्ग्य कहते हैं । ३५वीं कारिका में उसी का परिचय दिया गया है । ( द्वितीयकार ने अवतरण में लिखा है—‘काकादिस्वरूप गुणीभूतव्यङ्ग्य के प्रकार का निरूपण
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कर रहे हैं जनकि लोचनकार ने काकाक्षिस को गुणीभूतव्यंग्य का उदाहरण कहा है। लोचनकार का आशय यह है कि ध्वनिकार ने गुणीभूतव्यंग्य का क्षेत्र अनन्त बतलाया है; उन्होंने उसका प्रकार-विभाजन नहीं किया। यह काकाक्षिप्त व्यंग्य भी उसी प्रकार गुणीभूतव्यंग्य का एक उदाहरण हो सकता है। जिस प्रकार पहले बतलाया गया है कि अनेक अलंकार गुणीभूतव्यंग्य के ही उदाहरण होते हैं। कारिका का आशय यह है कि 'देखा जाता है कि काकु से दूसरे अर्थ की प्रतीति हो जाती है, उसमें भी व्यंग्य गुणीभूत ही होता है; अतः वह भी इसी प्रकार के अन्दर सन्निविष्ट हो जाती है।'
काकु शब्द की निष्पत्ति दो प्रकार से बतलाई जा सकती है (१) लौलय अर्थवाली 'कक्' धातु से 'उण्' प्रत्यय होकर काकु शब्द बनता है। काकु का लौलय (लोभ) यही है कि वह अपने अर्थ से सुतरांष्ट न रहकर दूसरे अर्थ को भी अपने में सम्मिलित करना चाहता है। काकु दो प्रकार का होता है साकांक्ष और निराकांक्ष क्योंकि वाक्य भी दो ही प्रकार का होता है। जिस वाक्य से जितना वाक्यार्थ आ रहा हो उतने ही वाच्यार्थ तक सीमित न रहकर जहाँ अधिक या न्यून अर्थ लिया जाता है और जिसका निर्णय वाद में प्रमाण के द्वारा किया जाता है वह साकांक्ष वाक्य होता है तथा जहाँ अर्थ स्वाभाविक पर्यवसित होता है वह वाक्य निराकांक्ष कहलाता है। साकांक्ष वाक्य में जो काकु होता है वह साकांक्ष काकु कहलाता है और निराकांक्ष वाक्य में जो काकु होता है उसे निराकांक्ष काकु कहते हैं। इसी प्रकार कण्ठध्वनि के अनुसार इसके द्रुतत्व इत्यादि भेद भी होते हैं। इन सब के क्रम से जहाँ काकु का प्रयोग किया जाता है वहाँ वह प्रकट अर्थ के अतिरिक्त अन्य अर्थ का भी लोभ रखता है। अतः उसे काकु कहते हैं। (२) ईषद् अर्थ में 'कु' शब्द है। उसका 'का' आदेश हो जाता है। इसका आशय यह है कि काकु उसे कहते हैं जिसमें हृदय में स्थित वस्तु की बहुत थोड़ी प्रतीति कराई जाय। उस काकु से जो व्यंग्यार्थ प्रतीत होता है वह भी इसी प्रकार (गुणीभूतव्यंग्यज्ञ) का ही आश्रय लेता है। यहाँ पर 'अर्थान्तरगति:' इस शब्द का वोध्यार्थ काव्य है। अर्थात् इसका आशय यह है कि जिस काव्य में काकु से अर्थान्तर गति होती है उसे इसी प्रकार में समावेश प्राप्त होता है। इस प्रकार यहाँ काव्य ही गुणीभूत होता है, प्रतीति गुणीभूत नहीं होती। अथवा प्रतीति को गुणीभूत कहकर यहाँ पर काव्य के गुणीभाव का निरूपण किया गया है। (यहाँ पर 'अर्थान्तर गति' शब्द में दो प्रकार से समास किया जा सकता है—बहुव्रीहि 'अर्थान्तर की गति (प्रतीति) है जिसमें' अर्थात् काव्य और तत्पुरुष समास अर्थात् अर्थान्तर की प्रतीति। प्रथम अर्थ के
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अन्ये त्वाहुः—व्यङ्ग्यस्य गुणीभावेऽयं प्रकारः अन्यथा तु तत्रापि ध्वनित्वमेवेति। तच्वासत्, काकुप्रयोगे सर्वत्र शब्दस्पृष्टत्वेन व्यङ्ग्यस्योन्मीलितस्यापि गुणीभावात्, काकुरिह शब्दरयैव कश्रिद्वर्मस्तेन स्पृष्टं ‘गोपीयैव गदितः सलेशम्’ इति, ‘हसनेत्राप्पिता-कृतम्’ इति वच्च्छन्दनवशानुगृहीतस्। अनत एव ‘भ्रम भ्रमिषु’ इत्यादौ काकुयोजने कूजितम् इति गुणीभूतव्यङ्ग्यतैव व्यनक्तक्त्वेन तदामिमानालोकस्य। स्वस्था इति, मवन्ति इति मयि जोवति इति, धार्तराष्ट्र इति च साकांक्षद्वोसगद्गदतारप्रशमनोद्दीपनचित्रिताकाकुरसम्भाग्योदयमर्योदित्यर्थमनुचितश्वेत्यसुं व्यङ्ग्यधर्मी स्पृष्टान्ती तेनैवोपकृता सती क्रोधानुभावरूपता वाच्यस्यैवाभिधत्ते।
और लोग तो कहते हैं—‘व्यङ्ग्य के गुणीभाव में यह प्रकार है अन्यथा तो वहाँ पर भी ध्वनि ही होती है’ यह। वह ठीक नहीं है क्योंकि काकुप्रयोग में सर्वत्र शब्द से स्पृष्ट होने के कारण उन्मीलित भी व्यङ्ग्य का गुणीभाव हो जाता है। काकु शब्द की ही वाचक धर्मं है, उससे स्पष्टी किया हुआ शब्द काकु के द्वारा ही अनुगृहीत होता है जैसे ‘गोपी के द्वारा इस प्रकार सासभिप्राय कहा हुआ’ और ‘हँसते हुये नेत्र के द्वारा संकेत देकर’ इत्यादि में (शब्द के द्वारा कहा गया है) अतएव ‘हे धार्मिक भ्रमण करो’ इत्यादि में काकु की योजना करने पर गुणीभूत व्यङ्ग्यता ही होगी क्यों कि वहाँ पर व्यक्त रूप में उक्त होने से लोक का अभिमान (उसी में है।) ‘स्वस्थ’ यह ‘होते है’ यह ‘मेरे जीवित रहते हुये’ यह और ‘धार्तराष्ट्र’ यह आकांक्षा युक्त दोष और गद्गद के साथ तार प्रशमन और उद्दीपन के द्वारा विचित्र बनाई हुई काकु ध्वनि ‘यह अर्थं असम्भाव्य है और अत्यन्त अनुचित है’ इस व्यङ्ग्य अर्थ का स्पष्ट करते हुये उसी के द्वारा उपकृत होकर व्यङ्ग्य से उपकृत वाच्य की ही क्रोधानुभावरूपता को कहती है।
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अनुसार काव्य की गुणीभूतव्यङ्ग्यता सिद्ध होती है और दूसरे के अनुसार प्रतीति की गुणीभूतव्यङ्ग्यता सिद्ध होती है। दूसरे अर्थ के अनुसार भी प्रतीति के माध्यम से काव्य को ही गुणीभूतव्यङ्ग्य कहा जा सकता है।
(कारिका के ‘व्यङ्ग्यस्य गुणीभावे’ में सप्तमी विभक्ति की व्याख्या दो अर्थों में की जा सकती हैं—निमित्त सप्तमी में और भाव सप्तमी (सति सप्तमी) में। निमित्त सप्तमी मानने पर अर्थ यह होगा कि क्योंकि काकु में व्यङ्ग्य गुणीभूत होता है इसलिये वहाँ पर गुणीभूतव्यङ्ग्य काव्य कहा जाता है। दूसरी व्याख्या के अनुसार इसका अर्थ होगा—‘जहाँ कहीं काकु से अभिव्यक्त होनेवाला व्यङ्ग्यार्थ गुणीभूत हो जाता है वहाँ गुणीभूतव्यङ्ग्य काव्य कहा जाता है। दोनों व्याख्याओं में अन्तर
(कारिका के ‘व्यङ्ग्यस्य गुणीभावे’ में सप्तमी विभक्ति की व्याख्या दो अर्थों में की जा सकती हैं—निमित्त सप्तमी में और भाव सप्तमी (सति सप्तमी) में। निमित्त सप्तमी मानने पर अर्थ यह होगा कि क्योंकि काकु में व्यङ्ग्य गुणीभूत होता है इसलिये वहाँ पर गुणीभूतव्यङ्ग्य काव्य कहा जाता है। दूसरी व्याख्या के अनुसार इसका अर्थ होगा—‘जहाँ कहीं काकु से अभिव्यक्त होनेवाला व्यङ्ग्यार्थ गुणीभूत हो जाता है वहाँ गुणीभूतव्यङ्ग्य काव्य कहा जाता है। दोनों व्याख्याओं में अन्तर
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लोचनालङ्कारलवणाक्तसमाप्रवेशैः
प्राणेषु वित्तनिचयेषु च नः प्रह्लादः ।
आकृष्टय पाण्डववधूपरिधानकेशान्
स्वास्थ्य भवन्तु मयि जीवति धार्तराष्ट्राः ॥
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तथा भूतां हष्षा नृपसदसि पाख्वालतनयां, वने व्याधेः साधं सुचिरमुषितं वल्कलधरैः। विराटस्यावासे स्थितमनुचितारम्भनिभृतं, गुरुः खेदं खिन्ने मयि भजति न्यायापि कुरुषु ॥
लाक्षागृह, अनल, विषाण्न और द्यूतसभा प्रवेश के द्वारा हमारे प्राणों और धन सज्जनों पर प्रहार करके तथा पाण्डव वधू के वस्त्र, और केशों को खींचकर मेरे जीवित रहते हुये धृतराष्ट्र के पुत्र स्वस्थ हों ? यहाँ पर यह व्यंजना निकलती है कि यह बात सर्वथा असंभव है कि मैं जीवित रहूँ और धृतराष्ट्र के पुत्र स्वस्थ होकर बैठे रहें। यहाँ पर चार शब्दों ‘स्वस्था:’ ‘भवन्तु’ ‘मयि जीवति’ और ‘धार्तराष्ट्राः’ के उच्चारण में कण्ठ का स्वर ऐसा बना लिया गया है कि उससे कण्ठ की चार प्रकार की अवस्थायें व्यक्त होती है एक तो आकांक्षा से भरी हुई दोषि; गद्गद (भरे हुये) रूप में तार (जोर का) स्वर, प्रशमन और उद्दीपन। इस स्वरभंगिमा से इस व्यंग्य अर्थ का स्पष्ट हो जाता है कि यह बात सर्वथा असंभव है और अत्यन्त अनुचित है। उस व्यंग्य के द्वारा उपक्रत होकर काकु व्यञ्जना से उपस्कृत वाच्य की ही क्रोधानुभावरूपता को व्यक्त करती है। इस प्रकार व्यङ्ग्य के वाच्योपस्कारक होने के कारण यह गुणीभूत-व्यङ्ग्य का ही उदाहरण है।
यहाँ पर एक बात स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि अभिनवगुप्त सर्वत्र काकु स्थलों में गुणीभूतव्यङ्ग्य ही मानते हैं। किन्तु काव्य प्रकाशकार की ऐसी सम्मति नहीं है। उन्होंने काकु द्वारा अभिव्यक्त व्यङ्ग्यार्थ के प्रधान होने पर ध्वनि और गौण होने पर गुणीभूतव्यङ्ग्य माना है। यही मत दीक्षितकार ने भी ठीक माना है। मम्मट का कहना है कि जहाँ काकु से व्यञ्जित व्यङ्ग्यार्थ के बिना भी वाच्यार्थ की पूर्ति हो जाती है वहाँ प्रकरणादि की पर्यालोचना करने पर व्यङ्ग्यार्थ की प्रतीति होती है, अतः वहाँ पर ध्वनिकाव्य ही होना चाहिये। प्रमाण के रूप में मम्मट तथा उनके समर्थक वेणीसंहार के निम्नलिखित पद्य को प्रस्तुत करते हैं—
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यथा वा— आम असइओ ओरेम पडिच्चाए ण तुए मलिणिअं सीलम् । किं उण जणस्स जाइ तव चन्दिल्लं तं ण कामेमो ॥ शब्दशक्तिरेव हि स्वाभिव्यापाराध्यासितकाकुसंहार्या । अर्थविशेषप्रतीतिपत्तिहेतुनंतु काकुमात्रं । विषयान्तरे स्वेच्छाकृतात् काकुमात्रात् तथाविधार्थप्रतिपत्त्यसम्भवान् । स चार्थे: काकुविशेषसहायशब्दव्यापारोपारुढोऽप्यर्थसामर्थ्यलब्ध एव व्यङ्ग्यच्यरूप एव । वाचकत्वानुगमेनैव तु यदा तद्विशिष्टवाच्यप्रतीतिसतदा गुणीभूतव्यङ्ग्यतया तथाविधार्थच्योतिनः काव्यस्य व्यपदेशः । (अनु०) अथवा जैसे ‘अच्छा प्रतिव्रता ? अब अधिक मत कहो; हम तो असती हैं; तुमने तो शील को मलिन नहीं किया । फिर हम किसी साधारण की धर्मपत्नी के समान उस नाई की कामना क्यों न करें ।’
यथा वा— आम असइओ ओरेम पडिच्चाए ण तुए मलिणिअं सीलम् । किं उण जणस्स जाइ तव चन्दिल्लं तं ण कामेमो ॥ शब्दशक्तिरेव हि स्वाभिव्यापाराध्यासितकाकुसंहार्या । अर्थविशेषप्रतीतिपत्तिहेतुनंतु काकुमात्रं । विषयान्तरे स्वेच्छाकृतात् काकुमात्रात् तथाविधार्थप्रतिपत्त्यसम्भवान् । स चार्थे: काकुविशेषसहायशब्दव्यापारोपारुढोऽप्यर्थसामर्थ्यलब्ध एव व्यङ्ग्यच्यरूप एव । वाचकत्वानुगमेनैव तु यदा तद्विशिष्टवाच्यप्रतीतिसतदा गुणीभूतव्यङ्ग्यतया तथाविधार्थच्योतिनः काव्यस्य व्यपदेशः । (अनु०) अथवा जैसे ‘अच्छा प्रतिव्रता ? अब अधिक मत कहो; हम तो असती हैं; तुमने तो शील को मलिन नहीं किया । फिर हम किसी साधारण की धर्मपत्नी के समान उस नाई की कामना क्यों न करें ।’
शब्दशक्ति ही निस्सन्देह अपने अभिधेय के सामर्थ्य से आदित्त काकु की सहायता प्राप्त कर अर्थ विशेष की प्रतिपत्ति में हेतु होती है केवल काकु नहीं । क्योंकि दूसरे विषय में अपनी इच्छा से ही किये हुये केवल काकु से उस प्रकार के अर्थ की प्रतिपत्ति असम्भव होती है । और वह अर्थ काकु विषय में सहायक शब्दव्यापार में उपारूढ़ होकर अर्थ सामर्थ्य से ही प्राप्त होता है अतः व्यङ्ग्य रूप ही होता है । वाचकत्व के अनुगम के द्वारा ही जब तद्विशिष्टवाच्य की प्रतीति होती है तब गुणीभूतव्यङ्ग्य के रूप में उस प्रकार के अर्थ का च्योतन करनेवाले का नाम काव्य होता है । व्यङ्ग्य विशिष्टवाच्य को कहनेवाले का निस्सन्देह गुणीभूतव्यङ्गयत्व होता है ।
तारावती मम्मट का कहना है कि यहाँ पर काकु की विश्रान्ति प्राणमात्र में ही हो जाती है, अतः ‘हम पर क्रोध अनुचित है कुरुओं पर उचित है’ यह अतिरिक्त ध्वनि का रूप धारण करती है । यहाँ पर दो दशायें हो सकती हैं—एक तो काकु से बोधी यही व्यञ्जना निकले कि ‘हमपर क्रोध अनुचित है कुरुओं पर उचित है’ तब तो इष्टके गुणीभूत होने में कोई सन्देह रह ही नहीं जाता । दूसरा यह कि यहाँ पर प्रश्न की अभिव्यक्ति हो और प्रश्न से औचित्य अनौचित्य की अभिव्यक्ति हो । ऐसी दशा में भी प्रश्न भी तो शब्द वाच्य नहीं है । अतः काकु की व्यञ्जना तो काकु की वाच्यस्थिति का अज्ञ ही है । ध्वनिरूपता को धारण करनेवाला परवर्ती
तारावती मम्मट का कहना है कि यहाँ पर काकु की विश्रान्ति प्राणमात्र में ही हो जाती है, अतः ‘हम पर क्रोध अनुचित है कुरुओं पर उचित है’ यह अतिरिक्त ध्वनि का रूप धारण करती है । यहाँ पर दो दशायें हो सकती हैं—एक तो काकु से बोधी यही व्यञ्जना निकले कि ‘हमपर क्रोध अनुचित है कुरुओं पर उचित है’ तब तो इष्टके गुणीभूत होने में कोई सन्देह रह ही नहीं जाता । दूसरा यह कि यहाँ पर प्रश्न की अभिव्यक्ति हो और प्रश्न से औचित्य अनौचित्य की अभिव्यक्ति हो । ऐसी दशा में भी प्रश्न भी तो शब्द वाच्य नहीं है । अतः काकु की व्यञ्जना तो काकु की वाच्यस्थिति का अज्ञ ही है । ध्वनिरूपता को धारण करनेवाला परवर्ती
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आमेति । आम असत्यः उपरम पतिव्रते न त्वथा मलिनितं शीलम् । किं पुनर्जनस्य जायेव नापितं तं न कामयामहे ॥
लोचन 'आम्' इत्यादि छाया है । 'आम असत्यः......' इत्यादि छाया है । 'अरे हम असती हैं' यह स्वीकार की काकु साकांक्षोपहासपरक है । 'उपरम' यह निराकांक्ष होने के कारण यहाँ पर सूचनार्घभित है । 'पतिव्रता' यह 'दीर्घ स्मित' से युक्त होनेवाली काकु है। 'तुमने शीलको मलिन नहीं किया' यह गद्रद के साथ आकांक्षा है । 'फिर किसी एक व्यक्ति की जाया के समान कामान्ध होकर उस चंडाल नापित की कामना न करें' यह निराकांक्ष शाब्द और उपहास से गर्भित काकु है । यह किसी नापित में अनुरक्त कुलवधू के द्वारा हँसी जाननेवाली देखे हुये अविनयवाली ( स्त्री ) की प्रत्युपहास के आवेश से गर्भित उक्ति काकुप्रधान ही है । गुणीभाव को दिखलाने के लिये शब्द स्फुटता को सिद्ध कर रहे हैं—शब्दशक्ति ही इत्यादि के द्वारा ।
तारावती औचित्य अनौचित्यपरक व्यङ्ग्यार्थ काकु से प्रत्यक्ष रूप में अभिव्यक्त नहीं होता, उसमें निमित्त दूसरा प्रधानरूप व्यङ्ग्य है । अतः काकुरथों में सर्वत्र काकु से होनेवाली व्यञ्जना गुणीभूत ही होती है यह मत समीचीन है । काकु व्यङ्ग्य गुणीभूतव्यङ्ग्य का दूसरा उदाहरण— कोई अच्छे घराने की स्त्री किसी चंडाल नामक नाई से फँसी है । संयोग वश वह अपने पड़ोस की किसी दूसरी स्त्री की दुश्शेशाओं को देखकर उसकी हँसी उड़ाने लगती है जिस पर वह पड़ोसिन कहती है— 'अच्छा पतिव्रता जी ! हम तो दुराचारिणी हैं ही रहने दो तुमने तो अपना शील बचा ही लिया तुमने तो उसे मलिन नहीं किया । भला हम एक अच्छे घराने की बहू होकर उस चंडाल नाई की कामना क्यों न करें ।' 'हाँ हम तो दुराचारिणी हैं ही' यह स्वीकार की जो काकु है उसका स्वरूप
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है साकांक्ष उपहास रूप । 'रहने दो' यह काकु सूचना से गर्भित है और उसको निराकांक्ष रूप कह सकते हैं । 'पतित्रता' यह काकु दीप्त और सिमत से युक्त है । 'तुमने शील को मलिन नहीं किया' इस काकु को गद्गद् पूर्ण साकांक्ष कहा जाता है । 'एक अच्छे व्यक्ति की पत्नी के समान कामिनी होकर पामर प्रकृतिवाले उस चाण्डाल नाई की कामना क्यों न करें' निराकांक्ष गद्गद और उपहासगर्भित है । यहाँ पर उपहास की अभिव्यक्ति काकु के द्वारा ही होती है और काकु की व्याख्या करने के लिये इस अभिव्यक्ति का सहारा लेना अनिवार्य हो जाता है । अतः वाच्यसिद्धयर्थ होने के कारण यह गुणीभूतव्यङ्ग्य का ही एक उदाहरण है ।
अब इस विषय में विचार किया जा रहा है कि काकु के द्वारा अभिव्यक्त होनेवाला अर्थ गुणीभाव को धारण कैसे करता है । वही अभिव्यङ्ग्य अर्थ गुणीभाव को धारण कर सकता है जिसका स्पर्श शब्द से हो जाय अथवा अभिव्यक्त होकर जो अर्थ शब्द अथवा वाच्यार्थ का मुखापेक्षी हो । यहाँ पर ध्यान देनेवाले वात यह है कि केवल काकु से कभी भी कोई अर्थ नहीं निकलता । उदाहरण के लिये यदि कोई व्यक्ति वाचक शब्द का प्रयोग न करे किन्तु अपने कण्ठ को यों ही साकांक्ष, दीप्त इत्यादि किसी प्रकार का बनाकर एक प्रकार का कण्ठरव करने लगे तो उससे किसी प्रकार के अर्थ की अभिव्यक्ति नहीं होगी । काकु से कोई अर्थ तब भी अभिव्यक्त होता है जब उसके साथ शब्दों का भी प्रयोग किया जाय और वह शब्दशक्ति ही अपने वाच्यार्थ के सामर्थ्य से काकु का आक्षेप कर उसकी सहायता से विशेष अर्थ की प्रतिपत्ति में कारण बन जाय । आशय यह है कि काकु से जो अर्थ निकलता है वह शब्द शक्ति का ही व्यापार होता है । क्योंकि शब्दशक्ति के अभाव में केवल काकु से कोई अर्थ नहीं निकलता । इस प्रकार उस व्यङ्ग्यार्थ की प्रतिपत्ति में काकु केवल सहायक होता है, व्यापार तो शब्द शक्ति का ही होता है । अतः काकु से निकला हुआ अर्थ गुणीभूतव्यङ्ग्य की कोटि में आता है ।
( प्रश्न ) यदि अर्थ प्रतीति में शब्दशक्ति का व्यापार ही उपयोगी होता है तो आप उसे व्यङ्ग्यार्थ क्यों कहते हैं? उसको आप वाच्यार्थ की संज्ञा क्यों नहीं प्रदान करते ? ( उत्तर ) यद्यपि काकुस्थलों में प्रतीतिगोचर होनेवाला अर्थ शब्द के अभिधा व्यापार में ही कुछ न कुछ उपरूढ़ हो जाता है, साकांक्षादिरूप शब्द का एक प्रकार का धर्म काकु ( कण्ठरव ) उसमें साहाय्यक माना होता है तथापि उसमें अर्थ के सहकार की भी अपेक्षा होती है । इसीलिए उस प्रतीतिगोचर अर्थ को व्यङ्ग्य कहा जाता है । आशय यह है कि जब हम कण्ठ की विशेष दशा में कोई वाक्य सुनते हैं तब हमें उस वाक्य के एक अर्थ वाच्यार्थ का बोध हो जाता है । किन्तु
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नवेवं व्यङ्ग्यत्वं कथमित्याशङ्क्याह—स चेति । अनुगमा गुणीभावं दर्शयति—याचकत्वेति । वाचकत्वेऽनुगमो गुणत्वं व्यङ्ग्यव्यञ्जकभावस्य व्यङ्ग्यविवक्षितवाच्यमतोल्या तत्प्रे काव्यस्य प्रकाशकत्वं करण्यते । तेन च तथा व्यपदेश इति काकुयोजनया सवंत्र गुणीभूतव्यङ्ग्यत्वम् । अत एव ‘मध्नामि कौन्तेयं समरे न कोपात्’ इत्यादौ विपरीतलक्षणायां य आहुस्ते न सम्यक् परामृश्यः । यतोऽत्रोच्चारणकाल एव ‘न कोपात्’ इति दीप्तारगद्गददसाकाङ्क्षकाकुलालक्षितेधस्य निषिध्यमानतयैव युद्धिराभिमतसनिधिमार्गमारुपतावाभिमायेण प्रतिपत्तिरिति मुख्यार्थबाधाग्यनुसरणविधिना भावात् को लक्षणाया अवकाशः । ‘दर्शं यजेत’ इत्यत्र तु तथाविधकाकूाद्युपायान्तरभावाद्वतु विपरीतलक्षणा इत्यलमवान्तरेण बहुना ॥ ३८ ॥
( प्रश्न ) इस प्रकार व्यंग्यता कैसे यह शब्दा करके कहते हैं—‘और वह’ यह । अब गुणीभाव को दिखलाते हैं—‘वाचकत्व’ यह । वाचकत्व में अनुगम का अर्थ है व्यङ्गय-व्यञ्जकभाव का गुणीत्व, व्यङ्ग्यावारिष्ट वाच्य की प्रतीति से वहां पर काव्य का प्रकाशकत्व कल्पित किया जाता है । उससे वैसा नाम हो जाता है । इस प्रकार काकुयोजना में सवंत्र गुणीभूतव्यङ्ग्यता ही होती है । अतएव ‘सौ कौरवों को क्रोध से युद्ध में न मारूं’ इत्यादि में विपरीत लक्षणा को जो कहते हैं उन्होंने ठीक परामर्श नहीं किया था क्योंकि काकु के बल से निषेध की निषिध्यमान रूप में ही युधिष्ठिर के अभिमत सनिधिमार्ग को न सह सकना के अभिप्राय के रूप में प्रतिपत्ति होती है इस प्रकार मुख्यार्थबाध इत्यादि विद्ध्न के अभाव से लत्तणा काक्या अवकाश ? ‘दर्शं में यज्ञ करना चाहिये’ इसमें तो उस प्रकार के काकु इत्यादि का उपाय न होने से विपरीत लक्षणा हो जाय । बस अधिक अवान्तर की आवश्यकता नहीं ॥ ३८ ॥
तारावती
उस अर्थ की सज्जति थस कण्ठ रव से नहीं लगती क्योंकिकण्ठ रव से हम वक्ता की जिस परिस्थिति का ज्ञान प्राप्त करते हैं उससे हमें यह ज्ञात हो जाता है कि वक्ता के प्रयोग किये हुए वाक्य का जो अर्थ हमारी समझ में आ रहा है वस्तुतः वक्ता का वही आशय कदापि नहीं हो सकता । तब हम उन शब्दों से ही ऐसा अर्थ समझ ले जाते हैं जिससे वक्ता के कण्ठ स्वर की भी सज्जति बैठ जाती है । इस प्रकार कध्वान्तर के विशोेष रूप के सहयोग से शब्द व्यापार ही कुछ न कुछ प्रचार पाकर दूसरे अर्थ की प्रतीति कराता है तथापि उस अर्थ के पूर्ण परिज्ञान में तो अर्थसामर्थ्य ही कारण होता है । इसीलिए उस अर्थ को व्यङ्ग्य अर्थ ही माना जाता है । ( प्रदन ) इस प्रकार उस अर्थ को आप व्यंग्य तो कह सकते हैं
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किन्तु उसको गुणीभूत कहने का क्या कारण है ? ( उत्तर ) गुणीभूतव्यंग्यत्व वहाँ पर होता है जहाँ व्यंग्यार्थ वाच्य का अनुगमन करे । जहाँ पर व्यंग्यव्यञ्जक-भाव का वाच्य के प्रति अनुगमन होता है अर्थात् व्यंग्यार्थ वाच्यार्थ के प्रति गुणवत्त्व को प्राप्त हो जाता है तब वहाँ पर गुणीभूतव्यंग्य कहा जाता है । क्योंकि में भी यही होता है, अतः व्यंग्य के गुणीभूत होने के कारण अर्थात् व्यंग्यविशिष्ट वाच्य की प्रतीति के कारण वहीं पर काव्य का प्रकाशकत्व होता है जिससे उसका नाम गुणीभूतव्यंग्य हो जाता है ।
( यहाँ पर इस वाक्य का अन्वय ऐसा भी हो सकता है—यहाँ वाचकत्वानुगमेनैव तु तद्विशिष्टा वाच्यप्रतीति: तदा तथाविधार्थच्योतिना काव्यस्य गुणीभूतव्यङ्गयत्व व्यपदेशः' अर्थात् 'जब वाचकत्व के प्रति अनुगमन करते हुये ही व्यंग्यविशिष्ट वाच्य की प्रतीति होती है तब वहाँ पर उस प्रकार के अर्थ का च्योतन करनेवाले काव्य का नाम गुणीभूतव्यंग्य के रूप में पड़ जाता है। किन्तु यह अर्थ लोचनकार के मत के प्रतिकूल है क्योंकि लोचनकार तो सर्वत्र काकुस्थलों में गुणीभूतव्यंग्य ही मानते हैं । अतः उन्होंने 'गुणीभूतव्यंग्यत्वया' का अन्वय 'तथाविधार्थच्योतिना' के साथ कर दिया है जिससे उसका अर्थ यह हो गया है कि जहाँ पर काकु के द्वारा कोई व्यंग्यार्थ प्रतीतिगोचर होकर और वाचकत्व का अनुगमन करके व्यंग्यविशिष्ट वाच्य की प्रतीति कराते हुये गुणीभूतव्यंग्य होकर उस प्रकार के अर्थ का च्योतन करता है वहीं पर उसे काव्य का नाम प्राप्त होता है ।')
आशय यह है कि जहाँ कहीं काकु की योजना होती है वहाँ सर्वत्र गुणीभूतव्यंग्य ही होता है । कुछ लोगों ने निम्नलिखित पद्य में विपरीत लक्षणा माना था :--
मथ्नामि कौरवशतं समरे न कोपात्, दुश्यासनस्य रधिरं न पिबाम्युरस्तः । सख्खूण्यामि गदया न सुयोधनोरू, सन्धिं करोतु भवतां नृपति: पणेन ।।
वेधीसंहार में यह सुनकर कि युधिष्ठिर सन्धि का प्रयत्न कर रहे हैं भीमसेन कहते हैं—
'मैं सैकड़ों कौरवों को युद्ध में न मथूँ ? छाती से दुश्शासन के रक्त को न पीऊं ? गदा से दुर्योधन की जंघाओं को न तोड़ दूँ ? आपके राजा पण के द्वारा सन्धि कर लें ?'
इन लोगों का आक्ष्य यह है कि भीमसेन क्रोध में भरे हैं और वस्तुतः कौरवों का मथन इत्यादि कार्य करना ही चाहते हैं; फिर उनका यह कहना तात्पर्य में ही
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प्रभेदस्यास्यविषयो यद्ध युक्त्या प्रतीपते । विधातव्या सहृदयैस्तत्र ध्वनियोयोजना ॥
सङ्ङीर्णों हि कश्चिद्ध्वनेरगुणीभूतगड्यस्य च लच्यते हश्यते मार्गः । तत्र यस्य युक्तिसहायता तत्र तेन व्यपदेशः कर्तव्यः । न स चात्र ध्वनिर्योगणां भाव-तत्त्वम् । यथा—
पत्युः शिरश्रन्द्रकलामनेन स्पृशोति सख्या परिहासपूर्वकम् । सा रञ्जयित्वा चरणौ कृताशीर्माल्येन तां निर्वचनं जगान ॥ (अनु०) ‘और जो युक्ति से इस प्रभेद का विषय प्रतीत होता है, सहृदयों को वहाँ ध्वनि योजना नहीं करनी चाहिये’ ॥ ३५ ॥
पत्युः शिरश्रन्द्रकलामनेन स्पृशोति सख्या परिहासपूर्वकम् । सा रञ्जयित्वा चरणौ कृताशीर्माल्येन तां निर्वचनं जगान ॥
ध्वनि और गुणीभूतव्यङ्गच्य का लक्ष्य में कोई सङ्ङीर्ण मार्ग देखा जाता है जिसमें जिसकी युक्ति सहायाता हो वहाँ उसी से नामकरण करना चाहिये । सर्वत्र ध्वनि का प्राधान्य नहीं होना चाहिये । जैसे—
'चरणों को रंगकर परिहासपूर्वक ‘इससे पति के सिर की चन्द्रकला का स्पर्श करो’ यह आशीर्वाद दिये हुए पार्वती ने बिना वचन के ही माला से उसको मार डाला ।’
अथुना सङ्ङीर्ण विषयं विमृजते—प्रभेदस्येति । युक्त्येति । चारुत्वप्रतीतिरेवात्र युक्तिः । पत्युरिति । अननेनेति । अलक्तकोपरक्तस्य हि चन्द्रकलः परभागलालामनवरतपादपतनप्रसादनेन्विना न पत्युर्क्षोभति यथेष्टमनुवर्तिन्या माङ्गल्यमिति चोपदेशः । शिरोऽद्रता या चन्द्रकला तामपि परिमवैति सपत्नीलोकापजय उक्तः ।
निर्वचनमिति । अननेन लज्जावहिथ्यहर्षेष्यांसाध्वससौभाग्याभिमानप्रभृति यद्यपि ध्वन्यते, तथापि तत्रिवचनशब्दार्थस्य कुमारोज्ज्वलतयाप्रतिपत्तिलक्षणस्यार्थंस्योपस्कारकता केवलमाचरति । उपसृततसर्वथः शृङ्गाराङ्गतामेति ।
अथ सङ्ङीर्ण विषय का विमाजन करते हैं—‘प्रभेद का’ यह । ‘युक्ति से’ यह । चारुत्व प्रतीति ही यहाँ पर युक्ति है । ‘पति का’ यह । ‘इससे’ यह । अलक्तक से रंगे हुये (पैर) की चन्द्र की अपेक्षा परम सौभाग्य प्राप्ति होगी—और निरन्तर पैर पड़ने के प्रसाद के बिना पति की शिरश्र्च ही यथेष्ट अनुवर्तिनी नहीं होना चाहिये यह उपदेश है । सिर पर धारण की हुई जो चन्द्रकला उसको भी पराजित करेा यह सपत्नी लोक को जीतना बतलाया गया है ।
निर्वचनमिति । अननेन लज्जावहिथ्यहर्षेष्यांसाध्वससौभाग्याभिमानप्रभृति यद्यपि ध्वन्यते, तथापि तत्रिवचनशब्दार्थस्य कुमारोज्ज्वलतयाप्रतिपत्तिलक्षणस्यार्थंस्योपस्कारकता केवलमाचरति । उपसृततसर्वथः शृङ्गाराङ्गतामेति ।
इत्यादि यद्यपि ध्वनित होता है तथापि वह निर्वचन शब्द के अर्थ कुमारीजोचित अस्वीकृति रूप अर्थ की उपस्कारकता का ही केवल आचरण करता है । उपसृत अर्थ तो शृङ्गार की अङ्गता को प्राप्त हो जाता है ।
'निर्वचन' यह । इससे लज्जा, अवहित्थ, हर्ष, ईर्ष्या, भय, सौभाग्य, अभिमान इत्यादि यद्यपि ध्वनित होता है तथापि वह निर्वचन शब्द के अर्थ कुमारोजनोचित अस्वीकृति रूप अर्थ की उपस्कारकता का ही केवल आचरण करता है । उपसृत अर्थ तो शृङ्गार की अज्ञता को प्राप्त हो जाता है ।
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बाधित है कि मैं ऐसा न करूँ' इससे यहाँ विपरीत लक्षणा होकर उसका अर्थ हो जाता है कि मैं ये सत्कार्य अवश्य करूँगा। इस प्रकार कुछ लोगों के मत में यहाँ विपरीतलक्षणा है। किन्तु जो लोग ऐसा समझते हैं वे ठीक नहीं समझते। कारण यह है कि जिस समय इन वाक्यों का उच्चारण किया जाता है और 'न कोपात्' कहने में कण्ठ का काकु दीर्घ तार और गद्गद साक्रांक्ष हो जाता है तब उस काकु के वल पर 'न करूँ' इस निपेध की प्रतिबिम्ब निपेध के रूप में ही होती है और उसका यही अर्थ हो जाना है कि युधिष्ठिर जिस शान्ति मार्ग का अनुसरण कर रहे हैं उसको हम सह नहीं सकते।
ऐसी दशा में मुख्यार्थबाध रूप विघ्न यहाँ उपस्थित ही नहीं होता और निर्विघ्न रूप में अज्ञानमूलकता तथा अवश्यकर्तव्यता का अर्थ निकल आता है। इस प्रकार जब यहाँ पर बाध इत्यादि का प्रतिसन्धान होता ही नहीं तब विपरीतलक्षणा का अवसर ही क्या? विपरीत लक्षणा तो ऐसे स्थान पर हो सकती है जहाँ काकु इत्यादि किसी अन्य उपाय से काम न चल रहा हो और बाध उपस्थित ही हो जाय। जैसे- 'दर्शों में यज्ञ करना चाहिये' दर्शों का अर्थ है अमावास्या। दर्श की व्युत्पत्ति इस प्रकार करली जाती है- 'जिसमें चन्द्र न दिखाई पड़ता हो।' किन्तु 'दर्श' शब्द 'दृश' धातु से बना है। अतः इसका अर्थ होना चाहिये पूर्णिमा जबकि चन्द्र दिखाई पड़ता है। अतः अमावस्या का अर्थ लेने के लिये विपरीतलक्षणा का आश्रय लेना पड़ता है।
आश्रय यह है कि काकु स्थलों में विपरीतलक्षणा का आश्रय बिना ही लिये हुये काकु के वलपर अर्थान्तर की प्रतीति हो जाती है और जहाँ कहीं काकु होता है वहाँ सर्वत्र गुणीभूतव्यङ्ग्य ही हुआ करता है। वस इतना पर्याप्त है, अवान्तर प्रकरण की अधिक व्याख्या करने की क्या आवश्यकता? ॥ ३५॥
उपर ध्वनि और गुणीभूतव्यङ्ग्य का विस्तृत विवेचन किया जा चुका। कुछ स्थल ऐसे होते हैं जहाँ एकदम यह कहना असम्भव हो जाता है कि अमुक स्थल ध्वनि काव्य है या गुणीभूतव्यङ्ग्य। ऐसे स्थान पर क्या करना चाहिये यह इस २९वीं कारिका में बताया गया है। कारिका का आश्रय यह है—
'जहाँ पर युक्ति गुणीभूतव्यङ्ग्य के पक्ष में हो अर्थात् जहाँ युक्ति से कोई स्थल गुणीभूतव्यङ्ग्य सिद्ध किया जा सकता हो सङ्केतों को यह नहीं चाहिये कि वहाँ ध्वनि को संयोजित करने की चेष्टा करें।'
(युक्ति एक तो तर्कशास्त्रीय होती है। किन्तु काव्यालोचन के प्रसङ्ग में इसका तर्कशास्त्रीय अर्थ नहीं लिया जाना चाहिये। यहाँ पर युक्ति का अर्थ औचित्य ही किया जाना चाहिये। काव्य में औचित्य चारुताप्रतीतिरूप ही होता है।
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अत एव यहाँ पर कारिका का आशय यही है कि जहाँ कहीं चमत्कार का आधिक्य गुणीभूतव्यंग्य में दिखलाई पड़ रहा हो वहाँ वलात् ध्वनि को आरोपित करने की चेष्टा नहीं करनी चाहिये ।
इस समस्त कथन का आशय यही है कि चमत्कार का आधिक्य ही नामकरण का एकमात्र कारण होता है । यदि ध्वनि में चमत्कार का आधिक्य दिखलाई पड़े तो उसको ध्वनि नाम देना चाहिये और यदि गुणीभूतव्यंग्य में चमत्कार आधिक्य दिखलाई पड़े तो उसे गुणीभूतव्यंग्य ही कहना चाहिये । ध्वनि का इतना प्रेमी नहीं होना चाहिये कि चमत्कार का आधिक्य तो गुणीभूतव्यंग्य में हो और उसको वलात् ध्वनि कहने की चेष्टा की जाय ।
उदाहरण के लिये कुमार सम्भव के सप्तम सर्ग का यह पद्य लीजिये---
'विवाह के अवसर पर पार्वती की सखियों ने पार्वती के पैरों में महावर लगाया और उपहास के साथ कहा कि अपने इन रंगे हुये पैरों से अपने पति के मस्तक की चन्द्रकला का स्पर्श किया करना । जब सखियों द्वारा यह आकांक्षा व्यक्त की गईं तब पार्वती ने बिना कुछ कहे अपनी माला से उस सखी को मार दिया ।'
सखी का आशय यह है कि सुरत काल में तुम मान किया करना और तुम्हारे प्रियतम भगवान् शिव तुम्हें मनाने के लिये तुम्हारे चरणों पर अपना मस्तक रख्खा करेंगे तब तुम अपने इस अलक्तक रक्तिज्जत चरण से चन्द्रकला का स्पर्श किया करना । यहाँ पर व्यंजना यह है कि चन्द्रकला तो बिल्कुल र्वेत होगी जैसी करना । तुम्हारा पैर र्वेत है, किन्तु तुम्हारे पैर में यह महावर की लाल रेखा अधिकाधिक सौन्दर्य को बढ़ानेवाली होगी जो सौभाग्य चन्द्रकला को प्राप्त नहीं होगा ।
चन्द्रकला श्वेतिंग शब्द है, विशेष रूप से जब भगवान् शंकर ने उसे अत्यधिक सम्मान देने के लिये अपने मस्तक पर बैठा लिया हो तब तो उसका पार्वती के चरणों पर गिरना और अधिक महत्व रखता है इससे यहाँ पर एक व्यंजना सखियों के उपदेशपरक भी निकलती है कि जब तक भगवान् शंकर तुम्हें पैरों पर गिरकर प्रसन्न न करें तबतक उनकी इच्छानुकूल वशवर्तिनी न होना ।
'विना कुछ कहे ही अपने गले की फूलों की माला उतार कर पार्वती ने सखी
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यथा च— प्रायच्छतोऽचेः कुसुमानि मानिनी विपद्गोत्रं दयितेन लभ्यतां । न किञ्चिदूचे चरणेन केवलं डिलेख वाष्पाकुललोचनाभुवम् ॥
और जैसे— 'ऊँचे पुष्पों को देनेवाले प्रियतम के द्वारा विपन्न ( सौत ) के नाम को प्राप्त हुई मानिनी ने कुछ नहीं कहा; केवल आँसुओं से आकुल नेत्रवाली होकर पैर से भूमि को करेदने लगी ।'
इत्यत्र 'निर्वचनं जगौ' 'किञ्चिदूचे' इति प्रतिषेधमुखेन व्याज्ञः-चेष्ट्यार्थ-व्याजञ्चोदर्थस्तात्पर्येण प्रतीतं तदा तस्य प्राधान्यम् । यथा 'एवं वादिनि देवर्षौ' इत्यादौ । इह पुनरुक्तिभङ्गयासतीति वाच्यस्यापि प्राधान्यम् । तस्माद्वाच्यात्रातुरणन-रूपव्यङ्ग्यगन्धानुपपदेऽो विधेयः ।
तारावती
इससे पर्वतीगत कई भाव अभिव्यक्त होते हैं—( १ ) लज्जा-जिससे कुमारियाँ चाही हुई वस्तु का भी प्रत्याख्यान कर देती हैं ।
को मार दिया ।
( २ ) अवहित्था-अर्थान्तर भावगोपन की प्रवृत्ति ।
आशय यह है कि पार्वती को प्रियतम के चरण पड़ने की बात सुनकर प्रसन्नता तो हुई किन्तु वे उसे कुमारीजन्सुलभ लजा के कारण छिप गई ।
( ३ ) ईर्ष्या-चन्द्रकला को भगवान् रुद्रर ने सिर पर धारण किया; उससे पार्वती को ईर्ष्या हुई ।
( ४ ) भय-यह कुमारीजनोंचितभाव है जो कि सुगन्धाओं को प्रायः हुआ ही करता है ।
( ५ ) सौभाग्य-कि उसका प्रियतम उसके चरणों पर पड़ेगा और साथ ही उसकी सौत भी उसके चरणों पर पड़ेगी ।
और ( ६ ) अभिमान-कि चन्द्रकला की अपेक्षा भी उसके चरणों में ही अधिक सौन्दर्य होगा फिर मुख इत्यादि इतर अङ्गों का तो कहना ही क्या ?
इत्यादि कई भावों की यहाँ पर व्यञ्जना होती है ।
कुमारीजनों का यह स्वभाव ही होता है कि जब उनके सामने उनके भावी प्रियतमों की और विशेष रूप में उनकी भाविनी
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प्रायच्छतेति । उच्चैरिति । उच्चैर्यैति कुसुमानि कान्तया स्वयं गृहीतुमशक्यस्वदृश्याचितानीस्थर्थः । अस्मदुपाध्यायास्तु हृद्यतमानी पुष्पाणि असुकेँ गृहाण, गृहाणेत्युचैस्तारस्वरेणादरातिशयार्थं प्रयच्छता । अत एव लभ्भितेति । न किञ्चिदिति । एवंविधेऽपि श्रृङ्गारोचिते तस्मिन्नेव मानप्रदर्शनमेवात्र न युक्तिमति सातिशयमन्तुसम्भारो व्यङ्ग्यो वचननिवेधस्यैव वाच्यस्य संस्कारः । तद्रक्ष्यतिउत्कर्षेऽप्यास्तीति । तस्येति व्यङ्ग्यस्य । इहेँति पत्युरित्यादौ । वाच्यस्याप्योति । अपि शब्दो मिल्नक्रमः । प्राधान्येँपि मत्वति वाच्यस्य, रसाद्यपेक्षया तु गुणतापीच्यर्थः । अतएवोपसंहारे ध्वनिशब्दस्य विशेषणमुक्तम् ॥ ३५ ॥
'प्रदान करनेवाले' यह । 'ऊँचे' यह । अर्थात् ऊँचे जो पुष्प कान्ता के द्वारा स्वयं ग्रहण करने में अशक्य होने के कारण संग्रह करके दिये गये । हमारे उपाध्याय तो ( यह अर्थ लगाते हैं— ) 'अरी असुक नामवाली ? इन हृद्यतम पुष्पों को ले लो, ले लो, यह ऊँच अर्थात् तारस्वर से अधिक आदर के लिये प्रदान करते हुये । अतएव 'प्राप्त कराई हुई' यह । 'कुछ नहीं' यह । इस प्रकार के श्रृङ्गार के अवसरों पर उसी को यह याद किया करता है अतएव मान-प्रदर्शन ही यहाँ पर उचित नहीं है, इस प्रकार अत्यधिक मन्त्र्यु का सम्भार रूप वाच्य का ही संस्कार करता है । वह कहेंगे—'उक्ति भङ्गिमा से है' यह । उसका अर्थात् व्यङ्ग्य का। 'यहाँ' अर्थात् 'पत्युः' इत्यादि श्लोक में। 'वाच्य का भी' यह । 'भी' शब्द यहाँ मिल्नक्रम से लगता है । अर्थात् वाच्य का प्राधान्य भी होता है और रस इत्यादि की अपेक्षा तो गौणता भी अतएव उपसंहार में ध्वनि शब्द का विशेषण दिया गया॥३५॥
तारावती प्रणयलीला की बात की जाती है तब वे अपगलब्भ हो जाती हैं और कुछ बोल नहीं पातीं । इस अपगलब्भता से ही लजा इत्यादि की अभिव्यक्ति होती है । उस अपगल्भता को 'निर्वचन' 'विना कुछ कहे ही' इन शब्दों से उक्त कर दिया गया है। उस अपगलब्भतारूप वाच्य को ही अभिव्यक्त होनेवाली लजा इत्यादि भाव पुष्ट करते हैं और इन भावों का काम केवल उस अप्रागल्भ्यरूप वाच्य को पुष्ट करना ही है । इससे यह व्यङ्ग्य गुणीभूत हो गया है । अतएव वक्ताॢ इसे ध्वनि कहने की चेष्टा नहीं करनी चाहिये अपितु गुणीभूतव्यङ्ग्य ही कहना चाहिये । फिर यह उपकृत वाच्यार्थ श्रृङ्गार रस का अंग बन जाता है और उसे ध्वनि बना देता है क्योंकि अन्ततः तो सभी काव्य ध्वनि होते ही हैं । एक दूसरा उदाहरण—यह पद्य किरातार्जुनीय के अष्टम सर्ग से लिया गया है । गन्धर्व और अप्सरायें अर्जुन की तपस्या को भङ्ग करने के लिये भेजे
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गये हैं । वे वन विहार में प्रवृत्त हो गये हैं । उनके उसी उद्यान-भ्रमण का वर्णन करते हुये कवि कह रहा है—
'उधर को जो फूल लगे हुये थे और जिनको नायिका अपने छोटे हाथों से पा नहीं सकती थीं उन फूलों को प्रियतम ने नायिका को प्रदान कर दिया, साथ ही उसने पुष्प देने के अवसर पर उसकी सौत का नाम लेकर उसे पुकारा जिससे मानिनी होकर उस नायिका ने कुछ कहा नहीं किन्तु अपनी आँखों को आँसुओं से भरकर पैरों से केतकी भूमि कुरेदने लगी ।'
यहाँ पर नायिका के भूमि कुरेदने लगने से तथा आँखों में आँसू भर लेने से उसका चिन्ता- मिश्रित मन्यु अभिव्यक्त होता है । उसे चिन्ता इसी बात की थी कि ऐसे शृङ्गार के अवसरों पर यह ( नायक ) हमारी सौत की ही याद किया करता है । अतः मानप्रदर्शन से क्या होगा ? जब मैं इसकी प्रेयसी ही नहीं हूँ । तनु मान-प्रदर्शन भी उचित नहीं है । मानप्रदर्शन का अभिप्राय होता है आँख चुरा लेना, उपालम्भ देना, प्रणय को न स्वीकार करना इत्यादि के द्वारा । किन्तु नायिका रोने लगी और भूमि कुरेदने लगी । ये चिन्ता और मन्यु के अनुभव हैं । इससे चिन्ता और मन्यु का आधिक्य अभिव्यक्त होता है । इसको 'कुछ नहीं कहा' इस शब्द के द्वारा वाच्य बना दिया गया है । अतः अभिव्यञ्जनीय मन्यु का आधिक्य वाच्य का ही संस्कार करता है । अतः ऐसे अवसरों पर व्यङ्ग्यार्थ वाच्य का कुछ विषय बना दिया जाता है जिससे इसे गुणीभूतव्यङ्ग्य कहना ही अधिक समीचीन जान पड़ता है ।
अभिनवगुप्तके उपाध्याय ( सम्भवतः भट्टेन्दुराज ने ) उच्चैः का अन्वय दूसरे प्रकार से लगाया है । उन्होंने कहा है कि नायिक उच्चैः अर्थात् तिरस्कार से चिल्ला-चिल्लाकर नायिका की सौत का नाम ले-लेकर पुकार रहा था और कह रहा था कि इन पुष्पों को ले लो, ले लो ? ( किन्तु यह अर्थ ठीक नहीं है; क्योंकि एक तो 'उच्चैः' शब्द 'कुसुमानि' के साथ जुड़ा हुआ है; दूसरे एक बार धोखा भी हो सकता है और नायिका की सौत का नाम मुख से निकल भी सकता है; किन्तु बार-बार ऐसा होना अस्वाभाविक प्रतीत होता है । इसीलिये अभिनवगुप्त ने अपने मत का प्रथम उल्लेख कर बाद में पद्यान्तर के रूप में अपने उपाध्याय का मत दे दिया है । यहाँ पर सारांश यह है कि जहाँ पर उक्ति में वक्रता न हो, किन्तु तत्व से ही व्यङ्ग्यार्थ को प्रतीति हो जाय वहाँ पर व्यङ्ग्यार्थ की प्रधानता होती है और वह ध्वनि का उदाहरण होता है । जैसे 'एवंववादिनि देवर्षौ' इत्यादि पद्य में । किन्तु इसके प्रतिकूल जहाँ पर उक्ति में भङ्गिमा ( वक्रता ) हो वहाँ वाच्य की प्रधानता भी होती है । जैसे 'पत्युः शिरःखण्डितमनेन' इत्यादि पद्य में ।
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प्रकारोयं गुणीभूतव्यङ्ग्योऽपि ध्वनिरूपताम् । धत्ते रसादितात्पर्यपर्यालोचनया पुनः ॥ ४० ॥
गुणीभूतव्यङ्ग्य नाम का प्रकार भी पुनः रस इत्यादि तातर्य की पर्यालोचना करने पर ध्वनिरूपता को ही धारण करता है
पुनः प्रकार इति । श्लोकद्वयमिदं ग्रन्थकारो रसभावादितात्पर्यपर्यालोचने पुनर्ध्वेनिरूपतामेव सम्पादयति । यथोक्तमनन्तरदृष्टान्ते श्लोकद्वयम् । (अनु०) ‘यह गुणीभूतव्यङ्ग्य नाम का प्रकार भी पुनः रस इत्यादि तातर्य की पर्यालोचना करने पर ध्वनिरूपता को ही धारण करता है’ ॥ ४० ॥ गुणीभूतव्यङ्ग्यं भी काव्य प्रकार रसभाव इत्यादि तातर्य की पर्यालोचना करने पर ध्वनि ही हो जाता है । जैसे अपने उदाहरण दिये हुये दो श्लोकों में ।
पुनरपि निर्वाह्यत्वं काव्यात्मत्वं ध्वनेरेव परिदीपयति—प्रकार इति । श्लोकद्वयमिति तुल्यच्छायं यदुदाहृतं पत्पुरित्यादि तत् त्रेति । द्वयशब्दादेव वादिनीत्यस्य स्थानवकाशः ।
यहाँ पर 'अपि' शब्द 'वाच्यस्य' के साथ लगा हुआ है; किन्तु उसकी व्याख्या क्रम को तोड़कर 'प्राधान्य' के साथ लगाकर करनी चाहिये । इससे इसका अर्थ यह हो जाता है कि जहाँ पर उक्ति में वक्रता हो वहाँ वाच्य की प्रधानता भी होती है । आशय यह है कि अवान्तर व्यङ्गय के द्वारा वाच्य का उपस्कार होता है; अतः वहाँ पर व्यङ्गय गौण होता है और वाच्य प्रधान । अत एव उसे अनुरणनरूप व्यङ्गय-ध्वनि की संज्ञा प्रदान नहीं की जा सकती । यहाँ पर यह ध्यान रखने की बात है कि ‘वाच्य की प्रधानता भी होती है’ इस 'भी' का आशय यह है कि वाच्य में गौणरूपता तो होती ही है ।
गुणता और प्रधानता इस प्रकार सम्भव है कि अवान्तर व्यङ्गयार्थ की अपेक्षा वाच्य में प्रधानता होती है; अतः उस दृष्टि से उसे गुणीभूत व्यङ्गय ही कहना ठीक होगा अनुरणन रूप व्यङ्गय ध्वनि नहीं । किन्तु अन्तिम रस इत्यादि की अपेक्षा तो वाच्य में गुणता होती ही है । अतः वहाँ पर असंलक्ष्यक्रमव्यङ्गय ध्वनि तो कही ही जा सकती है । इसीलिये यहाँ पर आनन्दवर्धन ने यह नहीं कहा कि यहाँ पर ध्वनि नहीं होती अपितु विशेषण लगाकर विशेष रूप में यही कहा है कि अनुरणनरूप व्यङ्गयध्वनि नहीं होती । इसका आशय यही है कि रसध्वनि तो सर्वत्र होती है
यहाँ पर 'अपि' शब्द 'वाच्यस्य' के साथ लगा हुआ है; किन्तु उसकी व्याख्या क्रम को तोड़कर 'प्राधान्य' के साथ लगाकर करनी चाहिये । इससे इसका अर्थ यह हो जाता है कि जहाँ पर उक्ति में वक्रता हो वहाँ वाच्य की प्रधानता भी होती है । आशय यह है कि अवान्तर व्यङ्गय के द्वारा वाच्य का उपस्कार होता है; अतः वहाँ पर व्यङ्गय गौण होता है और वाच्य प्रधान । अत एव उसे अनुरणनरूप व्यङ्गय-ध्वनि की संज्ञा प्रदान नहीं की जा सकती । यहाँ पर यह ध्यान रखने की बात है कि ‘वाच्य की प्रधानता भी होती है’ इस 'भी' का आशय यह है कि वाच्य में गौणरूपता तो होती ही है । गुणता और प्रधानता इस प्रकार सम्भव है कि अवान्तर व्यङ्गयार्थ की अपेक्षा वाच्य में प्रधानता होती है; अतः उस दृष्टि से उसे गुणीभूत व्यङ्गय ही कहना ठीक होगा अनुरणन रूप व्यङ्गय ध्वनि नहीं । किन्तु अन्तिम रस इत्यादि की अपेक्षा तो वाच्य में गुणता होती ही है । अतः वहाँ पर असंलक्ष्यक्रमव्यङ्गय ध्वनि तो कही ही जा सकती है । इसीलिये यहाँ पर आनन्दवर्धन ने यह नहीं कहा कि यहाँ पर ध्वनि नहीं होती अपितु विशेषण लगाकर विशेष रूप में यही कहा है कि अनुरणनरूप व्यङ्गयध्वनि नहीं होती । इसका आशय यही है कि रसध्वनि तो सर्वत्र होती है ॥ ३६ ॥
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यथा च—दुराराधा राधा सुभग यदनेत्रापि म्रुजत—स्तवैनतप्राणेशाजघनवसनेनाश्र पतितम् । कठोरं हृदयं तस्य तदलमुपचारैररमे हे क्रियात्कल्याणं वो हरिरनुनयेष्ये वमुदितः ॥
और जैसे—'हे सुभग ? अपनी प्राणेश्वरी की जघ्या के इस वस्त्र से भी इस गिरे हुये आँसू को पोंछते हुये ( पोंछनेवाले ) तुम्हारे लिये राधा को प्रसन्न करना अत्यन्त दुष्कर है । स्त्री का चित्त कठोर होता है । इसलिये उपचारों की आवश्यक्ता नहीं । स्क् जाओ । अनुनय में इस प्रकार कहे हुये हरि तुम्हारा कल्याण करें ।'
तारावती ऊपर बतलाया गया है कि गुणीभूतव्यङ्गच्यम् केवल एक दृष्टिकोण से होते है वह दृष्टिकोण है अवान्तरव्यङ्गयत्व का । किन्तु अनन्तः सभी काव्य ध्वनिकाव्य ही होते हैं; वस्तुतः काव्य की आत्मा तो ध्वनि ही है । यही बात प्रस्तुत ( ८० वीं ) कारिका में कही गई हैं । प्रस्तुत कारिका का आश्रय यह है—‘जिस गुणीभूत व्यङ्गच्य नामक प्रकार का ऊपर परिचय दिया गया है जव उसमें पर्यालोचना की जाती है और देखा जाता है कि उसका पर्यवसान रस इत्यादि रूप तात्पय में ही होता है तब उसे भी ध्वनि ही कहना पड़ता है ।’ आशय यह है कि आन्तरिक दृष्टि से चाहे हम किसी काव्य को ध्वनि कहें चाहे गुणीभूतव्यङ्गच्य, यद्यपि अभिव्यक्त विभिन्न भावि प्रत्येक रस को पुष्ट करे तो हमें उसे ध्वनि कह लें और यदि वाच्य को पुष्ट करें तो गुणीभूतव्यङ्गच्य कहलें । किन्तु पर्यवसान सबका ध्वनि में हो होता है क्योंकि यह पर्यालोचना करने पर कि अमुक रचना का पर्यवसान कहाँ होता है ध्वनि ही आयेगी और स्वयं गुणीभूतव्यङ्गच्य ध्वनि का रूप धारण कर लेगा । उदाहरण के लिये कालिदास और भारवि के जो दो पद्य अभी उद्धृत किये गये हैं वे आन्तरिक व्यञ्जना की दृष्टि से तो गुणीभूत व्यङ्गच्य हैं किन्तु रस की दृष्टि से ध्वनि ही कहे जा सकते हैं । वे दोनों श्लोक हैं—‘पतुयः शररक्ष-दकला- देन’ और ‘प्रावच्यतोच्चैः कुमुमानि मानिनी’ । ये दोनों पद्य तुल्य छाया-
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दुराराधेति । अकारणकुपिता पादपातिते मयि न प्रसोदसि अहो दुराधर्षासि मारोदरितयुक्तिपूर्वं प्रियतमेऽश्रूणि मार्जयति इयमस्या अभ्युपगमग्लानौकः । हे सुभगेति । प्रियया यः स्वसम्भोगभूषणविहीनः क्षणमपि मोक्तुं न पार्यसे । अनन्ववीति । परिष्यद् प्रत्युत्स्नयत्यर्थः । तदेव च यदेवमोदिते यतः लज्जादैन्यादिगुणानप्यच धार्यते । मृजत इत्यनेन हि प्रत्युत स्वोत्तःसहस्त्रवाहो वाष्पो स्रवति । इयच्च त्वं हतचेतनो यन्मां विस्मृत्य तामेव कुपितां मन्यसे । अन्यथा कथं मे व कुर्पा! पतितमिति । गतहृदानीं रोदनावकार्शोदपीयर्थः । यदित तूष्यंते इयताप्यादरेण किंर्मात कोपं न मुञ्चसि-
दुराराधा' यह । अह कारण क्रोधित हुई मेरे चरणों पर गिरने पर भी प्रसन्न नहीं हो रही हो, आश्चर्य है कि आराधना करने में तुम बहुत ही दुष्कर हो, मत रोओ, इस उक्ति के साथ प्रियतम के अश्रु परिमार्जन करने पर यह उसकी स्वीकृति गम्भित उक्ति है । 'हे सुभग' यह । जो कि प्रिया के द्वारा अपने सम्भोग के विभूषण से रहित क्षणभर भी छोड़े नहीं जा सकते हो । 'इसके द्वारा भी' यह । अर्थात् इसको प्रत्यक्ष रूप में ही देख लो । उसी को जो इस प्रकार आदर किया गया कि लज्जा इत्यादि के त्याग के द्वारा भी इस प्रकार धारण किया जा रहा है । 'मार्जन करते हुये' यह । इसके द्वारा प्रत्युत सहस्र स्त्रोतों में वहनेवाला वाष्प हो जाता है । तुम इतने अधिक चेतना रहित हो कि मुझे भुलाकर उसी को कुपित मानते हो । नहीं तो ऐसा क्यों करो । 'पतित' यह । अर्थात् अब तो रोदन का अवकाश भी चला गया । यदि कहा जाय कि इतने आदर से भी क्यों कोप नहीं छोड़ती हो तो क्या
लिये 'दो श्लोक' यह विशेष रूप से कह दिया गया है । नहीं तो कोई व्यक्ति सम्भवतः 'एवंवादिनि' इत्यादि में भी वही बात समझ लेता । एक और उदाहरण लीजिये— राधा खण्डिता नायिका हैं कृष्ण कहीं अन्यत्र विहार कर राधा के पास आये हैं । धोखे से वे उस सैत का अधोवस्त्र ( साड़ी ? ) ओढ़े चले आये हैं । इस पर राधा ने मान किया है । कृष्ण उनको प्रसन्न करने की चेष्टा करते हैं किन्तु राधा नहीं मानती । तब कृष्ण कहते हैं— 'तुम व्यर्थ ही रुष्ट हो गई हो; मैं तुम्हारे पैरों पर पड़ हुआ हूँ फिर भी प्रसन्न नहीं होती हो; आश्चर्य है कि तुम्हारी आराधना कितनी कठिन है ।' इस पर राधा अपनी आराधना का कठिन होना स्वीकार करते हुये कहती हैं—
हे सौभाग्यशाली ! मेरे इस गिरे हुये आँसू को जो तुम अपनी उस प्राणेश्वरी की जङ्घाओं पर धारण किये हुये वस्र से पोंछ रहे हो इस दशा में तुम्हारे लिये तो
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तत्कि क्रियते कठोरस्वभावं स्त्रीचेतः । खीति हि प्रेमादियोगादस्तु विशेषमात्रमेतत्; तस्य चैष स्वभावः, आत्मनि चैतत् सुकुमारहृदया योषित् ऋतु न किंचिद्विध्वंसाराधिकमांसां हृदयं यदेवंविधध्वस्तान्तसाक्षात्कारेऽपि सहस्रधा न दलति। उपचारैरिति दाक्षिण्यप्रयुक्तः । अनुनयैरिष्यते बहुवचननेन वारं वारमस्य बहुलभक्तस्येमवं स्थितौ तिरिति सौभाग्यातिशय उतः । एवमेष वाक्यार्थसारो वाच्यं भूषयति । तत् तु वाच्यं भूषितं सद्दर्श्याविप्रलम्भशृङ्गाराङ्गत्वमेतीति । यस्तु त्रिष्वपि श्लोकेषु प्रतीममानस्पैव रसाङ्गत्वं न्याचचष्टे स देवं विक्रिय तद्यानोत्सवमकार्षीत् । एवं हि व्यङ्ग्यस्य या गुणीभूतता प्रकृत सैव समूलं खुच्यते। रसादिर्यात्रिकृतस्य हि व्यङ्ग्यस्य रसाङ्गभागयोगित्वमेव प्राधान्यं नान्यथैकाङ्गादित्यलं पूर्ववंश्यैः सह विवादेन ।
किया जाय, कठोर स्वभाववाले क्रियों का चित्त होता है । 'स्त्री' यह प्रेम इत्यादि के योग न होने से केवल यह वस्तु ही है । उसका यह स्वभाव है । स्वयं में सुकुमार हृदयवाली क्रियाएं होती हैं यह कुछ नहीं। इनका हृदय वज्रसार से भी अधिक ( कठोर ) होता है जो कि इस प्रकार के वृत्तान्त के साक्षात्कार होनेपर भी सहस्रधा विदीर्ण नहीं हो जाता। 'उपचारों द्वारा' का अर्थ है दाक्षिण्य के द्वारा प्रयुक्त उपचारों से । 'अनुनयों में' इसमें बहुवचन के द्वारा यह कहा है कि बहुत सी वत्सलभावोंवाले इन कृष्ण की बार-बार यही स्थिति होती है यह सौभाग्यातिशय कहा गया है । इस प्रकार यह वाक्यार्थ का सार वाच्य को भूषित करता है है। वह वाच्य तो भूषित होकर ईर्ष्यां विप्रलम्भ श्रृंगार के अङ्गत्व को प्राप्त हो जाता है । जिसने तो तीनों श्लोकों में प्रतीयमान का ही रसाङ्गत्व कहा है उसने तो देवको वेचकर यात्रा का उत्सव किया । इस प्रकार निस्सन्देह व्यङ्ग्य की जो गुणीभूतता प्रकृत है वही समूल नष्ट हो जाय । निस्सन्देह रसादि से अतिरिक्त व्यङ्ग्य का रसाङ्गभावयोगित्व ही प्रधान है और कुछ नहीं, बस अपने पूर्व वंश्यों से अधिक विवाद की आवश्य- कता नहीं ।
तारावती
राधा की आराधना दुष्कर है ही । क्रियों का चित्त तो कठोर होता ही है, इस लिये इन बाहरी दिखावों की आवश्यक्ता नहीं, अब रहने दो पर्याप्त चाटुकारिता होगी इससे कोई लाभ नहीं होगा ।' कवि कहता है कि अनुनयों में जिन कृष्ण से राधा के द्वारा इस प्रकार कहा जाता है वे कृष्ण आप का कल्याण करें ।
इस पद्य की व्याख्यानें इस प्रकार हैं—
१—'हे सुभग ?' इस सम्बोधन से अभिव्यक्त होता है कि आप बड़े सौभाग्य-
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देना चाहती कि आप उसके सम्भोग के विभूषण से रहित रहें । जब आप यहाँ आये तब भी आपकी प्रेयसी ने आपको अपनी साड़ी उड़ा ही दी ।
२—‘इससे भी’ का व्यङ्ग्यार्थ यह है कि वैसे तो आप अपने दुराचार को छिपा ही सकते थे, किन्तु जब आप प्रत्यक्ष रूप में मेरी सौत को साड़ी ओढ़े हुये हैं तब आप उसे छिपा ही कैसे सकते हैं? दूसरी बात यह है कि आप इसका इतना अधिक आदर करते हैं कि इसको धारण करने में लज्जा का भी अनुभव नहीं करते कि कोई इसे देख लेगा ।
३—‘पोछ रहे हैं’ इसमें वर्तमान काल के प्रयोग से व्यक्त होता है कि आप कितना ही पोछें ये आँसू निकलते ही जा रहे हैं, ये समाप्त नहीं हो सकते; प्रत्युत सहस्रों लोनों में प्रवाहित होनेवाले हो रहे हैं । दूसरी बात यह है कि तुम इतने चेतना शून्य ( प्रेमावेश में बेहोश ) हो कि मुझे बुलाकर तुम अपनी उसी प्रेयसी को मुझमें देख रहे हो । तभी तो तुम उसके वस्त्र से मेरे आँसू पोछ रहे हो, नहीं तो ऐसा क्यों करते?
( ४—‘प्राणेश्वा’ से व्यक्त होता है कि मैं तुम्हारी कोई नहीं हूँ, मेरी सौत तुम्हारी प्राणेश्वा है अतः मेरा कुपित होना उचित ही है ।
५—‘मैं’ इस सर्वनाम के स्थान पर ‘राधा’ इस अपने नाम लेने का व्यङ्ग्यार्थ यह है कि मैं कम स्वाभिमानिनी नहीं हूँ जो इस प्रकार मान जाय ।
६—‘गिरे हुये’ इस शब्द में भूतकाल से अभिव्यक्त होता है कि मेरा रोने का अधिकार भी समाप्त हो गया ।
( ७ ) ‘श्री का चित्त कठोर होता है’ में श्री शब्द से व्यक्त होता है कि मैं आपकी प्रेयसी नहीं हूँ । मैं तो सामान्य श्री हूँ, जब मुझमें प्रेम का योग ही नहीं तब मेरे अन्दर विशेषता क्या रही? यह जो कहा जाता है कि त्रियां सुकुमार हृदयवाली होती हैं यह कोई भी बात सही नहीं है । वस्तुतः उनका हृदय तो वज्रसार से भी अधिक कठोर होता है; देखो इस दशा में भी जब कि तुम सौत की साड़ी से हमारा अश्रुपरिमार्जन करना चाहते हो तब भी यह हमारा हृदय सहस्र खण्डों में विदीर्ण नहीं हो रहा है ।
( ८ ) ‘उपचारों को रहने दो’ कहने का आशय यह है कि वस्तुतः तुम्हें मुझसे प्रेम नहीं है । तुम्हारी प्रेमिका तो कोई दूसरी ही है । तुम केवल दाक्षिण्यवश मेरे पास आते हो । इस दाक्षिण्य की मुझे आवश्यकता नहीं है ।
( ९ ) ‘अनुनयों में’ इसमें बहुवचन से सिद्ध होता है कि कृष्ण की अनेक वल्लभ—
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भायें हैं। अतः कृष्ण को बार-बार ऐसे अवसर मिलते रहते हैं जब कि उन्हें अनुमय-विनय के द्वारा राधा को मनाना पड़ता है।
इस प्रकार यहाँ व्यङ्ग्यार्थ को सारे वाच्य को दूषित करता है जिससे इसे व्यङ्ग्यार्थ को गुणीभूत व्यङ्ग्य की संज्ञा प्राप्त हो जाती है। वह दूषित वाच्य फिर ईर्ष्या-विप्रलम्भ श्रृङ्गार का अङ्ग हो जाता है। कतिपय आचार्यों ने इन तीनों श्लोकों में गुणीभूतव्यङ्ग्य की ध्वनिरूपता इस प्रकार सिद्ध की है कि इनमें प्रतीममान अर्थ रस का अङ्ग हो जाता है। इन आचार्यों ने प्रतीमान की गुणीभूतता तो पहले ही समाप्त करदी फिर वे कहते हैं कि यह गुणीभूतव्यङ्ग्य ध्वनिरूप होता है। यह उनका कहना ऐसा ही है जैसे किसी व्यक्ति के यहाँ देवता की कोई पुरानी मूर्ति रखी हो और वह उसकी सवारी निकालना तथा यात्रा का उत्सव करना चाहता हो। वह यात्रोत्सव के लिये पहले तो देवता की मूर्ति को बेचकर पैसा जुटाये फिर यात्रोत्सव करना चाहे। जब उसके पास देवता ही नहीं तो यात्रोत्सव किसका होगा ( अथवा कोई व्यक्ति घड़ी की चेन के लिये घड़ी ही बेच दे। ) वही दशा प्रतीयमान को रसांग बनाकर गुणीभूतव्यङ्ग्य को ध्वनिरूप सिद्ध करनेवालों की भी है। उन्हें यह तो ध्यान रखना ही चाहिये कि रस सर्वदा व्यङ्ग्य होता है और काव्य-तात्पर्य का पर्यवसान सर्वदा रस में ही होता है क्योंकि काव्यात्मारूप में रसध्वनि को ही स्वीकार किया गया है। इस प्रकार रसध्वनि सर्वदा स्वमात्रप्रयवसायिनी होती है। किन्तु वस्तु और अलङ्कार की व्यञ्जनायें तभी ध्वनिरूपता को धारण कर सकती हैं जब वे रस का अंग होकर रसप्रवण हो जाती हैं। आशय यह है यदि व्यङ्ग्यवस्तु को रस का अंग माना जायेगा तो वह तो वस्तुध्वनि हो जायगी, वह व्यङ्ग्यवस्तु गुणीभूतव्यङ्ग्य की कोटि में आयेगी ही नहीं, फिर गुणीभूतव्यङ्ग्य की ध्वनिरूपता का उदाहरण यह हो ही कैसे सकता है? (यहाँवर निष्कर्ष यह है कि वे स्थान ध्वनि के कहे जा सकते हैं—जहाँ रस भाव इत्यादि प्रधान रूप में अभिव्यक्त हो रहे हों या जहाँ वस्तु या अलङ्कार की अभिव्यक्ति रसप्रवण रूप में हो रही हो। इसके प्रतिकूल जहाँ रस या भाव अपरांग होकर आते हैं अथवा वस्तु या अलङ्कार की अभिव्यक्ति वाच्यांग के रूप में होती है वे समस्त स्थल गुणीभूत-व्यङ्ग्य ही कहे जाते हैं। यहाँ पर यदि गुणीभूतव्यङ्ग्यता सिद्ध करनी है तो व्यङ्ग्यार्थ को वाच्यांग ही मानना होगा रसांग नहीं। ) बस इतना पर्याप्त है अपने पूर्ववंश्यों से अधिक विवाद करना और उनका अधिक खण्डन करना ठीक नहीं मालूम पड़ता।
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एवंस्थिते च 'न्यक्कारो ह्ययमेव' इत्यादि श्लोकनिर्दिष्टानां पद्यानां व्यङ्ग्यविशिष्टवाच्यप्रतिपादने डयेतद्वाक्यार्थीभूतरसापेक्षया व्यङ्गक्त्वमुक्तम् । न तेषां पद्यानामर्थान्तरसङ्क्रमितवाच्यध्वनिधर्मो विवक्षितवाच्यताप्रसङ्गात् । तेषु हि व्यङ्ग्यविशिष्टत्वं वाच्यस्थं प्रतीतित न तु व्यङ्गक्त्वपरिणतत्वम् । तस्माद्वाक्यं तत्र ध्वनि: पदानी तु गुणीभूतव्यङ्ग्यानि । न च केवलं गुणीभूतव्यङ्ग्यत्वेऽपि पद्यान्यलङ्कारमध्यडयडङ्ग्यध्वनेरङ्गकानि यावदर्थान्तरसङ्क्रमितवाच्यानि ध्वनिप्रभेदरुपाण्यपि । यथाैत्रै श्लोके रावण इत्यस्य प्रभेदान्तररुपव्यङ्गक्त्वम् ।
(अनु०) ऐसी स्थिति होनेपर 'न्यक्कारो ह्ययमेव' इत्यादि श्लोकमें निर्दिष्ट पदोंके व्यङ्गयविशिष्टवाच्य के प्रतिपादन करने पर भी इस वाक्य के अर्थीभूत रस की अपेक्षा व्यङ्गक्त्व कहा गया है । उन पदों का अर्थान्तरसङ्क्रमितवाच्य ध्वनि का धर्म नहीं करना चाहिए, क्योंकि उनका विवक्षितवाच्यताप्रसङ्ग है । उनमें वाच्य का व्यङ्ग्यविशिष्टत्व प्रतीत होता है व्यङ्गक्त्वरूप में परिणतत्व नहीं । इससे वहाँ पर वाक्यध्वनि है और पद गुणीभूतव्यङ्ग्य हैं । केवल गुणीभूतव्यङ्ग्य पद ही अलङ्कारमध्यडयङ्ग्य ध्वनि के व्यङ्गक होते हैं; क्योंकि ध्वनिप्रभेदरूप अर्थान्तरसङ्क्रमितवाच्य भी व्यङ्गक होते हैं । जैसे इसी श्लोकमें 'रावण' इसका प्रभेदान्तररूप व्यङ्गक्त्व है ।
एवंस्थित इति । अनन्तरोक्तेन प्रकारेण ध्वनिगुणीभूतव्यङ्ग्ययोर्विमर्शोऽस्ति सत्त्वेऽर्थ: । कारिकागतमपिशब्दं व्याख्यायात इति न पुनरुल्लिख्यते ।
'ऐसी स्थिति में' यह । अर्थात अभी कहे हुये प्रकार से ध्वनि और गुणीभूतव्यङ्ग्य के विभाग के स्थित होने पर । कारिका में आये हुये 'अपि' शब्द की व्याख्या करने के लिये कहते हैं—'न च' यह । इस श्लोक की पहले ही व्याख्या कर दी गईं इसलिये फिर नहीं लिखा जा रहा है ।
तारावती
ऊपर यह सिद्ध किया गया है कि गुणीभूत व्यङ्ग्य भी अन्ततः ध्वनि काव्य ही होते हैं क्योंकि सभी काव्यों का तात्पर्य तो रसास्वादन ही होता है । एक उदाहरण और ले लीजिये—'न्यक्कारो ह्ययमेव मे यदरय:' में प्रत्येक शब्द व्यङ्गक है। इसकी व्यङ्गकता की पूरी व्याख्या इसी उद्योत की १६ वीं कारिका में की जा चुकी है ।
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इस पद्य में प्रत्येक शब्द का वाच्यार्थ व्यङ्ग्य के सहकार में ही लिया जाता है और व्यङ्ग्यार्थ का एकमात्र प्रयोजन यही है कि वह वाच्यार्थ को पुष्ट करे । अतः वहां पर अभिव्यक्त होनेवाले व्यङ्ग्यार्थ गुणीभूत व्यङ्ग्य ही हैं । फिर भी सम्पूर्ण पद्य की चरम अभिव्यक्ति रसात्मक ही है और समस्त मध्यवर्ती व्यङ्ग्यार्थ वाच्य की पोषकता के माध्यम से रसाभिव्यक्ति में ही सहायक होते हैं । अतः मध्यवर्ती व्यङ्ग्यार्थों की दृष्टि से इसमें गुणीभूतव्यङ्ग्यता है किन्तु चरम रसाभिव्यक्ति की दृष्टि से यह ध्वनि काव्य ही कहा जायगा ।
(प्रश्न) यहां पर वाच्यार्थ में व्यङ्ग्यार्थ भी सम्मिलित हो जाता है और व्यङ्ग्यविशिष्ट वाच्य की प्रतीति होती है । यही बात अर्थान्तरसङ्क्रमितवाच्य ध्वनि में भी हुआ करती है । फिर आप अवान्तर व्यङ्ग्यार्थों की दृष्टि से इसे अर्थान्तरसङ्क्रमितवाच्य ध्वनि न कहकर 'गुणीभूतव्यङ्ग्य' क्यों कहते हैं ?
(उत्तर) अर्थान्तरसङ्क्रमितवाच्य ध्वनि वहां पर होती है जहां बाध का प्रतिसन्धान हो और वाच्यार्थ के व्यङ्ग्यार्थ में बिना सङ्क्रमण किये हुये वहां पर वाच्यार्थ सज्जत ही न हो । इस प्रकार अर्थान्तरसङ्क्रमितवाच्य तो अविवक्षितवाच्य का भेद होता है किन्तु प्रस्तुत पद्य 'न्यक्कारो ह्ययमेव में यदरय:' में व्यङ्ग्यार्थ का वाच्यार्थ में अभिसङ्क्रमण नहीं होता है और न वाच्यार्थ व्यङ्ग्यार्थ के द्वारा विशेषित होकर के ही अर्थ की पुष्टि करता है अपितु वाच्यार्थ स्वतः पूर्ण होता हैं किन्तु उसमें व्यङ्ग्यार्थ की विशेषता सन्निविष्ट हो जाती है । इस प्रकार इस उदाहरण में वाच्यार्थ विवक्षित ही रहता है । अतएव इस उदाहरण में वाक्यव्यङ्ग्यत्व तो ध्वनिरूप है और पदव्यङ्ग्यत्व गुणीभूत व्यङ्ग्य ही मानी जाती है । यहां पर यह भी ध्यान रखना चाहिये कि रसव्यञ्जना में केवल गुणीभूत व्यङ्ग्य ही निमित्त नहीं होते अपितु अविवक्षितवाच्य के भेद अर्थान्तरसङ्क्रमितवाच्य भी रसव्यञ्जना में निमित्त होते हैं । उदाहरण के लिये—इसी पद्य में 'जीवत्यहो रावण:' में 'रावण' शब्द अर्थान्तरसङ्क्रमित वाच्यपरक है ।
यह अर्थान्तरसङ्क्रमितवाच्य भी वाक्य से अभिव्यक्त होनेवाली रसध्वनि का अङ्ग है । इसी प्रकार अन्यत्र भी समझना चाहिये । यह कारिका में आये हुये 'अपि' शब्द का आशय है कि 'गुणीभूतव्यङ्ग्य भी' ध्वनिरूपता को धारण करते हैं अर्थात् अन्यत्रत्व तो धारण करते ही हैं ।
ऊपर जो कुछ कहा गया है उसका आशय यह नहीं है कि जहां-कहीं गुणीभूतव्यङ्ग्य होता है वहां सर्वथा ध्वनिकाव्य होता ही है । कहीं-कहीं ऐसा भी होता है कि पदों में गुणीभूतव्यङ्ग्यता होती है और उसका पर्यवसान ध्वनि में नहीं
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यत्र तु वाक्ये रसादितात्पर्यं नास्ति गुणीभूतव्यङ्ग्यं तत्र गुणीभूतव्यङ्ग्यचमत्कारैव समुदायधर्मः । यथा— रोजानपि सेवते विपमप्युपयुङ्कते । रमन्ते च सह शत्रुभिः कुशलाः खलु मानवाः ॥
जहाँ तो वाक्य में रस इत्यादि तात्पर्य न हो, गुणीभूत व्यङ्ग्य पदों से उद्द्रासित होनेपर भी वहाँपर गुणीभूतव्यङ्ग्यता ही समुदाय धर्म होता है । जैसे— 'निस्सन्देह कुशल मनुष्य राजा का भी सेवन करते हैं; विष का भी उपयोग करते हैं और शत्रियों से भी रमण करते हैं ।'
लोचन यत्र त्विति । यद्यपि चात्र विषयनिवेदात्मकशान्तरसंगीतिरस्ति, तथापि चमत्कारोऽयं वाच्यनिष्ठ एव । व्यङ्ग्यं त्वसम्भाव्यत्वविपरीतकारित्वादि तस्यैवाऽनुयायि, तच्चापि शब्दाभ्यामुमयतो योजिताभ्यां च शब्देन स्थानत्रययोजितेन खलुशब्देन चोमयतो योजितेन मानुषशब्देन स्पष्टमेवेति गुणीभूतम् । तारावती यहाँ कहीं वाच्यार्थ रसाभिव्यञ्जनपरक नहीं होता वहाँ यदि वाच्यार्थ गुणीभूत व्यङ्गयों से उद्द्रासित भी हो रहा हो तथापि उसे ध्वनिकाव्य को सङ्क्षा नहीं दी जायगी अपितु वहाँ समुदाय धर्म भी गुणीभूतव्यङ्ग्य ही होता है । उदा— हरण के लिये इस उद्धृत को लीजिये— 'निस्सन्देह वे मानव कुशल ही होते हैं जो राजा की भी सेवा कर लेते हैं, विष का भी उपयोग कर लेते हैं और क्रियों से भी रमण कर लेते हैं ।'
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यद्यपि यहाँ पर शान्त रस की कल्पना की जा सकती है। सारा लौकिक व्यवहार ही नीरसप्राय तथा दुःख और क्लेश से भरा हुआ है। लोक राजाओं को अधिक महत्व देता है और क्रियों में अधिक लित रहता है क्योंकि वे ही सर्वाधिक आकर्षक होती हैं। किन्तु ये सब तत्व हैं कुछ भी नहीं परिणमन में ये सब विषभक्षण के समान ही मारक हो जाते हैं। इस प्रकार यह सब वर्णन विषयवैरस्य का प्रतिपादक है और उससे शान्तरस की अभिव्यञ्जना होती है। तथापि रसध्वनि वहीं पर होती है जहाँ चमत्कार रसानिष्ठ हो और रस की स्पष्ट रूप में अभिव्यक्ति हो रही हो। यहाँ पर रसध्वनि नहीं कहीं जा सकती क्योंकि यहाँ पर चमत्कार वाच्यनिष्ठ ही है। यहाँ पर पूरे वाक्य से भी व्यञ्जना निकलती है कि राजा की सेवा करना, क्रियों का हृदय पहिचान सकना और उनका प्रेम प्राप्त कर सकना तथा विषभक्षण कर सकना ये सब असम्भव कार्य हैं और जिस फल की आकांक्षा से इनको स्वीकार करो ये उसके विपरीत ही फल देते हैं। किन्तु यह सम्पूर्ण वाक्यगत व्यञ्जना चमत्कारपर्यवसायिनी नहीं होती क्योंकि यह वाच्य का ही संस्कार करती है अतएव ध्वनि न होकर गुणीभूतव्यङ्ग्य की ही कोटि में आती है। वाच्य का उपस्कार इस प्रकार होता है कि 'अपि' शब्द दोनों ओर लगाया जाता है कर्म के साथ भी लगाया जाता है और क्रिया के साथ भी। जैसे--'राजानम् अपि' 'सेवन्ते अपि' अर्थात् 'राजा को भी' इससे व्यञ्जना निकलती है राजा लोगों को प्रशस्त कर सकना अत्यन्त दुष्कर है, उनकी कुरता, असहिष्णुता और अयुक्तियुक्तता सर्वजनसम्मत है। 'सेवा भी कर लेते हैं' इससे व्यञ्जना निकलती है कि राजाओं से दूर का व्यवहार तो कोई बड़ी बात नहीं है किन्तु उनकी सेवा में तो सदा उनके पास उपस्थित रहना पड़ता है जो अति दुष्कर कार्य है। इसी प्रकार 'अपि' की दोनों ओर योजना 'विषम् उपयुञ्जते' और 'श्रियम् रमन्ते' में भी कर लेनी चाहिये और उनके व्यङ्ग्यार्थ की व्याख्या भी इसी प्रकार की जानी चाहिये। 'च' शब्द की योजना तीन बार होती है। क्योंकि योतकों का प्रयोग एक बार होता है किन्तु उनका सम्बन्ध प्रत्येक के साथ हो जाता है। 'च' भी योतक है। ('म' इत्यादि तथा 'च' इत्यादि को योतक माना जाता है। इसका आशय यह है कि इन शब्दों का अर्थ इनसे सम्बद्ध शब्दों में ही विद्यमान रहता है किन्तु ये शब्द इस अर्थ को व्यक्त मात्र कर देते हैं। जैसे 'रामः कृष्णश्च' में कृष्ण का अर्थ है 'और कृष्ण' इस और शब्द का अर्थ 'च' शब्द के द्वारा योतित कर दिया गया है। यहीं 'च' शब्द की योतकता है। वैच्याकरण भूपण में कहा गया है-- 'योतकः पादयो येन निपाताश्रावयस्तथा ।'
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वाच्यव्यङ्ग्ययो: प्रयो: प्राधान्येऽप्राधान्यविवेके पर: प्रयत्नो विधातव्य:। येन ध्वनि-
वाच्य और व्यङ्ग्य के प्राधान्य और अप्राधान्य के विवेक में बहुत प्रयत्न करना चाहिये जिससे ध्वनि
गुणीभूतव्यङ्गयोरलङ्काराणां चासड्ढीनां विषय: सुज्ञातो भवति। अन्यथा तु प्रसिद्धालङ्काराविपय एव व्यामोह: प्रवर्त्तते।
और गुणीभूत व्यङ्ग्य का और अलङ्कारों का तथा असंख्यात विषय भलीभाँति ज्ञात हो जाता है। नहीं तो प्रसिद्ध अलङ्कारों के विषय में ही व्यामोह प्राप्त हो जाता है।
दिवेकदर्शना चेयं निरुपेयोगेतिदर्शयति—वाच्यव्यङ्गयोरिति। अलङ्काराणां चेतिं। यत्र व्यङ्गयं नास्त्येव तत्र तेषां शुद्धानां प्राधान्यम्। अन्यथात्यति। यदि प्रयत्नवता न भूयात् इत्थर्थ:। व्यङ्ग्यप्रकारस्तु यो मया पूर्वमुखैकक्षिततस्तस्या-संदिग्धमेव व्यामोहस्थानत्वमिथ्येककारामिप्राय:।
विवेक के दिखलानेवाले इस बात को दिखलाते हैं—'वाच्य और व्यङ्ग्य का' यह। 'अलङ्कारों का' यह। जहाँ व्यङ्ग्य नहीं ही होता वहाँ उन शुद्धों (अलङ्कारों) का प्राधान्य होता है। 'नहीं तो' यह। अर्थात् यदि प्रयत्नवाला न हुआ जाय तो। 'एव' शब्द के प्रयोग का आशय यह है कि जिस व्यङ्ग्य प्रकार की मैंने पहले कल्पना की थी उसके व्यामोह स्थान होने में कोई सन्देह नहीं रह जाता।
लोचन
ये निपात अन्त में प्रयुक्त किये जाते हैं किन्तु इनका अन्वय सभी से हो जाता है। जैसे 'राम: सीता लक्ष्मणश्र गच्छन्ति' यहाँ 'च' शब्द का अन्त में प्रयोग किया गया है किन्तु इसका सम्बन्ध राम, सीता और लक्ष्मण तीनों से हो जाता है। उसी प्रकार यहाँ पर भी 'राजानमपि सेवते, त्रिपमपि उपयुङ्क्ते, स्त्रीमिश्र सह रमन्ते' यहाँ अन्तमें 'च' शब्द का प्रयोग किया गया है, किन्तु तीनों के साथ जुड़ जाता है।
तारावती
इस प्रकार 'च' शब्द की तीनों स्थानों पर योजना से अभिव्यक्त असम्भाव्यत्व इत्यादि का कुछ न कुछ स्पष्टीकरण हो ही जाता है क्योंकि इस से व्यक्त होता है कि 'केवल इतना ही नहीं और भी'। इसी प्रकार 'खलु' (निस्सन्देह) शब्द की योजना दो वार होती है—'मानव' शब्द के साथ और 'कुशल' शब्द के साथ—'वे निस्सन्देह मानव हैं।' क्योंकि मानवगत विशेषता तो उन्हें ही प्राप्त हुई है और 'वे निस्सन्देह कुशल हैं' इससे भी असम्भवकारित्व का स्पष्टीकरण हो जाता है। 'मानव' शब्द भी इसी अर्थ का स्पष्टीकरण करता है। इस प्रकार यहाँ पर शान्त इत्यादि किसी रस में
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यथा— लावण्यद्रविपण्ययो न गणितः क्लेशो महान स्वीकृतः । स्वच्छन्दस्य सुखं जनस्य वसतश्चिन्तानलो दीपितः ॥ एवापि स्वयमेव तुल्यरमणाभावाद्दराकीर्तिता । कोडर्थे श्वेतरिति वेधसा चिनिहितरसतन्ग्यासतनुं तन्वता ॥
(अनु.) जैसे— 'लावण्य धन के अपव्यय को नहीं गिना, महान क्लेश स्वीकृत किया, सुखपूर्वक निवास करनेवाले स्वच्छन्द व्यक्ति के हृदय में चिन्ता की आग प्रदीप्त कर दी । यह बेचारी स्वयं ही तुल्य रमण के अभाव में मारी गई । इस कुशाझी को बनाने में ब्रह्मा ने न जाने अपने चित्त में कौन सा प्रयोजन रखा था ।' तारावती
वक्ता का तात्पर्य नहीं है अपितु यहाँ पर पर्यवसान अभिधार्थ से अनुप्राणित वाच्य में ही होता है। अतः यहाँ समुदाय धर्म गुणीभूत व्यङ्ग्य ही है रसङ्वनि नहीं। ऊपर प्राधान्य तथा अप्राधान्य का जो विचार किया गया है वह व्यर्थ नहीं है अपितु काव्यतत्त्वचिन्तन के लिये उसका बहुत बड़ा उपयोग है । यह काव्य का एक अत्युत्कृष्ट विवेकदर्शन है । प्रत्येक विवेचक का यह बहुत बड़ा कर्तव्य है कि काव्य का परिशीलन करने में बड़ी ही सावधानी से इस बात पर विचार करे कि अमुक काव्य में कौन तत्त्व प्रधान है और कौन अप्रधान है । क्या व्यङ्ग्यार्थ प्रधान है ? अथवा क्या व्यङ्ग्यार्थ वाच्यार्थ का अनुप्राणन मात्र है ? अथवा क्या व्यङ्ग्यार्थ स्वयं रस का पोषक है ? अथवा वाच्योपस्कारक होकर रसाभिव्यञ्जक होता है। क्या कवि का रस में तात्पर्य है या नहीं ! यदि इन सब बातों पर भलीभाँति ध्यान दिया जायगा तो यह सरलता से ही मालूम पड़ जायगा कि अमुक स्थान में ध्वनिकाव्य है अथवा गुणीभूतव्यङ्गय है या शुद्ध अलङ्कार की प्राधान्यता है जिसमें व्यङ्गय होता ही नहीं । यदि प्रयत्नपूर्वक प्राधान्यता और अप्राधान्यता पर विचार न किया जाय तो प्रधान अलङ्कारों के विषय में ही व्यामोह हो सकता है । अप्रसिद्ध अलङ्कारों का तो कहना ही क्या ? यहाँ पर 'अलङ्कार विपय एव' में जो 'एव' शब्द लिखा गया है उसका अभिप्राय यह है कि यदि परिशीलक प्रधान और अप्रधान की विवेचना करने में ही चूक जायगा तो जिस व्यङ्गय प्रकार का मैंने पहले विस्तृत विवेचन किया है उसमें उसके व्यामोह में पड़ जाने में कोई सन्देह ही नहीं रह जायगा । प्राधान्यता का विचार न करने पर किस प्रकार व्यामोह सम्भव है इसके लिये केवल एक उदाहरण पर्याप्त होगा । निम्नलिखित उक्ति को लीजिये—
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द्रविणशब्देन सर्वस्वमायत्वमनेककृत्योपयोगित्वमुक्तम् । गणित इति ।
द्रविण शब्द से लगभग सर्वस्व होना और अपने अनेक कृत्यो का उपयोगी होना बतलाया गया । 'गणित गया' यह ।
यहाँ पर लावण्य पर द्रविण का आरोप किया गया है । द्रविण ( पूँजी ) ही एक ऐसी वस्तु है जो किसी भी व्यक्ति का सर्वस्व कही जा सकती है और उसी से मानव के प्रायः सभी कार्य बन जाते हैं । अतः उसको सुरक्षित रखने की सर्वथा नेषा करनी जाहिये और यह ध्यान रखना चाहिये कि कहीं उसका अपव्यय न हो जाय । ब्रह्माजी की सम्पत्ति लावण्य ही है क्योंकि उससे वे समस्त विश्व की रचना करते हैं । प्रस्तुत नायिका की रचना में ब्रह्माजी ने खुले हाथों उस सौन्दर्य का अपव्यय किया और इस बात की परवा भी नहीं की कि उनका सर्वस्वभूत बहुमूल्य
चिरेण हि यो व्ययः सम्पच्यते न तु विदयुदिव ऋऋटिति तत्नावश्यं गणनया भवितव्यम् । अनन्तकालनिर्माणकारिणोऽपि तु विधेर्नि विवेकलेशोऽप्युद्भवति परमस्यामपेक्षावत्त्वम् ।
बहुत समय में जो व्यय किया जाता है विजली के समान शीघ्र ही नहीं हो जाता वहाँ अवश्य गणना होनी चाहिये । अनेक काल से निर्माण करनेवाले भी ब्रह्मा का विवेकलेश भी उदय नहीं हुआ यह उनका बहुत बड़ा नामसमझो से कार्य करना है । इसीलिये कहते हैं—'बहुत बड़ा क्लेश' यह ।
अत्र हेतुः—स्वल्पो हि महान् । स्वल्पोऽनुद्भवति । विशेषेऽपि महतेर्थः । ऋषाभिप्रति यत्स्वयं निर्मीयते तदेव च निधीयते इति महद्वेशसमपि शब्देनैकारण चोक्तम् ।
'स्वल्पशब्द का' यह । अर्थात् विश्रृड्खल का । 'यह भी' यह । जो स्वयं निर्मित किया जाता है वही मारा जाय यह बहुत बड़ा घात हुआ—यह 'अपि' शब्द तथा 'एव' शब्द के द्वारा कहा गया । 'कौन अर्थ' यह । अर्थात् न तो अपना ही अर्थ न लोक का ही और न बनाये हुये का ही ।
ब्रह्माजी ने उसको न जाने क्यों वनाया एकतो सौन्दर्य की महत्ती सम्पत्ति का निर्माणतापूर्वक व्यय कर डाला और उसकी परवा भी नहीं की । स्वयं इसके बनाने में न जाने कितना परिश्रम किया । लोक का भी इस्की रचना से क्या हितसाधन हुआ । लोग स्वल्पशब्द का चिन्तन कर रहे थे उनके हृदयों में चिन्ता की आग जला दी। स्वयं यह वेचारी भी अपने जैसे किसी प्रियतम को प्राप्त न कर सकी अतः यह भी नष्ट ही हो गई । न जाने इस कुशांगी के इतने मनोहर रूप की रचना करने में ब्रह्माजी ने अपने हृदय में क्या प्रयोजन रखा जोकि ऐसी अमृतपूर्व सुन्दरी की रचना कर दी ।
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पदार्थ समप्त होता जा रहा है। कभी-कभी ऐसी परिस्थिति आ जाती है कि विजली की चमक के समान पूँजी एकदम समप्त हो जाती हैं और स्वामी उसे देखता ही रह जाता है, सम्पत्ति की रक्षा कर सकना उसके स्वामी के वश में ही नहीं रहता; अथवा इतनी अधिक आवश्यक्ता पड़ जाती है कि सम्पत्ति का मोह छोड़कर भी आई हुई विपत्ति से पीछा छुड़ाया जाता है। किन्तु यहाँ तो ऐसी बात नहीं है। ब्रह्माजी ने बहुत सोच समझ कर बहुत समय में नायिका की रचना की है। अतः सौन्दर्य की पूँजी का विनियोजन बहुत सोच समझ कर धीरे-धीरे किया गया है; विजली के समान वह एकदम ही नहीं लग गई और न उसके विनियोजन के लिये ब्रह्माजी वाध्य ही थे। अतः उनको इस बात की परवा करनी ही चाहिये थी कि उनकी बहुमूल्य सम्पत्ति का यों ही अपव्यय हुआ जा रहा है। सबसे बड़ी आश्र्चर्य की बात तो यह है कि ब्रह्माजी अनन्तकाल से रचना करते चले आये हैं फिर भी उन्हें इतना विवेक प्राप्त नहीं हो सका कि ऐसी नासमझी न करें। केवल इतना ही नहीं
किन्तु ब्रह्माजी को इतना सुन्दर निर्माण करने में न जाने कितना कष्ट उठाना पड़ा होगा किन्तु ब्रह्माजी ने उसे सहर्ष स्वीकार कर लिया। यदि कहा जाय कि ब्रह्माजी ने इस निर्माण से लोक का कोई बड़ा हित किया तो यह बात भी नहीं है। क्योंकि लोक पर तो इसकी रचना से एक आपत्ति ही आ गई। अभी तक लोग स्वच्छन्दतापूर्वक आनन्द से रहते थे उनके लिये कोई बन्धन नहीं था और कोई परेशानी नहीं थी। किन्तु इसकी रचना से उन सबके हृदयों में चिन्तारूप आग दहक उठी कि यह कैसे प्राप्त की जा सके। आशाय यह है कि इस नायिका को देखकर प्रत्येक व्यक्ति के हृदय में वासना की ज्वाला जल उठती है और प्रत्येक व्यक्ति उसे प्राप्त करने के लिये आतुर हो जाता है। यह तो बैठे बिठाये से एक आपत्ति ही आ गई। यह भी नहीं कहा जा सकता कि इस निर्माण से इस नायिका का कोई हित हुआ है। क्योंकि इतना रूपवान् कोई मनुष्य संसार में बनाया ही नहीं गया जिसका रमण इसके अतुकूल कहा जा सकता। अतः यह वेचारी भी मारी ही गई। जिसको स्वयं बनाया जाय और उसी को मार डाला जाय यह तो बहुत बड़ी हत्या ही कही जायेगी। यह बहुत बड़ी हत्या का भाव ‘एषापि स्वयमेव’ में
अपना ही हित किया क्योंकि अपनी सारी पूँजी व्यय कर दी और महान् कष्ट उठाया, न लोक का ही हित किया क्योंकि लोगों के हृदयों में कामाग्नि प्रज्वलित कर दी और न इस नायिका का ही उपकार किया जोकि इसे अपने समान प्रियतम नहीं मिल सका। नहीं कहा जा सकता कि ब्रह्माजी ने इसको बनाने में क्या प्रयोजन रखा होगा।
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इत्यत्र व्याजस्तुतिरलङ्कार इति व्याख्याथि केनचित्कश्र चतुरश्रम्, यतोऽस्याभिधेयस्यैतदलङ्कारस्वरूपमात्रपर्यवसायित्ने न सुश्लिष्टता । यतो न तावदयं रागिणः कस्यचिद्विकल्पः । तस्य ‘एषापि स्वयमेव तुल्यरमणाभावाद्दराकी हता’ इत्थं विभावकृतानुप्राणने । नापि नीरागस्य, तस्यैवंविधविकल्पपरिहारैकव्यापारत्वात् । न चायं श्लोकः कस्यचिद्रवन्ध इति श्रूयते, येन तत्करणानुगतार्थेतास्य त्वान् । परिकल्प्येत ।
यहाँ पर व्याजस्तुति अलङ्कार है, यह किसी ने व्याख्या की, वह चारों ओर से ठीक नहीं बैठता; क्योंकि इस अभिधेय के इस अलङ्कार स्वरूपमात्र में पर्यवसित होने पर सङ्घति ठीक नहीं बैठती ।क्योंकि यह किसी रागी का तो विकल्प हो नहीं सकता, क्योंकि उसकी इस प्रकार की उचित उपपत्ति नहीं होती कि ‘यह बेचारी भी तुल्य रमण ( प्रियतम ) के अभाव में मारी गई ।’ यह किसी रागहीन की भी उत्त्ति नहीं हो सकती क्योंकि उसका तो एकमात्र कार्य ही यह होता है कि इस प्रकार के विकल्पों का परिहार करे । यह श्लोक किसी प्रवन्ध में है यह भी नहीं सुना जाता जिससे उस प्रकरण के अनुगत अर्थ को वह कलनना कर ली जाय ।
तस्यैति । रागिणो हि वराकी हतेति कृपणतैलिड्ढितमपज्जलोपहतं चानुचितं वचनम् । तुल्यरमणाभावादिति स्वात्मन्यत्यन्तमनुचिततम् । आत्मन्यपि तद्रूपासम्भावनायां रागितायां च पशुप्रायत्वं स्यात् ।
‘उसका’ यह । रागी का ‘बेचारी मारी गई’ यह वचन कृपणता से आलिड्ढित है और अमज्जल से उपहत अनुचित वचन है । ‘तुल्यरमण के अभाव में’ यह अपने विषय में अत्यन्त् अनुचित है । अपने विषय में भी तद्रूप का असम्भावन करने पर रागिता में भी पशुप्रायत्व हो जाय ।
यहाँ पर किसी किसी ने व्याजस्तुति अलङ्कार माना है । व्याजस्तुति अलङ्कार वहाँ पर होता है जहाँ प्रस्तुत की निन्दा की जाय जिसका अभिप्राय प्रस्तुत की ही प्रशंसा में हो । यहाँ पर ब्रह्मा प्रस्तुत हैं उनकी निन्दा की गई है । इस निन्दा का तात्पर्य है प्रशंसा में, क्योंकि इससे अभिव्यक्त होता है कि ब्रह्मा जी इतने निपुण हैं कि वे इतनी उच्चकोटि की सुन्दरियों का भी निर्माण कर सकते हैं । किन्तु वस्तुतः यहाँ नायिका का वर्णन ही प्रस्तुत है और ब्रह्मा जी की निन्दा के .रूप में नायिका की निन्दा ही वाच्य है—‘इस नायिका को व्यर्थ ही इतना लावण्य दे दिया गया,
यहाँ पर किसी किसी ने व्याजस्तुति अलङ्कार माना है । व्याजस्तुति अलङ्कार वहाँ पर होता है जहाँ प्रस्तुत की निन्दा की जाय जिसका अभिप्राय प्रस्तुत की ही प्रशंसा में हो । यहाँ पर ब्रह्मा प्रस्तुत हैं उनकी निन्दा की गई है । इस निन्दा का तात्पर्य है प्रशंसा में, क्योंकि इससे अभिव्यक्त होता है कि ब्रह्मा जी इतने निपुण हैं कि वे इतनी उच्चकोटि की सुन्दरियों का भी निर्माण कर सकते हैं । किन्तु वस्तुतः यहाँ नायिका का वर्णन ही प्रस्तुत है और ब्रह्मा जी की निन्दा के .रूप में नायिका की निन्दा ही वाच्य है—‘इस नायिका को व्यर्थ ही इतना लावण्य दे दिया गया,
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इसका भी जीवन व्यर्थ है क्योंकि इसे अपने समान रूपवान् व्यक्ति उपभोग के लिये मिल ही नहीं सकता ।' इस निन्दा से नायिका की प्रशंसा अभिव्यक्त होती है कि इसकी जैसी सुन्दरी और कोई है ही नहीं ! इस प्रकार यह व्याजस्तुति अलङ्कार माना गया है । किन्तु यह कथन ठीक नहीं है और इस चुटि का कारण यही है कि विचारकों ने सभी दृष्टियों से इस पर विचार नहीं किया है तथा ठीक रूप में प्राधान्य-अप्राधान्य के विवेचन करने की चेष्टा नहीं की । कारण यह है कि यदि इस पद्य के वाच्यार्थ का पर्यवसान केवल व्याजस्तुतिपरक ही माना जाय तो इस पद्य की सङ्गति ठीक बैठ ही नहीं सकती । इसको इस प्रकार समझिये—इस पद्य में नायिका के निर्माण के प्रयोजन के सम्बन्ध में जो अनेक विकल्प किये गये हैं वे किस व्यक्ति के विकल्प हैं ? क्या वे किसी प्रेमी व्यक्ति के विकल्प हैं ? किन्तु प्रेमी तो वही हो सकता है जिसकी चित्तवृत्ति अपनी प्रेयसी में बिल्कुल निमग्न हो गई हो और वह अपनी उस प्रेमिका की रूपसुधा का आस्वादन करने में हो । अपनी को कृतकृत्य मानता हो । वह तो अपनी प्रेयसी को सभी प्रकार का आदर देने को प्रस्तुत रहता है और उसी को सर्वस्व तथा सारभूत सफल पदार्थ समझता है । फिर भला वह अपनी प्रेयसी के लिये ही 'बेचारी' इस दीनता भरे हुये शब्द का प्रयोग कैसे करेगा ? और 'नष्ट हो गई' यह अमङ्गलिक वाक्य भी उसके मुख से कैसे निकलेगा ? ये वचन सर्वथा अनुचित हैं जो एक प्रेमी अपनी प्रेयसी के लिये कह ही नहीं सकता । साथ ही प्रेमी तो वही हो सकता है जो नायिका के वियोग में दुःखी रहे और उसे प्राप्त करने की चेष्टा करे । 'इसकी इसका जैसा रमण करने वाला व्यक्ति मिल ही नहीं सकता' ये शब्द किसी प्रेमी के मुखसे निकल ही नहीं सकते क्योंकि इससे यह स्पष्ट ही है कि वह अपने को उसके अनुकूल नहीं समझता।
तब वह उसका प्रेमी कैसा ? अपने अन्दर उसके जैसे रूप के प्राप्त कर सकने की योग्यता का अभाव समझना एक प्रेमी के लिये पशुओं की जैसी क्रिया हो जायगी । अतः यह कथन किसी रागी का नहीं माना जा सकता । तो क्या यह कथन किसी विरक्त व्यक्ति का है ? किन्तु विरक्त व्यक्ति का तो एकमात्र कार्य यही होता है कि वह नायिकाओं के इस प्रकार के स्वरूप पर्यालोचन को सर्वथा बचाता रहे । यदि वह इस प्रकार सौन्दर्य की समीक्षा में प्रवृत्त रहे तो वह विरागी कैसा ? अतः यह सिद्ध है कि यह कथन प्रस्तुतपरक नहीं हो सकता और न व्याजस्तुति अलङ्कार ही यहाँ सङ्गत हो सकता है । यहाँ तो अप्रस्तुत अंश पर ही प्रकाश पड़ता है । अतः यह अप्रस्तुतप्रशंसा अलङ्कार ही हो सकता है ।
( प्रश्न ) यह कथन किसी रागी का क्यों नहीं हो सकता ? मान लीजिये किसी
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ननु च रागिणोऽपि कुतश्चित्कारणात् परिगृहीतकतिपयकालव्रतस्य वा रावणप्राप्तस्य वा सीतादिविषये दुष्यन्तप्रायस्य वाडनिज्जातिविशेषे शकुन्तलादौ किमियं स्वसौभाग्याभिमानगर्भा तात्सुतिगर्भा चोक्तिनं भवति । वीतरागस्य वा अनादिकालाभ्यासतरङ्गावासनावासिततया मध्यस्थस्वभावापि तां वस्तुतस्तथा पश्यति । न तस्य मुक्तिकाकरोऽतिकल्पं प्रतिभाति । तस्मावस्तुतानुसारेणोभयस्यापीयं मुक्तिरुपपद्यते । अप्रस्तुतप्रशंसायामपि ह्यप्रस्तुतः सम्भावनेऽर्थो वक्तव्यः, नहि तेजसीस्थमप्रस्तुतप्रशंसा सम्भवति-अहो धिक्के कारण्यमिति स परं प्रस्तुतपरतयेऽपि नात्रासम्भव हेत्याशङ्क्याह-न चेति ।
( प्रश्न ) कहाँँ किसे कारण से थोड़े समय के लिये व्रत लिये हुये रागी की; अथवा सीता इत्यादि के विषय में किसी रावण सदृश रागी की अथवा अज्ञात जातिविशेषवाली शकुन्तला इत्यादि के विषय में दुष्यन्त जैसे किसी रागी की—क्या यह अपने सौभाग्य के अभिमान से गर्भित तथा उसकी प्रशंसा से गर्भित उक्ति नहीं हो सकती ? अथवा अनादि काल से अभ्यस्त राग की वासना से वासित होने के कारण मध्यस्थ होते हुये भी उसको वस्तुतः उस प्रकार की देखनेवाले वीतराग की भी यह उक्ति सम्भावित नहीं की जा सकती ऐसा नहीं । इसका वीणा का सुमनोहर शब्द कौये की कावँ कावँ जैसा तो मालूम नहीं पड़ता । इससे प्रस्तुत का अनुसरण करते हुये दोनों की यह उक्ति सिद्ध की जा सकती है । अप्रस्तुतप्रशंसा में भी सम्भव हो अप्रस्तुत अर्थ कहा जाना चाहिये । तेज में यह अप्रस्तुतप्रशंसा सम्भव नहीं होती कि तुम्हारी कालिमा को धिक्कार है । इस प्रकार प्रस्तुतपरक ही है अतः यहाँँ असम्भव नहीं शङ्का करके कहते हैं—‘और नहीं यह श्लोक’ इत्यादि ।
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रागी व्यक्ति ने कुछ समय के लिये किसी कारण से स्त्री-सहवास न करने का व्रत ले रखा है । वह अपने को उस नायिका के लिये उपयुक्त समझते हुये भी इस प्रकार के शब्द कह सकता है । अथवा ( यदि कहो कि उसका भी ‘विरहारी’ या ‘मारी गई’ ये शब्द कहना तो अनुचित ही है तो ) ये शब्द किसी ऐसे व्यक्ति के हो जैसे रावण का प्रेम सीता के प्रति । ( किन्तु इस प्रेम में भी रावण मदोन्मत्त है और वह अपने प्रेम की असफलता पर पश्चात्ताप ही करता रह जाय या उसके हृदय में अपनी प्रेयसी के प्रति करुणाभाव की जागृतिमात्र हो जाय यह रावण के स्वभाव के प्रतिकूल है । रावण तो दर्प के साथ सीता को प्राप्त करने की चेष्टा
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करेगा। ऐसी दशा में उसका भी इस प्रकार का कथन सङ्गत नहीं होता। क्योंकि रावण के सीता के प्रति प्रेम में तो चिन्ता की ही अधिकता होनी चाहिये। अथवा यह ऐसे प्रेमी के विषय में हो सकता है जैसा कि दुष्यन्त का शकुन्तला के प्रति उस समय था जब दुष्यन्त को शकुन्तला की जाति का पता नहीं चल पाया था। (अभिज्ञान शाकुन्तल में यह प्रकरण आया है कि वृद्धों को सींचती हुई शकुन्तला को आड़ से देखकर दुष्यन्त यह वितर्क करने लगे कि क्या शकुन्तला उनके लिये उपभोगयोग्य है या नहीं।) वास्तव में शकुन्तला अनन्य साधारण सुन्दरी है ही और उपभोगयोग्य न होने के कारण दुष्यन्त के हृदय में यह विचार आ ही सकता है कि वेचारी शकुन्तला को अपनी सुंदरता के योग्य प्रियतम मिलना असम्भव है। यद्यपि दुष्यन्त स्वयं को इस योग्य समझते हैं किन्तु सामाजिक प्रतिबंध उन्हें उसके सहवास में प्रवृत्त होने की अनुमति नहीं देता। इस प्रकार इस कथन से दुष्यन्त के सौभाग्य के अभिमान में भी कमी नहीं आती और शकुन्तला की प्रशंसा भी अभिव्यक्त हो जाती है। इस प्रकार यह कथन एक रागी व्यक्ति को ही हो सकता है। वीतराग की भी यह उक्ति असम्भव नहीं है। क्योंकि वीतराग व्यक्ति भी अनेक योनियों में भ्रमण करते हुये अनादि काल से जिस रागात्मक प्रवृत्ति का आनन्द लेता रहा है उसे उसकी आत्मा वासित तो है ही। अतः इस समय यद्यपि वह समस्त विषयों का परित्याग कर चुका है तथापि किसी अमृतपूर्व सौन्दर्य-शाली पदार्थ को तो वह उसी रूप में देखेगा जैसा वह है, अर्थात् जो पदार्थ सौन्दर्य में सर्वोत्कर्ष को प्राप्त होते हैं उनको वीतराग भी सुंदरतम रूप में ही देखता है। उसकी सौन्दर्यप्रतीति की भावना समाप्त तो नहीं हो जाती। वह समस्त वस्तुओं को विपयस्त रूप में तो नहीं देखने लगता। वीतराग का समनोहर क्रोधन उसके लिये कौवे की कावँ कावँ तो नहीं हो जाती। अतएव चाहे आप इसे रागी व्यक्ति की उक्ति मानें चाहे वीतराग की; दोनों अवस्थाओं में यह प्रस्तुत का ही वर्णन हो सकता है और दोनों का ही यह कथन सङ्गत हो जाता है। अतः यहाँ व्याजस्तुति अलङ्कार ही मानना चाहिये। यदि आप अप्रस्तुतप्रशंसा मानेंगे तो भी ऐसा ही अप्रस्तुत अर्थ मानना पड़ेगा जो सम्भव हो। असम्भव अप्रस्तुत से प्रस्तुत की प्रतीति कदापि नहीं हो सकती। यह तो आप कह ही नहीं सकते कि चोहे जिस अप्रस्तुत से चाहे जो प्रस्तुत अर्थ निकल सकता है। यदि आप ऐसा मानने लगें कि चाहे जिस अप्रस्तुत से चाहें जिस प्रस्तुत की प्रतीति हो सकती है तब तो यह भी सम्भव हो सकेगा कि 'तुम्हारी कालिमा को धिक्कार है' इसको अप्रस्तुत मानकर इससे यह प्रतीति होगी कि वक्ता का अभिप्राय तेज का वर्णन
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तस्मादप्रस्तुतप्रशंसेयम्। यस्मादनेन वाच्येन गुणीभूतात्मना निस्सामान्यगुणावलेपाधमातस्य निजमहिमोत्कर्षजनितसमुत्सरजनड्ढरसस्य विशेषज्ञात्मनो न कश्चिदेवापरं पर्ययत: परिदेवितमेतदिति प्रकाशयते। तथा चायं धर्मकीर्तेः श्लोक इति प्रसिद्धः। सम्भाव्यते च तस्यैव। यस्यात्— अनध्यवसितावगाहनमनल्पधीशक्तिनाम् । मतं मत्स जगत्सलयसहस्रप्रतिमाहकं, प्रयास्यति प्रयोनिधे: पय इव स्वदेहे जराम् ॥
अनु० उस ( कारण ) से यह अप्रस्तुतप्रशंसा है । क्योंकि गुणीभूत आत्मावाले इस वाच्य से असामान्य गुणों के अभिमान से फूले हुए अपनी महिमा के उत्कर्ष से मत्सरपूर्ण वृत्तियों के हृदय में सन्ताप उत्पन्न करनेवाले और अपने किसी अन्य विशेषज्ञ को न देखनेवाले व्यक्ति का यह विलाप है यह प्रकाशित किया जा रहा है । क्योंकि यह प्रसिद्धि है कि यह धर्मकीर्ति का श्लोक है और सम्भावना भी उन्हीं के श्लोक होने की है । क्योंकि— ‘बहुत बढ़ी-चढ़ी बुद्धि की शक्तिवाले के द्वारा भी जिसके अवगाहन का अध्यवसाय नहीं किया जा सकता, अधिक अभियोगों के द्वारा भी जिसके परमार्थ तत्व को नहीं देखा जा सकता है और जिसका समान प्रतिमाहक प्राप्त नहीं होता इस प्रकार का हमारा मत महासागर के जल के समान अपने शरीर में ही जरा को प्राप्त हो जायगा । इस श्लोक के द्वारा भी इस प्रकार का अभिप्राय प्रकाशित ही किया गया है ।
तारावती सारांश यह है कि अप्रस्तुतप्रशंसा में अप्रस्तुत अर्थ प्रस्तुतपरक ही होना चाहिये मनमाना नहीं । जब अप्रस्तुतप्रशंसा में भी सम्भावना अपेक्षित होती ही है तब यहाँ पर व्याजस्तुति मानने में आपत्ति ही क्या है ? ऊपर बतलाई हुईं विधि से हम इसे किसी रागी की या विरागी की उचित क्यों नहीं मान सकते ? ( उत्तर ) यह श्लोक किसी प्रबन्ध में नहीं आया है । अतः इसके लिये यह कल्पना नहीं की जा सकती कि इसमें कोई प्रकरणानुगत अर्थ हो सकता है । यदि यह पद्य किसी प्रबन्ध के अन्दर होता तो उस प्रबन्ध के अनुसार ही उसकी योजना कर ली जाती । अतः जो अवतरण आपने सुझाये हैं वे यहाँ पर लागू ही नहीं होते ।
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निस्सामान्येति निजमहिमेति विशेषज्ञमिति परिदेवितमित्येतेैश्वरुतुमिः वाक्यखण्डैः क्रमेण पादचतुष्टयस्य तात्पर्यं व्याख्यातम् । नन्वत्रापि किं प्रमाणमित्याशङ्क्य तदाशयेन निर्विवादतदीयश्लोकापिंतेनास्याश्रायं संवादयति-सम्भावयति इति । अवगाहनमध्यवसितमपि न यत्र आस्तां तस्य सम्भावनम् । परमं यदर्थतस्त्वं कौस्तुभादिभ्योडप्युत्तमम्, अलङ्घ्यं प्रयत्नपररीक्षितमपि न प्राप्तं सदृशं यस्य तथाभूतं प्रतिग्राहमेकैको ग्राहो जलचरः माणि ऐरावतोच्चैःश्रवोधन#वन्तरिप्रायो यत्र तदलङ्घ्यसदृशप्रतिग्राहकम् ।
'निस्सामान्य' यह 'निजमहिमा' यह 'विशेषज्ञ' यह 'परिदेवित' यह इन चार वाक्यखण्डों से क्रमशः चार पदों के तात्पर्य की व्याख्या की गई । ( प्रश्न ) निस्सन्देह यहाँ पर भी क्या प्रमाण है ? यह शङ्का करके कहते है—‘तथा च’ इत्यादि । इससे क्या ? यह शङ्का करके उसके आश्रय से उन ( धर्मकीर्ति ) के निर्विवाद श्लोक के द्वारा अर्पित आश्रय का मेल करा रहे हैं—‘सम्भावित किया जाता है’ यह । जहाँ अवगाहन की तैय्यारी की हो और उसका सम्पादन न हो सके । परम जो अर्थतस्त्वं अर्थात् कौस्तुभ इत्यादि से भी उत्तम । नहीं प्राप्त किया अर्थात् प्रयत्नपूर्वक परीक्षा करने पर भी जिसके समान प्राप्त नहीं हुआ उस प्रकार का प्रतिग्राह अर्थात् जलचर प्राणी ऐरावत, उच्चैःश्रवा, धनवन्तरि इत्यादि हैं जिसमें उसको कहते हैं सदृश प्रतिग्राहक को न प्राप्त करनेवाला ।
( प्रश्न ) जब आपके मत में यहाँ व्याजस्तुति का मानना ठीक नहीं तो और कौनसा अलङ्कार होगा ? ( उत्तर ) यहाँ अप्रस्तुतप्रशंसा अलङ्कार मानना ही ठीक है । यहाँ पर प्रस्तुत ही किसी विचारक को चिन्तनाशक्ति से उद्भूत गहन दार्शनिक सिद्धान्त जिसका समझ सकना भी प्रतिभाशालियों के लिये असम्भव है । कवि इसी बात को कहना चाहता है । अतः उसके तुल्य इस अप्रस्तुत अर्थ का उपन्यास करता है कि बृहस्पति ने एक ऐसी अभूतपूर्व सुन्दरी की रचना कर दी है कि उसके उपभोगयोग्य ही कोई व्यक्ति दृष्टिगत नहीं होता । इस अप्रस्तुत से इस प्रस्तुत अर्थ की प्रतीति होती है कि विचारक का सिद्धान्त समझने की क्षमता ही बड़े-बड़े विद्वानों में भी नहीं है । इस प्रकार तुल्य अप्रस्तुत से तुल्य प्रस्तुत की अभिव्यक्ति की व्याख्या इस प्रकार की जा सकती है—‘लावण्यरूपी ध्वन के अर्थ से व्यक्त होता है कि इसका वक्ता अपने असामान्य गुणों के अभिमान से
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फूला हुआ है; उसका कहना है कि उसने अपने सिद्धान्त के प्रवर्तन में अपनी सारी प्रतिभा लगा दी है और उसमें उसे बड़ा परिश्रम करना पड़ा है । यह सिद्धान्त ऐसा वैसा नहीं है अपितु इसमें असाधारण गुण भरे पड़े हैं । दूसरे पाद का अर्थ यह है—‘जो लोग स्वच्छन्द विचरण करते थे उनके हृदयों में चिन्ता का उद्वेग उत्पन्न कर दिया ।’ इसकी व्याख्या यह है कि ‘जो लोग मुझसे मत्सर रखते हैं वे मेरे इस महिमा के उत्कर्ष को देखकर ईर्ष्या की आग से एकदम जलने लगे हैं ।’ तीसरे पाद का अर्थ है—‘यह बेचारी भी अपने तुल्य रमण को प्राप्त न कर सकने के कारण मारी गई ।’ इसकी व्याख्या यह है कि—‘मैंने जैसे सिद्धान्त का प्रवर्तन किया है और जैसी उच्चकोटि की प्रतिपादनशैली इसमें अपनाई है उसकी तुलना विश्व के किसी विचारक से नहीं की जा सकती । मैं अपने विषय का अद्वितीय विशेषज्ञ हूँ ।’ चतुर्थ पादका अर्थ यह है—‘न जाने ब्रह्माजी ने इस तन्वङ्गी की रचना करके किस अर्थ की सिद्धि की ?’ इसका व्यङ्ग्यार्थ है—‘मुझे दु:ख है कि मेरा इतना उच्चकोटि का सिद्धान्त किसी की समझ में नहीं आयेगा और यह यों ही व्यर्थ हो जायगा ।’ इस प्रकार इस पद्य से वक्ता का परिदेवन व्यक्त होता है । अत: यहाँ पर अप्रस्तुतप्रशंसा अलङ्कार ही है ।
( प्रश्न ) इस विषय में क्या प्रमाण है कि इस पद्य का प्रस्तुत अर्थ किसी विद्वान् की उच्चकोटि की रचना के न समझे जाने से उद्भूत परिदेवन है । ( उत्तर ) यह प्रसिद्ध है कि यह पद्य धर्मकीर्ति का लिखा हुआ है । ( आनन्दवर्धन को भी इस बात का ठीक पता नहीं था कि यह पद्य किसका लिखा हुआ है । यहाँ पर उन्होंने अपने समय की प्रसिद्धिमात्र का उल्लेख किया है । आनन्दवर्धन के इसी उल्लेख के आधार पर क्षेमेन्द्र ने निश्चय के साथ लिख दिया है कि यह धर्मकीर्ति का पद्य है । धर्मकीर्ति एक बौद्धभिक्षु थे । इन्होंने न्यायबिन्दु की रचना की थी । सुवन्धु की वासवदत्ता में दी हुई एक उपमा से व्यक्त होता है कि इन्होंने एक अलङ्कार ग्रन्थ की भी रचना की थी । इससे यह भी सिद्ध होता है कि धर्मकीर्ति सुवन्धु से भी पहले हुये थे ।)
( प्रश्न ) यह तो प्रसिद्धिमात्र है इसमें प्रमाण ही क्या कि यह धर्मकीर्ति का इलोक है ? दूसरी बात यह है कि यदि इसे धर्मकोर्ति का मान भी लिया जाय तो भी यह कैसे सिद्ध हो जायगा कि यह व्याजस्तुति न होकर अप्रस्तुतप्रशंसा है । ( उत्तर ) सम्भावना यही है कि उन्हीं का श्लोक होगा । कारण यह है कि इस पद्य में जिस प्रस्तुत की व्याख्या की गई है बिल्कुल उसी से मिलता-जुलता भाव धर्मकीर्ति के एक दूसरे श्लोक का भी है जिसके विषय में यह सन्देह नहीं है कि वह धर्मकीर्ति का है या नहीं । उस पद्य का आशय इस प्रकार है—
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एवंविध इति । परिदेवितविषय इत्यर्थः । इयति चाथे अपस्तुतप्रशंसोपमालक्षणमलङ्कारद्वयम् । अनन्तरं तु स्वात्मनि विस्मयधामतयाहुतेः विश्रान्तिः । परस्य च श्रोतृजनस्यात्यादरास्पदतया प्रयत्नग्राह्यतया चोत्साहजननेनैवं भूतमलङ्कारोपादेयं सत्कवित्वसमुचितजनानुरागिकं कृतमिति स्वात्मनि कुशलकविताप्रदर्शनतया धर्मवीरस्पर्शनेन वीररसे विश्रान्तिरिति मन्तव्यम् । अन्यथा परिदेवितमात्रेण किं कृतं स्यात् । अपेक्षापूर्वंकारिस्वमात्मन्यावेदितं चेत् किं ततः स्वार्थपरार्थासम्भवादिस्यलं बहुना ।
'इस प्रकार का' यह । अर्थात् परिदेवन ( विलाप ) का विषय । और इतने अर्थ में अप्रस्तुतप्रशंसा और उपमा नाम के दो अलंकार हैं । बाद में तो अपने विषय में विस्मयघामता होने के कारण अद्भुत में विश्रान्ति होती है । दूसरे श्रोता लोगों के लिए अत्यन्त आदरास्पद होने के कारण और प्रयत्नपूर्वक ग्राह्य होने से उत्साहजनक के द्वारा इस प्रकार के ( अर्थ ) को अत्यन्त उपादेय बनाकर कतिपय श्रोताओं का अनुरागक बना दिया गया है । इस प्रकार अपने अनन्दर कुशलताप्रदर्शन के द्वारा धर्मवीर के स्पर्श से वीररस में विश्रान्ति हो जाती है यह माना जाना चाहिये । नहीं तो परिदेवन मात्र से क्या कार्यं वन सकेगा । यदि कहो कि अपने अनन्दर बिना सोचे समझे कार्यं करने की प्रवृत्ति वतलाई गई है तो इससे क्या ? क्योंकि इससे स्वार्थ और परार्थ दोनों असम्भव हैं । वस अधिक विस्तार की क्या आवश्यकता ?
लोचन
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'मेरा मत महासागर के जल के समान अथाह और दुर्गम है । जिस प्रकार वृद्धि की बहुत वड़ी रत्नराशि रत्ननेवाले व्यक्ति भी न हो तो महासागर के जल में प्रविष्ट होने का साहस कर सकते हैं और न उसके आलोडन-विलोडन की शक्ति उनमें होती है उसी प्रकार मेरे मत में प्रवेश पाने को शक्ति अधिक से अधिक बुद्धि की शक्ति रखनेवालों में भी नहीं है । यदि वे उसमें अवगाहन का अध्यवसाय भी करें तो वह कार्य उनसे सम्पन्न नहीं हो सकता । जिस प्रकार अधिक से अधिक उद्योग करने पर भी मानव-वर्ग महासागर के बहुत बड़े अर्थतत्त्व कौस्तुभमणि इत्यादि से भी वड़ी चद्दी रत्नराशि का अवलोकन नहीं कर सकता उसी प्रकार प्रकृष्ट अभियोग के द्वारा भी विद्वन्मण्डल मेरे मत के वास्तविक अर्थतत्त्व का परिज्ञान नहीं कर सकता । जिस प्रकार प्रयत्नपूर्वक परीक्षा करने पर भी समुद्र के समान प्रतिग्राह अर्थात् प्रत्येक जलचर प्राणि प्राप्त नहीं हो सकता । अर्थात् समुद्र से जैसे उच्चैःश्रवा, ऐरावत, धन्वन्तरि, कामधेनु इत्यादि महत्त्वपूर्ण प्राणी निकलते हैं वैसे अन्यत्र प्रयत्न करने पर भी नहीं मिल सकते उसी प्रकार मेरे मत के मुझ जैसे प्रतिग्राहिक अर्थात्
'मेरा मत महासागर के जल के समान अथाह और दुर्गम है । जिस प्रकार वृद्धि की बहुत वड़ी रत्नराशि रत्ननेवाले व्यक्ति भी न हो तो महासागर के जल में प्रविष्ट होने का साहस कर सकते हैं और न उसके आलोडन-विलोडन की शक्ति उनमें होती है उसी प्रकार मेरे मत में प्रवेश पाने को शक्ति अधिक से अधिक बुद्धि की शक्ति रखनेवालों में भी नहीं है । यदि वे उसमें अवगाहन का अध्यवसाय भी करें तो वह कार्य उनसे सम्पन्न नहीं हो सकता । जिस प्रकार अधिक से अधिक उद्योग करने पर भी मानव-वर्ग महासागर के बहुत बड़े अर्थतत्त्व कौस्तुभमणि इत्यादि से भी वड़ी चद्दी रत्नराशि का अवलोकन नहीं कर सकता उसी प्रकार प्रकृष्ट अभियोग के द्वारा भी विद्वन्मण्डल मेरे मत के वास्तविक अर्थतत्त्व का परिज्ञान नहीं कर सकता । जिस प्रकार प्रयत्नपूर्वक परीक्षा करने पर भी समुद्र के समान प्रतिग्राह अर्थात् प्रत्येक जलचर प्राणि प्राप्त नहीं हो सकता । अर्थात् समुद्र से जैसे उच्चैःश्रवा, ऐरावत, धन्वन्तरि, कामधेनु इत्यादि महत्त्वपूर्ण प्राणी निकलते हैं वैसे अन्यत्र प्रयत्न करने पर भी नहीं मिल सकते उसी प्रकार मेरे मत के मुझ जैसे प्रतिग्राहिक अर्थात्
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अप्रस्तुतप्रशंसायां च यद्वाच्यं तस्य कदाचिद्दिवक्षितत्वं, कदाचिद्दिवक्षितत्वं कदाचिद्विवक्षिताविवक्षितत्वमिति त्रयी वन्धच्छाया । तत्र विवक्षितत्वं यथा-परार्थे यः पीडामनुभवति भड्रगोडपि मधुरो भवति । यदोक्तं सर्वेषामिह खलु विकारायैवाभिमतः । न सम्प्राप्तो वृद्धिं । यदि स भूषणचन्द्रपतितः किमिक्षोदोषोदसौ न पुनरगुणाया मरुभुवः ॥
(अत्रु) और अप्रस्तुतप्रशंसा में जो वाच्य होता है वह कदाचित् विवक्षित होता है; कदाचित् अविवक्षित और कदाचित् विवक्षिताविवक्षित । इस प्रकार तीन प्रकार की वन्धच्छाया होती है । उसमें विवक्षित जैसे— 'दूसरे के लिये जो पीड़ा का अनुभव करता है, जो टूटने पर भी मधुर होता है, जिसका विकार निःसंदेह सभी व्यक्तियों के लिये अभिमत होता है । यदि वह गुण-हीन मरुभूमि का नहीं हुआ तो क्या यह गन्ने का दोष है ?
यथा वा ममैव — अमी ये हश्यन्ते नतु सुभगरूपाः सफलतां यस्य ज्ञानमुपगतानां विषयताम् । निरालोके लोके कथं मिदमंहो चचुरधुनाल समं जातं सधैनैः सममथवैरयवैः ॥
अथवा जैसे मेरा ही— 'ये जो सुन्दर रूपवाले ( शरीरावयव ) देखे जाते हैं इनकी सफलता जिस ( चक्षु ) के क्षणमात्र विषय बन जाने से हो सकती है; आश्चर्य है कि आलोकरहित इस लोक में ये नेत्र कैसे अन्य सव अवयवों के समान ही हो गये अथवा अन्य अवयवों के समान भी नहीं रहे ।'
तारावती
तारावती
ग्रहण करनेवाले और दूसरों को समझानेवाले नहीं मिलसकते । अतएव जिस प्रकार महासागर का जल अपने शरीर में ही वृद्ध हो गया उसी प्रकार मेरे शरीर में ही मेरा मत भी जीर्ण हो जायेगा ।'
ग्रहण करनेवाले और दूसरों को समझानेवाले नहीं मिलसकते । अतएव जिस प्रकार महासागर का जल अपने शरीर में ही वृद्ध हो गया उसी प्रकार मेरे शरीर में ही मेरा मत भी जीर्ण हो जायेगा ।'
इस पद्य का वही भाव है । जोकि 'लावण्यद्रविणव्ययो न गणितः' इत्यादि पद्य का है । इसमें वही परिदेवन की भावना है । अतः यह अप्रस्तुतप्रशंसा अलङ्कार ही है व्याजस्तुति नहीं । यहाँ तक तो अलङ्कारों की व्याख्या हुई । 'लावण्यद्रविणव्ययो न गणितः' इत्यादि में अप्रस्तुतप्रशंसा है और 'अन्ध्यवस्थितावगाहन' इत्यादि
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नजु यथास्थिततस्यार्थस्यासज्जतौ भवत्प्रस्तुतप्रशंसां इह तु सज्जतिरस्त्येवेत्याश्रद्धय सज्जनावपि भवत्येवैति दर्शयितुमुपक्रमते—अप्रस्तुतोति। नन्विति। यैरिदं जगद्भूषितमित्यर्थः। यस्म चतुषो विषयतां क्षणं गतानामेषां सफलता भवति तदिदं चतुरिति सम्वन्धः। आलोको विवेकोडपि। न समामिति। हन्तो हि परस्पराविरादानादावध्यवसायोऽरिति अतितुच्छप्रायैरित्यर्थः। अप्रासः पर उत्कृष्टो भागोऽर्थललाभात्मकः स्वरूपप्रथनलक्षणो वा येन तस्य
लोचन यथास्थित अर्थ की असज्जति में अप्रस्तुतप्रशंसा हो जाय; यहाँ तो सज्जति है ही यह आशङ्का करके सज्जति होने पर भी यह हो ही जाती है यह दिखलाने के लिये उपक्रम करते हैं—‘अप्रस्तुत’ यह । ‘निस्सन्देह’ यह । अर्थात् जिनके द्वारा यह संसार भूषित किया गया है । जिस नेता की विषयता को दूषणभर गये हुये इन ( अज्जों ) की सफलता होती है वह यह नेता—यह सम्वन्ध है । आलोक का अर्थ विवेक भी है । ‘समाम नहीं’ यह । हाथ निस्सन्देह दूसरे के स्पर्श और आदान इत्यादि में भी उपयोगी है । ‘अवयवों’ से अर्थात् जो अत्यन्त तुच्छप्राय हैं उनसे । नहीं प्राप्त किया गया है पर अर्थात् उत्कृष्ट भाग अर्थात् अर्थ प्राप्तिरूप अथवा स्वरूप प्रसिद्धिरूप जिसके द्वारा उसका
तारावती वाद में रसध्वनि पर विचार का प्रश्न उठता है। इस दिशा में कवि के दृष्टिकोण से विस्मय का स्थान होने के कारण इसकी विश्रान्ति अद्भुत में होती है । यदि श्रोताजनों के दृष्टिकोण से विचार किया जाय तो उनके लिये यह इस प्रकार का मत अत्यधिक आदरणीय होगा और वह मत इस योग्य है कि उसे ग्रहण करने की प्रयत्नपूर्वक चेष्टा की जानी चाहिये, अतः उससे श्रोताओं के हृदय में उत्साह का सञ्चार होता है; उन्हें अनुभव होता है कि ‘जो सिद्धान्त कोई नहीं समझ पाता वह मैं समझकर दिखलाऊँगा’ । इससे यह वक्त होता है कि कवि ने एक ऐसे मत का प्रवर्तन किया है जिसका उपादान सभी के लिये बहुत ही उपयोगी है और जो व्यक्ति इस योग्य होंगे कि उसे समझ सकें तथा वे परिश्रम करके समझेंगे भी वे बहुत ही कृतार्थ हो जायेंगे । चाहे संख्या में वे कितने ही कम हों । इस प्रकार कवि ने अपनी प्रतिभा का उपयोग कर अत्यन्त परिश्रम के साथ लोगों को अनुगृहीत करनेवाला एक अत्यन्त महत्वपूर्ण सिद्धान्त प्रवर्तित किया है । इस प्रकार इस उक्ति के द्वारा कवि ने अपनी उच्चकोटि की क्रियाशीलता वक्त की है । इस प्रकार यह उक्ति वीररस का स्पर्श करती है और इसकी विश्रान्ति वीररस में हो होती है । यदि इसकी विश्रान्ति साभिमान वीररस में न मानी जाय तो यह
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केवल एक विलाप रह जायेगा। उससे लाभ क्या होगा? यदि कहो यहाँ कवि ने यह व्यक्त किया है कि मैं कितना नासमझी का काम करनेवाला हूँ तो इससे भी क्या लाभ होगा? नासमझी से न तो अपना ही अर्थ बनता है और न पराया ही। इस पद्य की व्याख्या में इतना कहना पर्याप्त है अधिक की आवश्यक्ता नहीं।
( प्रश्न ) अप्रस्तुतप्रशंसा का ऐेसे स्थान पर होना तो ठीक है। जहाँ जो कुछ कहा गया हो उसकी सङ्गति ठीक न बैठे। यदि सङ्गति ठीक बैठ जाती है तो अप्रस्तुतप्रशंसा हो ही नहीं सकती यहाँ पर ‘लावण्यद्रविणविच्छयो न गणितः’ इत्यादि पद्य मे किसी व्यक्ति का किसी रमणी के अभूतपूर्व सौन्दर्य पर मुग्ध होना दिखलाया गया है जोकि सङ्गत ही है। अतः आप इसे अप्रस्तुतप्रशंसा कैसे कह सकते हैं?
( उत्तर ) अप्रस्तुतप्रशंसा केवल वहीं पर नहीं होती जहाँ अर्थ की सङ्गति न हो। किन्तु अस्वतप्रशंसा तीन प्रकार की होती है-( १ ) जहाँ वाच्य विवक्षित हो अर्थात् अर्थ की सङ्गति लग जाती हो, ( २ ) जहाँ वाच्य अविवक्षित हो अर्थात् अर्थ की सङ्गति न लग सकने से वाच्यार्थ का बाघ हो जाता हो और ( ३ ) जहाँ वाच्यार्थ एक अंश में विवक्षित हो और दूसरे अंश में अविवक्षित अर्थात् जहाँ अर्थ की सङ्गति एक अंश में लग जाती हो और एक अंश में न लगती हो। इन तीनों प्रकारों को उदाहरणों द्वारा यहाँ पर स्पष्ट किया जायेगा। पहले प्रथम प्रकार को लीजिये—
प्रस्तुत अर्थ यह है कि कोई बहुत ही गुणवान् व्यक्ति किसी ऐसे स्थान पर जा पड़ा है जहाँ न तो उसे अपने गुणों के सम्मान की आशा है, न पैसा ही मिलने वाला है और न उसकी प्रसिद्धि ही हो सकती है। यह उसके लिये बड़े दुर्भाग्य की बात है; किन्तु इससे उस व्यक्ति की गुणहीनता तो नहीं सिद्ध हो जाती इससे तो उस स्थान के लोगों की गुणग्राहकता की कमी ही सिद्ध होती है। यही बात कविगण्ने की अप्रस्तुत योजना का माध्यम से व्यक्त कर रहा है—
‘गन्ना कितनी अच्छी वस्तु है? यह दूसरे के लिये पीड़ा सहता है और चाहे तोड़ा जाय चाहे पीसा जाय किन्तु अपनी मधुरता नहीं छोड़ता। यदि संयोगवश वह किसी बहुत ही बुरे ऊसर खेत में पड़ जाय और बढ़ न सके तो नहीं हो गया। यह तो उस मरप्रदेश का दोष होगा जो उस गन्ने जैसे अच्छे पदार्थ को भी नहीं बढ़ा सका।’
आनन्दवर्धन ने एक दूसरा और उदाहरण इसी विषय में दिया है जोकि उन्हीं का बनाया हुआ पद्य है और जिसमें उक्त बात ही कही गई है तथा यह बत-
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अनयोर्हि द्वयोः श्लोकोयोरिज्जुचचुुषी विवक्षितस्वरूपे एव न च प्रस्तुते । महागुणस्याविषयपतितत्वादप्राप्तपरभागस्य कस्यचिच्चित्स्वरूपमुपवर्णयितं द्वयोरपि श्लोकोयस्तात्पर्येण प्रस्तुतत्वात् ।
(अनयोः) निस्संदेह इन दोनों श्लोकों में वक्ता और वाच्य विवादित रूपवाले ही हैं किन्तु प्रस्तुत नहीं हैं । क्योंकि महागुणोंवाले और तुच्छस्थान में पड़ जाने के कारण उत्कर्ष को प्राप्त न करनेवाले किसी व्यक्ति के स्वरूप का वर्णन करने के लिये दोनों श्लोकों में (वह व्यक्ति) तात्पर्य के रूप में प्रस्तुत है ।
तारावती लाया गया है कि यदि पूज्य व्यक्ति के रहते हुये अपूज्यों की पूजा होती है तो उसमें पूज्य का क्या दोष ? 'द्वाथ पैर इत्यादि शरीर के विभिन्न अङ्ग बहुत ही सुन्दर कहे जाते हैं और यह समझा जाता है कि शरीर के इन सुन्दर अङ्गों से ही संसार भासित कर दिया गया है । किन्तु इन अङ्गों की सफलता तभी होती है जब ये नेत्र के सम्पर्क में आते हैं। नेत्रों का महत्व इतना बढ़ा-चढ़ा है कि क्षणमात्र के सम्पर्क से ही अर्थात् क्षण भरके लिये ही इन अङ्गों को अपना विषय बनाकर नेत्र इन्हें सफल बना देते हैं । यह कैसी आश्चर्य और दुःख की बात है कि आलोकरहित अन्धकारपूर्ण संसार में वे ही नेत्र अन्य अङ्गों के समान हो जाते हैं अथवा अन्य अङ्गों की समानता कर भी नहीं सकते ।' 'आलोकरहित' में आलोक का अर्थ विवेक भी है । आशय यह है कि ऐेसे स्थान पर जहाँ लोगों की विवेकशक्ति मारी जाती है उनसे अच्छे लोग भी जन साधारण में ही गिने जाते हैं । 'अथवा अन्य अवयवों के समान नेत्र नहीं हो सकते' यहाँ पर 'अन्य अवयवों' से व्यञ्जना निकलती है कि वे अवयव बहुत ही तुच्छ हैं । अन्य अङ्ग हाथ-पैर इत्यादि तो अन्धकार में भी स्पर्श इत्यादि के द्वारा कुछ न कुछ कार्य कर ही सकते हैं किन्तु आँखें तो बिल्कुल व्यर्थ हो जाती हैं वे उस समय अन्य अङ्जोंके समान भी नहीं रह जाती । इस प्रकार यहाँ पर अप्रस्तुत इसु और चक्षु का वर्णन किया गया है । इषु के विषय में जो कुछ कहा गया वह सब ठीक है और चक्षु भी सभी अङ्गों में अधिक महत्त्वपूर्ण है हो । अतः यहाँ पर वाच्यार्थ विवक्षित है । उससे इस प्रस्तुत की व्यञ्जना निकलती है कि अत्यन्त गुणी व्यक्ति ने बुरे स्थान पर पड़ कर परभाग अर्थात् उत्कृष्ट धन अथवा स्वरूप की प्रसिद्धि को नहीं प्राप्त कर पाया है । उसी की यहाँ व्यञ्जना होता है । इस प्रकार यहाँ विवक्षितवाच्य पर अप्रस्तुतप्रशंसा आधारित है ।
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अविवक्षिततयं यथा— कस्त्वं भोः कथयामि दैवहतकं मां विध्दि शाखोटकं वैराग्यादिव वक्ति, साधु विदितं कस्मादिं कथ्यते । वामेनात्र वटस्तमह्वगजनः सर्वात्मना सेवते न छ्छायापि परोपकारकरणी मार्गस्थितस्यापि मे ॥
अविवक्षिततत्त्व जैसे— ‘अरे तुम कौन हो? कहता हूँ; मुझे दैव का मारा हुआ तुच्छ शाखोट (सिहोरा) का वृक्ष समझो । कुञ मानो वैराग्य से बोल रहे हो । ठीक समझ गये । क्यों? यह कहा जा रहा है? यहाँ से वाई ओर वटवृक्ष है; यात्री लोग पूरी आत्मा से उसी का सेवन करते हैं; मार्ग में स्थित भी मेरी छाया भी परोपकार करनेवाली नहीं है ।’
वृक्ष विशेष से उचित-प्रयुक्ति सम्भव नहीं होती; अतः अविवक्षिताभिधेयवाले इस श्लोक से समृद्ध अश्वतपुरुष के निकटवर्ती किसी निर्धन मनुष्य का परिदेवन तात्पर्य से वाक्यार्थ बनाया गया है यह प्रतीत होता है ।
न हि वृक्षविशेषेण सद्दोक्तिप्रयुक्ती सम्भवत इत्यविवक्षिताभिधेयेनैनैवानेन श्लोकेन समृद्धाश्वपुरुषसमोपवर्तिनो निर्धनस्य कस्यचिन्मनसः परिदेवितं तात्पर्येण वाक्यार्थीकृतमिति प्रतীয়ते ।
वृक्ष विशेष से उचित-प्रयुक्ति सम्भव नहीं होती; अतः अविवक्षिताभिधेयवाले इस श्लोक से समृद्ध अश्वतपुरुष के निकटवर्ती किसी निर्धन मनुष्य का परिदेवन तात्पर्य से वाक्यार्थ बनाया गया है यह प्रतीत होता है ।
लोचन कथयामित्यादि प्रत्युक्तिः। अननेत पदेनैदमाह—अकथनीयमेतत् श्रुयमाणं हि निवेद्य भवति, तथापि तु यदिति निर्वेद्यस्तत्कथयामि । वैराग्यादिति । काक्वा दैवहतकमित्यादिना च सूचितं वैराग्यमित्यवत । साधुविदितमित्युत्तरम् । कस्मादिति वैराग्ये हेतुप्रश्नः । इदं कथ्यत इत्यादिसनिवेदस्मरणोपक्रमं कथंकथयमपि निरूपणीयत-योत्तरम् । वामेनैति । अनुचितेन कुलादिनोपालक्षित इत्यर्थः । ‘वट’ इति । छायामात्र-अनुचितेन कुलादिनोपालक्षित इत्यर्थः ।
लोचन कथयामित्यादि प्रत्युक्तिः। अननेत पदेनैदमाह—अकथनीयमेतत् श्रुयमाणं हि निवेद्य भवति, तथापि तु यदिति निर्वेद्यस्तत्कथयामि । वैराग्यादिति । काक्वा दैवहतकमित्यादिना च सूचितं वैराग्यमित्यवत । साधुविदितमित्युत्तरम् । कस्मादिति वैराग्ये हेतुप्रश्नः । इदं कथ्यत इत्यादिसनिवेदस्मरणोपक्रमं कथंकथयमपि निरूपणीयत-योत्तरम् । वामेनैति । अनुचितेन कुलादिनोपालक्षित इत्यर्थः । ‘वट’ इति । छायामात्र-अनुचितेन कुलादिनोपालक्षित इत्यर्थः ।
‘कहता हूँ’ इत्यादि प्रत्युक्ति है । इस पद से यह कहते हैं—अकथनीय यह सुने जाने पर निवेदन के लिये होता है तथापि यदि आग्रह है तो कहता हूँ । ‘वैरग्य से’ यह । काकु से तथा ‘दैवहतक’ इत्यादि से तुम्हारा वैराग्य सूचित हुआ है यह आशय है । ‘ठीक समझा’ यह उत्तर है । ‘क्यों’ यह वैराग्य के हेतुका प्रशन है । ‘यह कहा जा रहा है’ इत्यादि निवेदनपूर्ण स्मरण के उपक्रम के साथ जैसे तैसे निरूपण करने के योग्य होने के रूप में उत्तर दिया गया है । ‘वाईं ओर से’ अर्थात् अनुचित कुल इत्यादि से उपलक्षित । ‘वट’, यह । अर्थात् फलदान इत्यादि से
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करणादेव फलदानादिशून्यादुद्भिदुरकन्धर इत्यर्थः। छायापोति। शाखोटको हि स्मशानाग्रिदह्वालालीढलतापल्लवादितस्त्रविशेषः।
अत्राविवक्ष्यां वेतुमाह—न हीति। समृद्धो हि योडसत्पुरुषः। ‘समृद्धसत्पुरुष’ इति पाठे तु समृद्धेन कृत्स्निमात्रेण सत्पुरुषो न तु गुणादिनैव व्याख्येयम्।
शून्य छायामात्र करणेस हि ऊपर को कन्या उठाये हुये। ‘छाया भो’ शाखोटक निस्सन्देह एक विशेष वृक्ष होता है जिसके लतापल्लव इत्यादि स्मशानाग्नि की दह्वाला से कवलित कर लिये गये हों। यहाँ अविवक्षा में हेतु बतलाते हैं—‘न हि’ यह। समृद्ध जो असत् पुरुष। ‘समृद्धसत्पुरुष’ इस पाठ के होने पर यह व्याख्या करनी चाहिये कि जो समृद्ध से अर्थात् समृद्धिमात्र से सत्पुरुष है गुण इत्यादि से नहीं।
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अप्रस्तुतप्रशंसा का दूसरा प्रकार वह होता है जहाँ वाच्य की विवक्षा नहीं होती अर्थात् वाच्यार्थ बोधित नहीं होता। उदाहरण के लिए कोई नायिका सखी के वृक्ष से प्रश्नोत्तर कर रही है—
व्यक्ति—‘भाई तुम कौन हो ?’ वृक्ष—‘कहता हूँ’। आशय यह है कि यह बात बतलाने की तो नहीं है कि मैं कौन हूँ क्योंकि इसको सुनकर तुम्हें दुःख और निर्वेद ही होगा तथापि यदि तुम्हारा अधिक आग्रह है तो मुझे कहना ही पड़ेगा, लो कहता हूँ—‘तुम यह समझ लो मैं दैव का मारा हुआ शाखोटक हूँ ।’
व्यक्ति—‘तुम तो विरागियों की भाँति बातें कर रहे हो ?’ अर्थात् तुम्हारे कहने के ढंग—कण्ठ विकार ( क्राकु ) और ‘दैव का मारा’ इत्यादि शब्दों से तुम्हारे वैराग्य की भावना अभिव्यक्त होती है।
वृक्ष—‘हाँ ऐसा ही है, आप बिल्कुल ठीक समझे ।’ व्यक्ति—‘क्यों ?’ अर्थात् तुम्हारे वैराग्य में क्या कारण है ?
वृक्ष—‘यह मैं कहता हूँ ?—( वृक्ष के इस कथन से व्यक्त होता है कि वह निर्वेद के साथ अपनी दशा का स्मरण कर रहा है और जैसे—तैसे ऐसा उत्तर देना चाहता है जो उसके वैराग्य का निरूपण कर सके ।) यहाँ बाईं ओर एक बरगद है, यात्रीगण उसका पूरे मनोयोग से सेवन करते हैं। यद्यपि मैं मार्गों में स्थित हूँ तथापि मेरी छाया भी परोपकार करनेवाली नहीं है ।’
यहाँ बाईं ओर की व्यञ्जना यह निकलती है कि वह वृक्ष न तो मार्गों पर ही उगा हुआ है और न ठीक स्थान पर ही स्थित है फिर भी यात्री लोग उसी ओर जाते हैं। ‘बरगद’ की व्यञ्जना यह है कि वह एक साधारण सा वृक्ष है,
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विवक्षिततत्वाविवक्षितत्वं यथा—
उत्पथजआपेँ असोहिणीऍँ फलकुसुमपत्तरहिआऍ । वेरिॲँ वईँ देन्तो पामर हो ओहोसिजिहोसि ॥
अत्र हि वाच्यार्थो नात्यन्तं सम्भवी न चासम्भवी । तस्माद्वाच्यव्यङ्ग्ययोः आधान्यप्राधान्येन्तया निरूपणीयम् ॥४०॥
(अनु०) विवक्षिताविवक्षितत्व जैसे— 'हे पामर ! उत्पथ में उत्कट हुई, अशोभन तथा फल, पुष्प और पत्रों से रहित वेरि के लिये वाङ् देते हये हँसे जाओगे ।'
यहाँ पर वाच्यार्थ न तो अत्यन्त सम्भवत है और न असम्भव। अतः वाच्य और व्यङ्गय के प्राधान्य और अप्राधान्य का निरूपण प्रयत्नपूर्वक करना चाहिये ॥ ४० ॥
तारावती
जिसमें फल इत्यादि बिल्कुल नहीं होते, केवल उसमें छाया मिल जाती है केवल इतने से ही वह अभिमान में भर कर अपना कल्पा ऊपर किये हुये है । यदि उसके पास फलों की आशा होती तो यात्रियों का उसके पास जाना ठीक भी कहा जा सकता था, किन्तु यात्री वहाँ केवल छाया के लोभ में ही जाते हैं । यदि मेरे पास भी छाया होती तो यात्री लोग मेरे पास ही आया करते इतनी दूर चल कर क्यों जाते । किन्तु मैं ऐसा अभागा हूँ कि मुझे छाया भी नहीं मिल सको जो मैं उसके द्वारा ही यात्रियों का उपकार कर सकता । शाखोटक नाम का एक वृक्ष होता है जो कि रमणीय है प्रायः उगता है और रमशान की अग्नि से उसके लता पल्लव इत्यादि झुलस जाते हैं । (नागेश भट्ट ने इसे भूतों के आवास का वृक्ष लिखा है । वैद्यक निघण्टु में लिखा है कि शाखोट भूतावास वृक्ष होता है जिसके फल पीले होते हैं, छाल कठोर होती है और छाया बहुत थोड़ी होती है । )
यह तो हुई अप्रस्तुत की व्याख्या । यहाँ पर प्रस्तुत यह है कि कोई बहुत ही सज्जन तथा उदार व्यक्ति है जो दान देना चाहता है । किन्तु उस वेचारे के पास ऐसे साधन ही नहीं हैं कि याचक उसके पास आया करें । उसी के पड़ोस में एक दूसरें महाशय रहते हैं जो वस्तुतः बड़ी ही नीच प्रकृति के हैं, किन्तु परमात्मा ने उसे ऐसा दिया है, अतः वह सभी लोगों से घिरा रहता है, यद्यपि वह दान किसी को नहीं देता, केवल लोगों को दुराशामात्र है जिससे सभी लोग उसके पास आते रहते हैं । यह कथन उस निर्धन किन्तु सज्जन व्यक्ति का विलाप है । यही तात्पयरूप वाच्यार्थ है । यहाँ पर वाच्यार्थ में वृक्ष के साथ उत्तर-प्रत्युत्तर किया गया है जो कि असम्भव है । क्योंकि वृक्ष किसी से बातचीत नहीं
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नाट्यन्तामिति । वाच्यभावनियमो नास्ति नास्तीति न शक्यं वक्तुम्; व्यङ्गचस्यापि भावादिति तत्पर्यम् । तथा हि उत्पथजाताया इति न तथा कुलोळद्वायाः । अशोभना दिवक्षपरिपूर्णतया सम्वन्धिवर्गोपरिपोषिता वा परिष्क्ष्यते । वदर्या वृत्ति ददत् पामर भोः, हसिष्यसे सर्वलोकैरिति भावः । एवमप्रस्तुतप्रशंसा प्रशंसतो निरूप्य प्रकृतमेव यत्रिरूपणीयं तदुपसंहरति—तस्मादिति । अप्रस्तुतप्रशंसायामपि लावण्येत्यत्र श्लोके यद्याप्यमोहो लोकस्य दृश्यततो हेतोरित्यर्थः ॥ ४० ॥
लोचन नाट्यन्तामिति । वाच्यभावनियमो नास्ति नास्तीति न शक्यं वक्तुम्; व्यङ्गचस्यापि भावादिति तत्पर्यम् । तथा हि उत्पथजाताया इति न तथा कुलोळद्वायाः । अशोभना दिवक्षपरिपूर्णतया सम्वन्धिवर्गोपरिपोषिता वा परिष्क्ष्यते । वदर्या वृत्ति ददत् पामर भोः, हसिष्यसे सर्वलोकैरिति भावः । एवमप्रस्तुतप्रशंसा प्रशंसतो निरूप्य प्रकृतमेव यत्रिरूपणीयं तदुपसंहरति—तस्मादिति । अप्रस्तुतप्रशंसायामपि लावण्येत्यत्र श्लोके यद्याप्यमोहो लोकस्य दृश्यततो हेतोरित्यर्थः ॥ ४० ॥ 'नाट्यन्त' यह । तत्पर्य यह है कि वाच्य भाव का नियम नहीं होता ( और ) नहों होता यह नहीं कहा जा सकता क्योंकि व्यङ्गचकी भी सत्ता होती है । वह इस प्रकार—‘उत्पथ में उत्पन्न हुई' अर्थात् उस प्रकार के ( अपने समान ) वंश मे उत्पन्न नहीं हुई । 'अशोभन' अर्थात् लावण्य रहित । 'फल, पुष्प, पत्र रहित अर्थात् इस प्रकार की भी कोई पुत्रिणी अथवा भाइए इत्यादि पत्त्त्र से परिपूर्ण होने के कारण सम्बन्धित वर्ग से परिपोषित की रक्षा की जाती है। भाव यह है कि अरे वेढी की वेड़ी लगानेवाले पामर ? तुम सत्र लोगों के द्वारा हँसे जाओगे । इस प्रकार प्रशंसावश अप्रस्तुतप्रशंसा का निरूपण कर प्रकृत में ही जिसका निरूपण करना है उसका उपसंहार कर रहे हैं—‘इससे' यह । अर्थात् अप्रस्तुतप्रशंसा में भो लोक जा जो व्यामोह देखा गया है उस हेतु मे ॥ ४० ॥
तारावती अतः यह अविवक्षितवाच्यमूलक अप्रस्तुतप्रशंसा है । यहाँ पर समृद्ध असत्पुरुषका निकटवर्ती होना अप्रस्तुतप्रशंसा में हेतु है । यहाँ पर 'समृद्धासत्पुरुष' यह पाठ ठीक है । कहाँ कहाँ 'समृद्धसत्पुरुष' यह पाठ होता है । वहाँ भो आशय वही है । वहाँ अर्थ इस प्रकार करना होगा—जो समृद्ध होने से अर्थात् समृद्धि या सम्पत्तिमात्र से सत्पुरुष है, अन्यथा तो वह असत्पुरुष हो है । अप्रस्तुतप्रशंसा का तीसरा प्रकार वह होता है जिसमें वाच्य का कुछ अंश विवक्षित हो और कुछ अविवक्षित । इसके उदाहरण के रूप में एक प्राकृत गाथा उद्धृत की गई है । जिसकी संस्कृत छाया यह होगी— उत्पथजाताया अशोभनाया फलकुसुमपत्ररहिताया: । वदर्या वृत्ति ददत् पामर भो अवहसिष्यसे ॥ कोई व्यक्ति किसी कुरूप तथा निम्नवंशोत्पन्न स्त्री को प्रयत्नपूर्वक पदें में रखने और उसकी रक्षा करने के लिए चेष्टा कर रहा है कि कहीं कोई उसका शील भङ्ग न कर दे । उसे सुनाकर कोई दूसरा कह रहा है :-
उत्पथजाताया अशोभनाया। फलकुसुमपत्ररहिताया: । वदर्या वृत्ति ददत् पामर भो अवहसिष्यसे ॥
उत्पथजाताया अशोभनाया। फलकुसुमपत्ररहिताया: । वदर्या वृत्ति ददत् पामर भो अवहसिष्यसे ॥
उत्पथजाताया अशोभनाया। फलकुसुमपत्ररहिताया: । वदर्या वृत्ति ददत् पामर भो अवहसिष्यसे ॥
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'तुम बड़े मूर्ख हो जो कि बेरी के चारों ओर बाड़ी लगाने की चेष्टा कर रहे हो जो मार्ग से हटकर बुरे स्थान पर उगी हुई है। कोई सुन्दर वृक्ष नहीं है और न तो उसमें फल ही आते हैं और न कुसुम पत्र इत्यादि ही उत्पन्न होते हैं। लोग जब तुम्हें ऐसी बेरी के चारों ओर बाड़ी लगाते हुए देखेंगे तो तुम्हारी हंसी ही उड़ाएँगे।'
यहाँ पर बेरीपरक अर्थ अप्रस्तुत है और उससे इस प्रस्तुत अर्थ की प्रतीति होती है कि जिस रमणी की रक्षा करने के लिए तुम इतने प्रयत्नवान हो वह न तो किसी अच्छे कुलमें उत्पन्न हुई है ( उत्पथजाताया: ) न देखने में सुन्दर तथा लावण्ययुक्त है ( अशोभनाया: ) तथा न तो उसके सन्तान ही होती है और न उसके भाई इत्यादि कुटुम्बियों का वर्ग ही है जिसने उसका प्रेमपूर्वक पालन-पोषण किया हो ( फलकुसुमपत्ररहिताया: ) आशय यह है कि ऐसी स्त्री की सुरक्षा का ध्यान रखना उचित भी कहा जा सकता है चाहे सुन्दर न हो किन्तु अच्छे वंश में उत्पन्न हुई हो और अपने भाई विरादरों में प्रेमपूर्वक पालन पोषण पाया हो। जहाँ यह भी न हो वहाँ तो किसी रमणी के सुरक्षित रखने की चेष्टा हास्यास्पद हो होती है। यहाँ पर वाच्यार्थ न तो बिल्कुल सम्भव है और न असम्भव । क्योंकि यहाँ व्यङ्ग्यार्थ की सत्ता भी विद्यमान है। ( यहाँ पर न तो यह उदाहरण ही स्पष्ट है और न लोचन में की हुई व्याख्या ही ठीक प्रतीत हो रही है। यह उदाहरण इस बात का दिया गया है कि कहीं कहीं जिस अंश में अप्रस्तुत वाच्य के माध्यमसे प्रस्तुत की प्रतीति कराई जाती है वह अप्रस्तुत एक अंश में विवक्षित होता है और दूसरे अंश में अविवक्षित । बेरी की बाड़ लगाने में क्या अविवक्षित है और क्या विवक्षित यह समझ में नहीं आता। लोचन में इसकी व्याख्या इस प्रकार की गई है कि 'वाच्य होने का नियम नहीं है और न हो यह भी नहीं कहा जा सकता क्योंकि व्यङ्ग्य की सत्ता भी यहाँ विद्यमान है।' सम्भवतः: लोचनकार का आशय यह है कि बेरी में बाड़ कोई नहीं लगाता क्योंकि यह कार्य अनुचित है, अतः यह वाच्य अविवक्षित है। किन्तु व्यङ्ग्य कुरूप नायिका की रक्षा की जाती है अतः यह विवक्षित है। यही व्याख्या दीक्षिति में कर दी गई है। किन्तु यहाँ आपत्ति यह है कि व्यङ्ग्य तो प्रस्तुत होता है और वह सर्वत्र विवक्षित ही होता है। यदि व्यङ्ग्यार्थ अविवक्षित होगा तो बात कहाँ जायगी और पर्यवसान कहाँ होगा? 'कस्स्व मोः कथयामि' इस पद्य में भी जो कि अविवक्षितवाच्य का उदाहरण दिया गया है वाच्यार्थ वृक्ष का उत्तर-प्रत्युत्तर ही अविवक्षित है। किसी निर्गुण का वैराग्य तो विवक्षित
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ही है । अतः वाच्यार्थ को लेकर उसके एक अंश को अविवक्षित कहना ठीक नहीं है । दूसरो बात यह है 'विवक्षिताविवक्षितवाच्य' इस नामकरण से ही ज्ञात होता है कि वाच्यार्थ के ही विवक्षित और अविवक्षित होनेपर विचार किया जाना चाहिये । तब वाच्य की बौडी लगाने में क्या असम्भव है ? क्या उसमें फल इत्यादि नहीं होते ? अतः उदाहरण ठीक नहीं जँचता । विवक्षिताविवक्षित वाच्य का ठीक उदाहरण विहारी का यह दोहा हो सकता है—
दिन दस आदरु पाइकै करि लै आपु बखानु । जौ लगि काग सराध पल्ख तौ लगि तो सनमानु ॥
यहाँ पर कौवे का आदर और श्राद्धपक्ष भर सम्मान विवक्षित है । किन्तु कौवा स्वयं अपना बखान नहीं कर सकता, अतः यह अंश अविवक्षित है ।
ऊपर प्रसंगवश अप्रस्तुतप्रशंसा का निरूपण किया गया । इस निरूपण का मन्तव्य यही दिखलाना था कि अप्रस्तुतप्रशंसा केवल वहीं नहीं होती जहाँ वाच्य असङ्गत तथा अविवक्षित हो । यह वहाँ पर भी हो सकती है जहाँ वाच्य सङ्गत अथवा अर्धसङ्गत हो । ऐसा मान लेनेपर 'लावण्यद्रविणगव्यो न गण्यत:' इत्यादि में अप्रस्तुतप्रशंसा के होने सकने में कोई आपत्ति नहीं उठाईँ जा सकती । किन्तु इस पद्य में ( लावण्यद्रविणगव्यो न गण्यत:' इत्यादि में ) अप्रस्तुतप्रशंसा को न समझकर कुछ लोगों ने व्याजस्तुति बतला दी है । इस भ्रम का एकमात्र कारण यही है कि इस बात का ठीक-ठीक विवेचन नहीं किया जा सका है कि प्रधानता किस तत्त्व की है । यदि प्रधानता और अप्रधानता पर ठीक ध्यान न दिया जाय तो साहित्यसमोक्षा के क्षेत्र में बहुत अधिक गुत्थियाँ हो जाना सम्भव है । अतः इस दिशामें आलोचक को विशेष जागरूक रहने की आवश्यकता है जिससे साहित्य का ठीक अभिप्राय समझा जा सके । यहीँ इस प्रकरण का सार है ॥ ४० ॥
ऊपर व्यङ्गच्य के स्वरूप का भी निरूपण कर दिया गया और यह भी बतला दिया गया कि व्यङ्गच्यार्थ की विभिन्न परिस्थितियों में काव्य का कौन सा रूप कहा जा सकता है । अब यहाँ प्रश्न उपस्थित होता है कि क्या काव्य में कुछ ऐसे स्थल होते हैं या नहीं जहाँ व्यङ्गच्यार्थ बिल्कुल ही न हो ? यदि ऐसे स्थल होते हैं तो वहाँ पर क्या व्यवस्था होती है ? उस काव्य का क्या नाम रखा जाता है ? इस प्रश्न का उत्तर ४१ वीं और ४२ वीं कारिकाओं में दिया गया है । इन कारिकाओं का आशय यह है कि—'काव्य के उन दो प्रकारों के
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प्रधानगुणभावाभ्यां व्यङ्ग्यस्यैवं व्यवस्थिते । उभे काव्ये ततोऽन्यद्यच्चित्रमभिधीयते ॥८१॥ चित्रं शब्दार्थभेदेन द्विविधं च व्यवस्थितम् । तत्र किञ्चिच्छब्दचित्रं वाच्यचित्रमतः परम् ॥८२॥
व्यङ्ग्यस्यार्थस्य प्राधान्ये ध्वनिरिसंज्ञितकाव्यप्रकारः गुणभावे तु गुणीभूतव्यङ्ग्यता । ततोन्यद्रसभावादि तात्पर्येरहितं व्यङ्ग्यार्थविशेषप्रकाशनशक्तिशून्यं झझ्यता । च काव्यं केवलवाच्यवाचकवैचित्र्यमात्राश्रयेपणिबद्धमालेख्यप्रख्यं यदाभासते तच्चित्रम् । न तन्मुख्यं काव्यम् । काव्यानुकारो ह्यसौ । तत्र किञ्चिच्छब्दचित्रं वाच्यचित्रं ततः शब्दचित्रादन्यद्वयङ्ग्यार्थसंस्पर्शेरहितं यथा दुष्करयमकादि । प्राधान्येन वाक्यार्थतया स्थितं रसादितात्पर्येरहितमुपेक्ष्यादि । (अनु०) ‘व्यङ्ग्य के प्रधान तथा गुणीभाव के द्वारा दो काव्य इस प्रकार व्यवस्थित हैं । उन दोनों से जो भिन्न है वह चित्रकाव्य कहा जाता है ॥ ८१ ॥’ ‘शब्द अर्थ के भेद से चित्रकाव्य दो प्रकार से व्यवस्थित होता है । उसमें कुछ शब्दचित्र होता है और उससे भिन्न वाच्यचित्र होता है ॥ ८२ ॥’ व्यङ्ग्यार्थ के प्राधान्य में ‘ध्वनि’ नाम का काव्यप्रकार होता है और गुणीभाव में तो गुणीभूतव्यङ्ग्यता होती है । उनसे भिन्न रसभावादि रहित तथा विशेष प्रकार के व्यङ्ग्यार्थ के प्रकाशन की शक्ति से शून्य केवल वाच्यवाचकवैचित्र्यमात्र के आश्रय से उपनिबद्ध होकर आलेख्य के समान जो आभासित होता है उसे चित्र कहते हैं । वह मुख्य काव्य नहीं होता । वह निस्सन्देह काव्य का अनुकरण होता है । उसमें कुछ शब्दचित्र होता है जैसे दुष्करयमक इत्यादि । उस शब्दचित्र से भिन्न वाच्यचित्र होता है ( जैसे ) व्यङ्ग्यवाच्यार्थसंस्पर्श से रहित और रसादितात्पर्य से रहित वाक्यार्थ के रूप में स्थित उपेक्षा इत्यादि ।
एवं व्यङ्ग्यस्वरूपं निरूप्य सर्वथा यत्तच्च्युतं तत् तु का वातेति निरूपयितुमाह— प्रधानेत्यादिना । कारिकाद्वयेन । शब्दचित्रामिति । यमकचक्रमध्यादि चित्रतया प्रसिद्धमेव ततुल्यमेवार्थचित्रं मन्तव्यमितिभावः । आलेख्यप्रख्यमिति रसादिजीवरहितं मुख्यप्रतिरूपतिरूपं चेत्यर्थः ।
इस प्रकार व्यङ्ग्य के स्वरूप का निरुपणकर जो सर्वथा उससे शून्य होता है उसमें क्या बात होती है ? यह निरुपण करने के लिये कह रहे हैं-‘प्रधान’ इत्यादि । दो कारिकाओं के द्वारा । ‘शब्दचित्रामिति’ । भाव यह है कि यमक चक्र इत्यादि चित्र के रूप में प्रसिद्ध ही हैं; उन्हीं के समान अर्थचित्र भी माना जाना चाहिये । ‘आलेख्य के समान’ अर्थात् रस इत्यादि जीवनरहित और मुख्य प्रतिकृतिरूप ।
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व्यवस्थित होने की व्याख्या की जा चुकी जहाँ व्यंग्यार्थ प्रधान या गुणीभूत होता है। जो काव्य इन दोनों विधाओं में अन्तभूत नहीं होता अर्थात् जहाँ व्यंग्यार्थ होता ही नहीं उस काव्य को चित्र-काव्य कहते हैं। इस चित्र काव्य के भी दो भेद होते हैं—शब्दचित्र और अर्थचित्र । कहाँ शब्दचित्र होता है और कहाँ अर्थचित्र।
इन कारिकाओं का आशय यह है कि जहाँ व्यंग्य अर्थ की प्रधानता होती है उस काव्यप्रकार को ध्वनि कहते हैं और जहाँ व्यंग्यार्थ गौण होता है उसे गुणीभूत व्यंग्य कहते हैं। उनसे भिन्न ऐसा भी काव्य हो सकता है जिसमें न तो रस इत्यादि की तात्पर्यरूप में व्यंजना हो रही हो और न अन्य किसी प्रकार की वस्तु अथवा अलंकार की व्यंजना ही विद्यमान हो। उसमें या तो केवल वाच्य का वैचित्र्य हो या केवल वाचक का वैचित्र्य हो और उसी वैचित्र्य को लक्ष्य बनाकर काव्यरचना की गई हो। इस प्रकार के काव्य को चित्रकाव्य कहते हैं। इसके नामकरण का कारण यह है कि जिस प्रकार किसी वस्तु का चित्र बनाया जाता है, उसमें मुख्य वस्तु के समस्त अवयव और समस्त वाङ्मयाकृति दृश्यमान होती है। केवल एक वस्तु की कमी होती है और वह है जीवन। इसी प्रकार जिस काव्य में काव्य के सारे तत्व शब्द, अर्थ उनका वैचित्र्य इत्यादि तो विद्यमान होते हैं किन्तु काव्य-जीवन रस इत्यादि विद्यमान नहीं होता उसे चित्रकाव्य कहते हैं। वह मुख्यकाव्य की कोटि में नहीं आता अपितु काव्य का अनुकरण मात्र कहा जाता है। उसमें केवल मुख्य की प्रतिकृति होता है। यह चित्रकाव्य दो प्रकार का होता है एक तो शब्दचित्र और दूसरा अर्थचित्र। शब्दचित्र में ऐसे यमक सन्निविष्ट होते हैं जिनकी संघटना दुष्कर होती है। (कुछ यमक तो ऐसे होते हैं जो स्वाभाविक रूप में ही कविवाणी में स्फुरित होते चले जाते हैं उनसे रस परिपोष ही होता है। इसके प्रतिकूल कुछ यमक प्रयत्नपूर्वक लाये जाते हैं वे यमक चित्र-काव्य की ही कोटि में आते हैं। उदाहरण के लिये रघुवंश के नवें सर्ग में और शिशुपाल वध के छठे सर्ग में प्रयत्नपूर्वक दुतविलम्बित के तीसरे पाद में यमक लाने की चेष्टा की गई है।) इसी प्रकार चक्रबन्ध, मुरजबन्ध, गोमूत्रिका बन्ध इत्यादि में भी यही चित्रकाव्यता होती है। (इस प्रकार के पद्य शिशुपालवध के १९ वें सर्ग में और किरातार्जुनीय के १५ वें सर्ग में बहुलायत से आये हैं। इन सर्गों का विषय चित्रयुद्धवर्णन कहलाता ही है।) यह तो सब वाचक चित्र (शब्दचित्र) हुआ। वाच्यचित्र ऐसी उत्प्रेक्षा इत्यादि को कहते हैं जो शब्दचित्र से भिन्न होता है, जिसमें व्यंग्यार्थ का संस्पर्श नहीं होता; जिसमें रस इत्यादि का तात्पर्य भी नहीं होता और मुख्यवाच्यार्थ के रूप में उत्प्रेक्षा इत्यादि की ही स्थिति होती है।
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अथ किमिदं चित्रं नाम ? यत्र न प्रतीममानार्थसंस्पर्शः । प्रतीममानो ह्यर्थ-विभेदः प्राकप्रदर्शितः । तत् यत्र वस्त्वलङ्कारान्तरं वा अलङ्गयं नास्ति स नाम-चित्रस्य कल्प्यतां विषयः । यत्र तु रसादीनामविषयत्वं स काव्यप्रकारो न सम्भवेत्यव । यस्मादवस्तुसंस्पर्शिता काव्यस्य नोपपद्यते । वस्तु च सर्वमेव जगद्गतंवस्त्वश्रयं कस्मादचित्रत्स्य भावस्य वाङ्लत्वं प्रतिपच्यते अनन्तो विभावत्वेन । चित्त-वृत्तिविशेषा हि रसादयः, न च तद्रूप्ति वस्तु किचिद्रिय चित्तवृत्तिविषयतैव तस्य न स्यात् कविविषयत्वं चित्रतया कचिद्रुप्यते ।
अनु० अच्छा यह चित्र क्या वस्तु है ? यही न कि जहाँ प्रतीममान अर्थ का संस्पर्श न हो । निस्सन्देह पहले तीन भेदोंवाला प्रतीममान अर्थ पहले दिखलाया गया है । उसमें जहाँ पर कोई दूसरी वस्तु या दूसरा अलङ्कार व्यंग्य नहीं होता वह चित्रकाव्य का विषय कल्पित कर लिया जाय । जहाँ तो रस इत्यादि की अविषयता होतो है वह काव्यप्रकार सम्भव ही नहीं होता है क्योंकि किसी वस्तु का संस्पर्श न करना काव्य के लिये सम्भव ही नहीं होता । सभी संशार में विद्यमान वस्तु अवश्य ही किसी रस या भाव की अंगता को प्राप्त हो जाती है क्योंकि अन्ततः विभावरूप ही होती है । रस इत्यादि तो चित्तवृत्तिविशेषरूप ही होते हैं । ऐसी कोई वस्तु नहीं होती जो विशेष प्रकार की चित्तवृत्ति को उत्पन्न न करे । उसके उत्पादन न करने पर उसकी कविविषयता ही सिद्ध न हो और कोई कवि-विषय ही चित्र के रूप में निरूपित किया जाता है ।
‘अथ किमिदम्’ इति भाच्चेपे वाक्यमाण आश्रयः । अन्रोच्तरम्—यत्र नेति । भाच्चेप-स्वामिप्रायं दर्शंयति-प्रतीममान इति । अवस्तुसंस्पर्शितेति । कचटतपादिवन्निरर्थकत्वं दर्शादिड्भादिवदवदसंबद्धार्थत्वं चेत्यर्थः । ननु माभूत्कविविषय इत्याशाङ्क्याह—कवि-विपयश्र्वेति । काव्यरूपतया यद्यपि न निर्देशस्तस्थापि कविगोचरीकृत एवासौ वक्क्वय
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अत्रोच्यते—सत्यं न ताहक्वाल्यप्रकारोऽस्ति यत्र रसादीनामप्रतीति: । किन्तु यदा रसभावादिविवक्षाशून्य: कवि: शब्दालङ्कारमर्थालङ्कारं वोपनिवन्धति तदा तद्विवक्षापेक्षया रसादिशून्यतार्थस्य परिकल्प्यते । विवक्षापारूढ एव हि काव्ये शब्दानामर्थ: । वाच्यसमाध्यवसानेऽपि कविविवक्षा विषयेऽपि तथाविधे विषये रसादि प्रतीतिरभवंती परिदृश्यते । नीरसत्वं परिकलप्य चित्रविषयो व्यवस्थाप्यते ।
यहाँ पर कहा जा रहा है—सचमुच उस प्रकार का काव्य प्रकार नहीं होता जहाँ रस इत्यादि की प्रतीति न हो । किन्तु जब रस, भाव इत्यादि की विवक्षा से रहित कवि शब्दालंकार अथवा अर्थालङ्कार का उपनिबन्ध करता है तब उसकी विवक्षा की अपेक्षा करते हुये अर्थ की रस इत्यादि से शून्यता कल्पित की जाती है । काव्य में शब्दों का अर्थ निस्सन्देह विवक्षा में उपरूढ ही होता है । कवि की विवक्षा के न होते हुये भी उस प्रकार के विषय में ही होनेवाली रस की प्रतीति अत्यन्त दुर्बल हो जाती है इस प्रकार से भी नीरसत्व की कल्पना करके चित्रविषय की व्यवस्था कर दी जाती है ।
तारावती
का अन्तिम पर्यवसान तो विभाव के रूप में ही होता है । आशय यह है कि संसार की प्रत्येक वस्तु विभावरूपता में परिणत होती है और उस रूप में वह किसी न किसी भाव या रस की या उद्दीपनिका होती है या उद्दीपिका । ऐसी दशा में रस या भाव से शून्य तो कोई वस्तु हो ही नहीं सकती । रस इत्यादि वस्तुतः है क्या वस्तु ? विशेषप्रकार की चित्रवृत्ति ही तो रस कहलाती है । ऐसी कोई वस्तु संसार में होती ही नहीं जो किसी न किसी विशेष प्रकार की चित्रवृत्ति को उत्पन्न न करे । बिना वस्तु के काव्य नहीं हो सकता । अतः प्रत्येक काव्य रस या भाव के बिना सम्भव ही नहीं है । यदि आप किसी ऐसी वस्तु की कल्पना कर लें जो चित्तवृत्ति के उत्पादन की क्षमता न रखती हो तो वह कवि का विषय ही नहीं बन सकती । यदि कहो कि कविषय न रहने में क्या हानि हो जायगी तो मेरा निवेदन है जिसे आप चित्रकाव्य के रूप में स्वीकार करना चाहते हैं वह भी तो कविषय ही है । यदि कवि ही उसे नहीं अपना विषय बनायेगा तो वह चित्रकाव्य की संज्ञा ही कैसे प्राप्त कर सकेगा ?
का अन्तिम पर्यवसान तो विभाव के रूप में ही होता है । आशय यह है कि संसार की प्रत्येक वस्तु विभावरूपता में परिणत होती है और उस रूप में वह किसी न किसी भाव या रस की या उद्दीपनिका होती है या उद्दीपिका । ऐसी दशा में रस या भाव से शून्य तो कोई वस्तु हो ही नहीं सकती । रस इत्यादि वस्तुतः है क्या वस्तु ? विशेषप्रकार की चित्रवृत्ति ही तो रस कहलाती है । ऐसी कोई वस्तु संसार में होती ही नहीं जो किसी न किसी विशेष प्रकार की चित्रवृत्ति को उत्पन्न न करे । बिना वस्तु के काव्य नहीं हो सकता । अतः प्रत्येक काव्य रस या भाव के बिना सम्भव ही नहीं है । यदि आप किसी ऐसी वस्तु की कल्पना कर लें जो चित्तवृत्ति के उत्पादन की क्षमता न रखती हो तो वह कवि का विषय ही नहीं बन सकती । यदि कहो कि कविषय न रहने में क्या हानि हो जायगी तो मेरा निवेदन है जिसे आप चित्रकाव्य के रूप में स्वीकार करना चाहते हैं वह भी तो कविषय ही है । यदि कवि ही उसे नहीं अपना विषय बनायेगा तो वह चित्रकाव्य की संज्ञा ही कैसे प्राप्त कर सकेगा ?
चाहे आप उसे काव्यरूप में स्वीकार न करें किन्तु कवि का विषय तो वह होगा ही । क्योंकि यहाँ पर जो कुछ लिखा जा रहा है वह कविता के विषय में ही लिखा जा रहा है, कोई मनमानी बात तो लिखी नहीं जा रही है । यदि कविषय के अतिरिक्त मनमाने ढंग से यहाँ चाहे जो कुछ भी लिख दिया जाय तो वह काव्य की संज्ञा ही कैसे प्राप्त कर सकेगा ?
चाहे आप उसे काव्यरूप में स्वीकार न करें किन्तु कवि का विषय तो वह होगा ही । क्योंकि यहाँ पर जो कुछ लिखा जा रहा है वह कविता के विषय में ही लिखा जा रहा है, कोई मनमानी बात तो लिखी नहीं जा रही है । यदि कविषय के अतिरिक्त मनमाने ढंग से यहाँ चाहे जो कुछ भी लिख दिया जाय तो वह काव्य की संज्ञा ही कैसे प्राप्त कर सकेगा ?
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विवक्षा त्वरत्वेन नाङ्गीकृत्य कथंचन । इत्यादियोंडलङ्कारनिवेशने समीक्षाप्रकार उत्तर्स्तं यदा नानुसरतीत्यर्थः । रसादि-शून्यतामति । नैव तत्र रसादितात्पर्याभिनिर्वृत्तौ यथा पकान्नभिसंस्कारविनिर्वृत्ते मांसपाकविशेषे । न तु वस्तुसौन्दर्यादवश्यं भवति कदाचिच्छास्त्रादौ कुशलकृतयामपि शिखरिण्यामिवे-त्याद्राक्षयाह—यच्येत्यादि । अननेनापीति । पूर्वं सर्वथा तच्च्छून्यत्वमुक्तमधुना तु दौर्बल्यमित्यपिशब्दस्यार्थः । अजकृत्यां च शिखरिण्यामहोद्रिखरिण्योति न तज्ज्ञानाच्च-मकारः अपि तु दधिगुडमरिचं चैतदसमक्षसयोजितमितिवक्तारो मनन्ति ।
'किन्तु' यह । अर्थात् 'तत्परक रूपमें विवक्षा (होनी चहिये) अङ्गी के रूप में कैसे भी नहीं ।' इत्यादि जो समीक्षा प्रकार अलङ्कार के निवेशन के विषय में वतलाया गया है उसका अनुसरण जब नहीं करता । 'रस इत्यादि से शून्यता' यह । वहाँ पर रस की प्रतीति नहीं होती जैसे पाक में अनभिज्ञ रसोइया के बनाये हुए विशेष प्रकार के मांस पाक में । (प्रश्न) वस्तु के सौन्दर्य से कदाचित् वहाँ आस्वाद अवश्य आ जाता है । जैसे अकुशल की बनाई हुई शिखरिणी में । यह शङ्का करके कहते हैं—'वाच्य' इत्यादि । 'इसके द्वारा भी' यह । यहाँ 'भी' का अर्थ है—पहले तो सर्वथा उसकी शून्यता वतलाई गई थी, अब उसका दौर्बल्य वतलाया गया है । अज्ञ की बनाई हुई शिखरिणी में 'आश्चर्य है शिखरिणी पर' यह उसके ज्ञान से चमत्कार नहीं होता; अपितु लोग यह कहने लगते हैं कि यह दधि गुड़ और मरिच वेमेल रूप में मिलाई गई हैं ।
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जो कहा जाने लगेगा तो वह सब उसी प्रकार अप्रयोजनीय होगा जिस प्रकार वासुकि की कथा लिखी जाने लगे । इस सबका निष्कृष्टार्थ यही है कि काव्य से अर्थबोध अवश्य होना चाहिये, अर्थ बोध से कोई वस्तु ही अवगत होगी । वस्तु सर्वदा भावरूप ही होती है जो किसी न किसी भाव को जागृत अवश्य करती है । अतः यदि चित्रकाव्य की वस्तु कवि की विषयगोचर है तो उससे प्रीति का जनन अवश्य होना चाहिये । अतः प्रत्येक वस्तु का पर्यवसान विभाव, अनुभाव या संचारिभाव में ही होता है । इस प्रकार आप यह कदापि नहीं कह सकते कि चित्रकाव्य रस से भी रहित होता है ।
इस विषय में उत्तर दिया जा रहा है—यह तो ठीक ही है कि कोई काव्य ऐसा नहीं होता जिसमें रस इत्यादि की प्रतीति न होती हो । वस्तुतः
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कवि का लक्ष्य रसनिष्पत्ति ही होना चाहिये । यदि कवि अलङ्कार योजना भी करता है तो भी उसका लक्ष्य रस ही होना चाहिये । यह पहले ही बतलाया जा चुका है कि कवि को बहुत ही सावधानी से समीक्षा पूर्वक अलङ्कारों की योजना करनी चाहिये । उस प्रकरण में कहा जा चुका है कि कवि को अलङ्कार-योजना रस-परक रूप में ही करनी चाहिये, कभी भी अङ्गी या प्रधान रूप में नहीं करनी चाहिये । किन्तु कभी कभी कवि असावधानता के कारण इस समीक्षापद्धति की अनजाने अवहेलना कर जाता है । ऐसी दशा में वह ऐसे शब्दालङ्कारों और अर्थालङ्कारों की योजना करता है जिनका मन्तव्य रसनुभूति को तीव्रता प्रदान करना नहीं होता । अतः उन स्थानों पर कवि का अनभिप्रेत होने के कारण रस, भाव इत्यादि की शून्यता की कल्पना कर ली जाती है । कारण यह है कि काव्य में शब्दों का अर्थ इस दृष्टि कोण को लेकर किया जाता है कि कवि का अभिप्रेत विवक्षित अर्थ क्या है? अतः जो कवि अकुशल होते हैं, उनकी कविता प्रायः रसभावादि शून्य हो जाती है । यह इसी प्रकार समझिये जैसे मांस पकाना कुशल रसोइये का काम है । यदि कोई अकुशल रसोइया मांस पकाकर रख देता है तो उसमें मांस का स्वाद नहीं आता । उसमें अनुचित परिमाण में डाले हुये 'मिर्चे मसाले इत्यादि का स्वाद ही आ जाता है । इसी प्रकार काव्य का लक्ष्य रसनिष्पत्ति करना ही है । यदि कोई अकुशल कवि रसनिष्पत्ति के लिये प्रयत्नशील होकर उसमें असफल हो जाता है तब उसमें रस प्रतीति की अनुभूति नहीं होती अपितु अलङ्कारों की ही प्रतीति होकर रह जाती है । उसी को चित्रकाव्य कहते हैं ।
( प्रश्न ) यदि अकुशल रसोइया भी किसी वस्तु को बनाता है तो भी उसमें जो पदार्थ डाले जाते हैं उनकी तो स्वाद ओा ही जाता है । उदाहरण के लिये यदि अकुशल रसोइया भी शिखरन बनायेगा तो उसमें जो चीनी इत्यादि डाली जाएगी उनका तो स्वाद आएगा ही । फिर आप यह कैसे कह सकते हैं कि अकुशल कवि द्वारा की हुई रसनिष्पत्ति में कोई रस आएगा ही नहीं ?
( उत्तर ) यदि कवि को रसनिष्पत्ति अभिप्रेत नहीं भी होगी तब भी वाच्यसामर्थ्य के बल पर उस प्रकार के विषय में यदि रसनिष्पत्ति होगी भी तो भी बहुत ही शिथिल हो जायेगी । यह भी एक दूसरा प्रकार है जिससे उस प्रकार के काव्य की नीरसता की कल्पना कर ली जाती है और उसे चित्रकाव्य की संज्ञा प्रदान कर दी जाती है । इसी प्रकार चित्रकाव्य व्यवस्थित किया जा सकता है । यहाँ पर दो प्रकार से काव्य की नीरसता को कल्पित करके चित्रकाव्य को रसविहीन सिद्ध किया गया है । एक तो मांस के परिपाक के समान बिल्कुल ही स्वाद का अनुभव न होना और
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तदिदमुक्तम्— 'रसभावादिविषयविवक्षाविरहे सति । अलङ्कारनिबन्धो यः स चित्रविषयो मतः ॥ रसादिपु विवक्षा तु स्यात्तात्पर्यावततो यथा । तदा नास्त्येव तत्काव्यं ध्वनेरन्तर न गोचरः ॥'
एतच्चित्रम् कवीना विश्रुत्कलिगिरां रसादितात्पर्यमनपेक्ष्यैव काव्यप्रवृत्तिदर्शनादस्माभिः परिकलिप्यत्म् । इदानीन्तनानां तु न्याय्ये काव्यनयव्यवस्थापन क्रियमाणे नास्त्येव ध्वनिव्यतिरिक्तः काव्यप्रकारः । यतः परिपाकवतां कवीना रसादितात्पर्यविरहे व्यापार एव न शोभते । रसादितात्पर्ये च नास्त्येव तद्रसु यदभिमतरसाद्धता नी यमानं न प्रगुणीभवति । अचेतना अपि हि भाव यथायथमुचितरसविभावतया चेतनवृत्तान्त्योजनया वा न सन्त्येव ते ये यान्ति न रसाद्धताम् ।
(अनु०) यह यहाँ कहा गया है -
'रसभाव इत्यादि के विषय में विवक्षा न होने पर जो अलङ्कार का निबन्ध वह चित्रविषय माना जाता है । जब रस इत्यादि के विषय में तात्पर्यवाली विवक्षा हो तब ऐसा काव्य नहीं ही होता जहाँ ध्वनि का गोचर न हो जाय ।' विश्रुत्कलवाणीवाले कवियों की रसादि तात्पर्य की विना अपेक्षा किये हुये काव्य में प्रवृत्ति देखने से हमने यह चित्र कल्पित कर लिया है । आजकल के कवियों की तो काव्यनय की न्याय्य व्यवस्था करने पर ध्वनिव्यतिरिक्त काव्यप्रकार नहीं ही होता । क्योंकि परिपाकवाले कवियों का रसादितात्पर्य के न होने पर तो व्यापार ही शोभित नहीं होता।
रस इत्यादि के तात्पर्य होने पर तो वह वस्तु नहीं ही होती जो अभिमत रस की अंगता को प्राप्त कराये जाने पर प्रगुण नहीं हो जाती । अचेतनभाव ( पदार्थ ) भी ऐसे नहीं होते जो ठीक-ठीक रस के विभाव होने के कारण अथवा चेतन वृत्तान्त्योजना के कारण रस का अंग नहीं बन जाते ।
तारावती
शिखरन के समान स्वाद का पूरी मात्रा में अनुभव न होना । दूसरी अवस्था में भी नीरसता ही मानी जायेगी क्योंकि यदि किसी के सामने यह शिखरन है यह कहकर उसे परोस दिया जाय तो यह कोई नहीं कहेगा कि 'अहा यह शिखरन कितनी अच्छी है ?' यही सब लोग कहेंगे कि इसमें दही चीनी मिर्च इत्यादि ठीक रूप में नहीं मिलाई गईं है । इस प्रकार उसे नीरस मानकर चित्र काव्य की संज्ञा प्रदान की जा सकती है । यही बात आनन्दवर्धन ने दो कारिकाओं में कही है
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उक्तमिति । मचैवेत्यर्थः । अलङ्काराणां शब्दार्थंगतानां निबन्ध इत्यर्थः । ननु 'तच्चित्रमभिधीयते' इति किमनेनोपदिश्यते । अकाव्यरूपं हि तदितिकथितम् । हेयतया तदुपदिश्यत इति चेत्—घटे कृते कविनं भवतीत्येतदपि वक्तव्यमित्याशङ्क्य कविमिः खलु तत्कृतमतो हेयतयोपदिश्यत इत्येतद्व्यतिरुपर्यति—एतद्व्यादिना । परिपाकवत्-मींति । शब्दार्थविषयो रसौचित्यलक्षणः परिपाको विदिते येषाम् ।
उक्तमिति । मचैवेत्यर्थः । अलङ्कारों का शब्द और अर्थ से संबंध रखनेवाला निबन्ध ही अभीष्ट है । ( प्रश्न ) 'वह चित्रकाव्य कहा जाता है' यह किसलिए कहा गया है ? क्योंकि कहा गया है कि वह तो अकाव्यरूप ही होता है । यदि कहो कि उसका उपदेश हेय के रूप में किया जा रहा है तो यह भी कहना चाहिये कि घड़ा बनाने पर कवि नहीं हो जाता यह शङ्का करके कवियों ने ऐसा किया है; अतः हेय के रूप में उपदेश दिया जाता है यह निरूपण करते हैं—'और यह इत्यादि के द्वारा' । 'परिपाकवाले' यह शब्दार्थविषयक रसौचित्यलक्षणवाला परिपाक जिनका विद्वान है ।
इत्यापि रसौचित्यशरणमेव वक्तव्यमन्यथा निह्नुतुकं स्यात् । 'कहा गया' यहाँ । अर्थात् हमारे ही द्वारा । अलङ्कारों का अर्थात् शब्द और अर्थगत अलङ्कारों का निबन्ध । ( प्रश्न ) उसे चित्र करते हैं इस उपदेश की क्या आवश्यकता ? क्योंकि कहा गया है कि वह तो अकाव्यरूप ही होता है । यदि कहो कि उसका उपदेश हेय के रूप में किया जा रहा है तो यह भी कहना चाहिये कि घड़ा बनाने पर कवि नहीं हो जाता यह शङ्का करके कवियों ने ऐसा किया है; अतः हेय के रूप में उपदेश दिया जाता है यह निरूपण करते हैं—'और यह इत्यादि के द्वारा' । 'परिपाकवाले' यह शब्दार्थविषयक रसौचित्यलक्षणवाला परिपाक जिनका विद्वान है । 'जो पद परिपुष्ट सहिष्णुता को छोड़ ही देते हैं ।' यह भी रसौचित्य को शरण में रखकर ही कहा जाना चाहिये अन्यथा हेतु रहित हो जाय ।
तारावती
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जहाँ कवि को रस या भाव की विवक्षा नहीं होती अर्थात् जहाँ कविता करने में कवि का प्रतिपत्तिनिमित्त रसनिष्पत्ति नहीं होता, किन्तु वह वहाँ पर अलङ्कार का निबन्धन करता है वहाँ काव्य चित्रकाव्य कहा जाता है । इसके प्रतिकूल जहाँ कवि का विवक्षित तात्पर्यार्थ रस इत्यादि ही होता है अर्थात् जहाँ कवि रस को तात्पर्य का विषय बनाता है इस प्रकार का कोई भी काव्य ऐसा नहीं होता जिसे ध्वनि इस नाम से अमिहित न किया जा सके या जो ध्वनि के क्षेत्र में न आ जाय ।'
जहाँ कवि को रस या भाव की विवक्षा नहीं होती अर्थात् जहाँ कविता करने में कवि का प्रतिपत्तिनिमित्त रसनिष्पत्ति नहीं होता, किन्तु वह वहाँ पर अलङ्कार का निबन्धन करता है वहाँ काव्य चित्रकाव्य कहा जाता है । इसके प्रतिकूल जहाँ कवि का विवक्षित तात्पर्यार्थ रस इत्यादि ही होता है अर्थात् जहाँ कवि रस को तात्पर्य का विषय बनाता है इस प्रकार का कोई भी काव्य ऐसा नहीं होता जिसे ध्वनि इस नाम से अमिहित न किया जा सके या जो ध्वनि के क्षेत्र में न आ जाय ।'
जहाँ कवि को रस या भाव की विवक्षा नहीं होती अर्थात् जहाँ कविता करने में कवि का प्रतिपत्तिनिमित्त रसनिष्पत्ति नहीं होता, किन्तु वह वहाँ पर अलङ्कार का निबन्धन करता है वहाँ काव्य चित्रकाव्य कहा जाता है । इसके प्रतिकूल जहाँ कवि का विवक्षित तात्पर्यार्थ रस इत्यादि ही होता है अर्थात् जहाँ कवि रस को तात्पर्य का विषय बनाता है इस प्रकार का कोई भी काव्य ऐसा नहीं होता जिसे ध्वनि इस नाम से अमिहित न किया जा सके या जो ध्वनि के क्षेत्र में न आ जाय ।'
( प्रश्न ) जब रस ही काव्य का जीवन है और उस जीवन से शून्य केवल अलङ्कार के मन्तव्य से लिखा हुआ ध्वनि बाह्य काव्य कभी भी काव्यसञ्ज्ञा का अधिकारी नहीं हो सकता । तब इस चित्रकाव्य के निरूपन से क्या लाभ ? यह तो आप कहते ही हैं कि वह चित्रकाव्य काव्य नहीं होता । यदि कहो कि यहाँ पर चित्रकाव्य का निरूपण इसलिये किया जा रहा है कि कविता करने में उसका परित्याग किया जा सके । यहाँ पर चित्रकाव्य के निरूपण का मन्तव्य यदि यह
( प्रश्न ) जब रस ही काव्य का जीवन है और उस जीवन से शून्य केवल अलङ्कार के मन्तव्य से लिखा हुआ ध्वनि बाह्य काव्य कभी भी काव्यसञ्ज्ञा का अधिकारी नहीं हो सकता । तब इस चित्रकाव्य के निरूपन से क्या लाभ ? यह तो आप कहते ही हैं कि वह चित्रकाव्य काव्य नहीं होता । यदि कहो कि यहाँ पर चित्रकाव्य का निरूपण इसलिये किया जा रहा है कि कविता करने में उसका परित्याग किया जा सके । यहाँ पर चित्रकाव्य के निरूपण का मन्तव्य यदि यह
( प्रश्न ) जब रस ही काव्य का जीवन है और उस जीवन से शून्य केवल अलङ्कार के मन्तव्य से लिखा हुआ ध्वनि बाह्य काव्य कभी भी काव्यसञ्ज्ञा का अधिकारी नहीं हो सकता । तब इस चित्रकाव्य के निरूपन से क्या लाभ ? यह तो आप कहते ही हैं कि वह चित्रकाव्य काव्य नहीं होता । यदि कहो कि यहाँ पर चित्रकाव्य का निरूपण इसलिये किया जा रहा है कि कविता करने में उसका परित्याग किया जा सके । यहाँ पर चित्रकाव्य के निरूपण का मन्तव्य यदि यह
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वतलाना हो है कि वह काव्य नहीं होता तब तो फिर संसार को जितनी वस्तुयें काव्य नहीं होतीं उन सबको गिनाना चाहिये कि ‘घड़ा काव्य नहीं होता ।’ ‘वस्तु काव्य नहीं होता’ इत्यादि । ( उत्तर ) चित्रकाव्य के परिहार का उपदेश यहाँ पर करना इसलिये आवश्यक प्रतीत होता है कि कतिपय कवियों ने काव्य के नाम पर जो रचनायें प्रस्तुत की हैं वे वास्तविक काव्य की सीमा में नहीं आतीं; न उनमें रस है न ध्वनि । अतः उनको काव्य बाह्य करने का उपदेश आवश्यक प्रतीत होता है । हमने प्रायः देखा है कि जो कवि काव्यकला में निष्णात नहीं होते और उनकी वाणी काव्य की व्यवस्थित पद्धति का अनुसरण करने में अक्षम होकर अनियन्त्रित भाव से प्रवृत्त हुआ करती है; वे रस इत्यादि तात्पर्य की परवा नहीं करते यों ही काव्य में प्रवृत्त हो जाते हैं । अतः उन्हीं को लक्ष्य बनाकर हमने ( आनन्दवर्धन ने ) चित्र नामक एक नये प्रकार की कल्पना कर ली है । किन्तु काव्य के इस प्रकार को काव्य की संज्ञा प्रदान करना उचित प्रतीत नहीं होता ।
आजकल काव्य जिस स्थिति पर पहुँच गया है और आजकल के काव्य में जैसी भावात्मक तथा कलात्मक प्रौढ़ता के दर्शन होते हैं उसको देखते हुये यहीं कहना पड़ता है कि यदि आजकल की उचित तथा न्याय सम्मत काव्य नीति की ठीक रूप में व्यवस्थापना की जाय तो ऐसा कोई काव्यप्रकार दृष्टिगत हो नहीं होता जिसको ध्वनि से बाह्य कहा जा सके । क्योंकि कवि कहलाने का अधिकारी वही व्यक्ति हो सकता है जिसकी वाणी परिपाक को प्राप्त हो गई हो । परिपाक का अर्थ यही है कि वाणी में शब्द और अर्थ ठीक रूप में स्फुरित होने लगे और वे शब्द तथा अर्थ ऐसे ही हों जिनमें रसानुकूल औचित्य का सर्वथा पालन किया गया हो । जबतक रसानुकूल शब्द और अर्थ अनायास ही स्फुरित नहीं होने लगते तबतक यह नहीं कहा जा सकता कि कवि को काव्य परिपाक प्राप्त हो गया है । पद परिपाक की परिभाषा इस प्रकार की गई है—
‘यत्पदानि त्यजन्त्येव परित्रुतिसहिष्णुताम् । तं शब्दन्यासनिष्णाताः शब्दपाकं प्रचक्षते ॥’
अर्थात् कवि जिन शब्दों का प्रयोग करता है यदि उन शब्दों को बदल कर उनके स्थान में दूसरे पर्यायवाचक शब्दों को रख देने से काव्य सौन्दर्य नष्ट हो जाय तथा कवि के प्रयोग किये हुये शब्दों को बदलना असम्भव हो तो शब्द प्रयोग में निपुण लोग उसे शब्दपाक कहते हैं । यहां पर भी शब्दों के न बदले जा सकने का आशय यही लगाया जाना चाहिये कि शब्दों के बदल देने से ‘रस’ में कमी नहीं आनी चाहिये । यदि रस
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तथा चेदमुच्यते– अपारे काव्यसंसारे कविरेकः प्रजापति: । यथास्मै रोचते विश्वं तथेदं परिवर्तते ॥ श्रृङ्गारादि कवीनां च काव्ये जाति रसात्मक जगत् । स एव वीतरागश्चेत् रीरसः सर्वमेव तत् ॥ भावानचेतनानपि चेतनवच्चेतनाच्चेतनवत् । व्यवहारयति यथेष्टं सुकवि: काव्ये स्वतन्त्रतया ॥
(अनु०) और इस प्रकार यह कहा जाता है— 'अपार काव्य-संसारमें कवि ही प्रजापति है । जैसा विश्व इसे अच्छा लगता है वैसा ही हो जाता है। यदि काव्य में कवि श्रृङ्गारी हो तो जगत् रसमय हो जाता है; वही यदि वीतराग हो तो वह सब नीरस ही होता है ॥ सुकवि काव्य में स्वतन्त्रतारूप में अचेतनभावों का चेतन के समान और चेतनों का अचेतन के समान व्यवहार करता है ॥'
की दृष्टि से ही शब्द और अर्थ के परिपाक पर विचार नहीं किया जायगा तो शब्दों के न बदल सकने का हेतु ही क्या रह जायगा । आशय यह है कि कवि की ऐसी कोई क्रिया सम्भव ही नहीं है जिसमें रस इत्यादि के तात्पर्य का अभाव हो । यदि ऐसी कोई क्रिया दिखलाई पड़े तो वह न तो शोभित ही होगी और न काव्य का नाम ही ग्रहण कर सकेगी । जब इतनी बात स्वीकार कर लो और यह मान लिया कि काव्य में सर्वत्र रस इत्यादि ही तात्पर्य रूप में स्थित होते हैं तब ऐसी कोई वस्तु ही शोभ नहीं रह जाती जिसे रस का अङ्ग बना देने से उसमें परमरमणीयता न आ जाय और उसके रमणीयतारूप गुण में अभिवृद्धि न हो जाय । ( प्रश्न ) रस तो चेतनगत ही होता है । काव्य का विषय अचेतन भी बनता ही है । कवि लोग प्रकृति इत्यादि का वर्णन करते ही हैं; फिर आप यह कैसे कह सकते हैं कि सर्वत्र कवि का अभिप्राय रस ही होता है ? ( उत्तर ) काव्य में अचेतन पदार्थों का समावेश दो ही रूपों में होता है—या तो किसी मानव भाव के उद्दोपन के रूप में या स्वयं आलम्बन होकर वर्ण्य विषय के रूप में । जहाँ कहीं मानवभाव के उद्दोपन के रूप में प्रकृति का उपादान होता है वहाँ तो प्रकृति अथवा अचेतन पदार्थ का वर्णन रसप्रवण होता ही है क्योंकि वहाँ पर अचेतन पदार्थ रस के विभाव के रूप में परिणत हो जाते हैं । इसके अतिरिक्त जहाँ
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काव्य में अचेतन पदार्थों का समावेश दो ही रूपों में होता है—या तो किसी मानव भाव के उद्दोपन के रूप में या स्वयं आलम्बन होकर वर्ण्य विषय के रूप में । जहाँ कहीं मानवभाव के उद्दोपन के रूप में प्रकृति का उपादान होता है वहाँ तो प्रकृति अथवा अचेतन पदार्थ का वर्णन रसप्रवण होता ही है क्योंकि वहाँ पर अचेतन पदार्थ रस के विभाव के रूप में परिणत हो जाते हैं ।
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अपार इति । अनाद्यन्त इऽर्थः। यथा रुचिपरिवृत्तिमाह—शृङ्गारो-
‘अपार’ यह । अर्थात् आदि-अन्तरहित । रुचि के अनुसार परिवर्तन को कह रहे हैं—‘शृङ्गारी’ यह । शृङ्गारी का अर्थ यह समझना चाहिये कि शृङ्गार में वतलाये हुये विभाव, अनुभाव और व्यभिचारीभाव की वर्णना रूपप्रतीति से युक्त, स्त्री-व्यसनी नहीं । अतएव भरत मुनि ने कहा है—‘कवि के अन्तर्गत भाव को•••’ इत्यादि तथा ‘काव्यार्थ को भावित करता है’ इत्यादिकों में कवि शब्द का ही मूर्धोऽभिषिक्तरूप में प्रयुक्त करता है । यह रसस्वरूपनिरूपण के अवसर पर निरुपित किया गया है । ‘जगत्’ यह । अर्थात् उस रस में निमज्जन से । शृंगार शब्द रस का उपलक्षण है । ‘वहि:’ यह । यहाँ यह अर्थ है कि जब तक रसिक नहीं होता उस समय दिखलाई देनेवाला भी यह भाववर्ग केवल लौकिक सुख-दुःख और मोह की मध्यस्थता को ही प्रदान करता है । तथापि कविवर्णनो के उपारोह के बिना लोकोत्तर रसास्वाद की भूमि पर आरूढ़ नहीं होता ।
कविभावानुभावव्यभिचारिचर्वणारूपप्रतीतिमयो न तु स्त्रीव्यसनीति मन्तव्यम् । अत एव भरतमुनि:—‘कवेरन्तर्गतं भावं’ ‘काव्यार्थान् भावयति’ इत्यादिषु कविशब्दमेव मूर्धोऽभिषिक्तरूपा प्रयुड्क्ते । निष्पत्तिं चैतद्रसस्वरूपनिरूपणीयासरे । जगादिति । तद्रसनिमज्जनादित्यर्थः । शृङ्गारपदं रसोपलक्षणम् । स एवेति । यावद्रसिको न भवति तदा परिदृश्यमानेsप्ययं भाववर्गो यद्यपि सुखदुःखमोहमध्येsस्थ्यमात्रलौकिकं वितरति, तथापि कविवर्णनोपारोहं विना लोकोत्तररसास्वादसुरवं नाधिशेते इत्यर्थः ।
प्रकृति स्वयं वर्ण्यविषय के रूप में उपजत होती है वहाँ भी चेतन चैतन्य की योजना कर ही ली जाती है । कवि अचेतन पदार्थों को भी चेतन के प्रकाश में ही देखता है । वस्तुतः काव्य में कवि का भाव ही प्रधान होता है । चाहे चेतन पदार्थ हो चाहे अचेतन पदार्थ; जिस पदार्थ को कवि अपने जिस भाव के प्रकाश में देखता है वह वस्तु कवि को उस भावना से समवलित ही दिखलाई पड़ती है । अतः कवि का तात्पर्य सर्वत्र रसाभिव्यक्तजनन में ही होता है । यही बात कतिपय कारिकाओं में इस प्रकार कही गई है :-
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‘यह नानाविध तथा अनन्त विस्तृत काव्य भी एक जगत् ही है जिसका न आदि है और न अन्त । ( अनादि काल से कविता होती आई है और अनन्तकाल तक होती रहेगी । इस प्रकार कविता के न तो प्रारम्भ का पता है और न अन्त ही दृष्टिगत होता है । यही दशा संशार की है; संशार भी आदि अन्त से रहित है—‘आदिनोऽस्यात्मनः क्षेत्रपरम्परयमनादिकम् ।’ ) जिस प्रकार हश्यमान जगत्
प्रकृति स्वयं वर्ण्यविषय के रूप में उपजत होती है वहाँ भी चेतन चैतन्य की योजना कर ही ली जाती है । कवि अचेतन पदार्थों को भी चेतन के प्रकाश में ही देखता है । वस्तुतः काव्य में कवि का भाव ही प्रधान होता है । चाहे चेतन पदार्थ हो चाहे अचेतन पदार्थ; जिस पदार्थ को कवि अपने जिस भाव के प्रकाश में देखता है वह वस्तु कवि को उस भावना से समवलित ही दिखलाई पड़ती है । अतः कवि का तात्पर्य सर्वत्र रसाभिव्यक्तजनन में ही होता है । यही बात कतिपय कारिकाओं में इस प्रकार कही गई है :-
‘यह नानाविध तथा अनन्त विस्तृत काव्य भी एक जगत् ही है जिसका न आदि है और न अन्त । ( अनादि काल से कविता होती आई है और अनन्तकाल तक होती रहेगी । इस प्रकार कविता के न तो प्रारम्भ का पता है और न अन्त ही दृष्टिगत होता है । यही दशा संशार की है; संशार भी आदि अन्त से रहित है—‘आदिनोऽस्यात्मनः क्षेत्रपरम्परयमनादिकम् ।’ ) जिस प्रकार हश्यमान जगत्
‘यह नानाविध तथा अनन्त विस्तृत काव्य भी एक जगत् ही है जिसका न आदि है और न अन्त । ( अनादि काल से कविता होती आई है और अनन्तकाल तक होती रहेगी । इस प्रकार कविता के न तो प्रारम्भ का पता है और न अन्त ही दृष्टिगत होता है । यही दशा संशार की है; संशार भी आदि अन्त से रहित है—‘आदिनोऽस्यात्मनः क्षेत्रपरम्परयमनादिकम् ।’ ) जिस प्रकार हश्यमान जगत्
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की रचना विधाता करता है उसी प्रकार काव्य जगत् की रचना कवि के द्वारा सम्पन्न होती है। इस प्रकार कवि इस काव्यजगत् का विधाता है। ब्रह्माजी तो सृष्टि की रचना कर देते हैं किन्तु अपने काव्य के माध्यम से उसकी व्यवस्था कवि ही करता है। कवि को जैसा विरेच्छा लगता है वैसा ही वहाँ बदल जाता है। यदि काव्य में कवि श्रृङ्गारी बन जाता है तो सारा विश्व ही श्रृङ्गारी हो जाता है। कवि के श्रृङ्गारी होने का यह आशय नहीं है कि वह व्यक्तिगत जीवन में क्रियों के पीछे पड़ जाता है। अपितु उसका अर्थ यह है कि कवि अपनी कविता में श्रृङ्गारसमानुकूल विभाव अनुभाव और संचारीभाव की चर्वणा कराने में ही दत्तचित्त हो जाता है; वह चर्वणा ही प्रतीति है तथा कवि का हृदय उस चर्वणा रूप प्रतीति से ओतप्रोत हो जाता है; उसका परिणाम यह होता है कि सारे संसार का जीवन श्रृङ्गार की भावना से भर जाता है। यदि कवि वीतराग हो जाय अर्थात् अपने काव्यों में वैराग्य भावना का पोषण करने लगे तो सारा संसार ही रस की भावना से रहित हो जायगा। यही बात रस की परिभाषा करते हुये भरत मुनि ने लिखी है कि भाव उसे कहते हैं जो कवि की अन्तर्गंत भावना को भावित करे। एक दूसरे स्थान पर भरतमुनि ने लिखा है कि कवि काव्यार्थों को भावित करता है। (अभिनवभारती में लिखा है कि कवि शब्द 'कु' धातु से बनता है। अतः कवि-कर्मरूप काव्य का अर्थ होता है कवन्तीय और उसमें पदार्थ तथा वाक्यार्थ का पर्यवसान रस में ही होता है। इस प्रकार असाधारणता तथा प्राधान्यता से रस काव्य का अर्थ होता है; क्योंकि 'अर्थ' शब्द का व्युत्पत्तिलभ्य अर्थ यही है कि जो प्रधानतया अभ्यर्थित किया जाय। प्रधानतया कवि का अभ्यर्थनीय रस ही होता है।) यहाँ पर श्रृङ्गार शब्द उपलक्षणपरक है। इसका आशय यह है कि जिस प्रकार कवि के श्रृङ्गारी होने पर सारा संसार श्रृङ्गारमय हो जाता है उसी प्रकार अन्य रसों की कविता से संसार उन रसों के अनुकूल बन जाता है। कवि के जगत् में चेतन अचेतन की भी आबद्धता नहीं होती। कवि जैसा चाहता है उसी के अनुसार अचेतन भावों का व्यवहार चेतन के समान करता है और चेतन भावों का व्यवहार अचेतन के समान करता है। अर्थात् अचेतन पदार्थों पर कवि चेतन सत्ता का आरोप करता है और चेतन पदार्थों में भी आनन्द इत्यादि के अवसर पर अचेतनता की स्थापना करता है।
की रचना विधाता करता है उसी प्रकार काव्य जगत् की रचना कवि के द्वारा सम्पन्न होती है। इस प्रकार कवि इस काव्यजगत् का विधाता है। ब्रह्माजी तो सृष्टि की रचना कर देते हैं किन्तु अपने काव्य के माध्यम से उसकी व्यवस्था कवि ही करता है। कवि को जैसा विरेच्छा लगता है वैसा ही वहाँ बदल जाता है। यदि काव्य में कवि श्रृङ्गारी बन जाता है तो सारा विश्व ही श्रृङ्गारी हो जाता है। कवि के श्रृङ्गारी होने का यह आशय नहीं है कि वह व्यक्तिगत जीवन में क्रियों के पीछे पड़ जाता है। अपितु उसका अर्थ यह है कि कवि अपनी कविता में श्रृङ्गारसमानुकूल विभाव अनुभाव और संचारीभाव की चर्वणा कराने में ही दत्तचित्त हो जाता है; वह चर्वणा ही प्रतीति है तथा कवि का हृदय उस चर्वणा रूप प्रतीति से ओतप्रोत हो जाता है; उसका परिणाम यह होता है कि सारे संसार का जीवन श्रृङ्गार की भावना से भर जाता है। यदि कवि वीतराग हो जाय अर्थात् अपने काव्यों में वैराग्य भावना का पोषण करने लगे तो सारा संसार ही रस की भावना से रहित हो जायगा। यही बात रस की परिभाषा करते हुये भरत मुनि ने लिखी है कि भाव उसे कहते हैं जो कवि की अन्तर्गंत भावना को भावित करे। एक दूसरे स्थान पर भरतमुनि ने लिखा है कि कवि काव्यार्थों को भावित करता है। (अभिनवभारती में लिखा है कि कवि शब्द 'कु' धातु से बनता है। अतः कवि-कर्मरूप काव्य का अर्थ होता है कवन्तीय और उसमें पदार्थ तथा वाक्यार्थ का पर्यवसान रस में ही होता है। इस प्रकार असाधारणता तथा प्राधान्यता से रस काव्य का अर्थ होता है; क्योंकि 'अर्थ' शब्द का व्युत्पत्तिलभ्य अर्थ यही है कि जो प्रधानतया अभ्यर्थित किया जाय। प्रधानतया कवि का अभ्यर्थनीय रस ही होता है।) यहाँ पर श्रृङ्गार शब्द उपलक्षणपरक है। इसका आशय यह है कि जिस प्रकार कवि के श्रृङ्गारी होने पर सारा संसार श्रृङ्गारमय हो जाता है उसी प्रकार अन्य रसों की कविता से संसार उन रसों के अनुकूल बन जाता है। कवि के जगत् में चेतन अचेतन की भी आबद्धता नहीं होती। कवि जैसा चाहता है उसी के अनुसार अचेतन भावों का व्यवहार चेतन के समान करता है और चेतन भावों का व्यवहार अचेतन के समान करता है। अर्थात् अचेतन पदार्थों पर कवि चेतन सत्ता का आरोप करता है और चेतन पदार्थों में भी आनन्द इत्यादि के अवसर पर अचेतनता की स्थापना करता है।
'यदि कवि वीतराग हो तो संसार नोरस हो जाता है' इस कथन का आशय यही हैं कि संसार की समस्त वस्तुओं में सुख दुःख और मोह के मध्य स्थित होने और सुख इत्यादि प्रदान करने की स्वाभाविक शक्ति होती है; किन्तु इन वस्तुओं
'यदि कवि वीतराग हो तो संसार नोरस हो जाता है' इस कथन का आशय यही हैं कि संसार की समस्त वस्तुओं में सुख दुःख और मोह के मध्य स्थित होने और सुख इत्यादि प्रदान करने की स्वाभाविक शक्ति होती है; किन्तु इन वस्तुओं
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तस्मान्नास्येव तद्रस्तु यत्सर्वात्मना रसतात्पर्यवतः कवेरतदिच्छया तदभिमतरसाङ्गतां न धत्ते । तथोपनिबध्यमानं वा न चारुत्वातिशयं पुष्णाति । सर्वमेतच्च महाकवीनां काव्येषु दृश्यते । अस्माभिरपि स्वेषु काव्यप्रबन्धेषु यथायथं दर्शितमेव । स्थिते चैवं सर्व एव काव्यप्रकारो न ध्वनिधर्मतामतिपतति । रसाद्यपेच्चायां कवेरगुणीभूतव्यङ्ग्यच्यलच्चणोडपि प्रकारस्तदज्ञतामवलम्बत इत्युक्तं प्राक्। यदा तु चाटूषु देवतास्तुतिषु वा रसादीनामज्ज्ञतया व्यवस्थानं हृदयवतीषु च सम्प्रज्ञकगाथासु कामुचिदृश्यच्यविशिष्टवाच्ये प्राधान्यं तदपि गुणीभूतव्यङ्ग्यस्य ध्वनिनिषेधनद्भूतत्वमेवस्त्युक्तं प्राक्।
अनु०) अतएव वह वस्तु नहीं ही है जो पूरी आत्मा से रस को तात्पर्य माननेवाले कवि की उसकी इच्छा से उसकी अभिमत रसाङ्गता को धारण नहीं करता अथवा उस प्रकार से उपनिबद्ध किया हुआ चारुत्व की अतिशयता को पुष्ट नहीं करता । और यह सब महाकवियों के काव्यों में देखा जाता है । हमने भी अपने काव्य प्रवन्धों में ठोक रूप में दिखलाया ही है । इस प्रकार की स्थिति में सभी काव्य प्रकार ध्वनि की धर्मता का अतिक्रमण नहीं करता ।यह पहले ही बताया जा चुका है कवि की रस की अपेक्षा में गुणीभूतव्यङ्ग्य नामक प्रकार भी उसकी अज्ञता का अवलम्बन लेता ही है और जब चाटूक्तियों में अथवा देवतास्तुतियों में रस इत्यादि की व्यवस्था अज्ञ के रूप में होती है और हृदयवती सम्प्रज्ञक कतिपय गाथाओं में व्यङ्ग्यविशिष्ट वाच्य में प्रधानता होती है वह भी गुणीभूतव्यङ्ग्य का ध्वनि निषेधन होना ही है यह पहले हो कहा जा चुका है ।
चारुत्वातिशयम् यत्न इति सम्बन्धः । स्वेऽपि इति । विषमवाणीलादिषु । हृदयवतीष्वति 'हिअअललीआ' इति प्राकृतकविगोष्ठ्यां प्रसिद्धासु । त्रिवगोंपायोपेयकुशलासु सम्प्रज्ञकाः उच्चयन्ते । सहृदया तद्गाथा यथा भट्टेन्दुराजस्य—यहाँ समबन्ध ऐेसा है—चारुत्व की अधिकता को जो पुष्ट नहीं करता वह नहीं ही है । 'अपने मे' यह । विषय वाणलीला इत्यादि में । 'हिअअललीआ' इस प्राकृत कविगोष्ठी में प्रसिद्धों में त्रिवगोंपाय के उपेयों में कुशलों में प्रज्ञा से युक्त सद्धृदय कहे जाते हैं । उनकी गाथा जैसे महेन्द्रराज का—
तारावती
तारावती
में यह यक्ति नहीं होती कि वे लोकोत्तर रसास्वाद की भूमिका पर आरूढ हो सकें । वस्तुओं में यह यक्ति तभी आती है जब वे कविवर्णना पर आरूढ हो जाते हैं । यदि कवि अपनी कविता के माध्यम से वीतरागता को प्रसार देना चाहता
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है तो समस्त वस्तु जगत् अपने स्वभाव के अनुसार सुख-दुःख इत्यादि तो देती ही है किन्तु लोकोत्तरानन्दरूपता को प्रदान नहीं कर सकती ।
उपर के विवेचन से स्पष्ट हो गया होगा कि विश्व में कोई ऐसी वस्तु होती ही नहीं जो कवि की इच्छा का अनुसरण न करे और जब कवि अपनी रुदय रस-निष्पत्ति को ही बनाकर चल रहा हो उस समय कवि की इच्छा का अनुसरण करते हुये अपनी पूरी आत्मा से कवि के चाहे हुये रस का अज्ञ न बन जावे । इसी भाँति ऐसी भी कोई वस्तु नहीं होती जो रसनिष्पत्ति के प्रयोजन से निवद्ध किये जानेपर चारुतातिशय को पुष्ट न करे । उजर जो कुछ कहा गया है उस सभी के उदाहरण महाकवियों की कविताओं में सर्वत्र देखे जाते हैं । आनन्दवर्धन का कहना है कि स्वयं मैंने अपने काव्यप्रबन्धों में औचित्य का निर्वाह करते हुये इन सभी बातों का ठीक-ठीक पालन किया है ।
वस्तुतः आनन्दवर्धन के विषय-वाणीली इत्यादि प्रवन्धों में इसके उदाहरण पर्याप्त मात्रों में पाये जाते हैं ।
यहाँतक सारी स्थिति स्पष्ट हो गई । समस्त व्याख्या का सार यही है कि कोई भी काव्य ऐसा नहीं होता जिसका समाहार ध्वनिकाव्य में न हो जावे । आशय यह है कि जिस किसी रचना को काव्य की संज्ञा प्रदान की जा सकती है उसका समावेश ध्वनिकाव्य में सफलतापूर्वक किया जा सकता है । ध्वनि को काव्य की आत्मा मानने का यही अभिप्राय है । यद्यपि काव्य का एक प्रकार वह भी होता है जहाँ व्यङ्गयार्थ प्रधान न होकर गुणीभूत हो जाता है । किन्तु उस विषय में यह पहले ही वतलाया जा चुका है कि इस प्रकार के काव्य भी अन्तिम रसनिष्पत्ति की दृष्टि से काव्य के क्षेत्न में ही अन्तर्भूत हो जाते हैं ।
कुछ काव्य ऐसे भी होते हैं जिनमें रस भी अपनी मुख्यता को छोड़कर गौण बन जाता है । जैसे प्रशस्तियों में राजा के प्रेम अथवा शौर्य इत्यादि के वर्णन में श्रृङ्गार वीर इत्यादि रस कविगत राजविषयक रति का अज्ञ होते हैं । अथवा देवताओं की स्तुतियों में देवताओं के विषय में वर्णन की हुई कोई भी भावना कविगत देव-विषयक रतिभाव का अज्ञ होकर गौण हो जाती है ।
अथवा एक प्रकार और है— प्राकृत कवियों की गोष्ठी में कतिपय ‘हिअअलीलआ’ (संभवतः ‘हृदयललिता’ ) नाम की सद्धृदयों की गाथायें प्रसिद्ध हैं । इन गाथाओं में धर्म, अर्थ और काम इन तीन वर्गों के उपाय की ज्ञातव्यता में निपुणता होती है । ( ज्ञात होता है कि आनन्दवर्धन के समय में ही या उससे पहले कतिपय सद्धृदय कवियों ने अपनी गोष्ठी बना ली थी और उसके सम्मेलनों में वे लोग अपनी प्राकृत की रचनायें प्रस्तुत किया करते थे । इस कविगोष्ठी का नाम भी कवित्व के अनुकूल ही था ।
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लड्ढिभगआ फलहीलआओ होन्तुत्ति वड्ढुअन्तीअ । हालिअस्स आसिसं पालिवेसवतुअ विणिहविच्छा ॥
अत्र लड्ढितगगना कर्पासलता भवन्तीति हालिकस्यात्रिष्यां वर्धयन्त्या प्रातिवेश्यवधूका निर्वृत्तेति प्रीतिरिति चैषसम्भोगसम्भोगमहाभोगाभिलाषाभिलाषनेन वड्ढूषणेन चित्रितं वाक्यमेव सुन्दरम् ।
कपासलतिकायें आकाश को लांघनेवाली हो जाएँ इस प्रकार हालिक को आशीर्वाद बढाती हुई ( सखी ) के द्वारा पड़ोसिन की बहू शान्त की गई । यहाँ 'आकाश को लांघनेवाली कपास की लता हो जाएँ यह आशीर्वाद हालिक को बढाती हुए ( सखी ) ने पड़ोसिन की बहू को शान्त किया इस प्रकार 'चौयं सम्भोग की अभिलाषा' रस व्यङ्गच से विशिष्ट्वाच्य ही सुन्दर है ।
तारावती 'हिअअलिअआ' अर्थात् 'हृदयलतिका' या 'हृदयललिता' । कविता भी तो 'हृदयलतिका के पुष्प गुञ्च के अतिरिक्त और कुछ नहीं है । गोष्ठी की इन गाथाओं में धर्म, अर्थ और काम से सम्बद्ध गाथायें सुनाई जाती थीं । दीधितिकार ने 'अलोल्या' यह नाम बतलाया है और 'संप्रज्ञातगाथासु' के स्थान पर 'ष्टत्प्रज्ञादिगाथासु' यह पाठ मानकर त्रिकाण्डरोष की षट्प्रज्ञा की यह परिभाषा दी है— धर्मेऽर्थकाममोक्षेषु लोक्तत्त्वार्थयोरपि । षट्सु प्रज्ञास्विति यस्स्योच्चैः षट्प्रज्ञा इति संस्मृतः ॥
लड्ढितगगना: कर्पासलता भवन्तीवति वर्धयन्त्या । हालिकस्याशिष्यं प्रातिवेश्यवधुका निर्वृपिता ॥
आश्रय लगभग मिलता जुलता है । ज्ञात होता है कि यह गोष्ठी अभिनवगुप्त के समय तक चलती रही । अभिनवगुप्त ने इसी गोष्ठी में प्रस्तुत की हुई अपने गुरु की दो गाथायें उद्धृत की हैं । ) उदाहरण के लिये भट्टेन्द्रराज की एक गाथा लीजिये जिसकी संस्कृतच्छाया इस प्रकार है— कोई पड़ोसिन किसी हालिक में अनुरक्त है । किन्तु उसे सहवास का अवसर नहीं मिलता जिससे वह बहुत ही सन्तप्त है । इधर हालिक कपास के खेत में काम कर रहा है । कोई सखी उस हालिक को आशीर्वाद देने के बहाने उस सन्तप्त पड़ोसिन को आह्वस्त करने के लिये कह रही है :—
'हे हालिक ? ईश्वर करे तुम्हारी ये कपास की लतायें इतनी बड़ी हो जाएँ कि आकाश को भी लांघने लगें । सखी हालिक को बार-बार यही आशीर्वाद दे रही थी जिससे उसने पड़ोसिन के सन्ताप को शान्त किया ।'
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गोलकच्छ निकुञ्जे भरण जम्बूसु पच्यमानासु । हालिकबहुआ णिअंसङ जम्बूरसरत्तअं सिअअम् ॥
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अत्र गोदावरोकच्छलतागहने भरण जम्बूफलेषु पच्यमानेषु । हालिकवधूः परिभञ्जे जम्बूफलसरकतं नितम्बभङ्गिमति त्वरितचारुसम्मोहसम्भ्रमानिजम्भूफलरसरक्तत्वपरभागनिहितवनं गुणीभूतव्यङ्ग्यमित्यलं बहुना ।
'गोदावरी के किनारे की कुञ्जों में जामुनों के भरकर पकने पर हालिक की वधू जंम्बू के रस में रँगे हुये परिधान को धारण करती है ।'
यहाँ गोदावरी के किनारे के लतागहन में भरकर जम्बू फलों के पकने पर हालिकबधू जामुन के रस से रक्त वस्त्र को धारण करती है । इसमें शीघ्रता से किये जानने वाले चौर्यसम्भोग के कारण जिस जम्बूफल-रस-रक्त स्वरूप परम सौभाग्य की सम्भावना की जासकती है उसका छिपाना गुणीभूतव्यङ्ग्य है, वस बहुत की आवश्यक्ता नहीं ।
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इससे यह व्याख्या निकलती है कि सखी ने पड़ोसिन को यह समझाया कि तुम्हें अधिक सन्ताप नहीं करना चाहिए, अब तुम्हारे दुःख दूर होने का अवसर आ गया । ये कपास की लतायें धीरे-धीरे बहुत ही बढ़ जाएँगी और तब उनमें तुम्हारा चौर्य-सुरत सफलतापूर्वंक सम्पन्न हो सकेगा । इस पद्य में ही यह बात कह दी गई है कि सखी ने पड़ोसिन को शान्त किया ।'
इस वाक्यार्थ का सम्बन्ध आशीर्वाद से तभी स्थापित किया जा सकता है जब उक्त व्यङ्ग्यार्थ को सत्ता स्वीकार कर ली जाय । इस प्रकार वाच्यार्थ ही व्यङ्ग्यार्थ के द्वारा अधिक सुन्दर होकर चमत्कार में कारण बनता है । अतएव यह गुणीभूत व्यङ्ग्य का उदाहरण है । फिर उस वाच्यार्थ से पड़ोसिन की हालिक के प्रति भाव की अभिव्यक्ति होती है । जो शृङ्गाररस का रूप धारण कर लेती है । अतः यहाँ शृङ्गाररस ध्वनि है ।
एक दूसरा उदाहरण लीजिए जिसकी संस्कृत छाया इस प्रकार है— गोदाकच्छ निकुञ्जे भरण जम्बूषु पच्यमानासु । हालिकवधूनियच्छति जम्बूरसरकतं सिचयम् ॥
अर्थात् गोदावरी नदी के तटपर उगी हुई झाड़ियों में जब जामुन के फल रस से पूर्ण रूप से भर गये हैं और पकें हुए हैं उस समय हालिक की वधू एक ऐसा वस्त्र धारण कर लेती है जो कि जामुन के फलों के रस से रंगा हुआ है ।
यहाँ पर जामुन के फलों के रस से अपने वस्नोंको रंग गोदावरी तट पर स्थित निकुञ्जों में ज्ञाने से व्यक्त होता है कि वह हालिकवधू उन निकुञ्जोंमें अत्यन्त शीघ्रता के साथ
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तदेवमिदानींतनकविकाव्यनयोपदेशे क्रियमाणे प्राथमिकानामश्यासार्थिनां यदि परं चित्रेण व्यवहार:; प्राप्तपरिणतीनां तु ध्वनिरेव काव्यमिति स्थितमेतत्।
तद्यमंत्र सङ्ग्रहः- यस्मिन् रसो वा भावो वा तात्पर्येण प्रकाशते । संवृत्याभिहितौ वस्तु यत्रालङ्कार एव वा ॥ काव्याध्वनि ध्वनिर्दृश्यप्राधान्यैकनिवन्धनः । सर्वत्र तत्र विषयी ज्ञेयः सहदयैर्जनैः ॥
(अनु०) वह इस प्रकार आजकल के कवियों की नीति से उपदेश किये जाने पर प्राथमिक अभ्यासार्थियों का यदि केवल चित्र से व्यवहार हो ( तो हो सकता है ) परिणति को प्राप्त करनेवालों के लिये तो ध्वनि ही काव्य है यह स्थिति है ।
वह इस प्रकार यह संग्रह है :- ‘जिस काव्यमार्ग में रस या भाव अथवा छिपाकर कही हुई वस्तु या केवल तात्पर्य के रूप में प्रकाशित होते हैं वह एकमात्र व्यङग्यप्रधान होने- वाली ध्वनि सहृदय लोगों के द्वारा विषयी समझी जानी चाहिये ॥ ४९, ४२ ॥
ध्वनिरेव काव्यमिति। आत्मात्मिनोरभेद एव वस्तुतः । व्युत्पत्तये तु विभागः कृत इत्यर्थः । वाग्रहणाद्दासादेः पूर्वोक्तस्य ग्रहणम् । संङ्कृत्यैति । गोप्यममानतया लृध-सौन्दर्येन्द्रियार्थः ।
इति यावत् ॥ ४९, ४२ ॥ ‘ध्वनि ही काव्य होता है’ यह । अर्थात् वस्तुतः आत्मा और आत्मी का अभेद ही होता है; व्युत्पत्ति के लिये विभाग कर लिया गया है । ‘वा’ ग्रहण से पूर्वोक्त तदाभास इत्यादि का ग्रहण हो जाता है । ‘छिपाकर’ यह । छिपाकर कहने के कारण जिसको सौन्दर्य प्राप्त हो गया है । ‘काव्य के अध्वनि में’ अर्थात् काव्यमार्गों में । आशय यह है कि वह काव्य मार्ग त्रिविध ध्वनि का विषय होता है ॥ ४९, ४२ ॥
तारावती चौर्य सुरत करने जा रही है । उसे इस बात की सम्भावना है कि कहीं शीघ्रता में कार्य प्रवृत्त होने से उसके कपड़ों में जामुन के दाग न पड़ जायँ । अतः उन्हें छिपाने के लिये उसे पहले से ही यह प्रयत्न कर लिया है कि अपनी साड़ी को जामुन के रंग में ही रंग लिया है जिसको जामुन के दाग छिप सकें । यहाँ पर जामुन के फलों के रस से साड़ी रंगनारूप वाच्यार्थ सहवासगोपनरूप व्यङग्यार्थ से अधिक सुन्दर हो जाता है । इस प्रकार वह् व्यङग्य गुणीभूतव्यङग्य की
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कोटि में आता है। फिर व्यंग्यार्थ से सुन्दरीभूत वाच्यार्थ ही रसध्वनि में पर्यवसित होता है। इसी प्रकार दूसरे उदाहरण भी समझे जाने चाहिये। ये प्राकृत गाथायें हैं। इन सर्वमें जहाँ कहीं एक व्यंग्यार्थ वाच्यार्थ को सुन्दर बनाता है; फिर वह सुन्दरीभूत वाच्यार्थ रसध्वनि में पर्यवसित होता है वह स्फुट रसाभिव्यंग्य का विषय है। इसके विषय में भी कहा जा चुका है कि यह स्फुटनिनिष्यन्दभूत है।
कारण यह है कि इसका अन्तिम पर्यवसान तो रसध्वनि में ही होता है। ऊपर जो कुछ कहा गया है उससे निष्कर्ष यही निकलता है कि आजकल के कवियों को जब काव्यकला का उपदेश दिया जाय तो उन्हें यह बतलाया जाना चाहिये कि जो कवि पहले पहल कविता करना प्रारम्भ करते हैं और काव्यक्रिया का अभ्यास प्राप्त कराना चाहते हैं उन्हें रसनिष्पत्ति के फेर में अधिक नहीं पड़ना चाहिये। उनके लिये यह सरल रहेगा कि वे चित्रकाव्य की रचना करने तक हो अपनेको सीमित रखें (फिर उनकी चेष्टा न होने पर भले ही उनके चित्रित किये हुये भाव इस निष्पत्ति के रूप में परिणत हो जावें।) किन्तु जब बाद में काव्यक्रिया में पूरी कुशलता प्राप्त हो जाय तब उनके बनाये हुये सभी काव्य स्फुट ध्वनि ही कहे जायेंगे।
(प्रश्न) उपक्रम में तो ध्वनि को काव्य की आत्मा माना गया है। फिर यहाँ पर ध्वनि ही काव्य है यह उपसंहार कैसे सङ्गत कहा जा सकता है? (उत्तर) आत्मतत्त्व एक व्यापक तत्त्व है और ब्रह्म के रूप में आत्मा तथा शरीर दोनों एक ही होते हैं। उनमें भेद नहीं होता। अतः काव्य की प्रत्येक वस्तु चाहे वह वाच्य तत्त्व हो चाहे आभ्यन्तर, ध्वनि ही कहा जावेगा। वस्तुतः ब्रह्म के समान ध्वनि के रूप में काव्य का भी एक अद्वैत तत्त्व है। केवल शिष्यों को उपदेश देने के लिये विभाग कर लिया गया है।
(यह पहले ही बतलाया जा चुका है कि ध्वनिसिद्धान्त की उत्पत्ति स्फोटवाद से हुयी है जो शब्दब्रह्म का दूसरा पर्याय है। जिस प्रकार ब्रह्म में व्यवहार के लिये भेद की कल्पना कर ली जाती है उसी प्रकार काव्यब्रह्म ध्वनि के रूप में एक है किन्तु व्यवहार के लिये विभागों की कल्पना कर ली गई है।) यहाँ पर दो सङ्ग्रह श्लोक हैं :-
'जहाँ कवि का तात्पर्य रस या भाव में हो अथवा रसाभास या भावाभास इत्यादि असंलयदृश्यक्रम व्यञ्जक्य के किसी अन्य प्रभेद में हो अथवा वस्तु या अलङ्कार इस रूप में छिपाकर कहे जायँ कि उनमें सौन्दर्य प्रकट हो जाय तो उस काव्यमाग में सर्वत्र ध्वनि ही विषयी हुआ करता है अर्थात् उन तीन प्रकारोंवाला काव्यमार्ग ध्वनि का विषय हो जाता है क्योंकि उसको ध्वनिरूपता प्रदान करनेवाला मुख्यतत्त्व व्यङ्ग्यश का प्राधान्य वहाँ पर विद्वमान ही रहता है यह सहृदयों को भलीभाँति समझ लेना चाहिये ॥ ४१, ४२ ॥'
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सगुणीभूतव्यङ्ग्यैः सालङ्कारैः सह प्रबन्धैः स्वैः । सङ्घट्टरसंस्कृध्दिभ्यां पुनरप्युद्योतते बहुधा ॥४३॥
अनु० 'गुणीभूतव्यङ्ग्यों और अलङ्कारों के सहित अपने प्रबन्धों से सङ्कर और संसृष्टि के द्वारा ( वह ध्वनि ) फिर भी बहुत प्रकार से उद्योतित होती है' ॥ ४३ ॥ उस ध्वनि के अपने प्रबन्धों से गुणीभूतव्यङ्ग्य के साथ और वाच्यालङ्कारों के साथ सङ्घट्टर संसृष्टि की व्यवस्था किये जाने पर लच्य्य में बहुत प्रबन्धता देखी जाती है । वह इस प्रकार—अपने प्रबन्धों से सङ्कीर्ण, अपने प्रबन्धों से संसृष्ट, गुणीभूतव्यङ्ग्य से सङ्कीर्ण, गुणीभूतव्यङ्ग्य से संसृष्ट, दूसरे वाच्यालङ्कारों से सङ्कीर्ण, दूसरे वाच्यालङ्कारों से संसृष्ट, संसृष्ट अलङ्कारों से सङ्कीर्ण और संसृष्ट अलङ्कारों से संसृष्ट इस प्रकार बहुत प्रकार से ध्वनि प्रकाशित होती है ।
लोचन एवं श्लोकद्वयेन सङ्ग्रहार्थमभिधाय बहुप्रकारत्वप्रदर्शनं पठति—सगुणीति । सहगुणीभूतव्यङ्ग्येन सालङ्कारैर्य वर्तन्ते स्वध्वने: प्रबन्धास्ते: सङ्कीर्णतया संसृष्ट्या चानन्तप्रकारो ध्वनिरिति तात्पर्यम् । बहुप्रकारतां दर्शयति—तथाहीति । स्वभेदैरगुणीभूत-व्यङ्ग्येनालङ्कारै: प्रकाश्यत इति नयो भेदा: । तथापि प्रत्येकं सङ्करेण संसृष्ट्या चैति षट् । सङ्करस्यापि त्रय: प्रकारा: अनुग्राह्यानुग्राहकभावेन सन्देहास्पदत्वेनैकपदातुप्रवेशेनैकद्वादश भेदा: । पूर्वं च ये पञ्चत्रिंशद्भेदा उक्तास्ते गुणीभूतव्यङ्ग्यस्यापि मन्तव्या: । इस प्रकार दो श्लोकों से सङ्ग्रहार्थ कहकर बहुप्रकारत्व को दिखलानेवाली ( कारिका ) को पढ़ते हैं—‘सगुणीभूतव्यङ्ग्यै:’ इत्यादि । तात्पर्य यह है कि गुणीभूत-व्यङ्ग्य के साथ और अलङ्कारों के साथ जो अपने अर्थात् ध्वनि के प्रबन्ध वर्त्तमान होते हैं उनके साथ सङ्कीर्णरूप में अथवा संसृष्टि से ध्वनि अनन्त प्रकार की होती है । बहुप्रकारता को दिखलाते हैं—‘वह इस प्रकार’ यह । अपने भेदों से, गुणे-भूत व्यङ्ग्य से और अलङ्कारों से प्रकाशित होता है यह तीन प्रकार हुये । उसमें भी प्रत्येक का सङ्कर और उसकी संसृष्टि होती है उससे ६ भेद हो गये । सङ्कर के भी तीन प्रकार होते हैं—अनुग्राह्यानुग्राहकभाव के द्वारा; सन्देहास्पदत्व के रूप में और एकपदातुप्रवेश के द्वारा ये १२ भेद होते हैं । और जो पहले ३५ भेद बतलाये
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स्वप्रभेदास्तावन्तोडलङ्कार इत्येकस्सति: । तत्र सङ्करत्रयेण संसृष्ट्या च गुणेन द्वे शते चतुरशीत्यधिके । तावता प्रख्यातिशातो मुख्यभेदानां गुणनेन सप्तसहस्राणि चत्वारि शतानि विशल्यधिकानि भवन्ति । अलङ्काराणामानन्त्याच्चवसंख्यत्वम् ।
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गये हैं वे गुणभीमूतव्यङ्ग्यन्यङ्ग्य के भी भेदो जाने चाहिये । उतने ही अपने अवान्तर भेद और अलङ्कार ये ७१ हुये । उसमें तीन प्रकार के सङ्कर और एक प्रकार की संसृष्टि ' से गुणा करने पर २८४ हो जाते हैं । उतने से ३५ मुख्य भेदों के गुणा करने पर ७४२० हो जाते हैं । अलङ्कारों के अनन्त होने से तो असंख्याता आ जाती है ।
उपर ध्वनि का पूर्ण विवेचन किया जा चुका । अब ४३वीं कारिका में ध्वनि के विस्तार पर प्रकाश डाला जा रहा है और यह दिखलाया जा रहा है कि ध्वनि के विभिन्न भेदों के परस्पर एकत्र सन्निविष्ट होने में उनके भेदोपभेदों की संख्या कितनी अधिक बढ जाती है । कारिका का आशय इस प्रकार है :-
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'ध्वनि के अपने जितने भी भेद हैं उनका परस्पर सङ्कर और संसृष्टि होती है । उन अवान्तर भेदों से गुणभीमूतव्यङ्ग्यन्यङ्ग्य के विभिन्न प्रकारों का सङ्कर और संसृष्टि होती है तथा इसी प्रकार अलङ्कारों से भी सङ्कर्य और संसृष्टि होती है । इस प्रकार की जब व्यवस्था की जाती है तब इस ध्वनि के अनेक भेद हो जाते हैं । आशय यह है कि इन भेदोपभेदों की कल्पना करने पर ध्वनि के इतने भेद हो जाते हैं कि उनका अन्त ही नहीं मिलता ।'
इस अनन्तता और अनेकता को इस प्रकार समझिये—सर्वप्रथम तो ध्वनि के ५६ भेद होते हैं जिनका उल्लेख द्वितीय उद्योत के अन्त में किया जा चुका है । वह संक्षेप में इस प्रकार है—ध्वनि के दो मूल भेद होते हैं—लक्षणामूलक और अभिधामूलक । लक्षणामूलक के दो भेद होते हैं—अत्यन्ततिरस्कृतवाच्य और अर्थान्तरसङ्क्रमितवाच्य । विवक्षितान्यपरवाच्य के दो भेद होते हैं—असंलक्ष्यक्रम-वृत्ति और संल्लक्ष्यक्रम । असंल्लक्ष्यक्रम के अनन्त भेद होते हैं । अतः उसको एक प्रकार का ही कहना ठीक होगा । संल्लक्ष्यक्रम दो प्रकार का होता है—शब्दशक्तिमूलक और अर्थशक्तिमूलक । अर्थशक्तिमूलक तीन प्रकार का होता है—कविप्रौढोक्तिसिद्ध, कविनिबद्धवक्त्रप्रौढोक्तिसिद्ध और स्वतः सम्भवी । इनमें व्यङ्गच दो प्रकार का होता है—वस्तु और अलङ्कार तथा व्यञ्जक दो प्रकार का होता है वस्तु और अलङ्कार । इस प्रकार प्रत्येक के चार चार भेद होते हैं, जैसे कविप्रौढोक्तिसिद्ध के चार भेद—(१) वस्तु से वस्तु । (२) वस्तु से अलङ्कार, (३) अलङ्कार से वस्तु और (४) अलङ्कार से अलङ्कार । इस प्रकार उक्त तीनों
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भेदों में प्रत्येक के चार-चार भेद होकर कुल १२ भेद हो गये इस प्रकार ध्वनि के मूल भेद १६ हुये—लक्षणामूलक - २ + असंललक्षण्यक्रम १ + शब्द शक्तिमूलक १ +अर्थ शक्तिमूलक १२ । इनमें प्रत्येक के दो भेद होते हैं—पदप्रकाश्य और वाक्यप्रकाश्य । इस प्रकार ये ३२ भेद हो गये । असंललक्षण्यक्रम के तीन भेद और होते हैं—वर्णप्रकाश्य, सङ्कटनाप्रकाश्य और प्रबन्धप्रकाश्य । इस प्रकार ध्वनि के कुल ३५ मूल भेद हो गये । अब इनके परस्पर संयोग को लीजिये । यह संयोग तीन प्रकार का होता है—(१) मूलभेदों का मूलभेदों से संयोग; (२) मूलभेदों का गुणीभूतव्यङ्गच्य से संयोग और (३) मूलभेदों का अलङ्कार से संयोग ।
यह संयोग दो प्रकार का होता है—(१) जहाँ संयुक्त होनेवाले तत्त्व परस्पर निरपेक्ष भाव से स्थित हों वहाँ संसृष्टि कही जाती है । और (२) जहाँ संयुक्त होनेवाले तत्त्व परस्पर सापेक्षभाव से स्थित हों वहाँ सङ्कर होता है । इन उक्त तीनों प्रकार के संयोगों के सङ्कर और संसृष्टि के रूप में ६ प्रकार हो जाते हैं । सङ्कर तीन प्रकार का होता है—(१) अनुमाथ्यानुप्राहक भाव सङ्कर—जहाँ दो संयोग्य तत्त्वों में परस्पर उपकार्योपकारक भाव हो (२) सन्देह सङ्कर—जहाँ यह निश्चय न जा सके कि ध्वनि का कौन सा भेद अमुक स्थान पर विद्यमान है । और (३) एकपदानुप्रवेश सङ्कर—जहाँ एक ही पद में दो ध्वनि भेद इत्यादिकों का समावेश हो । इस प्रकार संयोगों के १२ प्रकार होते हैं—तीन प्रकार का सङ्कर और उनमें प्रत्येक के तीन-तीन प्रकार—तथा संसृष्टि ३ प्रकार की इस भाँति मूल भेदों का १२ प्रकार से संयोग हो सकता है ।
उदाहरण के लिये सन्देह सङ्कर के तीन भेद होते हैं—(१) अपने भेदों का परस्पर सन्देह सङ्कर, (२) गुणीभूतव्यङ्गच्य से सन्देह सङ्कर और (३) अलङ्कार से सन्देह सङ्कर । इसी प्रकार के तीन तीन प्रकार सङ्कर के दो अन्य भेदों के होते हैं और यही प्रकार संसृष्टि के भी होते हैं । अब मूल भेदों को लीजिये—अभी ३५ भेद ध्वनि के बतलाये गये हैं । वे ही भेद गुणीभूतव्यङ्गच्य के हो सकते हैं । इस प्रकार इन दोनों के मिलाकर ७० भेद हुये । एक प्रकार अलङ्कार का है । इस प्रकार मूलभेद ७१ हुये । उनका यदि तीन प्रकार के सङ्कर और एक प्रकार की संसृष्टि से गुणन किया जाय तो ७१ × ४ = २८४ भेद हो गये । उनको यदि ३५ मुख्य भेदों से गुणित किया जाय तो २८४ × ३५ = ७४२० भेद हो जाते हैं । अलङ्कार तो अनन्त हैं; अतः ध्वनि के असंख्य भेद हो जाते हैं ।
[ ऊपर लोचन के गणना-परक भाग की व्याख्या की गई है । ज्ञात होता है कि यह प्रकरण अभिनव गुप्त ने बहुत ही लापरवाही से लिखा है । पहली बात तो
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यह है कि २८४×३५=९८४० होते हैं ७४२० नहीं । दूसरी बात यह है कि गुणा करने के जिन विभिन्न तत्वों का उपादान किया गया है वे भी बहुत अधिक सझ्ज्ञत नहीं हैं । सम्भवतः इस लापरवाही का कारण यह है कि वस्तुतः काव्य प्रकारों को संख्या की सीमा में आवद्ध करना ठीक है हो नहीं ।
तारावतो
'गग रही कविता युगों से मुरघ हो ; मधुर गीतों का न पर अवसान है ।'
वृत्तिकार के अनुसार भी केवल गुणी भूत व्यज्ज्य के ही भेदों की गणना उसी प्रकार असम्भव है जिस प्रकार संसार के सभी शब्दों का शेष सकना । अलङ्कार अनन्त होते ही हैं । केवल श्रृङ्गार रस के ही भेदोपभेदों का परिसंख्यान असम्भव है फिर भला ध्वनि के समस्त भेदों को संख्या के संकुचित घेरे में बांधा ही कैसे जा सकता है ? यह परिसङ्ख्यान और परिसंख्यान भी अनन्तता का ही परिचायक है । इस दृष्टि से विचार करने पर आचार्य की यह असावधानी बहुत कुछ उपेक्षणीय हो जाती है ।
यहाँ पर यह देना भी अप्रासङ्गिक न होगा कि काव्य-प्रकाशकार की गणनापद्धति अधिक व्यवस्थित और वैज्ञानिक है । पहला अन्तर तो यह है कि काव्यप्रकाश में ३५ नहीं अपितु ४९ मूलभेद माने गये हैं । मूल दो भेद तो काव्यप्रकाश में भी लोचन के जैसे ही हैं और ललक्षणामूलक ध्वनि के दो भेद अर्थान्तरसङ्क्रमित वाच्य तथा अत्यन्ततिरस्कृत वाच्य लोचन के समान ही हैं । इन दोनों भेदों के पदगत और वाक्यगत ये दो दो भेद वैसे ही हैं । इस प्रकार ललक्षणामूलक ध्वनि के चार भेदों में कोई अन्तर नहीं आता । अन्तर केवल अभिधामूलक ध्वनि के भेदों में है । अभिधामूलक ध्वनि के प्रथम भेद असंललक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य के लोचन में ४ भेद माने गये हैं— पदप्रकाश्य, वाक्यप्रकाश्य, वर्णप्रकाश्य, सङ्कटुनाप्रकाश्य और प्रबन्धप्रकाश्य । काव्यप्रकाश में प्रबन्धप्रकाश्य नामक एक भेद और जोड़कर असंललक्ष्य क्रम व्यङ्ग्य की संख्या ६ कर दी गई है । लोचनकार ने शब्दशक्तिमूलक संल्लक्ष्यक्रम के केवल दो भेद माने हैं पदगत और वाक्यगत । किन्तु काव्यप्रकाश में ८ भेद माने गये हैं— पदगत वस्तु, वाक्यगत वस्तु, पदगत अलङ्कार और वाक्यगत अलङ्कार । इसी प्रकार काव्यप्रकाश में अर्थशक्तिमूलक के १२ भेद तो वे ही हैं, जो लोचनकार ने बतलाये हैं । कितने व्यज्जकों में भेद हो जाता है । लोचन में केवल दो व्यज्जक माने गये हैं पद और वाक्य । किन्तु काव्यप्रकाश में प्रबन्ध को भी व्यज्जक मानकर व्यज्जक तीन प्रकार का मान लिया गया है । इस प्रकार लोचन में
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अर्थशक्तिमूलक के १२×२=२४ भेद किये गये हैं। जब कि काव्यप्रकाश में १२×३=३६ भेद हो जाते हैं। लोचन में उभयशक्तिमूलक का कोई भेद नहीं बतलाया गया है। किन्तु काव्यप्रकाश में उभयशक्तिमूलक का भी एक भेद विगणमान है। इस प्रकार काव्यप्रकाश के भेदोपभेदों की गणना इस प्रकार होगी—लक्षणामूलक ध्वनि ४ + असंललक्ष्य क्रम व्यङ्ग्य ६ + शब्दशक्तिमूलक ८ +अर्थशक्तिमूलक ३६ +उभयशक्तिमूलक १=५१ भेद हो जाते हैं। जो बात मूल भेदों के विषय में कही गई है वही गुणन की प्रक्रिया में भी लागू होती है। गुणन की प्रक्रिया में भी दोनों आचार्यों में परस्पर पर्याप्त मतभेद हैं।
काव्यप्रकाशकार की गुणन प्रक्रिया इस प्रकार है—इन ५१ भेदों में प्रत्येक का दूसरे के साथ संशयात्मक हो जाता है और प्रत्येक भेद के ५१ उपभेद हो जाते हैं। जैसे पदगत अर्थान्तरसंक्रमित वाच्य से, वाक्यगत अर्थान्तर संक्रमित वाच्य से, वाक्यगत अत्यन्त-तिरस्कृत वाच्य से, पदगत अत्यन्ततिरस्कृत वाच्य से इत्यादि । इस प्रकार सन्देह सङ्कर के कुल मिलाकर ५१×५१=२६०१ भेद हो जाते हैं। इतने ही भेद अनुगृहीतानुगृहीत भाव सङ्कर, एकव्यङ्गयानुप्रवेश सङ्कर और संसृष्टि में प्रत्येक के हो जाते हैं। इस प्रकार कुल मिलाकर २६०१×४=१०४०४ सङ्कीर्ण उपभेद ध्वनि के हो जाते हैं।
इस गुणनप्रक्रिया के विषय में काव्यप्रकाश की टीकाओं में एक आक्षेप उठाया गया है और उसका समाधान भी वहीं दिया गया है। आक्षेप और समाधान इस प्रकार हैं—कुछ लोगों का कहना है कि यह गणना ठीक नहीं है क्योंकि इसमें वे भेद किये कई बार आ जाते हैं। जैसे यदि अर्थान्तर संक्रमित वाच्य के उपभेदों की गणना की जायगी तो उसका सादृश्य अत्यन्त-तिरस्कृत वाच्य से आ ही जायगा। फिर अत्यन्ततिरस्कृत वाच्य के उपभेद की गणना में पुनः अत्यन्ततिरस्कृत वाच्य का सादृश्य अर्थान्तरसंक्रमित वाच्य से हो जायगा। इस प्रकार सभी भेद अनेक बार आ जायेंगे। क्योंकि अर्थान्तरसंक्रमित वाच्य और अत्यन्ततिरस्कृत वाच्य ये दोनों एक ही वस्तुएँ हैं। अतः यहाँ गणना का वही कम होना चाहिये जो काव्यप्रकाश में विरोधालङ्कार के प्रसङ्ग में उठाया गया है। वहाँ पर काव्यप्रकाशकार ने लिखा है—
'जातितश्वतुंर्जात्याद्यैर्विरुद्धा स्याद्गुणैर्विभिः । क्रिया द्वाभ्यामपि द्रव्यं द्रव्येणैवति ते द्वषा' ॥
विरोध चार तत्वों में होता—जाति, गुण, क्रिया और द्रव्य। इन चार का
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चार से विरोध होने पर गणना की प्रक्रिया यह होगी—जाति का जाति इत्यादि चार से विरोध, गुण का गुण इत्यादि ३ से विरोध, ( क्योंकि गुण और जाति का विरोध तो जाति के विरोधों में ही आ गया । ) क्रिया का क्रिया और द्रव्य से विरोध और द्रव्य का द्रव्य से विरोध । इस प्रकार ४+३+२+१=१० भेद हुये सीधे सीधे ४×४=१६ भेद नहीं । यही प्रक्रिया यहाँ भी अपनाई जानी चाहिये । अर्थात् अभिम अथिम भेदों में एक एक कम करके गणना की जानी चाहिये । जैसे पदच्योत्य अर्थान्तरसंंक्रमित वाक्य के ५३ भेद । फिर वाक्यच्योत्य अर्थान्तरसंंक्रमित वाक्य के ५०, इसी प्रकार एक एक कम करके गणना की जानी चाहिये । इस दशा में गुणन की प्रक्रिया यह बतलाई गई है—
एको राशिद्रिधा स्थाप्य एकमेकाधिकं गुरु । समाधेनासमो गुण्य एतत्सङ्कुलितं लघु ॥ ( लीलावती )
अर्थात् एक से जिस राशि तक गुणन करना हो उस राशि को दो बार रखना चाहिये । एक राशि में एक को जोड़ देना चाहिये जिससे यदि वह राशि विषम होगी तो सम हो जायेगी और सम होगी तो विषम हो जायेगी । जो सम हो उसका आधा करके उससे विषम को गुणा कर देना चाहिये । यह सङ्कलन की लघु प्रक्रिया है । इस प्रकार १ से ५१ तक प्रत्येक राशि को जोड़ने की लघु प्रक्रिया यह होगी—५१+१=५२ इस राशि ५२ का ½=२६, अब ५१ को २६ से गुणा कर देना चाहिये ५१×२६=१३२६ भेद सन्देह सङ्कर के हुए । कुल मिलाकर घ्वनि के सङ्कीर्ण भेद १३२६×४=५३०४ होने चाहिये १०८०४ नहीं । इसका समाधान यह दिया गया है कि विरोध की गुणन प्रक्रिया यहाँ पर लागू नहीं हो सकती । क्योंकि जाति और गुण का विरोध अथवा गुण और जाति का विरोध एक ही बात है । किन्तु अर्थान्तरसंंक्रमित का अत्यन्ततिरस्कृत वाक्य से और अत्यन्ततिरस्कृत वाक्य का अर्थान्तरसंंक्रमित वाक्य से सङ्कर्य एक बात नहीं । जब अर्थान्तरसंंक्रमित वाक्य की प्रधानता होगी तब अर्थान्तरसंंक्रमित वाक्य का अत्यन्ततिरस्कृत वाक्य से विरोध कहा जायगा और यदि अत्यन्ततिरस्कृत वाक्य की प्रधानता होगी तो अत्यन्ततिरस्कृत वाक्य का अर्थान्तरसंंक्रमित वाक्य से विरोध कहा जायेगा । इसी उत्तर के कारण काव्य प्रकाश में बतलाई हुई प्रक्रिया यहाँ पर ठीक सिद्ध होती है ।
यहाँ पर एक शङ्का और रह जाती है कि उक्त अन्तर के मान लेने पर भी एकगव्यङ्कानुप्रवेश सङ्कर के विषय में फिर यह संख्या ठीक सिद्ध नहीं होती । एक व्यङ्गयानुप्रवेश सङ्कर में एक ही व्यङ्गयक मे दो भेदों का समावेश होता है ।
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इस प्रकार पद के एकदेश, पद, वाक्य, प्रवन्ध इनमें परस्पर सङ्कर नहीं हो सकता। क्योंकि मान लीजिये वाक्य से एक व्यङ्ग्य निकलता है तो उसका एक व्यङ्जकानुप्रवेश सङ्कर तभी हो सकता है जब दूसरा व्यङ्गय उसी वाक्य से निकले। यदि अनुप्रवेश सङ्कर तभी हो सकता है जब दूसरा व्यङ्गय उसी वाक्य से निकलेगा और दूसरे पद में तो ऐसी दशा में व्यङ्जक की एकता नहीं रहेगी और इनका एकव्यङ्जकानुप्रवेश सङ्कर नहीं वन सकेगा। इस प्रकार भी इनकी संख्या पर्याप्त रूप में कम हो जायगी। इसका उत्तर यह है कि यहाँ पर व्यङ्जकता का अर्थ है व्यञ्जना में किसी प्रकार का सहयोग देना।
तारावती
अब मान लो कि कोई ऐसा स्थान है जहाँ एक व्यङ्गय तो वाक्य से निकलता है और दूसरा वाक्य के केवल एक भाग पद से। वहाँ पर यदि वाक्य से निकलनेवाले व्यङ्गय में पद की किसी भी प्रकार की सहयोगिता हो जाती है तो उस वाक्य के द्वारा उस व्यङ्गय अर्थ की व्यङ्जकता भी उस पद में आ गई। इस प्रकार पद और वाक्य के व्यङ्ग्यार्थों में एकव्यङ्जकानुप्रवेश सङ्कर हो सकता है। अतएव सङ्कीर्ण भेदों की संख्या १०४०४ मानना ही ठीक है। इनमें शुद्ध ५१९ भेदों के जोड़ने से १०४५९ ध्वनिन भेद हो जाते हैं।
अब गुणीभूतव्यङ्गय के सङ्कीर्ण को लीजिये—ध्वनि के जो ५१ मूलभेद बतलाये गये हैं उनमें कुछ भेद ऐसे हैं जो गुणीभूतव्यङ्गय में सम्भव नहीं हो सकते। जैसा कि ध्वनिकार ने लिखा है कि जब वस्तु से अलङ्कार की अभिव्यक्ति होती है तब उसे केवल ध्वनिरूप ही प्राप्त होती है। कारण यह है कि वस्तु की अपेक्षा अलङ्कार में स्वाभाविक प्रकर्य होता है। अतः व्यङ्ग्य अलङ्कार वस्तु की अपेक्षा तो कभी गौण हो ही नहीं सकता। वस्तु से अलङ्कार की व्यञ्जना तीन प्रकार की होती है—(१) स्वतः सम्भव वस्तु से अलङ्कारव्यञ्जना, (२) कविकल्पित वस्तु से अलङ्कारव्यञ्जना और (३) कविनिबद्धवक्तृकल्पित वस्तु से अलङ्कार व्यञ्जना। इन तीनों में प्रत्येक के तीन भेद होते हैं—पदगत, वाक्यगत और प्रवन्धगत।
इस प्रकार ये ९ भेद हुए। ये केवल ध्वनि भेद ही हो सकते हैं। शेष ५१— ९ = ४२ भेद गुणीभूतव्यङ्गय के भी हो सकते हैं। इन ४२ भेदों में प्रत्येक के ८ भेद होते हैं—(१) अगूढ, (२) अपराज्ञ, (३) वाच्यसिद्ध्यङ्ग, (४) अस्फुट, (५) सनिग्रह प्राधान्य, (६) तुल्य प्राधान्य, (७) काकाक्षित और (८) असुन्दर। इन ८ प्रकारों से मूल ४२ भेदों का गुणा करने पर ४२ × ८ = ३३६ शुद्ध हो गये। इन ३३६ भेदों की सङ्कीर्ण करने पर ३३६ × ३३६ = ११२८९६ भेद हो जाते हैं। एक प्रकार की सङ्कीर्ण और तीन प्रकार का सङ्कर इस प्रकार इन भेदों को ४ से गुणा करने पर ११२८९६ × ४ = ४५१५८४ भेद सङ्कीर्ण गुणीभूतव्यङ्गय
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तत्र स्वप्रभेदसड्ढीर्णत्वं कदाचिदनुप्राह्यानुप्राहकभावेन । यथा ‘एवंवादिनि-
देवपौ’ इत्यादौ । अत्र ह्यर्थशक्त्युद्भवानुरणनरूपव्यङ्ग्यध्वनिप्रभेदेनालदय-क्रमव्यङ्ग्यध्वनिप्रभेदोऽनुप्राह्यो गृह्यमाणः प्रतीयते ।
(अनु०) उनमें अपने भेदों से सङ्कीर्णत्व कभी अनुप्राह्यानुप्राहक भाव के द्वारा होता है । जैसे—‘एवं वादिनि देवर्षौ’ में यहाँ निस्सन्देह अर्थशक्त्युद्भव अनुरणन-
रूप व्यङ्ग्य नामक ध्वनि के प्रभेद के द्वारा ध्वनि का अलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य नामक प्रभेद अनुगृहीत किया जाता हुआ दृष्टिगत होता है ।
लोचन
तत्र नुस्पत्तये कतिपयमेदेषूदाहरणानि दित्सु: स्वप्रभेदानां कारिकायामन्यपदार्थ-
त्वेन प्रधानतयोक्तस्वात्तदाधयाण्येव चत्वार्युदाहरणान्याह—त्रेति । अनुगृह्यमाण
इति । लज्जया हि प्रतीतया । अमिलाषशृङ्गारोद्रानुगृह्यते व्यभिचारिभूतत्वेन ।
उनमें व्यक्तपत्ति के लिये कतिपय भेदों में उदाहरण देने की इच्छा करते हुये
कारिका में अपने प्रभेदों के अन्यपदार्थत्व होने के कारण प्रधानरूपमें कहे जाने से उसके आश्रयवाले ही चार उदाहरणों को कहते हैं—‘उनमें’ यह । ‘अनुगृह्यमाण’
यह । निस्सन्देह प्रतीत होनेवाली लज्जा के द्वारा । वहाँ व्यभिचारिभाव होने:के कारण ( लज्जा के द्वारा ) अभिलाष शृङ्गार अनुगृहीत किया जाता है ।
तारावती
के हो गये । ध्वनि के १०४४९ भेद बतलाये जा चुके हैं यदि इनका परस्पर चार
बार गुणा किया जाय तथा शृङ्गाररस के नायक-नायिका भेद विभाव अनुभव
और समस्त अलङ्कारों से पुष्टक गुणन किया जाय तो इतने भेद हो जाते हैं कि
कोई व्यक्ति उनकी गणना कर ही नहीं सकता । इस प्रकार नवनवोन्मेषशालिनी कवि
प्रतिभा के लिये कहीं अन्त का अवसर ही नहीं आता । इस प्रकार यह सरस्वती
का अनन्य भण्डार अनन्त काल तक सहृदयों के समक्ष स्फुरित होता रहता है । यह
है काव्यप्रकाश की गुणन प्रक्रिया का संक्षिप्त परिचय ।
साहित्यदर्पण में मूल भेद तो ५१ ही हैं, किन्तु उसमें विरोधालङ्कारवाली
काव्यप्रकाश की शैली को अपनाकर प्रत्येक अग्निम भेद में एक एक भेद कम
कर दिया है । इस प्रकार १ से ५१ तक की संख्याओं का जोड़ ही साहित्यदर्पण-
कार के मत में एक प्रकार के सङ्कर की संख्या मानी जानी चाहिये । तीन प्रकार
का सङ्कर और १ प्रकार की संसृष्टि को मिलाकर ४ से गुणा कर देने पर ध्वनि के
सङ्कीर्ण भेदों की संख्या आ जायेगी । इस प्रकार साहित्य दर्पण के अनुसार ५१ ×
२६ = १३२६ भेद सङ्कृति के हो जाते हैं और कुल भेद १३२६ × ४ = ५३०४
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मङ्गीर्णमेदः सिद्ध होते हैं। किन्तु वस्तुतः यह सब गणना ध्वनि-अनन्तता को ही सिद्ध करती है।
अब आलोककार यह दिखलाना चाहते हैं कि इन भेदों का परस्पर संसर्जन ( संसृष्टि ) और सङ्कर होता किस प्रकार है ? इसके लिये कुछ उदाहरण देने की आवश्यकता है। किन्तु काव्य अनन्तपार है अतः कतिपय उदाहरणों से ही सन्तोष करना पड़ेगा। जिस क्रम से उदाहरण दिये जावेंगे उसको समझ लेना चाहिये। सामान्यतया सङ्कर या संसृष्टि तीन तत्वों में होती है— ( १ ) अपने भेद से, ( २ ) गुणीभूतव्यङ्गय से और ( ३ ) अलङ्कारों से। इनमें सर्वप्रथम अपने भेदों से सङ्कर और संसृष्टि को लीजिये। सर्वप्रथम अपने भेदों से ही सङ्कर और संसृष्टि के उदाहरण देने का कारण यह है कि ४३ वीं कारिका में गुणीभूतव्यङ्गय और अलङ्कार के साथ 'च' शब्द जोड दिया गया है—'गुणीभूतव्यङ्गयश्च:' 'सालङ्कारे:' यह वह 'च' के अर्थ में हुआ है तथा इत्थं बहुविधे समास का निर्देश है। बहुविधे समास का मूल पाणिनीय सूत्र है 'अनेकमन्यपदार्थे' अर्थात् अनेक प्रथमान्तों का अन्य पद के अर्थ में समास हो जाता है। इसमें समास में आनेवाले शब्द गौण हो जाते हैं और अन्य पदार्थ प्रधान हो जाता है। अतः यहाँ पर 'सालङ्कारे:' में अलङ्कार गौण है और 'सगुणीभूतव्यङ्ग्ये:' में 'गुणीभूत व्यङ्ग्य' गौण है। प्रधानता किसी अन्य पदार्थ की है। वह अन्य पदार्थ क्या है ? इसका निर्देश कारिका में ही कर दिया गया है 'प्रभेदैः स्वैः'। इस प्रकार स्वप्रभेद अर्थात् ध्वनि के मूल भेद ( काव्यप्रकाशा के अनुसार ५१ और लोचन के अनुसार ३५ ) प्रधान है। अतः इन प्रधान भेदों के सङ्कर की व्याख्या पहले की जायेगी तथा दूसरे भेदों से सङ्कर्य की व्याख्या बाद में की जायेगी। अपने प्रभेदों से सङ्कर्य तीन प्रकार का होता है और संसृष्टि एक प्रकार की। इस प्रकार कुल मिलाकर चार प्रकार हुये। इन्हीं चार प्रकारों में प्रत्येक का एक एक उदाहरण दिया जा रहा है।
सर्वं प्रथम सङ्कर को लीजिये। यह तीन प्रकार का होता है— ( १ ) कभी तो एक भेद दूसरेका अनुग्राहक होता है और उससे उपकृत होकर दूसरा भेद अधिक उत्कर्ष को प्राप्त कर लेता है। उसे अनुग्राह्यानुग्राहकभाव सङ्कर कहते हैं। जैसे—
एवं वादिनि देवर्षौं पाख्षे पितुरधोमुखी । लीलाकमलपत्राणि गणयामास पार्वती ॥
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यह कुमारसम्भव का पद्य है, इसमें कहा गया है कि नारद जी हिमाङ्खल से पार्वती के विवाह के विषय में बात कर रहे थे। उस समय पार्वती अपने पिता के पास बैठी हुयी नीचे को मुख किये हुये लीलाकमल पत्रों को गिन रही थी। यहाँ पर पार्वती के अधोमुख और लीलापत्र गणना से लज्जा की अभिव्यक्ति होती है। यह लज्जा अनुरणनरूप व्यङ्ग्य के रूप में प्रतीत होती है। और स्वतःसम्भवी वस्तु से वस्तु व्यञ्जना कही जा सकती है। दूसरी व्यञ्जना यहाँ पर अभिलाष श्रृङ्गार की होती है जो कि असंलक्ष्य क्रम व्यङ्ग्य रस ध्वनि का एक भेद है। प्रतीतिगोचर होनेवाली लज्जा असंलक्ष्य क्रम अङ्गाङ्गी रसध्वनि को अनुराहित करती है क्योंकि लज्जा श्रृङ्गार का व्यभिचारी भाव है। इस प्रकार ध्वनि के एक भेद अनुरणनरूप व्यङ्ग्य से रस ध्वनि उपकृत होकर चमत्काराधिक्य में कारण होती है।यहाँ पर दो स्वरूप-गत भेदों का अनुगृहीतानुग्राहकभाव सङ्कर है।
( यहाँ पर यह पूछा जा सकता है कि व्यभिचारी भाव तो एक संयोगज तत्त्व है जिसके संयोग से रसव्यञ्जना हुआ करती है जैसा कि मुनि ने कहा है—‘विभावानुभावव्यभिचारिसंयोगाद्रसनिष्पत्ति:। फिर यहाँ पर लज्जा को अनुरणनरूप व्यङ्ग्य कैसे माना जा सकता है ? इसका उत्तर यह है कि विभाव इत्यादि सभी तत्त्व स्थायीभाव से मिलकर रसनिष्पत्ति किया करते हैं। किन्तु जहाँ कोई व्यभिचारी भाव प्रमुख हो जाता है वहाँ उस भाव की ध्वनि कही जाती है। जैसे कपूर शकर इत्यादि अनेक पदार्थों के योग से बने हुये पदार्थ में एक सञ्ज्ञात-रस तैयार हो जाता है। किन्तु जब उस सञ्ज्ञात-रस में मिर्च-चीनी इत्यादि किसी एक वस्तु की प्रधानता हो जाती है तब कहा जाता है कि अमुक पदार्थ में चीनी का स्वाद है, मिर्च का स्वाद है इत्यादि। इसी प्रकार सामूहिक रसध्वनि में जब एक भाव की प्रधानता हो जाती है तब वहाँ उस भाव की ध्वनि कही जाती है, जैसा कि साहित्यदर्पण में कहा गया है— ‘रतिदेवादिविषया व्यभिचारी तथाङ्कितः। भाव: प्रोक्त:……’
इस प्रकार यहाँ पर लज्जा-भाव की व्यञ्जना अनुरणन रूप में ही होती है और इससे अभिलाष श्रृंगार अनुराहित होकर चमत्कार में कारण बनता है। अतः यह अनुराग्यानुग्राहक भाव का उदाहरण है।
( २ ) कभी दो ध्वनिभेद एक साथ आ पड़ते हैं और दोनों में किसी एक का निश्चय नहीं किया जा सकता कि अमुक भेद ही सङ्केत रहेगा दूसरा नहीं। ऐसे स्थान पर सन्देह होनेके कारण सन्देहसङ्कर कहा जाता है।
उदाहरण—
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एवं कदाचित्प्रभेदद्रयसम्पातसन्देहेन । यथा— खणपाहुणिआ देअर एषा जाआइ किंपि दे भणिदा । रुअइ पडोहरवहहीघरम्मि अणुणिज्झड वराइ ॥ ( दाणप्राभृतिका देवर एषा जायते किंपि ते भणिता । रोदिति शून्यवलभीगृहेऽनुनयनीयतां वाराकी ॥ इति इच्छाया ) अत्र हतुननीयतामित्येतद्वरमर्थान्तरसङ्क्रमितवाच्यत्वेन विवक्षितान्यपर- वाच्यत्वेन च सम्भाव्यते । न चान्यतरपक्षनिर्णये प्रमाणमस्ति ।
ध्वन्यालोक: इस प्रकार कभी प्रभेदद्वय के सम्पात से सन्देह होने पर जैसे— देवर में एषा जाया कहती है कि कोई तो कहता है । पड़ोसी के घर में रोती हुई बेचारी प्रेयसी अनुनय कर रही है ॥ ( दान आदि देने में कुशल देवर! यह तुम्हारी जाया किसी दूसरे की कहलाती है । शून्य पड़ी हुई वालभी के घर में बेचारी स्त्री रो रही है, उसको तुम समझाओ । ) यहाँ पर 'अनुनयनीयताम्' यह पद अर्थान्तरसङ्क्रमितवाच्य के रूप में और विवक्षितान्यपरवाच्य के रूप में सम्भावित किया जाता है । किसी एक पक्ष के निर्णय में प्रमाण नहीं है ।
लोचन क्षण उत्सवस्तत्र निमन्त्रणेनानीता हे देवर ! एषा ते जायया किंपि भणिता रोदिति । पडोहरे शून्ये वलभीगृहे अनुनयनीयतां वराकी । सा तावदेवरानुरक्ता तउज्जा- यता विदितवृत्तान्तया किमप्युक्तेयेषोक्तिसतद्वृत्तान्तमन्यस्यास्तदेवरचौर- कामिन्या: । ततस्तव गृहिणीयां वृत्तान्तो ज्ञात इत्युभयतः कलहोऽयितुमिच्छन्त्येव- माह । ततार्थान्तरे सम्भोगेनैकान्तोचितेन परितोष्यतामित्येवं रूपे वाच्यस्य सङ्क्रमणमम् । यदि वा त्वं तावदेतस्यामेवानुरक्त इतीर्ष्यांकोपतत्पर्योदनुनयमन्यपरं विवक्षितम् । एषा तवेदानीमुचितमगर्हणीयं प्रेमास्पदमित्यनुनयो विवक्षितः; यं त्विदानीं गर्हणीयाः 'त्ण' अर्थात् उत्सव में निमन्त्रण के द्वारा बुलाई हुई हे देवर ! यह तुम्हारी जाया के द्वारा कुछ कही हुई रो रही है । पड़ोसी अर्थात् शून्य वलभी गृह में वेचारी मना ली जाय । वह देवर में अनुरक्त है, वृत्तान्त को जानलेनेवाली उसकी जाया के द्वारा कुछ कही गई है यह उक्ति उनके वृत्तान्त को देखनेवाली किसी दूसरी अपने देवर की चौरकामिनी की है । वहाँ वह 'तुम्हारी गृहिणी के द्वारा यह वृत्तान्त जान लिया गया है' इस प्रकार दोनों ओर कलह की इच्छा करते हुए कहती है । वहाँ 'एकान्त में उचित सम्भोग के द्वारा परितुष्ट कर ली जाए' इस प्रकार के अर्थान्तर में वाच्य का संक्रमण होता है । अथवा तुम तो इसमें अनुरक्त हो इस ईर्ष्या कोप तत्पर्य से अन्यपरक अनुनय विवक्षित है । यह तुम्हारी इस समय उचित तथा अगर्हणीय प्रेमास्पद है इस अनुनय का कहना अभीष्ट है, हम
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सम्वृत्ता ह्येतत्परतया उमयथापि च स्वामिप्रत्यायप्रकाशनैकतरनिश्चये प्रमाणाभाव इत्युक्तम् । विवक्षितस्य हि स्वरूपस्थस्यैवान्यपरत्वम् । संक्रान्तस्तु तस्यैतद्रूपतात्पत्ति: । यदि वा देवरानुरक्ताया एतद् देवरमन्यया सहावलोकितसम्भोगवृत्तान्तं प्रतीत्यविवक्ष्यैवमन्त्रणं व्याख्येयतिम् ।
इस प्रकार परतया होने के कारण दोनों ही प्रकार से स्वामी के प्रति निश्चय न होने में प्रमाण का अभाव कहा गया है । स्वरूपस्थ ( वाच्यस्थ ) ही विवक्षित की अन्यपरता होती है । उसकी इस रूप को प्राप्ति तो संक्रान्त होती है । अथवा देवरानुरक्ता की ही उस देवर के प्रति, जिसके सम्भोग वृत्तान्त को अन्य के प्रति देखा गया है, यह उक्ति है । प्रथम व्याख्यान में तो 'देवर' इस आमन्त्रण की व्याख्या कर दी गई ।
तारावती
कोई नायिका अपने देवर में अनुरक्त है । वह अपने देवर के उत्सव में आई है । देवर की पत्नी उनके प्रच्छन्न अनुराग को जान गई है । अत: उसने प्रच्छन्नानुरागिणी से कुछ कह दिया जिससे वह दुःखित होकर एकान्त स्थान पर जाकर रोने लगी । उस नायिका के देवर को कोई दूसरी स्त्री भी चाहती है । उसका भी गुप्त प्रेम है । उस दूसरी कामिनी ने ये सब बातें देख ली हैं कि उसके प्रेमी की पत्नी ने उस घर में आई हुई से कुछ कह दिया है और वह एकान्त में जाकर रो रही है। अतः वह सब समाचार उस अपने प्रेमी से कह रही है :-
कोई नायिका अपने देवर में अनुरक्त है । वह अपने देवर के उत्सव में आई है । देवर की पत्नी उनके प्रच्छन्न अनुराग को जान गई है । अत: उसने प्रच्छन्नानुरागिणी से कुछ कह दिया जिससे वह दुःखित होकर एकान्त स्थान पर जाकर रोने लगी । उस नायिका के देवर को कोई दूसरी स्त्री भी चाहती है । उसका भी गुप्त प्रेम है । उस दूसरी कामिनी ने ये सब बातें देख ली हैं कि उसके प्रेमी की पत्नी ने उस घर में आई हुई से कुछ कह दिया है और वह एकान्त में जाकर रो रही है। अतः वह सब समाचार उस अपने प्रेमी से कह रही है :-
'तुम्हारे उत्सव में प्रेमपूर्वक आमन्त्रित किये जाने पर वह ( तुम्हारी भाभी ) तुम्हारे यहाँ आई थी । तुम्हारी जाया ( पत्नी ) ने न जाने उससे क्या कह दिया कि वह एकान्तवधूम्री गृह में जाकर रो रही है, अरे देवर ? बेचारी को मना लो ।'
'तुम्हारे उत्सव में प्रेमपूर्वक आमन्त्रित किये जाने पर वह ( तुम्हारी भाभी ) तुम्हारे यहाँ आई थी । तुम्हारी जाया ( पत्नी ) ने न जाने उससे क्या कह दिया कि वह एकान्तवधूम्री गृह में जाकर रो रही है, अरे देवर ? बेचारी को मना लो ।'
वलभ्री का अर्थ है—अन्तःपुर, चन्द्रशाला या घर की ऊपरी मञ्ज़िल ( 'गृहद्रान्ते वलभोचन्द्रशाले सौधोऽश्ववेश्मनि' )
वलभ्री का अर्थ है—अन्तःपुर, चन्द्रशाला या घर की ऊपरी मञ्ज़िल ( 'गृहद्रान्ते वलभोचन्द्रशाले सौधोऽश्ववेश्मनि' )
'देवर' इस आमन्त्रण से व्यञ्जना निकलती है कि 'तुम्हारा उससे स्वाभाविक प्रेम होना ही चाहिये । उत्सव में प्रेमपूर्वक बुलाई गई थी' इससे व्यञ्जना निकलती है कि यहाँ तो कम से कम तुम्हारी पत्नी को उसका आदर करना ही चाहिये था किन्तु यहाँ भी उसने उसे स्पष्ट कर दिया । अतः उसका दुःखित होना स्वाभाविक है । 'जाया' शब्द के प्रयोग से व्यक्त होता है कि 'यह मैं जानती हूँ कि वह तुम्हारी विवाहिता पत्नी ही है, उसने तुम्हारा प्रेम कभी प्राप्त नहीं कर पाया और जब वह ऐसी अनुचित बातें करती है तब तुम्हारा प्रेम उसे मिल ही कैसे सकता है ।
'देवर' इस आमन्त्रण से व्यञ्जना निकलती है कि 'तुम्हारा उससे स्वाभाविक प्रेम होना ही चाहिये । उत्सव में प्रेमपूर्वक बुलाई गई थी' इससे व्यञ्जना निकलती है कि यहाँ तो कम से कम तुम्हारी पत्नी को उसका आदर करना ही चाहिये था किन्तु यहाँ भी उसने उसे स्पष्ट कर दिया । अतः उसका दुःखित होना स्वाभाविक है । 'जाया' शब्द के प्रयोग से व्यक्त होता है कि 'यह मैं जानती हूँ कि वह तुम्हारी विवाहिता पत्नी ही है, उसने तुम्हारा प्रेम कभी प्राप्त नहीं कर पाया और जब वह ऐसी अनुचित बातें करती है तब तुम्हारा प्रेम उसे मिल ही कैसे सकता है ।
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तारावती
सकता है ? 'तुम्हारी पत्नी ने कहा है' में 'तुम्हारी' शब्द से व्यक्त होता है कि 'जब तुम्हारी पत्नी ने कहा है तब मनाना भी तुम्हें ही पड़ेगा । 'कुछ कह दिया' का व्यङ्ग्यार्थ यह है कि जो कुछ कह दिया वह इतना अनुचित है कि मैं उसका उत्तर देना भी नहीं कर सकती । वलभी के शत्रु होते से आक्रान्त में प्रेम करने की सुर्कता, 'रोती है' से प्रतीकाराक्षमतत्व तथा नायक के प्रति प्रेमाधिक्य के कारण पलायन की असमर्थता व्यक्त होती है जिससे नायक के शीघ्र जाकर मनाने का औचित्य सिद्ध होता है । 'वराकी' शब्द से भी नायिका की अक्षमता ही व्यक्त होती है । यहाँ पर वक्त्री का यह अभिप्राय व्यक्त होता है कि वह नायक को यह सूचना देकर नायक और उसकी पत्नी में कलह कराना चाहती है ।
'अनुनय' का वाच्यार्थ है समझा बुझाकर दुःख दूर कर देना । किन्तु यहाँ पर कहनेवाली का केवल यही अभिप्राय नहीं हो सकता, क्योंकि एक तो वह एकान्त स्थान इत्यादि का निर्देश करती है, दूसरे प्रणयीजनों का मानना और मनाना बात-चीत तक ही सीमित नहीं रहता । अतः 'अनुनय' का वाच्यार्थ तात्पर्यानुपपत्ति के कारण बाधित है और इससे यह अर्थ निकलता है कि सम्भोग के द्वारा उसे प्रसन्न करो । सम्भोग के साथ बात-चीत द्वारा अनुनय का भी वाच्यार्थ सन्निविष्ट हो जाता है । अतः यहाँ पर वाच्य 'अर्थान्तरसंक्रमित' हो जाता है । अतः यह अर्थान्तरसंक्रमित वाच्य नामक ध्वनि भेद है । अथवा यहाँ यह कथन एक अन्य प्रेमिका का है; अतः इससे यह व्यञ्जना भी निकल सकती है—'मेरे सामने आज तुम्हारा रहस्य खुला है ; तुम वस्तुतः मेरे अतिरिक्त एक अन्य प्रेमिका ( अपनी भाभी ) से भी प्रेम करते हो ; तभी तो तुम्हारी पत्नी उससे रुष्ट होती है ।' इससे वक्त्री का अभिप्राय ईर्ष्याजन्य कोप में पर्यवसित होता है । इस अर्थ में अनुनय के अर्थ का सर्वथा परित्याग हो जाता है । अतः यह अत्यन्त तिरस्कृत ध्वनि नामक प्रभेद हो सकता है । अब यहाँ पर यह निश्चय करना कठिन है कि अर्थान्तर संक्रमित वाच्य माना जाय अथवा अत्यन्त तिरस्कृत वाच्य । एक के निश्चय करने में यहाँ कोई प्रमाण है ही नहीं । क्योंकि दोनों अवस्थाओं में वक्त्री का यही प्रयोजन रूप तात्पर्य व्यङ्ग्य होता है कि 'यह तुम्हारी भाभी तुम्हारी सच्ची प्रेमास्पद है । भला अब तुम मुझसे प्रेम क्यों करोगे । इसका तुम्हारा प्रेम उचित भी है और अनिन्दनीय भी । अब मैं तो निन्दनीय हो ही गई हूँ ।' चाहे अनुनय का सम्भोगपरक अर्थ मानकर तथा एक प्रेमिका से दूसरी प्रेमिका के सम्भोग का निर्देश दिखलाकर यहाँ पर अर्थान्तरसंक्रमित वाच्य माना जाय या ईर्ष्या कोप में लक्षणा मानकर अन्यतिरस्कृत वाच्य माना जाय दोनों अवस्थाओं में प्रयोजन
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एकव्यङ्कानुप्रवेशेन तु व्यङ्ग्यैवमलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्यस्य स्वप्रभेदान्तरा-पेक्षया वाहुल्येन सम्प्रति । यथा 'स्निग्धशय्यामल' इत्यादौ ।
(अनु.) एक व्यङ्ग्यानुप्रवेश के द्वारा तो व्यङ्ग्यैवमलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य के अपने दूसरे प्रभेदों की दृष्टि से बहुतता में सम्भव है । जैसे—‘स्निग्ध शय्यामल’ इत्यादि में ।
लोचन
लोचन
वाहुल्येनeti । सर्वत्र काव्ये रसादितात्पर्यं तावदस्ति । तत्र रसध्वनेर्मावध्वनेश्चे-कैक व्यङ्ककेनाभिध्यङ्ग्यनां स्निग्धशय्यामलेऽयत्र विमललमभशृङ्गारस्तद्रूयमिचारिणक्श शोक-वेगातमनश्वरवीयीयात् ।
'वाहुल्य से' यह । सर्वत्र काव्य में रसादि तात्पर्य तो होता ही है । उसमें रस-ध्वनि और भावध्वनि का एक ही व्यङ्ग्यक के द्वारा अभिव्यञ्जन ( होता है ) क्योंकि 'स्निग्धशय्यामल' इत्यादि में विमलललभशृङ्गार और उसके व्यभिचारी शोक और आवेश की ( एक साथ ) चर्वणा होती है ।
तारावती
तारावती
रूप व्यङ्ग्यार्थ तो एक ही होगा । अतः एक का निश्चय करने में कोई तर्क न होने से यहाँ सन्देह सदृर है । यह तो बहुशः वतलाया जा चुका है कि जहाँ वाच्यार्थ के स्वरूप में ही व्यङ्ग्यार्थ अवस्थित होता है उसे अर्थान्तरसंक्रमित वाच्य कहते हैं और जहाँ स्वरूप दूसरे रूप में परिणत हो जाता है वहाँ अत्यन्त-तिरस्कृत वाच्य कहा जाता है ।
रूप व्यङ्ग्यार्थ तो एक ही होगा । अतः एक का निश्चय करने में कोई तर्क न होने से यहाँ सन्देह सदृर है । यह तो बहुशः वतलाया जा चुका है कि जहाँ वाच्यार्थ के स्वरूप में ही व्यङ्ग्यार्थ अवस्थित होता है उसे अर्थान्तरसंक्रमित वाच्य कहते हैं और जहाँ स्वरूप दूसरे रूप में परिणत हो जाता है वहाँ अत्यन्त-तिरस्कृत वाच्य कहा जाता है ।
अथवा उक्त पद्य की योजना एक रूप में और हो सकती है । यह कचन भाभी का ही है जिसका कि अपने देवर से स्वयं प्रच्छन्न प्रेम है । उसने किसी अन्य से देवर का प्रेम जान लिया है । वह दूसरी प्रेमिका देवर के घर किसी उत्सव में आई है और उसको देवर की पत्नी ने अपमानित किया है । यही सारा समाचार अपने देवर को देकर वह अपना ईष्र्या जन्य रोष प्रकट कर रही है । वस्तुतः यही अर्थ ठीक है । क्योंकि इसमें 'देवर' इस सम्बोधन की सङ्गति ठीक बैठ जाती है । यदि पहली वाली व्याख्या के अनुसार यह माना जाय कि कहने वाली भाभी नहीं कोई अन्य प्रेमिका है और वह भाभी के अपमानित होने की सूचना दे रही है तो ‘हे देवर’ यह सम्बोधन भाभी की दृष्टि से माना जायगा ( और यह कटाक्षपरक सम्बोधन होगा । )
अथवा उक्त पद्य की योजना एक रूप में और हो सकती है । यह कचन भाभी का ही है जिसका कि अपने देवर से स्वयं प्रच्छन्न प्रेम है । उसने किसी अन्य से देवर का प्रेम जान लिया है । वह दूसरी प्रेमिका देवर के घर किसी उत्सव में आई है और उसको देवर की पत्नी ने अपमानित किया है । यही सारा समाचार अपने देवर को देकर वह अपना ईष्र्या जन्य रोष प्रकट कर रही है । वस्तुतः यही अर्थ ठीक है । क्योंकि इसमें 'देवर' इस सम्बोधन की सङ्गति ठीक बैठ जाती है । यदि पहली वाली व्याख्या के अनुसार यह माना जाय कि कहने वाली भाभी नहीं कोई अन्य प्रेमिका है और वह भाभी के अपमानित होने की सूचना दे रही है तो ‘हे देवर’ यह सम्बोधन भाभी की दृष्टि से माना जायगा ( और यह कटाक्षपरक सम्बोधन होगा । )
(३) सदृर का तीसरा प्रकार है एकाश्रयानुप्रवेश सदृर । अपने भेदों का एकाश्रयानुप्रवेश सदृर अलक्ष्यक्रम व्यङ्ग्य ध्वनि का दूसरे भेदों से प्रायः हुआ
(३) सदृर का तीसरा प्रकार है एकाश्रयानुप्रवेश सदृर । अपने भेदों का एकाश्रयानुप्रवेश सदृर अलक्ष्यक्रम व्यङ्ग्य ध्वनि का दूसरे भेदों से प्रायः हुआ
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स्वप्रभेदसंस्कृतत्वं च यथा पूर्वोदाहरण एव । अत्र ह्याथान्तरसंङ्क्रमितवाच्यस्यैव च संसर्गः ।
(अनु०) स्वप्रभेद संसृष्टत्व जैसे——पहले के उदाहरण में ही । यहाँ निस्सन्देह अर्थान्तरसंङ्क्रमितवाच्य और अत्यन्ततिरस्कृतवाच्य का संसर्ग है ।
लोचन व्याख्याय संसृष्टिमुदाहरति——स्वप्रभेदेति । अत्र हीति ॥ लिङ्गशब्दादौ तिरस्कृतो वाच्यः, रामादौ तु सङ्क्रान्त इत्यर्थः । इस प्रकार के सङ्कर की व्याख्या करके संसृष्टि का उदाहरण देते हैं——‘अपने प्रभेद से’ यह । ‘यहाँ निस्सन्देह’ यह । लिङ्ग शब्द इत्यादि में वाच्य तिरस्कृत है और राम इत्यादि में सङ्क्रान्त ।
तारावती काव्य में सर्वत्र तात्पर्य तो रसध्वनि में ही होता है, उस रस के पोषक भावों की भी अभिव्यक्ति होती है । उदाहरण के लिये ‘स्निग्धयैयामलकान्तिलितवियत्’ इत्यादि पद्य को लीजिये । इसकी विस्तृत व्याख्या द्वितीय उद्योत की प्रथम कारिका में की जा चुकी है । यहाँ पर असंल्लक्ष्यक्रम व्यङ्ग्य रसध्वनि विप्रलभशृङ्गारास्पद है । साथ ही शोक और आवेश की भी अभिव्यक्ति होती है जो कि उसका व्यभिचारी भाव है । इन दोनों की एक साथ चर्वणा होती है । दोनों का व्यञ्जक यह पद्य ही है । अतः यहाँ पर ध्वनि के स्वगत भेदों का एकाश्रयानुप्रवेश सङ्कर है ।
( कुछ लोगों ने यहां पर रामशब्द के अर्थान्तरसङ्क्रमित वाच्य और रसध्वनि इन दो का एकाश्रयानुप्रवेश सङ्कर बतलाया है । क्योंकि दोनों का अभिव्यञ्जन रामशब्द से ही होता है । वस्तुतः यह ठीक भी है । किन्तु इससे आलोचक के इस कथन की सार्थकता नहीं होती कि अधिकतर ऐसे स्थान पाये जाते हैं जहाँ एक पद में दो व्यङ्ग्यों का समावेश होता है । अतः बाहुल्य की व्याख्या करने के लिये रसध्वनि का व्यभिचारियों की व्यञ्जना से उपकृत होना मानना ही पड़ेगा । यही लोचनकार का आशय है । )
उपर स्वगत भेदों मे तीनों प्रकार के सङ्कर की व्याख्या की जा चुकी । अब स्वगत भेदों की संसृष्टि को लीजिये । संसृष्टि वहाँ पर होती है जहाँ दो ध्वनिभेद परस्पर रूप में स्थित होने हैं । जैसे ‘स्निग्धशय्यामलकान्तिलसितवियत्’ इस पद्य को लीजिये । यहाँ पर ‘लिङ्ग’ शब्द इत्यादि का अर्थ वाच्यित है । लिङ्ग किसी मूर्त तथा स्पृश्य वस्तु का क्रिया जाता है । कान्ति का लेप नहीं हो सकता इससे
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गुणीभूतव्यङ्ग्यसड्ढीर्णत्वं यथा—‘न्यक्कारो ह्यमेव मे यदुरयः’ इत्यादौ। यथा वा— कर्त्ता व्यतच्छलानां जतुमयशरणोदीपनः सोडिभिमानी । कृष्णकिशोरैरुपेतनयटनपटुः पाण्डवानां यस्य दासः ॥ राजा दुश्शासनोदेर्गुरुरतुजशतस्याड्गराराजस्य मित्रम् । कास्ते दुर्योधनोडसौ कथयतन रुपा दृष्टुमभ्यागतौ स्वः ॥
गुणीभूत व्यंग्य से संकीर्ण उदाहरण जैसे—‘न्यक्कारो ह्यमेव मे यदुरयः’ इत्यादि में। अथवा जैसे— व्यूत के छलों का करनेवाला, लाख के बने मकान का जलानेवाला, वह अभिमानी, द्रौपदी के केश तथा उत्तराय के अपसारण में निपुण, जिसके दास पाण्डव हैं, दुश्शासन इत्यादि का राजा, सौ छोटे भाइयों का दुष्ट, अङ्गराज का मित्र वह दुर्योधन कहाँ है, कहते क्यों नहीं हो, हम दोनों क्रोधपूर्वक देखने आये हैं ।’
अत्र ह्यलङ्कारमथयङ्ग्यस्य वाक्यार्थीभूतस्य व्यङ्ग्यविशिष्टवाच्याभिधेयिभिः पदैः समिमिश्रता। अत्र एक च पदार्थाश्रितत्वे गुनीभूतव्यङ्ग्यस्य वाक्यार्थाश्रितत्वे च ध्वने: सड्ढीर्णतायार्मपि न विरोधः स्वप्रभेदान्तरत्वात्। यथा हि ध्वने: प्रभेदान्तराणि परस्परं सड्ढीर्णत्वे पदार्थवाक्यार्थाश्रितत्वेन च न विरुद्ध्यन्ति।
लोचन एवं स्वप्रभेदं प्रति चतुर्मेदानुदाहरणस्य गुणीभूतव्यङ्ग्यं प्रत्युदाहरणति—गुणीभूततेऽपि हीत्युदाहरणाद्येऽपि । अलङ्कारकमथयङ्ग्यस्येति रौद्रस्य व्यङ्ग्यविशिष्टेस्थ्यनेत गुणवता व्यङ्ग्यस्योक्ता। पदैरित्युपलक्षणे तृतीया । तेन तदुपलक्षिते योडर्थो
इस प्रकार स्वप्रभेदों के प्रति चारों प्रभेदों के उदाहरण देकर गुणीभूतव्यङ्ग्य के प्रति उदाहरण देते हैं—‘गुणीभूततेऽपि’ यह । यहाँ निस्सन्देह अर्थात् दोनों ही उदाहरणों में । ‘अलङ्कारकमथयङ्ग्य का’ यह । रौद्र के प्रतीत होने से ‘व्यङ्ग्यविशिष्ट’ इत्यादि के द्वारा व्यङ्ग्य की गुणरूपता कही गई है । ‘पदैः’ में उपलक्षण में तृतीया है । इससे उसके द्वारा उपलक्षित की हुई, व्यङ्ग्य के गुणोभाव के द्वारा
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व्यङ्ग्यगुणीभावेन वतंते तेन सन्मिश्रता सङ्करीणता । सा चानुप्राह्यानुप्राहकमावेन, सन्देहयोगेनैककष्यङ्कानुप्रवेशेन चेति यथासम्भवमुदाहरणद्वये योज्या । तथाहि मे 'यदरय इत्यादिभिः सर्वैरैव पदार्थैः कर्तेत्यादिमिश्र विभावादिरूपतया रौद्र एवानुगृह्यते । जो अर्थे वर्तमान रहता है, उसकी सन्मिश्रता अर्थात् सङ्करीणता और वह अनुप्राह्यानुप्राहक भाव के द्वारा, सन्देह योग के द्वारा और एक व्यङ्ग्यानुप्रवेश के द्वारा यथासम्भव दोनो उदाहरणो में जोड़ी जानी चाहिये । वह इस प्रकार 'मेरे जो रथ' इत्यादि इन सब पदार्थों के द्वारा और 'कर्तव्योतचछलानां-' इत्यादि के द्वारा विभावादि रूपता से रौद्र ही अनुगृहीत होता है ।
लोचन
'लिम्प' शब्द का प्रकृत कान्ति के लेप के अर्थ में बाध हो जाता है । उससे लक्ष्यार्थ निकलता है कि 'कान्ति सभी अवयवों में व्याप्त है ।' इसकी प्रयोजन-रूप व्यञ्जना यह है कि कान्ति सभी अवयवों में परिपूर्ण रूप में तथा अतिशयता के साथ भर गई है । इस प्रकार यहाँ पर 'लिम्प' शब्द के अर्थ का सर्वथा त्याग हो जाता है । अतः यह अत्यन्ततिरसकृत वाच्य नामक ध्वनि भेद का उदाहरण है । 'राम' शब्द अर्थान्तरसंक्रमित वाच्य नामक ध्वनि भेद का उदाहरण है जैसे कि विस्तरपूर्वक द्वितीय उद्योत की प्रथम कारिका की व्याख्या में दिखलाया जा चुका है । ये दोनों ध्वनि भेद परस्पर असम्बद्ध होकर स्थित रहते हैं । अतः यहाँ ध्वनि के दो स्वगत भेदों की संसृष्टि है । इसी प्रकार अन्यत्र भी समझना चाहिये ।
तारावती
यहाँ तक ध्वनि के स्वगत भेदों के चारों प्रकारों की व्याख्या की गई । अब गुणीभूतव्यङ्गच के साथ ध्वनि के सादृश्य और संसृष्टत्व को लीजिये—तृतीय उद्योत की १६वीं कारिका की व्याख्या में 'न्यक्कारो हृयमेव' इत्यादि पद्य में प्रत्येक पद की व्यञ्जना की व्याख्या की जा चुकी है । इस व्याख्या के अनुसार प्रत्येक पद व्यङ्गचविशिष्ट होकर ही चमत्कारकारक होता है । इस प्रकार प्रत्येक पद गुणीभूत-व्यङ्गच का उदाहरण है । पूर्ण पद्य में रौद्र रसध्वनि होती है । ( यहाँ पर रौद्र रस की व्यञ्जना होती है यह लोचनकार का मत है । निवेद नामक व्यभिचारी से पुष्ट होकर वीर रस ही ध्वनि का रूप धारण करता है ।) इस प्रकार यहाँ पर रस, ध्वनि और गुणीभूतव्यङ्गच का सादृश्य है । दूसरा उदाहरण लीजिये—
यह पद्य वेणीसंहार के पञ्चम अङ्क से लिया गया है । महाभारत के युद्ध में अनेक वीरों का शस्त्रास्त्र हो चुका है । भीम ने दुःशासन के हृदय का रक्त
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कर्तेत्यादौ च प्रतिपदं प्रत्यवांतरवाक्यं प्रतिसमासं च व्यङ्ग्यमुत्प्रेक्षितुं शक्यमेव न लिखितम् । 'पाण्डवा यस्म दासा:' इति तदीयोक्रथ्यतुकार: । तत् गुणवैशिष्ट्यड्ङ्गयतापि योजयितुं शक्या, वाच्यस्यैव क्रोधोद्दीपकत्वात् । दासैश्र कृतकृत्यै: स्वाम्यवश्यं द्रष्टव्य इत्यर्थंशक्यतुरणनरूपतापि । उभयथापि चारुत्वादेकक्षग्रहे प्रमाणाभाव: । एकव्यङ्जकानुप्रवेशस्तु तैरैव पदै: गुणवैशिष्ट्यड्ङ्ग्यप्रस्य प्रधानीभूतस्य च रसस्य विभावादिद्वारतयामिष्यक्ताव । अत एव चेतिं । यतोडत्र लक्ष्ये दर्शयते तत् इत्यर्थ: ।
और 'कर्त:' इत्यादि प्रत्येक शब्द में, प्रत्येक अवान्तर वाक्य में और प्रत्येक समास में व्यङ्ग्य की उत्प्रेक्षा की जा सकती है इसलिये नहीं लिखा गया । 'पाण्डव जिसके दास हैं' यह उसकी उक्ति का अनुकरण है । उसमें गुणीभूत व्यङ्ग्यता की भी योजना की जा सकती है, क्योंकि वाच्य ही क्रोधोद्दीपक है और 'कृतकृत्य' दासों के द्वारा स्वामी अवश्य द्रष्टव्य जाना चाहिये' यह अर्थशक्तिगूढक अनुरणन रूप व्यङ्ग्यता भी है । दोनों प्रकार से चारुत्व होने के कारण एक पक्ष के ग्रहण में प्रमाण नहीं है । एकव्यङ्जकानुप्रवेश तो उन्हीं पदों से गुणीभूत व्यङ्ग्य के और प्रधानीभूत रस के विभाव हेत्यादि के द्वारा अभिव्यक्त होने के कारण सिद्ध हो जाता है । अत एव च' यह ।
पी लिया है; कर्ण और अर्जुन का युद्ध चल रहा है । दुर्योधन वट वृक्ष के नीचे चिन्ताग्रस्त सुद्रामा में बैठे हैं । उसी समय धृतराष्ट्र, संजय और गांधारी आकर दुर्योधन को युद्ध छोड़ने का उपदेश देते हैं किन्तु दुर्योधन हठ कर रहा है । इतने में सुनाई देता है कि कर्ण मारा गया । सब उद्विग्न तथा शोकग्रस्त हैं; दुर्योधन बदला लेने के लिये एकदम चल देना चाहता है । इसी समय पाण्ड़व के पीछे भीम और अर्जुन का स्वर सुनाई देता है । वे कहते हैं—
हम दोनों दुर्योधन से क्रोध के साथ मिलने आये हैं, तुम लोग हमें क्यों नहीं बतलाते कि वह दुर्योधन कहाँ है ? वह दुर्योधन जो कि चूतच्छलों का करनेबाला है, वह दुर्योधन जो लाख के बने हुये हमारे आवासस्थलों को जलानेवाला है, वह अभिमानी दुर्योधन जो द्रौपदी के केश और उत्तरीय के हटाने में बड़ा ही निपुण है, वह दुर्योधन पाण्डव जिसके दास हैं, वह दुर्योधन दुश्शासन इत्यादि का राजा, सौ छोटे भाईयों में ज्येष्ठ, अर्जुनराज ( कर्ण ) का मित्र वह दुर्योधन कहाँ है ।
हम दोनों दुर्योधन से क्रोध के साथ मिलने आये हैं, तुम लोग हमें क्यों नहीं बतलाते कि वह दुर्योधन कहाँ है ? वह दुर्योधन जो कि चूतच्छलों का करनेबाला है, वह दुर्योधन जो लाख के बने हुये हमारे आवासस्थलों को जलानेवाला है, वह अभिमानी दुर्योधन जो द्रौपदी के केश और उत्तरीय के हटाने में बड़ा ही निपुण है, वह दुर्योधन पाण्डव जिसके दास हैं, वह दुर्योधन दुश्शासन इत्यादि का राजा, सौ छोटे भाईयों में ज्येष्ठ, अर्जुनराज ( कर्ण ) का मित्र वह दुर्योधन कहाँ है ।
( लोचनकार ने इस पद्य की व्याख्याओं के विषय में केवल इतना ही लिखा है कि इसके प्रत्येक शब्द, प्रत्येक उपवाक्य और प्रत्येक समास की व्यञ्जनायें
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तारावती
'इसकी व्यञ्जनाओं की व्याख्या स्पष्ट हैं, अतः उनका उल्लेख अनावश्यक है ।' इसकी व्यञ्जनाओं की व्याख्या इस प्रकार की जा सकती है 'कर्ता' में 'कृ' धातु से सीधे कर्तर्थक प्रत्यय से व्यक्त होता है कि द्यूत के अवसर पर छल करने में शकुनि तो निमित्तमात्र था वास्तविक उत्तरदायी तो यह दुर्योंधन ही था । 'द्यूतच्छलानां' के बहुवचन से व्यक्त होता है कि इस दुर्योंधन ने हम लोगों से एक नहीं अनेक छल किये हैं । 'जतुमयसारणोद्दीपनाः' की व्यञ्जना यह है कि इस दुर्योंधन ने हम लोगों को नष्ट कर देने में कोई कमी शेष नहीं रखी, यह तो परमात्मा की कृपा थी कि हम अपने भाग्य से बचते रहे । 'कर्ता द्यूतच्छलानां' 'जतुमयसारणोद्दीपनाः' इन दोनों वाक्यखण्डों से व्यञ्जना निकलती है कि सारा अपराध इसी दुष्ट दुर्योंधन का है जिससे यह सारा वंश नष्ट हो गया । 'सः' 'वह' से अभिव्यक्त होता है कि दुर्योंधन अपनी दुष्टता के लिये सर्वत्र प्रसिद्ध हो गया । 'अभिमानी' की व्यञ्जना यह है कि अब दुर्योंधन का अभिमान कहाँ चला गया ? उसे अपने अभिमान का पूरा बदला मिल गया । 'कृपणिकशोकोत्तरव्यपनयनपटुः' से व्यञ्जना निकलती है कि दुर्योंधन ने तो द्यूत के अवसर पर पाण्डवों को जीतकर अपना दास बना लिया था और वह सर्वदा पाण्डवों को अपना दास ही कहा करता था । क्या उसे अब तक पता नहीं चला कि ऐसे अन्याय का परिणाम क्या होता है ? 'दुःशासनो द्राजा' से दुःशासन इत्यादि सभी वंशवर्तियों के मारे जाने की व्यञ्जना होती है, 'गुरुनतुराशातस्य' से व्यक्त होता है कि जिस दुर्योंधन को अपने सौ भाइयों पर पूरा अभिमान था वह अब अकेला शेष रह गया; उसके सभी भाइयों को एकाकी भीम ने ही मार डाला । 'अङ्गराजस्य मित्रम्' से व्यक्त होता है कि दुर्योंधन सर्वदा अङ्गराज की ही सम्मति पर चला करता था और समस्त अनर्थ अङ्गराज की दुर्बुद्धि के ही कारण हुये थे । दुर्योंधन समझता था अकेला अङ्गराज ही सभी पाण्डवों को मार सकता है किन्तु आज अङ्गराज का कहीं पता नहीं । आज हम क्रोध और क्रूरता के साथ दुर्योंधन का अन्त करने आये हैं । दुःशासन उसके सौ भाई और कर्ण इत्यादि उसके सहायक अब कहाँ हैं जिनके बल पर उसने इतना अन्याय किया था ) ।
'न्यक्कारो ह्यमेव' और 'कर्ता द्यूतच्छलानां' इन दोनों पदों में रौद्ररस की व्यञ्जना होती है ( अथवा प्रथम में वीररस की और दूसरे में रौद्ररस की व्यञ्जना होती है । ) यह रौद्ररस असंलिच्यचक्र व्यङ्ग्य है और प्रधानीभूत वाक्यार्थ बनकर यही ध्वनि का रूप धारण करता है । इन दोनों पदों में शब्दों से जो
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व्यङ्ग्यनायें वतलाई गई हैं शब्दो के अर्थ उन विशिष्ट प्रकार को व्यङ्ग्यनाओ से मिश्रित होकर ही अवभासित होते हैं। इस प्रकार व्यङ्ग्यविशिष्ट वाक्य का अभिधान करने के कारण इन में गुणीभूतव्यङ्ग्य है। यहाँ पर 'पदैः समिमिश्रता' अर्थात् व्यङ्ग्यविशिष्ट वाक्य को कहनेवाले से असंललक्ष्यक्रम व्यङ्ग्य का समि-मिश्रित होना बतलाया गया है। वस्तुतः असंललक्ष्य क्रम व्यङ्ग्य पदों से नहीं अपितु उनके अर्थों से समिमिश्रित होता है। अतः यहाँ पर 'पदैः' में उपलक्षण में तृतीया माननी चाहिये जिसका आशय यह होता है कि पदों के विशिष्टाभिधव्यञ्जनपरक प्रयोग के कारण ही असंललक्ष्य क्रम व्यङ्ग्य से विभिन्न गुणीभूतव्यङ्ग्यों का समिमिश्रण उपलक्षित होता है। अन्वय यह प्रश्न उपस्थित होता है कि इन दोनों पयों में यह समिमिश्रण होता किस प्रकार है ? इसका उत्तर यह है कि सङ्कर के तीनों भेदों की यहाँ यथासम्भव योजना कर लेनी चाहिये। वह इस प्रकार— ( १ ) 'मेरे और शत्रु' इत्यादि सभी वाक्यार्थों से अथवा 'कल' इत्यादि के वाक्यार्थों से इन दोनों पयों की विभावरूप सामग्री का ही सम्भावन किया जाता है। यह व्यङ्ग्य विशिष्ट वाक्य के द्वारा रस ध्वनि के अनुग्रहीत होने से गुणीभूतव्यङ्ग्य और रस का अनुप्राह्यानुग्राहक भाव सङ्कर है। ( २ ) 'माण्डव जिसके दास है' यह दुर्योधन की उक्ति का अनुकरण है। अर्थात् दुर्योधन ऐसा कहा करता था। उसने हम लोगों को दास बना लिया था जिसका उचित दण्ड उसे मिल गया कि उसके सब भाई इत्यादि मारे गये। इस प्रकार 'माण्डव जिसके दास हैं' से यह व्यङ्ग्यना निकलती है। किन्तु प्रधानता वाच्यार्थ को ही है क्योंकि क्रोध की अभिव्यक्ति वाच्यार्थ से ही होती है। व्यङ्ग्यार्थ उसमें सहायक मात्र होता है। इस प्रकार यह गुणीभूतव्यङ्ग्य है। साथ ही इससे यह भी व्यङ्ग्यना निकलती है कि 'हम तो दुर्योधन के दास हैं, दासों का यह कर्तव्य होता है कि स्वामी का कार्य कर के स्वामी का दर्शन करें। इस दुर्योधन का काम कर आये हैं और अब उनसे मिलना चाहते हैं, उनसे कह दो कि तैयार हो जाएँ।' यह व्यङ्ग्यना वाक्य को अपेक्षा प्रधान है अतः स्वतः सम्भवी वस्तु से अनुरणनरूप वस्तु ध्वनि भी यहाँ विद्यमान है। यह निर्णय नहीं किया जा सकता कि उक्त व्यङ्ग्यविशिष्ट वाक्य अधिक चमत्कारकारक है या यह अनुरणनरूप व्यङ्ग्यध्वनि। इस प्रकार यहाँ सन्देहसङ्कर है। ( ३ ) एकव्यङ्ग्यकानुप्रवेश सङ्कर तो स्पष्ट हो है। उन्हीं शब्दों से गुणीभूतव्यङ्ग्य की भी व्यङ्ग्यना होती है, और उन्हीं से विभाव इत्यादि के माध्यम से असंललक्ष्यक्रम व्यङ्ग्य रसध्वनि भी अभिव्यक्त होती है। इस प्रकार सङ्कर के तीनों भेदों की यहाँ पर व्याख्या की जा सकती है।
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ननु व्यङ्ग्यं गुणीभूतं प्रधानं चेति विरुद्धमेव तदूदर्शनमानमन्युक्तत्वात् श्रद्धेयमिस्याशङ्क्य व्यञ्जकभेदात्तावन्न विरोध इति दर्शयति—अत एवेति । स्वेति । स्वभेदान्तराणि सङ्कीर्णतया पूर्वमुदाहृतानीति तान्येव दृष्टान्तयति तदेव व्याचष्टे—यथा हीति । तथाहि प्रतीच्यद्याहारोदाहरण कर्तव्यः। ‘तथाहि’ इति वा पाठः।
प्रश्न यह है कि व्यङ्ग्य गुणीभूत है या प्रधान, यह परस्पर विरुद्ध बात है और इसे दिखलाने में समर्थ होने से श्रद्धेय नहीं है। इसका समाधान करते हुए कहते हैं कि व्यञ्जक के भेद से विरोध नहीं होता—‘अत एव’ इत्यादि । ‘स्वेति’ अर्थात् अपने भेदान्तर सङ्कीर्ण होने के कारण पहले जो उदाहरण दिये गये थे वे ही यहाँ दृष्टान्त के रूप में प्रस्तुत किये जा रहे हैं। ‘तदेव व्याचष्टे’ अर्थात् उसी को स्पष्ट करते हुए कहते हैं—‘यथा हीति’ । यहाँ पर ‘तथाहि’ का अर्थ है कि प्रतीच्यद्याहार का उदाहरण देना चाहिए। इसके स्थान पर ‘तथाहि’ पाठ भी हो सकता है।
( प्रश्न ) व्यङ्ग्य गुणीभूत भी और प्रधान भी यह विरुद्ध है वह दिखलाई पड़ता हुआ भी उक्त हेतु से श्रद्धेय नहीं है यह शङ्का करके व्यञ्जक भेद से विरोध नहीं होता यह दिखलाते हैं ‘अतएव’ यह । ‘अपने’ यह । अपने दूसरे प्रभेद जिनका सङ्कीर्ण के रूप में उदाहरण दिया गया है उन्हीं को दृष्टान्त बना रहे हैं वही कहते हैं—‘निस्सन्देह जैसे’ । ‘वैसा यहाँ पर’ यह अध्याहार करना चाहिये ।
( प्रश्न ) यह तो विचित्र सी बात है कि व्यङ्ग्य गुणीभूत भी है और प्रधान भी । यह परस्पर विरुद्ध बात मानी कैसे जा सकती है ? ( उत्तर ) क्योंकि यह लक्ष्य में दिखलाई पड़ता है जिसके उदाहरण अभी दिये जायेंगे; अतः यह मानना ही पड़ता है । ( प्रश्न ) चाहे वह लक्ष्य में दिखलाई ही क्यों न पड़ता हो; किन्तु दिया हुआ हेतु इतना प्रबल है कि लक्ष्य में दिखलाई पड़नेवाले तत्व पर भी श्रद्धा करना उचित ही प्रतीत नहीं होता । जब प्रधान और अप्रधान सर्वथा एक दूसरे के विरुद्ध हैं तब दोनों तत्वों को एकत्र सन्निविष्ट कहना कहाँ तक उचित कहा जा सकता है?
( प्रश्न ) यह कहना अजीब लगता है कि व्यङ्ग्य कभी गुणीभूत होता है और कभी प्रधान । ये दोनों बातें परस्पर विरुद्ध हैं, तो इन्हें कैसे स्वीकार किया जा सकता है? ( उत्तर ) क्योंकि लक्ष्य में इसकी उपस्थिति दिखाई देती है, जिसके उदाहरण आगे दिए जाएंगे; इसलिए इसे मानना ही होगा । ( प्रश्न ) भले ही यह लक्ष्य में दिखाई दे, लेकिन दिया गया हेतु इतना प्रबल है कि लक्ष्य में दिखने वाले तत्व पर भी विश्वास करना उचित नहीं लगता । जब प्रधान और अप्रधान सर्वथा विरोधी हैं, तो दोनों को एक साथ कैसे कहा जा सकता है?
( उत्तर ) प्रधान और अप्रधान व्यङ्गयों में व्यञ्जको का भेद है । अतः उनको परस्पर सर्वथा विरुद्ध नहीं कहा जा सकता। यहाँ पर गुणीभूतव्यङ्ग्य की अभिव्यक्ति पदों के अर्थ से होती है और असंलक्ष्यक्रम व्यङ्ग्य रसध्वनि की अभिव्यक्ति वाक्यार्थ से होती है । एक के व्यञ्जक पदार्थ हैं और दूसरे के व्यञ्जक वाक्यार्थ हैं । इस प्रकार जब दोनों के व्यञ्जकों में भेद है तब आप यह कैसे कह सकते हैं कि दोनों के प्रधान और अप्रधान होने में परस्पर विरोध है ?
इस प्रकार जब दोनों के व्यञ्जकों में भेद है तब आप यह कैसे कह सकते हैं कि दोनों के प्रधान और अप्रधान होने में परस्पर विरोध है ? इनका साज्ज्यं हो सकता है और व्यञ्जकभेद के कारण उनमें कोई विरोध भी नहीं आता । यह इस प्रकार समझिये कि जैसे ध्वनि के स्वगत भेदों में साज्ज्यं और संसृष्टि दिखलाई गई है । उसमें व्यञ्जकभेद के कारण ही दो भेदों के प्रधान और अप्रधानभाव में विरोध नहीं आता । ध्वनि के स्वगत भेदों के उदाहरण पहले दिये जा चुके हैं और यह दिखलाया जा चुका है कि पदार्थ तथा वाक्यार्थ इन दो विभिन्न तत्वों से अभिव्यक्त होने के कारण दोनों का साज्ज्यं वन जाता है । उसी दृष्टान्त से गुणीभूतव्यङ्ग्य और ध्वनि के साज्ज्यं के विषय में भी समझ लिये
इस प्रकार जब दोनों के व्यञ्जकों में भेद होता है, तब आप यह कैसे कह सकते हैं कि दोनों के प्रधान और अप्रधान होने में परस्पर विरोध है? इनमें सङ्गति हो सकती है और व्यञ्जक के भेद के कारण इनमें कोई विरोध नहीं आता। यह इस प्रकार समझना चाहिए कि जैसे ध्वनि के अपने भेदों में सङ्गति और संसृष्टि दिखाई गई है। उसमें भी व्यञ्जक के भेद के कारण ही दो भेदों के प्रधान और अप्रधान भाव में विरोध नहीं आता। ध्वनि के अपने भेदों के उदाहरण पहले दिए जा चुके हैं और यह दिखाया जा चुका है कि पदार्थ और वाक्यार्थ जैसे दो विभिन्न तत्वों से अभिव्यक्त होने के कारण दोनों का सङ्गति बन जाती है। उसी दृष्टान्त से गुणीभूतव्यङ्ग्य और ध्वनि की सङ्गति के विषय में भी समझ लेना चाहिए।
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किं चैकव्यङ्ग्याश्रयत्वे तु प्रधानगुणभावो विरुद्ध्यते न तु व्यङ्ग्यभेदापेक्षया यतोऽप्यस्य नविरोधः। अयं च सङ्करसंस्कृतिरव्यहारो बहूनामेकत्र वाच्यवाचकभाव एव व्यङ्ग्यव्यञ्जकभावेऽपि निर्निरोध एव मन्तव्यः॥
अनु०—भो—एकव्यङ्ग्यव्यञ्जकश्रयत्वे प्रवेशे तथा गुणभावो न परस्पर विरोध होता है व्यङ्ग्यभेद की दृष्टि से नहीं। इससे भी इसका विरोध नहीं होता। और यह सङ्कर-संस्कृति व्यवहार बहुतों के एकत्र वाच्यवाचकभाव के समान व्यङ्गयव्यञ्जकभाव में भी निर्निरोध हो माना जाना चाहिये।
ननु व्यञ्जकभेदादप्रथमभेदयोः परिहारोऽस्तु एकव्यञ्जकानुप्रवेशे तु किं वक्तव्यमिल्याशङ्कच्य पारमार्थिकं परिहारमाह—किं चेति। ततोडन्वयव्यतिरेकाभ्यां गुणीभूतमन्यच्च प्रधानमिति को विरोधः? न तु वाच्यालङ्कारविषये श्रुतोऽयं सङ्करादिव्यवहारो न तु व्यङ्ग्यविषये इत्याशङ्कनीयम्—अयं चेति। मन्तव्य इति मन्तेनैव प्रतीत्या। तथा निश्चेय इत्यत्रापि प्रतीतेरेव शरणत्वादितिभावः।
लोचन ननु व्यञ्जकभेदादप्रथमभेदयोः परिहारोऽस्तु एकव्यञ्जकानुप्रवेशे तु किं वक्तव्यमित्याशङ्क्य पारमार्थिकं परिहारमाह—किं चेति। ततोडन्वयव्यतिरेकाभ्यां गुणीभूतमन्यच्च प्रधानमिति को विरोधः? न तु वाच्यालङ्कारविषये श्रुतोऽयं सङ्करादिव्यवहारो न तु व्यङ्ग्यविषये इत्याशङ्कनीयम्—अयं चेति। मन्तव्य इति मन्तेनैव प्रतीत्या। तथा निश्चेय इत्यत्रापि प्रतीतेरेव शरणत्वादितिभावः।
( प्रश्न ) व्यञ्जक भेद से प्रथम दो भेदों का परिहार हो जाय, एक व्यञ्जकानुप्रवेश शङ्कर के विषय में क्या कहा जाना चाहिये? यह शङ्का करके वास्तविक परिहार बतला रहे हैं ‘और भी’ यह। ‘उससे भी’ यह। क्योंकि दूसरा व्यङ्गयगुणीभूत है और दूसरा प्रधान है, अतः उसमें क्या विरोध? ( प्रश्न ) यह सङ्कर इत्यादि का व्यवहार तो वाच्यालङ्कार के विषय में सुना गया है; व्यङ्गय के विषय में तो नहीं? यह शङ्का करके कहते हैं—‘और यह’ यह। ‘माना जाना चाहिये’ यह। भाव यह है कि मनन से अर्थात् प्रतीति से वैसा निश्चय करना चाहिये। क्योंकि दोनों ओर प्रतीति का ही सहारा है।
जाना चाहिये। यहाँ पर आलोक में--‘यथाहि…… विरुध्यते’ यह वाक्य अधूरा सा मालूम पड़ता है। क्योंकि इसमें केवल दृष्टान्त तो दिया गया है दाष्टान्त नहीं। अतः यहाँ पर ‘तथात्रापि’ यह वाक्यखण्ड जोड़कर पूरा कर लेना चाहिये। अथवा ‘यथाहि’ के स्थान पर ‘तथाहि’ कर लेना चाहिये जिससे यह तर्क हो जावेगा और वाक्य की अपूर्णता जाती रहेगी।
तारावती जाना चाहिये। यहाँ पर आलोक में--‘यथाहि…… विरुध्यते’ यह वाक्य अधूरा सा मालूम पड़ता है। क्योंकि इसमें केवल दृष्टान्त तो दिया गया है दाष्टान्त नहीं। अतः यहाँ पर ‘तथात्रापि’ यह वाक्यखण्ड जोड़कर पूरा कर लेना चाहिये। अथवा ‘यथाहि’ के स्थान पर ‘तथाहि’ कर लेना चाहिये जिससे यह तर्क हो जावेगा और वाक्य की अपूर्णता जाती रहेगी।
(प्रश्न) अपने विरोधपरिहार के लिये व्यञ्जकभेद का सहारा लिया है। यह अनुमाानुमाहकभाव सङ्कर और सन्देहसङ्कर के विषय में तो ठीक कहा जा सकता है; किन्तु एकाश्रयातुप्रवेश सङ्कर के विषय में क्या व्यवस्था होगी जहाँ एक ही व्यञ्जक से दो व्यङ्गयार्थ निकलते हैं? जब तक व्यञ्जक एक ही नहीं
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यत्र तु पदानी कानिचिदिवक्षितवाच्यान्यनुरणनरूपव्यङ्ग्यथवाच्यानि वा तत्र ध्वनिगुणीभूतव्यङ्ग्यचयोः संसृष्टिस्त्वम् । यथा—‘तेषां गोपवधूविलाससुहृदाम्’ इत्यादौ। अत्र हि ‘विलाससुहृदां’ ‘राधारहःसाक्षिणाम्’ इत्येते पदे ध्वनिप्रसदरूपे ‘ते’ ‘जाने’ इत्येत च पदे गुणीभूतव्यङ्ग्यचरुपे ।
(अनु०) जहाँ कुछ पद तो अविवक्षितवाच्य होते हैं अथवा अनुरणनरूप व्यङ्ग्यवाच्य होते है वहाँ ध्वनि और गुणीभूतव्यङ्ग्य की संसृष्टि होती है । जैसे—‘तेषां गोपवधूविलाससुहृदाम्’ इत्यादि में । यहाँ निस्सन्देह ‘विलाससुहृदाम्’ और ‘राधारहःसाक्षिणां’ ये दो पद ध्वनि के उपभेदरूप हो हैं और ‘ते’ तथा ‘जाने’ ये दो पद गुणीभूतव्यङ्ग्यरूप हैं ।
तारावती
होगा तब तक यह भेद कहा ही नहीं जा सकेगा और व्यङ्ग्य के एक हो जाने पर व्यङ्गयभेद का आपक आश्रय समाप्त हो जावेगा । (उत्तर) केवल व्यङ्गकभेद ही नहीं व्यङ्गयभेद भी प्राधानता तथा गुणीभाव का भेदक होता है । प्रधानता तथा गुणीभाव का विरोध वहीं पर होता है जहाँ एक ही व्यङ्ग्य को प्रधान भी कहा जाय और उसी को गुणीभूत बतलाया जाय । इसके प्रतिकूल जहाँ प्रधान कोई दूसरा व्यङ्ग्य होता है और गुणीभूतव्यङ्ग्य कोई दूसरा होता है वहाँ विरोध का प्रश्न ही नहीं उठता । वस्तुतः यही उत्तर ठीक है । व्यङ्गय भेद का उत्तर सभी भेदों में ठीक बैठ जाता है । जब दो वस्तुयें भिन्न भिन्न ही हैं तब उनमें एक प्रधान और दूसरा अप्रधान कैसे हो सकती है? (प्रश्न) पुराने आचार्यों ने संकर और संसृष्टि का व्यवहा तो वाच्यालंकारों के विषय में किया है । आप उन्हें ध्वनिभेदों के क्षेत्र में लागू कर रहे हैं इसमें क्या औचित्य है ? (उत्तर) पुराने आचार्यों ने मनन किया और उन्हें प्रतीत हुआ कि संकर और संसृष्टि का व्यवहा वाच्यालंकारों के विषय में किया जा सकता है । इस बात का निर्णय कि किस तत्व का व्यवहा किस क्षेत्र मे किया जाय मनन और प्रतीति का ही कार्य है । यही मनन और प्रतीति यह बतलाती है कि संकर और संसृष्टि का व्यवहा व्यङ्गय अर्थों के विषय मे भी हो सकता है । दोनों स्थानों पर प्रतीति का ही एकमात्र आश्रय लिया जा सकता है और वह आश्रय वाच्यालंकारों के समान व्यञ्जना के क्षेत्र में भी इनके व्यवहा के औचित्य को सिद्ध करता है ।
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पञ्चं गुणीभूतदयङ्ग्यसड्ऱ्रमेदांस्वानुदाहृत्य संसृष्टिमुदाहरति-यत्र तु पदानीति । कानिचिदित्यनेन सकृरावकाशं निराकरोति । सुहृच्छब्देन साक्षिशब्देन चाविवक्षितवाच्यो ध्वनि; 'ते' इत्यपदेनासाधारणो गुणगणोडभियुक्तोडपि गुणत्वमवलम्बते, वाच्यस्वैत स्मरणस्य प्राधान्येन चाकुङ्कहेतुत्वात् । 'जाने' इत्यनेनोत्रमुख्यमाणान्त धर्म-व्यज्जकेनापि वाच्यमेवोत्र्मेक्षणरूपं प्रधानीक्रियते । एवं गुणीभूतदयङ्ग्येडपि चत्वारो भेदा उदाह्रता: ।
इस प्रकार गुणीभूत व्यङ्ग्य के संकर के तीन भेदों के उदाहरण देकर संसृष्टि का उदाहरण देते हैं—‘जहाँ तो पद’ इत्यादि ‘कुछ’ इससे संकर के अङ्गकास का निराकरण करते हैं । ‘सुहृत्’ शब्द से और ‘साक्षिन्’ शब्द से अविवक्षितवाच्य ध्वनि है । ‘ते’ इस पद के द्वारा यद्यपि असाधारण गुणगणों की अभिध्यक्ति होती है तथापि (वह गुणगण) गौणरूपता को प्राप्त कर लेता है । क्योंकि यहाँ पर वाच्यस्मरण ही प्रधानरूप में चाकुङ्क में हेतु है । ‘जाने’ इस शब्द के उत्पादक किये जानेवाले अनन्तधर्म के व्यज्जक होने पर भी उत्पाद्यरूप वाच्य ही प्रधान बना दिया जाता है । इस प्रकार गुणीभूत व्यङ्ग्य में भी चारों भेदों के उदाहरण दिये गये ।
तारावती
ऊपर गुणीभूत व्यङ्ग्य के सांकर्य के तीनों प्रकारों को उदाहरणों के द्वारा समझाया गया । अब गुणीभूत व्यङ्ग्य की संसृष्टि पर विचार किया जा रहा है । गुणीभूत व्यङ्ग्य तथा ध्वनिभेदों की संसृष्टि वहाँ पर होती है जहाँ कुछ पद अविवक्षितवाच्य परक हों और उनसे भिन्न कुछ दूसरे पद अनुरणनरूप व्यङ्ग्य-परक हों तथा उनमें कुछ तो प्रधान होकर ध्वनि का रूप धारण करते हों और दूसरे गुणीभूतव्यङ्ग्य का । कुछ पद इस प्रकार के हों और कुछ उस प्रकार के । यह कहने का अभिप्राय यह है कि ध्वनिरूपता में परिपतन होनेवाली व्यञ्जना और गुणीभूत व्यङ्ग्य का रूप धारण करनेवाली व्यञ्जना पृथक् पृथक् शब्दों से प्रतीत होने चाहिये । यदि व्यञ्जक शब्दों का पार्थक्य नहीं होगा तो एक ही शब्द से उद्दूत होकर दो पृथक् व्यवस्थतियाँ संकर का रूप धारण कर लेंगी संसृष्टि का उदाहरण नहीं वन पायेगी । इसी मन्तव्य से ‘कुछ’ शब्द का प्रयोग किया गया है । ‘कुछ शब्दों’ में ‘कुछ’ शब्द के प्रयोग से ध्वनि की सम्भावना का निराकरण हो जाता है । उदाहरण के लिये ‘तेपा गोपवधूविलासमुह्दराम् । इस पर्य को लीजिये । इसकी विस्तृत व्याख्या द्वितीय उद्योत की ५वीं कारिका में की जा चुकी है । वहाँ पर ‘ह्लादिनीशम्’ को ‘गोपवधुओं के विलास का मित्र’ तथा ‘राधा के एकान्त विहार का साक्षी’ कहा गया है । मित्रता करना या साक्ष्य देना
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वाच्यालङ्कारसङ्गीर्णत्वमलङ्क्रमलङ्घ्यापेक्षया रसवति सालङ्कारे काव्ये सर्वत्र सुव्यवस्थितम्।
अलङ्कार्य अलंकारों से युक्त तथा वाच्यालङ्कारों से सङ्गीर्ण होने पर भी जहाँ रस की दृष्टि से सालङ्कार काव्य में सर्वत्र सुव्यवस्थित है।
अब अलंकारगत उन (भेदों) को दिखलाते हैं—‘वाच्यालङ्कार’ यह वाच्य शब्द का आशय यह है कि व्यङ्ग्यत्व में तो अलङ्कारों का उत्त ८ भेदों में ही अन्तर्भाव हो जाता है। ‘काव्य’ यह। निस्सन्देह इस प्रकार का ही काव्य होता है। ‘सुव्यवस्थित’ यह। ‘विवक्षा तत्परत्वेन’ इस द्वितीयोद्योत के मूल के उदाहरणों से यह चेतन धर्म ही है, लतावेश्म जैसे जड़ तत्त्व से न तो मिल्रता की ही सम्भावना की जा सकती है और न साक्ष्य ही का कार्य उनसे सम्भव हो सकता है। अतः सुहृद् और साक्षी शब्द बाधित हैं तथा उनसे लक्ष्यार्थ निकलता है कि उन लताओं में गोपीयों के विलास और राधा की एकान्त प्रणय लीला चरितार्थ करती थी। इनसे प्रयोजन रूप व्यङ्ग्यार्थ यह निकलता है कि उनमें पर्याप्त मात्रा में स्वच्छन्द तथा उन्मुक्त विहार हुआ है, इसी व्यङ्ग्यार्थ की प्रधानता है। अतः यहाँ पर अत्यन्ततिरसृक्त अविवक्षित वाच्य ध्वनि है। इसके साथ ही ‘ते’ ‘वे’ शब्द से व्यक्त होता है कि उनमें असाधारण गुणसमूह विद्यमान हैं। यह अभिव्यक्त असाधारण गुणसमूह गौण ही है क्योंकि इन अभिव्यक्त गुणगणों से युक्त ‘ते’ शब्द ही चारुत्व में हेतु है और वही स्मरण का बोधक है। इस प्रकार ‘जाने’ ‘ज्ञात होता है’ यह शब्द उत्प्रेक्षा या कल्पना का वाचक है। इससे अनेक उत्प्रेक्ष्य धर्मों की व्यञ्जना होती है। उन व्यङ्गय उत्तप्रेक्ष्य धर्मों से उपरूक्त होकर ‘जाने’ की उत्प्रेक्षा ही चमत्कार में कारण होती है। इस प्रकार ‘ते’ और ‘जाने’ शब्दों में व्यङ्ग्योपसृकृत, वाच्य ही चमत्कार में कारण है। अतएव इन शब्दों में गुणीभूत व्यङ्गय है। ‘सुहृदां’ और ‘साक्षिणां’ शब्दों में अविवक्षितवाच्य ध्वनि सिद्ध की जा चुकी है। इस ध्वनि और गुणीभूत व्यङ्ग्य के व्यक्कक पृथक् पृथक् हैं। अतएव यहाँ इन दोनों की संसृष्टि है। इस प्रकार गुणीभूत व्यङ्गय में भी तीन प्रकार का सङ्कर और एक प्रकार की संसृष्टि ये चार भेद बतलाये जा चुके और उनके उदाहरण दिये गये।
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दाहरणेऽस्य: सङ्करत्नयां संसृष्टिश्व लभ्यत एव । ‘चलापाङ्गां ददृशिम्’ इत्यत्र हि रूपकष्यतिरेकस्य प्राग्वद्याख्यातस्य श्रृङ्गारानुप्राहकत्वं स्वभावोक्ते: श्रृङ्गारस्य चैकानुप्रेवशः । ‘उपपहजाया’ इत्यगाथायां पामरसभावोक्तिर्या ध्वनिवेति प्रकरणाद्भावे एकतरग्राहकं प्रमाणं नास्ति ।
तीन प्रकारका संकर और संसृष्टि ये प्राप्त हो जाते हैं । ‘चलापाङ्गांददृशिम्’ यहाँ पर रूपक और व्यतिरेक जिनकी पहले व्याख्या की जा चुकी है श्रृङ्गाररस के अनुप्राहक हैं, स्वभावोक्ति और श्रृङ्गार का एक में अनुप्रवेश है । ‘उपपह जाया’ इस गाथा में पावर स्वभावोक्ति है या ध्वनि है? इनमें एक को ग्रहण करनेवाला प्रमाण प्रकरण इत्यादि के अभाव में है ही नहीं ।
तारावती
अब अलङ्कारों के सङ्कर् और संसृष्टि का प्रश्न सामने आता है । अलङ्कार मूलतः दो प्रकार के होते हैं—एक तो व्यङ्ग्य अलङ्कार और दूसरा वाच्य अलङ्कार। व्यङ्ग्य अलङ्कार के सङ्कर् और संमृष्टि का अन्तर्भाव तो उक्त ८ भेदों में ही हो जाता है जो कि ध्वनि के ४ और गुणीभूत व्यङ्ग्य के ४ भेद अभी तक बतलाये गये हैं । अब वाच्यालङ्कारों का प्रश्न दोप रह जाता है । जहाँ कहीं रसमयी रचना होती है और उसमें अलङ्कारों का भी प्रयोग किया जाता है वहाँ सर्वत्र अङ्गाङ्गद्य कम व्यङ्ग्य की दृष्टि से वाच्यालङ्कार और ध्वनि का सङ्कर््य तो सुध्यवस्थित रूप में अभिगत हो ही जाता है । यदि सच पूछा जाय तो ठीक रूप में काव्य की संज्ञा उसे ही प्राप्त हो सकती है जिसकी रचना का उद्देश्य रसनिष्पत्ति हो और उसमें रसप्रवण अलङ्कारों का चमत्कार की दृष्टि से प्रयोग किया गया हो ।
अब अलङ्कारों के सङ्कर् और संसृष्टि का प्रश्न सामने आता है । अलङ्कार मूलतः दो प्रकार के होते हैं—एक तो व्यङ्ग्य अलङ्कार और दूसरा वाच्य अलङ्कार। व्यङ्ग्य अलङ्कार के सङ्कर् और संमृष्टि का अन्तर्भाव तो उक्त ८ भेदों में ही हो जाता है जो कि ध्वनि के ४ और गुणीभूत व्यङ्ग्य के ४ भेद अभी तक बतलाये गये हैं । अब वाच्यालङ्कारों का प्रश्न दोप रह जाता है । जहाँ कहीं रसमयी रचना होती है और उसमें अलङ्कारों का भी प्रयोग किया जाता है वहाँ सर्वत्र अङ्गाङ्गद्य कम व्यङ्ग्य की दृष्टि से वाच्यालङ्कार और ध्वनि का सङ्कर््य तो सुध्यवस्थित रूप में अभिगत हो ही जाता है । यदि सच पूछा जाय तो ठीक रूप में काव्य की संज्ञा उसे ही प्राप्त हो सकती है जिसकी रचना का उद्देश्य रसनिष्पत्ति हो और उसमें रसप्रवण अलङ्कारों का चमत्कार की दृष्टि से प्रयोग किया गया हो ।
द्वितीय उद्योत में बहुत विस्तार के साथ दिखलाया जा चुका है कि समीचीन्ा पूर्वक सन्निविष्ट किये हुये अलङ्कार ही रसपोषक होते हैं । वहाँ यह भी बतलाया जा चुका है कि रस के उद्देरय से अलङ्कारों के निवन्धन में किस प्रकार की समीक्षा से काम लेना वाहिये । वहाँ पर ‘विक्षातात्परत्वेन’ इत्यादि कारिकाओं की व्याख्या के अवसर पर जो उदाहरण दिये गये थे उन्हीं में वाच्यालङ्कार और रसध्वनि भेद के सङ्कर््य के उदाहरण भी सन्निविष्ट हैं और उन्हीं में रसध्वनि तथा वाच्यालङ्कार की संसृष्टि भी मिल जाती है । जैसे ‘चलापाङ्गां ददृशिम्’ इस उदाहरण को लीजिये । इसकी विस्तृत व्याख्या द्वितीय उद्योत की १९ वीं कारिका में की जा चुकी है । वहाँ यह भी बतलाया गया था कि इसमें मतान्तर से रूपक से युक्त व्यतिरेक भी है । वह रूपकव्यतिरेक श्रृङ्गाररस का अनुप्राहक है । अतः रूपक व्यतिरेक और श्रृङ्गार ध्वनि का वहाँ पर अनुप्राह्यानुप्राहक भाव सङ्कर है । उस पद्य में प्रमुख रूप में
द्वितीय उद्योत में बहुत विस्तार के साथ दिखलाया जा चुका है कि समीचीन्ा पूर्वक सन्निविष्ट किये हुये अलङ्कार ही रसपोषक होते हैं । वहाँ यह भी बतलाया जा चुका है कि रस के उद्देरय से अलङ्कारों के निवन्धन में किस प्रकार की समीक्षा से काम लेना वाहिये । वहाँ पर ‘विक्षातात्परत्वेन’ इत्यादि कारिकाओं की व्याख्या के अवसर पर पर जो उदाहरण दिये गये थे उन्हीं में वाच्यालङ्कार और रसध्वनि भेद के सङ्कर््य के उदाहरण भी सन्निविष्ट हैं और उन्हीं में रसध्वनि तथा वाच्यालङ्कार की संसृष्टि भी मिल जाती है । जैसे ‘चलापाङ्गां ददृशिम्’ इस उदाहरण को लीजिये । इसकी विस्तृत व्याख्या द्वितीय उद्योत की १९ वीं कारिका में की जा चुकी है । वहाँ यह भी बतलाया गया था कि इसमें मतान्तर से रूपक से युक्त व्यतिरेक भी है । वह रूपकव्यतिरेक श्रृङ्गाररस का अनुप्राहक है । अतः रूपक व्यतिरेक और श्रृङ्गार ध्वनि का वहाँ पर अनुप्राह्यानुप्राहक भाव सङ्कर है ।
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प्रभेदान्तराणामपि कदाचित्सङ्कीर्णत्वं भवत्येव । यथा ममैव-या व्यापारवती रसान् रसयितुं काचित्कवीना नवाहस्त्र्या परिणिष्ठितार्थविषयोन्मेपाच वैपञ्चिती । तद्द्वये अभ्यवलम्ब्य विश्वमुनिश्रीर्निर्णीयते च यच्छ्रान्ता नैव च लब्धमविधिशयन त्वरितकृतुल्यं सुखम् ॥
इत्यत्र विरोषालङ्काराणामर्थान्तरसङ्क्रमितवाच्यस्य ध्वनि प्रभेदस्य सङ्कीर्णत्वम् ।
(अनु०) दूसरे प्रभेदों का भी कदाचित् सङ्कीर्णत्व होता ही है । जैसे मेरा ही-‘हे समुद्रशायी भगवान् ! जो रसों को आस्वादमय बनाने के लिये व्यापारवाली कवियों की कदाचित् नवीन दृष्टि और जो परिणिष्ठित अर्थविषयक उन्मेष करनेवाली विद्वानों की दृष्टि उन दोनों का अवलम्ब लेकर निरन्तर विश्व का वर्णन करते हुये हमें शान्त हो गये; किन्तु तुम्हारी मति के समान सुख प्राप्त नहीं हुआ ।’ यहाँ पर विरोषालङ्कारों का अर्थान्तर सङ्क्रमितवाच्य नामक ध्वनि १ प्रभेद से सङ्कीर्णत्व है ।
तारावती
स्वभावोक्ति अलङ्कार है । अतः स्वभावोक्ति और शृङ्गार रस का एकाश्रयानुप्रवेश संकर है । एक दूसरी गाथा है ‘उपपह जाइए’ इसकी व्याख्या तृतीय उद्योत की ७०वीं कारिका में की जा चुकी है । वहाँ यदि प्रकरण का ज्ञान न हो तो यह निश्चय ही नहीं किया जा सकता कि वहाँ पर पामरों के स्वभाव का कथन किया गया है या रस इत्यादि है । क्योंकि गाथा से होनें वाली बातें मिल जुल होती हैं । इस प्रकार इस गाथा में रसध्वनि और वाच्यालङ्कार का सन्देहसंकर है ।
ऊपर वाच्यालङ्कार और रसध्वनि के तीनों प्रकार के संकर की व्याख्या की जा चुकी । अब रसध्वनि और अलङ्कार की संसृष्टि पर विचार करना है । वस्तुतः जितने भी अलङ्कार होते हैं वे रस को अवश्य ही अनुगृहीत करते हैं तथापि कुछ अलङ्कार ऐसे अवश्य होते हैं जिनके निर्वन्धन में कवि का मन्तव्य अलङ्कार निर्वन्धन ही होता है । इसीलिये तो रसपोषक अलङ्कारों का उपदेश देते हुये आचार्य ने कहा है कि ‘अलङ्कार की योजना करने में इस बात का ध्यान रखना चाहिये कि जिस अलङ्कार की योजना में कवि का ध्यान अलङ्कार के निर्वाहण की ओर होता है वह अलङ्कार रसपोषक नहीं होता । इससे सिद्ध होता है कि कुछ अलङ्कार ऐसे भी होते हैं जो रसध्वनि को पुष्ट नहीं करते । ऐसे अलङ्कारों का रसध्वनि से संकर हो ही नहीं सकता । अतएव उनकी रसध्वनि ही होगी । जैसे उसी प्रकरण में ‘नाति-
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यद्यप्यलङ्कारो रसमवश्यमनुगृहीतु, तथापि ‘नातिनिर्वहणैषिता’ इत्यदभिप्राये-पणोकं तत्र सङ्करासम्भवात् संसृष्टिरेवालङ्कारेग रसध्वने: । यथा ‘बाहुलतिकापाशेन वदृध्वा हृदयम्’ इत्यत्र । प्रभेदान्तराणामपीति । रसादिष्वनियतिरिक्कानाम् । व्यापारवतीति । निष्पादनप्राणो हि रस इत्युक्तम् । तत्र विभावादिजनितात्मको वर्णनः, ततः प्रभृति घटनापर्यन्ता क्रिया व्यापारः; तेन सतततयुक्ता । रसान्निति । रस्यमानतासारान् स्थायिमावान् रसायितुं रस्यमानतापत्तियोग्यान् कर्तुम् । कार्चिदिति । लोकवार्ताच्छा-
यद्यपि अलंकार रस को अवश्य अनुगृहीत करते हैं, तथापि 'अत्यन्त निर्वहण की इच्छा नहीं होनी चाहिए' यह जिस अभिप्राय से कहा गया है उसमें संकर असम्भव होने से संसृष्टि ही होती है । जैसे 'बाहुलतिका के पाश से हृदय को बाँधकर' इसमें । 'दूसरे प्रभेदों का भी' यह । यह कहा गया है कि रस का प्राण निष्पादन है उसमें विभाव इत्यादि योगनात्मक वर्णना होती है । वहाँ से लेकर घटनापर्यन्त जो क्रिया होती है उसे व्यापार कहते हैं उससे निरन्तर युक्त । 'रसों को' यह । रस्यमानता या आस्वादन करना ही जिसका सार है ऐसे स्थायिभावों को रसित करने के लिये अर्थात् रस्यमानता की प्राप्ति के योग्य बनाने के लिये । 'कोई' यह । लोकवार्ता में आये हुए बोध की
लोचन
यचपि अलङ्कार रस को अवशय अनुग्रहीत करते है तथा पि ‘अत्यान्त निर्वहणकी इच्छा नहीं होनी चाहिये’ यह जिस अभिप्राय से कहा गया है उसमें सङ्कर असम्भव होने से रसध्वनि की अलङ्कार के साथ संसृष्टि ही होती है । जैसे ‘बाहुलतिकापाशेन वदृध्वा हृदयम्’ इत्यादि । ‘दूसरे प्रभेदों का भी’ यह । रस इत्यादि निष्पादन है । उसमें विभाव इत्यादि योगनात्मक वर्णना होती है । वहाँ से लेकर घटनापर्यन्त जो क्रिया होती है उसे व्यापार कहते हैं उससे निरन्तर युक्त । ‘रसों को’ यह । रस्यमानता या आस्वादन करना ही जिसका सार है ऐसे स्थायिभावों को रसित करने के लिये अर्थात् रस्यमानता की प्राप्ति के योग्य बनाने के लिये । ‘कोई’ यह । लोकवार्ता में आये हुए बोध की
यह बताया गया था कि यदि 'बाहुलतिका पाशेन' इस रूपक का निर्वाह किया जाय तो नायिका पर व्यभिचार का आरोप करना होगा । इस प्रकार का रूपक रस का पोषक नहीं होगा अपितु उसको रसध्वनि से संसृष्टि ही होगी । इस प्रकार वाच्यालङ्कार की रसध्वनि से संसृष्टि और संकर के तीन भेद, इन चारों भेदों की व्याख्या की गई ।
तारावती
निर्वहणैषिता’ का उदाहरण दिया गया था—‘कोकिलकामललोलव बाहुलतिकापाशेन वदृध्वा हृदम्’ इत्यादि । यह बताया गया था कि यदि 'बाहुलतिका पाशेन' इस रूपक का निर्वाह किया जाय तो नायिका पर व्यभिचार का आरोप करना होगा । इस प्रकार का रूपक रस का पोषक नहीं होगा अपितु उसको रसध्वनि से संसृष्टि ही होगी । इस प्रकार वाच्यालङ्कार की रसध्वनि से संसृष्टि और संकर के तीन भेद, इन चारों भेदों की व्याख्या की गई ।
जिस प्रकार वाच्यालङ्कार की संसृष्टि और संकर रसध्वनि के साथ होते हैं उस प्रकार अन्य भेदों के साथ भी उनका सङ्करय हो सकता है । उदाहरण के लिये आनन्दवर्धन का ही पद्य लीजिये—इसका भाव यह है कि ‘एक तो हम कवियों की किसी नवीन दृष्टि का आश्रय लेकर विश्व का निर्वर्णन करते रहे जो दृष्टि निरन्तर रसों को आस्वादमय बनाने के लिये व्यापारमयी रहती है, दूसरे हमारी दृष्टि प्रामाणिकों की दृष्टि का आश्रय लेकर निश्चित वस्तुओं के प्रकथन में हृदता से जमी रही । इन दोनों दृष्टियों का अवलम्बन लेकर हमने निरन्तर ही विश्व का निर्वर्णन किया और इस कार्य में हम श्रान्त हो गये किन्तु हे क्षीरसागरशायी भगवान् ! हमने आपकी भक्ति के समान सुख कहीं भी प्राप्त नहीं कर पाया ।’
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पतितबोधावस्थात्यागेनोन्मीलन्ती। अत एव ते कवयः वर्णनायोगात् तेषाम्। ने चेत्। क्षणे क्षणे नूतनैर्नूतनैर्वचोभिर्जगत्स्याद्विस्मयन्न्ती। दृष्टिरिति। प्रतिबिम्बुपा, तत्र दृष्टिश्रावुपं ज्ञानं पाडवादि रसयतीति विरोधालङ्कारोद्व नव। तद्नुगृहीतश्र
अब इन पदों के शब्दों के प्रयोग पर विचार कीजिये—इसमें कवियों की दृष्टि को व्यापकवाली कहा गया है और इस व्यापार का उद्देश्य बतलाया है रसों को आस्वादयोग्य बनाना। यह पहले ही बतलाया जा चुका है कि रसों का प्राण होता है निष्पादन या निष्पत्ति। यह निष्पत्ति इसी प्रकार होती है कि पहले उसमें विभाव अनुभाव और सञ्चारीभाव इस रस सामग्री की संयोजना की जाती है और उस संयोजना को ही वर्णन का विषय बनाया जाता है।
लोचन
अवस्था के त्याग के द्वारा उन्मीलित होनेवाली। अतएव वे कवि हैं क्योंकि उनका वर्णन से योग होता है। 'नई' यह। क्षण क्षण में नई नई विचित्रताओं से जगत् को प्रकाशित तथा गुम्फित करती हुई। 'दृष्टि' यह। अर्थात् प्रतिबिम्बुप। उसमें दृष्टि अर्थात् चाक्षुप ज्ञान पाडव इत्यादि को रसित करती है यह विरोधालङ्कार है इसीलिये नई है। और ध्वनि उससे अनुगृहीत
फिर उस वर्णन के लिये उचित शब्द और अर्थ की सङ्घटना की जाती है। इस प्रकार सङ्घटित हुये शब्द अर्थ के माध्यम से जन विभाव, अनुभाव और सञ्चारीभाव से सञ्चालित रसों को समर्पित किया जाता है तब ठीक रूप में रसनिष्पत्ति हो पाती है। इस रस निष्पादन क्रिया मे कवि वाणी निरन्तर ही प्रवृत्त रहती है। यहाँ पर रस शब्द का अर्थ है स्थायीभाव। क्योंकि स्थायीभाव का सार ही उनमें रसनीयता उत्पन्न करना है।
तारावती
रति इत्यादि भाव जब विभावादिरहित होते हैं तब उन्हें स्थायीभाव कहते हैं और जब उनमें विभावादि के योग से आस्वादनीयता उत्पन्न हो जाती है तब उसे रस कहने लगते हैं। स्थायीभाव को आस्वादयोग्य बनाने में कवि की वाणी निरन्तर क्रियाशील रहती है। यही 'व्यापारवती' इस विशेषण का आशय है। 'कोविद' 'कान्त' यह दृष्टि का दूसरा विशेषण है। इसका आशय यह है कि यह दृष्टि अभूतपूर्व तथा आश्रर्यजनक है।
यह वही दृष्टि नहीं है जो कि लौकिक वस्तुओं को देखने के काम में लाई जाती है। लोक में दृष्टि के अंदर जो वस्तु आ पड़ती है उसका बोध हो जाता है, किन्तु कवि की दृष्टि लोकवार्ता में आनेवाली बोध की व्यास्या को पीछे छोड़कर नवीन रूप में उन्मीलित होती है और उसी दृष्टि का आश्रय लेकर कवि लोग विश्व का वर्णन करते हैं।
कवि शब्द 'कत्वर्ण' इस धातु से निष्पन्न हुआ है तथा
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ध्वनि:, तथाहि चाक्षुषं ज्ञानं नातिवक्ष्यरमध्येन न परमार्थत आभात् । न चान्यदवरम्, अपि स्वार्थान्तरे ऐन्द्रियकविज्ञानाभ्यापोहिते प्रतिभान ऊर्जे यै मडकान्तमू। मडक- मणे च विरोधोडनुग्राहक एव। तदुक्तमित—‘विरोधालङ्कारेण’ इत्यादिना। या चैवंविधा दृष्टिः परिनिष्ठितोऽचले: अर्थविषये निश्चेतव्ये विषये उन्मेषो यस्साः । तथा परिनिष्ठिते लोकप्रसिद्धेर्थे न तु कविवदूर्व्वस्मिन्नर्थे उन्मेषो यस्याः सा । विप्रकृष्टाम्रियं, वैपश्चित्ती । ते अवलम्ब्येति कवीनामिति वै श्वित्रोति रचनेन नाहं कविनं पणिडत- इत्यादिमनो, नोद्वृत्यं ध्वन्यते । अनास्मायमपि दरिद्र गृह इत्युपक्रमतयाडन्यत आहृत- मेत्तन्मया दृष्ट्रयमित्यर्थः। तद् द्वे अपेक्षते। न झटेकया दृष्ट्या सम्यड् निर्वर्णनं निर्वंहति । विश्वमित्यशेषम् । अनिशमिति । पुनः पुनरनवरतम् । निर्वर्णयन्नतो वर्णनया तथा निश्चितार्थं वर्णयन्न्तः#इदमित्थमिति परामर्शानुमानादिना निश्चितं निर्वर्णनं किमन्तर सारं स्यादिति तिलकास्तिलशो विचय्यनम् ।
मही होती है, वह इस प्रकार—चाक्षुष ज्ञान अविवक्षित नहीं है क्योंकि उसमें अत्यन्त असम्भव होने का अभाव है । अन्यपरक भी नहीं है, अपितु ऐन्द्रियक विज्ञान के अभ्यास से उल्लसित प्रतिभान रूप अर्थ में संक्रान्त हो जाना है । और संक्रमण में विरोध अनुग्राहक ही होता है । वह कहेंगे—‘विरोधालङ्कार’ इत्यादि के द्वारा। और जो इस प्रकार की दृष्टि है कि जिसका उन्मेष अर्थात् निश्चेतव्य विषय में परिनिष्ठित अर्थविषय में अनल है । उसी प्रकार परिनिष्ठित अर्थात् लोक प्रसिद्ध अर्थ में कवि के समान अपूर्ण अर्थ में नहीं जिसका उन्मेष है । विद्वानों की यह ( दृष्टि ) वैपश्चित्ती कहलानी है । ‘उन दानों का सद्दारा लेकर’ यह । कवियों की और विद्वानों की इन कथन से ‘न मैं कवि हूँ न विद्वान् हूँ’ इस प्रकार अनन्वादृत्य ध्वनित किया जाता है । अर्थात् अग्ना न होते हुए भी दरिद्र गृह में उपकरण के रूप में दूसरे स्थान से यह दो दृष्टियाँ मैं लाया हूँ । ‘उन दोनों को भी यहां केवळ एक के द्वारा ठीक निर्वर्णन का निर्वाह नहीं होता है । विश्च का अर्थ है सम्पूर्ण । ‘निरन्तर’ यह । बार-बार वर्णन करते हुए अर्थात् वर्णना के द्वारा तथा निश्चित अर्थ का वर्णन करते हुए ‘यह इस प्रकार है’ यह परामर्श और अनुमान इत्यादि के द्वारा विमक्त करके निर्वचन करना, यहां क्या सार होगा ? यह तिल-तिल करके चयन करना ।
तारावती
इसका आशय है ‘लोकोत्तर रूप में वर्णन करनेवाला’ । है ‘नई’ ‘नवा’ । इसका आशय यह है कि कवि की दृष्टि प्रत्येक क्षण पर विश्व को
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नये रूप में ही देखती और प्रकाशित करती है । कवि अपनी दृष्टि से प्रतिदिन नई नई विचित्रताओं का आाद्य लेकर लोक-लोकोत्तर तत्व का जिस रूप में रूपफन करता है वह सर्वथा अद्वितीय तथा लोकोत्तर रूप में अन्वर्थन होना है । दृष्टि का आधार है प्रतिभा । कवि की दृष्टि प्रतिभारूपिणी ही होती है जिससे वह नई कल्पना करके विश्व को नये रूप में ही दिखलाने की चेष्टा करता है । ‘कवि की दृष्टि रसों को आम्वादमय बनाने में सर्वदा क्रियाशील रहती है’ इस कथन में विरोधाभास अलंकार है । दृष्टि तो चाक्षुष ज्ञान को कहते हैं । दृष्टि का काम तो चाक्षुष प्रत्यक्षीकरण ही है । वह सरसता सम्पादन का कायं कर ही नहीं सकती । सरस बनाने का अर्थ तो यह है कि षाडव इत्यादि में या दूसरे प्रकार के लेख्य चोष्य भोज्य इत्यादि पदार्थ बनाये जावें उनमें चीनी कपूर इत्यादि डालकर उनको सरस बना देना ही सरसता सम्पादन कहा जा सकता है । यह कार्य दृष्टि का हो ही नहीं सकता । अतः यहाँ पर विरोध है । किन्तु जब दृष्टि का अर्थ कविप्रतिभा ले लिया जाता है और उससे लौकिक पदार्थों में रस का संचारकर कविता का रूप प्रदान करने का अर्थ किया जाता है तब विरोध जाता रहता है । अतः यह विरोधाभास अलंकार है । इसी प्रकार यहाँ ध्वनन की भी व्याख्या की जा सकती है ।
तारावती
यहाँ पर ‘दृष्टि के द्वारा देखकर वर्णन करने’ में दृष्टि का अर्थ सर्वथा बाधित नहीं है । क्योंकि कवि को भी तो लौकिक पदार्थों का चाक्षुष साक्षात्कार करके ही अपनी कल्पना की भित्ति खड़ी करनी पड़ती है । इस प्रकार दृष्टि को हम अत्यन्त-तिरसृतवाच्य नहीं कह सकते । कारण यह है कि यह शब्द सर्वथा अपने अर्थ को छोड़कर अन्य अर्थ का वोधक नहीं हो जाता । किन्तु यहाँ पर अर्थान्तर- संक्रमित वाच्य ध्वनि हो जाती है । क्योंकि इस शब्द का यहाँ पर अर्थ हो जाता है ऐसी कविप्रतिभा जिसमें लौकिक विभिन्न वस्तुओं का ऐन्द्रिय विज्ञान भी सन्निविष्ट हो और उस ऐन्द्रिय ज्ञान का निरन्तर अभ्यास करने के कारण प्रतिभा में एक चमक आ गई हो । इस प्रकार दृष्टि का अर्थ यहाँ पर अत्यन्ततिरस्कृत न होकर अर्थान्तर संक्रमित हो जाता है और इस प्रकार यहाँ पर अर्थान्तर संक्रमित वाच्य ध्वनि हो जाती है । इस अर्थान्तरमक्रमण में सहयोग और सहाय्यता उक्त विरोधाभास अलंकार से भी मिलती है । अतः तिरोभूतवाच्य और अर्थान्तर संक्रमित वाच्य ध्वनि का यहाँ पर अनुप्राणनात्मक भाव है । यही बात मूल में आनन्दवर्धन ने कही है । यह तो हुई एक प्रकार की दृष्टि की बात जिसके द्वारा कवि नई नई उद्भावनायें और कल्पनायें करके विश्व को नवीन रूप में ही प्रदर्शित करता है । अब दूसरे प्रकार की दृष्टि को लीजिये । यह दृष्टि विद्वानों की दृष्टि होती है । इसमें
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नवीन कल्पनाओं का अवमर नहीं होता और न नये विश्व की उद्भावना ही की जाती है, किन्तु विश्व जिस प्रकार का है उसका ठीक रूप में वैसा ही उद्घाटन किया जाता है । वस्तुतः संसार रहस्यों से भरा हुआ है । यह एक जादू की पिटारी है । इसको खोलना सामान्य व्यक्ति का काम नहीं । यह तो वस्तुतः विद्वानों के ही समझने और निरूपित करने की वस्तु है । अतः विद्वान् लोग जिस दृष्टि का सहारा लेकर विश्व के रहस्यों का उद्घाटन करते हैं वह दूसरे प्रकार की दृष्टि होती है । यहाँ पर इस दृष्टि के लिये 'वसोःपण' दिया गया है—'गरिनि ह्नतार्थविषयोन्मेषा' इसमें बहु-व्रीहि समास है और इसकी व्युत्पत्ति दो प्रकार से की जा सकती है—एक के अनुसार परिनिष्ठित शाब्द अर्थ-विषय का विशेषण होगा। प्रथम व्युत्पत्ति यह होगी—अर्थ विषय अर्थात् निश्चेतव्य विषय का उन्मेष अर्थात् निरूपण जिसका परिनिष्ठित है अर्थात् जिसका निरूपण सर्वदा निश्चित और एकरूप ही रहता है कवियों के समान नवनवोन्मेषशाली नहीं होता । दूसरी व्युत्पत्ति यह होगी—जिसका निरूपण परिनिष्ठित अर्थविषयक हो होता है अर्थात् जो दृष्टि कल्पित संसार का निरूपण नहीं किया करती अपितु हृदयमान जगत् जिस प्रकार का है उसी प्रकार का उसका वर्णन किया करती है । 'इन दोनों दृष्टियों का सहारा लेकर' कहने का आशय यह है कि एक दृष्टि तो कवियों की है और दूसरी विद्वानों की । हमारी दृष्टि इनमें कोई नहीं । न मैं कवि हूँ न विद्वान् । किन्तु जैसे दरिद्र के घर में अपना कुछ भी नहीं होता; वह अवसर पड़नेपर इधर-उधर से कुछ वस्तुओं को मांगकर अपना घर सजा लेता है । उसी प्रकार कवियों और विद्वानों दोनों की दृष्टियों में मेरी कोई अपनी दृष्टि नहीं है । मैं तो इधर-उधर से कुछ ले-लिवाकर विश्व का वर्णन करने लगा हूँ । इस कथन से अपने औदृश्य का निराकरण हो जाता है । यहाँ पर जगत् के लिये 'विश्व' शब्द का प्रयोग किया गया है । विश्व शब्द का एक अर्थ है—समस्त, इस प्रकार इसका आशय यह है कि हम निरन्तर ही बार बार समस्त विश्व का वर्णन करने मे लगे रहते हैं । समस्त विश्व का पूर्ण रूप से वर्णन न तो केवल काल्पनिक दृष्टि से सम्भव है और न केवल पारमार्थिक दृष्टि से । अतः हम समस्त विश्व का वर्णन दोनों दृष्टियों का आश्रय लेकर किया करते हैं । हम इस विश्व का निर्वर्णन अर्थात् निश्चित रूप में वर्णन किया करते हैं ।
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यच्च निर्वर्ण्यते तत्रखलु मध्ये व्यपार्यमाणया मध्ये चार्थविशेषेषु निश्चितोन्मेषया निश्रलया दृष्ट्या सभ्यड्निर्वर्णितं भवति । व्यप्मिति । मध्ये यतरतदृष्ट्या हरणध्यसनिन्नित्यर्थ: । श्रान्ता इति । न केवलं सारं न लड्धं यावद्र्रत्युत खेद: प्राप्त इति भाव: । च शब्दस्तुशब्दसूचक: । अध्यवसायेनैति । योगनिद्रया त्वमते यत्सारस्वरूपवेदितृ स्वरूपवस्थित इत्यर्थ: । श्रान्तस्य ध्यानस्थितं प्रति बहुमानो भवति । त्वदृक्तिति । स्वमेव परमात्मस्वरूपो विश्वसारस्तस्य भाक्तृ श्रद्धादिपूर्वंक उपासनाक्रमजस्तदावेशस्तेन तुल्यर्माप न लड्धमास्तां तावतज्जातीयम् ।
और जिसका निर्वर्णन किया जाता है वह निश्चिन्देह मध्य में व्यापारित की जाननेवाली और मध्य में अर्थविशेषों में निश्चित उन्मेषवाली निश्चल दृष्टि से ठीक रूप में निर्वर्णित हो जाता है । 'हम' यह । अर्थात् मिथ्या और तत्त्व दृष्टि से आहरण काछवस्तन रखननेवाले । 'श्रान्त' यह । भाव यह है कि न केवल सार ही प्राप्त नहीं कर पाया प्रस्तुत खेद भी प्राप्त किया । यहाँ पर 'च' शब्द 'तु' शब्द के अर्थ में है । 'अध्यवसाय' यह । अर्थात् इसलिये योगनिद्रा से तुम सारस्वरूप को जाननेवाले और अपने स्वरूप में ही स्थित हो । थके हुये के प्रति बहुमान होता है । 'तुम्हारी भक्ति' यह । तुम्हीं परमात्मस्वरूप विश्वसार हो उसकी श्रद्धापूर्वक उपासना इत्यादि के क्रम से उत्पन्न जो भक्ति उसके आवेश उसके तुल्य भी प्राप्त नहीं किया तजातीय की तो बात दूर रही ।
तारावती
कि हम कविवर्णना के अतिरिक्त निश्चितार्थ का भी वर्णन करते हैं जिसमें व्याप्तिग्रह, लिङ्गपरामर्श इत्यादि अनुमान की सारी प्रक्रिया सन्निविष्ट रहती है और हम प्रत्येक वस्तु के विभिन्न तत्त्वों को पृथक् पृथक् करके समझजाते हैं कि अमुक वस्तु के बनानेवाले विभिन्न पदार्थ कौन कौन से हैं । हम यह भी दिखलाते हैं कि किसी वस्तु का सार क्या है और उसको तिलतिल करके पृथक् पृथक् करके सज्झलित करके समझते है । ( आश्रय यह है कि एक ओर तो हम तर्क का आश्रय लेकर वस्तुतत्त्व की वास्तविकता का निवंचन किया करते हैं और दूसरी ओर वैज्ञानिक पद्धति का आश्रय लेकर हम किसी पदार्थ के सार, उसके पृथक् पृथक् निर्माणक तत्व और उन तत्त्वों से किसी वस्तु के निर्माण की प्रक्रिया को समझाया करते हैं । यह सब वैर्पश्रुती बुद्धि की ही किया है । ) जिस वस्तु का ठीक रूप में वर्णन करना हो उसके प्रकथन करने में बीच बीच में स्थायीभावों की रसनात्मकता के सम्पादक के व्यापार से उसमें भावात्मक सम्बन्ध स्थापित किया जाता है और उसी बीच में विशेष अर्थों का निश्चित उन्मेष किया जाता है । इसी प्रकार किसी वस्तु का
कि हम कविवर्णना के अतिरिक्त निश्चितार्थ का भी वर्णन करते हैं जिसमें व्याप्तिग्रह, लिङ्गपरामर्श इत्यादि अनुमान की सारी प्रक्रिया सन्निविष्ट रहती है और हम प्रत्येक वस्तु के विभिन्न तत्त्वों को पृथक् पृथक् करके समझजाते हैं कि अमुक वस्तु के बनानेवाले विभिन्न पदार्थ कौन कौन से हैं । हम यह भी दिखलाते हैं कि किसी वस्तु का सार क्या है और उसको तिलतिल करके पृथक् पृथक् करके सज्झलित करके समझते है । ( आश्रय यह है कि एक ओर तो हम तर्क का आश्रय लेकर वस्तुतत्त्व की वास्तविकता का निवंचन किया करते हैं और दूसरी ओर वैज्ञानिक पद्धति का आश्रय लेकर हम किसी पदार्थ के सार, उसके पृथक् पृथक् निर्माणक तत्व और उन तत्त्वों से किसी वस्तु के निर्माण की प्रक्रिया को समझाया करते हैं । यह सब वैर्पश्रुती बुद्धि की ही किया है । ) जिस वस्तु का ठीक रूप में वर्णन करना हो उसके प्रकथन करने में बीच बीच में स्थायीभावों की रसनात्मकता के सम्पादक के व्यापार से उसमें भावात्मक सम्बन्ध स्थापित किया जाता है और उसी बीच में विशेष अर्थों का निश्चित उन्मेष किया जाता है । इसी प्रकार किसी वस्तु का
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एवं प्रथममेव परमेश्वरभक्तिभाज: कुतूहलमान्रावलम्बितकविप्रामाणिकोभयवृत्ते: पुनरपि परमेश्वरभक्तिविश्वान्तरेव युक्त इति मन्वानस्येयमुक्तिः सकलप्रमाणपरिनिश्रित-
इस प्रकार पहले ही परमेश्वर की भक्ति से युक्त तथा कुतूहल मात्र से कवि तथा प्रामाणिक दोनों वृत्तियों को अवलम्बन लेनेवाले फिर भी परमेश्वर की भक्ति में विश्रान्ति ही उचित है ऐसा माननेवाले की यह उक्ति है । समस्त प्रमाणों से
तारावती
ठीक-ठीक निर्वचन हो सकता है। 'हम' 'वयम्' इस कर्ताकारक से व्यक्त होता है कि हमारा यह व्यवसाय ही है कि कभी मिथ्या ( काल्पनिक ) दृष्टि से और कभी तत्व दृष्टि से इधर-उधर का कुछ खींच-खाँच कर विश्व का वर्णन करते रहें। किन्तु इस व्यवसाय से हमें लाभ क्या हुआ ? विवेचन करते करते थक गये कि हमें इस विश्व का सार प्राप्त ही न हो सका। केवल इतना ही नहीं कि हमें इसका सार नहीं मिला; अपितु हमारी बहुत बड़ी हानि यह हुई कि हमें अत्यधिक कष्टों का सामना करना पड़ा। हे भगवान् आप क्षीरसागर में सोनेवाले हैं और हम थके हुये हैं। जो व्यक्ति थक जाता है वह ऐसे व्यक्ति का हो तो सम्मान करता है जो सो रहा है। इस प्रकार यहाँ पर हे अनिधयचयन ! यह सम्बोधन सामिप्राय है।
इस सम्बोधन का दूसरा प्रयोजन यह है कि हम प्रत्येक प्रकार से विश्व का सार ग्रहण करना चाहते हैं; किन्तु हमें कहीं सार के दर्शन होते ही नहीं। किन्तु उस सार का आकर तो हे भगवान् आप ही हैं। आपका यह शयन योगनिद्रा का परिचायक है। योगमाया का आश्रय लेकर आप ध्यान करते हैं और योगमाया के आश्रय से ही एकमात्र आप ही संसार के सार को भलीभाँति जानते हैं तथा अपने स्वरूप में अवस्थित रहते हैं। केवल आप ही परमात्मस्वरूप हैं; विश्व का सार हैं। आपकी उपासना जब श्रद्धा-पूर्वक की जाती है तब उसी क्रम से हमारे अन्दर भक्ति उत्पन्न हो जाती है और भगवद्विषयक प्रेमाधिक्य जब हमारे अन्तःकरण में सञ्चरित हो जाता है तथा हमारे अन्तःकरण की वृत्तियाँ जब भगवदारूप में ही परिणत हो जाती हैं उस समय हमे जितना सुख प्राप्त होता है उस सुख के तुल्य भी सुख हमें समस्त विश्व के निर्वचन में प्राप्त नहीं होता; यह तो कहने की आवश्यकता ही नहीं कि हमें तज्जन्य सुख विश्व में नहीं मिलता।
ऊपर जो कुछ कहा गया है उससे सिद्ध होता है कि यह कथन किसी ऐसे व्यक्ति का है जो पहले से ही परब्रह्म परमात्मा की भक्ति से ओतप्रोत रहा है; वह कवि भी बना है और प्रामाणिक भी। किन्तु ये दोनों वृत्तियाँ उसने केवल अपनी कुतूहलवृत्ति शान्त करने के लिये ही स्वीकार की हैं। सब कुछ कर चुकने
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दृष्टादृष्टविषयविशेषं यत्सुखं, यदपि च लोकोत्तरं रसचर्वणात्मकं तत् उभयतोडपि परमेश्वरविश्रान्तनैयानन्द: प्रकृष्ट्यते । तदनन्ददविप्रुणमात्रावमासो हि रसास्वाद इत्युक्तं प्रागस्माभिः । लौकिकं तु सुखं ततोडपि निःश्रेष्ठप्रायं बहुत्रदुःखानुषङ्गादितितात्पर्यम् ।
लोचन दृष्टादृष्टविषयविशेषं यत्सुखं, यदपि च लोकोत्तरं रसचर्वणात्मकं तत् उभयतोडपि परमेश्वरविश्रान्तनैयानन्द: प्रकृष्ट्यते । तदनन्ददविप्रुणमात्रावमासो हि रसास्वाद इत्युक्तं प्रागस्माभिः । लौकिकं तु सुखं ततोडपि निःश्रेष्ठप्रायं बहुत्रदुःखानुषङ्गादितितात्पर्यम् ।
तत्र तावत् दृष्टशब्दे पक्षैकपदानुप्रवेशः । दृष्टशब्दवलम्भ्य निर्वचनंमात्राविरोधाल्लौकिकी वाच्यताम् , अनधपदन्यायेन दृष्टशब्दोऽस्यान्तर्गतिरसकृतवाच्यो वस्तु इत्येकतरनिश्रये नास्ति प्रमाणम् । प्रकारान्तरेणापि हृदयङ्गमात् । न च पूर्वंन्राप्येवं वाच्यम् । न वा शब्देन श्राव्यशक्चनुरणनतया विरोधस्य सर्वथावलम्बनात् ।
तत्र तावत् दृष्टशब्दे पक्षैकपदानुप्रवेशः । दृष्टशब्दवलम्भ्य निर्वचनंमात्राविरोधाल्लौकिकी वाच्यताम् , अनधपदन्यायेन दृष्टशब्दोऽस्यान्तर्गतिरसकृतवाच्यो वस्तु इत्येकतरनिश्रये नास्ति प्रमाणम् । प्रकारान्तरेणापि हृदयङ्गमात् । न च पूर्वंन्राप्येवं वाच्यम् । न वा शब्देन श्राव्यशक्चनुरणनतया विरोधस्य सर्वथावलम्बनात् ।
तत्र तावत् दृष्टशब्दे पक्षैकपदानुप्रवेशः । दृष्टशब्दवलम्भ्य निर्वचनंमात्राविरोधाल्लौकिकी वाच्यताम् , अनधपदन्यायेन दृष्टशब्दोऽस्यान्तर्गतिरसकृतवाच्यो वस्तु इत्येकतरनिश्रये नास्ति प्रमाणम् । प्रकारान्तरेणापि हृदयङ्गमात् । न च पूर्वंन्राप्येवं वाच्यम् । न वा शब्देन श्राव्यशक्चनुरणनतया विरोधस्य सर्वथावलम्बनात् ।
परिनिष्ठित दृश्ट और अदृश्ट विषय की विशेषता से उत्पन्न जो रसचर्वणात्मक लोकोत्तर सुख उन दोनों से परमेश्वरविश्रान्ति का आनन्द प्रकृष्ट हो जाता है । हमने यह पहले ही कहा था कि उस आनन्द के विन्दुमात्र का अवभास हो रसास्वाद है । लौकिक सुख तो उससे भी निःश्रेष्ठप्राय है क्योंकि उसमें बहुत से दुःखों का अनुषङ्ग हो जाता है यह तात्पर्य है ।
परिनिष्ठित दृश्ट और अदृश्ट विषय की विशेषता से उत्पन्न जो रसचर्वणात्मक लोकोत्तर सुख उन दोनों से परमेश्वरविश्रान्ति का आनन्द प्रकृष्ट हो जाता है । हमने यह पहले ही कहा था कि उस आनन्द के विन्दुमात्र का अवभास हो रसास्वाद है । लौकिक सुख तो उससे भी निःश्रेष्ठप्राय है क्योंकि उसमें बहुत से दुःखों का अनुषङ्ग हो जाता है यह तात्पर्य है ।
तारावती के बाद उसे ज्ञात हो गया है कि संसार में सार नहीं है । यदि कहीं सार है तो वह परमात्मा में । मनुष्य को अन्तरात्मा को विश्राम केवल परमात्मा में ही मिलता है । अतः मनुष्य के लिये विधेय भगवद्भक्ति ही है । यह मानकर ही प्रस्तुत कथनें किया गया है ।
तारावती के बाद उसे ज्ञात हो गया है कि संसार में सार नहीं है । यदि कहीं सार है तो वह परमात्मा में । मनुष्य को अन्तरात्मा को विश्राम केवल परमात्मा में ही मिलता है । अतः मनुष्य के लिये विधेय भगवद्भक्ति ही है । यह मानकर ही प्रस्तुत कथनें किया गया है ।
इसका सारांश यही है कि समस्त प्रमाणों से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष विश्व की विशेषताओं का जितना भी निश्रय किया जाता है और उससे जो भी सुख मिलता है अथवा रसचर्वणाजन्य जितना भी लोकोत्तर सुख मिलता है वह समस्त सुख मिलकर भी परमेश्वरानन्द के समकक्ष नहीं हो सकताः, परब्रह्मानन्द इन दोनों प्रकार के सुखों से अत्यधिक प्रकृष्ट होता है ।
इसका सारांश यही है कि समस्त प्रमाणों से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष विश्व की विशेषताओं का जितना भी निश्रय किया जाता है और उससे जो भी सुख मिलता है अथवा रसचर्वणाजन्य जितना भी लोकोत्तर सुख मिलता है वह समस्त सुख मिलकर भी परमेश्वरानन्द के समकक्ष नहीं हो सकताः, परब्रह्मानन्द इन दोनों प्रकार के सुखों से अत्यधिक प्रकृष्ट होता है ।
यह तो हम पहले ही बता चुके कि ब्रह्मानन्द का जो बिन्दुमात्र अवभास या प्रतीति है वही रसास्वाद है । जब रसास्वाद की यह दशा है तव लौकिक आनन्द का तो कहना ही क्या ? लौकिक आनन्द तो रसास्वाद की अपेक्षा भी निम्नातिनिम्न कोटि का होता है । क्योंकि रसास्वाद आनन्दचिन्मय होता है और लौकिक आनन्द में अनेक दुःखों
यह तो हम पहले ही बता चुके कि ब्रह्मानन्द का जो बिन्दुमात्र अवभास या प्रतीति है वही रसास्वाद है । जब रसास्वाद की यह दशा है तव लौकिक आनन्द का तो कहना ही क्या ? लौकिक आनन्द तो रसास्वाद की अपेक्षा भी निम्नातिनिम्न कोटि का होता है । क्योंकि रसास्वाद आनन्दचिन्मय होता है और लौकिक आनन्द में अनेक दुःखों
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वाच्यालङ्कारसंस्कृतं च पदमपेक्ष्ययैव । यत्र हि कानिचित् पद्यानि वाच्यालङ्कारभाजि कानिचिच्च ध्वनिप्रभेदयुक्तानि ।
( अन्० ) और वाच्यालङ्कार संस्कृत पद की अपेक्षा ही होता है । जहाँ निस्संदेह कुछ पद वाच्यालङ्कार से युक्त होते हैं और कुछ ध्वनिप्रभेद से युक्त ।
लोचन
एवं सद्दयं त्रिविधमुदाहृत्य संसृष्टिमुदाहरति—वाच्येति । सकलवाक्ये हि पद्य-काव्यारोदपि व्यङ्ग्यार्थोंऽपि प्रधानं तदानुगृहीतं ग्राहककवसङ्करस्तद्मावै त्वसदृशंतेरिय-काव्यारेण वा ध्वनिना वा पर्यायेण द्वाभ्यामपि वा युगपत्प्रदर्शिताभ्यां भाव्यमिति मेदाः । एतद्गर्भीकृत्य सावधानणमाह—पदापेक्षयैवेति । यत्रानुगृहीतानुग्राहकमात्रं
इस प्रकार तीन प्रकार के सङ्कर का उदाहरण देकर संसृष्टि का उदाहरण दे रहे हैं—‘वाच्य’ यह । यदि समस्त वाक्य में अलङ्कार भी और व्यङ्ग्यार्थ भी प्रधान हो तो अनुग्राह्यानुग्राहक सङ्कर होता है । उसके उदाहरण में तो असदृशतेरियकाव्यारेण वा ध्वनिना वा पर्यायेण द्वाभ्यामपि वा युगपत्प्रदर्शिताभ्यां भाव्यमिति मेदाः ।
तारावती
का संसर्ग रहता है । अब इसमें तीनों प्रकार के सङ्कर को समझ लीजिये—पहले दृष्टि से रससञ्चार में विरोधाभास और दृष्टि शब्द में अर्थान्तरसङ्क्रमितवाच्य की व्याख्या की जा चुकी है और इनका अनुगृहीतानुग्राहक भाव सङ्कर भी बतलाया जा चुका है । इस दृष्टि शब्द में ही एकव्यङ्ग्यानुप्रवेश सङ्कर भी बतलाया जा सकता है । अब निश्चित वर्णनपरक दृष्टि शब्द को लीजिये । क्या यहाँ विरोधाभास अलङ्कार माना जाय या जैसे—‘निश्श्वासान्ध इवादर्शः’ में अन्ध शब्द को अत्यन्ततिरसृकृत वाच्य माना जाता है उसी प्रकार यहाँ पर भी दृष्टि शब्द अत्यन्ततिरसृकृत वाच्य माना जाय ? विरोधाभास और तिरसृकृतवाच्य में किसको माना जाय इस विषय में कोई प्रमाण नहीं है । क्योंकि दोनों ही प्रकारों के मानने में चमत्कार की समान प्रतीति होती है और दोनों ही प्रकार हृद्य तथा आनन्ददायक हैं ।
इस प्रकार इस दूसरे दृष्टि शब्द में सन्देह सङ्कर है । इस प्रकार इस एक ही पद्य में सङ्कर के तीनों प्रकार मिल जाते हैं । प्रथम कविसमयसिद्धिनी दृष्टि में अनुगृहीतानुग्राहकभाव सङ्कर और एकव्यङ्ग्यानुप्रवेश सङ्कर तथा वैपैश्वर्ती दृष्टि में सन्देह सङ्कर ।
यदाँ यहाँ पूछा जा सकता है कि कविसमयसिद्धिनी दृष्टि में भी सन्देह सङ्कर क्यों नहीं माना जाता ? इसका उत्तर यह है कि पहले दृष्टि शब्द के लिए ‘नई’ ‘नवा’ यह विशेषण दिया
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प्रत्याश्रयापि नावतरति तं तृतीयमेव प्रकारमुदाहर्तुमुपक्षमता-यत्र हीति। यम्माद्यत्र-कानिचिदलङ्कारभाजि कानिचिद्रध्वनियुक्तानि, यथा दीर्घीं कुर्वन्स्त्रियं श्रेति। तथा विधपदापेक्षयैव वाच्यालङ्कारसंस्कृतत्वमित्यादृत्या पूर्वंग्रन्थेन सम्बन्धः कर्त्तव्यः। अत्र हेतुः। यदेत्योर्हिशब्दोर्मैत्रपदामेल्यस्याऽनन्तरं योज्य इत्यग्रन्थसङ्क्तः।
प्रत्याश्रयापि नावतरति तं तृतीयमेव प्रकारमुदाहर्तुमुपक्षमता-यत्र हीति। यस्माद्यत्र-कानिचिदलङ्कारभाजि कानिचिद्रध्वनियुक्तानि, यथा दीर्घीं कुर्वन्स्त्रियं श्रेति। तथा विधपदापेक्षयैव वाच्यालङ्कारसंस्कृतत्वमित्यादृत्या पूर्वं ग्रन्थेन सम्बन्धः कर्तव्यः। अत्र हेतुः। यदेत्योर्हिशब्दोर्मैत्रपदामेल्यस्याऽनन्तरं योज्य इत्यग्रन्थसङ्क्तः।
यहाँ पर 'निस्सन्देह' 'हि' शब्द 'मैत्री पद' के बाद जोड़ा जाना चाहिए यह ग्रन्थ की सङ्क्ति है।
यदेत्योर्हिशब्दोर्मैत्रपदामेल्यस्याऽनन्तरं योज्य इत्यग्रन्थसङ्क्तः।
यहाँ 'निस्सन्देह' 'हि' शब्द 'मैत्री पद' के बाद जोड़ा जाना चाहिए यह ग्रन्थ की सङ्क्ति है।
गया था। अतः इस 'नहि' शब्द की व्याख्या करने के लिए शब्दशक्तिमूलक अनुरणन रूप व्यङ्ग्य विरोधालङ्कार का आश्रय लेना ही पड़ेगा।
गया था। अतः इस 'नहि' शब्द की व्याख्या करने के लिए शब्दशक्तिमूलक अनुरणन रूप व्यङ्ग्य विरोधालङ्कार का आश्रय लेना ही पड़ेगा।
गया था। अतः इस 'नहि' शब्द की व्याख्या करने के लिए शब्दशक्तिमूलक अनुरणन रूप व्यङ्ग्य विरोधालङ्कार का आश्रय लेना ही पड़ेगा।
ऐसी दशा में एक ओर निर्णय का हेतु अधिगत हो जाने से वहाँ पर सन्देह सङ्कर का अवसर ही नहीं रहा।
ऐसी दशा में एक ओर निर्णय का हेतु अधिगत हो जाने से वहाँ पर सन्देह सङ्कर का अवसर ही नहीं रहा।
ऐसी दशा में एक ओर निर्णय का हेतु अधिगत हो जाने से वहाँ पर सन्देह सङ्कर का अवसर ही नहीं रहा।
ऊपर सङ्कर के तीनों भेदों के उदाहरण दे दिये गये। अब यह दिखलाया जायेगा कि वाच्यालङ्कार की ध्वनि से संसृष्टि किस प्रकार होती है?
ऊपर सङ्कर के तीनों भेदों के उदाहरण दे दिये गये। अब यह दिखलाया जायेगा कि वाच्यालङ्कार की ध्वनि से संसृष्टि किस प्रकार होती है? इसका एक वाक्य में उत्तर यह है कि वाच्यालङ्कार की ध्वनि से संसृष्टि भी पद को दृष्टिकोण में रखकर ही होती है।
ऊपर सङ्कर के तीनों भेदों के उदाहरण दे दिये गये। अब यह दिखलाया जायेगा कि वाच्यालङ्कार की ध्वनि से संसृष्टि किस प्रकार होती है? इसका एक वाक्य में उत्तर यह है कि वाच्यालङ्कार की ध्वनि से संसृष्टि भी पद को दृष्टिकोण में रखकर ही होती है।
सम्पूर्ण वाक्य में नहीं। क्योंकि यदि सम्पूर्ण वाक्य से ही किसी अलङ्कार की प्रतीति होगी और इसी से व्यङ्ग्यार्थ की भी प्रतीति होगी तो उनमें अनुग्राह्यानुग्राहक भाव साक्षात् अनिवार्य रूप से आ जायेगा।
सम्पूर्ण वाक्य में नहीं। क्योंकि यदि सम्पूर्ण वाक्य से ही किसी अलङ्कार की प्रतीति होगी और इसी से व्यङ्ग्यार्थ की भी प्रतीति होगी तो उनमें अनुग्राह्यानुग्राहक भाव साक्षात् अनिवार्य रूप से आ जायेगा।
सम्पूर्ण वाक्य में नहीं। क्योंकि यदि सम्पूर्ण वाक्य से ही किसी अलङ्कार की प्रतीति होगी और इसी से व्यङ्ग्यार्थ की भी प्रतीति होगी तो उनमें अनुग्राह्यानुग्राहक भाव साक्षात् अनिवार्य रूप से आ जायेगा।
आश्रय यह है कि अलङ्कारों को अलङ्कार्यता तभी प्राप्त होती है जब वे अलङ्करण करें, अलङ्कार रस को ही अलङ्कार करते हैं।
आश्रय यह है कि अलङ्कारों को अलङ्कार्यता तभी प्राप्त होती है जब वे अलङ्करण करें, अलङ्कार रस को ही अलङ्कार करते हैं। अतः जब समाशोक्ति इत्यादि अलङ्कार सम्पूर्ण वाक्य से अवगत होते हैं और रसध्वनि भी सम्पूर्ण वाक्य से ही होती है तब उनका अनुग्राह्यानुग्राहक भाव हो जाना स्वाभाविक ही है।
आश्रय यह है कि अलङ्कारों को अलङ्कार्यता तभी प्राप्त होती है जब वे अलङ्करण करें, अलङ्कार रस को ही अलङ्कार करते हैं। अतः जब समाशोक्ति इत्यादि अलङ्कार सम्पूर्ण वाक्य से अवगत होते हैं और रसध्वनि भी सम्पूर्ण वाक्य से ही होती है तब उनका अनुग्राह्यानुग्राहक भाव हो जाना स्वाभाविक ही है।
यदि उनमें अनुग्राह्यानुग्राहक भाव न माना जाय तो उनका अलङ्कार होना ही असङ्गत हो जायेगा।
यदि उनमें अनुग्राह्यानुग्राहक भाव न माना जाय तो उनका अलङ्कार होना ही असङ्गत हो जायेगा। अतः यह निश्चय ही है कि अलङ्कार तथा ध्वनि की संसृष्टि वहीं पर हो सकती है जहाँ अलङ्कार पद के आश्रित हो।
यदि उनमें अनुग्राह्यानुग्राहक भाव न माना जाय तो उनका अलङ्कार होना ही असङ्गत हो जायेगा। अतः यह निश्चय ही है कि अलङ्कार तथा ध्वनि की संसृष्टि वहीं पर हो सकती है जहाँ अलङ्कार पद के आश्रित हो।
(यहाँ यह भी ध्यान रखना चाहिए कि पदबोध्य अलङ्कार रसोपकारक तो होता ही है। अन्यथा उसमें अलङ्कारता ही नहीं आती।
(यहाँ यह भी ध्यान रखना चाहिए कि पदबोध्य अलङ्कार रसोपकारक तो होता ही है। अन्यथा उसमें अलङ्कारता ही नहीं आती। किन्तु केवल रसध्वनि ही तो नहीं होती।
(यहाँ यह भी ध्यान रखना चाहिए कि पदबोध्य अलङ्कार रसोपकारक तो होता ही है। अन्यथा उसमें अलङ्कारता ही नहीं आती। किन्तु केवल रसध्वनि ही तो नहीं होती।
दूसरी ध्वनियाँ भी तो होती हैं। पदाभित अलङ्कार
दूसरी ध्वनियाँ भी तो होती हैं। पदाभित अलङ्कार
दूसरी ध्वनियाँ भी तो होती हैं। पदाभित अलङ्कार
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यथा— दीर्घोंकुरत्वेन पट्टुमदकलं कूजितं सारसानां, प्रत्यूषेषु स्फुटितकमलामोदमात्रैकपात्रे । यत्र स्त्रियां हरति सुरतग्लानिमझानुमूलः, चित्रप्रायातः प्रियतम इव प्रार्थनाचाटुकारः ॥ अत्र हि मैत्रीपदमविवक्षितवाच्यो ध्वनिः । पदान्तरे षड्लकारानन्तराणि ।
( अनु० ) जैसे— 'सारसों के रमणीय तथा मद के कारण मधुर कूजन को निपुणतापूर्वक दीर्घ करते हुये, प्रातःकालों में खिले हुये कमलों की सुगन्धि से मैत्री के कारण सुगन्धित, अङ्ग के अनुकूल स्त्रिपा वायु प्रार्थनाचाटुकार प्रियतम के समान जहाँ स्त्रियों की सुरतग्लानि को दूर करता है ।' यहाँ मैत्री शब्द अविवक्षितवाच्यो ध्वनि है । दूसरे पदों में दूसरे अलङ्कार हैं ।
तारावती उन्हीं रसातिरिक्त ध्वनियों के साथ संश्रुति को प्राप्त होता है । इस संश्रुति की तीन अवस्थायें सम्भव हैं—या तो अलङ्कार पदविश्रान्त हो या ध्वनि ही पदविश्रान्त हो अथवा दोनों एक साथ पदविश्रान्त हों । यही समझकर 'यत्र' शब्द का प्रयोग किया गया है, 'एव' शब्द का यहाँ पर अर्थ है अवधारण अर्थात् केवल पद की दृष्टि से ही संश्रुति हो सकती है वाक्य की दृष्टि से नहीं । जहाँ पदाश्रित अलङ्कार में पर्यवसान होता है अथवा वहाँ यह भी शङ्का हो सकती है कि अलङ्कार और ध्वनि का कोई न कोई संकर हो । अतः यहाँ पर तृतीय प्रकार को ही उदाहरण दिया जा रहा है जहाँ ध्वनि और अलङ्कार दोनों की एक साथ पृथक् रूप में विश्रान्ति होती है । इस प्रकार की स्थिति में अनुगृहीतानुगाहक भाव या दूसरे प्रकार के सङ्कर की सम्भावना ही नहीं रहती । क्योंकि इसमें कुछ पद अलङ्कार से युक्त होते हैं और कुछ पद ध्वनि से युक्त होते हैं । यहाँ पर यह एक वाक्य है—'जहाँ निस्सन्देह कुछ पद वाच्यालङ्कारवाले होते हैं और कुछ ध्वनि के किसी प्रभेद से युक्त, यह वाक्य अधूरा मालूम पड़ता है । अतः इसकी सङ्क्ष्ति बैठाने के लिये इसका समर्थन पूर्ववाक्य से कर देना चाहिये कि 'वहाँ उस प्रकार के पद की दृष्टि से ही वाच्यालङ्कार संश्रुत होता है ।' इस वाच्यालङ्कार संश्रुत का उदाहरण दिया गया है 'दीर्घोंकुरत्वेन' इत्यादि मेघदूत का पद्य और लक्षण से इसकी सङ्क्ष्ति करने के लिये पद्य के बाद आलोककार ने लिखा है—'अत्र हि मैत्रीपदमविवक्षितवाच्यो ध्वनिः ।'
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दीर्घोंकुर्यन्रिति । सिम्पावातेन हि दूरमप्यसौ शब्दोनीयते तथा सुकुमारपवनस्पर्शजातहर्षा: चिरं कूजति, तत्कूजितं च वातानुबोलितसिप्रातटजमधुरशब्दैरमिश्रं भवति द्वार्षंवम् । पटूविचिते । तथासौ सुकुमारो वायुर्येन तज्जः शब्दः सारसकूजितमपि नामिषयति प्रत्युत तत्सदृशवाच्यो भवेत् । न च दीपनं तद्यीयमनुपयोगियतस्तन्नमदेन कलं मञुरमाकर्णनानुयायम् । प्रत्युपोषिति । प्रभातस्य तथाविधसेवावसरस्वम् । बहुवचनं सदैव तत्क्षेषा हृद्यतेति निरूपयति । स्फुटितानयन्तर्वंतंमानमकरन्दमरेण । तथा स्फुटितानि नयनहरोणि यानि कमलानि तेषां य आमोदस्तेन या मैत्री अभ्यासाझावियोगपरस्परनुकूल्यलब्धाभस्तेन कषाय उपरक्तो मकरन्देन च कषायवर्णीकृतः।
दीर्घोंकुर्यन्रिति । सिम्पावातेन हि दूरमप्यसौ शब्दो नीयते तथा सुकुमारपवनस्पर्शजातहर्षा: चिरं कूजति, तत्कूजितं च वातानुबोलितसिप्रातटजमधुरशब्दैरमिश्रं भवति द्वार्षंवम् । पटूविचिते । तथासौ सुकुमारो वायुर्येन तज्जः शब्दः सारसकूजितमपि नामिषयति प्रत्युत तत्सदृशवाच्यो भवेत् । न च दीपनं तद्यीयमनुपयोगियतस्तन्नमदेन कलं मञुरमाकर्णनानुयायम् । प्रत्युपोषिति । प्रभातस्य तथाविधसेवावसरस्वम् । बहुवचनं सदैव तत्क्षेषा हृद्यतेति निरूपयति । स्फुटितानयन्तर्वंतंमानमकरन्दमरेण । तथा स्फुटितानि नयनहरोणि यानि कमलानि तेषां य आमोदस्तेन या मैत्री अभ्यासाझावियोगपरस्परनुकूल्यलब्धाभस्तेन कषाय उपरक्तो मकरन्देन च कषायवर्णीकृतः।
'दीर्घ करते हुये' यह । सिप्रातट के द्वारा निस्सन्देह यह शब्द दूर ले जाया जाता है । उसी प्रकार सुकुमार पवन के स्पर्श से उत्पन्न हर्षवाले बहुत समय तक कूजते रहते हैं, उनका कूजन वायु से अन्वोालित सिप्रातटजों से उत्पन्न मधुर शब्द से मिला हुआ हो जाता है । 'वह' यह । वह वायु इतना सुकुमार है कि उससे उत्पन्न शब्द सारसों के कूजन को भी नहीं दबा पाता प्रत्युत उसका दीपन अनुपयोगी तो नहीं ही है क्योंकि वह मद के कारण कल अर्थात् मधुर और आकर्णनीय है । 'प्रभातों में' यह । प्रभात का ही उस प्रकार की सेवा का अवसर है । बहुवचन यह निरूपित करता है कि यह हृद्यता वहाँ सर्वदा रहती है । स्फुटित अर्थात् अनन्दर विद्यमान मकरन्द के भार के द्वारा । तथा स्फुटित अर्थात् विकसित नेत्रों को हरनेवाले जो कमल उनका जो आमोद उससे जो मैत्री अर्थात् संश्लेष के अभ्यासाझावियोग से परस्पर अनूकूलता का लाभ उससे कषाय वायु का बनाया हुआ ।
ध्वनि है ।' इस पर लोचनकार ने लिखा है कि इस वाक्य का 'हो' 'निस्सन्देह' शब्द 'मैथ्रीपदम्' के बाद जोड़ा जाना चाहिये । इससें यह वाक्य बन जाता है-'यहाँ मैत्रीपद निस्सन्देह अविवक्षितवाच्य ध्वनि है ।'
ध्वनि है ।' इस पर लोचनकार ने लिखा है कि इस वाक्य का 'हो' 'निस्सन्देह' शब्द 'मैथ्रीपदम्' के बाद जोड़ा जाना चाहिये । इससें यह वाक्य बन जाता है-'यहाँ मैत्रीपद निस्सन्देह अविवक्षितवाच्य ध्वनि है ।'
अब उदाहरण को लीजिये-यक्ष मेघ को अपने घर का मार्ग बतलाते हुए विशाला नगरी का परिचय देने लगता है । वह कहता है कि 'यह विशाला नगरी सिप्रा नदी के तट पर बसी हुई है । यहाँ सिप्रा के जल के सम्पर्क से शीतल होकर जो वायु चलता है वह सारसों के सुमधुर तथा आकर्षक कूजन को और अधिक बढ़ा देता है । प्रातःकाल जब कमल खिल जाते हैं तब उनकी सुगन्धि को लेकर जो वायु बहता है वह अत्यन्त सुरागन्धित हो जाता है । वह वायु शरीर के अनुकूल होता है और जिस प्रकार कोई चाटुकार प्रियतम प्रातःकाल अपनी प्रियतमाओं की सुरतजन्य भान्ति को दूर किया करता है उसी प्रकार वह सिप्रा का वायु भी इस
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स्त्रीणामिति । सर्वस्य तथाविधस्य त्रैलोक्यसारभूतस्य य एवं करोति सुरतकृत ग्लानिं तान्ति हरति, अथ च तद्विषयां ग्लानिं पुनः सम्भोगामिलाषोदीपनेऽन हरति । न च प्रसह्य प्रभृतयापि त्वद्नुकूलो हृदयस्पर्शः हृदयान्तर्भूतश्र । प्रियतमे तद्विषये प्रार्थनार्थं चाटूनि करियाति । तत्र तमोदपि तत्पवनस्पर्श-प्रभुद्रसम्भोगामिलाषः । प्रार्थनार्थं चाटूक्ति करोतीति तेन तथा कार्यत इत्यर्थः । प्रियतमोदपि रतान्तेऽनुकूलः संवाहनादिना प्रार्थनार्थं चाटूकार एवमेव सुरतग्लानिं हरति । कूजितं चानङ्गीकरणवचनादिमधुररध्वनितं दोर्घीकरोति । चाटूकरणावसरे च स्फुटितं 'क्षियोन्' का॥
उस प्रकार के त्रैलोक्यसारभूत सभी का जो यह करता है-सुरत से ग्लानि को हरता है और तद्विषयक ग्लानि को पुनः सम्भोग की अभिलाषा के उद्दीपन के द्वारा हरता है । बलात्कार से नहीं । अनुकूल अर्थात् प्रियतम के विषय में प्रार्थना के लिये चाटुकारिता कराता है । प्रियतम भी उस पवन के स्पर्श से प्रभुद्ध सम्भोग की अभिलाषावाला हो जाता है । प्रार्थना के लिये चाटुकारिता करता है और इससे वैसा कराता है । इस प्रकार यह पवन ऐसे श्रृङ्गार का सर्वस्वभूत है जिसका प्राण परस्परानुराग ही होता है । यह उसके लिये उचित ही है क्योंकि यह वायुस्पृष्ट से परिज्ञात है अतः नागरिक है एक गवार के समान अविदग्ध नहीं है । प्रियतम भी सुरत के अन्त में अङ्गों के अनुकूल अर्थात् संवाहन इत्यादि के द्वारा प्रार्थना के चाटुकार होकर इत्यादि अर्थात् मधुररध्वनि को और अधिक बढ़ाता है । और चाटुकारण के
नगरी को क्षियोन के शरीरी की सुरतजन्य थकावट को दूर किया करता है ।' यह है कालिदास के पद्य का सारांश । अब इस पद्य के शब्दप्रयोग पर ध्यान दीजिये । वायु के लिये कहा गया है कि वह सारसों के कूजन को और अधिक 'दीर्घ' कर देता है । इस दीर्घ करने में कई एक व्यञ्जनायें निकल सकती हैं—सिप्रा का वायु सारसों के कूजन को दूर ले जाता है जिससे सारसों का कूजन एक स्थान पर उद्भूत होकर दीर्घ दशयित्योति होता है । दूसरी बात यह है कि जब यह शीतल मन्द सुगन्धित वायु के संसर्ग से सारसों में आनन्द का अतिरेक उत्पन्न हो जाता है जिससे सारस बड़ी देर तक सुमधुर स्वर में कूजन करते रहते हैं । तीसरी बात यह है वायु सिप्रा की तरङ्गों को धारे धीरे आनदोलित करता है जिससे सिप्रा की तरङ्गों
तारावती नगरी की क्षीण के शरीरी की सुरतजन्य थकावट को दूर किया करता है ।' यह है कालिदास के पद्य का सारांश । अब इस पद्य के शब्दप्रयोग पर ध्यान दीजिये । वायु के लिये कहा गया है कि वह सारसों के कूजन को और अधिक 'दीर्घ' कर देता है । इस दीर्घ करने में कई एक व्यञ्जनायें निकल सकती हैं—सिप्रा का वायु सारसों के कूजन को दूर ले जाता है जिससे सारसों का कूजन एक स्थान पर उद्भूत होकर दीर्घ दशयित्योति होता है । दूसरी बात यह है कि जब यह शीतल मन्द सुगन्धित वायु के संसर्ग से सारसों में आनन्द का अतिरेक उत्पन्न हो जाता है जिससे सारस बड़ी देर तक सुमधुर स्वर में कूजन करते रहते हैं । तीसरी बात यह है वायु सिप्रा की तरङ्गों को धारे धीरे आनदोलित करता है जिससे सिप्रा की तरङ्गों
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विकसितं यत्कमलकान्तिधारि वदनं तस्य यामोदमैत्री सहजसौरभपरिचयस्तेन कपाय उपरक्तो भवति । अज्ञेषु चातुःषष्टिकप्रयोगेष्वनुकूलः । एतद्रूपगन्धस्पर्शा यत्र हृद्या यत्र च पवनोदपि तथा नागरिकः स त्वावश्यमभिगन्तव्य उपदेश इति मेघदूतेऽपि मेघं प्रति कामिनि उक्तिः । उदाहरण लक्षण योक्तुं यत्नं विद्धि । हि शब्दोऽनन्तरं पठितस्य इत्युक्तरोधः । अलङ्कारान्तराणीतिः । उत्प्रेक्षा स्वभावोक्तिरुपकक्रमेणैष्यर्थः ।
अवसर पर स्फुटित अर्थात् विकसित जो कमल की कान्ति को धारण करनेवाला मुख उसको जो सुगन्धि की मैत्री अर्थात् स्वाभाविक सुगन्धि से परिनय उससे कषाय अर्थात् उपरक्त हो जाता है । अज्ञों में अर्थात् चतुःषष्टिक प्रयोगों में अनुकूल होता है । इस प्रकार शब्द, रूप, गन्ध, स्पर्श जहाँ हृद्य हैं और जहाँ पवन भी नागर है वह देश तुम्हारे लिये अवश्य ही अभिगन्तव्य है । यह मेघदूत में मेघ के प्रति कामिनी की उक्ति है । उदाहरण में लक्षण को योजित करते हैं—‘मैत्री उपद’ यह । ‘हि’ शब्द वाद में पढा जाना चाहिये यह कहा ही गया है । ‘दूसरे अलङ्कार’ यह । अर्थात् उत्प्रेक्षा, स्वभावोक्ति, रूपक और उपमा क्रमशः ।
तारावती
तारावती
में एक मनोहर शब्द होने लगता है । उस शब्द से मिलकर सारसों का क्रूजन अर्धकाधिक दोर्घ हो जाता है । ‘दीर्घ करते हुये’ का विशेषण दिया गया है ‘कुशलता पूर्वक’ ( पटु ) । यह क्रियाविशेषण है । कुशलतापूर्वक कहने का आशय यह है कि यह वायु इतना सुकुमार है कि इसके शब्द से सारस का मन्द स्वर भी दब नहीं पाता । अपितु जैसे कोई साथ में पड़नेवाला साथी ब्रह्मचारी ‘अपने दूसरे सहचर के अध्ययन में सहायता पहुँचाता है वैसे ही यह वायु भी एक अच्छे सहचर के समान सारसकूजन को प्रदीप्त ही करता है । यह प्रदीप्त करना अर्थ ही नहीं है अपितु इसका बहुत बडा उपयोग यह है कि कोमल वायु के कारण सारस मदमस्त हो जाते हैं और उससे उनके स्वर में एक स्वाभाविक मधुर्य आ जाता है । ‘प्रभातों में’ यह शब्द भी अभिप्राय है । कारण यह है कि अपनी प्रियतमाओं की महिमा की थकावट को दूर करने का सबसे अच्छा अवसर तो प्रभात ही होता है । इसमें बहुवचन का अभिप्राय यह है कि इस विशाला नगरी में कोई एक प्रभात ही ऐसा नहीं होता कि उसमें हृदया आ जाती है । अपितु यहाँ सदैव सभी प्रभात ऐसे ही हृदय होते हैं । ‘स्फुटितकमलामोदमैत्रोकषाय’ स्फुटित का अर्थ है फूटा हुआ ।
में एक मनोहर शब्द होने लगता है । उस शब्द से मिलकर सारसों का क्रूजन अर्धकाधिक दोर्घ हो जाता है । ‘दीर्घ करते हुये’ का विशेषण दिया गया है ‘कुशलता पूर्वक’ ( पटु ) । यह क्रियाविशेषण है । कुशलतापूर्वक कहने का आशय यह है कि यह वायु इतना सुकुमार है कि इसके शब्द से सारस का मन्द स्वर भी दब नहीं पाता । अपितु जैसे कोई साथ में पड़नेवाला साथी ब्रह्मचारी ‘अपने दूसरे सहचर के अध्ययन में सहायता पहुँचाता है वैसे ही यह वायु भी एक अच्छे सहचर के समान सारसकूजन को प्रदीप्त ही करता है । यह प्रदीप्त करना अर्थ ही नहीं है अपितु इसका बहुत बडा उपयोग यह है कि कोमल वायु के कारण सारस मदमस्त हो जाते हैं और उससे उनके स्वर में एक स्वाभाविक मधुर्य आ जाता है । ‘प्रभातों में’ यह शब्द भी अभिप्राय है । कारण यह है कि अपनी प्रियतमाओं की महिमा की थकावट को दूर करने का सबसे अच्छा अवसर तो प्रभात ही होता है । इसमें बहुवचन का अभिप्राय यह है कि इस विशाला नगरी में कोई एक प्रभात ही ऐसा नहीं होता कि उसमें हृदया आ जाती है । अपितु यहाँ सदैव सभी प्रभात ऐसे ही हृदय होते हैं । ‘स्फुटितकमलामोदमैत्रोकषाय’ स्फुटित का अर्थ है फूटा हुआ ।
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जब कोई वस्तु अत्यधिक मात्रा में भर दी जाती है और वह समाती नहीं है तब पात्र फूट पड़ता है। विशाला के कमलों में पुष्पों का रस मकरन्द इतनी अधिक मात्रा में भरा रहता है कि उनके भार से कमल फूट पड़ते हैं। स्फुटित का दूसरा अर्थ है खिले हुये। मकरन्द भार से दब करके ही कमल एकदम खिल उठते हैं। (यहाँ पर विकसित के लिये स्फुटित शब्द का प्रयोग किया गया है जिससे व्यंजना निकलती है कि कमल मकरन्द भार के आधिक्य से फूट कर खिलते हैं।) अतएव वे कमल इतने सुन्दर होते हैं कि दर्शकों के नेत्र एकदम उनकी ओर खिंच जाते हैं। इन कमलों में मस्तिष्क को तृप्त कर देनेवाला अनुपम गन्ध विद्यमान रहता है जिस से सिप्रा के वायु की स्थायी मैत्री है। जिस प्रकार दो निकटवर्ती मित्र कभी एक दूसरे से अलग नहीं रहना चाहते उसी प्रकार विशाला में सिप्रा का वायु भी मकरन्द के अतिनिकट सम्पर्क से रहित नहीं रहता। यह वायु निरन्तर कमलों के आमोद से सम्पृक्त रहने के कारण सदैव उसके अनुकूल ही रहता है और उससे कषाय अर्थात् उपरक्त हो जाता है। दार्शनिक भाषा में कषाय चित्त के उपरञ्जक भावों को कहते हैं। मित्र का चित्त अपने मित्र के प्रति सदा उपरक्त रहता है। उसी प्रकार यह वायु खिले हुए कमलों की सुगन्धि से सदैव उपरक्त रहता है। कषाय का दूसरा अर्थ है लाल पीला मिला हुआ एक विशेष प्रकार का वर्ण। सिप्रा का वायु मकरन्द के मिश्रण से उसी वर्ण का हो जाता है। 'स्त्रियों को' यहाँ 'प्रिय' शब्द में वहुवचन का प्रयोग विशेष मन्तव्य से किया गया है। एक तो स्त्रियाँ स्वतः तीनों लोकों का सारभूत तत्व हैं। उनसे अधिक रमणीय वस्तु जगतीतल पर कोई अन्य है ही नहीं। फिर यह वायु केवल किसी एक स्त्री को ही सुरतग्लानि को ही दूर नहीं करता अपितु सभी स्त्रियों की सुरतग्लानि को दूर करता है। सुरतग्लानि के दूर करने के भी दो अर्थ हैं-एक तो स्त्रियों में रात्रि में सहवासजन्य थकावट के कारण जो मालिन्य आ जाता है यह ताजा वायु उन स्त्रियों के शरीर का स्पर्श कर उस थकावट को दूर कर देता है। दूसरा अर्थ यह है कि जब स्त्रियों में सम्भोग की कामना उद्दीप्त हो उठती है तब उनमें एक अवसाद तथा मुखमालिन्य उत्पन्न हो जाता है। यह वायु उन रमणियों के प्रियतमों में एक हर्ष तथा सम्भोगाभिलाष उत्पन्नकर उन रमणियों की सुरताकाङ्क्षाजन्य मलिनता को दूर करता है। किन्तु प्रश्न यह है कि वायु उस मलिनता को दूर किस प्रकार करता है? क्या प्रभु के समान आदेश देकर बलात् उनके अन्दर से उस ग्लानि को दूर करता है? उत्तर है नहीं। वह अज्ञानकूल बनकर उनकी उस ग्लानि का अपाकरण करता है। इस अज्ञानकूल शब्द के भी दो अर्थ हैं। एक तो अज्ञों में स्पर्श करने में सुख देता
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हे, दूसरे यह हृदय के अन्दर प्रविष्ट हो जाता है अर्थात् इसके प्रति हृदय में एक अनुराग उनःन हो जाना है। इस प्रकार यह वायु बलात् नहीं अद्भुत प्रेमपूर्वक हृदय में प्रवेशकर तथा अङ्गों में सञ्चर करके सुरतग्लानि को दूर करता है। 'प्रियतम इव' शब्द की सन्धि दो प्रकार से तोड़ी जा सकती है। 'प्रियतम + इव' और 'प्रियतमः + इव'। प्रथम सन्धिविच्छेद में प्रियतम शब्द विषयसम्पम्यन्त है। अतः इसका अर्थ यह होगा कि स्त्रियों के हृदय में प्रियतमविषयक सम्भोग की अभिलाषा का उत्पादक करने के लिये यह पवन चाटुकारिता करता है। दूसरी व्युत्पत्ति के अनुसार यह अर्थ होगा कि प्रियतम के हृदय में भी उस पवन के सङ्घर्ष से सम्भोग की अभिलाषा प्रबुद्ध हो जाती है और प्रियतम स्त्रियों में सहवास की आकाङ्क्षा उत्पन्न करने के लिये चाटुकारिता करने लगता है। प्रियतम को चाटुकारिता करने में प्रेरणा वायु से प्राप्त होती है। अतः वायु प्रियतमों से स्त्रियों की वाटुकारिता कराता है। इस अर्थ में 'पार्थस्नात्कार' में प्रेरणार्थक णिजन्त होकर उससे घञ् प्रत्यय होता है। प्रियतम चाटुकारिता करता है। वायु उसे प्रेरित करता है इस प्रकार वायु प्रियतमों से स्त्रियों की चाटुकारिता कराता है।
उधर दूसरे अर्थ में वायु स्त्रियों के हृदय में स्वयं सम्भोग की प्रार्थना का भाव जागृत कर देता है। इस प्रकार वायु शृङ्गाररस का सर्वस्व है। क्योंकि शृङ्गार रस का प्राण ही यह है कि दोनों में एक दूसरे के प्रति अनुराग की भावना जागृत हो और उक्त व्याख्या में यह बताया ही जा चुका है कि वायु दोनों में अभिलाषा को जागृत करता है। और यह बात ठीक भी है कि वायु में यह गुण विद्यमान हो क्योंकि वायु कोई देहाती गँवार तो है नहीं, वह तो एक उच्च कुलीन के समान है। अतः उसमें यह निपुणता होनी ही चाहिये कि वह दोनों के हृदयों में प्रेम-भावना जागृत करे। यह बात 'सिपावत' शब्द से अभिव्यक्त होती है। यह वायु सिप्रा से परिप्लुत है जो कि 'विशाला' जैसी नगरी के पास होकर बहती है। अतः यह विशाला के व्यवहार को भलीभाँति जानता है, नागरిక है और नागरिकों का जैसा व्यवहार करना है।
उधर इस पद्य की पवनसम्बन्धी व्याख्या की गई है। इसी प्रकार यह पद्य प्रियतम के विषय में घटाया जा सकता है। प्रियतम भी जो सुरत के बाद अङ्गानुकूल होकर अर्थात् अङ्गों को दवा दवाकर इसी प्रकार तो सुरत की ग्लानि को दूर किया करता है जिससे उसकी प्रियतमा में सुरत के लिये प्रार्थना उत्पन्न हो जावे। अतः वह भी अङ्गों के सञ्चालन इत्यादि से चाटुकारिता करता है। जिस प्रकार वायु सारसों के क्रूजन को दीर्घ करता है उसी प्रकार प्रियतम भी स्त्रियों के क्रूजन अर्थात् सुरत को अस्वीकार करने के मधुर स्वर
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तारावती
को अधिकाधिक बढ़ाता जाता है । प्रियतम प्रार्थना करता है और स्त्रियाँ इनकार करती जाती है जिसमें उनका बड़ा मधुर कूजन के समान स्वर होता है । ( कामशास्त्र में क्रियों के सुरत कालीन शब्द के लिये अनेक पक्षियों के कूजन की उपमा की गई है । ) प्रियतम जिस समय अपनी प्रियतमाओं से चाटुकारिता करते हैं उस समय क्रियों का मुख प्रसन्नता से त्रिभोर होकर खिल उठता है और उनके मुख की शोभा प्रकृष्टित कमल की जैसी हो जाती है । उस मुख में एक प्रकार की स्वाभाविक सुगन्ध होती है जो हर समय बनी रहती है । उससे सम्भोगकाल में रसिकों का विशेष परिचय होता है जिससे रसिकों के अन्नःकरण कषाय या अनुरक्त हो जाते हैं । ‘अङ्गों के अनुकूल’ यह जब प्रियतमपरक होगा तो उसका एक अर्थ यह भी हो सकता है कि प्रियतम कामशास्त्र की ६४ कलाओं में निष्णात है और उसके अनुकूल ही सहवासविधि में प्रवृत्त होता है । इस प्रकार यह विशालानगरी सभी गुणों से परिपूर्ण है और सभी इन्द्रियों को तृप्त करनेवाली है । यहाँ सारसों और रमणियों का मधुर कूजन कानो को तृप्त करता है । खिले हुये कमल तथा सुन्दरियों के वदनारविन्द रूप के आगार हैं और नेत्रों को तृप्त करते हैं । चारों ओर सौरभ उड़ता है और वायु आमोद से परिपूर्ण है जिससे घ्राणेन्द्रिय तृप्त हो जाती है । यहाँ वायु का त्वचा को तृम करनेवाला नझा ही सुकोमल स्पर्श है । यहाँ का पवन भी बहुत ही नाजुुक है जो कि प्रेम की विधि को भलीभाँति जानता है । हे मेघ ! तुम्हें उस देश में अवश्य जाना चाहिये । यह मेघदूत में मेघ के प्रति कामो यक्ष का कथन है ।
अब इस उदाहरण की योजना लक्षण में कीजिये । यहाँ पर मैत्री शब्द अपने आधिदैविक अर्थ में बाधित है । क्योंकि मित्रता करना मनुष्य का धर्म है पशु-पक्षी आदि का नहीं । अतः यहाँ पर लक्ष्यार्थ निकलता है कि वायु का कमल-मकरन्द की सुगन्ध से अविच्छिन्न सम्बन्ध बना रहता है । इससे प्रयोजनरूप व्यञ्जना यह निकलती है कि वहाँ का वायु और कमल की सुगन्ध एक दूसरे के सवथा अनुकूल हैं और वह प्रदेश बड़ा ही मनोरम है । इस प्रकार मैत्री शब्द के अर्थ का सवथा परित्याग हो जाता है । अतएव मैत्री शब्द में अत्यन्ततिरस्कृतवाच्य अविवक्षितवाच्य ध्वनि है । साथ ही दूसरे शब्दों से यहाँ अलङ्कार भी प्रतीत होते हैं— ( १ ) मानों वायु सारसों के कूजन को और अधिक बढ़ाना है, मानों वायु स्त्रियों की सुरतकलानि को दूर करता है, इस प्रकार यहाँ प्रतीममान उत्प्रेक्षा अलङ्कार है । ( २ ) वायु तथा प्रभात का स्वाभाविक वर्णन किया गया है, अतः स्वभावोक्ति अलङ्कार है । ( ३ ) खिले हुये कमलरूपी क्रियों के मुख, नायक रूपी
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संसंृष्टालङ्कारान्तरसङ्कीर्णो ध्वनिर्यथा— दन्तत्कताने करजैरैश्व विपाटितानि, प्रोद्वृत्तनसान्द्रपुलके भवतः शरीरे । dन्तानि रक्तमनसां भृङ्गराजवन्ध्या, जातस्रुहैर्मुनिभिरप्रथयवलोकितानि ॥
अत्र हि समासोक्तिसंसंष्टेन तिरोधालङ्कारेण सङ्कीर्णस्यालङ्कारमध्ययक्रममध्यपयध्वने: प्रकाशनम् । दयावीरस्य परमार्थतो वाक्यार्थीभूतत्वात् । ( अन्० ) दूसरे संसृष्ट अलङ्कार से सङ्कीर्ण जैसे— ‘उठे हुये घने पुलकवाले आपके शरीर पर रक्तमनस वाली सिंह की बधू के द्वारा दिये हुये दन्तत्कत और नाखूनों से विदारण, उत्पन्न इच्छावाले मुनियों के द्वारा भी देखे गये ।’ यहाँ निस्संदेह समासोक्त्ति से संसृष्ट विरोधालङ्कारके द्वारा सङ्कीर्ण अलङ्कारकमव्यक्तव्य ध्वनि का प्रकाशन होता है । क्योंकि यहाँ वस्तुत: तो दयावीर ही वाक्यार्थ हो जाता है ।
एवमियता— "सगुणीभूतचर्यैच्यै: सालङ्कारे: सह प्रभेदै: स्वै: । सङ्कीरसंसंष्टिभ्याम् ।" इत्येतदन्तं व्याख्यायोदाहरणानि च निरूप्य पुनरपि इत्थे यत्कारिकाभागे पदद्वयं तस्यार्थं प्रकारायत्युदाहरणद्वारेणैव—संसंष्टेत्यादि । पुनः शब्दस्यायमर्थ:—न केवलं ध्वने: स्वप्रभेदादिमि: संसृष्टिसङ्कीर्णौ विवक्षितौ यावत्तेषामन्वयोन्यमपि । स्वप्रभेदैरगुणीभूतव्यङ्गयेन वा सङ्कीर्णानां संसृष्टानां च ध्वनिनां सङ्कीर्णत्वं संसृष्ट-स्वं च दुलङ्क्यमितिविस्पष्टोदाहरणं न भवतीदृशलङ्कारस्यालङ्कारेण संसृष्टसङ्कीर्णस्य वा ध्वनौ सङ्करसंघौ प्रदर्शनायौ ।
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वायु इनमें रूपक अलंकार है और ( ४ ) प्रियतम इत्यादि में उपमा है; इन अलंकारों का यहाँ मैत्री शब्द की अत्यन्ततिरसृतत्वाद्य अविवक्षितवाच्य ध्वनि से संसृष्टि है ( मल्लिनाथ ने 'प्रार्थनाचाटुकार:' से खण्डिता के अनुरय की व्याख्या की है और 'मुरतग्लानि हरतीव' यह अन्वय मान कर लिखा है - क्योंकि खण्डिता का सुरत हुंभा ही नहीं है, अतः इस समय उसको मनाना वाद में होनेवाले सुरत की ग्लानि को हरने के समान है, अतः यह उत्प्रेक्षा अलंकार है । )
प्रस्तुत ( ४३ वीं ) कारिका में कहा गया था कि ध्वनि की गुणीभूतव्यङ्गय और अलंकार सहित अपने भेदों से सङ्कर और संसृष्टि होती है । यहाँ तक 'उस' सङ्कर और संसृष्टि की पूरी व्याख्या कर दी गई और प्रत्येक प्रकार का सङ्भमन' उदाहरणों से भी कर दिया गया । कारिका के अग्रिम भाग में लिखा है - 'पुनरप्युद्योतते बहुधा' 'यह ध्वनि और भी बहुत प्रकार से उद्योतित होती है ।' इस 'पुनरपि' शब्द का क्या अर्थ है ? अब इसी पर विचार किया जायगा ।
यहाँ 'पुनरपि' शब्द का यह अर्थ है कि इस ध्वनि के उत्त्क सङ्कर और संसृष्टि में भिन्न और भी सङ्कर और संसृष्टि सम्भव हैं । वे सङ्कर और संसृष्टि इस प्रकार हो सकती हैं कि ध्वनि के अपने भेदों से, गुणीभूतव्यङ्गच्य के प्रकारों से और अलंकारों से जब एक बार सङ्कर और संसृष्टि हो जाती हैं तब उन सङ्कीर्ण और संसृष्ट प्रकारों से पुनः ध्वनि की संसृष्टि या सङ्कीर्णता । ( १ ) अपने स्वतन्त्र सङ्कीर्ण भेदों से .अपने स्वतन्त्र भेदों से संसृष्ट या सङ्कीर्ण । ( २ ) गुणीभूतव्यङ्गच्य से संसृष्ट या सङ्कीर्ण अपने भेदों को पुनः अपने भेदों से संसृष्टि या सङ्कीर्णता । ( ३ ) परस्पर संसृष्ट गुणीभूत व्यङ्गच्य की संसृष्टता या सङ्कीर्णता ( ४ ) अलंकारों से संसृष्ट ध्वनि की अपने भेदों से संसृष्टता या सङ्कीर्णता । ( ४ ) परस्पर संसृष्ट या सङ्कीर्ण अलंकारों की ध्वनि के किसी भेद से संसृष्टता या सङ्कीर्णता। इत्यादि । यहाँ पर प्रथमं चार प्रकारों के उदाहरण नहीं दिये जायेंगे क्योंकि उदाहरणों में उनका सङ्कीर्णित करना कुछ कठिन है । अतः अन्तिम प्रकार के ही उदाहरण दिये जायेंगे । ये भेद भी चार प्रकार के हो सकते हैं—(१) सङ्कीर्ण अलंकारों का ध्वनिभेद से सङ्कार्य (२) सङ्कीर्णो अलंकार की ध्वनि भेद से संसृष्टि। ( ३ ) संसृष्ट अलंकारों का ध्वनि भेद से साङ्कर्य और ( ४ ) संसृष्ट अलंकारों की ध्वनि भेद से संसृष्टि । यहाँ पर दो के उदाहरण दिये जायेंगे एक तो संसृष्ट अलंकारों की सङ्कीर्णता और दूसरे संसृष्ट अलंकारों की संसृष्टि । शेष उदाहरण स्वयं समझ लेना चाहिये । पहले चारुणा अलंकार की सङ्कीर्णता का उदाहरण लीजिये—
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तदिस्मिन् भेदचतुष्टये प्रथमं भेदमुदाहरति—दन्तत्क्षतातीतिः । बोधिसत्त्वस्य स्वकिशोरमक्षणप्रवृत्तां सिंहों प्रति निजशरीरं वितीर्णवतः केनचिच्चाटुकं क्रियते । प्रोद्भूतः सान्द्रः पुलकः परार्थसम्पत्तिजेनानन्दभरेण यत्र । रक्ते रोधिरे मनोडमिलाषो यस्या:, अनुरक्तं च मनो यस्याः । मुनयः श्रद्धाधातेमदनविलासिचोलि विरोधाः । जातस्नुहेरिति वयमपि कदाचिदेवं कारणिकपदवीमधिरोक्ष्यामस्तदासस्त्यतो मुनयो भविष्याम इति मनोराज्ययुक्ते: । समासोक्तिश्र नायिकावृत्तान्तप्रतिपते: । दयावीरस्यैति । दयामयुक्तमनोराज्ययुक्ते: ।
वह इन चार भेदों में प्रथम भेद का उदाहरण देते हैं—‘दन्तत्क्षत’ यह । अपने किशोरों के भरण में प्रवृत्त सिंहों के प्रति अपने शरीर को दे देनेबाले बोधिसत्व की कोई चाटुकारिता कर रहा है । उत्कृष्ट रूप में उद्भूत हुआ है घना पुलक-दूसरे के अर्थ सम्पादन से उत्पन्न आनन्द भार के द्वारा जिसमें । रक्त में अर्थात् रुधिर में मनोडमिलाषा है जिस ( सिंही ) की । और अनुरक्त है मन जिसका । मुनि होते हुए मदन के आवेश को उद्दोधित करनेवाले यह विरोध है । ‘जातस्नुहे:’ इसका अर्थ यह है कि हम भी कदाचित् कारणिक पदवी पर अधिरुढ होंगे तब मुनि बनेंगे इस मनोराज्य से युक्त । और समासोक्ति है नायिका के वृत्तान्त की प्रतीति के द्वारा। ‘दयावीर का’ यह ।
कोई भूखी सिंही अपने बच्चों को खा जाने के लिये तैयार है । बोधिसत्व उन सिंही के बच्चों की रक्षा करने के लिये उस सिंहिनी को अपना शरीर अर्पित कर देते हैं उस समय वह सिंहिनी अपने दाँतों और नाखूनों से बोधिसत्व की जो दुर्दशा कर डालती है उसको देखकर कोई भक्त बोधिसत्व की प्रशंसा करते हुये कह रहा है—
जिस समय बोधिसत्व ने यह देखा कि कोई सिंहिनी भूख से अत्यधिक पीड़ित हो गयी है और यहाँ तक कि अपने बच्चों को भी खा जाने को उद्यत है । उसी समय बोधिसत्व ने उन सिंहिनी के बच्चों को बचाने के लिये अपना शरीर, उस सिंहिनी को अर्पित कर दिया । उस समय दूसरे का उपकार करने का अवसर मिल जाने और अपने कर्तव्य का निर्वाह करने में समर्थ हो सकने के कारण बोधिसत्व के हृदय में अभूतपूर्व आनन्द उत्पन्न हो गया और उस हर्ष के कारण उन के शरीर पर बहुत ही घना रोमांच उठ आया । उस समय सिंहिनी का मन रक्तपान में लगा हुआ था । अतः उस सिंहिनी ने बोधिसत्व पर आक्रमण कर दिया और उनके शरीर में दाँतों के घाव बना दिये और नाखूनों से उनका शरीर विदीर्ण कर डाला । यह देख कर मुनियों के हृदय में भी आकांक्षा जागृत हो गयी कि परमात्मा
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स्वादत्र धर्मस्य धर्मवीर एव दयावीरशब्देनोक्तः । वीरश्रात्र रसः उत्साहस्यैव स्थायित्वादिति भावः । दयावीरशब्देन वा शान्तं व्यपदिशति सोऽत्र रसः संसृष्टालङ्कारेणैव गृहीते । समासोक्तिमहिम्ना ह्यायमर्थः सम्पद्यते—यथा काश्चिन्मनोरथैरथ सप्रीतिसम्भोगावसरं जातपुलकस्तथा त्वं परार्थसम्पादनाय स्वशरीरदानं हि अतिशयकरुणातिशयोडनुभावविभावसम्पदोद्दीपितः ।
दयावीर शब्द से धर्मवीर का ही कथन किया गया है । यहाँ पर वीर रस है, क्योंकि उत्साह का ही स्थायित्व है, यह भाव है । अथवा दयावीर शब्द से शान्त का नामोल्लेख करते हैं । वह यह रस संसृष्ट अलङ्कार से अनुगृहीत किया जाता है । समासोक्ति की माहिमा से यह अर्थ हो जाता है । जैसे कोई सैकड़ों मनोरथों से प्राप्त प्रार्थनीय प्रेयसी के सम्भोग के अवसर पर पुलकपूर्ण हो जाता है वैसे ही तुम परार्थसम्पादन के लिये अपने शरीरदान में, यह करुणा का अतिशय अनुभव विभाव की सम्पत्ति से उद्दीपित किया गया है ।
हमें भी ऐसी शक्ति देता और हमारे अन्दर भी कारुण्यकला की ऐसी ही भावना जागृत होती कि हम भी परोपकार के लिये अपना शरीर अर्पित कर सकते जिससे हमारा भी मुनि कहलाना वास्तविक रूप में सत्य हो सकता । किन्तु वह अभिलाषा उनकी मनोराज्यपदवी पर ही आरूढ है । अर्थात् उनका खयाली पुलाव पकाना ही है । और मुनियों में इतनी शक्ति ही नहीं कि वे जीव्ररक्षा के लिये अपने प्राण दे सकें ।
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यहाँ पर नायिका के वृत्तान्त की भी प्रतीति होती है । अतः यहाँ पर समासोक्ति अलङ्कार है । समासोक्ति अलङ्कार वहाँ पर होता है जहाँ विशेषणवाचक शब्द द्वयर्थक हो किन्तु विशेष्य द्वयर्थक न हो, किन्तु उन द्वयर्थक विशेषणों के बल पर एक अप्रस्तुत अर्थ और निकाल लिया जाय और प्रस्तुत तथा अप्रस्तुत दोनों अर्थों का उपमानोपमेय भाव स्थापित कर दिया जाय । यहाँ पर दन्तक्शत इत्यादि शब्द द्वयर्थक हैं किन्तु विशेष्य मृगराजवधू शब्द द्वयर्थक नहीं है । द्वयर्थक विशेषणों के बल पर एक अप्रस्तुत अर्थ की व्याख्या होती है कि किसी नायिका ने किसी नायक के शरीर पर अनुरागपरिपूर्ण चित्त होकर दन्तक्शत और नखक्षत के चित्र बना दिये । उस समय नायक के शरीर पर सम्भोगजन्य हर्ष के कारण अत्यन्त घना रोमाञ्च हो रहा था । इस अर्थ में 'रक्तमनसा' का अर्थ होगा—'अनुरक्त है मन जिनका ।' इस प्रकार इस समासोक्ति के द्वारा इसका अर्थ हो जावेगा—'जिसका ।'
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प्रकार कोई रसिक प्रेमी व्यक्ति सैंकड़ों मनोरथों से प्रेयसी के समागम की कामना करता रहे और सौभाग्य से उसे अपनी मनचाही प्रेयसी का समागम मिल भी जाय तथा वह सुन्दरी हर्ष निर्भर होकर अपने उस प्रियतम के शरीर पर दन्तक्षत और नखक्षत के अनेक चिह्न बनाये उस समय वह रसिक प्रेमी आनन्द निभर हो जाता है और उसके शरीर पर अत्यन्त घना रोमाञ्च उद्भूत हो जाता है। उसी प्रकार भगवान बोधिसत्व के हृदय में प्रणिरक्षा के लिए अपने शरीर दे देने की कामना अत्यन्त तीव्रता के साथ विद्यमान थी फिर जब उन्हें सिंही के बच्चे की रक्षा के लिए अपने शरीरदान का सौभाग्य प्राप्त हो गया तब हर्षातिरेक से उनके शरीर पर भी गादा रोमाञ्च हो गया। यह तो हो गया समासोक्ति अलङ्कार। यहाँ पर दूसरा अलङ्कार है विरोधाभास—‘मुनियों ने सृग्हापूर्वक देखा’ यहाँ सृग्हा का अर्थ है कामवासना का आवेश। रसिकों के शरीर पर दन्तक्षत और नखक्षत देखकर रागियों के हृदय कामवासना से भर ही जाते हैं। यहाँ मुनियों के मन कामवासना से भर गये यह विरोध है। मुनियों के चित्तों में भगवान बुद्ध के समान अपने शरीरदान की उत्कट स्पर्धा उत्पन्न हुई यह विरोध का परिहार है। इस प्रकार यहाँ विरोधाभास अलङ्कार है। उक्त समासोक्ति और विरोधाभास की परस्पर संसृष्टि है।क्योंकि दोनों में न उपकार्योपकारक भाव है और न मन्त्रदृष्टि ही, तथा दोनों की प्रतीति विभिन्न शब्दों से होती ही है।यह समासोक्ति और विरोधाभास की संसृष्टि समस्त पद्य से अभिव्यक्त होनेवाले दयावीर को उपकृत करती है। दयावीर ही यहाँ मुख्य वाक्यार्थ (तात्पर्यार्थ) है। अतः समासोक्ति और विरोधाभास की संसृष्टि से उपकृत दयावीर ही यहाँ पर ध्वनि का रूप धारण करता है। अतः यहाँ पर दयावीर और उक्त दोनों अलङ्कारों की संसृष्टि का सङ्कर है। यहाँ पर प्रश्न यह है कि भरत मुनि ने वीररस का दयावीर नामक भेद तो माना ही नहीं फिर दयावीर की ध्वनि कहना कहाँ तक शास्त्रसम्पत हो सकता है? इसका उत्तर यह है कि यहाँ यदि दयावीर न माना जाय तो धर्मवीर ही माना जा सकता है। आनन्दवर्धन ने दयावीर इसलिये वन्तलाया है कि यहाँ पर धर्म वस्तुतः दयाप्रयुक्त ही है। वास्तविकता यह है कि चाहे इसे आप धर्मवीर कहें चाहे दयावीर, है यह वीररस ही। क्योंकि यहाँ पर उत्साह ही स्थायीभाव है। अथवा दया का यहाँ पर अर्थ है शान्तरस। क्योंकि निवेद की भी यहाँ प्रधनाता बतलाई जा सकती है। इस प्रकार यहाँ रस संसृष्ट अलङ्कारों से अनुगृहीत हुआ है।
अब दूसरी मे्रद का उद्धाहरण लीजिये जहाँ संसृष्ट अलङ्कार और ध्वनि के किसी भेद की संसृष्टि होती है। इसके उदाहरण के रूप में पद्य गाथा उद्धृत की गई है
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संसंस्कृालङ्कारसंस्कृतस्य च ध्वनेर्यथा— adिणुअ पओअर सिअसु पहिअसामाइअसु दिअहेसु । सोहइ पसरीअगिआणं णच्चिअं मोरवन्दाणम् ॥
अनु० ) संसृष्ट अलङ्कार का ध्वनि से संसृष्टत्व जैसे — 'अभिनव पयोधों के शब्द से युक्त पथिकों के लिये श्यामायित दिवसों में मेघों का नृत्य शोभित हो रहा है ।'
द्वितीय भेद का उदाहरण देते हैं—संसंस्कृतेति । अभिनव हृदयैः पयोधनां मेघानां रोषते येषु दिवसेषु । तथा पथिकान् प्रति श्यामायितेषु मोहजनकत्वादातिरुपतामाचरितवत्सु । यदि वा पथिकानां श्यामायितं दुःखवशेन श्यामिका येभ्यः । शोभते प्रसारितग्रीवाणं मयूरचृन्दानां नृतम् । अभिनयमयोगरिसिकेषु पथिकसामाजिकेषु सत्सु मयूरचृन्दानां प्रसारितग्रीवाणां प्रकृष्टसारणानुसारिगीतानां तथा ग्रीवारेचकाय प्रसारितग्रीवाणां नृतं शोभते । पथिकान् प्रति श्यामा इवाचरन्तीति कियच् । मतयेन हुलसोपरमा संसर्ग इति ग्रन्थकारस्यायः । अत्रैवोदाहारणेऽन्यत्रेदृशयसुदाहतं शक्यमित्याशयेनो—
अत्र हूपमारुपकाभ्या शब्दशक्त्युद्भवानुरणनरूपव्यङ्ग्यस्य ध्वने: संसृष्ट-त्वम् ॥ ४३ ॥
यहाँ निस्सन्देह उपमा और रूपक से शब्दशक्त्युद्भव अनुरणनरूप व्यङ्ग्य ध्वनि की संसृष्टि हो जाती है ॥ ४३ ॥
अर्थात् मेघों का गर्जन हैं जिन दिवसों में । तथा पथिकों के प्रति श्यामायित अर्थात् मोहजनक होने से रात्रिरुपता का आचरण करनेवाले ( दिनों ) में । अथवा पथिकों के लिये श्यामायित अर्थात् दुःखवश श्यामवर्ण की हैं जिनसे । फैलाईं हुईं गर्दनोंवाले मयूरचृन्दों का नृत्य शोभित होता है । अभिनव प्रयोग के रसिक पथिक सामाजिकों के होते हुये प्रकृष्ट सारणा के अनुसार गीतोंवाले तथा ग्रीवा रेचक के लिये फैलाई हुई गर्दनोंवाले मयूरचृन्दों का नृत्य शोभित हो रहा है । पथिकों के प्रति श्यामा के समान आचरण करते हुए हैं इस अर्थ हैं हम अर्थ में कवि का प्रयोग हो जाता है । प्रत्यय से हुलोपमा का निर्देश किया गया है । 'पथिकसामाजिकेषु' में कर्मधारय के स्पष्ट होने के कारण रूपक है । उन दोनों से ध्वनि का संसर्ग होता है यह ग्रन्थकार का आशय है । इसी उदाहरण में और दो भेदों के उदाहरण दिये जा सकते हैं इस आशय से दूसरे
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दाहरान्तरं न दत्तम् । तथाहि व्याघ्रादेराकृतिगणत्वे पथिकसामाजिकेष्विवस्युपमा-रूपकाभ्यां सन्देहास्पदत्वेन संकीर्णाभ्यामनिनयप्रयोगे च रसिकेष्वति प्रसारितगीतानामिति यः शब्दशक्युद्धवस्तुस्य संसर्गमात्रमनुप्राह्ल्वभावात् । 'पहिअ सामाइएसु' इत्यत्र तु पदे संकीर्णाभ्या ताभ्यामुपमारूपकाभ्यां शब्दशक्तिमूलस्य ध्वनेः संकीर्णत्वमेकत्रयज्जकानुप्रवेशादिति संकीर्णालङ्कारसंस्कृतः संकीर्णालङ्कारसङ्कीर्ण-श्लेषत्यपि भेदद्रयं मन्तव्यस् ॥ ४३ ॥
दाहरान्तरं न दत्तम् । तथाहि व्याघ्रादेराकृतिगणत्वे पथिकसामाजिकेष्विवस्युपमा-रूपकाभ्यां सन्देहास्पदत्वेन संकीर्णाभ्यामनिनयप्रयोगे च रसिकेष्वति प्रसारितगीतानामिति यः शब्दशक्युद्धवस्तुस्य संसर्गमात्रमनुप्राह्ल्वभावात् । 'पहिअ सामाइएसु' इत्यत्र तु पदे संकीर्णाभ्या ताभ्यामुपमारूपकाभ्यां शब्दशक्तिमूलस्य ध्वनेः संकीर्णत्वमेकत्रयज्जकानुप्रवेशादिति संकीर्णालङ्कारसंस्कृतः संकीर्णालङ्कारसङ्कीर्ण-श्लेषत्यपि भेदद्रयं मन्तव्यस् ॥ ४३ ॥
वह इस प्रकार—व्याघ्रादि के आकारिगण होने के कारण 'पथिक सामाजिकों' में संदेहास्पद के रूप में सङ्कीर्ण उपमा और रूपक के द्वारा 'अभिनय के प्रयोग में और अभिनव' प्रयोग में रसिकों में और 'गीत को प्रसारित करनेवालों' का यह जो शब्दशक्त्युद्भव ध्वनि है उसका केवल संसर्ग होता है क्योंकि अनुप्राह्ल्व का अभाव है । 'पहिअ सामाइएसु' इसमें तो पदों में सङ्कीर्ण उन दोनों उपमा रूपकों से एकव्यज्जकानुप्रवेश के कारण शब्द-शक्तिमूलक का सङ्कीर्णत्व हो जाता है इस प्रकार सङ्कीर्णालङ्कार संसृष्ट और संकीर्णालङ्कारसङ्कीर्ण-श्लेषत्यपि भेदद्रयं मन्तव्यस् ॥ ४३ ॥
जिसकी छाया यह है:- अभिनवप्रयोगदर्शितेषु पथिकश्यामायितेषु दिवसेषु । शोभते प्रसारितग्रीवाणां नृत्यं मयूरचन्दनानाम् ॥
जिसकी छाया यह है:- अभिनवप्रयोगदर्शितेषु पथिकश्यामायितेषु दिवसेषु । शोभते प्रसारितग्रीवाणां नृत्यं मयूरचन्दनानाम् ॥
इस वर्षाकाल के इन दिनों में अभिनव अर्थात् हृदय को प्रिय मेघ गरज रहे हैं तथा विरहियों के लिये विरह वेदना के कारण ये दिन मोह या मूर्छा उत्पन्न करने वाले हैं जिससे ये रात्री के जैसे होगये हैं अथवा इन दिनों के कारण ही पथिकों में श्यामता अर्थात् कालुष्य उत्पन्न होंगया है । इस समय गर्दन को फैलाकर मोर नाच रहे हैं अतः बहुत ही सुन्दर मालूम पड़ते हैं ।
इस पद्य की एक छाया यह भी हो सकती है :- अभिनवप्रयोगरसिकेषु पथिकसामाजिकेषु दिवसेषु । शोभते प्रसारितगीतानां नृत्यं मयूरचन्दनानाम् ॥
इस पद्य की एक छाया यह भी हो सकती है :- अभिनवप्रयोगरसिकेषु पथिकसामाजिकेषु दिवसेषु । शोभते प्रसारितगीतानां नृत्यं मयूरचन्दनानाम् ॥
सारणा के अनुसार उत्त्कृष्ट गानवाले मयूरचन्दनदों का नाच शोभित हो रहा है । इस द्वितीय छाया में 'प्रसारितगीतानां' के स्थान पर 'प्रसारितग्रीवाणां' यह छाया भी रखी जा सकती है । तब इसका अर्थ यह होगा:कि मयूरचन्दन ग्र्रीवा-
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रेचक नामक नृत्यभेद के लिये अपनी गर्दन फैला रहे हैं और उनका नृत्य बहुत जोरभत हो रहा है।
इस पद्य का आशय यह है कि वर्षाकाल में मेघों का गर्जन मयूरों के लिये हर्षंप्रदायक है जिससे मयूरवृन्द अपनी गर्दन को फैलाकर नाचते और गाने लगते हैं। ये दिन पथिकों अर्थात वियोगियों के लिये अन्धकारपूर्ण हैं।
यहाँ पर 'पथिकऽस्यामायितेषु' की पथिकों के प्रति श्यामायित यह व्युत्पत्ति होगी। श्यामायित का विग्रह होगा—‘श्यामा इवाचरन्ति’ अर्थात् रात्रि के समान आचरण करनेवाली। यहाँ आचारार्थ में कृतच् प्रत्यय हो जाता है। इस प्रकार इसमें हुतोः उपमालङ्कार है।
इसके दूसरे अर्थ का सार यह है कि पथिक तो सामाजिक अर्थात दर्शक हैं, अभीष्ट प्रयोग में आनन्द लेना चाहते हैं और उस समाज को आनन्द देने के लिये मयूरों का गान तथा नृत्य प्रवृत्त हो रहा है।
यहाँ पर यदि इसका पाठ 'पथिक सामाजिकेषु' रखा जाय तो कर्मधारय समास होगा—‘पथिका एव सामाजिकाः;’ अथवा 'पथिकाक्ष ते सामाजिकाः' इस कर्मधारय समास के अनुसार इसमें रूपक अलङ्कार माना जायेगा।
ये दोनों अलङ्कार विभिन्न दो शब्दों में हैं इसलिये इनकी यहाँ पर संश्रुति है। यहाँ पर श्यामायित शब्द का अर्थ होता है दिन रात्रि बन जाते हैं अथवा अन्धकारमय हो जाते हैं क्योंकि जब मेघ गर्जन हो रहा हो और मयूरों का नृत्यगान भी प्रारम्भ हो गया हो उस समय दिनों की उद्दीप्तता बहुत बढ़ जाती है।
इस प्रकार यहाँ पर दिनों के उद्दीपन के आधिक्य की व्यञ्जना होती है। यह व्यञ्जना शब्दशक्तिमूलक है क्योंकि 'श्यामायित' परिकृति को सहन नहीं कर सकता। अतः उक्त अलङ्कारों को संसृष्टि से शब्दशक्तिमूलक ध्वनि की संश्रुति है।
यहाँ पर दो उदाहरण और दिये जाने चाहिये थे एक तो दो सकर्ण अलङ्कारों की ध्वनि के किसी भेद से सकर्णता का और दूसरा दो संकीर्ण अलङ्कारों की ध्वनि के किसी भेद से संसृष्टि का। किन्तु वृत्तिकार ने ये दो उदाहरण नहीं दिये हैं।
उसका कारण यह है कि यह अन्तिम उदाहरण ऐसा है जिसमें शेष दो उदाहरण भी सन्निविष्ट किये जा सकते हैं। वह इस प्रकार—‘उपमितं व्याघ्रादिभिः सामान्यप्रयोगे’ इस सूत्र के अनुसार जहाँ साधारण धर्म का प्रयोग न हो वहाँ उपमान और उपमेय का समास हो जाता है।
इस प्रकार 'पथिकसामाजिकेषु' की यह भी विग्रह किया जा सकता है—‘पथिकः सामाजिकः इव’ इस प्रकार यहाँ पर 'पथिकसामाजिकेषु' शब्द में ही हुतोः उपमा हो सकती है। व्याघ्रादिगण आकृति-गण है; अतः यह भी नहीं कहा जा सकता कि सामाजिक शब्द उसमें नहीं आया है, अतः
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एवं ध्वने: प्रभेदा: प्रभेदप्रभेदाच्च केन शक्यन्ते । संस्यातुं दिड्मात्रं तेषामिदमुक्तमस्माभि: ॥ ४८ ॥ अनन्ता हि ध्वने: प्रकारा: सहृदयानां व्युत्पत्तये तेषां दिड्मात्रं कार्थताम् ॥
(अनु०) इस प्रकार ध्वनि के प्रभेद और प्रभेदों के भी भेद किसके द्वारा परिगणित किये जा सकते हैं? उनका यह दिग्दर्शनमात्र हमारे द्वारा कह दिया गया है॥ ४८ ॥ ध्वनि के निस्सन्देह अनन्त प्रकार होते हैं । सहृदयों की व्युत्पत्ति के लिये उनका यह दिग्दर्शनमात्र कहा गया है॥
एतदपुसंहरति—एवमिति । स्पष्टम् ॥ ४८ ॥ तारावती यह समास यहाँ पर नहीं हो सकता । 'पथिकसामाजिकेषु' में रूपक बतलाया ही जा चुका है । इस प्रकार एक ही शब्द से दो अलंकारों के सम्भव होने के कारण इन दोनों अलंकारों का सन्देह संकर है । इन संकीर्ण अलंकारों के साथ ध्वनि की संसृष्टि हो जाती है । यह ध्वनि शब्दशक्तिमूलक वस्तु ध्वनि है—'अभिनय के प्रयोग में या अभिनव प्रयोग में रसिकों के मध्य गर्दन को फैलाये हुये या गीतों का निर्माण करनेवाले.....' इत्यादि से यह ध्वनि निकलती है कि पथिक रूपी रसिकों का समूह उपस्थित है क्योंकि नये अभिनयों को देखने की आकांक्षा कर रहा है । सभा बंधा हुआ है, मयूर नाच रहे हैं और अपनी नई नई कला दिखलारहे हैं, साथ ही अभिनय और संगीत भी चल रहा है । इस ध्वनि से उक्त दोनों अलकारों की संसृष्टि हो जाती है क्योंकि रूपक ध्वनि के अनुग्राहक नहीं होते । यहाँ पर ध्वनि शब्दशक्तिमूलक वस्तुध्वनि है क्योंकि 'अभिणा' इत्यादि शब्द बदले नहीं जा सकते । इसी प्रकार 'पथिकसामाजिकेषु' शब्द में जो उपमा और रूपक का सन्देह संकर है उसके साथ इसी शब्द से अभिव्यक्त होनेवाली ध्वनि का संकर हो जाता है क्योंकि यहाँ एक ही व्यञ्जक से अलंकार और ध्वनि दोनों निकलते हैं । इस प्रकार संकीर्णालंकार संसृष्टि और संकीर्णालंकार संकर के दोनों उदाहरण प्रस्तुत उदाहरण में ही गतार्थे हो जाते हैं । इसीलिये इनके उदाहरण पृथक् नहीं दिये गये ॥ ४८ ॥
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इत्युक्तलक्षणगेयोध्वनिविवेच्य: प्रयत्नेत: सद्दिः। सत्काव्यं कर्तुं वा ज्ञातुं वा सम्यगभियुक्तैः॥ ४५ ॥
उक्त लक्षणवाली जो ध्वनि सज्जनों के द्वारा अथवा सत्काव्य को करने के लिये या जानने के लिये ठीक रूप में उचित लोगों के द्वारा प्रयत्नपूर्वक विवेचित की जानी चाहिये॥ ४५॥
उक्तस्वरूपध्वनिनिरूपणनिपुणा हि सत्कवय: सहदयाश्र नियतमेव काव्यविषये पदां प्रकर्षे पदवीमासादयन्ति । अस्फुटस्फुटितं काव्यतत्त्वमेतद्यथोदितम् । अझाकुस्फुटितैर्यानकतुं रीतय: सम्प्रवर्तिता:॥ ४६ ॥
उक्त स्वरूपवाली ध्वनि के निरूपण में निपुण सत्कवि और सहृदय निश्चितरूप से ही काव्यविषय में प्रकर्ष पदवी को प्राप्त कर लेते हैं। जैसा कहा गया है यह काव्यतत्त्व अस्फुटरूप में स्फुटित हो रहा था। ( इसक्री ) व्याख्या करने के लिये असमर्थ होनेवालों के द्वारा रीतियों को प्रवृत्त किया गया॥ ४६॥
इस ध्वनिप्रवर्तन के द्वारा निर्णय किया हुआ काव्यतत्त्व अस्फुटरूप में स्फुटित होते हुये प्रतिपादन करने के लिये असमर्थ होनेवालों के द्वारा वैदर्भी गौड़ी और पांचाली ये रीतियां प्रवृत्त की गईं। रीति तत्त्व का विधान करनेवालों के सामने यह काव्यतत्त्व अस्फुटरूप में थोड़ा था स्फुरित हो रहा था यह लक्षित होता है। वह यहां पर स्फुटरूपमें प्रदर्शित ( ध्वनि सिद्धान्त ) के कारण अन्य रीति लक्षण की कोई आवश्यकता नहीं।
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४८वीं कारिका उपसंहारात्मक है जिसमें कहा गया है कि किसी में इतनी शक्ति नहीं है जो ध्वनि-मेदों का पूरा परिगणन कर सके। ध्वनि के भेद, भेदों के भेद, उनकी संरृष्टि और सङ्कर 'फिर संरृष्टि और सङ्कर की संरृष्टि और सङ्कर, इस प्रकार ध्वनि के अनन्त प्रकार हो जाते हैं। हमने यहां पर जितने भी उदाहरण दिये हैं वह तो केवल भेदों की दिशा दिखलाना है जिससे सहृदय लोग उसी पद्धति का आश्रय लेकर ध्वनि की व्याख्या विभिन्न काव्यों में कर सकें अथवा उसे समझ सकें। दर्शन की इच्छा दिखलाना प्रस्तुत प्रकरण का उद्देश्य नहीं है॥ ४८ ॥
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अथ 'सहृदयमनःप्रीतये' इति। यस्यमूचितं तदिदानीं न शब्दमात्रमपितु निःश्रूढमित्याश्रयेनाह—इत्युक्तेति । यः प्रयत्नतो विवेच्यः अस्माभिरश्लोकलक्षणो ध्वनिरेतदेव काव्यतत्त्वं यथोदितेन प्रपञ्चनिरूपणादिना व्याकर्तुमशकुतुवद्विरलद्धारकारैः रीतयः प्रवर्तिताः । इत्युक्तकारिकया सम्बन्धः । अन्ये तु यच्च्छब्दस्थाने 'अयम्' इति पठन्ति । प्रदर्श्यपदार्थौमिति । निर्माणे बोधे चैति भावः । व्याकर्तुमशकुतुवद्विरित्यत्र हेतुः—अस्फुटं कृत्स्नं स्फुरितमिति । लध्यते इति । रीतिहिं गुणेष्वेव पर्यवसित । यदाह—विशेषो गुणात्मा गुणाश्रय रस पर्यवसायिन एवेति । हृदयं प्राग्गुणनिरूपणे—'शृङ्गार एव मधुरः' इत्यत्रेति ॥ ४५-४६ ॥
अब 'सहृदयमन की प्रीति के लिये' यह जो सूचित किया था वह इस समय शब्दमात्र नहीं है अपितु पूरा हो गया । इस आशय से कहते हैं—'यह उक्त' इत्यादि । जो उक्त लक्षणवाली ध्वनि प्रयत्नपूर्वक हमारे द्वारा विवेचित की जानी चाहिये; यही काव्यतत्त्व है, इस काव्यतत्त्व की ठीक रूप में बतलाये हुए प्रपञ्चनिरूपण इत्यादि के द्वारा व्याख्या करने में असमर्थ लोगों के द्वारा रीतियाँ प्रवृत्त की गई यह उत्तर कारिका से सम्बन्ध है । और लोग तो 'यत्' शब्द के स्थानपर 'अयम्' यह पढ़ते हैं । 'प्रदर्श्यपदार्थौमिति' । 'निर्माणे बोधे चैति भावः' । 'व्याख्य करने में असमर्थ हुये' इसमें हेतु है—'अस्फुट करके स्फुरित यह' । 'लक्षित होता है' यह । रीतियाँ निःश्रूढदेह गुणों में ही पर्यवसित होती हैं। जैसे कहा गया है—विशेष गुणात्मक होता है और गुण रसपर्यवसायी होते हैं यह निःश्रूढदेह पहले गुणनिरूपण में कहा गया है—'शृङ्गार ही मधुर होता है' इसमें ॥ ४५, ४६ ॥
४५ वीं कारिका में ध्वनि निरूपण के प्रयोजन का उपसंहार किया गया है । उपक्रम में प्रयोजन पर दृष्टिपात करते हुए 'सहृदयमनःप्रीतये' लिखा गया था विवेचन करके यह सिद्ध कर दिया गया कि सहृदय मतप्रीति जो कि प्रमुख लक्ष्य था वह पूरा कर दिया गया । ४५ वीं कारिका के प्रथम चरण में लोचन के अनुसार दो प्रकार का पाठ होता है—( १ ) 'इत्युक्तलक्षणो यो ध्वनि:' और ( २ ) 'इत्युक्तलक्षणोय ध्वनि:' । प्रथम पाठ के अनुसार यह एक पूरा वाक्य है और स्वतन्त्र रूप में अर्थ का प्रतिपादन करता है । इस पाठ के अनुसार इसका सार यह है इस ध्वनि का लक्षण बतलाया जा चुका और उसकी व्याख्या भी कर दी गई। सज्जनों का कर्तव्य है कि वे इस की मनोयोगपूर्वक विवेचना करें । इसी
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प्रकार जिन लोगों की कामना है कि वे उत्तम काव्य की रचना कर सकें अथवा जिनकी कामना है कि वे उत्तम काव्य का परिज्ञान कर सकें इन दोनों प्रकार के व्यक्तियों का परम कर्तव्य है कि वे ध्वनि का ठीक रूप में अनुसन्धान तथा विवेचन करें। प्रथम पाठ के अनुसार इस कारिका का यहीं आशय है। अनुवाद दूसरे पाठ को लीजिए। इसमें ‘अथम्’ के स्थान पर ‘यः’ पाठ है। अतएव यह एक अपूर्ण वाक्य रह जाता है और उसका अर्थ पूरा करने के लिये ४६वीं कारिका का आश्रय लेना पड़ता है। इस प्रकार ४५वीं और ४६वीं कारिकाओं का सम्मिलित अर्थ हो जाता है। ४५वीं कारिका उद्देश्य वाक्य है और ४६वीं कारिका विधेय वाक्य। इस प्रकार इन दोनों का मिलाकर अर्थ यह होगा कि—जिस ध्वनि के लक्षणों का हमने उक्त प्रकरण में ठीक रूप में निरूपण किया है, जिस ध्वनि का विवेचन करना सज्जनों का परम कर्तव्य है और सत्काव्य की रचना करनेवाले कवियों तथा सत्काव्य के समझने की इच्छा करनेवाले सहृदयों दोनों के द्वारा जिस ध्वनि का विवेचन करना अगरिहायॅ कर्तव्य है वह ध्वनि एक सर्वप्रमुख काव्यतत्त्व है जैसा कि उक्त विवेचन से स्पष्ट हो गया होगा।
यह काव्यतत्त्व अस्पुट रूप में प्राचीन काव्य शास्त्रियों के समुख स्फुरित अवश्य हुआ था। किन्तु क्योंकेयह तत्त्व बहुत स्पष्ट नहीं था अतएव प्राचीन आचार्य उसकी ठीक रूप में व्याख्या नहीं कर सके। किन्तु उन्होंने इस तत्त्व की व्याख्या करने की चेष्टा अवश्य की और उसका परिणाम यह हुआ कि उन आचार्यों ने रीतियों का प्रवर्तन कर डाला। उनके विवेचन से इतना तो स्पष्ट ही प्रतीत होता है कि काव्य का यह तत्त्व बहुत ही मन्द रूप में उनके मानसिक में विद्यमान अवश्य था किन्तु उसका स्पष्ट चित्र उनके सामने नहीं था। उन्होंने व्याख्या करने की चेष्टा को किन्तु वे ठीक व्याख्या नहीं कर सके। इसीलिए उन्होंने रीतियों को प्रविष्ट कर दिया। ये रीतियाँँ तीन हैं—वैदर्भी, गौडी, और पाञ्चाली। उन्होंने रीति की परिभाषा बनाई ‘विशिष्टपदरचना रीति:’ अर्थात् विशेष प्रकार की पदरचना को रीति कहते हैं। इस पद-रचना की विशेषता होती है गुणात्मक अर्थात् ऐसी पदरचना जिसमें गुण विद्यमान हो। वस्तुतः उन आचार्यों का विवेचन यहाँ पर रुक गया। उन्होंने यह बतलाने की चेष्टा नहीं की कि गुणों को गुणरूपता प्रदान करनेवाला तत्त्व कौन सा है। यदि उन्होंने यह विचार किया होता तो उन्हें स्फुट हो जाता कि गुणों का पर्यवसान रस में ही होता है।
ध्वनिकार ने कहा ही है—‘शृङ्गार एव मधुरः परः प्रह्लादनो रसः।’ इसका अर्थ यह है कि माधुर्य शृङ्गारपर्यवसायी ही होता है। ( रस सर्वदा व्यङ्गय ही होते हैं।) इस प्रकार स्वतः सिद्ध हो जाता है कि काव्य का
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सर्वप्रमुख तत्व ध्वनि ही है। इस ध्वनि की व्याख्या की जा चुकी। अतः अब रीति के विस्तृत विवेचन की कोई आवश्यक्ता नहीं रह गई।
[ यहाँ पर ध्वनिकार ने लिखा है कि रीति का प्रवर्तन वस्तुतः काव्य के मूल-तत्व के अनुसन्धान की चेष्टामात्र है। यहाँ पर ध्वनिकार ने सम्भवतः वामन की ओर संकेत किया है क्योंकि वामन ने ही स्पष्ट रूप में रीति को काव्य-आत्मा कहा है। आनन्दवर्धन ने व्याख्या करने में तीन रीतियों का उल्लेख किया है वैदर्भी, गौडी और पांचाली। यह मान्यता भी वामन की ही है। अभिनव गुप्त ने तो वामन के सूत्रों का भी उल्लेख कर दिया है। इन सब प्रमाणों से यही निष्कर्ष निकलता है कि यहाँ पर वामन की ही ओर आचार्यों ने संकेत किया है।
वस्तुतः रीतियों का इतिहास बहुत पुराना है। भरतमुनि ने तो देश-भेद पर आधारित आचार-व्यवहार और रीति-रिवाजों का वर्णन किया ही है। वाणी का आचार ही रीति है। काव्य शास्त्र की सर्वप्राचीन उपलब्ध ग्रन्थ भीमहेर काव्यालङ्कार है। इसमें सवल शब्दों में काव्य रीति को वैदर्भी और गौडी के रूप में विभाजित करने का प्रतिवाद किया गया है और कहा गया है कि दूसरे विद्वान् रीतियों की मान्यता स्वीकार करते हैं। इससे सिद्ध होता है कि भामह के बहुत पहले रीतियाँ प्रतिष्ठित हो चुकी थीं और देशभेद के आधार पर एक अच्छी और दूसरी बुरी ये दो रीतियाँ मानी जाने लगी थीं। वाणभट्ट ने चार रीतियों का उल्लेख कर उनके समन्वय की चेष्टा की है। ये चारों रीतियाँ हैं उत्तरी, दक्षिणी, पूर्वी और पश्चिमी। ज्ञात होता है कि काल क्रम से उत्तरी और पश्चिमी शैलियों ने अपनी वत्सा खो दो थी और दक्षिणी (वैदर्भी) तथा पाँचवीं (गौडी) ये दो शैलियाँ ही शेष रह गई थीं।
इन दोनों शैलियों का विस्तृत विवेचन और इनके प्रति पूरी आस्था हमें दण्डी के काव्यादर्श में प्राप्त होती है। दण्डी ने १० काव्य गुणों का उल्लेख किया है और उनकी सत्ता वैदर्भी रीति में मानी है। दण्डी के बाद वामन ने स्पष्ट रूप में रीति को काव्य की आत्मा कहा। इनकी मौलिकता दो बातों में है— ( १ ) इन्होंने १० के स्थान पर २० गुण मान लिये १० शब्द गुण और १० अर्थ गुण। अर्थ गुणों में ओज प्रौढि माधुर्य (उत्कर्षलेश और कान्ति (दीप्तरसत्व) को स्वीकारकर इन्होंने रीतियों का क्षेत्र बहुत ही व्यापक बना दिया और ( २ ) इन्होंने दो के स्थान पर तीन रीतियाँ स्वीकार कीं। उन दोनों रीतियों में एक पांचाली रीति और जोड़ दी। किन्तु आज वामन ने गुण साकल्य के कारण वैदर्भी को ही ग्राह्य बतलाया और शेष दो में गुणों की कमी बतलाकर चनको स्वीकार न करने का निर्देश दिया। वामन के बाद आनन्दवर्धन के समय
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काव्यार्थतत्त्वयुजोडपराः ।
वृत्तयोडपि प्रकाशन्ते ज्ञातेऽस्मिन् काव्यलक्षणे ॥ ४७ ॥
अस्मिन् व्यङ्ग्यार्थकभावविवेचनमये काव्यलक्षणे ज्ञाते सति याः काश्चित्प्रसिद्धा उपनागरिकाद्याः शब्दतत्त्वाश्रित वृत्तयो याश्चार्थतत्त्वसम्बद्धा वैदर्भ्यादयस्ताः सम्यग्मोत्पदवीमवतरन्ति । अन्यथा तु तासामदृष्टार्थोनामिव वृत्तीनामश्रद्धेयत्वमेव स्यात् ।
इस व्यङ्ग्यार्थकभाव-विवेचनमय काव्यलक्षण के ज्ञात हो जाने पर जो कोई प्रसिद्धे उपनागरिका इत्यादि शब्दतत्त्वाश्रित वृत्तियाँ और जो अर्थतत्त्व से सम्बद्ध कैशिकी इत्यादि वृत्तियाँ वे ठीक रूप में रीतिगदवी पर अवतीर्ण होती हैं। नहीं तो उन वृत्तियों का अदृष्टार्थ के समान अश्रद्धेयत्व ही हो जाय अनभवसिद्धत्व नहीं ।
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अनु० 'इस काव्यलक्षण के ज्ञात हो जाने पर वृत्तियाँ भी प्रकाशित होती हैं; कुछ शब्दतत्त्व के आश्रित होती हैं और दूसरी अर्थतत्त्व के आश्रित' ॥ ४७ ॥
तक रीतियों की संख्या में केवल एक की वृद्धि हुई—रुद्रट ने लाटीया रीति को और स्वीकार कर रीतियों की संख्या चार कर दी और अच्छी रीतियों में वैदर्भी तथा पांचाली को और बुरी रीतियों में गौडी तथा लाटी को सम्मिलित कर दिया । रुद्रट ने रीतियों का सम्बन्ध वस्तु से भी स्थापित कर दिया । आनन्दवर्धन के पहले रीतियों की यही स्थिति थी । रीतियों' का मुख्य आधार तो शब्दगुम्फ ही है । कतिपय आचार्यों ने रीतियों के विवेचन में वर्ण-संघटना पर विचार किया है तथा कतिपय अन्य रुद्रट इन्हादि आचार्यों ने समासप्रयोग पर रीतियों को आभ्रित माना है । किन्तु रीतियों के केवल यही दो आधार नहीं हैं । दण्डी तथा वामन ने रीतियों के आधारभूत तत्त्वों में काव्य के प्रायः सभी तत्त्व समेट लिये हैं । वाण ने भी श्लेष इत्यादि को रीतियों का आधार माना है । धनिकार तथा धनिनिसम्प्रदायत्रादी दूसरे आचार्य रीतियों को अस्वीकार तो नहीं करते । किन्तु उनका कहना है कि रीतियों की काव्य के मूलतत्त्व के रूप में यह कल्पना सर्वथा अधूरी है ।
यदि रीतियों के मूलाधार का अनुसन्धान किया जाय तो वह रस ही सिद्ध होगा । 'कोमलवन्ध से शृङ्गाररस' कठोर बन्ध से रौद्ररस' इत्यादि कथनों से यह स्पष्ट हो जाता है कि शृङ्गार इत्यादि सब वाच्य न होते अपितु बन्ध के आधार पर उनकी अभिव्यक्ति होती है । इस प्रकार यदि रीतियों का ठीक रूप में अनुसन्धान किया जाय तो उनकी पर्यवसान व्वनि सिद्धान्त में ही होगा । ध्वनि सिद्धान्त की ठीक ठीक व्याख्या कर देने पर रीतियों के विवेचन की आवश्यकता ही नहीं रह गई ।
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प्रकाशान्त इति । अनुभावसिद्धतां काव्यजीवितत्वे प्रयान्तीर्थे: । रीतिपदवीमिति । तददेव रसपर्यवसायित्वात् । प्रतोतिपदवींमिति का पाठ: । नागरिकया चुपामिते:पुचासक्ति: श्रृङ्गारादौ विश्राम्यति । प्रहसति दंसेष्टु रौद्रादिषु । कोमलति हास्यादौ । तथा—‘वृत्तय: काव्यमातृका:' इति यदुक्तं मुनिना तत्र रसोचित एव चेष्टाविशेषो वृत्ति: । यदाह--‘कैशिकी श्लक्ष्णगनेपथ्या श्रृङ्गाररससमम्तरा' इत्यादि ।
प्रकाशान्त इति । अनुभावसिद्धतां काव्यजीवितत्वे प्रयान्तीर्थे: । रीतिपदवीमिति । तददेव रसपर्यवसायित्वात् । प्रतोतिपदवींमिति का पाठ: । नागरिकया चुपामिते:पुचासक्ति: श्रृङ्गारादौ विश्राम्यति । प्रहसति दंसेष्टु रौद्रादिषु । कोमलति हास्यादौ । तथा—‘वृत्तय: काव्यमातृका:' इति यदुक्तं मुनिना तत्र रसोचित एव चेष्टाविशेषो वृत्ति: । यदाह--‘कैशिकी श्लक्ष्णगनेपथ्या श्रृङ्गाररससमम्तरा' इत्यादि ।
४७ वीं कारिका वृत्तियों के विषय में है । इसका आशय यह है कि व्यञ्जक्यव्यङ्ग्य भाव का विवेचन करना ही काव्य का लक्षण है । जब इतनी बात मान ली गई और व्यङ्गयव्यञ्जक के रूप में काव्यलक्षण का विवेचन कर दिया गया तब काव्य जीवन के पर्यालोचन के क्षेत्र में वृत्तियों पर विचार करना भी सार्थक हो जाता है । ये वृत्तियाँँ दो प्रकार की होती हैं—एक तो उपनागरिका इत्यादि वृत्तियाँँ होती हैं जिनका आश्रय शब्दतत्त्व होता है और दूसरी वृत्तियाँँ कैशिकी इत्यादि होती हैं जिनका आश्रय अर्थतत्त्व होता है । इन दोनों प्रकार की वृत्तियों के विषय में भी वही कहा जा सकता है जो कि ४६ वीं कारिका में रीतियों के विषय में कहा गया है । अर्थात् वृत्तियाँँ भी रीतियों के समान ही रसपर्यवसायिनी होती हैं । यदि रस की सत्ता ही न मानी जाय तो वृत्तियों पर विचार करना ही व्यर्थ हो जायेगा । अतः रस पर बिना विचार किये वृत्तियों पर विचार अधूरा ही रह जायेगा । रसप्रवणता के अभाव में उन वृत्तियों पर उसी प्रकार विश्वास नहीं किया जा सकेगा जिस प्रकार यज्ञ इत्यादि कायोंँ पर विश्वास नहीं किया जाता क्योंकि उनका फल प्रत्यक्ष नहीं आप्तु अदृष्ट होता है । जिसे प्रकार प्रत्यक्ष फल न दिखाई पड़ने के कारण यज्ञ इत्यादि अनुभव सिद्ध नहीं माने उसी प्रकार वृत्तियों को भी कोई प्रत्यक्ष अनुभव सिद्ध नहीं मानेगा । अतः वृत्तियों रसप्रवण मानना ही उचित है ।
४७ वीं कारिका वृत्तियों के विषय में है । इसका आशय यह है कि व्यञ्जक्यव्यङ्ग्य भाव का विवेचन करना ही काव्य का लक्षण है । जब इतनी बात मान ली गई और व्यङ्गयव्यञ्जक के रूप में काव्यलक्षण का विवेचन कर दिया गया तब काव्य जीवन के पर्यालोचन के क्षेत्र में वृत्तियों पर विचार करना भी सार्थक हो जाता है । ये वृत्तियाँँ दो प्रकार की होती हैं—एक तो उपनागरिका इत्यादि वृत्तियाँँ होती हैं जिनका आश्रय शब्दतत्त्व होता है और दूसरी वृत्तियाँँ कैशिकी इत्यादि होती हैं जिनका आश्रय अर्थतत्त्व होता है । इन दोनों प्रकार की वृत्तियों के विषय में भी वही कहा जा सकता है जो कि ४६ वीं कारिका में रीतियों के विषय में कहा गया है । अर्थात् वृत्तियाँँ भी रीतियों के समान ही रसपर्यवसायिनी होती हैं । यदि रस की सत्ता ही न मानी जाय तो वृत्तियों पर विचार करना ही व्यर्थ हो जायेगा । अतः रस पर बिना विचार किये वृत्तियों पर विचार अधूरा ही रह जायेगा । रसप्रवणता के अभाव में उन वृत्तियों पर उसी प्रकार विश्वास नहीं किया जा सकेगा जिस प्रकार यज्ञ इत्यादि कायोंँ पर विश्वास नहीं किया जाता क्योंकि उनका फल प्रत्यक्ष नहीं आप्तु अदृष्ट होता है । जिसे प्रकार प्रत्यक्ष फल न दिखाई पड़ने के कारण यज्ञ इत्यादि अनुभव सिद्ध नहीं माने उसी प्रकार वृत्तियों को भी कोई प्रत्यक्ष अनुभव सिद्ध नहीं मानेगा । अतः वृत्तियों रसप्रवण मानना ही उचित है ।
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इयता तस्याभावं जगदुरपरे ह्लादावमानविकल्पेषु वृत्तियो रीतियश्र गता श्रवणगोचरं, तदितरित्कः कोऽयं ध्वनिरिति तत्र काव्यविदाम्स्युपगमः कृतः कथञ्चिद् दूषणं दत्तमस्मुऽस्फुटस्फुरितमिति वचनेन ।
इतने से 'दूसरे लोग उसका अभाव कहते हैं' इत्यादि में अभाव के विकल्पों में वृत्तियाँ और रीतियाँ श्रवणगोचर हुई हैं, उनसे अतिरिक्त यह ध्वनि क्या वस्तु है ?' यह ( जो कहा था ) उसमें किसी प्रकार स्वीकार्यता दे दी और किसी प्रकार 'अस्फुट स्फुरित' इस वचन के द्वारा दोष दे दिया ।
[ यहां पर वृत्तियों का संक्षिप्त परिचय प्राप्त कर लेना आवश्यक प्रतीत होता है । रीति, वृत्ति और प्रवृत्ति ये तीन शब्द काव्यशास्त्र में प्रयुक्त हुए हैं । इनका अन्तर दिखलाते हुए राजशेखर ने लिखा है—वेषविन्यासक्रम को प्रवृत्ति कहते हैं, विलासविन्यासक्रम को वृत्ति कहते हैं और वचनविन्यासक्रम को रीति कहते हैं । अभिनवगुप्त ने इनकी अनुभावों के अन्तर्गत रक्षा की है । शरीरारम्भ अनुभाव आङ्गिक अभिनय कहलाता है जिसे प्रवृत्ति शब्द से अभिहित किया जाता है । वागारम्भे अनुभव वाचिक अभिनय होता है जो कि रीति शब्द से अभिहित किया जा सकता है । वृत्ति समस्त क्रियाओं को कहते हैं । भरत मुनि ने ही वृत्तियों का सर्वप्रथम विवेचन किया था । उनके अनुसार वृत्तियाँ चार प्रकार होती हैं—सात्त्वती, कैशिकी, आरभटी और भारती । यदि इन वृत्तियों का विशेषणात्मक अध्ययन किया जाय तो उसका निष्कर्ष यह होगा कि सात्त्वती वृत्ति सात्विकाभिनय में प्रयुक्त होती है । इसका उपयोग नाट्य में होता है । कैशिकी वृत्ति कोमल वर्णन में प्रयुक्त होती है और आरभटी कठोर वर्णन में । भारती वृत्ति सभी प्रकार के वाचिक अभिनय को कहते हैं । अतः समस्त श्रव्यकाव्य भारती वृत्ति में ही अन्तर्भूत हो जाता है । इस भारती वृत्ति को कैशिकी और आरभटी परिवर्तित कर देती हैं । यदि भारतीवृत्ति कैशिकी के साथ होगी तो वह वैदर्भी रीति बन जावेगी और यदि आरभटी के साथ होगी तो गौडोरोति बन जावेगी । यह वृत्तियों के विषय में भरतमुनि-सम्प्रदाय है । इसके अतिरिक्त वृत्तियों के विषय में दूसरी मान्यता है अलङ्कारवादियों की । उनके अनुसार अनुप्रास-जाति को ही वृत्ति कहते हैं । अनुप्रास तीन प्रकार का होता है, उसे आधार पर तीन वृत्तियों की कल्पना की गई है—उपनागरिका, परुषा और कोमला । इस आधार पर अनुप्रास का एक भेद वृत्त्यनुप्रास माना गया है । आनन्दवर्धन को भरत की वृत्तियों का तो ज्ञान है ही उद्दट की उपनागरिका इत्यादि वृत्तियों का भी
[ यहाँ पर वृत्तियों का संक्षिप्त परिचय प्राप्त कर लेना आवश्यक प्रतीत होता है । रीति, वृत्ति और प्रवृत्ति ये तीन शब्द काव्यशास्त्र में प्रयुक्त हुए हैं । इनका अन्तर दिखलाते हुए राजशेखर ने लिखा है—वेषविन्यासक्रम को प्रवृत्ति कहते हैं, विलासविन्यासक्रम को वृत्ति कहते हैं और वचनविन्यासक्रम को रीति कहते हैं । अभिनवगुप्त ने इनकी अनुभावों के अन्तर्गत रक्षा की है । शरीरारम्भ अनुभाव आङ्गिक अभिनय कहलाता है जिसे प्रवृत्ति शब्द से अभिहित किया जाता है । वागारम्भे अनुभव वाचिक अभिनय होता है जो कि रीति शब्द से अभिहित किया जा सकता है । वृत्ति समस्त क्रियाओं को कहते हैं । भरत मुनि ने ही वृत्तियों का सर्वप्रथम विवेचन किया था । उनके अनुसार वृत्तियाँ चार प्रकार होती हैं—सात्त्वती, कैशिकी, आरभटी और भारती । यदि इन वृत्तियों का विशेषणात्मक अध्ययन किया जाय तो उसका निष्कर्ष यह होगा कि सात्त्वती वृत्ति सात्विकाभिनय में प्रयुक्त होती है । इसका उपयोग नाट्य में होता है । कैशिकी वृत्ति कोमल वर्णन में प्रयुक्त होती है और आरभटी कठोर वर्णन में । भारती वृत्ति सभी प्रकार के वाचिक अभिनय को कहते हैं । अतः समस्त श्रव्यकाव्य भारती वृत्ति में ही अन्तर्भूत हो जाता है । इस भारती वृत्ति को कैशिकी और आरभटी परिवर्तित कर देती हैं । यदि भारतीवृत्ति कैशिकी के साथ होगी तो वह वैदर्भी रीति बन जावेगी और यदि आरभटी के साथ होगी तो गौडोरोति बन जावेगी । यह वृत्तियों के विषय में भरतमुनि-सम्प्रदाय है । इसके अतिरिक्त वृत्तियों के विषय में दूसरी मान्यता है अलङ्कारवादियों की । उनके अनुसार अनुप्रास-जाति को ही वृत्ति कहते हैं । अनुप्रास तीन प्रकार का होता है, उसे आधार पर तीन वृत्तियों की कल्पना की गई है—उपनागरिका, परुषा और कोमला । इस आधार पर अनुप्रास का एक भेद वृत्त्यनुप्रास माना गया है । आनन्दवर्धन को भरत की वृत्तियों का तो ज्ञान है ही उद्दट की उपनागरिका इत्यादि वृत्तियों का भी
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उन्हें पूरा ज्ञान है। इन दोनों प्रकार को वृत्तियों की व्यवस्था तथा समन्वय उन्होंने इस प्रकार किया है कि भरत की कैशिकी इत्यादि वृत्तियाँ अर्थगत होती हैं और उद्भट की उपनागरिका इत्यादि वृत्तियाँ शब्दगत होती हैं। यहाँ पर ध्वनिकार का अभिप्राय यही है कि वृत्तियाँ रसाभिव्यक्ति और रसास्वादन की साधनमात्र हैं। अतः इनकी मान्यता ही ध्वनिसिद्धान्त में एक प्रमाण है।
यह तो स्पष्ट ही है कि उपनागरिका का अर्थ है नगरनिवासिनी ललना का अनुकरण करनेवाली वृत्ति। जिस प्रकार नगरनिवासिनी ललना अपने सौकुमार्य के लिये प्रसिद्ध होती है उसी प्रकार अनुपास की उपनागरिका नामक वृत्ति भी श्रृङ्गाररस में विश्रान्त होती है। उसी प्रकार पुरुष शब्द का अर्थ है कठोर वृत्ति। यह रौद्र इत्यादि बीस रसों में विश्रान्त होती है तथा कोमला हास्य इत्यादि में विश्रान्त होती है। ये वृत्तियाँ रसपर्यवसायिनी होती हैं। इसमें स्वयं भरतमुनि प्रमाण हैं। उन्होंने लिखा है कि 'वृत्तियों की माता काव्य ही है।'
इस कथन से मुनि का तात्पर्य यही है कि वृत्ति उन विशेष प्रकार की चेष्टाओं को कहते हैं जिनका सत्त्व विशेष रस के औचित्य को ध्यान में रखकर किया गया हो। (क्योंकि भरत की कैशिकी इत्यादि वृत्तियाँ वस्तुतः चेष्टा की विशेषता में ही हैं क्योंकि उन्हें ही लिखित कर कहा गया है कि 'विलासविन्यासक्रमो हि वृत्तिः'।) यहाँ पर मुनि का अभिप्राय रसप्रवण चेष्टाविशेष को वृत्ति कहना है। इस मान्यता में भी मुनि का वचन ही प्रमाण है, क्योंकि मुनि ने अन्यत्र स्वयं कहा है कि—'कैशिकी का संविधान कोमल होता है और उसकी उत्पत्ति श्रृङ्गार-रस से होती है।'
तथा यहाँ यह भी है कि वृत्तियाँ रसाभिव्यक्ति और रसास्वादन की साधनमात्र हैं। वृत्ति माधुर्य के कारण श्रृङ्गाररस के अनुकूल होती है। इसी प्रकार गौड़ी रीति आरभटी अर्थवृत्ति और परुषा शब्दवृत्ति ये ओज के कारण रौद्र रस के अनुकूल होती हैं और पांचालीरीति, सात्वती अर्थवृत्ति और कोमला शब्दवृत्ति ये प्रसाद की प्रधानता के कारण हास्य इत्यादि के अनुकूल होती हैं। इन वृत्तियों की स्वरूपस्थिति रस के कारण ही होती है। अतः वृत्तियों से रस सिद्धान्त ही पुष्ट होता है। रस सर्वदा व्यङ्ग्य ही होता है, अतः वृत्तियों को हृदि से भी ध्वनि रीतियों और वृत्तियों को काव्य की आत्मा नहीं मान सकते।
अतः उनकी मान्यता पर विचार प्रतिपादन का कारण यह है कि अभाववादियों में कुछ लोग रीतियों और वृत्तियों में ध्वनि के अन्तर्भाव का समर्थन करते थे।
अत: उनकी मान्यता पर विचार करना आवश्यक है।
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एवं स्फुटतरैव लक्षणीयं स्वरूपमस्य ध्वने:। यत्र शब्दानामर्थानां च केषांचि-
स्त्रिपतत्त्वविशेषसंवेद्यं जात्यलंमित्र रत्नविशेषपाणां चारुत्वमनारोह्येयमवभासते काव्ये तत्र ध्वनित्वबहुलैरिति यल्लक्षणं ध्वनेरुच्यते केनचित्तदयुक्तंमिति नाभिधे-
यताभंहति । यतः वाच्यार्थस्वरूपाश्रयस्तावदक्लिष्टत्वे सत्यप्रयुक्तप्रयोगः। वाचक-
श्रयस्तु प्रसादो व्यङ्कत्वं चेति विशेष । अर्थानां च स्फुटतरावभासनं व्यङ्ग्य-
परत्वं व्यङ्ग्यांशविशिष्टत्वं चैति विशेषः। तौ च त्रिप्रकारौ व्याख्यातुं शक्येते व्याख्यातौ च बहुप्रकारम्। तदर्थतिरिकतानारोह्येयविशेषसम्भावना तु विवेक-
वसादभावमूलैव । यस्मादनाख्येयत्वं सर्वेश्वद्व्यागाच्चरत्वेन न कस्यचिच्चित्सरभवति ।
अन्ततो नाख्येयशब्देन तस्याभिधानसम्भवात् । सामान्यसंस्पर्शिविकल शब्द-
प्राणां रत्नविशेषाणामत्र न सम्भवति । तेषां लक्षणकारैर्यक्रतरूपत्वात् । रत्न-
विशेषाणां च सामान्यसम्भावनयैवमूल्यस्यस्थितिपरिकल्पनादर्शनाच्च । उभयेषा-मपि तेषां प्रतिपतत्त्वविशेषसंवेद्यत्वमस्येव । वैकटिका एव हि रत्नतत्त्वविदः,
सहृदया एव हि काव्यानां रसज्ञा इति कस्यात्र विप्रतिपत्तिः ?
(अनु०) इस प्रकार स्फुटरूप में ही इस ध्वनि का स्वरूप लक्षित करने योग्य है। जहां कुछ शब्दों और अर्थों का रत्नविशेषों के जात्यत्व के समान विशेष प्रतिपत्ता से संवेद्य चारुत्व न कहने योग्य ही अवभासित होता है उस काव्य में ध्वनि-व्यवहार होता है यह जो ध्वनि का लक्षण किसी के द्वारा कहा जाता है वह अनुचित है अतः वर्णन की योग्यता को प्राप्त नहीं कर पाता । क्योंकि शब्दों की स्वरूपाश्रित विशेषता है क्लिष्ट न होने पर प्रयुक्त का प्रयोग न करना । वाचकाश्रित विशेषता है प्रसाद और व्यङ्कत्व । अर्थों की विशेषता है स्फुटरूप में अवभासित होना, व्यङ्ग्यपरता और व्यङ्ग्यांशविशिष्टता । उन दोनों विशेषताओं को व्याख्या की जा सकती हैं और बहुंत प्रकार से व्याख्या की भी गई है । उससे भिन्न अनारोह्येय विशेष की सम्भावना तो विवेकाध्वंस मूलक ही है । क्योंकि सर्व शब्द के अङ्गोचररूप में किसी का अनास्लयेयत्व सम्भव नहीं है क्योंकि अन्त में अनास्लयेय शब्द से उसका अभिधान सम्भव है । सामान्य का संस्पर्श करनेवाले विशेष से जो शब्द, उससे अगोचर होते हुए प्रकाशमानत्व यदि कहीं अनास्लयेयत्व कहा जाय वह भी रत्नविशेषो के समान काव्यविशेषो का सम्भव नहीं है । क्योंकि लक्षणकारो ने उसके रूप की व्याख्या कर दी और क्योंकि सामान्य सम्भावना के 'द्वारा ही मूल्यस्थिति की परिकल्पनां देखी जाती है । उन दोनों का ही प्रतिपतत्त्वविशेष संवेद्यत्व है ही क्योंकि वैकटिक ही रत्न का तत्त्व जाननेवाले होते हैं और सहृदय ही काव्यो के रसज्ञ होते हैं इस विषय में किसको विप्रतिपत्ति हो सकती है ?
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हृदयानिर्वाचां स्थितमवविषये इति यदूचे तत् तु प्रथमोद्योते दूषितमपि दूषयति सर्वप्रपञ्चकथने हि असम्मतस्यमेवानाल्येयत्वमिल्यमिप्रायेण । अकिञ्चित्कत्व इति । श्रुतिकष्टाधभाव इत्यर्थः । अपयुक्तस्य प्रयोग इत्यपौरुकस्यम् । ताविति शब्दगतोडर्थंगतक्ष । विवेकस्यावसादो यत्रे तथ्ये वाचा निर्विवेकत्वम् । सामान्यस्पर्श यो विकल्वान्ततो यः शब्दः । दृष्टान्तेऽपि अनाल्येययं नास्तीति दर्शंयति-रत्नविशेषाणां चेति । ननु सर्वेण तत् संवेष्टत इत्याशङ्क्याभ्युपगमेनैवोत्तरयति-उभयेषामिति । रत्नानां काम्यानां च ।
इस समय 'वाणी के अविषय में स्थित' यह जो कहा गया वह प्रथम उद्योत में दूषित भी सर्वप्रपञ्चकथन में निस्सन्देह अनाल्येयत्व असम्भव ही है इस अभिप्राय से ( पुनः ) दूषित कर रहे हैं-‘अकिञ्चित्कत्व’ यह । अर्थात् श्रुतिकष्टत्व इत्यादि का अभाव । अपयुक्त के प्रयोग का अर्थ है अपौरुकस्य । वे दोनों अर्थात् शब्दगत और अर्थगत । विवेक का अवसाद है जहाँ तथा भावा निर्विवेकत्व । सामान्य का स्पर्श करनेवाला जो विकल्प उससे जो शब्द । दृष्टान्त में भी अनाल्येयत्व नहीं है यह दिखलाते हैं-‘और रत्न विशेषों का’ यह । ( प्रश्न ) सबके द्वारा वह विद्धित नहीं किया जा सकता यह शङ्का करके स्वीकार कर पूर्वंक ही उत्तर देते हैं-‘दोनों का’ यह । रत्नों का और काव्यों का ।
तारावती करना उचित तथा आवश्यक था । इस मान्यता को आनन्दवर्धन ने आंशिक रूप में स्वीकार कर लिया और आंशिक रूप में उसका प्रत्याख्यान कर दिया । ध्वनिकार ने इसी विवाद का समर्थन कर कि रीति और वृत्ति को काव्य की आत्मा मानना केवल एकाङ्गी दृष्टिकोण है । रीतियाँ और वृत्तियाँ रसप्रवण होकर ही काव्य की आत्मा हो सकती हैं । अतः हृ्टिकोण ध्वनि को काव्य की आत्मा मानना हो है ।
तारावती करना उचित तथा आवश्यक था । इस मान्यता को आनन्दवर्धन ने आंशिक रूप में स्वीकार कर लिया और आंशिक रूप में उसका प्रत्याख्यान कर दिया । ध्वनिकार ने इसी विवाद का समर्थन कर कि रीति और वृत्ति को काव्य की आत्मा मानना केवल एकाङ्गी दृष्टिकोण है । रीतियाँ और वृत्तियाँ रसप्रवण होकर ही काव्य की आत्मा हो सकती हैं । अतः हृ्टिकोण ध्वनि को काव्य की आत्मा मानना हो है ।
ऊपर जो कुछ कहा गया है उससे अभाववाद के तीनों पक्षों ओर लक्षणा में अन्तर्भाव के प्रश्न पर पर्याप्त प्रकाश पड़ जाता है और यह सिद्ध हो गया है कि ध्वनि का अन्तर्भाव इन किन्हीं काव्य के प्रतिष्ठित तत्वों में नहीं हो सकता तथा ध्वनिकाव्य का सर्व प्रमुखस्वतन्त्र तत्व है । अब पाँचवाँ पक्ष शेष रह जाता है जिसमें यह कहा गया है कि ध्वनि का तत्व सर्वथा अनिर्वाच्य है और वाणी में इतनी शक्ति ही नहीं कि उसका ठीक विवेचन कर सके । यद्यपि इसका उत्तर भी पहले उद्योत में दिया जा चुका है तथापि अन्त में उसपर प्रकाश डालना आवश्यक प्रतीत होता है । इस पक्षवालों के कथन का सार यही है
ऊपर जो कुछ कहा गया है उससे अभाववाद के तीनों पक्षों ओर लक्षणा में अन्तर्भाव के प्रश्न पर पर्याप्त प्रकाश पड़ जाता है और यह सिद्ध हो गया है कि ध्वनि का अन्तर्भाव इन किन्हीं काव्य के प्रतिष्ठित तत्वों में नहीं हो सकता तथा ध्वनिकाव्य का सर्व प्रमुखस्वतन्त्र तत्व है । अब पाँचवाँ पक्ष शेष रह जाता है जिसमें यह कहा गया है कि ध्वनि का तत्व सर्वथा अनिर्वाच्य है और वाणी में इतनी शक्ति ही नहीं कि उसका ठीक विवेचन कर सके । यद्यपि इसका उत्तर भी पहले उद्योत में दिया जा चुका है तथापि अन्त में उसपर प्रकाश डालना आवश्यक प्रतीत होता है । इस पक्षवालों के कथन का सार यही है
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कि जिस प्रकार माणिक्य का एक धर्म होता है जात्यत्व । यह धर्म माणिक्य में उत्कर्ष का आधान करता है । इस जात्यत्व धर्म को एक तो सभी लोग जान नहीं पाते, कतिपय विशेषज्ञ ही इससे परिचित होते हैं, दूसरे जो लोग इस जातियत्व को जानते भी हैं वे भी ठीक रूप में उसकी व्याख्या नहीं कर सकते जिससे दूसरे लोग जात्यत्व के आधार पर माणिक्य के उत्कर्ष को पहिचान सक । इसी प्रकार शब्दों और अर्थों में एक प्रकार की चारुता होती है । जिस प्रकार सभी रत्नों में जात्यत्व गुण विद्यमान नहीं होता उसी प्रकार सभी शब्दों और अर्थों में चारुता विद्यमान होती है । जिस प्रकार रत्नों के जात्यत्व गुण को सभी लोग नहीं समझ पाते। उसी प्रकार शब्दों और अर्थों की चारुता का ज्ञान भी कतिपय विशेष श्रोताओं को ही होता है। किन्तु वह चारुता गूँगे के गुड के समान सर्वथा अनिर्वचनीय है । उसका आनन्द ही लिया जा सकता है प्रकटन नहीं किया जा सकता । इस प्रकार सौन्दर्य का जो अनिर्वचननीय तत्व अवभासित होता है वही ध्वनि नाम से अभिहित किया जा सकता है। यह है कुछ लोगों का मत। इस पर निवेदन है कि यह मत तो नितान्त अनुचित है, अतः इस प्रश्न का उठाया जाना भी ठीक नहीं । ऐसी कौन सी विशेषता होती है जिसका निरूपण न किया जा सके । उदाहरण के लिये शब्द को ही लीजिये । शब्द की तीन प्रकार की विशेषतायें होती हैं—( १ ) स्वरूपगत विशेषता ( २ ) वाचकत्व के आश्रित रहनेवाली विशेषता और ( ३ ) अर्थ की विशेषता । शब्द की स्वरूपगत विशेषता यही होती है कि शब्द शिथिलकट न हो और एक ही शब्द का बार-बार प्रयोग न किया जाय अर्थात् शब्द की पुनरुक्ति न हो । शब्द की वाचकाश्रित विशेषता यही होती है कि उसमें शीघ्र ही अर्थबोध कराने की शक्ति हो अर्थात् उसमें प्रसाद गुण विद्यमान हो और विशेष अर्थ के अभिव्यंजन की क्षमता हो । इसी प्रकार अर्थ की भी यही विशेषता होती है कि अर्थ स्फुट रूप में अवभासित हो रहा हो, वह दूसरे व्याक्ष्य अर्थ के प्रति उन्मुख हो और व्यङ्ग्यांश को लेकर उसकी चारुता मे अभिवृद्धि हो रही हो। यही शब्द की कतिपय विशेषतायें हैं ! इन समस्त विशेषताओं का कथन कर सकना असम्भव नहीं है और अधिकतर आचार्यों ने शब्द और अर्थ की इन विशेषताओं पर प्रकाश डाला भी है । इतना सब होते
हुये भी शब्द और अर्थ की विशेषताओं को अनिर्वचननीय ( गूँगे का गुड ) कह देना तो यही सिद्ध करता है कि कहनेवाले के विवेक का सर्वथा श्वंश हो गया है और उसके अविचेक से ही इस प्रकार के तर्क उद्भूत हो गये हैं ।
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तारावती
आखिर 'अनाख्येय' शब्द का अर्थ क्या है? यहीं न कि ऐसी विशेषता जिसका लिये किसी शब्द का प्रयोग न किया जा सके। अर्थात् जिसका निर्देश किसी शब्द के द्वारा न किया जा सके। यह तो सम्भव ही नहीं है। जितनी भी विशेषतायें होती हैं सबके लिये किसी न किसी शब्द का प्रयोग तो किया ही जाता है और प्रत्येक वस्तु का अभिधान शब्द के द्वारा तो हो ही जाता है। यदि कहो कि कुछ ऐसी विशेषतायें होती हैं जिनके लिये किसी शब्द का प्रयोग नहीं किया जा सकता तो इस पर मेरा निवेदन है कि यदि कोई ऐसी विशेषता सम्भव भी हो तो भी उसे 'अनाख्येय विशेषता' कहेंगे अर्थात् ऐसी विशेषता जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता। 'यह कहना भी तो उस विशेषता का एक परिचय देना ही हो गया। 'अनाख्येय' शब्द स्वयं ही उस विशेषता का परिचायक हो गया। अतः यह कहना किसी प्रकार भी ठीक नहीं कि कोई भी तत्व अनाख्येय हो सकता है।
इस विषय में पूर्वपक्षी यह कह सकते हैं कि ज्ञान दो प्रकार का होता है एक तो सविकल्पक और दूसरा निर्विकल्पक। जो ज्ञान विशेषण-विशेष्य पर आश्रित होता है वह सविकल्पक कहलाता है और जो ज्ञान विशेष्य पर आश्रित नहीं होता वह निर्विकल्पक कहलाता है। उदाहरण के लिये हम किसी गाय को इस लिये पहिचान लेते हैं कि हमें गोत्व का (आकृति) ज्ञान है। गाय का ज्ञान विशेष्य ज्ञान है और गोत्व का ज्ञान विशेषण ज्ञान। अतएव गाय का ज्ञान सविकल्पक ज्ञान कहलाता है। इसके प्रतियोगी जो ज्ञान विशेषण पर आश्रित नहीं होता वह निर्विकल्पक कहलाता है। जब हम किसी ज्ञान को अनाख्येय या अनिर्वाच्य कहते हैं तब हमारा अभिप्राय यह होता है कि उस ज्ञान का आधार कोई सामान्य धर्म नहीं है और वह ज्ञान सविकल्पक ज्ञान नहीं कहा जा सकता। आशय यह है कि जो ज्ञान प्रकाशित तो होता है किन्तु सामान्य धर्म का स्पर्श करनेवाले सविकल्पक शब्द का क्षेत्र नहीं होता वह ज्ञान अनाख्येय कहा जाता है। इस पर मेरा निवेदन है कि यह परिभाषा मान लेने पर भी काव्य अनाख्येय सिद्ध नहीं होता। जैसे रत्नों की विशेषतायें जात्यत्व इत्यादि अनाख्येय नहीं होतीं। काव्यशास्त्र के अनेक लक्षणकार अचार्यों ने उन विशेषताओं की व्याख्या कर दी है। अतः हम उसे अनाख्येय कह ही नहीं सकते। रत्नों के विषय में और काव्य के विषय में उभयनिष्ठ यह कहा जा सकता है कि 'सामान्य' की सत्ता ही उनके लिये पर्याप्त होती है। रत्नों के मूल्य की परिकल्पना इतने से ही हो जाती है कि उनकी दृष्टि में सामान्य रूप से उसे रत्न की संज्ञा दे दी जावे। किन्तु उनका विशेष रूप तो विशेष व्यक्तियों को ही देखना है। अर्थात् काव्य रत्न होने के कारण
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यत्तनिदेशयत्वं सर्वलक्षणविषयं बौद्धानां प्रसिद्धं तच्चमतपरீच्यांयां ग्रन्थान्तरे निरूपयिष्यामः। इह तु ग्रन्थान्तरश्रवणतत्प्रकाशनं सहृदयवै मनस्यप्रदायोति न प्रक्रियते। बौद्धमतेऽन वा यथा प्रत्यक्षादिलक्षणं तथास्माकं ध्वनिलक्षणं भविष्यति। तस्माल्लक्षणान्तरस्याघटनादशब्दार्थेत्यादि तद्युक्तमेव, ध्वानिलक्षणं साधीयः। तदिदमुक्तम्- अनाश्रयेयांशभासितं निर्वाच्यार्थेतया ध्वनेनः। न लक्षणं लडणं तु साधीयोडस्य यथोदितम्॥
यहाँ अनिर्देशयत्वं सर्वलक्षणविषयं बौद्धानां प्रसिद्ध है उसका निरूपण हम उनके मत की परीक्षा में दूसरे ग्रन्थ में करेंगे। यहाँ तो ग्रन्थान्तर के श्रवण के एक अंश का प्रकाशित करना सहृदयों को वैमनस्य देने-वाला होगा। अतः ( उसका अंशमात्र भी प्रकाशन ) नहीं किया जा रहा है अथवा बौद्धमत से जैसे प्रत्यक्ष इत्यादि का लक्षण ( किया जाता है ) वैसा हमारा ध्वनिलक्षण हो जावेगा। उस कारण से उसके दूसरे लक्षण के घटित न होने से और शब्द का अर्थ न होने से कहा हुआ ही ध्वनिलक्षण अधिक अच्छा है। वह यहाँ कहा गया है— ‘ध्वनि के निर्वाच्यार्थक होने के कारण अनिर्वाच्यांशभासित्व लक्षण नहीं है; इसका लक्षण तो वही ठीक है जैसा कहा गया है ॥’
इति श्रीराजानकानन्दवर्धनाचार्यविरचिते ध्वन्यालोके तृतीय उद्योतः ॥
इति श्रीराजानकानन्दवर्धनाचार्यविरचिते ध्वन्यालोके तृतीय उद्योतः ॥
यह राजानक आनन्दवर्धनाचार्य के रचे हुए ध्वन्यालोक में तीसरा उद्योत है।
तारावती
बहुमूल्य है किन्तु उसमें जातित्व इत्यादि गुण विद्यमान है यह बात तो जौहरी ही जान पाता है। इसी प्रकार सामान्य सहृदय काव्य से चमत्कृत हो जाता है किन्तु उसके विशेष गुणों को विशेष सहृदय ही जान पाते हैं। इस विषय में तो किसी को विप्रतिपत्ति हो ही नहीं सकती। यह उन लोगों को उत्तर दिया गया है जो यह कहते थे कि विशेषताओं का ज्ञान सभी को नहीं होता।
यहाँ पर एक प्रश्न यह है कि बौद्धों में एक क्षणिकतावादी वर्ग है जो प्रत्येक वस्तु को क्षणिक मानता है। इस मत के अनुसार प्रत्येक वस्तु प्रत्येक क्षण बदलती रहती है। देवदत्त एक क्षण पहले और था दूसरे क्षण वह और ही हो गया। इस मत के अनुसार अनिर्देश्यत्व तो सभी वस्तुओं में आ गया। क्योंकि क्षणिक होने के कारण शब्द तो अर्थ का स्पर्श कर ही नहीं सकते। इस प्रकार जब सभी वस्तुयें अनाश्रयेय ही हैं तब ध्वनि में ही क्या विशेषता है कि उसको अनाश्रयेय न माना
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ननु नार्थं शब्दा: स्पष्टीयन्तपीत, भनिदेश्यस्य वेदकमित्यंदौ कथमनाख्येयेस्वं वस्तूनामुक्तमिति चेदत्राह--यस्स्विति । एवं हि सर्वभावचृत्तान्ततुल्य एवं ध्वनिरिति ध्वनिस्वरूपमनाख्येयंव्यत्यधिक्यापकलक्षणं स्यादितिभाव: । ग्रन्थान्तर इति । विनिश्शयटीकायां धर्मोत्तीयो या विवृत्तिरसुना ग्रन्थकृता कृत तत्नव तद्वाख्यातम् । उक्तोऽर्थात । संग्रहार्थं मयैवेत्यर्थ: । अनाख्येयांशस्यामासो विद्यते यस्मिन् काये तस्य भाव-
स्तकं लक्षणं ध्वनेरेतित सम्बन्ध:। अत्र हेतुः । निर्वाच्योऽर्थतयेतिं । निर्विंभज्य वक्तुं शक्यत्वादितस्यर्थ:। अन्यस्तु 'निर्वाच्योऽर्थतया' हेतुत्व निसोन्नर्थत्वं परिकलत्यानाख्येयांशमासित्वेऽयं हेतुरिति न्याचष्टे, तत्तु क्लिष्टम् । हेतुश्श साध्याविशिष्ट इत्यूक्तबद्याख्या-
ममेवेति शिवम् ।
( प्रश्न ) अर्थ को शब्द स्पष्ट नहीं ही करते यह अनिदेश्यत्व का आवेदक है इत्यादि में वस्तुओं का अनाख्येयत्व कैसे कहा गया है यदि यह कहो तो यहाँ पर कहते हैं—‘जो तो’ यह । इस प्रकार निस्सन्देह सब पदार्थों के वृत्तान्त के समान ही ध्वनि है इसमें ध्वनिस्वरूप अनाख्येय है यह लक्षण अतिव्यापक हो जावेगा यह भाव है । ‘ग्रन्थान्तर में’ यह । विनिश्शयटीका में धर्मोत्तरों में
जो विद्वचित लिखी है वहीं उसकी व्याख्या की है । ‘कहा गया है’ यह । अर्थात् संग्रह के लिये मेरे द्वारा ही । अनाख्येय अंश का आभास जिस काव्य में विद्यमान है उसका भाव वह ध्वनि का लक्षण नहीं है यह सम्बन्ध है । इसमें हेतु है—निर्वाच्य होने के कारण । अर्थात् निर्विंभज्य करके कहे जाने योग्य होने के कारण । दूसरे ने तो ‘निर्वाच्योऽर्थतया’ यहाँ पर निस के निषेध अर्थ की परिकल्पना करके यह हेतु अनाख्यायांशभावित्व में
व्याख्या की । वह तो क्लिष्ट है और हेतु साध्य से अवशिष्ट है अतः उक्त व्याख्या ही ठीक है। वस, आनन्दवर्धन और कल्याण हो ।
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जा सके । इस विषय में आनन्दवर्धन का कहना यह है कि यह दार्शनिक विषय है । इसका विवेचन हम विनिश्शय नामक वौद्धग्रन्थ पर धमेंत्तमा नाम की टीका लिखने के अवसर पर करेंगे । साहित्य के छात्र सु कुमार बुद्धिवाले होते हैं अतः यह विषयान्तर यदि उनके सामने विस्तार से रखा जावेगा तो वे जन उठेंगे और
उनको वह विषय नीरस प्रतीत होगा । हाँ यहाँ पर इतना कह देना अप्रासङ्गिक न होगा कि बौद्ध लोग मानते तो सभी पदार्थों को क्षणिक हैं; फिर भी प्रत्यक्ष हेत्यादि का लक्षण बनाते ही हैं । इसी प्रकार उनके मत को दुर्जनतोष न्याय से स्वीकृत करते हुये मो हमारे ध्वनिलक्षण करने में कोई अनुपपत्ति नहीं होनी चाहिये । इस
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काव्यालोके प्रथां नीतान् ध्वनिभेदान् परामृशन् । इदानों लोचनं लोचान् कृतार्थान् संविधास्यति ॥ भासूत्रितान् भेदान् स्फुटतापचिदायिनीम् । त्रिलोचनपियाम् वन्दे मध्यमां परमेश्वरीम् ॥
‘काव्यालोक में विस्तार को प्राप्त ध्वनिभेदों का परामर्श करनेवाला लोचन अब लोगों को कृतार्थ कर देगा । ‘आसूत्रित भेदों को स्पष्टता की प्राप्ति करानेवाली त्रिलोचन की प्रिया परमेश्वरी मध्यमा देवी की मैं वन्दना कर रहा हूँ ।’ यह है परममहादेववर श्रेष्ठ आचार्य अभिनवगुप्त द्वारा उल्लिखित ध्वनि-संकेत रूप ध्वन्यालोक लोचन में तृतीय उद्योत ॥
इति श्रीमहामाहेश्वराचार्यवर्याभिनवगुसोन्मीलिते सद्द्ययालोकलोचने ध्वनिसङ्केते तृतीय उद्योतः ॥
तारावती
प्रकार क्योंकि कोई दूसरा लक्षण सङ्क्षित नहीं होता और ध्वनि का वाच्य अर्थ है भी नहीं इसलिये हमारा बनाया हुआ लक्षण हो ठीक है । ऊपर जो कुछ कहा गया है उसको एक ही श्लोकमें मैंने इस प्रकार सङ्गृहीत किया है :-
प्रकार क्योंकि कोई दूसरा लक्षण सङ्क्षित नहीं होता और ध्वनि का वाच्य अर्थ है भी नहीं इसलिये हमारा बनाया हुआ लक्षण हो ठीक है । ऊपर जो कुछ कहा गया है उसको एक ही श्लोकमें मैंने इस प्रकार सङ्गृहीत किया है :-
‘इस ध्वनि का अर्थ (नि:) निःशेष रूप में तथा इसको (निर्विभक्त कर खण्ड-खण्ड करके निरूपित किया जा सकता है; अतः ध्वनि का यह लक्षण नहीं है कि ध्वनि उसे कहते जिसमें अनाख्येय (अनिर्वाच्य) तत्व आभासित हो रहा हो । ध्वनि का वास्तविक लक्षण तो वही है जिसका भली भाँति इस ग्रन्थ में प्रतिपादन कर दिया गया है ।
इस श्लोक का अर्थ करने में किसी ने ‘निर्वाच्यार्थतया’ इस हेतुको ‘अनाख्येयांशभासित्व’ के साथ लगाया है और ‘नि:’ का अर्थ किया है निषेध। इस प्रकार उनका अर्थ यह हो जाता है कि ‘क्योंकि ध्वनिके अर्थ का निर्वचन नहीं किया जा सकता अतः ध्वनि अनाख्येयांशभासी है ।’ किन्तु यह अर्थ ठीक नहीं है क्योंकि एक तो इसमें किलिष्ट कल्पना है दूसरे ‘निर्वाच्यार्थतया’ यह हेतु है और ‘अनाख्येयांशभासित्व’ साध्य है । दोनों का अर्थ एक हो है । अतः हेतु और साध्य में कोई भेद नहीं रहता । अतः ऊपर जो अर्थ किया गया है वही माना जानना चाहिये । बस इतना पर्याप्त है । शेष यही कहना है कि सभी का इस ग्रन्थ के द्वारा आनन्दमय हो ।
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अन्त में लोचनकार ने दो उपसंहारात्मक श्लोक लिखे हैं। एक में लोचन के प्रयोजन का उपसंहार है और दूसरे में अन्त का मङ्गलाचरण है। प्रथम
'काव्यालोक ( ध्वन्यालोक ) में विस्तारपूर्वक जिन ध्वानिमेदों का निरूपण किया गया है उन्हीं की छानबीन इस लोचन नामक व्याख्या में की गई है। यह लोचन तृतीय उद्योत तक पूरा हो चुका है। अतः अब यह इस योग्य हो गया है कि सहृदय समाज को ध्वनि का रहस्य समझाकर कृतार्थ कर दे। यह लोचन ऐसा ही करेगा ऐसी हमारी आशा है।'
दूसरा श्लोक ग्रन्थान्त में मङ्गलाचरणपरक है। दूसरे उद्योत में पश्यन्ती देवी की अस्म्यर्थना की गई थी; अब इस उद्योतमें मध्यमा देवी की अस्म्यर्थना की गई है। ( वाणी के चार रूप हैं परा, पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी। परारूप में सभी ध्वनियाँ 'क ख ग' इत्यादि एक सी रहती हैं; पश्यन्ती में भेद का सूत्रपात होता है जिसे केवल बुद्धि ग्रहण कर सकती है; फिर मध्यमा में वे भेद स्फुट हो जाते हैं। द्वितीय उद्योत में ध्वनिभेदों का सूत्रपात किया गया था; अतः उसमें पश्यन्ती की प्रार्थना ठीक थी। अब इस उद्योत में ध्वनिभेदों का स्पष्टीकरण किया गया है, अतः इसमें मध्यमा-की प्रार्थना ही उचित है। दूसरी बात यह है कि शैवे लोग शिव को ही परब्रह्म का स्वरूप मानते हैं और महामाया भगवती पार्वती ही हैं।
मेवों का सृजनपात कर जगत् को सत्ता में लाना और उसको स्पष्टता प्रदान करना यह महामाया भगवती पार्वती का ही कार्य है। अतः पश्यन्ती और मध्यमा ये भगवती पार्वती के ही रूप हैं। इस प्रकार इस पद्य में मध्यमा के रूप में भगवती पार्वती की वन्दना की गई है। श्लोक का सार यह है—
'जिन भेदों का सूत्रपात हो जाता है उनको स्पष्टता प्रदान करनेवाली भगवती पार्वती की शक्ति मध्यमा रहती है। यह त्रिलोचन भगवान् शंकर की प्रेयसी है। और उन्हीं के आधीन रहकर कार्य करती है। इसकी हम वन्दना करते हैं।'
यहाँ पर शंकर के लिए त्रिलोचन शब्द का प्रयोग बहुत ही सार्थक है। 'त्रि' शब्द तृतीय उद्योत की ओर संकेत करता है और 'लोचन' शब्द लोचन टीका की ओर। अतः त्रिलोचन की प्रिया मध्यमा देवी की वन्दना भी सार्थक हो जाती है और इससे यह भी अभिव्यक्त हो जाता है कि ध्वनि भेदों को स्पष्टता प्रदान करना ही लोचन टीका का प्रमुख उद्देश्य है।
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ध्वनेर्य सगुणीभूतव्यङ्ग्यस्याध्वा प्रदर्शितः । अनेनानन्त्यमायाति कवीनां प्रतिभागुणः ॥ ९ ॥ य एष ध्वनेःगुणीभूतव्यङ्ग्यस्य च मार्गेः प्रकाशितस्तस्य फलान्तरं कविप्रतिभान्त्यम् ॥
( अनु० ) इस प्रकार विप्रतिपत्ति के निराकरण के लिये प्रपञ्च के साथ ध्वनि का व्युत्पादनकर उसके व्युत्पादन में दूसरा प्रयोजन कहा जा रहा है । 'गुणीभूतव्यङ्ग्य' के साथ ध्वनि का जो यह मार्ग दिखलाया गया है इससे कवियों का प्रतिभागुण आनन्त्यता को प्राप्त हो जाता है । जो यह ध्वनि का और गुणीभूतव्यङ्ग्य का मार्ग प्रकाशित किया गया है इसका फल है कविप्रतिभा की आनन्त्यता ।
कुल्यपदकनिवर्हियोगेऽपि परमेश्वरः । नान्योपकरणापेक्षो या तां नौमि शाङ्करीम् ॥ उद्योतान्तरसङ्घाति विचालयति वृत्तिकां सा—‘एवमपि’ । प्रथोजनान्तरोपैति । यथापे ‘सहृदययनःप्रीतये’ इत्यनेन प्रयोजनं प्रागेवोक्तं, तृतीयोद्योतावधौ च सत्काव्यं ‘परमेश्वरः कृत्यपक्ष क े निर्वाह ्ययोग म े भी जिस माय े क े कारण अन्य उपायों की अपेक्षा नहीं करते उस शाङ्करी माया की हम बन्दना करते हैं । दूसरे उद्योत की सङ्क्रति पर विचार करने के लिये वृत्तिकार कहते हैं—‘इस प्रकार’ यह । ‘दूसरा प्रयोजन’ यह । यद्यपि ‘सहृदयों की मन प्रीति के लिये’ इसके द्वारा प्रयोजन पहले ही कहा गया और तृतीय उद्योत की समाप्ति पर्यन्त आऽऽऽऽ
चतुर्थ उद्योत के प्रारम्भिक मङ्गलाचरण में भी अभिनवगुप्त ने भगवान् शाङ्कर को मयासृपिणी शक्ति की ही अभ्यर्थना की है । जिसक
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कतुं वा ज्ञातं वेति तदेवेक्ष्यस्पुटीकृतं तथापि स्फुटतरीकृतंमिदानीं यत्नः । यतस्सुस्पष्टरूपस्वेन विज्ञायते, भतोऽस्पष्टनिरूपितात्स्पष्टनिरूपणमन्यथैव प्रतिभाति ति प्रयोजनान्तरमित्युच्यते । अथवा पूर्वोक्तयोः प्रयोजनयोरन्तरं विशेषोऽपि मधीयते, केन विशेषेण सत्काव्यनिरूपणमस्य प्रयोजनम्, केन च सत्काव्यबोधो भवति विशेषो निरूप्यते । तत्र सत्काव्यनिरूपणकथमस्य व्यापार इति पूर्वं वस्तुनि निष्पादितत्वात् तदुच्यते ॥ १ ॥
काव्य को करने के लिये अथवा जानने के लिये उसीको कुछ स्पष्ट कर दिया गया तथापि और अधिक स्पष्ट करने के लिये यह यत्न है । क्योंकि सुस्पष्टरूप में विज्ञात होता है; अतः अस्पष्ट निरूपित की अपेक्षा स्पष्टनिरूपण अन्यथा ही प्रतिभात होता है इसलिये प्रयोजनान्तर यह कहा गया है। अथवा पूर्वोक्त दोनों प्रयोजनों का अन्तर अर्थात् विशेषता बतलाई जारही है कि किस विशेषता से सत्काव्य का बनाया जाना इसका प्रयोजन है और किससे सत्काव्यबोध यह विशेषता निरुपित की जारही है । उसमें सत्काव्य करण में इसका व्यापार कैसे होता है यह पहले कहा जाना चाहिये क्योंकि निरापादित ही श्रेय होता है । वह कहते हैं-‘ध्वनि का जो’ यह ॥ १ ॥
'भगवान् शिव सर्वदा ५ कर्तव्यों का निर्वाह किया करते हैं—उत्पत्ति, स्थिति, ( पालन ) संहार, तिरोभाव और अनुग्रहकरण । इन कर्तव्यों का पालन कोई सामान्य बात नहीं है तथापि इनके पालन में परमेश्वर को केवल एक साधन की अपेक्षा होती है वह है शंकर जी की मायारूपिणी शक्ति । उसके रहते हुये संसार के क्रियाकलाप सञ्चालित नहीं होती । हम उसी मायारूपिणी शंकर की शक्ति को नमस्कार कर रहे हैं ।'
यहाँ आशय यह है कि भगवती मायूरी शक्ति ही सबसे बड़ा साधन हैं जिससे विश्व के सारे क्रियाकलाप सञ्चालित होते हैं । हमें भी उस मायूरी शक्ति का ही पूरा विश्वास है कि केवल उसी की सहायता से हम ध्वन्यालोक की व्याख्यारूप अपने दुस्स्तर कार्य को सफलतापूर्वक पूरा कर लेंगे ।
तारावती
चौये उद्योत की प्रथम कारिका की व्याख्या करने के पहले वृत्तिकार ने प्रतिपादक उपायों में तृतीय और चतुर्थ उद्योतों की सङ्ङति बैठाने का प्रयत्न किया है । उनको कहना है कि ‘ध्वनि के विषय में ज्ञाजनों में पर्याप्त विप्रतिपत्तियाँ चल रहीं थीं । जब तक उन विप्रतिपत्तियों का निराकरण नहीं किया जाता तब तक इस ग्रन्थ को स्थिरतापूर्वक ही नहीं हो सकती थी । अतः ध्वनि का हमें प्रपञ्च के साथ निस्पक्ष करना पड़ता है और यह कार्य हमने तृतीय उद्योत के अन्त तक
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पूरा कर लिया। इस ध्वनिनिरूपण के और भी प्रयोजन हैं। अब इस चतुर्थ उद्योत में उन्हीं प्रयोजनों पर प्रकाश डाला जावेगा। 'दूसरे प्रयोजन' कहने का आशय यह है कि तृतीय उद्योत तक कितिपय प्रयोजन तो बतलाये जा चुके। प्रथम उद्योत में ही कहा गया था कि प्रस्तुत प्रबन्ध का प्रयोजन है सहृदयमनः- प्रीति, तृतीय उद्योत में भी ४५वीं कारिका में कहा गया था कि इस ध्वनिनिरूपण का प्रयोजन है सत्काव्य का करना या सत्काव्य का समक्षना। वस्तुतः प्रथम उद्योत में कहे हुये प्रयोजन 'सहृदयमनःप्रीति का ही स्पष्टीकरण है—सत्काव्य का करना या सत्काव्य का समक्षना। किन्तु यह बात वहां पर बहुत स्पष्ट नहीं थी। अब यह जो चतुर्थ उद्योत में प्रयोजन का प्रकरण प्रारम्भ किया जा रहा है उसका मन्तव्य उसी प्रयोजन को और अधिक स्पष्ट करना है। ( प्रश्न ) जब उसी प्रयोजन को अधिक स्पष्ट किया जावेगा तब 'दूसरा प्रयोजन' कहने का क्या आशय ? ( उत्तर ) चतुर्थ उद्योत के विवेचन के बाद वह प्रयोजन और अधिक स्पष्टरूप में ज्ञात हो जावेगा। अतः अस्पष्टनिरूपण और स्पष्टनिरूपण दोनों एक तत्त्व नहीं कहे जा सकते। स्पष्टता और अस्पष्टता में स्वाभाविक भेद होता है। इसीलिये स्पष्ट- निरूपण को अस्पष्टनिरूपण की अपेक्षा पृथक् प्रयोजन कहा गया है। अथवा यहां पर प्रयोजनान्तर की यह व्युत्पत्ति नहीं होगी कि—'अन्यत् प्रयोजनमिति प्रयोजनान्तरम्' अपितु यहां पर अन्तर शब्द का अर्थ है भेद। अतएव यहां व्युत्पत्ति यह होगी—'प्रयोजनयोरन्तरमिति प्रयोजनान्तरम्' अर्थात् दो प्रयोजनों का भेद। आशय यह हे कि दो प्रयोजन बतलाये गये हैं—सत्काव्य की रचना और सत्काव्य का बोध। अब इस चतुर्थ उद्योत में यह दिखलाया जावेगा कि इन दोनों प्रयोजनों में भेद क्या है? वे कौन सी विशेषतायें होती हैं जिनसे सत्काव्य की रचना ध्वनिनिरूपण का प्रजोजन हे तथा वे कौन सी विशेषतायें होती हैं जिनसे सत्काव्य का बोध ध्वनिनिरूपण का प्रयोजन होता है? यही निर्णय इस उद्योत में किया जावेगा। समक्षना निर्माण के बाद आता है क्योंकि जब वस्तु बन जाती हे तभी वह समक्षी जा सकती है। अतः पहले कवि को दृष्टि से ध्वनिनिरूपण के प्रयोजन पर विचार किया जावेगा; बाद में सहृदय की दृष्टि से प्रयोजन बतलाया जावेगा। इस पहली कारिका का अर्थ यह है :
ध्वनि का भी मार्ग बतलाया जा चुका और गुणीभूतव्यङ्ग्य का भी। इसका ( सहृदयमनःप्रीति तो फल है ही दूसरा ) फल यह भी है कि इससे कवि का प्रतिभा-गुण अनन्त हो जाता है ॥ १ ॥
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कथमिति चेत् - अतो ध्वन्यतमेनापि प्रकारेण विभूषिता । वाणी नवत्वमायाति पूर्वार्थान्वयवत्यपि ॥ २ ॥
अनु० - यदि कहो कैसे ? तो - 'यदि दोनो में से किसी एक प्रकार से भी विभूषित वाणी पूर्व अर्थ के अन्वयवाली होते हुये भी नवीनताको प्राप्त होजाती हैं ॥ २ ॥ 'इन दोनों मे से अर्थात् ध्वनि के उक्त प्रबन्धों के मध्य से अन्यतम प्रकार से विभूषित होती हुई वाणी पुराने कवियों के निबद्ध अर्थ का स्पर्श करती हुई भी नवीनता को प्राप्त हो जाती है ।
लोचन - ननु ध्वनिभेदात् प्रतिभानामाननत्यमिति व्यधिकरणमेतद्यमित्यभिप्रायेणाहुढते-कथमिति । भन्रोच्तरम्-अताहीन्ति । आसन्न्तात् बहवः प्रकाराः, एकेनाप्येवं भवतीस्यपि शब्दार्थे । एतदुक्तं भवति-वर्णनीयवस्तुनिविष्टः प्रज्ञाविशेषः प्रतिभानं, तत्र वर्णनीयस्य पारिमित्यादधकविक्रैव सृष्टत्वाद् सर्वस्य तद्र्रष्यं प्रतिमानं तज्ज्ञातीयमेव स्यात् । ततश्च कार्यमपि तज्ज्ञातीयमेवेलित्प्रष्ट इदानों कविप्रयोगः उक्तिवैचित्र्येण तु तद्ववार्थी निरब- धयो भवन्तीति तद्र्रिष्याणां प्रतिमानामाननत्यमुपपन्नमिति । ननु प्रतिमाननत्यस्य किं फलमिति षण्ढं वाणी नवत्वमायाति; स्युक्तं, तेन वाण्या काव्यवाक्याना तावत्स्वल्
( प्रश्न ) ध्वनिभेद से प्रतिभानान्त्य यह व्यधिकरण है इस अभिप्राय से आशाङ्का करते हैं-‘कैसे ?' यह।यहाँ उत्तर है-'इन दोनों में से' यह।'आशा' का अर्थ है 'चारों ओर से बहुत से प्रकार; अपिशब्द का अर्थ है कि एक प्रकार के द्वारा भी ऐसा हो जाता है । यह कहा गया है-‘प्रतिभान का अर्थ है वर्णनीय वस्तु में रहनेवाली प्रज्ञा की विशेषता । उसमें वर्णनीय के परिमित होने के कारण आदि कवि के द्वारा ही सृष्ट होने से सभी का तद्र्रष्य प्रतिमान तज्ज्ञातीय ही होगा । ततश्च कार्यमपि तज्ज्ञातीयमेव स्यात् ।
उसमें वर्णनीय के परिमित होने के कारण आदि कवि के द्वारा ही सृष्ट होने से सभी का तद्र्रष्य प्रतिमान तज्ज्ञातीय ही होगा । इससे इस समय कविप्रयोग श्रष्ट हो गया । उक्तिवैचित्र्य से तो वे ही विषय समीक्षित हो जाते हैं और उनके विषयों का प्रतिममनन्त्य 'सिद्ध हो जाता है ।
( प्रश्न ) प्रतिभानन्त्य का क्या फल है ? यह निश्चित करने के लिये वाणी नवीनता को प्राप्त हो जाती है यह कहा गया है। इससे वाणियों का अर्थात् काव्यवाक्यों का नवीनत्व आ जाता है। और वह प्रतिमो के
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मायाति । सन्धप्रतिभानलयेसलुपपद्यते, तच्चार्थानन्वये तद्वचनिमित्तभेदादिति । अनन्त होने पर सिद्ध होता है और वह अर्थ की अननता में और वह ध्वनि के प्रभेद से ।
दूसरी कारिका की प्रतीकयोजना करते हुये वृत्तिकार ने प्रश्न किया है 'यह कैसे ?' । इस प्रश्न का आशय यह है कि वस्तुतः प्रयोग एकविकरणय में होता है । जो व्यक्ति कोई कार्य करता है या जिसमें कोई गुण होता है उसी व्यक्ति को उसका फल मिलता है अन्य को नहीं । यहाँ पर काव्यमार्ग बतलाया गया है और उसी प्रसङ्ग में ध्वनि और गुणीभूतव्यङ्गच का विवेचन किया गया है । अतः फल भी ध्वनि और गुणीभूतव्यङ्गच का हो दिखलाया जाना चाहिये था । किन्तु इसके प्रतिकूल प्रथम कारिका में फल दिखलाया गया है कवि की प्रतिभा की अननता । इस प्रकार ध्वनि इत्थादि भेद तो काव्यगत होते हैं फल दिखलाया जा रहा है प्रतिभा की अननता जोकि कविगत होती है । यह वैषम्यदिकरणय हो गया अर्थात् गुण कहीं अन्यत्र है और फल कहीं अन्यत्र । इसकी सङ्ङ्ति किस प्रकार लगती है ? इसी प्रश्न का उत्तर दूसरी कारिका में दिया गया है । इस कारिका का आशय यह है कि जिस अर्थ को प्राचीन कवि वाल्मीकि इत्यादि ने काव्यबद्ध कर दिया हो उसी अर्थ को लेकर अर्वाचीन कवियों की जो वाणी प्रवृत्त होती है यद्यपि उसमें उपान्त अर्थ पुराना ही होता है तथापि यदि उसमें ध्वनि या गुणीभूतव्यङ्गच के किसी एक ही प्रकार का आश्रय ले लिया जाता है तो वह पुराना अर्थ भी नया मालूम पड़ने लगता है । 'किसी एक ही' कहने का आशय यह है कि यदि अनेक प्रकारों का आश्रय लिया जाय तो कितनी नवीनता आ जायेगी यह तो कहा भी नहीं जा सकता । 'आयाति' में 'आ' इस उपसर्ग का अर्थ है चारों ओर से । अर्थात् ध्वनि के प्रभेद अनन्त हैं; अतः नवीन प्रकार का आश्रय लेने से सभी ओर से उसमें नवीनता आ जाती है । यहाँ कहने का आशय है कि प्रतिभा का अर्थ क्या है ? यही न कि कवि की एक विशेष प्रकार की प्रज्ञा जो वर्णनीय विषय के सम्भन्ध में होती है अर्थात् कवि के अन्दर एक विशेष प्रकार की प्रज्ञा होती है जिससे वह किसी वस्तु को उसके अनेक रूपों में देख लेता है । उसी प्रज्ञा को प्रतिभा कहते हैं । यदि इस हष्टि से विचार किया जाय तो कविता के क्षेत्र में आनेवाली वर्णनीय वस्तुयें तो बहुत थोड़ी है । ( नन्द्र, कमल इत्यादि के कुछ गिने-चुने अप्रस्तुत तथारति उत्साह इत्यादि कतिपय प्रस्तुत भाव ही कविता के क्षेत्र में अपनाये जाते रहे हैं । )
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सबका वर्णनं तो आदि कवि वाल्मीकि ने ही कर दिया । अब यदि उन्हीं विषयों को लेकर कवि की प्रतिभा प्रस्कुटित होगी तो उसमें भी वही तत्व आयेंगे जिनको महाकवि वाल्मीकि ने पहले ही अपने काव्य में स्थान दे दिया था । यदि इस प्रकार समस्त काव्य एक जैसा ही बनेगा तो कविवर वाल्मीकि के लिये तो कवि कहना ठीक होगा उसके बाद जितने भी कवि हुये हैं उन सबके लिये कवि शब्द ही बचीत्स हो जायेगा । अतः उस तत्व का अन्वेषण किया जाना चाहिये जिसके कारण पुराने विषय भी नये जैसे प्रतीत होते हैं । वह तत्व है उत्तिवैचित्र्य अथवा वैदग्ध्य भङ्गीभणित । यदि उत्तिवैचित्र्य का आश्रय लिया जाय तो वही पुराना विषय नवीन हो जाता है और जैसा कि पहले बताया जा चुका है उत्तिवैचित्र्य अघोमित होता है; अतः कोई एक विषय भी काव्य के लिये असीमित हो सकता है । इस प्रकार प्रतिभा की अननन्तता सिद्ध हो जाती है । प्रतिभा की इस अननन्तता का यहाँ फल है कि कवि की वाणियों में नवीनता का समावार हो जाय और चमत्कारपूर्ण उक्तियाँ नई-नई ज्ञात होने लगें । इस प्रकार यह जो प्रश्न उठाया गया या कि ध्वनि के भनन्त भेदों से प्रतिभा के अनन्त भेद कैसे हो जायेंगे ? यह तो वैच्यषिकरणण्य में फल का स्वीकार कर लेना हो जायेगा । इसका उत्तर भी हो गया । वह इस प्रकार कि इनमें परम्परा सम्बन्ध है । ध्वनियों के भेदापमेद अनन्त होते हैं । इसका परिणाम यह होता है कि उपादेय अर्थ भी अनन्त हो जाते हैं क्योंकि यह बताया हो जा चुका है कि एक ही अर्थं नवीन भङ्गिमा से कहे जाने पर नवीन ही हो जाता है । किन्तु अर्थों में अननन्तता स्वयं एक हेतु है और उससे कवि-प्रतिभा में अननन्तता आ जाती है । क्योंकि प्रतिभा भी अन्ततः कवि की वर्णनीयर वस्तुनिष्ठ विशेष प्रकार की प्रज्ञा ही है । प्रतिभा की अननन्तता का फल यह होता है कि काव्य वाक्य भी अनन्त हो जाते हैं । इस प्रकार वैच्य-शिकरण्य का परिहार हो जाता है । यही बात दूसरी कारिका में कही गई है
ध्वनि के बहुत से भेदोपभेदों पर प्रकाश डाला जा चुका है । यदि उनमें से किसी एक का ही आश्रय ले लिया जाय तो कवि चाहे ऐसी ही बात कहे जो पुराने किसी कवि ने कही हो फिर भी वह बात पहले कही गई सी नहीं प्रतीत होगी अपितु उसमें एक नवीनता के दर्शन होने लगेंगे ।
इस विषय में दो एक उदाहरण देना वाञ्छनीय होगा । सर्वप्रथम यह दिखलाया जा रहा है कि कही हुई बात में ही यदि अविवक्षितवाच्य ध्वनि के दोनों प्रकारों की योजना कर दी जाय तो किस प्रकार नवीनता आ जाती है । देखिये :-
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तथा ह्यविवक्षितवाच्यस्य ध्वने: प्रकारद्वयसमाश्रयणेन नवत्वं पूर्वार्थानुगमेडपि यथा—स्मितं किश्चित्स्मुग्धं तरलमधुरो हृष्टविभव: परिस्पन्दी वाचामभिनवविलासोर्मीसरस: । गतानामारम्भ: किसलयितलीलापरिमल: स्पृशान्त्यास्तारुण्यं किमिव न हि रम्यं मृगदृश: ॥
इत्यस्य—सविध्रमस्मितोद्रेकद्रोलाक्ष्य: प्रस्खलदूगिर: । नितम्बालसगामिन्य: कामिन्य: कस्य न प्रिया: ॥
इत्येवमादिपु सत्स्वापि तिरसकृतवाच्यध्वनिसमाश्रयेणापूर्वत्वमेव प्रतिभासते । ( अनु० ) वह निस्सन्देह पूर्व अर्थ के अनुराग में भी अविवक्षितवाच्य ध्वनि के दो प्रकारों के आश्रये लेने से नवीनता जैसे—‘कुछ मुग्ध स्मित, तरल और मधुर दृष्टि का विभव, अभिनव विलास की ऊर्मियों से सरस वाणी का प्रवाह; लीला का परिमल जिसमें किसलय का आचरण कर रहा है इस प्रकार का गमन का आरम्भ ( इत्यादि ), ऐसी तारुण्य को स्पष्ट करनेवाली नायिकाओं का क्या वस्तु है जो रमणीय नहीं प्रतीत होता ।’ इसका—‘जिनकी मुस्कुराहट का उद्द्रेद विलासपूर्ण है, नेत्र चञ्चल हैं; वाणी स्कलित हो रही है और जो नितम्बभार से आलस्ययुक्त गमनवाली हैं वे कामिनियां किसको प्यारी नहीं हैं ।’
इत्यादि के होते हुए भी तिरसकृतवाच्यध्वनि के समाश्रय से अपूर्वत्व हो प्रतीत होता है ।
तत्र प्रथममत्यन्ततिरसकृतवाच्यान्वयमाह—स्मितमिति । मुग्धमधुरविमवसरसकिसलयितपरिमलस्पर्शनान्नयन्ततिरसकृतानि । तैरना हतसौन्दर्यंसर्वजनवश्लभ्याक्षोणप्रसरत्वसन्तापशमनतरपंकत्वसौकुमार्यसार्वकालिकतत्संस्कारानुवृत्तित्वयत्नामिलषणी—यसड्रद्वानि ध्वन्यमानानि यानि, तै: स्मितादे: प्रसिद्धार्थकस्य स्थविरवेधोविहित—
उसमें प्रथम अत्यन्ततिरसकृतवाच्य का अन्वय कहते हैं——‘स्मित’ यह । मुग्ध, मधुर, विभव, सरस, किसलयित, परिमल और स्पर्शन् ये शब्द अत्यन्ततिरसकृत है;
इनसे अनाहत सौन्दर्य सर्वजनवश्लभ्य, अक्षीणप्रसरत्व, समन्ताप्रशमन, तरपंकत्व, सौकुमार्य, सार्वकालिक तत्संस्कारानुवृत्तित्व और यत्नामिलषणीय सज्जतत्व ये जो ध्वन्यमान होते हैं उन्हें प्रसिद्ध अर्थवाले स्मित इत्यादि की बुद्धि के द्वारा
ध्वन्यमान होते हैं उनसे प्रसिद्ध अर्थवाले स्मित इत्यादि की बुद्धि के द्वारा
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धर्मव्यतिरेकेण धर्मान्तरपात्रता यावक्रियते तावत्तदप्येव भासत इति दूरेण सम्बन्धः। सर्वत्रैवास्य नवत्वमिति सज्जति:
बनाये हुये धर्म से भिन्न दूसरे धर्मों को जब तक पात्रता की जाती है तब तक वह अपूर्व ही हो जाता है यह सर्वत्र माना जाना चाहिये । 'इसका' 'अपूर्व हो जाता है' इस दूर के शब्द से सम्बन्ध है । सज्जति यह है कि सर्वत्र इसका नवत्व ही हो जाता है ।
'जब मृगनयनी तारुण्य का स्पर्श करती है तब उसे समृद्ध क्या वस्तु मनोरम नहीं हो जाती ? मुस्कुराहट कुछ मृग्ध होती है, दृष्टि का वैभव कुछ तरल और मधुर होता है, वाणी का प्रवाह अभिनव विलास की लहरों से सरस हो जाता है, गमन में यह तत्व उद्भूत हो जाता है कि उसमें लीला परिमल किसलय का कार्य करने लगता है ।' एवं इसके शब्दप्रयोग पर विचार कीजिये:-
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( १ ) 'मुस्कुराहट कुछ मृग्ध है' 'मृग्ध' ( भोलाभाला ) कोई व्यक्ति हो सकता है मुस्कुराहट नहीं । अतः यह शब्दार्थ में बाधित होकर स्वाभाविक इस अर्थ को लक्षित कराता है । इससे प्रयोजनरूप व्यङ्ग्य निकलता है कि मुस्कुराहट में बिना किसी बनावट के सौन्दर्य का अतिरेक विद्यमान है ।
( २ ) 'दृष्टि मधुर है' मधुर कोई खाद्य पदार्थ हो सकता है; दृष्टि के लिये यह विशेषण वाधित है । अतः इससे लक्ष्यार्थ निकलता है कि 'दृष्टिप्रसार सुन्दर है ।' इसका प्रयोजनरूप व्यङ्ग्यार्थ होगा कि दृष्टि का प्रसार इतना आकर्षक है कि बिना किसी अपवाद के सभी रसिकों के हृदयों का प्रेम अपनी ओर खींच लेता है ।
( ३ ) 'दृष्टि का वैभव' वैभव या ऐश्वर्य व्यक्ति का हो सकता है दृष्टि का नहीं । इससे लक्ष्यार्थ निकलता है 'दृष्टि का प्रसार' और व्यङ्ग्यार्थ निकलता है कि नायिका का दृष्टिपात वेरोकटोक अविरतगति से हो रहा है; उसको कोई रोक ही नहीं सकता ।
( ४ ) 'वाणी का सरस प्रवाह' सरस प्रवाह जलधारा का ही हो सकता है वाणी का नहीं । इससे लक्ष्यार्थ निकलता है कि वह निरन्तर श्रुतिमुखद वाणी बोल रही है । इससे व्यङ्ग्यार्थ निकलता है कि उसकी मधुरवाणी को सुनकर सन्ताप शान्त हो जाता है और हृदय में एक तृषि का अनुभव होने लगता है ।
( ५ ) 'गमन किसलय का कार्य कर रहा है ।' गमन का किसलय कार्य असम्भव है; अतः वाच्य होकर लक्ष्यार्थ निकलता है कि उसकी चाल में मनोहरता
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है। इससे व्यङ्ग्यार्थ निकलता है कि उसकी चाल सौकुमार्य से युक्त है और हर समय सौकुमार्य का ही अनुवर्तन करती रहती है।
( ६ ) 'लीला-परिमल' परिमल कमलों का हो सक्ता है लीलामें सम्भव नहीं। अतः वाधित होकर परिमल शब्द मुखमंडल को लक्षित करता है। जिससे व्यङ्ग्यार्थ निकलता है उसकी चाल इतनी सुन्दर है कि प्रयत्नपूर्वक उसके देखने की अभिलाषा की जानी चाहिये।
( ७ ) 'तारुण्य का स्पर्श' स्पर्श किसी मूर्त वस्तु का किया जा सकता है; तारुण्य का सम्भव नहीं है। अतः बाध होकर लक्षित होता है कि उसके अन्दर तारुण्य का सञ्चार हो गया है। इससे व्यङ्ग्यार्थ निकलता है कि तारुण्य उसके अङ्ग से मिलकर बहुत ही सजीत प्रवीत होता है।
यहाँपर स्मित इत्यादि शब्दों के वाच्यधर्म का सर्वथा परित्याग हो जाता है। ब्रह्मा जी तो वृद्ध हो गये हैं; उनमें रसिकता कहाँ से आई। अतः उन्होंने स्मित में भी जिस धर्म की स्थापना की वह बड़ा ही अनाकर्षक था। तारुण्य के सञ्चार के साथ वह अनाकर्षक रूप दूर हो गया और यह शब्द दूसरे धमों का पात्र बन गया।
जब इस तथ्यपर विचार किया जाता है तब इस पद्य में एक अभूतपूर्व चारुता की प्रतीति होने लगती है। किन्तु इस पद्य में कोई नई बात नहीं कही गई है। रमणियों की मुस्कुराहट, हस्तिपात, भोली भाली वाणी का सरसप्रवाह और लीलागति ये ऐसे तत्त्व हैं, जिनका कविता में प्रायः उपादान होता ही है। इस पद्य की रचना के पहले ही किसी कवि ने लिखा था—
'ऐसी कामिनियाँ जिसको प्यारी नहीं होतीं जिनकी मुस्कुराहट हर समय प्रस्फुटित होती रहती है और उस मुस्कुराहट के साथ विलासों का भी योग रहता है, जिनके नेत्र चञ्चल होते हैं, जिनकी वाणी (मद के कारण ) स्वालित होने लगती है और जिनका गमन नितम्बभार के कारण आलस्यमय होता है ।'
इस पद्य में भी वे ही सब बातें आ जाती हैं जिनका उपादान उक्त पद्य में कवि ने किया है। अतः वस्तु की तो कोई नवीनता है नहीं। यदि कोई नवीनता कही जा सकती है तो केवल यह कि उस पद्य में कवि ने अत्यन्ततिरस्कृतवाच्य ध्वनि का प्रयोग किया है जो कि पुराने पद्य में नहीं किया गया था। अतएव अत्यन्ततिरस्कृतवाच्य ध्वनि ने ही परिचित पुराने भाव को सर्वथा नया बना दिया।
एक दूसरा उदाहरण और लीजिये जिसमें अर्थान्तरसंक्रमितवाच्य के कारण पुराने परिचित भाव में नवीनता आई है। पद्य का भावार्थ यह है :—
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यः प्रथमः प्रथमः स तु तथाहि हतहस्तिवहलपल्वलाशी । स्वापद्गणे षु सिंहः सिंहः केनाधरीक्रियते ॥
इत्यस्य— स्वतेनःक्रीतमहिमा केनान्येनातिशश्यते । महद्धिरपि मातद्धेः सिंहः किमभिभूयते ॥ इत्येवमादिषु श्लोकेपु सत्स्वप्यर्थान्तरसंक्रमितवाच्यध्वनिसमाश्रयेण नवत्वम् । ( अनु० ) उसी प्रकार— ‘जो प्रथम है वह प्रथम ही है । वह इस प्रकार कि मारे हुये हाथियों के घने मांस को खानेवाला जङ्गली जीवों में सिंह ही है क्या उसका पराभूत किया जा सकता है । इसको— ‘अपने तेज से महिमा को अर्जित करनेवाले किस दूसरे के द्वारा नीचा किया जा सकता है ? बड़े-बड़े हाथियों को भी सिंह क्या दबाया जा सकता है ?’ इत्यादि श्लोकों के होते हुये भी अर्थान्तरसंक्रमितवाच्य ध्वनि का आश्रय लेने से नवीनता आ जाती है ।
द्वितीयः प्रथमशब्दोऽर्थान्तरे डणपाकरणीयप्रभानत्वासाधारणत्वादिव्यङ्गयधर्मान्तरे सक्रान्तं स्वार्थं व्यनक्ति । एवं सिंहशब्दोऽपि वीरत्वानपेक्षत्वविस्मयनीयत्वादौ व्यङ्गयधर्मान्तरे संक्रान्तं स्वार्थं ध्वनति । दूसरा प्रथम शब्द अनुपेक्षणीय प्रधनात्व असाधारणत्व इत्यादि व्यङ्गय धर्मान्तर रूप अर्थान्तर में सक्रान्त अपने अर्थ को व्यक्त करता है । इसी प्रकार सिंह शब्द भी ‘वीरत्व’, ‘अनपेक्षत्व’, ‘विस्मयनीयत्व’ इत्यादि व्यङ्गय धर्मान्तर में संकान्त स्वार्थ को ध्वनित करता है । ‘जो प्रथम है वह सर्वदा प्रथम ही है, इस में सब से बड़ा प्रमाण यही है कि शेर स्वयं हाथियों को मारकर उनके बहुत ही पुष्टकल ध्वन मांस को खाता है । समस्त जङ्गली जीवों में वह शेर शेर ही है । क्या कोई उसे इस विधि में रोका है जो अपने वीरता के गुणों से शेर को नीचा दिखा सके ।’ यहाँ पर ‘जो प्रथम है वह प्रथम है’ यह कोई बात नहीं हुई । तात्पर्यानुपत्ति के कारण दूसरा प्रथम शब्द स्वार्थ में बाधित है । और उससे लक्ष्यार्थ निकलता
यः प्रथमः प्रथमः स तु तथाहि हतहस्तिवहलपल्वलाशी । स्वापद्गणे षु सिंहः सिंहः केनाधरीक्रियते ॥
स्वतेनःक्रीतमहिमा केनान्येनातिशश्यते । महद्धिरपि मातद्धेः सिंहः किमभिभूयते ॥
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विवक्षितान्यपरवाच्यस्याप्युक्तप्रकारसमाश्रयेण नवत्वं यथा— निद्राकेतविनः प्रियस्य वदनैर्विन्यस्य वक्त्रं वधूः बोधाभासनिरुद्धचुम्बनरसाप्याभोगलोलं स्थिता । वैदग्ध्यादिविश्रुताभिव्यक्तित पुनस्तस्याप्यनारम्भः साकाड्क्षप्रतिपत्ति नाम हृदयं यातं तु पारं रतेः ॥
अनु० विवक्षितान्यपरवाच्य का भी उच्च प्रकार के आश्रय से नवत्व जैसे— 'निद्रा का बहाना करनेवाले प्रिय के मुख पर मुख रखकर वधू जागजाने के चास से चुम्बनरस को रोके हुये प्रयत्न के कारण चञ्चल होकर स्थित रही । लज्जा साकाङ्क्ष प्रवृत्ति के कारण रति के तो पार पहुँच गया ।'
इत्यादि श्लोकस्य । है कि जिसको अपने गुणों के कारण प्रथम स्थान प्राप्त होता है वह सर्वथा प्रधान ही बना रहता है । इसका प्रयोजनरूप व्यङ्ग्यार्थ है कि जिस व्यक्ति को समाज प्रधान मान लेता है उसके गुण इतने महान् होते हैं कि उसकी प्रधानता को टाल सकने की शक्ति किसी में नहीं होती; और उसमें लोक की अपेक्षा एक विशेषता तथा असाधारणता होती है । इसी प्रकार 'सिंह सिंह है' यह कथन भी कुछ सझत नहीं होता और उससे लङ्ग्यार्थ निकलता है कि सिंह सब जीवों में प्रधान है । उससे भी यही व्यञ्जना निकलती है कि सिंह की प्रधानता को कोई भी टकरा नहीं सकता और उसमें असाधारण पराक्रम होता है जिससे उसे किसी की परवा नहीं होती । चमत्कार व्यङ्ग्यार्थनिष्ठ है अतः यह अर्थान्तरसंक्रमित विवक्षितान्यपर वाच्य अविवक्षितवाच्य ध्वनि है । किन्तु यह भाव भी कोई नया नहीं है । इस पद्य की रचना में भी एक पुराने श्लोक का भाव ही लिखा गया है । उक्त श्लोक
का भावार्थ यह है :— 'जिस व्यक्ति को महिमा प्राप्त करने के लिये किसी अन्य की अपेक्षा नहीं होती। वह अपने तेज से ही महिमा को प्रात कर लेता है । क्या उसका अतिक्रमण किसी दूसरे व्यक्ति द्वारा किया जा सकता है, क्या बड़े बड़े हाथियों के द्वारा भी सिंह का अपरिभव किया जा सकता है ?'
तारावती प्रथम पद्य का भाव भी लगभग वही है । वस्तु में प्रायः कोई अन्तर नहीं अन्तर है तो केवल इतना कि उस पद्य में वही बात कहने के लिये अर्थान्तर
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एवं प्रथमस्य द्वौ भेदावुदाहृतौ द्वितीयस्याप्युदाहृतौ तृतीयस्याप्युदाहृतौ मासून्रयति—विवक्षितेति । निद्रायां कैतवो ऽतकसुत इत्यर्थः । वदने विन्यास्य वक्त्रंमिते । वदनस्पर्शांजमेव तावदिव्यं सुखं त्यक्तुं न पर्यतीति । अत एव प्रियस्येति । वधूः नवोढा । बोधत्रासेन प्रियतमेऽप्रबोधन निरुद्धो हतारः प्रवर्तमानः प्रवर्तमानोऽपि कथञ्चित्कथञ्चित् क्षणमात्राद्धृतशङ्कुचुम्बनाभिलाषो यया । अत एव आयोगेन पुनः पुनर्निद्राविचारनिरवर्णनया विलोलं कृतवा स्थिता, न तु सर्वथैव चुम्बनानिवृत्तिं शङ्कोतीत्यर्थः ।
इस प्रकार प्रथम के दो भेदों के उदाहरण देकर द्वितीय के भी उदाहरण देने के लिए उपक्रम करते हैं—‘विवक्षित’ इत्यादि । ‘निद्रा में कैतवो’ अर्थात् बनावटी सोये हुये । ‘मुख के ऊपर मुख रखकर’ यह । अर्थात् वदनस्पर्शों से ही उत्पन्न हुये दिव्य सुख को छोड़ने में समर्थ नहीं हो रही है । इसीलिये—‘प्रिय का’ यह । वधू अर्थात् नवोढ़ा । बोधत्रास से अर्थात् प्रियतम के प्रबोध के भय से हटपूर्वंक पुनः पुनः प्रवृत्त हुई भी चुम्बन की अभिलाषा को जैसे तैसे क्षणमात्र के लिए रोक कर स्थित हुई । अर्थात् सर्वथा ही चुम्बन से निवृत्त होने में समर्थ नहीं है ।
संक्रमितवाच्य अविवक्षितवाच्य ध्वनि का आश्रय ले लिया गया है । इस प्रकार ध्वनि की नई प्रक्रिया का सहारा ले लेने से पुराना अर्थ भी नया हो गया है ।
संक्रमितवाच्य और अविवक्षितवाच्य ध्वनि का आश्रय ले लिया गया है । इस प्रकार ध्वनि की नई प्रक्रिया का सहारा लेने से पुराना अर्थ भी नया हो गया है ।
उपर इस बात का संकेत करा दिया गया कि अविवक्षितवाच्य के दोनों भेदों का आश्रय लेने से पुराने अर्थ में भी किस प्रकार नवीनता आ जाती है । अब एक उदाहरण इसको भी लीजिये कि विवक्षितान्यपरवाच्य ध्वनि का आश्रय लेने से किस प्रकार पुराने अर्थ में नवीनता आती है । उदाहरण का भावार्थ यह है :-
ऊपर इस बात का संकेत करा दिया गया कि अविवक्षितवाच्य के दोनों भेदों का आश्रय लेने से पुराने अर्थ में भी किस प्रकार नवीनता आ जाती है । अब एक उदाहरण इसको भी लीजिये कि विवक्षितान्यपरवाच्य ध्वनि का आश्रय लेने से किस प्रकार पुराने अर्थ में नवीनता आती है । उदाहरण का भावार्थ यह है :-
‘प्रियतम निद्रा का अभिनय कर रहा था । अर्थात् वह वस्तुतः सो नहीं रहा था अपितु अपने को ऐसा प्रकट कर रहा था मानों सो रहा हो । वधू के अन्दर सहवास की इतनी उत्कट आकांक्षा थी कि वह क्षणमात्र विलम्ब भी सहन नहीं कर सकती थी । किन्तु प्रियतम के सो जाने के कारण उसे सहवास तत्काल सुलभ नहीं था । अतः उसने प्रियतम के मुख पर अपना मुख रख लिया जिससे उसे वदनस्पर्शों का ही सुख प्राप्त हो सके जिसे वह दिव्य सुख समझती थी और जिसे छोड़ने की उसमें शक्ति नहीं थी । क्योंकि सोनेवाला व्यक्ति उसका प्रियतम था । वस्तुतः वह वधू थी अर्थात् नई ही ब्याह कर आई थी । अतः प्रियतम से उसका शक्कोच पूर्णरूप से लूट नहीं सका था । अतएव उसे भय मालूम पड़ रहा था कि
‘प्रियतम निद्रा का अभिनय कर रहा था । अर्थात् वह वस्तुतः सो नहीं रहा था अपितु अपने को ऐसा प्रकट कर रहा था मानों सो रहा हो । वधू के अन्दर सहवास की इतनी उत्कट आकांक्षा थी कि वह क्षणमात्र विलम्ब भी सहन नहीं कर सकती थी । किन्तु प्रियतम के सो जाने के कारण उसे सहवास तत्काल सुलभ नहीं था । अतः उसने प्रियतम के मुख पर अपना मुख रख लिया जिससे उसे वदनस्पर्शों का ही सुख प्राप्त हो सके जिसे वह दिव्य सुख समझती थी और जिसे छोड़ने की उसमें शक्ति नहीं थी । क्योंकि सोनेवाला व्यक्ति उसका प्रियतम था । वस्तुतः वह वधू थी अर्थात् नई ही ब्याह कर आई थी । अतः प्रियतम से उसका शङ्कोच पूर्णरूप से लूट नहीं सका था । अतएव उसे भय मालूम पड़ रहा था कि
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शून्यं वासगृहं विलोक्य शयनादुत्थाय किञ्चिच्छनै-र्निद्राव्याजमुपागतस्य सुचिरं निर्वर्ण्यं पद्युमुखवम् । विश्रब्धं परिचुम्ब्य जातपुलकामालोक्य गण्डस्थलौं लज्जानिर्मुखी प्रियतमा हसिता वीक्ष्य चिरं चुम्बिता ॥
इत्यादिषु श्लोकेषु सत्स्वपि नवत्वम्। यथा वा ‘तरङ्गभ्रमज्ञा’ इत्यादि-श्लोकस्य ‘नानाभ्रभ्रमद्भूः’ इत्यादि श्लोकापेक्षयान्यत्वम् ।
( अनु० ) ‘वासगृह को शून्य देखकर शयन से धीरे से कुछ उठकर निद्रा के बहाने को प्राप्त हुये पति के मुख को बड़ी देर तक देखकर विश्वासपूर्वक चुम्बन; करके उत्पन्न हुये पुलकवाली गण्डस्थली को देखकर लजा के कारण नीचे को मुख की हुई हँसनेवाले प्रियतम के द्वारा बहुत देर तक चुम्बन की गई ।’
इत्यादि श्लोकों के होते हुये भी नवीनता है । अथवा जैसे ‘तरङ्गभ्रमज्ञा’ इत्यादि श्लोक का ‘नानाभ्रभ्रमद्भूः’ इत्यादि श्लोक को अपेक्षा अन्यत्व है ।
एवंभूतैषा यदि मया परिचुम्ब्यते तद्रिलक्षाविसुखीभवेदिति । तस्यापि प्रियस्य परिचुम्बनविषये निरारम्मसि हृदयं साकाड्क्षंप्रतिपत्तिनामेति । साकाड्क्षा सामिलाषा प्रतिपत्ति: स्थितिर्यस्य तादृशं रहरहिकादर्शितं न तु मनोरथसम्पत्तिचरितार्थं किन्तु रते: परस्परजीवितसर्वस्वाभिमानरुपया: परनिर्वृते: केनचिद्यनु भवेनालब्धावगाह-नाया: पार्ङ्गतमिति परिपूर्णामूत एव शृङ्गारः ।
द्वितीयश्लोके तु परिचुम्बनं सम्पन्नं लज्जा स्वशब्देनोक्ता । तेनापि सा चुम्बितेति यद्यपि पोषित एव शृङ्गारः, तथापि प्रथमश्लोके परस्परामिलाषप्रसरनिरोधपरम्परापर्यवसानासम्भवेन या रतिरुक्ता सोमयोरप्येकस्व-
विमुख हो जायेगी इसलिए उस प्रियतम के भी प चुम्बनविषय को प्रारम्भ न करने पर । ‘साकाङ्क्ष प्रदृश्र्तिवाला हृदय’ यह । साकाङ्क्ष अर्थात् सामिलाष प्रतिपत्ति अर्थात् स्थिति है जिसकी उस प्रकार का उत्तकण्ठा से कदर्थित मनोरथ की समृप्ति से चरितार्थ नहीं किन्तु परस्पर जीवितसर्वस्वाभिमान रूपवाली परा निर्वृति रूप रति के, जिसका अन्गागहन किसी भी अनुभत्र के द्वारा प्राप्त नहीं हुआ है, पार को गयाहुआ इस प्रकार श्रृङ्गार परिपूर्ण ही हो गया है ।
द्वितीय श्लोक में तो परिचुम्बन हो गया है, लज्जा स्वशब्द से कही गई है । उसके द्वारा भी वह भलीभाँति चुम्बित की गई इससे यद्यपि श्रृंगार पुष्ट ही कर दिया गया है तथापि प्रथम श्लोक में परस्पर अभिलाषप्रसार की निरोधपरम्परा के पर्यवसान के असम्भव होने से जो रति उक्ता
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रूपचित्तवृत्त्यनुप्रवेशमाचक्षाणा रतिं सुतरां पोषयति ॥ २ ॥
निवृत्ति कही गई है वह दोनों की एक स्वरूपवाली चित्तवृत्ति को कहते हुई रति को भलीभाँति पुष्ट कर देती है ॥ २ ॥
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कहीं प्रियतम जाग न पड़े इसीलिये यद्यपि उसके अंदर बार-बार चुम्बन की उत्कण्ठा उद्दीप्त होती जाती थी तथापि वह बड़ी कठिनाई से अपनी उस अभिलाषा को बार-बार दबा जाती थी । किन्तु बार-बार उसके अंदर चञ्चलता उत्पन्न हो जाती थी और जब यह विचार करती थी कि प्रियतम तो सो रहा है क्यों न अपनी चुम्बन की अभिलाषा पूरी कर ली जाय तब उसकी वह चञ्चलता और अधिक उद्दाम हो जाती थी । चञ्चलता का आशय यह है कि वह न तो चुम्बन कर ही सकती थी और न चुम्बन से सर्वथा निवृत्त ही हो सकती थी । दूसरी ओर प्रियतम सोचता था कि यह इस प्रकार मुख पर मुख रखे हुए है यदि मैं इसका चुम्बन करूँ तो इसके अंदर लज्जा उत्पन्न हो जायगी और फिर लज्जा के कारण यह सहवास से पृथक् हो जायगी । अतः प्रियतम भी अपनी ओर से चुम्बन का प्रारम्भ नहीं कर रहा था । इस प्रकार दोनों की स्थिति आकांक्षा से भरी हुई थी, दोनों का मन उत्कण्ठा से पीड़ित था किन्तु मनोरथ की पूर्ति से उनके मन को सफलता नहीं मिली थी । ऐसी स्थिति में भी उनका हृदय रति के पार पहुँच गया था । रति वस्तुतः है क्या वस्तु ? यही तो कि दोनों एक दूसरे को जीवनसर्वस्व मानें और जीवनसर्वस्व के प्राप्त हो जाने का दर्प भी उनमें विद्यमान हो । परा तृप्ति उन्हें उस अवस्था में किसी प्रकार नहीं मिल रही थी । चुम्बन आलिङ्गन इत्यादि किसी भी अनुभव से उनको रति के आस्वादन और अवगाइन का अवसर नहीं मिल रहा था फिर भी उनका हृदय रति की अन्तिम सीमा पर पहुँच गया और उनका सङ्केत पूरा हो ही गया ।
यह पद्य एक दूसरे (अमरुक कवि लिखित) पद्य की छाया पर लिखा गया है जिसका आशय यह है :-
'नायिका ने भली-भाँति देख लिया कि सोने का कमर्रा बिल्कुल सूना है अर्थात् कोई सखी इधर-उधर छिपी हुई भी नहीं देख रही है । वह चुपके से धीरे-धीरे अपनी चार पाँइँ से कुछ उठी अर्थात् आधे शरीर से लेटी रही और शरीर का आधा ऊपरी भाग उसने कुछ-कुछ उठा लिया । प्रियतम पास ही लेटा हुआ था, वह घो नहीं रहा था किन्तु सोने का बहाना कर रहा था । वह बड़ी देर तक अपने प्रियतम के मुखकी ओर ध्यान से देखती रही । जब उसे विश्वास हो गया कि
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प्रियतम वस्तुतः सो ही रहा है तब उसने निश्चिन्तता से प्रियतम के कपोलों का चुम्बन किया जिससे कामोद्दीपन जन्य हर्षातिरेक से प्रियतम के कपोलों पर रोंगटे खड़े हो गये। यह देखकर उसे लज्जा आ गयी और उसने सिर झुका लिया। प्रियतम हँसते हुये उठा और उसने उस बाला का बड़ी देर तक चुम्बन किया।
'दोनों पद्यों का अर्थ एक ही है, किन्तु फिर भी रूपविधान में कुछ अन्तर आया है। अमरुक के पद्य में चुम्बन का कार्य पूरा हो गया है किन्तु प्रथम पद्य में वह आकांक्षित ही है। अमरुक के पद्य में लज्जा शब्द का ही प्रयोग किया गया है जिससे उसमें स्वाभाव्यता आ गयी है, किन्तु प्रथम पद्य में लज्जा के लिये विलक्ष शब्द का प्रयोग किया है जिसका अर्थ होता है स्वभाव का परिवर्तन अर्थात् उत्कण्ठा की शान्ति और लज्जा का उदय इस प्रकार प्रथम पद्य में लज्जा व्यंग्य है। अमरुक के पद्य में नायक और नायिका दोनों एक दूसरे को चूमते हैं। इस प्रकार रति उभय निष्ठ है। अतः यह पूर्ण स्थायी भाव हैं। इसके पोषक सभो तत्व विद्यमान हैं। नायिका इत्यादि आलम्बन, शून्य वासगृह इत्यादि उद्दीपन, स्थथ्या से उठना इत्यादि अनुभाव और लज्जा इत्यादि सञ्चारी भावों से पुष्ट होकर उभयनिष्ठ वह रति आस्वादगोचर होकर पूर्ण शृङ्गार का रूप धारण कर लेती है। इस प्रकार कमी अमरुक के पद्य में भी नहीं है।
किन्तु प्रथम श्लोक में ऐसी स्थिति उत्पन्न कर दी गयी है कि एक दूसरे के अन्दर अभिलाषा तो विद्यमान है किन्तु उसका प्रसार एकदम रुक हुआ है और यह रुकावट की परमरा अभी समाप्त होती हुयी भी नहीं जान पड़ती। इस प्रकार अवरुद्ध हो जाने के कारण रति का उपयोग नहीं हो रहा है, जिससे रति तीव्रतम अवस्था को प्राप्त हो गयी है। वह रति यह प्रकट करती है कि दोनों की चित्तवृत्ति का अनुप्रवेश एक जैसा हो है। इस प्रकार रति का जितना परिपोष प्रथम श्लोक में हुआ है उतना अमरुक के पद्य में नहीं हुआ। इस उदाहरण द्वारा यह सिद्ध हो गया कि विवक्षितान्यपरवाच्य को नई भङ्गिमा का आश्रय लेने से भी पुराना अर्थ नया हो जाता है।
इसी प्रकार 'तरङ्गभूभृङ्ग' इत्यादि पद्य पर 'नानाभाङ्गिभ्रमद्रुत:' इस पद्य को छाया लक्षित होती है। ('तरङ्गभूभृङ्गा' यह विक्रमोर्वशीय का पद्य है और इसकी व्याख्या द्वितीय उद्योत में की जा चुकी है। दूसरे पद्य का पता नहीं कि यह कहाँ से लिया गया है। और पूरा पद्य किस प्रकार है। ज्ञात होता है वृत्तिकार ने इस पद्य में असंलक्ष्य क्रमव्यंग्य का आश्रय लेने के द्वारा भावनवीनता लाने को ध्यास्या की होगी। क्योंकि लोचनकार ने अग्निम कारिका का अवतरण देते हुये लिखा है कि यहां तक ध्वनि के चार मूलभेदों की व्याख्या की जा चुकी। इन चार भेदों की
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युक्त्यनुयुसर्तव्यो रसादिर्वहुविस्तरः । मितोड्यननन्ततां प्राप्तः काव्यमार्गो यदाश्रयात् ॥ ३ ॥
इस युक्ति से बहुत विस्तारवाले रस इत्यादि का अनुसरण करना चाहिये जिसके आश्रय से सीमित भी काव्यमार्ग अनन्तता को प्राप्त हो गया है ॥३॥
बहुविस्तारोडयं रसभावतदाभासतत्प्रशमलक्षणो मार्गो यथास्वं विभावानुभावव्यभिचारिसमास्र्यादपरिमितत्वं यथोक्तं प्राक् । स च सर्व एवात्रानया युक्त्यनुसर्तव्यः । यस्य रसादिराश्र्यादयं काव्यमार्गः पुरातनैः कविभिः सहृदयसंधार्यैव बहुप्रकारं गुणणत्व-निमितोड्यननन्ततामेति । रसभावादीनां हि प्रत्येकं विभावानुभावव्यभिचारिसमास्र्यादपरिमितत्वम् । तेषां चैकैकप्रभेदापेक्ष्यापि तावज्जगद्वृत्तमुपनिबध्यमानं सुकविविम्बितदिच्छावशादन्यथास्थितमप्यनन्यथैव विवर्तते । प्रतिपादितं चैतच्चित्रविचारावसरे ।
एवं मौलं भेदचतुष्टयमुदाहृत्यालक्ष्यक्रमभेदेष्वतिदेशं करोति-युक्त्यनुयेत । ‘अनुसर्तव्य’ इति । उदाहर्तव्यमित्यर्थः । यथोक्तमिति ।
इस प्रकार मूलभूत चार भेदों के उदाहरण देकर अलक्ष्यक्रमभेद्यद्धय के अति-दिशा के माध्यम से सभी उपभेदों के विषय में निर्देश करते हैं—‘इस युक्ति से’ यह । अर्थात् उदाहरण दिये जाने चाहिये । ‘जैसा कहा गया है’ यह ।
व्याख्या तभी पूरी होती है जब इसे रसध्वनि से नवीनता लाने का उदाहरण मान लिया जाय ।
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गाथाचात्र कृतैव महाकविना-- अतह्डिए वि तहसण्ठिअए व हिअअम्मि जाइ निवेसेइअ । अत्थविसेसे सा जइअ विकडकइगोअरा वाणी ॥ [ अतथास्थितानपि तथा संस्थितानिव हृदये या निवेभ्रयति । अर्थविशेषान सा जयति विकटकविगोचरा वाणी ॥ ] इति छाया । तदित्थं रसभावाद्याश्रयेण काव्यार्थानामानन्त्यं सुप्रतिपादितम् ॥ ३ ॥
(अनु०) और यहाँ पर महाकवि के द्वारा गाथा रची गई है— 'जो उस रूप में न स्थित भी अर्थों विशेषों को तथास्थित के समान हृदय में निविष्ट कर देती है उस विकट कविगोचर विकट वाणी की जय हो । वह इस प्रकार रसभाव इत्यादि के आश्रय से काव्यार्थों का आनन्त्य भलीभाँति प्रतिपादित कर दिया गया ॥ ३ ॥
तारावती द्वितीय कारिका में मूल चार भेदों के द्वारा काव्य में पुराना अर्थ भी किस प्रकार नवीन बन जाता है इस बात की व्याख्या की जा चुकी और उनके उदाहरण भी दिये जा चुके । वे चार मूलभेद हैं—दो प्रकार का अविवक्षितवाच्य अर्थात् अत्यन्ततिरस्कृतवाच्य और अर्थान्तरसंक्रमितवाच्य अर्थात् संल्लक्ष्यक्रम और असं- लक्ष्यक्रम । अब तीसरी कारिका में यह बतलाया जा रहा है कि वस्तुतः काव्य मार्ग अनन्तपार है । इसका कारण ध्वनिभेदों का आश्रय लेना ही है । यहाँ पर रस इत्यादि अलक्ष्यक्रमव्यंग्य का अतिदेश किया गया है अर्थात् यह बतलाया गया है कि जिस प्रकार रसध्वनि के भेदों की इयत्ता नहीं उसी प्रकार का सभी ध्वनिप्रपञ्च है । किसी भी भेद की इयत्ता नहीं कही जा सकती । कारिका का भाव यह है— 'जो उक्ति द्वितीय कारिका में बतलाई गई है वह दिग्दर्शन मात्र है । (कहीं कहीं 'दिशानया' भी पाठ है ।) उसीका आश्रय लेकर अतिविस्तृत रस इत्यादि के भी उदाहरण दे दिये जाने चाहिये । इस प्रकार यद्यपि काव्यमार्ग बहुत ही सीमित है तथापि इन भेदोपभेदों के कारण वह अनन्त हो जाता है ।' ध्वनिभेदों के निरूपण के अवसर पर पहले ही बतलाया जा चुका है कि ध्वनि का केवल एक भेद रसध्वनि ही ऐसा है कि उसका अन्त नहीं मिल सकता । पहले तो रस, भाव, रसाभास, भावाभास, भावशान्ति, भावोदय, भावसन्धि और भावशवलता ये आठ भेद आते हैं । फिर इनमें प्रत्येक के विभाव अनुभाव और सञ्चारी भावों का विस्तार होता है । (आलम्बन विभाव में नायक और नायिका आते हैं । आचार्यों ने केवल नायिका के ही सहस्रों भेद बतलाये हैं । वस्तुतः
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तस्याझ्ञानां प्रभेदा ये प्रभेदा स्वगताश्र ये । तेषामन्योन्यमन्योन्यसम्बन्धपरिकल्पने
इत्यत्र । प्रतिपादिते चैतदिति । च शब्दोऽपि शब्दार्थे मिलनक्रमः । पृथदपि प्रतिपादितं ‘भावानचेतनानपि चेतनवच्चेतनानचेतनवदिति’स्यत्र । अतथास्थितानपि वहिस्थासंस्थितानिवे’ति इवशब्देन एकतरत्र विश्रान्तियोगाभावादेव सुतरां विचित्रूपानित्यर्थः। हृदय इति। प्रधानतमे समस्तभावकनकनिकषस्थान इत्यर्थः। निवेशयति यस्य हृदयमस्ति तस्य तस्य अचलतया तत्र स्थापयतीत्यर्थः। अत एव ते प्रसिद्धार्थेभ्योऽन्य एवेत्यर्थविशेषा सम्पद्यन्ते । हृदयनिविष्टा एव च तथाभवन्ति नान्यथे’स्यर्थः। ‘सा जयति’ परिचिछन्नशकिब्यः प्रजापतिभ्योऽप्युल्लस्र्षेण वर्तंते । तत्प्रसादादेव कविगोचरो वर्णनीयोडर्थों विकटो निस्सीमा सम्पद्यते ॥ ३ ॥
यहाँ पर । ‘यह भी प्रतिपादित किया गया है’ यह । ‘च’ शब्द अपि शब्द के अर्थमें मिलनक्रम है । यह भी प्रतिपादित किया गया है—‘अचेतन भावों को भी चेतनवत् और चेतनों को अचेतनवत्’ यहाँ पर । ‘उस प्रकार न स्थितों को भी बाहर तथास्थितों के समान’ यह । ‘इव’ शब्द से ( प्रकट होता है ) एक स्थान पर विश्रान्तियोगके अभाव से ही विचित्र रूपवाले यह अर्थ है । ‘हृदय में’ यह । अर्थात् प्रधानतम तथा समस्त भावरूपी सोनेके लिए कसौटी के स्थान पर स्थित ‘निविष्ट करती है’ अर्थात् जिसके जिसके हृदय है उसके उसके अन्दर अचल रूप में वहाँ पर स्थापित कर देती है । अतएव वे प्रसिद्ध अर्थों से भिन्न ही होते हैं यह अर्थ विशेष हो जाता है । अर्थात् हृदय में निविष्ट ही वैसे बनते हैं अन्यथा नहीं । ‘उसकी विजय होती है’ अर्थात् सीमित शक्तिवाले प्रजापति से भी उत्कृष्ट रूपमें वर्तमान रहती है । उसके प्रसाद से ही कविगोचर वर्णनीय अर्थ विकट अर्थात् सीमा रहित हो जाता है॥ ३ ॥
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नहीं है । फिर ध्वनि के दूसरे भेदों के विषय में तो कहना ही क्या ? इस अनन्तता और अपरिमितता की व्याख्या 'तस्याझ्ञानां प्रभेदा ये—परिकल्प्यने' ( उ. २ का. १२ ) में की जा चुकी है । इन रसभावादिकों के एक एक भेद का आश्रय ढे लिया जाय और उसके माध्यम से जगद्वृत्त को काव्य के अन्तर लाया जाय तो वे वृत्त जिस प्रकार के होते हैं वे अन्यथा ही प्रतोत होने लगते हैं । आशय यह है कि यदि जगत् के सामान्यवृत्त का ही उपनिबन्धन किया जाय तो भी काव्य के माध्यमों और ध्वनि के भेदों का इतना अधिक विस्तार है कि कविता के विषय कभी समाप्त ही नहीं हो सकते, फिर कविता के विषय कल्पित भी होते हैं और कवि की जैसी भी इच्छा होती है हरयमान विश्व वैसा ही बन जाता है । इस प्रकार जब विश्व में कवि की इच्छा से परिवर्तन होता ही रहता है तब काव्यार्थ का अन्त हो सकेगा इसकी तो कल्पना भी नहीं की जा सकती । यही कारण है कि अनन्त काल से अनन्त कवि इस काव्यमार्ग को पीछते चले आये हैं, यह सीमित ही जैसे कि पहले बतलाया जा चुका है । अतः इसको बहुत पहले ही समाप्त हो जाना चाहिये था । किन्तु रसध्वनि इत्यादि ध्वनिभेदों का इतना विस्तार है और उनकी ऐसी अनन्तता है कि वह काव्यमार्ग न तो अभी तक समाप्त हुआ ही और न हो ही सकता है । 'प्रतिपादितं चैतत्' में 'च' का अन्वय भिन्न क्रम से होता है - 'एतत् च' । 'च' का यहाँपर अर्थ है 'भी' इस बात का भी प्रतिपादन चित्र काव्य के विचार के अवसर पर किया जा चुका है और कवि किस प्रकार अपनी रुचि के अनुसार विश्व को बदल लेता है । इसपर भी संकेतरूप में प्रकाश डाला
चुका है जैसा कि वहां पर एक कारिका का उद्धरण देकर बतलाया गया था कि कवि अचेतन भावों को चेतन के रूप में और चेतन भावों को अचेतन के रूप में जैसा चाहता है वैसा ही व्यवहृत करता है । प्राकृत के एक महाकवि ने (सम्भवतः) मालिवाहन ने यही बात एक गाथा में कही है । महाकवि का आशय यह है:- 'जिन कवियोंकी सम्पत्ति लोकोत्तर वर्णन ही है और जो ऐसी रचना करने में समर्थ होते हैं कि जिसमें अनन्त पदार्थ-समूह का प्रकाशन हुआ करता है इस प्रकार वे कवि अत्यन्त उत्कृष्ट होते हैं और ऐसे कवियों को विकट कवि कहा जाता है । ऐसे कवि ही जिस वाणी का विषय होते हैं वह कविवाणी लोकोत्तर रूप में विदयमान रहती है । उस कविवाणी की जय हो । इस कविवाणी की विशेषता यही है कि संसार में जो वस्तुयें विभिन्नरूप में ही स्थित होती हैं उन वस्तुओं को यह कविवाणी सहृदयों में अन्यथा के समान निविष्ट कर देती है अर्थात् कामिनी के मुख इत्यादि जो पदार्थ संसार में चन्द्र इत्यादि के रूप में प्रसिद्ध नहीं होते हैं उनको सहृदयों के हृदयों में वह उन्हीं विलक्षण रुपों में निविष्ट कर देती है ।'
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एतदेवोपपादयितुमुच्यते— दृष्टपूर्वोऽपि ह्यार्थः काव्ये रसपरिग्रहात् । सर्वे नव इवाभान्ति मधुमास इव द्रुमाः ॥ ८ ॥
तथाहि विवक्षितान्यपरवाच्यस्येव शब्दशक्त्युद्भवानुरणननरूपव्यङ्ग्यस्यैव श्रयेण नवत्वम्—‘घरणी धारणायाधुना त्वं शेषः' इत्यादे । शेषो हिमगिरिस्थस्त्वं च महानतो गुरवः स्थिराः । यदल्लडितमर्यादाश्वलन्तीं विभृथ नितिम् ॥ इत्यादिषु सत्स्वपि । तस्येवार्थशक्त्युद्भवानुरणनरूपव्यङ्ग्यच समाश्रयेण नवत्वम् । यथा—‘एवंवदति देवपौ’ इत्यादि श्लोकस्य कृते वरकथालापे कुमार्यः पुलकोद्गमैः । सूचयन्ति स्मृहामन्तर्लज्जयावनततनानः ॥ इत्यादिषु सत्सु । अर्थशक्त्युद्भवानुरणनरूपव्यङ्ग्यस्यैव कविप्रौढोक्तितत्पन्नशरीरत्वेन नवत्वम् । ‘यथा सज्जेऽ सुरहिमासो’ इत्यादे ? सुरभिमस्मये प्रादुर्भवन्ति रमणीयाः । रागवतासुत्कलिकाः सहैव सहकारकलिकाभिः ॥ इत्यादिषु सत्स्वण्यपूर्वत्वमेव ।
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प्रतिमानां वाणीनां चानन्ट्यं ध्वनिकृतमिति यदनुच्रियन्तयुक्तं तदेव कारिकया भङ्गया निरूप्यत इत्याह—उपपादयितुमिति । उपपत्या निरूपयितुमित्यर्थः । यच्चाप्यथान्त्यमात्रे हेतुत्रृत्तिकारेणोक्तः तथापि कारिकाकारेण नोक्त इति भावः । यदि वा उच्यते संग्रहश्लोकड्यामिति भावः । अतएवास्य श्लोकस्य वृत्तिकारेण व्याख्यानं न कृतम् ।
प्रतिभाओं और वाणियों का आनन्ट्य ध्वनि का किया हुआ है यह जो अस्पष्ट कारिका में कहा गया है वही कारिका के द्वारा भङ्गिमा से निरूपण किया जा रहा है यह कहते हैं—‘उपपादन करने के लिये’ यह । अर्थात उपपत्ति के द्वारा निरूपण करने के लिये। भाव यह है कि यद्यपि वृत्तिकार ने अर्थान्त्य मात्र में हेतु बतलाया तथापि कारिकाकार ने नहीं बतलाया । अथवा कहा जाता है । भाव यह है कि यह संग्रह श्लोक है । इसीलिये वृत्तिकार ने इस श्लोक की व्याख्या नहीं की ।
अन्यथा के समान कहने का आशय यह है कि जिन अर्थसमूहों को कवि की वाणी सहृदयों के हृदयों में निविष्ट कर देती है वे अर्थसमूह विचित्ररूपवाले होते हैं क्योंकि किसी एक ही रूप में उनका पर्यवसान नहीं होता । अतः नये-नये कवि आते जाते हैं और पुरानी वस्तुओं को नये रूप में ही प्रस्तुत करते जाते हैं, नये रूपों से सहृदयगण पूर्व परिचित नहीं होते, अतः नवीन अर्थ सहृदयों को विलक्षण ही प्रतीत होते हैं । ‘सहृदयों के हृदयों में’ कहने का आशय यह है कि सहृदयों के हृदय ही वस्तुतः ऐसी कषौटी होते हैं जिनपर कसकर प्रत्येक भाव रूपी स्वर्ण अपना वास्तविक रूप प्रकट करता है कि वह खरा है या खोटा । ‘प्रविष्ट कर देती है’ शब्द का आशय यह है कि जो लोग सहृदय होते हैं अर्थात जिस किसी भी व्यक्ति के पास हृदय होता है उसके अंदर वह विलक्षण भाव अचलरूप में स्थित हो जाता है । जिनके हृदय में कविवाणीप्रस्तुत अर्थ अचल स्थान प्राप्त नहीं कर लेता वे वस्तुतः हृदयहीन ही होते हैं । इसीलिये वे अर्थ कहे जाते हैं । क्योंकि वे प्रसिद्ध अर्थों से भिन्न ही होते हैं और वे अर्थ विलक्षणता को तभी प्राप्त कर पाते हैं जब सहृदयों के हृदयों में उन्हें स्थान मिल जाता है । ‘जय हो’ कहने का आशय यह है कि कवि वाणी सर्वोत्कृष्ट रूप में विद्यमान रहती है यहाँ तक कि ब्रह्मा जी की भी शक्ति सम्मिलित होती है । उत्तम कवि-वाणी उत्कृष्टरूप में वर्तमान रहती है । विकट कवियों की कृपा से ही कवि गोचर वर्णनीय अर्थ असीम हो जाता है । इस प्रकार रस और भाव के आश्रय से काव्यार्थों के आनन्ट्य का भलीभाँति प्रतिपादन कर दिया गया ॥ ३ ॥
अन्यथा के समान कहने का आशय यह है कि जिन अर्थसमूहों को कवि की वाणी सहृदयों के हृदयों में निविष्ट कर देती है वे अर्थसमूह विचित्ररूपवाले होते हैं क्योंकि किसी एक ही रूप में उनका पर्यवसान नहीं होता । अतः नये-नये कवि आते जाते हैं और पुरानी वस्तुओं को नये रूप में ही प्रस्तुत करते जाते हैं, नये रूपों से सहृदयगण पूर्व परिचित नहीं होते, अतः नवीन अर्थ सहृदयों को विलक्षण ही प्रतीत होते हैं । ‘सहृदयों के हृदयों में’ कहने का आशय यह है कि सहृदयों के हृदय ही वस्तुतः ऐसी कषौटी होते हैं जिनपर कसकर प्रत्येक भाव रूपी स्वर्ण अपना वास्तविक रूप प्रकट करता है कि वह खरा है या खोटा । ‘प्रविष्ट कर देती है’ शब्द का आशय यह है कि जो लोग सहृदय होते हैं अर्थात जिस किसी भी व्यक्ति के पास हृदय होता है उसके अंदर वह विलक्षण भाव अचलरूप में स्थित हो जाता है । जिनके हृदय में कविवाणीप्रस्तुत अर्थ अचल स्थान प्राप्त नहीं कर लेता वे वस्तुतः हृदयहीन ही होते हैं । इसीलिये वे अर्थ कहे जाते हैं । क्योंकि वे प्रसिद्ध अर्थों से भिन्न ही होते हैं और वे अर्थ विलक्षणता को तभी प्राप्त कर पाते हैं जब सहृदयों के हृदयों में उन्हें स्थान मिल जाता है । ‘जय हो’ कहने का आशय यह है कि कवि वाणी सर्वोत्कृष्ट रूप में विद्यमान रहती है यहाँ तक कि ब्रह्मा जी की भी शक्ति सम्मिलित होती है । उत्तम कवि-वाणी उत्कृष्टरूप में वर्तमान रहती है । विकट कवियों की कृपा से ही कवि गोचर वर्णनीय अर्थ असीम हो जाता है । इस प्रकार रस और भाव के आश्रय से काव्यार्थों के आनन्ट्य का भलीभाँति प्रतिपादन कर दिया गया ॥ ३ ॥
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दृष्टपूर्वा इति । बहिः प्रत्यक्षादिमिः प्रमाणैः प्राप्तनैश्र कविमिरित्युचयथा नेयम् । काव्यं मधुमासस्थानीयम्, स्फुटहां लज्जामिति । रागवतामुल्कलिका इति च । शब्ददृष्ट-
यह कहा गया था कि कवियों की प्रतिभायें भी अनन्त होती हैं इस अनन्तता का कारण बतलाया गया था ध्वनिप्रभेदों का विस्तार, किन्तु यह बात वहाँ अस्पष्टरूप में कही गई थी क्योंकि उस बात में कोई प्रमाण नहीं दिया गया था । अब चतुर्थ कारिका में उसी बात को सिद्ध किया जा रहा है । ( प्रश्न ) पिछले प्रकरण में तो उदाहरण देकर भलीभाँति सिद्ध कर दिया गया कि 'पुराणो अर्थ भी नई भङ्गिमा से कहे जानेपर नया ही हो जाता है । इस प्रकार वहाँ अनन्तता तो सिद्ध कर दी गयी थी । अब उसके लिये यह कहना कि पहले अस्पष्ट तथा अनुपपत्तिक रूप में कहा गया था और उसके लिये एक नई कारिका लिखना कहाँ तक ठीक है ? ( उत्तर ) उस बात को सिद्ध करने के लिये जो कुछ कहा गया था वह सब वृत्तिकार का कथन था । कारिकाकार ने उसके प्रमाण के रूप में कुछ नहीं कहा था । अतः कारिकाकार ने उसी कथन में प्रमाण देने के लिये यह कारिका लिखी है । दूसरी बात यह भी कही जा सकती है कि जिसपर चार संख्या डाली गई है वह वास्तव में परिकर श्लोक है । वृत्तिकार की यह शैली है कि किसी बात को विस्तारपूर्वक सिद्ध करके उसके सार के रूप में एक श्लोक लिख देते हैं । यह इलोक परिकर श्लोक कहलाता है । प्रस्तुत श्लोक वस्तुतः ध्वनिकार की कारिका नहीं अपितु परिकर श्लोक है इसमें सबसे बड़ा प्रमाण यही है कि वृत्तिकार ध्वनि कारिकाओं की व्याख्या के रूप में कुछ न कुछ अवश्य लिखते हैं किन्तु इस कारिका की व्याख्या में कुछ नहीं लिखा है । कारिका का आशय यह है :-
'ष्टपूर्व' यह । बाहर प्रत्यक्षादि प्रमाणों से और पुराने कवियों के इस प्रकार दोनों ओर लगाना चाहिये । काव्य मधुमासस्थानीय है । स्फुटहा, लज्जा, राग-
'जिन अर्थों को पहिले देखा जा चुका है वे अर्थ भी यदि रस को स्वीकार कर लेते हैं तो नये ही जान पड़ते हैं । जैसे जिन वृक्षों को हम देखते ही रहते हैं वे वृक्ष भी वसन्त काल में नए मालूम पड़ने लगते हैं ॥ ४ ॥ पुराना अर्थ नई भङ्गिमा से कहे जाने पर किस प्रकार नवीन मालूम पड़ता है इसके कई उदाहरण पहले दिये जा चुके । यह बतलाया जा चुका है कि अविवक्षित वाच्य के दो भेदों का आश्रय लेने से पुराने अर्थ में किस प्रकार नवीनता
वालों को उत्कण्ठा इन शब्दों से स्फुर्श हुये अर्थ में क्या हृद्यता है ?
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जिन अर्थों को पहिले देखा जा चुका है वे अर्थ भी यदि रस को स्वीकार कर लेते हैं तो नये ही जान पड़ते हैं । जैसे जिन वृक्षों को हम देखते ही रहते हैं वे वृक्ष भी वसन्त काल में नए मालूम पड़ने लगते हैं ॥ ४ ॥
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तातो है। अब विवक्षितानन्यपरवाच्य के अनुरणनरूप व्यङ्गच के दो भेदों को लीजिये—पहला भेद है शब्दशक्त्युन्मुद्रवावानुरणनरूप व्यङ्गच विवक्षितानन्यपरवाच्य ध्वनि। एक पुराना भाव था—
कोई चाटुकार राजा की प्रशंसा करते हुए कह रहा है—‘हे राजन् केवल तीन व्यक्ति ऐसे हैं जो अपनी मर्यादा को न छोड़ते हुए विचलित भूमि को धारण करते हैं—शेषनाग, हिमालय और आप। तीनों ही महान् हैं, ( शेषनाग और हिमालय विशाल आकारवाले हैं और राजा महान् गुणोंवाला है।) गुरु हैं, ( पृथिवी के भार को वहन करने में समर्थ हैं और राजा प्रतिष्ठित है।) और स्थिर हैं, ( शेषनाग और हिमालय तो अविचलित हैं और राजा हृदयप्रतिष्ठ है।)
इसी भाव को वाणभट्ट ने हर्षचरित में अपनाया है। प्रभाकरवर्धन और राजवर्धन दोनों ही समरत हो चुके हैं अब केवल हर्षवर्धन ही बच रहे हैं जो राज्य का भार वहन कर सकें। उसी अवसर पर यह वाक्य आया है कि—‘पृथिवी को धारण करने के लिये अब तुम शेष हो।’ यहाँ पर पृथिवी को धारण करने के दो अर्थ हो सकते हैं—पृथिवी को विचलित होने से रोकना और राज्य-भार वंहन करना। इसी प्रकार ‘शेष’ के भी दो अर्थ हो सकते हैं—शेषनाग और अवशिष्ट। प्रकरण के कारण राज्यभार वहन करने के लिये अवशिष्ट इस अर्थ में अभिधा का नियन्त्रण हो जाता है तब दूसरा अर्थ व्यञ्जना होकर उपमानोपमेयभाव धारण कर लेता है—जिस प्रकार पृथिवी को धारण करने के लिये शेषनाग होता है उसी प्रकार तुम भी राज्यभार वहन करने के लिये अवशिष्ट हो। इस उपमा में महाराज हर्ष की अमृतपूर्व क्षमता अभिव्यक्त होती है। इस प्रकार बात वही है किन्तु ‘शेष’ शब्द के प्रयोग द्वारा शब्दशक्तिमूलक अनुरणनरूप व्यङ्गच विवक्षितानन्यपरवाच्य ध्वनि का सम्पादन कर पुराने अर्थ की ही नवीनता रँगी गई है।
[ ‘श्रेषो हिमगिरि:’ इत्यादि श्लोक का वास्तविक पाठ ‘विभ्रते सुवम्’ है। किन्तु यह पाठ अशुद्ध है क्योंकि नियमानुसार जहाँ मध्यम पुरुष और अन्य पुरुष दोनों के कर्ता पृथक् पृथक् विद्यमान हो वहाँ क्रिया का प्रयोग मध्यम पुरुष में होना चाहिये। किन्तु वचन का प्रयोग पृथक् शब्दों की संख्या के अनुसार होता है। इस प्रकार ‘शेष:’ ‘हिमगिरि:’ और ‘स्वम्’ इन तीन कर्ताओं के कारण मध्यम पुरुष का बहुवचन आना चाहिये। अतः यहाँ पाठ होना चाहिये ‘विभृथ’ या ‘विभृश्वे’। इस प्रकार या तो ‘विभृथ सुवम्’ यह पाठ होना चाहिये या ‘विभृश्वे भुवम्’ में ‘थ’ यह पञ्चम वर्ण ह्रस्व हो जाता है जो दीर्घ होना चाहिये और ‘विभृश्वे
भुवम्' में ‘थ’ यह पञ्चम वर्ण ह्रस्व हो जाता है जो दीर्घ होना चाहिये और ‘विभृश्वे भुवम्’ में ‘वे’ यहाँ षष्ठ वर्ण ह्रस्व हो जाता है। दोनों दशाओं में प्लुतोद्भट दोष आ जाता है।
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भुवम् में 'भू' यह संयुक्ताक्षर होने के कारण गुरु हो जाता है जो पञ्चम वर्ण होने के कारण लघु होना चाहिये । अतः इन दोषों को दूर करने के लिये दीर्घितिकार ने 'विभृथ क्षितिम्' यह पाठ कल्पित कर लिया है । यही पाठ ठीक प्रतीत होता है ।
विवक्षितान्यपरवाच्य का दूसरा भेद है अर्थान्तरसङ्किमूलक अनुनरनरूप व्यङ्ग्यध्वनि । इसके आश्रय से पुराना अर्थ नया मामला पढता है । जैसे एक प्रसिद्ध श्लोक है जिसका आशय यह है—
'जब कुमारियों के सामने उनके अभिभावक उनके विवाह और उनके भावी पति की बात करने लगते हैं तब कुमारियों के रोंगटे खडे हो जाते हैं और लज्जा से उनका सिर नीचे झुक जाता है । इस प्रकार वे अपनी अन्तर्गत् अभिलाषा को अभिव्यक्त करने लगती हैं ।'
इस पद्य का आश्रय कालिदास के 'ऋतुसंहारदिन देवषैः' इत्यादि पद्य में भी आया है । ( विस्तृत व्याख्या के लिये देखे द्रि. उ. का. ३२, तृ. उ. का. ३६ तथा तृ. उ. का. ४३ ) उक्त श्लोक में लज्जा और स्पृहा शब्दोक्त हैं, किन्तु कालिदास के श्लोक में लीला-कमलपत्र गणना से उनकी अभिव्यक्ति होती है । इस प्रकार यहाँ अनुनरनरूप व्यङ्ग्य विवक्षितान्यपरवाच्य का आश्रय लेने से ही अर्थ में नवीनता आ गई है ।
अर्थशक्त्युद्भव अतुनरनरूप व्यङ्ग्य का जो ऊपर उदाहरण दिया गया है वह तो है स्वतःसम्भवी वस्तु से वस्तु व्यञ्जना । इसके प्रतिकूल कभी कभी कविप्रौढोक्तिरूप वस्तु से भी वस्तुध्वनि होती है । उसके अवलम्बन में नवीनता का उद्भावन जैसे एक पद्य का भाव है :-
'वसन्त काल के आ जाने पर आम्रकलिकाओं के साथ ही रागियों की रमणीय उत्कण्ठायें सहसा प्रादुर्भूत हो जाती हैं ।'
इस पद्य का भाव 'सज्जेऽ सुरहिमासो' इत्यादि पद्य में भी लिया गया है । ( दे. द्वि. उ. का. २४ ) भाव वही है । केवल अन्तर यह है कि इस पद्य में वसन्त मास का कामदेव के बाणों को तैयार करना कविप्रौढोक्तिसिद्ध वस्तु है जिससे अत्यन्त गाढी होनेवाली मन्मथ की दशा अभिव्यक्त होती है । इस प्रकार कविकल्पित वस्तु से वस्तुध्वनि के कारण पुराने भाव में नवीनता आ गई है ।
इसी प्रकार कविनिबद्ध-वक्तृ कल्पित वस्तु से वस्तु ध्वनि का आश्रय लेने से भी काव्य में नवीनता आ जाती है । जैसे एक पुराना भाव है—
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अर्थशक्त्युद्भवानुरणनरूपव्यङ्ग्ययस्य कविनिबद्धवक्तृप्रौढोक्तिमात्रनिष्पन्न- शरीरत्वेन नवत्वम् । यथा-‘वाणिअ हत्थिदन्ता’ इत्यादिगाथार्थस्य । करिणीवैधव्यकरो महु पुतो एक्काण्डव्विणिपाति । हतस्नुषया तथाकृतो यथा काण्डकरण्डकं वहइ ॥ [ करिणीवैधव्यकरो मम पुत्र एककाण्डविनिपाती । हतस्नुषया तथाकृता यथा काण्डकरण्डकं वहति ॥ ] इतिेच्छाया । यथा व्यङ्ग्यश्रभेदसमाश्रयेण ध्वने: काव्यार्थानां नवत्वमुत्पद्यते, तथा व्यङ्ग्यक- भेदसमाश्रयेणापि ।
अनु० अर्थशक्त्युद्भवानुरणनरूप व्यङ्ग्य का कविनिबद्ध वक्तृप्रौढोक्तिमात्र निष्पन्न शरीर के द्वारा नवत्व-जैसे-‘हे वणिक् हाथी के दांत’ इत्यादि गाथा के अर्थ का— ‘करिणीं को वैधव्य करनेवाला एक प्रहार में ही विनिपात कर देनेवाला मेरा पुत्र दुष्ट बहू के द्वारा ऐसा कर दिया गया कि वाणों की राशि को ढो रहा है ।’ इत्यादि अर्थों के होते हुये भी अगतार्थता ही है । जिस प्रकार ध्वनि के व्यङ्ग्य भेद का आश्रय लेते से काव्यार्थों का नवत्व उत्पन्न होता है उसी प्रकार व्यङ्ग्यभेद का आश्रय लेने भी । वह ग्रन्थ के विस्तार के भय से नहीं लिखा जा रहा है, सहृदयों के द्वारा स्वयं ही जान लिया जाना चाहिये ।
एतत् चोदाहरणानि विततस्य पूर्वमेव व्याख्यातानीति किं पुनरुक्त्या । सत्यपि प्राप्तनकविसृष्टत्वे नूतनत्वं भवत्येवैतद्वकारानुप्रहादित्येतावति तात्पर्यं हि ग्रन्थस्याअधिकं नान्यत् । करिणीवैधव्यकरो हि मम पुत्रः एकेन काण्डेन विनिपातनसमर्थः हतस्नुषया तथा कृतो यथा काण्डकरण्डकं वहतीत्युतान एवंमर्थः; गाथार्थस्यान- लोढतैवेति सम्बन्धः ॥ ४ ॥
और इन उदाहरणों की विस्तारपूर्वक पहले ही व्याख्या कर दी गई, अतः पुनरुक्ति से क्या ? प्राक्तन कवियों के द्वारा विशेष स्पष्ट होते हुये भी इन प्रकारों के अनुग्रह से नवीनत्व होता ही है, ग्रन्थ का केवल इतने में ही तात्पर्य है और कुछ भी नहीं । करिणी वैधव्य करनेवाला एक बाण में विनिपातन में समर्थ मेरा पुत्र दुष्ट बहू के द्वारा ऐसा कर दिया गया, जिससे वाणों का समूह ढो रहा है, यह अर्थ उत्तान ही है, गाथा के अर्थ की अगतार्थता ही है यह सम्बन्ध है ॥
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'मेरा पुत्र हाथियों की पत्नियों को विधवा बनाने वाला है और वाण के एक ही प्रहार में महाराजाओं को धराशायी कर देता है। किन्तु आजकल जीविका को नष्ट करनेंवाली दुष्ट बहू ने उसे ऐसा बना दिया है कि वह वाणों का समूह धारण करनेवाले तरकश को ढो रहा है।'
यह किसी व्यक्ति के द्वारा दांत के लिये पूछने पर व्याध ने उत्तर दिया है। इसकी व्याख्या यह है कि मेरा पुत्र बहू के सम्भोग के कारण इतना क्षीण हो गया है और बहू के हाव-भाव कटाक्षों में ऐसा फँसा रहता है कि न तो उसमें इतनी शक्ति ही रह गई है कि वह मत्त हाथियों को मार सके और न उसकी प्रवृत्ति ही उस ओर है। वह वाणों को ढो रहा है, किन्तु उनका उपयोग कुछ नहीं। अतः हमारे घर में हाथी दाँत कहाँ से आये? इसी आशय को लेकर 'वाणिअ हत्थिदन्ता' इत्यादि गाथा लिखी गई है। (दे. उ. त. का. ९) यद्यपि भाव वही है, किन्तु 'करिणीवेहत्थ अरयो……वहद' में 'हत्थनट्ठया तथाकृतः' यह कहकर व्यङ्ग्यार्थ को एक अंश में वाच्य बना दिया गया है जब कि 'वाणिअ हत्थिदन्ता' इत्यादि गाथा में 'यावल्हुलितालकमुखी' इत्यादि शब्दों के द्वारा उस अर्थ को सर्वथा गौण ही रखा गया है। इस प्रकार पुराने अर्थ के होते हुये भी 'वाणिअ' इत्यादि गाथा का अर्थ सर्वथा नवीन तथा पुराने पद्य के द्वारा अगतार्थ ही है। यहाँ पर कविनिबद्धवस्तुकलिप्त वस्तु से वस्तुध्वनि का आश्रय लेकर नवीनता का सम्वार किया गया है।
उपर व्यङ्ग्य की दृष्टि से ध्वनि के विभिन्न भेदों का आश्रय लेने से पुराना अर्थ किस प्रकार नवीन हो जाता है इसका दिग्दर्शन करा दिया गया और कुछ उदाहरण भी दिये गये। यहाँ यह भी ध्यान रखना चाहिये कि केवल व्यङ्ग्यार्थ की दृष्टि से ही ध्वनिभेद अनन्तता के प्रयोजक होते हैं। एक भाव को एक कवि शब्द इत्यादि जिन उपकरणों का आश्रय लेकर अभिव्यक्त करता है उसी भाव को अभिव्यक्त करने के लिये दूसरा कवि दूसरे ही शब्दों का प्रयोग किया करता है। इस प्रकार एक भाव के अनन्त व्यङ्गक हो सकते हैं। व्यङ्गकों का निरूपण तृतीय उद्योत के प्रारम्भ में किया जा चुका है। उन भेदों का आश्रय लेकर किस प्रकार नवीनता सम्पन्न हो जाती है यह स्वयं समझ लेना चाहिये। यदि इन सब के उदाहरण दिये जायेंगे, तो ग्रन्थ का अनपेक्षित विस्तार हो जायगा। इस समस्त प्रकरण का सार यही है कि ध्वनि-विस्तार काव्यगत भावों को अनन्तता प्रदान कर देता है, यह ध्वनि का सब से बड़ा प्रयोजन है॥ ४॥
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अत्र च पुनः पुनरुक्तमपि सारत्येदमुख्यते— व्यङ्ग्यव्यञ्जकभावेडस्मिन्निविधे सम्भवत्यपि । रसादिमियैकस्मिन्नकवि: स्याद्वधानवान् ॥ ५ ॥
अनु० 'इस विविध व्यङ्गयव्यञ्जक भाव के सम्भव होते हुये भी कवि एक रसादिमय में ही ध्यान देनेवाला हो' ॥ ५ ॥
भी अपूर्व अर्थ के लाभ की इच्छावाला कवि एक रसादिमय व्यङ्गयव्यञ्जक भाव में ( ही ) यत्न से ध्यान दे । रस, भाव और तदाभास रूप व्यङ्गच्य में और उसके यथा निर्दिष्ट व्यञ्जक वर्ण, पद, वाक्य, रचना और प्रवन्ध में मन को सावधानतापूर्वक लगानेवाले कविन का सभी काव्य अपूर्व हो जाता है । वह इस प्रकार—रामायण महाभारत इत्यादि में बार बार कहे हुये भी संग्राम इत्यादि नये नये प्रकाशित होते हैं और प्रवन्ध में एक ही अङ्गीरस उपनिबद्ध किया जाता हुआ अर्थविशेष की प्राप्ति को और छाया के आधिक्य को पुष्ट करता है । यदि कहो किसके समान ? तो जैसे रामायण में अथवा जैसे महाभारत में । रामायण में निस्सन्देह करुण रस 'शोक श्लोक को प्राप्त हो गया' यह कहनेवाले स्वयं आदिकवि ने सूत्ररूप में निर्दिष्ट कर दिया है और सीता के अत्यन्त वियोग पर्यन्त प्रवन्ध की रचना करते हुये उसे समाति को भी प्राप्त करा दिया ।
लोचन अत्यन्तग्रहणेन निरपेक्षभावतया विप्रलम्भश्रृङ्गारां परिहरति ।
अत्यन्त ग्रहण से निरपेक्ष भाव रूप में विप्रलम्भ की शृङ्कार को दूर करते हैं ।
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प्रस्तुत पुस्तक के पिछले प्रकरणों में कई बार कहा गया है कि ध्वनि के तीनों भेदों में रसध्वनि ही प्रधान होती है तथा अन्य ध्वनियाँ रसप्रवण होकर ही काव्य की संज्ञा प्राप्त करती हैं। यही प्रस्तुत रचना का सार है, अतः अन्त में एक बार पुनः इसी बात को दृढ़ करने के लिये दो कारिकाएँ लिखी गई हैं। कारिका का आशय यह है :-
यह ध्वनि अनन्तता में हेतु होती है और ध्वनि का प्रयोजक व्यङ्गच-व्यक्षक भाव बड़ा ही विचित्र तत्त्व है। इसके अनेक भेद सम्भव हैं। तथापि यदि कवि ऐसी रचना करने के लिए उत्सुक हो जिसका प्रयोजन चमत्कार प्रकर्ष की अपूर्व प्राप्ति ही हो तो उसे ऐसे व्यङ्गच-व्यञ्जक भाव में प्रयत्नपूर्वक ध्यान देना चाहिए जिसका स्वरूप रसादिमय हो। यदि कवि रस, भाव, रसाभास, भावाभास, भाव शान्ति, भावोदय, भावशवलता इत्यादि रस ध्वनि के व्यङ्गच भेदों का ध्यान रखता है और उनके व्यञ्जक वर्ण, पद, वाक्य रचना और प्रवन्ध का भी विशेष ध्यान रखता है तो उसका समस्त काव्य अद्वितीय बन जाता है।
(इस कथन का आशय यही है कि कवि को वस्तुयोजना अलङ्कार ध्वनि इत्यादि काव्य सम्बन्धी सभी तत्त्वों के प्रति जागरूक रहना चाहिए किन्तु विशेष रूप से उसे ऐसे शब्दों और अर्थों का प्रयोग करने में सावधान रहना चाहिए जिससे रस व्याहत न होने पाए। यदि कवि रसोपघातक शब्दों और अर्थों का प्रयोग करेगा तो यह उसके लिये दोष होगा। साथ ही उसे यह भी ध्यान रखना चाहिए कि जिस रस की वह व्यञ्जना कर रहा है वह भी लोकानुमोदित हो तथा औचित्य की सीमा से च्युत न होने पाए। ऐसा करने पर ही उसका काव्य अपूर्व बन जाता है।) यदि कवि रस के प्रति जागरूक रहता है तो एक बात यदि वह बार-बार कहता है तो भी उसमें नवीनता ही आती रहती है और यह प्रतीत नहीं हो पाता कि वही पुरानी बात बार-बार कही जा रही है। उदाहरण के लिये रामायण और महाभारत में युद्ध का न जाने कितनी बार वर्णन किया गया किन्तु हरबार नया ही मालूम पड़ता है। उसका कारण यही है कि यद्यपि युद्ध का वर्णन तो वैसा ही सर्वत्र है तथापि युद्ध के अभिव्यञ्जक और अभिव्यङ्गच तत्त्वों में भेद पड़ जाने से जो भी अगला वर्णन किया गया है वह नया ही मालूम पड़ता है।
प्रबन्धकाव्यों में प्रकरणानुसार अनेक रसों का उपादान होता है कहीं शृङ्गार, कहीं वीर, कहीं शान्ति, कहीं हास्य इत्यादि अनेक रस अवसर के अनुसार आते रहते हैं। उन रसों में अङ्गीरस का अनुसन्धान करना पड़ता है। यह तो निश्चित ही है कि जितने रसों का प्रबन्ध में उपादान किया जायगा उनमें कोई एक ही प्रधान होगा
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अन्य रस उसके पोषक होंगे। पोषक रसों को अङ्ग कहते हैं और पोष्य रस को अङ्गी । अतः किसी प्रबन्धकाव्य का अध्ययन करने में इस बात का विशेष रूप से अनुसन्धान कर लेना चाहिये कि उस प्रबन्ध में कौन सा रस अङ्गी है और कौन कौन से अङ्ग हैं। अङ्गी रस वही होता है जो अन्य रसोंसे पुष्ट किया जाय, जिसमें विशिष्ट रस अङ्गी हो । अङ्गी रस वह होता है जो चमत्कार के आधायक की शक्ति हो और छायाधिक्य के कारण उससे विशेष अर्थ की अवगति हो रही हो। इस बात को ठीक रूप में हृदय में करने के लिये हमें सर्वाधिक प्रतिष्ठित प्रबन्ध रामायण और महाभारत के अङ्गी रस की परीक्षा कर लेनी चाहिये। इस परीक्षा के द्वारा हम दूसरे महाकाव्यों के अङ्गी रस की परीक्षा पद्धति भली भाँति समझ सकेंगे।
( अङ्गी रस की परीक्षा कई प्रकार से की जा सकती है—कवि स्वयं अङ्गी रस का संकेत दे देता है, कभी कभी उपक्रम में अङ्गी रस का उल्लेख कर दिया जाता है और उपसंहार में उसी रस का निर्वाह किया जाता है, अन्य रस उसके निर्वाह के लिये आते हैं और उस रस का पोषण ही करते हैं। इत्यादि कुछ ऐसे उपाय हैं जिनसे अङ्गी रस की परीक्षा की जा सकती है।) सर्व प्रथम रामायण को लीजिये। रामायण में वाल्मीकि जी ने उपक्रम में लिखा है कि—क्रोध के जोड़े के वियोग से उत्पन्न शोक ही श्लोक रूप में परिणत हो गया। यह शोक वस्तुतः करुण रस का स्थायी भाव है, क्योंकि क्रोध का वियोग अत्यन्तिक है। मुनि के इस संकेत से व्यक्त होता है कि रामायण का अङ्गीरस करुण है। मुनिवर वाल्मीकि जी ने रामायण की रचना वहाँ तक की है जहाँ राम ओर सीता का वियोग अत्यन्तिक रूप में हो जाता है और उनके पुनः समिलन की सम्भावना नहीं रहती। अतः अन्त में भी करुण रस में ही रामायण की समाप्ति होती है। इस प्रकार मुख और निर्वहण दोनों सन्धियों में करुणरस विद्यमान है। मध्य में भी जो वीर रस इत्यादि आये हैं वे भी करुणरस के परिपोषक और अङ्ग ही हैं। इस प्रकार रामायण का अङ्गीरस करुणरस ही है। यहाँ पर यह प्रश्न किया जा सकता है कि सीतावियोगजन्य दुःख तो विप्रलम्भ श्रृङ्गार का विषय है फिर यहाँ यह कैसे कहा गया कि रामायण का अङ्गीरस करुण है? इसका उत्तर यह है कि विप्रलम्भ की शृङ्गार का परिपाक करने के लिये ही तो यहाँ पर ‘अत्यन्त’. शब्द का प्रयोग किया गया है। अत्यन्तिक वियोग करुणरस का ही विषय होता है विप्रलम्भ शृङ्गार का नहीं। (यहाँ पर टीकाकार ने लिखा है कि वृत्तिकार का यह कथन सर्वथा चिन्त्य है क्योंकि ‘शोकः श्लोकत्वमागतः’ यह श्लोकपाद तो ध्वनिकार है—‘काव्यस्यात्मा स एवार्थः.......’ इत्यादि कारिका का यह अन्तिम चरण है—वाल्मीकि का नहीं। यह श्लोक-पाद रामायण में आया भी नहीं। फिर
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महाभारतेsपि शास्त्ररूपे काव्यच्छायान्वयिनि वृष्णिपाण्डवविरसावसानवैम-नस्यदायिनों समासिमुपनिबद्धता महामुनिना वैराग्यजननतात्पर्यं प्राधान्येन स्र-प्रबन्धस्य दर्शंयता मोक्षलचणः पुरुषार्थः शान्तो रसश्र मुख्यतया विवक्षाविषय-त्वेन सूचितः। एतच्चाशन विवृतमन्यैः्यलोचकैःिविधैः। स्वयंसव चैतदुद्गार्णतेनोदेष्टंमहामोहममुजिहीर्षता लोकमतिविमलज्ञानालोकेदायिना लोकनाथेन-(अनु०) शास्त्र और काव्य की छाया के अन्वयवाले महाभारत में भी वृष्णि और पाण्डवों के विरसावसान से वैराग्य देनेवाली समासि को निवद्ध कर महामुनि ने भी अपने प्रबन्ध का मुख्य तात्पर्य वैराग्यजनन ही दिखलाते हुये सूचित किया है कि मोक्षरूप पुरुषार्थ और शान्तरस मुख्यरूप में विवक्षाविषय है। अन्य व्याख्याकारों ने यह आंशिक रूप में विवृत किया है। वड़े-वड़े महामोह में डूबे हुये लोक को निकालते अति निर्मेल ज्ञान का आलोक देनेवाले उन लोकनाथ ( व्यास ) ने स्वयं कह दिया है :-
वृष्णीनां परस्परक्षयः, पाण्डवानामपि महापथक्लेशेनानुचिता विपत्ति:, कृष्णस्यापि व्याधादिध्वंस इति सर्वस्यापि विरसावसानमिति । मुख्यतयैति । यद्यपि ‘धर्में चाथें च कामे च मोचे च’युक्तं, तथापि चतुवारश्रकारा एवमाहुः--यद्यपि धर्मार्थ-कामानां सर्वस्वं ताडडनास्ति यदन्यत्र न निगद्यते, तथापि पर्यन्तविरसत्वमत्नैवावलोक्य-ताम् । मोचे तु यदृपं तस्य सारतात्रैव विचार्यंतामिति ।
लोचन
वृष्णियों का परस्पर क्षय, पाण्डवों की भी महापथ क्लेश से अनुचित विपत्ति, कृष्ण का भी व्याधि से विध्वंस इस सबका भी विरस ही अवसान ( हुआ ) यह । ‘मुख्य रूप में’ यह । यद्यपि धर्म में और अर्थ और काम में और मोक्ष में’ यह कहा गया है कि तथापि चार ‘और’ यह कहते हैं—यद्यपि धर्म अर्थ और काम का सर्वस्व यहाँ पर देखा जावे, मोक्ष में तो जैसा रूप है उसकी सारता यहाँं विचार्री जावे, यह ।
यह कथन सङ्झत ही कैसे हो सकता है ?’ इस विषय में निवेदन यह है कि यह चरण स्वयं महाकवि वाल्मीकिक का ही है और रामायण में बालकाण्ड के द्वितीय सर्ग के अन्त में आया है । टीकाकार को आक्षेप करने के पहले रामायण का उपक्रम देख लेना चाहिये था ।
तारावती
अब महाभारत के अङ्गी रस पर विचार कीजिये । महाभारत एक ऐसा ग्रन्थ है जिसमें हमें पातञ्जल इत्यादि शास्त्रों की भी छाया दृष्टिगत होती है और रामायण
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इत्यादि काव्यों के स्वरूप का भी प्रतिफलन इस महाग्रन्थ में हुआ है । यह ग्रन्थ तत्वनिर्णय की दिशा में शास्त्र का काम देता है और चमत्कारोत्पादन दिशा में यह महाकाव्य का कार्य करता है ।इस ग्रन्थ का पर्यवसान सभी के विनाश में होता है । कृपाणवंशावले इतने महान् तथा सुन्दर हैं, इतने अद्भुत हैं, किन्तु अन्त में शाप से वे सब परस्पर लड़कर ही समाप्त हो जाते हैं और उनका भरापूरा ऐश्वर्यं बात की बात में समाप्त हो जाता है । पाण्डवों की कथा मुख्य है। पाण्डव अपनी वीरता में किसी को भी अपने सामने नहीं आने देते । महाभारत जैसे महासंग्राम में अभूतपूर्व पराक्रम दिखलाकर और सभी शत्रुओं का संहार कर एक समृद्ध राज्य के अधिकारी बन जाते हैं । किन्तु अन्त में होता क्या है ? सभी को हिमालय के महापथ की ओर जाना पड़ता है और अनेक वर्णनातीत विपत्तियों को सहते हुये हिमराशि में अपनी कथा समाप्त कर देनी पड़ती है । उन युगपुरुष भगवान् वृष्णि का ही क्या होता है ! जो अपने योगेश्वर रूप के कारण अपने प्रभाव से सारी जनता पर छा जाते हैं और भगवान् के रूप में उनकी पूजा होने लगती है वे भगवान् कृष्ण भी अन्त में एक साधारण बहेलिये से मारे जाते हैं । सभी को कितना नीरस अन्त होता है! यह नीरसता दिखलाकर ही महाभारत समाप्त कर दिया जाता है । इस उपसंहार से व्यक्त होता है कि महामुनि व्यास कृष्ण पाण्डव और कृष्ण का महान् उत्कर्ष दिखलाकर यही सिद्ध करना चाहते हैं कि जब इतने महापुरुषों और उत्कर्षशालियों का ऐसा नीरस अन्त हो सकता है तब साधारण मनुष्य का तो कहना ही क्या ? मानव कितना ही बढ़ जाय किन्तु अन्त में समाप्ति नीरसता में ही होती है । विश्व की सभी वस्तुयें क्षणभंगुर हैं । इससे सिद्ध होता है कि महामुनि का तात्पर्य वैराग्य-जनन ही है । यदि काव्यरूप में इस महाग्रन्थ का परिशीलन किया जाय तो वैराग्यजनक परिस्थितियाँ विभाव होकर तृष्णाक्षयजन्य सुख में पर्यवसित होंगी और सम्पूर्ण काव्य का अधीरस शान्तरस ही सिद्ध होगा । यदि इसकी पर्यालोचना शास्त्र की दृष्टि से की जाय तो धर्म अर्थ और काम ये तीनों पुरुषार्थ गौण सिद्ध होंगे और मुख्य पुरुषार्थ मोक्ष ही सिद्ध होगा । आशय यह है कि महाभारत के कवि भगवान् व्यास को मुख्य रूप में यह कहना अभीष्ट है कि शान्त रस ही इस ग्रन्थ का अद्भीरस है और मोक्ष ही परम पुरुषार्थ है । मुख्य कहने का आशय यह है कि गौण रूप में इसमें दूसरे रस भी विद्यमान हैं, किन्तु उनका पर्यवसान शान्त रस में ही होता है । इसी प्रकार गौण रूप में इसमें धर्म अर्थ और काम को भी पुरुषार्थ के रूप में प्रतिपादित किया गया है किन्तु परम पुरुषार्थ मोक्ष ही है । पुरुषार्थ-निरूपण के विषय में महाभारत का यह श्लोक प्रसिद्ध है :-
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धर्मे न्वाथ च कामे च मोक्षे च भरतर्षभ । यदिहास्ति तदन्यत्र यन्नेहास्ति न तत्क्वचित् ॥
इस इलोक में प्रत्येक पुरुषार्थ का उल्लेख करने के बाद एक ‘च’ जोड़ दिया गया है। इसे प्रकार चारों चकारों का प्रयोग यहाँ किया गया है। इन चकारों का अभिप्राय यह है कि लोक में धर्म, अर्थ और काम ये पुरुषार्थ माने जाते हैं। इन पुरुषाथों का जिस प्रकार का उल्लेख इस महाग्रंथ में हुआ है वह सब लोक में पाया जाता है। किन्तु लोक में इनकी निस्सारता नहीं पाई जाती जिसका ठीक रूप में उल्लेख इसी ग्रन्थ में किया गया है। मोक्ष के विषय में जो कुछ कहा गया है और उसका जैसा रूप है वह लोक की वस्तु नहीं है। मोक्ष का सार रूप तो इस ग्रन्थ में ही है और इसी में इस तत्व का विचार किया जाना चाहिये।
('च' का प्रयोग समुच्चय, अन्वाचय इत्यादि अर्थों में होता है। जिन शब्दों अथवा वाक्यखण्डों का एक में अन्वय करना होता है उनके साथ 'च' का योग किया जाता है। सामान्यतया संयुक्त होनेवाले शब्दों और वाक्यखण्डों को लिखकर अन्त में 'च' का प्रयोग कर दिया जाता है। किन्तु यहाँ पर विशेष रूप से प्रत्येक शब्द के साथ 'च' का प्रयोग किया गया है। अतः यहाँ पर इसका विशिष्ट अर्थ लिया जाना चाहिये। वह विशिष्ट अर्थ यही होगा कि जो कुछ लोक में अधिगत होता है वह इस महाग्रन्थ में न हो ऐसी बात नहीं है वह सब तो इसमें है हो। किन्तु लोक में उनकी विरसावसानता दृष्टिगत नहीं होती जिसका इस ग्रन्थ में प्रतिपादन किया गया है। मोक्ष का तो प्रतिपादन इस महाग्रन्थ की विशेषता ही है। इस प्रकार विरसावसानता और मोक्ष की विशेषता ही विशिष्ट अर्थ हैं जिनकी अभिव्यक्ति चार चकारों के प्रयोग से होती है।)
महाभारत के अझीरस के विषय में ऊपर जो कुछ कहा गया है उसका आंशिक विवरण महाभारत के विभिन्न व्याख्याताओं ने दे दिया है किन्तु स्पष्ट रूप में यह किसो ने नहीं कहा कि शान्तरस हो महाभारत का अझीरस है। किन्तु महाभारत के रचयिता को तो हम लोकनाथ कह सकते हैं क्योंकि एक तो अवतारों के परिगणन में भगवान् वेदव्यास का नामोल्लेख पाया जाता है, अतः भगवान् का अवतार होने के कारण वेदव्यास जी लोकनाथ हैं। दूसरी बात यह है कि उन्होंने महाभारत जैसे परमोत्कृष्ट प्रबन्ध लिखकर सांसारिक व्यक्तियों की भावनाओं को नियन्त्रित कर सन्मार्ग में प्रवृत्त करने को चेष्टा की है। इस प्रकार लोक पर नियन्त्रण करने के कारण वे लोकनाथ हैं। उन्होंने देखा
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यथा यथा विपर्येति लोकतन्त्रमसारवत् । तथा तथा विरागोडत्र जायते नात्र संशयः ॥
जैसे जैसे लोकतन्त्र असार के समान विपरीत होता जाता है वैसे वैसे इसमें विराग होता जाता है इसमें कोई सन्देह नहीं ।
इत्यादि बहुत बार कहते हुये । उससे शान्तरस दूसरे रसों के द्वारा और मोक्षरूप पुरुषार्थ दूसरे पुरुषार्थों के द्वारा उसके प्रति गौण होने के कारण अनुप्राणित किया जाता हुआ अज्ञ्ज्ञिभावश्र यथा रसानां तथा प्रतिपादितमेव (अनु०) 'जैसे जैसे लोकतन्त्र असार के समान विपरीत होता जाता है वैसे वैसे इसमें विराग होता जाता है इसमें कोई सन्देह नहीं ।'
यथा यथेति । लोकैस्तन्त्र्यमाणं यत्नेन सम्पाद्यमानं धर्मार्थकामतत्साधनलक्षणं वस्तुभूततयाभिमतमपि । येन येनाज्ज्ञ रक्षणक्षयादिना प्रकारेण । असारवत्तुच्छेन्द्रियादिवत् । विपर्येति । प्रत्युत विपरीतं सम्पद्यते । आस्तानतस्य स्वरूपचिन्तेत्यर्थः । तेन तेन प्रकारेण अत्र लोकतन्त्रे । विरागो जायते इत्यनेन तत्त्वज्ञानोत्थितं निवेदं शान्तरसस्थायिनं सूचयता तस्यैव च सर्वत्रासारत्वमतिपादनेन प्राधान्यमुक्तम् ।
'जैसे जैसे' यह । लोकों के द्वारा तन्त्रित किया जाता हुआ प्रयत्नपूर्वक् सम्पादित किया जाता हुआ धर्मे, अर्थ और काम तथा उसके साधन के रूप में स्थित वस्तुरूप होने से अभिमत भी । जिस जिस अर्जन रक्षण और क्षय इत्यादि के प्रकार से । असारवत् अर्थात् तुच्छ । इन्द्रजालवत् 'विपर्येति' अर्थात् प्रत्युत लोकतन्त्र में । 'विरागो जायते' इसके द्वारा तत्वज्ञान से उत्थित शान्त रस के स्थायी निर्वेद को सूचित करते हुये समस्त दूसरी वस्तुओं के असारत्व के प्रतिपादन के द्वारा उसी का प्राधान्य कहा गया है ।
कि सारा विश्व एक महान् अज्ञान और मोह में डूबा हुआ है, तमोगुण और मलिन-गुण का पराभव हो चुका है और रजोगुण और तमोगुण ही प्रधान हो गये हैं । अतः यह महामोह बहुत अधिक उद्दीर्ण हो गया है और लौकिक व्यक्तियों के लिये यह
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एक बहुत बड़ा वनवन है। उनकी केवल एक यही कामना थी कि जैसे भी हो सके यह अज्ञानान्धकार में डूबा हुआ विश्व निस्तार प्राप्त कर ले और मोह-महोदधि से बाहर निकल सके। इसी मन्तव्य की पूर्ति के लिए उन भगवान् ने महाभारत की रचना की। इस रचना के द्वारा उन्होंने तत्त्वज्ञान को ऐसे प्रकाश प्रदान करने की चेष्टा की जो महामोहान्धकार के अपसरण में समर्थ हो। अतः यह कहा ही जा सकता है कि उनका मन्तव्य मोक्ष को ही परम पुरुषार्थ कहना था और शान्तरस को ही वे प्रधान मानकर चले थे। केवल इतना ही नहीं, अपितु उन्होंने यह बात कही भी है। उनके कथन का एक नमूना देखिये :-
तन्त्र का अर्थ है प्रयत्नपूर्वक् सम्पादन किये जानेवाले तत्त्व हैं धर्म, अर्थ और काम तथा उनके सम्पादन के लिये उपयुक्त साधन। ये सब लौकिक तत्त्व हैं, सांसारिक वस्तुयें हैं। और सभी लोग इनके जुटाने को प्रयत्न किया करते हैं। तथाः सभी लोगों के लिये ये वस्तुयें अभिमत होती हैं। संसार इनके उपार्जन तथा संरक्षण के लिये अनेक प्रकारों को अपनाया करता है। किन्तु अन्त में वे समस्त प्रकार और उनके फल धर्म अर्थ और काम सभी कुछ असार सिद्ध हो जाता है तथा ज्ञात होने लगता है कि जैसे इन्द्रजाल में दिखाई गई वस्तुयें मिथ्या होती हैं उसी प्रकार संसार के सभी पदार्थ मिथ्या ही हैं। केवल इतना ही नहीं अपितु मानव आनन्द की कामना लेकर जिन वस्तुओं की ओर दौड़ता है वे अन्त में विपरीत फलदायक अतएव दुःखकारक हो जाती हैं। अतः उनकी स्वरूप चिन्ता से क्या लाभ? जैसे जैसे ये भावनायें जगत् होती हैं और अनुभव मनुष्य के सामने वास्तविकता को प्रस्तुत करता जाता है वैसे ही वैसे विराग उत्पन्न होता जाता है।
‘विराग उत्पन्न होता है’ इन शब्दों से अभिव्यक्त होता है कि तत्त्व ज्ञान से उत्पन्न निर्वेद ही संसार का एक मात्र सत्य है। यह निर्वेद शान्तरस का स्थायी भाव है। इससे अन्य समस्त वस्तुओं की असारता का प्रतिपादन करते हुए निर्वेद को ही महाभारत का प्रधान प्रतिपाद्य बतलाया है। इस प्रकार के बहुत से वाक्य महाभारत में आये हैं। इन सबसे यही सिद्ध होता है कि महाभारत में जितने भी रस आये हैं चाहे वे वीर हों चाहे करुण वे सब शान्तरस के ही पोषक हैं और शान्तरस के ही अङ्ग हैं, अङ्गी शान्तरस हो है। इसी प्रकार धर्म, अर्थ इत्यादि जितने भी पुरुषार्थ प्रतिपादित किये गये हैं वे सत्र मोक्षरूप पुरुषार्थ के ही अङ्ग हैं और उसी के पोषक हैं, अङ्गी मोक्ष नामक पुरुषार्थ ही है।
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पारमार्थिकान्तस्तत्त्वानपेक्षया शरीरस्येवाऽऽभूतस्य रसस्य पुरुषार्थस्य च स्वप्राधान्येन चारुत्वमप्यविरुद्धम् । नतु महाभारते यावान् विवक्ष्याविषयः सोऽनुक्रमण्यां सर्वे एवानुक्रान्तो न चैतत्तत्र दृश्यते, प्रत्युत सर्वपुरुषार्थप्रबोधहेतुत्वं सर्वरससङ्भैतत्वं च महाभारतस्य तस्मिन्नुद्देहे स्वशब्दनिवेदितत्वेन प्रतोयत-सत्यं शान्तस्यैव रसस्याऽऽदित्वं महाभारते मोक्षस्य च सर्वपुरुषार्थेभ्यः प्राधान्यमित्येतत् स्वशब्दाभिधेयत्वेनानुक्रमण्यां दर्शितम्, दर्शितं तु व्यङ्ग्यत्वेन—
अनु० पारमार्धिक अन्तस्तत्व की अपेक्षा न करते हुये अङ्भूत शरीर के समान रस का और पुरुषार्थ का अपने प्राधान्य के द्वारा चारुत्व विरुद्ध नहीं है ।
( प्रश्न ) महाभारत में जितना विवक्षा का विषय है वह अनुक्रमणी में सभी अनुक्रान्त किया गया है; यह तो वहाँ नहीं ही देखा जाता; इसके प्रतिकूल महाभारत का सब पुरुषार्थों के प्रबोध का हेतुत्व और सर्वरससङ्भैतत्व उस उद्देष में स्वशब्दनिवेदितत्व के रूप में प्रतीत होता है । यहाँ कहा जा रहा है—सच ही है कि शान्त रस का ही आदित्व और मोक्ष का ही समस्त पुरुषार्थों में प्रधानत्व यह स्वशब्दाभिधेय के रूप में अनुक्रमणी के द्वारा नहीं दिखलाया गया है; व्यङ्ग्य के द्वारा तो दिखलाया गया है :
नतु श्रृङ्गारवीरादिचमत्कारोऽपि तत्र मातीयाशब्दयाह—पारमार्थिकेति । मोगामिनिवेशिनां लोकवासनाविष्ठानमङ्घ्रूभूतेऽपि रसे तथाभिमानः, यथा शरीरेऽप्रमातुः स्वाभिमानः प्रमातुरङ्गायतनमात्रेऽपि ।
लोचन
निस्सन्देह श्रृङ्गार वीर इत्यादि का चमत्कार भी वहाँ शोभित होता है यह शंका करके कहते हैं—‘पारमार्थिक’ यह । भोग में अभिनिवेश रखनेवाले लोकवासनाओं में आविष्ट लोगों का अङ्भूत भी रस में वैसा अभिमान होता है जैसा प्रमाता के भोगायतन मात्र शरीर में भी प्रमाता का प्रमातृत्वाभिमान होता है ।
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इस प्रकार इन कथनों के आधार पर स्पष्ट रूप में सिद्ध हो जाता है कि मुनि की इच्छा यान्तरस और मोक्ष का प्रतिपादन करने की ही है और यही महाभारत का तात्पर्य है । रसों का अङ्घाङ्ज्ञभाव तो हो ही सकता है । इसका तो प्रतिपादन पहले ही किया जा चुका है । (दे० उ० ३ का० २० ) बहुत से विचारक महाभारत में कई दूसरे अङ्गों का प्रतिपादन करते हैं । वस्तुतः महाभारत में कई दूसरे रस भी पर्याप्त विस्तार के साथ आये हैं ।
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भगवान् वासुदेवश्च कीर्त्यतेऽत्र सनातनः' इत्यस्मिन् वाक्ये । अननेत् ह्यमरथो व्यङ्ग्ययत्नेन विवक्षितो यदत्र महाभारते पाण्डवादिचरितं यत्कीर्त्यते तत्सर्वमवसानविरसमविद्याप्रपञ्चरूपपञ्च, परमार्थसत्स्वरूपस्त भगवान् वासुदेवोऽत्र कीर्त्यते । तस्मात्साहित्येषु परमोत्तमेषु भावनतिभवन भावितचेतसः, मा भूत् विभूतिषु निस्सारासु रागिणो गुणेषु वा नयविनयपराक्रमादिष्वमीषु केवलेषु केषुचिस्सर्वात्मना प्रीतिनिविष्टधियोः । तथा चाग्रे पश्यत् हीत्थं शब्दः । एतद्विधमेवार्थे गर्भीकृतं सन्दर्शयन्तोडनन्तरश्लोका: लद्यन्ते— 'सहि सत्यम्' इत्यादयः ।
इस वाक्य में । इससे यह अर्थ व्यङ्ग्यार्थ के रूप में कहना अभीष्ट है कि यहाँ पर महाभारत में जो पाण्डव आदि चरित कीर्तित किया जा रहा है वह सत्र अवसान में विरस है और अविद्याप्रपञ्चरूप है; परमार्थ सत्स्वरूप तो भगवान् वासुदेव यहाँ कीर्तित किये जा रहे हैं । इससे उन परमेश्वर भगवान् में हो भावित चित्तवाले बनो, निस्सार विभूतियों में रागी न बनो और न नय, विनय, पराक्रम इत्यादि केवल कुछ गुणों में पूर्ण आत्मा से आग्रहयुक्त बुद्धिवाले बनो । उसी प्रकार आगे अनुवहीत 'च' शब्द स्पष्ट ही अवभासित होता है । इस प्रकार के गर्भित अर्थ को दिखलाते हुये वाद के श्लोक देखे जाते हैं—'स हि सत्यम्' इत्यादि ।
लोचन केवलेऽत्र निति । परमेशर्मक्त्युपकरणेषु तु न दोष इत्यर्थः । विभूतिषु रागिणो गुणेषु च निविष्टधियो मातृतेतिसम्वन्धः । अग्र इति । अनुवमण्यनन्तरं यो भारतग्रन्थस्तत्रेत्यर्थः ।
केवलेऽत्र निति । परमेशर्मक्त्युपकरणेषु तु न दोष इत्यर्थः । विभूतिषु रागिणो गुणेषु च निविष्टधियो मातृतेतिसम्वन्धः । अग्र इति । अनुवमण्यनन्तरं यो भारतग्रन्थस्तत्रेत्यर्थः ।
केवलों में' यह । अर्थात् परमेश्वर की भक्ति के उपकरणों में तो दोष नहीं है । सम्बन्ध यह है—विभूतियों में रागी और गुणों में निविष्ट बुद्धिवाले न होओ' । 'आगे' यह । अर्थात् अनुक्रमण के बाद जो भारत ग्रन्थ है वहाँ ।
शृङ्गार है, कहीं वीर । किन्तु ये शव रस शान्तरस के ही पोषक हैं। किन्तु जो लोग महाभारत के वास्तविक अर्थ को नहीं समझते अथवा उस ओर ध्यान नहीं देते वे कहने लगते हैं कि महाभारत में अन्य रसों की प्रधानता है । इसी प्रकार महाभारत में धर्म, अर्थ और काम का भी विस्तार देखकर वे लोग भ्रम में
शृङ्गार है, कहीं वीर । किन्तु ये शव रस शान्तरस के ही पोषक हैं। किन्तु जो लोग महाभारत के वास्तविक अर्थ को नहीं समझते अथवा उस ओर ध्यान नहीं देते वे कहने लगते हैं कि महाभारत में अन्य रसों की प्रधानता है । इसी प्रकार महाभारत में धर्म, अर्थ और काम का भी विस्तार देखकर वे लोग भ्रम में
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भगवान् वासुदेवश्चैवत्यतेडत्र सनातनः । सहि सत्यमृतं चैव पवित्रं पुण्यमेव च ॥ शाश्वतं परमं ब्रह्म ध्रुवं ज्योतिः सनातनम् । यस्मि दिव्यानि कर्माणि कथयन्ति मनीषिणः ॥
पड़ जाते हैं और यह नहीं समझ पाते कि ये सब धर्म अर्थ और काम वस्तुतः मोक्ष के ही साधन होकर आये हैं। इन लोगों की यही दशा है जैसे जो लोग सारभूत तत्व आत्मा को नहीं जान पाते और शरीर को ही अनेक क्रियाएँ करते हुये देखते हैं वे क्रियाकलाप में शरीर की ही प्रधानता बतलाने लगते हैं। शरीर और कुछ नहीं आत्मा का भोगायतन ही है। इसमें रहकर आत्मा अपने कमों का भोग किया करता है। किन्तु जब प्रमाता अपने स्वरूप को नहीं जान पाता तब वह शरीर को ही प्रमाता मानने लगता है। इसी प्रकार जिन लोगों का आग्रह ही सांसारिक वस्तुओं का उपयोग करना है और जिनमें लोकवासनायें आविष्ट हो चुकी हैं वे अज्ञभूत रस को ही अंगी मान बैठते हैं।
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( इसमें सनातन वासुदेव का कीर्तन किया गया है, वे निस्सरदेह सत्य हैं, मृत हैं, पवित्र हैं, पुण्य हैं, शाश्वत परब्रह्म हैं, सनातन अटल प्रकाश हैं जिसके दिव्य कर्मों का मनीषीगण वर्णन करते हैं । )
सनातन का अर्थ है सदा रहनेवाले, आदि मध्यान्त रहित और भगवान का अर्थ है परम ऐश्वर्यशाली जिनमें अचिन्त्य तथा अद्भुत शक्ति विद्यमान है। यदि देखा जाय तो ज्ञात होगा कि महाभारत का प्रधान प्रतिपाद्य वासुदेव कृष्ण का चरित्र नहीं अपितु पाण्डवचरित्र है । किन्तु उपक्रम में कहा गया है कि इस महाग्रन्थ में भगवान वासुदेव का कीर्तन है । इससे सिद्ध होता है कि पाण्डवादिकों के जिस चरित्र को विस्तार दिया गया है वह भगवान्कीर्तन का ही एक अङ्ग है । इससे व्यञ्जना निकलती है कि पाण्डवादिकों का जो चरित्र महाभारत में आया है उस सबका अवसान विरसता तथा नाश में ही होता है । अतः विश्व का जितना भी प्रपञ्च है वह सर्व अशाश्वत का ही विलास है । इस अभिधान्विलास को मुख्य मानकर जो भी प्रवृत्त होता है वह कितना ही महान क्यों न हो पाण्डवों के समान अन्त में विरसता में ही समाप्त हो जाता है । इस विश्व का वास्तविक वासुदेव ही हैं और उन्हीं का कीर्तन इस ग्रन्थ में प्रतिपाद्य है । अतएव अखण्ड दैताद्वैतग्रूप संसार के उदय पालन और लय के करनेवाले भगवान कृष्ण के प्रति ही अपने चित्तों में भावना भरो, जो सांसारिक तुच्छ विभूतियां हैं, जिनका पर्यवसान विरसता में ही होता है उनके रागी मत बनो । ये जितने भी सांसारिक गुण हैं जैसे नीति, विनय, पराक्रम इत्यादि यदि उनका प्रयोजन केवल सांसारिक विभूतियां उपार्जित करना ही है तो उन्हें भी किसी सीमा तक संग्रहित होना बुरा नहीं है किन्तु अपनी पूरी आत्मा से उन्हीं में अपनी बुद्धि लगा देना ठीक नहीं है । हाँ यदि इन गुणों का प्रयोजन भगवत्सान्निध्य प्राप्त करना है और ये गुणभक्ति साधना में सहायक होते हैं तो कोई बुराई नहीं तब तो इन गुणों में आसक्त होना ही चाहिये । 'भगवान वासुदेवश्च' में 'च' शब्द विशेष व्यञ्ज्यार्थ को द्योतित करने के लिए प्रयुक्त किया गया है । इससे यह व्यञ्जना निकलती है कि इस महाभारत ग्रन्थ में संसार की अधोगति और भगवत्तत्व की ससारता का प्रतिपादन किया गया है इसे समझने की चेष्टा करो । यह व्यञ्जना इसमें स्पष्ट ही अभिव्यक्त होती है । अग्निम ग्रन्थ में इसी व्यञ्ज्यार्थ को दिखलाने के लिए श्लोक लिखे गये हैं जो 'भगवान वासुदेवश्र कीर्त्यते ऽत्र सनातनः' के विल्कुल बाद में आते हैं और जिनका प्रारम्भ 'सहिसत्यम्' इत्यादि से होता है । यहाँ पर 'तथा चाग्रे' का अर्थ करते हुये लोचनकार ने लिखा है कि 'अग्रिम भाग में' का आशय है
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अयं च निगूढरमणीयोडर्थो महाभारतावसानेऽहरिवंशवर्णननेन समाप्तिं विदृधतता तेनैव कविवेधसा कृष्णद्वैपायनेन सम्यक् स्फुटीकृतः । अननेन चार्थेन संसारातीते तत्त्वान्तरे भक्त्यतिशयं प्रवर्तयतता सकल एव सांसारिको व्यवहारः पूर्वपक्षीकृतो न्यायेन प्रकटीकृतः । तेनात्यन्तीयप्रमितितोऽप्रमेयत्वेन प्राप्त्युपायत्वेन तत्त्वभूतित्वेनैव देवताविशेषणासंन्येषां च । पाण्डवादिचरितवर्णनस्यापि वैराग्यजननतात्पर्योद्वैराग्यस्य च मोक्षमूलत्वान्मोक्षदस्य च भगवत्प्राप्त्युपायत्वेन मुख्यतया गीतादिषु प्रदर्शितत्वात् परब्रह्मप्राप्त्युपायत्वमेव । परम्परया वासुदेवादिसंज्ञाभिधेयत्वेन चापरिमितशक्त्यास्पदं परं ब्रह्म गीतादिप्रदेशान्तरेपु तदभिधानत्वेन लब्धप्रसिद्धिमाथुरप्रादुर्भावांशानुरूपतस्कलस्वरूपं विरिचितं न तु माथुरप्रादुर्भावांश एव, सनातनशब्दविशेपितत्वात् । रामायणादिषु चान्यया संज्ञया भगवन्मूर्त्यन्तरे व्यवहारदर्शनात् । निर्णीतश्चायमर्थः शब्दतत्त्वविद्दिरेव ।
और यह निगूढ रमणीय अर्थ महाभारत के अन्त में हरिवंश वर्णन के द्वारा समासि करते हुये उन्हीं कवियों के ब्रह्मा कृष्ण द्वैपायन ने ही ठीकरूप में स्फुट कर दिया ! और इस अर्थ के द्वारा संसारातीत दूसरे तत्त्व में भक्ति को अधिकता को प्रवर्तित करते हुये ( वेदव्यास के द्वारा ) सभी ही सांसारिक व्यवहार पूर्वपक्ष होने के कारण और विशेष देवताओं तथा दूसरों का उन्हीं की विभूतिरूप होने के कारण देवता, तप, तीर्थ इत्यादि के प्रभाव का अतिशय वर्णन ( किया गया है ) पाण्डवदि चारित वर्णन का भी वैराग्यजनन-तात्पर्य हेने से, वैराग्य के मोक्ष का मूल होने से और मोक्ष के भगवत्प्राप्ति का उपाय होने से मुख्यरूप में गीता इत्यादि में प्रदर्शित होने के कारण परब्रह्म की प्राप्ति का उपायत्व ही है । और परम्परा से वासुदेव इत्यादि की संज्ञा से अभिधेय होने के कारण अपरिमित शक्तिका आस्पद परब्रह्म गीता इत्यादि दूसरे प्रदेशों में उसी नाम से प्रसिद्धि को प्राप्त करनेवाला मथुरा में प्रादुर्भाव से अनुरूप सभी का स्वरूप कहना अभीष्ट है केवल मथुरा में प्रादुर्भाव का अंश ही नहीं, क्योंकि इसके विशेषण के रूप में सनातन शब्द का प्रयोग किया गया है। रामायण इत्यादि में इस संज्ञा से भगवान् की दूसरी मूर्ति में व्यवहार देखा जाता है । इस अर्थ का निर्णय शब्दतत्त्वज्ञों ने ही कर दिया है ।
ननु वासुदेवादिपद्य वासुदेव इत्युच्यते, न परमेश्वरः परमात्मा महादेव इत्याश्रयाह--वासुदेवादि संज्ञाभिधेयत्वेनैति।
( प्रश्न ) वसुदेव का अपत्य वासुदेव यह कहा जाता है, परमेश्वर परमात्मा महादेव नहीं यह रीति करके कहते हैं—‘वासुदेवादिसंज्ञाभिधेयत्व’ के द्वारा यह ।
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‘बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते । वासुदेवः सर्वम्’ । इत्यादौ अंशिरूपमेतत्संज्ञाभिधेयमितिनिर्णीतं तात्पर्यम् । निर्णीताश्रयति । शब्दो हि नित्या एव सन्तोदनन्तरं काकतालीयवशात्तथा सङ्गच्छत इत्युक्तम्—ऋष्यशृङ्कवृष्णिकुरुभयश्रयेत्यत्र ।
लोचन 'बहुत जन्मों के अन्त में ज्ञानवान मुझे ‘वासुदेव सभी है’ इस रूप में प्राप्त होता है । इत्यादि में यह संज्ञाभिधेय अंश रूप में है यह निर्णीत तात्पर्य है । शब्द, नित्य होते हुये निस्सन्देह बाद में काकतालीय न्याय से वैसे सङ्केतित किये गये हैं यह ‘ऋष्यशृङ्कवृष्णिकुरुभयश्रयेत्यत्र’ इस सूत्र में कहा गया है ।
तारावती 'अनुक्रमणी समाप्त कर लेने के बाद जो महाभारत ग्रन्थ का अगला प्रकरण प्रारम्भ होता है वहाँ पर' । किन्तु वक्तिकार का यह आशय प्रतीत नहीं होता, क्योंकि एक तो 'स हि सत्यम्' इत्यादि श्लोक-खण्ड का उद्धरण दिया गया है जो कि अनुक्रमणी का ही श्लोक है, दूसरी बात यह है कि 'अनन्तरश्लोका:' लिखा गया है जिसका अर्थ है 'भगवन्तं वासुदेवाख्यं कीर्तयिष्यामः' के तत्काल बाद में आनेवाले श्लोकों का संग्रह । अतः यहाँ पर अनुक्रमणी के श्लोकों से ही तात्पर्य है । वाद के प्रकरण के श्लोकों से नहीं ।)
अनुक्रमणी में जो कुछ कहा गया है वह सर्वथा वाच्य है और इसीलिये प्रकट है । अतएव उसमें सौन्दर्य नहीं है । किन्तु उसका यह ध्वान्त की अज्ञीरूपता और मोक्ष के परमपुरुषार्थता का अर्थ निगूढ़ रूप में व्यक्त किया गया है, अतः उसमें रमणीयता आ गई है । महाकवि वेदव्यास कवियों के विधाता हैं । उनके मूर्धन्य प्रवन्ध महाभारत को भुवनोपजीव्य कहा जाता है और यह अनिवार्य माना जाता है कि कविता करने में पूर्णता प्राप्त करने के लिये महाभारत का आश्रय लिया जाय । इसीलिये रमणीयता-सम्पादन के उद्देश्य से ही उन्होंने इस अर्थ को प्रच्छन्न रूप में अभिव्यक्त किया है ।
किन्तु इसे उन्होंने सर्वथा प्रच्छन्न रखा भी नहीं है । महाभारत के परिशिष्ट के रूप में हरिवंश पुराण जोड़ा गया है और उसी से महाभारत की समासि*की गई है । हरिवंश में कृष्ण की लोकोत्तर लीलायें वर्णित की गईं हैं । भगवद्गुणानुवाद से ग्रन्थ का समाहत करना ही इस बात का सबसे बड़ा प्रमाण है कि ग्रन्थ का उद्देश्य भगवद्गुणानुवाद का प्रकथन करना ही है । हरिवंश पुराण का जो भी अर्थ है उस से पाठक की मनोवृत्ति लौकिक तत्व से उदासीन होकर परम सत्ता परमात्मा में ही लीन हो जाती है और उसी ओर पाठक की आंतरिक शक्ति प्रवाहित हो जाती है । इसने महाभारत के मुख्य भाग में जो कुछ सांसारिक व्यवहार वर्णित किया गया है वह पूर्वपक्ष ही सिद्ध होता है ।
चारकारों की यह सामान्य परम्परा है कि वे पहले पूर्वपक्ष को विस्तारपूर्वक दिख-
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यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा ।
अन्य देवताओं की आराधना को भी गीता में भगवदाराधन ही का संग्रह कहा गया है ।
येडप्यनदेवताभक्का: यजन्ते श्रद्धयान्विता: । तेऽपि मामेव कौन्तेय यजन्त्यविधिपूर्वकम् ॥
येडप्यनदेवताभक्का: यजन्ते श्रद्धयान्विता: । तेऽपि मामेव कौन्तेय यजन्त्यविधिपूर्वकम् ॥
इतना ही नहीं मुख्य पाण्डवचरित इत्यादि का तात्पर्य वैराग्यजनन ही है जैसा कि पहले बतलाया जा चुका है, वैराग्य मोक्ष का मूल है और मोक्ष भगवत्प्राप्ति का उपाय है । गीता इत्यादि प्रकरणों में यही दिखलाया गया है ।
गीता में शरीरादियों को अनित्यव् तथा शरीरों को नित्य कहकर ज्ञानाग्नि के द्वारा कर्मों को भस्मकर भगवत्सायुज्य प्राप्त करने का उद्देश्य दिया गया है । यहाँ पर यह कहना ठीक नहीं है कि मोक्ष तो भगवत्प्राप्ति रूप ही होता है, अतः मोक्ष को भगवत्प्राप्ति का उपाय बताने का आशय यही है कि मोक्ष भगवत्प्राप्ति रूप ही होता है । मोक्ष एक व्यापार है और भगवत्प्राप्ति फल । व्यापार और फल को कभी एक नहीं बतलाया जा सकता ।
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( प्रश्न ) उद्देश्य वाक्य में तो वासुदेव के कीर्तन करने की बात कही गई है-‘भगवान् वासुदेवो हि कीर्त्यतेऽत्र सनातनः ।’ वासुदेव का अर्थ है वसुदेव का पुत्र । वसुदेव यदुवंशी थे उनसे मथुरा में कृष्ण ने जन्म लिया था । यहाँ पर उनके ही विषय में कहा गया है कि भगवान् वासुदेव का गुणानुवाद किया जा रहा है । वासुदेव शब्द से अपने यह कैसे अर्थ निकाल लिया कि परब्रह्म का कीर्तन किया जा रहा है ? ( उत्तर ) ‘वासुदेव’ यह संज्ञा बहुत पुरानी है, केवल मथुरा में उत्पन्न हुये व्यक्तिविशेष का ही नाम नहीं है । (‘वसु’ शब्द ‘वास्’ धातु से औणादिक उण् प्रत्यय होकर बनता है जिसका अर्थ होता है आत्मरूप में समस्त जगत् में निवास करनेवाली व्यापक सत्ता । उसी का कृदर्थक दिव् धातु से निष्पन्न देव शब्द से समास हो जाता है । इस प्रकार ‘वासुदेव’ शब्द का अर्थ हो जाता है समस्त विश्व में व्यापक सत्ता जो कि लीलामयता से युक्त है । वासुदेव शब्द के इस अभिधेयार्थ की ओर विष्णुपुराण में इस प्रकार निर्देश किया गया है :-
‘वसुस्सर्वनिवासक्च विश्वानि सर्वलोमसु । वासुदेवस्ततो वेधो बृहत्वाद्दृश्नुरुश्यते ॥’ स्वयं महाभारत में इस अर्थ की ओर संकेत मिलता है :- ‘वसनात् सर्वभूतानां वसुदेवयोनितः । तस्मय देवः परं ब्रह्म वासुदेव इतीरितः ॥’
गीता में लिखा है कि अनेक जन्मों की साधना के बाद हो कोई विरला ज्ञानी मेरे इस तत्व को जान पाता है कि यह सारा विश्व वासुदेव ही है । जिसका इस प्रकार का ज्ञान हो गया हो उसे महात्मा का मिलना बड़ा ही कठिन है । ( यही भाव और भी पुराणों में पाया जाता है । उदाहरण के लिये श्रीमद्भागवत के प्रथम स्कन्ध में लिखा है कि ‘वेदा वासुदेवपरक ही हैं, यज्ञ वासुदेवपरक ही हैं, योग वासुदेवपरक ही हैं क्रियायें वसुदेवपरक हैं, ज्ञान, तप, धर्म और गति सब कुछ वासुदेवपरक ही है । इन्हीं विभु वासुदेव भगवान् ने जो स्वयं गुणरहित हैं अपनी सदसद्रूपिणी गुणमयी आत्ममाया के द्वारा इस विश्व की रचना की :-
‘वासुदेवपरा वेदा वासुदेवपरा मखाः । वासुदेवपरा योगा वासुदेवपरा: क्रियाः ॥ वासुदेवपर्ं ज्ञानं वासुदेवपर्ं तपः । वासुदेवपरो धर्मो वासुदेवपरा गति: ॥ स एषेदं ससर्जाग्रे भगवानात्ममायया । सदसद्रूपया चासौ गुणमय्याड्गुणो विभुः ॥’
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तदेवमनुक्रमणीनिर्दिष्टेन वाक्येन भगवद्रतिरेकिणः सर्वेस्यान्यस्यानित्यतां प्रकाशयता मोक्षलक्षण एवैकः परः पुरुषार्थः शास्त्रनये, काव्यनये च तृष्णाक्षयपरिपोषलक्षणः शान्तो रसो महाभारतस्याङ्गित्येन विवक्षित इति सुप्रतिपादितम्। अत्यन्तसारभूतव्यङ्ग्यार्थो हि काव्येषु परमार्थदर्शिभिरदर्शितो न तु वाच्यतयेति सारभूता ह्यर्थः स्वशब्दानभिधेयत्वेन प्रकाशितः सुतरामेव शोभामावहति। प्रसिद्धविद्वेयमस्त्येव विदग्धविद्वत्परिषत्मु यदभिमतततं वस्तु व्यज्ज्यतवेन प्रकाशयते न साक्षाच्छब्दवाच्यतवेन।
वह इस प्रकार भगवान् से भिन्न सभी अन्य पदार्थों की अनित्यता का प्रतिपादन करनेवाले अनुक्रमणीनिर्दिष्ट वाक्य से शास्त्र की नीति में मोक्षरूप एक ही परम पुरुषार्थ और काव्य की नीति में महाभारत का अङ्गीरस तृष्णाक्षय सुखपरिपोषरूप शान्तरस भलीभाँति प्रतिपादित कर दिया गया। इस अर्थ के अत्यन्त साररूप होने के कारण यह व्यङ्ग्यार्थरूप में ही प्रतिपादित किया गया है; वाच्य के रूप में नहीं। निस्सन्देह सारभूत अर्थ अपने अनभिधेय रूप में प्रकाशित किये जाने पर भलीभाँति शोभा को धारण करता है। विदग्ध विद्वानों की परिषद् में यह प्रसिद्धि है ही कि अधिक अभिमत वस्तु व्यङ्ग्य के रूप में ही प्रकाशित की जाती है साक्षात् शब्दवाच्यत्व के रूप में नहीं।
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इन सभी प्रकरणों में वासुदेव का परब्रह्म सत्ता के लिये प्रयोग किया है। इसके अतिरिक्त वसुदेव के पुत्र के लिये ही नहीं अपितु वासुदेव शब्द का प्रयोग भगवान् के दूसरे अवतारों के लिये भी होता है। (जैसे निम्नलिखित श्लोक में भगवान् राम के लिये वासुदेव शब्द का प्रयोग हुआ है :- यस्त्वयं वसुधा कृत्स्ना वासुदेवस्य धीमतः। महर्षि माधवस्यैव स एव भगवान् प्रभुः।।) वैद्यशास्त्रों में भी स्वर्य ही इस तत्व का सङ्केत मिलता है कि वासुदेव शब्द व्यापक सत्ता के लिये आनेवाला नित्य शब्द है ‘श्रृण्धकवृष्णिकुरुभ्यश्र’ इस सूत्र की व्याख्या करते हुये कैयट ने लिखा है—‘शब्द तो नित्य होते हैं उनका अन्वाख्यान अनित्य अन्वक वंश इत्यादि के आश्रय से कैसे उचित हो सकता है। (उत्तर) त्रिपुरुषानुक नाम करना चाहिये इस नियम से अन्वक शब्द इत्यादि भी नित्य हैं।’ काशिकाकार ने भी यही लिखा है कि शब्द नित्य ही होते हैं, जब नामकरण में उनका उपादान होता है तब वह काकतालीय न्याय से ही समझा जाना चाहिये। आशय यह है कि शब्द संयोगवश ही नाम से मेल खा जाते हैं
इन सभी प्रकरणों में वासुदेव का परब्रह्म सत्ता के लिये प्रयोग किया है। इसके अतिरिक्त वसुदेव के पुत्र के लिये ही नहीं अपितु वासुदेव शब्द का प्रयोग भगवान् के दूसरे अवतारों के लिये भी होता है। (जैसे निम्नलिखित श्लोक में भगवान् राम के लिये वासुदेव शब्द का प्रयोग हुआ है :- यस्त्वयं वसुधा कृत्स्ना वासुदेवस्य धीमतः। महर्षि माधवस्यैव स एव भगवान् प्रभुः।।) वैद्यशास्त्रों में भी स्वर्य ही इस तत्व का सङ्केत मिलता है कि वासुदेव शब्द व्यापक सत्ता के लिये आनेवाला नित्य शब्द है ‘श्रृण्धकवृष्णिकुरुभ्यश्र’ इस सूत्र की व्याख्या करते हुये कैयट ने लिखा है—‘शब्द तो नित्य होते हैं उनका अन्वाख्यान अनित्य अन्वक वंश इत्यादि के आश्रय से कैसे उचित हो सकता है। (उत्तर) त्रिपुरुषानुक नाम करना चाहिये इस नियम से अन्वक शब्द इत्यादि भी नित्य हैं।’ काशिकाकार ने भी यही लिखा है कि शब्द नित्य ही होते हैं, जब नामकरण में उनका उपादान होता है तब वह काकतालीय न्याय से ही समझा जाना चाहिये। आशय यह है कि शब्द संयोगवश ही नाम से मेल खा जाते हैं
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शास्त्रनय इति । तत्रास्वादयोगामावे पुरुषपेणाध्यंत इत्थमेव व्यपदेशः साधारः, चमत्कारयोगे तु रसव्यपदेश इति भावः । एवं च ग्रन्थकारेण तत्त्वालोके विततथ्योक्तमिह त्वस्य न मुख्योदवसर इति नास्माभिरंदंशितम् । सुतरामेवेति यदुक्तं तत्र हेतुमाह—निर्देशो हि नामपदार्थः । यत इयं लौकीकी प्रसिद्धिरनादिसत्ता भगवान् दृश्यास्प्रभृतिभि:नामप्येवमेवास्वशब्दाभिधाने आशयः । अन्यथा हि क्रियाकारकसम्बन्धादौ 'नारायणं नमस्कृत्ये'त्यादि शब्दार्थनिरुपणं च तथाविध पुत तस्य भगवान् आशय इत्यत्र किं प्रमाणमिति भावः । विदग्धविदग्धग्रहणेन न काव्यनये शास्त्रनय इति चानुसृतम् ।
'शास्त्रनीति में' यह । भाव यह है कि वहाँ आस्वाद के अभाव में पुरुष के द्वारा अर्थित किया जाता है यही नामकरण आदरपूर्ण है, चमत्कार के योग में तो रस का नामकरण है । और यह ग्रन्थकार ने तत्त्वालोक में विस्तारपूर्वक बतलाया है, यहाँ तो उसका मुख्य अवतसर नहीं है । इसलिये हमलोगों ने नहीं दिखलाया । 'भलीभाँति ही' यह जो कहा उसमें हेतु बतलाते हैं—'और प्रसिद्धि' यह । 'च' शब्द क्योंकि के अर्थ में है । क्योंकि यह लौकिक प्रसिद्धि अनादि है उससे भगवान् व्यास इत्यादि का भी अपने शब्द के द्वारा न कहने में यही आशय है, अन्यथा क्रिया-कारक सम्बन्ध इत्यादि में और 'नारायणं नमस्कृत्य' इत्यादि शब्दार्थनिरुपण में उस प्रकार का ही उन भगवान् का आशय है इसमें क्या प्रमाण है ? यह भाव है । 'विदग्ध विदग्ध' इस शब्द से काव्य की नीति में और शास्त्र की नीति में इन दोनोंका अनुसरण कर लिया गया ।
तारावती वस्तुतः तो शब्द नित्य ही होते हैं । इस प्रकार वासुदेव शब्द नित्य ही है, सांयोगिक रूप में वसुदेव के पुत्र के रूप में भी उसकी व्युत्पत्ति हो गई है । इसका आशय यह नहीं है कि मथुरा में जन्म लेनेवाले वसुदेव के पुत्र को ही वासुदेव कहते हैं । एक बात और है—यहाँ पर वासुदेव के लिये 'सनातनः' यह विशेषण दिया गया है । इस से भी यही सिद्ध होता है कि महाभारत का मुख्य प्रतिपाद्य भगवद्वक्ति ही है ।
ऊपर जो कुछ कहा गया है उससे यही निष्कर्ष निकलता है कि चाहे हम शास्त्र की दृष्टि से विचार करें चाहे काव्य की दृष्टि से, दोनों दशाओं में यही बात सिद्ध होगी । शास्त्र और काव्य इन दोनों के हृदिकोंण भिन्न-भिन्न होते हैं । शास्त्र ऐसे व्यक्तियों के लिये लिखा जाता है जो वस्तु में आनन्द तो लेते नहीं, वे उसे
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समझना चाहते हैं, ये लोग विद्वान् होते हैं और विषयों की आस्वादनीयता से तटस्थ रहकर निःलित बुद्धि से वस्तुतत्त्व को जानने की चेष्टा किया करते हैं। यदि उनकी दृष्टि से महाभारत के उद्देश्य पर विचार किया जाय तो यहीं निर्णय करना होगा कि महाभारत में किस पुरुषार्थ का निरूपण किया गया है।पुरुषार्थ शब्द का अर्थ है पुरुष के द्वारा प्रार्थित की जानेवाली वस्तु। अर्थात् उनकी दृष्टि से महाभारत में यही देखा जावेगा कि महाभारत में किस तत्व को पुरुष के लिये प्रधान रूप में प्रार्थनीय माना गया है और इसका विचार करने पर निष्कर्ष यही निकलेगा कि महाभारत में परम पुरुषार्थ मोक्ष ही माना गया है। दूसरे लोग वे होते हैं जो वस्तु में आस्वाद का अन्वेषण करते हैं; ऐसे लोग काव्यरसिक कहे जा सकते हैं। उनके हृदयकोण से महाभारत में अङ्गीरस पर विचार किया जावेगा उनके मत से विचार करने पर यही सिद्ध होगा कि शान्तरस ही महाभारत का अङ्गीरस है जिसका परिपोषक स्थायीभाव तृष्णानाश सुख होता है। यहाँ सर्वत्र यही पर भली-भाँति सिद्ध किया जा चुका। लोचनकार ने इस प्रकरण पर टिप्पणी करते हुये लिखा है कि ग्रन्थकार ने तत्वालोक में ही यह बात भली भाँति समझाकर विस्तारपूर्वक कह दी है। अतः हमें इस विषय में अब कुछ और नहीं कहना है।
यह एक सामान्य नियम है कि जो बात प्रधान होती है और जो सारभूत तत्व होता है उसका प्रकथन कभी भी वाच्य वृत्तियों में नहीं किया जाता। यदि वह बात साफ-साफ कह दी जाती है तो उसमें कोई सुन्दरता नहीं आती। इसके प्रतिकूल जो बात व्यञ्जनावृत्ति से कही जाती है वह कुछ छिपाकर कही जाने के कारण उसी प्रकार अलौकिक शोभा को धारण कर लेती है जिस प्रकार कमलकलश कुछ प्रच्छन्न रूपमें ही प्रकट होकर शोभा को धारण करते हैं। इसका कारण यह है कि सहृदयों और विद्वानों दोनों में यह बात प्रसिद्ध ही है कि जो वस्तु अधिक अभीष्ट हो उसे व्यङ्ग्य के रूप में ही प्रकाशित करना चाहिये वाच्य के रूप में नहीं। इसी प्रसिद्धि के आधार पर भगवान् व्यास ने सभी अप्रधान उद्देश्यों का अनुकमणी में वाच्यवृत्ति में उल्लेख किया है और प्रधान उद्देश्य मोक्ष प्राप्ति तथा शान्तरस का उल्लेख व्यङ्ग्य के रूपमें 'भगवान् वासुदेवश् कीर्त्यतेऽत्र सनातनः' इन शब्दों के द्वारा किया है। इन शब्दों की सङ्क्ति में इस लौकिक प्रसिद्धि के आधार पर ही लङ्गन कचाहिये कि अत्यन्त अभीष्ट बात व्यङ्ग्य के द्वारा कही जाती है वाच्य के द्वारा नहीं। सारांश यह है कि यह प्रसिद्धि अनादि है और इस प्रसिद्धि का ज्ञान भगवान् व्यास को भी था। इसीलिये उन्होंने अपना मुख्य प्रयोजन कहने के लिये व्यञ्जना वृत्ति का ही आश्रय लिया। यदि ऐसा न माना
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तस्मात्स्थितमेतत्—अङ्गिभूततरसाधाश्रयेण काव्ये क्रियमाणे नवार्थलाभोभवति वन्धच्छाया च महती सम्पद्यत इति । अत एव च रसानुगुणार्थविशेषोपनिबन्धनलङ्कारान्तरविहितेऽपि छायातिशययोगिनि तस्मिन् हृश्यते । यथा—मुनिजनैः प्रिय योगीन्द्रे महातमा कुम्भसम्भवा । येनैकचुलुके हृष्टौ तौ दिव्यौ मत्स्यकच्छपौ ॥
इससे यह स्थित हुआ—अङ्गिभूत इत्यादि के आश्रय से काव्य किये जाने पर नवीन अर्थ का लाभ होता है और वन्धच्छाया भी बहुत अधिक होती है यह वह । अतएव पूरतर अलङ्कार के अभाव में भी रसानुकूल अर्थविशेष का उपनिबन्धन लक्ष्य में छायातिशयता से युक्त होते हुये देखा जाता है । जैसे:—'कुम्भ-सम्भवा महात्मा योगीन्द्र मुनी की जय हो जिन्होंने एक चुल्लू में उन दो दिव्य मत्स्य और कच्छप को देखा ।'
इत्यादौ । अत्र हृद्यतरसानुगुणमेकचुलुके मत्स्यकच्छपदर्शनं छायातिशयं पुष्णाति । तत्र ह्येकचुलुके सकलजलनिधिसंभृतानांदपि दिव्यमत्स्यकच्छपदर्शनमञ्जणत्वादद्युतरसाङ्गुणतरम् । अञ्जणं हि वस्तु लोकप्रसिद्ध्यादुतमपि नाख्रयकारि भवति ।
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जाय कि भगवान् व्यास ने लौकिक प्रसिद्धि का अनुसरण किया था तो फिर महाभारत का कोई अर्थ ही नहीं हो सकेगा । कौन सी क्रिया है ? उसका कर्ता कौन है ? कर्ता में कौन सी विमति होती है ? उत्तम पुरुप की क्रिया अथवा कर्ता कौन होते हैं ? इत्यादि प्रश्नोंका उत्तर भी लोकप्रसिद्धि के आधार पर ही दिया जा सकता है । इसी प्रकार शब्दों के अर्थ का निर्णय भी लोकप्रसिद्धि के आधार पर ही होता है । 'नारायणं नमस्कृत्य' में नारायण का अर्थ विष्णु और नमः का अर्थ प्रणति है इसका भी निर्णय लोकप्रसिद्धि से ही होता है । यदि लोकप्रसिद्धि को न माना जाय तो महाभारत के किसी भी पद का कोई अर्थ ही न लगाया जा सकेगा । लोकप्रसिद्धि का आधार स्वीकार कर लेने पर यह भी माना ही होगा कि महाभारत के मुख्य मन्तव्य का निर्णय भी लोकप्रसिद्धि के आधार पर ही हो ।
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'रसादिमय पतस्मिन् कवि: स्यातद्वधानवानि'तियदुक्तं तदेव प्रसङ्घागतमारतसम्बन्धनिरूपणानन्तरमुपसंहरति-तस्मातिस्थितमिति । अथ इति । यत एवं स्थितम् अत एवेदमपि यल्लक्ष्ये दृश्यते तदुपपन्नमन्यथा तदनुपपन्नमेव, न च तदनुपपन्नम्, चारुत्वेन प्रतीतः । तस्याश्चितदेव कारणं रसानुरणाथ्वसवैचित्र्यश्रियोः । अलङ्कारान्तराती । अन्तरशब्दो विशेषवाची । यदिवा दिशते उदाहरणे रसवदलङ्कारस्य विद्यमानस्वात्तदपेक्ष्यालङ्कारान्तरशब्दः ।
'इस रसादिमय में कवि सावधान रहे' यह जो कहा गया था, उसका प्रसंगगत भारतसम्बन्ध के निरूपण के बाद उपसंहार करते हैं—'इसलिए यह स्थित है' यह । 'अत:' यह । क्योंकि ऐसी स्थिति है इसीलिये यह भी जो लक्ष्य में देखा जाता है वह उपपन्न है अन्यथा वह अनुपपन्न ही हो, वह अनुपपन्न नहीं ही है क्योंकि उसकी प्रतीति चारुता के रूप में होती है। आशय यह है कि उसका कारण यहाँ है कि उसकी रसानुरणाथता हो । 'अलङ्कारान्तर' यह । अन्तर शब्द विशेष अर्थ का वाचक है। अथवा दिये जाने के लिये अमोष्ट उदाहरण में रसवत् अलङ्कार के विद्यमान होने से उसकी अपेक्षा से अलङ्कारान्तर शब्द का प्रयोग किया गया है।
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आधार पर निर्णय करने से यहीं सिद्ध होता है कि महाभारत में मोक्ष परम पुरुषार्थ माना गया है और उसका अङ्गीरस शान्त है ।
यहाँ पर इस बात का विचार किया जा रहा था कि यद्यपि अनेक प्रकार के वयङ्ग्य-व्यञ्जक भाव सम्भव हैं तथापि कवि को एकमात्र रसादिमय वयङ्गय-व्यञ्जक भाव के प्रति ही जागरूक रहना चाहिये । इसी प्रश्न में महाभारत के अङ्गीरस का प्रश्न आ गया और उस पर भी विस्तारपूर्वक विचार कर लिया गया । किन्तु यह प्रासङ्गिक ही था मुख्य विषय नहीं । मुख्य विषय तो यहाँ पर यही चल रहा है कि यदि काव्य की रचना इस प्रकार की जाती है कि एक अङ्गीरस मान लिया जाय और समस्त कथानक में सभी अवान्तर रस उसी परिवेष में ग्रथित किये जायँ तो रचना सुसम्बद्ध हो जाती है और उसमें एक बड़ी वन्धच्छाया सम्पन्न हो जाती है । यह बात यहाँ पर ठीक रूप में सिद्ध हो गई और उपयुक्त विवेचन से यही निष्कर्ष भी निकल आया । जब हम इस सिद्धान्त को मान लेते हैं तत्र जो कुछ लक्षणग्रन्थों में देखा जाता है वह भी तर्कसङ्गत हो जाता है । यदि हम इसे न मानें तो लक्षणग्रन्थों में देखी हुई बात भी असङ्गत हो जाय । किन्तु वास्तविकता यह है कि लक्षणग्रन्थों में देखी हुई बात असङ्गत होती नहीं । क्योंकि लक्षणग्रन्थों में देखा जाता है कि कवि किसी एक प्रधान रस के परिवेष में ही
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ननु मत्स्यकच्छपदर्शनात्मतीयमानं यदेकचुलुके जलनिधिसन्निधानं तत्तो मुनेः माहात्म्यप्रतिपत्तिरिति न रसानुगुणेनार्थेन छायापोषितेत्याशङ्क्याह—अत्र हीति । नन्वेवं मत्स्यमानं जलनिधिदर्शनमेवाङ्गुतरुणं सदृक्ष्वति रसानुगुणोक्त वाच्योऽर्थ इत्यस्मकांशे कथमिदमुदाहरणमित्याशङ्क्याह—तत्रोक्तम् । गुण्ण हीति । पुनस्तुनिवर्णन निरूपणादिना यत्पिष्टपिष्टत्वादतिनिमित्तं स्वरूपमित्यर्थः।
( प्रश्न ) मत्स्य और कच्छप के दर्शन से प्रतीत होनेवाला जो एक चुल्लु में समुद्र का सन्निधान उससे मुनि के माहात्म्य की प्रतिपत्ति होती है अतः रसानुगुण अर्थ से छाया पोषित नहीं हुए है यह शङ्का करके कहते हैं—‘यहाँ निस्सन्देह’ यह। ( प्रश्न ) इस प्रकार प्रतीत होनेवाला जलनिधिदर्शन ही अङ्गुतरस के अनु- गुण है, इस प्रकार रसनुगुण यहाँ पर वाच्यार्थ है इस अंश में यह उदाहरण कैसे हो सकता है ? यह शङ्का करके कहते हैं—‘वहाँ पर यह । ‘निस्सन्देह क्षुण्ण’ यह । अर्थात् पुनः पुनः वर्णन और निरूपण इत्यादि के द्वारा जो अत्यधिक पिष्ट होने से अत्यन्त निर्मित्त स्वरूपवाला हो गया है ।
समस्त काव्य को गुम्फित कर देता है और ऐसा करने से उसके काव्य में चारुता भी बढ़ जाती है । अतः एक रस के परिवेश में सम्पूर्ण काव्य को आवद्ध कर देना असङ्कत नहीं कहा जा सकता । अतः इस सिद्धान्त को स्वीकार करना ही पड़ेगा । यही कारण है कि अलङ्कार ही काव्य की शोभा का आधायक नहीं है । यहाँ पर मन्तर शब्द का अर्थ है विशेष । अतः इस वाक्य का आशय यह हो जाता है कि काव्यसौन्दर्य का सम्पादन करनेवाला सबसे बड़ा तत्त्व रस ही है।यदि किसी काव्य में कोई विशेष अलङ्कार न भी हो तब भी यदि वस्तु की योजना रस की दृष्टि से कर दी जाय तो काव्य-सौन्दर्य का सम्पादन हो ही जाता है । अथवा यहाँ पर ‘दूसरा’ यह अर्थ भी किया जा सकता है । उस दशा में इस वाक्य की योजना अग्निम उदाहरण ‘मुनिर् जयति…मत्स्यकच्छपौ’ की दृष्टि से करनी होगी । इस दशा में इस वाक्य का आशय यह होगा कि प्रस्तुत पद्य का प्रतिपाद्य मुनिविषयक रतिभाव है । मत्स्य कच्छप का एक चुल्लु में दर्शन अद्भुतरस के अनु गुण होने से अद्भुतरस की निष्पत्ति कर देता है । यह अद्भुतरस प्रधान प्रतिपाद्य मुनिविषयक रतिभाव का अङ्ग होकर रसवत् अलङ्कार हो जाता है । इस प्रकार यहाँ पर एक तो अलङ्कार विद्यमान हो है । अतएव किसी दूसरे अलङ्कार के न होने पर भी वस्तु की रसप्रवण योजना से ही छायाकी अधिकता सम्पन्न हो गई है । उदाहरण का आशय इस प्रकार है ।
समस्त काव्य को गुम्फित कर देता है और ऐसा करने से उसके काव्य में चारुता भी बढ़ जाती है । अतः एक रस के परिवेश में सम्पूर्ण काव्य को आवद्ध कर देना असङ्कत नहीं कहा जा सकता । अतः इस सिद्धान्त को स्वीकार करना ही पड़ेगा । यही कारण है कि अलङ्कार ही काव्य की शोभा का आधायक नहीं है । यहाँ पर मन्तर शब्द का अर्थ है विशेष । अतः इस वाक्य का आशय यह हो जाता है कि काव्यसौन्दर्य का सम्पादन करनेवाला सबसे बड़ा तत्त्व रस ही है।यदि किसी काव्य में कोई विशेष अलङ्कार न भी हो तब भी यदि वस्तु की योजना रस की दृष्टि से कर दी जाय तो काव्य-सौन्दर्य का सम्पादन हो ही जाता है । अथवा यहाँ पर ‘दूसरा’ यह अर्थ भी किया जा सकता है । उस दशा में इस वाक्य की योजना अग्निम उदाहरण ‘मुनिर् जयति…मत्स्यकच्छपौ’ की दृष्टि से करनी होगी । इस दशा में इस वाक्य का आशय यह होगा कि प्रस्तुत पद्य का प्रतिपाद्य मुनिविषयक रतिभाव है । मत्स्य-कच्छप का एक चुल्लु में दर्शन अद्भुतरस के अनु गुण होने से अद्भुतरस की निष्पत्ति कर देता है । यह अद्भुतरस प्रधान प्रतिपाद्य मुनिविषयक रतिभाव का अङ्ग होकर रसवत् अलङ्कार हो जाता है । इस प्रकार यहाँ पर एक तो अलङ्कार विद्यमान हो है । अतएव किसी दूसरे अलङ्कार के न होने पर भी वस्तु की रसप्रवण योजना से ही छायाकी अधिकता सम्पन्न हो गई है । उदाहरण का आशय इस प्रकार है ।
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कुम्भ से उत्पन्न योगिराज महात्मा अगस्त्य की जय हो जिन्होंने उन प्रसिद्ध तथा विचित्र प्रकार के मत्स्य और कच्छप को एक ही अञ्जलि में देखा ।
भगवान् ने प्रलयकाल में मत्स्यावतार लिया था और समुद्रमन्थन के अवसर पर कच्छपावतार । ये दोनों भगवान् के अवतार प्रसिद्ध हैं । 'तौ' इस सर्वनाम से अभिव्यक्त होता है वे मत्स्य और कच्छप असाधारण थे तथा उनको सब कोई जानता है । इसी असाधारणता (लोकातिक्रान्तता) को 'दिव्य' शब्द पुष्ट करता है । ये दोनों अवतार महासागर में ही निवास करते हैं । जब महर्षि अगस्त्य ने समस्त महासागर को एक ही चुल्लु में पी जाना चाहा तो वे दिव्य मत्स्य और कच्छप भी उनके चुल्लु में आ गये । यह महामुनि अगस्त्य की लोकोत्तर शक्ति का निदर्शन है । यहाँ पर तिमि नाम की मछली का भी अर्थ लिया जा सकता है ।
यहाँ पर एक ही चुल्लु में उस प्रकार के अनिवर्चनीय मत्स्य और कच्छप का दर्शन विस्मयाधिक्य का उत्पादक है और इस प्रकार अद्भुत रसास्वादन का प्रवर्तक है । काव्य की सुषमा का आधार यह अद्भुत रसास्वादन हो है ।
यहाँ पर एक प्रश्न यह किया जा सकता है कि छाया की पुष्टि तो मुनि के माहात्म्य से होती है । एक चुल्लु में मत्स्य और कच्छप को देखने से जलधि-पान अभिव्यक्त होता है और उससे मुनि के माहात्म्य की प्रतीति होती है । यह मुनि का माहात्म्य ही काव्य सौन्दर्य में पर्यवसित होता है । फिर यह कैसे कहा गया कि एक चुल्लु में मत्स्य और कच्छप को देखना एक ऐसा वाच्यार्थ है जो अद्भुत रस के अनुकूल पड़ता है उस वाच्यार्थ में ही छाया की अधिकता का पर्यवसान होता है ।
इसका उत्तर यह है कि यद्यपि मुख्यरूप में प्रतीति मुनिविषयक रति की ही होती है । किन्तु उस रति में सौन्दर्य का आधार करनेवाली तो यह उक्ति ही चमत्कारपर्यवसायिनी है ।
(प्रश्न) यहाँ पर मत्स्यकच्छप दर्शन रूप वाच्यार्थ चुल्लु में समुद्र को भर लेने का अभिव्यञ्जक है । यह व्यङ्ग्यार्थ ही अद्भुत रस के अनुप्राण माना जाना चाहिये । यह कहना कैसे ठीक हो सकता है कि यहाँ पर उक्त वाच्यार्थ ही सौन्दर्य का पोषक है !
(उत्तर) सामान্যতया नियम यह है कि जब किसी वस्तु का बार-बार वर्णन कर दिया जाता है और उसका निरूपण भी पर्याप्त मात्रा में हो चुका है तब वह वस्तु भलीभाँति पिस जाती है और लोगों के सामने बार-बार आने से लोग उससे परिचित हो जाते हैं ।
वह वस्तु कितनी ही अद्भुत क्यों न हो किन्तु लोकप्रसिद्धि के कारण फिर वह वस्तु लोगों के हृदयों में आश्चर्य उत्पन्न नहीं करती । (जैसे कितना आश्चर्य जनक है कि विज्ञान के प्रभाव से सैकड़ों मील की दूरी पर बैठे हुये दो व्यक्ति ऐसे ही बातें
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न चाच्चुणं वस्तूपनिबध्यमानमद्भुतरसस्यैवानुरुणं यावद्रसान्तरस्यापि ।
तथा—
सिज्झइ रोमञ्चिझइ वेइ रत्थातुल्लगपडिलग्गो । सोवासो अज्जु णि सुहइ जणासि दालिोो ॥
एतद्वाथार्त्थोद्धाव्यमानाव्या रसप्रतीतिरभिव्यक्तिः, सा त्वां स्पष्टा स्विच्छति रोमाञ्चते वेपते इत्येवं विधार्थोपनतिप्रतीममानान्नागपि नो जायते ।
( अनुः ) उपनिबद्ध किये जाने पर अक्षुण्ण वस्तु अद्भुत रस की ही अनुरुण नहीं होती अपितु दूसरे रस की भी होती है । वह इस प्रकार—
'हे सुभग ? उस ( नायिका ) के जिस पार्श्व से रथ्या में संयुगवश तुम लग गये थे वह इसका पार्श्वं आज भी पसीजता है, रोमाञ्चित होता है और कांपता है ।' भावित किये हुये रस गाथा के अर्थ से जैसी रस की प्रतीति होती है वह प्रतीति 'वह तुम्हें स्पर्श कर पसीजती है, रोमाञ्चित होती है और कांपती है' इस प्रकार के प्रतीयमान अर्थ से बिल्कुल नहीं होती ।
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करते हैं मानों एक कमरे में बैठे हों । किन्तु टेलीफोन इतना सामान्य हो गया है कि आज उसे देखकर लोगों को आश्चर्य नहीं होता ।
इसके मलतबिकूल जो वस्तु अनेकशः परिशीलन के माध्यम से पूर्ण रूप से पिष्ट नहीं जाती वह जन नये नये रूप में सामने आती है तत्र उससे विस्मय की भावना उद्भूत हो जाती है ।
अगस्त्य का समुद्रपान इतना क्षुण हो चुका है कि अव पाठकों के सामने उसका प्रस्तुत करने में उन्हें आश्चर्य नहीं होता । किन्तु एक अंजलि में भगवान के विशाल दो अवतारों का दर्शन वस्तुतः पाठकों के लिए नवीन कल्पना है ।
अतएव इस वस्तु में अद्भुतरस का आस्वादन कराने की अधिक क्षमता है । अधिक कहने का आशय यह है कि समुद्र पान में भी कुछ न कुछ तो आश्चर्य हो ही जाता है । यहाँ पर कोई विशेष अलंकार नहीं है, फिर भी वस्तु की योजना ही इतने सुन्दर ढंग से कर दी गई है कि उसमें अद्भुतरसात्मकता आ जाती है ।
( यहाँ पर रचयित ने भाविक अलंकार का होना बतलाया है । किन्तु भाविक अलंकार वहीं पर होता है जहाँ भूत और भविष्य के अर्थों को वर्तमान में प्रत्यक्ष-करण दिखलाया जाय । किन्तु यहाँ पर भूतकाल में ही प्रत्यक्षीकरण दिखलाया गया है, अतः भाविक अलंकार यहाँ पर नहीं हो सकता । )
ऊपर कहा गया है कि जो बात लोक में भलीभाँति मंज जाती है और सर्व-साधारण में प्रचलित हो जाती है वह बात आश्चर्यजनक नहीं होती किन्तु जिस बात
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बहुतरलक्ष्यव्यापकं चैतदिति दर्शयति—न चेत्यादिना । रध्यायां तुलाग्रेण काकतालीयेन प्रतिलग्नः सामुख्येन स पार्श्वोंड्यापि सुभग तस्य येनास्यतिक्रान्तः । रसप्रतीतिरिति । परस्परहेतुकशृङ्गारप्रतीतिः! अस्यार्थस्य रसानुरणत्वं व्यतिरेकद्वारेण इहद्योत—सा त्वाद्यलत्यादिना॥
और यह बहुत से लक्ष्यों में व्यापक है, यह दिखलाते हैं—‘और नहीं’ इत्यादि के द्वारा । रथ्या में तुलाग्र से अर्थात् काकतालीय से प्रतिलग्न वह ( नायिका ) मुख्यरूप से वह उसका पार्श्व आज भी हे सुभग जिसके अतिक्रान्त हो गये हो । ‘रस प्रतीत’ यह । परस्परहेतुक शृंगार की प्रतीति । इस अर्थ का रसानुरणत्व व्यतिरेक के द्वारा हढ़ करते हैं—‘वह तुम्हें’ इत्यादि के द्वारा ।
तारावती की पूर्ण प्रतिष्ठा लोक में नहीं हो चुकी होती है वही आश्चर्यजनक तथा अद्भुतरसप्रयोजक होती है । यहाँ पर यह भी ध्यान रखना चाहिए कि अक्षुण्ण वस्तु केवल अद्भुत रस की ही प्रयोजक नहीं होती अपितु उससे अन्य रसों की भी पुष्टि होती है । उदाहरण के लिए देखिये अक्षुण्ण ( नवीन ) वस्तु से शृंगार रस की किस प्रकार पुष्टि होती है—
नायिका की कोई दूती नायक से नायिका के प्रणय का निवेदन करते हुये कह रही है :- सिच्छति रोमाञ्चति वेपते रथ्यातुलाग्रप्रतिलग्नः । स पार्श्वोंड्यापि सुभग तस्य येनास्यतिक्रान्तः॥ (छाया)
नायिका की कोई दूती नायक से नायिका के प्रणय का निवेदन करते हुये कह रही है :- सिच्छति रोमाञ्चति वेपते रथ्यातुलाग्रप्रतिलग्नः । स पार्श्वोंड्यापि सुभग तस्य येनास्यतिक्रान्तः॥ (छाया)
‘नम दिन जब तुम उस गली में निकल रहे थे नायिका भी उधर से गईं । न तुमने उससे ठकराने का प्रयत्न किया और न उसने ही । किन्तु संयोगवश उसका एक पार्श्व तुम्हारे शरीर से टकरा गया । तुम सौभाग्यशाली हो कि उसी दिन से उसका वही पार्श्व निरन्तर सात्विक भावों से भरा रहता है, कभी रोमाञ्चित हो जाता है, कभी कांपने लगता है ।
यहाँ पर नायक और नायिका का उभयनिष्ठ प्रेम है, नायक सौभाग्यशाली है और नायिका अनेक सात्विकों से ओत प्रोत है । इस शृंगार के आस्वादन कराने के लिये जिस वस्तु का उपादान किया गया है वह सर्वथा नवीन है। शांकर गली में सायोगिक स्पर्श और उससे केवल उसी पार्श्व का निरन्तर पसीजना इत्यादि न तो कवियों का सामान्य विषय है और न लौकिक घटना में ही प्रायः देखा जाता है । इसमें एक नवीनता है जिससे इसमें रसास्वादन कराने की विशेष क्षमता उत्पन्न हो गई है ।
यहाँ पर नायक और नायिका का उभयनिष्ठ प्रेम है, नायक सौभाग्यशाली है और नायिका अनेक सात्विकों से ओत प्रोत है । इस शृंगार के आस्वादन कराने के लिये जिस वस्तु का उपादान किया गया है वह सर्वथा नवीन है। शांकर गली में सायोगिक स्पर्श और उससे केवल उसी पार्श्व का निरन्तर पसीजना इत्यादि न तो कवियों का सामान्य विषय है और न लौकिक घटना में ही प्रायः देखा जाता है । इसमें एक नवीनता है जिससे इसमें रसास्वादन कराने की विशेष क्षमता उत्पन्न हो गई है ।
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तदेवं ध्वनिप्रभेदसङ्काश्रयेण यथा काव्यार्थानां नवत्वं जायते तथा प्रतिपादित- तम्। गुणीभूतव्यङ्ग्यस्यापि त्रिभेदलयङ्ग्यापेक्षया ये प्रकारास्तत्समाश्रयेणापि काव्यवस्तूनां नवत्वं भवत्येव। तत्स्यतिविस्तारकारीति नोदाहृतं सहृदयैः स्वयमुत्प्रे- क्षणीयिम्।
( अनु० ) वह इस प्रकार ध्वनि के भेदोपभेदों का आश्रय लेने से भी जिस प्रकार काव्यार्थों की नवीनता उत्पन्न हो जाती है वैसा प्रतिपादित कर दिया गया । गुणीभूतव्यङ्गच्य के भी तीन भेदोंवाले व्यङ्गच्य की दृष्टि से जो प्रकार होते हैं उनका आश्रय लेने से भी काव्यवस्तुओं की नवीनता हो ही जाती है । वह तो अत्यन्त विस्तार देनेवाला है इसलिये उसके उदाहरण नहीं दिये गये सहृदयों द्वारा स्वयं समझ लिये जाने चाहिये ।
'ध्वनेयं: सगुणीभूतव्यङ्गच्यस्याध्वा प्रदर्शितः । इत्युद्योतारम्भे यः श्लोकः तत्न ध्वनेरध्वना कवीनां मतिमागुणोडनन्तो भवतीत्येष मार्गो व्याख्यात इत्युपसंहरति—तदेवमित्यादिना । सगुणीभूतव्यङ्गच्यस्येत्यमुं मार्गं 'गुणीभूतव्यङ्गच्य के साथ ध्वनि का जो भाग दिखलाया गया है ।' यह जो उद्योतारम्भ में श्लोक था उसमें ध्वनि के मार्ग से कवियों का प्रतिभागुण अनन्त हो जाता है इष्ट भाग की व्याख्या कर दी गई यह उपसंहार करते हैं—'वह इस प्रकार' इत्यादि के द्वारा । 'सगुणीभूतव्यङ्गच्य का' इस भाग की व्याख्या तुम्हें देखकर पसीने से युक्त हो जाती है, रोमाञ्चित हो जाती है और कांपने लगती है' तो उससे प्रतीतमान रति उसका अंश-मात्र भी आस्वादन प्रदान न कर सकती जितना गाथा में बतलाये हुये तथा से हो जाता है । चतुर्थ उद्योत के प्रारम्भ में कहा गया था कि ध्वनि और गुणीभूतव्यङ्गच्य के मार्ग का अवलम्बन करने से कवियों का प्रतिभागुण अनन्त हो जाता है । ऊपर यह बतला दिया गया कि ध्वनि-मार्ग के आश्रय से प्रतिभागुण में अन- नता किस प्रकार आती है । अब यह विचार करना शेष रह गया है कि गुणीभूत- व्यङ्गच्य का आश्रय लेने से प्रतिभागुण में अनन्तता किस प्रकार आती है । गुणीभूत- व्यङ्गच्य भी तीन प्रकार का होता है—वस्तु, अलङ्कार और रस । यदि गुणीभूत- व्यङ्गच्य वस्तु इत्यादि का भी आश्रय लिया जाय तो भी पुराना अर्थ नया सा मालूम पड़ने लगता है । गुणीभूतव्यङ्गच्य का विस्तार अनन्त है । एक तो जितने भी
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मथ विहुल रख्खूखणेकमह्हसरणागआणअध्ठाण । खनणमत्तं विण दिण्णा विस्सामकहेत्ति जुक्तमिणम् ॥
काव्य में नवीनीकरण लाने के लिए कवि गुणीभूतव्यङ्ग्य वस्तु का आश्रय लेते हैं । यहाँ ध्वनि के प्रभेदों में गुणीभाव से अनन्तता आ जाती है ।
अर्थात् तीन उपमेदोंवाला निस्सन्देह वस्तु रस और अलङ्कार की आत्मा से युक्त जो व्यङ्ग्य उसकी जो अपेक्षा अर्थात् वाच्य में गुणीभाव उसके द्वारा । वहाँ पर ध्वनि के जो सब उपभेद उनके गुणीभाव से अनन्तता हो जाता है यह वह कहते हैं—‘अतिविस्तार’ यह । ‘स्वयम्भू’ यह । उसमें गुणीभूतव्यङ्ग्य वस्तु के द्वारा नवीनता पुराने अर्थ के स्पष्टीकरण होते हुए भी जैसे मेरा ही पद्य—हे राजन् ! जो लोग भय से व्याकुल होते हैं उनकी रक्षा करने में जितना शौर्य आपके अन्दर है उतना और किसी में नहीं पाया जाता । धन भी आपकी शरण में क्षणमात्र भी विश्राम की बात ही न करने दी, यह ठीक था ?'
भयविहुलरक्कूखणेकमल्लशरणागतनामर्थानाम् । क्षणमत्रिमात्रपि न दत्ता विश्रामकथातियुक्तमदम् ॥
कोई कवि राजा की दानशीलता की प्रशंसा करते हुए कह रहा है—हे राजन् ! जो लोग भय से व्याकुल होते हैं उनकी रक्षा करने में जितना शौर्य आपके अन्दर है उतना और किसी में नहीं पाया जाता । धन भी आपकी शरण में क्षणमात्र विश्राम की बात भी नहीं करने दी ।
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अत्र त्वमनवरतमथांस्यजसीति औदार्यलक्षणं वस्तु ध्वन्यमानं वाच्यस्योपस्कारकं नवत्वं ददाति, सत्यपि पुराणकविसृष्टेडर्थे । तथाहि पुराणी गाथा—
यहाँ पर तुम निरन्तर धन्यों का त्याग करते हो यह औदार्यलक्षणवाली वस्तु ध्वनित होते हुये वाच्य की उपस्कारक नवीनता को दे देता है । यद्यपि पुराने कवि को स्पष्ट किया हुआ अर्थ विद्धमान है । वह इस प्रकार पुरानी गाथा है—
चाइअणयरपरम्परसंघारणे अणिसमहस्सरीरā । किण्णघणस्थिā सुण्णपथ्थासुचंचतीव ॥
‘दयापी लोगों के हाथों की परम्परा में सङ्घारण के खेद को अपने शरीरपर न वह सकनेवाले धन कृपणों के घरों में स्थित होकर मनों स्वस्थ अवस्था में सो रहे हैं ।’
अलङ्कारेरण व्यज्ज्यने वाच्योपस्कारे नवत्वं यथा ममैव— वसन्तमत्तालिपरम्परोपमा: कचास्तवासन् किल रागवृद्धये । श्मशानभूभागपरागभासुरा: कथन्तददेते न मनारिवक्तये ॥
व्यङ्ग्य अलङ्कार से वाच्योपस्कार में नवत्व जैसे मेरा ही— ‘वसन्त काल के मत्त भौरों की परम्परा की उपमावाले तुम्हारे केश निस्सन्देह राग को बढानेवाले थे । श्मशान भाग की पराग के समान भासुर वर्ण के ये कुछ भी विरक्त करनेवाले नहीं हैं, यह क्या बात है ?’
अत्र ह्याल्लेपेण विभावनया च ध्वन्यमानाभ्यां वाच्यमुपस्कृतमिति नवत्वं सत्यपि पुराणार्थयोगेऽपि । तथाहि पुराणश्लोक:—
यहाँ ध्वनित होनेवाले आक्षेप और विभावना से वाच्य उपस्कृत हुआ है जिससे नवीनता आ गई है । यद्यपि पुरानी गाथा विद्धमान थी । वह इस प्रकार पुरानी गाथा है—
आये । किन्तु उन धन्यों को आपने एक क्षण भी अपने यहाँ विश्राम नहीं करने दिया । क्या ऐसा करना आपकी शरणागतरक्षणतत्परता के अनुकूल था ।’
यहाँ पर यह व्यञ्जना निकलती है कि हे राजन् आप बडे ही दानशील हैं और शरणागतों की रक्षा में तत्पर रहते हैं । यह व्यङ्ग्यार्थ वाच्य की अपेक्षा सुन्दर भी है और उसका उपकारक भी । अतएव यह गुणीभूतव्यङ्ग्य है । इस पद्य का आशय एक दूसरी गाथा से लिया गया है जिसका छाया इस प्रकार है :—
त्यागेनपरम्परासंघारणखेदनि:स्सहशरीरा: । अस्थि: कृपणगृहस्था: स्वस्थावस्था: स्वप्तीव ॥
तारावती
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मुत्तृणाकाममास्सयं मरणाच्च महद्भयम् । पञ्चेता न विवर्धन्ते वाधंके विदुषामपि ॥
'भूख, प्यास, कामवासना, मात्सर्य और मरण से महान् भय ये ५ वृद्धावस्था में विद्वानों के अन्दर भी बढ़ जाते हैं ।'
'धन दानी लोगों के हाथों में नित्य प्रति घूमते ही रहते हैं, एक हाथ में आते हैं और दूसरे में चले जाते हैं, कभी रुकते ही नहीं । इस भ्रमणचक्र में वे इतने थक जाते हैं कि और अधिक भ्रमण करने की शक्ति ही उनमें नहीं रहती । मानो इसीलिये कृपणों के घरों में पहुँचकर वे धन स्वस्थ अवस्था को प्राप्त होकर आराम से सोते हैं ।'
बात वही है । किन्तु अभिनवगुप्त ने अपने पद्य में ऐसी अत्यन्त्य वस्तु का आश्रय ले लिया है जो गुणीभूत हो गईं है । इस प्रकार गुणीभूतव्यंग्य वस्तु का आश्रय लेने से पुराने अर्थ में नवीनता आ जाती है ।
( २ ) यदि अलङ्कार व्यंग्य हो और वह गुणीभूत हो जाय तो उसका आश्रय ले लेने से भी पुरानी वस्तु में नवीनता आ जाती है । इसका उदाहरण भी अभिनवगुप्त का पद्य ही है :-
किसी व्यक्ति को वृद्धावस्था में भी वासनायें पीड़ित कर रही हैं । उसका कोई ज्ञानी मित्र उससे कह रहा है:-
'तुम्हारे यौवन काल में तुम्हारे बाल इतने काले थे और ऐसे मालूम पड़ रहे थे मानो वसन्तकाल के मतेवाले भौंरे पंखों को बनाकर उड़े रहे हों । उस समय तुम्हारे उष्ण भरे पूरे यौवन ने तुम्हारे अन्दर काम-वासना को खूब बढ़ाया । अब तुम्हारे ये बाल इतने सफेद हो गये हैं कि मालूम पड़ता है मानो स्मशानभूमि पर पड़ी हुई सफेद चिता भस्म हो । इन सफेद बालों से तो तुम्हारे अन्दर विराग होना ही चाहिये । किन्तु क्या बात है कि ये बाल तुम्हारे अन्दर विराग को जागृत नहीं करते ।'
'चाहे कोई कितना ही विद्वान् और ज्ञानवान् क्यों न हो किन्तु जब उसकी वृद्धावस्था आ जाती है तो उसके अन्दर ये पाँचों बातें बढ़ ही जाती हैं—भूख और प्यास, काम-वासना, दूसरों से ईर्ष्या-द्वेष और मरने से बहुत अधिक भय ।'
इस गाथा की रचना में भी एक पुराने पद्य का आश्रय ग्रहण किया गया है—
आश्रय दोनों पद्यों का एक ही है । किन्तु इस पुराने पद्य का आश्रय लेते हुये भी अभिनवगुप्त ने इसमें कुछ नवीनता पैदा कर दी है ।
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व्यङ्ग्येन रसेन गुणीभूतेन वाच्योपस्कारेण नवन्त्वं यथा ममैव— जरानेयं मूर्ध्नि ध्रुवमयमसौ कालकूटजगः, कुधान्धः फूत्कारैः स्मुटतगरलफेनान् प्रकिरति । तदेनं संस्पृश्यतयथ च सुखितममन्य हृदयः शिवोऽपयं नेच्छन्न् अपि तु सुधीः खलु जनः ॥
यहाँ पर व्यङ्ग्य अर्थ से उपस्कृत वाच्य शान्त रस की प्रतिपत्ति का अज्ञ होने से सुन्दर हो जाता है इससे नवीनता आ जाती है यद्यपि पुराना श्लोक विद्यमान है :-
गुणीभूतव्यङ्ग्य रस से वाच्योपस्कार के द्वारा नवन्त्व जैसे मेरा हो— 'यह बुढ़ापा नहीं है अपितु कालरूपी भुजङ्गम क्रोधान्ध होकर सिरपर निस्सन्देह फूत्कारों के द्वारा स्पष्ट गरलफेनान् प्रकिरति । तदेनं संस्पृश्यतयथ च सुखितममन्य हृदयः शिवोऽपयं नेच्छन्न् अपि तु सुधीः खलु जनः ॥'
भत्राऽऽशुतेऽपि व्यङ्ग्येन वाच्यमुग्रसृतं शान्तरसप्रतिपत्त्यङ्गत्वाच्चारु भवतीति न नवन्त्वं सत्यप्यास्मिन् पुराणश्लोके— जराजीर्णशरीरस्य वैराग्यं यत्न न जायते । तस्मिन् हृदये मृत्युद्रुवं नास्तीति निश्चयः ।। ५ ।।
'जराजीर्णशरीरस्य वैराग्यं यत्न न जायते । तस्मिन् हृदये मृत्युद्रुवं नास्तीति निश्चयः ।। ५ ।।'
दो अलङ्कार ध्वनित होते हैं—( क ) 'मृत्यु के निष्टट पहुँचकर तो तुम्हारे अन्दर विराग होना ही चाहिये; किन्तु अधिक हम तुमसे क्या कहें ? हमारा तुमसे कुछ अधिक कहना ठीक नहीं है ।'यह उक्तविषयक आक्षेप अलङ्कार है क्योंकि इसमें कहीं हुई बात का निषेध कर दिया गया है। अथवा 'अब तुम्हारी मृत्यु निकट आ रही है' इस न कही हुई बात के कहने का निषेध व्यङ्ग्य है जिससे यह अनुक्तविषयक आक्षेप है। विराग की भावना को तीव्र करना ही विशेष अभिधेय है। ( ख ) कामवासना का कारण विद्वमान नहीं है फिर भी कामोत्तेजन रूप कार्य हो रहा है। यह विभावना है । ये दोनों व्यङ्ग्य अलङ्कार वाच्य का सौन्दर्य ही बढाते हैं । अतः ये गुणीभूत हो गये हैं। इस प्रकार यहाँ पर गुणीभूतव्यङ्ग्य अलङ्कार का आभय हो पुराने भाव में नवीनता उत्पन्न करनेवाला है ।
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ध्वनेरित्योर्गुणीभूतवच्यङ्गस्य च समाश्रयान् । न काव्यार्थविरामोडस्ति यदि स्यात्प्रतिभागुणः ॥ ६ ॥
अनु० 'इस प्रकार यदि प्रतिभागुण हो तो ध्वनि के और गुणीभूतव्यङ्गय के आश्रय लेने से काव्यार्थ का विराम नहीं होता ॥ ६ ॥'
पुरातन कविग्रन्थों के होते हुये भी यदि प्रतिभागुण हो; उसके न होने पर कुछ भी कवि की वस्तु नहीं होती। बन्धच्छाया भी दो अयों के अनुरूप शब्दसन्निवेश ( ही है वह ) अर्थप्रतीति के अभाव में कैसे स्फुरित होती है ? अर्थविशेष की अपेक्षा न करते हुये अक्षर रचना हों बन्धच्छाया है। यह सन्निवेश निस्सन्देह ऐसा होने पर अर्थ की अपेक्षा न करनेवाले तथथा मधुर वचनरचना में भी काव्य का नाम प्रवृत्त हो जावेगा। यदि कहो कि जब शब्द और अर्थ के साहित्य के द्वारा काठ्यत्व होता है तब उस प्रकार के त्रिपय में काव्यघटस्था कैसे होगी ? तो ( इसका उत्तर यह है कि ) दूसरों से उपनिबद्ध अर्थ की रचना में जैसे उस काव्य का सङ्गवहार होता है वैसे ही उस प्रकार के काव्यसन्दर्भों के लिये भी ( काव्य का व्यवहार हो जावेगा । )
सत्स्वपि कारिकाया उपस्कारः । त्रीन् पादान् स्पष्टान् मत्वा तुयं पादं व्याख्यातुं पठति -यदि० इति । विधमानो ह्यासौ प्रतिभागुण उत्करीत्या भूतान् भवति, नतवत्यान्त-सदृशेवेत्यर्थः । तस्मिन्नृते । अनन्तीभूते प्रतिभागुणे । किश्चित्प्रवेतु । सर्वं हि पुराण-
'होते हुये भी' यह कारिका का उपस्कार है तो। तीन पादों को स्पष्ट मानकर चौथे पाद की व्याख्या करने के लिये पढते हैं-'यदि' यह निस्सन्देह का अर्थ यह है कि निस्सन्देह विद्वमान वह प्रतिभागुण उक्त रीति से अधिक हो जाता है, अत्यन्त रूप में न होते हुये नहीं। 'उसके' यह। अर्थात अनन्तभूत प्रतिभागुण के। 'कुछ भी नहीं' यह। निस्सन्देह सभी कुछ पुराने कवि द्वारा ही स्पर्य कर
लोचन
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( ३ ) रस गुणीभूतव्यंग्य होकर जब वाच्य को उपस्कृत करता है तब भी पुराने अर्थ में नवीनता आ जाती है। इसका भी उदाहरण अभिनवगुप्त का बनाया हुआ एक पद्य ही है। उस पद्य का आशय इस प्रकार है:-
'लोगों के सिर के सफेद बाल बुढ़ापा नहीं हैं किन्तु निस्सन्देह यह कालरूपी सर्प क्रोध में अन्धा हो गया है और बार-बार फुफकारता है। जिससे तुम्हारे सिर पर विष का झाग छूट रहा है और वह स्पष्टरूप से सफेद बालों के रूप में झलक रहा है, इसको लोग देखते हैं और फिर भी उनका हृदय अपने को सुखी ही समझता है। लोग इस बात की चेष्टा नहीं करते कि कल्याणकारक उपाय का सहारा लें। निस्सन्देह लोगों में आश्चर्यजनक धैर्य है। यह दुःख की बात है।'
इस पद्य में भी एक दूसरे पुराने इलोक की छाया है:-
'जिस व्यक्ति का शरीर जरा से जीर्ण हो चुका है उसके हृदय में भी यदि वैराग्य की भावना उदित नहीं होती तो इसका तो आशय यही है कि उसके हृदय में हद निश्चय है कि असंदिग्ध रूप में मौत है ही नहीं।'
दोनों पद्यों के अर्थ में कोई विशेष अन्तर नहीं है। किन्तु इस श्लोक में शान्त-रस का परिपाक हुआ है। शान्तरस का परिपाक उक्त अभिनवगुप्त के श्लोक में भी है। किन्तु अन्तर यह हो गया है कि अभिनवगुप्त के पद्य में विस्मय स्थायी भाव का उपादान हुआ है। वह विस्मय अद्भुतरस के रूप में आस्वादयोग्य है। अद्भुत-रस शृंगार की प्रतिपत्ति का अंग ही है। इसीलिये वह गुणीभूत होकर शान्त को अधिक रमणीय बना रहा है। यहां पर गुणीभूतव्यंग्य रस का आश्रय लेने से ही नवीनता आ गई है। इस प्रकार गुणीभूतव्यंग्य के भेदों का आश्रय लेकर किस प्रकार पुराने अर्थ में नवीनता आ जाती है। इसका दिग्दर्शन करा दिया गया है और गुणीभूतव्यंग्य के मूलभेदों का एक-एक उदाहरण दे दिया गया है। ॥ ५॥
ऊपर विस्तारपूर्वक सिद्ध किया जा चुका है कि कविता में नवीनता ध्वनि और गुणीभूतव्यंग्य से ही आती है। अर्थ तो पुराने ही होते हैं किन्तु अभिधयकथन कौशल से पुराने अर्थों को भी नवीन रूप दे देता है। इस कारिका में उसी प्रकार का उप+हार किया गया है। कारिका का अर्थ करने में 'सत्वपि पुरातनकवि-प्रबन्धेऽपि' इतना वाक्यखण्ड और जोड़ देना चाहिये। इस प्रकार पूरी कारिका का आशय यह हो जावेगा :-
जैसा ऊपर वर्णन किया गया है उससे सिद्ध होता है कि चाहे पुराने कवियों
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कविनैव स्पष्टमिति किमिदानीं वर्ण्यं यत्न कवेच्चर्णनाङ्यापारः स्यात् । ननु यद्यपि वर्ण्येमपूर्वं नास्ति, तथाप्युक्तिपरिपाकगुम्फघटनाच्च रपय्यवन्धच्छाया नवनवा भविष्यति । यद्विवेशने काव्यान्तराणां संग्रंम्म इत्याशङ्क्याह —वन्धच्छायापीति । अर्थद्वय गुणीभूतव्यङ्ग्यं च । नेदীয় इति । निकटतरं हृदयानुप्रवेशि न भवतीत्यर्थः । अत्र हेतुमाह—एवं हि सतोति । चतुरत्वं समाससङ्घटना । मधुरत्वमपारुष्यम् । तथाविधानामिति । अपूर्ववन्धच्छायायुक्तानामपि परोपनिबद्धार्थनिबन्धने परकृतकाव्यत्वव्यवहार एव स्यादित्यर्थस्यापूर्वत्वमाश्रयणीयम् । कवनीयं काव्यं तस्य भावः काव्यत्वं, न तद्वयं भावप्रत्ययान्तात् भावप्रत्यय इति शङ्कितव्यम् ॥ ६ ॥
कवि के द्वारा ही यह स्पष्ट है कि अब वर्णनीय विषय के वर्णन में कवि को यत्न करना चाहिये । यदि यह कहा जाय कि वर्णनीय विषय नया नहीं है तो भी उक्ति के परिपाक और उसके गुम्फन तथा घटन से नवीनता की छाया वन्ध में अवश्य आयेगी । इस कारिका में ‘वन्धच्छायापीति’ इत्यादि का आशय यह है कि अन्य कवियों के काव्यों का संग्रह नहीं है । यहाँ ‘अर्थद्वय’ पद से गुणीभूत व्यङ्गय और प्रधानभूत व्यङ्गय का ग्रहण होता है । ‘नेदীয়’ का अर्थ है अत्यन्त निकट अर्थात् हृदय में अनुप्रविष्ट होने वाला । इस प्रकार के होने में हेतु बतलाते हैं—‘एवं हि सतोति’ इत्यादि । ‘चतुरत्व’ का अर्थ है समास से बना हुआ संघटन । ‘मधुरत्व’ का अर्थ है अपारुष्य । ‘तथाविधानामिति’ इत्यादि में कहा गया है कि यदि दूसरे कवियों के द्वारा उपनिबद्ध अर्थ के निवन्धन में भी अपूर्व वन्ध की छाया युक्त काव्य का परकृत काव्यत्व व्यवहार ही होगा । इसलिये अर्थ के अपूर्वत्व का ही आश्रय लेना चाहिये । कवि के द्वारा रचित होने से उस काव्य का काव्यत्व है । यहाँ यह शङ्का नहीं करनी चाहिये कि भाव-प्रत्यय से भाव-प्रत्यय किया गया है ॥ ६ ॥
के काव्यप्रबन्ध कितनी ही संख्या में विद्यमान हो किन्तु यदि कवि में प्रतिभा का गुण विद्यमान है और वह पुराने अर्थ की ही अभिव्यञ्जना करने के लिये ध्वनि तथा गुणीभूतव्यङ्गय का सहारा ले लेता है तो पुराने अर्थ भी नये हो मालूम पड़ने लगते हैं । इस प्रकार काव्यार्थी की कहीं परिभाषा आयेगी ही नहीं । काव्यार्थ अनन्त हो जायेंगे । इधर कारिका में और जो कुछ कहा गया है वह तो सब पुरानी ही बात है; वह सब स्पष्ट है और उस विषय में कुछ नहीं कहना है । हाँ एक बात नई अवश्य है । वह यह है कि यदि प्रतिभा गुण विद्यमान हो । ( प्रतिभा कवियों को उस स्फुरणात्मक शक्ति को कहते हैं जिससे अवसर के अनुकूल शब्द और अर्थ पकड़म स्फुरित हो जाते हैं ।) यदि यह प्रतिभा का गुण बीजरूप में विद्यमान
तारावती
हो तो काव्यप्रबन्ध कितनी ही संख्या में विद्यमान हो किन्तु यदि कवि में प्रतिभा का गुण विद्यमान है और वह पुराने अर्थ की ही अभिव्यञ्जना करने के लिये ध्वनि तथा गुणीभूतव्यङ्गय का सहारा ले लेता है तो पुराने अर्थ भी नये हो मालूम पड़ने लगते हैं । इस प्रकार काव्यार्थी की कहीं परिभाषा आयेगी ही नहीं । काव्यार्थ अनन्त हो जायेंगे । इधर कारिका में और जो कुछ कहा गया है वह तो सब पुरानी ही बात है; वह सब स्पष्ट है और उस विषय में कुछ नहीं कहना है । हाँ एक बात नई अवश्य है । वह यह है कि यदि प्रतिभा गुण विद्यमान हो । ( प्रतिभा कवियों को उस स्फुरणात्मक शक्ति को कहते हैं जिससे अवसर के अनुकूल शब्द और अर्थ पकड़म स्फुरित हो जाते हैं ।) यदि यह प्रतिभा का गुण बीजरूप में विद्यमान
के काव्यप्रबन्ध कितनी ही संख्या में विद्यमान हो किन्तु यदि कवि में प्रतिभा का गुण विद्यमान है और वह पुराने अर्थ की ही अभिव्यञ्जना करने के लिये ध्वनि तथा गुणीभूतव्यङ्गय का सहारा ले लेता है तो पुराने अर्थ भी नये हो मालूम पड़ने लगते हैं । इस प्रकार काव्यार्थी की कहीं परिभाषा आयेगी ही नहीं । काव्यार्थ अनन्त हो जायेंगे ।
हो तो काव्यप्रबन्ध कितनी ही संख्या में विद्यमान हो किन्तु यदि कवि में प्रतिभा का गुण विद्यमान है और वह पुराने अर्थ की ही अभिव्यञ्जना करने के लिये ध्वनि तथा गुणीभूतव्यङ्गय का सहारा ले लेता है तो पुराने अर्थ भी नये हो मालूम पड़ने लगते हैं । इस प्रकार काव्यार्थी की कहीं परिभाषा आयेगी ही नहीं । काव्यार्थ अनन्त हो जायेंगे । इधर कारिका में और जो कुछ कहा गया है वह तो सब पुरानी ही बात है; वह सब स्पष्ट है और उस विषय में कुछ नहीं कहना है । हाँ एक बात नई अवश्य है । वह यह है कि यदि प्रतिभा गुण विद्यमान हो । ( प्रतिभा कवियों को उस स्फुरणात्मक शक्ति को कहते हैं जिससे अवसर के अनुकूल शब्द और अर्थ पकड़म स्फुरित हो जाते हैं ।) यदि यह प्रतिभा का गुण बीजरूप में विद्यमान
इधर कारिका में और जो कुछ कहा गया है वह तो सब पुरानी ही बात है; वह सब स्पष्ट है और उस विषय में कुछ नहीं कहना है । हाँ एक बात नई अवश्य है । वह यह है कि यदि प्रतिभा गुण विद्यमान हो । ( प्रतिभा कवियों को उस स्फुरणात्मक शक्ति को कहते हैं जिससे अवसर के अनुकूल शब्द और अर्थ पकड़म स्फुरित हो जाते हैं ।) यदि यह प्रतिभा का गुण बीजरूप में विद्यमान
हो तो काव्यप्रबन्ध कितनी ही संख्या में विद्यमान हो किन्तु यदि कवि में प्रतिभा का गुण विद्यमान है और वह पुराने अर्थ की ही अभिव्यञ्जना करने के लिये ध्वनि तथा गुणीभूतव्यङ्गय का सहारा ले लेता है तो पुराने अर्थ भी नये हो मालूम पड़ने लगते हैं । इस प्रकार काव्यार्थी की कहीं परिभाषा आयेगी ही नहीं । काव्यार्थ अनन्त हो जायेंगे । इधर कारिका में और जो कुछ कहा गया है वह तो सब पुरानी ही बात है; वह सब स्पष्ट है और उस विषय में कुछ नहीं कहना है । हाँ एक बात नई अवश्य है । वह यह है कि यदि प्रतिभा गुण विद्यमान हो । ( प्रतिभा कवियों को उस स्फुरणात्मक शक्ति को कहते हैं जिससे अवसर के अनुकूल शब्द और अर्थ पकड़म स्फुरित हो जाते हैं ।) यदि यह प्रतिभा का गुण बीजरूप में विद्यमान
हो । ( प्रतिभा कवियों को उस स्फुरणात्मक शक्ति को कहते हैं जिससे अवसर के अनुकूल शब्द और अर्थ पकड़म स्फुरित हो जाते हैं ।) यदि यह प्रतिभा का गुण बीजरूप में विद्यमान
हो तो काव्यप्रबन्ध कितनी ही संख्या में विद्यमान हो किन्तु यदि कवि में प्रतिभा का गुण विद्यमान है और वह पुराने अर्थ की ही अभिव्यञ्जना करने के लिये ध्वनि तथा गुणीभूतव्यङ्गय का सहारा ले लेता है तो पुराने अर्थ भी नये हो मालूम पड़ने लगते हैं । इस प्रकार काव्यार्थी की कहीं परिभाषा आयेगी ही नहीं । काव्यार्थ अनन्त हो जायेंगे । इधर कारिका में और जो कुछ कहा गया है वह तो सब पुरानी ही बात है; वह सब स्पष्ट है और उस विषय में कुछ नहीं कहना है । हाँ एक बात नई अवश्य है । वह यह है कि यदि प्रतिभा गुण विद्यमान हो । ( प्रतिभा कवियों को उस स्फुरणात्मक शक्ति को कहते हैं जिससे अवसर के अनुकूल शब्द और अर्थ पकड़म स्फुरित हो जाते हैं ।) यदि यह प्रतिभा का गुण बीजरूप में विद्यमान
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हो तो ध्वनि और गुणीभूतव्यंग्य के विभिन्न प्रकारों का आश्रय लेने से उस प्रतिभा-शाली कवि के सामने नये-नये अर्थ आते जाते हैं और उनकी संख्या बहुत बढ़ जाती है। अनन्तता का सृपादक तो प्रतिभा-गुण हो है। यदि वह बीजरूप में विद्धमान नहीं है तो कवि के लिये कोई भी विषय वर्णनीय रह ही नहीं जावेगा! नये अर्थ उसे दिखाई नहीं पड़ेंगे और जो अर्थ दिखलाइए पड़ेंगे वे ऐसे मालूम पड़ेंगे कि उनका वर्णन तो पुराने कवि ही कर चुके हैं। अतः नवीन अर्थों के स्फुरण के लिये प्रतिभा का होना अनिवार्य है और कवि के लिये केवल यही एक शर्त है।
( प्रश्न ) नवोनता केवल अर्थ की ही नहीं होती; यदि अर्थ नवीन न भी हो तो भी वन्धच्छाया के नवीन होने से काव्य भी नवीन हो जावेगा। वन्धच्छाया को ही हम रसत्ति,परिपाक, गुफ्त, सङ्घटना इत्यादि अनेक नामों से पुकार सकते हैं। इस प्रकार पुराने अर्थों को लेकर वन्धच्छाया यदि नई जोड दी जाय तो काव्य भी नवीन हो सकता है और उसी प्रकार के काव्य लिखने में सहृदयों का अभिनिवेश भी हो सकेगा।
( प्रश्न ) वन्धच्छाया तो हम काव्य के उसी सौन्दर्य को मानते हैं जिसमें अर्थ की अपेक्षा न की जाय; केवल अक्षररचना के सौन्दर्य पर ही ध्यान दिया जाय। केवल शब्दसौन्दर्य को ही लेकर काव्य प्रवृत्त हो सकता है, अर्थ की नवीनता पर विचार करने से क्या लाभ? ( उत्तर ) इस प्रकार की वन्धच्छाया जिसमें अर्थ पर ध्यान ही न दिया जाय केवल शब्द-सङ्घटना सौन्दर्य को लेकर ही सब कुछ निर्णय कर लिया जाय सहृदयों के हृदयों में न तो प्रतिष्ठित हो सकती है और न उनक नष्ट हो जा सकती है। यदि वन्धच्छाया आप ऐसी ही मानते हैं और उसी के मानने का आग्रह करते हैं तो जहाँ पर समासोंकी सुन्दर सङ्घटना कर दी जाय और पारुष्यमधुर अक्षर जोड दिये जायँ तो उसे भी आप काव्य की संशा देने के लिये योग्य होंगे चाहे उसमें अर्थ बिल्कुल ही न हो।
( प्रश्न ) इसक लिये तो हमें काव्य की परिभाषा पर ध्यान देना होगा। काव्य उसे ही कहते हैं जहाँ सहृदय-हृदय,आह्लादजनक शब्द और अर्थ दोनों विद्धमान हों। केवल आह्लादजनक शब्द-
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रचना में अर्थसौन्दर्य तो होगा नहीं फिर वहाँ पर काव्य की परिभाषा ठीक कैसे बैठेगी और हम उसे काव्य की संज्ञा भी कैसे दे सकेंगे ?
( उत्तर ) जहाँ पर कवि किसी दूसरे के कहे हुए अर्थ को लेकर अपना काव्य बना देता है; वहाँ उस कवि का काव्यबन्धन ही अपूर्व ( नया ) होता है और बन्धच्छाया ही उसकी अपनी होती है; केवल इतनी सी नवीनता को लेकर उस कवि का वह काव्य कहा जाता है । अतः बन्धच्छाया ही तो आप के मत में काव्यव्यवहार की प्रयोजिका हुई । क्योंकि अब दूसरे कवि का बन्ध ही अपना रहा; अर्थ तो पूर्ववर्ती कवि का हो गया । अतः यदि आप उत्तम स्थलपर बन्धच्छाया को लेकर उस कविता को परवर्ती कवि की रचना मान सकते हैं तो जहाँ केवल बन्ध है अर्थ है ही नहीं उसे आप कविता की संज्ञा क्यों नहीं दे सकते ? यदि अर्थ को लेकर आप काव्य के कर्ता का निर्णय करेंगे तो उस काव्य का कर्ता पुराण ही माना जावेगा । अतएव बन्धच्छाया में अनिवार्य रूप से अर्थ की विशेषता सम्मिलित की जानी चाहिये। वह अर्थ की विशेषता ध्वनि तथा गुणीभूतव्यंग्य के द्वारा ही होगी । अतः ध्वनि और गुणीभूतव्यंग्य को काव्य की अनन्यता का प्रयोजक मानना ही चाहिये और उसका प्रवर्तन कवि की प्रतिभा के द्वारा ही होता है ।
( इस उत्तर वाक्य का अर्थ विभिन्न व्याख्याओं में विभिन्न प्रकार से प्राप्त होता है। किन्तु एक तो वे व्याख्याएँ लोचन के प्रतिद्वन्द्वी हैं, दूसरे उनसे न तो रक्ति के शब्द ही ठीक सङ्क्रुटिन होते हैं और न प्रकरण की सङ्गति हो ठीक बैठती है । अतः उत्तम अर्थ ही मान्य है । )
यहाँ पर वृत्तिकार ने 'काव्यत्व' शब्द का प्रयोग किया है । यह शब्द 'अव्याकरण की दृष्टि से अशुद्ध मालूम पड़ता है 'कृत्-वर्ण' धातु से 'कवि' शब्द निष्पन्न होता है जिसका अर्थ होता है कवि का भाव या कर्म । इस प्रकार 'कवि' शब्द से भाव और कर्मं अर्थ में घञ् प्रत्यय होकर 'काव्य' बनता है । व्याकरण का नियम है कि एक भावप्रत्यय के बाद दूसरा भावप्रत्यय नहीं होता । अतः यहाँ पर 'त्व' प्रत्यय नहीं हो सकता । इस प्रकार यह शब्द अशुद्ध है । लोचनकार ने इसका उत्तर यह दिया है कि यहाँ पर भाव प्रत्यय है हो नहीं । यहाँ पर तो विधि के अर्थ में 'कृत्' धातु से हो 'ण्यत्' प्रत्यय हो गया है—काव्येतव्यत् । यह प्रत्यय उसी अर्थ में होता है जिस अर्थ में तव्य और अनीयर हुआ करते हैं । अतएव काव्य का अर्थ हुआ कवनীয় अर्थात् कवि का विषय । इस प्रत्यय से त्व प्रत्यय हो सकता है । अतः यह शब्द अशुद्ध नहीं है ॥ ६ ॥
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न चार्थानन्त्यं व्यङ्ग्यार्थोपेक्ष्यैव यावद्वाच्यार्थोपि न्त्यापीति प्रतिपादयितु-मुच्यते— अवस्थादेशकालादिविशेषैरपि जायते आनन्त्यमेव वाच्यस्य शुद्धस्यापि स्वभावतः ॥ ७ ॥
अर्थ की अनन्तता न केवल व्यङ्ग्यार्थ की अपेक्षा से ही अपितु वाच्यार्थ-की अपेक्षा से भी होता है यह प्रतिपादन करने के लिये कहा जा रहा है— 'अवस्था, देश, काल इत्यादि की विशेषताओं से शुद्ध भी वाच्य का स्वभावतः आनन्त्य हो जाता है ॥' ७ ॥
शुद्धस्यापि वाच्यस्य शुद्धस्यापि स्वभावतः । स्वभावो ह्ययं वाच्यानां चेतनाचेतनानां च यद्वस्स्थाभेदाद्देशभेदात्कालभेदाद्रव्यलक्षणभेदाच्चानन्तता भवति । तैश्च तथाविधैरस्थितैः सद्धिः प्रसिद्धैरनेकस्वभावानुसरणरूपया स्वभावोक्त्यापि तावदुपनिबध्यमानैरनिर्नवधिः काव्यार्थः सम्पद्यते । तथा ह्यावस्थाभेदाद्रव्यत्वं यथा—भगवती पार्वती कुमारसम्भवे 'सर्वोपमाद्रव्यसमुच्चयेन' इत्यादिभिरहक्भिः प्रथममेव परिसमापितरूवर्णनानापि पुनर्भगवत् शम्भोर्लोचनगोचरमायान्ती 'वसन्तपुष्पाभरणं वहन्ती' मन्यथोप-करणभूतेन भड्झ चनतरणोपवर्णिता । सैव च पुनर्नवोद्राहसये प्रसाध्यमाना 'तां प्राड्मुखीं तत् निवेभिय तन्वीम' इत्याद्युक्तिभिरनिर्नवेनैव प्रकारेण निखपितरुप-सौष्ठवम् । न च ते तस्य कवेरेकत्रैवासकृत्कृता वर्णनप्रकारा अपुनरुक्ततयेवास-पेत्का से भी होता है यह प्रतिपादन करने के लिये कहा जा रहा है— 'अवस्था, देश, काल इत्यादि की विशेषताओं से शुद्ध भी वाच्य का स्वभावतः आनन्त्य हो जाता है ॥' ७ ॥
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नवनवार्थनिर्भरतरवेन वा प्रतिभासन्ते । दर्शितमेव चैतद्विषयमवाणतोलायाम् - ण अ ताण घडइ ओहो ण अ ते दीसन्ति कह वि पुनरुत्ता । जे विसममा पिआणं अस्था वा सुकइ वारणाम् ॥
पुनरुक्तत्व रूप में अत्यन्त पुराने अपने अर्थ से परिपूर्ण रूप में नहीं प्रतीत होते । और यह विषमबाणलीला में दिखलाया हो गया है— 'उनकी सीमा नहीं घटित होती, और वे कैसे भी पुनरुक्त नहीं दिखाई देते जो प्रियों के विभ्रम होते हैं अथवा जो सुकवियों के अर्थ होते हैं ।'
प्रतिपादयितुमिति । प्रसङ्गादिति शेषः । यदि वा वाच्यं तावद्विविधव्यङ्ग्यो-पयोगि तददेव व्यक्तव्यङ्ग्यान्तं भवतीदृशप्रकारणेनैव प्रकृतमेवोच्यते । शुद्धरस्म्र्रयेतिति । व्यङ्ग्य-विषयो यो व्यापारः तत्र्रश्नं विनाप्ययान्त्यं स्वरूपमात्रेणैव पश्र्रात्तु तथा स्वरूपेण-नन्तं सदृश्यङ्ग्यं* व्यतनुते भावः । न तु सर्वथा तत्र व्यङ्ग्यं नास्तीति मन्तव्यमस-सम्भूततद्रूपसामावे काव्यव्यवहारहाने: । तथा चोदाहरणेनु रसध्वने: सद्भावोऽस्त्येव । आदिग्रहणं व्याचष्टे-- स्वालक्षणयेतिति । स्वरूपेत्यर्थः । यथा रूपसंस्पर्शयौस्तीचैकावस्थ्यो-रेकद्रव्यनिष्ठयोरककालयोश्च ।
'प्रतिपादन करने के लिये' यह । प्रसङ्गवश यह शेष है । अथवा वाच्य तो विभिन्न व्यङ्ग्यों का उपयोगी होता है, यदि वही अनन्त हो तो उसके बल पर व्यङ्ग्यों की भी अनन्तता हो जावेगी इस अभिप्राय से यह प्रकृत ही कहा जा रहा है । 'शुद्ध का' यह । व्यङ्ग्य विषयक जो व्यापार उसके स्वरूप के बिना भी स्वरूपमात्र से ही आननन्त्य हो जाता है; बाद में तो स्वरूप से अनन्त होते हुये व्यङ्ग्य को व्यक्त करता है यह भाव है । सर्वथा वहाँ पर व्यङ्ग्य नहीं होता ऐसी बात नहीं मानी जानी चाहिये क्योंकि आत्मस्थानीय उस रूप के अभाव में काव्यव्यवहार की ही हानि हो जायेगी, और भी उदाहरणों में रसध्वनि की सत्ता है ही । आदि ग्रहण की व्याख्या करते हैं— 'स्वालक्षण्य' यह । अर्थात् स्वरूप । जैसे तौत्र एक अवस्थावाले, एक द्रव्य में रहनेवाले और एक काल में रहनेवाले रूप और
लोचन
ऊपर ध्वनि और गुणीभूतव्यङ्ग्य की दृष्टि से काव्य की अनन्तता की पूरी व्याख्या कर दी । अब इस १७वीं कारिका में वाच्य की दृष्टि से काव्य की अनन्तता की व्याख्या की जा रही है । यहाँ पर प्रश्न यह है कि प्रकरण तो ध्वनि और गुणीभूतव्यङ्ग्य के प्रयोजननिरूपण का है, यहाँ पर वाच्य की अनन्तता के प्रति-
तारावती
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पादन से क्या लाभ ? इसका उत्तर यह है कि ध्वनि और गुणीभूतव्यङ्गच्य के प्रयोजन निरूपण के प्रसंग में ही यह भी विषय आ पड़ा कि इनमे काव्य अनन्त हो जाता है । अतः इस अनन्तता के प्रसंग में ही यह भी दिखला देना आपेक्षित नहीं कहा जा सकता कि अनन्तता केवल व्यङ्गच्यार्थ के ही अधीन नहीं होती अपितु वाच्यार्थ के अधीन भी होती है । अथवा इसका दूसरा उत्तर यह भी हो सकता है कि व्यङ्गच्यार्थ का व्यञ्जक तो वाच्यार्थ हो होता है । एक वाच्यार्थ से बहुत से व्यङ्गच्यार्थ निकल आते हैं । यदि व्यञ्जक वाच्यार्थ ही अनन्त होगा तो व्यङ्गच्यार्थ के अनन्त होने में तो कोई सन्देह रह ही नहीं जाता । अतः इस कारिका में जो वाच्यार्थ जी अनन्तता बतलाई गई है वह प्राकरणिक हो है अपाकरणिक नहीं ।
‘यदि शुद्ध वाच्य को दृष्टि से ही विचार किया जाय अर्थात् वाच्य का जो व्यञ्जक विषयक व्यापार होता है उसका विचार न किया जाय केवल उसके स्वरूप पर ही ध्यान दिया जाय तो भी स्वाभाविक रूप में ही वाच्य की अनन्तता हो जाती है । यह अनन्तता अवस्था देशकाल इत्यादि अनेक विशेषताओं से हुआ करती है ।’ यहाँ पर यह ध्यान रखना चाहिये कि ‘शुद्ध वाच्य का यह अर्थ नहीं है कि ऐसा वाच्य जिसमें व्यञ्जना की सत्ता ही न हो । क्योंकि यदि यह अर्थ माना जायगा तो काव्य की आत्मा तो वहाँ रहेगी नहीं । कारण यह है कि आत्मा तो प्रधानीभूत व्यङ्गयार्थ हो हो सकती है । अतः यहाँ पर शुद्ध वाच्य का अर्थ यह है कि केवल वाच्यार्थ की दृष्टि से ही विचार किया जाय व्यङ्गयार्थ पर विचार वाद के लिये स्थगित कर दिया जाय तो भी वाच्यार्थ भी अनन्त हो होते हैं । वृत्तिकार का मन्तव्य यही है इसमें प्रमाण यह है कि उन्होंने शुद्ध वाच्य के जो भी उदाहरण दिये हैं उनमें स्वतः रसव्यञ्जना विद्यमान है । वाच्य चाहे चेतन हों चाहे अचेतन उनका स्वभाव हो यह होता है कि जब वे काव्य का विषय बनते हैं तब उनमें अनन्तता आ जाती है । यह अनन्तता अनेक कारणों से होती है जैसे अवस्था-भेद , देश-भेद काल-भेद । इन विशेषक तत्वों का परिगणन कराते हुये कारिका में आदि शब्द का प्रयोग किया गया है । आदि का अर्थ है स्वलक्षण ( स्वलक्षण शब्द स्वलक्षण शब्द को भाववाचक संज्ञा है । स्वत अर्थात् स्वयं ही लक्षण है जिसका अर्थात् अपना स्वरूप ) । आशय यह है कि अवस्था-भेद , देशभेद और कालभेद के साथ अपना स्वरूप भी भेदक होता है जैसे पृथक् ही द्रव्य में, एक ही काल में तीन एक अवस्थावाले रूप और स्वर्ण में परस्पर
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मेद होता है। आचार्य यह है कि वस्तुएँ तो अवस्था हत्यादि के मेद से अनेक स्वभाववाली होती हैं। यदि उन वस्तुओं को काव्य में इस रूप में उपनिबद्ध किया जाय कि उसमें स्वभावोक्ति का ही प्रयोग किया जाय जिसका रूप यह होता है कि वस्तुओं के प्रसिद्ध अनेकविध स्वभावों का अनुसरण किया जाता है तो भी काव्य का विस्तार इतना अधिक हो जायेगा कि काव्यार्थों की कोई सीमा ही न रहेगी।
सर्वप्रथम अवस्थामेद से अनंतता को लीजिये। कुमारसम्भव में कविकुलगुरू कालिदास ने पार्वती के यौवनजस्य लावण्य का बड़ा ही मनोरम वर्णन किया है। यह वर्णन 'असंभृतं मण्डनं मण्डयष्टे:' इस पद्य से प्रारम्भ होता है। अंग-प्रत्यंग का वर्णन तथा 'सर्वोंऽमाददप्समुच्चयेन' इत्यादि पद्य के द्वारा शारीरिक समस्त शृंगार वर्णन इतना मनोरम वन पड़ा है कि मालूम पड़ने लगता है कि रूप-लावण्य के वर्णन की दिशा में अब कुछ कहने को शेष ही नहीं रह गया।
फिर जब तृतीय सर्ग में सखियों के साथ रासक्रीड़ा करने जाती हैं 'वसन्तपुष्पभरणं वहन्ती' 'शङ्खारिणी पत्त्राविनी लतावेष्ट' इत्यादि के द्वारा पुनः उनके सौन्दर्य का वर्णन किया गया है। यह अवस्था भिन्न है जिससे वर्णन में भी एक नया चमत्कार आ जाना है।
फिर पञ्चम सर्ग में 'विमुख्य साहारमहार्यनिश्र्चया' इत्यादि के द्वारा उनके तपस्विनी रूप का वर्णन किया जाता है वह अवस्था भिन्न ही है और वह वर्णन भी नवीन हो गया है।
इसके बाद सप्तम सर्ग में जब विवाह निवेदय तन्वीम्' इत्यादि पद्यों के द्वारा उनकी इस नवीन अवस्था का वर्णन किया गया है जो कि नई चमक पैदा कर देता है।
एक ही पावती हैं और वर्णन करनेवाला कवि भी एक ही है तथा एक ही काव्य में बार-बार वर्णन किया गया है फिर भी वहाँ पर न तो स्वल्प मात्रा में भी पुनरुक्ति मालूम पड़ती है और न यही मालूम पड़ता है कि प्रत्येक वर्णन में एक नवीनता नहीं है।
कारण स्पष्ट है—एक ही व्यक्ति अवस्थामेद से असंख्य प्रकारों से वर्णित किया जा सकता है।
(यहाँ पर 'दीक्षित' टोकाकार ने 'पुनरुक्तवैन वाडनवनवार्थेनभर्स्वेन' यही पाठ माना है और प्रकरण के अनुसार यह ठीक भी है। आचार्य विश्वेश्वर ने लिखा है कि सभी संस्करणों में 'अपुनरुक्तवेन' और 'नवनार्थनिभर्स्वेन' यह पाठ पाया जाता है।
यद्यपि प्रकरणानुसार यह ठीक नहीं है तथापि जो सभी संस्करणों में पाया जाता है वह लेखक का प्रमाद नहीं हो सकता, अतः उसकी संगति बिठाई ही जानी चाहिये। उन्होंने उसकी संगति बैठाने की चेष्टा की है और बहुत कुछ संगति बैठ भी गई है।
किन्तु मेरी समझ में सङ्गुद पाठ की जैसी-तैसी संगति
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न च तेषां घटते डवाद्धि: न च ते दृश्यन्ते कथंमपि पुनरुक्ता: । ये विभ्रमा: प्रियाणामर्था वा सुकविवाणीनाम् ॥ चकाराभ्यामतिविस्मय: सूच्यते । कथमपि इति । प्रयत्नेनापि विचार्यमाणं पौनरुक्त्यं न हश्यमिति यावत् । प्रियाणामिति । बहुवल्लभो हि सुभगो राधावल्लभमप्रायस्तास्ता: कामिनी: परिभोगसुभगसुप्रसुप्तज्ञानोऽपि न विभ्रमपौनरुक्त्यं परस्पति तदा । एवदेव प्रियालवमुख्यते यदाह—
‘क्षणे क्षणे यन्नवतामुपैति तदेव रूपं रमणीयताया: ।’ इति ‘नच’…‘वाणीनाम्’ उक्त गाथा की संस्कृतच्छाया है । दो चकारों से अतिविस्मय सूचित होता है । ‘कैसे भी’ यह । आशय यह है प्रयत्नपूर्वक विचार किया हुआ भी पौनरुक्त्य प्राप्य नहीं है । ‘प्रियाओं को’ यह । बहुधा वल्लभाओंझाला राधावल्लभ का जैसा सुभगद्रव्यक्ति त्रिभिन्न कामिनियों का सुभोग के सौभाग्य के साथ उपभोग करता हुआ उस समय विलासों के पौनरुक्त्य को नहीं देखता । यही तो प्रियालव कहा जाता है जैसा कि कहा गया है— ‘क्षण-क्षण पर जो नवीनता को धारण करे वही रमणीयता का रूप यह है ।’
तारावती
बैठाने की अपेक्षा यह आधिक अच्छा है कि लेखक का प्रमाद मान लिया जाय । द्विचितिकार ने ऐसा किश्वा भी है । ) यह आनन्दवर्धन की लिखी हुई विषम वाण लीला में दिखलाया गया है । पद्य का आशय यह है— ‘प्रियतमाओं के जितने विलास होते हैं तथा सत्कवियों के जितने अर्थ होते हैं न तो उनकी इयत्ता ही निश्चित की जा सकती है, न उनकी सीमा ही प्राप्त होती है और यदि एक ही प्रकार की चेष्टायें बार-बार होती हैं तो भी उनमें किसी प्रकार भी पुरानापन तथा पुनरुक्ति नहीं मालूम पड़ती ।
एक पद्य में दो बार ‘न च’ शब्द का प्रयोग किया गया है जिससे ध्वनित होता है कि यह महान् आश्चर्य की बात है कि रमणियों के विलासों और कवियों के अर्थों में कभी पुरानापन नहीं आता । ‘किसी प्रकार भी’ शब्द का आशय यह है कि कितना ही प्रयत्नपूर्वक उनका मनन तथा चिन्तन किया जाय, कितना ही उनका पर्यवेक्षण तथा अनुसन्धान किया जाय किन्तु उनमें पुरानापन तथा शिथापिटापन दिखलाई ही नहीं देता । ‘प्रियतमाओं’ में बहुवचन का आशय यह है कि राधावल्लभ भगवान् कृष्ण जैसे जो व्यक्ति अनेक वल्लभाओं का उपभोग किया करते हैं और प्रत्येक कामिनी के उपभोग में सौभाग्य का अनुभव करते हैं उन्हें कभी भी
देख नहीं सक्कम पड़ता कि उनकी प्रत्येक प्रेयसी के विभ्रम एक जैसे ही हैं । उन्हें
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प्रियाणामिति चासंसरं प्रवहद्भूपो योऽयं कान्तानां विभ्रमविशेषः स नवनवैव दर्शयते । नह्यसावकृत्यनादिवदन्यान्तः शिक्षितः, येन तत्तदर्शयात् पुनरुक्ता गच्छेत् । अपि तु निसर्गोऽस्यामानमदनाऽऽकुरविकासमात्रं तदिति नवनवत्वम् । तदुक्त-स्परकोपशिक्षानपेक्षनि प्रतिभागुणनिष्ठानन्दभूतः काव्यार्थ इति भावः ।
और ‘प्रियाओं का’ इसका भाव यह है कि समस्त संसार में प्रवाहमय रूप- वाला जो कान्ताओं का विभ्रम विशेष वह नवीन नवीन ही दिखलाई देता है । भाव यह है कि यह अग्निचयन आदि के समान कहीं और स्थान से नहीं सीखा गया है जिससे उसके साहश्य से पुनरुक्तता को प्राप्त हो जाय। अपितु वह स्वभावतः खिलनेवाले मदनांकुर का विकासमात्र है, अतः वह नवीन नवीन ही होता है । वैसे ही पराई शिक्षा की अपेक्षा न करते हुये अपनी प्रतिभा के गुण का निध्यानन्द रूप ही काव्यार्थ होता है ।
तारावती प्रत्येक वार नया ही आनन्द आता है । प्रिय होने की परिभाषा भी तो यही है जैसा कि शिशुपाल वध में कहा गया है कि ‘जो वस्तु प्रत्येक क्षण पर नई ही मालूम हो वही रमणीयता का रूप कही जा सकती है ।’ समस्त संसार में कामिनियाँ और प्रियतमायें भरी पड़ी हैं । प्रत्येक कामिनी के विलास धारावाहिक रूप में प्रवाहित होते रहते हैं । कान्ताओं का प्रत्येक दृष्टिपात, प्रत्येक चाल तथा अंगों की प्रत्येक क्रिया सर्वदा नई ही मालूम पड़ती है । उसमें कभी पुरानापन नहीं आता । बात यह है कि पुरानापन तो उसमें आता है जो किसी दूसरे से सीखा जाय और सीखकर उसी प्रकार उसका अभ्यास किया जाय । उदाहरण के लिये अग्नि कााधान एक ऐसो वस्तु है जिसकी शिक्षा दूसरों से ली जाती है और उसी के अनुसार अभ्यास किया जाता है । अतएव अग्न्याधान की क्रिया एक जैसी ही मालूम पड़ेगी और बार बार देखने पर वह क्रिया देखी हुई पुरानी प्रतीत होगी । इसके प्रतिकूल रमणियों की प्रेमाभिव्यक्तक चेष्टायें कहीं से सीखी हुई नहीं होतीं अपितु जिस समय उनके हृदयों में कामवासना का अंकुर फूटता है उस समय उनके विलास उसी प्रकार प्रारम्भ हो जाते हैं जैसे किसी अकुर के निकल आने के बाद उसका विकास अपने आप होता जाता है । विभिन्न अकुरों के विकास विभिन्न प्रकार के होते हैं उसी प्रकार नायिकाओं के यौवनजन्य विलास भी व्यक्तिगतर होते हैं, कभी पुराने नहीं पड़ते । यही दशा सत्कवियों की काव्यवस्तु की भी होती है । वस्तु की कल्पनायें उद्भावना कहीं से सीखी हुई नहीं होती और न इसकी कोई शिक्षा ही दे सकता है अपितु कवियों में जो जन्मजात प्रतिभा होती है उसी
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अयं तावद्वस्त्वास्थाभेदप्रकारो यद्वचेतनानां सर्वेषां चेतनं द्वितीयं रूपमभिमानित्यप्रसिद्धं हिमाद्रिगङ्गादीनाम् । तच्चोचितविनियस्वरूपयोजनयोः प्रतिबन्ध्यमानमन्यदेव सम्पद्यते । यथा कुमारसंभवे एव पर्यंतस्थहिमवतो वर्णनं, पुत्रः सम्प्रेषितुं शक्यो चेतनतस्वरूपोपक्षेपात् तद्पूर्वमेव प्रतिभाति । प्रसिद्धश्रायं सत्कवीनां मार्गः । इदं तु प्रस्थानं विमर्शणशीलानां सम्प्रष्टव्यं दर्शितम् । चेतनानां च वाल्याद्यवस्थाभिरनन्यतं सत्कवीनां प्रसिद्धमेव । चेतनानामवस्थाभेदेऽप्यन्तरावस्थाभेदान्नातम् । यथा कुमाराणां कुसुमशराभिन्नहृदयानामन्यासां च । तत्रापि विनीतानामविनीतानाच । अचेतनाच भासमानाम् । रसभास्यवस्थाभेदाभिन्नानामेकैकशः स्वरूपमपन्निच्छ्यम् । अनमाननन्यमेवोपयाति । यथा--हंसानां निनादेषु यैः कवलितैरासज्यत कूजतामन्यः काकपि कषायकण्ठलुठनादार्वरो विभ्रमः ।
ते समग्रकठारवर्णनव्युदन्तैः कुसुमशरप्राणैः निर्याताः कमलाकरेऽपि ममन्यैः । एतन्मन्यत्रापि दिशानयानुसतेव्यम् ।
(अनु०) यह दूसरा अवस्थाभेद का प्रकार है जो हिमालय गंगा इत्यादि सब अचेतनों का दूसरा चेतनरूप अभिमानितत्र के रूप में प्रसिद्ध है । वह उचित विषय स्वरूप की योजना के द्वारा उपनिबद्ध किये जाने पर और ही हो जाता है । जैसे कुमार-संभव में ही पर्वत स्वरूप हिमालय का वर्णन, फिर ऋषियों की प्रिय उक्तियों में उसके चेतन स्वरूप की दृष्टि से दिखलाया हुआ वह अपूर्व ही प्रतीत होगा है । और यह सत्कवियों का मार्ग प्रसिद्ध हो है । यह प्रस्थान विमर्शणशीलाओं में प्रष्टव्य के साथ दिखलाया गया है । चेतनों का वाल्य इत्यादि अवस्थाओं से अन्यत्व सत्कवियों में प्रसिद्ध हो है । चेतनों का अवस्थाभेद होने पर भी अवान्तर अवस्थाभेद से नानात्व हो जाता है । जैसे कुमारियों का कामदेव से भिन्न हृदय-वालियों का और दूसरों का । उसमें भी विनीतों का और अविनीतों का। आरम्भ हत्यादि अवस्थाभेद भिन्न अचेतनों का एक एक स्वरूप उपनिबद्ध किये जाने पर अनन्तता हो जाती है । जैसे :-
'जिनको मक्षण करने पर शब्दायमान हंसों के मधुर कंठों में संयोजन होने से कोमल स्तिग्ध नवा ही विलासमय स्वर सम्भ्रान्त हो जाता है; हस्तिनियों के कोमल सन्तानकुरों से स्पर्धा करनेवाली कमलिनी-कन्द की वे ही अपूर्व ग्रन्थियां कमलाकरों में निकल आई हैं ।' इस प्रकार अन्यत्र भी इसी दिशा से ( अननन्तता का ) अनुसरण कर लेना चाहिये ।
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देशभेदाद्रानात्वमचेतनानां तावत् । यथा वायूनां नानादिग्देशचारिणामन्ये-
और देशों से चलनेवाली वायु
षामपि सांलकुसुमादीनां प्रसिद्धमेव । चेतनानामपि मानषुग्रशुपतिप्रभृतितीनां
चेतनों का गाँव वन जल इत्यादि में बढे हुये मनुष्य पश्वादि इत्यादिकों का परस्पर
प्रामाण्यसलिलादिसमेधितानां परस्परं महान् विशेषः समुपलभ्यत एव । स च
महान् विशेष दिखलाई ही देता है । और वह विवेचन करके ठीक रूप में
विविच्ये यथायथमुपनिबध्यमानस्तत्त्वैनान्त्यमाप्राप्ति । तथाहि—मानुपाणामेव
उपनिबद्ध किया हुआ उसी प्रकार आननत्य को प्राप्त हो जाता है । वह इस
तावद्विरदेशादिभिन्नश्रान्तं ये व्यवहाराव्यापारादिषु विचित्रा विशेषास्तेपां केन तृः
प्रकार—दिशा देश इत्यादि से भिन्न मनुष्यों के ही जो व्यवहार और व्यापार
शक्यते गन्तुम् , विशेषतो याषिताम् । उपनिबध्यते च तत्रैवमेव सुरुत्रिभिरियेथा-
इत्यादि उनकी जो विचित्र विशेषताएँ होती हैं उनके अन्त को कौन जा सकता है । और वह सब कवियों के द्वारा प्रतिभा के अनुसार निबद्ध
प्रतिभम् ।
किया जाता है ।
कालभेदाच्च नानात्वम् यथर्तुभेदादिग्रयोमससलिलादीनामचेतनानाम् । चेत-
और कालभेद से नानात्व जैसे ऋतुओं के भेद से दिया आकाश इत्यादि
नानां चौत्सुक्यादयः कालविशेषाश्रयिणः प्रसिद्धा एव । स्वालक्षणयप्रभेदाच्च
अचेतनों का । और चेतनों के औत्सुक्य इत्यादि कालनिमित्त का आश्रय लेनेवाले
सकलत्नाद्रतां वस्तूनां विनिवन्धनं प्रसिद्धमेव । तच्च यथावस्थितमपि तदुप-
प्रसिद्ध ही हैं । और स्वरूपभेद से समस्त संशार में विद्यमान वस्तुओं का वि्नि-
निबध्यमानत्तामेव काव्यार्थस्यापाद्यति ।
बन्धन प्रसिद्ध ही है । और वह ठीक अवस्था में उपनिबद्ध किये जाने पर काव्यार्थ
तावदिति । उत्तरकालं तु व्यज्ञयसंस्पर्शन विचित्रां परां मजतां नाम तावत्ति
की अननतता का ही समपादन करता है ।
तु स्वभावेनैव सा विचित्रेति तावच्छब्दस्यामिप्रायः ।
'तावत्' यह । बाद में तो व्यज्ञय के संस्पर्शों से बहुत बड़ी विचित्रता को प्राप्त कर ले उतने में तो स्वभाव से ही वह विचित्र होतो है यह 'तावत्' शब्द का अभिप्राय है ।
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का चारभूत निष्यन्द काव्यवस्तु है । वह भी युक्तियों की विलास चेष्टा के समान व्यक्तिगत ही होती है । अतः उसमें पुरानापन कभी आता ही नहीं ।
( अभिम तीन चार अनुच्छेदों में वृत्तिकार ने वस्तु की नवीनता की ही व्याख्या की है । यह स्पष्ट प्रकटण स्पष्ट है और लोचनकार ने इस पर टिप्पणी भी नहीं दी है । यहाँ इसका सार दिया जा रहा है । ) अवस्था भेद से वस्तु भेद
इस प्रकार भी होता है कि हिमालय गंगा इत्यादि का एक तो अपने स्वाभाविक अचेतन रूप में वर्णन किया जाता है, दूसरा रूप उन पर चेतना के आरोप के द्वारा होता है जिनमें उनके अभिमानी देवता की कल्पना कर दी जाती है ।
( पुराण इत्यादि में जहाँ कहीं हिमालय गंगा इत्यादि के मानवसुलभ क्रियाकलापों का वर्णन किया जाता है वहाँ उनके एक चेतन अभिमानी देवता की कल्पना कर ली जाती है और उस देवता के क्रियाकलापों को ही गंगा इत्यादि का क्रियाकलाप माना जाता है । इसके अतिरिक्त मानव-गत चेतना के आरोप के साथ वस्तुओं के वर्णन की भी कविपरम्परा है । )
कुमार सम्भव में हिमालय के अचेतन रूप का प्रारम्भ में वर्णन किया गया है, किन्तु बाद में सप्तशृंगियों की बातचीत के अवसर पर उनपर मानव धर्म का आरोप कर लिया गया है । अचेतन पर चेतन भावों का आरोप कवियों का एक सामान्य मार्ग है ।
इसका विस्तृत विवेचन आनन्दवर्धन ने विस्मय वाण लीला में किया है । अचेतन भावों की आरम्भ इत्यादि अवस्थाओं का भी भेद होता है जैसे ‘हसनां निनदेषु’ इत्यादि पद्य में विसिनी कन्द को प्रारम्भिक अवस्था का वर्णन एक नई हो वस्तु है यद्यपि विसिनी के अनेक रूपों का कवियों ने वर्णन किया है ।
इसी प्रकार चेतनों की अवस्थायें भी नाना गौण इत्यादि के द्वारा भिन्न होती हैं जैसे कुमारियों की कामवासना से पीड़ित अवस्था और विकार रहित अवस्था, उसमें भी विनीत कुमारियाँ और अविनीत कुमारियाँ ।
देश भेद से अचेतनों का नानात्व जैसे अनेक दिशाओं से चलने वाले वायु हे । चेतनों में भी मानव, पशु, पत्ती इत्यादि में भी देशजन्य तथा ऋतुजन्य भेद होता ही है । इसी प्रकार ग्रामीण, जंगली, जलीय, शहरी इत्यादि विशेषताएँ जीवों में होती हैं ।
यदि देशभेद को दृष्टिगत रखकर काव्यरचना की जाय तो काव्य-वस्तु अनन्त हो जायेगी । दिशा और देश के भेद से मनुष्यों में, उनके व्यवहार में, रीति-रिवाज में, क्रियाकलाप में, मनुष्यों में परस्पर इतने भेद होते हैं कि कोई भी व्यक्ति उनका पार नहीं पा सकता ।
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अत्र केचिदाच्चिरन—यथा सामान्यात्मना वस्तूनि वाच्यतां प्रतिपद्यन्ते न विशेषात्मना; तान् हि स्वयमनुभूतानां सुखादीनां तन्निमित्तानां च स्वरूपमन्यमारोपयद्धिः स्वपरानुभूततूपसाभ्र्यान्यमात्राश्रयेणोपनिबध्यन्ते कविमिः। न हि तैरतदितमनुभाव्यं वक्तुमाश्रयते पोक्तिकादिस्थलक्षण योगिभिरेव प्रत्यक्षीक्रियते, तद्यानुभाव्यानुभवसामान्यं सर्वप्रतिपत्तृसाधारणं परिमितलक्ष्यपुरातनानामेव गौचरीभूतम्, तस्यादिष्यतत्वादुपपत्तेः। अत एव स प्रकारविशेषो यैरद्यतनैरभिनवत्वेन प्रतीयते तेऽपि मानमात्रमेव भणितिकृतवैचित्र्यमात्रास्तीति।
यहाँ पर कुछ लोग कहे—जैसे वस्तुयें सामान्य आत्मा से वाच्यता को प्राप्त होती हैं विशेष आत्मा से नहीं। वे ( वस्तुयें ) तो स्वयंम् अनुभूत सुख इत्यादि के और उन ( सुख इत्यादि ) के निमित्तों के स्वरूप को अन्यत्र आरोपित करनेवाले कवियों के द्वारा अपने और दूसरों के द्वारा अनुभूत किये हुये सामान्यमात्र के आश्रय से उपनिबद्ध की जाती हैं। उनके द्वारा अपरिचित स्वभाववाले अतीत अनागत और भविष्य वस्तु का योगियों के समान प्रत्यक्ष नहीं किया जाता। और वह अनुभाव्य और अनुभावक सामान्य सभी प्रतिपत्ताओं में सर्वसाधारण रूप में परिमित होनेके कारण प्राचीनों के ही गोचरीभूत हो गया क्योंकि उसके प्रत्यक्ष का विषय न होने की सिद्धि नहीं होती। अनएव वह प्रकारविशेष जिन आधुनिकों के द्वारा अभिनव रूप में प्रतीत किया जाता है वह उनका अभिमान मात्र है। यहाँ पर उक्ति के द्वारा सम्पादित वैचित्र्य है।
तन्निमित्तानां चेति। महतामाल्यादीनामू। स्वेति। स्वानुभूतपरानुभूतानां यत्सामान्यं तदेव विशेषान्तररहितं तन्मात्रं तस्याश्रयेण। प्ततचात्यन्तासम्भावनार्थमुक्तम्। प्रत्यक्षदर्शनेऽपि हि—शब्द: सङ्केतितं प्राहुरुद्यवहाराय स स्मृतः। तदास्वलक्षणं नास्ति सङ्केतेऽस्तेन तत्र नः॥इत्यादियुक्तिमिस्सामान्यमेव स्पृश्यते।
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चाल ढाल पहिरावों इत्यादि में भेद होता है उसका तो कोई ठिकाना नहीं । कवि लोग अपनी प्रतिभा के अनुसार इन सभी विभेदों का उपयोग अपने काव्यों में करते हैं ।
कालभेद से भी नानात्व होता है । विभिन्न ऋतुओं में दिशायें, आकाश जल इत्यादि विभिन्न प्रकार के हो जाते हैं । यह तो हुएँ अचेतन की बात । चेतनों में उत्कण्ठा इत्यादि का परिणाम और उनका स्वरूप आयु, ऋतु, इत्यादि काल भेद के अनुसार घटता-बढ़ता रहता है । स्वरूपभेद तो प्रसिद्ध ही है । किसी एक लोहे के खम्भे पर ही असंख्य दृष्टियों से विचार किया जा सकता है, अतः उसके असंख्य ही स्वरूप हो जाते हैं । यदि इन समस्त भेदों को दृष्टिगत रखते हुए इनकी स्वाभाविक स्थिति का ही काव्य में निरूपण कर दिया जाय तो भी काव्यविषय अनन्त हो जायगा । फिर यदि उनमें कल्पना का भी योग कर दिया जाय तब तो कुछ कहना ही नहीं ।
वृत्तिकार ने इस प्रकरण में देशभेद का परित्यय देते हुये 'तावत्' शब्द का प्रयोग किया है ( देशमेदिन नानात्वमचेतनानां तावत् ) इस तावत् शब्द का आशय बतलाते हुये लोचनकार ने लिखा है—‘तावत्’ शब्द के प्रयोग का आशय यह है कि यहाँ पर जो भी विचार किया गया है वह वाच्यवृत्ति तथा काव्यविषय को ही दृष्टिगत रखते हुये किया गया है । यदि हम अभिधेयार्थ की विचित्रता पर ध्यान न दें केवल वाच्य वस्तु की ही विलक्षणता पर विचार करें तो भी काव्य-वस्तु का स्वाभाविक स्वरूप ही अनन्त हो जाता है । इसके बाद जब बाद में उन वाच्यार्थों से व्यङ्ग्यार्थ का स्पर्श होता है और एक एक वाच्य के सैकड़ों व्यंग्य हो जाते हैं । तब तो काव्य की अनन्तता का ठिकाना ही नहीं रहता ।
वाच्य की दृष्टि से काव्य की अनन्तता का ऊपर प्रतिपादन किया गया है । इस पर पूर्वपक्ष की ओर से एक प्रश्न उठाया जा रहा है कि वस्तु के अनेक पक्ष हो सकते हैं । एक ही वस्तु विभिन्न देशों में विभिन्न प्रकार की होती है, फिर भूत, भविष्य, वर्तमान कृत कालभेद के कारण भी वस्तुयें बदल जाती हैं फिर विभिन्न अवस्थाओं में पड़ने के कारण भी वस्तुभेद हो जाता है, फिर उनके अपने तो स्वगत असंख्य पक्ष हो ही सकते हैं । यह सब विवाद-स्पद नहीं है । किन्तु प्रश्न यह है कि इस सबका परिज्ञान होता किसको है ? इस प्रश्न का उत्तर होगा एक योगी को । केवल योगी ही अपनी योगसाधना के द्वारा करतलामलकवत् सभी विश्व को देख सकता है और भूत, भविष्य तथा वर्तमान का प्रत्यक्ष कर सकता है । कवि कोई योगी तो है नहीं । जो वस्तु को उसके समस्त
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पक्षों में देख सके तथा उसका अनुभव कर सके । आशय यह है कि जिस प्रकार योगी अपरिचित के स्वरूप को भी योगसाधना से प्रत्यक्ष के समान देख सकता है वैसी शक्ति कवि को नहीं होती । कवि तो जितना कुछ उसके लिये प्रत्यक्ष होता है उतना ही देख सकता है । अतः कवि को यह करना पड़ता है कि वह अपने अनुभव से ऐसे सामान्य तत्त्वों को छाँटता है जो दूसरों के भी अनुभव हो सकते हैं । इस काव्य में कवि उन तत्त्वों को वर्णने की चेष्टा करता है जो विशिष्ट अंश होते हैं और सामान्य अनुभव का विषय नहीं बन सकते । कवि केतल सामान्य तत्त्व का आश्रय लेकर काव्यवस्तु को चुनता है । अपने अनुभव किये हुए सुख इत्यादि तथा सुव इत्यादि के निमित्त ऋतु माला इत्यादि का आरोप अपने कल्पित पात्रों पर कर देता है । इस सबकार यहाँ है कि सामान्य तत्त्व ही काव्य का विषय बन सकते हैं विशिष्ट नहीं । इससे सिद्ध होता है कि अनुभवयोग्य जितने भी सुख इत्यादि हैं, उनके जितने भी लौकिक पदार्थ हैं वे सभी सामान्य रूप ही होते हैं । इस प्रकार वस्तुओं के सामान्य रूप तो सीमित ही होते हैं और उन सबको पुराने कवियों ने ही प्रत्यक्ष कर लिया था तथा उनको अपने काव्यों में स्थान भी दे दिया । यह तो हम कह ही नहीं सकते और न यह बात सिद्ध ही की जा सकती है कि सामान्य-रूप में सभी पदार्थ काव्य का विषय नहीं बन सके तथा पुरान क्रान्तदर्शी कवियों ने वस्तुओं को उनके सामान्य रूप में नहीं देख पाया । यहाँ पर जो कुछ कहा गया है उसका सार यही है कि कवि अपने काव्य में सामान्य वस्तु का ही व्यवहार करते हैं । समस्त वस्तुओं को उनके विशेष रूप में देखना सर्वथा असम्भव है । जिन वस्तुओं को कवि विशिष्ट रूप में देखता भी है, उन वस्तुओं का प्रयोग भी वह उनके सामान्य रूप में ही करता है विशेष रूप में नहीं । यदि कवि विशेष रूपों का अपने काव्य में उपादान करे तो वे वस्तुयें सर्वसाधारण की समवेदना का विषय बन ही न सकेंगी । जैसा कि कहा गया है :-
'शब्द संकेतित अर्थ को ही कहते हैं । संकेत ग्रहण का प्रयोजन यही है कि व्यवहार का निर्वाह हो सके । शब्दों का अर्थ विशिष्ट नहीं होता और न संकेत-ग्रहण के अवसर पर विशेषता की ओर ध्यान हो जाता है । इससे संकेत उन वस्तुओं में सम्भव होता है ।' ( आशय यह है कि 'गो' शब्द से संकेत के द्वारा गोत्व का ही बोध होता है विशिष्ट गाय का नहीं । क्योंकि विशिष्ट गाय में सकृ्त ग्रहण नहीं हो सकता । )
इस प्रकार वस्तुयें अपने सामान्य रूप में प्राचीन कवियों के द्वारा ग्रहीत हो ही
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तत्रोच्यते--यत्तत्कं सामान्यमात्राश्रयेण काव्यप्रवृत्तिस्तस्य च परिमितत्वेन प्रागेव गोचरोकतत्याश्रित नवत्वं काव्यवस्तूनामिति तद्युक्तम्--यतो यदि सामान्- न्यमात्रमाश्रित्य काव्यं प्रवर्तते किंकृतस्तर्हि महाकविनिबन्ध्यमानानां काव्यार्थानाम्- तिशयः ? वल्मीकाव्यतिरिक्तस्यान्यस्य कविव्यपदेश एव वा ? सामान्यव्यतिरिक्स्यान्यस्य काव्यार्थस्याभावात्, सामान्यस्य चादिकविनैव प्रदर्शितत्व्यात्। उक्तिवैचित्र्याद्रेप दोष इति चेत्--किमिदमुक्तिवैचित्र्यम् ? उक्तिरहि वाच्यविशेष- प्रतिपादितवचनम्। तद्रे चिचित्र्ये कथम् न वाच्यवैचित्र्यम् ? वाच्यवाचकयोरविनाभावेन प्रवृत्ते:। वाच्यानां च काव्ये प्रतिभासमानानां यद्रूपं तत्तु ग्राह्यविशेष- भेदेनैव प्रतोयते। तेनोक्तिवैचित्र्यवादिना वाच्यवैचित्र्यमनिच्छताप्यवश्यमेवाभ्युपगन्तव्यम्। तद्यमत् सङ्ग्रहः--
(अनु०)उस विषय में कहा जा रहा है--जो यह कहा गया है कि सामान्यमात्र के आश्रय से काव्यप्रवृत्ति होती है और उसके परिमित होने के कारण पहले ही गोचर हो जाने से काव्यवस्तुओं का नवीनत्व होता ही नहीं वह ठीक नहीं है क्योंकि यदि केवल सामान्य का आश्रय लेकर काव्य प्रवृत्त होता है तो महाकवियों के द्वारा निवद्ध किये हुये काव्यार्थों की अतिशयता किसके द्वारा सम्पादित की हुई होती है ? अथवा वाल्मीकि से व्यक्तिरिक्त किसी अन्य का कवि नाम ही कैसे होता है। क्योंकि सामान्य से भिन्न अन्य काव्यार्थ का अभाव ही होता है और सामान्य का आदि कवि के द्वारा ही प्रदर्शन कर दिया गया है । यदि कहो उक्तिवैचित्र्य से यह दोष नहीं होता तो यह उक्तिवैचित्र्य क्या वस्तु है? उक्ति निस्सन्देह वाच्य विशेष के प्रतिपादन करानेवाले वचन को कहते हैं। उसके वैचित्र्य में वाच्य से होती है। और काव्य में प्रतिभासित होनेवाले वाच्यों का जो रूप वह तो ग्राह्य विशेष के भेद के साथ ही प्रतीत होता है। इससे उक्तिवैचित्र्यवादी के द्वारा न चाहते हुये भी वाच्यवैचित्र्य स्वीकृत किया जाना चाहिये। तो यह यहां पर संक्षेप है ।—‘यदि वाल्मीकि से भिन्न किसी एक की भी प्रतिभा अर्थ में अभीष्ट हो तो वह आननुरूप्य हो जायेगा ।’
ईष्यते प्रतीकार्यो तत्तद्विनिर्नियमदर्शनात्॥
जुकी हैं। आधुनिक काव्य में अर्थ की तो कोई नवीनता है नहीं। जो लोग अपने अर्थ को नवीन कहने का साहस करते हैं यह उनका दम्भमात्र ही है। यदि काव्य
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किमिति। असंवेद्यमानमर्थपौनरुक्त्यं कथं प्राकरणिकैरीकृत्यैर्मितिभावः। तमेव प्रकटयति—न चेदिति। उक्तिहींनति। पर्यायमान्रतैव यद्य किंविशेषस्तत्पर्योयान्तरैरविचलं तदर्थोपनिबन्धे अपुनरुक्त्याभिमानो न भवति। तस्माद्विशिष्टवाच्यप्रतिपादके नैवोक्तौ विशेष इति भावः। ग्राह्यविशेषेति। ग्राह्यः प्रत्यक्षादिप्रमाणैर्यो विशेषः तस्य योऽभेदः। तेनायमर्थः—पदानां तात्सामान্যে वा तद्वदति वाडपोहे वा यत्न कुत्नापि वस्तुनि समयः, किमनेन वादान्तरेण ? वाक्यातद्विशेषः प्रतीयत इति कस्यात्र वादिनो विमति:? अन्वितामिधानतद्विपर्ययैः संसर्गभेदादिवाक्यार्थपक्षेषु सर्वत्र विशेषस्याप्रत्या- ख्येयत्वात् उक्तिवैचित्र्यं च न पर्यायमात्रकृतमित्युक्तम्।
'किसके द्वारा' यह। भाव यह है—संवेदनागोचर न होनेवाला अर्थ पौनरुक्त्य प्रकारणिकों के द्वारा कैसे अभीकृत किया जाने योग्य है। उसी को प्रकट करते हैं—'यदि कहो' इत्यादि। 'निस्संदेह उक्ति' यह। यदि उक्तिविशेष पर्यायमान्रता ही है तो दूसरे पर्यायों से अविकल रूप में उस अर्थ के उपनिबद्ध करने पर अपुनरुक्त्य का अभिमान नहीं होता। उससे विशिष्ट वाच्य के प्रतिपादक के द्वारा ही उक्ति की विशेषता होती है यह भाव है। 'ग्राह्य विशेष' यह। ग्राह्य प्रत्यक्ष इत्यादि प्रमाणों से जो विशेष उसका जो अभेद। उससे यह अर्थ होता है—पदों का तो सामान्य में अथवा तद्वान् में अर्थवा अपोह में चाहे जिस किसी वस्तु में हो, इन विशेषवादों की क्या आवश्यकता ? वाक्य से उसकी विशेषता प्रतीत होती है इस विषय मैं किस वादी की असहमत है ? क्योंकि अन्वितामिधान, उसके विपर्यय, संसर्ग भेद, इत्यादि वाक्यार्थ। पक्षों में सर्वत्र विशेष का तो प्रत्याख्यान किया ही नहीं जा सकता। यह तो कहा ही गया है कि उक्त वैचित्रय केवल पर्यायकृत नहीं होता।
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तारावती में कोई नवीनता सम्भव है। तो वह उक्तिर्विच्चित्रम या अभिव्यक्ति के प्रकार की ही नवीनता है, या हम दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि वस्तु के प्रस्तुत करने में ही कोई नवीनता हो सकती है वस्तु में कोई नवीनता नहीं हो सकती। ऐसी दशा में अवस्था, देश, काल इत्यादि के द्वारा काव्य-वस्तु की नवीनता का प्रतिपादन कहाँ तक सङ्गत कहा जा सकता है ? यह है प्रश्नकार का आशय। ( यह प्रश्न स्वरूप- गत भेद के विषय में विशेष रूप से सङ्गत होता है किन्तु अवस्था, देश, काल इत्यादि सभी भेदकों के विषय में लागू किया जा सकता है। ) यह एक सम्भावना- मूलक प्रश्न है क्योंकि 'उचचतरन' इसमें लिङ्लकार का प्रयोग किया गया है।
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यह सम्भावना उसी प्रकार की है जैसी कि प्रथम उद्योत में विरोधी सिद्धान्तों की उद्द्भावना में की गई थी। यहाँ पर बहुवचन प्रयोग सिद्ध करता है कि यह मत अनेकों का है किसी एक का नहीं।
अब इस प्रश्न के उत्तर पर विचार किया जा रहा है——यह कहना ठीक नहीं है कि काव्य में वस्तुओं के सामान्य रूपों का ही उपादान होता है। यदि सामान्यरूप में ही वस्तुओं का काव्यविषय बनाया जाय तो काव्य की असौम्यता सिद्ध ही नहीं हो सकता। वास्तविकता यह है कि काव्य में वस्तुयें अपने विशिष्ट रूप में ही प्रस्तुत की जाती हैं अथवा सामान्य रूप के साथ वस्तुओं का कुछ न कुछ विशेष रूप रहता ही है। कवि जिस देश जाति अथवा वर्ग का होता है और जिस समय में उसके व्यक्तित्व का निर्माण होता है साथ ही वस्तु की जिन अवस्थाओं को वह प्रत्यक्ष करता है उन सबकी झलक उसकी कविता में आ ही जाती है। इस प्रकार उसकी कविता कहीं भी सामान्यमात्र को लेकर प्रवृत्त नहीं हो सकती।
(उदाहरण के लिये राम-काव्य की रचना वाल्मीकि, कालिदास, तुलसीदास, मैथिलीशरणगुप्त इत्यादि अनेक कवियों ने की है। प्रत्येक कवि की कविता में उसके देशकाल की स्पष्ट छाप दिखाई देती है जिससे रामकथा अनन्त प्रकार की हो गई है। इसी आधार पर तुलसी ने कहा है—‘राम कथा की मिति जग नाहीं।’) यदि देशकाल अवस्था इत्यादि परिस्थितियों को काव्य-वस्तु के भेदक तत्व के रूप में स्वीकार न किया जाय और यहीं माना जाय कि काव्य केवल वस्तु के सामान्य रूप को लेकर चलता है तो महाकवियों के काव्यों की जो सीमातीत-रुपता है उसमें प्रभाण ही क्या रह जाय ? क्या यह सब व्यर्थ ही है ? जो कहा जाता है कि कालिदास महाकवि हुये, भारवि और माघकवि ने महाकाव्यों की रचनायें की, भवभूति बड़े अच्छे नाटककार थे, इत्यादि। क्या जितना भी काव्यवैचित्र्य दिखाई देता है वह पिष्टपेषण ही है ? क्या सर्वत्र पौनरुक्त्य हो है ? जब हम कोई नया काव्य पढ़ने लगते हैं तब हमें यह आभासित ही नहीं होता कि हम पढ़े हुये पुराने भावों को ही पढ़ रहे हैं। जब अर्थपौनरुक्त्य हमें संवेदनागोचर होता ही नहीं तब उसे प्रज्ञ्ञानुकूल कविता करनेवाले लोग स्वीकार कैसे कर सकते हैं ? जब वे किसी विशेष प्रज्ञा को लेकर कविता करते हैं तब यह कैसे मान सकते हैं कि उस प्रज्ञा की उनकी कविता पर कोई छाप नहीं वे तो केवल कही हुई बातों को ही दोहरा रहे हैं ?
यदि सामान्य को लेकर ही काव्यरचना की जाती है तो वाल्मीकि से भिन्न कालिदास इत्यादि किसी अन्य व्यक्ति को कवि कहना ही ठींक नहीं कहा जा सकता क्योकि वाल्मीकि आदि कवि
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है—उनके काव्य का इतना विस्तार है कि उन्होंने सभी सामान्य काव्यविषयों को काव्यबद्ध कर ही दिया है तथा आपके मत में सामान्य से भिन्न कोई काव्यार्थ होता नहीं । अतः कोई नया कवि कवि ही न कहा जायेगा और कोई भी नई कविता पुरानी कविता का विशिष्टरण ही रह जायेगी। यहाँ पर सामान्यतया वादी यह कह सकते हैं कि काव्य में नवीनता विषयवस्तु से नहीं अपितु उक्तिवैचित्र्य से आती है । इसे में पूँछना चाहता हूँ कि उक्तिवैचित्र्य से आपका तात्पर्य क्या है ? यदि पुरानी बात को पर्यायवाचक शब्दों द्वारा प्रकट करदिया जाय तो उसे आप उक्तिवैचित्र्य कहेंगे कि यदि हाँ तो यदि पूरा-पूरा वही अर्थ पर्यायवाचक शब्दों के माध्यम से उपनिबद्ध कर दिया जाता है तो आपका यह अभिमान खिद्ध नहीं हो सकता कि आपने कोई नई बात कही है या आप यह नहीं कह सकते कि आप पुरानी बात को ही नहीं दुहरा रहे हैं । आपका अगौनरुकत्य का अभिमान खिद्ध हो नहीं हो सकता । अतः उक्तिवैचित्र्य के मूल में आपको नये शब्द ही नहीं अपितु नया वाच्य भी स्वीकार करना पड़ेगा । आपको यह कहाना पड़ेगा कि उक्तिवैचित्र्य उसे ही कहते हैं जिसमें किसी विशेष उक्ति के द्वारा विशिष्ट वाच्य का प्रतिपादन किया जाय । क्योंकि वाच्य और वाचक का अविनाभाव सम्बन्ध है । वाच्य के बिना वाचक नहीं रह सकता और वाचक के बिना वाच्य नहीं रह सकता । दोनों का तादात्म्य सम्बन्ध है । अतः यदि वाचक में नवीनता आयेगी तो वाच्य में नवीनता स्वतः ही आ जायेगी । काव्य में जितने भी वाच्य प्रतीतिगोचर होते हैं उन वाच्यों के जितने भी रूप होते हैं वे सब अपने विशिष्ट रूप में ही प्रतीत हुआ करते हैं । प्रत्यक्ष इत्यादि प्रमाणों के आधार पर वस्तु की जो विशिष्टता अवगत होती है उसे विशिष्टता से अभिन्न रूप में ही काव्य के वाच्य संवेदनागोचर हुआ करते हैं । आशय यह है कि काव्यवस्तु विशिष्ट से ही सम्बन्ध रखती है सामान्य से नहीं । इस सबका निष्कर्ष यह है कि जो लोग काव्य में उक्तिवैचित्र्य को अज्ञकार करते हैं वे यदि न भी चाहें तब भी उनको उक्तिवैचित्र्य के साथ वाच्यवैचित्र्य मानना ही पड़ेगा । इससे वे पीछा नहीं लुड़ा सकते ।
ऊपर जो कुछ कहा गया है उसका आशय यह है कि यद्यपि अनेक विचारक पद की शक्ति सामान्य में मानते हैं तथापि वाक्यार्थ की दृष्टि से उन्हें विशेष में शक्ति माननी ही पड़ेगी । पदों का अर्थ आप चाहे जो मानें ( १ ) चाहे आप मीमांसकों के अनुसार यह मानें कि 'जिस शब्द से नियामित रूप से जो प्रतीत होता है वह उसका वाच्य होता है' जैसे, गाय लाओ इस वाक्य में गाय शब्द का वाच्य गोत्व है' ( अर्थसंप्रह ) अतः मीमांसकों के अनुसार सामान्य में शक्ति मानें; ( २ )
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किश्चिदुक्तिवैचित्र्यं यत्काव्यनव्यत्वे निवन्धनमुख्यते तदस्सत्पक्षानुगुणमेव । यतो यावानयं काव्यार्थानामनन्यभेदहेतुः प्रकारः प्रदर्शितः स सर्व एव पुनरुक्तिवैचित्र्यादिगुणतामापद्यते । यद्वायमुपमारलङेपादिरलङ्कारवर्गे प्रसिद्धः स भणिति-वैचित्र्यादुपनिवन्ध्यमानः स्वयमेव निवन्धे हेतुः पुनः । शाब्दावस्थानम् । अभणितिवैचित्र्यादुपनिवन्ध्यमानः स्वभावाभेदेन व्यवस्थितः सन् प्रतिनियतभापानोचचारार्थवैचित्र्यान्निवन्धनं पुनरपपं काव्यार्थानामाननत्यमापद्यति । यथा ममैव-महमह इत्ति भणन्तड गज्जादि कालो जणरसो । तोडि णा देहजणहण गोआरि भोदेि मणसो ॥इत्यं यया तथा निरूप्यते तथा तथा न लभ्यतेsन्तः काव्यार्थानाम् ॥ ७॥
काव्य में नवीनता का मुख्य कारण कुछ विशिष्ट उक्ति-वैचित्र्य होता है, जो सत्पक्ष के अनुकूल ही होता है । जितना काव्यार्थों के अनन्य भेद का हेतु प्रकार पहले दिखलाया गया है वह सब पुनरुक्ति वैचित्र्य आदि गुणों को प्राप्त हो जाता है । और जो यह उपमा आदि अलङ्कार वर्ग में प्रसिद्ध है वह भणिति वैचित्र्य से उपनिबद्ध किया हुआ स्वयं ही सीमातीत होकर शास्त्रता को धारण कर लेता है । और भणिति अपने भाषा-भेद से व्यवस्थित होकर प्रत्येक नियत भाषा में दिखलायी पड़नेवाले अर्थवैचित्र्य के कारण फिर दूसरा ही काव्यार्थों का आननत्य सम्पादित कर देता है । जैसे मेरा ही-मेरे मेरा कहते यद्यपि लोगों का समय व्यतीत हो जाता है फिर भी मध्यमयन देव जनादन उनके मन के गोचर नहीं होते । इस प्रकार जैसे जैसे निरूपित किया जाता है वैसे वैसे काव्यार्थों का आनन्त्य नहीं मिलता ॥ ७ ॥
तारावती चाहे नैय्यायिकों के अनुसार जातिविशिष्ट व्यक्ति में शक्ति मानें ( १ ) चाहे बौद्धों के अनुसार अपोह को पदार्थ के रूप में स्वीकार करें अर्थात् यह मानें कि गौ इत्यादि शब्दों का अर्थ अश्व इत्यादि का परित्याग होता है, हम चाहे जिस सिद्धान्त तथा वाद को स्वीकार करें हमें यह तो मानना ही पड़ेगा कि पदार्थ के मानने में चाहे ऐसा वैमत्य क्यों न हो वाक्यार्थ विशिष्ट में ही होता है और वाक्य से विशेष अर्थ की ही प्रतिति होती है । इस विषय में किसी भी वादी को वैमत्य नहीं है । चाहे हम अन्विताभिधान के अनुसार यह मानें कि शब्द की अन्वित में शक्ति होती है चाहे ( २ ) तद्रिप्रयं अर्थात् अभिहितान्वय के अनुसार अभिहितों का अन्वय स्वीकार करें, ( ३ ) चाहे नामार्थों का संसर्गविधि से अन्वय मानें ( देखिये
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अन्यत्तु यत्तत्प्रत्युतास्माकं पक्षसाधकमित्याह—किन्त्वेति । पुनरिति । । भ्रूय इत्यर्थः । उपमा हि निभं, प्रतिबिम्बं, छलं, प्रतिबिम्बं, प्रतिबिम्बं, प्रतिबिम्बं, तुल्यसदृशाभासादिभिरवैचित्र्याभिरुक्तिभिरवैचित्र्येव । वस्तुत एतासामुक्तीनामर्थवैचित्र्यस्यान्नैव चित्रमात्र । नियमेन भानयोगाद्धि निष्प्रतिषेधः, तदनुकरणतया तु प्रतिबिम्बशब्द इत्येवं सर्वत्र वाच्यं केवलं बालोपयोगी काव्यार्थकापरिशीलनदौर्बल्यादेव पुथ्यायत्वश्रम इति भावः । एवमर्थानान्त्यमलङ्कारानन्त्याद्वा मणितिवैचित्र्यादवते । अन्यथापि च तत्सतो भवतीति दर्शयति भणितिष्वेति । प्रातिनियतया भाषया गोचरो योडर्थस्तत्कृतं यद्वैचित्र्यं तत्र्वनन्धनं निमित्तं यस्स, अलङ्काराणां काव्यार्थानान्त्यस्यान्नैव स्यस् । तत्कर्मैभूतं मणितिवैचित्र्यं कर्तृभूतमपादयतीति सम्बन्धः । कर्मणो विशेषणच्छलेन हेतूदर्शितः ।
मम मम इति मणतो व्रजति कालो जनस्य । तथापि न देवो जनार्दनो गोचरो भवति मनसः ॥ मधुमथन इति योडनवरतं मणाति, तस्य कथमपि देवो मनोगोचरो भवतीति विरोधालङ्कारच्छाया । सैन्धवभाषया महामह इत्यनया मणित्या समुपक्लेषिता ॥ ७ ॥
मम मम इति मणतो व्रजति कालो जनस्य । तथापि न देवो जनार्दनो गोचरो भवति मनसः ॥ मधुमथन इति योडनवरतं मणाति, तस्य कथमपि देवो मनोगोचरो भवतीति विरोधालङ्कारच्छाया । सैन्धवभाषया महामह इत्यनया मणित्या समुपक्लेषिता ॥ ७ ॥
और जो कुछ है वह प्रत्युत हमारे पक्ष को ही सिद्ध करनेवाला है यह कहते हैं—‘और भी’ ‘अर्थात् फिर’ उपमा निस्सन्देह निभ, प्रतिम, छल, प्रतिबिम्ब, प्रतिबिम्ब, तुल्य, सदृश, आभास इत्यादि विचित्र उक्तियों से से विचित्र हो ही जाती है । क्योंकि वस्तुतः इन उक्तियों का अर्थवैचित्र्य विद्यमान ही है । नियम से भान को योग होने से निभे शब्द; उसकी अनुकरण होने से प्रतिमशब्द इस प्रकार सर्वत्र कहा जाना चाहिये । केवल बालोपयोगी काव्यटीकाओं के परिशीलन के दौर्बल्य से इनमें पर्यायत्व का भ्रम है यह भाव है । इस प्रकार अर्थानान्त्य और अलङ्कारानन्त्य यह भणिति वैचित्र्य से हो जाता है । अन्यथा भी वह भणितिवैचित्र्य से निस्सन्देह हो जाता है । प्रतिनियत भाषा में गोचर अर्थात् वाच्य जो अर्थ उससे क्रिया हुआ जो वैचित्र्य वह है निवन्धन अर्थात् निमित्त जिसका अर्थात् अलङ्कारों के और काव्यार्थ के आननत्यका । उस कर्मभूत को कर्तृभूत भणिति वैचित्र्य सम्पादित कर देता है यह भाव है । कर्म के विशेष के बहाने हेतु दिखलाया गया है । ‘मम मम—मनसः’ यह छाया है । ‘मधुमथन’ यह जो निरन्तर कहता है देव उसके मनोगोचर क्यों नहीं होते यह विरोध अलङ्कार की छाया है । सैन्धव भाषा के द्वारा ‘महमह’ इस उक्ति से प्रकट की गई है ॥ ७ ॥
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व्युत्पत्ति वाद, प्र० प्रकारण ) और चाहे ( ४ ) भेदसम्भन्ध का सिद्धान्त मानें अथवा इसी प्रकार की कोई और वाक्यार्थ की व्याख्या करें, प्रत्येक अवस्था में इस तथ्य का प्रत्याख्यान नहीं हो सकता कि वाक्य सर्वदा विशिष्ट अर्थ का ही अभिधायक होता है। इस विषय में किसी सिद्धान्ती की वेमतें हो नहीं। केवल उक्ति-वैचित्र्य के आधार तक ही काव्य की अनन्तता सीमित नहीं होती और न यह कहा ही जा सकता है कि किसी वाक्य में शब्दों के पर्याय रखने से ही उसमें उक्ति-वैचित्र्य आ जाता है। उक्तिवैचित्र्य तो तभी हो सकता है जब वाक्यवैचित्र्य भी हो। इस प्रकार संस्कृत में कहा जा सकता कि—
‘यदि आप वाल्मीकि को छोड़कर किसी एक कवि को भी कविरूप में स्वीकार करते हैं और यह मानते हैं कि अर्थ की दिशा में उनकी प्रतिभा प्रसरुरित हुई है तो यही बात आपको सभी कवियों के विषय में माननी पड़ेगी तथा इस प्रकार काव्य की अनन्तता स्वतः सिद्ध हो जायेगी। यदि वाल्मीकि से भिन्न किसी एक कवि को भी आप कवि नहीं मानते तो दूसरी बात है।’
ऊपर जो कुछ कहा गया है उससे काव्य की अनन्तता पूर्णरूप से प्रतिपादित हो जाती है। और भी बहुत सी बातें हैं जो काव्य की अनन्तता का प्रतिपादन करने को ओर अग्रसर करती हैं। आपने जो उक्तिवैचित्र्य की बात कही है वह भी निस्सन्देह काव्य की अनन्तता का ही निष्कर्ष निकालती है। क्योंकि हमने ऊपर बहुत से हेतु ऐसे दिखलाये हैं जो काव्यार्थ की अनन्तता का प्रतिपादन करते हैं। उन सब प्रकारों के साथ जब उक्तिवैचित्र्य भी सम्मिलित हो जाता है तब काव्यार्थों की अनन्तता और दूनी हो जाती है। उपमा इत्यादि बहुत से अलंकार गिनाये गये हैं। एक तो इन अलंकारों की संख्या ही बहुत अधिक है। फिर इनके भेदोपभेद असंख्य हो जाते हैं। उन भेदोपभेदों के साथ जब अन्य अलंकारों का प्रवर्तन होता जाता है तब सिद्ध होता है कि उनकी कोई निश्चित संख्या ही नहीं, वे असंख्य हैं।
फिर उन अलंकारों का सड़क या संश्रुष्ट होता है, दो-दो अलंकारों का सङ्कर, तीन-तीन का, चार-चार का, इस प्रकार अलंकारों के प्रयोग की कोई सीमा ही नहीं रह जाती। इतना ही नहीं एक-एक अलंकार के प्रयोग के भी इतने रूप हो सकते हैं कि उनका अन्त मिलता ही नहीं।
उदाहरण के लिये उपमा को ही लीजिये—इसके प्रकट करनेवाले बहुत से शब्द हैं—निभ, प्रतिम, छल, प्रतिबिम्ब, प्रतिच्छाय, तुल्य, सदृश, आभास इत्यादि। इन सब विचित्र प्रकार की उक्तियों से स्वयं उपमा अलंकार विचित्र हो ही जाता है। यह भी बात नहीं कि उपमा वाचक इन सब शब्दों के अर्थों में कोई अन्तर न हो। सूक्ष्म भेद तो इन सभी
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अथों में पाया ही जाता है 'निभ' शब्द का अर्थ है नियम से भान होना। प्रतिम शब्द का अर्थ है- 'प्रति' अर्थात् 'ओर' और 'मा' अर्थात् नापना अर्थात् जिसकी ओर करके कोई वस्तु नापी जाय, आशय यह है कि जिसका अनुकरण किया जाय। इस प्रकार सभी अर्थ कुछ न कुछ एक दूसरे से भिन्न अवश्य हैं। किन्तु कुछ लोगों ने बच्चों को समझाने के लिये काव्य ग्रन्थों की टीकाएँ लिखीं और उनमें उपमा वाचक सभी शब्दों को समानार्थक बना दिया। परिणाम यह हुआ कि जब दूसरे लोगों ने भी उन टीकाओं को पढ़ा तो वे भी उन सब शब्दों को पर्याय समझने लगे। किन्तु यह केवल उनका भ्रम है और इस भ्रम का उत्तरदायित्व उन टीकाकारों के परिशीलन पर है। वस्तुतः सभी शब्दों में कुछ न कुछ अर्थभेद होता है जिससे एक ही अलङ्कार की सैकड़ों शाखायें हो जाती हैं। इस प्रकार उक्तिवैचित्र्य का ही यह प्रभाव है कि अर्थों में भी आननन्त्य आ जाता है और अलङ्कारों में भी आननन्त्य आ जाता है।
केवल उक्तिवैचित्र्य ही भाषाभेद से भी काव्यार्थ में अननन्तता का सम्पादन करता है। संसार में संख्यातीत भाषायें हैं और सब भाषाओं की अपनी अपनी विशेषताएँ होती हैं। उन विशेषताओं से उक्तिवैचित्र्य सम्पन्न हो जाता है जिससे पुनः काव्यार्थों में अनन्तता आ जाती है। भाषा की विशेषता से अर्थानन्त्य भी हो जाता है और अलङ्कारानन्त्य भी। उदाहरण के लिये आनन्दवर्धन ने एक सिन्धी भाषा का पद्य वनाया था जिसका आशय यह है— 'लोगों का समय मधुमथन मधुमथन कहते ही बीतता जा रहा है तथापि देव-जनार्दन लोगों के मनोगोचर नहीं होते।'
जो लोग निरन्तर मधुमथन की ही रट लगाये रहते हैं उनको भगवान् जनार्दन मनोगोचर नहीं होते यह विरोध है। विरोध का परिहार यह है कि 'अहमह' शब्द के सिन्धी भाषा में दो अर्थ हो सकते हैं—'मधुमथन' और 'मम मम' अर्थात् 'मेरा मेरा'। जब दूसरे अर्थ को लिया जाता है तब इस पद्य का आशय हो जाता है कि लोग माया मोह में फंसे हैं; रात दिन 'यह मेरा' 'यह मेरा' की रट लगाये रहते हैं किन्तु भगवान् जनार्दन का ध्यान नहीं करते। यह विरोध का परिहार है। इस प्रकार सिन्धी भाषा के 'मह मह' शब्द के आधार पर यहाँ पर विरोधाभास अलङ्कार बन गया है। इसी प्रकार भाषाओं का आश्रय लेने से भी काव्यार्थ अनन्त विध हो जाता है। जितना जितना निरूपण किया जाय उतना उतना काव्य की अननन्तता का ही परिचय मिलता है।।७।।
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अवस्थादि विभिम्नानां वाच्यानां विनिबन्धनम् । यत्प्रदर्शितं प्राक् भूतं नैव हृश्यते लक्यये न तच्छक्यमपोढितुम् । तत् तु भाति रसाश्रयात् ॥ ९ ॥
अवस्था इत्यादि से विभिन्न वाच्यों का विनिबन्धन' जो पहले दिखलाया गया है । 'लक्ष्य में अधिकता से देखा जाता है' उसका परित्याग नहीं हो सकता 'वह तो रस के आश्रय से शोभित होता है' ॥ ९ ॥
तदिदमत्र सन्दीपेणाभिधीयते सत्कवीनामुपदेशाय — रसभावादिसंवद्र्धा यदौचित्यानुसारिणी । अन्वीयते वस्तुगतिदर्शकत्वादिवेदिनो ॥ ९ ॥
वह यहाँ पर सत्कवियों के उपदेश प्रसङ्ग में कहा जा रहा है :— यदि रस भाव इत्यादि से सम्बद्ध औचित्य का अनुसरण करनेवाली तथा देश काल इत्यादि से भिन्न होनेवाली वस्तु का अनुगमन किया जाय । तो दूसरे परिमित शक्तिवाले कवियों की गणना ही क्या जच कि 'सहस्र वाचस्पतियों के द्वारा सहस्र ही यत्नों से निवद्ध की हुई वह संसारों की प्रकृति के समान द्रव्य को प्राप्त नहीं होती' ॥ ९ ॥
तथा हि जगत्प्रकृतितितीतिकलङ्कपरम्पराविचित्रवस्तुप्रपञ्चा सती पुनर्द्वान् परिक्षीणा परपदार्थानिर्माणशक्तिरिति न शक्यते डभिधातुम् । तद्रदेवयं काव्यस्थितिरनन्ताभिः कविमतिभिरुपसुक्तापि नेदानीं परिहीयते प्रत्युत नवनव-भिङ्ग्युत्पत्तिभिः परिवर्धते ॥ १० ॥
वह इस प्रकार 'जगत् की प्रकृति अतीत कलङ्क परम्परा से आश्रिभूत विचित्र वस्तु प्रपञ्चवाली होती हुयी पुनः इस समय दूसरे पदार्थ के निर्माण की शक्ति परिक्षीण हो गई है यह नहीं कहा जा सकता ।' उसी प्रकार यह काव्यस्थिति भी अनन्त कविमतियों के द्वारा उपभुक्त भी इस समय परिहीन नहीं होती प्रत्युत नई नई व्ङ्ग्युत्पत्तियों द्वारा बढ़ती जाती है ॥ १० ॥
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अवस्थादिविमिन्नानां वाच्यानां विनिबन्धनम् । भून्नैव दृश्यते लक्ष्ये तत्तु माति रसाश्रयात् ॥ इतिकारिका । अन्यसुत ग्रन्थो मध्योपस्कार: ॥ ८ ॥
अवस्था आदि से विभिन्न वाच्यों का विनिबन्धन । यह लक्ष्य में नहीं दिखता है, किन्तु रसाश्रय से प्रतीत होता है ॥ यह कारिका है । अन्य ग्रन्थ का उपस्कार है ॥ ८ ॥
अत्र तु पौनरुक्त्यस्थार्थमनूद्य चतुर्थपादार्थोऽपृथक् तयोर्भाव्यते । तादृश्यादृशक्तीनामित्यान्तं कारिक्योर्मध्योपस्कार: । द्वितीयकारिक्यास्तुर्य पादं व्याचष्टे — यथा हीति ॥ ९, १० ॥ संवाद इति कारिक्याया अर्थ नैकरूपतयैति द्वितीयम् ॥ ९१ ॥ 'अवस्थादि…' 'रसाश्रयात्' यह कारिका है । अन्यग्रन्थ का उपस्कार है । यहाँ तो तीन पादों के अर्थ का अनुवाद करके चौथे पद का अर्थ अपूर्व होने के कारण कहा जा रहा है । 'तत्तु' यहाँ से 'शक्तीनाम्' यहाँ तक दो कारिकाओं के मध्य का उपस्कार । द्वितीयकारिका के चौथे पद की व्याख्या करते हैं—'वह इस प्रकार है' इति ॥ १० ॥ 'संवादास्तु' यह कारिका आधा है; 'नैकरूपतया' यह द्वितीय है ॥ ९१ ॥
८ से १० तक कारिकायें सामान्य उपसंहारात्मक हैं । न इन पर वृत्तिकार ने कोई विशेष टिप्पणी की है और न लोचनकार ने ही विशेष कुछ कहा है । इन सबका सार यह है—यह अधिकतर देखा जाता है कि वाच्यों को काव्य में अवस्था, देश, काल, स्वरूप इत्यादि के भेद से निवद्ध किया जाता है जिसका पहले परिचय दिया जा चुका है और जिसका अपलाप सम्भव ही नहीं है । किन्तु उस सबकी शोभा रस के आश्रय से ही होती है । शर्त यह है कि औचित्य का पालन किया जाय और रचना को रस, भाव इत्यादि से सम्बद्ध रखा जाय तो देश और काल से विभेद को प्राप्त होनेवाली वस्तु की गति इतनी अनन्त हो जाती है कि सामान्य सीमित शक्तिवाले कवियों का तो कहना ही क्या यदि हजारों वाचस्पति आ जावें और हजारों प्रयत्नों के द्वारा उसको निवद्ध करने की चेष्टा करें तो यह काव्यस्थिति समाप्त नहीं हो सकेगी । इसमें यह दृष्टान्त दिया जा सकता है कि संसार अनादि काल से चला आ रहा है । अनेक कल्पों में सृष्टि की रचना करने के लिये प्रकृति का उपयोग किया गया और सर्वदा सृष्टि में विचित्र और आश्चर्यजनक वस्तुओं का ही आविर्भाव हुआ । फिर भी यह नहीं कहा जा सकता कि दूसरे पदार्थों के निर्माण की शक्ति अब समाप्त हो गई है । उसी प्रकार कवियों की संख्यातीत बुद्धियों का समूह इस काव्यस्थिति का उद्भोग करता रहा है फिर भी काव्यवस्तु समाप्त नहीं हुई प्रत्युत नवीन नवोन व्युत्पत्तियों से बढ़ती ही जा रही है ॥८, ९, १०॥
८ से १० तक कारिकायें सामान्य उपसंहारात्मक हैं । न इन पर वृत्तिकार ने कोई विशेष टिप्पणी की है और न लोचनकार ने ही विशेष कुछ कहा है । इन सबका सार यह है—यह अधिकतर देखा जाता है कि वाच्यों को काव्य में अवस्था, देश, काल, स्वरूप इत्यादि के भेद से निवद्ध किया जाता है जिसका पहले परिचय दिया जा चुका है और जिसका अपलाप सम्भव ही नहीं है । किन्तु उस सबकी शोभा रस के आश्रय से ही होती है । शर्त यह है कि औचित्य का पालन किया जाय और रचना को रस, भाव इत्यादि से सम्बद्ध रखा जाय तो देश और काल से विभेद को प्राप्त होनेवाली वस्तु की गति इतनी अनन्त हो जाती है कि सामान्य सीमित शक्तिवाले कवियों का तो कहना ही क्या यदि हजारों वाचस्पति आ जावें और हजारों प्रयत्नों के द्वारा उसको निवद्ध करने की चेष्टा करें तो यह काव्यस्थिति समाप्त नहीं हो सकेगी । इसमें यह दृष्टान्त दिया जा सकता है कि संसार अनादि काल से चला आ रहा है । अनेक कल्पों में सृष्टि की रचना करने के लिये प्रकृति का उपयोग किया गया और सर्वदा सृष्टि में विचित्र और आश्चर्यजनक वस्तुओं का ही आविर्भाव हुआ । फिर भी यह नहीं कहा जा सकता कि दूसरे पदार्थों के निर्माण की शक्ति अब समाप्त हो गई है । उसी प्रकार कवियों की संख्यातीत बुद्धियों का समूह इस काव्यस्थिति का उद्भोग करता रहा है फिर भी काव्यवस्तु समाप्त नहीं हुई प्रत्युत नवीन नवोन व्युत्पत्तियों से बढ़ती ही जा रही है ॥८, ९, १०॥
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इत्थं स्थितेडपि -- संवादास्तु ध्वन्येवबाहुल्येन सुमेधसाम् । स्थितं ह्येतत् संवादिन्य एव मेधाविनां बुद्धयः । किन्तु -- न केषुचिदपि सर्वे ते मन्त्रतत्पया विपश्चितः ॥ ११ ॥
अनु० 'ऐसा स्थित होने पर भी—बुद्धिमानों के (वचनों में) वे सब एक रूप में नहीं माने जाने चाहिये । यदि कहो किस प्रकार ? तो—‘संवाद निस्सन्देह काव्यार्थ का कहा जाता है जो कि दूसरी काव्य वस्तु से साहश्य हो । जो कि फिर शरीरियों के प्रतिबिम्बवत् आलेख्यवत् और तुल्यदेहीवत् इन तीन रूपों में व्यवस्थित है । निस्सन्देह कोई काव्यवस्तु शरीररी ही दूसरी वस्तु के प्रतिबिम्ब के समान होती है, दूसरी आलेख्य के समान दूसरी तुल्य घरीरी के समान ।
संवादो ध्वन्यसाहश्यं तत्पुनः प्रतिबिम्बवत् । आलेख्याकारवतुल्यदेहीवच शरीरिणाम् ॥ १२ ॥
लोचन किमियं राजाज्ञेत्यमिप्रायेणाशङ्कते कथंमिति । चेदिति । अन्तरतमं--संवादोध्वन्येवनया कारिकया । एषा खण्डीकृत्य वृत्तौ व्याख्याता । शरीरिणामित्ययचछब्दः प्रतिवाक्यं दृश्यो हति दर्शितम् । शरीरिण इति पूर्वमेव प्रतिलङ्घस्वरूपतया प्रधानभूतस्यैवर्थः । क्या यह राजा की आज्ञा है इस अभिप्राय से शङ्का करते हैं—‘कैसे' यह 'यदि' यह । यहाँ उत्तर है—‘संवादो ध्वन्ये'व इस कारिका से । वृत्ति में इस कारिका को खण्डित करके व्याख्या की गई है । और यह दिखलाया गया है कि 'शरीरियों को' यह शब्द प्रत्येक वाक्य में दिखलाया जाना चाहिये । 'शरीरियो का' यह । अर्थात् पहले ही स्वरूप को प्राप्त हो जाने के कारण जो प्रधान है उसका ॥ १२ ॥
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स एतत् सर्ववाक्यान्तर विरचनापरं यत् । तदपरमार्थविमर्शं काव्यं प्रतिबिम्बकल्पं स्यात् ॥
काव्यमीमांसा में प्रतिबिम्बकल्प की यह परिभाषा दी गई है :- स एतत् सर्ववाक्यान्तर विरचनापरं यत् । तदपरमार्थविमर्शं काव्यं प्रतिबिम्बकल्पं स्यात् ॥ ( अ० १२ )
अर्थ: जहाँ सभी अर्थ पुराने कवि का हो कहा हो किन्तु वाक्यरचना दूसरे प्रकार की कर दी जाय और उसमें तात्विक भेद न हो उस काव्य को प्रतिबिम्बकल्प काव्य कहते हैं ।'
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जैसे एक पूराना पद्य है :-- ते पान्तु वः पद्मुपतेरलिनीलभासः कण्ठप्रदेशेघटिता: फणिनः स्मुरन्तः । चन्द्रामृताम्बुकणसेकसुखप्रवृद्धैर्यद्कुरैरिव विराजति कालकूटः ॥
जैसे एक पुराना पद्य है :-- 'हे पद्मुपति ! ये शेषनाग जिनके कण्ठ के भाग में स्थित होकर अपने नील वर्ण से चमक रहे हैं वे ऐसे मालूम होते हैं जैसे चन्द्रमा की अमृतधारा रूपी जल के कणों से सींचे जाने पर कालकूट विष से उत्पन्न हुए बड़े-बड़े वृक्ष कालकूट के अञ्जुर निकाल रहे हों ।'
अथ्यांत् 'पद्मुपति के कण्ठ प्रदेश में संल्लग्न स्फुरित होनेवाले वे शेष आप लोगों की रक्षा करें; जिनसे कालकूट इस प्रकार शोभित होता है मानों चन्द्र के अमृत रूपी जल के कणों से सींचकर सुखपूर्वक उस कालकूट के अञ्जुर निकल आए हों ।' इसी अर्थ को लेकर एक नवीन पद्य बनाया गया है :-- जयति नीलकण्ठस्य कण्ठे नीला महाहयः । ग्लद्रदाम्बुसंसिक्तकालकूटाञ्जुरा इव ॥
जयति नीलकण्ठस्य कण्ठे नीला महाहयः । ग्लद्रदाम्बुसंसिक्तकालकूटाञ्जुरा इव ॥
'नीलकण्ठ के कण्ठ में लगे हुए ये बड़े-बड़े सर्पों' की जय हो जो कि गिरनेवाले गर्जाजल से सिञ्चकर उगे हुए कालकूटाञ्जुर जैसे प्रतीत होते हैं ।'
अर्थ वही है केवल शब्दभेद कर दिया गया है । ( इस प्रकार के काव्य को प्रतिविम्बकल्पन काव्य कहते हैं ।) अर्थापहरण काव्य का दूसरा प्रकार होता है आलेख्याकारवत् काव्यरचना । अर्थात् जिस प्रकार किसी मूर्त पदार्थ का कोई चित्र उतार लिया जाता है और वह चित्र वास्तविक वस्तु के बिल्कुल समानाकार मालूम पड़ता है । उस काव्य मीमांसा में इस प्रकार दी गई है :-- कियतापि यत्र संस्कारकर्मणा वस्तु भिन्नवद्व्राति । तकचित्रतया चेहुरलक्ष्यप्रख्यायते मतौ काव्यमु ॥
कियतापि यत्र संस्कारकर्मणा वस्तु भिन्नवद्व्राति । तकचित्रतया चेहुरलक्ष्यप्रख्यायते मतौ काव्यमु ॥
अर्थात् जहाँ काव्यवस्तु तो पुरानी ही ली जाय किन्तु उसका कुछ थोड़ा सा संस्कार कर दिया जाय जिससे वस्तु भिन्न जैसी प्रतीत होने लगे उस काव्य को अर्थचतुर लोग आलेख्यप्रकाय काव्य कहते हैं । जैसे ऊपर के ही भाव को लेकर एक दूसरा पद्य बनाया गया है :-- जयति धवलवाला: शम्बमोजूटावलम्बिनः । ग्लद्रदाम्बुसंसिक्तचन्द्रकनदाञ्जुरा इव ॥
'शङ्कर जी के जटाजूट में लम्बमान श्वेत सर्पों की जय हो जो ऐसे शोभित होते हैं मानों गिरनेवाले गर्जाजल से सिञ्चकर चन्द्ररूपी मूल से अञ्जुर निकल आप हों ।'
जयति धवलवाला: शम्बमोजूटावलम्बिनः । ग्लद्रदाम्बुसंसिक्तचन्द्रकनदाञ्जुरा इव ॥
बात वही है किन्तु अन्तर यह पड़ गया है कि मूल पद्य में चन्द्रामृत को जल माना गया था इसमें गर्जाजल के द्वारा सिञ्चन का उपादान किया गया है,
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विषयस्य यत्र भेदेऽप्यभेदबुद्धिर्नितान्तमात्रात् ।
जहाँ विषय का भेद होते हुये भी अत्यन्त सादृश्य के कारण अभेद बुद्धि भासित होने लगती है उस काव्य को तुल्यदेहित काव्य कहते हैं । इस प्रकार के काव्य का निर्वन्धन बुद्धिमान् लोग भो करते हैं ।
तुल्यदेहेहित काव्य की परिभाषा काव्यमीमांसा में यह दो गई है—
तुल्यदेहीततुल्यं काव्यं निवन्धनिति सुब्धियोऽपि ।।
उदाहरण के लिए एक पुराना पद्य है—
अवोनादौ कृत्वा भवति तुरगो यावदक्विपत्त्पशु-
जो पशु अश्व मेढ़ों को आगे करके जब तक रहता है अर्थात् अपने साथ मेढ़ों को भी सुख पहुँचाता है तब तक वह सुखपूर्वक रहता है और जीता भी है ऐसा पशु धन्य है । इन भस्मरूप नष्ट हाथियों का निर्माण ही कैसा अर्थात् व्यर्थ हुआ जिनका निवास या तो वन में होता है या राजाओं के घर में होता है । आशय यह है कि जो सभी के काम नहीं आ सकते उनका जीवन व्यर्थ है ।
इसी अर्थ को लेकर एक दूसरा पद्य लिखा गया है :-
र्धनयस्तावत् प्रतिवसति यो जीवति सुखं सः ।।
अमीषां निर्माणं किमपि तदमृदृङ्गरिणाम्
वनं वा लोप्ति भूमिर्दवनमथवा येन् शरणम् ।।
प्रतिग्रहमुपलानामेक एव प्रकारो मुहुरुपकरणत्वाद्चितः पूजिताक्षः ।
प्रत्येक घर में पत्थरों का एक ही प्रकार है जो उपभोग का साधन होने के कारण बार-बार अर्चित किया जाता है और पूजा जाता है । किन्तु इन अभागिन मणियों का एक अद्वितीय प्रकाश स्फुरित हो रहा है । जिससे उनका निवास या तो राजभवनों में होता है या अपनी खानो में ही होता है ।
स्फुरितहततणीनां किन्तु तद्द्रव्यं येन् स्थितिपतिभवने वा स्वाकरेः वा निवासः ।।
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तत्र पूर्वमनन्यात्म तुच्छात्म वदनंतरम् । तृतीयं तु प्रसिद्धात्म नान्यसाम्यं त्यजेत्कविः ॥ १३ ॥
उनमें पहला अनन्य आत्मावाला और उसके बाद तुच्छ आत्मावाला और तृतीय प्रसिद्ध आत्मावाला होता है । कवि दूसरे के सामानन्य का त्याग न करे ॥' १३ ॥
उनमें पहले काव्यवस्तु प्रतिबिम्ब के समान होती है वह बुद्धिमान् के द्वारा छोड़ दी जानी चाहिये । क्योंकि वह अनन्य आत्मावाली अर्थात् तात्विकशारीरीरूप शून्य होती है । उसके बाद चित्र के समान अन्यसाम्य दूसररे शारीर से युक्त भी तुच्छ आत्मावाली होने के कारण छोड़ दी जानी चाहिये । तीसरी तो विभिन्न कमनीय शारीर के होने पर मिलती हुई भी काव्यवस्तु कवि के द्वारा छोड़ी नहीं जानी चाहिये । एक शारीरी दूसरे शारीरी के समान होते हुये भी एक ही है यह नहीं कहा जा सकता ॥ १३ ॥
तारावती
यहाँ पर दोनों पदों का निष्कृष्टार्थ एक हो है, जीवन उसी का ध्वन्य है जो सभों का उपकार करता है, किन्तु इस अर्थ को अभिव्यक्त करने के लिये जिन विषयवस्तुओं का उपादान किया गया है वे दोनों परस्पर भिन्न हैं । इस प्रकार विभिन्न वस्तुएँ ऐसी मालूम पड़ती हैं जैसे दो शारीरी अत्यन्त साहश्य के कारण एक जैसे मालूम पड़ते हैं । अतः यह प्रकार तुल्यदेहितुल्य कहा जा सकता है ।
( राजघेखर ने परार्थहरण का श्रेणीविभाजन अन्य प्रकार से किया है । उन्होंने इस दृष्टि से प्रथमतः काव्य के तीन प्रकार माने हैं—अन्ययोनि, निहृतयोनि और अयोनि । अन्ययोनि के दो प्रकार बतलाये हैं—प्रतिबिम्बकल्प और आलेख्यप्रस्त्य । निहृतयोनि भी दो प्रकार की बतलाई है—तुल्यदेहितुल्य और परपुरप्रवेश महश । अयोनि को केवल एक प्रकार का ही बतलाया है । फिर इन मेदों के अवान्तर मेद किये हैं । इनका विस्तृत निरूपण काव्यमीमांसा में किया गया है । वहाँ देखना चाहिये । अपेक्षित होने के कारण यहाँ पर उन पर विचार नहीं किया जा रहा है ।)
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तत्र पूर्वमितिकारिका। भनन्यः—पूर्वोपनिवन्धकाव्यादात्मा स्वभावो यस्य तदनन्यन्यास येन रूपेण माति तत्प्राकविस्पष्टमेव, यथा येन रूपेण प्रतिबिम्बं माति तेन रूपेण बिम्बमेवतत्। स्वयं तु तात्विकशरीरमित्यग्राह—तात्विकशरीरशून्यमिति। नहि तेन किश्चित्पूर्वंमुपेक्षितं प्रतिबिम्बमप्येवमेव। एतद् द्वितीयं प्रकारं व्याख्याय द्वितीयं न्यासं चष्टे—तदनन्तरन्यत्न्याति। द्वितीयमित्यर्थः। अन्येन साम्यं यस्य तत्त्वतः। तुच्छात्मेति। भनुकारे भानुकायंवदिरेव चित्रपुस्तादाविव न तु सिन्दूरादिबुद्धिः स्फुरति, यापि च चारुत्वायेतिमावः॥ १३ ॥
'तत्र पूर्वम्......' इत्यादि कारिका है। पहले उपनिबन्ध किये हुये काव्य से अनन्य है आत्मा अर्थात् स्वभाव जिसका बह है अनन्यात्म, वह जिस रूपसे शोभित होता है वह दूसरे कविका स्पर्श किया हुआ हो है। अर्थात् जिस प्रकार जिसरूप में प्रतिबिम्ब शोभित होता है उस रूप में यह बिम्ब ही है। स्वयं तो वह किस प्रकार का है इसमे कहते है—'तात्विकशरीरशून्य'। उसके द्वारा किसी अपूर्व की कल्पना नहीं की गई। प्रतिबिम्ब भी तो ऐसे ही है।इस प्रकार प्रथम प्रकार की व्याख्या करके द्वितीय की व्याख्या करते हैं—'तदनन्तर तो' यह अर्थात् द्वितीय। अन्य से है साम्य जिसका वह उस प्रकार का। 'तुच्छात्म' यह। अनुकरण में चित्रलिखित किसी कला-कृति के समान अनुकार्यबुद्धि ही स्फुरित होती है; सिन्दूर इत्यादि की बुद्धि नहीं और वह भी चारुता के लिये नहीं होती ॥ १३ ॥
तारावती
१२वीं कारिका में यह दिखलाया गया था कि कितने प्रकार के सम्वाद हो सकते हैं। अब इस तेरहवीं कारिका में उनकी उपादेयता के तारतम्य पर विचार किया जा रहा है। इस कारिका में यह बतलाया गया है कि सम्वाद का पहला रूप होता है प्रतिबिम्बकल्प अर्थात् जिस प्रकार दर्पण में संक्रान्त प्रतिमा प्रतिबिम्ब कहलाती है उसी प्रकार जब किसी पुराने कवि की कविता नये कवि के बुद्धि-दर्पण में उसी रूप में संकान्त हो जाती है तब उसे प्रतिबिम्बकल्प काव्य कहते हैं। बुद्धिमान् कवि का कर्तव्य है कि इस प्रकार के काव्यनिर्माण से सदा दूर रहे क्योंकि उसकी कोई दूसरी आत्मा नहीं होती। आशय यह है कि जिस प्रकार दर्पण में संक्रान्त प्रतिमा स्वरूपहीन होती है और उसका वही स्वरूप माना जाता है जो वास्तविक वस्तु का होता है। उसी प्रकार बाद के कवि के लिखे हुये काव्य का स्वरूप, स्वभाव अथवा आत्मा उससे भिन्न नहीं होती जो कि पहले उपनिबद्ध काव्य में विद्यमान थी। प्रतिबिम्ब छायामात्र होता है उसका तात्विक शरीर नहीं होता। उस रूप में तो वह बिम्ब ही होता है। इस प्रकार के काव्य की रचना करनेवाले को स्वयं कुछ भी श्रेय नहीं मिलता; उसका तो कार्य केवल इतना
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ही होता है कि दूसरे की कही हुई बात अपने शब्दों में पाठकों तक पहुँचा दे । अतः महत्व तो पूर्ववर्ती कवि को ही मिलता है । अतएव कवियों का यह कर्तव्य है कि जिसके लिये लोग यह कहें कि इषने तो कोई नई कल्पना नहीं की इस प्रकार के काव्य की रचना में कभी प्रवृत्त न हो ।
दूसरे प्रकार का काव्य आलेख्यप्राय होता है । अर्थात् चित्र के समान उसमें कुछ थोड़े से संस्कारों को बदलकर वही बात दूसरे रूप में कही जाती है । इस काव्य का शरीर तो दूसरा अवश्य होता है; किन्तु इसमें भी दूसरे की समानता बनी रहती है । अतः इसका स्वरूप या स्वभाव अथवा आत्मा अत्यन्त तुच्छ होता है; क्योंकि अनुकरण करने में प्रधनता तो उसीकी रहती है जिसका अनुकरण किया जाता है, उसकी प्रधानता कभी नहीं होती जिसमें अनुकरण किया जाता है । जैसे यदि सिन्दूर इत्यादि से कोई कलात्मक वस्तु बनाई जाय तो उसे देखकर एकदम मुँह से निकल जाता है कि यह घोड़ा इत्यादि अमुक वस्तु है । और ध्यान भी उसकी ओर जाता है जिसका वह चित्र बना होता है । सिन्दूर इत्यादि की ओर ध्यान प्रायः जाता ही नहीं । उसी प्रकार किसी ऐसे काव्य को पढ़कर जिसमें पुराने काव्य की छाया कुछ विभिन्नता के साथ दृष्टिगत हो रही हो उस पुराने काव्य पर ही ध्यान जाता है । यह काव्य तुच्छ आत्मावाला होता है अतः इसकी रचना में भी कवि को प्रवृत्त नहीं होना चाहिये क्योंकि उसमें भी कोई चमत्कार नहीं होता।
तीसरे प्रकार का काव्य वह होता है जिसमें या तो केवल अभिधेयंग्यार्थ का साम्य हुआ करता है, ( वैसे दोनों के अभिधेयक वस्तुतत्व भिन्न-भिन्न ही होते हैं ) या ध्वनिततस्व भिन्न होते हैं दोनों का अभिधेयकतत्व एक होता है । दोनों को देखने से यह मालूम पड़ता है कि दोनों भाव समान हैं । यद्यपि यह समानता एक दूसरे से लो हुई नहीं मालूम पड़ती अपितु जैसे दो आकृतियाँ अपनी स्वतन्त्र सत्ता रखते हुये भी सायोगिक रूप में एक दूसरे से मिलती हुई प्रतीत होती हैं उसी प्रकार उन भावों का साम्य भी अवगत होता है । इस प्रकार यदि उनकी अपनी सत्ता पृथक् पृथक् हो और दोनों का कमनीय कलेवर भी एक दूसरे से निरपेक्ष होकर स्थित हो तो यदि काव्यवस्तु मेल भी खाती हो तो भी कवि को उसका परित्याग नहीं करना चाहिए । क्योंकि दो समान आकृतियों को देखकर यह तो कोई कह ही नहीं सकता कि दोनों एक ही हैं । इसी प्रकार वहाँ पर परवर्ती काव्य को पूर्ववर्तियों से मिलता हुआ देखकर कोई नहीं कह सकता कि परवर्ती कवि ने पूर्ववर्त्ती कवि के वाक्य का अपहरण किया है । कारण यह है कि दोनों के कलेवर भिन्न होते हैं॥ १३ ॥
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एतद्वोपपादयितुमुच्यते— आत्मनोडन्यस्य सन्नावे पूर्वस्थित्यनुयायिपि । वस्तु भातितरां तत्त्व्यः शाशिच्छायामिवाननम् ॥ १४ ॥
अनु० इसको उपपादित करने के लिये कहते हैं— 'पूर्वस्थिति का अनुसरण करनेवाली वस्तु अन्य आत्मा के होने पर तन्वी के चन्द्रमाकी छायावाले मुख के समान अत्यन्त शोभित होती है ॥ १४ ॥ तत्त्व के अर्थात् सारभूत दूसरी आत्मा के होनेपर पूर्वस्थिति का अनुसरण करनेवाली भी वस्तु अत्यन्त शोभित होती है । पुरानी रमणीय अनङ्गहीन वस्तुनिस्सन्देह शरीर के समान परा शोभा को पुष्ट करती है, पुनरुक्तत्व के रूप में तो अवभासित नहीं होती । जैसे तन्वी का चन्द्रमा की छायावाला मुख ॥ १४ ॥
एतदेवेति तृतीयस्य रूपस्यात्याज्यत्वम् । आत्मनोडन्यस्येतिकारिका खण्डीकृत्य वृत्तौ पठिता । केषुचित्पुस्तकेषु कारिका अखण्डीकृता एव दश्यन्ते । आत्मन इत्यस्य शब्दस्य पूर्वपठिताभ्यामेव तत्सस्य सारभूतस्येति च पदाभ्यामर्थो निरूपितः ॥१४॥ 'एषी को' अर्थात् तृतीय रूप की आत्मान्वता को । 'आत्मनोडन्यस्य' यह कारिका वृत्ति में खण्डित करके ही पढ़ी गई है । किन्हीं पुस्तकों में कारिकायें अखण्डीकृत ही दिखलाई देती हैं । 'आत्मा का' इस शब्द का पहले पढ़े हुए 'तत्त्वस्य' और 'सारभूतस्य' इन दो पदों से अर्थ निरुपित किया गया है ॥ १४ ॥
तारावती उपर बतलाया गया है कि प्रतिबिम्बकल्प और आलेख्यप्रसिद्ध रचना करने से कवि निन्दनीय हो जाता है, किन्तु यदि तुल्यदेहितुल्य रचना की जाय तो कविको दोष नहीं होता । अब इस १४ वीं कारिका में उसी बात को सिद्ध किया जा रहा है कि तुल्यदेहितुल्य काव्यरचना करने में कवि को दोष नहीं होता । कारिका का सार यह है कि 'काव्य की आत्मा दूसरी होनी चाहिये' । आत्मा का अर्थ है तत्त्व अथवा सार रूप अङ्ग । यदि इस प्रकार की आत्मा में तादात्म्य नहीं होता तो वह काव्य नवीन ही कहा जाता है फिर चाहे उस काव्य का निर्माण किसी पुराने काव्य की छाया पर ही हुआ हो । उदाहरण के लिये सुन्दरियों के मुख चन्द्र के समान हुआ करते हैं । उनमें भी पूर्णचन्द्र को जैसी आकृति और वैसी ही रम
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णीयता विद्यमान रहती है। किन्तु उनमें लावण्य का भेद होता है। नायिकाओं के मुख पर एक ऐसी पौवनजन्य चमक और आह्लादकता होती है जैसी चन्द्र में नहीं होती। चन्द्र का लावण्य दूसरे ही प्रकार का होता है। इस प्रकार यद्यपि नायिकाओं के मुख का निर्माण पूर्णचन्द्र का जैसा ही हुआ है फिर भी लावण्य का भेद होने के कारण यह कोई नहीं कहता कि चन्द्र और मुख दोनों एक ही वस्तु हैं। यह पहले ही (प्रथम उद्योत में) बतलाया जा चुका है कि काव्य का ध्वनि तत्व (प्रधानोभूत प्रतोयमान अर्थ) ललनाओं के लावण्य के समान हुआ करता है। अतः यदि वह तत्व भिन्न हो तो जिस प्रकार ललनाओं का लावण्यमय मुखचन्द्र पुनरुक्त नहीं मालूम पड़ता उसी प्रकार नवीन काव्य भी पुनरुक्त नहीं कहा जा सकता।' आशय यह है कि जिस काव्य से भावापहरण किया गया हो उसमें भी सङ्कटुनाजन्य एक रमणीयता विद्यमान ही होती है। उस रमणीय वस्तु का उपादान कर यदि नवीन काव्य की रचना की जाय और उसमें आत्मा को बदल दिया जाय तो काव्य पुराना नहीं नया ही मालूम पड़ता है। जैसे सभी शरीरों की बनावट एक जैसी होती है किन्तु रमणियों का लावण्य ही प्रत्येक की आकर्षकता में विभाजक तत्व का काम देता है। पुराने अङ्गप्रत्यङ्गों से युक्त भी शरीर नये लावण्य को पाकर नया हो जाता है। ऐसा ही काव्य के विषय में भी समझना चाहिए।
यहाँ पर 'आत्मनः' इस शब्द की व्याख्या करने के लिये ही वृत्तिकार ने 'तत्वस्य' और 'सारभूतस्य' इन दो शब्दों का प्रयोग किया है। वस्तुतः पर्यायवाचक शब्द बाद में लिखे जाते हैं, किन्तु यहाँ पर वृत्तिकार ने 'आत्मनः' के पहले इनको लिख दिया है। कहों कहों इस कारिका को दो भागों में खण्डित करके भी पढ़ा गया है अर्थात् पहली पंक्ति के बाद वृत्ति की 'तत्वस्य...पूर्वस्थित्यनुयायिपि' यह पंक्ति आई है। फिर दूसरी पंक्ति लिखकर वृत्ति का शेष भाग लिखा गया है। ऐसी दशा में भी अर्थ में कोई भेद नहीं पड़ता।
[ कपर अर्थ हरण पर पूरा प्रकाश डाला गया है और उसके प्रयोजनों पर भी दृष्टिपात किया गया है। इसके प्रयोजनों के विषय में राजशेखर ने काव्यमीमांसा में विभिन्न मतों का उल्लेख किया है जिसका सार यह है :- आचार्यों का कहना है कि 'पुराने कवियों के द्वारा भी माँति अभ्यस्त मार्ग में ऐसी वस्तु का प्राप्त करना ही कठिन है जिसका पहले स्पर्श न किया गया हो। अतः पुराने कवियों के द्वारा अभ्यस्त मार्ग का संस्कार करने की ही चेष्टा करनी चाहिये।' इस पर वाक्पतिराज का कहना है कि 'ऐसा नहीं होता क्योंकि-
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तारावती
'संस्कार की प्रगति पर्यन्त (उसको मर्यादा मानकर) उदार कवि प्रतिदिन उसका सार ग्रहण करते रहते हैं फिर भी वाणी के प्रवाह की मुहर आज तक नहीं टूटी ।'
सतः "दुलंभ और अस्पृष्ट वस्तु के स्पष्ट करने के लिये दूसरों के प्रवन्ध पदने चाहिये ।" कुछ लोगों का कहना है कि "दूसरों के प्रवन्धों के पढ़ने से यह बात मालूम पड़ जाती है कि जो एकरूप भाव विभिन्न काव्यों में आ गये हैं उनमें पार्थक्य कहाँ कहाँ पर क्या क्या है ?" दूसरे लोग कहते हैं कि 'विभिन्न काव्यों में पढ़े हुये अर्थों का नवीन छाया के द्वारा परिवर्तन कर लेना ही प्राचीन काव्यग्रन्थों के पढ़ने का फल है ।' कुछ लोग कहते हैं कि 'महात्माओं की बुद्धियाँ मेघ खाने-वाली होती हैं और वे एक समान अर्थ को उपस्थित करती हैं, अतः अपने काव्यों में पुरानी बातें न आ जायं इसके लिये पुराने काव्यों को पढ़ना चाहिये ।'
इस पर यायावरীয় राजशेखर का कहना है कि 'ऐसा नहीं होता ।' आनाय इत्यादिकों ने जो कुछ कहा है वह सब ठीक नहीं है । कारण यह है कि कवियों के नेत्र सरस्वती के तत्व से ओतप्रोत होते हैं । उनको भी योगियों की समाधि का वरदान प्राप्त हुआ रहता है । उनकी भी समाधि लोकोत्तर होती है जहाँ न वाणी जा सकती है और न मन । कवियों के ऐसे विलक्षण नेत्र समस्त अर्थ तत्व को उनके सामने स्पष्ट कर देते हैं और उन्हें स्वयं वे शब्द तत्व दिखलाई पड़ जाते हैं जिनको पुराने कवि देख चुके होते हैं या नहीं देख चुके होते हैं । (तुलसी ने अपनी काव्य रचना में इसी सारस्वत चक्षु का सहारा लिया था किन्तु दिव्य दर्शन का श्रेय गुरु की चरण-रज को दिया था :
गुरु पद रज मृदु मंजुल अंजन । नयन अमिअ हरू दोष विभंजन ।। तिहिकरि विमल विवेक विलोचन । वरणौं रामचरित भव मोचन ।। यथा सुअज्जन भांजि हरू साधक सिद्ध सुजान । कौतुक देखहिं शैळ वन भूतलभूरि निषान ।।
राजशेखर का कहना है कि- 'यदि महाकवि सो भी रहा हो तो भी सरस्वती उसके सामने शब्द और अर्थ को प्रकट कर देती है । दूसरे लोग यदि जाग भी रहे हों तो भी उनके नेत्र अन्धे हो जाते हैं । महाकवि औरों के देखे हुये अर्थ में चनमना अन्धे होते हैं और दूसरों के द्वारा अदृष्ट अर्थ में उन्हें दिव्यदृष्टि प्राप्त होती है । न तो त्रिनेत्र शंकर और न सहस्राक्ष इन्द्र उस वस्तु को देख पाते हैं । जिसको चर्मचक्षुवाले कवि लोका देख लेते हैं । सारा विश्व कवियों के मतिदर्पण में प्रतिफालित हो जाता है ।'
महात्मा कवियों के सामने शब्द और अर्थ 'मैं पढ़े नाऊं
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एवं तावत्संवादात्समुदायरूपां वाक्यार्थानां विभक्ताः सीमाः । पदार्थरूपाणां च वस्तुनतरसदृशानां काव्यवस्तूनां नास्त्येव दोष इति प्रतिपाद्यतेऽक्षरादिरचनैव योज्यते यत्र वस्तुरचना पुरातनी । नूतने स्फुरति काव्यवस्तुनि व्यक्तमेव खलु सा न दुष्यति ॥१५॥
इस प्रकार संवाद से युक्त समुदायरूप वाक्यार्थों की सीमाएँ विभक्त हो गईं। (अब) पदार्थरूप दूसरी वस्तु के समान काव्यवस्तुओं को दोष नहीं है यह प्रतिपादित करनेके लिये कह रहे हैं— 'अक्षर इत्यादि की रचना के समान स्फुरित होनेवाली नूतन काव्यवस्तु में पुरानी वस्तुरचना संयुक्त की जाती है वह स्पष्टरूप में ही निस्सन्देह दूषित नहीं होती' ॥ १५ ॥
वाचस्पति के द्वारा भी कुछ अपूर्व अद्भुत या पद सन्निविष्ट नहीं किये जा सकते । वे तो उसी रूप में उपनिबद्ध किये हुये नवीनता के विरुद्ध नहीं जाते । उसी प्रकार पदार्थरूप श्लेषादिमय अर्थतत्त्व भी ॥ १५ ॥
लोचन ससंवादानामिति पाठः । संवादानामिति तु पा ठे वाक्यार्थरूपाणां समुदायानां ये संवादाः तेषामिति चैर्याधिकरण्येन सङ्गति: । वस्तुशब्देनैक्रो वा द्वौ वा त्यो वा चतु-रादयो वा पदानामर्थः । तानि त्वति । अक्षराणि च पदनि च । तान्येवेति । तेनैव ससंवादानामिति पाठः ।
'ससंवादानाम' यह पाठ है । 'संवादानाम' इस पाठ में तो वाक्यार्थरूप समुदायों के जो संवाद उनका इस वैर्यधिकरण्य से सङ्गति होगी । वस्तु शब्द से एक अथवा दो अथवा तीन अथवा चार इत्यादि पदों के अर्थ लिये जाते हैं । 'वे तो' यह । अक्षर और पद । 'वे ही' यह । अर्थात् उसी रूप से युक्त तथा थोड़ी
तारावती मैँ पहले जानूँँ इस दोहँ मैं कवि आगे आगे दौड़ते चलै आते हैं कि मैं कैसे देखि सिया जाऊँँ । सिद्ध प्रणिधानवाले योगी जिसको देखते हैं कवि उसमें वाणी के द्वारा विहार करते हैं । इस प्रकार कवियों की सुक्कियों का अन्त नहीं मिल सकता ॥ १५ ॥
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रूपेण युक्तानि मनागध्यनन्यरूपतामनागतानीत्यर्थः । एवमक्षरादिरचनैवैति दृष्टान्तमागं व्यार्ध्याय दार्ष्टान्तिकेयोजयति—तथैवैति । श्लेषादिमयानोति । श्लेषादिस्वभावानोत्यर्थः । सदृक्ततेजस्विगुणद्विजादयो हि शब्दाः पूर्वपूर्वैरपि कविसहस्तैः श्लेषादिच्छायापथा निवन्ध्यन्ते, निवद्धाश्चन्द्रादयश्रोपमानत्वेन । तथैव पदार्थरूपाणोत्यत्त्र नापूर्वाणि घटयितुं शक्यन्ते इत्यादिविरुध्यनीयतयैवमनं प्राक्तनं वाक्यममिसन्धानीयम् ॥
इस प्रकार यहाँ यह बताया गया है कि जब शब्दार्थ समुदाय रूप वाक्यार्थ एक दूसरे से मेल खा रहे हों अर्थात् एक कवि का शब्दार्थ समुदाय रूप वाक्यार्थ दूसरे कवि के शब्दार्थ समुदाय रूप वाक्यार्थ से मेल खा रहा हो तो उसकी सीमायें क्या क्या होती हैं और कौन सा प्रकार उपादेय है तथा कौन सा प्रकार त्याज्य है । अब इस कारिका में यह बताया जा रहा है कि यदि काव्यवस्तु पदार्थ की दिशा में दूसरी वस्तु के समान हो तो उसके मेल खाने में पौनरुक्त्य इत्यादि दोष तो होते ही नहीं । यहाँ पर वृत्तिग्रन्थ का दो प्रकार का पाठ उपलब्ध होता है—‘संवादानाम’ और ‘संवादानाम’ । यदि पहला पाठ माना जाय तो ‘संवादानाम’ शब्द ‘वाक्यार्थानाम’ का विशेषण होगा और यदि दूसरा पाठ माना जाय तो ‘समुदायरूपाणां वाक्यार्थानाम’ यह ‘संवादानाम’ का सम्बन्धी होगा ।
लोचन - रूपेण युक्तानि... इत्यादि । तारावती - ऊपर यह बताया गया है कि वाक्यार्थ जो कि शब्दार्थसमुदायरूप होते हैं यदि एक दूसरे से मेल खा रहे हों अर्थात् एक कवि का शब्दार्थसमुदायरूप वाक्यार्थ दूसरे कवि के शब्दार्थसमुदायरूप वाक्यार्थ से मेल खा रहा हो तो उसकी सीमायें क्या क्या होती हैं और कौन सा प्रकार उपादेय है तथा कौन सा प्रकार त्याज्य है । अब इस कारिका में यह बताया जा रहा है कि यदि काव्यवस्तु पदार्थ की दिशा में दूसरी वस्तु के समान हो तो उसके मेल खाने में पौनरुक्त्य इत्यादि दोष तो होते ही नहीं । यहाँ पर वृत्तिग्रन्थ का दो प्रकार का पाठ उपलब्ध होता है—‘संवादानाम’ और ‘संवददानाम’ । यदि पहला पाठ माना जाय तो ‘संवादानाम’ शब्द ‘वाक्यार्थानाम’ का विशेषण होगा और यदि दूसरा पाठ माना जाय तो ‘समुदायरूपाणां वाक्यार्थानाम’ यह ‘संवादानाम’ का सम्बन्धी होगा ।
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व्यक्ति अपने नये शब्द बनाये करे और और उन्हीं का प्रयोग किया करे । आशय यह है कि पुराने ही अक्षरों का प्रयोग किया जाता है और पुराने ही शब्दों का प्रयोग किया जाता है, किन्तु इस तथ्य के आधार पर यह कोई नहीं कहता कि कवि ने कोई नई बात नहीं कही है । पुराने अक्षरों और पदों का प्रयोग नवीनता का विरोधी नहीं होता । उसी प्रकार जब नवीन रूप में स्फुरित होनेवाली काव्यवस्तु में पुरानी वस्तुरचना संयुक्त की जाती है तब स्पष्ट ही उसमें पौनरुक्त्य का दोष नहीं होता । यहां पर 'वस्तुरचना' शब्द में वस्तु का आशय यह है कि बहुत से शब्दों के अर्थ एक होते हैं, बहुतों के दो, बहुतों के तीन, बहुतों के चार या इससे भी अधिक होते हैं । इस प्रकार के शब्दों के आधार पर जहां पुरानी वस्तुरचना संयुक्त की जाती है और उसका पर्यवसान नवीनता में होता है, वहां पर दोष नहीं होता । वे अक्षर और पद वे ही अर्थात् अपने ही रूप में निवद्ध किये जाते हैं । और उनमें थोड़ी भी अन्यरूपता नहीं आती । यह है दृष्टान्त ! इसका दार्शनिक यह है कि उसी प्रकार शब्द पर आधृत कोई अर्थतत्त्व भी जब पुराना ही होता है और नया कवि उसे नई भङ्गिमा के साथ प्रस्तुत करता है तब उनमें भी पुरानापन नहीं रह जाता । श्लेषादिमय अर्थ तत्त्वों के विषय में भी यही बात कही जा सकती है । सहस्रों कवि अनेक परम्पराप्राप्त विशिष्ट शब्दों का प्रयोग करते रहते हैं जैसे सदृक्त के अर्थ हैं सदाचार, गुणवत्, वतुलाकार, सदाचार, स्वस्त्वभाव इत्यादि । इसी प्रकार तेजस्वी शब्द के अर्थ हैं—प्रकाशमान, शक्तिशाली, उदात्त, प्रसिद्ध, प्रदीप्त, अभिमानी इत्यादि । गुण शब्द भी अनेक रूपों में प्रयोग किया जाता है—सामान्य विशेषता, अच्छाई विशेषता, उपयोग ( कः स्थानलाभे गुणः-१ ), परिणाम, सूत्र, धनुज्या इत्यादि । द्रिज के अर्थ हैं पक्षी, दांत, नक्षत्र इत्यादि । श्लेष के लिये कवि लोग प्रायः इन्हीं तथा इन जैसे दूसरे शब्दों का आश्रय लिया करते हैं जैसे शिलीमुख, हरि, कौशिक, विष, कमल इत्यादि । अनेकशः इन शब्दों का श्लेषमयी रचना के लिये प्रयोग होता है किन्तु इनमें पुरानापन नहीं आता । इसी प्रकार मुख के लिये चन्द्र और कमल; नेत्रों के लिये इन्दीवर, खञ्जन, हरिण; स्तनों के लिये कलश, पर्वत; केशों के लिये मयूरकलाप, भूषण, तिमिर, सर्प इत्यादि की उपमायें अनादि काल से चली आती रही हैं । किन्तु इनमें कभी पुरानापन नहीं आया । इसे पुरानापन न लाने का कारण यही है कि पद्यों में पदार्थवस्तु के पुराने होते हुये भी उनकी अन्तरात्मा नई ही होती है । यहां पर वृत्तिग्रन्थ का अन्तिम वाक्य पिछले वाक्यों के धनदर्भ में . उनसे मिलाकर पढ़ा जाना चाहिये । इस प्रकार पूरा वाक्य यह हो
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यदपि तदपि रस्यं यत्र लोकस्य किक्चित्स्पुरितमिदमितीयं वुद्धिरभ्युत्जिहीते । स्फुरणेयं कार्चिदीत सहृदयानां चमत्कृतिरुत्पद्यते । अनुगतमपि पूर्वच्छायायावस्तु ताहक् । सुकविरुपनिबन्धनं निन्यतां नोपयाति ॥१६॥
‘जहाँ लोक की यह बुद्धि उत्पन्न होती है कि यह कुछ स्फुरित हुआ है वह चाहे जो हो रमणीय होता है ।’ यह कोई स्फुरण है अतः सहृदयों में चमत्कार उत्पन्न होता है । ‘सुकवि उस प्रकार की वस्तु को पूर्वच्छाया के रूप में भी उपनिबद्ध करते हुये निन्यता को प्राप्त नहीं होता’ ॥ १६ ॥
लोचन लोकस्येति —सहृदयानामिति । चमत्कृतिरिति । भास्वादप्रभाना बुद्धिरस्यर्थः । अभ्युत्जिहीते इति भ्याचष्टे—उदेत्यते इति । उदेतावस्थः—बुद्ररूपाकार दर्शयति—स्फुरणेयं कार्चिदिति । ‘यदपि तदपि रस्यं…………नोपयाति’ इति कारिका खण्डीकृत्य पठिता । ‘लोक की’ इसकी व्याख्या करते हैं—‘सहृदयों का’ यह । ‘चमत्कृति’ यह । अर्थात् आस्वादप्रधाना बुद्धि । ‘अभ्युत्जिहीते’ इसकी व्याख्या करते हैं—‘उत्पन्न होती है’ । अर्थात् उदय होती है । बुद्धि के ही आकार को दिखलाते हैं—‘यह कोई सभ्रूभ है ।’ ‘यदपि तदपि रस्यं……नोपयाति’ इस कारिका को खण्डित करके पद्मा गया है ॥ १६ ॥
तदनुगतमपि पूर्वच्छाया वस्तुताहक् ताहक् सुकविव्यवच्छितलयझ्झरवाच्यार्थसमर्पणसमर्थशब्दरचनारूपया वन्धच्छायोपनिबन्धन निन्यतां नैव याति ॥ ६ ॥
तो पूर्व छाया से अनुगत भी उस प्रकार की वस्तु विवक्षित व्यङ्ग्य और वाच्य अर्थ के समर्पण में समर्थ शब्दरचनारूप वन्धच्छाया के द्वारा उपनिबद्ध करते हुये कवि निन्द्यता को प्राप्त नहीं होता ।
वार्तिके तथैव पदार्थरूपाणि इलेषादिमयान्यर्थतस्त्वानि नहि कानिचिदपूर्वाणि घटयितुं शक्यन्ते । तानि तु तान्येवोपनिबद्धानि न काव्यादिषु नवतां विरुध्यन्ति’ इष वाक्य का आशय यही है कि जिस प्रकार महान् से महान् कवि नये अक्षर नहीं
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।। ९५ ।।
९५वीं कारिका उपपत्ति-हेतु-आत्मक है। इस कारिका में पूर्वार्ध की दोनों पंक्तियाँ लिखी गई हैं। फिर 'स्फुरणंय् ... उत्पाद्यते' यह कृतिकार की पंक्ति है। इस कारिका का सारार्थ यह है—जिस कविता को पढ़कर सहृदयों की बुद्धि में यह आभासित होने लगे कि इस कविता में कुछ स्फुरित हुआ है वह चाहे पुराना हो चाहे नया, रमणीय ही कहा जायगा। 'कुछ स्फुरित' होने का आशय यह है कि जिसको पढ़कर सहृदय लोग चमत्कृत हो जायँ अर्थात् सहृदयों की बुद्धि में आस्वाद उत्पन्न हो जाय। तात्पर्य यह है कि रमणीयता का एकमात्र आधार है सहृदयों को आस्वादमय चमत्कार की अनुभूति। यदि वह अनुभूति उत्पन्न हो जाती है तो इस बात का कोई महत्व नहीं रह जाता कि उस अनुभूति का साधन क्या है? क्या वह कोई नयम अर्थ है या पुराना? इन प्रश्नों का कोई महत्व नहीं रह जाता। अतएव यदि कवि ऐसी वस्तु का उपनिबन्धन करता है जो आस्वादमय चमत्कार को उत्पन्न करती हैं तो फिर वह चाहे पुरानी छाया से अनुगत ही क्यों न हो उस कवि की निन्दा नहीं होती। हाँ शर्त यह है कि उसकी अभिव्यक्ति शिथिल नहीं होनी चाहिए। कवि जिस व्यङ्ग्यार्थ को अभिव्यक्त करना चाहता है और उसके लिये जिस वाच्यार्थ का अभिधान करता है और उन दोनों व्यङ्ग्य-वाच्य अर्थों के समर्पण करने में उसकी शब्दरचना समर्थ होनी चाहिए और उसकी वच्यचातुरता भी उतनी ही सशक्त होनी चाहिए।
।। ९६ ।।
९७वीं कारिका में कवियों को निश्शङ्क होकर रचना करने का उपदेश दिया गया है। इस कविता का सारार्थ यह है—कि कवि को निश्शङ्क होकर अपनी भाषा का यथेष्ट विस्तार करना चाहिए। जो कुछ भी स्फुरित हो उसको निःसंकोच भाव से व्यक्त कर देना चाहिए। किन्तु यह ध्यान रखना चाहिए कि
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तदित्थं स्थितम् - प्रवायन्तीं वाचो निमितविविधार्थामृतरसT । न साधु: कर्तव्य: कविरनवद्ये स्वविषये ॥
सन्ति नवाः काव्यार्था: परोपनिबद्धार्थविरचनै: कश्चित्कवेर्गुण इतिभावयित्वा । परस्वादानेच्छा विरतमनसो वस्तु सुक्तवे: । सरस्वत्यैवैषा घटयति यथेष्टं भगवती ॥ ९७ ॥
येषां शुकवीरां प्राक्तनपुण्याभ्यासपरिपाकवशेन प्रवृत्तिस्तेषां परोपरचितार्थपरिग्रहनिस्पृह्हाणां स्वव्यापारो न क्चिदुपयुज्यते । सैव भगवती सरस्वती स्वयंभिमतमर्थमाविर्भावयति । एतदेव हि महाकवित्वं महाकवीना मिल्योम् ॥ ९७ ॥
(अनु०) वह इस प्रकार स्थित है— 'विविध अर्थों का अमृतरस मिला दिया गया है इस प्रकार की वाणियाँ कवियों द्वारा विस्तारित की जायँ । उन्हें अपने अनिन्दनीय विषय में विषाद नहीं करना चाहिये ।'
नये काव्यार्थ हैं; दूसरों द्वारा उपनिबद्ध अर्थ की रचना में कवि का कोई गुण नहीं है यह समझकर । 'दूसरे के अर्थ का आदान करने की इच्छा से विरत कवि की वस्तु को यह भगवती सरस्वती ही यथेष्ट रूप में संघटित कर देती है ।'
दूसरे के अर्थ का आदान करने की इच्छा से विरत मनवाले सुकवि को यह सरस्वती भगवती ही यथेष्ट वस्तु सङ्घटित कर देती है । जिन सुकवियों की प्रवृत्ति पुराने पुण्यों से और अभ्यास के परिपाक के कारण होती है दूसरों द्वारा उपनिबद्ध अर्थ के ग्रहण करने में निस्पृह्ह उन कवियों का अपना व्यापार कहाँ उपयुक्त ही नहीं होता । वही भगवती सरस्वती स्वयं अभिमत अर्थ का आविर्भाव कर देती है । यही महाकवियों का महाकवित्व है । वश्च आनन्द मज्जुल हो ॥ ९७ ॥
स्व विषय इति । स्वयं ताल्कालिकत्वेनास्फुरित हत्यर्थ: । परस्वादानेच्छेत्यादि द्वितीयं श्लोकार्ध पूर्वोपस्कारेण सह पठति—परस्वादानेच्छाविरतमनसो वस्तु सुक्तवेरिति । 'स्वविषय' यह । अर्थात् स्वयं तात्कालिक रूप में स्फुरित न हुये । 'परस्वादानेच्छा' इत्यादि द्वितीय श्लोकार्ध पूर्वोपस्कार के 'परस्वादानेच्छा विरतम-नखो वस्तु सुक्तवे:' यह तृतीय पाद है । कहाँ से अपूर्वता लाएँ इस आशय से
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सूत्रं—कुतः शब्दपूर्वंमाननया मित्यादि संयेन निरूपयोगः परोपनिबद्धवस्तूपजीवको वा स्यादित्याद्दयाह—सरस्वत्येवेति । कारिकायां सुकवेर्निति जातावेकवचनमित्यभिप्रायेण स्याचष्टे—सुकवीनामिति । अतदेव स्पष्टयति—प्राक्तनेत्यादिना तेषा मिल्यनतेन । आविर्भावच्यतीनि नूतनमय सृजत इत्यर्थः॥ १७ ॥
लोचन—'कुतः' इत्यादि । कारिका में 'सुकवेः' यह जाति में एक वचन है इस अभिप्राय से कहते हैं—'सुकवियों का' यह । इसी को स्पष्ट करते हैं—'प्राक्तन' इत्यादि से लेकर 'न तेषाम्' इस तक । 'आविर्भूत कर देती है' अर्थात् नूतन ही रच देती है ॥ १७ ॥
तारावती—उसकी वाणी से जो वर्ण या शब्द निकलें वे अर्थगर्भित हों और प्रत्येक अर्थ समुत्पन्न करने में कविरस से अतिप्रवीण हो । उसकी यह समझे बिना नही चाहिये कि कविता का अनन्त क्षेत्र हो सकता है और कवि के असंख्य विषय हो सकते हैं । कोई भी विषय कवि की वाणी में आकर निन्दनीय नहीं रह जाता । अतः कवि को अपने मन में अवसाद नहीं आने देना चाहिये कि उसकी वाणी निम्न कोटि की है, अथवा उसकी वाणी में नवीनता नहीं है, या उसकी वाणी हृदयसंवेद्य नहीं है । उसे यह समझकर भी मन में अवसाद नहीं आने देना चाहिए कि 'नये काव्यार्थ विद्धमान हैं ही' पुराने अर्थों को लेकर कविता करने में कवि की क्या विशेषता ? साथ ही जिन लोगों की यह दृढ़ धारणा बन गई है कि नवीन अर्थ के लिखने में ही कवि की गरिमा होती है पुराना अर्थ लिखना उसके लिये व्यर्थ है उन्हें भी यह समझकर निराश नहीं होना चाहिये कि अब हम नया अर्थ कहाँ से ले आवें । क्योंकि यदि उनकी यह धारणा बन जावेगी तो या तो वे काव्यक्रिया से विरत हो जावेंगे या दूसरों के बनाये हुए काव्य को आश्रय लेकर उसी के आधीन कविता करने लगेंगे । ये दोनों स्थितियाँ श्रेयस्कर नहीं हैं । न तो उनका काव्यक्रिया को छोड़ बैठना ही वाञ्छनीय है और न सर्वथा परमुखापेक्षी हो जाना ही उचित है । (ऐसी दशा में या तो काव्यरचना ही नहीं या यदि होगी भी तो प्रतिबिम्बकल्प अथवा आलेख्यप्राय होगी । यह बतलाया जा चुका है कि इस प्रकार की रचनाओं साहित्यजगत् में वाञ्छनीय नहीं कही जा सकती । ) तब प्रश्न यह है कि ऐसे लोगों को और चारा ही क्या है जिन्होंने दूसरों की रचनाओं से भावापहरणकर रचना न करने का व्रत ले लिया है ? उनकी धारणा यह है कि कवियों की कविता भी उनका एक धन है ।
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इत्युक्तलक्षणरसाश्रयोचितगुणालङ्कारशोभाभृतो, यस्माद्वस्तुसमीहितं सुचतिमिः सर्वे समासाद्यते । काव्याख्येयडवलसौख्यविधायिनि विविधोच्याने ध्वनिदर्शितः सोऽयं कल्पतरुपमानमहिमाभोग्योऽस्तु भव्यात्मनाम् ॥
अनु० इस प्रकार अकिलष्ट रस के आश्रय से उचित गुण और अलङ्कार की शोभा को धारण करनेग्राले, जिससे समोहित समस्त वस्तु पुण्यात्माओं के द्वारा प्राप्त कर ली जाती है, समस्त सौख्य के धाम इस काव्य नामक देवोद्यान में ध्वनि प्रदर्शित की गई है । जिसकी महिमा कल्पवृक्ष की उपमावाली है वह यह भव्य आत्मवालों के उपभोग के योग्य बने ।
तारावती अतः उनके भाव को लेना दशरों की सम्पत्ति की चोरी करना जैसा है । ( 'स्व' शब्द का अर्थ धन भी है और यहाँ पर उसका अर्थ काव्यार्थ भी है । ) इसका सत्तर यह है कि उन्हें भी निराश होने की आवश्यकता नहीं । क्योंकि भगवती सरस्वती में अपूर्व शक्ति है । वे ऐसे लोगों के हृदय में स्वयं ही उस समस्त नवीन अर्थ-समूह को संघटित कर देती हैं जो कि एक कवि के लिये वाञ्छनीय होता है । वे भगवती यह क्रिया किसी एक कवि पर ही नहीं करती अपितु कवियों की पूरी जाति पर उनकी यह अनुकम्पा होती है । जिन कवियों की काव्य में प्रवृत्ति या तो पूर्वजन्म के सञ्चित पुण्यों के प्रभाव से होती है या अभ्यास का पूरा परिपाक कर लेने पर उन कवियों की प्रत्ति होती है तथा दूसरों के रचे हुये अर्थ का उपादान करना ही नहीं चाहते उनको यह आवश्यकता नहीं होती कि वे स्वयं अपने प्रयत्न से नवीन अर्थों की कल्पना करें । यह तो भगवती सरस्वती की उन- पर अनुकम्पा का ही प्रभाव है कि उन्हें नये-नये अर्थ एकदम दृष्टिगत हो जाते हैं । भगवती सरस्वती की इस प्रकार की कृपा प्राप्त कर लेना ही महाकवित्व का सबसे बड़ा लक्षण है । ( ऐसे ही कवियों को राजशेखर ने सरस्वत कवि कहा है । )
यहाँ पर वृत्तिग्रन्थ समाप्त होता है और इस समाप्ति की सूचना देने के लिये आनन्दवर्धन ने 'इत्योम्' शब्द का प्रयोग किया है । ॐ शब्द मङ्गलाचरण- परक है क्योंकि स्मृति में कहा गया है कि अथ और ॐ शब्द पहले ब्रह्माजी के कण्ठ को भेदकर निकले थे अतः दोनों माङ्गलिक हैं । यहाँ पर 'ॐ' का प्रयोग आशीर्वादात्मक मङ्गल के लिये किया गया है । इसका आशय यह है कि बस, अब मैं वह सब कुछ कह चुका जो मुझे ध्वनि-कारिकाओं की व्याख्या में कहना था । यदि कुछ शेष रह गया है तो बस यही कि पाठकों का-समस्त विश्व
यहाँ पर वृत्तिग्रन्थ समाप्त होता है और इस समाप्ति की सूचना देने के लिये आनन्दवर्धन ने 'इत्योम्' शब्द का प्रयोग किया है । ॐ शब्द मङ्गलाचरण- परक है क्योंकि स्मृति में कहा गया है कि अथ और ॐ शब्द पहले ब्रह्माजी के कण्ठ को भेदकर निकले थे अतः दोनों माङ्गलिक हैं । यहाँ पर 'ॐ' का प्रयोग आशीर्वादात्मक मङ्गल के लिये किया गया है । इसका आशय यह है कि बस, अब मैं वह सब कुछ कह चुका जो मुझे ध्वनि-कारिकाओं की व्याख्या में कहना था । यदि कुछ शेष रह गया है तो बस यही कि पाठकों का-समस्त विश्व
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इतीति । कारिकातद्वृत्तिनिरूपणप्रकारेणेत्यर्थः । भक्तिलत्प्रा रसाश्रयेण उचिताः ये गुणालङ्कारासत्तो या शोभा तों विमर्ति काव्यम् । उद्यानमप्यक्लिष्टं कालोचितो यो रसः सेकादिकृतः तदाश्रयस्तदृकृतो यो गुणानां सौकुमार्यच्छायावत्सौगन्ध्यप्रभृतोनामलङ्कारः पर्यास्तताकारणं तेन च या शोभा तां विमर्ति । यस्मादिति । काव्यादुद्यानात् । सर्वेषामोहितमिति । व्युत्पत्तिकीतिंप्रोतिलक्षणमित्यर्थः । एतच्च सर्वं पूर्वमेव वितत्योक्तमितिश्लोकार्थमात्रं न्याह्यात्म् । सुकृतिभिरिति । ये कष्टोपदेशेनापि विना तथाविधफलमाज् तैरित्यर्थः । अखिलसौख्यधाम्नीति । अखिलदुःखशेनाप्यनुविद्धं यत्सौख्यं तस्य धाम्नि एकायतन इत्यर्थः । सर्वथा प्रियं सर्वथा हितं च दुःखलेशं जगतीतिमावः । नन्दनम् । सुकृतीनां कृतज्योतिष्टोमादीनामेव समीहितासादननिमित्तम् । विदुषां श्रा काव्यतस्ववित् । दर्शित इति । स्थित एव सन् प्रकाशितः । अपकाशितस्य हि कथं भोग्यत्वम् । कल्पतरुणा उपमानं यस्मात्तादृक् महिमा यस्मादिति बहुव्रीहिगर्भो बहुव्रीहिः । सर्वेषामोहितमिति काव्ये तदायत्ता । एतच्चोक्तं विस्तरतः ।
'इस प्रकार' यह । अर्थात् कारिका और वृत्ति के निरूपण के प्रकार से । रस के आश्रय से उचित ( और ) क्लेशरहित जो गुण और अलङ्कार उनसे जो शोभा उसको ( जो ) धारण करता है ( अर्थात् ) काव्य । उद्यान भी अक्लिष्ट अर्थात् कालोचित जो सेक इत्यादि से उत्पन्न रस उसके आश्रयवाला अर्थात् उससे किया हुआ जो गुणों का अर्थात् सौकुमार्य छायावत्स सौगन्ध्य इत्यादि का अलङ्कार अर्थात् पर्याप्त कर देना उससे जो शोभा उसको धारण करता है । 'जिससे' यह । अर्थात् काव्य नामक उद्यान से । 'समाहित' यह । अर्थात् व्युत्पत्ति कीर्ति और प्रीतिलक्षणवाला । यह सब पहले ही विस्तारपूर्वक बताया गया है इसलिये श्लोक के अर्थमात्र की व्याख्या की गई है । 'सुकृतियों के द्वारा' यह । अर्थात् जो कष्टोपदेश के बिना भी उस प्रकार का फल प्राप्त करनेवाले हैं उनके द्वारा । 'समस्त सुख के धाम' यह अखिल अर्थात् दुःखलेश से भी अननुविद्ध जो सौख्य उसके धाम अर्थात् एक मात्र आयतन । भाव यह है कि सर्वथा प्रिय और सर्वथा हित लोक में दुलंभ है । विदुषोद्यान अर्थात् नन्दन सुकृतियों का अर्थात् किया है ज्योतिष्टोम इत्यादि जिन्होंने उनकी समीहित प्राप्ति के निमित्त । विदुब्ध काव्यतत्ववेत्ता भी ( कहलाते हैं ) । 'दिखलाया है' यह । स्थित होता हुआ ही प्रकाशित किया गया है; अप्रकाशित का भोग्यत्व कैसा ? 'कल्पतरुपमानमहिमा' में बहुव्रीहिगर्भित बहुव्रीहि है—कल्पतरु से उपमान है जिसकी उस प्रकार की महिमा है जिसकी । काव्य में निस्संदेह समाहित प्राप्ति एकमात्र उसी के अधीन है । और यह विस्तारपूर्वक बताया दिया गया है ।
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क का कल्याण हो । यहाँ यह समझना ठीक नहीं है कि ‘इत्योम्’ यह शब्द वृत्ति-भाग की समाप्ति का सूचक है; अतः वाद के दोनों पद्य कारिका-भाग समझे जाने चाहिए । यहाँ पर ‘इत्योम्’ शब्द केवल इस बात का सूचक है कि वृत्तिकार को कारिकाओं की व्याख्या में जो कुछ कहना था वह उसने कह दिया । अब अगले दोनों पद्य उसके अपने निवेदन हैं जो कि उसने उपरंहार के रूप में पाठकों के सामने प्रस्तुत किये हैं ।
अब उपसंहार के रूप में लिखे गये दोनों पद्यों में ग्रन्थकार ( वृत्तिकार ) ग्रन्थ के विषय, सम्बन्ध, प्रयोजन इत्यादि का निरूपण कर रहे हैं । यहाँ पर पहले पद्य में काव्य पर नन्दनवन का आरोप किया गया है और धननि को कल्पवृक्ष की उपमा दी गई है । यहाँ पर करे शब्द द्वयर्थक हैं—( ९ ) रस—काव्य रस तथा जल, ( २ ) गण—साधर्थ्यादि तथा सौकुमार्य इत्यादि, ( ३ ) अलङ्कार—उपमा इत्यादि तथा सीमा तक पहुँचा देना, ( अलम् अर्थात् समासि और कार अर्थात् करना ), ( ४ ) समीहित वस्तु—व्युत्पत्ति कीर्ति प्रीति इत्यादि तथा मनचाही वस्तु, ( ५ ) मुक्ति—काव्यतत्त्ववेत्ता सद्धदय तथा समीहित की प्राप्ति के लिये ज्योतिष्टोम इत्यादि यज्ञ करनेवाले, ( ६ ) विद्वान्—विद्वान् तथा देवता ।
यहाँ पर देवोद्यान नन्दनवन अप्रस्तुत है और काव्य प्रस्तुत है । यहाँ पर उपमानोपमेय भाव के अनुसार इस पद्य का यह अर्थ होगा—जिस प्रकार अक्लिष्ट अर्थात् समयानुसार बिना कष्ट के प्राप्त रस अर्थात् जल से सींचने इत्यादि के आश्रय से देवोद्यान नन्दन उद्यान के सभी वाञ्छनीय गुणों की चरम सीमा प्राप्त कर लेता है—वे गुण हो सकते हैं सौकुमार्य, कोमल छायावत्त्व, सङ्गनद्ध इत्यादि । तथा जिन लोगों ने समीहित की प्राप्ति के लिये ज्योतिष्टोम इत्यादि यज्ञ किये हैं और पुण्यों के प्रभाव से वे नन्दनवन में विहार करने के अधिकारी बन गये हैं वे लोग उस नन्दनवन से अपनी मनचाही सभी वस्तु प्राप्त कर लेते हैं । उसी प्रकार का यह काव्यजगत् नन्दनोद्यान की उपमानवाला है । इसमें भी गुणों और अलङ्कारों की संयोजना इस रूप में की जाती है कि उनके संयोजन में यह प्रतीत नहीं होता कि बलात् उनको काव्य में समाविष्ट किया गया है और उन ( गुणों और अलङ्कारों ) का प्रयो रस निष्पत्ति के अनुकूल भी होता है । काव्य में इस प्रकार के गुणों और अलङ्कारों का सौन्दर्य विद्यमान रहता है । जिस प्रकार नन्दनवन से पुण्यात्माओं को सब कुछ मिल जाता है उसी प्रकार जिन लोगों को अपने प्राक्तन पुण्यों के प्रभाव से सद्धदयता प्राप्त हो गई है वे काव्य से व्युत्पत्ति कीर्ति प्रीति इत्यादि सभी कुछ प्राप्त कर लेते हैं । काव्यप्रयोजनों के प्रसङ्ग में
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ध्वन्यालोके
ध्वन्यालोकः
सत्काव्यतत्त्वनयवलमेचिरप्रसुप्तकल्पं मनस्सु परिपक्वधियां यदासीत् । तद्र्थाकारोत्त्सहदयेन्द्रियलाभहेतोरानन्दवर्धनेन इति प्रथिताभिधानः ॥ इति श्रीराजानकानन्दवर्धनाचार्यैं विरचिते ध्वन्यालोके चतुर्थे उद्योतः । sमाप्तोऽयं ग्रन्थः ॥
(अनु०) सत्काव्यतत्त्व की नीति का मार्ग जो परिपक्व बुद्धिवालों के मनों में बहुत समय से सोया हुआ जैसा था उसे उसकी सहृदयों के उदयलाभ के लिये आनन्दवर्धन इस प्रसिद्ध नामवाले (आचार्य) ने व्याख्या की ।
यह है श्रीराजानक आनन्दवर्धनाचार्य कृत ध्वन्यालोक का चौथा उद्योत । यह ग्रन्थ समास हुआ ।
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इन तत्वों का विस्तारपूर्वक विवेचन किया गया है वहीं देखना चाहिए । यह काव्यरूपो विदुधोद्यान सममत मुखों का धाम है । क्योंकि सुख दो प्रकार का होता है एक तो लौकिक सुख और दूसरा अलौकिक सुख । लौकिक सुख में दुःख का अंश अवश्य विद्यमान रहता है । इसके प्रतिकूल अलौकिक सुख वही होता है जो दुःख से सर्वथा विनिर्मुक्त हो । स्वर्ग में नन्दनवन-विहार और काव्यास्वाद दोनों ही दुःख से संबद्ध नहीं होते । इनमें केवल सुख ही सुख होता है । (काव्यप्रकाशकार ने काव्य-सृष्टि को हृदयैकमयी बतलाया है । इसमें दुःखाभासों में भी केवल आह्लाद ही होता है ।) आशय यह है कि जगत् में सर्वथा प्रिय और सर्वथा हित दुर्लभ ही होता है । किन्तु काव्य तथा नन्दनोद्यान में सभी कुछ आनन्दमय ही होता है । इस काव्यरूपि नन्दनोद्यान में ध्वनि की महिमा कल्पवृक्ष की उपमावाली है ।
'कल्पतरुपमानमहिमा' में दो बहुव्रीहि हैं । एक है 'कल्पतरुपमान' में 'कल्पतरु है उपमान जिसका' और दूसरा है 'कल्पतरुपमानमहिमा' में अर्थात कल्पतरु की उपमावाली है महिमा जिसकी । काव्यरूपि नन्दनोद्यान में ध्वनिरुपी कल्पवृक्ष पहले से ही विद्यमान था किन्तु इस नन्दनोद्यान में विचरण करनेवाले लोग इसे जानते नहीं थे । अब इस ध्वन्यालोक की रचना से लोग जान गये हैं कि इस उद्यान में यह कल्पवृक्ष है । कल्पवृक्ष नन्दनोद्यान में अपनी सत्ता-मात्र से ही उपभोग का साधन नहीं बन सकता । इसके लिये आवश्यकता होती है कोई आकर इस कल्पवृक्ष के दर्शन करा दे । आनन्दवर्धन ने ध्वन्यालोक लिखकर उसी कल्पवृक्ष के दर्शन करा दिये हैं । अब आनन्दवर्धन की कामना यह है कि यह कल्पवृक्ष उन लोगों के उपभोग का साधन बने जिनकी आत्माएं
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सत्काव्यतत्वनयवर्मचिरप्रसुसकल्पं मनस्तु परिपक्वोधियां यदासीत् । तद्व द्वारोद्धृतहृदयोदयलाभहेतोः-
इति संबन्धाभिधेयप्रयोजनोपसंहारः । इह बाहुल्येन लोको लोकप्रसिद्धया सम्मावनाप्रत्ययबलेन प्रवर्त्तते । स च सम्मावनाप्रत्ययो नाम श्रवणवशात्सिद्धान्त्यतदीयसमाचारकवित्त्वविदग्धतादिसमनुसरणेन भवति । तथाहि भर्तृहरिणा कृतं-यस्यायमौदार्यमहिमा यस्मिन् शास्त्रे एवंविधस्सारो दृश्यते तस्यायं श्लोकप्रबन्धस्तस्समादरणीयमेतदितिलोकः प्रवर्त्तमानो दृश्यते । लोकश्रावश्यकं प्रवर्त्तनीयः तच्छास्त्रोदितप्रयोजनसम्पत्तये । तदनुगृद्य श्र्रोतृजनप्रवर्त्तनान्निबन्धनग्रन्थकारः स्वनामनिबन्धनं कुर्वन्ति, तदभिप्रायेणाह-आनन्दवर्धन इति । प्रथितशब्देनैतदेव प्रथितं यतु तदेव नामश्रवणं केषाञ्चिन्नि रुन्धेति करोति, तन्मात्रार्थ्यविजृम्भितं नात्र गणनीयम्, निःश्रेयसप्रयोजनादेव हि श्रुताक्कोऽपि रागान्धो यदि निवर्त्तते किमेतावता प्रयोजनसम्प्रयोजनमवश्यं वक्तव्यमेव स्यात् । तस्मादर्थिनां प्रवृत्त्यर्थं नाम प्रसिद्धम् ।
सत्काव्यतत्वनयवर्मचिरप्रसुसकल्पं मनस्तु परिपक्वोधियां यदासीत् । तद्व द्वारोद्धृतहृदयोदयलाभहेतोः-
यहाँ अधिकता से लोक लोक प्रसिद्धि से सम्भावना के विश्वास नाम श्रवण से प्रसिद्ध अन्य उसके समाचार कवित्व विदग्धता इत्यादि के भलीभाँति अनुसरण के द्वारा प्रवृत्त होता है । वह इस प्रकार—भर्तृहरि के द्वारा यह किय गया है जिसकी यह औदार्य महिमा है जिसका इस शास्त्र में इस प्रकार का सार दिखलाई देता है, उसका यह श्लोक प्रबन्ध है, उससे यह आदरणीय है, हम बात को लेकर लोक प्रवृत्त होता हुआ देखा जाता है । उस शास्त्र में कहे हुए प्रयोजन की पूर्ति के लिये लोक को अवश्य प्रवृत्त किया जाना चाहिए । इसलिये अनुग्राह्य श्रोताजनों के प्रवर्त्तन का अज्ञ होने के कारण ग्रन्थकार अपने नाम का निवन्धन करते हैं । किया गया है वही नाम श्रवण किसी की निःश्रेयस प्रयोजनवाले ही शास्त्र से यदि कोई रागान्ध निवृत्त हो जाय तो क्या इतने से ही प्रयोजन को अप्रयोजन कहना आवश्यक हो जायेगा । इसलिये प्रसिद्ध नाम अर्थियों की प्रवृत्ति का अज्ञ होता है ।
सच्ची तथा होनहार हैं । ( कल्पवृक्ष सभी इच्छाओं को पूरा कर देता है और यह वचन सिद्धान्त भी काव्य के सभी तत्वों को आत्मसात् करा देता है । )
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दूसरे पद्य में संबन्ध, विषय, प्रयोजन, ( और अधिकारी ) इन अनुबन्धों का उपसंहार किया गया है । ग्रन्थ के प्रारम्भ में भी इन पर प्रकाश डाला गया था और अब यहाँ पर उपसंहार में भी इनका उल्लेख किया जा रहा है । यह ध्वनि-सिद्धान्त सत्काव्य का एक उचित तथा न्याय्य मार्ग है।
यह सहृदयों के अन्तःकरण की अवचेतन अवस्था में सोया हुआ या पड़ा था । जिन लोगों की प्रज्ञा परिपक्व को प्राप्त हो चुकी है उनको इस ध्वनिमार्ग का आभास अवश्य प्राप्त हो रहा था किन्तु यह तत्त्व उनके सामने सर्वथा प्रकट रूप में विद्यमान नहीं था। आनन्दवर्धन इस प्रसिद्ध नामवाले आचार्य ने सहृदयों के उदयलाभ के लिए उस तत्त्व की व्याख्या कर दी है ।
यह नहीं समझा जाना चाहिए कि आनन्दवर्धन ने किसी नये काव्यतत्त्व का प्रवर्तन किया है । यहाँ पर निरूपितध्वनि तत्त्व ग्रन्थ का विषय है, काव्यसंबन्धी इतर तत्त्व विषय से सवद्ध है । सहृदयों को उदय प्रदान करना ग्रन्थ का प्रयोजन है और सहृदय उसके अधिकारी हैं ।
प्रारम्भ में “सहृदयमनःप्रीति” प्रयोजन माना गया था यहाँ पर सहृदयों का उदय प्रयोजन माना गया है ।
अभिनवगुप्त ने यहाँ पर ‘आनन्दवर्धन’ इस नामग्रहण पर विशेष प्रकाश डाला है । उनका कहना है कि यह लोक की एक सामान्य प्रवृत्ति होती है कि लोग किसी काम में तभी प्रवृत्त होते हैं जब उन्हें लोकप्रसिद्धि के आधार पर किसी से विशेष सम्भावना हो जाती है और उसका उन्हें विश्वास हो जाता है ।
कहने का आशय यह है कि हमें किसी नई बात का अतिशीघ्र प्रायः विश्वास ही नहीं होता । किन्तु जब कोई लेखक लोक में प्रतिष्ठा प्राप्त कर लेता है और लोक उससे सम्भावना करने लगता है कि जो कुछ कहेगा वह सब अनुभूत तथा सत्य होगा तब लोग उसकी कही बात को प्रमाणरूप में मानने लगते हैं और उसके अनुसार अपना आचरण बनाने की चेष्टा करते हैं ।
जब उस प्रामाणिक महापुरुष का नाम लिया जाता है तब उसके दूसरे प्रसिद्ध कार्योंपर एक दम ध्यान चला जाता है और उसकी विदग्धता तथा कवित्वशक्ति एकदम नेत्रों के सामने नाचने लगती है । तब उसपर विश्वास जम जाता है और उससे एक प्रकार की सच्ची बात की सम्भावना की जाने लगती है ।
जैसे यह प्रायः देखा जाता है कि लोग कहते हैं कि यह पद्य भर्तृहरि का बनाया हुआ है, उनकी उदारता की ऐसी महिमा है और उनका इस शास्त्र में इतना अधिक प्रवेश है । इस प्रकार भर्तृहरि के नाम श्रवण करने से उनके औदार्य महिमा तथा शास्त्र में उनकी गति एकदम सामने आ जाती है तथा लोग कहने लगते हैं कि अमुक पद्य उन्हीं भर्तृहरि का बनाया हुआ
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रे अतः इसका आदर करना चाहिए और इसी आधार पर लोग उस कार्य में प्रवृत्त होते हुए दिखाई देते हैं। शास्त्र का मुख्य प्रयोजन यही होता है कि शास्त्र में जो कुछ कहा गया हो उसमें लोक की प्रवृत्ति हो जानी चाहिए। क्योंकि लोक को प्रेरणा ही न मिले और लोक उस शास्त्र का आदर ही न करे तो शास्त्र-रचना में जो भी उद्योग किया गया होता है वह व्यर्थ ही हो जाता है। इसीलिए ग्रन्थकार अपना नाम ग्रन्थ के साथ जोड़ देते हैं जिससे उनका शास्त्र ऐसे श्रोताओं की प्रवृत्ति का अज्ञ बन जाय जिनपर शास्त्रकार अनुग्रह करना चाहता है। आनन्दवर्धन भी लोक में प्रामाणिकता के पद पर प्रतिष्ठित हो चुके हैं, अतः उनकी कही हुई बात को लोग नतमस्तक होकर स्वीकार कर लेंगे इसी मन्तव्य से यहाँ पर उन्होंने अपना नाम लिखा है।
यहाँ पर ‘प्रथित’ शब्द का प्रयोग इसी मन्तव्य से किया गया है। इस शब्द का आशय यह है कि जिन आनन्दवर्धन का नाम लोक में प्रसिद्ध हो चुका है उनका लिखा हुआ यह शास्त्र है। यहाँ पर यह बात और ध्यान रखनी चाहिए कि जिस प्रकार किसी का नामोल्लेख दूसरों के अन्दर श्रद्धा पैदा करता है उन्हें उस शास्त्र की ओर झुका देता है उसी प्रकार किसी का नाम सुनकर कुछ लोग उस ओर से उदासीन भी हो जाते हैं। किन्तु इस प्रकार की वैराग्यभावना तभी जागृत हो जाती है जब दूसरे लोगों में द्वेष की भावना उद्दीप्त हो रही हो। अतः इस प्रकार की द्वेष बुद्धि से जो बात प्रकट होती है उस पर तो ध्यान देना ही नहीं चाहिए। उदाहरण के लिए यदि एक व्यक्ति राग से अन्धा हो रहा है और वासनाएँ उसके अन्तःकरण में भरी हुई हैं तो जब उसके सामने कहा जावेगा कि श्रुति का प्रयोग है पारलौकिक कल्याण प्रदान करना तब वह उससे विरक्त ही हो जावेगा।
तो उसके विरक्त हो जाने से क्या यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि श्रुति का प्रयोजन तो विपरीत फल देता है? ऐसा तो शायद कोई विचार भी न करेगा। इससे यह सिद्ध होता है कि किसी महान् लेखक का नामग्रहण केवल उन्हीं को प्रवृत्त कर सकता है जो उस शास्त्र को जानने के लिए प्रार्थी होते हैं। ऐसे ही लोगों को ध्वनिसिद्धान्त में प्रवृत्त करने के लिये और उनमें श्रद्धा उत्पन्न करने के लिए आनन्दवर्धन ने अपना नाम लिखा है।
अन्त में लोचनकार ने ५ पद्य उपसंहार के रूप में लिखे हैं। प्रथम पद्य में ग्रन्थान्त का मङ्गलाचरण है, द्वितीय में लोचन का परिचय दिया गया है, तृतीय में अभिनव गुप्त ने अपने और अपने गुरु के विषय में कुछ कहा है, चौथे में सजन और दुर्जन का विभाजन किया गया है और पाँचवें में हृदय के शिवमय होने पर सभी विश्व का शिवमय होना बताया गया है और पाठकों की मङ्गलाशंसा की गई है।
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स्फुटीकृतार्थंवैचित्र्यबहिःप्रसरदायिनीम् । तुयां शक्ति महं वन्दे प्रत्यक्षार्थनिदर्शिनीम् ॥ १ ॥
मन में स्पष्ट किये हुये अर्थ वैचित्र्य को बाहर प्रसार देनेवाली प्रत्यक्षार्थ को दिखलानेवाली चौथी शक्ति की हम वन्दना करते हैं ॥ १ ॥
प्रथम पद्य मङ्गलाचरणपरक है । इसमें क्रमप्राप्त वैखरी वाणी की वन्दना की गई है । यह बताया जा चुका है कि वाणी ४ प्रकार की होती है—परा, पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी । प्रथम तीन उद्योतों में क्रमशः परा, पश्यन्ती और मध्यमा की वन्दना की गई है और इस उद्योत के अन्त में चौथी अर्थात् वैखरी वाणी की वन्दना है । वैखरी वाणी की उस अवस्था को कहते हैं जिसमें शब्द स्थान और प्रयत्न के बल पर मुख से बाहर निकल कर दूसरों के श्रोतिगोचर हो जाते हैं । प्रथम तीन वाणियों को लोग सुन नहीं पाते, अतः कहने का काम चौथी वाणी से ही लिया जाता है । ( गुदाद्वोणि निहिताने॑ञ्जयन्ति तुर्यो वाचं मनुष्या वदन्ति । ) परा वाणी में सभी अर्थ एकरूप रहते हैं, उनमें वैचित्र्य नहीं होता, सर्वप्रथम मन में अर्थवैचित्र्य स्फुट होता है; उसको बाह्य जगत् में प्रसार देनेवाली वैखरी वाणी ही होती है जिसके प्रभाव से लोग समझ सकते हैं कि अमुक व्यक्ति के मन में अमुक बात है । वैखरी ही अर्थ का प्रत्यक्ष् निदर्शन करती है । इसीलिये अभिनवगुप्त ने यहाँ इख् वैखरी वाणी की वन्दना की है और उसे शक्ति का एक रूप बतलाया है ।
आनन्दवर्धनविवेककविकासिकाव्यालोकार्थतत्स्वघटनादनुभेदसारम् । यत्नेनास्पष्टत्कलसद्वृत्तियकादिशि व्यापारयंतामिनवगुप्तविलोचनं तत् ॥ २ ॥
आनन्दवर्धन के विवेक से प्रकाशमान काव्यालोक के अर्थतत्त्व को संयुक्त करने से जिसके सारपूर्ण होने का अनुमान लगाया जा सकता है, जो सब प्रकार के भलीभाँति प्रकट होनेवाले विषयों को प्रकाशित करनेवाला है इस प्रकार के अभिनवगुप्त के नवीन और गूढ विलोचन को क्रियाशील बनाया गया है ॥ २ ॥
श्रीसिद्धिचेलचरणाजपरागपूतभट्टेन्दुराजमतितिसंस्कृतटद्द्विलेशः । वाक्यप्रमाणपदवीदिशगुः प्रभन्थ सेवाससो व्यरचयदध्वनिवस्तु वृत्तिम् ॥ ३ ॥
श्री सिद्धिचेल के चरणकमलों की पराग से पवित्र हुये मट्टेन्दुराज की बुद्धि से जिनकी बुद्धि का अंश संस्कृत हुआ है; जो मीमांसा, न्याय और व्याकरण जाननेवालों के गुरु हैं और जिनको प्रभन्धरचना के सेवन में आनन्द आता है ( इस प्रकार के अभिनवगुप्त ने ) ध्वनि नामक वस्तु के विवरण की रचना की ॥ ३ ॥
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सज्जनान् कविरसौ न याचते ह्लादनाय शशाङ्ककिरणार्थितः । नैव निन्दति कञ्चन मुहुर्मुहुः श्विकृतोऽपि नहि शोतालोडनलः ॥ ४ ॥
वह कवि सज्जनों से प्रार्थना नहीं करता । क्या आह्लाद देने के लिए नन्द्र से प्रार्थना की गई है ? दुष्टों की निन्दा भी नहीं करता । वार-वार धिक्कार करने पर भी अग्नि शीतल नहीं होती ॥ ४ ॥
वस्तुतः शिवमयं हृदय होने पर स्फुट रूप में सभी शिवमय ही शोभित होता है; कहीं किसी के वचननें आश्रय नहीं होता। इससे आप लोगों की दशा शिवमय ही जाय ।
वस्तुतस्त्वविशवमये हृदि स्फुटं सर्वत्रशिवमयं विराजते । नाशिवं कवचन कस्यचिद्वचः तेन वरिशवमर्यो दशा मवेत् ॥ ५ ॥
यह है महामाहेश्वर अभिनवगुप्तविरचिते काव्यालोकलोचन में चतुर्थ उद्योत । और यह ग्रन्थ समाप्त हो गया ॥
इति महामाहेश्वराभिनवगुप्तविरचते काव्यालोकलोचने चतुर्थ उद्योतः । समाप्तश्रायं ग्रन्थः ॥
दूसरे पद्य में लोचन की विशेषता वतलाई गई है । अभिनवगुप्त ने अपने प्रसिद्ध लोचन को ध्वन्यालोक समझने के पुनीत कार्य में प्रवृत्त किया है । यह लोचन अपने कर्ता के नाम के अनुसार अभिनव भी है और गुप्त भी, क्योंकि दूसरे लोग अभी तक इसे समझ नहीं सके हैं । इस लोचन में चरम फल हुआ है जिसका अनुमान इसौ बात से लगाया जा सकता है कि आनन्दवर्धन जैसे परमनिष्णात आचार्य के विवेक से जिस काव्यालोक का विकास हुआ था उसके अर्थ को पूर्णरूप से इसमें संघटित करा दिया गया है और सहृदयों में काव्य के जितने भी महत्वपूर्ण विषय प्रकृष्ट रूप में प्रकाशित होते हैं उन सत्वकों यह प्रकाशित करनेवाला है ॥ २ ॥
तीसरे पद्य में वतलाया गया है कि अभिनव गुप्त ने भट्टेन्द्रराज से शिक्षा पाई थी । भट्टेन्द्रराज के गुरु ये श्रीसिद्धिचेष्ट । यहां पर लिखा गया है कि अभिनवगुप्त की बुद्धि के एक अंश का भट्टेन्द्रराज ने संस्कार किया था । इसका आशय यह है कि अभिनवगुप्त ने कई आचार्यों से शिक्षा पाई थी । विशिष्ट शास्त्रों के अध्यापन की इनकी अभिरुचि इतनी अधिक वढ़ी चढ़ी थी कि ये कश्मीर के तथा बाहर के अनेक अधिकारी विद्वानों के पास शिक्षा प्राप्त करने गये थे । इनके कितिपय आचार्यों के नाम ये हैं—श्रीनरसिंहगुप्त-इनके पिता जो चुखुलक नाम से प्रसिद्ध थे इनके व्याकरण गुरु थे । श्रीशम्भुनाथ कौलमत के गुरु, भूतिराज वेदान्त के गुरु,
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त्रिकदर्शनं, प्रत्यभिजादर्शन और शैव सम्प्रदाय के गुरु थे श्री सोमानन्द, श्री उत्पलपादाचार्य और ललितगुप्तनाथ, ध्वनि सिद्धान्त के गुरु भट्टेन्दुराज इत्यादि अनेक लब्ध प्रतिष्ठ विद्वानों से इन्होंने विभिन्न शाखाओं का अध्ययन किया था। यहाँ इन्होंने अपने को वाक्यानुशासन अर्थात मीमांसा दर्शन, प्रमाणानुशासन अर्थात न्याय दर्शन और पदानुशासन अर्थात व्याकरण शास्त्र का गुरु बतलाया है। साथ ही इन्होंने इसमें अपने को विभिन्न रचनाओं में रस लेनेवाला कहा है। (इनके विशेष परिचय के लिये देखिये भूमिका का संबद्ध भाग।) ॥ ३ ॥
कवियों तथा लेखकों की सामान्य परम्परा है कि वे अपने ग्रन्थों में सज्जनों की प्रशंसा और दुष्टों की निन्दा किया करते हैं तथा सज्जनों से अपने ग्रन्थ पढ़ने की अभ्यर्थना करते हैं और दुष्टों की निन्दा कर उनकी आलोचना की ओर ध्यान न देने का उपदेश देते हैं। (तुलसी ने ऐसा ही किया है। किन्तु अभिनवगुप्त ऐसा नहीं करना चाहते क्योंकि सज्जनों और दुर्जनों का जन्मजात हृदय स्वभाव होता है, कहने सुनने से उसमें अन्तर नहीं आ सकता। चन्द्र स्वतः आल्हाद देता है और सज्जन स्वभाव से ही विमल प्रार्थना किये ही अपने आचरण से आनन्दित किया करते हैं। इसके प्रतिकूल दुष्ट लोगों को कितना ही धिक्कृत किया जाय वे अपने दुष्ट स्वभाव को नहीं छोड़ते। क्या निन्दा के भय से अमि भी कभी शीतल हुआ है या हो सकता है? यहाँ 'वह कवि' का अर्थ यह है कि जिसका परिचय तीसरे पद्य में दिया गया है ॥ ४ ॥
कवियों तथा लेखकों की सामान्य परम्परा है कि वे अपने ग्रन्थों में सज्जनों की प्रशंसा और दुष्टों की निन्दा किया करते हैं तथा सज्जनों से अपने ग्रन्थ पढ़ने की अभ्यर्थना करते हैं और दुष्टों की निन्दा कर उनकी आलोचना की ओर ध्यान न देने का उपदेश देते हैं। (तुलसी ने ऐसा ही किया है। किन्तु अभिनवगुप्त ऐसा नहीं करना चाहते क्योंकि सज्जनों और दुर्जनों का जन्मजात हृदय स्वभाव होता है, कहने सुनने से उसमें अन्तर नहीं आ सकता। चन्द्र स्वतः आल्हाद देता है और सज्जन स्वभाव से ही विमल प्रार्थना किये ही अपने आचरण से आनन्दित किया करते हैं। इसके प्रतिकूल दुष्ट लोगों को कितना ही धिक्कृत किया जाय वे अपने दुष्ट स्वभाव को नहीं छोड़ते। क्या निन्दा के भय से अमि भी कभी शीतल हुआ है या हो सकता है? यहाँ 'वह कवि' का अर्थ यह है कि जिसका परिचय तीसरे पद्य में दिया गया है ॥ ४ ॥
सज्जनों और दुर्जनों के व्यवहार पर विचार करने की आवश्यकता ही क्या? कवि को तो अपने भक्ति भाव पर विश्वास है। कवि महाशय है और उसका हृदय शिवमय है। अतः उसके लिये तो सारा विश्व ही शिवमय है क्योंकि हृदय की झलक सभी पदार्थों पर पड़ती है और अपना हृदय जैसा होता है सारा विश्व वैसा ही मालूम पड़ने लगता है। जिसके हृदय में भगवान् शिव सदा विराजमान रहते हैं उसकी कहीं भी कोई भी वाणी अशिव हो ही नहीं सकती। अतः कवि की कामना यही है कि उसकी शिवमयी वाणी का पाठकों पर ऐसा प्रभाव पड़े कि सभी पाठकों की दया भी शिवमय हो जाय ॥ ५ ॥
सज्जनों और दुर्जनों के व्यवहार पर विचार करने की आवश्यकता ही क्या? कवि को तो अपने भक्ति भाव पर विश्वास है। कवि महाशय है और उसका हृदय शिवमय है। अतः उसके लिये तो सारा विश्व ही शिवमय है क्योंकि हृदय की झलक सभी पदार्थों पर पड़ती है और अपना हृदय जैसा होता है सारा विश्व वैसा ही मालूम पड़ने लगता है। जिसके हृदय में भगवान् शिव सदा विराजमान रहते हैं उसकी कहीं भी कोई भी वाणी अशिव हो ही नहीं सकती। अतः कवि की कामना यही है कि उसकी शिवमयी वाणी का पाठकों पर ऐसा प्रभाव पड़े कि सभी पाठकों की दया भी शिवमय हो जाय ॥ ५ ॥
महामाहेश्वर तथा ग्रन्थ की "तारावती" नामक विस्तृत हिन्दी व्याख्या भी समास हुई अभिनवगुप्त के द्वारा रचा गया यह काव्यालोकोचन का चौया उद्योत समास हुआ और साथ ही यह ग्रन्थ भी समास हो गया।
महामाहेश्वर तथा ग्रन्थ की "तारावती" नामक विस्तृत हिन्दी व्याख्या भी समास हुई अभिनवगुप्त के द्वारा रचा गया यह काव्यालोकोचन का चौया उद्योत समास हुआ और साथ ही यह ग्रन्थ भी समास हो गया।
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अकारादि एवं विशिष्टविषय ( का० )
अक्षरादिरचनैत्र यौग्यले ( का० )
अरण्यतवच्त्राल अज्जु ( वृ० )
अतहड्ढ वितहसरिठए ( वृ० )
अतिक्रान्त सुखा: काल ( वृ० )
अतोऽनिर्जातिहेतुत्वात् ( लो० )
अतो हन्यतभेनापि ( का० )
अनन्यवचसितावगाहनम् ( वृ० )
अनवरतनयनजलनिपतन ( वृ० )
अनाख्येयांश भासित्वं ( वृ० )
अनिष्टसस्य श्रुतियेंवत् ( वृ० )
अनुगतमपि पूर्वंच्छायपि ( का० )
अनुरागवती सन्ध्या ( वृ० )
अनुस्वानोपमालमापि ( का० )
अनेनानन्वयमायाति ( का० )
अनौचित्याहते नान्यत् ( वृ० )
अनौचित्याहते नान्यत् ( लो० )
अन्नोयते वसुगतिः ( का० )
अभावारे काव्यसंसारे ( वृ० )
अभो ये हरयन्ते ( वृ० )
अभमुं कनकवर्णभिं ( लो० ) ( महाभा० श्लो० १५३-१४ )
अयं मन्त्रद्युतिभास्वान् ( लो० ) ( भामह ३-३८ )
अयं स रसनोत्कर्षी ( वृ० ) ( महाभा० स्त्रीप० ६४-१६ )
अयं रामा उदयणोत्ति ( लो० ) ( वासव० )
अयमेकपदे तथा वियोगः ( वृ० ) ( विक्रमो० ४-३ )
अर्थान्तरगतिः काक ( वृ० )
Page 782
अलड्कृतोना शक्तावपि ( का० )
६७९३
अलंस्थित्वारमशानेडस्मिन् ( लो० ) ( महां०भा०शा० १५२-१९ )
५२७
अल्पं निर्मितमाकाशं ( लो० )
९९४९
श्रद्धधानातिशयवान् ( का० )
६५९
अवसररोइचिअ ( वृ० )
५४२
अवस्थादिविभिन्नानां ( का० )
१३६७
अवस्थादेशकालादि ( का० )
१३६५
अविरोधी विरोधी वा ( का० )
९३४
अविवक्षितवाच्यस्य ( लो० )
६४७,१०१७
अव्युत्पत्तिकृतोदोषः ( वृ० )
७३५
अशक्नुवाद्दृढः प्याकतुं ( का० )
१२६९
असमासा समासेन ( का० )
७९७
अस्फुट स्फुरितं काव्यं ( का० )
१२६९
महिणअ पओअरएसु ( वृ० )
१२५७
महो वत्तासि स्पृहणीयवोयं ( वृ० )
८४३
आगर्भोदासिमशाद्दा ( लो० )
६२६
आत्मनोड्नयस्य सद्द्रावेः ( का० ) ( ना०शा० )
१३६७
आदित्योडयं स्थितो मूढःः ( लो० ) ( महां०भा०शा० १५२-२३ )
५२५
आननत्यमेव वाच्यस्य ( का० )
१३६५
ज्ञानन्दवर्धनविवेक ( लो० )
९८०८
आस्वादातिसंवाद ( लो० ) ( श्लो०, वा० १-१-७ )
९९८४
आम असथ्योओरम ( वृ० )
९९७६
आलेख्याकारवत्तुल्य ( का० )
९३६०
आलोकार्थो यथादपि ( लो० )
५५८
आश्रयंवदभिध्याने ( लो० )
५०६
आसूत्रितानां भेदानां ( लो० )
९३०४
इतिवृत्तवशातां ( का० )
७७२
इतिवृत्तं हि नाट्यस्य ( लो० )
६६४
इत्थं यन्त्रनया ( लो० )
५९५
Page 783
इत्यलंष्टरसाश्रयोचितगुणैः ( वृ० )
१४८१७
इत्पलक्ष्यकमा एव सन्तः ( वृ० )
९९७
इत्युक्तलक्षणो यः ( का० )
१२६१
इन्दीवरश्यति यदा ( लो० ) ( भट्टेनुराजस्य )
७८४
इष्टस्यान्यस्य रचना ( लो० )
५०३
उत्कम्पिनी भय ( वृ० ) ( ता० व० )
६०४
उत्प्रेक्ष्याप्यन्तराभोष्ट्र ( का० )
६७२
उद्दोपनप्रशमने ( का० )
६७३
उपक्लेपः परिकर ( लो० ) ( ना० शा० २६-३६ )
५०३
उपभोगसेबात्रसरोदयं ( लो० )
५०५
उपपह जाइए ( वृ० )
१२१४
उपपद जायो ( लो० )
१२६३
एकत्तो हइप्पिआ ( वृ० )
८३५
एकाश्रयत्वे निर्दोषः ( का० )
८४९
एको रसोऽङ्गीकतव्यः ( का० )
८२२
एतद्यथोक्तमौचित्यं ( का० )
७६५
एमेयजणोतिस्सा ( वृ० )
६६३
एवं वादिनि ( वृ० ) ( कु० सं० ६-५४ )
१६६७, १२०६, १३२६
एहि गच्छ्अत्तोऽतिष्ठ ( वृ० ) ( व्यासस्य )
८०७, ८१३
मौचित्यवान्यस्तातयत ( का० )
८६२
कथमयिकृत प्रत्यपत्तौ ( वृ० )
७६१
कर्एठाच्छलवाक्षमालावलयं ( वृ० )
८३८
कथाशरीरमुत्पाद्य ( वृ० )
५८२
करणोवेहवअभरो ( वृ० )
१३३१
कर्ताद्यूतचछ्नानां ( वृ० ) ( वेसं० ५-२६ )
१२४३
क वे. प्रयत्नान्नेतॄणां ( लो० ) ( ना० शा० )
८४८
Page 784
कवेरन्तर्गतं भावं ( लो० )
कस्त्वंभो: कथयामि ( वृ० )
कस्पचिद्दचनि भेदस्य ( लो० )
कस्सद्धे विरहजधुरां ( वृ० ) ( मेघदूत )
कायंमेकं यथाय्यापि ( का० )
काव्यप्रभेदाश्रयत: ( का० )
काव्यशोभाया: कत्तरो धर्मा: ( लो० ) ( वा० सू० ३-?-३ )
काव्यस्यात्मा ध्वनिः ( लो० )
काव्याध्वनि छन्निः ( वृ० )
काव्यार्थान्न भावयति ( लो० ) ( ना० शा० ७-६६ )
काव्यालोके प्रथां नीतार्त्त ( लो० )
काव्ये उभे तत्तोन्यत्र ( का० )
किमिव हि मधुराणां ( वृ० )
कुरडकौवाझानि ( लो० ) ( शाकुन्तल १-१७ )
कुरवककुचाघात ( लो० )
कृतक कुत्रितै: ( वृ० ) रामाभ्युदये
कृतक कुत्रितै: ( ली० ) ( रामाभ्युदये )
कृते घरकथालापे ( वृ० )
कृत्तदितसमासेऽसौ ( का० )
कृतपक्षानिर्वाहयोगेडपि ( लो० )
कैशिकोशलक्षण नेपथ्या ( लो० ) ( ना० शा० )
कोपात्कोमललोलवाहुलतिका ( वृ० ) ( लो० ) ( अमरु-३ )
क्रामनत्य: क्षण कोमलांगुलि ( वृ० )
क्रिययैव तदर्थंस्य ( लो० ) ( भामह ३-३३ )
क्वाकायं शशलक्ष्म ग: ( वृ० ) ( विक्रमो-४ )
क्षते भये यथात्रिताम् ( लो० ) ( माधे ४-१७ )
क्षिसोहस्तावलग्नः ( वृ० ) ( अमर २ )
धुततृष्णाकाममात्स्यं ( लो० ) ( पुराणश्लोक )
Page 785
गद्यपद्यमयोचस्मूः ( लो० ) ( दरङे० ) गावोत्रः पावनानां ( वृ० ) गुणानाम्रिथया निष्ठितो ( का० ) गुणः कृतातमस्कारः ( लो० ) ( नो शा० ) गोलाकच्छकुड्योः. ( लो० ) ( सो शा० ) गोप्यवंगविता सले शं ( लो० )
चलापाङ्गां हृष्टि ( लो० ) ( शा० १-३५ ) चाङ्यणकर परस्पर ( लो० ) ( पुराणो गाथा ) चित्तवृत्तिप्रसृतस्वसंवेद्यत्वात् ( लो० ) चित्रं शब्दार्थमेदेन ( का० ) सूभड कुरात्नअंसं ( वृ० ) ( हरिंविजये ) चूचोंपदे: प्रसन्ने: ( लो० ) ( नो शा० )
जराजीर्णशरीरस्य ( लो० ) जरा तेयं मृद्नित ( लो० ) ( अभिनव )
पा ब्रतानि घडै ओहो ( वृ० )
त एव तु निवेशयन्ते ( का० ) तत्र किश्चितचलदचितं ( का० ) तत्र पूर्वंमनन्यात्म ( का० ) तथा दोर्घं समासेति ( का० ) तथो रसस्थायी विधो ( का० ) तथाभूते तस्मिन् मुनिवचसि ( लो० ) ( ता० व० ४ ) तदनस्यानुरण न रूप ( का० ) तदा तं दोपयन्न्येव ( का० ) तदंगोहं नताभित्ति ( वृ० ) तद्वक्त्रेन्दु विलोकनेन दिवसः ( लो० ) ( ता० व० ६ )
Page 786
तद्विदग्धरसं ग्यः: ( का० )
तमर्थमवलम्बन्ते ये वृ० )
तया स पूतक्ष त्रिभूषितक्ष ( लो० ) ( कु० सं० )
तरङ्गभङ्गा: ( वृ० )
तस्य प्रशान्त वाहिता ( लो० ) ( यो० सू० ३-१० )
तस्याङ्गानां प्रभेदा ये ( लो० )
तस्याभावं जगदुरपरे ( लो० )
तां प्रादु: मुखी तत्र नितेश्य ( वृ० ) ( कु० सं० )
तालै: शिखावलयसुभगे: ( वृ० ) ( मे० दू० १६ )
तुतोयं तु प्रसिद्धातम ( का० )
तौस्थं तौध्यतिकारभवे ( लो० )
तस्मिं गोपवधूविलासिसुन्दौ ( वृ० )
त्वत्सम्प्राप्ति विलोभितेन ( लो० )
त्वां चन्द्रचूडं सहृसा स्वशन्तो ( लो० )
त्वामालिख्य प्रणयकुपितां ( लो० ) ( मे० दू० )
दंतकषतानि करजैक्श ( वृ० )
दानवो रं शरमं वो रं ( लो ) ( ना० शा० )
दो चों कुबनं पट्ट मदकेल ( वृ० )
दुराराधा राधा सुभग ( वृ० )
दष्टपूर्वा अपि द्यार्ताः ( का० )
हस्तिनामितवर्षिणी ( लो० )
देवी स्वीकृतमानसस्य ( लो० ) ( ता० व० ८ )
घत्ते रसादितात्पयं ( का० )
घरणी धारणायाधना त्वं धेष: ( वृ० )
धर्मे चार्ये च कामे च ( लो० )
धृति: क्षमा दया शौचं ( लो० ) ( या० स्मृ० )
ध्वनेर्य: सगुणीभूत ( लो० )
ध्वनेरस्य प्रबन्धे पु ( का० )
ध्वनेरित्यं गुणीभूत ( का० )
Page 787
ध्वनेयंस्य गुणीभूत ( का० )
न
न काव्यार्थे विरामो ( का० )
च चेद जीवनः कश्चित् ( लो० ) ( मो० भा० श्लो० ५४३० )
न तु केवलया शाब्द ( का० )
नातिनिबंहणौपिता ( लो० ) ( ना० शा० )
नानाभृदि भ्रमद्भूः ( बु० )
नारायणं नमस्कृत्य ( लो० )
निद्राकेतविनः ( वृ० )
निबद्धा सा कस्य नैति ( का० )
निवर्त्तते हि रसयोः ( का० )
निःश्वासानाम इवादर्शं: ( लो० )
तोरस्तु प्रवन्धो यः ( वृ० )
नीवाराः शुका ( वृ० ) ( शाकु० ६०१८ )
नूतने स्पुरति काव्यवस्तुनि ( का० )
नैकरूपतया सर्व ( का० )
नोपहन्त्यादृतिं सोडस्य ( का० )
नोपादानं विरुद्धस्य ( लो० )
न्यक्कारो हृदयमेतत् ( वृ० ) ( ह० ना० भ० ८८ )
प
पश्युः शिरश्छेदकलामन्थन ( वृ० )
पदानां स्मारकत्वेऽपि ( वृ० )
परस्वादानेच्छा ( का० )
परार्थे यः पोडामनुभवति ( वृ० ) ( मो० श० इलो० ५६ )
परिपोषं न नेतव्यः ( का० )
पहिअसामाइएसु ( लो० )
पारडुक्रामं बदनं ( लो० )
पुरुषार्थहेतुकमिदं ( लो० )
पूर्वे विश्रृतहलागिरः ( वृ० )
प्रकरणाटकयोगात ( लो० ) ( ना० शा० )
प्रकारोऽयो गुणीभूत ( का० )
Page 788
प्रकारोऽयं गुणीभूत ( का० )
प्रतियन्तां वाचो ( का० )
प्रतीयमानं पुनर्नव्यदेव ( लो० )
प्रतीयमानच्छायैषा ( लो० )
प्रधानगुणभावास्यां ( का० )
प्रधानेऽप्यत्र वाक्यार्थे ( लो० )
प्रबन्धवस्य रसादोनां ( का० )
प्रबन्धे मुक्तकेऽपि ( का० )
प्रभामहत्यैव शिक्षयेत् ( वृ० )
प्रभ्रश्यत्युत्तरौषसि ( वृ० )
प्रभेदस्यास्य विषयो ( का० )
प्रसादे वत्सस्व ( लो० ) ( चन्द्रकस्यो )
प्रसिद्धेऽपि प्रबन्धानां ( का० )
प्रातुं जनैरर्थजननस्य ( वृ० )
प्राप्तादेवो भूनधात्री च ( लो० ) ( रत्ना० )
प्रायच्छतोच्चैः कुसुमानि ( वृ० )
प्रायैरैव परां छायां ( का० )
प्रारम्भेऽभ्र्र प्रयत्नस्थ ( लो० )
प्रारम्भेऽस्मिन् स्तम्भादिमन् ( लो० )
प्रासङ्गिके परार्थं त्वात् ( लो० ) ( ना० शा० २१-२० )
प्रिये जने नास्ति पुनरुक्तम् ( वृ० )
प्रौढोक्तिमात्रनिष्ठपन्नशरोरः ( लो० )
वदतोऽरठमिदं मनः ( लो० ) ( ता० व० १ )
बहूनां जन्मनमानन्ते ( लो० )
बहूनां समवे तानां ( लो० ) ( ना० शा० )
वाङ्गयानामङ्गभावं वा ( का० )
भगवान् वासुदेवस्थ ( वृ० )
भयविहल रक्षखखए ( लो० ) ( अभिनव० )
भम षम्ममत्र ( लो० ) ( गा० सु० श्लो ७६ )
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भवेत्सस्मिन् प्रमादो हि (का०)
भावान्चेतनानपि ( वृ० )
भावान्चेतनानपि ( लो० )
भूम्नैव इत्यते लक्ष्ये (का०)
मूरेगुदिग्वान् ( वृ० )
भ्रमिमरतिमलस ( वृ० )
म
मध्य्नामि कौरवशतं (लो०) (वेणी० १-१४)
मनुष्यवध्या समुपाचरन्तं ( वृ० )( लो० )
मन्दारकुसुमरेगुपिश्ररित ( वृ० )
महुमहु इति भणन्तो ( वृ० )
मापत्यं रुन्धोयोन् अवेहि ( वृ० )(स० श० ६६१)
मीअवहोऽरिड अरोरो (लो०)
मितोडप्यनत्ततां प्राप्तः (का०)
मुरव्या महाकविगिरां (का०)
मुख्यां वृत्तिं परित्यज्य (लो०)
मुख्या व्यापारविषया: ( वृ० )
मुनिजयति सोमोऽत्र: ( वृ० )
मुहुरड मुलिसंवृता श्रोष्ठं ( वृ० )(शा० ३-३५)
य
यः प्रथमः प्रथमः ( वृ० )
यष काससुखं लोके ( वृ० )
यत्नः कायं सुमतिना (का०)
यत्पदानि त्यजन्त्यये (लो०) (ना० शा०)
यत्र वयडध्यान्वये वाच्यं (का०)
यत्रायं शब्दो वा (लो०)
यथापदार्थधारेण (लो०)
यथा यथा विपर्येति ( वृ० )
यदपि तदपि रम्यं (का०)
महच्छब्दाहितमति: ( वृ० )(सुभाषितावली २७९)
Page 790
यद्वामाभिनिवेशितत्वम् ( लो० ) ( नाट्य शा० )
यद्वश्र्रम्य विलोकितेभु ( लो० )
यस्तल्लक्ष्यक्रमव्या्ङ्ग्य: ( का० )
यद्मनूरसो वा मादो वा ( का० )
या निश्रा सर्वभूतानां ( वृ० )
या व्यापारवतो रसात् ( वृ० )
युक्त्यानयानुसर्तव्य: ( का० )
ये च तेभु प्रकारोडप्रम् ( का० )
ये जीवान्ति न मान्ति ( वृ० )
योय: शस्त्रं विभर्ति ( वृ० ) ( लो० ) ( वेण० ३-३२ )
रचना विषयापेक्ष* ( का० )
रसबन्धोक्तमौंचत्यं ( का० )
रसभावादिविषय ( वृ० )
रसभावादि सम्बद्धां ( का० )
रसस्यारन्धविश्रान्ते: ( का० )
रसस्य स्यादिरोगाय ( का० )
रसादिमय एकस्मिन् ( का० )
रसादिविषयैरौचित्यं ( का० )
रसादिषु विवक्षा तु ( वृ० )
रसाद्यनुगुणत्वेन ( का० )
रसांस्त्रितयमे हेतुः ( का० )
रसान्तर व्यवस्थिना ( का० ) ( लो० )
रसान्तरसमाावेश: ( का० ) ( लो० )
रसान्तरसमावेश; ( लो० )
रसान्तरानुप्रवेशो: ( का० )
रामस्यास्पदंमित्यवैमि ( लो० ) ( नागा० १-४ )
राजहंसैरवीच्यन्त्त ( लो० )
रञ्जानमपि सेवते ( वृ० )
राज्यं निर्जित शत्रु ( लो० )
रामेऽपं प्रियजीवितेन तु ( वृ० )
Page 791
रुढ़ा ये विषयेऽन्यत्र ( लो० )
रौद्रस्य चैव यत्कर्म ( लो० ) (ना० शा० )
लड्डियगअणा फल ( लो० )
लच्छी दुहिदाजामाउओ ( वृ० )
लावरेयद्रविणव्ययोन गणितः ( वृ० )
लावरयसिन्धुरपरपैरवहि ( वृ० )
लीलाकमलपत्राणि ( वृ० ) (कु० स० )
लीलादआश्रुयमड्ढा ( लो० )
वक्रोपि शबदोक्ति ( लो० ) (भामह १-३६)
वदति त्रिसिनीपतत्रशयनम् ( लो० )
वसन्तपुष्पाभरसं वहन्ति ( वृ० ) (कु० स० )
वसन्तमत्तालिपरम्परोपमा ( लो० ) (अभिनव० )
वस्तुत शिवमये हृदि ( लो० )
वस्तुभातितरां तन्व्राः ( का० )
वाक्यार्थमितये तेषाम् ( लो० ) (श्लो० वा० १-१-३)
वाक्ये सङ्कटना यां च ( का० )
वागङ्गीसोऽपि काव्यार्थान् ( लो० ) (ना० शा० )
वाक्प्रकल्पनामानन्त्यात् ( लो० )
वाचस्पतिसहस्राणां ( का० )
वाच्यानां वाचकानाश्र ( का० )
वाच्यालङ्कारवर्गोऽयं ( का० )
वाणीरभ हत्प्रदत्ता ( वृ० )
वाणीनवत्वमायाति ( का० )
वाल्मीकि व्यतिरिक्तस्य ( वृ० )
वाल्मीकिव्यासमुख्याश्र ( व० )
वासुदेवः सर्वोऽमात ( लो० )
विच्छित्तिशोभिनिर्देन ( वृ० )
विज्ञायेयं रसादीनाम् ( का० )
विधातव्या न सह्दरैः ( का० )
Page 792
विधिः कथाश्रोरसस्य ( का० )
विनेयानुनमुखोकतुं ( का० )
विर्ध्यो वर्चितव्ान ( लो० )
विभावभावानुभाव० ( का० )
विमतिविषयो या आसोत् ( वृ० )
विमानपयंडूतले निषरणा: ( वृ० )
विहुदैकाश्रयो यस्तु ( का० )
विरोधर्माविरोधश्व ( का० )
विरोधालड्कारेण ( लो० )
विरोधिनः स्युः श्रृङ्गारे ( का० )
विरोधिरससम्वन्धि ( का० )
विवक्षातिपरत्वेन ( लो० )
विवक्षिते रसे लब्ध ( का० )
विशेषतस्तु श्रृङ्गारे ( का० )
विश्रान्त विग्रहकथः ( लो० )
विषयत्वमाग्रे: ( लो० ) ( ना० शा० )
विषयं सुकविः काव्यं ( का० )
विष्याश्रयमप्यनयत् ( का० )
विसमङ्यो कावणवि ( वृ० )
विस्तरेणात्वत्स्यापि ( का० )
विसम्भोत्या मन्मथाज्ञाविकौ न ( वृ० )
वीतरागजन्त्वादर्शनात् ( लो० ) ( न्या० सू० ३-१ )
वीरसस्य चैव यत्कमं ( लो० ) ( ना० शा० )
वृत्तयः काव्यमात्रुका: ( लो० ) ( ना० शा० )
वृत्तयोऽपि प्रकाशन्ते ( का० )
वृत्तेऽस्मिन् महाप्रलये ( वृ० ) ( ह० च० )
व्यक्तिव्यञ्जनघान्तुना ( लो० )
व्यञ्जयथ्यङ्कमेदेस्मिन् ( का० )
भोडियोगात्रतवदनया ( वृ० )
सर्वतत्त्वाश्रया: कावित् ( का० )
Page 793
शब्दार्थंशामनज्ञानमात्रे'व ( लो० )
शब्दा: सङ्केतितं प्रापू ( लो० )
शब्दौ सरेरफसंयोग: ( का० )
शून्यं वासगृहं विलोक्य ( वृ० ) ( अमरु )
शृङ्गार एव परम: ( लो० )
शृङ्गार एव मधुर: ( लो० )
शृङ्गारक्ष तै: प्रसभम् ( लो० ) ( ना० शा० )
शृङ्गारी चेत्कविः काव्ये ( वृ० )
शेषो हिमगिरिस्थं व ( वृ० ) ( भामह ३-२८ )
शोक: इलोकत्वमागत: ( वृ० ) ( रामा', )
श्रीमद्विच्चेलचतुरःअज ( लो० ) ( अभिनव० )
स एव वीतरागश्रेत ( लो० )
संध्यातुं डिडि:मात्रं ( का० )
संवादास्तु भवन्न्येव ( का' )
संवادो ह्न्यसमाहृत्यं ( का० )
संरूल्याभिहितौ वस्तु ( वृ० )
संसाध्ये फलयोगं तु ( लो० ) ( ना० शा० २१-७ )
सगुणीभूतव्यङ्ग्यै: सालङ्कारै: ( का० )
सगुणीभूतव्यङ्ग्यै! ( लो० )
सङ्केतसृष्टिप्रभृं पुन: ( का० )
सङ्केतकालमनसं ( लो० )
सज्जनात् कविरसौ ( लो' )
सज्जे हि सुरहिमासो ( वृ० )
सत्त्वाव्यक्तं वा ज्ञातुं ( का० )
सत्त्वावयतत्त्वं नयवतं ( वृ० )
सत्यं मनोरमा: कामा: ( लो० )
सत्यं मनोरमा राम: ( वृ० )
सन्तिसिद्धिरसप्रख्या: वृ० )
सन्धिसन्ध्यादि घटनं ( का० )
समेताः समिषः स्त्रियः ( वृ० ) ( व्यासस्य )
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समपंकतवं काव्यस्य ( लो० )
समविषमणिबन्धनेस ( वृ० )
समोहा रतिभोगार्थी ( लो० )
समुत्थिते ध्वनिरन्तौ ( लो० ) ( भर्जुन न० )
समुद्र कुणिडका ( लो० )
सर्वक्षिातिभृतां नाथ हत्ना ( लो० ) ( विक्रमो० )
सर्वत्र गद्यबन्धेऽपि ( का० )
सर्वत्रैव लितेऽपु वेश्मसु ( लो० ) ( तां० व० )
सर्वे नवा ध्वनयो त ( का० )
सर्वोपमात्र व्यसमुचयेन ( वृ० ) ( कुमार सं )
सर्वभिन्नाश्रय. कायं ( का० )
सविभ्रमस्मितोल्ल्र्दवा: ( वृ० )
स शोणितै: ऋतयभुजां ( वृ० )
सा व्यज्जयस्य गुणीभावे ( का० )
सिज्झइ रोमञ्जिज्झइ ( वृ० )
सिहिपिच्छ करणऊरा ( वृ० )
सुमिड: वचनसम्बन्धे; ( का० )
सुरभिसमये प्रवृत्ते ( वृ० )
सुवर्गपुष्टिं पृथिवीं च लो०
सैषा सर्वैव वक्रोक्ति: ( वृ० )
त्रियोनरपतिवंधि: ( लो० )
स्थितर्मिति यथाश्रग्याम ( लो० ) ( रामाभ्युदये )
स्थैयैणोत्तममध्यम ( लो० ) ( ना० शा० )
स्निग्धश्यामालकान्तिलिल्त ( वृ० )
सुट्टोकृतार्थं वैचिच्र्य ( लो० )
स्मरणवनदोपूरेणोढा ( वृ० ) ( अमर १०४ )
स्मरोऽस्मर सहाइरे ( लो० ) ( आभिनव० )
स्मितं किश्चित्सुरघं ( वृ० )
स्वच्छितपक्ष्यमकपाटं ( लो० ) ( स्वप्रवा० )
स्वतेज:क्रातमहिमा ( वृ० )
स्वल्पमात्रं समुद्दिष्टं ( लो० ) ( ना० शा० )
स्वस्था भवन्ति मधि जीवति ( वृ० ) ( वे० सं० )